Book Title: Agam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Part 01 Sthanakvasi
Author(s): Kanhaiyalal Maharaj
Publisher: Jain Shastroddhar Samiti Ahmedabad
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ அறமமமமமமமமமமமாறாம்மைழைமமமமமமமமமமமும் जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्री-घासीलालजी-महाराज विरचित प्रकाशिकाख्यया व्याख्यया समलङ्कृतम् Kmm हिन्दी-गुर्जर-भाषाऽनुवादसहितम् FRON जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रम् (प्रथमो भागः) @@ नियोजकः संस्कृत-प्राकृतज्ञजैनागमनिष्णात-प्रियव्याख्यानि पण्डितमुनि-श्रीकन्हैयालालजी महाराजः प्रकाशक: se@@@@@@ अ० भा० श्वे. स्था० जैनशास्त्रोद्धार समिति प्रमुखः श्रेष्ठिः श्री बलदेवभाई डोसाभाई पटेल महोदयः मु. अहमदाबाद प्रथम-आवृत्तिः प्रति १२०० वीरसंवत् विक्रमसंवत् २५०६ २०३६ मूल्यम्-रु० ४०-०. इस्वीसन् १९८० GODDOOOOOOOOOOOOptimaemmammohammam wil.jainelibravon P ale Persand Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र भाग १ की विषयानुक्रमणिका अनुक्रमांक विषय पृष्ठाक ३.-८ rams, १२..१६ १७.-२२ २२-३४ ३५-:४३ ४४--४९ ४९-५५ प्रथम वक्षस्कार १ मङ्गलाचरण २ प्रस्तावना नमस्कार निक्षेप गौतमस्वामी का वर्णन ५ जम्बूद्वीपके सम्बन्धमें प्रश्नोत्तर ६ जम्बूद्वीप का प्राकारभूतजगतीका वर्णन पद्मवरवेदिका के बहिर्भागस्थ वनषण्ड का वर्णन ८ वनखण्ड की भूमि भाग का वर्णन ९ जम्बूद्वीप की द्वारसंख्या एवं द्वारों के स्थान विशेष का वर्णन १० भरतक्षेत्र के स्वरूपका वर्णन ११ दक्षिणार्ध भरतवर्षका निरूपण १२ दक्षिणार्धभरत का सीमाकारी बैताढ्य पर्वत कहां है ? उसका कथन १३ वैताढय पर्वतके पूर्व पश्चिम भागमें आगत दो गुफाओंका वर्णन १४ आभियोग दो श्रेणीका निरूपण १५ सिद्धायतनकूटका वर्णन १६ दक्षिणार्ध भरतकूटका निरूपणम् १७ वैताढय नाम होनेके कारण का कथन १८ उत्तरभरतार्द्ध का स्वरूप वर्णन १९ उत्तरार्धभरतमें ऋषभकूटपर्वतका निरूपण दूसरावक्षस्कार-प्रथमारक २० कालके स्वरूपका निरूपण २१ सुषमासुषमानामकी अवसर्पिणी का निरूपण २२ कल्पवृक्षके स्वरूपका कथन २३ सुषमसषमाकालमें उत्पन्न मनुष्यों के स्वरूपका कथन २४ सुषमसुषमाकाल भावि मनुष्यके आहारादिका कथन २५ युगलियों के निवास का निरूपण २६ सुषमसुषमा कालमें गृहादिके होने के संबन्धमें प्रश्नोत्तर २७ सुषमसुषमादिकाल में राजादिके विषयमें प्रश्नोत्तर २८ उसकालमें आबाह विवाहादि विषयमें प्रश्नोत्तर २९ उसकालमें शकटादिके अस्तित्वसंबन्धी प्रश्नोत्तर ३० उसकालमें गर्तादिके सम्बन्धमें प्रश्नोत्तर ६४-७५ ७५-८२ ८२--९२ ९२-१०६ १०७--११७ ११७--१३० १३०-१३२ १३३-१३९ १४०-१४८ १४९-१८३ १८४-१९८ १९९-२२२ २२२-२४० २४१-२५४ २५४-२५७ २५८-२६३ २६४-२७० २७१-२७५ २७५-२८० २८१-२८४ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३१ उससमयमें डिम्ब उपद्रवसम्बन्धी प्रश्नोत्तर २८५-२९१ ३२ उसकालके मनुष्योंकी भवस्थित्यादि का निरूपण २९१-२९९ दूसरा आरक ३३ सुषमानामके दूसरे आरेका निरूपण २९९-३९० ३४ सुषमानामके आरेमें भवस्थितिका निरूपण तीसरा आरक ३५ तोसरे आरकके स्वरूपका कथन ३१४-३२३ ३६ सुषमदुष्षमाकालके अन्तिम त्रिभागमें लोक व्यवस्था का कथन ३२४-३२७ ३७ कुलकरता के प्रकारका कथन ३२७-३३३ ३८ ऋषभस्वामी के त्रिजगज्जनपूजनीयता का कथन ३३३-३५६ ३९ ऋषभस्वामीके दीक्षागृहण के अनन्तरीय कर्तव्यका कथन ३५६-३६७ ४. भगवान की श्रामण्यावस्थाका वर्णन ३६८-३७४ भगवानको केवलज्ञान प्राप्तिका कथन ३७४-३८४ ४२ ऋषभस्वामी को केवलज्ञानोत्पत्तिके अनन्तरीय कार्यका निरूपण ३८४-३९७ ४३ भगवान के जन्मकल्याणकादिका निरूपण ३९७-३९९ ४४ भगवानके निर्वाणके बाद के देवकृत्यका निरूपण ३९९-४१. ४५ भगवानके निर्वाणके अनन्तर ईशानेन्द्र के कर्तव्यका कथन ४११-४१८ ४६ ६४ इन्द्रोंके आगमनानन्तर देवेन्द्र शकके कार्य का कथन ४१८-४२१ ४७ भगवान आदिके कलेवरके स्नपनादि का निरूपण ४२१-४२६ ४८ भगवान आदिके कलेवर चितामें रखने के बादका शक्रादिके कार्य का निरूपण ४२६-४३४ ४९ अस्थिसंचयके बाद की विथी का निरूपण ४३४-४४० चतुर्थ आरक ५. चतुर्थ आरक के स्वरूप का कथन ४४१-४४६ पांचवां आरा ५१ पंचम आरक के स्वरूपका कथन ४४७-४५२ छट्ठा आरक ५२ छट्टे आरेका स्वरूपनिरूपण ४५२-४८३ ५३ उत्सर्पिणी के दुष्षमा आरकमें अवसर्पिणीके दुष्षमा आरकसे विशिष्टताका कथन-४८४-४९४ ५४ उत्सर्पिणी दुष्षमाकालके मनुष्यों के कर्तव्य एवं आकार भावप्रत्यवतारका कथन -४९४-४९९ ५५ दुष्पमसुषमा कालको वर्णन - ४९९-५११ तीसरा वक्षस्कार ५६ भरतवर्ष नाम होने के कारण का कथन ५१२-५१६ ५७ भरत चक्रवर्ती के उत्पत्यादिका निरूपण ५१६-५२६ ५८ भरत चक्रवर्ती के दिग्विजयादिका निरूपण ५२७-५४८ Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५९ भरत चक्रवर्ती के गमन के बाद उनके अनुचर वर्ग के कार्यका निरूपण- ५४८-५६८ ६० अष्टाहिका समाप्त करके आगेके कार्य का निरूपण ५६८-५८४ ६१ भरतचक्रीके स्नानादिसे निवृत्त होनेके अनन्तर कार्यका निरूपण ५८४-५९८ ६२ मागधतीर्थाधिपतिका भरतचक्री को भेटप्रदान का निरूपण ६३ भरतचक्रीका वरदामतीर्थ के प्रतिगमनका निरूपण ६१०-६१९ ६४ वर्दकीरत्नको आवसथादिबनानेकी आज्ञा करने पर वर्द्ध कीरत्न के कौशल्यका वर्णन- ६१९-६२७ ६५ रथवर्णन पूर्वक भरत महाराजा के रथावरोहणका निरूपण ६२७-६४३ ६६ सिंधूदेवी को साधने का निरूपण ६४३-६५४ ६. वैताढयगिरिकुमारदेव के साधने का कथन ६५४-६६३ ६८ सुषेणसेनापति के विजय का वर्णन ६६३-६८८ ६९ तमिस्रा गुहा के द्वार को उद्घाटन करने का निरूपण - ६८८-७२१ ७० उन्मग्न निमग्ननाम को महानदी के जलाशयका निरूपणएवं उत्तराधभरत जितनेका निरूपण ७२१-७४० ७१ भरत महाराजाके सैन्यको स्थितिका कथन ७४०-७५९ ७२ आपातचिलातके देवों के उपासना का निरूपण ७६०-७७२ ७३ वर्षा हो जाने के बाद भरतमहाराजा के कार्य का वर्णन ७७३-७८० ७४ भरतमहाराजाके सैन्य को स्थिति का वर्णन - ७८१-७८८ ७५ सातरात्रि के बादका वृत्तांत वर्णन ७८९-८०६ ७६ उत्तरदिशाके निष्कूटजितनेका एवं ऋषभकूट को जितनेका वर्णन ८०६-८२० ७७ नमी एवं विनमी नामके विद्याधरों के विजयका वर्णन ८२०-८३४ ७८ भरत महाराजा के दिग्यात्रा तथा दक्षिणार्ध में भरत के कार्यका वर्णन ८३४-८६५ ७९ राज्यों के जितने के बादका भरतमहाराजा-के कार्य का वर्णन ८६५-८८९ ८. अपनी राजधानी में आये हुए भरत महाराजा के कार्य का निरूपण - ८९०-९०८ ८१ भरतमहाराज के राज्याभिषेक विषयका निरूपण ९०९-९५७ ८२ भरतमहाराजाके रत्नोत्पत्ति के स्थान का निरूपण ९५७-९५९ ८३ छहोंखंडों के पालन करते हुए भरतमहाराजा को प्रवृति करने का निरूपण- ९५९-९७७ ८४ प्रकारान्तर से भरतनामकी अन्वर्थताका कथन ९७८-९८० समाप्त Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ આધમુરબ્બીશ્રીઓ શેઠ શ્રી શાંતિલાલ મંગળદાસભાઈ અમદાવાદે (સ્વ.) શેઠશ્રી શામજીભાઈ વેલજીભાઈ વીરાણી-રાજકોટ (સ્વ.) શેઠશ્રી છગનલાલ શામળદાસ ભાવસાર-અમદાવાદ શેઠ શ્રી પોપટલાલ માવજીભાઈ–મહેતા જામજોધપુર શેઠશ્રી રામજીભાઈ શામજીભાઈ વીરાણી-રાજે કેટ बच्चे बेठेला-लालाजी किशनचंदजी सा.जौहरी उभेला-सुपुत्र चि. महेतावचन्दजी सा. नाना--अनिलकुमार जैन दोयत्ता दिल्ही Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ આવમુરબ્બીશ્રીઓ માનવતા આધ સુરઇ- શેઠ શ્રી. માણેકલાલભાઈ મમુલખુભાઈ મહેતા - ઘાટકોપર-મુમ્બઈ. (સ્વ.) શેઠશ્રી હરખચંદ કાલીદાસ વારિઆ ભાણવ8. (સ્વ.) શેઠ રંગજીભાઈ મેહનલાલ શાહ અમદાવાદ, (સ્વ.) શેઠશ્રી દિનેશભાઇ કાંતિલાલ શાહ અમદાવાદ શેઠશ્રી જેસિંગભાઈ પાચાલાલભાઈ સ્વશેઠશ્રી આત્મારામ માણે કેલાલ અમદાવાદ અમદાવાદ Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ આઘમુ૨૭-મીશ્રીઓ स्व.श:श्री हरिदास सनापय स्व. शेठ श्री ताराचंदजी साहेब गेलडा मद्रास. ભાત शेठी चीमनलालजी अखभचंदजी अजीतवाले सपरिवार शेठ श्री कीशनलालजी फुलचंदजो लुणिया बेंगलोरवाले बच्चे बेठेला-मोटाभाइ श्रीमान् मूलचंदजी जवाहीरलालजी बरडिया बाजुमां बेठेला-भाई मिश्रीलालजी बरडिया उभेला-भाई पूनमचंदजो बरडिया श्रीमान् शेठश्री खींवराजजी सा. चोरडिया मु० मद्रास Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ આધમુરબ્બીશ્રીઓ પટેલ ડોસાભાઈ ગોપાલદાસ મુ. સાણ ૬ (જી. અમદાવાદ) ૬ અમીચંદભાઈ તથા ૨ ગીરધરભાઈ ખાટવિયા મુ. બેંકૈગાર મદ્રાસવાલા સ્વર્ગસ્થ ન્યાયમૃતિ રતીલાલભાઈ ભાયચંદભાઇ મહેતા શાસ્ત્રી શ્રી મહીસ્ટીની ત્રુન્દુિ मुः उदयपुर अमलनेर પાવી જોવામઢની મુઢતાનમઢી शेट रघुनाथमलजी, शेठ बाबुलालजी ११ पन्नालालजी, शेठ सुगनचंदजो સ્વ. શેઠ માણેકચંદ નેમચંદભાઈ મુ. મારેલ Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आद्यमुरब्बी श्रीओ શ્રીમાન શેઠ મણીલાલ પેપટલાલ વારા અ મદાવાદ શ્રી વ્રજલાલ દુર્લભજીભાઈ પારેખ રાજકા શેઠશ્રી મણીલાલ જેઠુભાઇ minal પાલનપુરવાળા श्रीमान् शेठ लालाजी कपूरचन्दजी नाहटा, मु. देहली કોઠારી હરગાવિ જેચ દભાઇ રાજકોટ. श्रीमान् लालाजी पन्नालालजी नाहटा 'सपरिवार-दिल्ली Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आद्यमुरब्बीश्रीओ श्रीमान् शेठ धनराजजी पन्नालालजी श्रीमान् शेठ कानुगा धिगडमलजी-अमदावाद जांगडा, मु. जालना (महाराष्ट्र) शेठ श्री मिश्रीलालजी लालचंदजी सा. लुणिया : भुसमा भूखाशी तथा शेठश्री जेवंतराजजी-अमदावाद રાજકોટ ઝવેરી રસીકલાલ મણીલાલ મહેતા स्व. श्रीमान् शेठश्री मुकनचदजी सा० बालिया-पाली मारवाड Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आद्यमुरब्बीश्रीओ (સ્વ.) શેઠશ્રી ધારશીભાઈ જીવણલાલ આરસી સ્વ. શેઠશ્રી જીવરાજભાઈ મૂલચંદભાઈ ધ્રાંગધ્રા શેઠશ્રી લક્ષ્મીચંદભાઈ જશકરણભાઈ પાલણપુર નિવાસી શ્રી વીનાદકુમાર વિરાણી રાજકોટ રોઠશ્રી દેવચંદભાઈ | વલાણી-સુરત લાલભાઈ - સ્વ. સુધીરભાઈ જયંતીલાલ ઝવેરી મુમુઈ, Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ આધમુરબ્બીશ્રીઓ પાલનપુરવાલા શેઠશ્રી કેચલાલજી ભાનુભાઈ કેશવલાલ ભણસાલી કોઠારી અમુલખચંદ મલુકચંદ દેરડા-મુ, ચિચાલા પાલનપુર-મુંબઈ શેઠ જગજીવનભાઈ રતનસીભાઈ ગડિયા-દામનગર શેઠ ભેગીલાલ છગનલાલ ભાવસાર સરસપુર-અમદાવાદું श्रीमान लालाजी हजारो लालजी शेठ श्री मेरुदानजी अगरचंदजी દિયા વીરનેર | Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ આધમુરખ ભીશ્રીઓ શ્રી પન્નાલાલજી છાગમલજી પારેખ નગરપાલીકા અધ્યક્ષ અમલનેર શ્રીમાન ભીકમચંદજી એલ, ચુતર બી. એ. એલ. એલ. બી. મુ. નવાસા જી. અહેમદનગર શ્રી શાંતિલાલ ટી. અજમેરા સ્વ. મૂલચંદભાઈ જેઠાલાલભાઈ મહેતા અમદાવાદ ( કોટડાવાલા ) રાજકેટ श्रीमान जिनेन्द्रकुमारजी जैन વી. [. g&. $. વી. जोधपुर-राजस्थान Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री वीतरागाय नमः ॥ श्री जैनाचार्य जैन धर्मदिवाकर पूज्य श्रीघासीलालवतिविरचितया प्रकाशिकाख्यया व्याख्यया समलङ्कृतं ॥ श्रीजम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्रम् ॥ मङ्गलाचरणम् श्रीसिद्धराजं स्थिर सिद्धिराज्यं, प्रदं गतं सिद्धिगतिं विशुद्धम् । निरञ्जनं शाश्वत सौधमध्ये, विराजमानं सततं नमामि ॥१॥ चतुर्ज्ञानोपेतं जिनवचनपीयूषमतुलं, पिबन्तं कर्णाभ्यामविरति पुटाभ्यां गुणगृहम् । अघौघं भिन्दन्तं सकलजनकल्याण सदनं, भजे तं श्रीमन्तं गुणिषु गुणिनं गौतममिनम् ॥२॥ जम्बूदीपप्रज्ञमिसूत्र का हिन्दी अनुवाद मंगलाचरण का हिन्दी अनुवाद मोक्षरूप स्थिर सिद्धिराज्य को देने वाले एवं सिद्धिगति को प्राप्त किये हुए अत्यन्त विशुद्ध निरञ्जन और शाश्वत कैवल्य धाम में हमेशा विराजमान श्री सिद्धराज भगवान् को मै नमस्कार करता हूं ॥१॥ चार प्रकार के ज्ञानों से युक्त, अनुपम जिन वचनामृत को सतत दोनों कर्णपुटों से पान करने वाले गुणों के आकार, सारे ही पापपुञ्ज को भेदन करने वाले सकलजन मङ्गलालय, गुणिगण श्रेष्ठ श्री गौतम गणधर को भजना हूं ॥२॥ જમ્બુદ્રીપ પ્રજ્ઞપ્તિના ગુજરાતી અનુવાદ મગલાચરણ आक्ष३य स्थिर सिद्धि-राज्यने आपनारा, सिद्धि-गति प्राप्त, अत्यन्त विशुद्ध निर જન અને શાશ્વત સુખના ધામમાં સદા વિરાજમાન શ્રીસિદ્ધરાજ ભગવાનને હૂં નમસ્કાર કરૂ છુ॥૧॥ ચાર પ્રકારના જ્ઞાનાથી સમય કૃત, અનુપમ જિન વચનામૃતને સતત પેાતાના મન્ને કહ્યુ પુરથી પાનકરનારા, ગુણેાના આકર, સમસ્ત પાપપુ જોને વનષ્ટ કરનારા, સકલજનમંગલા ક્ષય, ગુણિગણ શ્રેષ્ઠ શ્રીગૌતમ ગણધરને હૂં ભજું છું... રા Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २ पटुकाय प्रतिपालकं च करुणा धर्मोपदेशोत्सुकं, aat aafaar विलसितास्यन्दुं प्रसन्नाननम् । अन्तर्ध्वान्त विनाशकाङ्घ्रि नखरज्योतिश्चयं चिन्तयन्, संस्तौम्युग्रविहारिणं गुरुवरं पञ्चवताऽऽराधकम् ॥३॥ सर्वानुयोग विज्ञान वृद्धान् श्रीगुरु परम्परामुख्यान् । हुकुमचन्द्रजी पूज्यान भजे जैनागमविशारदान् ||४|| पूज्य तत्पट्टशिष्यान् श्रीशिवलालजी वाचकप्रमुखान् 1 अर्हद् दीक्षादक्षान् निदधेज्ञान वैराग्यसम्पन्नान् ॥५॥ पूज्यान् गुरूनुदयसागर पूज्यवर्यान् ज्ञानप्रकाशमिहिराहत जाड्यराशीन् । मान्यान् प्रणम्य विहिताञ्जलि रेष घासीलालोऽनुयोगविशदामुखमातनोति ॥ ६ ॥ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पृथिवीकायादि षट्काय जीवों का प्रतिपालक दया धर्मोपदेश में तत्पर एवं यतना के लिये मुखवस्त्रिका से अलंकृतमुखचन्द्र, एवं प्रसन्न वदन, उग्र विहारी पांच महाव्रतों का आराधक आन्तरिक मोहान्धकार का विनाशक चरणनखज्योतिः पुञ्ज से विराजमान गुरुवर को चिन्तन करते हुए स्तुति करता हूं ॥ ३॥ सर्वानुयोग बिज्ञान वृद्ध श्री गुरुपरम्परा प्रमुख जैनागम विशारद पूज्य श्री हुकुमचन्द्र जी को भजता हूं ||४|| तत्पट्टशिष्य अर्हदीक्षादक्ष ज्ञान वैराग्य सम्पन्न पूज्य श्री शिवलाल जी महाराज वाचक प्रमुख को हृदय में धारण करता हूँ ||५|| ज्ञानप्रकाशरूप सूर्य से जाडयान्धकार को दूर करने वाले पूज्यमान्य उदयसागर गुरुवर्य को प्रणाम कर बद्धाञ्जलि घासीलाल मुनि अनुयोग की विशद प्रस्तावना को पल्लवित करता हैं ॥ ६ ॥ પૃથિવીકાયાદિ પકાય જીવેાના પ્રતિપાદક, દયાધર્મોપદેશમાં તત્પર, યતનામાટૅ મુખ વગ્નિકાથી સમલંકૃત, ચન્દ્રવર્તી મુખવાળા, પ્રસન્નવદન, ઉગ્રવિહારી, પાંચમહાનતાના આરાધક, આંતરિક મેહાન્ધકારને વિનષ્ટ કરનારી ચરણુ નખયેતિઃ પુજોથી સુશેાભિત એવા ગુરુવરનુ ધ્યાન કરતા હૂં તેમની સ્તુતિ કરુ છું. ા સર્વાનુયાગવિજ્ઞાન વૃદ્ઘ શ્રીગુરુપર’પરાપ્રમુખ જૈનાગમ વિશારદ પૂજ્ય શ્રીહુકુમચન્દ્રજીને હું ભજું છું ૫૪ા તપટ્ટશિષ્ય, અહ દીક્ષાદક્ષ, જ્ઞાન-વૈરાગ્ય સમ્પન્ન પૂજ્ય શ્રીશિવલાલજી મહારાજ વાચક પ્રમુખને હું હૃદયમાં ધારણ કરું છું "પા જ્ઞાન પ્રકાશરૂપ સૂર્યથી જાડયાન્ધકારને દૂર કરનાશ પૂછ્યું, માન્ય ઉદયસાગર ગુરુવને પ્રણામ કરી બદ્ધાંજલિથયેલા ' ાસીલાલ મુનિ અનુયાગનો વિશદ પ્રસ્તાવનાને પલ્લવિત કરૂ છું ગોદા Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावमा आहती भारती नत्वा घासीलालो मुनिव्रती । श्रीजम्बूद्वीपप्रज्ञप्तेाख्यां कुर्वे प्रकाशिकाम् ॥७॥ - जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रस्य प्रस्तावना ॥ इह हि परमासारविकरालसंसारकान्तारपर्यटनजन्य नानाविधदुःखदावदन्दह्यमानान्त:करणा उच्चावच्चाः प्राणिनो जिहासितमपि तद् दुःख समूलघातमपहन्तुमपारयन्तोऽकामनिर्जरायोगतः संजात दुःखनिदानकर्मलाघवास्तज्जिहासया निखिलकर्ममलक्षयलक्षणं निरतिशयसुखस्वरूपमोक्षपदमभिवाञ्छन्ति, तच्च मोक्ष्ययदं परमपुरुपार्थरूपतया सम्यग्ज्ञानसम्यगदर्शनसम्यक्चारित्रलक्षणरत्नत्रयविषयकपरमपुरुषकारलक्षणपरमयत्नैरुपार्जनीयम्, स च पुरुषकारः इष्टसाधनताज्ञानेन जन्यते, ममेद मिष्टसाधनम् , इति इष्ट साधनता ज्ञानश्चाप्तोपदेशात् भवति, आप्तश्च यथार्थवक्ता केवलज्ञानावलोकित सकलजीवाजीवपदार्थसार्थों निरुपाधिक परोपकारपरायणः करुणावरुणालयोऽनुभूय अर्हद् भगवान् की भारती वाणी को नमस्कार कर मुनि ब्रती घासीलाल जी श्री जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति की प्रकाशिका व्याख्या करता हूँ ॥७॥ प्रस्तावना का हिन्दी अनुवाद इस परम असार संसाररूप घोर जंगल में इधर उधर भटकने से उत्पन्न नाना प्रकार के दुःख दावानलों से अत्यन्त सन्तप्त छोटे बडे सभी प्राणी सर्वथा छोड़ने के लायक उन दुःखो को समूल विनाश करने में असमर्थ होकर अकाम निर्जरा योग से दुःखों के मूल निदानभूतकर्मों को हलका कर उसको छोड़ने की इच्छा से सारे ही कर्मों का क्षय लक्षण निरतिशय सुख स्वरूप मोक्षपद की अभिलाषा करते है उस मोक्ष पद को परम पुरुषार्थस्वरूप होने से सम्यग् ज्ञान' सम्यग दर्शन, सम्यक चारित्र लक्षण रत्नत्रय विषयक परम पौरुषलक्षण परम यत्नों से उपार्जित करना चाहिये वह पौरुष इष्ट साधनताज्ञान से उत्पन्न होता है, " मम इदम् इष्ट साधनम्" इस प्रकार का इष्टसाधनताज्ञान आप्त पुरुषों के उपदेश से होता है અહંદ ભગવાની ભારતી વાણુને નમસ્કાર કરીને મુનિવતી હું ઘાસીલાલ શ્રીજબૂદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિની પ્રકાશિકા વ્યાખ્યા પ્રારંભ કરૂં છું છા પ્રસ્તાવનાનો ગુજરાતી અનુવાદ આ પરમ આસાર સંસાર રૂપ ઘેર જંગલમાં આમ-તેમ ભટકવાથી ઉત્પન્ન થયેલ અનેક જાતના દુઃખ દાવાનલે થી અત્યંત સન્તતથયેલા નાના-મોટા બધાં પ્રાણીઓ સર્વથા ત્યાજ્ય એ દુઃખને સમૂળ વિનષ્ટ કરવામાં અસમર્થ થઈને અકામ નિર્જરાયાંગથી દુઃખના મૂલ નિદાનભૂત કર્મોને હળવા કરીને તેમને ત્યજવાની ઈચ્છાથી સમસ્ત કર્મોના ક્ષય-લક્ષણ નિરતિશય સુખસ્વરૂપ મેક્ષપદની અભિલાષા કરે છે, તે મોક્ષપદનું પરમ પુરૂષાર્થ સ્વરૂપ હોવાથી સમ્યગુ જ્ઞાન, સમ્યગ , દશન, સમ્યક ચારિત્ર લક્ષણ રત્નત્રય વિષયક પરમપરુષ લક્ષણ પરમયોથી દરેકને ઉપાર્જન કરવું જોઈએ. તે પૌરુષ ઈષ્ટ સાધન તાજ્ઞાનથી ઉત્પન્ન થાય छ. "मम इदं इष्ट साधनम् " तनुष्ट साधतना ज्ञान मास पुरुषांना उपहेशथी थाय Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मानतीर्थकुन्नामकर्मा कोऽपि विलक्षणो विचक्षणः परमः पुरुष एव भवति, तदुपदेशश्च गणधर स्थविरादिभिरङ्गोपाङ्गादि शास्त्रेषु प्रपञ्चितो विशदीकृतश्च वर्तते, तत्र आचाराङ्गादीनि द्वादशाङ्गानि प्रतीतान्येव, उपाङ्गान्यपि अङ्गैकदेशविस्तररूपाणि प्रत्यङ्गमेकैकसवात् द्वादशैव सन्ति, तत्राचाराङ्गस्य औपपातिकमुपाङ्गम् १, सूत्रकृदङ्गस्य राजप्रश्रीयम् २, स्थानाङ्गस्य जीवाभिगमः ३, समवायाङ्गस्य प्रज्ञापना ४, भगवत्याः सूर्यप्रज्ञप्ति: ५, ज्ञाताधर्मकथाङ्गस्य जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिः ६, उपासकदशाङ्गस्य चन्द्रप्रज्ञप्तिः ७, अन्तकृद्दशाङ्गादीनां दृष्टिवादपर्यन्तानाम् पञ्चानामप्यङ्गानां निरयावलिका श्रुतस्कन्धगतकल्पिकादिपञ्चवर्गाः पञ्च उपाङ्गानि सन्ति, तत्र अन्तद्दशाङ्गस्य कल्पिका ८, अनुत्तरौपपातिकदशाङ्गस्य कल्पातंसिका ९, प्रश्नव्याकरणस्य पुष्पिता १०, विपाकश्रुतस्य पुष्पचूलिका ११, यथार्थवक्ता को आप्त कहते हैं । जो कि केवलज्ञान के द्वारा सकल जीवाजीव पदार्थ समूह को जानने वाले निर्व्याज परोपकार परायण, करुणावरुणालय, तोर्थकृद् नामकर्मों का अनुभव करने वाले कोई विलक्षण विचक्षणविरले ही परम पुरुष होते है उन आप्त पुरुषों के उपदेशों को गणधर स्थविरादि महामुनियों ने अङ्गोपाङ्गादि शास्त्रों में विशदरूप से पल्लवित किया हुआ है । उनमें भी आचाराङ्गादि द्वादशाङ्ग प्रसिद्ध ही है । अङ्गैकदेश विस्तररूप उपाङ्ग भी प्रत्यङ्ग एक एक होने से द्वादश हो माने जाते हैं । उनमें आचाराङ्ग का औपपातिक उपाङ्ग है १, सूत्रकृताङ्ग का राजप्रश्रीय २, स्थानाङ्ग का जीवाभिगम ३, समवायाङ्ग का प्रज्ञापना ४, भगवतीसूत्रका सूर्यप्रज्ञप्ति ५, ज्ञाताधर्मकथाङ्ग का जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति ६, उपासक दशाङ्ग का चन्द्रप्रज्ञप्ति ७, अन्तकृद दशाङ्गादि दृष्टिवादपर्यन्त पांचों भी अङ्गों का निरयावलिका श्रुतस्कन्धगत कल्पिकादि पांच वर्ग पांच उपाङ्ग माने जाते हैं । उनमें अन्तकृद दशाङ्गका कल्पका ८, अनुत्तरौपपातिक दशाङ्ग का कल्पावर्तसिका ९ प्रश्नव्याकरण का पुष्पिता १०, विपाकत का पुष्पचूलिका ११, दृष्टिवाद का वृष्णिदशा १२, उपाङ्ग है । उनमें प्रस्तुत जम्बू ४ છે. યથા વક્તાને આમ કહે છે. કેવળ જ્ઞાન વડે સકળ જીવાજીવ પદાર્થ સમૂહ ના જ્ઞાતા, નિર્વ્યાજ પરાપકાર પરાયણ, કાવરુણાલય, તીકુ નામ કર્મને અનુભવનારા કાઈ વિલક્ષણ—વિચક્ષણ વિરલા પરમ પુરુષાજ આપ્ત હોય છે. તે માપ્ત પુરુષાના ઉપદેશને ગણધર સ્થવિરાદિ મહામુનિએએ અદ્ગોપાંગાદિ શાસ્ત્રોમાં વિશદરૂપથી પલ્લવિત કર્યાં છે. તે સČમાં આચારાષ્ટ્રાદિ દ્વાદશાìા પ્રસિદ્ધ છેજ. મૌકદેશ વિસ્તાર રૂપઉપાંગ પશુ પ્રત્યંગ એક-એક હાવાથી દ્વાદશજ માનવામાં આવેલ છે. તેમાં આચારાંગનું ઔપપાતિક ઉપાંગ છે ૧, સૂત્રકૃતાંગ નું રાજપ્રશ્નીય ૨, સ્થાનાંગનુ ં જીવાભિગમ ૩, સમવાયાંગનું' પ્રજ્ઞાપના ૪, ભગવતી સૂત્રનું સૂર્ય પ્રજ્ઞપ્તિ ય, જ્ઞાતાધમ કથાંગનું જમ્મૂદ્રીપ પ્રજ્ઞપ્તિ ૬, ઉપાસક દશાંગનું ચન્દ્રપ્રજ્ઞપ્તિ ઉપાંગ ગણાય છે ૭ તમજ અન્તકૃદ્દશાંગાદિ દૃષ્ટિવાદ પયંત પાંચે અંગેા, નિરયાવલિના શ્રુતસ્કંધગત કલ્પિકાદિ પાંચ વગેરે પણ પાંચ ઉપાંગેા ગણાય છે. તેમાં અન્તકૃદ્ઘશાંગનું કલ્પિકા ૮, અનુત્તરૌષપાતિકદશાંગનું કપાવત સકા-૯, પ્રશ્નવ્યાકરણનું પુષ્પિતા Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना दृष्टिवादस्य वृष्णिदशा १२, तत्र प्रस्तुतोपाङ्गम् जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिरूपगम्भीरार्थतयाऽतिगहनत्वादनुयोगरहितं मुद्रितराजकीय कमनीय कोशागारमिव न तदर्थाथिनामभीष्टफलदायकं भवतीति विभाव्य कोशाध्यक्षाज्ञया प्रेष्येण कोशागारस्योन्मुद्रणमिवविदुषा तदनुयोगः कृतः, सचानुयोगश्चतुर्विधो भवति, धर्मकथानुयोगः, गणितानुयोगः, चरणकरणानुयोगश्च, तत्र धर्मकथानुयोगः-उत्तगध्ययनादिकः, गणितानुयोगः-सूर्यप्रज्ञप्त्यादिकः, द्रव्यानुयोगः पूर्वाणि सम्मत्यादिकश्व, चरणकरणानुयोगश्च आचाराङ्गादिकः तत्रानुयोगशब्दार्थस्तु युज्यते सम्बध्यते भगवदुक्तार्थेन सहेति योगः-कथनलक्षणो व्यापारः अनुरूपोऽनुकूलो वा योगः अनुयोगः भगवदुक्तार्थानुरूपः प्रतिपादनलक्षणो व्यापारोऽनुयोग इति निष्कर्षः, तत्र यथा गणधरेण सुधर्म स्वामिना जम्बूस्वामिन प्रति भगवदुक्कार्थानुरूपद्वीप प्रज्ञप्ति रूप उपाङ्ग गम्भीरार्थक होने से अत्यन्त गहन है इसलिये अनुयोग रहित होकर यह उपाङ्ग बन्द किये हुए कमनीय राजकोय कोशागार की तरह तदर्थार्थी का अभीष्ट फलदायक नहीं हो सकता ऐसा समझकर कोशाध्यक्ष को आज्ञा से नोकर द्वारा कोशागार का उद्घाटन के समान विद्वानों ने उसका अनुयोग किया, वह अनुयोग चार प्रकार का हैं-धर्मकथानुयोग १, गणितानुयोग २, द्रव्यानुयोग ३, और चरण करणानुयोग ४, उनमें उत्तराध्ययनादि धर्मकथानुयोग कहलाता है, सूर्यप्रज्ञप्त्यादि गणितानुयोग, पूर्व और सम्मत्यादि द्रव्यानुयोग और आचाराङ्गादि वरण करणानुयोग कहलाता है, उनमें अनुयोग शब्द का अर्थ भगवान वीतराग के द्वारा उक्त अर्थ के साथ अनुरूप या अनुक्ल कथन रूप व्यापार को अनुयोग कहाजाता है इस प्रकार भगवदुक्तार्थानुरूप प्रतिपादनरूप व्यापार ही अनुयोग शब्द का निष्कर्ष होता है। उस में जैसे गणधर सुधर्मस्वामी ने जम्बुस्वामी के प्रति भगवदुक्तार्थानुरूप कथनरूप अनुयोग ૧૦ વિપાક શ્રતનું પુષ્પચૂલિકા-૧૧, દષ્ટિવાદનું વૃષ્ણુિદશી-૧૨ ઉપાંગ છે. તે સર્વમાં પ્રસ્તુત જબૂદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ રૂપ ઉપાંગ ગભરાર્થક હોવાથી અત્યંત ગહન છે. એટલા માટે રહિત થઈને આ ઉપાંગ બંધ કરવામાં આવેલા કમનીય રાજકીય કેશાગારની જેમ તદથર્થોને અભીષ્ટ ફળદાયક થઈ શકે નહિ આમ વિચારીને કેશાધ્યક્ષની આજ્ઞાથી નકર વડે કેશાગારને ઉઘાટિત કરાવવાની જેમ વિદ્વાને એ તેને અનુગ કર્યો તે અનુગ ચાર मारने। छ (१) धर्मानुय।। (२) गणितानुय।। (3) च्यानुयो। मने (४) २२५४२९।नुस. તેમાં ઉત્તરાધ્યયનાદિ ધર્મકથાનુગ” કહેવાય છે. સૂર્યપ્રજ્ઞત્યાદિ ગણિતાનુયોગ, પૂર્વ અને સમેત્યાદિ દ્રવ્યાનુગ અને આચારાંગાદિ ચરણકરણાનુગ કહેવાય છે. એમાં જે “અનુગ” શબ્દ છે, તેનો અર્થ થાય છે ભગવાન વીતરાગ વડે ઉક્ત અર્થની સાથે અનુરૂપ યા–અનુકૂલ કથન રૂપ વ્યાપાર. આ પ્રમાણે ભગવદ્ ઉક્તાર્યાનુરૂપ પ્રતિપાદન રૂપ વ્યાપારજ અનુગ શબ્દને નિષ્કર્ષ થાય છે. તેમાં જેમ ગણધર સુધર્મા સ્વામીએ જણૂ સ્વામી પ્રતિ ભગવદુકૃતાર્થનુરૂપ કથન રૂપ અનુગને એટલે કે ઉપકમ-નિક્ષેપ–અનુગમ-નયલક્ષણ ON नया .. .. . Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कथनरूपोऽनुयोगः उपक्रमनिक्षेपअनुगम-नयलक्षणानि चत्वारि द्वाराणि आश्रित्य कृत्तस्तथा अन्येनाप्याचार्येण शिष्येभ्यः सूत्रार्थकरूपोऽनुयोगः कर्तव्यः, यद्यपि सर्वेषामागमानामनुयोगः कर्तव्य स्तथाप्यत्र सूत्रे जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ते रनुयोगस्यैव प्रस्तुतत्वेन तस्या अनुयोगकरणे समर्थों हि सर्वेषामागमानामनुयोगकरणे समर्थों भवति, तस्मादनुयोगविधि जिज्ञासुना मुनिनाऽनुयोगद्वारसूत्रमध्येतव्यम् , अतएव--- "चूर्णीकृत्य पराक्रमान्मणिमयं स्तम्भं सुरः क्रीडया, मेरौ सन्नलिकासु वायुवशतः क्षिप्त्वा रजो दिक्षु तत् । स्तम्भस्तैः परमाणुभिः सुमिलितैलॊके यथा दुष्करः, संसारे भ्रमतो मनुष्यजननं जन्तोस्तथा दुर्लभम् " इत्युक्तिभणितमतिदुर्लभ मानुषं जन्म सम्प्राप्य मिथ्यात्वतिमिरविनाशकं श्रद्धा ज्योतिः प्रकाशकं तत्त्वातत्त्वविवेचकं सुधाधाराऽऽसारमियामरत्वप्रदायकं चञ्चच्चन्द्रचन्द्रिकामिव चकोरचेतसो हृदयावादकं स्वप्नदृष्टवस्तुनः पुनर्जाग्रदवस्थायां तल्लाभवत् प्रमोदसन्दोहजनकं भूमिगत प्राप्तनिधिमिव सुखजनकं सकलसन्तापहारकं धर्मश्रवणं समुपओ उपक्रम-निक्षेप-अनुगम-जयलक्षण चार द्वारों का आश्रय कर किया है, वैसे ही अन्य आचार्यो ने भी शिष्यों के लिये सूत्रार्थ कथन रूप अनुयोग करना चाहिये, यद्यपि सभी आगमों का अनुयोग करना चाहिये तथापि इस सूत्र में जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति के अनुयोग को ही प्रस्तुत होने से उसके अनुयोग करने में समर्थ पुरुष सभी आगमों के अनुयोग करने में समर्थ होते हैं इस लिये अनुयोग विधिका जिज्ञासु मुनि को अनुयोग द्वार सूत्र पढना चाहिये, अत एव 'र्णीकृत्य पराक्रमान्मणिमयं,, इस उक्ति भणिति के अणुसार अत्यन्त दुर्लभ मणुष्य जन्म को प्राप्त कर मिथ्यात्वरूप तिमिर का विनाशक, श्रद्धारूप ज्योति प्रकाशक, तत्वातत्व का विवेचक, सुधाधारा मुशलधारवर्षा के समान अमरत्व का प्रदान करने वाला चञ्चत् चन्द्र चन्द्रिका के समान चकोर चित्त सहृदय जनों का हृदयाह्लादजनक, स्वप्नदृष्ट वस्तु का जाग्रद् अवस्था में फिर से એ ચાર દ્વારેને આશ્રય કર્યો છે. તેમજ અન્ય આચાર્યોએ પણ શિબેનામાટે સૂત્રાર્થ કથનરૂપ અનુગ કર જોઈ એ. યદ્યપિ બધા આગમનો અનુગ કરવો જોઈએ તથાપિ આ સૂત્રમાં જમ્બુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિને અનુગ જ પ્રસ્તુત હોવાથી એને અનુયોગ કરવામાં સમર્થ પુરુષ સર્વ આગમના અનુયાગ માટે સમર્થ હોય છે. એથી અનુગ વિધિ માટે ज्ञासा राना२ भुनिने नये 'मनुयोगवा' सूत्रनु अध्ययन ४२. मेथी 'चर्णी कृत्य पराक्रमान्मणिमयम् " म ति भु४५ अत्यंत दुम मनुष्य सन्म प्रात शन મિથ્યાત્વ રૂપ તિમિર ને વિન કરનાર, શ્રદ્ધારૂપ જ્યોતિને પ્રકાશક, તવાતવને વિવેચક, સુધાધારા-મૂશળધાર વર્ષની જેમ અમરત્વ પ્રદાન કરનાર, ચંચત્ ચદ્ર-ચન્દ્રિકાની જેમ ચકર ચિત્ત, સહુદાના મનને આહ્માદિત કરનાર, સ્વપ્ન દષ્ટ વસ્તુ જાગ્રતાવસ્થામાં પુનઃ પ્રાપ્ત થાય તેમ, અત્યંત પ્રમોદાનન્દ જનક, ભૂમિગત પ્રાપ્ત નિધિની જેમ સુખ જનક, Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना लभ्य अपारसंसारसागरतरणतरणि मिथ्यात्वकषायतिमिर हरण द्युमणिं स्वर्गापवर्गसुखचिन्तामणि क्षकश्रेणिसरणिं कर्मरिपुदमनी केवलज्ञानकेवलदर्शनजननी श्रद्धामवाप्य, कर्मरजः प्रक्षालने जलमिव भोज भुजङ्गनिवारणे गारुडमन्त्रमिव कर्मघनाघनविकरणे पवनमिव केवलज्ञानभास्करप्रकटने प्राची दिशामिव साधनन्तमुक्तिसाम्राज्याभिलषितप्राप्तौ कल्पतरु मिव संयम लब्ध्या हेयोपादेय वस्तु स्वरूपनिरूपकाणि अव्याआधसुखजनकानि आचाराङ्गादि सूत्राणि विधिवदधीत्य, संसारवारिधिमहातरणिं शिवपदसरलसरणिं सिद्धिपददायक सकलगुणनायकम् अनादि संचिताष्टाविधकर्म बन्धनोच्छेदकं मिथ्यात्वग्रन्थिभेदकं सम्यग्ज्ञानवर्षण समर्थ सूत्र परमार्थ स्वपर समयरहस्यं च विज्ञाय तथाविधकर्मक्षयोपशमसम्भालाभ के समान, अत्यन्त प्रमोदानन्दजनक भूमिगत प्राप्त निधिकी तरह सुखजनक सकल सन्तापहारक धर्मश्रवण को प्राप्त कर अपारसंसार सागर को तैरने की नौका के समान, मिथ्यात्वकषाय रूप अन्धकार का विनाशक सूर्यके समान, स्वर्गापवर्गसुख का प्रदान कर्ता चिन्जामणिवत् क्षपक |णि को संर णरूप, कर्मरिपु का दमन करने वालो केवलज्ञान और केवलदर्शन की जननी श्रद्धा को प्राप्तकर कर्मरज के प्रक्षालन में जल के समान भोगरूप भुजङ्ग को दूर करने में गारुड मंत्र के समान, कर्मरूप घन घोर घटा को तितर बितर करने में पवन आंधी की तरह केवलज्ञानरूप सूर्य को प्रगट करने में पूर्व दिशा की तरह सादि अनन्त मुक्तिरूप अभिलषित साम्राज्य प्राप्ति में कल्पवृक्ष के समान संयम को प्राप्तकर हेयोपादेय वस्तुओं के स्वरूप का निरूपक, बाधरहितसुख का जनक आचाराङ्गादिसूत्रोको बिधी पूर्वक अध्ययन कर संसाररूप समुद्र की बड़ी नौका के समान शिवपद मोक्ष को सरल सरणि 'मार्ग" के समान सिद्धिपद का दायक, सकल गुण का नायक, अनादिभव द्वारा संचित (उपार्जित अष्टविध कर्मबन्धन का उच्छेदक मिथ्यात्व रूप ग्रन्थि का भेदक सम्यग्ज्ञान बर्षण समर्थ सूत्र के સકલ સન્તાપહારક, ધર્મશ્રવણને પ્રાપ્ત કરીને અપાર સંસાર સાગરને તરી જવા માટે નૌકા સમાન મિથ્યાત્વ કષાય રૂપ અન્ધકારને વિનષ્ટ કરનાર સૂર્ય સદશ સ્વર્ગાપવર્ગ સુખને આપનાર ચિતામણિવત્, ક્ષપક શ્રેણિની સરણિરૂપ, કમંરિપુને દમન કરનારી કેવળજ્ઞાન અને કેવળદર્શનનિ જનની શ્રદ્ધાને મેળવીને કમરજના પ્રક્ષાલન માટે જલ સમાન, ભેગ રૂપ ભજગને દૂર કરવા માટે ગાડમત્રવતુ , કમ ૨૫ ઘનઘોર ઘટાને છિન્ન-વિછિન્ન કરવામાં આંધીની જેમ, કેવળ જ્ઞાન રૂપ સૂર્યને પ્રકટ કરવામાં પૂર્વ દિશાની જેમ સાદિ, અનન્ત મુક્તિરૂપ અભિલષિત સામ્રાજ્ય પ્રાપ્તિમાં ક૯૫વૃક્ષની જેમ સંયમને પ્રાપ્ત કરીને હેપાદેય વસ્તુઓના સ્વરૂપને નિરૂપણ કરનારા, બાધરહિત સુખને ઉત્પન્ન કરનારા આચારાકાદિ સૂત્રોનું યથાવિધિ અધ્યયન-મનન કરીને સંસાર રૂપ સમુદ્રની મહાન નૌકા સદેશ શિવપદ મોક્ષની સરલ સરણિ “માર્ગની જેમ સિદ્ધિપદ દાતા, સકલ ગુણ નાયક, અનાદ ભવ દ્વારા સંચિત (ઉપાજિત) અર્વિધ કબજો છેદક મિધારૂપ ગ્રથિ-ભેદક, સમ્યગુ જ્ઞાન વર્ષણ સમર્થ સૂત્રના પરમ-અર્થ તેમજ સ્વપર સિદ્ધાન્ત રહસ્યને નણીને પૂર્વોત Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे विनीं सकलतत्त्व वरूपनिदहिनी द्रव्य गुण पर्यायविषयविज्ञां विशदाज्ञां समधिगत्य, प्रवचनानुयोगकरणे यतिभिर्यतितव्यम् , अनुयोग द्वारसूत्रमिदमावश्यकस्य अनुयोगतया द्रव्यानुयोगान्तर्गतमवसेयम् , प्रस्तुतशास्त्रस्य जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिरूपस्य क्षेत्रप्ररूपणात्मकत्वात् , तस्याश्च गणितसाध्यत्वात् गणितानुयोगेऽन्तर्भावोऽवसेयः अथैवमस्याः जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तेः गणितानुयोगतया साक्षात् मोक्षमार्गभूत रत्नत्रयानुपदेशकत्वात् चरणकरणात्मकाचारादि शास्त्राणामिव न मोक्षाङ्गत्वमितिचेत् अत्रोच्यते-साक्षान्मोक्षमार्गानुपदेशकत्वेऽपि तदुपकारितया परम्परया शेषाणामपि त्रयाणामनुयोगानां मोक्षाङ्गत्वे विरोधाभावात् । चरणपडिवत्ति हेऊ धम्मकहा कालि दिक्खमादीया । दविए दंसण सोही दंसण सुद्धस्स चरणं तु ॥१॥ छाया-चरणप्रतिपत्तिः हेतुः धर्मकथानुयोगः काले गणितानुयोगे दीक्षादीनि । व्रतानि शुद्ध गणितसिद्धे प्रशस्ते काले गृहीतानि प्रशस्त फलानि स्युः॥१॥ परमार्थ को और स्वपर सिद्धान्त रहस्य को जानकर पूर्वोक्त अष्टविध कर्म क्षयोपशम के द्वारा उत्पन्न होने वाली सकल तत्व स्वरूप को बतलाने वाली द्रव्यगुण पर्यायों के विषयों को जानने वाली विशदप्रज्ञा को प्राप्त कर प्रवचन अनुयोग करने में यतियों को प्रयत्नकरना चाहिये, इस अनुयोग द्वारसूत्र को आवश्यक का अनुयोगरूप होने से द्रव्यानुयोग के अन्तर्गत समझना चाहिये, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिरूप प्रस्तुत शास्त्र को क्षेत्र प्ररूपणात्मक होने से गणित साध्य क्षेत्र प्ररूपण की तरह गणितानुयोग में अन्तर्भाव समझना चाहिये, यह जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति गणितानुयोगात्मक ोने से साक्षात् मोक्षमागेभूत रत्नत्रय का अनुपदेशक है इसलिए चरण करणात्मकाचारादि शास्त्रों की तरह यह मोक्ष का अङ्ग नहीं माना जा सकता ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये क्योंकि साक्षात् मोक्षमार्गका उपदेशक नहीं होने पर भी तदपकारी होने से परम्परया शेष तीन अनुयोगों को भी मोक्षका अङ्ग मानने में कोई विरोध नही माना जा અષ્ટવિધ કર્મયોપશમ દ્વારા ઉ૫ન્ન થનારી સકલ તત્ત્વ સ્વરૂપને બતાવનારી, દ્રવ્યગુણ પર્યાના વિષયને જાણનારી, વિશદ પ્રજ્ઞાને પ્રાપ્ત કરીને પ્રવચન-અનુગ કરવામાટે યતિઓએ પ્રયત્ન કરવા જોઈએ આ “અનુગદ્વાર સૂત્ર આવશ્યકનાજ અનુગ રૂપ છે, એવું માનીને-દ્રવ્યાનુયેગની અંદર જ એનો અન્તર્ભાવ માનવો જોઈએ. જમ્બુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિરૂપે પ્રસ્તુત શાસ્ત્ર ક્ષેત્ર પ્રરૂપણમક હોવાથી, ગણિત સાધ્ય ક્ષેત્ર પ્રરૂપણાની જેમ ગણિતાનુગમાં અન્તર્ભાવ સમજ જોઈએ. આ “જમ્બુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ’ ગણિતાન ગાત્મક હોવાથી સાક્ષાત્ મેક્ષમાર્ગભૂતરત્નની અનુપદેશક છે, એથી ચરણ કરણાત્મકાચારાદિ શાની જેમ આ મોક્ષ નથી એવી શંકા કરવી યોગ્ય ન ગણાય. કેમકે આ સાક્ષાત મોક્ષમાર્ગેપદેશિક ન હોવા છ-એ, તદુપકારી હોવાથી, પરંપરા શેષ ત્રણ અનુયોગેને પણ મોક્ષ માટે અા રૂપ ગણવામાં ડાઈ પણ જાતનો વિરોધ હોઈ શકે નહિ. ४j ५ छे.-"चरण रडियति हेऊ" त्यादि यथानुयो। य२ प्रतिपत्तनात Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका सू. १ नमस्कारनिक्षेपाः मूलम् णमो अरिहंताणं तेणं कालेणं तेणं समएणं मिहिलाणामं णयरी होत्था, रिद्धस्थिमिय समिद्धा वण्णओ, तोसे णं मिहिलाए णयरीए बहिया उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए एत्थ णं माणिभद्दे णामं चेइए होत्था वण्णओ । जियसत्तराया, धारिणी देवी, वण्णओ तेणं कालेणं तेणं समएणं सामी समोसढे, परिमा णिग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडिगया ॥मू० १॥ छाया-नमोऽर्हदभ्यः तस्मिन् काले तस्मिन् समये मिथिला नाम नगरी आसीत् । ऋद्धस्तिमितसमृद्धा वर्णकः । तस्याः खलु मिथिलाया नगर्याः, वहिः उत्तरपौरस्त्ये दिग्भागे अत्र खलु माणिभद्रनाम चैत्यम् अभवत्, वर्णकः (जितशत्रुः राजा) धारिणी देवी, वर्णकः । तस्मिन् काले तस्मिन् समये स्वामी समवसृतः परिषद् निर्गता, धर्मः कथितः, परिषत् प्रतिगता ॥सू० १॥ टोका--'णमो अरिहंताणं इत्यादि नमोऽर्हद्भ्यः अर्हद्भ्यः अर्हन्त्यशोशाधष्ट प्रकाराणि परमभक्ति भरभरितसुरासुरसमूहविरचितानि जन्मान्तरसंजातानवच्छिन्नसम्यक्त्वमहालवालविरूढार्हद्गुणग्रामगानप्रभृति विंशतिस्थानक समाराधनजलाभिषिक्त तीर्थङ्करत्वमहातरुकल्पानि महाप्रातिहार्मणि, निखिलकर्मनिविडनिगडबन्धनबन्धापगमात् सिद्धिसौधशिखराऽऽरोपणं चेत्यर्हन्तः, अष्टमहाप्रातिहार्ययोग्या मुक्तियोग्याश्चेत्यर्थः, तेभ्योऽर्हद्भयो नमः सकता । कहा भी है के "चरणपडिवत्तिहेऊ" इत्यादि, धर्मकथानुयोग चरणप्रतिपत्ति का हेतु होता है गणितानुयोग काल में दीक्षा प्रभृतिव्रत शुद्धगणित सिद्ध प्रशस्त काल में गृहीत हो पर प्रशस्त फलवाले होते हैं। "णमो अरिहंताणं-तेणं कालेणं तेणं समएणं" इत्यादि । अर्हन्त भगवन्तों को नमस्कार हो, जो अष्ट प्रातिहार्यों से सुशोभित होते हैं वे अर्हन्त हैं, ये प्रातिहार्य अशोक वृक्ष आदि के भेद से आठ प्रकार के होते हैं-अर्हन्तों के सिवाय और किसी के ये नहीं होते हैं-इनके करने वाले परमभक्ति के भार से भरे हुए सुर और असुर होते હોય છે. ગણિતાનુગકાલમાં દીક્ષા પ્રભૂતિ વ્રત શુદ્ધ ગણિત સિદ્ધ પ્રશસ્તકાળમાં ગૃહીત થઈને પ્રશસ્ત કુળવાનું હોય છે. જમ્બુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિનું ગુજરાતી ભાષાન્તર णमो अरिहंताण-तेणं कालेणं तेणं समएण-इत्यादि. सूत्र-१ । અહંન્ત ભગવન્તને નમસ્કાર કે જેઓ અષ્ટ પ્રાતિહાર્યોથી સુશોભિત હોય છે તેઓ જ અન્ત છે. આ પ્રાતિહાર્યા શેકવૃક્ષ વગેરેના ભેદથી આઠ પ્રકારના હોય છે. અહંન્ત સિવાય બીજા કોઈને પણ આ હેતા નથી. એમને કરનારા પરમભક્તિના ભારથી યુક્ત સુર Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे नमस्कारः, 'तेणं कालेणं' तस्मिन् कालेअवसर्पिणी चतुर्थारकलक्षणे भगवच्छ्री महावीरस्वामीविहरणकाले, 'तेणं समएणं' तस्मिन्समये हीयमानलक्षणे, 'मिहिला णामं नयरी होत्था' मिथिलानाम्नी नगरी आसीत् । ननु सूत्रनिरूपणकालेऽस्याः सत्त्वेऽपि 'होत्था' इति भूतकालनिर्देशः कथमुचितः ? इति न शङ्कनीयम्, अस्मिन्नवसर्पिणीकाले शुभाभावाः प्रतिक्षणं हानिमुपगच्छन्तीतिहेतोस्तादृशविशेषण विशिष्टाया अस्या इदानीमसम्भवाद् भूतकालनिर्देशो न दोषावह इति । सा कीदृशी ? इति जिज्ञासायामाहहैं । जन्मान्तर-पूर्वभव में जिन्होंने अनवच्छिन्न सम्यक्त्व पूर्वक वोमस्थानों की आराधना से तीर्थकर नामकर्म को प्रकृति का बन्ध कर लिया होता है ऐसे मनुष्य ही इस भव में इन अष्ट महा प्रातिहायों के योग्य होते हैं, अथवा जो मुक्ति प्राप्ति के योग्य होते हैं वे अर्हन्त हैं, ऐसे अष्ट महाप्रातिहार्यो के योग्य और मुक्ति प्राप्ति के योग्य अर्हन्त भगवन्तों को यहां सूत्रकार ने नमस्कार किया है.। "तेणं कालेणं" इस अवसर्पिणी के चौथे आरे में जब कि भगवान् श्री महावीर स्वामी का विहार हो रहा था "तेणं समएण" और उस समय में-जो कि हीयमान स्वरूप था-आयु आदि की जिसमें प्रतिसमय हीनता हो रही थी-“मिहिला णामं णयरी होत्था" मिथिला नाम की नगरी थी, शंका-जब इस सूत्र का निरूपण हुआ है उस काल में इस नगरी का सद्भाव तो था हो-तो फिर यहां पर "होत्था" ऐसा भूत काल का निर्देश क्यों किया गया ? उत्तर-इस अवसर्पिणी-काल में शुद्ध भाव प्रतिक्षण हीनता की ओर से ही बढते रहते हैं-अतः जैसे विशेषणों का इसमें निर्देश किया गया है वैसे विशेषणोवाली यह नगरी इस सूत्र निरूपण के अवसर में नहीं અને અસુર હાય છે. જન્માન્તર-પૂર્વભવમાં જેમણે અનાવચ્છિન્ન સમ્યફવપ્રાપ્તિ પૂર્વક વીશ સ્થાનની આરાધનાથી તીર્થંકર નામકર્મની પ્રકૃતિને બધ કરેલ છે એવા માણસોજ આ ભવમાં આ અષ્ટ મહાપ્રાતિહાર્યો માટે એગ્ય હોય છે. અથવા જેઓ મુક્તિને પ્રાપ્ત કરવા ચગ્ય હોય છે, તેઓ અહંન્ત છે. એવા અષ્ટ મહાપ્રાતિહાયના ચેગ્ય અને મુક્તિ પ્રાપ્તિ માટે એગ્ય અહંત ભગવન્તોને અહી સૂત્રકારે નમસ્કાર કરેલ છે. ___तेणं कालेण" 240 अपिंाना याथा मारामा यारे मावान् महावीर स्वामीना विहा२ / २ह्यो हता, "तेण समर्पण” भने ते समये-ले हीयमान २१३५ तु-मायु. वगैरेनी २मा ४३ ४२४ क्षणे हीनता थई ही ती-"मिहिला णामं णयरी होत्था" મિથિલા નામે એક નગરી હતી. શંકા-જ્યારે આ સૂત્રનું નિરૂપણ થયું છે, તે કાલે તે નગરીને સદ્ભાવ તે હતે ४, ते ५छ। सही होत्था पारीत भूताना नि: शश। माटे ४२वामां आवे छ ? ઉત્તર–આ અવસર્પિણ કાળમાં શુભ ભાવે પ્રતિક્ષણ હીનતા તરફ જ વધતા રહે છે તેથી જેવા વિશેષણે આમાં નિર્દિષ્ટ કરવામાં આવે છે, તેવા વિશેષણેથી યુક્ત આ નગરી આ સૂત્રના નિરૂપણ વખતે રહી નહીં–બેથી અહીં ભૂતકાળને નિર્દેશ દોષયુક્ત નથી. Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटोका सू. १ नमस्कारनिक्षेपाः 'रिद्धस्थिमिय समिद्धा' इति, ऋद्धस्तिमितसमृद्धा तत्र-ऋद्धा-विभव-भवनादिभिः पौरजनैश्च वृद्धि प्राप्ता, स्तिमिता-स्वचक्रपरचक्रभयरहिता स्थिरेत्यर्थः, समृद्धा-धनधान्यादि समृद्धियुक्ता ऋद्धाचासौ स्तिमिता चासौ सगृद्धा चेति पदत्रयकर्मधारयः । 'वण्णओ' अस्याः वर्णकःवर्णनकारकः पदसमूह औपपातिकसूत्रे प्रथमसूत्रगत चम्पानगरी वर्णनवद्बोध्यः । 'तीसेणं मिहिलाए गयरीए बहिया' तस्याः-ऋद्धत्वादि सम्पन्नायाः खलु मिथिलाया नगर्याः बहिः-बहिः प्रदेशे, 'उत्तरपुरथिमे दिसीभाए' उत्तरपौरस्त्ये उत्तरपूर्वान्तरालरूपे दिग्भागे ईशानकोणे, 'एत्थणं' अत्र खलु 'माणिभद्दे णाम चेइए होत्था'माणिभद्रं-मणिभद्रनामकं चैत्यं व्यन्तरायतनम् आसीत् । 'बण्णओ' वर्णकः अस्यापि वर्णनपदसमूह औपपातिकसूत्रे द्वितीयसूत्रगतपूर्णभद्रचैत्यवर्णनवद् बिज्ञेयः, 'जियसत्तूराया जितशत्रनामा राजा आसीत । 'धारिणी देवी' तस्य जितशत्रराजस्य धारिणी-धारिणी नाम्नी देवी पट्टराज्ञी आसीत् । 'वण्णओ' वर्णकः-राज राज्ञीवर्णनपदसमूह औपपातिकत्र एकादश द्वादश सूत्रगत कूणिकराजधारिणीदेवी वर्णनववोध्यः ।। रही-इसलिये इसके निरूपण में भूतकाल का निर्देश दोषावह नहीं है । "रिस्थिमियसमिद्धा" उस समय यह नगरी ऋद्ध-विभव, भवन एवं पौर-जनों से वृद्धि को प्राप्त थी, स्तिमित-स्वचक्र और परचक्र के भय से रहित थी, समृद्ध धन धान्यादि रूप समृद्धि से परिपूर्ण थी “वण्णओ" इसका वर्णन कारक पदसमूह औपपातिक सूत्र में प्रथमसूत्र में चम्पा नगरी के वर्णन में जैसा कहा गया है वैसा ही है "तीसेणं मिहिलाए णयरीए बहिया उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए एत्थ णं माणिभद्दे णामं चेइए होत्था” इस मिथिला नगरी के बाहर ईशान कोण में माणिभद्र नाम का एक व्यन्तरायतन था "वण्णओ" इसका वर्णन औपपातिक सूत्र के द्वितीयसूत्र में वर्णित पूर्णभद्र चैत्य के जैसा ही है “जियसत्तू राया धारिणी देवी वण्णओ" इस नगरी का राजा जितशत्रु था और इसकी पट्टरानी का नाम धारिणी था, इन दोनों का वर्णन औपपातिक सूत्र के ११वें और १२ वे सूत्र मे वर्णित कूणिक राजा और उसकी देवी धारिणी के जैसा ही है 'तेणं कालेण तेणं समएणं सामी रिथिमियसमिद्धा ते सभये माना। *-विभव, मन मन परिना थी वृद्धिंગત હતી. સ્તિમિત-સ્વચક અને પરચકના ભયથી મુક્ત હતી. સમૃદ્ધ-ધન-ધાન્યાદિ ३५ समृद्धिथी परिपूछती. “वण्णओ" मा नगरीनु पन सौपयाति सूत्र ना प्रथम सूत्रमा पर्शित यानगरानावन नी रेभ छे. तीसेणं मिहिलाए णयरीए बहिया उत्तरपुरथिमे दिसीभाए पत्थणं माणिभद्दे णाम चेइए होत्था 24 मिथिला नगशनी महार शान शुमा मणिभद्रनाभनु मे व्य-तरायतन तु “वण्णओ" मार्नु पर्थन मौ५. पाति सूत्र न भी सूत्रमा पति पुन चैत्य छ "जियसत्तराया धारिणी देवी वण्णओं 24 नारीने। २an (Vतशत्रु तो मन तेनी ५४२७ नु नाम पाणि तुं આ બનેનું વર્ણન ઔપપાતિક સૂત્રના ૧૧ અને ૧૨ સૂત્રેમાં વર્ણિત કુણિક નરેશ અને तभनी हेवी पारिणी र १ छे. "तेणं कालेणं तेणं समएण सामी समोसढे" ते असे Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'तेणं कालेणं' तस्मिन्काले 'तेणं समएणं'-तस्मिन् समये खलु 'सामी समो सढे' स्वामी श्रीमहावीरप्रभुः समवसृतः-समबासरत् । समवसरणवर्णनमप्योपपातिकमुत्रस्य पीयूपवर्पणी टीकातो ग्राह्यम् । 'परिसा णिग्गया' परिषत् जनसंहतिः निर्गता नगरान्निस्सृता । 'धम्मो कहिओ' सदेवासुरमानुषपरिषदि भगवता श्रीमहावीरेण धर्म:-अगारधर्मोऽनगारधर्मश्च कथितः प्ररूपितः । सच 'अत्थिलोए अत्थिअलोए' इत्यादि औपपातिकसूत्रे षट्पञ्चाशत्तमसूत्रतो बोध्यः। 'परिसा पडिगया' परिपत्जनसंहतिः यामेव दिशं समाश्रित्य प्रादुर्भूता समागता तामेव दिशमाश्रित्य प्रतिगतापरावृत्य गता ॥सू० १॥ अथ परिपदि प्रतिगतायां सत्यां यज्जातं तदाहमूलम्-तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवओ महावीरस्स जे अंतेवासी इंदमूई णामं अणगारे गोयमगोत्तेणं सत्तुस्से हे समचउरंससंठाणसंठिए जाव तिखुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी ।।सू० २॥ छाया--तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य ज्येष्टोऽन्तेवासो इन्द्रभूति मानगारो गौतमोगोत्रेण सप्तौत्सेधः समचतुरस्त्रसंस्थानसंस्थितः यावत् त्रिकृत्वः आदक्षिणं प्रदक्षिणं करोति वन्दते नमस्यति वन्दित्वा नमस्यित्वा एवमवादीत् ।। सू० २।। टीका-'तेणं कालेणं' इत्यादि 'तेणं कालेणं तेणं समएणं' तस्मिन् काले तस्मिन् समये एतद् व्याख्या प्रथमसूत्रवबोध्या। 'समणस्स भगवओ महावीरस्स' श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य 'जेद्रे समोसढे" उस काल में और उस समय में वहां पर भगवान् महावीर स्वामी समवसृत हुएआये समवसरण का वर्णन भी औपपातिक सूत्र की पीयूष वर्पिणो टीका से जान लेना चाहिये "परिसा निग्गया" नगर से जनमेदिनी निकलो "धम्मो कहिओ" भगवान् ने गृहस्थ धर्म और मुनिधर्म की प्ररूपणा की यह उपदेश "अत्थिलोए अस्थि अलोए" इत्यादि रूप से औपपातिक सूत्र में ५६ वें सूत्र से जान लेना चाहिये, “परिसा पडिगया" धर्म सुनकर वह जन संहति जिस दिशा से आई थी उसी दिशा की तरफ वापिस चली गई ॥१॥ અને તે સમયે ત્યાં ભગવાન મહાવીર સ્વામી સમવસૃત થયા-પધાર્યા. સમવસરણનું वर्षन ५४ मौ५५तिसूत्रनी पीयूषवविएट ५२थी one से ये. "परिसा णिग्गया" नगरथी नमहिनी नीजी "धम्मो कहिओ भगवाने गृहस्थधम भने भुनिधर्मनी प्र३५। २ मा अपहेश “अत्थिलोए अत्थिअलोए त्यहि ३५मां औ५५ति सूत्र न। ५४ना सूत्रथा ती सवय. 'परिसा पडिगया' धर्म सामगीन ते ४५२५४२ દિશા તરફથી આવેલહતી તે તરફ પાછી જતી રહી. ૧ Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका सू० २ गौतमवर्णनम् ज्येष्ठः-सर्वतः प्रथमः 'अंतेवासी' अन्तेवासी-शिष्यः 'इंद भूईणामं अणगारे' इन्द्रभूतिः इन्द्रभूतिनामा अनगारः-अगारं-गृहं तत् अविद्यमानं यस्य सोऽनगारः-श्रमणः । स कीदृशः ? इत्याह-'गोयमगोत्तेणं' गोत्रेण गौतमः-गौतमगोत्रोत्पन्नः 'सत्तुस्सेहे' सप्तोत्सेधः-सप्तहस्तप्रमाणोच्चशरीरः 'समचउरंससंठाणसंठिए' समचतुरस्रसंस्थानसंस्थितःसमा:-तुल्या:-अन्यूनाधिकाः चतस्रोऽस्रयो-हस्त-पाद-पर्य धोरूपाश्चत्वारोऽपि विभागा यस्य तत् समचतुरस्रं-तुल्यारोह-परिणाहं, तच्च संस्थानम् आकार विशेष इति समचतुरस्र-संस्थानं,तेन संस्थितः युक्तः समचतुरस्रसंस्थानसंस्थितः । 'जाव' यावत् यावत्पदेनवज्रऋषभ-नाराचसंहननः, कनकपुलकनिकषपद्मगौरः, तथा-उग्रतपाः, दीप्ततपाः, तप्ततपाः महातपाः, उदारः, घोरः, घोरव्रतः, घोरगुणः, घोरतपस्वी, घोरब्रह्मचर्यवासीक उच्छूढशरीरः, संक्षिप्तविपुलतेजोलेश्यः, चतुर्ज्ञानोपगतः, सर्वाक्षरसन्निपाती इत्येषां पदानां सङ्ग्रहो बोध्यः। तत्र चतुर्दशपूर्वी वज्रऋषभनाराचसंहननः वज्र-कीलिकाकारमस्थि, ऋषभः "तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवओ महावीरस्त' इत्यादि । "तेणं कालेण तेणं समएणं' उस काल में और उस समय में 'समणस्त भगवओ महावीरस्स,, श्रमण भगवान् महावीर के 'जेटे अंतेवासी" ज्येष्ठ-प्रधान-अन्तेवासी शिष्य कि "इंदभूई णाम अणगारे" कि जिनका नाम इन्द्रभूति अनगार था “गोयम गोत्तेणं" और जो गौतम गोत्रोत्यन्न थे "संतुस्सेहे" तथा जिनका उत्सेध ७ हाथ का था “समचउरंस संठाणसंठिए" संस्थान जिनका समचतुरस्र था अर्थात्-हाथ पैर, ऊपर और नीचे ये चार अस्त्रियां-विभाग शरीर के प्रमाणानुरूप थे न कमथे और न अधिक थे; यावत्पद के अनुसार-संहनन इनका वन्नऋषभनाराच था जिसके द्वारा शरीर पुद्गल दृढ किये जाते है उसका नाम संहनन हैं ये संहनन शास्त्रकारों ने ६ विभागों में विभक्त किये हैं इनमें यह प्रथम संहनन है इस संहनन वाले जोव की जो अस्थि होती है वह कीलिका के आकार की होती है और इसके ऊपर परिवेष्टनपट्टी के जैसी तेणं कालेणं तेण समएण समणस्स भगवओ महावीरस्स-त्या. सूत्र-॥२॥ टीकार्थ-तेंण कालेण तेण समएणते मने ते समयमा 'समणस्त भगवओ महावीरस्स" श्रमय लगवान महावीरन। 'जेढे अंतेवासी" ये४-प्रधान-तवासीशिय 'दभई णाम अणगारे' भनु नाम चन्द्रभूत मारत "गोयमगोत्तणं" भने रेमो गौतम गोत्रमा उत्पन्न येत खता “सत्तुस्सेहे तथा मनो से अया ७ साथ रेटसोती_ 'समचउरंससंठाणसंठिए' संस्थान मनु सभयतु तु भ प ता नही તેમજ વધારે પણ ન હતા–ચાવ૫દ મુજબ- સંહનન–વજ ઋષભ નારાચ રૂપ-હતું જેના વડે શરીર પુદ્ગલો સુદૃઢ કરવામાં આવે છે, તેનું નામ સંહનન છે. એ સંહનને શાસ્ત્રકારો એ ૬ વિભાગ માં વિભક્ત કરેલ છે. આમાં આ પ્રથમ સહનન છે. આ સંહનનવાળા જીવની જે એસ્થિ હોય છે તે કીલિકાના આકાર જેવી હોય છે અને તેની ઉપર પરિષ્ટન Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तदुपरि-परिवेष्टनपट्टाकृतिकोऽस्थिविशेषः, नाराचम्-उभयतो मर्कटबन्धः, तथा च उभयोरस्योरुभयतो मर्कटबन्धनेन बद्धयोः पट्टाकृतिना तृतीयेनास्थ्ना परिवेष्टितयोरुपरि तदास्थित्रय पुनरपि दृढीकर्तुं तत्र निखातं कीलिकाकारं वज्रनामकमस्थियत्र भवति तद् वत्रऋषभनाराचम् । तत् संहननं-संहन्यन्ते दृढी क्रियन्ते शरीरपुद्गला येन तत् संहननम् अस्थिनिचयो यस्य स तथा । कनकपुलकनिकषपद्मगौर:-कनकस्य सुवर्णस्य पुलक:-खण्डम् तस्य निकषः-शाणनिघृष्टरेखा, 'पद्म' शब्दात्पद्मकिञ्जल्कं गृह्यते, तेन पद्म पद्मकिञ्जल्कं च, तद्वत् गौरः, यद्वा-कनकस्य सुवर्णस्य पुलकः सारो वर्णातिशयस्तत्प्रधानो यो निकषः-शाणनिघृष्टसुवर्णरेखा, तस्य यत् पक्ष्म-बहुलचं तद्वद् गौर:--शाणनिघृष्टानेकसुवर्णरेखावच्चाकचिक्ययुक्तगौरशरीरः, उग्रतपाः-उग्रं-विशुद्धं प्रवृद्धपरिणामत्वात् पारणादौ विचित्राभिग्रहत्वाच्च अप्रधृष्यमनशनादि द्वादशविधं तपो यस्य स तथा, तीव्रतपोधारीत्यर्थः दीप्ततपा:-दीप्तं-जाज्वल्यमानं तपो यस्य स तथा-वह्निरिव कर्मवनदाहएक और विशेष हड्डी होती है इस का नाम ऋषभ है उभयतो मकटबन्ध का नाम नाराच है तथाच दोनों हड्डियों के दोनों ओर से मर्कट बन्धन से बद्ध करके और पट्टाकृति के जैसी एक तृतीय हड्डो से परिवेष्टित करके पुनः इन तीनों हड्डियों को बहुत हो अधिकरूपसे मजबूत करने के लिये वे आपस में विधटित न हो जावें इस रूप से उन्हें दृढ बनाने के लिये जिस संहनन में कीलिका के आकार जैसी वज्र नामकी हड्डी हुकी रहती है उस संहनन का नाम वज्र ऋषभ नाराच संहनन है शाण के ऊपर-कसोटी पर कसे गये सुवर्ण की रेख एँ जैसी चाकचिक्य से युक्त होती हैं-चमकीली होती हैं और गौरवर्ण की प्रतीत हैं-ठोक इस प्रकार का इन गौतम का शरीर भी था ये उग्रतपस्वी थे पारणादि के समय ये विचित्र प्रकार के अभिग्रह को धारण करते रहते थे क्यों कि चारित्र विशुद्धि के प्रति इनके परिणाम सदा जागृति संपन्न बने रहते थे किसी भी ऐसी शक्ति नहीं थी जो इन्हें अनशनादि के भेद से १२ प्रकार के तप से च्युत कर सके इस तरह से ये तीव्र तप की आराधना में अपने आपको विसर्जित किये हुए थे जिस प्रकार अग्नि वन को पट्टी नारवा मे मील वधारानी अस्थि डाय छे. तेनु नाम ऋषम छ. उभयतो मर्कट વિશ્વ નું નામ નારાચ છે. તથાચ અને અસ્થિઓને બન્ને તરફથી મકટ બંધનથી બદ્ધ કરીને અને પટ્ટાકૃતિ જેવી એક ત્રીજી અસ્થિ વડે પરિવેષ્ટિત કરીને ફરી આ ત્રણે અસ્થિઓ ને બહુજ સુદઢ કરવા માટે તેઓ એક બીજીથી વિઘટિત થઈ ન જાય-આ પ્રમાણે તેમને સુદઢ બનાવવા માટે જે સહનનમાં કલિકાના આકાર જેવી વજ નામની અસ્થિ પરોવા ઈને હલ છે તે સં હનનનું નામ વજી ઋષભનારાંચ સહનન છે, શાણ પર–કસટી પરકસવામાં આવેલ સુવર્ણની રેખાઓ જેમ ચમકતી હોય છે અને મોરવણની પ્રતીત થાય છે. તેમ આ ગૌતમનું શરીર પણ હતું. એઓ ઉગ્રત સ્વી હતા પારણાદિના સમયે એ વિચિત્ર પ્રકારના અભિગ્રહો ધારણ કરતા રહેતા હતા કેમકે ચરિત્ર વિશુદ્ધિના પ્રત્યે એમના પરિણામે સર્વદા જાગૃતિ સંપન્ન રહેતા હતા. કેઈમાં પણ એવી તાકાત નહતી કે જેથી એમને અનશનાદિના ભેદથી ૧૨ પ્રકારના તપથી વિચલિત કરી શકે. આ પ્રમાણે તીવ્ર Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका स्. २ गौतमवर्णनम् कत्वेन, ज्वलत्तेजस्वीत्यर्थः, तप्ततपाः-येन तपसा ज्ञानावरणीयाद्यष्टकर्म भस्मी भवति तादृशं तपस्तप्तं येन स तथा, कर्म निर्जरणार्थ तपस्यावान् । महातपाः आशंसादोषरहितत्वात् प्रशस्ततपाः, उदारः-सकलजीवैः सह मैत्रीकरणात् प्रधानः, घोरः परीषहोपसर्गकषायशत्रुप्रणाशनविधौ भयानकः, घोरव्रतः-घोरं कातरैर्दुश्चरं व्रतं सम्यक्त्व शीलादिकं यस्य स तथा, घोरगुणः-घोरा:-अन्यैर्दुरनुचरा गुणा:-मूल गुणादयो यस्य स तथा । घोरतपस्वी घोरैस्तपोभिस्तपस्वी-कठिनतपोधारीत्यर्थः, घोरब्रह्मचर्यवासी घोरंदारुणं-कठिनम् अन्यैरल्प सत्त्वैर्दुष्करत्वाद्यद् ब्रह्मचर्य तत्र वस्तुं स्थातुं शीलवान् , उच्छ्रदग्ध करने में कसर नहीं रखती हैं ठीक इसी प्रकार से इनका उग्रतप भी कर्मरूप कान्तार को सर्वथा क्षपित करने में समर्थ था यही बात दीप्ततप विशेषण से स्त्रकार ने प्रकट की है । तप्ततपाः" पद से यह समझाया गया हैं कि तपस्या की आराधना ये किसी लौकिक कामना के वशवर्ती होकर नहीं कर रहे थे किन्तु कर्मों की निर्जरा होने के निमित्त से ही करते थे "महातपाः " इन्हें इसलिये कहा गया है कि जैसी तपस्या ये करते थे-वैसी तपस्या अन्य साधारण तपस्विजनों से होनी अशक्य थी ये बड़े उदाराशयवाले थे क्यों कि सकल जीवों के साथ इनका व्यवहार मैत्री भावसे युक्त था घोर ये इसलिये प्रकट किये गये हैं कि परीषह और उपसर्ग के आजाने पर ये विचलित नवीं होते थे तथा कषोयादि आत्मा के विकारी भावों को ये अपने पास तक नहीं आने देते थे ये विकारीभाव उनके समीप तक आने में भय खाते थे धोर व्रतकातरों से दुश्चर इनके व्रत-सम्यक्त्व शीलादिवत थे घोरगुण-मूलगुणादिक जो इनके गुण थे वे अन्य जनों द्वारा दुरनुचर थे घोरतपस्वी ये इसलिये थे कि ये कठिन से कठिन तपों की आराતપની આરાધનામાં તેઓ તલ્લીન હતાં. જેમ અગ્નિ વનને દગ્ધ કરવામાં કચાશ રાખતી નથી, તેમ એમનુઉગ્ર તપ પણ કર્મ રૂપ કાંતાર (વન) ને સર્વથા ક્ષપિત (વિનષ્ટ) કરવામાં समय तु मे पात 'दीप्ततप विशेषथी सूत्रारे ५८ ४१ छ 'तप्ततपाः ५६था આમ સમજાવવામાં આવ્યું છે કે તપસ્યાની આરાધના એઓ કોઈ લૌકિક કામના માટે ४२त। नडात। ५२ तु भनी नि२१ माटे ४ सय ४२ ता. "महातपाः” भने એટલા માટે કહેવામાં આવેલ છે કે જે જાતની તપસ્યા એઓ કરતા હતા. તેવી તપસ્યા બીજા સાધારણ તપસ્વીઓ માટે એકદમ અશકય જ હતી. એઓ બહુજ ઉદાર આશય युत त. भ स४७वानी साथे समान व्यवहार मैत्री भावY इता. याने चोर' એટલા માટે કહેવામાં આવેલ છે કે પરીષહ અને ઉપસર્ગથી એઓ વિચલિત થતા નહીં તેમજ કષાય આદિ આત્માના વિકારી ભાવે ને એ બહુજ દૂર રાખતા હતા. આ સર્વ (41। मेमनी पासे मातi भयभीत यता ता 'घोरवत' तथा दुश्वर अमना व्रतासभ्यत्व व्रता ता. 'धारगुण'-भूगुणा २ मेमना गुडता ते भन्यो। વડે દરનુચર હતા ઘેરતપસ્વી એઓ એટલા માટે હતા કે એઓ કઠણ માં કઠણ તપોની આરાધનામાં તલ્લીન હતા એ ઘર બ્રહ્મચર્યવાસી એટલા માટે હતા કે બીજા અલપસવ Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ढशरीरः-उच्छुढं-त्यक्तमिवत्यक्तं शरीरं तत्संस्कारपरिहाराद येन स तथा । संक्षिप्तविपुलतेजोलेश्या-संक्षिप्ता शरीरान्तर्गतत्वेन संकुचिता, विपुला विस्तीर्णा अनेक योजन परि मितक्षेत्रगतवस्तु भस्मोकरणसमर्था, तेजोलेश्या -विशिष्टतपोजनितलब्धिविशेषसमुत्पन्नतेजोज्वाला यस्य स तथा चतुर्दशपूर्वी-चतुर्दशपूर्वाण्यस्य सन्तीति चतुर्दशपूर्वी-चतुर्दशपूर्वधारी स चावध्यादि विकल्पोऽपि भवेदित्याह-चतुर्ज्ञानोपगतः-मति-श्रुत्य-वधि-मन:पर्यवज्ञानसम्पन्नः चतुर्दशपूर्वि चतुझेनोपगतेति विशेषणद्वयविशिष्टोऽपि कश्चिन्न समस्तश्रुतगतषिपयव्यापि ज्ञानवान् भवति चातुर्दश पूर्वधराणां षड्गुणहानिवृद्धिलक्षण षट्स्थानपतितत्वेन श्रूयमाणत्वात् , अतस्तन्निरासार्थमाह-सर्वाक्षरसन्निपाती सर्वे च ते अक्षरसन्निपाता अक्षर संयोगा, यद्वा-सर्वेषामक्षराणां सन्निपाता:-संयोगाः सर्वाक्षरसन्निपाताः ते ज्ञेयत्वेन सन्त्यस्येति सर्वाक्षरसन्निपाती सर्वाक्षरार्थ ज्ञानसम्पन्नः, एतादृश इन्द्रभूतिः, 'तिखुत्तो' श्रीमहावीर स्वामिनं विकृत्वः-वारत्रयम् , 'आयाहिणं पयाहिणं करेइ' आदक्षिणं प्रदक्षिणं करोति 'वंदइ णमंसइ' वन्दते स्तौति, नमस्यति-नमस्करोति, 'वंदित्ता णमंसित्ता' वन्दित्वा नमस्यित्वा च ‘एवं वयासी' एवम्-अनुपदं वक्ष्यमाणं वचनम् अवादीत्-उक्तवान् ॥१० २॥ धना में अपने आप को लगाये हुए थे घोर ब्रह्मचर्यवासी ये इसकारण थे कि ये अन्य अल्प सत्त्व वाले जीवों द्वारा जिसका पालन करना असंभव है उस कठिनातिकठिन ब्रह्मचर्य व्रत की नव कोटि से आराधना करते थे इन्होने अपने शरीर का संस्कार आदि करना बिलकुल छोड़ रक्खा था इसलिये ये उच्छुढ शरीर थे इन्हें जो तेजोलेश्या प्राप्त थी उसमें ऐसी शक्ति थी कि वह अनेक योजनों तक की वस्तु को भस्मसात् कर सकती थी पर वह उन्हों ने अपने भीतर ही संकुचित करके दबा रखी थी उसे कभी भी कार्यान्वित नहीं किया था यह तेजो विशिष्ट तपस्या से जनित लब्धिविशेष से उत्पन्न होती है ये चतुर्दशपूर्वो के पाठी थे साथ में मतिज्ञान श्रुतज्ञान अवधिज्ञान और मनः पर्यय ज्ञान के धारी थे और सर्वाक्षरार्थज्ञान संपन्न थे ऐसे इन इन्द्रभूति गणधरने भगवान् महावीर का तीन बार आदक्षिण प्रदक्षिण किया बन्दना की, नमस्कार किया, वन्दना नमस्कार करके फिर उन्होंने प्रभु से ऐसा पूछा ॥२॥ યુક્ત છ વડે જેમનું પાલન અશક્ય જેમહતું. તે કઠિનાતિકઠિન બ્રહ્મચર્યવ્રતની એએ નવકટિથી આરાધના કરતા હના. એમણે પોતાના શરીરના સંસ્કારો વગેરે કરવા ત્યજી દીધા હતા. એથી તેઓ ઉછૂઢ શરીર હતા એમને જે તે વેશ્યા પ્રાપ્ત હતી તેમાં એવી શક્તિ હતી કે તે ઘણું પેજને દૂરની વસ્તુને પણ ભસ્મ કરી શકે તેમ હતી. પણ તે તેને લેશ્યાને તેમણે પોતાના શરીરની અંદર જ સંકુચિત કરીને દબાવી રાખી હતી. તે વેશ્યાને તેમણે કઈ પણ દિવસે કાર્યાન્વિત કરી ન હતી, આ તેજે વિશિષ્ટ તપસ્યાથી જનિત લબ્ધિ વિશેષથી ઉત્પન્ન હોય છે. એ એ ચતુર્દશ પૂર્વના પાઠી હતા. અને એની સાથે મતિજ્ઞાન, શ્રત અવધિજ્ઞાન અને મનઃ પર્યયજ્ઞાનના ધારી હતા અને સર્જાક્ષરાર્થજ્ઞાન સંપન્ન હતા. એવા આ ઈદ્રભૂતિ ગણધરે ભગવાન મહાવીરની ત્રણ વાર આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણું કરી વન્દના કરી નમસ્કાર કર્યા વંદના નમસ્કાર કરીને પછી તેમણે પ્રભુને આ પ્રમાણે નિવેદન કર્યું. જાસૂરા Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. ३ जम्बूद्वीपविषयकप्रश्नोत्तरः किमुक्तवानिति प्रदर्शयितुमाह मूलम्-कहिणं भंते ! जम्बुद्दीवेदीवे ? के महालएणं भंते ! जंबुहोवे दीवे ? २ किं संठिएणं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे ३ किमायोरभावपडोयरेणं भंते ! जंबुद्दोवे दीवे ४ पण्णत्ते ? गोयमा ! अयण्णं जंबुदीवे दोवे सव्वदीवसमुदाणं सव्वब्भतराए ? सव्वखुड्डाए वट्टे तेल्ला पूयसंठाणसंठिए क्ढे रहचकवालसंठाणसंठिए वट्टे पुक्खरकण्णेिया संठाणसंठिए वट्टे पडिपुण्णचंदसंठाणसंठिए वट्टे ३ एगं जोयणसयसहस्सं आयामविखंभेणं तिण्णि जोयणसयसहस्साइं सोलस सहस्माइं दोण्णि य सत्तावीसे जोयणसए तिण्णिय कोसे अट्ठावीसं च धणुसयं तेरस अंगुलाई अद्धंगुलं च किंचि विसेसाहियं परिक्खेवेणं पण्णत्ते ॥सू०३॥ छाया--क्व खलु भदन्त ! जम्बूद्वीपो द्वीपः १, किं महालयः ? खलु भदन्त ! जम्बू द्वीपो द्वोपः २, किं संस्थितः ? खलु भदन्त ! जम्बूद्वीपो द्वीपः ३, किमाकारभावप्रत्यवः तारः ? खलु भवन्त ! जम्बूद्वीपो द्वीपः ४, प्रज्ञप्तः ? गौतम ! अयं खलु जम्बूद्वीपो द्वीप सर्वद्वीपसमुद्राणां सर्वाभ्यन्तरकः सर्वक्षुल्लकः वृत्तः तैलापूपसंस्थानसंस्थितः वृत्तः रथ चक्रवालसंस्थानसंस्थितः वृत्तः, पुष्करकर्णिका संस्थानसंस्थिनः वृत्तः परिपूर्णचन्द्रसंस्थान: संस्थितः वृत्तः ३, एकं योजनशतस्राणि द्वेच सप्तविशे योजनशते त्रयः कोशाः अष्टाविंश च धनुः शतं त्रयोदश अगुलानि अधांगुलं च किञ्चिद्विशेषाधिकं परिक्षेपेण प्रज्ञप्तः॥सू०३॥ टीका --- 'कहि णं भंते !' इत्यादि । इन्द्रभूतिः श्रीमहावीरं प्रति पृच्छति- हे भदन्त ! हे सुख कल्याणकारक ! भदन्त ! शब्दस्य विस्तरतो व्याख्याऽऽवश्यक "कहि णं भंते ! जंबुद्दोवे दीवे ? इत्यादि । टीकार्थ---हे भदन्त ! हे सुख कल्याण कारक ! “कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे ?,, किस स्थान परजम्बृद्धीप नाम का द्वीप कहा गया है ? यहां "गं" शब्द खलु शब्द के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है और यह इस वाक्य की अलंकृत करने के लिये आया है, इसी प्रकार से अन्य प्रश्न व.क्यों को हिर्ण भंते ! जंबुद्दीवे होवे ! इत्यादि सूत्र-३॥ साथ-3 महन्त ! सुमया ॥२४ ! 'कहि णं भंते जम्बुद्दीवे दीवे' ક્યા સ્થાન પર જબુદ્વીપ નામક દ્વીપ કહેવામાં આવેલ છે ? અહીં “” શબ્દ ઘ' શબ્દના અર્થમાં પ્રયુક્ત થયેલ છે અને આ શબ્દ આ વાકયને અલંકૃત કરવા માટે પ્રયુક્ત કરવામાં આવેલ છે. આ પ્રમાણે બીજા પ્રશ્ન વાકયે માટે Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सूत्रस्य मत्कृतायां मुनितोषिणीटीकायां विलोकनीया । क कस्मिन् स्थाने 'जंबूद्दीवे दीवे' १ जम्बू द्वीप:-जम्बूद्वीपनामको द्वीपः प्रज्ञप्तः १ इत्यग्रेऽपि खलु शब्दो वाक्यालङ्कारे । अनेन जम्बूद्वीपस्य स्थानं पृष्टवान् १, 'के महलएणं भंते ! जंबूद्दीवे दीवे २' तथा-हे भदन्त जम्बूद्वीपो द्वीपः किं महालयः किं प्रमाणो महान् आलयः आश्रयो व्याप्यक्षेत्ररूपो यस्य स तथा कियत्प्रमाणकमहत्त्वविशिष्टाऽऽश्रयसम्पन्नः अनेन जम्बूद्वीपस्य प्रमाणं पृष्टवान् ।२। 'कि संठिए णं भंते ! जंबूद्दीवे दीवे ३' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपो द्वीपः किं संस्थितः ? किं कीदृशं संस्थानम्-आकारो यस्य स कि संस्थानोऽस्ति ? एतेन जम्बूद्वीपस्य संस्थानं पृष्टवान् ।३। 'किमायारभाव पडोयारेणं भंते ! जंबूद्दीवे दीवे ४' तथा-हे भदन्त ! जम्बूद्वीपो द्वीपः किमाकारभावप्रत्यवतार:-कः कीदृशः आकारभावप्रत्यवतारः-तत्राऽऽकारः- स्वरूपं भावाः पृथिवीवर्षवर्षधर प्रभृतयस्तदन्तर्गताः पदार्थाः, तेषां प्रत्यवतार:-अवतरणं प्रकटीभावः इति यावत् यस्मिन् स तथा 'पण्णत्ते' प्रज्ञप्त:-कथितः । अनेन जम्बूद्वीपस्य स्वरूपं तदन्तर्वति पदार्थाश्च पृष्टवान् ।४। इत्येवं प्रश्नचतुष्टये कृते तदुत्तर श्रवणपरायणतामुत्पादयितुं तस्य जगत्प्रसिद्ध गोत्रनामोच्चारण पूर्वकामन्त्रणेन क्रमेण भगवानुत्तरयति-'गोयमा' इत्यादि । 'गोयमा' हे गौतम ! गौतमगोत्रोत्पन्न ! इन्द्रभूते ! 'अयण्णं जंबुद्दीवे दीवे' अयम् भी ऐसा ही जानना चाहिये, “भदन्त" शब्द की विस्तृत व्याख्या आवश्यक सूत्र की मुनि तौषिणी टीका में की जा चुकी है, अतः वहां से इसे देख लेना चाहिये, 'के महालए णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे ?,, तथा हे भदन्त ! जंबु द्वीप, नाम का द्वोप कितना विशाल कहा गया है ?,, 'किं संठिए णं जंबुद्दीवे दीवे ?' तथा-हे भदन्त ! इस जम्बूद्वीप का संस्थान कैसा कहा गया है ? "किमायार भावपडोयारे णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे ४,, ? तथा इस जम्बूद्वीप का आकार-स्वरूप कैसा कहा गया है ? ओर इसमें कौन से पदार्थ कहे गये हैं ? इसप्रकार से ये चार प्रश्न गौतम ने प्रभु से यहां पूछे हैं इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-"गोयमा! हे गौतम गोत्रोत्पन्न ? इन्द्रभूते !" 'अयण्णं जंवूद्दीवे दीवे सबद्दीवसमुदाणं सव्वन्भंतराए,, यह जो प्रत्यक्ष से दृश्यमान द्वीप है कि जहां पर हम सब रहते है इसी का नाम जम्बूद्वीप है यह जम्बूद्वीप नाम का द्वीप समस्तद्वीप પણ એવી રીતે જ સમજવું જોઈએ. ભદન્ત શબ્દની વિસ્તૃત વ્યાખ્યા આવશ્યક सूत्रनी भुलितोषियी टीम ४२वामां आवे छे. तेथीत त्यांची सभ देवी 'के महालए ण भते जंबुद्दीवे दीवे ?" ता महन्त ! मा पूदी५ नोभे द्वी५ हेटसा विशाण मां भाव छ? "fक संठिए णं जंबुद्दीवे २ ? तभी 3 महन्त ! म पूदीपर्नु सस्यान ४ामा मावत छ ? “किमायारभावपडोयारे णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे ४७ तम५ मा दीपन। मा४।२-२५३५-डेको छ ? अने मां / ४४ જાતના પદાર્થો છે ? આરીતે આ ચાર પ્રશ્નો ગૌતમે પ્રભુને અહીં પૂછયા છે. એનાં Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सृ० ३ जम्बूद्वीपविषयकप्रश्नोत्तरः प्रत्यक्षतो दृश्यमानः अस्मदादीनां निवासभूतः, जम्बूद्वीपो द्वीपः जम्बूद्वीप नामको द्वीपः 'सबद्दीवसमुदाणं सव्वभंतराए' १, सर्वद्वीपसमुद्राणाम्-सर्वेषां द्वीपानां-धातकोखण्डप्रभृतीनां तथासर्वेषां समुद्राणां लवणोदादीनां च सर्वाभ्यन्तरकः सर्वात्मना अभ्यन्तरः सर्वाभ्यन्तरः स एव सर्वाभ्यन्तरकः सर्वतिर्यग्लोकमध्यवर्तीत्यर्थः । इति प्रथमप्रश्नस्योत्तरम् १। 'सव्वखुडाए व? २' तथा-सर्वक्षुल्लकः सर्वेभ्यो द्वीपेभ्यः समुद्रेभ्यश्च क्षुल्लकः वृत्तः-गोलाकारः । इति द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् २। तथा वृत्तः वर्तुळः, स च छिद्रसहित वृत्तोऽपि स्यादित्यत आह-'तेल्लापूयसंठाणसंठिए बट्टे' इति ३, तैलापूपसंस्थानसंस्थितः तैलापूपः तैलेन पकोऽपूपस्तैलापूपः तैलपकाप्पोहि प्रायः परिपूर्ण वृत्तो भवति न तु घृतपकोऽपूपस्तथेवि तैलविशेषणम् । तद्वत् यत् संस्थानम्-आकारः और समुद्रों के बीच में रहा हुआ सब से पहिला द्वोप है इस प्रकार के कथन से प्रभुने प्रथम प्रश्न का उत्तर दिया है तात्पर्य इसका यही है कि धातको खण्ड आदिक जितने भी और असंख्यात द्वीप है, तथा-लवण समुद्रादिक जितने असंख्यात समुद्र हैं उन सब के बीच में यह जम्बूद्वीप नाम का द्वीप हैं । इस तरह यह जम्बूदोष नामका द्वीप समस्त तिर्यग्लोक के मध्य में रहा हुआ है । इसका विस्तार धातकी खण्ड आदिकों एवं लवण समुद्र आदिकों की अपेक्षा कम है जितने भी इसके सिवाय द्वीप और समुद्र है वे सब वलय के आकार जैसे गोल हैं-अतः इसकी गोलाई सब द्रोप और समुद्रों से कम है ऐसा यह द्वितोय प्रश्न का उतर दिया गय इसोलिये "सच खुड्डाए बट्टे" ऐसा सूत्रकार ने कहा है " तेल्लापूयसं ठाण संठिए व' रहचकवाल संठाण संठिए वट्टे,, इसका आकार जैसा तैल में तले हुए पुये का होता है वैसा है घृत में तले गये पुये का आकर पूर्णरूप से गोल नहीं हो पाता है इसलिए यहां तैल में तछे पुये के साथ में उत्तरमा प्रमुख छ-'गोयमा !” हे गौतम गोत्रोत्पन्न छन्द्रभूति ! “अयण्णं जंबुद्दीवे दीवे सबद्दीवसमुदाणं सवब्भंतराए" मारे समारी सामे प्रत्यक्ष भान દ્વીપ છે, ત્યાં અમે બધાં રહીએ છીએ, તેનું નામ જ જબુદ્વીપ છે. આ જબ કીપ નામક દ્વીપ બધા દ્વીપે તેમજ સમુદ્રોની વચ્ચે અવસ્થિત સૌથી પહેલે દ્વીપ છે. આ રીતે પ્રભુએ પ્રશ્નનો જવાબ આપે છે તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે ધાતકી ખંડ વગેરે જેટલા બીજા અસંખ્યાત દ્વીપ છે તથા લવ સમુદ્ર કિક જેટલા અસંખ્યાત સમુદ્રો છે, તે સર્વની મધ્યે આ જ બુદ્વીપ નામક દ્વીપ આવેલ છે. આ પ્રમાણે આ જ બૂદ્વીપ નામનો દ્વીપ સમસ્ત તિર્યલેકના મધ્યમાં આવેલ છે. આ વિસ્તાર ઘાતકીખંડ વગેરે તેમજ લવણ સમુદ્ર વગેરેની અપેક્ષા સ્વરુપ છે. એના સિવાય બીજા જેટલા દ્વીપ છે તેમજ સમુદ્રો છે તેઓ સર્વે વલયના આકાર જેવા ગેળ આકૃતિવાળા છે. આ દ્વીપ પણ ગાળ છે એથી એની ગોળ આકૃતિ સર્વ દ્વીપ અને સમુદ્રો કરતાં સ્વપ છે. આમ બીજા પ્રશ્નનો જવાબ मारवामां माध्ये. छे. मेथी । “सव्व खुड्डाए वट्टे' मा प्रमाणे इयु छ. "तेल्लापूय संठाणसंठिए बट्टे रहचकवालिद ठाणसंठिए वढे, पुखरकण्णिया संठाणसंठिए चट्टे सानो २ तawi man सपू। २ छे. धीमा तणेता अ५५ । मा२ સંપૂર્ણ પણે ગોળ થતો નથી એથી અહી તેલ માં તળેલા અપૂપની સાથે તેના ગોળ Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र तेन संस्थितः एतत्तु न्यो वृत्तः । 'रहचक्कबाल संठाण संठिए वट्टे' पुनः कीदृशो वृत्तः ? रथचक्रवालसंस्थानसंस्थितः रथशब्दोऽत्र रथाङ्ग (चक्र) परः, तेन स्थस्य-रथाङ्ग (चक्र) स्य यत् चक्रवालं-मण्डलं तद्वत् यत् संस्थानं तेन संस्थितः वृतः-वर्तुलः, तथा 'पुक्खर कणिया संठाणसंठिए वट्टे' पुष्करकर्णिका संस्थानसंस्थितः पुष्करं कमलं तस्य या कर्णिका-वीजकोशी तद्वत् यत् संस्थानं तेन संस्थित:-कमलमध्यभागाकारसंस्थितः एतादृशो वृत्तः, तथा 'पडिपुण्णचंद संठाणसंठिए बट्टे ३' परिपूर्णचन्द्रसंस्थानसंस्थित:परिपूर्णः षोडशकलासम्पन्नो यश्चन्द्रः तद्वत् यत् संस्थानं तेन संस्थितः अखण्डचन्द्रमण्डलाकार संस्थानसंस्थितः एवं वृत्तः । वृत्तत्व प्रदर्श नेनानोपमापदकथन नानादेशीय विनेयानां बुद्धिवैशद्यार्थम् । इति संस्थानविषयक तृतीयप्रश्नस्योत्तरम् ३। अथ सामान्यतः प्रागुक्तमेव प्रमाण विशेषतो दर्शयितुमाह-'एग इत्यादि । ‘एगं जोयण सयसहस्सं आयामविक्खंभेणं' एकं योजनशतसहस्त्रमायाम-विष्कम्भेण-आयामो दैध्ये-विष्कम्भ:-बिस्तारश्चेत्यनयोः समाहारद्वन्द्व आयाम-विष्कम्भं तेन-एकं योजन शतसहस्रं योजनलक्षम्-एकलक्षसंख्यकयोजनप्रमाण दैयविस्तारयुक्तो जम्बूद्वीप इति । इसके गोल आकार को उपमित किया गया है क्योंकि तैल में तले हुए पुये का आकार गोलाई परिपूर्ण होता है अथवा-रथ के पहिये का चक्र वाल जैसा गोल होता है उसी तरह की गोलाई इसकी है यहां रथ से रथ का चक्रग्रहीत हुआ है । अथवा पुष्कर- कमल कर्णिका जैसी पूर्णरूप गोल होती है वैसी गोलाई इसका है अथवा "पडिपुण्ण चंद संठाणसंठिए" अपनी १६ कलाओं से परिपूर्ण चंद्रमा को जैसो गोलाई होता है वैसो हो गोलाई इस जम्बूद्वीप नाम के द्वीप की है इस तरह गोलाई के दिखाने में जो ये नाना उपमान पदों का कथन किया है वह नानादेशीय बिनेय जानों की बुद्धि को विशदता के निमित्त कियागया है इस कथन से तृतीय प्रश्न का उत्तर सूत्रकार ने दिया है "एगं जोयण सयसहस्सं आयामविक्खंभेणं तिण्णि जोयणसय सहस्साइं सोलससहस्साई दोण्णि य सत्तावीसे जोयणसए तिण्णि य कोसे अट्ठावासं च धणुसयं આકાર ને ઉપમિત કરવામાં આવેલ છે કેમ કે તેલમાં તળેલા અપૂપ ને આકાર ગોલાકૃતિમાં પરિપૂર્ણ હોય છે. અથવા રથના પૈડાને ચક્રવાલ જે પ્રમાણે મેળ હોય છે તેમજ તે પણ ગેળ છે, અહી રથથી રથનું ચક્ર ચંડીત થયેલ છે. અથવા પુષ્કર-કમળ-ની કર્ણિકા २५ ५ ३५थी शेण खाय छे ती गे वाकृति मेनी छ. अथवा 'पडिपुग्ण वंदसंठाण संठिए" पातानी १६ मामाथी परिपू यद्रमा नीरवी गोल माइति डोय छ ती ४ ગેલાકૃતિ આ જંબુદ્વીપ નામના દ્વીપની છે. આ પ્રમાણે અહી ગાલાકત થી સંબદ્ધ અનેક ઉપમા પદેનું કથન કરવામાં આવ્યું છે તે નાનાદેશીય વિનેય (શિષ) જનની બુદ્ધિની વિશદતા માટે કરવામાં આવેલ છે. આ કથન થી ત્રીજા પ્રશ્નનો જવાબ સૂત્રકારે આપે छ. “एरां जोयणसयसहस्सं आयामविखमेणं तिणि जोयणसयसहस्पाइं सोलस सहस्साई दोण्णि य सत्तावीसे जोयणसए तिण्णि कोसे अट्टावीस च धणुस तेरसं अंगुलाई Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. ३ जम्बूद्वीपविषयकप्रश्नोत्तरः ननु जम्बूद्वीपस्य पूर्वतः पश्चिमं यावत् योजनलक्षं प्रमाणमभिहितं, तत्र पूर्व पश्चिमदिग्वति जगती मूलयोः प्रत्येक विष्कम्भो द्वादशयोजनप्रमाणः, ततश्च पूर्वोक्त लक्षप्रमाणे पूर्वपश्चिमदिगूवर्त्ति जगत्यो दिश द्वादश योजनात्मकं मूलविष्कम्भप्रमाणं संयोजितं तच्चतुर्विशत्यधिकैकलक्षयोजनं जम्बूद्वीपप्रमाणं वक्तव्यम् , एवं च पूर्वोक्तं मानं विरुध्यते इतिचेदाह-जम्बूद्वीपस्य यत् प्रमाणमभिहितं तज्जगतो मूलविष्कम्भप्रमाणापेक्षयैव । एवं लवणसमुद्रस्यापि यल्लक्षद्वयं प्रमाणमभिहितं तद् लव. णसमुद्र जगती मूलविष्कम्भमादायैव । एवमन्यान्य द्वीप समुद्रविषयेऽपि विज्ञेयम् । यदि द्वीपसमुद्रमानाज्जगतीमानं पृथग् भण्येत, तदा मनुष्यक्षेत्रप्रमाणं यत् पञ्च. चत्वारिंशल्लक्षयोजनप्रमाणमभिहितं तद् विरुध्येत । अतो जगतीविष्कम्भप्रमाणमादातेरस अंगुलाइ अद्वंगुलं च किंचि विसेसाहियं परिक्खेवेणं पण्णत्ते" इसकी लम्बाई चौड़ाई एक लाख योजन की है शंका-जम्बूद्वीप का जो पूर्व पश्चिम तक एक लाख योजन का प्रमाण कहा गया है वहां पूर्व पश्चिम दिग्वर्ती जगती और मूल का प्रत्येक का विष्कम्भ प्रमाण १२-१२ यों नन का है अतः एक लाख योजन में २४ योजनात्मक इस प्रमाण को मिलाने से एक लाख २४ योजन का प्रमाण इसका कहना चाहिये था सों केवल इसकी लम्बाई का यह १ एक लाख योजन का प्रमाण विरूद्ध पड़ता है। उत्तर-यहां जो जम्बूदीप का प्रमाण कहा है वह जगती और मूल के विष्कम्भ प्रमाण को अपेक्षा से हो कहा है, इसी तरह लवण समुद्र का जो दो लाख योजन का प्रमाण कहा गया है वह लवण समुद्र की जगती और मूल विष्कम्भप्रमाण को लेकर ही कहा गया जानना चाहिये इसी तरह का कथन अन्य द्वीप और समुद्रों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिये यदि द्वीप समुद्रों के प्रमाण पृथक् कहा जाता तो मनुष्यक्षेत्र का जो प्रमाण ४५ लाख योजन का कहा गया हैं उसमें विरोध आता है' अतः जगतो विष्कंभ प्रमाण अद्धंगुलं च किंचि विसेसाहियं परिणखेवेणं पण्णत्ते” मामा , योडाछ में योन જેટલી છે શંકા–જબૂદ્વીપનું પ્રમાણ પૂર્વ પશ્ચિમ સુધીનું એક લાખ જન જેટલું કહેવામાં આવેલ છે ત્યાં પૂર્વ પશ્ચિમ દિગ્ય જગતી અને મૂલનું પ્રત્યેકનું વિક્ભ પ્રમાણ ૧૨ ૧૨ જન જેટલું છે. એવા એક લાખ યોજનમાં ૨૪ ચાજનાત્મક આ પ્રમાણુને એકત્ર કરવાથી એક લાખ ૨૪ જન નું પ્રમાણ આનું છે તેમ કહેવું જોઈએ પરંતુ અહીં તે ફકત આની લંબાઈ પહોળાઈનું એક લાખ યોજન પ્રમાણ નિરૂપિત કરવામાં આવેલ છે તે ઉપરોકત રીતે એક લાખ એજનનું કથન વિરૂદ્ધ પડે છે. ઉત્તર–અહીં જંબૂ દ્વીપનું પ્રમાણુ કહેવામાં આવેલ છે તે જગતી અને મૂલના વિપ્નભ પ્રમાણુની અપેક્ષાથી જ કહેવા માં આવેલ છે. આ પ્રમાણ લવણું સમુદ્રનું જે બે લાખ જન જેટલું કહેવામાં આવેલ છે તે લવણું સમુદ્રની અંગતી અને મૂલવિઝંભ પ્રમાણના આધારે જે કહેવામાં આવેલ છે. જે આ પ્રમાણે બીજા દ્વીપ અને સમુદ્રોના વિશે પણ જાણી લેવું જોઈએ. જે દ્વીપ સમુદ્રના પ્રમાણુ થી જગતીનું પ્રમાણ અલગ કહેવામાં આવે તે મનુષ્યક્ષેત્રનું જે પ્રમાણ ૪પ લાખ જન જેટલું કહેવામાં આવેલ છે, તેમાં વિરોધ લાગે છે. એથી જગતીના વિકૅભ પ્રમાણુ Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्रोपप्रज्ञप्तिसूत्रे यैव द्वीपसमुद्राणां प्रमाणं विवक्षितमितिविज्ञेयमिति । तथा 'तिणिजोयण सयसहस्साई' त्रीणि योजनशतसहस्राणि त्रीणि लक्षाणि 'सोलससहस्साई' षोडश सहस्राणि योजनानि 'दोन्निय सत्तावीसे जोयणसए' द्वे योजनशते सप्तविशे सप्तविंशत्यधिके 'तिण्णियकोसे' त्रयः-त्रिसंख्यकाः क्रोशाः, 'अट्ठावीसं च धणुसयं' अष्टाविंशम्-अष्टाविशत्यधिकं धनुः शतं 'तेरस अंगुलाई” त्रयो शाङ्गुलानि 'अद्धं गुलं च किंचिविसेसाहिय परिक्खेवेणं पण्णत्ते' अधोमुलं च किञ्चिद्विशेषाधिकमित्येतावान् परिक्षेपेण परिधिना जम्बूद्वीपो द्वीपः प्रज्ञप्तः ॥सू०३॥ अथाऽऽकारभावप्रत्यवतारविषयकप्रश्नस्योत्तरमाह मूलम्-से ण एगाए वईरामईए जगईए सव्वओ समंता संपरिक्खित्ते । सा णं जगई अट्ठ जोयणाई उड्ढे उच्चत्तेणं, मूले बारस जोयणाई विक्खंभेणं, मज्झे अट्ठ जोयणाई विक्खंभेणं, उवरिं चत्तारिजोयणाई विक्खंभेणं, मूले वित्थिन्ना मज्झे संखिता उवरि तणुया गोपुच्छसंठाणसंठिया सब्बवइरोमई अच्छा सहा लण्हा घट्ठा मट्ठा णीरया निम्मला णिप्पंका णिक्कंकटच्छाया सप्पभा समरीइया सउज्जोया पासाइया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा । सा णं जगई एगेणं महंतगवक्खकडएणं सव्वओ समंता संपरिक्खित्ता । से णं गवक्खकडए अद्धजोयणं उठें उच्चत्तेणं पंच धणुसयाई विक्खंभेणं सव्वरयणामए अच्छे जाव पडिरूवे। तीसेणं जगईए उप्पि बहुमज्झदेसभाए एत्थणं महई एगा पउमवरवेइया पण्णत्ता, अद्धजोयणं उर्दू उच्चत्तेणं पंच धणुसयाई विक्खभणं जगई समिया परिक्खेवेणं सव्व. रयणामई अच्छा जाव पडिरूवा । तीसेणं पउमवरवेइआए अयमे को लेकर ही द्वीप समुद्रों का प्रमाण कहा है ऐसा जानना चाहिये इस जम्बू द्वीप की परिधि का प्रमाण ३ लाख १६ हजार दो सौ २७ योजन एवं ३ कोश २८ धनुष १३॥ अंगुल से कुछ अधिक हैं ॥३॥ ને લઈને જ દ્વીપ સમુદ્રોનું પ્રમાણુ કહેવામાં આવેલ છે, આમ સમજવું જોઈએ. આ જ બુદ્વીપની પરિધીનું પ્રમાણ ૩૩ લાખ ૧૬ હજાર બસે ૩૭ (૩૩૧૬૨૩૭) જન અને ૩ કેશ ૨૮ ધનુષ ૧૩ અંગુલ કરતાં કંઈક વધારે છે. આવા Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. ४ जम्बूद्वीपप्राकारभूतजगत्याः वर्णनम् यारूवे वण्णावोसे पण्णत्ते, तं जहा वइरामया णेमा एवं जहा जीवाभिगमे जोव अठो जाव धुवा णियया सासया जाव णिचा ॥सू०४॥ छाया-स खलु एकया वज्रमय्या जगत्या सर्वतः समन्तात् सपरिक्षिप्तः । सा खलु जगतो अष्टयोजनानि उर्ध्वमुच्चत्वेन, मूले द्वादश योजनानि विष्कम्भेण, मध्ये अष्टयोजनानि विकम्भेण, उपरि चत्वारि योजनानि विष्कम्मेण, मूले विस्तीर्णा मध्ये संक्षिप्ता उपरि तनुका गोपुच्छसस्थानसंस्थिता सर्ववज्रमयी अच्छा प्रलक्षणा घृष्टा मृष्टा नीरजाः निर्मला निष्पङ्का निष्कङ्कटच्छाया सप्रभा समरीचिका सोयोता प्रासादीया दर्शनीया अभिरूपा प्रतिरूपा, सा खलु जगती एकेन महागवाक्ष कटकेन सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्ता स खलु गवाक्षकटकः अर्द्धयोजनम् ऊर्ध्वम् उच्चत्वेन पञ्चधनुः शतानि विष्कम्मेण, सर्वरत्नमयः अच्छः यावत् प्रतिरूपः, तस्याः खलु जगत्या उपरि बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु महती एका पद्मवरवेदिका प्रशष्ता, अद्धयोजनम् ऊर्ध्वम् उच्चत्वेन, पञ्चधनुः शतानि विष्कम्भेण जगतीसमिता परिक्षेपेण सर्वरत्नमयी अच्छा यावत् प्रतिरूपाः । तस्याः खलु पद्मवरवेदिकायाअयमेतद्पो वर्णावासः प्रज्ञप्तः तद्यथा-वज्रमया नेमाः एवं यथा जोवाभिगमे यावत् अर्थः ध्रुवा नियता शाश्वती यावत् नित्या ॥ सूत्र० ४ ॥ ___टीका- “से णं एगाए" इत्यादि-से णं एगाए बइरामईए जगईए' सः-अनन्तरोक्तो जम्बूद्वीप नामा द्वीपः खलु वक्यालङ्कारे, एकया एकसंख्यया वज्रमय्या वज्ररत्नमय्या जगत्या-जम्बूद्वीपप्राकाररूपया द्वीपसमुद्रसीमाकारिण्या, 'सव्वओ समंता संप. रिक्खित्ते' सर्वतः सर्वदिक्षु समन्तात् सर्वदिक्षु संपरिक्षिप्तः-सम्यक् परिवेष्टितः । 'सा णं जगई अट्ठ जोयणाई उड्दं उच्चत्तेणं' सा च जगती अष्टयोजनानि ऊर्ध्वम् उपरि उच्चत्वेन-उच्छ्रयेण प्रज्ञष्तेत्यग्रेण सम्बन्धः एवमग्रेऽपि । 'मूले बारस जोयणाई विक्खंभेणं' मूले-मूलभागे विष्कम्भेण--विस्तारेण द्वादश योजनानि मज्झे अद्वजोयणाइं विक्खं " से णं एगाए वईरामईए जगईए " इत्यादि । ___टोकार्थ --- यह जम्बूद्वीप नाम का द्वीप एक वनमयी जगती से-द्वीप समुद्र की सीमाकारी कोट से- “सवओ समंता" चारों ओर से अच्छी तरह से घिरा हुआ है "सा णं जगई अट्ट जोयणाइ उड्हें उच्चत्तेणं मूले बारस जोयणाई विक्खंभेणं, मज्झे अट्ठ जोयणाइ विक्खंमेणं" यह प्राकार रूप जगती आठ योजन की ऊँची है मूल में बारह योजन की विष्कम्भवाली है मध्य में आठ से णं एगाए बई रामईए जगईए सवओ समता, इत्यादि ॥ सूत्र ४॥ ટીકાથ-આ જ ખૂદ્વીપ નામક દ્વીપ વામણી જગતી થી-દ્વીપ સમુદ્રની સીમાકારી કટથી"सधओ समंता” योभेर सारी शत आवृत्त छे. “सा णं जगई अट्ठ जोयणाई उइद उच्च त्तेण मूले बारस जोयणाई विक्खंभेण, मज्झे अट्ठजोयणाई बिखंमेण" | प्रा१२ ३५ જગતી આઠ જન જેટલી ઊંચી છે. મૂલમાં બાર યોજન જેટલી વિધ્વંભવાળ છે. મધ્યમાં मायेन र विस्तारपणी छे, "उवरिं चत्तारि जोयणाई विक्खंमेण' ५२मा । Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे भेणं' मध्ये-मध्यभागे विष्कम्भेण अष्टयोजनानि 'उवरिं चत्तारि जोयणाई विक्खंभेणं, उपरि ऊर्वभागे विष्कम्भेण चत्वारि योजनानि । अतएवाह-'मूले वित्थिन्ना मूले विस्तीर्णाद्वावशयोजनविष्कम्भसम्पन्नत्वात्, 'मज्झे संखित्ता, मध्ये-संक्षिप्ता-मूलापेक्षयाऽल्पप्रमाणा अष्टयोजनप्रमाणविष्कम्भसम्पन्नत्वात् , उवरि 'तणुया' उपरि-उप्रभागे तनुका -मूलमध्यापेक्षया इस्वा चतुर्योजनप्रमाणविष्कम्भसम्पन्नत्वात्, अतएव" 'गोपुच्छ संठाणसंठिया' गोपुच्छ संस्थानसंस्थिता गोपुच्छम् ऊर्वीकृत गोपुच्छ क्रमशः बहुमध्यमाल्पप्रमाणं भवति तद्वत् यत् संस्थानम्-आकारः तेन संस्थिता, 'सबवइरामई' सर्ववज्रमयी-सर्वात्मना-सामस्त्येन वज्ररत्नमयी सा कीदृशीति वर्ण्यते-"अच्छे" त्यादि, 'अच्छा' अच्छा-आकाश स्फटिकवत् स्वच्छा 'सण्हा' श्लक्ष्णा-लक्ष्ण पुद्गलस्कन्धनिष्पन्ना श्लक्ष्णसूत्रनिष्पन्न पटवत्, पुनः 'लण्हा' श्लक्ष्ण-चिक्कणा धुण्टितपटवत्, 'घट्टा' घृष्टाधृष्टेऽवघृष्टा खरशाण निधृष्टपाषाणखण्डवत् 'मट्ठा' मृष्टा-मृष्टेव मृष्टा-कोमलशाणघृष्टपाषाणखण्डवत्, ‘णीरया' नीरजा:-स्वाभाविकरजोवर्जिता, 'निम्मला' निर्मलायोजन की विस्तार वाली है "उवरिं चत्तारि जोयणाई विक्खभेणं" ऊपर में यह चार योजन की विस्तार वाली है इस तरह यह मूल में विस्तीर्ण है, मध्य में संक्षिप्त है और ऊपर में पतली हो गई है अत एव इस जगती का आकार ‘गोपुच्छ के आकार जैसा हो गया है यह जगती "सव्ववरामई अच्छा, सण्हा, लण्हा घट्ठा, मट्ठा, णीरया, नीम्मला, णिप्पंका, णिक्कंकडच्छाया, सप्पभा, समरीइया, सउज्जोया, पासाईया दरिसणिज्जा, अभिरूवा पडिरूवा" सर्वात्मना वज्ररत्न की बनी हुई है, तथा यह आकाश और स्फटिक मणि के जैसी अतिस्वच्छ है, लक्ष्ण सूत्र से निर्मित पट कि तरह यह श्लक्ष्णपुद्गल स्कन्ध से निर्मित हुई है. अत एव यह सब से श्रेष्ट है तथा घुटे हुए बस्त्र की तरह यह चिकनी है, खरशाण से घिसे गये पाषाण की तरह यह घृष्ट है, कोमल शाण से घिसे गये पाषाणखण्ड को तरह यह मृष्ट है स्वाभादिक रज से रहित होने से यह नीजर है आगन्तुक मैल से रहित होने से यह निर्मल है, कर्दमरहित होने से यह निष्पङ्क है , आवरण ચાર યોજન જેટલી વિસ્તારયુક્ત છે આ પ્રમાણે આ મૂલમાં વિસ્તીર્ણ છે, મધ્યમાં સંક્ષિપ્ત छ, भने ०५२मां पाती थ/ गई छ. मेथी मागताना मा.२ "गोपुच्छसंठाणसंठिया" गोपुछन५४२ । २७ गये। छे. ती "सव्व वईरोमई अच्छा सण्हा, लण्हा, घट्टा, मट्ठा, नीरया, निम्माला, जिप्पंका णिक्कंकडच्छाया सप्पभा समरीइया, सउज्जोया, पासाईया दरिसणिज्जा, अभिरूवा, पडिरूवा," सर्वात्मना 400 रत्ननी मनी છે, તેમજ આ આકાશ અને સ્ફટિકમાણિ જેવી અતિ સ્વચ્છ છે, લફરું સૂત્ર નિર્મિત પટની જેમ આ લક્ષણ પુગલ સ્કલ્પથી નિર્મિત થયેલી છે એથી આ લષ્ટ-શ્રેષ્ઠ–છે તેમજ ઘૂંટેલ વસ્ત્રની જેમ આ સુચિવણ છે. ધાર કાઢવાના પથ્થરથી ઘસેલા પાષાણની જેમ આ વૃષ્ટ છે. કોમળ શાણથી ઘસેલા પાષાણ ખંડની જેમ આ મૃષ્ટ છે. સ્વાભાવિક રજથી રહિત હેવા બદલ આ નીરજ છે. આગંતુક મેવથી રહિત હોવા બદલ આ નિમેળ છે. કમ Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २५ प्रकाशिका टीका सू० ४ जम्बूद्वीपप्राकारभूतजगत्याः वर्णनम् आगन्तुकमलरहिता, 'णिप्पंका' निष्पङ्का-पङ्क-रहिता निष्कदमा, तथा 'णिक्कंकटच्छाया' निष्कङ्कटच्छाया आवरण रहितत्वाव्याहत प्रकाशा 'सप्षभा' सप्रभा-स्वरूपतः प्रभासम्पन्नाः, प्रकाशमानेत्यर्थः, 'समरोइया' समरीचिका-किरणसम्पन्ना वस्तुजातप्रकाशि केत्यर्थः, 'सउज्जोया' सोयोता निरन्तरदिग्विदिक् प्रकाशिका, तथा 'पासाईया' प्रासादीका-प्रसादो-मनः प्रसन्नता, स प्रयोजनं यस्या इति प्रासादीया हृदयोल्लास कारिणी । 'दरिसणिज्जा' दर्शनीया-रमणीयतया क्षणे क्षणे द्रष्टुं योग्या, 'अभिरूवा' अभिरूपा-अभिमतमनुकूलं रूपं यस्याः सा तथा-सर्वथा दर्शकजनमनमनोहारिणी । 'पडिरूवा' प्रतिरूपा-अपूर्व चमत्कारसमुत्पादिका । असाधारणरूप सम्पन्नेत्यर्थः । यद्वा प्रति प्रतिक्षणं नवं नवमिव रूपं यस्याः सा तथा । ___ 'सा णं जगई' सा च खलु जगती 'एगेणं महंत गवक्ख कडएणं' एकेन अनुपमेन महागवाक्षकटकेन-विशाल जालक समूहेन 'सबओ समंता संपरिक्खित्ता' सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्ता-सम्यक परिवेष्टिता विविधविशालगवाक्षसम्पन्नेत्यर्थः । 'से णंगवक्खकडए' स खलु गवाक्षकटकः अद्धजोयणं उड्ढे उच्चत्तेणं' अर्द्धयोजनम् ऊर्ध्वम् उपरि उच्चत्वेन-उच्छ्येण 'पंचधणुसयाइं विक्खभेणं' पञ्चधनुः शतानि विष्कम्भेण विस्तारेण, प्रज्ञप्तः । कीदृशः पुनः स गवाक्ष कटकः ? इत्याह-'सबरयणामए' इत्यादि। रहित होने से निष्कङ्कटच्छाया वाली है- अव्याहत प्रकाशयुक्त है- स्वरूप से प्रभासंपन्न है-स्वतः प्रकाशमान है, किरणयुक्त है- वस्तु समूह को प्रकाशक है, निरन्तर दिशाओं में इसका प्रकाश फैला रहता है, इसलिये सोद्योत है हृदय में उल्लास जनक होने से यह प्रासादीय है. अधिक रमणीय होने से क्षण क्षण में यह देखने के योग्य है इसलिये दर्शनीय है; सर्वथा दर्शकजनों के नेत्र और मन को हरण करनेवालो होने से यह अभिरूप है और असाधारणरूपसंपन्न होने से यह प्रतिरूप है । अथवा-क्षण क्षण में इसका रूप नवीन नवीन जैसा प्रतीत होता है इसलिये प्रतिरूप है। “सा णं जगई " वह जगती “एगेणं महंतगवक्खकडएणं सवओ समंता संपरिविखत्ता" एक विशाल गवाक्षजाल से--अनेक बड़ी २ खिडकियों से युक्त है “से ण गवक्खकडए" वह गवाक्ष जाल"अद्धजोयगं उड्ढउच्च तेणं' आधे योजन का ऊँचा है “पंच રહિત હોવાથી આ નિષ્પક છે. આવરણ રહિત નિષ્કટક છાયાવાળી છે. અવ્યાહત પ્રકાશચક્ત છે, વસ્તુ સમહની પ્રકાશિકા છે. નિરંતર દિશાઓમાં અને વિદિશાઓમાં આને પ્રકાશ વ્યાસ રહે છે. એથી આ સોદ્યોત છે, હૃદયમાં ઉલ્લાસજનક હોવાથી આ પ્રાસાદીય છે. અધિક રમણીય હોવાથી આ દર્શનીય છે સર્વથા દશ કોના નેત્ર અને મનને આકર્ષાનારી હોવાથી આ અભિરૂપ છે. અથવા ક્ષણ ક્ષણમાં આનું રૂપ નવનીત જેવું લાગે છે એથી આ પ્રતિરૂપ છે. ___ “सा णं जगई" ले ती "एगेण महंतगवक्खकडएण सव्वओ समंता संपरिक्खिता" मे ( या nanी ने भाटा भोट ३ामाथी युटत छ. "से गवतखकडए" राक्ष MA "अद्ध जोयण उडूढ़ उच्चत्तेणे" अर्धा योगगन सय Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सर्वरत्नमयः-सर्वात्मना-सामस्त्येन रत्नमयः 'अच्छे' अच्छ:-आकाशस्फटिकवदति स्वच्छः 'जाव पडिरूवे' यावत्-यावत्पदेन-"श्लक्ष्णः घृष्टः, पृष्टः, नीरजः, निर्मलः निष्पङ्कः, निष्कङ्कटच्छायः सप्रमः, समरीचिका, मोद्योतः, प्रासादोयः दर्शनीयः अभिरूपः" एतेषां सङ्ग्रहो बोध्यः । तथा--प्रतिरूपः एषां इलक्ष्णादि प्रतिरूपान्तानां व्याख्या अस्मिन्नेव सूत्रे गता केवलं स्त्रीपुंसकता विशेषः । इत्येवं जगतीवर्णन मुक्त्वा जगत्या उपरिभागवर्णनमाह-तीसेणं' इत्यादि। 'तीसेणं जगईए उपि तस्याः-- अनन्तरोताया वलयाकारेण व्यवस्थितायाः खलु जगत्या उपरि चतुर्योजनवितारात्मके उपरित ने भागे 'बहुमज्झदेसभाए' यो बहुमध्य देशमागः-चतुर्थोजन विस्तारात्मकस्य जगत्युपरितनभागस्य लवणदिशि देशोनयोजनद्वये त्यक्ते जम्बूढोपदिशि च देशोनयोजनद्वये त्यक्तेऽवशिष्टः पञ्चधनुश्शतात्म के बहुमध्यदेशभागः अस्ति, 'एत्य णं महई एगापउभवरवेइया पण्णत्ता' अत्र अस्मिन् स्थ महतो -वृहती एका पद्मवरवेदिका श्रेष्ठकमलप्रधाना वेदिका देवभोगभूमिः प्रज्ञप्ता-कथिता । कि प्रमाणा? इत्याह - "अद्ध जोयागं" इत्यादि, 'अद्धजोयणं उडू उच्चत्तणं पञ्चधणुसयाई विखंभेणं' अर्द्धयोजनम्रर्ध्वमुच्च धणुसयाइं विखंभेणं' एवं पांचसौ धनुष का इसका विस्तार है "पवर यणाभए" यह सर्वात्मना सर्वरत्नमय है, तथा “अच्छे जाव पडिरू' अच्छ से लेकर प्रतिरूप तक के विशेषणों वाला है, "तीसेणं जगईए उपि" वलयाकार वाली इस जगनी के ऊपर के भाग में जो किनार योजन के विस्तार वाला है "बहुमज्झदेसभाए" ठीक मध्य में-५०० योजन विस्तार वाले नोच के भाग में लवण समुद्र की दिशा की ओर कुछ कम दो योजन को और जम्बूद्वीप की दिशा की ओर कुछ कम दो याजन को - छोड़कर बार्क' बचे हुए ५०० योजन के विस्तार वाले बहुमध्य -देश में-" एत्थ णं महई एगा पउमवरवेझ्या पण्णत्ता" एक विशा पाव-वेदिका. यः श्रेष्ठ -कमलों की प्रधानतावाली है , इसलिये इसका नाम पद्मवर वेदिका कहा गया है. यह देवों का भोगों को भोगने का एक स्थान रूप है. यह पद्मवर वेदिका 'अद्ध जोयणं उड्ढं उच्चत्तेणं पंचघणुछ. “पंव धणु सयाई विजखमेण" पांयसे। धनुष ने विस्तार के 'सम्वत्यणामए' मा सर्वात्मना सव२त्ननय छ, तय: 'अच्छे जान पडिरूवे" ५२७ मांगने ३५ सुधान। विशेषणेथी युति छ. तासेण जगई। उप्ति" २०११ मागताना ७५२ना सामोरे यार येन (46२५ । छ वहुमज्झदेसमाए" ही મધ્યમાં ૫૦૦ જન વિસ્તારવાળા વચ્ચેના ભાગમાં ડાલ સમુદ્રની દિશાની તરફ કંઈક-કમ બે જન અને જંબુદ્ધી ની દિશાની તરફ કંઈક સ્વ૬૫ બે વાજ. ને બાદ ४२di शेष ५०० यात्रेता ( १९ ३श "एत्थ ण मदई एगा पउमबरवेईया पण्णत्ता” २४ विश ५१२वा । . २५ श्रेष्ठ माना प्रभावी એથી આનું નામ પાવરવેદિકા ક વાર રમાવેલ છે : દેવોને ભેડા (ઉપભે ગ કર ના में स्थान ३५ छ. म ५२ “अद्ध जोयणं उड्हें उच्चत्तण पंच धणुसायई Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. ४ जम्बूद्वीपप्राकारभूतजगत्याः वर्णनम् त्वेन पञ्चधनुः शतानि विष्कम्भेण-विस्तारेण, 'जगई समिया परिक्खेवेणं' जगती समिका-जगत्या समा समाना जगती समा सैव जगती समिका परिक्षेपेण-परिधिना, यावान् जगत्याः परिधिस्तावानेवास्या अपीति भावः । सा कीदृशी ? इत्याह-'सबरयणामई" इत्यादि । सर्वरत्नमयो सर्वात्मना रत्नमयो 'अच्छा जाव पडिरूवा' अच्छा यावत् प्रतिरूपा इत्येतस्य विवरणं प्राग्वत् । 'तीसे णं पउमवरवेइयाए' तस्याः अनन्तरोक्तायाः खलु पद्मवरवेदि कायाः 'अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते' अयमेतद्रपः- वक्ष्यमाणस्वरूपः वर्णावासः वर्णनषद्धतिः, प्रज्ञप्तः 'तं जहा' तद्यथा-'वइरामया णेमा' नेमाः भूमिभागावं निष्कामन्तः प्रदेशाः वज्रमयाः-वज्रमणिमयाः 'एवं जहा जीवाभिगमे' एवम्-अनेन प्रकारण यथा जीवाभिगमे जीवाभिगमसूत्रे पद्मवरवेदिकावर्णनविस्तर उक्तः तथाऽत्रापि सर्वो बोध्यः स च कियत्पर्यन्तः ? इत्याह-"जाब अट्टो" यावदर्थः-वज्रमया नेमा इत्यारभ्य अर्थ इत्यन्तः पाठो बोध्यः, तत आरभ्य कियत्पर्यन्तः पाठो ग्राह्यः ? इत्याह-'जाव धुवा णियया सासया" यावद् ध्रुवा नियता शाश्वती" इति, ततोऽपि कियत् पर्यन्तः पाठो ग्राह्यः? इत्याह - ‘जाब णिच्चा' यावनित्या, इति, स च सर्वः पाठ एवम्-"वइरामया णेमा सयाई विखंभेणं" ऊँचाई में आधे योजन की है और विस्तार में अर्थात् चोड़ाई में पांचसौ धनुष की है "जगई समिया परिक्खेवेणं" इसका परिक्षेप जगती के परिक्षेप बराबर पावरवेदिका "सव्वरयणामई' सम्पूर्णरूप से रत्नमयी है और अच्छ आदि प्रतिरूपान्ततक के विशेषणों वाली है "तासेणं पउमवर वेइयाए अयमेयारूवे पण्णावासे पण्णत्ते' इस पद्मवरवेदिका के वर्णन के सम्बन्ध में ऐसा कहा गया है-"तं जहा-वइराम या पाइसके नेम--भूमिभाग से ऊपर की और निकले हुए प्रदेश वज्रमणि के बने हुए हैं "एवं जहा जीवाभिगमे" इस तरह से वर्णन जैसा इसका जीवाभिराम सूत्र में किया गया है वैसा हो यहां पर समझना चाहिये. और यह वहां का सब वर्णन वेदिका के सम्बन्ध का “जाव अट्ठो जाव धुवा णियया सासया" इस सूत्र पाठ तक का यहां पर कहलेना चाहिये क्यों कि वेदिका का वर्णन वहां इसी सूत्र पाठ तक " अयामा अायोशन २८मी छ भने विस्तारमा मेट योभा पांयसे। घनसी छ. "जगई समीया परीक्खेवेणं" सानो परिक्ष५ गतीना परिक्ष५ ५२१२ माझवश्वरि । "सव्वरयणामई" पूणे २(नमया छ भने १२७ वगेरेथी प्रति३५॥ सपना विशेष । युरत छे. 'तीसेणं पउमवरवेइयाए अयमेयरूवे वण्णावासे पण्णत्ते" पावन १. म २५ डेबामा न्यु. "तं जहा वरामया" ना थी ५२नी त२३ नीरजेता प्रदेश 40 मलिना मानेला छे. 'एवं जहा जीवाभिઆ પ્રમાણે આનું વર્ણન જીત્રાભિગમમાં જે રીતે કરવામાં આવ્યું છે, તેમ અહી પણ नये. अन वा विषेतुं न जाव अट्ठो जाव धुवा णियया सासया" ગ સત્રપાઠ સુધી અહી' સમજવું જોઈએ. કેમ કે વેદિકાનું વર્ણન ત્યાં એ જ સૂત્રપાઠ Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे रिकामया पाणा वेरुलियामया खंभा सुवण्णमया फलगा लोहियक्खमईओ सईओ वइरामई संधि णाणामणिमया कलेवरा णाणामणिमया कलेवरसंघाडा णाणामणिमया रूवा णाणामणिमया रूवसंघाडा अंकामया पक्खा पक्खवाहाओ य जोइरसामया वंसा वंसकवेल्लया य रययामईओ पट्टियाओ जायख्वमईओ ओहाडणीओ वइरामईओ उवरि पुंछणीओ सव्वसे रययामए छायणे साणं पउमवर वेश्या एगमेगेणं हेमजालेणं एगमेगेणं arraraजाणं एगमेगेणं खिखिणीजालेणं एगमेगेणं घंटाजालेणं एगमेगेणं मुत्ताजालेणं एगमेगेणं मणिजालेणं एगमेगेणं कणगजालेणं एगमेगेणं रयणजालेणं एगमेगेणं पउमजालेणं सव्वरयणामएणं सव्वओ समंता संपरिक्खित्ता, ते णं जाला तवणिज्जलंबूसगा सुवणपरमंडिया णाणामणिरयणहारद्धहार उवसोभियसमुदया ईसिअण्णमण्ण संपत्ता पुव्वावरदाहिणुत्तरागएहिं वाएहिं मंदायं मंदायं एइज्जमाणा एइज्जमाणा पलंबमाणा पलंबमाणा पझमाणा पझुंझमाणा ओरालेणं मणुण्णेणं मणहरेणं कृष्णमणणिव्वुइकरेण सद्देणं ते परसे सव्वओ समता आपूरेमाणा सीरिए अईव २ उवसोभेमाणा २ चिह्नंति । तीसेणं पउमards तत्थ तत्थदेसे तहिं तहिं बहवे हयसंघाडा गयसंघाडा णरसंघाडा किनरसंघाडाकिंपुरिससंघाडा महोरगसंघाडा गंधव्वसंघाडा वसहसंघाडा सव्वरयणामया जाव पडिरूवा, एवं पंतीओवि विहीओवि मिहुणगाइविच तीसे णं पउमवरवेइयाए तत्थ तत्थदेसे तर्हि २ बहुओ पउमलयाओ नागलयाओ असोगलयाओ चंपगलयाओ वणलयाओ वासंतीलयाओ अइमुत्तलयाओ कुंदलयाओ सामलयाओ णिच्चं कुसुमियाओ णिच्चं मउलियाओ णिच्चं लवइयाओ णिच्चं थवइयाओ णिच्चं गुलइयाओ णिच्चं गुच्छियाओ णिच्च ज़मलियाओ णिच्चं जुयलियाओ गिच्चं विणमियाओ णिच्चं पणमियाओ णिच्चं सुविभत्तपडिपिंड मंजरिवर्डिसगधरीओ णिच्चं कुसुमियमउलियलवइयथवइय गुलइयगुच्छियजलिय जुयलिय विणमिय पणमिय सुविभत्तपडि पिंड मंजरीवर्डिसगधरीओ सव्वरयणामईओ अच्छा जाव पडिरूवा, तीसेणं पउमवरवेड्याए तत्थ तत्थ देसे तर्हि २ बहवे अक्खयसोत्थिया पण्णत्ता सव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरुवा, से केणदृणं भंते ! एवं बुच्चइ - परमवर वेइया २१, गोयमा ! पउमवरवेइयाए तत्थ तत्थ देसे तर्हि तर्हि वेइयामु वेड्याबाहासु वेइयापुडंतरे खंभे खंभवादासु खंभसीसेसु खंभपुडंतरेस सूई सूइमुहे सूईफलए सूईपुडंतरेसु पक्खेसु पक्खवादासु बहूई उप्पलाई पउमाई कुमुयाई सुभगाईं पौंडरीयाई महापोंडरीयाई सयवत्ताई सहस्वत्ताइं सव्वरयणामयाई अच्छाई जाव पडिवाई महावासिक्कछत्तसमाणाइं पण्णत्ताइं समणाउसो ? से एएणद्वेणं गोयमा ! एवं बुच्चइ - परमवरवेइया२, अदुत्तरं च णं गोयमा ! पउमवरवेइयाए सासए णामधेज्जे पण | पउमवर वेइयाणं भंते ! किं सासया असासया ? गोयमा ! सिय सासया सियअसासया, सेकेणणं • ? गोयमा दव्वट्टयाए सासया वण्णपज्जवेहिं गंधपज्जवेहि रसपज्जवेहिं फासपज्जवेहिं असासया, से तेणद्वेणं एवं बुच्चइ सिय सासया सिय असासया । पउमवरवेइयाणं भंते ! कालओ केवच्चिरं होइ ? गोयमा ! ण कयाइ णासी णक २८ Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. ४ जम्बूद्वीपप्राकारभूतजगत्याः वर्णनम् याइ ण भवइ ण कयाइ ण भविस्सइ भुविं च भवई य भविस्सइ य धुवा णियया सासया अक्खया अव्वया अबट्टिया णिच्चा " छाया - वज्रमया नेमाः रिष्टमयानि प्रतिष्ठानानि, वैमयाः स्तम्भाः, सुवर्णमयानि फलकानि, लोहिताक्षमय्यः सूचयः, वज्रमयाः सन्धयः, नानामणिमयानि कलेवराणि नानामणिमयाः कलेवरसङ्घाटाः, नानामणिमयानि रूपाणि, नानामणिमयाः रूपसङ्घाटाः अङ्कमयाः पक्षाः, पक्षवाहाश्च ज्योतिरसमयाः वंशाः, वंशकवेल्लुकानि च, रजतमय्यः पट्टिकाः, जातरूपमय्यः अवघाटिन्यः, वज्रमय्यः उपरि पुच्छ्न्यः, सर्वश्वेतं रजतमयं छादनम् । सा खलु पद्मवरवेदिका । एकैकेन हेमजालेन एकैकेन कनकजालेन, एकैकेन किङ्किणीजालेन एकैकेन घंटाजालेन, एकैकेन मुक्ताजालेन एकैकेन मणिजालेन एकैकेन कनकजालेन, एकैकेन रत्नजालेन एकैकेन पद्मजालेन सर्वरत्नमयेन सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्ता । तानि खलु जालानि तपनीय लम्बूसकानि सुवर्णप्रतरकमण्डितानि नानामणिरत्न हारार्द्धहारोपशोभित समुदयानि ईषदन्योऽन्यमसंप्राप्तानि, पूर्वापरदक्षिणेत्तराऽऽगतै वर्तिर्मन्दं मन्दमेजमानानि एजमानानि प्रलम्बमानानि प्रलम्बमानानि शब्दायमानानि शब्दायमानानि उदारेण मनोज्ञेन मनोहरेण निर्वृत्तिकरेण शब्देन तान् प्रदेशान् सर्वतः समन्तात् आपूरयन्ति २ श्रिया अतीव २ उपशोभमानानि २ तिष्ठन्ति । तस्याः खलु पद्मवर वेदिकायाः किया गया है इसके आगे नहीं, वह पाठ सब इस प्रकार से है - " वइरामया णेमा, रिट्ठमयापइाणा, वेरुलियामया खंभा, सुवण्णमया फलगा, लोहियक्खमईओ सूईओ, वईरामई संधी, जाणामणिमया कलेवर संघाडा, णाणामणिमया रूवा, णाणामणिमया रूवसंघाडा, अंक्रामया वक्खापक्खबाहाओ य, जोइरसमया वंसा वंसकवेल्लूगा, य रययामईओ पट्टियाओ, जायरूवमईओ ओहाडणीओ, वइरामईओ उवरिं पुछणीओ, सव्वसेए रययामए छायणे, साणं पउमवरवेइया एगमेगेणं हेमजालेणं, एगमेगेणं कणगवक्ख जालेणं, एगमेगेणं खिखिणीजाले णं एगमेगेणं घंटाजालेणं, एगमेगेणं मुत्ताजालेणं, एगमेगेणं मणिजालेणं, एगमेगेणं कणगजालेणं, एगमेगेणं रयणजालेणं, एगमेगेणं पउमजालेणं "इत्यादि, इस सब पाठ के पदों की व्याख्या चिलकुल स्पष्ट है और यह सुधी वामां आवे छे. सेना पछी नहीं ते सर्व पाहे या प्रमाणे छे - बईरामया नेमा, रिमया पहाणा, वेरुलियामया खंभा, सुवण्णमया फलगा, लोहियक्खमईओ, सुईओ, वईरामई, संधी णाणा मणिमया कलेवरा णाणामणिमया कलेवरसंधाडा, णाणामणिमया रूवा, णाणामणिमया रूवसंधाडा. अंकामया पक्खा, पक्खबाहाओ य, जोइरसमया, वंसा बसकवेल्लुगाय, रययामईओ पट्टियाओ, जायरूवमई ओ ओहाडणीओओ, वहरामईओ उवरि पुंछणीओ, सबसेप रययामए छायणे, साणं पउमर वेइया, पगमेगेणं हेमजालेण एगमेगेणं कणगवस्त्रखजा लेणं एग मे गेणं खिखिणोजालेण पगमेगेण घंटाजालेण एगमेगेणं मुत्ताजालेणं पगमेगेणं मणिजालेणं एगमेगेणं कणगजालेणं पगमेगेणं रय नाणं पगमेपणं पउमजालेणें" इत्यादि या सर्वपाउना पहोनी व्याभ्या साव स्पष्ट ४ २९ Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 30 जम्बूद्वोपप्राप्तिसूत्र तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहको हयसवाटा गजसनाटाः न सङ्घाटाः किन्नरसवाटा: किंपुरुषसधाटाः महोरगसङ्घाटाः गन्धर्वसङ्घाटाः वृषभसङ्घाटाः सर्वरत्नमयाः यावत् प्रतिरूपाः, एवं पंक्तयोऽपि पीथयोऽपि मिथुनकान्यपि । च तस्याः खलु पद्मवरवेदिकाया तत्र तत्र देशे तत्र तत्र वयः पमलताः नागलताः अशोकलताः चम्पकलताः बनलनाः वासन्तीलताः अतिमुक्तलताः कुन्दलता श्यामलता नित्यं कुसुमिताः नित्यं मुकुलिताः नित्यं लकिता: नित्यं स्तवकिताः नित्यं गुल्मिताः नित्यं गुच्छिताः नित्यं याताः नित्यं युगलिताःहित्यं विनमिताः नित्यं प्रणमिताः नित्यं मुविमतपतिपिण्डमचर्यवतंसकधराः नित्यं कुसुमित मुकुलित लकितस्तवकित गुलिमत यमलितयुलित विनमित प्रणमित मुविभकप्रतिपिण्डमञ्जयंवतंसकधराः सर्वरत्नमय्यः अच्छाः यावत् प्रतिरूपाः । तस्याः खलु पनवरवेदिकायाः तत्र तत्र देशे तत्र २ अक्षय स्वस्तिकानि प्रज्ञप्तानि सर्वरत्नमयानि अच्छानि यावत् प्रतिरूपाणि । अथ के नार्थेन भदन्त ! एवमुच्यते-पावरवेदिकः ? २ गौतम! पद्मवरवेदिकायास्तत्र तत्र देशे तत्र २ वेदिका वेदिकावाहामु वेदिकापुटान्तरेषु स्तम्भेषु स्तम्भबाहासु स्नम्मशीर्षेषु स्तम्भपुटान्तरेषु सूचीषु सूचीमुखेषु सूनीफलकेषु सूची पुटान्तरेषु पक्षेषु पक्षवाासु बहूलि उत्पलानि पमानि कुमुदानि सुभुगानि सौगन्धि कानि पुण्डरीकाणि महापुण्डरीकाणि शतपत्राणि सहस्रपत्राणि सर्वरत्नमयानि अच्छानि यावत् प्रतिरूपाणि महावापिकच्छ बसमानानि प्रज्ञप्तानि श्रमणाऽऽयुष्मन् ! सा एतेनार्थेत गौतम ! एवमुच्यते-पद्मबरवेदिका २ 'अदुत्तरं पाणं' अथ च खलु गौतम ! पदमवरवेदिका इति शाश्वतं नामधेयं प्रज्ञप्तम् । पदभवरवेदिका खलु भदन्त कि शाश्वती अशाश्वती ? गौतम स्यात् शाश्वती स्यादशाश्वतो अथ केनार्थेन स्यात् शाश्वती स्यादशाश्वती ? गौतम ! द्रव्यार्थतया शाश्वतीवर्णपर्यायैः गन्धपर्यायः रसपर्यायः सर्शपर्यायैः अशाश्वती सा तेनार्थेन एवमुच्यते स्यात् शाश्वती स्वादशाश्वती । पद्मवरवेदिका खलु भदन्त ! कालतः किच्चिरं भवति ? गौतम ? न कदाचित् नाऽऽसीत् न कदाचिन्न भवति न कदाचिन्न भविष्यति, अभूच्च भवति च भविष्यति च ध्रुवा नियता शाश्वती अक्षया अव्यया अवस्थिता नित्या " इति । ____ अथ व्याख्याः -- तस्याः पद्मवरवेदिकायाः वज्रमयाः-वज्ररत्नमयाः नेमाःभूमिभागादृषं निःसृताः प्रदेशाः रिष्टमयानि-रिष्टरत्नमयानि प्रतिष्ठानानि मूलपादाः वैडूर्यमया:- वैयरत्नमयाः स्तम्भाः , सुवर्णमयानि-फलकानि-पद्मवरवेदिकावयव. तानि, लोहिताक्षमस्य:-लोहिताक्षरत्नमय्यः सूचयः-फलकद्वय संयोगकारि पादत्थानीयाः, वज्रमय्या:- वज्ररत्नमयाः, सन्धयः-फलकानां मेल नानि वज्ररत्नले पापूरिताः फलकसन्धयः इति भावः । नानामणिमयानि-विविधमणिमयानि कलेवराणि-मनुष्याकाररूपाणि, तथा-नानामणिमयाः कलेवरलाटा:-मनुष्ययुग्मकरूपाणि, तथा-नानामणिमयानि रूपाणि गजावादीनामाकाराः नानामणिमयाः रूपसङ्घाटाः- गजाश्वादिरूपयु. Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० ४ जम्बूद्वीपप्राकारभूतजगत्याः वर्णनम् ग्मानि, अङ्कमयाः-अङ्करत्नमयाः, पक्षाः -वेदिकावयवाः, पक्षवाहाः वेदिकावयवकविशेषाश्च, ज्योतिरसमयाः-ज्योतिरस-नामकरत्नमयाः--वंशाः-पृष्ठवंशाः महान्तो मध्यवलका इत्यर्थः, वंशकवेल्लुकानि-तत्र वंशाश्च-महतां पृष्ठवंशानामुभयपार्श्वयोस्तिर्यक् स्थाप्यमानाः वंशाः कवेलुकानि-तदुपरि आच्छादनविशेषाश्च एतान्यापि ज्योतीरसभयानि रजतमय्यः- रूप्यमय्यः पट्टिका:-बंशानामुपारि कम्बा स्थानीयाः प्रतराः, जातरूपमय्यः-सुवर्णविशेषमय्यः अवघाटिन्यः-कम्बोपरिस्थाप्यमानाच्छादनभूतमहाप्रमाणकिलिचस्थानीयाः, वज्रमय्यः- वज्ररत्नमय्यः, उपरि-अवघाटिनीनामुपरि पुञ्छन्यःनिविडतराऽऽच्छादनभूतचिक्कणतरतृणविशेषस्थानीयाः, सर्वश्वेतं सर्वात्मना श्वेत-श्वेतवर्ण रजतमयं रूप्यमयं छादनम्-आच्छादनम् । सा पूर्वोक्ता खलु पमवावेदिका एकैकेन हेम जालेन स्वर्णमयम लासमूहेन 'संपरिक्षिप्ता' इति परेण सम्बन्धः, एवमग्रेऽपि, एकैकेन कनकजालेन- पीतवर्णस्वर्णविशेषमयमालासहेन, एकैकेन किङ्किणीजालेन-क्षुद्रयाण्टिकासमूहे ने, एकैकेन घण्टाजालेन-घण्टासमूहेन एकैकेन मुक्काजालेन-मुक्ताफलमयमालासमूहेन, एककेन कनकजालेन मणिजालेन-मणिमयमालासमूहेन, एकैकेन कनकजालेन पी सुवर्णमयमालासमूहेन एकैकेन रत्नजालेन-हीरकादिरत्नमयमालासमूहेन, एकैकेन पदमजालेन सर्वरत्नमयेन कमलमालासमूहेन सर्वतः सवेदिक्षु समन्तात् सर्वविदिक्षु संपरिक्षिप्ता-सम्यक् परिवेष्टिता तानि-हेमजालादीनि जालानि-दामानि मालाः, तपनीयलम्बसकानि तपनीयं- रक्तवणे स्वर्ण तन्मयोलम्बूसका:- मालाग्रभागस्थमण्डनविशेषो येषां तानि तथा, तथा-सुवर्णप्रतरक्रमण्डितानि-सुवर्णमयपत्रभूषितानि तथा नाना मणिरत्न हारार्द्धहारोपशोभितसमुदयानि, तत्र-नाना- अनेक प्रकारकाणि यानि मणिरत्नानि मणयामर तादयः रत्नानि-कर्केतनादोनिच तेषां -तत्सम्बन्धिनः- तद्रचिता ये विविधा हाराहाराः तत्र हाराः - अष्टादशसरिकाः, अर्द्धहाराः- नवसरिकाश्च हारविशेषाः, तैरुपशोभितः अलकृतः समुदयः समूहो येषां तानि तथा, तथा- ईषदन्योऽन्यमसम्प्राप्तानि-ईषत किंचित अन्योऽन्यं -परस्परम्, असम्प्राप्तानि. असंलग्नानि, तथा पूर्वापरदक्षिणोत्तराऽऽगतैः पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरदिग्भ्यः समागतैः वातैः वायुभिः मन्दं सन्दम् अतिमन्दम किञ्चिदित्यर्थः एजमानानि एजमानानि पुनः पुनः कम्पमानानि, प्रलम्बमानानि प्रलम्बमानानि इतस्ततः किञ्चिच्चलनेन पुनः पुनः लम्बितानि भवन्ति तथा 'पझं झमाणाई' इति शब्दायमानानि २ परस्परं संघर्षवशात् पुनः पुनः शब्दं कुर्वाणानि, तथा -उदारेण- विशालेन व्यापकेनेत्यर्थः, अस्य 'शब्देने' ति परेण सम्न्धः एवमग्रेऽपि. भनोज्ञेन - मनोऽनुकूलेन, मनोऽनुकूलत्वं लेशतोऽपि स्यादन आह-मनोहरेण-श्रोतृजनमनोहरण तारकेण अतएव कर्णमनोनिवृतिकरेण प्रतिश्रोतकर्गमनःसुखोत्पादकेन शब्देन तान् पद्मवरवेदिकाऽसन्नान् सर्वतः सर्वदिक्षु आपूरयमाणानि २ वारंबारपूरितान् कर्वाणानि, श्रिया- शोभया अतीव २ अत्यधिकं यथा स्थात्तथा उपशोभमानानि २ Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सर्वदा सर्वथा शोभां धारयमाणानि तिष्ठन्ति । तस्याः अनन्तरोक्तायाः खलु पद्मवरवेदिकायाः तत्र तत्र - तस्मिस्नस्मिन् देशे तत्र तत्र तस्य देशस्य तस्मिस्तस्मिन् अवान्तरदेशे बहवः-बहुसंख्या अनेके हयसंघाटका:-अश्वसंघाता:-अश्वसमूहाः एवं गजनरकिन्नर-किंपुरुष-महोरग-गन्धर्व-वृषभाना-संघाटा वोध्याः , ते च हयादिसंघाटा: सर्वरत्नमयाः-सर्वात्मना रत्नमयाः, यावत्-यावत्पदेन-अच्छा:-श्लक्ष्णाः , घृष्टाः , मृष्टाः, नीरजसः, निर्मलाः, निष्पङ्काः, निष्कङ्कटच्छायाः, सप्रभाः, समरीचिकाः सोद्धोताः, प्रासादीयाः, दर्शनीयाः, अभिरूपाः; इत्येषां सङ्ग्रहो बोध्यः, तथा प्रतिरूपाः एषां पदानां व्याख्याऽस्मिन्नेव सूत्रे पूर्वं जगतो वर्णनप्रसङ्गे कृता, केबलं स्त्रीपुंसत्व बहुवचनकतो विशेषः, एवम् -इत्यादि संबाटवत् पङ्क्तयोऽपि-हयादीनां श्रेणयोऽपि बोध्याः, तथा हयादीनां वीथयः उभयोः पार्श्वयोरेकैकश्रेणिभावेन यत् श्रेणियुगलं तत् बीथि पदवाच्यम् तद्वहुत्वे वीथयः अनेकश्रेणी हयानि पंक्तिस्तु एकस्यां दिशि अथवा श्रेणिः सा व्यवहियते अतो न पंक्ति-वीथ्योरेकार्थकताशङ्का । एतेषामेव हयगजनरकिन्नरकिम्पुरुष महोरगगन्धर्ववृषभानामष्टानां स्त्री पुसयुग्म प्रतिपादनार्थमाह मिथुनकान्यापि स्त्रीपुंसयुग्मान्यपि हयादिसङ्घाटबदेव वक्तव्यानि ८। तस्याः पूर्वोक्तायाः खलु पद्मवरवेदिकायाः तत्र तत्र तस्मिंस्तस्मिन् देशे तत्र तत्र तद्देशैकदेशे बहव्यः पद्मलताः पद्मिन्यः नागलताः नागाः वृक्षविशेषाः तद्रूपाः लताः तिर्यकशाखा विस्तार रहितत्त्वाल्लता इवेति नागलताः एवम् अशोकलताः अशोकवृक्षरूपलताः चम्पकलताः चम्पकपुष्पक्षविशेषरूपलताः वनलताः वननार्थकवृक्षविशेषरूपलताः, वासन्तीलताः वासन्तीपुष्पविशेषलताः अतिमुक्तकलताः अतिमुक्तकः तिनिशनामको वृक्षविशेष स्तद्रूपालताः कुन्दलता:-कुन्दनामक पुष्पविशेषलताः श्यामलताः श्यामा वनस्पतिविशेषः शारिवेति प्रसिद्धा तद्रूपा लताः ता अनन्तरोक्ताः पद्मलतादयो लताः कीदृशः ? इत्याह-नित्यं सदा कुसुमिताः पुष्पिताः पुष्पसम्पन्नाः नित्यं मुकुलिता कुइमलिता ईषद्विकासोन्मुखकालिका सम्पन्नाः नित्यं लवकिताः सजातपल्लवलवाः नित्यं स्तबकिता विकासोन्मुखाकलिका सम्पन्ना नित्यं गुल्मिताः स्तम्विताः काण्डरहितावयव सम्पन्नाः। नित्यं गुच्छिताः पत्रपुष्पगुच्छसमूहसम्पन्नाः नित्यं यमलिताः सजातीयलतायुग्मपरिवेष्टिताः नित्यं युगलिताः सजातीय-विजातीयलताद्वयपरिवेष्टिताः नित्यं विनमिताः फलपुष्पादिसारेण विशेषेण नम्रभावं प्रापिताः, नित्य प्रणमिताः फल पुष्पादिभारणनम्रभावं प्रापयितुमारब्धाः नम्रभावोन्मुखा इति भावः, नित्यं मुविभक्तप्रतिपिण्डमजयवतंसकधराः सुविभक्तः सम्यग् विभागयुक्तो यः प्रतिमजयंवतंसकः प्रतिमब्जरी प्रतिगता प्रतिपल्लवस्थिता या मजरी-पुष्पमठजरी सैवावतंसकः शिरोभूषणविशेषः तस्य धराः धारिकाः, एवं सति ताः पद्मलतादयो लताः नित्यं कुसुमितमुकुलितलवकित स्तबकितगुल्मितयमलितयुगलितविनमितप्रणमिवसुविभक्तप्रतिमनर्यवतंसकधराः Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू० ४ जम्बूद्वीपप्राकारभूतजगत्याः वर्णनम् ३३ एतदव्याख्याऽनुपदं गता । पुनस्ताः पद्मलतादेय सर्वाः लताःसर्वरत्नमय्यः सर्वात्मनाकर्केतनादिरत्नमय्यः पुन अच्छाः यावत् प्रतिरूपाः-अच्छादि प्रतिरूपान्तानां सङ्ग्रहोऽथेश्वास्मिन्नेव,सूत्रे पूर्व कृतः। तस्याः पूर्वोक्तायाः खलु पद्मवरवेदिकायाः तत्र तत्र देशे तस्मिंस्तस्मिन् देशे तत्र तत्र तस्यैव देशस्यैकदेशे अक्षय स्वस्तिकानि प्रज्ञप्तानि कथितानि तानि अक्षय स्वस्तिकानि कीदृशानि ? इत्याह-सर्वरत्नमयानि सर्वात्मना रत्नमयानि, अच्छानि यावत् प्रतिरूपाणि अच्छादि प्रतिरूपपर्यन्तपदानां संग्रहो विवरणं च प्राग्वत् । पूर्वतोऽत्र नपुंसककृतो विशेषः । सम्प्रति पद्मवरवेदिकाशब्दार्थ गौतमः पृच्छति ___ अथ केन अर्थन कारणेन भदन्त ! एवम् इत्थम् उच्यते कथ्यते यत् पद्मवरवेदिका २ इति ? किमर्थमादायास्याः पद्मवरवेदिकेति शब्दप्रवृत्ति तेत्यर्थः । इति पृष्टो भगवान् गौतमं प्रत्याह-हे गौतम ! पद्मवरवेदिकायाः तत्र तत्र-तस्मिंस्तस्मिन् देशे तत्र तत्र तस्यैव देशस्यैकदेशे वेदिकासु-उपवेशनार्थमत्तगजाकाररूपासु वेदिका बाहासु वेदिकायाः बाहासुः पार्श्वेषु वेदिकापुटान्तरेषु वेदिकयोयोर्यत् पुट-परस्परमेलनं तदन्तरेषु तन्मध्येषु स्तम्भेषु प्रसिद्धेषु स्तम्भबाहासु स्तम्भपार्श्वषु, स्तम्भशीर्षेषु स्तम्भाग्रभागेषु, स्तभपुटान्तरेषु द्वयो स्तम्भयोः सन्धिमध्येषु सूचीषु फलकद्वयसंधानार्थप्रतनुकीलकरूपासु सूचिषु सूचीमुखेषु सूचीनां फलकान्तः प्रवेशासन्नप्र देशेषु सूचीफल केषु सूचीसंयोजित फलकप्रदेशेषु सूचीपुटान्तरेषु सूचीद्वयमेलनमध्येषु पक्षेषु वेदिकाया अवयवविशेषेषु तथा पवक्षाहासु वेदिका पार्वेषु, वहूनि-प्रचुराणि उत्पलानि-चन्द्रविकाशीनि कमलानि पद्मानि-सूर्यविकाशीनि कमलानि कुमुदानी कैरवाणि, तान्यषि चन्द्रविकाशीनि श्वेतरक्तादिवर्णानि भवन्ति, तानि सुभगानि सुन्दराणि, सौगन्धिकानि- कहलाराणि, श्वेतवर्णानि सुगन्धीनि कमलानि, पुण्डरीकाणि-श्वेत कमलानि, तान्येव महान्ति महापुण्डरीकाणि, शतपत्राणि-पत्रशतविशिष्टानि कमलानि सहस्रपत्राणि पत्रसहस्रयुक्तानि कमलानि एतानि सर्वाणि सर्वरत्नमयानि, सर्वात्मना कर्केतनादि रत्नमयानि, अच्छानि यावत् प्रतिरूपाणि अच्छादिप्रतिरूपपर्यन्तपदानां संग्रहो विवरणं च प्रागवत् । पुनस्तानि कथम्भूतानि ? इत्याह-महावार्षिकच्छत्रसमानानि महान्ति विशालानि यानि वार्षिकानि वर्षाकालिकानि जलधारानिवारणार्थानि च्छत्राणि तैः समानानि-समाकाराणि प्रज्ञप्तानि-कथितानी हे श्रमण आयुष्मन् ! गौतम ? सा पद्मवर वेदिका एतेन अनन्तरोक्तेन अर्थेन समुचितेनार्थेन एवम् इत्थम्-उच्यते कथ्यते यत् पद्म वरवेदिका पदमवरवेदिकेति । अथ च खलु अत एवास्याः पद्मवर वेदिका पद्मबर वेदिकेति शाश्वतं नामधेयं प्रज्ञप्तमिति । पुनौतमः पृच्छति-हे भदन्त पद्मवरवेदिका खलु किं शाश्वती उत अशाश्वती ! इति पृष्टो भगवानाह-हे गौतम स्याच्छाश्वती स्यादशाश्वती । अत्र स्याच्छब्दः कथञ्चिदथेको निपातःतेन कथञ्चिच्छाश्वती कथञ्चिदशाश्वती विद्यते । पुनर्विशेषजिज्ञासया गौतमः पृच्छति-"से केणटेणं' इत्यादि । अथ केना Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे न केन प्रकारेण शाश्वती केन प्रकारेण च अशाश्वतीति प्रश्नः । भगवानाह हे गौतम ! द्रव्यार्थतया - द्रव्यार्थिकनयेन शाश्वती नित्या पर्यायार्थिकनयेन प्राह-वर्णपर्यायैः कृष्णा दिभिः तथा गन्धपर्यायैः सुरभिः प्रभृतिः, रसपययैः तिक्तादिभिः स्पर्शपर्यायैः कठिन त्वादिभिः अशाश्वतो अनित्या तेषां वर्णादीनां प्रतिक्षणं कियत् कालान्तरं वाऽन्यथाऽन्यथा संभवात् । एवं च नित्यत्वानित्यत्वयोर्विरुद्धयोरपि धर्मयोद्रव्यार्थिक पर्यायर्थिक नयाभ्यामेकस्मिन्नधिकरणेऽवस्थानं सम्भवतीति पर्यवसितम् । एवमुपसंहति सा तेनार्थेन एवम् इत्थमुच्यते स्याच्छाश्वती स्यादशाश्वतीति । एतद्व्याख्या निगदसिद्धा । द्रव्यास्तिकनयवादी स्वमतं द्रढयितुमाह " नात्यन्तासत उत्पादो नापि सतो विद्यते विनाशो वा" अपि च-"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः" इति, ततश्च सर्वं वस्तु नित्यमेवेति । इत्थं तन्मते सन्देहः सा पद्मवेदिका किं घटादिवत् द्रव्यार्थत्वेन शाश्वती । आहोस्वित्-सर्वदा शाश्व तीति । इमं सन्देहं गौतमो निराकर्तुं भगवन्तं पुनः पृच्छति कालतः कियच्चिरमिति, पद्मवेदिका खलु हे भदन्त ! कालतः काल माश्रित्य कियच्चिरं कियन्तं कालं या - दवतिष्टते ? अत्र भगवानाह हे गौतम न कदाचिद् नासीत् नव्द्वयस्य प्रकृतार्थं दृढीकारकत्वात् सदैवासीदिती तथा न कदाचित् न भवति अपि तु सदैव भवति तथा न कदा चिद् न भविष्यति - अपि तु सदैव भविष्यति । एवं सर्वमुपसंहरति-अमूच्च भवति च भविष्यति कालत्रयेऽपि अवस्थिति शीलत्वात् । अत एव ध्रुवा - मेरु पर्वतादिवत्स्थरत्वात् नियता- निश्चितत्वात् जीवद्रव्यवत् अत एव शाश्वती समयावलिकादिषु कालवचनवच्छाश्वतत्वात् अतएव अक्षया पुद्गलपुञ्जविघटनेऽपि नवीनपुगलपुञ्जसंक्रमणेन स्वरूपाधिनाशात्, गङ्गा सिन्धु प्रवाहेऽपि पद्मदवत् अतएव अव्यया कदाचिदपि स्वरूपचलनस्यासम्भवत् मानुषोत्त(पर्वताद् बहिः समुद्रवत् अत एव अवस्थिता स्व प्रमाणे सम्यक् स्थिता जम्बूद्वीपादिवत् एवं च स्वप्रमाणावस्थायितया नित्या धर्मास्तिकायादिवत् इति ॥ सू० ४ || " जीवाभिगम सूत्र में पद्मवरवेदिका के वर्णन में ज्यों की त्यों लिखी जा चुकी है अतः वहां से इसे देखना चाहिये यह विस्तृत व्याख्या वज्रमय पद से लगाकर अन्त के नित्यपद तक की गई है। अतः यहां पुनः उसे विस्तार हो जाने के भय से नहीं लिखा है । इसी अभिप्राय को हृदय में છે અને જીવાભિગમ સૂત્ર’માં પદ્મવવેદિકાના વર્ણનમાં આબેહૂબ નિરૂપિત કરવામાં અવી છે. એથી જિજ્ઞાસુઓએ ત્યાંથી વાંચી લેવી. આ સવિસ્તૃત વ્યાખ્યા ત્યાં વમય પદમાંડીને અન્તના નિત્યપદ સુધી કરવામાં આવી છે એથી વિસ્તાર ભયથી અહી ખીજી વખત વ્યાખ્યા Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. ५ पद्मवरवेदिकायाः बहिर्भागस्थवनषण्डवर्णनम् अथ जगत्या उपरि पद्मवरवेदिकाया बहिर्यदस्ति तदाह ---- मूलम्-तीसेणं जगईए उप्पिं बाहिं पउमवरवेइयाए एत्थ णं महं एगे वणसंडे पण्णत्ते देसूणाई दो जोयणाई विक्खंभेण जगईसमए परिक्खेवेणं वणसंडवण्णओ णेयव्वो ॥सू०५॥ छाया- तस्या खलु जगत्या उपरि बहिः पनवरवेदिकायाः अत्र खलु महानेको वनषण्डः प्रज्ञप्तः, देशोने द्वे योजने बिष्कम्मेण जगती समकः परिक्षेपेण वनषण्डवर्णको नेतव्यः ॥सू०५॥ टीका--'तीसेणं जगईए' इत्यादि 'तीसे णं जगईए' तस्याः पूर्वोक्तायाः खलुजगत्त्याः 'उप्पि बाहिं पउमवरवेइयाए' उपरि ऊर्ध्वभागे पद्मवरवेदिकायाः प्राग्वर्णिताया देव भोगभूमि विशेषरूपायाः बहिः परतः 'एत्थ णं महं एगे वणसंडे पण्णत्ते' अत्र अस्मिन् प्रदेशे खलु एको महान् बृहत् वनषण्ड:- अनेकविधबृक्षसमूहः प्रज्ञप्तः । स च वनषण्डः कीदृशः ? - इत्याह-'देसूणाई दो जोयणाई विक्खंभेणं' देशोने देशतो न्यूने द्वे योजने विष्कम्भेण-विस्तारेण प्रज्ञप्तः देशश्चात्र सार्धधनुःशतद्वयरूपो बोध्यः तथाहि चतुर्योजनविस्तृतशिरस्काया जगत्या बहुमध्यभागे पञ्चधनुः शतव्यासा धारण करके सूत्र कार ने एवंजहा जीवाभिगमे जाव अट्ठो जाव धुवा, णियया, सासया, नाव णिच्चा" ऐसा सूत्र पाठ कहा है ॥४॥ जगती के ऊपर वर्तमान पद्मवर वेदिका के बाहर विद्यमान बनषण्ड का वर्णन"तीसेणं जगईए उप्पि बाहि" इत्यादि।। उस जगती के ऊपर जो पद्मवरवेदिका है उस पद्मवरवेदिका के बाहर " एत्थ णं महं एगे वणसंडे पण्णत्ते " एक बहुत विशाल वन ण्ड है-अनेक प्रकार के वृक्षों का समूह है " देसूणाई दो जोयणाई विश्वंभेणं " इस का विष्कम्भ - विस्तार- कुछ कम दो योजन का है यहां देश से २५० धनुष लिया गया है इसका विचार इस तरह से करना चाहिये जगती के मध्यभाग में ४२वामा मावा नथी ये प्रायन सूत्ररेयमा धा२३ रीन. 'एवं जहा जीवाभिगमे जाब अट्ठो जाव धुवा णियया सासया जाव णिच्चा', या सूत्रा8 सा छे. ॥४॥ જગતીની ઉપર વિદ્યમાન પદ્મવદિકાની બહાર વર્તમાન વનખંડનું વર્ણન – तीसेण जगईए उप्पि बाहि' इत्यादि सूत्र ॥५॥ मातिनी ५२२ ५१२वी छे ते पनवश्वहिानी मडा२ "पत्थण महं एगे घणसंडे पण्णने" ४ . विशण वनमछ. मन प्रश्न। वृक्षसभूडा छे." दो जोयणाई विक्खमेण" माने। विभ-विस्ता२-४४४ २१८५ मे योन से छे. मी દેશથી ૨૫૦ ધનુષ ગ્રહણ કરવામાં આવેલ છે. આ સંબંધમાં આ પ્રમાણે વિચાર કરે જોઈએ. જગતીના આ શિખરનો વિસ્તાર ચાર યોજન જેટલું કહેવામાં આવેલ છે. આ Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पद्मवरवेदिका एतस्य बहिर्भागे एको वनषण्डः अपरश्चाभ्यन्तरभागे अतो जगती शिरो विस्तारो वेदिका विस्तारश्च धनुःशतपञ्चकन्यूनोऽर्धी क्रियते ततो यथोक्तं मानं स्पष्टं भवति । तथा स वनषण्डः 'जगइ समए परिक्खेवेणं' जगतो समकः जगती तुल्यः परिक्षेपेण परिधिना प्रज्ञप्तः 'वणसंडवण्णओ णेयको' बनवण्डवर्णकः वनपण्डवर्णनकारकः सर्वोऽपि पदसमूहोऽत्र ज्ञातव्यः । स चैवम्-'किण्हे किण्होभासे नीले नीलो भासेहरिए हरिओमासे सोए सीओभासे णिद्धे णिद्धोभासे तिव्वे तिब्बो भासे किण्हे किण्हच्छाए नीले नीलच्छाए हरिए हरियच्छाए सीए सीयच्छाए णिद्धे णिद्धच्छाए तिव्वे तिव्यच्छाए घणकडिअच्छाए रम्मे महामेहणिकुरंबभूए तेणं पायवा मूमंतो कदमंतो खंधमंतो तयामंतो सालमतो पवालमंतो पत्तमंतो पुप्फमंतो फलमंतो बीयमंतो अणुपुब्बिसुजायरुइलबट्टभावपरिणया एगखंधी अणेगसाहप्पसाहविडिमा अणेगणरवाममुप्पसारिया गेज्झघणविउलवट्टखंधा अच्छिदपत्ता अविरलपत्ता अचाईणपत्ता अणईईपत्ता णियजरढपंडुरपत्ता णव हरियभिसंतपत्तभारंधयारगंभीरदरिसणिज्जा उवविणिग्गय नवतरुणेपत्तपल्लवकोमलुज्जलचलंत किसलयसुकुमाल पवाल सोभिय वरंकुरग्गसिहरा णिच्चं कुसुमिया णिच्च मउलिया णिच्चं लवइया णिच्चं थवइया णिच्चं गुलइया णिच्चं गुच्छिया णिच्चं जमलिया णिच्च जुलिया णिच्च विणमिया णिच्चं पणमिया णिच्चं कुसुमियमउलियलवइयथवइयगुलइयगोच्छियजमलियजुय५०० धनुष की व्यासवाली एक पद्मवरवेदिका कही गई है ; इस पद्मवरवेदिका के बहिर्भाग में एक वनषण्ड है और भीतर के भाग में भी एक वनषण्ड है जगती के ऊपर के भाग का विस्तार ४ योंजन का है और बिदिशाओं में जो इसका विस्तार है वह ५०० धनुष का है सो इस विस्तार को ऊपर के विस्तार में से कम करने पर एवं अवशिष्ट प्रमाण को आधा करने पर वनषण्ड का यथोक्त प्रमाण निकल आता है, इस वनषण्ड का परिक्षेप " जगई समए परिकलेवेणं " प्रमाण , जगती के परिक्षेप प्रमाण जैसा ही है " वणसंडवण्णो णेयत्वो" वनपण्ड का वर्णन यहां पर कर लेना चाहिये जो अन्य सूत्रों में इस प्रकार से किया गया है “किण्हे किण्होभासे नीले नीलोभासे, हरिए हरिओमासे, सीए सीओभासे, णिद्धे, गिद्धोभासे" જગતીના મધ્યભાગમાં ૫૦૦ ધનુષ જેટલી વ્યાસ યુક્ત એક પદ્યવરવેદિકા છે. આ પદ્વવરવેદિકાના બહારના ભાગમાં એક વનખંડ છે. જગતીના ઉપરના ભાગને વિસ્તાર ૪ યાજન જેટલું છે અને વિદિશાઓમાં જે આ વિસ્તાર છે તે ૫૦૦ ધનુષ જેટલો છે તો આ વિસ્તારને ઉપરના વિસ્તારમાંથી બાદ કરવાથી તેમજ અવશિષ્ટ પ્રમાણને અર્ધા કરવાથી बनम नु यथात प्रमाण मावी जय छे. मा नमन। परिक्ष५ "जगई समए परिक्खेवेण' प्रभा गतीना परिक्ष५ प्रमाण २ छे. वणसंडवण्णओ णेयधो" वनખંડનું વર્ણન અહીં કરી લેવું જોઈએ. જે બીજા સૂત્રોમાં આ પ્રમાણે કરવામાં આવેલ છે. “किण्हे किण्होभासे नीले नीलोभासे, हरिए हरिओभासे, सीए सीओभासे णिद्धे णिद्धो. Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. ५ पद्मवरवेदिकायाः वहिर्भागस्थ वनपण्डवर्णनम् ३७ लियविणमिय पणमियसुविभत्तपडिमंजरिवर्डिसयधरा सुयवरहिणमयण सलागकोइल कोरगभिंगार को उलकजीवंजीवग दोमुहकविलपिंगलक्खगकारंडव चक्कवाय कलहंस सारस अग सउणगणमिण विरइय सदुन्य महुरसरणाइया सुरम्मा सपिंडिय दरिय भमरमहुयरिय पहकर परिलितम तछप्पय कुसुमासवलोलमहुरगुमगुमेंत गुंजत देसभागा अभितरपुष्पफला बाहिरपत्तछन्ना पुप्फेहि फलेहिय उच्छन्न पलिच्छन्ना णीरोयरा अकंटया साउफला जाणाविहगुच्छ गुम्ममडंबगसोहिया विचित्तसुह के उभूया वावि पुक्खरिणी दीहिया सुनिवेसियरम्मजालघरमा पिडिमनीहारिम सुगंधी सुहसुरभिमणहरं च महया गंधद्धाणि मुयंता सुहसाउके बहुला अणेगरह जाणजुग्ग सिबिय संदमणिया पविमोयणा पासाईया जाव पडिरुवा " इति । कृष्णः, कृष्णावमासः, नीलः, नीलावभासः, हरितः, हरितावभासः, शीतः, ataraare: स्निग्धः, स्निग्धावभासः तीव्रः, तीव्रावभासः, कृष्णः, कृष्णच्छायः, नील:, नीलच्छायः हरितः, हरितच्छायः शीतः शीतच्छायः, स्निग्धः स्निग्धच्छायः, तीव्रः तीव्रच्छायः, घनकटितटच्छायः, रम्यः, महामेघनिकुरम्बभूतः । खलु पादपाः, मूलवन्तः कन्दवन्तः स्कन्धवन्तः त्वग्वन्तः शालवन्तः, प्रवालवन्तः पत्रव न्तः, पुष्पवन्तः फलवन्तः, बीजवन्तः, आनुपूर्वी सुजातरुचिर वृत्तभावपरिणताः, एक स्कन्धिनः, अनेक शाखा प्रशाखाविटपाः, अनेक नर व्यामसुप्रसारिताग्राह्यघन विपुलवृत्तस्कन्धाः, अच्छिद्रपत्रा:- अविरलपत्राः, अवातीन पत्राः, अनीतिपत्राः निर्धूतजरठपाण्डुपत्राः नव हरितभासमानपत्रकारान्धकारगम्भीर दर्शनीयाः, उपविनिर्गत नवतरुणपत्र पल्लव कोमलोज्ज्वलचलत्किसलय सुकुमारप्रवालशोभितवराङ्कुराग्रशिखराः नित्यं कुसुमिताः, नित्यं मुकुलिताः नित्यं लवकिता नित्यं स्तवकिताः, नित्यं गुल्मिता नित्यं गुच्छिताः, नित्यं यमलिताः, नित्यं युगलिताः, नित्यं विनमिताः, नित्यं प्रणमिताः नित्यं सुविभक्त प्रतिमञ्जर्यवतंसकधराः । नित्यं कुसुमित मुकुलितलव कितस्तव कितगुल्मित गुच्छितयमलित युगलितविनमितप्रणमित सुविभक्तप्रतिमञ्जर्यवतंसकधराः शुकबर्हिण - मदनशलाका - कोकिल - कोरक - भृङ्गारक- कोण्डलक जीवजीवक - नन्दीमुख कपिल - पिङ्गलाक्षक--कारण्डव--चक्रवाक--कर हंस - सारसा ने कशकुनगणमिथुनविरचित शब्दोन्नतमधुरस्वरनादिताः सुरम्याः सम्पिण्डितदृप्तभ्रमरमधुकरीप्रकर परि लीयमानमत्तपट्पदकुसुमासवलोलमधुर गुमगुमायमान गुञ्ज देशभागाः, अभ्यन्तर पुष्पफलाः बहिः पत्रावच्छन्नाः पुष्यैः फलैश्चावच्छन्नप्रतिच्छन्नाः स्वादुफलाः नीरोगकाः अकण्टकाः नानाविध गुच्छगुल्ममण्डपकशोभिताः विचित्रशुभकेतुभूताः वापीपुष्करिणीदीर्घिकासु निवेशितरम्यजालगृहका : पिण्डिम निहारिम सुगन्धिशुभसुरभिमनोहरां च महागन्धत्राणि मुञ्चन्तः शुभसेतु केतु बहुलाः अनेकरथशकटयानयुग्य गिल्लिथिल्लिस्यन्दमानिका शिबिका प्रविमोचनाः सुरम्याः प्रासादीयाः दर्शनीयाः, अभिरूपा: प्रतिरूपाः, इति । Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे एत व्याख्या चैवम्---कृष्णः मध्यमावस्थायां कृष्णवर्णपत्रसम्पन्नत्वाद् वन पण्डोऽपि कृष्णवर्णः न चोपचारमात्रेण कृष्ण इति व्यवह्रियते । किन्तु कृष्णतया प्रतिभासनात् । तथाऽऽह --- कृष्णावभासः-यावतिवनषण्डभागे कृष्णदलानि सन्ति तावति तद्भागे स वनपण्डोऽतीव कृष्णः कृष्णवर्णोऽवभासाः कान्तिर्यस्य वनषण्डस्य स तथाकृष्णवर्णावभाससम्पन्नः एवमग्रेऽपि । तथा-नीलः प्रदेशान्तरे नीलवर्णपत्रयुक्तः मयूरकण्ठवत् एवं नीलावभासः नीलवर्णावभाससम्पन्नः तथा-हरितः-प्रदेशान्तरे हरितवर्णपत्रयुक्तः एवं हरितावभासः हरितवर्णपर्णानां प्राचुर्याच्छुक पक्षवदवभासमानः इदानीं स्पर्शापेक्षया वर्ण्य ते-शीत:-शीतलस्पर्शवान् आर्द्रलतापुजपिहितान्तरालतलतया सूर्य किरणाप्रवेशात् अतएव शीतावभासः क्रीडार्थसमागतानां वनषण्डतलवर्तिव्यन्त मध्यमावस्था में पत्तों का वर्ण कृष्ण हो जाता है अतः उन पत्तों से युक्त होने के कारण यहां बनको भी कृष्ण वर्णवाला कह दिया गया है इस तरह यह वनषण्ड किसो २ प्रदेश में काले वर्ण वाला है यह कथन उपचार मात्र से कहा गया नहीं जानना चाहिये क्योंकि उस रूप से ही इसका अवभास होता है इसी बात को स्पष्ट करने के लिये "किण्हे किण्होभासे । इन दो पदों का प्रयोग किया गया। इसी तरह किसी २ प्रदेश में यह वन नीलवर्ण वाले पत्तों स युक्त होने के कारण स्वयं नीलवर्ण वाला है और इसी रूप से इसका अबभास होता है तथा किसी २ प्रदेश में यह वन पत्रों की हरीतिमा को लेकर – अर्थात् हरे २ पत्रों से युक्त होने के कारण-स्वयं हरित वर्णवाला है और इसीरूप से इसका अवभास होता है. यह वषण्ड किसो स्थान विशेष में शीतलस्पर्शवाला है. क्यो कि आर्द्रलतापुञ्जों से इसका तल सदा पिहित-ढकारहता है, तथा सूर्य किरणों का प्रवेश वहां नहीं हो सकता है. अतएव वहां पर क्रीडा के लिये समागत व्यन्तर देव और देवियों को इसका स्पर्श शीतल रूप से प्रतीत होता है । क्यों માણે મધમાવસ્થામાં પાંદડાઓને વર્ણ કૃષ્ણ થઈ જાય છે. એથી એ પંદડાઓથી યુક્ત હેવા બદલ અહીં વનને પણ કૃષ્ણ વર્ણ યુક્ત કહેવામાં આવેલ છે. આ પ્રમાણે આ વનખંડ કઈ કઈ પ્રદેશમાં શ્યામવર્ણ યુક્ત છે. આ કથન ઉપચાર માત્રથી જ કહેવામાં આવેલ છે એવું સમજવું ન જોઈએ કેમ કે તે રૂપથી જ આને અવભાસ થાય છે. આ વાતને २५४ ४२१। भाट “किण्हे किण्होभासे” मा में पहोना प्रयोग ४२वामा मावस छे. अशते કઈ કઈ પ્રદેશમાં આ વન નીલવર્ણ યુક્ત પાંદડાઓથી યુક્ત હવા બદલ સ્વયં નીલવર્ણ યુકત છે. અને આ રૂપથી જ એને અવભાસ થાય છે. તેમજ કઈ કઈ પ્રદેશમાં આ વને પત્રોની હરીતિમાને લઈને એટલે કે લીલા લીલા પાંદડાઓથી યુક્ત હોવા બદલ સ્વયં હરિત યુકત છે અને આ રૂપથી આને અવભાસ થાય છે. આ વનખંડ કેઈ સ્થાન વિશેષમાં શીતલ સ્પર્શવાળે છે કેમ કે આદ્રલતા પુજેથીઆનું તળિયું સદા પિડિતઆચ્છાદિત રહે છે, તેમજ સૂર્યકિરણે. ત્યાં પ્રવેશી શકતા નથી. એથી જ ત્યાં કીડા મટે આવેલ વ્યંતરદેવ અને દેવીઓને આનો સ્પર્શ શીતળ રૂપથી પ્રતીત થાય છે. કેમ કે તેઓ Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० ४ पद्मवरबेदीकायाः बहिर्भागस्थवनपण्डवर्णनम् रदेवदेवीनां तथाविध शीतस्पर्शेन प्रमोददर्शनात् शीतावमासो वनपण्डः, तथा - स्निग्धः चिक्कणः स्निग्ध कृष्णादि वर्णयुक्तत्वाद् वनपण्डोपि स्निग्ध इत्युच्यते, एवं स्निग्धावभासः वास्तविक स्निग्धत्वेन प्रतिभासमानो न तूपचारमात्रतः एवं तीव्रः - इहावभासो मरुमरीचिकाया जलावभासवद् भ्रमविषयोऽपि भवत्यतो यथावस्थितस्वरूपज्ञानाय विशेपणान्तरमाह- कृष्ण इत्यादिकृष्णवर्णो वनपण्डः, कुतः ? इत्याह-कृष्णच्छायः - कृष्णवर्णच्छाया विशिष्टः एतद्विशेषणद्वयं गाढकृष्णतां प्रकटयति । एवं नीलः नीलच्छाय इत्याद्यपि | घन कटितटच्छायः - घना - निविडा कटितटच्छाया मध्यभागच्छाया यस्य स तथा, अत कि वे वहां क्रीडा करते २ उकताते नहीं है. प्रत्युत अधिक प्रमोदभाव से भरित अन्तःकरण वाले बनते रहते हैं। तथा यह वनषण्ड किसी २ स्थान में स्निग्ध-चिकना है और चिकने रूप से हो इसका अवभास होता है । कहीं पर यह वनषण्ड " तीव्रः " तोत्र प्रभावाला है और इसी रूप से इसका अवभास होता है. यदि यहां पर ऐसी आशंका की जावे कि सभी अवभास सत्य नहीं होते हैं अतः उस रूप के अवभास को लेकर जो यहां वनषण्ड में तद्रूपता सिद्ध की जा रही है वह कैसे सिद्ध हो सकती है. यदि कहा जावे कि नहीं तद्रूप से जो अवभास होता है वह तो सत्य हो होता है सो इस पर ऐसा कहा जा सकता है कि मरुमरीचिका में जो जला भास होता है वह अवभास भी सत्य मानना पड़ेगा. परन्तु वह तो सत्य नहीं माना गया है-अतः यहां जो अवभास होता है वह ऐसा नहीं है. इसी बात को सूत्रकार इन विशेषणान्तरों से सुस्पष्ट कर रहे हैं कि यह वन कृष्णवर्णवाला इससे सानित होता है कि यह वन कृष्णवर्ण काली छाया से विशिष्ट है । इसी तरह यह वन नीलवर्णवाला इसलिये हैं कि यह नीलवर्णवाली छाया से युक्त है "घनकटितटच्छायः " इसके मध्यभाग में जो छाया रहती है वह बहुत ३९ ત્યાં ક્રીડા કરતાં કરતાં કંટાળી જતા નથી પરંતુ વધારે ને વધારે પ્રમેાદ ભાવથી યુક્ત અંતઃ કરણવાળા થઇને રહે છે. તેમજ આ વનખંડ કોઇ સ્થાનમાં સ્નિગ્ધ-સુચિકકણુ છે અને पिथो अवभास थाय छे, होठा अर्थ स्थळे या वन' "तीन” तीव्र પ્રભાવાળા છે અને આ રૂપથી જ આના અવભાસ થાય છે. જો અડી' આ જાતની આ શકા કરવામાં આવે કે સર્વ અવભાસે સત્યરૂપમાં હોતા નથી એથી તે રૂપના અવભાસને લઈને જે અહો' વનખંડમાં તદ્રુપતા સિદ્ધ કરવામાં આવી રહી છે તે કેવી રીતે સિદ્ધ થઈ શકે છે, જો કહેવામાં આવે કે આમ નહિ તદ્રુપથી જે અવભાસ થાય છે તે સત્યરૂપમાં જ હાય છે તા આ સંબંધમાં આમ કહી શકાય કે મરુમરીચિકામાં જે જલાવભાસ હોય છે તે અવભાસ પથ્રુ સત્ય માનવામાં આવશે. પણ ખરેખર તે તે સત્ય માનવામાં આવતા નથી. એથી અહીં જે અવભાસ હાય છે તે એવા નથી. એ જ વાતને સૂત્રકાર આ વિશે ષાન્તરેથી સુસ્પષ્ટ કરી રહ્યા છે કે આ વન કૃષ્ણવર્ણ યુક્ત એટલા માટે સાબિત થયુ છે કે આ વન કૃષ્ણવની છાયાથી વિશિષ્ટ છે. આ રીતે આ વન નીલગણુ વાળુ` એટલા માટે छेउमा नीलवर्णा युक्त छांयडाथी युक्त छे. “धनकटितटच्छायः " आना मध्यभागभां Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४० जम्बूद्वोपप्रज्ञप्तिसूत्रे एव-रम्य:-रमणीयः तथा महामेघ निकुरम्बभूतः-महामेघसमूहतुरन्यः-ते खलु पादपाः मूलवन्तः-दुरावगाढमूलसहिताः, कन्दवन्तः प्रशस्त मूलोपरिवर्ति--भागरूपकन्दयुक्ताः तथा- स्कन्धवन्त:- स्कन्धः शाखाप्रभवप्रदेशः, स प्रशस्तोऽस्त्येषामिति स्कन्धवन्तः-प्रशस्त स्कन्धयुक्ताः, तथा-प्रवालवन्तः-प्रशस्तपल्लवाङ्कुरयुक्ताः तथा पत्रवन्तः-प्रशस्तपत्रसम्पन्नाः एवं पुष्पवन्तः, फलवन्तः, बीजवन्तः प्रशस्त पुष्पफलवीजयुक्ता इति, तथा आनुपूर्वी सुजातरुचिरवृत्तभावपरिणताः आनुपूा-यथाक्रम सुजाताः सुसमुत्पन्नाः अतएव रुचिराः सुन्द राश्च ते वृत्तभाव परिणताः-वृत्तभावेन वर्तुलत्वेन परिणताः परिणामप्राप्ताः, एकस्कन्धिनः-एकस्कन्धवन्तः, अनेकशाखाप्रशाखाविटपा:-अनेके शाखा प्रशाखा विटपाः-तत्र शाखा:-प्रधानशाखाः, प्रशाखा:-अवान्तरशाखाः, विटपा:--विस्तारा येषां ते तथा बह ही सान्द्र होती है , इसासे यह “ रम्यः " बहुतरमणीय है " महामेघनिकुरम्बभूतः" जिस प्रकार जल से भरे हुए मेघ प्रतीत होते हैं । उसी प्रकार से यह वषण्ड भी प्रतीत होता है " मूलवन्तः" यहां जो वृक्ष हैं वे प्रशस्त मूल वाले हैं। अर्थात् इनकी जड़े बहुत ही दरतक जमीन के भीतर गई हुई हैं। प्रशस्त कन्दवाले हैं । मूल के ऊपरि वर्ती भागरूप प्रशस्त कन्द से युक्त हैं। प्रशस्तस्कन्ध - वाले है- शाखाएँ जिस स्थान से उत्पन्न होती हैं उस स्थान का नाम स्कन्ध है , प्रशस्त प्रवाल वाले हैं । प्रशस्त पल्लवाङ्कुरों से युक्त हैं । प्रशस्त पत्रों वाले हैं. प्रशस्त पुष्पों वाले हैं , प्रशस्त फलों वाले हैं , प्रशस्त बीज वाले हैं। इसतरह प्रशस्त पुष्प . फल और बीज से युक्त यहां के वृक्ष हैं " आनुर्वी सुनातरुचिरवृत्त भाव परिणताः " तथा ये वृक्ष क्रम २ से अच्छी तरह से उत्पन्न हुए हैं अतएव ये रुचिर - सुन्दर हैं और वृत्त भाव को परिणत हुए हैं , छते का जैसा आकार होता है वैसा इनका आकार है। इनमें अनेक स्कन्ध नहीं हैं किन्तु एक ही स्कन्ध है , “ अनेक शाखा प्रशाखा विटपाः " ये अनेक प्रधान જે છાયા રહે છે તે ખૂબ જ સાંદ્ર હોય છે. એથી આ “મા” ખૂબ જ રમણીય છે. "महामेधनिकरम्बभतः” भvan(R1 मेघ मासूम 43 छ ८ मा वनम ५ मालम ५४ छ. "मलवन्तः" मा २ वृक्षा छ त प्रशस्तभूसाणा छ भेटले समना ખૂબ જ દૂર સુધી જમીનની અંદર પહાંચેલી છે. તેઓ પ્રશસ્ત કંદવાળા છે મળના ઉપરિવતી ભાગ રૂપ પ્રશસ્ત કબ્દોથી યુક્ત છે. પ્રશસ્ત સ્કન્ધવાળા છે. શાખાઓ જ સ્થાનેથી ઉત્પન્ન થાય છે તે સ્થાનનું નામ સકધ છે. પ્રશસ્ત પ્રવાલવાળા છે. પ્રશસ્ત પલવારોથી યુકત છે. પ્રશસ્ત પત્રોવાળા છે. પ્રશસ્ત પુપિવાલા છે પ્રશસ્ત ફલોવાળા છે પ્રશસ્ત બી. वामा छे. मा प्रमाणे प्रशस्त पुण्य ३८ मने मालथा युटत महीना वृक्ष छ. "आन. पूर्वीसुजातरुचिरवृत्तभावपरिणताः" तभ० मा वृक्षा मनु सारी रात उत्पन्न थयों છે. એથી આ બધાં રુચિર સુંદર છે. મધપૂડાને જેવો આકાર હોય છે તે જાતનો આકાર એમને छ. भाभा । २४-या नथी परंतु मे ॥ २५छे “अनेकशाखाप्रशाखाविटपा" से ઘણી પ્રધાન શાખાઓ અને અવાન્તર શાખાઓના વિરૂપ-વિસ્તારથી ચુકત છે. એ Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका स० ५ पद्मवरवेदिकाया बहिगिस्य वनषण्डवर्णनम् शाखाप्रशाखाविस्तारयुक्ताः अनेक नरव्यामसुप्रसारिताग्राह्यधनविपुलवृत्तस्कन्धाः अनेकेषां बहूनां मनुष्याणां व्यामैः-प्रसारितभुजान्तरालैः अग्राह्यः-अतिस्थूलतयाग्रहीतुमशक्यः धनः-सान्द्रः विपुल:-विशालः वृत्तः-वर्तुलः स्कन्धो येषां ते तथा भूताः अतिस्थूलसघनविशालतया प्रसारितपाणिभिनरैर्दुग्राह्य वर्तुलस्कन्धाः इति यावत् । तथा अच्छिद्रपत्राः अच्छिद्राणि सूर्यकिरणैरपि दुष्प्रवेशानि पत्राणि येषां ते तथापरस्परमिलितपत्राः, अतएव अविरल पत्राः-निरन्तरपत्राःअवातीनपत्रा:-वातीनानि वातोपहतानि न वातीनानि अवातीनानि तादृशानि पत्राणि येषां ते तथा अत्र अतिसघनत्वाद्वायोरप्रवेशेनाकम्पित पत्रा इत्यर्थः। तथा-अनीतिपत्राः ईतयः षट्-अतिवृष्टिः १, अनावृष्टिः २, मूषिकः३, शलभः ४, शुकः ५. अत्यासन्नो राजा ६ चेति, अविद्यमाना ईतयो येषां तानि अनीतिनि-पडूविधेति रहितानि निरुपद्रवाणि पत्राणि येषां ते तथा । तथा निदर्धत जरठपाण्डुपत्राः-निधूतानि नष्टानि जरठानि जीर्णानि पाण्डुपत्राणिपाण्डवर्णपत्राणि येषां ते तथा । तथा नव हरितभासमान पत्र भारान्धकारगम्भीर दर्शनीयाः नवेन सद्योजान हरितेन शुकपिच्छाभेन भासमानः स्निग्धत्वचा दीप्यमानो यः पत्रभार:-पत्रसमूहः तेन अन्धकारा, अन्धकारव्याप्ता अत एव गम्भीरा:-इदमी दृगिति विवेक्तु मशक्या यथा तथा दृश्यन्त इति गम्भीरदर्शनीयाः तथाउपविनिर्गतनवतरुणपत्रपल्लवकोमलोज्ज्वलचलत्किसलयसुकुमारप्रवालशोभितवराङ्कुराग्रशिखराः-उपविनिर्गतानि-सद्यः प्रकटितानि नवतरुणानि-नवीनाऽऽगततरुणता सम्पन्नानि यानि पत्र पल्लवानि-पत्रगुच्छरूपाणि तेः, तथा-कोमलोज्ज्वलैः मृदु निमैले चलद्भिःकम्पमानैः, किसलयैः-सद्योजातैः पत्रविशेषैः सुकुमारप्रवालैः-कोमलपल्लवैः शोभितानि वराङ्कुरायशिखराणि-सुन्दराकुरयुक्तोपरितनभागाः येषां ते तथा । अत्र विशेषणेअकुर:-प्रबाल-पल्लव-किसलय-पत्राणि स्वल्पतर स्वल्यबहु चिरतरादि कालकृतावस्थाभेदाद भिन्नानीति भावः । नित्यं कुसुमिता:-सदा सर्वर्तुसंजातपुष्पोपेताः, न तु ऋतु प्रतिबद्धपुष्पाः, नित्यं- सदा मुकुलिताः, नित्यं लवकिताः-सदा पल्लविताः, नित्यं सदास्तबकिताः विकासोन्मुखकलिका सम्पन्नाः, नित्यं गुल्मिताः-सदा प्रतानसम्पन्नाः, नित्यं गुच्छिताः-कलिकादि समूहसम्पन्नाः, नित्यं यमलिताः-समपंक्तितया स्थिताः, नित्यं युगलिताः -सदा युगल तया स्थिताः, नित्यं विनमिता:-फल पुष्पादिभिविनम्रीकृताः, नित्यं प्रणमिताः केचित् प्रकर्षेण नम्रीकृताः, नित्यं सुविभक्त प्रतिमजर्यवतंसकधराः, नित्यं-सर्वकालं सुविभक्तः सुविच्छित्तिक प्रतिविशिष्टो मजरीरूपो योऽवतंसकः शिरोभूषणस्तद्धरा-तारिणः । नित्यं कुसुमित मुकुलितलवकित स्तबकित गुल्मितगुच्छितयमलितयुगलितविनमितप्रणमितसुविभक्तप्रतिमजर्यवतंसकधराः, अत्र स्थानि कुसमितादिपदानि पूर्व पृथक पृथग् व्याख्यातानि । शुकबहिण मदनशलाका कोकिल कोरक भृङ्गारक कोण्डलकजीवजीवकनन्दीमुखकपिल पिङ्गलाक्षक कारण्डवचक्रवाककलहंससारसानेकशकुनगणविरचितशब्दोन्नतमधुरस्वरनादिताः-तत्र शुकाः Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपमाप्तिसूत्रे प्रसिद्धाः, बर्हिणाः मयूराः मदनशलाका:-सारिकाः कोकिला:-प्रसिद्धाः, कोरका:पक्षविशेषाः, भृङ्गारकाः भृङ्गाराः पक्षिविशेषास्त एव भृङ्गारकाः कोण्डलकाः पक्षिविशेषाः, जीवजीवका:--जीवजीवाः चकोरास्त एव जीवञ्जीबकाः, नन्दीमुखाः-पक्षिविशेषाः, कपिला:-पक्षिविशेषाः, पिङ्गलाक्षका:-पिङ्गलवर्णनेत्राः पक्षिविशेषाः, कारण्डवाः-पक्षिविशेपाः, चक्रवाकाः-केकाः 'चकवे'ति भाषाप्रसिद्धाः, कलहंसाः 'बतक'-इति प्रसिद्धाः, सारसा:-प्रसिद्धाः पक्षिविशेषाः, एते ये अनेके शकुनाः पक्षिणस्तेषां ये गणा:-- समूहा स्तेषां यानि मिथुनानि स्त्री पुंसयुग्मानि तैर्विरचिताः-कृता ये शब्दोन्नता:-उन्नत शब्दाः-उच्चै रवाः ते मधुरस्वरा मधुरालापयुक्तास्तै दिताः कलकलरवयुक्ताः-विविध पक्षिगण मिथुन कृतमधुरध्वनियुक्ता इत्यर्थः, अतएव सुरम्याः अतीव रमणीयाः, तथा सम्पिण्डित दृप्तभ्रमर मधुकरी प्रकरपरिलीयमानमत्तपट्पद कुसुमासवलोल मधुरगुमगुमायमानगुजद्देशभागाः, तत्र सम्पिण्डिताः कुसुमासवपानार्थ परस्पर सम्मिलिताः ये दृप्तानां मदमत्तानां भ्रमराणां मधुकरीणां भ्रमरीणां च प्रकराः समूहास्तैः सह परिलीयमानाः श्लिष्यन्तः-परिमिलन्तो ये मत्तषट्पदाः, त एव पुनः कुसुमाऽऽसवलोलाश्च पुष्परसाऽऽ स्वादलोलुपाश्च तेषां मधुरं यथा तथा गुमगुमायमानः गुमगुमेति मधुर भृङ्गसङ्गीतैः गुजन् मधुरमव्यक्तं शब्दायमानो देशभागो येषु ते तथा । अत्र मधुकरगुरुजनं देशभागे आरोपितम् । तथा अभ्यन्तरपुष्पफलाः अभ्यन्तरे पुष्पफलैः सम्भृताः, बहिः पत्रावच्छन्ना:-बहिः संजात पत्रसमूहप्रच्छन्नाः पुष्पै फलैश्च अवच्छन्न प्रतिच्छन्नाः सर्वथाऽऽच्छादिताः, तथा स्वादुफलाः-स्वादयुक्तफलसम्पन्नाः नोरोगकाः वृक्षचिकित्साशास्त्रप्रदर्शितरोगवर्जिताशोत-विधु-दातपादिजनितोपद्रवरहिता वा, अकण्टकाः कण्टकरहिता नानाविध गुच्छगुल्ममण्डपकशोभिता:नानाविधैः बहुप्रकारैः गुच्छै:-पुष्पस्तबकैः गुल्मैः लताप्रतानः मण्डपकैः मण्डपाकारलतामण्डलैश्च शोभिताः शोभासम्पन्नाः, विचित्रशुभकेतुभूताः विचित्रशुभक्जरूपाः वापी पुष्करिणी दीर्घिका सुनिवेशितरम्यजालगृहकाः, तत्र वाप्यः चतुष्कोणाः, पुष्करिण्यः-वृत्ता वाप्य एव दीर्घिकाः अजु सारिण्यः, तासु सुनिवेशितानि सुष्टुतया स्थापितानि रम्याणि-रमणीयानि जाल गृहकाणि सच्छिद्रगवाक्षा यत्र ते तथा पिण्डिमनि रिमसुगन्धि सुरभिमनोहरां सम्मिलितां सती शुभपुद्गलसमूहरूपेण दूरदेशगामिनीं सुगन्धि शोभनगन्धवती शुभमुरभिमनोहरां-श्रेष्ठसुगन्धमनोहारिणीम् , महागन्धघ्राणि-महती चामौ गन्ध एव नाणिः तृप्तिस्तद्धेतुत्वाद् प्राणिः गन्धघ्राणिः तां महागन्धघ्राणि-महागन्धतृप्तिम् , मुञ्चन्त:-प्रसारयन्तः तथा शुभ सेतुकेतु बहुलाः गुभा प्रधानाः ये सेतवःमार्गाः आल वालपाल्यो वा, केतवः पताकाश्च तैबेहुला:-व्याप्ताः, अनेक रथ शकटयान युग्य गिल्लि विल्लि स्यन्दमानिकाशिविका प्रविमोचनाः-अनेकेत्यस्य रथादि शिविकान्त द्वन्द्वघटकेषु Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. ५ पद्मवर वेदिकायाः बाहर्भागस्थ वनपण्डवर्णनम् प्रत्येकेषु सम्बन्धः, तेन तत्र अनेके ये रथाः अनेकानि यानि शकटानि, अनेकानि यानि यानानि अश्वादीनि, अनेकानि यानि युग्यानि गोल्लदेशप्रसिद्धानि द्विहस्तप्रमाणानि चतुरस्राणि वेदिकोपशोभितानि जम्पानानि 'गिल्लि' इति देशीयः शब्द आसन विशेषार्थकः तेन हस्तिनः पृष्टोपर्यासनानि 'अम्बाड़ी' इति प्रसिद्धानि गिल्लिपदवाच्यानि । 'थिल्ली' इत्यपि देशीयः क्रोडारथार्थकः, तेन लाटदेशप्रसिद्धाः क्रीडारथाः थिल्लिपदवाच्याः, स्यन्दमानिकाः-पुरुषप्रमाणजम्पानविशेषाः, एवम् अनेकाः या शिबिकाः-पुरु वाह्ययानविशेषाः पालखी' इति प्रसिद्धाः, तासामनेकरथाधनेक शिविकान्तानाम् अधोऽतिविस्तीर्णत्वात् प्रविमोचनं स्थापनं यत्र ते तादृशाः। क्रीडार्थमागतानां जनानामनेकरथादयस्तत्र स्थाप्यन्त इति भावः । तथा-सुरम्याः, अतिरमणीयाः प्रासादीयाः-दर्शकानां हृदयप्रसादकराः, यावत्पदेन “दर्शनीयाः द्रष्टुं योग्याः, तथा अभिरूपा:-सर्वथा दर्शकजनमनोनयनहारिणः” इति पदद्वयं बोध्यम् । तथाप्रतिरूपाः-असाधारणरूपयुक्ताः, इति । सू० ५॥ शाखाओं और अवान्तर शाखाओं के विटप- विस्तार से युक्त हैं ये इतने मोटे हैं कि अनेक पुरुष एक साथ हाथ पसारे तब भी इनके स्कन्ध को अपने अङ्क में नहीं भर सकते हैं। इनका जो स्कन्ध है वह मोटे होने के साथ सान्द्र है- मजबूत है , पोला नहीं है। गोल है- आडा टेड़ा नहीं हैं । सरल है इनके पत्र ऐसे हैं कि जिनमें छिद्र का नामतक भी नहीं है । अथवावृक्षों की डालियों आपस में इस रूप से मिली हुई हैं कि उनके पत्र आपस में एक दूसरे पत्रों के साथ संलग्न होते गये हैं । अतः छिद्र वहां नहीं होता है । इसलिये सूर्य की किरणों को वहां प्रवेश करने के लिये स्थान नहीं प्राप्त होता है , " इत्यादि रूप से इस सूत्रपाठ में आगत यह वनषण्ड का वर्णन जीवाभिगम सूत्र में व्याख्यात किया जा चुका है । अतः वहीं से इस पाठ की व्याख्या जान लेनी चाहिये ॥५॥ એટલા વિશાળ છે કે અનેક પુરુષે એકી સાથે હાથ પહોળા કરે છતાં એ એમના થડને પિતાના બાહુઓમાં સમાપ્તિ કરી શકતા નથી. એમના' જે સ્કર્ષે છે તે મોટા હોવાથી सान्द्र छ, भ न छ, पासा नथी. छे, 24131-4it नथ), स२१ छ. मेमना ५istઓ એવા છે કે જેમનામાં છિદ્ર નથી અથવા વૃક્ષની શાખાએ એક બીજાથી એવી રીતે સમ્મિલિત થયેલી છે કે તેમના પાંદડાઓ પરસ્પર સંલગ્ન થઈ ગયાં છે. એથી ત્યાં છિદ્રો રહ્યા નથી, એથી સૂર્યના કિરણેને ત્યાં પ્રવેશવા માટે અવકાશ નથી. ઈત્યાદિરૂપમાં આ સૂત્ર પાઠમાં વર્ણિત આ વનખંડનું વર્ણન જીવાભિગમ સૂત્રમાં વ્યાખ્યાત કરવામાં આવેલ છે. જિજ્ઞાસુઓએ ત્યાંથી આ પાઠની વ્યાખ્યા જાણી લેવી જોઈએ. પાપા Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४ अथ वनखण्डस्य भूमिभागं वर्णयितुमुपक्रमते मूलम् - तस्स णं वणसंडस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते से जहा नामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव णाणाविह पंचवमणिहिं तहिं उवसोभिए, तं जहा किण्णेर्हि ? एवं वण्णो गंधो रसो फासो सदा पुक्खरिणीओ पव्त्रयगा घरगा मंडवगा पुढवि सिलोवहटया गोयमा ! णेयव्वा, तत्थ णं बहवे वाणमंतरा देवा य देवोओ य आसयति संयंति चिद्वेति णिसीयंति तुअति रमंति ललंति कीलंति किति मोहंति पुरा पराणोणं सुचिण्णाणं सुपरिक्कंताणं सुभाणं कल्लाणा काणं कम्माणं कल्लोण फलवित्तिविसेसं पच्चणुभवमाणा विहरंति । तीसेणं जगईणं उप्पि अंतो पउमवरवेइयाए एत्थणं एवं महं वणसंडे पण्णत्ते देसूणाई दोजायणाई विक्खंभेण वेदियासमए परिक्खेवेणं किन्हे जाव तणविणे यव्वे ॥ सू० ६ ॥ छाया--तस्य खलु वनखण्डस्य अन्तः बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः तत् यथा नामक आलिङ्गपुष्करमिति व यावत् नानाविधपञ्चवर्णैर्मणिभिः तृणैरुपशोभितः, तद्या -कृष्णः एवं वर्णो गन्धो रसः स्पर्शः शब्द : पुष्करिण्यः पर्वतका गृहकाणि मण्डपकाः पृथियो शिलापट्टकाः गौतम ! नेतव्याः । तत्र खलु बहवो वानव्यन्तरा देवाश्च देव्यश्च आ सते शेरते तिष्ठन्ति निषीदन्ति त्वग्वर्त्तयन्ति रमन्ते ललन्ति कीडन्ति कीर्तयन्ति मोहन्ति पुरा पौराणानां सुचीर्णानां सुपरीक्रान्तानां शुभानां कल्याणानां कृतानां कर्मणां कल्याणफलवृत्तिविशेषं ग्रत्यनुभवन्तस्तिष्ठन्ति । तस्याश्च खलु जगत्या उपरि अन्तः पद्मवरवेदिकायाः अत्र खलु एको महान् वनखण्डः प्रज्ञप्तः देशोने द्वे योजने विष्कम्मेण वेदिका समयः परिक्षेपेण, कृष्णो यावत् तृणविहीनो ज्ञातत्यः ॥ सू० ६ ॥ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे टीका- 'तस्स णं वणसंडस्स' इत्यादि । 'तस्स णं वणसंडस्स अंतो' तस्य पूर्वोक्तस्य खलु बनपण्डस्य अन्तः मध्यभागे वनण्ड के भूमिभाग का वर्णन - 66 तस्स णं वणसंडस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते " इत्यादि । उस वषण्ड का भीतरी भूमिभाग अत्यन्त - समतलवाला होने से बहुत सुन्दर है " से વનખના ભૂમિભાગનું વર્ણન :— तस्लणं वणसंडस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते- इत्यादि सूत्र - ६" તે વનખંડના અ ંદરના ભૂમિ ભાગ અતીવ સમતલ હાવાથી બહુ જ સુંદર છે Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० ६ वनखण्डभूमिभागवर्णनम् 'बहुसमरमणिज्जे भूभिमागे पण त्ते' बहुसमरमणीयः अत्यन्त समतलोऽतएव रमणीयः सुन्दरो भूमिभागः प्रज्ञप्तः कथितः । 'आलिंगपुक्खरेइवा' तत् प्रसिद्धं यथा इति दृष्टान्तोपदर्शनार्थम् नामेति कोमलामन्त्रणे 'ए' इति वाक्यालङ्कारे, आलिङ्गपुष्करमिति वा-आलिङ्गः-मृदङ्गस्तस्य यत्पुष्कर-मुखोपरि चर्मपुटकम् तदत्यन्तं समतलं भवतीति तद्वत्समतल मिति तेन सादृश्यं दर्शयितुमितिशब्दः प्रयुक्तः, वा समुच्चये, एवमग्रेऽपि 'जाव' यावत् यावत्पदेन भूमिभागस्थात्यन्त समतल तावर्णनं राजप्रश्नीवसूत्रस्य पञ्चदशसूत्रे विलोकनीयम् । तदर्थस्तत्रैव मत्कृतसुबोधिनी टीकातोऽवसेयः । पुनः स भूमिभागः कीदृशः ! इत्याह "नाणाविहपंचवण्णेहि' इत्यादि, नानाविध पञ्चवर्णैः कृष्णादिपञ्चवर्णयुक्तैः “मणिहि तणेहि उवमोभिए" मणिभिस्तृणैश्चोपशोभितः 'तं जहा' 'इत्यादि, तं जहा' तद्यथा-तदेव दर्श यति किण्हेहि' कृष्णः-कृष्णवर्णयुक्तैः एवं वण्णो' एवं नीललोहितहारिद्र-शुक्ल वर्णयुक्तैर्मणिभिस्तृणैश्चेति सर्व वर्णविषयकं वर्णन तथा 'गंधो रसो फासो' गन्धरसस्पर्शवर्णनं च राजप्रश्नीयसूत्रे पञ्चदशसूत्रादारभ्यैकोनजहा नामए आलिंग पुक्खरेइ वा जाव णाणाविह पंचवण्णेहिं मणिहिं तणेहिं उवसोभिए" जैसा मृदङ्ग के मुख पर मडा हुआ चर्म पुट समतल वाला होने से सुन्दर होता है । यहां यह दृष्टान्त समतलता की सादृश्यता प्रकट करने के लिये कहा गया है यहां जो यावत्पद का प्रयोगहुआ है वह यह प्रकट करता है कि भूमिभाग की अत्यन्त समतलता का वर्णन यदि देखना हो तो राजप्रश्नीय सूत्र के १५ वे सूत्र को देखो-वहां पर इस बात का अच्छी तरह से स्पष्टीकरण किया गया है राजप्रानीय सूत्र की मैं ने सुबोधिनी टीका लिखी है । उसमें पद व्याख्या इस समबन्ध में मैने की है। यह भूमिभाग अनेक प्रकार के पांचवर्ण वाले रत्नों से एवं तृणों से खचित है -उपशोभित है। वे पांच वर्ण कृष्ण , नील , लोहित , हारिद्र-और शुक्ल है वहां जैसे ये पांच वर्णों के रत्न हैं उसी प्रकार से वहां पांच वर्गों के तृण भी हैं इनके गंध, रस एवं स्पर्श किस प्रकार के हैं-इन सम्बन्ध का वर्णन राजप्रश्नीय सूत्र में १५ जहा नामए आलिंग पुक्खरेइ वा जाव णाणाविह पंचवण्णेहिं मणिहिं तणेहिं उवसोभिए" મૃદંગના મુખ ઉપરને ચર્મપુટ જે સમતલ હેવાથી સુંદર હોય છે. અહીં આ દષ્ટાંત સમતલતાની સદશ્યતા પ્રકટ કરવા માટે જ કહેવામાં આવેલ છે. અહી જે યાવત્ પદનો પ્રયોગ થયેલ છે તે આ પ્રકટ કરે છે કે ભૂમિભાગની અત્યન્ત સમતલતા. વિષે જાણવું હોય તો રાજપ્રનીય સૂત્રના ૧૫ મા સૂત્રને જુઓ. ત્યાં આ વિષે બધું સારી રીતે સ્પષ્ટીકરણ કરવામાં આવ્યું છે રાજ પ્રશ્નીયસૂત્રની મેં સુબાધિની ટીકા લખી છે તેમાં આ વિષેની પદવ્યાખ્યા મેં કરી આ ભૂમિભાગ. અનેક છે જાતના પાંચવર્ણોવાળા રત્નથી તેમજ તૃણેથી અચિત છે. તે ઉપભિત પાંચ વર્ષો કૃષ્ણ, નીલ, લોહિત, હારિદ્ર, અને શુકલ છે ત્યાં જેમ આ પાંચ વર્ણોવાળાં રને છે તેમજ ત્યાં પંચવર્ણોવાળા તૃણે પણ છે. એમના ગંધ, રસ અને સ્પર્શ કેવા પ્રકારના છે? આ સંબંધમાં રાજપ્રશ્નીય સૂત્ર ના ૧૫ માં સૂત્ર થી લઈને Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र विंशतितमसूत्रपर्यन्तं विलोकनोयम् । अर्थोऽपि तत्रैव सुबोधिनी टोहातो विज्ञेयः । नदेवाह--"एवं" इत्यादि । “सदो त्ति' शब्दवर्णनमा तस्यैव राजप्रश्नोयसूत्रस्य त्रिाष्टि तम चतुष्पष्टितमेमि सूत्रद्वये विलोकनीयम् । अर्थोऽपि तत्रैव सुबोधिनी टीकायां द्रष्टव्यः । “पुक्खरिणीओ त्ति, तत्र वनषण्डस्य बहुसमरमणीये भूमिभागे पुष्करिण्यःक्षुद्राः क्षुद्रिका, वाप्यः, पुष्करिण्वादयश्च सन्ति तासां वर्णनं राजप्रश्नीयसूत्रस्य पञ्चषष्टितमसूत्रे, “पब्धयणा इति पर्वतकाः, तासां पुष्करिण्यादीनां तत्र तत्र देशे उत्पातादि पर्वताः सन्ति, एषां वर्णन षट्पष्टितमसूत्रे "घरगा इति 'आलियघरगा' तेषु वनपण्डेषुतत्र तत्र देशे बहूनि आलिका गृहकाणि कदली गृहकाणीत्यादि गृहवर्णनं सप्तषष्टितमसूत्रे, 'मंडवगा' इति मण्डपकाः तत्रैव तत्र तत्र देशे बहवो जाति मण्डपका यूथिका मण्डपकाः, इत्यादि मण्डपकवर्णनं, तथा 'पुढविसिलापट्टया' इति पृथिवी शिलापट्टका वें सूत्र से लेकर २१वें सूत्र तक किया गया है-सो वहीं से इस वर्णन को जान लेना चाहिये, तथा पदों की अर्थ व्याख्या सुबोधिनी टीका में की गई है-सो यह भी उसी से देख लेना चाहिये जब ये तृण वायु के झोकों से मन्द २ रूप में या विशेषरूप में प्रकम्पित होते हैं-तब इनमें से परस्पर के संघट्टन से किस प्रकार का शब्द निकलता है यह सब यदि देखना हो तो राज प्रश्नीय के ६३वें और ६४वे सूत्र की व्याख्या को देखना चाहिये । वहाँ पर यह सब बहुत ही सुन्दर ढंग से समझाया गया है "पुक्खरिणीओत्ति" बहुसमरमणीय मध्यभूमिभाग में अनेक छोटी २ वापिकाएँ हैं-इनका वर्णन भी राजप्रश्नीयसूत्रके ६५वे सूत्र में आया है' इन पुष्करिणियों के बीच में "पव्वया" उत्पात आदि पर्वत हैं तथा उस वनषण्ड में अनेक "घरगा" कदलीगृह हैं, अनेक "मंडवगा" मण्डप-लताकुज-आदि हैं एवं "पुढविसिलापट्टया" अनेक हंसासन आदि जैसे पृथिवीशिलापट्टक हैं और ये सब प्रतिरूपान्त तक के विशेषणों वाले हैं-यह सब ૨૧ માં સૂત્ર સુધી વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે. તે ત્યાંથી જ આ વર્ણન વિષે જાણી લેવું જોઈએ. તેમ જ પદેના અર્થની વ્યાખ્યા સુધિની ટીકામાં કરવામાં આવી છે. તે આ વિષે પણ ત્યાંથી જોઈ લેવું જોઈએ જયારે આ તૃણે પવનના ઝપાટાએથી ધીમે ધીમે અથવા વિશેષ રૂપમાં પ્રકંપિત થાય છે. ત્યારે એમનામાંથી પરસ્પરના સંઘટ્ટનથી કઈ જાતને શબ્દ ઉપન થાય છે. આ વિશે જે જાણવું હોય તે “રાજપ્રશનીયના ૬૩મા અને ૬૪ મા સૂત્રના વ્યાપાવાંચવી જોઈએ. ત્યાં આ વિષે ઉત્તમ રૂપમાં स्पष्ट ४२वामां भाव छ, “पुङ्गखरिणीओ "त्ति" तमसमरमाशीय मध्यभूमिमामा घशी નાની વાપિકાએ છે. તેમનું વર્ણન પ્રણ “રાજપ્રનીયસૂત્રનાં ૬૫ માં સૂત્રમાં કરવામા मावस छ. 24 पुरिणीमानी १२२ "पव्वया" त्यात २ ५ । छे. ते ते पनमा भने “घरगा" ४सी । छे. अने 'मंडवगा भ७५-ता -वगेरे छे. तभर "पुढविसिलापट्टया" अनेसासन त्या 24 पृथिवी शिक्षा--५८८ । छ भने આ સર્વ પ્રતિરૂપાન્ત સુધીના વિશેષણેથી યુક્ત છે. આ બધું વર્ણન પણ અનુક્રમે ત્યાં Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. ५ वनखण्डभूमिभागवर्णनम् ४७ हंसासन संस्थिता यावत्प्रतिरूपाः, इत्यादि वर्णनं च राजप्रश्नीयसूत्रस्याष्टषष्टितमसूत्रे द्रष्टव्यं तदर्थोऽपि तत्रैव सुबोधिनी टीकायां विलोकनीयः, 'गोयमा' गौतम ! 'णेयव्वा' इति नेतव्याः एते पदार्था ज्ञातव्या इत्यर्थः । 'तत्थ णं' इत्यादि । तत्र पूर्वोक्तेषु हंसासनादि संस्थानसंस्थितेषु पृथिवीशिलापट्टकेषु खलु 'वहवे वाणमंतरा देवा य देवीओ य बहवः-अनेकसंख्याः वानमन्तरा:-व्यन्तस्देवाश्च देव्यश्च व्यन्तर देवा व्यन्तर देव्यश्च 'आसयंति' आसते, यथासुखं सामान्यत स्तिष्ठन्ति, 'सयंति शेरते-दीर्घकाय प्रसारणेन बर्तन्ते न तु निद्राति देवानां निद्राया अभावात् , 'चिट्ठति' तिष्ठन्ति ऊर्धावस्थानेन 'णिसीयंति निषोदन्ति-उपविशति, 'तुयटुंति त्वग्वर्त्तयन्ति-पार्श्वपरिवर्तनं कुर्वन्ति, 'रमंति' रमन्ते-रतिमानध्वन्ति, 'ललंति ललन्ति-विलसन्ति, 'कीलंति क्रीडन्ति क्रीडां कुर्वन्ति 'किइंति' कीर्तयन्ति 'मोहंति' मोहन्ति-विलासं कुर्वन्ति, 'पुरा पोरा. णाणं पूरा-प्राग्भवे पुराणानां-पूर्वजन्मजातानां कर्मणामिति परेण सम्बन्धः, एवं 'मुचिष्णणं' सुचीर्णानां-सुचीर्णानां सुविधिकृतानां, 'सुपरिक्वंताणं' हुपरिक्रान्तानां शोभनपराक्रमसम्पादितानाम् , अतएव 'सुभाणं' शुभानां शुभफलानां 'कल्लाणं' कल्याणानांवर्णन भी क्रमशः वहीं राजप्रश्नीय सूत्र में ६६वें ६७-६८ सूत्र में आया है अतः इसके लिए उसकी सुबोधिनी टीका देखना चाहिये "तत्थ णं बहवे वाणमन्तरा देवा य देवीओ य आसयंति सयंति, चिटुंति, णिसीयंति, तुयट्ठति, रमंति ललंति, कोलंति, किति, मोहंति" उन हंसासनादि के जैसे आकार वाले पृथिवी शिलापट्टको के ऊपर अनेक वानव्यन्तरदेर और देवियां सुखपूर्वक उठती बैठती रहती हैं, लेटती रहती है, आराम करती रहती है, कहीं खड़ी रहती हैं, पार्श्वपरिवर्तन करती रहती है, और करवटबदलती हुई विश्राम करती रहती है रतिसुखभोगा करती हैं, नाना प्रकार की क्रीडाएँ करती रहती हैं, गाने गाती रहतो हैं, आपस में एक दूसरे को मुग्ध करती रहती हैं, भिन्न २ प्रकार के घिला सों से देवों के चित्त को लुभाती रहती हैं, इस प्रकार से ये देव और देवियां "पुरा पोराणाणं सुचिण्णाणं सुपरिक्कंताणं सुभाणं कल्लाणाणं શજપ્રશ્રીય સૂત્રના ૬૬ મા અને ૬૭ મા તેમજ ૬૮ મા સૂત્રમાં કરવામાં આવેલ છે. मेथी माविषेत डाय त तनी सुधिनी टीवी ध्ये. "तत्थ ण बहवे वाणमंतरा देवाय देवोओ य आसयति सयंति चिट्ठति णिसीगंति, तुअट्ठति रमंति, ललंति, कीति, किति मोहति " ते सासनहिना सपा मारवाणा पृथिवी(शतपटीनी ઉપર ઘણા વાનવ્યંતર દેવ દેવીઓ સુખેથી ઉઠતા બેસતા રહે છે, ભેટતા રહે છે, આરામ કરતા રહે છે, કયાંક કયાંક ઊભા રહે છે. પાર્શ્વ પરિવર્તિત કરતાં રહે છે. એટલે કે પાસું ફેરવીને વિશ્રામ કરતાં રહે છે. રતિસુખ ભેગવતાં રહે છે. અનેક પ્રકારની ક્રીડાઓ કરતાં રહે છે. ગીત ગાતાં રહે છે, પરસ્પર એક બીજાને મુગ્ધ કરતાં હે છે. ભિન્ન ભિન્ન પ્રકારના વિલાસેથી દેવના ચિત્તને દેવીએ લુબ્ધ કરતી રહે છે. આ રીતે આ સર્વ દેવ भने हेवी "पुरापोराणाण, सुचिण्णाणं सुपरिकताणं सुभाणं कल्लाणाण काणं करमाणं Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वास्तविक कल्याण फलानां 'कडाणं' कृतानां कर्मणां-पुण्यकर्मणां 'कल्लाणफलबित्तिविसेसं पच्चणुभवमाणाविहरंति' कल्याणं-कल्याणरूपं फलवृत्तिविशेष फलविपाके परिणाम फलं प्रत्यनुभवन्तः एकैकशोऽनुभवविषयं कुर्वन्तः सन्तो विहरन्ति । इत्येवं पद्मवरवेदिकाया बहिः स्थितवनषण्डवर्णनमुक्तम् । अधुना तस्या एव मध्यवर्ति प्रदेशान्तर्गत महावनपण्डवर्णन चिकीर्षुराह-'तीसेणं इत्यादि-'तीसेणं जगइए उप्पि' तस्याः पूर्वोक्तायाः खलु जगत्याः उपरि-ऊर्ध्व भागे 'अंतो पउमवर वेइयाए' स्थितायाः पद्मबरवेदिकायाः अन्तः मध्ये यः प्रदेशः, 'एत्थ णं एगं महं वणसंडे पण्णत्ते' अत्र-अस्मिन्प्रदेशे खलु एको महान् विशालो वनपण्डः प्रज्ञप्तः, 'देसूणाई दो जोयणाई विक्खंभेणं' सच देशोने द्वे योजने विष्कम्भेण विस्तारेण, 'वेदियासमए परिक्खेवेणं, वेदिकासमकः-वेदिकया पद्मवरवेदिकया समः तुल्यः वेदिकासमः स एव वेदिका समकः परिक्षेपेण-परिधिना, पद्मवरवेदिकापरिक्षेपयुक्त इत्यर्थः, अस्य वर्णनं पद्मवरवेदिकडाणं कम्माणं कल्लाणफलवित्तिविसेसं पच्चणुभवमाणा विहरंति" पूर्व में आचरित किये गये शुभाध्यवसाय से सविधि शोभनपराक्रमपूर्वक उल्लास के साथ सेवित किये-ऐसे शुभकल्याणकारी फलवाले पुण्यकर्मो के कल्याणरूप फल को उनके उदयकाल में भोगते हुए अपने समय को व्यतीत करते रहते हैं। इस प्रकार से पद्मवरवेदिका के बाहर के वनषण्ड का वर्णन कर-अब सूत्रकार उमके मध्यवर्ती महावनपण्ड का वर्णन करते हुए कहते है "तीसेणं जगइए उपि अंतो परमवर वेइयाए" उस जगती के ऊपर जो पद्मवरवेदिका कही गई है उस पद्मवरवेदिका के भीतर “एत्थ णं एग महं वणसंडे पण्णत्ते” एक बहुत विशाल वनषण्ड कहा गया है यह वनषण्ड "देसूणाई दो जोयणाई विखंभेणं वेदिया समए परिक्खेवेणं किण्हे जाव तणविहूणे णेयव्वे" चौड़ाई में कुछ कम दो योजन का है तथा इसकी परिधि का कल्लाणफवित्तिविसेस पच्चणुभबमाणा विहरंति" पूर्वमा मायरित शुमायવસાયથી વિધિ શોભન પાકમપૂર્વક ઉલાસની સાથે સેવન કરેલા – એવા શભકલ્યાણકારી ફળવાળા પુણ્ય કર્મોના ક૯યાણ રૂ૫ ફળ ને તેમના ઉદયકાળમાં ભેગવતાં પોતાના સમયને પસાર કરે છે. આ પ્રમાણે પાવર વેદિકાને બહારના વનખંડનું વર્ણન કરીને હવે સૂત્રકાર તેના मध्यवती मानमर्नु न त ४ छ:-"तीसेण जगईए उम्पि अंतो पउमवरवे इयाए” a तानी 3५३ पावरवहा छ त पव२ वी मह२ "एत्थणं एगं महं वणसंडे पण्णत्ते २४ मई विश न ४ामा मा छे 20 वष : “देसणाई दो जोयणाई विखमे ण वेदियासमए परिक्खेवेणं किण्हे जाव तण विहूणे णेयव्वे" यઈમાં કંઈક સ્વ૫ બે યે ન જેટલું છે તેમજ આની પરિધિ નો વિસ્તાર વેદિકાની પરિધિ Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४९ प्रकाशिका टीका सू. ६ वनखण्डभूमिभागवर्णनम् । काया बहिर्गतवनषण्डवत् केवलं तृणशब्दवर्णनमत्र न कार्यमित्याह -'किण्हं जाव तणविहूणे णेयव्वो' कृष्णो यावत् तृण विहीनो ज्ञातव्य इति-कृष्णः कृष्णावभासः नीलो नीलावभासः, इत्यादि, अत्रस्थ पञ्चमसूत्रोक्त वर्णनमत्र बोध्यम् । तृणविहीनः तृणशब्दोऽत्र तृणजन्य शब्दपरः, तेन तृणजन्य शब्दविहीन इत्यर्थः अस्योपलक्षणत्वान्मणिशब्द विहीनोऽपि स वनषण्डो बोध्यः, यतः पद्मवरवेदिका मध्यवर्ति वनषण्डस्य पद्मवरवेदिका परिवेष्टिततया तत्र वायुप्रवेशाभ वात्तणानां मणीनां च चलनासम्भवात्परस्परं संघर्षाभावात् शब्दो न सम्भवति ।। मू०६॥ अधुना जम्बूद्वीपस्य द्वारसंख्याप्ररूपणार्थमाह ---- मूलम्-जंबुद्दीवस्स णं भंते ! दीवस्स कइ दारा पण्णत्ता ! गोयमा ! चत्तारि दारा पण्णेत्ता. तं जहा-विजए १ वेजयंते २ जयंते ३ अपराजिए ४ ॥ सू० ७ ॥ __ छाया जम्बूद्वीपस्य खलु भदन्त कत्ति द्वाराणि प्रज्ञप्तानि, गौतम ! चत्वारि द्वाराणि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा विजयं १ वैजयन्तं २ जयन्तं ३ अपराजितम् ४॥ सू० ७ ॥ टीका--'जम्बूद्दीवम्स णं इत्यादि । व्याख्या स्पष्टा ॥ सू ७ ॥ विस्तार वेदिका की परिधि के ही बराबर है इस महावनषण्ड का वर्णन जैसा अभी पद्मवरवेदिका के बाहर का वनषण्ड वर्णित हुआ है वैसा ही है परन्तु बहर के वनषण्ड के वर्णन में वह वनषण्ड कृष्ण है और कृष्णरूप से उसका अवभास होता है इत्यादि रूप से जो कहा गया है सो वह सब पंचम सूत्रोक्त वर्णन यहां पर भी कर लेना चाहिये परन्तु उस वर्णन में जो तृण और मणियों के शब्दों का वर्णन किया गया है वह वर्णन यहां पर इसालये नहीं करना चाहिए कि यह वनषण्ड पद्मवर वेदिका से परिबेष्टित है अतः इसमें वायु का प्रवेश न हो सकता है और वायु प्रवेश के अभाव से वहां के मणियों का एवं तृणों का परस्पर में संचलन नहीं हो सकता है इसलिये वे आपस में संघट्टित नहीं होते है टकराते नहीं हैं अतः संघर्ष के अभाव में शद्रोत्थान नही होता है ॥६॥ એટલે જ છે. આ મહારનષડનું વર્ણન ઉપર પદ્મવદિકાની બહારના વનણંડનું વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે તેવું જ છે. બહારના વનણંડના વર્ણનમાં તે વનખંડ કૃષ્ણ છે અને કૃષ્ણ રૂપથી તેનો અવભાસ થાય છે વગેરે રૂ માં જે કહેવામાં આવેલ છે તે સર્વ પંચમ સૂત્રોક્ત વર્ણન અહીં પણ જાણી લેવું જોઈએ. પરંતુ તે ર્ણનમાં જે તૃણ અને મણિઓના શબ્દનું વર્ણન કરવામાં આવેલ છે તે વર્ણન અહીં એટલા માટે નહીં કરવું જોઈએ કે આ વનણંડ પદ્વવર વેદિકાથી પરિવેષ્ઠિત છે. એની આમાં વાયુપ્રવેશ થઈ શકતો નથી. અને વાયુ-પ્રવેશ ના અભાવથી ત્યાંના મણિએ તેમજ તૃણનું પરસ્પર સંચલન થઈ શકતું નથી. એથી તેઓ પરસ્પરમાં સંઘક્રિત થતાં નથી–અથડાતા નથી. એથી સંઘર્ષના અભાવમાં શોત્થાન થતું નથી ૬ Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५० rai द्वाराणां स्थानविशेषनियमनाय ग्राह- मूलम् — कहि णं भंते ! जंबुद्दीवस्स दीवस्स विजए णामं दारे पण्णत्ते ! गोयमा ! जंबुद्दीवे दोवे मंदरस्स पव्वयस्स पुरत्थिमेणं पणयालीस जोयण सहस्साई वीडवsत्ता जंबुद्दी वदी व पुर स्थिमपेरं ते लवणसमुद्दपुर स्थिमद्धस्स पच्चत्थिमेणं सीयाए महाणईए उपि एत्थ णं जंबुद्दीवस्स दीवस्स विजए णामं दारे पण्णत्ते, अट्ठ जोयणाई उड़ढं उच्चत्तेणं चत्तारि जोयणाईं विक्खंभेणं तावइयं चेब पवेसेणं से वरणगथ्रुभियाए, जाव दारस्स वण्णओ जाव रायहाणी ||सू०८ || छाया -क्व खलु भदन्त ! जम्बूद्वीपस्य द्वीपस्य विजयं नाम द्वारं प्रज्ञप्तम् १ गौतम । जम्बूद्वीपे द्वीपे मन्दरस्य पर्वतस्य पौरस्त्ये पञ्चचत्वारिंशतं योजनसहस्राणि व्यति व्रज्य जम्बूद्वीप द्वीप पौरस्त्यपर्यन्ते लवणसमुद्रपौरस्त्यार्द्धस्य पाश्चात्ये सीताया महानद्या उपरि अत्र खलु जम्बूद्वीपस्य विजयं नाम द्वारे प्रशप्तम् अष्ट योजनानि ऊर्ध्वमुच्यत्वेन चत्वारि योजनानि विष्कम्भेण तावदेव प्रवेशेन, श्वेतं वरकनकस्तूपिकाकं यावह द्वारस्य वर्णको यावद् राजधानी ||सू०८॥ 'कहि णं भंते' इत्यादि । जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे टीका – 'कहिणं भंते ! जबुद्दीवस्स दीवम्स विजए णाम दारे पण्णत्ते' हे भदन्त ! - जम्बूद्वीपस्य द्वीपस्य विजयं नाम द्वारं क्व कस्मिन् प्रदेशे प्रज्ञप्तं गौतमेन पृष्टो भगवान् महावीर आह - 'गोयमा' गौतम ! " जंबुद्वीप की द्वारसंख्या का वर्णन जंबुद्दीवस णं भंते ! दीवस्स कई दारा पण्णत्ता" इत्यादि । सू० ७ ॥ इस सूत्र की व्याख्या स्पष्ट है || ७ || ये द्वार कहां है ? इसका कथन - कथितम् ?" इति 'जंबुद्दीवे दीवे "कहि णं भंते ! जंबुद्दीवस्स दीवस्स विजए णामं दारे पण्णत्ते" इत्यादि । भदन्त ! जंबूद्वीप नाम के द्वीप का विजय द्वार कहां पर कहा गया है ? इसके उत्तर में જમ્મૂઠ્ઠીપની દ્વાર સંખ્યાનું વણુનઃ— 'जंबुद्दीवरसणं भते ! दीवस्स कई दारा पण्णत्ता' इत्यादि सुत्र ७|| આ સૂત્રની વ્યાખ્યા સ્પષ્ટ છે. આ દ્વારા કયાં કયાં છે ? તેનું વન આ પ્રમાણે છે "कहिण भंते ! जंबुद्दीवस्स दीवस्स बिजप णाम दारे पण्णत्ते इत्यादि હે ભટ્ઠત ! જમૂદ્રીપનામક દ્વીપનુ` વિજય દ્વાર કયાં કહેવામાં આવેલ છે ? એના Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० ८ द्वाराणां स्थानविशेषनिरूपणम् मंदरस्स पव्वयस्स पुरथिमेणं जम्बूद्वीपे द्वीपे स्थितस्य मन्दरस्य पर्वतस्य पौरस्स्ये पूर्वदिशि ‘पणयालीसं जोयणसहस्साई वोइवइत्ता, पञ्चचत्वारिंशतं पञ्चचत्वारिंशसंख्यकानि योजनसहस्राणि व्यतित्रज्य अतिक्रम्य 'जंबुद्दीव दीवपुरथिमपेरंते जम्बूद्वीप द्वोपपौरस्त्यपर्यन्ने-जम्बूद्वीपाभिधद्वीपपूर्वपर्यन्तं 'लवणसमुद्दपुरस्थिमद्धस्स पच्चत्थिमेणं' लवणसमुद्रपौरस्त्यार्द्धस्य पाश्चात्ये पाश्चात्यभागे 'सीयाए महाणईए उप्पिं सीतायाः महानद्याः उपरि यः प्रदेशोऽस्ति, 'एत्थ णं जंबुद्दीवस्स दीवस्स' अत्र अस्मित् प्रदेशे खलु जम्बूद्वीपस्य द्वीपस्य 'विजए णामं दारे पण्णत्ते' विजयं नाम द्वारं प्रज्ञप्तम् । तच्च 'अट्ट जोयणाई उड्ढे उच्चत्तणं' अष्ट-अष्ट संख्यानि योजनानि ऊर्ध्वम् उपरि उच्चत्वेन उच्छ्रयेण-अनन्तत्वेनेत्यर्थः, तथा-'चत्तारि जोयणाई विक्खभेणं' चत्वारियोजनानि विष्कम्भेण चतुर्योजनपरिमाणविस्तारयुक्तमित्यर्थः, 'तावइए चेव पवेसेणं' तावदेव-चतुर्योजनपरिमाणमेव प्रवेशेन प्रवेशमार्गावच्छेदेन प्रज्ञप्तम्, तत्पुनः कीदृश मित्याह-'सेए' इत्यादि । 'सेए' श्वेतं-श्वेतवर्णयुक्तम्, तथा 'वर कणगथूभियाए' वरकनकं प्रभु कहते है-'गोयमा ! जंबुद्दीवे दोवे मंदरस्स पब्वयस्स पुरस्थिमेणं पणयालीसं जोयणसहस्साई वीइवइत्ता" हे गौतम ! जम्बूद्वीप नामके इस द्वीप में स्थित मन्दर पर्वत की पूर्वदिशा में ४५ हजार योजन आगे जाने पर "जंबुद्द वेदीवे पुरत्थिमपेरते लवणसमुद्दपुरस्थिममद्धस्स पच्चस्थिमेणं सीयाए महाणईए. उपि' जम्बूद्वीप के पूर्व के अन्त में और लवण समुद्र से पूर्वदिशा के पश्चिम विभाग में सीता महानदी के ऊपर "एत्थ णं जंबुद्दीवस्स दीवस्स विजए णामं दारे पण्णत्ते' जम्बूद्वीप का विजय नाम का द्वार कहा गया है "अट्ठजोयणाइं उड्ढं उच्चत्तेणं" इस द्वार की ऊँचाई आठ योजन की है तथा "चत्तारि जोयणाई विक्खंभेणं" इसका विस्तार ऊँचाई से आधा है-चार योजन का है “तावइयं चेव पवेसेणं" और प्रवेश भी-प्रवेश मार्ग भी इतने ही योजन का अर्थात् चार यो नन का है "सेए वर कणगथूभियाए" यह द्वार धवल वर्ण वाला है और शिखर इसकी उत्तम स्वर्ण को बनी हुई है "जाव दारस्त वण्णओ जाव रायहाणी" इस विजय उत्तरमा प्रभु 33-"गोयमा ! जंबुद्दीवे दोवे मंदरस्स पव्वयस्स पुरात्थिमेण पणयाली सं जोयणसहस्साई वीइवइत्ता " गौतम ! द्वी५ नाम द्वाभां स्थित मन्ह२ पतन दिशामा ४५ ॥२ योna आग पाथी "जंबुद्दीव दीव पुरथिमपेरंते लवणसमुदं पुरित्थिमद्धस्स पच्चत्थिमेण सीआए महाणईए उप्पि दीपनी शान मत भने सब समुद्रथा पूर्व शान। ५श्चमविभागमा सात महानहीनी ५२ "एत्थ ण जबुद्दीवस्ल दीवस्स विजए णाम दारे पण्णत्ते" भूदा५नु वि०१५ नाम द्वा२ हवामा माबेस छ. "अट्ठजोयणाई उड्ढं उच्चत्तेणं' मा द्वा२नी या 28 यान २०ी छ तमा “चत्तारि जोयणाई विखंभेण" माना पिरता२ या ४२di अर्धा छ से यार योनी छे. "तावस्यं चेव पवेसेज” भने प्रवेश ५-प्रवेशमा ५५ यार योन से छे. "सेए घरकणगथूभियाए' मा २ घajाणुछ भने मानु शिस Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे स्तूपिकाकम् उत्तमस्वर्णमयशिखरयुक्तम् , 'जाव दारस्स वण्णओ' यावत् द्वारस्य वर्णकः पदसमूहोऽत्र बोध्यः कियदवधिः ? इत्याह-'जाव रायहाणी' यावत् राजधानी विजय देवस्य या विजयाभिधा नाम राजधानी सो यावद् वर्ण्यते तावत्पर्यन्ते सर्व पदजातं व्याख्यासहितं सर्वमत्र जीवाभिगमसूत्रस्य तृतीयप्रतिपत्तौ विलोकनीयमिति ॥ सू ८ ! अधुना विजयादि द्वाराणां परस्परमन्तरं दर्शयितुमाह मूलम्--जंबुद्दोवस्स भंते दीवस्स दारस्स य दारस्स य केवइए अबाहाए अंतरे पण्णत्ते ? गोयमी ! अउणासीई जोयणसहस्साई बावण्णं च जोयणाई देखणं च अद्धजोयणं दारस्स य दारम्स य अबा हाए अंतरे पण्णने अउणासोइ सहस्सा, बावण्णं चेव जोयणा हंति । उर्ण च अद्धजोयणं. दारंतरं जंबुदीवस्स ||सू०९॥ छाया- जम्बूद्वीपस्य खलु भदन्त ! द्वोपस्य द्वारस्य च द्वारस्य च कियत् अबा. धया अन्तरं प्रज्ञप्तम् । गौतम, एकोनाशीतिर्योजनसहस्राणि द्विपञ्चाशच्च योजनानि देशोनं च अर्द्धयोजन द्वारस्य च द्वारस्य च अबाधया अन्तरं प्रज्ञप्तम् । एकोन, अशीतिः सहस्राणि द्विपञ्चाशदेव योजनानि भवन्ति । ऊनंच अईयोजनं द्वारान्तरं जम्बूद्वीपस्य ॥ ९ ॥ 'जंबुद्दीवस्स णं भंते' इत्यादि । टीका-गौतमः पृच्छति 'जंबूद्दीवस्स णं भंते दीवस्स दारस्स य दारस्स य' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपस्य खलु द्वीपस्य सम्बन्धिनो द्वारस्य च द्वारस्य च चतुर्णा द्वाराणाम् एकस्माद् द्वाराद् द्वितीयस्य द्वारस्य परस्परं 'केवइए' कियत्-किं प्रमाणकम् 'अबाहाए' द्वार का वर्णन विजया नामक राजधानीतक का जैसा जीवाभिगम सूत्र में किया गया है वैसा ही वह सब वर्णन यहाँ पर भी कह लेना चाहिये यह सब वर्णन जीवाभिगम सूत्र में तृतीय प्रतिपत्ती में किया गया है ।।८।। विजयादि द्वारों का पारस्परिक अन्तर कथन "जंबुद्दीवस्स णं भंते ! दीवस्स दारस्स य दारस्स य इत्यादि । टीकार्थ-गौतमस्वामी ने अब प्रभु से ऐसा पूछा है-हे भदन्त ! जम्बूद्वीप के एक द्वार से दूसरे उत्तम स्व निर्मित छ. "जाव दारस्स वण्णओ जाव रायहाणी" An arयानुन વિજયા નામક રાજધાની સુધીનું જેમ જીવાભિગમ” “સૂત્ર' માં કરવામાં આવેલ છે તેવું જ વર્ણન અહીં પણ સમજવું જોઈએ. આ સર્વ વર્ણન “જીવાભિગમ સૂત્રની તૃતીય પ્રતિપત્તિમાં પૂરવામાં આવેલ છે. આ વિજયાદિ દ્વારેનું પારસ્પરિક અન્તર કથન– 'जंबुद्दीवस्स णं भंते ! दीवस्स दारस्स य दारस्स य' इत्यादि सूत्र ॥९॥ ટીકાર્થ–ગૌતમસ્વામીએ પ્રભુને પ્રશ્ન કર્યો કે હે ભદંત! જંબુદ્વિપ ના એક દ્વારથી બીજા દ્વાર Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. ९ विजयादिद्वाराणामन्तरनिरूपणम् अबाधया--परस्पर संघर्षाभावेन 'अतरे' अन्तरं-व्यवधानं 'पण्णत्ते' प्रज्ञप्तम् ? भगवानाह'गोयमा !' हे गौतम ! 'अउणासीई जोयणसहस्साईबावणं ध जोयणाई" एकोनाशीतिः योजनसहस्राणि द्विपञ्चाशच्च योजनानि 'देसूर्ण' देशोनं देशेन किञ्चिद्देशेन ऊनं न्यूनं च 'अद्धजोयनं' अर्द्धयोजनं 'दारस्सय दारस्सय' द्वारस्य च द्वारस्य च 'अबाहाए अंतरे' अबाधया अन्तर 'पण्णत्ते' प्रज्ञप्तम् । तदेव विशदयति तथाहिजम्बूद्वीपपरिधिप्रमाणम् सप्तविंशत्युत्तरशतवयाधिक षोडशसहस्राधिकलक्षत्रय (३१ ६२२७) मितानि योजनानि क्रोशत्रयम् ३ अष्टाविंशत्यधिकं धनुः शतम् १२८ त्रयो. दशाङ्गुलानि १३ अर्ड्सगुलं चेति । अस्मात् विजयादिद्वारचतुष्टस्याष्टादश योजनरूप विस्तारः पृथक् क्रियते, प्रतिद्वार विस्तारस्तु चत्वारि योजनानि ४ द्वारशाखाद्वय विस्तारश्च क्रोशद्वयम् २ क्रोशद्वयस्य चतुर्यु द्वारेषु सत्त्वेन चतुभिगुणनेन क्रोशाष्टकं भवति तच्च द्वे योजने तयोः षोडशभियोजनैः सह योजनयाऽष्टादशयोजनानि १८ सम्पन्नानि । तस्मात् पूर्वोक्तपरिधिपरिमाणादष्टादशापनयने शेषपरिधिपरिमाणस्य द्वार तक का अव्यवहित अन्तर कितना है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-"गोयमा ! मउणासीई जोयणसहस्साई वावण्णं च जोयणाई देसूणं च अद्धजोयणं दारस्स य दारस्स य अबाहाए अंतरे पण्णत्ते" हे गौतम ! जम्बूद्वीप के एक द्वार से दूसरे द्वार तक अव्यवहित अन्तर ७९ हजार ५२ योजन तथा कुछ कम आधे योजन का है यह अन्तर इस प्रकार से निकाला गया है-जम्बूद्वीप की परिधि का प्रमाण ३१६२२७ तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताईस योजन ३ तीन कोश १२८ धनुष और १३॥ अंगुल का है इस प्रमाण में से विजयादि चार द्वार का १८ योजनरूप जो विस्तार है वह अलग कर देना चाहिये हर एक द्वार का विस्तार चार योजन का है द्वार शाखाद्वय का विस्टार २ कोश का है ४ कोशों में कोशद्वय के सद्भाव से चार से गुणा करने पर ८ कोश होते है ८ कोश के २ योजन हैं इन दो योजनों को १६ योजनों के साथ मिलाने से १८ योजन हो जाते है पूर्वोक्त परिधि प्रमाण में से १८ योजन अव्यवहित मत छ १ माना याममा प्रभु ४ छ । 'गोयमा ! अउणासीई जोयण सहस्साइ वावण्णं च जोयणाई देसूण च अद्धजोयण दारस्स य दारस्स य अवाहाए अंतरे पण्णत्ते" हे गौतम ! मूद्वीपना थेट द्वारथी भागद्वार सुधीनु अव्यवडित मतर ૭૯ હજાર પ૨ જન તેમજ કંઈક સ્વ૬૫ અર્ધા જન જેટલું છે. આ અંતર આ રીતે જાણુવામાં આવે છે કે જંબુદ્વીપની પરિધિનું પ્રમાણ ૩૧૬૨૨૭ જન ૩ ગાઉ ૧૨૮ ધનુષ અને ૧૩ અંગુલ જેટલું છે. આ પ્રમાણમાંથી વિજયાદિ ચારદ્વાર ના ૧૮ જનને જે વિસ્તાર છે તે જુદે જ રાખવું જોઈએ. દરેકે દરેક દ્વારને વિસ્તાર ચાર જન જેટલું છે. દ્વાર થનો વિસ્તાર ૨ ગાઉ જેટલી છે. ૪ ગાઉમાં કોશદ્રયના સદૂભાવથી ચારથી ગણ કરવાથી ૮ ગાઉ થાય છે. ૮ ગાઉના ૨ જન થાય છે. આ બે જનેને ૧૬ પેજનેની સાથે એકત્ર કરવાથી ૧૮ જન થઈ જાય છે. પૂર્વોક્ત પરિધિના પ્રમાણમાંથી ૧૮ એજન Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वोपप्रज्ञप्तिसूत्र नवोत्तरद्विशताधिक गोडशसहस्र पहितलक्षत्रयपरिमितस्य (३१६२०९) चतुभिर्भागे हृते लब्धानि द्विपञ्चाशदधिकानि एकोनाशीति सहस्राणि कोशश्चैकः । परिधि सत्कस्य क्रोशत्रयस्य चतुभिर्भागे हृते लब्धः पादोन एकः क्रोशः पूर्वलब्धक्रोशेकेन सयोजने जातं पादोनं क्रोशद्वयम् (१।।) परिधि सत्कानामष्टाविंशत्यधिकशतक (१२८) धनुषां चतुर्भि र्भागे हृते लब्धानि द्वात्रिंशद् धनूषि (३२) परिधिसत्कानां त्रयोदशांगुलानां चतुर्भिर्भागे हृते लब्धानि त्रीण्यंगुलानि ३ अवशिष्टमेकांगुलम् एतदेवांगुलं परिधिसत्केनाद्धांगुलेन सह मीलने जातं सार्द्दकमंगुलम् , एकांगुलस्याष्टौ यवां इति साकांगुलस्य यवकरणे जाता द्वादश यवाः, एषां चतुर्भिर्भागे हृते लब्धाः पूर्णास्त्रयो यवाः । इत्येकैकस्य द्वारस्यान्तरं जातं-द्वि पञ्चाशदधिकैकोनाशीति सहस्त्र योजनानि (७९०५२) पादोन क्रोशद्वयं (१॥) द्वात्रिंशद्धनूंषि (३२) त्रीण्यं गुलानि त्रयो यवाश्च (६९०५२ यो , १॥ क्रो०, ३२ धनु, ३ अं, ३ यव) इत्येवमायातमेकैक द्वारान्तरम् एकोनाशीतिसहस्राणि द्विपञ्चाशदधिकानि योजनानि किञ्चिदनमर्धयोजनं चेति । इत्येव दृढीकत एका गाथामाह-"अउणासीइ सहस्सा, बावणं चेव जोयणा हंति । कम करने पर शेष रहे हुए ३१६२०९ को ४ से भाजित करने पर ५२ अधिक ७९ हजार योजन और १ कोश लब्ध होता है अर्थात् ७९ हजार ५२ योजन एवं १ कोश आता है परिधि संबंधी तीन कोश को ४ से भाजित करने पर' । कोश लब्ध होता है इसमें पूर्वलब्ध एक कोश मिलाने से १॥ हो जाते है अब १२८ धनुष में ४ का भाग देने पर ३२ धनुष होते हैं परिधि के जो १३ अंगुल है उनमें ४ का भाग देने रप ३ अंगुल लब्ध होते हैं और १ अंगुल बचता है इस एक अंगुल को परिधि के आधे अंगुल के साथ जोड़ देने से १॥ अंगुल हो जाता है आठ जी का एक अंगुल होता है १॥ अंगुल के १२ जो होते हैं । १२ में ४ भाग देने से ३ अंगुल आते हैं, इस तरह एक एक द्वार का अंतर ७९०५२ योजन १॥ कोश, ३२ धनुष ३ अंगुल और ३ जौ का निकल आता है । यही बात “अउકમ કરવાથી અવશિષ્ટ ૩૧ ૬૨૦૯ ને નથી ભાજિત કરવાથી પર અધિક ૭૯ હજાર જન અને ૧ ગાઉ લબ્ધ થાય છે. એટલે કે ૭૯ હજાર પર યોજન અને ૧ પેશ આવે છે. પરિધિ સંબંધી ત્રણ ક્રોશને ૪ થી ભાજિત કરરાથી કોશ લબ્ધ થાય છે આમાં પૂર્વ લબ્ધ એક કોશને સરવાળો કરવાથી ૧ાા થઈ જાય છે. હવે ૧૨૮ ધનુષમાં ૪ ને ભાગાકાર કરવાથી ૩૨ ધનુષ થાય છે. પરિધિના જે ૧૩ અંગુલે છે તેમાં ચાર નો ભાગાકાર કરવાથી ૩ અંગુલ લબ્ધ થાય છે અને ૧ અંગુલ શેષ રહે છે. આ એક અંગુલ ને પરિ. ધિના અર્ધા અંશલની સાથે સરવાળો કરવાથી ૧ાા અંગુલ થઈ જાય છે. આઠ જવનો એક અંગુલ થાય છે. ના અંગુલના ૧૨ જવ હોય છે. ૧૨ માં ૪ નો ભાગાકાર કરવાથી ૩ અંગુલ આવે છે આ પ્રમાણે એક એક દ્વારનું અંતર ૭૯૦૫૨ જન ૧ ગાઉ ૩૨ ધનુષ ૩ અંગુલ अनावर याय यश पात 'अउणासीह सहस्सा बावणं चेव जोयणा हंति ऊणच अदध जोयणा दारंतरं जंबुदीवस्स" थ। १ ४२वामां भावी छ । Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सृ० १० भरत क्षेत्रस्वरूपनिरूपणम् ऊणं व अद्धजोयणा दारंतरं जंबुद्दोवस्स ॥ छाया - एकोन, अशीतिः सहस्राणि द्विपञ्चाशदेव योजनानि भवन्ति । ऊनं च अर्द्धयोजनं द्वारान्तरं जम्बूद्वीपस्य || व्याख्या स्पष्टा ॥ सू० ९. इत्थं जम्बूद्दीपविषये स्वपृष्ट सकलप्रश्नानामुत्तरं निशम्य गौतमः स्वापेक्षया ऽऽसन्नभरतक्षेत्रस्वरूपं जिज्ञासुस्तृतीयसूत्रोक्त चतुर्विधप्रश्नवर्तिनम् आकार भावरूपं चतुर्थ प्रश्नमाश्रित्य पृच्छति मूलम् - कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे भरहे णामं वासे पण्णत्ते गोयमा चुल्लहिमवंतस्स वोसहरपव्वयस्स दाहिणेणं दाहिणलवणसमुहस्स उत्तरेणं पुरत्थिमलवणसमुहस्स पच्चत्थिमेणं पञ्चत्थिमलवणसमुद्दस्स पुरत्थिमेणं, एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे भरहे णामं वासे पण खाणु बहुले कंटगबहुले विसमबहुले दुग्गबहुले पव्वयबहुले पवायवहुले उज्झबहुले णिज्झखहुले खड्डा बहुले दखिहुले बहुले दहब हुले रुक्ख बहुले गुच्छबहुले गुम्मबहुले लयाबहुले वल्लीबहुले अडवीबहुले सावयबहुले तणबहुले तकरबहुले डिबहुले डमबहुले दुभिक्ख बहुले दुक्कालबहुले पासंडबहुले किवणबहुले वणीमगबहुले ईतिबहुले माखिहुले कुबुद्धिबहुले अणावुडिबहुले रायबहुले रोगबहुले संकिलेस बहुले अभिक्खणं अभिक्खणं संखोह बहुले पाईणेपडीणायए उदीणद । हिणवत्थिष्णे उत्तरओ पलिअंकसंठाणसंठीए दहिणओ धणुपिट्ठसंठिए तिधा लवणसमुदं पुट्ठे गंगा हि महाणईहिं वेयड्ढेण य पव्वरण छ भागपविभत्ते जंबुद्दीव दीव णउयसयभागे पंचछब्बीसे जोयणसए छच्च एगूणवीसइभाए जोयणस्स विक्खंभेण । भरहस्स णं वोसस्स बहु मज्जदेसभा एत्थ वेयड्डे णामं पव्वए पण्णत्ते जे णं भरहं बासं दुहा विश्यमाणे २ चिट्ठइ, तं जहा - दाहिणद्धभरहं च उत्तरद्धभरहं च ॥ सू० १०॥ छाया क खलु भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वोपे भरतं नाम वर्ष प्रज्ञप्तम्, गौतम ! क्षुल्लहिमवतो वर्षधर पर्वतस्य दक्षिणे दक्षिणलवणसमुद्रस्य उत्तरे पौरस्त्यलवणसमुद्रस्य पश्चिमे सोइ सहस्सा बावण्णं चेव जोयणा हुंति ऊणं च अद्धजोयणा दारंतरं जंबुदोवस्स" इस गाथा द्वारा प्रकट की गई है ॥९॥ ५५ Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र पाश्चात्यलवणसमुद्रस्य पौरस्त्ये, अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वीपे भरतं नाम वर्ष प्रज्ञप्तम् स्थाणु बहुलं कण्टकबहुलं विषमबहुलं दुर्गवहुलं पर्वतवहुलं प्रपातबहुलम् अवझरबहुलं निझर बहुलं गर्तबहुल दरीबहुलं नदीबहुलं हृदबहुलं वृक्षबहुलं गुच्छबहुलं गुल्मबहुलं लताबहुलं वल्लीबहुलम्. अटवीबहुलं श्वापदबहुलं तृणबहुल तस्करबहुल डिम्बबहुलं उमर बहुलं दुर्भिक्ष. बहुलं दुष्कालबहुलं पाखण्डबहुल कृपणबहुल वनीपकबहुलस् ईतिबहुल मारिबहुल कुष्टिबहुलम् अनावृष्टिबहुल राज बहुल रोगबहुल संक्लेशबहुलम् अभीक्षणमभीक्षणं सक्षोभबहुल प्राचीनप्रतीचीनायतम् उदीचीनदक्षिणविस्तोर्णम् उत्तरतः पल्यङ्कसंस्थानसंस्थितं दक्षिणतो धनुष्पृष्टसंस्थितम् त्रिधा लवणसमुद्रं स्पृष्टः गङ्गासिन्धुभ्यां महानदीभ्यां वैताढयेन च पर्वतेन षड्भागाविभक्तं जम्बूद्वीपद्वीप नवतिशतभागं पञ्चषड्विंशं योजनशतं षट्र च एकोनविर्शात भागान् योजनस्य विष्कम्भेण । भरतस्य खलु वर्षस्य बहुमध्य खल वैताढयो नाम पवेतः प्राप्तः, यः खलु भरतं वर्ष द्विधा विभजमानो विभजमानस्तिष्ठति , तद्यथा-दक्षिणार्द्धभरतं च उत्तरार्द्ध भरतं च ॥ सू० १० ॥ ___टीका-'कहिण भंते' इत्यादि गौतमस्वामी पृच्छति-'कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे भरहे णामं वासे पण्णत्ते' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे भरतं नाम वर्ष क्य-कस्मिन् प्रदेशे प्रज्ञप्तं कथितम्, भगवानाह-गोयमा !' हे गौतम ! 'चुल्लहिमवंतस्स क्षुल्लहिमवतः-लघुहिमवतः, 'वासहरपब्वयस्स' वर्पधरपर्वतस्य भरतादिक्षेत्रसीमा कारिणः पर्वतविशयस्य, 'दाहिणेणं' दक्षिणे दक्षिणदिग्मागे 'दाहिणलवणसमुदस्स दक्षि इस प्रकार से जम्बू द्वीप के विषय में अपने द्वारा पूछे गये सकल प्रश्नोका उत्तर सुनकर गौतम स्वामी अपनी स्थिति की अपेक्षा आसन्नवर्ती भरतक्षेत्रके स्वरूप को जानने का इच्छा से प्रेरित होकर तृतीय सूत्रगतचतुर्विधप्रश्न के अन्तर्गत आकारभावस्वरूप चतुर्थ प्रश्न को लेकर के प्रभु से ऐसा पूछते हैं ... "कहि णं भंते ! जंबुदो वे दीवे भरहे णामं वासे पण्णत्ते ?" इत्यादि। टीकार्थ- 'कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दौवे भरहे णामं वासे पण्णत्ते !' हे भदन्त ! जम्बुद्वीप नाम के द्वीप में भरत नाम का वर्ष-क्षेत्र कहां पर कहा गया है ! इसके उत्तरमें प्रभु कहते हैं - "गोयमा ! क्षुल्लहिमवंतस्स वासहरपव्वयस्स दाहिणेणं दाहिणलवणसमुदस्स उत्तरेणं पुरथिम આ પ્રમાણે જબૂદ્વીપના સંબંધમાં પિતાના સર્વ પ્રફનોના જવાબ સાંભળીને હવે ગૌતમ સ્વામી પિતાની સ્થિતિની અપેક્ષા આસનવતી ભરત ક્ષેત્રના સ્વરૂપને જાણવાની ઈચ્છાથી પ્રેરિત થઈને તૃતીયસૂત્રગત ચતુર્વિધ પ્રશ્નની આ તર્ગત આકારભાવ રૂપ ચતુર્થ પ્રશ્નને લઈને પ્રભુ ને આ પ્રમાણે પૂછે છે કે 'कहिणं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे भरहे णामं वासे पण्णत्ते ?' इत्यादि सूत्र-१० ટીકાથ–હે ભદન્ત ! જંબુદ્વીપ નામક દ્વીપમાં ભારતના એક વર્ષ-ક્ષેત્ર-કયાં કહેવામાં मावत छ ? माना oratuwi प्रभु ४ छ-'गोयमा ! क्षुल्ल हमवंतस्स वासह Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सु. १० भरतक्षेत्रस्वरूपनिरूपणम् ५७ णलवण समुद्रस्य 'उत्तरेणं' उत्तरे - उत्तरदिग्भागे, 'पुरस्थिम लवणसमुहस्स पच्चत्थिमेण ' पौरस्त्यलवण समुद्रस्य पश्चिमे - पश्चिमदिग्भागे 'पच्चत्थिमलवण समुद्दस्स' पाश्चात्यलवण समुद्रस्य 'पुरस्थिमेणं' पौरस्त्ये - पूर्वद्विग्भागे, 'एत्थ णं जंबूद्दीवे दीवे भरहे णामं वासे पण्णत्ते' अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वीपे भरतं नाम वर्षं प्रज्ञप्तम् । तत् कीदृशम् ? इति जिज्ञासायामाह - 'खाणु बहुले' स्थाणुवहुलम् - स्थाणुभिः पल्लवादिरहितशुष्कवृक्षैः 'ठूंठा' इति प्रसिद्धैः, बहुलम् व्याप्तम् यद्वा-बहुलाः स्थाणवो यस्मिंस्तत्तथा, एवमग्रे sपि 'कंटगबडुले' कण्टकबहुलं बर्बुरबदरीखदिरादि कण्टकव्याप्तम्, 'विसमबहुले' विषमबहुलम् निम्नोच्चस्थानव्याप्तम्, 'दुग्गबहुले' 'दुर्गबहुलम्' दुष्प्रवेशस्थानव्याप्तम् लवण समुदस्स पच्चत्थमेणं पच्चत्थिम लवण समुहस्स पुरत्थिमेणं एत्थणं जम्बुद्दीवे दीवे भरहे णामं वासे पण्णत्ते" हे गौतम ! भरतादि क्षेत्रों को सीमा करने वाले लघुहिमवान् पर्वत के दक्षिणदिग्भाग में, दक्षिणदिग्वर्ती लवण समुद्र के उत्तरदिग्भाग में पूर्वदिग्भागवर्ती लवण समुद्रकी पश्चिम दिशामें एवं पश्चिमदिग्भागवत लवण समुद्रकी पूर्वदिशा में यह जम्बूद्वीपगत भरतक्षेत्र है, यह भरत क्षेत्र “खाणुबहुले, कंटगबहुले, विसमबहुले, दुग्गबहुले फन्वयबहुले, पवायबहुले, उज्झर बहुले' स्थाणु बहुल है अर्थात् इसमें स्थाणुओं की टूठों की अधिकता है. ये ठूंठे पत्र पुष्पादि से रहित होते हैं और निरस - शुष्क होते हैं - अर्थात् जो वृक्ष उखट जाते है वे पत्र पुष्पादि से रहित होते हुए सूख जाते हैं और जमीन में ही गढे रहते हैं इन्हें ही स्थाणु कहा गया है । ऐसे ठूठों से यह भरतक्षेत्र व्याप्त है. अथवा ऐसे ठूठों की इस भरत क्षेत्र में बहुलता - अधिकता है तथा ऐसे ही वृक्षों को यहां वहुलता है जो कण्टको वाले हैं- जैसे-बबूल, बेर और खैर आदि के वृक्ष यहां पर होते हैं यहां की जमीन का भाग अधिकांश ऐसा ही है कि जो नीचाऊँचा है सर्वथा सम नहीं है बहुत से स्थान रस्स दाहिणेण दाहिणलवणसमुहस्स उत्तरेणं पुरत्थिमलवणसमुहस्स पच्चत्थिमेण पच्च स्थिमलवण समुहस्स पुरत्थिमेणं पत्थणं जवुद्दीवे दीवे भरहे णामं वासे पण्णत्ते" હૈ ગૌતમ! ભરતાદિ ક્ષેત્રોની સીમા કરનાર લઘુ હિમવાન્ પવંતતા દક્ષિણ કિંગ્ ભાગમાં દક્ષિણ દિગૂવત્તી' લવણ સમુદ્રના ઉત્તરદ્વભાગમાં પૂર્વ ઈંગ્ ભાગવતી લવણુ સમુદ્રની પશ્ચિમ દિશામાં અને પશ્ચિમ દિગ્ ભાગવતી લવઝુ સમુદ્રની પૂર્વ દિશામાં श्रीपगत भरत क्षेत्र छे मा भरत क्षेत्र "खाणु वहुले, कंटग बहुले, विसम बहुले दुग्ग बहुले पव्वय बहुले पवायबहुले उज्झरबहुले” स्थाणुं महुस छे, पेटसे } આમાં સ્થણુાની-હુંડાંએની અધિકતા છે. આ સ્થાણુ એ પત્ર પુષ્પાદિથી રહિત હાય છે. અને નીર-શુષ્ક હાય છે. એટલે કે જે વૃક્ષેા ઊખડી જાય છે તે બધા પુત્ર-પુષાદિ રહિત થઈ ને શુષ્ક થઈ જાય છે અને જમીનમાં જ ઊભા રહે છે. એમને જ સ્થાણુ કહેવામાં આવેલ છે. એવા ઠૂંઠાંએશી આ ભરતક્ષેત્ર વ્યાપ્ત છે અથવા એવા હું ઠાંએની આ ભરત ક્ષેત્રમાં બહુલતા અધિકતા છે. તેમજ કાંટાવાળા વૃક્ષાની પણ અહી અધિકતા છે. બાવળ, ખેરડી, ખેર વગેરે અનેક વૃક્ષો અહી પુષ્કળ પ્રમાણમાં છે. અહીંની જમીનને અધિકાંશ ભાગ 1 ८ Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'पव्वयबहुले' पर्वतबहुलम् अनेकपर्वतव्याप्तम् 'पवाय बहुले' प्रपातवहुलम् प्रपपाता भृगवः पर्वततः पतनस्थानविशेषाः, यत्र मुमूर्षवो जनाः प्राणान् परित्यक्तुं निपतन्ति तैर्बहुलम्, 'उज्झरबहुले, अबझर बहुलम् पर्वततटतो जलाधः पतनव्याप्तम्, 'णिज्झर बहुले' निर्झर बहुलम् पर्वततटात् सदातनजलक्षरणव्याप्तम्, 'खड्डा बहुले' गर्तबहुलम् खड्डा इति प्रसिद्धाः तैर्बहुलम्, 'दरिबहुले' दरीबहुलम् गुहाबहुलम् 'णईबहुले' नदी बहुलम्, 'दहबहुले' हृदबहुलम्, 'रुक्खबहुले' वृक्षबहुलम्, 'गुच्छबहुले' गुच्छबहुलम् गुच्छा:- स्तबकाः, तैर्बहुलम्, 'गुम्मबहुले' गुल्मबहुलं गुल्माः नवमालिकादयस्तैर्व ५८ यहां ऐसे हैं कि जहाँ पर प्रवेश पाना अशक्य है-या कष्ट साध्य है. यहां पर्वतों की अधिकता है तथा उन पर्वतों पर ऐसे ही विशेष स्थान हैं कि जहां से गिरने पर मनुष्य का शरीर चूर २ हो जाता है. यहां अवझर बहुत हैं - जिन पर्वतीय स्थानों से नोचे जल गिरता है उन स्थानों का नाम अवझर है जैसे जबलपुर का -मेडाघाट आदि; यहां निर्झर बहुत हैं -पर्वत के जिन स्थानों से सदा जल झरता रहता है-ऐसे स्थानों का नाम निर्झर है - ऐसे स्थान इस भरतक्षेत्र में अधिकांश हैं । इसी प्रकार यह भरतक्षेत्र "खड्डा बहुले" जगह २ जिस में प्रायः गड्ढे हैं ऐसे स्थानों वाला है - अर्थात् जगह २ गड्ढों वाला हैं " दरि बहुले" पहाड़ों पर जिसके जगह२प्रायः गुफाएँ है ऐसे स्थानों वाला है-अर्थात् गुफाओं की अधिकता वाला हैं " गई बहुले" जगह २ जिसमें प्रायः नदियाँ है ऐसा है "दहबहुले” जगह २ जहां प्रायः द्रह--पानी के कुंड हैं ऐसा है "रुक्ख बहुले" जगह २ जहां प्राय: वृक्ष हैं ऐसा है " गुच्छ बहुले" प्रायः जगह २ जहाँ गुच्छे हैं, ऐसा है जगह २ जहां पर " गुम्म बहुले " ઊંચા-નીચા છે—સથા સમનથી, અહીં ઘણાં રથાના એવાં પણ છે કે ત્યાં પ્રવેશવું અશકય છે- અથવા તે કષ્ટ સાધ્ય છે, અહીં પર્વતેની અધિકતા છે. તેમજ તે પાની ઉપર એવાં એવાં વિશેષ સ્થાન છે કે જ્યાંથી પડી જવાય તે મ ચુસનાશરીરના ભુકકે ભુક્કા થઈ જાય છે. અહીં અવઝરા પુષ્કળ છે. જે પર્વતીય સ્થાનેા પરથી નીચે જળ પડે છે તે સ્થાનેને અવઝર (પ્રપાત) કહે છે જેમકે જખલપુરનેા ભેડાઘાટ વગેરે. અડ્ડી' નિર્ઝારા પુષ્કળ છે, પતના જે સ્થાનેથી સદા જળ ઝરતુ રહે છે એવાં સ્થાનાને નિઝર કહે છે. એવાં સ્થાને आ लरतक्षेत्रमां अधिश याप्रमाणे या भरतक्षेत्र "खड्डा बहुले" उगले ने पगबे જયાં ખાડાએ પુષ્કળ છે એવા સ્થાન વાળુ છે. એટલે કે સ્થાન સ્થાન પર ઘણા ખાડાએ छे. "दरि बहुले" डुगरे। पर घड़ी गुझसे। वागु छे भेटते है सहीं गुहाओ। जून वधारे छे. "णई बहुले" स्थान स्थान पर मां नदीओ। छेवु' मा क्षेत्र छे. "दह बहुले” ठेकुठे आणु नयां आय: द्रयाना हुआ। छे से क्षेत्र छे. "रुक्ख बहुले" 85 ठेकाले नयां धयां वृक्षो छे भेधुं छे. “गुच्छ बहुले" प्राय: हेम्हे क्यों गुरछायो छे मेनु हे. ठेऊठेये त्यां " गुम्म बहुले" गुडमा अधिकांश ३५मां धथा छे मेवु या क्षेत्र छे Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. १० भरतक्षेत्रस्वरूपनिरूपणम् हुलम् , 'लया बहुले' लताबहुलम् पद्मलतादिव्याप्तम् , 'वल्लीबहुले' 'बल्लीबहुलम कूष्माण्ड्यादिलताव्याप्तम् , यद्यपि लतावल्ल्योरेकार्थकत्वं तथापीह लतापदेन विस्तार रहिता वल्लीपदेन विस्तारसहिता लता गृह्यत इति तयो मेंदः। 'अडवीबहुले' अटवीबहुलम् , 'सावयबहुले' श्वापदबहुलम्-हिंसकजन्तुव्याप्तम् , 'तणबहुले' तृणबहुलम्, 'तक्करबहुले' तस्करबहुलम्-चौर व्याप्तम् , 'डिंबबहुले' डिम्बबहुलम्-स्वदेशोत्पन्नोपद्रवव्याप्तम् , 'डमरबहुले' डमरबहुलम्-परदेशीराजकृतोपद्रवव्याप्तम्, 'दुभिक्खबहुले' दुर्भिक्षबईलम् दुर्लभा भिक्षा यत्र ते दुर्भिक्षाः कालविशेषाः तैर्बहुलं व्याप्तम् , 'दुक्कालबहुले' दुष्कालबहुलम्-धान्यमहार्यतादिना ये दुष्टाः कालास्तैर्बहुलम् , 'पासंडबहुले' पाखण्ड बहुलम् पाखण्डाः मिथ्यावादास्तैर्बहुलम् , 'किवणबहुले' कृपणबहुलम् कृपणा:-कदा:मितम्पचास्तै 'बहुलम्' 'वणीमगबहुले' वनीपकबहुलम्-वनीपकाः-याचकास्तैर्बहुगुल्म अधिकांश है ऐसा हैं “लया बहुले" जगह २ जहां पर लताओं की विस्तार रहित पमलतादि कों को-प्रधानता है ऐसा है " वल्ली बहुले" विस्तार वाली कूप्माण्डादि वेलों की प्रधानता जहां पर है ऐसा है " अडवी बहुले " जंगलों की जहां पर प्रधानता है ऐसा है "सावय बहुले" जंगली हिंसक जानवरो की जहां पर प्रधानता है ऐसा है "तण बहुले" घासकी जहां के जंगलों में प्रधानता है ऐसा है 'तक्कर बहुले ' तस्करों--चोरों की जहां पर बहुलता है ऐसा है “डिंब बहुले" स्वदेशोत्पन्न जनों से ही जहां पर उपद्रवों की बहुलता है ऐसा है "डमर बहुले" परदेशी राजा के द्वारा किये गये उपद्रवों की जहां बहुलता है ऐसा है "दुभिक्ख बहुले" दुर्भिक्ष की जहां बहुलता है ऐसा है " दुक्काल बहुले" दुष्काल की चीजों को जहां पर बहुत ही अधिक कीमत बढ़गई हो ऐसे कालकी बहुलता वाला है "पासंड बहुले" पाखण्डों-मिंध्या वादियों की जहां बहुलता है ऐसा हैं "किवण बहुले" कृपणजनों की जहां पर बहुलता है ऐसा है “वणीमग बहुले" याचक "लया बदुले" ४४४ च्या तासानी विस्ता२२हीत पासताहिकानी प्रधानता व मात्र छ "वल्ली बहुले” विस्तार प्रधान wile तामे वधारे ५ती छ । क्षेत्र छ. “अडवी बहुलम्" सानीयां प्रधानता छे. मेव। मा प्रदेश छे. "सावय बहुले" साना बनवशनी जयां बसता छ सयुमा क्षेत्र छ. "तण बहुले" रानी न्यांसामा प्रधानता छ आमा क्षेत्र छे. "तक्कर बहुले" तरोनी-थोशनीय मरसताछ मेमा क्षेत्र छ. "डिम्ब बहुले" स्वशात्पन्ननाथायां उपद्रव या थाय छ सेवा मा प्रदेश छे. "डमर बहुले" ५२हेश २ या पद्रव ४२ता छ वा मा प्रदेश छे. " दुब्भिक्खबहुले" हुमक्षनी यां पहुसता छे सेवामा प्रदेश छ. "दुक्काल बहुले" हु.aनी-मेटलेल्या या रतुमानी मतमा मन पधारे वृद्धि थई डाय-मेवानी हुसतावाणी माहेश छे. "पासंड बहुले" या भिल्या. पाहीना rii मरता छ । २ प्रदेश छे. “किवण बहुले" ऐपनानी यां मत।छे सेवामा प्रवेश छे. “वणीमग बहुले" यायनी ज्यां महसताछ सवा । Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे लम् 'ईतिबहुले' इतिवहुलम्-ईतयः-अतिवृष्टयनावृष्टि-मूषक-शलभ--शुकात्यासन्नराजाः षडुपद्रवाः ताभिर्वहुलम् 'मारिबहुले' मारि बहुलम् मारयो विचिकादयः, ताभिर्बहुलम् 'कुवुठिबहुले' कुवृष्टिबहुलं कुवृष्टयः-कुत्सिताः कर्षक ननानभिलपणीया वृष्टयो वर्षास्ताभिबहुलम्, 'अणावुट्टिबहुले' अनावृष्टिबहुलम्-अनावृष्टयः-वर्षणस्याभावाः ताभिर्बहुलम् 'रायबहुले' राजबहुलम्-राजानःआधिपत्यकर्तारो जनास्तैर्बहुलम् 'रोगबहुले' रोगबहुलम् रोगाः-वात-पित्त-कफ विषमताजन्याः ज्वरादयस्तैबहुलम् , 'संकिलेसबहुले' संक्लेशबहुलं-संक्लेशाः-शारीरिकमानसिकासमाधयस्तैर्बहुलम् 'अभिक्खणं अभिक्खणं' अभीक्ष्णमभीक्ष्णम् वारंवारम् 'संखोहबहुले' संक्षोभबहुलम् संक्षोभाः प्रजानां दण्डपारुष्यादिना चित्तवैकल्यानि तेर्बबहुलम् इत्थं स्वरूपतः प्रदर्य सम्प्रति प्रमाणत आह-पाईणयडीणायए' प्राचीनप्रतीचीनाऽऽयतं प्राचीनप्रतीचीनयोः पूर्वपश्चिमदिशोः, आयतं दीर्घम् अत्र प्राक् प्रत्यक्छब्दाभ्यां स्वार्थे खः प्रत्ययस्तस्येनादेशः स च खः, जनों की जहां पर बहुलता है ऐसा है "ईति बहुले' मारी बहुले कुमुट्ठि बहुले अणाबुट्ठि बहुले रायबहुले रोग बहुले संकीलेस बहुले" अतिवृष्टि अनावृष्टि मूषिक शलभ शुक एवं अत्यासन्नराजा ये छह ईतियां होती हैं इन छह ईतियोंको उपद्रवों के बहुलता जहां पर है ऐसा है इनकी बहुलता भरत और ऐरवत क्षेत्रमें ही होती है, मारी हैजा आदि को है बहुलता जिसमें ऐसा है कर्षककिसान जनों को अनभिलषणीय वर्षा की बहुलता जिसमे है ऐसा है अनावृष्टि वर्षा के अभाव का जहां प्रायः सद्भाव है ऐसा है अधिपतित्व करने वाले राजा जनों की जहां पर बहुलता हैं ऐसा है वात पित्त कफ की विषमता जन्य रोगों का सद्भाव जहां पर है ऐसा है शारीरिक और मानसिक अप्तमाधियों की बहुलगा जहां पर है ऐसा है 'अभिक्खणं अभिक्खणं संखोह वहुले पाईणपडीणायए उदीणदाहिणं वित्पिण्णे उत्तरओ पलिअंक संठाण संांठेए' और निरन्तरबार बार जहां पर प्रजा जनों के चित्तको शुभेत करने वाले दण्डकी कठोरताएँ प्रदेश छ. "ईति बहुले, मारि बहुले, कुबुट्ठी बहुले अणावुट्टि बहुले. राय बहुले, रोग बहुले, संकिलेसबहुले" मत वृध, मनावृष्टि, भूषः, Aa, शु मा मत्यासन्न રાજાએ આમ ૬ ઈતિઓ હોય છે. આ દ ઈતિઓના ઉપદ્રની જેમાં બહુલતા છે એ આ ભરત પ્રદેશ છે. એરવત પ્રદેશમાં પણ એવું જ થાય છે. મારિ–કેલેરા વગેરે જયાં વિશેષ રૂપમાં થાય છે એ આ પ્રદેશ છે. કર્ષક–ખેડૂ ના માટે અનિચ્છિત વર્ષ જયાં થતી રહે છે એ આ પ્રદેશ છે..અનાવૃષ્ટિ-વર્ષાના અભાવને જયાં પ્રાયઃ સદુભાવ છે એ આ પ્રદેશ છે. અધિપતિત્વ કરનારા રાજાઓની જયાં બહુલતા છે એ આ પ્રદેશ છે. વાસ, પિત્ત, કફની વિષમતાથી જયાં રોગો વધારે પડતા ફાટી નીકળે છે એવો આ પ્રદેશ છે. शारी२ि४, भने मानसि असमाधीयानी मरसता यो छ मे मा प्रदेश छे. "अभिक्खण २ संखोहबहुले, पाईपडीणायए उदोणदाहिणवित्थिपणे उत्तरओ पलिअंक संठाण संठिए" मन निरत२-बार वा२ या निनायित्तने ट मापना। नी-शिक्षानी Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६१ प्रकाशिका टोका सू० १० भरतक्षेत्रस्वरूपनिरूपणम् आपत्वात् एवम् 'उदीण दाहिण वित्थिण्णे' उदीचीन दक्षिणविस्तीर्णम् उत्तर-दक्षिणदिशोविस्तारयुक्तम् , तदेव संस्थानतो वर्णयति- 'उत्तरओ' उत्तरतः-उत्तरस्यां दिशि 'पलियंकसंठाणसंठिए' पल्यङ्कसंस्थानसंस्थित पर्यङ्काकारसंस्थितम् , 'दाहिणओ' दक्षिणतः-दक्षिणस्यां दिशि 'धणुपिट्ठ संठीए' धनुष्पृष्ठ संस्थितं-धनुषः पृष्ठं पाश्चात्यभागस्तस्येव संस्थितं-संस्थानं यस्य, यद्वा-धनुषः पृष्ठमिव संस्थितं यत् तत्तथा, तथा 'तिधा' त्रिधा-त्रिभिः प्रकारै स्पृष्ट-पूर्वकोटया 'लवणसमुदं' पूर्व लवणसमुद्रं, धनुष्पृटेन दक्षिणलवणसमुद्रम् अपरकोटया पश्चिमलवणसमुद्रं. 'पुढे, प्राप्तम् । इह धातूनामनेकार्थत्वात् स्पृशेः प्राप्त्यर्थः, कत्तरिक्तः, तेन कर्मणि द्वितीया । तथा 'गंगासिंधुर्हि' गङ्गासिन्धुभ्यां 'महाणई हिं' महानदीभ्यां 'वे यड्ढेणय'वैताढयेन च 'पव्वएण' पर्वतेन' छन्भागपविभत्ते' षड्भागप्रविभक्तं-षड्भिर्भागः प्रविभक्तं मौजूद हैं; ऐसा यह भरत क्षेत्र है, यह भात क्षेत्र पूर्व से पश्चिम तक लम्बा है, और "उदीणदाहिणवित्थिण्णे" उत्तर से दक्षिणतक चौडा है । “उत्तरओ" यह भरतक्षेत्र उत्तरदिशामें "पलियंक संठाणसंठिए" पलंग का जैसा संस्थान-आकार होता है वैसे आकार वाला है. "दाहिणओ धणुपिट्ठसंठिए" दक्षिण दिशा में धनुषपृष्ठ का जैसा संस्थान होता है वैसे संस्थान वाला हो गया है. यह “तिधा लवणसमुदं पुढे" भरत क्षेत्र तीन प्रकार से लवण समुद्र को छू रहा हैं-पूर्वकोटि से पूर्वलवण समुद्र को, धनुष्पृष्ठ से दक्षिण लबण समुद्र को और अपर कोटि से पश्चिमलवण समुद्र को । इस तरह से यह तीन प्रकार से लबणसमुद्र को छू रहा है "गंगा सिंधूहिं महाणईहिं वेअड्ढेण य पव्वएण छब्भागपविभत्ते जंबुद्दीव दीव णयउ सयभागे पंच छवोसे जोयणसए छच्च एगूणवीसइभाए जोयणस्स विक्खंभेण" यह भरत क्षेत्र गंगा और सिन्धु इन दो महानदियों से और विजयाध पर्वत से विभक्त हुआ ६ खड़ों કરતાઓ જ્યાં વિદ્યમાન છે. એ આ પ્રદેશ છે. આ ભરતક્ષેત્ર પૂર્વથી પશ્ચિમ સુધી લાંબુ छ. अने "उदीणदाहिणवित्थिण्णे" उत्तरथा हक्षि सुधी पाछे. “उत्तरओ" मा भरत क्षेत्र हत्तर शाम "पलिअकसंठाणसंठिए" ५८ गर्नु संस्थान (१२) डाय छे सेवा पाछे "दाहिणओ धणुपिट्ट सठिए:' हक्षिण दिशामा धनुष पृष्ठनु सस्थान डाय छ तेवा सस्यानवायुं 25 युछे. मा "तिधा लवणसमुदं पुढें" ભરતક્ષેત્ર ત્રણ રીતે લવણ સમુદ્રને સ્પશી રહ્યું છે. પૂર્વ કેટિથી પૂર્વ લવણુ સમુદ્રને ધનપૃષ્ઠથી દક્ષિણ લવણ સમુદ્રને અને અપકટિથી પશ્ચિમ લવ સમુદ્રને આ સ્પશી રહે छ माम मात्र मागुमेथी सव समुद्रने २५॥ २घुछे. “गंगा सिधूहिं महाणई हिं वे अडढेण य पच्चएण छन्भागपविभत्ते जंबुद्दीबदीव णउय सय भागे पंच छब्बीसे जोयणसए छच्च पगूणबीसई भाए जोयणस्स विक्खमेण" 41 मरतक्षेत्र ॥ सिधु से અને મહાનદીઓથી અને વિજયાર્ધ પર્વતથી વિભક્ત થઈને છ ખંડેથી ચુકત થઈ ગયેલ Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे खण्डितम्, उत्तरस्यां दिशि खण्डत्रयं दक्षिणस्यां दिशि च खण्डत्रयमिति षड्धा खण्डितमिति भावः । इदं च भरतक्षेत्रम् जम्बू द्वीपस्यैकदेशभूतं तदिदम् आयामविष्कम्भतो जम्बू द्विपस्य कतितमे भागे भवति ? इति जिज्ञासानिवृत्त्यर्थमाह- 'जंबु दीव दीवणउयसयभागे, इत्यादि । तदिदं भरतक्षेत्र 'जंबुद्दीव दीवणउयसयभागे' जम्बूद्वीप द्वीप नवतिशत भागे - जम्बूद्विपनामको यो द्वीपस्तस्य यो नवति शतभागो - नवत्यधिकैकशततमो भागस्तत्र वर्त्तते, जम्बूद्वीपापेक्षया आयामविष्कम्भेणेदं नवत्यधिकैकशतभागतो न्यूनमिति भावः । ननु जम्बूद्वीपापेक्षया भरतक्षेत्रं नवत्यधिकैकशतभागतो न्यूनमिति पर्यवसितं तर्हि भरतक्षेत्रस्यायाम विष्कम्भतः प्रमाणं कियद् भवति ? इति जिज्ञासायामाह - 'पंचछवी से', इत्यादि । इदं भरतक्षेत्र 'पंच छव्वीसे' पञ्चषडविंशं 'जोयणसए' योजनशतम् - षड्विंशत्यधिकानि एकशतयोजनानि वाला हो गया है, इसका विस्तार ५२६ ६ / १९ योजन प्रमाण है. अर्थात् जम्बूद्वीप कि जिसका विष्कम्भ १ एक लाख योजन का है उसके १९० टुकड़े करने पर भरत क्षेत्र का विस्तार १९० वां टुकडा के रूप में आता है, और वह १९० वां टुकडा ५२६ ६ / १९ रूप पड़ता है. यह इस प्रकार से समझना चाहिए जम्बूद्वीप लम्बाई चौड़ाई में १ लाख योजन का कहा गया, १ एक लाख में ९९० का भाग देने पर ५२६ आते हैं और नीचे ६० बचते हैं, अब ६० को १० से भाजित करने पर ६ आते हैं, भाजक राशी जो १९० है उसे भी १० दस से भाजित करनेपर १९ आते हैं । इस तरह करने से "पंच छवोसे जोयणसए छच्च एगूणवीसइभाए जोयणस्स,' यह सूत्रकार का कथन स्पष्ट हो जाता है । ६२ शंका- जम्बुद्वीप के १९० वे भागरूप यह भरत क्षेत्र है इसमें युक्ति क्या है - सुनो - इस विषय में युक्ति यह है- भरत क्षेत्र का १ एक भाग है इसकी अपेक्षा द्विगुणित विस्तारवाला होने से हिमवत् पर्वत के दो भाग है, इसक्रम से पूर्व पूर्व की अपेक्षा दूने २ विस्तार वाले છે. આના વિસ્તાર ૫૨૬૬/૧૯ ચૈાજન પ્રમાણુ છે. એટલે કે જ મૂઠ્ઠીય કે જેનેા વિષ્ણુંભ ૧ લાખ ચેાજન જેટલેા છે તેના ૧૯૦ કકડા કરવા થી ભરત ક્ષેત્ર ના વિસ્તાર ૧૯૦ મા કકડા જેટલે થાય છે. અને તે ૧૯૦ મા કકડા પ૨૬ ૬/૧૯ જેટલા થાય છે. જ ખૂટ્વીપ લખાઈચાડાઈમાં ૧ લાખ ચેાજન પ્રમાણ છે. ૧ લાખમાં ૧૯૦ ના ભાગાકાર કરવાથી પર૬ આવે છે અને શેષ ૬૦ વધે છે. હવે ૬૦ ને ૧૦ ભાજિત કરીએ તે ૬ આવે છે. ભાજક શશિ જે १७० छेतेने पशु १० भाभितरी तो १८ गावे छे. या प्रमाणे उरवाथी "पंच छब्बीसे जोयणसप छच्च पगूण वीसइभाए जोयणस्स” या सूत्रहार दु' अथन स्पष्ट थर्ध लय है. શકા↓←જ ખૂદ્વીપના ૧૯૦ મા ભાગ રૂપે આ ભરતક્ષેત્ર છે. આમાં યુતિ શી છે ? સાંભળે આ સંબધમાં યુકિત આ પ્રમાણે છે કે ભરતક્ષેત્રના ૧ ભાગ છે, તેની અપેક્ષા દ્વિગુણિત વિસ્તારવાળા હાવાથી હિમવત્ પર્યંતના એ ભાગ છે. આ ક્રમથી પૂર્વની અપેક્ષા ખમણુા Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६३ प्रकाशिका टीका सू १० भरतक्षेत्रस्वरूपनिरूपणम् 'छच्च एगूणवीसइभागे' षट्च एकोनविंशतिभागान् 'जोयणस्स' योजनस्यएकोनविंशतिभागविभक्तस्य योन नस्य षड्भागांश्च विक्खंभेणं 'विष्कम्भेण-विस्तारेण इदमायामस्याप्युपलक्षणम्, आयामेन-दैर्येण च भवतीति । भरतक्षेत्रस्येदमायामविष्कम्भमानमनया दिशाऽवगन्तव्यम् । तथाहि-जम्बूद्वीपो हि आयामविष्कम्भतो लक्षयोजनप्रमाणः । अयमङ्कराशि नवत्याधिकै कशतसंख्यकेन राशिनः भाजितः, लब्धोऽ राशिःषइविंशत्यधिकपश्चशतानि (५२६) भाज्यराशितोऽवशिष्टः पष्टिरूपोऽङ्कराशिः । अयं दशभिरपहतो लब्धः षहरूपोऽङ्कराशिः । भाजकराशिश्च नवत्यधिकैकशतरूपः । अयमपि दशभिरपहतो लब्ध एकोनविंशतिरूपोऽङ्कराशिः । अनया रीत्या 'पञ्चछव्वीसे जोयणसए छच्च एगणवीसइभाए जोयणस्स" इति संगमनीयम् ।। ननु भरतक्षेत्र जम्बू द्वीपस्य नवत्यधिकशततमभागे वर्तते इति यदुक्तं तत्र का युक्तिः ? इतिचेत्, उच्यते-भरतक्षेत्रस्यैको भागः, तदेपेक्षया द्विगुणत्वाद हिमवतो द्वौ भागौ, एवं क्रमेण पूर्वपूर्वापेक्षया उत्तरोत्तरस्य द्विगुणत्वात् हैमवत क्षेत्रस्य चत्वारो भागाः महाहिमवतोऽष्टौ भोगाः हरिवर्षस्य षोडश भागाः निषधस्य द्वात्रिं शद् भागः, सर्वसंकलनया जाताः त्रिषष्टिर्भागाः । एते भागा मेरोदक्षिणतः । एवं मेरोरुत्तरतोऽपि त्रिषष्टिर्भागाः । उभयसंकलनया जाताः पर्दिशत्यधिकशतभागाः । विदेहवर्षस्य तु चतुष्पष्टिर्भागाः इत्येितेषां पूर्वराशौ निक्षेपे जाता नवत्यधिकैकशतभागाः इति भरतक्षेत्रं जम्बू द्वीपस्य नवत्यधिकशततमभागै वर्त्तते इति यदुक्तं तत्समीचीनमेवेति । होते जाने से हैमवत क्षेत्र के ४ भाग हो गये हैं, महाहिमवान् पर्वत के ८ भाग हैं हरिवष के १६ भाग हो गये हैं, निषधपर्वत के ३२ भाग हैं, ये सब भाग जोडने पर ६३ होते है ये ६३ भाग मेरु को दक्षिणदिशा को ओर वर्तमान क्षेत्र और पर्वतों के हैं इसी तरह के भाग मेरु की उत्तर- दिशा में वर्तमान क्षेत्र और पर्वतों के है. इन दोनों के भागों का जोड़ १२६ आता है. विदेह क्षेत्र के ६४ है. सो ये ६४ भाग१२६ में जोड़ने पर १९० भाग होते हैं, इस तरह यह भरत क्षेत्र जम्बूद्वीप के १९० वें भाग रूप है यह वात स्पष्ट हो जाती है। બમણ વિસ્તાર ચુકત હોવાથી હૈમવતક્ષેત્રના ચાર ભાગો થઈ ગયા છે. મહા હિંમવાન પર્વતના ૮ ભાગે છે. હરિવર્ષના ૧૬ ભાગે થઈ ગયા છે. નિષધ પર્વના ૩૨ ભાગ છે. આ સર્વ ભાગેનો સરવાળે કવરાથી ૬૩ થઈ જાય છે. આ ૬૩ ભાગે મેરુની દક્ષિણ દિશા તરફ વર્તમાન ક્ષેત્ર અને પર્વતના છે. આ જાતના ભાગે મેરુની ઉત્તર દિશામાં વર્તમાન ક્ષેત્ર પર્વતોના છે. આ બન્ને ભાગેના સરવાળા ૧૨૬ થાય છે. વિદેહક્ષેત્રના ૬૪ ભાગો છે. તે આ ૬૪ ભાગે ૧૨ ૬. મા ઉમેરવાથી ૧૯૦ ભાગ થાય છે. આમ આ ભરતક્ષેત્ર જ બૂદ્વીપના ૧૯૦ મા ભાગ રૂપ છે. આ વાત સ્પષ્ટ થઈ જાય છે. ભરતક્ષેત્રના ગંગા સિંધુ Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे __ अथ 'गङ्गासिन्धुभ्यां महानदीभ्यां वैताठ्यपर्वतेन पहभागप्रविभक्तम् इत्युक्तम् तत्र वैताध्यपर्वतः किं स्वरूपः ? इति जिज्ञासायां तत्स्वरूपं निरूपयितुमाह-'भरहस्स णं वासस्स' इत्यादि । 'भरहस्स णं वासस्स' भरतस्य खलु वर्षस्य-क्षेत्रस्य 'बहुमज्झदेसभाए' बहुमध्यदेशभागे-अत्यन्तमध्यदेशभागे 'एत्थ णं वेयड्डे णामं पबए पण्णत्ते' अत्र इह खलु वैतान्यो नाम पर्वतः प्रज्ञप्तः । 'जे ण' यः वैताढ्यः पर्वतः खलु 'भरई वासं दुहा' भरतं वर्षे द्विधा-द्वाभ्यां प्रकाराभ्यामनुपदं वक्ष्यमाणाभ्यां 'विभयमाणे २, विभजन् विभजन-विभक्तं कुर्वन् कुर्वन् 'चिट्ठइ, तिष्ठति-वतेते 'तं जहा' तद्यथा 'दाहिणद्ध भग्हंच' दक्षिणाई भरतंच 'उत्तरद्धभरहंच' उत्तरार्द्धभरतं चेति ॥सू०१०॥ तत्र प्रथममासन्नत्वेन दक्षिणार्द्धभरतवर्षस्थानं वर्णयति - मूलम्-कहि णं भंते जंबुद्दीवे दीवे दाहिणद्धे भरहे णामं वासे पण्णत्ते गोयमा ! वेयड्ढस्स पव्वयस्स दाहिणेणं दाहिणलवणसमुदस्स उत्तरेणं पुरथिमलवणसमुदस्स पच्चत्थिमेणं पच्चत्थिमलवणसमुदस्स पुरथिमेणं एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे दाहिणद्धभरहे णामं वासे पण्णत्ते पाईणपडीणायए उदीणदाहिणवित्थिपणे अद्धचंदसंठाणसंठिए तिहा लवणसमुद्दे पुढे गंगा सिंधूहिं महाणईहिं तिभाग पविभत्ते दोणि अट्ठतीसे जोयणसए तिण्णि य एगूणवीसइभागे जोयणस्स विखंभेणं तस्स जीवा उत्तरेणं पाईणपडीणायया दुहा भरत क्षेत्र के गंगा सिन्धु नदियों से और वैताढ्य पर्वत से ६ खंड हो गये हैं ऐसा जो कहा गया है सो वैताढय पर्वत का क्या है ! इस जिज्ञासा को शान्त करने के निमित्तसूत्रकार उसका स्वरूप प्रतिपादन करते हैं "भरहस्स णं वासस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं बेयड्ढे णामं पव्वए पण्णत्ते जे णं भरहं बासं दुहा विभयमाणे२ चिट्ठह" वताढ्य पर्वत भरत क्षेत्र के बिलकुल मध्यभाग में पड़ा हुआ है. इसने भरत क्षेत्र को दो विभागों में विभक्त कर दिया है वे उसके दो विभाग दक्षिणार्द्धमरत और उत्तरार्द्ध भरत है ॥ १० ॥ નદીઓથી અને વૈતાઢ્ય પર્વત થી છ ખંડો થઈ ગયા છે. આજે કહેવામાં આવ્યું છે તે વૈતાઢ્ય પર્વત વિષે શું છે આ જિજ્ઞાસા ને શાંત કરવા માટે સૂત્રકાર तेना स्१३५नु प्रतिमाहन ४२i ४ छे , “भरहस्सण वासस्स बहुमज्झदेसभाए पत्थण धेयडूढं नाम पव्वर पण्णने जे ण भरहं वासं दुहा विभयमाणे २ चिट्ठह" वैताढय पर्वत ભરત ક્ષેત્રના એકદમ મધ્યભાગમાં આવેલ છે. આ પર્વતે ભરતક્ષેત્રને બે ભાગમાં વિભક્ત કરેલ છે. આના તે બે વિભાગો દક્ષિાદ્ધ ભરત અને ઉત્તરાદ્ધ ભરત છે. ૧૧ Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका- सू. ११ दक्षिणार्थभरतनिरूपणम् लवणसमुदं पुट्ठा पुरथिमिल्लाए कोडीए पुरथिमिल्लं लवणसमुद पुठ्ठा, पञ्चत्थिमिल्लाए कोडीए पच्चथिमिल्लं लवणसमुदं पुट्ठा णव जोयणसहस्साई सत्तय अडयाले जोयणसए दुवालस य एगृणवीसइभाए जोयणस्स आयोमेणं तीसे धणुपुढे दाहिणेणं णव जोयणसहस्साइं सत्तच्छावडे जोयणसए इक्कं च एगूणवीसइभागे जोयणस्स किंचिविसेसाहिए परिक्खेवेणं पण्णत्ते । दोहिणद्ध भरहस्स णं भंते ! वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णते ? गोयमा ! बहसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव णाणाविह पंचवण्णे हे मणीहि तणेहिं उवसोभिए, तं जहाकित्तिमेहि चेव अकित्तिमेचेव । दाहिणद्धभरहेणं भंते वासे मणुयाणं केरिसए आयोरभावपडोयारे पण्णत्ते ? गोयमो ! ते णं मणुया बहुसंघयणा बहुसंठाणा बहुउच्चत्त पज्जवा बहु आउ पज्जवा बहूई वासाइं आउं पालेति. पालित्ता अप्पेगइया निरयगामी अप्पेगइया तिरियगामी अप्पेगइयो मणुयगामी अप्पेगडया देवगामी अप्पेगईया सिझंति बुझंति भुच्चंति परिणिब्वायंति सब्बदुक्खाणमंतं करेइ ॥सू०११॥ छाया-क्व खलु भदन्त ? जम्बूद्वीपे द्वीपे दक्षिणार्द्धभरतं नाम वर्ष प्रक्षप्तम् ?, गौतम ! वैताव्यस्य पर्वतस्य दक्षिणे दक्षिणलवणसमुद्रस्य उत्तरे पौरस्त्यलवणसमुद्रस्य पाश्चात्ये पाश्चात्यलवणसमुद्रस्य पौरस्त्ये अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वीपे दक्षिणार्द्ध भरतं नाम वर्ष प्रज्ञप्तम्, प्राचीनप्रतीचीनायतम् उदीचीनदक्षिणविस्तीर्णम् अर्द्धचन्द्रसंस्थानसंस्थितं त्रिधा लवणसमुदं स्पृष्टं, गङ्गा सिन्धुभ्यां महानदीभ्यां त्रिभागप्रविभक्तं द्वे अष्टात्रिंशं योजनशतं त्रींश्चैकोनविंशतिभागान योजनस्य विष्कम्भेण । तस्य जीवा उत्तरे प्राचीन प्रतीचीनाऽऽयता द्विधा लवणसमुद्रं स्पृष्टा पौरस्त्यया कोटया पौरस्त्यं लव. णसमुद्रं स्पृष्टा पाश्चात्यया कोटया पाश्चात्य लवणसमुद्रं स्पृष्टा । नव योजन सहस्राणि सप्त च अष्ट चत्वारिंशानि योजनशतानि द्वादश च एकोचिंतिभागान् योजनस्य आया. मेन, तस्याः धनुस्पृष्ट दक्षिणे नव योजनसहस्राणि सप्त षट् षष्टयधिकानि योजनशतानि एक चैकोनविंशति भागान् योजनस्य किचिंद्विशेषाधिक परिक्षेपेण प्रज्ञप्तम् । दक्षिणाद्ध Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे भरतस्य खलु भदन्त ! वर्षस्य कीदृशकः आकाभावप्रत्यवतारः प्रज्ञप्तः १ गौतम ! बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः, स यथानामक; आलिङ्गपुष्कर इति वा यावद् नानाविध पञ्चवर्णमणिभिः तृणैरुपशोभितः तद्यथा-कृत्रिमैश्चैव अकृत्रिमैश्चेव । दक्षिणाद्ध भरते खलु भदन्त ! वर्षे मनुजानां कीदृशकः आकारभावप्रत्यवतारः प्रज्ञप्तः, गोतम ! ते खलु मनुजाः बहुसंहननाः बहुसंस्थानाः बहूच्चत्वपर्यवाः बह्वायुः पर्यवाः बहूनि वाणि आयुः पालयन्ति, पालयित्वा अग्येकके निरयगामिनः अप्येकके तिर्यग्गामितः अप्येकके मनुजगामिनः अप्येकके देवगामिनः अप्येकके सिध्यन्ति वुध्यन्ते मुच्यन्ते परिनिर्वान्ति सर्वदुःखानामन्तं कुर्वन्ति ॥सू०११॥ टीका-'कहि गं भंते' इत्यादि । 'कहि णं भंते ! जंबूदोवेदोवे दारिणद्धे भरहे णाम वासे पण्णत्ते' जम्बूद्वीपे द्वीपे क्व-कस्मिन्प्रदेशे खलु दक्षिणार्द्ध भरतं नाम वर्ष प्रज्ञप्तम् ? इति गौतमेन पृष्टो भगवांस्तं सम्बोधयन्नाह-'गोयमा वेयड्ढस्स पव्वयस्स दाहिणेणं' हे गौतम ! वैताट्यस्प पर्वतस्य दक्षिणे-दक्षिणदिग्भागे 'दाहिण लवणसमुदस्स उत्तरेणं' दक्षिणलवणममुद्रस्य उत्तरे उत्तरदिग्भागे 'पुरथिमलवणसमुदस्स' पौरस्त्यलवणसमुद्रस्य-पूर्वदिग्भवलवणसमुद्रस्य 'पच्चत्थिमेणं' पश्चिम-पश्चिमदिग्नागे 'पच्चत्थिमलवणसमुदस्स' पाश्चात्यलवणसमुद्रस्य = पश्चिमदिग्भवलवणसमुद्रस्य 'पुरस्थिमेणं' पौरस्त्ये-पूर्व दिग्भागे 'पत्थणं' अत्र-अस्मिन् दक्षिणार्द्ध भरत कहां पर है ? इसका कथन-- "कहिणं भंते ! जम्बूद्दीवे दीवे दाहिणद्धे' इत्यादि । टीकार्थ-हे भदन्त ! जम्बूद्वीप नाम के इस द्वीप में दक्षिणार्ध "भरहे'' भरत "णाम वासे" नाम का क्षेत्र “कहिणं पण्णत्ते" किस स्थान पर कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते है..-"गोयमा ! वेयबस्स पव्वयस्स दाहिणेणं दाहिणलवणसमुदस्स उत्तरेणं पुरथिमलवण समुदस्स पच्चस्थिमेणं पवत्थिमलवणसमुदस्स पुरस्थिमेण" हे गौतम ? वैताढ्य पर्वत की दक्षिणदिशामें दक्षिणदिग्वर्ती लवण समुद्र की उत्तर दिशा में, पूर्व देग्पी लवणसमुद्र की पश्चिमदिशा में एवं पश्चिमदिग्वर्ती लवणसमुद्र की पूर्वदिशा में "एत्थणं દક્ષિણાદ્ધ ભરત કયાં આવેલ છે ? આ વિશે કથન:_ 'कहिण भंते जंबुद्दीवे दीवे दाहिणद्धे'-इत्यादि सूत्र-११॥ सी-3मन्त दीप नाम२॥ द्वीपमi lag "भरहे णाम वासे" परत नाम क्षेत्र “कहिण पण्णत्ते" ४॥ २५॥ ५२ गावेत . माना . Inni प्रभु ४३ है "गोयमा ! वेयडढस्स पव्वयस्स दाहिणेण दाहिण लवण समुदस्स उत्तरेण पुरथिम लवण समुदस्स पच्चत्थिमेणं पच्चत्थिम लवणसमुदस्स पुरथिमेण" हे गीतमा वताय पतनी દક્ષિણ દિશામાં દક્ષિણદિતી લવણ સમુદ્રની ઉત્તર દિશામાં, પૂવતી લવણ સમુદ્રની पश्चिमाहशामा अने पश्चिमहिती am समुद्रनी पूहियामा 'एत्थ णं जम्षदीवे दीवे Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. ११ दक्षिणार्थभरतवर्षनिरूपणम् प्रदेशे खलु जंबुदीवेदीवे' जम्बूद्वीपे द्वीपे 'दाहिणद्ध भरहे णामं वासे पण्णत्ते' दक्षिणार्द्धभरतं नाम वर्ष प्रज्ञप्तम् । तच्च पाईण पडीणायए' प्राचीनप्रतिचीनाऽऽयतं पूर्वपश्चिम यो दिशो रायतं-दीर्घम्, 'उदीणदाहिणवित्थिष्णे' उदीचीनदक्षिणविस्तीर्णम् उत्तरदक्षिणयो दिशो विस्तीर्ण-विस्तारयुक्तम् 'अद्धचंदसंठाणसंठीए' अर्द्धचन्द्रसंस्थानसंस्थितम् अर्द्धचन्द्रस्य संस्थानेन-अवयवसंनिवेशेन आकारेण संस्थितम् 'तिहा' त्रिधा -त्रिभिः प्रकारैः 'लवणसमुदं पुढे' लवणसमुद्रं स्पृष्टम् तथाहि आरोपितज्यधनुम्तुल्यतयेदं पूर्वकोट्या पूर्वलवणसमुद्रं धनुः पृष्ठेन दक्षिणलवणसमुद्रं पश्चिकोटयाच पश्चिमलवणसमुद्रं स्पृष्टमिति । तथा 'गंगा सिंधूर्हि' गङ्गासिन्धुभ्यां 'महाणई हिं' महानदीभ्यां 'तिभागपविभत्ते' त्रिभागप्रविभक्तं-त्रिभिर्भागैः प्रविभक्तं विभागीकृतम् । तत्रैवं भागत्रयं बोध्यं पूर्वभागो लवणसमुद्रं संगतया गङ्गामहानद्या कृतः, पश्चिजंबूद्दीवे दीवे दाहिणद्धभरहे णामं वासे पण्णत्ते" जम्बूद्वीपान्तर्गत दक्षिणाई भरत नाम का क्षेत्र कहा गया है; "पाइणपडोणायए उदीणदाहिणवित्थिपणे अद्धचंदसंठाणसंठिए" यह दक्षिणार्ध भरतक्षेत्र पर्व से पश्चिमतक लम्बा है और उत्तर से दक्षिणतक चौड़ा है इसका आकार जैसा अर्द्धचन्द्र का होता है वैसा है. “तिहा लवणसमुदं पुढे" यह तीन तरफ से लवण समुद्र को स्पर्श करता है, प्रत्यंचा जिसके ऊपर चढाई गई है ऐसे धनुष के आकार वाला हो जाने से यह भरतक्षेत्र पूर्वकोटो से पूर्वमलवण समुद्र को, धनुः पृष्ट से दक्षिण लवणसमुद्र को एवं पश्चिम कोटी से पश्चिमलवणसमुद्र को स्पर्श करता है. “गंगा सिंधूहि महाणईहिं तिभागपविभत्ते दोणि अद्वतीसे जोयणसए तिण्णि य एगूणवोसहभागे जोयणस्स विखंभेणं" गंगा और सिन्धुनामकी दो महा नदियों के द्वारा यह तीन भागों में बट गया है. पूर्व लवणसमुद्र में मिली हुई गंगा नदी के द्वारा पूर्वभाग इसका किया गया है, पश्चिमलवणसमुद्र में मिली हुई सिन्धु महानदी के द्वारा इसका पश्चिमभाग किया गया है, तथा गंगा और दाहिणभरहे णाम पासे पण्णत्ते' दीपान्तर्गत क्षयरत नाय क्षेत्र डिवाय छ. "पाईणपडीणायए उदीणदहिणवित्थिपणे अद्धचंदसंठाणसंठिए” मा क्षिा ભરતક્ષેત્ર પૂર્વથી પશ્ચિમ સુ' લાંબો છે અને ઉત્તર થી દક્ષિણ સુધી પાળે છે અને બાકાર सद्ध यन्द्र छ. " तिहा लवणसमुदं पुढे ।' मात्रा मामेशी समुद्रने ५' છે. પ્રત્યંચા છે ધનુષની ઉપર ચડાવવામાં આવી છે. એવા ધનુષના આકારવાળો આ પ્રદેશ થે જાય છે, તેથી આ પૂર્વ કેટથી પૂર્વ લવણ સમુદ્રને ધનુઃ પૃષ્ઠથી દક્ષિણ લવણું સમુદ્રને भने पश्चिमरिया पश्चिम समुद्रने २५शे छे. “गंगासिधूहि महाणई हि तिभाग पविभते दोणि अठतीसे जोयणसए तिण्णिय एगूणवीसइभागे जोयणस्ल विक्खंभेणं" ગંગા અને સિંધુ નમક બે મહાનદીએ વડે આ ત્રણ ભાગમાં સંવિભક્ત થયેલ છે. પૂર્વ દ્વાવણ સમદ્રમાં મળતી ગંગાનદી વડે અને પૂર્વ ભાગ જુદો થાય છેપશ્ચિમ સમદ્રમાં મળતી સિધુ મધુ નદી વડે આને પશ્ચિમ ભાગ જુદો તરી આવે છે. તેમજ છે અને Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૬૮ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे भागो लवणसमुद्रं संगतया सिन्धु महानद्या कृतः मध्यमभागो गङ्गासिन्धुकृत इति । अथ विष्कम्भमाह - 'दोन्नि अद्वतीसे' इत्यादि द्वे अष्टात्रिंशे 'जोयणसए' योजनशते = अष्टात्रिंशदधिकानि द्विशतयोजनानि, 'तिष्णि य एगूणवीसइभागे जोयणस्स' त्रीन् एकोनविंशतिभागानू योजनस्य - एकोनविंशति भागविभक्तस्यैकस्य योजनस्य त्रीन् भागांश्च 'विक्खभेणं' विष्कम्भेण विस्तारेण प्रज्ञप्तमिति । अथ दक्षिणार्द्ध भरतस्य जीवां निरूपयति- 'तस्स जीवा' इत्यादि । ' तस्स जीवा' तस्य दक्षिणार्द्ध भरतस्य जीवाजीवेव- धनुयैव जीवा - धनुर्ज्याऽऽकारः क्षेत्र विभागविशेषः 'उत्तरेणं' उत्तरे - उत्तरदिग्भागे ' पाईणपडीणायया ' प्राचीनप्रतीचीनाऽऽयता पूर्वपश्चिमयोदिशा दैर्ध्य युक्ताः 'दुहा' द्विधा = द्वाभ्यां प्रकाराभ्यां 'लवणसमुदं पुट्ठा' लवणसमुद्र स्पृष्टा तत्र 'पुरथिमिलाए कोडी पुरथिमिल्लं लवणसमुदं पुट्ठा' पौरस्त्यया- पूर्वदिग्भवया कोटचा= अग्रभागेन पौरस्त्यं = पूर्वदिग्भवं लवणसमुद्रं स्पृष्टा 'पच्चत्थिमिल्लाए कोडीए पच्चत्थिमिल्लं लवणसमुदं पुट्ठा' पाश्चात्यया- पश्चिमदिग्भवया कोट्या अग्रभागेन पाश्चात्यं - पश्चिमदिग्भवं लवणसमुद्रं स्पृष्टा । अथ जीवायाः प्रमाणमाह-' नवजोयण सहसाई' इत्यादि । 'णवजोयण सहस्साइ, नव योजन सहस्राणि नव सहस्र योजनानि 'सत्तय अडयाले जोयणसए' सप्त च अष्टचत्वारिंशद्योजनशतानि-अष्टचत्वारिंशदधिकानि सप्तशतयोजनानि, 'दुवालस य एगूणवीस भाए जोयणस्स ' आयामेणं' सिन्धु इन दोनों नदियों के द्वारा इसका मध्यभाग किया गया है. 'दोनी अद्धतीसे जोयणसए तिण्णि य एगूण वीसईभागे जोयणस्स विक्खंभेणं" इस दक्षिणार्ध भरतक्षेत्र का विस्तार ३ २३८ योजन का है, " तम्स जीवा उत्तरेणं पाईणपडणायया दुहा लवणसमुद्दे पुट्ठा” १९ उस दक्षिणार्द्ध भरतकी जीवा - धनुष की ज्याके जैसा क्षेत्र विभागविशेष उत्तर दिशा में पूर्व से पश्चिमदिशातक लम्बी है और दो प्रकार से लवण समुद्र को छू रही है; पूर्वदिशा की कोटि से पूर्वदिशा के समुद्र को छूती है, और पश्चिम दिशा की कोटी से पश्चिम दिशा के समुद्र को छूति है । जीवा का प्रमाण कथन - "णव जोयणसहस्साई अडयाले जोयणसए दुवालस य एगूण वीसइभाए जोयणस्स सत्तय १२ १९ 3 ૧૯ सिन्धु गया भन्ने नहीओ वडे आने। मध्य भाग धर्ध लय छे. “ दोन्नि अद्धतीसे जोयणसप तिष्णिय पगूण वीसईभागे जोयणस्स विक्खमेणं" मा दक्षिणाद्ध भरतक्षेत्रन વિસ્તાર ૨૩૮ योवन भेटलो छे. “तस्स जीवा उत्तरेण पाईण पडीणायया दुहा लवण समुई पुट्ठा" ते हक्षिशुद्ध भरतनी लवा - धनुषनी क्या लेना क्षेत्र विभाग विशेष - उत्तर દિશામાં પૂર્વથી પશ્ચિમ દિશા સુધી લાંખી છે અને એ રીતે લવણ સમુદ્રને સ્પર્શી રહી છે. પૂર્વ દિશાની કાટિથી પૂર્વ દિશાના સમુદ્રને અને પશ્ચિમ દિશાની કેટિથી પશ્ચિમદિશાના समुद्रने स्पशा रही है. भवानी प्रमाणु विषे अथन: - 'णवजोयणसहस्साई सत्तय अडयाले जोयणसप वालस य पगूणवीसइ भाए नोयणस्स आयामेणं” ८-७४८ ચૈાજન જેટલુ आया मेणं" ९७४८ ૧૨ ૧૯ Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू, ११ दक्षिणार्ध भरतवर्ष निरूपणम् द्वादश च एकोनविंशतिभागान योजनस्य-एकोनविंशतिभागविभक्तस्य एकस्य योजनस्य द्वादशभागाँश्च सा जीवा आयामेन-दैर्येण प्रज्ञप्ता । इत्थं जीवायाः स्वरूपं प्रमाणं चाभिधाय सम्प्रति धनुष्पृष्ठप्रमाणमाह -'तीसे, इत्यादि । 'तीसे घणु पुढे दाहिणेणं' तम्या जीवायाः दक्षिणे-दक्षिदिग्भागे धनुष्पृष्ठं =धनुष्पृष्ठाऽऽकारक्षेत्रविशेषो 'णव जोयण सहस्साई' नवयोजनसहस्त्राणि-नवसहस्त्रयोजनानि 'सत्तच्छावडे जोयणसए, सप्तषट्पष्टि योजनशतानि-पट् षष्टयधिकानि सप्त शतयोजनानि 'इक्कं च एगूणवीसइ भागे जोयणस्स' एकं च एकोनविंशतिभागं योजनस्य 'किंचि विसेसाहिए' किंचिद् विशेषाधिकम् -एकोनविंशतिभागविभक्तस्य योजनस्य किंचिद्विशेषाधिकम् एकं भागं च परिक्खेवेग' परिक्षेपेण-परिधिना 'पण्णने' प्रज्ञप्तम् । अथ दक्षिणाईभरतस्वरूपं प्रश्नात्तराभ्यां निरूपयितुमाह-'दाहिणद्धे' त्यादि, 'दाहिणभरहस्स णं भंते ! वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते १, हे भदन्त ! दक्षिगाईभरतम्ब वर्षस्य क्षेत्रस्य खलु को दृश:-कीदृशः ? आकारभाव प्रत्यवतार:-आकारस्य-स्वरूपस्य भावाः-पर्यायाः आकारभावास्तेषां प्रत्यवतार:प्रकटीभावः प्रज्ञप्तः, दक्षिणा भरतस्य वर्षस्य कीदृशः स्वरूपविशेष-इति भावः' इति गौतमेना पृष्टो भगवानाह 'गोयमा' ! 'हे गौतम ! दक्षिणार्द्ध भरतस्थ 'बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते' बहुसमरमणीयः बहुसमः - अत्यन्त समतलोड योजन का प्रमाण जोवा का लम्बाई की अपेक्षा से है, धनुष्पृष्ठ के प्रमाण का कथन-"तीसे धणुपुढे दाहिणेणं णवजोयणसहस्साई सत्तच्छाव? जोयणसए इक्कं च पगूणवीमइभागे जोयणस्स किंचि विसेसाहिए परिक्खेवेणं पण्णत्ते" उस जीवा का धनुष्पृश्ठ नौ हजार सात सौ ६६ योजन और एक योजन के १९ भागों में से कुछ अधिक एक भाग है यह परिधि की अपेक्षा दक्षिणार्ध भरत के स्वरूप का कथन--"दाहिणद्ध भरहस्स ण भंते ! वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते" हे भदन्त ! दक्षिणार्धभरतक्षेत्र का स्वरूप कैसा कहा गया है ? इस प्रकार से जब गौतम स्वामी ने प्रभु से पूछा-तब प्रभु ने उनसे कहा"गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते-जहानामए आलिंगपुक्लेरेइ वा जाव णाणाप्रमाण मानी पक्ष छ. धनु-तुप्रम.६१-४थन-"तीसे धनुपुढे दाहि. णेणं णवजोयण सहस्साइं सत्तच्छाबडे जोयणसए ईकं च पगूणवीसइलागे जोयणस्स किंचि विसेसाहिए परिक्खेवेणं पण्णत्त' सानु०५४ ६.००२ ७ से १६ यान અને એક વૈજનના ૧૯ ભાગમાંથી કંઈક વધા ૨ એક નાગ જેટલું છે. આ પરિધિની અપેક્ષાએ છે દક્ષિણ ભારતના સ્વરૂપનું કથન– "दाहिणद्ध भरहस्स ण भंते वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते" ભદંત ! દક્ષિણાર્ધ ભરત ક્ષેત્રનું સ્વરૂપ કેવું કહેવાય છેઆ પ્રમાણે જ્યારે ગૌતમે પ્રભુને प्रश्न - त्यारे प्रभुमे तमन ४ाम Pandi sघु “गोयमा ! वहुसमरमणिज्जे भूमि Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्रे त एव रमणीयः सुन्दरः भूमिभागः प्रज्ञप्तः ' से जहानामए , स यथानामक:-आलिङ्गपुष्कर इति वा तत्र 'आलिंगपुक्खरेइ वा' आलिङ्गपुष्करः -मृदङ्गामुखपुटः' इति शब्दः स्वरूपनिर्देशे वा शब्दो विकल्पे, मृदङ्गमुखपुटवद-बहुसमरमणीयइत्यर्थः । यावच्छब्देन- आलिङ्गपुष्कर इति वा इत्यन्तं राजप्रश्नीयसूत्रस्य पञ्चदश सूत्रादारभ्यैकोनविंशतितमसूत्रस्थ नानाविध पञ्चवर्णैः इत्यन्तः पूर्वं यानि पदानि तानि सकलानि संग्राह्याणि । तदर्थश्च तत्रैव मत्कृतायां सुबोधिनीटीकायां द्रष्टव्य इति । तथा 'णाणाविहपंचवण्णेहि' नानाविधपञ्चवर्णैः-अनेकप्रकारकपञ्चवर्णे 'मणीहि तणेहि उवसोभिए' मणि भिस्तृणैश्च उपशोभित इति । एतानि पदानि तदर्थश्च कीदृशस्तैर्मणिभिस्तुणे स्स भूमिभाग उपशोभित इति जिज्ञासायामाह 'तं जहा' तद्यथा 'कित्तिमेहिं चेव' कृत्रिमैः शिल्पिकर्षकादिप्रयोगनिष्पन्नः 'अकित्तिहिंचेव' अकृत्रिमैः रत्न खनौ भूमौ च स्वतः संजातैरिति । विह पंच वण्णेहि मणीहि तणेहिं उवसोभिए-तं जहा कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिंचेव" हे गौतम ! दक्षिणा भरत का बहुसमहोने से भूमिभाग रमणीय कहा गया है. वह ऐसा बहुसम है जैसा कि आलिङ्ग-मृदङ्ग का मुखपृष्ट होता है. यहाँ पर इति शब्द स्वरूपनिर्देश में वीर 'बा" शब्द विकल्प में प्रयुक्त हुआ है. यहाँ यावत् शब्द राजप्रश्नीय सूत्र के 'आलिंगपुकवरेइ" इस १५वें सूत्र से लगाकर १९ वे सूत्र के "नानाविह पंचवण्णेहिं" यहाँ तक के पाठ में जितने भी पद आये हैं वे सब यहाँ गृहीत किये गये हैं इन समस्त पदों की व्याख्या वहीं पर मैने उसकी सुबोधिनी टीका में कर दी है-अतः वहीं से यह सब कथन जानलेना चाहिए वहाँ पर का जो अनेक प्रकार के पंचवर्णों वाले मणियों से और तृणों से भूमिभाग उपशोभित कहा गया है सो ये मणि और तृण कृत्रिम शिल्पियों द्वारा एवं कर्षकों द्वारा प्रयोग से निष्पन्न हुए भी है । भगे पण्णत्ते-से जहानामए आलिंगपुक्खरे ईवा जाव णाणाविहपंचवण्णेहि मणिहि तणेहि उवसोभिए तंजहा कित्तिमेहि चेव अकित्तिमेहि चेव गौतम ! क्षिा मरतना ભૂમિભાગ બહુસમ હોવાથી રમણીય લાગે છે. તે આલિંગ મૃદંગના મુખ પૃષ્ઠ જે બહુ सभ छ અહી ઈતિ શબ્દ સ્વરૂપ નિદેશમાં અને વા” શબ્દ વિકલ્પ માટે પ્રયુક્ત થયેલ छे. महा यावत् ४थी २१४५श्नीय सूत्रना "आलिंग पुक्खरेई वा" । १५ मा सूत्रथी भांडानमा सूत्रन। 'नानाविह पचवण्णेहिं" मी सुधीना ५४मा २८मा परे। मावेस છે તે સર્વે અહીં ગૃહીત થયેલા છે. આ સર્વ પદની વ્યાખ્યા મેં ત્યાં જ તેની સુધિની ટીકામાં કરી છે તેથી ત્યાંથી જ આ બધું કથન જાણી લેવું જોઈએ ત્યાંને ભૂમિ ભાગ જે અનેક પ્રકારના પાંચ વર્ણોવાળા મણિએ તેમજ તૃણેથી ઉપશોભિત કહેવાય છે. તે આ સર્વ મણિ અને તૃણે કૃત્રિમ શિહિપ વડે તેમજ કર્ષકે વડે પ્રગથી નિષ્પન્ન પણ થયેલા છે અને અકૃત્રિમ રત્ન ખાણમાં તેમજ ભૂમિમાં સ્વતઃ સ્વભાવથી જનિત પણ થયેલા છે. Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. ११ दक्षिणार्ध भरतवर्ष निरूपणम् ७१ ननु सामान्यतो भरतवर्णनसूत्रे 'स्थाणुबहुले' विषमबहुल कण्टकबहुलम् इत्यादि यदुक्तं तेन सह बहुसमरमणीयत्ववर्णनपरेऽस्मिन् सूत्रे वक्ष्यमाणोत्तरार्द्ध भरतवर्णकसूत्रेच विरोध: आयाति विषमत्व समत्वयोस्तेजस्तिमिरयोरिव धर्माधर्म योरिव सुरासुरयो रिव परस्परं विरोधात् ? न चारकविशेषापेक्षमिदं सूत्रद्वयं, सामान्यतो वर्णकभरतसूत्रं तु अवसर्पिण्यां तृतीयारकान्तादारभ्य वर्षशतन्यून दुष्षमारक पर्यन्तरूप प्रज्ञापक कालापेक्षमिति न विरोधावकाश इति वाच्यम् । मणीनां तृणानां कृत्रिमत्वाकृत्रिम - त्वोभयप्रतिपादनेनैतत्सूत्रद्वयस्यापि प्रज्ञापककालापेक्षत्वस्यैवोचित्यात् कृत्रिममणितृणानां शंका- सामान्य से जो भरतक्षेत्र के वर्णन करने वाला सूत्र कहा गया है उसमें वहाँ का भूमिभाग स्थाणुबहुल, विषमप्रदेशबहुल एवं कण्टकबहुल आदि रूप से कहा गया हैं परन्तु इस दक्षिणा भरत क्षेत्र के वनर्ण में यहाँ का भूमिभाग बहुसमरमणीय कहा गया है सो उस वर्णन से इस वर्णन में विषमता और समता के विरोध को लेकर तेज और तिमिर की तरह धर्म और अधर्म की तरह एवं सुर और असुर की तरह परस्पर विरोध स्पष्ट ही हैं. यदि इस विरोध को हटाने के लिए ऐसा कहा जावे कि दक्षिणार्द्ध भरत एवं वक्ष्यमाण उत्तरार्ध भरत क्षेत्र के प्रतिपादक सूत्रद्वय तो- आरक विशेष की अपेक्षा लेकर कहे गये हैं और भरत क्षेत्र का जो सूत्र है वह सामान्यसे भरतक्षेत्र का वर्णन करनेवाला कहा गया है सो वह अवसर्पिणी काल में तृतीय आरक के अन्तर से लेकर वर्ष शतन्यून दुष्षमारक पर्यन्तरूप प्रज्ञापक काल की अपेक्षा से कहा गया है अतः विरोध आने की कोई बात ही नहीं उठती है। सो ऐसा कहना भी उचित नहीं है- क्योंकि दक्षिणार्ध एवं वक्ष्यमाण उत्तरार्ध भरत संबंधी जो सूत्र हैं वे भी मणि और तृणों में कृत्रिमता और अकृत्रिमता के प्रतिपादन से શકા—ભરતક્ષેત્રના વિષે વર્ણન જે સૂત્રમાં પહેલાં કરવામાં આવ્યું છે તેમાં સામાન્યરૂપમાં આમ કહેવામાં આવ્યુ છે કે ત્યાને ભૂમિભાગ સ્થાણુ ખફુલ, વિષમ પ્રદેશ બહુલ તેમજ કટક અહુલ યુક્ત છે. પરંતુ દક્ષિણા ભરતક્ષેત્રના વર્ણનમાં ત્યાંનેા ભૂમિભાગ મહુસમરમ ણીય કહેવામાં આવેલ છે તે તે વર્ણન માં અને આ વર્ણનમાં વિષમતા અને સમતાના વિરોધને લઈ ને, તેજ અને તિમિરની જેમ. ધમ અને અધમની જેમ તેમજ સુર અને અસુરની જેમ પરસ્પર વિરાધ સ્પષ્ટરીતે તરી આવે છે. જો આ વિરાધના પરિદ્વાર માટે આમ કહેવામાં આવે કે દક્ષિણાદ્ધ ભરત તેમજ વક્ષ્યમાણ ઉત્તરાધ ભરતક્ષેત્રના પ્રતિપાદક તે આરક વિશેષણની અપેક્ષાએ કહેવામાં આવેલ છે અને ભરતક્ષેત્ર વિષે જે સૂત્ર છે તે સામાન્યની અપેક્ષાએ ભરતક્ષેત્રનું વણ ન કરનાર છે, તા આ અવસર્પિણી કાલમાં તૃતીય સ્મારકના મતથી લઇને વર્ષી શતન્યૂન દુખમારક પન્તરૂપ પ્રજ્ઞાપક કાળની અપેક્ષાએ કહેવામાં આવેલ છે. એથી વિરાધ જેવી સ્થિતિ ઉત્પન્ન થતી નથી. તે વિશેષ છે એવું થન યેાગ્ય ન કહેવાય કેમકે દક્ષિણા તેમજ વૃક્ષમાણુ ઉત્તરાધ ભરતસ`ખશ્રી જે સૂત્ર છે તે પણ મણુિ અને તૃણેામાં કૃત્રિમતા અને અકૃત્રિમતાના પ્રતિપાદનથી પ્રજ્ઞાપક સૂત્ર Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे प्रज्ञापक काल एव सम्भवात् ? इति चेच्छूयताम् स्थाणुबहुलं विषमबहुलम् इत्यादि सूत्रं भरतस्य बहुस्थले स्थाणुसम्पन्नं वैषम्यसम्पन्नं चेति प्रतिपादकं बहुसमरमणीयो भूमिभाग" इत्येतत्पदगर्भितं च सूत्रद्वयं भरतस्य कचिदेशविशेषे पुरुषविशेषस्य पुण्यफलभोगार्थमत्यन्तसमो भूमिभागे । रमणीयोऽस्तीत्येतत्प्रतिपादकमिति न विरोध शङ्का भोक्तृवैचिच्ये सति भोग्यवैचित्र्यस्य नियमेन सत्त्वात् । एतेन भरतवर्षस्यैकान्त शुभकान्ताशुभ मिश्र रूप कालत्रयाधारत्वं सूचितम् । तत्रैकान्तशुभे काले सर्वे क्षेत्रभावाः शुभा एव भवन्ति एकान्ताशुभे काले सर्वे भावाः अशुभा एव भवन्ति, मिश्रकाले प्रज्ञापक काल की अपेक्षा से ही कहे गये हैं क्योंकि इस प्रकार के मण्यादिकों का सद्भाव प्रज्ञापक काल में ही होता है, ७२ उत्तर - भरत क्षेत्र के वर्णन में जो "स्थाणुचहुल, रूप से भूमिभाग वर्णित हुआ है वह भरत क्षेत्र के अनेक है क्योंकि भरत क्षेत्र के कई स्थल ऐसे हैं जो स्थाणु संपन्न और विषम तासंपन्न हैं तथा "बहुसमरमणीय भूमिभाग है" इस तरह के पद से गर्भित जो सूत्रद्वय कहे गये हैं वे यह प्रकट करते हैं कि भरतक्षेत्र के किसी देश विशेष में पुरुष विशेष के पुण्यफल के भोगार्थ अत्यन्तसम भूमिभाग होता है और वह रमणीय होता है । इस तरह के प्रतिपादन में विरोध के लिये कोई स्थान नहीं है क्योंकि भोक्ताओं की विचित्रता से भोग्य पदार्थों में विचित्रता का सद्भाव नियम से देखा ही जाता है । अत: भरतक्षेत्र काल की अपेक्षा एकान्ततः शुभ का भी आधारभूत होता है अशुभ का भी आधारभूत होता है और शुभाशुभ કાળની અપેક્ષાએ જ કહેવામાં આવેલ છે. કેમકે આ જાતના ગેરેના સદ્ભાવ પ્રજ્ઞા પક કાળમાં જ થાય છે. ઉત્તર-તરક્ષેત્રના વર્ષોંનમાં જે સ્થાણુ બહુલ વિષમ સ્થાન બહુલ વગેરે રૂપમાં જે ભૂમિભા વર્ણિત થયેલ છે તે ભરત ક્ષેત્રના ઘણા સ્થળાને લઈને વિત થયેલ છે. કેમકે ભરત ક્ષેત્રના અનેક સ્થળો એવા છે કે જે એ સ્થ ણુ સપન્ન અને વિષમતા સપન્ન છે તેમજ અ ુસનમણીયભ્રાંમલગવાળા” છે આ જાતના પદાથી ગર્ભિત જે સૂત્રય નિરૂપિત કરવામાં આવેલા છે, તેમનાથી આ પ્રકટ થાય છે હું ભરતક્ષેત્રના ક્રાઇ દેશ વિશેષમાં પુરુષ વિશેષના પુણ્યફળના ઉપભાગમાટે અત્યંત સમભૂમિભાગ હોય છે. અને તે રમણીય હાય છે આ જાતના પ્રતિપાદ્ધમાં વિરોધ માટે કોઇ સ્થાન જ નથી કેમકે લોકતાઓની વિચિત્રતાથી મેગ્ય પદાર્થમાં વિચિત્રતા સદૂભાત્ર યથાનિય જોવામાં આવે જ છે, એથી ભરતક્ષેત્ર કાળ ની અપેક્ષાએ એકાન્તતઃ જીભાધારભૂત પણ હાય છે તેમજ અશુભાધારભૂત પણ હેાય છે, તથા શુભાશુભ અને રૂપમાં પણ હાય છે. જ્યારે એકાન્ત શુભકાળ ડાય છે ત્યારે તેમાં જેટલાં ક્ષેત્રો છે તે સર્વે શુભરૂપજ હોય છે. એકાન્ત અનુભ કાલમાં સ અશુભપજ હાય છે તેમજ શુભાશુભમિશ્રકાલમાં કયાંક તા શુભતા રહે છે 6. विषम स्थान बहुल" इत्यादि स्थलों को लेकर वर्णित हुआ Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७३ प्रकाशिका टीका सू ११ दक्षिणार्धभरतवर्षनिरूपणम् तु क्वचिच्छुभा:क्वचिच्चाशुभाः। इत्थं चात्र सूत्रत्रयमवसर्पिण्यास्तृतीयारकान्तादारभ्य बर्षशतन्यूनदुष्पमारकपर्यन्तो यो मिश्रकालस्तदपेक्षया बोध्यम् न तु एकान्ताशुभषष्ठारककालापेक्षम् , तत्र विरोधस्यावार्यमाणत्वादिति सर्व समञ्जसम् ।। ___अथ दक्षिणार्द्धभरतोद्भवमनुष्यस्वरूपं पृच्छति 'दाहिणभरहेणं भंते ! वासे मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते' हे भदन्त ! दक्षिणार्द्ध भरते खलु वर्षे मनुजानां मनुष्याणां कीदृशकः किं स्वरूपः आकारभावप्रत्यवतारः स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः प्रज्ञप्तः ! इति गौतमेन पृष्टो भगवानाह-'गोयमा' हे गौतम ! तेणं मणुया' ते खलु मनुजाः मानवाः 'बहुसंघयणा' बहुसंहननाः-बहूनि-अनेकानि वज्रऋषभनाराचादीनि संहनानि-शरीरदाढर्यसम्पादकास्थिसमूहरूपाणि येषां ते तथा । तथा 'बहुसंठाणा' बहुसंस्थानाः बहूनि-प्रचूराणि संस्थानानि-चमचतुरस्रादि लक्षणशरीराकृतिविशेषा येषां ते तथा, 'बहुउच्चत्तपज्जवा' बहूच्चत्वपर्यवाः बहवः अनेकविधा उच्चत्वपर्यवाः उच्चत्वस्य शरीरोन्नतत्वस्य पर्यवाः पञ्चधनुःशतहस्तप्रमाणादिकाः दोनों का भो आधारभूत होता है । जब एकान्त शुभ काल होता है तब उसमें जितने भी क्षेत्र है वे सब शुभरूप ही होते हैं एकान्त अशुभकाल में सब ही अशुभरूप ही होते हैं एवं शुभाशुभ मिश्रकाल में कहीं पर शुभता रहती है और कहीं पर अशुभता रहती है। इस तरह सूत्रत्रय अवसर्पिणी के तृतीय आरक के अन्त से लेकर वर्ष शतन्यून दुष्षम आरक पर्यन्त जो मिश्र काल है उसकी अपेक्षा से कहे गये हैं। एकान्त अशुभ आरकरूप षष्ठ काल की अपेक्षा से नहींक्योंकि वहाँ पर इस प्रकार के कथन में विरोध का आना अनिवार्य है दक्षिणार्धभरत में उत्पन्न हुए मनुष्यों का कथन-- 'दाहिणभरहेणं भंते ! मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते' ___ इस सूत्र द्वारा गौतम ने प्रभु से ऐसा पछा है-हे भदन्त ! दक्षिणार्द्ध भारत में रहनेवाले मनुष्यों का आकारभाव प्रत्यवतार-स्वरूप कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं"गोयमा । तेणं मणुया बहुसंघयणा, बहुसंठाणा, बहु उच्चत्तपज्जवा" हे गौतम ! दक्षिणार्धभरत में रहनेवाले मनुष्य अनेक वनऋषभनाराच आदि संहनन वाले होते हैं, अनेक समचतुरस्र आदि संस्थानवाले होते हैं, अनेक प्रकार की ५०० धनुष आदि रूप शारीरिक उच्चतावाले होते અને ક્યાંક અશુભતા રહે છે. આ પ્રમાણે સૂત્રત્રય અવસર્પિણના તૃતીય આરકના અંતથી માંડીને વર્ષશતન્યન દૃષમ આરકપર્યન્ત જે મિશ્રકાળ છે તેની અપેક્ષાએ કહેવામાં આવેલ છે. એકાન્ત અથભ આરક રૂપ ષષ્ઠ કાલની અપેક્ષાએ કહેવામાં આવેલ નથી. કેમકે ત્યાં આ જાતના કથનમાં વિરોધની સ્થિતિ ઉત્પન્ન થવી અનિવાર્ય જ છે. દક્ષિણાર્ધ ભારતમાં ઉત્પન્ન થયેલા મનુષ્યોના સ્વરૂપનું કથન – "दाहिणभरहेण भंते ! वासे मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते" આ સૂત્ર વડે ગૌતમે પ્રભુને એવી રીતે પ્રશન કર્યો કે હે ભદન્ત ! દક્ષિણાદ્ધ ભારતમાં २ना२। मासेाना २ मा प्रत्यवता२-२५३५--उi छ, rqाममा प्रभु ४३ छे , 'गोयमा तेणं मणुया बहुसंधयणा बहुसंठाणा बहु उच्चत्तपजवा हे गौतम ! हक्षिा भारतमा રહેનાર મનુષ્ય અનેક વજ ઋષભ નારાચ વગેરે સંહનનવાળા હોય છે અનેક સમચતુરન્સ Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे विशेषा येषां ते तथा' तथा 'बहुआर पज्जवा' बह्नायुः पर्यवाः वहवः अनेकविधाः आयुः पर्यवाः आयुषो जीवितस्य पर्यवाः पूर्वकोटि वर्षशतादिका विशेषा येषां ते तथा 'बहूई वासाई' बहूनि वर्षाणि' संवत्सरान् 'आउं' आयुः जीवितं 'पार्लेति' पालयन्ति धारयन्ति 'पालित्ता' पालयित्वा 'अप्पेगइया' अप्येकके अप्येके केचित् मनुजाः 'निरयगामी' निरयगामिनः नरकगतिगामिनः 'अप्पेगइया' अप्येकके केचित् ' तिरियगामी' तिर्यगामिनः तिर्यग्गतिगामिनः 'अध्येगइया' अप्येकके केचित् मणुयगामी' मनुजगामिनः मनुष्यगतिगामिनः 'अप्पेगईया' अप्येकके केचित् 'देवगामी' देवगामिनः देवगतिगामिनः 'अप्पेगइया' अप्येकके केचित् मनुजाः 'सिज्झंति' सिध्यन्ति सकलकार्यकारि तया सिद्धा भवन्ति 'बुज्नति' बुध्यन्ते विमलकेवलालोकेन सकललोकालोकं जानन्ति 'मुच्चति' मुच्यन्ते सर्वकर्मभ्यो मुक्ता भवन्ति, 'परिणिव्वायंति' परिनिर्वान्ति समस्तककृतविकाररहितत्वेन स्वस्था 'भवन्ति सव्वदुक्खाणमंत करेंति' सर्वदुःखानाम् शारीरिक हैं "वहु आउ जवा" अनेक प्रकार की आयुवाले पूर्वकोटि रूप एवं सौ वर्ष आदि रूप आयु वाले होते हैं "बहु वासाई आउं पार्लेति, पालित्ता अप्पेगइया निरयगामी अप्पेगइया तिरियगामी, अष्पेगइया, मणुयग़ामी, अष्पेगइया देवगामी" अनेक वर्षों की आयु के वे भोक्ता होते हैं इस तरह से आयु - जीवनकाल को भोग करके - समाप्त करके इनमें से कितनेक ऐसे होते हैं जो मर कर तिर्यञ्चगति में जाते हैं कितनेक ऐसे होते हैं जो मरकर मनुष्यगति में जाते हैं, और कितनेक ऐसे है जो मरकर देवगति में जाते हैं तथा "अप्पेगइया सिज्झति, बुज्झति, मुच्चंति, परिणिव्वायंति सव्व दुक्खाण मंतं करें ति" कितनेक ऐसे भी होते हैं जो सिद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं अर्थात् कृतकृत्य हो जाते है बुद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं - विमल केवल ज्ञान रूप आलोक से समस्त लोक सहित अलोक के ज्ञाता हो जाते हैं- मुक्त हो जाते हैं-सकलकर्मों से छूट जाते हैं-रहित हो जाते हैं । सकलकर्म कृत विकारों से रहित हो जाने के कारण वे परिनिवांत हो વગેર સસ્થાનવાળા હૉય છે, અનેક પ્રકારની ૫૦૦ ધનુષ આદિ રૂપ શારીરિક ઊંચાઇવાળા डाय छे. "बहु आउपज्जवा" भने प्राश्नी अयुवाणा होय छे. बहूई 'बालाई आउं पाि पालिता अप्पेगइगया निरयगामी अध्पेगईया तिरियगामी अप्पेगइया मणुयगामी अप्पेगtया देवगामी" ४ वर्षेनी आयुना तेथे ला होय हे या रीते आयु-भवनाज-नो उ ભાગ કરીને એમનામાં કેટલાંક એવાં હોય છે કે જેઓ મૃત્યુ પ્રાપ્ત કરીને નરકમાં જાય છે કેટલાક એવાં હાય છે કે જેએ મૃત્યુ પ્રાપ્ત કરીને તિય ચ ગતિમાં જાય છે, કેટલાંક એવાં હાય છે કે જેઓ મૃત્યુ પ્રપ્ત કરીને મનુષ્ય ગતિમાં જાય છે અને કેટલાંક એવા હોય છે . भेो। मरीने देवगति पाये तथा अप्पेगइया सिज्झति बुज्झति, मुञ्चति, परिणिव्वायंति सव्वदुक्खाणमंत के रैति" व शेवां पशु होय हे सिद्ध व्यवस्थाने पाये छ એટલે કે કૃત કૃત્ય થઈ જાય છે. બુદ્ધ અવસ્થા પામે છે—વિમળ કેવળ જ્ઞાનરૂપ આલાકથી સમસ્ત લેાક સહિત અલેાકના જ્ઞાતા થઈ જાય છે. મુક્ત થઇ જાય છે. સકલ કર્મોથી મુક્ત થઈ જાય છે-રહિત થઈ જાય છે. સકલક કૃત વિકારાથી રહિત થઈ જાય છે. તેથી તેઓ પરિ ७४ Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू० १२ दक्षिणार्द्धभरतस्य सीमाकारी पर्वतस्थितिः मानसिक समस्त क्लेशानाम् अन्तम् नाशं कुर्वन्ति अव्याबाधसुखभाजो भवन्तीत्यर्थः। अनोक्तमिदं सर्व स्वरूपवर्णनम् अरकविशेषापेक्षया नानाविधान् जीवानपेक्ष्य बोध्यम् अन्यथा सुषमसुषमादि भवमनुजानां सिद्धत्वादि विरहात्तत्कथनमयुक्तं स्यादिति ॥सू० ११॥ अथास्य दक्षिणा भरतस्य सीमाकारी वैताढयपर्वतः काऽऽस्ते ? इति पृच्छति मूलम्-कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे वेयड्ढे णामं पबए पण्णत्ते ? गोयमा ! उत्तरद्ध भरहवासेस्स दाहिणेणं दाहिण भरह वासस्स उत्तरेणं पुरथिमलवणसमुदस्स पच्चत्थिमेणं पच्चत्थिम समुदस्स पुरथिमेणं एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे वेयड्डे णाम पव्वए पण्णत्ते, पाईणेपडीणायए उदीणदाहिणवित्थिण्णे दुहा लवणसमुदं पुढे पुरथिमिल्लाए कोडीए पुरथिमिलं लवणसमुदं पुढे पच्चत्थिमिल्लाए कोडीए पञ्चथिमिल्लं लवणसमुदं पुढे, पणवीसं जोयणाई उ8 उच्चत्तेणं छस्म कोसाइं जोयणाई उब्वेहेणं पण्णासं जोयणाई विक्खंभेणं, तस्स बाहा पुरथिमपच्चत्थिमेणं चत्तारि अट्ठोसीए जोयणसए सोलस य एगूणवीसइ भागे जोयणस्स अद्धभागं च आयामेणं पण्णत्ता. तस्स जीवा उत्तरेणं पोईणपडीणायया दुही लवणसमुदं पुट्ठा पुरथिमिल्लाए कोडीए पुरथिमिल्लं लवणसमुदं पुट्ठा पच्चत्थिमिल्लाए कोडीए पच्चथिमिल्लं लवणसमुदं पुट्ठा दस जोयणसहस्साई जाते हैं, अपने आप में समा जाते हैं और शारीरिक एवं मानसिक समस्त क्लेशों का नाश कर देते हैं अर्थात्-अव्या बाध सुख के गोक्ता हो जाते हैं । यहां उक्त यह सब स्वरूप वर्णन अरकविशेष की अपेक्षा से नानाविध जीवों को लेकर के कहा गया जानना चाहिये। नहीं हो तो फिर सुषम सुषमादि काल में उत्पन्न हुए मनुष्यों को सिद्ध पद की प्राप्ति तो होती नहीं हैमतः यह कथन अयुक्त हो जावेगा ॥११॥ નિર્વા થઈ જાય છે. સ્વ સ્વરૂપમાં જ સમાહિત થઈ જાય છે. અને શારીરિક અને માનસિક સમસ્ત કલેશને વિષ્ટ કરી નાખે છે. એ ટલે કે અવ્યાબાધ સુખના ભકતા થઈ જાય છે. અહીં આ બધું સ્વરૂપ વર્ણન જે કરવામાં આવ્યું છે તે અરક વિશેષની અપેક્ષાએ નાનાવિધ જીવેને લઈને કહેવામાં અને વેિલ છે. આમ ન હોય તે સુષમભુષમાદિકાળમાં ઉત્પન્ન થયેલ મનુષ્યને સિદ્ધ પદ પ્રાપ્ત થતું નથી એથી આ કથન અયુક્ત થઈ જશે. ૧૧ Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७६ जम्बूद्धोपप्रज्ञप्तिसूत्रे सत्त य वीसे जोयणसए दुवालस य एगूणवीसइभागे जोयणस्स आयामेणं तीसे धणुपुढे दाहिणेणं दस जोयणसहस्साई सत्त य तेआले जोयणसए पण्णास य एगूणवीसइभागे जोयणस्स परिक्खेवेणं रुयगसंठाणसंठिए सव्वरयणामए अच्छे सण्हे लढे घढे मढे नीरए निम्मले णिष्पंके णिक्कंकडच्छाए सप्पभे समरोए पासाईए दरिसणिज्जे अभिरूवे पडिरूवे उभओ पासि दोहिं पउमवरवेइयाहिं दोहिं य वणसंडेहि सबओ समंता संपरिक्खित्ते । ताओ णं पउमवरवेइयाओ अद्धेजोयण उ8 उच्चत्तेणं पंचधणुसयाई विक्खंभेणं पव्वयसमियाओ आयामेणं वण्णओ भाणियब्यो । तेणं वणसंडा देसूणाई दो जोयणाई विक्खंभेणं पउमवरवेइया समगा आयामेणं किण्हा किण्होभासा जीव वेण्णओ ॥सू०१२॥ छाया--का खलु भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वोपे भारते वर्षे वैताढ्यो नाम पर्वतः प्रशप्तः, गौतम। उत्तरार्द्ध भरतवर्षस्य दक्षिणे दक्षिणभरतवर्षस्य उत्तरे पौरस्त्यलवणसमुद्रस्य पाश्चात्ये पश्चिमलवणसमुद्रस्य पौरस्त्ये अत्र खलु जम्बूद्वोपे द्वीपे भरते वर्षे वैतात्यो नाम पर्वतः प्रज्ञप्तः, प्राचीनप्रतोचीनाऽऽयतः उदीचीनदक्षिण विस्तीर्णः द्विधा लवणसमुद्र स्पृष्टः पौरस्त्यया कोट्या पौरस्त्य लवणसमुद्रं स्पृष्टः पाश्चात्त्यया कोटया पाश्चात्यं लवणसमुद्रं स्पृष्टः, पञ्चविंशति योजनानि ऊध्वमुच्चत्वेन षट् सकोशानि योजनानि उद्वेधेन पञ्चाशतं योजनानि विष्कम्मण ५० तस्य वाहा पोरस्त्यपश्चिमेन यत्वारि अष्टाशीतानि योजनशतानि षोडशच एकोनविंशतिभागान योजनस्य अर्द्धभागं च आयामेन प्रक्षप्ता । तस्य जोवा उत्तरेण प्राचीनप्रतीचोनाऽऽयता द्विधा लवणसमुद्रं स्पृष्टा पौरस्त्यया कोट्या पौरत्यं लवणसमुद्र स्पृष्टा पाश्चात्यया कोट्या पाश्चात्त्यं लवणसमुद्र स्पृष्टा, दश योजन सह स्माणि सप्त च विंशति योजनशतानि द्वादश च एकोनविंशति भागान् योजनस्य आयामेन । तस्या धनुष्पृष्ठ दक्षिणेन दश योजनसहस्राणि सप्त च त्रिचत्वारिंशानि योजन शतानि पञ्चदश च एकोनविंशतिभागान् योजनस्य परिक्षेपेण । रुचकसंस्थानसंस्थितः सर्वरजतमयः अच्छः श्लक्ष्णः लष्टः घृष्टः मृष्टः नोरजाः निर्मलः पिङ्कः निष्कङ्कटच्छायः सप्रभः समरीचिकः प्रासादीयः दर्शनीयः अभिरूपः प्रतिरूपः । उभयोः पार्श्वयोः द्वाभ्यां पद्मवरवेदिकाभ्यां द्वाभ्यां च वनषण्डाभ्यां सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्तः । ते खलु पद्मवरवेदिके अर्द्धयोजनमूर्ध्वमच्चत्वेन पञ्चधनुः शतानि विष्कम्मेण, पर्वतसमिके आयामेन वर्णको भणितव्यः । तौ खलु वनषण्डः देशोने द्वे योजने विष्कम्मेण पद्यवरवेदिका समको आयामेन कृष्णा कृष्णावभासा याबद् वर्णकः ॥सू०१२॥ Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १२ दक्षिणार्द्धभरतस्य सीमाकारी पर्वतस्थितिः टीका- 'कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे' इत्यादि-गौतमो भगवन्तं पृच्छति 'कहि णं भते जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे वेयड्ढे णामं पब्वर पण्णते' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे भरते वर्षे वैढ्यो नाम पर्वतः क = कुत्र प्रज्ञप्तः ? इति पृष्टो भगवानाह - 'गोयमा उत्तरद्धभरवास' हे गौतम उत्तरार्द्ध भरतवर्षस्य अनन्तरोक्तस्वरूपस्य 'दाहिणेणं' दक्षिणे दक्षिणदिग्भागे ' दाहिणभर हवासस्स उत्तरेणं' दक्षिणार्द्ध भरतस्य उत्तरे - उत्तर दिग्भागे 'पुरत्थमलवणसमुहस्स' पौरस्त्यलवणसमुद्रस्य 'पच्चत्थिमेणं' पश्चिमे पश्चिमदिग्भागे 'पच्चत्थिमलवणसमुहस्स पुरत्थिमेणं' पश्चिमलवण समुद्रस्य पौरस्त्ये- पूर्वदिग्भागे । एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे वेयड्ढे णामं पव्वए पण्णत्ते' अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वीपे भरते वर्षे वैताढ्यो नाम पर्वतः प्रज्ञप्तः स वैताढ्यः पर्वतः कीदृश: ? इत्याह 'पाइण पडीणायए' प्राचीन प्रतीचीनाऽऽयतः पूर्वपश्चिम दिशोरायतः - दीर्घः 'उदोणदाहिणfa स्थिण्णे' उदीचीनदक्षिणविस्तीर्णः उत्तर दक्षिणदिशोर्विस्तीर्णः विस्तारयुक्तः 'दुहा' द्विघा अनुपदं वक्ष्यमाणाभ्यां द्वाभ्यां प्रकाराभ्यां 'लवणसमुद्द पुट्ठे लवणसमुद्रं स्पृष्टः इस दक्षिणार्ध भरत की सीमा करने वाला वैताढ्य पर्वत कहां पर है ? इसका कथन -- "कहिणं भंते ! जंबूद्दीवे दीवे भरहे वासे वेयढे णामं पव्वए पण्णत्ते" इत्यादि । टीकार्थ - भदन्त ! जम्बूद्वीप में स्थित भरत क्षेत्र में वैताढ्य पर्वत कहां पर कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं- " गोयमा ! उत्तरद्ध भरहवासस्स दाहिणणंदाहिण भरहवासस्स उत्तरेणं पुरत्थमलवण समुदस्स पञ्चत्थिमेणं पच्चत्थिमलवण समुद्दस्स पुरत्थिमेणं एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे वेयढे णामं पव्वए पण्णत्ते" हे गौतम ! उत्तरार्ध भरत क्षेत्र को दक्षिणदिशा में दक्षिणभरत क्षेत्र की उत्तरदिशा में पूर्वदिग्वर्तीलवण समुद्र की पश्चिमदिशा में और पश्चिमदिग्वर्ती लवण समुद्र की पूर्वदिशा में जम्बूद्वीपस्थ भरतक्षेत्र में वैताढ्यनामका पर्वत है । यह वैताढ्य - पर्बत " पाईणपडीणायए उदिण दाहिणवित्थिष्णे दुहा लवणसमुद्दे पुरट्टे पुरथिमिल्लाए कोडीए पुरत्थिमिल्लं लवणसमुदं पुट्ठे, पच्चत्थिमिल्लाए कोडीए पच्चत्थिमिल्लं लवण समुदं पुट्ठे" पूर्व से આ દક્ષિણાદ્ધ ભરતની સીમા બતાવનાર વૈતાઢ્ય પર્યંત કયાં આવેલ છે ? આ વિષે કથન 'कहिणं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे वैयड्ढे णामं पव्वर पण्णत्ते- इत्यादि सूत्र -१२ ॥ ટીકા-હે ભદ ́ત ! જ ખૂદ્વીપમાં સ્થિત ભરત ક્ષેત્રમાં વૈતાદ્રય પર્યંત કયાં આવેલ છે ? એના वामां प्रभु ! छे ! " गोयमा ! उत्तरद्ध भरहवा उस्त दाहिणेणं दाहिण भरहवासस्स उत्तरेणं पुरात्थिम लवणसमुद्दस्स पच्चत्थिमेणं पच्चत्थि मलवण समुहस्स पुरत्थिमेणं पत्थणं बुद्दीवे दीवे भरहे वासे वेअड्ढे णामं पव्वप पण्णत्ते" हे गौतम ! उत्तरार्ध भरत क्षेत्रनो हांक्षायु દિશામાં દક્ષિણ ભરત ક્ષેત્રની ઉત્તરદિશામાં પૂર્વ દિગ્વતી લવણુ સમુદ્રની પશ્ચિમ દિશામાં અને પશ્ચિમ દિગ્વતી' લવણુ સમુદ્રની પૂર્વ દિશામાં જંબૂદ્રીપસ્થ ભરત ક્ષેત્રમાં વૈતાઢ્ય નામે પર્વત છે. वैताय पर्वत " पाईणपडीणायप उदीणदाहिणवित्थिपणे दुहा लत्रणसमुद्दे पुढे पुरत्थिमिल्लाप कोडीए पुरत्थि मल्लं लवणसमुद्दे पुढे पच्चत्थिमिल्लाप ७७ Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे प्राप्तः स्पृशेरत्र प्राप्त्यर्थत्वात्कर्तरिक्तः तेन कर्मणि द्वितीया, एवमग्रेऽपि । 'पुरस्थिमिल्लाए' पौरस्त्यया पूर्व दिग्भवया 'कोडीए' कोट्या अग्रभागेन 'पुरथिमिल्लं' पौरस्त्यं पूर्व दिग्भवं 'लवणसमुदं पुढे' लवणसमुद्रस्पृष्टः ‘पच्चथिमिल्लाए' पश्चिमया पश्चिदिग्भवया 'कोडीए' कोट्या 'पच्चथिमिल्लं लवणसमुदं पुढे' पश्चिमलबणसमुद्र स्पृष्टः । स च ‘उड्द' ऊर्ध्वम् उपरि 'उच्चत्तेणं' उच्चत्वेन 'पणवीसं' पञ्चविंशति पश्चविंशति संख्यकानि 'जोयणाई' योजनानि 'उव्वे हेणं' उद्वेधेन भूम्यन्तर्गतभागेन 'छस्सकोसाई जोयणाई' सक्रोशानि क्रोशसहितानी एक क्रोशाधिकानि षट् षट्सख्यानि योजनानि समयक्षेत्रवर्तिना मेरुवर्जनां सकलपर्वतानामुद्वेधः स्वोचत्व चतुर्थीशो भवति । अतएवात्र पञ्चविंशतियोजनचतुर्थाशः सक्रोशषड्योजनानि 'उव्वेहेणं' उद्वेधत्वेन प्रोक्तानीति बोध्यम् । तथा 'विक्खंभेणं' विष्कम्भेण-विस्तारेण 'पण्णासं जोयणाई' पञ्चाशत योजनानि एतत्परिमितो वर्तते ।। पश्चिमतक लम्बा । और उत्तर से दक्षिणतक चौड़ा है दो तरफ से यह लवण समुद्र को छू रहा है पूर्व की कोटि से पूर्वदिग्वर्ती लवणसमुद्र को और पश्चिमदिग्वर्ती कोटि से पश्चिम के लवणसमुद्र को । “पणवीसं जोयणाई उड्ढं उच्चत्तेणं छस्स कोसाइं जोयणाई उठवेहेणं पण्णासं जोयणाई विक्खंभेणं" इसकी उंचाई २५ योजन की है. इसका उद्वेध एक कोश अधिक ६ योजन का है. समय क्षेत्रवर्ती जितने भी पर्वत हैं उनमें एक मेरु पर्वत को छोड़ कर सब पर्वतों का उद्वेध अपनी उँचाई से चतुर्थाश होता है. इसीलिए यहां पर वैतात्य पर्वत का उद्वेध एक कोश अधिक ६ योजन का कहागया है तथा विस्तार इस का ५० योजन का कहा गया है "तस्स बाहा पुरस्थिमपच्चत्थिमेणं चत्तारिं कोड़ीप पच्चत्थिमिल्लं लवणसमुदं पुठूटे" व थी यि सुधा सामा छ भने उत्तरथी क्ष! સુધી ચડે છે. બે બાજુથી આ લવણ સમુદ્રને સ્પશી રહ્યો છે. પૂર્વની કેટથી પૂર્વ દિગ્વતી લવ સમુદ્રને અને પશ્ચિમ દિગ્વતી કેટથી પશ્ચિમના લવણ સમુદ્રને આ સ્પશી રહ્યો तीसं जोयणाई उडूढे उच्चरोणं छस्सकोसाइं जोयणाई उठवेहेण पण्णासं जोयणाई विक्खभेणं" मानी या २५ योनी छे. मानो वेध 8 अघि જન જેટલું છે. સમય ક્ષેત્રવત જેટલા પર્વત છે. તેમાં એક મેરુ પર્વતને બાદ કરતા સવ પર્વતાનો ઉદૂધ પિત પિતાની ઊંચાઈથી ચતુર્થાશ હોય છે એથી જ અહીં વૈતાદ્રય પર્વતનો ઉદૂધ એક ગાઉ અધિક યોજન જેટલે કહેવામાં આવેલ છે. તેમજ વિસ્તાર मान। ५० येन २४वामा मा०ये। छे. "तस्स बाहा पुरथिम पच्चत्थिमेणं चत्तारि अट्ठासीए जोयणसए सोलसय एगूणवीसइभागे जोयणस्स अद्धभागं च आयामेणं च पण्णत्ता' मा वैताहय पतनी वाह-६क्षिणथी 6त्तर सुधीनी गाडी माश प्रदेश પંકિત-પૂર્વ અને પશ્ચિમ દિશામાં ૮૪ જન જેટલી છે અને એક એજનના ૧૯ ભાગો માંથી ૧૬ ભાગ પ્રમાણ છે. આ તેની લંબાઈની અપેક્ષા એ કથન છે. Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७२ प्रकाशिका टीका सू. १२ दक्षिणार्द्धभरतस्य सीमाकारीपर्वतस्थितिः 'तस्स' तस्य-वैतादयस्य 'बाहा' बाहा-दक्षिणोत्तरायता वक्रा आकाशप्रदेशपङ्क्तिः 'पुरथिमपच्चत्थिमेणं' पौरस्त्यपाश्चात्येन पूर्वपश्चिमयोर्दिशोः, 'चत्तारि अठासीए जोयणसए' अष्टाशीतानि अष्टाशीत्यधिकानि चत्वारि योजनशतानि चतुश्शत योजनानि तथा 'सोलसय एगूण वीसइभागे' षोडश च एकोनविंशतिभागान् 'जोयणस्स' योजनस्य एकोनविंशतिभागविभक्तस्य एकस्य योजनस्य पोडशभागान् , 'अद्धभागच आयामेणं पण्णत्ता' अर्द्धच-एकोनविंशतितमभागस्य अर्धं च सार्द्ध षोडशभागानीत्यर्थः, आयामेन-दैर्येण प्रज्ञप्ता ।। __अथ वैताढयस्य जीवामाह-'तस्स जीवा उत्तरेणं' तस्य-वैताव्यस्य जीवा उत्तरेण – उत्तरस्यां दिशि ‘पाईणपडोणाययो' प्राचीनप्रतीचीनाऽऽयता-पूर्व पश्चिमयो दिशोरायता 'दुहा' द्विधा द्वाभ्यां प्रकाराभ्यां 'लवणसमुदं पुटा' लवणसमुद्र स्पृष्टा, तथाहि 'पुरथिमिल्लाए' पोरस्त्यया-पूर्वदिग्भवया 'कोडीए' कोटया अग्रभागेन 'पुरथिमिल्लं' पौरस्त्यं-पूर्वदिग्भवं 'लवणसमुद्द पुढा' लवणसमुद्र स्पृष्टा ‘पच्चत्थिमिल्लाए' पाश्चात्यया-पश्चिमदिग्भवया 'कोडीए' कोटया-पञ्चस्थिमिल्ले पाश्चात्त्यं-पश्चिमदिग्भवं 'लवणसमुदं पुट्ठा' लवणसमुद्रं स्पृष्टा, 'दसजोयणसहस्साई' दश योजनसहस्राणि दशसहस्र योजनानि, 'सत्त य वीसे जोयणसए' सप्तच विशानि अट्ठासीए जीयणसए सोलसय एगूणवीसईभागे जोयणस्स अद्धभागं च आयामेणं पण्णत्ता" इस वैताड्य पर्वत की बाहा-दक्षिण से उत्तर तक टेड़ी आकाश प्रदेशपङक्ति-पूर्व और पश्चिम दिशा में ८४ योजन की है और एक योजन के १७ भागों में से १६॥ भाग प्रमाण है । यह उसकी लम्बाई की अपेक्षा कथन हैं । वैताढ्य को जीवा का प्रमाण कथन "तस्स जोवा उत्तरेणं पाईणपडीणायया दुहा लवणसमुदं पुट्ठा, पुरथिमिल्लाए कोडीए पुरथिमिल्लं लवणसमुदं पुट्ठा पच्च थिमिल्लाए कोडीए पच्चस्थिमिल्लं लणसमुदं पुट्ठा" उस वैताढ्य को जीवा उत्तरदिशा में पूर्व से पश्चिमादशा तक लम्बी है एवं दो प्रकार से लवण समुद्र को स्पर्श करती है पूर्व दिग्भवक टी से पूर्वेदिग्भवलवण समुद्र को और पश्चिमदिग्भवकाटि से पश्चिमदिग्भव लवण समुद्र को । इसको लम्बाई १०७२० योजन का है और १ योजन के १७ भागों में से १२ भाग प्रमाण है तयनी लवाना प्रभानु ४थ- "तस्स जीवा उत्तरेणं पाईणपड़ीणायया दुहा लवणसमुदं पुट्ठा पुरथिमिल्लाए कोड़ीए पुरथिमिल्लं लवणसमुदं पुट्ठा पच्चथिमिल्लाए कोडीप पच्चथिमिल्ल लवण जमुई पुटूठा" । वैदयनीला त्तहिशाम था પશ્ચિમદિશ સુધી લાંબી છે તેમજ બે રીત લવણું સમુદ્રને સ્પર્શ કરે છે. પૂર્વ દિભવ કેટથી પ્રવદિાવ લનણ સમુદ્રને અને પશ્ચિમ દિક્ષવ કે ટિથી પશ્ચિમ દિલ્મ લવણ સમદ્રને શશ કરે છે આની લંબાઈ ૧૦૭૨૦ જન જેટલી છે અને ૧ જનના ૧૯ ભાગમાંથી .१२ मा प्रभारी छे Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञतिसूत्रे योजनशतानि - विंशत्यधिकानि सप्तशतयोजनानि च ' एगूण वीसइभागे - जोयणस्स' एकोनविंशतिभागान् योजनस्य - एकोनविंशतिभागविभक्तस्य योजनस्य 'दुवालसय' द्वादश भागाँव ' आयामेणं' आयामेन देर्येण प्रज्ञप्ता । अथ वैताढ्य धनुष्पृष्ठं वर्णयति - 'तीसे' तस्याः - जीबायाः 'दाहिणेणं' दक्षिणेन दक्षिणदिग्भागे वैताढ्यपर्वतस्स 'घणुपुट्टे' धनुष्पृष्ठं 'दस जोयण सहस्साई' दश योजनसहस्राणि दशसहस्रयोजनानि तानि 'तेयाले, त्रिचत्वारिंशदधिकानि 'सत्त य जोयणसए, सप्तशत योजनानि, 'पण्णास य एगूणवीस |गे' पञ्चदशच एकोनविंशतिभागविभक्तस्य एकस्य योजनस्य पञ्चदशभागांश्च परिक्खेवेणं' परिक्षेपेण परिधिना - वर्तुळाकारेण प्रज्ञप्तम् । अथ कीदृशो वैताढ्य : इत्याह- 'रुयगसंठाणसंठिए' रुचकसंस्थानसंस्थितः रुचकं, ग्रीवाभूषणविशेषः तस्य यत् संस्थानम् - आकारः तेन संस्थितः, तथा 'सव्वरययामए' सर्वरजतमय:- सर्वात्मना रजतमयः- रूप्यमयः, 'अच्छे सण्डे लट्ठे मीर निम्मले णिपंके णिक्कंकडच्छाए सप्पमे समरीए पासाईय दरिसणिज्जेअभिरूवे पडिरूवे' अच्छादि प्रतिरूपलपर्यन्तपदानां व्याख्या अस्यैव चतुर्थसूत्रे गता, तत एवावलोकनीयेति । ८० वैताद्रय का धनुष्पृष्ठ- 'तीसे धणुपुट्ठे दाहिणेणं दसजोयणसहस्साइं सत्तय तेयाले जोयणसए पणास एगूणवीस भागे जोयणस्स परिक्खेवेणं रूयगसंठाणसंठिए सव्व रयणामए अच्छे सहे लहे घठ्ठे मठ्ठे नीरए निम्मले पिप्पंके, णिकंकटच्छाए सप्पमे समरीए पासाईए दरि सणिज्जे अभिरूवे पडिरूवे ', उस जीवा के दक्षिण दिग्भाग में वैताढ्य पर्वत का धनुष्पृष्ठ १०७४ योजन का और १ योजन के १९ भागों में से १५ भाग प्रमाण हैं यह उसकी परोधि की अपेक्षा से कथन है इस वैताढ्य का आकार रुचक ग्रीवा के आभू षण विशेष का जैसा आकार होता है वैसा हैं. यह वैताढ्ययपर्वत सर्वात्मना रजतमय है। और अच्छ आदि विशेषण से लेकर प्रतिरूपतक के विशेषणों वाला है इन अच्छादि पदों को वैताढ्य धनुष्पृष्ठ : -- "तीसे धणुपुट्टे दाहिणेणं दस जोयणसहस्साइ सरायतेयाले जोयणसप पण्णा सय एगुणवीसइभागे जोयणस्स परिक्खेवेणं रुअगसंठाणसंठिए सव्बरयणामए अच्छे सहे लहे घट्टे मट्टे नीरए, णिम्मले, णिवयंके, णिकं०, सप्प०, समरी०, पालो०, दरि०, अभि०, पडि० ते वाना दक्षिषु हिग्लायां वैताढ्य पर्वतनुं धनुष्य १०७४ ચેાજન જેટલુ અને ૧ ચેાજન ના ૧૯ ભાગેામાંથી ૧૫ ભાગ પ્રમાણ જેટલું છે. મા તેની પરિધીની દૃષ્ટિએ કથન છે. તે વૈતાઢયને આકાર રુચક-ગ્રીવાને એક આભૂષણ વિશેષને જેવા આકાર હાય છે-જેવે છે. આ વૈતાઢય પત્તસર્વાત્મના રજતમય છે અને અચ્છ વિગરે વિશેષણુથી માંડીને પ્રતિરૂપ સુધીના વિશેષણેાથી યુકત છે. આ સ્માદ્ધિ પદોની વ્યાખ્યા Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १२ दक्षिणार्द्धभरतस्य सीमाकारीपर्वतस्थितिः स च पुनः 'उभओ' उभयोः-द्वयोः 'पासि पार्श्वयोः उत्तरतो दक्षिणतश्च 'दोहि' द्वाभ्यां 'पउमवरवेइयाहिं' पद्मवर वेदिभ्यां - मणिमयपद्मरचितोत्तमवेदिकाद्वयेन 'दोहि य वणसंडेहि द्वाभ्यां च वनषण्डाभ्यां-अनेकजातीयोत्तमवृक्षसमूहाभ्यां 'सव्वोसमंता' सर्वतः समन्तात् 'संपरिक्खत्ते' संपरिक्षिप्तः परिवेष्टितः । पूर्वपश्चिमतो जगतीसत्वेन तदवरुद्धत्वात् पद्मवरवेदिका वनषण्डाभावेन 'उभयोः पार्श्वयोः इत्युतम् । 'ताओणं पउमरवेइयाओ' ते अनन्तरोक्ते खलु पद्मवरवेदिके 'अद्धजोयणं' अर्धयोजनम्-योजनस्य अर्धम् - अर्धभागम् 'उड्ढं' उर्ध्वम् उपरि 'उच्चत्तणं' उच्छयेण तथा 'पंचधणुसयाई' पञ्चधनुःशतानि 'विक्खंभेणं' विष्कम्भेण विस्तारेण, तथा 'पव्वयसमियाओ' पर्वतसमिके पर्वततुल्ये 'आयामेणं' आयामेन-दैर्येण प्रज्ञप्ते । 'वण्णओ वर्णकः-अत्र वर्णनपरो वाक्यसमूहो 'भाणियन्वो' भणितव्यः वक्तव्यः। सचास्यैव चतुर्थसूत्रे टीकायां द्रष्टव्य इति । 'तेणं' तौ-पूर्वोक्तौ 'वणसंडा' वनषण्डौ खलु 'देसूणाई' देशोने-देशेन-किचिदेशेने ऊने-न्यूने दो 'जोयणाई द्वे योजने 'विक्खभेणं' विस्तारेण, 'पउमवरवेइया समगा' पद्मवरवेदिका समके पद्मवरबेदिकासमाने 'आयामेणं' आयामेनदेर्येण 'किण्हे' कृष्णे कृष्णवर्णे 'किण्होभासे' कृष्णावभासे 'जाव वण्णओ' यावत्व्यख्या इसी के चतुर्थ सूत्र में की जाचुकी है । "उभओ पसिं दोहिं पउमवरवेइयाहिं दोहिं दणसंडेहिं सव्वओ समंता संपरिक्खित्तो" यह वैताढ्य पर्वत अपने दोनों पार्श्वभागों से दो पद्मवर वेदिकाओं से स्पृष्ट हो रहा वैताढ्य पर्वत के उत्तर पार्श्वभाग की ओर एक पद्मवर वेदिका है और वैताब्य पर्वत के दक्षिण पार्वभाग की ओर एक पद्मवर वेदिका है इसी प्रकार से उसके दोनो पार्श्वभागों की तरफ दो वनषण्ड है - ये पद्मवरवेदिकाएँ माणिमय पद्म की बनी हुई तथा वनषण्ड अनेक जातिय उत्तम वृक्ष समूह से युक्त है। "ताओणं पउमवरवेइयाओ अद्धजोयणं उड्ढं उच्चत्तणं पंच धणुसयाई विक्खंभेणं पव्वयसमियाओ आयामेणं वण्णओ भाणियव्वो" ये पद्मवर मा अन्य न याया सूत्रमा ४२वामा मावी. उभओ पासि दोहिं पउमवरवेइयाहि दोहिय वणसंडेहि सव्वओ समंता संपरिक्खित्तो" वैताढय ५ भन्ने मागुमेथी मे. ५५१२ વેદિકાઓને સ્પશી રહેલ છે. વૈતાઢય પર્વતના ઉત્તર પાર્વભાગની રફ એક પદ્મવર વેદિકા છે અને વૈતાઢય પર્વતના દક્ષિણ પાર્વભ ગની તરફ એક પદ્વવર વેદિકા છે. આ પ્રમાણે તેના બન્ને પાર્વભાગેની તરફ બે વર્ષ છે. એ પદ્વવ વેદિકા મણિમય ५भनी नेकी छे तभी वन अने तीयत्तम वृक्ष समूहथी युत छ, ताओण पउमवरवेइयाओ अद्धजोयणं उइदं उच्चत्तण पंच धणुसयाई विखमेण पचय समियाओ आयामेण वण्णओ भाणियव्वो को पाव२ वहा। ५०2. 16 2ी यी छ भने ૫૦૦, ૫૦૦ ધનુષ જેટલી ચડી છે તેમજ એમાંથી દરેની દીર્ઘતા પદ્મવર વેદિકા Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे यावत्पदेन 'नीले, नीलावभासे, हरिते, हरितावभासे, शीते शीतावभासे, स्निग्धे, स्निग्धावभासे ती, तीव्रावभासे, कृष्णे, कृष्णच्छाये, नीले, नीलच्छाये, हरिते, हरितच्छाये, शीते, शीतच्छाये, स्निग्धे, स्निग्धच्छाये. तीने तीव्रच्छाये, घनकटितटच्छाये रम्ये महामेघनिकुरम्बते' इत्यादि पञ्चमसूत्रतो बोध्यम् । व्याख्या च तत एव बोध्या ।। सू० १२॥ मूलम्-वेयड्डस्स णं पव्वयस्स पच्चथिमपुरथिमेणं दो गुहोओ पण्णताओ, उत्तरदाहिणाययाओ पाईणपडीवित्थिण्णाओ पण्णासं जोयणाई आयामेणं दुवालमजोयणाई विक्खंभेणं अट्ठ जोयणइं उर्दू उच्चत्तेणं वशमयकवाडोहाडियाओ, जमलजुयलकवाडघणदुप्पवेसाओ णिच्चंधयारतिमिस्साओ ववगयगहचंदसूरणक्खत्तजोइसपहाओ जाव पडि रुवाओ तं जहा तमिसगुहो चेव खंडप्पवायगुहा चेव । तत्थणं दो देवा महिड्डिया महज्जुईया महाबली महायसा महासोक्खा महाणुभागा पलिओवमट्टिईया परिवसंति, तं जहो कयमालए चेव णमालए चेव । । तेसिणं वणसंडाणं बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभोगाओ वेयड्वस्स पबयस्स उभओ पासिं दस दस जोयणाई उड्ढे उप्पइत्ता एत्थणं दुवे विज्जाहरसेढीओ पण्णत्ताओ पाईणपडीणाययाओ उदीणदाहिणवित्थिण्णाओ दम दस जोयणाई विक्खंभेणं पब्वयसमियाओ आयामेणं उभओ पासिं दोहिं पउमवरवेझ्याहि दोहिं वणसंडेहिं संपरिक्खित्ताओ। ताओ णं पउमवरवेइयाओ अद्धजोयणं उहें उच्चत्तेणं पंचधणुसयाई विक्खंभेणं पव्वयसमियाओ आयामेणं वण्णओ णेणव्वो वणसंडावि पउमवरवेइया समगा आयामेणं वण्णओ। विज्जाहरसेढीणं भंते ! भूमीणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते वेदिकाएँ दो दो कोश की उनि है और ५००-५०० धनुप को चोड़ी है तथा इनकी प्रत्येक पर्वत की दीर्घता पद्मवर वेद का जितनी है। यहाँ वनषण्ड का वर्णन जैसा जो पहिले कृष्ण कृष्णा वभास आदि पदों द्वारापंच सूत्र में किया गया हैं वैसा ही वह वर्णन यहाँ पर भी कर लेना चाहिये ॥१२॥ જેટલી છે. અહીં વનખંડનું વર્ણન જે રીતે પહેલા પંચમ સૂત્રમાં કરવામાં આવ્યુ છે તે રીતે જ સમજવું ૧૨ા Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका र१० १३ वैताढ्यपर्वतस्य पूर्वपश्चिमे गुफाद्वयवर्णनम् ८३ गोयमा बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते से जहानामए आलिंग पुक्खरेइ वा जीव णाणाविहपंचवण्णेहि मणीहि तणे हे उवसोभिए, तं जहा-कित्तिपहिं चेव अकित्तिमेहि चेव तत्थणं दाहिणिल्लाए विज्जाहरसेढीए रहनेउरचकवालपामोक्खा सढि विज्जाहरणगरावासा पण्णत्ता एवोमेव सपुव्वावरेणं दाहिणिल्लोए उत्तरिल्लोए विज्जाहरसेढीए एगं दसुत्तरं विज्जाहरणगरावाससयं भवतीतिमक्खायं, ते विज्जाहरणगरा रिद्धस्थिमियसमिद्धा पमुइयजणवया जाव पाडेरुवा । तेसु णं विज्जाहरणगरेसु विज्जाहररायाणो परिखसंति महयाहिमवंतमलयमं. दरमहिंदसारा रायवण्णओ भाणियव्वो । विज्जाहरसेढीणं भंते मणु याणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते । गोयमा ! तेणं मणुया बहु संघयणा बहुसंठोणा बहुउच्चत्तपज्जवा बहुआउपज्जवा जाव सव्व दुक्खाणमंतं करेंति ।। सू० १३ ॥ छाया- वैताढयस्य स्खलु पर्वतस्य पाश्चात्यपौरस्त्येन द्वे गुहे प्रज्ञप्ते, उत्तरदक्षि णाऽऽयते प्राचीनप्रतोत्रीनविस्तीर्ण पञ्चाशतं योजनानि आयामेन द्वादश योजनानि विष्कम्भेण अष्ट योजनानि ऊर्ध्वमुच्चत्वेन वज्रमयकपाटावघाटिते यमलयुगलकपाट घनदुष्प्रवेशे नित्यान्धकारतमिस्र व्यपगतग्रहचन्द्रसूर्यनक्षत्रज्योतिःपथे यावत् प्रतिरूपे तद्यथा-तमिस्रगुहा चैव १ खण्डप्रपातगुहा चैव २। तत्र खलु द्वौ देवो महद्धिको महाद्यु.. तिको महायशसौ महासौख्यौ महानुभागौ पल्योपमस्थितिको परिवसतः, तद्यथा कृतमालकश्चैव नृतमाल कश्चैव । तयोः खलु वनपण्डयोः बहुसमरमणोयाद् भूमिभागाद् वैताढयस्य पर्वतस्य उभयोः पार्श्वयोः दश दश योजनानि उर्ध्वम् उत्पत्य अत्र खलु द्वे विद्याधरश्रेण्यौ प्रज्ञप्ते, प्राचीनप्रतोचीनाऽऽयते उदीचीनदक्षिणविस्तीर्ण दश दश योजनानि विष्कम्मेण पर्वनसमिके आयामेन उभयोः पार्श्वयोः द्वाभ्यां पद्मवरवेदिकाभ्यां द्वाभ्यां वनषण्डाभ्यां संपरिक्षिप्ते । ताः खलु पद्मवरवेदिकाः अर्द्ध योजनमूर्ध्वमुच्चत्वेन पञ्चधनुः शतानि विष्कम्भेण पर्वतसमिका आयामेण वर्णको नेतव्यः वनषण्डा अपि पद्मवरवेदिका समका आयामेन वर्णकः । विद्याधरश्रेण्योः भदन्त ! भूम्योः कोदशकः आकारभावप्रत्यक्ष तारः प्रज्ञप्तः, गौतम ! बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः, स यथानामकः आलिङ्गपुष्कर इति वा यावत् नानाविधपञ्चवणे मणिभिस्तृगैरूपशोभितः, तद्यथा-कत्रिमैश्चैव अकत्रि मैश्चेव । तत्र खलु दाक्षिणात्यायां विद्याधरश्रेण्यां गगनवल्लभप्रमुखाः पञ्चाशद् विद्याधर Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे नगराऽऽवासाः प्रज्ञप्ताः, औत्तराहायां विद्याधरश्रेण्यां रथनूपुरचक्रवालप्रमुखाः षष्टिविद्याधरनगराऽऽवासाः प्रज्ञप्ताः, एवमेव सपर्वापरेण दाक्षिणात्यायाम औत्तराहायां विद्याधरश्रेण्या मेक दशोत्तरं विद्याधरनगराऽऽवासशतं भवतीत्याख्यातम् । तानि विद्याधर नगराणि ऋद्ध स्तिमितसमृद्धानि प्रमुदितजनजानपदानि यावत् प्रतिरूपाणि, तेषु खलु बिद्याधरनगरेषु विद्याधरराजाः परिवसन्ति, महाहिमवन्मलयमन्द महेन्द्रसारा: राजवर्णको भणितव्यः । विद्याधरश्रेण्यो भदन्त ! मनुजानां कीदृशकः आकारभावापत्यवतारः प्रज्ञप्तः ! गौतम । ते खलु मनुजा बहुसंहननाः बहुसंस्थानाः बहूच्चत्वपर्यवाः बह्वायुः पर्यवाः यावत् सर्वदुःखानामन्तं कुर्वन्ति ॥ सु० १३॥ टीका --- 'वेयड्ढस्स णं' इत्यादि । अथ वैताव्यपर्वतगुहावर्णनमाह-वेयड्ढस्स णं पचयस्स पच्चत्थिमपुरस्थिमेणं' वैताव्यस्य खलु पर्वतस्य पाश्चात्यपौरस्त्येन-पश्चिमपूर्वयोर्दिशोः 'दो गुहाओपण्णताओ' द्वे गुहे प्रज्ञप्ते, ते च उत्तरदाहिणाययाओ' उत्तरदक्षिणाऽऽयते-उत्तरदक्षिणयोर्दिशोरायते दोघे, 'पाईण पडीणवित्थिण्णाओ' प्राचीन प्रतीचीनविस्तीर्णेपूर्वपश्चिमयोदिशोविस्तीर्णे-विस्तारयुक्तं 'पण्णासं' पञ्चाशतं पञ्चाशत्संख्यानि 'जोयणाई आयामेणं' योजनानि आयामेन-दैर्येण 'दुवालसजोयणाई विक्ख मेणं' द्वादश योजनानि विष्कम्भेण-विस्तारेण 'अट्ठजोयणाई' अष्टयोजनानि 'उड्डे' उर्ध्वम्-उपरि 'उच्चत्तेणं' उच्चत्वेन प्रज्ञप्ते । पुनस्ते कथंभूते ? इत्याह-वईरामयकवाडोहाडियाओ' "वेयड्ढस्स णं पव्वयस्स पच्चत्थिमेणं" इत्यादि टीका-वैताढ्य पर्वत को पश्चिम और पूर्व दिशा में दो गुहाए कही गई है । "उत्तर दाहिणाययाओ" ये उत्तर और क्षिण तक लम्बी है । 'पाईणपडीण वित्थिण्णाओ "तथा पूर्व से पश्चिमतक चौडी है "पण्णासं जोंयणाई आयामेणं,, इनको प्रत्येक को लम्बाई ५० योजन को है 'दुवालस जोयणाई विक्खं भेणं" और विस्तार---चौडाई १२ योजन का है “अड्ढ जोयणाई उड्ढे उच्चत्तेगं वइरामयकवाडोहा डियाओ, जमल जुय ठ कवाड घण दुपवेसाओ णिच्चंधयारतिमिस्साओ ववगयगहचंदसूरणवस्वत्तजोइसपहाओ जाव पडिरूवाओ" इनकी प्रत्येक को उँचाई ८ योजनकी है. ये दोनों वन्नमय किवाडों से आच्छादित रहती है. तथा ये किवाड आपस में 'वेयइडस्स णं पव्वयस्स पचत्थिम पुरथिमेणं' इत्यादि सूत्र ॥१३॥ जीकार्थ-वैताद्वय ५५ तनी पश्चिम भने पूर्व हशाम में मुशाय। ४२वाय छे. "उत्तरदाहिणाययाओ,, से उत्तर भने ६क्षिय सुधी aisी छे “पाईण पडोण वित्थिण्णाओ" तमा ५था पश्चिम सुवी याडी छे. 'पण्णास जोय नाई आयामेणं' समांथा हरेनी 4-5 ५० योजन २८सी छे. “दुवालस जोयणाई विक्खमेणं' अने विस्तार-या ४-१२ यान va छ, “अड्ढ जोयणाई उद्धं उच्च तेणं वरईरामयकवोडाहाडियाओ जमलजुअलकवाड घण दुप्पवेसाओ णिच्चंधयारतिमिस्साओ ववगयगहचंद सूरणक्खत्तजोइंसं पहाओ जाव Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० १३ वैतढयपर्वतस्य पूर्वपश्चि मे गुफाद्वयवर्णनम् वज्रमय पटावघाटिते- वज्ररत्नमयक पाटाभ्यामवघाटिते- आच्छादिते, अतएव 'जमलजुयलकवाडघणदुप्पवेसाओ' यमलयुगलकपाटघनदुष्प्रवेशे यमलानि समस्थितानि युगलानि - युग्मानि धनानि निश्छिद्राणि च यानि कपाटानि तैः दुष्प्रवेशे कष्टेन प्रवेशा पुनः कीदृशे ? 'निच्चधयारतिमिस्साओ' नित्यान्धकारतमित्रे नित्यं सदा अन्धं सतोरप्यायतलोचनयोः प्रवेशकजनं निश्चक्षुषमिव करोतीति अन्धकारं तादृशं तमिस्रं - तिमिरं यत्र ते तथ:- सदा निविडान्धकारयुक्ते, तादृशत्वे हेतुमाह-ववगयगहचंदसूर णक्खत्त जोइस पढाओ' व्यपगतग्रहचन्द्रसूर्य नक्षत्रज्योतिः पथे - व्यपगतं निर्गत ग्रहचन्द्रसूर्य नक्षत्राणां ज्योतिः प्रकाश यस्मात् स व्यपगत ग्रहचन्द्रसूर्य नक्षत्रज्योतिः, तादृशः पन्था ययोस्ते तथा यद्वाTarत्यादि प्राकृतस्य " व्यपगत ग्रहचन्द्र सूर्यनक्षत्र ज्योतिः प्रभे" इतिच्छाया, व्यप गता निर्गता ग्रह चन्द्रसूर्यनक्षत्र ज्योतिः प्रभा यतस्ते तथा । तत्र ज्योतिष्पदेन वह्ने ग्रहणम्, ग्रहपदेनैव चन्द्रसूर्ययोरपि ग्रहणसम्भवे पुनस्तयोरुपादानं गोबलीवर्द्दन्यायेन प्रकर्षद्योतना - र्थम् 'जाव' यावत् - यावत्पदेन - ' अच्छ लक्षणे लष्टे मृष्टे नीरजसौ निर्मले निष्पङ्के निष्कङ्कटच्छाये सप्रभे समरीचिके सोद्योते प्रासादीये दर्शनीये अभिरूपे" इत्येषां पदानां संग्रहो बोध्यः, तथा 'पडिरूवाओ' प्रतिरूपे अच्छादि प्रतिरूपपर्यन्तपदानां व्याख्या चतुर्थसूत्रतो बोध्या । अथ तद्गुहाद्वयं नामतो दर्शयति, 'तं जहा ' तद्यथा 'तमिस्सगुहाचेव खंडप्पवायगुहाचेब' तमिस्रगुहा चैव खण्डप्रपातगुहा चैवेति । 1 'तत्थ णं' तत्र - तयोर्गुहयोः प्रत्येकमेक एको देव इति संकलनया 'दो देवा' द्वौ देवौ परिवसतः इति वक्ष्यमाणेनान्वयः । तौ च कीदृशौ ? इति जिज्ञासायामाह - 'महिड्डिया' इस तरह से जुडे रहते हैं कि जिनकी वजह से उनमें प्रवेश पाना बडे कष्ट से होता है. इनमें सदा ऐसा गाढ अन्धकार रहता है कि वह प्रवेशक जन को निश्चक्षुष जन की तरह कर देता है अर्थात् ये निविड अन्धकार से युक्त रहती है क्यो कि ग्रह, चन्द्र सूर्य एवं नक्षत्र इनका वहां प्रकाश तक नहीं पहुंचता है ये दोनों गुफाएं अच्छ से लेकर प्रतिरूप तक के विशेषणों वाली हैं इन गुफाओं के नाम " तमिस्सगुहा चेव खंडप्पवायगुहाचेव" तमिस्र गुहा और खंडप्रपात - गुहा हैं । " तत्थ णं दो देवा महिढिया महज्जुईया महाबला, महायसा, महासोक्खा, महाणुभागा पलिओ मईया परिवसंति" इन प्रत्येक गुफामें दो देव रहते हैं. ये विमान परिवार आदि पडिरूवाओ" मेमांथी हरे हरेउनी अया - योगन भेटसी छे । जन्ने વજ્રમય કપાટોથી આચ્છાદિત રહે છે તેમજ એ કવાટે પરસ્પર આ રીતે સયુકત થયેલા છે કે જેથી તેમાં પ્રવિષ્ટ થવું બહુજ દુષ્કર કાય છે. એમાં ગ ઢ અંધકાર વ્યાપ્ત છે તેથી એમાં પ્રવિષ્ટ જનને તે ચક્ષુવિહીનની જેમ બનાવી દે છે. એટલે કે એ નિબિડ અંધકાર પૂર્ણ રહે છે. કેમકે ગ્રહ, ચંદ્ર. સૂર્ય, તેમજ નક્ષત્રોના ત્યાં પ્રકાશ પહોંચને નથી. એ બન્ને ગુફાઓ अच्छथी भांडीने प्रति ३५ सुधीना विशेषोयी युक्त छे से गुझयाना नाम 'तमिस्स गुहा खंडवा गुहा चेव" तमिस्र गुझे मने जड प्रपात गुझे छे. तत्थण दो देवा महिढिया महज्जुईया महाबला महायसा, महासोक्खा, महाणुभागा ८५ Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वोपप्रज्ञप्तिसूत्रे इत्यादि-महर्द्धिकादि पदव्याख्याऽष्टमसूत्रे विजयदेववद् विज्ञेया । तो देवौ तत्र 'कयमालएचेव कृतमालकस्त मिस्रगुहाधिपतिः, 'नट्टमालएचेव' नृत्तमालकः खण्डप्रपातगुहाधिपतिश्चैव । ___ अथात्र विद्याधरश्चेणिद्वयं प्ररूपयितुमाह-'तेसि णं वणसंडाणं' तयोः-पूर्वोक्तयोः खलु वनपण्डयोः 'बहुसमरमणिज्जाओ' बहुसमरमणीयात-अत्यन्तसमतलात् अतएव रमणीयात् सुन्दरात् 'भूमिभागाओ' भूमिभागात् भूमिभागप्रदेशात् 'वेयड्ढस्स-पव्ययस्स उभओ पागि' वैताठ्यस्स पर्वतस्य उभयोः द्वयोः पार्श्वयोः 'दस दस जोयणाई उड्डे' दश दश योजनानि ऊर्ध्वम्-ऊपरितनभागम् 'उप्पइत्ता' उत्पत्य गत्वा तत्थणं दुवे विजाहरसेढीओ' अत्र इह खलु द्वे विद्याधरश्रेण्यौ विद्याधराणां श्रेण्यौ आश्रयभूते पती पत्ताओ' प्रज्ञप्ते, तयोरेका दक्षिणभागे अपरा चोत्तरभागे ते द्वे कीदृश्यौ ? इत्याह-पाईणपडीणाययाओ' प्राचीन प्रतीचीनायते-पूर्वपश्चिमयोदिशोरायते दीर्घे, "उदोण दाहिण वित्थिण्णाभो' उदीचीन दक्षिण विस्तीर्णे-उत्तरदक्षिणयोर्दिशोविस्तीर्णरूप महा ऋद्धि के स्वामी हैं महाद्युति वाले हैं महा बल वाले हैं महा यशवाले हैं महासुखशाली हैं, महाप्रभाबवाले है, इन पदों की व्याख्या विजयदेव की तरह अष्टम सूत्र में की जाचुकी है, इनकी प्रत्येक की स्थिति १-१ पल्योपम की हैं "तं जहा "-कयमालए चेव, नट्टमालए चेव" इन देवों के नाम कृतमालक और नृत्यमालक हैं इनमें जो कृतमालकदेव है वह तमिस्रगहा का अधिपति है । "तेसिणं वणसंडाणं बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ" इन वनघंडो के भूमिभाग बहुसम हैं और बहुत रमणीय हैं । "वेयड्ढस्स पव्वयस्स उभओ पासिं दस दस जोयणाई उड्ढे उप्पइत्ता एत्थणं दुवे विज्जाहरसेढीयो पण्णत्ताओ" वैताढ्य पर्वतके दोनों पार्श्वभागों में दस योजन ऊपर जाकर विद्याधरों की दो श्रेणियाँ कही गई हैं "पाईणपडीणाययाओ उदीणदाहिणवित्थिण्णाओ" ये विद्याधरश्रेणियां पूर्व से पश्चिमतक लम्बी हैं और उत्तर से पलिओवमठिईया परिवसति समाथी १२४ शुभ मे वह छ. ससा विमान પરિવાર આદિ રૂપથી મહાઋદ્ધિના સ્વામી છે. મહાતિવાળા છે, માબળવાન છે. મહાયશ વાળ છે. મહાસુખશાલી છે, મહા પ્રભાવ સંપન્ન છે. આ પદની પાખ્યા અષ્ટમ સૂત્રમાં વિજયદેવની જેમ કરવામાં આવી છે. આમાંથી દરેકની સ્થિતિ ૧–૧ પલ્યોપમ જેટલી છે. "तं जहा-कयमालए चेव जट्टमालए चेव" । हेवानानाभ। इतमान सने नृत्याभास છે. આમાંથી જે કૃતમાલક દેવ છે તે તમિસગુફાને અધિપતિ છે, અને નૃત્યમાલક છે તે अपात शुशन। मविपति छे. "तेसिण वणसंडाणं बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ" से बनाना भूमिमा असम छ भने भूम २भएीय छे. “वेयइढस्स पव्ययस्त उभओ पासिं दस दस जोयणाई उड्ढ़ उप्पइत्ता पत्थण दुवे विज्जाहरसेढीओ पण्णसाओ" શૈતાઢય પર્વતના બન્ને પાર્શ્વભાગોમાં દશ એજન ઉપર જઈને વિદ્યાધરોની બે શ્રેણી . "पाईण पडीणाययाओ उदीणदाहिणवित्थिण्णाओ" से विद्याधर श्रेणीय। पूर्वथा Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. १३ वैताढ्यपर्वतस्य पूर्वपश्चिमे गुफाद्वयवर्णनम् विस्तारयुक्ते प्रज्ञते । पुनस्ते उभे 'दस दस जोयणाई विक्खंभेणं' दश दश योजनानि विष्कम्भेण - विस्तारेण पुनः 'पव्वयसमियाओ' पर्वतसमिके - पर्वतसमाने 'आयामेणं' आयामेन दीर्घत्वेन ज्ञातव्ये तथा ते विद्याधरश्रेण्यौ 'उभओ पासिं' उभयोः द्वयोः पार्श्वयोः दक्षिणत उत्तरतश्च 'दोहिं पउमवरवेइयाहिं' द्वाभ्यां पद्मवरवेदिकाभ्यां 'दोहिं वणसंडे हिं' द्वाभ्यां च वषण्डाभ्यां 'संपरिक्खित्ताओ' संपरिक्षिप्ते परिवेष्टिते । एवञ्च एकैकस्यां विद्याधरश्रेण्यां द्वे पद्मवर वेदिके द्वौ च वनषण्डौ इति द्वयोर्द्वाभ्यां संयोजनया चतस्रः पद्मवर वेदिकाः चत्वारो वनपण्डाथ - सम्पद्यन्त इति बोध्यम् । 'ताओ णं पउमवरवेइयाओ' ताः चतस्रः पद्मवरवेदिकाः खलु 'अद्धजोयणं' - अर्धयोजनं - योजनार्द्धम् 'उड्दं' ऊर्ध्वम्उपरि 'उच्चत्तणं' उच्चत्वेन 'पंचधणुसयाई' पञ्चधनुश्शतानि - पञ्चशतसंख्यानि धनूंषि 'विक्खम्भेणं' विष्कम्भेण - विस्तारेण 'पब्वय समियाओ' पर्वतसमिकाः - पर्वतसमानाः 'आयामेणं' आयामेन - दैर्येण, 'वण्णओ' वर्णकः - अस्या वर्णनपरकवाक्यसमूहो 'णेयब्वो' नेतव्यः - पूर्वणद् बोध्यः । स चास्यैव चतुर्थसूत्रे टीकायां द्रष्टव्य इति । तथा समूहो दक्षिण तक विस्तृत हैं " दस दस जोयणाई विक्खांभेणं पव्वयसमियाओ आयामेणं " इनका प्रत्येक का विस्तार दश दश योजन का और लम्बाई इनकी पर्वत को लम्बाई के बराबर है “उभओपासिं दोहिं पउमवरवेईयाहिं दोहिं वणसंडेहिं संपरिक्खित्ताओ" ये दोनों विद्याधरश्रेणियां अपने दोनों पार्श्वभागों में दक्षिणसे और उत्तर से दो दो पद्मवर वेदिकाओं से एवं दो दो वनषंडों से परिवेष्टित हैं इस तरह से ये ४ पद्मवर वेदिकाओं से और ४ वनषंडोसे परिवेष्टित हैं ऐसा जानना चाहिए ये ४ पद्मवश्वेदिकायें “अद्धजोयणं उड्टं उच्चत्तणं पंच घणुसयाई विक्रांभेणं पव्त्रयसमियाओ आयामेणं वण्णओ यन्वो" आधे आधे योजन की ऊंचाईवाली हैं और पांच सौ पांचमी धनुष की विस्तार वाली है तथा इनकी प्रत्येक की लम्बाई पर्वत की लम्बाई के बराबर ही है । इनके वर्णन में पूर्व जैसा वर्णन ही जानना चाहिये, यह वर्णन इसी के चतुर्थसूत्र में किया जा चुका है । पद्मवरवेदिका की लम्बाई के वराबर ही लम्बाई वनषण्डों पश्चिम सुधी सांगी छे भने उत्तरथी दक्षिण सुधी विस्तृत छे. "दसदस जोयणारं विक्खमेणं पव्वयसमियाओ आयामेण” मेमांथा हरेनो विस्तार हश हश योन्न भेटलो छे थाने हरेनी सगाई पर्यंतनी संभाई भेटसी छे. “उभओ पासिं दोहिं पउमवरवेइयाहिं दोहिं वणसंडेदि संपरिक्खित्ताओ" येथे भन्ने विद्याधर श्रेणी पोताना भन्ने पार्श्व भागभां દક્ષિણથી અને ઉત્તરથી ખચ્ચે પાવરવેદિકા એથી અને વનષ`ડાથી પરિવષ્ટિત છે, એ पद्मवर "अद्ध जोयण उड्ढं उच्चतेण पंचधणुसयाई विक्खंभेण पव्वय समियाओ आयामेण वण्णओ णेयव्वो" भर्द्धा अर्द्धा येोन भेटली अथार्थ वाणी छे. अने પાંચમે પાંચસે ધનુષની જેટલી વિસ્તાર વાળી છે. તથા આમાંથી દરેકની લંબાઈ પવ તની લખાઈ જેટલી છે. એમનુ વર્ણન પહેલા જેવું જ સમજવુ જોઈએ. આ વર્ણન આ ગ્રંથના સતુ સૂત્રમાં કરવામાં આવેલ છે. પદ્મવરવેદિકાની લબાઈ જેટલી લખાઈ વનષાની પણ ८७ Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'वणसंडावि' वनषण्डा अपि 'पउमवरवेइया समगा' पद्मवरवेदिका-पद्मवरवेदिका तुल्या 'अयामेणं' आयामेन बोध्याः । 'वण्णओ' वर्णकः-वनषण्डवर्णकपरः सर्वोऽपि पद समूहोऽस्यैव पञ्चमसूत्रे टीकायां द्रष्टव्य इति । ___अथ तयोः श्रेण्योराकारभावप्रत्यवतारं पृच्छति- 'विज्जाहरसेढीणः' इत्यादि, 'विज्जाहर सेढीणं भंते! ' हे भदन्त ! विद्याधरश्रेण्यो:-विद्याधरश्रेणिद्वय सम्बन्धिन्योः 'भूमीणं केरिसए' भूम्योः कीदृशक:-कीदृशः ' आयारभावपडोयारे' आकारभावप्रत्यवतारः स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः ‘पण्णत्ते' प्रज्ञप्त: भगवानुसरयति 'गोयमा बहुसमरमणिज्जे' हे गौतम ! बहुसमरणीयः-अत्यन्तसमतलः अत एव रमणीयः 'भूमिभागेपण्णत्ते' भूमिभागः प्रज्ञप्तः, 'से जहा णामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव' स यथा नामकः आलिङ्गपुष्कर इति वा यावत् ‘णाणाविहपंच वण्णेहिं मणीहिं तणेहि उवसोभिए' नानाविधि पञ्चवर्णैः मणिभिः-तृणैश्च उपशोभित: आलिङ्गपुष्कर इति वा इत्यारभ्य नानाविध पञ्चवर्णेणिभि स्तृणैचोपशोभित इत्यन्त पद सङ्ग्रहो राजप्रश्नीयसूत्रस्य पञ्चकी है. वनषण्ड का वर्णन करने वाला पदमम्ह इस सूत्रके पंचम सूत्र में कहा जा चुका है इसलिए सूत्रकार ने "वनसंडानि परमववरवेझ्या ममगा आयामेणं वण्णओ" ऐसा यह सूत्र कहा है। "विज्जाहरसेढीण भंते ! भूमिण केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते" हे भदन्त विद्याधर श्रेणियों का आकारभाव प्रत्यवतार-स्वरूप कैमा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते है-'गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते" हे गौतम विद्याधरश्रेणियों का भूमिभाग बहुसम-विलकुलसमतलवाला -अतएव. रमणीय कहा गया है । “से जहा नामए आलिंगपुक्खरेई वा जाव णाणाविह पंचवण्णेहिं मणोहिं तणेहिं उवसोभिए" वह ऐसा बहुसम है कि जैसा मृदंग का मुख पुट बहुसभ होता है, इत्यादि रूप से जैसा वर्णन भूमिभाग का यावत् वह नाना प्रकार के पांच वर्णीवाले मणियों से एवं तृणों से उपशोभित है" यहां तक के पद सम्हों द्वारा किया गया है वैसा ही वह सब वर्णन इसके सम्बन्ध में यहां पर भी कर लेना चाहिये' यह सव वर्णन राजप्रश्रीय सूत्र के १५ वे सूत्र से लेकर १९ वे सूत्रतक करने में છે. આ ગ્રંથના પંચમ સૂત્રમાં એ વનખંડેનું વર્ણન કરવામાં આવેલ છે. એથી જ સૂત્રકારે “वनसंडाव पउमघर वेइया समगा आयामेण वण्णओ" मा प्रमाणे युं छे. 'विज्जाहर सेढीण भंते ! भूमीण केरिसए आयार भाव पडोयारे पण्णत्ते"महत। વિદ્યાધર શ્રેણી ઓને આકારાવ પ્રર્વતાર-સ્વરૂપ વિષે શું કહ્યું છે. જે એના જવાબમાં प्रभु ४३ छ. गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते" गौतम ! (१धाधर श्रेणी सानो भूमिकामसम-से हम सम-मेथी रमणीय छे. “से जहा नामए आलिंग पुक्ख रेइ वा जाव णाणाविह पंचवण्णेहिं मणीहि तणेहिं उपसोभिए" ते मृगना भुपत ए. સમ છે. ઈત્યાદિ રૂપમાં જેવું વર્ણન “યાવત્ તે અનેક જાતના પંચવર્ષોથી યુક્ત મણિઓ તેમજ તૃથી ઉપશાભિત છે. “અહીં સુધી તે પદ સમૂહો વડે ભૂમિભાગનું વર્ણન પહેલાં - Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. १३ वैताढयपर्वतस्य पूर्वपश्चिमे गुफाद्वयवर्णनम् दशसूत्रादारभ्य एकोनविंशतितमसूत्रपर्यन्तेभ्यः पञ्चभ्यः सूत्रेभ्य कर्तव्यः, तदर्थश्च तत्रैव मत्कृतसुबोधिनीटीकायां द्रष्टव्य इति । कीदृशै मणिभिस्तृणश्चोपशोभित-इति । जिज्ञासायामाह 'तं जहा' तद्यथा 'कित्तिमेहि चेव अकित्तिमेहि चेव' कृत्रिमैश्चेव अकृत्रिमैश्चेवेति । तत्र कृत्रिमाः शिल्पिकौशलनिर्मिताः, अकृत्रिमा:= स्वाभाविकाः, तैरुभयैः स भूमिभागः उपशोभित इति सम्बन्धः । अत्रोभयोर्विद्याधर श्रेण्योनगर संख्यामाह-'तत्थ णं तत्र-तयो योर्विद्याधर श्रेण्योमध्ये खलु दाहिणिल्लाए' दाक्षिणात्यायां-दक्षिणभागवर्तिन्यां 'विज्जाहर सेढीए' विद्याधरश्रेण्यां गगनवल्लभप्रमुखाः--गगनवल्लभः प्रमुख:--प्रधानो येषु ते तथाभूताः पञ्चशत्संख्यकाः विद्याधरनगराऽऽवासाः विद्याधराणां नगरावासाः-राजधान्यः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा ओत्तराहायाम्-उत्तरभागवार्त्तन्यां विद्याधरश्रेण्यां रहनेउरचकवालपामोक्खा' रथनूपुर चक्रवालप्रमुखाः-रथनपुर चक्रवालाः प्रमुखो येषु तथाभूता 'विज्जाहरणगरावासा पण्णत्ता' विद्याधरनगराबासाः प्रज्ञप्ताः, एवामेव' एवमेव प्रदर्शितप्रकारेणैव 'सपुव्वावरेणं' सपूर्वापरेण-पूर्वापरसंख्यासंकलने 'दाहिणिल्लाए' दाक्षिणात्यायां-दक्षिणभागवर्तिन्याम् 'उत्त रिल्लाए' औत्तराह्याम्-उत्तरभागवर्तिन्यां च 'विज्जाहरसेढीए' विद्याधरश्रेण्यां 'एगं दसुत्तर' दशोत्तरं-दशाधिकम्, एकम्-एकसंख्यकम्, 'विज्जाहरणगरावाससयं' विद्याधरनगरावासशतम्-विद्याधरनगरावामानां शतं भवति, उभयश्रेणीस्थानां विद्याधराणां दशाधिका एकशतसंख्यका राजधान्यो भवन्तीत्यर्थः , 'भवंतीति मक्खायं' इति एतत आया है ये मणि और तृण वहां पर “कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चेव"कृत्रिम भी हैं और अकृत्रिम भी हैं शिल्पियों द्वारा अपनी कुशलतासे निर्मित जो मणि और तृण हैं वे कृत्रिम और स्वाभाविक जो मणि और तृण हैं वे अकृत्रिक है। "तत्त्थणं दाहिणिल्लाए बिज्जाहरसेढोए रहने उर चक्कवालपामोव वा सट्टि विज्जाहरणगरावासा पण्णत्ता" दक्षिण विद्याधर श्रेणि में गगनवल्लभ आदि ५० नगर हैं राजधानियां हैं तथा उत्तर विद्याधरश्रेणी में रथनपुर चक्रवाल आदि ६० नगर है-राजधानियां है इस तरह ये सब नगर ११० हैं दोनों કરવામાં આવેલ છે તેવું જ વર્ણન અહી પણ સમજવું જોઈએ. આ વર્ણન રાજકીય સૂત્રના ૧૫ મા સૂત્રથી માંડીને ૧૯ મા સૂત્ર સુધી કરવામાં આવેલ છે. આ મણિ અને તૃણ त्यां "कित्तिमेहि चेव अकित्तिमेहिं चेव" कृत्रिम भने कृत्रिम पम छ. शिपशि કૌશલથી મણિ અને તૃણનું નિર્માણ કરે છે તે કૃત્રિમ અને સ્વાભાવિક રીતે જે મણિ અને तो। सति थाय छ । अकृत्रिम छ. "तत्थण दाहिणिल्लाए विज्जाहरसेढीए रहने उरचक्क वालपामोवा सहि विजाहर णगरावासा पण्णत्ता" इक्षिण विद्याधर श्रेणीमा अनसन વગેરે ૫૦ નગર છે-રાજધાની છે. તેમજ ઉત્તરવિદ્યાધર શ્રેણીમાં રથનપુર ચકવાલ જો કે દ નગર આવેલા છે. રાજધાનીઓ-છે. આમ આ સર્વ નગર બને છે આ લવ નગરી મન શાંએિમાં Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे आख्यातं - कथितम् । 'ते विज्जाहरणगरा' तानि अनन्तरोक्तानि विद्याधरनगराणि कीटशानि ? इति जिज्ञासायामाह - 'रिद्धत्थिमियसमिद्धा' ऋद्धस्तिमित समृद्धानि 'पमुइय जण जाणवया जाव पडिरुवा' प्रमुदितजनजानपदानि यावत् प्रतिरूपाणि ऋद्धानि = विभवभवनादिभिर्वृद्धिं प्राप्तानि स्तिमितानि - स्वपरचक्रभयरहितानि, समृद्धानि-धनधान्यादिसमृद्धियुक्तानि अत्र द्विपदकर्मधारयः । तथा पमुदित जनजानपद नि-प्रमुदिताः हृष्टाः प्रमोदकर वस्तूनां सद्भावात् जना नगरीवास्तव्याः लोकाः जानपदाः जनपदभवाः देशभवास्तत्राऽऽयाताः सन्तो येषु तानि तथा । यावत् यावच्छद्वात् नगरवर्णनमौपपातिकसूत्रवर्णित चम्पानगरीवद् बोध्यम् । केवलं स्त्रीनपुंसकत्वकृतो विशेषः तदर्थ जिज्ञासुभिरौपपातिकसूत्रस्य मत्कृता पीयूपवर्षिणी टीका विलोकनीयेति । प्रासादीयानि दर्शनीयानि अभिरूपाणि प्रतिरूपाणीत्येषां व्याख्या प्राग्वत् । 'तेसु णं विज्जाहरणगरेसु तेषु पूर्वोक्तेषु विद्याधरनगरेषु खलु 'विज्जाहररायाणो' विद्याधरराजानः विद्याधराणां राजान:- अधिपतयः 'परिवसंति' परिवसंति - निर्वसन्ति । " विद्याधरराजान" श्रेणियों में । " ते विजाहरणगरा रिद्धत्थिमियसमिद्धा पमुइय जणजाणवया जाव पडिरूवा " ये विद्याधरों की राजधानियां विभव, भवन आदिकों द्वारा ऋद्ध हैं- वृद्धि को प्राप्त है; स्तिमित हैंस्वचक और परचक्र के भय से रहित है, एवं धनधान्यादि रूप समृद्धि से युक्त हैं । तथा प्रमोदकर वस्तुओं के सद्भाव से नगरी में वसने वाले जन एवं बाहर से आये हुए जन सब सदा प्रमुदित रहते है यहां यावत् शब्द सूत्रकार ने यह प्रकट किया है कि इन नगरियों का वर्णन जैसा औपपातिक सूत्र में चम्पा नगरी का वर्णन किया गया है वैसा ही है उस के वर्णन में आये हुए पदों की व्याख्या हमने उसकी पीयूषवर्षिणी टीका में स्पष्ट की है प्रासा दीय दर्शनीय, अभिरूप एवं प्रतिरूप पदों की व्याख्या यथास्थान कर दी गई है “तेसुणं विज्जाहरणगरेसु विज्जाहररायाणो परिवसंति महया हिमतवंतमलयमंदरम हिंदसारा रायवपणओ भाणियन्वो" उन विद्याधर नगरों में विद्याधर राजा रहते हैं ये सब राजा हैमवतक्षेत्र की 1 ९० 7 जाव ११० छे. "ते विज्जाहरणगरा रिद्धत्थिमियसमिद्धा पमुइयजण जाणवया पडिरुवा” मा विद्याधरोनी राजधानीओ। विलव, भवन वगेरेथा ऋद्ध छे, वृद्धि-आस छे, સ્તિમિત છે-સ્વચક્ર અને પરચક્રના ભયથી મુક્ત છે, તેમજ ધનધાન્યાદિરૂપ સમૃદ્ધિથી યુક્ત છે. તથા પ્રમાદદાયિની વસ્તુઓના સદ્ભાવથી નગરમાં રહે નારા તેમજ મહરિથી यावेसा न प्रमुदित रहे हो. ही 'यावत्' शब्दथी सूत्रअरे मा વાત સ્પષ્ટ કરી છે કે આ નગરીયાનુ વર્ણન જે રીતે ઔપપાતિક સૂત્રમાં ચ'પા નગરીનું વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે તેવું જ છે. ચંપા નગરીના વનમાં જે પદે છે તેની વ્યાખ્યા અમે તેની પીયૂષષિણી ટીકામાં કરી છે. પ્રાસાદીય, દશનીય, અભિરૂપ અને પ્રતિરૂપ પદોની વ્યાખ્યા સ્થાસ્થાન ४२वामां आवी छे " तेसुणं विज्जाहरणगरेसु विज्नाहररायाणो परिवर्तत महाहिमवंत मलय मंदर मदिसारा रायवण्णओ भाणियव्त्रो' ते विद्याधर Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशि का टीका सू० १३ वेतढयपर्वतस्य पूर्व पश्चिमे गुफाद्वयवर्णनम् . इत्यत्र समासान्तविधेरनित्यत्वाच्प्रत्ययाभावो बोध्यः ते कीदृशाः ? इति जिज्ञासायामाह-'महयाहिमवंतमलयमंदरमहिंदसारा' महाहिमवन्मलयमन्दरमहेन्द्रसाराः महाहिमबान्-हैमवत क्षेत्रस्योत्तरतः सीमाकारी वर्षधरः पर्वतः, मलयः पर्वतविशेषः, मन्दरःमेरुः, महेन्द्रः पर्वतविशेषः, ते इव साराः प्रधानाः इत्यादि 'रायवण्णओ' राजवर्णक:राजवर्णनपरः पदसमूहोऽत्र 'भाणियब्यो' भणितव्यः-वक्तव्यः । अयं च--औपपातिक सूत्रस्य एकादशसूत्रतो बोध्यः तदर्थश्च तत्रैव मत्कृतपीयूषवर्षिणी टीकातोऽवगन्तव्य इति । __ अथ विद्याधरश्रेणिद्वयवास्तव्य मनुजानामाकारभावप्रत्यवतारं पृच्छति--विज्जाहरसेढीणं भंते ! मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते विद्याधरश्रेण्योः भदन्त मनुजाना-मानवानां कीदृशकः कीदृशः आकारभावप्रत्यवतारः-स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः प्रज्ञप्तः कथितः ? इति पृष्टो भगवानाह-'गोयमा! ते णं मणुआ बहुसंघयणा' हे गौतम ! ते विद्याधरश्रेणि वास्तव्यः खलु मनुजाः--मनुष्या बहुसंहननाः- बहूनि वज्रऋषभनाराउत्तर दिशा में सोमाकारी महाहिमवान् पर्वत, एवं मलय पर्वत मेरुपर्वत और महेन्द्र पर्वत के जैसे प्रधान हैं इन राजाओं का और विशेष वर्णन देखना हो तो औपपातिक सूत्र के ११ वें सूत्र की टोका देखनी चाहिये, वहां पर विस्तार के साथ यह वर्णन करने में आया है। ___अब सूत्रकार विद्याधरश्रेणिय के निवासी जनों के आकार भाव प्रत्यवतार को प्रकट करने के लिये प्रश्नोत्तर के रूप में उसे स्पष्ट करते है-“विज्जाहर सेढोणं भंते ! मणुयाणं के रिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते' हे भदन्त ! विद्याधर श्रेणिद्वय में रहेनेवाले मनुष्योंका आकार भाव प्रत्यवतार-स्वरूप कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-"गोयमा ! तेणं मणुजा बहुसंघयणा, बहुसंठाणा, बहु उच्चत्त पज्जवा बहु उपज्जवा जाव सव्व दुक्खाण मंतं करेंति" हे गौतम ! विद्याधर श्रेणि द्वय निवासी मनुष्यों का स्वरूप इस प्रकार से कहा गया है-वे वज्र ऋषभ नाराच आदि संहनन वाले होते हैं, समचतुरस्त्र आदि संस्थान નગરમાં વિદ્યાધર રાજા રહે છે. આ બધા રાજાએ હૈમવત ક્ષેત્રની ઉત્તર દિશામાં સીમા કારી મહાડિમવાન્ પર્વત તેમજ મલય પર્વત મેરૂ પર્વત અને મહેન્દ્ર પર્વતના જેવા પ્રધાન છે. આ રાજાઓ વિષે જાણવું હોય તે ઔપપાતિક સૂત્રના ૧૧ મા સૂત્રની ટીકા જેવી જોઈએ. ત્યાં વિસ્તારપૂર્વક આ વિષે વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે. હવે સૂત્રકાર વિદ્યાધર શ્રેણિદ્રયના નિવાસીજનના આકારભાવ પ્રત્યવતાર–વિષે સ્પષ્ટતા કરવા માટે પ્રશ્નોત્તર રૂપમાં પોતાનું કથન આ રીતે પ્રકટ કરે છે કે – "विज्जाहार सेढीणं भंते ! मणुयाण केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते " है ભદત ! વિદ્યાધ શ્રેણિયમાં રહેનારા માણસેના આકાર ભાવપ્રત્યવતાર-સ્વરૂપ–કેવું કહેવામાં भाव छ ? य समा प्रभु छे , “गोयमा ! तेणं मणुया बहुसंधयणा बहुसं ठाणा बहुउच्चत्तपज्जवा बहु आउपज्जवा जाव सव्व दुक्खाण मंतं करेंति' हे गौतम ! વિદ્યાધર શ્રેણિદ્વય નિવાસી મનુષ્યનું સ્વરૂપ એવું કહેવામાં આવેલું છે. સમચતુરસ આદિ Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९२ जम्बूद्वीपपज्ञप्तिसूत्रे चादोनि संहननानि-वपुदीकरणास्थिनिचयरूपाणि येषां ते तथा, 'बहुसंठाणा' बहुसंस्थाना:-बहूनि समचतुरस्त्रादी ने संस्थानानि-विशिष्टावयवरचनारूपशरीराकृतयो येषां ते तथा, 'बहु उच्चत्तपज्जवा' बहूच्चत्वपर्यवाः बहवः नानाविधा उच्चत्त्वस्य शरीरोच्छुयस्य पर्यवाः पञ्चधनुश्शतादिका मानविशेषा येषां ते तथा, तथा 'बहु आउपज्जया' बह्वायुः-पर्यवाः बहवः आयुषः पूर्वकोटिवर्षशतादिकाः पर्यवा:-विशेषा येषां ते तथा, 'जाव' यावत्-यावत्पदेन “बहूनि वर्षाणि आयुः पालयन्ति पालयित्वा अप्येके निरयगामिनः अप्येके तिर्यगामिनः, अपये के मनुजगामिनः अप्येके देवगामिनः, अप्ये के सिध्यन्ति मुच्यन्ते परिनिर्वान्ति' इत्येषां पदानां सङ्ग्रहो बोध्यः, 'सबदुक्खाणयंतं करें ति' सर्वदुक्खानामन्तं कुर्वन्ति । एषां व्याख्या एकादशसूत्रतो बोध्या ।।सू०१३॥ __मूलम्-तासि णं विज्जाहरसेढीणं बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ वेयड्ढस्स पव्वयस्स उभओ पासि दस जोयणाई उइदं उप्पइत्ता एत्थ णं दुवे आभिओगसेढीओ पण्णताओ पाईणपडीणाययाओ उदीणदाहिणवित्थिण्ण ओ दस दस जोयणाई विखंभेणं पव्वय वाले होते हैं, इनके शरीर की ऊँचाई पांचसौ धनुष आदि की होता है, पूर्व कोटिवर्षश र आदि की इनको आयु होता है यावत् पद के अनुसार वे इतनो भायु का अच्छी तरह से पालन करते है-पालन करके मृत्यु के अवसर पर मर कर उनमें से कितनेक तो नरकगामी होते हैं, कितनेक तिर्यग्गतिगामी होते हैं, कितनेक मनुष्यगति गमो होते हैं और कितने क देवगति गामी होते हैं। कितनेक सिद्ध-कृतकृत्य हो जाते हैं केवलज्ञान रूपी आलोक से लोकालौक के ज्ञाता हो जाते हैं सर्व कर्मों से रहित हो जाते हैं, समस्त कर्मकृतविकार से रहित हुए अपने आप में समा जाते हैं शारीरिक एवं मानसिक रूप समस्त क्लेशों का नाश कर देते हैं-इस तरह अव्यावाध सुख के वे भोक्ता हो जाते है। ऐसी ही व्यख्या इसीके ११ वें सूत्र में की जाचुकी है ॥१३॥ સંસ્થાનવાળા હોય છે. એમના શરીરની ઉંચાઈ પાંચસે ધનુષ વગેરે જેટલી હોય છે. પૂર્વ टि वर्षशत माहिती मायु डाय छे. 'यावत् ५४थी से २५५८ थाय छ । मे। આટલું આયુ ચેકસ ભોગવે છે. આયુ ભેળવીને મૃત્યુ વખતે તેમાંથી કેટલાક નરકગામી હોય છે, કેટલાક તિર્યમ્ ગતિગામી હોય છે અને કેટલાક મનુષ્ય ગતિગામી હોય છે અને કેટલાક દેવગતિગામી હોય છે. કેટલાક સિદ્ધ-કૃતકૃત્ય-થઈ જાય છે-કેવળજ્ઞાનરૂપી આલોકથી લેાકાલકના જ્ઞાતા થઇ જાય છે. સર્વ કમેથી રહિત થઈ જાય છે. સમસ્તકર્મકતવિકારથી રહિત થયેલા તેઓ સ્વમાં જ સમવહત થઈ જાય છે. શારીરક અને માનસિકરૂપ સમસ્ત કલેશેને વિનષ્ટ કરી નાખે છે. આ રીતે અવ્યાબાધ સુખના તેઓ સેક્તા થઈ જાય છે એવી જ વ્યાખ્યા એના જ ૧૧ મા સૂત્રમાં પહેલાં કરવામાં આવી છે. ૧૩ Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १४ आभियोग्यश्रेणिद्वनिरूपणम् समियाओ आयामेणं उभओ पासिं दोहि य वणसंडेहि संपरिक्खि ताओ वण्णओ दोण्हवि, पव्वयसमियाओ आयामेणं । आभिओगसेढीणं भंते ! केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते ? गोयमा बहु समरमणिज्जे भूमिभोगे पण्णत्ते जोव तणे हे उवसोभिए वण्णाई जाव तणाणं सहोत्ति । तासि णं आभिओगसेदीणं तत्थ तत्थ देसे तहि तहिं बहवे वाणमंतरा देवा य देवीओ य आसयंति संर्यात जाव फलवित्तिविसेसं पच्चणुब्भवमाणा विहरति । तासु णं आभि ओगसेढीसु सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो सोमजमवरुणवेसभणकाइयाणं आभिओगाणं देवाणं बहवे भवणा पण्णत्ता, ते णं भवणा बा हे बट्टा अंतो चउरंसा वण्णओ जाव अच्छरगणसंघविकिण्णा जाव पडिरूवा । तत्थ णं सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो सोमजमवरुणवेसगणकाइया बहवे आभिओगा देवा महिड्डिया महज्जुईया जाव महासोक्खा पलिओवमहिइया परिवसंति । तासि णं आभिओगसेढीणं बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ वेयड्ढम्स पव्ययस्स उभओ पासें पंच पंच जोयणाई उड्दं उप्पइत्ता. एत्थणं वेयड्ढस्स पव्वयस्स सिहरतले पण्णत्ते पाईणपडिणायए उदीणदाहिणविच्छिण्णे दस जोयणाइं विक्खंभेणं पब्बयसमगे आयामेणं से णं इक्कोए पउमवरवेइयोए इक्केणं वणसंडेणं सबओ समंता संपरिक्खित्ते, पमाणं वण्णओ दोण्हंपि । वेयड्ढस्स ण भंते ! पव्वयस्स सिहरतलस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते गोयमा ! बहुसपरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते से जहागामए आलिंग पुक्खरेइ वा जाव णोणाविहपंचवण्णेहिं मणीहिं उवसोभिए जाव वावीओ पुक्खरिणीओ जाव वाणमंतरा देवा य देवीओ य आसं यंति जाव भुजमीणा विहरति । जंबुद्दीवे ण भंते ! दीवे भारहेवासे वेयड्दपव्वए कइ कूडा पण्णत्ता ? गोयमा ! णव कूडा पण्णत्ता, तं जहा-सिद्धोययणकडे १ दाहि Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे गड्ढभरहकूडे २ खंडप्पवायगुहाकूडे ३ मणिभदकूडे ४ वेयड्डकूडे ५ पुण्णभदकूडे ६ तिमिसगुहाकूडे ७ उत्तरड्वभरहकूडे ८ वेसमणकूडे ।। सू० १४॥ छाया- तयोः खलु विद्याधरश्रेण्योः बहुसमर मणीयाद् भूमिभागाद् वैताव्यस्य पर्वतस्य उभयोः पश्चियोः दश योजनानि ऊर्ध्वमुत्पत्य अत्र खलु द्वे आभियोग्यश्रेण्यो प्रशप्ते प्राचीनप्रतीचोनाऽऽयते उदीचीनदक्षिणविस्तीर्णे दशदश योजनानि विष्कम्भेण पर्वत समिके आयामेन उभयोः पार्श्वयोः द्वाभ्यां पद्मवरवेदिकाभ्यां च वनखण्डाभ्यां संपरिक्षिप्ते वर्णको द्वयोरगि पर्वतसमका आयामेन आभियोग्यश्रेण्यो भदन्त कीदृशकः आकारभाव प्रत्यवतारः प्रज्ञप्तः गौतम ! बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः यावत् तृणैरुपशोभितः वर्णा यावत् तृणानां शब्द इति । तयोःखलु अभियोग्यश्रेण्याः तत्र तत्रदेशे तत्र तत्र बहवो व्यन्तरा देवाश्च देव्यश्च आसते शेरते यावत् फलवृत्तिविशेषं प्रत्यनुभवन्तो विहरन्ति । तयोः खलु अभियोग्य श्रेण्योः शक्रस्य देवेन्द्रस्य देबराजस्य सोमयमवरुणवैश्रवण कायिकानामाभियोग्यानां देवानां बहूनि भवनानि प्रज्ञप्तानि । तानि खलु भवनानि बहिः वृत्तानि अन्तःचतुरस्राणि वर्णकः यावत् अप्सरोगणसंविकीर्णानि यावत् प्रतिरूपाणि । तत्र खलु शक्रस्य देवेन्द्रस्य देवराज स्य सोमयमवरुणवैश्रवणकायिका बहव आभियोग्या देवा महद्धिका महातिका यावत महासौख्याः पल्योपस्थितिकाः परिवन्ति । तयोः खलु आभियोग्यश्रेण्योः बहुसमरमणीयाद् भूमिभागात् वैताढ्यस्य पर्वतस्य शिखरतल प्रज्ञप्तम्, प्राचीनप्रतीचीनाऽऽयतम् उदीचीन दक्षिणविस्तीर्ण दश योजनानि विष्कम्भेण पर्वतलमकम् आयामेन । तत् खलु एकया पद्मवरवेदिकया एकेन वनखण्डेन सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्तम् प्रमाणं वर्णकोद्वयोरपि । वैताढयस्य खलु भदन्त ! पर्वतस्य शिवरतलस्य कीदृशकः आकारभावप्रत्यवतारः प्रज्ञप्तः १ गौतम ! बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः, स यथानामकः आलिङ्गपुष्कर इति वा यावत् नानाविधपञ्चवणे : मणिभिरूपशोभितः, यावत् वाप्यः पुष्करिण्यः यावत् व्यन्तरा देवाश्च देव्यश्च आसते यावद् भुजाना विहरन्ति, जम्बूद्वीपे खलु भदन्त ! द्वीपे भारते वैताढयपर्वते कतिकूटानि प्रज्ञप्तानि गौतम नवकटानि प्रज्ञप्तानि तद्यथा सिद्धायतनकटं १ दक्षिणाद्ध भरतकूट २ खण्डप्रपातगुहाकट ३ मणिभद्रकूटं ४ बैताढयकूटं ५ पूर्णभद्रकूट ६ तमिस्रगुहाकूटम् ७ उत्तरार्द्धभरतकूटम् ८ बैश्रवणकूटम् ९ ।सू०१४॥ टीका--'तासि णं विज्जाहरसेढीणं' इत्यादि । अथात्रैव वर्तमानाभियोग्य श्रेणी निरूपयति 'तासि ॥' तयोः-पूर्वोक्तयोः खलु 'विज्जाहरसेढीणं बहुसमरम "तासिणं विज्जाहर सेढीणं बहुसमरमणिज्जाओ" इत्यादि । टीकार्थ-उन विद्याधर श्रेणियों के बहुसमरमणीय भूमिभाग से वैताढ्य पर्वत के दोनों पार्व'तासिण विज्जाहरसेढीण बहुसमरमणिज्जाओं' इत्यादि ।।सूत्र १४॥ ટીકાર્ય–તે વિદ્યાધર શ્રેણીઓને બહુમરમણીય ભૂમિ માગથી મૈતાદ્રવ પતના બને પાન Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० १४ आभियोग्यश्रेणिद्वयनिरूपणम् णिज्जागो भूमिभागाओ वेयड्ढस्स पव्वयस्स' विद्याधरश्रेण्योः बहुसमरमणीयात् , भूमिभागात् वैताव्यस्य पर्वतस्य 'उभओ' उभयोः-द्वयोः 'पासिं' पार्श्वयोः 'दसजोयणाई' दश योजनानि 'उड्ढं' ऊर्ध्वम्-उपरि 'उप्पइत्ता' उत्पत्य गत्वा 'एत्थण दुवे अभि ओग सेढीओ' अत्र इह द्वे आभियोग्यश्रेण्यौ आ समन्तात् आभिमुख्येन युज्यन्ते प्रेष्यकर्मणि व्यापार्यन्त इत्याभियोग्याः शक्र लोकपालानां किङ्करा व्यन्तरविशेषाः तेषां श्रेण्यौ आवासपङ्क्ती 'पण्णत्ताओ' प्रज्ञप्ते- कथिते ते च, कीदृश्यौ ! इति जिज्ञासायामाह 'पाईणपडीणययाओ' प्राचीन प्रतीचीनाऽऽयते पूर्वपश्चिमयोर्दिशोरायते दीर्धे 'उदीणदाहिणवित्थिण्णाओ' उदीचीन दक्षिण विस्तीर्णे उत्तरदक्षिणदिशोविस्तीर्णे विस्तारयुक्ते, 'दस दस जोयणाई विखंभेणं' दश दश योजनानि विष्कम्भेण-विस्तारेण, 'पव्वयसमियाओ' पर्वतसमिके पर्वततुल्ये 'आयामेणं' आयामेन दर्पण, तथा 'उभओ' उभयो:-द्वयोः 'पासिं' पार्श्वयोः 'दोहिं' द्वाभ्यां पद्मवरवेदिकाभ्यां द्वाभ्यां च 'वण संडेहिं संपरिक्खित्ताओ' वनषण्डाभ्यां संपरिक्षिप्ते परिवेष्टिते । 'वण्णओ' वर्णकःवर्णनपरो वाक्यसमूहो 'दोण्हवि' द्वयोरपि द्वयोरिति जात्यापेक्षया प्रोक्तं, तेन द्वयोः पद्मवरवेदिकयोः द्वयोर्वनषण्डयोरितिचतुणी पूर्ववद् बोध्यः । तथा-चत्वारोऽप्येते पद्मवरवेदिकावनपण्डा 'आयामेणं' आयामेन-दैर्येण 'पव्वयसमियाओ' पर्वतसमकाः पर्वतनुल्या बोध्या इति । भागों में दश दश योजन ऊपर जाकर दो अभियोग्य श्रेणियां कही गई है शक एवं लोकपालों के किङ्करभूत जो व्यन्तर देवविशेष है उनकी ये निवास भून श्रेणियां हैं "प्राचीन प्रतीचीनायते ये दोनों पूर्वपश्चिम में लम्बी है "उदीचीनदक्षिणविस्तीर्णे" उत्तर दिशा और दक्षिणदिशा में चोडी है इनका विस्तार दश दश योजन का है “पर्वत समिके" तथा पर्वत की लम्बाई के बराबर इनको लम्बाई है। तथा ये अपने दोनो पार्श्वभाग में दो पद्मवर वेदिकाओं से एवं दो वनषण्डों से परिवेष्टित हैं। इस ४ पद्मवरवेदिकाएँ और चार वनस्खण्ड इनके दोनों पार्श्वभागों की ओर हैं । ये चारों पद्मवरवेदिकाएँ और वनषण्ड लम्बाई में पर्वत के तुल्य हैं । "आभिओगसेढीणं" हे भदन्त ! इन आभियोग श्रेणियों का आकारभाव ભાગમાં દશ દશ એજન ઉપર જઈને એ અભિગ્ય શ્રેણીઓ છે. શક અને લેપના કિંકરभूत व्यतर व विशेष छ, तमनी निवासी श्रेणीमा छ. "प्राचीनप्रतीचीनायता' या मन्न पूर्व पश्चिममा aisी छ “उदीचीनदक्षिण विस्तीर्णा उत्त२ हिशभने हक्षिण दिशामा छ.सना पिरतार इश-श यारानाथे "पर्वत समिके" तभ। ५ तन ans જેટલી એમની લંબાઈ છે. તથા એ ઓ અને પાશ્વ ભાગમાં બે પદ્વવર વેદિકા માથી તેમજ બે વનષથી પરિષ્ટિત છે. એ જ પદ્મવદિકાઓ અને ચાર વનખંડ એમની બંને બાજુએ छ. से यारे पाये। मन पनपनी पततुल्य छे. “अभिओगसेढीणं" હે ભદત ! આ અભિગ શ્રેણિએને આકારભાવપ્રત્યવતાર (સ્વરૂપ) કેવો છે ? એના Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्र अभियोग्य श्रेणिद्वयस्याकारभावप्रत्यवतारं पृच्छति 'आभिओगसेढीणं' इत्यादि । 'आभिओगसेढीणं भंते ! केरिसए आया भाव पडोयारे पण्णत्ते' हे भदन्त अभियोग श्रेण्याः कीदृशकः कीदृशः आकारभावप्रत्यवतारः प्रज्ञप्तः : भगवागाह - 'गोयमा बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते' हे गौतम ! बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः 'जाव तणेहिं उवसोभिए' यावत् तृणैरुपशोभितो 'वण्णाई जाव तणाणं सदोत्ति' वर्णा यावतृणानां शब्द इति । अत्र यावत्पदसंग्राह्यः पदसमूहो राजप्रश्नीयसूत्रस्य पञ्चदशसूत्रादारभ्य एकोनविंशतितमसूत्रतो बोध्यः । अर्थोऽपि तत्रैवमत्कृत सुबोधिनो ararasata इति । 'तासि णं' तयोः पूर्वोक्तयोः खलु 'अभिओगसेढीणं' आभियोग्यश्रेण्योः 'तत्थ तत्थ' तत्र तत्र तस्मिंस्तस्मिन् 'देसे' देशे भागे, 'तहि तर्हि ' तत्र तत्र तत्तदेशस्यावान्तरदेशे 'बहवे वाणमंतरा' बहवो व्यन्तराः देवविशेषाः देवा य देवीओ य आसति' देवाश्च देव्यश्व आसते - यथासुखं सामान्यतस्तिष्ठन्ति, 'संयंति' शेरते सर्वथा का प्रसारणेन वर्तन्ते न तु निद्रान्ति देवानां निद्राया अभावात् 'जाव' याव प्रत्यवतार-स्वरूप कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं 'बहु समरमणीओ भूमिभागो पण्णत्तो" हे गौतम ! इन दोनों श्रेणियों का भूमिभाग बहुसम है और इसीसे वह बहुत ही रमणीय कहा गया है. क्योंकि वह तृणों से और मणियों से उपशोभित है. ये तृण मणियां वहां कृत्रिम भी हैं और अकृत्रिम भी है । यहां यावत्पद से संग्राह्य पद समूह राजप्रश्नीय सूत्रके १५वें सूत्र से लेकर १९ तक के सूत्र से जान लेना चाहिये; उनका अर्थ हमने उसकी बोधिनी टीका में स्पष्ट कर लिख दिया है। वहां उनके वर्णों का और उनके शब्दों का भो सद्भाव प्रकट किया है । "तासिणं आभिओगसेढीणं तत्थ तत्थ देसे तर्हि बहवे वाणमंत देवा य देवीओ आसयंति, संयंति, जाव फलवित्तिविसेसं पच्वणुब्भवमाणा विहरंति" इन पूर्वोक्त आभियोग्यश्रेणियों के उन २ स्थानों पर अनेक वानव्यन्तर देव और देवियां यथासुख उठती बैठती रहती हैं, शरीर को पसार कर आराम करती रहती हैं, ९६ वाम प्रभु उडे छे “बहुसमरमणीओ भूमिभागो पण्णत्तो" हे गौतम! मे मन्ने श्रेणीએને ભૂમિભાગ બહુ સમ છે અને એથી જ તે મહુજ રમણીય છે કેમકે તે તૃણાથી અને મહુએથી ઉપશે ભત છે. એ તૃણુ મણિએ ત્યાં કૃત્રિમ પણ છે અને અકૃત્રિમ પણ છે, गही' "यावत्" पद्मश्री संग्राह्य यह सभू राम अनीय सूत्रमा १५ मा सूत्रथी १८ मां सूत्र સુધી જાણવા જોઇએ. આ શ્રધા પસમૂહાની વ્યાખ્યા તેની સુએાધિની ટીકામાં સ્પષ્ટ કરી छे. त्यां तेमनावे तेमन राहो। सहभाव अश्वामां आवे छे. “तासिणं अभि ओगसेढीणं तत्थ तत्थ देसे तर्हि तर्हि वहवे वाणमंतरा देवा य देवीओ आसयंति, सयंति जाव फलवित्तिविसेसं पञ्चणुग्भवमाणा विहरंति" | पूर्वोक्त मालियोग्य श्रेणीमाना સ્થાનેાપર અનેક વાન વ્યતર દેવા દેવીએ સુખપૂર્વક ઉઠતા-બેસતા રહે છે, શરીરને પત કરીને આરામ કરતા રહે છે, નિદ્રાધીન થતા રહે છે. કેમકે દેવાને નિદ્રા આવતી નથી, Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १४ आभियोग्यश्रेणिद्वयनिरूपणम् त्पदेन -"तिष्ठन्ति, निषीदन्ति, त्वग्वतयन्ति, रमन्ते, ललन्ति, क्रीडन्ति, कीर्तयन्ति, मोहन्ति, पुरापुराणानां सुचीर्णानां सुपरीक्रान्तानां शुभानां कृतानां कल्याणानां कर्मणां कल्याणम्" इति संग्राह्यम् । तत्र तिष्ठन्ति ऊर्धावस्थानेन विद्यन्ते, निषीदन्ति-उपविशन्ति, त्वग्वतयन्ति त्वक्परिवर्तनं पार्श्वपरिवर्तनं कुर्वन्ति रमन्ते रतिमाबध्नन्ति, ललन्ति विलसन्ति क्रीडन्ति क्रीडां कुर्वन्ति कीर्तयन्ति वर्णयन्ति, मोहन्ति विषयं सेवन्ते तथा पुरा प्राग्वे उपार्जितानां पुराणानां चिरन्तनानां सुचीर्णानां सुविधिकृतानां सुपराक्रान्तानां शोभनपराक्रमसम्पादितानाम् अत एव शुमानां शुभफलानां कृतानां कल्याणानां बास्तविककल्याणफलानां कर्मणां दानशीलादीनां कल्याणम् एकान्तसुखावह 'फलवित्तिविसेसं' फलवृत्तिविशेष फलविपाकं 'पच्चणुभवमाणा' प्रत्यनुभवन्तः एकैकशोऽनुभवविषयं कुर्वन्तः सन्तो 'विहरंति' विहरन्ति तिष्ठन्ति । _ 'तासु णं' तयोः पूर्वोक्तयोः खलु 'आभिओगसेढीसु सकस्स देविंदस्स देवरणो सोममवरूणवेसमणकाइयाणं' आभियोग्यश्रेण्योः शक्रस्य देवेन्द्रस्य देवराजस्य सोम - निद्रा नहीं लेती हैं, क्योंकि देवों के निदा का अभाव होता है । यहां यावत्पदसे "तिष्ठन्ति निषीदन्ति, त्वग्वतयन्ति, रमन्ते, ललन्ति, क्रोडन्ति, कोर्तयन्ति मोहन्ति, पुरापुराणानां सुची र्णानां सुपराक्रान्तानां शुभानां कृतानां कल्याणानां कर्मणां कल्याणम्" इस पाठ का संग्रह हुआ है. इस..पाठ के अनुसार वे वानव्यन्तर देव और देवियां उन२ स्थानों में खड़ी भी रहती हैं, बैठी भी रहती हैं, करबटे भी बदलती हैं, विषय सेवन भी करती हैं, विलास. युक्त चेष्टाएँ भी करती हैं. भिन्न२ प्रकार की क्रीडाएँ भी करती हैं, गाना बजाना नृत्य करना आदि क्रियाएँ भी करती है, देवियां एक दूसरे देवों को और देवियों को वहां रिझाते रहते हैं; इत्योदि रूप से वे वहां पर अपने सुविधिपूर्वक किये गये पूर्वके दानादिरूप शुभ कर्मों के शुभ फलविशेष भोगा करते हैं । “तासुणं आभिभोगसेढोसु सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो सोमजमवरुणवेसमण काइयाणं आभिओगाणं देवाणं वहवे भवणा पण्णत्ता'' उन दोनों मही यावत् पहथी "तिष्ठन्ति, निषीदन्ति, त्वग् वर्तयन्ति, रमन्ते, ललन्ति, क्रीडन्ति कीर्तयन्ति, मोहन्ति, पुरापुराणानां सुचीर्णानां, सुपराक्रान्तानां,शुभानां, कृतानां कल्याणानां कर्मणां कल्याणम' मा पानी सडथये छ. मा 416 भुरा त पानव्यत२ हव भने દેવી એ તત્તત પ્રદેશમાં ઊભા રહે છે, બેસે છે, પાર્શ્વ પરિવર્તન કરે છે, વિષય સેવન કરે છે, વિલાસ યુક્ત ચેષ્ટાઓ કરે છે, ભિન્ન ભિન્ન પ્રકારની ક્રીડાઓ કરે છે, ગાવું, વગાડવું નૃત્ય કરવું વગેરે વિવિધ ક્રિયાઓ કરતા રહે છે. દેવીએ બીજા દેને અને દેવે બીજી દેવીઓને રિઝવતા રહે છે. ઈત્યાદિ રૂપમાં તેઓ ત્યાં પોતપોતાની સુવિધાથી પૂર્વકત हानाहिशुभ ना शुम ३विशेषन। यसो ४२त। २ छे. "तासुणं आभिओगसेढीसु सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो सोमजप्रबरुणवेसमणकाइआणं आभिओगाणं देवाणं बहवे भवणा पण्णत्ता' तेथे। मन्नमलियाश्य श्रेणीमा देवेन्द्र १२० शना-२ पूEnvi Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे यमवरुणवैश्रवणकायिकानां तत्र सोमः पूर्वदिक्पाल: यमो दक्षिण दिक्पालः, वरुणः पश्चिमदिक्पालः, वैश्रवणः उत्तरदिक्पालः तेषां कायः समूहः स्वामित्वेन येषां ते तथाभूतास्तेपाम् 'आभिभोगाणं' आभियोग्यानाम् आज्ञाकारिणां 'देवाणं बहवे भवणा पण्णत्ता' देवानाम् अनेकानि भवनानि प्रज्ञप्तानि 'तेणं भवणा बाहिं बट्टा' तानि खलु भवनानि बहिर्वत्तानि बहिर्वतु लाकाराणि 'अंतो चउरंसा' अन्तः अभ्यन्तरे चतुरस्राणि चतुष्कोणानि अत्र 'वण्णओ' वर्णकः भवनवर्णनपर पदसमूहो वक्तव्यः स च किं पर्यन्त इत्याह 'जाव अच्छरगणसंघविकिण्णा' यावदप्सरोगणसङ्ग विकीर्णानि-अासरोगणसङ्घविकीर्णानि अप्सरोगणसमूहव्याप्तानि इति पर्यन्तः ततोऽपि किमवधिरिति जिज्ञा सायामाह 'जाव पडिरूवा' यावत् प्रतिरूपाणि । प्रतिरूपाणि इति पर्यन्तो वर्णको बोध्य इति पर्यवसितम् । तथा च सर्वपदानि यावत्पदसंगृहीतान्येवम् अधः पुष्करकणिकासंस्थानसंस्थितानि उत्कीर्णान्तरविपुलगम्भीरखातपरिखाणि प्राकाराहालक कपाटतोरणप्रतिद्वारदेशभागानि यंत्रशतध्नीमुशलमुशुण्डीपरिवारितानि अयोध्यानि सदा जयानि सदा अजेयानि सदा गुप्तानि अष्टचत्वारिंशत्कोष्ठरचितानि अष्टचत्वाआभियोग्य श्रेणियों में देवेन्द्र देवराज शक के जो पूर्व दिशा के दिक्पाल सोम है , दक्षिण दिशा के दिक्पाल जो यम है , पश्चिम दिशा के दिक्पाल जो वरुण है और उत्तर दिशा के दिक्पाल जो वैश्रवण है जो कि इन्द्र के आज्ञाकारी है उनके अनेक भवन कहे गये है। "तेणं भवणा बाहिं वा, 'अतो चउरंसा, वण्णओ जाव अच्छरगणसंवि किण्णा जाव पडिरूवा" वे भवन बाहर में तो गोल है, और भोतर में चतुरस्र-चौकोर है। यहां भवनों के वर्णन करने वाला पाठ "ये अप्सराओं के सम्ह से व्याप्त है और यावत्प्रासादीय आदि विशेषणों वाले है" यहां तक का यहां गृहीत हुआ है. वह पाठ जानकारी के लिए यहां प्रकट किया जाता है- “ अधः पुष्करकर्णिकासंस्थानसंस्थितानि उत्कीर्णान्तरविपुलगंभीरखातपारखाणि, प्राकार टाच्यकपाटतोरणप्रतिद्वारदेशभागानि, यंत्रशतघ्नी मुशलमुशुण्डीपरिवारितानि, अयोध्यानि, सदा जयानि सदा अजेयानि, सदा गुप्तानि, દિપાલ સેમ છે. દક્ષિણ દિશાના દિફ પાલ યમના પશ્ચિમ દિશાના દિકપાલ વરુણના અને ઉત્તર દિશાના દિકપાલ વૈશ્ર ણન –જે અદ્રના આજ્ઞ કારી છે–તેમના અનેક ભવન કહેવાય छ. "तेण भवणा बाहिं वट्टा, अंतो च उरंसा, वण्णओ जाव अच्छरगणसंघविकिण्णा जाव पडिरूवा" त सपने मागे म २था यतुरन यामा-छे. ही भवनाना વણ. સંબંધી એ આ અસર જ ના રમૂહથી વ્યાપ્ત છે અને યુવા સાદીય આદિ વિશેભણેથી યુક્ત ને “અહીં સુ ને પાઠ ગૃત થયેલ છે તે પાઠ જાણવા માટે અહીં પ્રકટ કરવામાં मावले. “अधः पुष्करकणि संस्थानसंस्थितानि उत्कीर्णान्तविपुल गभीरखातपरि खाणि, प्राकाराट्टालयकपाटतारण प्रतिद्वारदेशभागानि यन्त्रशनीमुशल मुशुण्डी परिवा. रितानि, अयाध्यानि, सदः जयानि सदा अजेयान, सदा गुप्तानि, अष्टचत्वारिशत् कोष्ठ Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० १४ आभियोग्यश्रेणिद्वयनिरूपणम् रिंशत्कृतवनमालानि क्षेमाणि शिवानि किङ्करामरदण्डोपरक्षितानि लायितोल्लायितमहितानि गोशीर्षसरसरक्तचन्दनददर (प्रचुर) दत्त पञ्चाङ्गुलितलानि उपचितचन्दनकलशानि चन्दनघटसुकृततोरणप्रतिद्वारदेशभागानि आसक्तोसक्तविपुलवृत्तव्याघारितमाल्यदामकलापानि पञ्चवर्णसरससुरभिमुक्तपुष्पपुजोपचारकलितानि कालागुरुप्रवरकुन्दुरूष्कतुरुष्कधूपदह्यमानसुरभिमघमघायमान गन्धोद्ध्ताभिरामाणि सुगन्धवरगन्धितानि गन्धवर्तीभूतानि (अप्सरोगणसङ्घ-कीर्णानि) दिव्यत्रुटितशब्दसंप्रनादितानि सर्वरत्नमयानि अच्छानि श्लक्ष्णानि लष्टानि घृष्टानि मृष्टानि नीरजांसि निर्मलानि निष्पङ्कानि निष्कङ्कटच्छायानि सप्रभाणि समरीचिकानि सोद्योतानि प्रासादीयानि दर्शनीयानि अभिरूपाणि (प्रतिरूपाणि) इति । ___ एतद्व्याख्या-अधः पुष्करकर्णिकासंस्थान संस्थितानि अधः पुष्करकर्णिका-अधोमुखकमलबीजकोशस्तस्या यत् संस्थानम्-आकारस्तेन संस्थितानि अधोमुखपद्मबीजकोशाकाराणि तथा-उत्कीर्णान्तरविपुलगम्भीरखातपरिखाणि उत्कीर्णमिवो अष्टचत्वारिंशत् कोष्ठरचितानि, अष्टचत्वारिशत्कृतवनमालानि, क्षेमाणि, शिवानि, किङ्करामरदण्डोपरक्षितानि, लायितोल्लायितमहितानि, गोशीर्षसरसरक्तचन्दन दर्दर (प्रचुर) दत्त पञ्चा गुलितलानि उपचितचन्दनकलशानि, चन्दनघटसुकृततोरणप्रतिद्वारदेशभागानि, आसक्तोत्सक्तविपुलवृत्तव्याघारितमाल्यदामकलापानि, पञ्चवर्णसरससुरभिमुक्तपुष्पपुजोपचारकलितानि, कालागुरुप्रवरकुन्दरुष्कतुरुष्कधूपदह्यमान सुरभिमघमघायमानगन्धोधूताभिरामाणि, सुगन्धवरगन्धितानि, गंधवर्तिभूतानि, (अप्सरोगणसंघकीर्णनि,) दिव्यत्रुटित शब्दसंप्रनादितानि सर्वरत्नमयानि, अच्छानि, लक्ष्णानि, लष्टानि; घृष्टानि, मृष्टानि, नीरजांसि, निर्मलानि, निष्पकानि, निष्कंकटच्छायानि सप्रमाणि, समरीचिकानि सोद्योतानि, प्रासादीयानि, दर्शनीयानि, अभिरूपाणि प्रतिरूपाणि । इस पाठ के पदों को व्याख्या इस प्रकार से है-नोचा मुख करके रखी गई कमलकर्णिका का जैसा आकार होता है. वैसा आकार इन भवनों का है इनकी जो खात-ऊपर रचितानि, अप्टचत्वारिंशत्कृतवनमालानि क्षेमाणि, शिवानि, किङ्करामरदण्डोपरक्षितानि, लायितोल्लायितमहितानि, गोशीर्षसरसरक्तचन्दनददर (प्रचुर दत्तपऊ बागुलितलानि, उपचितचन्दनकलशानि, चन्दनघटसुकृततोरणप्रतिद्वार देशभागानि, आसक्तोसक्तविपुलवृत्तव्याघारित माल्यदामकलापानि, पञ्चवर्णसरस सुरभि मुक्तपुष्पपुञ्जोपचारकलितानि, कालागुरुप्रवरकुन्दरुष्क तुरुष्क धूप दह्यमानसुरभिमघमधायमानगन्धोद्धृताभिरामाणि, सुगन्ध वर गन्धितानि, गंधवभूतानि, (अप्सरोगणसंघकीर्णागि) दिव्यत्रुटित शब्दसंप्रनादितानि सर्वरत्नमयानि, अच्छानि लक्ष्णानि, लष्टानि, धृष्टानि, मृष्टाति, नीरजांसि निर्मलानि, निष्पकानि निष्कंकटच्छायानि 'सप्रभाणि, समरीचिकानि, सोद्योतानि, प्रासादीयानि' दर्शनीयानि, अभिरूपाणि प्रतिरूपाणि' मा पाउन योनी व्यायामा प्रभाव छ. नत Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे स्कीर्णम्-सुव्यक्तम् तादृशमन्तरम्-अभ्यन्तरं यासां तादृश्यः विपुलाः बहवः गम्भीराः अलब्धतलाः खातपरिखाः खातानि उपर्यधः समानि परिखाः उपरि विशाला अधः सङ्कुचिताश्च येषां तानि प्राकाराट्टालककपाटतोरणप्रतिद्वारदेशभागानि-प्राकारः 'कोर्ट' इति भाषाप्रसिद्धः, अट्टालक :-'अटारी' भाषाप्रसिद्धः, तथा प्रतिद्वार देशभागे कपाटं तोरणं च येषां तानि तथा । 'प्रतिद्वारदेशभाग' शब्दस्य परनिपात आपत्वात् तथा-यन्त्र शतध्नी मुशलपुशुण्डी परिवारितानि-यन्त्राणि जलादि यन्त्राणि शतघ्न्यःपुरुषशतघातकास्त्रविशेषाः 'तोप' इति भाषा प्रसिद्धाः मुशलानि-प्रसिद्धानि मुशुण्डयः शस्त्रविशेषाः एतैः परिवारितानि-रक्षणाय परिवेष्टितानि, अतएव अयोध्यानि - योधुमशक्यानि सदा सर्वस्मिन् काले जयानि-जयन्तीति जयानि शत्र जयकारका णि, तथा शत्रुभिः सदा अजेयानि-जेतुमयोग्यानि सदा गुप्ताणि-रक्षितानि अष्टचत्वारिंशकोष्टरचितानि-रचितानि-कृतानि अष्टचत्वारिंशतकोष्टानि यत्र तानि तथा, रचितशब्दस्य प्राकृतत्वात्परनिपातः । अष्टचत्वारिंशत्कृतमालनि अष्ट चत्वारिंशत-अष्टचत्वारिंशड्रेदभिन्नविच्छित्तियुक्ता वनमालाः कृताः-स्थापिताः येषु तानि तथा, क्षेमाणि -पर और नीचे समान आकृति वाली खाई है उसका एवं ऊपर में विशाल और नीचे भाग में संकुचित जो परिखा है उसका भीतरी अन्तर बिलकुल सुव्यक्त है तथा ये दोनो ही विपुल गंभीर है - अलब्ध तल वाली है, प्रत्येक भवन के साथ कोट है, अटारी है तथा इनके प्रत्येक द्वार में कपाट लगे हुए है, हर एक भवन में एक साथ सो पुरुषो को मार डालें ऐसी अनेक शतग्धियाँ-अस्त्रविशेष जिसे तोप कहा जाता है हैं, अनेक मुशल है अनेक मुशुण्डियां है-इस नाम के हथियार विशेष है इन सब हथियारों से वे मकान परिवेष्टित है अतएव कोई भी इन पर आक्रमण नहीं कर सकता है । इसीसे ये सदा अजेय है और स्वयं में ये सदा शत्रुओं को जीतने वाले है और सुरक्षित है प्रत्येक भवन में ४८-४८ कोठे बने हुए है एवं “अष्ट चत्वारि" ४८-४८ वनमालाएं रखी हुई है । મુખ કમલકર્ણિકાને જે આકાર હોય છે તે આકાર અહીંના ભવનનો છે. એમની જ ખાત–ઉપર અને નીચે સમાન આકૃતિવાળી ખાઈ છે-તેનો તથા ઉપરની તરફ વિશાળ અને નીચેના ભાગમાં સંકુચિત જે પરિખા છે તેનું ભીતરી અન્તર એકદમ સુસ્પષ્ટ છે તેમજ એ એ બને વિપુલ ગંભીર છે. અલબ્ધ તલવાળી છે. દરેક ભવનની સાથે કોટ છે, અટારી છે. તેમજ એમના પ્રત્યેક દ્વારમાં કપાટ લાગેલા છે. દરેક ભવનમાં એ કી સાથે સે પ૨ ને એકી સાથે મારી નાખે એવી અનેક શતદનીએ-તપ-છે, અનેક મુશલે છે, અનેક મસરૂડી છે, મુસણી એક વિશેષ પ્રકારનું હથિયાર હોય છે, આ સર્વ હથિયારોથી તે ભવનો પરિવેષ્ઠિત છે. એથી તેમની ઉપર કે આક્રમણ કરી શકે નહીં. એથી જ એ ભવને સદા અજેય રહે છે. અને સ્વયમેવ આ ભવને શત્રુઓને જીતનારા છે. અને સુરક્ષિત છે. प्रत्ये: भवनमा ४८-४८ मी मने छ. awr "अटचत्वारि" ४८-४८ वनमापाये। Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. १४ आभियोग्यश्रेणिद्वयनिरूपणम् चक्रभयरहितानि, पुनः शिवानि-स्वचक्रभयरहितानि तथा किङ्करामरदण्डोपरक्षितानि दण्ड हस्तै भृत्यदेवैः संरक्षितानि, लायितोल्लायितमहितानि-लेपोपलेपपरिष्कृतानि, गोशी पसरसरक्तचन्दनदर्दरदत्तपश्चाङ्गुलितलानि-गोशीर्ष चन्दनविशेषः, सरसं-रससहितं प्रशस्तं यद रक्तचन्दनं चेत्युभाभ्यां दर्दरं-प्रचुरं यथा स्यात्तथा दत्तानि-न्यस्तानि पञ्चांगुलितलानि येषु तानि तथा, । उपचितचन्दनकलशानि-उपचिताः-स्थापिताः चन्दन कलशा येषु तथा, चन्दनघटसुकृततोरणप्रतिद्वारदेशभागानि चन्दनघटाः चन्दनचर्चितकलशाः, सुकृततोरणानि -सुष्टु रचिततोरणानि च प्रतिद्वारदेशभागेषु येषां तानि तथा । आसकोत्सा विपुलवृत्तव्याधारित माल्यदामकलापानि आसक्तः भूमौ लग्न उत्सतः-उपरि लग्नश्च विलः विस्तीर्णः वृता-वर्तुलः व्याधारितः-प्रलम्बित: माल्यदामकलापः-पुष्पमाला-समूहो येषु तानि तथा, पञ्चवर्णसरससुरभिमुक्तपुष्पपुरजोपचारकलितानि पञ्चवर्णानां सरसानां सुरभीणां-सुगन्धीनां पुष्पाणां यः पुजः-समूहः तस्य य उपचारः यत्र तत्र स्थापनम् तेन कलितानि-युक्तानि तथा कालागुरु प्रवरकु. पर चक्र का यहां भय नहीं है "शिवानि" तथा स्व चक्र के भय से ये रहित है । जिनके हाथो में दण्ड है ऐसे किंकरभूत देवों से ये संरक्षित बने हुए है । "लायितोल्लायित महितानि" गोमयादि के लेप से ये परिष्कृत है "गोशीर्ष सरसरक्तचंदनदर्दरदत्त पञ्चांगुलितलानि"" गोशीर्ष चन्दन और सरस रक्त चन्दन के अधिक से अधिक मात्रा में इनमें हाथे लगे हुए है । जगह जगः इनमें चन्दन के बने हुए कलश रखे हुए है। हर एक भवन के हर एक द्वार पर चन्दन कलशों द्वारा किये गए तोरण बने हुए है "आसक्तोसक्त विपुलवृत्तव्याधारितमाल्यदामकलापानि" इनमें जो पुष्पमालाओं का समूह है वह ऊपर से लकर भूमि तक लगा हुआ है-ऐसा विस्तीर्ण है, तथा-वृत्त-गोल आकार वाला है और लटकता हुआ हैं 'पञ्चवर्णसरस." इन भवनो में यत्र-तत्र सरस पंचवर्णोपेत एवं सुगंधित पुष्पों का समूह विखरा हुआ रहता है "कालागुरु" जलते हुए कालागुरु की, गावली छ. १२५नी ही थी. "शिवानि', तेमन वयना नयथा रहित छ. मना डायामा छ । भूतदेवाधाम संरक्षित थयेछे, "लायितोल्लायितमहितानि" गोमयादिना पनधी यो भवन शित. "गोशीर्षसरसरक्तचंदनदर्दरदत्त पञ्चांगुलितलानि" शयन मरे सर २६५ ना म४ि प्रगाढवेપાદિના એ ભવનમાં હાથના થાપાએ લાગેલા છે. થાન સ્થાન પર ચંદન નિર્મિત કલશે એ ભવનોમાં મૂકેલા છે. દરેક ભવનના દરેક દ્વાર પર ચન્દન કલશે ના તોરણે બનેલા છે. "आसक्तोत्सतविपुलमत्त व्याधारितमाल्यदामकलापानि" भवनामारे ५०५माताએના સમૂહે છે તે ઉપરથી ભૂમિસુધી પહોંચેલા છે–વિસ્તીર્ણ છે. તેમજ વૃત્ત-ગળ આકાર पाणा छ. मन बटता छ. “पञ्चवर्णसरस." से सपनामा यत्रतत्र सरस पयवीतभा सुगधित पोना सभू विश्री श्येला २ छे. “कालागुरु०" raled stal Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे न्दुरुष्कतुरुष्कधूपदह्यमानसुरभिमघमघायमानगन्धोद्धृताभिरामाणि-कालागुरुः- कृष्णागुरुः प्रवरः-प्रशस्ततरो यः गन्धद्रव्यविशेषः, तुरुष्का-यावनो धृपः 'लोहवान्' इति भाषा प्रसिद्धः, धप:-दशाङ्गधृपश्च, एतेषां दह्यमानानां यः सुरभि:-मनोज्ञः मघमघायमानः -प्रसरन् गन्धः स एव उद्धृतः, वायुना प्रसृतस्तेन, अभिरामाणि-रमणीयानि तथा-सुगन्धवरगन्धितानि-सुगन्धेषु-शोभनगन्धेषु यो वरः उत्तमो गन्धः स सञ्जातोऽत्रेति तथा उत्तमगन्धयुक्तानि, अत एव गन्धवर्तिभूतानि-गन्धगुटिकासदृशानि, तथा अप्सरोगणसकीर्णानि-अप्सरोगणानां सङ्गेन समुदायेन कीर्णानि-व्याप्तानि तथा- दिव्यत्रुटित शब्दसम्प्रनादितानि-दिव्यानां त्रुटितानां-वाधानां यः शब्दस्तेन सम्प्रनादितानि-शब्दयुक्तानि सर्वरत्नमयानि-सर्वात्मना रत्नमयानि अच्छादिप्रतिरूपपर्यन्तपदव्याख्या पूर्ववत् । 'तत्थ णं सक्कस्स देविंदस्स देवरणो सोमजमवरुणवेसमणकाइया बहवेआभिओगा देवा परिवसंति' तत्र-तेषु पूर्वोक्तेषु भवनेषु खलु शक्रस्य देवेन्द्रस्य देवराजस्य सोमयमवरुणवैश्रवणकायिका बहव आभियोग्याः -किङ्कराः देवाः परिवसन्तीति प्रशस्ततर कुन्दरुष्कगन्धद्रव्य विशेष की लोमान की और दशाङ्गधूप की मनोज्ञ गन्ध-वास से जो कि वायु के द्वारा इधर उधर फैलाई गई है ये भवन बन ही अधिक रमणीय बने हुए है तथा शोभनगन्ध वाले द्रव्यों की गन्ध से भी उत्तम गन्ध को महक इनमें सदा भरी रहती है अत एव ये ऐसे ज्ञात होते है कि मानो ये गंध को गुटिकारूप हो है । इन भवनो में सदा अप्सराओं का समुदाय इधर से उधर फिरता रहता है। यहां पर दिव्य वाजों का नाद होता रहता है अतएव उससे ये सदा वाचालित से बने रहते है । ये सर्वात्मना रत्नमय है तथा अच्छ से लेकर प्रतिरूप तक के जितने भी विशेषण पद है-उनसे ये युक्त है इन अच्छ आदि पदों की व्याख्या पहले यथास्थान की जा चुकी है इन पूर्वोक्त भवनों में देवेन्द्र देवराज शक के सोम, यम, वरुण और वैश्रवण जाति के अनेक किंकर भूत देव रहते है । ये देव विपुल भवन एवं परिवारादिरूप समृद्धि ગુરુની પ્રશસ્તિતર કુન્દરુષ્કગન્ધ દ્રવ્ય વિશેષની, લેબાનની અને દશાંગધ્રપની માગ અહીંના ભવનામાં સર્વત્ર વ્યાપ્ત છે તેથી એ ભવને ખૂબજ રમણીય થઈ ગયા છે. તેમજ શેભન ગન્ધવાળા દ્રષ્યની ગબ્ધ કરતાં પણ ઉત્તમ ગધની મહેકથી સર્વદા એ ભવન મહે કતા રહે છે. એથી એ એવા લાગે છે કે માને એ ગધની ગુટિકા રૂપ જ છે. એ ભવનમાં અસરાઓના સમુદાયે આમથી તેમ હરતા-ફરતાજ રહે છે. અહીં દિવ્ય વાજાઓને નાદ થતું રહે છે. એથી એ મુખરિત રહે છે. એ સમયના ૨નમય છે તેમજ અછથી માંડીને પ્રતિરૂ૫ સુધીના જેટલા વિશેષણ પદે છે તેમનાથી એ યુક્ત છે. આ અચ્છ વગેરે પદોની વ્યાખ્યા પહેલા યથાસ્થાન કરવામાં આવી છે. આ પૂર્વોક્ત ભવનમાં દેવેન્દ્ર દેવરાજ શકના સોમ, યમ, વરુણ અને વૈશ્રવણુ જાતિના અનેક કિંકર ભૂત દે રહે છે. એ દે વિપુલ Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० १४ आभियोग्यश्रोणिद्वयनिरूपणम् परेणान्वयः, तेच कीदृशाः ? इति जिज्ञासायामाह-'महिढिया' महद्धिकाः विपुल भवनपरिवार-लक्षणसमृद्धियुक्ताः 'महज्जुईया महाद्युतिकाः शरीराभरणोभयसम्बन्धिबृहत्प्रकाशसम्पन्नः 'जाव' यावत्-यावत्पदेन-'महाबलाः महायशसः, एतदुभयपद संग्रहो बोध्यः, तथा 'महासोक्खा पलिओवमट्टिइया' महासुखाः पल्योपमस्थितिकाः एतेषां महाबलादोनां पदानां व्याख्याऽष्टमसूत्रतो विजयद्वाराधिष्ठातृविजयदेववर्णनप्रकरणादवसेया । 'तासिणं' तयोः- पूर्वोक्तयोः खलु आभिओगसेढीणं बहुसमरमणिज्जाओ भूभिभागओ वेयइढस्स पव्वयस्स उभो पासिं' आभियोग्यश्रेण्यःो बहुसमरमणीयात् भूमिभागात् वैताव्यस्य पर्वतस्य उभयोः-द्वयोः पार्श्वयोः 'पंच पंच जोयणाई उड्ढं उप्पइत्ता, पञ्च पश्च योजनानि ऊर्ध्वमुत्पत्य-गत्वा 'एत्थणं वेयड्ढस्स पचयस्ससिहरतणे पण्णत्ते' अत्र-इह खलु वैताव्यस्य पर्वतस्य शिखरतलं प्रज्ञप्तम्, तच्च कीदृशम् ? इति जिज्ञासायामाह-प्राचीनप्रतीचीनायतमित्यादि । तत्र 'पाईण पडीणायए' प्राचीनप्रतीचीनायतं पूर्व पश्चिमयोर्दिशोरायतं-दीर्घम् 'उदीण दाहिण विच्छिण्णे' उदीचीनदक्षिणविस्तीर्णे 'दसजोयणाई विक्खभेण' दशयोजनानि विष्कम्भेण-विस्तारेण 'पव्वयसमगे' पर्वतसमकम्-पर्वतसमानम् 'आयामेणं' आयामेन- दैर्येण । 'सेणं' तत् शिखरतलं खलु 'इक्काए' एकया 'पउमवरवेइयाए' युक्त है शरीर की एवं आभरण की वृहत् कान्ति से सम्पन्न है. यावत्पद के अनुसार ये महाबलिष्ठ है, महायशस्वी है तथा महासुख संम्पन्न है, और एक पल्योपम की स्थिति वाले है । महाबल आदि पदों की व्याख्या अष्टमसूत्र से की जिसमें विजय द्वार के अधिपति विजय देव का वर्णन प्रकरण है जान लेनी चाहिए । इन दोनों आभियोग्य श्रेणियो के बहुसमरमणीय भूमिभाग से वैताठ्यपर्वत की दोनों बाजुओं में पांच पांच योजन ऊपर आगे जाने पर वैताढय पर्वत का शिखर तल कहा गया हैं "पाईण पडिणायए उदीण दहिणविच्छिण्णे दस जोयणाई विक्खंभेणं पव्वयसमगे आयामेणं" यह शिखर पूर्व से पश्चिम तक लम्बा हैं इसका विस्तार १० योजन का है इसलिए यह लम्बाई को अपेक्षा पर्वत के हो बराबर है “ से णं एक्काए पउमवर ભવન તેમજ પરિવારાદરૂપ સમૃદ્ધિથી યુક્ત છે. શરીરની તેમજ આભરણની બૃહત કાંતિથી સંપન્ન છે. પાવાદ મુજબ એ મહાબલિષ્ઠ છે, મહાયશસ્વી છે તેમજ મહાસુખસંપન્ન છે અને એકએક પલ્યોપમ જેટલી સ્થિતિવાળા છે. મહાબલ આદિ પદોની વ્યાખ્યા અષ્ટમસૂત્રમાંથી જાણી લેવી જોઈએ. તેમાં વિજય દ્વારના અધિપતિ વિજયદેવેનું વર્ણન કરવામાં આવેલુ છે. એ બને આભિયોગ્ય શ્રેણીઓના બસમરમણીય ભૂમિભાગથી વૈતાઢ્ય પર્વતની અને બાજુ એમાં પાંચ પાંચ યે જન ઉપર આગળ જવાથી વૈતાઢય પર્વતનું શિખર કહેવાય છે. "पाईण पडियायए उदीण दाहिण विछिण्णे दसजोयणाई विक्खमेण पव्वयसमगे आयामेण" આ શિખર પૂર્વથી પશ્ચિમ સુધી લાંબું છે. આ વિસ્તાર ૧૦ એજન જેટલો છે. એથી स नी अपेक्षाये ५ तनी ५२१५२ छे. "सेणं एक्काए पउमवरवेइयाए एक्केणं वण Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पद्मवरवेदिकया 'इक्केण वणसंडेणं' एकेन वनपण्डेन च-'सब्बओ समंता संपरिक्खिते' सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्त-परिवेष्टितमिति । अनयोर्दै र्यविस्तार प्रमाणं वर्णनं च जम्बूद्वीपजगतीगतपमवरचेदिकावनषण्डयोरिव बोध्यम् । एतदेव सूचयितुमाह 'पमाणं वण्णगो दोण्ह पि' प्रमाणं वर्णको द्वयोरपीति । __ अथ गौतमः पुनः पृच्छति--'वेयड्ढस्सणं भंते' इत्यादि । 'वेयड्ढस्स णं भंते ! पब्बयस्स सिहरतलस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते । हे भदन्त ! बैताव्यस्य खलु पर्वतस्य शिखरतलस्य कोदृशकः आकारभावप्रत्यवतार:-स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः प्रज्ञप्तः ? भगवानाह-'गोयमा ! बहुसरमणिजे भूमिभागे पण्णत्ते' हे गौतम ! बहुसमरमणीयः भूमिभागः प्रज्ञप्तः, 'से जहाणामए अलिंगपुक्खरेइवा जाव णाणाविह पंचवण्णेहिं मणीहि उवसोभिए जाव वावीओ पुक्खरणीओ जाव वाणमंतरा देवा य देवीओ य आसयंति जाव भुंजमाणा विहरंति' स यथानामकः आलिङ्गपुष्कर इति वा पश्चवणे मणिभिरुपशोभितो यावद् वाप्यः पुष्करिण्यो यावद् व्यन्तरा देवाश्च वेइयाए इकोणं वगसंडे गं सत्रभो समंता संपरिकिखते पभाणं वग्णगो दोण्हंपि " वह शिवरतल एक पद्मवर वेदिका और एक वनषण्ड से चारों ओर से घिरा हुआ है. इन दोनों को लम्बाई चौडाई का प्रमाण तथा इनके सम्बन्ध का वर्णन जम्बूद्वोप की जगती पद्मवर वेदिका और वनषण्ड के वर्णन जैसा हो है। ___ "वेयड्ढस्स णं भंते ! पव्वयस्स सिहरतलस्स केरिसर आगारभावपाडोयारे पण्णत्ते" हे भदन्त ! वैताढ्य पर्वत के शिखर का आकारभाव प्रत्यवतार -स्वरूप कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "गोयमा ! बहुसमर-मणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते" हे गौतम ! शिखर तलका जो भूमिभाग है वह सम एवं रमणीय कहा गया है, ' से जहोणामए आलिंगपुक्खरे इवा णाणाविह पंच वण्णोहिं मणोहिं उवसोभिए जाव वाकोओ पुक् वरिणोओ जाव वाण-मंतर देवाय देवीओ य आसयंते जाव भुंज माणा विहरति" जैसा बहुसमरमणीय मृदंग का मुख पुट होता है इत्यादि रूप से तथा यावत् नाना प्रकार के पंच वर्णोपेत मणियों से वह संडेणं सवओ समता संपरिक्खित्ते पमाणं वण्णओ दोण्हंपि" ते शिमरत मे ५વરેવેદિકા અને એક વનખંડથી ચારે તરફથી ઘેરાયેલું છે. એ બન્નેની લંબાઈ ચેડાઈનું પ્રમાણ તેમજ એમના સંબંધનું વર્ણન જ બુદ્વીપની જગતીની પદ્મવરવેદિકા અને વનખંડના वर्णन ४ छे. 