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अध्याय : पांचवां ]
[ २६७ सौ बार जप करता है। वह एक उपवास के निर्जरा रूप फल को प्राप्त होता है।
एतद्धि कथितं शास्त्रो रुचिमात्र प्रसाधकम् । किन्त्वमीषां फलं सम्यवस्वर्ग मोक्षक लक्षरगम् ॥५१०॥
यह जो शास्त्र में इन मन्त्रों का उपवास रूप फल कहा है सो केवल मन्त्र जपने की रुचि कराने के लिये है, किन्तु वास्तव में उक्त मंत्रों का उत्तम फल स्वर्ग
और मोक्ष ही है। पंचाक्षरी विद्या का ध्यान--
पञ्च वर्णमयीं विद्या पञ्च तत्त्वोपलक्षिताम् ।। मुनि थोरैः श्रुत स्कन्धा द्वाज बुद्धया समुद्धताम् ।।५११॥
पाँच तत्वों से युक्त, पांच अक्षर मयी विद्या को मुनिश्वरों ने द्वादशांग शास्त्र में से सारभुत समझ कर निकाली है। वह पंचाक्षर मयी विद्या "ॐहाँ ही हौं हः असि पा उ सा नमः' इस प्रकार है ।
अस्यां निरन्तराभ्यासा वशीकृत निजाशयः । .. प्रोचिन्नत्त्याशु निःशङ्को निगूढे जन्म बन्धनम् ।।५१२।।
इस पूर्वोक्त पंचाक्षरमयी विद्या में निरन्तर अभ्यास करने से वशीभूत कर लिया है, मन जिसने ऐसा मुनि निःशंक होकर अति कठिन संसार रूपी बन्धन को शीघ्र ही काट देता है। मगलोतमशरण पदों के ध्यान का फल--- . मङ्गल शरणोत्तम पद निकुरम्ब यस्तु संयमी स्मरति ।
विकलमे काग्रधिया . स चापवर्गश्रियं श्रयति ॥५१३॥
जो संयमी मुनि एकाग्र बुद्धि से मंगल, शरण, उत्तम इन पदों के समूह का म्भरमा करता है, वह भोक्ष लक्ष्मी का अाश्रय करता है । वह मंगलकारक उत्तम पदों
का समह यह है-~चत्तारि मंगलं । परन्त संगलं । सिद्ध मंगलं । साह मंगलं । ' केवलिपपरन्तो धम्मो . मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा । अरहन्त लोगुत्तमा । सिद्ध ‘लोगुत्तमा । साहू लोगुत्तमा । केबलिंपत्तो धम्मो लोगुत्तमा । चत्तारि सरणं
पन्बज्जामि । अरहते सरगं पव्वज्जामि । सिद्ध. सरणं पब्वजामि । साह सरणं. ....पव्य ज्जामि । केवलिपण्णत्तं धम्म सरंण पव्य ज्जामि ।
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