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अध्याय : दसवां ]
[ ६२३ प्रकार समुदाय रूप से सूतक का वर्णन है, उसमें भी थोडा सा विशेष यह है कि क्षत्रियों को पांच दिन का सूतक है, ब्राह्मणों को दश दिन का है, वैश्य को बारह दिन का सूतक है और शूद्र को पन्द्रह दिन का सूतक है । सो ही प्रायश्चित ग्रन्थ में लिखा है--
परस दश वारण रिणयमा पारस होइ तहय दिवसे हि। स्वत्तिय वंभा विस्सा सुदा हि कमेण सुद्धति ॥१९४२।। इस अनुक्रम से सूतक जानना चाहिये। ..
___ लौकिक में जो सती होती है, उसके बाद घर के स्वामी को उसकी हत्या का पाप छह महीन तक रहता है। छह महीने बाद प्रायश्चित लेकर शुद्ध होता है। जिसके घर में कोई सती हो गई हो, उसको छह महिने पहले प्रायश्चित्त देकर शुद्ध नहीं करना चाहिये ।
यदि कोई अपघात से नर जाय तो उसके बाद घर के स्वामी को था योग्य प्रायश्चित देना चाहिये।
भैंस का दूध प्रसूति के दिन से पन्द्रह दिन पीछे शुद्ध होता है । गाय का दूध प्रसूति के दिन से दश दिन बाद शुद्ध होता है । बकरी का दूध प्रसूति के दिन से आठ दिन बाद शुद्ध होता है, इन सबका दूध ऊपर लिखे दिनों से पहले शुद्ध नहीं होता ।
इस प्रकार गृहस्थों को संक्षेप से सूतक का विचार समझ लेना चाहिये । सो मलाचार की टीका में लिखा है---
सूतक वृद्धि हानिभ्यां दिनानि दश द्वादश । प्रसूतिकास्थानं मासकं दिदानि पंच मोत्रिणाम् ॥१६४३॥ प्रसूतौ च मते बाले देशांतले मृते रणे । सन्यासे मरणे चैव दिनक सूप्तकं भवेत् ॥१६४४॥ अश्वी च महिषी चेटी प्रसूता गौ हांगरणे। सूतकं दिनमेकं स्यात् गृहबाह्य न सूतकम् ॥१४॥ पुत्रादि सूलके जाते गते द्वादश के दिने । जिनभिषेक पूजाभ्यां पात्रदानेन शुद्धयति ॥१९४६॥ दासो दासस्तथा कन्या आयते मरणे यदि । विरात्रि सुतकं ज्ञेयं गृहमध्ये तु भूषणम् ॥१६४७।।
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