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अध्याय : दसवां ]
[ ६५५ कुर्थाणः सुराः यान्ति । सप्तमे नर्तकानी के तीर्थकराणां चतुस्त्रिशदतिशयाष्ट प्रातिहार्यानन्त ज्ञानादि गुण रचित चरित्रेण तद्गुणरागरसोत्कटाः माकिनः प्रवरं नर्तनं प्रकुर्वन्तो गच्छन्ति ।
प्रश्न :-वे देव किस स्वर से गाते हैं ?
उत्तर :-खड्ग, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पचम, धैवत, निषाद ये सात स्वर हैं। इनमें से एक-एक सेना, एक-एक स्वर से गाती है तथा अनुक्रम से माती है । सो ही सिद्धान्तसार दीपक में लिखा है- .
प्रायनी के खड्ग स्वरेण जिनेन्द्र गुणान् गायन्तः, द्वितीये ऋषभस्वरेण च गानं कुर्वन्तः, तृतीये मांधार नादेन गायन्तो गंधर्वा गच्छति ।
चतुर्थे मध्यमध्वनिना जन्माभिषेक संबन्धि गीतान् गायन्तः, पंचमे पंचमस्वरेण पानं कुर्वाणः, षष्ठे धैवतध्वनिना च गायन्त:, सप्तमे निषाद घोषणकलं गीतमानं कुर्वन्तो गंधर्वा व्रजन्ति । प्रश्न :-सातों हो : नरकों में कोई महापापो जीव अलग-अलग नरकों में
उत्कृष्टता कर कितनी-कितनी बार जन्म धारण करता है ? उत्तर :- पहले धम्मा नाम के नरक में उत्कृष्टताकर असंज्ञी जीव जाता है । सो वह अधिक से अधिक अाठ बार जाकर जन्म लेता है । दूसरे वंशा नाम के नरक में सरीसृत अर्थात् सर्प (फरणा रहित जाति का जोडी डू जाति का सर्प) को आदि लेकर महापाप के उदय से अधिक से अधिक सात बार जन्म धारण करते हैं। तीसरे मेधा नाम के नरक में दुष्ट पक्षी भ्रादि जीव उत्कृष्ट पाप के उदय से छह बार जाकर जन्म लेते हैं। चौथे अंजना नाम के नरक में सादिक तिर्यच महापाप के उदय से पांच बार जन्म लेते हैं। पांचवें अरिष्टा नाम के नरक में सिंहादिफ जीव अधिक से अधिक चार बार जन्म लेते हैं। छठवें मघवी नाम के नरक में मनुष्यरणी (स्त्री) अधिक से अधिक तीन बार जन्म लेती है। सातवें माघवी नाम के नरक में मनुष्यादिक जीव अधिक से अधिक दो बार जन्म लेते हैं ।
___ इस प्रकार ये जीव मिथ्यात्वादिक महापाप कर्मों से तथा हिंसादिक पापों से से उत्पन्न हुए कर्मों के उदय से नरकों में उत्कृष्ट जन्मों को धारण करते हैं.। तथा वहां पर सागरों पर्यंत की आयु तक छेदन, भेदन, शूलारोपण, ताडन पीडन, आदि के महादुःख भोगते हैं । उन दुःखों को भगवान सर्वज्ञ देव ही जानते हैं। इसलिये भव्य