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________________ rangonlynews [ १०२७ अध्याय ग्यारहवां ] का धारी था और जो महान् पुरुषार्थी थे, ऐसे प्रादिनाथ तीर्थंकर जैसे महापुरुष भी भाग्य का अनुग्रह नहीं होने के कारण बुभुक्षित होकर छह महीने तक पृथ्वी पर घूमे यह श्राश्चर्य की बात है । ठीक ही है- भाग्य के राज्य में कोई भी प्राणी दुष्ट भाग्य के विधान को लांघने में समर्थ नहीं है । ऐसा महान् पुरुषार्थी भी आहार के लिये छह महीना तक पुरुषार्थ करते हुये भी बिना भाग्य के कार्य सिद्धि कर नहीं पाये जो कि भाग्य के अनुग्रह से एक बेला में प्राप्त कर सकते थे, तब अन्य पुरुष की बात ही क्या ? जब भाग्य के राज्य में परिस्थिति कालोन राष्ट्रपति शासन रूप निकाचित कारण लागू रहता तब उस शासन को कौन ऐसे पुरुष हैं, जो उस कार्यकम को लोटा सा भी देर पर कर सकते हैं। "उदयावल्यां निक्षेप्तु' संक्रमयितुमुत्कर्षयितुमपकर्षयितु चा शक्यं तसिकाचित नाम भवति ।" जिस कर्म की उदीरणा, संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण ये चारों ही अवस्थायें नहीं हो सके उसे निकाचितकरण कहते हैं । इस प्रकार भाग्य को परिवर्तन करने में पुरुषार्थं असमर्थ होता है । जिस प्रकार एकान्ततः भाग्य से कार्य सिद्धि नहीं होती, उसी प्रकार एकान्ततः पुरुषार्थ से भी कार्य की सिद्धि नहीं होती 'सामग्री जनिका कार्यस्य नैकं कारणम्' अर्थात् सामग्री मात्र से कार्य होता है एक कारण से नहीं यह सिद्धान्त है, अनुभव सिद्ध है, वैज्ञानिक कार्यकारण व्यवस्था है । जब देव एवं पुरुषार्थ दोनों पक्ष की जय हुयी तब एक एकान्ती कहता है कि कुछ कार्य देव से ही होते हैं और कुछ कार्य पुरषार्थ से ही होते हैं । इस प्रकार पृथक् पृथक् कार्यों की अपेक्षा से भाग्यं एवं पुरुषार्थ की अनेकान्त की मान्यता बन जायेगी सो यह भी एकान्त होने से मिथ्या है । fateral भयैकात्स्यं स्याद्वाद न्याय विद्विषाम् । श्रवाच्यकान्युक्ति वायमिति युज्यते ॥ २१७२ ॥ अन्वय --- स्याद्वाद न्याय विद्वषां विरोधात् उभयैकात्म्यं न । ग्रवाच्यतैकान्ते 'श्रवाच्य' इत्यपि उक्ति न भुज्यते । स्याद्वादरूप नीति से विरुद्ध रखने वालों का देव और पुरुष का एकात्म पक्ष परस्पर में विरुद्ध होने से नहीं बनता हैं । इसी तरह इन दोनों का प्रवक्तव्य एकान्त 4
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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