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________________ अध्याय : पहला जाते हैं और मिथ्यादष्टी जीव भवत्रिक में जाते हैं और चौथे काल का नाम दुःखमासुखमा है । जैसे किसान पहले खेती कर के खाता है, वैसे ही इस काल के जीब पहले दुःख पाकर धन्न उपार्जन करते हैं, फिर सुख से खाते हैं । इसी चतुर्थ' काल में प्रेषठशलाका पुरुष उत्पन्न होते हैं। इस काल में छहों ही संहनन रहते हैं। पांचवे काल का नाम दुखमा है । इस काल के जीव निरन्तर दुःख ही भोगते हैं। इस पंचम काल में अन्त के तीन. संहनन होते हैं । अादि के तीन संहनन नहीं होते हैं और कर्मभूमि की स्त्री के तीन संहनन होते हैं । अर्द्ध नाराच संहनन, कीलक, स्फाटिक, ये तीन - संहनन अन्त के सदा ही होते हैं। छठवें काल का नाम दुख मादुःखमा है । . इस काल के जीव महान घोर दुःख ही पाते हैं । इस काल में एक स्फाटिक सहनन ही होता है । दुसरा कोई भी संहनन नहीं होता है। वीन्द्रिय, त्री इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंनी पंचेन्द्रिय इन विकल चतुक को एक अन्त का फाटिक संहनन होता है, अन्य दुसरा कोई संहनन नहीं होता है । पंच स्थावर को कोई संहनन नहीं होता है, क्योंकि वे एकेन्द्रिय हैं। प्रश्न :---कौन-कौन से गुरणस्थान वाले जोव को कौन-कौन से संहनन होते हैं ? उत्तर :-छहों संहनन बाले जीव मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, असंयम, देशसंयम, प्रमत, अनभन तक पाये जाते हैं। वन वृषभ नाराच, वन नाराच, नाराच ये ग्रादि के तीन संहनन वाले जीव ग्यारखें गुगणास्थान तक ही पाये जाते हैं । अन्त के तीनों संहनन वाले जीव श्रेणी आरोहणा कभी नहीं करते हैं, इसीलिये इन जीवों का सातवां गुणस्थान होता है। क्षपक श्रेगी आरोहरा करने वाले जीवों का तेहरवाँ गुगास्थान होता है, आगे प्रयोग गुणस्थान होता है-सो उसमें संहनन ही नहीं होता है। - दश प्रकार का बंध कौनसा है ?. उत्तर - जीवों के परांति के भदं से कर्म के बंध दश प्रकार से होता है । जीव ने पर में बुद्धि की इसलिये कर्म का बंध हुआ। (१) जो प्रकृति उदय याये विना न खिरे उसे उदयबंध कहते हैं। (E) जो प्रायु कर्म के बिना सात कर्मों की प्रकृति जबरदस्ति उदीरणा करके
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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