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अध्याय: चौथा ]
उत्तर :- तीन हैं- नेगम, संग्रह, व्यवहार |
प्रश्न :- पर्यायार्थिकनय किसको कहते हैं ? और कितने भेद हैं ?
उत्तर :- जो नय को विशेष ( गुण अथवा पर्याय) को विषय करता है। इसके चार भेद हैं, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत |
प्रश्न :- नैगमनय किसको कहते हैं ?
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उत्तर :--
- जो नय अनिष्पन्न अर्थ के संकल्पमात्र को ग्रहण करता है, उसे नैगमनय कहते हैं । जैसे- लकड़ी, पानी यदि सामग्री इकट्ठी करने वाले मनुष्य से कोई पूछता है कि आप क्या कर रहे हो ? तो वह उत्तर देता हैं कि मैं. भात पका रहा हूँ । किन्तु उस समय वह भात पकाने की तैयारी कर रहा है, पर उसका संकल्प भारत बनाने का है, जो अभी निष्पन्न नहीं हुई, उसे वहां निष्पन्न मानकर व्यवहार करता है, यह नैगमंनय है ।
प्रश्न :- संग्रहनय किसको कहते ?
उत्तर :--जो नय अपनी जाति का विरोध नहीं करके एकपने से समस्त पदार्थों को
ग्रहण करता है, उसे संग्रहनय कहते हैं। जैसे- द्रव्य कहने से समस्त द्रव्यों का, जीव कहने से समस्त जीवों का और पुद्गल कहने से समस्त पुद्गलों का ग्रहण होता है ।
प्रश्न :-- व्यवहारनय किसको कहते हैं ?
उत्तर :-- -जो नय संग्रह नय के द्वारा ग्रहण किये हुये पदार्थों का विधिपूर्वक भेद करता हैं, उसे व्यवहारतय कहते हैं । जैसे द्रव्य के छह भेद करना । जीव के संसारी और मुक्त ग्रादि भेद करना तथा पुद्गल के परमाणु और स्कन्ध श्रादि भेद करना । यह नय वहां तक भेद करता है, जहां तक भेद हो सकते हैं ।
प्रश्न :- ऋजुसूत्र नय किसको कहते हैं ?
उत्तर :--- भूत और भावी पर्याय को छोड़कर जो वर्तमान स्थूल पर्याय को ही ग्रहण करता है, उसे ऋजुसूत्र नय कहते हैं ।
प्रश्न : शब्दtय किसको कहते है ?
उत्तर :- जो नय लिंग, संख्या, कारक आदि के व्यभिचार को दूर करता है, उसे शब्दtय कहते हैं । यह नय लिंगादिक के भेद से पदार्थ को भेदरूप ग्रहण