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________________ ६६० } [ गो. प्र. चिन्तामणि देवोत्तर कुरुष्वेव द्विपंच . भोगभूमिषु । दक्षिणोत्तरयो मेरौ प्रथमः काल कजितः ॥२०७३।। हरिरम्य · वर्षेषु · मध्यमा भोगभूमिषु । वृद्धि हासातिगः कालो द्वितीयो मध्यमो मतः ॥२०७४। हैमवताख्य हैरण्य . वत्क्षेत्रेषु द्विपंचसु.. । तृतीयः शाश्वतः कालो जघन्य भोग भूमिशु ॥२०७५।। तिर्यग्द्वीपेष्ब संख्येषु मानुषोत्तर पर्वतात् । बाह्यस्थेष्वन्तरे स्थेषु नागेन्द्र शलतः स्फुटम् ।।२०७६॥ । जघन्य भोग भूभाग स्थिति युक्त षु वर्तते । जघन्य भोग भूकर्ता नित्यकाल स्तृतीयकः ॥२०७७॥ नागेन्द्र पर्वताद्वाह्य स्वयंभूरणार्णवे । स्वयंभूरमण द्वीपाद्ध कालः पंचमोऽव्ययः ॥२०७८।। इस प्रकार काल का निर्णय है । प्रश्न :-- मौनव्रत से भोजन न करना सदोष बतलाया सो मौन कहां-कहां धारण करना चाहिये ? उत्तर :--लघुशंका (पेशाब करते समय), दीर्घशंका जाते समय (शौच जाते समय), स्नान करते समय, पंच परमेष्ठी की पूजन करते समय, स्त्री संभोग करते समय, भोजन करते समय और सामायिक आदि. जप वा ध्यान करते समय इन सात स्थानों में मौन धारण करना चाहिये । सो ही लिखा है-. हवनं मूत्ररखं स्नानं पूजनं परमेष्ठिनाम् । भोजनं सुरस्तोत्रं कुर्यान्मान समन्वितः ॥२०७४।। इन सात स्थानों में मौन धारण करना चाहिये इनके सिवायं जहां पर बचन बोलने से राग वा द्वेष उत्पन्न होता हो, वहां पर भी मौन धारण करना योग्य है। लिखा भी है दोषवादे च मौनम् । इस प्रकार आठ स्थानों में मौन धारण करना चाहिये । । प्रश्न :-छठे काल में मनुष्य कैसे होंगे तथा उनका व्यवहार कैसा होगा? उत्तर-छठे काल का नाम दुःखमा-दुःखमा है । वह इक्कीस हजार वर्ष का Videters .....
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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