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Pania
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[ गो. प्र. चिन्तामणि हैं । अर्थात् वहां से चयकर मनुष्य होकर फिर विजयादिक में जन्म लेकर फिर मनुष्य होकर मुक्त होते है । सो ही मोक्षशास्त्र में लिखा है--
विजयादिषु द्विचरमाः ।। यही सब सिद्धांतसार प्रदीपक के पंद्रहवें अधिकार में लिखा है---- सौधर्मेन्द्रस्य दृष्ट्याप्ता महादेव्यो दिवश्च्युताः । सर्वे च दक्षिणेन्द्रा हि चत्वारो लोकपालकाः ॥२०६३॥ सर्वे 'लोकांतिका विश्वे सर्वार्थसिद्धि जामराः । निर्धारणं तपसा यान्ति संप्राप्य नृभवं शुभम् ॥२०६४॥ नयानुत्तरजा देवाः पंचानुत्तर वासिनः । सतश्च्युत्वा न जायते वासुदेवा न तद्विषः ।।२०६५॥ तिर्यञ्चो मानवाः सर्वे भावनादि निजामराः । शलाकाः पुरुषाः जातु न भवन्त्यमराचिता ॥२०६६।। विजयादि विभानेभ्योऽहमिन्द्रा गत्य भूतलम् । मयंजन्मद्वयं प्राप्य ध्रुवं गच्छन्ति निर्वृत्तिम् ।।२०६७।। प्रश्न- इस मध्यलोक में जंबूद्वीप से लेकर स्वयंभूरमण समुद्र तक काल चक्र
का बर्ताव किस प्रकार है अर्थात् सुखमा-सुखमा प्रादि छह कालों
में से कौन-कौन काल कहां बसता है ?
उत्तर :---डाई द्वीप के पंचमेरु सम्बन्धी पांचों भरत क्षेत्र और ; पांचों ऐरावत क्षेत्रों में अनुक्रम से उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छहों कालों का बर्ताव रहता है अर्थात् अवसापिणी काल का पहला दूसरा तीसरा चौथा पांचवां छठा तथा उत्सपिरणी काल का छठा, पांचथां, चौथा, तीसरा, दूसरा, पहला इस प्रकार इन दशों क्षेत्रों में काल चक्र बराबर फिरता रहता है तथा इन्हीं कालों के द्वारा उनमें वृद्धि ह्रास सदा होता रहता है । इसी प्रकार समस्त विजयार्द्ध पर्वतों पर तथा प्रत्येक क्षेत्र के पांचों म्लेच्छ खंडों में सदा चौथा काल रहता है। उसमें भी इतना अन्तर है कि विदेह क्षेत्र के विजयादों को छोड़कर बाकी के भरत ऐरावत सम्बन्धी दशों विजयाओं में चतुर्थकाल होनाधिक रूप से रहता है । अर्थात् उनमें तीर्थ करों की आयु . काय की समान होनाधिकता होती रहती है। पहले तीर्थ कर के समय पांच सौ धनुष का पारीर और एक करोड़ पूर्व की आयु वाले विद्याधर होते हैं । तथा अन्तिम तीर्थ