'वेयड्ढस्स णं भंते ! व्वयस्स सिहरतलस्स केरिसए आगारभाववडोयारे पण्णते" है महन्त ! वैतादय पतन। शियन मारमा प्रत्यक्ता२-२१३५) । छ.? सेनामा प्रभु . "गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते" है गीतम ! शिप तसनी ? भूमिमा छ त समसणीय छे. “से जहाणामए आलिंग पुक्खरेइवा जाव णाणाविह पंचवण्णेहिं मणीहि उवसोभिए जाव वावीओ पुक्खरिणीओ जाव वाणमंतरा देवाय देवीओ य आसयति जाव भुजमाणा विहरंति" भृ भुम ५८ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०५ प्रकाशिका टीका सू. १४ आभियोग्यश्रेणिद्वयवर्णनम् देव्यश्च आसते यावद् र्भुञ्जमाना विहरन्तोति । अत्र यावत् पदसंग्राह्यः पाठो राजप्रश्नीवसूत्रस्य तत्रैव मत्कृतसुबोधिनीटीकातोऽवबोध्य इति । _ अथास्य वैताब्यस्योपरितनानां कूटानां संख्या पृच्छति'जंबूद्दीवेणं' इत्यादि 'जम्बूहीवे णं भंते ! दीवे भारहे वासे वेयड्ढपव्वए कई कूडा पण्णत्ता' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे वर्तमाने भारते वर्षे स्थिते वैताठ्यपर्वते कति-कियत्संख्यकानि कूटानि-शिखराणि प्रज्ञप्तानि भगवानाह--'गोयमा ! णव कूडा पण्णत्ता' हे गौतम ! नव-नव संख्यानि कटानि प्रज्ञप्तानि 'तं जहा सिद्धाययणकूडे'तद्यथा सिद्धायतनकूटं सिद्ध शाश्वतं यदायतनं स्थानं गदुपलक्षितं कूटं प्रथमम् ? 'दाहिणभरहकूडे दक्षिणार्द्धभरतकूटं-दक्षिणार्द्धभरतनामकस्य देवस्य निवासभूतं कूटं द्वितीयम् २, 'खण्डप्पवायगुहाकूडे' खण्डप्रपातगुहाकूटं-खण्डप्रपातगुहायां अधिष्ठातृदेवस्य नृत्तमालस्य शोभित है इत्यादि रूप से तथा वहां पर अनेक वापिकाएँ एवं अनेक पुष्करिणियां हैं यावत् अनेक व्यन्तर देव और देवियां वहां पर उठती बैठती रहती है इत्यादि रूप से तथा यावत् वहां वे भोग भोगते हुए अपना समय चैन से व्यतीत करते हैं इत्यादि रूप से जैसा यह सब पुरा का पुरा वर्णन राजप्रश्रीय सूत्र के १५वे सूत्र से लेकर १९ बे सूत्र तक कथित वर्णन से जान लेना चाहिये वहां यह सब वर्णन बिलकूल स्पष्ट से किया गया है। "जंबुद्दीवे ण भंते ! दीबे भारहे वासे वेयड्ढपव्वए कइ कूडा पण्णत्ता" हे भदन्त ! जम्बूद्वीप नामके द्वीपमें स्थित भरत क्षेत्र में पड़े हुए वैताढ्यपर्वत के कितने कूट-शिखर कहे गये है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं, 'गोयमा ! णव कूडा पण्णत्ता' हे गौतम ! वैताढय पर्वत के नौ कूट शिखर कहे गये हैं। 'तं जहा" जिनके नाम इस प्रकार से हैं "सिद्धाययणकूडे १, दाहिणड्ढभरहकूडे २, खंडप्पवायगुहाकूडे ३ माणिभद्दकडे બસમ રમણીય હોય છે ઈત્યાદિ રૂપથી તથા યાવતુ નાના પ્રકારના પંચવર્ણોપેત મણિએથી તે શોભિત છે. ઈત્યાદિ રૂપથી તથા ત્યાં અનેક વાપિકાઓ અનેક પુષ્કરિણીઓ છે. યાવત્ અનેક વ્યન્તર દેવ અને દેવીઓ ત્યાં ઉઠતા-બેસતા રહે છે ઈત્યાદિ રૂપથી તેમજ યાવત ત્યાં તેઓ ભગવતા પિતાને સમય આનંદ પૂર્વક વ્યતીત કરે છે. ઈત્યાદિ રૂપથી જેવું આ બધું વર્ણન રાજ પ્રશનીય સૂત્રના ૧૫મા સૂત્રથી માંડીને ૧૯ મા સૂત્ર સુધી કરવામાં આવેલ છે તે પ્રમાણે અહિંયાં પણ જાણી લેવું જોઈએ. આ બધું વર્ણન ત્યાં એકદમ સ્પષ્ટ રૂપમાં કરવામાં આવેલ છે. - "जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे भारहे वासे वेअइढ़पवर कइ कूडा पण्णत्ता" हे महत! જબૂદ્વીપ નામ દ્વીપમાં સ્થિત ભરતક્ષેત્રના મધ્યમાં પડતા વૈતાઢ્ય પર્વતના કેટલા શિખરો छ ! सेना सभा प्रभु ४९ छ ? “गोयमा णव कूडा पण्णत्ता" 3 गीत ! तादय ५ तना नव इट-शिप ४उवाया छे. "तं जहा" २मना नाभीमा प्रमाणे छे. "१ सिद्धाययण कूडे,२ दाहिणड्ढभरहकूडे, ३ खंडप्पवाय गुहा कूडे, ४ माणिभद्दकूडे, ५, इढवेय ૧૪ Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०६ जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्रे निवासभूतं कूटं तृतीयम् ३, ‘माणिभद्दकूडे,' माणिभद्रकूट-माणिभद्रनामकस्य देवस्य निवासभूतं कूटं चतुर्थम् ४, 'वेयड्ढकूडे' वैताठ्यकूट-वैताढ्यनामकस्य देवस्य निवासभूतं कूटं पञ्चमम् ५, 'पुण्णभद्दकडे' पूर्णभद्रनामकस्य देवस्य निवासभूतं कूटं षष्टम् ६, 'तिमिसगुहा कूडे' तमिस्रगुहाकूट-तमिस्रगुहाधिष्ठातृदेवस्य कृतमालकस्य निवासभूतं कटम् सप्तमम् ७ 'उत्तरड्ढभरहकडे' उत्तरा भरतक्टम्-उत्तरार्द्धभरतनामकस्य देवस्य निवासभूतं की अष्टमम्, 'वेसमणक्डे' वैश्रवणकूट-वैश्रवणनामकस्य लोकपालविशेषस्य निवासभूतं नवमम् ९, सर्वत्र मध्यमपदलोपि तत्पुरुषसमासो बोध्यः । इति ॥१४॥ 'यथोदेशं निर्देशः' इति प्रथमतः सिद्धायतनकूटं वर्णयति-- मूलम्-कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे मारहे वासे वेयड्वपव्वए सिद्धाययणकूडे पण्णत्ते ? गोयमा पुरथिमलवणसमुदस्स पच्चत्थिमेणं दाहिणद्धभरहकूडस्स पुरस्थिमेणं एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे वे४, वेयड्ढ कडे ५, पुण्णभदकूडे ६, तिमि पगुहा कूडे ७, उत्तरड्ढभरहकूडे ८, वेसमणकूडे ९,” सिद्धायतनकूट--शाश्वत आयतन से उपलक्षित कूट १, दक्षिणार्ध भरतनाम के देवका निवासभूत दक्षिणार्ध भरतकूट २, खंडप्रपात नाम की गुहाके अधिष्ठायक नृत्तमाल देव का निवासभूत खंडप्रपातगुहाकूट ३' माणिभद्र नामक देव का निवासस्थान रूप माणिभद्रकूट ४, वैताढ्यनामक देव का निवासभूत वैताढ्यकूट ५, पूर्णभद्रनामक देव का निवासभूत कूट पूर्णभद्रकूट ६, तमिस्रगुहाके अधिष्ठायक कृतमाल देव का निवसभूतकूट तमिस्रगुहाक्ट ७, उत्तरार्धभरत नामकदेव का निवासभूतकट उत्तरार्धभरतकूट ८, और वैश्रवणनामक लोकपाल का निवसभूतक्ट वैश्रवणकूट है । इन समस्त पदों में मध्यमपदलोपी तत्पुरुष समास हुआ है ॥१४॥ कडे, ६ पुण्णभद्द कूडे, ७ तिमिसगुहा कूडे, ८ उत्तरडूढ भरहकूडे ९ वेसमणकडे," सिद्धा યતન ફૂટ-શાશ્વત--આયતનથી ઉપલક્ષિત ફૂટ ૧, દક્ષિણુદ્ધ ભરતનામક દેવના નિવાસ ભત દક્ષિણદ્ધ ભરત કૂટ, ૨. ખંડપ્રપાત નામક ગુફાના અધિષ્ઠાયક નૃત્તમાલ દેવના નિવાસ ભૂત ખંડપ્રપાતગુફાકૂટ ૩. માણિભદ્ર નામક દેવના નિવાસસ્થાન રૂપ માણિભદ્ર ફૂટ ૪, શૈતાઢય નામક દેવના નિવાસભૂત શૈતાઢયકૂટ ૫. પૂર્ણભદ્ર નામક દેવના નિવાસ ભૂત પૂર્ણભદ્ર કુડ ૬. તમિસ ગુડાના અધિષ્ઠાયક કૃતમાલ દેવના નિવાસભૂત ફૂટ તમિસગુહાફટ ૭. ઉત્તરાઈ ભરત નામક દેવના નિવાસ ભૂત કૂટ ઉત્તરાર્ધ ભરત કૂટ ૮, અને શ્રવણ નામક લે કપાલના નવા સભૂત વૈશ્રવણફટ છે. આ સર્વે પદોમાં મધ્યમપદ લેવી તત્ય રુષ સમાસ થયેલ છે. ૧૪ Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०७ प्रकाशिका टोका सू १५ सिद्धायतनकूटवर्णनम् यड्ढे पब्बए सिद्धाययणकूडे णामं कूडे पण्णत्ते-छसकोसाइं जोयणा इं उठें उच्चत्तेणं ,मूले छसकोसाइं जोणाई विखंभेणं मज्झे देसूणाई पंच जोयणाइं विक्खंभेणं, उवरि साइरेगाई णव जोयणाई परिक्खेवेणं, मूले वित्थिपणे मज्जे संखित्ते उप्पिं तणुए गोपुच्छसंठाणसंठिए, सबरयणामए अच्छे सण्हे जाव पडिरूवे । से णं एगाए पउमवरवेइयाए एगेण य वणसंडेणं सवओ समंता संपरि क्खित्ते. पमाणं वणओ दोण्हंपि । सिद्धाययणकूडस्स णं उप्पि बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, से जहानामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव वाणमंतरा देवा य जाव विहरति । तस्स णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभागे एत्थणं महं एगे सिद्धाययणे पण्णत्ते कोसं आयामेणं, अद्धकोसं विक्खंभेणं , देसूर्ण कोसं उड्ढे उच्चत्तेणं अणेग खंभसयसंनिविढे खंभुग्गय सुकयवइरवेइया तोरणवररइयसालभंजियाग सुसिलिट्ठविसिट्ठलट्ठसंठियपसत्थवेरुलियविमलखंभे णाणामणिस्यण खचियउज्जलबहुसम सुविभत्तभूमिभागे ईहामिग उसभतुरगणर मगर विहगवालगकिन्नर रुरुसरभचमर कुंजरवणलय जाव पउमलयभत्तिचित्ते कंचणमणिरयणथूभियाए णाणाविह पंच० वण्णओ घंटापडागपरिमंडियग्गसिहरे धवले मरीइकवयं विणिम्मुयंते लाउल्लोइयमहिए जाव झया । तस्स णं सिद्धाययणस्स तिदिसिं तओ दारा पण्णत्ता । तेणं दारा पंच धणुसयाई उड्ढं उच्चत्तेणं अड्डाइज्जोई धणुसयाई विक्खंभेणं तावइयं चेव पवेसेणं, सेयवरकणगथूभियाग दाखण्णओ जाव वणमाला । तस्सणं सिद्धाययणेस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, से जहा णामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव तस्स णं सिद्धाययणस्स णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थणं महं एगे देवच्छंदए पण्णत्ते पंचधणुसेयोइं आयामविक्खंभेणं साईरेगाइं पंचधणुसयाइं उठें Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૦૮ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे उच्चत्तेणं सव्वरयणामए । एत्थणं अट्ठसयं जिणपडिमाणं जिणुस्सेहप्पमाणमित्ताणं संनिखित्तं चिट्ठइ एवं जाव धूवकडुच्छुगा || सू० १५॥ छाया -क्व खलु भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे भारते वर्षे वैताढ्यपर्वते सिद्धायतनकूटं नाम कूटं प्रज्ञप्तम् ? गौतम । पौरस्त्यलवणसमुद्रस्य पश्चिमेन दक्षिणार्द्धभरतकूटस्य पौरस्त्येन अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वीपे भारते बर्षे बैताढ्ये पर्वते सिद्धायतनकूट नाम कूटं प्रज्ञप्तम्, षट् सक्रोशानि योजनानि उर्ध्वमुच्चत्वेन, मूले षट् सक्रोशानि योजनानि विष्कम्भेण मध्ये देशोनानि पञ्च योजनानि विष्कम्भेण, उपरि सातिरेकाणि त्रीणि योजनानि विष्कम्भेण मूले देशोनानि द्वाविंशति योजनानि परिक्षेपेण, मध्ये देशोनानि पञ्चदश योजनानि परिक्षेपेण, उपरि सातिरेकाणि नव योजनानि परिक्षेपेण मूले विस्तोर्ण मध्ये संक्षिप्तम् उपरि तनुकं गोपुच्छसंस्थान संस्थितं सर्वरत्नमयम् अच्छं श्लक्ष्णं यावत् प्रतिरूपम् । तत् खलु एकया पद्मवरवेदिकया एकेन च वनपण्डेन सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्तम्, प्रमाणं वर्णको द्वयोरपि ! सिद्धायतनकूटस्य खलु उपरि बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः, स यथा नामकः अलिङ्गपुष्कर इति वा यावद् व्यन्तरा देवश्व यावद् विहरन्ति । तस्य खलु बहुसमरमणीयस्य भूभिभागस्य बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु महदेवं सिद्धायतनं प्रज्ञप्तम्, क्रोशमायामेन अर्द्धकोश विष्कम्मेण देशोनं क्रोशमूर्ध्वमूच्चत्वेन; अनेक स्तम्भ शतसन्निविष्टं स्तम्भोगतकृत वज्रवे कातोरणवररचितशालभञ्जिकाक सुश्लिष्टविशिष्ट लष्ट संस्थित प्रशस्तवैर्य विमलस्तम्भं नानामणिकनकरत्नखचितोज्ज्वलब हुसम सुविभक्तभूमिभागम् ईहामृगवृषभतुरंग नरमकर विहगव्यालक किन्नर रुरु सरभ चमरकुञ्जरवनलता यावत् पद्मलता भक्तिचित्रं काञ्चनमणि रत्न स्तूपिकाकं नानाविध पञ्च० वर्णकः घण्टापताका परिमण्डिताग्रशिखरं धवलं मरीचिकवचं विनिर्मुञ्चत् लायितोल्लायितमहितं यावत् ध्वजा । तस्य खलु सिद्धायतनस्य त्रिदिशि त्रीणि द्वाराणि प्रज्ञप्तानि तानि खलु द्वाराणि पञ्चधनुःशतानि ऊर्ध्वमुच्चत्वेन, अर्धतृतीयानि धनुःशतानि विष्कम्भेण तावदेव प्रवेशेन श्वेतवरकनक स्तूपिकाक द्वारवर्णको यावद् वनलता । तस्य खलु सिद्धायतनस्य अन्तः बहुसमरणीय भूमिभागः प्रज्ञप्तः, स यथानामकः अलिङ्गपुष्कर इति वा यावत् तस्य खलु सिद्धायतनस्य खलु बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु महानेको देवच्छन्दकः प्रज्ञप्तः पञ्च धनुः शतानि आयामविष्कम्भेण सातिरेकाणि पञ्चधनुः शतानि उर्ध्वमुच्यत्वेन सर्वरत्नमयः अत्र खलु अष्टशतं जिनप्रतिमानां जिनोत्सेधप्रमाणमात्राणां संनिक्षिप्तं तिष्ठति, एवं यावत् धूपकटुच्छुका ॥ सू० १५ ॥ टीका - - ' कहि णं भंते !" इत्यादि । 'कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे वेयड्ढपच्चए सिद्धायययणकूडे पण्णत्ते' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे भारते वर्षे वैताढ्य पर्वते - - मध्य जम्बूद्दीपान्तर्वर्त्ति भरत - Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ wwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww प्रकाशिका टीका सू १५ सिद्धाय ननकूटवर्णनम् १०९ क्षेत्रस्थितवैताढ्यपर्वते सिद्धायतनकुटं क्व कस्मिन् भागे खलु प्रज्ञप्तम् ? भगवानाह'गोयमा! पुरत्थिमलवणसमुदस्स' हे गौतम पौरस्त्य लवणसमुद्रस्य पूर्व दिग्वतिलवणसमुद्रस्य 'पच्चत्थिमेणं' पश्चिमेन-पश्चिमायां दिशि 'दाहिणड्ढभरहकूडस्स पुरत्थिमेणं' दक्षिणार्द्धभरतकूटस्य पौरस्त्येन-पूर्वस्यां दिशि 'एत्थ णं जंबूदीवे दीवे भारहे वासे वेयड्ढे पबए सिद्धाययणकूडे णामं कूडे पण्णत्ते' अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वोपे भारते वर्षे वैताढय. पर्वते सिद्धायतनकूटं नाम कूटं प्रज्ञप्तम् । तस्य उन्नतत्वादि प्रमाणमाह-'छ सकोसाई' इत्यादि । तत् सिद्धायतनकूट 'छ सकोसाई जोयणाई उड्डे उच्चत्तेणं' सक्रोशानि क्रोशेन सहितानि षट् -पटसंख्यानि योजनानि ऊर्ध्वम् उच्चत्वेन प्रज्ञप्तम् । तथा 'मूले छ सकोसाइं जोयणाइं विक्खंभेणं' मूले-मूलप्रदेशे सक्रोशानि-क्रोशसहितानि षट् योजनानि विष्कम्भेण विस्तारेण, 'मज्झे देसूणाई पंच जोयणाइं विक्खंभेणं' मध्ये मध्यभागे देशोनानि-किश्चिदेशेन न्यूनानि पञ्च योजनानि विष्कम्भेण, 'उवरि साइरेगाई तिणि जोयणाई विखंभेणं' उपरि-उर्ध्वभागे सातिरेकाणि-किश्चिदधिकानि "कहिणं भंते! जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे वेयड्ढपव्वए' इत्यादि । टोकार्थ- गौतम स्वामी ने इस सूत्र द्वारा प्रभु से ऐसा पूछा है-हे भदन्त ! जम्बूद्वीप नामके द्वीप में स्थित जो भरत नाम क्षेत्र है और उस भरतक्षेत्र के बीचमें जो विजयाध नाम का पर्वत है सो उस पर्वत पर सिद्धायतन नामक कूट किस भाग में कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "गोयमा ! पुर थमलवणसमुदस्स पच्चस्थिमेणं दाहिणद्धभरहकूडस्स पुरत्थिमेणं एत्थ णं जंबूद्दीवे दीवे भारहे वासे वेयड्ढपव्वए सिद्धाययण कूडे णामं कूडे पण्णते “हे गौतम ! पूर्वदिग्वीलवण समूद्र की पश्चिमदिशा में तथा दक्षिणार्ध भरतकट की पूर्वदिशा में जम्बूद्वोपस्थित भरतक्षेत्र के मध्य में रहे हुए वैताढ्यपर्वत के ऊपर सिद्धायतन कूट कहा गया है। "छक कोसाई जोयणाई उड्ढे उच्चत्तेणं मूठे छ सक्कोसाई जोयणाई विक्खंभेणं मज्झे देसूणाई पंचजोयणाइं विक्खंभेणं उवरिं साइरेगाई तिण्णि जोयणाई विखंभेणं, मूले देसूणाई बावीसं 'कहिण भंते ! जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे वेयडूढपवए- इत्यादि सूत्र ॥१५॥ ટીકાથ–“ગૌતમે આ સૂત્ર વડે પ્રભુને પ્રશ્ન કર્યો કે હે ભદન્ત ! જમ્બુદ્વીપ નામક દ્વીપમાં સ્થિત જે ભારત નામક ક્ષેત્ર છે અને તે ભરત ક્ષેત્રનાં મધ્યમાં જે વિજયાધ નામક પર્વત છે અને તે પર્વત પર જે સિદ્ધયતન નામક કૂટ છે તે કયા ભાગમાં આવેલ છે ? આના જવાબમાં प्रभु . छे 'गोयमा ! पुरस्थिमलवणसमुदस्त पच्चत्थिमेणं दाहिणद्धभरहकूडस्स पुरथिमेण एत्थणं जंबुद्दीवे दोवे भारहे वासे वेयड्ढ पव्वए सिद्धायतनकूडे नाम कूडे पण्ण" गौतम ! पूर्व हिवताप समुद्रमा पश्चिमायामा तभा क्षिा કુટની પૂર્વ દિશામાં જ બુદ્વીપ સ્થિત ભરત ક્ષેત્રના મધ્યમાં આવેલ શૈતાઢય પર્વતની ७५२ सिद्धायतन टूट छे. "छक्कोसाई जोयणाई उड्ढं उच्चत्तेणं मूले छसक्कोसाई जोयणाई विक्खमेण मज्झे देसूणाई पंच जोयणाई विक्वमेण उवरिं साइरेगाई तिणि जोयणाई Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अक्रोशाधिकानि त्रीणि योजनानि विष्कम्भेण, 'मूले देखणाई बावीसं जोयणाई परिक्खेवेणं' मूले देशोनानि किञ्चिदेशन्यूनानि द्वाविंशतिं - द्वाविंशति संख्यानि योजनान परिक्षेपेण-परिधिना, 'मज्झे देखणाई पण्णरसजोयणाई परिक्खेवेणं' मध्ये-मध्यभागे देशोनानि किञ्चिदेशन्यूनानि पञ्चदश पञ्चदश संख्यानि योजनानि परिक्षेपेण, 'उवरि साइरेगाई णव जोयणाई परिक्खेवेणं' उपरि- उपरितनमागे सातिरेकाणि-साधिकानि नव-नवसंख्या नियोजनानि परिक्षेपेण, 'मूले वित्थिपणे' मूले विस्तीर्णे विस्तारयुक्तम् 'मज्झे संखिते' मध्ये मध्यभागे संक्षिप्तं संकुचितम् ' उप्पि तणुए' उपरिऊर्ध्वमागे तनुकं - - प्रतलम् अत एव 'मूलमध्योर्ध्वेषु क्रमशो विस्तारसंक्षेप-तनुत्वसत्वात् ' 'गोपुच्छ संठाणसंठिए' गोपुच्छसंस्थानसंस्थितं - गोपुच्छाऽऽकारेण संस्थितम् पुनः 'सव्वरयणामए' सर्वरत्नमयं - सर्वात्मना रत्नमयम् ' अच्छे सण्हे जाव पडिरूवे ' अच्छं श्लक्ष्णं यावत् प्रतिरूपम्, तत्र अच्छम् - आकाशस्फटिकवदति निर्मलम् - "इलक्ष्णं श्लक्ष्णपुद्गलस्कन्ध निर्मितवदतिचिक्कणम्, यावत् यावत्पदेन लष्टं घृष्टं मृष्ट नीरजस्कं निर्मलं निष्पङ्कं निष्कङ्कटच्छायं सप्रभं समरीचिकं सोद्धोतं प्रासादीयं दर्शनीयम् अभिरूपम्" इत्येषां सङ्ग्रहो बोध्यः, तथा प्रतिरूपम् एषां व्याख्या चतुर्थसूत्रतो बोध्या । जोयणाई परिक्खेवेणं' यह सिद्धायतन कूट एक कोश ६ योजन का ऊँचा है मूल में इसका विस्तार एक कोश सहित ६ योजन का है मध्य में इसका विस्तार कुछ कम पांच योजना का है, उर्ध्वभाग में इसका विस्तार तीन योजन का एवं कुछ अधिक आकोश का है मूल में इसकी परिधि कुछ कम २२, योजन की है मध्यभाग में इसको परिधि कुछ कम १५ योजन की है, ऊपर मैं इसकी परिधि कुछ अधिक नौ योजन की है इस तरह यह मूल में विस्तार युक्त है, मध्यभाग में संकुचित हैं और ऊपर में प्रतल है अत एव यह गोपुच्छ के आकार जैसा हो गया है । यह पर्वत सर्वात्मना रत्नमय है और अच्छ से लेकर प्रतिरूप तक के समस्त विशेषणों से युक्त हैं । इन अच्छ आदि समस्त पदोंकी व्याख्या चतुर्थ सूत्र में की जा चुकी है अतः वही से यह देख लेना चाहिये यह सिद्धायतन कट विषखंभेणं, मूले देसूणाई बावीस जोयणाई परिक्खेवेणं” मा सिद्धायतन ड्रेट भेउ गाउ ૬ ચેાજન જેટલેા ઊંચા છે. મૂલમાં આના વિસ્તાર એક ગાઉ સહિત ૬ ચૈાજન જેટલે છે. મધ્યમાં આના વિસ્તાર કૃષ્ટ ક્રમ પાંચયેાજન જેટલે છે. ઉર્ધ્વ ભાગમાં આને વિસ્તાર ત્રણ ચૈાજન તેમજ કંઇક વધારે અ`ગાઉ જેટલા છે. મૂલમાં આની પરિધિ કંઈક કમ ૨૨ ચેાજન જેટલી છે. મધ્યભાગમાં આની પરિધિ કર્યાંઈક કમ ૧૫ ચેાજન જેટલી છે. ઉપરની એની પરિધિ કંઈક વધારે નવ ચાજન જેટલી છે. આમ આ મૂલમાં વિસ્તાર યુક્ત છે. મધ્યભાગમાં સ‘કુચિત છે અને ઉપર પ્રતલ છે. એથી આ ગેાપુચ્છના આકાર જેવા થઇ ગયા છે. આ પર્યંત સર્વાત્મના રત્નમય છે અને અચ્છથી પ્રતિરૂપ સુધીના સમસ્ત વિશેષણેથી ચુક્ત છે. આ અચ્છ વગેરે સર્વ પદોની વ્યાખ્યા ચતુર્થ સૂત્રમાં કરવામાં આવી છે. એથી ११० Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू, १५ सिद्धायतनकूटवर्णनम् १११ 'से णं एगाए' तर सिद्धायतनकूटं खलु एकया 'पउमवरवेइयाए' पद्मवरवेदिकया 'एगेण य' एकेन च 'वणसंडेणं' वनपण्डेन 'सव्वओ समंता संपरिक्खित्ते' सवेतः समन्तात् संपरिक्षिप्त-परिवेष्टितम् । पद्मवर वेदिकावनषण्डयोर्दै यविस्तारप्रमाणं वर्णनं च जम्बूद्वीपजगतीगत पद्मवरवेदिकावनषण्डयोरिव बोध्यम् । एतदेव सूचयितुमाह-- 'पमाणं बण्णओ दोण्हंपि' प्रमाणं वर्णको द्वयोरपीति । तथा 'सिद्धाययणकूडस्स णं उप्पि' सिद्धायतनकूटस्य खलु उपरि-ऊर्ध्वभागे 'बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते' बहुसमरमणियः भूमिभागः प्रज्ञप्तः, ‘से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव वाणमंतरा देवा य जाव विहरंति' स यथानामकः आलिङ्गपुष्कर इति वा यावद् व्यन्तरा देवाश्च यावद् विहरन्ति । अत्र एक पद्मवरवेदिका से और एक वनपंड से सब ओर से घिरा हुआ है पद्मवर वेदिका और वनषण्ड का वर्णन लम्बाई चौड़ाई को लेकर जैसा जम्बूद्वीप की जगती की पद्मवरवेदिका का और उसके वनषण्ड का पहिले किया जा चुका है वैसा ही है । इसी बात को सूचित करने के लिए सूत्रकारने "प्रमाणं वर्णको द्वयोरपीति' ऐसा सूत्र पाठ कहा है । "सिद्धाययणकूडस्स णं उपि बहुसमसमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते" उस सिद्धायतनकूट के ऊपर बहुसमरमणीय भूमिभाग कहागया है "से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव वाणमंतरा देवा य जाब विहरंति" वह बहुसमरमणीय भूमि ऐसी बहुसम है कि जैसा बहुसम मृदङ्ग का मुखपुट होता है यावत् यहां अनेक व्यन्तर देव आदि अपने समय को आनन्द से व्यतीत करते रहते हैं यहां यावत्पद द्वय से राजप्रश्वोयसूत्र के १५वे सूत्र से लेकर १९वे सूत्रतक जो पाठ कहा गया है वह गृहोत हुआ है. इस समस्त पाठ का अर्थ हमने उसकी सुबोधिनी टीका में लिखा है अतः वहीं से इस विषय को समझ लेना चाहिये ! ત્યાંથી આ વિષે વાંચી લેવું જોઈએ આ સિદ્ધાયતફટ એક પદ્મવરવેદિકાથી અને એક વનપંડની ચારે બાજુએથી ઘેરાયેલો છે. પદ્મવરવેદિકા અને વનખંડનું વર્ણન લંબાઈ તેમજ ચડાઈની અપેક્ષાઓ જેમ જંબૂદીપની જગતિની પદ્મવર વેદિકા અને તેના વનણંડનું પહેલા ४२वामा मान्यु छे त छ. म पातन सूयित ४२१। भाट सूत्रधारे 'पमाण वर्णको द्वयोरपीति' मा तने। सूत्र 41s छे. सिद्धाययणकूडस्स ण उदिप बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते" ते सिद्धायतन टनी 6५६ महुसम २मणीय भूमिला छे. "से जहा णामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव वाणमंतरा देवा य जाब विहरंति" ते समरभनीय भूमिमा मृा भुभवत બટ્સમ છે. યાવત્ અહીં અનેક વ્યતર દેવ આદિ પિતાના સમયને આનંદ પૂર્વક પસાર કરે છે. અહીં ચાવત્પદયથી રાજપ્રશ્રીયસૂત્રના ૧૫માં સૂત્રથી ૧૯ માં સૂત્ર સુધી જે પાઠ કહેવામાં આવેલ છે તેનું ગ્રહણ સમજવું આ સમસ્ત પાઠને અર્થ અમે ત્યાં સુબે ધિની ટીકામાં લખે છે એથી આ સંબંધમાં ત્યાંથી જ જાણી લેવું જોઈએ. Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे यववत्पदद्वयेन राजप्रश्नीयसूत्रस्य पञ्चदश सूत्रादारभ्य एकोनविंशतितमसूत्रतः पाठः संग्राह्यः, तदर्थश्च तत्रैव मत्कृतसुबोधिनीटीकातोऽवसेय इति । 'तस्स णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभागे' तस्य खलु बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे,-अत्यन्तमध्यदेशभागे 'एत्थ णं महं एगे सिद्धाययणे पण्णत्ते' अत्र खलु एकं महत् विशालं सिद्धायतनं प्रज्ञप्तम् , तस्य प्रमाणमाह 'कोसं आयामेणं' क्रोशम् एक क्रोशम् आयामेन दैर्येण 'अद्धकोसं' अर्द्धक्रोशम् क्रोशस्यार्द्धम् 'वेक्खंभेणं' विष्कम्भेण विस्तारेण, 'देसूणं कोसं उड्ढं उच्चत्तेणं' देशोनं किञ्चिद्देशन्यून क्रोशम् ऊर्ध्वम् उच्चत्वेन प्रज्ञप्तम् । इत्थं प्रमाणमुक्त्वा सम्प्रति तद्वर्णनमाह'अणेगखभसयसंनिविटे' अनेक स्तम्भशतसन्निविष्टम् अनेकानि बहूनि स्तम्भशतानि सन्निविष्टानि संलग्नानि यत्र तत् अनेकशतस्तम्भयुक्तमित्यर्थः, तथा 'खंभुग्गयसुकयवइर वेइया तोरण वररइयसालभंजियाग सुसिलिट्ठविसिट्ठलट्ठसंठिय पसत्थ वेरुलियविमल खंभे स्तम्भोद्गतसुकृतवज्रवेदिकातोरणवररतिदशालभजिकाकमुश्लिष्टविशिष्टलष्टसस्थितं प्रशस्त वैयविमलस्तम्भम् तत्र स्तम्भेषु उद्गताः निविष्टाः सुकृताः निपुणशिल्पिरचिता ___ "तस्स णं बहुसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभागे एत्थणं महं एगे सिद्धाययणे पण्णत्ते" उस बहुसमरमणीय भूमिभाग के टीक बीच में एक विशाल सिद्धायतन कहा गया है, यह "कोसं आयामेणं, अद्धकोसं विक्खंभेणं, देसूणं कोसं उड्ढं उच्चत्तेणं" सिद्धायतन लम्बाई में एक कोश का है और विस्तार में आधे कोश का है. तथा कुछ कम एक कोश का उँचा है. 'अणेगखभसयसंनिविद्वे" यह अनेक सौ खंभो के ऊपर रहा हुआ है. "खंभुग्गय सुकयवरवेइया तोरणवररइयसालभंजियागं सुसिलिट्ठ विपिट्ठ लट्ठसंठियपसत्थवेरुलियविमलखंभे' प्रत्येक स्तम्भ के ऊपर निपुण शिल्पिजनो द्वारा रचित नैसी वज्रवेदिकाएँ और तोरण हैं तथा श्रेष्ठ एवं नेत्रमन को हर्षित करने वाली शालभंजिक एँ बनी हुई हैं । इस सिद्धायतन के जो वैयनिर्मित स्तम्भ हैं वे सुश्लिष्ट- अच्छी तरह से जमे हुए हैं विलक्षण हैं-ये किस प्रकार से ___ "तस्सणं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेस भागे पत्थणं महं एगे सिद्धाययणे पण्णत्ते ते पसभरमणीय भूमिमायना स२ मध्यम : वि सिद्वायतन मावत छ. "कोसं आयामेणं अद्धकोस विक्रमेण देसूण कोस उड्ढं उच्चत्तेण" सिद्धायतनमा માં એક ગાઉ જેટલું છે અને વિસ્તાર માં અદ્ધ ગાઉ જેટલું છે, કંઈક કમ એક ગાઉ २८९ यु छ. "अणेगखंभसयसंनिविठे" मा अनेसो थामखानी ५२ स्थित छ. "खभुग्गय सुकयवरवेड्या तोरणवररइअसालभंजियाग सुसिलिट्ट विसिलठ्ठ संठिय पसत्थ वेरुलियविमलखंभे ४२४ तानी ५२ निपुथ शि५४१२। निर्मित 40 सा भने તેરસે છે તથા શ્રેષ્ઠ અને નેત્ર મનને હર્ષિત કરનારી શાલ ભંજિકાઓ બંનેલી છે. આ સિધ્ધાયતનના જે ડૂર્ય રત્નનિર્મિત સ્તંભે છે. તે સુલિષ્ટ સારી રીતે લિષ્ટ થયેલા છે. વિલક્ષણ છે શિલાકારોએ એમનું નિર્માણ કેવી રીતે કર્યું હશે ? આ પ્રમાણે જેનારાઓ Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० १५ सिद्धायतनकूटवर्णनम् इव वज्रवेदिकास्तोरणानि वररतिदशालभजिकाः वराः श्रेष्ठाः रतिदाः नेत्रमनः सुखदाः शालभञ्जिकाश्च यत्र तत् स्तम्भोगतसुकृतवज्रवेदिका तोरणेवररतिदशालभञ्जिकाकं, तथा सुश्लिष्टाः मुष्ठु मिलिताः विशिष्टाः विलक्षणाः लष्टसंस्थिताः सुन्दरसंस्थानयुक्ताः, अतएव प्रशस्ताः वैडूर्यविमलस्तम्भाः वैडूर्यरत्नमयनिर्मलस्तम्भा यत्र तत् मुश्लिष्टविशिष्टलष्टसंस्थितप्रशस्तवैडूर्यविमलस्तम्भम्, ततः पदद्वयस्य कर्मधारय इति । तथा 'नानामणिरयणखचियउज्जलबहुसमसुविभत्तभूमिभागे' नानामणि कनकरत्नखचितोज्ज्वलबहुसमसुविभक्तभूमिभाग-नानामणिभिः अनेकप्रकारकमणिभिः कनकैः स्वर्णैः रत्नश्च चितः युक्तः उज्ज्वल: विशुद्धः बहुसमः अत्यन्तसमः मुविभक्तः कृतसम्यग्विभागो भूमिभागो यत्र तादृशम्, तथा 'ईहामिगउसभतुरगणरमगरविहगवालगकिन्नररुरुसरभचमरकुंजरवणलय जाव पउमलयभत्तिचित्ते' इहामृगतृषभतुरगनरमकरविहगव्यालककिन्नररुरुशरभचमरकुन्जर वनलता यावत् पमलता भक्तिचित्रम्तत्र-इहामृगो वृकः वृषभो बलीवईः, तुरगः अश्वः, नरः मनुष्यः, मकरः ग्राहः, विहगः पक्षी, व्यालकः व्याल:-सर्पः स एव व्यालकः, किन्नरः व्यन्तरदेव विशेषः, रुरु-मृगः, शरभः अष्टापदो वन्यजन्तुविशेषः चमरः वन्या गौः, कुजरः-हस्ती वनलतावनोत्पन्नलता यावत्-यावत्पदेन नागलता अशोकलता चम्पकलता चूतलता वासन्तिकालताऽतिमुक्तकलता कुन्दलतानां सेग्रहः, तथा-पद्मलता कमलिनी चैषां भक्त्याबनाये गये होगे इस तरह के आश्चर्य देने वाले हैं लष्ट संस्थित-सुन्दर आकार वाले हैं एवं प्रशस्त हैं और विमल -निर्मल हैं । "णाणामणिरयणखचिय उज्जल बहुसम सुविभत्तभूमिभागे" इस सिद्धायतन का जो भूमिभाग है वह अनेक मणियों से स्वर्णों से और रत्नों से खचित है अतएव वह उज्ज्वल है और अत्यन्तसम है. तथा-"ईहामिग उसभतुरगणरमगरविहगवालग किन्नरहरुसरभचमरकुंजरवणलय जाव पउमलयभत्तिचित्ते" यहां ईहामृग-वृक-वृषभ-बैल, तुरगअश्व, नर, मनुष्य, मकर-मगर, विहग-पक्षी, व्याल-सर्प, किन्नर-व्यन्तरदेवविशेष, रुरु-मृग, शरभ-अष्टापद, चमर-चमरीगाय कुञ्जर-हाथी, वनलता-वनोत्पन्नवेल, तथा यावत्पद-गृहीत-नाग लता, अशोकलता, चम्पकलता, चूतलता, वासन्तिकीलता, अतिमुक्तकलता, कुन्दलता तथा पद्मજોઈને આશ્ચર્ય પામે તેવા એ સ્તંભે છે. લષ્ટ-સંસ્થિત સુંદર આકાર વાળા છે, તેમજ प्रशस्त छ भने मिनिस छ. "णाणा मणि खचिअ उज्जल बहुसुविभत्त भूमि भागे" આ સિદ્ધાયતનને જે ભૂમિભાગ છે તે અનેક મણિયેથી સ્વથી અને રત્નથી ખચિત છે. એથી asaraa छ भने सत्यत सम छ. म 'ईहामिग उसमतुरगणरमगरविहगवालग किन्नरहरु सरभ चमरकुंजरवणलयजाव पउमलयभत्तिचित्ते" मडी छामृग ,वृषभ मजह तु म, न२ मनुष्य, भ४२ भगर, [१ -५क्षा, व्यास-स५, निर व्यंतरवविशेष. મૃગ, શરભ અષ્ટાપદ, ચમાર ચમરી ગાય કુંજર હાથી વનલતા વનત્પન લતા તથા થાપત્ય ગૃહીત નાગલતા અશેલતા ચંપકલતા ચૂતલતા, વાસંતિકી લતા અતિમુકતકલતા કુંદલતા Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे रचनया चित्रम् अद्भुतम् तथा 'कंवणम णिरयणभिगाए' काञ्चनमणिरत्नं स्तूपिकाकाञ्चनं सुवर्णमणिः-मरकतादि:-रत्नं वैडूर्यादि तन्मयी स्तू पका यस्य तत्तथा पुनः की शम्: 'णाणाबिह पंच०' नानाविधपञ्चवर्णमणिभिः- अनेकजातीय कृष्णादिवर्णमणिभिः उपशोभितम्-अलंकृतम् । तत्र मणोनां वर्णगन्धरसस्पर्शानां 'वण्णओ' वर्णकः वर्णनपरः पदसमूहः प्राग्वत् । तथा 'घंटापडागपरिमंडियग्गसिहरे' ' घण्टापताकापरिमण्डितामशिखरं घण्टाभिः पताकाभिश्च परिमण्डितम् सुशोभितम्-अग्रशिखरम् उपरितनभागो यस्य तत् तथा 'धवले' धवलं-शुक्लवर्णम् 'मरीइकबयं' मरीचिकवचं किरणसमूहपरिक्षेपं 'विणिम्मुयंते' विनिर्मुञ्चत् -निःसारयत् तथा 'लाउल्लोइयमहिए' लायितोल्लायितमहितं-लायितं-गोमयादिना भूम्युपलेपनम् , उल्लायित सेटिकादिभिः(श्वेतमृत्तिकादिभिः) कुड्यसमूहस्य संमृष्टीकरणम् आभ्यां महितं परिष्कृतमिव, तथा 'जाव झया' यावद् ध्वजाः इति । लायितोल्लायितमहितमित्यनन्तरं 'धनाः' इत्यतः लता कमलिनी इन सबके चित्र बने है. इससे वह सिद्धायतन अद्भुत जैसा प्रतीत होता है 'कंचणमणि रयणथूभियाए, णाणाविहपंचवण्णओ,घंटापडाग परिमंडियग्गसिहरे धवले मरीइकवयं विणिम्मुयंते "कंचन-सुवर्ण, मरकत आदि मणि और वैर्य आदि रत्न इनसे उसकी शिखर बनी हुई है अनेक प्रकार के कृष्णादि वर्णोपेत मणियों से वह सिद्धायतन सुशोभित है यहां मणियों के वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्शी का वर्णन परक पद समूह जैसा पहले कहा गया है-वैसा ही वह यहां पर भी कह लेना चाहिये इसका अग्रशिखर-उपरितनभाग घण्टा और पताकाओं से परिमंडित है यह सिद्धायतन धवल है. तथा किरणों के समुदाय की- प्रभाजाल को प्रति समय छोड़ता रहता है "ला उल्लोइय." इसकी भित्तियां सेटिकादि से-चूने की कली आदि सेपुनी हुई हैं और जमोन इसको गोमयादि से लिप्त रहती है- इससे यह बड़ा ही सुहावना लगताहै, "जाव झया" यावत् ध्वजाएँ इसके ऊपर फहराती रहती हैं यहां यावत्पद से जिन તેમજ પદ્મવતા કમલિની આ સર્વના ચિત્રો બનેલા છે. એથી આ સિદ્ધાયતન અદભુત युवा छे 'कंत्रणमणिरयणभूभियाए णाणाविहपंच० वण्ण भो, घंटा पडागपरिमंडियग्गसिहरे धवले मरीइकवयं बिर्णिम्मुयते" यन सुवर्ष भ२४१ वगेरे मणि माहौर्य આદિ રત્નથી તેનું શિખર બનેલું છે. અનેક પ્રકારના કૃષ્ણાદિ વર્ણોપેત મણીઓથી તે સિદ્ધાયતન સુશોભિત છે. અહીં મણિઓના વર્ણ, ગબ્ધ, રસ અને સ્પર્શના વર્ણન સંબંધી ૫દ સમૂહ જેમ પહેલા કહેવામાં આવેલ છે તેમ સમજી લેવો જોઈએ. આનું અગ્રશિખર ઉપરિતન ભાગ ઘંટા અને પતાકાઓથી પરિમંડિત છે. આ સિદ્ધાયતન ધવલ छ त मा २५ सभूलाने-माने प्रतिसमय प्रसत ४२तु २७ छ. "लाउल्लोइय." આની દિવાલે સેટિકાદિથી–ચૂના વગેરેથી ઘેાળેલી રહે છે અને એની જમીન ગોમયાદિથી वित २७ छ मेथी भाग २नियामा लागेछ 'जाव झया' यावत यानी 6पर લહેરાતી રહે છે. અહીંયાવ૫૮થી જે પસંગૃહીત થયેલ છે તે પદનું વિવરણ યમિકા Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १५ सिद्धायतनकूटबर्णनम् पूर्व यानि पदानि तानि वक्ष्यमाण यमिकाराजधानी वर्णनप्रसङ्गे वक्ष्यन्तेऽतस्तानि न वित्रियन्ते इति बोध्यम् । 'तस्स णं सिद्धाययणस्स तिदिसि' तस्य खलु सिद्धायतनस्य त्रिदिशि - तिसृणां दिशां समाहार स्त्रिदिक् तस्मिन् तिसृषु दिक्षु 'तओ दारा पण्णत्ता' त्रीणि त्रिसंख्यकानि द्वाराणि प्रज्ञप्तानि । ' ते णं दारा पञ्च धणुसयाई' तानि खलु द्वाराणि पञ्च धनुश्शतानि पञ्चशत धनुः प्रमाणानि ५०० 'उडूढं उच्चत्तेणं अड्डाइज्जाई' ऊर्ध्व मुच्चत्वेन अर्धतृतीयानि 'घणुसयाई, धनुः शतानि - सार्धद्विशत- धनुः २५० प्रमाणानि 'विक्खंभेणं' विष्कम्भेणविस्तारेण, 'तावइयं चेव पवेसेणं' तावदेव तत्प्रमाणमेव प्रवेशेन प्रज्ञप्तानि । तानि कीहशानि ? इत्याह- 'सेयवरकण गथुभियाए ' श्वेतानि शुक्लवर्णानि वरकनक- स्तृपिकाकानिउत्तमस्वर्णमयस्तृपिका युक्तानि अत्र 'दार वण्णओ'द्वारवर्णकः- द्वारवर्णनपरः पदसमूहो वक्तव्यः सकियन्तः ? इत्याह 'जाव वणमाला' यावद् वनमाला इति वनमाला वर्णनपर्यन्तो वर्णको बोध्य इत्यर्थः । अयं वर्णकोऽस्यैवाष्टमसूत्रे विलोकनीय इति । ११५ अथ सिद्धायतनस्य भूमिभागं वर्णयितुमाह - ' तस्स णं' तस्य पूर्वोक्तस्य खलु पदों का संग्रह हुआ है उन पदों का विवरण यमिका राजधानी के वर्णन प्रसङ्ग में किया जायगा इसलिये यहां उनका विवरण नहीं किया है. " तस्स णं सिद्धाययणस्स तिदिसि तम दारा पण्णत्ता" उस सिद्धायतन के तीन द्वार तोन दिशाओं में कहे गये हैं " तेणं दारा पंचधणुसयाई उड्ढं उच्चत्तेणं अड्ढाइज्जाईं धणुसाईं विक्खंभेणं तावइयं चेव पवेसेणं सेयवर कणगथुभियाग, दार वण्णओ जाव वणमाला " ये द्वार ५०० पांच सौ धनुष के ऊँचे हैं और २५० अढाई सौ धनुष के विस्तार वाले-चौड़े हैं । और इतना ही इनका प्रवेश है । ये द्वार सफेद हैं और इनकी शिखरें श्रेष्ठ सुवर्ण की बनी हुई हैं। यहां द्वारों का वर्णन करने वाला पद समूह वन माला वर्णन तक का जो इसी के आठवें सूत्र में कहा जा चुका है यहां पर भी कह लेना चाहिये. 'तस्स णं सिद्धाययणस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते' उस सिद्धायतन का રાજધાનીના વન પ્રસંગમાં કરવામાં આવશે. એટલા માટે જ અહી આનુ વર્ણન કરવામાં याव्यु नथी. " तस्स णं सिद्धाययणस्स तिदिसिं तओ दारा पण्णत्ता' ते सिद्धायतनना त्रषु द्वारे द्विशामां आवे छे. “तेणं दारा पंचधणु सयाइ उडढ़ उच्चत्तेण अड्ढाइज्जाई धणु सयाई विक्रमेणं तावइयं चैव पवेसेणं सेयवर कणगथूमियाग दारवण्णओ जाव वणमाला " એ દ્વારા ૫૦૦ પાંચસે ધનુષ જેટલાં ઉંચાં છે. ૨૫૦ અઢીસેા ધનુષ જેટલા વિસ્તાર વાળા છે. ચેાડા છે તેમજ એટલે એમના પ્રવેશ છે, એ દ્વારા શ્વેત છે અને એમનાં શિખર શ્રેષ્ટ સુવર્ણ નિમિત છે. આ ગ્રન્થના આઠમો સૂત્રમાં વનમાલા સુધી જે દ્વાર વિષયક વર્ણન કરનાર પદ્મ સમૂહ છે તે અહી પશુ જાણવા જોઈએ 'तस्मण सिद्धाययणस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते' ते सिध्धयतन नो Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११६ जम्बूद्वीपप्रशतिसूत्रे 'सिद्धाययणस्स' सिद्धायतनस्य 'अन्तो' अन्तः - मध्ये 'बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, बहुसमरमणीयः भूमिभागः प्रज्ञप्तः कथितः 'से जहाणामह आलिंगपुक्खरेइ वा जाव' स यथानामक आलिंगपुष्कर इति बा यावत् । यावत्पदेन -'आलिंग पुष्कर इति वा' इत्यारभ्य ' तस्य खलु सिद्धायतनस्य' इत्यतः पूर्वं 'नानाविधपञ्चवर्णैर्मणिभिरुपशोभितः इत्यन्त पदसंग्रहोत्र कर्तव्यः इति । , 'तस्स णं सिद्धाययणस्स' तस्य खलु सिद्धायतनस्य सिद्धायतनसम्बन्धिनो 'बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेस भाए' बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे-अत्यन्त मध्यदेशभागे 'एत्थ णं' अत्र इह खलु 'मह' महान विस्तृतः 'एगे देवच्छंदए' एकः देवच्छन्दकः- देवासन विशेषः 'पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः, स च देवच्छन्दकः 'पंचधणुसयाई' पञ्चधनुःशतानि 'आयाम बिक्खंभेणं' आयामविष्कम्भेण दैर्ध्य विस्ताराभ्याम् 'साइरेगाई' सातिरेकाणि किञ्चिदेशाधिकानि 'पंचधणुसयाई' 'उड़ढं उच्चत्तेणं' 'पञ्चधनुः शतानि ऊर्ध्वमुच्चत्वेन स पुनः 'सब्वरयणामए' सर्वरत्न - मयः - सर्वात्मना रत्नमयः । ' एत्थणं' अत्र इद्द अनन्तरवर्णित देवच्छन्दके स्खलु भीतरी भूमिभाग बहु समरमणीय कहा गया है ' से नहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा नाव तस्स णं सिद्धाययणस्स णं बहुसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महं एगे देवच्छंदए पण्णत्ते' वह भूमिभाग ऐसा बहुसम है जैसा कि मृदङ्ग का मुखपुट बहुसम होता है इत्यादिरूप से इस भूमिभाग के वर्णन में जैसे उपमावाची पद पहिले क गये हैं वे ही उपमावाचीं सब पद यहां पर भी कहलेना चाहिये और यह भूमिभाग का वर्णन "वह नाना प्रकार के पांचवर्णों वाले मणियों से सुशोभित हैं इन अन्तिम पदों द्वारा वहां जैसा किया गया है वैसा ही यहां पर भी यह इन अन्तिमपदों द्वारा वर्णित कर लेना चाहिये उस सिद्धायतन के बहुमध्यदेशभाग में एक विशाल देवच्छंद - कहा गया है । देवच्छंदक देवासनविशेषरूप होता है । यह देवच्छेदक 'पंचघणुसयाई उड़्ढं उच्चत्तेणं सव्वरयणामए' ऊँचाई में पांच सौ धनुष का हैं तथा सर्वात्मना रत्नमय अदृश्नो भूभिलोग महुस भरमा वामां आवे छे, “से जहाणाम अलिंग क्वा नाव तणं सिद्धाययणस्स बहुसमरमणिज्जरस भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभा पत्थण महंगे देवच्छंद पण्णत्ते' ते भूमिभागमृग भुजपुटवत् महुसम छे. त्याहि३यमां આ ભૂમિભાગનું વણુન કરતાં જે પ્રમાણે ઉપમાવાચી પર્દા પહેલાં કહેવામાં આવેલા છે તે ઉપમાવાચી સવ પદો અહી પણ્ કહેવા જોઈએ આ ભૂમિભાગનું વર્ણન તે નાના પ્રકારના પાંચ વર્તાવાળા મણુિઓથી સુશાભિત છે, એ અતિમ પદ્મા વડે ત્યાં જેવું કરવામાં આવ્યું છે તેવું અહીં પણ એ અ`તિમ પદે વડે વિણત સમજી લેવું જોઈએ તે સિદ્ધાય તન મહુમધ્ય દેશભાગમાં એક વિશાળ દેવ કાંઇક કહેવાય છે. આ દેવચ્છ ક દેવાસન વિશેષ होय छे. आ देवच्छ ६४ "पंचधणुसया उडदं उच्चतेण सव्वरयणामप" अयामां पांयसो Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १५ सिद्धायतनकूटवर्णनम् 'अट्ठसयं' अष्टशतम् अष्टोत्तरशतम् 'जिणयडिमाणं जिणुस्सेहप्पमाणमित्ताणं' कामदेवप्रतिमानां कामदेवोत्सेधप्रमाणमात्राणां कामदेवशरीरोच्चत्वप्रमाणप्रमिताम् 'संनिखित्तं' सन्निक्षिप्त-संरक्षितं 'चिट्ठइ' तिष्ठति । इतोऽनन्तरं 'तासां खलु कामदेव प्रतिमानामयमेतद्रूपो वर्णावासः प्रज्ञप्तः, इत्यारभ्य' 'अष्टशतं धूपकटुच्छुकानां सन्निक्षिप्तं तिष्ठति, इति पर्यन्तः पाठः संग्राह्यः । अमुमेवार्थ सूचयितुमाह-'जाव धृवकडुच्छुगा' इति । स च, पाठो राजप्रश्नीयसूत्रस्य अशीतितमैकाशीतितमसूत्रतो द्रष्टव्यः । तदर्थश्च तत्रैव मत्कृता सुबोधिनी टीकातोऽवसेय इति ॥ उक्तश्च-'अर्हन्नपि जिनश्चैव जिनः सामान्यकेवलो । कन्दर्पोऽपि जिनश्चैव जिनो नारायणो हरिः॥१॥॥सू०१५॥ अथ दक्षिणा भरतकूट स्वरूपमाह-- मूलम्-कहि णं भंते वेयड्ढे पव्वए दाहिणड्ढभरहकूडे णामं कूडे पण्णत्ते ? गोयमा ! खंडप्पवायकूडस्स पुरथिमेणं सिद्धाययणकूडस्स पच्चत्थिमेणं एत्थ णं वेयड्ढपव्वए दाहिणड्ढभरहकडे णामं कूडे पण्णत्ते सिद्धाययणकूडप्पमाणसरिसे जाव तस्स णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमि भागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ ण महं एगे पासायबडिसए पण्णत्ते कोसं उट्टे उच्चत्तेणं, अद्धकोसं विक्खंभेणं, अब्भुग्गयमूसिय पहसिए है । 'एत्थ णं अट्ठसयं ज़िगपडिमाणं जिणुस्सेहप्पमाणमित्ताणं संनिखित्तं चिटुइ" इस देवछंदक में जिनोत्सेधप्रमाण प्रमित १०८ कामदेव को प्रतिमाएं हैं। इन १०८ कामदेव प्रतिमाओं का वर्णावास इस प्रकार का कहा गया है इसके बाद यहां ऐसे इस पाठ से लेकर "अष्टशतं धूपकडुच्छुकानां संनिक्षिप्तं तिष्ठति" इन कामदेव प्रतिमाओं के आगे १०८ धूप से भरे हुए कडाहे रखे हुए हैं यहां तक का सब पाठ कह लेना चाहिये इसी अर्थ को सूचित करने के लिये “एवं जाव धूवकडुच्छुगा " सूत्रकार ने ऐसा सूत्रपाठ कहा है। यह पुरा का पुरा पाठ राजप्रश्नोय सूत्र के ८० और ८१ बे सूत्र से जान लेना चाहिए वहां हमने इसको सुबोधिनी टीका से उसका अर्थ स्पष्ट किया है ॥१५॥ धनुष प्रभार छ तर सर्वात्मना २मय छे. 'एत्थणं अट्ठसय जिणपडिमाण जिससेह पमाणमित्ताण संनिखित्तं चिट्टइ" १२७४i नेत्सेध प्रमाण प्रभित १०८ रन પ્રતિમાઓ વિરાજમાન છે. આ ૧૦૮ જિન પ્રતિમાઓ ને વર્કવાસ આ પ્રમાણે છે. આ પાઠથી આ જિન પ્રતિમાઓની સામે ૧૦૮ ધૂપ-પૂરિત કટાહ મૂકેલા છે. અહીં સુધી સમસ્ત પાઠ અધ્યાહત કરવા જોઈએ એના અર્થને સૂચિત કરવા માટે સત્રકારે એવા સત્રપાઠ કહે છે, આ સંપૂર્ણ પાઠ રાજપ્રનીય સૂત્રના ૮૦ અને ૮૧ સૂત્રથી જ જોઈએ ત્યાં અમે સુબોધિની ટીકામાં આનો અર્થ સ્પષ્ટ કર્યો છે. પા Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे जाव पासाईए २ । तस्स णं पासायवडिंसगस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महं एगा मणिपेढीया पण्णत्ता पंच धणूसयाई आयामविक्खंभेणं अड्डाइज्जाइं धणूसयाइं बाहल्लेणं सबमणिमई । तीसे णं मणिपेढियाए उप्पिं सीहासणं पण्णत्तं सपरिवार भाणियव्वं से केणद्वेणं भंते ! एवं वुच्चइ-दाहिणड्ढभरहकूडे दाहिणड्ढभरहकूडे ? गोयमा ! दाहिणड्ढभरहकूडे णं दाहिणड्ढभरहे णामं देवे महिड्ढोए जाव पलिओवमट्टिईए परिवसइ, से णं तत्थ चउण्हं सोमाणियसाहस्सीणं चउण्हं अग्गमहिसीणं सपरिवाराणं तिण्हं परिसाणं सत्तण्हं अणियोणं सत्तण्हं अणियाहिवईणं सोलसण्हं आयरक्खदेवसाहेस्सीणं दाहिणड्ड. भरहकूडस्स दाहिणेड्ढाए रायहाणीए अण्णेसि बहणं देवाण य देवीण य जाब बिहरइ । कहि णं भंते ! दाहिणड्वभरहस्स देवस्स दाहिणड्डा णामं रोय. हाणी पण्णता ? गोयमा ! मंदरस्स पब्बयस्स दक्खिणेणं तिरियमसंखेज्जे दीवसमुद्दे वीइवइत्ता अण्णमि जंबुद्दिवे दीवे दक्खिणेणं वारस जोयणसहस्साई ओगाहित्ता एत्थ णं दाहिणड्डभरहस्स देवस्स दाहिणड्डा गोमं रायहाणी भाणियब्धा जहाँ विजयस्स देवस्स । एवं सबकटा णेयव्वा जाब वेसमणकूडे परोप्परं पुरथिमपच्चत्थिमेणं । इमेसि वण्णावासे गाहा मज्झे वेयड्ढस्स उ कणगमया तिण्णि होंति कूडाउ । सेसा पव्वयकुडा सव्वे रयणामया होंति माणिभद्दकूडे १ वेयड्डकूडे २ पुण्णभदकूडे ३ एए तिण्णि कूडा कगगामया सेसा छप्पि स्यगामया, दोण्हं वि सरिसणामया देवो कय मालए चेव गट्ठमोलए चेव. सेसाणं छण्हं सरिसणामयो जण्णामया य कडा तन्नामो खलु हबंति ते देवा । पलिओवमट्टिईया हवंति पत्तेयं पत्तेयं ।। रायहाणीयो जंबुद्दीवे दोवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणेणं तिरियं Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-सू. १६ दक्षिणा भरतकूटनिरूपणम् असंखेज्जे दीवसमुद्दे वीईवइत्ता अण्णंमि जंबुद्दीव दीवे वारसजोयण सहस्साइं ओगाहित्ता, एत्थ णं रायहोणीओ भाणियव्वाओ विजयराय हाणी सरिसयाओ ॥सू० १६॥ छया-क्व खलु भदन्त ! वैताढयपर्वते दक्षिणार्द्धभरतकूट नाम कूटं गौतम ! खंड प्रपातक्टस्य पौरस्त्येन सिद्धायतनकूटस्य पाश्चात्येन अत्र खलु वैताव्यपर्वते दक्षिणार्द्धभरतकूटं नाम कूटं प्रशप्तम्, सिद्धायतनकूटप्रमाणसदृशं यावत् तस्य खलु बहुसमरम णीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु महानेकः प्रासादावतंसकः प्रशप्तः, क्रोशमूर्ध्वमुच्चत्वेन अर्द्धकोश विष्कम्मेण अभ्युद्गतोच्छ्रितप्रहसितो यावत् प्रासादीयः ४ । तस्य खलु प्रासादावतंसकस्य बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु महती एका मणिपीठिका प्रक्षप्ता पञ्चधनुःशतानि आयामविष्कम्मेण अर्धतृतीयानि धनुःशतानि बाहल्येन, सर्वमणिमयो तस्याः खलु मणिपीठिकाया उपरि सिंहासन प्रज्ञप्तम्, सपरिवारं भणितव्यम् । तत् केनार्थेन भदन्त ! एव मुच्यते दक्षिणाद्धभरतकूट दक्षिणार्द्धभरतकूटम् १ गौतम ! दक्षिगा भरतटेकू खलु दक्षिणाद्ध भरतो नाम देवो महद्धिको यावत् पल्योपमस्थितिकः परिवसति, स खलु तत्र चतसृणां सामानिकसाहस्रोणां, चतसृणाम् अग्रमहिषीणां सपरिवाराणां, तिसृणां परिषदां, सप्तामामनीकानां, सप्तानामनीकाधिपतीनां, षोडशानामात्मरक्षकदेवसाहस्रीणां, दक्षिणाद्ध भरतकूटस्य दक्षिणा यां राजधान्याम अन्येषां बहूनां देवानां च देवीनां च यावत् विहरति । ___व खलु भदन्त ! दक्षिणा भरतस्य देवस्य दक्षिणार्धा नाम राजधानो प्रज्ञप्ता ? गौतम ! मन्दरस्य पर्वतस्य दक्षिणेन तिर्यगसंख्येयवीपसमुद्रान् व्यतिवज्य अन्यस्मिन् जम्बूद्वीपे द्वीपे दक्षिणेन द्वादश योजनसहस्राणि अवगाह्य अत्र खलु दक्षिभरतस्य देवस्य दक्षिणार्धा नाम राजधानी भणितव्या यथा विजयस्य देवस्य। एवं सर्वकूटानि नेतन्यानि यावत् वैतश्रवणकुटम् परस्परं पोरस्त्यपश्चिमेन । एषां बर्णावासे गाथा मध्ये वैताढयस्य तु कनकमयानि त्रीणि भन्ति कूटानि तु, शेषाणि पर्वतकूटानि सर्वाणि रत्नमयानि भवन्ति ॥१॥ माणिभद्रकूटं । वैताठ्यकूटं २ पूर्णभद्रकूटं ३ पतानि त्रीणि कूटानि कनकमयानि, शेषाणि षडपि रत्नमयानि, । द्वयोः विसदृश नामको देवो कृतमालकश्चैव १ नृत्तमालकश्चैव २ शेषाणां षण्णां महशनामकाः य नामकानि च कूटानि तन्नामानः खलु भवन्ति ते देवाः । पल्योपस्थिति का भवन्ति प्रत्येक प्रत्येकम् १ राजधान्यो जम्बूद्वीपे द्वीपे मन्दस्य पर्वतस्य दक्षिणेन तिर्यगसंख्येयद्वीपसमुद्रान् व्यतिबज्य अन्यस्मिन् जम्बूद्वीपे द्वीपे द्वादश योजन सहनणि अवगाह्य, अत्र खलु राजधान्यो भणितव्याः विजयाराजराजधानी सहशिका ॥सू१६॥ Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे टीका-- 'कहि ण भंते ! वेयइढे' इत्यादि । गौतमः श्रीमहावीरस्वामिनं पृच्छति-'कहि णं भंते ! वेयड्ढे पबए दाहिणड्ढभरहकूडे णामं कूडे पण्णत्ते' हे भदन्त ! क-कुत्र खलु वैताढये पर्व ते दक्षिणा भरतकूटं नाम कूटं प्रज्ञ प्तम्,भगवानाह-'गोयमा ! खंडप्पवायकूडस्स' हे गौतम ! खण्डप्रपातकूटस्य-खण्डप्रपातगुहाकूटस्य 'पुरस्थिमेणं' पौरस्त्येन-पूर्वस्यां दिशि 'सिद्धाययणकूडस्स' सिद्धायतनकूटस्य वैताठ्यपर्वतीयप्रथमकूटस्य 'पच्चत्थिमेग' पाश्चात्त्येन पश्चिमायां दिशि 'एत्थ णंवेयड्ढपचए' अत्र खलु वैताठ्यपर्वते-वैताठ्यपर्वतोपरि 'दाहिणड्ढभरह कूडे णामं कडे पण्णत्ते' दक्षिणार्द्धभरतकूटं नाम कूटं प्रज्ञप्तम् । तत् कीदृशम् ? इति जिज्ञासायामाह-सिद्धाययणकूडप्पमाणसरिसे' सिद्धायतनकूटप्रमाणसदृशं.सिद्धायतनकूटस्य यत् प्रमाणं षट् सक्रोशानि योजनानि ऊर्ध्वमुच्चत्वेन इत्यादि वर्णकेनोक्तं त्रयोदशसूत्रे तेन सदृशं तत्प्रमाणसदृशप्रमाण कम् सिद्धायतनकूटस्य यत्प्रमाणं तदेवदक्षिणार्धभरतकूटस्यापि प्रमाणमिति भावः । एवं च षट् सक्रोशानीत्यारभ्य तस्य खलु इत्यादि पर्यन्तः दक्षिणा भरतकट का स्वरूप कथन'कहिणं भंते! वेयड्ढे पव्वए दाहिणड्ढे भरहकूडे णामं कूडे पण्णत्ते" इत्यादि । ____टीकार्थ-इस सूत्र द्वारा श्रीगौतमस्वामी ने प्रभु श्रीमहावीरस्वामी से ऐसा पूछा है-हे भदन्त! वैताढ्यपर्वत के ऊपर दक्षिणार्द्धभरतकूट नामक कूट कहां पर कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "गोयमा' खंडप्पवायकूडस्स पुरथिमेणं सिद्धाययणकूडस्स पच्चत्थिमेणं एत्थणं वेयड्ढपव्वए दाहिणड्ढभाहकूडे णामं कूडे पण्णत्ते" हे गौतम! खंडप्रपात क्ट को पूर्वदिशा में एवं प्रथम सिद्धायतन क्ट की पश्चिमदिशा में वैताढयपर्वत संबंधी दक्षिणा भरतकूट नामक द्वितीय कूट कहा गया है "सिद्धाययणकूडप्पमाण तरिसे जाव तस्सणं बहुसमरमणिज्जस्स भूमि भागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महं एगे पासायडिसए पण्णत्त' इस क्ट को ऊँचाई का દક્ષિણ ભરત ફૂટના સ્વરૂપનું કથન 'कहिण भंते वेयड्ढे पव्वर दाहिणम भरह कूडे णामड्ढे कूडे पण्णत्ते' इत्यादि सूत्र १६॥ ટીકાથ-આ સૂત્ર વડે ગૌતમે પ્રભુ શ્રી મહાવીરસ્વામી ને પ્રશ્ન કર્યો કે હેભદત વૈતાઢય પવત ५२६क्षिणा मरत नामेट याथणे मावस छे. अनासपासमा छ "गोयमा खंडप्प वाय कूडस्त पुरथिमेण सिद्धाययणकूडस्प पच्चत्थिमेणं एत्थण वेयड्ढपब्वए दाहिणबदभरहकूडे णामं कूडे पण्णत्ते' प्रपात कूटनी पूर्व दिशाम वैतादय पत साधा भरतट नामे द्वितीय 2 आवे छे. 'सिद्धाययणकूडप्पमाणसरिसे जाव तस्स ण बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्त बहुमज्झदेसभाए पत्थणं महं एगे पासायवडिसए पण्णत्ते' मा झूट यातु प्रमाण सिध्यायतन इटनी या १२२ यामा અાવેલ છે. એટલે એક ગાઉ અધિક છચા જન જેટલી એની ઉંચાઇ છે. સિદ્ધાયતન કુટની ઉંચાઈનું વર્ણન૧૩ મા સૂત્રમાં કહેવામાં આવ્યું છે. આ દ્વિતીય કટની બસમરમણીય ભૂમિભાગની બરાબર મધ્યમાં એક વિશાળ પ્રાસાદાવહંસક આવેલ છે. Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० १६ दक्षिणार्द्धभरतकूटनिरूपणम् १२१ सर्वोऽपि पदसमूहः सङ्ग्राह्यः इति सूचयितुमाह- 'जाव तस्सणं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए' यावत् तस्य खलु बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे इति-एतद्वयाख्या पञ्चदशसूत्रे गता। 'एत्थणं' अत्र इह दक्षिणार्द्ध भरतकूटस्य बहुसमरमणीयभूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे खलु ‘महं एगे' एको महान्-'पासायवडिसए' प्रासादावतंसकः-प्रासादश्रेष्ठः ‘पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः । स च 'कोसं' क्रोश-क्रोशप्रमाणम् ‘उड्ढं उच्चत्तेणं' ऊर्ध्वम् उच्चत्वेन ‘अद्धकोस' अर्द्धक्रोश-क्रोशस्यार्द्धम् 'विक्खभेणं' विष्कम्भेण-विस्तारेण तथा 'अब्भुग्गयमृसियपहसिय' अभ्युद्गतोच्छ्रितप्रहसितः अभ्युद्गतोच्छित:- अत्युच्चः प्रहसितः-श्वेतोज्वलप्रभया हसचिव तथा 'जाव पासाईए' यावत् प्रासादोयः दर्शनीयः अभिरूपः प्रतिरूपः इति अत्र यावत्पदेन "विविधमणिरत्नभक्तिचित्रः, वातोद्धतविजयवैजयन्ती पताकाच्छत्रकलितः, तुङ्गः गगनतलमनुलिखच्छिखरः' जालान्तररत्नः, पनरोन्मीलितः इव मणिकनकस्तूपिकाक: बिकसितशतपत्रपुण्डरीकतिलकरत्नाद्धचन्द्रचित्रः नानामणिदामालंकृतः अन्तर्बहिश्चप्रमाण सिद्धायतन कूट की ऊँचाई बराबर कहा गया है अर्थात् एक कोश अधिक ६ योजन की इसकी ऊँचाई है. सिद्धायतन कूट की ऊँचाई का प्रमाण १३ वें सूत्र में कहा है। इस द्वितीयकूट के वहुसमरमणीय भूमिभाग के ठीक बीच में एक विशाल प्रासादावतंसक कहा गया है "कोसं उड्ढं उच्चत्तेणं, अद्धकोसं विक्खंभेणं, अब्भुग्गयमूसियपहसिए जाव पासाईए ४' यह प्रासादावतंसक-श्रेष्ठ प्रासाद-एक कोश का ऊँचा है और आधे कोश का विस्तार वाला है. तथा यह बहुत ही अधिक ऊँचा है. और अपनी श्वेत उज्ज्वलप्रभा से हस सा रहा है ऐसा प्रतीत होताहै. यावत् यह प्रासादीय है, दर्शनीयहै, अभिरूप और प्रतिरूप है. यहां यावत्पद से "विविधमणिरत्नभक्तिचित्रः, वातोंद्धृत विजय वैजन्ती पताकाच्छत्रकलितः तुङ्गः, गगनतलमनुलिस्वच्छिखरः, जालान्तररत्नः, पञ्जरोन्मीलितइव मणिकनकस्तूपिकाकः, विकसितशतपत्रपुण्डरीकतिलकरत्नार्द्धचन्द्रचित्रः, नानामणिदामालंकोस उइढं उच्च नेणं अद्धकोसं विक्खभेण अब्भुग्गमभूसियषहसिप जाव पासाइए ४" આ પ્રાસાદાવતં સક- શ્રેષ્ઠ પ્રાસાદ એક ગાઉ જેટલે ઉંચે છે અને અર્ધા ગાઉ જેટલો વિસ્તાર વાળો છે તેમજ આ ખૂબજ વધાર ઉચો છે. આ પિતાની ત ઉજવલ પ્રભાથી હસતે ટોય નેમ લાગે છે. વિન્ આ પ્રાસાદીય છે દર્શનીય છે. અભિરૂપ છે प्रति३५ छ. गही यावत् ५४थी', विविध मणिरत्नभक्तिचित्रः वातोद्धतविजयवैजयन्ती पताकाच्छकलितः तुङ्गः गगनतलमनुलिखच्छिखरः जालान्तररत्नः पजरोन्मीलित इव मणिकन कस्तूपिकाकः विकसितशतपत्र पुण्डरीकतिलकरत्नार्द्धचन्द्रचित्रः नानामणि दामालतः अन्तर्बहिश्व प्रलक्षणः तपनीयवालुकाप्रस्तटः सुखस्पर्शः सश्रीकः" ! Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे श्लक्ष्णः तपनीयवालुकामस्तटः सुखस्पर्शः सश्रीकः इत्येषां संग्रहः, व्याख्या च राजप्रश्नीयसूत्रस्यैकोनषष्ठितमसूत्रस्य मत्कृतसुबोधिनी टीकातोऽवसेया। अथ तस्य प्रासादावतंसकस्यान्तवर्तिवस्तु वर्णयति-तस्सणं पासायवडिसगस्स बहुमज्झदेसभाए' तस्य खलु प्रासादावतंसकस्य बहुमध्यदेशभागे-अत्यन्त मध्यभागे 'एस्थ णं महं एगा मणिपेढिया पण्णत्ता' अत्र खलु महती विशाला एका मणिपीठिका प्रज्ञप्ता, सा-मणिपीठिका पंचधणूसयाई आयामविक्खंभेणं' पञ्चधनुःशतानि आयामविष्कम्भेण-दैर्ध्य विस्ताराभ्याम् 'अड्ढाइज्जाई धणूसयाई बाहल्लेणं' अद्धतृतीयानि धनुः शतानि बाहल्यन-सर्वात्मना रत्नमयी-'तीसेंण' तस्याः-अनन्तरोक्तायाः खलु 'मणिपेढियाए उप्पिं सीहासणं पण्णत्तं' मणिपीठिकायाः उपरि सिंहासनं प्रज्ञप्तम् । तच्च सिंहासनं 'सपरिवार' सपरिवारं-दक्षिणार्द्धभरतकूटाधिष्ठातृ सामानिकादि देवोपवेशनयोग्यभद्रासनसहितं 'भाणियव्वं' भणितव्यं वक्तव्यम् ।। अथ दक्षिणार्द्धभरतकूटस्यान्वर्थनामतां प्रश्नोत्तराभ्यां दर्शयितुमाह-'से केणढेणं __ कृतः, अन्तर्बहिश्च श्लक्ष्णः, तपनीयबालुकाप्रस्तरः, सुखस्पर्शः, सश्रीकः' इस पूरे पाठ का संग्रह हुआ है. इस सूत्रपाठ की व्याख्या हमने राजप्रश्ननीय सूत्र के ५८ वे सूत्र की सुबोधिनी टीका में कर दी है अतः वही से इसे जानलेना चाहिये., "तस्सणं पासायवडिंसगस्स बहु मज्झ देसभाए एत्थणं महं एगा मणिपेढिया पण्णत्ता" उस प्रासादावतंसक के ठीक मध्यभाग मे एक विशाल मणिपीठिका कही गई हैं “पंचधणूसयाई आयामविक्खंभेणं अड्ढाइज्जाई धणुसयाई बाहल्लेणं, सव्वमणिमई' यह मणिपीठिका लम्बाई में पांच सौ धनुष की है तथा इसकी मोटाई अढाई सौ धनुष की है यह मणिपीठिका सर्वात्मना रत्नमय है "तीसेणं मणिपेढियाए उप्पिं सीहासणं पण्णत्तं, सपरिवारं भाणियवं" इस मणिपोठिका के ऊपर एक सिंहासन कहा गया है इस सिंहासन के वर्णन में “यह सिंहासन दक्षिणार्ध भरतकूट के अधिष्ठायक देव के जो सामानिक आदि देव हैं उनके उपवेशन के योग्य भद्रासनों से सहित है, ऐसा कथन સમસ્ત પાઠને સંગ્રહ થયેલ છે. આ સૂત્ર પાઠની વ્યાખ્યા અમે રાજપ્રશનીય સૂત્રના ५८मां सूत्रनी सुमोधिनी मां री छे. तेथी जिज्ञासु त्यांथी onella. "तस्स ण पासायवर्डिसगस्स बहुमज्झदेसभाए पत्थणं महं एगा मणिपेढिया पण्णत्ता' त प्रासाहावत सन १९१२ मध्यभागमा म विशाण मनिधी 8t छे. 'पंचधणूसयाई आयामविक्खमेणं अड्ढाइज्जाइं धणूसयाई बाहल्लेणं सव्व मणिमई" मा मणिपाल લંબાઈ ચેડાઈમાં પાંચસે ધનુષ જેટલી છે. આ મણિપીઠિકા સર્વાત્મના રનમય છે. 'तीसेणं मणिपेढियाए उपि सीहासणं पण्णत्त सपरिवारं भाणिमवं" मा मणिपानी ઉપર એક જિંહાસન છે. આ સિંહાસનના વર્ણનમાં “આ સિંહાસન દક્ષિણાર્ધ ભરત કુટના અધિષ્ઠાયક દેવના જે સામાજિક આદિ દેવો છે તેમના ઉપવેશન માટે યોગ્ય मद्रासनाथा समाहित छे.” अस्थन ४२९ नये. Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १६ दक्षिणार्द्ध भरतकूट निरूपणम् १२३ 1 भंते !" हे भदन्त ! तत् कूटं केनार्थेन केन प्रकारेण 'दाहिणड्ढभरहकडे दाहिणड्ढभरडकूडे ' दक्षिणार्द्ध भरतकूटं दक्षिणार्द्धभरतकटम् ' एवं बुच्चर' एवम् इत्थम् उच्यते - प्रज्ञाप्यते ! भगवानाह - 'गोयमा' दाहिणड्ढमरहकूडेणं दाहिणड्ढभरहे णामं देवे' हे गौतम ! दक्षिणाभरतकूटे खलु दक्षिणार्द्ध भरतो नाम देवः - तदधिष्ठातृ देव: 'परिवसई' परिवसतीत्युत्तरेणान्वयः, स च कीदृश: ? इत्याह- 'महिढिए जाव पलिओमट्ठिए' महर्द्धिको यावत् पल्योपमस्थितिकः, इति । महर्द्धिक इति समारभ्य पल्योपमस्थितिक इति पर्यन्तानां देवविशेषणवाचकानां पदानां संग्रहोऽस्यैवाष्टमसूत्रे विलोकनीयो व्याख्याऽपि तत एव बोध्येति । ' से णं' स-पूर्वोक्तः दक्षिणार्द्ध भरतनामा देवः खलु 'तत्थ' तत्र - दक्षिणार्द्ध भरतकूटे विहरतीति परेणान्वयः, स किं कुर्वन् विहरतीत्याह -- 'चउन्हें सामाणियसाहस्सीणं चउन्हं अग्गमहिसोणं सपरिवाराणं' चतुसृणां सामानिक- साहस्रीणां सपरिवाराणां चतसृणामग्र महिषीणां = प्रधानमहिषीणाम् 'तिरहं' तिसृणाम् आभ्यन्तरिकमध्यमबाह्यानां 'परिमाणं' परिषदां - समानां 'सत्ता' सप्तानां हयगजरथपदाति महिपगन्धर्वनाट्य लक्षणानाम् 'अणियाणं' अनीकानां - सैन्यानाम् 'सत्तहूं' अणियाहिवईणं' सप्तानाम् अनीकाधिपतीनां - सेनाधिपतीनाम् 'सोलसहं कर लेना चाहिए । " से केणद्वेणं भंते! एवं वुच्चइ दाहिणड्ढ़भरह कूडे २' हे भदन्त ! इस कूटका नाम दक्षिणार्ध भरतकूट ऐसा किस कारण से हुआ है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं" गोयमा ! दाहिणभर हकडेणं दाहिणद्धभर हे णामं देवे महिढिए जाव पलिओदमट्ठिईए परिवसई' हे गौतम ! इस कूट का नाम दक्षिणा भरतकूट इसलिये कहा गया है इस पर दक्षिणार्ध भरत नाम का एक देव रहता है. यह महर्द्धिक यावत् पल्योपम की स्थिति वाला है. यहां इस देव के वर्णन में महर्द्धिक पद से लेकर पल्योपमस्थितिक पद के भीतर जितने भी देव विशेषणवाचक पद आये हैं उन सब का संग्रह इसी सूत्र के ८वें सूत्र में देख लेना चाहिये. “ से णं तत्थ चउण्हं सामाणियसाहस्सीणं चउण्हं अग्गमहिसणं, सपरिवाराणं तिण्डं परिमाणं सत्तण्हं अणियाणं, सत्तण्हं अणियाहिवईणं सोलसण्हं आय'से के भंते एवं वुब्बइ दाहिणड्ढभरहकडे २” हे लढत ! આ ફૂટનું નામ दक्षिणाध भरत छूट देवी रीते प्रसिद्ध यु ? साना वामां प्रभु ! छे गोयमा ! दाहिणद्धभरहकडे णं दाहिणभर हे णाम देवे महिइढिए जाव पलिओषमट्टिईए परिवस" હે ગૌતમ ! આ ફૂટનુ નામ દક્ષિણાધ` ભરત કૂટ એટલા માટે પ્રસિદ્ધ થયું કે આ ફ્રૂટ પર દક્ષિણાધ ભરત નામે એક દેવ રહે છે. આ દૈવ મહદ્ધિક છે યાવત્ પત્યેાપમની સ્થિતિવાળે છે. અહીં આ દેવના વર્ણનમાં મહદ્ધિક પદથી લઈ ને પાપમાસ્થિતિ સુધી જેટલા દેવિશેષણ વાચક પદો આવેલા છે. તે સ`ના સગ્રહું આ સૂત્રના૮મા સૂત્રમાં જોઈ वे. "से णं तत्थ चउण्हं सामाणियसाहस्सीणं च उण्हं अग्गमद्दिसीण सपरिवाराणं तिह परिसाण सत्तण्ड अणियाण सत्तण्ह अणियाहिवईणं सोलसण्हं आयरक्खदेवसाहस्तीर्ण Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૨૨૪ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे आयरक्खदेवसाहस्सीणं' षोडशानाम् आत्मरक्षकदेवसाहस्रीणाम्-षोडशसहस्र संख्यात्मरक्षकदेवानाम् 'दाहिणड्ढभरहकूडस्स दाहिणढाए रायहाणीए अन्नेति' दक्षिणार्द्धभरतकूटस्य दक्षिणा याः राजधान्याः अन्येषाम्-उक्तेभ्य इतरेषां 'बहूणं' देवा ण देवीण य' बहूनां देवानां च देवीनां च 'जाव' यावत् यावत्पदेन "आधिपत्यं पौरपत्यं स्वामित्वं भर्तृत्वं महत्तरकत्वम् आज्ञेश्वरसेनापत्यं कारयन् पालयन् महताऽहतनाटयगीतवादित्रतन्त्रोतलताल-त्रुटितघनमृदङ्गपटुप्रवादितरवेण दिव्यान् भोगभोगान् भुजानः" इत्येषां संग्रहः, एवंभूतः स 'विहरइ' विहरति तिष्ठति, एतेषां विवरणमष्टमसूत्रे गतम् । अथास्य राजधानी कुत्र वर्तते इति पृच्छति -'कहि णं भंते ! दाहिणडूढभरहस्स देवस्स दाहिणड्ढा णामं रायहाणी पण्णत्ता' हे भदन्त ! क कुत्र खलु दक्षिणार्द्ध रक्खदेवसाहस्सीणं दाहिणड्ढभरह कूडस्स दहिणड्ढाए रायहाणीए अण्णेसिं च बहूणं देवाण य देवीण य जाव विहरइ' यह वहां चार हजार सामानिक देवों का चारसपरिवार अग्रमहिषियों का, तीन परिषदाओं का, सात सैन्यों का, सात सेनापतियों का, सोलह हजार आत्मरक्षक देवों का तथा दक्षिणार्ध भरतक्ट की दक्षिणार्धा राजधानी निवासी अन्य और भी बहुत से देव और देवियों का आधिपत्य, पौरपत्य, स्वामित्व, भर्तृत्व, महत्तरकत्व एवं आज्ञेश्वर सेनापत्य करवाता हुआ, पलवाता हुआ, एवं चतुर प्रकारके बाजे बजाने वाले पुरुषों द्वारा जोरजोर से बजाये गये बाजों के नाद पूर्वक, गीतों के साथ बाजों के नाद पूर्वक, नाट्य के बाजों के नाद पूर्वक दिव्य दो गंधीक देवोके समान भोगों को भोगता हुआ अपने समय को आनन्द के साथ व्यतीत करता है. यहां "तन्त्री, तल, ताल, त्रुटिल, घनमृदङ्ग' ये सब विशेष प्रकार के बाजों के ही भेद हैं । इनके विषय में जीवाभिगमसूत्र की टीका में स्पष्टीकरण किया गया है. तथा इन सब का विवरण इसके ८ वें सूत्र में किया जाचुका है. अतः वहां से इस विषयको देख लेना चाहिये । दाहिणइढभरहकूडस्प दाहिणड्ढाए रायहाणोए अन्नेसिंच बहूणं देवाण य देवीणय जाव विहरा व त्यां यार २ सामानि वाना या२ सपरिवार महिषीयाना ત્રણ પરિષદાઓના સાત સૈન્યના સાત સેનાપતિઓના સોળ હજાર આત્મરક્ષક દેવના તેમજ દક્ષિણાદ્ધ ભરત ફૂટની દક્ષિણાર્ધી રાજધાની નિવાસી અન્ય બીજા ઘણું દેવ-દેવીઓના આધિપત્ય, પૌર પત્ય, સ્વામિત્વ, ભતૃત્વ મડરરકત્વ તેમજ આશ્વર સેનાપત્ય કરાવતે પળાવ તથા ચતુર વાજા વગાડનાર પુરુષથી જોરથી વગાડેલા વાજીંત્રોથી ગીત સાંભળીને નાય કે વાજિંત્રોના નાદપૂર્વક દિવ્યસેગ સેગવનો પિતાને સમય આનંદપૂર્વક પસાર કરે છે. અહીં “તત્રી, તલ, તાલ, ત્રુટિત, ઘનમૃદંગ એ સર્વે વિશેષ પ્રકાર ના વાદિત્રોના જ પ્રકારે છે. આ સંબંધમાં જીવાભિગમ સૂત્રની ટીકામાં સ્પષ્ટીકરણ કરવામાં આવ્યું છે તેથી એ સર્વનું વિવરણ એના ૮ સૂત્રમાં કરવામાં આવ્યું છે. એથી આ વિષે ત્યાંથી જાણી લેવું જોઈએ. Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १६ दक्षिणार्द्ध भरतकूटनिरूपणम् १२५ भरतस्य देवस्य दक्षिणार्द्धा नाम राजधानी प्रज्ञप्ता ? भगवानाह - ' गोयमा ! मंदरस्स पव्वयस्स दक्खिणेणं' हे गौतम ! मन्दरस्य - मेरोः पर्वतस्य दक्षिणेन - दक्षिणस्यां दिशि 'तिरियमसंखेज्जे दोवसमुद्दे' तिर्यगसंख्येयद्वीपसमुद्रान् तिर्यक् स्थितान् असंख्येयान् द्वीपान् समुद्रां 'वो वत्ता' व्यतिवृज्य - व्यतिक्रम्य उल्लङ्घय 'अण्णंमि' अन्यस्मिन् - अस्मदाद्याश्रयीभूतजम्बूद्वीपाद्भिन्ने 'जंबुद्दीवे दीवे दक्खिणेणं' जम्बूद्वीपे द्वीपे दक्षिणेन दक्षिणस्यां दिशि 'बारस जोयणसहस्साई' द्वादश योजन सहस्राणि - द्वादशसहस्रयोजनानि 'ओगाहित्ता' अवगाह्य - प्रविश्य एत्थ णं - दाहिणइभरहरूस देवस्स दाहिणडूढा uri यहाणी भाणियव्वा' अत्र खलु दक्षिणार्द्ध भरतस्य देवस्य दक्षिणार्द्धा नाम राजधानी भणितव्या वक्तव्या 'जहा विजयस्स देवस्स' यथा विजयस्य देवस्य । ' एवं ' एवम्-दक्षिणार्द्धभरतकूटवत् 'सव्वकूडा नेयव्वा' सर्वकूटानि नेतव्यानि - ज्ञातव्यनि, किम्पर्यन्तानि ? इत्याह- 'जाब - वेसमणकू डे' यावत् वैश्रवणकूटपर्यन्तानि सर्वाणि राजधानी विषयक प्रश्न " कहिणं भंते ! दाहिणड्ढमरहस्स देवस्स दाहिणड्ढा णामं शहाणी पण्णत्ता' गौतम ने प्रभु से ऐसा पूछा है है मदन्त ! दक्षिणार्धमरतदेव को दक्षिa नामकी राजधानी कहां पर कहो गई है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं " गोयमा ! मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणेणं तिरियमसंखेज्जे दीवसमुद्दे व ईवइत्ता अण्णंमि जंबुद्दीवे दीवे दक्खि णणं बारस जोयणसहस्साई ओगाहित्ता एत्थणं दाहिणड्ढमरहस्स देवरस दाहिणड्ढा णामं यहा भाणिवा' हे गौतम! सुमेरु पर्वत को दक्षिणदिशा में तिर्यक् असंख्यात द्वीप समुद्रों को पार करके अन्य जम्बूद्वीप नाम के द्वीप में दक्षिण दिशा में १२ हजार योजन नीचे आगे जाने पर दक्षिणार्ध भरत देव की दक्षिणाधा नाम की राजधानी वक्तव्य है 'जहा विजयस्स देवस्म' जैसे विजयदेव की राजधानी वक्तव्य हुई है, "एव सव्व कूडा यव्वा जाव वेसमणकूडे परोप्पर पुरत्थिमपच्चत्थिमेणं" इसी तरह से वैश्रवण राजधानी विषयक प्रश्न :- कहि णं भंते दाहिणड्ढ भरहस्स देवस्स दाहिणडूढाणामं रायहाणी पण्णत्ता" गौतमे प्रभुने प्रश्न यि हे महन्त ! दक्षिणाध भरत देवनी दक्षिणार्धा नाम राज्धानी या स्थणे आवेली छे ? ना वामां प्रभु उडे छे. गोयमा । मंदरस्स पव्व ree दक्खिणं तिरियमस खेज्जे दीवसमुद्दे विश्वत्ता अण्णंमि जबुद्दीवे दोवे दक्खिणेण बारस जोयणसहस्सा ओगाहित्ता पत्थणं दाहिणद्ध भरहस्स देवस्स दाहिणड्ढा णाम रायहाणी भाणियव्वा "हे गौतम! सुभे३ पर्यंतनी दक्षिण दिशामां तिर्यई असण्यात द्वीपસમુદ્રાને પારકરીને અન્યજ બુદ્વીપનામક દ્વોપમાં દક્ષિણ દિશામાં ૧૨ હજાર યેાજન નીચે આગળ જવાથી દક્ષિણા ભરત દેવની દક્ષિણા નામની રાજધાની આવેલી છે. દા विजय देवस्' विनय हेवनी राजधानी विषे प्रभावामां आव्यु छे. "एवं सव्वकूडा यव्वा जाव वेसमणकूडे परोप्परं पुरस्थिमपश्ञ्चत्थिमेण” ते प्रमा વૈશ્રવણ Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कूटानि दक्षिणार्द्धभरतकूटवद् वर्णनीयानीति भावः । एवञ्च दक्षिणा भरतकटं १ खण्डप्रपातगुहाकूटं २ माणिभद्रकूटं ३ वैतादयकूटं ४ पूर्णभद्रकूटं ५ तमिस्रगुहाकूटं ६ उत्तरार्द्ध-भरतकूटं ७ वैश्रवणकूटम् ८ एतानि अष्टौ कूटानि समानवर्णनक नीति । तथा 'परोप्परं' परस्परम् -अन्योन्यं 'पुरथिमपच्चस्थिमेणं' पौरस्त्यपाश्चात्त्येन-पर्व पूर्वेकूटं पूर्वेदिशि परं परं कूटं पश्चिमदिशि वर्तत इति बोध्यम् । तथा च दक्षिणार्द्ध भरतकूट पूर्वस्यां खण्डपातकूटात् पूर्वस्यां माणिभद्रकूटात्, तत् पूर्वस्यां वैताध्यकूटात् तत् पूर्वस्यां पूर्णभद्रक्टात् तत् पूर्वस्यां तमिस्रगुहाकूटात् तत् पूर्वस्यामुत्तरार्द्ध भरतकूटात् तत् पूर्वस्यां वैश्रवणकूटात् यस्माद्यत पूर्वस्यां तस्मात्तत् पश्चिमायां बोध्यम्, पूर्वपश्चिमयोः सापेक्षत्वात्, तथाहि-वैश्रवणकूटं पश्चिमायामुत्तराद्ध भरतकूटात्, तत पश्चिमायां तमिस्रगुहाकूटात्, तत् पश्चिमायां पूर्णभद्रकूडात्, तत् पश्चिमायां वैताढयक्टात्, कूटतक और सब वाकीके कूटों का वर्णन कर लेना चाहिये. इस तरह दक्षिणार्ध भरतक्ट १ खण्डप्रपातगुहा कूट २ माणिभद्रकूट ३ वैताढयकूट ४ पूर्णभद्रकूट ५ तमिस्रगुहाकुट ६ उत्तरार्घभरतकूट ७ और वैश्रवणक्ट ८ ये आठ कूट समान वर्णन वाले हैं । इन कटों में पूर्व पूर्व का कट तो पूर्वदिशा में है और दूसरा दूसरा कूट पश्चिमदिशा में हैं ऐसा जानना चाहिये. तथाच दक्षिणार्ध भरतक्ट खण्डप्रपातकूट से पूर्व दिशा में है खण्डप्रपातगुहाकूट माणिभद्र कूट से पूर्व दिशा में है, वैतादयकूट से माणि भद्रकूट पूर्वदिशा में है. पूर्णभद्रक्ट से वैतढयकूट पूर्वदिशा में है तमिस्र गुहाकूट से पूर्णभद्रक्ट पूर्वदिशा में है उत्तरार्धकूट से तमिस्रगुहाकूट पूर्व दिशा में है और वैश्रवणकूट से उत्तरार्धक्ट पूर्व दिशा में है. इस तरह जो जिससे पूर्वदिशा में है वह उससे पश्चिमदिशा में हैं क्यों कि पूर्व पश्चिम में सापेक्षता है. जैसे उत्तरार्ध भरतक्ट से वैश्रवण क्ट पश्चिमदिशा में है तमिस्रगुहाक्ट से उतरार्ध भरतक्ट पश्चिमदिशा में है. पूर्णभद्रक्ट से तिमिस्र गुहाक्ट पश्चिमदिशा में है. वैताढयक्ट से पूर्णभदकूट पश्चिमदिशा में है. माणि भदक्ट से वैताढयकूट पश्चिमदिशा में है કૃટ સુધી અને બીજા સર્વ કુટેનું વર્ણન અહીં રામજવું જોઈએ. આ પ્રમાણે દક્ષિણ ભરતકૂટ ૧, ખંડ પ્રપાતગુફાકૂટ ૨, માણિભદ્ર ફૂટ ૩, વૈતાઢયકૂટ ૩, પૂર્ણભદ્રકુટ ૫, તમિસ ગુફાકૂટ ૬, ઉત્તરાર્ધ ફૂટ ૭ અને વિશ્રવણ કુટ ૮ એ આઠ કૂટો સમાનવર્ણનવાળા છે એ કટમાં પૂર્વ પૂર્વના કૂટ તા પૂર્વ દિશામાં છે અને બીજા બીજા કૂટ પશ્ચિમ દિશામાં છે. એમ જાણવું જોઈએ. તથા દક્ષિણાર્ધ ભરતટ ખંડપ્રપાત ફૂટથી પૂર્વ દિશામાં છે, ખંડ પ્રતાપ ગુફાકૂટ મણિભદ્ર ફટથી પૂર્વ દિશામાં છે, વૈતાદ્રય ફૂટથી મણિભદ્રકુટ પૂર્વ દિશા માં છે. પૂર્ણભદ્રકુટેથી વેતાદ્ય ફુટ પૂર્વ દિશામાં છે. તમિસ્ત્ર ગુફાટથી પૂર્ણભદ્રફ દિશામાં છે. ઉત્તરાર્ધ ફૂટથી તમિસ ગુફાફટ પૂર્વ દિશામાં છે અને વૈશ્રવણકુટથી ઉત્તરાધકેટ પૂર્વ દિશામાં છે આ પ્રમાણે જે જેનાથી પૂર્વ દિશામાં છે તે તેનાથી પશ્ચિમ દિશામાં છે. કર્મ કે પૂર્વ પશ્ચિમમાં સાપેક્ષતા છે જેમકે ઉત્તરાર્ધ ભરતકૂટથી વૈશ્રવણકુટ પશ્ચિમ દિશામાં છે. તમિત્ર ગુફાકૂટથી ઉત્તરાર્ધ ભરતકૂટ પશ્ચિમ દિશામાં છે, પૂર્ણભદ્ર ફૂટથી તિમિસ ગુફા Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-सू. १६ दक्षिणार्द्धभरतकूटनिरूपणम् तत् पश्चिमायां माणिभद्रक्डात् तत् पश्चिमायां खण्डप्रपातकाटात् तत् पश्चिमायां दक्षिणाद्धं भरतकूटात् इति पर्यवसितम् ।। 'इमेसि' एषाम् अनन्तरोक्तानां कूटानां 'वण्णावासे' वर्णाचासे-वर्णनपद्धतौ 'गाहा' गाथा-'मज्झे वेयडूहस्स उ' वैताढयस्य पर्वतस्य मध्ये-मध्यभागे 'तिणि कूडा' त्रीणिकूटानि अनुपदं वक्ष्यमाणानि 'कणगमया' कनकनयानि -स्वर्णमयानि 'होति' भवन्ति सन्ति 'सेसा' शेषाणि-तद्भिन्नानि 'पव्वयकूडा पर्वतकूटानि 'सव्वे रयणामया सर्वाणि रत्नमयानि-वैडूर्यादि रत्नमयानि 'हो ति भवन्ति-सन्ति ।१। तत्र कानि स्वर्णमयानि कानि रत्नमयानोति दर्शयितुमाह -'मागिमदकूडे माणिभद्र कूटं १ 'वेयडूढकूडे' वैताढयकूटर 'पुण्णभद्द कूडे' पूर्णभद्रकूटं ३ 'एए तिणि कूडा कणगमया' एतानि त्रीणि कूटानि कनकमयानि 'सेसा' शेषाणि-अनन्तरोक्तकूटत्रयभिन्नानि 'छप्पि रयणामया' षडपि कूटानि रत्नम यानीति । नवसु कूटेषु 'दोण्हं' द्वयोः कूटयोः तमिस्रगुहाकूट, खण्डप्रपातकूटयोः इत्यादि। ता इमेसिं वण्णावासे गाहा~ माझे वेयड्ढस्स उ कणगमया तिण्णि होति कूडा उ । सेसा पव्वयकूडा सव्वे रयणामया होति ।१॥ इन कूटों के वर्णन करने में यह गाथा है वैताढ्य पर्वत के मध्य में वक्ष्यमाण ये तीन कूट है जो कि स्वर्णमय हैं: इनसे भिन्न जो और पर्वत कूट है वे सब रत्नमय हैं वैडूर्य आदि रत्नों के बने हुए हैं इनमें 'माणिभद कूडे वेयड्ढकूडे पुण्णभद्दकूडे एए तिण्णि कूडे कणगामया सेसा छप्पि रयणामया' माणिभद्रकूट वैताढयकूट एवं पूर्णभद्रकूट, ये तीन कूट कन कमय हैं और बाकीके ६ कूट रत्नमय हैं। 'दोण्हं वि सरिसणामया देवा कयमालए चेव णट्टमालए चेव सेसाणं छहं सरिसणामया जण्णामया य कूडा तन्नामा खलु हवंति ते देवा पलिओवमद्विइया हवंहि पत्तेय',॥१।। इन नौ कूटों में से दो कूटो के तमिस्रगुहाकूट और ફૂટ પશ્ચિમ દિશામાં છે. વૈતાદ્રય ફટથી પૂર્ણભદ્ર ફૂટ પશ્ચિમ દિશામાં છે. મણિભદ્ર કુટથી वैतादयट पश्चिम हिम छे छत्यादि. इमेसि वण्णावासे गाहा मज्झे वेअइढस्स उ कणगमया तिण्णि होत क्रडा उ। सेसा पव्वयक्डा सव्वे रयणामया होति ॥१॥ આ કૂટેના વર્ણનને અનુલક્ષીને આ ગાથા છે – વૈતાઢય પર્વતના મધ્યમાં વયમાણ એ ત્રણ ફૂટે છે જે સ્વર્ણમય છે. એનાથી બીજા જે પર્વત કૂટ છે તે સર્વે રતનમય છે. छ. वैडू वगैरे २त्नाना मनेा छ. मेमा 'माणिभद्दकूडे वेयड्ढकूडे पुण्णभहकूडे पए तिण्णि कूड़ा कणगामया सेसा छप्पि रयणामया "मामि यूट, वैताढय ५८ मने द्र से त्रयट नभय छ भने पाहीना 2 नभय छ "दोषणं वि सरिसणामया देवा कयमालए चेव नट्टमालए सेसाण कण्हं सरिसणामया जण्णामया य कृडा तन्नामा खलु हवंति ते देवा पलिओवमट्टिइया हवंति पतेयं ॥१॥ से नामांथा मेटाना Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'विसरिणामया देवा' विसदृशनामकौ देवौ स्तः । तौ च क्रमेण दर्शयति- ' कयमालए चैव' कृतमालकः १ चैव 'नहमालए चेव' नृत्तमालकः चैव इति । तमिस्र - गुहा कूटस्य कृतमालः खण्डप्रपातगुहाकूटस्य नृत्तमालः इति क्रमेण द्वौ देवौ बोध्यौ । 'सेसाणं' शेषाणां - पूर्वोक्तभिन्नानां 'छण्डं' षण्णां कूटानां 'सरिसणामया' सदृशनामकाः कूट नामसदृशनामकाः देवा भवन्ति । अत्रार्थे गाथामाह- 'जण्णामया' इत्यादि । इति स्पष्टयति- ' जण्णामयाय कूडा तन्नामा खलु' यन्नामकानि कूटानि तन्नामकाः खलु ते = कूटाधिष्ठातारो देवाः | 'होति' भवन्ति सन्ति इति ते देवाः कीदृशाः ? इति जिज्ञासायामाह - 'पलिओ मईया' पल्योपमस्थितिकाः - इत्यादि 'पत्तेयं' प्रत्येकम् एकैकस्य कूटस्य 'पत्तेय' प्रत्येकम् एकैको देव एवं सर्वकूटदेवाः पल्योपमस्थितिकाः 'हवंति' सन्तीति । अनेनाष्टानां कूटानां स्वामिन उक्ताः सिद्धायतनकूटे तु सिद्धायतस्यैव मुख्यत्वेन स्वामिनोऽकथनमिति बोध्यम् । १२८ अथ खण्डप्रपात गुहाकूटाद्यधिपतीनां राजधान्यः क सन्तीति पृच्छति - हे भदन्त ! खण्डप्रपातगुहाकूटाद्यधिपतीनां तेषां कृतमालकादिदेवानां 'रायहाणीओ' खण्डप्रपातगुहाकूट के देव विसदृशनाम वाले है इनके नाम क्रमशः कृतमालक और नृत्तमालक है । बाकी के ६ कूटों के देवकूटों जैसे नाम है वैसे ही नामवाले हैं । यही बात'' जण्णा मयाय कूडा तन्नामा खलु हवंति ते देवा पलिओवमट्ठिया हवंति पत्तेयं २" इस गाथा द्वारा प्रकट को गई है इन देवों को एक २ पल्योपम की स्थिति होती है इस तरह एक एक कूट का एक एक देव होता है और वह अपने २ मी होता है परन्तु सिद्धायतनकूटमें जो सिद्धायतन देव है वही वहां का स्वामी है ऐसा नहीं है ऐसा जानना चाहिये । इन खण्डप्रपातगुहाक्ट आदि के अधिपतियों की राजधानियां कहां पर हैं, इस बात को जानने की इच्छा से गौतमस्वामी प्रभु से ऐसा पूछते हैंતમિસ્ર શુક્ાકૂટ અને ખણ્ડ પ્રપાત ગુફા ફૂટના-દેવ વિંસદેશ નામવાળા છે. એમના નામે उभशः કૃતમાલક અને નૃત્તમાલક છે. શેષ ૬ ફૂટના નામ જેવા જ નામવાળા છે એજ वात " अण्णा मया य कूडा तन्नामा खलु हर्बति ते देवा पलिओमट्ठिइया हवंति पत्तेय २” આ ગાથા વડે પ્રકટ કરવામાં આવી છે. એ દેવાની એક એક પચાપમ જેટલી સ્થિતિ છે. આ પ્રમાણે એક એક દેવ હાય છે અને તે પેત પાતાના ફૂટને સ્વામી હાય છે. પર`તુ સિદ્ધાયતન રૃટમાં જે સિદ્ધાયનન દેવ છે તેજ ત્યાના મુખ્ય રૂપથી સ્વામી હાય એવુ' નથી આ એક વિશેષ વાત ધ્યાનમાં રાખવી જોઇએ. એ ખડપ્રપાત શુક કૂટ વગેના અધિપતિએની રાજધાનીએ કયાં આવેલી છે? એ वातने लघुवानी ईच्छा थी गौतम प्रभुने ओवी रीते पूछे छे " रायहाणीओ" डे महेत ! कूट का स्वामुख्य रूप से Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सु, १६ दक्षिणार्द्धभरतकूटनिरूपणम् राजधान्यः क्व सन्ति ? भगवानाह-हे गौतम ! 'जंबूद्दीवे दीवे मंदरस्स पब्वयस्स दाहिणेण' जम्बूद्वीपे द्वीपे मन्दरस्य पर्वतस्य दक्षिणेन-दक्षिणस्यां दिशि -तिरियअसंखेज्जे दीवसमुद्दे वीईवइत्ता' तिर्यक असंख्येयद्वीपसमुद्रान् व्यतिव्रज्य-व्यतिक्रम्य 'अगंमि जंबुद्दीवे दोवे बारस जोयणसहस्साई ओगाहेत्ता' अन्यस्मिन् जम्बूद्वीपे द्वीपे द्वादश योजनसहस्राणि अवगाह्य-प्रविश्य 'एत्थ णं रायहाणीओ' भाणियवाओ' अत्र खलु राजधान्यः भणितव्याः-वक्तव्याःताकीदृश्यः ? इति जिज्ञासायामाह-विजया रायहाणी सरिसयाओ' विजयाराजधानीसशिकाः इति । यथा बिजया राजधन्याः प्रमाणादिक वणितं तथैवैतासामपि बोध्यमिति । तत्र खण्डप्रपातगुहाकूटाधिपतिदेवस्य राजधानी खण्डप्रपातगुहानाम्नी माणिभद्रक्टाधिपत्ते देवस्य माणिभद्रेत्येव मन्येषामपि राजधान्यो "रायहाणीओ" हे भदन्त! उन खण्डप्रपात गुहाकूट आदि के अधिपति कृतमालादि देवों की राजधानियां कहां पर हैं? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "गोयमा! जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्त पव्वयस्स दाहिणेणं तिरियं असंखेज्जे दीवसमुद्दे वोईवइत्ता अण्णमि जंबुद्दीवे दोवे बारस जोयणसहस्साई भोगाहित्ता एत्थणं रायहाणीओ भाणियब्वामओ विजया रायहाणी सरिसयाओ" जहां पर हम रहते हैं ऐसे इस जंबूद्वीप नामके द्वीप में जो सुमेरु पर्वत है उस पर्वत की दक्षिण दिशामें तिर्यक् असंख्यात द्वीप समुद्रों को उल्लङ्घन करके आगत अन्य दूसरे जम्बूद्वीप में १२ हजार योजन नीचे आगे जाने पर उन कृतमालादिक देवों को राजधानियां हैं । ये राजधानियां विजया राजधानी की हो जैसी हैं अतः विजया राजधानी का प्रमाण आदि जैसा उपर कहा गया है वैसा ही वह सब यहां पर भी है ऐसा जानना चाहिये इनमें जो खण्डप्रपातगुहाकूट का अधिपति देव है उसकी राजधानी खण्डप्रपातगुहा नामकी है माणिभद्रकूट का अधिपति जो देव है उसकी राजधानी माणिभद्रा नाम की है इसी तरह से अन्य कटाधिपति देवों की भी राजधानियां समझलेनी चाहिये। ये सब कहे ખંડપ્રપાત ગુફાકૂટ આદિના “અધિપતિ કૃતમાલાદિદેવેની રાજધાનીએ કયાં આવેલી છે ? साना त्तरमा प्रभु छ, "गोयमा ! जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहि णेण तिरियं असंखेज्जे दीवसमुद्दे वीइवइत्ता अण्णमि जंबुद्दीवे दीवे वारसजोयण सहस्साई ओगाहेत्ता पत्थ णं रायहाणीओ भाणिअव्वाओ विजयारायहाणी सरिसयाओ જ્યાં અમે રહીએ છીએ એવા આ જબૂદ્વીપ નામક દ્વીપમાં જે સુમેરુ પર્વત છે તે પર્વત ની દક્ષિણ દિશામાં તિર્થક અસંખ્યાત દ્વીપ સમુદ્રોને ઓળંગીને જે અન્ય જ બુદ્વીપ આવે છે તેમાં ૧૫ જન નીચે આગળ વધવાથી તે કૃતમાલાદિક દેવેની રાજધાનીએ છે. એ સર્વ રાજધાનીએ વિજય રાજધાની જેવી જ છે. એથી વિજયા રાજધાનીનું પ્રમાણ જેવું કહેવામાં આવ્યું છે તેવું જ સર્વનું સમજવું જોઈએ. એમાં જે ખંડ પ્રતાપ ગુફા ના અધિપતિ દેવ છે તેની રાજધાની ખંડ પ્રપાત ગુહા નામની છે. માણિભદ્ર કટને અધિપતિ જે દેવ છે તેની રાજધાની મણિભદ્રા નામે છે. આ પ્રમાણે અન્ય કૂટાધિપતિ १७ Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३० जम्बूद्वीपप्राप्तिस्वे वोध्याः । सर्वाणि चोकानि वक्ष्यमाणानि च कूटानि एकैकवनपण्डपद्मवरवेदिकोपशोभितानि वोध्यानि इति ॥ सू०१६ ॥ सम्प्रति वैताढयपर्वस्य वैताढयाभिधाने कारणं प्ररूपयति - __ मूलम्-से केणद्वेणं मंते ! एवं बुच्चइ वेयड्ढे पव्वए ? गोयमा वेयड्डेणं पब्बए भरहं वासं दुहा विभयमाणे २ विट्ठइ तं जहा-दाहि णड्वभरहंव उत्तरड्डभरहंत्र वेयड्ढगिरिकुमारे य इत्थ देवे महिइदिए जाव पलिओवमट्ठिइए परिवसइ । से तेणटेणं गोयमा ? एवं बुच्चइ चेयड्डे पत्रए २ अदुनरं च णं गोयमा ! वेयड्डस्स पव्वयस्स वेय ड्रेई सामए णामधेज्जे पाणने जं णं कयाइ ण आसि, ण कयाइ ण. अस्थि, ण कयोइ ण भविस्सइ भुवि च भवइ य भविस्सइ य धुवे णियए सामए अखए अव्वए अवट्टिए णिच्चे ॥सू०१७॥ छाया- अथ देनार्थन भदन्त ! एवमुच्यते वैताढ्यः पर्वतो वैतादयः पर्वतः १ गौतम ! वैताढयो नाम पर्वतो भरतवर्ष द्विधा विभजन २ तिष्ठति, तद्यथा-दक्षिणाईभरतं च उत्तरार्द्धभरतं च, वैताढयगिरिकुमारश्चात्र देवो महर्धिको यावत् पल्योपमस्थितिकः परिवसति, स तेनार्थेन गौतम ! एवमुच्यते वैताब्यः पर्वतः२, अथोत्तरं चखल गौतम ! वैनाढयपर्वतस्य वैताढयेति शाश्वतं नामधेयं प्रशप्तम्, यत् न कदापि नाऽस्ति न कदापि न भविष्यति अभूञ्च भवति च भविष्यति च. ध्रुवो नियतः शाश्वतः अक्षयः अव्ययः अवस्थितो नित्यः ॥सू. १७॥ टीका-'से केणट्रे ण भंते !' से केणद्वेणं' अथ केनार्थेन केन कारणेन 'भंते ! एवं गये और आगे कहे जाने वाले क्ट एक एक वनषण्ड से और एक एक पद्मवरवेदिका से उपशोभित हैं ॥१६॥ वैताढ्य नाम होने में क्या कारण-इस बात का उत्तर'से केणइठेग भंते! एवं बुच्चइ वेयइढपबए" इत्यादि । टीकार्थ-गौतमस्वामीने प्रभु से इस सूत्र द्वारा ऐसा पूछा है- हे भदन्त ! वैताढ्यपर्वत का वैताढयपर्वत इस प्रकार के नाम होने का क्यो कारण है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं - દેવેની પણ રાજધાનીઓ સમજવી જોઈએ. એ સવ વણિત તેમજ આગળ જેમના વજન થશે તે કુટે એક એક વનખંડથી અને એક એક પદ્વવર વેદિકાથી ઉપશાભિ છે. ૧દા હતાય નમ શા કારણથી પ્રસિદ્ધ થયું ? તે વિષે કથન :-- ‘से केणटूटेणं! एवं बुच्चइ वेयडूढ़ पव्वए' इत्यादि ॥१७॥ ટીકાઈ--ગૌતમે પ્રભુને આ સૂત્ર વડે આ જાતને પ્રશ્ન કર્યો છે. કે—હે ભત! વૈતાઢય પર્વનું વૈદ્રય પર્વત આ રૂપમાં જે નામ થયું તેનું કારણ શું છે ? એના Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १७ वैताब्याभिधाने कारणनिरूपणम् १३१ वुच्चई' भदन्त । एवम् उच्यते-कथ्यते 'वेयड्ढे पव्वए' वेयड्ढे पव्वए, चैतादयः पर्वतः वैवाढयः पर्वतः ! इति भगवानाह-'गोयमा ! वेयइढेण पत्रए भरहं वासं' हे गौतम ! वैताढयः खलु पर्वतः भरतं वर्ष-क्षेत्र 'दुहा' द्विधा वक्ष्यमाणायां द्वाभ्यां प्रकाराभ्यां विभयमाणे२' विभनन् २- विभक्तं कुर्वन् २ चिट्ठइ' तिष्ठति, 'तं जहा' तद्यथा 'दाहिणइड भरहंच उत्तरद्धभरह' दक्षिणार्द्धभरतंच ? उत्तरार्द्धभरतं च २। एवं भरतवर्षस्य भागद्रयं करोति वैताध्यः एकं दक्षिणमर्द्धम् अपरं चोत्तरमद्धमिति । अत्र वैताढयपर्वतेच 'वेयड्ढगिरिकुमारे य इत्थदेवे परिवसई' वैताहयगिरिकुमारो देवः परिवमति, स च कीदृशः ? इति जिज्ञासायामाह-'महिडूढिए जाव पलिओवमट्टिइए' महर्द्धिको यावत् पल्योपमस्थितिकः इति । अत्र यावच्छब्द संग्राह्याः शब्दा अस्यैवाष्टमसूत्रतो ग्रहीतव्याः, तेषामर्थोऽपि तत्रैव टीकातोऽवबोध्य इति ।। अथ वैताब्यस्यान्वर्थनामत्वे दर्शित हेतुमुपसंहरति-से तेणटेणं' तत्तेनार्थेनेत्यादि-स:-वैतादयः तेन- प्रदर्शितेन अर्थेन कारणेन 'गोयमा, एवं बुच्चई' हे गौतम! एवमुच्यते-'वेयड्ढे पव्वए' वैताढयः पर्वतः २ इति । ___'अदुत्तरं च णं' अथोत्तरम्-अथापरं च खलु “गोयमा ! वेयड्ढस्स पन्ध ‘गोयमा ! वेयड्ढेणं पव्वए भरहं वासं दुहा विभयमाणे चिट्ठई' हे गौतम! वैताढ्यपर्वत भरतक्षेत्र को दो विभागों में विभक्त करता है "तं जहा" जैसे 'दाहिणड्ढभरहं च उत्तर ड्ढभरहं च' इनमें एक का नाम दक्षिणोड़भरत और दूसरे के नाम उत्तरार्द्रभरत है ‘,वेयडूढगिरिकुमारे य इत्थ देवे महिइढिए जाव पलिओवमदिइए परिबसइ', इस वैताढयपर्वत पर वैताढयगिरिकुमार नाम का एक देव रहता है यह महर्द्धिक देव है और इसकी एक पल्योपम की स्थिति है यहां यावत् शब्द से संग्राह्य शब्द इसी सूत्र के अष्टम सूत्रसे जान लेना चाहिये "से तेणद्वेणं गोयमा एवं वुच्चइ वेयड्ढे पवए २' इस कारण हे गौतम! इस पर्वत का नाम वैताढ्य ऐसा मैंने कहा है । “अदुत्तरं च णं गोयमा! वेयड्ढस्स स्वासमा प्रभु छे. "गोमया ! वेयड्ढेणं पव्वए भरहं वासं दुहा विभयमाणे २ चिदुइ" गीतम! वैतादय पर्वत मत क्षेत्रने में विभागोमा विमरे छ. "तं जहा" म "दाहिणडूढभरह च उत्तरड्ढभरहं च" मेमोथी मेनु नाम इक्षिा मरत भारत नाम उत्तरारत . "वेयडढगिरिकुमारे य इत्थ देवे महिडूढिए जाव पलिओवमदिइए परिवसई, वैताढय ५ ५२ वैताक्ष्य निरिमार नामे २४ व २ छ. मामा દેવ છે. અને આની એક પલ્યોપમ જેટલી સ્થિતિ છે. અહીં યાવત્ શબ્દથી સંગ્રાહ્ય શબ્દ मे ४ सूत्रन अष्टम सूत्रथा की सेवा २७ . से तेणढेणं गोयमा ! एवं बुच्चइ वेयइढेय पव्वर २" मा रथा गीतम! मा पतनु नाम वैतादय मे में धुंछ. "अदुत्तरं Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ર जम्बूद्वीपप्राप्तिस्त्रे यस्स वेयड्ढेइ सासए' हे गौतम ! वैताढयस्य पर्वतस्य वैताढय इति शाश्वतं शाश्चतत्वसूचकं 'णामधेज्जे पण्णत्ते' नामधेयं प्रज्ञप्तम् । तत्र हेतुमाह-'जं गं' यत् यस्मात् कारणात् खलु अयं वैताब्यपर्वतः 'कयाइ ण आसि' कदापि नासीदिति न, अपि तु सर्वदैवासीत् अनेन भूतकालिकशाश्वतसत्ता सूचिता, तथा 'न कयाइ ण अत्थि' न कदापि नास्ति 'ण कयाइ ण भविस्सई' न कदापि न भविष्यति इत्याभ्यां वर्तमानकालिकी भविष्यत्कालिकी च शाश्वतसत्ता सूचिता । इत्थं व्यतिरेकेणाभिधाय सम्प्रत्यन्वयेनाह-'भुवि च' इत्यादि । अयं वैताद्व्यः 'भुवि च भवई य भविस्सइ य' अभूच्च भूतकाले भवति, अस्ति च वर्तमाने, भविष्यति च भविष्यकाले । अत एवायं-'धुबे णियए सासए अक्खए अबए अवढिए णिच्चे' ध्रुवो नियतः शाश्वतः अव्ययः अवस्थितो नित्य इति । ध्रुवादीनामर्थोऽस्यैव चतुर्थसूत्रतो बोध्य इति ॥ सू० १७॥ अथ उत्तरभरतार्द्धस्वरूपं पृच्छति मूलम्-कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे उत्तरभरहे णामं वासे पव्वयस्स वेयड्ढेइ सासए णामधेज्जे पण्णत्ते', अथवा हे गौतम-वैताढय पर्वत का- वैताढ्य ऐसा नाम शाश्वत कहा गया है' इसके होने में कोई निमित्त नही है। 'जं णं कयाइ ण आसि ण कयाइ ण अस्थि ण कयाइ ण भविस्सइ भुविं य भवइ य भविस्सइ य धुवे णियए सासए अक्खए अव्वए अवट्ठिए णिच्चे" क्योंकि ऐसा नहीं है कि यह वैताढयपर्वत पहिले नहीं था किन्तु यह पहिले भी था और ऐसा भी नहीं है कि यह वर्तमान में भी नहीं है किन्तु अब भी यह है तथा ऐसा भी नहीं है कि यह भविष्यत् काल में नहीं रहेगा किन्तु उस समय भी यह रहेगा अतः त्रिकाल में इसकी सत्ता होने से यह पहिले भूतकाल में था अब भी वर्तमान है और भविष्यत् काल में भी रहेगा इस कारण यह ध्रुव है नियत हैं शाश्वत है अक्षय है अव्यय है अवस्थित है और नित्य है इन ध्रुवादि पदों की व्याख्या चतुर्थ सूत्र में को जा चुकी है अतः यह वहीं से जानलेनी चाहिये ॥१७॥ च णं गोयमा । वेयड्ढेस्स पब्बयस्स वेयड्ढेइ सासए णामधेज्जे पण्णत्ते" अथवा गीतम! વતાઠ્ય પર્વતનું વૈતાઢય એવું નામ ય પર્વતન: તાઢય એવું નામ શાશ્વત કહેવામાં આવેલ છે. એ નામથી તેની પ્રસિદ્ધિમાં निमित्त नथा. "ज ण कयाइ ण आसि, ण कयाइ न अस्थि न कयाइ ण भविस्साह भुविं च भवइ य भविस्सइ य धुवे णियए सा ए अक्स्त्रए अवर अवठिए णिच्चे" माँ એવું પણ નથી કે આ વૈતાઢય પર્વત પહેલા હતા નહિ. પરંતુ ખરેખર એ પહેલાં પણ હતું. એ અત્યારે નથી એવું પણ નથી, એ ખરેખર વર્તમાનમાં પણ છે. તેમજ એવું પણ નથી કે એ ભવિષ્યન્ત કાલમાં રહેશે નહિ ખરેખર એ ભવિષ્યત કાળમાં પણ વિદ્યમાં રહેવાનો છે. આ રીતે ત્રિકાળમાં એની સત્તા હોવાથી આ ભૂતકાળમાં હતું, હમણાં વર્તમાનમાં मा २3. मेथी मार छ, नियत छ, शाश्वत छ, अक्षय छ, અવ્યય છે, અવસ્થિત છે અને નિત્ય છે એ પ્રવાદિ પદની વ્યાખ્યા ચતુર્થ સૂત્રમાં કરવામાં આવી છે. એથી તે સંબંધી કથન ત્યાંથી જાણું લેવું જોઈએ. ૧૭ળા Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तस्स वाहा पुरसए तिणि याणई हिं तिभ प्रकाशिका टीका सू. १८ उत्तरभारतार्द्धस्वरूपनिरूपणम् पण्णते ? गोयमा ! चुल्लहिमवंतस्स वासहरपव्वयस्स दाहिणेणं वेयड्ढस्स पव्वयस्स उत्तरेणं पुरथिमलवणसमुदस्स पच्चत्थिमेणं एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे उत्तरड्ढभरहे णामं वासे पण्णत्ते पाईणपडीणोयए उदीणदाहिणवित्थिपणे पलिअंकसंठिए दुहा लवणसमुदं पुढे पुरथिमिल्लाए कोडीए पुरथिमिल्लं लवणसमुदं पुढे पच्चत्थिमिल्लाए कोडीए पच्चथिमिल्लं लवणसमुदं पुढे गंगासिंधूहि महाणईहिं तिभागपविभत्ते दोण्णि अट्ठ तीसे जोयणसए तिणि य एगूणवीसइभागे जोयणस्स विक्खंभेणं तस्स वाहा पुरथिमपच्चत्थिमेणं अट्ठारसवोणउए जोयणसए सत्त य एगूणवीसइभागे जोयणस्स अद्धभागं च आयामेणं । तस्स जीवा उत्तरेणं पाईणपडीणायया दुहा लवणसमुदं पुट्ठा तहेव जाव चोदस जोयणसहस्साई चत्तारिय एक्कहत्तरे जोयणसए छच्च एगूणवीइभाए जोयणस्स किंचिविसेसूणे आयामेणं पण्णत्तो। तीसे धणुपुढे दहिणेणं चोदसजोयणसहस्साइं पंच अट्ठावीसे जोयणसए एक्कारस य एगृण वीसइभाए जोयणस्स परिक्खेवेणं । उत्तरड्वभरहस्स णं भंते ! वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते ? गोयमो ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव कित्तिमे हिंचेव अकित्तिमेहिचेव । उत्तरड्ड भरहेण भंते ! वासे मणुयाण केरिसए आयारभाव पडोयारे पण्णत्ते ? गोयमा ! तेणं मणुया बहु संघयणा जाव अप्पेगइया सिझंति जाव सब्ब दुक्खाणमंतं करेंति ॥सू० १८॥ छाया-क्य खलु भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे उत्तरार्द्धभरतं नाम वर्ष प्राप्तम् ? गौतम क्षुद्रहिमवतो वर्षधरपर्वतस्य दक्षिणेन वैताव्यस्य पर्वतस्य उत्तरेण पौरस्त्यलवणसमुद्रस्य पाश्चोत्येन पाश्चात्यलवणसमुद्गस्य पौरस्त्येन अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वोपे उत्तराद्ध भरत नाम वर्षे प्रशप्तम, प्राचीनप्रतीचीनाऽऽयतम्, उदीचीनदक्षिणविस्तीर्ण पर्यङ्कसंस्थितं द्विधा लघणसमुद्रं स्पृष्ट पौरस्त्यया कोट्या पौरस्त्यं लवणसमुद्रं स्पृष्टं पाश्चात्यया कोटया पाश्चात्यं लवणसमुद्रं स्पृष्टं गङ्गासिन्धुभ्यां महानदीभ्यां त्रिभागप्रविभक्तं द्वे अष्टात्रिशे योजनशते त्रीश्चैकोनविंशतिभागान योजनस्य विष्कम्मेण । तस्य बाहा पौरस्त्यपाश्चात्येन Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रतिसूत्रे अष्टादश द्विनवत्यधिकानि योजनशतानि सप्त च एकोनविंशतिभागान् योजनस्य अद्धभाग च आय मेन । तस्य जीवा उत्तरेण प्राचनप्रतीचीनाऽऽयता द्विधा लवणसमुद्र स्पृष्टा तथैव यावत् चतुर्दशयोजनसहस्त्राणि चत्वारि च एक सप्तत्यधिकानि योजनशतानि षट्च एकोनविंशतिभागान् योजनस्य किञ्चिद्विशेषोनान् आयामेन प्रज्ञप्ता । तस्याः धनुष्पृष्ठं दक्षिणेन चतुर्दशयोजनसहस्त्राणि पश्चअष्टार्विशानि योजनशतानि एकादश च एकोनविंशतिभागान् योजनस्य परिक्षेपेण ! उत्तरार्द्ध भरतस्य खलु भदन्त ? वर्ष स्य कोदशकः आकारभावप्रत्यवतारः प्रक्षप्तः ? गौतम ! बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः स यथानामकः आलिङ्गपुष्करभिति वा यावत् कृत्रिमैश्चैव अकृत्रिमैश्चैब । उत्तरार्धभरते खलु भदन्त! वर्षे मनुजाना कोदशकः आकारभाव प्रत्यवतारः ? गौतम ते खलु मनुजा बहुसंहनना यावत् अप्येकके सिद्धयन्ति यावत् सर्वदुःबानामन्तं कुर्वन्ति ।। १८ ।। टीका- 'कहि णं भंते !' इत्यादि । 'कहि णं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे-उत्तरभरहे णामं वासे पण्णत्ते' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे उत्तरार्द्धभरनं नाम वर्ष खलु क्व प्रज्ञप्तम् ? भगवानाह-'गोयमा ! चुल्लहिमवंतस्स' हे गौतम ! क्षुद्रहिमवतः-लघुहिमवतः 'वासहरपव्ययस्स दाहिणेणं' वर्षधरपर्वतस्य दक्षिणेन-दक्षिणस्यां दिशि 'वेयड्नस्स पव्वयस्स उत्तरेणं. वैताढ्यस्य पर्वतस्य उत्तरेण-उत्तरस्यां दिशि 'पुरस्थिमलवणसमुदस्स' पौरस्त्यलवणसमुद्रस्य पूर्वदिग्वतिलवणसमुद्रस्य ‘पच्चस्थिमेणं' पाश्चात्त्येन-पश्चिमायां दिशि 'पच्च स्थमलवण उत्तरार्घ भरतके स्वरूप का प्रतिपादन'कहिणं भंते! जंबुद्दीवे दीवे उत्तरड्ढ भरहे णामं वासे पण्णत्ते' इत्यादि । टोकार्थ-गौतमस्वामी ने प्रभु से ऐसा पूछा है हे भदन्त! इस जम्बूद्वीप नामके द्वीप में उत्तरार्घ भरतक्षेत्र कहां पर कहा गया है? इसके उत्तर में प्रभु कहते है ‘गोयमा! चुर्लाहमवंतस वासहरपञ्चयस्स दाहिणेणं वेयड्ढस्त पवयस्स उत्तरेणं पुरस्थिमलव गसमुदस्स पच्चत्थिमेणं पच्चस्थमलवणसमुद्दस्त पूरस्थिमेणं एस्थ णं जंबुद्दोवे दीवे उत्तरड्ढे झरहे णामं वासे पण्णत्ते हे गौतम! लघुहिमवान् वर्षधर पर्वत को दक्षिण दिशा में एवं वैताढयपर्वन की उत्तरदिशामें तथा पूर्व दिग्वीलवण समूद को पश्चिमदिशामें एवं पाश्चात्यलवणसमुद्र को पूर्वदिशामें ઉત્તરાદ્ધભરતના સ્વરૂપનું પ્રતિપાદન-- 'कहिणं भते ! जम्बुद्दीवे दीवे उत्तरड्ढभरहे णामं कासे पणत्ते' इत्यादि सूत्र ॥१८॥ ટીકાથે–ગૌતમે પ્રભુને એવી રીતે પ્રશ્ન કર્યો છે કે હે ભદંત ! આ જમ્બુદ્વીપ નામક દ્વીપમાં उत्तरा भरत क्षेत्र या स्थणे आवे छ ? मान। वामां प्रभु । छे. "गोयमा ! क्षुल्लहिमवतस्स वासहरपब्वयस्स दाहिणेणे वेयड्ढस्स पब्वयस्स उत्तरेणं पुरथिमलवण समुहस्स पच्चस्थिमेण पत्थणं जम्बुद्दीवे दोवे उत्तरडूढभरहे णामं वासे पण्णत्ते" गीतम! લઘુહિમયાન વર્ષધર પર્વતની દક્ષિણ દિશામાં અને શૈતાઢય પર્વતની ઉત્તર દિશામાં તથા પૂર્વ દિગ્વતી લવણ સમુદ્રની પશ્ચિમ દિશામાં અને પાશ્ચાત્ય લવણુ સમુદ્રની પૂર્વ દિશામાં Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० १८ उत्तरभरतार्द्धस्वरूपनिरूपणम् समुदस्स पुरथिमेणं' पाश्चात्यलवणसमुद्रस्य पौरस्त्येन-पूर्वस्यां दिशि 'एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे उत्तरढ भरहे णामं वासे पण्णत्ते' अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वीपे उत्तरार्द्धभरतं नाम वर्ष प्रज्ञप्तम्, तच्च कीदृशमिति जिज्ञासायामायामप्रमाणादिना तद्वर्णयति-'पाईणपडीणायए' प्राचीनप्रतीचीनाऽऽयतं पूर्वपश्चिमयोदिशोरायतं-दीर्घम् 'उदीणदाहिणबित्थिण्णे' उदीचीनदक्षिणविस्तीर्ण-उत्तरदक्षिणयोर्दिशोविस्तारयुक्तम्, 'पलियंकसंठिए' पर्यङ्कसस्थितं-पयङ्कासनसंस्थानेन संस्थितम्, 'दुहा लवणसमुदं पुढे' द्विधा लवणसमुद्रं स्पृष्टम्, तथाहि 'पुरथिमिल्लाए' पौरस्त्यया पूर्वदिग्भवया 'कोडीए कोटया-अग्रभागेन 'पुरथिमिल्लं' पौरस्त्थं पूर्वदिग्भवं 'लवणसमुदं पुट्टे' लवणसमुद्र स्पष्ट 'पच्चस्थिमिल्लाए' पाश्चात्यया-पश्चिमदिग्भवया 'कोडीए' कोटया 'पच्च. थिमिल्लं लवणसमुदं पुढे' पश्चिमलवणसमुद्रं स्पृष्टम्, गंगासिंधुहिं महाणईहिं तिभागपविभचे' गङ्गासिन्धुभ्यां महानदीभ्यां त्रिभागविभक्तं त्रिभिर्भागैविभक्तम्, तत्रैवं भागत्रयं बोध्य-पूर्वभागो लवणसमुद्रं संगतया गंगामहानद्या कृतः, पश्चिमभागो लवणसमुद्रं संगतया सिन्धुमहानद्या कृतः, मध्यभागो गङ्गासिन्धुकत इति । तथा 'दोण्णि जम्बूद्वोप नामक द्वीप में उत्तरार्ध भग्तक्षेत्र कहा गया है यह क्षेत्र-"पाडीण पडी णायए उदोणदाहिणवित्थिपणे पलीअंकसंठिए दुहा लवणसमुदं पुटे पच्चत्थिमिल्लाए कोडीए पच्चथिमिल्लं - लवण समुदं पुढे गंगासिंधुहिं महाणईहिं तिभागपविभत्ते दोण्णि अनीसं जोयणसए तिण्णि य एगूणविसइभागे जोयणस्स विक्खंभेणं " यह पूर्व एवं पश्चिम दिशा में लम्बा है उत्त' और दक्षिणदिशा में विस्तारयुक्त है पर्यङ्कासन संस्थान से संस्थित है पूर्वदिग्वर्ती कोटि से पूर्वदिग्वर्ती लवण समुद्र को और पश्चिम दिग्वर्ती कोटि से पश्चिम लवण समुद्र को स्पर्श कर रहा है गंगा और सिन्धु इन दो महान लवण समुद्र में मिलने वाली गंगा महानदी ने पूर्वभाग कियाहै, लवण समुद्र में मिलने वालो सिन्धु महानदी ने इसका पश्चिम भाग किया है एवं गंगा और सिन्धु इन दोनोने इसका मध्यभाग किया है, इसका विस्तार मद्वीप नामापमा उत्तरा भरत क्षेत्र आवेस छ. मात्र पाडीण पडीणायव उदीणदाहिणवित्थिपणे पलिअंकसंठिए दुहा लवणसमुदं पुढे पुरस्थिमिल्लाए. कीडोए पुरथिमिल्लं लवणासमुहं पुढे पच्चथिमिल्लाए कोडीए पच्वत्थिमिल्लं लवणसमुदं पुढे गंगासिधूहि महाणईहि तिभागपविभत्ते दोणि अटतीसे जोयणसए तिण्णिय पगूणवोसइ भागे जायणस्ल विक्खंमेण" मा पूतभर पनि દિશામાં લાંબુ છે. ઉત્તર અને દક્ષિણ દિશામાં વિસ્તારયુક્ત છે. પર્યકાસન સંસ્થાનથી સંસ્થિત છે. પૂર્વ દિગ્વતી કેટથી પૂર્વ દિગ્વતીં લવણ સમુદ્રને અને પશ્ચિમ દિશા કોટિ પશ્ચિમ લવ સમુદ્રને આ પશી રહેલ છે. ગંગા અને સિધુ એ બે મહા નદીઓ એ એને ત્રણ વિભાગમાં વિભક્ત કરેલ છે. લસણ સમુદ્રમાં મળનારી મહા નદી ગંગાએ અને પૂર્વ ભાગ કર્યો છે, લવણ સમુદ્રમાં મળનારી મહાનદી સિધુએ આને પશ્ચિમે ભાગ કર્યો છે. અને ગંગા અને સિધુએ આનો મધ્યભાગ કર્યો છે. આ વિસ્તાર Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३६ जम्बूद्वीपप्रक्षप्तिसूत्रे अद्वतोसे जोयणसए' द्वे अष्टात्रिंशे योजनशते अष्टात्रिंशदधिकानि द्विशतयोजनानि 'तिणि य एगृथबीसइभागे जोयणस्स' त्रीश्च एकोनविंशतिभागान् योजनस्य-एकोनविंशतिभागविभक्तस्य योजनस्य त्रीन् भागाँश्च 'विक्खंभेणं' विष्कम्भेण-विस्तारेण । 'तस्स' तस्य-उत्तरार्द्धभरतस्य 'बाहा'-बाहा-भुजाकारः क्षेत्रविशेषः 'पुरथिमपञ्चत्थिमेणं' पौरस्त्यपश्चिमेन-पूर्वपश्चिययोदिशोः 'अट्ठारस बाणउए जोणसए' अष्टादश द्विनवत्यधिकानि योजनशतानि-द्विनवत्यधिकाष्टशताधिकैकसहस्रयोजनानि 'सत्त य एगूण वीसइभागे जोयणस्स अद्धभागं च सप्त च एकोनविंशतिभागान् योजनस्य अर्द्धभागम्-एकोनविंशतिभागविभक्तस्य योजनस्य सप्तभागान् एकोनविंशतितमभागस्य अर्द्धभागं च 'आयामेणं'=दैर्येण । 'तस्स' उत्तरार्धभरतस्य 'जीवा' जीवा 'उत्तरेणं' उत्तरेण चुल्लहिमवदिशि 'पाईणपडोणायया' प्राचीन प्रतीचीनाऽऽयता-पूर्वपश्चिमयोर्दिशोरायता दीर्घा, 'दुहा लवणसमुदं पुट्ठा तहेव' द्विधा लवणसमुद्रं स्पृष्टा तथैव पूर्ववदेव दक्षिणार्द्धभरतजीवावदेव, अयम्भावः पौरस्त्यया कोटया पौरस्त्यं लवणसमुद्रं स्पृष्टा पश्चिमया कोटया पश्चिमलवणसमुद्रं स्पृष्टा, इत्येव दर्शयितुमाह-'जाव' यावदिति पश्चिमलवणसमुद्रं स्पृष्टेति पर्यन्तमित्यर्थः, 'चोदसजोयणसहस्साई' चतुर्दश योजन २३८ - योजन का है "तस्स बाहा पुरथिमपच्चत्थिमेणं अट्ठारस बाण उए जोयणसए सत्त य एगूणवीसइभागे जोयणस्स अद्धभागं च आयामेणं" इस उत्तरार्ध भरत की बाहा-भुनाकार क्षेत्र विशेष पूर्व पश्चिमदिशा में १८९२ योजन को और एक योजन के १९ भागों में से ७|| भाग प्रमाण है यह कथन आयाम(दीर्घता) की अपेक्षा से कहा गया है। "तस्स जीवा उत्तरेणं पाईणपडीणायया दुहा लवणसमुदं पुट्ठा तहेव जाव चोद्दसजोयण सहस्साई चत्तारि य एकहत्तरे जोयणसए छच्च एगूणवीसइमाए जोयणस्त किंचि विसेसुणे आयामेणं पण्णत्ता" उस उत्तरार्ध भारत की जीवा क्षुल्लहिमवान् पर्वत की दिशा में पूर्व से पश्चिम तक लम्बी है और पूर्व दिग्वर्ती कोटि से पूर्वदिग्वर्ती लवणससुद्र का तथा पश्चिम दिग्वर्ती कोटिसे पश्चिम लवण समुद्र को छूती है इसका आयाम १४४७१ योजन का है और २3८13:१८ यान से छ. "तस्स बाहा पुरथिमपचत्थिमेणं अट्ठारसबाण उप जोयणसए सत्त य एगूणवीसइभागे जोयणस्स अद्धभागं च आयामेण" मा उत्तरा ભારતની વાહા-ભુજાકાર ક્ષેત્ર વિશેષ- પશ્ચિમ દિશામાં ૧૮૯૨ યેાજન જેટલી અને એક યોજનના ૧૯માં ભાગમાંથી ના ભાગ પ્રમાણ છે. આ કથન આયામની અપેક્ષાએ समान थे. "तस्त जीवा उत्तरेणं पाईणपडीणायया दुहा लवणसमुदं पुट्ठा तहेव जाव चोइस जोयणसहस्साई चत्तारिय पक्कहत्तरे जोयणसए छच्च पगूणवीसइ भाए णस्स किचि विसेसूणे आयामेण पण्णत्ता" तत्तरा बरतनी खुद હિમાવાન પર્વતની દિશામાં પૂર્વથી પશ્ચિમ સુધી લાંબી છે અને પૂર્વ દિવતી કોટથી પૂર્વ દિવતી લવણુ સમુદ્રને તેમજ પશ્ચિમ દિગ્વતી કટિથી પશ્ચિમ લવણ સમુદ્રને Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १८ वैताढ्याभिधाने कारणनिरूपणम् १३७ सहस्राणि-चतुर्दशसहस्त्रयोजनानि 'चत्तारि य एक्कहत्तरे जोयणसए' चत्वारि च एकसप्तत्यधिकानि योजनशतानि- एकसप्तत्यधिकचतुश्शतयोजनानि 'छच्च एगृणवीसइभाए जोयणस्स किंचिविसेसूणे' षट् च एकोनविंशतिभागान् योजनस्य किश्चिद्विशेषोनान् एकोनविंशतिभागविभक्तस्य योजनस्य किंचिद्विशेषन्यूनान् षड्भागान् 'आयामेणं पण्णत्ता' आयामेन-दैर्येण प्रज्ञप्ता, 'तीसे' तस्याः उत्तरार्द्धभरतजीवायाः 'दाहिणेणं' दक्षिणेन-दक्षिणस्यां दिशि दक्षिणपार्श्वे इति भावः 'धणुपुढे' धनुष्पृष्ठम्-उत्तरार्धभरतक्षेत्रसम्बन्धि धनुष्पृष्ठाकारः क्षेत्रविशेषः 'चोदस्स जोयणसहस्साई' चतुर्दशयोजनसहस्राणि-चतुर्दशसहस्रयोजनानि, 'पंच अट्ठावीसे जोयणसए' पञ्च अष्टाविंशानि योजनशतानि-अष्टाविंशत्यधिकानि पञ्चशतयोजनानि 'एक्कारस य एगूणवीसइभाए जोयणस्स' एकादश एकोनविंशतिभागान् योजनस्य एकोनविंशति-भागविभक्तस्य योजनस्य एकादश भागांश्च 'परिक्खेवेणं' परिक्षेपेण-परिधिना विज्ञयमिति । अथोत्तरार्द्धभरतस्य स्वरूपं प्रश्नोत्तराभ्यां वर्णयितुमाह-'उत्तरद्ध भरहस्स णं भंते ! वासस्स केरिसए' उत्तरार्द्धभरतस्य खलु भदन्त ! वर्षस्य कीदृशकः-स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः ‘पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः, भगवानुत्तरयति--गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे' हे गौतम ! बहुसमरमणीयः-अत्यन्तसमतलोऽत एव रमणीयः-सुन्दरः भूमिएक योजन के १८ भागों में से कुछ कम ६ भाग प्रमाण है । "तीसे धणुपुढे दाहिणेणं चोदस जोयणसहस्साइं पंच अावोसे जोयगसए एकारस य एगूणवीसभाए जोयणस्स परिक्खेवेणं" उस उत्तरार्ध भारत की जीवा का दक्षिण दिशा में दक्षिणपार्श्वमें-धनुष्पृष्ठ-धनुष् पृष्ठाकार क्षेत्र विशेष १४५२८ योजन को और एक योजन के १८ भागों में से ११ भाग प्रमाण कहा गया है यह धनुष्पृष्ठ का परिक्षेप की अपेक्षा प्रमाण कथन है। "उत्तरड्ढ भरहस्स णं भंते ! वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते" हे भदन्त! "उत्तरार्ध भरतक्षेत्र का आकारभाव प्रत्यवतार-स्वरूप कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "गोयमा बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते से जहा णामए आलिंग पुवखरेह वा जाव સ્પશે છે. આને આયામ ૧૪૪૭૧ જન જેટલું છે. અને એક જનના ૧૦ ભાગभांथी म ६ मा प्रमाण छे. "तीसे धणुपुढे दाहिणेण चोद्दस्स जोयणसहस्साई पंच अटूठावीसे जोयणसए एक्कारस य एग्णवीस हे भाए जोयणस्स परिक्खेवेणं" ते ઉત્તરાર્ધ ભરતની જીવાનું દક્ષિણ દિશામાં–દક્ષિણ પાર્શ્વમાં-ધનુપૃષ્ઠ—ધનુષ-પૃષ્ઠકાર ક્ષેત્ર વિશેષ-૧૪૫૨૮ જન જેટલું છે અને એક એજનના ૧૦ ભાગમાંથી ૧૧ ભાગ પ્રમાણે કહેવાય છે. ધનુપૃષ્ઠના પરિક્ષેપની અપેક્ષાએ આ પ્રમાણ કથન છે. 'उत्तरड्ढभरहस्सण भंते ? वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णते" है ભદન્ત ! ઉત્તરાર્ધ ભરત ક્ષેત્રને આકારભાવ પ્રત્યવતાર (સ્વરૂપ) કેવા છે? આના જવાબમાં प्रभु है छे. "गोयमा बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते से जहा णामए आलिंगन खरेइ ૧૮ Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३८ जम्बूद्वीपप्रतसूत्रे भागे पण्णत्ते' भूमिभागः प्रज्ञप्तः स च भूमिभागः कीदृशः इति जिज्ञासायामाह - 'से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव कित्रिमेहिंचेव अकित्तिमेहिं चेव' स यथा नामक आलिङ्गपुष्करमिति वा यावत् कृतिमैश्चेव अकृत्रिमैश्चैवेति । अत्र यावत्पद संग्राह्याणि पदानि राजप्रश्नीयसूत्रस्य पञ्चदशसूत्रादारभ्य एकोनविंशतितमसूत्रतो बोध्यानि । तदर्थश्च तत्रैव मत्कृतसुबोधिनी टीकातो विज्ञेय इति । अथोत्तरार्द्ध भरतवर्षवास्तव्यमनुष्यस्वरूपं पृच्छति - उत्तरार्द्ध भरते खलु भदन्त ! वर्षे - इत्यादि 'उत्तरड्ढ भर हे णं भंते ! वासे' हे भदन्त ! उत्तरार्द्धभरते वर्षे - उत्तराद्धभरतक्षेत्रे स्थितानां ' मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे' मनुजानां कीदृशकः आकारभावप्रत्यवतारः–स्वरूपपर्याय प्रादुर्भावः 'पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः ? भगवानाह - गोयमा ! तेणं मणुया वहुसंघयणा जाव अप्पेगइया सिज्यंति जाव सव्व दुक्खाण मंतं करें ति' हे गौतम ! ते खलु मनुजा: बहुसंहनना यावद् अप्येकके सिद्धयन्ति यावत् कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिंचेव" हे गौतम उत्तरार्ध भरत क्षेत्र का स्वरूप इस प्रकार से कहा गया है वहां का भूमिभाग बहुसमरमणीय है और वह आलिंगपुष्कर के जैसा कहा गया है मृदङ्ग के मुखपुट का नाम आर्लिङ्गपुष्कर है इस विषय में पहिले अनेक उपमावाची शब्दों द्वारा स्पष्टीकरण किया जा चुका है यही बात यावत् पद से यहां समझाई गई है इसके लिये राजप्रश्नीय सूत्र के १५ वें सूत्र से लेकर १९ वें सूत्र तक के पाठ को देखना चाहिये वहां का भूमिभाग कृत्रिम और अकृत्रिम तृणों से एवं मणियों से सुशोभित है । "उत्तरडूढभरणं भंते वासे मणुयाणं केरिसए आयारभाव पडोयारे पण्णत्ते' हे भदन्त ! उत्तरार्ध भरत में रहने वाले मनुष्यों का स्वरूप कैसा कहा गया हैं ? उत्तर में प्रभु कहते हैं 'गोयमा तेणं मणुया बहु संघयणा जाव अप्पेगइया सिज्झति जाव सव्वदुक्खाणमंत करें ति, हे गौतम ! वहां के निवासी मनुष्यों का स्वरूप ऐसा है कि वे वज्रऋषभनाराच आदि अनेक प्रकार जावतमेहिं चेव अकित्तिमेहि चैव” डे गौतम ! उत्तराध भरतक्षेत्र स्व३ मा प्रभा કહેવામાં આવેલ છે. ત્યાંના ભૂમિભાગ બહુસમરમણીય છે અને તે આલિંગ પુષ્કરના જેવા કહેવામાં આવેલ છે. મૃદાંગના મુખપુટનું નામ આલિંગ પુષ્કર છે. આ સબ ંધમાં પહેલાં અનેક ઉપમાવાચી શબ્દોવડે સ્પષ્ટતા કરવામાં આવી છે. એજ વાત અહીં યાવતું પદ્મથી અહીં સ્પષ્ટ કરવામાં આવી છે. આ માટે રાજપ્રશ્નીય સૂત્રના ૧૫માં સૂત્રથી માડીને ૧૯માં સૂત્ર સુધીના પાઠને જોવા જોઈ એ. ત્યાંના ભૂમિભાગ કૃત્રિમ અને અકૃત્રિમ તૃણાથી તેમજ મણુિએથી સુશેાભિત છે. "उत्तरइढभरहेण भंते ! वासे मणुयाण केरिसप आयारभावपडोयारे पण्णत्ते" डे ભત ! ઉત્તરાષ` ભરત માં રહેનારા માણસાના સ્વરૂપ કેવા છે. ? ઉત્તરમાં પ્રભુશ્રી કહે છે. "गोयमा ! तेण मणुया बहुसंघयणा जाव अप्येगइया सिज्झति जाव सव्व दुक्खाणमंत करेति” डे गौतम ! त्यांना निवासी मनुष्याना स्वय सेवा छे तेथे व ऋष Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० १८ वैताढ्याभिधाने कारणनिरूपणम् सर्वदुःखानामन्तं कुर्वन्ति । अत्र यावत्पदद्वयसंग्राह्याणि पदानि एकादशसूत्रतो बोध्यानि तदर्थोऽपि तत्रैव बोध्य इति । ननु उत्तरार्द्ध भरतवर्षक्षेत्रवासिमनुष्याणां मुक्तिधर्मोपदेशकतीर्थकराद्यभावेन मोक्षाङ्गभूतधर्मश्रवणाद्यभावात् कथं मोक्षप्राप्तिसूचकसूत्रोक्तिः सङ्गतिमङ्गति ? इतिचेत् उच्यते चक्रवर्तीकाले समुद्घाटित गुहाद्वयसत्त्वेन उत्तरार्द्धभरतवासिनां जनानां दक्षिणार्द्धभरते दक्षिणार्द्ध भरतवासिनां साध्वादीनामुत्तरार्द्धभरते च गमनागमनतस्तेषामुत्तरार्द्ध भरतवासिनां साध्वादिभ्यो मोक्षधर्मश्रवण सद्भावान्मोक्षसूत्रोक्तिरुचितैव । यद्वा चक्रवर्ती कालातिरिक्ते काले विद्याधरश्रमणादिभ्यो मोक्षधर्मंश्रवणसंभवात् स्वतो वा जातिस्मरणादिना मोक्षाङ्गधर्मप्राप्ति संभवान्मोक्षसूत्रोक्तिः रुचितैवेति ॥ ०१८॥ के संहनन वाले होते हैं, यावत् इनमें से कितनेक उसीभव से सिद्ध होते हैं यावत् समस्त दुःखों का विनाश करते हैं । यहां आगत दो यावत्पदों के द्वारा जिन पदों का संग्रह हुआ है उन पदों के लिये देखो ११ वें सूत्रको १३९ शंका उत्तरार्धभरत क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों को जो मोक्ष प्राप्ति होना कही गई सो वहां मुक्ति धर्मोपदेशक तीर्थकर आदि के अभाव होने से मोक्षाङ्गभूत धर्म श्रवण के अभाव को आश्रित करके कैसे वह संगत हो सकती है ? उत्तर - चक्रवर्तिकाल में समुद्घाटित गुहा द्वय के सत्व से उत्तरार्ध भरतवासी जनों का दक्षिणार्ध भरत में गमनागमन होने से उन्हें साधु आदिकों से मोक्षधर्मश्रण का अवसर मिल जाता है इससे इन्हें मोक्षप्राप्ति को होना संगत ही है असंगत नहीं । अथवा चक्रवर्तीकाल के अतिरिक्त काल में विद्याधर श्रमणादि को से मोक्षप्राप्ति के कारणभूत धर्म की प्राप्ति का होना संभव होने से अथवा स्वतः जातिस्मरण आदि से मोक्षके कारेणभूत धर्मकी प्राप्तिका होना संभव होनेसे यहां मोक्षसूत्रोक्ति उचित ही है ॥ १८ ॥ નારાચ વગેરે અનેક પ્રકારના સહુનનવાળા હાય છે, યાવત્ અમાંથી કેટલાક તેજ ભવમાં સિદ્ધ થઈ જાય છે. યાવત્ સર્વ દુઃખાને વનષ્ટ કરે છે. અહીં આવેલા એ ચાવતા પદો, વડે જે પદેને! સૌંગ્રહ થયેલ છે. તે પદો ના માટે ૧૧ મા સૂત્ર માં જોવુ' જેઈ એ. શંકા——ઉત્તરાષ` ભરત ક્ષેત્ર માં નિવાસ કરનારા મનુષ્યના સબંધમા જે મેક્ષ પ્રાપ્તિ માટે કહેવામાં આવેલ છે તે ત્યાં મુક્તિ ધર્મપદેશક તિર્થંકરના અભાવથી તેમજ મેાક્ષાં ગભૂત ધર્મ શ્રવણના અભાવથી માક્ષપ્રાપ્તિનું ક્રથન કેવી રીતે ઉચિત કહેવાય ? ઉત્તર-ચક્રવતી કાળમાં સમુદ્ધાટિત શુદ્ભયના સત્ત્વથી ઉત્તરાધ ભરત વાસી જનેાનુ દક્ષિણુાદ્ધ ભરત માં ગમનાગમન થવાથી તેમને સાધુઓ વગેરેથી મેાક્ષધમ શ્રવણુના અવસર મળે છે. તેથી તેમને મેક્ષ પ્રાપ્તિ થવી અસંગત નહિ. પણુ સંગત જ કહેવાય અથવા ચક્રવતી કાળના અતિરિક્ત કાળ માં વિદ્યાધરભ્રમણાદિકાથી માક્ષપ્રાપ્તિના કારણભૂત ધર્મનુ શ્રવણુ” સંભવિત ઢાવાથી અથવા સ્વતઃ જાતિ સ્મરણુ આદિથી માક્ષના કારણે ભૂત ધર્માંની પ્રાપ્તિ થવી સ’ભવ હાવાથી મેક્ષ સૂત્રાકિત ઉચિત જ છે, ૫૧૮૫ Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ .१४० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे उत्तरार्द्धभरते ऋषभकूटपर्वतः क्वाऽस्तीति पृच्छति मूलम्-कहिण भंते ? जंबुद्दीवे दीवे उत्तरड्ढभरहे वासे उसभकूडे णामं पव्वए पण्णत्ते । गोयमा ! गंगा कुंडस्स पञ्चत्थिमेण सिंधुकुंडस्स पुरस्थिमेणं चुल्लहिमवंतस्स वासहरपव्वयस्स दाहिणिल्ले णितंवे एत्थ णं जंबुदीवे दीवे उत्तरड्ढभरहे वासे उसभकूडे णामं पब्बए पण्णत्ते, अट्ठ जोयणाई उड्ढे उच्चत्तेण, दो जोयणाई उव्वेहेणं मूले बारस जोयणाई विक्खंभेणं, मज्झे अट्ठ जोयणाई विक्खभेणं, उप्पिं चत्तारि जोयणाई विक्खंभेणं, मृले साइरेगाइं सत्ततीसं जोयणाई परिक्खेवेणं मज्झे साइरेगाइं पणवीसं जोयणाई परिक्खेवेणं उप्पिं साइरेगाइं बारस जोयणाई परिक्खेवेणं मूले वित्थिपणे मज्झे संक्खित्ते उप्पि तणुए गोपुच्छसंगणसंठिए, सब्वजंबणयामए अच्छे सण्हे जाव पडिरूवे । से णं एगाए पउमवरवेइयाए तहेव जाव भवणं को आयांमणं, अद्धकोसं विक्खंभेणं. देसूर्ण कोसं उड्डें उच्चत्तेणं अट्ठो तहेव उप्पलाणि पउमाणि जोव उसमेय एत्थ देवे महिड्डिए जाव दाहिणेणं रायहाणी तहेव मंदरस्स पव्वयस्स जहा विजयस्त अविसेसियं'।सू०१९।। छाया-क्व खलु भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे उत्तरार्द्धभरते वर्षे ऋषभकूटो नाम पर्वतःप्रज्ञप्तः, गौतम ! गङ्गाकुण्डस्य पश्चिमेन सिन्धुकुण्डस्य पौरस्त्येन क्षुद्रहिवतो वर्षधरपर्वतस्य दक्षिणात्ये, नितम्बे, अत्र खलु जम्बूद्वीपे द्वीपे उत्तरार्द्धभरते वर्षे ऋषभकूटो नाम पर्वतःप्रज्ञप्तः, अष्ट योजनानि ऊर्ध्वमुच्चत्वेन द्वे योजने उद्वेधेन, मूले द्वादश योजनानि विष्कम्भेण मध्ये अष्ट योजनानि विष्कम्भेण, उपरि चत्वारि योजनानि विष्कम्भेण, मूले सातिरेकाणि सप्तत्रिशतं योजनानि परिक्षेपेण, मध्ये सातिरेकाणि पञ्चविंशति योजनानि परिक्षेपेण, उपरि सातिरेकाणि द्वादशयोजनानि परिक्षेपेण । मूले विस्तीर्णः मध्ये संक्षिप्तः उपरि तनुकः गोपुच्छ संस्थान संस्थितः सर्वजम्बूनदमपः अच्छः श्लक्ष्णो यावत् प्रतिरूपः स खलु पकया पद्मवरवेदिकया तथैव यावत् भवनं क्रोशम् आयामेन अर्द्धक्रोशं विष्कम्मेण, देशोन कोशमूर्ध्वमुच्चत्वेन, अर्थस्तथैव, उत्पलानि पद्मानि यावत् ऋषभश्च, अत्र देवो महद्धिको यावत् दोन राजधानो तथैव मन्दरस्य पर्वतस्य यथा विजयस्य अविशेषितम् ।।सू०१९॥ उत्तरार्ध भरत में ऋषभक्ट कहां पर है ? इसका समाधान :"कहिं गं भंते ! जेबुद्दीवे दीवे उत्तरइढ भरहे वासे उसभकूहे णामं पव्वए' ઉત્તરાર્ધ ભારતમાં ત્રષભકૂટ કયાં આવેલ છે ! તેનું સમાધાન'कहिणे भंते ! जम्बुद्दोवे दीवे उत्तरड्ढ भरहे पासे उसमकूडे णाम पव्वर पण्णते' Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू, १९ उत्तरार्द्धभरते ऋषभकूटपर्वतनिरूपणम् टीका-'कहि णं भंते !' इत्यादि । 'कहिणं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे उत्तरढभरहे बासे उस भकूडे णामं पव्वए पणत्ते' हे भदन्त ! जंबद्वीपे द्वीपे उत्तरार्द्धभरते वर्षे ऋषभकूटो नाम पर्वतः क्य-कस्मिन् प्रदेशे प्रज्ञप्तः ? भगवानाह-'गोयमा ! गंगाकुंडस्स' हे गौतम ! गङ्गाकुण्डस्य गङ्गायाः महानद्याः कुण्डं-हिमवतो निपतज्जलाशयस्तस्य 'पच्चत्थिमेणं' पश्चिमेन पश्चिमायां दिशि 'सिंधुकुंडस्स' सिन्धुकुण्डस्य सिन्धोः कुण्डंहिमवतो निपतज्जलाशयस्तस्य 'पुरस्थिमेगं' पौरस्त्येन-पूर्वस्यां दिशि 'चुल्लहिमवंतस्स' क्षुद्रहिमवतः-लघुहिमवतो 'वासहरपबयस्स दाहिणिल्ले' वर्षधरपर्वतस्य दाक्षिणात्येदक्षिणदिग्भवे 'णितंबे' नितम्बे मेखलासमीपवर्ती प्रदेशे 'एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे उत्तरड्ढभरहे वासे उसभकूडे णामं पाए पण्णत्ते' अत्र स्खलु जम्बूद्वीपे दीपे उत्तरार्द्धभरते वर्षे ऋषभक्टो नाम पर्वतः प्रज्ञप्तः, स च 'अट्ठजोयणाई उड्हें उच्चत्तण दो जोयणाई उव्वे हेणं' अष्ट योजनानि उर्ध्वमुच्चत्वेन द्वे योजने उद्वेधेन गाम्भीर्येण परिक्षेपेण । पण्णत्ते' इत्यादि । टीकार्थ-गौतम स्वामो ने प्रभु से ऐसा पछा हे-हे भदन्त! उतरार्ध भरत क्षेत्र में ऋषक्ट नामका पर्वत कहां पर कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं- 'गोयमा ! गंगाकुंडस्स पच्चत्थिमेणं सिंधुकुंडस्स पुरस्थिमेणं क्षुल्लहिमवंतस्स वासहरपवयस्स दाहिजिल्ले णितंबे एत्थ णं जंबुद्द वे द वे उत्तरड्ढ भरहेवासे उसभकूडे णामं पव्वए पण्णत्ते" भगवान फरमाते है हे गौतम ! गंगाकुन्ड-हिमवान पर्वत से गङ्गा नदी जिस स्थान पर नीचे गिरती है उस स्थान की पश्चिम दिशा में एवं सिन्धुकुण्ड-हिमवान् से सिन्धु महानदी जिस स्थान पर नीचे गिरती है उस स्थान--की पूर्व दिशा में नथा-लघुहिमवान् वर्षधर पर्वत के दक्षिण दिशा के नितम्ब-मेखलासमीपवर्ती प्रदेश-पर जम्बुद्वीपस्थित उत्तरार्ध भरतक्षेत्र में ऋषभकूट नामका अत्यंत रमणीय पर्वत कहा गया है । यह ऋषभक्ट नाम का पर्वत 'अट्ठजोयणाई उड्हें उच्चत्तेणं' ऊँचाई में आठ योजन का है "दो जोयणाई उव्वेहेणं" दो योजन जमीन में है इत्यादि स० १९॥ ટીકાર્ચ–ગૌતમેં પ્રભુને પ્રશન કર્યો કે હે ભદન્ત ! ઉત્તરાર્ધ ભરત ક્ષેત્રમાં ઋષભકૂટ નામે त यां यावती छे. १ ना वासभा प्रभु ४३ छ-गोयमा' गंगाकुंडस्स पच्चत्थिमेण सिंधुकुण्डस्स पुरथिमेण क्षुल्लहिमवंतस्त बासहरपव्वयस्स दाहिणिल्ले णितंबे पत्थण जम्बुद्दीवे दीवे उत्तरड्ढ भरहे वासे उसभकूडे णाम पव्वर पण्णत्त" 3 गौतम! भिवान પર્વત થી ગંગા મહા નદી જે સ્થાન પરથી નીચે પ્રવાહિત થાય છે, તે ગંગા કુંડની પશ્ચિમદિશામાં અને હિમવાન થી સિધુ મહા નદી જે સ્થાન પરથી નીચે પ્રવાહિત થાય છે તે સિબ્ધ કુંડની પૂર્વ દિશામાં તથા લઘુહિમાવાન વર્ષધર પર્વતની દક્ષિણ દિશાના નિતંબમેખલા સમી પવતી પ્રદેશ-પર જબૂદ્વીપસ્થિત ઉત્તરાર્ધ ભરતક્ષેત્રમાં ઋષભકૂટ નામે पत मावत छ. मा मटनम त "अट्ठजोयणाई उडूढ उच्चत्तणं" याभां 18 योगनरेट छ. 'दो जोयणाई उब्वेहेणं' में यात रेस मीननी ४२ छे. Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ કર जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मूले बारस जोयणाई विक्खभेणं' मूले- मूलप्रदेशे द्वादशयोजनानि विष्कम्भेण, 'मज्झे अठ जोयणाई विक्खंभेणं' मध्ये अष्ट योजनानि विष्कम्भेण 'उपिं चत्तारि जोयणाई विक्खंभेणं' उपरि चत्वारि योजनानि विष्कम्भेण उपलक्षणत्वाद् मूले मध्ये उपरि च आयाम प्रमाणमपि तथैव विज्ञेयम् समवृत्तस्यायामविष्कम्भयोः साम्यादिति । तथा 'मूले साइरेगाई' मूले सातिरेकाणि किञ्चित्प्रदेशाधिकाणि 'सत्ततीसं जोयणाई परिक्खेवेणं' सप्तत्रिंशतं योजनानि परिक्षेपेण - परिधिना, 'मज्झे' मध्ये - मध्यदेश भागे 'साइरेगाई पणवीसं' सातिरेकाणि पञ्चविंशतिं - पञ्चविंशतिसंख्यानि 'जोयणाई परि क्खेवेणं' योजनानि परिक्षेपेण 'उप' उपरि- ऊर्ध्वदेशे 'साइरेगाई बारस जोयणाई परिक्खेवेणं' सातिरेकाणि द्वादश योजनानि परिक्षेपेण-परिधिना । सण्हे, जाव पडिरूवे" तथा 'मूले वित्थिण्णे' मूले विस्तीर्णो 'मज्झे संक्खित्ते' मध्ये संक्षिप्तः 'उपितणुए' उपरि तनुकः अत एव 'गोपुच्छसंठाणसंठिए गोपुच्छसंस्थानसंस्थितः, तथा 'सव्वजंबुणयामए' सर्व जम्बूनदमयः सर्वात्मना जम्बूनदाख्यस्वर्णविशेषमय : 'अच्छे स "मूळे बारस जोयणाई चिक्खंभेणं, मज्झे अट्ठजोयणाई विक्खंभेणं, उपि चत्तारि जोयणाई विक्खंभेणं" मूल में इसका विष्कम्भ - विस्तार - बारह योजन का है मध्य में इसका विस्तार आठ योजन का है और ऊपर में इसका विस्तार चार योजन का है "मूळे साईरेगाई सत्ततीसं जोयणाई परिक्खेवेणं' मज्झे साइरेगाईं पणवोसं जोणाईं परिक्खेवेणं, उपि साइरेगाई बारस जोयणाई परिक्खेवेणं" मूल में इसको परिधि कुछ अधिक ७ सात योजन की है। मध्य मे इसकी परिधि कुछ अधिक २५ पचीस योजन कहि गई है और ऊपर में इसकी परिधि कुछ अधिक १२ बारह योजन की है । इस तरह यह ऋषम कूट पर्वत " मूले वित्थिन्ने मझे संखित्ते उपिं तणुए गोपुच्छसंठाणसंठिए सव्वजंबूणयामए अच्छे, मूल में विस्तीर्ण मध्य में संकुचित और ऊपर में पतला होगया है अतएव गाय को पूछ का जैसा संस्थान होता है वैसा हि इसका संस्थान होगया है यह पर्वत सर्वात्मना जाम्बूनद स्वर्णका बना हुआ है और अच्छ से लेकर प्रतिरूप तक के विशेषणों वाला है 'मूले बारस जोयणाई विक्खमेण मज्झे अट्टजोयणाइं विक्खेमेण उपि चत्तारि जोयणाई विक्खमेण " भूसमां माने। विष्णुंभ- विस्तार भार थोक्न भेटलो छे, मध्यमां मानो વિસ્તાર આઠ ચેાજન જેટલેા છે. અને ઉપરમાં આના વિસ્તાર ચાર ચાજન જેટલે છે. "मूले साइरेगाई सत्ततोस जोयणाई परिक्खेवेण मज्झे साइरेगाइ पणवीसं जोयणाइ परिक्खेवेण उपि साइरेगाई बारसजोयणारं परिक्खेवेण” भूमां यानी परिधि અધિક ૨૫ યેાજન જેટલી છે. અને ઉપરમાં એની પિરિધ કઈક અધિક ૧૨ ચેાજન જેટલી छे. या प्रभाछे या ऋषलट पर्यंत 'मूले वित्थिन्ने मज्झे संखित्ते, उपि तणुए गोपुच्छसंठाणसंठिए सत्र जम्बू गयामप अच्छे सन्हे जाव पडिरूत्रे" भूसमां मध्यमां સંકુચિત અને ઉપરમાં પાતળા થઈ ગયા છે. એથી ગાયના પૂછડાનુ' જેવું સસ્થાન હોય ઢે તેવું આન' સંસ્થાન થઈ ગયુ` છે. આ પર્યંત સર્વાત્મના જામ્બૂનઃ-સ્વર્ણ નિર્મિત છે Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १९ उत्तरार्द्धभरते ऋषभकूटपर्वतनिरूपणम् जाव पडिरूवे' अच्छश्लक्ष्णो यावत्प्रतिरूपः । अच्छादि प्रतिरूपान्तपदानां संग्रहोऽथेश्च पूर्ववद् बोध्य इति । तथा 'से णं' सः ऋषभकूटपर्वतः खलु 'एगाए पउमवर वेइयाए' एकया पद्मवरवेदिकया 'तहेव' तथैव-सिद्धायतनकूटवदेव वर्णनीयः, तद्वर्णकवाक्यं किम्पर्यन्तं संग्राह्यमिति जिज्ञासायामाह-'जाव भवणं' यावद् भवनम् ऋषभकूटाधिपते ऋषभनामकदेवस्य भवनवर्णनपर्यन्तं संग्राह्यम् , तथाहि-एकेन च वनषण्डेन सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्तः, ऋषभकूटस्य खलु उपरि बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्ता, स यथा नामकः आलिङ्गपुष्करमिति वा यावदू व्यन्तरा यावद् विहरंति, तस्य खलु बहुसमरमणीयस्य भूमिभागम्य बहुमध्यदेशभागे महदेकं भवनं प्रज्ञप्तमिति । एतदयाख्या भवणवणेनं च चतुर्दशसूत्रतो बोध्यम् । अथ भवनमानमाह-कोसं' इत्यादि । तद्भवनं 'कोसं आयामेणं' क्रोशम् आया मेन दैध्येण 'अद्धकोसं' अर्द्धक्रोशं-क्रोशस्यार्द्ध 'विक्खम्भेणं'-विष्कम्भेण विस्तारण "से णं एगाए पउमवर वेइयाए तहेव जाव भवणं कोसं आयामेणं अद्धकोसं विखंभेणं दे सूर्ण कोर्स उडे उच्चत्तेणं अट्ठो तहेव" यह ऋषभकूट पर्वत चारों ओर से एक पद्मवर वेदिका से परिवेष्टित हैं । इसका और सर्व विशेष वर्णन सिद्धायतन क्ट के जैसा ही है तथाच वह ऋषभकूट पर्वत एक वनषण्ड से चारों ओर से घिरा हुआ है । इस ऋषभकूट पर्वत की ऊप र की भूमि बहुसमरमणीय है जैसा बहुसम मृदङ्ग का मुखपुट होता है ऐसा ही बहुसम उस पर्वत का ऊपर का भूमिभाग हैं, यावत् यहां अनेक प्रकारके व्यन्तर देव और देवियां यावत् आनन्द से अपने पूर्व कृत शुभकर्मों के शुभफलों कों भोगते हुए आनन्द से रहते हैं उस बहुसमरमणीय भूमिभाग के मध्यभाग में एक विशाल ऋषभ नाम के देवका भवन कहा गया हैं इत्यादि रूप से कथन और भवन का वर्णन इसी सूत्र के १४ में सूत्र से जानलेना चाहीये इस भवन की लम्बाई एक कोश को है और चौडाई आधे कोश ५२७ थी भांडी प्रति३५ सुधाना विशेषथी युति छ. “से ण पगाए पउमवरवेझ्याए तहेव जाव भवण कोसं आयामेण अद्धकोस विक्खमेण देसूर्ण कोसं उडूढं उच्चत्तणं अट्ठो तहेव" पलटूट पर्वत यामेर मे प२ वहिाथी परिवष्टित छे. सानु विशेष વર્ણન સિદ્ધાયતન ફૂટના જેવું જ છે. તથા ચ–ષભકૂટ પર્વત એક વનખંડથી ચોમેર રાએલ છે. આ ઋષભકટપર્વતની ભૂમિ છે ઉપરિભાગ બસમરમણીય છે. મર્દ ગમખપટ વત આને ઉપરિભાગ બહુસમરમણીય છે. યાવતુ અહીં અનેક વ્યંતર દેવ અને દેવીઓ થાવત્ આનંદ પૂર્વક પિતાના પૂર્વકૃત શુભ કર્મોના શુભ ફળને ઊપભેગ કરતા સાનંદ નિવાસ કરે છે. તે બહુસમરમણીય ભૂમિભાગના મધ્યભાગ માં એક વિશાલ ઋષભ નામના દેવનું ભવન છે. ઈત્યાદિ રૂપમાં કથન અને ભવનનું વર્ણન આજ સૂત્રના ૧૪ મા સુત્રોમાંથી જાણી લેવું જોઈએ આ ભવનની લંબાઈ એક ગાઉ જેટલી છે. અને ચોડાઈ એ ગાઉ જેટલી છે. તેમજ કંઈક કમ એક ગાઉ જેટલી એની ઉચાઈ છે. Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १४४ जम्बूद्वीपप्राप्तिस्त्रे 'देसूर्ण कोसं उडढं उच्चत्तण' देशोनं क्रोशम ऊर्ध्वम उच्चत्वेन वर्तते इति । अयं भावः धनुस्सहस्रद्वयप्रमाण एकः क्रोशो भवति । "किञ्चिद्देशोन" शब्देनेह षष्ट्यधिक पञ्चशतधनुन्यूनताविवक्षिता । एवं चेदं भवनं चत्वारिंशदधिक चतुर्दशशतधनुः प्रमाणमुच्चत्वेन भवतोति । अर्थः नामानुगतोऽर्थः 'अट्ठो तहेब' तथैव अर्थ अन्वर्थ ऋषभकूटस्य तथैव यथा जीवाभिगमादौ यमकादीनां पर्वतानामुक्तः तथैवौचित्येन वक्तव्यः । तदभिलापसूत्रं तु 'उप्पलाणी' त्यादिना सूचितं तदनुसृत्य सूत्रमेवं वक्तव्यम् तथाहि ‘से केणढणं भंते ! एवं वुच्चइ उसहकूडपव्यए २१ गोयमा उसहकूडपव्वए खुड्डासु वावीसु पुक्खरिणीसु जाव विलपंतीसु वहूई उप्पलाइं जाव सहस्सपत्ताई सयसहस्सपत्ताई उसहकूडप्पभाइं उसहकूडवण्णाई' इति । की है तथा कुछ कम एक कोश की इसकी ऊँचाई है तात्पर्य इसका ऐमा है कि दो हजार धनुष का एक कोश होता हैं यहां जो इसकी ऊँचाई कुछ कम एक कोश की कहो गई है सो उस दो हजार धनुष में से ५६० कम विवक्षित हुए हैं। इस तरह इसकी ऊँचाई १ एक हजार ४४० चारसो चालोस धनुष की होती है ऐसा जानना चाहिये, “अट्ठो तहेव" ऋषभक्ट ऐसा नाम इसका साथक है जीवाभिगम सूत्र में जैसे यमकादिक पर्वतों के नामकी सार्थकता प्रकट की गई है वैसे ही यहां पर भी इसके नाम की सार्थकता प्रकट करलेनी चाहिये यही बात “उप्पलाणि पउमाणि जाव उसभे य एत्थ देवे महिड्ढिए" इस सूत्रपाठ द्वारा प्रकट की गई है अर्थात् जब श्रीगौ , स्वामी ने प्रभु से ऐसा पूछा कि हे भदन्त ! “से केणटेणं एवं वुच्चइ उपहकूडपव्वए !' इस ऋषभकूट पर्वत को ऋषभ क्ट इस नाम से आपने क्यों कहा है ? तब प्रभुश्री ने इसके उत्तर में इस प्रकार कहा है "गोयमा ! उसहक्डपव्वए खुढासु खुट्ठियासु वावीसु पुक्खरिणीसु जाव विलपंतीसु बहुइं उप्पलाइं जाव सहस्सपत्ताई सयसहस्सपत्ताइं उसहकूडप्पभाई उसहकूड તાત્પર્ય આમ છે કે બે હજાર ધનુષ બરાબર એક ગાઉ હોય છે. અહીં જે આની ઊંચાઈ કંઈકકમ એક કોશ જેટલી કહેવામાં આવી છે તે તે બે હજાર ધનુષમાંથી ૫૬૦ કમ વિવક્ષિત છે. આ પ્રમાણે આની ઊંચાઈ ૧ હજાર ૪૪૦ ધનુષ જેટલી હોય છે. એવું नये "अट्ठो तहेव" ऋषभट नाम सानु यथाथ ॥ छे. वाभिगमसूत्रमारम યમકાદિક પર્વતોના નામની સાર્થકતા પ્રકટ કરવામાં આવી છે. તેવી જ અહી આના નામ नी साथ ४ता ४ सवीनस मे४ पात "उप्पलाणि पउमाणि जाव उसमेय एत्थ देवे महिइढिप" सूत्र५४ 43 2 ४२वामां आवी छ. मेट यारे गौतम प्रभु श्री२ मा 1 प्रश्रय मह-1! “से केणट्टेणं एवं बुच्चा ऊसहकूड पव्वर" ? ! *सयूट ५त ने पसळूट नाम थी तभे म समाधित श २। छ।! त्यारे प्रभु सेना उत्तरमा म प्रमाणे ४ ३ 'गोयमा ! उसहकूडपबए खुडासु खुडियासु बावोसु पुक्खरिणीसु जाव बिलपंतीसु बहूई उप्पलाई जाव सहस्तपत्ताई सयस Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. १९ उत्तरार्द्धभरते ऋषभकूट पर्वत निरूपणम् १४५ एतच्छाया - अथ केनार्थेन भदन्त ! एवमुच्यते ऋषभकूटपर्वतः २ ! गौतम । ऋषभकूट पर्वते क्षुद्रा क्षुद्रिकासु वापीसु पुष्करिणीषु यावत् बिलपंक्तिषु बहूनि उत्पलानि पद्मानि यावत् सहस्रपत्राणि शतसहस्रपत्राणि ऋषभकूटवर्णाभानि । इति । एतद्वयाख्या - अथ केन अर्थेन कारणेन भदन्त । एवमुच्यते ऋषभकूटपर्वतः २ इति ! भगवानाह हे गौतम ? ऋषभकूटपर्वते ऋषभकूट पर्वतोपरि मानासु क्षुद्रासु स्वल्पासु-क्षुद्रिकासु अतिस्वल्पासु वापीषु चतुष्कोणासु पुष्करिणीषु वर्तुलासु कमलयुक्तासु वा यावत् यावत्पदेन - दीर्घिकासु च गुञ्जालिकासु च सरस्सु च सरः पङ्क्तिकासु च सरः सरः पङ्क्तिकासु च इतिपदानि संग्राह्याणि । तत्र दीर्घिकासु - सरलजलागममार्गयुक्तासु गुञ्जालिकासु वक्रजलागममार्गयुक्तासु सरस्सु जलाशय विशेषेषु सरःपंङ्क्तिकासुसरसां - तडागानां पङ्क्तिषु सरः सरः पंक्तिका एकस्मात्सरसोऽन्यस्मिन्नन्यस्मादन्यस्मिन्नेव संचारकपाट केनोदकं संचरति यासु तासु तथा बिलपंक्तिषु विलानि - बिल सदृशानि कूपरूपजलस्थानानि तेषां पंङ्क्तयस्तासु च बहूनि उत्पलानि चन्द्रविका - सीनि कमलानि पद्मानि सूर्यविकासीनि कमलानि यावत् यावत्पदेन कुमुदानि नलिनानि सुभगानि सौगन्धिकानि पुण्डरीकाणि महापुण्डरीकाणि शतपत्राणि इत्येषां वण्णाभाई" इस पाठ के पदों की स्पष्ट व्याख्या ईस प्रकार से है । हे आयुष्यमान गौतम ऋषभकूट पर्वत पर छोटी २ वापिकाएँ चार कोनेवाली बावडियां हैं बडे सुन्दर कमलों से युक्त अथवा गोल २ आकार की पुष्करिणियां हैं यावत् दीर्घिकाएँ हैं जिनमें जलके आनेका मार्ग सरल है ऐसी वापिकाएँ है गुञ्जालिकाएँ हैं जिनमें जलके आनेका मार्ग सीधा नहीं है किन्तु बडा वक्र - टेढ़ा है ऐसी वापिकाएँ हैं । सरः - तालाब हैं। सरः पंक्तियां है। एवं बिल (छोटे छोटे नल स्थान) हैं उनमें पंक्तियां अनेक चन्द्र विकाशी कमल सूर्यविकाशी कमल कुमुद, नलिन सुभग, सौगन्धिक, पुण्डरीक शतपत्र और सहस्र पत्र कमल हैं इनकी प्रभा ऋषभकट पर्वत की प्रभा जैसी है और इनका आकार ऋषभकूट पर्वत के आकार के जैसा है अतः इन उत्पलादिकों को ऋषभक्ट कह दिया गया हैं और इनके योग से इस पर्वत को ऋषभकूट कह दिया गया है । हसपत्ताई उहकूडप्पभाई उसद्दकूडवण्णाभाई" मा पाउना पहोनी स्पष्ट व्याभ्या भा પ્રમાણે છે. હે ગૌતમ ઋષભકૂટ પર્વત પર નાની નાની વાર્ષિકાએ-ચાર ખૂણા વાળી નાની નાની વાપિકાએ છે. કમલેથી સુશાભિત છે અથવા ગેાળ ગે ળ આકારનીપુષ્કરિણીએ છે. યાવત્ ધિં કાએ છે. જેમાં જલ સરલ રીતે આવી શકેએવી વાપિકાઓ છે. શુ લિકાએ! છે જેમાં જલ પ્રવેશવાને માર્ગ સીધે! નથી પરતુ વક્ર આડા ટેઢા છે એવી વાષિક એ છે. સરઃ તળાએ છે. સરઃ ૫તિ છે તેમજ બિલ ૫કિતએ નાના નાના ખાખાથી યા ગ્રૂપ પંકિતઓ છે . તેએમાં અનેક ચન્દ્રવિકાશી કમળે, કુમુદ, નલિન, સુભગ સૌગાન્ધિક, પુંડરીક, મહાપુડરીક, શતપત્ર અને સહસ્રપત્ર કમલે છે, એમની પ્રભા ઋષભ ફૂટ પવ તની પ્રભા જેવી છે અને એમના આકાર ૠષભકૂટ પર્વતના આકાર જેવે છે, એથી આ ઉપલાકાને ૠષભકૂટ કહ્યો છે, અને એમના યાગથી આ પર્વતને ઋષભટ કહ્યો છે, १९ Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वोपप्रचप्तिसूत्रे सङ्ग्रहो बोध्यः। तत्र कुमुदानि-चन्द्रविकासि श्वेतकमलानि नलिनानि-सामान्य कमलानि, सुभगानि-कमलविशेषाः, सौगन्धिकानि-शोभनगन्धयुक्तकमलबिशेषाः पुण्डरीकाणि-श्वेतकमलानि,-महापुण्डरीकाणि विशालश्वेत कमलानि शतपत्राणि शतपत्रयुक्तानि कमलानि तथा सहस्रपत्राणि सहस्रसंख्यकपत्रयुक्तानि कमलानि, शतसहस्रपत्रानि लक्षपत्रयुक्तानि कमलानि तानि कीदृशानि ? इत्याह ऋषभकूटप्रभाणि ऋषभकूटपर्वताकाराणि । तथा ऋषभकूटवर्णाभानि ऋषभकूटस्य यो वर्णः तस्येव आभा प्रतिभासो येषां तानि तथा ततस्तानि तदाकारत्वात् तद्वर्णसादृश्याच्च ऋषभकूटानीति प्रसिद्धानि । तधोगादेष पर्वतः ऋषभकूटः, नन्विह ऋषभकूटाकारत्वात् तत्सादृश्याच्च उत्पलादीनि ऋषभकूटान्यूच्यन्ते तेषां तेषामुत्पलादीनां योगात् पर्वतोऽपि ऋषभकूट उच्यते ? इत्यन्योन्याश्रयप्रसङ्ग इति चेदाह-उभयेषामपि नाम्ना अनादिकाल प्रवृत्तोऽयं व्यवहार इति अन्योन्याश्रय दोषो नाशङ्कनीय इति । एवमन्यत्रापि बोध्यम्। ____अथ प्रकान्तरेणापि नामकारणं तदतिरिक्तं च सर्व वर्णयितुं सूत्रकारः संक्षेपेणाह'उसभेय एत्थ देवे' इत्यारभ्य 'जहा विजयस्स अवसेसियं" इति ततश्च ऋषभश्चात्र देवो शंका- इस प्रकार के कथन से तो फिर परस्पराश्रय दोष उपस्थित हो जाता है क्योंकि ऋषभकूट के आकार वाले कमल होने से उत्पलादिकों को ऋषभकूट कहा गया है और इनके योग होने से पर्वत को ऋषभकूट कहा गया है । उत्तर-ऐसा नहीं है क्यो कि दोनों का ऐसा नाम तो अनादिकाल से ही प्रवृत्त हुआ चला आ रहा है अतः इसमें परस्पराश्रय दोष के लिये स्थान ही नहीं मिलता है अनादि परम्परा से चले आरहे व्यवहार में परस्पराश्रय दोष नहीं होता है । "उसमे य एत्थ देवे महिढ़िए जाव दाहिणेणं रायहाणी तहेव मंदरस्स पव्वयस्स जहा विजयस्स अविसेसियं" अब सूत्रकार इस सूत्र द्वारा प्रकारान्तर से ऋषमट का नामकरण आदिमें का कथन करते हुए कहते हैं कि इस पर्वत का जो ऋषभकूट नाम कहा गया है उसका कारण ऐसा है कि उस पर ऋषभकूट नाम का देव जी कि महर्द्धिक, महाद्युतिक, महावल, महायश શંકા –આ જાતના કથનથી તો ફરી પરસ્પરાશ્રય દેષ ઉપસ્થિત થાય છે કેમકે ઋષભ કૂટના આકારવાળા હોવાથી ઊ૫લાદિકેને ઋષભકૂટ કહેવામાં આવેલ છે. અને એમના ગથી પર્વતને ઋષભકૂટ કહેવામાં આવેલ છે. ઊત્તર-આમ નથી. કેમકે બનેના એ નામો તે અનાદિકાળથી જ પ્રવૃત્ત થતા આવ્યા છે એથી એમાં પરસ્પરાશ્રય દોષ માટે કોઈ સ્થાન નથી. અનાદિ પરંપરાથી याली मापता व्यवहारमा ५२२५२॥श्रय होष यता नथी. 'उसमे य पत्थ देवे महिढिए जाव दाहिणेण रायहाणो तहेव मंदरस्स पव्वयस्ल जहा विजयस्त अविसेसियं" वे ત્રકાર આ સત્ર વડે પ્રકારાન્તરથી ઋષભકટના નામકરણ આદિનું કથન કરતાં કહે છે. કે આ પર્વતનું જે કષભકૂટ નામ કહેવાય છે તેનું કારણ આ છે કે તેની ઉપર ઋષભ Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. १९ उत्तरार्द्धभरते ऋषभकूटपर्वतनिरूपणम् १४७ महार्द्धिको महाद्युतिको महाबलो महायशा महासौख्यः पल्योपमस्थितिकः परिवसति । स खलु तत्र चतसृणां सामानिकसाहस्रीणां चतसृणाम् अग्रमहिषीणां सपरिवाराणां तिसृणां परिषदां सप्तानाम् अनीकानां सप्तानाम् अनीकाधीपतीनां पोडशानाम् आत्मरक्षकसाहस्रीणाम् ऋषभकूटस्य ऋषभाया राजधान्या अन्येषां च खलु बहूनां देवानां च देवीनां च आधिपत्यं पौरपत्यं स्वामित्वं भर्तृत्वं महत्तरकत्वम् आज्ञेश्वरसेनापत्य कारयन् पालयन् महताऽऽहतनाटय गोतवादिततन्त्रीतलतालत्रुटितधनमृदङ्गप्रत्युत्पन्न वादितरवेण दिव्यान् भोगभोगान् भुजानो विहरति, स तेनार्थन एवमुच्यते । ऋषभक्ट ऋषभक्ट इत्यारभ्य “च खलु भदन्त ! ऋषभस्य देवस्य ऋषभानाम राजधानी स्वी, महासुखी एवं पल्योपम की स्थिति वाला है रहता है वहां वह चार हजार सामानिक देवों का, चार सपरिवार अग्रमहिषियों का, तीन परिषदाओं का, सात अनीकों का, सात अनीकाधिपतियों का सोलह हजार आत्मरक्षकदेवों का तथा ऋषभकूट को ऋषभा राजधानी का एवं अन्य और वहां के निवासी अनेक देवों का और देवियों का आधिपत्य पौरपत्य स्वामित्व भर्तृत्व, महत्तरकत्व, आज्ञेश्वर सेनापत्य करवाता हुआ, पलवाता हुआ, जोर २ से चतुर बजाने वालों के द्वारो बजाये गये नाट्य, गीत के बाजों की, तन्त्री, तल, ताल, आदि रूप बाजों की ध्वनि पूर्वक दिव्य भोग भोगों को भोगता हुआ आनन्द के साथ रहता है । इस कारण गौतम ! मैंने एवं अन्यतीर्थंकरो ने ऋषभकूट इस नाम से उस पहाड का नाम कहा है। हे भदन्त ! ऋषभदेव की ऋषभा नामकी राजधानी कहां पर है ? इसके उत्तर में प्रभु श्रीकहते हैं-हे गौतम ! નામનો દેવ કે જે મહદ્ધિક મહાદ્યુતિક મહાબલ, મહાયશસ્વી, મહાસુખી તેમજ પોપમની સ્થિતિવાળો છે. તે રહે છે. ત્યાં તે ચાર હજાર સામાનિક દેવેનુ ચાર સપરિવાર અગ્રમહિષીઓનું ત્રણ પરિષદાઓનું સાત અનીકેનું સાત અનીકાધિપતિનું સોળ હજાર આત્મરક્ષક દેવેનું તેમજ ઋષભકૂટની ઋષભારાજધાનીના તેમજ બીજા કેટલાક ત્યાંના નિવાસી અનેક દેવ અને દેવીઓનું આધિપત્ય પરિપત્ય, સ્વામિત્વ ભતૃત્વ, મહત્તરકત્વ આશ્વર સેનાપત્ય કરવાતાં, પાલન કરવાતા, ચતુર વાદક વડે ખૂબ જોરથી વગાડેલા વાજાઓ ગાયેલા ગીત, નાટ્યે તેમજ તન્ની, તલ, તાલ આદિ રૂપ વિશેષ વાદ્યોની વનિ પૂર્વક દિવ્ય ભોગોને ઉપલેગ કરતો આનંદપૂર્વક ત્યાં રહે છે. આ કારણથી હે ગૌતમ! મેં અને બીજા તીર્થકર ઋષભકૂટ આ નામથી આ પર્વતને સંબોધિત કરેલ છે. તે ભદંત બાષભદેવની ઋષભાનામક રાજધાની ક્યા સ્થલે આવેલી છે. એના જવાબમાં પ્રભુ શ્રી કહે છે. હે ગૌતમ ! કષભદેવની ઋષભ નામક રાજધાની ઋષભકૂટની દક્ષિણ દિશામાં તિર્યક Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसू प्रज्ञप्ता ? गौतम ! ऋषभकूटस्य दक्षिणेन तिर्यगसंख्येयान् द्वीपसमुद्रान् व्यतिव्रज्यइत्यादि सर्व वर्णनमस्या सूत्रतो बोध्यम् । तदर्थोऽपि तत्रैव बोध्य इति ॥सू०॥१९॥ इति श्री श्विविख्यात-जगद्वल्लभ-प्रसिद्ध वाचक-पञ्चदशभाषाकलित-ललितकलापालापक-प्रबिशुद्धगद्यपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्री शाहु छत्रपति कोल्हापुर राजप्रदत्त-'जैनशास्त्राचार्य' पदभूषित कोल्हापुर राजगुरु-बालब्रह्मचारी जनशास्त्राचार्य जैनधर्मदिवाकर पूज्यश्री-घासीलाल-व्रति विरचितया जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तेः प्रकाशिकाख्यायां व्याख्यायां प्रथमवक्षस्कारपर्वतवर्णनम् ॥१॥ ऋषभदेव को ऋषभा नामको राजधाकी ऋषभाकूट की दक्षिणदिशा में तिर्यक् असंख्यात द्वीप समुद्रों को उल्लंघन करके इत्यादि सब वर्णन इस विषय का जैसा इसी सूत्र के ८ वें सूत्र में कहा गया है वैसा हि जानना चाहिये. ॥ २० ॥ श्री जैनाचार्य जैनधर्मदिवाकर पूज्य श्री घासीलाल व्रति विरचित जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र की प्रकाशिका व्याख्या में प्रथम वक्षस्कार पर्वत वर्णन संपूर्ण ॥१॥ - અસખ્યાત દ્વીપ સમુદ્રને એ બીને ઈત્યાદિ વન આ સૂત્ર ના ૮ સૂત્રમાં કરવામાં આવેલું છે. તેવું જ સહી પણ સમજી લેવું જોઈએ. આ પ્રમાણે અહીં જબૂદ્વીપપ્રાપ્તિ ની પ્રકાશિકા ટીકામાં પ્રથમવક્ષસ્કાર પર્વતનું વર્ણન અહી સમાપ્ત થયું. શ્રી જૈનાચાર્ય જૈનધર્મ દિવાકર પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલ વ્રતિવિરચિત જમ્બુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્રની પ્રકાશિકા વ્યાખ્યામાં પ્રથમ વક્ષસકાર પર્વત વર્ણન સંપૂર્ણ ના Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू० २० कालस्वरूपम् काला धिकारः- अथ द्वितीयवक्षस्कारवर्णनम् -- क्षेत्राणि अवस्थितानवस्थितकालभेदेन द्विधा जानन्नपीह साक्षादपगच्छतः शुभान्भावान् दृष्ट्वा पारिशेष्यात्सं माव्यमानमनत्रस्थितकालमभिप्रेत्य पृच्छति- मूलम् - जबुद्दीवे गं भंते ! दीवे भार हे वासे कइविहे काले पण्णत्ते गोयमा ! दुविहे काले पण्णत्ते, तं जहा - ओसप्पिणिकाले य उस्सप्पिणिकाले य, ओसपिणि कालेगं भंते ! इविहे पण्णत्ते ? गोयमा छव्विहे पण्णत्ते तं जहा - सुसमसुसमा काले णे सुसमाकाले २ सुसम दुस्समकाले ३ दुस्सम सुसमाकाले ४ दुस्समा काले ५ दुस्सम दुस्समा काले ६ उस्सप्पिणि काले णं भंते ! कइविहे पण्णत्ते ! गोयमा ! छव्विहे पण्णत्ते, तं जहा - दुस्समदुस्समाकाले १ जाव सुसमसुसमाकाले ६ । एगमेगस्स णं भंते ! मुहुत्तस्स केवइया उस्सासद्धाविया हिया ? गोयमा ! असंखिज्जाणं समयाणं समुदयसमइ समागमेणं सा एगा आवलियत्ति वुच्चइ, संखिज्जाओ आवलियाओ उसासो संखिज्जाओ आवलियाओ नीसासा । ૪Ŕ इस अणवगल्लस्स, णिरुवकिट्ठस्स जंतुणो । एगे उसासनीसासे, एस पाणुति वच्चइ || १ || सत्त पाणूई से थावे. सत्त थोवाई से लवे । लवानां सत्तहत्तरीए, एस मुहुति आहिए || २ || तिणि सहस्सा सत्त य सयाई तेवत्तरि च उसासा । एस मुहुत्तो भणिओ सव्वेहिं अनंतनाणाहिं ||३|| एएणं मुहुतप्पमाणेण तीसं मुहुत्ता अहोरत्तो, पण्णरस अहोरता पक्खो, दो पक्खा मासो, दो मासा उउ, तिष्णि उउ अयणे, दो अयणा संवच्छरे, पंच संवच्छरिए जुगे, वीसं जुगाईं वाससए, दस वाससयाई वाससहस्से, सयं वाससहस्साणं वाससहस्से, चउरासीइं वासस्यसहस्साई से एगे पुव्वंगे, चउरासीई पुव्वंगसयसहस्साई से एगे पुग्वे, एवं विगुणं विगुणं णेयव्वं तुडिए २ अडडे २ अववे २ हुहुए २ उप्पले २ पउमे २ णलिणे २ अत्थ Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे णिउरे २ अउए २ नउए २ चूलिया २ सीसपहेलिया २ जाव चउरासीइ सीसपहेलियग सय सहस्साइं सा एगा सीसपहेलिया । एतोव ताव गणिए एतावताव गणियस्स विसए, तेण परं ओवमिए ॥ सू० २० ॥ छाया-जम्बूद्वीपे खलु भदन्त ! द्वोपे भारते वर्षे कतिविधः कालः प्रज्ञप्तः ? गौतम! द्विविध; कालः प्रज्ञप्तः तद्यथा अवसर्पिणीकाल: १, उत्सर्पिणोकोलश्च २, अवसर्पिणोकालः खलु भदन्त कतिबिधः प्रज्ञप्तः ? गोतम षड्विधः प्रज्ञप्तः तद्यथा सुषमसुषमाकालः १, सुपमाकाल: २, सुषमदुष्षमाकालः ३, दुष्षमसुषमाकालः ४, दुष्षमाकालः ५, दुषमदुष्षमाकालः ६, उत्सर्पिणोकालः खलु भदन्त कतिविधः प्रशप्तः गोतम षडूविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा दुष्षमदु ष्षमाकालः १ यावत् सुषमसुषमाकोलः ६ एकैकस्य खल भदन्त महत्तस्य कियत्यउच्छवा साद्धा व्याख्याताः, गौतम असंख्येयानां समयानों समुदयसमितिसमागमेन सा एका आवलिकेति उच्यते, संख्येयाः आवलिकाः उच्छ्वासः, संख्येयाः आवलिकाः निःश्वासः। दृष्टस्य अनवग्लानस्य निरुपक्लिष्टस्य जन्तोः । एक उच्छ्वासनिःश्वासः एष प्राण इत्युच्यते ॥१॥ सप्त प्राणाः स स्तोकः सप्त स्तोकाः स लवः । लवानां सप्त सप्तत्या, एष मुहूर्त इत्याख्यातः॥२॥ त्रीणि च सहस्राणि सप्त च शतानि त्रिसप्ततिश्च उच्छवासाः । एष मुहूर्ता भणत; सर्वैरनन्तज्ञानिभिः ॥ ३ ॥ एतेन मुहूर्तप्रमाणेन त्रिंशन्मुहर्ता अहोरात्रः, पच्चदश अहोरात्राः पक्षः, द्वौ पक्षौ मासः द्वौ मासो ऋतुः त्रय ऋतवोऽयनम् द्वे अयने संवत्सरः पञ्च संवत्सरिकं युगं विशतिर्युगानि वर्षशतम् दशवर्षशतानि वर्षसहस्र, शतं वर्ष सहस्राणां, चतुरशीतिर्वर्षशतसहस्त्राणि नदेक पूर्वाङ्गं चतुरशोतिः पूर्वाङ्गशतसहस्राणि तदेक पूर्वम्, एवं द्विगुणं द्विगुणं नेतन्य त्रुटितम् २, अववम् २, हुहुकम् २, उत्पलम् २ पद्मम् २ नलिनम् २, अर्थनिपूरम् २, अयुतम् २, नयुतम् २, प्रयुतम् २, चूलिका २, शीर्षप्रहेलिका २, यावच्चतुरशीतिशोर्ष प्रहेलिकाङ्गशतसवस्त्राणि सा एका शीर्षप्रहेलिका । एतावत् तावद् गणितम् एतावान् तावद् गणितस्य विषयः ततः परम् औपमिकम् ॥ २० ॥ कालाधिकारअवस्थित और अनवस्थित काल के भेद से क्षेत्रों के दो प्रकारों को जानते हुए भी गौतम स्वामी साक्षात् शुभ भावों का यहां हास देखकर संभाव्यमान अनवस्थित काल को लक्ष्य में लेकरके प्रभू से पूछते हैं--- अबाधि२-छ અવસ્થિત અને અનવસ્થિત કાળના ભેદથી ક્ષેત્રો ના બે પ્રકારોને જાણવા છતાએ ગૌતમ સ્વામી સાક્ષાત્ શુભ ભાવેને અહીં હાસ જોઈને સંભાવ્યમાન અનવસ્થિત કાળ ને લક્ષ્ય માં રાખી ને પ્રભુને પ્રસન્ન કરે છે– Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू २० कालस्वरूपम् टीका -- जंबूद्दीवेणं भंते ! दीवे' इत्यादि । 'जंबुद्दी वेणं भंते ! दीवे भारदे वासे कइविहे काले पण्णत्ते' जम्बूद्वीपे द्वीपे खलु भदन्त भारते वर्षे कतिविधः कियत्प्रकारकः कालः प्रज्ञप्तः ? भगवानाह - गोयमा ! दुविहे काले पण्णत्ते' हे गौतम ! द्विविधः द्विप्रकारकः कालः प्रज्ञप्तः 'तं जहा ओसपिणि काले य' तद्यथा - अवसर्पिणीकालः - अवसर्पति हीयमानारकत्वेनावसर्पयतिवा क्रमेणाऽऽयुः शरीर प्रभृतिभावान् ह्रासयतीति अवसर्पिणी स चासौ कालश्चेति तथा अस्याः प्रथमतउपादानं प्रज्ञापकापेक्षया बोध्यं, क्षेत्रेषु भरतवत् ! तथा 'उस्सप्पणिकाले य' उत्सर्पिणीकाल:उत्सर्पति-वर्द्धते अरकापेक्षया, उत्सर्पयति क्रमेणाऽऽयुः शरीरादिकान् भावान् वर्द्धयति वेत्युत्सर्पिणी साचासौ कालचेत्ति तथा, चकारद्वयमुभयोरपि समानारकता समानपरिमाणतादि सूचनार्थम् । उभयत्र संज्ञात्वाद्भाषितपुंस्कत्वाभावान्न पुंवद्भावः । तत्रावसर्पिणी कालभेदं पृच्छति - 'ओसप्पिणि कालेणं भंते कइविहे पण्णत्ते' हे भदन्त अवसर्पिणीकालः "जबूद्दीवेण भंते ! दीवे भारहे वासे कइविट्ठे काले पण्णत्ते" इत्यादि । टीकार्थ - भदन्त ! जम्बूद्वीप नामके इस द्वीप मे कितने प्रकार का काल कहा गया हैं ? इसके उत्तर मे प्रभुश्री कहते हैं - " गोयमा ! दुविहे काले पण्णत्ते" इस जम्बूद्रोपनामके द्वीपमें दो प्रकार का काल कहा गया है, “तं जहा " जो इस प्रकार से हैं "ओसप्पिणी काले य उस्सप्पिणी काले य" एक अवसर्पिणकाल और दूसरा उत्सर्पिणीकाल:, जिस काल में क्रमशः आयु, शरीर आदि हीन होते जाते है - ह्रास को प्राप्त होते रहते हैं ऐसा जो काल है वह अवसर्पिणी काल हैं, प्रज्ञापक की अपेक्षा से इसका प्रथमतः उपादन किया गया है, जैसा कि क्षेत्रों में भरत का प्रथम उपादान किया गया है तथा जिस काल में क्रमशः आयु, शरीर आदि भावों की वृद्धि होती जाती है अथवा जो क्रमशः इन भावों को अरकों की अपेक्षा से बढता जाता है उसका नाम उत्सर्पिणी काल १५१ 'जम्बुद्दीवे ण भंते ! दीवे भारहे वाले कइविहे काले पण्णत्ते इत्यादि सूत्र २० ॥ ટીકા'-હે ભદ ́ત ! જ ભૂદ્વીપ નાંમક આ દ્વીપમાં કેટલા પ્રકાર ના કાળ કહેવામાં આવેલ छे? भेना वाणमां प्रभु हे छे. “गोयमा ” ! दुविहे काले पण्णत्ते" मा भ्यूद्वीप नाभ द्वीयभां में प्रारने आज वामां यावेस है. 'तं जहा' ते मा प्रमाणे छे. "ओसपिणी काले य उस्सप्पिणी काले य" मे अवसर्पिणी आज भने जीले उत्सर्पिणी आज, में अमां ક્રમશઃ આયુ, શરીર વગેરે હીન થતા જાા છે. હાસ થતા જાય છે. એવે જે કાળ છે તે અવસર્પિણી કાળ છે.પ્રજ્ઞાપકની અપેક્ષાએ આનું પ્રથમતઃ ઉપાદાન કરવામાં આવેલ છે. જેવુ કે ક્ષેત્રો માં ભરતનું પ્રથમ ઉપાદાન કરવામાં આવેલ છે. તેમજ જે કાળમાં ક્રમશઃ આયુ શરીર વગેરે ભાવાની વૃદ્ધિ થતી જાય છે અથવા જે ક્રમશઃ એ ભાવેાને અરકાની અપે. ક્ષાએ વધારતા જાય છે. તે કાળનુ નામ ઉત્સર્પિણી કાળ છે. અહી' જે એ ચ' આવ્યા છે Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कतिविधः प्रज्ञप्तः भगवानाह - 'गोयमा छबिहे पण्णते' हे गौतम अवसर्पिणीकाल: षइविध प्रज्ञप्तः 'तं जहा-'पुसम सुसमाकाले'तद्यथा सुषमसुषमाकाल:-सु-सुष्ठु शोभना समा वर्षाणि यस्या सा सुषमा, अत्र सुविनिर्दुभ्यः सुपि सूति समाः८।३।८८ इति सकारस्य षत्वम् सुषमाचासो सुषमा सुषमसुषमा, उभयोः समानाथयोः प्रकृष्टार्थत्वा दत्यन्त सुषमेत्यर्थः इयमवैकान्तसुखरूपप्रथमारकरूपा सा चासो कालश्च सुषम सुषमा काल: १, 'सुसमाकाले' सुषमाकालः तत्र सुषमा-प्रागुक्तस्वरूपा तद्रूप कालस्तथा २, 'सुसम:दुस्सम काले' सुषम दुष्षमाकालः तत्र सुषमा प्रागुक्तस्वरूपा सा चासौ दुष्षमा दुः दुष्टा समा वर्षाणि यस्या सा चेति सुपमदुष्षमा अधिक सुषमा प्रमावाऽल्पदुष्पसुषमाप्रभावा तद्रूपः कालः सुषमदुष्षमाकालः ३ 'दुष्षम सुसमाकाले' दुष्षम सुपमाकालः दुष्पमा चासा सुषमा है । यहां जो दो चकार आये हैं वे यह प्रकट करते हैं ये दोनो काल अरक आदिकों की अपेक्षा समान है, और परिमाणता आदि को अपेक्षा भो समान हैं । अब अवसर्पिणो काल के कितने भेद हैं इसबात को श्रीगौतम स्वामी पूछते हैं “ओसप्पिणि कालेणं भंते ! कइविहे पणत्ते" हे भदन्त ! अवसपिणी काल कितने प्रकार का कहा गया हैं उत्तर में प्रभुश्री कहते है- 'गोयमा ! छब्बिहे पण्णत्ते" हे गौतम ! अवसर्पिण) काल ६ प्रकार का कहा गया हैं "तं जहा" जैसे- "सुसम सुसमाकाले १, सुसमाकाले २, सुसमदुस्समकाले ३, दुस्समसुसमाकाले ४, दुस्समाकाले ५, दुस्समदुस्समा काले ६, सुषममुषमा काल- जिसमें अच्छे समा-वर्ष होते हैं उसका नाम सुषमा हैं यहां स को ष "सुविनिर्दुभ्यः सुपि सूति समा” इस सूत्र से हुआ है “सुषमा चासौ सुषमा इति सुषमसुषमा" यहां दूसरा सुषमा शब्द भो इसा पूर्वोक्त-प्रथम पुषमा अर्थ का हो वाचक है. यह दोनों समानार्थक शब्दों के प्रयोग से यह काल अत्यन्त शोभन वर्षों वाला होता है. यह प्रथम आरक अवसर्पिणी काल का कहागया है. क्यों कि यही एकान्ततः सुखखरूप होता है. તે એ બતાવે છે કે એ બને કાળે અરક વગેરેલી અપેક્ષાએ સમાન છે. અને પરિમા ણતા આદિની અપેક્ષાએ પણ સમાન છે. હવે અવસર્પિણી કાળના કેટલા ભેદે છે, એ पातन गोतम स्वामी पूछे छे. "ओसप्पिणि काले ण भंते ! कहविहे पण्णते" मत ! अqसपिणी । प्ररने पाय छे ! उत्त२ मा ५४४ छ- “गीयमा! "छविहे पण्णते" ३ गौतम ? अस िण ६ माने। वामां आवसछे. "तं जहा" रेम "सुसमसुसमाकाले १, सुसमाकाले २, सुसमदुस्समकाले ३, दुस्समसुसमाकाले ४, दुस्लमाकाले ५, दुस्समदुस्समाकाले ६" सुषमसुषमा सा२१ समा-प-डाय छे. तेनु नाम सुषमा छे. ही 'स' ने 'अ' सुविनि-१Wःसुपि सूतिसमः" ८११८८ मा सूत्र वडे थथे छे सुषमा चासौ सुषमा इति सुषम सुषमा" मी गाने सुषमा १७६ ५y પૂર્વોક્ત પથમ અર્થને જ વાચક છે. સમાનાર્થક બને શબ્દના પ્રયોગથી આ સ્પષ્ટ થાય છે કે આ કાળ અતીવ શેભન વર્ષવાળો થાય છે. આ પ્રથમ આરક અવસર્પિણી કાળને Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. २० कालस्वरूपम् च दुष्षम सुषमा अधिक दुष्पमाप्रभावाऽल्पसुषमा प्रभावा, तद्रूपः कालो दुष्षममुषमा कालः ४, 'दुस्समाकाले' दुष्षमाकालः तत्र दुष्षमा प्रागुक्तस्वरूपा तद्रूपः कालः ५, 'दुस्समदुस्समकाले' दुष्पमदुष्षमाकाल: दुष्पमा प्रागुक्तस्वरूपा सा साचो दुष्षमा 'अत्यन्तदुष्पमा तद्रूपः कालस्तथा ६, इत्यवसर्पिणीकाल भेदाः १। __ अथोत्सर्पिणी कालभेदं पृच्छति 'उस्सप्पिणिकाले णं भंते कइविहे पण्णत्ते' उस्स पिणीकालः खलु भदन्त कतिविधः प्रज्ञप्तः भगवानाह-'गोयमा छविहे पण्णत्ते' हे गौतम उत्सर्पिणी कालः षइविधः प्रज्ञप्तः 'तं जहा-दुस्समदुस्समाकाले' तद्यथा दुष्षम दुष्पमाकालः जाव यावत् यावत्पदेन 'दुष्षमाकालः २, दुष्पमसुषमाकाल: ३, सुषमद्वितीयकाल जिसका नाम सुषमा है यह भी शोभन वर्षों वाला होता है. “सुषमदुप्पमाकाल" यह तृतीय काल है. इस काल में अधिकरूप से प्रथम तो शोभन वर्ष होते हैं, और बाद में दुष्ट वर्ष अल्प होते हैं. तात्पर्यकहने का यही है कि इस तृतीय आरक में सर्वप्रथम सुषमा का प्रभाव होता है और अन्यरूम में दुष्षमाओं का प्रमाव रहता है. चतुर्थ आरक दुष्षम सुषमाकाल हैं-इस काल में अधिकरूप में दुष्पमाओं का प्रभाव रहता है और अल्परूप में सुषमाओं का प्रभाव रहता है. पांचवां आरक दुष्षमाकाल नामका है इस काल में समस्त वर्ष दुःख दायक ही होते हैं, छट्ठा भेद दुष्पमा काल हैं. इनमें जितने भो वर्ष होते हैं-अर्थात् २१ हजार वर्ष होते हैं वे सब अत्यन्त दुष्ट ही होते हैं. एक भी समय इसमें शोभन नहीं होता है उस्सप्पिणी काले णं भंते ! कइविहे पण्णत्ते" हे भदन्त ! उत्सर्पिणीकाल कितने प्रकार का कहा गयो है उत्तर में प्रभुश्री कहते है."गोयमा! छविहे पण्णते" हे गौतम! उत्सपिणो काल ६ प्रकार का कहा गया है'ते जहा जैसे-"दुस्समदुस्समाकाले' १ जाव सुसमसुसमाकाले ६" दुष्षम दुष्षमाकाल, यावत्दुष्षमाकाल२, दुष्षमसुषमाकाल ३,सुषमदुष्षमाकाल४, सुषमाकाल ५ और सुषमसुषमाकाल ६ । કહેવામાં આવેલ છે. કેમકે એજ એકાન્ત સુખસ્વરૂપ હોય છે. દ્વિતીય કાળ જેનું નામ સુષમાં छ ते ५५ शासन वा हाय छे. “ सुसमदुस्समा काले' मा तृतीय छे. मा કાળમાં અધિક રૂપથી પ્રારંભમાં તે શેભન વર્ષો હોય છે અને ત્યાર બાદ અયરૂપમાં દુષ્ટ વર્ષો હોય છે. તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે આ તૃતીથ આરક માં સર્વ પ્રથમ સુષમાને પ્રભાવ હોય છે અને અલપરૂપમાં દુષમાઓનો પ્રભાવ રહે છે. ચતુર્થ આરક દુષમ સુષમા કાળ છે. આ કાળમાં અધિક રૂપમાં દુષમાઓનો પ્રભાવ રહે છે. અને અલ્પરૂપમાં સુષમાઓને પ્રભાવ રહે છે. પાંચમે આરક દુષમા કાળ નામે છે. આ કાળમાં સમસ્ત વર્ષ દુખદાયક જ હોય છે. છઠ્ઠો પ્રકાર દુષમ દુષમા કાળ છે. એમાં જેટલા વર્ષો હોય છે. એટલે કે ૨૧ હજાર વર્ષ હોય છે તે સર્વે અતીવ દુષ્ટ હે છે. એક પણ સમય આમાં શેભન થત नथी. 'उस्सप्पिणी काले ण भंते ! कइबिहे पण्णत्ते" Gajsthan प्रश्न वामां आवे छ ? उत्तरमा ५९ ४ छ-'गोयमा ! छव्धिहे पण्णत्ते' गीतम! Galleg] ४ ६ ने। वामां मावेश छ, 'तं जहो' रेम है 'दुस्सम दुस्समाकाले १ जाव सुसमसुसमाकाले ६' दुप्पमपमा १. यावत दुषमा २. मनुषमा २० Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे दुष्षमाकालः ४, सुषमाकालः ५ इति पदचतुष्टयस्य संग्रहः तथा 'सुसम सुसमा काले' सुषमसुषमा कालः ६, इति इत्युत्सर्पिणीकालभेदाः ।२। अथ तदुभयकालपरिमाणं जिज्ञासमानोऽवान्तरकालं प्रष्टुमुपक्रमते | 'एगमेगस्स णं' इत्यादि । 'एगमेगस्सण भंते मुहुत्तस्स' हे भदन्त एकैकस्य मुहूर्तस्य खलु 'केवइया' कियत्यः कित्प्रमाणाः निश्वासो नाम वायोर्बहि निर्गमः ततश्च 'उस्सासद्धा' उच्च्छासाद्धाः उच्छवासः-वायोरन्तःप्रवेशः उपलक्षणमेतत् तेन-निःश्वासोपि गृह्यते उच्छ्वासपदेन उच्छवासनिःश्वासौ बोध्यौ तदद्धाः-उच्छ्वासनिःश्वासाद्धाः उच्छासनिःश्वासपमितकालविशेषाः 'वियाहिया' व्याख्याता:-कथिताः भगवानाह-'गोयमा असंखिज्जाण समयाणं' हे गौतम असंख्येयानां समयानां आगम प्रसिद्धपटशाटिकापाटनदृष्टान्तज्ञापनीयस्वरूपाणां परमजधन्यकालविशेषाणां 'समुदयसमिइ समागमेणं' समुदय समिति समागमेन समुदयाः समूहास्तेषां समितय सम्मेलनानि तासां यः समागमः एकीभवनं समुदयस "एगमेगस्स णं भंते ! मुहुत्तस्स केवइया उस्सासद्धा विआहिआ ?" इन दोनों कालों के परिमाण जाननेकी इच्छा से अब श्रीगौतम स्वामीने प्रभु से ऐसा पूछा है-हे भदन्त! एक एक मुहूर्त के कितने उच्छ्वास निःश्वास प्रमित काल विशेष कहे गये हैं यहां उच्छवास यह पद उपलक्षण रूप हैं इससे निःश्वास का भी ग्रहण हो जाता है वायु का भीतर जाना यह उच्छ्वास है, तथा वायु का बाहर निकालना यह निःश्वास है. तात्पर्य पूछने का यही हैं की एक अन्तर्मुहूर्त में कितने उच्छवासनिःश्वास होते हैं ? इसके उत्तर में प्रभुश्री कहते हैं- "गोयमा ! असंखिज्जाणं समयाणं समुदयसमिई समागमेणं सा एगा आवलिअत्ति बुच्चई संखिज्जाओ आवलियाओ उसासो, संखिज्जाओ आवलियाओ नीसासो" हे गौतम आगम प्रसिद्ध समय का स्वरूप की जिसे शास्त्रकारों ने पटशाटिका के फाडने के दृष्टान्त से साबित किया है और जो काल का सब से जघन्यरूप प्रमाण हैं ऐसे असंख्यातसमयों को समुदायरूप एक आवलिका कही गई है. यहां पर ऐसी शंका કાળ ૩. સુષમ દુષમકાળ ૪. સુષમા કાળ ૫. અને સુષમ સુષમા કાળ ૬. "एगमेस्स ण भते ! मुहुत्तस्स केवइया उस्सासद्धा विआहिआ ? भन्ने आजोन પરિમાણ ને જાણવાની ઈચ્છાથી હવે ગૌતમે પ્રભુ ને એવી રીતે પ્રસન્ન કર્યો કે હે ભદંત એક એક મુહૂર્તના કેટલા ઉચ્છવાસ નિઃશ્વાસ પ્રમિત કાળ વિશેષ કહેવાય છે? અહીં ઉછુવાસ પદ ઉપલક્ષણ રૂપ છે. એનાથી નિશ્વાસનું પણ ગ્રહણ થાય છે, વાયુ ને અંદર લઈ જ તે ઉહ્વાસ છે હવા વાયુ બહાર નીકળે છે તે નિઃશ્વાસ છે. તાત્પર્ય આ છે કે એક અતર્મુહૂર્તમાં કેટલા ઉછૂવાસ નિશ્વાસ હોય છે ? એના જવાબમાં પ્રભુ કહે छे- गोयमा ! असंखिज्जाण समयाण समुदय समिइमसमागमेणं सा पगा आधलि अति वुच्चइ संखिज्जाओ आवलिया ओ उसासो संखिज्जाओ आवलियाओ नोसासो" गौतम આગળ પ્રસિદ્ધ સમયનું સ્વરૂપ કે જેમ શાસ્ત્રકારોએ પટશાટિકાનો ફાડવાના દૃષ્ટાંત થી સાબિત કરેલ છે જે કાલ નુ સર્વથી જઘન્ય રૂપ પ્રમણ છે એવા આ સંખ્યાત સમયોના સમુદાય રૂપ એક આવલિકા કહેવામાં આવી છે. અહીં એવા શંકા કરવી યોગ્ય નથી કે પ્રશ્નકારે Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५५ प्रकाशिकाटीका सू. २० कालस्वरूपम् मिति समागमस्तेन प्रमितः कालविशेषः ‘सा एगा आवलियत्ति वुच्चइ' सा एका आबलिका इति उच्यते । ननु प्रश्नवाक्ये मुहूर्तस्य कियन्तः उच्छ्वासाद्धा व्याख्याताः इत्युक्तम् उत्तरवाक्ये तु समयावलिकादिक्रमेण निरूपणं क्रियते इति प्रश्नाननुरूपमुत्तरदानमसंगतम् इति चेत् आह प्रश्नवाक्ये समयावलिकयोरसांव्यवहारिकत्वेन तद्विषये पृच्छा न कृता उत्तर वाक्ये तु केवलि प्रज्ञाया सूक्ष्मत्वेन वस्तुसूक्ष्मस्वरूपपर्यन्त गमनात् उच्छ्वासादीनां समया वलिकानिरूपणाधीननिरूपणत्वाच्च भगवतस्तयोनिरूपणं युक्तमेवेति । ननु पूर्वसमयसद्भावे परसमयस्मानुत्पन्नतया परसमयस्य च सद्भावे पूर्वसमयस्य व्यतीतत्त्वेनाभावात्कथमसंख्यातसमयानां समुदय समिति समागमो भवितुमर्हति येनाs नहीं करनी चाहीये कि प्रश्नकोर ने तो एक अन्तर्मुहूर्त में कितने उच्छावास निःश्वास होते हैं ऐसा पूछाहैं और आप उत्तर दे रहे है कि असंख्यात समयों के समुदाय की एक आवलिका होती है सो ऐसा आपका उत्तररूप वाक्य सर्वथा असंगत ही है. क्यों कि उच्छवास आदिकों का निरूपण किये बिना नहीं हो सकता है. अतः उच्छ्वास आदिकों का निरूपण इनके निरूपण के आधीन है. इसोलिये शास्त्रकार ने इनका निरूपण पहिले किया है. यद्यपि शंकाकार ने समय आवलीका को असंव्यवहारिक होने से इस विषय में पृच्छा नहीं की हैं परन्तु उत्तरवाक्य में जो इनका निरूपण किया गया है वह केवलिप्रज्ञा सूक्ष्म होती है और वह वस्तु के सूक्ष्म स्वरूपतक पहुंच जाति है इस तरह समय काल का सब से सूक्ष्मस्वरूप है. अतः जबतक ऊपका निरूपण नहीं हो जाता है तब तक इसके द्वारा साध्य आवलिका का और आवलिका साध्य उच्छवास आदि का निरूपण नहीं हो सकता है, इस बात को प्रकट करने के लिये भगवान् ने इस प्रकार से उत्तर दिया है अतः ऐसा यह उत्तर रूप कथन अनुचित नहीं है किन्तु उचित ही है । તે એક અંતમુહૂર્તમાં કેટલા ઉચ્છવાસ નિઃશ્વાસ હોય છે એ પ્રશ્ન કર્યો છે અને તમે જવાબ આપી રહ્યા છે કે અસંખ્યાત સમયના સમુદાયની એક આવલિકા હોય છે. તે એવા તમારા ઉત્તર રૂપ વાકયને સર્વથા અસંગત કહેવો ઉચિત નથી, કેમકે ઉચ્છવાસ વગે રેનું નિરૂપણ સમય આવલિકાના નિરૂપણ કર્યા વગર સંભવ નથી. એથી ઉચ્છવાસ આદિ કેનું નિરૂપણું સમય આવલિકાના નિરુપણ કર્યા વગર સંભવ નથી એથી ઉચ્છવાસ આદિકનું નિરૂપણ એમના નિરૂપણને આધીન જ છે. એથી શાસ્ત્રકારોએ એમનું નિરૂપણ પહેલાં કરેલ છે. જો કે શંકાકારે સમય આવલિકા ને અસંવ્યવહારિક હોવાથી આ સંબંધમાં પૃચ્છા કરી નથી પરંતુ ઉત્તર વાકયમાં જે આ વિષે નિરૂપણ કરવામાં આવેલું છે તે કેવલિ પ્રજ્ઞા સક્ષમ હોય છે અને તે વસ્તુના સૂમ સ્વરૂપ સુધી પહોંચી જાય છે. આ રીતે સમય કાળનું સૌ કરતાં વધારે સૂક્ષ્મ સ્વરૂપ છે. એથી જ્યાં સુધી તેનું નિરૂપણ કરવામાં આવે નહી ત્યાં સુધી તેના વડે સાય આવલિકા અને આવલિકા સાય ઉચ્છવાસ આદિનું નિરૂપણ થઈ શકે તેમ નથી એ વાતને પ્રકટ કરવા માટે ભગવાને એવી રીતે જવાબ આવ્યું છે. એથી આ ઉત્તરરૂપ કથન અનુચિત નથી પરંતુ ઉચિત જ છે. Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वलिकादीनामसंख्यातसमयप्रमाणस्वरूपता घटते इति चेत् आह-यद्यपि समुदया दिधर्मों विमात्र स्निग्धरूक्ष पुद्गलादीनां भवति न तु कालस्येति सत्यं तथापि यं यं कालविशेष प्ररूपयितुं प्रज्ञापकपुरुषविशेषेण यावन्तो यावन्तः समया एक ज्ञानविषयी कृतास्ता वन्तस्ते समुदयसमितिसमागता उपचर्यन्ते, अत एवायमौपाधिकः काल इति न काचि दनुपपत्तिरिति । तथा 'संखिज्जाओ श्रावलियाओ उसासो' सख्येया आवलिका उच्छ्वास: संखिज्जाओ आवलियाओ नीसासो' संख्येया आवलिका निःश्वासः तत्र सख्येयत्वोपपत्तिश्चैवम् आवलिकानां पद पश्चाशदुत्तरशतद्वयेनैकः क्षुल्लकभवो भवति तानि शंका-असंख्यात समयों की समूह समिति से एक आवलिका निष्पन्न होती है ऐसा आप कह रहे हैं-सो यह बात हम को समझ में ही नहीं आती है क्यों कि जब तक पूर्वसमय का सद्भाव रहेगा-तब तक पर समय का उदय नहीं होगा और जब परसमय का सद्भाव हो जावेगा-तब पूर्व समय का विनाश हो जावेगा-तो फिर असंख्यात समयों की समुदायसमिति कैसे निष्पन्न हो सकेगी कि जिससे आवलिका बनाई जाती है ? उत्तर-शंका ठीक है क्योंकि समुदयादि रूप धर्म विमात्र स्निग्ध क्षगुणवाले पुद्गलो में होता है काल में नहीं होता क्योंकि वह अमूर्त है परन्तु फिर भी प्रज्ञापकपुरुष विशेष द्वारा जिस जिस काल विशेष की प्ररूपणा करने के लिये जितने जितने समय एक ज्ञान के विषयभूत किये गये होते हैं उतने उतने वे समय समुदयसमिति में आ गये हैं ऐसा उपचार से मान लिया जाता है, इसलिये काल को औपाधिक माना गया है वास्तविक नहीं अतः इस प्रकार की प्ररूपणा में कोई अनुपपत्ति नहीं है । संख्यात आवलिकाओं का एक उच्छ्वास होता है और संख्यात ही आवलिकाओं का एक निःश्वास होता है, संख्यात की उपपत्ति इस प्रकार से होती है-२५६ आवलिकार्मो का एक क्षुल्लकभव होता है कुछ अधिक १७ क्षुल्लकभवों શકાઅસંખ્યાત સમયની સમૂહ સમિતિથી એક આવલિકા નિષ્પન્ન થાય છે એવું તમે કહી રહ્યા છે. તે આ વાત સમજમાં આવતી નથી. કેમકે જ્યાં સુધી પૂર્વ સમયને સદૂભાવ રહેશે ત્યાં સુધી પ૨સમયને ઉદય થશે નહીં અને જ્યારે પરસમયને સદૂભાવ થઈ જશે ત્યારે પૂર્વ સમયને વિનાશ થઈ જશે, તો અસંખ્યાત સમયની સમુ દાય સમિતિ કેવી રીતે નિપન થઈ શકશે કે જેનાથી આવલિકા નિષ્પન્ન થાય છે. : ઉત્તર-શંકા બરાબર જ છે. કેમકે સમુદાયાદિ રૂપ ધર્મ વિમાત્રનિગ્ધ રૂક્ષગુણવાળા પુદગલો માં હોય છે કાળમાં થતું નથી. કેમકે તે અમૂર્ત છે. છતાં પ્રજ્ઞાપક પુરુષ વિશેષ વડે જે જે કાળ વિશેષની પ્રરૂપણ કરવા માટે જેટલા જેટલા સમયે એક જ્ઞાનના વિષયભૂત કરેલા હોય છે તે તેટલા તે સમયે સમુદાય સમિતિમાં આવી ગયા છે, આમ ઉપચારથી માની લેવામાં આવે છે. એથી જ કાળને ઔપાધિક માનવામાં આવેલો છે તે વાસ્તવિક નથી. એથી આ જાતની પ્રરૂપણમાં કેઈ પણ અનુપત્તિ નથી, સંખ્યાત આવલિકાઓને એક ઉચ્છવાસ હોય છે. અને સંખ્યાત આવલિકાઓને જ એક નિઃશ્વાસ પણ હોય છે. સંખ્યાત ઉપપત્તિ આ પ્રમાણે થાય છે. ૨૫૬ આવલિકને એક ક્ષુલ્લક ભવ હોય છે. Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-सू. २० कालस्वरूपम् च सप्तदश साधिकानि उच्छ्वास निःश्वासकालः इति । अथ यादृशैरुच्छ्वास निश्वासादिभिर्मुहूर्त्तमानं भवति तदाह - 'हेडस्स' इयादि 'हेडस्स' हृष्टस्य- तारुण्येन समर्थस्य 'अणवगल्लस्स' अनवग्लानस्य - ग्लानिवर्जितस्य 'णिरूव किस्स ' निरूपक्लिष्टस्य-सर्वदा व्याधिरहितस्य नोरोगस्य 'जंतुणो' जन्तोः मनुष्यस्य च 'एगे उसा भनीसासे' एक उच्छ्वासनिःश्वासः उच्छ्वास युक्तो निश्वासः 'एस पाणुत्ति' स एष प्राण इति प्राण इति संज्ञया 'वुच्चई' उच्यते व्यवहियते इति । तथा 'सत्त पाई से थोवे' सप्त प्राणाः स स्तोकः 'सत्त थोवाई से लवे' सप्त स्तोका स लवः 'लवानां सत्तहत्तरीए' लवानां सप्त सप्तत्या मितो यः स 'एस मुहुत्तेत्ति' एष मुहूर्त्त इति 'आहिए' आख्यातः कथितः २ । १५७ का एक उच्छ्वास निःश्वासरूप काल होता है । अब जिस प्रकार के उच्छवासनिःश्वास आदिकों से एक मुहूर्त का प्रमाण होता है वह प्रकट किया जाता है - "हेट्ठस्स अणवगल्लस्स निरुवकटुस्स जंतुणो । एगे उसासनीसासे एस पाणुत्ति बुच्चई" || १ || सत्त पाई से थोवे सत्त थोवाईं से लवे, लवानां सत्तहत्तरीए एए मुहुत्तेत्ति आहिए ॥२॥ तिणि सहस्सा सत्त य सयाइ ं तेवत्तरिं च ऊसासा, एस मुहुत्तो भणिओ सवेहिं अणंतनाणोहिं ॥ ३ ॥ – ऐसे पुरुष का कि जो युवा होने से समर्थ हो, ग्लानि वर्जित हो, सर्वदा व्याधि से रहित हो ऐसे उस नीरोग मनुष्य का जो एक उच्छ्वासयुक्त निःश्वास है उसका नाम प्राण कहा गया है ऐसे सात प्राणों का एक स्तोक होता है सात स्तोकों का एक लव होता है ७७ लवों का एक मुहूर्त होता हैं ३७७३ उच्छवासनिःश्वासों का एक मुहूर्त होता है । ऐसा अनन्त ज्ञान सम्पन्न श्रोजिनेन्द्र भगवानों ने कहा है “एएणं मुहुत्तप्पमाणेणं तसं मुहुत्ता अहोरतो, पण्णरस अहोरता पक्खो, दो पक्खा मासो, दो मासा उऊ, तिण्गि उऊ अयणे, दो अयणा संवच्छरे " કંઈક વધારે ૧૭ ક્ષુલ્લકભવાના એક ઉ^વાસ નિઃશ્વાસ રૂપ કાળ હેાય છે. હવે જેમ ઉ વાસ નિ:શ્વાસ આદિકાથી એક મુહૂત નું પ્રમાણુ હાય છે, તે પ્રકટ કરવામાં આવે છે. 'हेडस्स अणवगल्लस्स णिरूव किट्टस्स जन्तुणेो ! पगे उसासनो सासे एस पाणुत्ति वुच्च ॥ १ ॥ सन्त पाणू से थोवे' सत्त थोवाइ से लत्रे लवानां सत्तहत्तरीप एस मुहुत्तेत्ति आहिए ||२|| तिणि सहस्ता सत्तय सयाई तेंवरि च ऊसासा एस मुहुत्तो भणिओ सग्वेद्दि अनंतनाणीहि ||३|| येवो पुरुष होय लेने युवावस्था प्राप्त होय भने समर्थ होय ગ્લાનિ વર્જિત હાય, સઢા વ્યાધિ વિહીન ઢાય એવા તે નિરેશગ મનુષ્યને જે એક કૂવાસ યુક્ત નિશ્ર્વાસ છે તેનું નામ પ્રાણ કહેવામાં આવેલ છે. એવા સાત પ્રાાના એક સ્તાક હાય છે. સાત સ્તાકના એક લત્ર હેાય છે. ૭૭ લવાનુ એક મુહૂત્ત' હાય છે. ૩૭૭૩ ઉચ્છ્વવાસ-નિઃશ્વાસેાનું એક મુહૂત્ત હાય છે. એવુ' અનન્તજ્ઞાન सम्पन्न सर्वश्री मिनेन्द्र भगवन्ता धुं छे. 'पण मुहुत्तप्पमाणे णं तीस मुहुत्ता अहोरतो पण्णरस अहोरता पक्खो, दो पक्खा मासो दो मासा उऊ उऊ, अयणे, दो अयणा संवच्छरे, भेषा मुहूर्त प्रभाशुथी 30 मुहूर्त्तनेो मे तिष्णि महारा Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अथ कियद्भिरुच्छ्रवासनिःश्वासैरेको मुहूर्ती भवतीत्याह 'तिष्णि सहस्सा' इत्यादि 'तिणि सहस्सा सत्त य सयाई तेवत्तरिं' त्रीणि सहस्राणि सप्त शतानि त्रिसप्ततिः त्रि सप्तत्यधिकसप्तशत्युत्तरसहस्रत्रय संख्यका 'उसासा' उच्छ्वासा उपलक्षणत्वान्निः श्वासाश्व 'एस मुहूतो' एष मुहूतः मुहूर्ताभिधानः कालः 'सव्वेहिं अनंतनाणीहिं' सर्वै अनन्त ज्ञानिभिः अनन्तज्ञानसम्पन्नैर्जिनैः 'भणिओ' भणितः - उक्त इति । 'एएणं एतेन - अनन्तरोक्त स्वरूपेण 'मुहुत्तप्पमाणेणं तीसं' मुहूर्तप्रमाणेन त्रिंशत् - त्रिंशत्संख्यका 'मुहुत्ता' मुहूर्ता: 'अहोरतो' अहोरात्रः भवति, 'पण्णरस' पञ्चदश- पञ्चदशसंख्यकाः 'अहोरत्ता' अहोरात्राः एक 'पक्खो' पक्षः 'दो पक्खा मासो' द्वौ पक्षौ एको मासः, 'दो मासा उऊ' द्वौ मासौ एकः ऋतुः 'तिष्णि' त्रयः त्रिसंख्यका 'उऊ अयणे' ऋतवः एकमयनम् 'दो अयणा संवच्छरे' द्वे अयने एकः संवत्सरः, 'पंच संवच्छरिए' पञ्च संवत्सरिकं - पञ्च वर्ष परिमितम् एकं 'जुगे' युगम् 'वो' 'विंशति संख्यकानि 'जुगाई वाससए' युगानि वर्ष - शतम् 'दस' दश–दश लेख्यानि 'वाससयाई वाससहस्से' वर्षशतानि वर्षसहस्रम् 'सयं वाससहस्साणं वाससयसहस्से' वर्षसहस्राणां शतं वर्षशतसहस्रम् - वर्षलक्षम्, 'चउरासीईवाससय सहस्साई' चतुरशीति वर्षशतसहस्राणि चतुरशोतिवर्ष लक्षाणि 'से एगे पुब्वंगे' तदेकं पूर्वाङ्गम्, 'चउरासोई पुग्वंगलय सहस्साई' चतुरशीतिः पूर्वाङ्गशतसहस्राणि चतुर शीतलक्षपूर्वाङ्गाणि 'से एगे पुव्वे' तदेकं पूर्वम्, पूर्ववर्ष मानं चैवमभिहितं तथाहि - "पुच्चऐसे मुहूर्त प्रमाण से ३० मुहूर्त का एक अहोरात्र होता है पन्द्रह अहोरात का एक पक्ष होता हैं दो पक्ष का एक मास होता है दो मास को एक ऋतु होती है तीन ऋतुओं का एक अयन होता है, दो अयन का एक संवत्सर होता है, “पंच संबन्छरिए जुगे, बींसं जुगाई वाससए, दसवाससयाई वाससहस्से सयं वाससहस्साणं वाससय सहस्से, चउरासीइ वाससयसहस्साईं से एगे पुर्व्वगे" पांच संवत्सरों का एक युग होता है. वीस युगों का एक सौ वर्ष होता है, १० सौ वर्षों का एक हजार वर्ष होते हैं, १००एक सौ हजार वर्षों के एक लाख वर्ष होते हैं ८४ लाख वर्षों का एक पूर्वाङ्ग होता है, "चउरासीई पुग्वंगसयसहस्साईं से एगे पुग्वे, एवं विगुणं विगुणं णेयवं तुडिए२ अडडे २ अबवे२ हुहुए २ उप्पले २ पउमे २ ત્ર હોય છે. પ`દર અહારાત્રના એક પક્ષ હેાય છે. એ પક્ષનેા એક માસ હાય છે. બે માસની એક ઋતુ હાય છે. ત્રણ ઋતુએનુ' એક અયન હાય છે. એ અયનેા ના એક સ'વત્સર હાય छे. 