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[ गो. प्र. चिन्तामणि पर मोक्ष रूपी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि भाग्य के अभाव रूप कारण से एवं परम पुरुषार्थ रूप कारण के सदभाव होने पर मोक्ष रूपी कार्य सिद्ध होता है।
यस्य पुण्यं च पापत्र निष्फलं. गलति स्वयम् । . स योगी तस्य निर्वाणं न तस्य पुनरास्त्रवः ।।..
. He whose meirit and demerit (Karmas). Exhoust themselves with out beariog fruit, is a true ascetic. He will never bave the karmię inflow and will attain liberation.
जिस वीतराग के पुण्य एवं पाप दोनो भाग्य फलदान के बिना स्वयं अविपाक निर्जरा स्वरूप से निर्जीण होते हैं, वह योगी (पुरुषार्थी) कहा जाता है और उसके भाग्य की पराधीनता छूट जाती है, स्वाधीनता (मोक्ष प्राप्त हो जाता है, किन्तु प्राश्रव (भाग्य की सृष्टि) नहीं होती है । ....... ..परम पुरुषार्थी पुरुष "प्रत्यक्षे प्रीयवादिनं परोक्षे कार्य हन्तारं", संसार में इन्द्रिय सय दुल देने जाना रोड झणी कार्य को नष्ट करने वाला सुभाग्य को भी "त्यजेत्येतत् बन्धु विषकुम्भ पयोमुख", न्याय के अनुसार (बाह्य में सुख एवं अन्तरंग में दुःख देने वाला) त्याग करता है। प्रत्यक्ष मोक्ष रूपी कार्य के भाग्य प्रतिबन्धक कारण है।
कम्ममसुहं कुसोलं सुहकम्मं चावि जाण सुसीलं । कह तं होदि सुसीलं जं संसारं पवेसेति ॥२१३६।।
Know bad Karmas to be demerit and good Karmas at he merit. How can that be merit arious which causes the soul at wander in the cycly of existences. . . अशुभ कर्म तो पाप स्वभाव (दुष्ट) और शुभ कर्म पुण्य स्वभाव (भद्र) है ऐसा जगत् जानता है। परन्तु वास्तविक जो पुरुष को संसार में प्रवेश कराता है वह भाग्य शुभ या उपकारी कैसे हो सकता है। अतः सिद्ध हुा-"बन्ध हेत्वा भाव निर्जराभ्यां कृत्स्न कम विप्रमोक्षो मोक्षः ।" मो, शा. १०-२.
Owing to the absrdce of tee cause of bondage and with functioning of the dissociation of karmas, the annihilation of Karmas is libera tion, . -
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