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________________ [ गो. प्र. चिन्तामरिण तादशी जायते बुद्धि. व्यवसायश्च सादृशः । ___ सहायास्तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता ॥२१६६॥ जैसी भवितव्यता (भाग्य) होती है, उसी तरह की बुद्धि हो जाती है, उसी प्रकार का व्यवसाय (पुरुषार्थ) होने लगता है, सहायक भी उसी तरह के मिल जाते हैं । इस प्रकार भाग्य द्वारा बुद्धि पुरषार्थ का निर्माण सिद्धि होता है । "पुग्मलकम्ममित्त तहेव जीवों विपरिणमइ ।" भाग्य के निमित्त पाकर जीव भी भाग्य के अनुरूप परिणमन करता है। केवल भाग्य के अनुरूप परिगमन नहीं करता वरं अनादि से जीव भाग्य के अधीनता में रहकर अपना जन्म मत अधिकार एवं अनन्त शक्ति रूप अशुजीबी गुण को भी धाति कर्म के विनिमय में भाग्य को बंधक देकर दीन होकर संसार रूपी राज्य में 'द्वार २ देहि २' करके अनादि से परिभ्रमण कर रहा है। किन्तु अभी तक उसको पेट भर खाने के लिये सुखी रोटी. भी प्राप्त नहीं हुई। मिष्ठान्न, घृतान्न, Vitimeine, tonic आदि कहां प्राप्त होगा ? जिससे वह शक्तिशाली होकर भाग्य के साथ युद्ध करें। . . . . . सो सव्यपारसदारसी कम्मरयेण रिएएगावच्छण्यो । संसार समावण्णो ण विजारादि सम्वदो. सव्वं ॥२१७०॥ पुरुष सर्वज्ञ और सर्वदर्शी है किन्तु अपने भाग्य रूपी मिट्टी से आच्छादित होने के कारण संसार को प्राप्त हुप्रा है। वह समस्त पदार्थों को सब प्रकार से नहीं जानता। जब भाग्य का एकछत्राधिपति शासन चलता है, उस समय उन्हीं के शासन के अन्तर्भूत कौन ऐसे पुरुष हैं, उन्हीं के आदेश के अनुसार नहीं चलें। पुरा गर्भादिन्द्रो मुकुलितकरः किंकर इद, स्वयं स्राष्टा सुष्टेः पतिरथ निधीनां निअसुतः । क्षधित्वा षण्मासान स किल परप्याड जगती, महो केनाप्यस्मिन् विलसितमलभ्यं हसविधेः ॥२१७॥ जिस आदिनाथ भगवान के गर्भ में आने के पूर्व छह महीने से ही इन्द्र दास के समान हाथ जोड़े हुए सेवा में तत्पर रहा, जो स्वयं ही सृष्टि की रचना करने वाले थे अर्थात् कर्मभूमि की संस्थापन करने वाले थे, एवं जिसका पुत्र भरत निधियों के स्वामी अर्थात् चक्रवर्ती था; जो स्वयं चार ज्ञान का स्वामी, बज्रवृषभ नाराचसंहनन :NE : . ......- "- - . AMRADH - SHARE A -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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