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[ गो. प्र. चिन्तामणि पांच संहनन वाले जीव पहले से लेकर बारहवें स्वर्ग तक जाता है और स्फाटिक संहनन आठवें स्वर्ग से ऊपर नहीं जाता है-यह नियम है। इसलिये आदिके पांच बारहवें तक जाते हैं। चारों संहनन बाले जीव पहले में लेकर सोलहवें नमर्ग तक अगा। हिना कला बारहवें से ऊपर नहीं जायेगा, इसीलिए अादि के चारों संहनन कहे हैं। कीलक और स्फाटिक के बिना बज्न वृषभनारान्त्र, बज्वनाराच, नाराच तीन संहनन वाले जीव नौ ग्रोवेयक तक जाते हैं । अन्त के तीनों अद्ध नाराच, कीलक, स्फाटिक संहनन बाले जीव नौ प्रवेयक तक नहीं जाते हैं-ऐसा नियम है । वज. वृषभनाराच संहनन इन दो संहनन वाले जीव नब अनूदिश विमानों तक जाते हैं । और अन्त के नाराच, ग्रई नाराच, कीलक, स्फाटिक इन चार संहनन वाले जीय अनुदिश विमान में नहीं जाय-यह नियम है । एक माद्रिका वनवृषभनाराच संहनन वाला जीव पांच अनुत्तर विमान तक जाला है और पांच संहनन वाले नहीं जाते हैं यह नियम है । पहले संहनन के बिना अन्य संहनन बाले नहीं जाते हैं। जो जीव चरम गरीरी है, उसके एक पहला बनवृषभनागच संहनन होता है, अन्य संहनन नहीं होता है यह नियम है। चरम शरीरी मान जिसके संसार का अन्त आ गया है, प्रागे अव शरीर
धारण नहीं करेगा और नियम से मोक्ष ही जायगा । प्रश्न :-छहों काल के जीवों को कौन-कौनसा संहनन होता है और मर कर कहां
पैदा होते हैं ? - —पहला काल सुखमासुलभा । इस काल में निरंतर सुख ही सुख है कल्पवृक्षः से प्राप्त सामग्री से सुख भोगते हैं । पहले काल में उत्तम भोग भूमि रहती है, दुसरे काल में मध्यम भोग भूमि है । इस काल का नाम सुरुमा है। तीसरे काल. का नाम सुख मादुखमा है, इस काल में पहले प्रादि में मुखं और अन्त में दुःख.. होता है, इन तीनों कालों में वज्ज वृषभ नाराच संहनन होता है । इन तीनों काल.
में भोग भूमि की रचना रहती है । इन कालों के जीवों का छींक तथा जभाई ..... आने पर मरण होता है । जुगलिया को और जुगलिया ही पैदा होते हैं और
पैदा होते ही माता-पिता का मरन हो जाता है, यो भोग भूमि के जीव मर कर. - नियम में देवं ही होते हैं । जो समादृष्टी है, ये तो सौधर्म और ऐशान स्वर्ग में