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________________ अध्याय : पांचवा ] [ २६५ के प्रभाव से मनीषिगरण (बुद्धिमान्) संसार के क्लेशों से छूटते हैं। .. . असावेव जगत्यस्मिन्मध्यव्यसन बान्धवः । . अमु विहाय सत्त्वानां नान्यः कश्चित्वत्कृपापरः ।।५.००॥ भव्य जीवों को आपदा के समय यही मन्त्र इस जगत में बांधव (मित्र) है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी जीवों पर कृपा करने में तत्पर नहीं हैं । भावार्थ :-सबका रक्षक यही एक महामन्त्र है। एतद व्यसन पाताले भ्रमत्संसार सागरें । अनेनैव जगत्सवमुद्धत्य : बिघृतं शिवे ॥५०१।। प्रापदा अर्थात कष्ट ही है पातालगतै जिसमें ऐसे संसार रूपी समुद्र में ___ भ्रमते हुए इस जगत को इस मन्त्र ने ही उद्धार करके मोक्ष में धारण किया है। कृत्वा पाप सहस्त्राणि हत्वा जन्तु शतानि च । अमु मन्त्रं समाराध्य लियञ्चोऽपि दिवं गताः ॥५०२॥ पूर्व काल में हजारों पाप करके तथा सैकड़ों जीवों को मार कर तिर्यच्च भी इस महामन्त्र का शुद्ध भावों से प्राराधन करके स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं, उनकी कथा पुराणों में प्रसिद्ध है। शतमष्टोत्तर चास्य त्रिशुद्धया चिन्तयन्मुनिः । भुजानोऽपि चतुर्थस्य प्राप्नोत्य विकलं फलम् ॥५०३॥ मन वचन काय को शुद्ध करके इस मन्त्र को एक सौ आठ बार चिन्तवन करें तो वह मुनि पाहार करता हुआ भी चतुर्थ कहिये एक उपवास के पूर्ण फल को प्राप्त होता है । चित्र नं० १७ । षोडशाक्षरी विद्या का ध्यान स्मर पञ्च पदोद्भूतां महाविद्यां जगन्न ताम् । गुरु पञ्चक नामोत्थां षोडशाक्षर राजिताम् ।।५०४॥ हे मुने! तू सोलह अक्षरों से विराजमान जो महाविद्या है, उसका स्मरण कर अर्थात् ध्यान कर; क्योंकि पोड शाक्षरी विद्या पञ्च पदों और पंच परम • गुरु के नामों से उत्पन्न हुई है और जगत मात्र से नमस्कार करने योग्य है; वह सोलह अक्षरी विद्या यह है-अह सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो नमः । .. .......: s tism
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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