________________
अध्याय : सातवां 1
[ ५३१
लाव और कापिष्ट स्वर्ग के प्रथम पटल में बारह सागर और दूसरे पटल में कुछ अधिक चौदह सागर की प्रायु है। शुक्र और महाशुक्र में एक ही पटल हैं । शतार और सहस्त्रार में भी एक ही पटल है ।
आनत, प्राणत, आरण और अच्युत स्वर्ग में छह पटल हैं। प्रथम पटल में सागर के तीसरे भाग से कुछ अधिक कम उन्नीस सागर की आयु हैं । दूसरे पटल में बीस सागर, तीसरे पटल में २०, २ बटे ३ सागर, चौथे पटल में इक्कीस सागर, पांचवें पटल में २१, १ बटे ३ सागर और छठवें पटल में बाईस सागर की आयु है ।
प्रारणाच्युतादूर्ध्वमेककेन नवतु ग्रंथेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च ।। १२२६॥ रंग और अच्युत स्वर्ग से ऊपर नव ग्रैवेयकों में, नव अनुदिशों में और विजय आदि विमानों में एक-एक सागर बढ़ती हुई आयु है। सूत्र में नव शब्द का ग्रहण यह बतलाता है कि प्रत्येक में एक-एक की वृद्धि होती है । 'विजयादिषु' में आदि शब्द के द्वारा नव अनुदिशों का ग्रहण होता है ।
इस प्रकार प्रथम वेयक में तेईस सागर और नवमें ग्रैवेयक में इकतीस सागर की आयु है। नव अनुदिशों में बत्तीस सागर और विजय आदि पांच विमानों में तैंतीस सागर की उत्कृष्ट आयु है । सर्वार्थसिद्धि में जघन्य आयु नहीं होती इस बात को बतलाने के लिए सूत्र में सर्वार्थसिद्धि शब्द को पृथक् स्वता हैं । नवत्रैवेयकों के १. सुदर्शन, २. प्रमोध, ३. सुप्रबुद्ध ४ यशोधर, ५. सुभद्र, ७. सुमनस, = सौमनस और ६. प्रीतिङ्कर ।
नाम
६. सुविशाल,
-
स्वर्गों में जघन्य आयु का वन
श्रायु है ।
ree eatenfone ॥१२३०॥
atri at ऐशान स्वर्ग के प्रथम पटल में कुछ अधिक एक पत्य की
परतः परसः पूर्वा पूर्वाऽनन्तराः ॥१२३१
पहिले-पहिले के पटल पर स्वर्ग की आयु आगे के पटलों और स्वंगों की जघन्य आयु है । अर्थात् सोधर्म और ऐशान स्वर्ग की उत्कृष्ट स्थिति सानत्कुमार और