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________________ १८ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तर :-इस संहनन नामकर्म के छह भेद हैं । ववर्षभनाराचसंहनन, वज्रनाराच संहनन, नारायसंगन, अर्द्धनाराचसंहनन, कोलितसंहनन और असंप्राप्ता सृपाटिकासंहनन - ये छह भेद हैं । प्रश्न :-बजर्षभनाराचसंहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से ऋषभ (वेष्ठन), नाराच, (कील) और संहनन (हड्डियां) वज्र के समान अभेद्य होती हैं, उसे वज्रर्षभनाराच संहनन कहते हैं । । प्रश्न :-वज्रनाराचसंहनन का क्या स्वरूप हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से कोलें वा हड्डियां तो वन के समान होती हैं, परन्तु वेष्ठन वन के समान नहीं होता है, उसे वज्रनाराच संहनन कहते हैं । प्रश्न :-नाराचसंहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से सामान्य वेष्ठन और कीलिसहित हड्डियों होती है, उसे नाराचसंहनन कहते हैं। . प्रश्न :--अर्धनाराचसंहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से हड्डियों की संधियां अर्धकीलित होती है, उसे अर्ध नाराचसंहनन कहते हैं । प्रश्न :-कीलितसंहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से हड्डियां परस्पर कीलित होती है, उसे कीलितसंहनन ___ कहते हैं। प्रश्न :-असंप्राप्तासृपाटिका संहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से अलग-अलग हड्डियां नसों से बंधी होती हैं, परस्पर में कीलित नहीं होती; उसे असंप्राप्तासृपाटिका संहनन कहते हैं। प्रश्न :-स्पर्श नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से शरीर में स्पर्श होता है, उसे स्पर्श नामकर्म कहते हैं। इसके पाठ भेद है-हल्का, भारी, रूखा, चिकना, कडा, नरम, ठंडा, गरम इन सवका अनुभब स्पर्श नामकर्म के द्वारा होता है । प्रश्न :- रस नामकर्म किसे कहते हैं ?
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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