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प्रतिष्ठाचार्य प्रदीपकुमार जैन (शास्त्री) के प्रकाशित ग्रन्थ के बारे में उद्गार
प्रस्तुत ग्रंथ परम पूज्य श्रमणरत्न, वात्सल्य रत्नाकर, स्याद्वाद केशरी, श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज ने बाहुबलि सहस्त्राभिषेक के शुभावसर पर उनके बाहुबलि वर्षायोग के समय पर ही वर्ष १६८१ में संग्रह करके लिखा था । इस ग्रंथ के माध्यम से गणधराचार्य महाराज ने वर्तमान में जो भी जैनागम में मिलावट द्वारा श्रागम प्रदूषण किया जा रहा है, उसको रोकने के लिए उनके प्रश्नों का, शंकाओं का आचार्यों के प्रमाण देकर बहुत ही सुलभ एवं सुन्दर ढंग से समाधान किया है । भोले-भाले स्वाध्याय प्रेमी मुमुक्षुओं को ग्रागम का सही ज्ञान कराने की अद्भुत चेष्टा की है । बर्तमान में एकान्तवादी, झूठ, अत्याचारी, पंथवादी, कूटनीतिवाले, राजनीति वाले, सुधारवादी, मायाबारी, ग्रात्म-प्रशंसक, धर्मघातक, कुणास्त्र प्रचारक, पथ भ्रष्ट, पद भ्रष्ट, एवं धर्मद्रोही लोग, आगम . दुति करने का प्रयास कर रहे हैं, उनके ऊपर निष्पक्षता से पुरजोर शब्दों मैं स्याद्वाद एवं अनेकता के माध्यम से अच्छा भावात किया है। सभी जगह पूर्वाचार्यो के शब्दों में उनकी गाथा एवं सूत्रों का प्रसारण देकर स्पष्टीकरण किया है। प्रस्तुत ग्रंथ में महाराज ने अपने स्वयं के कुछ भी विचार नहीं लिखे, यह प्रमुख विशेषता रही है । मैं डंके की चोट यह कह सकता हूँ वर्तमान में परम पूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज जैसे प्रोजस्वी एवं निष्पक्ष सहस्त लेखक की परम आवश्यकता है, क्योंकि श्राप श्री किन्हीं धनवानो के, पंथ वादियों के धार्मिक, सामाजिक यादि संस्थानों के प्रभाव में आकर अपने प्रापको परतन्त्र बनाये हुए नहीं है । आप के संघ में लगभग ४० साधु विद्यमान हैं । वे सभी स्वतन्त्र हैं एवं सही प्रागम के प्रचार एवं प्रसार के