'पंच सवच्छरिए जुगे, वीसं जुगाई वाससए दसवाससयाई बाससहस्से सयंवास सहस्साणं वाससय सहस्से चउरासी वास सय सहस्लाई से एगे पुव्वंगे" पां સંવત્સર ના એક યુગ હોય છે. વીસ યુગેાના એક સાવ ડાય છે. ૧૦ સેા વર્ષોના એક હજાર વર્ષ હાય છે. ૧૦૦ હજાર વર્ષોંના એક લાખ વર્ષોં હોય છે. ૮૪ લાખ વષોનું यूवींग होय छे, 'चउरासीई पुव्वंगसयसहस्साह से पगे पुव्वे एवं विगुणं विगुण यम् तुडिए २ अडडे २ अववे २ हुहुए २ उपके २ पउमे २ णलिणे अत्थणिउरे २ अउप १५८ Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू० २० कालस्वरूपम् स्सउ परिमाणं सपरि खलु हुंति कोडिलक्खाओ । छप्पण्णं च सहस्सा बोद्धव्वा वासकोडीणं" छाया-पूर्वस्य तु परिमाणं सप्ततिः खलु भवन्ति कोटिलक्षाणि । षट्पञ्चाशत् सहस्राणि बोद्धव्यानि वर्षकोटीनाम् इति । स्थापना च ७०५६०००००००००० इति । 'एव' एवम्-अनेन प्रकारेण-पूर्वाङ्गपूर्वन्यानेन परं परं त्रुटिताङ्गं त्रुटितम्इत्यादि तदङ्गतल्लक्षणभेदाभ्यां 'विगुणं विगुणं' द्विगुणं द्विगुणं द्विसंख्यकं द्विसंख्यक 'णेयव्वं' नेतव्यं-ज्ञातव्यम् । अयं भाव:-"त्रुटितम् अडडम्" इत्यादीनि सूत्रे एकत्वेन निर्दिश्यमानानि त्रयोदशसंख्यास्थानानि सूत्रस्य लाधवप्रधानत्व सूचकानि । द्विगुण द्विगुणमिति तु द्विसंख्यकं द्विसंख्यकमिति परं न तु द्विगुणकारपरम् । ततश्च पूर्वानन्तरं 'तुडिए २' टिताङ्ग त्रुटितम्, 'अडडे २' अडडाङ्गम् अडडम्, 'अववे २' अववाङ्गम् अववम् 'हुहुए २' हहुकान हूहुकम्, 'उप्पले २' उत्पलाङ्गम् उत्पलम्, 'पउमे २' पद्माङ्ग पद्मम्, 'णलिणे २' नलिनाङ्ग नलिनम्, 'अत्थनिउरे २' अर्थनिपूराङ्गम् अर्थनिपूरम्, 'अउए २' अयुताङ्गम् अयुतम् 'ण उए २' नयुताङ्गं नयुतं, 'पउए' २' प्रयुताङ्ग णलिणे२ अत्थणिउरे२ अउए२ नउए पउए२ चूलिया२ सीसपहेलियाए२ जाव चउरासीइ सीसपहेलियगसयसहस्साइं सा एगा सीसपहेलिया" ८४ लाखपूर्वाङ्ग का एक पूर्व होता है. पूर्ववर्ष का प्रमाण इस प्रकार से कहा गया है-"पुवस्स उ परिमाणं सपरि खलु हुंति कोडिलक्खीओ, छप्पणं च सहस्सा बोद्धव्वा वासकोडीणं" इनकी स्थापना इस प्रकार हैं७०५६००००००००००। ८४लाख पूर्व का एक त्रुटिताङ्ग होता है, ८४लाख त्रुटिताङ्ग का एक त्रुटित होता है ८४ लाख त्रुटित का एक अडडाङ्ग होताहै ८४ लाख अडडाङ्ग का एक अडड होता है, ८४ लाख अडड का एक अववाङ्ग होता है, ८४लाख अववाङ्ग का एक अवव होता है, ८४ लाख अवव का एक हुहुकाङ्ग होता है, ८४लाख हुहुकाङ्ग का एक हुहुक होता है, ८४लास्त्र हुहुक का एक उत्पलाङ्ग होता है, ८४लाख उत्पलाङ्ग का एक उत्पल होता है, ८४ लाख उत्पल का एक पद्माङ्ग होता है, ८४लाख पद्माङ्ग का एक पद्म होता है, ८४ लाख पद्म का एक नलिनाङ्ग २ नउए २ पउए २ चूलिया ५ सीसपहेलियाए २ जाब चउरालीइ सीसपहेलियंग सय सहस्साइंसा एगा सीसपहेलिया" ८४ तास पूर्वागने से पूर्व डाय छ, पूर्व वषनु प्रभावमा प्रमाण वामां मा छे. "पव्वस्स उ परिमाण सपरि खल हंति कोडि लक्खाओ छप्पण्णं च सहस्सा बोद्धव्वा वासकोडीण" मेमनी स्थापनामा प्रमाणे छ૭૦૫૬૦૦૦૦૦૦૦૦૦૦, ૮૪ લાખ પૂર્વનું એક ત્રુટિતાંગ હોય છે ૮૪ લાખ ત્રુટિતાંગ બરાબર એક એડડાંગ હોય છે. ૮૪ લાખ અડડાંગ બરાબર એક અડડ હોય છે. ૮૪ લાખ અડડનું એક અવવાંગ હોય છે. ૮૪ લાખ અવવાંગ બરાબર એક અવવ હેાય છે. ૮૪ લાખ અવવનું એક હુડુકાંગ હોય છે. ૮૪ હેકાંગ બરાબર એક હક હોય છે, ૮૪ લાખ હક બરાબર એક ઉ૫લાંગ હોય છે. ૮૪ લાખ ઉ૫લાંગ બરાબર એક ઉપલા હોય છે. ૮૪ લાખ ઉ૫લનું એક પદ્માંગ હોય છે. ૮૪ લાખ પધાંગ નું એક પદ્ધ હોય છે. ૮૪ લાખ પદ્યનું એક નલિનાંગ હોય છે. ૮૪ લાખ નલિનાંગ બરાબર એક નલિન હેય છે. Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १६० जम्बूद्वीपप्रशतिसूत्रे प्रयुतं 'चूलिया २' चूलिकाङ्ग चूलिका, 'सीसपहेलिया २' शीर्षप्रहेलिका शीर्षप्रहेलिका इति पर्यन्तं बोध्यम् । अत्र प्रथम प्रथमापेक्षयाऽपरमपरं चतुरशीति लक्षगुणितं बोध्यमिति एतदेव सूचयितुमाह - जाव चउरासीइ सीसपहेलियगसयसहस्साई' यावच्चतुरशीतिः शीर्षप्रहेलिकाङ्गशतसहस्राणि चतुरशीति लक्षशीर्षप्रहेलिकाङ्गानि 'सा एगा सोसप हेलिया' सा एका शीर्षप्रहेलिकेति । अस्याः स्थापना चैवं विज्ञेया, तथाहि - ७५८२६३ २५३०, ७३०१०२४११५, ७९७३५६९९७५, ६९६८९६२१८९, ६६८४८०८०१८ ३२९६ इति चतुष्पञ्चाशदङ्काः, एतदग्रे च चत्वारिंशदधिकं शून्यशतं प्रक्षेण्यम् । एवं चैकस्यां शीर्षप्रहेलिकायां चतुर्नवत्याधिकशतसंख्यकानि अङ्कस्थानानि भवन्तीति । यद्वा - विगुणं विगुणं" इत्यस्य - ' विगुणं विगुणम्' इतिच्छाया । एतत्पक्षे तु यथोत्तरं प्रधानं प्रधानं प्रकर्षयुक्तं यथा स्यात्तथा ज्ञातव्यमिति । ततश्चायमत्र पर्यवसितोऽर्थः होता है, ८४ लाख नलिनाङ्ग का एक नलिन होता है, ८४ लाख नलिन का एक अर्थ - निपूराङ्ग होता है, ८४ लाख अर्थनिपुराङ्ग का एक अर्थनिपूर होता है. ८४ लाख अर्थ - निपूर का एक अयुताङ्ग होता है, ८४ लाख अयुताङ्ग का एक अयुत होता है, ८४ लाख अयुत का एक नयुताङ्ग होताहै, ८४ लाख नयुताङ्ग का एक नयुत होता है, ८४ लाख नयुत का एक प्रयुतात होता है, ८४ लाख प्रयुताङ्ग का एक प्रयुत होता है, ८४ लाख प्रयुत का एक चूलिकाङ्ग होता है, ८४ लाख चूलिकाङ्ग की एक चूलिका होती है, ८४ लाख चूलिका का एक शीर्षप्रहेलिकाङ्ग होता है और ८४लाख शीर्षप्रहेलिकाङ्ग को एक शप्रिहेलिका होती है इस शीर्षप्रहेलिका की स्थापना इस प्रकार से है- ७५८२६३२५३०७३०१०२४११५७९७३५ ६९९७५६९६८९६२१८९६६८४८०८०१८३२९६ ये सब अंक ५४ हैं इनके आगे शून्यों की स्थापना और करनी चाहिये. इस तरह एक शीर्षप्रहेलिका में १९४ - अङ्कस्थान होते हैं, यद्वा"विगुणं विगुणं" की जब संस्कृत छाया "विगुणं विगुणं" ऐसी ही होती है तब इस पक्ष में आगे ૮૪ લાખ નલિન નું એક અનિપૂરાંગ હોય છે. ૮૪ લાખ અનિપુરાંગ બરાબર એક અથ નિપૂર હોય છે. ૮૪ લાખ અથ નિપૂર નુ એક અણુતાંગ હોય છે, ૮૪ લાખ અયુતાંગ ખરાખર એક અયુત હોય છે, ૮૪ લાખ અયુતનું એક નયુતાાંગ હોય છે, ૮૪ લાખ નયુતાંગ ખરાખર એક નયુત હૈયિ છે. ૮૪ લાખ નયુતનુ એક પ્રયુતાંગ હાય છે. ૮૪ લાખ પ્રયુતાંગ ખશખર એક પ્રદ્યુત હોય છે. ૮૪ લાખ પ્રયુતનું એક ચૂલિકાંગ હાય છે, ૮૪ લાખ ચુલિકાંગની એક ચૂલિકા હોય છે, ૮૪ લાખ ચૂલિકાનું એક શીષ પ્રહેલિકાંગ ઢાય છે અને ૮૪લાખ શીષ પ્રહેલિકાંગની એક શીષ પ્રહેલિકા હાય છે. આ શીષ' પ્રહેલિકાની સ્થાપના આ પ્રમાણે છે–૭૫, ૮૨ ૬૩, ૨૫, ૩૦૭૩૦૧૦૨૪૧૧૫, ૭૯૭૩૫૬૯૯૭૫૬૯ ૬૮૯૬૨૧ ૮૯૬૬૮૪૮૦૮૦૧૮૩ ૯૬ એ સ અંક ૫૪ છે. એમની આગળ ૧૪૦ શૂન્યાની સ્થાપના વધારાની કરવી જોઇએ. આ પ્રમાણે એક શીષ પહેલિકામાં ૧૯૪ અંક સ્થાનેા હોય છે. यद्वा- "विगुणं विगुणं" नी संस्कृत छाया विगुणं विगुणं ४ थाय छे से पक्षमां भागण Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. २० कालस्वरूपम् १६१ यथा पूर्वाङ्गापेक्षया पूर्व प्रधान तथा पूर्वापेक्षया त्रुटिताङग प्रधानं तदपेक्षया त्रुटितमित्यादि रीत्या उत्तरमुत्तरं प्रथमप्रथमापेक्षया प्रधान २ बोध्यम् । एवं च शीर्षप्रहेलिका सर्वापेक्षया प्रधानं बहुत्तरसंख्यास्थानविषयत्वादिति । अथवा-विगुणं गुणरहितमित्यर्थः । अयमत्राशयः-पूर्वाङ्गपूर्वादिकानि अनादिसिद्धसंकेतमात्रवशादेव विवक्षित संख्याभिधायकानि, न पुनः पञ्चाशच्छतसहस्रादिवद् गुणनिष्पन्नानि । तथा च यथा पूर्वाङ्ग पूर्व च तथा त्रुटितादिकपदसमूहोऽपि विज्ञेयः । “विगुणं विगुणम्" इति वीप्सा तु अटितादिपदानां बहुत्वात् । ननु भवता पूर्वाङ्ग. पूर्बादिकानि अनादि सिद्ध संकेतमात्रवशादेव विवक्षितसंख़्याभिधायकानि इत्युक्तं, ततश्चैषामन्वर्थत्वाभाव इति पर्यवस्यति, परन्तु अन्वर्थत्वमेषां सुव्यक्तमेव, तथाहि- अङ्गं तावत्कारणं, कारण च कार्यसापेक्षम्, २ का प्रधान होता है ऐसा भाव निकलता है.तथा च पूर्वाङ्ग को अपेक्षा पूर्व में प्रधानता-प्रकर्ष युक्तता है, पूर्व को अपेक्षा त्रुटिपाङ्ग में प्रधानता है, त्रुटिताङ्ग की अपेक्षा त्रुटित में प्रधानता है इत्यादि रीति से उत्तर उत्तर में प्रथम प्रथम को अपेक्षा से प्रधानता जाननी चाहिये । इस तरह शीर्ष प्रहेलिका में सब की अपेक्षा प्रधानता है क्योंकि वह बहुतर संख्याके स्थान का विषय है अथवा-"विगुणम्', इसका अर्थ गुण रहित ऐसा भी होता है इस पक्ष में ऐसा भाव निकलता है कि जिस प्रकार पञ्चाशत् शतसहस्र इत्यादि गुण निष्पन्न हैं उस तरह से ये पूर्वाङ्ग पूर्व आदि गुणनिष्पन्न नहीं हैं ये तो केवल अनादिसिद्ध संकेत के वश से ही विवक्षित संख्या के अभिधायक हैं “विगुणं२, ऐसा जो दो बार कहा गया है वह त्रुटित भादि पदों को बहुता को लेकर कहागया है। शंका-आपने अभी पूर्वाङ्ग पूर्व आदिकों को अनादि सिद्ध संकेत के वश से ही विवक्षित संख्या के अभिधायक कहा है तो इसका तात्पर्य-भाव यही हुआ कि इनमें अन्वर्थता नहीं हैं परन्तु ऐसी बात तो है नहीं कि क्यों इनमें अन्वर्थता है और वह इस प्रकार से है-अङ्ग कारण होता આગળ નું પ્રધાન થાય છે એ ભાવ સ્પષ્ટ થાય છે. તથા ચ-પૂવગની અપેક્ષા પૂર્વમાં પ્રધાનતા પ્રર્ષ યુક્તતા છે. પૂર્વની અપેક્ષા ત્રુટિતાંગ માં પ્રધાનતા છે. ત્રુટિતાંગની અપેક્ષા ત્રુટિત માં પ્રધાનતા છે. ઈત્યાદ્વિરૂપમાં ઉત્તર ઉત્તરમાં પ્રથમની અપેક્ષાએ પ્રધાનતા જાણવી જોઈએ. આ રીતે શાર્ષપ્રહેલિકામાં સર્વની પ્રધાનતા છે કેમકે તે બહુતર સંખ્યાત સંસ્થા નને વિષય છે. અથવા વિલુન્ આને અર્થ ગુણ રહિત પણ થાય છે. આ પક્ષમાં એ ભાવ પણ નીકળે છે કે જે પ્રમાણે પંચાશત શતસહસ્ત્ર ઈત્યાદિ ગુણે નિષ્પન છે. તેમ એ પૂર્વાગે પૂર્વ આદિ ગુણ નિષ્પન્ન નથી. એ તે ફકત અનાદિ સિદ્ધ સંકેત વશથી १ विवक्षित सध्यान। मनिधाय छ विगुणम्,,.२ मे पा२ ४२वामा मा०यु छेते ત્રુટિત આદિ પદેની બહુલતાને લીધે કહેવામાં આવેલ છે, શંકા–તમે હમણું પૂર્વાગ પૂર્વ આલિકાને અનાદિસિદ્ધ સંકેતના વશથી જ વિવક્ષિત સંખ્યા ના અભિધાયક કહેલ છે તે આને અર્થ એ થયો કે આમાં અર્થત નથી. પરંતુ ખરેખર એવું નથી કેમકે આમાં અવર્થતા અને તે ખા પ્રમાણે છે. અંગ કારણ હોય છે. અને તે કાર્ય સાપેક્ષા डाय छे. मही पूर्वा ॥३५ २५ नुय पूछे तथा तो पागमा 'पूर्वस्य अङ्ग' ૨૧ Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे कार्य च पूर्वम्, अतएव पूर्वस्याङ्ग पूर्वाङ्गमिति विग्रहः, पूर्वाङ्ग चतुरशीतिलक्षगुणितं सत् पूर्व जायते, पवं चात्रान्वर्थत्वं सुव्यक्तमेवेति चेत्, आह-पूर्वशब्दस्यैव तावन्नास्त्यन्वर्थत्वं ततश्च तत्कारणस्यापि तदभावः मुस्पष्ट एवेति न कश्चिद्दोषः । यद्वा-द्विगुणं द्विगुणमित्येवच्छाया, अर्थस्तु 'द्विभेद विभेदं" इति वोध्यः । ततश्चायमत्राशयः-यथा “पूर्वाङ्ग पूर्वम्" इति द्विभेदम् अनेन क्रमेणैव टिताङ्गं त्रुटितमित्यारभ्य शीर्षप्रहेलिकाङ्गं शीर्षप्रहेलिका इति पर्यन्तं भेदद्वयं बोपमिति । सम्प्रति प्रक्रान्तविषयम् उपसंहरन्नाह"एतावदिति" 'एताव' एतावत्-समयादि शीर्षपहेलिका पर्यन्तं 'ताव' तावद् 'गणिए' गणित-कालगणितं संख्यास्थानमिति यावत् । 'एताव ताव गणियस्स बिसए' एतावानेव तावर गणितस्य विषयः आयुःस्थित्यादिकालः । एतावानायुः कालस्तु केषांचिद् रत्नप्रभानारकाणां भवनपतिव्यन्तराणां सुपम दुष्षमारक संभविनां नरतिरश्चां च बोध्यः । एतस्मात्परतोऽपि सर्षपचतुष्पल्यप्ररूपणा गम्यः संख्येयः कालोऽस्ति, परन्तु सोऽनहै और वह कार्य सापेक्ष होता है, यहां पूर्वाङ्ग रूप कारण का कार्य पूर्व है तभी तो जाकर पूर्वाङ्ग में-"पूर्वस्य अङ्गं" इस व्युत्पत्ति के अनुसार ऐसा विग्रह हुआ है पूर्वङ्ग को ८४ लाख से गुणा करने पर उससे पूर्व बनता है इस तरह से यहां अन्वर्थता स्पष्ट हो है फिर आपने इनमें अन्वर्थता का अभाव कैसे प्रतिपादित किया है ? तो इस शंका का उत्तर ऐसा है कि जब पूर्व शब्द में ही अन्वर्थता नहीं है तो फिर इनका जो कारण है उसमें अन्वर्थता का अभाव तो स्पष्ट ही है इस तरह से यहां कोई दोष नहीं है । यद्वा-“विगुणं २" की संस्कृत छाया द्विगुण द्विगुण ऐसी ही है इसका अर्थ दो दो भेद होता है तथा च पूर्वाङ्ग पूर्व त्रुटिताङ्ग त्रुटित इस रूपसे शीर्षप्रहेलिकाङ्ग शोर्षप्रहेलिका तक दो दो भेद होते गये हैं-जो ऊपर में स्पष्ट किये जा चुके हैं। "एताव ताव गणिए, एतावताव गणियस्स विसए तेण परं ओवमिए" इस प्रकार समय से लेकर शीर्षप्रहेलिका तक कालगणित है-संख्या का स्थान है और इतना हो गणित का विषय है- आयुस्थिति आदि रूप काल है इतना आयुःकाल कितनेक रत्नप्रभा के नारकोंका, भवनपति देवों का, व्यઆ વ્યુત્પત્તિ મુજબ આ જાતને વિગ્રડ થયા છે. પૂર્વાગને ૮૪ લાખથી ગુશિત કરવામાં આવે તે તેના થી પૂર્વ બને છે. આ પ્રમાણે અહીઅન્વર્થતા સ્પષ્ટ જ છે. તે પછી તમોએ આમાં અન્વતાને અભાવ છે. એવું પ્રતિપાદન કર્યું છે તે એગ્ય છે ? આ શંકાને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે જયારે પૂર્વ શબ્દમાં જ અવર્થતા નથી તો પછી એનું જે કારણ કે તેમાં અન્યતાને અભાવ તે ૨૫ષ્ટ છે. આ પ્રમાણે અહીં કોઈ દોષ જ નથી. __यद्वा-"विगुणं २" नी सकृत छाया द्विगुण द्विगुण' मेवी छे, मान सय બબે ભેદ હોય છે. તથા ચ-પૂર્વાગ પૂર્વ, ત્રુટિતાંગ ત્રુટિત આ રૂપથી શીર્ષ પ્રહેલિકાંગ, शीर प्रति सुधी १० सेहो थय। छे. ते विष ५२ स्पष्टता ४२वामां मावी छे. पता वतावगणिए,, एतावतावगणियस्स विसर तेण परं ओवमिए" मा प्रमाणे समयथा માંડી ને શીર્ષ પ્રહેલિકા સુધી કાળ ગણિત છે, સંખ્યાનું સ્થાન છે, અને એજ ગણિતને વિષય છે. આયુથિતિ આદિરૂપ કાળ છે. આટલે આયુ કાળ કેટલાક રતનપ્રભાના નારકોના Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू० २१ कालस्वरूपम् तिज्ञानिनामसंव्यवहार्यः, अत एवात्र स न निर्दिष्ट इति । शीर्षप्रहेलिकातः. परंतु अनतिशयज्ञानिभिग्रहीतुमशक्यम्' अतस्तदौपमिकम्-उपमया सादृश्येन निवृत्तं बोध्यमिति । एतदेव सूचयितुमाह-तेण परं ओवमिए' इति । 'तेण' इति पञ्चम्यर्थे-तृतीया बोध्येति ॥२०॥ पूर्वमौपमिकमुक्त तदेव प्रश्नोत्तराभ्यां निरूपयितुमाहमूलम्- से किं तं उवमिए, उविमिए दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-पलि ओमे य सागरोवमे य। से कि तं पलिओवमे? पलिओवमस्स परूवणं करिस्सामि' परमाणु दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-सुहुमे य वावहारिए य, तत्थ णं जे से सुहमे से ठप्पे, तत्थ णं जे से वावहारिए से णं अणंताणं सुहुमपरमाणु पुग्गलाणं समुदय समिइ समागमेणं वावहारिए परमाणु निप्फज्जइ, तत्थ णो सत्थं कमइ सत्थेण सुतिक्खेण वि छेत्तुं भेत्तं च किर ण सक्का । तं परमाणु सिद्धा वयंति आई पमाणाणं ॥१॥ वावहारिय परमाणूणं समुदयसमिइसमागमेणं सा एगा उस्सण्हन्तर देवों का एवं सुषमदुष्षमारक में उत्पन्न हुए नर और तिर्यञ्चों का, जानना चाहिये इस काल से भी आगे जो सर्षपचतुष्पल्य प्ररूपणागम्य काल है वह भी संख्यात काल ही है परन्तु वह अन तेशयज्ञानियों के ज्ञान का विषय नहीं होने से असंव्यवहार्य है इसीलिये उसे यहां निर्दिष्ट नहीं किया गया है शीर्षप्रहेलिका से आगे का जो काल है वह अनतिशय ज्ञानियों द्वारा गम्य नहीं हो सकता है इसलिये उसे औपमिक कहा गया है अर्थात् उसका ज्ञान उपमा देकर ही कराया जाता है अर्थात् वह सादृश्य से बोध्य है- इसीलिये 'तेण परं ओवमिए' ऐसा सूत्रकार ने कहा है । 'तण' यह तृतीया विभक्ति पंचमी विभक्ति के अर्थ में हुई है ॥२०॥ ભવનપતિ દેવના તેમજ સુષમ દુષમારકમાં ઉત્પન્ન થયેલા નર અને તિર્યંચાને જાણ જોઈએ. આ કાળ કરતાં પણ આગળ જે સર્ષ પચતુષ્ટય પ્રરુપણું ગમ્ય કાળ છે તે પણ સંખ્યાત કાળ જ છે. પરંતુ તે અનતિશય જ્ઞાનીઓના જ્ઞાનને વિષય નથી તેથી તે અસં વ્યવહાર્યા છે. એથી જ તેને અડી નિર્દિષ્ટ કરવામાં આવેલ નથી. શીર્ષપ્રહેલિકા પછી જે જે કાળ છે. તે અનતિશય જ્ઞાનીઓ વડે ગમ્ય થાય તેવું નથી એથી તેને ઔપમિક કહેવા માં આવેલ છે એટલે કે તેનું જ્ઞાન ઉપમા વડે જ સંભવી શકે તેમ છે. એટલે કે તે સાદ श्यथा माध्य छे. मेथी । "तेण परं ओवमिए" मे सूत्र धुं छे. "तेण" मातृतीया વિભકિત પંચમીના અર્થ માં થઈ છે. ૨૦ Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १६४ जम्बूद्धोपप्रप्तिसूत्रे सण्हिआइवा सण्हिसण्हिआइ वा उद्धरेणूइ वा तसरेणूइ वा रहरेणूइ वा वालग्गेइ वो लिक्खाइ वा जूआइ वा जवमज्झेइ वा उस्सेहंगुलेइ वा अट्ठ उस्सण्हसण्हियाओ सा एगासण्ह सण्हिया, अट्ठ सहसण्हियाओ सा एगा उद्धरेणू , अट्ठ उद्धरेणूओ सा एगा तसरेणू, अट्ठ तासरेणूओ सा एगा रहरेणू अट्ठ रहरेणूओ से एगे देवकुरूत्तरकुराण मणुस्साणं वालग्गे अट्ठ देवकुरूत्तरकुराण मणुस्साण वालग्गा से एगे हखिासरम्मयवासाण मणुस्साणं वालग्गे, एवं हेमवयहेरण्ण्वयाण मणुस्साणं पुनविदेह अवरविदेहाणं मणुस्साणं वालग्गा सा एगा लिक्खा अट्ठ लिक्खाओ सा एगा जूआ अट्ठ जूआओ से एगे जवमज्झे अट्ठ जवमज्झा से एगे अंगुले. एएणं अंगुलप्पमाणेणं छ अंगुलाई पाओ, बारस अंगुलाई विहत्थी, चउवीसं अंगुलाई रयणी, अडयालीसं अंगुलाई कुच्छी, छण्णउइ.अंगुलाई से एगे अक्खेइवा, दंडेइ वा, धणूइ वा, जुगेइ वा, मुसलेइ वा, णालिआइ वा, एएणं धणुप्पमाणेणं दो धणुसहस्साई गाउयं, चत्तारि गाउयाई जोयणं, एएण जोयणप्पमाणेणं जे पल्ले जोयणं आयामविक्खंभेणं जोयणं उ8 उच्चत्तेणं, तं तिगुणं सविसेस परिक्खेवेणं । से णं पल्ले एगाहिय बेहिय तेहिय उक्कोसेणं सत्तरत्तप ढाणं संमढे सण्णिचिए भरिए वालग्गकोडीणं । तेणं बालग्गा णो कुत्थेज्जा, णो परिविडंसेज्जा णो अग्गी डहेज्जा णो वाए हरेज्जा, णो पूइत्ताए हव्यमागच्छेज्जा, तओणं वाससए २ एगमेगं वालग्गं अवहाय जावइएणं कालेणं से पल्लेखीणे णीरए पिल्लेवे णिट्ठिए भवइ सेतं पलिओवमे । एएसि पल्लाणं कोडाकोडी हवेज्ज दस गुणिआ । तं सागरोवमस्स उ एगस्स भवे परिमाणं ॥१॥ एएणं सागरोवमप्पभाणेणं चत्तारि सोगरोवमकोडाकोडीओ कालो सुसमसुसमा १ तिण्णि सागरावमकोडाकोडीओ कालो सुसमा२ दो सागरोवमकोडाकडीओ कालो सुसमदुस्समा ३ एगा सागरोवमको Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-सू. २१ कालस्वरूपम् । कोडी बायालीसाए वाससहस्सेहिं ऊणिओ कालो दुस्समसुसमा ४ एकवीसं वोससहस्साई कालो दुस्समा ५ एकवीसं वाससहस्साई कालो दुस्समदुस्समा ६ पुणेरवि उस्सप्पिणीए एकवीसं वाससहस्साई कालो दुस्समदुस्समा १ एवं पडिलोमं णेयव्वं जाव चत्तोरि सागरोवम कोडाकोडीओ कालो सुसमसुसमा ६ दस सागरोवमकोडा कोडीओ कालो ओसप्पिणि दस सागरोपवमकोडाकोडोओ कालो उस्सप्पिणी । वीसं सागरोवाकोडाकोडीओ कालो ओसप्पिणी उस्सप्पिणी ॥सूत्र २१॥ छाया--अथ किं तदौंपमिकम् ? औपमिकं, उपमित द्विविधं प्रज्ञप्तम् तद्यथा-पल्योपमं च सागरोपमं च, अथ किं तत् पल्योपम १, पल्योपमस्य प्ररूपणां करिष्यामि, परमाणु द्विविधा प्राप्तः तद्यथा सूक्ष्मश्च व्यावहारिकश्च, तत्र खलु यः सः सूक्ष्मः, स स्थाप्यः, तत्र खलु यः स व्यावहारिकः स खलु अनन्तानां सूक्ष्मपरमाणुपुद्गलानां समुदयसमितिसमागमेन व्यावहारिकः परमाणु निष्पद्यते, तत्र नो शस्त्रं कामति शस्त्रेण सुतीक्ष्णेनापि छेत्तु मेत्तु च य किल न शक्ताः। तं परमाणु सिद्धा वदन्ति आदि प्रमाणानाम् । १ ॥ — ब्यावहारिक परमाणूनां समुदयसमितिसमागमेन सा एका उच्छ्लक्ष्णश्लक्ष्णिका इति वा प्रलक्ष्णश्लक्षिणका इति वा ऊर्ध्वरेणुरिति वा प्रसरेणुरिति वा रथरेणुरिति वा वालाग्रमिति वा लिक्षा इति वा यूका इति वो यवमध्यमिति वा उत्सेधाङ्गुलमिति वा अष्ट उच्छ्रलक्षण श्लक्ष्णिकाः सा एका श्लक्ष्णश्लक्ष्णिका, अष्टलक्ष्णश्लक्ष्णिकाः सा एका ऊर्ध्वरेणुः अष्ट ऊब्बरेणवः सा एका त्रसरेणुः, अष्ट त्रसरेणवः सा एका रथरेणुः, अष्ट रथरेणवः तदेक देवकुरूत्तरकुरूणां मनुष्याणां वालाग्रम्, अष्ट देव कुरूत्तरकुरूणां मनुष्याणां वालाग्राणि तदेक हरिवर्षरम्यकवर्षाणां मनुष्याणां वालाग्रम्, एवं हैमवत हैरण्यवतानां मनुष्याणो पूर्वावदेहाप. रविदेहाणां मनुष्याणां वालाग्राणि सा एका लिक्षा, अष्ट लिक्षाः सा एका यूका, अष्ट यकाः तदेकं यवमध्यम्, अष्ट यवमध्यानि तदेकमङ्गुलम्, पतेनाल्गुलप्रमाणेन षडङ्गुलानि पादः, द्वादशाङ्गुलानि वितस्तिः, चतुर्विशतिरङ्गुलानि रनिः, अष्ट चत्वारिंशदगुलानि कुक्षिः, षण्णवतिरगुलानि स एकोऽक्षइति वा दण्डइतिवा धनुरिति वा युगमिति वा मुशलमिति वा नालिका इतिवा । पतेन धनुष्प्रमाणेन द्वे धनुः सहस्त्रे गव्यूतं, चत्वारि गब्यूतानि योजनम्। एतेन योजनप्रमाणेन यः पल्यः योजनमायाम विष्कम्भेण योजनमूर्ध्वमुच्चत्वेन तत् त्रिगुण सविशेष परिक्षेपेण, स खलु पल्यः ऐकाहिक द्वैयहिक त्रैयहिकोणाम् उत्कर्षेण सप्तरात्रप्ररूढानां संभृष्टः सन्निचितः भृतः वालाग्रकोटीनाम् । तानि खलु बालाग्राणि नो कुथ्येयुः नो परिविध्वंसेरन्, नो अग्निदहेत् नो वातो हरेत्, नो पूतितया शीघ्रमागच्छेयुः, ततः Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १६६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे खलु वर्षशते २ एकमेकं वालाग्रमपहाय यावता कालेन स पल्यः क्षीणः नीरजाः निर्लेपः निष्ठितो भवति । तत् पल्योपमम् । एतेषां पल्यानां, कोटाकोटी भवेद् दशगुणिता । सा सागरोपमस्य तु एकस्य भवेत् परिमाणम् ॥ १ ॥ एतेन सागरोपमप्रमाणेन चतस्रः सागरोपमकोटाकोट्यः कालः सुषमसुषमा १, तिस्रः सागरोपमकोटा कोट्यः कालः सुषमा २, द्वे सागरोपमकोटाकोट्यौ कालः सुषम दुष्षमा ३ एका सागरोपम कोटाकोटी द्विचत्वारिंशता वर्षसहस्रैः उनिका कालः दुष्यमसुषमा ४, एकविंशति वर्षसहस्राणि कालो दुष्पमा ५ एकविंशतिवर्ष सहस्राणि कालो दुष्षम दुष्षमा ६ - पुनरपि उत्सर्पिण्या एकविंशति वर्षसहस्राणि कालो दुष्षमदुष्षमा १, एवं प्रतिलोमं नेतव्यम् यावत् चतस्रः सागरोपमकोटाकोटयः कालः सुषमसुषमा ६, दशसागरोपमकोटाकोटयः कालः अवसर्पिणो दशसागरोपमकोटाकोटयः कोल उत्सर्पिणी, विशतिः सागरोपम कोटा कोटयः कालः अवसर्पिण्युत्सर्पिणो ॥ सू० २१ । टीका- 'से किं तं उबमिए' इत्यादि । 'से किं तं वमिए' अथ किं तत् औपमिकम् ? इति प्रश्नः उत्तरमाह - 'उवमिए दुविहे ' औपमिकं नाम कालविशेषं द्विविधं द्विप्रकारकं 'पण्णत्ते' प्रज्ञप्तम्, 'तं जहा पलिओवमे य साग रोवमे य' तद्यथा पल्योपमं च सागरोपमंच । तत्र धान्यपल्यवत् पल्यं वक्ष्यमाणस्वरूपं तेन उपमा यस्मिंस्तत् पल्योपमम् १, सागरेण - समुद्रेण उपमा - दुर्लभपारत्वेन सादृश्यं यस्मिंस्तत् सागरोपमम् । इह चकारौ समकक्षत्वद्योतनार्थी, समकक्षता - समान औपमिक कालका निरूपण "से किं तं उवमिए" इत्यादि - इस सूत्र द्वारा गौतम ने प्रभु से ऐसा पूछा है - है भदन्त ! औपमिक काल का क्या स्वरूप है ? इसके उत्तर में प्रभु ने कहा है “उवमिए दुविहे पण्णत्ते" हे गौतम औपमिक दो प्रकार का कहा गया है 'तं जहा' जैसे 'पलिओवमे य, सागरोवमे य" पल्योपम और सागरोपम, जिस काल में धान्य के पल्य की तरह पल्य की उपमा दी जाय वह पल्योपम है और जिस में समुद्र को उपमा दी जाय वह सागरोपम है यहां जो दों चकार आये हैं वे इन कालों में ઔપમિક કાળનું નિરૂપણુઃ- 'से किं तं उवमिर' इत्यादि सूत्र - २१ ॥ ટીકાર્થ-આ સૂત્ર વડે ગૌતમે પ્રભુને પ્રશ્ન કર્યાં છે કે હે ભદત ! ઔપમિકકાળનુ સ્વરૂપ वु छे ? माना भवाम प्रभु छे " उवमिप दुविहे पण्णत्ते " हे गौतम ! औपभिना मे । वामां आवे छे. "तं जहा" प्रेम डे "पलिओवमेय सागरोवमेय" પાપમ અને સાગરાપમ. જે કાળમાં ધાન્યના પુણ્યની જેમ પલ્પની ઉપમા આપવમાં આવે તે પાલ્યાપમ છે. અને જેમાં સમુદ્રથી ઉપમા આપવામાં આવે તે સાગરે પમ છે. અહી' Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका सू. २१ कालस्वरूपम् श्रेणिता सा च द्वयोरसंख्येयकालत्वरूपा । एवं चासंख्येयकालविशेपस्वरूपं पल्योपमसागरोपमद्वयं सिद्धम् । सम्प्रति पल्योपमस्वरूपं जिज्ञासमानः शिष्यः पृच्छति - हे भदन्तः ! 'से किं तं पलिओ मे' अथ किं तत्पल्योपमम् ? इति । आचार्य आह - 'पलिओवमस्स' इत्यादि । 'पलिओमस्त परूवणं' पल्योपमस्य प्ररूपणां-‍ - स्वरूप निरूपणां 'करिस्सामि' करिष्यामि - अस्मिन्नेव सूत्रेऽग्रे विधास्यामि इति । अनेनाग्रे पल्योपमप्ररूपणाकरण क्रियासूचक वाक्येन शिष्यमनः प्रसादितं भवति, अन्यथा “परमाणु द्विविधः" इत्यादिप्रक्रियारीत्या दूरसाध्यां पल्योपमप्ररूपणां मन्यमानः शिष्यः खिन्नः स्यादिति । वाचनादानकाले आचार्यस्य शिष्यं प्रत्यायमेव हि क्रम इति पल्योपममेव प्ररूपयन्नाह - " पर माणू" इत्यादि । 'परमाणु दुविहे पण्णत्ते' परमाणुद्विविधः प्रज्ञप्तः तं जहा - मुहमे य वावहारिए य' तद्यथा- सूक्ष्मश्र व्यावहारिकञ्च । इह चकार द्वयं समकक्षत्व द्योतनार्थम् । समकक्षता के द्योतक हैं समकक्षता का तात्पर्य समान णिता से है यह समान श्रेणिता दोनों में असंख्येय कालत्वरूप है इस तरह ये दोनों काल असंख्यात काल विशेष स्वरूप वाले सिद्ध होते हैं । “से किं तं पलिआवमे" हे भदन्त पच्योम का स्वरूप कैसा है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "पलिओदमस्त परूवणं करिस्सामि - परमाणु दुविहे पण्णत्ते तं जहा सुमेय वावहारिए य" हे गौतम ! मैं आगे पल्योपम की प्ररूपणा करने वाला हूं सो उससे तुम्हें पल्योपम का स्वरूप ज्ञात हो जायगा, इस प्रकार के कथन से सूत्रकार ने शिष्य के मन को प्रसन्न किया है जो वे ऐसा न कहते तो परमाणु दो प्रकार को है इत्यादि कथन रूप प्रक्रिया की रीति से दूरसाध्य पल्योपम की प्ररूपणा मान कर शिष्य का मन खेदखिन्न हो जाता, वाचनादान काल में आचार्य का शिष्य के प्रति यह क्रम है । पल्योपम की प्ररूपणा करने के निर्मित सूत्रकार ने सब से पहिले परमाणु सूक्ष्म एवं व्यावहारिक के भेद से दो प्रकार का है ऐसा कहा है यहां दो चकार इनमे समकक्षता के द्योतन के निमित्त प्रयुक्त हुए हैं । જે બે ચ આવેલા છે. તે એ કાલેામાં સમકક્ષતા બતાવવા માટે છે. સમકક્ષતાનેા અથ સમાન શ્રેણીએ થાય છે. એ સમાન શ્રેણિતા બન્નેમાં અસંખ્ય કાલ ત્વરૂપ છે. આ प्रमाणे मे बन्ने अणो असंख्यात आज विशेष स्व३पवाणा सिद्ध थाय छे. 'से कि तं पलिओ मे " महंत ! पयेोमनु ३५ वु छे १ आना वाणमां अनुछे "पलिओवमस्स परूषण करिस्लामि परमाणु दुविहे पण्णत्ते तं जहा - सुहुमेय वावहारिण्य “હે ગૌતમ” હું આગળ પલ્યાપમની પ્રરૂપણા કરવાના છું જેથી તમને પલ્યાપમના સ્વરૂપનું જ્ઞાન થઈ જશે. આ જાતના કથનથી સૂત્રકારે શિષ્યના મનને પ્રસન્ન કર્યું છે. જો તેઓ આમ કરતા નહી તેા પરમાણુ એ પ્રકારના હોય છે. ત્યાદિ કથન રૂપ પ્રક્રિયાની રીતિથી દૂરસાધ્ય પલ્યામની પ્રરૂપણા માનીને શિષ્યનું મન ખેદ ખિન્ન થઇ જતું વાચના દાનકાળમાં આચાય ના શિષ્ય પ્રતિ એજ ક્રમ હાય છે પચેપમની પ્રરૂપણ કરવા માટે સૂત્રકારે સપ્રથમ પરમાણુ સૂક્ષ્મ અને વ્યાવહારિકના ભેદથી એ પ્રકારના છે એમ કહ્યુ` છે. અહી' એ ‘' ની પ્રરૂપણા એમાં સમકક્ષતાના ઘોતન માટે કરવામાં આવી છે, એમાં જે १६७ Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे 'तत्थणं' तत्र-तयो मध्ये खलु 'जे से सहमे से ठप्पे' यः सः सूक्ष्मः परमाणुः सः स्थाप्यः अनिरूपणीयः एतत्प्रसङ्गानुपयोगित्त्वात्, तस्य स्वरूपं चान्यत्रोक्तमेवम् _ "कारणमेव तदन्त्यं सूक्ष्मो नित्यश्च भवति परमाणुः । एकरसवर्णगन्धो द्विस्पर्शः कार्यलिङ्गश्च ॥१॥" इत्यादि लक्षणेनात्यन्त परम निकृष्टत्वमस्य स्वरूप प्रतिपादितम्, तदतिरिक्तं वैशेषिकं रूपं चात्र न प्रतिपाद्यमस्ति तस्मात्तं सूक्ष्म परमाणु स्थापयित्वा व्यावहारिकं परमाणु प्रक्रान्ततया निरूप्यस्वरूपत्वेन निरूपयति 'तत्थ णं जे से वावहारिए' तत्र तयोर्मध्ये यः सः-बूर्वोक्तो द्वितीयः व्यावहारिकः व्यवहार प्रयोजनः परमाणुपुद्गल: ‘से ण अणताणं सुहुम परमाणुपुग्गलाणं समुदयसमिइसमागमेणं' स खलु अनन्तानां सूक्ष्मपरमाणु पुद्गलानां समुदयसमितिसमागमेन समुदयाः समूहाः तेषां याः समितयः-बहूनि मेलइन में जो सूक्ष्म परमाणु है वह स्थाप्य है अनिरूपणोय है क्यों कि वह इस प्रसङ्ग में अनुपयोगी है इसका स्वरूप दूसरी जगह इस प्रकार से कहा गया है परमाणु कारण हो होता है और वह अन्त में ही होता है तथा सूक्ष्म, नित्य, एक रस एक वर्ण, एक गन्ध और दो स्पर्शवाला होता है इसको सत्ता का अनुमापक उससे जन्य कार्य ही होता है । "कारणमेव तदन्त्यं सूक्ष्मो नित्यश्च भवति परमाणुः । - एक रस वर्णगन्धो द्विस्पर्शः कार्यलिङ्गश्च ॥ १ ॥ . इस प्रकार के लक्षण कथन से इसका स्वरूप अत्यन्त परम निकृष्ट है ऐसा ही प्रतिपादित होता है. इसके अतिरिक्त और विशेष स्वरूप इसका यहां प्रतिपाद्य नहीं है. इसलिए सूक्ष्मपरमाणु की चर्चा न करके अब सूत्रकार व्यवहारोपयोगो परमाणु के स्वरूप का कथन करते हैं । यह व्यावहारिक परमाणु पुद्गल अनन्त सूक्ष्म परमाणु पुद्गलों की एकोभाव परिणति रूप समुदाय સૂક્ષ્મ પરમાણુ છે તે સ્થાપ્ય છે અનિરૂપણીય છે કેમકે તે આ પ્રસંગમાં અનુપયોગી છે આનું રસરૂપ અન્યત્ર આ પ્રમાણે નિરૂપિત કરવામાં આવેલ છે-- કે પરમાણું કારણ હોય છે અને તે અંતમાં જ હોય છે તથા સૂક્ષ્મ, નિત્ય, એક રસ એક વર્ણ એક ગળ્યું અને સ્પર્શ વાળો હોય છે. આની સત્તાને અનુમાપક તેનાથી નિષ્પન્ન आय य छ-.. कारणमेव तदन्त्य सूक्ष्मो नित्यश्च भवति परमाणुः । एक रस वर्ण गन्धो द्विस्पर्शः कार्यलिङ्गश्च ॥१॥ આ જાતના કથનથી અનુિં સ્વરૂપ અતીવ પરમ નિકૃષ્ટ છે એવું જ પ્રતિપાદિત થાય છે. એના સિવાય આનું વિશેષ સ્વરૂપ અહીં પ્રતિપાદ્ય નથી એથી સૂક્ષ્મ પરમાણુની ચર્ચા ન કરતાં હવે સૂત્રકાર વ્યવહારોપયોગી પરમાણુના સ્વરૂપનું કથન કરે છે. આ વ્યાવહારિક પરમાણુ પુદ્ગલ અનન્ત, સૂક્ષમ પરમાણુ યુદ્ગલની એકી ભાવ પરિણતિ રૂપ સમુદય સમિ તિના સમાગમથી નિષ્પન હોય છે. તાત્પર્ય આમ છે કે નિશ્ચય નય સૂક્ષ્મ પુદ્ગલેની Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू, २१ कालस्वरूपम् १६९ नानि तासां समागमेन संयोगेन एकीभावपरिणतिरूपेण एको 'वावहारिए परमाणु फिज्जइ' व्यावहारिकः परमाणु निष्पद्यते सम्पद्यते । अयम्भावः- - निश्चयनयोहि निर्विभागसूक्ष्मं पुद्गलं परमाणुं वाञ्छति, यस्त्वनेकपरमाणु निष्पन्नः सोऽशसहितत्वात् स्कन्धत्वेनैव व्यपदिश्यते, व्यवहारनयस्तु सूक्ष्म परमाणुपुद्गलानेक संघातनिष्पन्नोऽपि यः शस्त्रच्छेद भेदानलदाहादिविषयो न भवति तं तथाविधस्थूलत्वा प्राप्तत्वात्परमाणुत्वेन व्यवहरति, तस्मादसौ - निश्चयनयतः स्कन्धोऽपि व्यवहारनयमतेन व्यावहारिकः परमाणुरुक्तः इति । अयं च स्कन्धत्वादिन्धनवत् छेदादिविषयो भवतीति मा कश्चित्संशयं कुर्यादित्याह - 'तत्थ णो' इत्यादि । 'तत्थ णो सत्थ कमइ' तत्र व्यावहारिक परमाणौ शस्त्र समिति के समागम से निष्पन्न होता है. तात्पर्य कहने का यह हैं - यद्यपि निश्वयनय सूक्ष्म पुद्गलों की एकीभाव परिणतिरूप समिति के समागम से उत्पन्न हुए परमाणु नहीं मानता है-उसे तो वह एक स्कन्धरूप ही मानता है, उसकी मान्यता में तो परमाणु वही है जो निर्विभाग सूक्ष्म पुद्गल है. जो अनेक परमाणुओं के मेल से निष्पन्न हुआ है वह तो अंश सहित होने कारण स्कन्धरूप से ही कहा गया है. परन्तु जो व्यवहारनय है वह ऐसा मानता है कि भले ही अनेक परमाणु पुगलों के संयोग स्कन्धरूप अवस्था निष्पन्न हुई हो परन्तु यदि वह शस्त्रादि से छिदती नहीं है, भिदती नहीं हैं, अग्नि से जलती नहीं है तो वह तथाविध स्थूलतारूप परिति को अप्राप्त होने के कारण परमाणु रूप से ही व्यवहार पथ में अवतरित होती है, इसलिये व्यावहारिक परमाणू भलेही निश्चयनय की मान्यतानुसार स्कन्धरूप हो तबभी वह व्यवहारनय की मान्यतानुसार परमाणुरूप ही मानी गई है परन्तु कोई इसे यों न समझ बैठे कि यह स्कन्धरूप होने से इन्धन काष्ठादि की तरह छेदादि क्रिया का विषयभूत होती होगी । इसलिये इस संशय को दूर करने के लिये सूत्रकार ने ऐसा कहा हैं कि "तत्थणों सत्यं कमइ" उस व्यावએકીભાવ પરિવ્રુતિરૂપ સમિતિના સમાગમથી ઉત્પન્ન થયેલ પરમાણુને પરમાણુ જ માન તા નથી. તેને તે તે એક સ્કન્ધ રૂપ જ માને છે. તેની માન્યતા મુજબ તે પરમાણુ તે of છે કે જે નિર્વિભાગ સૂક્ષ્મ પુદ્ગલ છે. જે અનેક પરમાણુએના મેળથી નિષ્પન્ન થયેલ છે તે તા અંશ સહિત હેાવા બદલ સ્કંધરૂપ જ કહેવાય છે. પરંતુ જે વ્યવઙારનય છે તે એમ માને છે કે અનેક પરમાણુ પુદ્ગલેાના સચેાગથી સ્કન્ધરૂપ અવસ્થા નિષ્પન્ન થયેલી છે તે તે શસ્ત્રાદિથી છેદિત થતી નથી. ભેદિત થતી નથી, અગ્નિમાં ભસ્મ થતી નથી તે તે તથાવિધ સ્થૂલતારૂપ પરિણતિ ને પ્રાપ્ત ન કર્યાથી પરમાણુ રૂપમાંજ વ્યવહારપંથ માં અવ તરિત હાય છે. એથી વ્યાવહારિક પરમાણુ નિશ્ચયનયની માન્યતા મુજબ ભલે કન્ય રૂપ હાય છતાંએ તે વ્યવહારનયની માન્યતાનુસાર પરમાણુરૂપ જ માનવામાં આવી છે પરંતુ કાઈ આમ ન સમજી લેકે આસ્ક ધરૂપ હાવાથી ઈન્ધન-કાષ્ઠાદિની જેમ છેદાદિ डियाना विषय थती इथे. मेथी या संशयने हर पुरवा माटे सूत्र छुछे 'तत्थ नो सत्थं कमई” ते व्यावहारिक परमाणुने मगाहि शयी शता नथी. यहीं खेवी आशा २२ Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १७० ____ जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्रे खड्गादि नो क्रामति न प्रविशति । ननु अनन्त सूक्ष्मपरमाणुपुद्गलानेक संघातनिष्पन्नानां काष्ठादीनां छेदनभेदनादि प्रसिद्धं तत्कथमनन्तसूक्ष्मपरमाणुपुद्गलानेकसंघातनिष्पन्नस्य व्यावहारिकपरमाणोश्छेदनभेदनादि न भवति ?, इतिचेत्, आह-काष्ठादीनां स्थूलत्वाद्भवति शस्त्रादिभिश्छेदनादि व्यावहारिक परमाणोस्तु सूक्ष्मत्वात् शस्त्रादिभिश्छेदनादि न भवति । इह शस्त्रं नो क्रामतीत्युपलक्षणम्, तेन वह्निजलादिकमपि तत्र न क्रामति । ततश्च अग्निदाह्यत्वं जलार्द्रत्वं गङ्गादिनदीस्रोतः प्रतिघात्यत्वं तरङ्गान्दोल्यत्वादिकं च व्यावहारिकपरमाणौ न भवतीति बोध्यम् । अमुमेवार्थ सूत्रकारो गाथया प्राह-'सत्थेण' हारिक परमाणु को खड्गादि काट नहो सकते हैं, यदि यहां पर ऐसी आशंका की जाय कि अनन्त सूक्ष्म पुद्गल परमाणुओं के संयोग से निष्पन्न हुए काष्ठोदिक तो शस्त्रादि द्वारा छेदे भेदे जाते हैं तो फिर अनेक सूक्ष्म पुद्गल परमाणुओं के संयोग से निष्पन्न हुआ यह व्यावहारिक परमाणु शस्त्रादिकों द्वारा क्यों नहीं काटा जाता है? क्यों नही भेदा जाता है? क्यों नहीं अग्नी द्वारा जलाया जाता है ? वह भी काष्ठादिकों की तरह से छेदा भेदा जाना चाहिये तो इस आशंका का उत्तर ऐसा है कि काष्ठादिक तो स्थूल होते हैं इसलिये उनका तो शस्त्रादिकों द्वारा छेदन भेदन आदि होता है, परन्तु व्यावहारिक जो परमाणु है वह सूक्ष्म होता है इसलिये उसका शस्त्रादिकों द्वारा छेदनभेदनादि नहीं होता है। यहां जो ऐसा कहा है कि इस पर शस्त्र का प्रभाव नही पड़ता है सो यह उपलक्षण है इससे यह भी गृहीत होता है कि इस पर अग्नि जल आदि का भी कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता है न अग्नि इसे जला सकती है और न पानो इसे गोला आदि कर सकता है, ऐसा यह व्यावहारिक परमाणु है । गंगा आदि महानदियों का प्रवाह भी इसे नही बहा सकता है, और न लहरें इसे डुला सकती हैं इसी बात को कथित यह गाथा वताती हैકરવામાં આવે કે અનંત સૂમ પુદ્ગલ પરમાણુઓના સંગથી નિપન્ન થયેલા કાષ્ઠાદિક તે શસ્ત્ર આદિ વડે છેરી શકાય છે. અને ભેદી શકાય છે તો પછી અનેક સૂમ પુદ્ગલ પર માણુઓના સંગથી નિષ્પન્ન થયેલ આ વ્યાવહારિક પરમાણુ શસ્ત્ર આદિ વડે કેમ કાપી શકા તો નથી ? કેમ ભેદી શકાતું નથી ? કેમ અગ્નિ માં ભસ્મ કરી શકાતા નથી ? કાષ્ઠ આદિ કેની જેમ તેનું પણ છેદન તેમજ ભેદન થઈ જવું જોઈએ. તે આ આશંકાને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે કાઠાદિક પૂલ હોય છે, તેથી તેમનું તો શસ્ત્ર આદિ વડે છેદન-ભેદન વગેરે થઈ શકે છે. પરંતુ વ્યાવહારિક જે પરમાણ છે તે સૂક્ષમ હોય છે એથી તેનું શસ્ત્ર આદિ વડે છેઠન-ભેદન થઈ શકતું નથી. અહીં જે આમ કહેવામાં આવ્યું છે કે તેની ઉપર શસ્ત્ર નો પ્રભાવ પડતો નથી તે આ ઉપલક્ષણ છે. એનાથી એવું પણ ગ્રહણ થાય છે કે એ રી ઉપર અમિ-જલ વગેરેને પગુ પ્રભાવ પડતું નથી. એને અગ્નિ ભસ્મ કરી શકો નથી તેમજ પાણું પણ એને ભીનું કરી શકતું નથી. એ આ વ્યાવહારિક પરમાણુ છે ગંગા આદિ મહાનદીઓને પ્રવાહ પણ એને પ્રવાહિત કરી શકતો નથી અને પાણી ની લહેરે પણ એને હલાવી શકતી નથી, સ્થાનસ્થત કરી શકતી નથી. એ જ વાતને આ Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू० २१ कालस्वरूपम् इत्यादि । 'सत्थेग सुतिखेग वि' सुतीक्ष्णेनापि शस्त्रेण खङ्गादिना केऽपि जनाः यं 'छेत्तुं' छेत्तुं-द्विधाकर्तुम् 'भेत्तु, भेत्तुं' विदारयितुं वा 'किर' किल-निश्चयेन ण सका' न शक्ताः-समर्था न भवन्ति, 'तं सिद्धा'तं-सिद्धाः सिद्धाइव सिद्धा उत्पन्न केवलज्ञानधरा जिनाः, न तु सिद्धिं गताः, तेषां वचनयोगासम्भवात् 'परमाणु' परमाणुव्यावहारिक परमाणु ‘पमाणाणं' प्रमाणानाम्-अग्रे वक्ष्यमाणानामुच्छ्लक्ष्ण श्लक्ष्णिकादिरूपाणाम् आदि' आदि-प्रथमम् 'वयंति' वदन्ति-कथयन्ति इति । भगवदुक्तत्वेनात्र परमाणुलक्षणे आगमप्रमाणं सुव्यक्तम्, अनुमानप्रमाणमप्यत्रैव विज्ञेयं तथाहि-अनुमानप्रयोगः अणुपरिमाणं कचिद् विश्रान्तं तरतमशब्दवाच्यत्वात् महत्परिमाणवत्, यत्र विश्रान्तं स परमाणुरिति । "सत्थेण सुतिखेण वि छेत्तु भेत्तुं च जं किर ण सका। तं परमाणु सिद्धा वयंति आई पमाणाणं ।। १ ।। -- कोई भी मनुष्य सुतीक्ष्ण शस्त्र से भी इस व्यावहारिक परमाणु को खंडित करने के लिये या उसे विदारित करने के लिये समर्थ नहीं है ऐमा उत्पन्न केवलज्ञान वाले भगवन्तों ने कहा है यहां सिद्ध पद से सिद्ध अवस्था प्राप्त जन गृहीत नहीं हुए हैं, क्यों कि उनके वचनयोग नहीं होता है, अतः केवलज्ञान के आधारभूत केवलो ही गृहीत हुए हैं । यह ब्यावहारिक परमाणु सकल प्रमाणों का कहे जाने वाले उच्चलक्षण आदि प्रमाणों का आदि कारण है, इस प्रकार का यह कथन भगवक्त होने से व्यावहारिक परमाणु के अस्तित्व में आगम प्रमाणरूप है। अर्थात् व्यावहारिक पमाणु की सत्ता का ज्ञापक आगम प्रमाण है। अनुमान प्रमाण इसकी सत्ता का ज्ञापक इस प्रकार से है "अणुपरिमाणं कचिद विश्रान्तम् तरतमशब्दवाच्यत्वात् महत् परिमाणवत्" महत्परिमाण की तरह अणु परिमाण तरतमशब्द वाच्य होने से कहीं पर विश्रान्त है अर्थात् जिस प्रकार तरतमशब्द होने के कारण महत् परिमाण आकाश में विश्रान्त है, इसी प्रकार यह अणुपरिमाण भी तरतमगाथा २५ष्ट अरे छ:.. सत्थेण सुतिक्खेण वि छेत्तुं मेतुच जे किर ण सक्का । तं परमाणु सिद्धा वयंति आई पमाणाण ॥१॥ કેઈ પણ મનુષ્ય સુતીક્ષણ શત્રુથી પણ આ વ્યાવહારિક પરમાણુ ને ખંડિત કરી શકતો નથી, વિદીર્ણ કરી શકતા નથી, એવું ઉત્પન્ન કેવળ જ્ઞાની ભગવન્તએ કહ્યું છે. અહીં સિદ્ધપદથી સિંદ્ધ અવસ્થા પ્રાપ્ત જન ચંડીત થયેલા નથી કેમકે તેમને વચન એગ થતું નથી. એથી કેવળજ્ઞાનના આધારભૂત કેવળી જ અહીં ગૃહીત થયેલા છે. આ વ્યાવ હારિક પરમાણુ સકલ પ્રમાણેને કહેનાર ઉચ્છલણ આદિ પ્રમાણેનું આદિ કારણ છે, આ જાતનું આ કથન ભગવદુકૃત લેવાથી વ્યાવહારિક પરમાણુના અસ્તિત્વમાં આગમ પ્રમાણ રૂપ છે. એટલે કે વ્યાવહારિક પરમાણુ સત્તા વ્યાપક આગમ પ્રમાણ છે. અનુમાન પ્રમાણ मानी सत्ताने मतावना२ मा प्रमाणे छ "अणु परिमाणु क्वचिद् विश्रान्तम् तरतमशब्द पाच्यत्वात् महत्परिमाणवत् ” भइत् परिभानी २ मा परिमाय तरतम शहाय्य હોવાથી કેઈ સ્થાને વિશ્રાન્ત છે. એટલે કે જેમ તરતમ શબ્દ હોવાથી મહત્ પરિમાણ Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १७२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अन्यथा वस्तुनो महत्त्वमपि नोपपद्येत अणुमहतोः सापेक्षत्वात् । अतो द्वथणुकादीनि परिणामानि परस्पर भिन्नानि मन्तव्यान्येव । एवं च द्वयणुके सिद्धे ततः पूर्ववर्ती निरंशः परमनिकृष्टः परमाणुः सिध्यत्येव । यदि अणुमहत्त्वादिरूपेण परिमाणभेदा न मन्येत तदा सर्पपसुमेर्वोस्तुल्यपरिमाणता प्रसज्येत । अतः सिद्धः परमाणुः । ननु भवतु परमाणुः स सूक्ष्मत्वात् चक्षुरादीन्द्रियागम्योऽपि भवतु, परन्तु तैरनन्तः परमाणुभिश्चक्षुराधगोचरः शस्त्रच्छेदा धगोचरश्च एको व्यावहारिकः परमाणुनिष्पद्यते इति यदुक्तं तन्मन्दम् इति चेत्, आह, पुद्गलपरिणामो हि सूक्ष्मबादरभेदेन द्विविधः । तत्र सूक्ष्मपरिणामपरिणतानां पुद्गलानामिन्द्रियाग्राह्यत्वागुरुलघुपर्यायवत्त्वशस्वच्छेदाद्यविषयत्वादयो शब्दवाच्य होने के कारण परमाणु में विश्रान्त है, यदि ऐसा न हो तो वस्तु में महत्ता नही बन सकती है महत्ता के सद्भाव से यह भी मानना पड़ता है कि कहीं न कहीं अणुपरिमाण भी है क्यो कि अणु और महत् ये दोनों परस्पर सापेक्ष हैं, इसलिये द्वयणु कादि व्यणुकादिरूप परिमाण परस्पर में भिन्न हैं ऐसा मानना चाहिये जब जिससे निष्पन्न हुआ हैं दुघणुक का सत्ता सिद्ध हो जाती है तो यह द्वयणुक जिससे निष्पन्न हुआ है ऐसा पूर्ववर्ती निरंश परमनिकृष्ट परमाणु भी सिद्ध हो जाता है । यदि अणु महत्त्वादिरूप से परिमाण भेद न माने जावे तो सर्षप और सुमेरु में तुल्य परिमाणता आने का प्रसङ्ग प्राप्त होगा परन्तु ऐसा तो है नहीं इसलिये परमाणु है इससे यह सिद्ध हो जाता है । शंका-भले ही परमाणु की सिद्धि हो जावे ओर यह भी बात मानली जावे कि वप चक्षुरादिक इन्द्रियो का विषय नहीं है, परन्तु यह बात ठीक नही है कि इन अनन्त परमाणुओं से चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा ग्रहण करने में नही आने वाला और शस्त्रादिकों द्वारा छेदन भेदनादि रूप क्रिया का विषय नहीं हो सकने वाला एक व्यावहारिक परमाणु निष्पन्न होता है- तो इसका उत्तर ऐसा है कि पुद्गल-परिणाम सूक्ष्म एवं बादर के भेद से दो प्रकार આકાશમાં વિશ્રાન્ત છે, તેમજ આ અણુ પરિમણ પણું તરતમ શબ્દ વાસ્થ હોવાથી પરમા શુમાં વિશ્રાન્ત છે જે આમ ન હોય તે વસ્તુમાં મહત્તા થઈ શકે જ નહીં', મહત્તાના સદુ ભાવથી આ વાત પણ માનવી પડશે કે કેઈ ને કઈ સ્થાને અણુ પરમાણુ પણ છે જ કેમકે આણુ અને મહતું એ બન્ને પરસ્પર સાપેક્ષ છે. એથી દ્રવણુકાદિ ચકાદિ રૂપ પરિણામ પરસ્પરમાં ભિન્ન છે. એવું માનવું જોઈએ. જ્યારે દ્રયણુકની સત્તા સિદ્ધ થઈ જાય છે તે આ દ્વયશુક જેનાથી નિષ્પન્ન થાય છે એ પૂર્વવતિ નિરશ પરમનિકૃષ્ટ પરમાર પણ સિદ્ધ થઈ જાય છે. જે અણુ મહાદિરૂપથી પરિમાણે ભેદ માનવામાં આવે નહીં તે સર્ષ અને સુમેરુમાંતુલ્યપરિણામતા આવવાને સમય ઉપસ્થિત થશે પરંતુ આમ તે બનતું જ નથી, એથી પરમાણુ છે આ મ સિદ્ધ થઈ જાય છે. શંકા-પરમાણુની સિદ્ધિ ભલે થાય અને એ વાત પણ માન્ય થઈ જાય કે તે ચક્ષુરાદિક ઈન્દ્રિયેનો વિષય નથી, પરંતુ આ વાત ઠીક નથી કે આ અનંત પરમાણુઓથી ચક્ષુરાદિ ઈન્દ્રિયો દ્વારા ગ્રહણ કરવામાં નહી આવેલ શસ્ત્ર આદિક દ્વારા જે છેદન-ભેદન રૂપ ક્રિયાને વિષય થઈ શકે નહી તે એક વ્યાવહારિક પરમાણુ નિષ્પન્ન થાય છે. તો આને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે પુદ્ગલ પરિણામ Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १७३ प्रकाशिका टीका सू. २१ कालस्वरूपम् धर्मा भवन्त्येवेति न काऽप्यनुपपत्तिः । आगमेऽपि पुद्गलानां सूक्ष्मत्वासूक्ष्मत्वपरिणामः श्रयते, यथा द्विप्रदेशिकः स्कन्ध एकस्मिन्नाकाशप्रदेशे भाति द्वयोश्चापीति संकोचविकास कृतो भेदः । लोकेऽपि पिजित कार्पासपुजलोहपिण्डयोः परिणामभेदो दृश्यते एवेति नात्र काऽपि विप्रतिपत्तिः कर्त्तव्येति दिकू । ____ अथ प्रमाणान्तरं लक्षयितुमाह-वावहारियपरमाणूणं' इत्यादि । 'वावहारिय परमाणणं' व्यावहारिकपरमाणूनां व्यावहारिका ये परमाणवस्तेपाम् इहाप्यनन्तानामिति पूर्वतोऽनुपज्यते तेनानन्तानां व्यावहारिकपरमाणूनां 'समुदयसमिइ समागमेणं' समुदयका होता है. इनमें जो पुद्गल सूक्ष्म परिणाम वाले होते हैं उनमें इन्द्रियाग्राह्यत्व, अगुरुलघुपर्यायवत्त्व, एवं शस्त्रादि द्वारा अच्छेद्यत्व आदि धर्म होते ही हैं. इस विषय में तो कोई कहने जैसी बात ही नहीं है. आगम में भी ऐसा कहा गया सुना गया है कि पुद्गलों का सूक्ष्म परिणाम और असूक्ष्म परिणाम होता है. द्विप्रदेशिक स्कन्ध एक आकाश प्रदेश में भी समा जाता है और दो प्रदेशों में भी समा जाता है. ऐसा जो यह भेद है त वह उनके संकोच और विकाश को लेकर हो जाता है. जब द्विप्रदेशी स्कन्ध संकुचित होता है त वह एक अकाश प्रदेश में मा जाता है और जब वह विस्तारवाला होता है तो वही दो प्रदेशों में समा जाता है. संकोच और विस्तार ये पुद्गलों का स्वभाव है. जब कपास पिण्डावस्था में होता है तो वह आकाश प्रदेशों को इतना नहीं घेरता है कि जितना वह अपिण्डावस्था में धेरता है । इसी तरह एक मन कपास के जितने प्रदेश फैले हुए नज़र आते हैं उतने ही वे प्रदेश लोहे में संकुचित देखे जाते हैं , इस तरह यह पुद्गलों में परिणामकृत भेद लक्षित होता है. अतः इस સૂક્ષ્મ અને બાદરના ભેદથી બે પ્રકારનું થાય છે. એમાં જે પુદગલ સૂક્ષમ પરિણામવાળા હોય છે તેમાં ઇન્દ્રિય ગ્રાહ્યત્વ અગુરુલઘુ પર્યાયવત્વ, તેમજ શસ્ત્રાદિ વડે અચ્છેદ્યત્વ વગેરે ધર્મો હોય જ છે. આ સંબંધમાં તે વિશેષ કહેવા જેવું કંઈ નથી. આગમમાં પણ એવું જ કહેવામાં આવ્યું છે તેમજ સાંભળવામાં આવ્યું છે કે પુદગલનું સૂફમ પરિણામ અને અસૂમ પરિણામ હોય છે દ્વિપ્રદેશિક સ્કધુ એક આકાશ પ્રદેશ માં પણ સમાવિષ્ટ થઈ જાય છે અને બે પ્રદેશોમાં પણ સમાવિષ્ટ થઈ જાય છે. એ જે ભેદ છે, તે તે તેના સંકેચ અને વિકાશ ને લઈને જ થાય છે. જ્યારે દ્વિપ્રદેશી સ્કંદ સંકુચિત થાય છે, તે તે એક આકાશ પ્રદેશમાં સમાવિષ્ટ થઈ જાય છે અને જ્યારે તે વિસ્તારવાળો હોય છે તે તે બે પ્રદેશમાં સમાવિષ્ટ થઈ જાય છે. સંકેચ અને વિસ્તાર એ પુદગલને સ્વભાવ છે જ્યારે પાસ પિંડાવસ્થામાં હોય છે તે તે આકાશ પ્રદેશને આટલે ઘેરતો નથી કે જેટલો તે અપિંડાવસ્થામાં ઘેરે છે આ પ્રમાણે એક મણ કપાસના જેટલા પ્રદેશે ફેલાએલા દેખાય છે. તેટલાજ તે પ્રદેશે લોખંડ માં સંકુચિત દેખાય છે. આ રીતે પુદગલમાં પરિણામ કત ભેદ લક્ષિત હોય છે. એથી આ સંબંધમાં શંકા જેવી કઈ વાત નથી, Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १७४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस् समिति समागमेन या परिणाममात्रा 'सा एगा उस्सहसण्डिभाइ" सा एका उच्छलक्षण लक्षिणका उत् प्राबल्येन 'सन्हिसहिआइ' श्लक्ष्णश्लक्ष्णिका अतिशयेन श्लक्ष्णा लक्ष्णलक्ष्णा सैव तथा' इति शब्दः स्वरूपदर्शनार्थ:, वा शब्दः परापेक्षया समुच्चयार्थकः | ' एवं उद्धरेणू वा तसरेणूइ वा रहरेण्इ वा वालग्गेइ वा लिक्खाइ वा जूआइ वा जवमज्झेइ वा उस्सेहंगुलेइ वा' ऊर्ध्वरेणुरिति वा त्रसरेणुरिति वा रथरेणुरिति वा वालग्रमिति वा लिक्षाइति वा यूका इति वा यवमध्य इति वा उत्सेधाङ्गुलमिति वा श्लक्ष्णलक्ष्णिकाद्युत्सेधाङ्गुलान्ता अपि बोध्याः । एते च श्लक्ष्णश्लक्ष्णकादय उत्सेधाङ्गुलान्ता सर्वे प्रमाणाविशेषा यथोत्तरमटगुणाः अनन्तपरमाणुकाः बोध्याः अनन्तपरमाणुकत्वस्य सर्वत्राविरोधेन सत्त्वात्, अत एव लक्षणलक्ष्णिके त्यादि निर्विशेषितमेवोक्तम् । तत्र श्लक्ष्णलक्ष्णिका - पूर्वप्रमाणापेक्षयाऽष्टगुणाचिका, एवमग्रेऽपि बोध्यम् । एतदेव स्पष्टयति- 'अट्ठ उस्साहसforeाओ' इत्यादि । 'अट्ठ उस्सरहसहियाओ सा एगा सहसण्डिया' अष्ट उच्छलक्षण इलणिकाः सा एका श्लक्ष्णलक्ष्णिकाः 'असह सहियाओ सा एगा उद्धरेणू' अष्ट श्लक्ष्णश्लक्ष्णिका सा एका ऊर्ध्वरेणुः अत्र उर्ध्वेत्यस्योपलक्षणत्वादधस्तिर्यग्ग्रहणम् तेन ऊर्ध्वास्तिर्यगामी जालान्तरगतसूर्य किरणस्फुरुणलक्ष्णोरेणुः - धूलिः ऊर्ध्वरेणुः 'अट्ठ सम्बन्ध में शंका करने जैसी कोई बात नहीं है । " वावहारिय परमाणूणं समुदयसमिइसमागमेणं सा एगा उस्साहसहिआइ वा सहिसिव्ह आइ वा उद्धरेगूइ वा तसरेणूइ वा रहरेणूइवा वालग्गेइ वा लिक्खाइ वा जुआइ वा " अनन्त व्यावहारिक परमाणुओं का संयोग से जो परिणाममात्रा होती है ऊसका नाम एक उच्छ्लक्ष्णलक्ष्णिका है, आठ उच्छ्लक्ष्णलक्ष्णिकाओं की एक श्लक्ष्णलक्ष्णिका होती है. इसी तरह से उत्सेधाङ्गुल तक कथन जानना चाहिये. ये सब प्रमाण विशेष है ये सब अपने से पहिले से आठ २ गुणित होते हैं और एक अनन्त २ पुद्गल परमाणुओं वाला होता है । आठ लक्षणलक्ष्णिकाओं का एक उर्ध्वरेणु होता है । उर्ध्वशब्द यहां उपलक्षणरूप है, इससे अधोगाकी रेणु और तिर्यग्गामी रेणु का भी ग्रहण हुआ है, इस तरह जो रेणु उर्ध्व, अधः एवं तिर्यग्गामी जाल के अन्तर्गत सूर्य किरणों से जिसका "वावहारिय परमाणूणं समुदय समिइ समागमेण सा एगा उस्सहसादिआइ वा सहिआइ वा उद्धरेणूई वा तसरेण्इ वा रहरेणूई वा वालग्गेइइ वा लिङ्गखाइवा जूआइ वा ” અનંત પરમાણુ એના સયેાગથી જે પિરણામમાત્રા થાય છે તેનુ નામ ઉષ્ણુલણિકા છે ५ એક કથન જાણવું જોઈએ. એ સર્વે પ્રમાણ વિશેષ છે, એ સર્વે પહેલા જેટલા આવી ગયા છે તે અધાથી ગુણિત થાય છે અને દરેકે દરેક અનંત અનંત પુદ્ગલ પરમાહિએવાલા હાય છે આઠ ક્ષ્ણુશ્ટણિકાએના એક ઉધ્વ રણુ હાય છે. ઉર્ધ્વ શબ્દ અહી ઉપલક્ષણરૂપ છે. એનાથી અધેાગામી રણુ અને તિગ્ગામી રેણુનું પણ ગ્રહણુ થયુ' છે. આ પ્રમાણે જે રેણુ Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका ढोका सु. २१ कालस्वरूपम् १७५ " उद्धरेणओ सा एगा तसरेणु' अष्ट ऊर्ध्वरेणत्र सा एका त्रसरेणुः - त्रस्यति पूर्वादि वातप्रेरितो गच्छतीतित्रता सा चासौ रेणुस्त्रसरेणुः 'अट्ठ तसरेणुओ सा एगा रहरेणु' अष्ट सरेणवः सा एका रथरेणुः रथगमनादुड्डीयमाना रेणु रथरेणुः 'अट्ठ रहरेणूओ से एगे देवकुरूत्तर कुराण' अष्ट रथरेणव तदेकं देवकुरूत्तरकुरूणां देवकुरूत्तरकुरुक्षेत्र निवासिनां 'मस्सा वालग्गे' मनुष्याणां वालाग्रं केशाग्रभागः, 'देवकुरूत्तर कुराण मणुस्साणं' देवकुरुत्तरकुरूणां मनुष्याणां यानी 'अट्ठा वालग्गा' अष्टवालाग्राणि केशाग्राणि 'से एगे हरिवासे रम्मयवासाण' तदेकं हरिवर्षरम्यकवर्षाणां हरिवर्ष रम्यकवर्षवासिनां 'मणुस्साणं वालग्गे' मणुष्याणां वालाग्रम् ' एवं ' एवम् अनेन प्रकारेण हरिवर्ष रम्यकवर्षक्षेत्रवासिमनुष्याणां यानि अष्ट वालाग्राणि तत् 'हेमवय हेरण्णवयाण' हैमवत हैरण्यवतानां हैमवतहैरण्यवतवर्षवासिनां ' मणुस्साणं' मनुष्याणामेकं वालाग्राम्, यानि अष्टौ हैमवत हैरण्यचतवर्षवासिमनुष्यवालाग्राणि तत् 'पुव्वविदेह अवरविदेहाणं' पूर्व विदेहापरविदेहानां पूर्वविदेहापरविदेहवासिनां मणुष्याणामेकं वालाग्रम् यानि चाष्टौ पूर्वविदेहापर विदेहवासि 'मणुस्साण वालग्गा सा एगा लिक्खा' मनुष्यवालाग्राणि सा एका लिक्षा, 'अट्ठ लिक्खाओ स्फुरण होता है ऐसी जो धूलि है वह उर्ध्व रेणु शब्द से वाच्य हुई है । आठ उर्ध्वरेणुओं का एक त्रसरेणु होता है । जो पूर्वादि दिशाओं से आगत वात से प्रेरित हुई इधर उधर चली जाती है- उड़ जाती है ऐसी धूलि का नाम त्रसा है, ऐसी त्रसारूप जो रेणु है वह त्रसरेणु है. आठ त्रसरेणुओं का एक रथरेणु होता है, रथ के चलने समय उससे उड़ी हुई धूलि ही रथ रेणु है आठ रथ रेगुओं का एक देवकुरु एवं उत्तर कुरु क्षेत्र के निवासी मनुष्यों का बालाग्र होता है. आठ बालाग्रों का हरिवर्ष और रम्यकवर्ष के निवासी मनुष्यों का एक बालान होता है. इसी हरिवर्ष और रम्यकवर्ष के निवासी मनुष्यों के जो आठ बालाग्र हैं उनका हैमवत और हैरण्यवतक्षेत्र निवासी मनुष्यों का एक बालाग्र होता है. इनके आठ बालाग्रों का पूर्व विदेह और अपरविदेह के निवासी मनुष्यों का एक बालाम्र होता है. इनके आठ बालानों ઉ, અધઃ અને તિય་ગામોજાલાન્ત તસૂર્ય કિરણેાથી જેનુ સ્ફુરણ હોય છે. એવી જે ધૂલિ છે તે ઉ રણુ શબ્દથી વાચ્ચે થયેલી છે. આઠ ઉણુને એક ત્રસરેણુ હાય છે. જે પૂર્વ આદિ દિશાએથી આગત વાતથી પ્રેરિત થઈ ને આમ-તેમ ઉડી જાય છે. એવી ધૂલિનુ નામ ત્રસા છે. એવી ત્રસારુપરેણુ જ ત્રસરેણુ કહેવાય છે. આડ ત્રસરેણુઓને એક ઘરેણુ હાય છે, રથ ચાલે છે ત્યારે તેનાથી જે રેણુ ઉડે છે તે રથરેણુ છે. આઠ રથરેણુઓને એક દેવ કુરુ અને ઉત્તર કુરુક્ષેત્ર નિવાસી મનુષ્યના ખાલાગ હોય છે. આઠ ખાલાગ્નોના રિવષ અને રમ્યક વર્ષના નિવાસી મનુષ્ય નું એક માલાશ્ર હોય છે. એજ હરિસ્વર્ણ અને રમ્યકવન નિવાસી મનુષ્યેાના જે આઠ ખાલાત્રો છે તે હેમવત અને હૈરણ્યવત ક્ષેત્ર નિવાસી મનુ ષ્યાનુ' એક બાલાવ્ર હેાય છે. એમના આઠ ખાલાગ્રોનું પૂર્વ વિદ્રેડ અને અપર વિદેહના નિવ:સી મનુષ્યાનું એક ખાલાગ્ર હાય છે. એમના આઠ ખાલાસ્ત્રોની-કેશાગ્રાની એક વિક્ષા Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १७६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सा एगा जूआ' या अष्टयूकाः तदेकं यवमध्यम् , यानिच 'अट्ठ जवमज्झा से एगे अंगुले' अष्ट यवमध्यानि तदेकमङ्गुलम् , 'एएणं' एतेन अनन्तरोक्तेन 'अंगुलप्पमाणेणं छ अंगुलाइं पाओ' अङ्गुलप्रमाणेन षडङ्गुलानि एकः पादः-पादमध्यतलप्रदेशः, पादैकदेशत्वा त्पादः ग्रामैकदेशे ग्रामत्वव्यवहारवत् 'बारस अंगुलाई विहत्थी' द्वादश अङ्गुलानि वित स्तिः , चउवीसं अंगुलाई रयणी' चतुर्विशतिः अंगुलानि रत्निः प्रसारिताङ्गुलिको हस्तः, रत्नरिति सैद्धान्तिकी परिभाषा शब्दकोशेतु "मुष्टया तु बद्धया स (हस्तः) रत्निः स्यात्" इति बद्धमुष्टिकहस्तो रत्निरुक्तः, सचेह न गृह्यते न्यूनप्रमाणत्वात् , विवक्षितश्च चतुर्विंशत्यगुलप्रमाणः स च प्रसारिताङ्गुलिक एव हस्तो घटते इति, तथा 'अडयालीसं अंगुलाई कुच्छी.' अष्टचत्वारिंशत अङ्गुलानि कुक्षिः, 'छण्णउइ अंगुलाई से एगे अक्खेइवा' षण्णवतिरङ्गुलानि स एकोऽक्षः शकटावयव विशेषः, इतिवा इति शब्दः स्वरूपोपदर्शने वा शब्दः समुच्चये एवमग्रेऽपि 'दंडेइवा' दण्ड इति की-केशानों को एक लिक्षा-लाख होती है. आठ लिक्षाओं की एक यूका- शिरका जूं होती है. आठ यूकाओं का एक यवमध्य होता है आठ यवमध्यों का एक अङ्गुल होता है. छह अंगुलों का एक पाद- पादमध्यतल प्रदेश होता है. पादमध्यतल प्रदेश को जो यहां पाद कह दिया है वह ग्रामैकदेश में हुए ग्राम के व्यवहार को तरह कह दिया है. १२अंगुलों की एक वितस्ति होती है तथा २४ अंगुलों की एक रत्नि होती है जिसमें अंगुलियां पसारी गई हों ऐसे एक हाथ का नाम सैद्धान्तिको परिभाषा में रनि कहा गया है । परन्तु शब्दकोष में बंधी हुई मुट्ठिवाले हाथको एक रत्नि कहा गया है, सो ऐसी रत्नि यहां गृहीत नहीं हुई है क्यों कि इसमें प्रमाण कम आता है, जब पसारी हुई अंगुलियों वाले हाथ की रत्नि कहते हैं तभी उसमें २४ अंगुल प्रमाणर्ता आती है, और इसीसे रत्नि प्रमाण सधता है ४८ अंगुलों की एक कुक्षि होती है, ९६ अंगुलों का एक अक्ष होती है, शकट का अवयव विशेष जो होता है उसका नाम अक्ष है इसी प्रकार से ९६ अंगुलो का एक दण्ड होता है, धनुष भो इतने હોય છે, આઠ લિક્ષાઓની એક યૂકા હોય છે. આડ ચૂકાઓનું એક યા મધ્ય હોય છે. આઠ યમથેનો એક અંગૂલ હોય છે. ૬ અંગુલને એક પાદ–પાદમધ્યતલ પ્રદેશ હોય છે. પાદ મધ્યતલ પ્રદેશને જે અહીં પાદ કહેલ છે તે ગ્રામૈક દેશમાં થયેલ ગ્રામના વ્યવહારની જેમ સમજવું ૧૨ અંગુલેની એક વિતસ્તિ હોય છે. તેમજ ૨૪ અંગુલેની એક રનિ હોય છે.જેમાં આંગળીઓ પહોળી કરવામાં આવી છે. એવા એક હાથનું નામ સૈદ્ધાતિકી પરિભાષામાં રનિ કહેવામાં આવેલ છે શબ્દકોષમાં મુષ્ટિકા બાંધેલા હાથને પણ એક રનિ કહેવામાં આવેલ છે. પરંતુ એનું અહીં ગ્રહણ થતું નથી કેમકે આમાં પ્રમાણ ઓછું આવે છે. જ્યારે પહેલી કરેલી અંગલીઓ વાળા હાથને રનિ કહે છે ત્યારે જ તેમાં ૨૪ અંગુલ પ્રમાણુતા આવે છે-અને એનાથીજ રનિ પ્રમાણુ સધે છે. ૪૮ અંગુલની એક કુક્ષિ હોય છે. ૯૬ અંગુલનો એક અક્ષ હોય છે. શકટને અવયવ વિશેષ જે હોય છે તેનું નામ અક્ષ છે. આ પ્રમાણે Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू, २१ कालस्वरूपम् १७७ वा दण्डः प्रसिद्धः, धणूइवा' धनुरिति वा धनुः प्रसिद्धम्, 'जुगेइवा' युगमिति वा युग धुर्यवृषभस्कन्धस्थितः कण्ठविशेषः 'मुसलेइ वा' मुशलमिति वा मुशलं प्रसिद्धम् 'णालिआ वा' नालिकेति वा नालिका यष्टि विशेषः अक्षादि नासिकान्तानि षण्णवत्य " प्रमाणानि । अत्र धनुर्मात्रमुपयोगि, तदतिरिक्तानि नामानि प्रसङ्गादुपन्यस्तानि तानि चान्यत्रोपयोगीनि 'एएणं' एतेन अनन्तरोक्तेन 'धणुप्पमाणेण दो धणुसहस्सा ई' धनुष्प्रमाणेन द्वे धनुःसहस्रे द्वि सहस्रधनूंषि एकं 'गाउयं' गव्यूतम् 'चत्तारि गाउयाइं जोयणं' चत्वरि गव्यूतानि एकं योजनम् । 'एए' एतेन अनन्तरोक्तेन 'जो यमाणं जे पल्ले' योजनप्रमाणेन यः पल्यः धान्यपात्रविशेषः स इव पल्यः पन्यसदृशः पात्रविशेषो 'जोयण' योजनम् एकं योजनम् ' आयामविक्खंभेणं' आयामविष्कम्भेण-दैर्घ्यविस्ताराभ्यां समवृत्तत्वात् एकं 'जोयण' योजनम् 'उ उच्च तेणं' ऊर्ध्वम् उच्चत्वेन, 'त' तत् पूर्वोक्तं योजनम् 'तिगुणं' त्रिगुणं त्रिभिर्गुणितं 'सविसेसं' सविशेषं विशेषसहितं ' परिक्खेवेणं' परिक्षेपेण- परिधिना, वृत्तपरिधेः किञ्चिन्न्यूनं पड़भागाधि त्रिगुणत्वात् 'से णं पल्ले' स खलु पल्य: 'एगाहिय बेहिय तेहिय' एकाहिक द्वय हित्रैयहिकोणां तत्र मुण्डिते शिरसि एकेनाहा यावत्प्रमाणा वालाग्रकोटय उत्तिष्ठन्ति ता एकाहिक्यः द्वाभ्यां तु द्वैयहिक्यः त्रिभिस्तु त्रैयहिक्यस्तासाम्-अर्थात् एकदिनभव द्विदिनभव त्रिदिनभवानाम् 'उक्कोसेणं' उत्कर्षेण- उत्कृष्टतया 'सत्तरत्तपरूढाणं' सप्तरात्रो ही अंगुलों का होता है जुआ जो बैलो के कंधो पर रखा जाता है वह भी इतने ही अंगुलो का होता है। मुशल एवं नालिका यष्टिविशेष भो इतने ही अंगुलो की होती है । यहां प्रकरण में उपयोगी एक धनुष मात्र ही हैं. इससे अतिरिक्त और नाम तो केवल प्रसङ्ग से हो लिख दिये हैं । इनका उपयोग अन्यत्र होता है । २हजार धनुष का एक गव्यूत होता है । चार गव्यूत का एक योजन होता है । इस योजन प्रमाणवाला पल्य-धान्यपात्रविशेष के जैसा यह पल्य होता है अर्थात् एक योजन गहरा, एक योजन चोड़ा और एक योजन लम्बा ऐसा एक पल्य बनाना चाहिये. इस पल्य में कम से कम एक दिन से लेकर तीन दिन तक और अधिक से अधिक सात दिन तक के मुण्डित हुए शिर पर उत्पन्न हुए बालानों की जो कि देवकुरु और ૯૬ અંશુલાને એક દંડ હાય છે ધનુષ્ટ્રે પણ આટલાજ અંશુલાનુ ડ્રાય છે ધૂસ ુ–જે ખળદના ખાંધાં પર મૂકવામાં આવે છે તે પણ એટલા જ અંશુલાનું હાય છે મુશલ અને નાલિકા—યષ્ટિ વિશેષ પણ એટલાજ અંશુલાની હોય છે. અહી પ્રકરણમાં ઉપયેગી એક ધનુષ માત્ર જ છે. બીજા નામેા ફેંકત પ્રસંગાનુસાર જ લખવામાં આવ્યા છે. અન્યત્ર આ સને ઉપયાગ થાય છે, બે હજાર ધનુષના એક ગબૂત થાય છે. ચાર ગબ્યૂત બરાબર એક ચેાજન હાય છે. આ ચેાજન પ્રમાણવાળા પલ્ય-ધાન્ય પાત્રવિશેષના જેવુ આ પલ્ય હાય છે. એટલે કે એક ચેાજન પહેાળુ' અને એક ચેાજન લાંબુ એવું એક પલ્ય બનવું જોઈએ. આ પલ્પમાં ઓછામાં ઓછા એક દિવસથી માંડીને ત્રણ દિવસ સુધી અને વધારેમાં વધારે સાત દિવસ સુધીના સુડિત થયેલા શિર પર ઉત્પન્ન થયેલા માલાશ્રોની—કે જેઓ દેવકુ અને ઉત્તર ૨૩ Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १७८ जम्बूद्वीपप्रचप्तिसूत्रे त्पन्नानाम् वालाग्रकोटोना-देवकुरूत्तरकुरूमनुष्यवालाग्रभागानाम् 'संभट्टे' संभृष्टः आकर्णपूरितः 'सण्णिचिए' सन्निचितः-सं-सम्यक् प्रचयविशेषात् निचित:-निबिडोकृतः, भरिए" भृतः पूर्णः । 'मृले एगाहिय वेहिय तेहिय' इत्यत्र प्राकृतत्वात् षष्ठो बहुवचनलोपः सर्वत्र तृतीयार्थे षष्ठि 'तेणं' तानि पूर्वोक्तानि खलु 'बालग्गा णो कुथेज्जा' वाला ग्राणि न कुथ्येयुः प्रचयविशेषाद् विवराभावाद्वायोः प्रवेशासम्भवाच्चासारतां न प्राप्नुयुः अतएव जो परिविडंसेज्जा' न परिविध्वंसेरन् कतिपय परिशाटनमपि स्वीकृत्य विध्वस्तानि न भवेयुः, तानोत्यस्यार्थवशाद्विभक्तिं विपरिणमय्य द्वितीया बहुवचनान्तत याऽग्रेतन दहनादि क्रियान्वय इति तानि वालाग्राणि 'णो अग्गो डहेज्जा' अग्निः नो दहेन्-न भस्मी कुर्यात् 'णो वाए हरेज्जा' वातः वायुः न हरेत् देशाद्देशान्तरं न नयेत् अत्यन्तनिचितत्वा तत्र वह्नि वाय्वोः सङ्क्रमो न भवतीति तात्पर्यम् । तानि वालाग्राणि 'णो पूइत्ताए हव्वमागच्छेज्जा' पूतितया तिभावं हव्यं कदाचिदपि न गच्छेयुःन कदापि शटितभावं प्राप्नुयुरित्यर्थः ततः तेभ्यः पूर्वोक्तेभ्यो वालाग्रेभ्यः यद्वा 'तोणं' तत तदनन्तरं पूर्वोक्तप्रकारकपल्यभरणानन्तर मित्यर्थः 'वाससए' २ वर्षशते वर्षशते प्रतिवर्षशते 'एगमेगं' एकमेकम्-एकैकम् 'वालग्ग' वालाग्रम् पूर्वोक्तस्वरूपं-प्रमाणविशेषम् 'अवहाय' अपहाय-अपहृत्य 'जावइएणं' यावता-यत्प्रमाणेन 'कालेणं' कालेन 'से उत्तर कुरु के मनुष्यों की ही कोटियों को खूब धांस२ कर भर देना चाहिये. कहीं पर तिल मात्र भी स्थान खाली न रहे इस ढंग से वे उसमें भरना चाहिये. इस तरह भरे जाने पर उनमें विवर-छेद नहीं रहेगा. विवर नहीं रहने से वहां वायु का भी प्रवेश नहीं हो सकेगा, इसलिये न वे सड़ गल सकेंगे और न एक स्थान से दूसरे स्थान पर उडाये जाकर वायु द्वारा रखे जा सकेंगे. निविडरूप से भरे रहने के कारण उन्हें अग्नि भी भस्मसात् नहीं कर सकेगी. इस तरह जब उन बालाग्रकोटियों से वह पल्य आकर्ण अच्छी तरह अत्यन्त निविडरूप से भर जावे-तब उसमें से सौ वर्ष निकल जाने पर एक बालाग्रकोटि निकालनी चाहिये. इस तरह करते २ जितने काल में वह पल्य उन बलाग्रकोटियों से रिक्त होता है, थोड़ा सा भी बालानों का अंश उसमें नहीं चिपका रहता, अत्यन्त रूप से उस पल्य की उन बालानों से शुद्धि हो કરના માણસોના જ હોય-કેટિઓને એકદમ ઠાંસી ઠાંસીને ભરવામાં આવે પણ સ્થાને તલમાત્ર પણ સ્થાન ખાલી હોય નહીં તેમ તેમાં ભરવામાં આવે. આમ ભર્યા પછી તેમાં વિવર રહેશે નહીં વિવર નહી રહેવાથી ત્યાં વાયુ પણ પ્રવિણ થઈ શકશે નહીં. એથી તેઓ સડશે નહીં ઓગળશે નહી અને વાયુ પણ તેમને એક સ્થાનથી ઊડાવી ને અન્યત્ર લઈ જવામાં સમય થશે નહીં નિબિડરૂ૫માં હોવાથી અગ્નિ પણ તેમને ભસ્મ કરી શકી નહીં આ રીતે જ્યારે તે બાલા કેટિએથીતે પલ્પ આકણું સારી રીતે અતીવ નિબિડ રૂપમાં પૂરિત થઈ જાય ત્યારે તેમાં સો વર્ષ નીકલી જવા બ દ એક બાલાચ કોટિ બહાર કાઢવી જોઈએ આમ કરતાં કરતાં જેટલા કાળ માં તે પ૬૧ તે બાલાગ્ર કાટિ એ રિક્ત થાય છે. બાલા ત્રને તપ પણું તેમાં રહે નહી તે પલ્ય એક દમ બાલાગ્રોથી રિક્ત થઈ જાય. એટલે Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. २१ कालस्वरूपम् पल्ले खीणे' सः पूर्वोक्तः पल्यः क्षीणः वालाग्रकर्षणवशात् क्षयं प्राप्तः आकृष्टधान्यकोष्ठागारवत् तथा 'णीरए' नीरजाः - रज धूलिस्तत्सदृशस्सूक्ष्मवालाग्रस्तस्मान्निष्क्रान्तो नीरजाः रजस्तुल्य सूक्ष्मवालाग्ररहितः कोष्ठागारवत् तथा 'णिल्लेवे' निर्लेपः टेपरहितः अत्यन्तसंश्लेषेण तन्मयत्वप्राप्तवालाग्रलेपापहारात् अपनीत धान्यलेपकोष्ठागारवत् ' तथा 'णिट्टिए' निष्ठितः अपनेतव्यः द्रव्यापनयनान्निष्ठां रिक्ततां गतो 'भवइ' भवति विशिष्ट प्रयत्न प्रमार्जित कोष्ठागारवत् यद्वा नीरज आदयस्त्रयोऽपि समानार्थी शब्द अतिशयित शुद्धि सूचनपराः 'से तं पलिओवमे' तदेतत् पल्योपमम् । इदं संख्येयवर्ष कोटीकोटी प्रमाणं बादरपल्योपमं बोध्यं यतोऽत्र पल्यगतवालाग्राणां संख्येयैरेव वर्षे रपहारसंभव उक्तः । अस्य च यद्यपि वक्ष्यमाण सुषमसुषमादिकालमानादौ नोपयोगस्तथापि सुषम सुषमा काल मानोपयोग सूक्ष्मपल्योपमं सुखेनावबोध्यं भवत्वितोदं प्रदर्शितम् । सूक्ष्मपल्योपमप्रमाणं तु एवं विज्ञेयं, तथाहि पूर्वोक्तमेकैक वालाग्रमसंख्येय खण्डीकृत्य भृतस्य उत्सेधाङ्गुलयोजनप्रमाणायामविष्कम्भावगाहस्य पल्यस्य वर्षशते २ एकैक वालाग्र खण्डापहारेण यावता कालेन सर्ववालाग्रखण्डापहारान्निर्लेपतास्यात् सोऽसंख्येय वर्ष जाती है-अर्थात् पूर्णरूप से वे बालग्र उस पल्य में से निकल जाते हैं तो इतने काल का नाम पल्योपम काल हैं इस पल्य में संख्यात कोटी कोटोप्रमाण वर्ष समाप्त हो जाते हैं, इसे बाद पल्योपम काल कहागयाहै. क्यों कि इस पल्य गत बालायों का अपहार संख्यात वर्षों में ही हो जाता है. इस पल्य का यद्यपि वक्ष्यमाण सुषमा सुषमादिकाल प्रमाण में उपयोग नहीं है परन्तु भी सुषम सुषमा काल के प्रमाण में उपयोगी जो सूक्ष्म पल्योपम है वह सुख से समझ में आजाय इसलिये इसे यहां दिखलाया गया है सुक्ष्म पल्योपम का प्रमाण इस तरह से विज्ञेय है - पूर्वोक्त बालाओंों में से एक एक बालाग्र के असंख्यात खण्ड कर देना चाहिये और फिर उनसे उस पल्य को भरना चाहिये. इस अवस्था में इस पल्यकी लम्बाईचौडाई एवं अवगाह उत्सेधाङ्गुल योजन प्रमाण हो जावेगी; अब सौ वर्ष निकल जाने पर उसमें से एक २ बालाप्रखण्ड का अपहार करना चाहिये. इस तरह से करते २ जितने काल में वह पल्य उन सर्व बालायों के કે તેમાંથી સપૂર્ણ પણે ખાલાગેા બહાર કાઢી નાખવામાં આવે તે તેટલા કાળનુ' નામ પયેાપમ કાળ છે. આ પલ્પમાં સખ્યાત કાટિ કોટિ પ્રમાણુ વ સમાપ્ત થઈ જાય છે. આને બાદર પડ્યેાપન કહેવામાં આવે છે, કેમકે આ પથ્થગત ખાલાગેનેા અપહાર સંખ્યાતવષે માં જ થઇ જાય છે. જો કે આ પલ્પને વક્ષ્યમાણુ સુષમ સુષમાદિ કાલ પ્રમાણમાં ઉપચેાગ નથી છતાંએ સુષમ સુષમાકાળના પ્રમાણમાં ઉપયેગી જે સમયેાપમ છે તે સુખેથી સમજ માં આવી શકે એટલામાટે અહી દર્શાવવા માં આવેલ છે. સૂક્ષ્મપલ્યાપમનુ પ્રમાણ આ પ્રમાણે વિજ્ઞેય છે. પૂર્વાકત લાગેામાં એક એક બાલાથના અસખ્યાત ખડા કરી નાખવા જોઈએ અને ત્યાર બાદ તેમના વડે આ પથ્યને પૂરિત કરવું. આ સ્થિતિ માં આ પચની લંબાઈ પહેાળાઇ તેમજ અવગાહ ઊત્સેધાંગુલયેાજન પ્રમાણ થઇ જશે. હવે દર સો વર્ષે એક માલાગ્રખડના તેમાંથી અપહાર કરવા આ પ્રમાણે જેટલા કાળમાં તે પચ १७९ Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कोटीकोटोप्रमाणः कालः सूक्ष्मपल्योपमम् । "विचित्राकृति राचार्यस्य' इति सूत्रकारणा नुक्तमपीदं स्वयं विज्ञेयम् । इदं सूक्ष्मपल्योपममेवच प्रस्तुतोपयोगी । अन्यथाऽनुयोगद्वारा दिभिः सह विरोधः प्रसज्येतेति सर्वमुपपन्नम् । एवमग्रे सागरोपमेऽपि विज्ञेयमिति । ____ अथ गाथया सागरोपमस्वरूपपमाह-'एएसिं' इत्यादि । 'एएसि'एतेषाम्-अनन्तरोक्तानां 'पल्लाणं' पल्यानां-पल्योपमानां या 'दसगणिया कोडाकोडी हवेज्ज' दश गुणिता कोटी कोटी र्भवेत् 'तं' तत् 'एगस्स' एकस्य 'सागरोवमस्स' सागरोपमस्य 'भवे परिमाणं' परिमाणं भवेत् ॥१॥ इति । 'एएणं सागरोवमप्पमाणेणं चत्तारि सागरोवमकोडाकोडोओ कालो सुसममुसमा' एतेन सागरोपमप्रमाणेन चतस्रः सागरोपमअपहार होते २ उनसे सर्वथा निलिप्त बन जाता है ऐसा यह असंख्यातकोटीकोटी वर्षप्रमाणवाला काल सूक्ष्म पल्योपम काल कहा गया है । यही विषय “एएणं जोयणप्पमाणेणं जे पल्ले" इत्यादि सूत्रपाठ से लगाकर “णि ट्ठए भवइ सेतं पलिओवमे" यहां तक के सूत्रपाठ द्वारा स्पष्ट की गई है। यद्यपि यहां पर सूत्रकार ने सूक्ष्मपल्योपम के विषय में अपने स्वतेज रूप से विचार प्रगट नहीं किये हैं परन्तु फिर भी “विचित्राकृतिराचार्यस्य" के अनुसार अनुक भी इसे स्वयं समझ लेना चाहिये. क्योंकि यह सूक्ष्म पल्योपम हो प्रस्तुत में उपयोगी है । यदि ऐसा न हो तो फिर अनुयोगादि द्वारों के साथ विरोध का प्रसङ्ग प्राप्त होगा, इसी तरह का कथन सागरोपम के संबंध में भी जानना चाहिये; अब सूत्रकार इस गाथा द्वारा सागरोपम के स्वरूप का कथन करते हुए कहते हैं __ "एएसिं पल्लाणं कोडाकोडी हवेज्ज दसगुणिआ । तं सागरोवमस्स उ एगस्स भवे परिमाणं ॥१॥ पल्योपम की जो दश गुणित कोटी कोटी है वही एक सागरोपम प्रमाण है। अर्थात् कोटी कोटो पल्योपम को १० दश से गुणित करने पर एक सागरोपम होता है. ऐसे सागरोपम તે બાલાના અપહાર થી સર્વથા નિર્લિપ્ત બની જાય. એવે તે અસંખ્યાત કેટી કેટી વર્ષ પ્રમાણુ વાળે કાળ સૂક્ષમ પલ્યોપમ કાળ કહેવામાં આવે છે. એ જ વિષય “guળ जोयणप्पमाणेण जे पल्ले" त्या सूत्र पाथी भांजन 'णिट्ठिए भवइ से तं पलिओवमे' मी સુધીના સૂત્રપાઠ વડે સ્પષ્ટ કરવામાં આવેa છે, જે કે અહીં સૂત્રકારે સૂમપલ્યોપમના विष पोताना स्वतंत्रशते वियारे। यत या नथा छ " विचित्राकृतिराचार्यस्य" ના મુજબ અહીં અનુકત છે તે પણ સમજી લેવું જોઈએ કેમકે આ સૂક્ષમ પલ્યોપમ જ પ્રરતુતમાં ઉપયોગી છે. જે આમ હોય નહિ તો પછી અનુગાદિ દ્વારે સાથે વિરોધની સ્થિતિ ઉપસ્થિત થશે. આ જાતનું કથન સાગરોપમના સંબંધમાં પણ જાણવું જોઈએ, હવે સૂત્રકાર આ ગાથા વડે સાગરોપમ ના સ્વરૂપનું કથન કરતાં કહે છે पएसि पल्लाणं कोडा कोडी हवेज्ज दस गुणिआ। तं सागरोवमस्स उ एगस्स भवे परिमाणं ॥१॥ પલ્યોપમની જે દશ ગુણિત કેટી કેટી છે તેજ એક સાગરોપમનું પ્રમાણ છે, એટલે Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८१ प्रकाशिका टोका सू० २१ कालस्वरूपम् कोटाकोट्रयः कालः सुषमसुषमा, चतुः सागरोपमकोटाकोटी प्रमितः कालः प्रथमोऽरको भवतीत्यर्थः १ ! तथा 'तिणि सागरोवमकोडाकोडीओ' तिस्रः सागरोपमकोटाकोटयः-त्रिसागरोपम कोटाकोटी रूपः 'कालो सुसमा' कालः सुषमा, अयं कालो द्वितीयोऽरक इति २ । 'दो सागरोवम फोडाकोडीओ' द्वे सागरोपमकोटाकोटयौ द्विसा-- गरोपमकोटाकोटीरूपः 'कालो सुसमदुस्समा' कालः सुषमदुष्पमा, अयं कालस्तृतीयोऽरक इति ३ । 'बायालीसाए वाससहस्सेहिं ऊणिया' द्विचत्वारिंशता वर्षसहरूनिका-न्यूना 'एगा सागरोवमकोडाकोडी' एका सागरोपमकोटाकोटी 'कालो दुस्समसुसमा' कालो दुष्षमसुषमा, अयं कालश्चतुर्थाऽरक इति ४। एकवीसं वाससहस्साई कालो दुस्समा' एकविंशतिवर्षसहस्राणि कालो दुष्पमा अयं कालः पञ्चमोऽरकः इति ५। तथा 'एकवीसं वाससहस्साई कालो दुस्समदुस्समा' एकविंशतिवर्षसहस्राणि कालो दुष्षमदुष्पमा, अयं कालः षष्टोऽरक इति । ६ । अत्रेदं बोध्यम्-प्रथमेऽरके चतस्रः सागरोपमकोटाकोटयः द्वितीये तिस्रः, तृतीये द्वे, चतुर्थे द्विचत्वारिंशत्सहस्त्रवर्षन्यूना एका सागरोपमकोटाकोटी, पश्चमे एकविंशतिसहस्त्रवर्षाणि षष्ठे च एकविंशतिसहस्त्रवर्षाणीति सर्वसंकलनयाऽवसर्पिणीकालो दशसागरोपमकोटाकोटी प्रमाण इति । इत्त्यवसर्पिणी कालनिरूपणम् ॥ __ अथोत्सर्पिणी कालं निरूपयितुमाह--"पुणरवि' इत्यादि । 'पुणरवि उस्सप्पिणीए' पुनरपि उत्सर्पिण्या:-उत्सपिणीकालस्य 'एकवीसं वाससहस्साई कालो दुस्समदुस्समा प्रमाण से चार सागरोपम कोटाकोटी का एक सुषमसुषमा काल होता है. इसोको अवसर्पिणी का प्रथम आरक कहा गया है तन सागपमकोटाकोटि का द्वितीय काल जो सुषमा है वह होता है. दो सागरोपम कोटाकोटि का तृतीय काल जो सुषम दुष्षमा है वह होता है. ४२ हजार वर्ष कम १ कोटाकोटि सागरोपम का दुष्पम सुषमा काल होता है. यह चौथा काल है. "एकवीसं वाससहस्साई कालो दुस्समा " २१ हजार वर्ष का दुष्पमा नामका ५वा काल होता है तथा इतने ही हजार वर्ष का ६ वाँ काल जो दुष्षम दुष्षमा है वह होता है. इस तरह सर्व संकलना से अवसर्पिणी काल १० कोडाकोडो सागरोपम का होता है. इसप्रकार से अवसर्पिणी કે કેટી કેટી પાપમને ૧૦ વડે ગુણિત કરવાથી એક સાગરોપમ થાય છે. એવા સાગર પમ પ્રમાણથી ચાર સાગરોપમ કોટા કેટિને એક સુષમ સુષમા કાળ હોય છે. એને જ અવસર્પિણ ને પ્રથમ આરક કહેવામાં આવેલ છે. ત્રણ સાગરોપમ કોટા કેટીને દ્વિતીય કાલ જે સુષમા છે તે હોય છે. બે સાગરોપમ કેટ કોટિનો તૃતીય કાળ જે સુષમ દુષ્પમાં છે. તે હોય છે. ૪૨ હજાર વર્ષ કમ ૧ કોટા કટી સાગરોપમનો દુષમ સુષમાકાળ डाय छ, साया। छे. “एक्कबीसं वाससहस्साई कालो दुस्समा" २१ ॥२ वषन। દુષમાં નામે ૫ મે કાળ હોય છે. તથા આટલાજ હજાર વર્ષને ૬ઠો કાળ જે દુષમ-દુષમાં છે તે હોય છે. આ પ્રમાણે સર્વ સંકલનાથી અવસર્પિણી કાળ ૧૦ કેડા કોડી સાગરોપમાં Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८२ __ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे एकविंशतिवर्षसहस्राणि काल दुष्पमदुष्पमा इति उत्सर्पिण्याः प्रथमोऽरको १ । 'एवं' एवम् अनेन प्रकारेण अवमर्पिणीकालस्य 'पडिलोमं' प्रतिलोम-पश्चानुपूर्ध्या 'णेयब्वं' नेतव्यं-ज्ञातव्यं कियदवधिज्ञातव्यम् ? इत्याह-जाव चत्तारि' इत्यादि । चत्तारि सागरोवम काल का निरूपण करके अब सूत्रकार उत्सर्पिणी कालका निरूपण करते हैं-"एवं पडिलोम णेअव्वं जाव चत्तारि सागरोवम कोडाकोडीओ कालो सुसमसुसमा६" उत्सर्पिणीकाल में प्रथम काल जो दुष्यमदुषमा है वह २१ हजार वर्ष का होता है इसे ही उत्सर्पिणी काल का प्रथम अरक कहा गया है इस तरह से उत्सर्पिणी काल के ६ छटे सुषमसुषमा अरक तक कथन कर लेना चाहिये, अवसर्पिणी काल में जो १ प्रथम अरक है वह उत्सर्पिणी काल में ६ छट्ठा पड जाता है और अवसर्पिणीकाल में जो ६छठ्ठा अरक है वह उत्सर्पिणो काल में प्रथम अरक हो जाता यहाँ पर जो अरकों का कालप्रमाण अवसर्पिणो के प्रकरण में कहा गया है वह वैसा ही हैउतना ही है. घट बढ नहीं है. इस तरह अवसर्पिणी में अरकों का प्रमाण और नम्बर इस प्रकार से रहता है-अवसर्पिणी के अरक १-सुषमसुषमा ४ कोडाकोडी सागरोपम की स्थिति.। २-सुषमा-३ कोडाकोडी सागरोपम की स्थिति । ३-सुषमदुष्पमा-२कोडाकोडी सागरोपम की स्थिति । ४-दुषष्मसुषमा--४२हजार वर्ष कम१ कोडाकोडी सागरोपम की स्थिति ५-दुप्षमा-२१हजार वर्ष की स्थिति. । ६-दुष्पमदुप्पमा-२१हजार वर्ष को स्थिति । ને હાથ છે. આ પ્રમાણે અવસર્પિણી કાળનું નિરૂપણ કરીને હવે સૂત્રકાર ઉત્સર્પિણી કાળ नन५ रे छ. "एवं पडिलोमं अव्वं जाव चत्तारि सागरोवमकोडाकोडीओ कालो सुसमसुसमा ६” उसी मा प्रथम 11 २दुषम दुषमा छे २१९१२ વર્ષને હોય છે. એને જ ઉસપિણું કાળને પ્રથમ આરક કહેવામાં આવેલ છે. આ પ્રમાણે ઉત્સર્પિણી કાળના દર્ફે સુષમા સુષમા આરક સુધીનું કથન સમજી લેવું જોઈએ. અવસપિણી કાળમાં જે ૬ પ્રથમ આરક છે તે ઉત્સર્પિણી કાળમાં ૬ ઠ્ઠો હોય છે અને અવસ પિ કાળમાં જે ડ્રો આરક છે તે ઉત્સર્પિણી કાળમાં ૧ પ્રથમ આરક થઈ જાય છે. અહીં જે આરકેના કાલ પ્રમાણુ અવસર્પિણીના પ્રકરણમાં કહેવામાં આવેલ છે તે પ્રમાણે જ છે વઘ ઘટ નથી. આ રીતે અવસર્પિણીમાં આરકે નું પ્રમાણ અને ક્રમ આ પ્રમાણે રહે છે. અવસર્પિણી ના આરક ૧ સુષમ સુષમાં ૪ કડા કોડી સાગરોપમની સ્થિતિ. २ सुषमा- 3 , ૩ સુષમ દુષમાં ૨ , ૪ દુષમ સુષમા ૪૨ હજાર વર્ષ કમ ૧ કેડા કેડી સાગરોપમની સ્થિતિ. ૫ દુષમા ૨૧ હજાર વર્ષની સ્થિતિ. ૬ દુષમ દુષમાં ૨૧ હજાર વર્ષની સ્થિતિ. Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. २१ कालस्वरूपम् ૨૮૨ कोडाकोडीओ कालो सुसमसुसमा' चतस्त्रः सागरकोटाकोटयः कालः सुषमसुषमा इति, योऽवसर्पिण्याः प्रथमो भेदः स इह षष्ठत्वेनावसेय इत्यर्थः । अत्रे बोध्यम्-उत्सपिण्या दुष्षमदुष्पमारूपे प्रथमेऽरके एकविंशतिवर्षसहस्त्राणि, द्वितीये दुष्पमारूपेऽरके एकविंशतिवर्षसहस्त्राणि, दुष्पमसुषमारूपे तृतीयेऽरके द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्रोना एका सागरोपमकोटा कोटी, सुषमदुष्पमारूपे चतुर्थेऽरके द्वे सागरोपमकोटाकोटयो, सुषमारूपे पञ्चमेऽरके तिस्रः सागरोपमकोटाकोटयः, सुषमसुषमारूपे षष्ठेऽरके चतस्रः सागरोपमकोटाकोटयइति सर्व संकलनया दश सागरोपमकोटाकोटय एकस्या मुत्सर्पिण्यां भवन्तीति । ___ अथ प्रकृतमुपसंहरन्-अवसपिण्या उत्सपिण्या उभयोश्च कालमानमाह-दससागरोवमकोडाकोडो भो' इत्यादि तत्र असर्पिणीकाल उत्सर्पिणीकालश्च दशसागरोपमको टे कोटिकः । अवसर्पिण्युत्सर्पिणीरूपं कालचक्रं तु । विंशतिसागरोपमकोटाकोटिकम् इत्यर्थः ॥ सू० २१ ॥ उत्सर्पिणी कोल के आरक१-दुष्पमसुषमा-२१हजार वर्ष की स्थिति । २ - दुष्षमा- २१ हजार वर्ष की स्थिति । ३. -दुष्पमसुषमा-१२ हजार वर्षे कम १ कोडा कोडी सागरोपम की स्थिति । ४-सुषमदुषमा-२ कोडाकोडी सागरोपम की स्थिति । ५-सुषमा--३कोडाकोडी सागरोपम को स्थिति । ६-सुषमसुषमा-४कोडाकोडी सागरोपम की स्थिति । इस सब की संकलना करने से उत्सर्पिणी काल भी १०कोडाकोडी सागरोपम का होता है. इस तरह यह अवसर्पिणीरूप और उत्सर्पिणोरूप काल चक्र २० कोडाकोडी सागरोपम का होना कहा गया है; यही सब विषय “एएणं सागरोवमप्पमाणेणं चत्तारि सागरोवमकोडाकोडिमो" से लेकर “दस सागरोधमकोडाकोडीओ कालो उस्सप्पिणी, वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ ઉત્સર્પિણ કાળના આરક ૧ દુષમ દુષમા-૨૧ હજાર વર્ષની સ્થિતિ. २ दुषमा૩ ષમ સુષમા ૪૨ વર્ષ કમ ૧ કેડા કેડી સાગરોપમનિ સ્થિતિ. ૪ સુષમ દુઃષમાં ૨ કેડા કેડી સાગરોપમની સ્થિતિ, ૫ સુષમાં ૩ કેડા કેડી સાગરોપમની स्थिति, ૬ સુષમ સુષમા ૪ કોડા કડી સાગરોપની સ્થિતિ. આ સર્વની સંકલન કરવાથી ઉત્સર્પિણી કાલ પણ ૧૦ કેડા કેડી સાગરોપમ ને હોય છે. આ પ્રમાણે આ અવસર્પિણુ રૂપ અને ઉ પણ રૂપ કાલ ચક ૨૦ કડા छोडी सागरापमनु छ मे ४ामा मावेस छे, पात "एपणं सागरोवमप्पमाणेणं - Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अनन्तरसूत्रे भरते कालस्वरूपमुकम् , सम्प्रति काले भरतस्वरूपं जिज्ञासमानस्तत्र प्रथमोपस्थितत्वादादौ सुषमसुषमारूपावसर्पिणीभेदं पृच्छति ___मूलम्-जंबुद्दीवेणं भंते ! दीवे भरहे वासे इमीसे ओसप्पिणए सुसमसुसमाए समाए उत्तमकट्ठपत्ताए भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभावपडीयारे होत्था ? गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था. से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव णाणामणि पंच वण्णेहिं तणेहि य मणीहि य उवसोभिए. तं जहा-किण्हेहिं जाव सुक्किल्लेहि एवं वण्णो गंधो रसो फासो सहो य तणाण य मणीण य भाणियवो जाव तत्थ णं बहवे मणुस्सा मणुस्सोओ य आसयंति संयंति चिट्ठति णिसीयंति तुयट्रंति हसति रमंति ललंति । तीसेणं समाए भरहे वासे बहवे उद्दाला कुदाला कयमाला णट्टमाला दंतमाला नागमाला सिंगमाला संखमाला सेयमाला णामं दुमागणा पण्णत्ता. कुसविकुसविसुद्धरूक्खमूला मूलमंतो कंदगंतो जाव बीयमंतो पत्तेहि व पुप्फेहि फलेहि य उच्छण्णपडिच्छण्णा सिरीए अईव २ उवसोभेमाणा चिट्ठति । तिसेणं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ बहवे मेरुतालवणाई हेरुतालवणाई मेरूतालवणाई पभयालवणाइं सालवणाई सरलवणाई सत्तवण्णवणाई पूयफलिवणाइं खज्जूरीवणाई णालिएरीवणाई कुसविकुसविसुद्धरुक्खमूलाई जाव चिट्ठति । तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ बहवे सेरिया गुम्मा णोमालियागुम्मा कोरंटयगुम्मा बंधुजीवगगुम्ना मणोज्ज-गुम्मा बोयगुम्मा बाणगुम्मा कणइग्गुम्मा कज्जयगुम्मा सिंदुवारगुम्मा मोग्गरगुम्मा जूहियागुम्मा मल्लियागुम्मा वासंतियागुम्मा वत्थुलगुम्मा कत्थुलगुम्मा कालो ओसप्पिण) उस्साप्पणो" यहां तक के सूत्रपाठ द्वारा कहा गया है. इनके पदों की व्याख्या सुगम है ॥२१॥ चत्तारि सागरोवमकोडाकोडीओ' यो भाडान " दस सागरोवमकोडोकोडीओ कालो उस्सप्पिणी' वोसं सागरोवमकाडा कोडीओ कालो ओसप्पिणो उस्सप्पिणी" मी सुधान। સૂત્ર પાઠ વડે કહેવામાં આવેલ છે. આ સર્વ પદ્યની વ્યાખ્યા સરળ છે. ૨૧ Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू २२ सुषम सुषमाख्यावसर्पिण्यानिरूणपम् सेवालगुम्मा अगत्थिगुम्पा मगदंतियोगुम्मा चंपगगुम्मा जाइगुम्मा णवणीइयागुम्मा कुंदगुपा महाजाइगुम्मा रम्मा महामेघणिकुरम्बभूया दसद्धवण्णं कुसुमं कुसुमैति । जे णं भरहे वासे बहुसमरमणिज्जं भूमिभागं वायविधुयग्गसाला मुकपुष्कपुंजोवयारकलियं करेंति । तीसेणं समाए भर वासे तत्थतत्थ तर्हि ताहें बहुईओ पउमलयाओ जोव सामलयाओ णिच्चं कुसुमियाओ जाव लावण्णओ । तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थतत्थ तर्हि तहि बहुओ वणसईओ पण्णत्ताओ, किण्हाओ किण्हो भासाओ जाव माओ स्यमत्तगछप्पय कोरंटगभिंगारंग कोंडलग जीवंजीवग नंदी मुहविलपिंगलक्खग कारंडवचकवायगकलहंस हंससारसअणेगसउणगणमिणवियरिया सदुष्णइयमहुर सरणाइयाओ संपिंडिय दरिय भमरमहुपरिपकर परिरतिमत्त छप्पय कुसुमासवलोलमहुरगुमगुमंत गुजंत देसभागाओ अभितरपुष्पफलाओ बाहिरपत्तोच्छण्णाओ पत्तेहि य पुष्फेहि य ओच्छन्नवलिच्छनाओ साउफलाओ निरोययाओ अकंटयाओ णाणाविहगुच्छगुम्म भंडवग सोहियाओ विचित्तसुहकेउभूयाओ वावी क्खरिणी दीहिया सुनिवेसिय रम्मजाल हस्याओ पिंडिमणीहामि सुगंध सुह सुरभि मणहरंच महया गंधद्धाणिमुयंताओ सव्वाउयपुष्पफलसमद्धाओ सुरम्बाओ पासाईयाओ दरिसणिज्जाओ अभिरूवाओ पडिरूवाओं ॥ सू०२२॥ छाया - जम्बूद्वीपे खलु भदन्त ! द्वीपे भरते वर्षे अस्या अवसर्पिण्या: सुषम सुषमायो समायाम् उत्तम काष्ठा प्राप्तायां भरतस्य वर्षस्य कीदृशक आकारभावप्रत्यवतारोऽभवत् गौतम ! बहुसमरमणोयो भूमिभागोऽभवत् स यथानामकः आलिङ्ग पुष्करमितिवा यावत् नानाविधपञ्चवर्णैः तृणैश्च मणिभिश्च उपशोभितः, तद्यथा- कृष्णैर्यावच्छुक्लैः, एवं वर्णो गन्धो रसः स्पर्शः शब्दश्च तृणानांव मणीनां व भणितव्यः यावत् तत्र खलु बहवो मनुष्या मानुष्यश्च आसते शेरते तिष्ठन्ति निषीदन्ति त्वग्वर्त्तयन्ति हसन्ति रमन्ते ललन्ति । तस्यां खलु समायां भरते वर्षे बहव उद्दालाः कुद्दालाः मोद्दालाः कृतमालाः नृत्तमालाः दन्तमालाः नागमालाः शृङ्गमालाः शङ्खमालाः श्वेतमालाः नाम द्रुमगणा प्रज्ञप्ताः कुशविकुशविशुद्धवृक्षमूला मूलवन्त कन्दवन्त यावद् वीजवन्त पत्रैश्च पुष्पैश्च फलैश्च अवच्छन्नप्रतिच्छन्ना श्रिया २४ १८५ Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अतिव अतीव उपशोभमानास्तिष्ठन्ति । तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र बहूनि मेरुतालवनानि हेरुतालबनानि मेरुतालवनानि प्रभतालवनानि सालवनानि सरलबनानि सप्तपर्णवनानि गफलीवनानि खजूरोवनानि नालिकेरीवनानि कुशविकुशविशुद्धवृक्षमूलानि यावत् तिष्ठन्ति । तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र वहवः सेरिका गुल्माः नवमालिका गुल्माः कोरण्टकगुल्माः बन्धुजीवकगुल्माः मनोऽवद्यगुल्पाः बीजगुल्माः बाणगुल्माः कर्णिकार गुल्माः कुब्जकगुलमाः सिन्दुवारगुल्मा मुद्गरगुल्माः यूथिकागुल्माः मल्लिकागुल्माः वासन्ति - कागुल्माः वस्तुलगुल्माः कस्तुल गुल्माशेवालगुल्माः अगस्तिगुलमाः मगदन्तिका गुल्माः चम्पकगल्माः जातिगुल्माः नवनीतिकागुलमाः कुन्दगुल्माः महाजातिगुल्माः रम्याः महा मेनिकुरम्बभूताः दशार्द्धवर्ण कुसुमं कुसुमयन्ति । ये खलु भरते वर्षे बहुँसमरणोयं भूमिभागं वातविधूतानशाला मुक्तपुष्पपुजोपचारकलितं कुर्वन्ति । तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र तस्मि तस्मिन् बहव्यः पद्मलताः यावत् श्यामलताः नित्यं कुसुमिताः यावत् लता वर्णकः । तस्यां खलु समायां भरते व तत्र तत्र तस्मिन् तस्मिन् बहव्यो वनराजय प्रशप्ताः कृष्णः कृष्णवभासा यावत् रम्याः रत मत्तक षट्पदकोरङ्ग भृङ्गारक कुण्डल-- कजीवजीवनन्दीमुख कपिल पिङ्गलाक्षक कारण्डवचक्रवाककलहंस हंससारसानेकशकुन गर्णामथुन विचारिताःशब्दोन्नदितमधुरस्वरनादिताः सम्पिडितहप्तभ्रमरमधुकरीप्रकरपरिली यमानमत्तषट्पद कुसुमासवलोलमधुरगुमगुमायमान अजद्देशभागाः अभ्यन्तरपुष्पफलाः वहिः पत्रावच्छन्ना; पुष्पैश्च फलैश्चावच्छन्नप्रतिच्छन्नाः स्वादुफलाः नीरोगकाः अकण्टकाः नानाविधगुच्छगुल्ममण्डपकशोभिता:विचित्रशुभकेतुभूताः वापीपुष्करिणी दोधिका सुनिवेशित रम्यालग्रहका पिण्डिमनिर्धारिमा सुगनधि शुभसुरभिमनोहरांच महागन्धघ्राणि मञ्चन्त्यः सवत्तकपुष्पफलसमृद्धाः सुरम्या प्रासादीया दर्शनीया अभिरूपाःप्रतिरूपाः ॥सू० टीका-'जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे' इत्यादि । गौतमस्वामी पृच्छति 'जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे भारहे वासे इमीसे ओसप्पिणीए मुसमसुसमाए समाए' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपे द्वीपे भरते वर्षे अस्या वर्तमानायाः ___ भरत क्षेत्र में यह काल स्वरूप प्रतिपादित हुआ है अतः भरतक्षेत्र के स्वरूप को जानने की इच्छावाले गोतमस्वामी सब से पहिले कहे गये सुषमसुषमा काल के स्वरूप जो कि अवसर्पिणी का प्रथम अरक कहा गया है पूछते हैं "जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे भरहे वासे इमीसे ओसप्पिणीए" इत्यादि । "बुद्दीवे णं भंते ! दोवे भरहे वासे इमोसे ओसप्पिणीए" हे भदन्त! इस जम्बूद्वीप नाम ભરતક્ષેત્રમાં આ કાલ સ્વરૂપ પ્રતિપાદિત થયેલ છે, એથી ભરતક્ષેત્રના સ્વરૂપ વિષે જાવાને ઈચ્છક શ્રી ગૌતમ સ્વામી સર્વ પહેલા કહેવામાં આવેલ સુષમ સુષમા નામક કાલના સ્વરૂપ વિષે-કે જે અવસર્પિણ ના પ્રથમ આરક ના રૂપમાં કહેવામાં આવેલ છે પ્રભુ શ્રીને पूछे छ 'जवुद्दीवेण भंते ! दीवे भरहे वासे इमीसे ओसप्पिणीए' इत्यादि सूत्र-२२ ॥ ટીકાર્થ-હે ભદન્ત ! આ જ બુદ્વીપ નામના દ્વીપમાં સ્થિત ભરતક્ષેત્રમાં આ અવસર્પિણ Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. घक्षस्कार सू. २२ सुषमसुषमाख्यावसपिण्याः निरूपणम् १८७ अवसपिण्याः सुषमसुषमायां समायां कालविभागरूपायां प्रथमेऽरके इत्यर्थः, तस्यां कीदृश्याम् ? 'उत्तमकट्टपत्ताए' उत्तमकाष्ठाप्राप्तायां प्रशस्तप्रकृष्टावस्थां गतायां सत्यां 'भरहस्स बासस्स केरिसए' भरतस्य वर्षस्य कीदृशकः - कीदृशः ' आयारभाव पडोयारे' आकारभावप्रत्यवतारः स्वरूपपर्याय प्रादुर्भावः 'होत्था' अभवत् ? इति । भगवानाह - 'गोयमा !" हे गौतम! अस्या अवसर्पिण्याः सुपमसुषमायां समायां भरतवर्षस्य 'बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था' बहुसमरमणीयो भूमिभागोऽभवत् ' से जहा णामए आfagrats ar are frणामणि पंचवण्णेहिं तणेहि य मणीहिय उवसोभिए' तद्यथा नामकः आलिङ्गपुष्करमिति वा यावत् नानाविधपञ्चवर्णैः तृणैश्च मणि मिश्र उपशोभितः । अत्र यावच्छब्दसंग्राह्याणि पदानि राजप्रश्नीयसूत्रस्य पञ्चदश सूत्रादारभ्य एकोनविंशतितम सूत्रपर्यन्तात् सूत्रसमूहादु विज्ञेयः, तदर्थश्चापि तत्रैव मत्कृतसुबोधिनी टीकातोऽवसेय के द्वीप में स्थित भरतक्षेत्र में इस अवसर्पिणी काल के "सुमसुमाए समाए" सुषमसुषमा नाम के प्रथम आरक में “उत्तम कटूपत्ताए" जब कि वह अपनोसर्वोत्कृष्ट अवस्था में वर्त रहा था “भरहवासस्स केरिसए आयारभाव डोयारे" भरतक्षेत्र का कैसा आकारभावप्रत्यवतार - स्वरूप " होत्था" था, इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं - " गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था, से जहा णामए आलिंगपुत्रखरेइ वा णाणामणिपंचवण्णेहिं तणेहिं य मणोहि य उवसोभिए" हे गौतम! जब जम्बूद्वीपति इस भरतक्षेत्र में अवसर्पिणी काल के समय प्रथम सुषमसुषमा नाम का प्रथम आरक अपनी सर्वोत्कृष्ट अवस्था पर चलता था उस समय यहां भूमिभाग बहुसम रमणीय था और वह ऐसा बहुसम था जैसा कि मृदंग का मुखपुट होता है यावत् वह नाना प्रकार के पांच वर्णों वाले मणियों से एवं तृणों से सुशोभित था. यहां यावत्पद से जिन पदों का संग्रह किया गया है उनपदों को यदि जानना हो तो इसकेलिये राजप्रश्नीयसूत्र के १५ वें सूत्र से लेकर १९वें सुत्र तक के कथन को देखना चाहिये. वहां पर इसविषय को उसकी सुबोधिनी टीका अपना 'सुसम सुसमाए" सुषभ सुषमा नामना प्रथम २५ भां "उत्तम कट्टपत्ता" न्यारे ते चातानी सर्वोत्कृष्ट अवस्थामा वर्ती रह्यो । "भरहवासस्स केरिसए आयारभाव - पडोयारे” भरतक्षेत्रने है। आर ला प्रत्यवतार - ( स्त्ररुप) 'होत्था' हुतो. सेना वामમાં પ્રભુ કહે છે " गोयमा ! बहुसमर णिज्जे भूमिभागे होत्था से जहाणामप आलिंग पुक्खरेह वो जाव नाणामणि पंचवण्णेहि तणेहिं य मणीहिय उवसोभिए” हे गौतम! જ્યારે જ ખૂદ્ભીપાશ્રિત આ ભરતક્ષેત્રમાં અવસર્પિણી કાળના સમયે પ્રથમ સુષમસુષમા નામક પ્રથમ આરક પેાતાની સર્વોત્કૃષ્ટ અવસ્થા પર ચાલી રહ્યો હતું, તે સમયમાં અહી’ ભૂમિ ભાગ બહુ સમ રમણીય હતા અને તે એવા બહુસમ હતા કે જેવા મૃદ ંગના મુખ ૫૮ ને આકાર હોય છે. યાવત્ તે અનેક પ્રકારના પાંચ વધુ વાળા મણિએ થી તેમ જ તૃણેાથી સુÀાભિત હતા અહીં યાવપદ થી જે પદાના સ ંગ્રહે કરવામાં આવેલ છે તે પદે વિષે તે જાણુવાની ઈચ્છા હોય તે એના માટે રાજપ્રશ્નીય સૂત્રના ૧૫ માં સૂત્ર થી માંડી ને ૧૯ માં સૂત્ર સુધીના કથનને જોવુ જોઈ એ. અહીં' આ વિષય ને તેની સુખે Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे इति । यद्यद्वर्णविशिष्टैस्तृणैश्च मणिभिश्च स उपशोभितस्तत्तवर्णविशिष्ट तृणमणिप्रतिपादनायाह--'तं जहा-किण्हेहि जाव मुक्किलेहि' तद्यथा-कृष्णैर्यावच्छक्लैरिति । अत्र यात्पदेन 'नीलैंः लोहितः हारिदैः' इति संग्राह्यम् तथा ‘एवं वण्णो गंधो रसो फासो सद्दो य तणाण य मणीण य भाणियबो' तेषां तृणाना मणीनां च वर्णो गन्धोरसः स्पर्शः शब्दश्च भणितव्यः । वर्णादि स्पर्शान्तवर्णनं राजप्रश्नीयसूत्रस्य पञ्चदशसूत्रादारभ्य एकोनविंशतितमसूत्रपर्यन्तेऽवलोकनोयम् शब्दवर्णनं तस्यैव त्रिपष्टितमचतु षष्टितमेति सूत्रद्वयेऽवलोकनीयम् । तथा 'जाव' यावत् तत्थ णं बहवे मणुस्सा मणुस्सीओ य आसयंति' तत्र खलु बहवो मनुष्या मानुष्यश्च आसते, अत्र यावत्पदेन पुष्करिण्यः पर्वतकाः गृहकाणि मण्डपकाः पृथिवो शिलापट्टकाश्च ज्ञातव्याः । तत्र पुष्करिणीवर्णनं तस्यैव पञ्चषष्टितमसूत्रतः पर्वतकवर्णने पटषष्टितमसूत्रतः गृहकवर्णनं सप्तषष्टितमसूत्रतः, मण्डपकवर्णनं पृथिवीशिलापट्टकवर्णनं च अष्ट्षष्टितमसूत्रतो बोध्यम् । द्वारा स्पष्ट किया गया है। -'किण्हेहिं जाव सुकिल्लेहि एवं वण्णों, गंधो, रसो, फासो सदोयतणाण य मणीण य भाणियव्यो मणुस्सा जाव तत्थ णं बहने माणुसा माणुसीओ य आसयंति सयंति चिटुंति णिसीयंति तुयति हसंति रमंति ललंति" वे वहां के मणि और तृण कृष्णवर्ण यावत् नीलव र्ण, लोहित ( लाल ) वर्ण एवं पीत वर्ण इन वर्णो से एवं शुक्लवर्ण से युक्त हैं । इस उन मणियो और तृणों के गन्ध, रस, स्पर्श और शब्द का वर्णन जैसा कि राजप्रश्नीय सूत्र के १५ वें सूत्र से लेकर १९ वें सूत्र तक वहां पर किया गया है उसी प्रकार से यहां पर भी वह वर्णन कर लेना चाहिये इनके शब्दों का वर्णन राजप्रश्रीय सूत्र के ६३ वे सूत्र में और ६४ वें सूत्र में किया गया है । यावत् वहां पर अनेक मनुष्य और मनुष्य स्त्रीयां उठती बैठती रहती हैं इत्यादि यहां यावत्पद से पुष्करिणियों का, पर्वतों का, गृहों का, मण्डपों का और पृथिवीशिलापट्टकों का ग्रहण हुआ है । पुष्करिणियों का वर्णन राजप्रश्रोय सूत्र के ६५ वें सूत्र से पर्वतों का वर्णन ६६ वें सूत्र से, गृहों का वर्णन ६७ वें सूत्र से एवं मण्डपों का और पृथिव शिलापट्टों का वर्णन ६८ धिनी नामनी 2018 स्पष्ट ४२वामां आवे छ, “किण्हेहिं जाव सुश्किल्लेहिं एवं वण्णो, गंधो, रसो फासो सहोय तणाणय मणोणय भाणियब्बो जाव तत्थ णं बहवे मणुस्सा माणुसीओ य आसयंति, सयंति, चिटुंति, णिसीयंती, तुयति रमंति, ललंति” त्यांना મણિ અને તૃણ કૃષ્ણ વર્ણ યાવતુ નીલવર્ણ, હિતવર્ણ પીતવર્ણ તથા શુકલ વણે થી યુ છે. આ પ્રમાણે તે મણિએ અને તૃણેના ગધ, રસ, પશે અને શબ્દનું વર્ણન જે પ્રમાણે રાજપ્રશનીય સૂત્રના ૧૫ માં સુત્રથી માંડીને ૧૯ માં સૂત્ર સુધી માં કરવામાં આવ્યું છે તે પ્રમાણે જ અહીં પણ વર્ણન કરી લેવું જોઈએ. એમના શબ્દોનું વર્ણન રાજપ્રનીય સૂત્રના ૬૩ માં સૂત્ર અને ૬૪ મા સૂરમાં કરવામાં આવેલ છે. યાવત્ ત્યાં અનેક પુરુ, રત્રીઓ ઉડતાં, બેસતાં રહે છે. ઈત્યાદિ. અહીં યાવત્ પર થી પુષ્કરિણીઓ, પર્વતો ગ્રહ મંડપ અને પૃથિવી શિલા પટ્ટાનું ગ્રહણ થયેલું છે. પુષ્કરિણીઓનું વર્ણન રાજપ્રશનીય સુત્રના ૬૫ મા સૂત્ર થી, પર્વતા નું વર્ણન ૬૬ સત્ર થી ગૃહોનું વર્ણન Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. २२ सुषमसुषमाख्यावसर्पिण्याःनिरूपणम् १८९ अर्थोऽपि तत्रैव मत्कृतसुबोधिनी टीकातोऽवसेयः। तथा 'आसयंति सयंति' आसते शेरते इत्यादीनामर्थोऽस्यैवागमस्य षष्ठ सूत्रतो विज्ञेयः । केवलं 'शेरते' इत्यस्य अन्यो ऽर्थों बोध्यः । तत्र देवानां निद्राया अभावात् 'शेरते शय्योपरिशरीरप्रसारणमात्रं कुर्वन्ति इत्यर्थः मनुष्याणां तु शरीरप्रसारणस्य निद्रायाश्वापि संभवात् अत्र शेरते-शय्यो. परि शरीरं प्रसारयन्ति निद्रान्ति चेत्यर्थ इति । शिष्योपकारपरायणेन गुरुणा शिष्याऽविजिज्ञासितोऽपि विषयः स्वयं वक्तव्य इति प्रथमारकप्रभावजनितं भरतक्षेत्रभूमिसौभाग्यं सूचयितुमाह-तीसेणं इत्यादि । 'तीसेणं' तस्यां पूर्वोक्तायां खलु 'समाए' समायां सुषमसुषमायां 'भारहे-बासे वहवे' भरते वर्षे बहवः-अनेके 'उद्दाला कुद्दाला' उद्दालाः कुद्दालाः, 'कयमाला' कृतमालाः 'नट्टमाला दंतमाला नागमाला सिंगमाला संख माला सेयमाला णाम' नृतमालाः दन्तमालाः नागमालाः शृङ्गमालाः शङ्खमालाः श्वेत मालाः नाम वें सूत्र से जान लेना चाहिये इन सूत्रोंके पदों की व्याख्या हमने उनकी सुबोधिनो टीका में कर दी है "आसते शेरते" इत्यादि क्रिया पदों की व्याख्या इसी आगम के छद्रे सूत्र में की जा चुकी है । "शेरते" शब्द का अर्थ यद्यपि सोना होता है पर वहां यह अर्थ विवक्षित नहीं हुवा है क्यो कि देवों को निद्रा का अभाव रहता है इसलिये इसका अर्थ केवल यहां पर शय्या के ऊपर वे देव और देवियां अपने अपने शरीर को पसार कर लेट जाती हैं ऐसा ही "शेरते" इस क्रियापद का अर्थ किया गया है पर यह अर्थ यहां नही किया है क्यों की मनुष्यों में शय्या के ऊपर शरीर प्रसारण भी देखा जाता हैं और निद्रा लेना भी देखा जाता है इसलिये शेरते क्रियापद का अर्थ यहां पर "वे लेटते भी हैं और निद्रा भी लेते है" ऐसा ही करना चाहिये इस नीति के अनुसार कि गुरु के द्वारा जो कि शिष्यों के उपकार करने में ही परायण रहते हैं शिष्यजनों द्वारा अविजिज्ञासित भी विषय स्वयं बताना प्रकट करना चाहिये, अब सूत्रकार भारतक्षेत्र की भूमि के सौभाग्य को सूचित करने के लिए कहते हैं 'तीसे णं समाए भरहे वासे बहवे उद्दाला कु૬૭ માં સૂત્ર થી તેમ જ મંડપ અને પૃથિવી શિલાપટ્ટકોનું વર્ણન ૬૮ મા સૂત્રથી કરવામાં આવેલ છે. આ સૂત્રોના પદોની વ્યાખ્યા તેની સુબોધિની ટીકામાં કરવામાં આવેલ छ. "आसते शेरते' त्याहि लियापहोनी व्याच्या मा २४ सामना ६ सूत्रमा ४२वामा मावत छे. “शेरते। शने अथले 'सु ' थाय छे. ५२'तुमही । अर्थ વિવક્ષિત નથી. કેમ કે દેવ સૂતા નથી. એથી આ શબ્દને અર્થ ફકત અહીં શય્યાની 6५२ हे सने हवा में। पाताना शरीर ने प्रसत ४१ २ वट छे, मडी 'शेरते' કિયા પદ ને અર્થ મનુષ્યના સંદર્ભમાં કરવામાં આવેલ છે. તે રૂપમાં કરવામાં આવેલ છે. મનુષ્યો શય્યા પર શરીરનું પ્રસારણ કરે છે અને નિદ્રાધીન પણ થાય છે. એથી 'शेरते' या पहने। अर्थ माता बेटे छ भने निद्राधीन पण थाय छे. सेवा કરવું જોઈએ. આ નીતિ મુજબ શિષ્યોના ઉપકારમાં રત ગુરુ શિષ્ય વડે અવિજિજ્ઞાસિત વિષયના સંબંધમાં પણ જાતે યથા સમય સ્પષ્ટતા કરતા રહે છે. તે મુજબ હવે સૂત્રકાર भरतक्षेत्रनी भूभिना सोमाय ने सूयित ४२१। भाटे ४ छ-"तीसेणं समाए भरहे वासे Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १९० जम्बूद्वीपप्रज्ञसूत्रे I प्रसिद्धाः 'दुमगणा' द्रुमगणाः उत्तमवृक्ष जाति विशेषसमूहाः 'पण्णत्ता प्रज्ञप्ताः मया - ऽन्यैश्च तीर्थकरैः । ते च कीदृशाः ? इति जिज्ञासायामाह - ' कुस - विकुसविसुद्धरुक्खमूला' कुश विकुशविशुद्धवृक्षमूलाः तत्र कुशाः - दर्भाः विकुशाः बल्वनादयस्तुणविशेषाश्चेति कुश विकुशास्तैर्विशुद्धं - रहितं वृक्षमूलं वृक्षाघोभागो येषां ते तथा, मूलमिह शाखा - दोना मपि आदिभागो लक्षणया गृह्यते, ततश्च सकलवृक्षसत्कमूलज्ञापनायेह वृक्षपदमु पात्तम् । तेन सर्वेऽपि वृक्षाः स्वस्वमूलेषु शाखा प्रशाखादि मूलेषु च कुशविकुशवर्जिता इत्यर्थः । पुनः कीदृशास्ते ? इत्याह- 'मूलमंतो' मूलवन्तः - अत्र प्रशस्तार्थे मतुपू प्रत्ययः तेन दूरावगाढप्रशस्तमूलयुक्ता इत्यर्थः एवमग्रेऽपि 'कंदमंतो जाव' कन्द वन्त यावत् या - वत्पदेन जगतो वनगतवृक्षगणवत् सर्व विशेषणं ग्राह्यम् तदर्थश्च तत्सङ्गा द्बोध्यः, वृक्षववर्णनं च पञ्चमसूत्राद्बोध्यम् । कियदवधि विशेषणं वृक्षस्य संग्राह्यम् इत्याह 'बीयमंतो' बीजवन्तः प्रशस्तबीजयुक्ताः इति पर्यन्तम्, तथा 'पत्तेहिय पुप्फेहिय फलेहिय उछाला, कयमाला माला दंतमाला, नागमाला, सिंगमाला संखमाला, सेयगाला णामं दुमगणा पण्णत्ता" उस सुषम सुषमा काल में इस भारत क्षेत्र में अनेक उद्दाल, कुद्दाल, मोदाल, कृतमाल, नृत्तमाल, दन्तमाल, नागमाल, शृङ्गमाल शङ्खमाल और श्वेतमाल नामके प्रसिद्ध उत्तमवृक्ष जाति के उत्तम वृक्षो का समूह कहा गया है " कुस विकुस विसुद्धरुक्खमूला मूलमंतों, कंदमंतो जाव ? यतो पत्ते हि य पुप्फेहि, फलेहि य उच्छण्णपडिउण्णा सिरीए अईव अईव उवसोभेमाणा चिट्ठ ति" ये सब वृक्ष अपने अपने मूल भागो में और शाखा प्रशाखा आदि के मूल स्थानों में कुश और विकुश बल्वज आदि तृण विशेषों से रहित हैं । वृक्षों का जो अधोभाग होता है वह यहां मूल शब्द से गृहीत हुआ है । तथा लक्षणा से शाखादिकों का भी आदि भाग गृहीत हो जाता है तथा ये सब वृक्ष प्रशस्त मूल वाले हैं क्योंकि इनके मूल जडे बहुत बहुत दूरदूर तक जमीन में गहरे गये हुए है । इसी तरह से ये सब वृक्ष प्रशस्त कन्दों वाले हैं यहां आगत यावत् बहवे उद्दालाः कुला कयमाला णट्टमाला, दंतमाला, नागमाला, सिंगमाला, संखमाला, सेयमाला, णामं दुमगणा पण्णत्ता" मा सुषभ सुषमा असमां आ भरत क्षेत्रमा अने उद्दास, सुहास, भोहास, द्रुतभास' नृत्तमास, हतभाव, नागभाव, श्रृंगमास, शांणमा भने શ્વેતમાલ નામના પ્રસિદ્ધ ઉત્તમ વૃક્ષ જાતિના ઉત્તમ વૃક્ષ સમૂહેા કહેવામાં આવેલ છે. "कुसविकुसविसुद्धरुक्खमूला मूलमंतो कंदमंतो जाव वीयमंतो पत्तेहिय पुफ्फेहि, फलेहि, य उच्छण्ण पडिच्छण्ण सिरोप अईव २ उवसोभेमाणा चिट्ठति सा सर्व वृक्षो પેાત પેાતાના મૂળ ભાગેામાં અને શાખ પ્રશાખા આદિના મૂળ સ્થાનેમા કુશ અને વિષુરાખવન વગેરે તૃણુ વિશેષાથી રહિત હોય છે. વૃક્ષને જે ધેાભાગ હાય છે તે અહીં મૂલ શબ્દથી ગૃહીત થયેલ છે. તેમ જ લક્ષણાથી શાખાદિકને પશુ દિલગ સંગૃહીત થઈ જાય છે. તેમ જ આ સર્વ વૃક્ષે પ્રશસ્ત મૂલ વાળા છે કેમ કે એમના સૂત્રભાગ ખહુ જ ઊંડા સુધી ભૂમિમાં ગયેલા છે. આ પ્રમાણે આ સત્ર વૃક્ષેા પ્રશસ્ત કદો વાળા છે. અહી' આવેલ યાવત પદે આ બતાવે છે કે જગતી ના વનવૃક્ષેાના વર્ણન માં જેટલા Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार स.२२ सुषमसुषामख्यावसपिण्याः निरूपणम् १९१ च्छण्णपडिच्छण्णा' पत्रैश्च पुष्पैश्च फलैश्च अवच्छन्न प्रतिच्छन्नाः व्याप्ताः 'सिरीए' श्रि या-शोभया 'अइव २'अतीवातीव अतितराम् ‘उवसोभेमाणा' उपशोभमानाः विराजमाना: 'चिट्ठति' तिष्ठन्ति विद्यान्ते 'तीसेणं समाए भरहे वासे' तस्यां समायां खलु भरते वर्षे भरतक्षेत्रे 'तत्थतत्थ' तत्र तत्र स्थले स्थले 'बहवे' बहुनि वहुसंख्यकानि मूले पुस्त्वं प्राकृतत्वान्दोध्यम् 'भेरुतालवणा' भेरुतालवनानि भेरुतालाः वृक्षविशेषाः तेषां वनानि एवं 'हेरुतालवणाई मेरुतालवणाई पभया लवणाइं सालवणाई सरलवणाई सत्तवण्णवणाई पूयफलिवण्णाई खज्जूरीवणाई णालिएरीवणाई' हेरुताल मेरुताल प्रभताल साल सरल सप्तपर्ण पूगफली खजूरी नालिकेरीणां वृक्षविशेषाणां वनानि तानि च बनानि कीदृशानि? इत्याह-'कुसबिकुस बिसुद्धरुक्खमूलाइ' कुशविकुशविशुद्धवृक्षमूलानि कुशविकुशवर्जितवृक्षपद यह प्रकट करता है कि जगती के वन के वृक्षो के वर्णन में जितने विशेषण प्रशस्त बीज विशेषणतक प्रयुक्त किये गये हैं वे सब ही विशेषण इन वृक्षो के वर्णन करने में यहां पर भी गृहोत कर लेना चाहिये । वृक्षों का वर्णन पंचम सूत्रमें किया गया है तथा ये सब वृक्ष पत्रों से पुष्पों से, और फलों से भरे हुए रहते हैं । इस कारण ये अपनी शोभा से बहुत अधिक रूप में सुहावने हैं । "तीसे गं समाए भरहे वासे तत्थ तत्य बहवे भेरुतालवणाई, हेरुतालवणाई मेरुतालवणाई पमयालवणाई सालवणाई सरलवणाई सत्तवण्णवणाइ', प्यफलिवणाई,खज्जूरीवणाई, णालिएरीवणाई, कुसविकुस वसुद्धरुक्स्वमूलाई जाव चिटुंति" उसकाल में भारतवर्ष में जगह २ अनेक मेरुताल-वृक्षविशेषके वन होते हैं , हेरुतोल के वन होते हैं, मेरुताल के वन होते हैं, प्रभताल के वन होते हैं, सालवृक्षोके वन होते हैं, सरलवृक्षो के वन होते हैं, सप्तपर्णों के वन होते है, पूगफली सुपारीके वृक्षों के वन होते हैं खजू री-पिण्डखजूरो के वन होते हैं और नारियल के वृक्षो के वन होते हैं । इन वनो में रहे हुए इन वृक्षो के नीचे का भूभाग कुश-काश और विल्वादि लताओं से વિશેષ પ્રશસ્ત બીજ વિશેષ સુધી પ્રયુકત કરવામા આવેલ છે. તે સર્વ વિશેષણે આ વૃક્ષોના વર્ણનમાં અહી પણ ગૃહીત કરવા જોઈએ. વૃક્ષોનું વર્ણન પંચમ સૂત્રમાં કરવામાં આવેલ છે. તેમ જ આ સર્વ વૃક્ષે પત્ર, પુષ્પ અને ફળેથી અલંકૃત રહે છે. એથી આ वृक्षा महु सुह२ ला संपन्न l गत थाय छे "तीसेण समाए भरहे वासे तत्थ २ बहवे मेरुतालवणाई, हेरुतालवणाई, मेरुतालवणाइ , पमयालवणाई, सालवणाई, सरलवणाई सत्तवण्ण वणाई, पूयफलिवणाई खज्जूरी वणाई, णालिएरी वणाइ कुसविकसविसद्ध रुक्खमलाई जाव चिति" ते मां भारतवमा मनोस તાલ–વૃક્ષ વિશેષ–ના વને હેાય છે હેરુતાલના વને હેય છે, મેરુતાલના વને હોય છે, પ્રભતાલના વનો હોય છે. સાલવૃક્ષના વનો હોય છે, સરલવૃક્ષેના વને હોય છે, સપ્તપ ના વને હોય છે, પૂગફલી-સેપારી-ના વૃક્ષના વને હોય છે, ખજૂરી–પિંડખજરેના વનો હોય છે. અને નારિયેલના વૃક્ષેના વને હોય છે. આ વને માં આવેલા વૃક્ષોની નીચેના ભૂમિ ભાગ કુશ-કાશ અને મિલવાદિ લતા એથી સર્વથા રહિત હોય છે. આ વૃક્ષે પણ પ્રશસ્ત મૂલ વાળા હોય છે. પ્રશસ્ત કંદવાળા હોય છે. ઈત્યાદિ રૂપ થી જે જે વિશેષ Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मूलसहितानि 'जाव चिट्ठति' यावत्तिष्ठन्ति । यावत्पदेन मूलवन्ति कन्दवन्तित्यादीनि उपरितनानि पदानि संग्राह्याणि । तथा 'तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ बहवे सेरियागुम्मा' तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र वहवः सेरिकागुल्माः-सेरिकाऽऽख्यलता समूहाः ‘णोमालियागुम्मा' नवमालिकागुल्माः नवमालिकालतासमूहाः एवं 'कोरंटयगुम्मा' कोरण्टकगुल्माः 'बंधुजोवगगुम्मा' बन्धुजीवक.गुल्माः ‘मणोज्जगुम्मा' मनोऽवद्यगुल्माः 'बीयगुम्मा' बीजगुल्मा 'बाणगुम्मा' बाणगुल्मा' नील झिण्टिकागुल्माः 'कणइरगुम्मा' कर्णिकारगुल्माः कर्णिकाराणां 'कणेर इति भाषा प्रसिद्धानां गुल्माः तथा 'कज्जयगुम्मा' कुब्जकगुल्मा कुब्जा वृक्षविशेषास्त एव कुब्जका तेषां गुल्मा 'सिंदु सर्वथा रहित होता है, ये वृक्ष भो प्रशस्त मूल वाले होते हैं, प्रशस्त कन्दवाले होते हैं- इत्यादि रूप से जो विशेषण अभी २ ऊपर में संग्राह्य कहे गये हैं वे सब विशेषण यहां इन वृक्षो के वर्णन मे भी प्रशस्त बोजतक के विशेषणतक ग्रहण कर लेना चाहिये "तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ बह वे सेरियागुम्मा, णोमालियागुम्मा, कोरंटयगुम्मा, बंधुजीवयगुम्मा, भणोज्जगुम्मा, बीयगुम्मा बाणगुम्मा कणइगुम्मा, कज्जयगुम्मा सिंदुवारगुम्मा, मोग्गरगुम्मा, जहियागुम्मा, मल्लियागुम्मा, वासंतियागुम्मा, वत्थुलगुम्मा कत्थुलगुम्मा, सेवालगुभ्मा, अगस्थिगुम्मा, मगदंतिगुम्मा चंपकगुम्मा, जाईगुम्मा णवणीयगुम्मा कुंदगुम्मा, महा जाइगुम्मा रम्भा, महा मेहणिकुरंबभूया दसवण्णं कुसुमं कुसुमेति" उस कालमें भरतक्षेत्र में जगह जगह अनेक सेरिका नामकी लताओं के समूह होते हैं, नवमालिका नामको लताओ के समूह होते हैं कोरण्ट नामकी लताओं के समूह होते हैं, बन्धु जीवक नामको लताओं के समूह होते हैं मनोऽवद्य नामकी लताओं के समूह होते हैं, वोजगुल्म होते हैं पण तुम होने हैं । नोलझिंटिका गुल्म होते हैं, कनेर के गुल्ल होते हैं । कुब्नक के गुन्म होते हैं, वृक्ष विशेष का नाम कुब्ज हैं, सिन्दुरवार હમણાં જ ઉપર સંગ્રહ કરવામાં આવેલા છે તે સર્વ વિશેષણે અહીં આ વૃક્ષેના વર્ણનમાં ५६ प्रशस्त भी सुधीना विशेष सुधा अड ४२११ नसे. "तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ २ बहवे सेरिया गुम्मा, णोमालिया गुम्मा कोरंटयगुम्मा, बंधुजीवयगुम्मा, मणोज्ज गुम्मा, बोजगुम्मा, बाणगुम्मा, कणइर गुम्मा, कज्जय गुम्मा, सिंधुवारगुम्मो, मोग्गरगुम्मा जूहियागुम्मा मल्लिया गुम्मा' वासंतिया गुम्मा, वत्थुल गुम्मा, कत्थुल गुम्मा, सेवाल गुम्मा, अगस्थि गुम्मा मगदंतिया गुम्मा चंपग गुम्मा, जाई गुम्मा, णवणो यया गुम्मा कुद गुम्मा महाजाइगुम्मा रम्मा, महामेहणिकुरंबभूया दसवण्णं कुसुम कुसमेंति' अणे भरत क्षेत्रमाणे घी से नामनी तासाना समूडा डाय છે. નવમાલિકા નામની લતાઓના સમૂહો હોય છે. કરંટ નામની લતાઓના સમૂહ હોય છે. બધુ જીવક નામની લતાઓના સમૂહ હોય છે. મને વઘ નામની લતાઓના સમૂહે હોય છે બીજ ગુલ્મો હોય છે. બાણ ગુમે હોય છે. નીલર્કિટિકા ગુલ્મો હોય છે. કણેરના ગુમે હેાય છે. કુર્જકના ગુલ્મ હોય છે વૃક્ષ વિશેષનું નામ કુજક છે. સિંદૂ Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. २२ सुषमसुषमाख्यावसर्पिण्याः निरूपणम् १९३ वारगुल्मा' सिन्दुवारगुल्माः 'मोग्गरगुम्मा' मुद्गरगुल्माः वेली इति प्रसिद्धपुष्पविशेषगुल्माः 'जूहियागुम्मा' यथिकागुल्माः जूहि' इति प्रसिद्ध पुष्पविशेषगुल्माः 'मल्लियागुम्मा मल्लिकागुल्माः 'वासंतियागुम्मा' वासन्तिकागुल्माः 'वत्थुलगुम्मा' वस्तुलगुल्माः हरितवनस्पतिविशेषगुल्माः शाकविशेषगुल्मा वा 'कत्थुलगुम्मा' कस्तुलगुल्माः वनस्पति विशेषगुल्मा 'सेवालगुम्मा' शैवालगुल्माः 'अगस्थिगुम्मा' अगस्त्यगुल्मा:-अगस्तिपुष्पगुल्माः 'मगदंतियागुम्मा' मगदन्तिकागुल्मा:-'चम्पगगुम्मा' चम्पकगुल्माः 'जाईगुम्मा' जाती गुल्माः मालतीगुल्माः ‘णवणोइयागुम्मा' नवनीतिकागुल्माः पुष्पप्रधान वनस्पतिविशेषगुल्माः 'कुंदगुम्मा' कुन्दगुल्मा माद्यपुष्पविशेषगुल्मा ‘महाजाइगुम्मा' महाजातीगुल्माः वृहन्मालतीगुल्माः ते च गुल्माः कीदृशाः इत्याह 'रम्मा' रम्: मनोहरा 'महामेहणिकुरंबभू या' महामेधनिकुरम्बभूता महान्तः साटोपा ये मेघास्तेषां निकुरम्बेन समूहेन भूताः सदृशाः 'दसद्धवणं' दशार्द्धवणे पञ्चवर्ण 'कुसुमं' कुसुमं पुष्पं पुष्पाणोति बोध्यम् जातावेकत्वात् 'कुसुमेति' कुसुमयन्ति उत्पादयन्ति कुसुमपदसमभिव्याहारे फलांशस्यात्रमोषात् कुसुमं कुर्वन्ति उत्पादयन्तीति हि तस्य विवरणम् 'जे णं भरहे वासे बहुसमरमणिज्जं भूमिभागं' ये गुल्माः खलु भरते वर्षे स्थितं बहुसमरमणीयम् भूमिभागम् 'वायविधुयग्गसालामुक्क गुल्म होते हैं, मुद्गर वेली के गुल्म होते हैं यूथिका स्वर्णजुही के गुल्म होते हैं, मल्लिकालता के गुल्म होते हैं, वासन्तिकालता के गुल्म होते हैं, वस्तुल के गुल्म होते हैं, वस्तुल यह एक प्रकार की हरित वनस्पति का नाम है और यह शाक के काम में आती हैं वनस्पति विशेषरूप कस्तुल के गुल्म होते हैं शैवाल के गुल्म होते है, अगस्तिपुष्प के गुल्म होते हैं, मगदन्तिका के गुल्म होते हैं चम्पक के गुल्म होते हैं, मालती के गुल्म होते हैं पुष्पप्रधान वनस्पति रूप नवनीतिका के गुल्म होते हैं, माद्यपुष्पविशेषरूप कुन्द के गुल्म होते हैं एवं बृहत् मालती के गल्म होते हैं। ये सब गुल्म बडे सुन्दर होते हैं और आटोपयुक्त मेध के समूह जैसे होते हैं तथा पांच वर्णों वाले पुष्पो को ये उत्पन्न करते रहते हैं “जे णं भरहे वासे बहुसमरमणिज्ज भूमि भागं वायविधुयग्गसाला मुक्कपुप्फ.' ये गुल्म भारतक्षेत्र में स्थित बहुसमरमणीय भूमिभाग को वायु વારના શુભ હોય છે. મુદુગર વેલી ના ગુમ હોય છે. યૂથિકા-સ્વર્ણ જુહીના ગુમ હોય છે. મલ્લિકા લતાના ગુમે હોય છે. વાસંતિકા લતાના ગુલમો હોય છે. વસ્તલના ગર્ભે હોય છે. વસ્તુલ આ એક પ્રકારની હરિત વનસ્પતિ નું નામ છે. અને આ એક બનાવવાના ઉપયોગ માં આવે છે. વનસ્પતિ વિશેષરૂપ કસ્તુલના ગુલ્મ હોય છે. સેવા લના ગુમ હોય છે. અગસ્તિ પુષ્પના ગુમે હોય છે. મગદંતિકાના ગુમે હોય છે. ચંપકના ગુમ હોય છે. માલતીના ગુલમો હોય છે. પુપ પ્રધાન વનસ્પતિ રૂપ નવનીતિ કાના ગુલમો હોય છે. માદ્ય પુરુષ વિશેષ રૂપે કુંદના ગુમ હોય છે. તેમજ બહત માલતીના ગુમ હોય છે. આ સર્વ ગુમે અતીવ સુદંર હોય છે અને આપ યુક્ત મેઘના સમૂહ જેવા હોય છે. તેમજ પાંચ વર્ણ વાળા પુષ્પને આ સર્વે ઉત્પન્ન કરતા રહે છે. "जे ण भरहे वासे बहुसमरमणिज्ज भूमिभाग वायविधुयगसाला मुक्क पुप्फ०" मे शुक्ष्मी २५ Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे पुप्फपुंजोवयारकलिय' वातविधुताग्रशालामुक्तपुष्पपुञ्जोपचारकलितं वातेन वायुना विधुताः विशेषेण कम्पिताः या अग्रशाला शालाग्राणि शाखाग्राणि ताभिर्मुक्तः त्यक्तो य पुष्पपुजः पुष्पसमूहः स एव उपचारः रचनाविशेषस्तेन कलित-युक्तं 'करेंति'कुर्वन्ति अग्रशाला इत्यत्र आर्षत्वादग्र शब्दस्य पूर्वप्रयोगः तथा 'तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ तहिं तहि बहुइओ पउमलयाओ जाव' तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र तस्मिंस्तस्मिन् देशे तत्र तत्रतस्य तस्य देशस्यावान्तरदेशे बहव्य पद्मलता यावत्-यावत्पदेन 'नागलता अशोकलताः चम्पकलताः आम्रलताः वनलताः वासन्तिकलता अतिमुक्त कलता कुन्दलता इति संग्राह्यम् , तथा 'सामलयाओ' श्यामलताश्च प्रज्ञप्ता ताश्च कीदृश्य इत्याह-"णिच्च कुसुमियाओ' नित्यं कुमुमिता 'जाव यावत् यावत्पदेन-नित्यं मयूरिताः इत्यादय शब्दा अस्यैवागमस्याष्टमसूत्रतः संग्राह्या इदमेव सूचयितुमाह 'लयावण्णओ' लतावर्णक इति । अथ भरतक्षेत्रवर्ति वनराजिं वर्णयति-'तीसे गं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ' तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे 'तहिं तहिं' तत्र तत्र-तस्य से कम्पित शाखाओंके अग्रभाग से त्यक्त हुए पुष्पसमूह से युक्त करते रहते हैं । “तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ तहिं तहिं बहुईओ पउमलयाओ जाव सामलयाओ णिच्चं कुसुमियाओ जाव लयावण्णओ" उस काल में भरतक्षेत्र में जगह जगह स्थान स्थान पर अनेक पालताएँ होती हैं, यावत् श्यामलताएँ होती हैं, ये सब लताएँ सर्वदा, पुष्पों को उत्पन्न करती हैं । यहां यावत्पद से "नागलता, अशोकलता, चम्पकलता, आम्रलता, वनलता वासन्तिकलता, अतिमुक्तकलता, और कुन्दलता इन सब लताओं का ग्रहण हुआ है । इन लताओं के विशेषरूप से वर्णन को देखने के लिये इसी आगम का अष्टम सूत्र देखना चाहिये, इसी सूचना के निमित्त "जाव लयावण्णओ'' ऐसा सूत्रपाठ सूत्रकार ने कहा है । "तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ तहिं तहिं बहुईओ वणराइओ पण्णत्ताओ" उस काल में भारतक्षेत्र में जगह जगह स्थान स्थान पर अनेक कनराजियां कही गई है ये वनराजियां ભરત ક્ષેત્રમાં સ્થિત બમરમણીય ભૂમિભાગને વાયુથી કંપિત શાખાઓને અગ્રભાગથી वर्षे पुष्पोथी मत ४२ता २ छे, "तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ तहिं तहिं बहुईओ पउमलयाओ जाव सामलयाओ णिच्चं कसुमियाओ जाव लया वण्णओ" मां ભરત ક્ષેત્રમાં ઠેક ઠેકાણે અનેક પદ્મલતા હોય છે. યાવત્ શ્યામલતા હોય છે. એ સર્વ લાઓ સર્વદા પુપને ઉત્પન્ન કરે છે. અહીં યાવાદથી નાગલતા, અશોક લતા, ચંપક લતા, આમ્ર લતા, વન લતા, વાસંતિકા લતા, અતિમુક્તક લતા અને કુન્દ લતા આ સર્વ લતાએનું ગ્રહણ થયું છે. આ લતાએના વિષે સવિશેષ જાણવા માટે એ જ આગમના सभा सूत्रनु अध्ययन ४२ से. भेसूयन। माटे 'जाव लया वण्णओ' मेव। सूत्रा સૂત્રકારે કરેલ છે. 'तीसेण समाए भरहेवासे तत्थ २ तहिं तहिबहु ईओ वणराईओ पण्णत्ताओ" तसे ભરત ક્ષેત્ર માં ઠેકઠેકાણે ઘણી વનરાજિઓ હતી એવું કહેવામાં આવે છે, એ વનરાજિઓ Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका सू. २२ द्वि० वक्षस्कार सुषमसुषमाख्यावसर्पिणयः निरूपणम् १९५ तस्य देशस्यावान्तरदेशे 'बहुईओ' बद्दयः-बहुसंख्याः 'वणराईओ' वनराजयः- वनपंक्तयः ‘पण्णत्ताओ' प्रज्ञप्ताः, ताश्च कीदृश्यः ? इत्याह-'किण्हाओ किण्होभासाओ जाव रम्माओ' कृष्णाः कृष्णावभासाः यावद् रम्याः इति । कृष्णावभासा इत्यारभ्य रम्या इति पर्यन्तानां पदानां वनराजि विशेषणवाचकानामत्र सङ्ग्रहो बोध्यः, तथाहि-नीलाः नीलावभासाः हरिताः हरितावभासाः शीताः शीतावभासाः स्निग्धाः स्निग्धावभासाः तीवाः तीवावभासाः कृष्णाः कृष्णच्छायाः नीलाः नीलच्छायाः हरिताः हरितच्छायाः शीता शीतच्छायाः स्निग्धाः स्निग्धच्छायाः तीव्राः तीवच्छायाः वनकटितटच्छायाः महामेघनिकुरम्बभूता रम्या इति, व्याख्या पूर्वमेव पञ्चमसूत्रे कृता पद्मवरवेदिका वन'किण्हाओ किण्होभासाआ जाव रम्माओ, रयत्तगछप्पय कोरंटगभिंगारग कोंडलग जीवं जीवग नंदीमुह कविठविंग लावा कोरंडा वायग कलसलसारस अगेगस उग गमिहुगं वियरियाओ" कृष्ण हैं और कृष्णरूप से ही इनका अवभास होता है यावत् ये बड़ी अच्छी सुहावनी लगती हैं, यहां यावत्पद से यह प्रकट किया गया है कि कृष्णावभास पद से लेकर अन्तिम रम्य पद तक जितने भी पद वनराजि के विशेषणरूप से वाचक है उन सब का यहां पर संग्रह हुआ है बे पद इस प्रकार से हैं-"नीला, नीलावभासाः, हरिताः हरितावभासाः, शीताः शीतावभासाः, स्निग्धाः स्निग्धावभासाः, तीवाः तीव्रावभासाः, कृष्णाः कृष्णच्छायाः, नीलाः नीलच्छायाः, हरिताः हरितच्छायाः, शीताः, शीतच्छायाः, सिन्धाः स्निग्धच्छायाः, तीवाः तोत्रच्छायाः, घनकटितच्छायाः, महामेघनि कुरम्बभूताः रभ्याः" इन पदों को व्याख्या पूर्व में पांचवें सूत्र में पद्मवर वेदि. का के वर्णन के प्रसङ्ग में कर दिया गया है । इन वनराजियों में पुष्पों की गंध में अनुरक्त हुए उन्मादी भृङ्ग कहीं कहीं पर भन भनाते हुए नजर आते हैं तो कहीं पर कोरङ्गक नाम के पक्षि विशेष नह चहाते हुए दिखाई पड़ते हैं कहीं पर भृङ्गारक कहीं पर कुंडलक, कहीं पर चकोर, "किण्हाओ किण्होभासाओ, जाव रम्माओ, रयमत्तगछप्पय कोरंट गभिंगारग कोंडलगजीवं जीवग नंदीमुह कविल पिंगलक्खगकोरंडव चक्कवायग कलहंस हंस सारस अणेग सउणगण मिहुणं वियरियाओ" gण छ भने ४३५थी अपमासित थाय छे. यावत् । भूमर સહામણું લાગે છે. અહી યાવતું પદથી આવાત સપષ્ટ કરવામાં આવી છે કે કૃણાલભાસ પદથી માંડીને અંતિમ રમ્ય પદ સુધી જેટલા પદે વનરાજિના વિશેષ રૂપમાં આવેલા છે ते सपना मात्र सडथये। छे. तेभसमानते ५४ मा प्रमाणे छ 'नीला नीलावभासाः, हरिताः, हरितावभासाः शीताः, शीतावभासाः, स्निग्धाः, स्निग्धावभासाः तीब्राः, तीब्राव भासाः, कृष्णः, कृष्णच्छायाः, नीलाः णीलच्छायाः, हरिताः, हरितच्छायाः, शीताः, शीतच्छाया:, स्निग्धा:स्निग्धच्छायाः, तीव्रा: तोब्रच्छायाः, धनकटितटन्छाया:,महामेघनिकुरम्बभूताः रम्याः" 241 पहोनी व्याच्या ५१२ वान प्रसमा ५ मा सुत्रमा ४२वामा આવી છે. એ વનરજિએમાં પુપની ગંધમાં અનુરક્ત થયેલ ઉન્માદી ભંગ કઈ કઈ સ્થલે ગુંજન કરતા દેખાય છે. તે કઈ કઈ સ્થળે કરંટક નામના પક્ષી વિશેષો કલરવ કરતા દેખાય છે. કોઈ સ્થળે ભંગારક, કોઈ સ્થળે કુંડલક, કેઈ સ્થળે ચકેર, કોઈ સ્થલે Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वर्णनप्रसङ्गे । तथा 'रय मत्तगछप्पय कोरंटगभिंगारग कोंडलगजीवंजीवग नन्दीमुह कविलपिंगलक्खग कारंडव चकवायग कलहंस हंससारस अणेगस उणगण मिहुण वियरियाओ' रतमत्तक षट्पदको रङ्गभृङ्गारककुण्डलकजीवञ्जीव नन्दीमुख कपिलपिङ्गलाक्षक कारण्डचक्रवाककलहंस हंससारसानेक शकुनगणमिथुनविचरिताः तत्र रताः अनुरक्ता अतएव मत्ताः - उन्मादिनो ये षट् पदाः - भ्रमराः, कोरङ्गकाः पक्षिविशेषाः, भृङ्गारकाः पक्षिविशेषाः, कुण्डलकाः - पक्षिविशेषाः, जीवजीवाः - चकोराः, नन्दीमुखाः-पक्षिविशेषाः कपिला:- पक्षिविशेषाः, पिङ्गलाक्षकाः - पिङ्गलवर्णनेत्राः पक्षिणः कारण्डवाः - पक्षिविशेषाः चक्रवाकाः - 'चकवा' इति भाषा प्रसिद्धाः पक्षिणः कलहंसा: 'बतक' इति प्रसिद्धाः, हंसाः प्रसिद्धाः, ते शकुनाः - पक्षिणः तेषां ये गणाः- समूहा- स्तेषां मिथुनेन युरमेन विचरिताः - इतस्ततः शाखाग्राच्छाखाग्रे कृतसंचाराः तथा 'सदुण्णइयमहुरसरणाइयाओ' शब्दोन्नदितनमधुरस्वरनादिताः उन्नदिता - पक्षिभिरुच्चै रुच्चारिता ये शब्दास्तेषां मधुरस्वरेण मधुरध्वनिना नादिताः ध्वनिताः तथा 'संपिंडियदरिय भ्रमरमहुकरि पहकर परिलित मत्त छप्पय कुसुमा सवलोल महुरगुमगुमंत गुंजत देस भागाओ' सम्पिण्डितदृप्त - मर मधुकरीप्रकर परिलीयमानमत्तषट्पदकुसुमासवलोळमधुर गुमगुमायमान गुञ्ज देशभागाः, सम्पिण्डिताः कुसुमासवपानार्थ परस्परसम्मिलिताः ये दृप्तानां - मदमत्तानां भ्रमराणां मधुकरीणां - भ्रमरीणां च प्रकराः समूहास्तैः सह परिलीयमानाः श्लिष्यन्तः परि मिलन्तो ये मत्तषट्पदाः, त एव पुनः कुमुमासवलोलाश्च पुष्परसाऽऽस्वादलोलुपाच तेषां मधुरं यथा स्यात्तथा गुमगुमायमानैः - गुमगुमेति मधुरभृङ्गसङ्गीतैः गुञ्जन् -मधुरमव्यक्तं शब्दायमानो देशभागो यासु तास्तथा, अत्र मधुरगुञ्जनं मधुकरवृत्त्यापि देशभागे १९६ कहीं पर नन्दीमुख, कहीं पर कपिल तीतर, कहीं पर पिंगलाक्षक, पिङ्गल नेत्रों वाले पक्षी विशेष, कहीं पर कारण्डव जलकाक और कहीं पर चक्रवाल तथा कलहंस- वतख एवं हंस अपनी अपनी घर वालियों के साथ वृक्षों की एक शाखा से दूसरी शाखाओं के ऊपर संचार करते हुए दृष्टिपथ होते है । इस तरह यह वनराजि इन पक्षियों के मधुर शब्दों से सदा ध्वनित होती रहती है । "संर्पिडियदरिय भमर महु परि पहकर परिलित मत्त छप्पय कुसुमासवलोल महुर गुम गुमंत गुजंत देसभा - गाओ" इन वनराजियों के प्रदेश जगह जगह के कुसुमों का आसव के पान करने के निमित्त परस्पर संमिलित हुए मदोन्मत्त भ्रमरों एवं भ्रमरीओं के समूह के साथ साथ मिले हुए एवं कुसुम નદી મુખ કોઈ સ્થળે કપિ તીતર, કોઈ સ્થળે પિંગલાક્ષક પિંગલ નેત્રવાળું પક્ષી વિશેષ કોઈ સ્થળે કાર ડવ જલકાક અને કાઈ સ્થલે ચક્રવાક તેમજ કલહુ સ-ખતક અને હુસ પેાતપેાતાની માદાઓની સાથે વૃક્ષોની એકથી ખીજી શાખાઓ પર સંચરણ કરતા દેખાય છે આ પ્રમાણે આ વનરાજ આ પક્ષીએના મધુર શબ્દોથી સદા મુખરિત રહે છે. “તિ डियदरियममर महुपरिपहकर परिलित मत्त छप्पय कुसुमासवलोलम दुरगुमगुमायमानगुजत सभागाओ" मा वनराजियोना प्रदेश सुभासवान पान रवा माटे परस्पर સમિલિત થયેલા મદમત્ત ભ્રમરા અને ભ્રમરીઓના સમૂહેાની સાથે સાથે એકત્ર થયેલા Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्वि० वक्षस्कार सू. २२ सुषमसुषमाख्यावसर्पिण्याः निरूपणम् १९७ समारोपितम्, तथा 'अभितरपुप्फफलाओ' अभ्यन्तरपुष्पफलाः अभ्यन्तरे पुष्पफलः सम्भृताः, 'बाहिरपत्तोच्छण्णाओ' बहिः पत्रावच्छन्नाः बहिर्भागे संजातपत्रसमूहमच्छन्नाः 'पत्तेहि य पुप्फेहि य' पत्रैश्च पुष्पैः फलैश्च 'ओच्छन्न वलिच्छत्ताओ' अवच्छन्न प्रतिच्छन्ना:-सर्वथाऽऽच्छादिताः, 'साउफलाओ' स्वादुफला:- स्वादयुक्तफलसम्पन्नाः 'निरोययाओ' निरोगका:-रोगरहिताः वृक्षचिकित्साशास्त्रप्रदर्शितरोगवर्जिताः शोतविधुदातपादि जनितोपद्रवरहिता वा, तथा 'अकंटयाओ' अकण्टकाः कण्टकरहिताः 'णाणाविह गुच्छ गुम्ममंडवगसोहियाओ' नानाविध गुच्छ गुल्म मण्डपकशोभिता:- नानाविधैः-बहुप्रकारैः गुच्छैः पुष्पस्तवकैः गुल्मैः-लताप्रतानैः मण्डपकैः-लतामण्डपैश्च शोभिताः, 'विचित्त सुहकेउ भूयाओ' विचित्र शुभकेतुभूताः-विचित्रशुभध्वज़रूपाः, 'वावी के आसव पान से चंचल हुए मत्त अन्य और षट्पदों के गुम गुम मधुर संगीत से शब्दायमान होते रहते हैं । "अम्भितरपुप्फफलाओ बाहिरपत्तोच्छण्णाओ पत्तेहि य पुप्फेहि य ओच्छन्नबलिच्छत्ताओ, साउफलाओ निरोययाओ अकंटयाओ णाणाविहगुच्छगुम्ममंडवग सोहियाओ" ये वनराजियां भीतर में तो पुष्प ओर फलों से लदो हुई हैं और बाहर में पत्रों के समूह से आच्छादित हो रही हैं इनके फल मधुर रस से भरे हुए हैं इनमें किसी भी प्रकार का रोग नहीं है अथवा यहां किसी भी प्रकार का रोग नहीं रहता है वृक्षचिकित्साशास्त्र में जो रोग कहे गये हुए हैं वे रोग यहां के वृक्षों में नहीं हैं उन रोगों से यहां के वृक्ष रहित हैं, अथवा शीतजन्य, विद्युत्पात्तजन्य एवं आतप आदि जन्य उपद्रवों से ये वृक्ष सर्वथा रहित हैं। यहां कांटों का तो नाम नहीं है, ये वनराजियां नाना प्रकार के पुष्प स्तवकों से पुष्पों के गुच्छों से गुल्मों से, लता प्रतानों से, और लता मण्डपों से शोभित हैं । " विचित्त सुहके उभूयाओ वावी पुक्खरिणी दीहिया सुनिवेसियरम्मजालहरयाओ , पिंडिमणोहारिमं, सुगंधिं सुहसुरभिमणहरं च महया गंधद्धाणि मुयंताओ सव्वोउयपुप्फતેમજ કુસુમાસવ પાનથી ચંચલ થયેલ મદમસ્ત બીજા ષપદના મધુર ગુંજન સંગીતથી शहायमान थता २ छ. "अभितरपुष्फफलाओ बाहिरपत्तोच्छण्णाओ पत्तेहियपुप्फे हिय ओच्छन्न बलिच्छत्ताओ, साउफलाओ, निरोययाओ अकंटयाओ णाणाविह गुच्छ गुम्म मंडवग सोहियाओ" थे ५२मि। म२ ता पु०॥ अने साथी युक्त छ भने प्रहार પત્રોના સમૂહથી આછન્ન છે. એમના ફળ મધુર રસેથી યુક્ત છે. એમનામાં કઈ પણ જાતને રોગ નથી અથવા અહીં કેઈ પણ જાતના રોગનું અસ્તિત્વ જ નથી. અથવા વૃક્ષચિકિત્સા શાસ્ત્ર માં જે રોનું વર્ણન છે. તે રોગો અહીંના વૃક્ષોમાં નથી. અર્થાત અહીંના વૃક્ષે તે સર્વ રેગથી રહિત છે અથવા શીત જન્ય વિદ્યુત્પાતજન્ય અને આત આદિ જન્ય ઉપદ્રવથી એ વૃક્ષો સર્વથા હીન છે. અહીં કાંટાઓનું તે અસ્તિત્વ જ નથી એ વનરાજિએ અનેક જાતના પુપસ્તબકથી-પુપોના ગુચ્છથી ગુલમોથી લતા પ્રતાनाथी अने बताभ पाथी सुशालित छे. "विचित्त सुहके उभूयाओ, वावी पुक्खरिणी दीहिया सुनिवेसिय रम्मजालहरयाओ, पिण्डिमणीहारिम, सुगंधि सुहसुरभिमणहरं च महया गंधद्धाणि मुयंताओ सव्वोउय पुप्फफलसमिद्धाओ सुरम्माओ पासाईयाओ, दरि Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे पुक्खरिणी दीहिया मुनिवेसिय रम्मजालहरयाओ' वापीपुष्करिणी दीर्घिका मुनिवेशितरम्यजालगृहकाः, तत्र-वाप्य:-चतुष्कोणाः, पुष्करिण्यः-वाप्य एव वृत्ताकाराः, दी. धिका:-ऋजुसारिण्यः, तासु मुनिवेशितानि-सृष्ठु स्थापितानि रम्याणि-रमणीयानि जालगृहकाणि -सच्छिद्रगवाक्षा यासु ताः, 'पिडिमणोहारिमं' पिण्डमनिहारिमां-पिण्डिमां मिलितां सतों निरिमां शुभपुद्गलसमूहरूपेण दूरदेशगामिनोम् 'सुगन्धि' सुगन्धिशोभनगन्धवतीम्, तथा 'मुह सुरभिमणहरं च' शुभसुरभिमनोहराम् -शुभः-प्रशस्तः यः सुरभिः शोभनो गन्धस्तेन मनोहारिणोम्, 'महया गंधद्धाणिं' महागन्धघ्राणिं महती चासौ गन्धघ्राणिः-गन्ध एव प्राणिः तृप्तिः तद्धतुत्वात् गन्धघ्राणि स्तां तथा महागन्धतृप्तिम् 'मुयंताओ' मुश्चन्त्यः-प्रसारयन्त्यः तथा 'सयोउप पुप्फकल समिद्धाओ' सार्वर्तु - कपुष्पफलसमृद्धाः-सकलऋतूत्पन्नपुष्पफलैः समृद्धाः-सम्पन्नाः 'सुरम्माओ' सुरम्या:-अति रमणीया, 'पासाइयाओ' प्रासादीयाः-दर्शकानां हृदयप्रसादकराः, 'दरिसणिज्जाओ' दर्शनीयाः, द्रष्टुं योग्या, 'अभिरूवाओ' अभिरूपाः-सर्वथा दर्शकज नमनोनयनहारिण्यः 'पडिरूवाओ' प्रतिरूपाः-असाधारण रूप युक्ताश्च सन्ति इति ॥सू०२२॥ फल समिद्धाओ सुरम्माओ पासाईयाओ, दरिसणि जाओ, अभिरूवाओ पडिरूवाओ' ये वनराजियां देखने वालों को ऐसी प्रतीत होता है कि मानो ये विचित्र प्रकार की अच्छी बजाएँ सी ही हैं । इन में जो वापिकाएँ हैं चौकोर बावड़िवा है, गोल आकार वालो पुष्करिणियां हैं तथा दीर्घिकाएँ है इन सब के ऊपर सुन्दर सुन्दर जालगृह स्थापित हैं, छिद्रों सहित गवाक्षों का नाम जालगृह है, ये वनराजियां ऐसी गन्ध घ्राणि को-जिससे मनुष्यों को तृप्ति हो जावे ऐसी सुगन्धि को-लोड ती रहतो हैं यह गन्ध घ्राणि उन वनराजियों में से अल्प मात्रा के रूप में निकलती है किन्तु पिण्डित होकर के निकलती है और निकलकर वह बहत दूर दूर तक चली जाती है इसकी जो वास होती है वह मनोहर होती है, इन वनराजियों में सर्वऋतुओं के पुष्प एवं फूल लगे रहते हैं अतः ये उनसे सदा समृद्ध रहती हैं, ये सब वनराजियां अति रमणीय हैं, दर्शकजनों के हृदयों को प्रसन्न करनेवाली हैं, दर्शनीय हैं देखने योग्य हैं, देखने वालों के मन और नयनों को हरण करने वाली हैं, और असाधारणरूप से युक्त हैं ।। २२ ॥ सणिज्जाओ अभिरुवाओ षडिरूवाओ" से वन बनाशमान मेवा लागेल એએ વિચિત્ર પ્રકારની સારી વજાએજ હેય'એમાં જે વાપિકા એ છે–ચાર ખૂણા વાળી વાવે છે. ગોળ આકારવાળી પુષ્કરિણીઓ છે. તેમજ દીઘિકાઓ છે એ સર્વની ઉપર સુન્દર સુન્દર જાલ ગૃહે સ્થાતિ છે. છિદ્રોવાળા ગવાક્ષો જાગૃિહ કહેવાય છે. એ વન રાજિઓ મનુષ્યને તૃપ્તિ થાય તેવી સુગંધિને–ગઘધ્રાણિને ચોમેર પ્રસત કરતી રહે છે. એ ધ્રાણિ તે વનરાજિઓ માંથી અલ૫માત્રામાં પિડિત થઈને નીકળે છે અને નીકળી ને તે બહુજ દૂર સુધી જતી રહે છે. એમની જે વાસ હોય છે તે મનોર હોય છે. એ વનરાજિઓમાં સર્વ ઋતુઓના પુષ્પ તેમજ ફળો સર્વદા રહે છે. એથી એ તેમનાથી સદા સમૃદ્ધ રહે છે. એ સર્વ વનરાજિએ અતિ રમણીય છે. દર્શકોના હૃદયને પ્રસન્ન કરનારી છે. દશનીયા છે, દશ કે ના મન અને નયનાને આકર્ષાનારી છે અને અસાધારણ રૂપથી યુક્ત છે. ૨રા Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू० २३ कल्पवृक्षरवरूपनिरूपणम् अथात्र वृक्षाधिकारात्कल्पवृक्षवक्षस्वरूपमाह मूलम्- तीसेण समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ देसे तहिं तहिं मत्तंगाणाभं दुमगणा पण्णत्ता. जहा से चंदप्पभा जाव ओच्छण्ण पडिच्छण्णा चिटुंति, एवं जाव अणिगणाणामं दुमगणा पण्णत्ता ॥सू०२३॥ छाय-तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तस्मिन् तस्मिन् मत्ताङ्गा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः यथा ते चन्द्रप्रभा यावत् अवच्छन्न प्रतिच्छन्नास्तिष्ठन्ति, एवं यावत् अनग्नका नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः ॥२३॥ टीका-'तीसे णं समाए भरहे' इत्यादि । 'तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ देसे तहिं तर्हि' तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तस्मिन् तस्मिन् तस्य तस्य देशस्यावान्तरभागे 'मत्तंगा' मत्ताङ्गाः मत्त-मदो हर्षः, तत्कारणभूतः, पेयपदार्थ इह मत्त शब्देनोच्यते, तस्य अङ्गकाः-हेतुभूताः, अथवा मत्तम्-आनन्दजनक पेयवस्तु तदेव अङ्गम्-अवयवो येषां ते तथा आनन्दप्रदपेयपदार्थदायिनो ‘णामं दुमगणा नाम द्रुमगणा:-वृक्षसमूहाः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः ते कीदृशाा ! इति जिज्ञासायामाह'जहा से चंदप्पभा जाव ओच्छण्णपडिच्छणा चिट्ठति' यथा ते चन्द्रप्रभा यावत् छम्न अब सूत्रकार वृक्षाधिकार को लेकर कल्पवृक्षों के स्वरूप का कथन करते हैं "तीसेणं समाए भरहे वासे” इत्यादि । टीकार्थ-"तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ देसे तहिं तहिं मत्तंगा णामं दुमगणा पण्णत्ता' उस सुषम सुषमा नामके आरक में भारतक्षेत्र में जगह जगह उन स्थानों में मत्तांग नामके कल्पवृक्ष थे यहां मत्त शब्द से हर्ष का कारण भूत पदार्थ लिया गया है उस हर्ष के कारण भूत पदार्थ को देने में जो हेतुभूत होते हैं वे यहां मत्ताङ्ग शब्द से कहे गये हैं अथवा आनन्द जनक जो पेयव स्तु वही वस्तु जिनकी अवयव है-अर्थात् आनन्द प्रद पेय पदार्थ को देने के स्वभाववाले जो द्रुम गण हैं-वृक्ष समूह हैं वे मत्ताङ्गशब्द से कहे गये हैं । “जहा से चंदप्पभा जाव ओच्छण्ण पडिच्छ હવે સૂત્રકાર વૃક્ષાધિકારને લઈને કલ્પવૃક્ષાના સ્વરૂપનું કથન કરે છે – "तीसेणं समाए भरहेवासे तत्थ २ देसे तहिं २ मत्तगा णामं दुमगणा पण्णत्ता' इत्यादि सूत्र-३३॥ ટીકાન્તે સુષમ સુષમા નામના આરકમાં ભરતક્ષેત્રમાં ઠેક ઠેકાણે તે સ્થાનમાં મત્તાંગ નામના કલ્પવૃક્ષો હતા. અહીં મત્ત શબ્દથી હર્ષના કારણભૂત પદાર્થ ગ્રહણ કરવામાં આવેલ છે. તે હર્ષાના કારણભૂત પદાર્થ ને આપવામાં જે હેતુભૂત હોય છે. તે અહી મત્તાંગ શબ્દથી કહેવામાં આવ્યા છે. અથવા આનન્દ જનક જે પિયવસ્તુ છે તે વસ્તુ જેમના અવ ય છે એટલે કે આનંદ પ્રદ પેય પદાર્થને આપનારા જે ક્રમે છે-વૃક્ષ સમૂહે છે તે सन थातथला छे. "जह से चंपवमा जाव ओळपण पहिचण्णा चिटति" આ પાઠને સ્પષ્ટ રૂપથી સમજવા માટે ચાવત પર વડે જે પાઠ સંગૃહીત થયેલ છે, પહેલાં तन प्रगट ४२व। मां आवे छे. ते पा४ मा प्रमाणे छ: “जहासे चंडप्पभामणि सिलागवर Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे प्रतिच्छन्नास्तिष्ठन्ति । अत्र यावत्पदेन् - 'जहा से चन्दप्पभामणिसिलाग वरसीधुवर वारुणि सुजाय पतपुप्फफल चोर्याणिज्जा ससार बहुदव्वजुत्ति संभार काल संधि आसवा महुमेरिट्ठाभदुद्धजाति पसन्नतल्लगसताउर खज्जूरिमुद्दियासारका विसायण सुपक्क खोयरसवर सुरा वण्णगंधरस फरिसजुत्ता बलवीरियपरिणामा मज्जविही बहुष्पगारा तहेव ते म गाव दुमगणा अग बहु विविहवीससापरिणयाए मज्जविहीए उववेया फलेहिं पुण्णा वसंत कुसविस विमुद्धरुक्खमूला जाव पत्तेहिं च पुष्फेहिं च फलेहिं च ओच्छन्नपडिच्छन्ना चिद्वति' इति संग्राह्यम् । एतेषां छाया २०० यथा ते चन्द्रप्रभा मणिशिलिकावरसीधुवरवारुणी सुजात पत्र पुष्पफलचोय नियस सार वहुद्रव्य युक्ति सम्भार सन्धि आसवा मधुमेरकरिष्टाभा दुग्ध जाति प्रसन्ना तल्लकशतायुः खर्जूरी मृद्वीकासार कापिशायन सुपकक्षोदरसवरसुराः वर्णगन्धरसस्पर्शयुक्ताः बलवीर्यपरिणामाः मद्यविधयो बहुप्रकाराः तथैव ते मत्तङ्गा अपि द्रुमगणाः वहुविविधविस्रसापरिणतेन मद्यविधिना उपपेताः फलेषु पूर्णाः विष्यन्दन्ते. कुशवि कुशविशुद्ध वृक्षमूलाः यावत् पत्रैश्च पुष्पैश्च फलैश्च अवच्छन्न प्रतिच्छन्नाः तिष्ठन्ति । ण्णा चिति" इस पाठ को स्पष्टरूप से समझने के लिये यावत् पद द्वारा जो पाठ गृहीत हुआ है पहिले उसे प्रकट किया जाता है वह पाठ इस प्रकार से है- “जहा से चंदप्पभा मणि सिलाग वर वारुणि सुजय पत्तपुप्फ फलचोयणिज्जा ससार बहुदव्वजुत्तिसंभार काल संधि आसवा महुमेरगरिट्ठाभदुद्धजाति पसन्न तल्लग सताउ स्वज्जुरिय मुद्दियासारका विसायण सुपक्कखोयरस वर सुरा वण्णगंधरसफरिसजुत्ता बलवोरियपरिणामा, मज्जविही बहुत्पगारा तहेव ते मत्तंगादिदुमगणा अग बहु विविहवीससा पविणयाए मज्जविहीए उववेया फलेहिं पुण्णा वीस दति, कुसविकु विसुद्ध रुक्खमूला जाय पत्तेहिं च पुप्फेहिं च फलेहिं च ओच्छन्नपडिच्छन्ना चिठ्ठति" चन्द्रप्रभा, मणिशिलिका, उत्तममद्य एवं वरवारुणी ये सब मादक रस विशेष हैं ये सब सुपरिपाकगत पुष्पों के फलों के एवं चोय इस नामके गन्धद्रव्य विशेष के रस से बनाये जाते हैं तथा इनमें शरीर को पोषण करने वाले द्रव्यों का मेल रहता है, इसी प्रकार से अनेक प्रकार के आसव ( नशा करने वाला) भी बनाये जाते हैं जो अपने अपने समय में आसवोत्पादक सीधु वरवारुणि सुजाय पत्त पुप्फफल चोयणिज्जा ससार बहुदव्वजुत्ति संभारकाल संधि आसवामहुमेरगा रिट्ठाभदुद्धजातिपसन्न तल्लग सताउखज्जुरिय मुद्दिया सारका विसायण सुपकखोय रसवर सुरा वण्णगंधरसफरिसजुत्ता बलवीरिय परिणापा मज्जविही बहुपगारा तहेव ते मत्तंगा वि दुमगणा अणेग बहुविविह वीसला परिणयाय मज्जबिशेष उववेया फलेहिं पुण्णा वीसंदति, कुसविकुसविसुद्धरुक्खमूला जाव पत्तेहिं च पुष्फेदि च फलेहिं च ओच्छन्नपच्छिन्ना चिति" यन्द्रप्रभा मथि शिक्षि उत्तमभद्य तथा वरवाशी मे સર્વે માદક ૨સ વિશેષો છે. આ સવે સુરિયાકગત્ પુષ્પા ફળા તેમજ ચેાય નામક ગન્ધ દ્રવ્ય વિશેષના રસામાંથી બનાવવામાં આવે છે, તથા એમના માં શટરને પુષ્ટ કરનારા દ્રવ્યાનુ સમ્મિશ્રણ રહે છે. આ પ્રમાણે અનેક જાતના આસવા પણ તૈયાર કરવામાં આવે છે. જે Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Mmmmn प्रकाशिका टोका सू. २३ द्वि० वक्षस्कार कल्पवृक्षस्वरूपनिरूपणम् २०१ इदं सङ्केतवाक्यमपरेष्वपि वक्ष्यमाण मगणेषूहनीयम् । व्याख्या चैवम्-यथा-येन प्रकारेण ताः चन्द्रप्रभा मणिशिलिका वरसीधु वरवारुणोसुजात पत्रपुष्पफलचोयनिर्यास सार बहुद्रव्य युक्ति संभार कालसन्धिजासवा:-तत्र-चन्द्रस्येव प्रभा-कान्तिः यस्याः सा तथा, मणिशिलिका-मणिशिलैव मणिशिलिका सैव तथा, वरसोधु.वरं परमं सीधु-मद्य,वर वारणो-उत्तमवारुणी, सुजातपत्रपुष्पफलचोयनिर्याससाराः सुजातानां सुपरिपाकागतानां पुपाणां फलानां च चोयस्य तदाख्यगन्धद्रव्यविशेषस्य च निर्यासः रसः तेन साराः, तथा बहुद्रव्ययुक्ति सम्भाराः बहूनां द्रव्याणां-रस वर्धकानां या युक्तयः मेलनानि तासां सम्भा र:-समूहो येपु ते तथा कालसन्धि जासवाः काले स्व स्वोचितकाले सन्धिजासवाः आसवाङ्गभूतद्रव्यमेलनजनितमधानि ततः पदद्वय पदद्वय सम्मेलनेन कर्मधारयसमासः तथा मधुमेरकरिष्टाभादुग्धजाति प्रसन्नातल्लकशतायु. खर्जुरो मृद्वोकासार कापिशायन सुपक्वक्षोदरसवरसुराः तत्र मधु-मद्यविशेषः, मेरकं मद्यविशेषः रिष्टामा ष्टिरत्नवर्णा जम्बूफलकलिकेति प्रसिद्धा, दुग्धजातिः आस्वादतो दुग्धसदृशी प्रसन्ना-सुराविशेषः तल्लकः सुराविशेपः, शतायुः-शतकृत्वः शोधिताऽपि स्व स्वरूपा परित्यागिनी सुराः खजूरी मृद्वीकासारः खर्जूरद्राक्षयोः सारः कापिशायनं--मद्यविशेषः, सुपकक्षोदरसवरसुराः सुपकः सम्यक्परिपाकप्राप्तो यः क्षोदरसः सुरोत्पादकचूर्णमिलितेनादिरसः तन्निष्पन्नाः वरसुरा सर्वेषां पदानां कर्मधारयः, एतेच मधविधय मद्यप्रकारा वर्णगन्धरसस्पर्शयुक्ता विशिष्टेन वर्णेन गन्धेन द्रव्यों के मेल से निष्पन्न होते है तथा मधु मेरक, आदि ये भी मद्य जाति के विशेष प्रकार हैं इनमें मधु और मेरक ये मादक पदार्थों के संयोग से बनाये जाते हैं रिष्टाभा नाम की शराब जामुन के फलो से तैयार की जाती है, दुग्ध जाति की जो शराब होती है वह स्वाद में दुग्ध जैसे स्वादवालो होतो है प्रसन्ना और तल्लक यह मो एक प्रकार को विशेष शराब होती है सौबा र शोधित हो जाने पर भी जो अपने स्वरूप का परित्याग नहीं करती है उस शराब विशेष का नाम शतायु है खर्जुर और दांखो के रस से जा शराब बनाई जाती है उसका नाम खर्जुरी मृद्ध का सारा है इसी प्रकार एक शराब ऐसी भी होती है जो इक्षु के रस को पकाकर के उससे तैयार की जाती है और इसमें सुरोत्पादक चुर्ण मिलाया जाता है । इन सब सुराविशेषों का वर्ण યથા સમયે આસપાદક દ્રવ્યોના સામ્મિશ્રણથી નિષ્પન્ન હોય છે. તેમજ મધુમેરક વગેરે એ પણ મઘ જાતિના વિશેષ પ્રકારે છે. આમાં મધુ અને મેરક એ માદક પદાર્થોના સંયે થાય છે. રિક્ટાભા નામક શરાબ જાંબુના ફળથી તૈયાર કરવામાં આવે છે. દુઘજાતિની જે શરાબ હોય છે તે સ્વાદમાં દૂધ જેવી સ્વાદવાળી હોય છે. પ્રસન્ન અને તક આ પણ એક પ્રકારની શરાબ શેષ છે સો વખત રોધિત થઈ જાય છતાં એ જે પિતાના 4 રૂપ ને યથાવત રાખે છે તે શરાબ વિશેષનું નામ શતાયુ છે. ખજૂર અને દ્રાક્ષાના રસથી જે શરાબ તૈયાર કરવામાં આવે છે તેનું નામ ખજુરી મૃઢીકાસારા છે. આ પ્રમાણે એક શરાબ એવી પણ હોય છે કે જે ઈશુનો રસને પકવી ને તેનાથી તૈયાર કરવામાં આવે છે અને તેમાં સુત્પાદક ચૂર્ણ મિશ્રિત કરવામાં આવે છે. આ સર્વ સુરા વિશેષોના વર્ણ ગજ રસ Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૨૦૨ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे रसेन स्पर्शेन च युक्ता सम्पन्ना तथा बलवीर्यपरिणामा बलं शारीरिक शक्तिः वीर्य पराक्रमः इत्युभे परिणमयन्तीति तथा बलवीर्यकारका इत्यर्थः तथा बहुप्रकारा अनेकविधाश्च सन्ति तथैव तेनैव प्रकारेण ते-पूर्वोक्ता मत्ताङ्गा अपि द्रुमगणा अनेकबहुविविधविस्रसापरिणतेन अनेक व्यक्तिभेदात् सचासौ बहु विविध-बहु प्रचुरं यथा स्यात्तथा विविध जातिभेदान्ना नाविध विस्रसारपरिणतः-विस्रसया-स्वभावेन परिणतः जातः न पुन केनापि कृतश्चेत्ति अनेक बहुविविधविस्रसापरिणतस्तेन तथाप्रकारेण मद्यविधिना माद्यन्ति-हृष्यन्ति अनेनेति मधम्-आनन्दप्रदपेयपदार्थः 'मदीहर्षे' इति धातोः, गदमदचर (पा० ३।१।१००) इति यत्प्रत्ययः, तस्य विधिः प्रकार स्तेन आनन्दप्रदपेय प्रकारेणेत्यर्थः उपपेता युक्ता ते च तालादि तख इव नाङ्करादिषु पेयप्रकार युक्ताः किन्तु फलेषु, इत्येव दर्शयितुमाह-'फ लेहि' इति । मूले तृतीया सप्तम्यर्थे प्राकृतत्वात्, तेन फलेषु- फलावच्छेदेन पूर्णा तैरानन्दप्रदपेयपदार्थभृता सन्तो निष्पन्दन्ते स्रोतोरूपतया वहन्ति निर्झरवत् । अयं भावःतेषां द्रमगणानां परिपक्कः स्फुटितफलेभ्यः आनन्दप्रदपेयरसा निझरन्तीति । ते दुमगणापुनः कीदृशा ? इत्याह कुशविकुशविशुद्धवृक्षमूला दर्भवल्वजादि रहिताधोभागा यावत् यावत्पदेन मूलवन्तः, कन्दवन्तः स्कन्धवन्तः इत्यादय पश्चमसूत्रोक्ता संग्राह्या, अर्थोऽपि तत एव बोध्यः । तथा पत्रैश्च पुष्पैश्च फलैश्च अवच्छन्न प्रतिच्छन्नाः सर्वथाऽऽच्छादिताः तिष्ठन्तीति । एते द्रुमगणास्तु युगलिजनेभ्य पेयपदार्थ वितरन्तीतिबोध्यम् । अत्रेदं बोगन्ध, रस और स्पर्श विशिष्ट प्रकार का हो जाता है और ये सेवित किये जाने पर शरीर में बल एवं वीर्य के उत्पादक होते हैं और ये अनेक प्रकार के होते हैं । तो जिस प्रकार ये लोग प्रसिद्ध चन्द्रप्रभा आदि सुराये होती है उसी प्रकार से मत्ताङ्ग जाति के द्रुमगण भो स्वतः स्वभाव से अनेक प्रकार के अमादक पदार्थों के रूप में परिणत हो जाते हैं इनका यह ऐसा परिणमन तालादि वृक्षों में जैसा उनके अनुरादिकों में होता हुआ देखा जाता है वैसा इनमें नहीं देखा जाता है किन्तु जब इनके फल पकज़ाते हैं और वे फुटते हैं तब उनमें से निर्झर की तरह रस झर ने लगता है और उसे पीकर वहां के लोग आनन्द की मस्ती में झुमने लगते हैं इन वृक्षों के अधोभाग कुश और विल्वादि तृणों से रहित होते हैं जो मनुष्य इनके पास जाकर जिस मादकपदार्थઅને સ્પર્શ વિશિષ્ટ પ્રકારના હોય છે. અને એમના સેવનથી શરીરમાં બળ અને વીર્યનું ઉત્પાદન થાય છે. એ ઘણી પ્રકારની હોય છે, જેમ લોક પ્રસિદ્ધ ચન્દ્રપ્રભા વગેરે સુરાએ હોય છે. તેમજ મત્તાંગ જાતિના કુમગણુ પણ સ્વતઃ સ્વભાવથી અનેક પ્રકારના અમાદક પદાર્થોના રૂપમાં પરિણુત થઈ જાય છે. એમનું આ એવું પરિણમન અંકુરાદિકના રૂપમાં તાલાદિ વૃક્ષમાં જોઈ શકાય છે તેવું નથી. પરંતુ જયારે એમના ફૂલે પરિપકવ થઈ જાય છે અને તે કુટે છે ત્યારે તેમનામાંથી નિઝરની જેમ ૨૫ નિરુત થવા લાગે છે. અને તે રસનું પાન કરીને ત્યાંના લેકે આનંદની મસ્તીમાં તરબોળ થઈ જાય છે. આ વૃક્ષોના અધ ભાગો કુશ અને બિલ્વાદિ તૃણેથી વિહીન હોય છે. જે માણસ આ વૃક્ષોની પાસે જઈને જે માદક Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू० २३ कल्पवृक्षस्वरूपनिरूपणम् २०३ ध्यम् मद्यपानं हि निश्चयतो दुर्गतिजनकं सुषमसुषमाकालवर्तिनो युगलिनस्तु निश्चयत सुगतिगामिनः । अतो मत्ताङ्गका वृक्षा अमादकान् अमृतमयान् आनंदप्रदरसविशेषानेव निष्पन्दयन्ति न तु सुराविशेषान् । सादृश्यं तु वर्णसाम्येनेति । एते द्रुमगणास्तु युगलिजनेभ्यः पेयपदार्थ वितरन्तीति बोध्यम् । एवं' एवम् अनेन प्रकारेण मत्ताङ्ग द्रुमग. णवत् 'जाव अणिगणा णामं दुमगणा पण्णत्ता' यावत् अनग्नका नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः इति । अत्र यावत्पदेन ये दुमगणाः संगृह्यन्ते तद्वर्णनप्रकार एवं बोध्यः । तथाहि 'तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ देसे तहि तर्हि बहवे भिंगंगा णाम दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो जहा से वारग घडग कलस करग कक्करिपायंचणिउदंकवद्धणिसु पइट्ठगविट्ठरकी चाहना करता है वे वृक्ष उसी रूप में स्वतः स्वभाव से परिणत हो जाते हैं और याचकजनों की उस चाहना को शान्त कर देते हैं. इस विषय में विशेष खुलाशा रूप से पाठगत पदों को व्याख्या पूर्वक कथन हमने जीवाभिगम सूत्र की प्रमेयद्योतिका टीका में किया है. तात्पर्य इस कथन का केवल इतना ही है कि युगलिकजनों को ये द्रुमगण जैसा पेय पदार्थ वे चाहते हैं वैसा ही पेय पदार्थ प्रदान करते रहते हैं वैसा देखा जाय तो मद्यपान दुर्गतिका जनक होता है और सुषमसुषमा कालवर्ती युगलिक जन नियम से सुगतिगामी होते है. अतः ये मत्ताङ्गक वृक्ष अमादक अमृतमय ऐसे आनन्दप्रद रसविशेषों को ही बहाते रहते है सुराविशेषों को नहीं, परन्तु यहां जो सुराविशेषों के साथ इन्हें उपमित किया गया है वह इनके वर्ण को लेकर किया गया है। इसी प्रकार से वहां जो १० वे अन्तिम कल्पवृक्ष अनग्नक नाम के होते हैं वे भी उन युगलिकों को अनेक प्रकार के वस्त्रों को देकर उनकी चाहना को पूर्ति करते रहते है, यहां जो यावत्पद आया है उससे शेष कल्पवृक्षों का ग्रहण हुआहै-इनमें द्वितीय नम्बर का कल्पवृक्ष भृताङ्ग नामका है ये कल्पवृक्ष भी वहां अनेक ही होते है इनके सम्बन्ध પદાર્થની ઈચ્છા કરે છે તે વૃક્ષ તે સ્વરૂપમાંજ સ્વતઃ સ્વભાવથી પરિણત થઈ જાય છે, અને વાચકોની ઈચ્છા ને પૂર્ણ કરે છે. આ સંબંધમાં વિશેષ રૂપષ્ટતાથી પાઠત પદોનું વ્યા ખ્યા પૂર્વક કથન જીવાભિગમ સૂત્રની ટીકામાં કરવામાં આવેલ છે. આ કથનનું તાત્પર્ય આટલું જ છે કે એ ક્રમે યુગલિક જનેની ઈચ્છા મુજબ જે પદાર્થ તેઓ ઈચ્છતા હોય તે આપે છે. જે બુદ્ધિ પૂર્વક વિચાર કરવામાં આવે તો આમ જણાશે કે મદ્યપાન દુર્ગતિ જનક છે. અને સુષમ સુષમકાળના યુગલિકો નિયમતઃ સુગતિગામી હોય છે. તેથી આ મત્તાંગક વૃક્ષો પણ સુરા વિશેષના સ્થાને અમાદક અમૃતમય એવા આનંદ પ્રદ ૨સ રસવિ શેષને જ પ્રવાહિત કરે છે. અહીં જે સુરા વિશેષોની સાથે એમને ઉપમિત કર્યા છે તે ફત એમના વર્ણનના ઉદ્દેશ્યથી જ. આ પ્રમાણે ત્યાં જે ૧૦ માં અંતિમ અનરાક નામે કલ્પવૃક્ષો હોય છે. તે પણ તે યુગલિકેને અનેક જાતના વોને અપી ને તેમની ઈચ્છા પૂર્ણ કરતા હે છે. અહીં જે યાવત્ પર આવેલ છે તેનાથી શેષ ક૯૫વૃક્ષોનું ગ્રહણ કરવા માં આવ્યું છે. આમાં બીજા નંબરે જે ક૯૫વૃક્ષ છે તે ભૂતાંગ નામક ક૯પવૃક્ષ ક રે ૨ કલ્પવૃક્ષ છે તે ભૂતાંગ નામક કલ્પવૃક્ષ કહેવાય છે. से ४६५वृक्षो ५५ त्यांYण प्रभामा डाय छे. अमन समयमां से थन छ-'तीसेणं Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २०४ जम्बूद्वीपप्रक्षप्तिसूत्रे पारीचसक भिंगार करोडि सडगपत्ती थालणल्लगचवलियं अवमद दगवारग विचित्तव दृगसुत्तिचारुपीणया कंचण मणिरयण भत्तिचित्ता भायणविहोय बहुप्पगारा तहेव तेभिंगगा वि दुमगणा अणेगबहुविह वीससा परिणयाए भायणविहीए उववेआ फलेहिं पुण्णाविव विसट्टति ।। ___एतच्छाया-तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र तस्मिन् तस्मिन् बहवो भृताङ्गा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणाऽऽयुष्मन् यथा ते वारकघटककलशकरक कर्करी पादाश्चन्युदङ्क वार्थानी सुप्रतिष्ठक विष्टरपारीचपक भ्रङ्गारकरोटिसरक पात्री स्थाल नल्लक चप लितावमददकवारक विचित्र वृत्तक मणि वृत्तक शुक्तिचारुपीनकाकाश्चन मणिरत्नभक्तिचित्राः भाजनविधयश्च बहुप्रकारा तथैव ते भृताङ्गा अपि द्रुमगणा अनेकबहुविधविस्रसापरिणतेन भाजनविधिना उपपेताः फलः पूर्णा इव विकसन्ति २ एतद्वयाख्या-'तीसेणं' इत्यादि । हे श्रमणायुष्मन् तस्यां खलु समायां भरते वर्षेतत्र तत्र देशे तस्मिन् तस्मिन् तस्य तस्य देशस्यावान्तरभागे वयो भ्रताङ्गाः भ्रतं-भरणं पूरणम् तस्मिन् अङ्गानि कारणानि भ्रताङ्गानि भाजनानि भरणक्रियाहि भरणीयं भाजनं विना नोपपद्यते इति भाजनसम्पादकत्वाद् वृक्षा अपि भ्रताङ्गाः-भाजनसंपादका नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः तान् द्रुमगणान् वर्णयितुं दृष्टान्तमुपन्यस्यति यथा ते प्रसिद्धा वारक घटक कलश करक कर्करी षादाञ्चन्दुदङ्कवार्धानी सुप्रतिष्ठक विष्टरपारीचषकभ्रङ्गार करोटि सरक पात्री स्थाल नल्लक चपलितावमददकवारक विचित्र वृत्तक मणि वृत्तक शुक्ति चारु पीनक काश्चनमणिरत्नभक्तिचित्रा तत्र वारक माङ्गलिकघटः घटकः ह्रस्वो घटो घटकः-लधु में ऐसा कथन है-"तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ २ देसे तहिं तहिं बहवे भिंगंगा णाम दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो ! जहा से वारग-घडग-कलस-करग ककरि पायंचणि उदक वद्धणि सुपइदुग विठ्ठरपारी चसक भिंगारकरोडिसडक पत्तो थालगल्लक चवलिय अवम दयग वारग विचित्त वट्टगसुत्ति चार पीणया कंचण मणिरयण भत्तिचित्ता भायण विहीय बहुप्पगारा तहेव ते भिंगंगा वि दुमगणा भणेग बहुविह वोससा परिणयाए भायणविहीए उववेया फलेहिं पुण्णाविव विसति, इस कथन का तात्पर्य ऐसा है कि उस प्रथम आरक में भरत क्षेत्र में जगह २ स्थानों स्थानों पर अनेक भृताङ्ग नाम के कल्पवृक्ष होते है, ये कल्पवृक्ष उन्हें युगलिकों को अनेक प्रकार के समाप भरहे वासे तत्थ २ देसे तहिं तहि बहवे भिंगंगा णामं दुमगणा पण्णता समणाउसो जहा से वारग घडगा-कलस- करगकक्करिपायंचणि उदंकवद्धणिसुपइट्ठगविद्वर पारी चसक भिंगार करोडिसडगपत्ती थाल णल्लक चवलियं अवमददगवारग विचित्त वटा सुत्तिचारुणीणया कंचणमणिरयणभत्तिचित्ता भायण विहोय बहुप्पगारा तहेव ते भिगंगा वि दुमगणा अणेग बहुबिवीससा परिणयाए भायणविहीए उववेआ फलेहिं पुण्णाविव विसति" मा ४थननु ता५य 20 प्रभारी छे ते प्रथम भा२४मां सरतक्षेत्र માં ઠેક ઠેકાણે અનેક ભૂતાંગ નામના ક૯૫વૃક્ષો હોય છે. એ ક૯૫વૃક્ષો તે યુગલિકને અનેક પ્રકારના ભાજનેને પ્રદાન કરતા રહે છે. આ સૂત્રપાઠગત પદોની વ્યાખ્યા જીવાભિગમ સૂત્ર Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्वि० वक्षस्कार सू. २३ कल्पवृक्षस्वरूप निरूपणम् २.५ घटः कलशः महाघटः, काकः कर्करी पात्र विशेषः, पादाचनी पाद प्रक्षालनार्था काञ्चनमयी पात्रो, उदङ्कः जलोत्क्षेपणपात्रविशेषः, वार्धानी जलधानी जलकुण्डिका सुप्रतिष्ठकः- पुष्पपात्रविशेषः पारी, घृतपात्रम् चषकः पानपात्रम् , भ्रङ्गारकनकालुका 'झारी' इति भाषायां प्रसिद्धा सरकः पात्रविशेषः पात्री भाजने विशेषः, स्थालम् प्रसिद्धम्, नल्ल कः पात्रविशेषः चपलिता अवमदश्च पात्रविशेषौ दकवारकः- जलघटः, तथा विचित्राणिविविधचित्रयुक्तानि वृत्तकानि गोलाकाराणि भोजनकालोपयोगीनि घृतादि पात्राणि, तथा मणि वृत्तकानि-मणिप्रधानानि वृत्तकानि-पूर्वोक्तानि पात्राणि, शुक्तिः-चन्दनाद्याधारभूता 'पात्री' चारुपीनका-पात्रविशेषः, एते पात्रकाराः कीदृशाः ? इत्याह-काश्चनमणि रत्न भक्तिचित्राः काञ्चनमणिरत्नानां या भक्तयः- रचनास्ताभिः चित्राः अद्भुताः भाजन विधयः-पात्रभेदाः, बहुप्रकाराः-एकैकस्मिन् भाजनविधाववान्तरानेकभेदसत्त्वाद्वहुविधाः भवन्ति तथैव तद्वदेव ते पूर्वोक्ताः भृताङ्गा अपि द्रुमगणाः अनेक बहुविधविस्रसापरिण तेन भाजनविधिना उपपेताः फलैः पूर्णा इव विकसन्ति- शोभन्ते इति एते च द्रुमगणाः युगलिभ्यो यथेच्छं पात्राणि वितरन्तीति बोध्यम् ॥२॥ अथ तृतीयकल्पवृक्षस्वरूपमाह 'तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ देसे तहि तहिं बहवे तुडिअंगा णाम दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो! जहा से अलिंगमुइंगपणव पडह दद्दरिय करडि डिडिम भंभाहोरंभकणिये खरमुहिमुगंद संखिय पिरलीवच्चक परिवाइणि वंसवेणु सुधोस विवंचिमहती कच्छभिरिगिसिगिआतलतालकंसतालसुसंपउत्ता आतोज्जविही निउणगंधव्यसमयकुसलेहि फंदिया तिहाणकरणसुद्धा तहेव ते तुडिअंगा वि दुमगणा अणेग बहु विविहवीससापरिणयाए ततविततघणझुसिराए आतोज्जविहीए उववेया फलेहि पुण्णाविव विसट्टति, कुसविकुस जाव चिट्ठति ।३। भाजनों को प्रदान करते रहते हैं । इस सूत्रपाठगत पदों की व्याख्या जीवाभिगम सूत्र में की जा चुकी है. अतः वहीं से इसे देखलेना चाहिये । तृतीयकल्प वृक्षका स्वरूप ककथन "तीसेण समाए भरहे वासे तत्थ२ देसे तहिं बहवे तुडिमगा णाम दुमगणा पण्णत्ता, समणाउसो ! जहा से आलिंगमुइंग पणव पडह दद्दरियकरडि डिडिम भंभा होरंभ कणिय स्वरमुहि मुगुंद संविय पिरली वच्चक परिवादिनी वसवेणु सुघोस विवचि महतिकच्छभि रिगि सिगिआ-तल तालकंस सुसंपउत्ता आतोज्जविही निउण गंधव्व समय कुसलेहिं फंदिया तिद्वाण करणसुद्धा तहेव માં કરવામાં આવી છે, એથી જિજ્ઞાસુજનો ત્યાંથી જ વાંચી લે, તૃતીય ઠ૯૫વૃક્ષના સવરૂપનું કથન— 'तोसेणं समाए भरते वासे तत्थ २ देसे तहिं २ बहवे तुडिअंगा णाम दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो ! जहा से आलिंग मुइंग पणव पडह, दद्दरियकरडि डिडिम भंभाहो. रंभ कणिय खरमुहिमुरांद संखिय पिरली :वच्चक परिवादिनी बंसवेणु सुघोस विवंचि - Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे एतच्छाया-तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र तस्मिन् तस्मिन् बहवः त्रुटिताङ्गा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणाऽऽयुष्मन् ! हे श्रमणायुष्मन् तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र वहवः त्रुटिताङ्गाः-वाद्यदायका नाम द्रुमगणाः मज्ञप्ताः । तत्र दृष्टान्तमाह-यथा ते आलिङ्ग मृदङ्ग पणव पटह दर्दरिका करटी डिण्डिम भम्भाहोरम्भा कणिता खरमुखी मुकुन्द शङ्खिका पिरलोकच्चक परिवादिनीवंशवेणु सुधोपाविपश्ची महतो कच्छपी रिगिसिगिका तल-ताल कांस्यताल सुसम्प्रयुक्ताः आतोद्यविधयःनिपुणगान्धर्वसमयकुशलैः स्पन्दिता त्रिस्थानकरणशुद्धाः, तथैव ते त्रुटिताङ्गा अपि द्रुमगणाः अनेक बहुविधविस्रसापरिणतेन ततविततघनशुषिरेण आतोद्यविधिना उपपेता फलैश्च पूर्णा इव विकसन्ति, कुशविकुशयावत् तिष्ठन्ति ।३। एतद्वयाख्या-तीसे गं' इत्यादि 'जहा से' इत्यादि । यथा येन प्रकारेण ते वक्ष्यमाणाः वाद्यविधय, ते च कीदृशा ? इत्याह-'आलिङ्गे' त्यादि-आलिङ्गी-आलिङ्गन्य हृदिधृत्वा वादकेन वाद्यमानो मुरजः, मृदङ्गः-लधु मृदङ्गः, पणवः-भाण्डपटहः यद्धा-लधु पटहः, पटहः-दका, ददिका वाद्यविशेषः, करटी-वाद्यविशेषार्थः,डिण्डिमा-वाद्यविशेषः, खरमुखी-वाधविशेषः, मुकुन्दः- वाविशेष:-प्राणातिलीनं ये वाद्यमानः, शटिका-लघुशङ्करूपा तस्याः शब्दः किश्चित्तीक्ष्णो भवति, न तु शङ्खवद्गम्भीर पिरलीवच्चकौ-तृणवाद्यविशेषौ, परिवादिनी-सप्ततन्त्रीका वीणा सितार इति भाषा प्रसिद्धा, वंशः वंशवाधम्, वे. णुः-वंशवाद्यविशेषः मुधोषा-वीणाविशेषः, विपश्ची-त्रितन्त्रीका वीणा, महती-शततन्त्री का वीणा, कच्छपी-वीणाविशेषः रिगिसिगिका-घjमाणवाद्यविशेषः, तलं- हस्त पुटं, तालो वाद्यविशेषः, कांस्यताल:-कांस्यनिर्मितो वाधविशेषः इत्येतैः सुसंप्रयुक्ता-सु-मुष्ठअतिशयेन सम्-सम्यक् सङ्गीतशास्त्रोक्तरीत्या प्रयुक्ताः-सम्बद्धा, यद्यपि हस्तपुटरूपं तलं ते तुडिअंगा वि दुमगणा अणेगबहुविविह वोससा परिणयाए तत वितत घण झुसिराए आतोज्जविहीए उववेया फलेहिं पुण्णा वि विसति कुसविकुस जाव चिद्रूति " इस तृतीय कल्पवृक्ष का यह कार्य है कि वह उन युगलिक जनों के लिये अनेक प्रकारके यथेच्छ बाजों को देता रहता है । ये कल्पवृक्ष वहां अनेक हैं इनका स्वाभाविक परिणमन ही बाजों के रूप में हो जाता है अतः जिन्हें जिन २ बाजों की चाहना होती है वे उन २वाजों को वहां से प्राप्त कर लिया करते हैं । इस सूत्रपाठगत पदों को व्याख्या मैने जीवोभिगमसूत्र में भोग भूमि के वर्णन महति कच्छभि रिगिसिगिआ-तल तालकंस ताल सुसंपउत्ता आतोज्जविही निउणगंधव्व समयकुसलेहिं फंदिया तिट्टाणकरणसुद्धा तहेव ते तुडिअंगा वि दुःपगणा अणेग बहु विविह वीससापरिणयाए तत वितत धण झुसिराए आतोज्जविहीए उववेया फलेहि पुण्णा विव विसट्टति कुसविकुस जाव चिट्ठति" तृतीय ४६५वृक्ष या प्रमाण छ ते Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि वक्षस्कार सू. २३ कल्पवृक्षस्वरूप निरूपणम् न वाद्यविशेषस्तथापि तलोत्पन्नशब्द सदृशशब्दवद्वाद्यं लक्षणयाऽवगमयति, एतादृशाः आतोधविधयः- वाद्यप्रकाराः निपुणगान्धर्व समयकुशलैः - निपुणं - पटु यथा स्यात्तथा गान्धर्वसमये संगीतशास्त्रे ये कुशला - चतुरास्तैः स्पन्दिताः वादिताः पुनः कीदृशाः ? इत्याहत्रिस्थान करणशुद्धाः त्रिषु - आदिमध्यान्त्येषु स्थानेषु कारणेन - क्रियया यथावद्वादनरूपक्रिया शुद्धाः निर्दोषाः अस्थान व्यापारदोषरहिताः, इत्यर्थः तथैव - तद्वत् ते पूर्वोक्ता त्रुटिताङ्गा अपि द्रुमगणा: अनेक बहु विविध-विस्रसापरिणतेन अनेको व्यक्तिभेदात् स चासौ बहु- प्रचुरं यथास्यात्तथा विविधो-जाति भेदान्नानाविधः स चासौ विस्रसापरिणतविस्रसया - स्वभावेन परिणतश्च तेन तथाप्रकारेण तत् विततघनशुषिरेण तत्र ततं - वीणादिकं वाद्यम् विततं पटहादिकं घनं - कांस्यतालादिकं, शुषिरं वंशादिकं चैषां समाहारः ततविततधनशुषिरं तेन तथा भूतेन आतोद्य विधिना वाद्यप्रकारेण उपपेता - युक्ताः फलैः पूर्णा इव विकसन्ति शोभन्ते । पुनस्ते कीदृशाः इत्याह- कुशविकुशयावत्तिष्ठन्ति इति । यावत्पदसंग्राह्याणि पदानि अर्थश्वास्यैव पञ्चमसूत्रतो बोध्यः । अथ चतुर्थ कल्पवृक्षस्वरूपमाह 'ती से णं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ देसे तर्हि तर्हि बहवे दीवसिहा णामं दुगणा पण्णत्ता समणाउसो ! जहा से संज्ञाविरागसमए नवनिहिवइणो दीविया चक्कवालविंदे पभूयवट्टिपलित्तणेहे घणिउज्जलिए तिमिरमदए कणगनिगरकुसुमियपालियातग बणगा से कंचणमणिरयण विमलमहरिह तवणिज्जुज्जल विचित्तदंडाहिं दीविमाहिं प्रकरण में की है. अतः वहीं से इसे देखलेना चाहिए, ग्रन्थ का कलेवरे बढ जाने के भय से यहां उसे नहीं लिखा है. इस तृतीय कल्पवृक्ष का नाम त्रुटिताङ्ग है- त्रुटित नाम बाजे का है बाजे अनेक प्रकार के होते हैं । यही बात इस सूत्रपाठ द्वारा प्रकट की गई है । २०७ યુગલિકજનાને અનેક પ્રકારના યથેચ્છ વાદિત્રા આપતા રહે છે. એવા કલ્પવૃક્ષો ત્યાં અનેક છે. વાદિત્રાના રૂપના એમનુ' સ્વાભાવિક રૂપમાં પરિણમન થઈ જાય છે. જેમને જે જે પ્રકારના વાદિત્રાની આવશ્યકતા જણાય છે. તે તે પ્રકારના વાદિત્રો તેએ ત્યાંથી મેળવીલે છે. આ સુત્રમાં આવેલા પદોની વ્યાખ્યા જીાભિગમ સૂત્રના ભાગમૂમિ પ્રકરણમાં કરવામાં આવી છે. એથી વાચકે ત્યાંથી વાંચી લે. ગ્રન્થ વિસ્તાર ભયથી અત્રે વ્યાખ્યા કરવામાં આવી નથી આ તૃતીય કલ્પવૃક્ષનું નામ ત્રુટિતાંગ છે. ત્રુટિત નામ વાદિત્રનુ છે. વાદિત્ર અનેક પ્રકારના હાય છે, એ જ વાત આ સૂત્ર પાઠ વડે પ્રફટકરવામાં આવી છે. Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૨૦૮ जम्बूद्वोपप्रक्षप्तिसूत्रे सहसा पज्जालिउस्सप्पिय निद्धतेय दिप्पंत विमलगहगणसमप्पहाहि वितिमिरकरसूरपसरिउज्जोयचिल्लियाहिं जालुज्जलप्पहसियाभिरामाहिं सोभमाणा तहेव ते दीबसिहावि दुमगणा अणेगबहुविविहवीससापरिणयाए उज्जोयविहीए उववेया फलेहि पुण्णा इव विसर्टीति कुसविकुस जाव चिटुंति, इति ।४। ___एतच्छाया-तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवो दीपशिखा नाम दुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणाऽऽयुष्मन् !, येथा तत् सन्ध्यारागसमये नवनिधिपतेः दीपिकाचक्रवालवृन्दं प्रभूतवर्तिपर्याप्तस्नेहं घनोज्ज्वलितं तिमिरमईकं कनकनिकरकुसुमितपारिजातकवनप्रकाशं काञ्चनमणिरत्नविमलमहाईतपनीयोज्ज्वलविचित्रदण्डाभिः दीपिकाभिः सहसा प्रज्वालितोत्सर्पितस्निग्धतेजोदीप्यमान विमलग्रहणसमप्रभाभिः वितिमिरकरमरप्रसृतोद्योतदीप्यमानाभिः ज्वालोज्ज्वलप्रहसिताभिरामाभिः शोभमानं तथैव ते दीपशिखा अपि द्रुमगणाः अनेक बहुविविधविस्रसापरिणतेन उद्द्योतविधिना उपपेताः फलैश्च विकसन्ति, कुशविकुश यावत् तिष्ठन्ति इति ।४। एतद्व्याख्या--हे श्रमणायुष्मन् ! तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवो दीपशिखाः दीपशिखा इव दीपशिखाः, तत्कार्यसम्पादित्वात्, अन्यथा व्याघातकालत्वेन तत्र वढेरभावादीपशिखानामप्यसम्भवात्, नाम प्रसिद्धाः द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः । तान् वर्णयितुं दृष्टान्तमुपन्यस्यति यथा-येन प्रकारेण तत्-प्रसिद्ध सन्ध्या चतुर्थ कल्पवृक्षका स्वरूप"तोसेणं समाए भरहेवासे तत्थ २ देसे तहिं २ बहवे दीवसिहा णामं दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो ! जहा दे संझाविरागसमए नवनिहिवइणो दोवियाचकवालविंदे पभूय वट्टिपलित्तणेहे धणि उलिए तिमिरमदए कणगणिगर कुसुमिय परियातगवणप्पगासे कंचणमणिरयणविमलमहरिह तवणिज्जुज्जल विचित्त दंडाहिं दीवियाहिं सहसा पज्जालियो सप्पिय निद्धतेयदिप्पंत विमलगहगणइत्यादि. । चतुर्थ कल्पवृक्ष का नाम द्वीपशिख है ये द्वीपशिख नामके कल्पवृक्ष वहां उस समय जगह २ अनेक स्थलो पर सुशोभित होते हैं । ये अनेक बहुबिध विस्नसा परिणत उद्योतविधि से ચતુર્થ કલ્પવૃક્ષનું સ્વરૂપ – 'तीसेण समाप भरहे वासे तत्थ २ देसे तहिं २ बहवे दोवसिहा णामं दुमगणा पण्णता समणाउसो । जहा से संझाविरागसमए नवनिहिवइणो दीबिया चक्कवाल विदे पभू वहिपलित्तणेहे घणि उज्जलिए तिमिरमदए कणर्गाणगर कुसुमिय पारियातगवणप्पगासे कंचणमणिरयण विमलमहरिय तवणिजुज्ज्वल विवित्त दंडाहि दीवियाहि सहसा पज्जालियो सप्पिय निद्धतेयदिप्पंत विमल गहगण-इत्यादि। ચતુર્થ ક૯૫વૃક્ષનું નામ દ્વીપશિખ છે. દ્વીપૂશિખ નામના કલ્પવૃક્ષો ત્યાં ઠેક ઠેકાણે હોય છે. એ સર્વ વૃક્ષો ત્યાં અનેક એ બહુવિધ વિસસા પરિણત ઉદ્યોતવિધિથી યુક્ત હેયે Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार सू. २३ कल्पवृक्षस्वरूपनिरूपणम् विरागसमये सन्ध्यैव विरागः विगतो रागः सूर्यस्यारुणिमा यत्र स विरागः स चासौ समयः सन्ध्याविरागसमयस्तस्मिन् तथा सूर्यरागरहितं संध्यासमये अंधकारारम्भकाले नवनिधिपतेः नवनव संख्यकाश्च ते निधयः नैसपे १, पाण्डुक २, पिङ्गलक ३, सर्वरत्न ४, महापद्म ५, काल ६, महाकाल ७, माणवक ८, शङ्खाः तेषां पतिः-स्वामीनवनिधिपतिः-चक्रवति तस्य नवनिधिपते: दीपिकाचक्रवालवन्दं- दीपिका:-लघु दीपाः, तासां चक्रवालं-गोलाकारः दीपिका चक्रवालं तदेव वृन्दं, तत् कीदृशम् ? इत्याह प्रभूतवर्ति पर्याप्तस्नेह-प्रभूताः-प्रचुराः स्थूला वर्तिकाः दशा यस्य तत् प्रभूतवति तच्च तत् पर्याप्तस्नेहं- पर्याप्त:-परिपूर्णाः स्नेहः तैलादि-लक्षणो यस्य तत् तथा. तथा घनोज्ज्वलितं धनम्-अत्यथै-निरन्तरम् उज्ज्वलितं-प्रकाशितम्, अतएव तिमिरमईकम्अन्धकारनाशकम्, पुनस्तत् कीदृशम् इत्याह-कनकनिकरकुसुमितपारिजातकवनप्रकाश तत्र कनकनिकरः-स्वर्णपुजः कुसुमितपारिजातकवनं कुसुमितं-पुष्पितं यत् पारिजातकवनं कल्पवृक्षविशेषवनं चेति कुसुमितपारिजातकवनम् अनयोः समाहारद्वन्द्वे कनकनिकरकुसुमितपारिजातकवनं तद्वत्प्रकाशो यस्य तत् तथा, तथा-काश्चनमणि रत्न विमल महार्हतपनीयोज्ज्वलविचित्रदण्डाभिः-तत्र काञ्चनं-स्वर्ण मणिः वैडूर्यादिः, रत्न बज्रादि चेति काश्चमणिरत्नानि तन्मयाः विमलाः स्वाभाविकागन्तुकमलरहिताः महार्हा:-बहुमूल्या तपनीयोज्ज्वलाः तपनीयेन-उत्तमजातीयस्वर्णेन उज्ज्वला:-भास्वराः, विचित्रा:-विचित्रवर्णाः दण्डा:-दीपिकाधारयष्टयो यासां ताभिः, तथा सहसा प्रज्यालितोत्सर्पित स्निग्धतेजोदीप्यमानविमलग्रहगणसमप्रभाभिः सहसा:-एककालेन प्रज्यालिता:-प्रदीपिताः उत्सर्पिता:-एककालेन वत्त्युत्सर्पणत उध्वीकृताः, स्निग्धतेजसः स्निग्धं-नयनसुखदं तेजो यासां ताः नेत्राप्रतीघातकतेजोयुक्ता इत्यर्थः, दीप्यमानविमलग्रहगणसमप्रभाःदीप्यमान:-निशि स्फुरन् विमल:-धूल्याद्यभावेन स्वच्छो यो ग्रहगण-ग्रहसमूहः तेन समा-समाना प्रभा-दीप्तिर्यासां ताः एतेषां पदानां कर्मधारये सहसा प्रज्वालितोत्सपितस्निग्ध तेजोदोप्यमानविमलग्रहगणसमप्रभास्ताभिः, तथा-वितिमिरकरमरप्रसृतोद घोतदीप्यमानाभिः-वितिमिरकरः-विगतं तिमिरमन्धकारं यस्मिन् सति स वितिमिरः तादृशः कर:-किरणो यस्य स वितिमिरकरः, अथवा वितिमिरम्-अन्धकाराभावः तस्यकरः कारको वितिमिरकरः स चासौ सुरः सूर्यश्चति वितिमिरकरसूरः तस्य यः प्रसृतःदिशि दिशि व्याप्तः उद्योतः-प्रभासमूहः तद्वत् दीप्यमानाः प्रकाशमानास्ताभिः, तथा ज्वालोज्ज्वल प्रहसिताभिरामाभिः ज्वालाः शिखाएव उज्ज्वलप्रहसितं स्वच्छहासः, तेनाभिरामाः मनोहरास्ताभिः, एतादृशीभिर्दीपिकाभिः शोभमानं भवति, तथैव ते दीपयुक्त होते हैं अतः द्वोपो को जो कार्य होता है उसके ये सम्पादक होते हैं. नौ निधियों के ये नाम हैं- नैसर्प १, पाण्डक २, पिंगलक ३, सर्वरत्न ४, महापद्म ५, काल ६, महाकाल ७, છે. એથી દ્વીપનું જે કાર્ય હોય છે તેમના એ સમ્પાદકો હોય છે. નવ નિધિએાના નામ આ પ્રમાણે છે. નૈસર્ષ ૧ પાંડક ૨ પિંગલ ૩ સર્વરન ૪ મહાપદ્મ ૫ કાલ ૬ મહાકાલ २७ Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २१० vivoxxnx जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे शिखा अपि द्रुमगणा अनेकबहुविविधविस्रसापरिणतेन अनेको व्यक्तिभेदात्, स चासौ बहुविविधः बहु-प्रचुरं यथा स्यात्तथा विविधः जातिभेदान्नानाविधः स चासौ विस्रसा परिणताः स्वभावपरिणतश्च तेन तथाभूतेन उद्योतविधिना दीपप्रकारेण उपपेता युक्ता फलैः पूर्णा इव विकसन्ति शोभन्ते, तथा कुशविकुश यावत् तिष्ठन्तीति प्राग्वत् इति ॥४॥ अथ पश्चमकल्पवृक्षस्वरूपमाह 'तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ देसे तहिं तहिं बहवे जोइसिया णामं दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो ! जहा से अइरुग्गयसरयसूरमण्डलपडंतउक्कासहस्सदिपंत विज्जुज्जलहुयवहणिद्धृमजलियणिद्धंतधोय तत्ततवणिज्जकिंयासोयजासुयणकुसुमबिमउलियपुंजमणिरयण किरणजच्चहिंगुलयणिगररूवाइरेगरूवा तहेव ते जोइसिया वि दुमगणा अणेगबहुविविह वीससापरिणयाए उज्जोयविहीए उववेया मुहलेसा मंदलेसा मंदायवलेसा कूड इव ठाणट्टिया अन्नोन समोगाढाहिं लेसाहिं साए पहाए ते पएसे स व्वओ समंता ओहासेंति उज्जोयंति पभासंति, कुसविकुस जाव चिटंति, इति ।