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________________ अध्याय ग्यारहवां ] [ २०१३ मिथ्यादर्शनादि बन्धहेतुत्रों के अभाव से नूतन ( कम ) भाग्य का आना रुक जाता है । कारण के प्रभाव से कार्य का अभाव होता ही है। निर्जरा के कारण ( पुरुषार्थ से ) संचित भाग्य ( कर्मों का ) विनाश संपूर्ण रूप से युगपत् क्षय हो जाने से मोक्ष हो जाता है । -- परम पुरुषार्थ के द्वारा पुरुष समस्त विकल्पों (भाग्य) को नष्ट करके परम पुरुषार्थ ( आप में ) में लीन होकर अचित्य अनन्त सुख का अनुभव करता है । सर्व निराकृत्य विकल्प जालं, संसारकान्तार निपात् हेतुम् । विवक्तमात्मन मवेक्षमाणो, निलोयसे त्वं परमात्म तत्वे ॥ २१४० ॥ In order to destory the drery world-forest, liberate. Thy self from all trammels of delusion. Realise Thy salf as distinc, and be engrosssed in the Highesit-self, नदि कालिन एक छाप भाग्य का पराजय करके कृतकृत्य होकर स्वाधीन स्वराज्य में विचरण करता है . ( पुरुष + अर्थ ) पुरुष का प्रयोजन मोक्ष ही पुरुषार्थ आता है। सर्व विक्ततीर्णं यदा स चैतन्य लमाप्नोति । भवति तथा कृत कृत्यः सश्यक पुरुषार्थ सिद्धमापन्नः ॥ २१४१ ॥ जिस समय परम पुरुषार्थ की सिद्धि को प्राप्त वह भारयाधीन (शुद्ध) आत्मा सम्पूर्ण विभावों ( शुभ अशुभ भाग्य से ) मुक्त होकर अपने सुदृढ़ निष्कम्प चैतन्य स्वरूप को प्राप्त होता है, तब यह पुरुष कृतकृत्य (स्वाधीन) होता है । . जिस परमपुरुषार्थ द्वारा पुरुष ने अपने स्वराज्य को प्राप्त किया, उसका उपाय हुआ, भाग्य की सत्ता ( अधीनता) का अस्वीकार एवं अपनी सत्ता (स्वाधीनता) का स्वीकार | अपनी सत्ता के ऊपर विश्वास, अपनी सत्ता की ज्ञान एवं अपनी सत्ता के अनुसार आचरण करना ही परम पुरुषार्थ सिद्धयुपाय है । ; विपरीताभिनिवेशं निरस्य सम्यव्यवस्य: निजतत्वं । तस्मादविचलन स एव पुरुषार्थ सिद्धियुपायोऽयं ॥ २१४२ ॥ विपरीत श्रद्धान- आग्य जनित पर्याय को आत्मा मान लेने ( भाग्य में ही अपनी सत्ता का विश्वास ) रूप विश्वास को नष्ट करने के लिये अपना स्वतत्त्व सत्ता
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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