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[ गो. प्र. चिन्तामणि
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव गत्यादि के नाना रूप से परिमित होता है । अथवा शरीरादिक बनते हैं, उसे नाम कर्म कहते हैं । इस नाम कर्म के उदय से आत्मा के सूक्ष्मत्व गुण का घात होता है ।
प्रश्न :- गति नाम कर्म किसे कहते हैं ?.
उत्तर :-- जिस कर्म के उदय से जीव का साकार नारकी, तिर्यञ्च मनुष्य देव के समान हो, उसे गति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :-- गति नाम कर्म के कितने भेद है ?
उत्तर :--तरक गति, तिर्यञ्च गति, मनुष्य गति, देव गति ये चार भेद हैं ।
प्रश्न :-- मनुष्य गति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव को मनुष्य पर्याय प्राप्त होती है, उसे मनुष्य गति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :--नरक गति नाम कम किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से नरक पर्याय प्राप्त होती है, उसे नरक गति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- तिर्यञ्च गति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :-- जिस कर्म के उदय से जीव को तिर्यञ्च गति प्राप्त हो, उसे तिर्यञ्च गति नाम कर्म कहते हैं |
प्रश्न :- देव गति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से देव गति की प्राप्ति होती हो, उसे देवगति नाम
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कर्म कहते हैं ।
प्रश्न : --- इन चारों गतियों में मुख्य रूप से किस-किस कषाय का उदय रहता है, ( जन्मते समय ) ?
उत्तर :- -जीव को नरक गति में क्रोध का उदय रहता है, तिर्यञ्च गति में माया का उदय रहता है, मनुष्य गति में मान का उदय होता है और देवगति में लोभ का उदय रहता है ।
प्रश्न :- जाति नाम कर्म किसे कहते हैं ?