SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 1049
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय : दसवां ] [ ६५६ कर के समय एक धनुष का शरीर और एक सौ बीस वर्ष की आयु बाले विद्याधर होते हैं । बाकी के विदेह क्षेत्र सम्बन्धी एक सौ साठ विजयार्द्ध निवासी विद्याथरों की प्रायु काय उत्कृष्ट श्री सीमंधर स्वामी के समान सदा रहती है। वहां की प्रायु काय हीनाधिक नहीं होती। विदेह क्षेत्र की एक सौ साठ नगरियों में तथा पंच मेरु सम्बन्धी दश कनकाचल पर्वतों पर सदा मोक्ष मार्ग का प्रवर्तक चौथा काल रहता है अर्थात् इन क्षेत्रों में कभी दूसरा काल नहीं बदलता सदा चौथा काल ही रहता है। पांचों मेरु पर्वत की दक्षिरण उत्तर दिशा की ओर जो देवकूर और उत्तरकुरु की दश भूमियां हैं, जिनमें सदा उत्कृष्ट भोगभूमि रहती है, उसमें संदा पहला काल ही रहता है। पांचों मेरु सम्बन्धी पांचों हरिक्षेत्रों में तथा पांचों रम्यक क्षेत्रों में समा मध्यम भोग भूमि रहती है और सदा दूसरा काल रहता है। इसी प्रकार पांचों हैमवत क्षेत्रों में और पांचों हैरण्यवत क्षेत्रों में सदा जघन्य भोगभूमि रहती है । और सदा तीसरा काल रहता है । मानुषोत्तर पर्वत से आगे नागेन्द्र नाम के पर्वत तक मध्य के असंख्यात द्वीप समुद्रों में सदा जघन्य भोग भूमि की रचना के समान तीसरा काल रहता है । नागेन्द्र पर्वत से भागे स्त्रयंभूरण नाम के अंत के द्वीप के प्राधे क्षेत्र में सदा पांचवां काल रहता है। इस प्रकार मध्य लोक में काल की किरन का स्वरूप है । सो ही सिद्धान्तसार दीपक के नौवें अधिकार में लिखा है-- भरतरावतक्षेत्रेषु सर्वेषु द्विपंचसु । द्विषटकालाः प्रवर्तन्ते वृद्धि ह्रासयुताः सदा ॥२०६८॥ विजयाद्ध नगेश्वत्र म्लेक्षखडेषु पंचसु । चतुर्थकाल एवास्ति शास्वतो निरुपद्रवः ॥२०६६।। कितु चतुर्थकालस्य यदा स्माद्भरतादिषु । श्रायुः काय सुखादीनां वृद्धिः ह्रासाश्च जन्मिनाम् ॥२०७०॥ तवा तेल समः कालो वृद्धि हासयुतो भवेत् । रूप्यादिम्लेच्छ खण्डेषु शेषकालश्च न पवचित् ॥२०७१।। पूर्वापर विदेहेषु द्विपंच स्वर्ण पर्वते । । चतुर्थकाल एवैको मोक्षमार्ग प्रवर्तकः ॥२०७२।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy