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________________ वर्षायोग स्मारिका श्री १०८ प्राचार्य सन्मतिसागरजी महाराज (अजमेर) ने वर्ष १९८४ का चातुर्मास जयपुर में किया । ग्रन्थमाला समिति ने. इस गुभावसर पर एक बहुत ही सुन्दर बायोग स्मारिका का प्रकाशन करवाकर बुलियन विल्डिंग, जयपुर (राजस्थान) में विशाल जन-समुदाय के बीच दिनांक २८-१०-८४ को श्री १०८ प्राचार्य सन्मति सागरजी महाराज के करकमलों द्वारा विमोचन करवाया। इस स्मारिका में वर्षायोग : में आयोजित कार्यक्रमों के चित्रों की झलक प्रस्तुत की गई है और अलग-अलग विषयों पर ही ज्ञानोपयोगी साधुओं द्वारा लिखित लेख प्रकाशित किये गये हैं। समारोह की र अध्यक्षता श्रीमान् ज्ञानचन्दजी जैन (जयपुर) ने की थी। सम्मेदशिखर माहात्म्यम ... परम पूज्य श्री १०८ प्राचार्यरत्न धर्मसागरजी महाराज ने विशाल संघ सहित अपना १९८५ का वर्षायोग श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र लगायां (राजस्थान) में किया। समिति ने इस अवसर पर अष्टमः पुष्प के रूप में “सम्मेदशिखर माहात्म्यम" ग्रन्थ का प्रकाशन करवाकर प्राचार्य श्री के करकमलों द्वारा दिनांक १४-७-८५. को विशाल जन-समुदाय के बीच विमोचन किया । .: श्री सम्मेदशिखर माहात्म्यम. ग्रन्थ एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है । श्री सम्मेदशिखर जी के महत्व पर प्रकाश डालने वाला इस प्रकार के ग्रन्ध का प्रकाशन अाज तक नहीं हुआ है। इस ग्रन्थ में २४ तीर्थंकरों के चित्र, प्रत्येक कूट का चित्र, अर्थ व उसका. फल प्रकाशित किया गया है 1 संसार में सम्मेदशिखरजी सिद्धक्षेत्र जैसा कोई क्षेत्र नहीं है । क्योंकि यह तीर्थराज अनादिकाल का है और इस सिद्धक्षेत्र से हमारे २४ तीर्शकरों में से २० तीर्थकर मोक्ष पधारें है और उनके साथ-साथ असंख्यात्त मुनिराज मोक्ष पधारे हैं । इसलिये इस क्षेत्र की कगा-कण पूजनीय व बंदनीय है । इस क्षेत्र की. वंदना करने से मनुष्य के जन्म-जन्म. के पापों का क्षय हो जाता है और उसके लिए मोक्षमार्ग .. ग्रासान हो जाता है तथा उसे नरक व पशुगति में जन्म नहीं लेना पड़ता . और वह ४६ भव में निश्चय ही मोक्ष की प्राप्ति करता है । कहा भी है. : भाव सहित वंदे जो कोई। ताहि नरक पशुगति नहीं होई ।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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