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________________ २६८ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि.. तेरह प्रक्षर वालो विद्या का ध्यान--- सिद्धः सौधं समारोढुमियं सोपान मालिका । त्रयोदशाक्षरोत्पन्ना विद्या विश्वाति शायिनी ।।५१४॥ जगत में अतिशय रूप तेरह अक्षरों से उत्पन्न हुई यह विद्या मोक्ष के महल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की पंक्ति है । वह. १३ तेरह अक्षर का मंत्र ॐ अहत् सिद्ध . ... सयोग केवली स्वाहा' इस प्रकार है । प्रसादयितुमुद्य क्त मुक्ति कान्तां यशस्विनीम् । दूतिकेयं मता मन्ये जगवन्य मुनीश्वरः ॥५१५॥ यश की धारक मुक्ति रूपी स्त्री को प्रसन्न करने के लिए उद्यमी हुये ऐसे तथा जगत् से पूज्य मुनीश्वरों ने इस तेरह अक्षरी विद्या को मुक्ति को प्रसन्न करने के अर्थ दूती माना है, ऐसा मैं मानता हूँ। (चित्र नं. २०) नीचे लिखित विद्या का चिन्तवन का प्रभाव जो सप्ताक्षरमय है.... सकल ज्ञान साम्राज्य दान दक्षं विचिन्तय। . . . .. . मन्त्रं जगत्रयी-नाथ-चूडारत्नं कृपास्पदम् ।।५१६॥ यह मन्त्र सकल ज्ञान के साम्राज्य (केवल ज्ञान) के देखने में प्रवीरण है और जगत्त्रय के नाथों के चूड़ा रत्न समान है तथा कृपा का स्थान है, सो हे मुने, तू . चिन्तवन कर । वह मन्त्र---ॐ ह्रीं श्रीं अहँ नमः' है । न चास्य भवने कश्चित्प्रभाव गदित क्षमः । श्रीमत्सर्वज्ञ देवेन यः. साम्यमवलम्बते ॥५१७॥ इस मन्त्र का प्रभाव लोक में कोई भी कहने को समर्थ नहीं है, क्योंकि वह मन्त्र श्रीमत्सर्वज्ञ देव की समानता को धारण करने वाला है। (चित्र २१) · पंचाक्षरी विद्या का प्रभाव-... . . .... ... - स्मरकर्म कलौघ ध्वान्त विध्वंस भास्करम् । पञ्च वर्ण मयं मंत्रे पवित्रं पुण्य शासनम् ।।५१८॥ हैं मुने, तू पंच अक्षरमयी जो मन्त्र है, उसे चिन्तवन कर; क्योंकि यह मन्त्र कर्म कलंकों के समूह रूप अंधकार का विध्वंस करने को सूर्य के समान है, पवित्र है ... ... और पुण्य शासन है । यह मन्त्र 'सामो सिद्धागा' यह है। (चित्र नं. २२ देखें) --6 . . RAMAILI
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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