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________________ अध्याय: पहला | | ૨૬ प्रश्न : - चौदहवें गुरणस्थान में उदय कितनी प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :- तेरहवें गुरगस्थान में जिन ४२ का उदय होता है, उनमें से व्युच्छिन्न प्रकृतियां तीस ( वेदनीय १ बज्रऋषभनाराचसंहनन १, निर्माण २, स्थिर १, अस्थिर १ शुभ, अशुभ, सुस्वर, दुःस्वर, प्रशस्तविहायोगति १, प्रशस्तविहायोगति, श्रीदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरख संस्थान, न्यग्रोध, स्वाति, कुटजक, वामन, हुण्डक, स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, अगुरुलघुत्व, उपघात, परघात, उच्छवास और प्रत्येक को घटाने पर शेष बारह प्रकृतियों का वेदनीय १, मनुष्यगति, मनुष्यायु, पञ्चेन्द्रिय जाति, सुभग, बस, बादर, पर्याप्त, आय, यशः किति, तीर्थंकर प्रकृति और उच्चगोत्र १ का ) प्रयोग केवली गुणस्थान में उदय होता है । - चौदहवें गुणस्थान में सत्त्व कितनी प्रकृतियों का होता है ? प्रश्न उत्तर :- तेरहवें गुणस्थान की तरह इस गुणस्थान में भी ८५ प्रकृतियों का सत्व है, परन्तु हि चरम समय में ७२ और अन्तिम समय में १३ प्रकृतियों का सत्त्व नष्ट करके अरिहन्त भगवान मोक्ष जाते हैं । प्रश्न :- - कौनसे संहननवाला जीव कहां पैदा होता है ? उत्तर :- च्या संहननों वाले जीव छठे नरक में जा सकते हैं। स्फाटिक और कीलक संहनन वाले जीव छठें नरक में नहीं जा सकते हैं । इसीलिये यदि के चारों छठे तक कहे हैं। कीलक और स्फाटिक दोनों संहनन की छटे में गति नहीं हैं। पहले वज्र वृषभनाराच संहनन वाले जीव सातवें नरक में जा सकते हैं । वज्ज्र वृषभनाराच संहनन वाले को छोड़कर पांच संहनन वाले जीव सातवें नरक में नहीं जा सकते हैं। छहों संहनन वाले जीव तीसरे नरक तक जा सकते हैं। पांच संहनन वाले जीव पहले से लेकर चौथे, पांचवें नरक तक जा सकते हैं । और स्फाटिक संहतन वाला जीव तीसरे से आगे नहीं जाता है - यह नियम है । स्फाटिक संहनन वाला जीव तीसरे तक ही जाता है, इसीलिये चौथे, पांचवें में पांच संहनन सहित जीव की गति होती है । -छहो संहनन वाले जीव स्वर्ग में जावें तो कहां तक जावें ? -यहीं संहनन वाले जीव पहले स्वर्ग से लेकर आठवें स्वर्ग तक जाते हैं । प्रश्न उत्तर :
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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