________________
। गो. प्र. चिन्तामणि
क्षय कर डाले, उसे उदीरणा बंध कहते है ।(३) प्रकृति बंध होकर उदय आवेनहीं, सत्ता में पड़ा रहे, सो सत्ता बंध है (४) उत्कर्षा परिणामों से जो प्रकृति बांबी थी, फिर परिणामों का निमित पाकर उस प्रकृति की स्थिति बढाये, उसका नाम उत्कर्षण बंध है ।(५) भुज्यमान आयु के बिना और जिस प्रकृति का बंध किया था, फिर परिणामों का निमित पाकर उस प्रकृति की स्थिति । घटाये, उसका नाम अपकरण बंध है। (६) जो प्रकृति वांधी थी, फिर परिगागों के निमित पाकर ताकत से उस प्रकृति को और प्रकृति में मिला दे उसका नाम संक्रमगा बांध है। (७)जो कर्म प्रकृति की उदीरणा न होय, सो उपसमा बंध हैं । (८) जो कर्म प्रकृति बांधी थी फिर वह प्रकृति और प्रकृति में नहीं मिले और उस प्रकृति की उदीरमा भी नहीं होती, उसका नाम निधत्तबंध । कहते हैं । (5.) जो कर्म प्रकृति बांधी थी उस प्रकृति की प्रकृति की स्थिति न घटती है, न बढ़ती है, न जुदीरणा होती हैं, न संक्रमण होती है । ऐसे चार प्रकार के भेद से रहित सौ निःकाचित. वंध हैं। इस प्रकार का दश प्रकार
का बंध जिनागम में कहा है। प्रश्न :-आयु कर्म के बंध के नी भेद कौन कौनसे है ? उत्तर :---प्रायु कर्म का बंध विभाग में होता है। देव और नारको के प्रायु का
जव छह महीना शेष रहे तब प्रिभाग पड़ता है । भोग भूमि के मनुष्य और। तिर्यञ्ज जीव के प्रायु के नौ महीना शेष रहे, तव विभाग पड़ता है। कर्म भूमि के जीव एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यत सम्पूर्ण स्नायु का निभाग:
१
पड़ता है।
त्रिभंगी किसे कहते हैं, सो बताते हैं। प्रायु के तीन भाग करें । जब दो । भाग खत्म हो जाने पर तीसररे भाग के प्रादि अन्तर्मुहूर्त के अन्दर बंध । पड़ता है । अगर नहीं पड़ा तो जितनी अायु शेष रही, झिर उल का विभाग पड़ेगा, इस प्रकार नौ बार अायु बंधने का समय अाता हैं। इसको अायु
त्रिभंगी कहते हैं । प्रश्न :--आयुबध त्रिभंगी का दृष्टान्त क्या है ? - उत्तर :--जैसे पहले प्रायु के पैसठ सी इकसठ भाग करें। उसकी तिहाई इकाईस सौ ।
..
..
..