५। एतच्छाया --तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवो ज्योतिषिका नाम द्रुमगणा प्रज्ञप्ता श्रमणाऽऽयुष्मन् ! यथा ते अचिरोद्गतशरत्सूर्यमण्डलपतदुल्कासहस्रदीप्यमानविधुदुज्ज्वल निधूमज्वलितहुतवह निर्मात धौततप्ततपनीय किंशुकाशोक जपाकुसुमविमुकुलितपुजमणिरत्नकिरणजात्यहिङ्गुलकनिकररूपातिरेकरूपाः तथैब ते ज्योतिषिका अपि दुमगणा अनेकबहुविविधविस्रसापरिणतेन उद्योतविधिना उपपेता सुखलेश्या मन्दलेश्या मन्दाऽऽतयलेश्या कूटानीव स्थानस्थिता अन्योऽन्यसमवगाढाभिः लेश्याभिः स्वया प्रभया तान प्रदेशान् सर्वतः समन्तात् अवभासयन्ति उद्योतयन्ति प्रभासयन्ति कुशविकुश यावत् तिष्ठन्ति, इति ।५। एतव्याख्या-'तीसे गं' इत्यादि, तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र-तस्य तस्य देशस्यावान्तरभागे ज्योतिषिका ज्योतिः प्रभा, तदस्त्यस्येति ज्योतिषः स एव ज्योतिषिकः सूर्यः, तद्वत्प्रकाशकत्वेन वृक्षा अपि ज्योतिषिकाः एतन्मानः नाम प्रमाणवक ८, और शङ्ख । इस सूत्रपाठगत पदों की व्याख्या भी जीवाभिगम सूत्र के अनुवाद करते समय लिखी जा चुकी है अतः वहीं से देख लेना चाहिये । पांचवें कल्पवृक्ष का स्वरूप ---- "तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ २ देसे तहिं २ बहवे जोइसिया णामं दुमगणा पण्णत्ता इत्यादि-पांचवे कल्पवृक्ष का नाम जोतिषिक है. ये कल्पवृक्ष उसकाल में वहां अनेक होते हैं૭ માણુવક ૮ અને શંખ આ સૂત્રપાઠમાં આવેલા પદોની વ્યાખ્યા જીવાભિગમસૂત્ર ના ભાષાતર માં કરવામાં આવી છે. એથી જિજ્ઞાસુઓએ ત્યાંથી વાંચી લેવુ પાંચમાં ક૯પવૃક્ષનું સ્વરૂપ 'तीसेण समाए भरहे वासे तत्थ २ देसे तहि २ बहवे जोइसिया णाम दमगणा पण्णत्ता" इत्यादि पांयमा ६५वृक्षनु नामनाताप छ. ४.५वृक्ष त समय त्या धयां Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ .२११ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार सू. २३ कल्पवृक्षस्वरूपनिरूपणम् सिद्ध द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः । सम्प्रति सदृष्टान्तं तद्वर्णनमाह 'जहा से' इत्यादि । यथा येन प्र कारेण ते प्रसिद्धाः अचिरोङ्गतशरत्सूर्यमण्डलपतदुल्कासहस्रदीप्यमानविधुदुज्ज्वलित निर्धमज्ज्वलित हुतवहनिर्मातधौततप्ततपनीयकिंशुकाशोकजपाकुसुमविमुकुलितपुञ्जमणिरत्नेकिरण जात्यहिङगुलकनिकररूपातिरेकरूपाः तत्र अचिरोद्गतशरत्सूर्यमण्डलम्-अचिरोद्गतं सद्य एव उदितं यत् शरत्सूर्यमण्डलं शरदृतु सम्बन्धिसूर्यबिम्बम्, तथा-पतदुल्कासहस्रम्-पतन्तीनाम्-आकाशादध आगच्छन्तीनाम् उल्कानां सहस्रम्, तथा दीप्यमानविधुत्-प्रकाशमानविद्युत्, तथा-उज्ज्वालनिर्धू मज्वलितहुतवहः-उज्ज्वाल:-उद्गता ज्वाला यस्य सः देदीप्यमानः एतादृशो निर्धमोधृमरहितो ज्वलितः-दीप्तिसम्पन्नो यो हुतवहः-अग्निः स तथा, मूले 'हुतवह' शब्दस्य 'निधूम' शब्दात्पूर्वप्रयोगः प्राकृतत्वात, पूर्वोक्तपदचतुष्टयस्य द्वन्द्वे-'अचिरोद्गतशरत्सूरमण्डलपतदुल्कासहस्र-दीप्यमानविधु-दुज्ज्वाल निधमज्वलितहुतवहा इति । एते कीदृशा इति दर्शयितुमाह-'निध्र्मात' इत्यादि । तत्र निर्मातं नितराम् अग्निसंयोगेन घ्मातं-शोधितमलम् अत एव धौतं- शुद्धं तप्ते-तापप्राप्तं च यत् तपनीयम् उत्तमजातीय सुवर्ण तत् निर्मातधौततप्ततपनीयमिति, तथा किंशुकाशोकजपाकुसुमानां किंशुकः-पलाशः, अशोकः प्रसिद्धः, जपा प्रसिद्धा, आसां यानि विमुकुलितानि-विकसितानि कुसुमानि-पुष्पाणि तेषां ये पुञ्जाः- समूहास्ते किंशुकाशोकजपाकुसुमविमुकुलितपुञ्जा इति । 'विमुकुलित' शब्दस्य परनिपात आर्षत्वात् । तथा-मणीनां रत्नानां च किरणाः इति मणिरत्नकिरणा इति ता-जात्यहिङ्गुलकानां-उत्तमजातीयहिङ्गुलकानां यो निकरः-समूहः स जात्यहिङ्गुलकनिकर इति । एतेषां द्वन्द्वे-निर्मातधौततप्ततपनीयकिंशुकाशोक जपाकुसुमविमुकुलितपुजमणिरत्नकिरणजात्यहिङ्गुलकनिकराः एतेषां यद्रूपं ततोऽपि अतिरेक-सातिशयं रूपं येषां ते तथा, ततः 'अचिरोद्गतेत्यादि ज्वलित हुतवहान्तस्य पदस्य निर्मातेत्यादि रूपातिरेकरूपान्तस्य च पदस्य कर्मधारयः । येन प्रकारेण निर्मातधौततप्ततपनीयाद्यपेक्षयाऽपि विशिष्टरूप सम्पन्ना अचिरोद्गतशरत्सूरमण्डलादयः सन्तीति निष्कर्षः इति । तथैव ते-पूर्वोक्ताः ज्योतिषिकाः अपि द्रुमगणाः, अनेक बहुविविधविस्रसापरिणतेनोद्योतविधिनोपपेताः सन्ति । ननु यदि सूर्यमण्डलादिहुतवहान्त ज्योतिर्वत प्रकाशिनस्ते स्युस्तदा तद्वदुर्दर्शत्वतोवत्व चलनादिधर्मोपेता अपि सम्भवेयुरित्याह--मुखलेश्याइत्यादि सुखयतीति सुखा-सुखदा लेश्या तेजो येषां ते सुखलेश्याः अतएव मन्दलेश्याः और ये अपनी स्वाभाविक प्रभा से एवं अनेकबहुविविधविस्रसा परिणत हुई उद्योतविधि से युक्त हुए उन २ प्रदेशों को चारों ओर से अवभासित करते रहते हैं। उद्योतित करते रहते हैं । इन सब कल्पवृक्षों के अधोभाग कुशकाश एवं विकुश-बिल्वादि लताओं से रहित होते हैं । હોય છે અને પોતાની સ્વાભાવિક પ્રભાથી તેમજ અનેક બહુવિવિધવિશ્વસા પરિણત થયેલી ઉદ્યોત વિધિથી યુક્ત થયેલા તત્ તત્ પ્રદેશને ચેમેરથી એવભાસિત કરતા હે છે. ઉદ્યોતિત કરતા રહે છે તેમજ પ્રભાયુક્ત કરતા રહે છે. આ સર્વે કલ્પવૃક્ષના અધોભાગ કુશ કાશ તેમજ વિકશ બિવાદિ લતાએથી રહિત હોય છે. આ સૂત્રપાઠગત પદની વ્યાખ્યા જીવા Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २१२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे -मन्दा-अल्पा लेश्या येषां ते तथा, मन्दाऽऽतपलेश्याः मन्दातप इव लेश्या येषो ते तथा, सुखसह तेजस्सम्पन्ना इत्यर्थः, तथा कुटानीव-पर्वतादि शिखराणीव स्थानस्थिता:-स्वोत्पत्तिस्थाने स्थिताः स्थिरीभूताः समयक्षेत्रबहिर्वति ज्योतिष्का इव ते प्रकाशयन्तीति भावः, तथा अन्योऽन्य समवगाढ़ाभिः-अन्योऽन्य-परस्परं समवगाढ़ाभिः एकत्र मिलिताभिः लेश्याभिः तेजोभिः स्वया स्वकीयया प्रभया दीप्त्या तान् प्रदेशान् सर्वतः सर्वदिक्षु समन्तात्-सर्वे विदिक्षु च अवभासयन्ति-प्रकाशयन्ति, उद्योतयन्ति तत्रस्थान् पदार्थान् सामान्यतः प्रभासयन्ति विशेषत इति । तथा कुश विकुश यावत् तिष्ठन्तीति प्राग्वदिति । एषां ज्योतिषिकाणां द्रुमगणानां प्रकाशो बहुदूर व्यापीदीपशिखाद्रुमापेक्षया तीव्रश्च भवतीति पूर्वद्रुमेभ्यो विशेषोऽत्र बोध्यः ।५। अथ षष्टकल्पवृक्षस्वरूपमाह 'तीसे ण समाए भरहे वासे तत्थ देसे तत्थ तत्थ बहवे चित्तंगा णामं दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो! जहा से पेच्छाधरे विचित्ते रम्मे वरकुसुम दाम मालुज्जले भासंतमुकपुष्फपुंजोवयारकलिए विरल्लिय विचित्तमल्लसिरिसमुदयप्पगब्भे गंठिम वेढिम पूरिम संघाइमेणं मल्लेण छेय सिप्पिविभागरइ एणं सवओ चेव समणुबद्धे पविरल लंबंत विप्पइट्ठ पंचवण्णेहिं कुसुमदामेहि सोभमाणे वणमालकयग्गए चेव दिप्पमाणे, तहेव-ते चित्तंगा वि दुमगणा अणेग बहु विविह वीससापरिणयाए मल्लविहीए उववेया कुसविकुस जाव चिट्ठति इति ।६। एतच्छाया-तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवः चित्राङ्गा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणाऽऽयुष्मन्, यथा तत् प्रेक्षागृहं विचित्रं रम्यं वरकुसुमदाममालो ज्ज्वलं भासमान मुक्त पुष्पपुञ्जोपचारकलित वितत विचित्र माल्य श्रीसमुदयप्रगल्भं ग्रंथिमवेष्टिम पूरिम सङ्घातिमेन माल्येन छेक शिल्पिविभागरचितेन सर्वतश्चैव समनुबद्धं प्रविरललम्बमान विप्रकृष्ट पञ्चवर्णैः कुसुमदामभिः शोभमानं वनमालाकृताय चैव दीप्यमानं, तथैव ते चित्राङ्गा अपि द्रुमगणाः अनेक बहुविविध विस्त्रसापरिणतेन माल्यविधिना उपपेताः कुशविकुश यावत् तिष्ठन्ति, इति ।६। ___एतद्वयाख्या-'तीसेणं' इत्यादि । हे श्रमणायुष्मन् ! तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवः चित्राङ्गाः चित्राणाम् अनेक प्रकारकाणां माल्यानां कारणइस सूत्र पाठ गत पदों की व्याख्या जीवाभिगम सूत्र में लिखी गई है । अतः इसे भी वहीं से देख लेना चाहिये । ग्रन्य का कलेवर विस्तृत करने से कोई लाभ नहीं है । छठे कल्पवृक्ष का स्वरूप "तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ २ देसे तहिं बहवे चित्तंगा णामं दुमगणा पण्णत्ता" इत्यादि । छठे कल्पवृक्ष का नाम चित्राङ्ग हैं । पुण्य से ये कल्पवृक्ष उस काल में वहां अनेक होते ભિગમસૂત્ર માં કરવા માં આવી છે એથી જિજ્ઞાસુઓએ ત્યાંથી વાંચી લેવું જોઈએ અહીં પુનઃ સૂત્રપાઠગત પદની વ્યાખ્યા કરવાથી ગ્રન્થ વિસ્તાર થશે. Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २१३ प्रकाशिका टीका-द्वि वक्षस्कार सू. २३ कल्पवृक्षस्वरूपनिरूपणम् त्वात् चित्रांगा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः । तान् द्रुमान् वर्णयितुं दृष्टान्तमुपन्यस्यति-'जहासे' इत्यादि । यथा-येन प्रकारेण तत् - प्रसिद्ध प्रेक्षागृहं नाटयशाला, विचित्रं-नानाविधचित्रोपशोभितम् अतएव रम्यं-रमणीयं तथा वरकुसुमदाममालोज्ज्वलं-वराणि-उत्तमानि यानि कुसुमानि येषां यानि दामानि-माल्यानि तेषां यों: मालाः श्रेणयस्ताभिरुज्ज्वलं मण्डितं-देदीप्यमानम्, तथा-भासमानमुक्तपुष्पपुञ्जोपचारकलितं भासमानः-देदीप्यमानो यः मुक्तपुष्पपुञ्जोपचारः मुक्तो विकीर्णो यः पुष्पपुञ्जः पुष्पसमूहः तत्कृतो उपचारः-रचना तेन कलितं युक्तम्, तथा विततविचित्रमाल्यश्रोसमुदायप्रगल्भं विततानि विस्तृतानि विवित्राणि-नानाप्रकाराणि यानि माल्यानि-गुम्फितपुष्पमालाः, तेषां यः श्रीसमुदायः शोभासमूहः तेन प्रगल्भम्-अतिपरिपुष्टं तथा-ग्रन्थिमं ग्रन्थिमवेष्टिमपूरिमसङ्घातिमेनग्रन्थिमं ग्रन्थेन निर्वृत्तं, नैपुण्यातिशयात् ग्रन्थि ग्रन्थिसमुदायनिष्पादितं वेष्टनेन सूत्रवे. ष्टनक्रमेण निष्पन्नं पूरिमम् पूरणेन -भरणेननिष्पन्न संघातिमम् -संवातेन समूहेण निष्पन्नम्, एषां समाहारे ग्रन्थिमवेष्टिम पूरिमसङ्घातिमं तेन तथा प्रकारेण माल्येन मालया, पुनः कीदृशेन माल्येन ? इत्याह छेकशिल्पिविभागरचितेन छेकः निपुणो य; शिल्पी तेन विभागरचितं विभागेन विभक्त्या विच्छित्त्या रचितं निष्पादितं तेन तथाभूतेन माल्येन सर्वतः सर्वदिक्षु समनुबद्धं संयुक्तम् तथा-प्रविरल लम्बमानविप्रकृष्टपञ्चवर्णैः-प्रविरलानि अमिलितानि लम्बमानानि दीर्घाणि विप्रकृष्टानि-परस्परतःसुदूरवर्तीनि यानि पञ्चव नि नीलकृष्णहारिद्र लोहितशुक्लवर्णात्मकानि तानि प्रविरललम्बमानविप्रकृष्टपञ्चवर्णानि तैस्तथाभूतैः कुसुमदामभिः-पुष्पमाल्यैः शोभमानं प्रविरलत्वम् अल्पावकाशे सत्यपि स्यादत उक्त विप्रकृष्टेति । पुनः कीदृशम् ? इत्याह-वनमालाकृताग्रं वनमाला-वन्द नमाला सा कृता अग्रे-अग्रभागे यस्य तत्तथाअग्रभागे कृतवन्दनमालमित्यर्थः,एव-निश्चयेन तथाभूतं सत् दीप्यमानं शोभमानं भवति, तथैव ते पूर्वोक्ताः चित्राङ्गाः अपि मगणाः अनेकबह विविधविस्रसापरिणतेन अनेको व्यक्ति भेदात् बहुप्रचुरं यथा स्यात्तथा विविधः अनेकविधो जातिभेदात् स चासौ विस्रसापरिणत:-स्वभावेन परिणतस्तेन तथाविधेन माल्यविधिना उपपेताः-युक्ता भवन्ति, तथा कुशविकुश यावत् तिष्ठन्तीति प्राग्वत् ।६। हैं जगह २ में स्थान २ पर ये वहां उस काल में पाये जाते हैं । भोगभूमि में इनका अब भो सद्भाव है। इस भरतक्षेत्र में प्रथमकाल में भोगभूमि था । अतः उस समय ये यहां प्रत्येक स्थानों पर वर्तमान थे । ये चित्रांग जाति के कल्पवृक्ष उन भोग भूमिया जनों को तथाविध છઠ્ઠા ક૯૫વૃક્ષનું સ્વરૂપ:'तीसेणं समाए भरहे वाले तत्थ २ देसे तर्हि तर्हि बहवे चित्तंगा णाम दुमगणा पण्ण ता" इत्यादि । છઠા ક૯પવૃક્ષનું નામ ચિત્રાંગ છે. તે કાળે એ કલ્પવૃક્ષ ત્યાં પુષ્કળ સંખ્યામાં થતા હતાં ઠેકઠેકાણે એ ક૯૫ વૃક્ષે તે કાળે ત્યાં પુષ્કળ સંખ્યામાં પ્રાપ્ત થતા હતા ભંગ ભૂમિમાં એમને અત્યારે પણ અભાવ છે. આ ભરત ક્ષેત્રમાં પ્રથમ કાળમાં ભેગ ભૂમિ હતી. એથી તે Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अथ सप्तमकल्पवृक्षस्वरूपमाह 'तीसे णं समाए तत्थ तत्थ भरहे वासे देसे तहिं तहिं बहवे चित्तरसा णामं दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो ! जहा से सुगंधवरकमलसालि तंदुलविसिणिरुवहयदुद्ध रद्ध सारयघयगुडखण्डमहुमेलिए अइरसे परमण्णे होज्जा उत्तमवण्णगंधमंते, अहवा रणो चक्कवट्टिस्स होज्ज णि उणेहिं सूवपुरिसेहि सज्जिए चउकप्पसेयसित्ते इव ओदणे कलम सालिणिव्वत्तिए विप्पमुक्के सबप्फमिउविसयसगलसित्थे अणेगसालणगसंजुत्ते अहवा पडिपुण्णदव्वुवक्खडे मुसक्खए वण्णगंधरसफरिसजुत्ते बलबीरिय परिणामे इंदियबलपुद्विविवद्धणे खुप्पिपासामहणे पहाणं गुलकढिय खण्डमच्छंडियउवणीएव्यमोअगे सहसमिइगब्भे हवेज्ज परमेहगसंजुत्ते, तहेव ते चित्तरसावि दुमगणा अणेगबहुविह विबिह वीससापरिणयाए भोयणविहीए उववेया कुसबिकुस जाव चिट्ठति इति । । एतच्छाया---तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवः चित्ररसा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् !, यथा तत् सुगन्धवर कलम शालि तण्डुलविशिष्ट निरुपहतदुग्धराद्धं शारदघृतगुडखण्डमधुमेलितम् अतिरसं परमान्नं भवेत् उत्तमव गन्धवत् अथवा राज्ञः चक्रवर्तिनः भवेत् निपुणैः सूपपुरुषैः सज्जितः चतुष्कल्पसेकसितः इव ओदनः कलमशालिनिवर्तितः विप्रमुक्तः सबाष्पमृदुविशदसकलसिक्थः अनेक शालनसंयुक्तः अथवा परिपूर्णद्रव्योपस्कृतः सुसंस्कृतः वर्णगन्धरसस्पर्शयुक्तो बलवीर्यपरिणामः इन्द्रियबलपुष्टिबिवर्धन: क्षुत्पिपासामथनः प्रधानगुडकथितखण्डमत्स्यण्डी घृतोपनीत इव मोदकः लक्ष्णसमितागर्भः भवेत् परमेष्टकसंयुक्तः, तथैव ते चित्ररसा अपि द्रुमगणाः अनेकवहु विध विविध विस्त्रसापरिणतेन भोजनविधिना उपपेताः कुशविकुश यावत् तिष्ठन्ति, इति ॥७॥ एतद्व्याख्या-'तीसे णं' इत्यादि । तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवः चित्ररसा:-चित्रः मधुराम्लादि भेदाद नेकप्रकारः, यद्वा-आस्वादकजनाविस्रसा परिणाम से परिणत होकर अनेक प्रकार को माला मों को प्रदान करते हैं । इस सूत्र पाठ गत पदों की व्याख्या जीवाभिगम सूत्र के अनुवाद से जानना चाहिये । - सातवें कल्पवृक्ष का स्वरूप "तींसे गं समाए तत्थ २ भरहे वासे देसे तहिं २ बहवे चित्तरसा णामं दुमगणा पण्णत्ता વખતે અહિંઆ તે ઠેક ઠેકાણે હતાં. એ ચિત્રાંગ જાતિના કલ્પવૃક્ષે તે ભેગ ભૂમિના માણ સેને તથાવિધ વિસસાપરિણામથી પરિણત થઈને અનેક પ્રકારની માળાઓ પ્રદાન કરે છે. આ સૂત્રપાઠગત પદની વ્યાખ્યા જીવાભિગમસૂત્રના અનુવાદમાં કરવામાં આવી છે. સતિમાં ક૯૫વૃક્ષનું વરૂ૫–. "तीसेणं समाए तत्थ २ भरहे वासे तत्थ देसे तहिं २ बहवे चित्तरसा णामं दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो' इत्यादि । સાતમા કલ્પવૃક્ષનું નામ ચિત્રરસ છે. પ્રથમ કાળમાં એ ક૯૫વૃક્ષે આ ભરત ક્ષેત્રમાં Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्वि० वक्षरकार स. २३ कल्पवृक्षस्वरूप निरूपणम् २१५ नामाश्चर्यकरो रसो येषां ते तथाभूताः नाम दुमगणाः प्रज्ञप्ताः । तान् द्रुमगणान् सदृष्टान्तं वर्णयति तान् वर्णयितुं दृष्टान्तमाह-'जहा से' इत्यादि । यथा येन प्रकारेण तत् प्रसिद्ध सुगन्धवरकलमशालितण्डुलविशिष्टनिरुपहत दुग्धराद्धं सुगन्धाः उत्तमगन्धयुक्ताः वरा:-प्रधानाः निर्दोषक्षेत्रकालादिसामग्रीभिः प्राप्ततण्डुलभावाः, ये कलमशालितण्डुलाः कलमशालेः तण्डुलास्ते सुगन्धवरकलमशालितण्डुलाः, तथा विशिष्टं-नीरोग-गवादिभवत्वादुत्तमगुणसम्पन्न निरुपहतं- पाकादिभिरनुपहतं च यद् दुग्धं तद् विशिष्टनिरुपहतदुग्धम्, उभयो द्वन्द्वे सुगन्धवरकलमशालि तण्डुल-विशिष्ट निरुपहत दुग्धानि तैः राद्धं-पकम, उत्तमशालितण्डुलै विशुद्धदुग्धेन च पाकनिपुणेन निष्पादितमिति भावः, तथा – शारदघृतगुडखण्डमधुमेलितम् शारदघृतगुडखण्डमधुभिः तत्र-शारदघृतं-शरदृतुभवं घृतं गुडः प्रसिद्धः खण्डं ='खाँड' इति प्रसिद्धम्, मधु-शहद इति प्रसिद्धं तैर्मेलितं योजितम् अतएव अतिरसम्-प्रशस्तरससम्पन्नम्, उत्तमवर्णगन्धवत्-प्रकृष्टवर्णगन्धसम्पन्नं परमान्नं पायसं भवेत्, अथवा-इव यथा राज्ञश्चक्रवर्तिनो निपुणैः पाककुशलैः सूपपुरुषैः पाककारिपुरुषैः सज्जितः-निष्पादितः चतुष्कल्पसेकनसिक्त इव चत्वारः कल्पाः पाकशास्त्रोक्तविधयो यत्र स चतुष्कल्पः स चासौ सेकश्चेति चतुष्कल्पसेकस्तेन सिक्तः युक्तःपाकशास्त्र विदोहि ओदनेषु कोमलतोत्पादनायै चतुरः सेककल्पान् कुर्वन्तीति बोध्यम् । तथा-कलमशालिनिर्वर्तितः कलमशालितण्डुनिष्पादितः तथा विप्रमुक्तः-पाकदोषरहितः सुपक्वः तथा सबाष्पमृदुविशदसकलसिक्थः सबाष्पाणि- बाष्पसहितानि निःसरद्वाष्पयुक्तानि मृदुनि कोमलानि विशदानि-सर्वथा तुषादिमलापगमाद्विशुद्धानि सकलानि-पूर्णानि सिक्थानि कणा यत्र सः तथा-अनेकशालनकसंयुक्तः अनेकानि बहूनि यानि शालनकानि निष्ठानकानि तैः संयुक्तः ओदनो भवेत, अथवा इव यथा परिपूर्णद्रव्योपस्कृतः-परिपूर्णानि -मोदकाङ्गभूतानि सर्वाणि यानि द्रव्याणि केसरैलावातद्राक्षादीनि तैरुपस्कृतः परिष्कृतःयद्वा तानि उपस्कृतानि निश्चितानि यत्र स तथा, तथा-सुसंस्कृतः यथामात्राग्नि तापादिनोत्तमस्कार सम्पन्नीकृतः, तथा-वर्णगन्धरसस्पर्शयुक्तः वर्णादयोऽत्राऽतिशायिनो गृह्यसमणाउसो" - इत्यादि । सातवें कल्पवृक्ष का नाम चित्ररस है । प्रथम काल में ये कल्पवृक्ष इस भरतक्षेत्र में जगह २ पर अनेक होते हैं । जैसा इनका नाम है उसी के अनुसार ये गुणोपेत है । मधुर आम्लादि रस इनका अनेक प्रकार का होता है । अथवा-आस्वादक जनों को वह रस आश्चर्यकारी होता है । इसलिये भी इन कल्पवृक्षों का नाम चित्ररस हो गया है । ये कल्पवृक्ष इस मधुरादि भेद से अनेक प्रकार के रसादि को किसी के द्वारा किये जाने पर नहीं देते हैं किन्तु इनका ऐसा ही स्वभाव है कि ये स्वभावतः ही उस प्रकार के परिणमनवाले ઠેકઠેકાણે પુષ્કળ સંખ્યા માં હોય છે. જેવું એમનું નામ તેવા જ ગુણેથી એ યુક્ત છે. મધુર અસ્લાદિ ૨૩ એમના અનેક પ્રકારના હોય છે. અથવા આસ્વાદકેના માટે તે રસ આશ્ચર્યકારી હોય છે. એથી પણ આ ક૯૫વૃક્ષે ચિત્રરસ નામથી પ્રસિદ્ધ થઈ ગયાં છે. એ કલ્પવૃક્ષ મધુર વગેરે રસકે કઈ વડે નહિ પણ સ્વતઃ સ્વભાવતઃ જ આ પ્રમાણે પરિ Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे न्ते सामर्थ्यात्, तेन अतिशायिवर्णगन्धरसस्पर्शेःयुक्तः-सम्पन्नः, तथा बलवीर्यपरिणामः -बलवीर्यहेतवः परिणामा उत्तरकाले यस्य स तथा, बलवीर्यहेतुपरिणामयुक्त इति भावः तत्र बलं शारिरीकं वीर्य मानसिकोत्साहः, तथा- इन्द्रियबलपुष्टिविवर्धनः इन्द्रियाणां यद् बलं-स्वस्वविषयग्रहणसामर्थ्य तस्य या पुष्टिः= अतिशायी पोषस्तस्याः वर्धनः वर्धयतीति वर्धनः वृद्धिकारकः, तथा-क्षुत्पिपासामथन:- क्षुधावृषानाशकः, तथा प्रधानगुडकथित खण्डमत्स्यण्डीघृतोपनीतः प्रधानानि गुडखण्डमत्स्यण्डीघृतानि तत्र गुडः-प्रसिद्धः, खण्डंखाँड' इति प्रसिद्धम् मत्स्यण्डी 'मिश्री' इति भाषा प्रसिद्धम, घृतं-प्रसिद्धम् इत्येतानि उपनीतानि योजितानि यत्र सः अत्र 'कथित' शब्दस्य उपनीत' शब्दस्य च परप्रयोगः आर्षत्वात्, तथा-श्लक्ष्णसमितागर्भ:-इलक्ष्णा-त्रिवस्त्र गालितत्वेन सूक्ष्मतामुपनीता या समिता गोधूमचूर्ण सा गर्भे-अभ्यन्तरे यस्य स तथा वस्त्र त्रिः पूतगोधूमचूर्णनिर्मितः, तथापरममेष्टक संयुक्तःप्रशस्त द्रव्ययुक्त, एतादृशः मोदको भवेत् तथैव ते चित्ररसा अपि द्रुमगणाः, अनेक बहुविध विविधविससापरिणतेन भोजनविधिनोपपेता भवन्ति, तथा कुशविकुश यावत् तिष्ठन्ति इति प्राग्वत् । ७। अथाष्टमकल्पवृक्षस्वरूपमाह'तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ तत्थ देसे तत्थ तत्थ बहवे मणियंगाणामं दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो! जहा से हारद्धहारवेढणयमउडकुंडल वामुत्तग हेमजाल मणिजाल कणगजालग सुत्तग उचिय कडग खुडुय एकावलि कंठसुत्तग मगरियउरत्थ गेविज्ज सोणिमुत्तगा चूडामणिकणगतिलग फुल्गसिद्धत्थयकण्णवालि ससिसर उसह चक्कगतल भंगयतुडिय हत्थ मालगहरिसय केऊर वलय णालंब अंगुलिज्जग वलक्ख दोणारमालिया कंचि मेहलकलाव पयरगपारि हेरग पायजाल घंटियाखिखिणि रयणोरुजाल खुड्डियवर नेऊरचलणमालिया कणगणिगल मालिया कंचणमणिरयणभत्तिचित्ता, तहेव ते मणिअंगावि दुमगणा अणेग जाव भूसणविहीए उववेआ जाव तिटुंति इति । ८। एतच्छाया-तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवो मण्यङ्गा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणऽऽयुष्मन् ! यथा सा हारा हारवेष्टनकमुकुटकुण्डल ब्यामुक्तक होते हैं । अतः अनेक बहुविध विस्रसा परिणत हुए भोजनविधि से युक्त होते हैं इस संबन्ध में कहे गये सूत्र के पदों की व्याख्या पहिले हम जीवाभिगम सूत्र के हिन्दी अनुवाद में लिख आये हैं, अतः वहीं से इसे समझ लेनी चाहये । आठवें कल्पवृक्ष का स्वरूप "तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ २ देसे तहि २ बहवे मणियंगा णामं दुमगणा पण्णत्ता સુમનવાળા હોય છે. એથી અનેક બહુવિધ વિવિધ વિસ્ત્રસા પરિણત થયેલા ભેજન વિધિથી એ યુક્ત હોય છે. આ સંબંધમાં કહેવામાં આવેલા સૂત્રોના પદોની વ્યાખ્યા જીવાભિગમ સૂત્ર ના અનુવાદમાં અમે પહેલાં કરી છે. એથી જિજ્ઞાસુજને ત્યાંથી વાંચી લે. આઠમાં દ૯૫વૃક્ષનું વરૂપ: "तोसेंण समाए भरहे वासे तत्थ २ देसे तहिं २ बहवे मणियंगाणार्म दुमगणा पण्णता Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका सू. २३ द्वि० वक्षस्कार कल्पवृक्षस्वरूपनिरूपणम् २१७ हेमजालमणिजाळकनकजालक सूत्रकोचित कटकक्षुद्रकैकावलिकण्ठसूत्रकमकरिकोरः स्थग्रैवेय श्रोणिसूचकचूडामणिकनकतिलकपुष्पक सिद्धार्थककर्णवाली शशिसूर्यवृषभचक्रकतलभङ्ग त्रुटित हस्तमालक हर्षक केयूर वलय प्रालम्बाङ्गुलीयक वलाक्षदीनार मालिकाकाची मेखला कलापप्रतरक पारिहार्यक पादजाल घण्टिका किङ्किणी रत्नोरुजाल क्षुद्रका वरनूपुर चरणमालिका कनक निगडमालिका काञ्चनमणिरत्नभक्तिचित्रा, तथैव ते मण्यङ्गा अपि द्रुमगणाः अनेक यावद् भूषणविधिना उपपेता यावत् तिष्ठन्ति इति |८| एतद्व्याख्या- 'तीसे णं' इत्यादि । हे आयुष्मन् श्रमण ! अस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तत्र तत्र बहवो मण्यङ्गाः - तत्र मणिपदं मणिमयाभरणपरं तेन मणयः ममियान्याभरणानि तेषाम् अङ्गभूताः - कारणभूता मण्यङ्गा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः तान् द्रुमगणान् दृष्टान्तं वर्णयति 'जहा से ' इत्यादि । यथा येन प्रकारेण सा वक्ष्यमाणाभरणमालिका भवति, कथंभूता सा ? इत्याह 'हारद्धहार' इत्यादि । तत्र हारः अष्टादशसरिकः अर्द्धहार: नवसरिक वेष्टनकः कर्णभूषणविशेषः, मुकुटकुण्डले प्रसिद्धे व्यामुक्तकं प्रालम्बि - तं कुण्डलविशेषः, हेमजालं स्वर्णरचितजालाकृतिकालङ्कारविशेषः एवं मणिजालकनकजाकेsपि बोध्ये, हेमजालकनकजालयो भेंदो रुढिगम्यः, सूत्रकं - यज्ञोपवीतवद् धार्यमाणं सुवर्णसूत्रम्, उचितकटकानि - योग्यवलयानि, क्षुद्रकम् - अड्. गुलीयकविशेषः, एकावली विचित्रमणिस्वर्णरचिता एकसरिका, कण्ठसूकं - सूत्राकारकण्ठाभरणविशेषः मकरिका - मकराकृतिराभरणविशेषः, उरःस्थं - हृदयाभरणविशेषः, ग्रैवेयं ग्रीवाभरणविशेषः श्रोणि कटिसूत्रं चूडामणिः सर्वभूपरत्नसारो देवमनुष्याधिपतिमौलिस्थायी रोगामङ्गळादिदोषनाशकः परममङ्गलभृतः आभरणविशेषः, कनकतिलकं ललाटाभरणं, पुष्पकं पुष्पाकृतिललाटा भरणं, - सिद्धार्थकं सर्वपप्रमाण स्वर्णकणरचित सुवर्णमणिकमयं भूषणं, कर्णवाली कर्णोपरितनभागाभरणविशेषः, शशिसूर्य वृषभाः चन्द्रसूर्यवृषभाकार स्वर्णमयाभरण विशेषाः चक्रकं चकाकार शिरोभूषणं, तलभङ्गकं वाह्रा भणविशेषः, त्रुटिकानि बाहाभरणानि, उभयोर्बाह्वाभरणत्वेSपि आकारकृतो भेदः, हस्तमालकम् आभरणविशेषः, हर्षकं भूषणविशेषः' केयूरं बाहुभूषणविशेषः, अङ्गदापरपर्यायः, पूर्वोक्त बाहुभूषणतोऽत्राकृतिकृतो भेदः, वलय- कङ्कणं, प्रासमणाउसो" इत्यादि । उस सुषम सुषमा नामके आरक की उपस्थिति में इस भरतक्षेत्र में जगह २ अनेक मण्यङ्गनामके कल्पवृक्ष होते थे । ये कल्पवृक्ष वहां के युगलिकों के लिये स्वामाविक रूप से अनेक प्रकार की भूषणविधि से युक्त हुए उनके मनोनुकूल आभूषणों की इच्छाओंकी पूर्ति करते हैं इस सूत्र पाठ में जो २५द आये हैं, उन की व्याख्या जीवाभिगम सूत्र के हिन्दी समणाउसो" इत्यादि । તે સુષમ સુષમાં નામના આર્કની ઉપસ્થિતિમાં આ ભરતક્ષેત્રમાં ઠેકઠેકાણે અનેક મધ્યગ નામના કલ્પવૃક્ષો ત્યાંના યુગલિકા માટે સ્વાભાવિક રૂપથી અનેક પ્રકારની ભૂષણ વિધિથી યુક્ત થયેલા તેમના આભૂષણાની ઇચ્છાઓની પૂર્તિ કરે છે. આ સૂત્રપાઠમાં જે જે પો २४ Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र लम्बे-झुम्बनकं कर्णभूषणम् अङ्गुलीयकं मुद्रिका, वलक्षं गलाभरणविशेषः, दीनारदालिकादीनार स्वर्णमुद्रा तदाकारा मणिमाला, काञ्ची मेखला कलापाः तत्र काञ्ची एका यष्टिः, मेखेल | अष्ट यष्टिका कलापः पञ्चविंशति यष्टिः । उक्तं च तल्लक्षणम्एका यष्टिर्भवेत् काञ्ची, मेखला त्वष्ट यष्टिकाः । रशनाः षोडश ज्ञेयाः, कलापः पञ्चविंशकः ॥ १ ॥ इति । काञ्च्यादयस्त्रयः स्त्रीकट्याभरणविशेषाः प्रतरकं - वृत्तप्रतल आभरणविशेषः, पारिहार्य कम्-वलयविशेषः पादजालं - जालाकृतिपादाभरणम्, घण्टिका घर्वरिका, किङ्किण्यः क्षुघण्टिकाः, अनयोराकारकृतो विशेषः, रत्नोरुजालं - रत्नमयं जङ्घायाः प्रलम्बमानं सङ्कलकंक्षुद्रिका - आभरणविशेषः वरनूपुराणि श्रेष्ठ चरणाभरणविशेषः, चरणमालिका विलक्षणाकारं पादाभणं तच्च लोके 'पागडां' इति प्रसिद्धम् कनकनिगड : - निगडाकारः पादालङ्कारः, सौवर्णः राजतो वा लोके स 'कडला' इति ख्यातः, एतेषां हारार्द्ध हारादि कनकनिगडान्ताना या मालिका श्रेणिः सा तथा, कथंभूता सा ? इत्याह' कंचण' इत्यादि । काञ्चन- सुवर्णमणिः–चन्द्रकान्तादिः रत्नं- कर्केतनादिकम् एतेषां या भक्तिः - विच्छित्तिः रचना इति यावत् तया चित्रा अद्भुता सा काञ्चनमणिरत्नभक्तिचित्राः ततः हारार्द्धहारादिमालिकान्तं पदस्य काञ्चनादि चित्रान्तपदस्य च कर्मधारयो, विशेषणस्य परनिपात आर्षत्वात् । ततश्चायं संक्षिप्तोऽर्थः काञ्चनमणिरत्नविच्छित्ति सुशोभिता हारार्द्ध हारादि श्रेणि र्भवति इति तथैव तेन प्रकारेणैव ते मण्यङ्गा अपि द्रुमगणा अनेक बहुविधविविधविस्रसा परिणतेन भूष विधन उपपेताः- युक्ता भवन्ति, तथा कुशविकुश यावत् तिष्ठन्तीति ॥ ८ ॥ २१८ अथ नवम कल्पवृक्षस्वरूपमाह - तसे समाए भरडे वासे तत्थ तत्थ देसे तत्थ तत्थ बहवे गेहागारा णामं दुमगणा पुण्णत्ता समणाउसो! जहा से पागारहालयच रियदारगोपुरपासायागासतलमंडब एगसालगविसालगतिसालगच उसालग गम्भघरमोहणघर वलभीघरचित्त मालयघरभत्तिघरवट्टतसचउरंस दियावत्तसंठिया पंडुरतल मुंडमाल हम्मियं अहवाणं धवलहर अद्धमागह विन्भम सेलद्धसेल संठिय कूडागारसुविहिय कोट्ठग अणेगघर सरणलेण आवणा विडंग जालविंद - - णिज्जूह अपवरगचंद सालिया स्वविभत्तिकलिआ भवणविही बहुविकप्पा, तदेव ते गेहागारा विदुमगणा अग बहुविह विविहवीससा परिणयाए सुहारुहण सुहोत्ताराए मुहणिअनुवाद में स्पष्ट रूप से की जा चुकी है । अतः यह वहीं से समझ लेनी चाहिये, एक लर की काञ्ची होती है । आठ लरों की मेखला होती है । सोलह लरों की रसना होती है और पच्चीस लरों का एक कलापक होती है । આવેલા છે, તેમની વ્યાખ્યા જીવાભિગમસૂત્ર' ના હિન્દી અનુવાદમાં સ્પષ્ટ રૂપમાં કરવામાં આવી છે. એથી આ વિષે ત્યાંથી જ વાંચી લેવું જોઈએ. એક સેરની કાંચી હૈાય છે, આઠ સેરાની મેખલા હોય છે. સેાળસેરાની રસના હોય છે. અને ૨૫ સેરાની એક કલાપક હોય છે, Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Ammmmmmm प्रकाशिकाटीका द्वि० वक्षस्कार सू. २३ कल्पवृक्षस्वरूपनिरूपणम् २१९ क्खमणपवेसाए दद्दरसोवाणपंतिकलियाए पइरिक सुहविहाराए मणोणुकूलाए भवणविहीए उववेया जाव चिट्टति, इति ।९। एतच्छाया- तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र तत्र देशे तस्मिन् तस्मिन् बहवः गेहाकारा नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् ! यथा ते प्राकाराट्टालक चरिकाद्वार गोपुरप्रासादाऽऽकाशतलमण्डपैकशालक द्विशालक त्रिशालक चतुःशालक गर्भगृहमोहनगृह वलभीगृह चित्रमालकगृहमक्तिगृहवृत्त व्यस्रचतुरस्रनन्द्यावर्तसंस्थिताः पाण्डुरतल मुण्ड मालहर्म्यम् अथवा खलु धवलगृहार्द्धमागध विभ्रम शैलार्द्धशैल संस्थितकूटाकार सुविहितकोष्ठकानेक गृहशरणलयनापणाः विटङ्कजाल वृन्द नियंहापवरक चन्द्रशालिका रूपविभक्ति कलिताः भवविधयो बहुविकल्पाः, तथैव ते गेहाकारा अपि द्रुमगणा अनेक बहुविधविविध विस्रसांपरिणतेन सुखाऽऽरोहण सुखावतारेण सुखनिष्क्रमणप्रवेशेन दईरसोपानपङ्कि कलितेन प्रतिरिक्त सुखविहारेण मनोऽनुकूलेन भवनविधिना उपपेताः यावत्तिष्ठन्ति, इति ।। एतद्व्याख्या-'तस्यां खलु समायामि' त्यादि-पूर्ववत्, नवरं गेहाकारा नाम द्रमगणाः प्रज्ञप्ताः, हे आयुष्मन ! श्रमण ! तान् वर्णयितुं दृष्टान्तमुपन्यस्यति-यथा ते प्राकारेत्यादि प्राकारः 'कोट' इति भाषा प्रसिद्धः अट्टालकः- प्रासादोपरिगृहम्, चरिकानगर प्राकारान्तरालेऽष्ट हस्त प्रमाणो मार्गः, द्वारम्-गृहादि प्रवेशस्थानम्, गोपुरं पुरद्वारम्, प्रासादः-राजभवनम् आकाशतलम्- कटाधनाच्छन्नप्रदेशः मण्डपः छायाद्यथै पटादिमयः स्थानविशेषः, एकशालकम् -एक भूमगृहम्, द्विशालकं द्विभूमगृहम्, त्रिशालकं त्रिभूमगृहम, चतुःशालकं चतुभूमगृहम् । गर्भगृहम्-अभ्यन्तरगृहम्, मोहनगृहं वासभवनम्, वलभीगृहप्रासादाग्रभागः, चित्रमालकगृहम्-चित्रकर्मयुक्तगृहम् मालकगृहं-द्वितीयभूमिकाधुपरिवर्ति गृहम्, गृहेत्यस्योभयत्रयोगात्, भक्तिगृहं भक्तिः विच्छित्ति-स्तत्प्रधानं गृहं, वृत्तं वर्तुलाकार, व्यस्र-त्रिकोणं, चतुरस्र-चतुष्कोण, नन्द्यावर्तः स्वस्तिकविशेषस्तैः संस्थिताः, पा ण्डुरेत्यादि पाण्डुरतलं -शुक्तिकाचूर्णलिप्त तलयुक्तं गृहं मुण्डमालहर्म्यम्- उपर्यनाच्छादितशिखरादिभागरहित हर्म्यम् अथवा-यद्वा खलु निश्चयेन धवलगृहेत्यादि-धवलगृहे सौधम् अर्धमागधविभ्रमाणि गृहविशेषाः , शैलार्धशैलसंस्थितानि-संस्थितेत्यस्य शैले 'अर्धशैले च योगः, तेन शैलसंस्थितानि पर्वताकाराणि अर्धशैलसंस्थितानि अर्धपर्वताकाराणि च गृहो नौवें कल्पवृक्ष का स्वरूप - "तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ२ देसे तहिं तहिं बहवे गेहागारा णामं दुर्मगणी पण्णत्ता समणाउसो ।" इत्यादि । हे श्रमण आयुष्मन् उस सुषम सुषमा नामक आरे में भरतक्षेत्र में जगह २ अनेक गेहाकारનવમા કલ્પવૃક્ષનું સ્વરૂપ "तीसेणं समाए भरहे वासे तत्थ २ देसे तहिं तर्हि बहवे गेह गारा णामं दुमगणा पण्णत्ता इत्यादि। શ્રમનું આયુષ્યન્ તે સુષમ સુષમા નામના આરામાં ભરતક્ષેત્રમાં એ સ્થાન પર । Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे णि, कूटाकाराणि -शिखराकृतीनि सुविहितकोष्ठकानि सुसूत्रणापूर्वक रचितो परितिनभागविशेषाः अनेक गृहाणि - बहूनि गृहाणि सामान्यतः शरणानि तृणमयानि लयनानि पर्वतनिकुट्टितगृहाणि आपणाः हट्टाः, इत्यादिकाः भवनविधय इत्यग्रिमेण सम्बन्धः ते च की दृशाः ? इत्याह-विटङ्केत्यादि - विटङ्कः - कपोतपालिका जाल वृन्दं - गवाक्षसमूहः, निर्यूह: -द्वारोपरितन पार्श्वनिःसृतदारु अपवरकः आच्छादकः चन्द्रशालिका शिरोगृहम् इत्येवं रूपा या विभक्तयः विच्छित्तयस्ताभिः कलिताः युक्ताः, वहुविकल्पाः अनेक प्रकाराः भवनविधयः वास्तु प्रकाराः भवन्ति तथैव तेनैव प्रकारेण ते गेहाकारा अपि द्रुमगणाः । किं विशिष्टास्ते ! इत्याह- 'अनेक बहुविध विविधविस्त्रसापरिणतेन' अर्थस्तु प्राग्वत् सुरारोहणसुखोत्तारेण - सुखेन सुख पूर्वकम्, आरोहः उपरिगमनम्, तथा सुखेन अवतारः अधस्तादवतरण यत्र स तथा तेन । सुखनिष्क्रमण प्रवेशेन सुखेन निष्क्रमणं ततोऽपगमनं यत्र स तथा । दर्दरसोपानपङ्क्तिकलितेन - दर्दराणि निरन्तर रत्नफलकमयानि सो - पानानि तेषां पङ्क्तयस्ताभिः कलितः युक्तस्तेन । प्रविरक्तसुखविहारेण प्रविरक्ते एकान्ते सुखः सुखमयः विहारः अवस्थानशयनासनादिरूपो यत्र स तथा तेन । अतएव मनोऽनुकूलेन भवनविधिना उपपेताः - युक्ता यावतिष्ठन्तीति प्राग्वत् |९| अथ दशम कल्पवृक्ष स्वरूपमेवम् तसेणं समाए भर वासे तत्थ तत्थ देसे तर्हि तर्हि बहवे अणिगणा णामं दुमगणा पण्णत्ता समाउसो ! जहा से आईणग खोमतणुल कंवल दुगूल कोसेज्ज कालमिगपट्ट अंसुअ चीणअसुयपट्टा आभरण चित्त सण्हग कल्लाणगगिणीलकज्जल बहुवण्णरतपीयसुकिल्ल सक्कय मिगलोमहेमघरल्लग अवरुत्तर सिंधुउसभदामिल - वंगकलिंग नलिण तंतुमय भत्तिचित्ता वत्थविही बहुष्पगारा पवरपट्टणु गया वण्णरागकलिआ, तदेव ते भणि गणा विदुमगणा अगबहुविह विविह वीससा परिणायाए वत्थविहीप उबवेआ कुसविकुस जाव चिट्ठति, इति । १०१ एतच्छाया - तस्यां खलु समायां भरते वर्षे तत्र देशे तस्मिन् तस्मिन् बहवः अनग्ना नाम द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणाऽऽयुष्मन् ! यथा ते आजिनक क्षौम तनुल (क) कम्ब ल दुकूल कौशेय कालमृग पट्टांशुकचीनांशुक पट्टा: आभरण चित्र श्लक्ष्णककल्याणक भृङ्गनील कज्जलबहुवर्णरक्तपीत शुक्ल संस्कृतमृगलोम हेमात्म रल्लकापरोत्तर सिन्धुऋषभद्रविनाम के कल्पवृक्ष होते हैं । ये कल्पवृक्ष मनोनुकूल भवनविधि से युक्त होते हैं अर्थात् अनेक प्रकार के भवनरूप में ये स्वतः स्वभाव से परिणत हो जाते हैं । सूत्रगत पदों की व्याख्या जीबाभिगम सूत्र के अनुवाद में की गई है । અનેક ગેહાકાર નામના કલ્પવૃક્ષેા હોય છે. એ કલ્પવૃક્ષો મનેાનુકૂલ ભવનિધિથી યુક્ત હાય છે. એટલે કે અનેક પ્રકારના ભવન રૂપમાં એ સ્વતઃ સ્વભાવથી પરિણત થઈ જાય છે. આ સૂત્રમાં આવેલા પાની વ્યાખ્યા જીવાભિગમસૂત્રના અનુવાદમાં કરવામાં આવેલી ४. मेथी निज्ञासु त्यांथी वांगी से. Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. २३ कल्पवृक्षस्वरूपनिरूपणम् २२१ ड वङ्ग कलिङ्ग नलोन तन्तुमयभक्तिचित्राः वस्त्रविधयः बहुप्रकाराः प्रवरपत्तनोद्गताः व रागकलिताः, तथैव ते अनग्ना अपि द्रुमगणाः अनेक बहुविधविविधविनसा परिणतेन वस्त्रविधिना उपपेताः कुशविकुल यावत् तिष्ठन्ति, इति ।१०। एतद्व्याख्या--'तस्यां खलु' इत्यादि प्राग्वत्, नवरम् अनग्नाः अविद्यमानाः नग्नाः तात्कालिका जना येभ्यस्तेऽनग्नाः द्रुमगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् ! तान् वर्णयितुं दृष्टान्तमुपन्यस्यति यथा ते आजिनकेत्यादि-तत्र आजिनकम्-चर्ममयं वस्त्रं क्षौमं सामान्यतः कार्पासिकं वस्त्रं केचित्तु क्षुमा-अतसी तन्मयं वस्त्रमिती वदन्ती, तनुलं-तनुः शरीरं तत् सुखस्पर्शतया लाति अनुगृह्णातोति तनुलं शरीरसुखादि कारकं वस्त्रं, कम्बलः प्रसिद्धः 'तणुअकंबल' इति पाठे तु तनुक कम्बला, इतिच्छाया, तत्पक्षे तनुकः सूक्ष्मोर्णामयः क म्बलः, दुकूल:-गौडदेशीयं काासिकं वस्त्रम्, यद्वा-दुकूल:-वृक्षविशेषः. तद्वल्कं गृहीत्वा उदूखले जलेन सह कुट्टयित्वा कुसीकृत्य च व्यूयते तत्तत् दुकूलम्, कौशेय-कृमिकोशजतन्तुनिष्पन्नं वस्त्रम्, कालमृगपट्टाः कृष्णमृगचर्ममय वस्त्रम् अंशुकं चीनांशुकानि नानादेशेषु प्रसिद्धानि दुकूलविशेप रूपाणि पूर्वोक्तस्यैव वल्कस्याभ्यन्तरहारिभिनिष्पादितानि चीनांशुकानि वा पट्टाः पट्टसूनिष्पन्नानि वस्त्राणि, आभरणचित्रेत्यादि तत्र आभरणैः, भू पणैः, चित्राणि अमृतानि आभरणचित्राणि, ग्लक्ष्णानि सूक्ष्मतन्तुनिष्पन्नानि कल्याणकानि सुलक्षणानि वस्त्राणि भृगनील भ्रमरवन्नीलवर्ण तथा कज्जलं कज्जलवत्कृष्णवर्णे बहुवर्णम् विचित्रवर्णम् रक्तं-रक्तवर्ण पीतं पीतवर्णम्, शुक्ल शुक्लवर्णम् संस्कृतं सुसज्जितं यन्मृगलो म हेम स्वणे च तदात्मकं तन्मयम्, रल्लकः कम्बल चैते कीदृशाः ! इत्याह-अपरः-प श्चिमदेशः उत्तरः-उत्तरप्रदेशः सिन्धु:-देशविशेषः ऋषभः-देशविशेषः, द्रविडवङ्ग कलि दशवें कल्पवृक्ष क, स्वरूप कथन "तीसे णं समाए भरहे वासे तत्थ २ देसे तहिं तहिं बहवे अणिगण्य णामं दुमगणा पण्णत्ता समणाउसो !" इत्यादि । हे श्रमण आयुष्मन् ! उस सुषम सुषमा नाम के आरे में भरत क्षेत्र में अनग्ननाम के कल्पवृक्ष होते हैं, इन कल्पवृक्षों के प्रभाव से वहां का कोई भी जन वस्त्र रहित नहीं रह पाता है, सुन्दर २ वेश कीमती वस्त्र वहां के मनुष्यों को इन से प्राप्त होते रहते है क्योंकि ये वृक्ष स्वभावतः अनेक रागों से रंजित हुए वस्त्रों के रूप में परिणत हो जाते है। દશમા ક૯૫વૃક્ષનું સ્વરૂપ કથનઃ "तीसेणं समाए भरहे बासे तत्थ २ देसे तहिं २ बहवे अणिगमा णाम दुमगणा पण्णत्ता"इत्यादि। હે શ્રમણ આયુશ્મન તે સુષમ સુષમા નામના આરામાં ભરતક્ષેત્રની અંદર અનન - ક૯પવૃક્ષ હોય છે. એ ક૯૫વક્ષના પ્રભાવથી ત્યાંની કોઈ પણ વ્યક્તિ વસ્ત્ર રહિત રહેતી નથી. ઉત્તમ તેમજ મૂલ્યવાન વસ્ત્ર ત્યાંના માણુઓને એમનાંથી પ્રાપ્ત થતા રહે છે કેમકે એ વૃક્ષો સ્વભાવતઃ અનેક રોગોથી રંજિત થયેલા વસ્ત્રાના રૂપમાં પરિણત થઈ જાય છે, જેને Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तसूत्रे ङ्गाः एते त्रयो देशविशेषाः, एतेषां सम्बन्धिनो ये नलिनतन्तवः मृणालतन्तवः सूक्ष्मतन्त वः यद्वा सूक्ष्मतन्तुमय्यः, भक्तयः विशिष्टरचनाः ताभिः चित्राः अद्भुताः वस्त्रविधयः बहु प्रकाराः अनेक प्रकाराः भवन्ति तथा प्रवर पत्तनोगताः प्रसिद्धनगरोद्भवाः, वर्णरागकलिताः वर्णैः अनेकविधवर्णैः रागैः मञ्जिष्ठादिभी रागैः कलिताः युक्ताः तथैव तेनैव प्रकारेण ते पूर्वोक्ताः अनग्ना अपि द्रुमगणा: तिष्ठन्ति, अनेक बहुविधेत्यादि प्राग्वत् ॥ १० ॥सू०२३|| पूर्वसूत्रे सुषमसुषमायां कल्पवृक्षदशकस्वरूपं वर्णितम् अधुना सुषमसुषमा भाविनां मनुजानां स्वरूपं जिज्ञासमान आह मूलम् -- तीसे णं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाणं केरिसए आयारभाव पडोयारे पण्णत्ते ! गोयमा ! ते णं मनुया सुपइट्ठियकुम्म चारुचलणा जाव लक्खणवंजणगुणोववेया सुजायसुविभत्त संगयंगा पासाईया जाव पडिरूवा । तीसे णं भंते ! समाए भरहे वासे मनुईण केरिसए आयारभाव पडोयारे पण्णत्ते ? गोश्मा ! ताओ णं मनुईओ सुजायसव्वंगसुंदरओ पहाणमहिला गुणे | है जुत्ता अइकंत विसप्पमाणमउयसुकुमाल कुम्मसंठियविसिट्ठचलणा उज्जुमउयपीवर सुसाहयगुलीओ अब्भुण्णयरइयतलिण तंत्र सुइणिद्रणक्खा रोमरहियपट्टलट्ठसंठिय अजहृण्ण सत्थलखण अक्कोप्पजघजुयलाओ सुणिम्मिय सुगढ सुजण्णुमंडलसुबद्धसंधीओ कयली खंभाइरेकसंठियणिव्वण सुकुमालमउयमंसल अविरलसमसंहियसुजाय वट्टपीवरणिरंतगेरु अड्डावयवीइयपट्टसंठिय पसत्थविच्छिण्णपिहुलसोणी वयणायामप्पमाण दुगुणिय विसालमंसल सुबद्ध जहणवरधारिणीओ वज्जविराइयपसत्थ लक्खणनिरोदर तिवलियबलियतणु यमज्झिमाओ उज्जुयसमसहिय जच्च तणु कसिण गिद्ध आइज्जलउहसुजाय सुविभत्त कंत सोभंतरुइल रमणिज्जरोमराई गंगावत्तपयणहिणावत्ततरंग भंगुर विकिरणतरुण बोहिय आकोसायंतपउम गंभीरवियडणाभा अणुब्भडपसत्थपीण कुच्छीओ सण्णयपासाओ संगयपासाओ इन्हीं वस्त्रों का वर्णन इस सूत्र द्वारा किया गया है इनको प्रकट करने वाले सूत्रगत पदों की व्याख्या मैंने हिन्दी अनुवाद करते समय जींवाभिगम सूत्र में की है अतः वहीं से यह जान लेनी चाहिये । આ વત્રાનુ વર્ણન આ સૂત્રદ્વારા કરવામા આવેલ છે. તેને પ્રકટ કરનારા સૂત્ર ગતપદ્માની વ્યાખ્યા જીવાભિગમ સૂત્રના અનુવાદમાં કરવામાં આવીગયેલ છે. તેથી ત્યાંથી તે સમજી લેવી ાસ૦ ૨૩।। Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्यस्वरूपनिरूपणम् २२३ सुजायपासाओ मियमाइयपीणरइयपासाओ अकरंडय कणगरुयगणिम्मल सुजायणिरुवहयगायलट्ठीओ कंचणकलसप्पमाण समसहियलट्ठ चुच्चुआमेलगजमलजुयलवट्टिय अब्भुण्णयपीणग्इअय पोवरपओहराओ भुयंग अणुपुवतणुय गोपुच्छ वट्टसमसंहियणमिय आइज्जललियवाहा तंबणहाओ मंसलग्गहत्थाओ पीवरकोमलवरंगुलियाओ णिद्धपाणिरेहा रवि ससि संखचकसोत्थियसुविभत्तसुविरइयपाणिरेहाओ पीणुण्णय कर कक्ख वत्थिप्पएसा पडिपुण्णगलकपोला चउरंगुल सुप्पमाण कंबुवरसरिसगीवाओ मंसलसंठिय पसत्थहणुगाओ दाडिम पुष्फप्पगास पीवर पलंब कुंचियवराधराओ सुंदरुत्तरोटाओ दहिदगरयचंदकुंदवासंतिमउलधवलअच्छिद्दविमलदसणाओ रत्तुप्पलपत्तमउय सुकुमालतालुजीहाओ कणवीरमउलकुडिल अब्भुग्गय उज्जुतुंगणासाओ सारयणवकमल कुमुयकुवलयविमलदलणियरसरिसलक्खणपसत्थअजिह्मकंतणयणा पत्तलधवलायत आतंबलोयणाओ आणामियचावरुइलाकण्हब्भराइसंगयसुजायभूमयाओ अल्लीणपमाणजुत्तसवणा सुसवणाओ पीणमट्टगंडलेहाओ चउरंसपसत्थ समणिडालाओ कोमुई स्यणिअरविमलपडिपुण्णसोमवयणाओ छत्तुण्णयउत्तमंगाओ अकविल सुसिणिद्ध सुगंधदीहसिस्याओ छत्त १ ज्झय २ जूअ ३ थूम ४ दामिणि ५ कमंडलु६ कलस ७ वावि ८ सोत्थिय ९ पडाग १० जव ११ मच्छ १२ कुम्म १३ रहवर १४ मगरज्झय १५ अंक १६ थाल १७ अंकुस १८ अट्ठावय १९ सुप्पइट्ठग २० मयूर २१ सि रियभिसेय २२ तोरण २३ मेइणि २४ उदहि २५ वरभवण २६ गिरि २७ वरआयंस २८ सलीलगय २९ उसभ ३० सीह ३१ चामर ३२ उत्तम पसत्थ बत्तीस लक्खणधरीओ हंससरिसगईओ कोइलमहुरगिरसुस्सगओ कंता सव्वस्स अणुमयाओ ववगयवलिपलियवंगदुबण्णवाहि दोहग्गसो Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२४ जम्मूदीपप्राप्तिस्त्रे गमुक्काओ उच्चत्तेण य णराण थोवूणमुस्सियाओ सभावसिंगारचारुवे. साओ, संगयगयहसियभणियचिट्ठियविलाससंलावणिउणजुत्तोवयारकुसलाओ सुंदर थणजहणवयणकरचलणणयणलावण्णयरूपजोव्वणविलासकलियाओ गंदणवणविवरचारणीउव्व अच्छराओ भरहवास माणुसच्छराआ अच्छेरगपेच्छणिज्जाओ पासाईयाओ जाव पडिरूवाओ। तेण मणुओ ओहस्सरा हंसस्सरा णंदिस्सरा सीहस्सरा सीहघोसा सुस्सरा सुस्सरणिग्घोसा छायायवोज्जोविअंगमंगा वज्जरिसहनारायसंघयणा समचउरंससंगणसंठिया छविणिरातका अणुलोमवाउवेगा कंकग्गहणी कवोयपरिणामा सउणिपोसपिटुंतरोरुपरिणया छद्धणुसहस्सभृसिआ । तेसिणं मणुयाण वे छप्पण्णा पिट्ठकरंडकसया पण्णत्ता समणाउसो ! पउ मुप्पलगंधसरिसणीसाससुरभिवयाणा, तेणं मणुया पगई उवसंता पगई पयणु कोहमाणमायालोमा मिउमदवसंपन्ना अल्लीणा भदगा विणीया अप्पिच्छा असण्णिहिसंचया विडिमंतरपरिवसणा जहिच्छिय कामकामिणो ।सू०२४॥ छाया--तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरते वर्षे मनुष्याणां कीशकः आकारभावप्रत्यवतारः प्रज्ञप्तः गौतम ! ते खलु मनुजा सुप्रतिष्ठितकूर्मचारुचरणा याबतू लक्षणव्यञ्जनगुणोपपेता सुजात सुविभक्तसङ्गताङ्गाः, प्रासादीयाः, यावत् प्रतिरूपाः, । तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरते व मनुजीनां कीदृशकः आकारभावप्रत्यवतारः प्रक्षप्तः ? गौतम ! ताः स्खलु मनुज्यः सुजातसर्वाङ्गसौन्दर्य प्रधानमहिलागुणयुक्ताः अतिकान्त विसर्प न्मृदुकसुकुमार कुर्मसंस्थित विशिष्ठचरणाः 'ऋजुमृदुक पीवरसुसंहताङ्गुलयः अभ्युन्नरतिद तलीन ताम्रशुचिस्निग्धनखाः रोमरहितवृत्तलष्ट (रम्य) संस्थिताऽजघन्य प्रशस्तलक्षण कोप्यजङ्घायुगलाः सुनिर्मित सुगूढ़ सुजानु मण्डल सुषद्धसन्धयः कदलीस्तम्भातिरेक संस्थिनिर्वृण सुकुमार मृदुकमांसलाबिरलसमसहितसुजातवृत्तपोवरनिरन्तरीर्वः अष्टापदवोतिक प्रष्ठ संस्थित प्रशस्तविस्तीर्ण पृथुलश्रोणयः वदनाऽऽयामप्रमाण द्विगुणितविशालमांसल सुबद्धजधनवरधारिण्यः वज्रविराजितप्रशस्तलक्षणनिरुदरत्रिवलिकबलिततनुनतमध्यमाः ऋजुकसमसा तनकृष्णस्निग्धादेयललित सुजात सविभक्तकान्तशोभमानरूचिररमणीय रोमराजयः गडावर्त प्रदक्षिणावर्ततरङ्गभङ्गुररविकिरण तरुणबोधिताऽऽक्रोशायमानपद्मगम्भीरविकटनाभाः अनुगट प्रशस्तपीन कुक्षय सन्नतपाङः सड्गतपाः सुजातपाङः मितमात्रिक पीनरतिदपाङः अकरण्डुक कनयरूचक सुजातनिरूपहतगात्रयष्टयः काञ्चनकलशप्रमाण समसहितलष्ट (रम्या)च्चुकमेलक यमल युगल वत्तित्ताभ्युन्नतपीनरतिदपीवरपयोधराः भून Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्यस्वरूपनिरूपणम् २२५ छगानुपूर्वतनुकगोपुच्छवृत्तसमसंहितनतादेयललितबाहवः ताम्रनखाः मांसलाग्रहस्ताः पीवरकोमलबराङ्गुलीकाः स्निग्धपाणिरेखाः रविशशिशङ्खचक्रस्वस्तिकसुविभक्तसुविरचितपाणिलेखाः पीनोन्नतकरकक्षवस्तिप्रदेशाः परिपूर्णगलकपोलाः चतुरङ्गुलसुप्रमाण कम्बुवरसदृशग्रोवाः मांसलसंस्थितप्रशस्तहनुकाः दाडिमपुष्पप्रकाशपीवरप्रलम्धकुञ्चित तरोष्ठाः दधिदकरजश्चन्द्रकुन्दबासन्तीमुकुलधवलाच्छिद्रविमलदशनाः रक्तोत्पलपत्रमृदुकसुकुमारतालुजिह्वाः करवीरमुकुलकुटिलाभ्युद्गतऋजुतुङ्गनासाः शारदनवकमल कुमुदकुवलयविमलदलनिकरसदृश लक्षणप्रशस्ताजिह्मकान्तनयनाः पत्रल धवलायताऽऽताम्रलोचनाः आनामित चाप चारुधिर कृष्णाभ्रराजिसङ्गतसुजातभ्रवः आलीनप्रमाणनयुक्तश्रवणाः सुश्रयणाः पीनलष्ट (रम्य) गण्डलेखाः चतुरस्र प्रशस्तसमललाटाः कौमुदीर निकरविमलपरिपूर्णसौम्यवदनाः छत्रोन्नतोत्तमागा: अकपिलसुस्निध सुगन्घदीर्धशिरोजाः छत्र १ ध्वज२ यूप ३ स्तूप ४ दामनी ५ कमण्डलु ६ कलश ७ वापी८ स्वस्तिक ९पताका १० यव ११ मत्स्य १२ कूम्म १३ रथबर १४ मकरध्वजा १५ ऽङ्क १६ स्थाला १७ ऽकुशा २१८ ऽष्टापद १९ सुप्रतिष्ठक २० मयूर २१ श्यभिषेक २२ तोरण २६ मेदिन्यु २४ दधि २५ वरभवन २६ गिरि २७ वरादर्श २८ सलीलगज २९ ऋषभ ६० सिंह ३१ चामरो ३२ त्तमप्रशस्तद्वात्रिंशल्लक्षणधराः हंससदृशगतयः कोकिलमधुरगीः सुस्वराः कान्ताः सर्वस्य अनुमताः व्यपगतवलिप. लित व्यङ्गदुर्वर्णव्याधिदौर्भाग्यशोकमुक्ताः उच्चत्वेन च नराणां स्तोकोनोच्छिताः स्वभावशृङ्गारचारवेषाः सङ्गतगतहसितभणितस्थितविलाससंलापनिपुणयुक्तोपचारकुशलाः सुन्दरस्तनजधनवदनकरचरणनयनलावण्यरूपयौवनविलासकलिताः नन्दनवनविवरचारिण्य इव अप्सरसः भरतवर्ष मानुषासरसः आचार्यकप्रेक्षणीयाः प्रासादीयाः यावत् प्रतिरूपाः ते खल मनुजा ओघस्वरा हंसस्वराः क्रौञ्चस्वराः नन्दीस्वराः सिंहस्वराः सिंहधोषाः सुस्वराः सु स्वरनिर्घोषाः छायातपोद्योतिताङ्गाङ्गाः बज्रऋषभनाराचसंहननाः समचतुरस्रसंस्थानसंस्थिताः छविनिरातङ्काः अनुलोमवायुवेगाः कङ्कग्रहणोकाः कपोतपरिणामाः शकुनिपोसपृष्ठासरोकपरिणताः षडधनुः सहस्रोच्छिताः तेषां खलु मनुष्याणां द्वेषटू पञ्चाशत् पृष्टकरण्डकशते प्रज्ञप्ते, श्रमणायुष्मन्!ाते खलु मनुजाः प्रकृत्युपशान्ताः प्रकृतिप्रतनुक्रोधमानमायालोमाः मृदुमादवसम्पन्नाः आलीनाः भद्रकाः विनीताः अल्पेच्छाः असन्निधिसंचयाः विष्टपान्तरप. रिवसनाः यथेप्सितकामकामिनः ॥ सू० २४ ॥ टीका--'तीसे णं भते!' इत्यादि । 'तीसे णं भंते! समाए भरहे वासे मणुयाणं' हे भदन्त ! तस्यां खलु समायां भरते इस प्रकार से १० दस तरह के कल्पवृक्षों का स्वरूप प्रकट कहके अब सूत्रकार सुषमसुषमा नामके कालमें उत्पन्न हुए मनुष्यों के स्वरूप का वर्णन करते हैं। "तीसेणं समाए भरहेवासे मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते" इत्यादि । આ પ્રમાણે ૧૦ પ્રકારના કલ્પવૃક્ષોનું સ્વરૂપ પ્રકટ કરીને હવે સૂત્રકાર સુષમાસુષમા નામક કાળમાં ઉત્પન્ન થયેલ મનુષ્યના સ્વરૂપનું વર્ણન કરે છે.? २९ Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२६ जम्बूद्वीप वर्षे मनुजानां युगलिनां स्त्री पुरुषाणां 'केरिसए' कोदृशक:-कथम्भूतः 'अयारभावपडोयारे' आकारभावप्रत्यवतारः-स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः ‘पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः?इति गौतमेन पृष्टो भगवान् प्राह- 'गोयमा !ते ण मणुया' हे गौतम! ते युगलिनः स्त्रीपुरुषाः 'सुपइट्टियं कुम्मचारुचलणा' सुपतिष्ठितकूर्मचारुचरणाः-सुप्रतिष्ठिताः समीचीनसंस्थानाः कूर्मचारुचरणाः-कूर्मः कच्छपस्तद्वत् उन्नतत्वेन चारवः शोभनाः चरणाः येषां ते तथा ननु'मानवा मौलितो चा देवाश्चरणतः पुनः" इति कविसमयान्मनुज जन्मवतां युग्मिनां मौलित एव वर्णनमुचितं तत्कथं चरणादारभ्य वर्णनं युक्तियुक्तमितिचेदत्रोच्यते - युग्मिनो हि मनुष्याः प्रशस्तपुण्यात्मानो भवन्तीति ते देव कल्पा इति न देवकल्पानां तेषां चरणत आभ्य वर्णने काचित्क्षतिरिति 'जाव लक्खणवंजणगुणोववेया यावत् लक्षणव्यन्जनगुणोपपेताः "सुपइ गौतम स्वामी ने प्रभु से इस सूत्र द्वारा ऐसा पूछा है कि हे भदन्त ! उस सुषमसुषमा आरक के सद्भाव में भरत क्षेत्र में युगलिक मनुष्योंका स्वरूपपर्याय प्रादुर्भाव-स्वरूप कैसा होता है ? इसके उत्तर में प्रभु ने ऐसा कहा है-'गोयमा ! तेण मणुया सुपइद्विय कुम्म चारुचलणा, जाव लकक्खणवंजणगुणोववेया सुजाय सुविभत्तसंगयंगा पासाईया जाव पडिरूवा" हे गौतम ? उस समय में मनुष्य युगलिक स्त्री पुरुष-जिनका संस्थान समीचीन है ऐसे तथा कच्छप के जैसे उन्नत सुन्दरचरणों वाले होते है, शंका-"मानवा मौलितो वा देवाश्चरणतः पुनः" इस कविसमय के अनुसार मनुष्य जन्मवाले युगलिकों का वर्णन मस्तक से लगाकर किया जाता हैं और देवों का वर्णन चरण से लेकर किया जाता है तो फिर यहां इनका वर्णन चरण से लेकर सूत्रकार ने क्यों किया ? तो इसका उत्तर ऐसा है कि युगलिक मनुष्य प्रशस्त पुण्यवाले होते हैं अतः उन्हें देवतुल्य माना जाता है अतः देवकल्प इन युगलिक मनुष्यों का वर्णन चरण से लेकर करने में कोई क्षति जैसी बात 'तीसेण समाए भरहे वासे मणुयाण केरिसप आयारभावपडोयारे पण्णत्ते-इत्यादि ।सूत्र१॥ ટીકાર્થ–ગૌતમે પ્રભુને આ સૂત્ર વડે પ્રશ્ન કર્યો છે કે હે ભદંત ! તે સુષમસુષમા આરકના સદ્ભાવમાં ભરતક્ષેત્રમાં યુગલિક મનુષ્યના સ્વરૂપ પર્યાય પ્રાદુર્ભાવ એટલે કે સ્વરૂપ डाय छे. ? सेना म प्रभुमे २५! प्रभाको धुं छे.-गोयमा ! तेणं मगुया सुपरट्ठिय कुम्मचारुचलणा जाव लक्खणवंजणगुणोववेया सुजायसुविभत्तसंगयंगा पासाईया जाव पडिरूवा' हे गौतम ! समये मनुष्य युगतिर स्त्री-पुरु५ रे मनु संस्थान सभीथीन छ એવા તેમજ કચછપ જેવા ઉન્નત સુંદર ચરાવાળા હોય છે. A-"मानवा मौलितो वा देवाश्चरणतः पुनः" । विसभर भुर मनुष्यજન્મવાળા યુગલિકોનું વર્ણન મસ્તકથી માંડીને કરવું જોઇએ અને દેવોનું વર્ણન ચર થી કરવામાં આવવું જોઈએ તે પછી અહીં એમનું વર્ણન ચરણથી માંડીને સૂત્રકારે શા માટે કર્યું છે ? આ પ્રશનો ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે યુગલિક મનુષ્ય પ્રશસ્ત પુણ્યવાળા હોય છે. એથી તેઓ દેવ તુલ્ય માનવામાં આવે છે. એટલા માટે દેવકલ્પ આ યુગલિક મનુષ્યનું વર્ણન ચરણથી માંડીને કરવા કે ઈ ક્ષતિ જેવી વાત નથી, આ યુગલિક સ્ત્રી-પુરુષ-લક્ષણ સવ Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्यस्वरूपनिरूपणम् २२७ ट्ठिय' इत्यादि पदादारभ्य 'लक्खण वंजण' इत्यादि पदपर्यन्त विशेषणपदानां संग्रहो जीवाभिगमादि सूत्रतो बोध्यः लक्षणव्यजनगुणोपपेताः-लक्षणानि-स्वस्तिकादीनि व्यजनानि-मपीतिलकादीनि गुणाः, प्रकृतिभद्रतादयश्च तैरुपपेताः युक्ताः 'सुजाय सुविभत्त संगयंगा' सुजातमुविभक्तसङ्गताङ्गाः मुविभक्तं सुष्ठु विभागयुक्तम् अङ्गोपाङ्गानो यथा वद्विभागसत्त्वात्, सङ्गतं-प्रमाणोपेतं न तु न्यूनाधिकम् अङ्गं शरीरावयवो येषां ते तथा 'पा साईया' प्रासादीया इत्यारभ्य 'जाव पडिरूवा' यावत् प्रतिरूपाः इति पर्यन्तपदसङ्ग्रहो बोध्यः तथाहि-पासादीयाः, दर्शनीयाः अभिरूपाः प्रतिरूपाः इति पदचतुष्टयं फलितम् एत द्वयाख्या प्राग्वत् . तस्यां खलु भदन्त ! समायामित्यादि 'तीसे णं भंते ! समाए' हे भदन्त ! तस्यां-पूर्वोक्तायां सुषमसुषमायां समायां कालविभागरूपायां खलु 'भरहे वासे भरते वर्षे भरतक्षेत्रे 'मणुईण' मनुज़ीनां मानुषीणां प्रस्तावाद युग्मिनीनां 'केरिसए' कीशकः कोदृशः 'आयारभावपडोयारे' आकारभावप्रत्यवतारः स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः 'पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः ? भगवानाह-गोयमा ! ताओणं' हे गौतम ! तस्यां खलु समायां ताः-त्वया पृष्टाः खलु 'मणुईओ' मनुज्यः 'सुजाय सव्वंगसुन्दरीओ' सुजातसर्वाङ्गसुन्दर्यः, सुजा नहीं है । युगलिक स्त्री पुरुष लक्षण-स्वस्तिक आदि, व्यंजन-मषीतिलक आदि एवं गुण-प्रकृति . भद्रता आदि से युक्त होते हैं, सुजात सुविभक्त संगत अंग वाले होते हैं अर्थात् इनके शरीरावयव सुविभागयुक्त होते हैं एवं सङ्गत -प्रमाणेपेत होते हैं न्यूनाधिक नहीं होते हैं, यहां जो प्रथम यावत् शब्द आया है उससे 'सुपइडिय' इत्यादि पद से लेकर 'लक्खण, वंजण' इत्यादि पद पर्यन्त जितने और विशेषणपद है उनका संग्रह जीवाभिगम आदि सूत्र से जानलेना चाहिये “पासाईया जाव पडिरूवा" पाठ में आगत इस यावत्पद से दर्शनीय और अभिरूप इन पदों का संग्रह हुआ है, इन चारों पद की ब्याख्या पहिले जैसो की गई है वैसे ही जाननी चाहिये "तीसेणं भंते ! समाए भरहे वासे मणुईणं केरिसए आयारभाव पडोयारे पण्णत्ते" हे भदन्त ! उस सुषमसुषमाकाल के समय भरत क्षेत्र की स्त्रियों का मनुष्यणियों का आकारभाव प्रत्यवतार स्वरूप कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं - "गोयमा ! ताओ णं मणुईओ सुजायसव्वंग सुंदरीओ पहाण સ્તિક વિગેરે વ્યંજન-ભષીતિલક વિગેરે તેમજ ગુણ-પ્રકૃતિ ભદ્રતા વગેરેથી યુક્ત હોય છે. સુજાત સુવિભક્ત સંગત અંગવાળા હોય છે. એટલે કે એમના શરીરાવય સુવિભાગયુકત હોય છે. તેમજ સંગત પ્રમાણે પેત હોય છે ન્યૂનાધિક હોતા નથી અહીં જે પ્રથમ યાવત્ २७४ मा छ तथा 'सुपइट्टिय' हत्याहि ५४थी भनि 'लक्खणवंजण' त्या ५६ ५-1 २८ वधाराना विशेषण पहे। छे भने। सई 'जीवाभिगम' पोरे सूत्रद्वा२। ngो नम्मे 'पासादीया जाव पडिरूवा" याम मावसभा यावत ५थी शनीय भने અભિરૂપ આ પદોના સંગ્રડ થયેલ છે. એ ચારે ચાર પદેની વ્યાખ્યા પહેલાં જેવી કરવામાં आवे छे. तेथी ४ सभापी से “तीसेणं भंते ! समाए भरहेवासे मणुईणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते" हे महन्त ! ते सुषमसपमा ना समये भरत क्षेत्रनी स्त्रीએના આકાર ભાવ પ્રત્યવતાર-સ્વરૂપ કેવું કહેવામાં આવેલ છે. આના જવાબમાં પ્રભુ કહે छे.- “गोयमा ! ताओ णं मणुइओ सुजायसव्वंगसुंदरीओ पहाण महिलागुणेहिं जुत्ता" . Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૨૨૮ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तानि यथावत् प्रमाणोपेततया सूत्पन्नानि सर्वाण्यङ्गानि मस्तकादोनि यासां ताः सुजातसर्वाङ्गा, ताश्च सुन्दर्यः सुजातसङ्गित्वात् मनोहराकाराः, 'पहाण महिलागुणेहिं जुत्ता' प्रधानमहिलागुणैर्युक्ताः प्रधानाः प्रवराः ये महिला गुणाः स्त्रीगुणाः प्रियंवदत्व स्वामिचित्तानुवर्तकत्वादयस्तैर्युक्ताः उपेताः तथा अइकंत विसप्पमाण मउय सुकुमाल कुम्मसंठिय विसिट्ठचलणा' अतिकान्त विसर्पन्मृदुक सुकुमार कूर्मसंस्थितविशिष्टचरणाः-अतिकान्तौ अतिसुन्दरौ, विसर्पन्तौ सञ्चरन्तावपि यद्वा 'विसप्पमाणे' त्यस्य विश्वप्रमाणेतिच्छाया तस्य द्विवचने विश्वप्रमाणौ-विशिष्ट स्वप्रमाणौ स्वशरीरानुसारि प्रमाणौ न न्यूनाधिकप्रमाणा वित्यर्थः मृदुक सुकुमारौ मृदुकानां-कोमलानां मध्ये सुकुमारौ सुकोमलौ कूर्मसंस्थितौ कूर्मः कच्छपस्तद्वत् उन्नतपृष्टतया संस्थिती विशिष्टौ मनोज्ञौ चरणौ यासांतास्तथा 'उज्जु मउयपीवरसुसाहयंगुलीओ, ऋजुमृदुकपीवरसुसंहताङ्गुली काः ऋजवः सरलाः मृदुकाः महिलागुणेहिं जुत्ता" हे गौतम ! वे मनुष्य स्त्रियां-युगलिक मनुष्यस्त्रियां अच्छे प्रमाण में उत्पन्न हुए मस्तकादिक अंगों वालो होती है तथा सुजात सर्वाङ्गयुक्त होने से वे बड़ी सुन्दर होतो हैमनोहर आकार वाली होती है, तथा महीलाओं के प्रधानगुणों से प्रिय बोलना एवं अपने स्वामी के चित्त के अनुकूल वर्तन करना आदि महिला जगत के प्रधान सद्गुणों से वे युक्त होतो है, "अ इकत विसप्पमाण मउय सुकुमाल कुम्मसंठियविसिट्ठचलणा, उज्जुमउल पीवर सुसाहियंगुलिओ अभुण्णय रइय तलिण तंबसुइणिदणक्खा रोमरहिय पट्ट-लट्ठ संठिय अजहण्णपसत्थलक्खण अक्को प्पजंघजुयलाओ" इनके दोनों चरण अतिक्रान्त-अतिसुन्दर होते है, विशिष्ट प्रमाणोपेत होते हैअपने-अपने शरीर के अनुरूप प्रमाण वाले होते हैं न्यूनाधिक प्रमाणयुक्त नहीं होते , दुनियां में जितने कोमल पदार्थ माने जाते हैं उन पदार्थों के बीच में ये इनके चरण और भी अत्यन्त सुकोमल है। तथा जैसा कच्छप का संस्थान होता है वैसाही संस्थान आकार इनके चरणों का होता है, अतएव ये बडे मनोज्ञ होते हैं । इनके चरणों की अंगुलियां ऋजु सरल होती है , मृदुक कोमल ગૌતમ ! તે મનુષ્ય સ્ત્રીઓ–યુગલિકમનુષ્ય સ્ત્રીઓ સુપ્રમાણમાં ઉત્પન્ન થયેલા મસ્તકાદિ અંગેવાળી હોય છે. તેમજ સુજાત સર્વાગ યુક્ત હોવાથી તેઓ ખૂબ જ સુંદર હોય છે. નેહર આકારવાળી હોય છે, તથા મહિલાઓના પ્રધાનગુણથી એટલે કે પ્રિય બલવું તેમજ સ્વામીના ચિત્તાનુકૂલ વર્તન કરવું વગેરે મહિલા જગતના પ્રધાન સદ્ ગુણેથી તેઓ યુક્ત હોય छे. “अइकंत विसप्पणमाण मउय सुकुमाल कुम्म संठिय-विसिट्ठचलणा उज्जमउल पीवर सुसाहियंगुलीओ अब्भुण्णयरईअतलिण तंब सुइद्धणिद्धणक्खा रोमरहिअ पट्ठलट्ठ संठिय अजहण्णपसत्थलक्खण अक्कोप्प जंध जुय लाओ' ओमना मन्ने यर । सतिsi-d-मति સુંદર હોય છે, વિશિષ્ટ પ્રમાણે પેત હોય છે. પોતપોતાના શરીરના અનુરૂપ પ્રમાણુવાળા હેય છે. ન્યૂનાધિક પ્રમાણ વાળા હોતા નથી. સંસારમાં જેટલા કોમળ પદાર્થો માનવામાં આવે છે. તે પદાર્થોની વચ્ચે એમના આ ચરણે અત્યન્ત વધારે સુકમળ છે. તેમજ જેવું કછપનું સંસ્થાન હોય છે, તેવું જ સંસ્થાન એમના ચરણેનું હોય છે. એથી એ ખૂબ જ મનોજ્ઞ હોય છે. એમના ચરણેની આંગળીઓ ઋજુ સરલ હોય છે. મૃદુક-કમળ-હોય છે અને પી Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाषिमनुष्य स्वरूपनिरूपनम २२९ कोमला : पीवराः पुष्टाः अनुपलक्ष्यमाणस्नाय्वादिसन्धिकत्वेनोपचिताः सुसंहताः सुमि लिताः अङ्गुल्यः पादाङ्गुल्यो यासां तास्तथा, 'अब्भुण्णय रइय तलिण तंब सुइणिदणक्खा' अभ्युद्गत रतिदतलिन ताम्र शुचिस्निग्धनखाः अभ्युन्नताः समुन्नताः रतिदाः द्रष्टृ जनानां प्रीतिदाः यद्वा 'रइया' इत्यस्य रजितेतिच्छाया, तत्पक्षे रन्जिताः लाक्षारसेन रागेण रज्जनमुपनीताः, तलिनाः प्रतलाः ताम्राः - ताम्रवर्णाः - ईषद्रक्ता शुचयः पवित्राः मलरहिताः स्निग्धाः चिक्कणाः नखाः यासां तास्तथा, मूळे 'नक्खे' त्यत्र द्वित्वं प्राकृतत्वात् 'रोमर हियवळ संद्वियअजहण्णपसत्थलक्खण अक्कोप्पजंघजुअलाओ' रोमरहित वृत्त लष्ट ( रम्य ) संस्थिताऽजघन्य प्रशस्तलक्षणा कोप्यजङ्घा युगलाः - रोमरहितं निर्लोम वृत्तं वर्तुलं लष्टसंस्थितं रम्यसंस्थानयुक्तम् ऊर्ध्वोर्ध्वक्रमेण स्थूलस्थूलतरम् इति भावः, अजधन्य प्रशस्तलक्षणम् अजघन्यानि उत्कृष्टानि प्रशस्तानि श्लाध्यानि लक्षणानि यत्र तत्तथा भूतम् अकोयम् अद्वेष्यम् अति सुभगत्वात् जङ्घायुगलं यासां तास्तथा, 'सुणिम्मिय सुगूढ सुजाणुमंडल सुबद्धसंघीओ' सुनिर्मित सुगूढ सुजानुमण्डलसुबद्धसन्धयः सुनिर्मिते सुष्ठु नितरां प्रमाणोपेते सुगूढे मांसलत्वादनुपलक्ष्ये ये सुजानुमण्डले सुन्दरजानुमण्डले तयोः सुबद्धौ दृढस्नायुभिः सम्यग्बद्धौ सन्धी सन्धाने यासां तास्तथा, ' कयलोखंभाइरेक संठिय " होती हैं और पीवर पुष्ट होती है, अर्थात् स्नायु आदिकों की सन्धियां इनमें दिखलाई नहीं देती हैं ऐसी होती है तथा सुसंहत होती हैं आपस में मिली रहती हैं इन अंगुलियों के नख समुन्नत होते हैं ऊपर कीओर बीच में उठे हुए रहते है रतिद होते हैं। देखने वालों को आनन्द प्रद होते है अथवा "रइया" रञ्जित होते हैं - लाक्षारस के राग से रंगे हुए रहते हैं, तलिन पतले होते हैं ताम्र ईषद् रक्तवर्ण वाले होते हैं, शुचि मल रहित होते है एवं स्निग्ध चिकने होते हैं । " नक्खे" में द्वित्व प्राकृत होने से हुआ है इनका जन्धायुगल रोमरहित होता है. वृत्त-वर्तुल-गोल होता है लष्ट संस्थित रम्य संस्थान से युक्त होता है उर्ध्व उर्ध्व क्रम से स्थूल स्थूल तर होता है-और अजघन्यप्रशस्त लक्षणों वाला होता है-उत्कृष्ट श्लाघ्य लक्षणों से युक्त होता है, अकोटच अतिसुभग होने से अद्वेष्य होता है " बुणिम्मिय सुगूढ़ सुजाणु मण्डल सुबद्ध संधीओ, कयलो भाइरेक सं વર-પુષ્ટ હાય છે. અર્થાત્ સ્નાયુ વગેરેને સ ંધિભાગ એમાં દેખાતા નથી, તેમજ સુસંર્હુત હોય છે. પરસ્પર અડીને રહે છે. એ આંગળીઓના નખા સમુન્નત હેાય છે. ઉપરની તરફ મધ્યમાં ઉउन्नत थयेला रहे छे. रतिह होय छे-लेनारायाने मानहग्रह होय छे. अथवा "रया" ति हाय छे-साक्षा रसना रागथी रंगेला होय छे. 'तलिन' पाता होय छे. ताम्र-विहू स्ववाजा होय छे. शुचि भव विहीन होय छे. तेभन स्निग्ध सुभिश्वय होय छे. "नक्खे' भां દ્વિત્વ પ્રાકૃત હૈાવાથી થયેલ છે. એમનું જ ધાયુગલ રામરહિત હૈાય છે. વૃત્ત-તુલ-ગાલ ડાય છે લષ્ટસ સ્થિત-મ્યસંસ્થાનથી યુક્ત હૈાય છે. ઉ ઉર્ધ્વ ક્રમથી સ્થૂલ સ્થૂલતર હોય છે. અને અજઘન્ય પ્રશસ્ત લક્ષણવાળુ' હોય છે. ઉત્કૃષ્ટ સ્લાય્ય લક્ષણોથી યુક્ત હાય છે. અકાપ્ય Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २३० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे णिव्वण सुकुमाल मउय मंसल अविरल समसंहिय मुजाय वट्टपीवरणिरंतरोरु' कदलो स्तम्भातिरेक संस्थित निव्रण सुकुमार मृदुक मांसलाविरलसमसंहितसुजातवृत्तपीवर निरन्तरोरवः कदली--रम्भा तस्या यः स्तम्भः-काण्डम् तस्मादतिरेकेण अतिशयेन सस्थितं संस्थानं ययोस्ते कदलीस्तम्भातिरकसंस्थिते निव्रणे विस्फोटकादि क्षतरहिते सुकुमा रमृदुके सुकुमारेषु मृदुषु मृदुके तथा अतिकोमले मांसले पुष्टे अविरले परस्परासन्ने समे तुल्यप्रमाणे सहिके क्षमे सुनाते मुनिष्पन्ने वृत्ते वर्तुले पीवरे उपचिते निरन्तरे पर स्परनिर्विशेषे ऊरू यासां तास्तथा, 'अट्ठावय वीइय पट्ट संठिय पसत्थ विच्छिण्णपिहुल सोणी' अष्टापदवीतिक प्रष्ठ संस्थित प्रशस्तविस्तीर्ण पृथुक श्रोणयः वोतिकः विगता ईतयो यस्य स वीतिकाः घुणाधुपद्रवरहितः स चासौ अष्ठापदः-चूतफलकविशेषः अत्र विशेषण वाचकपदस्य परप्रयोगः प्राकृतत्वात्, तद्वत् प्रष्ठसंस्थिता प्रधान संस्थानोपेता प्रशस्ता लाध्या विस्तीर्णविपृथुला-अतिस्थूला श्रोणिः कटिदेशो यासां तास्तथा तथा 'वयणायामप्पमाण दुगुणिय विसालमंसल सुबद्ध जहनवरधारिणीओ' वदनायामप्रमाणद्विगु ठिय निव्वण सुकुमालमउय म सल अविरल समसंहिय सुजाय वट्ट पीवर णिरंतरोरु" इनके सुजानु मण्डल नितरां प्रमाणोपेत होते हैं, और मांसल होने से अनुपलक्ष्य होते है तथा इनको संधियां दृढ़स्नायुओं से अच्छी तरह बद्ध रहती है इनके दोनों उरु कदली के स्तम्भ के जैसे संस्थान से भो अधिक सुन्दर संस्थान वाले होते हैं, विस्फोटक आदि के व्रण से रहित होते हैं, सुकुमार पदार्थों से भी ये अधिक सुकुमार होते हैं अतिकोमल होते हैं, मांसल -पुष्ट होते हैं, अविरल-परस्पर में जुड़े हुए से अर्थात् सट्टे हुए से रहते हैं, सम-तुल्य प्रमाण वाले होते हैं. सहित-सक्षम होते हैं, अच्छे रूप में उत्पन्न हुए होते हैं, वृत्त-वर्तुल-होते है, पीवर-मांस से भरे हुए रहते हैं. एवं निरन्तर-अंतर रहित होते हैं, "अट्ठावय वोइयपट्ठसंठियपसत्थविच्छिण्णपिहुलसोणी, वयणायामप्पमाण दुगुणिय विसालमंसल सुबद्ध जहणवर धारिणीओ, वज्जविराजियपप्तत्थ लक्खणनिरोदरअति सुभम हावाथी अ५ डाय छे. “सुणिम्मिय सुगूढ सुजण्णुमंडल सुबद्धसंधीओ, कयली खंभाइरेक संठिअणिवण सुकुमाल मउअ मंसल अविरल समसंहिअ सुजायवट्ट पीवर णिरं तरोरु" मनु सुजनुम अतीव सप्रमाण डाय छ, भने भांस पायी गनुपलक्ष्य હોય છે. તેમજ એમની સંધિઓ દૃઢ સ્નાયુઓથી સારી રીતે આબદ્ધ રહે છે. એમના બન્ને ઉરુએ કદલીને સાંભના સંસ્થાન કરતાં પણ વધારે સુંદર સંસ્થાનવાળા હોય છે. વિસ્ફોટક વગેરના ત્રણથી રહિત હોય છે. સુકુમાર પદાર્થો કરતાં પણ વધારે એઓ સુકુમાર હોય છે. અતિ કોમળ હોય છે. માંસલ-પુષ્ટ હોય છે. અવિરલ એક બીજા ને અડીને રહે છે. સમતુલ્ય પ્રમાણ વાળા હોય છે સહિક–સક્ષમ હોય છે. સારા રૂપમાં ઉત્પન્ન થયેલા હોય છે. वृत्त-वतु डाय छे. पी५२ पुष्ट २७ छे. तभ४ सतत मत२ विलीन डाय छ "अट्ठावय. वीइय पट्ट संठिअ पसत्थ विच्छिण्ण पिहुलसोणी वयणायामप्पमाणदुगुणिया विसाल मंसल सुबद्धजहणवरधारिणीओ वज्जविराजि अपसस्थ लक्खण निरोदरतिवलियवलि Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्य स्वरूपनिरूपणम् २३१ णितविशाल मांसल सुबद्ध जघनवरधारिणीण्यः वदनं मुखं तस्य य आयामो दैर्घ्य द्वादशाङ्गुलप्रमाणं तस्माद् द्विगुणितं चतुर्विशत्यङ्गुलप्रमितं विस्तीर्ण वि तारोपेतं मांसलं पुष्टं सुबद्धं दृढवद्धं न तु श्लथं जघनवरं प्रधानकटिपूर्वभागं धरन्तीत्येवं शीलास्तथा वरशब्दस्य विशेषणवाचकत्वेन पूर्वप्रयोगाईत्वेऽपि परप्रयोगः प्रकृतत्वादेवात्रापि बोध्यः 'वज्जविराइय पसत्यलक्खणनिरोदरतिवलियवलिय तणुणयमज्झिमाओ' वज्रविराजित प्रशस्तलक्षणनिरुदर त्रिवलिक बलित तनुनतमध्यमाः-वज्रविराजितं वज्रवद् विगजितं शोभितं क्षामत्वेन प्रशस्तलक्षणं सामुद्रिकशास्त्रोक्तप्रशस्तगुणयुक्तं निरुदरं विकृतोदररहितं यद्वा निरुद - रम् अल्पोदरम् त्रिवलिकं त्रिवलियुतं बलितं सजातबलं बलयुक्तं नहि क्षामतया दुर्बलम् तनुप्रतलं नतं नम्रं तनुनतं किञ्चिन्नम्रम् मध्यम-कटिरूपमध्याङ्गम् यासां तास्तथा 'उज्जुयसमसहियजच्च तणु कसिण णिद्ध आइज्जलउह सुजायमुविभत्तकंतसोभंत रुइल रमणिज्ज रोमराई' ऋजुक समसहितजात्यतनु कृष्णस्निग्धादेय ललित सुजात सुविभक्त कान्तशोभ तिबलियवलियतणुमज्झिमाओ" अष्टापदवीतिक पद में वीतिक विशेषण का प्राकृत होने से परप्रयोग हुआ है-तथा च-घुण आदि उपद्रव से रहित चूतफलक की तरह प्रष्ठ संस्थान वाला-श्रेष्ठ आकार वाला इनका श्रोणिप्रदेश-कटिभाग होता है और वह प्रशस्त एवं अतिस्थूल होता है. इनका प्रधानकटि पूर्वभाग अर्थात् जघन मुख को द्वादश अंगुल प्रमाण लम्बाई से दूना होता है अतएव वह विस्तीर्ण, मांसल-पुष्ट, एवं सुबद्ध-मजबूत होता है. इनका जो मध्यभाग है वह-वज्र के जैसा सुहावना होता है. प्रशस्त लक्षणों से-सामुद्रिक शास्त्रोक्त अच्छे २ लक्षणों से युक्त होता है. विकृत उदर से रहित होता है अथवा अल्प उदर वाला होता है. त्रिबली से युक्त होता है, बलित-बल संपन्न होता है. दुर्बल नही होता है पतला होता है-स्थूल नही होता है, और कुछ २ झुकासा रहता है " उज्जुय सम सहिय जच्चतणु कसिणणिद्ध आइजलउहसुजाय सुविभत्त कंतसोभतरुइल रमणिज्जरोमराई, गंगावत्त पयाहिणावत्त तरंग भंगुर विकिरण तरुण यतणुमज्झिमाओ, मष्टापवीति: ५४मां वीति विशेष प्राकृतनु पाथी ५२ प्रयोग થયેલ છે. તેમજ ઘણ વગેરે ઉપદ્રવથી વિહીન ઘતકલકની જેમ પ્ર૪ સંસ્થાને યુકત શ્રેષ્ઠ આકાર યુક્ત એમને શ્રોણિ પ્રદેશ-કટિ ભાગ હોય છે, અને તે પ્રશસ્ત અને અતિ સ્થૂલ હોય છે. એમને પ્રધાન કટિપૂર્વભાગ એટલે કે જઘન મુખની દ્વાદશ અંગુલ પ્રમાણ લંબાઈ કરતાં બે ગણું હોય છે, તેથી તે વિસ્તીર્ણ માં લાલ પુષ્ટ અને સુબદ્ધ સુદઢ હોય છે. એમને જે મધ્યભાગ છે તે વજના જે મને ડર હોય છે. પ્રશસ્ત લક્ષણેથી સામુદ્રિક શાસ્ત્રોકત સારાં-સારાં લક્ષણેથી યુક્ત હોય છે. વિકૃત ઉદરથી રહિત હોય છે. અથવા અલ્પ ઉદરવાળે હોય છે. ત્રિવલીથી યુક્ત હોય છે. બલિત-બલ સંપન્ન હોય છે. દુર્બળ डत नथी, पाता डाय छे, स्थूल डा। नथी अने ४ नमित डाय छे."उज्जुयसमसहिय जच्च तणुकसिणणिद्ध आईज्जलउह सुजाय सुविभत्तकंतसोभतरुइलरमणिज्ज Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २३२ मानरुचिररमणीय रोमराजयः:-इह ऋजुकत्वादीनि रोमराजिविशेषणानि, तत्र ऋजुका - अवक्रा न कुटिला समा तुल्या न क्वापि दन्तुरा संहिता मिलिता न त्वन्तरिता जात्या स्वाभाविक मुख्या वा, तन्वी सूक्ष्मा कृष्णा-कृष्णवर्णा, न तु कपिरोमवत्कपिशा स्निग्धा चिक्कणा सकान्तिः आदेया नेत्रस्पृहणीया ललिता - सुन्दरता सम्पन्ना सुजाता सूत्पन्ना सुविभक्ता समीचीनविभागसम्पन्ना कान्ता कमनीया अत एव शोभमाना रुचिररमणीया अत्यधिकमनोहरा रोमराजि: रोमवलिर्यांसां तास्तथा, केचिद् ऋजुकत्वादीनि रोम विशेणान्याहुः तथा सति व्यधिकरणबहुव्रीहे खलम्बनापत्तिरतो रोमराजिविशेषणान्येव युक्तानीति व्यधिकरणबहुव्रीहे रगतिकगतित्वात्तन्मतं न युक्तम् । 'गंगावत पयाहिणावत्ततरंग भंगुर विकिरणतरुण बोहियआको सायं तप उमगंभीरवियडणाभा' गङ्गावर्त्तप्रदक्षिणावर्ततरङ्गभङ्गुररविकिरणतरुण बोधिताकोशायमानपद्मगम्भीरविकटनाभाः - एतत्पदं मनुजवर्णनप्रसङ्गेऽस्मिन्नेव सूत्रे पूर्वं व्याख्यातं केवलं स्त्रीपुंसत्वकृतो भेदः अन्यत्सर्व समानम्, 'अणुब्भडपसत्थपीण कुच्छीओ' अनुद्भट प्रशस्तपीनकुक्षयः अनुद्भटौ - अस्पष्टौ प्रशस्तौपोनौ स्थूल कुक्षी - उदरस्य वामदक्षिणभागौ यासां तास्तथा, ' सण्णयपासाओ ' बोहिय आकोसायंतपउम गंभीरवियडणाभा" इनकी रोमराजिऋजुक - ऋज्वी सरल होती है, वक्र, कुटिल नहीं होती है, सम- बराबरहोती है कमती बढती नहीं होती है-संहित- आपस से मिली हुई होती है. अन्तर युक्त नहीं होती है. स्वभावतः पतली होती है. स्थूल नहीं होती है. कृष्णवर्ण वालो होती है. ऋषि के रोमों की तरह कपिश नहीं होती है. स्निग्ध - चिकनी होती है, दर्दरी नहीं होता है, आदेय नेत्रों को स्पृहणीय होती है, ललित सुन्दरता से युक्त होती है, सुजात होतो है. अच्छे ढंग से उत्पन्न हुई होती है, सुविभक्त होती है. अच्छी तरह विभाग से संपन्न होती है. कान्त कमनीय होती है. अतएव यह बड़ी सुहावनी लगती है, और जितनी भी रुचिर वस्तुएँ हैं उनकी भी अपेक्षा यह अधिक रुचिर होती है "गंगावर्त प्रदक्षिणावर्त” आदि सूत्र वर्णन के प्रसङ्ग में इसी सूत्र में पहिले व्याख्यात हो चुका है " अणुब्भड पत्थ पीणकुमनुष्य मराई, गंगावत पयाहिणावत्ततरंगभंगुर विकिरण तरुण बोहिअ आकोसायंत पउम : गंभीरविअडणाभा" शेभनी भिरात्रि ऋ ऋवी सरण होय थे. वह टिस होती નથી. સમ ખરાખર હૈાય છે. સહિત પરસ્પર મિલિત હૈાય છે. અન્તરથી યુક્ત હાતી નથી સ્વભાવતઃ પાતળી હાય છે. સ્થૂલ હાતી નથી કૃષ્ણ વણુ વાળી હોય છે, કપિના રામની જેમ કપિશ હૈાતી નથી. સ્નિગ્ધ સુચિકણુ હાય છે, ખરબચડી હાતી નથી આર્દ્રય નેત્રો માટે સ્પૃહણીય છે. લલિત સુંદરતાથી યુક્ત હાય છે સુજાત હાય છે. સારી રીતે ઉત્પન્ન થયેલ ડાય છે. સુવિભકત હાય છે. સારી રીતે વિભાગથી સંપન્ન હેાય છે. કાન્ત કમનીય છે. એથી તે ખૂબજ સેાહામણી લાગે છે. અને જેટલી રુચિકર વસ્તુએ છે તે સવ' કરતાં તે વધારે थिर होय छे, “गंगावर्त प्रदक्षिणावर्त्त" वगेरे सूत्र भनुभवायुनना प्रसंगमा या सूत्रन वर्षानभां पडेलां व्यभ्यात थयेा छे “अणुब्भडपसत्थपीण कुच्छीओ सण्णयपासाओ संगय . Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुमाभाविमनुष्यस्वरूपनिरूपणम् २३३ सन्नतपार्थाः,' संगयपासाओ ' संगतपार्थाः, 'सुजायपासाओ' सुजातपार्थाः, 'मियमाइयपीण रइयपासाओ' मितमात्रिकपीनरतिदपााः एतत्पदचतुष्टयं प्राग्वत् केवलं स्त्रीपु. सत्वकृतो विशेषः, 'अकरडय कणगरुयगणिम्मलसुजायणिरुवहयगायलट्ठीओ' अकरण्डुक कनकरुचकनिर्मलसुजातनिरुपहतगात्रयष्टयः-अकरण्डु का मांसलत्वादनुपलक्ष्यमाणपृष्ठवंशास्थिका कनकरुचका-स्वर्णवत्कान्तिकलिता निर्मला स्वाभाविकाऽऽगन्तुकोमयमलरहिता, सुजाता गर्भाधानादारभ्य जन्मदोषरहिता, निरूपहता ज्वरादिरोगदंशाधुपद्रवरहिता गात्रयष्टिः-शरीररूपयष्टि र्यासा तास्तथा, 'कंचण कलसप्पमाणसमसहिय लट्ठचुच्चुआमेलगजमलजुयल वट्टिय अब्भुण्णयपीणरइयपीवरपओहराओ' काश्चनकलशप्रमाणसमसहितलष्ट (रम्य) चूचुकामेलक यमल युगल वर्तिताभ्युन्नतपोनरतिदपीवरपयोधरा:-काञ्चनकलशप्रमाणौ सुवर्णघटमितौ समौ परस्परं समानौ न न्यूनाधिको सहितौ मिलितो आन्तर्यरच्छुओ सण्णयपासाओ, संगयपासाओ, सुजायपासाओ. मियमाइयपोणरइयपासाओ" इनके उदर के वाम दक्षिणभाग अनुद्भट-अस्पष्ट होते हैं, प्रशस्त-लाध्य होते हैं, और पीन-स्थूल होते हैं, "सन्नतपार्श्व, सुजातपार्श्व, मित्रमात्रिक पीन रतिदपार्श्व"ये पदत्रय पहिले मनुज वर्णन के समय व्याख्यात हो चुके हैं "अकरंडय कणग रुयग णिम्मल सुजायणिरुवहय गायलट्ठीओ" इनकी शरीर यष्टि अकरण्डुक-मांसल होने से अनुपलक्ष्यमाण है. पृष्ठवंश की हड्डी जिसमें ऐसी होती है, तथा स्वर्ण को जैसो कान्ति से युक्त होती है, निर्मल स्वाभाविक एवं आगन्तुक मैल से रहित होती है. सुजात होती है. गर्भ से लेकर जन्म तक के दोषों से रहित होती है एवं निरुवहतज्वरादिरोग तथा देशादिक उपद्रव से रहित होती है "कंचणकलसप्पमाणसमसहियलट्ठचुच्चु आमेलग जमलजुअलवद्रिय अब्भुणययोग रइय पवरप मोहराओ' इनके दोनों पयोधर सुवर्ण के घट के जैसे सुहावने होते हैं, सम होते हैं परस्पर में समान होतेहैं न्यूनाधिक नहीं होते हैं. आपस में मिले हुए होते हैं. इनको इतनी अधिक निकटता रहती है कि इन दोनों के बीच में पासाओ, सुजायपासाओ, मियमाइय पीणरइमपासाओ" मेमना Rन पाम-Res ભાગ અનુદુ ભટ અસ્પષ્ટ હોય છે. પ્રશસ્ત લાધ્ય હોય છે. અને પીન સ્થૂલ હોય છે. "सन्नतपाव, सुजातपाव, मित्र मात्रिक पीनरतिदपार्श्व" से त्र0 पहे। ५i भनुभव बनना प्रभा व्याभ्यात ये छे. 'अकरंडय कणगरुयगणिम्मल सुजाय णिरुवहय मायलहीओ" अमनी शरीरयष्ट ४२ मांसल पाथी अनु५सयमा छे वशन હાડકું જેમાં એવી તે હોય છે તેમજ વર્ણના જેવી કાંતિથી યુકત હોય છે. નિર્મળ સ્વા ભાવિક અને આગતુક મેલથી વિહીન હોય છે. સુજાત હોય છે. ગર્ભથી માંડીને જન્મ સુધીના દૃષોથી રહિત હોય છે. અને નિવહત જવરાદિરોગ તેમજ દંશાદિક ઉપદ્રથી सीन डाय छे. "कंचणकलसप्पमाणसमसहिय लढवाचु आमेलगजमल जुअल पट्टिअ अभुण्णयवीणरइअपीवरपओहराओ" समान भन्ने पयोधरे। सुवर्ण घटना वा भना હર હોય છે. સમ હોય છે પરસ્પર માં સમાન હોય છે. ન્યૂનાધિક હોતા નથી પરસ્પર Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २३४ अम्म्दीपप्रतिस्पे हितौ अनयोर्मध्ये विसतन्तुरपि न प्रवेष्टुमर्हतीति भावः, लष्टचूचुकामेलको-लष्टौसुन्दरौ चूचुकामेलको कुचाग्रभागौ ययोस्तौ तथाभूतौ यमलौ तुल्यश्रेणिको युगलौ युग्मरूपौ वर्तितौ-वर्तुलाकारौ अभ्युन्नतौ उत्तुङ्गो पीनरतिदौ पुष्टप्रीतिदी, पीवरौ मांसलत्वात्पुष्टौ पयोधरौ-कुचो यासां तास्तथा, 'भुयंग अणुपुव्व तणुअ गोपुच्छ वट्ट समसंहिय णमिय आइल्लललियवाहा' भुजङ्गानुपूर्व्य तनुक गोपुच्छ वट्ट समसंहितनताऽऽदेयललितबाइव:भुजङ्गानुपूर्व्यतनुको-भुजङ्गः सर्पस्तद्वत् आनुपूर्येण अधोऽधोभागक्रमेण तनुको प्रतली अ. तएव गोपुच्छवृत्ती गोपुच्छवद् वृत्तौ वर्तुलो समौ परस्परं सदृशौ संहितो मध्यशरीरापेक्षयाऽविरलौ नतौ-नम्रौ स्कन्धदेशस्य नतत्वात आदेयौ-अतिशोभनतया कमनीयौ ललितौ मनोहरौ बाहू भुजी यासां तास्तथा, 'तंबनहाओ' ताम्रनखाः ताम्रवर्णनखाः रक्तनखा इत्या. शयः, 'मंसलग्गहत्थाओ' मांसलाग्रहस्ताः मांसलो पुष्टी अग्रहस्तो हस्ताग्रभागो यासां तास्तथा, पीवर कोमलवरंगुलियाओ' पीवर कोमल वराङ्गुलीका: पीवराः पुष्टाः कोमला मृदवः से मृणालतन्तु भो नही निकल सकता है या मृणालतन्तु भी इन दोनों के मध्य में प्रवेश नहीं पासकता है। इन दोनों स्तनों के जो अग्रभाग होते हैं वे बड़े सुन्दर होते हैं, ये दोनों स्तन समश्रेणि में रहे हुए होते हैं और युग्मरूप होते हैं इनका दोनों का आकार गोल होता है और ये वक्षस्थल पर आगे की ओर बहुत सुन्दर ढंग से ऊँचे उठे हुए होते हैं "पीनरतिदौ" ये स्थूल होते हैं और प्रीति देने वाले होते है तथा मांस से भरे हुए रहते है “भुअंग अणुपुब्बतणुभ गोपुछवट्टसमसंहिय णमिय आइज्जललियवाहा” इनकी दोनों भुजाएँ सर्प की तरह क्रमशः नीचे की ओर पतली हुई होती है अतएव वे गोपुच्छ की तरह गोल होती है परस्पर में वे समान एकसी होती है, मध्यशरीर की अपेक्षा ये संहित-अविरल होती हैं स्कन्ध देशके नत होने से ये नम्रझुकी हुई होती है आदेय होती है और मनको हरण करने वाली होती है । "तंबणहाओ, मंसलग्गहत्थाओ, पीवर कोमलवरंगुलियाओ, णिपाणिरेहा, रविससिसंखचक्कसोत्थियसुविभत्तसुविरइयમળેલા હોય છે, એઓ એટલા પાસે પાસે હોય છે કે એઓ બનેનાં મધ્યમાંથી મૃણાલ તતું પણ નીકળી શકતું નથી અથવા તે એમના મધ્યમાં મૃણાલ તંતુ પણ પ્રવેશી શકતું નથી. એ બનશે સ્તનને જે અગ્રભાગ હોય છે. તે બહુ જ સુંદર હોય છે, એ બને તને સ ગમાં હોય છે. અને યુગ્મ રૂપ હેાય છે. એ બન્નેની આકૃતિ ગેળ હોય છે भने पक्षस्थर ५ मा म सु२ री 2 80 डाय छे "पीनरतिदों में स्थूल डाय छ भने प्रीति॥२४ डाय छे तम४ मांसथी सुपुष्ट डाय छे. "मुअंग अणु पुवतणु अगोपुच्छवटूट समसंहिय णमिय आइज्जललिय वाहा" मेमनी भन्ने सुनो। सपना જેમ ક્રમશઃ નીચેની તરફ પાતળી હોય છે એથી તે ગપુછની જેમ ગોળાકાર હોય છે. પર સ્પરમાં તે સમાને એક સરખી હોય છે. મધ્ય શરીરની અપેક્ષાએ એ-સંહિત અવિરલ હોય છે. સ્કન્ધદેશ નત હોવાથી એ નમ્ર-મિત હોય છે. આદેય હોય છે. અને મનહર लाय. "तंबणाओ. मंसलाहस्थाओ. पीवरकोमलवरंगलियाओ. णिपाणिरेहा. रवि ससि संख चक्क सोस्थिय सुधिभत्त सुविरइय पाणिलेहाओ" अमना नपान पता હોય છે. એમના હાથના અગ્રભાગ માંસલ-પુષ્ટ હોય છે, એમના હાથની આંગળી ઓ પી Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-छि वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्य स्वरूपनिरूपणम् २३५ वरा:- उत्तमा अंगुल्यो यासां तास्तथा, 'णिद्धपाणि रेहा' स्निग्धपाणिरेखा:-चिकणहस्तरेखावत्यइत्यर्थः 'रविससिसंखचक्कसोत्थिय सुविभत्तसुविरइयपाणिरेहाओ' रविशशिशकचक्रस्वस्तिक सुविभक्तमुविरचितपाणिरेखा:-रविशशिशचक्रस्वस्तिक एव सुविभक्ताः सुस्पष्टाः मुविरचिताः सुनिर्मिताः पाणिरेखाः हस्तरेखा यासां तास्तथा, 'पीणुण्णयकरकक्खवत्थिपएसा' पीनोन्नतकरकक्षवक्षोवस्तिप्रदेशाः पीनाः-पुष्टाः अत एव उन्नता:-अभ्युन्नति प्राप्ताःमशस्ता कर कक्षवक्षोबस्तिप्रदेशाः करकक्षः भुजमूळे वक्षो-हृदयं वस्तिमदेशा:-गुखप्रदेशश्च यासां तास्तथा, तथा 'पडिपुण्णगलकपोला' प्रतिपूर्णगलकपोलाः प्रतिपूर्णाः परिपुष्टा गलकपोलाः गल:-कण्ठः कपोलौ च यासां ताः, तथा चउरंगुल मुप्पमाण कबुंवरसरिसगीवाओ' चतुरगुलसुप्रमाण-कम्बुवर सदृशग्रीवाः चतुरंगुला-चतुरङ्गुलप्रमाणा अत एव सुप्रमाणा-उचितप्रमाणयुक्ता कम्बुवरसदृशी श्रेष्ठशकसमाना रेखात्रययुक्ता ग्रीवा यासां तास्तथा; 'मसलसठियपसत्थहणुगाओ मांसलसंस्थितप्रशस्तहनुकाः मांसलः-परिपुष्टः पाणिलेहाओ" इनके नखों का वर्ण ताम्र होता है इनके हाथों के अग्रभाग मांसल-पुष्ट होते है, इनके हाथों की मंगुलियां पीवर-पुष्ट होती है कोमल होती है और उत्तम होती है । ये स्त्रियां चिकनी हस्तरेखावालो होती हैं, इनके हाथों में रवि, शशि, शङ्ख, चक्र एवं स्वस्तिक, की रेखाएँ होती है और ये रेखाएँ वहां सुस्पष्ट होती हैं । "पीणुण्णयकरकक्खवस्थिपएसा" इनका कक्षप्रदेश, वक्षस्थल, और वस्तिप्रदेश-गुह्यप्रदेश-ये सब पुष्ट होते हैं उन्नत होते हैं एवं प्रशस्त होते हैं। "पडिपुण्णगलकपोला" इनके गाल और कण्ठ ये दोनों प्रतिपूर्ण-भरे हुए होते हैं पिचके नहीं होते हैं "चउरंगुलसुप्पमाणकंबुवरसरिसगीवाओ" इनकी जो ग्रीवा होती है वह चतुरंगुलप्रमाणवाली होती है और इससे वह सुप्रमाणोपेत मानी जाती हैं, तथा जैसा श्रेष्ठ शक होता है वैसी वह होती है अर्थात् रेखात्रय से सहित होती है, "मंसलसंठियपसत्थहणुगाओ" इनके कपोल का अधोभाग-हनु-मांसल होता है, उचितसंस्थानवाला होता है, अतएव वह प्रशस्त होता વર-સુપુષ્ટ હોય છે કે મળવાય અને ઉત્તમ હોય છે, એ સ્ત્રીઓ સુચિવાણ હસ્તરેખાઓ વાળી હોય છે. એમના હાથમાં રવિ શશી શંખ ચક્ર અને સ્વરિતકની રેખાઓ હોય છે. અને એ मा। त्यो सुस्पष्ट डाय छ, “पीणुण्णयकरकक्ववत्थिप्पएसा" मना ४६ प्रदेश पक्षસ્થળ અને વસ્તિપ્રદેશ-ગુદા પ્રદેશ એ સર્વે પુષ્ટ હો છે, ઉન્નત હોય છે તેમજ પ્રશસ્ત डाय छे. "पडिपुण्णगलकपोला" अमना माल भने ४४ थे भन्ने प्रति यू परिपुष्ट सुंदर डाय छ. २ वणी ये त नथी. चउरंगुलप्पमाणकंबुवरसरिसगीवाओ" मेमनी જે ગ્રીવા હોય છે તે ચતુરંગુલ પ્રમાણુવાળી હોય છે અને એથી જ તે સુપ્રમાણે પેતમાનવામાં આવી છે. તથા જે શ્રેષ્ટ શંખ હોય છે. તેવી જ તે શ્રેષ્ઠ હોય છે, એટલે કે ३मात्रयथी युत डाय छे. "मसल संठी पसत्थ हणुगाओ" मनापासना अधे। साग नु मांसल डाय छे. अथित संस्थान युत डाय छ, मेथी ते प्रशस्त डाय छे. "दाडिम Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २३६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे संस्थितः - उचिताकारयुक्तः, अत एव प्रशस्तः शोभनः हतुः कपोलाघोभागो यासां तास्तथा, 'दाडिमपुप्फ पगासपीवर पलंबकुंचियवराधराओ' दाडिमपुष्पप्रकाश पीवर मलम्बकु चितवराधराः - दाडिमपुष्पवत् प्रकाशो यस्य सः दाडिमपुष्पप्रकाशः दाडिमपुष्पवद् रक्तः पीवरः पुष्टः प्रलम्बः:- पूर्वोष्ठापेक्षया ईषलम्बमानः कुञ्चितः - ईषद् वलितः अत एव वरः श्रेष्ठः अधरः - अधस्तनोष्ठो यासां तास्तथा, 'सुंदरुत्तरोट्ठाओ, सुन्दरोत्तरोष्ठ्यः- शोभनोपरितनोष्ठयुक्ताः, तथा' दहि दगरयचंद कुं दवासंतिमउयधवल अच्छिदविमलदसणाओ' दधिदकरजचन्द्र वासंतीमुकुलधवलाच्छिद्रदशनाः- दधि प्रसिद्धं दकरजः जलकणः चन्द्रः प्रसिद्धः, कुन्द - कुन्दपुष्पं, वासन्ती मुकुल वासन्तीकलिका, तद्वद्धवलाः- शुभ्रास्तथा, अच्छिद्रा:अविरला दशनाः- दन्ताः यासां तास्तथा, - तथा 'रत्तुप्पलपत्त मउयसुकुमाल तालु जीहाओ' रक्तोत्पल पत्र मृदुकसुकुमार तालुजिहा :- रक्तोत्पलस्य पत्रं 'पांखडी इति प्रसिद्धं, तद्वद् रक्तं मृदुसुकुमारम्= अति कोमल तालुजिहुं-तालु जिह्वा च यासां तास्तथा, तथा 'कणवीरम उलकुडिल अब्भुग्गय उज्जुतुंगणासाओ, करवीर मुकुलाकुटिलाभ्युद्गतऋजुतुङ्गनासा:- करवीर: ' कनेर इति भाषा प्रसिद्धो वृक्षविशेषः, तस्य मुकुलवत् कलिका सदृशी अकुटिला: - अजिह्मा सती अभ्युद्गना श्रद्वय मध्यविनिर्गता, ऋज्वी सरला तुङ्गा उच्चा न तु हैं " दाडिमपुष्पगासपीवरपलंबकुंचियवराधराओ" इनका जो अधरोष्ठ होता है, वह पुप्प की तरह प्रकाशवाला होता है, अर्थात् अनार के पुष्प के जैसा लाल होता है, पुष्ट होता हैं, और ऊपर के होठ की अपेक्षा कुछ २ लम्बा होता है तथा वह कुंचित - नीचे की ओर कुछ २ झुका सा हुआ रहता है, अत एव वह बड़ा श्रेष्ठ होता है, "सुंदरुत्तरोट्टयाओ दहिदगरयचंदकुंदवासंतिमउलधवल अच्छिदविमलद सणाओ" तथा ऊपर का जो इनका होठ होता है वह बहुत सुन्दर होता है इनके जो दांत हैं वे दहि, जलकण, चन्द्र, कुन्दपुष्प और वासन्तीकली के जैसे अत्यन्त धवलवर्णवाले होते हैं, इनके बीच में छिद्र नहीं होता है ये ऐसे अविरल होते हैं, और विमल - मलरहित होते है, "रत्तुप्पलपत्तमउय मुकुमालतालुजीहाओ, कणवोरम उलकुडिल अभुग्गय उज्जुतुंगणासाओ, सारयणवकमलकुमुय कुवलयविमलदलणियरसरिसलक्खणपसत्थ अजिह्मपुष्पगास पीवर पलबकुंखियवराधराओ” खेभनो ने अधरोष्ठ होय छे ते हाडमा પુષ્પની જેમ પ્રકાશયુક્ત હેાય છે. એટલે કે દાડમના પુષ્પ જેવા લાલ હોય છે પુષ્ટ હાય છે. અને ઉપરના એક કરતાં કંઈક લાંબે હોય છે તેમજ તે કુચિત નીચેની તરફ સહેજ नम्र थयेस होय छे. मेथी ते भूज श्रेष्ठ होय छे. "सुन्दरुत्तरोटूठयाओ दहिदगरय चंद कु दवासंति मउलधवलअच्छिद्द विमलदसणाओ" तेभन उपरने में मेमना श्रेष्ठ होय हे ते બહુજ સુંદર હાય છે. એમના દાંત દહીં જલકણુ ચન્દ્ર કુન્દે પુષ્પ અને વાસન્તીની કળી જેવા અતીવ શ્વેત વર્ણવાળા હાય છે. એમની મધ્યમાં છિદ્ર હાતા નથી એ અવિરલ હાય છે અને विभा-भण रहित होय छे. "स्तुत्पलपत्तमउयसुकुमालतालुजीहाओ कणवीर मउलकुडिलअभुग य उज्जुतुरंग णासाओ, सारयणवकमलकुमुय कुवलयविमलदलणियरसरिस लक्खण Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्यस्वरूपनिरूपणम् २३७ गवादि शृङ्गवत् कुटिला नासा-नासिका यासां तास्तथा, तथा-'सारयणवकमलकुमुयकुवलयविमलदलणियर सरिसलक्खणपसत्थ अजिमकंतनयना' शारद नवकमल कुमुदकुवलय विमलदलनिकर सदृशलक्षणप्रशस्ताजिमकान्तनयनाः-शारदानि शरदृतु भवानि यानि नवानि-नूतनानि यानि कमलकुमुदकुवलयानि कमलं च पचं सूर्य विकासि, कुमुदं च उत्पलं चन्द्रविकासि, कुवलयं च नीलोत्पलम् ,एतेषां द्वन्द्वस्तानि तथा, एतेषां यानि विमलानिनिर्मलानि दलानि पत्राणि तेषां यो निकरः समूहः, तत्सदृशे-रक्तश्वेतनीलवर्णयुक्त लक्षणप्रशस्ते लक्षणतः-शोभनलक्षणयोगात् सुशोभने अजिह्मे अमन्दे भद्रभावयुक्ततया निर्विकारचपले कान्ते सुन्दरे नयने नेत्रे यासांता स्तथा, तथा 'पत्तलधवलायत आतंबलोयणाओ' पत्रलधवलायताताम्रलोचनाः पत्रले- पक्ष्मले शोभनपक्ष्मयुक्त धवले-शुभ्रे आयते दीर्धे कर्णान्तगते आताने-ईषदरुणे लोचने नेत्रे यासां तास्तथा, नारीणां नयनसुभगत्वकंतणयणा" इनका ताल और जिह्वा रक्तोत्पल के पत्र के समान रक्त होते हैं तथा मृदु और सुकुमार होते है इनकी नासिका कनेर की कलिका जैसी अकुटिल होती हुई भ्रद्वय के मध्य से निकलकर अत्यन्त सरल एवं ऊँची रहती है, गाय आदि की नाक की तरह वह कुटिल नहीं होती है, इनके दोनों नेत्र शरद ऋतु सम्बन्धी नवीन सूर्य-विकासी पद्म, कुमुद चन्द्रविकाशी उत्पल, एवं कुवलय-नीलोत्पल के विमल पत्रों के समूह के जैसे होते हैं, अर्थात रक्त, श्वेत एवं नील वर्ण से युक्त रहते है, तथा वे शोभन लक्षण के योग से प्रशस्त होतेहैं, अजिह्म होते हैं भद्रभावयुक्त होने से विकारभाव रहित होकर चपल होते हैं, और कान्त होते हैं बडे सुन्दर होते हैं, "पत्तलधवलायत आंतब लोयणाओ, आणामियचावरुइलकिण्हब्भराइसंगयसुजाय भूमयाओ" तथा वे उनके लोचन पत्रल-पक्ष्मल शोभन पक्ष्म से युक्त होते हैं, धवल शुभ्र होते हैं, आयत होते है, कर्णान्तगत होते हैं एवं ईषद् अरुणहोते हैं नारियों की नयनसुभगता ही उनका उत्कृष्ट शृङ्गार है इस बात को सूचित करने के लिये ही शोभनपक्ष्मयुक्तता और कर्णान्तगतत्व विशेषणों को ले-. पसत्थ अजिह्मकंतणयणा' मना तायु अने (val२४तात्पसना पत्रनी २५ २६त डाय छे. અને સુકુમાર હોય છે. એમની નાસિકા કણેરની કલિક જેવી અકુટિલ હોય છે અને તે ભ્રદ્રયના મધ્યમાંથી નીકળીને અતીવ સરળ તેમજ ઊંચી રહે છે. ગાય વગેરેના નાકની જેમ તે કુટિલ હોતી નથી. એમના બન્ને નેત્રો શરદ ઋતુ સંબંધી નવીન કમળ-સ પ કુમુદ ચન્દ્ર વિકાસી ઉત્પલ તેમજ કુવલય નીલેલના વિમલ પત્રોના સમૂહના જેવાં હોય છે. એટલે કે રક્ત ત અને નીલ વર્ણથી યુક્ત રહે છે તથા તે શોભન લક્ષણના ગથી પ્રશસ્ત હોય છે. અજીહ્ય હોય છે, ભદ્ર ભાવયુક્ત હોવા થી વિકાર ભાવ રહિત હોવા छतांचे यण डाय छ भने आन्त डाय छे सती सुहर डाय"पत्तलधवलायत आतंब लो. यणाओ, आणामियचावरुइलाकण्ह भगइ संगयसुजायभूभयाओ, तभन त तमना नेत्री વપકમલ-શોભન પકમથી ચુકત હોય છે, ધવલ શબ હોય છે. આયત હોય છે કતગત હોય છે અને ઈષદ્ અરુણ હોય છે. સ્ત્રીઓની નયન સુભગતા જ તેમને ઉત્કૃષ્ટ શુંગાર છે. એ વાતને સૂચિત કરવા માટે શેભન પથમ ચુકતતા અને કર્ણાન્તગતવ વિશેષણેને Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे मेवोत्कृष्टशृङ्गमिति शोभनपक्ष्मयुक्तत्व कर्णान्तगतत्वसूचनार्थ पुनरिद विशेषणमुपात्तमिति बोध्यम् । तथा-'आणामिय चाव रुइल किण्हब्भराइ संगय सुजायभूमयाओ' आनामित चापरुचिर कृष्णाभ्रराजिसंगतसुजातभ्रवः-अनामितः आरोपितो यश्चापो-धनुस्तद्वद् वक्रे रुचिरे सुन्दरे कृष्णाभ्रराजिसंगते कृष्णमेघपङ्क्तिवत् संगते संहते अविच्छिन्ने सुजातेशोभने भ्रवौ यासां तास्तथा 'आलीणपमाणजुत्तसवणा आलीन प्रमाणयुक्तश्रवणाः, आलीने-संगते अत एव प्रमाण युक्त श्रवणे-कर्णी यासा तास्तथा, अत एव 'सुसवणाओ' सुश्रवणा:-सुकर्णाः तथा 'पीणमट्टगंडलेहाओ, पीनमृष्ट गण्डलेखाः-पीना परिपुष्टा न तु निम्नोन्नता तथा मृष्टा शुद्धा न तु श्यामत्वादिभिर्वणे संक्रान्ता गण्डलेखा-कपोलपाली यासां तास्तथा, तथा 'चउरंसपसत्यसमणिडालाओ' चतुरस्रप्रशस्तसमललाटा:-चतुरस्र-चतुष्कोणं प्रशस्तं लक्षणोपेतं समम्-अविषमम् ललाटं-भालं यासां तास्तथा, तथा 'कोमुईरयणिकरविमलपडिपुण्णसोमवयणाओ' कौमुदी रजनीकरविमलप्रतिपूर्णसौम्यवदना:-कौमुदीकर पुनः लोचन का वर्णन किया गया है, आनामित-आरोपित धनुष समान बक्र-कुटिल अतएवं रुचिर-सुन्दर एवं कृष्णाभ्रराजि के जैसे संगत-कृष्णमेघपंक्ति के समान संगत-संहतअवि. च्छिन्न तथा सुजात – शोभन ऐसी भौएं भ्रू इनकी होती हैं । "आलीणपमाणजुत्तसवणां, सुसवणाओ, पीणमट्ठगंडलेहाओ, चउरंसपसत्थसमणिडालाओ, कोमुईरयणियरविमलपडिपुण्णसोमवयणामो" इनके दोन श्रवण-कान-मालीन-संगत होते हैं अतएव वे प्रमाणयुक्त होते हैं और इसी लिये ये सुकर्ण-अच्छे कान वाली मानी जाती है इनको कपोलपाली पोन होता है-परिपुष्ट होती है, नीची ऊँची नहीं होती है तथा वह शुद्ध होती है श्यामता आदि वर्गों से संक्रान्त नहीं होती है इसका ललाट भाल चतुरस्र चौकोर होताहै, प्रशस्त-लक्षणोपेत होता है, एवं सम-अविषम होता है इनका मुख शरदकाल की पूर्णिमा के चन्द्र के जैसा विमल-निर्मल होता है, प्रतिपूर्ण होता है-सौन्दर्य से पूर्णरूप में भरा हुआ होताहै और सौम्य-शान्तिजनक होता है "छत्तुण्णय उत्तमंगाओ, अ - લઈને ફરીથી તેનું વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે. આનામિત આ પિત ધનુષની જેમ વક્ર કુટિલ એથી રુચિર સુંદર તેમજ કૃષ્ણાસ્રરાજિની જેમ સંગત કૃષ્ણ મેઘપંકિતની સમાના संगत-सहत मविछिन्न तथा सु शासन थेवी भभ। भने डाय छे. "आलीणपमाण जुत्तसवणा सुसवणाओ, पीणमट्ठगंडलेहाओ, चउरंसपसत्थसमणिडालाओ, कोमुई रयणिअर विमलपडिपुण्णसोमवयणाओ' अमना मन्ने श्रवणे।-नमालीन संगत डाय छे. એથી તે સપ્રમાણ હોય છે અને એટલા માટે જ એઓ સુકર્ણ એટલે કે સારા કાનેવાળી માનવામાં આવે છે. એમની કપિલપાલી પીન હોય છે પરિપુષ્ટ હોય છે, નીચી ઊંચી હતી નથી તેમજ તે શુદ્ધ હોય છે. સ્પામતા વગેરે વર્ષોથી સંક્રાંત હોતી નથી. એમને લલાટ પ્રદેશ ભાલ ચતુરસ્ત્ર ચખૂણિ હોય છે. પ્રશસ્ત લક્ષણે પેત હોય છે. તેમજ સમ–અવિષય હોય છે. એમનું મુખ શરદુ કાલની પૂર્ણમાસીના ચન્દ્રના જેવું વિમળ નિર્મલ હોય છે પ્રतिपूर्ण डाय छ, सोय या परिपाय छे अने सौभ्य शांतिन डाय छे. "छत्तुण्णय Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाषिमनुष्य स्वरूपनिरूपनम् २३९ शर पौर्णमासी, तस्या यो रजनीकरः चन्द्रस्तद्वद् विमलं निर्मलं प्रतिपूर्णम् - अहीनं सौम्यं प्रसन्नं वदनं मुखं यासां तास्तथा, तथा 'छतुण्णय उत्तमंगाओ, छत्रोन्नतोत्तमाङ्गाः - छत्रवत् उन्नतं- तुङ्गम् उत्तमाङ्गं शिरो यासां तास्तथा, तथा 'अकविल सुसिणिद्धसुगन्ध दोह सिरयाओ' अपिल सुस्निग्ध सुगन्धिदीर्घशिरोजाः अकपिलाः - कृष्णाः सुस्निग्धाः स्वभावतचिक्कणाः सुगन्धयः शोभनगन्धयुक्ताः दीर्घा :- लम्बमानाः शिरोजाः केशा यासां तास्तथा, तथा 'छत्त' छत्र १ 'ज्झय' ध्वज २ 'जूय' यूप 'धूभ' स्तूप ४ 'दामिणि' दाम ५ 'कमंडलु' कमण्डलु ६ 'कलस' कलश ७' वावि' वापी ८ 'सोत्थिय' स्वस्तिक ९ 'पडाग पताका १० 'जव' यव ११ 'मच्छ' मत्स्य १२ 'कुम्म' कूर्म १३ 'रहवर' रथवर १४ 'मगरज्य' मकरध्वज १५ 'अंक' अङ्क १६ 'थाल' स्थाल १७ 'अंकुल' अङ्कुश १८ 'अट्ठावय' अष्टापद १९ 'सुप्पट्ठग' सुप्रतिष्ठक २० 'मयूर' मयूर २१ 'सिरि अभिसेअ' भ्यूभिषेक २२ 'तोरण' तोरण २३ 'मेइणि' मेदिनि २४ 'उदहि' उदधि २५ 'वरभवण' वरभवन २६ 'गिरि' गिरि २७ ' वर आयस' वरादर्श २८' सलीलगय' सलीलगज २९ 'उसभ' ऋषभ ३० 'सीह' सिंह ३१ 'चामर' चामर ३२ 'उत्तम पसत्थ बत्तीस लक्खणधरीओ 'उत्तमप्रशस्तद्वात्रिंशल्लक्षणधरिण्यः- तत्र छत्रं प्रसिद्धं १, ध्वजः प्रसिद्धः यूपः-स्तम्भविशेषः ३. स्तूपः- पीठं ४, दाम - माला ५, कमण्डलुः - जलपात्रविशेषः ६, कलशः ७वापी ८ स्वस्तिकविल सुसिणिद्ध सुगंधदीह सिरयाओ, छत्त १ ज्झय २ जूअ ३ थूभ ४ दार्मािण ५ कमंडल६ कलस ७ वाँवि ८ सोत्थिय९ पडाग १०, जव ११, मच्छ १२, कुंभ १३' रहवर १४ मगरउझय १५, अंक १६, थाल १७, अंकुस १८, अट्ठावय १९ सुपइट्ठग २० मयूर २१, सिरि अभिसेय २२, तोरण २३ मेण २४, उदहि २५, वरभवण २६, गिरि २७ वर आयंस २८, सलीलगय २९, उसभ ३० सीह ३१ चामर ३२ उत्तमपसत्थ बत्तीस लक्खणधरोओ" इनका मस्तक छत्र के जैसा उन्नत होता है, इनके मस्तक के बाल - केश - अकपिल कृष्ण होते हैं, सुस्निग्धस्वभावतः चिकने होते है सुगन्धित शोभनगन्ध से युक्त रहते हैं, दीर्घ-लम्बे होते हैं, ये बत्तीस श्रेष्ठ लक्षणों को जो सामुद्रिक शास्त्र में स्त्रियों के सौभाग्य सूचक कहे गये हैं धारण करने वाली होती हैं वे ३२ चिन्ह लक्षण इस प्रकार से है-छत्र १ ध्वज २, यूप-स्तम्भविशेष - जो कि उमंगा अकविल सुसिणिद्ध गंधदीहसिरयाओ छत्त १, ज्झय - २ जूअ - ३ थूभ ४ दामिणी -५ कमंडलु-६ कलम ७ वाबि-८ सोत्थिय - ९ पडाग - १० जव- ११ मच्छ-१२ कुम्म १३ रद्दवर-१४ मगर-ज्झय- १५ अंक - १६ थाल - १७ अकुस - १८ अट्ठावय - १९ सुपरट्ठग-२० म यूर - २१ सिरिअभिसे अ- २२ तोरण - २३ मेइणि २४ उदद्दि -२५ बरभवण - २६ गिरि - २७ वरआयस-२८ सलोलगय - २९ उसभ - ३० सीह - ३१ चामर- ३२ उत्तमपसत्थबती सलक्खणધરીો એમનું મસ્તક છત્ર જેવું ઉન્નત હોય છે. એમના મસ્તકના વાળ કપિલ કૃષ્ણ - હોય છે. સુસ્નિગ્ધ સ્વભાવતઃ સુચિકવણુ હાય છે. સુગન્ધિત શાભન ગધથી યુકત રહે છે દીધ' લાંબા હોય છે. સ એના સૌભાગ્ય સૂચક તેમજ સામુદ્રિક શાસ્ત્રના ૩૨ લક્ષણાથી તેએ સપન્ન હોય છે. રૂ૨ લક્ષશે। આ પ્રમાણે છે છત્ર ૧–,ધ્વજા ૨.યૂપ-એક સ્ત ંભ વિશેષ ने यज्ञमां आरोपित होय छे स्तूप पी-४हाम भाषा - पं. भ उखु - सपात्र विशेष - ६, ४ Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४० जम्बद्विपप्राप्तिसूत्रे कः ९ पताका १० यवः ११ मत्स्यः १२ कलशादयः प्रसिद्धाः, तथा-कूर्म:-कच्छप:१३ रथवरः-श्रेष्ठरथः १४ मकरध्वन:-मकररूपः ध्वजः कामदेवध्वजः, अयं-ध्वजः सर्वकालिकं सौभाग्यं सूचयति १५, तथा अङ्कः-चिह्न श्यामता लक्षणं १६ स्थालं प्रसिद्धम् १७ अङ्कशः प्रसिद्धः १८,अष्टापदं-छूतफलकम् १९, सुप्रतिष्ठकं-स्थापनकं चिन्हविशेषः २०, मयूरःप्र. सिद्धः २१, श्यूभिषेकः श्रियः-लक्ष्म्याः , अभिषेकः स्नपनम् २२, तोरणं प्रसिद्धम् २३, मेदिनी-पृथ्वी २४ उदधिः-समुद्रः २५, वरभवनं श्रेष्ठप्रासादः २६, गिरिः-पर्वतः २७. वरादर्श:-श्रेष्ठदर्पणः २८, सलोलगजः-लीला सहितोगजः २८, ऋषभः बलीवईः ३०, सिंहः प्रसिद्धः ३१ चामरं प्रसिद्धम् ३२इत्येतानि उत्तमानि-श्रेष्ठानि अतएव प्रशस्तानिसामुद्रिकशास्त्रे श्रेष्ठत्वेनाभिहिततया प्रशंसाहाणि यानि द्वात्रिंशल्लक्षणानिद्वात्रिंशत्संख्यकानि स्त्रीणां सौभाग्यसूचकानि चिह्नानि, तेषां धारिण्यः-धारिका:-प्रशस्तछत्रादिद्वात्रिंशसंख्यक स्त्रीशुभलक्षणधारिण्य इति भावः, 'हंससरिसगईओ' हंसपदृशगतयः तथा 'कोइल महुरगिर सुस्सराओ' कोकिलमधुरगीर्वराः-कोकिलस्य सहकारमञ्जरी रसास्वादजनितानन्देन मत्तस्य सतो या मधुराः-मनोहरा गीः-वाणी तद्वत्स्वरो यासां तास्तथा कोकिलवन्मधुरालापिन्यः इति भावः तथा 'कंता' कान्ताः कमनीयाः अत एव 'सव्यस्स' सनेस्य-स्वा. सन्नवतिनो जनस्य 'अणुमयाओ' अनुमता:-अभिमताः न तु कस्यापि द्वेष्या इति भावः तथा-'ववगयवलिपलिय' व्यपगतवलिपलिता:-व्यपगतानि-विशेषेण उपगतानि-दरिभूयज्ञ में आरोपित होताहैं ३, स्तुप-पीठ ४, दाम-माला ५, कमण्डलू जलपात्रविशेष ६, कलश ७ वापी ८, स्वस्तिक९, पताका १०, यव ११, मत्स्य १२कूर्म-कन्छप १३,रथवर-श्रष्ठे रथ१३. मकरध्वज-मकररूपध्वजा १५, यह कामदेव की ध्वजा है और वह सर्वकालिक सौभाग्य की सूचक होती है अङ्क-कालातिल १६, स्थाल-थाल १७, अङ्कुश १८, अष्टापद-तफलक १९. सुप्रतिष्ठक-स्थापनक २०, मयूर-मोर २१, अभिषेक-लक्ष्मी का अभिषेकरूपचिन्ह २२, तोरण २३, मेदिनी-पृथिवी २४' उदधि-समुद्र २५, श्रेष्ठ प्रासाद २६, गिरि-पर्वत २७ श्रेष्ठदर्पण २८, सलोलगज-लीला सहितहाथी २९,ऋषभ-बलीवर्द - बैल ३०, सिंह ३१और चामर ३२, " हंस सरिसगईओ, कोइलमहुरगिरसुस्सराओ, कंता, सव्वस्स अणुमयाओ, ववगयवलिपलियवंगલશ-૭. વાપી-૮, સતિક –૯ પતાકા-૧૦ ૧૧ મત્સ્ય-૧૨ કુમ ક૭૫ ૧૩ રથવર-શ્રેમ રથ-૧૪ મકર ધ્વજ- મકર રૂપ ધ્વજા-૧૫ આ કામદેવની ધ્વજા છે, અને એ સર્વ કાલિક सोसाय-सूय डाय छे.) A det-स्थान-थान-१७, मश-१८, ५ धुत३१४-१५, सुप्रति०४-स्थापन४-२०, मयू२-भा२ २१, यनि-समानु मनिष४ ३५ थिई -२२, ताण-२३, महिनी-पृथ्वी-२४, पि समुद्र-२५, श्रे० प्रासा-२६, २-५१त२७, ०६५-२८, wale in-alan सहित हाथी-२८, *पल-Halag-18-30, सि8-3१ अने याभ२-३२, हंससरिस गईओ, कोइलमहुरगिरसुस्सराओ' केता, सव्वस्स अणुमयाओ, ववगयवलिपलियवेगदुव्वणवाहि दोहग्गसोगमुक्काओ' सना की मनी ગતિ હોય છે, એમના સવાર સહકાર–આમ્રની મંજરીના રસાસ્વાદથી ઉત્પન્ન થવાવાળા આ Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्यस्वरूपनिरूपणम् २४१ तानि वलिपलितानि वलयः-चर्मशैथिल्यजनिता रेखाविशेषाः पलितानि श्वेतकेशाश्च यासां तास्तथा वार्धकरहिता इ ते भावः तथा 'वंग दुव्वणवाहि दोहग्गसोगमुक्काओ' व्यङ्ग दुर्वण व्याधिदौर्भाग्यशोकमुक्ताः विरुद्धानि अङ्गानि व्यङ्गानि हीनाधिका अवयवाः दुर्वर्णः दुष्टो वर्णः अप्रशस्ता त्वगित्यर्थः व्याधयः-ज्वरादय दौर्भाग्य-वैधव्यं शोकः-पति पुत्रादिमरणजनितो दारिद्रयकृतश्च एभ्यो मुक्ताः-रहिता च पुनः 'उच्चत्तेण' उच्चत्वेन-औन्नत्पेन 'नराण' नराणाम् अपेक्षया 'थोवूणमुस्सियाओ' स्तोकोनं किंचिदून यथा स्यात्तथा उच्छिताः उच्चा-किंचिन्न्यून त्रिगव्यूतोच्छ्रिता इत्यर्थः तथा 'सभावसिंगारचरुवेसाओ' स्वभाव शृङ्गारचारुवेषाः स्वभावतः प्रकृत्या शृङ्गारः श्रृङ्गारानुकूलः चारुः सुन्दरो वेषो यासां तास्तथा स्वभावत एव श्रृङ्गारानुरूप सुवेषशालिन्य इत्यर्थः अनेन केशविरचाधौपाधिकशृकाराभावेन तासां निर्विकारमनस्कता सूचितेति तथा 'संगयगयहसियभणियचिट्ठियविलाससंलार्वाणउणजुत्तोवयारकुसलाओ' संगतगतहसित भणितचेष्टितविलाससंलापनिपुणयुक्तो पचारकुशलाः तत्र-संगतम् उचितं गतं गमनं हसितं हासः भणितं वचनं चेष्टितं चेष्टा व्यापारो विलासः शृङ्गारचेष्टाविशेषः संलापः मिथो भाषणम् एतेषु निपुणाः कुशलाः तथा युक्ताः-संगता ये उपचारा-लोकव्यवहारास्तेषु कुशलाः ततः संगतादिनिपुणान्तपदस्य दुव्वण्णवाहि दोहग्गसोगमुक्काओ" हँस की जैसी इनको चाल होती है इनका स्वर सहकार-आम्र मंजरी के रसास्वाद से जनितानन्द से मत्त हुई कोकिल की वाणो के जैसा मधुर होता है ये बड़ी सुन्दरी होती है, अतएव पास में रहे हुए प्रत्येक व्यक्ति की चाहना के ये विषयभूत ही बनी रहती हैं, कोई भी उनसे द्वेष नहीं करता है, इनके शरीर में चर्म की शिथिलता से जनित रेखाएँ- झुर्रियां नहीं पड़ती हैं और न इनके बाल ही सफेद होते हैं अर्थात् इनके शरीर में वृद्धता नहीं आता है इनके शरीर में होनाधिक अंग नहीं हैं, इनके शरीर की चमड़ी अप्रशस्त वर्णवाली नहीं होती है, ज्वर आदि व्याधियां इन्हें नहीं सताती हैं वैधव्य का दुःख ये नहीं भोगती है और पुत्र का शोक एवं दारि जन्य संक्लेश इनके निकट तक भी नहीं आ पाता है। "उच्चत्तेणय णराण थोवूण मुस्सियाओ सभावसिंगारचारुवेसाओ, संगयगयहसियभणिय चिट्ठियविलास નન્દથી મત્ત થએલી કેફિલની વાણી જે મધુર હોય છે. એઓ બહુ જ સુન્દર હોય છે. એથી નિકટ રહેનારી દરેકે દરેક વ્યક્તિ એમને ચાહે છે. કોઈ એમનાથી દ્વેષ કરતું નથી સામાન્ય વ્યક્તિના શરીરમં ચમની શિથિલતાથી જે પ્રકારની રેખા પડી જાય છે તે પ્રકારની રેખાઓ એટલે કે કરચલિયે એમના શરીર પર પડતી નથી અને એમના વાળ પણ સફેદ થતા નથી અર્થાત્ એમના શરીરમાં કઈ પણ દિવસે ઘડપણુ આવતું નથી. એમના શરી રમાં હીનાધિક—એ હેતા નથી. એમના શરીરની ચામડી અપ્રશસ્ત વર્ણવાળી હોતી નથી. તાવ વગેરે રેગેથી એ એ સર્વે મુક્ત હોય છે. વૈધવ્યનું દુઃખ એ કંઈ પણ દિવસે - ગવતો નથી, અને પુત્રશોક અને દારિદ્રય જન્ય સંકલેશથી એ એ સદા મુકત રહે છે. “જુउयसेण य णराण थोवण-मुस्सियाओ सभावसिंगारवारुबेसाओ संगयगयहसियमणिय चिट्ठिय विलाससलावनिउणजुत्तोवयारकुसलाओ, सुंदरथणजहणवयणकरचलणणयणलावण्ण Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे युक्तादि कुशलान्तपदस्य च कर्मधारयः अत्रेदं बोध्यम्-तदानीन्तनस्त्रीणां मनः परपुरुष प्रति न कदाचिदपि साभिलाषमभूत् न पुरुषस्यापि परस्त्रियं प्रति । __ नन्बेवं तर्हि भगवद् आदिनाथस्य सुनन्दापाणिग्रहणमनुचितम् तथाविध काल स्वभावात् मृते पत्यौ तस्याः पाणिग्रहण भगवता कृतमिति भगवतः परस्त्री दोष प्रसङ्गोऽनिवार्यः ? इतिचेत् आह-कस्यचिद्युगलस्य युगलत्वेन समुत्पन्नौ कन्यादारको बालभावानुरूपया क्रीडया क्रीडन्तौ कस्यचित् तालतरोरधस्ताद् गतौ । तदा कर्मयोगा तस्य तालतरोः पतता फलेन काकतालीयन्यायनस्तयोर्मध्ये दारकः शिरस्याहतो मृतश्च संलाव निउणजुत्तोवयार कुसलाओ, सुंदरथणजहणवयण कर चलणणयणलावण्णरूव जोव्वणविलासकलियाओ" इनकी ऊँचाई मनुष्यों की उँचाई से कुछ कम होती है अर्थात् ये कुछ कम ३ कोश को उँची होती हैं तब कि वहां के मनुष्य पूरे ३ कोश के उँचे होते हैं, स्वभावतः ही इनका बेष शृङ्गार के अनुरूप होता है इस कथन से “कोश विरचन आदि जो औपाधिक शृङ्गार है उसका उनमें अभाव रहता है और इमीसे उनमें निर्विकार मनस्कता रहती है। यह बात सूचित की गई है ये उचित गमन में, हास में, बोलने में, विविध प्रकार की चेष्टाओं के करने में विशास में और आपस में बातचीत करने में बड़ी चतुर होती है, तथा उचित लौकिक व्यवहारों में भी ये बड़ी निपुण होती है । इस कथन का भाव ऐसा है कि उस काल की स्त्रियों का मन परपुरुष के प्रति और परपुरुष का मन परस्त्रियों के प्रति कभी भी अभिलाषी नहीं होता है यदि ऐसी बात है तो भगवान् आदिनाथ के सुनन्दा का पाणिग्रहण करना अनुचित ठहरता हैं क्योंकि सुनन्दा के पति के मर जाने पर ही भावान् ने उसका पाणिग्रहण किया है अतः इस प्रकार के कृत्य करने में भगवान् को परस्त्रों दोष का प्रसङ्ग अनिवार्य रूप से आता है, तो इसके सम्बन्ध रूवजोवणविलासकलियाओ' भनी या माणसांनी या ४२ता सहेर माछी हाय छ. એટલે કે એમાં કંઈક કમ ત્રણગાઉ જેટલે ઊંચી હોય છે. ત્યાંના પુરુષો ત્રણ કેસ જેટલા ઊંચા હોય છે. ભાવતઃ એમને વેષ શૃંગાર યોગ્ય હોય છે. આ કથનથી “કેવિચન વગેરે જે. પાધિક શંગારે છે, તેને તેઓમાં અભાવ રહે છે અને એથી જ તેમનામાં નિર્વિકાર મનસ્કતા રહે છે” આ વાત સૂચિત કરવામાં આવી છે. એ ઉચિત ગમનમાં, હાસમાં, બોલવામાં, અનેક જાતની ચેષ્ટાઓ કરવામાં, વિલાસમાં અને પરસ્પર વાત ચીત કરવામાં ખૂબ જ ચતર હોય છે, તેમ જ લૌકિક વ્યવહારોમાં પણ ખૂબ જ નિપુણ હોય છે. આ કથનને ભાવ આ પ્રમાણે છે કે તે કાળની સ્ત્રિઓનું મન પરપુરુષ તરફ અને પરપુરુષનું મન પરસ્ત્રીઓ તરફ કદાપિ અભિલાષી થતું નથી. જે આ વાત યથાર્થ છે તે ભગવાન આદિનાથન સુનન્દા સાથે પાણિગ્રહણ કરવું અનુચિત ઠરે છે. કેમકે સુનન્દાના પતિના અવસાન પછી જ ભગવાને તેનું પાણિગ્રહણ કર્યું છે. એથી આ જાતના આચરણ બદલ ભગવાનને પરસ્ત્રી દોષને પ્રસંગ અનિવાર્ય પણે ઉપસ્થિત થાય છે. તે આ સંબંધમાં સમાધાન એવું છે કે કઈ યુગલિમાંના યુગલ રૂપથી કન્યા અને દારક ઉત્પન્ન થયાં તેઓ બાલચિત-ફીડાઓ Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाचिका टोका द्वि० वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाबिमनुष्यस्वरूपनिरूपणम् २४३ तज्जननीजनकौ च तां कन्यां पालनपोषणादिना रक्षितवन्तौ । ताभ्यां च तस्याः मुनन्देति नाम कृतम् । ततः कियदिवसानन्तरं तज्जननीजनको मृतौ । ततः सासुनन्दा आश्रयाभावाद् एकाकिनी तिष्ठति स्वपिति उपविशति वने इतस्ततः परिभ्रम तिच । क्रमेण प्राप्तयौवनां निस्सहायामेकाकिनी वने परिभ्रमन्तीमवलोक्य युगलिनस्तां नाभिकुलकरस्य समीपे समानीतवन्तः । नाभिकुलकरोऽपि तदीयमशेषवृत्तान्तमुपलभ्य भ वत्वेषा भूषभस्य पत्नीति तां भगवत ऋषभदेवस्य पत्नीत्वेन गृहीतवान् । अतो भगवता कुमारिकैव सुनन्दा परिणीता ततो भगवति परत्त्रीपरिणयनरूपो दोषारोपो न घटते । ननु युगलिकानामकाल मृत्यु न भवतीति कथमस्य दारकस्य मृत्युर्जातः इति चेदाह-पूर्वकोटयधिकायुष्काणामकाल मृन्युन गवति किन्तु भगवतः आदिनाथवारके तस्य दारकस्य में समाधान ऐसा है किसी युगलियाके युगल रूप से कन्या और दारक उत्पन्न हुआ वे बालोचितक्रीड़ा से खेलते किसी तालवृक्ष के नीचे पहुंच गये वहां कर्मयोग से उस ताड़वृक्ष से काकतालोय न्याय से गिरते हुए उसके फल से सिर में चोट आजाने से वह बालक मर गया कन्या के माता पिता ने उस कन्या को पालपोष कर बड़ा किया उसका नाम सुनन्दा रखा गया कितनेक दिनों के बाद सुनन्दा के माता पिता का देहोत्सर्ग-मरण, हो गया सुनन्दा अब अकेली रह गई और अकेली ही उठने बैठने सोने लगी धीरे धीरे वह वनमें भी इधर उधर आश्रयाभाव के कारण आने जाने एवं फिरने लगी। जब वह यौवन मती हुइ तो उसे जंगल में अकेली धूमती हुई देखकर युगलिक जन नाभिराय कुलकरके पास ले गये नाभिकुलकर ने उसका सब वृत्तान्त जानकर “यह ऋषभकुमार की पत्नी हो जावे" इस रूप से उसे स्वीकार कर लिया इस तरह भगवान् ऋषभ ने कुमारिका अवस्था में रही हुई ही उस सुनन्दा के साथ अपना विवाह किया है अतः भगवान पर परस्त्री परिणय का दोषारोप नहीं आता है, शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि भोगभूमियां जीवों की अकाल मृत्यु नहीं होतीहैं फिर उस दारक की अकाल में मृत्यु कैसे होगइ कही गइ है ? तो इस કરતા કોઈ એક તાલ વૃક્ષની નીચે જઈ પહોંચ્યા. ત્યાં કર્મચગથી તે તાલવૃક્ષ પરથી કાક તાલીય ન્યાયથી પડતા તેના ફળથી માથામાં આઘાત થવાથી તે દારક મરણ પામે. કન્યાના માતા-પિતાએ તે કન્યાનું પાલન પોષણ કર્યું અને તેને મેટી કરી તેનું નામ માતા પિતા એ સુનંદા રાખ્યું. કેટલાક દિવસો પછી સુનંદાના માતા પિતાનું અવસાન થઈ ગયું. સુનંદા ત્યાર બાદ એકલી રહી ગઈ. તે એકલી જ ઘરમાં રહેવા લાગી. ધીમે ધીમે તે વનમાં પણ આમ તેમ જવા આવવા લાગી. જ્યારે તે યુવતી થઈ તે તેને જંગલમાં એકલી ફરતી જોઈ તે યુગલિક જન નાભિરાય કુલકરની પાસે લઈ ગયા. નાભિકુલકરે તેની બધી હકીકત જાણી ને આ ઋષભકુમારની પત્ની થાય. આમ તેને સ્વીકાર કરી લીધું. આ રીતે ભગવાન રાષભે કુમારિકાવસ્થાવાળી તે સુનંદા સાથે પાણિગ્રહણ કર્યું છે. એથી ભગવાન પર પરસ્ત્રી પરિણયનનો દોષારોપણ યોગ્ય કહેવાય નહિ. શાસ્ત્રોમાં એવું વિધાન છે કે ભેગભૂમિમાં Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४४ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे पूर्वकोटयधिकमायुर्ना भूदित्यकालमृत्योः प्राथम्यम् । तदेवाहान्यत्र ननु एवं तर्हि भगवतः सहोदरया सुमङ्गलया सह पाणिग्रहणं त्वनुचितमेव सहोदरापाणिग्रहस्यातिगर्हितत्त्वं तु आपामरप्रसिद्धम् इतिचेत् आह-तदानीं तथाविध व्यवहारस्य लोकाविरुद्धत्वेन भगवत्कृतस्य सहोदरायाः पाणिग्रहणस्यानौचित्यकथनमयुक्तमेवेति-पुनरप्याह-सुन्दर इत्यादिसुगमम् । जघनं स्त्रीकटया अधोभागः विलासः स्त्रीणां चेष्टाविशेषः तथा 'णंदणवणविवरचारिणीउव्व' नन्दनवनविवरचारिण्यः नन्दनवन मेरोद्वीतीयं वनं तस्य यो विवरः अवकाशः तत्र चारिण्यः विहरणशीला 'अच्छराओ' अप्सरस इव 'भरहवासमाणुसच्छराओ' भारतवर्षमानुषाप्सरस: भरतक्षेत्रे मानुषीरूपा अप्सरसः तथा 'अच्छेरगपेच्छणिज्जाओ' आश्चर्य प्रेक्षणीयाः आश्चर्यमिति कृत्वा जनरवलोकनीयाः तथा पासाईयाओ जाव पडिरूवाओ प्रासादीया यावत् प्रतिरूपाः यावत्पदेन दर्शनीया अभिरूपाः इति संग्राह्यम् प्रासाका उत्तर ऐसा है कि जिसकी आयु पूर्व कोटि से अधिक हाति है ऐसे युगलिकों को अकाल मृत्यु नहीं होती हैं, परन्तु आदि नाथ के वारक में हुए इस दारक की पूर्वकोटि से अधिक आयु नहीं थी, इसलिए इसकी अकाल मृत्यु हुई । अह अकाल मृत्यु का उनके वारक का प्रथम दृष्टान्त है। ऐसे ही बात अन्यत्र इस प्रकार से कहो गइ हैं भगवान् का अपनी सहोदरा सुमंगला के साथ जो पाणिग्रहण हुआ है वह अनुचित ही हुआ हैं। सहोदरा के साथ पाणिग्रहण होना तो साधारण से साधारण तक व्यक्तियों में अनुचित कार्य माना जाता है तो इस विषय में कहा गया है कि उस समय इस प्रकार का व्यवहार लोकाविरुद्ध था-लोक में निन्दनीय-एवं अनुचित नहीं माना जाता था. अतः सहोदरा के साथ किया गया भगवान् का पाणिग्रहण उस समय के अनुसार अनुचित कार्य नहीं था । सुन्दर इत्यादि इन स्त्रियों के स्तन जघन भाग-कटि के निचे का स्थान इत्यादि वह सुन्दर ही होते है । "णंदणवणविवरचारिणीउव्व अच्छराओ" नन्दन वन में सुमेरु के द्वितीयवन में-विहरण शोल अप्सराओं के जैसी ये प्रतीत होती है अतः જીવોનું અકાલમૃત્યુ થતું નથી. તે પછી તે દારકનું અકાલ મૃત્યુ કેવી રીતે થયું ? તે આને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે જેમનું આયુ પૂરકોટિથી અધિક હોય છે, એવા યુગલિકનું અકાલમૃત્યુ થતું નથી પણ આદિનાથના વારકમાં થયેલ આ દારકની પૂર્વકેટિ કરતાં વધારે આયુષ્ય ન હતી એથી એનું અકાલ મૃત્યુ થયું. તેમનાવારકમાં અકાલ મૃત્યુ સંબંધી આ પહેલું દૃષ્ટાન્ત છે. એવી વાત બીજા સ્થાને આ પ્રમાણે કહેવામાં આવી છે. ભગવાનનું પિતાની સહોદરા સુમંગલા સાથે જે પાણિગ્રહણ થયું છે તે ઘણું અનુચિત જ થયું છે. સહદરા સાથે પાણિગ્રહણ તે સાધારણ વ્યકિત માટે પણ અનુચિત કાર્ય ગણાય છે. તે આ સંબંધમાં આમ કહેવામાં આવ્યું છે કે તે વખતે આ જાતને વહેવાર લોકવિરુદ્ધ ગણાતો. હતા. લોકમાં નિંદનીય તેમજ અનુચિત ગણાતા નથી. એથી સહોદરાની સાથે કરવામાં भावे पाक्षि मतना व्यवहार भुष मनुथित आय गाय नहि. 'सुन्दर' त्याह એ સ્ત્રીઓના સ્તન જઘન ભાગ કટિના નીચેનું સ્થાન વગેરે સર્વ અંગે સુંદર જ હોય छ. "नन्दण वण विवरवारिणी उव्व अच्छराओ" मेस्त्रीय ननवनमा-सुभेना द्वितीय Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्यस्वरूपनिरूपणम् २४५ दीयादीनामा पूर्ववबोध्या इति सम्प्रति तत्कालोत्पन्न स्त्रीपुंसां साधारणतया वर्णनमाह 'तेणं मणुया' इत्यादि । ते भरतवर्षे सुषमसुषमाकालभाविनः खलु मनुनाः, मनुनाश्च मनुज्यश्चेति मनुजाः-पुरुषाः स्त्रियश्च 'ओहस्सरा' ओघस्वराः-ओपेन प्रवाहेण स्वरो येषां तेतथा-मेघवद् गम्भीरस्वरा इत्यर्थः । 'हंसस्सरा:-हंसस्येव मधुरो स्वरो येषां ते तथा । 'कोचस्सरा' क्रोश्चस्वराः-क्रोञ्चस्येव-क्रोचपक्षिण इव अनायासनिर्गतोऽपि दूरदेशव्यापी स्वरो येषां ते तथा । 'णंदिस्सरा' नन्दीस्वराः-नन्दी:-द्वादशविधतूर्य समुदयस्तस्याः स्वर इव स्वरो येषां ते तथा' तथा 'णंदिघोसा' नन्दीघोषाः-नन्याः पूर्वोक्तरूपायाः घोष इवअनुनाद इव घोषः-अनुनादो येषां ते तथा । 'सीहस्सरा' सिंह स्वरा:-सिंहस्येव बलिष्ठः स्वरो येषां ते तथा । 'सीहघोसा' सिंहघोषा:-सिंहस्य घोष इव अनुवाद इव घोषो येषां ते तथा, अतएव 'मुस्सरा' सुस्वरा:-प्रशस्तस्वरयुक्ताः 'सुस्सरणिग्योसा' सुस्वरनिर्घोषा-सु ष्ठु-शोभनः स्वरनिर्घोषः-स्वरानुनादो येषां ते तथा, तथा 'छायायवोज्जो विअंगमंगा' छायोद्योतिताङ्गाङ्गाः-छायया-प्रभया उद्दयोतितानि-प्रकाशितानि अङ्गानि अवयवा यस्य 'भरहवास माणुसच्छरामो', भरतक्षेत्र की ये मानुषीरूप में अप्सराएँ ही है “अच्छेरगपेच्छणिज्जा भी पासाईयामओ जाव पडिरूवाओ' मनुष्यलोक के ये आश्चर्यरूप है ऐसा समझ कर ये जनों द्वारा प्रेक्षणीय है प्रासादीय आदि-इन चार पदों की व्याख्या जैसी पूर्व में की जा चुकि हैं वैसी ही है "तेणं मणुया ओहस्सरा, हंसस्सरा, कोचस्सरा, णंदिस्सरा गंदिघोसा सीहस्सरा" वे उस काल के मनुष्य और स्त्रियां ओघस्वर वाले मेधके जैसे गंभीर स्वर वाले, हंस के जैसे मधुर स्वर वाले क्रौञ्च पक्षी के जैसे दूरदेश व्यापि स्वर वाले, नन्दी के द्वादशविध तूर्य समुदाय के स्वर के जैसे स्वर वाले, नन्दी के अनुनाद के जैसे अनुनाद वाले सिंह के बलिष्ट स्वर के जैसे स्वर वाले "सीहघोसा सुस्सरा, सुस्सरणिग्घोसा, छायायवोज्जोविअंगमंगा, वज्जरिसह नारायसंघयणा समचउरंससंठोणसंठिया छविणिरातका" सिंह के अनुनाद जैसे अनुनाद वाले, एतएव शोभन स्वर वनमा-विरशी असशमा २वी सुह२ छे या "भरहवासमाणुसच्छराओ" १२. तत्रनी से भानुषी३५मां सराय . "अच्छेरगपेच्छणिज्जाओ पासाईयाओ जाव पडिरूवामो" भनु-या मारे थे माश्य १३५. पायी है। वई से प्रेक्षणीय छे. પ્રાસાદી) વગેરે એ ચાર પદોની વ્યાખ્યા જેમ પહેલા કરવામાં આવી છે તેવી જ અહીં ५ समावी. “तेण मणुया ओहस्लरा, हंसस्सरा, कोंचस्सर णंदिस्सरा, णंदीधोसा, सीहस्सरा" बना मनुष्य। अन सिमे सोपवाणा मेघना भी२ २१२वा હંસના જેવા મધુર સ્વરવાળા કૌંચ પક્ષીના જેવા દેશવ્યાપી સ્વરવાળા નન્દીના દ્વાદશવિધતૂર્ય સમુદાયના સ્વર જેવા સ્વરવાળા નંદના અનુવાદના જેવા અનુનાદવાળા સિંહनमस४ ११२ना वा स्वरवास, "सीहधोसा, सुस्सरा, सुस्सरणिग्धोसा, छायायवोज्जो विभंगमंग बजरिसहनारायसंघयणा, समचउरंससंठाणसंठिया छविणिरातंका" सिना Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तदेवंविधमङ्ग-शरीरं येषां ते तथा, तथा 'वज्जरिसदनारायसंघयणा' वज्रऋषभनाराच संहननाः वज्रऋषभनाराचानि वजऋषभनाराचनामकानि संहननानि-शरीरसंघटन प्रकारा येषां ते तथा । 'तथा-समचउरंससंठाणसंठिया' समचतुरस्त्रसंस्थानसंस्थिताः-समचतुरस्र संस्थानम् आकृति विशेषो येषां ते तथा । , तथा 'छविणिरातंका' छविनिरातङ्काः छव्यां =त्वचि निरातङ्काः रोगरहिता-दद्रुकुष्ठादि चर्मरोग रहिता इत्यर्थः । तथा 'अणुलोमवायुवेगा' अनुलोमवायुवेगाः अनुलोमः अनुकूलो वायुवेगः-शरीरान्तर्वर्ती वातप्रचारो येषां ते तथा । कंकगहणी' कंकग्रहण्यः कस्येव पक्षिविशेषस्व नीरोगवर्चस्कतया ग्रहणी-गु दाशयो येषां ते तथा तथा 'कबोयपरिणामा' कपोतपरिणामाः-कपोतस्येव परिणाम:आहारपरिणामो येषां ते तथा कपोतस्य प्रस्तरलवोऽपि भुक्तो जीर्यते तथैव तेषामपि भुक्तं दुर्जरभोजनम् अनायासेन जीर्यते इति भावः । अनेन तेषामजीर्णतादिदोषराहित्यं सूचिवाले होते है अच्छे स्वर और निर्घोष अनुनाद वाले होते है, प्रभा से जिनके शारीरिक अवयव प्रकाशित होते रहते है ऐसे होते हैं वज्रऋषभनाराच संहननवाले होते है समचतुरस्र संस्थान वाले होते हैं, चमड़ी में इनकी किसी भी प्रकार का आतंक रोग नही होता है, दद् कुष्ट आदि चर्मरोग से ये रहित होते हैं 'अणुलोमवा उवेगा, कंकगहणी, कवोयपरिणोंमा, सउणिपोसपिटुंतरोरुपरिणया छडणुसहस्समूसिआ" शरीरान्तर्वतॊ वायु का वेग इनके सदा अनुकूल रहता हैं इनका गुदाशयकंकपक्षी के गुदाशय की तरह नोरोगवचर्ववाला होता हैं अर्थात् इनका गुदाशय टट्टी से लिप्त नहीं होता है कपोत का जैसा आहार परिणाम होता है उसी तरहका इनका आहार परिणाम होता हैं अर्थात् जैसे कबूतर कंकड वा जावे तो वह भी जीर्ण हो जाता है पच जाता है उसी तरह से इन्हें भी दुर्जर भोजन पच जाता है ऐसा इनका आहार परिणाम होता है इस कथन से ये अजीर्णता आदि दोष से रहित होते हैं यह बतलाया गया हैं इनकी गुदा का जो बा. ह्यभाग होता है वह पक्षी की गुदा के बाह्य भाग को तरह मल के लेप से रहित रहता है पोसઅનુનાદ જેવા અનુનાદવાળા એથી શેભન સ્વરવાળા હોય છે. સારા સ્વર અનેનિષ– અનુન દવાળા હોય છે. પ્રભાથી જેમના શારીરિક અવયવે પ્રકાશિત થતા રહે છે, એવા હોય છે. વજા ભનારાય સંહનનવાળા હોય છે. સમચતુરન્સ સંસ્થાનવાળા હોય છે. એમની ચામડીમાં કોઈ પણ જાતની વિકૃતિ થતી નથી દદ્ર કુષ્ઠ વગેરે ચર્મરોગથી એઓ વિહીન હોય छ, “अणुलोम वाउवेगा, कंकग्गहणी, कपोयपरिणामा सणिपोसपिटूठंतरोरुपरिणया, छद्धणुसहस्सभूसिआ' अमना शरीरान्त'ती' वायुन। वास अनुदूत २ छे. समनु ગુદાશય કંકપક્ષી ના ગુદાશયની જેમ નીરોગ વર્ચરવાળું હોય છે, એટલેકે એમનું ગુદાશય જાજરુથી લિપ્ત હેતું નથી. કપોતને જે જાતને આહાર-પરિણામ હોય છે તે જાતને એમને આહાર પરિણામ હોય છે એટલે કે કપત કાંકરાએ ખાય છે તે પણ જીર્ણ થઈ જાય છે પચી જાય છે, તેવી જ રીતે એમને પણ દુજ૨ ભજન પણ પચી જાય છે. એ એમનો આહાર પરિણામ હોય છે. આ કથનથી સ્પષ્ટ થાય છે કે એ સર્વે અજીર્ણતા વગેરે દેથી રહિત Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिक टीका द्वि. वक्षस्कार सू. २४ सुषमसुषमाभाविमनुष्य स्वरूपनिरूपणम् तम् । तथा--' सउणि पोसपिद्वंतरोरुपरिणया' शकुनि पोसपृष्ठान्तरोरुपरिणताः - शकुने:पक्षिण इव निर्लेपत्वात् पोस:- अपानभागो गुदबाह्यभागो येषां ते तथा । तथा-पृष्ठ-पृष्ठभागः, अन्तरे- पृष्ठोदरयोरन्तराले - पार्श्वे इत्यर्थः ऊरू = सक्थिनी - इत्येतानि - परिणतानि परिनिष्ठतां गतानि येषां ते तथा, ततः पक्षद्वयस्य कर्मधारयः । तथा 'छद्धणु सहस्समृसिया' षड्धनुस्सहस्रोच्छ्रिताः - षट्सहस्रधनुः परिमितोच्चाः । एवं विधास्ते मनुजा भवन्तीति । अथ तेषामेव मनुजानां वैशिष्ट्यमाह - ' तेसिणं मणुयाणं' इत्यादि । 'समणा उसो, हे आयुष्मन् ! श्रमण ! 'तेसिणं मणुयाणं ' तेषां खलु मनुजानां 'वे छप्पणा पिट्ठकरंडगसया' द्वे षट्पञ्चाशत्पृष्ठकरण्डकशते-पट्पञ्चाशदधिकद्विशत् संख्यकानि पृष्ठवंशवर्युन्नता अस्थिखण्डाः पंशुलिका इति यावत् 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ते - कथिते । तथा ते मनुजाः 'पउमुपळगंधसरिस णीसाससुर भिवयणा' पद्मोत्पल गन्धसदृश निःश्वाससुर भिवदनाः पद्मं सूर्यविकासिकमलम् उत्पलं-चन्द्रविकासिकमलम्, एतद्वयस्य यो गन्धस्तत्सदृशः - तत्तुल्यो निः श्वासुरभि र्यस्मिस्तादृशं वदनं मुखं येषां ते तथा भवन्ति । पुनस्ते कीदृशाः ! इत्याह'तेणं' इत्यादि । 'तेणं मणुया पगई उवसंता' ते खलु मनुजाः प्रकृत्युपशान्ताः - प्रकृत्या - स्वभावेन उपशान्ता शान्तस्वभावा भवन्ति न तु क्रूरस्वभावाः, तथा 'पगईपयणुको हमाणमायालोमा' प्रकृतिप्रतनुक्रोधमानमायालोभाः प्रकृत्या - स्वभावेन प्रतनवः - अत्यल्पाः क्रोधमान माया लोभाः येषां ते तथा, अतएव 'मिउमदवसम्पन्ना' मृदुमार्दव सम्पन्नाःमृदु शोभनं परिणाम सुखकरं यन्मार्दवं तेन सम्पन्नाः - युक्ताः, न तु खलजनवत् कपटमादेवयुक्ताः, तथा 'अल्लीणा' अलीनाः - सर्वगुणालङ्कृताः अथवा गुरुज़नाज्ञाकारिणो न तु शब्द का अर्थ अपान भाग है इनका पृष्टभाग दोनों पार्श्वभाग और दोनों उरू परिनिष्ठित होते हैं अर्थात् वहुत मजबूत होते हैं ६ हजार धनुष के ये ऊँचे होते हैं । "तेसिणं मणुयाणं वे छप्पण्णा पिट्ठ करंडकसया पण्णत्ता समणाउसो ?' हे श्रमण ! आयुष्मन् उन मनुष्यों की २५६ पंसुरियों को हड्डियां होती हैं, 'पउप्पलगंध सरिसणोसास सुरभिवयणा ' इनका श्वासोच्छवास पद्म एवं (कमल)की जैसों गंध होतो है वैसो गन्ध बाला होता है अतः उसकी खुशबू से इनका मुख दा सुवासित बना रहता है " तेणं मणुया पगई उवसंता पगई पयणु कोहमाण मायालोभा मिउमद्दव संपन्ना अल्लीणा महगा विणीया अपिच्छा असण्णिहिसंचया विडिमंतरपरिवसणा जहिच्छिय का मकामिणो” ये मनुष्य प्रकृति से ही शान्तस्वभाव वाले होते है क्रूरस्वभाव वाले नहीं होते है, तथा હાયછે. એમની ગુદાના જે ખાદ્ય ભાગ હાય છે તે પક્ષીની ગુદાના ભાગની જેમ મલના લેપથી विहीन रहे छे. 'पोल' शब्ने अर्थ भयानलांग है. मेमनेो पृष्ठभाग अन्ने पार्श्व भाग અને બન્ને ઉરુએ પિરિòિત હાય છે. એટલે કે બહું જ મજબૂત હાય છે. છ હજાર धनुष भेटला । उया होय छे. “ते सिणं मणुयाणं वे छप्पण्णा पिट्ठकरंडकसया पण्णता समणाउसो' हे श्रमण आयुष्मन् ! ते मनुष्योनी २५ह् यांसजी मोना अस्थि होय छे. "पउमुपपलगन्ध सरिस णीसाससुर भिवयणा” पद्म भने उत्पसना व गंध होय छे તેવા જ ગંધવાળા એમના શ્વાસેછ્વાસ હોય છે, એથી એમના ગંધથી એમનુ' મુખ २४७ Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૨૪૮ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कदाचिदपि तदाज्ञोल्लङ्घकाः, यद्वा-आ-समन्तात् लीना:-सर्वासु क्रियासु गुप्ता न तूद्धतचेटाकारिणः इत्यर्थः, तथा 'भद्दगा'भद्रकाः-कल्याण भागिन: 'भद्रगा' इतिच्छाया पक्षे-भद्रहस्तिगतय इत्यर्थः, तथा 'विणीया' विनीता:-वृद्धजनेषु विनयशालिनः, 'अप्पि-छा' अल्पेच्छाः-मणिकनकादि प्रतिबन्ध रहिताः, 'असण्णिहिसंचया' असन्निधि संचयाः-नविद्यते सन्निधेः-पर्युषितखाधादेः संचयो येषां ते तथा असंचयशीला इत्यर्थः, तथा-'वि डिमंतरपरिवसणा' विटपान्तरपरिवसनाः-विटपान्तरेषु-प्रासादाधाकारेषु शाखान्तरेषु परिव सनम्-आवासो येषां ते तथा, प्रासादाकारकल्पवृक्षनिवासिन-इत्यर्थः । तथा 'जहिच्छियकामकामिणो' यथेप्सितकामकामिनः-यथेप्सितान्-यथेष्टान् कामान्-शब्दादीन् भोगान् कामयन्ते-उपभोग्यत्वेन अभिलषन्तीति तथा यथेष्ट शब्दादिविषयोपभोगशालिनश्च भवन्तीति ।मु०२४॥ प्रकृति से ही क्रोध मान माया और लोभ कषाय का मंदता वाले होते है इसलिये ये मृदु-शोभन परिणामवाले परिणाम में सुखकारो-ऐसे मार्दव भाव से संपन्न होते हैं खलजन को तरह कपट युक्त मार्दवभाववाले नहीं होते हैं । ये अलीन सर्वगुणों से सहित होते हैं अथवा गुरुजनों की आज्ञा के आराधक होते हैं उनकी आज्ञाके विराधक नही होते हैं । अथवा सब तरफसे ये समस्त शुभ क्रियाओं में लोन रेहते हैं उद्धतचेष्टाकारी ये नही होते हैं, ये भद्रक कल्याणभागी होते हैं अथवा भद्रग-भद्रहाथी की जैसो चाल वाले होते है ये विनीत होते है वृद्धजनों की विनय करने वाले होते है, ये अल्पेच्छ होते है. मणि कनक आदि में प्रतिबन्ध से हीन रहते हैं ये पर्युषित खाच भादि के संग्रह शील नहीं होते हैं इनका रहन सहन प्रासाद आदि के आकाररूप कल्पवृक्षों की शाखाओं के भीतर होता हैं तथा ये प्रासाद के जैसे आकार वाले कल्पवृक्षों पर निवास करते है तथा ये यथेष्ट शब्दादिक भोगों को भोगने के स्वभाव वाले होते है ॥२४॥ सहा सुवासित २ छ. "तेणं मणुया पगई उवसंता, पगई पयणु कोहमाणमायालोमा मिउमदवसंपन्ना, अल्लीणा, भगा, विनीमा अप्पिच्छा असण्णि हिसंचया, विडिमंतरपरिवसणा, जहिच्छियकामकामिणो" से मनुष्य। प्रकृतिथी शान्त स्वमाain डाय छे. છે નહિ. તેમજ પ્રકૃતિથી ક્રોધ, માન, માયા અને લાભ કષાયની મંદતાવાળા હોય છે. એથી જ એ ઓ મૃદુ શોભન પરિણામવાળા પરિણામ માં સુખકારી એવા માર્દવભાવથી સંપન્ન હોય છે. ખેલ માણસોની જેમ કપટ યુકત માર્દવભાવવાળા હોતા નથી. એ અલીન સર્વગુણ સંપન્ન હોય છે અથવા ગુરુજનોની આજ્ઞાન વિરાધક નહિ પણ પાલન કરનારા હોય છે. અથવા સર્વ રીતે એ સર્વ સમસ્ત શુભક્રિયાઓમાં લીન રહે છે. એઓ ઉદ્ધત ચેષ્ટાકારી હોતા નથી એ ભદ્રક કલ્યાણ ભાગી હોય છે. અથવા ભદ્રગ ભદ્ર હાથીના જેવી ગતિવાળા હોય છે. એ વિનીત હોય છે વૃદ્ધ જનોની સામે વિનઝ થઈ ને રહે છે. એ અપેછ હોય છે. મણિ કનક વગેરેમાં પ્રતિબન્ધથી હીન રહે છે. એ પર્યું ષિત ખાદ્ય વગેરે પદાર્થોને સંગ્રકરવાવાળા હતાં નથી. એમની રહેણી કરણી પ્રાસાદ આદિના આકર રૂપ કઃપવૃક્ષોની શાખાઓની અંદર હોય છે. એટલે કે એ પ્રાસાદ જેવા આકાર વાળા વૃક્ષેપર નિવાસ કરે છે તેમ જ યથેષ્ટ શબ્દાદિક ભેગોને ભેગવનાર, હાય છે-૨૪ Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्वि० पक्षस्कार सू. २५ तेषां मनुजानां आहादिकनिरूपणम् २४९ सम्प्रति तेषां मनुजानां कियत्सु दिनेसु व्यतीतेषु आहारप्रयोजनं भवति ? तेषामाहारश्च कीदृशो भवति ? तस्मिन्काले च पृथिव्याः पुष्पफलानां च कीदृश आस्वादोभवति ? इति च प्रदर्शयितुमाह - मूलम्-तेसि णं मणुयाणं केवइकालस्स आहारट्टे समुप्पज्जइ ? गोयमा ! अट्ठमभत्तस्स आहारट्टे समुप्पज्जइ । पुढवीपुप्फफलाहारा णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो ! तीसे णं भंते ! पुढवीए केरिसए आसाए पण्णते ? से जहा नामए गुलेइ वा खंडेइ वा सक्कराइ वा मच्छंडियाइ वा पप्पडमोयएइ वा भिसेइ वा पुप्फुत्तराइ वा पउमुत्तराइ वा विजयाइ वा महाविजयाइ वा आकासियाइ वा आदंसियाइ वा आगासफलोवमाइ वा उवमाइ वा अणोवमाइ वा भवेएयारूवे ? गोयमा ! णो इणढे समट्टे, साणं पुढवी इत्तो इद्रुतरिया चेव जाव मणामतरिया चेव आसाएणं पपणत्ता । तेप्तिणं भंते ! पुष्फफलाणं केरिसए आसाए पण्णत्ते ! से जहा णाभए रण्णो चाउरंतचक्कवदिस्स कल्लाणे भोयणजाए सयसहस्सनिष्फन्ने वण्णेण..उवेए जाव फासेणं उवेए आसायणिज्जे विसायणिज्जे दिप्पणिज्जे दप्पणिज्जे मयणिज्जे बिहणिज्जे सबिदियगायपल्हाय णिज्जे भवे एयारूवे, ? गोयमा ! णो इणढे समढे, तेसिणं पुप्फफलाणं एत्तो इट्टतराए चेव जाव आसाए पण्णत्ते ॥सू०२५॥ छाया-तेषां खलु मनुजानां कियत्कालेन आहारार्थः समुत्पद्यते? गौतम! अष्टमभतेन आहारार्थः समुत्पद्यते, पृथिवीपुष्पफलाहाराः खलु ते मनुजाः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् ! तस्याः खलु पृथिव्या भदन्त ! कीदृशक आस्वादः प्रशप्तः तद्यथानामक गुड इति खण्डमितिवा शर्करेति वा मत्स्यण्डिकेति वा पर्पटमोदक इति वा विसमिति वा पुष्पोत्सरेति षा पद्मोत्तरेति वा विजयेति वा महाविजयेति वा आकाशिकेति वा आदर्शिकेति वा आकाशफलोपमेति वा उपमेति वा अनुपमेति वा, भवेदेतद्रपः ! गौतम! नो अयमर्थः समर्थः सा खलु पृथिवी इत इष्टतरिका चैव यावद् मन आमतरिका चैव आस्वादेन प्राप्ता । तेषां खल भदन्त ! पुष्पफलानां कीदृशक आस्वादः प्रशतः तद्यथा नामक राक्षश्चातुरन्तबक्रवर्तिनः कल्याणं भोजनजातं शतसहस्रनिष्पन्न वर्णेनोपेतं यावत् स्पर्शन उपेतम् आस्थादनीय विस्वादनीयं दीपनीयं दर्पनीय मदनोयं बृंहणीयं सवेंन्द्रियगात्रप्रहादनीयम्, भवेत एतद्रपः ? गौतम ! नायमर्थः समर्थः तेषां खलु पुष्पफलानाम् इत इष्टतरकश्चैव यावत् - स्वादः प्रज्ञप्तः ॥सू०२५॥ ३२ Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २५० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे टीका-'तेसि ण भंते ! इत्यादि । 'तेसि णं मनुयाणं केवइकालस्स' तेषां खलु मनुजाना कियत्कालेन किं प्रमाणेन कालेन 'अहारट्रे' आहारार्थः आहारप्रयोजनं 'समुप्पज्जइ' समुत्पद्यते संजायते ? इति गौतमप्रश्नः । 'केवइयकालस्स' इत्यत्र तृतीयार्थे षष्ठी। भगवानाह-'गोयमा ! अट्ठमभत्तस्स हे गौतम ! अष्टमभक्तेन अष्टभभक्तप्रमाण कालेन तेषाम् 'आहारटे' आहारार्थः आहारप्रयोजनम् आहारेच्छेत्यर्थः 'समुप्पज्जा' समुत्पद्यते । 'अट्ठमभत्तस्स' इत्यत्र तूतीयार्थे षष्ठी बोध्या । अष्टमभक्तम् इत्युपासत्रयस्य संज्ञा तच्च तपोविशेषो निर्जरार्थ क्रियते तेषां मनुष्याणां तु सरसाहार भोजित्वेन तावत्कालपर्यन्तं क्षुद्वेदनीयोदयाभावादाहारसंज्ञैव न जायते इति निरार्थत्वाभावात्तत्कृताहारत्यागस्य यधप्यष्टभक्तत्वं नास्ति तथापि अभक्तार्थत्वसाम्यादत्रापि 'अट्ठमभत्तस्स' इत्युक्तमिति । तथा अब सूत्रकार यह प्रगट करते हैं कि उन मनुष्यो को कितने दिनों के बाद आहार की इच्छा होती है, तथा-उनका आहार कैसा होता है, और उस काल में पृथिवी के पुष्पफलादिकों का कैसा आस्वाद होता है. । "तेसि णं भणुयाणं केवइ कालस्स आहारट्टे समुप्पज्जइ" इत्यादि । टीकार्थ-"तेसि णं मणुयाणं केवइ कालस्स आहारट्ठे समुज्जइ' गौतमस्वामी ने प्रभु से ऐसा पूछा है-हे भदन्त ! उन मनुष्यों को कितने समय के बाद आहार की अभिलाषा होतो है? इसके उत्तर में प्रभु कहते है-“गोयमा ! अट्ठम भत्तस्प आहारट्टे समुप्पज्जइ" हे गौतम ! अष्टम भक्त प्रमाण काल के बाद-अर्थात् तोन दिन के बाद उनके आहार की अभिलाषा होती है "अष्टम भक्त" यह तीन उपवास का नाम है, यह तपो विशेष है और निर्जरा के लिए किया जाता है, परन्तु ये मनुष्य तो उपवास करते नहीं हैं क्यों कि भोगभूमि के जीवों के चारित्र नहीं होता है. ये तो सरस आहार भोजो हैं, अतः इस भोजन से उन्हें तीन दिन तक क्षुवेदनीयोदय के अभाव से भूख ही नहीं लगती है. तोन दिन व्यतीत हो जाने पर ही भोजनेच्छा इन्हें હવે સૂત્રકાર એ પ્રકટ કરે છે કે તે મનુને કેટલા દિવસ પછી આહારની ઈચ્છા થાય છે, તેમ જ તેમનો આહાર કે વે હોય છે. અને તે કાળ માં પૃથિવીનાં પુષ્પફલ વગેરેનો સ્વાદ કેવો હોય છે. 'तेसिणं मणुयाणं केवइकालस्स आहारट्ठे समुप्पज्जइ', इत्यादि-सूत्र-॥२५॥ ટીકાથ-ગૌતમ પ્રભુને પ્રશ્ન કર્યો કે હે મદન્ત તે માણસોને કેટલા સમય પછી અહિારની અભિલાષા થાય છે. એના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે “गोयमा अठ्ठमभत्तस्प आहारट्टे समुप्पजइ' गौतम ! अष्टममत प्रमाण अण पछी मटन दिवस पछी मानी अभिनय याय छ 'अष्टम भक्त" मात्रा ઉપવાસનું નામ છે. આ તપ વિશેષ છે અને નિજધામાં કરવામાં આવે છે. પણ એ મનુષ્યો તે ઉપવાસ કરતા નથી, કેમકે ભેગભૂમિના જીવેને ચાત્રિ હોતું નથી એ તો સરસ આહાર-ભોજી છે. એ થી એ ભોજનથી તેમને ત્રણ દિવસ સુધી સુદનીદયના અભાવથી ભૂખ લ જાતી નથી. ત્રણ દિવસ થતીત ય તે પછી જ એમની ભેજ Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार स. २५ तेषां मनुजाना आहादिकनिरूपणम् २५१ 'समणाउसो !' हे आयुष्मन् ! श्रमण ! 'ते मणुया' ते मनुजाः ‘णं' खलु-निश्चयेन 'पुढवीपुप्फफलाहारा' पृथिवीपुष्पफलाहाराः पृथिवी=भूमिः,पुष्पाणि-कल्पतरुपुष्पाणि फलानि-कल्पतरुफलानि च, एतान्याहरन्ति-भुजते ये ते तथाभूताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः। ततो गौतमः पृच्छति- 'तीसे णं भंते ! पुढवीए' हे भदन्त ! तस्याः खलु पृथिव्याः 'केरिसए' कीदृशकः-किं प्रकारकः ‘आसाए'आस्वादः-रसः 'पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः ? 'से जहा णामए' तद्यथानामकम् 'गुलेइ वा' गुड इति वा, इति शब्दः स्वरूपप्रदर्शने, वा शब्दः समुच्चये, एवमग्रेऽपि, 'खंडेइवा' खण्डमिति वा 'सकराइ वा' शर्करेति वा शर्करा-'काल्पीमिश्री' इति प्रसिद्धा 'मच्छंडियाइ वा मत्स्य ण्डिकेति वा, मत्स्यण्डिका शर्करा विशेषः, 'पप्पडमोयएइ वा' पर्पटमोदक इति वा, पर्पटमोदको लड्रडक विशेषः, 'भिसेइ वा बिस्समिति वा, विसं-मृणालम् , 'पुप्फुत्तराइवा' पुष्पोत्तरेति वा, 'पउमुत्तराइ वा' पद्मोत्तरेति वा, पुष्पोत्तरपद्मोत्तरे शर्कराभेदौ 'विजयाइवा' विजयेति वा 'महाविजयाइ वा' महाविजहोती है. इसलिए यह आहारत्याग उनके कर्मों की निर्जरा का कारण नहीं होता है. क्यों कि उम आहारत्याग में अष्टम भकता नहीं है. परन्तु फिर भी जो इस आहारत्याग को अष्टमभक्त की संज्ञा दी गई है वह अभक्तार्थत्व के साम्य को लेकर ही दी गई है । "पुढवोपुप्फ फलाहारा णं ते मणुया पण्णत्ता" हे श्रमण आयुष्मन् ! वे मनुष्य निश्चय से पृथिवी-मृत्तिका, पुष्प और फल कल्प वृक्षों के फल इनका आहार करते हैं. अब गौतमस्वामी प्रभु से ऐसा पूछते हैं-"तीसे णं भंते ! पुढवीए केरिसए आसाए पण्णत्ते" हे भदन्त ! उस पृथिवी का आस्वाद कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-"से जहा नामए गुडेइ वा खंडेइ वा, सक्कराइ वा मच्छंडियाइ वा पप्पडमोयएड् वा भिसेइ वा पुप्फुत्तराइ वा विजयाइ वा" हे गौतम ! जैसा आस्वाद गुड़ का होता है, खांड का होता है, शर्करा का होता है -काल्पीमिश्री का होता है, मत्स्यण्डिका-राव या शर्कराविशेष का होता है, पर्पटमोदक-लडुका होता है, मृणाल का होता है, નેચ્છા જાગ્રત થાય છે. એથી આ આહારત્યાગ એમના કર્મોની નિર્જરાનું કારણ હોતું નથી, કેમકે તે આહારત્યાગમાં અષ્ટમ ભકતતા નથી, છતાંએ જે એ આહારત્યાગને અષ્ટમ ભકતતાની સંજ્ઞા આપવા માં આવી છે તે અભકતાર્થવના સામ્યને લીધે જ આપવામાં આવી छ. "पुढवी-पुप्फफलाहारा णं ते मणुया पण्णत्ता' भए ! सायुस्मन् ! । मनुष्य। નિશ્ચયપૂર્વક પૃથિવી, મૃત્તિકા, પુખ અને ફળ-કલ્પવૃક્ષેના ફળ-આ સર્વેને આહાર રૂપમાં अ५ ७३ छ. गीत सामी प्रभु तो प्रश्न ४२ छ “तीसे ण भंते ! पुढवीए केरिसए आसाप पण्णत्ते” महन्त ! त पृथिवीन मास्वा । वामां माया छ ? अनासपासमा प्रभु ४ छ:-"से जहा नामए गुलेइ वा खंडेइ वा सक्कराइ वा मच्छडि. याइ वा पप्पडमोयए इ वा मिसेइ वा पुप्फुत्तराइ वा पउमुत्तराइ वा विजयाइ वा' गीતમ ! જે આસ્વાદ મે ળને હેય છે, ખાંડને હોય છે, શકરાને હેય છે, કાલપી મિશ્રી નો હોય છે, મર્યાડિકા–રાવ અથવા શર્કરા વિશેષ હોય છે, પટ મેદક-લાડવા વિશેષનો હોય છે, મૃણાલનો હોય છે, પુલપિત્તરનો હોય છે, પદ્મોત્તર હોય છે, (પુષ્પોત્તર અને Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे येति वा, 'आकासियाइ वा' आकाशिकेति वा 'आदंसियाइ वा' आदर्शिकेति वा, 'आगासफलोवमाइ वा' आकाशफलोपमेति चा, 'उवमाइ वा' उपमेति वा, 'अणोवमाइ वा' अनुपमेति वा, विजयाधनुपमान्तास्तदानीन्तना अमृतस्त्रादा भोज्यविशेषा विज्ञेयाः किम् ‘एयारूवे' एतद्रूपः-एतत्प्रकारकः-गुडादीनामास्वाद तुल्यस्तेषामास्वादो 'भवे' भवति ? इति । भगवानाह-'गोयमा ! णो इणट्ठसमडे' हे गौतम ! नो अयमर्थः समर्थः 'सा णं पुढवी' सा खलु पृथिवी 'इत्तो' इतः- पूर्वोक्तगुडादितः 'इतरिया चेव' इष्टतरिका-अतिशयेन सकलेन्द्रिय सुखजनिका । 'जाव' यावत्पदेन-कान्ततरिकाप्रियतरिका मनोज्ञतरिका चेति पदत्रयं संगृह्यते, तत्र-कान्ततरिकाअतिशयेन रुचिकरा प्रियतरिका अतिशयेन प्रेमोत्पादिका मनोज्ञतरिका-अतिशयेन मनोहरा तथा 'मणामतरिया' मन आमतरिकाअतिशयेन पुष्पोत्तर का होता है पद्मोत्तर का होता है पुष्पोत्तर और पद्मोत्तर ये दो भेद एक जाति को शर्करा के होते हैं, विजया का होता है "महाविजयाइ वा, आकासियाइ वा, आदसियाइ वा, वा,आगासफलोवमाइ वा, उवमाइ वा, अणोवमाइ वा, भवे एयारूवे ?" महाविजया का होता है, आकाशिकाका होता है, आदर्शिका का होता है, आकाशफलोपमा का होता है, उपमा का होता है, अनुपमा का होता है-ये सब विजया से लेकर अनुपमा तक के उस समय के विशेष भोज्य पदार्थ हैं. इसका स्वाद अमृत के जैसा होता है, इतना प्रभु के कहते ही गौतमस्वामीने बीच में ही पूछा तो क्या हे भदन्त ! जैसा इनका स्वाद होता है वैसा ही स्वाद वहीं की पृथिवी का होता है ? तो इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-'गोयमा ! णो इणटे समढे' हे गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है. क्योंकि “सा णं पुढवी इत्तो इट्टतरिया चेव जाव मणामतरियाचेव आसा एणं पण्णत्ता" वहां की पृथिवी इन पूर्वोक्त गुडादि पदार्थों से भो इष्टतरक है- अतिशय रूपसे सकल इन्द्रिय को सुख जनक है. यहां यावत्पद से-“कान्ततरिका प्रियतरिका, मनोज्ञतरिका" इन तीन पद का ग्रहण हुआ है, अतः इन पदों के अनुसार वह कान्ततरिका--अतिशय रूपसे पनोत्तर समन्न हो से विशेष प्रारी शराना छे) वियाना डाय छे. "महाविजयाह वा, आगासियाइ वा आदेसियाइ वा, आगासफलोवमाइ वा, उवमाइ वा, भवे एया स्वे" महाविया। डाय छ, माशिअन हाय छ, मशिन डाय छ, माशફલાપમાન હોય છે, ઉપમાન હોય છે, અનુપમાને હોય છે, એ બધા વિયાથી માંડીને અનુપમાં સુધીના તે વખતના વિશેષ પ્રકારના ભેજ્ય પદાર્થો છે. એમનો આસ્વાદ અમૃત જે હોય છે. પ્રભુએ આટલું કહ્યું કે તરત ગૌતમે વૃચ્ચે જ પ્રશ્ન કર્યો કે-હે ભદન્ત ! જેવો એમનો સ્વાદ હોય છે, તેવા જ સ્વાદ ત્યાંની પૃથિવીના હોય છે. ? તે એના જવાसभा प्रभु ४३ छ-गोयमा ! णो इणठे समठे" गौतम! 241 अथ समथ नथी. म "साणं पुढवो इत्तो इद्रुतरिया चेव जाव मणामतरिया चेव आसारणं पण्णता" त्यांनी પ્રથિવી પૂર્વોકત ગોળ વગેરે પદાર્થો કરતાં પણ ઈટ તરક છે. અતિશય રૂપથી સકલ ઇનિદ્ર भाट सुमन छे. अडी यावत् ५४थी "कान्ततरिका, प्रियतरिका मनोशतरिका" से ત્રણ પદ ગ્રહણ કરવામાં આવ્યા છે. એથી એ પદ મુજબ તે કાન્તતરિકા–અતિશય રૂપમાં | Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २५३ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. २५ तेषां मनुजानां आहादिकनिरूपणम् मनो गम्या 'आसाएणं' आस्वादेन-रसेन 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ता। पुनौतमस्वामी पुष्पफलानामास्वादविषये पृच्छति-'तेसि णं' इत्यादि । 'तेसि ण भंते !' हे भदात ! तेषां स्लु तत्कालोत्पन्नमनुष्याहारभूतानां कल्पतरूसम्बन्धिनां 'पुप्फ फलाणं के रिसए आसाए पप्णत्ते' पुष्पफलानां कीदृशः आस्वादः प्रज्ञप्तः ? इति । ‘से जहा णामए रणो' तद्यथा नामकं राज्ञो नृपस्य कीदृशस्य तस्य ? 'चाउरंतचक्कट्टिस्स' चातुरन्तचक्रिवर्तिनः पट्खण्डाधिपतेः 'कल्लाणे कल्याणम्-एकान्तसुखजनकं 'भोयणजाए' भोजनजातं-भोजनप्रकार: ‘सयसहस्सनिप्फन्ने' शतसहस्रनिष्पन्न-लक्षदीनारव्ययेन सम्पन्नं 'वण्णेणं' वर्णेन-अनिप्रश स्तेन वर्णेन 'उवेए' उपपेतं-युक्तं, 'जाव' यावत्-यावत्पदेन गन्धेनोपपेतं रसेनोपपेतम् इति संग्राह्यम् तत्र-गन्धेन-अतिप्रशस्तेन गन्धेन, रसेन अतिप्रशस्तेन रसेनेति बोध्यम्, तथा 'फासेणं' स्यर्शन-अतिप्रशस्तेन स्पर्शेन 'उवेए' उपपेतं युक्तं यद्यपीह वर्णादयः सामान्येन नोक्तास्तथापितेऽति प्रशस्ता एव बोध्याः, सामान्य वर्णादिमत्वं तु सामान्य भोजनेऽपि भवत्येवेत्यत एवाह-'आसायणिज्जे' आस्वादनीयम् सामान्यतः, 'विसारुचिकरा है, प्रियतरिका-अतिशयरूप से प्रेमोत्पादिका है और मनोज्ञतरिका-अतिशय रूप से मन को हरने वाली है, एवं अतिशय रूप से वह मन आमतरिका मन के द्वारा गम्य है इस प्रकार का उसका रस कहा गया है. अर्थात् रस को लेकर इस पृथिवी का ऐसा वर्णन किया गया है। "तेसि ण भंते ! पुप्फफलाणं केरिसए आसाए पण्णत्ते ?" हे भदन्त ! वहां उन पुष्पफलों का रस कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं- ''से जहा णामए (ण्णो चाउरंतचक्कवदिस्स कल्लोणे भोयण नाए सयसहस्सनिष्फले वण्णेण उवेए जाव 'फासेण उवेए आसायणिज्जे विसायणिजे, दिप्पणिज्जे, दप्पणिउजे, मयणिज्जे, विहणिज्जे, सबिंदियगायपल्हायणिज्जे" हे गौतम ! जैसा-षट्खंडाधिपतिचक्रवर्तिराजा का भोजन जो कि एक लाख दीनार के खर्च से निष्पन्न हुआ हो, कल्याणप्रद-एकान्ततः सुख जनक होता है और वह अति प्रशस्त वर्ण से, अति प्रशस्त रस से, રુચિકરા-છે, પ્રિયતરિકા-અતિશય રૂપથી પ્રેમાદિકા છે અને મનેzતરકા-અતિશય રૂપથી મનને આકર્ષ મારી છે તેમજ અતિશય રૂપમાં તે મન આમનરિકા મને વડે ગમ્ય છે, આ જાતની તેના રસની વિશેષતાઓ કહેવામાં આવી છે. એટલે કે સને લઈને તે પૃથીનું આ જાતનું વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે. . "तेसि णं भंते ! पुष्फफलाण केरिसए आसाए पण्णत्त ?" महन्त ! त्या ते ५ जाना से ४ जतनांडवाम छ ? ना 02104 प्रमुड छ:-"से जहा णामए रणो चाउरंत चक्कट्टिस्स कल्लाणे भोरणजाए सयर हस्स बिएफन्ने वणेण उवेए जाव फासेणं उवेए आसायणिज्जे विसायणिज्जे दिप्पणिज्जे दप्पणिज्जे मणिज्जे बिहणिजे. सविदियगायपल्हाणिज्जे” गौतम ! पति यति नरेशनु मेशिन જે એક લાખ દીનારના ખર્ચે નિષ્પન થયેલ હોય જાણુ પદ, એકાન્તતઃ સુખજનક હોય છે, અને તે અતિ પ્રશસ્ત વર્ણથી, અતિ પ્રશસ્તરસથી, અતિ પ્રાપ્ત ગબ્ધથી અને અતિ પ્રશસ્ત સ્પર્શ થી યુકત હોવાથી તે જેમ આસ્વાદનીય હોય છે, વિશેષરૂપથી સ્વાદનીય હોય છે, જઠ Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २५४ जम्बूद्वीपप्रज्ञसूत्रे यणिज्जे' विस्वादनीयं विशेषतः, दिप्पणिज्जे, दीपनीयं- दीपयति जाठराग्निमिति दिग्रहे बाहुकात्कर्त्तर्यनीयर प्रत्ययः, जाठराग्निदीप्तिवरमित्यर्थः, 'दप्पणिज्जे' दर्पणीयम्-दृप्तिकरम् उत्साहवर्द्धकमिति यावत् 'मयणिज्जे' मदनीय - मदजनकं 'बिंहणिजे ' बृहणीथं - धातृपचयकर', 'सव्विदियगाय पल्हायणिज्जे, सर्वेन्द्रियगात्रप्रह्लादजनकं च भवति किम् 'भवे एयारूवे' एतद्रूपः = एतत्तुल्यः तेषां पुष्पफलानाम् आस्वादो- रसो भवेत् ? भगवाह 'गोयमा ! णो णट्ठे समट्टे' हे गौतम ! नायमर्थः समर्थः, 'तेसि णं पुष्पफलाणं' तेषां खलु पुष्पफलानाम् 'इत्तो' इतः चक्रवर्त्तिभोजनतः 'इदुतराए चेव' इष्टतरकचैव 'जाव' यावत् - यावप्पदेन कान्ततरश्चैव प्रियतरकश्चैव मनोज्ञतरकश्चैव मन आमतरकश्चैव इति पदसंग्रहः एषामर्थोऽत्रैव सूत्रे पूर्वं गतः, 'आसाए' आस्वादौ रसः पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः कथित इति ॥ ०२५॥ सुषमसुषमाकाले भरतवर्षोत्पन्ना जनास्तमाहारमाहार्य व वसन्ति ? इति जिज्ञासोपशान्तये गौतमस्वामी पृच्छति - मूलम् - तेणं ! मणुया तमाहारमाहारेत्ता कहिं वसहि उवेर्ति गोयमा ! रुक्खगेहालयाणं ते मण्या पण्णत्ता समणाउसो ! तेसि णं भंते!' रुक्खाणं केरिसए आयरभाव पडोयारे पण्णत्ते गोयमा ! कूडागारसंठिया पेच्छा अति प्रशस्त गन्व से और अतिप्रशस्त स्पर्श से युक्त हुआ जैसा आस्वादनोय होता है, विशेष रूप से स्वादनीय होता है, जठराग्नि का दीपक होता है, उत्साहवर्धक होता है, मदनीय होता है, बृंहणीय - धातुओं के उपचय का करने वाला होता है, प्रह्लादनीय- समस्त इन्द्रियों को और पूरे शरीर को आनन्द देने वाला होता है. तो क्या है भदन्त ! " भवे एयारूवे" इनके जैसा ही उन पुष्पफल का आस्वाद - रस होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं " गोयमा ! णो इट्टे समट्टे” हे गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है अर्थात् चक्रवर्ती के भोजन से भी इष्टतरक, ही यावत् आस्वाद इन पुष्पफलों का होता कहा गया है, यहां यावत्पद से "कान्ततरक, प्रियतरक, मनोज्ञ तरकर और मन आमतरक" इन पदों का संग्रह हुआ है । इन संग्रहीत पदों का अर्थ जैसा पहले कहा गया है- बैसा ही है ।। २५॥ शन्निने द्वीप होय छे, उत्साह वर्ध होय छे, महनीय होय छे, प्रीय-धातुयोनु उपयाચક હેાય છે. અને પ્રહ્લાદનીય-સવ ઈન્દ્રિયાને અને સવ શરીરને આનંદ આપનારુ' હાય छे, तो शु डे अहन्त ! ' भवेपयारूवे” शोभना व ते पुण्यानो स्वाद होय छे ? सेना नवाणमां प्रभु उडे हे. 'गोयमा ! णो इट्ठे समट्ठो' हे गौतम! या अर्थ समर्थ नथी. એટલે કે ચક્રવતિ ના ભેાજન કરતાં પણ ઇષ્ટ તરક ચાવત્ આસ્વાદ એ પુષ્પ ફલાર્દિકને! હાય छे. गडी यावत् पहथी "कान्ततरक प्रियतरक मनोशतरक. अने मन आम तरक'' से सर्व પદ્માને સગ્રહ થયેલ છે. એ પટ્ટાની વ્યાખ્યા. પહેલાં કરવામાં આવી છે, ડારયા Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २५५ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू. २६ युगलिकानां निवासनिरूपणम् छत्तझयधूमतोरण गोउरवेइया चोप्पालंग अट्ठालगपासाथ हम्मियग वक्खवालग्गपोइया वलभीधरसंठिया, अत्थण्णो इत्थ बहवे वरभवणविसिद्ध संठाणसंठिया दुमगणा सुहसीयलच्छाया पण्णत्ता समणाउसो ! ||सू०२६॥ छाया -- ते खलु भदन्त ! मनुजास्तमाहारमाहार्य क्व वसतिम् उपयन्ति १ गौतम वृक्षगेहालयाः खलु तें मनुजाः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् तेषां खलु भदन्त ! वृक्षाणां कीदृशक आकार भावप्रत्यवतारः प्रज्ञप्तः ? गौतम् ! कूटांगारसंस्थिताः प्रेक्षाछत्रध्वज स्तूपतोरण गोपुवेदिका चोपालकाट्टालक प्रासादहर्म्यगवाक्षवालाग्रपोतिका वलभीगृहसंस्थिताः सन्त्यन्ये अत्र वहवो वरभवनविशिष्टसंस्थान संस्थिता द्रुमगणाः शुभशीतलच्छायाः प्रज्ञप्ता श्रमणायुष्मन् ||२६|| टीका- 'तेणं भंते' इत्यादि । गौतम स्वामी पृच्छति - 'ते णं भंते ! मणुया' हे भदन्त ! ते खलु मनुजाः 'तमाहारमाहरेत्ता' तं पूर्वोक्तम् आहारम् आहार्य - अहारं कृत्वा 'कहिं क - कस्मिन् स्थाने 'वसतिं वासं - निवासम् 'उवेंति' उपयन्ति - प्रप्नुवन्ति कस्मिन् स्थानं निवासं कुर्वन्ति ! इत्यर्थः । भगवानाह - 'समणाउसो । हे आयुष्मन् ! श्रमण ! 'गोयमा !' गौतम ! 'रुक्खगेहालया णं' वृक्षगेहालायाः वृक्षरूपाणि गेहानि = गृहाणि आलयाः आश्रया येषां ते तथा - वृक्षरूपगृहेषु निवसनशीलाः, 'ते मणुया पण्णत्ता' ते मनुजा प्रज्ञप्ता भवन्ति । पुनर्गौतमस्वामी पृच्छति 'तेसि णं भंते ! रुक्खाणं केरिसए' हे भदन्त । तेषां खलु वृक्षाणां कीदृशः किम्प्रकारक 'आयर मावपडोयारे' आकारभावप्रत्यवतारः आकारभाव: स्वरूप अब भगवान् गौतम की इस जिज्ञासा के कि भारतवर्ष में उत्पन्न हुए वे युगनिक जन उस आहार को खाकर के फिर कहां रहते हैं ? समाधानार्थ सूत्र कहते हैं "तेणं भंते ! मणुया तमाहारमाहरेहत्ता कहिं वसहि उवेंति" इत्यादि । टोकार्थ - "तेणं भंते! मणुया तमाहारमाहरेत्ता कहि वसहि उवति" हे भदन्त ! वे युगलिक मनुष्य उस आहार को खा करके फिर कहाँ निवास करते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु कहते हैं " गोयमा ? रुक्स्खगेहालयाणं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो" हे श्रमण आयुष्मन् ! गौतम! वे युगलिक मनुष्य उस आहार को खाकर के वृक्षरूप गृह ही है आश्रयस्थान जिनका ऐसे होजाते है अर्थात् वृक्षरूप गृहों में निवास करते है । " तेसिणं भंते ! रु+खाणं केरिसए आयारभाव - “ભાતવ માં ઉત્પન્ન થયેલ તે યુગલિક જને આહ્ાર ગ્રહણુ કરીને પછી કયાં રહે છે ? એ જિજ્ઞાસાના સમાધાન માટે હવે ભગવાન ગૌતમને આ સૂત્ર કહે છે. 'ते णं भंते ! मणुया तमाहारमाहरेत्ता कहिं वसहि उवैति - इत्यादि. सू० ॥ २६॥ ટીકા-હે ભદન્ત ! તે યુગલિકા તે આહારને ગ્રહણ કરીને પછી કયાં નિવાસ કરે છે ? આ प्रश्नना श्वाणमां प्रभु हे छे, "गोयमा ! रुक्खगेहालया णं ते मणुया उसो " 3 श्रम आयुष्मन् ! गौतम ! ते युगवि मनुष्य ते मारने રૂપ ગૂડ જ છે માશ્રયસ્થાન જેમતુ-એવાં થઈ જાય છે એટલે કે વૃક્ષ રૂપ पण्णत्ता समणासुरीने वृक्ष ગૃડામાં નિવાસ Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २५६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे विशेषस्तस्य प्रत्यवतारः प्रादुर्भावः ‘पण्णत्ते' प्रज्ञप्तः प्ररूपितः भगवानाह—'गोयमा" हे गौतम ! 'कूडागारसंठिया' कूटाकारसंस्थिताः-कूटं-शिखरं तदाकारसंस्थिताः-तदाकृत्तिकाः तथा-'पेच्छाछत्तझय थूम तोरण गोउर वेइया चोप्पालग अट्टालगपासाय हम्मियगवश्ख वालग्गपोइया बलभीघरसंठिया' प्रेच्छाच्छत्रध्वज स्तूप तोरण गोपुर वेदिका चोप्पालकाहालकप्रासादहर्म्यगवाक्षवालाग्रपोतिका वलभीगृहसंस्थिताः अत्र प्रेक्षादि वलभीगृहान्तशब्दानां द्वन्द्वः, तद्वत् संस्थिताः-संस्थानयुक्ता इति विग्रहः, 'संस्थिताः, शब्दस्य द्वन्द्वान्ते श्रयमाणत्वात् प्रेक्षादिषु प्रत्येकत्रान्वयः । तेन-प्रेक्षा संस्थिताः छत्रसंस्थिताः इत्यादि रूपेण पदयोजना कार्या । तत्र प्रेक्षापदं पदैकदेशे पदसमुदायोपचारात् प्रेक्षागृहपर, ततश्च प्रेक्षागृहसंस्थिताः-प्रेक्षागृह-नाटकगृहं तद्वत् संस्थिताः-तादृशसंस्थान युताः प्रेक्षागृहाकारा इत्यर्थः। तथा छत्र संस्थिताः-छत्राकाराः, ध्वज संस्थिताः ध्वजाकाराः तोरणसंस्थिताः तोरणाकाराः, स्तूपसंस्थिताः स्तूपाकाराः गोपुरसंस्थिताः गोपुराकाराः, वेदिकासंस्थिताः-वेदिका-वितर्दिका-उपवेशनयोग्या भूमिस्तद्वत्संस्थिताः-तदाकाराः चोप्पालकसंस्थिता-चोप्पालकं वरण्डा, इति भाषा प्रसिद्धम्, तद्वत्संस्थिताः तदाकाराः, डोयारे पण्णते " हे भदन्त ! उन वृक्षों का स्वरूप कैसा कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं “ गोयमा ! कूडागार संठिया पेच्छा छत्तज्झयथूमतोरणगो उरवेइया चोप्पालग अट्ठालगपासाय हम्मिय गवस्वतालगपोइयावलभीघर संठियो" हे गौतम ! वे वृक्ष कूट-शिखर का जैसा आकार होता है वैसे आकार वाले होते हैं. प्रेक्षा-प्रक्षाग्रह-सिनेमाग्रह या नाटकग्रह-का जेसा आकार होता है वैसे आकार वाले होते हैं छत्र-छाते का जैसा आकार होता है वैसे आकार वाले होते हैं, ध्वजा का जेसा आकार होता है वैसे आकार वाले होते हैं, स्तूपका (चबूतरा) जैसा अकॉरेटोता है वैसे आकार वाले होते हैं, तोरण का जैसा आकार होता है वैसे आकार वाले होते हैं, गोपुरका जैसा आकार होता है, वैसे आकार वाले होते हैं, उपवेशन योग्य भूमि का जैसा आकार होता है वैसे आकार वाले होते हैं, चोप्पालक वरंडा का जैसा आकार रे छ. "तेसिणं भंते ! रुक्खाण केरिसए आयारभावपडायारे पण्णत्ते" हे सहन्त ! ते वृक्षानुस्१३५ युवामा ५०यु छ ? सेना उत्तम प्रभु ४९ छ : “गोयमा ! कूडागारसंठिया पेच्छा छत्रज्झयथूम तारण गोउरवेई या चोप्पालग अट्टालग पासाय हम्मिय गवक्खवालग्ग पोइया वलभीधरसंठिया" के गौतम ! ते वृक्षा 2-शि५२-नसा२ સદશ આકારવાળા હોય છે. પ્રેક્ષા-પ્રેક્ષાગૃહ-નાટક ગૃહને જેવો આકાર હોય છે, તેવા આ કારવાળા હોય છે. છત્રનો જેવો આકાર હોય છે. તેવા આકારવાળા હોય છે. દવાનો જે આકાર હોય છે, તેવા આકારવાળા હોય છે. સ્તૂપને જે આક ર હોય છે, તેવા આકારવાળા હોય છે. તેરણ ના જેવો આકાર હોય છે. તેવા આકારવાળા હોય છે. ગોપુરના જેવો આકાર હોય છે. તેવા આકારવાળા હોય છે. ઉપવેશન યોગ્ય બમિના જે આકાર હોય છે. તેવા આકારવાળા હોય છે. અટ રને જે ખાકાર હોય છે, તેવા આકારવાળા હોય છે, Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिक टोका द्वि. वक्षस्कार सू. २६ तेषां मनुजानामाहारादिकनिरूपणम् २५७ अट्टालकसंस्थिताः- - अट्टालकाकाराः, प्रासादसंस्थिताः - प्रासादो - राजगृहं तदाकाराः हर्म्यसंस्थिताः - हर्म्य - निनामावासः - तदाकाराः गवाक्षुसंस्थिताः - गवाक्षाकाराः, वालाग्रपोतिका संस्थिताः वालाग्रपोतिका=जलस्थितप्रासादः तदाकाराः तथा - वलभीगृहसंस्थिता-वभीगृहं चन्द्रशालागृहं तदाकाराश्च ते द्रुमगणाः सन्ति । अयं भावः केचिद् द्रुमगणाः कूटाकारसंस्थिताः केचित् प्रेक्षागृहसंस्थिताः केचिच्छत्रसंस्थिताः एवं प्रकारेणाग्रेऽपि भावनीयम् इति । तथा 'अत्थण्णेइत्थ' अत्र - भरते वर्षे अन्ये पूर्वोक्तभिन्ना 'बहवे' बहवो 'वर - भवणविसिसठाणसंठिया' वरभवनविशिष्ट संस्थान संस्थिताः - वरभवनं श्रेष्ठगृहं तस्य यद् विशिष्ट संस्थानम् - आकारस्तेन संस्थिताः 'दुमगणा' द्रुमगणाः सन्ति । 'समणाउसो !' हे आयुष्मन् ! श्रमण ! ते सर्वेऽपि द्रुमगणा 'सुहसीयलच्छाया' शुभशीतलच्छायाः - शुभा शीतला च छाया येषां ते तथाभूताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः = कथिता इति । पूर्वगृहाकार कल्पद्रुमवर्णने कृतेऽपि यत्पुनर्वर्णनं कृतं तत् एतेष्वति मनोहरेषु आवासेषु ते परमपुण्यभाजो मनुजाः परिवसन्तीति सूचयितुम् । अतोऽत्र पोनरुक्त्यं नाशङ्कनीयम् ॥ ० २६ ॥ होता है वैसे आकार वाले होते हैं अटारी का जैसा आकार होता है वैसे आकार वाले होते हैं, इसी प्रकार वे प्रासाद - राजमहल, हर्म्य-धनवालों के गृह - गवाक्ष खिडकी रूप गृह, वालाग्र-पोतिका जलस्थित प्रासाद और वलभगृह चन्द्रशालागृह के जैसे आकार वाले होते हैं ऐसा जानना चाहिये । तात्पर्य यह है कि कितनेक वृक्ष कूट के जैसे आकार वाले होते हैं कितनेक वृक्ष प्रेक्षागृह के जैसे आकार वाले होते हैं, कितनेक वृक्ष छत्र जैसे आकार वाले होते हैं, इसी प्रकार से आगे भी समझ लेना चाहिये । "अत्थण्णे इत्थ बहवे वरभवण विसिट्ठ संठाणसंठिया दुमगणा सुहसीयलच्छाया पण्णत्ता समणाउसो,, हे आयुष्मन् श्रमण ! इस भरतक्षेत्र में इन पूर्वोक्त वृक्षों से भिन्न अनेक वृक्ष ऐसे भी है जो श्रेष्ठ गृह का जैसा आकार होता है वैसे आकार वाले है । हे आयुग्मन् श्रमण ! ये सब द्रुमगण शुभशीतल छाया वाले है-ऐसा तीर्थकरों ने तथा मैंने कहा है | यहाँ पहिले ग्रहोकार के कल्पवृक्षों का वर्णन करके भी जो फिर से ' 'वर भवन संस्थान " इत्यादि रूप से वर्णन किया गया है वह इन मनोहर आवासों में वे परमपु ये प्रमाणे ते प्रसाह - राम भडेस-हु- धनाढ्य मानुसोना भवना - गवाक्ष-खडडी. ३५ગૃહ, વાલાપોતિકા-૪લસ્થિત પ્રાસાદ અને વલભીગૃહ-ચન્દ્રશાલ ગૃહના જેવા આકારવાળા હોય છે, એમ જાણવું જોઈ એ. તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે કેટલાંક વૃક્ષા ફૂટના જેવા આકારવાળા હોય છે, કેટલાટ વૃક્ષેા પ્રેક્ષાગૃહના જેવા આકારવાળા હોય છે, કેટલાક વૃક્ષેા છત્રના नेवा भाडारवाजा होय छे, आ प्रमाणे भाग पशु सम सेवु लेहये. “अत्थपणे इत्थ वहने बरभवणविसिट्ठसंठाणसंठिया दुमगणा सुहसीयलच्छाया पण्णत्ता समणाउलो " डे આયુષ્મન શ્રમણ્ ! તે ભરતક્ષેત્રમાં એ કત વૃક્ષાથી ભિન્ન ખીજા ઘણા વૃક્ષે એવા પણ છે કે શ્રેષ્ઠગૃહના જેવા આકાર હોય છે, તેવા આકારવાળા હાય છે, હું આયુષ્મન્ શ્રમણ ! એ સ ક્રમગણેા શુભ-શીતળ છાયાવાળા છે, એવુ તીર્થંકરાએ તેમજ મેં કહ્યુ છે. અહીં चडेसां गृहारना उदयवृक्षोनुं वन अमीने इरीथा "वरभवन संस्थानग" त्यिाहि ३षमा ३३ Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे किं तस्मिन् काले गृहाणि सन्ति ! नवा सन्ति सन्ति चेत् कि तानि विद्यमान धान्यवत्तेषामुपभोगाय न भवन्ति ! इत्यादिप्रश्नोत्तरमाह -- मूलम्-अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे गेहाइ वा गेहावणाइ वा गोयमा ! णो इणढे समढे रुक्खगेहालया गं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो! । अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे गामाइ वा जाव सण्णिवेसाइ वो गोयमा! णो इणढे समढे जहिच्छिय कामगामिणो णं ते मणुया । अत्थि णं भंते असीइ वा मसीइ वा किसीइ वा वणिएत्ति वा पणिएत्ति वा वाणिज्जेइ वा णो इण8 समठे ववगयअसिमसिकिसिवणिय पणियवाणिज्जा णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो अत्थि णं भंते हिरण्णेइ वा सुवण्णेइ वा कंसेइ वा दसेइ वा मणिमोत्तियसंख सिलप्पवालरत्तस्यणसावज्जेइ वा हंता अस्थि णो चेव णं तेसिं मणुयाणं परिभोगत्ताए हव्वमागच्छइ ॥सू०२७॥ छाया-सन्ति खलु भदन्त! तस्यां समायां भरते वर्षे गेहानि बा गेहापणानि वा। नायमर्थः समर्थः, वृक्षगेहालयाः खलु ते मनुजाः प्राप्ताः श्रमणायुष्मन् । सन्ति खलु भवन्त तस्यां समायां भरते वर्षे ग्रामा इति वा यावत् सन्निवेशा इति वा ? गौतम ! नायमर्थः समर्थः यथेप्सितकामगामिनः खलु ते मनुजाः प्रज्ञप्ताः, अस्ति खलु भदन्त असिरिति वा मषिरिति वा कृषिरिति वा वणिगिति वा पणितमिति वा वाणिमिति वा ? नायमथः समर्थः, व्यपगतासिमसि कृषि वणिक्पणितवाणिज्याः खलु ते मनुजाः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् । अस्ति खलु भदन्त । हिरण्यमिति वा सुवर्णमिति वा कांस्यमिति वा दृष्यमिति वा मणिमौक्रिक शङ्खशिलाप्रवाल रक्त रत्नस्वापतेयमिति वा ? हन्त ! अस्ति 'नो चैव खलु तेषां परिभोग्यतया हव्यम् आगच्छति ॥सू० २७ । ण्यशालो मनुष्य रहते हैं इस वात को सूचित करने के लिये किया गया है. इसलिये पुनरुक्ति की आशंका नहीं करना चाहिये । २६ ॥ ___ क्या उस काल में गृह होते हैं ? या नहीं होते है ! यदि होते है तो क्या वे उनके उपभोग के काम में नहीं आते है ? इत्यादि प्रश्नों का उत्तर देते हुवे सूत्रकार कहते हैं વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે તે એ મનહર આવાસમાં તે પરમ પુણ્યશાલી મનુષ્ય રહે છે, એ વાતને સૂચિત કરવા માટે કહેવામાં આવ્યું છે. માટે આ સંબંધમાં પુનરુકિત કરવામાં मावी छ, मेवी मा।। ४२वी नही ॥२६॥ શું તે કાળમાં ગૃડો હોય છે ? કે નહિ ? જે હોય છે તો શું તેમના ઉપભેગના કામમાં આવતા નથી ? વગેરે પ્રશ્નોના જવાબો ઃ Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सु. २७ तस्मिन्कालेगृहादिकानि सन्तिनवेतिप्रश्नोत्तराणि २५९ टीका- 'अस्थि भंते ! इत्यादि । गौतमस्वामी पृच्छति - 'अस्थिणं भते ! 'ती से समाए भरहे वासे' हे भदन्त ! तस्यां - सुषमसुषमायां समायां भरते वर्षे सन्ति 'गेear' गेहानि - गृहाणि वा; 'गेहावणाइ वा' गेहापणाः गृहयुक्ता आपणा ः हट्टावेति ? भगवानाह - 'गोयमा' णो इणट्ठे समट्ठे' हे गौतम ! नायमर्थः समर्थः, यतो 'समणाउसो ! हे आयुष्मन् ! श्रमण ! तदानीन्तनाः 'ते मणुया रुक्खगेहालया' ते मनुजा वृक्षगेहालयाःप्रासादाकार कल्पवृक्षरूपगृहेषु निक्सनशीलाः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः । गौतमस्वामी पुनः पृच्छति 'अस्थि भंते ! तीसे समाए भरहे वासे' हे भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे 'गामाइवा' ग्रामाः - अष्टा-दशकरसहिता वृत्तिवेष्टिताः, 'जाव' यावत् - यावदिति पदेन - आकाश- इति वा, नगराणीति वा, खेटानीति वा, कर्बटानीति वा मडम्बानीति वा, द्रोणमुखानीति वा, पत्तनानीति वा, निगमा इतिवा, आश्रमा इतिवा, संवाहा इति वा, इति संग्रहः । तत्र-आकराः = सुवर्ण रत्नाद्युत्पत्तिस्थानानि नगराणि - अष्टादशकरवर्जितानि, खेटानि= धूलिप्राकारपरिवेष्टितानि, कर्बटानि = क्षुल्लक प्राकारपरिवेष्टितानि, अभितः पर्वतावृत्तानिवा, मडम्बानि= सार्द्धक्रोशद्वयान्तर्ग्रामान्तररहितानि द्रोणमुखानि - जलस्थलपथोपेता जननिवासाः, पत्तनानि = समस्तवस्तु प्राप्तिस्थानानि तानि द्विविधानि जलपत्तनानि च स्थलपत्तनानि च । तत्र यत्र नौभिर्गम्यते तानि स्थलपत्तनानि । अथवा यानि केवलं शकटादिभि चभिर्वा गम्यन्ते तानि पत्तनानि यानि केवलं नोभिरेव गम्यन्ते तानि पट्टनानि । तदुक्तम् “अस्थि णं भते ? तीसे समाए भर हे वासे गेहाइ वा गेहावणाइ वा ? ' इत्यादि "टीकार्थ - अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे गेहाइ वा गे हावणाइ वा " हे भदन्त ! उस सुषम सुषमा काल में भरत क्षेत्र में घर होते हैं क्या ? गृहयुक्त आपण दुकानें होते है क्या ? अथवा बाजार होते हैं क्या ? इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु कहते हैं - " गोयमा ! णो इट्ठे समट्ठे" हे गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है क्यों कि "रुक्खगेहलया णं ते मणुया पण्णत्ता' हे श्रवण आयुष्मन् ! वृक्षरूप गृह हो जिनका आश्रय स्थान है ऐसे वे मनुष्य कहे गये हैं "अस्थि णं भंते ! तोसे समाए भरहे वासे गामाइ वा जाव सष्णिवेसाइ वा " हे भदन्त ! उस सुषम सुपमा आरक में भरत क्षेत्र में ग्राम यावत् सन्निवेश होते हैं क्या ? उत्तर में प्रभु कहते 'अस्थि भंते ! तीसे समाए भरहे वासे गेद्दाह वा गेहावणार वा ?" इत्यादि सूत्रो॥२७॥ ટીકા-હે ભદન્ત ! તે સુષમ સુષમા કાળમાં ભરતક્ષેત્રમાં ઘરેા હેાય છે. ? ગૃહ યુક્ત આપણ हुमनी - होय ? मरो होय हे भा प्रश्नना उत्तरमा प्रभु छे. 'गोयमा णो इण्ठे समट्ठे' हे गौतम या अर्थ समर्थ' नथी प्रेम ' रुक्खगेहालया णं ते मण्या पण्णता' श्रमण आयुष्मन् वृक्ष ३५ गृह मनुं माश्रय स्थान छे. सेवा ते मनुष्य 'अत्थिर्ण मंते तीसे समाप भरहे वाले गामाई बा जाव सण्णिवेसाइवा' है लहन्त ते सुषभ सुषमा आरम्भां भरतक्षेत्रमां आम यावत् सन्निवेश होय छे ? उत्तरमा प्रभु हे छे. 'गोयमा Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे फ्तनं शकटैगम्यं, घोटकैनौंभिरेव च । नौभिरेव तु यद् गम्यं,पट्टनं तत्प्रचक्षते ॥१॥इति । निगमा: प्रभूततरवणिग्जननिवासाः, आश्रमा:=पूर्व तापसैरावासिताः पश्चादपरेऽपि लो. का यत्रागत्य वसन्ति तादृशा जननिवासाः, संवाहा:-कृषीवलैर्धान्यरक्षार्थ निर्मितानि दुर्ग भूमिस्थानानि, पर्वतशिखरस्थितजननिवासा वा तथा 'सण्णिवेसाइवा' सन्निवेशाः समागतसार्थवाहादि निवासस्थानानि वा ! भगवानाह-'गोयमा ! णो इणठे समठे' हे गौतम ! नायमर्थः, 'जहिच्छियकामगामिणो णं ते मणुया' यतस्ते मनुजा यथेप्सितकामगामिन:यथेप्सितम्-इच्छामनतिक्रम्य कामम्-अत्यर्थम् गच्छन्तीति एवंशीला:-यथाभिलषितस्थानेषु गमनशोला इत्यर्थः, एतादृशाः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ता इति । अयं भावः-तस्मिन् काले ग्रामनगरापिच भावेन ते यथेच्छ स्थलगामिनः आसन् इति । पुनौतमस्वामी पृच्छति -भते ! हे भदन्त ! तस्यां पूर्वोक्तायां सुषमसुषमाख्यायां समायां भरते वर्षे जीवनोपायलाधनभूतः 'असीइ वा' असिः खड्ग इति वा शस्त्रकले त्यर्थः, 'मसीइ वा' मषिःलेखनकलेत्यर्थः 'किसीइ वा' कृषिः-कृषिकलेत्यर्थः 'वणिएति वा' वणिक-बणिकलेत्यर्थः 'पणिएत्ति वा' पणितं-क्रयविक्रयकलेत्यर्थः 'वाणिज्जेइ वा वाणिज्य ब्यापारकलेत्यर्थः 'अत्थि' अस्ति! अयं भावः जीवनोपायत्वेन प्रसिद्धा असिमष्यादि कलाः किं तदानीन्तन जनानां जीवनोपायभूता आसन् !इति। भगवानाह-हे गौतम! ‘णो इणढे समटे' नायमर्थः समर्थः, यतो 'समणाउसो ! हे, आयुष्मन् ! श्रमण ! 'ते मणुया' ते मनुजा 'ववगयअसि मसि किसिवणियपणिय वाणिज्जा' व्यपगतासिमषिकृषि वणिपणित वाणिज्याः कल्पवृक्षतो जीवनोपायभूत सकल वस्तु प्राप्त्या असिमस्यादि ब्यापाररहिताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञ'-गोयमा'! णो इणद्वे सम?" हे गौतम ? यह अर्थ समर्थ नहीं है क्योंकि "जहि-च्छिय कामगामिणो णं ते मणुया पण्णत्ता" वे मनुष्य यथाभिलषित स्थानों पर जाने के स्वभाव वाले होते है "अस्थि ण भत्ते ! असोइ वा मसीइ वा किसीइ वा वणिएत्ति वा पणिएत्ति वा वाणिज्जेइ वा" हे भदन्त ! उस काल में असि, मषो, कृषी वणिक कला, क्रयविक्रयकला और व्यापार कला ये सब जीवनोपाय भूत कलाएँ होती हैं क्या ? उत्तर में प्रभु कहते हैं "णो इणटे समट्रे" हे गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं हैं, क्योंकि "ववगयअसि मसि किसी वणिय पणियवाणीज्जा णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो" हे श्रमण आयुष्मन् ! वे मनुष्य असि, मषो, कृषी वणिक्कला आदि से रहित हुए जो इकटठे समठे' हे गौतम! सामथ समय नया मा 'जहिच्छियकामगामिणो ण ते मणुआ पेण्णत्ता' भनुष्य। यथालितषित स्थान। ५२ अप२०१२ २नार डाय छे. तमन। मा तना स्वभावशाय छे, “अत्थि ण भते! असीइ वा मसीहे वा किसोइ वा वणिएत्ति वा पाणिपत्ति वा वाणिज्जेइ वा महन्त ते मा मसि, भषा, कृषी, पारी કકલા કયવિક્રયકલા અને વ્યાપારકલા એ સર્વે જીવને પાયભૂત કલાઓ હોય છે. ? ઉત્તર मां प्रभु ४ छे. 'णो इणटूठे समठे 8 गौतम ये अथ समर्थ नथी भने 'वयगय असि मसि किसि वणिय पणिय वाणिज्जा णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो' श्रम भायु Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सू. २७तस्मिन्कालेगृहादिकानिसन्तिनवेतिप्रश्नोत्तराणि २६१ ताः पुनगौं तमस्वामी पृच्छति-अत्थि णं भंते !' हे भदन्त ! किमस्ति तस्यां समायां भरते वर्षे 'हिरण्णेइवा' हिरण्यमिति वा; तत्र हिरण्यं-रूप्यम् अघटित सुवर्णमिति वा सुवण्णेइवा' सुवर्ण-घटितं सुवर्णमिति वा, कंसेइ वा' कांस्यम्-ताम्रपुसंयोगजनितो धातुविशेषः इतिवा, 'सेइवा' दृष्यं वस्त्रमिति वा, 'मणिमोत्तियसंख सिलप्पवालरत्तरयण सावज्जेइ वा' मणिमौक्तिकशंखशिलामवालरक्तरत्नस्वापतेयमिति बा, तत्र-मणिः वैडूर्यादिः, मौक्तिक-मुक्ताफलं, शंख-दक्षिणावर्तादिः प्रशस्तः शंखशिला स्फटिकादिरूपा, प्रवालंविद्रमः रक्त रत्नानि पद्मरागादीनि, स्वापतेयं रजतसुवर्णादिकं द्रव्यम् एतेषां समाहारे तथेति । तस्मिन् काले हिरण्य सुवर्णादीनि द्रब्याण्यासन् न वेति गौतम स्वामिनः प्रश्नाशयः । भगवानाइ हता ! अत्थि' हन्त ! गौतम ? अस्ति हिरण्यादिकं तस्मिन् काले । परन्तु तत् 'तेर्सि मणुयाण परिभोगत्ताए' तेषां मनुजानां परिभोग्यतया उपभोग्यत्वेन 'णो चेवणं' नो चैव खलु 'हव्वमागच्छइ' हव्यं कदाचिदपि आगच्छति-याति इति । कहे गये हैं "अस्थि णं भते ! हिरण्णेइ वा सुवण्णेइ वा कंसेइ वा दूसेइ वा मणिमोत्तिय संख सि लप्पवाल रत्तरयण सावज्जेइ वा" हे भदन्त ! उसकाल में क्या भरत क्षेत्र में हिरण्य चाँदी अथवा अघटित सुवर्ण होता है क्या ? सुवर्ण होता है क्या ? कांसा होता है क्या ? दूष्य वस्त्र होते हैं क्या ? मणि, मौक्तिक, शंख, शोला, प्रवाल रक्त रत्न और स्वापतेय ये सब होते हैं क्या? उत्तर में प्रभु कहते है "हंता अस्थि णो चेव ण तेसिं मणुयाणं परिभोगत्ताए हव्वमागच्छइ" हाँ गौतम उस काल में ये सब होते हैं पर ये उन पुरुषों के परिभोग के काम में नही आते हैं । १८ प्र कार के कर-टेक्सों से जो सहित होते हैं तथा वाड से जो घिरे रहते है उनका नाम ग्राम है यहां यावत्पद से आकर आदि स्थानों का ग्रहण हुआ है इन में सुवर्ण, रत्न आदि उत्पन्न करने वाली खाने जहां पर होती है ऐसे स्थान का नाम आकर है । और १८ प्रकार के टेक्स जिनमें नही लगते है ऐसे स्थानों का नाम नगर है । धुलि के बने हुए कोट से जो परिवेष्टित होते हैं उन स्थानों का नाम खेट है । छोटे प्राकार से जो परिवेष्टित रहते है उन स्थानों का नाम कर्बट है भन् त मनुष्य। मसि, भषी, कृषी, पgan वगैरेथी हित हाय छे. 