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________________ अध्याय : ग्यारहवां ] [ १००६ जिस प्रकार एक हजार (किरण) प्रकाश से विश्व पर आक्रमण करने वाला अतिशय प्रतापी सूर्य भी समय आने पर (ग्रहण के समय) जिसका स्थान अज्ञात है, जो शरीर से रहित है, जो पाप से मलिन है यह दुष्ट राहु कवलित करता है; तो भी प्रतापशाली सूर्य भी राहु के आक्रमण से प्रात्मरक्षा नहीं कर सकता है, उसी प्रकार कितना भी बलवान् पुरुष क्यों न हो, किन्तु वह भी काल से अपनी रक्षा नहीं कर सकता है। ठीक है-समयानुसार देव उदय आने पर दूसरा कौन बलवान होमा ? जिस प्रकार कूटनी हस्तीनी की भोग इच्छा रूपी कुपुरुषार्थ के कारण महा प्रताप शाली स्वाधीन विचरण करने वाला गजराज भी जंगली दुष्ट पापियों के द्वारा पराधीन होकर उन्हीं को ही अपना स्वामी एवं पालन पोषण करने वाला एवं सर्वेसर्वा मानकर उन्हीं की ही सेवा करने लग जाता है, उसी प्रकार पुरुष भी अपना कुपुरुषार्थ के कारण देव के प्राधिन होकर देव को ही सर्वेसर्वा मान बैठता है। दइयमेव परं मपणे धिप्पउरुसमस्ययं । .. . .. . एसो सालसमुत्तुगो कष्णो हराइ संगरे ॥२१३२॥ . .. . __ मैं केवल देव (भाग्य) को ही उत्तम मानता हूँ, निरर्थक पुरुषार्थ को धिक्कार हो, देखो कि किले के समान ऊचा जो बह कर्ण नामा राजा सो युद्ध में मारा गया । जो एकान्ततः भाग्य से ही कार्य सिद्ध मानते हैं. उस का भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता . देवावेवार्थ सिद्धिश्चेद् वैवं पौरुषतः कथम् । दैवतश्चेद निमोक्षः पौरुषं निष्फलं भवेत् ।।२१३३॥ अन्वय-देवादेव अर्थसिद्धिः चेत् (तदा) पौरुषतः देवं कयं (स्यात्) देवतः चेत् अनिमोक्षः पौरुष (च) निष्फलं भवेत् । .. देव (भाग्य) से ही एकान्ततः कार्य की सिद्धि (सुख, दुःख, ज्ञान, अज्ञान, . कार्य की सफलता, निष्फलता) अंगीकार किया जाय तो प्रश्न यह उठता है कि भाग्य कैसे बना? क्योंकि "स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभम्।" "What ever Karaas you have performed pereviously, you experience their fruits, whether good or evil.” यह जीव पूर्व में जो शुभ या अशुभ पुरुषार्थ किया था, उसका फलस्वरूप वह पुरुषार्थ का परिपाक रूप शुभ अशुभ रूप भाय को उपभोग करता है । अर्थात् HONI." R aftegministrativecomnimtionarthlalitasantetvsanileumstandavasavimanahubas iSadrishkass u mericacanaindanetkamblems
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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