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अध्याय : दसवा ] सायंकाल स्वभाव से ६-६ घड़ी खिरती है। किन्तु धवला और तिलोयपत्ति में त्रिकाल के अतिरिक्त चतुर्थ समय में नहीं खिरती है । और 6-6 घड़ी वाणी खिरती है, ऐसा लिखा है । यह भगवान महावीर और हुण्डावसर्पिणीकालापेक्षा है । बाकी तीर्थंकरों की दिव्यध्वनि अर्धरात्रि को भी खिरती है। अर्थात् चार बार भी खिरती है।
पुवण्हे मज्भपणे अधरण्हे मज्झि माये रत्तिए । छन्छग्धडियारिणग्गदिश्व भुगी कहइ सुतत्थे ॥१६३४॥ . प्रश्न-जीवस पर्याय पाकर पुनः निगोद में कितने काल में चला
जाता है ? उत्तर--नित्यनिगोद से निकल कर बस पर्याय पाकर १६ कोटि पूर्व २ हजार सागर वर्ष प्रमाण. समय में जीव या तो मोक्ष प्राप्त कर लेता है, अन्यथा पुनः निगोद राशि में चला जाता है ।
प्रश्न-~-परिपतदशा जीव को कितने गुणस्थान तक है ?
उत्तर--८ वें गुणस्थान तक जीव की परिगत दशा है और श्रेणी प्रारोहरण के बाद अपरिगत दशा है ।
प्रश्न--समुद्र के जल की वृद्धि च हानि किसप्रकार होती है ?.
उत्तर-समुद्र का जल अमावस्या के दिन ११ हजार योजन समतल से ऊपर उठता है, और परिणमा के दिन १६ हजार योजन उठता है । उस समय बेलंधर जाति के देव उसे समरूप बना देते हैं ।
प्रश्न-~-शुभ या अशुभ तेजस का प्रभाव कितनी भूमि प्रमाण होता है ?
उत्तर-शुभ तेजस ४८ कोश लम्बाई और ३६ कोश चौड़ाई में सुभिक्ष करता है और अशुस तेजस का भी उतना ही प्रसारण है।
प्रश्न--षष्टमकाल के अन्तिम समय में क्या-क्या शाश्यत रहेगा?
उत्तर-षष्टम काल के अन्तिम समय में प्रलय होगा, उस प्रलय के समय में भरत क्षेत्र की सब वस्तुएं नष्ट हो जायेगी जीव भी सब नष्ट हो जायेंगे । उस समय देव और विद्याधर लोक जाकर ७२ जोड़े मनुष्यों के और तिर्यञ्चों को उठाकर विजयाई की गुफाओं में रख देंगे । षष्ठ काल के प्रारम्भ में फिर जब प्रलय का' उपद्रव शांत हो जायगा, तब फिर से उन मनुष्यों को और तिर्यंचों को विजयार्द्ध की मुफाओं