'अस्थि मते हिरण्णेइ वा सुवण्णेइ वा कसेइ वा दूसेड वा मणिमोत्तिय संखसिलाप्पवालरत्तरयण साव पजेहवा' महन्त ते मा भरतक्षेत्रमा २९य यही मथवा मधाटत सुवणाय छे, સુવર્ણ હોય છે ? કાંસું હેય છે. દુષ્ય-વસ્ત્ર હોય છે. મણિ મૌકિતક, શંખ, શિલા પ્રવાલ २४ २ल भने स्वापतेय थे साय छ, उत्तरमा प्रभु ४९ छे. "हंता-अस्थि णो चेव ण तेसि मणुयाण परिभोगत्ताए हव्वमागच्छई" i, गोतम मां स य छ. ५५ એ તે મનુષ્યના ઉપભોગમાં આવતા નથી. ૧૮ પ્રકારના ટેકસ (કેરે) સહિત જે હોય છે. તેમજ વાડથી જે આવૃત રહે છે. તેનું નામ ગ્રામ છે. અહીં યાત્મદથી આકર વગેરે સ્થાન ગ્રહણ કરવામાં આવ્યું છે. આમાં સુર્વણ રત્ન વગેરે ઉત્પન કરનારી ખાણે જ્યાં હોય છે. એવા સ્થાનનું નામ આકર છે, અને ૧૮ પ્રકારના ટેકસ જે સ્થાનમાં નાખવામાં આવતા નથી, તેવા સ્થાનેનું નામ નગર છે. માટીની દીવાલથી ને પરિવેષ્ટિત હોય છે, તે Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अत्राय प्रश्न:-अस्ति अघटितसुवर्णस्य सुवर्णखानौ, रूप्यस्य च रूप्यखानौ संभावना, प. रन्तु घटितसुवर्णस्य ताम्रत्रपुसंयोगजनितस्य कांस्यस्य तत्तसन्तानसंभवस्य वस्त्रस्य च तदानी तादृश विज्ञानाभावान्नास्ति संभावना । यद्यत्रैव मुच्येत-अतीतोत्सर्पिणी सम्बन्धीनि तान्यत्र भरते वर्षे निधानगतानि सम्भवन्तीति तदपि न वाच्यं, सादि सपर्यवसित प्रयोगबन्धस्य असंख्येयकालपर्यन्तमवस्थानासंभवात्, तर्हि कथं तानि तत्कालस्थायिअथवा जिनके चारों ओर पर्वत रहते हैं ऐसे स्थानों का नाम भी कर्बट है जिनके आस पास २॥-२॥ कोश तक दुसरे ग्राम नही होते हैं वे मडम्ब कहे गये है। जिन स्थानों में जल मार्ग से और स्थल मार्ग से दोनों मार्ग से पहुँचा जाता है ऐसे जन निवास स्थान का नाम द्रोणमुख है जिनमें जीवनोपयोगी समस्त वस्तुएँ मिल जाति हैं उन स्थानों का नाम पत्तन है । ये पत्तन जल पत्तन और स्थल पत्तन के भेद से दो प्रकार के होते हैं जहां पर नौकाओं द्वारा पहुंचा जाता है वे जलपत्तन हैं और जहां केवल गाड़ी आदिके द्वारा पहुंचा जाता है वे स्थल पत्तन हैं अथवा जहां पर केवल शकट आदि या नौका द्वारा पहुंचा जाता है ऐसे स्थान का नाम तो पत्तन है और जहां पर केवल नौका के ही द्वारा पहुंचा जाता है उस स्थान का नाम पट्टन है। पत्तनं शटैगम्यं धोटकै नैीभिरेव च । ___ नौभिरेव तु यद् गम्यं पट्टनं तत्प्रचक्षते ॥१॥ जहां पर बहुत अनेक वणिग्जन रहते हैं ऐसे स्थान का नाम निगम है. पूर्व जिस स्थान में तपस्विजन तापसीजन रहे हों और बाद में जहां पर लोक आकर के ठहरने लगे हों ऐसे स्थान का नाम आश्रम है किसानों द्वारा धान्य को रक्षा के लिये निर्मित जो दुर्गन्मिस्थान हैं अथवा पर्वत के ऊपर जो जन निवास स्थान हैं उनका नाम संवाह है जहां पर सार्थवाह आदि आकर के ठहरते हैं या निवास करने लगते हैं ऐसे स्थान का नाम सन्निवेश है। तलवार चला कर जो आजीविका की जाती है उस कला का नाम असि है. यह उपलक्षण है इससे और भी अन्य शस्त्रों સ્થાનનું નામ બેટ છે. લઘુ પ્રાકારથી જે પરિવેષ્ટિત રહે છે. તે સ્થાનનું નામ કMટ છે અથવા જેમની ચોમેર પર્વત ઢોય છે, એવા સ્થાનેનું નામ કબ ટ છે. જેમની આસ પાસ સા, Iઉ સુધી ગ્રામો હોતા નથી, તેને મડબ કહેવામાં આવે છે. જે સ્થાનોમાં જલમાર્ગ અને સ્થળમાર્ગ આમ બંને રીતે પહોંચી શકાય એવા જનનિવાસ સ્થાનનું નામ દ્રોણમુખ છે. જેસ્થાનોમાં જીવનપગી સર્વ વસ્તુઓ મળી આવે છે. તે સ્થાનેનું નામ પત્તન છે, એ પત્તને જલ પત્તન અને સ્થલ પત્તન આમ બે પ્રકારના હોય છે. જ્યાં હાડીઓ વડે જઈ શકાય તે જલ પત્તન અને જયાં ફકત ગાડી વગેરે વડે જઈ શકાય તે સ્થલપત્તન છે. અથવા જયાં ફકત શકટુ વગેરે કે હોડીઓ વડે જઈ શકાય છે, એવાં સ્થાનનું નામ પત્તન છે, અને જ્યાં ફકત નૌકા વડે જ જઈ શકાય તે સ્થાનનું નામ પડ્ડન છે. તદુકતમ पसनं शकटैगम्य घोटकै नाभिरेव च । नौभिरेव तु यद् गम्यं पट्टने तत्प्रचक्षते ॥९॥ જયાં ઘણું વણિક લાકે રહે છે તે રથોનનું નામ નિગમ છે, પહેલાં જે સ્થાનમાં તપ સ્વિ જન-તપસ્વી એ રહે છે. અને પછી જ્યાં લેકે આવી ને રહેવા લાગે છે. તે સ્થા Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्वि०वक्षस्कार सू. २५ तस्मिन्कालेगृहादिकानिसन्तिनवेति प्रश्नोत्तराणि २६३ નજાનિ ! કુતિ, ગત્રાદ-સાથ ક્ષેત્રા 11 તેવાં સંદરામન gષમgy___ माकालेऽपि भरते वर्षे तत्सत्ता संभाव्यत एवेति नात्र संशयाऽवकाश इति ॥सू०२७॥ के द्वारा जो आजीविका की जाती है वह भी असिकला या शस्त्रकला है लेखन कला का नाम मषि है, कृषि कला का नाम कृषि है, वणिग् कला का नाम वणिक् है खरीदने बेंचने की कला का नाम पणित है, व्यापार कलाका नाम वाणिज्य है, घटित सुवर्ण का नाम सुवर्ण है, मात्र सोने का नाम हिरण्य है । चांदी का नाम भी हिरण्य है। वैडूर्य आदि का नाम मणि है, मुक्ता फल का नाम मौक्तिक है, दक्षिणावर्तादि वाला जो प्रशस्त शङ्ख है वही यहां शङ्ख शब्द से लिया गया है, स्फटिक आदि रूप जो ठोस पदार्थ है वह शिला शब्द से लिया गया है मूंगे का नाम प्रवाल है ? पद्मरागादि रक्तरत्न से कहे गये हैं और रजत सुवर्ण आदिक द्रव्य स्वापतेय शब्द से लिये गये हैं। यहां पर ऐसी शंका हो सकती है कि अघटित सुवर्ण की सत्ता सुवर्ण खानि में तथा रूप्य चांदी की सत्ता चांदी की खान में हो सकती है. परन्तु घटित सुवर्ण की ताम्र और त्रपु के संयोग से जनित कांसेकी और तन्तु संयोग से जनित वस्त्र को उसकाल में ऐसे विज्ञान के अभाव से संभावना कैसे हो सकती हैं? अर्थात् नहीं हो सकती है, यदि यहां ऐसा कहा जावे कि अतीत उत्सर्पिणी काल सम्बन्धीं वे वस्तुएँ इस समय के भरतक्षेत्र में निधानगत हुई प्राप्त हो सकती हैं, सो ऐसा भी नहीं है क्योंकि सादि सपर्यवसित प्रयोगबन्ध असंख्यात નનું નામઆશ્રમ છે. ખેડુતો વડે નિર્મિત ધાન્યની રક્ષા માટે જે દુર્ગભૂમિ સ્થાન છે અથવા પર્વતની ઉપર જે જનનિવાસ સ્થાન છે, તેનું નામ સંવાહ છે. જ્યાં સાર્થવાહ વગેરે આવી ને રોકાય છે. અથવા નિવાસ કરે છે તે સ્થાનનું નામ સન્નિવેશ છે. તલવારની શક્તિના જે આજીવિકા મેળવવામાં આવે છે, તે કલાનું નામ અસિ છે. આ ઉપલક્ષણ છે. એનાથી બીજા શસ્ત્રોની તાકાત થી જે આજીવિકા મેળવવામાં આવે છે તે પણ અસિકલાશત્રકલા છે. લેખન કલાનું નામ મષિ છેકૃષિકલાનું નામ કૃષિ છે. વણિક કલાનું નામ વણિક છે. કય વિક્રય કરવાની કલાનું નામ પણિત છે. વ્યાપાર કલાનું નામ વાણિજય છે ઘટિત સુવર્ણનું નામ સુવર્ણ છે, ફકત સુવર્ણનું નામ હિરણ્ય છે. ચાંદીનું નામ પણ હિર શ્ય છે. વૈડૂર્ય વગેરેનું નામ મણિ છે. મુક્તાફળનું નામ મૌતિક છે. દક્ષિણાવર્તાદિ આકાર વાળા જે પ્રસ્ત શંખે છે તે અહીં શંખ શબ્દ વડે ગ્રહણ કરવામાં આવ્યા છે. ફિટિક વગેરે રૂપે જે નકકર પદાર્થો છે તે શિલા શબ્દોથી ગ્રહણ કરવામાં આવ્યા છે. મૂંગાનું નામ પ્રવાલ છે. પદ્મરાગાદિક રક્તરત્નને રત્નો કહેવામાં આવ્યા છે. તેમજ રજત સુવર્ણ વગરે દ્રવ્ય સ્થાપતેય શબ્દ વડે ગ્રહણ કરવામાં આવ્યા છે. અહીં એવી શંકા થઈ શકે કે અઘટિત સુવર્ણની સત્તા સુવર્ણની ખાણ માં તેમજ રૂ-ચાંદીની સત્તા ચાંદીની ખાણ માં જ હો ય છે પણ ઘટિતસુવર્ણની તામ્ર અને ત્રપુના સંગથી જનિત કાંસ્યની અને તંતુ સંગ થી જનિત વસ્ત્રની તે કાળમાં આધુનિક યુગ જેવા વૈજ્ઞાનિક આવિષ્કારોના અભાવે સંભા વના કેવી રીતે થઈ શકે ? એટલે કે થઈ શકે નહિ. જે અહીં આ પ્રમાણે કહેવામાં આવે કે અતીત ઉત્સર્પિણી કાળ સંબંધી તે વસ્તુઓ આ સમયના ભરત ક્ષેત્રમાં નિધાન ગત થયેલી પ્રાપ્ત થઈ શકે છે, તો આ વાત પણ ચગ્ય નથી. કેમકે સાદિ સપર્યવસિત પ્રગ Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मूलम् - अस्थि णं भंते! तीसे समाए भरहे वासे रायाइ वा, जुवरायाइवा, ईसरतलवर माडंबिय इन्भसेट्ठि सेणावइ सत्थवाहाइ वा ?, गोयमा ! णो इट्ठे समट्ठे, ववगय इड्डिसकारा णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो ! अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे दासेइ वा, पेसेइ वा सिस्सेइ वा, भयगेइ वा भाइलाइ वा, कम्मयरएइ वा ? णो इणट्टे समट्ठे, ववगय अभिओगाणं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो ! अत्थि णं भंते! तीसे समाए भर वासे ! मायाइ वा पियाइ वा भायाइ वा भगिणीइ वा भज्जाइ वा पुत्तेइ वा धूयाइ वा सुहोइ वा ? हंता ! अत्थि, णो चेव णं तेसिं मणुया तिव्वे पेमबंधणे समुपज्जइ । अस्थि णं भंते ! भरहे वासे अरीइ वा वेरिए वा धाइएइ वा वहुएइ वा पडिणीएइ वा पच्चामितेइ वाः? गोयमा ! णो इणट्ठे समट्ठे, ववगयवेराणुसया णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो ! अस्थि, णं भंते ! भरहे वासे मत्ताइ वा वयंसाइ वा णायएइ वा संघाडिएइ वा सहाइ वा सुहीइ वा संगत्ति वा ? हंता अस्थि. णोचेव णं तेसिं माणं तिव्वे रागबंधणे समुपज्जइ || सू० २८॥ २६४ वा. छाया- -अस्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे राजेति वा, युवराज इति ईश्वर तलवर माम्बिक कौटुम्बिकेभ्यश्रेष्ठि सेनापतिसार्थवाहा इति वा ? नो अयमर्थः समर्थः, व्ययगत ऋद्धि सत्काराः खलु ते मनुजाः प्रशप्ताः श्रमणायुष्मन् ! अस्ति खलु भदन्त तस्यां समायां भरते बर्षे दास इति वा प्रेष्य इति वा शिष्य इति वा भृतक इति वा भाजक इति वा कर्मकरक इति वा । नो अयमर्थः समर्थः, व्यपगताभियोगाः काल तक अवस्थित नहीं रह सकता है अतः उस सुषम सुषमा काल में भरतक्षेत्र में इनका जो आपने सद्भाव कहा है. सो कैसे कहा है? तो इसका उत्तर ऐसा है कि देव क्रीडा परायण होते हैं अतः वे क्षेत्रान्तर से उन वस्तुओं को संहरण करके सुषम सुषमा काल में भी भरतक्षेत्र में लाकर रख सकते हैं । इस तरह इनकी संभावना यहां हो सकती है इस विषय में संशय करने की कोई बात नहीं है || २७॥ બન્ધ અસ ંખ્યાત કાળ સુધી અવસ્થિત રહો શકે નહિ, માટે તે સુષમ સુષમા કાળમાં ભરત ક્ષેત્રમાં એમને જે આપશ્રીએ સદ્ભાવ કહ્યો છે, તે કયા આધારે કહ્યો છે ? તે મને જ વાબ આ પ્રમાણે છે કે તેવા ક્રીડા પરાયણુ હાય છે એથી તેએ ક્ષેત્રાન્તરથી એ વસ્તુઓનુ સ'હરણ કરીને સુષમ-સુષમા કાલમાં પણ ભરત ક્ષેત્ર માં લાવી મૂકી શકે છે, એથી એ સની અડી' સંભાવના થઈ શકે. છે. આ સંબંધનાં શયના માટે કાઈં સ્થાન નથી ૨૭ Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिक टोका द्वि. वक्षस्कार सू. सुषमसुषमाकाले राजादि विषयप्रश्नोत्तराणि २६५ खलु ते मनुजाः प्राप्ताः श्रमणायुष्नन् । अस्ति खलु भदन्त । तस्यां समायां भरते वर्षे माते ति वा पितेति वा नातेति वा भगिनीति वा भार्येति बर्बा पुत्र इति वा दुहितेति वा स्नुषे ति वा ? हन्त । अस्ति , नौ चैव खलु तेषां मनुजानां तीन प्रेमानुबन्धनं समुत्पद्यते । अस्ति खलु भदन्त । भरते वर्षे अरिरितिवा वैरिक इतिवा घातक इतिवा वधक इति वा प्रत्यनीक इति वा प्रत्यमित्रमिति वा ? गौतम ! नो अयमर्थः समर्थः, व्यपगतवैरानु. शयाः ख मनुजाः प्राप्ताः श्रमणायुष्मन् । अस्ति खल भदन्त भरते वर्षे मित्रमिति वा पयस्य इति वा शायक इति वा संघाटिक इति वा सखेति वा सुहृदिति वा संगत इति वा हन्त अस्ति, नो चैव खलु तेषां मनुजानां तीन रागबन्धनं समुत्पद्यते ॥सू०२८॥ टीका- 'अत्थिणं' इत्यादि। गौतम स्वामी पृच्छति-'अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे रायाइ वा जुवरायाइवा' हे भदन्त ! अस्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे राजा इति वा, युवराज इति वा, तत्र राजा-माण्डलिको नरपतिः, युवराजः-नृपत्वेनाभिषेक्ष्यमाणो राजपुत्रः । तथासन्ति,किं तस्यां समायां भरते वर्षे 'इसर तलवर माडंबिय इब्सेहि सेणावइ सत्यवाहाइवा ? ' ईश्वरतलबरमाडंम्बिककौटुम्बिकेभ्यश्रेष्ठिसेनापतिसार्थवाहा इति वा, तत्र इश्वरः ऐश्वर्यशाली , तलवरः = सन्तुष्टभूपालप्रदत्तपट्टबन्धपरिभूषितराजकल्पः , माडम्बिकः पञ्चशतग्रामाधिपतिः, 'माण्डविकः' इतिच्छाया पक्षे तु छिन्नभिन्नजनाश्रय विशेषो "अस्थि ण भंते! तीसे समाए भरहे वासे” इत्यादि । 'अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे रायाइ वा जुवरायाइ वा ईसरतलवर माबियइभ सेट्रिसेणावइसत्यवाहाइवा'' गौतमस्वामी ने यहां ऐसा पूछा है-हे भदन्त ! सुषम सुषमा आरक की मौजूदगी में भरतक्षेत्र में राजा, युवराज, ईश्वर, तलवर, माडम्बिक कौटुम्बिक श्रेष्ठी, सेनापति एवं सार्थवाह ये सब होते हैं क्या ? माण्डलिक राजा का नाम नरपति है । आगे जिस राजपुत्र का नृप के रूप में अभिषेक होने वाला होता है उसका नाम युवराज है, ऐश्वर्य शाली व्यक्ति का नाम ईश्वर है सन्तुष्ट हुए भूपाल के द्वारा प्रदत्त पट्टबन्ध से जो परिभू षित होता है ऐसे राजकल्प व्यक्ति का नाम तलवर है. जो पांच सौ ग्राम का अधिपति होता है उसका नाम माडंविक है "माण्डविक" इस छायापक्ष में जो छिन्न भिन्न जनाश्रय विशेष ___ 'अस्थिण भंते ! तीसे समाए भरहे वासे रायाइ वा जुवरायाइ वा ईसरतलबर मार्ड विय इब्भ सेहि सेणावइसत्थवाहाइवा ? इत्यादि स्त्र २८॥ ટીકાથ-ગૌતમ સ્વામીએ અહીં આ જાતનો પ્રશન કર્યો છે કે હે ભદન્ત! સુષમ સુષમા આરકના સમયમાં ભરતક્ષેત્રમાં રાજા, યુવરાજ, ઈશ્વર, તલવર માડંબિક કૌટુબિક શ્રેષ્ઠી, સેનાપતિ તેમજ સાર્થવાહે એ સ હોય છે ! માંડલિક નરેશ નું નામ નરપેતિ છે આગળ જે રાજપુત્રનું નૃપના રૂપમાં અભિષેક થનાર છે, તેનું નામ યુવરાજ છે. ઐશ્વર્ય શાલી વ્યતિનું નામ ઈશ્વર છે. સંતુષ્ટ થયેલ ભૂપાલ વડે પ્રદત્ત પટ્ટબંધથી જે પરિભૂષિત હોય છે તેવા રાજક૫ વ્યક્તિ નું નામ તલવાર છે. પાંચસો ગ્રામને જે અધિપતિ હોય છે. તેનું Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६६ जम्बूद्वोपप्रचप्तिसूत्रे मण्डवस्तत्राधिकृत इति. कौटुम्बिकः-कुटुम्बभरणे तत्परो बहुकुटुम्बप्रतिपालको वा, इभ्यः-इभो= हस्ती तत्प्रमाण द्रव्यमहतीति तथा, स जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदात् त्रिविधः तत्र हस्तिपरिमितमणिमुक्ताप्रवालसुवर्णरजतादि द्रव्यराशि स्वामी जधन्यः, हस्तिपरिमितवज्रहीरकमणिमाणिवयराशिस्वामिनो मध्यमाः, हस्तिपरिमित केवलवनस्वामी उत्कृष्टः इति । श्रेष्ठी - लक्ष्मीकाकटाक्षपत्यक्षलक्ष्यमाणद्रविणलक्षलक्षणविलक्षण हिरण्यपट्टसमल कृतमूर्धा नगरप्रधानव्यवहर्ता, सेनापतिः-चतुरङ्गसेनानायकः, सार्थवाहः गणिमधरि ममेयपरिच्छेद्यरूपक्रयविक्रयवस्तुजातमादाय लाभेच्छया देशान्तराणि व्रजतां सार्थ वाहयति-योगक्षेमाभ्या परिपालतीति, मूलधनं दत्वा तान् समद्धयतीति वा तथा, तत्र-ग णिमम् =एक द्वि त्रि चतुरादि संख्याक्रमेण गणयित्वा यद् दोयते तत्, यथा-नालिकेर में अधिकृत होता है उसका नाम माण्डविक है जो कुटुम्ब के भरण पोषण करने में तत्पर रहता है अथवा अनेक कुटुम्बों का जो प्रतिपालक होता है उसका नाम कौटुम्बक है जिसके पास हाथ का वजन बराबर द्रव्य होता है वह इभ्य है यह इभ्य उत्तम, मध्यम, और जघन्य के भेद से तीन प्रकार का कहा गया है इनमें जो हाथी के प्रमाण परिमित हुए मणि ,मुक्ता, प्रवाल, सुवर्ण एवं रजत आदि द्रव्यों का स्वामी होता है वह जघन्य स्वामी है, हाथी परिमित वज्र का ही जों स्वामी होता है वह उत्कृष्ट इभ्य है जो लक्ष्मी की कृपा के कृपाकटाक्ष से युक्त है एवं जिसका मस्तक लक्ष्मी की कृपा के द्योतक हिरण्यपट्ट से अलंकृत रहता है ऐसा नगर का जो प्रधान व्यबहर्ता पुरुष होता है उसका नाम श्रेष्ठी है चतुरङ्ग सेना का जो नायक होता है उसका नाम सेनापति हैं, गणिम, धरिम, मेय और परिच्छे यरू क्रय विक्रय के योग्य वस्तुओं को लेकर लाभ की इच्छा से देशान्तर में जाते हुए पुरुष के सार्थ-संध को जो योग क्षेम द्वारा पालता है उसका नाम सार्थवाह है अथवा मूलधन देकर जो उन्हें अपनी ऋद्धि के बराबर ऋद्धिवाला बनाता है वह सार्थवाह है नाम मामिछे “माण्डविक" मा छ।4। पक्षमा छिन्न भिन्न नाश्रय विशेषमा अधिકત હોય છે. તેનું નામ માંડવિક છે જે કુટુંબના ભરણુ પિષણ કરવામાં તત્પર હોય છે. અથવા તેમના કુટુંબને પ્રતિપાલક હોય છે, તેનું નામ કૌટુંબિક કહેવાય છે. જેની પાસે હાથીના વજન જેટલું દ્રવ્ય હોય છે તે ઈભ્ય છે. એ ઇન્ચે ઉત્તમ, મધ્યમ અને ૪ ઘન્ય આમ ત્રણ પ્રકારના કહેવામાં આવ્યા છે. એમાં જે હસ્તિ પ્રમાણપરિમિત મણિ. સુકતા, પ્રવાલ, સુવર્ણ તેમજ રજત વગેરે દ્રવ્યાનો સામી હોય છે, તે ને જઘન્ય ઈભ્ય કહેવામાં આવે છે. હસ્તિપરિમિત વજા નો જ જે સ્વામી હોય છે તે ઉત્કૃષ્ટ ઈભ્ય છે, જે લક્ષમીના કપા કટાક્ષથી જે યુક્ત છે તેમજ જેનું મસ્તક લક્ષમીની કૃપાથી દ્યોતક હિરણ્યપદથી અલંકૃત રહે છે, એવા નગરને જે પ્રધાન વ્યવહર્તા પુરૂષ હોય છે તેનું નામ શ્રેષ્ઠી છે. ચતુરંગ સેનાને જે નાયક હોય છે, તેનું નામ સેનાપતિ છે, ગણિમ, ધરિમ, મેય અને ઉછે ઘ૩૫ ક્રય-વિકય ગ્ય વસ્તુઓને લઈને લાભની ઈચ્છાથી દેશાન્તરમાં જતા પુરૂષો સાથે સંઘને જે વેગક્ષેમ વડે રક્ષણ આપે છે તેનું નામ સાર્થવાહ છે, અથવા મૂલધન આપી ને જે તેઓને પિતાની દ્ધિ જેટલી અદ્ધિવાળો બનાવે છે, તે સાર્થવાહ છે. જે વસ્તુ Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्विवक्षस्कार सू. २८ सुषमसुषमाकाले राजादिविषयकप्रश्नोत्तराणि २६७ पूगोफलकदलीफलादिकमिति, परिमंतुला सूत्रेणोत्तोल्य यद दीयते तत् यथा-ब्रीहि यव-लवणसितादि, मेयं = शरावलधुभाण्डादिनोत्तोल्य यद् दीयते तत् यथा-दुग्ध घृत. तेलप्रभृति, परिच्छेद्य च प्रत्यक्षतो निकपादिपरीक्षया यद् दीयते तत्, यथा मणि मुक्ताप्रवालाऽऽभरणादि । इश्वरादि सार्थवाहान्तपदानाम् इतरेतरयोग द्वन्द्व इति । भगवानाह'गोयमा ! णो इणढे समढे' गौतम ! नो अयमर्थः समर्थः, “समणाउसो !' हे आयुष्मन् ! श्रमण ! यतः 'तेग मणुया ववगयइइढिसकारा' ते खलु मनुना व्यपगतद्धि सत्काराः व्यपगतौ दुरीभूतौ ऋद्धिसत्कारौ-ऋद्धिः विभबैश्वर्यसत्कारः सेव्यतालक्षणश्च येभ्य स्ते तथा. 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः कथिता इति । पुनगाँतमस्वामी पृच्छति – 'अस्थि ण भंते ! तीसे समाए भरहे वासे दासेइ वा' हे भदन्त ! अस्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे दा स इति वा दासः प्रसिद्धः 'पेसेइ वा' प्रेष्य इति वा ? प्रेष्यः प्रेषणा) दृतादिः, 'सिसेइवा' शिष्य इति वा ? शिप्यः प्रसिद्धः' 'भयगेइ वा' भृतक इति वा, भृतकः वेतनेन नियतकालं यावत् कर्मसम्पादकः 'भाइल्लएइ वा' भाजक इति वा ? भाजको धनांशगृहीता जो वस्तु एक, दो, तीन आदि संख्या से गिन कर दो जाती है जैसे नारियल आदि ऐसी ये वस्तु एं गणिम में ली गई है, जो वस्तु तराजू से तोलकर दी जाती है जैसे ब्राहि, जौ, गेह आदि ऐसो ये वस्तुएं धरिम में ली गई हैं, जो वस्तु प्रमाणित वर्तन आदि से नापकर दो जाता है जैसे दूध, घृत, तैल आदि ऐसी ये वस्तुएँ मेय में लो गई है तथा जो चीज कसौटी आदि पर कसकर परीक्षा करके दी जाती है जैसे मणि, मुक्ता, प्रवाल सुवर्ण आदि ये सब वस्तुएँ परिच्छेद्य में ली गई हैं इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं “गोयमा ! णो इणद्वे समटे" हे गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है क्योंकि 'ववगयइट्रि सक्काराणं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो ' हे ' श्रमण आयुष्मन् ! वे मनुष्य विभव ऐश्वर्यरूप ऋद्धि और सेव्यतारूप सत्कार इनसे रहित होते हैं । 'अस्थि ण भंते ! तीसे समाए भरहे वासे दासेइ वा, पेसेइ वा. सिस्सेइ वा, भयगेइ वा, भाइल्लएइ वा कम्मयरएइ वा" हे भदन्त ! उस सुषम सुषमा काल के सद्भाव में इस भरत क्षेत्र में क्या कोई दास होता है ? क्या એક, બે, ત્રણ વગેરે સંખ્યા વડે ગણીને આપવામાં આવે છે, જેમ કે નારિયેલ વગેરે એવી તે વસ્તુઓને ગણિમ તરીકે ગણવામાં આવી છે જે વસ્તુ ત્રાજવાથી તોલીને આપવામાં આવે છે જેમકે ત્રીહિ, જવ' ઘઊ વગેરે-એવી એ વસ્તુઓને ધરિમ કહેવામાં આવે છે. જે વસ્તુઓ પ્રમાણિત પાત્ર વગેરેથી માપીને આપવામાં આવે છે, જેમકે દૂધ, ઘી, તેલ વગેરે એવી એ વસ્તુઓને મેય કહેવામાં આવે છે, તેમજ જે વસ્તુઓ ના કટી વગેરે ઉપર કસીને પરીક્ષા કરીને આપવામાં આવે છે, જેમકે મણિ, મુકતા, પ્રવાલ, સુવર્ણ વગર–એ સર્વ १स्तु। प२ि२छे ४३वाय छे. मनापामा प्रभु ४३ छ. "गोयमा णो इणढे समडे" 3 गौतम ! म। अथ समथ नथी. उभरे "ववगय इढिसक्कारा णं ते मणुया पण्णत्ता समणा उसो “3 श्रम मायुकभन् त मनुष्य। विस, मेश्य ३५ द्धि मन सेयता ३५ सरहारथी सतहोय छे. "अत्थि ण भंते !तीसे समाए भरहे वासे दासेई पेसेइ वा सिस्सेइ वा भयगेइ वा भाइल्लपइवा, कम्मयरएइ वा” महन्त ! सुषम सुषमान सहभा માં આ ભરત ક્ષેત્ર માં શું કઈ દાસ હોય છે ? પ્રેગ્ય–પ્રેષણઈ-દૂત વગરે હોય છે ? શિષ્ય Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे दायाद इति यावत्, 'कम्मयर एडवा' कर्मकरकइति वा ? कर्मकरकः = गृहसम्बन्धिसामान्य कार्यसम्पादक इति । गौतमस्वामिनः प्रश्न श्रुत्वा भगवानाह 'समणाउसो ! णो इण ठे समट्ठे' हे आयुष्मन् श्रमण ! नो अयमर्थः समर्थः, यतः 'ते मणुया ववगय अभिजोगा' ते मनुजा व्यपगताभियोगाः - व्यपगतः = दूरीभूतः अभियोगः कार्यं कर्त्तु परप्रेरणा येभ्यस्ते तथा भूताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः । तस्मिन् काले स्वस्वामिभावादि संवन्धाभा वान्न कस्यापि कंचित् प्रति प्रेरकत्वमस्तीति बोध्यमिति । गौतमस्वामी पुनः पृच्छति'अfor णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे मायाइवा पियाइवा भायाइ वा भगिणीइवा भजाइवा पुत्वा धूयाइवा सुण्डाइवा' हे भदन्त ! तस्यां खलु समायां भरते वर्षे अस्ति किं माता इति वा ! पिता इति वा ! भ्राता इति वा भगिनी इतिवा पुत्रः इति वा दुहिता इति वा स्नुषा पुत्रवधूः इति वा भगवानाह - 'हंता ! अस्थि' हन्त गौतम ! अस्ति किन्तु कोई प्रेष्य-प्रेषणाई दूत आदि होता है ? क्या कोई शिष्य होता है ? मृता-त्रेतन लेकर नियत काल तक काम करने वाला होता है ? क्या कोई दायाद धन का हिस्सेदार होता है ? क्या कोई गृहसंबंधी सामान्यकार्य करने वाला होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते है-" णो इणट्टे समट्टे" हे गौतम! यह अर्थ समर्थ नहीं है क्योंकि "ववगय आभियोगा णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो " हे श्रवण आयुष्मन् ? वे मनुष्य कार्य करने के लिये जिनसे परप्रेरणारूप अभियोग दूर हो गया है ऐसे होते हैं । अर्थात् उस काल में स्वस्वामिभाव आदि रूप संबंध का अभाव रहता है इस लिये कोई किसो प्रति प्रेरक नहीं होता है " अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे मायाइ वा पियाइ वा भायाइ वा, भागिणीइ वा, भजाइ वा पुत्तेइ वा, धूयाइ व', सुहाइ वा " हे भदन्त ? उस वर्तमान सुषम सुषमा काल में भरतक्षेत्र में माता होती है क्या ? पिता होता है क्या ? भ्राता होता है क्या ? बहिन होती है क्या ? पुत्र होता है क्या ? दुहिता-पुत्री होती है क्या ? पुत्र वधू होती है क्या ? अर्थात् उस काल में क्या भरतक्षेत्र में पिता पुत्र, पति पत्नी आदि संबंध होते है क्या ? इसके उत्तर में प्रभु करते हैं - "हंता, अस्थि णो चेव णं तेसिं माणं હોય છે ?ભૃતક– વેતન લઈને નિયતકાલ સુધી કામ કરનાર હાય છે ? શું કેાઈ દામાદ ધન નાહિસ્સેદાર-હાય છે ? શુ' કાઈ ગૃહ સબંધી સામાન્ય કાર્યો કરનાર ઢાય છે ? એના भवाणभां प्रभु कुडे छे - " णो इण्ट्ठे समट्टे” गौतम ! म अर्थ समर्थ नथी डेभरे "ववगय अभिओगाण ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो !” हे श्रम आयुष्मन् ! ते भनु ખ્યા કાય કરવા માટે જેમની ઉપરથી પરપ્રેરણા રૂપ અભિયાગ દૂર થઈ ગયા છે, એવા હોય છે. એટલે કે તે કાળમાંવસ્વામિભાવ વગરે રૂપ સંબધના અભાવ રહે છે. એથી अने २४ ३५ तु नथी. "अत्थिण भंते तीसे समाए भरहे वासे मायाइ वा पिया वा भाया वा भगिणीइ वा भज्जाइ वा पुत्तेइ वा धूयाइ वा सुहाइ वा " 6 लहन्त ! તે સુષમ સુષમા કાળમાં ભરત ક્ષેત્રમાં માતા હોય છે ? પિતા હોય છે ? ભાઈ હોય છે ? मडेन होय छे, पुत्र होय छे हुद्धिता-पुत्री - होय छे ? पुत्र वधू होय ? भेट डे ते अणमां. ભરત ક્ષેત્રમાં પિતા, પુત્ર પતિ, પત્ની વગેરે સબધેા હોય છે ? એના જવાબમાં પ્રભુ કહે Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्विवक्षस्कार स. २८ सुषमसुषमाकाले राजादिविषयक प्रश्नोत्तराणि २६९ मात्रादिकेषु प्रत्येकं च पुनः एतेषां परस्परं 'तिव्वे' तीव्र सातिशय,-'पेमबन्धणे' प्रेमवन्धनं स्नेहबन्धनं णो' नैव 'समुपज्जइ' समुत्पद्यते न संजायते पुन गौतम स्वामी पृच्छति'अस्थि णं भंते भरहे वासे अरीइ वा' हे भदन्त अस्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे अरिरिति वा अरिः सामान्य शत्रुः, 'वेरिएइवा' वैरिकः मूषकमार्जार बज्जातितः शत्रुः, 'घाइएइवा' घातक इति वा घातकः अन्यद्वारा घातकर्ता, 'बहएइवा' वधकः स्वयं हननकर्ता व्यथक इतिच्छाया पक्षे चपेटादिना व्यथोत्पादकः इति, 'पडिणीयएइवा' प्रत्यनीक इति वा प्रत्यनीकः कार्यविघातकर्ता, 'पच्चामित्तेइवा' प्रत्यमित्रमिति वा प्रत्यमित्रम् यः पू. र्व मित्रत्वमुपगतः पश्चादमित्रत्वमुपगच्छतीति सः, यद्वा-अमित्र सहायक इति ? भगवानाह-'गोयमा णो इणढे समठे' हे गौतम नो अयमर्थः समर्थः यतो 'समणाउसो' हे मायुष्मन् श्रमण' 'ते णं मणुया ववगयवेराणुसया' ते खलु मनु नाः व्यपगत वैरानुशया:व्यपगतो वैरानुशयः द्वेषानुवन्धो येभ्यस्ते तथाभूताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ता इति । तस्मिन् तिव्वे पेमबंधणे समुपज्जइ" हां गौतम ! यह सब वहां पर होता है परन्तु उन मनुष्य का उनमें तीव्र प्रेम बन्धन उत्पन्न नहीं होता है । “अस्थि णं भंते ! भरहे वासे अरोइ वा वेरिएइ वा घाइएइ वा, वहएइ वा, पांडणीयएइ वा, पच्चा मित्तेइ वा" अब गौतम प्रभु से ऐसा पूछते हैं -हे भदन्त ! उस काल में भरतक्षेत्र में क्या कोई किसी का शत्रु होता है ? मूषक-मार्जार की तरह क्या जाति से कोई किसी का वैरी होता है ? क्या कोई किसी का घातकर्ता-अन्य द्वारा वर करने वाला होता है ? क्या कोई स्वयं किसो की हत्या करने वाला होता है ? अथवा जब "वहाइ'' क' संस्कृत छाया व्यथक ऐसी होगी-तब चपेटा आदि द्वारा क्या कोई किसी को व्यथा उत्पन्न करने वाला होता है ? ऐसा इसका अर्थ होगा. क्या कोई किसी के कार्य का विधात करने के स्वभाव वाला होता है ? क्या कोई किसी का प्रत्यमित्र होता है ! अर्थात् पहिले मित्र बनाकर बाद में क्या कोई किसी का शत्रु होता है, इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "गोयमा! णो इणढे समटे" हे गौतम! यह अर्थ समर्थ नहीं है क्योंकि “ववगयवेराणुसया णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो" छ:- "हंता अस्थि णोचेवण तेसि मणुयाण तिव्वे पेमबन्धणे समुप्पज्जई" &ी, गौतम ! આ સર્વ સંબંધે તે કાળમાં હોય છે પણ તે માણસને તે સંબંધમાં તીવ્ર પ્રેમ ભાવ હોતો नथी. अत्थि णं भंते ! भरहे वासे अरिइ वा वेरिइवा धाइपइ वा वहएइ पडिणीपइ वा, पच्चामिह पा" वे गौतम प्रभुने माना न रे छ , महन्त ! ते भां, ભરત ક્ષેત્રમાં શું કર્યું કેઈનો શત્રુ હોય છે ? મૂષક-માજા ની જેમ શું કઈ પણ જાતનું જાતીય વેર હેાય છે ? કેાઈ ઘાતકતો બીજા વડે વધકરાવનાર હોય છે ? પિોતે छन त्या ४२नार डाय छ ? अथवा न्यारे 'वहईवा' शनी संस्कृत छाया व्यथ सेवा થશે ત્યારે થપ્પડ વગેરે વડે શુ કોઈ કોઈ ને વ્યથા આપનાર હોય છે ? એ એના અર્થ થશે કોઈ કેઈ ના કાર્યમાં વિધારવાના સ્વભાવવાળું હોય છે? શું કોઈ કોઈનો પ્રત્યમિત્ર હોય છે ? એટલે કે પહેલાં કેઈ કેઈ ને મિત્ર બનીને પછી તેને શત્રુ થઈ जय छ। नासपासमा प्रभु ४३छे 'णो इणटूठे समटूठे' गौतम ! म अर्थ समय Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २७० जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे काले वेरानुबन्धकारणाभावादरिप्रभृतयो नासन्नितिभावः । पुनीतमस्वामी पृच्छति-'अस्थि णं भंते ! भर हे वासे मित्तेइवा' हे भदन्त ! अस्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे मित्र मिति वा, मित्रं स्नेही 'वयंसाइवा' वयस्य इति वा, ! वयस्यः समानवयस्कोऽतिशयस्नेहवान् , 'णायएइ वा' ज्ञातक इतिवा ! ज्ञातकः स्वज्ञातीयः, यद्वा - एकत्र संवासादिना परिचितः 'संघाडिएइवा' संघाटिक इति वा !, संघाटिकः सहचरः, 'सहाइ वा सखा स मप्राणः "समप्राणः सखामतः" इत्यभिधानात् सहासनपानशीलः सातिशयस्नेहीत्यर्थः, 'सुहीइ चा' सुहदिति वा ! सुहृत् सकल कालमप्रतिकूलो हितोपदेशदायकश्चेति, 'संग एत्ति वा' साङ्गतिक इति वा ? साङ्गतिकः समानकार्यशीलत्वेनैकत्रसंगमनशील इति । भगवानाह- 'हंता अस्थि !' हन्त ! गौतम ! अस्ति मित्रादिषु प्रत्येकम् , च पुनः ‘णो' नैव ते सिं' तेषां परस्परं तिव्वे' तोत्रं सातिशय 'रागबन्धणे' गगबन्धनं प्रेमबन्धः 'समु पज्जइ' समुत्पद्यते । सू० २८॥ हे श्रमण आयुष्मन् ! वे मनुष्य वेसनुवन्ध से दूर रहे हुए होते हैं। इसका कारण यह है कि उसकाल में वैर।नुवध के कारणों का अभाव रहता है अतः वहां अरि आदि कोई किसी का नहीं होता है। अस्थि णं भते ! भरहे वासे मित्ताई वा, वयंलाइ वा णायएइ वा संघाडिएइ वा सहाइ वा, सुहोइ वा संगएत्ति वा" हे भदन्त ! उस काल में इस भरतक्षेत्र में क्या कोई स्नेही होता है ? क्या कोई वयस्य--समान वयवाले के साथ स्नेह रखने वाला साथी होता है ? क्या कोई स्वजातिय होता है ? अथवा एक जगह रहने आदि से क्या कोई परिचित-परिचयवाला बन्धु होता है ? क्या कोई संघाटिक-सइचर-साथ साथ रहनेवाला होता है ? क्या कोई सखा "समप्राण: खा मतः" के अनुसार समान प्राणों वाला होता हैं साथ उटने बैठने वाला साथ वाने पीने वाला जो सातिशय स्नेहो होता है उसे सखा कहा गया है, क्या कोई सुहृद् सर्वदा अप्रतिकूलाचरण वाला और हितोपदेश देनेवा ठा होता है ? क्या कोई साङ्गतिक होता है ? सदा किसी एक हो कार्य में लगा रहने वाला होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "हता, नथी. 3 वगय वेशगुसया ण ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो, श्रम मायुष्मन ! ते મન વૈરાનુઘથી પર હોવે છે. એનું કારણ એ છે કે તે કાળમાં વૈરાનુબન્ધના કારણેને समान २ . मेथी त्यां 55 नु मारे थतु नथी. 'अस्थि णं भंते ! भरहे वासे । मित्ताइवा वयंलाइ चा णायएइ वा संघाडिएइ वा सहाइ वा, सुहाइ वा संगपत्ति વા” હે ભદન્ત ! તે કાળમાં આ ભરત ક્ષેત્રમાં શું કઈ નહી હોય છે ? શું કોઈ વયસ્ય સમાન વયળાઓની સાથે નેહ ૨. બના૨ સાથી-હેય છે ? કાઈ સ્વજાતીય હોય છે ? अथवा शुई घाट-सय२-साथे २२नार हाय छ ? ५॥ शुई सभा 'सम प्राणः सखामतः” सेयन भुभ समान प्रापवाणे हा छ ? साथे २९ना२, साथे मानार પીનાર જે સાતિય નહી હોય છે, તેને સખા કહેવામાં આવે છે. શું કેઈ સુહદ સદા અપ્રકિલાચરણ મળે અને હિતોપદેશ આપનાર હોય છે ? શું કોઈ સાંગતિક હોય છે ? શું सब से अयमा प्रवृत्त २नार होय छ ? सेना समां प्रभु छ: "हंता ! Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्विष्वक्षस्कार सू. आबाहविवाहादिविषये प्रश्नोत्तराणि ૨૭૨ मूलम्-अस्थि णं भंते तीसे समाए भरहे वासे आवाहाइ वा बीवाहाइ वा जण्णाइवा सद्धाइ वा थालीपागाइ वा मियपिंडनिवेयणाइ वा? णो इणट्टे समढे, ववगय आवाह वीवाह जण्ण सद्ध थालीपोगमियपिंडणिवेयणा णं ते मण्या पण्णत्ता समणाउसो ! अत्थि णं भंते तीसे समाए भरहे वासे इंदमहाइवा खंदमहाइ वा णागमहाइ वा जश्वमहाइ वो भूयमहोइ वा अगडमहाइ वा तडागमहाइवा दहमहाइ वा णदीमहाइ वा रुक्खमहाइवा पव्वयमहाइ वा थूभमहाइ वा चेइयमहाइ वा ? णो इणट्टे समझे, ववगयमहिमा णं ते मणुयौ पण्णत्ता समणाउसो ! अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे णट्ठपेच्छाइ वा जल्लपेच्छाइ वा मल्लपेच्छाइ वा मुट्ठियपच्छाइ वा वेलंबगपच्छाइ वा कहगपेच्छाइ वा पर्वगपच्छाइ वोलासगपच्छाइ वा ? णो इणढे सपढ़े, ववगयकोउहल्लो णं ते मणुया पण्णत्ता सम णाउसो ! ॥सू० २९॥ . छाया-अस्ति खलु भदन्त तस्यां समायां भरते वर्षे आबाह इति वा विवाह इति वा यज्ञ इति वा श्राद्ध मिति वा स्थालीपाक इति वा मृतपिण्डनिवेदनम् इति वा नो अयमर्थः समर्थः, व्यपगताऽऽवाहविवाहयज्ञश्राद्धस्थालीपाकमृतपिण्डनिवेदनाः खलु ते मनुजा' प्रशप्ताः श्रमणायुष्मन् अस्ति स्खलु भदन्त तस्यां समायां भरते वर्षे इन्द्रमह इति वा स्कन्द मह इति वा नागमह इति बा यक्षमह इति वा भूतमह इति वा अवटमह इति वा तडागमह इति वा हृदमह इति वा नदीमह इति वा वृक्षमह इति वा पर्वतमह इति वा स्तूपमह इति वा चैत्यमह इति वा नो अयमर्थः समर्थः, व्यपगतमहिमाः खलु ते मनुजा प्रज्ञप्ता श्रमणायुष्मन् अस्ति खलु भदन्त तस्यां समायां भरते बर्षे नटप्रेक्षेति वा नाटयप्रेक्षेति वा जल्लप्रेक्षेति वा मल्लप्रेक्षेति वा मौष्टिकप्रेक्षेति वा विडम्बकप्रेक्षेति वा कथक प्रेक्षेनि वा प्लवकप्रेक्षेति वा लासकप्रेक्षेति वा नो अयमर्थः समर्थः व्यपगतकौतुहलाः खलु ते मनुजाः प्रज्ञप्ता भ्रमणायुष्मन् ॥सू०२७। ___टीका-अस्थि णं भंते ?' इत्यादि । गौतम स्वामी पृच्छति-'अत्थि णं भंते ! तोसे समाए भरहे वासे आवाहाइ वा' हे भअत्थि" हां गौतम ! ये सब वहां होते तो हैं परन्तु णो चेव णं तेसिं मणुयाणं तिव्वे रागबंधणे समुप्पज्जइ" आपस में कोई किसो के साथ सातिश तोव प्रेमबन्धन से बंधा हुआ नहीं होता है ॥२८ अत्थि" i, गौतम ! माधु त्योहाय ५५) 'णो चेव ण तेसिं मणुयाणं तिब्वे रागवन्धणे समुप्पज्जइ ५२२५२ धनी साथसातशय-ती-प्रेममन्धन मामाद्ध रहेत नथी, ॥२८॥ Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २७२ जम्बद्विपप्राप्तिसूत्रे दन्त अस्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे आवाह इति वा ? आवाहः विवाहात् पूर्व क्रियमाणो वाग्दानरूप 'उत्सवविशेषः, वीवाहाइ वा विवाह इति वा ? विवाहः-प्रसिद्धः, 'जण्णाइ वा' यज्ञ इति वा ! यज्ञःवह्नौ घृतादिडवनलक्षणः, 'सद्धाइ वा' श्राद्धमिति वा ? श्राद्धं मृतक क्रिया। ‘थालीपागाइ वा' स्थालीपाक इति वा ? स्थालीपाक:-लोकगम्यो मृतकक्रियाविशेष एव, 'मियपिंड निवेयणाइ वा' मृतपिण्ड निवेदनमिति वा ?, मृतपिंडनिवेदनम् मृतमुद्दिश्य पिण्डप्रदानम् ? भगवानाह-'णो इणटे समद्रे' नो अयमर्थः समर्थः यतो 'समणा उसो , हे आयुष्मन् श्रमण! 'तेण मणुया' ते मनुजाः खलु 'ववगय आवाहवीवाह जण्ण सद्ध थालीपागमियपिंडणिवेयणा' व्यपगताऽऽवाहविवाहयज्ञश्राद्धस्थालीपाकमृतपिंडनि वेदन:-व्यपगतानि आवाहविवाह यज्ञश्राद्ध स्थालीपाकमृतपिंडनिवेदनानि येभ्यस्ते तथा भूताः ‘पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः । न तत्रावाहविधाहादिकं वर्तते इति भावः । पुनौतमस्वामी पृच्छति-'अत्थिणं भते !तीसे समाए भरहे वासे इंदमहाइ वा' हे भदन्त अस्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्ष इन्द्रमह इति वा? इन्द्रमहः इन्द्रनिमित्तक उत्सवः, 'खंदमहाइ' वा स्क "अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे आवाहाइ वा वीवाहाइ" इत्यादि टीकार्थ-गौतम स्वामी ने पुनः प्रभु से ऐसा पूछा है हे भदन्त!उस सुषम सुषमा काल के समय इस भरत क्षेत्र में आवाह विवाह होने के पहिले होनेवाला वाद्गान रूप उत्सव विशेष होता है क्या ? विवाह परिणयन रुप उत्सव विशेष होता है क्या ! यज्ञ अग्नि में घृतादि के हवन करने रूप उत्सव विशेष होता है क्या ? श्राद्ध मरण के बाद पंक्तिभोजन आदि रूप क्रिया होती है क्या? स्थालीपाक लोक गम्य मृतक क्रिया विशेष होता है क्या ? मृतपिण्डनिवेदन मृतक को लक्ष्य करके पिण्डदान करना होता है क्या ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं कि "णो इणट्रे समझे" हे गौतम यह अर्थ समर्थ नहीं है क्योंकि "ववगयो आवाह विवाह जण्ण सद्ध थाली पाग मिय पिण्ड णिवेयणा णं ते मणुया पण्णत्ता" वे उस काल के मनुष्य आवाह, विवाह, यज्ञ, श्राद्ध, स्थालीपाक और मृत पिण्ड निवेदन इन सब से रहित होते हैं अर्थात् उस काल में आवाह आदि क्रियाएँ नहीं होती हैं। "अस्थि ण भंते ! तीसे समाए, भरहे वासे इंदमह'इ वा खंदमहाइ वा णागमहाइ वा जक्ख अस्थि ण भंते तीसे समाप भरहे वासे आवाहाइ बा वीवाहाइ वा-इत्यादि ટીકાર્ય–ગૌતમ સ્વામીએ પ્રભુને ફરીથી આમ પ્રશ્ન કર્યો કે હે ભદન્તીતે સુષમ સુષમા કાળના સમય માં આ ભરત ક્ષેત્રમાં આવાહ-વિવાહ પહેલાને વાગુદાન રૂ૫ ઉત્સવ વિશેષ હોય છે ? વિવાહ પરિણયન રૂપ ઉસવ વિશેષ હોય છે? યજ્ઞ–અગ્નિમાં ધૃતાદિકથી હવન કરવા રૂ૫ ઉત્સવ વિશેષ હોય છે? શ્રાદ્ધ-મૃત્યુ પછી પંકિતભેજન આદિ રૂપ ક્રિયા–હોય છે ? સ્થાલી પાક-કગમ્ય મૃતક ક્રિયા વિશેષ હોય છે ? મૃતપિડનિવેદન–મૃતકને અનુલક્ષીને પિડદાન નામક अस्वाभा मावस लिया विशेष डाय छ १ सेनामा प्रभु छ: "णो इणडे समडे" गीतभ ! ॥ अथ समर्थ नथी. उभा 'ववगय आवाह विवाह जससा सद्धथालीपाग मिय पिंड णिवेयणा ण ते मणुया पण्णत्ता' a जना भनुष्य मावास, विवास, यज्ञ, श्रा થાલીપાક અને મૃતપિંડ નિવેદન એ સર્વ ક્રિયાઓથી રહિત હોય છે. એટલે કે તે કાળમાં पापा वगरे सध्या । थती नथी. ? "अस्थि ण भंते तीसे समाए भरहे वासे ईद Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षार सू.२९ आवाहविवाहादिविषये प्रश्नोत्तराणि २७३ न्दमह इति वा स्कन्दमहः कार्तिकेयनिमित्तक उत्सवः 'णागमहाइ' वा नागमह इति वा? ना गमहः नागो भवनपतिविशेषः तन्निमित्तक उत्सवः 'जक्खमहाइ' वा यक्षमह इति वा? यक्ष महः यक्षनिमित्तक उत्सवः 'भूयमहाइ वा भूतमह इति वा भूतमह भूतनिमित्तक उत्सवः यक्षभूतौ व्यन्तरदेवविशेषौ 'अगडमहाइवा' अवटमह इति वा ? अवटमहः कूपोत्सवः 'तडा गमहाइवा' तडागमह इति वा तडागमहः सरोनिमित्तक उत्सवः 'दहमहाइवा' इदमह इति वा हृदमहः हृदनिमित्तक उत्सवः 'णदीमहाइ वा' नदीमहइति वा नदीमहः नदीमुद्दिश्य क्रियमाण उत्सवः, 'रुक्खमहाइ वा' वृक्षमह इति वा वृक्षमहः वृक्षमुद्दिश्य क्रियमाण उत्सवः 'पव्वरमहाइ वा पर्वतमह इति वा पर्वतमहः पर्वतोदेशेन क्रियमाण उत्सवः 'थूभमहाइ वा' स्तूपमह इतिवा स्तूपः स्मृतिस्तंभः तन्निमित्तक उत्सवः 'चेइयमहाइ वा' चैत्यमह इति वा चैत्यनिमित्तक उत्सवश्चैत्यमह इत्युच्यते चैत्यः मृतक स्मृति चिह्न चैत्यमिति । इत्थं गौत मेन पृष्टो भगबानाह-'णो इण? सम?' नो अयमर्थः समर्थः यतो 'समणा उसो' हे आयु ष्मन् श्रमण 'ते णं मणुया ववगयमहिमा' ते खलु मनुजाः व्यपगतमहिमानः व्यपगतो म महाइ वा भूयमहाइ वा, अगडमहाइ वा, तडागमहाइ वा दहमहाइ वा णईमहाई वा, रुक्खमहाइ वा, पव्वयमहाइ वा थूभमहाइ वा चेइयमहाइ वा ?' हे भदन्त ! क्या उस सुषम सुषमा काल के समय इस भरत क्षेत्र में इन्द्र को निमित्त करके महोत्सव किये जाते हैं ? कार्तिकेय को लक्ष्य करके महोत्सव किये जाते हैं ? नागकुमार को लक्ष्य करके महोत्सव किये जाते हैं ? यक्ष के निमित्त करके महोत्सव किये जाते हैं ? भूत को निमित्त करके उत्सव किये जाते हैं ! यक्ष और भूत ये व्यन्तर जातिके देव हैं । कुओं कूपों को निमित्त करके उत्सव किये जाते हैं तड़ाग को नि मित्त करके उत्सव किये जाते हैं ? इसी प्रकार से द्रह को नदो को वृक्ष को पर्वत को स्तप को स्मृतिस्तम्भ को एवं चैत्य को मृतक स्मृति चिन्ह को लक्ष करके उत्सव किये जाते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु कहते हैं “णो इणद्वे समढे" हे गौतम यह अर्थ समर्थ नहीं हैं क्योंकि "ववगय महिमा गं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो" हे श्रवण आयुष्मन् वे उस काल के मनुष्य जिसको हर महाइ वा खंदमहाइ वा णागमहाइ वा जक्खमहाइ वा भूयमहाइ वा, अगडमहाइ वा तडागमहाइ वा, दहमहाइ वाणदीमहाइ वा रुक्खमहाइ वा पव्वयमहाइ वा थूम महाइवा चेइयमहाह वा? महन्त शुत सुषमसुषमा ४जना समयमा भारतक्षेत्रमा ४न्द्रना निमित्त ઉત્સવે જવામાં આવે છે ? કાર્તિકેયને અનુલક્ષી ને મહત્સવ જવામાં આવે છે? નાગ કુમારને અનુલક્ષીને મહોત્સવ યોજવામાં આવે છે? યક્ષના નિમિત્ત મહોત્સવ યોજવામાં આવે છે ? ભૂતનાં નિમિત્તે ઉત્સવે જવામાં આવે છે ! ભૂત એ વાનર જાતિના દે છે. કપના નિમિત્તે ઉત્સવો યોજવામાં આવે છે ? તડાગ-તળા–ના નિમિત્ત ઉત્સવ જવામાં આવે છે ? આ પ્રમાણે કહને, નદીને, વૃક્ષને, પર્વતને, સૂપકને, મૃતિસ્તાને તેમજ ચૈત્યને મૃતકસ્મૃતિચિન્હને અનુલક્ષીને ઉત્સવ જવામાં આવે છે ? આ પ્રશ્નના उत्तरमा प्रभु डे छ : 'णो इणटूठे समटूठे' गौतम मा अर्थ समर्थ नथी, भ'वधगयमहिमाण ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो' श्रम मायुम्भन ! म भनध्यावा Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २७४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे हिमा माहात्म्यं येभ्यस्ते तशाभूतः 'पण्णत्ताः' प्रज्ञप्ताः । पुन गीतमस्वामी पृच्छति ‘अत्थिण भंते तीसे समाए भरहे वासे णडपेच्छाइ वा' हे भदन्त अस्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे नट प्रेक्षेति वा नटप्रक्षा नटानां क्रीडाकारिणां प्रेक्षा नटकृत कौतुक दर्शनाय जनमेलक इत्यर्थः 'नट्टपेच्छाइ' नाटयप्रेक्षेति वा नाट्यप्रेक्षा नाटय नटकर्म अभिनयः तदर्शनाय जनमेलक इति 'जल्लपेच्छाइ वा जल्ल प्रेक्षित जल्लप्रेक्षा जल्ला वरत्र खेलकाः तत्कृतकौतुकदर्शनाय सम्मिलितो जनसमुदाय इत्यर्थः ‘मल्लपेच्छाइ वा' मल्लप्रेक्षेति बा मल्लाः भुजाभ्यां युद्धकारकः तत्त्कृतबाहु युद्धदर्शनाय समुदिता जना इत्यर्थः। 'मुट्ठियपेच्छाइ वा' मौष्टिक प्रेक्षेति वा मौष्टिकाः मुष्टिभिर्युद्धकारका मल्लः तत्कृतकौतुक दर्शनाय सम्मिलितो जनसमूह इत्यर्थः । 'कहगपेच्छाइ वा' कथक प्रेक्षेति कथकप्रेक्षा-कथका:-कथाकारिणः ये हि सुललितकथावाचनेन श्रोतृजनानां हृदि रसमुत्पादयन्ति तत्कृत कथा श्रवणाय समागतो जनसमुदायइति 'पवगपेच्छाइ वा' प्लवक प्रेक्षेति वा प्लवकप्रेक्षाः-प्लवका उत्प्लुत्य ये गर्ताप्रकार के उत्सव करने को भावना दूर रहा करती है ऐसे ही होते हैं । “अत्थि णं भंते तीसे समाए भरहे वासे णडपेच्छाइ वा णट्टपेच्छाइ वा, जल्लपेज्छाइ वा, मल्लपेच्छाइ वा मुट्ठियपेच्छाइ वा वेलवगपेच्छाइ वा कहगपेच्छाइ वा पवगपेच्छाइ वा लासगपेच्छाइ वा' हे भदन्त उस सुषम सुषमा काल के समय में भरत क्षेत्र में क्या नटों के खेल तमाशों के देखने के लिये मनुष्यों के मेले होते है ? नाट्य-नट कर्म अभिनय आदि को देखने के लिये मनुष्य के मेले होते हैं क्या ? जल्ल वर्त पर नाना प्रकार के खेल तमाशे दिखाने वालों के कौतुको को देखने के लिये मनुष्यों के मेले होते है क्या ? अर्थात् वहां मनुष्य एकत्रित होते है क्या ! मल्लों द्वारा किये गये वाहुयुद्ध को दे खने के लिये मनुष्य एकत्रित होते हैं क्या ? मनुष्य द्वारा युद्ध करने वाले मल्लजनों के कौतुको को देखने के लिये मनुष्य एकत्रित होते है क्या? मुखविकार आदि द्वारा मनुष्यों को हसाने वाले विदूषक जन के कौतुक को देखने के लिये मनुष्य एकत्रित होते हैं क्या ? तथा सुललित कथा के वाचने से श्रोत्ता जनो के हृदय में रस उत्पन्न कराने वाले कथक पुरुषों के द्वारा वाची गई कथा को सुनने के लिये मनुष्य एकत्रित होते है क्या ? तथा प्लवकजनों के खड़्ढे आदि को लांधकर डाय छ ४२४ ततना उत्सव। योपानी भावनासाथी सा२ २ छ. 'अत्थि णं भंते तीसे समाए भरहे वासे णड पेच्छाइ वा णट्टपेच्छाइ वा जल्लपेच्छाई वा मल्लपेच्छाइ वा मुट्टिपेच्छोई वा वेलंवग पेच्छाइ ब. कहग पेच्छाई वा पवग पेच्छाइ वा चासग पेच्छाई वा' , a सुषम सुषमा ४जना समयमा भरत क्षेत्रमा शुनटीना तमाशाઆને જેવા મનુષ્યના ટોળાએ એકત્ર થાય છે ? નાટય-નાટકના અભિનય વિગેરે જેવા માટે મનુષ્ય એકઠા થાય છે ? જલ–વત પર અનેક જાતનાં ખેલ તમાશાએ બતાવનારાઓના કૌતુકને જોવા માટે મનુષ્યના ટેળાઓ એકત્ર થાય છે? એટલે કે ત્યાં માણસે એકત્રિત થાય છે? મલે વડે કરવામાં આવેલ બાહ યુદ્ધોને જોવા માટે માણસે એકત્રિત થાય છે ! મુષ્ટિએ વડે યુદ્ધ કરનારા મલે ન કૌતુકે ને જોવા માટે માણસે એકત્રિત સુખભંગમા વગેરે વડે માણસને હસાવવા માટે વિદૂષકોના કૌતુકોને જોવા માટે માણસો એકત્રિત થાય છે ? તેમના સુલંલિત કથાના વાંચનથી શ્રોતાઓના હૃદમા રસ ઉત્પન્ન કરા Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सृ. ३० शकटादिविषयक प्रश्नोत्तराणि २७५ दिकं लङ्घयन्तिने गर्तादिलङ्घनकारिण इत्यर्थः अथवा ये अन्यजनानुत्तरणी यामति विशालां नदोम् उत्तरन्ति ते प्लवकाः तत्कृतकौतुकदर्शनाय सम्मिलितो जनसमूह इत्यर्थः । 'लासकपेच्छाइ वा' लासकप्रेक्षेति वा लासकप्रेक्षा-लासकाः लास्य नामकनृत्यविशेषकारिणः तत्कृतलास्य नृत्यप्रेक्षणाय समागतो जनसमुदाय इति । इत्थं गौतमेन पृष्टो भगवानाह-'णो इणढे समटे नो अयमर्थः समर्थः यतो 'समणाउसो' हे आयुष्मन् श्रमण 'ववगय कोउ हल्लाणं ते मणुया ते मनुजाः खलु व्यपगतकौतुहला:-व्यपगतं कौतुहलं येभ्यस्ते तथा भूताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः इति ॥सू० २९॥ मूलम्-अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे सगडाइ वा रहाइवा जाणाइ वा गिल्लीइ वा थिल्लीइवा सीयाइ वा संदमाणियाइ वा णो इणद्वे समढे पायचारविहारा णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो ! अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे गावीइ वा महिसीइ वा आयाइ वा एलगाइ वा ? हंता अत्थि, णो चेव णं तेसिं मणुयाणं परिभोगत्ताए हव्वमागच्छंति । अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे आसाइ वा हथिइ वा, उट्ठाइ वा गोणाइ वा गवयाइ वा अयाइ वो एलगाइ वा पसयाइ वा मियाइ वा वराहाइ वा रुरुत्ति वा उसके पार पहुंच जाने वाले अथवा दूसरे जन जिस नदी को पार नहीं कर सके ऐसी अतिविशाल नदी को पार करने वाले मनुष्यों के द्वारा किये गये कौतुक को देखने के लिये मनुष्य एकत्रित होते हैं क्या ? लासक जनों के लास्यनामक नृत्य विशेष को करने वाले मनुष्यों के उस लास्य नृत्यविशेष को देखने के लिये मनुष्य एकत्रित होते हैं क्या ? इस प्रकार से गौतम ! के पूछने पर प्रभु उनसे कहते है ''णो इणटे समटे ववगय कोउहल्लाणं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो" हे गौतम यह अर्थ समर्थ नह। हैं क्योंकि जिनके चित्त से इस प्रकार के कौतुक देखने का भाव सर्वथ दूर होगया है ऐसे ह। वे मनुष्य वहां के होते हैं ऐसा शास्त्रो में सिद्धान्तका रोने कहा है ॥२९॥ વનારા કથક પુરુષો વડે કહેવામાં આવેલ કથાને સાંભળવા માટે માણસે એકત્રિત થાય છે ? તેમજ પ્લવક જના-ખાડાઓ વગેરેને ઓળંગીને તેની બીજીતરફ પહોંચનારા અથવા બીજા મનુષ્ય જે નદીને પાર કરી શકે નહીં એટલે કે આકોઠેથી બીજે કાંઠે જઈ શકે નહિ એવી અતિ વિશાલ નદીને પાર કરનારા માણસોના કૌતુકેને જોવા માટે શું માણસે એકત્રિત थाय छ १ मा प्रभारी गौतम ने प्रश्न समजीने प्रभु तन यात 'णो इणढे समढे वधगय कोउहल्ला णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो' गौतम ! ॥ अथ સમર્થ નથી, કેમકે જેમના ચિત્તમાંથી આ જાતનાં કૌતુકો જેવાને ભાવ સંપૂર્ણ રીતે દૂર થઈ ગયો છે એવા તે મનુષ્યો ત્યાં રહે છે એવું શાસ્ત્રોમાં સિદ્ધાન્તકાર એ કહ્યું છે !ારા - Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २७६ जम्बूद्वोपप्रज्ञप्तिसूत्रे सरभाइ वा चमराइ वा कुरंगाइ वो गोकण्णाइ वा ? हंता अस्थि, णो चेव णं तेसिं परिभोगत्ताए हव्व मागच्छंति । अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे सीहाइ वा वग्धाइ वा विगाइ वा दीवियाइ वा अच्छोइ वा तरच्छाइ वा सियालाइ वा विडालाइ वा सुणगाइ वा कोकंतियाइ वा कोलसुणगोइ वा ? हंता अत्थि, णो चेव णं तेसिं मणुयाणं आवाहं वा वाबाहं वा छविच्छेयं वा उप्पायेंति पगइभद्दयो णं ते सावयगणो पण्णत्ता समणाउसो ! अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे साली इ वो वीहीइ वा गोहुमाइ वा जवाइ वा जव जवाइ वो, कलोयाइ वा मयूराइ वा मुग्गाइ वो मोसाइ वा तिलाइ वा कुलत्थाइ वा णिप्फावाइ वो आलिसंदगोइ वा अयसीइ वा कुसुंभाइ वा कोदवाइ वो कंगुत्ति वा वरगाइ बा रालगाइ बा सणाइ वा सरिसवाइ वा मूलगबीयोइ ? हंता अत्थि णो चेव णं तेसिं मणुयाणं परिभोगत्तोए हव्वमागच्छति ॥सू० ३०॥ छाया-सन्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे शकटानीति वा रथा इति वा यानानीति वा युग्यानोति वा गिल्ल्यइति वा थिल्ल्यइति वा शिविका इति वा स्यन्दमानिका इति वा ? नो अयमर्थः समर्थः, पादचारविहाराः खलु ते मनुजाः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् ! अस्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे गाव इति महिष्य इति वा अजा इति वा एडका इति वा ? हन्त ! सन्ति, न चैव खलु तेषां मनुजानां परिभोग्यतया हव्यमागच्छन्ति । सन्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे अश्वा इति वा हस्तिन इति वा उष्ट्रा इति वा गाव इति वा गवया इतिवा अजा इति वा पडका इति वा प्रश्रया इति वा मृगा इति वा वराहा इति वा रुक्ख इति वा शरभा इति वा चमरा इति वा कुरङ्गा इति वा गोकर्णा इति वा ? हन्त ! सन्ति नो चैव खलु तेषां परिभोग्यतया हव्यमागन्छन्ति । सन्ति खलु भदन्त ! तस्या समायाँ भरतें वर्षे सिंहा इति वा व्याघ्रा इति वा वृ का इति वा द्वीपिका इति वा ऋक्षा इति वा तरक्षव इति वा शृगाला इति वा बिडाला इति वा शुनका इति वा कोकन्तिका इति वा कोलशुनका इति वा १ हन्त ! सन्ति, नो चव खलु तेषां मनुजानाम् आबाधांः वा याबाधां वा छविच्छेदं वा उत्पादयन्ति, प्रकृतिभद्रकाः खलु ते श्वापदगणाः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् ! अस्ति खलु भदन्त ! तस्यां सम यां भरते वर्षे शालय इति वा व्रीहय इति वा गोधूमा इति वा यवा इति वा यवयवा इति वा कलाया इति वा मसूरा इति वा मुद्गा इति वा माषा इति वा तिला इति वा कुलत्था इति वा नि व्यावा इति वा आलिसन्दका इति वा अल्स्य इति बा कुसुम्भा इति वा कोद्रवा इति वा . Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कार सू. ३० शक्टायिक मोहराणि २७७ कङ्ग वा इति वा वरगा इति वा रालका इति वा शणा इति वा सर्षपा इति वा मूलक बीजानीति वा ? हन्त ! सन्ति नो चैव खलु तेषां मनुजानां परिभोग्यतया हव्यमा गच्छन्ति सू ॥३०॥ टीका-'अस्थि णं भंते' इत्यादि । गौतम स्वामी पृच्छति-'अस्थि णं भंते तीसे समाए भरहे वासे सगडाइ वा' हे भदन्त सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे शकटानि इति वा शकटानि गन्त्री विशेषाः 'रहाइ वा' रथा इति वा 'रथा' प्रसिद्धाः 'जाणाइवा' यानानीति वा यानानि शकटरथातिरिक्ता गन्त्री विशेषाः 'जुग्गाइवा' युग्यानीति' वा युग्यानि पुरुषवाह्या यानविशेषाः जम्पानानीत्यर्थः 'गिल्लीइवा' गिल्ल्यति वा गिल्ल्यः-पुरुषद्वयवाह्याः शिविका विशेषाः 'थिल्लीइ वा' थिल्ल्य इति वा थिल्ल्यः अश्वद्वयेन अश्वतरद्वयेन वा बाह्यानि यानानि 'सीयाइ वा शिविका इति वा शिविका:-पुरुषवाह्या यानविशेषाः पालकीति प्रसिद्धः 'संदमाणियाइ वा' स्यन्दमानिका इति वा स्यन्दमानिकाः शिबिकाविशेषाः भगवानाह 'यो इण? समहेनो अयमर्थः समर्थः यतो 'समणाउसो' हे आयुष्मन् श्रमग 'पायचार विहारा णं ते मणुया' ते मनुजाः "अत्थि ण भंते तीसे समाए भरहे वासे सगडाइ वा रहाइ वा" इत्यादि । टीकार्थ-- "अत्थि ण भंते तोसे समा ए भरहे वासे सगडाइ वा रहाइ वा" गौतमस्वामी ने प्रभु से ऐसा पूछा है हे भदन्त क्या उस सुषम सुषमा काल के समय में भरत क्षेत्र में शकट सामान्य बैलगाड़ियां होती है, रथ होते हैं, यान शकट एवं रथ से अतिरिक्त सबारी की गाड़ियां होती हैं ? युग्य दो पुरुष जिन्हें अपने कंधों पर रखकर चलाते है ऐसी छोटी २ डोलियां पालकियां होती हैं ? गिल्लियां दो पुरुष जिन्हें कन्धा देकर चलाते हैं ऐसी डोलियों के आकार में कुछ २ बड़ी शिबिकाएं होती हैं क्या ? थिल्लियां दो घोडे जिन में जोते जाकर जिन्हें खेंचते हैं अथवा दो वच्चर जिनमें जुतकर जिन्हें खेचते हैं ऐसी विशेष शिबिकाएं बाग्धियां होती हैं क्या ? शिबिकाएं बड़ी २ पालकियां जिन्हें पुरुष अपने कन्धो पर रख कर साथ२ उठाकर चलते हैं होती है ? स्यन्दमानिकाएँ होती है ! इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-हे गौतम यह अर्थ समर्थ-शास्त्रसंमत नही क्योकि वहां के मनुष्य पादचारी ही होते हैं । अतः उन्हें न बेलगाड़ीयों की आवश्यकता ___ अस्थि ण भंते तीसे समाए भरहे वासे सगडाइ वा रहाइवा' इत्यादि सूत्र ॥३०॥ ટીકાથ–ગૌતમે પ્રભુને આ જાતને પ્રશ્ન કર્યો કે હે ભદત શું તે સુષમ સુષમા કાળના સમયમાં ભરત ક્ષેત્રમાં શકટ સામાન્ય બળદ ગાડીઓ હોય છે? થે હોય છે? યાને શકટ તેમજ રથાતિરિકત સવારી ગાડીઓ હોય છે ? યુ બે માણસે જેમને પોતાના સ્ક પર મુકીને ચાલે છે, એવી નાની નાની પાલખી હોય છે ? ગિલિએ બે પુરૂષો જેમને ખભા પર મૂકીને ચલાવે છે, એવી પાલખીએ કરતાં મેટી શિબિકાએ હેય છે બ્રિલિયે બે ઘોડાએ અથવા બે ખચ્ચરોવાળી વિશેષ શિબિકાઓ બગીએ હોય છે ? શિબિકાએ મેટી મોટી પાલખીએ જેમને માણસે પોતાના ખભા ઉપર મૂકિને ચાલે છે તે હોય છે ? સ્પેન્ડમાનિકાઓ હોય છે ? તેના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે-હે ગૌતમ. આ અર્થ સમર્થ નથી. એટલે કે શાસ્ત્ર–સમ્મત નથી, કેમકે ત્યાંના માણસે પાદચારી જ હોય છે. એથી તેમને Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे खलु पादविहाराः पादाभ्यां चरणाभ्यां विहारो विचरणं येषां ते तथाभूताः-चरणचङ्कमण शीला न तु शकटादि गामिनः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः । पुन गौतमस्वामो पृच्छति-'अत्थि णं भंते तीसे समाए भरहे वासे गाविइ वा' हे भदन्त सन्ति खलु तस्यां समायां भरहे वासे वा गावइतिवा गावो धेनवः ‘महिसीइवा' महिध्य इति वा, महिष्यः प्रसिद्धः 'अयाइवा' अजा इति वा 'अजाः छाग्यः' 'एलगाइ वा एडका इति वा एडकाः उरभ्यूः। भग वानाह-हंता अत्थि' हन्त सन्ति ‘णो चेव णं' नो चैव खलु ताः गावो महिष्योऽजा एडका वा 'तेसि मणुयाणं परिभोगत्ताए' तेषां मनुजानां परिभोग्यतया 'हव्वं हव्यं कदाचिदपि 'आगच्छंति' आगच्छन्तीति । पुनगरौतमस्वामी पृच्छति-'अस्थि णं भंते ! तोसे समाए भरहे वासे आसाइ वा हे भदन्त ! सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे अश्वा इति वा ?, अश्वा:-प्रसिद्धाः, 'हत्थीइ वा, उट्टाइ वा, गोणाइ वा, गवयाइ वा, अयाइ वा एलगाइ वा पसयाइ वा, मियाइ वा, वराहाइ वा, रुरुत्ति वा, सरभाइ वा, चमराइ वा, कुरंगाइ वा गोकण्णाइ वा' हस्त्युष्ट्रगोगवयाजैडकप्रश्रय मृगवराहरुरुशरभचमरकुरङ्गगोकर्णा इति वा ?, तत्र-हस्तिनःप्रसिद्धाः, उष्ट्रा:-प्रसिद्धाः, गावो-वृषभाः, गवया.गोसजातीयावन्यपशवः, अजाः छागाः, एडका:-मेषाः, प्रश्रयाः द्विखुरा वन्यपशु विशेषाः मृगाः=ह. रिणाः, वराहा:-शूकराः, रुरवो-मृगविशेषाः, शरभा: अष्टापदाः, चमरा: आरण्या गावः, रहतो है और न पालखो आदि की आवश्यकता ही रहती है हे भदन्त ! इस सुषम सुषमा काल की मौजूदगी में क्या गायें होती हैं ? भैसें होती हैं ? अजाएँ बकरियां होती हैं ? एडकाएँ भेडे होती है ! इस के उत्तर में प्रभु कहते है हां गौतम ये सब जानबर तो होते हैं पर वे गाय आदि पशु उन मनुष्यों के उपयोग में कभी नही आते हैं । अब पुनः गौतमस्वामी प्रभु से पूछते है-हे भदन्त उस काल में इस भरत क्षेत्र में अश्वघोड़ा हस्ती-हावी उष्ट्र-ऊँट गाय-गवय रोझ अजा एडक पसय मृग विशेष मृग-वराह सुअर रुरु मृगविशेष शरभ अष्टापद चमर चमरीगाय कुरङ्ग और गोकर्ण मृग विशेष ये सब जोव होते है क्या ? उत्तर में प्रभु कहते हैं हे गौतम ये सब जीव उस काल में होते है, "नो चेव णं." परन्तु ये उस समय के मनुष्यों के काम में कभी भी उपयुक्त नहीं होते है । पुनः गौतम स्वामी प्रभु से पूछते है हे भदन्त ! उस काल में इस भरत क्षेत्र में सिंह व्याघ्र वृक, भेडिया-दीपिकाબળદ ગંડીઓ, પાલખીઓ વગેરેની આવશ્યકતા રહેતી નથી. હે ભદન્ત ! તે સુષમા સ ષમા કાળમાં ભરતક્ષેત્રમાં ગાચા હોય છે ? ભે'શે હાય છે ? અજમા-બકરીએ-ટૅય છે ? એકાઓ ઘેટીએ-હાય છે ? એના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે. હા, ગૌતમ ! એ બધાં પ્રાણીઓ હોય છે, પણ એ ગાય વગેરે પશુએ માણસને ઉપગમાં આવતા નથી.” - હવે ફરી ગૌતમ સ્વામી પ્રભુને પ્રશ્ન કરે છે કે હે ભદત છે તે કાળમાં ભરતક્ષેત્રમાં અશ્વबाजारती-हाथी 62-6,आय, शक्य. 01.20७४. ५सय-भृगावशेष, भृ 8सू१२ ३२-भृगविशेष, श२-अष्टाहयभ२-यमरी गाय, १२ भने गो-भृगविशेष બધાં પ્રાણીઓ હોય છે ? ઉત્તરમાં પ્રભુ કહે છેઃ હા, ગૌતમ ! એ સર્વ જીવે તે કાળમાં होय छे. 'णो चेव णा' ५५ ते सभयना भारसाना आयोगमा ४६॥वि मावत नथी. ५ ગૌતમ પ્રભુને પ્રશ્ન કરે છે. હે ભદન્ત, તે કાળમાં, આ ભરત ક્ષેત્રમાં સિંહ વ્યાઘ, વૃક Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३० शकटादिविषयक प्रश्नोत्तराणि २७९ कुरङ्गाः मृगविशेषाः, गोकर्णाः मृगविशेषाः इति वा ? । भगवानाह-'हंता अत्थि' हन्त ! सन्ति, 'णो चेव णं' नो चैव खलु ते अश्वहस्त्युष्ट्रादयः' तेसिं परिभोगत्ताए' तेषां मनुजानां परिभोग्यतया 'हव्यमागच्छति' कदाचिदपि आगच्छन्ति इति । पुनर्गौतमस्वामी पृच्छति-'अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे सीहाइ वा' हे भदन्त ! सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे सिंहा इति वा ?, सिंहा केशरिणः, 'वग्याइवा' व्याघ्रा इति वा ?, व्याघ्राः-शार्दूलाः, 'विगाइ वा, दोवियाइ वा अच्छाइवा तरच्छाइ वा सियालाइ वा बिडालाइवा सुणगाइवा कोकंतियाइवा कोलसुणगाइ वा' वृक द्वीपिक ऋक्षतरक्षुश्रृगालबिडालशुनककोकन्तिक कोलशुनका इति वा?, तत्र वृका:-'भेडिया' इति प्रसिद्धाः, द्वीपिकाः व्याघ्रविशेषाः चित्रका इति प्रसिद्धाः, ऋक्षाः-भल्लकाः, तरसवः-मृगादनाः व्याघ्रविशेषाः, श्रृगालाः प्रसिद्धाः, बिडाला:-मार्जाराः, शुनकाः-श्वानः, कोकन्तिकाः'लोमडी' ति भाषा प्रसिद्धाः, कोलशुनकाः-महावराहाः। भगवानाह-'हंता अत्थि' हन्त ! सन्ति, 'णो चेव णं तेसिं मणुयाणं आवाहवा' नो चैव खलु तेषां मनुजानाम् आबाधाम्-ईशद्धाधांवा 'वाबाहवा' व्यागधां-विशेषेण बाधां वा, 'छविच्छेद-चर्मोत्पाटनं वा 'उप्पायें ति' उत्पादयन्ति-जनयन्ति, यतो समणा उसो ?' हे आयुष्मन् श्रमण ! 'ते सावयगणा' ते श्वापदगणाः-हिंसक पशुमहाःणं' खलु पगइ भदया' प्रकृति भद्रकाः व्याघ्रविशेष,चित्रक-चित्ता, ऋक्ष-रीछ तरक्षु मृगभक्षा व्याघ्रविशेष शृगाल गीदड बिडाल विलाव शुनक कुत्ता, कोकन्तिक लोमड़ी एवं कोलशुनक बडे २ सुअर या जंगली कुत्ते ये सब जानवर होते है क्या ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं, हां गौतम ! ये सव जंगली जानवर उस काल में इस भरत क्षेत्र में होते हैं परन्तु “णो चेव णं तेसिं मणुयाणं आबाहं वा वाबाहं वा." इत्यादि ये उन मनुष्योंको जरा सी भी बाधा नहीं पहुँचाते हैं, न विशेषरूप से उन्हें कष्ट देते है, न ये उनके शरीर को छिन्न भिन्न करते है क्योंकि "समणाउसो पगइ भद्दया णं ते सावयगणा पण्णत्ता" हे श्रमण आयुष्मन् ! ये श्वापदगण जंगली जानवर प्रकृति से ही भद्र होते हैं "अत्थिणं भंते तीसे समाए भरहे वासे सालीइ वा वोहिगोहूम जवजव नबाइ वा कलम मसूर०" इत्यादि વરૂ કીપિક વ્યાધ્ર વિશેષ ચિત્રક ચિત્તો, ઋક્ષ રીછ તરન્નુ મૃગભક્ષી વ્યાઘ વિશેષ શ્રાળ બિડાલ મુનક કૂતરું કેકન્તિક લેકડી અને કેલ શુનક મેટા સૂવરો અથવા વન્ય શ્વાન હોય છે ? એના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે, હા ગોતમ ! એ સર્વ વન્ય પ્રાણીઓ તે કાળમાં मा भरतक्षेत्रमा डाय छ, ५ "णो चेव ण तेर्सि मणुयाणं आवाहं वा वावाहं." त्या દિ. એ વન્ય પ્રણીઓ તે માણસને સહેજ પણ કષ્ટ આપતા નથી, ન વિશેષ રૂપમાં usels माथे छ भने न मनां शरी२१ २ छिन्न भिन्न ४२ छ भो 'समणाउसो पगई भयाणं ते सावयगणा प० मे श्रम आयुमन ! से वायगये।-वन्य प्राली मी स्व. भावतः भद्राय छे. अत्थि ण भंते ! भरहे वासे सालीति वा वीहि गोहूम जव जवा इवा कलम मसूर' इत्यादि व गी14 प्रभुने मागतना प्रश्न २ छ १-3 महन्त ! शु તે કાળમાં ભરત ક્ષેત્રમાં શાલિકલમાદિ ધાન્ય વિશેષ વ્રીહિ-ધાન્ય, ગોધૂમ ગેહું યવ જવ Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः । पुनतिम स्वामी पृच्छति-'अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे सालोइ वा' हे भदन्त ! सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे शालय इति वा ?, शालयः कलमादि धान्यविशेषाः, 'वीहीइ वा गोहूम।इवा जबाइ वा वनवाइ वा' ब्रोहिगोधूम यव यवयवा इति वा ? तत्र व्रीहिः धान्यविशेषः, गोधूमः-प्रसिद्धः, यवः प्रसिद्धः, यवयवः यवभेदः, एतेपाम् इतरेतरद्वन्द्वः, तथा-'कलायाइ वा मसूराइ वा मुग्गाइ वा मासोइवा तिलाइ वा कुलत्थाइ वा णिफ्फावाइ वा आलिसंदगाइ वा अयसीइ वा कुसुंभाइ वा कोईचाइ वा कंगुत्ति वा वरगाइ वा रालगाइ वा सणाइ वा सरिसवाइ वा मूलगबीयाइ वा' कलायमसुरमुद्गमासतिलकुलत्थनिष्पावालिसन्दकातसीकुसुम्भकोद्रवकवरकरालकशण सर्पपमूलक वीजानि वा ?, तत्र कलायावृत्तचणको मटर' इति भाषा प्रसिद्धः, मसूरो धान्य विशेषः, मुद्गः 'मुँग' इति लोकप्रसिद्धो धान्यविशेषः, माषः 'उड़द' इति भाषा प्रसिद्धो धान्य विशेषः, तिलः प्रसिद्धः, कुलत्थ:-'कुलथी' इति भाषा प्रसिद्धो धान्य विशेषः, वरको धान्य--विशेषः, ग़लक:-कङ्गु विशेषः, एव, तत्र कहच्छिगः, रालकोऽल्पशिरा दृति भेदो बोध्यः, शणो धान्यविशेषः, सर्षपः 'सरसों' इति भाषा प्रसिद्धस्ते इति वा, तथा मूलकबोजानि-मुलकं-'मूली' इति भाषाप्रसिद्धं तस्य बीजानि । इत्थं गोत्तमस्वामिना पृष्टो भगवानाह– 'हंता अस्थि' हन्त ! सन्ति, ‘णोचेव णं'न चैव खलु तानि.धान्यानि 'तेसिं मणुयाणं परिभोगत्ताए' तेषां मनुजानां परिभोग्यतया 'हव्वं' हव्यं-कदाचिदपि 'आगच्छति' आगच्छन्ति । यतस्ते मनुजाः कल्यवृक्षपुष्पफलाधाहरका भवन्तीति ॥३० अब श्रीगौतम स्वामी प्रभु से ऐसा पूछते हैं-हे भदन्त ! क्या उस कालमें भरत क्षेत्रमें शाल-कलमादि धान्यविशेष, बोहि धान्य, गोधूम गेहु, यव-जौं यवयव ज्वार या विशेष प्रकार के यव, कलाय--मटर, मसुर, मुद्ग मूग, मास उडद, तिल्लो, कुलत्थ कुलथी, निष्पाव वल्ल आलिसन्दक चौला, अतसा अलसो कुसुम्भ कुसुम्भवृक्ष का बोज जिस के पुष्पो से वस्त्र रंगाजाता है कोद्रव कोद, कङ्ग बड़ी कागनो, वरक धान्यविशेष, रालक छोटी कांगनीविशेष शण, सर्षप सरसों एवं मूलक बीज मूलो के बीज ये सब बोन होते है ? उत्तर में प्रभुश्री कहते है 'हंता अत्थि' हाँ, गौतम उस काल में भरत क्षेत्र में ये सब बी न होते हैं परन्तु "णो चेव ण तेसि मणुआणं परि भोगत्ताए हव्वमागच्छति" ये सब उन मनुष्यों के भोगोपभोग में काम नहीं आते है क्योंकि वे उस काल के मनुष्य कल्पवृक्ष के पुष्पो और फलों का आहार करते हैं ॥३०॥ ચવચવ આર અથવા વિશેષ પ્રકારને યવ કલાય વષથ મસૂર મુગ મગ માષ અડદ તિલ કલ0 કળથી નિષ્પાવ વલ આલિસન્દક ચોળા અતસી અલસી કુસુંભ-કુસુંભ વૃક્ષનું બી જેના પુપે વસ્ત્રો રંગવામાં આવે છે, કેદ્રવ ગળી કશ માટી કાંગની વરક ધાન્ય વિશેષ રાલક નાની કાંગની વિશેષ શણ સર્ષવ ચરસવ અને મૂળક બીજ મૂળીનાં બી એ સર્વ जतना मी डाय ? उत्तरमा प्रभु छः 'हंता अत्थि'ही, गौतम ! ते मा भरतक्षेत्रमा से सव जतनां मान डाय छ ५२ तु “णो चेव ण तेसि मणुआणं परिभोगत्ताए हव्व मागच्छन्ति' से सर्व घन मी ते ना मनुष्याना नागपिसाना उपयोगमा मा વતાં નથી, કારણુ કે તે કાળના મનુષ્ય કલ્પવૃક્ષના પુષ્પો અને ફળને આહાર કરે છે. સૂ.૩૦ Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-धि. वक्षस्कार सू. ३१ गड्डादिविषयकप्रश्नोत्तराणि २८१ मूलम्-अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे गड्डाइवा दरीइवा ओवायाइ वा पवायाइ वा विसमाइ वा विज्जलाइ वा ? णो इगटे समढे, भरहे वासे बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा० । अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे खाण्इ चा कंटगाइ वा तणाइ वा कयवराइ वा ? णो इणढे समढे, ववगय खाणुकंटगतणकयवरा णं सा समा पण्णत्ता । अस्थि णं मंते ! तीसे समाए भरहे वासे डंसाइ वा मसगाइ वा जूआइ वा लिक्खाइ वा ढिकुणाइ वा आइ वा ?, णो इणढे समढे, ववगयडंसमसगजूअलिक्खर्दिकुणपिसुआ उवद्दव विरहिया णं सा समा पण्णत्ता । अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे अहीइ वा अयगराइ वा ? हंता ! अत्थि णो चेवणं तेसिं मणुयाणं आबाहं वो जाव प गइ भद या णं ते बोलगगणा पण्णत्ता ॥ ॥सू०३१॥ - छाया - सन्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे गर्ता इति वा, दर्य इति षा, अवपाता इति वा, प्रपाता इति वा, विषमानिति वा, विजलानिति वा,? नो अयमर्थः समर्थः, भरने वर्षे बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः, तद्यथा नामकम्-आलिङ्गपुष्कर इति वा० । सन्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे स्थाणव इति वा कण्टका इति वा तृणानीति वा कचवरा इति वा ? नो अयमर्थः समर्थः, व्यापगतस्थाणुकण्टक तृण कचधरा खलु सालमा प्रज्ञप्ताः । सन्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे दशा इति वामशका इति वा पिशुका इति वा ? नो अयमर्थः समर्थः, व्यपगतदंशमक यूकालिक्षाढिकुणपिशुका, उपद्रवविरहिता खलु सा समा प्राप्ताः । सन्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे अहय इति वा अजगरा इति वा ? हन्त ! सन्ति नो चैव खलु तेषां मनुजानाम् आवाधां वा यावत् प्रकृतिभद्रकाः खलु व्यालकगणाः प्रक्षप्ताः ॥३१॥ टीका-'अस्थि णं' इत्यादि ।। 'अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे गड्डाइवा' हे भदन्त ? सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे गर्ता इति वा ? गर्ताः 'गढ्ढा-खड्डा' इति भाषा प्रसिद्धाः, 'अस्थिणं भंते तीसे समाए भरहेवासे' इत्यादि टीकार्थ-'पस्थिणं भंते तीसे समाए भरहे वासे गड्डाइ वा दरीइ वा" गौतम स्वामीने इस सूत्र द्वारा प्रभुसे ऐसा पूछा है हे भदन्त क्या उस काल में सुषमसुषमा नामक आरे में इस भरत क्षेत्रमें गहे 'अस्थि ण भंते तीसे समाए भरहे वासे गडाइ वा दरीहवा' इत्यादि सूत्र ३१॥ टी-डवे गौतम मा सूत्रपडे प्रभुने यातना प्रश्न छ, 'अस्थिण भंतेतीसे समाए भरहे वासे. महन्त ! मां सुषम सुषमा नामना मारामा मारत क्षेत्रमा "३६ Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिस्त्रे 'दरीइवा ओवायाइ वा पवायाइ विसमाइ वा विज्जलाइवा' दर्यवपात प्रपातविषमविजला. नीति वा । तत्र-दरी कन्दरा, अवपातः-अवपतन्ति जना यत्र सोऽवपातः, यत्र सपकाशेऽपिचलन् जनः पतति सोऽवपातो बोध्यः, प्रपातः = भृगुः प्रपातस्त्वतटो भृगुः' इत्यमरः विषमं आरोहावरोहौ यत्र स्थाने दुःशौ भवतस्तत्स्थान विषममित्युच्यते विज लं चिक्कणकर्दमसंवलिस्थानं, यत्र हि जनोऽतर्कित एव पततीति । 'णो इणढे समढे' नो अयमर्थः समर्थः यतः खलु 'भरहे वासे' भरते वर्षे तस्यां समायां 'बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते' 'बहुसमरमणीयो भूमि भागः प्रज्ञप्तः । तत्र-औपम्यमाह-'से जहा णामए' तद्यथा नामकम् 'आलिंगपुक्खरेइवा' आलिङ्गपुष्कर इति वा । अयं वर्णकग्रन्थः पूर्ववद् बोध्य इति । पुनगौतमस्वामी पृच्छति 'अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे बासे खाणूइवा' हे भदन्त सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे स्थाणव इति वा ? स्थाणू शाखापत्ररहिनतरुः 'कंटगाइ वा तणाइ वा तत्र कण्टकाः प्रसिद्धाः, तृणानि प्रसिदानि, कचवराः अवस्कराः 'कचरा इात भाषा प्रसिद्धाः। भगवानाह-'णो इणढे सम?' नो अयहोते है दरी कन्दराएँ होती है ! अवपात-दिन में भी चलता हुआ मनुष्य जिसमें गिर जाता है ऐसे छिपे हुए गुप्त गढे होते हैं? प्रपात-भृगु होते है विषमस्थान-जहां चढना और उतरना मुश्किल से हो ऐसे स्थान होते हैं ? एवं विजलस्थान-चिकनी कीचड़वाले स्थान होते हैं ! इसके उत्तरमें प्रभु कहते हैं-हे गौतम ! “णों इणढे समठे"यह अर्थ समर्थ नहीं है--अर्थात् उस कालमें भरत क्षेत्रमें ऐसे स्थान नहीं होते हैं, क्योंकि उस समय तो भरत क्षेत्रमें बहुसम रमणीय भूमिभाग होता है। "से-जहाणामए अलिंगपुक्खरेइ वा०" और वह भूमिभाग ऐसा बहुसमरमणीय होता है कि जैसा मृदंगका मुखपुट होता है, इस सम्बन्ध का वर्णन करेने वाला सूत्रपाठ पहिले लिखा जा चुका है। अब पुनः गौतमस्वामी प्रभुसे ऐसा पूछते हैं-"अस्थि ण भंते तीसे समाए भरहे वासे खाणड वा कंटगतणय कयवराइ वा० इत्यादि" हे भदन्त ! उस काल में इस भरत क्षेत्र में क्या स्थाणुशाखा पत्र आदि से रहित वृक्ष होते हैं ? कंटक होते हैं ? कचवर-कूडा कर्कट आदि होता है ! ખાડાઓ હોય છે દરી કંદરાઓ હોય છે? અપાતે દિવસે પણ ચાલતા માણસે જેમાં પડી જાય છે. એવાં ગુપ્ત ખાડાઓ હોય છે ? પ્રપાત ભૂગ હોય છે ? વિષમસ્થાનો જ્યા ચઢવું અને ઉતરવું કઠણ છે એવા સ્થાને હોય છે ? અને વિજલસ્થાને ચીકણુ કાદવવાળા સ્થાનૈ હોય छ ! सेना समां प्रभु ४ छ, गौतम ! 'णो इणहे समढे' । अर्थ समथ नथा. એટલે કે તે કાળમાં ભરતક્ષેત્રમાં એવા સ્થાને હોતા નથી કેમકે તે કાળે તે ભરતક્ષેત્ર બહુ सभरमणीय भूमिमाथा सुशामित डाय छे. 'से जहा णामए ओलिंगपुक्खरेड वा." अन તે બમિભાગ એ બહુસમરમણીય હોય છે કે જે મૃદંગને મુખપુટ હોય છે. એનાથી સમ્બદ્ધ સૂત્રપાઠ પહેલાં લખવામાં આવ્યા છે. वे श गौतम ने मारीत प्रश्न रे 'अस्थि णं भंते तीसे समाए भरहे घासे खाणूह वा कंटग तणय कयवराइ वा.' इत्यादि महन्त ! ते मा भरतक्षेत्रमा શું સ્થાણુઓ શાખાં પત્ર રહિત વૃક્ષો હોય છે ? કાંટાએ હોય છે ? તૃણ વાસ હોય છે Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ३१ गड्डादिविषयप्रश्नोत्तराणि २८३ मर्थ; समर्थः, यतो हे गौतम 'सा णं समा' सा सुषम सुषमाख्या समा खलु 'ववगय खाणु कंटगतण कयवरा' व्यपगत स्थाणुकण्टकतृणकचवरा-व्यपगताः दूरीभूताः स्थाणुकण्टक तृणकचवरा यस्यां सा तथाभूता स्थाणुकण्टकादिरहितेत्यर्थः, 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः । पुनौतमस्वामी पृच्छति-'अस्थि णं भंते तीसे समाए भरहे वासे डंसाइवा' हे भदन्त सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे दंशा इति वा दंशाः डांस इति भाषा प्रसिद्धाः 'मसगाइवा' मशका इति वा मशकाः 'मच्छर इति प्रसिद्धाः, 'जूआइवा यूकाइति वा ? यूकाः-जूं इति भाषा प्रसिद्धाः, 'लिक्खाइवा' लिक्षा इति वा 'लीख' इति भाषा प्रसिद्धाः 'ढिंकुणाइ वा' टिंकुणा इति वा डिंकुणाः मत्कुणाः, 'मक्कुणए ढिंकुणा तहा ढंकणी पिहाणीए' इति देशीनाममाला 'पिसुआईवा' पिशुका इति वा। पिशुकाः 'पिस्सू सुल्ला' इति भाषाप्रसिद्धाः भगवानाह 'णो इणढे समटे' नो अयमर्थः समर्थः यतो हे गौतम 'सा णं समा' सा सुषम सुषमा समा खलु 'ववगयडंसमसगजूअलिक्खटिंकुण पिसुआ' व्यपगतदंशमशक यूकालिक्षार्दिकणपिशुका अत एव 'उवद्दवविरहिया पण्णत्ता, उपद्रवरहिता प्रज्ञप्ताः । पुनर्गौतम स्वामी पृच्छति 'अत्थि णं भंते ! इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-हे गौतम ! “णो इणटे समढे" यह अर्थ समर्थ नहीं. अर्थात उसकाल में भरत क्षेत्र में स्थाणु भादि कुछ भी नहीं है. क्योकि “ववगयखाणु कंटक." सुषमसुषमा नाम का आरा स्थाणु, कण्टक, तृण और कचरा आदि से सर्वथा रहित ही होता है. ____ अब पुनः गौतमस्वामी प्रभु से ऐसा पूछते हैं- "अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे डंसाइ वा, मसगाइ वा जूआइ वा, लिक्खाइ वा०, इत्यादि-हे भदन्त ! उसकालमें इस भरतक्षेत्र में दंश-डोस, मशक-मच्छर, यूक-जू, लिक्षा-लीखें टिंकुण-खटमल एवं पिशुक-पिस्सू होते हैं क्या ! इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं हे गौतम ! “णो इणटे समढे" यह अर्थ समर्थ नहीं है अर्थात् उस काल में भरत क्षेत्र में डांस, मच्छर आदि जीव नहीं होते हैं, क्योंकि "ववगय डंसमसकजुअ लिक्व०" वह काल ही ऐसा होता है कि जिसमें ये उपद्रवकारी जीव भरतक्षेत्र में उत्पन्न नहीं होते हैं । पुनः अब गौतम स्वामी प्रभु से पूछते हैं “अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भने ज्य: न्य। बगैरे डायछे १ सेना वासभा प्रभु ४३ छ गौतम ! यो पर ' આ અર્થ સમર્થ નથી એટલે કે તે કાળમાં ભરતક્ષેત્રમાં સ્થાણું વગેરે કઈ પણ હોત નથી કેમકે ઘર arg દવે સુષમસુષમાં નામે ક્રાળ સ્થાણુ કંટક તૃણ કચવ વગેરેથી सया २डित डाय छे. वे श गौतम प्रसुने अवी Na छ'अस्थिभंते! तीसे समाए भरहे वासे डंसाइ वा मसगाइ वा जूआइ वा लिक्खाइ वा' इत्यादि" 8 ભક્ત! તે કાળમાં તે ભરતક્ષેત્રમાં દંશ મશક મચ્છ૨ યુક જૂ શિક્ષા લીખ ઢિંકણ માંકડ અને પિશુક ડાંસે હોય છે? એના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે, गीतम! "णो इणठे समठे" मा अर्थ समय नथी खेतमा भरतक्षेत्रमा स. भर७२कोरेलवडत नथा, ४२ "बवगय डसमसकलिक्ख०, इत्यादि"त કાળ જ એ હોય છે કે જેમાં એ ઉપદ્રવકારી જી ભરતક્ષેત્રમાં ઊત્પન્ન જ થતાં નથી, शव गौतम स्वामी प्रभुने प्रश्न ४रे छे “अत्थि णं भते! तीसे समाए भरहे वासे Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तीसे समाए भरहे वासे अहीइवा' हे भदन्त सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे अहय इति वा अहयः सर्पाः 'अयगराइवा' अजगरा इति वा अजगराः प्रसिद्धाः । भगवानाह 'हंता अस्थि' हन्त सन्ति अहयोजगराश्च 'णो चेव णं तेसि मणुयाणं आबाहं वा जाव' नो चैत्र खलु तेषां मनुजानाम् आबाधाम् ईषद्वाधां वा यावत् - यावत्पदेन व्याबाधां वा छबिच्छेदं वा उत्पादयन्ति इति संग्राह्यम् ततः व्याबाधां विशेषेण बाधांवा छविच्छेदं पाटनं वा उत्पादवन्ति जनयन्ति । अत्र हेतुवाक्यमाह 'पगइभदया णं ते वाळगगणा पण्णत्ता' प्रकृति भद्रकाः खलु ते व्यालकगणाः प्रज्ञप्ताः कथिता इति ॥ ०३१ ॥ मूलम् - अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे डिंबाइ वा डमराइ वा कलहाइ वा बोलाइ वा खाराइ वा वइराइ वा महाजुद्धाइ वा महासंगामाइ वा महासत्थपडणाइ वा महापुरिसपडणाइ वा महारुहिरणिवडणाइ वा ? गोयमा ! णो इणट्टे समट्ठे ववगयवेरानुबंधाणं ते म शुआ पण्णत्ता | अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे दुब्भूयाणी वा कुलरोगाइ वा गामरोगाइ वा मंडलरोगाइ वा पोट्टरोगाइ वा सीसवेणयाइ वा कण्णोड अच्छिणह दंतवेयणाइ वा कासोइ वा सासाइ वा सोसाइ वा दाहाइ वा अरिसाइ वा अजीरगाइ वा दओदराइ वा पंडुरोगाइ वा भगंदराइ वा एगाहियोइ वा वेयाहियाइ वा तेथाहियाइ वा चउत्थाहियाइ वा ईदग्गहाइ वा धणुग्गहाइ वा खंदग्गहाइ वा कुमारग्गहाइ वा जक्खग्गहाइ वा भूयग्गहाइ वा मत्थयसूलाइ वा हिययसलाइ वा पोट्टसूलाइ वा कुच्छिसूलाइ वा जोणिसूलाइ बा भर वासे अह वा अयगराइ वा ", हे भदन्त ! उस आरे में भरत क्षेत्रमें क्या सर्प एवं अजगर होते हैं ? उत्तरमें प्रभुश्री कहते हैं "हंता, अत्थि णो चेव णं तेसिं मणुयाणं आबाहं वा जाव पगइ भयाणं ते वालगगणा प० " हां गौतम ! उस काल में भरत क्षेत्र में सर्प और अजगर ये सब होते हैं परन्तु वे उन मनुष्यो को थोड़ा सा भी कष्ट नहीं देते हैं और न वे किसी को विशेष पीडा ही देते हैं, क्योंकि वे सब सर्प आदि स्वभावतः ही भद्र होते हैं ॥ ३१ ॥ अहीर वा अयगराइ वा हे महन्त ! ते भारामां भरतक्षेत्रमां शु सर्प ने अगरे। डाय हे वाणमां प्रभु उडे छे: "हंता, अस्थि णो चेव णं तेसि मणुयाणं आबाहंवा जाव पायाणं ते वालगगणा प० डा, गौतम ! ते अणुभां भरतक्षेत्रमां सर्प ने अગર એ સર્વ જીવા હાય છે પણ તે જીવા માસાને સહેજ પણ કષ્ટ આપતા નથી અને ઢાઈ ને વિશેષ કષ્ટ પણ આપતાં નથી કારણ કે એ સવ` સપ વગેરે સ્વભાવતઃ ભદ્ર હાય છે सू० ३१॥ Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्विवक्षस्कार सू. ३२ डिंबादिविषयक प्रश्नोत्तराणि गाममारीइवा जाब सण्णिवेसमारोइ वा पाणिक्खया जणक्खया कुलक्खया वसणब्भयमणारिया ? गोयमा ! णो इण8 समढे, ववगयरोगायंका णं ते मणुया पण्णत्ता समणोउसो ! ॥सू० ३२॥ छाया-सन्ति खलु भदन्त ! तस्यां समायां भरते वर्षे डिम्बा इति वा डमरा इति वा कलहा इति वा बोला इति वा क्षारा इति षा वैराणीति वा महायुद्धानीति वा महासंग्रामा इति वा महाशस्त्रपतनानीतिः महापुरुषपतनानीति वा महारुधिरनिपतनानोति वा गौतम ! नो अयमर्थः समर्थः व्यपगतषैरानुबन्धाः खलु ते मनुजाः प्राप्ताः । सन्ति खलु भवन्त ! तस्यो समायां भरते वर्षे दुर्भूतानीति था कुलवरोगा इति वा प्रामरोगा इति वा मण्डलरोगा इति वा पोट्टरोगा इति वा शीर्षवेदनेति वा कौँ ष्ठाक्षिनखदन्तवेदनेति वा कास इति वा श्वास इति वा शोष इति वा दाह इति वा अर्श इति बा अजीर्णमिति वा दकोदरम् इति वा पाण्डुरोग इति वा भगन्दर इति वा पेकाह्निक इति वा द्वैयाह्निक इति वा त्रैयाहिक इति वा चतुर्थाह्निक इति वा इन्द्र ग्रह इति वा धनुग्रह इति वा स्कन्दग्रह इति वा कुमार ग्रह इति वा यक्षग्रह इति वा भूतग्रह इति वा मस्तकशुलमिति वा हृदय शूलमिति घा पोशूमिति वा कुक्षिशलमिति वा योनिशुलमिति वा ग्राममारिरिति वा यावत्संनिवेशमारिरिति वा प्राणिक्षया जनक्षयाः कुलक्षयाः व्यसमभूता अनार्याः गौतम ! नो अयमर्थः समर्थः व्यपगतरोगातकाः खलु ते मनुजाः प्राप्ताः श्रमणायुष्मन् ॥सू० ३२॥ टीका-'अस्थिणं' इत्यादि। 'अत्थिणं भंते! तीसे समाए भरहे वासे डिंबाइवा' हे भदन्त ! सन्ति खलु तस्यां समायां भरते वर्षे डिम्बा इति वा ? डिम्बा: भयानि, 'डमराइवा' डमरा इतिवा ? डमरा: राष्ट्रे बाह्याभ्यन्तरा उपद्रवाः, 'कलहाइवा बोलाइवा खाराइवा वइराइवा महाजुद्धाइवा' कलह बोल क्षार वैर महायुद्धनीतिवा ? तत्र कलहाम्वाचिकः, बोला-बहुजनानां सम्मिलित आर्तध्वनिः, क्षारः-अन्योऽन्यमात्सर्यम् वैरं-शत्रुता असहनतयाऽन्योऽन्यं "अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे डिंबाइ वा डमराइ वा' इत्यादि । टीकार्थ-"तब गौतमस्वामी ने प्रभु से ऐसा पूछा है-हे भदन्त ! क्या उस सुषम सुषमा नाम के मारे में इस भरत क्षेत्रमें डिम्ब उपद्रव होते हैं ! डमर-राष्ट्र में भीतरी उपद्रव और बाहिरि उपद्रव होते हैं ! "कलहबोल खारवहर महाजुद्धाइ वा महासंगामाइ वा महासत्थ पडणाइ वा महापुरिसपडणाइ वा ?' कलह वाग्युद्ध होता है ? बोल अनेक मनुष्यों की संमिलितरूप में आतथ्वनि होती 'अस्थि भंते ! तीसे समाप भरहे वासे डिबाइ वा डमराइ वा' इत्या सू०३२॥ ટીકાથ-હવે ગૌતમે પ્રભુને એ જાતને પ્રશ્ન કર્યો છે હે ભદન્ત ! શું તે સુષમસુષમાનામના આરામાં આ ભરતક્ષેત્રમાં ડિબ–પ – હોય છે ? ડમરે-રાષ્ટ્રમાં અંદરો અંદર उपद्रव भने माखरी अपद्रवा डाय छे ? "कलहबोल खारवार महाजुद्धाइ वा महासंगामाह वा मरा सत्थपडणाइ वा महापुरिसपडणार वा ! " -पायुद्ध साय छे मास-ध। મનુષ્યને એકી સાથે ઘંઘાટ [અતિ દેવનિ] હેય છે ખાર–પરપર ઇર્ષાભાવ હોય છે વૈર - Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे हिंस्यहिंसक भाव इति, महायुद्ध व्यहनिरपेक्षो व्यवस्थारहितो महारण:, 'महासंगामाइवा' महासङ्ग्रामा इतिवा ? महासङ्ग्रामा:-चक्रव्यूहादि रचनाविशिष्ट-व्यवस्थासहिता महारणाः, 'महासत्थपडमाइवा' महाशस्त्रपतनानोतिवा। महाशस्त्राणि-अत्र शस्त्रशद्वेन अस्त्राणि ग्रद्यन्ते तेन महाशस्त्राणां पतनानि। अत्र अस्त्राणि दिव्यान्यस्त्राणि नागवाणादीनि, अति विस्मयजनक विचित्रशक्तियुक्तत्वादेतेषां महाशस्त्रत्वम् तेषु महाशस्त्रेषु । नागवाणा अधिज्ये धनुषि समारोप्य प्रक्षिप्ताः ज्वालामालाऽऽकुलिता असखोल्का दण्डरूपा, सन्तः शत्रुशरीरे सम्यइनागमूर्तयो भूत्वा शत्रु शरीराणि पाशरूपतया निबध्नन्ति । वायुवाणाश्च प्रचण्डं वायुमुत्पाद्य शत्रून् धृल्यादिभिरन्धीकृत्य युद्धाक्षमान् कुर्वन्ति । अग्निबाणास्तु प्रचण्डाग्नि ज्वालावर्षणेन शत्रुन् निर्दहन्ति । तामसवाणाः शत्रुपक्षे निबिडमन्धकार मुत्पाद्यहै ? खार-आपस में ईर्ष्याभाव होता है ? महायुद्ध व्यूह रचना से हीन एवं व्यवस्था से रहित महारण होते है ! महासंग्राम चक्रव्यूह रचना से सहित एवं विशेषव्यवस्था से युक्त ऐसे बढे २ युद्ध होते हैं ? महाशस्त्रो का पतन होता है ? यहां शस्त्र शब्द से भत्रों का ग्रहण हुआ है ये अस्त्र नाग बाण आदि दिव्य अत्ररूप से यहां प्रकट किये गये हैं, इन्हें जो महाशस्त्र शब्द से कहा गया है उसका कारण यह है कि ये अति विस्मय जनक विचित्र शक्ति से युक्त होते हैं इनमें जो नाग वाण होते हैं वे जब प्रत्यञ्चायुक्त धनुष पर आरोपित कर छोडे जाते हैं तब उनमें से ज्वालाएँ निकलती हैं, लकीरके रूपमें आकाशसे घिरे हुए तेजसमूहसे ये युक्त हो जाते हैं और फिर शत्रु के शरीर में प्रविष्ट होकर ये नाग के रूप में बनकर उस शत्रु के शरीर को चारों ओर से जकड़ लेते हैं वायु वाण जो होते हैं वे प्रचण्ड वायु को उत्पन्न करके शत्रु को धूलि आदि के द्वारा अन्धा बना कर उसे युद्ध करने में असमर्थ बना देते हैं, अग्नि वाण जो होते हैं वे प्रचण्ड अग्नि ज्वाला की वर्षा करते हैं और उससे शत्रु को दग्ध कर देते हैं, तामसवाण जो होते हैं પરસ્પર અસહનશીલ હોવાથી હિંસ્યહિંસક ભાવ હોય છે? મહાયુદ્ધ વ્યુહ રચનાથી રહિત અને વ્યવસ્થા વગરનું મહારણું હોય છે? મહાસંગ્રામ–ચક્રવ્યુહ રચના સહિત તેમજ વિશેષ વ્યવસ્થા સાથે મહાયુધો હોય છે, મહાશસ્ત્રોનું પતન હેય છે, અહીં શસ્ત્ર શબ્દથી અસ્ત્રનું પણ ગ્રહણ થયેલ છે. એ શસ્ત્રો અહીં નાગ બાણ વગેરે દિવ્ય અસ્ત્રોના રૂપમાં પ્રગટ કરવામાં આવ્યાં છે એમના માટે જે મહાશસ્ત્ર શબ્દનો પ્રયોગ કરવામાં આવ્યા છે તેનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે એ એ અદૂભૂત શક્તિસંપન્ન હોય છે એમાં જે નાગબાણે છે તે જયારે પ્રત્ય ચા યુક્ત ધનુષ પર આરોપિત કરીને છેડવામાં આવે છે ત્યારે તેમાં જ્વાલાઓ નીકળે છે લીટીનાં રૂપમાં આકાશમાંથી નીચે પડતા તેજ સમૂહથી એ સંપન્ન હોય છે અને શગુના શરીરમાં પ્રવિણ થઈને એ નાગ રૂપે પરિણત થાય છે અને તેના શરીરને ચારે તરફથી આબદ્ધ કરી લે છે જે વાયુબાણ હોય છે તે પ્રચંડ વાયુ ને ઉત્પન્ન કરીને શત્રુને ધૂળ-મારી વગેરેથી અંધ બનાવીને તેને યુદ્ધ કરવામાં અસમર્થ બનાવી દે છે. જે અગ્નિ બાણ હોય છે તે પ્રચંડ અગ્નિ જવાલાની વર્ષા કરે છે અને તેનાથી શત્રુને દગ્ધ કરી નાખે Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३२ डिम्बादिविषयक प्रश्नोत्तराणि तान् शत्रून् किङ्कर्त्तव्यविमूढान् कुर्वन्ति । गरुड पर्वतादि महास्त्राण्यपि स्वस्वनामानुरूपकार्याणि कृत्वा शत्रुदले विघ्नमुत्पादयन्तीति बोध्यम् । उक्तंच - “चित्रंश्रेणिक ! ते बाणा भवन्ति धनुराश्रिताः । उल्कारूपाश्च गच्छन्तः शरीरे नागमूर्त्तयः ॥ १ ॥ क्षणं बाणाः क्षणं दण्डाः क्षणं पाशत्वमागताः । आमरा ह्यस्त्रभेदास्ते यथाचिन्तितमूर्तयः ॥ २ ॥ 'महा पुरिस पडणार वा' महापुरुषपतनानीति वा - महापुरुषपतनानि - महापुरुषा :राजप्रभृतयः, तेषां पतनानि - युद्धादौ कालधर्मप्राप्तयः, 'महारुहिरणिवडणाइ वा महारुरिनिपतनानीति वा ?, महारुधिराणां - राजादिरुधिराणां निपतनानि - प्रवाहरूपेण वहनानि । भगवानाह - 'गोयमा ! णो इणट्ठे समट्ठे ' हे गौतम ! नो अयमर्थः समर्थः, 'ववगयवेराणुबंधाणं ते मणुया' यतस्ते खलु मनुजा व्यपगतवैरानुबन्धाः - व्यपगतो- दूरीभूतो वैरस्य शत्रुताया अनुबन्ध: - सम्बन्धो येभ्यस्ते तथाभूताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः । पुनर्गौतमपृच्छति-'अत्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे दुब्भूयाणी वा' हे भदन्त ! सन्ति २८७ शत्रुपक्ष में गहन अन्धकार उत्पन्न करके शत्रुओं को किंकर्तव्यविमूढ़ बना देते हैं, इसी तरह जो गरुड़ास्त्र एवं पर्वतास्त्र होते हैं वे भी अपने अपने नामके अनुरूप कार्य करके शत्रुदल में विघ्न बाधाओं को उपस्थित करते हैं उक्तं च - चित्रं श्रेणिक ! ते बाण भवन्ति धनुराश्रिताः । उल्कारूपाश्च गर्जन्तः शरीरे नागमूर्त्तयः || १ || क्षणं बाणाः क्षणं दण्डा क्षणं पाशत्वमागताः । आमरा ह्यस्त्रभेदास्ते यथाचिन्तितमूर्त्तयः ॥२॥ महापुरुषों का पतन होता है ? राजा आदि जनो को यहां महापुरुष शब्द से कहा गया है तथा च राजा आदि महापुरूषों की उस काल में भरतक्षेत्र में युद्ध के अवसर में मृत्यु होती है ? महारुधिर का पात होता हैं ? प्रवाहरूप से रक्तपात होता हैं ? इस प्रकार के इन प्रश्नों के उत्तर में प्रभु गौतम से कहते हैं हे गोतम ! " णो इणडे समङ्के " यह अर्थ समर्थ नहीं है क्योकि "ववयवेराणुबंधाणं ते मणुया पण्णत्ता" उस काल के होते हैं, अब गौतमस्वामी पुनः ऐसा पूछते हैं "अत्थिणं भंते ! तीसे मनुष्य वैरभाव से रहित समाए भरहे वासे दुब्भू છે. જે તામસ મખાણુ હાય છે તે શત્રુ પક્ષમાં પ્રગાઢ અંધકાર કતવ્ય વિમૂઢ મનાવી મૂકે છે આ પ્રમાણે જે ગરૂડાસ્ર અને તપેાતાના નામની વિશેષતા મુજબ કાર્ય કરીને શત્રુલમાં अत्पन्न १२ छ. उक्तंचः चित्रं श्रेणिक ! ते वाणा भवन्ति धनुराश्रिता: । उल्कारूपाश्च गच्छन्तः शरीरं नगमूर्तयः ॥१॥ क्षणं बाणः क्षणं दण्डाः क्षण पाशत्वमागताः । आमरा ह्यस्त्र मेदास्ते यथाचिन्तित मूर्तयः ॥ २॥ મહાપુરુષોનું પતન હાય છે ? રાજા વગેરે લેાકેાને અહીં મહાપુરૂષ શબ્દ વડે સમાપ્તિ કરવામાં આવ્યા છે. તેમજ રાજા વગેરે મહાપુરૂષનુ તે કાળમાં શરતતીર્થમાં યુદ્ધનાસમયે મત્યુ થાય છે ? મહારક્તપાત થાય છે ? વાહુરૂપમાં રક્તપાત થાય છે ? આપ્રમાણે એ પ્રાનાना उत्तरमा प्रभु गौतमने हे हे हे गौतम! "णो इण्ठे समडे" आ अर्थ समर्थ नथी ઊત્પન્ન કરીને શત્રુઓને કિ પ તામ્ર હાય છે તે પણ પે અનેક જાતની વિઘ્ન-માયાએ भट्ठे 'ववगय वेराणुबंधा णं ते मणुआ पण्णत्ता" ते अजना मनुष्यो वेलावथी रडित हाय छे. हवे गौतम स्वामी दूरी भी तो प्रश्न हे “अस्थि णं भंते ! तीसे } Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८८ 'जम्बूद्वीपतिसूत्रे खलु तस्यां समायां भरते वर्षे ?, दुर्भूतानीति वा? दुर्भूतानी= दुष्टानि भूतानि = प्राणिन:, धान्यादि हानिकारिणः शलभादयः, ईतय इति भावः, ईतयश्च -- अतिवृष्टिनावृष्टिर्मूषिकाः शलभाः शुकाः । अत्यासन्नश्च राजानः षडेता इतयः स्मृता ॥१॥ तथा - 'कुलरोगाइवा' कुलरोगा इतिवा ? कुलरोमा:=कुलपरम्परयाऽऽगता रोगाः, 'गामरोगाड़वा' ग्रामरोगा इतिवा' | ग्रामरोगाः - ग्रामव्यापिनो रोगाः - विषूचिकादयः, मंडळ रोगाइवा' मंडलरोगा इतिवा ? मण्डलं = ग्रामसमूहस्तद्व्यापिनो रोगाः - विषूविकादयः, 'पोरोगाइवा' पोरोगा इति वा ? पोट्टरोगाः - उदररोगाः, 'सीसवेयणाइवा' शीर्षवेद तिवा ? शीर्षवेदना - मस्तकपीडा, 'कण्णौच्छिणहवंतवेपणाइवा' कर्णौष्ठाक्षिनखदन्तवेदना इतिवा ? कठाक्षिनखदन्ता प्रसिद्धाः, तत्र वेदनाः पीडाः, 'कासाइवा' कास इतिवा ? कासः - कासरोगः 'खांसी' इति भाषा प्रसिद्धः, 'सासाइवा' श्वास इति बा ? श्वासः - श्वासरोगः, 'सोसाइ वा' शोष इति वा ?, शोषः - क्षयरोगः, 'दाहाई वा' दाह इति वा ? दाहः - दाहरोगः, 'अरिसाइ वा' अर्श इति वा?, अर्शों-गुदाङ्कुरः, 'बवासीर, मसा' इति' भाषा प्रसिद्ध:, 'अजीरगाइ वा' अजीर्णमिति वा ? अजीर्णम् - अजीर्णरोगः, 'दओदराइ वा' दकोदर मिति वा ? दकोदरं-जलोदरम् 'पंडुरोगाइ वा पाण्डुरोग इति वा १, पाण्डुरोगः प्रसिद्धः, 'भगंदराइ वा' भगन्दर इति वा ? भगन्दरः प्रसिद्धः, 'एगाहिआणि वा कुलरोगाइ वा, गामरोगाइ वा, मंडल रोगाइ पोटरोगाइ वा, सीसवेयणाइ वा, कण्णे अच्छिदंत वेणाइ वा, कासाइ वा सासाइ वा सोसाइ बा, हे भद्रन्त ! उस काल में भरतक्षेत्र में दुष्टभूत धान्यादि को हानि पहुँचाने वाले शलभ आदि रूप इतियां होते हैं ? उक्तं च"अतिवृष्टिरनावृष्टिर्भूषिकाः शलभाः शुकाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता इतयः स्मृताः ॥१ ॥ कुलरोग - कुलपरम्परा से आये हुए रोग है ? ग्रामरोग ग्रामव्यापी रोग विषूचिका आदि हैं मण्डलरोग अनेक ग्राम में व्यापीरोग वगैरह होते हैं पोहरोग उदरव्याधि, शीर्षवेदना, ओष्ठ बेदना, अक्षिवेदना, नस्ववेदना, एवं दन्तवेदना, ये सब वेदनाएँ होती है ! लोगो में खांसी होती हैवास रोग होता है क्षयरोग होता हैं "दाहाइ वा अरिसाइ वा, अजोरगाइ वा, दओदराइवा पंडुरोगाइवा, भगंदराइवा, ऐगाहिआइ वा, महिमाइ वा तेआहियाइ वा चत्थसमाप भर वासे दुम्भूआणि वा कुलूरोगाइ वा गामरोगाहवा, मंडलरोगाश्वा, पोड रोगाश्वा, सीसवेयणाइ वा, कण्णोड मच्छिणहृदंत वेथणाइबा कासार वा सासार वा सो ' ! ते अणे भरतक्षेत्र मां दुष्टलूता - धान्याहिने तुम्सान पडोयाउनारा શલભ વગેરે ઇતિએ-હાય છે ? ઊક્ત ચા अतिवृष्टिरनावृष्टिमूषिकाः शलभाः शुकाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता इतयः स्मृताः ॥ १॥ કુલરાગા—કુલપર પરાગતરાગ-હાય છે ગ્રામરાણ ગ્રામવ્યાપીરાગ-વિચિકા વગેર ડાય છે મંડલરેગ અનેક ગામામાં વ્યાર્ થાય તેવા કાલેરા વગેરે રાગ-ડાય છે, પાક રાગ—ઉદર વ્યાધિ શીષ વેદના કણુ વેદના એષ્ઠ વેદના અસ્થિ વેદના નખવેદના અને દન્તવેદના એ સવવેદનાએ હાય છે ? લોકોને ઉપશ્ય હોય છે ? શ્વાસરોગ હોય છે, ક્ષય રોગ होय छे, “दाहार वा अरिसाई वा अजीरग्गाई बा, दमोदरार वा पंडरोगार वा मद Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-हि- वक्षस्कार सू. ३२ डिम्बादिविषयकप्रश्नोत्तराणि २८९ या वा' एकाकि इति वा ?, एकाह्निकः - एकदिवसान्तरेण जायमानो ज्वरः, 'वेयाहिया वा' द्वैयाह्निकइति वा : द्वैयाह्निक' - द्वि दिवसान्तरेण जायमानो ज्वरः, 'तेयाहिया इवा' त्रैयह्निक इति वा १, त्रेपाह्निक:- दिवसत्रयान्तरेण जायमानो ज्वरः, 'चउत्थाहियाइवा' चतुर्थी इति वा ?, चतुर्थाह्निकः - चतुर्थ दिवसं व्यवधाय जायमानो ज्वरः, 'इंदuresar' इन्द्रग्रह इति वा ? इन्द्रग्रह : - इन्द्रावेशः, 'धणुग्गहाइवा' धनुग्रहइतिवा धनुर्ग्रहः - वातविशेषः, 'खंदग्गहाइवा' स्कन्दग्रह इति वा ! स्कन्दग्रह: - स्कन्दावेशः, 'कुमारहाइवा' कुमार ग्रह इति वा ? कुमारग्रहः - कुमार नामक यक्षविशेषावेशः, 'जक्खग्गहाइवा' यक्षग्रह इति वा ? यक्षग्रहः - यक्षावेशः, 'भूयग्गहाइवा' भूतग्रह इति वा ?, भूतग्रहःभूतावेश, एते इन्द्रग्रहादय उन्मादहेतवो बोध्या इति, तथा 'मत्थयसलाइवा' मस्तकशूलमिति वा ?' मस्तकशूलम् - मस्तके जायमानः शुल नामको रोगविशेषः, 'हिययसूलाइवा' हृदयशूलम् इति वा ? हृदयशूलं - हृदये जायमानः शूलरोगः . ' पोट्टसलाइवा' पोट्टशूलमिति वा ?, पोट्टशूलम् - उदरे जायमान शूलरोगः, 'कुच्छिलाइवा' कुक्षिशूल मितिहिआइ वा " दाहरोग होता है अर्शरोग-बबासोर होता है अजीर्ण होता है ? जलोदर होता है ? पाण्डुरोग होता है ? भगन्दर होता है ? एक दिन छोडकर आनेवाला ज्वर होता है ? दो दिन छोड कर आने वाला ज्वर होता है ? तीन दिन छोडकर आने वाला च्वर होता है ? चार दिनों को छोडकर आने वाला ज्वर होता है 'इंदग्गहाइ वा, धणुग्गहाइ वा वदग्गहाइ वा, कुमारग्गहाइ वा, जक्खग्गहाइ वा, भूअग्गहाइ वा मत्थयसूलाइ वा, हिययसूलाइ वा, पोट्टसूलाइ वा, कुच्छ - सूलाइ वा जोणिसुलाइ वा, गाममारीइ वा, जाव सण्णिवेसमारीइ वा, पाणिक्खया जणक्खया कुलकख्या, वसणब्भूयमणारिया" इन्द्रग्रह होता है ? धनुर्ग्रह होता है ! वातविशेष व्याधि होती है ? स्कन्धग्रह होता है? कुमारग्रह होता है? यक्षग्रह होता है ! भूतग्रह होता है? ये सब इन्द्रग्रह आदि उन्माद के हेतु होते है, तथा मस्तकशूल होता हैं ? हृदयशूल होता है ? पोट्टशूल उदरशूल होता है, कुक्षिराइ वा पग्गहिमाइ वा वेहिआइ वा तेहिआ वा उत्थाहिआइ वा हाड રાગ હાય છે ? અશરાગ હાય છે ? એટલેકે હરસા રાગ હાય છે ? અજીણુ હાય છે ? જળા દર હાય છે ? પાંડુરોગ હોય છે ? મગ તર હાય છે ? એક દિવસ વચમાં મૂકી દઈ ને આવનાર જવર વિશેષ એટલે કે એકાંતરિયા તાવ લેાકેાને આવે છે, ? બે દિવસ વચમાં મૂકીને આવ નાર તાવ લોકોને આવે છે, ? ત્રણુ દિવસ વચમા મૂકીને આવનાર તાવ લેાકેાને આવે છે ? ચાર हिवस वयमभूमीने भवनार ताव देने आवे है ? 'इंदग्गहाइवा, धणुग्गहाइवा खंदग्गहार वा कुमारग्गहाई वा जक्खग्गहाइ वा, भूअग्गहाइ वा मत्थयसलाइवा हियअ सुलाइ घा पोट्टसलाइवा सण्णिवेसमा कुच्छिलाइवा जोणिसूलाइवा गाममारोह वा जाव रोह वा पाणिक्या जणक्खया कुलक्खया वसणन्भूअमणारिआ ? इन्द्रग्रह होय छ ? ધનુગ્રહ હોય છે ? વાત વિશેષવ્યાધિ હોય છે ? સ્કન્દગ્રહ હોય છે ? કુમાર ગ્રહ હોય છે ? યક્ષ ગ્રહ હાય છે ભૂતગ્રહ હાય છે એ સર્વ ઈન્દ્રગ્રહ વગેરે ઉન્માદના હેતુ હાય છે ? તેમજ તે તે કાળના લેાકેાને મસ્તક શૂળ હોય છે. ? હૃદય શૂળ હાય છે ? પાટ્ટશૂળ-ઉદરશૂળ હાય ३७ Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वा, कुक्षि - कुतो जायमानः शूलरोगः, 'जोणिसूलाइ वा योनि शुलमिति वा !, योनिशुलं - योनौ जायमानः शूलरोगः, 'गाम नारीइवा' ग्राममारि रिति वा ? ग्राममारि:- रोगविशेषेण ग्रामे बहूनां मरणम्, 'जाव' यावत् - यावत्पदेन - आकरमारि रिति वा १, नगरमारीरिति वा ?, खेटमारि रिति वा ?, कर्बट मारि रिति वा ? मडम्ब मारिरिति वा ?, द्रोणमुख मारिरिति वा?, पत्तनमारिरिति वा?, आश्रममारिरिति वा ?, संवाहमारिरिति वाड, इति संग्रहः, तथा 'सण्णिवेसमारी इवा' संनिवेशमारिरिति वा !, आकरादि संनिवेशान्त शब्दानामर्थाः पूर्वमुक्ताः तेषु आकरादि सन्निवेशान्तेषु स्थानेषु मारि:- रोगविशेषेण बहुनो मरणमित्यर्थः, तथा 'वसणन्भूयं' व्यसनभूताः - जनानामापद्भूताः, 'अणारिया' अनार्याः - पापभूता: 'पाणिक्खया' प्राणिक्षया: - गवादि प्राणिनां विनाशाः, 'जणवखया' जनक्षयाः - मनुष्याणां विनाशाः, 'कुलक्खया' कुलक्षयाः - वंशविनाशाच किं भवन्ति ?. 'भगवानाह - गोयमा ! णो इणड़े समट्ठे' हे गौतम ! नो अयमर्थः समर्थः, यतो 'समणाउसो !' हे आयुष्मान् श्रमण ! 'ते णं मणुया' ते खलु मनुजाः 'ववगयरोगायंका' व्यपगतरोगातङ्काः - व्यपगता:- दूरीभूता रोगातङ्काः - षोडशविधा रोगा आतङ्काश्च येभ्यस्ते तथाभूताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ता इति ||३२|| शूल होता है, योनिशूल होता है, रोगविशेष से ग्राम में अनेक जीवो का मरना होता है, यहाँ यावत् शब्द से “आकरमारि, नगरमारि, खेटमारि, कर्बटमारि, मडम्बमारि, द्रोणमुखमारि, पत्तन, मारि, आश्रममारि, संबाहमारि" इन पदों का संग्रह हुआ हैं, तथा संनिवेशमारि होती है ? आकर से लेकर सन्निवेश पद के शब्दों का अर्थ पहिले कहा जा चुका है इन आकर आदि से लेकर सन्निवेशतक के स्थानों में जो रोगविशेष के द्वारा अनेक जीवों को मरना है वह तत्तत् मारि है तथा प्राणिक्षय होता है ? गाय आदि पशुओं का वोमारी से विनाश होता है ! जनक्षय मनु थ्यो का किसी बोमारी आदि द्वारा अकाल मरण होता है ? कुलक्षय वंशविनाश होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते है "गोयमा णो इणट्टे समट्टे" हे गौतम यह अर्थ समर्थ नहीं है क्योंकि"ववगय रोगायका णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो' हे श्रमण आयुष्मन् ! १६ प्रकार के છે. ! કુક્ષિશૂળ હોય છે. ? ચેાનિશૂળ હોય છે ? રાગ વિશેષથી ગ્રામમાં ઘણાં જીવાનુ भरगु थाय छे. ? अड्ड!' यात्रतू पहथी " आकरमारि, नगरमारि, खेटमारि, कब्बडमारि, मडम्बमारि, द्रोणमुखमारि पत्तनमारि, आश्रममारि संवाहमारि" मे पहोना संग्रह थयेव છે. તેમજ સનિવેશ મારિ હાય છે ? આકરથી સન્નિવેશ પદ સુધીના સર્વ પદ્માને અથ પહેલાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવેલ છે. એ આકરથી સન્નિવેશ સુધીના સ્થાનામાં જે રાગ વિશેષા વડે ઘણાં જીવેાનું મરણ થાય છે, તે તત્ તત્ મારિના પ્રભાવથી જ થાય છે. તેમજ પ્રાશિક્ષય થાય છે. ગાય વગેરે પશુઓને માંદગીથી વિનાશ થાય છે ? જનક્ષય-માણસેાને કાઈ માંદગી વગેરે વડે અકાલ મરણ થાય છે ? કુલક્ષય-વંશ વિનાશ થાય છે ? એના श्वाणमां प्रभु हे छे “गोयमा ! णो इणट्ठे समट्ठे' हे गौतम! आा अर्थ समर्थ नथी डेभ}'aarय रोगाय का णं ते मणुआ पण्णत्ता समणा उसो” हे श्रम आयुष्मन् १ सोज Page #305 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सू. ३३ तेषां मनुजानां भवस्थित्यादि निरूपणम् २९१ सम्प्रति तेषां मनुजानां भवस्थिति शरीरोच्चत्वादि विषयमाह-- मूलम्- तीसे तं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाणं केवइयं कालं ठिई पण्णता? गोयमा!जहण्णेणं देसूणाई तिण्णि पलि ओवमोइं उक्कोसेणं तिण्णि पलि ओवमाई । तीसे णं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाणं सरीरा केवइयं उच्चत्तेणं पण्णता ? गोयमा ! जहण्णेणं देसूणाई तिण्णि गाउयाइं उक्कोसेणं तिण्णि गाउयाइं । तेणं भंते ! मणुया किं संघयणी पण्णत्ता ? गोयमा ! वइरोसभणाराय संघयणी पण्णत्ता । तेसि णं भंते ! मणुयाणं सरीरा किं संठिया पण्णता ? गोयमा ! समचउरंस संठाणसठिया पण्णत्ता तेसि णं मणुयाणं बेछ-प्पण्णा पिट्ठकरंडयसया पण्णत्ता समणा उसो! तेणं भंते ! मणुया कोलमासे कालं किच्चा कहिं गच्छंति कहिं उववेज्जति गोयमा ! छम्मासावसेसाउया जुयलग पसवंति, एगूणपण्णं राइंदियाइं सारखंति संगोवेति सारक्खित्ता संगोवेत्ता कासित्ता छीइत्ता जंभाइत्त्म अकिट्टा अवहिया अपरियाविया कालमासे कालं किच्चा देवलोएसु उववज्जंति, देवलोयपरिग्गहाणं ते मणुया पण्णत्ता । तीसे णं भंते ! समाए भरहे वासे कइविहा मणुस्सा अणुसज्जित्था ? गोयमा ! छविहा पण्णत्ता, तं जहा पम्हगंधा १ मियगंधा २ अममो ३ तेयतली ४ सहा ५ सणिचारी ६ ॥सू०३३॥ . छाया-तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरते वर्षे मनुजानां कियन्तं कालं स्थितिः प्रशप्ताः ? गौतम ! जघन्येन देशोनानि त्रीणि पल्योपमानि, उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि । तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरते वर्षे मनुजानां शरीराणि कियन्ति उच्चत्वेन प्रज्ञप्तानि १, गौतम ! जघन्येन देशोनानि त्रीणि गव्यूतानि, उत्कर्षेण त्रीणि गव्यूतानि । ते खलु भदन्त ! मनुजाः किं संहनिनः प्रज्ञप्ताः ! गौतम ! वज्रऋषभनाराचसंहनिनः प्रज्ञप्ताः । तेषां खलु भदन्त ! मनुजानां शरीराणि कि संस्थितानि प्रज्ञप्तानि ?, गौतम ! समचतुरस्रसंस्थान संस्थितानि प्रज्ञप्तानि । तेषां खलु मनुनानां द्वे षट्र पञ्चाशत् पृष्ठकरण्डकशते प्रज्ञप्ते रोगो से और आतङ्को से ये सब रहित होते हैं अर्थात् रोग और आतङ्क सदा इनसे दूर रहा करते हैं ऐसा आगम का कथन है ।। ३२ ॥ પ્રકારના રોગો અને આતકેથી તે કાળના લોક વિહીન હોય છે. એટલે કે સદા રોગો અને આતંક એમનાથી દૂર રહે છે. એવું આગમનું કથન છે. સૂ૦ ૩રા Page #306 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे श्रमणायुष्मन् ! । ते स्त्रलु अदन्त ! मनुजाः कालमासे काल कृत्वा क्व गच्छन्ति ! क्व उत्पद्यन्ते ?, गोतम ! पण्मासावशेषायुषो युगलकं प्रसुयते एकोनपञ्चाशद् रात्रिन्दिबानो संरक्षन्ति संगोषयान्त, संरक्ष्य संगोप्य कासित्वा क्षुत्वा जृम्भित्वा अक्लिष्टा अथिता अपरितापिताः कालमासे कालं कृत्वा देवलोकेषु उत्पद्यन्ते, देवलोकपरिग्रहाः खलु ते मनुजाः प्रज्ञप्ताः । तस्याः खलु भदन्त ! समायां भरते वर्षे कतिविधाः मनुष्याः अन्वषजन् ?, गौतम ! षड्विधाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा पद्मगन्धाः १ मृगगन्धाः २ अममाः ३ तेजस्तलिनः ४ सहाः ५ शनैश्चारिणः ६ ॥सू० ३३॥ टीका-'तीसे गं' इत्यादि ।। 'तीसे णं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाणं केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता' हे भदन्त ! तस्यां खलु समायां भरते वर्षे मनुजानां कियन्तं कालं स्थितिः प्रज्ञप्ता ? भगवानाह--'गोयमा ! जहण्णेणं देसूणाई तिण्णि पलिओवमाई' हे गौतम ! जघन्येन देशोनानि त्रीणि पल्योपमानि, 'उकोसेणं तिण्णि पलिओवमाई' उत्कर्षेण च त्रीणि पल्योपमानि स्थितिस्तेषां मनुजानां प्रज्ञप्ता । अत्र ‘देशोनानि' इति विशेषणं युगलिक स्त्रियमाश्रित्य बोध्यम् । देशोनता च पल्योपमासंख्येयभागन्यूनतया वोध्या । अथ शरीरावगाहनाविषये पृच्छति—'तीसे णं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाणं सरीरा __ “तीसे णं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाणं केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता' इत्यादि । टीकाथ-"तीसे णं भंते ! समाए भरहेवासे भणुयाणं केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता" इस सूत्र द्वारा गौतमने प्रभु से ऐसा प्छा है-हे भदन्त ? उससुषमसुषमा काल में भरतक्षेत्र में मनुष्यों की स्थिति कितने काल की होती है इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं- "गोयमा जहण्णेणं देसूणाई तिण्णि पलि ओवमाई उक्कोसेणं देसूणाई तिण्णि पलिओवमाई" हे गौतम उस सुषमसुषमाकाल के समय में भरतक्षेत्र के मनुष्यो की आयु जधन्य कुछ कम तीन पल्योपम की होती है और उत्कृष्ट कुछ कम तीन पल्योपम की होती है यहां कुछ कम जो तीन पल्योपम की आयु कही गई है वह युगलिक स्त्रियों की आयु की अपेक्षा लेकर कही गई है तथा पल्योपम के असंख्यातवें भाग से जो हीनता है वही यहा कुछ कम के स्थान पर गृहीत हुई है अब गौतम शरीरावगाहना के सम्बन्ध 'तीसे ण भते ! समाए भरहे वासे मणुयाण केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता'-इत्यादि सूत्र३३॥ ટીકાર્યું–આ સૂત્ર વડે ગૌતમે પ્રભુને આ જાતના પ્રશ્ન કર્યો છે કે-હે ભદન્ત ! તે સુષમ સુષમા કાળમાં ભારત ક્ષેત્રમાં મનુષ્યની સ્થિતિ કેટલા કાળની હોય છે ? એના જવાબમાં પ્રભુ र छ8-गोयमा ! जहणेपण देसूणाई तिणि पलिओवमा उक्कोसेणे-देणाइं तिण्णि દિ વમારું હે ગૌતમ તે સુષમ સુષમા કાળના સમયમાં કરતા ક્ષેત્રના મનુષ્યનું આયુ જઘન્ય-કંઈક સ્વ૯૫ ત્રણ પામ જેટલું હોય છે અને ઉત્કૃષ્ટથી કઈક કમ ત્રણ પલ્યોપમ જેટલું હોય છે. અહીં જે કંઈક કમ ત્રણ પલ્યોપમ જેટલુ આયુ કહેવામાં આવેલ છે, તે લિક સ્ત્રીઓના આયુના અપેક્ષાએ કહેવામાં આવેલ છે તેમજ પર્યાપમ ના અસંખ્યાતમાં ભાગથી જે હીનતા છે તે અહીં કંઈક કામના સ્થાને ગૃહીત થયેલ છે. હવે ગૌતમ શરીરાવગાહ Page #307 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३३ तेषां मनुजानां भवस्थित्यादि निरूपणम् २९३ केवइयं' हे भदन्त ! तस्यां खलु समायां भरते वर्षे मनुजानां शरीराणि कियन्ति-किं प्रमाणानि 'उच्चत्तेणं पण्णत्ता' उच्चत्वेन प्रज्ञप्तानि !, भगवानाह-'गोयमा ! जहण्णेणं देसूणाई तिण्णि गाउयाई' हे गौतम ! तेषां मनुष्याणां शरीराणि जघन्येन देशोनानि त्रीणि गव्यूतानि, 'उक्कोसेणं तिण्णि गाउयाई उत्कर्षेण च त्रीणि गव्यूतानि उच्चत्वमाश्रित्य विज्ञेयानि । अत्रापि 'देशोनानि' इति विशेषणं युगलिकस्त्रियमाश्रित्य बोध्यम् । यद्यपि 'छ धणुसमूसियाओ' इति पूर्वमुक्तं, तेनैवावगाहना प्रतीता, तथापि जघन्योत्कृष्टता सूचनार्थ पुनरवगाहना सूत्रमुक्तमिति बोध्यम् । अथ संहननविषये पृच्छति---'ते णं भंते ! मणुया कि संघयणीपण्णत्ता' हे भदन्त । ते खलु मनुजाः किं संहनिनः-किं च तत् संहननं चेति किं संहननं, तदस्त्येषामिति किं संहननिनः-कि संहननविशिष्टाः प्रज्ञप्ता ?, भगवानाह--'गोयमा ! वइरोसभणाराय संघयणी पण्णत्ता' हे गौतम ! ते मनुजाः वज्रऋषभनाराचसंहनिनः प्रज्ञप्ताः । सम्प्रति संस्थानविषये पृच्छति-'तेसि ण भंते ! मणुयाणं सरीरा किं संठिया पण्णत्ता' हे भदन्त ! तेषां खलु मनुजानां शरीराणि किं संस्थितानि=किमाकाराणि प्रज्ञप्तानि ?, भगवानाह-'गोयमा ! समचउरंससंठाणसंठिया में प्रभु से पूछते है-“तासे णं समाए भरहे वासे मणुयाणं सरोरा केवइयं उच्चत्तेणं पण्णत्ता" हे भदन्त उस काल में भरतक्षेत्र में मनुष्यो के शरीर ऊचाई में कितने बडे थे ! उत्तर में प्रभु कहते है "गोयमा जहन्नेणं तिण्णि गाउयाई उक्कोसेणं तिण्णि गाउयाइ” हे गौतम उस काल में भरत क्षेत्र में मनुष्यो के शरीर जघन्य से और उत्कृष्ट से तीनकोश के थे । यहां पर भी जो उत्कृष्ट शरीर की अवगाहना बतलाई गई है वह युगलिक स्त्रियो की अपेक्षा से ही बताई गई है "तेणं भंते मणुआ कि संधयणो पण्णत्ता" हे भदन्त वे मनुष्य किस संहनन वाले होते कहे गये हैं ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं "गोयमा वइरोसभणाराय संधयणी पण्णत्ता" हे गौतम ! वे मनुष्य वज्रऋषभनाराच संहनन वाले होते कहे गये हैं। "तेसि णं भंते ! मणु पाणं सरीरा किं संठिआ पण्णत्ता" हे भदन्त ! उन मनुष्य के शरीर किस संस्थान वाले कहे गये है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं “गोयमा ! समचउरंसंठाण संठिया" हे गौतम ! उनका शरीर ना विष प्रसुन प्रश्न ४२ छ । 'तीसे णं भंते समाए भरहे वासे मणुआण सरीरा केवइ अ उच्चत्तेण · पण्णत्ता' ७ मत! ते ४ाणमा भरत क्षेत्रमा भारसी शरीरनी या भो रक्षा air ता? उत्तरभां प्रभु ४ छ है - " हमनेण तिण्णि गाउयाई उक्कोसेण तिण्णि गाउयाई गीतम त मां भरत क्षेत्रमा मासा घन्य अन ઉત્કૃષ્ટની અપેક્ષાએ ત્રણ ગાઉ જેટલા હતા. અહીં જે ઉત્કૃષ્ટ શરીરની અવગાહના સ્પષ્ટ नाम की छत युगल सीमानी अपेक्षाये स्पष्ट ४२वामा माया छ, “तेणं भंते मणुआ कि संघयणो पण्णत्ता ?' उमात ते मनुष्य। ४६ जना सननवा डाय छे. मेना वास मां प्रभु ४३ छे 3 'गोयमा ! वइरोसभणाराय संघयणी पण्णता गौतम ! त मनुष्य! १०० पक्ष नाराय ननवाणा डाय छे. 'तेसि णं भंते मणुआणं सरीरा किं संठिआ पण्णता' मत ! ते मनुष्याना शरी। ४६ गतना संस्थानवाणा छ ? सेना Page #308 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९४ जम्बूद्वीपप्रचप्तिसूत्रे पण्णत्ता' हे गौतम ! ते मनुजाः समचतुरस्रसंस्थानसंस्थिताः-समचतुरस्रं-तुल्यारोहपरिणाहं, तच्च, संस्थानं समचतुरस्रसंस्थानं तेन संस्थिताः। अथ पृष्ठकरण्डक संख्याविषये पृच्छति-'तेसि णं' इत्यादि । 'तेसि णं मणुयाणं वेछपण्णा पिढकरंडयसया' तेषां मनुजानां द्वे षट् पञ्चाशत् पृष्ठकरण्डकशते-पट्र पश्चाशदधिका द्विशतसंख्यकपृष्ठकरण्डकाः ‘पण्णत्ता' प्रज्ञप्ते । अत्र संहननसंस्थापृष्ठकरण्डकविषयाणि सूत्राणि पूर्वमुक्तानि तथाप्येषां पुनरुपादानं तेषां सर्वेषां संहननादिकं समानं भवतीति सूचनायेति । पुनीतमस्वामोपृच्छति-'ते णं भंते ! मणुया कालमासे' हे भदन्त ! ते खलु मनुजाः कालमापे मरणसमये 'कालं किच्चा' कालं कृत्वा मृत्वा 'कहिं गच्छंति' क्य गच्छन्ति= कस्मिन् लोके प्रयान्ति ? 'कहिं उववज्जंति' क्व उत्पद्यन्ते ? भगवानाह-'गोयमा ! छम्मासावसेसाउया' हे गौतम ! षण्मासावशेषायुषः-पण्मासावशेष षण्मासावशिष्टम् आयुर्येषां ते तथाभूता कालधर्मप्राप्तौ अवशिष्टषण्मानाः विहितपरभवायुर्वन्धाः सन्तस्ते मनुजाः यथासमय 'जुयलग' युगलकं-युग्म 'पसवंति' प्रसुवते जनयन्ति । तद् युगलम् 'एगूणपण्णं राइंदियाई' एकोनपञ्चाशद् रात्रिन्दिवम् अहोरात्रान् 'सारक्खंति' संरक्षन्ति= समचतुरक्ष संस्थान वाला कहा गया है बराबर आरोह ओर परिणाह जिसका होता है उसका नाम समचतुरस्र संस्थान है, "तेसि णं मणुआणं बे छप्पण्णा पिट्ठकरंडयसया पण्णत्ता समणा उसो' हे श्रमण आयुष्मन् ! उनके पृष्ठ करण्डक २५६ होते हैं, यद्यपि यह कथन पीछे किया जा चुका है. परन्तु फिर भो जो यहां पर दुहराया गया है उसका कारण इन सबका संहननादि सव समान होता है इस बातको सूचित करता है "तेणं भंते ! भणुया कालमासे कालं किच्चा कहिं गच्छंति, कहिं उववज्जति" हे भदन्त ! ये मनुष्य समय पर मर करके कहां जाते हैं ? कहां उत्पन्न होते हैं ? उत्तर में प्रभु कहते हैं "गोयमा ! छम्मासावसेसाउया जुयलयं पसवंति" हे गौतम ? जब इनकी आयु छ मास की बाकी रहतो है तब परभव की आयु का बन्ध करते हैं और युगलिक को उत्पन्न करते हैं फिर उसको उत्पत्ति के बाद ये उसे युगलिक की “एगूणपण्णं सभा प्रभु छ , “गोयमा समच उरंससंठाण संठिआ गौतम तमनु शरीर स મ ચતુરસ્ત્ર સ્થાનવાળું કહેવામાં આવ્યું છે. બરાબર આરેહ અને પરિણાહ જેમનું केतन नाम समयत रख सस्थानछ, 'तेसिंण मणुआण बेछप्पण्णा पिट्ट करंडय सया पण्णता समणाउसो' 8 श्र मायुभन्!मना १४४२२५६ हाय छे. આ જાતનું કથન પહેલા કરવામાં આવેલ છે, પણ છતાએ અહી જે બીજી વખત કહેવામાં આવ્યું છે તેનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે એમનું સહન ન વગેરે બધું સમાન હોય છે. આ વાતને સૂચિત કરવા માટે જ અહીં ઉપયુક્તકથનની બીજી વખત આવૃત્તિ કરવામાં આવી छ तेणं भते मणुआ कालमासे काल किच्चा कहिं गच्छंति, कहिं उववज्जति' महन्त એ મન યથા સમયે મૃત્યુ પ્રાપ્ત કરીને કયાં જાય છે કયાં ઉત્પન્ન થાય છે? ઉત્તરમાં પ્રભુ छह छ'गोयमा छम्मासावसेसाउया जुअलयं पसवंति' आतभयारे सेमनु माय માસ જેટલું બાકી રહે છે ત્યારે એ પરભવના આયુના બન્ધ કરે છે અને યુગલિકને ઉ• त्पन्न ४३ छे. युरासिनी उत्पत्ति पछी असे। युगतिर्नु 'पगूणपण्णं राइंदियाइं सार Page #309 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ३३ तेषां मनुजानां भवस्थित्यादि निरूपणम् २९५ उचितोपचारादिना पालयन्ति, 'संगोति' संगोपयन्ति अनाभोगेन हस्तस्खलनादिभ्यः सम्यक् रक्षन्ति, इत्थं 'सारक्खित्ता संगोवेत्ता' संरक्ष्य संगोप्य च अन्तसमये 'कासित्ता' कासित्बा-कासं कृत्वा, 'छीइत्ता' क्षुत्वा-छिक्कां कृत्वा, 'जंभाइत्ता' जृम्भित्वा-ज़म्भां कृत्वा 'अकिकट्टा' अक्लिष्टा: शारीरिकक्लेशवर्जिताः, 'अव्वहिया' अव्यथिता 'अपरियाविया' अपरितापिताः स्वतः परतो वाऽनुपजातकायमन:परितापाः सन्तः 'कालमासे कालं किच्चा देवलोएमु' कालमासे कालं कृत्वा देवलोकेषु भवनपतिमारभ्य ईशान पर्यन्त देवलोकेषु 'उववज्जति' उत्पद्यन्ते, 'देवलोयपरिग्गहाणं ते मणुया' यतस्ते खलु मनुजाः देवलोकपरिग्रहा: भवनपत्यादोशानान्तो देवलोकः, तथाविधकालस्वभावात् तद्योग्यायुर्ब न्धेन परिग्रह =अङ्गोकारो येषां ते तथाभूताः-देवलोकगामिन इत्यर्थः. 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः -कथिताः। युगलिनो हि आयुषः षट्सु मासेसु अवशिष्टेषु परभवायुर्बध्नन्ति, अत एतेषामायुस्त्रिभागादौ परभवायुबन्धाभाव उक्त इति । ते मनुजाः स्वसमायुष्केषु स्वहीराइंदियाइं सारक्खंति, संगोवेति" ४९ रातदिन तक उचित उपचार आदि से पालना करते हैं, देखभाल करते हैं इस प्रकार पालना और संरक्षण करके फिर ये 'कासित्ता छोइत्ता जंभा- । इत्ता अकिट्ठा अव्वहिया अपरियाविया कालमासे कालं किच्चा देवलोएसु उववज्जति " खांसी लेकर, छीक लेकर और जंभाई लेकर विना किसी कष्ट के और विना किसी परिताप के कालमास में मरकर देवलोक में भवनपति से लेकर ईशानपर्यन्त देवलोक में उत्पन्न होते हैं. क्योंकि "देवलोयपरिग्गहिया णं ते मणुया पण्णत्ता” इनका जन्म देवलोक में ही होता है. अन्य लोक में मनुष्य नारक और तियेचलोक में नहीं होता है ऐसा आगम का आदेश है। युगलिक जन भुज्यमान आयु नब छ मास की वाकी रहती है तब परभव की आयु का बन्ध कहते हैं इसलिये इनके परभव की आयु का बन्ध त्रिभाग में- अपनी आयु के त्रिभाग में नहीं होता है, ये स्वसमान आयुवाले देवलोकों में उत्पन्न होते हैं इसलिये इनका उत्पाद भवनप'त से लेकर ईशानपर्यन्त के देवलोकों में ही कहा गया है । इन युगलिक जीवों का अकाल में मरण नहीं होता है ये अपने खति संगोवेति ४८ रात ६१स सुधी अथित पयार पारेकी वासन पासना રેખ તેમ જ સંભાલ રાખે છે, બા પ્રમાણે લાલન પાલન તેમજ સંરક્ષણ કરીને પછી એ 'कासित्ता छोइत्ता जंभाइत्ताअक्किट्ठा अव्वदिया अपरिअविया कालमासे कालं किच्चादेवलोप स उववज्जति' उधर पाने, छी माध्ने मने सामने वा२ ५५ तना કટે વગર કોઈ પણ જાતના પરિતાપે કાલ પાસ માં મરણ પામીને દેવલોકમાં ભવન પતિથી. भी शान पय त हवस 41 थाय छ 33 'देवलोय परिग्गहिया ण ते मणी ન એ મને જન્મ દેવલોકમાંજ હોય છે. અન્ય મનુષ્ય, નાક અને તિયંકમાં એમના જન્મ થતો નથી. એવા આગમને આદેશ છે. ભુજમાન આયુ માસ જેટલ' બાકી રહે છે ત્યારે યમલિયા જેના પરભવના આ યુ બદ્ધ કરે છે. એથી એમના પરભવના આ અધ ત્રિભાગમાં પોતાના આયુના વિભાગ માં-થતા નથી. એઓ સમાને આવા કેમાં કે પોતાના આયુ કરતાં હીન યુવાળા દેવલેકામાં જન્મગ્રહણ કરે છે. એથી એમનો ઉત્પાદ ભવનપતિથી માંડીને ઈશાન પર્યંતના દેવકેમાં કહેવામાં આવેલ છે. Page #310 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९६ जम्बद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे नायुष्केषु वा सुरेषु समुत्पद्यन्ते इति तेषां भवनपत्यादीशानान्नेष्वेव सुरेषूत्पत्तिसंभव इति । 'कालमासे कालं कृत्वा' इति कथनेन तेषां युगलिकानामकालमरणाभाव उक्तः । 'युगलिनो हि स्वापत्यानि एकोनपश्चाशदिवसान् संरक्षन्ति संगोषयन्ति' इत्युक्तम् । तत्र ते कियत्सु दिवसेषु कोदृशा भवति ? इत्यत्र केचिदेवमाहुः 'सप्तोत्तानशयालिहन्ति दिवसान् स्माङ्गुष्ठमार्यास्ततः, को रिङ्खन्ति पदेस्ततः कलगिरो यान्ति स्खलद्भिस्ततः । स्थेयोभिश्च ततः कलागणभृतस्तारुण्यभोगोद्गताः सप्ताहेन ततो भवन्ति सुगादानेऽपि योग्यास्ततः ॥९॥ इति । अयमर्थः आर्याः-युगलिनः सप्त दिवसान् जन्मदिवसात् सप्तदिवसावधिकालं यावत् प्रथमे सप्ताहे उत्तानशयाः अतिबालाः सन्तः स्वाङ्गुष्ठं लिहन्ति -चूषन्ति सतो द्वितीये सप्ताहे सप्तदिवसान यावत् पदैः-चरणैः कृत्वा को-पृथिव्यां रिङन्ति-रिङ्खन्ति-जानुघुटीकाभ्यां अपत्यों को ४९ दिन तक पालते हैं और ऊनका संरक्षण .रते हैं ऐसा जो कहा गया हैसो इन दिनों में इन अपत्यों को क्या स्थिति होती रहती हैं, इस विषय में कितनेक जनों का ऐसा कहना है । "सप्तोत्तानशया लिहन्ति दिवसान् स्वाङ्गुष्ठमार्यास्ततः, को रिन्ति पदैस्ततः कलगिरो यान्ति स्खलद्भिस्ततः । स्थेयोभिश्च ततः कलागणभृतस्तारुण्य भोगोगताः, सप्ताहेन ततो भवन्ति सुदृगादानेऽपि योग्यास्ततः ॥ इसका अभिप्राय ऐसा है कि ये युगलिकजन जब से जन्म लेते हैं तब से ७ सात दिन तक तोअर्थात प्रथम सप्ताह में तो- ऊपर की ओर मुंह करके सोते २ अपने अंगुष्ठ को चसते रहते हैं फिर द्वितीय सताह में जमीन पर एवं घुटनों के बल सरकने लगते हैं, तृतीय सप्ताह में ये આ યુગલિક જીનું અકાલમાં મરણ થતું નથી. એઓ પિતાના અપોન ૪ દિવસ સધી લાલન-પાલન અને સંરક્ષણ કરે છે, એવું જે કહેવામાં આવ્યું છે તે એ દિવસો 5. અપચાની કેવી સ્થિતિ થતી રહે છે. આ સંબંધમાં કેટલાક લોકેાનું આ પ્રમાણે કહેવું છે કે सप्तोत्तानशया लिहन्ति दिवसान् स्वाङ्गुष्ठमार्यास्ततः को रिङखन्ति पदैस्ततः कलगिरो यान्ति स्खलदर्भिस्ततः । स्थेयोभिश्च ततः कलागुणभृतस्तारुण्य भागोदगताः । सप्ताहेन ततो भवन्ति सुदगादानेऽपि योग्यास्ततः ॥ એના અભિપ્રાય આ પ્રમાણે છે કે એ યુગલાદિ જને જ્યારથી જન્મ ગ્રહણ કરે છે ત્યારથી ૭ દિવસ સુધી તા એટલે કે પ્રથમ સપ્તાહ માં તે ઉપરની તરફ મો. કરીને સૂતાં સૂતાં જ પોતાના અંગુષ્ઠને ચૂસતા રહે છે. પછી બીજા સપ્તાહમાં પૃથ્વી Page #311 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३३ तेषां मनुजानां भवस्थित्यादि निरूपणम् २९७ सरन्ति । ततस्ततृतीये सप्ताहे सप्त दिवसान् यावत् कलगिरः-मधुरभाषिणो भवन्ति । ततश्चतुर्थे सप्ताहे सप्त दिवसान् यावद् स्खलद्भिः पदैः यान्ति-गच्छन्ति । ततः पश्चमे सप्ताहे सप्त दिवसान् यावत् स्थेयोभिः-अतिशयस्थिरैः पदैः यान्ति । ततः षष्ठे सप्ताहे कलागणभृतः-समस्तकलाधारिणो भवन्ति । ततः सप्तमे सप्ताहे तारुण्यभोगोद्गताः- तरुणावस्थोपयोगिभोगोन्मुखाः भवन्ति । केचित् पुनः सुगादानेऽपिसम्यक्त्वग्रहणेऽपि योग्या भवन्ति इति । इदं यदुक्तं तत् सुषमसुषमायां आदिकालमपेक्ष्य बोध्य, ततः परं तु किंचिदधिकमपि संभाव्यते इति । अत्र कश्चिदेवमपि शकेत-ननु तदानीं मृतक शरीराणां का स्थितिरासीत् ? इति चेत् , आह-तस्मिन् काले मृतयुगलिक शरीराणि भारण्डादिपक्षिणो नीडकाष्ठमिव समुत्पाटय नदीसागरादौ प्रक्षिपन्ति तथा जगत्स्वभाव्यात् । ननु उत्कृष्टतोऽपि धनुः पृथक्त्वप्रमाणशरीरैस्तैः पक्षिभिः स्वापेक्षया समुत्कृष्टप्रमाणानि मनुष्यशरीराणि समुत्पाटय कथं समुद्रादौ प्रक्षिप्यन्ते ? मीठी वाणी बोलने लगते हैं. चतुर्थ सप्ताह में ये सात दिन तक लड़खड़ाते हुए पैरों से चलने लगते हैं, पांचवें सप्ताह में ये स्थिर हुए पैरों से चलने लगते हैं छठे सप्ताह में ये समस्त कलाओं को धारण करने वाले हो जाते हैं। सातवें सप्ताह में ये युवावस्थापन्न हुए भोगों को भोगने वाले हो जाते हैं और कितनेक सम्यद्गर्शन को ग्रहण करने के योग्य भी बन जाते हैं । यह जो कुछ कहागया है वह सुषम सुषमा आरक के प्रारम्भक समय को लेकर कहा गया है. क्योंकि इसके बाद तो इससे भी अधिक काम कर सकते होंगे ऐसी संभावना होती है, यहां कोई ऐसी शंका कर सकता है कि उस समय अग्नि संस्कार आदि की अप्रादुर्भूतता में मृतक शरीरों की क्या स्थिति होती होगो ? तो इसके उत्तर में यही समझना चाहिये कि उस समय में मृतक युगलिक जीवों के शरीर को भारण्डादि पक्षी नीडकाष्ठा की तरह ऊठा कर के नदी सागर आदि में डाल देते होंगे क्योंकि उस समय के जगत् का ऐसा स्वभाव होता है, यदि फिर भी यहां હમાં પૃથ્વી ઉપર પગ તેમજ ઘૂંટણના બળે સરકવા માંડે છે. ત્રીજા સપ્તાહમાં એએ મધર વાણી બાલવા માંડે છે. ચતુર્થ સપ્તાહમાં એઓ સાત દિવસ સુધી લથડાતાં–લથડાતાં ચાલવા માંડે છે. પાંચમા સપ્તાહમાં એએ સ્થિર થયેલા પગોથી ચાલવા માંડે છે. છટ્ઠા સપ્તાહમાં એ સર્વ કલાઓમાં વિશારદ થઈ જાય છે. સાતમાં સપ્તાહમાં એ સવે યુવાવસ્થાપન ભોગોના ઉપકતા થઈ જાય છે, અને કેટલાક તે સમ્યગ્દર્શન ગ્રહણ કરવા ગ્ય પણ થઈ જાય છે. અહીં એ જે કંઈ કહેવામાં આવ્યું છે તે સુષમ સુષમા આરકના પ્રારંભિક સમયને લઈને કહેવામાં આવ્યું છે કેમકે એના પછી તે એના કરતાં પણ વધારે કામ સંભવી શકે છે, એવી સંભાવના થાય છે. અહીં કેઈ એવી પણ શકા ઉઠાવી શકે છે કે તે સમયે અગ્નિ સંસ્કાર વગરેની અપ્રાદુર્ભાતિતામાં મૃતક શરીરોની કેવી સ્થિતિ થતી હશે ? તે એના ઉત્તરમાં એવું જ સમજવું જોઈએ કે તે સમયમાં મૃતકયુગલિક જીવના શરીરને ભારંડાદિ પક્ષી નીડાઝાની જેમ ઊડાવીને નદી–સાગર વગેરેમાં નાખી દેતાં હશે કેમકે તે સમયના જગતને એ સ્વભાવ હોય છે. અહી ફરી કઈ Page #312 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे इति च न शङ्कयम् , केषांचित् पक्षिणाम् अरकापेक्षया यथासंभवं बहुबहुतर बहुतमधनुः पृथक्त्वप्रमाणशरीरत्वेन तत्कालवति युगलिक नरहस्त्यपेक्षयाऽधिकप्रमाणशरीरैस्तैः पक्षिभिस्तेषां नराणां मृतशरीरसंवहनसंभवादिति ।। पुनगौतमस्वामी पृच्छति-'तीसे गं भंते ! समाए भरहे वासे कइविहा' हे भदन्त ! तस्यां खलु समायां भरते वर्षे कतिविधाः कतिप्रकाराः कतिजातिया 'मणुस्सा अणु सज्जित्था' मनुष्या अन्वषजन् अनुषक्तवन्तः-कालाकालान्तरमनुवृत्तवन्तः-सन्ततिभावेनाभूवन् ? इत्यर्थः । भगवानाह-गोयमा ! छविहा पण्णत्ता' हे गौतम ! षविधाः मनुप्याः प्रज्ञप्ताः, 'तं जहा' तद्यथा-'पम्हगंधा' पद्मगन्धा:- पद्मस्येव गन्धो येषां ते तथापद्मगन्धवन्तो मनुष्या इत्यर्थः 'मियगंधा' मृगगन्धाः- अत्र मृगशब्देन मृगमदः कस्तूऐसी आशंका की जावे कि उत्कृष्ट सेभी धनुः पृथक्त्व प्रमाण शरीर वाले उन पक्षियों द्वारा अपनी अपेक्षा उत्कृष्ट प्रमाण वाले मनुष्य शरीरों को कैसे उठा कर समुद्र आदि में डालते होगे ! तो इसका उत्तर यही है कि कितनेक पक्षियों के शरीर का प्रमाण अरक की अपेक्षा यथा संभव बहु, बहुतर और बहुतम धनुः पृथक्त्व प्रमाण वाला होता है अतः तत्कालवर्ती युगलिक नर और हस्ती की अपेक्षा उनके शरीर का प्रमाण अधिक होने से वे पक्षी उन मनुष्य के मृत शरीर को उठा सकने में समर्थ हो जाते हैं। अब गौतम स्वामी प्रभु से ऐसा पूछते हैं-"तीसेणं भंते ! समाए भरहे वासे कइविहा मणुस्सा अणुस्सज्जित्था" हे भदन्त ! उस काल में भरतक्षेत्र में कितने प्रकार के मनुष्य काल से कालान्तर में सन्ततिभाव से उत्पन्न हुए ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं 'गोयमा ! छविहा पण्णत्ता तं जहा-पम्हगंधा, मियगंधा, अममा, तेयतली, तहा, सणिचारी" हे गौतम ! छ प्रकार के मनुष्य उत्पन्न हुए, जैसे- पद्मगन्ध- पद्म की गन्ध के समान गंध से युक्त शरीर वाले मनुष्य, मृगगन्ध-मृग की अर्थात् कस्तुरी की गन्ध के समान गन्ध से युक्त शरीर वाले બીજી શંકા ઉઠાવી શકે છે કે ઉત્કૃષ્ટથી પણ ધનુ પૃથકૂવ પ્રમાણ શરીરવાળા તે પક્ષીઓ પિતાના કરતાં ઉત્કૃષ્ટ પ્રમાણુવાળા મનુષ્ય શરીર ને કેવી રીતે ઉઠાવી ને સમુદ્ર વગેરેમાં નાખતા હશે ? તે આને જવાબ એ છે કે કેટલાક પક્ષીઓના શરીરનું પ્રમાણ અરકની અપેક્ષાએ યથાસંભવ બહુ, બહુતર અને બહુતમ ધનુ પૃથકત્વ પ્રમાણુવાળા હોય છે. એથી તત્કાળવતી યુગલિક કરો અને હસ્તીઓની અપેક્ષાએ તેમના શરીરનું પ્રમાણ અધિક હેવાથી તે પક્ષીઓ તે મનુષ્યોના મૃતશરીરને ઉચકી શકવામાં સમર્થ હોય છે. वे जीतभस्वामी प्रभुने प्रश्न ४२ छ 'तीसेणं भंते । समाए भरहे वासे काविहा मणु स्सा अणुसज्जित्था" ३ मत आणे भरतक्षेत्रमा प्रारना मनुष्या थी - तरमा सन्ततिमाथी उत्पन्न थया ? सेना ramम प्रभु ४ छ-'गोयमा छव्विहा पण्णता तं जहा पम्हगंधा, मिअ गंधा, अममा, तेअतली, सहा सणिचारी' ' गौतम' छ tરના મન તે કાળે ઉત્પન્ન થયા. જેમકે પદ્મગન્ય-પદ્યના ગંધ જેવા ગંધથી યુક્ત શરીર વાળા મનુષ્ય, મૃગગન્ધ મૃગની એટલે કે કસ્તુરીના ગંધ જેવા ગંધથી યુક્ત શરીરવાળા Page #313 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ३३ तेषां मनुजानां भवस्थित्यादि निरूपणम् २९९ रिका गृह्यते तस्येव गन्धो येषां ते तथा मृगमदगन्धवन्तो मनुष्या इत्यर्थः, 'अममा' अममाः ममत्वरहिता मनुष्याः' 'तेयतली' तेजस्तलिनः तेजः-प्रभा तलं-रूपं तद्वयमस्ति येषां ते तथा, कात्या रूपेण च युक्ता इत्ययः, 'सहा' सहा:-सहिष्णवः-सहन शीला इत्यर्थः५, 'सणिचारी' शनैश्चारिणः-शनैः औत्सुक्याभावान्मंदं चरन्तीत्येवं शीलाः, शनैर्गमनशीला इत्यर्थः ६, यथा पूर्वमेकाकाराऽपि मनुष्यजातिस्तृतीयारक प्रान्ते ऋषभदे. वेन उग्रभोगराजन्यक्षत्रियभेदेश्चतुर्धा विभक्ता तथाऽत्रापि पद्मगन्धत्वादिगुणयोगात्ते मनुष्याः स्वभावादेव पद्मगन्धादि भेदेन षड्विधजातिमन्तो भवन्ति इति भावः ॥म.०३३॥ इति प्रथमारक वर्णनम् --- मूलम्- तीसे णं समाए चउहि सागरोवमकोडाकोडीहिं काले वीइक्कंते अणंतेहिं वण्णपज्जवेहि अणतेहिं गंधपज्जवेहिं अणतेहिं रसप ज्जवेहि अणंतेहिं फासपज्जवेहि अणंतेहिं संघयणपज्जवेहि अणंतेहिं सं ठाणपज्जवेहि अणंते हैं उच्चत्तपज्जवेहिं अणंतेहिं आउपज्जवेहिं अणंतेहिं गुरुलहुपज्जवेहि अणंतेहि अगुरुलहुपज्जवेहिं अणंतेहिं उट्ठाणकम्म बलवीरियपुरिसकार परक्कमपज्जवेहिं अणतगुणपरिहाणीए परिहायमाणे२ एत्थणं सुसमा णामं समा काले पडिवज्जिसु समणाउसो ? ॥सू३४॥ छाया-तस्याः खलु समायाश्चतसृभिः सागरोपमकोटिकोटिभिः काले व्यतिक्रान्ते अनन्तैः वर्णपर्यवैः अनन्तैः गन्धपर्यवेः अनन्तैः रसपर्यवैः अनन्तैः स्पर्शपर्यवैः अनन्तैः संहननपर्यवैः अनन्तैः संस्थानपर्यवैः अनन्तैः उच्चत्वपर्यवैः अनन्तैः आयुः पर्यवैः अनन्तैः मनुष्य अमम-ममत्वरहित मनुष्य, तेज प्रभा और तल-रूप इन दोनों से युक्त हुए मनुष्य, सहिष्णु-सहनशील.मनुष्य एवं शनैश्चारी मनुष्य-औत्सुक्याभाव से मन्द मन्द गति वे चलने वाले मनुष्य जिस प्रकार पूर्व में एक आरक वाली भो मनुष्य जाति तृतीय आरक के प्रान्त में ऋषभ देव ने उग्र, भोग, राजन्य और क्षत्रिय के भेद से चार प्रकारों में विभक्त की उसी प्रकार से यहां पर भी पद्मगन्धत्वादि गुण के योग से वे मनुष्य स्वभावतः ही पद्ममन्ध आदि के भेद से छह प्रकार की जाति वाले हो जाते है ॥३३॥ ॥प्रथम आरक वर्णन समाप्त ॥ મનુષ્ય, અમમ-મમત્વહીન મનુષ્ય, તેજપ્રભા અને તલ રૂપ એ બન્નેથી સમ્પન્ન મન બે અને સુક્યાભાવથી મંદ-મંદ ગતિથી ચાલનારા મનુબે. જેમ પૂર્વમાં એક આકાર વાળી મનુજાતિ પણ તૃતીય આરકના પ્રાન્તમાં ઋષભદેવે ઉગ્ર ભેગ, રાજન્ય અને ક્ષત્રિય ના ભેદથી ચાર પ્રકારમાં વિભક્ત કરેલ છે. તેમજ અહીં પણ પદ્મગધાદિ ગુણના ગથી મનુષ્ય સ્વભાવથી જ પદ્મગન્ધાદિ ભેદથી છ પ્રકારની જાતિવાળા થઈ જાય છે 1૩૩ આ પ્રથમ આરકમું વર્ણન છે. Page #314 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३०० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे गुरुलघुपर्यवैः अनन्तैः अगुरुलघुपर्यवैः अनन्तैः उत्थानकर्मबलवीर्यपुरुषकारपराक्रमपर्यवैः अनन्तगुणपरिहाण्या परिहीयमाणे २ अत्र खलु सुषमा नाम समा कालः प्रत्यपद्यत भ्रमणा युष्मन् ॥ सू०६४ ।। ___ टीका- 'तीसे णं समाए' इत्यादि । 'तीसे' तस्याः सुषमसुषमायाः ‘णं' खलु 'समाए' समायाः 'चउहिं सागरोवम कोडाकोडीहिं' चतसृभिः सागरोपम-कोटीकोटीभिः कृत्वा 'काले वोइकंते' काले व्यतिक्रान्ते चतुस्सागरोपम कोटीकोटी प्रमाणे काले व्यतोते सति कीदृशे तस्मिन् काले ? इत्याह-'अणंतेहिं' अनन्तैः-अनन्तसंख्यकैः ‘वण्णपज्जवेहि वर्ण पर्यवैः वर्ण:-शुक्लपीत रक्त नील कृष्ण भेदात् पञ्चविधाः, कथिताः कपिशादयस्तु संयोगजन्या इति ते न विवक्षिताः, तेषां वर्णानां ये पर्यवाः पर्यायाः केवली बुद्धिकृता निर्विभागा भागा एकगुण शुक्लत्वादयस्तैः, 'अणंतेहिं गंधपज्जवेहि' अनन्तैः, गन्धपर्यवैः, 'अणंतेहिं रसपज्जवेहि' अनन्तैः रसपर्यवैः, 'अणंतेहिं फासपज्जवेहि' अनन्तैः स्पर्शपर्यवैः, 'अणं तेहिं संघयणपज्जवेहिं' अनन्तैः संहननपर्यबैः-संहननानि अस्थिनिचयरचना द्वितीय आरक वर्णन"तीसे णं समाए चउहिं सागरोवमकोडाकोडीहिं काले वीइक्कंते" इत्यादि । टीकार्थ-तीसे णं समाए चउहिं सागरोवमकोडाकोडीहिंकाले वीइक्वंते" जब चार को डाकोडी सागर काल व्यतीत हो जाते हैं तब दूसरा अवसर्पिणी का काल प्रारंभ होता है. ऐसा यहां सम्बन्ध लगाना चाहिए प्रथम जो सुषम सुषमानामका काल है उसकी स्थिति ४ चार को डाकोडी सागरोएम की है, यह अवसर्पिणी काल का प्रथम भेद है अतः अवसर्पिणी काल में क्रमशः आयुकाय आदि का प्रतिसमय ह्रास हो जाता है. इसीलिये "अणंतेहिं वण्ण पज्जवेहिं मणतेहिं गंधपज्जवेहिं, अणंतेहिं रसपज्जवेहि अणंतेहिं फास पज्जवेहिं" धीरे २ अनन्त वर्णपर्यायों का, अनन्त गन्ध पर्यायों का, अनन्त रसपर्यायों का, अनन्त स्पर्शपर्यायों का धीरे २ हास होते २ जब चार कोडा कोडा प्रमाण समय समाप्त हो जाता है, इसी प्रकार अनन्त संहननपर्यायों का, अनन्त संस्थानपर्यायों का, उच्चत्व पर्यायों का, अनन्त आयुपर्यायों का, अनन्त | દ્વિતીય આરક વર્ણન 'तीसेण समाए चउर्हि सागरोघम कोडाकोडीहिं काले वीईक्कते' इत्यादि सूत्र ॥३४॥ साथ-"तीसेणं समाए चउहि सागरो०" न्यारे यार ४१७॥डी सागर व्यतीत / लय છે ત્યારે દ્વિતીય અવસર્પિણી કાળ પ્રારંભ થાય છે. અહીં એવો સંબંધ જાણો જોઈએ. જે સુષમ સુષમા કાળ છે તેની સ્થિતિ જ કડાકડી સાગરોપમ છે આ અવસર્પિણી કાળને પ્રથમ ભેદ છે એથી અવસર્પિણી કાળમાં ક્રમશઃ આયુ, કાળ વગેરેને પ્રતિ સમય હાસ થત तय छे. थेटमा माटे " अणंतेहिं वण्णपज्जवेहिं अणतेहि गंध पज्जवेहि अणतेहिं रसपज्ज बेहि अणंतेहिं फासपज्जवेहिं' धीमे धीमे अनन्त पर्यायानी, मनन्तजन्य पायानीग નંત રસ પર્યાનો અનંત સ્પર્શના પર્યાયે હાસ થતાં થતાં જ્યારે ચાર કેડિકેડી પ્રમાણ સમય સમાપ્ત થઈ જાય છે આ પ્રમાણે અનંત સહનન પર્યાયના અનંત સંસ્થાન પર્યાને અનેક ઉચ્ચત્ત્વ પર્યાયોને અનંત આયુપર્યાનો અનંત ગુરુ–લઘુ પર્યાને અનંત અગુરૂ લઘુ પર્યા Page #315 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सू. ३४ द्वितीयारक निरूपणम् ३०१ विशेषरूपाणि वज्रऋषभनाराच-वज्रर्षभनाराचार्द्धनाराचकीलिका सेवात भेदात् षइविधा नि, अत्र चारके वज्रऋषभनाराचस्येव सद्भावः अन्येषामभावात् , तस्य वज्रऋषभनाराचसंहननस्य पर्यवास्तैः, 'अणंतेहि संठाणपज्जवेहि' अनन्तैः संस्थानपर्यवैः-संस्थानानि आकृतिरूपाणि समचतुरस्रन्यग्रोधसादि कुब्जक वामन हुण्डभेदात् षविधानि, अत्र चारके समचतुरस्रनामकं प्रथम संस्थानं गृह्यते-अन्येषामभावात्. तानि तस्य समचतुरस्रनामकस्य संस्थानस्य पर्यवास्तैः तथा 'अणतेहि उच्चत्त पज्जवेहि' अनन्तैः उच्चत्वपर्यवैः-उच्चत्वं-शरीरोच्छ्रायः-प्रथमेऽरके च तत् त्रिगव्यूतप्रमाणं तस्य पर्यवैः, तथा 'अणं तेहिं आउपगुरुलघु पर्यायों का, अनन्त अगुरुलधु पर्यायों का, अनन्त उत्थान कर्म बल वार्य पुरुषकार पराक्रम पर्यायों का हास होते २ जब चार कोडाकोडी प्रमाण प्रथम आरा अवसपिणी का समाप्त हो जाता है तब अवसर्पिणो काल का द्वितोय सुषमा नामका आरा इस भरतक्षेत्र में प्रारम्भ हो जाता है। यहां जो वर्णादिकों को पर्यायों का कथन किया गया है वह केवली भगवान् की बुद्धि के द्वारा किये गये निर्विभाग भागों को मानकर किया गया है. ये वर्णादि कों के निर्विभाग भाग एक गुण शुक्लत्वादि रूप पड़ते हैं, इस आरक में वज्रऋषभनाराच संहनन ही होता है, अन्य संहनन नहीं होते हैं, संहनन हड्डियों की एक प्रकार की रचना विशेष का नाम है, ये संहनन वज्रऋषभनाराच संहनन, नाराच संहनन, अर्द्धनाराचसंहनन, कीलिका संहनन और सेक्षतसंहनन के भेद से ६ प्रकार के शास्त्रों में वर्णित हुए हैं, संस्थान नाम आकार का है ये भी ६ प्रकार के होते हैं- समचतुरस्रसंस्थान, न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान, कुन्जकसंस्थान, वामन संस्थान, सादिसंस्थान और हुण्डकसंस्थान, इस आरक में समचतुरस्रनामका प्रथम संस्थान ही होता है. अन्य संस्थान नहीं । उच्चत्व से यहां शरीर की ऊँचाई गृहीत हुई है, प्रथम आरक में शरीर की ऊँचाई ३ तीन कोश की होती है और आयु का प्रमाण तीन पल्यो ચેન અનત ઉત્થાન કર્મ બળવીર્ય પુરુષકારપરાક્રમ પર્યાને હાર થતાં થતાં જ્યારે ૪ કેડાકેરી પ્રથમ આરા અવસર્ણને સમાપ્ત થઈ જાય છે ત્યારે અવસર્પિણી કાળના દ્વિતીય સુષમાનામક આરો આ ભરતક્ષેત્રમાં પ્રારંભ થઈ જાય છે. અહીં જે વર્ણાદિકના પર્યાયોનું કથન કરવામાં આવેલ છે. તે કેવલી ભગવાનની બુદ્ધિ વડે કરવામાં આવેલ નિવિભાગ ભાગોને માનીને કરવામાં આવેલ છે. એ વર્ણાદિકના નિવિભાગ ભાગ એક ગુણ શુકલત્યાદિ રૂપ પડે છે. આ આ રકમાં વજા sષભનારાચ સંહનન જ હોય છે અન્ય સંહનાને અભાવ રહે છે. સંવનન ડિશ ની એક પ્રકારની રચના વિશેષનું નામ છે. એ સં હનન શાસ્ત્રોમાં વજીરૂષભનારાચ સંહનન ઋષભનારા સંહનન, નાચમું હનન અદ્ધનારા સંહનન કીલિકા સંહનન અને સેવા સંહનાના ભેદથી ૬ પ્રકારના વર્ણિત થયેલા છે. સંસચાન આકારનું નામ છે. એના પણ ૬ પ્રકારે છે. સમચતુરઅસંસ્થાન ન્યગ્રોધ પરિમંડલ સંસ્થાન કુમ્ભક સંસ્થાન વામન સ્થાન સાદિસંસ્થાન અને હુડક સંસ્થાન. આ આ૨કમાં અન્ય સંસ્થાના નહિ પણ ફકત સમ થતરસ્ત્રનામક પ્રથમ સં સ્થાન જ હોય છે. ઉચવથી અહી: શરીરની ઉંચાઈ ગ્રહીત થયેલી. કે પ્રથમ આરકમાં શરીરની ઊંચાઈ ૩ ગાઉ જેટલી હોય છે. આયુનું પ્રમાણ ત્રણ પત્યે Page #316 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३०२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ज्जवेहि' अनन्तैः आयुः पर्यवैः आयुः-जीवितं, तदत्र प्रथमेऽरके त्रि पल्योपमप्रमाणं गृह्यते, तस्य पर्यवास्तैः, तथा 'अणं तेहिं गुरुलहु पज्जवेहिं' अनन्तै गुरुलघुपर्यवैः-गुरुलघुनिगुरुलघुद्रव्याणि-बादर स्कन्धद्रव्याणि औदारिक वैक्रियाहारकतैजसरूपाणि तेषां पर्यवास्तै तथा 'अणं तेहिं अगुरुलहु पज्जवेहि' अनन्तैः अगुरुलघुपर्यवैः अगुरूलघूनि-अगुरुलघुद्रव्याणि सूक्ष्मद्रव्याणि तानि च पौद्गलिकान्येव ग्राह्याणि अपौगलिकग्रहणे तु धर्मास्तिकायादीना मपि ग्रहणं प्रसज्येत ततश्च तेषामपि पर्यवहानिरापद्येत, तानि अगुरुलघुद्रव्याणि कार्मण मनो भाषादि द्रव्याणि तेषां पर्यवास्तैः, तथा 'अणं तेहिं उट्ठाण कम्मबल वीरियपुरिसकार परक्कमपज्जवेहिं' अनन्तै उत्थानकर्मबलवीर्यपुरुषकारपराक्रमपर्यत्रै उत्थानं-चेष्टाविशेषः, कर्म-भ्रमणादिक्रिया विशेषः, बलं-शरीरसामर्थ्य वीर्य जीवभावं, जीवत्वमित्यर्थः पुरुषकारः पौरुषम् अभिमानविशेषः, पराक्रमः-निष्पादितस्वविषयः पुरुषकार एव, एतेषां पर्यायास्तैश्च कृत्वा 'अणंतगुणपरिहाणीए' अनन्तगुणपरिहान्या अनन्तगुणानाम्-अनन्तानां ज्ञानदर्शनाद्यनन्तानां निर्विभागभागानां वर्णादिपर्यवानां परिहाणि:-अपचयस्तया परिहापम का होता है. गुरु लघु द्रव्य से बादरस्कन्धद्रव्यरूप जो औदारिक, वैक्रिय, आहारक एवं तेजस शरीर है उनको ग्रहण हुआ है. अगुरुलघु द्रव्य से सूक्ष्मद्रव्यरूप जो पौद्गलिक द्रव्य हैं वे ही गृहीत हुए है, अपौद्गलिक सूक्ष्मद्रव्य नहीं यदि इनका भी यहां ग्रहण होना मान लिया जाय तो धर्मास्तिकायादिक द्रव्यों का भी ग्रहण होना मानना पडेगा तो इस तरह से इनके पर्यायों की भी हानि होने का प्रसङ्ग प्राप्त होगा, अतः इस प्रसंग की निवृत्ति के लिये अगुरुलघु द्रव्य पद से कार्मण मनोभाषादि द्रव्यों का ही ग्रहण किया जानना चाहिये, इस तरह वर्णगुण की, गन्धगुण की, रसगुण की एवं स्पर्शगुण की, जो पर्यायें हैं- केवली के द्वारा अपनी बुद्धि से किये गये जो निर्विभाग भाग है- वे अनन्त संख्यक हैं, संहनन को पर्यायें अनन्त हैं, संस्थान की पर्याये अनन्त हैं, उच्चत्व को पर्याये अनन्त हैं, आयु कर्मको पर्याये अनन्त हैं, गुरुलघु द्रव्यों की पर्याये अनन्त हैं, उत्थान-चेष्टा विशेष रूप, कर्म-भ्रमणादि रूपक्रिया, शरीर પમ જેટલું હોય છે. ગુરુલઘુ દ્રવ્યથી બાદર સ્કન્ધ દ્રવ્ય રૂપ જે ઔદારિક ક્રિય આહારક તેમજ તેજસ શરીર છે તેનું ગ્રહણ થયેલ છે. અગુરૂ લધુ દ્રવ્યથી સૂક્ષમ દ્રવ્ય રૂપ જે પગ લિક દ્રવ્ય છે તેમનું જ ગ્રહણ થયેલું છે અપગલિક સૂઢમ દ્રવ્ય નું નહિ. જે એમનું પણ અહીં ગ્રહણ કરવામાં આવે તે ધમસ્તિકાયાદિક દ્રવ્યોનું પણ ગ્રહણ માનવું જ પડશે. તે આ પ્રમાણે એમની પર્યાની પણ હાનિ થવાની સ્થિતિ ઉપસ્થિત થશે. એટલા માટે આ પ્રસંગની નિવૃત્તિ માટે અગુરુ લઘુ દ્રવ્યપણુ થી કાર્માણ અને મનો ભાવાદિ દ્રવ્યોનું ગ્રહણ કરવામા આવવું જોઈએ આ પ્રમાણે વર્ણ ગુણની ગબ્ધગુણની રસગુણની તેમજ સ્પર્શ ગુણની જે પર્યો છે-કેવલી વડે સ્વ બુદ્ધિથી કરવામાં આવેલ જે નિર્વિભાગભાગે છે તે અનંત સંખ્યક છે. સંહનની પર્યાયે અનંત છે સંસ્થાનની પર્યાયે અનંત છે ઊચ્ચત્વની પર્યા અનંત છે આયુકર્મની પર્યાએ અનંત છે ગુરુલધુ દ્રવ્યની અને અગુરૂ લઘુ દ્રવ્યની પર્યા છે અનત છે ઉત્થાન–ચેષ્ટા વિશેષરૂપ કર્મભ્રમણાદિ રૂપ ક્રિયા શરીર સામર્થ્યરૂપ બળ વીર્ય Page #317 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्वि०क्षस्कार सू. ३४ द्वितीयारकनिरूपणम् ३०३ यमाणे२, परिहीयमाणे परिहीयमाणे-नितान्तमपचयं गच्छति सति 'एत्थणं' अत्रअत्रान्तरे खलु सुसमा णामं समा काले' सुसमा नाम समा कालः त्रिकोटि सागरोपमप्रमाणः अवसर्पिण्या द्वितीयोऽरकः । 'पडिवज्जिमु' प्रत्यपद्यत-प्रतिपन्नो लागत इति । यथैषामनन्तत्वम् अनुसमयमनन्तगुणहानिश्च भवति तदुच्यते, तथाहि---'तीसे णं समाए उत्तमकट्टपत्ताए' इति' इति प्रागुक्तोक्त्या सुसमसुसमा-काले कल्पद्रुमपुष्पफलादिगता ये वर्णगन्धरसादयस्ते उत्कृष्टाः, तेषां केवली प्रज्ञया छिद्यमाना यदि निर्विभागा भागाः क्रियन्ते तर्हि अनन्ता भागा भवन्ति । तेषां मध्यादनन्तभागात्मक एको राशिः प्रथमारक द्वितीय-समये त्रुटयति, एवं तृतीयादि समयेष्वपि वक्तव्यं यावत्प्रथमारकान्तिमसमय पर्यन्तम् । इयमेव रीतिः अवसर्पिणी चरम समयं यावद् बोध्या । अतएव- 'अनन्त गुणसामर्थ्यरूप बल, वीर्य - जीव की शक्ति, पुरुषकार और पराक्रम को पायें भी अनन्त हैं, इन सब अनन्त पर्यायों को केवलो भगवान् ही जानते हैं सो इन सव पर्यायरूप अनन्त गुणों की जब धीरे २ प्रतिसमय हानि होते २ सुषम सुषमा नाम का प्रथम आरक समाप्त हो जाता है तब ३ तीन कोडाकोडो सागरोपमप्रमाण वाला द्वितीय आरक की जिसका नाम सुषमा है प्रारंभ होता है इन वर्णादि पर्यायों में अनन्तता और प्रत्येक समय में अनन्तगुण हानि जो होती है उसे यहां स्पष्ट किया जाता है-सुषमसुषमा कल में कल्पद्रुम के पुष्प और फलादि कों में जो वर्ण, गन्ध और रसादि होते हैं वे उत्कृष्ट होते हैं । इनके यदि केवलो की प्रज्ञासे निर्विभाग भाग किये जावे-तो वे अनन्त भाग होते हैं इनके मध्य से अनन्त भागात्मक एक राशि प्रथम आरक के द्वितीय समय में समाप्त हो जाती है, द्वितीय अनन्तभागात्मक राशि प्रथम आरक के तृतीय समय में समाप्त हो जाती है इस प्रकार तृतीयादि अनन्तभागात्मकराशियां प्रथम आरक के चतुर्थादि समयो में समाप्त होतो रहती है सो इस प्रकार से इनके समाप्त होते रहने का यह क्रम प्रथम आरक के अन्तिम समय तक जानना चाहिये, तथा इसी प्रकार का यही क्रम अवसर्पिणी काल के अन्तिम समय तक चालू रहता है ऐसा जानना चाहिये, इस જીવની શક્તિ પુરૂષકાર અને પરાક્રમથી પર્યાચો પણ અનંત છે. એ સર્વ અનંત પર્યા ને કેવલી જ જાણે છે. તે એ સર્વ પર્યાયરૂપ અનત ગુણેથી જ્યારે ધીમે ધીમે પ્રતિસમય હાનિ થતાં થતાં સુષમ સુષમાં નામે પ્રથમ આરક સમાપ્ત થઈ જાય છે ત્યારે ત્રણ કેડીકેડી સાગરેપમ પ્રમાણયુક્ત દ્વિતીય આરક કે જેનું નામ સુષમા છે તે પ્રારંભ થાય છે. એ વર્ણાદિ પયામાં અન તતા અને દરેક સમયમાં અનતગુણ હાનિ જે હોય છે તેનું અહી' પલ્ટીકરણ કરવામાં આવે છે. સુષમ સુષમા કાળમાં ક૬૫દ્રમાં અને તેમનાં પુપો તેમજ ફળ વગેરે માં જે વર્ણ ગબ્ધ અને રસાદિ હોય છે તે ઉત્કૃષ્ટ હોય છે. એમના જે કેવલીની પ્રજ્ઞાથી નિર્વિભાગ ભાગ કરવામાં આવે છે તે અનંત ભાગ થાય છે. એમના મધ્યથી અનંતભાગાત્મક એક રાશિ પ્રથમ આરકના દ્વિતીય સમયમાં સમાપ્ત થઈ જાય છે. દ્વિતીય અનંતભા મક રાશિ પ્રથમ આરકના તૃતીય સમયમાં સમાપ્ત થઈ જાય છે. આ પ્રમાણે તૃતીયાદિ અનંત ભાગાત્મક રાશિમાં પ્રથમ આરકના ચતુર્થાદિ સમયેમાં સમાપ્ત થતી રહે છે. તે Page #318 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३०४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे परिहाण्या' इत्यत्र अनन्तगुणानां परिहानिस्तया इति षष्ठी तत्पुरुषो न तु कर्मधारयः । गुणशब्दश्च भागपयायवाची आगमेषु प्रसिद्धः। नन्वेवं वर्णादीनाम् अनन्तगुणहान्या श्वेतादिवर्णानां गन्धादीनां च सर्वथोच्छेदः प्रसज्येत, एतच्च प्रत्यक्षविरुद्धम् जातीयपुष्पादौ श्वेतवर्णस्य अन्यत्राण्यवानां तथैव गन्धादीनां सम्प्रत्यप्युपलभ्यमानत्वात् ? इति चेत् , आह-आगमे हि अनन्तकस्य अनन्तभेदा उक्ताः, तत्र हीयमानभागानाम् अनन्तकम् अल्पम् तदपेक्षया मौलराशेः-भागानन्तकं बृहत्तरं बोध्यम् अतो न सर्वथोच्छेद इति । युज्यते च तेषां सर्वथोच्छेदाभावो भव्यवत् तरह “अनन्तगुणपरिहाण्या” पद में अनन्त निर्विभागभागों की परिहानि से ऐसा ही अर्थ करके "अनन्तगुणानां परिहाण्या" में षष्ठी तत्पुरुष समास समझना चाहिये । कर्मधारय नहीं गुण शब्द भाग अर्थ का वाचक है यह बात आगम में प्रसिद्ध है । यहां ऐसी शंका हो सकती है कि जव वर्णादिकों के अनन्तगुणों की हानि होती कही गई है तो फिर इस तरह से इन श्वेतादि वर्गों का और गन्धादि गुणों का सर्वथा उच्छेद ही हो जावेगा परन्तु ऐसा तो होने का नहीं क्योंकि वर्तमान काल में इन सव ही इन गुणों का जैसे जातीय पुष्पादि में श्वेतवर्ण का, इसी तरह अन्यत्र भी अन्य श्वर्णों का एवं गन्धादिकों का सद्भा व तो देखा ही जाता है तो इस शंका का उत्तर ऐसा है कि आगम में अनन्त के भी अनन्त भेद माने गये हैं इनमें हीयमानभागों का जो अनन्तक है वह तो अल्प है और इनमें मूलराशि का जो भागानन्तक है वह वृहत्तर है इसलिये इनका सर्वथा उच्छेद नहीं हो सवता है । भव्य की तरह इनके सर्वथा उच्छेद होने का प्रसङ्ग ही प्राप्त नहीं होता है अभी तक अनन्त काल से भी भव्यों के सिद्ध अवस्थापन्न होते रहने पर भी और अनन्तकाल तक भी भव्य सिद्ध अवस्थाઆ રીતે એમની સમાપ્તિ સંબંધી આ ક્રમ પ્રથમ આરકના અંતિમ સમય સુધી જાણ જોઈએ. તેમજ આ પ્રમાણે એ જ ક્રમ અવસર્પિણી કાલના અંતિમ સમય સુધી ચાલુ રહે छे मे पण ए स. मा प्रमाणे अनन्तगुणपरिहाण्या ५४मा अनत निविला. गनी परिहानिथी वो ॥ अथ श्रय ४रीने अनन्तगुणानां परिहाण्या मां षही तत्पुरुष સમાસ સમજવો જોઈએ કર્મધારય નહિ. ગુણ શબ્દ ભાગ અર્થને વાચક છે આ વાત આગમમાં પ્રસિદ્ધ છે. અહી એવી શકાયણ ઉદ્ભવી શકે છે કે જ્યારે વર્ણાદિકેના અનંત ગુણોની હાનિ થતી રહી છે એવું કહેવામાં આવ્યું છે તે પછી આ રીતે તે એ વેતાદિ વર્ણોને અને ગન્ધાદિ ગુણેને સર્વથા ઉછેર જ થઈ જશે પણ આવું થશે નહિ કેમકે વર્તમાન કાળમાં એ સર્વ ગુણેને–જેમ જાતીય પુષ્પાદિમાં તવણેને આ પ્રમાણે અન્ય પણ અન્ય-અન્ય વર્ણને તેમજ ગંધાદિકેને સદૂભાવ તે જોવામાં આવે જ છે. તે આ શંકા ને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે આગમમાં અનંતતાના પણ અનંત ભેદો માનવામાં આવ્યા છે. એમાં હીયમાન ભાગો ને જે અનંતક છે તે તે અ૯૫ છે અને એમનામાં જે મૂલરાશિને ભાગાન્તક છે, તે બ્રહરૂર છે એથી એમના સર્વથા ઉચછેદનને સંભવ નથી. ભવ્યની જેમ - Page #319 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३४ सुषमानामक द्वितीयारकवर्णनम् ३०५ यथा सिध्यत्स्वपि भव्येषु न तेषामनन्तकालेनापि निर्लेपना तथा सर्वनीवेभ्योऽनन्तगुणानाम् उत्कृष्टवणौदिगतभागानां न सर्वथोच्छेद इति । न च ते संख्याता एव सिध्यन्ति, इमे तु प्रतिसमयम् अनन्ता हीयन्ते इति महद्दृष्टान्तवैषम्यम् ? इति वाच्यम् , यतस्तत्रसिध्यतां भव्यानां यथा संख्यातता तथा सिद्धिकालोऽनन्तः एवमत्राऽपि यथा प्रतिसमयम् अनन्तानामेषां हीयमानता तथा हानिकालोऽवसर्पिणी प्रमाण एव ततः परम् उत्ससिणी प्रथमसमयादौ तेनैव क्रमेण वर्द्धन्ते वर्णादय इति सर्वे सुस्थितम् । 'अणंतेहि पन्न होते रहेगें फिर भी इनका सर्वथा उच्छेद जैसे नहीं होता है उसी प्रकार मे सर्व जीवों की अपेक्षा अनन्तगुणों उत्कृष्ट वर्णादिगतभागों का सर्वथा उच्छेद नहीं होगा। __ शंका-वे संख्यात ही सिद्ध होते हैं परन्तु ये तो प्रति समय अनन्तरूप में ही हीन होते रहते हैं, इस तरह जो भव्य का दृष्टान्त देकर आपने इनकी निर्लेपता का अभाव प्रतिपादित किया है -सो इस दृष्टान्त में तो इनको अपेक्षा बहुत बड़ी विषमता है-अर्थात् इस दृष्टान्त से वर्णादिकों के सर्वथा उच्छेद होने का जो प्रसङ्ग दिया गया है वह हटता नहीं है बना ही रहता है ? सो इस प्रकार की यह आशंका भी ठीक नहीं है क्यों कि सिद्ध होनेवाले भव्य जीवों में जैसी संख्यातता है वैसी काल में संख्यातता नहीं है किन्तु वह सिद्धि काल तो अनन्त है इसी प्रकार प्रत्येक समय में अनन्त वर्णादि भावों में जैसी हीयमानता है क्योंकि बह उनका हानिकाल अव सर्पिणी प्रमाण ही है इसके बाद तो उत्सर्पिणी के प्रथम काल के प्रथम समय से लेकर अन्तिम काल के अन्तिम समय तक ये वर्णादि भाव इसी क्रम से वर्द्धमान होते रहते हैं । अतः किसी भी काल में इन बर्णादि भावोंका सर्वथा उच्छेद प्राप्त नही हो सकता है । "अणंतेहिं उच्चत्त એમનું સર્વથા ઉચ્છેદન થાય તે પ્રસંગ જ ઉપસ્થિત થતો નથી. આજ સુધી અનંતકાલથી ભવ્ય સિદ્ધ અવસ્થાપન્ન થતા આવ્યા છે અને ભવિષ્યમાં પણ તેઓ અનંતકાલ સુધી સિદ્ધ અવસ્થાપન્ન થતા રહેશે, છતાં એ તેમનું સર્વથા ઉચછેદન થતું નથી. આ પ્રમાણે જ સર્વજીની અપેક્ષાએ અનંતગુણ ઉત્કૃષ્ટ વર્ણાદિગત ભાગોનું સર્વદા ઉછેદન થશે નહિ. શકા–તેઓ તે સંખ્યાત જ સિદ્ધ હોય છે, પણ એ તે પ્રતિ સમય અનંતરૂપમાંજ હીન થતા રહે છે, આ પ્રમાણે જે ભવ્યનું દૃષ્ટાન્ત આપીને તમે એમની નિર્લેપતાનો અભાવ પ્રતિપાદિત કર્યો છે, તે આ દૃષ્ટાન્તમાં તો એમની અપેક્ષા ખૂબજ વિષમતા છે, એટલે કે આ દૃષ્ટાન્તથી વર્ણાદિકને સર્વથા ઉચ્છેદ થવા સંબંધી જે પ્રસંગ આપવામાં આવેલ છે તે કાયમ જ રહે છે તે આ જાતની આ આશંકા પણું યેગ્ય ન કહેવાય. કેમકે સિદ્ધ થનારા ભવ્ય જીવોમાં જેવી સંખ્યાતતા છે તેવી કાળમાં સંખ્યાતતા નથી પરંતુ તે સિદ્ધિ કાળ તે અભિન્ન છે આ રીતે દરેક સમયમાં અનંત વદિ ભાવોમા જેવી હીયમાનતા છે, તે તેમને હાનિકાલ અવસર્પિણી પ્રમાણ જ છે. એના પછી તે ઉત્સર્પિણીના પ્રથમકાળના પ્રથમ સમયથી માંડીને અંતિમકાળના અંતિમ સમય સુધી એ વર્ણાદિ ભાવો એ જ કમથી વદ્ધમાન થતા રહે છે. માટે કંઈ પણ કાળમાં એ વક્રિભાવે.ને સર્વથા ઉચછેદ પ્રાપ્ત થઇ શકતો નથી. Page #320 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे उच्चत्तपज्जवेहिं' इति यदुक्तं, तत्रेवमाशङ्का संजायते तथाहि-उच्चत्वं शरीरस्य स्वावगाढमूलक्षेत्रादुपरितननमः प्रदेशावगाहित्वं तत्पर्यवाश्च एकद्वित्रिप्रतरावगाहित्यादयोऽसं ख्यातमतरावगाहित्वान्ता असंख्याता एव, अवगाहना क्षेत्रस्यासंख्यातप्रदेशात्मकत्वात् , कथं तर्हि एषा मनन्तत्वम् ? कथं चतेऽनन्तभागपरिहाण्या परिहीयन्ते ? इति । ___अत्रोच्यते-प्रथमारके यत् प्रथमसमायोत्पन्नानामुत्कृष्टशरीरोच्चत्वं भवति ततो द्वितीयादि समयोत्पन्नानां यावतामेकनभः प्रतरावगाहित्वलक्षणपर्यवाणां हानिस्तावत् पुद्गलानान्तकं हीयमान द्रष्टव्यम् , आधारहानावाधेयहानेरावश्यकत्वात् । तेन उच्चत्वपर्यवाणामप्यनन्तत्वं सिद्धं नमः प्रतरावगाहस्य पुद्गलोपचयसाध्यत्वादिति पज्जवेहि" ऐसा जो कहा गया है सो वहां पर ऐसी आशंका हो सकती है कि स्वावगाढभूत मूल क्षेत्र से लेकर ऊपर ऊपर तक का जो नभः प्रदेश है उस नभः प्रदेश में जो अवगाहिता हैं वही शरीर की उच्चता है इस उच्चता की पर्याये एक दो तीन प्रतरावगाहित्व आदि असंख्यात प्रतरावगाहित्व तक होती है और ये असंख्यात ही होती हैं तात्पर्य इसका यही है कि जीव का अवगाह आकाश के एक प्रदेश से लेकर असंख्यातप्रदेश तक ही होता है क्योंकि लोकाकाश के असंख्यात ही प्रदेश हैं तो फिर यहां पर पर्यायों में अनन्तता कैसे कही गई हैं और कैसे यह अनन्तभागों की परिहानि से हीन कहो गई हैं ? सो इस शंका का समाधान ऐसा है कि प्रथम आरक के प्रथम समय में उत्पन्न हुए जीवों की जो शरीरोच्चता होती है उससे द्वितोयादि समयों में उत्पन्न हुए जीवों की जितनी एक नभः प्रदेशावगाहित्व रूप पर्यायों की हानि होती है वह अनन्तरूप में हीयमान होती है क्यों कि आधार को हानि में आधेय को हानि होना आवश्यक है, इससे उच्चत्वादि पर्यायों में भी नभः प्रदेशावगाह पुद्गलोपचय साध्य होने से अनन्तता सिद्ध हो जाती है। "अनन्तैः आयुः पर्यवैः" ऐसा जो कहा गया है सो वहां पर भी ऐसी आशंका हो __"अणंतेहिं उच्चत्तपजवेहिं" भामरे हवामां मायुताय मेवी ।। 5 श કે સ્વાગઢ ભૂત મૂલ ક્ષેત્રથી માંડીને ઉપર–ઉપર જે નભઃ પ્રદેશ છે, તે નભઃ પ્રદેશમાં જે અવગાહિત છે, તે જ શરીરનો ઉચ્ચતા છે, આ ઉચ્ચતાની પર્યાયે એક, બે, ત્રણ પ્રતરાવગાહિત્ય આદિ અસંખ્યાત પ્રતરાવાહિત સુધી હોય છે અને એ અસંખ્યાત જ હોય છે. તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે જીવને અવગાહ આકાશના એકપ્રદેશથી માંડીને અને સંખ્યાત પ્રદેશ સુધી જ હોય છે કેમ કે કાકાશના અસંખ્યાતજ પ્રદેશ છે, તે પછી અહીં પયામાં અંનતતા શા માટે કહેવામાં આવી છે ? અને કેવી રીતે આ અનંતભાગનો પરિહાનિથી હીન કહેવામાં આવ્યા છે ? તે આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે પ્રથમ આરકમાં પ્રથમ સમયમાં ઉત્પન્ન થયેલા છની જે શરીરોચ્ચતા હોય છે તેનાથી દ્વિતીયાદિ સમયમાં ઉત્પન્ન થયેલા જીવોની જેટલી એક નભ: પ્રદેશાવગાહિત્વ રૂપ પર્યાની હાનિ હોય છે તે અનંતરૂપમાં હીયમાન હોય છે. કેમ કે આધારની હાનિમાં અધેિયનો હાનિ આવશ્યક છે, એનાથી ઉચ્ચત્વાદિ પર્યામાં પણ નભ: પ્રદેશાવગાહપુદ્ગલે પચય साध्य पाथी मनता सिद्ध थ/ ४ नय छे. 'अनन्तैः आयुः पर्यवैः' मामले वाम Page #321 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि०वक्षस्कार सू. ३४ सुषमानामक द्वितीयारकवर्णनम् ३०७ अनन्तैः आयुः पर्यवैः' इति यदुक्तम् , तत्रैवमाशङ्का जायते, तथाहि -पर्यवाणाम् एकसमयोना द्विसमयोना यावदसङख्येयसमयोनोत्कृष्टा स्थितिरिति पर्यवाः स्थितिस्थानतारतम्यरूपा असंख्येया एव, आयुः स्थिते रसंख्यातसमयात्मकत्वात्, तर्हि कथमुक्तम्-'अनन्तैः आयुः पर्यवैः' इति !, अत्राह- हीयमानस्थितिस्थानकारणीभूतानि अनन्तानि आयुः कर्मदलिकानि प्रतिसमयं परिहीयन्ते । तानि हीयमानानि अनन्तानि आयुः कर्मदलिकानि भवस्थितिकारणत्वात् आयुः पर्यवा एव, अतस्तेषाम् अनन्तत्वे नास्ति काऽपि विप्रतिपत्तिरिति । तथा- 'अनन्तै गुरुलघुपर्यवैः' इति यदुक्तं, तत्रगुरुलघु-पर्यवाः औदारिक वैक्रियाहारकतैजसरूपाणां बादरस्कन्धद्रव्याणां पर्याया इति तत्र प्रकृते वैक्रियाहारकयोरनुपयोगः, तेन तत्राद्यसमये औदारिकशरीरमाश्रित्य उत्कृष्ट वर्णादयो बोध्याः, ततः परं सकती है कि एक समय होन, दो समय हीन, यावत् असंख्यात समय हीन जो उत्कृष्ट स्थिति होती है वही आयु की पर्याये हैं, इस स्थिति स्थानों की तरतमता को लेकर आयु की पर्याये असंख्यात ही हो सकती हैं, क्योंकि आयु की स्थिति असंख्यात समयरूप ही होती है, तो फिर आयु की पर्यायों में अनन्तता कैसे कही गई है ? तो इस शंका का समाधान ऐसा है कि हीयमानस्थितिस्थानकोंके कारणीभूत जो आयुकर्मदलिक प्रतिसमय हीन होते हैं वे हीयमान अनन्त आयुकर्मदलिक भवस्थिति के कारणभूत होने से आयु के पर्यायरूप ही होते हैं अतः इनकी अनन्तता में कोई विप्रतिपत्ति नही है, “अनन्तै गुरुलघु पर्यवैः" ऐसा जो कहा गया है सो औदारिक वैक्रिय आहारक एवं तैजस रूप बादर स्कन्ध द्रव्यों की जो पर्याये हैं वे गुरु लघु पर्याय हैं । प्रकृत में वैक्रिय और आहारक पर्यायों का उपयोग नहीं लिया गया है । अतः प्रथम आरक में आद्यसमय में औदारिक शरीर को आश्रित करके उत्कृष्ट वर्णादिक जानना चाहिए इसके बाद वे उसी तरह से हीन होते जाते हैं। तथा तैजस शरीर को आश्रित करके आधઆવ્યું છે, તે ત્યાં પણ એવી આશંકા થઈ શકે છે કે એક સમય હીન, બે સમય હીન, થાવત્ અસંખ્યાત સમય હીન જે ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ હોય છે તે જ આયુની પર્યાય છે. આ સ્થિતિ સ્થાનની તરતમ્યતા લઈને આયુની પર્યાયે અસંખ્યાત જ થઈ શકે છે. કેમ કે આયુની સ્થિતિ અસંખ્યાત સમય રૂપ જ હોય છે. તે પછી આયુની પર્યાયમાં અન તતા શા માટે કહેવામાં આવી છે ? તે આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે હીયમાન સ્થિતિ સ્થાનકોના કારણભૂત જે આયુ કમ દલિકે પ્રતિ સમયે હીન થતા રહે છે તેઓ હીયમાન અનંત આયુ કર્મ દલિક ભવસ્થિતિના કારણે ભૂત હોવાથી આયુના પર્યાય રૂપ लाय. मेथी मेमनी मन ततामा ५Y Mतनी विपत्ति नथी. “भनन्तै गुरुलधुपर्यधैः” मामा अवामा माथ्यु छे तो मोहा२ि४ वैश्य मा म तेस રૂપ બાદર સ્કન્ધ દ્રવ્યોની જે પર્યાયો છે તે ગુરુલઘુ પર્યાય છે. પ્રકૃતમાં વેક્રિય અને આહારક પર્યાયે ઉપયોગ કરવામાં આવ્યો નથી. એથી પ્રથમ આરકની આઘસમયમાં ઔદારિક શરીરને આશ્રિત કરીને ઉત્કૃષ્ટ વર્ણાદિક જાણવું જોઈએ. ત્યારબાદ તેઓ તે પ્રમાણે | Page #322 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३०८ जम्बूद्वीपप्रचतिसूत्रे तथैव हीयन्ते । तथा तैजस शरीरमाश्रित्याद्यसमये कपोतपरिणामक जाठराग्निरुत्कृष्टः, तदनन्तरं हान्या मन्द मन्दतरादि वीर्यकत्वरूपो भवतीति तथा - 'अनन्तैरगुरुलघुपर्यवैः, 18, इत्युक्तम् । तत्र 'अगरुलगु द्रव्याणि कार्मणमनोभापादीनि पौद्गलिकानि सूक्ष्मद्रव्याणि' इत्यर्थः कृतः । तत्र कार्मणस्य सातावेदनीय शुभनिर्माण सुस्वर सौभाग्यादेयादि रूपस्य बहुस्थित्यनुभाग प्रदेशकत्वेन, मनोद्रव्यस्य बहुग्रहणासन्दिग्धग्रहण झटितिग्रहण बहुधारणादि मत्वेन, भाषाद्रव्यस्य उदात्तत्व गम्भीरोपनीतरागत्वप्रतिपादनाद विधायितादिरूपत्वेन च आदिसमये उत्कृष्टत्वं ततः परं क्रमेणानन्ता पर्यवाहीयन्तेइति । तथा - 'अनन्तै रुत्थानकर्मबलवीर्य पुरष कार पराक्रमपर्यवैः' इत्युक्तम् । उत्थानादयः प्रथमसमये उत्कृष्टाः, ततः परं क्रमशो हीयन्ते इति बोध्यम् । अत्र प्रकृतविषये प्राचीना समय में कपोत परिणामक जठर संबंधी अग्नि उत्कृष्ट होती है । इसके बाद द्वितीयादिक समयों में वह हानिरूप से होती हुई मन्द मन्दतर आदि वीर्य प्रभाव वाली होती जाती है । “अनन्तैः अगुरुलघुपर्थवैः " ऐसा जो कहा गया हैं सो इसका अर्थ कार्मण मनोवर्गणा और भाषा वर्गणा आदि रूप सूक्ष्म पौगलिक द्रव्य ऐसा किया है इनमें जो कार्मेण द्रव्यरूप सूक्ष्म पुगल द्रव्य है एवं उसमें जो सातावेदनीय, शुभनिर्माण, सुस्वर, सौभाग्य और आदेयादि प्रकृतियां हैं उनमें बहु स्थिति रूप, बहु अनुभाग रूप, बहुप्रदेशरूप जो बंध है उस रूप से मनोद्रव्य का बहुग्रहणरूप से, असंदिग्ध ग्रहणरूपसे, झटिति ग्रहणरूप से और बहुधारणादिमत्त्व रूप से, भाषा द्रव्य का उदात्तरूप से, गंभीर रूप से राग आदि रूप से आदि समय में उत्कृष्ट संचय -ग्रहण होता हैं इसके बाद द्वितीयादि समयों में क्रमशः इनकी अनन्त पर्याय हीयमान होने लगती हैं । तथा-“अनन्तैरुत्थानकर्मबलवीर्य पुरुषकार पराक्रमपर्यवैः” ऐसा जो कहा गया है सो इसका જ હીન થતા જાય છે. તેમ જ તેજસ શરીરને આશ્રિત કરીને આદ્યસમયમાં કપાત પરિ ણામક જઠર સંબંધી અગ્નિઅતિ ઉત્કૃષ્ટ હાય છે, ત્યાર બાદ દ્વિતીયાદિક સમયેામાં તે હાનિરૂપમાં પરિણત થતી મન્દ મન્ત્રતર વગેરે વીય-પ્રભાવવાળી થતી જાય છે. "अनन्तैः अगुरुलघुपर्यवः” साम उडेवामां आव्यु छे तो मानो अर्थ भय, अने મનેાવણા અને ભાષાવગણુા આદિ રૂપ સૂક્ષ્મ પૌદ્ગલિક દ્રવ્ય આમ કરવામાં આવેલ છે. એમનામાં જે કામણુ દ્રવ્ય રૂપ સૂક્ષ્મ પુદ્ગલ દ્રવ્ય છે અને તેના જે સાતાવેદનીય, શુભનિર્માણુ સુસ્વર, સૌભાગ્ય અને આધૈયાદિ પ્રકૃતિચેા છે, તેમનામાં બહુસ્થિતિરૂપ, બહુ અનુભાગ રૂપ, બહુ પ્રદેશરૂપ જે અન્ય છે, તે રૂપથી મનેાદ્રવ્યનું બહુગુણરૂપથી, અસદિગ્ધ ગ્રહણ રૂપથી,દ્વિતિ ગ્રહણ રૂપથી અને અહુધારણાદિમત રૂપથી, ભાષાદ્રવ્યનુ' ઉદાત્ત રૂપથી, ગભીર રૂપથી શગ આદિ રૂપથી આદિ સમયમાં ઉત્કૃષ્ટ-સંચય ગ્રહણ હાય છે. ત્યાર બાદ દ્વિતીયાદિ સમયામાં ક્રમશઃ એમના અન ́ત પર્યાય હીયમાન થવા માંડે છે. तथा—“अनन्तैरुत्थानकर्मबलवीर्य पुरुषकारपराक्रमपर्यवैः” मेवु ने उडेवामां आयु Page #323 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विपक्षस्कार० सू. ३४ सुषमानामक द्वितीयारकवर्णनम् गाथा:--संघयणं संठाणं, उच्चत्तं आउयं च मणुयाणं । अणुसमयं परिहायइ, ओसप्पिणी कालदोसेण ॥१॥ कोहमयमायलोभा, ओसन्नं बढ़ए य मणुयाणं । कूड तुल कूडमाणा, तेणाऽणुमाणेण सव्वंथि ॥२॥ विसमा अज्ज तुलाओ, विसमाणि य जणवएस माणाणि । विसमा रायकुलाइं, तेण उ विसमाई वासाइ ॥३।। विसमेसु य वासेसु, हुति असाराई ओसहिबलाई । ओसहि दुब्बल्लेण य, आउ परिहायई णराणं ॥४।। छाया- संहननं संस्थानम् उच्चत्वम् आयुश्च मनुजानाम् । अनुसमयं परिहीयते अवसर्विणोकाल दोषेण ॥१॥ क्रोधमदमायालोभाः प्रायो वर्धन्ते च मनुजानाम् । कूटतुला कूटमाने तेनानुमानेन सर्वमपि ॥२॥ विषमा अद्य तुलाः विषमाणि च जनपदेषु मानानि । विषमाणि राजकुलानि तेन तु विषमाणि वर्षाणि ॥३॥ तात्पर्य ऐसा है कि-प्रथम अवसर्पिणी काल में उत्थान आदि प्रथम समय में उत्कृष्ट होते हैं इसके बाद क्रमशः ये द्वितीयादि समयो में हीन होते जाते हैं इस प्रकृत विषय में प्राचीन गाथाएँ इस प्रकार से हैं"संघयणं सठाणं उच्चत्तं आउयं च भणुयाणं, । अणुसमयं परिहायइ, ओसप्पिणीकालदोसेण ॥१॥ कोह मयमायलोभा ओसन्नं वड्ढए य मणुयाणं । कूडतुल क्डमाणा तेणाऽणुमाणेण सव्वंपि ॥२॥ विसमा अज्जतुलाओ विसमाणि य जणवएसु माणाणि । विसमारायकुलाइं तेण उ विसमाई वासाइं।।३।। विसमेसु य वासेसु हुंति असाराइं ओसहिबलाइं । ओसहि दुब्बलेण य आउ परिहायइ णराणं ॥४॥ છે તે આનું તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે–પ્રથમ અવસર્પિણી કાળમાં ઉત્થાન આદિ પ્રથમ સમયમાં ઉત્કૃષ્ટ હોય છે. ત્યારબાદ–ક્રમશ: એઓ દ્વિતીયાદિ સમયમાં હીન થતા જાય છે. આ પ્રકૃતવિષયમાં પ્રાચીન ગાથાઓ આ પ્રમાણે છે : संघयणं संठाणं उच्चतं आउयं च मणुयाण, अणुसमय परिहायइ ओसप्पिणी कालदोसेण । १॥ कोहमयमाय लोभा ओसन्न बडूढए य मणुयाण कूडतुलकुडमाणा तेणंऽणुमाणेण सव्वेपि । २॥ बिसमा अज्ज तलाओ विसमाणि य जणवपसु माणाणि, विसमा रायकुलाई तेण उ विसमाइ वासाई॥३॥ विसमेसुय वासेसु हुति असाराई ओसहिबलाई। ओसहि दुबलेण य आउं परिहायइ णराणं ॥४॥ Page #324 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे विषमेषु च वर्षेषु भवन्ति असाराणि ओषधिबलानि । ओषधिदौर्बल्येन च आयुः परिहीयते नराणाम् ॥४॥ इति । एषा वर्णगान्धादिपर्यवाणां हानि वसर्पिणीकालदोषेण बोध्या इयं तु दुष्षमामाश्रित्य वाहल्येन भवति शेषारकेषु तु यथासंभवं विज्ञेयेति । ननु-'नित्यद्रव्यस्यापि कालस्य कथं हानि ?" इति शङ्ककस्याशङ्कानिवारणार्थ भवता वर्णगन्धादि पर्यवाणां हानिनिर्दिष्टा, वर्णादि पर्यवाश्च पुद्गलधर्माः, हीयमानैस्तैः कालस्य हानिरसंभाव्या, नहि अन्यधर्मेंहीयमानः अपरस्य हानिः क्वचिद दृष्टा यधन्यधर्मीयमानैरपरस्य हानिः स्वीक्रियेत, तर्हि वृद्धाया वयोहानौ युवत्या अपि वयोहानिः प्रसज्येत, न चैवं भवतीति चेत् , आह, कालो हि कार्यमात्रस्य कारणमिति कार्यगतधर्मान् कारणेऽप्युपचर्य कालस्य हानिरुक्ते न काऽपि विप्रतिपत्ति रिति ॥सू० ३४॥ इनका भाव स्पष्ट है इन वर्ण गन्ध आदि पर्यायीं की हानि अवसर्पिणी काल के दोष से होती है ऐसा जानना चाहिये. दषमा आरक को आश्रित करके तो वर्ण गन्ध आदिकों को हानि बहुत अधिक रूप में होती है शेष आरकों में यथा संभव हो होती है ऐसा तीर्थंकरों का आदेश है। काल को तो नित्य द्रव्य माना गया है फिर इसकी हानि कैसे होती है ? इस प्रकार शङ्का करने वाले की शङ्का को निवारण करने के निमित्त आपने जो वर्ण गन्ध आदि पर्यायों की हानि कही हैं सो यह कथन तो ठीक है क्योंकि वर्णादिको की पर्यायें पुद्गलधर्मरूप हैं, परन्तु इन हीयमानों के द्वारा काल की हानि होना तो असंभवित् है क्यों कि अन्य की हानि में अन्य की हानि नहीं होती है कहीं ऐसा तो देखा नहीं जाता है कि वृद्धा की वयो हानि में युवती के वय की हानि होती हो' सो इसका उत्तर ऐसा है कि काल कार्यमात्र के परिवर्तन में कारण होता है इसलिये कार्यगत धर्मों का कारण में भी उपचार कर लिया जाता है अतः यहाँ पर इसी बात को लेकर काल की हानि कह दो गई है, इसमें विवाद जैसी कोई बात नहीं है।।३४॥ એમને ભાવ સ્પષ્ટ છે. આ બધાં વણું ગન્ધવગેરે પર્યાચાની હાનિ અવસર્પિણી કાળના દોષથી થાય છે, એમ સમજવું જોઈએ. દુષમા આરકને આશ્રિત કરીને તે વણ ગબ્ધ વગેરે આદિકની હાનિ અત્યધિક રૂપમાં થાય છે. શેષ આરકોમાં યથાસંભવ જ થાય છે, એવી તીર્થકરોની આજ્ઞા છે. કાળને તો નિત્ય દ્રવ્ય માનવામાં આવેલ છે. તે પછી એને હાનિ કેવી રીતે થાય છે? આ જાતની શંકા કરનારાઓની શંકાનું નિવારણ કરવા માટે તમે જે વર્ણ. ગબ્ધ વગેરે પર્યાની હાનિ બતાવેલ છે. તે આ કથન તો ઠીક જ છે. કેમ કે વર્ણાદિકેની પર્યા પુદ્ગલ રૂપ છે, પણ આ હીયમાન વડે કાળની હાનિ થવી એ તે અસંભવિત છે કેમ કે અન્યની હાનિમાં કેઈ અન્યની હાનિ થતી નથી. કેઈ સ્થળે માવું તે જોવામાં આવત’ નથી કે વૃદ્ધાની વચહાનિમાં યુવતીના વયની હાનિ થતી હોય. તે આને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે કાળ કાર્યમાત્રના પરિવર્તનમાં કારણભૂત હોય છે. એથી કાયગત ધર્મોને કારણમાં પણ ઉપચાર કરવામાં આવે છે. એથી અહીં એ વાતને લઈને જ કાલની હાનિ કહેવામાં આંવી છે. એમાં વિવાદ જેવી કઈ વાત નથી. ૩૪ Page #325 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार ३४ सुषमारके भरनक्षेत्रस्थितिनिरूपणम् ३११ मूलम्- जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे इमीसे ओसप्पिणीए सुसमाए समोए उत्तमकट्ठपत्ताए भरहस्स वासस्स के रिसए आयारभोवपडोयारे होत्था ? गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था, से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा, तं चेव जं सुसम सुसमाए पुववण्णियं, णवरं णाणतं चउधणुसहस्समृसिया एगे अट्ठावीसे पिट्ठकरंडुयसए, छट्ठभत्तस्स आहारतु, चउसहि राइंदियाइं सारक्खंति, दो पलिओवमोई आऊ, सेसं तं चेव । तीसे णं समाए चउबिहो मणुस्सा अणुसज्जित्था, जहा-एका?, पउरजंघा २, कुसुमा ३.