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naviwayamsinik
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२६६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि अस्याः शतद्वयं ध्यानी जपन्न कानमावसः । अनिच्छन्नप्यवाप्नोति चतुर्थ तपसः फलम् ।।५०५॥
जो जीव षोडशाक्षरी विद्या का एकाग्र मन होकर, दो सौ बार जप करता है, वह नहीं चाहता हुआ भी चतुर्थ तप अर्थात् एक उपवास के फल को प्राप्त होता है । चित्र नं० १८ । षडाक्षरी विद्या का ध्यान
विद्यां षड्वर्ण सम्भूतामजय्यां पुण्य शालिनीम् । जपप्रागुक्तमायेति फलं ध्यानी शत त्रयम् ।।५०६।।
तथा "अरहन्त सिद्ध" इस प्रकार छह अक्षरों से उत्पन्न हुई विद्या का तीन सी बार जब करने वाला मनुष्य एक उपवास के फल को प्राप्त होता है, क्योंकि वह पडक्षरी विद्या जप्य है और पुण्य को उत्पन्न करने वाली तथा पुगम से शोभित है । चित्र नं. १६। चार अक्षर की विद्या का ध्यान--
चतुर्वर्णमयं मन्त्रं चतुर्वर्य फल प्रदम् । चतुः शतं जपन्योगी चतुर्थस्य फलं लभेत् ॥५.०७।।
"अरहंत" इन चार अक्षरों का मन्त्र है, सो धर्म अर्थ काम मोक्ष रूप फल को देने वाला है इसका जो चार सौ बार जप करता है, वह एक उपवास का फल पाता है। दो अक्षर वाली विद्या का ध्यान---
वर्णयुग्मं श्रुत स्कन्धसार भूतं शिवप्रदम् । ध्यायेज्जन्मोद्भवाशेषक्लेश . विध्वंसनक्षमम् ।।५०८।।
'सिद्ध' इन दो अक्षरों का युग्म है, सो. श्रुत स्कन्ध (द्वादशांग शास्त्र) का सार भूत है, मोक्ष को देने वाला है, संसार से उत्पन्न हुए समस्त क्लेशों को नाश करने में समर्थ है, इसलिये योगी इसका ध्यान करें। एक अक्षर का जाप---
अवर्णस्य सहस्त्रार्द्ध .. जपन्नानन्दसंभृतः । . . . . प्राप्नोत्येकोपवासस्यः निर्जरं निजिताशयः ॥५०॥ जो मुनि अपने चित्त को वश करके प्रानंद से 'अ' इस वणं मात्र का पांच