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________________ संत ज [ गो. प्र. चिन्तामणि २२ ] प्रश्न : --- पर्याप्ति किसे कहते हैं ? उत्तर :-- जिस कर्म के उदय से जीव के एक भी पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती, उसे अपर्याप्त नामकर्म कहते हैं । प्रश्न : --- पर्याप्ति किसे कहते हैं ? उत्तर : -- ग्राहारवर्गरणा, भाषावर्गणा और मनोवगंगा के परमाणुओं के शरीर तथा इन्द्रियादि रूप परिमाने की शक्ति की पूर्णता को पर्याप्त कहते हैं । पर्याप्ति के छह भेद हैं- १. आहारपर्याप्ति २. शरीरपर्याप्ति, ३. इन्द्रियपर्याप्ति, ४. श्वासोच्छवासपर्याप्ति ५. भाषापर्याप्ति, ६ मनः पर्याप्ति । प्रश्न :-- पर्यातक के कितने भेद हैं ? उत्तर :-- निवृत्यपर्याप्तक और लब्ध्यपर्याप्तक - ऐसे दो भेद हैं । प्रश्न :-- निवृत्यपर्याप्तक किसे कहते हैं ? उत्तर:- ग्रपने-अपने योग्य पर्याप्तियों का प्रारम्भ तो साथ-साथ होता है, किन्तु ताक्रम से होती है । किसी जोव की जब तक शरीर पर्याप्तिपूर्ण नहीं होती; किन्तु नियम से पूर्ण होने वाली होती है, तब तक उस जीव की fretreator कहते हैं । प्रश्न :- लब्ध्यपर्याप्तक किसे कहते हैं ? उत्तर :- जिसकी शरीर पर्याप्त पूर्ण हो जाती है, उसे पर्याप्तक कहते हैं । और जिसकी एक भी पर्याप्ति पूर्ण नहीं होतीं तथा श्वास के ग्रठारहवें भाग में मरण हो जाता है, उसे लब्ध्यपर्याप्तक कहते हैं । प्रश्न :- प्राहारपर्याप्ति किसे कहते हैं ? उत्तर :- प्राहार वर्णना के परमाणुओं को खल वा रस भागरूप परिणामावने को कारभूत जीव की शक्ति की पूर्णता को ग्राहारपर्याप्त कहते हैं । प्रश्न : - शरीरपर्याप्ति किसे कहते हैं ? उत्तर :- जिन परमाणुओंों को खलरूप परिणामवाया था, उनको हड्डि वगैरह कटिन श्रवयवरूप और जिनको सरूप परिणमवाया था, उनको रुचिरादिक स्वरूप परिणामावने के कारणभूत जीव की शक्ति की पूर्णता को शरीरपर्याप्ति: कहते हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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