सुसमणा ४, ॥सू३५|| छाया-जम्बूद्वीपे खलु भदन्त ! द्वीपे अस्या अवसर्पिण्याः सुषमायां समायाम् उत्तमकाष्ठा प्राप्तायां भरतस्य वर्षस्य कोश आकारभावप्रत्यवतारोऽभवत् ?, गोतम ! बहुसमरमणीयो भूमिभागोऽभवत् तद्यथानामकम् आलिङ्गपुष्कर इति वा, तदेव यत् सुषमसुषमायां पूर्ववणितम् नवरं नानात्वं चतुर्धनुस्सहस्रोच्छ्रिताः एकम् अष्टाविंशं पृष्ठ करण्डकशतं षष्ठभक्तस्य आहारार्थः, चतुष्पष्टि रात्रिन्दिवं संरक्षन्ति, द्वे पल्योपमे आयुः शेषं तदेव । तस्यां खलु समायां चतुर्विधा मनुष्याः अन्वषजन् , तद्यथा-एकाः १, प्रचुरजवाः २; कुसुमाः ३, सुषमनाः ४, ॥ ३५॥ टीका-'जंबुद्दीवे णं' इत्यादि। गौतमस्वामी पृच्छति-'जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपे खलु द्वीपे 'इमीसे' अस्याः वर्तमानाया 'ओसप्पिणीए' अवसर्पिण्याः 'सुसमाए समाए उत्तमकट्टपताए' सुषमायां समायाम् उत्तमकाष्ठाप्राप्तायाम्-उत्कृष्टावस्थामुपगतायां सत्यां 'भरहस्स वासस्स केरिसए' भरतस्य वर्षस्य कीदृशः किं प्रकारकः 'आयारभावपडोयारे' आकारभाव प्रत्यवतारःस्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः 'होत्था' अभवत् ? इति । भगवान् आह'गोयमा ! वहुसमरमणिज्जे' हे गौतम ! बहुसमरसणीय-अत्यन्तसमो मनोरमश्च 'भूमिभागे' टीका---"जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे इमीसे ओसप्पिणीए" इत्यादि । इस सूत्र द्वारा गौतम ने प्रभु से पूछा है "जंबुद्दोवे णं भंते ! दीवे." हे भदन्त ! जब इस जम्बूद्वीप में इस अवसर्पिणी के सुषमा नामक आरे को मौजूदगी में जब कि वह अपनो उत्कृष्ट अवस्था में वर्तमान रहता हैं भरत क्षेत्र की स्थिति कैसी रहती है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-"गोयमा ! वहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था, से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा त चेव जं जंबुहीवेण भंते दीवे इमीसे ओसप्पिणीप, इत्यादि सूत्र-॥३५॥ 4-२मा सूत्र व गौतम प्रभुने साततने। प्रश्न ये छे “जबुद्दीवेणं भंते दीवे." "3 ભદન્ત ! જ્યારે આ જંબૂદ્વીપમાં આ અવસર્પિણના સુષમાં નામક આરકની હયાતીમાં જ્યારે તે પોતાની ઉત્કૃષ્ટ અવસ્થામાં વર્તમાન રહે છે, ત્યારે ભરતક્ષેત્રની સ્થિતિ કેવી રહે છે ? એના Page #326 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३१२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिमचे भूमिभागः भूमिप्रदेशः 'होत्था' अभवत् । तत्र दृष्टान्तमाह-'से जहानामए' इत्यादि । 'से जहा णामए' तद्यथा नामकम् 'आलिंगपुक्खरेइ वा' आलिङ्गपुष्कर इति वा, इत्यादि सर्व वर्णनं सुषमसुषमा सूत्रवद् बोध्यम् । एतदेव दर्शयति सूत्रकारः 'तं चेव जं सुसम सुसमाए पुव्ववणियं तदेव यत् सुषमसुषमायां पूर्ववणितमिति । सम्प्रति ततो वैशिष्टय प्रतिपादयति 'नवरं' इत्यादि । णवरं' नवरं केवलं 'णाणत्तं' नानात्वं-भेदोऽयम् , यत् सुषमसुषमासमुत्पन्ना मनुजाः 'चउधणुसहस्समूसिया' चतुर्धनुस्सहस्रोच्छूिता-चतुस्सहस्त्रधनुः परिमाणोच्चाः क्रोशद्वयोन्नताः प्रज्ञप्ताः । तेषां मनुजानाम् ‘एगे' एकम् 'अट्ठावीसेपिट्ठकरंडयसए' अष्टाविंशं पृष्ठकरण्डकशतम् अष्टाविंशत्यधिकैकशतसंख्यकाः पृष्ठकरण्डकाः भवन्ति । प्रथमारकोत्पन्न मनुजापेक्षया सुषमारकोत्पन्नमनुजानां पृष्ठकरण्डका अधं भवन्ती. ति बोध्यम् । तथा-तेषां मनुजानां 'छट्ठभत्तस्स' षष्ठभक्तेऽतिक्रान्ते 'आहारट्टे' आहारार्थ। =आहारप्रयोजनं समुत्पद्यते । तथा ते मनुजाः 'चउसर्टि राइंदियाई' चतुप्पष्टिं रात्रिन्दिवं स्वापत्यं 'सारक्खन्ति' संरक्षन्ति । अत्रेदं बोध्यम्-चतुष्पष्टिदिवसावशिष्टायुषस्ते मनुजाः अपत्यानि जनयन्ति, तानि चतुष्पष्टिदिवसावधिसंरक्ष्य संगोप्य पूर्वोक्तप्रकारेण कालधर्मसुसमसुसमाए पुव्ववण्णियं" हे गौतम ! इस काल की उपस्थिति में भरतक्षेत्र का भूमिभाग बहु सम रमणीय रहता है अत्यन्त सम और मनोरम होता हैं यहां इसका वर्णन "आलिङ्गपुष्कर आदि रूप से पूर्व में सुषमसुषमा के वर्णन में कहे गये सूत्र की तरह से कर लेना चाहिये। परन्तु उस काल के समय के वर्णन में और इस काल के समय के वर्णन में जो अन्तर है वह 'नवरं" इस पद द्वारा सूचित करते हुए सूत्रकार कहते है कि इस काल में उत्पन्न हुए मनुष्य "चउधणुसहस्ममूसिया एगे अट्ठावीसे पिट्ठकरंडयसए, छ? भत्तस्स आहारट्ठे चउसर्ट्सि राइंदियाई सारखंति" चारहजार धनुष की अवगाहनावाले होते हैं अर्थात्-दो कोश के ऊँचे शरीर वाले होते है, १२८ इनके पृष्ट करण्डक होते है, अवसर्पिणी के प्रथम काल के मनुष्यों के पृष्टकरण्डक २५६ होते है-तब कि इनके पृष्ट करण्डक उनसे आधे होते है, दो दिन के व्यतीत हो जाने नाममा प्रभु छ–'गोयमा! वहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था से जहा णामए आलिंग पुक्तरेह वा तं चेव जं सुसमसुसमाए पुव्बणियं" गौतम ! से मां भरतत्रन ભૂમિભાગ બહુસમરમણીય રહે છે, અતીવ સમ અને મરમ હોય છે. અહી આ મિभानु न 'भालिङ्ग पुष्कर' वगरे ३५मा पूर्वमा सुषम सुषमाना वनमा वाम આવેલ સૂત્રની જેમ જ સમજી લેવું જોઈએ. પણ તે કાળના સમયનાં વર્ણનમાં અને આ अपना समयना धुनमा २ अन्तर छे ते 'नवरं' मा ५६ 43 सूयित ४२ता सूर ४३ छतमinila मनुष्य 'चउधणुसहस्समूसिया एगे अट्ठावीसे पिठ करंयसए, छठ्ठ भत्तस्स आहारडे, बउसद्धिं राईदियाई साक्खंति" यार ७१२ घनुष २८ सपाહનાવાળા હોય છે. એટલે કે બે ગાઉ જેટલા ઉંચા શરીરવાળા હોય છે. ૧૨૮ એમના પૃષ્ઠ કરંડકો હોય છે. અવસર્પિણના પ્રથમકાળના મનુષ્યના પૃષ્ઠ કરડકે ૨૫૬ હાય છે. Page #327 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सू. ३५ भरतक्षेत्रस्थितिनिरूपणम् युक्ता भवन्ति । तदपत्यानां सप्त अवस्थाक्रमाः-पूर्ववत् बोध्याः। तेत्र प्रत्येकस्यामवस्थायां कालमानं नवदिनानि, अष्टौ घट्यः, चतुस्त्रिंशत्पलानि, किंचिदधिकानि सप्तदश चाक्षराणि । सप्तभिर्विभक्ताः चतुप्पष्टि दिवसाः पूर्वोक्तप्रमाणा एव लभ्यन्ते । पूर्वापेक्षया तेषामधिकसंरक्षणकालः कालस्य हीयमानस्य सत्वेन उत्थानादीनां हीयमानत्वात् उत्थानादोनामभिव्यक्तौ बहुतरदिवसानामपेक्षितत्वेन बोध्यः । एवमग्रेऽपि बोध्यमिति । तथातेषां मनुजानाम् आयुः जीवितकालः 'दोपलिभोवमाई' द्वे पल्योपमे=द्विपल्योपमयमाणं भवति । अत्र सूत्रे गौतमस्वामिनः प्रश्नवाक्यं' भगवत उत्तरवाक्यं च सुषमसुषमा सूत्रबद बोध्यमिति । 'आऊ सेसं तं चेव' इदमायुः प्रमाणं शरीरोच्छ्यादिकं च सुषमाया आदि समये बोध्यम् । अतः परं क्रमेण हानिक़ध्येति । पर इन्हें आहार की अभिलाषा होती है, अर्थात् दो दिन के बाद ये आहार करते है, ये अपने बाल बच्चों के संभाल ६४ दिन रात तक करते हैं, "दो पलिओवमाइं आऊ सेसं तं चेव" इनकी आयु का काल दो पल्योपम प्रमाण होता है. इनके बच्चों की अवस्था का क्रम जैसा पहिले कहा गया हैं वैसा हो यहां पर जानना चाहिए इनकी प्रत्येक अवस्था में कालमान नौ दिन का होता हैं, ८ घडियां होती हैं, ३४ पल होते है, कुछ अधिक १७ अक्षर होते है ६४ दिनों को सात से विभाजित करने पर यही प्रमाण आता है, इस कथन से सूत्रकार ने यह साबित किया है कि इनका संरक्षणकाल पूर्वकाल के संरक्षण काल को अपेक्षा हैं, काल की हीयमानता होने से यहां उत्थान आदि हीयमन होते है, इन उत्थान आदि की अभिव्यक्ति होने में बहुतर दिवसों की अपेक्षा रहा करती है, इसी तरह से आगे भी इनके सम्बन्ध में कथन जानना चाहिए, इनका आयुकाल दो पल्योपम प्रमाण होता है तथा इनके शरीर की ऊँचाई दो कोश की होती है इत्यादि रूप से जो ऐसा कहा गया है वह सब कथन सुषमा काल के आदि समय में कहा गया જ્યારે એમના પૃષ્ઠ કરંડક તેમના કરતાં અડધા હોય છે. બે દિવસ પસાર થાય પછી એમને આહારની અભિલાષા થાય છે એટલે કે બે દિવસ પછી એ આહાર ગ્રહણ કરે छ. ये मापताना पाहीनी सा ६४ हिवस-रात सुधी ४२ छे. "दो पलिओवमाइं आऊ सेसं तं चेव" मना मायुष्यनी अवधि ५८यापम प्रमाण २८बी डाय छे अमन બાળકને અવસ્થાક્રમ જેમ પહેલાં કહેવામાં આવેલ છે તેમ જ સમજ. એમની દરેકે દરેક અવસ્થામાં કાળમાન નવ દિવસનું હોય છે, ૮ ધડીઓ હોય છે, ૩૪ પલ હોય છે, કંઈક વધારે ૧૭ અક્ષર હોય છે, ૬૪ દિવસને ૭ વડે વિભાજિત કરીએ તે એ જ પ્રમાણુ આવે છે. આ કથન થી સૂત્રકારે આ વાત સિદ્ધ કરી છે કે એમના સંરક્ષણ કાળ પૂર્વકાળના સંરક્ષણ કાળની અપેક્ષાએ છે. કાળની હીયમાનતા હોવાથી અહીં ઉત્થાન આદિ હીયમાન હોય છે. એ ઉથાન આદિકોની અભિવ્યક્તિ હવામાં બહુતર દિવસોની અપેક્ષા રહે છે. આ પ્રમાણે હવે પછી પણ એમના સંબંધમાં આ રીતે જાણવું જોઈએ કે એમને આયુકાળ બે પલ્યોપમ પ્રમાણુ જેટલું હોય છે, તેમ જ એમના શરીરની ઊંચાઈ બે ગાઉ જેટલી હોય છે. ઈત્યાદિ રૂપમાં જે આવું કથન કરવામાં આવેલ છે તે બધું સુષમા કાળના આદિ Page #328 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३१४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अथ भगवान् मनुष्य भेदानाह-'तीसे णं' इत्यादि । हे गौतम ! 'तीसेणं समाए' तस्यां खलु समायां 'चउव्विहा मणुस्सा' चतुर्विधा मनुष्याः 'अणुसज्जित्था' अन्वषजन्अनुषक्तवन्तः, 'तं जहा' तद्यथा 'एका' एका प्रधानाः श्रेष्ठा, एकशब्दस्यात्र संज्ञात्वान्न सर्वनामता १, 'पउरजंघा' प्रचुरजा-पीनजङ्घाः, न तु काकवत् तनुजा इति २, 'कुसुमा' कुसुमाः सौकुमार्येण कुसुमसदृशत्वात् ३, 'मुसमणा' सुशमनासुष्टु शमनं-शान्तभावो येषां ते तथा-अतिशान्ताः प्रतनुकषायत्वादिति ४, अत्र तद्गुणवैशिष्टयात् तत्तज्जातीयता बोध्येति पूर्वारकोत्पन्नषड्जातीयमनुष्याणामत्रारकेऽभावादिमे मनुष्यास्ततोभिन्नजातीया एव भवन्तीति बोध्यम् ॥सू० ३५॥ इति द्वितीयारकः ।।।। अथ तृतीयारकस्य स्वरूपं प्रतिपादयितुं प्रश्नोत्तरस्वरूपात्मकं सूत्रमाह__ मूलम्- तीसे णं समाए तिहिं सागरोवम कोडाकोडीहिं काले वीइ कंते अणंतेहिं वण्ण पज्जवेहिं जाव अणंतगुणपरिहाणीए परिहायमाणे परिहायमाणे एत्थ णं सुसमदुस्समा णामं समा पडिवज्जिसु समणाउसो सा णं समा तिहा विभज्जइ पढमे तिभाए १. मज्झिमे तिभाए २. पच्छिमे तिभाए ३. । जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे इमीसे ओसप्पिणीए जानना चाहिए क्योंकि जैसे २ यह काल व्यतीत होता है वैसे २ आयु की हीनता होती जाती है; "तीसे णं समाए चउन्विहा मणुस्सा अणुसज्जित्था" इस काल में ये चार प्रकार के मनुष्य होते हैं-"तं जहा एका, पउरजंघा, कुसुमा, सुसमणा" एकश्रेष्ठ, यहां यह एक शब्द संज्ञा रूप में प्रयुक्त हुआ हैं. सर्वनामरूप में नहीं. दूसरे काकजङ्घा की तरह तनुजङ्घा वाले नहीं प्रत्युत पृष्ठ जङ्घा वाले, तीसरे पुष्प की तरह सुकुमारऔर चतुर्थ सुशमन-शान्तिभाववाले क्योंकि इनकी कषाय प्रतनु पतली होती है इस कारण ये अतिशान्त होते हैं' पूर्व आरक में उत्पन्न हुए ६ प्रकार के पुरुषों का इस आरक में अभावरहता है इसलिए ये उनसे भिन्न जातीय ही होते हैं, अतः तत्तद्गुण विशिष्ट होने से इनमें तत्तज्जातीयता जाननी चाहिये,, ॥३५॥ रक का कथन समाप्त ।। સમયમાં કહેવામાં આવેલ છે. કેમ કે જેમ જેમ આ કાળ વ્યતીત થાય છે તેમ તેમ આ वारेनी नतोथती जयछ. "तीसेणं समाए चउम्विहा मणम्सा असजिन्य प्रभाग या२२ मनुष्य। डाय -"तं जहा-एका पउरजंघा कुसुमा, ससमणा" એક શ્રેષ્ઠ, અહીંઆ એક શબ્દ સંજ્ઞા રૂપમાં પ્રયુક્ત થયેલ છે, સર્વનામ રૂપમાં નહિ બીજા કાક જઘાની જેમ તનુ જઘાવાળા નહિ પણ પૃષ્ઠજઠ્ઠાવાળા, ત્રીજા પુષ્પની જેમ સુકુમાર અને ચેથા સુશમન-શાંતિભાવવાળા. કેમ કે એમની કષાય પ્રતનુ-પાતળી હોય છે. એથી એ અતિશાંત હોય છે. પૂર્વ આરકમાં ઉત્પન્ન થયેલ ૬ પ્રકારના પુરુષોને આ આરકમાં અભાવ રહે છે. એથી એઓ તેમનાથી ભિન્ન જાતીય જ હોય છે. એથી તત૬ ગુણ વિશિષ્ટ હોવા બદલ એમનામાં તત્તજજાતીયતા જાણવી જોઈએ, એસપા દ્વિતીય આવકનું કથન સમાપ્ત. Page #329 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ३६ तृतीयारकस्वरूपनिरूपणम् सुसमदुस्समाए समाए पढममज्झिमेसु तिभाएसु भरहस्स वासस्स केरि सए आयारभावपडोयारे पुच्छा ? गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था, सो चेव गमो णेयव्यो णाणत्तं दो धणुसहस्सोई उड्ढे उच्चत्तेणं चउ सट्ठिपिट्ठकरंडगा चउत्थभत्तस्स आहारत्थे समुपज्जइ ठिई पलिओ. वमं, एगूणसीइ राईदियाइं सारखंति संगोवेंति जाव देवलोगपरिग्गहिया णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो ! । तीसे णं भंते ! समाए पच्छिमे तिभाए भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे होत्था ? गोयमा बहसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था, से जहा णामए अलिंगपुक्खरेइ वा जाव मणीहिं उवसोभिए, तं जहा कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चेव तीसे णं भंते ! समाए पच्छिमेतिभाए भरहे वासे मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे होत्था गोयमा ! तेसि मणुयाणं छविहे संघयणे, छबिहे संठाणे, बहूनि धणुसयाणि उद्धं उच्चत्तेणं, जहण्णेणं संखिज्जाणि वासाणि उक्कोसेणं असंखिज्जाणि वासाणि आउ यं पालंति, पालित्ता अप्पेगइया णिरयगामी अप्पेगइया तिरियगामी अप्पेगइया मणुस्सगामी अप्पेगइया देवगामी अप्पेगइया सिझंति जाव सव्वदुक्खाणमंतं क रेति ॥सू० ३६॥ छाया-तस्यां स्खलु समायां तिसृभिः सागरोपमकोटिकोटिभिःकाले व्यतिक्रान्ते अनन्तैः बर्णपर्यवैः यावत् अनन्तगुणपरिहाण्या परिहीयमाणे परिहीयमाणे अत्र स्खलु सुषमदुष्षमा नाम समा प्रत्यपद्यत श्रमणायुष्मन् !, सा खलु समा त्रिधा विभज्यते-प्रथमस्त्रिभागः १, मध्यमस्त्रिभागः २, पश्चिमस्त्रिभागः ३ । जम्बूद्वीपे खलु भदन्त ! द्वीपे अस्याम अवसर्पिण्यां सुषमदुषमायाः समायाः प्रथममध्यमयोस्त्रिभागयोर्भरतस्य वर्षस्य कीश आकारभावप्रत्यवतारः पृच्छा, गौतम ! बहुसमसमणीयो भूमिभागोऽभवत् स एव गमो नेतव्यः, नानात्वं द्वे धनुस्सहस्त्रे उर्ध्वमुच्चत्वेन, तेषां च मनुजानां चनुष्षष्टिपृष्ठकरण्डकाः, चतुर्थे भक्ते आहारार्थः, समुत्पद्यते, स्थितिः पल्योपमम् , एकोनाशीति रात्रिन्दिवं संरक्षन्ति संगोपयन्ति, यावत् देवलोकपरिगृहीताः खलु ते मनुजाः प्रशप्ताः श्रमणायुष्मन् !। तस्याः खलु समायाः पश्चिमे त्रिभागे भरतस्य कीदृश आकारभावप्रत्यवतारोऽभवत् १, गौतम! बहुसमरमणीयो भूमि भागोऽभवत् , तद्यथानाम आलिङ्गपुष्कर इति वा यावत् मणिभिरुपशोभितः तद्यथा-कृत्रिमैश्चैव अकृत्रिमैश्चैव । तस्याः खलु समायाः पश्चिमे त्रिभागे भरते वर्षे मनुजानां कीडश आकारभाव प्रत्यवतारोऽभवत् ', गौतम ! तेषां खलु मनुष्याणां षडविधं Page #330 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे संहननं षड्विधं संस्थान बहूनि धनुश्शतानि उर्ध्वमुच्चत्वेन, जघन्येय संख्येयानि वर्षाणि उत्कर्षेण असंख्येयानि वर्षाणि आयुष्कं पालयन्ति, पालयित्वा अप्येकके निरयगामिनः, अप्येकके तिर्यग्गामिनः, अप्ये कके मनुष्यगामिनः, अप्येकके देवगामिनः, अप्येकके सिध्यन्ति यावत् सर्वदुःखानामन्तं कुर्वन्ति ॥ ३६॥ टीका--'तीसेणं' इत्यादि । 'समणाउसो !' हे आयुष्मन् ! श्रमण ! 'तीसेणं समाए तिहि सागरोवम कोडाकोडीहिं' तस्याः खलु समायाः त्रिभिः सागरोपमकोटीकोटिभिः कृत्वा' काले वीइक्कं ते' काले व्यतिक्रान्ते सति, कीदृशे तस्मिन् काले ? इत्याह--'अणं तेहिं वण्णपज्जवेहि जाव' अनन्तैः वर्णपर्यवैर्यावत् 'अणंतगुणपरिहाणीए परिहायमाणे परिहायमाणे' अनन्तगुणपरिहाण्या परिहीयमाने परिहीयमाने इति, अत्र यावत् पदेन त्रयस्त्रिंशत्तमसूत्रोक्तः पाठः संग्राह्यः, 'एत्थणं' अत्र-अत्रान्तरे खलु 'सुसमदुस्समा णामं समा पडिजिम' सुषमदुष्षमा नाम समा प्रत्यपद्यत-प्रतिपन्न:-लगितः। 'सा णं' सा-सुषमदुष्पमा नाम खलु 'समा तिहा' समा त्रिधा-त्रिभिः प्रकारै 'विभज्जइ' विभज्यते-विभक्ता क्रियते । तमेवविभागमाह-'पढमे' इत्यादि । 'पढमे तिभाए' प्रथमस्त्रिभागः तृतीयो भागः, 'मज्झिमेतिभाए' मध्यमस्त्रिभागः, 'पच्छिमे तिभागे' पश्चिमः अन्तिमस्त्रिभागः ! अयं. भावः तृतीयारक का स्वरूप कथनटीका-तीसे णं समाए तिहिं सागरोवम कोडाकोडीहिं काले वीइक्कते' इत्यादि. । टीकार्थ-प्रभु गौतम को समझाते हुए कह रहे हैं-कि हे गौतम ! जब अनन्त वर्णपर्यायों का यावत् अनन्त पुरुषकार प्रराक्रम पर्यायों का धीरे २ हास होते २ यह तीन सागरोपम प्रमाण वाला सुसमा नामका द्वितीय आरा समाप्त हो जाता है. तब "एत्थ णं सुसम दुस्समा णाम समा पडिवग्जिसु समणाउसो" हे श्रमण आयुष्मन् ! इस भारत क्षेत्र में सुषम दुष्षमा नामका तृतीय काल लगता है; “सा णं समा तिहा विभज्जइ, पढमे तिभाए१, मज्झिमे तिभाए२, पच्छिमे तिभाए३" इस तृतीय काल को तीन विभागों में विभक्त किया गया है एक प्रथम त्रिभाग में, द्वितीय मध्यम त्रिभाग में और तृतीय पश्चिम विभाग में तात्पर्य इसका यह है कि इस तृतीय काल के તૃતીય આરકના સ્વરૂપનું કથન. 'तीसेण समाए तिहिं सागरोवम कोडा कोडीहिं काले वीइक्कंते'-इत्यादि ।सूत्र ३६॥ ટીકાથ–પ્રભુ ગૌતમને સમજાવતા કહે છે કે હે ગૌતમ! જ્યારે અનંતગણું પર્યાને થાવત્ અનંત પુરુષકાર પરાક્રમ પર્યાયનો ધીમે ધીમે હાસ થતાં થતાં ત્રણ સાબરેપમ પ્રમાણુ सुषमा नाम द्वितीय भा२४ समात थाय छे. त्यारे "एत्थ णं सुसम दुस्समा णाम समा एडिवन्जिसु समणाउसो' 3 श्रम आयु भन् ! । सरत क्षेत्रमा सुषभषमा नाम ततीय पारस थाय छे. साणं समा तिहा विभज्जइ, पढमे तिभाए १, मज्झिमे तिभाए २, पच्छिमे तिभाए ३" २॥ तृतीय ने जय मागोमा विमा ४२वामां आवस Page #331 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार ३६ तृतीयारकनिरूपणम् सुषमदुष्षमायाः समाया भागत्रये कृते प्रथममध्यमपश्चिमात्यो भागा भवन्ति । तत्र द्विकोटीकोटिसागरोपमाप्रमाणः सुषम दुषमाकालो भवति । द्विकोटीकोटिराशिस्त्रिभिर्विभक्तः सन् षट् षष्टिकोटिसहस्राणि षट्कोटिशतानि षट् पष्ठिकोटयः षट्पष्टिलक्षाणि षट्षष्टिः सहस्राणि षट् शतानि षट्षष्ठिश्च सागरोपमाणि द्वौ च सागरोपमत्रिभागौ इति लभ्यते, स्थापनाचेयम् ६६६६६६६६६६६६६६२ इति । एवं च प्रत्येकस्मिन् भागे पूर्वोक्त संख्या विज्ञेयेति । अत्र गौतमस्वामी पृच्छति-'जंबुद्दीवेणं भंते ! दीवे इमीसे ओसप्पिणीए सुसमदुस्समाए समाए पढममज्झिमेसु तिभागेसु भरहस्स वासस्स केरिसए' हे भदन्त ! जम्बूद्वीपे खलु अस्याम् अवसर्पिण्यां सुषमदुष्षमायाः समायाः प्रथममध्यमयोस्त्रिभागयोः भरतस्य वर्षस्य कीदृशः-किं प्रकारका 'आयारभावपडोयारे' आकारभावप्रत्यवतार:-स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावोऽभवत् ? इति गौतमस्य 'पुच्छा' पृच्छा=प्रश्नः । भगवानाह—'गोयमा !' हे गौतम ! अस्यां समायां 'भूमिभागे' भूमिभागः भरतक्षेत्र भूमिप्रदेशो 'बहुसमरमणिज्जे होत्था' बहुसम रमणीयोऽभवत् । अत्र सर्व पूर्ववद् वोध्यम् । एतदेव सूचयति-'सो चेव गमो णोयव्यो' स एव गमो नेतव्यः इति । स एव-पूर्वोक्त प्रथम, मध्यमऔर पश्चिम इस प्रकार से तीन भाग हुए हैं, इस तृतीय काल का समय कोडाकोडी सागरोपम प्रमाण है, इस राशि को जब तीन से विभक्त किया जाता है. तब इसका एकभाग ६६६६६६६६६६६६६६ इतना होता हैं इतना ही प्रमाण द्वितीयभाग का और इतना हो प्रमाण तृतीयभाग का होता है, अब गौतम स्वामी प्रभु से पुनः ऐसा पूछते हैं-"जंबू दीवे गं भंते ! दीवे इमीसे ओसप्पिणीए सुसम दुस्समाए समाए पढ़ममज्झिमेसु तिभाएसु भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पुच्छा" हे भदन्त ! जब इस जम्बूद्वीपान्तर्गत भरत क्षेत्र में अवसर्पिणी काल की स्थिति में सुषम दुषमा काल वर्तता है उस समय में इसके प्रथमत्रिभाग और मध्यमत्रिभाग में भरत क्षेत्र का क्या स्वरूप होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-"गोयमा बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था सो चेव गमो णेयवो णाणत्तं दो घणुसहस्साई उटुं उच्चत्तेणं" છે. એક પ્રથમ વિભાગમાં, દ્વિતીય મધ્યમ વિભાગમાં અને તૃતીય પશ્ચિમ વિભાગમાં આત તાપણું આ પ્રમાણે છે કે આ તૃતીય કાળના પ્રથમ, મધ્યમ અને પશ્ચિમ આ પ્રમાણે ત્રણ ભાગે થયેલા છે. આ તૃતીય કાળને સમય બે કેડા-કેડી સાગરોપમ પ્રમાણ છે. આ સંખ્યાને જ્યારે ત્રણથી વિભક્ત કરવામાં આવે છે ત્યારે તેનો એક ભાગ ६६६६६६६६६६६६६६३ माटला थाय छे. या प्रभार द्वितीय भने माट प्रमाण तुतीय भागनु हाय छे. हवे गौतम प्रभुने ३२ प्रश्न ४२ छ -“जवुद्दीवेणं भंते ! दीवे इमीसे ओसप्पिणीए सुसमदुस्समाए समाए पढममज्झिमेंसु तिभाएसु भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे पुच्छा" महन्त ! न्यारे दीपान्तर्गत ભરત ક્ષેત્રમાં અવસર્પિણી કાળની સ્થિતિમાં સુષમ દુષમા કાળ વતે છે તે સમયે આના પ્રથમ ત્રિભાગ અને મધ્યમ વિભાગમાં ભરતક્ષેત્રનું કેવું સ્વરૂપ હોય છે. એના જવાબમાં प्रभु ४३ छ–“गोयमा बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था सो चेव गमो यवो णाणत Page #332 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे एव गमः पाठो नेतव्यः ज्ञातव्य इति । अत्र ‘णाणत्तं' नानात्वं-पार्थक्यमेवं बोध्यम् , तथाहि-प्रथममध्यमयोस्त्रिभागयोर्वर्तमाना मनुष्या 'दो धणुसहस्साइं उइढं उच्चत्तेणं' द्वे धनुस्सहस्रे ऊर्ध्वम् उच्चत्वेन प्रज्ञप्ताः। तथा 'तेसिं च मणुयाणं चउसहि तेषां च मनुष्याणां चतुष्षष्टिः चतुष्षष्ठि संख्यकाः 'पिट्टकरंडुगा' पृष्ठकरण्डका भवन्ति । एवं च सुषमा समोत्पन्नमनुष्यापेक्षया एतेषां मनुष्याणां पृष्ठकरण्डकसंख्या अधं भवतीति बोध्यम् । तथा-तेषां मनुष्याणाम् 'आहारत्थे' आहारार्थ: आहारप्रयोजनं 'चउत्थभत्तस्स' चतुर्थभक्ते व्यतिक्रान्ते 'समुप्पज्जई' समुत्पद्यते-भवति । 'चउत्थ भत्तस्स' इत्यत्र सप्तम्यर्थे षष्ठी। एकदिनान्तरितस्तेषामाहारो भवतीति भावः । तथा तेषां 'ठीई' स्थितिः आयुः स्थितिः 'पलिओवम' पल्योपमम् एकं पल्योपमं भवति । तथा ते मनुष्याः स्वापत्यानि 'एगृणासीई' एकोनाशीतिं 'राइंदियाई रात्रिन्दिवं 'सारक्खंति संगोति' संरक्षन्ति संगोपयन्ति । एकोनाशीति रात्रिन्दिवावशिष्टायुष्कास्ते मनुजा अपत्यानि प्रसुवते, तानि ते एकोनाशीति रात्रिन्दिवं यावत् संरक्षन्ति संगोपयन्तीति भावः । एतेषामपत्यरूहे गौतम ! सुषम दुष्षमा काल के प्रथम और मध्य के विभागों में इस भरत क्षेत्र का भूमिभाग बहुसम रमणीय होता है, इत्यादि रूप से सब कथन इस समय का पूर्वोक्त रूप से ही समझ लेना चाहिये, परन्तु जो उस कथन से यहां से सम्बन्ध रखने वाले इस कथन में भिन्नता है वह ऐसी है-"णाणत्तं दो धणु सहस्साइं उर्दु उच्चतेणं, तेसिंच मणुयाणं चउसट्टि पिट्टकरंडुगा, चउत्थभत्तस्स आहारत्थे समुपज्जइ, ठिई पलिओवम, एगृणासोई राह दियाइ, सारक्खंति, संगोवेंति, जाव देवलोग परिग्गहिया णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो" कि इनके शरीर की ऊँचाई दो हजार धनुष की अर्थात् एक कोश की होती है, ६४ इनके पृष्ठ करण्डक होते हैं । एक दिन के अन्तर से इन्हें भूख लगती है. स्थिति १ एक पल्योपम की होती है ७९ रात दिन तक ये अपने अपयों-बच्चों को सार संभाल करते हैं यावत्-फिर ये कालमास में मरकर देवलोक में जन्म धारण करते हैं। ऐसा हे श्रमण आयुष्मन् ! इन मनुष्यों के सम्बन्ध में कथन किया गया है। इनके दो घणु सहस्साई उड्ढ़ उच्चसणं" 3 गौतम ! सुषमषमा जनप्रथम भने मध्यना ત્રિભાગોમાં આ ભરતક્ષેત્રને ભૂમિભાગ બહુ સમરમણીય હોય છે. ઈત્યાદિ રૂપમાં આ સમયનું કથન બધું પૂર્વોક્ત રૂપમાં જ સમજી લેવું જોઈએ. પણ પૂર્વકથન કરતાં અહીં જે विशेषता छ त म प्रमाणे छे. "णाणत्त दो घणु सहस्साई उड्ढ उच्चत्तेणं, तेर्सि च मणुयाणं चउसट्टि पिट्ठ करंडगा, चउत्थभत्तस्स आहारत्थे समुप्पज्जह, ठिई पलिओवम, एगृणासोई, राईदियाई, सारक्खंति, संगोवेति, जाव देवलोग परिग्गहिया णं ते मणुया पणत्ता समणाउसो” मेले कोभना शरीरनी या मे २ धनुष 2ी अर्थात् એક ગાઉ જેટલી હોય છે. એમના પૃષ્ઠ કરંડકે ૬૪ હોય છે. એક દિવસના અંતરે એમને ભૂખ લાગે છે. ૧ એમની સ્થિતિ એક પલ્યોપમ જેટલી હોય છે. ૭૯ રાત-દિવસ સુધી એ ઓ પિતાના અપભ્યોની સંભાળ રાખે છે, યાવતું પછી એઓ કાલમાસમાં મૃત્યુ પ્રાપ્ત કરીને દેવલોકમાં જન્મ ધારણ કરે છે. હે શ્રમણ આયુષ્યન્ ! આવું તે મનુષ્યના સંબંધમાં વિશેષ Page #333 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३६ तृतीयारकस्वरूपनिरूपणम् पाणां युगलिकानामपि सप्तावस्थाक्रमाः पूर्ववद् बोध्याः तत्रैकैकस्यामवस्थायाम् एकादश दिनानि सप्तघटयः अष्टौ पलानि चतुस्त्रिंशदक्षरोच्चारणपरिमितात् कालात् किश्चिदधिकश्वकालो भवतीति बोध्यम् । 'जाव' यावद्-यावत्पदेन 'संरक्ष्य संगोप्य कासित्वा क्षुस्वा जृम्भित्वा अक्लिष्टा अव्यथिता अपरितापिताःकालमासे कालं कृत्वा देवलोकेषु उत्पद्यन्ते' इति संग्राह्यम् । अर्थस्तु प्रागुक्त एव । एतेषां देवलोकोत्पादे हेतुमाह-'देवलोगपरिग्गहिया णं' इत्यादि । समणाउसो !' हे आयुष्मन् ! श्रमण ! ते णं मणुया' ते मनुजाः खलु निश्चयेन 'देवलोगपरिग्गहिया' देवलोक परिगृहीता भवन्तीति । अत्रेदं बोध्यम्अस्याः समायाः प्रथममध्यमत्रिभागयोभिन्नजातीयमनुष्याणामनुषञ्जाना जाति परम्परा नास्ति, तथाविधकालस्वाभाव्यात् । यत्तु-'उग्गा भोगा रायन्न खत्तिया संगहो भवेचउहा' इत्युच्यते तदस्याः समाया अन्त्यत्रिभागमपेक्ष्य बोध्यमिति । इत्थं सुषमसुषमाया: समायाः प्रथममध्यमत्रिभागौ वर्णयित्वा सम्प्रति अन्तिमत्रिभागविषये प्राह-'तीसे णं' युगलिक अपत्यों की सात अवस्थाओं का क्रम जैसा पहिले कहा जा चुका है वैसा ही है, एक २ अवस्था में ११ दिन सात घडो आठ पल और ३४ अक्षरों के उच्चारण करने में जितना काल लगता है उससे कुछ अधिक काल है, यहां यावत्पद से “७९ दिन तक ये अपत्यों की रक्षा और पालन करके खांसी छींक और जंभाई लेकर विना किसी क्लेश और व्यथा के प्राप्त किये काल मास में मर कर देवलोकों में उत्पन्न होते हैं" ऐसा पाठ गृहीत हुमा है, इसका कारण यह है कि इन्हें देवायु का ही बन्ध होता है और मनुष्यायु आदि का नहीं। इस तृतीय कालरूप आरे का प्रथम मध्य विभाग में भिन्न जातिय मनुष्यों की अनुषजना-जातिपरम्परा नहीं होती है, क्योंकि इस काल का ही ऐसा स्वभाव है; “यत्तु उग्गा भोगा रायन्न स्वत्तिया संगहो भवे चउहा" ऐसा जो कहा गया है वह इस तृतीय काल के अन्त्य त्रिभाग को लेकर कहा गया है। इस तरह से तृतीय कालके प्रथम त्रिभाग और मध्यम त्रिभाग કથન કરવામાં આવેલ છે. એમના યુગલિક અપત્યોની સાત અવસ્થાઓને ક્રમ જે રીતે પહેલાં કહેવામાં આવ્યા છે, તે રીતે જ અહીં પણ કમ સમજ. એક એક અવસ્થામાં ૧૧ દિવસ, સાત ઘડી, આઠ યેલ અને ૩૪ અક્ષરોના ઉચ્ચારણમાં જેટલો સમય લાગે છે. તેના કરતાં કંઈક અધિક સમય છે. અહી ચાવત પદથી ૭૯ દિવસ સુધી એ અપચ્ચેની રક્ષા અને પાલન કરે છે, ખાંસી, છીંક અને બગાસું ખાઈને વગર કઈ પણ જાતની વ્યથા કે કલેશે એઓ કાલ માસમાં મૃત્યુ પ્રાપ્ત કરીને દેવલોકમાં ઉત્પન્ન થાય છે. એ પાઠ સંગ્રહીત થયેલ છે. આનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે એમને દેવાયુને જ બન્ધ હોય છે. અને મનુષ્પાયુ વગેરે ને નહીં. આ તૃતીય કાળ રૂપ આરાના પ્રથમ મધ્યમ ત્રિભાગમાં ભિન્ન જાતીય મનુષ્યની અનુષંજના-જાતિ પરંપરા હતી નથી, કેમકે એ કાળને સ્પભાવ वे छे. “यत्तु उग्गा भोगा रायन्नखत्तिया संगहो भवे चउहा" माम २ वाभां આવેલ છે તે આ તૃતીય કાળના અન્ય ત્રિભાગને લઈને કહેવામાં આવેલ છે. આ રીતે તૃતીય કાળના પ્રથમ ત્રિભાગ અને મધ્યમ ત્રિભાગનું વર્ણન કરીને હવે સૂત્રકાર અંતિમ Page #334 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे इत्यादि । गौतमस्वामी पृच्छति 'तीसे णं भंते ! समाए पच्छिमे' हे भदन्त ! तस्याः समायाः खलु पश्चिमे = अन्तिमे 'तिभाए' त्रिभागे 'भरहस्त वासस्स केरिसए आयारभाव - पडोयारे' भरतस्य वर्षस्य कीदृश आकारभावप्रत्यवतारः = स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः 'होत्था' प्रज्ञप्तः ? भगवानाह - 'गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था' हे गौतम ! बहुसम - रमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः, 'से जहा णामए' तद्यथा नाम - 'आलिंगपुक्खरेइ वा जाव मणीहि उवसोभिए' आलिङ्गपुष्कर इति वा यावत् मणिभिरुपशोभितः । ' तं जहा ' तद्यथा- 'कित्तिमेहिंचेव अकित्तिमेहिंचेव' कृत्रिमैवेति यावत्पद संग्राह्यः पाठः पूर्वतोऽवधार्य इति । पूर्वकालापेक्षयात्रायं विशेषः- पूर्वकाले हि कृष्यादिकर्माणि न प्रवृत्तान्यमूवन् भूमिरपि कृत्रिमैस्तृणैर्मणिभिश्चोपशोभिता नासीत्, अत्र काले तु कृष्यादि कर्माणि प्रवृत्तानि, भूमिश्र कृत्रिमै स्तृणैर्मणिभिश्चोपशोभिताऽभूदिति । पुनर्गोतमस्वामी पृच्छति - · का वर्णन करके अब सूत्रकार अन्तिम त्रिभाग के विषय में कहते हैं- "तीसे णं भंते ! समाए पच्छिम तिभाए भरहस्स वासस्स केरिसए आयार भाव पडोयारे होत्था" इसमें गौतम प्रभु से ऐसा पूछा है कि हे भदन्त ! उस तृतीय काल के पश्चिम विभाग में भरत क्षेत्र का स्वरूप कैसा हुआ है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं - 'गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे होत्था से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव मणीहिंउवसोभिए तं जहां कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चेव" गौतम ! तृतीय काल के पश्चिमत्रिभाग में भरतक्षेत्र का भूमिभाग वहुसम रमणीय होता है और यह ऐसा बहुसमरभणीय होता है कि जैसा आलिंग पुष्कर होता है, यावत् यह मणियों से उपशोभित होता है. इन मणियों में कृत्रिम और अकृत्रिम मणि होते हैं. यहां यावत्पद संग्राह्य पाठ पूर्व में जैसा कहा गया है वैसा ही वह यहां ग्रहण किया गया जानना चाहिये. पूर्वकाल की अपेक्षा यहां यह विशेषता है कि पूर्वकाल में कृष्यादि कर्म चालु नहीं हुए थे; तथा भूमि भी कत्रिम तृण और मणियों से उपशोभित नहीं थी, परन्तु इस काल में तो कृष्यादि कर्म चालू हुए, और भूमि कृत्रिम एवं अकृत्रिम तृण और मणियों से शोभित हुई “ती से णं भंते ! समाए पच्छिमे त्रिभागना संगंधमा उहे छे. "तीसेण भते ! समाए पच्छिमे तिभाए भरद्दस्स वासस्स फेरिए आयारभावपडोयारं होत्था” यामां गौतमे प्रभुने या रीते प्रश्न ये हे ભદત ! તે તૃતીય કાળના પશ્ચિમ ત્રિભાગમાં ભરતક્ષેત્રનું સ્વરૂપ કેવુ' થયુ હશે ? આના वामां प्रभु हे छे - "गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिमागे होत्था से जहाणामए आलिग पुक्खरेइवा जाव मणीहि उवसोभिए तं जहा - कित्तिमेहि चेव अकिन्त्तिमेहि चेव" हे ગૌતમ ! તૃતીય કાળના પશ્ચિમ ત્રિભાગમાં ભરતક્ષેત્રના ભૂમિભાગ બહુસમરમણીય હોય છે અને એ આલિંગ પુષ્કરવત્ મહુસમરમણીય હાય છે, ચાવત્ આ ણુએથી ઉપશે।ભિત હાય છે, આ મણિએમાં કૃત્રિમ અને અકૃત્રિમ મણુિ હાય છે. અહીં યાવત્ પદ સંગ્રાહ્ય પાઠ પહેલાં જે પ્રમાણે કહેવામાં આવેલ છે તે પ્રમાણે જ અહીં” સમજવેા. પૂર્વકાળની અપેક્ષા અહી વિશેષતા આ પ્રમાણે છે કે પૂર્વકાળમાં કૃષ્યાદિ કમના પ્રાર'ભ જ થયે નથી. તેમજ ભૂમિ પણ કૃત્રિમ તૃણુ અને મણિએથી ઉપશે।ભિત ન હોતી પણ આ કાળમાં તા કૃષ્ણાદિ કર્માં ચાલૂ થઈ ગયાં હતાં અને ભૂમિ કૃત્રિમ તથા અકૃત્રિમ તૃણુ અને મણુિ Page #335 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका ढोका द्विव्वक्षस्कार सू. ३६ तृतीयारकस्वरूपनिरूपणम् ३२१ 'ती से णं भंते ! समाए पच्छिमे विभाष भरहे वासे मणुयाणं केरिसए आयारभाव पडोयारे' हे भदन्त । तस्याः खलु समायाः पश्चिमे त्रिभागे भरते वर्षे मनुजानां कीदृश आकारभाव प्रत्यवतारः= स्वरूपपर्यायप्रादुर्भावः 'होत्था' प्रज्ञप्तः ? भगवानाह - 'गोयमा ! सिं मणुयाणं छवि संघयणे' हे गौतम! तेषां मनुजानां पदविधं सहननं भवति, 'छवि ठाणे' पविधं च संस्थानं भवति । तथा ते मनुजा 'बहूणि घणुसयाणि उद्धं उच्चतेणं' बहूनि धनुश्चतानि उर्ध्वमुच्चत्वेन भवन्ति । तथा ते मनुजाः 'जहणेणं संखिजाणि वासाणि' जघन्येण संख्येयानि वर्षाणि 'उक्कोसेण असंखिज्जाणि वासाणि आउयं पार्लेति' उत्कर्षेण च असंख्येयानि वर्षाणि आयुः पालयन्ति, 'पालित्ता' पालयित्वा 'अप्पेगइया' अध्येक= केचित् 'णियरग. मी' 'निरयगामिनो - नारका भवन्ति, 'अप्पेगइया' अप्येकके 'तिरियगामी' तिर्यग्गामिनो भवन्ति, 'अप्पेगइया मणुस्सगामी' अप्येhi मनुष्यगामिनो भवन्ति, 'अप्पेगइया देवगामी' अप्येकके देवगामिनो भवन्ति 'अप्पेगया सिज्यंति' अप्येकके सिध्यन्ति = सकलकार्यकारितया सिद्धा भवन्ति ' जाव' याव तिभाए भरहे वासे मणुयाणं केरिसए आयर भाव पडोयारे होत्था" अब गौतम ने प्रभु से पूछा है है भदन्त ! उस तृतीय काल के अन्तिम त्रिभाग में भरत क्षेत्र में मनुष्यों का स्वरूप कैसा होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते है - " गोयमा तेसिं मणुयाणं छन्विहे संघयणे, छव्विहे संठाणे, बहूणि धणुसयाणि उड्ढं उच्चत्तेणं जहण्णेणं संविज्जाणि उक्कोसेणं असंखिज्जाणि वासाणि उ पालति ० "" हे गौतम ! इस काल के मनुष्यों के ६ प्रकार का संहनन एवं छह प्रकार का संस्था न होता है तथा इनके शरीर की ऊँचाई सैकड़ों धनुष की होती है. इनकी आयु जघन्य से संख्यात वर्ष की और उत्कृष्ट से असख्यात वर्षों की होती है. इस आयु का पालन करके अर्थात् इस आयु को पूर्णरूप से भोग करके इनमें से कितनेक तो मर कर नरक गति में जाते हैं, कितनेक तिर्यञ्च गति में जाते हैं, कितनेक देवगति में जाते हैं और कितनेक मनुष्यगति में जाते गोथी शोभित अर्ध गर्ध ती. "तीसे ण भंते ! समाए पच्छिमें तिभाए भरहे वासे मणुयाणं केरिस आयारभाव पडोयारे होत्था” हवे गौतम प्रभुने खेवी रीते प्रश्न रे છે કે એ ભદ ંત ! તે તૃતીય કાળના અતિમ ત્રિભાગમાં ભરતક્ષેત્રમાં મનુષ્યનુ સ્વરુપ કેવું होय हे ? सेना व प्रभु हे छे: 'गोयमा ! तेसिं मणुयाणं छव्विहे संघयण, छ संठाणे, बहूणि धणुसयाणि उद्ध उच्चतेण जहण्णेण संखिजाणि वासाणि ऊक्कोसेणं असंखिज्जाणि वासाणि आऊये पालंति० "हे गौतम! या आअजना मनुष्याने પ્રકારના સહુનને અને ૬ પ્રકારના સંસ્થાના હોય છે. તેમજ એમના શરીરની ઊંચાઈ સે'કડા ધનુષ જેટલી હાય છે, એમના આયુષ્યની અવધિ જઘન્યથી સખ્યાત વર્ષની અને ઉત્કૃષ્ટથી અસંખ્યાત વર્ષા જેટલી હેાય છે. આયુને ભાગવીને એટલે કેસ પૂર્ણ રીતે આ આયુના ઉપભેાગ કરીને એમાંથી કેટલાક તેા નરક ગતિમાં જાય છે, કેટલાક તિય ગ ગતિમાં જાય છે, કેટલાક દેવગતિમાં જાય છે અને કેટલાક મનુષ્ય ગતિમાં જાય છે, તેમ જ કેટલાક એવા પણ હાય છે કે જેએ સિદ્ધ અવસ્થાને પણ પ્રાપ્ત કરે છે. અહીં યાવત્ પદથી ४१ Page #336 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे त्पदेन बुध्यन्ते मुच्यन्ते परिनिर्वान्ति इति संग्रहः । तत्र बुध्यन्ते - विमल केवलालोकेन सकललोकालोकं जानन्ति, मुच्यन्ते = सर्वकर्मेभ्यो मुक्ता भवन्ति 'परिनिर्वान्ति=समस्तकर्मकृतविकाररहितत्वेन स्वस्था भवन्ति, तथा - 'सव्वदुक्खाणं' सर्वदुःखानाम् = समस्तक्लेशानाम् ‘अंतं' अन्तम् = नाश करेंति' कुर्वन्ति अव्याबाधसुखभाजो भवन्तीति भावः । ननु अस्याः समाया भागत्रयं कथं कृतम् ? इतिचेत् आह-यथा सुषमसुषमायाः समाया आदौ मनुष्याः त्रिपल्योपमायुष्कास्त्रिगव्युत परिमितोधास्त्रिदिनान्तरित भोजना एकोनपञ्चाशद् दिनानि यावत् स्वापत्यपालकाश्च भवन्ति । ततः क्रमेण वर्णगन्धादिपर्यवहान्या कालस्य हीयमानत्वेन सुषमायाः समाया आदौ मनुष्या द्विपल्योपमायुष्काः द्विगव्यूतोच्छ्रया द्विदिनान्तरित भोजनाश्चतुष्षष्टिम् अहोरात्रान् यावत् स्वापत्यपालकाच हैं तथा कितनेक ऐसे भी होते हैं जो सिद्ध अवस्था को भी प्राप्त करते हैं, यह यावत् पद से “बुध्यते, मुच्यते परिनिर्वान्ति" इन पदों का संग्रह हुआ है. विमल केवल ज्ञानरूप आलोक के द्वारा सकल लोकालोक को वे जानने लगते हैं, समस्त कर्मों से वे मुक्त - छूट जाते हैं और समस्त कर्मकृत विकारों से फिर वे रहित हो जाने के कारण स्वस्थ हो जाते हैं, एवं समस्त दुःखों का नाश कर देते है अर्थात् अन्याबाध सुख के भोक्ता बन जाते हैं, शंका-इस काल के तीन भाग कैसे किये ? तो इसका उत्तर ऐसा है कि जिस प्रकार सुषमसुषमा काल की आदि में मनुष्य तीन पल्योपम की आयु वाले तीन कोश प्रमाण शरीर वाले एवं तीनदिन के अन्तर से भोजन करने वाले होते हैं तथा ४९ दिन तक जीवित रहकर अपने युगलिक अपत्यों की सार संभाल करते हैं । फिर क्रम २ से यह काल जैसे २ हीन हो जाता है उस क्रम से वैसे वर्ण गंध आदि को की पर्यायों की हानि हो जाती है. और जब यह प्रथम काल पूर्णरूप से समाप्त हो जाता है तब सुषमा नामक द्वितीय आरा प्रारम्भ हो जाता है. इस काल की आदि में मनुष्यों की आयु दो पल्योपम की होती है, दो कोश ऊँचा उनका शरीर "बुध्यन्ते, मुच्यन्ते, परिनिर्वान्ति” या होना संग्रह थयेस छे. विभस डेवल ज्ञान ३५ આલાક વડે તેઓ સકલ લેાકાલેાકને જાણવા લાગે છે સમસ્ત કર્મોથી તેઓ મુક્ત થઈ જાય છે, અને સમસ્ત કમકૃત વિકારોથી તેઓ રહિત થઈ જવાથી સ્વસ્થ થઈ જાય છે, તથા સમસ્તદુઃખાના નાશ કરે છે. એટલે કે અવ્યાબાધ સુખના ભેાક્ત બની જાય છે. શંકા- કાળના ત્રણ ભાગેા કેવી રીત કરવામાં આવ્યા છે ? તેા એને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે જેમ સુષમ-સુષમા કાળના આદિમા મનુષ્યા ત્રણ પત્યેાપમ જેટલી આયુની અધિવાળા, ત્રણ ગાઉ પ્રમાણ શરીરવાળા તેમજ ત્રણ દિવસના અંતરે ભાજન કરનારા હાય છે તથા ૪૯ દિવસ સુધી જીવિત રહીને પેાતાના ચુંગલિક અપત્યેાની સાર સંભાળ કરે છે. પછી યથાક્રમે આ કાળ જેમ જેમ હીન થતે જાય છે, તે જ ક્રમથી વર્ણ, ગંધ આદિની પર્યાયાની હાનિ થતી જાય છે અને જ્યારે પ્રથમ કાળ સંપૂર્ણ રીતે સમાપ્ત થઈ જાય છે ત્યારે સુષમા નામક દ્વિતીય આરકના પ્રારંભથાય છે. આ કાળના પ્રાર ંભમાં મનુષ્યાનું આયુષ્ય એ પલ્યાપમ જેટલુ હાય છે. તેમનું શરીર એ ગાઉ જેટલું ઉંચુ હાય છે. એ દિવસના Page #337 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कार० सू. ३६ तृतीयारकस्वरूपनिरूपणम् ३२३ भवन्ति, ततोऽपि क्रमेण वर्णगन्धादि पर्यवहान्या कालस्य हीयमानत्वेन सुषमदुष्षमायाः समाया आदौ मनुष्या एकपल्योपमायुष्का एकगव्यतोच्छ्या एकदिनान्तरितभोजना एकोनाशीति दिवसान् यावत् स्वापत्यपालकाश्च भवन्ति । ततः सुषमदुषमाया आधत्रिभागद्वयं यावत् वर्णगन्धादीनां नियतपरिहाण्या काळस्य हीयमानत्वेन क्रमेणाधिकाधिक हीयमाना युगलिनोऽभूत् । अन्तिमत्रिभागे तु परिहाणिरनिश्चिता जातेति अस्याः समाया भागत्रयं कृतमिति ॥सू० ३६॥ होता है. दो दिन के अन्तर से इन्हें आहार की इच्छा होती है चौसठ रात दिन की जब इनकी आयु अवशिष्ट रहती है. तब इनके युगलिक संतान का जन्म होता है. और ये ६४ दिन तक अपनी संतान की सार संभाल करते रहते हैं. इस तरह क्रम २ से जब इस काल की भी समाप्ति हो जाती है और वर्ण गन्धादिपर्यायों की भी पहिले आरे की अपेक्षा और अधिक हीनता हो जाती है-तब तृतीय काल जो सुषमदुष्षमा है उसका प्रारंभ होता है. इस काल के प्रारंभ में मनुष्य एक पल्योपम की आयुवाले होते हैं, एक कोश का इनका शरीर होता है, और एक दिन के अन्तर से इन्हें आहार की अभिलाषा होती है. जब इनकी आयु ७९ दिन की बाकी रहती है- तब इनके युगलिक संतान का जन्म होता है, ये ७९ दिन तक उसका लालन पालन कर कालमास में आनन्द के साथ अपने शरीर का परित्याग कर देव गति में जन्म लेते हैं. क्रम २ से जब यह तृतीय काल का त्रिभाग प्रमाण आद्य समय में व्यतीत हो जाता है और मध्य का भी इसी तरह से त्रिभाग प्रमाण समय समाप्त हो जाता है-इन दोनों विभागों में वर्णादि पर्यायों की तो क्रमशः हानि होती ही रहती है-इन दोनों विभागों में अधिकाधिकरूप से युगलिकों की हीनता आजातो है और फिर अन्तिम त्रिभाग में यह हीनता अनिश्चित रूप में आजाती है. इस कारण इस અંતરે તેમને આહાર ગ્રહણ કરવાની ઈચ્છા થાય છે, ૬૪ રાત-દિવસ જેટલું આયુષ્ય અવશિષ્ટ રહે છે. ત્યારે એમને યુગલિક સંતાન થાય છે. અને તેઓ ૬૪ દિવસ સુધી પોતાના બાળકની સાર-સંભાળ કરતા રહે છે. આ પ્રમાણે યથાક્રમે જ્યારે આ પણું સમાપ્તિ થઈ જાય છે અને વર્ણ ગન્ધાદિ પર્યાની પણ-પહેલા આરકની અપેક્ષાએ વધારે હીનતા થઈ જાય છે, ત્યારે તૃતીય કાળ જે સુષમ દુષમા કાળ છે, તેને પ્રારંભ થાય છે. તે કાળના પ્રારંભમાં મનુષ્ય એક પ૯પમ જેટલા આયુષ્યવાળા હોય છે. એક ગાઉ જેટલું ઊંચુ એમનું શરીર હોય છે અને એક દિવસના અંતરે એમને આહાર ગ્રહણ કરવાની અભિલાષા થાયે છે. જ્યારે એમનું આયુષ્ય ૭૯ દિવસ જેટલું બાકી રહે છે ત્યારે એમને યુગલિક સંતાન ઉત્પન્ન થાય છે. એઓ ૭૯ દિવસ સુધી તેનું લાલન-પાલન કરીને કાલ માસમાં આનંદપૂર્વક પિતાના શરીરને છેડીને દેવગતિમાં જન્મ પ્રાપ્ત કરે છે. યથા ક્રમે જ્યારે આ તૃતીય કાળનું ત્રિભાગ પ્રમાણું–આદ્ય સમય વ્યતીત થાય છે અને મધ્યમ પણ વિભાગ પ્રમાણ સમય એ રીતે સમાપ્ત થઈ જાય છે–એ અને ત્રિભાગોમાં વર્ણાદિ પર્યાની તો ક્રમશઃ હાનિ થતી જ રહે છે, એ બન્ને વિભાગોમાં અધિકાધિક રૂપથી સુગલિકોની જ હીનતા આવી જાય છે અને પછી અંતિમ વિભાગમાં આ હીનતા અનિશ્ચિત Page #338 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बद्वीपप्रज्ञतिसूत्रे सुषम दुष्षमाया अन्तिमे त्रिभागे यथा लोकव्यवस्था जाता, तां प्रतिपादयतिमूलम् - तीसे णं समाए पच्छिमे तिभाए पलिओ मट्टमभागावसेसे एत्थ णं इमे पण्णरस कुलंगरा समुप्पज्जित्था तं जहा सुमइ १. पडिस्इ २. सीमंकरे ३. सीमंधरे ४. खेमंकरे ५. खेमंधरे ६. विमलवाहणे ७. चक्खुमं ८ जसमं ९ अभिचंदे १०. चंदामे १९. पसेणइ १२, मरुदेवे १३ नाभी १४ उसमे १५ ति ||सू० ३७॥ छाया-तस्याः खलु समायाः पश्चिमे त्रिभागे पल्योपमाष्टमभागावशेषे अत्र स्खलु इमे पञ्चदश कुलकराः समुदपद्यन्त तद्यथा - सुमतिः १, प्रतिश्रुतिः २, सीमङ्करः ३, सोमन्धरः ४, क्षेमङ्करः ५, क्षेमन्धरः ६, विमलवाहनः ७, चक्षुष्मान् ८, यशस्वान् ९, अभिचन्द्रः १०, चन्द्राभः ११, प्रसेनजित् १२, मरुदेवः १३, माभिः १४, ऋषभः १५, इति ॥ सू० ३७|| टीका- 'तीसे णं' इत्यादि - 'तीसे' तस्याः - सुषम दुष्पमायाः 'णं' खलु 'समाए ' समाया: 'पच्छिमे तिभाए पलिओ मट्टमभागावसेसे' पश्चिमे त्रिभागे पल्योपमाष्टमभागावशेषे कृताष्टभागस्य पल्योपमस्य अष्टमे भागे अवशिष्टे सति, 'एत्थ' अत्र एतदभ्यन्तरे 'णं' खलु 'इमे, इमे वक्ष्यमाण : ' पण्णरस कुळगरा' पञ्चदश कुलकरा :- लोकव्यवस्थाकारिणः कुलकरणशीलाः विशिष्ट बुद्धियुक्ताः पुरुषविशेषाः 'समुपपज्जित्था ' समुदपद्यन्त - समुत्पन्नाः, 'तं जहा ' तद्यथा - 'सुमई' सुमतिरित्यादि पञ्चदशनामानि सूत्रोक्तानि बोध्यानि । ३२४ तृतीय आरे के तीन त्रिभाग किये गये हैं ॥३६॥ इस आरे के अन्तिम त्रिभाग में जैसी लोक की व्यवस्था होती है अब सूत्रकार उसका प्रतिपादन करते हैं- 'तीसे णं समाए पच्छिमे विभाए पलिओवमहमभागाव से से' इत्यादि । टीकार्थ- उस सुषम दुष्षमा नामके तृतीय आरे के अन्तिम त्रिभाग की समाप्ति होने में जब पल्योपम का आठवां भागमात्र समय बाको रहता है तब ये "इमे पण्णरस कुलगरा समुप्पज्जित्था ” १५ कुलकर उस समय उत्पन्न होते हैं-"तं जहा" उनके नाम इस प्रकार से हैं" सुमई १, पडिस्सुई २, सीमंकरे ३, सीमंधरे 8, खेमैंकरे, ५, खेमंधरे ६, विमलवाहणे ७, चરૂપમાં આવી જાય છે. આ કારણાથી આ તૃતીય આરકના ત્રણ ત્રિભાગા કરવામાં આવેલ છે.૩૬ા ટીકા—આ સ્મારકના અંતિમ ત્રિભાગમાં જેવી લેકની વ્યવસ્થા હાય છે. તે વિષે વે સૂત્રકાર પ્રતિપાદન કરે છે. 'तीले णं समाए पच्छिमे विभाष पलिभवमट्ठ भागावसेसे' इत्यादि सूत्र ॥३७॥ ॥ ટીકા—તે સુષમદુખમા નામક તૃતીય આરાના અંતિમ ત્રિભાગની સમાપ્તિ થવામાં क्यारे पहयेापमने आ भी लोग भात्र माडी र छे त्यारे थे "हमें पण्णरस कुलगरा समुदयज्जित्था १५ । ते समये उत्पन्न थाय छे. 'तू जहा " तेभना नाम या प्रमाणे छे. 'म १, डिस्सु २, सीमकरे ३, सीमंधरे ४, खेमंकरे ५, खेमन्धरे ६, विमलवाहणे ८, चक्खुमं ८, जसमं ९, अभिचंदे १०, चंदामे ११, पसेणई १२, महदेवे १३, णाभी १४, Page #339 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि० वक्षस्कार सू. ३७ सुषमदुष्षमायान्तिमत्रिभागे लोकव्यवस्था ३२५ ननु स्थानाङ्गादिषु-"जंबुद्दीवे भारहे वासे इमीसे ओसप्पिणीए सत्तकुलगरा होत्था, तं जहा-पढमित्थ विमलवाहण १, चक्खुमं २, जसमं ३, चउत्थमभिचंदे ४, तत्तो पसेणई ५, पुण, मरुदेवे ६, चेव नाभी ७ य ॥" इत्युक्तम्, अत्र तु पञ्चदश कुलकरा उक्ता इति परस्परमागमविरोधः ? इति चेत्. आह-सूत्रगते वैचित्र्यात्तत्र सप्तैव कुलकरा उक्ता अत्र तु पञ्चदशेत्यदोष इति । ननु तथापि 'अस्याः समायास्तृतीये त्रिभागे पल्योपमाष्टभागावशेषे पञ्चदश कुलकरा अभूवन्' इति यदुक्तं तन्न संगच्छते, यतः पल्योपमं किल असत्कल्पनया चत्वाक्खुमं ८, जसमं २, अभिचंरे १०, चंदाभे ११, पसेणइ १२, मरुदेवे १३, णाभो १४,उसमे त्ति" सुमति १, प्रतिश्रुत २, सीमंकर ३, सीमंधर ४, क्षेमंकर ५, क्षमंधर ६, विमलवाहन ७, चक्षुष्मान् ८, यशस्वान् ९, अभिचन्द्र १०, चन्द्राभ ११, प्रसेनजित् १२, मरुदेव १३, नाभी १४, और ऋषभ १५, तात्पर्य इस कथन का ऐसा है कि जब इस काल की समाप्ति होने में एक पल्योपम प्रमाण काल बाको बचता है। तब इस पल्योपम प्रमाण काल के ८ भाग करना और ७ भाग प्रमाण पल्योपम जब समाप्त हो जावे और ८ वें भाग प्रमाण पल्योपम जब बाको रहे तब इस समय में ये पन्द्रह कुलकर उत्पन्न होते हैं। ये लोक को व्यवस्था करने वाले होते हैं इसलिये इन्हें कुल कर कहा गया है, इनका काम कुलों की रचना करने का है। ये विशिष्टबुद्धिशाली होते हैं । अतएव इन्हें पुरुष विशेष भी कहा जाता है । यहां शंका ऐसो हो सकती है कि स्थानाङ्ग आदि सूत्रों में "जंबुद्दोवेदीवे भारहे वासे इमीसे ओसप्पिणोए सत्तकुलगरा होत्था"-तं जहा पढमित्थ विमलवाहण, २, चक्खुम २, जसमं ३, चउत्थमभिचंदे ४, तत्तो पसेणई ५, पुण मरुदेवे ६, चेव नाभो ७, इस पाठ के अनुमार ७ ही कुलकर इस भरतक्षेत्र में अवसर्पिणो काल में हुए कहे गये। फिर आप यहां १५ प्रकट कर रहे हैं तो फिर उसमे १५ त्ति" सुभात १, प्रतिश्रुत २, सीम४२, सीम २ ४, ४२ ५, मध२६, વિમલવાહન ૭, ચક્ષુમાન ૮, યશસ્વાન ૯, અભિચન્દ્ર ૧૦, ચન્દ્રાભ ૧૧, પ્રસેનજિત ૧૨, મરુ દેવ ૧૩, નાભિ, અને ઋષભ ૧૫. આ કથનનું તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે જ્યારે આ કાળની સમાપ્તિ થવામાં એક પલ્યોપમ પ્રમાણુ કાળ શેષ રહે છે ત્યારે આપપમ પ્રમાણુ કાળના ૮ ભાગે કરવા અને સાત ભાગ પ્રમાણ પત્યે પમ જ્યારે સમાપ્ત થઈ જાય અને ૮ મે ભાગ પ્રમાણ પત્યોપમ જ્યારે શેષ રહી જાય ત્યારે એ સમયમાં એ ૧૫ કકર ઉપન થાય છે. એ લાક- વ્યવસ્થાપક હોય છે. એથી જ એમને કલકર કહેવામાં આવેલ છે. એમનું કામ કુલેની રચના કરવાનું છે. એ બુદ્ધિશાળી હોય છે, એથી એમને પુરુષ વિશેષ પણ કહેવામાં આવે છે. અહીં શંકા એવી ઉદ્ભવે છે કે “સ્થાના बोरे सत्रोमा "जबुद्दीवे दीवे भारहे वासे इमीसे ओसप्पिणीए सत्तकुलगरा होत्था-तं जहा पदमित्थ विमलवाहण १, चक्खुमं २, जसमं ३, चउन्थमभिचंदे ४, तत्तोपसेणई ५, पुण सामवे६. चेव नाभीय ७, २मा ५। भुकम ७ ८ ९४२ मा भरतक्षेत्रमा सक्सी કાળમાં થાય છે, આમ કહેવામાં આવ્યું છે. પછી તમે અહીં ૧૫ ને ઉલેખ કરી રહ્યા Page #340 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२६ जम्बूद्वीपप्रचप्तिसूत्रे रिंशद्भागविभक्त कल्पनीयम् ते चत्वारिंशद् भागा अष्टभिर्भाज्यास्तत एकैको भागः पञ्चपञ्चभागयुक्तो भवति । तत्र यः पञ्चभागयुक्तोऽष्टमो भागस्तस्मिन् पञ्चदश कुलकरा भवन्तीत्यागतम् । तेषु पञ्चसु भागेषु चत्वारो भागाः पल्योपमदशमभागायुषआधस्य सुमतिनामकस्य कुलकरस्यायुषि गताः शेषः पल्योपमस्यैको भागः, तत्रासंख्येयपूर्वायुषो द्वादश कुलकराः, संख्येयपूर्वायुष्को नाभिः, एकोन नवतिपक्षाधिक चतुरशीतिलक्षपूर्वायुष्क ऋषभदेवश्च भवन्ति, एकस्मिश्चत्वारिंशत्तमे भागे कथं प्रतिश्रुत्यादीनां चतुर्दशकुलकराणां बृहत्तमायुर्जुषां संभावना ! इति चेत्, आह-एकस्मिंश्चत्वारिंशत्तमे भगेऽसंख्येयानि पूर्वाणि भवन्ति, तानि च असंख्येयानि पूर्वाणि क्रमेण हीनहीनानि ‘पडिस्सुई, सीमंकरे, सीमंधरे, खेमंकरे, खेमधरे, विमलवाहणे, चक्खुमं, जसमं, अभिचंदे, चंदाभे, मरुदेवे' प्रतिश्रुति सीमङ्कर सीमन्धर क्षेमकर क्षेमन्धर विमलवाहन चक्षुष्मद्यशस्वदभिचन्द्र चन्द्राभप्रसेनयह परस्पर में आगमों में विरोध कैसा ? तो इस शंका का समाधान ऐसा है कि सूत्र की गति विचित्र होती है अतः वहां सात हो कुलकर कहे गये हैं और यहां १५ कहे हैं, इसमें कोई दोष आने जैसी बात नहीं है। शंका-आपने जो ऐसा कहा है कि इस काल का तृतीय त्रिभाग जब पल्योपम के ८वे भागमात्र अवशिष्ट रहता है तब १५ कुलकर उत्पन्न होते हैं सो यह कथन संगत नहीं होता है क्योंकि असत्कल्पना से पल्योपम के ४० चालीस भाग कल्पित करना चाहिये । इन ४० चालीस भागों में ८ का भाग देने पर एक एक भाग ५-५ भागों से युक्त होता है । इस तरह ५ भाग युक्त जो आठवां भाग है उसमें १५ कुलकर उत्पन्न होते हैं वह बात आगम प्राप्त होती है । इन पांच भागों में के ४ भाग तो पल्योपम के दशवें भाग प्रमाण आयुवाले आदि के सुमति नामके कुलकर की आयु में चले गये बाको का पल्योपम का एक भाग और रहा--प्सों उसमें असंख्यात पूर्व की आयुवाले शेष १२ कुलकर हुए इन में संख्यात पूर्वे की आयुवाला नाभि हुआ और ८९ पक्ष अधिक ८४ लाख पूर्व की आयुवाला છે તે આ આગમમાં પરસ્પર વિરોધ કેમ છે ? તે આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે સૂત્રની ગતિ વિચિત્ર હોય છે એથી ત્યાં સાન જ કુલકર કહેવામાં આવેલ છે અને અહી ૧૫ કહેવામાં આવ્યા છે તેમાં કોઈ પણ જાતને દોષ નથી. શંકા-તમે જે આમ કહ્યું છે કે આ કાળને તૃતીય ત્રિભાગ જયારે એક ફક્ત પલ્યોપમના ૮ આઠમા ભાગ જેટલે અવશિષ્ટ રહે છે ત્યારે ૧૫ કુલકર ઉત્પન્ન થાય છે, તો આ કથન સંગત થતું નથી કેમકે અસત્ક૯પનાથી પાપમના ૪૦ ભાગે કલ્પિત કરવા જોઈએ. એ .૪૦ ભાગોમાં ૮ ને ભાગ કરવાથી એક ભાગ ૫-૫ ભાગોથી યુક્ત થાય છે. આ પ્રમાણે છે ભાગ યુક્ત જે ૮ મે ભાગ છે તેમાં ૧૫ કુલકરે ઉત્પન્ન થાય છે, આ વાત આગમથી સિદ્ધ થાય છે. એ પાંચ ભાગમાંના ચાર ભાગો તે પાપમના દસમાં ભાગ પ્રમાણ આયુવાળા આદિના સુમતિ નામના કુલકરના આયુમાં જતા રહ્યા. શેષ પલ્યોપમનો એક ભાગ બાકી રહ્યા હતા, તેમાં અસંખ્યાત પૂર્વની આયુવાળા શેષ ૧૨ કુલકર થયા આમાં સંખ્યાત Page #341 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३८ कुलकरताप्रकारकथनम् ३२७ जिन्मरुदेवानां द्वादशानां कुलकराणामायुर्मानानि, ‘णाभी' नाभेस्तु संख्येयानि पूर्वाणि आयुर्मानम्, 'उसभे' ऋषभस्य चतुरशोति लक्षपूर्वाणि आयुर्मानम्, अवशिष्टाश्च एकोननवतिपक्षा इत्येकस्मिन्नेव चत्वारिंशत्तमभागे चतुर्दशकुलकराणामस्ति संभावनेति न कश्चिद् विरोध इति ॥३७॥ ___ मूलम्-तत्थ णं सुपइ पडिस्सुइ सीमंकर सीमंधर खेमंकराणं एएसिं पंचण्हं कुलगगणं हक्कारे दंडगोड होत्था ते णं मणुआ हक्कारेणं दंडेणं हया समाणा लज्जिया विलज्जिया वेड्डा भीया तुसिणिया विण ओणया चिट्ठति । तत्थ णं खेपंधरविमलवाहण चक्खुमं जसमं अभिचंदाणं एएसि णं पंचण्हं कुलगराणं मक्कारे णामं दंडणीई होत्था ते णं मणुया मक्कारेणं दंडेणं हया सभाणो जाव चिट्ठति तत्थ णं चंदाभ पसेणइ मरुदेव उसभाणं एएसिणं पंचण्हं कुलगराणं धिक्कारे ऋषभदेव हुआ तो फिर एक ४० वें भाग में प्रतिश्रुत आदि १४ कुलकरों की कि जो बहुत बड़ी आयुवाले थे उत्पत्ति कैसे सभवित हो सकती है ? तो इस शंका का उत्तर ऐसा है कि एक ४०. व भाग में असंख्यात पूर्व होते हैं और ये असंख्यात पूर्व क्रम से हीन हीन होते हैं तथा प्रतिश्रुत, सोमङ्कर, सीमन्धर, क्षेमकर, क्षेमन्धर, विमलवाहन, चक्षुष्मन्, यशस्वान्, अभिचन्द्र, चन्द्राभ, प्रसेनजित और मरुदेव इन १२ कुलकरों की आयु के प्रमाण होते हैं । नाभि की आयु का प्रमाण संख्यात पूर्वी का था और ऋषभ की आयु का प्रमाण ८४ लाख पूर्व का था । वाकी के कुलकरों को आयु का प्रमाण ८९ पक्षाधिक ८१ लाख पूर्व का था । इस तरह ४० वें भाग में १४ कुलकारों की उत्पत्ति की संभावना में क्या विरोध हो सकता हैं ? अर्थात् कोई भी विरोध नहीं हो सकता है ॥३७॥ પૂર્વના આયુષ્યવાળા, નાભિ થયા અને ૮૯ પક્ષ અધિક ૮૪ લાખ પૂર્વ જેટલા આવાળા, ઋષભદેવ થયા. તે પછી એક ૪૦ મા ભાગમાં પ્રતિત આદિ ૧૪ કુલકરની કે જેઓ ખૂબ લાંબા આયુષવાળા હતા-ઉ-પત્તિ કેવી રીતે સંભવી શકે ? તે આ શકાને ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે એક ૪૦ મા ભાગમાં અસંખ્યાત પૂર્વો હોય છે અને એ અસંખ્યાત પૂર્વે યથાકમે હીન-હીન હોય છે તેમજ પ્રતિસૃતિ, સીમંડૂકર, સીમન્વર, ક્ષેમકર, ક્ષેમધર, વિમલ વાહન, ચક્ષુષ્માન. યશસ્વા, અભિચન્દ્ર, ચન્દ્રાભ, પ્રસેનજિત અને મરૂદેવ એ ૧૨ કુલકરેની આયુના પ્રમાણે હોય છે. નાભિની આયુનું પ્રમાણ સંખ્યાત પૂર્વેનું હતું અને ઋષભના આયુષ્યનું પ્રમાણ ૮૪ લાખ પૂર્વનું હતું. શેષ કુલકરના આયુષ્યનું પ્રમાણ ૮૯ પક્ષાધિક ૮૪ લાખ પૂજેટલું હતું. આ પ્રમાણ ૪૦ ભાગમાં ૧૪ કુલકરેની ઉત્પત્તિની સંભાવનામાં શું વિરોધથઈ શકે છે ? એટલે કે કોઈ પણ જાતને વિરોધ સંભવી શકે જ નહિ. સૂત્ર. ૩૭ Page #342 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२८ जम्बूद्वीपरतिरो णामं दंडणीई होत्था ते णं मणुया धिक्कारेणं दंडेणं हया समाणा जाव चिट्ठति |सू० ३८॥ ___छाया-तत्र खलु सुमति प्रतिश्रुति सोमङ्कर सीमन्धर क्षेमङ्कराणाम् एतेषां पञ्चानां कुलकराणां हाकरो नाम दण्डनीतिरभवत्. ते खलु मनुजा हाकेरेण दण्डेन हताः सन्तो लज्जिता विलज्जिता व्यर्द्धा भीतास्तूष्णीका विनयावनतास्तिष्ठन्ति । तत्र खलु क्षेमन्धर विमलवाहन चक्षुष्मद यशस्वद भिचन्द्राणाम् पतेषां खलु .पञ्चानां कुलकराणां माकरो नाम दण्डनीतिरभवत्, ते खलु मनुजा माकारेण दण्डेन हताः सन्तो यावत् तिष्ठति । तत्र खलु चन्द्राभप्रसेनजिन्मरुदेव नाभि ऋषभाणाम् एतेषां स्खलु पञ्चानां कुलकराणां धिक्कारो नाम दण्डनीति रभवत् , ते खलु मनुजा धिक्कारेण दण्डेन हताः सन्तो यावत् तिष्ठन्ति ॥सू० ३८॥ एते कुलकरत्वं कथं कृतवन्तः ? इत्यह टीका--तत्थ णं' इत्यादि, 'तत्थ' तत्र - तेषु पञ्चदशसंख्यकेषु कुलकरेषु मध्ये 'ण' खलु 'सुमइ पडिस्सुइ सीमकर सीमंधर खेमकगणं एएसिं पचण्ड कुलगराणं' सुमति प्रतिश्रुति सीमङ्करसीमन्धरक्षेमङ्कराणाम् एतेषां पञ्चानां कुलकराणां काले 'हकारे' हाकारो = 'हा' इत्यधिक्षेपार्थकः शब्दस्तस्य करणम् नाम 'दंडणीई' दण्डनीतिः - दण्डनं दण्डः = अपराधिनामनुशासनं तत्र नीतिः = न्यायः 'होत्था' अभवत् = समुत्पन्नः । अत्रेदं बोध्यम् तृतीयारकान्ते कालदोषेण अल्पीभूतेषु कल्पवृक्षेषु सन्तु, तत्र तेषां युगलिकमनुजानां ममत्वे जायमाने ते कल्पवृक्षाः तै मनुजैः स्वकीयत्वेन परीगृहीताः । तत्रान्य परिगृहीते कस्मिंश्चित् कल्पवृक्षे केनचिद अब इन्होंने कुलकरता कैसे की-इस बात का कथन सूत्रकार करते हैं "तत्थ णं सुमइ, पडिस्सुइ सीमंकर, सीमंधर, खेमंकराणं एएसिं पंचण्ह" इत्यादि । टीकार्थ-"तत्थ णं सुमइ पडिस्सुइ, सीमंकर, सीमंधर खेम कराणं एएसिं पंचण्हं" इन पन्द्रह कुलकरों में से सुमति, प्रतिश्रुत, सीमंकर, सीमंबर और क्षेमं कर इन पांच कुलकरों के समय में "हाहाकार" इस नाम की दण्डनीति थी, "हा" यह शब्द अधिक्षेप का वाचक है।, इसका करना हाहाकार है, अपराधियों को अनुशासन में लेना यह दण्ड है, इस दण्ड के लिये जो नीति-न्याय है वह दण्डनोति है, यहां ऐसा समझ लेना चाहिये-तृतीय आरक के अन्त में कालदोष के प्रभाव से जब कल्पवृक्ष थोडे से रह गये -तब उन कल्पवृक्षों के ऊपर उन युगलिक હવે તેમણે કુલકરતા કેવી રીતે કરી ? આ વાતનું સૂત્રકાર કથન કરે છે– 'तत्थण सुमइ पडिस्सुइ सीमंकर सीमंधर खेमकराणं पएसि एचण्हं'- इत्यादि-सूत्र ॥३०॥ ટીક થૈ---એ ૧૫ કુલકરોમાંથી સુમતિ, પ્રવિંઋતિ સીમંકર, સી મધુર, અને ક્ષેમકર એ पांस खान सय हाहाकार' नामे १९७नीतिती. 'हा' ४ मधिपाय छे. मेनु કરવું હાહાકાર' છે. પરાધીઓને અનુશાસનમાં રાખવા એ દડના માટે જે નીતિ-ન્યાય છે, તે દડનીતિ છે. અહીં આમ સમજવું જોઈએ. તૃતીય આરકતા અંતમાં ફાળ દોષના Page #343 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि० वक्षस्कार सू. ३८ कुलकरता प्रकारकथनम् न्येन ममत्वेन परिगृह्यमाणे तेषु विवादः प्रावर्त्तत । ततस्ते मनुजाः विवाद निर्णयाय सर्वेभ्योऽधिकप्रभावशालिनं सुमतिं सर्वेषामाधिपत्ये व्यवस्थापयन् । ततः स सुमतिः सर्वेभ्यो यथायोग्यं कल्पवृक्षादीन् विभज्य प्रददौ । तत्र यः कश्चित् मर्यादा मतिचक्राम, तच्छासनाय स जातिस्मृत्या नीतिज्ञत्वेन हाकार दण्डनीति प्रावर्त्तयत् । तामेव दण्डनीति प्रतिश्रुत्यादयश्चत्वारोऽप्यनुकृतवन्तः इति । हाकारदण्डनीत्या ते कीदृशा अभूवन् ! इत्याह - ' ते ' इत्यादि । 'ते णं मणुया' ते मनुजाः खलु 'हक्कारेणं द डेणं हया' हाकारेण दण्डेन हताः = अदृष्टपूर्वशासनानां तेषां दण्डादि घातेभ्योऽप्यधिकं मर्मघाति तच्छासनमिदमिति आत्मानं हता इव मन्यमानाः 'समाणा' सन्तो 'लज्जिया' लज्जिताः = सामान्यतो लज्जायुक्ताः, 'विलज्जिया' विलज्जिताः = विशेषतो लज्जिताः, 'वेड्डा' व्यर्द्धा:= मनुष्यों को ममत्वभाव हो गया सो उन्होंने उन्हें अपना २ कर मान लिया, उस पर जब कोई दूसरा युगलिक मनुष्य अधिकार जमाने लगा तो उनमें अपस में विवाद होना प्रारंभ हो गया । तब उन मनुष्यों ने विवाद का निर्णय कराने के लिये सब से अधिक प्रभावशाली सुमति कुलकर को सब के ऊपर अधिपति चुन लिया । तब सुमति कुलकर ने सब के लिये यथायोग्य कल्पवृक्षों का विभाग कर दिया और सत्र के लिये उन्हें वितरीत कर दिया । इनमें से जो कोई मर्यादा का उल्लङ्घन करता उसे अनुशासन में लेने के लिये उसने जाति स्मरेण ज्ञान के बल से नीतिज्ञ बनकर हाकार दण्ड नीति की प्रवृत्ति की, उसी दण्डनीति का अनुसरण प्रतिश्रुति आदि चार कुलकरों ने भी किया, "तेणं मणुया हक्कारेणं दंडेणं हया समाणा लज्जिया, विलज्जिया वेड्ढा भीया तुमिणीया विणओणया चिट्ठति" वे मनुष्य उस हाकाररूप दण्ड से जब आहत हुए, तो अपने आपको हत हुए के जैसे मानते हुए पहिले तो सामान्यरूप से लज्जायुक्त वने फिर विशेषरूप से लज्जित हुए, व्यर्द्ध-: - अत्यन्त और अधिक लज्जित हुए क्योंकि उन्होंने पहिले कभी ऐसा शासन देखा नहीं था । अतः ऐसा यह शासन उनके लिये दण्डादिघात से भी अधिक मर्म - આવેલ કલ્પવૃક્ષ પર મીત્તે યુગલિક મનુષ્ય અધિકાર કરવા લાગ્યા તે તેમાં પણ પરસ્પર વિવાદ પ્રારભ થઈ ગયા. ત્યારે સૌ યુગલિકાએ વિવાદના નિર્ણય માટે સૌથી શ્રેષ્ઠ પ્રભાવ શાલી સુમતિ કુલકરને પેાતાના અધિપતિ તરીકે ચૂંટી લીધા. સુમતિ કુલકરે સૌના માટે યથાયાગ્ય કલ્પવૃક્ષોનું વિભાજન કરી દીધુ' એના પછી કાઈ મર્યાદાનું ઉલ્લંધન કરતા ત્યારે તને અનુશાસનમાં રાખવા માટે તેમણે જાતિ સ્મરણ જ્ઞાનના ખળથી નીતિજ્ઞ થઈને હાકાર વ્રુડનીતિની પ્રવૃત્તિ પ્રારંભ કરી. તેજ ડ઼નીતિનું અનુસરણ પ્રતિકૃતિ વગેરે यार दुलारो मे पशु यु छे. "तेणं मणुया हक्कारेण दंडेण हया समाणा लज्जिया, विलज्जिया, वेड्ढा भोया तुसिणीया विणओणया चिट्ठेति” ते मनुष्यो न्यारे हार રૂપ દડથી જ્યારે આહત થયા, ત્યારે પેાતાની જાતને હતના રૂપમાં માનીને પહેલાં તા સામાન્ય રૂપમાં લજ્જા યુકત થયા પછી વિશેષ રૂપમાં લજ્જિત થયા. યુદ્ધ અત્યત તેમ જ અધિક લજ્જિત થયા, કેમ કે તેમણે પહેલાં કઈ પણ દિવસે આવું શાસન જોયું નહાતુ. એથી આ શાસન તેમના માટે ઈંડાદિ ઘાત કરતાં પણ વધારે મમ ઘાતી થઈ ४२ ३२९ Page #344 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३३० जम्बद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अतिशयलज्जिताः, 'भीया' भीताः भययुक्ताः, 'तुसिणीया' तूष्णीका: मौनाः 'विणओवणया चिटंति' विनयावनताश्च तिष्ठन्ति, न तु धृष्टवत् निर्लज्जाः निर्भयाः वाचाला अहङ्कारिणश्च भवन्ति । हाकारदण्डेन हतास्ते मनुजा हृतसर्वस्वमिवाऽऽत्मानं मन्यमानाः पुनरपराधस्थाने न प्रवृत्ता अभूवन्निति । सम्प्रति तदनन्तरं या दण्डनीनिरभूत् तां प्रतिपादयति 'तत्थ णं खेमधर' इत्यादिना । 'तत्थ णं खेमधर विमलवाहण चक्खुम जसवं अभिचंदाणं' तत्र खलु क्षेमन्धर विमलवाहन चक्षुष्मयशस्वद्-अभिचन्द्राणाम् 'एएसिणं पंचण्हं कुलगराणं' एतेषां' पञ्चानां कुलकराणं काले 'मक्कारे' माकारो-माकरणं माकरो 'णाम दंडणीई होत्था' नाम दण्डनीतिरभवत् । 'ते णं मणुया मकारेणं दंडेण हया समाणा जाव चिटुंति' ते खलु मनुजा माकारेण दण्डेन हताः सन्तो यावत् तिष्ठन्ति । यावत् पदेन 'लज्जिता विलज्जिताः' इत्यादि पाठः संग्राह्यः । अत्रेदं बोध्यम् हाकारदण्डस्यातिपरिचयेन घाती हुआ । इसलिये उसे अपने आपका घातक मानकर उन्हें अत्यन्त अधिक लज्जा से युक्त होना पड़ता, हमारा अब क्या होगा इस प्रकार से भयभीत होकर उन्हें चुप रहना पड़ता और अपनी गल्ती स्वीकार कर उन्हें विनयावनत बनना पड़ता, धृष्ट पुरुष की तरह वे न तो निर्लज्ज बनते, न निर्भय बनते, न बाचाल बनते और न अहंकारी बनते । इस तरह हाकार दण्ड से हत हुए वे मनुष्य जिनका सर्वस्व हरण कर लिय है । ऐसा अपने आप को समझकर फिर अपराध करने के स्थान पर प्रवृत्त नहीं होते थे, "तत्थ णं खेमंधर विमलवाहण चक्खुमं जसमं अभिचंदाणं एएसि णं पंचण्हं कुलगराणं मक्कारे णामं दंडणीई होत्था" इस हाकार दण्ड. नीति के बाद क्षेमन्धर, विमलवाहन, चक्षुष्मान्, यशस्वान् एवं अभिचन्द्र इन पांच कुलकरों के काल में माकार नामको दण्डनीति का प्रचलन हुआ । “मत करना" इस प्रकार की जो निषेधास्मक नीति है वही माकार नाम की दण्डनीति है, इन क्षेमन्धर आदि पांच कुलकरों के समय में जो मनुष्य दण्डनीय कार्य करता तो उसे माकार दण्डनीति से दण्डित किया जाता था-इससे પડયું. એટલા માટે તેને પિતાના ઘાતક રૂપમાં માનીને તેઓ અત્યંત લજિજત થતા અને કહેતા કે હવે અમારું શું થશે? આ પ્રમાણે ભયભીત થઈને તેઓ ચુપ બેસી રહેતા અને પિતાની ભૂલ કબૂલ કરી તેઓ વિનયાવનત થઈ જતા ધૃષ્ટ માણસની જેમ તેઓ તે નિર્લજજ થતા, ન નિર્ભય થઇને રહેતા, ને વાચાલ બનતા અને ન અહંકારી બનતા. આ પ્રમાણે હાકાર દંડથી હત થયેલા મનુષ્ય કે જેમનું સર્વસ્વ હરણ કરવામાં આવ્યું छ. मे मानीने ३१ अपराध ४२वाना या प्रवृत्त थता नलि, “तत्थ णं खेमंधर धिमलवाहण चक्खुमं जसम अभिचंदाणं एएसिंण पंचण्ह कुलगराण मक्कारे णाम दंडणीह होत्था" २ नीति पछी मनधर, विमान, यशुमान् , यशस्वान्, અને અભિચન્દ્ર એ પાંચ કુલકરના કાળમાં માકાર નામની દંડનીતિનું પ્રચલન થયું. નહિ કરે” આ પ્રકારની જે નિષેધાત્મક નીતિ છે તે જ માકાર નામની દંડનીતિ છે. એ ક્ષેમધર આદિ પાંચ કુલકરના સમયમાં જે મનુષ્ય દંડનીય કાર્યો કરતા તેમને સાકાર નામક દંડનીતિ મુજબ દંડિત કરવામાં આવતા એથી તે અપરાધી પૂર્વની જેમજ લજિજત Page #345 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि० वक्षस्कार सू. ३८ कुलकर ताप्रकारकथननम् ३३१ ततोऽभीषु युग्मिमनुजेषु सत्सु क्षेमन्धरः कुलकरस्तेषामनुशासनाय माकारं दण्डनीति प्रवर्त्तितवान् तदनुयायिनो विमलवाहन - चक्षुष्मद् यशस्वदभिचन्द्रा अपि माकारमेव दण्डनीतिं प्रवर्तितवन्तः । तत्र महत्यपराधे माकारो दण्डः, सामान्यापराधे तु हाकार इति । अथ तदनन्तर कालभाविनः कुलकरा यां दण्डनीतिं प्रवर्तितवन्तः, तामाह - 'तत्थ णं' इत्यादि । 'तत्थ णं' तत्र खलु 'चंदाम पसेणइ मरुदेव उसभाणं एएसि णं पंचण्ड कुलगरा ' चन्द्राभप्रसेनजिद् मरुदेव नाभि ऋषभाणाम् एतेषां खलु पञ्चानां काले 'धिक्कारे' धिक्कारे - धिक्करणं धिक्कारो 'णामं दंडणीई होत्था' नाम दण्डनीतिरभवत् । 'ते णं मणुया धिक्कारेणं दंडेणं हया समाणा जाव चिड़ंति' ते खलु मनुजा धिक्कारेण वह पूर्व की तरह लज्जित, विलज्जित अदि विशेषणों वाला बन जाया करता था, यही बात यहां यावत्पद से समझाई गई है । तात्पर्य इस कथन का यही कि जब हाकार दण्ड अतिपरिचित हो चुका तो उससे उन लोगों में भय नहीं रहा - " ते तं मणुया मक्कारेणं दंडेणं हया समाणा जाव चिद्वैति" तत्र उन युगलिक मनुष्यों में भय का संचार रहे- वे अनुशासन से 'हीन न होजावें इस भाव को लेकर क्षेमन्धर कुलकर ने उनको अपने अनुशासन में रखने के लिये माकार नामकी दण्डनीति का प्रचलन किया । क्षेमन्धर के बाद इनके अनुयायी विमलवाहन, चक्षुमत्, यशस्वान, और अभिचन्द्र इन चार कुलकरों ने भी इसी माकार दण्डनीति का प्रवर्तन किया, यह मानकर दण्डनीति का वहुत बडे अपराध के होने पर ही किया जाता था, सामान्य अपराध में तो केवल हाकार दण्डनीति का प्रयोग होता था, इनके बाद में हुए कुलकरों ने जिस दण्डनीति को प्रवृत्ति को उसे अब सूत्रकार प्रकट करते हैं - " तत्थ णं चंदाभ, पसेनइ, मरुदेव, उसभाणं एएसि णं पंचण्हें कुलगराणं धिक्कारे णामं दंडणीई होत्था" चन्द्राभ, प्रसेनजित मरुदेव, नाभि और ऋषभ इन पांच कुलकरों के काल में धिक्कार नामकी दण्डनीति प्रचलित हुई, इस दण्डनीति से इन कुलकरों के समय के मनुष्य दण्डित होते रहे यहां ऐसा समझना વિલજિજત વગેરે વિશેષ@ાથી યુકત થઈ જતા. એ જ વાત અહીં યાવત્ પદથી કહેવામાં આ વી છે. આ કથનનુ તાપ આ પ્રમાણે છે કે જ્યારે હાકાર દંડ અતિ પરિચિત થઈ ગયા ત્યારે તે લેાકેામાં દંડ. પ્રત્યે ભય રહ્યો નહિ. તેએ અભીત થઈ ગયા. ત્યારે તે યુગલિક મનુષ્યમાં ભયનું સંચરણ રહે, તેઓ અનુશાસનહીન થઈ જાય નહિ, એ ભાવને લઈને ક્ષેમન્ધર કુલકરે તેમને પેાતાના અનુશાસનમાં રાખવા માટે ‘માકાર’ નામક દંડનીતિ નું પ્રચલન કર્યું. ક્ષેમધર પછી તેમના અનુયાયી વિમલવાહન, ચક્ષુષ્માન્ અભિચન્દ્ર એ ચાર કુલકરાએ પણ એજ ‘માકાર' દંડનીતિનું પ્રવર્તન કર્યુ. આ માકાર દડનીતિના પ્રત્યેગ બહુ જ મોટા અપરાધ મહેલ જ કરવામાં આવતા. સામાન્ય અપરાધ માટે તે ફકત ‘ડાકાર’ દંડનીતિનેા પ્રયણ્ જ થતે. ‘હાકાર' ન્રુણ્ડનીતિ બાદ કુલકરાએ જે દઢુનીતિના પ્રયાગ કર્યા, તે વિષે હવે સૂત્રકાર કહે છે- ચન્દ્રાક્ષ, પ્રસેનજિત, મરુદેવ, નાભિ અને ઋષભ એ પાંચ કુલકાના કાળમાં ધિકકાર' નામક ફ્રેંડનીતિનું પ્રચલન હતું. આ ક્રૂડનીતિથી એ કુંલકરોના સમયના લેાકેા દડિત થયા, એવુ' અત્રે સમજવું જોઇએ. ‘માકાર’ Page #346 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३३२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र दण्डेन हताः सन्तो यावत् तिष्ठन्ति । अत्रेदं बोध्यम्-माकार दण्डस्याप्यतिपरिचयेन ततोऽभीतेषु युग्मिमनुजेषु सत्सु चन्द्राभः कुलकरस्तेषामनुशासनाय धिक्कारं दण्डनीति प्रवर्तितवान् । तदुक्तम्-आगत्यल्पे नीतिमाद्यां द्वितीयां मध्यमे पुनः । महीयसि द्वे अपि ते, स प्रायुक्त महामतिः॥१॥इति । ततस्तदनुयायिनः प्रसेनजिद् मरुदेव-नाभिऋषभाश्चत्वारोऽपि कुलकराः स्व स्वकाले तामेव दण्डनीतिमनुसृतवन्तः । तत्र महत्यपराधे धिक्कारो दण्डो मध्यमापराधे मकारो, जघन्यापराधे तु हाकार इति । इतोऽनन्तरं भरतकाले कालस्वाभाव्याज्जनेषु महापराधिषु जातेषु परिभाषणाद्या चतुर्विधा दण्डनीतिरजायत । तदुक्तम्-- चाहिये-माकार दण्डनीति से जब मनुष्य अतिपरिचय में आगये तो फिर उन्हें उस दण्डनीति का जैसा भय चाहिये वैसा भय नहीं रहा-अतः वे इस नीति के सम्बन्ध में निर्भय होते चले गये, "तेणं मणुया धिक्कारेणं दंडेणं हया समाणा जाव चिटुंति" तब उन युगलिक मनुष्योंको अनुशासित करने के लिये चन्द्राभ कुलकर ने धिक्कार नाम को दण्डनीति को चालू कियातदुक्तम्-आगस्यल्पे नोतिमाद्यां द्वितीयां मध्यमे पुनः । महीयसि द्वे अपि ते स प्रायुक्त महामतिः ॥१॥ इन पांचो के बाद इन्हीं कुलकरों के अनुयायी प्रसेनजित्. मरुदेव, नाभि और ऋषभ इन पांच कुलकरों ने अपनी २ शासन व्यवस्था के समय में इसी धिक्कार दण्डनीति का अनुसरण किया जब युगलिक मनुष्यों से कोई महान् अपराध हो जाता तो उस समय वे धिक्कार दण्ड से उन्हें दण्डित करते, मध्यम अपराध हो जाने पर माकार दण्ड से और जघन्य अपराध हो जाने पर:हाकार दण्ड से दण्डित करते । इनके बाद भरत काल में काल स्वभाव से जब मनुष्य महापराधी होने लगे तो परिभाषण आदि चार प्रकार की दण्डनीति चालू की गई । દંડનીતિથી જ્યારે લેક અતિપરિચિત થઈ ગયા ત્યારે એ દંડનીતિનો જે ભય રહે જોઈએ તે ભય એ દંડનીતિને રહ્યો નહીં, એથી તેઓ એ નીતિના સંબંધમાં નિર્ભય થઈ એટલે કે બેપરવા થઈને રહેવા લાગ્યા. તે સમયે સુગલિકોને અનુશાક્ષિત કરવા માટે ચાભ નામક કુલકરે ‘ધિકાર’ નામક દંડનીતિ પ્રચલિત કરી ત૬કતમ आगत्यल्पे नीतिमाद्यां द्वितीयो मध्यमे पुनः । महियसि द्वे अपि ते स प्रायुंक्त महामतिः ॥१॥ એ પાંચ કુલકરો પછી એ કુલકરોના અનુયાયી પ્રસેનજિત, મરુદેવ, નાભિ અને ઋષભ એ પાંચ કુલકરોએ પિત-પોતાના શાસનકાળમાં એ “ધિકાર” દંડનીતિનું જ અનુસરણ કર્યું જ્યારે યુગલિક મનુષ્યો કેઈ મહાન અપરાધ કરતા ત્યારે “ધિકાર' દંડનીતિ દ્વારા તેને દંડિત કરવામાં આવતા, જ્યારે તેઓ મધ્યમ અપરાધ કરતા ત્યારે માકાર દંડનીતિ દ્વારા અને જઘન્ય અપરાધ કરતા ત્યારે હાકાર દંડનીતિ દ્વારા દડિત કરવામાં આવતા ત્યાર બાદ ભરત કાળમાં કાળના ભાવથી જયારે મનુષ્યો મહાપરાધી થવા લાગ્યા ત્યારે પરિભાષણ વગેરે ચાર પ્રકારની દંડનીતિઓ પ્રચલિત થઈ તકતમ - Page #347 -------------------------------------------------------------------------- ________________ देड प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३८ कुलकरताप्रकारकथनम् परिभासणाउ पढमा मंडलबंधत्ति होइ बीया य । चारग छवि छेयाई भरहस्स चउविदा नीई ॥१॥ ' छाया-परिभाषणा तु प्रथमा मण्डलबन्ध इति भवति द्वितीया च । . चारके छबिच्छेदादि, भरतस्य चतुर्विधा नीतिः ॥१॥इति॥ ॥९०३८॥ इत्थं पञ्चदशस्य कुलकरस्य ऋषभस्वामिनः चतुर्दश कुलकरसाधारण कुलकरत्व मुपदर्य सम्प्रत्यस्य असाधारणपुण्यप्रकृत्युदयसमुदभूत् त्रिजगज्जनपूजनीयतां प्रदर्शयितुं यथाऽस्मादेव लोके विशिष्ट धर्माधर्म संज्ञाव्यवहारा प्रवृत्ता अमूवन्निति दर्शयति____ मूलम्-णाभिस्स ण कुलगरस्स मरुदेवाए भारियाए कुच्छिसि एत्य णं उसमे णामं अरहा कोसलिए पढमराया पढमजिणे पढमकेवली पढमतित्थयरे पढमधम्मवरचाउरंतचकवट्टी समुप्पज्जित्था । तएणं उसमें अरहो कोसलिए वींसं पुव्वसयसहस्साई कुमारवासमझे वसइ, वसित्ता तेवढिं पुव्वसयसहस्साई महारोयवासमझे वसइतेवट्टि पुवसयसहस्साई महारायवासमझे वसमाणे लेहाइयाओ गणियप्पहाणाओ सउणस्यपज्जवसाणाओ बावेत्तरि कलाओ चोसर्हि महिलागुणे सिप्पसयंच क म्माणं तिण्णि वि पयाहियाए उवदिसइ, उवदिसित्ता पुत्तसय रज्जसए अभिसिंचइ अभिसिंचित्ता तेसीई पुव्वसयसहस्साई महारायवासमझे वसइ वसित्ता जे से गिम्हाणं पढमे मासे पढमे पक्खे चित्तबहुले तस्स णं चित्तबहुलस्स णवमीपक्खेणं दिवसस्स पच्छिमे भागे चइसा हिरणणं चइत्ता सुवण्णं चइत्ता पुरं चइत्ता कोसं कोट्टागारं चइत्ता बलं चइता काहणं चइत्ता पुरं चइत्ता अंते उरं चइत्ता विउलधणकणगरयण मणिमोत्तिय संख सिलप्पवालरत्तरयणसत्तसारसावइज्जं विच्छड्डइत्ता विगोवइत्ता दायं दाइया णं परिभाएत्ता सुदंसणाए सीयाए सदेवमणुयासुराए परिसाए समणुगम्ममाणमग्गे संखियचक्कियणंगलिय मुहमंगलिय पूसमाणब पद्धमा णग आइक्खगलंखमंख घंटियगणेहिं ताहिं इट्ठाहिं कताहिं पियाहि मणु तदुक्तबू-"परिभासणा उ पढमा मंडलबंधत्ति होइ बीया य । चारग छवि छेयाई भरहस्स चउम्विहा नीई ॥१॥३८॥ परिभासणा उ पढमा मंडलबंधत्ति होइ बीयाय । चारग छवि छेयाई भरहस्स चउन्विहा नीई ॥१॥ सूत्र ॥३८॥ Page #348 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ण्णाहिं मणामाहिं उरालाहिं कल्लाणाहिं सिवाहि धन्नाहि मंगल्लाहि सस्सिरियाहिं हियगमणिज्जाहिं हिययपल्हायणिज्जाहिं कण्णमणणिव्वुइकराहि अपुणरुत्ताहिं अट्ठसइयाहि वग्गूर्हि अणवस्यं अभिणंदंता य अभिथुणंता य एवं वयासी-जय जय नंदा ! जय जय भद्दा ! धम्मेणं अभीए परीसहोवसग्गाणं खंतिखमे भयमेवाणं धम्मे ते अविग्धं भवउत्तिकट्ठ अभिणंदति य अभिथुणंति य तएणं उसमे अरहा कोसलिए णयणमालासहस्सेहिं पिच्छिज्जमाणे पिच्छिज्जमाणे एवं जाव णिग्गन्छइ जहा उववाइए जाव आउलबोलबहुलं णमं करते विणीयाए रायहाणीए ममं मज्झेणं णिग्गच्छइ आसिय सम्मज्जिय सित्तसुइकपुफोक्यास्कलियं सिद्धत्थवणविउल रायमग्गं करेमाणे हयगयरहपहकरेण पाइकचडकरेण य मंदं मंदं उद्ध्यरेणुयं करेमाणे करेमाणे जेणेव सिद्धत्थवण्णे उज्जाणे जेणेव असोगवरपायवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता असोगवरपायवस्स अहे सीयं ठावेइ वित्ता सीयाओ पच्चोरुहइ पच्चोरहित्ता सयमेवाभरणालंकारं ओमुयइ ओमुइत्ता सयमेव चरहिं अ ट्राहिं लोयं करेइ करिता छटेणं भत्तेणं अपाणएणं आसाढाहिं णक्खत्तेण जोगमुवागएणं उग्गाणं भोगाणं राइन्नाणं खत्तियोणं चउहिं सहस्सेहिं सद्धि एगं देवदूसमादाय मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए सू० ३९॥ गया-नामः खलु कुलकरस्य मरुदेवाया भार्यायाः कुक्षौ अत्र खलु ऋषभो नाम भहन कौशलिकः प्रथमराजः प्रथमजिनः प्रथमकेवली प्रथमतीर्थकरः प्रथमधर्मवरचातुरस्तचक्रवती समुदपचत । ततः खलु ऋषभः अर्हन् कौशलिको विशति पूर्वशतसहस्राणि कुमारवासमध्ये बसति, उषित्वा त्रिषष्टि पूर्वशतसहस्राणि महाराजवासमध्ये वसति, त्रिष. प्टिशतसहस्राणि महाराजधासमध्ये वसन् लेखादिका गणितप्रधानाः शकुनरुतपर्यवसाना द्वासति बलाचतुष्यष्टि महिलागुणान् शिल्पशतं च कर्मणां त्रीण्यपि प्रजाहिताय उपदिशति, उपदिश्य पुषशत राज्यशते अभिषिञ्चति, अभिषिच्य त्रयस्त्रिंशत् पूर्वशतसहस्राणि महाराजबासमध्ये वसति उषित्वा यः स ग्रीष्माणां प्रथमे मासे प्रथमः पक्षश्चैत्र बहुलः, तस्य खलु चत्रबहुलस्य नवमीपक्षे दिवसस्य पश्चिमे भागे त्यक्त्वा हिरण्यं, त्यक्त्वा सुवर्ण, त्यक्त्वा कोश कोष्ठागार, त्यक्त्वा बल, त्यक्त्वा वाहनं त्यक्त्वा पुरं त्यक्त्वा अन्तःपुरं, त्यकृत्वा विपुलधन कनकरत्नमणि मौक्तिकशलशिलाप्रवालरक्तरत्न सत्सारस्वापतेय, विच्छद्य Page #349 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विपक्षस्कार० सू. ३९ ऋषभस्वामिनः त्रिगज्जनपूजनीयताप्ररूपणम् ३३५ विगोप्य, दाय दयिकानां परिभाज्य, सुदर्शनायां शिबिकायां, सदेवमनुशासुरवा परिषदा समनुगम्यमानमार्गः शाजिकचक्रिकलाङ्गलिकमुखमालिक पुष्यमाणव वर्षमानकाक्यायक लड मख धंटिकगणः ताभिरिष्टाभिः कान्ताभिः प्रियाभिर्मनोकाभिर्मन मामीभिः उदारामिः कल्याणीभिः शिवाभिः धन्याभिः मङ्गल्याभिः सश्रीकाभिः हृदयगमनीयाभिः दयमहादनीयाभिः कर्णमनोनिवृत्तिकरोभिः अपुनरुक्ताभिः अर्थशतिकाभिः वाग्भिः अनवरतम् अभिनन्दन्तश्च अभिष्टुवन्तश्च एवमवादिषुः जय जय नन्द ! जय जय भद्र ! धर्मेण अभीत: परीषहोपसर्गाणां क्षान्तिक्षमो भयभैरवाणां धर्मे ते अविघ्नं भवतु-इति कृत्वा अभिनन्दन्ति व अभिष्टुवन्ति च । ततः खलु ऋषभः अर्हन् कोशलिको नयनमालासहनः प्रेक्ष्यमाणः प्रेक्ष्यमाण एवं यावन्निर्गच्छति, यथा औपपातिके यावत् माकुलबोलबालं नमः कुर्वन विनीताया राजधान्या मध्यमध्येन निर्गच्छति, आसिकसम्मार्जितसिक्तविक पुष्पोपचारकलितं सिद्धार्थवनविपुलराजमार्ग कुर्वन् हयगजरथप्रकरण पदातिचटकरेण - मन्दं मन्दम् उखतरेणुकं कुर्वन् कुर्वन् यत्रैव सिद्धार्थवनम् उद्यानं यत्रैव अशोकबरपादपः तत्रैव उपा. गच्छति, उपागत्य अशोकवरपादस्य अधः शिविकां स्थापयति, स्थापयित्वा शिविकातः प्रत्यवरोहति, प्रत्यवरुह्य स्वयमेवाभरणालङ्कारम् अवमुञ्चति, अवमुच्य स्वयमेव बतलभिमुष्टिभिलोंचं करोति, कृत्वा षष्ठेन भक्तेन अपानकेन आषाढादिमिनक्षत्रेण योगमुपागते खलु उग्राणां भोगाना राजन्यानां क्षत्रियाणां चतुर्भिः सहस्त्रैः सार्धम् एक देवदूभ्यमादाय मुण्डो भूत्वा अगारात् अनगारतां प्रवजितः ॥सू० ३९॥ टीका-'णाभिस्स णं' इत्यादि । 'णाभिस्स ण कुलगरस्स मरुदेवाए भारियाए कृच्छिसि' नाभेः कुलकरस्य मरुदेव्या भार्यायाः कुक्षौ 'एत्य' अत्र अस्मिन् समये 'ण' खलु 'उसमे इस प्रकार से पन्द्रह कुलकरों में और ऋषभस्वामी में चतुर्दश कुलकरों को साधारण कुलकरता प्रगट करके अब सूत्रकार इनमें असाधारण पुण्यप्रकृति के उदय से समुदभूत त्रिजगज्जनों द्वारा-पूजनीयता प्रगट करने के लिये जिस तरह इनसे ही लोकमें विशिष्ट धर्माधर्मसंज्ञारूप व्यवहार चालू हुए इस बात को दिखाते हैं "णाभिस्स णं कुलकरस्स मरुदेवाए भारियाए" इत्यादि । टोकार्थ-'णाभिस्स णं कुलकरस्स मरुदेवाए भरियाए कुच्छिंसि एस्थणं उसमे णाम मरहा" नाभि कुलकर को मरुदेवी भार्या की कुक्षि में इस समय ऋषभ नाम के अर्हन्त-देव, मनुष्य ( આ પ્રમાણે પંદર કુલકરો અને ઋષભ સ્વામીમાં ચતુર્દશ કુલકરોની સાકાર કુલકરતા પ્રકટ કરીને હવે સૂત્રકાર એમનામાં અસાધારણ પુણ્ય પ્રકૃતિના ઉદયથી સમુદત ત્રિજગજજને વડે પૂજનીયતા પ્રકટ કરવા માટે જે રીતે એમના વડે જ લેકમાં વિશિષ્ટ ધમધર્મ સંજ્ઞા રૂપ વ્યવહારો પ્રચલિત થયા, એ વાતને સ્પષ્ટ કરે છે__ 'नाभिस्स ण कुलगरस्स मरुदेवार भारियाए' इत्यादि सूत्र ॥३९॥ । ટીકાર્યું–નાભિકુલકરની મરુદેવી ભર્યાની કુક્ષીમાંથી ઋષભ નામના અન્ત દેવ, મનુષ્ય અને - Page #350 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३३६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'नाम' ऋषभो नाम 'अरहा' अर्हन्- सदेव मनुजासुरनमस्कारार्ह : 'समुपज्जित्था' समुदपद्यत ' समुत्पन्नः । स कीदृशः समुदपद्यत ? इत्याह- 'कोसलिए ' कौशलिक:- कोशलायां देशविशेषे भवः, तथा 'पढमराया' प्रथमराजः प्रथमवासौ राजा चेति, इहावसर्पिण्यां नाभि कुलकराज्ञप्तैर्युगलिकमनुजैः शक्रेण च सर्वतः प्रथममभिषिक्तत्वात् आदिराज इत्यर्थः तथा 'पढमजिणे' प्रथमजिनः प्रथमश्चासौ जिनश्चेति, रागादीनां प्रथमो जेता, यद्वा राज्यत्यागादनन्तरं द्रव्यतो भावतश्च साधुत्वे समुत्पन्ने सति प्रथमो मनःपर्यवज्ञानी, अस्यामवसर्पिण्यामस्यैव भगवतः सर्वतः प्रथमं मनः पर्यवज्ञानित्वात् । ननु स एव भग· वान् अस्यामवसर्पिण्यां सर्वतः प्रथमम् अवधिज्ञानी मनः पर्यवज्ञानी केवलज्ञानी च जातः । जिनवदेन च अत्रधिमनः पर्यव केवलज्ञानिनां सर्वेषामपि ग्रहणं भवति, तर्हि कथमत्र जिनपदेन मनः पर्यवज्ञानिमात्रं गृह्यते ? इति चेत्, आह- जिनपदेन अवधिज्ञानिनो ग्रहणे मम् अक्रमबद्धं स्यात्, केवलज्ञानिनो ग्रहणे चोत्तरग्रन्थेन सह पौनरुक्त्यं स्यात्, अतो और असुरों से नमस्कार करने योग्य आदि नाथ प्रभु उत्पन्न हुए, "कोसलिए" ये कौशलिक. थे क्योंकि ये कोशला नामके देश विशेष में अवतरित हुए थे । “पढमराया" ये प्रथम राजा थे क्योंकि अवसर्पिणीकाल में नाभिकुलकर के द्वारा आज्ञन हुए युगलिक मनुष्यों ने और शकों ने सर्वप्रथम अभिषेक किया था । "पढमजिणे" सर्व प्रथम अवसर्पिणी काल के जिन थे- क्योंकि रागादिकों के ये ही सर्व प्रथम जेता थे, अथवा - राजत्याग के अनन्तर द्रव्य और भाव से साधुत्व के उत्पन्न होने पर ये प्रथम मनः पर्ययज्ञानी थे, क्योंकि इस अवसर्पिणी काल में ये मनः पर्यय के सर्वप्रथम अधिकारी हुए है शंका- जिनपद से तो समस्त अवधिज्ञानियों का, समस्त मनः पर्ययज्ञानियों का और केवल ज्ञानियों का ग्रहण हो जाता है तो फिर यहां पर जिन पद के द्वारा एक मनः पर्ययज्ञानी का ही ग्रहण आपने का उत्तर ऐसा है कि यदि जिन पद से अवधिज्ञानी का ग्रहण माना जावे तो इस स्थिति में सूत्रमें अक्रमबद्धता आजावेगी, केवलज्ञानी का ग्रहण मानने पर उत्तरग्रन्थ के साथ पुनरुक्ति दोष आअसुरोथी नभस्म्रराष्ट्रीय आदिनाथ प्रभु उत्पन्न थया. येथे 'कोसलिए' प्रशसिङ हता, डेम એએ કેશલ નામક દેશ વિશેષમાં અવતરિત થયા હતા. પ્રથમ રાજા હતા, કેમકે અવસર્પિણી કાળમાં નાભિ કુલકર વડે આજ્ઞપ્ત થયેલ યુગલિક મનુષ્યએ અને શક્રોએ સવ પ્રથમ એમન અભિષેક કર્યાં. અવસર્પિણી કાળના એએ સર્વપ્રથમ જિન હતા કેમ કે રાગાદ્રિકા પર વિજય મેળવનાર સર્વપ્રથમ એ જ હતા. અથવા રાજ્ય ત્યાગ પછી દ્રવ્ય અને ભાવથી સાધુત્વ ઉત્પન્ન થયા પછી એએ પ્રથમ મનઃ પ જ્ઞાની હતા કેમ કે એ વર્ષિણી કાળમાં એમના પયજ્ઞાનના સર્વપ્રથમ અધિકારી થયા ચકા:-જિનપદ્મથી તા સમસ્ત અવધિજ્ઞાનીઓનું સમસ્ત મનઃ પયજ્ઞાનીઓનું અને કેવળ જ્ઞાનીઓનું ગ્રહણ થઈ જાય છે તે પછી અહીં જિન પદ વડે તમે એક મન: પ. યજ્ઞાનીનું જ ગ્રહણ શા માટે કયુ છે? क्यों किया है ? तो इस शंका આ શંકાને વાત્ર આ પ્રમાણે છે કે જો જિનપથી અવધિજ્ઞાનીનું ગ્રહણ માનવામાં વે તે આ સ્થિતિમાં સૂત્રમાં અક્રમમઢતા આવી જશે અને કેવલજ્ઞાનીનું ગ્રહણ માન Page #351 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ३९ऋषभस्वामिनः त्रिजगज्जनपूजनीयता प्ररूपणम् ३३७ ऽत्र जिनपदेन मनःपर्यवज्ञानी एव गृह्यते इति । तथा 'पढम केवली' प्रथम केवली प्रथमकेवलज्ञानी-आद्यसर्वज्ञ इत्यर्थः । तथा 'पढमतित्थयरे' प्रथमतीर्थकरः आद्यश्चतुर्वर्णसवस्थापकः, अतएव 'पढमधम्मवर चाउरंतचक्कवट्टी' प्रथमधर्मवरचातुरन्तचक्रवर्ती-दानशीलतपोभावैः चतसृणां नरकादि गतीनां चतुर्णा वा कषायाणामन्तो नाशो यस्मात् , अथवा-चतस्रो गतिश्चतुरः कषायान् वा अन्तयति-नाशयतीति, यद्वा-चतुर्भिर्दानशीलतपोभावैः कृत्वा अन्तो-रम्यः, अथवा-चत्वारः-दानादयः अन्ताः अवयवा यस्य, यद्वा चत्वारि-दानादीनि अन्तानि-स्वरूपाणि यस्ये 'अन्तोऽवयवे स्वरूपे च' इति हेमचन्द्रः स चतुरन्तः, स एव चातुरन्तः, स एव चक्रं जन्म-जरामरणोच्छेदकत्वेन चक्रतुल्यत्वात् , वरं च तत् चातुरन्तचक्रं वरचातुरन्तचक्रं,वरपदेन राजचक्रापेक्षयाऽस्य श्रेष्ठत्वं व्यज्यते, लोकद्वयसाधकत्वात् धर्म एव वरचातुरन्तचक्रं धर्मवरचातुरन्तचक्रं तादृशस्य धर्मातिरिक्तस्यासंभवात् अत एव सौगतादिधर्माभासनिरासः, तेषां तात्विकार्थप्रतिषादकत्वाजावेगा । इसलिये यहां जिनपद से सिर्फ मनः पर्यय ज्ञानी का ग्रहण किया गया है, अवसर्पिणो काल में “पढमकेवली" ये ही सर्वप्रथम केवली हुए हैं, आद्यसर्वज्ञ हुए है । "पढमतित्थयरे" ये ही आध तीर्थकर प्रकृति के उदयवाले हुए हैं-सर्वप्रथम ये ही चतुर्विध संघ के स्थापक हुए हैं, "पढमधम्मवरचाउरंतचक्कवट्टी समुप्पज्जित्था" ये हो प्रथम धर्मवर चातुरन्त चक्रवर्ती हुए हैं-दान, शील, तप और भावों के द्वारा चार गतियों का अथवा चार कषायों का जिससे नाश हो जाता है, अथवा चार गतियों का और चार कषाओं का जो विनाश कर देता है, अथवा दान, शील, तप और भावों से जो रम्य है, अथवा चार दानादिक जिसके "अन्तोऽवयवे स्वरूपेच" इस हेमचन्द्र कोश के अनुसार अवयव हैं या जिसके स्वरूप हैं वह चतुरन्त है चतुरन्त ही चातुरन्त है, यह चातुरन्त ही जरा मरण का उच्छेदक होने से जन्म है, ऐसा जो श्रेष्ठ चातुरन्तकचक्र है वही वर चातुरन्तचक्र है; वर पद से राज चक्र की अपेक्षा इसमें श्रेष्ठता व्यक्त की गई है । क्योंकि यह लोक द्वय का साधक होता है ऐसा चातुरन्त चक्र धर्म के વામાં આવે તે ઉત્તર ગૅન્થની સાથે પુનરુકિત દોષ આવી જશે. એથી જ અહીં જિનપદથી ફકત મનઃ પર્યજ્ઞાનીનું ગ્રહણ કરવામાં આવેલ છે. અવસર્પિણી કાળમાં ફકત એઓ જ સર્વપ્રથમ કેવલી થયા છે, આઘે સર્વજ્ઞ થયા છે, એ જ આદ્યાતીર્થંકર પ્રકૃતિના ઉદયવાળા થયા છે, ચતુર્વિધ સંઘના સ્થાપક થયા છે. એ એ જ પ્રથમ ધર્મવિર ચાતુરન્ત નકાદિ ગતિએના અથવા ચાર ગતિએના અને ચાર નરકાદિ ગતિએને અથવા ચાર કષાચાને જેનાથી નાશ થઈ જાય છે, અથવા ચાર ગતિઓને અને ચાર કષાયને જે વિનાશ કરે छ, अ हान, शीख,त५ अ माथा रे २२५ छ, अथवा यार हाना 'अन्तोऽवयवे स्वरूपे च' से उभयन्द्र अपना ४थन भुराम अवयव। छ, अथवा न १३छ, ते ચતરા છે ચતુરન્ત ચાતરત છે, એ ચાતુરન્ત જ જરા મરણના ઉછેદક હોવાથી જન્મ છે, એ જે શ્રેષ્ઠ ચાતુરન્ત અંકની અપેક્ષા એમાં શ્રેષ્ઠતા વ્યકત કરવામાં આવી છે કેમ કે એ લેકદ્રવ્યને સાધક હોય છે. ચક્ર છે તે જ ચાતુરન્ત ચક્ર છે. આ પદથી Page #352 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे भावेन श्रेष्ठत्वाभावात् , धर्मवरचातुरन्तचक्रेण वर्तितुं शीलं यस्य स धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्ती चक्रवर्तिपदेन षट्खण्डाधिपति सादृश्यं व्यज्यते, तथाहि चत्वारः-उत्तरदिशि हिमवान् शेषदिक्षु चोपाधिभेदेन समुद्रा अन्ताः-सीमानस्तेषु स्वामित्वेन भवश्चातुरन्तः, चक्रेण रत्नरूपप्रहरणविशेषेण वर्तितुं शीलं यस्य स चक्रवर्ती, चातुरन्ताश्च ते चक्रवर्तिनश्चेति चातुरन्तचक्रवर्तिनः धर्मेण-न्यायेन वरः-श्रेष्ठः इतरतीथिकापेक्षयेति धर्मवरः 'धर्माः पुण्ययमन्याय स्वभावाचारसोपमाः' इत्यमरः, स चासौ चातुरन्तचक्रवर्ती चेति धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्ती, येद्वा-चातुरन्तं च तच्चक्रं चानुरन्तचक्रं वरं च तच्चातुरन्तचक्रं वरचातुरन्तचक्रं, धर्मोंवरचातुरन्तचक्रमिव धर्मवरचातुरन्तचक्रं, तेन वर्तितु वर्तयितुं वा शीलं यस्य स धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्ती, प्रथमश्चासौ धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्ती चेति प्रथमधर्मवरचातुरन्तचक्रवर्तीति । प्रथमराजन्यादि विशेषणविशिष्टः स भगवान् ऋषभोऽर्हन् नाभिकुलकर भार्याया मरुदेव्याः कुक्षौ समुत्पन्नः इति भावः । 'तएणं' ततः -जन्मग्रहणानन्तरं खलु 'उसभे अरहा कोसलिए' ऋषभोऽर्हन् कौशलिको 'वीसं पुत्र अतिरिक्त और कोई नहीं है । इससे सौगतादि धर्माभासों का निरास हो जाता है। क्योंकि उनमें यथार्थरूप से प्रतिपादकता नहीं है । अतः उन्हें श्रेष्ठता का स्थान प्राप्त नहीं हो सका है। धर्मवरचातुरन्तकचक्र से वर्तने का जिसका स्वभाव है वह धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्ती है । "चक्रवर्ती" इस पद से छह स्खण्ड के अधिपति का सा दृश्य व्यक्त किया गया है। जो उत्तर दिशा में रहा हुआ हिमवान् है वह और शेष दिशाओं में उपाधिभेद से वर्तमान जो समुद्र हैं वे इस भरत खण्ड को सीमा रूप हैं। इनमें जो स्वामिरूप से होता है वह चातुरन्त है तथा चक्र से रत्न रूप प्रहरण विशेष से वर्तन करने का जिसका स्वभाव है वह चक्रवर्ती है, "धर्माः-पुण्ययमन्याय स्वभावाचारसंयमाः" इस अमरकोष के वचनानुसार धर्म-न्याय से जो इतर तीर्थियों की अपेक्षा श्रेष्ठ है वह धर्मवर है । ऐसा धर्मवर जो चातुरन्तचक्रवर्ती है वह धर्मवर चातुरन्तचक्रवर्ती है ऐसे वे प्रथम राजवादि विशेषणों से विशिष्ट भगवान् ऋषभ अन्त नाभिकुलकर की એવું ચાતુરન્ત ચક્ર ધર્માતિરિકત બીજુ કંઈ નથી. એનાથી સોગતાદિ ધર્માભાસને નિરાસ થઈ જાય છે, કેમ કે તેમનામાં યથાર્થિક પ્રતિપાદક્તા નથી. એથી જ તેઓને શ્રેષ્ઠતાનું સ્થાન પ્રાપ્ત થયું તેથી. ધર્મવર ચતુરન્ત ચક્ર મુજબ વર્તવાને જેને સ્વભાવ છે, તે ધર્મ ચાતરક્ત ચકવતો છે. “ચકવતી” આ પથી ૬ ખંડના અધિપતિનું સાદસ્થ વ્યકત કશ્યામાં આવેલ છે. જે ઉત્તર દિશામાં આવેલ હિમવાનું છે તે અને શેષ દિશાઓમાં ઉપાધિભેદથી વર્તમાન જે સમુદ્ર છે તે આ ભરતખંડની સીમા રૂપમાં છે. વિદ્યમાન છે એમાં જે સ્વામિ રૂપે જે શાસક હોય છે તે ચાતુરન્ત છે, તેમ જ ચકથા એટલે કે રાગ રૂપ પ્રહરણ વિશેષથી पनि ४२वाना रनो स्वमा छे ते यवती छे. “धर्माःपुण्ययम न्याय स्वभावाचारसोपमा" એ અમરકોષ’ના વચનાનુસાર ધર્મન્યાયથી જે ઈતર તીથિયેની અપેક્ષાએ શ્રેષ્ઠ છે, તે ધર્મ વર છે. એ ધર્મવર જે ચાતુરન્ત ચકરતી છે, તે ધર્મવર ચાતુરત ચક્રવતી છે. એવા તે પ્રથમ રાજન્યાદિ વિરોષથી વિશિષ્ટ ભગવાન્ ઋષભ અહંન્ત નાભિકુલકરની ભાય Page #353 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सू. ३९ ऋषभस्वाणिनः त्रिजगज्जनपूजनीयताप्ररूपणम् ३३९ सयसहस्साई' विंशतिं पूर्वशतसहस्राणि-विंशतिलक्षपूणि 'कुमारवासमझे कुमारवासमध्ये कुमारेण-भावप्रधानत्वात् कुमारत्वेन वासः-अवस्थितिस्तन्मध्ये 'वसई' वसति । विंशतिलक्षपूर्वाणि यावत् कुमारपदे स्थित इति भावः । 'वसित्ता' उषित्वा-कुमारपदे स्थित्वा 'तेवहिं पुव्वसयसहस्साई' त्रिषष्टिं पूर्वशतसहस्राणि--त्रिषष्टि- लक्षपूर्वाणि 'म हारायवासमज्झे' महाराजवासमध्ये-महाराजेन-भावप्रधानत्वात् महाराजत्वेन वसनंमहाराजबासस्तन्मध्ये 'वसई' वसति । तत्र स प्रजानामुपकाराय यत्कृतवांस्तदाह 'तेवर्द्धि' इत्यादि । 'तेवहिं पुन्चसयसहस्साई महारायवासमज्झे वसमाणे त्रिषष्टिं पूर्वशतसहस्राणि महाराजवासमध्ये वसन् स भगवान् ऋषभोऽर्हन् 'लेहाइयाओ' लेखादिकाः-लेखन अक्षरविन्यासः स आदौ यासां तास्तथा ताः, पुन: 'गणियप्पहाणाओ' गणिततप्रधा नाः-गणितम्-अङ्कविद्या, तत्प्रधानं यासु तास्तथा ताः, तथा 'सउणरुयपज्जवसाणाओ'. शकुनरुतपर्यवसानाः शकुनरुतं-पक्षिशब्दः पर्यवसाने-अन्ते यासां तास्तथाभूताः ताः, 'बावत्तरि' द्वासप्ततिं-द्वासप्ततिसंख्यकाः 'कलाओ' कलाः, 'चोसढि चतुष्पष्टिं-चतुष्षभार्या मरुदेवी की कुक्षि में उत्पन्न हुए, "तएणं उसभे अरहा कोसलिए वीसं पुवसयसहस्साई कुमारवासमज्झे वसई" जन्म ग्रहण के अनन्तर उन कौशलिक ऋषभ अर्हन्त ने २० लाख पूर्व कुमारकाल में समाप्त किये । अर्थात् २० लाख पूर्वतक ऋषभनाथ कुमार काल में रहेकुमार काल में इतने पूर्व तक "वसित्ता" रहने के बाद "तेवर्द्वि पुवसयसहस्साई महाराय वासमझे वसई" फिर वे ६३ लाख पर्वतक महाराज पद में रहे "तेवढेि पुवसयसहस्साई महारायवासमझे वसमाणे लेहाइयाओ गणियप्पहाणाओ सउणरुयपज्जवसाणाओ बावत्तरि कलाओ चोसदि महिलागुणे सिप्पसयं च कम्माणं तिणि वि पया हियाए उवदिसई" उस पद में रहकर उन्होंने जो प्रजाजनों का उपकार किया वह अब "तेवर्द्धि" इत्यादि पदों द्वारा सूत्रकार प्रगट करते हैं-६३ लास्त्र पूर्वतक महाराज पद में रहकर उन ऋषभनाथ ने लेखादिक कलाओं को-अक्षर विन्यास आदि रूप विद्याओं को गणित प्रधान-रूप कलाओं को, एवं पक्षियों भरवानी एक्षिथी उत्पन्न थया 'तए णं उसमेअरहा कोसलिए वीसं पुव्वसयसइस्साई कमारवासमझे वसई' -भपछीauleसनाथराईत २० सा५५५भागमा સમાપ્ત કર્યા, એટલે કે ૨૦ લાખ પૂર્વ સુધી ઋષભનાથ કુમાર કાળમાં રહ્યા. એટલા પૂર્વ સુધી કુમારકાળમાં રહ્યા પછી તેઓ ૬૩ લાખ પૂર્વે સુધી મહારાજ પદે રહ્યા. એ પદ પર સમાસીન રહીને તેમણે જે રીતે પ્રજને ઉપકાર કર્યો તે વિષે હવે “તે वद्धि" छत्यादि पह! 3 सूत्रा२ ४९ छे. १३ सा५ पूर्वा सुधी भडा२०४ ५६ ५२ सभाસીન રહીને તે બાષભનાથે લેખાદિક કલાઓને અક્ષરવિન્યાસ આદિ રૂપ વિઘાન, ગણિત પ્રધાન રૂ૫ કલાનો, તેમજ પક્ષીઓની વાણી સમજવા રૂપ અંતિમ કલાઓને, આ વીતે સર્વ ૭૨ કલાઓને તેમજ ૬૪ સ્ત્રીઓની કલાઓને, જીવિકાના સાધનભૂત કર્મોના સંદર્ભમાં વિજ્ઞાનશત-શત સંખ્યક કુલકરાદિ શિપને, આમ સવમળીને પુરુષોની ૭૨ કલાઓનો ૬૪ સ્ત્રીઓની કલાઓનો અને વિજ્ઞાન શત રૂ૫ શિપને પ્રજાહિત માટે Page #354 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्र ष्टि संख्यकान् 'महिलागुणे' महिलागुणान् स्त्रीकलाः 'कम्माणं' कर्मणां-जीविकासाधनभूतानां च मध्ये 'सिप्पसयं' शिल्पशतं-विज्ञानशतम् शतसंख्यकानि कुम्भकारादि शिल्पानीत्यर्थः, एतानि 'तिण्णिवि' त्रीण्यपि ‘पयाहियाए' प्रजाहिताय-लोकोपकाराय 'उवदिसइ' उपदिशति । 'त्रीण्यपि' इत्यत्र अपि शब्दः कला-महिलागुण-शिल्पशतानाम् एकपुरुषोपदिश्यमानतेति सूचनार्थम् । 'उपदिशति' इति वर्तमानकालत्वेन निर्देशः सर्वेषा माधतीर्थकराणामयमेव उपदेश प्रकार इति सूचयितुम् । यद्यपि कृषिवाणिज्यादयो बहवो जीविकासाधनप्रकाराः सन्ति, तथापि यत् शिल्पशतमेवात्र निर्दिष्टं तत् कृषिवाणिज्यादीनां पश्चादुत्पत्तिरिति सूचनायेति । ततश्च भगवता शिल्पशतमेवोपदिष्टं कृषिवाणिज्यादीनि तु पश्चात् समुद्भूतानीति विज्ञेयम् । अत एव आचार्योपदेशजं शिल्पम् अनाचार्योपदेशजं कर्मेति प्रसिद्धम् । की बोली को पहिचाननेरूप अन्तिम कला तक की इन सब ७२ कलाओं को एवं ६४ स्त्रियों की कलाओं को, तथा जीविका के साधन भूत कर्मों के बीच में विज्ञानशत को-शत संख्यक कुम्भकारादि शिल्पों को इस तरह लेखादिक रूप पुरुषों की ७२ कलाओं को, ६४ स्त्रियों की कलाओं को और विज्ञानशतरूप शिल्पों को प्रजाजनों के हितके लिये उपदिष्ट किया, "त्रीण्यपि" में आया हुआ यह अपि शब्द यह सूचित करता है कि ये ७२ कलाएँ ६४ कलाएँ और शिल्पशत इन सब में एक पुरुष द्वारा उपदिश्यमानता है अर्थात् इनका सर्व प्रथम उपदेश इन्हीं ऋषभदेव ने दिया है । "उपदिशति" ऐसा जो वर्तमान कालिक का प्रयोग किया गया है उससे सूत्रकार ने यह सूचित किया है कि समस्त आद्यतीर्थंकरों के उपदेश का प्रकार ऐसा ही होता है । यद्यपि कृषि, वाणिज्य आदि अनेक प्रकार के जीविका के साधन हैं तथापि यहां जो शिल्पशतमात्र का ही निर्देश करने में आया है वह इस बात को प्रगट करता है कि इनकी उत्पत्ति पश्चात् ही हुई है । इस तरह भगवान् ऋषभदेव ने तो शिल्पमात्र का ही उपदेश दिया है । कृषि वाणिज्यादि का नहीं इनकी तो पीछे से ही उत्पत्ति हुई है। इसलियेशिल्प आचार्योपदेशज है और कर्म अनाचार्योपदेशज है । अथवाबपोश या. "त्रीण्यपिः' भी मावस 'अपि' श४ मा सूथित ४२ छ । ७२ કલાઓ, ૬૪ કલાઓ અને શિ૯૫–શત એ સર્વેમાં એક પુરુષ વડે ઉપદિશ્ય માનતા છે. सेट से सब सामान। सर्व प्रथम उपहेश ऋषम या छ. "उपदिशति" એ જ વર્તમાન કાલિક પ્રગ કરવામાં આવેલ છે તેનાથી સૂત્રકાર આ પ્રમાણે સૂચિત કરવા માંગે છે. સમસ્ત આદ્ય તીર્થકરો ના ઉપદેશને પ્રકાર એ જ હોય છે, જે કે કષિ. વાણિજ્ય વગેરે અનેક પ્રકારનાં જીવિકાનાં સાધન છે, તે પણ અહીં માત્ર શિ૯૫શતને જ નિર્દેશ કરવામાં આવેલ છે, તે આ વાત પ્રકટ કરે છે કે એમનું પ્રચલન પછી જ થયું છે. આ રીતે ભગવાન ઋષભદેવે તે શિ૯૫ શત માત્રને જ ઉપદેશ કર્યો છે. કૃષિ વાણિજયાદિ ને ઉપદેશ કર્યો નથી. એમને આવિષ્કાર તે પછી જ થયો છે. એથી શિ૯૫ આચાર્યોપદેશ જ છે અને કર્મ અનાચાર્યોપદેશ જ છે. અથવા Page #355 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार ३९ ऋषभस्वामिनः त्रिजगज्जनपूजनीयताप्ररूपणम् ३४१ अथवा-"तृणहार काष्ठहार कृषिवाणिज्यकान्यपि । ___ कर्माण्यासूत्रयामास लोकानां जीविकाकृते ॥१॥” इति । प्राचीनोक्त्या कृषिवाणिज्यादीन्यपि भगवतैवोपदिष्टानीति विज्ञेयम् । ततश्च ‘कर्मणाम्' इत्यत्र द्वितीयार्थे षष्ठी। एवं च भगवान् जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदभिन्नानि कर्माणिशिल्पशतं च पृथगेवोपदिष्टवानिति बोध्यम् । कलानां लेखादिका द्वासप्ततिभेदाः तदर्थाश्च ज्ञातासूत्रस्य प्रथमाध्ययने विंशतितमसूत्रे मत्कृतायाम् अनगारधर्मामृतवर्षिणीटीकायां द्रष्टव्याः । चतुष्षष्ठिः स्त्रीकलाश्चेमाः, नृत्यम् १, औचियं २, चित्रं ३, वादिनं ४, मन्त्रः ५, तन्त्र ६, ज्ञानं ७, विज्ञानं ८, दम्भः ९, जलस्तम्भः १०, गीतमानं ११, तालमानं १२, मेघवृष्टिः १३, जलवृष्टिः १४, आरामरोपणम् १५, आकारगोपनम् १६ धर्मविचारः १७, शकुनसारः १८, क्रियाकल्पः १९, संस्कृतजल्पः २०, प्रासादनीतिः २१, धर्मरीतिः २२, वणिकावृद्धिः २३, स्वर्णसिद्धिः २४, सुरभितैलकरणं २५, लीला"तृणहार काष्ठहार कृषिवाजिज्यकान्यपि । कर्मण्यास्त्रयामास लोकानां जीविकाकृते ॥१॥" इस प्राचीन उक्ति के अनुसार कृषि वाणिज्य आदि कर्म भी भगवान् के ही द्वारा उपदिष्ट हुश हैं ऐसा जानना चाहिये । “कर्मणाम्" यह द्वितीयार्थ में षष्ठी हुई है। अतः भगवान् ने जघन्य , मध्यम और उत्कृष्ट के भेद से अनेक प्रकार के कर्मों का और शिल्पशत का अलग २ ही उपदेश दिया है ऐसा समझना चाहिये। कलाओं के लेखादिक जो ७२ भेद हैं और इनका जो अर्थ है वह सब मैंने ज्ञातासूत्र के प्रथम अध्ययन का जो वीसमा सूत्र है उसकी टोका में खुलाशा किया है। अतः यह विषय वहां से अच्छी तरह जाना जा सकता है । ६४ जो स्त्रियों की कलाएँ हैं वे इस प्रकार से हैं-नृत्य १, औचित्य २, चित्र ३, वादित्र ४, मंत्र ५, तन्त्र ६, ज्ञान ७, विज्ञान ८, दम्भ ९, जलस्तम्भ १०, गीतमान ११, तालमान १२, मेघवृष्टि १३, जलवृष्टि १४, आरामरोपण १५, आकारगोपन १६, धर्मविचार १७, शकुनसार, १८. क्रियाकल्प १९, संस्कृतजल्प २०, तृणहार काष्ठहार कृषिवाणिज्यकान्यपि । __ कमण्यासूत्रयामास लोकानां जीविका कृते ॥१॥ આ પ્રાચીન કથન મુજબ કૃષિ વાણિજ્યાદિ કર્મો પણ ભગવાન વડે જ ઉપદિષ્ટ થયા छ, सामान . 'कर्मणाम्' मा द्वितीया भां पछी येसी छे. मेथी भावाने જઘન્ય, મધ્યમ અને ઉત્કૃષ્ટના ભેદથી અનેક પ્રકારના કમાન અને શિ૯ જુદા સ્વરૂપમાં જ ઉપદેશ કર્યો છે, આમ સમજવું જોઈએ. લેખાદિકના રૂપમાં કલા ના જે ૭૨ ભેદે છે અને એમના જે અર્થો છે, તે વિષે મેં “જ્ઞાતાસૂત્ર' ના પ્રથમ અધ્ય યનના, ૨૦ માં સૂત્રની ટીકામાં સ્પષ્ટતા કરી છે. એથી આ સંબંધમાં જિજ્ઞાસુઓ તે ગ્રન્થનું અધ્યયન કરીને વિશેષ જ્ઞાન પ્રાપ્ત કરી શકે છે. સ્ત્રીઓની ૬૪ કલાએ આ પ્રમાણે छ. १ नृत्य, २ मीथित्य, 3 चित्र, ४ पाहित्र, ५ मात्र, तन्त्र, ७ ज्ञान, ८ (वज्ञान, ૯ દંભ, ૧૦ જલસ્તંભ, ૧૧ ગીતમાન, ૧૨ તાલમાન, ૧૩ મેઘવૃષ્ટિ, ૧૪ જલવૃષ્ટિ, ૧૫ આરામ આપણુ, ૧૬ આકારગોપન, ૧૭ ધર્મવિચાર ૧૮ શકુનસાર, ૧૯ કિયાકલ્પ, ૨૦ Page #356 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४२ जम्बूद्वीपप्रचप्तिसूत्रे संचरण २६, हयगजपरीक्षणं २७, पुरुषस्त्रीलक्षणं २८, हेमरत्नभेदः २९, अष्टादशलिपिपरिच्छेदः ३०, तत्कालबुद्धि. ३१, वास्तुसिद्धिः ३२, कामविक्रिया ३३, वैद्यकक्रिया ३४, कुम्भभ्रमः ३५, सारिश्रम; ३६, अजनयोगः ३७, चूर्णयोगः ३८, हस्तलाघवं ३९, वचनपाटवं ४०, भोज्यविधिः ४१, (वाणिज्यविधिः ४१, मुख मण्डनं ४२, शालिखण्डनम् ४३, कथाकथनं ४४, पुष्पग्रथनं ४५, वक्रोक्तिः ४६, का व्यक्तिः ४७, स्फारविधिवेषः ४८, सर्वभाषाविशेषः ४९, अभिधानज्ञानं ५०, भूषण परिधानं ५१. भृत्योपचारः ५२, गृहाचारः ५३, व्याकरणं ५४, परनिराकरणं, ५५, रन्धनं ५६, केशबन्धनं ५७, वीणानादः ५८, वितण्डावादः ५९, अङ्कविचारः ६०, लोकव्यवहारः ६१, अन्त्याक्षरिका ६२, प्रश्नप्रहेलिका ६४ इति । इह काश्चित् कलाः स्त्रीपुरुषसाधारणा अपि यत् पृथक् पृथक् स्त्रीविषयत्वेन पुरुषविषयत्वेन चोक्तास्तत्र प्रसादनीति २१, धर्मरीति २२, वणिकावृद्धि २३, स्वर्णसिद्धि २४, सुरभितैलकरण २५, लोलासंचरण २६, हयगजपरोक्षण २७, पुरुषस्त्रीलक्षण २८, हेमरत्नभेद २९, अष्टादशलिपिपरिच्छेद ३०, तत्कालघुद्धि ३१, वास्तुसिद्धि ३२, कामविक्रिया ३३, वैद्यकक्रिया ३४, कुम्भभ्रम ३५, सारिश्रम ३६, अञ्जनयोग ३७, चूर्णयोग ३८, हस्तलाघव ३९, वचनपाटव ४०, भोज्यविधि ४१, (वाणिज्यविधि ४१) मुखमण्डन ४२, शालिखण्डन ४३, कथाकथन ४४, पुष्पग्रथन ४५,वक्रोक्ति ४६, काव्यशक्ति ४७, स्फारविधिवेष ४८, सर्वभाषाविशेष ४९, अमिधानज्ञान ५०, भूषणपरिधान ५१, भृत्योपचार ५२, गृहाचार ५३, व्याकरण ५४, परनिराकरण ५५, रन्धन ५६, केशबन्धन ५७, वीणानाद ५८, वितण्डावाद ५९, अङ्कविचार ६०, लोक व्यवहार ६१, अन्त्याक्षरिका ६२, एवं प्रश्नप्रहेलिका ६३, इन कलाओं में कितनोक कलाएँ ऐसी भी हैं जो स्त्री और पुरुष में समानरूप से होती हैं, परन्तु जब वे स्त्री संबन्धी होती हैं तो स्त्रीकला कहलाती हैं, और जब पुरुष संबन्धी होती हैं तो पुरुषकला कहलाती हैं, इसસંસ્કૃત જ૯૫, પ્રાસાદનીતિ, ૨૨ ધર્મ રીતિ, ૨૩ વણિકા વૃદ્ધિ, ૨૪ સ્વણસિદ્ધિદ, ૨૫ સુરભિ. મૈલ કરણ, ૨૬ લીલા સંચરણ ૨૭ હયગજપરીક્ષણ, ૨૮ પુરુષ સ્ત્રી લક્ષણ, ૨૯ હેમ૨તન ભે, અષ્ટાદશલિપિપરિચછેદ, ૩૧ તત્કાલ બુદ્ધિ, ૩ર વાસ્તુસિદ્ધિ, ૩૩ "કામવિક્રિયા, ૩૪ વિદ્યક ક્રિયા, ૩૫ કુંભ ભ્રમ, ૩૬ સરિશ્રમ, ૩૭ અંજનીગ ૩૮ ચૂર્ણગ, ૩૯હસ્ત ला, ४० वयन पाटव, ४१ विधि, (४१ पाशुन्य विधि), ४२ भुसभडन, ४३ શાલિખંડન, ૪૪ સ્થાથન, ૫, પુષ્પ ગ્રથન, ૪૬ વક્રોકિત, ૪૭ કાવ્યશક્તિ, ૬૮ સફાર વિધિવેષ, ૪૯ સર્વ ભાષા વિશેષ, ૫૦ અભિધાન જ્ઞાન, ૫૧ ભૂષણ પરિધાન, પર ભૂલ્યોપચાર, પ૩ ગૃહાચાર, પ૪ વ્યાકરણ, ૫૫ નિરાકરણ, પ૬ રન્ધન, પ૭ કેશ બઘન, ૫૮ વીણા નાદ, પ૯ વિતંડાવાદ, ૬૦ અંકવિચાર, ૬૧ લેકવ્યવહાર, ૬૨ અત્યાક્ષરિકા અને ૬૩ પ્રશ્ન પ્રહેલિકા, એ કલા એમાં કેટલીક કલાઓ એવી પણ છે કે જે સ્ત્રી અને પુરુષ બંને માટે સમાન રૂપે હોય છે, પણ જયારે તે સ્ત્રી સંબંધી હોય છે, ત્યારે સ્ત્રી કલા કહેવાય છે અને જયારે પુરુષ સંબંધી હોય છે ત્યારે તેની ગણનાં પુરુષ કલાના રૂપમાં થાય છે. એથી એમ Page #357 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ३९ ऋषभस्वामिनः त्रिजगज्जनपूजनोयताप्ररूपणम् ३४३ पौनरुक्त्यशङ्का न कार्या, स्त्रीकलाविषयत्वेन पुरुषकलाविषयत्वेन च पृथग् पृथग् विवक्षणात् , अन्यथा स्त्रीकलापुरुषकला तदुभयकलाचेति कलानां भेदत्रयं विवक्षणीयं स्यादिति । शिल्पशतं यदुक्तं तत्र मूलशिल्पानि कुम्भशिल्पं लोहशिल्पं चित्रशिल्पं तन्तुवायशिल्पं नापिशिल्पमिति पञ्च । तत्र एकैकस्य भेदस्य विंशतिविंशति भेदा इति शिल्पशतम् । तदुक्तम् "पंचेव य सिप्पाई घडलोह चित्तणंत कासवए। इक्किक्कस्स य इत्तो वीस वीसं भवे भेया ॥१॥" छाया-पञ्चैव च शिल्पानि घटलोह चित्र वस्त्र काश्यपानि । विंशति एकैकस्य च इतो विंशतिर्भेदाः ॥१॥ इति ननु किं निमित्तं भगवता पञ्च मूलशिल्पानि प्रोक्तानि ? इति चेत्, आह-कालस्वभावेन युगलिकपुरुषेषु मन्दजाठराग्निषु जातेषु अपक्वौषधिषु भुज्यमानासु तदपरिपाकेन रुग्णप्रायास्ते युगलिकपुरुषाः संजाताः, ततस्तेषां दुर्दशामालोक्य दयाहृदयेन लिये इनमें पुनरुक्ति की संभावना नहीं हो सकती है, यदि ऐसा न होता तो फिर स्त्री कला पुरुषकला और तदुभयकला इस तरह से कलाकों के तीन भेद विवक्षित होते परन्तु इस प्रकार से कलाओं के भेद विवक्षित नहीं हुए हैं। शिल्पशत ऐसा जो कहा गया हैं उसमें मूलशिल्प चित्रशिल्प, तन्तुवायशिल्प, और नापित शिल्प ये पांच मेद हैं, इनमें प्रत्येकशिल्प के २०-२० और भेद होते हैं, इस तरह शिल्पशत होते है । तदुक्तम्-पंचेव य सिप्पाइं, घडलोह चित्तणंत कासवए । इक्किक्कस्स य इत्तो-बीसं बीसं भवे मेया ॥१॥ शंका-भगवान् ने किस निमित्त से पांच मूलशिल्प कहे हैं ? तो इस शंका का उत्तर ऐसा है कि जब युगलिक पुरुष मन्द नठराग्नि वाले हो गये तब उन्होंने अपक औषधियाँ खाना प्रारंभ कर दिया । परन्तु वे भी उन्हें नहीं पची- इस कारण वे रुग्णप्राय रहने लगे। નામાં પુનરુકિતની સંભાવના હોઈ શકે નહિ. જે આમ ન હોત તે સ્ત્રી કલા, પુરુષ કલા અને તદુભયકલાના રૂપમાં કલાઓના ત્રણભેદો વિવક્ષિત હોત. પરંતુ કલાઓના આ રીતે ભેદો કરવામાં આવ્યા નથી. શિ૯૫શત એવું જે કહેવામાં આવ્યું છે, તેમાં મૂલશિ૯૫ના કુંભ શિલ્પ, લેશિ૯૫, ચિત્ર શિલ્પ તત્વાય શિ૯૫ અને નાપિતશિપ એ પાંચ ભેદે છે એમાં દરેક શિ૯૫ના ૨૦-૨૦ પ્રકારે બીજા પણ હોય છે આ રીતે શિલ્પશત થઈ જાય છે, તદુકતમ્ पंचेव य सिप्पाईघडलोह वित्तणत कासवए। इविककस्स य इत्तो बीसं बीसं भवे मेया ॥१॥ શંકા –ભગવાને કયો નિમિતે પાંચ મૂલ શિલ્પ કહ્યાં છે ? તે આ શંકાને જવાબ આ પ્રમાણે કરવામાં આવે છે કે યુગલિક પુરુષો મન્દ જઠરાગ્નિવાળા થઈ ગયાં ત્યારે તેમણે અપકવ ઔષધીઓનું સેવન કરવા માંડયું, પરંતુ તે ઔષધીઓને પણ તેઓ પચાવી શક્યાં નહિ, એથી તેઓ પ્રાયઃ ૨૭ રહેવા લાગ્યા તેઓની આવી દુર્દશા જોઈને ભગવાને દયા Page #358 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे भगवता तद्न्धनाय रन्धनसाधनपात्रनिर्माणशिल्पमुपदिदेश । तत्र भगवान् सर्वतः प्रथम घटनिर्माणशिल्पमुपदिष्टवानिति प्रथमं घटमूलशिल्पं संजातमिति ?। अनार्येभ्यः प्रजां रक्षितुं त्रियाः शस्त्रपाणयस्तिऽष्ठन्तु इति भगवता लोहशिल्पं दर्शितम् २। चित्राङ्गकल्पवृक्षेषु कालस्वभावेन परिक्षीणेषु चित्रशिल्पम् ३॥ वस्त्रप्रदायिषु कल्पवृक्षेषु परिक्षीणेषु तन्तुवायशिल्पम् ४। पूर्वमवर्द्धमानरोमनखान् कालप्रभावेण बर्द्धमानरोमनखान् युगलिनो नरान् वीक्ष्य तेरोमनखस्तेषां व्याघातो मा भूदिति विचार्य दयाहृदयेन भगवता नापितशिल्पं च प्रदर्शितम् ५ इति । ननु कर्मक्षपणार्थमेव अवशिष्टसत्कमौणो भगवन्तोऽर्हन्तो व्याधिप्रतीकारार्थ भैषज्यमिव स्त्र्यादि परिग्रहं स्वीकुर्वते, न वितरे, कथं पुन निरवध करुचितब ऐसी दुर्दशा उनकी देखकर दयाहृदय वाले भगवान् ने उन औषधियों को पकाने के लिये पकाने में सावररूप पात्रों के निर्माण करने कोशिल्प कला का उपदेश दिया, इसमें सबसे पहिले घट निर्माणरूप शिल्प का उपदेश दिया, इसलिए घटमूलशिल्प सर्व प्रथम हुआ। अनार्यजनों से प्रजा की रक्षा के लिये क्षत्रिय जन अपने २ हाथों में हथियार लिये रहे-इसके लिये प्रभ ने लोह शिल्प का उपदेश दिया. चित्राङ्गजात के कल्पवृक्ष जब कालस्वभाव के कारण न हो गये-तब प्रभु ने चित्रशिल्प का आदेश दिया, वस्त्रों को देने वाले कल्वृक्षों के नष्ट हो जाने पर प्रभु ने तन्तुबाय शिल्प का उपदेश दिया । पहिले युगलिक नरों के रोम नख नहीं बढ़ते थे पर अब काल के प्रभाव से बड़े हुए नख रोम वाले युगलिक नरों को देखकर उन नख रोमों से उनका व्याघात न हो जाय ऐसा विचार कर दया से जिनका अन्तः करण आर्द्र हो रहा है ऐसे भगवान् ने नापित शिल्पका उपदेश दिया। शंका-कर्मनष्ट करने के लिये ही अवशिष्ट सत्कर्मवाले भगवान् अर्हन्त व्याधि के प्रतीकार के लिये औषधिसेवन के समान स्त्री आदिरूप परिग्रह को स्वीकार करते हैं । इतरजन ऐसा नहीं करने; अतः निरवद्यकर्म में ही रुचिवाले भगवान् सावधक्रिया के उपदेश में कैसे प्रवृत्त हुए ! થઈને તે ઔષધીઓને પકવવા માટે પકવવામાં સાધન રૂપ પાત્રોને બનાવવાની શિ૯૫કલાને ઉપદેશ કર્યો. એમાં સૌથી પહેલાં ઘટ નિર્માણરૂપ શિલ્પકલાને ઉપદેશ કર્યો. એથી જ ઘટ મૂલ શિલ્પ સર્વ પ્રથમ અસ્તિત્વમાં આવ્યું. અનાર્ય લાકેથી પ્રજાની રક્ષા કરવા માટે શ્રેત્ર પિતા પોતાના હાથમાં હથિયારો રાખવા લાગ્યા, એના માટે પ્રભુએ લેહ શિલપનો ઉપદેશ 2. ચિત્રાંગ જાતના ક૯૫વૃક્ષો જ્યારે કાલ સ્વભાવના કારણે નાશ પામ્યાં ત્યારે પ્રભુએ ચિત્ર શિલ્પને ઉપદેશ કર્યો. વસ્ત્રો આપનારા કલ્પવૃક્ષો જ્યારે નાશ પામ્યાં ત્યારે પ્રભુએ તંતુવાય શિલ્પને ઉપદેશ કર્યો પહેલાં યુગલિક નરાના રામ-નખ વધતા ન હતાં. પણ પછી કાળના પ્રભાવથી યુગલિક નરોના રોમ-નખ વધવા લાગ્યાં ત્યારે તે નખ-રામે થી તેમને વ્યાઘાત થાય નહિ તેમ વિચારીને દયાહ્નન્તાકરણ ભગવાને નાપિત શિલ્પને ઉપદેશ કર્યો. શંકા-કર્મ નષ્ટ કરવા માટે જ અવશિષ્ટ સત્કર્મ વાળા ભગવાન અહ°ત વ્યાધિના પ્રતિકાર માટે ઔષધિ સેવન કરવામાં આવે છે. તેમ શ્રી આદિ રૂપ પરિગ્રહને સ્વીકારે છે. ઈતર લોકો આવું કરતા નથી. એથી નિરવધ કર્મમાં જ રુચિ ધરાવનારા Page #359 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कार० सू. ३९ ऋषभस्वामिनः त्रिजगज्जनपूजनीयताप्ररूपणम् ३४५ भवान् सावधक्रियोपदेशे प्रवृत्तः ? इति चेत्, आह कालप्रभावेण वृत्तिहीनेषु दीनेषु जनेषु सत्सु तदुदेशामालोक्य करुणरससमाप्लुतस्वान्तो भगवान् 'वृत्तिहीना एते चौर्यादि दुवृत्तिभाजो मा भूवन्' इति विचार्य तेषां जीविकासाधनभूता कलाः समुपदिदेशेति अवशिष्टसत्कर्मप्रभावेण भगवतामहतां स्त्र्यादि परिग्रह स्वीकरणमिव भगवत आदिजिनस्य कलोपदेशकत्वमपि बोध्यमिति । एवं भगवतो राज्यधर्मप्रवर्तकत्वं दुष्टनिग्रहाय शिष्टपरिपालनाय विज्ञेयम् । अराजकत्वे हि मात्स्यन्यायप्रवृत्त्या लोके व्यवस्थाया नितरामभावः प्रसज्येत्, ततश्च सर्वे दुर्वृत्तिभाज एव भवेयुरिति सर्वेषां दुर्गति रेव स्यात् इति दुर्गतिभाजो मा भूवन् मनुजा इति विचार्यैव भगवता आदिजिनेन रानधर्मोऽपि प्रवतितः । किं च सर्वेऽपि आदिजिना-प्रथम केवलिनः राजधर्ममपि प्रवर्तयन्तीति जीतव्य तो इसका उत्तर ऐसा है कि काल के प्रभाव से वृत्ति हीन हुए दीनजनों के हो जाने पर उनकी दुर्दशा के देखने से जिनका अन्तः करण करुणा रस के प्रवाह से भर गया है ऐसे अर्हन्त भगवन्त ने यह सोचकर कि वृत्ति से विहीन हुए ये जन चौर्यादिरूप दुवृत्तिवाले न बन जावे उनकी जीविका की साधनभूत कलाओं का उपदेश दिया । अवशिष्ट सत्कर्मके प्रभाव से भगवन्त श्री अर्हन्त प्रभु जिस प्रकार स्त्री आदिरूप परिग्रह को स्वीकार करते हैं उसी प्रकार से भगवान् आदिजिनका यह कला का उपदेश भी समझना चाहिये । इप्त नरह भगवान् में राजधर्म की प्रवर्तकृता दुष्टों के निग्रह के लिये और शिष्टजनों के पालन के लिये हुई जाननी चाहिये । लोक में अराजक अवस्था में मात्स्यन्यायकी प्रवृत्ति के अनुसार व्यवस्था का अत्यन्त अभाव हो जाता है । इस हालत में समस्त जन दुर्वृत्ति वाले हो जाते हैं ।अतः इन जीवों को दुर्गति का पात्र न होना पड़े ऐसा विचार करके भगवान् आदि जिन ने राजधर्म की भी प्रवृत्ति की, किंच-समस्त आदि जिन राजधर्म की भी प्रवृत्ति करते हैं ऐसा जीत व्यवहार है । इसी लिये इन आदि जिन ने भो राजधर्म प्रवर्तित किया । ભગવાન સાવદ્ય ક્રિયાના ઉપદેશમાં કેવી રીતે પ્રવૃત્ત થયા ? તે પ્રશ્નના જવાબ-આ પ્રમાણે છે કે કાળના પ્રભાવથી વૃત્તિહીન થયેલા હીન લેકેને જોઈને, તેમની દુર્દશા જોઈને જેમનું અન્તકરણ કરુણ પ્રવાહથી તરબોળ થઈ ગયું છે, તેવા અહંત ભગવાને વૃત્તિહીન લેકે ચૌર્યાદિ રૂપ દુવૃત્તિવાળા થઈ ન જાય આમ વિચારીને તેમની જીવિકાના સાધનના રૂપમાં કલાઓને ઉપદેશ કર્યો. અવશિષ્ટ સત્કર્મના પ્રભાવથી ભગવન્ત શ્રી અન્ત પ્રભુ જે રીતે સ્ત્રી આદિપ પરિગ્રહને સ્વીકારે છે, તે રીતે ભગવાન આદિ જિનને આ કલાને ઉપદેશ પણ સમજ જોઈએ. આ પ્રમાણે ભગવાનમાં રાજ ધર્મની પ્રવર્તકતા દુષ્ટના નિગ્રહ માટે અને શિષ્ટ જનના પાલન માટે છે. આમ સમજવું જોઈએ. લેકમાં અરાજક અનસ્થામાં માસ્યન્યાયની પ્રવૃત્તિ મુજબ વ્યવસ્થાને જ્યારે અત્યન્તાભાવ થઈ જાય છે ત્યારે સર્વ લેકે દુત્તિવાળા બની જાય છે એથી જીવો ખરાબ રસ્તે જાય નહિ, તેમ વિયાર કરીને ભગવાન આદિ જિને રાજ ધર્મની પ્રવર્તાના કરી. કિંચ, સમસ્ત આદિ જિનો રાજ ધર્મની પ્રવૃત્તિ કરે છે, એ જીત વ્યવહાર છે. એથી જ આ ભગવાન આદિ જિને પણ રાજધર્મની પ્રવર્તન કરી. Page #360 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -- - -- -- - - -- ३४६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वहारः, अतश्चापि भगवता राजधर्मः प्रवर्तित इति । प्रकृतमनुसरामः-तथा 'उवदिसित्ता' उपदिश्य द्वासप्ततिं पुरुषस्य कलाः चतुष्पष्टिं महिलागुणान शिल्पशतानि च प्रजाभ्य उपदिश्य 'पुत्तसयं' पुत्रशतं भरत बाहुबलिप्रमुखान् पुत्रान् ‘रज्जसए' राज्यशते-कोसलातक्षशिलादिषु शतसंख्यकेषु 'राज्येषु 'अभिसिंचइ' अभिषिञ्चति, 'अभिसिंचित्ता' अभिषिच्य 'तेसीइपुचसयहस्साई' ज्येशीर्ति पूर्वशतसहस्राणि-विंशतिपूर्वलक्षाणि कुमारवासस्य त्रिषष्ठिं पूर्वलक्षाणि महाराजवासस्येति व्यशीतिलक्षपूर्वाणि 'महारायवासमज्झे वसई" महाराजवासमध्ये वसति । यद्यपि भगवतो महाराजवासस्त्र्यशीति लक्षपूर्वाणि न भवन्ति, किन्तु कुमारवासमहाराजवासयोः सम्मलितानि तावन्ति, पूर्वाणि भवन्ति, तथापि कुमारवासापेक्षया महाराजवासस्य प्राचुर्येण महाराजवास सम्बन्धित्वेनैव त्र्यशीतिलक्षपूर्वाणि विबक्षितानीति बोध्यम् । इत्थं कुमारवासमहाराजवासयोः व्यशीतिलक्षपूर्वाणि 'वसित्ता'उषित्वा 'जे से' यःसःप्रसिद्धो 'गिम्हाणं' ग्रीष्माणां-ग्रीष्मऋतोः 'पढमे मासे' प्रथमे-आधे मासे चैत्रमासे 'पढमे पक्खे चित्तबहुले' प्रथमः पक्षः चैत्रबहुल:-चैत्र कृष्णपक्षः, 'तस्स णं चित्त बहुलम्स णवमी पक्खेणे' तस्य खलु चैत्रबहुलस्य नवमी पक्षे नवम्यां तिथौ 'दिवसस्स' इस तरह से प्रभु ने ७२ पुरुषों की कलाओं का ६४ स्त्रियों की कलाओं का और शिल्पशत का प्रजाजनों के लिये "उवदिसित्ता" उपदेश देकर फिर उन्होंने "पुत्तसयं रज्जसए अभिसिंचई" भरत, बाहुबलि आदि अपने शतसंख्यक पुत्रों को कोसला, तक्षशिला आदि १०० एक सौ राज्यों के ऊपर अभिषेक किया, "अभिसिंचित्ता" अभिषेक करके "तेसीइं पुव्वसयसहस्साई महारायवासमझे वसई" इस तरह ८३ लास्व पूर्व-कुमार काल के २० लाख पूर्व और महाराज पद के ६३ लाख पर्व तक के गृहस्थावस्था में रहे यहां इन दोनों पदों के कालको मिलाकर ८३ लाख पूर्व उन्होंने गृहस्थावस्था में अपना समय समाप्त किया-ऐसा जानना चाहिये. इस तरह ८३ लाख पूर्व तक वे गृहस्था वस्थारूप महाराज पद में रहकर फिर "ने से गिम्हाणं पढमे मासे पक्खे चित्तबहुले, तस्स णं चित्त बहुलस्स णवमी पक्खेणं दिवसस्स पच्छिमे भागे" ग्रीष्मऋतु के प्रथममास में चैत्रमास में कृष्णपक्ष में ९ नौमी तिथि में दिवस के पश्चिम આ પ્રમાણે પ્રભુએ ૭૨ કલાને ૬૪સ્ત્રીઓની કલાઓના અને શિલ્પશતને પ્રજાજનો माट 'उपदिसित्ता' ५३श ४शने तभणे 'पुत्तसयं' रज्जसए अभिर्सिचद' भरत le વગેરે પિતાના પુત્રોને કેસલા તક્ષશિલા વગેરે ૧૦૦ એકસો રાજ્ય પર અભિષેક કર્યો છે. अभिसिचित्ता' अभिषे ४शन 'तेसिइपुव्वसयसहस्साई महाराजवासमझे वसइ' ॥ રીતે ૮૩ લાખ પૂર્વ–કુમાર કાળના ૨૦ લાખ પૂર્વ અને મહારાજ પદના ૬૩ લાખ પૂર્વ સુધી ગૃહસ્થાવસ્થામાં રહ્યા અહીં આ આ બન્ને પદોના કાળને મેળવવાથી ૮૩ લાખ પૂર્વ થાય છે. તેમ સમજવું એ પ્રમાણે ૮૩ લાખ પૂર્વ તેઓ ગૃહસ્થાવસ્થા રૂપ મહારાજ પદમાં सीa पछ। “जे से गिम्हाणं पढमे मासे पक्खे चित्तबहुले तस्स णं चित्तबहुलस्स नवमी पाखे णं दिवसस्स पच्छिमे भागे' श्रीमतुन। प्रथम महीना से थैत्र मासमां पा पक्षमा नवमी तिथिमा सिना पाछा मागमा 'चइत्ता हिरण्णं' २०४-यांहीन छोडीन Page #361 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका - द्वि० वक्षस्कार सू. ३९ ऋषभस्वामिनः त्रिजगज्जनपूजनीयताप्ररूपणम् ३४७ दिवसस्य 'पच्छिमे भागे' पश्चिमे भागे उचार्द्ध भागे 'हिरण्णं' हिरण्यं = रजतम् अघटित सुवर्ण' वा 'चइत्ता' त्यक्त्वा परित्यज्य, सुवण्णं' सुवर्णम् = अघटितं घटितं वा सुवर्ण ' चइता ' त्यक्त्वा'कोसं 'कोशं=भाण्डागारं 'कोद्वागारं ' कोष्ठागारं = धान्यागारं च ' चइत्ता' त्यक्त्वा, 'बले' बलं=सैन्यं 'चइत्ता' त्यक्त्वा, 'वाहणं' वाहनम् = अश्वादिकं 'चइत्ता' त्यत्वा 'पुर' पुर = नगर' 'चइत्ता' त्यक्त्वा 'अंते उरं चइत्ता' अन्तः पुरं त्यक्त्वा, तथा 'विउल धणकणगरयणमणिमोत्तियसंखसिलप्पवालरत्तरयण संतसारसावइज्जं' विपुलधनकनकरत्नमणिमौक्तिकशङ्खशिलाप्रवालरक्तरत्नसत्सारस्वापतेयं - विपुलं = प्रचुर धनं- गवादिकं, कनकं- सुवर्ण, रत्नंकर्केतनादिकं, मणिः = सूर्यकान्तादिः, मौक्तिकानि - मुक्ताफलानि शङ्खाः दक्षिणावर्त्ताः, शिलाः = राजपट्टादिरूपाः, प्रवालानि = विद्रुमाणि, रक्तरत्नानि = पद्मरागाः, रत्नग्रहणेनैव पद्मरागस्यापि ग्रहणे सिद्धे पुनः रक्तरत्नग्रहणं तस्य प्राधान्यख्यापनार्थम् एषां द्वन्द्वः, एतद्रूपं यत् सत्सारस्वापतेयं सन् = विद्यमानः सारो यस्मिंस्तत् सत्सारं तादृशं यत् स्वापतेयं द्रव्यं तच्च 'चइत्ता' त्यच्चा, हिरण्यादिकं पूर्वोक्तं सर्वं ममत्वपरित्यागेन परित्य - ज्येति भावः, तथा 'विच्छडइत्ता' विच्छद्ये ममत्वाकरणेन दूरीकृत्य, 'बिगोवइत्ता' विगो - य - जुगुप्सितमेतद् हिरण्यादिकमिति विनिन्द्य, तथा 'दाइयाणं' दायिकानां दायादानां 'दायं परिभाएत्ता 'परिभाज्य एकैकशो वित्तोर्य, तदा याचकानामभावादत्र दायिकग्रहणम्, भाग में "इत्ता हिरणं" रजत - 'चांदो को छोड़कर " चइत्ता - सुवणं" सुवर्ण को छोड़कर "चहत्ता को कोट्ठागारं " कोश - भाण्डागार को छोड़कर, कोष्ठागार - धान्यभंडार को छोड़कर " चइत्ता बल" बलसैन्य को छोड़कर "चइत्ता वाहणं" अश्वादिक वाहनों को छोड़कर " चइत्ता पुरं" पुर-नगर छोड़कर " चइत्ता अंतेउरं" अन्तः पुर- रणवास को छोड़कर " चइत्ता विउल धणकणगरयणमणिमोत्तिय संखसिलापवालरत्तरयण संतसारसावइज्जं" प्रचुर गवादि रूप धन को छोड़कर, कनक - सुवर्ण को, कर्केतन आदि रत्नको, सूर्यकान्तादिरूप मणियों को मुक्ताफलो को शङ्खों को, राजपट्टादिरूप शिलाओं को, प्रवालों को, पद्मराग आदि रूप रक्त रत्नों को, इस प्रकार से सब सत्सारभूतद्रव्य को छोड़कर इन सबसे अपना ममत्वभाव हटाकर "विच्छडइत्ता" ये सब जुगुसित हैं इस प्रकार से इन्हें "विगोवइत्ता" निन्दनीय समझकर और उस समय याचक'चन्ता सुवणं' सेोनाने छोडीने 'चइत्ता कोस कोट्ठागारं ष लाएडागारने छोडीने भेटखेडे धान्य भंडारने छोडीने 'चइत्ता बलं' जब सैन्यने छोडीने 'चइत्ता वाहणं' अश्वाद्विवाहनाने छोडीने 'चहत्ता पुर" पुर-नगरने छोडीने 'चइत्ता अंतेउरं' अन्तःपुर-रवासने छोडीने 'चइत्ता विठलघणकणगरयणमणिमोत्तिय संख सिलापवालरत्तरयणसंतसारसावइज्जै' પ્રચુર ગવાદરૂપ ધનને ત્યજીને કનક-સુવર્ણ, કેતન વિગેરે રત્નોને સૂર્યકાન્તાદિ મણિને મુકતાળાને શખાને કનક-સેાનાને, રાજપટ્ટાદ્વિપ શિલાઓને, પ્રવાલાને, પ્રશ્નરાગ વિગેર રક્ત રત્નાને આ રીતે બધા જ સત્તાર રૂપ દ્રવ્યોને છેડીને એ બધાથી પેાતાનો મમત્વभाव हटावीने 'विच्छइहत्ता' भी धानुगुप्सित छे मे प्रभा तेभने 'विगोवइत्ता' निन्दनीय समने ते समये यायो। अलाव होवाथी 'दाय' दाइयाणं परिभापता' Page #362 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४८ जम्बद्वीपप्रशतिसूत्रे तेsपि निर्ममा भगवत्प्रेरिताः सन्तः उपहाररूपेणैव तं जगृहु: । जिनानामयमेव जीतकल्पो यद् ग्रहीतृणाम् इच्छावधि दातव्यमिति । ननु जिनस्य याचकेच्छावधिदानं यदि जीतं, तर्हि साम्प्रतिक एक एव महेच्छो याचकः एकदिनदेयं संवत्सरदेयं वा ग्रहीतुमिच्छेत् ? इति चेत् आह, प्रभु प्रभावेण तेषां तथाविधेच्छाया असंभवादिति । तथा - 'सुदंसणा ए' सुदर्शनायां =सुदर्शना नाम्न्या 'सीयाए' शिविकायां समारूढः । 'समारूढ' इत्यध्याहार्यम् । तथा 'सदेव मणुयासुराए' सदेव मनुजासुरया - मनुजाश्च असुराश्चेति मनुजासुराः देवैः सहिता मनुजासुरा यस्यां सा तथा तया परिसाए' परिषदा 'समणुगम्ममाणमग्गे' समनुगम्यमान मार्गोऽभूदित्यध्याहार्यम् । तत एवं विधं तं भगवन्तं 'संखियचक्किय गंगलियमुहजनों के अभाव होने से "दायं दाइयाणं परिभाएत्ता" दायादों में इन्हें विभक्तकर "सुदंसणाए सीयाए" वे प्रभु सुदर्शना नामक' रमणीय शिविका में आरूढ हो गये. जिस समय प्रभु ने दायादों को पूर्वोक्त द्रव्य विभक्त कर दिया था उस समय उन दायादों ने निर्मम होकर भगवान् के द्वारा प्रेरित होकर - उपहाररूप से ही उस विभक्त द्रव्य को ग्रहण किया था. जिनों का यही आचार है जीतकल्प है कि वे गृहोता जनों को उनकी इच्छा के अनुसार ही दान देते हैं । शंका- यदि याचक जनों को उनकी इच्छा के अनुसार ही दान देना जितेंन्द्रदेव का आचार है तो उस समय का एक महतो इच्छा वाला याचक एक दिन में देने योग्य या संवत्सर में देने योग्य दान को ग्रहण करने की इच्छा क्यों नहीं करता है ? तो इसका समा यही है कि प्रभु के दिव्य प्रभाव से याचक जनों में ऐसी इच्छा नहीं होती है कि एक दिन में दिये जाने योग्य दान या संवत्सर में दिये जाने योग्य दानको मैं ही पूरे रूप से ले लूँ । सुदर्शना शिविका पर आरूढ होकर जब प्रभु चले तो उस समय “सदेवमणुयासुराए परिसाए समणुगम्यमाणमग्गे" उनके साथ साथ मनुष्यों की परिषदा कि जिसमें देव और असुर हायाहोमां ने वहेथी ने 'सुदंसणाए सीयाए' सुदर्शना नामनी सुन्दर शिमिमां तेथे આરૂઢ થયા જે સમયે પ્રભુએ દાયાદેશમાં પૂર્વાકત દ્રવ્ય વહેંચી દીધું એ સમયે એ દાયાદા એ નિમ મમત્વ રહિત થઇને ભગવાન દ્વારા પ્રેરાઇને ૮૩ પહારરૂપે એ વડે ચેલા દ્રવ્યને સ્વીકાર્યું” જીનાને એ જ આચાર છે : જીત કલ્પ છે. કે તેઓ લેનાર જનાને તેમની ઈચ્છા પ્રમાણે જ દાન દે, શંકા—જો યાચક જનાને તેમની ઇચ્છા પ્રમાણે જ દાન આપવું એવા જીનેન્દ્રદેવને આચાર છે, તે તે સમયના એક મહતી ઇચ્છા ધરાવનાર યાચક એક એક દિવસ આપવા યેાગ્ય અથવા એક વર્ષમાં આાપવા ચેાગ્ય દાનને એક સાથે જ ગ્રહણ કરવાની ઇચ્છા કેમ કરતા નથી? આ શકાનું સમાધાન એવુ છે કે પ્રભુના દિવ્ય પ્રભાવથી યાચક જને માં એવી ઈચ્છા જ થતી નથી કે એક દિવસમાં આપવામાં દાન અથવા એક વર્ષ માં આપવામાં આવનાર દાનને હું પૂરે પુરૂ લઇ લઉ. આપનાર सुदर्शना शिणिश्रम मेसीने क्यारे अ यास्या तो ते परिसाए समणुगम्यमाणमग्गे' तेभनी साथै मनुष्योनी परिषदा अभये 'सदेवमणुयासुराए नमां देवा भने असुरो Page #363 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू.३९ ऋषभस्वामिनः त्रिजगज्जनपूजनीयताप्ररूपणम्३५९ मंगलियपूसमाणववद्धमाणग आइक्खगलखमंखघंटियगणेहि' शालिकं चाक्रिकलाङ्गलिकमुखमङ्गलिक पुष्यमाणववर्धमानकाख्यायक लङ्खमयाण्टिकगणाः-तत्र शाङ्खिकाः-शङ्खयादकाः, चक्रिका:-चक्रभ्रामकाः, लाङ्गलिका:-कण्ठावलम्बितस्वर्णादिमयहलधारिणो भट्टविशेषाः, मुखमङ्गलिकाः-चाटुकारिणः, पुष्यमाणवाः मागधाः, वर्धमानका:-स्कन्धारोपित नराः, आख्यायकाः-कथाकारकाः, लङ्काः-वंशाग्रमधिरुह्य क्रीडाकारिणः, मङ्खाः-चि त्रफलकहस्ताः, घण्टिकाः घण्टावादकाः, तेषां गणाः-समूहाः 'ताहिं' ताभिः-प्रसिद्धाभिः 'इटाहि' इष्टाभिः अभिलपणीयाभिः, 'कंताहि' कान्ताभिः-कमनीयाभिः, 'पियाहि' प्रियाभि:-प्रियार्थमुक्तत्वात् हृदयाभिलषणीयाभिः, 'मणुण्णाहि' मनोज्ञाभिः-सुन्दरोभिः अत एव 'मणामाहि' मन आमामि:-मनोगताभिः, 'उरालाहिं' उदाराभिः-उत्कृष्ट शब्दार्थयुक्ताभिः, 'कल्लाणाहिं' कल्याणोभिः-कल्याणार्थयुक्ताभिः, "सिवाहि' शिवाभिः-निरुपद्रवाभिः-शब्दार्थ दोषरहिताभिरित्यर्थः, 'धण्णाहिं' धन्याभिः- 'पुण्णाहिं' पुण्याभिः, 'मंग ल्लाहिं' मङ्गल्याभिः मङ्गलकरीभिः, 'सस्सिरियाहिं' सश्रीकाभिः-शब्दार्थालङ्कारयुक्तत्वात् सम्मिलित थे चली, "सखिय' शाङ्खिकोने-शङ्ख बजाने वालों ने, “चक्किय” चक्रिकोंने चक्र को घुमाने वालों ने “णंगलिय" लाङ्गलिकों ने स्वर्ण निर्मित हलकों कण्ठो में लटकाये हुए मनुष्यों ने, "मुहमंगलिय" मुस्वमङ्गलिको ने चाटुकारियो ने, “पूसमाणव" पुष्पमाणवों ने मागधों ने, "वद्धमाणर्ग' वर्धमानकों ने अपने स्कन्धो पर जिन्होंने पुरुषों को चढा रखा है ऐसे मनुष्यों ने "आइक्खग' आख्यायकों ने कथा कारकजनों ने "लंख" लक्षों ने-वंश पर चढ़कर क्रीड़ा करने वाले मनुष्यों ने, “मंख" मङ्खोंने जिनके हाथो में चित्रफलक है ऐसे मनुष्यों ने एवं "घंटियगणेहिं" घाण्टिको ने घण्टा बजाने वालो ने, “ताहि इट्ठाहिं कंताहि पियाहि मणुण्णाहिं" मणामाहि उरालाहिं कल्लाणाहिं सिवाहि धन्नाहि मंगल्लाहिं सस्सिरियाहिं हि ययगमणिज्जाहिं हिययपल्हायणिज्जाहिं कण्णमणणिव्वुइकराहिं अपुणरुत्ताहिं अट्ठसइयाहि वग्नहिं अणवरयं अभिणदंता" प्रसिद्ध, इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ, मनभावनी, उत्कृष्ट शब्दार्थयुक्त, कल्याणार्थसहित, निरुपद्रवसाथ तात मचा साथे यादया. 'संखिया' शमेटश पाउनाराया 'चक्कियो सेट २२ ३२५वावाणाले 'णंगलिय' titlem सोनाना भनेता न ४४ देता मनुष्याये 'मुहमंगलिया' भुभ मलिअमे-याटुरीमा. 'पृसमाणब' पुण्यमा वामे-१३ावलिनुपर्युन ४२ना२ भागधा 'वद्धमाणग' मानीमांधा ५२ पवार सारनामा 'आइक्खग' साध्याय -या रहेथे 'लंख' जोसेटस पास ५२ यदान दा४२ नामाथे 'मख' भमा २मना साथमा यित्रपट डाय तथा मनुष्यास. 'घंटियगणेहि' घटायगाउनासाथे 'ताहि इट्टाहिं कताहिं पियाहिं मणुण्णाहि मणामाहिं उरालाहिं कल्लाणादि सिवाहि धन्नाहिं मंगल्लाहिं सस्सिरियाहिं हिययगमणिज्जाहिं हिययपल्हावणिज्जाहिं कण्णमणणिव्वुइकराहि अपुणरुत्ताहि अहः सइयाहि वग्गहि अणवरय अभिणदत्ताय' प्रसिद्ध, ७८, सन्त, [प्रय, मनोज्ञ, मनमाविनी, ઉત્કૃષ્ટ, શબ્દાર્થ ચુકત, કલ્યાણાર્થ સહિત, નિરુપદ્રવ શબ્દાર્થ દેષ વગરની, પવિત્ર Page #364 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३५० जम्बूद्वीपप्रक्षप्तिसूत्रे शोभनाभिः, अतएव 'हिययगमणिज्जाहिं' हृदयगमनीयाभिः-प्रसादगुणयुक्तत्वात् सुबोधाभिः, तथा 'हिययपल्हायणिज्जाहि' हृदयप्रह्लादनीयाभिः-हृदयानन्दकरीभिः, अतएव 'कण्णमणणिव्वुइकराहिं' कर्णमनोनिवृतिकरोभिः-कर्णमनः सुखकरीभिः तथा 'अपुणरुत्ताहि' अपुनरुक्ताभिः,-पुनरुक्तिदोषरहिताभिः, तथा 'अट्ठसइयाहिं' अर्थशतिकाभिः-अर्थशतयुक्ताभिः, एतादृशीभिः 'वग्गृहि' वाग्भिः वाणीभिः 'अणवरयं' अनवरतम् अविच्छिन्नंयथा स्यात्तथा 'अभिणंदंता' अभिनन्दयन्तः सत्कुर्वन्तः 'अभिधुणंता' अभिष्टुवन्तःप्रशंसन्तश्च ‘एवं' एवं-बक्ष्यमाणप्रकारेण 'वयासी' अवादिषुः उक्तवन्तः। यदुक्तवन्तस्तदाह-'जय जय' इत्यादि । 'नंदा' हे नन्द ! नन्दतीति नन्दः, तत्संबोधने, हे समृद्धिशालिन् , यद्वा नन्दयतीति नन्दः, तत्संबोधने, हे आनन्द दायिन् 'जय जय' जय जय-नितरां जयशालो भर 'भदा' हे भद्र हे कल्याण शालिन् ! 'जय जय' जय जय-नितरां जयशाली भव । तथा 'धम्मेणं' धर्मेण-साधन-भूतेन धर्मेण 'परीसहोबसग्गाणं' परीषहोपसर्गाणां देवमनुष्य तियकृतपरोषहोपसर्गेभ्यः, आर्षत्वात् पञ्चम्यर्थे षष्ठी, 'अभीए' अभीतो भयरहितो भव, तथा 'भयभेरवाणं' भय भैरवाणांभयावहा ये भैरवाः घोराः प्राणिनस्ते भयभैरवास्तेषां भयङ्करप्राणिकृतोपद्रवाणां'खतिखमे' शान्तिक्षमः क्षमापूर्वकं सहनकारी भव, 'धम्मे' धर्मे-चरित्रधर्माराधने शब्दार्थ दोष रहित, पवित्र, मङ्गलकारी, शब्दालंकार और अर्थालंकार से युक्त होने के कारण सश्रीक, अतएव हृदयगमनीय, हृदयप्रह्लादनीय, कर्ण और मन को आनन्द दायक, अपुनरुक्त सैकड़ो अर्थों वाली, ऐसी वाणियों से बार बार प्रभु का अभिनन्दन -सत्कार किया, उनकी प्रशंसा को फिर उन्होने "एवं वयासो" इस प्रकार से कहना प्रारम्भ किया "जय जय णंदा" हे नन्द समृद्धिशालिन् अथवा हे आनन्ददायिन् ! आप अत्यन्त जयशाली हो "जय जय भद्दा" हे भद्र कल्याणशालिन् आप अत्यन्त जयशाली हो “धम्मेणं अभीए" साधनभूत धर्म के प्रभाव से देव, मनुष्य और तिर्यञ्चो द्वारा कृत परीषह और उपसर्गों से भयरहित-निडर हो, "परीसहोवसग्गाणं खंतिखमे" भयावह जो घोर प्राणी हैं-उनके द्वारा किये गये उपद्रवों के आप क्षान्तिक्षम-क्षमापूर्वक सहनकारी हो, "भय भेरवाणं धम्मे ते अविग्ध भवउ" चारित्र धर्म મંગલકારી, શબ્દાલંકાર અને અર્થાલંકારથી ચુકત હોવાથી સશ્રીક, અતએવ હદય ગમનીય. કાન અને મનને અત્યંત આનંદપ્રદ, અપુનરૂક્ત સેંકડો અર્થવાળી એવી વાણિયોથી વારંવાર प्रभुनु मलिन हन-स४२ ४यु भनी प्रशसारी. ते ५छी तयाणे 'एवं वयासी' मा प्रमाणे पाना प्रारम ध्ये 'जय जय गंदा' नई-समृद्धिासन अथवा भानहायिन् मा५ अत्यंत यशाली थाप, 'जय जय महा' भद्र ध्याशालिन् ।५ अत्यंत यश मनो. 'धम्मेण अभीए' साधन भूतधमनाप्रमाथी हेव, मनुष्ये। मन तिय"य। बा२॥ ४२वामा मावत पशषडमने उपसर्गाथी सय २हित-नि७२ मनी. 'परिसहोवसग्गाणं खति खमे' भय २२ घार प्रालिये। छ तमनाथी ४२वामा मावस उपद्रवाना मा५ क्षतिक्षम-क्षमा ५ ४ सहन ४२नार मना. 'भयमेरवाणं धम्मे ते अविग्धं भवउ' यात्रि Page #365 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कार सू. ३९ ऋषभस्वामिनः त्रिजगज्जनपूजनीयताप्ररूपणम् ३५१ 'ते' त-तव 'अविग्छ' अविघ्नं 'भवउ' भवतु-विघ्नाभावोऽस्तु 'त्तिकटु' इति कृत्वाइत्युच्चार्य पुनः पुनः 'अभिणंदंति' अभिनन्दयन्ति-सस्कुर्वन्ति 'अभिथुवंति' अभिष्टुवन्तिप्रशंसन्ति च । 'तएणं' ततः तदनन्तरं खलु 'उसभे अरहा' ऋषभोऽर्हन् 'कोसलिए' कौशलिको कोशलदेशोद्भवः 'णयणमालासहस्सेहि' नयनमालासहस्रैः-नागरिकजनानां नयनपङ्क्तिसहस्त्रैः 'पिच्छिज्जामाणे पिच्छिज्जमाणे' प्रेक्ष्यमाणः प्रेक्ष्यमाण:-भूयोभूयोऽवलोक्यमानः, “एवं जाव णिग्गच्छइ' एवम् -अमुना प्रकारेण निगच्छति-इति पदं यावत् - पर्यन्तं वाच्यम् , कस्मात् ? इत्याह 'जहा उववाइए' यथा औपपातिके-औपपातिकसूत्रे कूणिकराजनिर्गमनं तथैवात्रापि वक्तव्यम् । तत्कथं बक्तव्यमिति सूचयितुमाह'जाव आउलबोलबहुलं णभं करते विणीयाए रायहाणीए मज्झं मज्झेणं णिग्गच्छइ' यावत् आकुलबोलबहुलं नभः कुर्वन् विनीताया राजधान्या मध्यमध्येन निर्गच्छतीति । अत्र यावत्पदेन 'हिययमाला सहस्सेहिं अभिणदिज्जमाणे अभिणंदिज्जमाणे, मणोरहमालासहस्सेहिं पिच्छिज्जमाणे पिच्छिज्जमाणे वयणमालासहस्सेहिं अभिथुव्वमाणे अभिथुव्वमाणे, कंतिरूवसोहागगुणेहिं पत्थिज्जमाणे पत्थिज्जमाणे, दाहिण हत्थेणं बहूणं णरणारीकी आराधना में आपके लिये किसी भी प्रकार का विघ्न उपस्थित न हो, "त्तिकटु अभिणंदंति य अभिथुणंति य" इस प्रकार से कहकर फिर से उन्होने बारंबार प्रभुको अभिनन्दन सत्कार किया और प्रशंसा की, "तएण उसमे अरहा कोसलिए णयणमालासहस्सेहिं पिच्छिज्जमाणे पिच्छिज्जमाणे" इसके बाद वे कौशलिक ऋषभ अर्हन्त नागरिक जनों की हजारों नयनपङ्क्तियों के बार बार लक्ष्य होते हुए "एवं जाव णिग्गच्छइ जहा उववाइए" औपपातिक सूत्र वर्णित कूणिक राजा के निर्गमन की तरह "विणीयाए रायहाणीए मज्झं मज्झेणं णिग्गच्छई" विनीता राजधानी के बीचों बीच के मार्ग से होते हुए निकले “जाव आउलबोलवहुलं णमं करते" पाठ में जो यह यावत्पद आया है उससे औपपातिक सूत्र का यह पाठ संगृहीत हुआ है-"हिययमालासहस्सेहिं अभिणंदिज्जमाणे २ मणोरहमालासहस्सेहिं पिच्छिज्जमाणे २, वयणमालासहस्सेहि अभिथुव्वमाणे २, कंतिरूवसोहग्गगुणेहिं पत्थिज्जमाणे २, दाहिणहत्येणं बणं णरणारीसहस्साणं अंजलिधमनी साधनामा मानेछ ४२नु विध-साधा न था. 'तिकटु अभि दंति य अभिथुणति य' ! प्रमाणे ४डीशथी तयामे पार पा२ प्रभुनु भनिन यु साहारा मने प्रशसा ४२१. 'तपणं उसमे अरहा कोसलिए णयणमाला सहस्सेहिं पिच्छिजमाणे पिछिज्जमाणे' ते पछी त श षम नाग२ि४ सनोलिन। नेत्रतसाथी पारवा य यता यता एवं जाव णिगच्छइ जहा उववाइए' 'मोयाति सूत्रमा qees निममननी भ'विणीयाए रायहाणीए मज्झ मज्झेणं णिग्गच्छइ' विनीता नामधानीना मध्यमा सावता भाग ५२ २४ने पसारथया "जाव आउल बोल बहुलं णाम करते" ५ मां सही २ "यावत्' ५६ मा छे. नांया मो५५ति सूत्रनामा पास हीत थये छ-"हिययमाला सहस्सेहिं अभिणदिज्जमाणे २, मणोरहमाला सहस्सेहिं विच्छिपमाणे २, वयणमाला सहस्सेहि अभिथुव्वमाणे २. कंतिरूवलोहग्ग गुणेहिं पत्थिज्जमाणे २, Page #366 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३५२ जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्रे सहस्साणं अंजलिमालासहस्साइं पडिच्छमाणे पडिच्छमाणे मंजु मंजुणा घोसेणं पडिबुज्जमणे पडिबुज्झमाणे, भवणपंतिसहस्साइं समइच्छमाणे समइच्छमाणे, तंतीतलताल तुडियगीयवाइयरवेणं महुरेणं मणहरेणं जयसद्दघोसविसएणं मंजुमंजुणा घोसेणं य पडिबुज्झमाणे अप्पडिबुज्झमाणे, कंदरगिरिविवरकुहरगिरिवरपासादुइढघणभवणदेवकुलसिंघाडगतिगचउक्कचच्चर आरामुज्जाणकाणणसमप्पवापदेसभागे पडिसुयासयसहस्ससंकुलं करेंते हयहेसिय हत्थिगुलगुलाइय रहघणघणसदमीसएणं महया कलरवेणं य जणस्स महुरेणं पूरयंते सुगंधवरकुसुमचुण्णउबिद्धवासरेणुकविलं नभं करेंते कालागुरु कुंदुरुक्कतुरुक्कधूवनिवहेणं जीवलोगमिव वासयंते समंतओ खुभियचक्कवालं पउरजणबालवुड्ढपमुइयतुरियरहाविय विउलाउलबोलबहुलं' इतिसंग्राह्यम् । छाया-स्वस्य-हृदयमालासहरभिनन्धमानः. अभिनन्धमानः मनोरथमालासहरीविस्पृश्यमानो विस्पृश्यमानः, वचनमालासहस्रैः अभिष्ट्रयमानः अभिष्ट्रयमानः, कान्ति रूप सोभाग्यगुणैः अभिष्टयमानः अभिष्टयमानः कान्तिरूपसौभग्यगुणैः प्रार्थ्यम.नः प्रार्थ्यमानः दक्षिणहस्तेन बहूनां नरनारी सहस्राणाम् अञ्जलिमालासहस्राणि प्रतीच्छन् प्रतीच्छन्, मंजु मजुना घोषेण प्रतिबुध्यमानः प्रतिबुध्यमान:, भवनपक्ति सहस्त्राणि समति क्रामन् समतिक्रामन्, तन्त्री तलतालत्रुटितगीतवादितरवेण मधुरेण मनोहरेण जयशब्दघोषविशदेन मजुमजुना घोषेण च प्रतिबुध्यमानः प्रतिबुध्यमानः, कन्दरगिरि विवरकुहर्रागरिवरप्रासादोर्ध्वधनभवनदेवकुलशृङ्गाटकत्रिकचतुष्कचत्वरामोद्यानकानन सभा मालासहस्साई पडिच्छमाणे २, मंजुमंजुणाघोसेणं पडिबुज्नमाणे, भवणपतिसहस्साई समइच्छमाणे २, तंतीतललाल तुडियगीयवाइयरवेणं महुरेणं मणहरे णं जयसद्दघोसविमएणं मंजुमंजणाघोसेणं पडिबुज्झमाणे अप्पडिबुज्झमाणे कंदरगिरि विवरकुहर गिरिवर पासादुड्डघणभवणदेव कुलसिंघाडगतिग चउक्क चच्चर आरामुज्जाणकाणण समप्पवप्पदेसभागे पडिसुयासु सहस्मसंकलं करे ते हयहेसिय हत्थिगुलगुलाइयरहघण घण सद्दमीसएणं महथा कलरवेणं य जणस।। महरेणं परयंते सुगंधवरकुसुमवण्णउविद्धवासरेणुकविलं नभं करेंते कालागुरुकुंद्रुक्कतुरुक्कधूवनिवहेणं जीवलोगमिव वासयंते समंतओ खुभियचक्कवालं पउरजणबालबुड्डपमुइयतुरियपहाविय विउला उलबोलबहुल" दाहिणहत्थेण बहूणं णरणारी सहस्साणं अजलि माला सहस्साई पडिच्छमाणे २. मंजुमंजणा घोसेण पडिबुज्ञमाणे, भवणपति सहस्साई समइच्छमाणे २, तंतीतलताल तुडियगीय वाह यरवेणं महुरेण मणहरेण जयसद्दघोस विसरणं मंजुमंजुणा घोसेण पडिबुज्झमाणे अपडि. बुज्झमाणे कंदर गिरिविवर कुहर गिरिवर पासादुडुधणभवण देवकुल सिंघाडगतिगचउक्क बच्चर आरामुज्जाण काणण समापवप्प देसभागे पडिसुयाय सहस्स संकुल करें ते हयहेसिय हस्थि गुलगुलाईय रहधणधणसद्दमीसपणं महयाकलवरेणं य जणत्स महरेण पूरयंते सुगन्धवर कुसुम चुण्ण उधिद्धिवासरेणुकविलं नम करे ते कालागुरु कुदरुक्क तुरुक्क घव निवहेणं जीवलोममिव वासयंते समंतओ खुभिय चक्कवाल पउदजण बाल. वुड पमुइयतुरिय पहाविय विजलाउलबोलबहुलं " मा पाइने २५टा अमे 'मोषा Page #367 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ३९ ऋषभस्वामिनः त्रिजगज्जनपूजनीयता प्ररूपणम् ३५३ प्रपाप्रदेशभागात् प्रतिश्रुतशतसहस्रसंकुलान् कुर्वन्, हय हेषित गजगुलगुलायित रथघनघनशब्दमिश्रितेन महता कलरवेण च जनस्य मधुरेण पूरयन् सुगन्धवरकुसुमचूर्णोंविद्धवासरेणुकपिलं नमः कुर्वन, कालागुरुकुन्दुरुष्कतुरुष्फधृपनिवहेन जीवलोकमिव बासयन् समन्ततः क्षुभितचक्रवालं प्रचुरजनबालवृद्धप्रमुदितत्वरितप्रधावितविपुलाकुलबोलबहुलम्' इति । 'आकुलबोलबहुलं' नभः कुर्वन् विनीताया राजधान्यामध्यमध्येन निर्गच्छति' इति तु सूत्रे प्रोक्तमेव । अर्थस्तु औपपातिकसूत्रस्य मत्कृतपीयूषवर्षिणी टीकातोऽवगन्तव्यः । नवरं विनीतायाः अयोध्याया इति । तथा 'आसियसम्मज्जियसित्तसुइकपुप्फोवयारकलियं' आसिक्तसम्मार्जितसिक्तं शुचिकपुष्पोपचारकलितम्-आसिक्तम्ईषत्सितं सुगन्धिजलेन, ततः सम्मार्जितम्-अपनीतकचवरम्, सिक्त-सुगन्धितजलेन सम्यक् प्रक्षालितम्, अतएव शुचिकं-शुद्धं, ततः पुप्पपुञ्जोपचारकलितं-पुप्पपुजेन कृतो य उपचार:-उपचरणं शोभेति यावत् तेन कलितं युक्त 'सिद्धत्थ वणविउलरायमग्गं' सिद्धार्थवनविपुलराजमार्ग सिद्धार्थवनोद्यानगामिराजमार्ग 'करेमाणे' कुर्वन्, तथा 'हयगयरहपहकरेण' हयगजरथप्रकरण-हयगजरथसमूहेन 'पाइक्कचडकरेण' पदाति चटकरेण= पदाति समृहेन च 'मंद मंद' मन्द मन्दं यथा स्यात्तथा उद्धयरेणुयं' उद्धजरेणुकम्-उड्डीइस पाठ का स्पष्टार्थ हमने उसी औपपातिक सूत्र की पीयूषवर्षिणी टीका में लिखा हैं सो वहीं से इसे जान लेना चाहिये, उस समय "आसियसम्मज्जियसित्तसुइक पुप्फोबयारकलियं सिद्धत्थवणविउलरायमग्गं" सिद्धार्थवन उद्यान की ओर जाने वाला रास्ता सुगन्धित जल से सिक्त करवा दिया गया फिर उसे बुहारु आदि से झाड़कर साफ सुथरा करवाया गया, कूडा कचरा वहां से हटवा कर उसे दूर फिकवाया गया, पुनः सुगन्धित जल उस पर छिड़का गया, इससे वह पहले की अपेक्षा और अधिक शुद्ध हो गया था, फिर जगह २ उस पर पुष्पों द्वारा शोभा की गई थी, 'करेमाणे हय गय रहपहकरेण पाइक चडकरेण य" इस तरह जिनके प्रभाव से वह सिद्धार्थवनोद्यानगामी राजमार्ग शुद्ध, साफ और अलंकृत किया गया है ऐसे बे आदिजिन शिबिका में विराजमान हुए, हय और गज समुदाय के साथ २ एवं पैदल चलने वाले सैनिक 'તિક સૂત્રની પીયૂષ વર્ષિણી ટીકામાં કર્યો છે તે જિજ્ઞાસુ જનેએ ત્યાંથી જ જાણી લે ४. ते मते 'आसियसम्मज्जियसित्तसुइक पुप्फोवयारकलियं सिद्धत्थवविउलरायमगं' સિદ્ધાર્થ વન તરફ જનાર માર્ગને પહેલાં સુગન્ધિત જલ વડે સિકત કરવામાં આવ્યો અને ત્યાર બાદ સાવરણી વગેરેથી, કચરે સાફ કરવામાં આવ્યું હતું. જે ત્યાંથી લઈ લેવામાં આવ્યા હતા. અને છેવટે ફરી બીજી વાર તે માર્ગને સુગંધિત જલ વડે સિક્ત કરવામાં આવ્યો હતો. એથી તે માર્ગ પહેલાં કરતાં વધારે શુદ્ધ થઈ ગયા હતા, અને ત્યાર બાદ ते भाग ५२४४-४ पुष १ मा ४२वामा भावी रुती. 'करेमाणे हयगयरहपहक रेश पाइक्क चड करेणय' मा प्रमाणे मना प्रमाथी त सिद्धार्थ वनाधान भी शर માર્ગ શુદ્ધ. સાફ અને અલંકૃત કરવામાં આવેલ છે, આવા ત આદિ જિન આરૂઢ થયા અને ત્યાર બાદ હય અને ગજ તેમજ પાયદળથી પરિવેષ્ટિત થઈને તે Page #368 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -३५४ । जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे यमानरेणुयुक्त 'करेमाणे' कुर्वन् 'जेणेव सिद्धत्थवणे उज्जाणे' यत्रैव सिद्धार्थवनं उद्यानं, 'जेणेव' यत्रैव 'असोगवरपायवे' अशोकवरपादपः 'तेणेव उवागच्छइ', तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'असोगवरपायवस्स' अशोक वरपादपस्य, 'अहे' अधः अधोभागे 'सीयं ठावेइ' शिबिकां स्थापयति, 'ठावित्ता सीयाओ पच्चोरुहइ' स्थापयित्वा शिविकातः प्रत्यवरोहति-अवतरति 'पच्चौरुहित्ता' प्रत्यवरुह्य 'सयमेवाभरणालंकारं' स्वयमेव आभरणालङ्कारम्-आभरणानि च अलङ्काराश्चेति समाहारस्तत्, 'ओमुयइ' अवमुश्चतिपरित्यजति, 'ओमुइत्ता' अवमुच्य-धरित्यज्य 'सयमेव' स्वयमेव 'अट्ठाहिं' आस्थाभिः श्रद्धान्वितोभूत्वा 'चउहिं' चतसृभिः 'मुट्ठिहिं' मुष्टिभिः करणभूताभिः लोयं' लोच केशापनयनं 'करेइ करोति । अन्यतीर्थकराणां साधूनां पञ्चभिर्मुष्टिर्मिलोच इति यदुक्तं, तत्रेयं वृद्धपरम्परा-भगवानृषभ स्वामी प्रथममेकया मुष्टया श्मश्रुकूर्चयोर्लोचमकरोत् । ततस्तिसमूह के साथ २ घिरे हुए होकर जा रहे थे “मंदं मंदं उद्धतरेणुय करेमाणे करेमाणे जेणेव सिद्धत्थवणे उज्जाणे जेणेव असोगवरपायवे तेणेव उवागच्छइ" उस मार्ग पर उस समय हय और गज समुदाय के पैरों के आघात से एवं पैदल चलने वाले सैन्य समूह के पदों के आघात से जमीन में जमी हुई धूलि धीरे २ से निकलकर मन्द मन्द रूप में उड़ती हुई नजर आती थी सिद्धार्थवनोद्यान के आते ही और उसमें भी जहां अशोक नाम का वर पादप था "आगच्छित्ता असोगवरपायवस्स अहे सीयं ठावेइ" वहां पहुंचते ही उसके नीचे प्रभु की पालकी खड़ी हो गई "ठावित्ता सौयाओ पच्चोरुहइ" पालखी नीचे रखते ही प्रभु उस शिबिका से बाहर आगये, "पच्चोरुहित्ता सयमेवाभरणा लंकार मोमुयई" बाहर आते ही प्रभु ने पहिरे हुए आभरणों को एवं अलंकारों को अपने शरीर ऊपर से उतार दिया, “ओमुइत्ता सयमेव चउहिं अट्टाहिं लोयं करेइ" उतार कर उन्होंने श्रद्धायुक्त होकर चार मुष्टियों से केशों का लुञ्चन किया, अन्य तीर्थंकरो ने साधु अवस्था धारण करने पर पांच मुष्टियों से लोच किया है ऐसा जो कहा है सो इस सम्बन्ध में वृद्धपरंपरा ऐसी है कि भगवान् ऋषभ स्वामी ने प्रथम एक मुष्टि से मछ और दाढो के बालों शसभा ५२ व्याख्या ते मते 'मंद मंद उद्धतरेणुयं करेमाणे करेमाणे जेणेव सिखत्थवणे उज्जोणे जेणेव असोगवरपायवे तेणेव उवागच्छइ' &य, 7 अने पायन यातया તે માર્ગની જલ વડે સિક્ત થયેલી ભૂમિની ધૂલિ ધીરે ધીરે-મન્દ મન્દ રૂપમાં ઉડવા લાગી આ રીતે સિદ્ધાર્થવદ્યાન અને તેમાં પણ જ્યાં અશોક નામક વર પાદપડતુ ત્યાં તેઓ माल्या. त्यां 'आगच्छित्ता असोयवरपायवस्स अहे सीयं ठवेइ' पडindi नी नीये प्रभुनी शिम अभी २४ी. 'ठावित्ता सीयाओ पच्चीरुहइ' शिमनीय भूतir प्रभु तेमांथी बार साव्य.. 'पच्चोरुहित्ता सयमेवाभरणालंकारं ओमुयई' महार मातin प्रय परे मातभरी भरीने पोताना शरी२ ५२था तार्या अन् 'ओमहत्ता सयमेव चउहिं अट्ठाहिं लोयं करेइ' त्यार माह तभणे श्रद्धा पूर्व यार मुष्टिया पस લંચન કર્યું, બીજા તીર્થકરો એ સાધુ-અવસ્થા ધારણ કર્યા બાદ પાંચ મુષ્ટિએ વડે કેશનું લંચન કર્યું હતું, એવું જે કહેવામાં આવ્યું છે, તે આ સંબંધમાં વૃદ્ધ પરંપરા એવી Page #369 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कार सू. ३९ ऋषभस्वाणिनः त्रिजगज्जनपूजनीयताप्ररूपणम् ३५५ सृभिसृष्टिभिः शिरस्थकेशान् यावत् लुश्चति तावदिन्द्रोऽवशिष्यमाणामेकां मुष्टिं पवनान्दोलितां कनकावदातयोः प्रभुस्कन्धयोरुपरिलुठन्ती मारकतीं धुतिमाबिभ्रतीं परमरमणीयां वीक्ष्य परमानन्दरससमप्लाव्यमानहृदयः शिरसाऽञ्जलिं बद्ध्वा एवमवादीत् भगवन् ! इमां केशमुष्टिमेव रक्षतु भदन्तो मय्यनुगृह्येति । एवं शक्रेणोक्तो भगवान् तां केशमुष्टिं तथैव रक्षितवान् । महान्तो हि एकान्तभक्तिमतां प्रार्थनां चेद्विघटयन्तीति तेषां स्वभावसिद्धो उगवहारः। लुश्चितांश्च तान् केशान् शक्रो हंसचित्रचित्रते वस्त्रे निधाय, एवं लोचं 'करित्ता कृत्वा 'देविंदे देवराया भगवं सदोरयमुहपत्तिं रयहरणं, गोच्छगं, पडिग्गहं देवदूसं वत्थं पडिच्छइ' देवेन्द्रो देवराजः भगवते सदोरकमुखवस्त्रिकां, रजोहरण गोच्छकं, पात्रं देवदृष्यवस्त्रं च प्रयच्छति 'अपाणएणं' अपानकेन-निर्जलेन 'छ?णं भत्तेणं' षष्ठेन भक्तेनउपवासद्वयरूपेण युक्तः, 'आसाढाहि' आषाढाभिः उत्तराषाढाभिः 'णक्खत्तेणं' नक्षत्रेण सह 'जोगमुवागएणं' योगमुपागते चन्द्रे खलु 'उग्गाणं' उग्राणां स्वद्वारा आरक्षकत्वेन का लोच किया, तीन मुष्टियों से शिर के बालों का लोच किया, इतने में वाकी बची हुई एक मुष्टि को जो कि पवन के झोकों से हिल रही थी और कनक के जैसे अवदात प्रभु स्कन्धों के ऊपर लोट रही थी तथा देखने में जो मरकतमणि की जैसी कन्ति वाली थी. परमरमणीय देखकर आनन्दरस के प्रवाह से जिसका अन्तः कारण हिलोरे ले रहा है ऐसे इन्द्र ने दोनों हाथ जोड़कर प्रभु से ऐसी प्रार्थना की कि हे भगवन् इस केशमुष्टि को मेरे ऊपर अनुयह करके आप रहने दें इसे न उस्खाड़ें, प्रभुने इन्द्र की इस प्रार्थना से उस केशमुष्टि को वैसी वैसी रहने दी, जो महान् पुरुष हुआ करते हैं वे एकान्तभक्तिवाले पुरुषों की प्रार्थना को विहूनी नहीं करते हैं ऐसा उनका स्वभाव सिद्ध व्यवहार हुआ करता है, लुञ्चित हुए उन केशों को शकने हंसचित्र से विचित्र वस्त्र में रखकर क्षीरसागर में निक्षिप्त कर दिया, "करित्ता छटेणं भत्तेणं अपाणएणं आसाढाहिं णक्वत्तेण जोगमुवाएण उग्गाण भोगाणं राइन्नाणं खत्तियाण चउहिं सहस्सेहिं सद्धिं एगं देव दूसमादाय मुंडे છે કે ભગવાન રાષભ સ્વામીએ પ્રથમ એક મુષ્ટિ વડે મૂછ અને દાઢીના વાળનું લંચન કર્યું ત્રણ મુષ્ટિએ વડે માથાના વાળનું લંચન કર્યું. એના પછી બાકીની એક મુષ્ટિ કે જે પવનના ઝોકાથી હાલી રહી હતી. અને કનકના જેવા અવદાત પ્રભુના સ્કર્ધ પર આળોટી રહી હતી તેમજ જોવામાં જે મક્તમણિ સદશ કાંતિવાળી હતી, પરમરમણીય તે દશ્યને જઈને આનંદ રસના પ્રવાહમાં જેનું અન્તઃકરણ તરબળ થઈ રહ્યું છે એવા ઈન્દ્ર બને હાથ જોડીને પ્રભુને પ્રાર્થના કરી કે હે ભગવન્! મારા ઉપર અનુગ્રહ કરીને આ કેશ મુષ્ટિને આપ હવે રહેવા દો. હવે લંચન કરી નહિ. પ્રભુએ ઈન્દ્રની પ્રાર્થનાને સાંભળ કેશમુષ્ટિને તે પ્રમાણે જ રહેવા દીધી જે મહાન પુરુષો હોય છે તે એકાંત ભક્તિવાળા પુરુષોની પ્રાર્થનાને અવીકાર કરતા નથી. એ તેમને સ્વભાવ હોય છે. લુચિત થયેલા તે વાળને શકે હંસ ચિત્રથી ચિત્રિત થયેલા વસ્ત્રમાં મૂકીને ક્ષીર સાગરમાં નિક્ષિત ४श होया. 'करित्ता छठेणं भत्तेणं अपाणपणं आसाढाहिं णक्खत्तण जोगमुवागरण उग्गाणं भोगाणं राइन्नाथ खत्तियाण चउहिं सहस्सेहिं सद्धि पग देवदूसमादाय मुंडे भवित्ता Page #370 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिस्त्रे नियुक्तानां, 'भोगाणं' भोगानां गुरुत्वेन व्यवस्थापितानां, 'राइनाणं' राजन्यानां वयस्यत्वेन स्वीकृतानां 'खत्तियाणं' क्षत्रियाणां प्रजानां रक्षणार्थ नियुक्तानां 'चउहिं सहस्सेहि सद्धिं एगं देवदृसं' चतुर्भिः सहस्रः सह एकं देवदृष्यं दिव्यं वस्त्रम् 'आदाय' आदायगृहीत्वा-परिधायेत्यर्थः, "मुंडे भवित्ता अगाराओ' मुण्डो भूत्वा अगारात अगारं-गृह परित्यज्य, 'अणगारियं' अनगारिताम्-अगारं गृहं, तदस्यास्तीति अगारी-गृहस्थः, न अगारी अनगारी साधुः, तस्य भावस्तत्ता-साधुत्वं, 'पव्ववईए' प्रवजित: प्राप्तः, इति । एतावता भगवान् ऋषभदेवः इन्द्रप्रदत्तसदोरकमुखवस्त्रिकादि धौंपकरणानि गृहीत्वा स्वयं दीक्षितोऽभूत, तदसुसारिणः अन्येऽपि सहस्रचतुष्टयशिष्या इन्द्रप्रदत्तसाधृपकरणादि ग्रहणपूर्वकं स्वयं दीक्षिताः अभवन्, ततश्च तैः सहस्त्रचतुष्टयशिष्यैः सह भगवान् ऋषभदेवः गृहस्थाश्रमं परित्यज्य अनगारितां प्राप्तवान् इति फलितम् ॥९०३९॥ ततो भगवानृषभो यदकरोत्तदाह__ मूलम्-उसमेणं अरहा कोसलिए संवच्छर साहियं चीवरधारी होत्था, तेण परं अचेलए । जप्पभिई च णं उसमे अरहा कोसलिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए तप्पमिइं च णं उसमे अरहा कोसलिए णिच्चं वोसट्ठकाए चियत्तदेहे जे केइ उवसग्गा उप्पज्जंति, तं जहा-दिव्या वा जाव पडिलोमा वा अणुलोमावा । तत्थ पडिलोमा वेत्तेण वा जाव कसेण वा कोए आउटेज्जा, अणुलोमा वंदेज्ज वा जाव पज्जुवासेज्ज वा ते सव्वे सम्मं सहइ जाव अहियासेइ । तएणं से भगवं समणे जाए ईरियासमिए जाव परिट्टावणासमिए मणसमिए वयसमिए कायसमिए भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए" इस प्रकार प्रभु के लोच करने के बाद निर्जल दो उपवास किये; फिर उत्तराषाढानक्षत्र के साथ चन्द्र का योग होने पर अपने द्वारा आरक्षक रूप से नियुक्त किये गये उग्रों की, गुरुरूप से व्यवस्थापित किये गये भोगों की, मित्ररूप से स्वीकृत किये गये राजन्यों की और प्रजाजनों की रक्षा के लिये नियुक्त किये गये क्षत्रियों की चतुः सहस्रो के साथ एक देवदूष्य को ग्रहण कर मुण्डित होकर, गृह का परित्याग कर अनगारि अवस्थाको को धारणा किया ॥३९।। अगोराओ अणगारियं पब्बइए' मा प्रमाणे प्रभु दुयन र्या माह से याविहार वास। કર્યા પછી ઉત્તરાષાઢા નક્ષત્રની સાથે ચન્દ્રના ચોગ થયા ત્યારે પોતાના વડે આરક્ષક' રૂપમાં નિયુક્ત કરવામાં આવેલ ઉગ્રોની, ગુરુરૂપમાં વ્યવસ્થાપિત કરવામાં આવેલ ભેગોની, નિના રૂપમાં સ્વીકૃત કરવામાં આવેલ રાજની અને પ્રજા જનની રક્ષા માટે નિયુક્ત કરવામાં આવેલ ક્ષત્રિની ચતુન્સહસ્ત્રીની સાથે એક દેવદૂષ્યને સ્વીકારીને, મુંડિત થઈને, ઘરને પરિત્યાગ કરીને, અનગારિતા ધારણ કરી સૂત્ર ૩ાા Page #371 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार ऋषभस्वामिनः दीक्षितानन्तरकर्तव्यनिरूपणम् ३५७ मणगुत्ने जाव गुत्तबंभयारी अकोहे जाव अलोहे संते पसंते उवसंते प. रिणिव्वुडे छिण्णसोए निरुवलेवे संखमिव णिरंजणे, जच्चकणगंव जायरूवे आदिरसपडिभागे इव पागडभावे, कुम्मो इव गुतिदिए, पुक्खरपत्तमिव निरुवलेवे गगणमिव निरालंबणे, अणिले इव णिरालए चंदो इव सोमदंसणे, सूरो इव तेयंसो, विहग इव अपडिबद्धगामी, सागरो इवे गं भीरे, मंदरो इब अकंपे पुढधीविव सवफासविसहे, जीवोविव अप्पडिहयगइत्ति ॥सू० ४०॥ छाया-ऋषभः खलु अर्हन् कौशलिकः संवत्सरं साधिकं चीवरधारी अभवत्, ततः परम् अचेलकः । यभृत्प्रति च खलु ऋषभः अर्हन कौशलको मुण्डो भूत्वा अगारात् अनगारितां प्रवजितः, तत्प्रभृति च खलु ऋषभोऽर्हन् कौशलिको नित्य व्युत्सृष्टकायः त्यक्तदेहो, ये केचित् उपसर्गाः उत्पद्यन्ते, तद्यथा दिव्या वा यावत् प्रतिलोमा वा अनुलोमा वा, तत्र प्रतिलोमा वेत्तेण वा यावत् कशेन वा काये आकुट्टयेत्, अनुलोमा वन्देत वा यावत् पयुपासीत वा, तान् सर्वान् सम्यक् सहते यावत् अध्यास्ते । ततः खलु स भगवान् श्रमणो जात ईर्यासमितो यावत् परिष्ठापनिका समितो मनः समितो वाकूसमितः कायसमितो मनो गुप्तो यावद् गुप्तब्रह्मचारी अक्रोधो यावत् अलोभः शान्तः प्रशान्तः उपशान्तः परिनिर्वृतः छिन्न स्रोता निरूपलेपः, शङ्खइव निरज्जनः, जात्यकनकमिव जातरूपः आदर्श प्रतिभागइव प्रकट भावः, कूर्म इव गुप्तेन्द्रियः, पुष्करपत्रमिव निरुपलेपा, गगनमिव निरालम्बनः अनल इव निरालयः चन्द्र इव सौम्यदर्शनः, सूर इस तेजस्वी, विहग इव अप्रतिबद्धगामी, सागर इव गम्भीरः मन्दर इव अकम्पः पृथिवीव सर्व स्पर्श विषहः, जीव इव अप्रति बद्धगति रिति ॥सू० ४०॥ 'उसमेणं' इत्यादि । टीका- 'उसमेणं अरहा कोसलिए संवच्छरं साहियं ऋषभः खलु अर्हन् कौशलिक: संवत्सरं साधिकं किंचिदधिकैक-संवत्सरं यावत् 'चीवरधारी' चीवरधारीवस्त्रधारी 'होत्था' अभवत्, 'तेण परं' ततः परम्-तदन्तरम् 'अचेलए':अचेलकोऽभवत् । 'जप्प दीक्षित हो जाने पर प्रभु ने जो किया उसका कथन इस सूत्र द्वारा सूत्रकार करते हैं-"उसभेणं अरहा कोसलिए संवच्छरं साहियं" इत्यादि । टीकार्थ-"उसमेणं अरहा कोसलिए संक्च्छरं साहियं चीवरधारी होत्था" उन कोशलिक ऋषभ अर्हन्त ने कुछ अधिक एक वर्ष तक वस्त्र धारण किया. "तेण परं अचेलए" इसके बाद वे દીક્ષા ગ્રહણ કર્યા પછી પ્રભુ એ જે કર્યું તેનું કથન સૂત્રકાર આ સૂત્ર વડે કરે છે– टी -'उसमेणं अरहा कोसलिए संवच्छरं साहियं चीवरधारी होत्था' ते औशविर अपना महत ४४ क्यारे मे४ वर्ष पर्यन्त वस्त्रधारी २घा. 'तेण पर अचेलए' ते Page #372 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३५८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे भिई च णं' यत्प्रभृति-यत्समयादारम्य च खलु 'उसमे अरहा' ऋषभोऽहन् 'कोसलिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए' कौशलिको मुण्डो भूत्वाऽगारात अनगारितां प्रव्रजितः, 'तप्पभिइ च ण' तत्प्रभृति तत्समयादारभ्य च खलु 'उसमे अरहा कोसलिए णिच्चं' ऋषभोऽर्हन् कौशलिको नित्यं सर्वदा 'वोसट्टकाए' व्युत्सृष्टकायः व्युत्सृष्टः शरीरसंस्कारपरित्यागात् विसर्जितः काय:-शरीरं येन तथाभूत - शरीरसंस्कारपरिवर्जित इत्यर्थः, तथा 'चियत्त-देहे' त्यक्तदेहः त्यक्तः परिषहसहनात् उज्झित इव देहो येन स तथा शरीर ममत्व रहित इत्यर्थः, एतादृशः सन् सर्वान् उपसर्गान् सम्यक् सहते यावत् अध्यास्ते इति परेणान्वयः। एतदेवाह-'जे केइ उपसग्गा' ये केचित् उपसर्गाः-उपद्रवा 'उप्पज्जति उत्पद्यन्ते 'तं जहा' तद्यथा 'दिवा' दिव्याः दिवि भवाः-देवसम्बन्धिन इत्यर्थः, 'वा' शब्दो विकल्पार्थे, 'जाव' यावत्-यावत्पदेन-'माणुसा वा तिरिक्ख जोणिया वा' मानुषा वा तैर्यग्योनिका वा इति संग्राह्यम्, तत्र मानुषाः मनुष्यसम्बन्धिनः, तैर्यग्योनिका: तिर्यग्योनिसम्बिन्धिनो वा 'पडिलोमा वा' प्रतिकूलाः विरुद्धा वा 'अणुलोमावा' अनुकूलाः अविरुद्धा वा । 'तत्थ' तत्र तयोर्मध्ये 'पडिलोमा' प्रतिलोमा उपसर्गाः 'वेत्तेण' वेत्रेण वेत्रलतादण्डेन, 'जाव' यावत्-यावत्पदेन "तयाए वा छियाए अचेलक हो गये, "जप्पभिई च णं उसमे अरहा कोसलिए मुंडे भवित्ता अगारओ अणगारियं पव्वइए" जिस समय से कौलिक ऋषम अर्हन्त मुण्डित होकर अगार अवस्था को त्याग कर अनगार अवस्था में आये, “तप्पभिई च णं उसमे अरहा कोसलिए णिच्चं वोसट्टकाए चियत्त देहेजे केर उखसम्गा उपपज्जंति" तबसे उन्होंने अपने शरीर का संस्कार (श्रंगार) करना छोड दिया, वे त्यक्तदेह परीषहों के सहन करने से छोड़ दिये शरीर के जैसे हो गये-शरीर के महत्व हीन हो गये, "तं जहा दिव्वा वा जाव पडिलोमा वा अणुलोमा वा" जो भी कोई उपसर्ग-उपद्रव उनके ऊपर आता चाहे वह देवों द्वारा किया गया होता यावत् मनुष्यकृत या तिर्यचकृत होता वे उसे अच्छी तरह से सहन करते थे । यहां "वा" शब्द विकल्पार्थक है. "तत्थ पडिलोमा वेत्तेण वा जाव कसेण वा काए आउद्देज्जा" इन उपसर्गों में यदि कोई उपसर्ग उनके विरुद्ध होता जैसे-यदि कोई उन्हें बेंत से पीटता, वृक्ष की छाल से निर्मित रस्सी से कठिन चाबुक से पीटता, या चिकनी कशा से पोटता, लता दण्ड से उन्हें मारता, केश-चमड़े के कोडे से उन्हें मारता तो उसे भी ये बड़े शान्तभावों से सहन करते थे । "अणुलोमा वंदेज वा जाव पज्जवापछी तमा श्री अये मना गया. 'जप्पभिई च ण उसमे अरहा कोसलिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पब्बइप' न्यारथी शeिs *मनाथ मत भुत थने ॥२ अवस्थाना त्याग ४शमगार अवस्थामा माव्या. 'तप्पभिई च ण उसमे अरहा कोसलिए णिच्च वोसहकार चियत्तदेहे जे केइ उपसग्गा उपपजति' त्यारथी तास पाताना शरीरना સરકાર (ગ્નગાર) કરવાનું છેડી દીધું; તેઓ ત્યકત દેહ એટલેકે પરીષહે સહન કરવાથી ત્યજી हीधे शरीर प्रत्ये ममत्वमा भरे सवामनी गया. 'त जहा दिव्वा वा जाब पडिलोमा वा अणुलोमावा' २ उप-उपद्रव तमा ५२ भावat a या तावा द्वारा કરવામાં આવેલ હોય યાવત્ મનુષ્યકૃત અગર તિર્યંચ દ્વાજૂ કરવામાં આવેલ હોય તે બધાને त। सारीशत सहन ४२ता ता. मी या 'पा श६ qिाथ छे. 'तत्थ पडिलोमा वेत्तेण वा जाव कसेण वा काए आउटेज्जा' AL Guan पैी ने तमनाया Page #373 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार ऋषभस्वामिनः दीक्षितानन्तरकर्तव्यनिरूपणम् ३५९ वा लयाए वा" त्वचा वा श्लक्ष्णकषेण वा लतया वा इति संग्राह्यम्, तत्र त्वचा शणाणि वृक्षत्वग्निर्मितया कशया वा 'छियाए'-'छिया' शब्दः श्लक्ष्ण कशाथै देशीशब्दः, ततश्च लक्ष्णकशेन चिक्कणकशया वा लतया लतादण्डेन वा, 'कसेण' कशेन चर्मयष्ठया वा, 'काए' काये शरीरे 'आउटेज्जा' अकुट्टयेत् ताडयेदिति । तथा-'अणुलोमा' अनुलोमा उपसर्गाः वंदेज्ज' वन्देत अभिवादयेद् वा 'जाव' यावत् यावत्पदेन-'पूएज्ज वा सक्कारेज्ज वा सम्माणेज्ज वा कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं' पूजयेद् वा सत्कारयेद् वा सम्मानयेद् वा कल्याणं मङ्गलं दैवतं चैत्यम्' इति । तत्र-पूजयेत् वा सद्वचनैः, सत्कारयेद् वा वस्त्रादिना, सम्मानयेद् वा अभ्युत्थानादिना मगलं मङ्गलस्वरूपः, दैवतं देवस्वरूपः, चैत्यं ज्ञानस्वरूपः, इति धिया 'पज्जुवासेज्ज' पयुपासोत पयुपासनां कुर्याद वा, 'ते सव्वे' तान् द्विविधानप्युपसर्गान् स भगवान् ‘सम्म' सम्यक् -याथातथ्येन 'सहइ' सहते भयाकरणेन, निर्भयेनेत्यर्थः 'जाव' यावत् यावत्पदेन 'खमइ तितिक्खई' क्षमते तितिक्षते-इति संग्राह्यम् तत्र क्षमते क्रोधाभावेन, तितिक्षते देन्याकरणेन 'अहियासेइ' अध्यास्ते-अविचलतयेति । 'तएणं से भगवं समणे जाए' ततः खलु स भगवान् ऋषभः श्रमणो जातः । सेज वा" इसी तरह यदि उनके ऊपर अनुकूल उपसर्ग आते-जैसे-कोई उनकी वंदना करता, यावत् कोई उनकी पूजा - सवचनों से स्तुति करता, सत्कार-वस्त्रादि प्रदान कर या खड़े होकर उनके प्रति अपनी भक्तिप्रकट करता, उनका सम्मान करता-हाथ जोड़कर उनका आदर करता, इस बुद्धि से कि ये मंगल स्वरूप हैं, देवस्वरूप हैं और ज्ञान स्वरूप हैं यदि कोई उनकी पर्युपासना करता तो उस स्थिति में ये हर्षभाव युक्त नहीं होते "ते सव्वे सम्म सहइ नाव अहियासेइ" इस तरह ये भगवान् श्रीआदिनाथ भूप्र इन प्रतिकूल परीषह और उपसर्गों को अच्छी तरह से रागद्वेष परिणति उत्पन्न हुए विना-सहन करते थे. यहां यावत्पद से “खमइ तितिक्खइ" इन पदों का ग्रहण हुआ हैं. इन पदो से यह प्रकट किया गया है-कि इन क्षुदादि परीषहादिको के વિરૂદ્ધ હોય જેમકે-જે કદાચ કોઈ તેમને નેતરથી મારતું અથવા વૃક્ષની છાલથી બનાવેલ દોરાથી કે કાર ચાબકથી તેમને મારતું અથવા ચીકણા કશા-ચાબુકથી મારતું લતા દંડથી તેમને મારતા ચા મડાના ચાબુકથી તેમને મારતા તે તેને પણ એઓ અત્યંત શાંત ભાવથી सहन ४२ता ता. 'अणुलोमा वंदेज्जवा जाव पज्जुवासेजवा' से प्रभारी ने तभनी ०५२ અનુકૂળ ઉપસર્ગ અવે જેમકે કે તેમને વંદના કરતું યાવત્ કઈ તેમની પૂજા કરતું અર્થાત સદ્ધચનથી સ્તુતિ કરતું સત્કાર–વસ્ત્રાદિ પ્રદાન કરીને અગર ઉભા રહીને તેમના પ્રત્યે પોતાની ભકિતભાવ બતાવતું તેમનું સન્માન કરતું હાથ જોડીને તેમના જ કે તેઓ મંગલસ્વરૂપ છે. દેવસ્વરૂપ છે, અને જ્ઞાન સ્વરૂપ છે જે કઈ તેમની પર્યું પાસના ४२तु तो स्थितिम तापन्वित यता न ता. 'ते सव्वे सम्म सहइ जाव अहियासेह' આ રીતે એ ભગવાન શ્રી આદિનાથ પ્રભુ આવા પ્રતિકૂળ અનુકૂળ પરીષહ અને ઉપસર્ગોને सारी शत-भेट रागद्वेष २डित छन-सन ४२ता ता. मी यावत् ५४थी "खमा तितिक्खई" मा ५हानुहुए थयु छ. ये पोथी ये ४८ ४२पामा मावत छ । परीपा Page #374 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३६० जम्बूद्वीपप्रतिमा कोशः श्रमणो जातः ? इत्याह -'ईरिया समिए' इत्यादि । तत्र 'ईरियासमिए' ईर्यासमितः-ईरणम् ईर्याव्रतिगमनं, तत्र समितः सम्यगेकीभावेन रागद्वेषराहित्येन ना इतः प्रवृत्तः, 'जाव' यावत्-यावत्पदेन-"भासासमिए, एसणासमिए, आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिए, उच्चारपासवणखेलजल्लसिंधाण" इति संग्राह्यम्, 'परिद्वावणासमिए' इति मूलोक्तेन पदांशेन सह “उच्चारादि सिंघाणान्त' पदांशस्य सम्बन्धः । छाया तुभाषासमितः, एषणासमितः, आदानभाण्डमात्रनिक्षेपणासमितः, उच्चारप्रस्रवणखेलजल्लशिडाणपरिष्ठापनिकासमितः इति । तत्र-भाषासमितः भाषणं भाषावचनं तस्यां समित कार्कश्यादि रहित हितमितस्फोत्तमृदुवचनं यथा स्यात्तथा प्रवृत्तः, तथा एषणासमितः एषणा=गवेषणा ग्रहणैषणा परिभोगेषणादिलक्षणा, समितः, तत्र समितः-सम्यक् प्रकारेण यथास्थात्तथा प्रवृत्तः,सोपयोगं नवकोटिविशुद्धभिक्षाग्रहणशील इत्यर्थः,तथा-आदानभाण्ड सहन करने में इन्हें क्रोध का अभाव रहता था और दीनता का अभाव रहता था, ये तो अविचल भाव से ही इन्हें सहते थे, "तएणं से भगवं समणे जाए ईरियासमिए" ये ऋषभ ऐसे श्रमण बनें कि ये ईर्यापमिति के पालन में, “जाव" यावत्-भाषासमिति के पालन में, एषणासमिति के पालन में, "परिट्ठावणासमिए" आदान भाण्डमात्रनिक्षेपणा समिति के पालन में और उच्चार प्रस्रवणखेल जल्लशिवाणपरिष्ठापनि का समिति के पालन में रागद्वेष से रहित परिणति से प्रवृत्त रहे, अतिगमन का नाम ईर्या है. इस ईयों में जो एकीभाव से अथवा रागद्वेषरहितता से प्रवृत्त होना है वह ईर्या समिति है. ईर्यासमिति का पालन है, कार्कश्य आदि से रहित हित, मित, स्फीत, मृदुवचन का बोलना भाषासमिति है, भाषासमिति का पालना है, ग्रहणैषणा परिभोगैषणादिरूप गवेषणा में जो उपयोग पूर्वक नवकोटि विशुद्ध भिक्षा का ग्रहण होना एषणासमिति है एषणासमिति का पालन हैं, भाण्ड - वस्त्रादि उपकरण का मात्र-पात्र का जो आदान ग्रहण करना દિકને સહન કરતી વખતે એમાં- ક્રોધને અભાવ રહેતું હતું. અને દીનતાને અભાવરહે हता. मेरा तो 'अध्यास्ते' भेट भवियस साक्षी से सब पशेषडान सहन ४२ता सत. 'तएण से भगवं समणे जाए इरियासमिए' मेषम सेवा श्रमाय मन्या र्या अभि. तिना पानभा यावत् भाषा समितिना पालनमा, अषय। समितिना पासन भां, 'परिद्वाषणा મિક આદાન ભાંડ માત્ર નિક્ષેપણ સમિતિના પાલનમાં અને ઉચ્ચાર પ્રસવણું ખેલજ - શિઘાણપરિષ્ઠાપનિકા સમિતિના પાલનમાં રાગદ્વેષથી વિહીન પરિણતિથી એઓ પ્રવૃત્ત રહ્યા. વતિગમનનું નામ ઈર્યા છે. આ ઈર્યોમાં જે એકી ભાવથી અથવા રાગદ્વેષ રહિત થઈને પ્રવૃત્ત હોય છે, તે ઈર્ષા સમિત છે. એટલે કે ઈર્ષા સમિતિનું પાલન છે. કાર્કશ્ય વગેરેથી રહિત હિત, મિત, ફીત મૃદુ વચન બોલવું ભાષા સમિત છે. એટલે કે ભાષા સમિતિનું પાલન છે. ગ્રહણષણ પરિભેગષણદિરૂપ ગષણામાં જે ઉપયોગ પૂર્વક નવકટિ વિશુદ્ધ ભિક્ષાનું ગ્રહણ છે, તે ગ્રહણ એષણ સમિત છે, એટલે કે એષણ સમિતિનું પાલન છે. ભાંડ-વસ્ત્રાદિ ઉપકરણનું માત્ર પાત્રનું જે આહાન ગ્રહણ કરવું અને નિક્ષેપણ મૂકવું છે. તેમાં બરાબર Page #375 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका विवक्षस्कार० सू.४० ऋषभस्वामिनः दीक्षितानन्तरकर्तव्यनिरूपणम् ३६१ मात्र निक्षेपणासमितः, आदाने ग्रहणे, भाण्डमात्रयोः भाण्डस्य वस्त्राद्युपकरणस्य मात्रस्य पात्रस्य च निक्षेपणायां रक्षणे च समितः सुप्रत्युपेक्षितसुप्रमार्जितक्रमेण प्रवृत्तः, भाण्डमात्रयोः, मध्यमणिन्यायेन आदाने निक्षेपणायां चान्वयो बोध्य इति । तथा-उच्चारप्रस्रवणखेलजल्लशिवाणपरिष्ठापनिकासमितः, तत्र उच्चारः पुरिषं, प्रस्रवणं मूत्रं, खेल: प्रलेष्मा, जल्लः देहमलं, शिवाणं नासिकामलं तेषां परियुक्तः, तथा- 'मणसमिए' मनः समितः कुशलमनोयोगप्रवर्तकः, 'भाषासमितः' इत्युक्त्वा पुनर्यद् 'वाक्स मितः' इति प्रोक्तं तद् द्वितीयसमितावत्यादरसूचनार्थ करणत्रयशुद्धिसूत्रे संख्यापूरणार्थ च बोध्यमिति । तथा 'कायसमिए' कायसमितः प्रशस्तकाययोगवानित्यर्थः । तथा 'मणगुत्ते' मनोगुप्तः अकुशल मनोयोगनिरोधकः, 'जाव' यावत्-यावत्पदेन-'वाग्गुप्तः कायगुप्तो गुप्तो गुप्तेन्द्रियः, इति संग्राह्यम् । तत्र वारगुप्तः अकुशल वाग्योगनिरोधकः, कायगुप्तः अकुशलकाययोगनिरोधकः, सत्प्रवृत्ति निरोधो गुप्तिरिति समिति गुप्त्योविशेषः, अतएव गुप्तः सर्वथा संवृतः, ततश्च गुप्तेन्द्रियः-गुप्तानि इंद्रियाणि यस्य स एवं निक्षेपण-धरना है उसमे देख भाल कर एवं सुप्रमार्जित कर जो प्रवृत्त होना है वह आदानभाण्डमात्रनिक्षेपणसमिति है इस समिति का पालना है अर्थात् वस्त्रादिकों का और पात्रों का जो भूमि को देखकर और उसे प्रमार्जित कर धरना और देखकरे और प्रमार्जित कर उनका उठाना यही आदानभाण्डमात्रनिक्षेषणा समित है इस समित्ति का पालना है. उच्चार-पुरीषोत्सर्गकरना, प्रस्त्रवण-पेशाब करना, प्रलेष्मा का डालना, जल्ल-देह मैलका प्रक्षेपण करना, शिवाण-नाकछिकना इत्यादि रूप परिष्ठापनिका में जो समित होना है, वह उच्चार प्रस्रवण खेलजल्लशिवाण परिष्ठापनिका समिति है, इस समिति का पालना है, इसका तात्पर्य यही है कि निर्जन्तु स्थान में मल मूत्रादि का त्याग करना सो उच्चारप्रश्रवणादिरूप समिति का पालन है, इसी तरह से वे भगवान् श्री आदिनाथ प्रभु "मणसमिए, वयसमिए, कायसमिए, मणगुत्ते, जाव गुत्तबंभयारी अकोहे जाव अलोहे संते पसंते उवसंते परिणिव्वुडे, छिण्णसोए, णिरुवलेवे, જોઈને તેમ જ સપ્રમાજિત કરી જે પ્રવૃત્ત હોય છે. તે આદાન ભાંડ માત્ર નિક્ષેપણ સમિત છે. એટલેકે તે આદાન ભાડે માત્ર નિક્ષેપણ સમિતિનું પાલન છે. તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે વસ્ત્ર દિકે અને પાત્રોને ભૂમિને જોઈને અને તેને પ્રમાજિત કરીને મૂકવાં તેમ જ જોઈ ને અને પ્રમાર્જિત કરીને તે વસ્ત્રાદિકે અને પાત્રોને ઉઠાવવાં એ જ આદાન ભાંડમાત્રનિપેક્ષણ સમિત છે. એ સમિતિનું પાલન છે. ઉચ્ચાર–પુરષોત્સર્ગ કરે. પ્રસવણલઘુશંકા કરવી, લેમ્પ (કફ) નાંખ જલ-દેહ-મલનું પ્રક્ષેપણ કરવું, સિંધાણ–છીંક ખાવી ઈત્યાદિર્ગ પરિઝાપનિકામાં જે સમિત હોય છે તે ઉચ્ચાર પ્રસવણ ખેલ જલશિંઘાણ પરિષ્ઠાપનિકા સમિત છે, આ સમિતિનું પાલન છે. આનું તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે નિર્જનસ્થાનમાં મલ મૂત્રાદિને ત્યાગ કરે તે ઉચ્ચાર પ્રસવણદિ રૂપ સમિતિનું પાલન छ. मा प्रमाणे ते माहिनाथ प्रभु "मणसमिए, वयसमिए, कायसमिए, मणगुत्त जाव, गुत्त बभयारी अकोहे जाब अलोहे संते पसंते उवसंते परिणिन्बुडे, छिण्णसोए, णिरुबलेवे, Page #376 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तथा जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे - इन्द्रियविषयेषु शब्दादिषु रागद्वेषराहित्येन प्रवृत्त इत्यर्थः । तथा 'गुत्तबंभ - यारी' गुप्तब्रह्मचारी - गुप्तं वसत्यादिभिर्गुप्तिभिः प्रयत्नपूर्वकं रक्षितं यद् ब्रह्म मैथुनविरमणलक्षणं, तेन चरतीत्येवं शील:- ब्रह्मचर्यरक्षणे सततप्रवृत्त इत्यर्थः, तथा - 'अकोहे' अक्रोधः क्रोधवर्जितः, 'जाव' यावत् - यावत्पदेन - 'अमाणे अमाए' अमानः अमायः इति पद द्वयं संग्राह्यम् । ततश्च मानवर्जितो मायावर्जितश्चेत्यर्थः, तथा 'अलोहे' अलोभः लोभवर्जितः क्रोधादिराहित्यं स्थूलक्रोधाद्यपेक्षया बोध्यम् । सूक्ष्मक्रोधादीनां सूक्ष्म संपरायगुणस्थानपर्यन्तं सद्भावः अतः सूक्ष्मक्रोधादि सत्ता तु तत्काले भगवत असीदेवेति । अत एव 'संते' शान्तः शान्तकायवाग्मनोव्यापारत्वात्, अत एव 'पसंते' प्रशान्तः प्रकर्षेण शान्तियुक्तः, तत एव 'उवसंते' उपशान्तः परीषहोपसर्गप्रादुर्भावेऽपि प्रशान्तियुक्तत्वाद धीरतया तत्सहनशील इत्यर्थः, अतएव 'परिणिव्वुढे' परिनिर्वृतः सकल सन्तापवर्जित - त्वेन शीतलीभूतः, 'छिन्नसोए' छिन्न स्रोताः छिन्नसंसारप्रवाहः, 'छिन्नशोकः' इति च्छायाक्षे - शोकरहित इत्यर्थः तथा 'निरुवलेवे' निरूपलेपः द्रव्यभावमलरहितः, इत्थं संस्खमिव णिरंजणे” मनः समित, वचः समित, कायसमित, मनोगुप्त यावत् गुप्तब्रह्मचारी, क्रोधहीन यावत् लोभ हीन थे, शांत थे, प्रशान्त थे, उपशान्त थे, परिनिर्वृत थे, शोक रहित थे, उपलेप रहित थे; शंख की तरह निरञ्जन थे, यहां जो पांच समितियों से समित होने के बाद मनः समित आदि विशेषणों वाला जो प्रभु को प्रकट किया गया है उसका तात्पर्य ऐसा है कि वे कुशल मनोयोग के प्रवर्तक थे, इससे अशुभ चिन्तवन का उनमें सर्वथा अभाव सूचित किया गया है. धर्मध्यान के ध्यातृत्व की उनमें पुष्टि को गई है । " वचः समित" पद से भाषासमिति में उनको अत्यादरभाव था यह स्पष्ट किया गया है, तथा करणत्रयशुद्धि सूत्र में संख्यापूरण के लिये इन वाक्समित पद का प्रयोग किया गया है । " कायसमितः " ऐसा जो कहा गया है वह र्यापथ समिति में विशेष आदरभाव सूचित करने के लिये कहा गया है. क्यों कि ये प्रशस्त काययोग वाले थे., ये अकुशल मनोयोग के निरोधक थे. इसलिये मनोगुप्त ર संखमिव णिरंजणे” भन: सभित वयः समित, अयसभित मनोगुप्त यावत् गुप्त ब्रह्मचारी, ક્રોધહીન યાવત્ લેભઠ્ઠીન હતા, શાંત હતા, પ્રશાંત હતા, ઉપશાંત હતા, પરિનવ્રુત્ત હતા, શાક વિહીન હતા, ઉપલેપ રહિત હતા, શ`ખની જેમ નિર્જન હતા, અહીં જે પચસમિ તિ વડે સમિત થયા બાદ મન: સમિત વગેરે વિશેષણેાથી યુક્ત પ્રભુને પ્રકટ કરવામાં આવ્યા છે, તેનું તાત્પય આ પ્રમાણે છે કે તેઓ કુશલ મનાયેાગના પ્રવક હતા. એથી અશુભ ચિન્તવનના તેએ શ્રીમાં સંપૂર્ણ રીતે અભાવ સૂચિત કરવામાં આવેલ છે. धर्मध्यानन। ध्यातृत्वनी तेथे श्री मां पुष्टि अवामां भावी छे. "बचः समित" पहथी भाषाસમિતિમાં તેઓ શ્રીના અત્યાદર ભાવ હતા એ વાત સ્પષ્ટ કરવામાં આવી છે. તેમ જ કરણ ત્રય શુદ્ધિ સૂત્રમાં સખ્યા પૂરણ માટે એ વાક્ સમિત પદ્મના પ્રયોગ કરવામાં આવેલ छे. "कायसमितः” मे अहेव आव्यु छे, ते धर्यापथ समितिमा विशेष माहर ભાવ સૂચિત કરવા માટે કહેવામા આવેલ છે. કેમકે તેઓ શ્રી પ્રશસ્તકાયયેાગવાળા હતા, Page #377 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि० वक्षस्कार सू.४० ऋषभस्वामिनः दीक्षितानन्तरकर्तव्यनिरूपणम्३६३ भगवतो वर्णनं सामान्येनाभिधाय सम्प्रति सोपमानं भगवतोवर्णनमाह-'संखमिव' इत्यादि। 'संखमिव णिरंजणे' शङ्ग इव निरजनः निर्गतम् अजनं जीवमालिन्यकरं कर्म यस्मात् स तथा, यथा शङ्कः शुभ्रो भवति तथैव विगतकर्ममलत्वात् स भगवानपि विशुद्धात्मस्वरूप इत्यर्थः मूले 'संखमिव' इत्यत्र मकरोऽलाक्षणिकः, तथा 'जच्च कणगं वा जायरूवे' जात्यकनकमिव-विशुद्ध सुवर्णमिव जातरूपः, जातं रूपं स्वरूपं रागादि कुत्सितद्रव्यविरहाद् यस्य स तथा, यथा-निर्गतमल सुवर्ण सुदर्शनं भवति तथैवासौ रागादि थे, यहां यावत्पद से "वाग्गुप्तः कायगुप्तः गुप्तः गुप्तेन्द्रियः" इन पदों का ग्रहण हुआ है., अकुशलवाग्योग के निरोधक होने से ये वाग्गुप्त, अकुशल काययोग के निरोधक होने से ये कायगुप्त थे, सत्प्रवृत्ति का नाम सामेति है और असत्प्रवृत्ति का निरोध करना गुप्ति है. यही गुप्ति और समिति में मेद है, अतएव ये गुप्त-सर्वथा संवृत्त थे. इसीलिये ये गुप्तेन्द्रिय थे-इन्द्रियों के विषय भूत शब्दादिकों में इनकी रागद्वेष से रहित ही प्रवृत्ति थी. तथा ये गुप्त ब्रह्मचारी थेब्रह्मचर्य महाव्रत के संरक्षण में सदा ९ नौ कोटि से तल्लीत थे, तथा-'अक्रोधः" क्रोध रहित थे. यहां यावत्पद से “अमाणे, अमाए, इन पदों का ग्रहण हुआ है. तथा च-ये मानवर्जित और मायावर्जित थे. "अलोभः" लोभ से रहित थे. क्रोधादि कषायों से रहितता का यह कथन स्थूलक्रोधादि की अपेक्षा से किया गया जानना चाहिये. क्योंकि १० वें सूक्ष्म सांपराय गुणस्थान तक कषाय का सद्भा व सिद्धान्त ने मानो है अतः सूक्ष्म क्रोधादि कषायों की सत्ता तो उस समय प्रभु में थी ही. अत एव ये मन, वचन और काय के व्यापार की शान्ति होने से शान्त थे, प्रशान्त थे प्रकर्षरूप में शान्ति से युक्त थे और यही कारण था कि पहीषह और તેઓ અકુશલ મનેયેગના નિરાધક હતા, એથી જ મને ગુપ્ત હતા. અહીં યાવતુ પદથી पागुप्तः कायगुप्तः, गुप्तः गुप्तेन्द्रियः" मा पनि सघड ४२वामां मारा छे. मशa વાગના નિરોધક હતા તેથી એએ વાગ્યેય હતા અને અકુશલ કાયયોગના નિરોધક હોવાથી કાયગુપ્ત હતા. સપ્રવૃત્તિનું નામ સમિતિ છે. અને અસત્રવૃત્તિને નિરાધ કરો ગુપ્તિ છે. ગુપ્તિ અને સમિતિમાં એ જ ભેદ છે. એથી તેઓ ગુપ્ત સર્વથા સંવૃત્ત હતા. એથી જ એઓ ગુપ્તેન્દ્રિય હતા. ઈન્દ્રિયેના વિષયભૂત શબ્દાદિકે માં એમની રાગદ્વેષવિહીન પ્રવૃત્તિ જ હતી, તેમજ એઓ ગુપ્ત બ્રહ્મચારી હતા બદ્રાચર્ય મહાવ્રતના સંરક્ષણમાં સર્વદા मेमो टीथी तीन ता. तभ४ 'अक्रोधः' ओध विहान हता. मी यावत् ५४थी 'अमाणे, अमाए' ये पहे। अहएरायछे. तेभल मे। भानपति भने भाया पनित ता. 'अलोभः' बाम २हित त सही-धादि षाय विडीन या समयी ४थन સ્કૂલ-ક્રોધાદિની અપેક્ષાએ કરવામાં આવેલ છે. કેમકે ૧૦ મા સૂક્ષમ સાંપરાય ગુણસ્થાન સુધી કષાયને સદ્ભાવ સિદ્ધાને માન્ય છે. એથી સૂક્ષ્મ ક્રોધાદિક કષાની સત્તા તે તે વખતે પ્રભુમાં હતી જ, એથી તેઓ મન, વચન અને કાયના વ્યાપારની શાંતિ થઈ જવાથી શાંત હતા, પ્રશાંત હતા, પ્રકષ રૂપમાં શાંતિ યુકત હતા એથી જ તેઓ પરીષહ અને ઉપસર્ગોના આક્રમણ વખતે ધીર થઈ જતા અને તેથી તેઓ તેમના આ Page #378 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३६४ जम्बूद्वीपप्रचप्तिसूत्रे उपसर्गों के आने पर भी धीर हो जाने के कारण उन्हें ये सहन करने के स्वभाव वाले बन चुके थे; इन्हें किसी भी प्रकार का बाह्य और भीतर का आताप-सन्ताप-आकुल व्याकुल नहीं कर सकता था-उससे ये वर्जित थे इसलिए ये “परिनिर्वृतः" शीतलोभूत हो गये थे. तथा “छिन्न स्रोताः" ये इसलिये कहे कये हैं कि इनका संसार प्रवाह सर्वथा छिन्न हो चुका था, “छिन्नशोकः" जब ऐसी “छिण्णसोए" पद को छाया रखी जावेगी तब ये शोकरहित थे ऐसा इसका अर्थ होगा; “निरुपलेपः" पद से यह सूचित किया गया है ये द्रव्यमल और भावमल इन दोनों प्रकार के मलों से रहित हो चुके थे, इस तरह सामान्य रूप से भगवान् का वर्णन कर अब सूत्रकार सोपमान भगवान् का वर्णन करते हैं-ये भगवान् “शङ्खमिवणिरञ्जनः" जोव को मलीन करने वाला अञ्जन के जैसा कर्मरूप मैल जिनसे दूर हो गया है ऐसे थे, शङ्ख शुभ्र होता है इसी प्रकार कर्मरूप मैंल के विगत हो जाने से प्रभु भी विशुद्ध आत्मस्वरूप वाले थे, "मूल में संखमिव" ऐसा जो पाठ कहा गया है सो यहां यह मकार अलाक्षणिक है "जच्च कणगं व निरूवलेवे" विशुद्ध सुवर्ण की तरह प्रभु रागादिक कुत्सित द्रव्यों के विरह हो जाने से शुद्ध स्वरूप से युक्त थे, निर्गतमल वाला सुवर्ण जैसा सुदर्शन होता है उसी प्रकार रागादिमलरहित होने से प्रभु भी सुदर्शन थे, "आदिरस पडिभागे इव पागडभावे" प्रभु आदर्श-दर्पण के प्रति बिम्ब की तरह अनिगृहित अभिप्राय वाले थे, दर्पण में जैसा मुखादिक का आकार होता है। वैसा ही वह प्रतिबिम्बित है उसी प्रकार से ऋषभदेव भी सर्वदा अनिगूहित अभिप्रायवाले थे, ક્રમણને સહન કરવા ગ્ય સ્વભાવ વાળા થઈ ગયા હતા. એમને બહાર કે અંદરને કેઈ પણ જાતને આતાપ–સંતાપ-આકુળ વ્યાકુળ કરી શકતું ન હતું. તેનાથી એએ पतिता, कथा ४ 'परिनिवृतः' शीतवी भूत या हता. तथा 'छिन्नसोता' से ઓ એટલા માટે કહેવામાં આવેલ છે. કે એમનો સંસાર પ્રવાહ સર્વથા છિન્ન ભિન્ન થઈ शयाडतो. 'लिण्णसोए पहनी लिन्नशोकः सेवी छाया थशे त्या३ सयाशी रहितता मेवा भनो मथ थशे, 'निरूपलेप::' यहथी माम सूयित ४२वामां आवेत छे , असा દ્રવ્યમલ અને ભાવમલ એ બન્ને પ્રકારના મલાથી વિહીન થઈ ગયા હતા. આ પ્રમાણે સામાન્ય રૂપમાં ભગવાનનું વર્ણન કરીને સૂત્રકાર હવે સોપમાન ભગવાનનું વર્ણન કરે છે से भगवान् 'शङ्खमिब णिरञ्जनः' ने मlaन ४२नारा २५४नना भ३५ मत જેનાથી દૂર થઈ ગયું છે, એવા હતા. શંખ શુભ્ર હોય છે. આ પ્રમાણે કર્મરૂપ મલનાવિनाशथी प्रभु ५४ विशुद्ध मात्म २१३५वा ता. भूसमा संखमिव' सवा २ ५8 छतमा मा भार मसाक्षाए छ. “जत्यकनकमिव निरूपलेवः” विशुद्ध सुपर नीम प्रभु राદિક કુત્સિત દ્રવ્ય વિહીન હવા બદલ શુદ્ધસ્વરૂપ યુક્ત હતા. નિર્ગતમવવાળું સુવર્ણ જેવું सुहशन डाय छे. तभु प्रसु ५ रागाह भसत डोवा महसुहशन त, "आदर्श प्रतिभागइव प्रकटभावः" प्रभु माश-६५ गुना प्रतिमिनी गेम मनिगडित अभिप्राय વાળા હતા. દર્પણમાં જેમ મુખાદિકના આકાર જેવું જ પ્રતિબિંબ દેખાય છે, તેમજ ભગ વાન ઝાષભદેવ પણ સર્વદા અનિગૂહિત અભિપ્રાયવાળા હતા. શઠની જેમ તેઓ નિહિત Page #379 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कार सू. ४० ऋषभस्वामिनः दीक्षितानन्तरकर्तव्यनिरूपणम् ३६५ मलरहितत्वात् सुदर्शन इत्यर्थः, 'आदिरसपडिभागे इव' आदर्श प्रतिभाग इव आदर्शदर्पणे यः 'पागडभागे' प्रतिभागः प्रतिविम्नः स ईव प्रकटभावः प्रकट अनिगूहितः भावः अभिप्रायो यस्य स तथा, यथा दर्पणे यथास्थित मुखादेः प्रतिबिम्बः प्रतिफलितो भवति तथैव भगवान् ऋषमोऽपि सर्वदाऽनिगृहिताभिप्राय आसीत्, न तु शठ इव निगृहिताभिप्राय इति भावः । तथा 'कूम्मो इव गुत्तिदिए' कूर्म इव गुप्तेन्द्रियः-यथा कूर्मों भये समुपस्थिते चतुरश्चरणान् ग्रीवां च संगोपयति, तथैवासौ भगवान् शब्दादि भयेभ्यः सर्वदा संगोपितपञ्चेन्द्रिय आसीदिन्यर्थः । तथा 'पुक्खरपत्तमिव' पुष्करपत्रमिव कमलपत्रमिव 'निरुवलेवे' निरुपलेपः-उपलेपवर्जितः, यथा कमलपत्रं पड़ेजातं जले संवर्द्धितमपि जलादुपरि निर्लिप्तं तिष्ठति, तथैवासौ भगवान् भोगे समुत्पन्न: स्वजनादिषु संवड़ितोऽपि तत्स्नेहरूपलेपरहित इत्यर्थः। तथा 'गगगमिव निरालंबणे' गगनमिव निरालम्बनः यथा-गगनम् अवष्टम्भरहितं भवति तथैवासौ भगवान् कुलग्रामनगरादिनिश्रारहितोऽभूदित्यर्थः । तथा 'अनिले इव' अनिल इव-वायुरिव 'निरालए' निरालयः=आलयवर्जितः, यथा वायुः सर्वत्र संचरणशीलत्वेन स्थानप्रतिबन्धशठ की तरह निगूहित अभिप्रायवाले नहीं थे । “कुम्मो इव गुतिदिए" कच्छप जिस प्रकार भय के उपस्थित होने पर अपने चारों चरणों को और ग्रीवा को संकुचित कर लेता है उसी प्रकार प्रभु भी शब्दादिकों में आसक्ति हो जाने के भय से सर्वदा अपनी पांचों ही इन्द्रियों को उनके विषयों से संगोपित-सुरक्षित रखे हुए थे, "पुक्खपत्तमिव निरुवळेवे" प्रभु कमलपत्र की तरह उपलेप से रहित थे, जिस प्रकार कमल कीचड़ में उत्पन्न होता है और जल में संवर्द्धित होता है तब भी वह जल के ऊपर ही रहता है और उससे निर्लिप्त बना रहता है उसी तरह भगवान् भोग में उत्पन्न हुए और अपने संबंधि जनों के बीच में संवर्द्धित हुए फिर भी उनके स्नेहरूपलेप से रहित ये, 'गगणमिव निरालंबणे' प्रभु आकाश की तरह अवलंबन से रहित थे, आकाश विना सहारे के जैसा रहता है उसी प्रकार प्रभु भी कुल ग्राम आदि की निश्रा से रहित थे, “अणिले इव निरालए" वायु जिस प्रकार संचरण शील होने से विना किसो रोक मनिप्रायवान होता "कूर्म इव गुप्तेन्द्रियः" ४२७५ रभ भयावस्थामा पाताना या પગ અને ગ્રીવાને સંકુચિત કરી નાખે છે. તેમજ પ્રભુ પણ શબ્દાદિ વિષયોમાં આસકિત ન થઈ જાય તે ભયથી સદા પોતાની પંચેન્દ્રિયોને તેમના વિષથી સંગોપિત–સુરક્ષિત समता ता. "पुक्खरपत्तमिव निरुलेवः' प्रभु मनी रेभ पखेपथी २हित . જેમ કમળ કાદવમાં ઉત્પન્ન થાય છે. અને પાણીમાં સંવાદ્રિત થાય છે, છતાંએ તે જલ ઉપર જ રહે છે અને તેનાથી નિર્લિપ્ત થઈ ને રહે છે, તેમજ ભગવાન્ ભાગમાં પ્રકટ થયા અને પિતાના સંબંધિઓની વચ્ચે રહીને મોટા થયા છતાંએ તેમના સ્નેહરૂપ લેપથી રહિત હતા "गगनमिव निरालंबणे' प्रभु माशनी म मन विहीन ता. माम सखा। १५२ २९ छे तभ प्रभु पर ण, ग्राम वगेरेनी निश्राथी २डित ता. "अणिले इव निरा ” વાયુ જેમ સંચરણશીલ હોવાથી સર્વત્ર વિહરણશીલ હોય છે, તેમજ પ્રભુ પણ આ Page #380 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३६६ जम्बद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे रहितो भवति, तथैवासौ प्रभुरपि अप्रतिबन्धविहारित्वेन वसत्यादि प्रतिबन्धरहितोऽभूदित्यर्थः । तथा 'चंदो इव सोमदंसणे' चन्द्रइव सौम्यदर्शनः यथा चन्द्रः प्रियदर्शनत्वेन सर्वेषां मनोनयनालादजनको भवति तथैवासो प्रभुरपि सर्वेषां मनोनयनानन्दकर आसीदित्यर्थः । तथा 'सूरो इव तेयंसी' सूर इव तेजस्वी यथा-सूर्यः चन्द्रनक्षत्रादीनां तेजोऽपहारको भवति तथैवासो प्रभुरपि सकल परतीर्थिक तेजोऽपहारकोऽभूदित्यर्थः । तथा-'विहग इव अपडिबद्धगामी' विहग इव अप्रतिबद्धगामी-अप्रतिबद्धः प्रतिबन्धरहितः सन् गच्छतीत्येवं शीलः अप्रतिबद्धगामी-यथा-विहगः पक्षीप्रतिबन्धराहित्येन स्वावयवभूतपक्षसापेक्षः सर्वत्र विहरति तथैवासो भगवान् कर्मक्षयसहायकारिषु अनेकेष्वनार्यदेशेषु परानपेक्षः सन् स्वशक्त्या विहरतीति भावः । तथा 'सागरो इव गंभीरे' सागर इव गम्भीरः यथा सागरोऽतलस्पी भवति तथैवायं टोक के सर्वत्र विहरणशील होती है उसी प्रकार प्रभु भी अप्रतिबन्ध विहारी होने के कारण स्थान के प्रतिबन्ध से रहित थे, अर्थात् वसति आदि में ममत्व रहित थे, "चंदो इव सोम दंसणे" चन्द्र की तरह प्रभु सौम्य दर्शनवाले थे चन्द्र जिस प्रकार से प्रिय दर्शनवाला होने के कारण समस्त जीवों के मन और नयनों को आह्लाद जनक होता है उसी तरह प्रभु भी समचतुरस्र संस्थान एवं वज्रऋषभसंहनन के धारी होने से सब जीवों के मन और नेत्रों को आनन्द देने वाले थे "सूरो इव तेयंसी" सूर्य की तरह प्रभु तेजस्वी थे सूर्य जिस प्रकार नक्षत्रादिकों के तेज का अपहारक होता है उसी प्रकार पभु भी सकल परतोर्थिक जनों के तेज के अपहारक थे, “विहगइव अपडिबद्धगामी" पक्षी की तरह प्रभु अप्रतिबद्ध गामो थे' पक्षी जिस प्रकार प्रतिबन्ध रहित होने के कारण केवल अपने अवयवभूत पंखो के बल पर सर्वत्र विहार करता है उसी प्रकार पभु भी कर्मक्षय में सहायकारी अनेक अनार्यदेशों में परानपेश होकर अपनी शक्ति के बल पर विहार करते थे 'सागरो इव गंभोरे" प्रभु समुद्रकी तरह गंभीर थे, सागर जिस प्रकार अगाध होने के कारण किसी के भी द्वारा तल स्पर्शी પ્રતિબન્ધ વિહારી લેવા બદલ સ્થાનના પ્રતિબન્ધથી રહિત હતા, એટલે કે વસ્તી વગેરેમાં भभाव विहीन ता. 'चंदो इव सोमदंसणे" प्रभु यन्द्रवत् सीम्यहनवाण ता. रेम ચન્દ્ર પ્રિયદર્શી રહેવા બદલ સર્વ જીવના મન અને નેત્રોને આહલાદ આપનાર હોય છે, તે મજ પ્રભુ પણ સમચતુરન્સ સંસ્થાન તેમજ વજી ઝાષભ સં હનનના ધારી લેવાથી સર્વ लवाना मन भने नत्राने मान पाउना२ छे. "सूरइव तेजस्वी' प्रभु सूर्य ना मत। સ્વી હતા. સૂર્ય જેમ નક્ષત્રાદિકના તેજનો અપહર્તા હોય છે. તેમજ પ્રભુ પણ સમસ્ત ५२तीथिनाना न अपहता sal. "विहग इव अपडिबद्धगामी' पक्षीनी भ प्रभु અપ્રતિબદ્ધગામી હતા. પક્ષી જેમ પ્રતિબધ રહિત લેવા બદલ કૂકત પોતાના અવયવભૂત પંખેના આધારે સર્વત્ર વિહાર કરે છે તેમજ પ્રભુ પણ કર્મક્ષયમાં સહાયકારી અનેક આ नाय शोभा पशनपेक्ष थईने स्ना माधारे विहार रे छ. 'सागरो इव गंभीरे' सागर જેમ અગાધ હે વાથી અતલસ્પર્શી હોય છે. તેમજ પ્રભુ પણ અતલ સ્પશી એટલે કે ગૂઢ Page #381 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका f. वक्षरकार सु. ४० ऋषभस्वामिनः दीक्षितानन्तरकर्तव्यनिरूपणम् ३१७ प्रभुरपि गम्भीराशय इत्यर्थः । अयं भावः - यथा समुद्रोऽगाधत्वान्न केनापि तलावच्छेदेन स्पर्शनीयो भवति, तथैवासौ प्रभुरपि परैरज्ञातस्वाभिप्राय निरुपमज्ञानवत्वेऽपि रहः कृतदुश्चरितानामपरिस्रावित्वाद् हर्षशोकादिकारणसद्भावेऽपि तद्विकारादर्शनाद वेति । तथा - ' मंद इव अकंपे' मन्दर इव अकम्पः यथा मन्दरपर्वतोऽकम्पो भवति तथैवासौ प्रभुरपि स्वप्रतिज्ञातेषु तपःसंयमेषु दृढाशयत्वेन परीषहोपसर्गादिकृतबाधासंयुक्तोऽपि ततोsप्रच्यवनशील इति भावः । तथा 'पुढवीविव सव्वफासविस' पृथिवी इव सर्वस्पर्शविषहःयथा पृथिवी सर्वस्पर्शसहनशीलो भवति तथैव प्रभुरपि सर्वविधानुकूल प्रतिकूल स्पर्श सहनशीलो भवतीति तथा 'जीवविव अप्पडिहयगइत्ति' जीव इव अप्रतिबद्धगतिरिति । यथा जीवस्य कटकुड्यादिभिर्गतिप्रतिघातो न भवति तथैवास्य प्रभोरपि आर्यानार्यदेशेषु संचरत परपाखण्डिकृतप्रतिघातो नाभूदित्यर्थः । इति शब्दो सन्दर्भपरिसमाप्तौ ॥०४०॥ नहीं होता है उसी तरह प्रभु भी दूसरों के द्वारा जिनका अभिप्राय जाना जाय ऐसे नहीं थे । अथवा प्रभु निरुपम ज्ञानशाली थे, फिर भी एकान्त में कृत दुश्चरितों के अपरिस्रावो होने के कारण हर्षशोकादि कारणों के सद्भाव में भी तद्विकार का उनमें अदर्शन रहता था, इसलिये वे सागर के जैसे गंभीर थे, तथा "मंदरो इव अकंपे मन्दर के समान प्रभु अकम्प थे, जिस प्रकार मन्दर पर्वत भयंकर से भी भयंकर आंधी के समक्ष अकम्प अडिग रहता है उसी प्रकार प्रभु भो अपने द्वारा प्रतिज्ञात तपः संयमों के ऊपर दृढाशयवाले होने के कारण परीषह और उपसर्ग आदि के द्वारा बाधा संयुक्त होने पर भी उनसे विचलित नहीं होते, पृथिवो की तरह प्रभु "पुढवी विव सव्वफास विसहे" सर्व प्रकार के स्पर्शो के सहन कर्त्ता थे, पृथिवो जिस प्रकार सर्व प्रकार के स्पर्शो को सहन करने वाली होती है उसी प्रकार से प्रभु भी सर्व प्रकार के अनुकूल, प्रतिकूल स्पर्शो के सहन करने के स्वभाव वाले थे, “जीवोविव जपडिहयगइत्ति' प्रभु जीव की तरह अप्रतिबद्ध गतिवाले थे, जीव की गति जिस प्रकार कट कुड्यादिकों द्वारा प्रतिहत नहीं होतो उसो प्रकार प्रभु का विहार भो आर्य अनार्य देशों में होता हुआ भी पाखण्डियों द्वारा प्रतिघातयुक्त नहीं होता ||४०|| હતા. પ્રભુના અભિપ્રાય કોઇ જાણી શકતા ન હતા. અથવા પ્રભુ નિરુપમ જ્ઞાનચાલી હતા. છતાંએ એકાંતમાં કૃત દુૠરિતાના અપરિસાવી હાવાં ખદલ હષ શાકાહ કાણેાના સદ્ભા વમાં પણ તદ્ વિષયક વિકારાનેા તેઓશ્રીમાં અભાવ રહેતા હતા. એથી જ તેઓ શ્રી સાગ રની જેમ ગ ંભીર હતા તેમજ મન્દરની જેમ અકમ્પ હતા. જેમ મન્દર પર્યંત ભયકરમાં ભયંકર સખત આંધી ની સામે અકલ્પ અડગ રહે છે. તેમજ પ્રભુ પણ પાતાના વડે પ્રતિજ્ઞાત તપઃ સૌંચમા ઉપર દૃઢ આશયવાળા હેાવાથી પરીષહ અને ઉપસગ વગેરે વડે भाषा संयुक्त डोवा छतां तेमनाथी वियसित थता नथी, पृथिवीनी प्रेम अलु " सर्व स्पर्श विषहः " सर्व प्रभारना स्पर्शो ने सहन ४२नार ता. पृथिवी प्रेम सर्व प्रारना स्पर्शनि સહન કરનારી છે તેમજ પ્રભુ પણ સર્વ પ્રકારના અનુકૂલ-પ્રતિકૂલ સ્પĒને સહન કરી શકે तेवा स्वभाववाला ता. "जीव हव प्रतिबद्धगतिः" लवनी प्रेम प्रभु खप्रतिमद्धगतिवाणा હતા. જીવની ગતિ જેમ કટ કુયાદિ વડે પ્રતિહુત હાતી નથી તેમજ પ્રભુના વિહાર પણ આય અનાય દેશમાં હાય છે છતાંએ તે યાખ’ઢીએ વડે પ્રતિથાતયુક્ત થતા નથી. સુ જમા Page #382 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३६८ जम्बूद्धीपप्राप्तिस्त्रे _मूलम्-णत्थि णं तस्स भगवंतस्स कत्थइ पडिबंधे । से पडिबंधे, चउविहे भवइ तं जहा दवओ, खित्तओ. कालओ, भावओ! दब्बओइह खलु माया मे, पिया मे भाया मे भगिणी मे जाव संगंथसंथुआ मे, हिरण्णं मे, सुवणं मे जाव उवेगरण मे अहवा समासओ सच्चित्ते वा अचित्ते वा मीसए वा दव्वजाए सेवं तस्स ण भवइ । खित्तओगामे वा णयरेवा अरण्णे वा खेत्ते वा खले वा गेहे वा अंगणे वो, एवं तस्स ण भवइ । कालओ थोवे वा लवे वा मुहत्ते वा अहोरत्ते वा पक्खे वा मासे वा उऊण वा अयणे वा संवच्छरे वा अन्नयरे वा दीहकाले पडिबंधे एवं तस्स ण भवइ । भावओ-कोहे वा जाव लोहे वा भए वो होसे वा एवं तस्स ण भवइ । से णं भगवं वासावासवज्ज हेमंतगिम्हासु गामे एगराइए णयरे पंचरोइए ववगयहाससोग अरइ भय परित्तासे णिम्ममे णिरहंकारे लहुभूए अगंथे वासी तच्छणे अदुढे चंदणाणुलेवणे अरत्ते लेहुम्मि कंचणम्मि य समे इहलोए परलोए य अपडिबद्धे जीबियमरणे निरवकंखे संसोरपारगामी कम्मसंगणिग्घायणट्ठाए अब्भुट्ठिए विहरइ ॥सू० ४१॥ छाया-नास्ति खलु तस्य भगवतः कुत्रापि प्रतिबन्धः । स प्रतिबन्धः चतुर्विधो भवति, तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतो भावतः । द्रव्यतः-इह खलु माता मे, पिता मे, भ्राता मे, भगिनी मे, यावत् संग्रन्थसंस्तुता मे, हिरण्यं मे, सुवर्ण मे यावत् उपकरण मे, अथवा समासतः-सचित्ते वा अचित्ते वा मिश्रके वा, स एवं तस्य न भवति । क्षेत्रतो ग्रामे वा नगरे वा अरण्ये वा क्षेत्रे वा खले वा गेहे वा अङ्गणे वा, एवं तस्य न भवति । कालतः-स्तोके वा लवे वा मुहूर्त वा अहोरात्रे वा पक्षे वा मासे वा ऋतौ वा अयने पा संवत्सरेवा दीर्घकाले प्रतिबन्धः, एवं तस्य न भवति । भावतः क्रोधे वा यावत् लोमे वा भये वा हासे वा एवं तस्य न भवति । स खलु भगवान् वर्षावासवर्ज हेमन्तग्रोष्मयोः ग्रामे ऐकरात्रिको नगरे पाञ्चरात्रिको व्यपगतहासशोकारतिभयपरित्रासो निर्ममो निरहकारो लघुभूतः अग्रन्थो, वासीतक्षणे अद्विष्टः चन्दनानुलेपने अरक्तः, लेष्टौ काञ्चने व समः, इहलोके परलोके च अप्रतिबद्धः, जीवितमरणे निरवकाङ्क्षः संसारपारगामी कर्मसअनिर्धातनार्थाय अभ्युत्थितो विहरति ।।सू० ४१॥ Page #383 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सू. ४१ भगवतः श्रमण्णवस्थावर्णनम् अथ भगवतः श्रमणावस्था वर्णयति टीका- 'णत्थि णं' इत्यादि । 'णत्थि णं तस्स भगवंतस्स कत्थइ पडिबंधे ' तस्य भगवतः खलु कुत्रापि कस्मिंश्चिदपि स्थाने प्रतिबन्धः 'अयं मम अहमस्य' इति मनोभावरूपो बन्धो नास्ति = नासीदित्यर्थः । 'अयं मम अहमस्य ' इति रूपश्च संसार एव । तदुक्तं - "अयं ममेति संसारो नाहं न मम निर्वृप्तिः । चतुर्भिरक्षरैर्बधः पञ्चभिः परमं पदम् ||" इति । 'से पडिबंधे चउव्विहे भवइ' स च प्रतिबन्धश्चतुर्विधो भवति, 'तं जहा - दब्वओ' तद्यथा - द्रव्यतः - द्रव्यमाश्रित्य 'खित्तओ' क्षेत्रतः = क्षेत्रमाश्रित्य 'काळओ' कालतः = कालमाश्रित्य, 'भावओ' भावतः = भावमाश्रित्येति । तत्र 'दव्वओ' द्रव्यतः = भगवान् की श्रमणावस्या का वर्णन " णत्थि णं तस्स भगवंतस्स कत्थइ पडिबंधे" इत्यादि । टीकार्थ - " तस्स भगवंतस्स” उन ऋषभनाथ भगवान् को " कत्थइ" कहीं पर भी “पडिबंधे” यह मेरा है, मैं इसका हूं, इस प्रकार का मानसिक विकाररूप भाव नहीं होता । क्यों कि मै इसका हू, यह मेरा है इस प्रकार का भाव ही संसार है, तदुक्तम् - अयं ममेति संसारो नाहं न मम निवृतिः " २ जह मेरा है इस प्रकार का भावही संसार है मै न इसका हूं और न यह मेरा है" इस प्रकार का जो भाव है वही संसार की निवृत्ति है, " चतुर्भिरक्षरैर्बन्धः पञ्चभिः परमं पदम् " चार अक्षरों द्वारा बन्ध होता है और पांच अक्षरों से परम पद प्राप्त होता है " अहमस्य अयं मम" यहां चार चार अक्षर हैं इनसे जीव कर्मबन्ध का कर्त्ता होता है और "अहं अस्य न, अयं मम न" ये पांच अक्षर हैं, इनके अनुसार प्रवृत्ति करने वाले पुरुष को मुक्ति की प्राप्ति होती है, “से पडिबंधे चउन्विहे भवद्द " वह प्रतिबन्ध चार प्रकार का होता है "तं जहा" जैसे- "दव्वमो" द्रव्य को आश्रित करके, "स्वित्तओ" क्षेत्र को आश्रित करके, "कालओ" काल को आश्रित करके और "भावओ" ३६९ ભગવાનની શ્રમણાવસ્થાનું વધુ ન 'णत्थि णं तस्स भगवंतस्स कत्थर पडिबंधे' इत्यादि || सूत्र ४१ ॥ टीडार्थी – “तस्स भगवंतस्स” ते ऋषलनाथ भगवानने 'कत्थइ' ४ पशु स्थाने 'पडिયંત્રો આ મારુ છે. હું એના છું આ જાતના માનસિક વિકારરૂપ ભાવ ઉત્પન્ન થતા. નહતા કેમકે હું આના છુ. આ મારા છે આજાતના ભાવ संसार छे, तहुतभू - "अयं ममेति संसारो नाहं न मम निर्वृत्तिः" आ भारी छे भने नोछु थे लावसंसार छे. तेभ हुँ को भूनो नथी भने थे भारे। नथी या भवनो के भाव ते संसारनी निवृत्ति छे. “चतुर्भिरक्षरैर्बन्धः पञ्चभिः परमं पदम्" यार अक्षरे। वडे मन्ध थाय छे भने पांच अक्षरे वडे परभ यह प्राप्त थाय छे. "अहमस्य अयं मम" अहीं यार अक्षरो छे. येनाथी लवबन्धनात थाय छे भने “अहं अस्य न, अयं मम न” से पांच अक्षरो छे से भक्षरे। भु प्रवृत्ति १२नार पुरुषने भुस्तिनी प्राप्ति थाय छे. 'से पडिवंधे चउव्विहे भवह' ते प्रतिमन्धना यार प्रहार छे, 'तं जहा-' प्रेम 'दब्धओ' द्रव्यने माश्रित हरीने, 'खितमो' क्षेत्रने माश्रित पुरीने "कालओ" अवने याश्रित उरीने अने "भावओ" भावने माश्रित Page #384 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे द्रव्यमाश्रित्य प्रतिबन्धः 'इह खलु माया में' इहलोके खलु माता मे - माता ममास्ति, एवं 'पिया मे' पिता मे, 'भाया मे' भ्राता मे, 'भगिनी मे' भगिनी मे 'जाव' यावत्यावत्पदेन 'भज्जा मे, पुत्ता मे, धूआ मे, णत्ता मे सुहा मे, सहिसयण' छाया'भार्या में, पुत्रा मे, दुहितरी मे, नप्ता मे, स्नुषा मे सखिस्वजन' इति संग्राह्यम् । तत्र - भार्या - पत्नी मे - ममास्ति, पुत्रा मे दुहितरः- पुत्र्या मे नप्ता - पौत्रो दौहित्रो वा मे, स्नुषा - पुत्र वधू में, तथा 'संगंथ संथुया मे' संग्रन्थ संस्तुता मे सखिस्वजने - त्यस्य संग्रन्थसंस्तुता इत्यनेन सह सम्बन्धः, ततश्च - सखिस्वजनसंग्रन्थसंस्तुता इति पदम्, तत्र -- सखा - मित्रं, स्वजनः - पितृव्यपुत्रादिः, संस्तुतः - पुनः पुनर्दर्शनेन परिचितः, सख्यादीनामितरेतरयोग द्वन्द्वः, ते च मे मम सन्तीति । तथा - ' हिरण्णं मे' हिरण्यं मे 'सुवणं में' सुवर्ण मे, 'जाव' 'कंस मे दूस मे धणं मे' छाया- कांस्यं मे दृष्यं मे धनं मे' इति संग्राह्यम्, तथा 'उवगरणं मे' उपकरणं - पूर्वोक्तातिरिक्ता सामग्री मे इति । पुनः प्रकारान्तरेण द्रव्यतः प्रतिबन्धमाह - ' अहवा' इत्यादि । ' अहवा' अथवा - द्रव्यतः प्रतिबन्धः 'समास' समासतः --संक्षेपतः 'सचित्ते वा' सचित्ते - द्विपदादौ 'अचित्ते वा' अचितेभाव को आश्रित करके "दव्वओ" द्रव्य को आश्रित करके प्रतिबन्ध इस प्रकार से है 66 " इह खलु माया में पिया मे, भाया मे, भगिणी मे" माता मेरी है, पिता मेरा है, भाई मेरा है, भगिनी मेरी है " जाव" यावत्पद से " भज्जामे, पुत्ता मे घूआ में णत्ता में, सुण्हा में सहिसयण" इन पदों के संग्रह के अनुसार भार्या मेरी है, पुत्र मेरे हैं, दुहिता-पुत्री मेरी है, नाती मेरा है, स्नुषा पुत्र वधू मेरी है, सखि - मित्र और स्वजन मेरे हैं, "सविस्वजन " इस पद का " संगंथ संथुया मे" पद के साथ सम्बन्ध है. इससे संस्तुत -बार २ परिचित हुए सखि स्वजन पितृव्य पुत्र आदि ये सब मेरे है. तथा - " हिरण्णं मे" हिरण्य मेरा है, "सुवण्णं मे" सुवर्ण मेरा हैं. " जाव" यावत्पद से गृहीत "कंसं मे, दूसं मे, धणं मे" इन पदों के अनुसार कांखा मेरा है, दूषय-वस्त्र- तम्बू आदि मेरे हैं, तथा “उवागरणं मे" उपकरण - पूर्वोक्त वस्तुओं से अतिरिक्त सामग्री मेरी है । प्रकारान्तर से पुनः द्रव्य की अपेक्षा प्रतिबन्ध का कथन " अहवा समासभो सचित्ते वा अचित्ते वा मीसएवा दव्वजाए से त्तं तस्स ण भवइ" अथवा द्रव्य की अपेक्षा ३७० ने. 'दव्वओ' द्रव्यने आश्रित हुने के प्रतिबंध थाय छे तेनु स्व३५ या प्रमाणे छे. 'इह खलु माया मे, पिया मे, भाया मे, भगिणी मे, भाता भारी है, पिता भारा छे; लाई भारी छे, मन भारी है. यावत् पट्टथी 'भज्जा मे पुत्ता मे, धूआ मे, णत्ता में, सुन्हा मे, सहिसय ण" या पहाना सग्रह भुभम आर्याभारी छे. पुत्र भारी छे, हुहिता-पुत्री भारी छे, नाती पुत्रो पुत्र है पुत्रीने पुत्र मारे छे, स्नुषा - पुत्र वधू भारी छे, समि, भित्र भने स्वनने। भारा छे. 'सखिस्वजनः' या पहने। 'संग्रंथ संथुआ' या पहनी साथै संबंध छे. मेनाथी સસ્તુત વારંવાર પરિચિત થયેલ સપ્તિ-સ્વજન પિતૃવ્ય કાકા પુત્ર વગેરે બધાં મારા છે. तेभन' 'हिरण्ण में' डिरएय याही भाऊ' हे 'सुवण्णं मे' सुवाणु - सानु भाई है. 'जाव' यावत् पडथी गृडणुभ्शयेस 'कैसं मे दूस मे घणं मे' प्रभासु भारु छे, द्रव्य वस्त्रो तांबू Page #385 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार ४१ भगवतः श्रमणावस्थावर्णनम् हिरण्यादौ, 'मीसए वा' मिश्रके - हिरण्याद्यलङ्कृतद्विपदादौ 'दव्वजाए' द्रव्यजाते-उक्तातिरिक्तद्रव्यसमूहे भवति 'वा' शब्दाः समुच्चयद्योतकाः 'सेवं' स- पूर्वोक्तः प्रतिबन्धः 'तस्स' तस्य - प्रभोः एवं - ममेदमिति भावपूर्वकं 'ण भवइ' न भवति न आसीदिति । 'खित्तओ' क्षेत्रतः प्रतिबन्धः 'गामे वा' ग्रामे वा 'णयरे वा' नगरेवा 'अरण्णेवा' अरण्येवा 'खेतेवा' क्षेत्रे - केदारे वा, 'खले वा' खले- धान्यमर्दनस्थाने वा 'गेहे वा' गेहे वा 'अंगणे वा' अङ्गणेवा भवति, 'तस्स' तस्य प्रभोः क्षेत्रविषयः प्रतिबन्धः ' एवं ' एवं - ममेदमिति भावपूर्वक ' न भवइ' न भवति - नासीदिति । तथा 'काळओ' काळतः प्रतिबन्धः 'थोवे वा' स्तोके - सप्त प्राणात्मके 'लवेवा' लवे- सप्त स्तोकप्रमाणे वा, 'मुहुत्ते वा' मुहूर्त्त - सप्तसप्ततिलवमाने वा 'अहोरते वा' अहोरात्रे - त्रिंशन्मुहूर्तमाने वा, 'पक्खे वा' पक्षे-पञ्चदशाहोरात्रात्मके वा, 'मासे वा' मासे - पक्षद्वयप्रमाणे वा, 'उऊए वा' ऋतौ मासद्वयप्रतिबन्ध संक्षेप से सचित्त द्विपद चतुष्पद आदि में अचित्त हिरण्य सुवर्णादि पुद्गलों में और मिश्रक हिरण्य आदि से अलङ्कृतद्विपद आदि द्रव्यसमूह में होता है, यहां "वा" शब्द समुच्चयद्योतक है. ऐसा यह प्रतिबन्ध ममत्वभाव उन प्रभु के नहीं था । "वित्तओ गामे वा णयरे वा अरण्णे वा खेत्ते वा खले वा गेहे वा अंगणे वा एवं तस्त ण भवइ" क्षेत्र की अपेक्षा प्रतिबन्ध ग्रामों में, नगरों में, जंगलों में, खेतों में खलिहानों में गृह में, अथवा अङ्गण में ममत्वभाव उन प्रभु को नहीं था, "कालओ थोवे वा लवे वा मुहुत्ते वा अहोरते वा पक्खे वा मासे वा उऊए वा अयणे वा संवच्छरे वा अन्नयरे वा दीहकाले पडिबधे, एवं तस्स न भवइ" तथा काल की अपेक्षा प्रतिबन्ध ममत्वभाव उन प्रभु को एक स्तोक सातप्राणात्मक समयरूप काल में, एक लव- सात स्तोक प्रमाणात्मक समयरूप काल में एक मुहूर्त में ७७ लवप्रमाण समय में, एक अहोरात में तीस मुहूर्तप्रमाण समय में, एक पक्ष में १५ दिनरातप्रमाणसमय में, एक मास वगेरे भारां छे, तेभ४ 'उवगरण मे' उप४२ - पूर्वोस्तवस्तुमाथी माडी रहेली सामग्री भारी छे. प्रहारान्तरथी पुनः द्रव्यनी अपेक्षा अतिधनु थन- ' अहवा' समासओ सचिसे वा अचित्ते वा मीसप वा दव्वजाए से त्तं तस्स ण भवइ' अथवा द्रव्यनी अपेक्षा मे प्रतिगंध સંક્ષેપથી સચિત્ત-દ્વિપદ વિગેરે અચિત્ત-હિરણ્ય સુવર્ણાદિમાં અને મિશ્રક હરણ્ય વિગેરે થી શણગારેભ હાથિ વિગેરે દ્રશ્યસમૂહમાં ડાય છે. અહી` ‘વ’ શખ્સ સમુચ્ચય દ્યોતક છે. मेवो मा अतिमन्ध-भभत्वभाव-ते अलुभां न हता. 'खित्तओ गामेवा नयरे वा अरण्णे वा खेत्ते वा खले वा गेहे वा अंगणे व । एवं तस्स न भवइ' क्षेत्रनी अपेक्षाये श्राभीमां, नगरीभां, વનામાં, ખેતરામાં, ખળાઓમાં ઘરમાં અગર આંગણમાં તે પ્રભુને પ્રતિમન્ય ન હતા. तेभन 'कालओ थोवे वा लवेवा मुद्दत्ते वा अहोरते वा पक्खे वा मासे वा उऊप वा अयणे वा स्वच्छ रेवा अन्नयरे वा दोहकाले पडिबंधे एवं तस्स न भव' असनी अपेक्षाये મમત્વભાવ તે પ્રભુને એકશ્તાક–સાત પ્રાણાત્મક કાળમાં, નહતા એક લવ સાત સ્તાક પ્રમાણાત્મક સમય રૂપ કાળમાં, એક મુહૂત્ત ૭૭ લવ પ્રમાણાત્મક સમયમાં, એક અહેારાતમાં– ત્રીસ-મુહૂત પ્રમાણાત્મક સમયમાં, એક પક્ષમાં-૧૫ દિન-રાત પ્રમાણુ વાળા સમયમાં, એક ३७१ Page #386 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३७२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे प्रमाणे वा, 'अयणे वा' अयने-ऋतुत्रयप्रमाणे वा, 'संवच्छरे वा' संवत्सरे-अयनद्वयप्रमाणे वा 'अन्नयरे वा' अन्यतरस्मिन् वा 'दीहकाले' दीर्घकाले-वर्षशतादौ 'पडिबंधे' प्रतिबन्धो भवति, अयं प्रतिबन्धः 'तस्स तस्य प्रभोः ‘एवं' एवं-ममेदमिति भावपूर्वकं 'ण भवई' न भवति-नासीदिति । तथा-'भावओ' भावतः प्रतिवन्धः 'कोहे वा' क्रोधे वा 'जाव' यावत्पदेन-'माणे वा मायाएवा' माने वा मायायां वा-इति संग्राह्यम् , तथा 'लोहे वा' लोभे वा' 'भए वा भये वा, 'हासेवा' हासे वा भवति, स प्रतिबन्धः 'तस्स' तस्य प्रभोः 'एवं' एवं-ममेदमिति भावपूर्वकं 'ण भवई' न भवति-नासीदिति । 'से' स प्रतिबन्धरहितः 'ण' खलु 'भगवं' भगवान् 'वासावासवज्ज' वर्षावासवर्ज-वर्षासु-वर्षाकाले वास:बसनं निवासस्तद्वजे-वर्षाकालं विहायेत्यर्थः शेषयोः 'हेमंतगिम्हासु' हेमन्तग्रीष्मयोः ऋत्वोः 'गामे एगराइए' ग्रामे एकरात्रिका-एकरात्रपर्यन्त निवासकृत् 'णयरे पंचराइए' नगरे पाश्चरात्रिको 'वबगयहाससोग अरइ भय परित्तासे' व्यपगतहासशोकारतिभयपरित्रासाः, व्यपगता:-दुरीभूता हासशोकारतिभयपरित्रासाः-हास:-हास्यं, शोकः प्रसिद्धः, में पक्षद्वय प्रमाण समय में, एक ऋतु में मास द्वयप्रमाण समय में एक अयन में ऋतुत्रयप्रमाण समय में, एक संवत्सर में-अयनद्वय प्रमाण समय में अथवा और भी किसी लम्बे समयवाले वर्षशतादि सूपकाल में नहीं था, प्रतिबन्धशब्द का अर्थ ममत्वभाव है, ऐसा ममत्वभाव प्रभु को न द्रव्य में था, न क्षेत्र में था, और न काल में था, "भावओ-कोहे वा जाव लोहे वा भए वा हासे वा एवं तस्स ण भवइ" इसी तरह भाव की अपेक्षा प्रतिबन्ध उन प्रभु को न क्रोध में था न "यावत्पद" ग्राह्य मान में था, न माया में था, और न लोभ में था और न हास्य में ही था इस तरह प्रतिबन्ध रहित हुए वे प्रभु सिर्फ “से णं भगवं वासा वासवग्ज" वर्षाकाल के समय को छोड़कर शेष "हेमंत गिम्हासु" हेमन्त और ग्रीष्म ऋतुओं में "गामे एगराइए" ग्राम में एक रात्रपर्यन्त निवास करते थे, "णयरे पंचराइए" नगर में पांच रात्रि ये प्रभु पूर्वोक्तरूप से "ववगयहाससोगअरइभयपरित्तासे णिम्ममे णिरहंकारे', हास्य, शोक, अरति-- માસમાંએપક્ષ વાળા સમયમાં એક ઋતુમાં- બે માસ પ્રમાણુ સમયમાં, એક અયનમાં-ત્રણ હતુ પ્રમાણુ સમયમાં, એક સંવત્સરમાં-બે અયન પ્રમાણવાળા સમયમાં અથવા બીજા કોઈ પણ દીર્ઘ સમયવાળા વર્ષ શતાદિ રૂપ કાળમાં પ્રતિબન્ધ ન હતા. પ્રતિબન્ધ શબ્દનો અર્થ भभावमा छे. मेवो भमराव प्रभुने द्रव्यमा क्षेत्रमा अजमानतो. भावओ कोहे वा जाव लेहे वा भए वा हासे वा एवं तस्स ण भवइ' 4 प्रमाणे मानी अपेक्षा त પ્રભુને પ્રતિબંધ-મમત્વભાવ- ન ક્રોધમાં હતો, ન યાવત્પદ ગ્રાહ્યા-માનમાં હતે. ન માયામાં હતે ન લોભમાં હતા. તેમજ ન હાસ્યમાં હતું. આ પ્રમાણે પ્રતિબન્ધ રહિત થયેલા તે પ્રભુ त 'से गंगवं वासावासवज्ज' वर्षामना समय मा ४रीन माहीमा 'हेमंतगिम्हासु' हेमन्त मन श्रीभ तुमा 'गामे एगराइए' श्राममा ४ रात्र ५य"तनिवास ४२ता ता. 'जयरे पंचराइप' नगरभ पांय रात पर्यन्त से प्रभु पूर्वेति प्रमाणे निवास ४२ता तो 'वबगय हाससोगअरइभयपरित्तासे णिम्ममे निरहंकारे' हास्य, , पति मानसि द्वेष, Page #387 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ४५ भगवतः श्रमणावस्थावर्णनम् ३७३ अरति:-मनस उद्वेगः, भयं प्रसिद्धं, परित्रासः-आकस्मिकं भयं च यस्मात् स तथाभूतः, पुनः 'णिम्ममे' निर्ममा-ममत्वरहितः, 'णिरहंकार:' अहङ्कार वर्जितः, अतएव 'लहुभूए' लघुभूत: ऊर्ध्वगतिकः तत एव 'अगंथे' अग्रन्थः बाह्याभ्यन्तरग्रन्थिरहितः 'वासीतच्छणे' वासीतक्षणे वास्या-सूत्रधारोपकरणविशेषेण यत्तक्षणं-स्वच उत्खननं तत्रापि 'अदुहे' अद्विष्टः-द्वेषवर्जितः तथा 'चंदणाणुलेवणे' चन्दनानुलेपने 'अरत्ते' अरक्तः-रागरहितः, कश्चिद् भगवतः शरीरस्वचं बास्या तक्ष्णुयात् , कश्चित् शरीरं चन्दनेनानुलेपयेत् , भगवान् द्वेषरागराहित्येन सम इतिभावः तथा 'लेटुम्मि' लेष्टौ लोष्ठे 'कंचणम्मिय' काञ्चने-सुवर्णे च 'समे' समः लोभराहित्येन तुल्यः, 'इहलोए' इहलोके-मनुष्यलोके 'परलोए' परलोके-देवभवादौ च 'अपडिबद्धे' अप्रतिबद्धः-सुखाशाराहित्येन अभिलाषरहितः, तथा 'जीनियमरणे' जीवितमरणे जीवितं च मरणं च जीवितमरणं तत्र 'निर वकंखे' निरवकाङ्क्षः-आकाङ्क्षा रहितः इन्द्रादिकृत सत्कारादिप्राप्तौ जीवितविषये मानसिक उद्वेग, भय, और परित्रास आकस्मिक भय इनसे सर्वथा रहित बन चुके थे, निर्मम ममता रहित हो चुके थे, निरहंकार अहंकार से वर्जित हो चुके थे, अतएव ये "लहुभूए" इतने अधिक हल्के उर्ध्वगतिक बन चुके थे. कि इन्हें वाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह को आवश्यकता ने अपने में नहीं बांधा, "अगंथे वासो" अतः निम्रन्थ अवस्थायुक्त हुए इन प्रभु को अपने ऊपर "तच्छणे अदुडे" कुल्हाडाचलाने वाले के प्रति भी किसी प्रकार का द्वेष भाव नहीं था और अपने ऊपर “चन्दणाणुलेवणे अरत्ते" चम्दन का लेप करने वाले के प्रति थोड़ा सा भी राग भाव नहीं था, किन्तु दोनों प्रकार के प्राणियों पर इन के हृदय में समभाव था रागद्वेष से रहित परिणाम था, "लेहुम्मि कंचणम्मि य समे" ये लोष्ठ और काञ्चन में भेद बुद्धि से रहित हो चुके थे, "इहलोए" इसलोक में मनुष्यलोक में एवं "परलोए परलोक देवभव आदि में "अपडिबद्ध" इनकी अभिलाषा बिलकुल ध्वस्त हो चुकी थी, "जीवियमरणे निरवकखे" जीवन और मरण में ये आकांक्षा रहित बन चुके थे, इन्द्रादि द्वारा सत्कार की प्राप्ति होने ભય અને પરિત્રાસ-આકસ્મિક ભયથી સર્વથા રહિત બની ગયા હતા. નિર્મમ-મમતાથી રહિત થઇ ગયા હતા. નિરહંકાર-અહંકાર રહિત થઈ ગયા હતા. એથી જ એ શ્રી “દુभूए सेटमा e-BEगति-थई गया पातेभने माय भने माय तर परिग्रहना भावश्यता पोतानामा ४ा नही', 'अगंथे वासी' तथा निन्य अवस्था पाजामने। ते प्रभुन पातानी ५२ 'तच्छणे अदुढे' खायाना२ ५२ ५५ तन द्वेष मापन डतो मन पोताना ५२ 'चंदणाणुलेवणे अरत्ते' यहनना ५ ४२नारा प्रत्ये १२॥ सरमो પણ રાગ ભાવ ન હતો. પરંતુ બન્ને જાતના પ્રાણીઓ તરફ તેમના હૃદયમાં સમ ભાવ तो- द्वेष-विहीन थ गया al. 'लेहुम्मि कंचणम्मिय समे' तम्या सोनामा सह मुधि विनाना गया ता 'इहलोए' मां-मनुष्य मा भने 'परलोए' ५२४-देव सव माहिमा 'अपडिबद्धे' मेमनी मनिलाषा एत: नास पाभी हती. जीवियमरणे निरवकंखे न अने भरमा मेसीमाक्षा २हित २७ गया हता, Page #388 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अम्बूद्वीपप्रप्तसूत्रे दुस्सहपरीषहोपसर्गप्राप्तौ मरणविषये च वाच्छारहितः इत्यर्थः तथा 'संसारपारगामी' संसारपागामी - संसारस्य चतुर्विधगतिरूपस्य पारं गन्तुं शीलमस्येति तथा, निर्वाण गमनशील इत्यर्थः तथा 'कम्मसंगणिग्घायणद्वार' कर्मसङ्गनिर्घातनार्थाय - कर्मणां यः सङ्गः rasदेशैः सह आनादिकाः सम्बन्धस्तस्य निर्घातनार्थाय - निनाशाय 'अभुट्टिए ' अभ्युत्थितः - समुद्युक्त सन् 'विहरइ' विहरतीति ॥ सू० ४१॥ मूलम् - तस्स णं भगवंतस्स एएणं विहारेणं विहरमाणस्स एगे वास सहस्से विक्कंते समाणे पुरिमतालस्स नयरस्स वहिया सगडमुहंसि उज्जाणंसि णिग्गोहवरपायवस्स अहे झाणंतरियाए वट्टमाणस्स फगुणबहुलस्स इक्कारसीए पुव्वण्हकालसमए अट्ठमे भत्तेणं अपाणपणं उत्तरासादाणक्खत्तेणं जोगमुवागएणं अणुत्तरेणं णाणेणं जाव चरित्तेणं अणुत्तरेणं तवेणं बलेणं वीरिएणं आलएणं विहारेणं भावणाए सीए गुत्ती मुत्तीए तुट्ठीए अज्जवेणं मद्दवेणं लाघवेणं सुचरियसोवचिय फल निव्वाणमग्गेणं अप्पाणं भावेमाणस्स अणते अणुत्तरे निब्वाघाए ३७४ पर इन्हें "मैं और अधिक जिन्दा रहूँ तो इस प्रकार के सत्कार प्राप्त करता रहूँ" ऐसी अभिलाषा स्वप्न में भी नहीं होती थी, तथा दुस्सह परीषह और उपसर्ग की प्राप्ति होने पर इनके मन में ऐसी भावना भी नहीं उठती थी कि "मैं बहुत ही शीघ्र मर जाऊं तो इन आपत्तियों से मेरा पिण्ड छुटे" प्रत्युत जीवन और मरण में इनमें समभावना थी, क्योकि ये “संसार पारगामी" चतुर्विधगतिरूप जन्मजरामरण की व्याधिवाले इस संसार से पार जाने की कामना वाले थे अर्थात् समस्त कर्मों के क्षय से जायमान ऐकान्तिक आत्म शुद्धि रूप मुक्ति के पथिक थे, “कम्मसंग णिग्घायणणट्ठाए अब्भुट्टिए विहरइ" इसी कारण कर्मों के अनादिकाल से जीवप्रदेशो के साथ हुए सम्बन्ध को सर्वथा निर्मूल करने के लिये ये कटिबद्ध हुए ॥४१॥ ઇન્દ્રાદિ વગેરે દેવતાએ। વડે સત્કાર પામી ‘હુ વધારે આયુષ્ય ભાગવીને આ પ્રમાણે કાયમ સત્કાર મેળવતા રહું' એવી અભિલાષા સ્વપ્નમાં પણ એમને થતી નહતી તથા દુસહુ પરી હુ અને ઉપસર્ગ ની પ્રાપ્તિ થતાં એમનાં મનમાં એવી ભાવના પશુ ઉત્પન્ન થતી ન હતી કે 'હુ જલ્દી મરણ પામ્' તે આ સવ આપત્તિએથી મને મુક્તિ મળે “આ પ્રમાણે જીવન અને મરણ પ્રત્યે એમના મનમાં સોંપૂર્ણુતઃ સમભાવના-ઉત્પન્ન થઈ ચૂકી હતી. કેમકે એએ 'संसारपारगामी' स'सारथी - यतुर्विधगति ३५ ४-भराभरणुनी व्याधिवाणा या संसारथी પાર જવાની કામનાવાળા હતા. અર્થાત્ સમસ્ત કર્મના ક્ષયથી જાયમાન એકાન્તિક આત્મ द्धि ३५ भुक्तिना येथे। पथि हता. 'कम्मसंगणिधायणट्ठाए अब्भुट्टिए विहरइ' જ કર્મોના અનાદ્રિકાલથી જીવ પ્રદેશેાની સાથે થયેલ સ`અશ્વને સપૂતઃ નિર્મૂળ પાર્ટ એએ એકદમ ટિમદ્ધ થઈ ગયા હતા ૫૪૧ાા 1 Page #389 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार ४२ भगवतः केवलज्ञानोत्पत्तिवर्णनम् निरावरणे कसिणे पडिपुण्णे केवलवरनाणदंसणे समुप्पण्णे जिणे जाए के वली सव्वन्नू सबदरिंसी स णेरइयतिरियनरामरस्स लौगस्स पज्जवे जाणइ पासइ, तं जहा आगई गई ठिई चवणं उववायं भुत्तं कडं पडिसेवियं आवीकम्मं रहो कम्मं तं कालं मणवयकाए जोगे एवमादी जीवाणवि सब्बभावे अजीवाणवि सव्वभावे मोक्खमग्गस्स विसुद्धतराए भावे जाणमाणे पासमाणे एस खलु मोक्खे मग्गे मम अण्णेसि च जीवाणं हियसुहणिस्सेयसकरे सव्वदुक्खविमोक्ख परमसुहसमाणे भविस्सइ ॥सू० ४२॥ . छाया-तस्या स्खलु भगवत एतेन विहारेण विहरमाणस्य एकस्मिन् वर्षसहने व्यतिक्रान्ते सति पुरिमतालस्य नगरस्य बहिः शकटमुखे उद्याने न्यग्रोधपादपस्याधोध्यानान्तरिकायां वर्तमानस्य फाल्गुनबहुलस्य एकादश्यां पूर्वाहकालसमये अष्टमेन भक्तेन अपानकेन उत्तराषाढानक्षत्रे योगमुपागते, अनुत्तरेण ज्ञानेन यावत् चारित्रेण, अनुत्तरेण तपसाबलेन वीर्येण आलयेन विहारेण भावनया क्षान्त्या गुप्त्या मुक्या तुष्टया आजवेण मार्दवेन लाघवेन सुचरितसोपचितफलनिर्वाणमार्गेण आत्मानं भावयतोऽनन्तम् अनुत्तरं निा . घातं निसवरणं कृत्स्नं प्रतिपूर्ण केवलवरक्षानदर्शन समुत्पन्नम्, जिनो जातः केवली सर्वक्षः सर्वदर्शी स नैरयिकतिर्यनरामस्य लोकस्य पर्यवान् जानाति पश्यति, तद्यथा-आगति गति स्थति व्यवनम् उपपातं भुक्तं कृतं प्रतिसेवितं आविष्कर्म रहः कर्म, तस्मिन् तस्मिन् काले मनोवाकायान् योगान् एवमादीन् जीवानामपि सर्वभावान् अजीवानामपि सर्वभावान् मोक्षमार्गस्य विशुद्धतरकान् भावान् जानन् पश्यन् , एष स्खलु मोक्षमार्गों ममान्येषां च जीवानां हितसुखनिःश्रेयसकरः सर्वदुःखविमोक्षणः परमसुखसमोपन्नो भविष्यति ॥सू० ४२॥ ___टीका-'तस्सणं' इत्यादि । 'सस्सणं' तस्य-ऋषभस्य खलु 'भगवंतस्स' भगवतः एएणं' एतेन-अनन्तरोक्तेन 'विहारेणं' विहारेण 'विहरमाणस्स' विहरमाणस्य-विचरतः 'एगे वाससहस्से' एकस्मिन् वर्षसहस्रे 'विइक्कंते' व्यतिक्रान्ते सति एक सहस्त्रवर्षेषु व्यतीतेषु 'समाणे' सत्सु 'पुरिमतालस्स नयरस्स बहिया' पुरिमतालस्य नगरस्य बहिः पुरिम "तस्स णं भगवंतस्स एएणं विहारेणं विहरमाणस्स" इत्यादि । टोकार्थ-"तस्स णं भगवंतस्स एएणं विहारेणं विहरमाणस्स एगे वाससहस्से विइक्कते समाणे" इस तरह की परिणति में एकतान होकर विहार करते करते जब प्रभु का एक हजार वर्ष 'तस्स णं भगवंतस्स एएणं विहारेणं' त्यादि टी -'तस्स ण भगवंतस्स एपण विहारेण विहरमाणस्स एगे वाससहस्मे विड क्कंते समाणे' मा ततनी परिपतीमा तान थन विहार ४२i ४२di प्रभुने न्यारे मे ॥२ ५२॥ या त्यारे 'पुरिमतालस्स नयरस्स बहिया सगडमुहंसि Page #390 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३७६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तालनगराद् बहिःस्थिते 'सगडमुहंसि उज्जाणंसि णिग्गोहबरपायवस्स' शकटमुखे उद्याने न्यग्रोधवरपादपस्य वटवृक्षस्य 'अहे' अधः अधोभागे 'झाणंतरियाए' ध्यानान्तरिकायाम् अन्तरस्य विच्छेदस्य करणम् अन्तरिका, अथवा अन्तरमेव आन्तयं तस्य स्त्रीत्व विवक्षायाम् आन्तरी, सैव आन्तरिका, ध्यानस्य आन्तरिका ध्यानान्तरिका पृथक्त्ववितर्क सविचारम् १, एकत्ववितर्कमविचारम् २, सूक्ष्मक्रियमप्रतिपाति ३, व्युच्छिन्नक्रियानिवृत्ति ४, इति चतुश्चरणात्मकस्य शुक्लध्यानस्य आधचरणद्वयध्यानानन्तरं चरमचरणद्वयस्य या अप्राप्तिःसा ध्यानान्तरिका, योगनिरोधरूपस्य तृतीयचतुर्थचरणध्यानस्य चतुदशगुणस्थानवर्तिनि केवलिनि संभवात्तदानीं तस्य भगवतस्तदप्राप्तिर्बोध्या, एवं भूता या ध्यानान्तरिका तस्यां 'वट्टमाणस्स' वत्तेमानस्य, 'फग्गुणवहुलस्स' फाल्गुनबहुलस्य फाल्गुनकृष्णपक्षस्य 'एक्कारसीए' एकादश्याम् एकादशी तिथौ 'पुव्वण्हकालसमए' पूर्वाह्नकालसमये अह्नः पूर्वी भागः पूर्वाह्नः, तद्रूपो यः कालसमयस्तस्मिन्, 'अपाणएणं अपानकेन निर्जलेन 'अट्ठमेणं भत्तेणं' अष्टमेन भक्तेन युक्तस्येति गम्यं तथा 'उत्तरा साढाणक्खत्तण' उत्तराषाढानक्षत्रे चन्द्रेण सह 'जोगमुवागएणं' योगम् उपागते प्राप्ते सति, अणुत्तरेणं' अनुत्तरेण क्षपकश्रेणि समारूढत्वेन केवलसामीप्यतः परमविशुद्धिप्रप्तत्वेन का समय समाप्त हो चुका "पुरिमतालस्स नयरस्स बहिया सगडमुहंसि उज्जाणंसि णिग्गेहवरपाय बस्स अहे झाणंतरियाए वट्टमाणस्स" तब पुरिमताल नगरके बाहर के शकट मुख नामके उद्यान में न्यग्रोध वृक्ष के नीचे ध्यानान्तरिका में विराजमान-पृथक्त्ववितर्क सविचार १, एकत्त्ववितर्क - विचार २, सुक्ष्मक्रिया अप्रतिपाति ३ और व्युच्छिन्नक्रियानिवृत्ति ४ भेदवाले शुक्लध्यान के आदि के दो भेदों के अनन्तर अन्त के दो भेदों की अप्राप्ति का नाम ध्यानान्तरिका है क्योंकि इनकी प्राप्ति चौदहवें गुणस्थानवर्ती केवली को होती हैं, भगवान् के उस काल में इनकी अप्राप्ति थी, ऐसी इस ध्यानान्तरिका में स्थित “फग्गुण बहुलस्स इक्कारसीए पुवण्हकालसमए अमेणं भतेणं अपाणएणं" फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन पूर्वाह्न काल के समय में अष्टम भक्त से जब प्रभु युक्त थे "उत्तरासाढा णक्खत्तेणं जोगमुवागएण" तब चन्द्र के साथ उत्तराषाढा नक्षत्र के योग में "अणुत्तरेणं णाणेणं जाव चरित्तेणं" अनुत्तरज्ञान से क्षपक श्रेणि पर मारूढ़ हुए जीव णिग्गोहवरपायवस्स अहे झाणतरियाप वट्टमाणस्स' रिमतात नभनी महार शट મુખ નામના ઉદ્યાનમાં ન્યગ્રોધ વૃક્ષની નીચે ધ્યાનાન્તરિકામાં વિરાજમાન થઈ ગયા. ૧ પૃથકવિતર્ક સવિચાર, ૨ એકત્વરિતક અવિચાર, ૩ સૂમક્રિયા અપ્રતિપાતિ. ૪ વ્યછિન ક્રિયા નિવૃત્તિ એ રીતે ચાર પ્રકારના ભેદવાળા શંકલધ્યાનના પહેલાના બે ભે નો પછી અન્તના બે ભેદની અપ્રાપ્તિનું નામ યાનાન્તરિકા છે. કેમકે–તેની પ્રાપ્તિ ચૌદમાં ગુણસ્થાનમાં રહેલા કેવલીને જ થાય છે. ભગવાનને તે કાળે એની અપ્રાપ્તિ હતી. मेथी व ध्यानान्तभित २९ गवान् 'फग्गुणबहुलस्स इक्कारसीए पुव्वण्हकालसमए अहमण भत्तेणं अपाणएणं' शुन महीनान g५क्षनी शीना से पूर्वाहना अभयमा ममतथा युतsau त्यारे 'उत्तरासादा णक्खसेण जोगमुवागणं' यन्द्रनाथ Page #391 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि०वक्षस्कार सू. ४२ भगवतः केवलज्ञानोत्पत्तिवर्णनम् ३७७ च नास्ति उत्तरं प्रधानं छाअस्थिकं ज्ञानं यस्मात्तदनुत्तरं तेन तथाभूतेन 'णाणेणं' ज्ञानेन, 'जाव' यावत्पदेन दर्शनेनेति संग्राह्यम् , अनुत्तरेणेत्यस्य तु दर्शनेत्यारभ्य विहारेणेत्यन्तपदेषु सर्वत्रान्वयः, ततश्च अनुत्तरेण क्षायिकभावापन्नेन दर्शनेन सम्यक्त्वेन, अनुत्तरेण क्षायिकभावापन्नेन 'चरित्तेणं' चारित्रेण विरतिपरिणामेन, तथा 'अणुत्तरेण अनुत्तरेण सर्वोत्कृष्टेन 'तवेण" तपसा द्वादशविधानशनेन, अनुत्तरेण 'बलेणं' बलेन शारीरिक शक्त्या, अनुत्तरेण 'वीरिएणं' वीर्येण सामर्थ्यन, अनुत्तरेण आलएणं' आलयेन निर्दोष वसत्या, अनुत्तरेण 'विहारेणं' विहारेण गोचर्यादौ दोषपरिहारपूर्वकं विचरणेन, अनुत्तरया 'भावणाए' भावनया पदार्थानित्यत्वादिभावनया, अनुत्तरया 'खत्तीए' क्षान्त्या क्रोधनिरोधेन, अनुत्तरया'गुत्तीए' गुप्त्या मनोगुप्त्यादिरूपया, अनुत्तरया 'मुत्तीए' मुक्त्या निर्लोभतया अनुत्तरया 'तुट्टीए' तुष्टया सन्तोषेण, अनुत्तरेण 'अज्जवेण' आर्जवेन मायानिरोधेन अनुत्तरेण मद्दवेण मार्दवेन माननिरोधेन अनुत्तरेण 'लाघवेण 'लाघवेन क्रियानैपुण्येन को ही नियम से केवलज्ञान की प्राप्ति होती हैं क्यों के उस समय जीव १२वें गुणस्थान के अन्त में ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन कमौका--समूल विनाश कर चुका होता हैं, अतः केवलज्ञान के वह ज्ञान बिलकुल समीप पहुँच जाता है, छमस्थावस्था का ज्ञान इस क्षायिक ज्ञान के समक्ष अविशुद्ध होता हैं और यह केवलज्ञान-क्षायिक ज्ञान-परम विशुद्धिवाला होता है-ऐसे केवलज्ञान के समीप पहुँचे हुए ज्ञान से, यावत्पदग्राह्य-अनुत्तर दर्शन से, अनुत्तर चारित्र से "मणुत्तरेण तवेणं" तथा सर्वोत्कृष्ट तप से "बलेणं-वीरिएणं आलएण विहारेण" अनुत्तर बल से, अनुत्तर निर्दोष वसति से, अनुत्तर विहार से-गोचरी आदि में दोष परिहार पूर्वक विचरण से, "भावणाए" अनुत्तर भावना से-पदार्थो सम्बन्धी अनित्यत्वादि विचारधारा से, "खतिए" अनुत्तर क्षान्ति से-क्रोध के निरोध से, "गुत्तीए" अनुत्तर मनोगुप्त्यादि रूप गुप्ति से, "मुत्तीए" अनुत्तर निर्लोभतारूप मुक्ति से,"तुट्ठोए" अनुत्तर संतोष से, "अज्जवेणं' अनुत्तर आर्जव-माया उत्तराषाढा नक्षत्रना योगमा 'अणुत्तरेणं णाणेणं जाव चरितण' मनुत्तरज्ञानथा क्ष५४०ी આરઢ થયેલા જીવને નિયમથી કેવલ જ્ઞાનની પ્રાપ્તિ થાય છે. કેમકે તે સમયે જીવે ૧૨ માં ગુણસ્થાનના અંતમાં જ્ઞાનાવરણ, દશનાવરણ અને અંતરાય એ કર્મોને સમૂળ વિનાશ કરી ચૂકેલ હોય છે. તેથી કેવળજ્ઞાનની બિલકુલ નજીક તે પહેાંચી જાય છે. છસ્થાવસ્થાનું જ્ઞાન આ ક્ષાયિક જ્ઞાન પાસે અવિશુદ્ધ હોય છે. અને તે-કેવળ જ્ઞાનક્ષાયિકજ્ઞાન પરમવિશુદ્ધ હોય છે. એવા કેવળજ્ઞાનની સમીપ પહોંચેલા જ્ઞાનથી યાત્પદગ્રાહ્યअनुत्तरश नथी अनुत्तर यारथी 'अणुत्तरेण तवेणं' तथा सर्वोत्कृष्ट त५थी, 'बलेण वीरिएण आलएण विहारेणं' अनुत्त२ थी, अनुत्तर निषि वसतिथी, अनुत्तर-विहारथी शायरी विगेरेभा होष निवृत्ति५४ वियथा 'भावणाए' भनुत्तर भावनाथी पहार्थी संधी मनित्यत्वादिवियारधाराथी 'खंतीए' अनुत्तरक्षांतिथी-छोपना निराधथी 'गुत्तीप' अनुत्तर भनात्या६३५ मुस्तिथी 'मुत्तीए' अनुत्तर (Rale३५ भुतिया 'तुट्ठीए' अनुत्तर संतोषयी 'अज्जवेणं' अनुत्त२ मा 4-माया निराधया, 'महवेण' अनुत्तरमान Page #392 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३७८ अनुत्तरेण 'सुचरिय सोवचियफलनिव्वाणमग्गेणं' सुचरितसोपचितफलनिर्वाणमार्गेणसुचरितस्य सदाचरणस्य पुण्यस्य यत् सोपचितम् - उपचितेन उपचयेन सहितं सोपचितं पुष्टं यत्फलं परिणामो निर्वाणमार्गः असाधारणरत्नत्रयरूपस्तेन तथाभूतेन च 'अपाणं भावेमाणस्स' आत्मानं भावयतः वासयत ः 'अनंते' अनन्तम् निरवसानं विनाशरहितत्वात् 'अणुत्तरे' अनुत्तरं सर्वोत्कृष्टं तत उत्कृष्टस्याभावात्, 'णिव्वाघाए' निर्व्याघातं व्याघातवर्जितं - कटकुडयादिभिरप्रतिहतत्वात्, 'णिरावरणे" निरावरणम् - आवरणवर्जितं क्षायिकत्वात्, 'कसिणे' कृत्स्नं - समग्रं सकलार्थग्राहकत्वात्, 'पणिपुण्णे' प्रतिपूर्ण - सर्वतः पूर्ण चन्द्रवत् सकलस्वांशयुक्तत्वात् इति अनन्तेत्यादिविशेषणविशिष्टं 'केवल निरोध से, “मद्दवेणं” अनुत्तर माननिरोधरूप मार्दव से, "लाघवेणं" अनुत्तर लाघव से -क्रिया में नैपुण्य से और "सुरि सोवचियफलनिव्वाणमग्गेणं" अनुत्तर सुचरित सोपचितफलनिर्वाण मार्ग से- सुचरित -सदा-चरणरूप पुण्य का जो सोपचित - पुष्ट फल- निर्वाणमार्ग जो कि असाधारण रत्नत्रयरूप हैं उससे ‘अप्पाणं भावे माणस्स" अपने आपको भावित करते हुए "अणते अणुत्तरे निव्वाधार निरावरणे कसिणे पडिपुण्णे केवलवर नाणदंसणे समुप्पण्णे" अनन्त, अनुत्तर, निर्व्याघात, निरावरण, कृत्स्न, प्रतिपूर्ण, केवलवरज्ञान दर्शन उत्पन्न हो गया, केवलवरज्ञानदर्शन के इन विशेषणों का सारांश ऐसा है कि यह विनाश रहित होता है इसलिये अनन्त कहा गया है, सर्वोत्कृष्ट होता है इसलिये अनुत्तर कहा गया है, क्योंकि इससे उत्कृष्ट और ज्ञान दर्शन नहीं होता है । यह कट कुडय आदि आवरणों द्वारा अप्रतिहत होता है इसलिये इसे व्याघातवर्जित कहा गया है, क्षायिकरूप होने से यह आवरण से वर्जित होता है इसलिये निरावरण कहा गया है, सकलार्थ का ग्राहक होता है-मूर्त पदार्थ और अमूर्त पदार्थ इन सबको यह ग्रहण करनेबाला होता है-इसलिये इसे कृत्स्न कहा गया है, सब तरफ से यह पूर्ण होता है-चन्द्र की तरह निरोधश्य भाईदथी 'लाघवेणं' अनुत्तर साधवथी- प्रियामां नियुयुताथी भने 'सुच रिसोवचियफलनिव्वाणमग्गेणं' अनुत्तर सुयरित सोयन्यित इस निर्वाणु भार्गथी सुन्य તિ-સદાચરણુરૂપ પુણ્યનુ જે સેાપચિતિ-પુષ્ટ-ફળ-નિર્વાણું-માગ કે જે અસાધારણ रत्नत्रय३५ छे, तेनाथी 'अप्पाणं भावेमाणस्स' पोतपोताने भावित ४२ 'अणते अणुत्तरे निव्वाधार निरावरणे कसिणे पडिपुण्णे केवलवरनाणदंसणे समुप्पण्णे अनंत अनुत्तर, નિર્વ્યાઘાત, નિરાવરણુ કૃત્સ્ન, પ્રતિપૂર્ણ, કેવલવર જ્ઞાનદશંન ઉત્પન્ન થયા. કેવલવર જ્ઞાન દનના ઉપયુ`કત વિશેષણેના સારાંશ આ પ્રમાણે છેકે એ વિનાશ રહિત હૈાય છે. એથી અનંત કહેવામાં આવેલ છે, સર્વોત્કૃષ્ટ હાય છે એથી અનુત્તર કહેવામાં આવેલ છે, કેમકે એનાથી ઉત્કૃષ્ટ જ્ઞાન-દનની શકયતા જ હેાતી નથી. તે કટ, કુડ્સ વગેરે આવરણેા દ્વારા અપ્રતિત હોય છે. એથી આને વ્યાઘાત વજીત કહેવામાં આવેલ છે. ક્ષાયિકરૂપ હાવાથી આ આવરણથી વિત હાય છે. એથી એ નિરાવરણ કહેવામાં આવેલ છે. એ સકલાયના ગ્રાહક હાય છે. મૂર્ત પદાર્થ અને અદ્ભૂત પદાથ એ સર્વે ને એ ગ્રહણ કરનાર હોય છે. એથી આને કૃષ્ન કહેવામાં આવેલ છે. એને ચારે તરફથી પૂ હાય છે, ચન્દ્રની જેમ આ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे Page #393 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि वक्षस्कार सू. ४२ भगवतः भगवतः केवलज्ञानोत्पत्तिवर्णनम् ३७९ वरनाणदंसणे' केवलवरज्ञानदर्शनं - केवलम् अद्वितीयत्वात् असहायं वरं श्रेष्ठं ज्ञानंसामान्यविशेषोभयात्मके ज्ञेयवस्तुनि विशेषावधारणरूपं, दर्शनं च सामान्यावधारणरूपंनिर्विशेषं विशेषाणां ग्रहो दर्शनम्' इति वचनात् तत्तथाभूतं 'समुप्पण्णे' समुत्पन्नम् सम् सम्यकु क्षायिकत्वेनावरण देशस्याप्यभावादुत्पन्नं प्रादुर्भूतमिति । अत्रेदं बोध्यम् यथा दूरात् विभिन्न जातीयवृक्षसमूह तत्तज्जातीयवृक्षत्वेनानवधारितमवलोकयतो जनस्य सामान्येन यो वृक्षमात्रग्रहः स दर्शनमुच्यते, यत्पुनरासन्न प्रदेशात्तमेव विभिन्नजातीय' यह सकल अपने अंशों से युक्त होता है, इसलिये इसे प्रतिपूर्ण कहा गया है, ज्ञान को अद्वितीय होने से केवलपद से और अन्यज्ञानादिकों की सहायता से रहित होने से वर श्रेष्ठ कहा गया है, इस तरह का केवलज्ञान उन प्रभु के उत्पन्न हुआ, ज्ञान जो होता है वह सामान्य विशेषधर्मविशिष्ट वस्तु का विशेषरूप से निश्चय करनेवाला होता है और दर्शन जो होता है वह सामान्यरूप से ही वस्तु का जानने वाला होता है, "निर्विशेषं विशेषाणां ग्रहो दर्शनम् " ऐसा कथन है जिस समय केबलज्ञान केवलदर्शन उत्पन्न होते हैं उस समय आत्मा में आवरण का एक अंश भी मौजूद नहीं होता है; आवरण का सर्वथा अभाव हो जाता है । यहां इस प्रकार समझना चाहिये जब कोई मनुष्य दूर से विभिन्न जातिवाले वृक्षों के समूह को देखता है तब उसे यह प्रतीत नहीं होता है कि इस वृक्ष समूह में अमुक अमुक जाति अमुक अमुक वर्ण आदि के वृक्ष है वहां तो सामान्यरूप से ही वृक्षत्व जाति का ज्ञान होता है, अतः ऐसा जो यह ज्ञान है इसी का नाम दर्शन है और जब वही मनुष्य पास में पहुंच जाता है तो उसे यह आमलकी है, यह स्वदिर है, यह पलास है इत्यादि रूप से जो ज्ञान होता है वह विशेषग्राही ज्ञान कहा जाता है यही ज्ञान और दर्शन में भेद है । પેાતાના સવ અંશોથી યુક્ત હાય છે, એથી આને પ્રતિપૂર્ણ કહેવામાં આવેલ છે. જ્ઞાન અદ્વિતીય હાવા બદલ, કેવલ પદ્મથી અને અન્ય-જ્ઞાનાદિકાની સહાયતાથી રિહંત હાવા બદલ વર-શ્રેષ્ઠ કહેવામાં આવેલ છે. આ જાતનુ" કેવળ જ્ઞાન તે પ્રભુને ઉત્પન્ન થયું. જ્ઞાન જે હાય છે તે સામાન્ય વિશેષ ધમ વિશિષ્ટ વસ્તુને વિશેષ રૂપથી નિશ્ચય કરનારું હાય छे. अने दर्शन होय छे ते सामान्य ३५थी ४ वस्तुने गुना होय हे "निर्विशेषं विशेषाणां ग्रहो दर्शनम्" आवु अथन छे में समये देव ज्ञान, देवण दर्शन उत्पन्न घाय છે, તે સમયે આત્મામાં આવરણને એક અંશ પણ વિદ્યમાન હાતા નથી. એટલેકે આવરણને સવથા અભાવ થઈ જાય છે અહીં આ પ્રમાણે સમજવુ જોઈએ કે જ્યારે કોઈ મનુષ્ય દૂરથી વિભિન્ન જાતિવાળા વૃક્ષાના સમૂહને જુએ છે ત્યારે તેને એવી પ્રતીતિ થતી નથી કે આ વૃક્ષ સમૂહમાં અમુક જાતિના કે અમુક-અમુક વણૅ અાદિના વૃક્ષે છે ત્યાં તો જોનારને સામાન્ય રૂપથી વૃક્ષત્વ જાતિનું જ જ્ઞાન થાય છે. એથી આવું જે જ્ઞાન છે, તે જ દન કહેવાય છે. અને જ્યારે તે જ જોનારી વ્યક્તિ પાસે પહોંચે છે ત્યારે તેને આ આમલકી છે, આ ખદિર છે, આ પલાશ છે વગેરે રૂપથી જ્ઞાન થાય છે. એ જ્ઞાન વિશેષગ્રાહી જ્ઞાન કહેવાય છે. જ્ઞાન અને દનમાં આટલા જ તફાવત છે. Page #394 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३८० जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे वृक्षसमूहमुत्पश्पतस्तत्तज्जातीयविशिष्टवृक्षग्रहः स ज्ञानमुच्यते । अयमेव ज्ञानदर्शनयोविशेषः । ननु ज्ञानदर्शनयोविंशेषसामान्यग्राहिल्वेन भेदे केवलज्ञानदर्शनयोः प्रत्येकं सकलार्थग्राहकता न स्यात्, युज्यते च एकैकस्य सकलार्थग्राहकत्वम् ? इति चेत्, आह-ज्ञानक्षणे केवलिनो ज्ञानं सकलविशेषान् गृह्णन् प्रकाशते इति सकलविशेषरूपं सामान्यमपि प्रतिभातमेव । दर्शनक्षणे तु दर्शनं सामान्यं गृह्णन् प्रकाशते इति सकलविशेषा अपि प्रतिभाता एव, विशेषरहितस्य सामान्यस्य ग्रहणासंभवात् । अत एव 'निर्विशेष विशेपाणां ग्रहो दर्शनम्' इत्युच्यते। अतो-ज्ञानदर्शनयोः प्रत्येकसकलार्थग्राहित्वं न विरुध्यते । परमयं विशेषः ज्ञाने प्राधान्येन विशेषाः गौणत्वेन सामान्यं, दर्शने तु प्राधान्येन सामान्यं गौणत्वेन विशेषा इति । अथ समुत्पन्नकेवलज्ञानो भगवान् यथा जातस्तदाह'जिणे जाए' इत्यादि । समुत्पन्नकेवलज्ञानी स भगवान् 'जिणे' जिनो रागादिजेता शंका-ज्ञान और दर्शन में विशेषग्राहकता और सामान्य ग्राहकता की अपेक्षा से यदि भेद माना जाता है तो फिर केवली के ज्ञान और दर्शन में प्रत्येक में सकलार्थ प्राहकता नहीं बन सकती है परन्तु वहां तो सकलार्थ ग्राहकता मानी गई है ! तो इस शंका का उत्तर ऐसा है कि केवली का ज्ञान ज्ञानक्षण में सकल विशेषों को ग्रहण करता हुआ ही प्रकाशित होता है सो उस समय सकल विशेषरूप जो सामान्य हैं वह अप्रकाशित नहीं रहता है वह भी प्रकाशित हो जाता है, इसो तरह जब दर्शन क्षण में दर्शन सामान्य का प्रकाशन करता है-तब सकलविशेष भी प्रकाशित हो जाते हैं क्योंकि विशेषरहित सामान्य का ग्रहण होना असंभव है । इसलिये "निर्विशेष विशेषाणां ग्रहो दर्शनम्" ऐसा कहा गया है । इसलिये ज्ञानदर्शन इन दोनों में से प्रत्येक में सलार्थग्राहकता विरुद्ध नहीं होती है । परन्तु विशेषता यही है कि ज्ञान में विशेष की प्रधानता रहती है और सामान्य को गौणता रहती है और दर्शन में सामान्य की प्रधानता रहती है और विशेष की गौणता रहती है। भगवान् को जब केवल ज्ञान उत्पन्न हो गया-तब प्रभु "जिणे જ શંકા -જ્ઞાન અને દર્શનમાં વિશેષ ગ્રાહકતા અને સામાન્ય ગ્રાહકતાની અપેક્ષાથી જે ભેદ માનવામાં આવે તે પછી કેવલીના જ્ઞાન અને દર્શનમાં પ્રત્યેકમાં સકલાર્થ ગ્રાહકતા સિદ્ધ થઈ શકતી નથી પરંતુ ત્યાં તો સકલાર્થ ગ્રાહકતા માનવામાં આવી છે? તે આ શંકાના જવાબમાં આમ કહી શકાય કે કેવલીનું જ્ઞાન ક્ષણમાં સકલ વિશેષણેને ગ્રહણ કરતાં કરતાં પ્રકાશિત થાય છે, એટલા માટે તે સમયે સકલ વિશેષ રૂપ જે સામાન્ય છે તે અપ્રકાશિત રહેતું નથી. પણ તે પ્રકાશિત થઈ જાય છે. આ પ્રમાણે જ્યારે દશનક્ષણમાં દર્શન સામાન્યનું પ્રકાશન કરે છે ત્યારે સકલ વિશેષ પણ પ્રકાશિત થઈ જાય છે, કેમકે વિશેષ રહિત સામાन्य अहए थमस व छे. मेथी 'निर्विशेषं विशेषाणां ग्रहो दर्शनम्" माम मामा આવ્યું છે. એથી જ્ઞાનદશન એ બન્નેમાંથી દરેકમાં સકલાર્થ ગ્રાહકતા વિરુદ્ધ હતી નથી. પણ વિશેષતા આ પ્રમાણે છે કે જ્ઞાનમાં વિશેષની પ્રધાનતા રહે છે. અને સામાન્યની ગૌણતા રહે છે અને દર્શનમાં સામાન્યની પ્રધાનતા રહે છે અને વિશેષની ગણતા રહે છે. सशवानने न्यारे उवण ज्ञान ५न्न यु. त्यारे ५ "जिणे जाए" जिन-पट Page #395 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार ४२ भगवतः केवलज्ञानोत्पत्तिवर्णनम् 'जाए' जातः, ततः स 'केवली' केवली श्रतज्ञानादि सहायवर्जितज्ञानवान् , अतएव 'सधन्नू' सर्वज्ञः विशेषांशप्राधान्येन सर्वपदार्थज्ञाता, 'सव्वदरिसी' सर्वदर्शी सामान्यांशप्राधान्येन सर्वपदार्थज्ञाता सन्' स णेरइयतिरियनरामरस्स' स नैरयिकतिर्यन्नरामरस्य-नैरयिकाश्च नराश्च अमराश्चेति-नैरयिकतिर्यनरामराः, तेः सहितो यः स तस्य तथाभूतस्य 'लोगस्स' लोकस्य पञ्चास्तिकायात्मक क्षेत्रखण्डस्य, उपलक्षणात् अलोकस्य नभः प्रदेशमात्रात्मकक्षेत्रविशेषस्यापि पज्जवे' पर्यायान् क्रमभाविस्वरूपविशेषान् 'जाणइ' नानाति केवलज्ञानेन, ‘पासइ' पश्यति केवलदर्शनेनेति । तानेव पर्यायानाह'तं जहा' इत्यादिना । 'तं जहा' तद्यथा 'आगई' आगति नैरयिकदेवगतिभ्यां च्युत्वा तिर्यग्योनौ मनुष्ययोनौ वा आगमनम् ‘गई गति मनुष्यगतौ तिर्यग्गतौ वा मृत्वा देवगतौ नारकगतौ वा गमनं, "ठिई' स्थितिं कायस्थितिं भवस्थिति च 'चवणं' च्य वनं देवलोकान्नरकाच्च च्युति, 'उववाय' उपपातं देवगतौ नारकगतो वा जन्म, 'भुत्तं' जाए" जिन-रागादिकों के जेता हो गये, "केवली" ३ वली हो गये-श्रुतज्ञान आदि को सहायता से वर्जित ज्ञान वाले बन गये,अतएव “सव्वन्नू" सर्वज्ञ-विशेषांशों की प्रधानता को लेकर समस्त पदार्थों के ज्ञाता बन गये, “सव्वदरिसी" सर्वदर्शी-सामान्यांश की प्रधानता लेकर सर्व पदार्थों के ज्ञाता दृष्टा बन गये, “स णेरइयतिरियनरामरस्स लोगस्स पज्जवे जाणइ पासइः' इस तरह वे प्रभु नैरयिक, तिर्यञ्च, नर, और देव इन से युक्त इस पञ्चास्तिकायात्मक लोक के और उपलक्षण से नभः प्रदेशमात्रात्मक अलोक के ज्ञाता दृष्टा बन गये अर्थात् लोक और अलोक : की जो क्रमभावी पर्यायें है उन सब के हस्तामल कवत् देखने जानने वाले हो गये, "तं जहा-आगई गई ठिहचवण उववायं भुत्तं कडं पडिसेवियं-आवीकम्मं रहो कम्मं " नैरयिक और देवगति से चवकर मनुष्य अथवा तिर्यश्च गति में आगमन के मनुष्यगति और तिर्यञ्चगति में से मरकर देवगति अथवा नरकगति में गमन के कायस्थिति के, देवलोक से और नरकलोक से चवन के, देवगति में રાગાદિકના વિજેતા થઈ ગયા. કેવળા થઈ ગયા-શ્રુતજ્ઞાન વગેરેની સહાયતાથી વજિત ज्ञानवाणा गया. मेथी तमाश्री 'सव्वन्नू' सश-विशेषांशानी प्रधानता ने समस्त पहाना ज्ञाता मनी गया. 'सव्वदरिसी' सपा -सामान्यांनी प्रधानता ने सपा पहाना ज्ञाता-दृष्ट-मानी गया. 'स णेरइयतिरियनरामरस्स लोगस्स पज्जवे जाणा पासइ' मा प्रमाणे ते प्रभु २यि तियय, न२ भने ४१ मेमनाथी युत भा५यास्तिકાયાત્મક જીવ લેકના અને ઉપલક્ષણથી–નભઃ પ્રદેરામાત્રાત્મક અલકના જ્ઞાતા-દષ્ટ બની ગયા. અર્થાત લેક અને અલેકના જે ક્રમભાવી પર્યા છે, તે સર્વના હસ્તામલકવત જેનારા अनजाता थगया. 'तं जहा-आगई गई ठि चवणं उववाय भत्तं कडं पडिसेवियं आवि कम्मं रहोकम्म नयि४ अने पतिथी यवान मनुष्य अथवा तियर गतिमा मासમનના, મનુષ્ય ગતિ અને તિર્યંચ ગતિમાંથી મૃત્યુ પામીને દેવગતિ અથવા નરકગતિમાં ગમનના, કાયસ્થિતિના, દેવકથી અને નરલેકથી અવનના દેવગતિમાં અને નરકગતિમાં જન્મના, ભુફતના, એકાન્તમાં અશિતના, કૃતના–એકાંતમાં કૃત ચૌયદિ કર્મના, પ્રતિ સેવિ Page #396 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३८२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसुत्रे भुक्तम् एकान्तेऽशितं, 'कडं' कृतं एकान्ते कृतं चौर्यादि, 'पडिसेवियं' प्रतिसेवितं मैथुनादि, 'आवीकम्म' आविष्कर्म प्रकटकृतम् , 'रहोकम्म' रहकर्म एकान्तकृतमिति एतान् आगत्यादीन् पर्यायान् स भगवानृषभदेवः केवलज्ञानदर्शनेन जानाति पश्यतीत्यर्थः । तथा 'तं तं कालं' इत्यत्र प्राकृतत्वात्सप्तम्यर्थे द्वितीया, ततश्च तं तं कालं मणवयकाए जोगे' तस्मिन् तस्मिन् काले मनोवाक्कायान् योगान् करणत्रयरूपान् ‘एवमादी' एवमादीन् एवम्प्रकारान् 'जीवाणवि' जीवनामपि 'सव्वभावे' सर्वभावान् समस्तान् जीवधर्मान 'अजीवाणवि सव्वभावे' अजीवानामपि सर्वभावान् समस्तान् जीवधमान् रूपादीन् जानन् : पश्यन् विहरति, तथा 'मोक्खमग्गस्स' मोक्षमार्गस्य रत्नत्रयरूपस्य 'विसुद्धतराए' विशुद्धतरकान् अतिशयविशुद्धियुक्तान् कर्मक्षयहेतुभूतान् 'भावे' भावान् ज्ञानाचारादीन 'जाणमाणे पासमाणे' जानन पश्यन तथा 'एस' एषः वक्ष्यमाणप्रकारको 'मोखमग्गे' मोक्षमार्गः रत्नत्रयात्मकः 'खलु खलु निश्चयेन 'मम' मम उपदेशकस्य अषभस्य 'अण्णेसिं च' अन्येषां मदतिरिकानां च'जीवाणं' जीवानां और नरकगति में जन्मके, भुक्तके --एकान्तमें अशित के, कृतके-एकान्त में कृत चौर्यादि कर्म के, प्रतिसेवित के-मैथुनादि कर्म के, आविष्कर्म के-प्रकट में किये गये कर्म के, और रहः कर्म केएकान्त में आचरित कर्म के इस प्रकार से इन गति आगति आदि रूप पर्यायों के वे भगवान् साक्षात् ज्ञाता दृष्टा बन गये इसी तरह वे भगवान् “तं तं कालं मणवयकाए जोगे एवमादी जीवाणवि सव्वभावे अजीवाणवि सव्वभावे" समस्त जोवों के मन वचन काय रूप योगों के तथा उनसे सम्बन्ध रखने वाले और भी समस्त भावों के और अजीवों के समस्तभावों के-रूपादि अजीव धर्मों के ज्ञाता दृष्टा बन गये "मोक्खमग्गस्स विसुद्धतराए भावे जाणमाणे पास माणे" तथा-रत्नत्रयरूप मुक्तिमार्ग के अतिशय विशुद्धियुक्त-सकल कर्मों के क्षय में कारणभूत-भावोंके ज्ञानाचार आदिकों के ज्ञाता दृष्टा होते हुए “एस खलु मोक्खमग्गे मम अण्णेसिं च जीवाणं हिय मुहणिस्सेयसकरे सव्वदुक्ख विमोक्खणे परमसुह समाणणे भविस्सई" यह रत्नत्रयात्मक मुक्ति मार्ग निश्चय से मुझ उपदेशक ऋषभ को एवं मुझ से अतिरिक्त अन्य भव्य जीवों को हित सख તના–મથુનાદિ કર્મના, આવિષ્કમના, પ્રકટમાં કરવામાં આવેલ કર્મના અને રહઃ કર્મનાએકાન્તમાં આચરિત કર્મના આ પ્રમાણે આ ગતિ-સાગતિ આદિ રૂપે પર્યાયોના તે ભગવાન साक्षात् ज्ञाता हटा मनी गया. मारीत ते भगवान् 'तं तं कालं मणबयकाए जोगे एषमादी जीवाण वि सव्वभावे अजीवाण वि सव्वभावे' समस्त ७वाना मन-यन, ४ाय३५ये गाना તેમજ તેમનાથી સંબદ્ધ બીજા પણ સમસ્ત ભાવના અને અજીના સમસ્ત ભાવના ३पाहि १-धीना-शाता-हटा माना गया 'मोक्खमग्गस्स विसुद्धतराए भावे जाणमाणे' તેમજ રત્નત્રય રૂ૫ મુકિત માર્ગના અતિશય વિશુદ્ધિયુકત-સકલ કર્મોના ક્ષયમાં ક રણભૂતसावाना-जाना यार महिना ज्ञाता-हटा ने 'एस खलु मोक्खमग्गे मम अण्णेसिं च जीवाणं हियसुहणिस्सेयसकरे सव्वदुक्खविमोक्त्रणे परमसुइसमाणणे भविस्सइ' मा રત્નત્રયાત્મક મુકિતમાર્ગ નિશ્ચય પૂર્વક મને ઉપદેશક કષભનેતેમજ મારા સિવાય બીજા Page #397 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार ४२ भगवतः केवलशानोत्पत्तिवर्णनम् ३८३ 'हियसुहणिस्सेयसकरे' हितसुखनिःश्रेयसकरः, हितः परिणामशुभफलजनकः सुखम् आत्यन्तिकदुःखनिवृत्तिः, निश्रेयसं कल्याणकरं सकलकर्मक्षयलक्षणो मोक्षः, एतेषां करः कारक अत एव 'सव्वदुक्खविमोक्खणे' सर्वदुःखविमोक्षणः सर्वदुखेभ्यः शारीरमानससकलदुःखेभ्यो जीवान विमोक्षयति दूरी करोतीति तथा शारीरमानससकलदुःखापनेतेत्यर्थः तत एव 'परमसुहसमाणणे' परमसुखसमापनः परमम् विनाशाभावात् सर्वोत्कृष्टं यत् मुखं सातं तत् सम्पग याथातथ्येन आपयति प्रापयति ददाति यः स तथा परम सुखप्रदाता च 'भविस्सई' भविष्यतीति जानन पश्यंश्च विहरतीति । मूले हि 'सव्वन्नू सव्वदरिसी' इत्युक्तम् । तत्रोत्थं विचिकित्सा जायते केवलज्ञानं केवलदर्शनं च केवलज्ञान केवलदर्शनावरणयोः क्षीणमोहान्त्यसमय एव क्षीणत्वेन युगपदुत्पद्यते। ततश्च यथा 'सव्वन्नू सव्वदरिसी' इति ज्ञान प्राथम्यक्रमस्तथा 'सव्वदरिसीसव्वन्नू' इति दर्शनप्राथम्यक्रमोऽपि भवितुमर्हति, समानन्यायात् ? इति । अत्राह-'सव्वाओ लद्धीओ सागारोवउत्तनिःश्रेयसकर है परिणाम में शुभ है इसलिये हितरूप है, आत्यन्तिक दुःख की निवृत्तिरूप है इस लिए सुखकर है, और सकलकर्मों का क्षय करानेवाला है इसलिए निःश्रेयसकर है। इसी से सकल जीवों के शारीरिक, मानसिक समस्त दुःखों की निवृत्ति होती है इसी कारण यह सर्वदुःखविमोक्षणरूप कहा गया है और इसी से जीवों को अनन्त सर्वोत्कृष्ट जो सुख है उसका यह प्रदाता है पूर्व में हुआ है और आगे भी होगा, इस प्रकार से ज्ञाता दृष्टा बन गये यहां पर “सव्वन्न सव्वदरिसी" जो ऐसा सूत्रपाठ कहा गया है उसमें ऐसी विचिकित्सा संदेह हो सकती हैं कि केवल ज्ञान और केवल दर्शन, केवलज्ञानावरण और केवल दर्शनारण के क्षीणमोह नामके गुणस्थान के अन्त्य समय में ही क्षीण हो जाने से युगपत् उत्पन्न होते हैं तो फिर जिस प्रकार से सर्वज्ञ सर्व दी ऐसे कथन में ज्ञान की प्रथमता का क्रम कहा गया होता है उसी प्रकार "सव्वदरिसी सव्वन्नु" ऐसा भी दर्शन को प्रथमता का क्रम हो सकता है ? इसके लिए समाधान ऐसा है ભવ્ય ઇવેના માટે હિત-સુખ નિઃશ્રેયસ્કર છે, પરિણામમાં શુભ છે, એથી હિત રૂપ છે. આત્યન્તિક દુ:ખની નિવૃત્તિ રૂપ છે, એથી સુખકર છે અને સકલ કર્મોને ક્ષય કરનાર છે. એથી નિશ્રેયસ્કર છે, એથી જ સકલ જીવના શારીરિક-માનસિક સમસ્ત દુખની નિવૃતિ થાય છે, એટલા માટે જ આ સર્વદુખવિમોક્ષણ રૂપ કહેવામાં આવેલ છે અને એથી જ ના અનન્ત સર્વોત્કૃષ્ટ જે સુખ છે, તે સુખને આપનાર એ જ છે, ભૂતકાળમાં પણ સુખ આપનાર એ જ માર્ગ હતો અને ભવિષ્યમાં પણ સુખ આપનાર એ જ માર્ગ થશે, साप्रमाणेशाता-हष्टासनी गया. सही “सव्वण्णू सव्वदरिसो" २ मा तने। सूत्रा। કહેવામાં આવેલ છે, તેથી એવી વિચિકિત્સા (સંદેહ) થઈ શકે છે કે કેવળ જ્ઞાન અને કેવળ દર્શન કેવળ જ્ઞાનાવરણ અને કેવળ દર્શનાવરણના ક્ષીણ મોહ નામના ગુણસ્થાનના અત્ય સમયમાં જ ક્ષીણ થઈ જવાથી યુગપત ઉત્પન્ન થાય છે, તો પછી જે પ્રમાણે સર્વજ્ઞ સર્વદર્શી सवा ४थनमा ज्ञाननी प्रथमतान। म अवामां मावत छ प्रभारी सव्वदरिसी सव्वन्नू" तने। पy ननी प्रथमताना म सनवी श छ? सानु समाधान मा Page #398 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३८४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे स्स उववज्जति णो अणागारोवउत्तस्स' छाया-सर्वा लब्धयः साकारोपयुक्तस्य उपपद्यन्ते नो अनाकारोपयुक्तस्य-इत्यागमप्रमाणात् उत्पत्तिक्रमेण सर्वदा जिनानां प्रथमे समये ज्ञानं द्वितीये समये दर्शनं भवतीति सूचयितुं 'सव्वन्नू सव्वदरिसी' अयमेव क्रमः सर्वत्र स्वीक्रियते । इति छद्मस्थानां तु प्रथमे समये दर्शनं द्वितीये समये ज्ञानमुत्पघते इत्यपि प्रसङ्गतो विज्ञेयम् । 'परमसुहसमाणणो' इत्यस्य 'परमसुखसमापनश्छाया समापेः समाणः इति प्राकृतसूत्रेण समापेः समाणादेशाद् बोध्येति ॥१० ४२॥ मूलम्-तएणं से भगवं समणाणं निग्गंथाणय निग्गंथीणय महव्वयाई सभावणगाई छच्च जीवणिकाए धम्म देसेमाणे विहरइ, तं जहा पुढविकाइए भावणामेगं पंच महब्बयाई सभोवणगाई भाणियव्वाइं ति उसभस्स णं अरहओ कोलियस्स चउरासी गणा गणहरा होत्था । उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स उसभसेणपामोक्खाओ चुलसीई समणसाहस्सीओ उक्कोसिया समणसंपयो होत्था । उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स बंभीसुंदरीपामोक्खाओ तिण्णि अज्जिया सयसाहस्सीओ उक्कोसिया अज्जिया संपया होत्था । उसभस्म णं अरहओ कोसलियस्स कि "सव्वाओ लद्धीओ सागारोव उत्तस्स उववज्जति" जितनी भो लब्धियां होती हैं वे साकारोपयोग में उपयुक्त जीव के होती है, “णो अणागारोव उत्तस्स" अनाकार उपयोग वाले के नहीं होती हैं, ऐसा आगम का प्रमाण है । उत्पत्तिक्रम की अपेक्षा सर्वदा जिन प्रभु को प्रथम समय में ज्ञान उत्पन्न होता है और द्वितीय समय में दर्शन होता है, इस बात को सूचित करने के लिए "सव्वन्नू सव्वदरिसी" ऐसा ही सूत्रपाठ रखा गया हैं यहो कम सर्वत्र है । हां, जो जीव छमस्थ है उनके तो प्रथम समय में दर्शन और द्वितीय समय में ज्ञान होता है ऐसां जानना चाहिए "परम सुह समाणणो" में समापि के स्थान में प्राकृत सूत्र से समाणादेश हो जोता है तब "समाणण" ऐसा बन जाता है ॥४२॥ प्रभाव छ, “सव्वाओ लद्धीओ सागारोवउत्तस्स उववज्जति" २८सी धि। थायछ तसारोपयोगमा ५युत सपने थाय छ, “णो अणागारोवउत्तस्स" अनार ઉપયોગવાળાને હતી નથી. એવું આગમનું પ્રમાણ છે. ઉત્પત્તિ ક્રમની અપેક્ષા સર્વદા જિન પ્રભુના પ્રથમ સમયમાં જ્ઞાન ઉત્પન્ન થાય છે અને દ્વિતીય સમયમાં દર્શન હોય છે. એ वात सूयित ४२वा माटे "सम्वन्नू सव्वदरिससी" मेवा ॥ सूत्रा सवामां आवेद એ. એ જ ક્રમ સર્વત્ર છે. પણ ને જીવે છદ્મસ્થ છે, તેમને તે પ્રથમ સમયમાં દર્શન અને द्वितीय समयमा ज्ञान डाय छे माम धुन पर पारे “परमसुह समाणणो" भी समापिना स्थानमा प्राकृत सूत्रधी सभालाश थ य छे. त्यारे “समाणण" ये રૂપ થઈ જાય છે જરા Page #399 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका-द्विष्वक्षस्कारसू.४३ऋषभस्वामिन केवलज्ञानोत्पत्त्यनन्तरकार्यनिरूपणम् ३८५ सेज्जसपामोक्खाओ तिण्णि समणोवासगसयसाहस्सीओ पंच य साहस्सीओ उक्कोसिया समणोवासगसंपया होत्था । उसभस्स णे अरहवो कोसलियस्स सुभद्दापामोक्खाओ पंच समणोवासिया सयसाहस्सीओ चउपण्णं च सहस्सा उक्कोसिया समणोवासिया संपया होत्था। उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स अजिणाणं जिणसंकासाणं सव्वक्खरसंनिवाईणं जिणोविव अवितहं वागरमाणाणं चत्तारि चउद्दसपुव्वीसहस्सा अट्ठमा यो सया उक्कोमियो चउद्दसपुव्वी संपया होत्था । उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स णव ओहिणाणिसहस्सा उक्कोसिया ओहिणाणिसंपया होत्था । उसभस्स णं अरही कौसलियस्स वीसं जिणसहस्सा, वीसं वेउव्वियसहस्सा छच्चसयो उक्कोसिया जिणसंपया वेउब्वियसंपया य होत्था, बारसबिउलमइसहस्सा छच्चसया पण्णासा, बारसवाइसंपया छच्चसया पण्णासा । उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स गइकल्लाणाणं ठिइकल्लाणणं आगमेसि भदाणं बावीसं अणुत्तरोववाइयाणं सहस्सा णव य सया उक्कोसिया अणुत्तरोववाइयसंपया होत्था । उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स वीसं समणसहस्सा सिद्धा, चत्तालीसं अज्जियासहस्सा सिद्धा सहि अंतेवासिसहस्सा सिद्धा । अरहओ ण उसभस्स बहवे अंतेवासी अणगारा भगवंतो अप्पेइया मासपरियाया जहा उववाइए सव्वओ अणगारवण्णओ जाव उद्धं जोणू अहोसिरा झाणकोट्ठोवगया संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणा विहरति । अरहओ णं उसभस्स दुविहा अंतकरभूमी होत्था तं जहा-जुगंतकरभूमी य परियाअंतकरभूमीय। जुगंतकरभूमी जाव असंखेज्जाई पुरिसजुगाइं परियाअंतकरभूमी अंतोमुहुत्तपरियाए अंतमकासी ॥सू० ४३॥ __ छाया-ततः खलु स भगवान् श्रमणानां निग्रन्थानां च निर्ग्रन्थीनां च पञ्च महाब्रतानि सभावनकानि षट् च जीवनिकायान् धर्म देशयन् विहरति, तद्यथा-पृथिवीकायिकान् भावनागमेन पञ्च महाव्रतानि सभावनकानि भणितव्यानोति । ऋषभस्य खलु अर्हता कोशलिकस्य चतुरशीतिर्गणा गणधरा अभवन् । ऋषभस्य स्खलु अर्हतः कौशलिकस्य ऋषभ Page #400 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सेनप्रमुखाश्चतुरशीतिः श्रमणसाहस्यः उत्कृष्टाः श्रमणसम्पदोऽभवन् । ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य ब्राह्मीसुन्दरीप्रमुखाः तिस्त्रः आर्यिकाशतसाहस्त्र्यः उत्कृष्टा आर्यिका सम्पदोऽभवन् । ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य श्रेयांसप्रमुखास्तिस्रः श्रमणोपासक शतसाहस्यः पञ्च च साहस्त्र्यः उत्कृष्टाः श्रमणोपासकसम्पदोऽभवन् । ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य सुभद्राप्रमुखाः पञ्च श्रमणोपासिकाशतसाहस्त्र्यश्चतुष्पञ्चाशश्च सहस्राणि उत्कृष्टाः श्रमणोपासिकासम्पदोऽभवन् । ऋषभस्य स्खलु अर्हतः कौशलिकस्य अजिनानां जिनसंकाशानां सर्वाक्षरसन्निपातिनां जिनस्येव अवितथं व्यागृणतां चत्वारिचतुर्दशपूर्वीसहस्राणि अष्टिमानि च शतानि उत्कृष्टाश्चतुर्दशपूर्वीसम्पदोऽभवन् । ऋषभस्य खल्लु अहंतः कौशलिकस्य नव अवधिमानिसहस्राणि उत्कृष्टा अवधिज्ञानिसम्पदोऽभवन् । ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य विंशतिजिनसहस्राणि, विंशतिर्वैकुर्विकसहस्राणि षट् च शतानि उत्कृष्टा जिनसम्पदो वैकुर्विकसम्पदश्चाभवन् , द्वादशविपुलमतिसहस्त्राणि षट् च शतानि पञ्चाशत् , द्वादशवादिसहस्त्राणि षट् च शतानि पञ्चाशत् । ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य गतिकल्याणानां स्थितिकल्याणानाम् आगमिष्यद्भद्राणों द्वाविंशतिरनुत्तरोपपातिकानां सहस्राणि नव च शतानि उत्कृष्टा अनुत्तरोपपातिकसम्पदोऽभवन् । ऋषभस्य खल अर्हतः कौशलिकस्य विंशतिः श्रमणसहस्राणि सिद्धानि, चत्वारिंशत् आर्यिकासहवाणि सिद्धानि, पष्टिरन्तेवासिसहस्राणि सिद्धानि । अर्हतः खलु ऋषभस्य बहवः अन्तेवासिनः अनगारा भगवतः अप्येकके मासपर्यायाः, यथा औपपातिके सर्वकः अणगारवर्णको यावत् ऊर्ध्वजानवः अधःशिरसो ध्यानकोष्ठोपगताः संयमेन तपसा आत्मानं भावयन्तो विहरन्ति । अहंतः खलु ऋषभस्य द्विविधाऽन्तकर भूमिरभवत् , तद्यथा युगान्तकरभूमि पर्यायान्तकरभूमिश्च । युगान्तकरभूमिर्यावदसंख्येयानि पुरुषयुगानि, पर्यायान्तकरभूमिः अन्तर्मुहूतं पर्याये अन्तमकार्षीत् ॥सू० ४३॥ टीका-'तए णं' इत्यादि । 'तएणं से भगवं' ततः खलु स भगवान् ऋषभः 'समणाणं निग्गंथाण य निग्गंथीण य' श्रमणानां निर्ग्रन्थानां च निर्ग्रन्थीनां च श्रमणेभ्य निर्ग्रन्थेभ्यः श्रमणीभ्यो निग्रन्थीभ्यश्च 'सभावणगाई' सभावनकानि:र्यादिसमिति भावनासहितानि 'पंचमहब्बयाई' पञ्चमहाव्रतानि प्राणातिपातविरमणादि परिग्रहविरमणान्तानि पञ्चसंख्यकानि महाव्रतानि, तथा 'छच्च जीवणिकाए' षट् च जीवनिकायान "तए णं से भगवसमणाणं निग्गंथाण य निग्गंथीण य" इत्यादि । टीकार्थ-"तए णं से भगवं समणाणं निग्गंथाण य निग्गंथीण य" इसके बाद उन श्रमण भगवान् ऋषम देव ने श्रमण निन्थों को एवं निन्थियों को "पंच महन्वयाइ सभावणगा" पांच २ भावनाओं सहित पांच महाव्रतों का "छञ्च जीवणिकाए धम्म देसेमाणे विहरखने तपण से भगव समणाण निग्गंथाण य निग्गंथीण य, इत्यादि । -तए णं से भगवं समणाणं निग्गंथाण य निगांथीण य' त्या२ माईत सावन महव श्रभर निथान तभी नियामान पंचमहव्वयाई समावगाई पांच यांबावना सहित पांच महानता। 'छच्च जीवणिकाए धम्म देसे माणे Page #401 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकाद्वि०वक्षस्कार सू.४३ऋषभस्वामिनः केवलशानोत्पत्यमन्तरकार्यनिरूपणम्३८७ पृथिव्यादित्रसान्तान् जीवनिकायान् इत्येवं रूपं 'धम्म देसेमाणे' धर्म देशयन्-उपदिशन् विहरति । अत्र धर्म प्रस्तावे यत् षडूजीवनिकायाः प्रोक्ताः तद् जीवनिकायपरिज्ञानं विना सम्यग् महाव्रतपालनं न संभवतीति सूचयितुमितिबोध्यम् । ननु प्राणातिपातविरमणलक्षणे प्रथमे महाव्रतेऽयं नियमः संभवति, परन्तु मृषावादादिषु चतुषु महाव्रतेषु नायं नियमः संभवेत् , भाषाविभागादि परिज्ञानाधीनत्वात्तेषाम् ? इति चेत् , आह-महावनस्य पर्यन्तवर्त्तिवृक्षवद् मृषावादविरमणादीनि चत्वारि महाव्रतान्यपि प्राणातिजहा-पुढविकाइए भावणागमेणं पंच महन्वयाई सभावणगाइौं माणियव्वइत्ति" षटुविधजीवनिकायों का-पृथिवीकाय, अप्काय, तेजस्काय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय-इनका उपदेश दिया, अहिंसा महाव्रत, सत्यमहाव्रत, अचौर्यमहाव्रत, ब्रह्मचर्य महाव्रत और परिग्रहत्याग महाव्रत ये पांच महाव्रत हैं इन महाव्रतों की अराधना के लिये प्रत्येक महाव्रत की ५-५ भावनाएँ कही गई हैं, इनका वर्णन अन्य आगमों में हैं, यहां पर धर्मोपदेश के प्रकरण में जो ६ जीव निकायों के सम्बन्ध में कथन आया है उसका कारण यह है कि जब तक छ जीवनिकायों के स्वरूप का परिज्ञान नहीं होगा-तब तक महावतों का परिपालन अच्छी तरह से नहीं हो सकता है, इस बात की सुचना के लिये यहां पर छ जीवनिकायों का कथन किया गया है, शंका-प्राणातिपात विरमण रूप अहिंसा महाव्रत में यह नियम संभवित होता है, परन्तु मृषावादादि विरमणरूप चार सत्यमहाव्रतादिकों में यह नियम संभवित नहीं होता है क्यों कि इन चार महाव्रतों में तो भाषा आदि के परिज्ञान की आवश्यकता होती हैं, इनके परिज्ञान हुए विना सत्यमहावतादिकों का परिपालन यथार्थरूप में नहीं बन सकता है, सो शंका का समाधान ऐसा है-महावन के पर्यन्तवर्तिवृक्षों की वाड़ को तरह मृषाबादविरमणादि जो चार विहरइ, तं जहा-पुढविकाइए भावणागमेणं पंचमहव्वयाइं भाणियव्वाइंति पटविधवलકાને–પૃથિવીકાય, અકાય, તેજસ્કાય, વાયુકાય, વનસ્પતિકાય અને ત્રસકાયનો ઉપદેશ આ. અહિંસા મહાવ્રત, સત્ય મહાવ્રત અચૌર્ય મહાવ્રત, બ્રહ્મચર્ય મહાવ્રત અને પરિગ્રહ ત્યાગ મહાવ્રત એ પાંચ મહાવતે છે. આ મહાવ્રતાની આરાધના માટે દરેકે-દરેક મહાવ્રતની પાંચ-પાંચ ભાવનાઓ કહેવામાં આવી છે, એમનું વર્ણન અન્ય આગમ ગ્રન્થમાં છે. અહીં ધર્મોપદેશકના પ્રકરણમાં જે ૬ જીવનિકાયાના સંબંધમાં કથન આવેલ છે, તેનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે જ્યાં સુધી ૬ જવનિકાયના સ્વરૂપનું પરિજ્ઞાન થશે નહિ, ત્યાં સુધી મહાત્રાનું પરિપાલન સારી રીતે થઈ શકશે નહિ. એ વાતને સૂચિત કરવા માટે અહી ૬ જીવનિકાનું કથન કરવામાં આવેલ છે. . શંકઃ-પ્રાણાતિપાત વિરમણ રૂપ અહિંસા મહાવ્રતમાં એ નિયમ સંભવિત હોય છે પરતુ મૃષાવાદાદિ વિરમણ રૂપ ચાર સત્ય મહાવ્રતાદિકમાં એ નિયમ સંભવિત થતું નથી. કેમકે એ ચાર મહાવ્રતોમાં તે ભાષા વગેરેના પરિજ્ઞાનની આવશ્યકતા હોય છે, એમના પરિજ્ઞાન વિના સત્ય મહાવ્રતાદિકનું પરિપાલન યથાર્થ રૂપમાં થઈ શકતું નથી. આ પ્રમાણે ઉપર્યુકત શંકાનું સમાધાન થઈ શકે છે. મહાવ્રતના પર્યત્વતિ વૃક્ષોની વાડની જેમ મૃષા Page #402 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे पातविरमणलक्षणस्य प्रथममहाव्रतस्यैव रक्षकाणि, तथाहि मृषावादविरमणयुक्तो मुनिः परनिन्दा विरतत्वात् कुलवध्वादीनामहिंसको भवति, अदत्तादानविरमणयुक्तौ धनस्वामिनां सचित्तजलफलादीनां च अहिंसको भवति, मैथुनविरमणयुक्तो नवलक्षपञ्चेन्द्रियादीनां, परिग्रहविरमणयुक्तश्च शुक्तिककस्तूरीमृगादीनां च अहिंसको भवतीति जीवनिकायपरिज्ञानं सर्वेष्वपि महाव्रतेषु समुपयोगीति । धर्मस्वरूपमेव विवृणोति 'तं जहा' तद्यथा 'पुढवि काइए' पृथिवीकायिको जीवनिकायः, सूचामात्रत्वात् सूत्रस्यात्र लाघवार्थ 'पृथिवीकायिक इत्येवोपात्तं, ततश्च-अप्कायिकः तेजस्कायिको वायुकायिको वनस्पतिकायिकस्त्रसकायिक-' इति संग्राह्यम् , तथा-'सभावणागमेणं' सभावनकानि ईसिमित्यादि भावना युक्तानि 'पंचमहव्वयाइं 'पञ्च महाव्रतानि 'सभावणगाई' सभावनागमेन आचाराङ्गद्विमहावत हैं वे प्राणातिपात-विरमणरूप प्रथम अहिंसा महाव्रत के ही रक्षक है जो मुनि मृषावाद विरमणरूप चार महावतों से युक्त होता है वह परनिन्दाविरत हो जाने के कारण कुलवध्वादिको का महिंसक हो जाता है, अदत्तादान विरमण वाला मुनि धनस्वामियों के सचित्त जल फलादिकों का अहिंसक हो जाता है, मैंथुनविरमणयुक्त मुनि नौ लाख-पञ्चेन्द्रियों की हिंसा से रहित हो जाता है और परिग्रह विरमण वाला मुनि शुक्तिक कस्तूरीमृगादिकों का अहिंसक हो जाता है, इस तरह से जीवनिकायों का परिज्ञान सब ही महाव्रतों में समुपयोगी है, सूत्र सुचामात्र होता है इससे यहां आये हुए पृथिवीकायिक पद से अप्कायिक, तेजस्कायिक, वायुकायिक, वनस्पति कायिक और त्रसकायिक इन ५ निकायों का ग्रहण हो जाता है ईर्यासमिति आदि भावनाओं से युक्त पांच महाव्रत पालने का जो प्रभु ने उपदेश दिया है सो उन भावनाओं को जानने के लिए आचाराङ्ग द्वितीयश्रुतस्कंध सूत्र के अन्तर्गत भावना नामक अध्ययनवर्ती जो पाठ है उसे हृदयङ्गम कर लेना चाहिए, उसी के अनुसार पांच भावनाओं सहित इन पांच महाव्रतों का परिपालन करना चाहिए; વાદાદિ વિરમશુદિ જે ચાર મહાવ્રત છે તે પ્રાણાતિપાત-વિરમણારૂપ પ્રથમ અહિંસા મહાવ્રતના જ રક્ષક છે. જે મુનિ મૃષાવાદવિરમણ રૂપ ચાર મહાવ્રતોથી યુક્ત હોય છે, તે પરનિદા વિરત હોવાથી કુલ વધ્યાર્દિકો માટે અહિંસક થઈ જાય છે. અદત્તાદાન વિરમણવાળા મુનિ ધનસ્વામીના સચિત જળ ફલાદિકના અહિંસક થઈ જાય છે. મૈથુન વિરમણ યુકત મુનિ નવ લાખ પંચેન્દ્રિોની હિંસાથી રહિત થઈ જાય છે. અને પરિગ્રહ વિરમણ વાળા મુનિ શુકિત કસ્તુરી મૃગાદિકના અહિંસક થઈ જાય છે. આ પ્રમાણે જીવનિકાનું પરિજ્ઞાન સર્વમહાવ્રતમાં સમુપયોગી છે. સૂત્ર સૂચામાત્ર હોય છે તેથી અહી આવેલા પૃથિવીકાયિક પદથી અપૂકાયિક, તેજસ્કાયિક, વાયુકાયિક, વનસ્પતિ કાયિક અને ત્રસાયિક એ પાંચ નિકાયનું ગ્રહણ થાય છે. ઈર્થસમિતિ આદિ ભાવનાઓથી યુક્ત પાંચ મહાવ્રત પાળવાને જે પ્રભુએ ઉપદેશ આપે છે, તે તે ભાવનાઓના જ્ઞાન માટે આચારાંગ સત્રના બીજાગ્રુતકધમાં જે ભાવના નામના અધ્યયનવતી પાઠ છે, તેને હદયંગમ કરે જોઈએ. તે મુજબ જ પાંચ ભાવનાઓ સહિત એ પાંચ મહાવ્રતોનું પરિપાલન કરવું જોઈએ. Page #403 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कारसू. ४३ऋषभस्वामिन केवलज्ञानोत्पत्त्यनन्तरकार्यनिरूपणम्३८९ तीयश्रुतस्कन्धान्तर्गतभावनानामकाध्ययनवर्तिपाठानुसारेणात्र ‘भाणियब्वाइंति' भणितव्यानि वक्तव्यानीति । नन्वत्र सूत्रे उद्देशकोटौ 'पंचमहव्वयाइं सभावणगाई छच्च जीवणिकाए' इत्युक्तम् निर्देशकोटौ तु 'पुढविकाइए भावणागमेणं पंच महव्ययाई सभावणगाई भाणियब्वाइंति' इति वैपरीत्येनोक्तम् इति पूर्वोक्तेः पश्चादुक्तिविरुध्यते ? इति चेत् , आह-उद्देशकोटौ पश्चादुक्तानामपि पृथिवीकायिकादीनां निर्देशकोटौं यत्प्रथमत उपादानं तत् स्वल्पवक्तव्यतया 'सूचीकटाह' न्यायेन विचित्रा सूत्राणां कृतिराचार्यस्य' इति न्यायेन वा बोध्यमिति । ननु यथा यतिधर्मः प्रोक्तः तथैव भगवता गृहिधर्मसंविग्नपाक्षिकधर्मावपि वक्तव्यौ मोक्षाङ्गत्वात् , यदुक्तम्-"सावज्जजोगपरिवज्जणाउ सव्वुत्तमो जइधम्मो । बीमओ सावगधम्मो, संविग्गपक्खपहो ॥१॥" छाया-सावधयोगपरिवर्जनात्तु सर्वोत्तमो यतिधर्मः । द्वितीयः श्रावकधर्मः तृतीयः संविग्न पक्षपथः ॥१॥ इति, शंका-इस सूत्र में उद्देश्यकोटि में "पंच महत्वयाइं सभावणगाई छञ्च-जोवनिकाए" ऐसा पाठ कहा गया है और निर्देशकोटि में "पुढविकाइए भावणागमेणं पंच महव्वयाई सभावणगाइ भाणियब्वाइति" ऐसा पाठ कहा है-सो इस प्रकार विपर्यय कथन से परस्पर में पश्चात् उक्त भी पृथिवीयायिक आदिकों का निर्देशकोटि में जो प्रथमतः उपादान किया गया हैं वह उनके सम्बन्ध में स्वप्लवक्तव्यक्ता होने के कारण "सूची कटाह" न्याय के अनुसार किया गया है. आचार्यजन की सूत्रों की रचना विचित्र होती हैं। शंका-भगवान् ने जिस प्रकार यति धर्म कहा है उसी प्रकार उन्हों को गृहस्थधर्म और संविग्नपाक्षिक धर्म भी कहना चाहिये था, क्योंकि ये दो धर्म भी परम्परारूप से मोक्ष के कारणभूत हैं। तदुक्तम्-"सावज्जजोगपरिवज्जणा उ सव्वुत्तमो जइधम्मो । बीओ सावगधम्मो तइओ संविग्गपक्वपहो ॥१॥ जिसमें मन, वचन, काय, कृत,, कारित और अनुमोदना से सर्व सावद्ययोग का परिवर्जन हो जाता है वह यतिधर्म है, इससे उतरता श्रावक At :- सूत्रमा देश रिमा “पंच महव्वयाई सभावणाई छच्चजीवनिकाए" सवा 8 वाम मावस छ, भने निर्देश टिमा “पुढबिकाइए भावणागयेणं पंचमहव्वयाई सभावणगाई भाणियव्वाई ति" मे ५४ छे. तो सतना विपर्यय ४थनथी પરસ્પર પાઠમાં અંતર આવે છે તે આ અંતરનું કારણ શું ? ઉત્તર-ઉદેશ કોટિમાં પશ્ચાત્ ઉફત પણ પૃથિવી કાયિક આદિકનું નિર્દેશ કટિમાં જે પ્રથમતઃ ઉપાદાન કરવામાં આવેલ છે તે એમના સંબંધમાં સ્વ૯૫વક્તવ્યતા હોવાથી “સચી કટાહ” ન્યાય મુજબ કરવામાં આવેલ છે. આચાર્યજનેની સૂત્ર-૨ચના વિચિત્ર डाय छे. શંકા -ભગવાને જે પ્રમાણે યતિ ધર્મ કહેલો છે, તે પ્રમાણે જ ગૃહસ્થ ધર્મ અને સંવિગ્ન પાક્ષિક ધન વિષે પણ નિરૂપણ કરવું જોઈતું હતું. કેમકે એ બન્ને ધર્મ પણ ५२ ५२॥ ३५थी भाक्षना १२ भूत छे. ततभू :-सावज्जजोगपरिवज्जणा उ सव्वुत्तमो अाधम्मो, बीओ सावगधम्मो तइओ संविग्गपक्खपहो ॥१॥ २मा भन-क्यन-जायत ___ Page #404 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अत्राह --- सर्वसावधवर्जनीयत्वेन देशनायां प्रथमं यतिधर्मस्य देशनीयत्वात्, मोक्षपथस्यात्यासन्नत्वात्, श्रमणसंघस्य प्रथमं व्यवस्थापनीयत्वाच्च सर्वतः प्रथमं यतिधर्मोपदेशो भगवता कृतः, ततस्तदङ्गभूतौ श्रावकधर्म संविग्नपाक्षिकधर्मावपि भगवता समुपदिष्टावेव, अत एव तौ शास्त्रेषु समुपलभ्येते, भगवदनुपदिष्टत्वे तु तयो र्नामापि श्रोतुमशक्यम् । अत्र तु श्रमणधर्मस्यैव यदुपादानं तल्लाघवार्थमुक्तम् । अतः श्रावकधर्मयतिधर्मावपि भगवदुक्तत्वे नात्र संग्राह्यावेवेति । अथ भगवत्कृतधर्मोपदेशप्रभावेण बहवो भगवदनुयायिनो जाताः, तेषां यावन्तः संघा-जातास्तानाह-'उसभस्स णं' इत्यादिना । 'उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स चउरासीगणा गणहरा होत्था' ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशालिकस्य चतुरशीतिर्गणाः चतुरशीतिगणधराश्च अभवन् । अत्रेदं बोध्यम्-यस्य भगवतो यावन्तो गणा भवन्ति तस्य तावन्त एव गणधरा भवन्ति । तदुक्तं 'जावइया जस्स गणा तावइया गणहरा तस्स' छाया-यावन्तो यस्य गणास्तावन्तो गणधरास्तस्य का धर्म और संविग्नपाक्षिक का धर्म हैं, सो इस शका का समाधान ऐसा है कि सर्वप्रथम प्रभु देशना में यधिधर्म का ही व्याख्यान करते हैं, क्योकि वही देशनीय बतलाया गया है. इसका कारण भो यही हैं कि यतिधर्म में ही सर्व प्रकार से सावद्ययोग का परिहार होता है. इसी से वह मोक्षपथ के अत्यासन्न होता कहा गया हैं। श्रावकधर्म और संविग्न पाक्षिक धर्म ये दो धर्म यतिधर्म के अङ्गभूत कहे गये हैं सो इनका भी प्रभु ने उपदेश दिया ही है. यदि ऐसा न होता तो शास्त्रों में जो इनका वर्णन किया गया मिलता है वह नहीं मिलता। यहां पर जो यतिधर्म का ही उपासन किया गया है वह लाघव के लिये किया गया है. इसलिये श्रावकफर्म और यतिधर्म ये दोनों धर्म भगवदुपदिष्ट होने से यहो पर संग्राह्य ही हैं। भगवान् द्वारा उपदिष्ट हुए धर्मोपदेश के प्रभाव से अनेक मनुष्य उनके अनुयायी हो गये। "उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स चउरासी गणा गणहरा होत्था" उस समय उन कोश કારિત અને અનુમોદનાથી સર્વ સાવઘયોગનું પરિવર્જન થઈ જાય છે. તે યતિ ધર્મ છે એનાથી ઉતરતો શ્રાવક ધર્મ અને સવિગ્ન પાક્ષિક ધમ છે. તે આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે સર્વ પ્રથમ પ્રભુ દેશનામાં યતિ ધર્મનું જ વ્યાખ્યાન કરે છે, કેમકે તે જ દેશનીય કહેવામાં આવેલ છે. આનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે યતિ ધર્મમાં જ સર્વ પ્રકારથી સાવદ્યોગને પરિહાર થાય છે. એથી જ તે મોક્ષપથને અત્યાસન છે, એવું કહેવાય છે. શ્રાવક ધર્મ અને સંવિગ્ન પાક્ષિક ધર્મ એ એ બને ધર્મો યતિ ધર્મના અંગભૂત કહેવામાં આવેલ છે, પ્રભુએ એમને પણ ઉપદેશ આપે જ છે. જે એવું ન હોત તો શાસ્ત્રોમાં જે એમનું વર્ણન મળે છે તે મળત નહિ. અહીં જે યતિ ધર્મનું ઉપાદાન કરવામાં આવેલ છે તે લાઘવના માટે કરવામાં આવેલ છે, એથી જ શ્રાવક ધર્મ અને યતિ ધર્મ એઓ બને ધમૅ ભગવદુપદિષ્ટ હોવાથી અહી સંગ્રાહ્ય જ છે. ભગવાન દ્વારા ઉપદિષ્ટ ધર્મોપहेशन माथी । मनुष्योतमना मनुयाया। 2 गया, 'उसमस्त ण अरहओ कोसलियस्त चउरासी गणा गणहरा होत्था' a समये a अशा *५१ प्रभुने ८४ भने Page #405 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोकाद्वि.वक्षस्कार सू.४३ऋषभस्वामिन केवलज्ञानोत्पत्यनन्तरकार्यनिरूपणम्३९१ इति । भगवतः साधुसंख्यामाह-'उसभस्स ण अरहओ कोसलियस्स उसभसेणपामोक्खाओ चुलसीई समणसाहस्सीओ' ऋषभस्स खलु अर्हतः कोशलिकस्य ऋषभसेन प्रमुखाश्चतुरशीतिः श्रमणसाहस्यः चतुरशीतिसहस्रसंख्यकाः श्रमणाः 'उक्कोसिया समणसंपया होत्था' उत्कृष्टाः श्रमणसम्पदः अभवन् । साध्वी संख्यामाह-'उसमस्स णं अरहओ कोसलियस्स बंभी सुन्दरी पामोक्खाओ तिण्णि अज्जियासयसाहस्सीओ' ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य ब्राह्मी सुन्दरी प्रमुखाः तिस्रः आर्यिकाशतसाहस्थ्यः त्रिलक्षसंख्यकाः उत्कृष्टाः साध्व्यः 'उक्कोसिया अज्जियासंपया होत्था' उत्कृष्टाः आर्यिकासम्पदोऽभवन् , श्रावकसंख्यामाह-'उसभस्स णं अरही कोसलियस्स सेज्जंसपामोक्खाओ तिणि समणोवासगसयसाहस्सीओ' मृषभस्य खुलु अर्हतः कौशलिकस्य श्रेयांसप्रमुखाः तिस्रः श्रमणोपासकसाहस्त्र्यः 'पंच य साहस्सीओ' पञ्च साहस्यश्च = पञ्चसहस्राधिकलक्षत्रयपरिमिता श्रावकाः 'उक्कोसिया समणोवासगसंपया होत्था' उत्कृष्टाः श्रमणोपासकसम्पदोऽभवन् । श्राविकासंख्यामाह-'उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स सुभदा पामोक्खाओ पंच समणोवासियासयसाहस्सीओ-चउप्पण्णं च सहस्सा' ऋषभस्य खलु अर्हतः कोशलिकस्य सुभद्राप्रमुखाः पञ्च श्रमणोपासिकाशतसाहस्यः चतुष्पञ्चाशच्च साहस्त्र्या-चतुष्पञ्चाशत्सहखाधिकपञ्चलक्षसंख्यकाः 'उक्कोसिया समणोवासिया संपया लिक ऋषभ प्रभु के ८४गण एवं ८४ गणधर हो गये; ऐसा नियम है कि "जावइया जस्स गणा तावइया गणहरा तस्स" कि जिसके जितने गण होते हैं उतने उनके गणधर होते हैं, भगवान आदिनाथ के ८४ गण थे इसी कारण इनके ८४ गणधर कहे गये हैं, "उसभस्स णं अरहो कोसलियस्स उसभसेणपामोक्खाओ चुलसीइ समणसाहसीओ उक्कोसिया समणसंफ्या होत्था" इन प्रभु के ऋषभसेन आदि ८५ हजार श्रमण थे, "उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स बंभी सुन्दरी पामोक्खाओ तिण्णि अज्जिया सयसाहस्सोओ उक्कोसिया अज्जिया संपया होत्था" ब्राह्मी सुन्दरी आदि ३ तीन लाख अर्यिकाएँ थी, "उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स सेज्जस पामोक्खाओ तिण्णि समणोवासगसयसाहस्सीओ पंच य साहस्सीओ उक्कोसिया समणोवासगसंपया होत्था" तीन ३ लाख ५ हजार श्रेयांसप्रमुख श्रावक थे, "उसमस्स णं अरहओ कोसलियस्स सुभद्दा पामोक्खाओ पंच समणोवासियासयसाहस्सीओ चउपण्णं च सहस्सा उक्कोसिया ८४ गधरे। २४ गया, मेवा नियम छ "जावईया जस्स गणा तावइया गणहरा तस्स" જેમને જેટલા ગણે હોય છે, તેમને તેટલા ગણધરે હોય છે. ભગવાન આદિનાથને ૮૪ वारता मेथी नभने ८४ शोध वामां मावस छ. "उसमस्सण आहओ कोसलियस्स उसभसेणपामोक्खाओ चुलसीई समणसाहस्सीओ उक्कोसिया समणसंपया होत्था से प्रभुने *पलसेन बोरे ८४ हुनर श्रमणे। डा. 'उसमस्स ण अरहो कोसलियस्स बंभी सुदरी पामोखाओ तिणि अजियासयसाहस्सीओ उक्कोसिया अज्जिया संपया होत्था'माझी सुहरी विगे३३yाय मायामाती. "उसमस्सण अरहउनो कोसलियस्स सेज्जंसपामोक्खाओ तिन्नि समणोवासगसयसाहस्सीओ पंच य साहस्सीओ उक्कोसिया समणोवासगसंपया होत्था' या पाय श्रेयांस विगेरे श्राप । ता. 'उसभस्स ण अरहओ कोसलियस्ल सुभद्दापामोक्खाओ पंचसमणोवासिया सयसा Emainctruurmuse urwecorammaanemavaNA Page #406 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३९२ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे होत्था' उत्कृष्टा श्रमणोपासिका सम्पदोऽभवन् । चतुर्दशपूर्वीसंख्यामाह-'उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स अजिणाणं' ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य अजिनानां जिनभिन्नानां छद्मस्थानामित्यर्थः, 'जिणसंकासाणं' जिनसकाशानां जिनसदृशानां 'सव्वक्खरसंनिवाईणं' सर्वाक्षरसन्निपातिनाम्-सर्वाणि च तानि अक्षराणि अकारादीनि, तेषां सन्निप.ता:-द्वयादिसंयोगाः, ते च अनन्तत्वात् अनन्ताः, ते विद्यन्ते ज्ञेयत्वेन येषां ते तथा तेषां सर्वाक्षरसंयोगविदामिर्थः, तथा 'जिणो विव' अत्र षष्ठयथें प्रथमा, ततश्च 'जिणो विव' जिनस्येव-प्राप्त केवल ज्ञानस्येव केवलिश्रुत-केवलिनः प्रज्ञापनायां तुल्यत्वात् 'अवितह' अवितथं यथार्थ 'वागरमाणाणं' व्यागृणतां-व्याकुर्वतां 'चत्तारि चउद्दसपुवीसहस्सा अट्ठमा य सया' चत्वारि चतुर्दशपूर्वीसहस्राणि अष्टिमानि च शतानि-साद्धसप्तशताधिकचतुस्सहस्ससंख्यकाश्चतुर्दशपूर्विणः 'उक्कोसिया चउद्दसपुव्वीसंपया होत्था' उत्कृष्टाः चतुर्दशपूर्विसम्पदोऽभवन् । अवधिज्ञानिसंख्यामाह-'उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स णव ओहिणाणिसहस्सा' ऋषभस्य खलु अर्हतः कोशलिकस्य नव अवधिज्ञानि सहस्राणिनव संख्यका अवधिज्ञानिनः 'उक्कोसिया ओहिणाणिसंपया होत्था' उत्कृष्टा अवधिज्ञानि सम्पदोऽभवन् । जिनसंख्यां वैकुर्विकसंख्यां चाह-'उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स वीसं जिणसहस्सा' ऋषभस्स स्खलु अर्हतः कौशलिकस्थ विंशतिः जिनसहस्राणि= समणोवासिया संपया होत्था" पांच ५ लाख ५४ हजार सुभद्राप्रमुख श्रमणोपासिकाएँ-श्रविकाएँ थी. "उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स अजिणाणं जिणसंकासाणं सव्वक्खरसंनिवाईणं जिणोविव अवितहं वागरमाणाणं चत्तारि चउद्दस पुव्वीसहस्सा अद्धमा य सया उक्कोसिया चउहसपुज्वीसंपया होत्था" सर्वाक्षरसंयोग वेदी, जिनभिन्न, जिनसदृश एवं जिनकी तरह अवितथ अर्थ की प्ररूपणा करने वाले ऐसे चतुर्दश पूर्वधारी ४ हजार ७ सातसौ ५० पचास थे. चतुदर्श पूर्वधारी श्रुतकेवली होते हैं, प्रज्ञापना में केवली और श्रुतकेवली तुल्य होते है, इसी कारण यहां पर "जिनस्येव अवितथं व्यागृणतां" ऐसा पाठ कहा गया है। "उसभस्स गं अरहओ कोसलियस्स णव ओहिणाणिसहस्सा उक्कोसिया ओहिणाणि संपया होत्था" 'नो हजार अवधिज्ञानी थे, "उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स वीसं जिणसहस्सा" २० वीस हस्सीओ चउप्पण्णं च सहस्सा उक्कोसिया लमणोवासिया संपया होत्था' पायाम यापन २ सुखद्रा भासिया-श्राविमा हती. 'उसमस्स अरहओ कोसलियस्स अजिणाणं जिणसंकासाणं सव्वक्वरसंनिवाईणं जिणोचिव अवितह वागरमाणाणं चत्तारि चउहसव्विसहस्सा अट्ठमा य सया उक्कोसिया चउद्दसपुव्वी संपया होत्था' साक्षर સગજ્ઞાતા, જીનભિન્ન પણ જીન સરીખા તેમજ જીનની જેમ અવિતથ અર્થની પ્રકાશ કરવાવાળા એવા ૧૪ ચૌદપૂર્વેને ધારણ કરનારા ચાર હજાર ૭ સાતસો ૫૦ પચાસ હતા. ચૌદપૂર્વને ધારણ કરનારા શ્રુત કેવળ સમાન હોય છે એમ કહ્યું છે તેથીજ અહીયાં अवितथ व्यागृणतां मना पाठ 35 छ. 'उसमस्त णं अरइओ कोस. लियस्त णव मोहि णाणीसहस्सा उक्कोसिया ओहिणाणीसंपया होत्था' न M२ अवविज्ञानीय त. 'उसमस्त णं अरइओ कोसलियस्स वीसं जिणलहस्सा' वीस बार Page #407 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिक टीका द्वि.वक्षस्कार सू.४३ ऋषभस्वामिन केवलज्ञानोत्पत्यनन्तरकार्यनिरूपम् ३९३ विंशतिसहस्राणि जिनाः, तथा-वीसं वेउब्वियसहस्सा छच्चसया' विंशतिः वैकुर्विकसहस्राणि षट् च शतानि-षट्शताधिकविंशतिसहस्रसंख्यका वैक्रियलब्धिमन्तश्च 'उक्कोसिया जिणसंपया वेउब्धियसंपयाय होत्था' उत्कृष्टा जिनसम्पदो वैकुर्विकसम्पदश्च अभवन् । विपुलमतिसंख्यां वादिसंख्यां च प्राह-'बारस विउलमइसहस्सा छच्च सया पण्णासा' ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य द्वादश विपुलमतिसहस्राणि षट् च शतानि पञ्चाशत् पञ्चाशदधिक घट् शताधिक द्वादशसहस्रसंख्यकाः विपुलमतयो, बारस वाइसहस्सा छच्च सया पण्णासा' द्वादशवादिसहस्राणि षट् च शतानि पञ्चाशत् पञ्चाशदधिकषट्शताधिक द्वादशसहस्रवादिनश्च उत्कृष्टा विपुलमतिसम्पदो वादिसम्दश्चाभवन् । अनुत्तरोपपातिकसंख्यामाह-'उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स गइ कल्लाणाणं' ऋषभस्य खलु अर्हतः कौशलिकस्य गतिकल्याणानां गतौ देवगतौ कल्याणं दिव्यसातोदयत्वात् येषां ते तथा 'ठिइकल्लाणाणं' स्थितिकल्याणानां स्थितौ देवायूरूपस्थितौ कल्याणम् अप्रवीचारसुखस्वामित्वात् येषां ते तथा तेषाम् , तथा आगमेसि भदाणं' आगमिष्यद् भद्राणाम्-आगमिष्यति देवभवानन्तरमागामिनि मनुष्यभवे सेत्स्यमानत्वात् भद्रं मोक्षरूपं कल्याणं येषां ते तथा तेषां 'बावोसं अणुत्तरोइयाणं सहस्सा णव य सया' द्वाविंशतिः अनुत्तरोपहजार जिन थे, “बीसं वेउब्वियसहस्सा छच्च सया उक्कोसिया मिणसंपया वेउब्वियसंपया य होत्था'', वैकियलब्धिवाले २० हजार ६ छसौ थे, "बारह विउलमइसहस्सा छच्चसया पण्णासा" १२ बारह हजार ६ सौ ५० पचास विपुलमति मनः पर्यय ज्ञानी थे, और "बारह वाइसहस्सा छच्च सया पण्णासा" इतने ही वादी थे। "उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स गइकल्लाणाण, ठिइकल्लाणाणं आगमेसिभदाणं बावीसं अणुत्तरोववाइयाणं सहस्सा णव य सया उक्कोसिया अणुत्तरोववाइयसंपया होत्था" उन कोशलिक ऋषभ अर्हन्त के गति कल्याणों कीदेवगति में दिव्य सातोदय से कल्याण वालों की संख्या तथा स्थिति कल्याणवालों की-देवायुरूप स्थिति में अप्रवीचार सुख के स्वामी होने से कल्याण वालों की संख्या एवं आगमिष्यभद्रों की देवभव के अनन्तर आगामी मनुष्यभव में जिनका मोक्षरूप कल्याण होता है लना हता. 'वीस वेव्वियसहस्सा छच्चसया उक्कोसिया जिणसंपया वेउब्वियसंपयाय होत्था' वैयिाणा वीस १२ छ। ता. 'वारसविउलमइसहस्सा छच्च सया पण्णासा' मार डार छसे। ५यास विYसमति मनःपर्यय ज्ञानीया ता. मने 'बारसवाइसहस्सा छच्चसया पण्णासा' मन मेटा वाहाया . 'उसमस्स णं अरहो कोस लियस्स गइकल्लाणाण, ठिइकल्लाणाणं, आगमेसिभदाण बाधीस अणुत्तरोववाइयाणं सहस्सा णव य सया उक्कोसिया अणुत्तरोववाइयसपया होत्था' सोशल मतन ગતિ કલ્યાણવાળાઓની દેવગતિમાં દિવ્ય સાતેદયથી કલ્યાણવાળાઓની સંખ્યા તથા સ્થિતિકલ્યાણવાળાઓની દેવાયરૂપ સ્થિતિમાં અપ્રવિચાર સુખના સ્વામી હોવાથી કલ્યાણવાળાઓની સંખ્યા તેમજ આગમિથ્થભદ્રોની-દેવભવના પછી આવનારા મનુષ્ય ભવમાં જેમનાં મેક્ષ રૂપ કલ્યાણ થાય છે, એમની સંખ્યા અને અનુસરોપપાતિકાની સંખ્યા ૨૨૯૦૦ બાવીસ NA MmmmmmsamayENTATIOCEMBEDITararamumremiereuIKARowLaxmam -- Page #408 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३९४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पातिकानां सहस्राणि नव च शतानि नवशताधिक द्वाविंशतिसस्रसंख्यका अनुत्तरोपपातिकाः 'उक्कोसिया अणुत्तरोववाइयसंपया होत्था' उत्कृष्टा अनुत्तरोपपातिक संपदोऽभवन् । अथ सिद्धसंख्यामाह-'उसभस्स णं अरहओ कोसलियस्स वीसं समणसहस्सा सिद्धा' ऋषभस्य स्वलु अर्हतः कौशलिकस्य विंशतिः श्रमणसहस्राणि सिद्धानि-विंशति सहस्रसंख्यकाः श्रमणाः सिद्धाः, तथा 'चत्तालीसं अज्जियासहस्सा सिद्धा' चत्वारिंशत् आर्यिकासहस्राणि सिद्धानि-चत्वारिंशत्सहस्रसंख्यका आर्यिकाः सिद्धाः, इत्थं च श्रमणार्यिकोभयसंख्यामीलने 'सहि अंतेवासिसहस्सा सिद्धा' षष्टिः अन्तेवासिसहस्राणि सिद्धानि-पष्टिसहस्रसख्यकाः अन्तेवासिनः सिद्धा इत्यर्थः । अथ भगवतोऽन्तेवासिवर्णनमाह-'अरहओ णं' इत्यादि । 'अरहओ णं उसभस्स बहवे अंतेवासी' अर्हतः खलु ऋषभस्य बहवोऽन्तेबासिनः-शिष्या 'अणगारा' अनगाराः-साधवो 'भगवंतो' भगवन्तः सकलमान्याः, तत्र 'अप्पेगइया' अप्येकके केचित् 'मासपरियाया' मासपर्यायाः-मासं पर्यायो येषां ते तथा-एकमासिक दीक्षापर्याययुक्ताः, इतः परम् एकमासिका' इत्यारभ्य ऊध्र्व जानवः' इति पर्यन्तं सर्वम् अनगारवर्णनम् औपपातिकसूत्रतोऽवसेयम् , अमुमेवार्थ सूचयति-'जहा उववाइए सवओ अणगारवण्णओ जाव' इति, तथा 'उद्धं जाणू' उर्व जानवः ऊर्चे जानुनी येषां ते तथोक्ताः-ऊर्धीकृत जानव इत्यर्थः, अयं भावः-शुद्धपृथिव्यासन वर्जनादौपग्रहिक निषद्याया अभावाच्चोत्कुटुकासना इति, तथा 'अहोसिरा' अधः शिरस:उनकी संख्या, एवं अनुत्तरोपपातिकों की संख्या २२९०० थी, "उतभस्स णं अरहओ कोसलियस्स वीसं समणसहस्सा सिद्धा" २० हजार श्रमणसिद्धो की संख्या थी, "चत्तालोसं अज्जिया सहस्सा सिद्धा" आर्यिका सिद्धों की संख्या ४० चालीस हजार थी, इस प्रकार श्रमणसिद्ध और आर्यिका सिद्ध इन दोनों की संख्या ६० साठ हजार की थी "सदि अन्तेबासो सहस्सा सिद्धा" अन्तेवासी सिद्ध ६० हजार थे. "अरहओ णं उसभस्स बहवे तेवासी अणगारा भगवंतो" इनमें ऋषभ भगवान् के अन्तेवासी-शिष्य अनगार साधु सकलजनों द्वारा पूज्य थे, "अप्पेगइया मासपरियाया" इनमें कितनेक अन्तेवासी एक मास की दीक्षा वाले थे, “जहा उववाइए सव्वमओ अणगार वण्णओ जाव उद्धं जाण्" वहां से लेकर "उर्ध्वजानव;" तक का सब अनगार वर्णन औपपातिक सूत्र से जान लेना चाहिये। शुद्ध प्रथिवीरूप २ नवसोनी ती. 'उसमस्त णं अरहओ कोसलियस्स वीसं समणसहस्सा सिद्धा' वास २० जर श्रमसिद्धी सध्या ती. 'चत्तालीस आज्यिासहस्सा सिद्धा' आयि। સિહોની સંખ્યા ૪૦ ચાળીસ હજારની હતી આરીતે શ્રમણ સિદ્ધ અને આર્થિક સિદ્ધ से मन्टनी सध्या ६० सा8 &२नी उती. 'सर्हि अंतेवासी सइस्सा सिद्धा' सातपासी सिद्ध सा8 1२ ता. 'अरहओ उसभस्स बहवे अंतेवासी अणगारा भगवंतो' તેમાં ઋષભગવાનના અંતેવાસી-શિષ્ય-અનગાર સાધુ, સકળજને દ્વારા પૂજ્ય હતા. 'अपपेगइया मासपरियाया' तेमांडेटमा सतवासी से भासनी हीक्षावाजा ता. 'जहा उववाहए सबओ मणगारवण्णओ जाव उद्धं जाणू' मा ५४थी मार मीन Page #409 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कारसू. ४३ ऋषभस्वामिन केवलज्ञानोत्पत्त्यनन्तरकार्यनिरूपणम्३९५ अधोमुखाः ऊर्ध्वतिर्यग्दृष्टिविक्षेपरहिता इत्यर्थः, तथा 'झाणकोट्ठोवगया' ध्यानकोष्टोपगताः ध्यानरूपो यः कोष्ठः कुसुलस्तम् उपागताः तत्र प्रविष्टाः कोष्ठके यथा धान्यं निक्षिप्तं न विकीर्ण भवति, एवमेव तेऽनगारा ध्यानकोष्ठकोपगताः सन्तो विषयाप्रचारितदृष्टयो भवन्तीति भावः, एवं विधास्तेऽनगाराः 'संजमेणं' संयमेन सप्तदशविधेन तवसा' तपसा-द्वादशविधेन च 'अप्पाणं भावेमाणा' आत्मानं भावयन्तो वासयन्तो 'विहरंति' विहरन्ति=तिष्ठन्तीति । संयमतपसोश्चात्र ग्रहणं तयोः प्रधानतया मोक्षाङ्गत्वसूचनार्थम् , तत्र संयमस्य नवीनकर्मानुपादानहेतुत्वेन तपसश्च पुराणकर्मनिर्जराहेतुत्वेन मोक्षप्रधानाङ्गत्वम् । नवोनकर्मासंग्रहणात् पुरातनकर्मक्षपणाच्च सकलकर्मक्षयलक्षणो मोक्षो भवत्येवेति । तथा-'अरहओ णं उसभस्स आसन को छोड़ने से और औपग्राहिक निषद्या के अभाव से जो उत्कुटुक आसन वाले साधु जन हैं वे उर्ध्वजानु साधुजन हैं, "अहो सिरा" जो नीचा मुंह करके तपस्या में लीन रहते हैं वे अधः शिराः साधुजन हैं इनकी दृष्टि ऊपर की ओर नहीं जाती है. जो साधुजन कोष्ठक में रखा हुआ धान्य जिस प्रकार विकीर्ण नहीं होता हैं इसी प्रकार "झाण कोदोवगया" ध्यानरूपी कोष्ठक में विराजमान रहते है, इनकी दृष्टि विषयों की ओर प्रचारित नहीं होतो है वे अनगार ध्यानकोष्ठकोपगत कहे जाते हैं । “संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणा विहरंति" इस प्रकार के ये सब अनगार सतरह प्रकार के संयम से और १२ प्रकार के तप से अपनी आत्मा को भावित करते थे. यहां जो संयम और तप का ग्रहण हुआ है वह प्रधानता से उनमें मोक्षाङ्गत्व की सूचना के निमित्त से हुआ है. क्योंकि संयम के द्वारा नवीन कर्मों का आगमन रोका जाता है और तप के द्वारा संचित हुए कर्मों की निर्जरा की जाती हैं. इस कारण इनमें मोक्ष कारणता प्रधान हैं. यह तो निश्चित है कि नवीन कमों का आगमन तो होता नहीं और पुराने संचित कर्मों की निर्जरा होती रहे तो इस तरह से सकल कर्मक्षयरूप 'उर्वजानवः' पर्यन्तनु तमाम मनसावन गोयपातिसूत्रथी समछ . शुद्ध पृथिवी રૂપ આસનને છોડવાથી અને ઔપગ્રાફિક નિષદ્યાના અભાવથી જે ઉસ્કુટુક આસનવાળા साधुनना छ त अ नु साधुजना छे. २ 'अहोसिरा' नीयुमा ४शन तपस्यामा લીન રહે છે તે અધઃ શિરાર સાધુજને છે. એમની દૃષ્ટિ ઉપરની તરફ જતી નથી. જે साधुसन। अष्टभ भूईस धान्य भवितु' नथी त रे 'झाणकोटठोवगया' ધ્યાન રૂપી કેપ્ટકમાં વિરાજમાન રહે છે, તેમની દૃષ્ટિ વિષયેની તરફ પ્રચારિત થતી નથીतवा मनमारने ध्यान रगत वाम मा छे. 'संजमेणं तवला अपपाण भावेमाणा विहरंति' मा प्रमाणे से सव मनगा। १७ प्रा२ना संयमथी भने १२ प्रा२न। तपथी પિતાના આત્માને ભાવિત કરતા હતા. અહીં જે સંયમ અને તપનું ગ્રહણ થયેલ છે તે પ્રધાનતાથી તેમનામાં મેક્ષાંત્વની સૂચના માટે થયેલ છે, કેમકે સંયમ દ્વારા નવીન કમેનું આગમન રોકવામાં આવે છે અને તપ દ્વારા સંચિત થયેલા કર્મોની નિર્જરા કરવામાં આવે છે. એથી એમનામાં મેક્ષકારણતા પ્રધાન છે. આ વાત તે નિશ્ચિત છે કે નવીન કર્મોનું આગમન તે થાય નહીં અને જૂના સંચિત કર્મોની નિર્જરા થતી રહે તે આ પ્રમાણે Page #410 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३९६ जम्बूद्वीपप्रचतिसूत्रे दुविहा' अर्हतः खलु ऋषभस्य द्विविधा - द्विप्रकारा 'अंतकर भूमि' अन्तकर भूमिः - अन्तस्य = भवान्तस्य मोक्षस्य करा अन्तकराः मोक्षगामिनस्तेषां भूमिः = काल: 'होत्था' अभवत् । कालो हि सर्वाधारः, अत आधारत्वसाम्येनात्र काळो भूमित्वेन विवक्षित इति । तामेवान्तकर भूमिमाह - 'तं जहा' इत्यादि । 'तं जहा ' तद्यथा 'जुगंतकरभूमीय' युगान्तकरभूमिः - युगं - पञ्चवर्षात्मकः कालः कृतयुगादिरूपो वा कालः, अयं च युगरूपः कालः क्रमिको भवति तथैव गुरुशिष्यप्रशिष्यपरम्पराऽपि क्रमिका, अतो गुरुशिष्यपरम्पराऽपि युगशब्देनेह विवक्षिता । तया गुरुशिष्यप्रशिष्यपरम्परया समुपलक्षिता या अन्तकर भूमिः - मोक्षगामिकालः सा युगान्तरकर भूमिः । तथा 'परिया अंतकर भूमीय' पर्यायान्तकरभूमि:पर्यायः - तीर्थकृतः केवलित्वकालः, तदपेक्षया अन्तकरभूमिः = मोक्षगामिकालपर्यायः । अयं भावः - लब्धकेवलज्ञानस्य भगवतो यावति केवलित्वपर्यांये व्यतीते मोक्षं गन्तुं प्रवृत्ता मोक्ष जीव को प्राप्त हो ही जाता है । " मरहओ णं उसभस्स दुविहा अन्तकरभूमी होत्था " उन आदिनाथ प्रभु के अन्तकर मोक्षगामी जीवों का काल दो प्रकार का हुआ काल सर्वाधार होता हैं अतएव आधार की साम्यता को लेकर काल को यहां भूमिरूप से कह दिया है "तं जहा" वह द्विप्रकारता इस प्रकार से है "जुगंतकर भूमीय' एक युगान्तकर भूमि और "परियायंकर भूमि य, दूसरी पर्यायान्तकर भूमि, पांच वर्ष प्रमाण काल का नाम युग है अथवा कृतयुगादिरूप काल का नाम युग है. यह युगरूप काल क्रमिक होता हैं इसलिये युगशब्द से गुरुशिष्यप्रशिष्य परम्परा भी विवक्षित हो जाती है. इस गुरुशिष्यप्रशिष्यपरम्परा से समुपलक्षित जो अन्तर भूमि है मोक्षगामी जोवों का काल हैं वह युगान्तर भूमि है. तीर्थंकर का जो केवल पर्याय का काल है वह पर्याय है. इस अपेक्षा जो मोक्षगामी जीवों का काल है वह पर्यायान्तकर भूमि है, इसका तात्पर्य ऐसा हैं जब भगवान् को केवलज्ञान हो चुका और उस अवस्था में उनकी जितनी केवली अवस्थारूप पर्याय व्यतीत हो चुकी उस समय में जितने अजर्भक्षय३५ भोक्ष वने यह न लय छे. "अरहओ णं उसभस्स दुविहा अंतकरभूमी होत्या ते माहिनाथ अलुने अन्त४२ - भोक्षणाभी लवाने आज मे प्रभार ने। थये।. કાળ સર્વાંધાર હાય છે. એથી આધારની-સામ્યતાને લઈને કાળને અહીં ભૂમિ રૂપમાં કહેवामां आवेल छे. 'तं जहा ' ते द्विप्रहारता भी प्रभाछे. "जुगत करभूमीय' ४ युगान्त४२ भूमि रमने मील " परियायंतकरभूमी य पर्यायान्तर भूमि पांच वर्ष प्रमाण अजनु નામ યુગ છે. અથવા કૃતયુગાદિરૂપ કાળનું નામ યુગ છે. આ યુગ રૂપ કાળ-ક્રમક હાય છે. આ પ્રમાણે ગુરુશિષ્ય પ્રશિષ્ય પર પરા પણ કેમિક હેાય છે. એથી જ યુગ શબ્દથી ગુરુ શિષ્ય પ્રશિષ્ય પર પરા પણ વિવક્ષિત થઈ જાય છે. આ ગુરુ શિષ્ય પ્રશિષ્ય પર પરાથી સમુપલક્ષિત જે અંતકર નિ છે. મેાક્ષ ગામી જીવાના કાળ છે, તે યુગાન્તકર ભૂમિ છે. તીથ કરના જે કેલિત્વ પર્યાય કાળ છે તે પર્યાય છે. એ અપેક્ષાએ જે મેાક્ષગામી જીવાના કાળ છે તે પર્યંયાન્તકર ભૂમિ છે. આનુ તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે જ્યારે ભગવાનને કેવળ જ્ઞાન થઈ ચૂકયુ. અને તે સ્થિતિમાં તેમની જેટલા કેવલી અવસ્થા રૂપ પર્યાયવ્યતીત થઈ Page #411 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाठीका द्वि०वक्षस्कार सू.४४ भगवतो जन्मकल्याणकादिवर्णनम् अनगाराः स कालः पर्यायान्तकर भूमिरिति । अथ युगान्तकरभूमि पर्यायान्तकरभूम्योः प्रमाणप्ररूपणा याह-- 'जुगंतकर भूमी' युगान्तकर भूमि हि 'असंखेज्जाई पुरिसजुगाई' असं - ख्येयानि पुरुषयुगानि 'जाव' यावत्-असंख्येयपुरुषपरम्परापरिमिताऽभवत् । तथा 'परिया अंतरभूमी' पर्यायान्तकर भूमिरेषाऽभवत् यत् भगवत ऋषभस्य 'अंतोमुहुत्तपरियाए ' अन्तमुहूर्त्त पर्याये= केवलिज्ञानस्य अन्तर्मुहूर्त्तप्रमाणे पर्याये व्यतीते सति 'अंतमकासी' अन्तम् = भवान्तम् अकार्षीत् = अकरोत् मुक्तिं गतो न तु ततः प्राक् कश्विज्जीवः । भगवतोऽन्तर्मुहूर्त्त - प्रमाणे केवलिये सति तन्माता मरुदेवी मुक्तिं गतेति बोध्यम् ।। सू० ४३ || यस्मिन् यस्मिन्नक्षत्रे जन्मादि कल्याणकानि भगवतो जातानि तन्नक्षत्रप्रदर्शन पुरस्सरं भगवतो जन्मकल्याणकादीन्याह- मूलम् —उसभेणं अरहा पंच उत्तरासाढे अभीइछट्ठे होत्था, तं जहाउत्तरासादाहिं चुए चइत्ता गव्भं वक्कते, उत्तरासादाहिं जाए उत्तरासादाहिं राया भिसेयं पत्ते उत्तरासादाहिं मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए, उत्तरासादाहिं अनंते जाव समुप्पण्णे, अभीइणा परिणिव्वुए ॥ सू० ४४ ॥ ३९७ छाया - ऋषभः खलु अर्हन् पञ्चोत्तराषाढ: अभिजित्षष्ठोऽभवत् तद्यथा-उत्तराषाढालु च्युतश्च्युत्वा गर्भ व्युत्क्रान्तः, उत्तराषाढासु जातः उत्तरागढासु राज्याभिषेकं प्राप्तः उत्तराषाढासु मुण्डो भूत्वा अगारात् अनगारितां प्रब्रजितः, उत्तराषाढासु अनन्त यावत् मोक्ष में जाने के लिए अनगार प्रवृत्त हुए वह काल पर्यायान्त कर भूमि है, "जुगंतकरभूमी जाव असंखेज्जाई पुरिसजुगाई" इनमें जो युगान्तकर भूमि है वह असंख्यात पुरुषपरम्पराप्रमित होता है. तथा “परियायं तकरभूमि अंतो मुहुत्तपरियार अंतमकासी" पर्यायान्तकर भूमि ऐसी है कि भगवान् ऋषभ के केवली होने की पर्याय का अन्मर्मुहूर्तप्रमाण समय व्यतीत होने पर जिस जीव ने अपने भवका अन्त कर दिया होता है. मोक्ष में वह जीव पहुंच जाता है - इसके पहिले कोई जोव मोक्ष प्राप्त नहीं करता है. ऐसा वह समय पर्यायान्तकर भूमि रूप कहा गया है, ऋषभनाथ की केवलिपर्याय जब एक अन्तर्मुहूर्तप्रमाण काल व्यतीत हो चुकी थी उस समय में उनकी माता मरुदेवा मुक्ति चली गई थीं ॥ ४३ ॥ ચૂકયા તે સમયમાં જેટલા મેાક્ષમાં જનારા અનગારે પ્રવૃત્ત થયા, તે કાલ પર્યાયાન્તકર भूमि छे. “जुगंतकरभूमो जाव असंखेज्जाई पुरिसजुगाई” खेमनामों के युगान्तर भूमि छे ते असंख्यात पुरुष परंपरा प्रमित होय छे तथा "परियायत करभूमी अतो मुहुत्तपरियाप अतमकासी” पर्यायान्तर भूमि सेवी छे है लगवान ऋषभ देवणी थवानी पर्यायना અન્તમુહૂર્ત પ્રમાણ સમય વ્યતીત થઈ જવા ખાદ્ય જે જીવે પેાતાના ભવના અન્ત કરી દીધા છે, તે જીવ મેક્ષમાં પહોંચી જાય્ છે. એના પહેલાં કેઈ જીવ મેક્ષ પ્રાપ્ત કરતા નથી. એવા તે સમય પર્યાયાન્તકર ભૂમિ રૂપ કહેવામાં આવેલ છે. ઋષભનાથના કેવલ પર્યાય જયારે એક અન્તસુ હતં પ્રમાણુ કાળ વ્યતીત થઈ ચુકયા હતા, તે સમયે તેમની માતા મરુ દેવા મુકિત પ્રાપ્ત કરી ચૂકી હતી. ૫૪૩મા Page #412 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३९८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे समुत्पन्नम्, अभिजिता परिनिर्वृतः ॥सू० ४४॥ टीका-'उसभेणं' इत्यादि । 'उसभेणं अरहा पंच उत्तरासाढे' ऋषभः खलु अर्हन् पश्चोत्तराषाढः पञ्चसु उत्तराषाढासु च्यवनजन्मराज्याभिषेकदीक्षाज्ञानलक्षणानि पञ्चकल्याणकानि यस्य स तथाभूतः, 'अभीइछ?' अभिजित्षष्ठः-अभिजिति नक्षत्रे षष्ठंनिर्वाणलक्षणं षष्ठं कल्याणं यस्य स तथाभूतश्च ‘होत्था' अभवत् । तदेवाह-'तं जहा' तद्यथा 'उत्तरासादाहि' उत्तराषाढासु नक्षो 'चुए' च्युतः सर्वार्थसिद्धि नाम्नो महाविमानान्निर्गतः, 'चइत्ता' च्युत्वा 'गब्भं वक्कंते' गर्भ व्युत्क्रान्तः-मरुदेवायाः कुक्षौ, अवतीर्णः । तथा- 'उत्तरासाढाहि जाए' उत्तराषाढासु जात:-गर्भान्निष्क्रान्तः, 'उत्तरासाढाहिं रायाभिसेयं पत्ते' उत्तराषाढासु राज्याभिषेकं प्राप्तः, 'उत्तरासाढाहि मुडे भवित्ता अगाराओ' जिन २ नक्षत्र में जन्मादिक कल्याणक भगवान् के हुए हैं उन २ नक्षत्रों के प्रदर्शन पूर्वक अब सूत्रकार प्रभु के जन्मकल्याणक का कथन कहते हैं--. "उस भेणं अरहा पंचउत्तरासाढे' इत्यादि। टीकार्थ- "उसभेणं अरहा पंच उत्तरासाढे" ऋषभनाथ भगवान पांच उत्तर नक्षत्रों में च्यवन कल्याण वाले, जन्मकल्याण वाले, राज्यभिषेक कल्याण वाले और दीक्षा कल्याण वाले हुए हैं, तथा “अभिइ छट्रे होत्था" अभिजित् नामके नक्षत्र में वे निर्माण कल्याण वाले हुए है "तं जहा" इसी विषय का स्पष्टो करण अब सूत्रकार करते हुए कहते है-"उत्तरासाढेहिं चुए चइत्ता गन्भं वक्कंते उत्तरासाढाहिं जाए" ऋषभनाथ भगवान् सर्वार्थद्धि नामके महाविमानसे उत्तराषाढ नक्षत्र में निर्गत होकर उसी उत्तराषाढ नक्षत्र में मरुदेवाको कुझि में अवतीर्ण हुए, उत्तराषाढ नक्षत्र में ही वे राज्यपद में अभिषिक्त हुए, “उत्तराषाढाहिं मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पचहए" उत्तराषाढनक्षत्र में ही वे मुण्डित होकर अगारावस्था से अनगारावस्थामें प्रवजित हुए और જે જે નક્ષત્રમાં જન્માદિ કલ્યાણક ભગવાનને થયાં છે તે નક્ષત્રોને પ્રદર્શિત કરીને હવે સૂત્રકાર પ્રભુના જન્મકલ્યાણકનું કથન કરે છે ? 'उसमेणं अरहा-पंच उत्तरासाढे' इत्यादि सूत्र ॥४४॥ टा--"उसमेणं अरहा पंच उत्तरासाढे' मनाथ भगवान पांय 6त्तराषाढ नक्षત્રોમાં યવન કલ્યાણુવાળા. જન્મકલ્યાણવાળા, રાજ્યાભિષેક કલ્યાણવાળા અને દીક્ષાકલ્યાણवाणा या छ, तथा 'अभिइछठे होत्था' मलितनामना नक्षत्रमा तानिale या वाणा थय। छे. 'त जहा' से (वये २५ष्टता ४२ता हुवे सूत्रा२४ छ । 'उत्तरासादाहिं चए वइत्ता गम्भ वक्कंते उत्तरासाढाहि जाप' ऋषभनाथ भगवान सा सिद्धनामना महान માનથી ઉત્તરાષાઢા નક્ષત્રમાં નિર્ગત થઈ ને. તે ઉત્તરાષાઢા નક્ષત્રમાં જ મરુદેવાની કુક્ષિમાં भवती थया. उत्तराषाढ नक्षत्रमा न्य५ मनिषित थया. 'उत्तरासादाहि मंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए' उत्तराषाढ नक्षत्रमा तेसो भुडित अमाश Page #413 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३९९ प्रकाशिका टोकाद्वि०वक्षस्कार सू.४४ भगवतो जन्मकल्याणकादिवणनम् उत्तराषाढासु मुण्डो भूत्वा अगारात्-अगारं गृहं परित्यज्य 'अणगारियं' अनगारितां= साधुत्वं 'पन्चइए' प्रव्रजित: प्राप्तः, 'उत्तरासाढाहिं अणंते जाव समुप्पण्णे' उत्तराषाढासु अनन्तं यावत् समुत्पन्नम् । अत्र यावत्पदेन-'अणुत्तरेण निव्वाघाए णिरावरणे कसिणे पडिपुण्णे केवलबरनाणदंसणे' छाया-अनुत्तरं निर्व्याघातं निरावरणं कृत्स्नं प्रतिपूर्ण केवलवरज्ञानदर्शनम् इति संग्राह्यम् , अर्थास्त्वेषामेकचत्वारिंशत्तमसूत्रो (४१) विलोकनीया इति । तथा अभीइणा' अभिजिति नक्षत्रो परिणिव्वुए' परिनिर्वृत्तः सिद्धिंगत इति ॥सू०४४॥ मूलम्--उसमेणं अरहा कोसलिए वज्जरिसहनारायसंघयणे समचउरंससंठाणसंठिए पंच धणुसयाई उद्धं उच्चत्तेणं होत्था । उसमेणं अरहा वीसं पुव्वसयसहस्साइं कुमारवासमज्झ वसित्ता तेवट्टि पुव्वसयसहस्साई महाराज्जवासमज्झे वसित्ता तेसीइं पुव्वसयसहस्साई अगाखासमझे वसित्ता मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए । उसमेणं अरहा एग वासहस्सं छउमत्थपरियायं पाउणित्ता एगंपुव्वसयसहस्सं वाससहस्सूणं केवलिपरियायं पाउणित्ता एगंपुव्वसयसहस्सं बहुपडिपुण्णं सामण्णपरियायं पाउणित्ता चउरासीई पुव्वसयसहस्साई सव्वाउय पालइत्ता, जे से हेमंताणं तच्चे मासे पंचमे पक्खे भाहबहुले, तस्स णं माहबहुलस्स तेरसो पक्खेणं दसहि अणगारसहस्सेहि सद्धि संपरिखुडे अट्ठावयसेलसिहरंसि चोइसमेणं भत्तणं अपाणएणं संपलियंकनिसण्णे पुवाण्हकालेसमयंसि अभीइणा णक्खत्तेणं जोगमुवागएणं सुसमदूसमाए समाए एगृण णवउइईहिं पक्खेहिं सेसेहिं कालगए वीइक्कंतेजाव सव्वदुक्खप्पहीणे ॥सू०४५ छाया-ऋषभः खलु अर्हन् कौलको वनऋषभनाराचसंहननः समचतुरस्रसंस्थान संस्थितः पञ्च धनुश्शतानि ऊध्वम् उच्चत्वेन अभवत् । ऋषभः खलु अर्हन् विशति पूर्वशतसहस्राणि कुमारवासमध्ये उषित्वा त्रिषष्टिं पूर्वशतसहस्राणि उत्तरासाढाहिं अणंते जाव समुप्पण्णे" उत्तराषाढा नक्षत्र में ही उन्होंने अनन्त यावत् केवलवरज्ञान दर्शन प्राप्त किये; यहां यावत्पद से-“अणुत्तरेण निवाघाए, निरावरणे, कसिणे, पडिपुण्णे, केवलवरनाण दंसणे" इन पदों का ग्रहण हुआ है, इन पदों का अर्थ जानने के लिए ४१ वें सूत्र को देखना चाहिये, 'अभीइणा परिणिन्वुए" ऋषभनाथ प्रभुका निर्वाण अभिजित् नामके नक्षत्र में हुभा ॥१४॥ वस्थाथी मनमारावस्थामा प्रति यया 'उत्तरासाढाहि अणते जाब समुप्पण्ण' भने त्तરાષાઢા નક્ષત્રમાં જ તેમણે અનંત યાવત્ કેવળજ્ઞાન દર્શનની પ્રાપ્તિ કેરલી અહીં યાવત पहथी "मणुत्तरेण णिव्वाधाए, णिरावरणे, कसिणे, पडिपुण्णे, केवलवरणाण दंसणे" या પર ગ્રહણ થયા છે. આ પાના અર્થને જાણવા માટે ૪૧ માં સૂત્રને જેવું જોઈએ તેના परिणिब्खुए ऋषमनाथ प्रभुनु निaly मलिलित नामना नक्षत्रमा थयु ॥सत्र-४४॥ Page #414 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिस्त्रे उषित्वा त्र्यशीतिं पूर्वशतसहस्राणि अगारयासमध्ये उषित्वा मुण्डो भूत्वा अगारात् अनगारितां प्रवजितः । ऋषभः खलु अर्हन् एकं वर्षसहस्रं छद्मस्थपर्यायं पालयित्वा, एकं पूर्वशतसहस्रः वर्षसहस्त्रोनं केवलिपर्यायं पालयित्वा, एकं पूर्वशतसहस्त्रं बहुप्रतिपूर्ण श्रामण्यपर्याय पालयित्वा चतुरशीति पूर्वशतसहस्राणि सर्वायुष्कं पालयित्वा, यः स हेमन्तानां तृतीयो मासः पञ्चमः पक्षो माघबहुल, तस्य खलु माघबहुलस्य त्रयोदशी पक्षे खलु दशभिरनगारसहस्रः साद्ध संपरिवृतः अष्टापदशैलशिखरे चतुर्दशेन भक्तेन अपानकेन संपल्यङ्क निषण्णः पूर्वालकालसमये अभिजित्ः नक्षत्रेण योगमुपगते खलु सुषमदुष्षमायाः समायाः एकोन नवत्यां पक्षेषु शेषेषु कालगतो व्यतिक्रान्तो यावत् सर्वदुःस्वप्रहीणः ॥सू० ४५॥ टीका-'उसमे णं' इत्यादि । 'उसभेणं अरहा कोसलिए वज्जरिसहनारायसंघयणे' ऋषभः खलु अर्हन् कौशलिको वज्र पमनाराचसंहननः वन-कीलिकाकारमस्थि, ऋषभः तदुपरि परिवेष्टनपट्टाकृतिकोऽस्थिविशेषः, नाराचम्-उभयतो मर्कटबन्धः, तथा च द्वयोरस्थ्नोरुभयतो मर्कटबन्धनेन बद्धयोः पट्टाकृतिना तृतीयेनास्थ्ना परिवेष्टितयोरुपरि तदस्थित्रयं पुनरपि दृढीकर्तुं तत्र निखातं कीलिकाकारं वज्रनामकमस्थि यत्र भवति तद् वज्रऋषभनाराचम् संहन्यन्ते दृढीक्रियन्ते शरीरपुद्गला येन तत् संहननम् अस्थिनिचयः वज्रऋषभनाराचं संहननं यस्य स तथाभूतः, पुनः 'समचउरंससंठाणसंठिए' समचतुरस्रसं अब सूत्रकार प्रभु से संबन्धित शरीरसंहनन आदि का, कुमारादि कालों को स्थिति का और दीक्षा ग्रहण आदि कल्याणकों का कथन करते हैं "उसमे ण अरहा कोसलिए वज्जरिसहणारायसंघयणे" इत्यादि। टीकार्थ "उसमेणं अरहा कोसलिए वज्जरिसहणाराय संघयणे" कौशलिक वे ऋषभ अईन्त वज्र ऋषभनाराच संहनन वाले थे, इस संहनन में कीलिका के आकार की जो हड्डी होती है उसका नाम वज्र है, उसके ऊपर परिवेष्टनकरने वालो पट्टी के जैसी जो दूसरी हड्डी होती है उसका नाम ऋषभ है, दोनों तरफ जो मर्कटबन्ध है उसका नाम नाराच है, तथा जिस संहनन में दोनों हड्डियों के उपर जो कि दोनों ओर से मर्कटबन्ध द्वारा जकड़ी हुई होती है एवं पट्टी के जैसी तृतीय हड्डी से जो परिवेष्टित रहती हैं. इन तीनों हड्डियों को मजबूत करने के लिये उनमें कीलिका के आकार जैसी एक वज्र नाम को हड्डि ठुकी हुई होती है, इसी कारण इस संहनन का नाम હવે સૂત્રકાર પ્રભુથી સંબદ્ધ શરીર સંહનન વગેરેનું કુમાદિ કાળની સ્થિતિનું અને દીક્ષા ગ્રહણ વગેરે કલ્યાણકોનું કથન કરે છે? 'उसमेणं अरहा कोसलिए वज़रिसहणारायसंघयणे'- इत्यादि-सूत्र-॥४५॥ ટીકા-કૌશલિક તે બાષભ અહંત વજ ગષભનારાચ-સંહનનવાળા હતા, એ સંહનનમાં કલિકાના આકારની જે અસ્થિ હોય છે તેનું નામ વજ છે. તે અસ્થિની ઉપર પરિષ્ટન કરનારી પટ્ટી જેવી બીજી અસ્થિ હોય છે તેનું નામ ઋષભ છે. બન્ને તરફ જે મર્કટબંધ છે, તેનું નામ નારાચ છે. તથા જે સંહનનમાં બેઉ હાડકાઓની ઉપર કે જે બન્ને બાજુથી મર્કટ બન્ધ વડે જકડાયેલ હોય છે, અને પટ્ટિના જેવી ત્રીજા હાડકાથી જે વીંટળાયેલ રહે છે, આ ત્રણે હાડકાઓને મજબૂત કરવા માટે તેમાં ખીલાના આકાર જેવું એક Page #415 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू. ४५ भगवतः संहननादि निरूपणम् ४०१ स्थानसंस्थितः समाः तुल्याः अन्यूनाधिकाः चतस्रः अस्रयो हस्तपादोपर्यधोरूपाश्चत्वारोऽपि विभागाः शुभलक्षणोपेता यस्य संस्थानस्य तत् समचतुरस्र-तुल्यारोह सरिणाई, तच्च तत् संस्थानम् =आकारविशेषः, तेन संस्थितः युक्तः, तथा 'पंच धणुसयाई' पञ्चधनुश्शतानि 'उद्धं उच्चत्तेणं होत्या' ऊर्ध्वमुच्चत्वेन अभवत् आसीदिति । इत्थं भगवतः शरीरवर्णनमभिधाय सम्प्रति कुमारवासमध्यादि स्थिति छद्मस्थत्वादिपर्यायांश्च प्रदर्शयन् निर्वाणकल्याणमाह-'उसभेणं अरहा वीसं' इत्यादि । 'उसभेणं अरहा वीसं पुव्वसयसहस्साई' ऋषभः खलु अर्हन् विंशतिपूर्वशतसहस्राणि-विंशतिलक्षपूर्वाणि 'कुमारवासमझे वसित्ता' कुमारवासमध्ये उषित्वा -स्थित्वा, 'तेवढेि पुन्चसयसहस्साई' त्रिषष्टिं पूर्वशतसहस्राणि त्रिषष्टिलक्षपूर्वाणि 'महाराजवासमझे वसित्ता' महाराज्यवासमध्ये उषित्वा, इत्थं 'तेसीई पुव्वसयसहस्साई' ज्यशीतिं पूर्वशतसहस्राणि-ज्यशीतिलक्षपूर्वाणि 'अगारवासमज्झे' अगारवासमध्ये-गृहस्थत्वे 'वसित्ता' उषित्वा, ततो 'मुंडे भवित्ता अगाराओ' मुण्डो भूत्वा वज्रऋषभनाराच संहनन है; जिसके द्वारा शरीर पुद्गल दृढ किये जाते हैं उसका नाम संहनन है यहसंहनन अस्थिनिचयरूप होता है, भगवान् ऋषभनाथ का यही संहनन था "समचउरंससंठाण संठिए" संस्थान-समचतुरस्र था, जिस-संस्थान में हाथ, पैर, ऊपर और नीचे का भाग ये चारों अवयव सम अन्यूनाधिक प्रमाण वाले होते हैं तथा शुभलक्षणों से युक्त होते हैं, उस संस्थान का नाम समचतुरस्र संस्थान है, "पंच धणुसयाई उद्धं उच्चत्तण होत्था" इनके शरीर की ऊँचाई ५०० धनुष की थी, "उसमेणं अरहा वीसं पुव्वसयसहस्साई कुमारवासमज्झे वसित्ता" ये ऋषभनाथ जिनेन्द्र २० बीस लाख पूर्वतक कुमारावस्था में रहे, "तेवढेि पुष्वसयसहस्साई महाराज वासमझे वसित्ता" ६३ लाख पूर्व तक महाराजा के पद पर रहें, "तेसोई पुवसयसहस्साई अगारवासमझे वसित्ता" इस तरह ८३ लाख पूर्व तक ये गृहस्थावस्था में रहे, "मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए" बाद में ये मुण्डित होकर अगारावस्था को छोड़कर अनगारावस्था વજ નામનું હાડકું બેસાલ હોય છે. આકારણથી જ આ સંહનનું નામ વજી અષભ નારાચ સહનન છે. જેના વડે શરીરના પુદગલા મજબૂત કરવામાં આવે છે. તે સંહન કહેવાય છે. એ સં હનન અસ્થિ સમૂહ રૂપ હોય છે. ભગવાન ઋષભનાથનું એ જ સહનન ७तु 'समचउरंससंठाण संठिए' तमनु संस्थान सभयतुरख तु.२ स्थानमा साथ, प्रम ઉપર અને નીચેને ભાગ આ ચારે અવયવ સમ–અન્યૂનાધિક પ્રમાણ વાળા હોય છે. અને शुभ लक्षणेथी युताय छे. ते संस्थाननु' नाम सभयतु२ख संस्थान छे. 'पंच धणु सया उद्वं उच्चत्तंण होत्था' तमना शरी२नी या ५००-यांय से। धनुषनी ता. 'उसमेणं अरहा वीसं पुवसयसहस्साई कुमारवासमझे वसित्ता । 0 ऋषभनाथ नेन्द्र २० वीस ५यन्त भा२ मस्यामा २द्या. 'तेवट्टि पुश्वसयसइस्साई महाराजवासમશે વરિત્તા' આ પ્રમાણે ૬૩ લાખ પૂર્વ સુધી મહારાજ પદ પર બિરાજ્યા. ત્યાર બાદ 'तेसिइ पुव्वसयसइस्साई अगारवासमझे वसित्ता । ८३ प पू सुधा तया स्था. , Page #416 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४०२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे अगारात्=अगारं परित्यज्य 'अणगारियं पब्बइए' अनगारितां प्रबजितः प्राप्तः । इत्थं गृहीतप्रव्रज्य 'उसभेणं अरहा एग वाससहस्सं' ऋषभः खलु अर्हन् एकं वर्षसहस्रम्-एक सहस्रवर्षाणि 'छउमत्थपरियायं पाउणित्ता' छद्मस्थपर्यायं पालयित्वा समाप्य, ततः 'एग पुव्वसयसहस्सं वाससहस्सूणं' एकं-पूर्वशतसहस्रं वर्षसहस्रोनम्-एक सहस्रवर्षन्यूनैकलक्षपूर्वाणि 'केवलिपरियाय' केवलिपर्यायं केवलित्वं 'पाउणित्ता' पालयित्वा समाप्य, इत्थं च 'एगं पुव्यसयसहस्सं बहुपडिपुण्णं' एकं पूर्वशतसहस्रं बहुप्रतिपूर्णम् अखण्डितानि एकलक्षपूर्वाणि 'सामण्णपरियायं पाउणित्ता' श्रामण्यपर्यायं पालयित्वा, ततश्च 'चउरासीई पुव्वसयसहस्साई' चतुरशीतिं पूर्वशतसहस्राणि-चतुरशीतिलक्षपूर्वाणि 'सव्वाउयं' सर्वायुष्कं संपूर्णमायुः 'पालइत्ता' पालयित्वा समाप्य 'जे से हेमंताणं तच्चे मासे पंचमे पक्खे माहबहुले' यः स हेमन्तानां तृतीयो मासः पञ्चमः पक्षो माघबहुल:-माघकृष्णपक्षः, 'तस्सणं माहबहुलस्स तेरसीपक्खणं' तस्य माघबहुलस्य त्रयोदशीपक्षे त्रयोदशी तिथौ खलु 'दसहि अणगारसहस्सेहिं' दशभिः अनगारसहस्रैः दशसहस्रसंख्यकैरनगारैः 'सद्धिः संपरिखुडे' सार्द्ध सम्परिवृत्तः, 'अट्ठावयसेलसिहरंसि' अष्टापदशैलशिखरे अष्टापदनामकपर्वमें प्रवजित हों गये, “उसभेणं अरहा एगं वाससहस्सं छउमत्थपरियायं पाउणित्ता" ये इस अवस्था में एक हजार वर्ष तक छमस्थ रहे, “एगं पुव्व सयसहस्सं वाससहस्सूणं केवलिपरियायं पाउणित्ता" एक हजार वर्ष कम एक लाख पूर्वतक केवलिपर्याय का इन्होंने पालन किया, “एगं पुत्वसयसहस्सं बहुपडिपुण्णं सामण्णपरियायं पाउणित्ता" इस तरह पूरे एक लाख पूर्वतक श्रामण्य पर्याय का पालन करके इन्होंने अपनी “चउरासीइं पुव्वसयसहस्सं सव्वाउयं पालइत्ता" ८४ लाख पर्व की पूरी आयु समाप्त कर फिर ये “जे से हेमंताणं तच्चे मासे पंचमे पक्खे माहबहुले, तस्स णं माहबहुलस्स तेरसी पक्खेणं" हेमन्त-ऋतु के माघकृष्ण पक्ष में त्रयोदशी के दिन "दसहिं अणगारसहस्सेहिं सद्धि" दश हजार मुनियों से सम्परीवृत्त हुए "अट्ठावयसेल सिहरंसि" अष्टापद शैलशिखर से "चोद्दसमेणं भत्तेण" निर्जल छह उपवास करके "संपलियंकवस्थामा २.. त्या२ मा 'मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइए तेसो भुडित छन અગારાવસ્થાન એટલે કે ગ્રહસ્થપણાને ત્યાગ કરીને અનગાર અવસ્થા ધારણ કરી અર્થાત प्रत थई गया. 'उसमेणं अरहा एग वास सहस्सं छउमत्थ परियायं पाउणित्ता' तथा सा सस्थामा ४ २ १५ पर्यन्त छस्थरया. 'पग पव्वसयसम्म केवलिपरियाय पाउणित्ता' ये ४ २ वर्ष न्यून ४ ५ वर्ष पर्यन्त सभा le पायन पास यु “एरां पुव्वसयसहस्सं बहु पडिपुण्णं सामण्णपरियाय पाणित्ता' આ પ્રમાણે પૂરા એક લાખ વર્ષ સુધી શ્રમણ્ય પર્યાયનું પાલન કરીને એમણે પોતાનું 'चउरासीई पुव्वसयसहस्सं सव्वाउयं पालयित्ता' ८४ ५ पूर्व संपूर्ण भायु सभात शन पछी 'जे से हेमंताणं तच्चे मासे पंचमे पक्खे माहबहुले, तस्स ण माह--नेग्मो पक्खे ण' भन्त तन। माघ ४० पक्षमा तरसने हवसे वसहि अण. गारसहस्सेहिं सद्धिं' इस पर भुनियाथी युत थ न “अहावयसेलसिहरंसि" भटाप Page #417 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विवक्षस्कार सू. ४५ भगवतः संहननादि निरूपणम् तशिखरे 'चोइसमेणं भत्तेणं अपाणएणं' चतुर्दशेन भक्तेन अपानकेन निर्जलैः षभिरुपवासैः युक्त इत्यध्याहार्यम् , तथा 'संपलियंकणिसणे' सम्पल्यङ्कनिषण्ण: पद्मासनोपविष्टः सन् 'पुचण्हकालसमयंसि' पूर्वाह्नकालसमये अभीइणा णक्खत्तेण जोगमुवागएणं' अभिजिता नक्षत्रेण सह योगमुपागते खलु, चन्द्रे इत्यध्याहार्यम् , तथा 'सुसमदुसमाए समाए एगूणणवउइईहिं पक्खेहि' सुषम दुष्षमायाः समायाः एकोननवतौ पक्षेषु-सार्धाष्टमासाधिकेषु त्रिषु वर्षेषु 'सेसेहिं' शेषेषु सत्सु 'कालगए' कालगतः-मरणधर्म प्राप्तः, 'वीइक्कंते' व्यतिक्रान्तः जन्मजरामरणादिलक्षणं संसारम् व्यतिगतः 'जाव' यावत् --यावत्पदेन 'समुधतः छिन्नजातिजरामरणबन्धनः सिद्धो बुद्धो मुक्तोऽन्तकृतः परिविर्भूतः' इति संग्राह्यम् । तत्र-समुधातःसं-सम्यक पुनरावृत्तिराहित्येन उत्-उर्व लोकाग्रलक्षणं स्थानं यात प्राप्तः, न पुनरन्यतैर्थिकवत् पुनरवतारी, उक्तं च तैः “ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य, कर्तारः परमं पदम् । गत्वाऽऽगच्छन्ति भूयोऽपि, भवं तीर्थनिकारतः ॥१॥ इति निसणे" पर्यङ्कासन से "पुव्व ण्ह" पूर्वाह्न "कालसमयंति" काल के समय "अभीइणा णक्वतेणं" अभिजित नक्षत्र के साथ “जोगमुवागएणं" चन्द्रयोग में मुक्ति पधारे, जब ये मोक्ष पधारे उस समय "सुसम दुसमाए समाए एगूण णवइईहिं पक्खेहिं सेसेहिं" चतुर्थ काल के ३ वर्ष ८॥ मास बाकी थे, इस प्रकार “कालगए वीइक्कंते जाव सव्व दुक्खपहीणे" जन्म, जरा, मरण आदि लक्षण वाले संसार का परित्याग कर वे प्रभु यावत् सर्व दुःखों से प्रहीण हो गये, यहां यावत्पद से "समुद्धातः छिन्नजातिजरामरणबन्धनः सिद्धो बुद्धो मुक्तोऽन्तकृतः परिनिर्वृतः” इस पाठ का ग्रहण हुआ है । इस पाठ का भाव इस प्रकार है-प्रभु उस लोकाग्ररूप स्थान पर पहुँचे कि फिर जहाँ से कभी भी वापिस उन्हें यहां पर नहीं आना पड़ता है । अतः अन्य तीर्थकों ने जो ऐसा कहा है कि "ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य कर्तारः परमं पदम् । गत्वाऽऽगच्छम्ति भूयोऽपि शै शिपथी 'चोद्दसमेणं भत्तेणं' निora छ वास उशन 'संपलियंक निसणे' पय क्षनयी 'पुव्वण्हं पूर्वात कालसमयंसि' मना समये अभोणा णक्खत्तण' अभिलत् नक्षत्रथी साथ 'जोगमुवागएण' यद्रभानाय थये। त्यारे तो श्रीभुतिगामि थया. यारे तेसो श्री भुति पधार्या त्यारे 'सुसम दुसमाए समाए एग्णणवउ इईहि पक्खेहि િચતુર્થી કાળના ૩ ત્રણ વર્ષ અને ૮ સાડા આઠ માસ બાકિ હતા આ પ્રમાણે 'कालगए वीइक्कते जाव सव्व दुक्खपहीणे' -भ, स, भ२५ माहि सक्षवाणा સંસારને પરિત્યાગ કરીને તે પ્રભુ યાવત્ સર્વદુઃખેયી પ્રહીણ થઈ ગયા. અહી યાવત પદથી "समुद्धातः छिन्नजातिजरामरणबन्धनः सिद्धो बुद्धो मुक्तोऽन्तकृतः परिनिर्वृतः "AL પાઠ ગ્રહણ થયેલ છે. આ પાઠનો ભાવ આ પ્રમાણે છે : જ્યાંથી ફરી વાર કોઈ પણ દિવસે તેઓશ્રીને પાછા અહીં આવવાનું થાય નહિ એવા તે લેકારૂપ સ્થાન પર તેઓશ્રી પધાર્યા मेथी अन्य तीर्थ २ मा प्रमाणे युं छे , "शानिनो धर्मतीर्थस्य कर्तारं परमं पदम् । गत्वाऽऽच्छन्ति भूयोऽपि भवं तीर्थनिकारतः ॥१॥ युति मन मामयी साथ Page #418 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तथा छिन्नजातिजरामरणबन्धनः छिन्नं विनाशितं जातिजरामरणरूपं बन्धनं, तद्धतुभूतकर्मणां विनाशाद् येन स तथाभूतः, तथा सिद्धः कृतार्थः, बुद्धः ज्ञातसमस्ततत्त्वः, मुक्तः भवोपग्राहिकर्मा शेभ्यो विनिर्गतः, अन्तकृतः अन्तः भवान्तः कृतो येन स तथाविधः अपुनर्भव इत्यर्थः, परिनिवृतः कर्मकृतसकल सन्तापरहितत्वात् समन्ताच्छीतीभूतः, अतएव 'सव्वदुक्खप्पहीणे' सर्वदुःखप्रहीणः सर्वाणि-शारीरमानसानि दुःखानि प्रहोणानि यस्य स तथा विनष्टसकलशारीरमानसदुःखश्च जातः इति !।सू. ४५॥ __ अथ भगवति निवृते देवा यत्कृतवन्तस्तदाह___मूलम्-जं समयं च णं उसमे अरहा कोसलिए कालगए वीइक्कते समुज्जाए छिण्णजाइजरामरणबंधणे सिद्धे बुद्धे जाव सव्वदुक्खप्पहीणे, तं समयं च णं सक्कस्स देविंदस्स देवरन्नो आसणे चलिए । तए णं से सक्के देविदे देवराया आसणं चलियं पासइ, पासित्ता ओहिं पउंजइ, पउंजित्ता भयवं तित्थयरं ओहिणा आभोएइ, आभोइत्ता एवं वयासी-परिणिव्वुए खलु जंबुद्दीचे दीवे भरहे वासे उसहे अरहा कोसलिए, तं जीयमेयं तीयपच्चुप्पण्णमणागयाणं सक्काणं देविंदाणं देवराभवं तीर्थनिकारतः ॥१॥ वह सर्वथा युक्ति और आगम से विरुद्ध है, प्रभु ने जाति जरा मरण रूप बन्धन का विनाश इसलिये कर दिया कि इनके हेतुभूत कर्मों का उन्होंने विनाश कर दिया था। प्रभु कृतार्थ होने के कारण सिद्ध हो गये कहे गये हैं, भवोपग्राहिक कर्मा शो से विनिर्गत । हो जाने के कारण प्रभु को मुक्तरूप से प्रकट किया गया है। अब प्रभु का पुनः संसार में जन्म नहीं होगा । इस कारण उन्हें अन्तकृत कहा गया है, कर्मजन्य सकल संतापोंसे रहित होने के कारण प्रभु में सब तरफ से शीतलता आगई थी इसलिये उन्हें परिनिर्वृत कहा गया है, शारीरिक, मानसिक समस्त दुःखों से प्रभु सर्वथा रहित हो चुके थे इसलिये उन्हें सर्वदुःखप्रहीण प्रकट किया गया है ॥४५॥ વિરુદ્ધ છે. પ્રભુએ જાતિ જરા મરણ રૂપ બન્ધનને વિનાશ એટલા માટે કર્યો કે એમનાં હતશત કર્મોને તેઓશ્રીએ વિનાશ કરી દીધું હતું. કૃતાર્થ હોવા બદલ પ્રભુ સિદ્ધ રૂપે પ્રસિદ્ધ છે. સમસ્ત તાના જ્ઞાતા હેવા બદલ પ્રભુ બુદ્ધ કહેવામાં આવેલ છે. ભયગ્રાહિક કર્મા શોથી વિનિર્ગત હેવાથી પ્રભુને મુક્ત રૂપમાં પ્રકટ કરવામાં આવેલ છે. હવે સંસારમાં ફરી વાર પ્રભુને જન્મ કદાપિ થશે નહિ. એથી જ તેઓશ્રીને અન્નકૃત કહેવામાં આવેલ છે. કર્મ જન્ય સમસ્ત સંતાપોથી રહિત લેવા બદલ પ્રભુમાં સર્વ રીતે શીતળતા આવી. ગઈ હતી એથી જ તેમને પરિનિવૃત્ત કહેવામાં આવેલ છે. શારીરિક માનસિક સમસ્ત દુખેથી પ્રભુ સર્વથા વિહીન થઈ ચૂક્યા હતા એટલા માટે તેઓશ્રીને સર્વ દુઃખ પ્રહણના રૂપમાં પ્રકટ કરવામાં આવેલ છે. સૂત્ર-૪પા Page #419 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कार सू.४६ भगवतः निर्वाणानन्तरदेवकृत्यनिरूपणम् ४०५ ईणं तित्थगराणं परिनिव्वोणमहिमं करित्तए, तं गच्छामि णं अहंपि भगवओ तित्थगरस्स परिनिव्वाणमहिमं करेमि त्ति कटु वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता चउरासीए सोमाणियसाहस्सीहिं तायत्तीसाए तायत्तीसएहि, चरहिं लोगपालेहिं जाव चउहिं चउरासीईहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अण्णेहि य बहूहि सोहम्मकप्पवासीहिं वेमोणीएहिं देवेहिं देवीहिं य सद्धिं संपरिखुडे ताए उक्किट्ठाए जाव तिरियमसंखेज्जाणं दीवसमुद्दाणं मज्झं मज्झेणं जेणेव अट्ठावयपव्वए जेणेव भगवओ तित्थयरस्स सरीरए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता विमणे णिराणंदे अंसुपुण्णणयणे तित्थयरसरीरयं तिक्खुत्तो ओयाहिणं पयाहिणं करेइ, करित्तो पच्चासण्णे णाइदृरे सुस्सूसमाणे जाव पज्जुवासइ ॥ सू० ४६ ॥ छाया -यस्मिन् समये च खलु ऋषभोऽर्हन् कौशलिकः कालगतो व्यतिक्रान्तः समुद्यातः छिन्नजातिजरामरणबन्धनः सिद्धो यावत् सर्वदुःखप्रहीणः, तस्मिन् समये च खलु शक्रस्य देवेन्द्रस्य देवराजस्य आसन चलितं । ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजः आसन चलितं पश्यति, दृष्ट्वा अवधि प्रयुनक्ति, प्रयुज्य भगवन्तं तीर्थकरम् अवधिना आभोगयति, आभोग्य एवमवादीत्-परिनिर्वृतः खलु जम्बूद्वीपे द्वीपे भरते वर्षे ऋषभोऽन् कौशलिका, तद्जीतमेतत् अतीतप्रत्युत्यन्नमनागतानां शक्राणां देवेन्द्राणां देवराजानां तीर्थकराणां परि निर्वाणमहिमान कर्तुम् तद् गच्छामि स्खलु अहमपि भगवतस्तीर्थकरस्य परिनिर्वाणमहिमानं करोमीति कृत्वा वन्दते नमस्थति, वन्दित्वा नमस्यित्वा चुतुरशीत्या सामानिकसाहस्रीभिः, त्रयसिंशता प्रायसिंशकैः, चतुर्भिर्लोकपालर्यावत् चतसृभिः चतुरशीतिभिः आत्मरक्षकदेवसाहस्रीभिः, अन्यैश्च वहुभिः सौधर्मकल्पवासिभिः वैमानिकैः देवैर्देवीभिश्च सार्घ सम्परिवतस्तया उत्कृष्टया यावत् तियंगसंख्येयानां द्रीपसमुद्राणां मध्यमध्येन यत्रैव अष्टापदपर्वतो यत्रैव भगवतस्तीर्थकरस्य शरीरकं तत्रैव उपागच्छति उपागत्य विमना निरानन्द अश्रुपणनयनः तीर्थकरशरोरकं त्रिकृत्व आदक्षिण प्रदक्षिणं करोति, कृत्वा नात्यासन्ने नाति दूरे शुश्रूषमाणो यावत् पर्युपास्ते ॥४६॥ भगवान् के मुक्ति में चले जाने पर देवोंने जो कुछ किया उसे यहां सूत्रकार प्रकट करते हैं - "जं समयं च णं उसमे अरहा कोसलिए कालगए" इत्यादि । टोकार्थ-"जं समयं च णं उसभे अरहा कोसलिए कालगए वीइक्कंते समुज्जाए छिण्णजाइભગવાન મુકિતમાં પધાર્યા અને તે પછી દેવોએ જે કંઈ કર્યું, તેને અહી સૂત્રકાર प्रट ४२ छे: जं समयं च ण उसमें अरहा कोसलिए कालगए-इत्यादि-सूत्र-४६॥ टीआय-'जं समयं च णं उसमे अरहा कोसलिए कालगप विइक्कंते समुज्जाए छिण्ण mammu Page #420 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४०६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे टीका-'जं समयं च' इत्यादि । मूले 'जं समयं' 'तं समयं' इत्युभयत्र प्राकृतत्वात् सप्तम्यर्थे द्वितीया, ततश्च 'जं समयं च णं उसमे अरहा-कोसलिए कालगए वीइकते समुज्जाए छिण्ण जाइजरामरणबंधणे-सिद्धे बुद्धे' यस्मिन् समये च खलु ऋषभोऽहन् कौशलिकः कालगतो व्युत्क्रान्तः समुद्यातः छिन्नजातिजरामरणबन्धनः सिद्धो बुद्धो 'जाव' यावत्, यावत्पदेन-'मुक्तः अन्तकृतः परिनिर्वृत्तः' इति पदत्रयं संग्राह्यम्, तथा 'सव्व दुक्खप्पहोणे' सर्वदुःखपहीणः, 'कालगतादिसर्वदुःख प्रहोणान्तशब्दानां व्याख्याऽत्रैव चतुश्चत्वारिंशत्तमे सूत्रेऽवलोकनीया, 'तं समयं च णं सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो आसणे चलिए' तस्मिन् समये च खलु शक्रस्य देवेन्द्रस्य देवराजस्य आसनं चलितं= कम्पितम् । 'तए णं-से सक्के देविंदे देवराया आसणं चलियं पासइ' ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजः आसनं चलितं पश्यति अवलोकयति, 'पासित्ता' दृष्ट्वा 'ओहि' अवधिम् अवधिज्ञानं 'पउंजइ' प्रयुनक्ति व्यापृणाति, 'पउंजित्ता' प्रयुज्य अवधिज्ञानं व्यापृत्य 'भयवं तित्थयरं ओहिणा' भगवन्तं तीर्थकरम् अवधिना=अवधिज्ञानेन 'आभोएई आभोगयति-पश्यति, 'आभोइत्ता' आभोग्य-दृष्ट्वा ‘एवं' एवं वक्ष्यमाणं वचनम् 'वयासी' अवादीत्-उक्तवान् ‘परिणिव्वुए' परिनिवृतः-कर्मकृतसकलसन्तापरहितत्वात् समन्ताच्छीतलीभूतः 'खलु जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे उसहे अरहा कोसलिए' खलु जम्बूद्वीपे जरामरणबंधणे सिद्धे बुद्धे जाव सव्वदुक्खप्पहीणे" वे कौशलिक ऋषभ अहंत जिस समय मुक्ति में गये अर्थात् कालगत आदि सर्व दुःख प्रहोणान्त तक के विशेषणों से जब वे युक्त हो चुके "तं समयं च णं सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो आसणे चलिए" उस समय देवेन्द्र देवराज शक्र का आसन कम्पायमान हुआ, “तएणं से सक्के देविदे देवराया आसणं चलियं पासइ" शक्रने जब कम्मित होते हुए अपने आसन को देखा तो उसी समय उसने अपने अवधिज्ञान को व्यापारित किया "पासित्ता" व्यापारित कर "ओहिं पउंजइ पउंजित्ता भयवं तित्थयरं आभोएई" उसने उस अवधिज्ञान से तीर्थकर प्रभु को देखा, "आभोइत्ता" देखकर फिर वह "एवं वयासी" इस प्रकार कहने लगा ‘परिणिवुए खलु जंबूद्दीवेदोवे भरहे वासे उसहे अरहा कोसलिए" जम्बूद्वीप नामके द्वीप में स्थित भरतक्षेत्र में कोशलिक ऋषभ अर्हत परिनिर्वृत हुए हैं-कर्मकृत सकल जाइजरामरणबंधणे सिद्धे बुद्धे जाव सव्वदुःखप्पहोणे' ते शति *षम महतसमये મુક્તિમાં પધાર્યા–એટલે કે કાલગત વગેરે સર્વદુઃખ પ્રહાન્ત સુધીના વિશેષણેથી જ્યારે तेसोश्री युत य यूश्या त समयं च णं सक्कस्स देविंदस्स देवरणो आसणे चलिए' ते समये हेवेन्द्र देवस०४ शनुमासन पायभान थयु 'तएणं से सक्के देविंदे देवराया आसणं चलियं पासई' श यारे यातनासनने पायमानयतुं यु त्यारे तर क्षणे तो पाताना अवधि ज्ञानने व्यापारित यु 'पासित्ता' व्यापारित शन 'ओहिं पांजइ पउंजित्ता' भयवं तित्थयरं आभोपइ' तेत अवधि ज्ञानथी तीथ ४२ प्रसुननेया. 'आभोइत्ता' तय ४२ प्रभुने नछन ते 'एवं वयासी' 1 प्रमाणे उपाय। 'परिणिव्वुए खलु जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे उसहे अरहा कोसलिए' दीपनामना द्वीपमा सरतक्षेत्र Page #421 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ४६ भगवतः निर्वाणानन्तरदेवकृत्यनिरूपणम् ४०७ द्वीपे भरते वर्षे ऋषभोऽर्हन् कौशलिकः 'त' तदेतत् 'तीय पच्चुप्पण्णमणागयाणं' अतीतप्रत्युत्पन्नानागतानाम् भूतवर्तमानम विष्यत्कालजातानां 'सकाणं देविंदाणं देवराईणं तित्थगराणं परिनिव्वाणमहिमं शक्राणां देवेन्द्राणां देवराजानां तीर्थकराणां परिनिर्वाणमहिमानं-तीर्थकरसम्बन्धिपरिनिर्वाणमहोत्सवं 'करित्तए' कत्तं 'जीयमेयं' जीतं-जीतव्यवहारो वर्तते, 'तं' तत्-तस्माद् हेतोः अहंपि भगवओ तित्थगरस्स परिणिव्वाणमहिमं करोमि तद् गच्छामि खलु अहमपि भगवतस्तीर्थकरस्य परिनिर्वाण महिमान करोमि 'त्तिक?' इति कृत्वा इत्युक्त्वा 'वंदइ' वन्दतेस्तौति ‘णमंसइ' नमस्यति-प्रणमति 'वंदित्ता णमंसित्ता' वन्दित्वा नमस्यित्वा 'चउरासीए सामाणिय साहस्सोहि' चतुरशीत्या सामानिकसाहस्रीभिः चतुरशीति सहस्रसंख्यकैः सामानिकदेवः, 'तायत्तीसाए' त्रय स्त्रिंशतात्रयस्त्रिंशत्संख्यकैः ‘तायत्तीसएहिं' त्रायस्त्रिंशकैः गुरुस्थानीयैर्देवैः, 'चउहि' चतुभि: चतुस्संख्यकैः ‘लोगपालेहि' लोकपालैः सोमयम-वरुणकुबेरसंज्ञकै लोकपालैः. 'जाव' यावत्-यावत्पदेन–'अट्टहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहि तिहि परिसाहिं सत्तहि संतापों से रहित हो गये हैं इसलिये वे समन्तात् शीतलीभूत बन गये है, "तं जीयमेयं तीयपडुप्पण्ण मणागयाणं सक्काणं देविंदाणं देवराईणं तित्थगराणं परिनिव्वाणमहिमं करित्तए" अतः समस्त अतीत, वर्तमान एवं भविष्यत्काल संबंधी इन्द्रो का यह जीत-व्यवहार है कि वे तीर्थकर प्रभु के निर्वाणगमन महोत्सव को करें, "तं गच्छामि गं अर्हपि भगवो तित्थगरस्स परिनिव्वाणमहिम करित्तए" इसलिये में भी भगवान् तीर्थंकर ऋषभदेव के निर्वाणगमनोत्सव करने के लिये जाता ई "तं गच्छामि णं अहंपि भगवओ तित्थगरस्स-परिनिबाणमहिमं करेमित्ति कटु वंदइ णमसइ, वंदित्ता णमंसित्ता चउरासीए सामाणिय साहस्मीहिं तायत्तीसाए तायत्तीसएहिं, चउहि लोगपालेहिं जाव चउहिं च उरासीईहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अण्णेहि य बहूहिं सोहम्मकप्पवासोहिं वेमाणिएहिं देवेहिं देवीहि य सद्धिं संपरिबुडे ताए उक्किट्ठाए जाव तिरियमसंखेज्जाणं दीबसमुद्दाणं मझमझेणं जेणेव अट्ठावयपव्वए जेणेव भगवओ तित्थयरस्स सरीरए तेणेव उवागच्छइ, उवाમાં કૌશલિક ઋષભ અહત પરિનિવૃત્ત થયા છે-કર્મકૃત સકલ સંતાપથી રહિત થઈ ગયા छ. मेथी तभा समन्तात् शीतलीभूत मानी गया छे. 'तं जोयमेयं तीयपडुप्पन्नमणागयाण सक्काण देविदाणं देवरायाण परिणिधाणमहिम करित्तए' तथा सघा अतीत, मनात અને વર્તમાન કાલ સંબંધી ઈદ્રોને આ જીત વ્યવહાર છે કે–તેઓ તીર્થંકર પ્રભુને નિર્વાણ समान महोत्सववे. 'तं गच्छामि णं अह पि भगवओ तित्थगरस्स परिणिव्याणमहिम करित्तए' तथाई ५ सगवान् तीथ ४२ *षमा निर्वाण मास ४२वा 15 'तं गच्छामि ण अहंपि भगवओ तित्थगास्स परिणिवाण महिमं करेमित्ति कटु वंदइ णमंसह वंदित्ता णमंसित्ता चउरासोए सामाणिव साहस्सीपही तायत्तीसाए तायत्तीसऐहिं चाहि लोगपालेहिं जाव चउहि चउरासोइहिं आयरन देवसाहस्तीही अण्णेहिय बहुहिं सोहम्म कप्पवासीहिं वेमाणिपहिं देवेहिं देविहिय सद्धिं संपरिखुडे ताए उक्किट्ठाए जाव तिरियमसंखेज्जाण दीवसमुदाण मज्झ मज्झेणं जेणेव अहावयपव्वर जेणेव भगवओ Page #422 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तसूत्रे अणीएहिं छाया-अष्टभिरग्रमहिषीभिः सपरिवाराभिः, तिसृभिः परिबद्भिः सप्तभिरनीः इति संग्राह्यम्, तत्र-अष्टभिः अग्रमहिषीभिः पद्मा १, शिवा २ शची ३ अत: ४अमला ५ असरा ६ नवमिका ७ रोहिणी ८ इत्यष्टसंख्याभिरग्रममहिषीभिः कीदृशीभिराभिः इत्याह-सपरिवाराभिः षोडशसहस्र-षोडश-परिवार सहिताभिरिति, तथा तिमृभिः परिषद्भिः बाह्यमध्याभ्यन्तररूपाभिस्त्रिसंख्याभिः परिषद्भिः, तथा सप्तभिः अनी का हयगजरथ मुभट-वृषभ गन्धर्व नाटयरूपैः सप्तभिः सैन्यैः तथा सप्तभिः अनीकाधिपतिभिः, तथा 'चउहि चउरासोहि आयरक्ख देवसाहस्सीहि' चतसृभिः चतुरशोतिभिः आत्मरक्षकदेवसाहस्रीभिः चतसृषु दिक्षु प्रत्येकस्यां दिशि वर्तमानैः चतुरशीतिसहस्रैः चतुरशीति सहस्रात्मरक्षक देवैः, तथा-'अण्णेहि य बहि सोहम्मकप्पवासीहिं वेमाणिएहिं देवेहिं देवीहि य सद्धिं संपरिखुडे' अन्यैश्च बहुभिः सौधर्मकल्पवासिभिः वैमानिकदेवैः, ताहशीभिर्देवीभिश्च साई संपरिवृतः-संपरिवेष्टितः ‘ताए' तया=देव सम्बन्धिन्या 'उक्कि टाएं' उत्कृष्टया-प्रशस्तविहायोगतिषु श्रेष्ठया, जाव' यावत्-यावत्पदेन-'तुरियाए चलाए चंडाए जवणाए उद्धृयाए सिग्याए देवगईए वीईवयमाणे' छाया-त्वरितया चपलया चण्डया जवनया उद्धृतया शिघ्रया दिव्यया देवगत्या व्यतिव्रजन व्यतिव्रजन्' इति संग्राह्यम् । तत्र-त्वरितया मनोजन्यौत्सुक्यवशात् चपलया-कायव्यापारचापल्यात् चण्डया तीव्रया श्रमजनितग्लान्यभावात् जवनया अत्युत्कृष्टगतिमत्वात् उद्धृतया उत्कृ टया-वायुगतेरिवोकटत्वात् , शीघ्रया=निरवच्छिन्नशीघ्रत्वगुणयोगात् एतादृश्या दिव्यया-देवजनोचितया देवगत्या देवसम्बन्धिन्या गत्या करणभूगाया व्यत्तिनजन् व्यत्तिगच्छित्ता विमणे निराणंदे अंसुपुण्णणयणे तित्थयर सरीरयं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करित्ता पचासण्णे णाइदूरे सुस्सूसमाणे जाव पज्जुवासइ" इस प्रकार कहकर उस शक्रने वन्दना की, नमस्कार किया, वंदना नमस्कार करके अपने ८४ हजार सामानिक देवों के साथ ३३ त्रायस्त्रिंशक देवों के साथ वावत्-सपरिवार आठ अपनी पट्टरानियों के साथ प्रत्येक-दिशा के ८४-८४ हजार आत्मरक्षक देवों के साथ और इसी तरढ से और भी दूसरे सौधर्मकल्पवासो देव देवियों के साथ शक अपनी उत्कृष्ट प्रशस्त विहायोगति में भी श्रेष्ठ दिव्य देवगति से चलता २ तिर्यग् असंख्यात द्वीप समुद्रों के ठीक मध्यभाग से होता हुआ जहां अष्टापद पर्वत था तित्थधरस्ल सरीरप तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता विमणे निरानन्दे अंसुपुण्णणयणे तित्थयरसरीरयं त्तिक्खुत्तो आयाहिण पयाहिण करेइ, करित्ता णच्चासण्णे णाइदूरे सुस्सू. समाणे जांव पज्जुवासई' २५ प्रमाणे होने से श प्रभुने वनारी नभ४२ ४ा વંદના નમસ્કાર કરીને પોતાના ૮૪ હજા૨ સામાનિક દુર્વાની સાથે ૩૩ ત્રાયઅિંરાક દેવની સાથે યાવત્ સપરિવાર આઠ પિતાની પટ્ટરાણી સાથે દરેક દિશાના ૮૪ હજાર ૮૪ હજાર આત્મ રક્ષક દેવેની સાથે અને આ પ્રમાણે બીજા પણ સૌધર્મ કહ૫વાસી દેવ-દેવિયેની સાથે તે શકે પોતાની ઉત્કૃષ્ટ પ્રશસ્ત ષિડાયેગતિમાં પણ શ્રેષ્ઠ દિવ્ય એવી દેવગતિથી ચાલતે ચાહતે તિર્ય– અસંખ્યાત કાપ સમુદ્રોની બરાબર મધ્યભાગમાં થઈને જ્યાં અષ્ટાપદ પર્વત Page #423 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ४६ भगवतः निर्वाणानन्तरदेवकृत्य निरूपणम् ४०९ व्रजन्=गच्छन् ‘तिरियमसंखेऽजाणं' तिर्यगसंख्ये यानां तिर्यग्लोकवर्त्तिनाम् असंख्येयानां 'दीवसमुद्दाणं' द्वीपसमुद्राणां द्वीपानां समुद्राणां च 'मज्झं मज्झेणं' मध्यमध्येन = सातिशयमध्यभागेन 'जैक' 'यत्रैव यस्मिन्नेव प्रदेशे 'अट्ठावयपव्वए' अष्टापदपर्वतः तत्र चं पर्वते 'जेणेव' यत्रैव यस्मिन्नेव भांगे 'भगवओ तित्थ गरस्स सरीरए' भगवतस्तीर्थकरस्य शरीरकं 'तेणेव उवागच्छइ' तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'विमणे' विमनाः - शोकाकुलितचित्तः, अतएव 'णिराणंदे' निरानन्दः - आनन्दवर्जितः, 'सुपुण्णणणे' अश्रुपूर्ण नयनः - अश्रुपरिपूर्णनयनः 'तित्थयरसरीरयं' तोर्थकरशरीरकंभगवत ऋषभदेवस्य निष्प्राणं शरीरं 'तिक्खुत्तो' त्रिकृत्वः - वारत्रयम् ' आयाहिण पाणिं करेइ' आदक्षिणप्रदक्षिणं करोति, 'करिता' कृत्वा 'णच्चासरणे णाइदूरेनातिसमीपे नातिदूरे किन्तु समुचितस्थाने 'सुस्समाणे' शुश्रूषमाणः सेवमानः मांसाशिप्राणिभ्यो रक्षन्नित्यर्थः, 'जाव' यावत् - यावत्पदेन - णमंसमाणे अभिमुद्दे विणजहां भगवान् तीर्थकर का शरीर था वहां आया 'वहां पर आकर वह शोकाकुलित चित्त वाला बन गया उसके मन से आनन्द बाहर निकल गया उसकी आंखों में आंसु भर आये उसने निष्प्राण उस तीर्थकर शरीर की तीन प्रदक्षिणाएँ देकर वह समुचित स्थान पर बैठ गया, मांसाशिप्राणियों से उस शरीर की रक्षा करता हुआ वह इन्द्र बार २ उस शरीर को प्रणाम करने लगा - पञ्चाङ्गनमन पूर्वक नम्रीभूत होने लगा और विनय के साथ दोनों हाथ जोड़कर उस शरीर के पास संमुख बैठ गया । गति सूत्र में जो यावत्पद है उससे "तुरियाए, चवलाए, चंडाए, जवणाए, उद्धूयाए, eिrare, दिव्वा, देवगईए, वीईवयमाणे २" इस पाठ का यहां ग्रहण हुआ है मनोजन्य औत्सुक्य के वंश से उसको वह गति त्वरा से युक्त थी, कायव्यापार की चपलता से वह चपल थी, श्रम जनितंग्लानि के अभाव से वह तीव्र थी, इससे ऊँची - उत्कृष्ट - और कोई गति नहीं हो सकती है, इस कारण वह जवना थी, वायु की गति की तरह वह उत्कट थी, इसહતા જ્યાં ભગવાન તીર્થંકરનું શરીર હતુ ત્યાં ગયા. ત્યાં જઈ ને તે શાકાકુલિત ચિત્તવાળા થઈ ગયા. તેમના ચિત્તમાંથી આનંદ લુપ્ત થઈ ગયા. તેમની આંખા આંસુથી ભીંજાઇ ગઇ તેણે નિષ્પ્રાણ એવા તે તીર્થંકરના શરીરની ત્રણ પ્રદક્ષિણા કરી અને ત્યાર બાદ તે ઉચિત સ્થાન પર બેસી ગયા, માંસભક્ષક પ્રાણિયાથી તે શરીરની રક્ષા કરતા તેઈંદ્ર વારંવાર તે શરીરને પ્રણામ કર્વા લાગ્યા પચાંગ નમન પૂર્ણાંક નમ્રીભૂતથવા લાગ્યા અને સવિનય અન્નહાથ જોડીને તે શરીરની નજીક ખેસી ગયા. गति सूत्रमां ने यावत्यह आवेस छे. तेथी 'तुरियाप चवलाप, चंडाए, जवणाप, उधूयाए, सिरधाए, दिव्वाप, देवगईप वीईवयमाणे २० આ પાઠના સગ્રહ થયા છે. મનાજન્ય ઔત્સુકય ને લીધે તેની તે ગતિ ત્વાયુક્ત હતી. કાય વ્યાપારની ચપળતાથી ते यपण हती. श्रमभनित सानिना अभावथी ते तीव्र हुती. शेनाथी उभ्यतभ-उत्ष्टગતિ શ્રીજી ઢાય જ નહિ. એથી તે જવના હતી, વાયુની ગતિની જેમ તે ઉત્કટ હતી. ५२ Page #424 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४१० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे एणं पंजलिउडे' छाया-नमस्यन् अभिमुखे विनयेन पाञ्जलिपुटः, इति संग्राह्यम् , तत्र नमस्यन् पञ्चाङ्गनमनपूर्वकं प्रणतो भवन् अभिमुखे-सम्मुखे विनयेन सविनयं प्रा जलिपुटः अञ्जलीकृतकरयुगलः 'पज्जुवासई' पर्युपास्ते तिष्ठति ॥५० ४६॥ इत्थं भगवत्कलेवरसमीपागमनरूपां शक्रवक्तव्यतामुक्त्वा सम्प्रतीशानेन्द्रादिवक्तलिये वह उद्धृत थी, निरवच्छिन्न शीघ्रत्व गुण के योग से वह शीघ्ररूप थी, तथा देवजनोचित होने से वह दिव्य थी, तिर्यग् असंख्यात द्वीप समुद्रों को पार करता हुआ वह शक आया सो इसका तात्पर्य ऐसा है कि तिर्यग्लोकवर्ती असंख्याल द्वीप समुद्र शास्त्र में कहे गये हैं तिर्यग्यलोक का तात्पर्य मध्यलोक से है इस मध्यलोक में जम्बूद्वीप आदि द्वीप और लवणसमुद्र आदि समुद्र असंख्यात २ हैं ऐसी जिनेन्द्र की वाणी है। त्रायस्त्रिंशक देव ३३ ही होते हैं और ये गुरुस्थानीय होते हैं, सोम, यम, वरुण और कुबेर इस तरह से ये चार लोकपाल कहे गये हैं। आठ अग्रमहिषियों के नाम इस प्रकार से हैं-पमा १, शिवा २, शची, ३, अञ्जू ४, अमला ५, अप्सरा ६, नवमिका ७, और रोहिणी ८, इन एक २ पट्ट देवियों का परिवार १६-१६ हजार प्रमाण है, बाह्यपरिषदा, मध्यपरिषदा और अभ्यन्तर परिषदा के भेद से इसकी ३ परिषदाएँ होती हैं, अनीक-सेना सात प्रकार की कही गई है-हय, गज, रथ. सुभट, वृषभ, गन्धर्व, और नाट्य चार दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में ८४-८४ हजार आत्मरक्षक देव रहते है इसीलिये यहां चारों दिशाओं के चार चौरासी हजार अर्थात् तीन लाख छिहोत्तर हजार आत्मरक्षक देव कहे गये हैं ॥४६॥ - इस प्रकार से भगवान् के कलेवर के समीप शक के आगमन की वक्तव्यता को प्रकट करके એથી તે ઉપૂત હતી. નિરવચ્છિન્ન-શીઘવ ગુણના યોગથી તે શીધ્ર રૂષ હતી. તેમજ વજનેચિત હોવાથી તે દિવ્ય હતી. તિર્યગ્ન અસંખ્યાત દ્વીપ સમુદ્રોને પાર કરીને તે શક આવ્યો હતો અને તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે તિય લકવતી અસંખ્યાત દ્વીપ સમુદ્ર શાસ્ત્રમાં કહેવામાં આવેલ છે.-તિયગૂ લેકનું તાત્પર્ય મધ્યક થાય છે. એ મધ્યલોકમાં જબદ્વીપ વગેરે દ્વીપ અને લવણું સમુદ્ર વગેરે સમુદ્ર અસંખ્યાત ૨ છે. એવી જિનેન્દ્રની વાણી છે. ત્રાયશિક દેવે ૩૩ જ થાય છે, અને એએ ગુરુસ્થાનીય હોય છે. સોમ, યમ, વરુણ અને કુબેર આ રીતે એ ચાર લોકપાલે કહેવામાં આવેલ છે. આઠ અગ્ર મહિષીઓના નામ આ પ્રમાણે છે ૧ પદ્મા, ૨ શિવા, ૩ શચી, ૪ અંજૂ, ૫ અમલા, ૬ અપ્સરા, ૭ નવામિકા અને ૮ રોહિણી એ એક–એક પટ્ટદેવીઓનો પરિવાર ૧૬-૧૬ હજાર પ્રમાણે છે. બાહ્ય પરિષદા, મધ્ય પરિષદા અને આભ્યન્તર પરિષદાના ભેદથી આની રૂ પરિષદાઓ થાય છે. અનીક-સેના સાત પ્રકારની કહેવામાં આવેલ છે, હય, ગજ, રથ, સુભટ, વૃષભ, ગન્ધર્વ અને નાટ્ય ચાર દિશાઓમાંથી દરેક દિશામાં ૮૪-૮૪ હજાર આત્મરક્ષક દે રહે છે. એથી અહીં ચારે ચાર દિશાઓના ચાર ચોરાસી હજાર આમરक्ष व अपामा मावस छे. ॥४६॥ આ પ્રમાણે ભગવાનના કલેવરની પાસે શકના આગમનની વક્તવ્યતાને પ્રકટ કરીને હવે Page #425 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू.४७ भगवतः निर्बाणानन्तरमोक्षानदेवकृत्यनिरूपणम् ४११ व्यतामाह मूलम् तेणं कालेणं तेणं समएणं ईसाणे देविंदे देवरायो उत्तरद्धलोगाहिवई अट्ठावीसविमाणसयसहस्साहिवई सूलपाणी वसहवाहणे सुरिंदे अरयंबवत्थधरे जाव विउलाई भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरइ । तएणं तरस ईसाणस्स देविंदस्स देवरन्नो आसणं चलइ । तएणं से ईसाणे जाव देवरायो आसणं चलियं पासइ पासित्ता ओहिं पउंजइ पउंजित्ता भयवं तित्थयरं ओहिणा आभोएइ आभोइत्ता जहा सक्के नियगपरिखारेणं भाणेयवो जाव पज्जुवासइ । एवं सव्वे देविंदा जाव अच्चुए नियगपरिखारेणं भाणेयया । एवं जाव भवणवासीणं इंदा वाणमंतराणं सोलस जोइसियाणं दोण्णि णियगपरिखारा णेयव्वा ।। सू० ४७॥ __ छाया-तस्मिन् काले तस्मिन् समये ईशानो देवेन्द्रो देवराज उत्तरार्द्धलोकाधिपतिः अष्टाविंशतिधिमानशतसहनाधिपतिः शूलपाणिवृषभवाहनः सुरेन्द्रः अरजोऽम्बरवस्त्रधरो यावद् विपुलान् भोगभोगान् भुञ्जानो विहरति । ततः खलु तस्य ईशानस्य देवेन्द्रस्य देवराजस्य. आसनं चलति । ततः खलु स ईशानो यावत् देवराजः आसनं चलितं पश्यति, दृष्ट्वा अवधि प्रयुङ्क्ते, प्रयुज्य भगवन्तं तीर्थकरम् अवधिना आभोगयति, आभोग्य यथा शको निजकपरिवारेण भणितव्यो यावत् पर्युपास्ते । एवं सर्वे देवेन्द्रा यावत् अच्युतो निजकपरिवारेण भणितव्याः। एवं यावद् भवनवासिनामिन्द्रा व्यन्तराणां षोडश, जोतिष्काणां द्वौ, निजकपरिवारा नेतव्याः ॥सू०४७॥ ___टीका---'तेणं कालेणं' इत्यादि । तेणं कालेणं तेणं समएणं ईसाणे' तस्मिन् काले तस्मिन् समये ईशानः ईशाननामकः 'देविंदे देवराया उत्तरद्ध लोगाहिवई' देवेन्द्रो देवराजः उत्तरार्द्धलोकाधिपतिः उत्तरार्द्धदेवलोकस्वामी, अट्ठावीसविमाणसयसहस्साहिवई' अष्टाविंशति अब सूत्रकार ईशान इन्द्र की वक्तव्यता का कथन करते हैं "तेणं कालेणं तेणं समएणं ईसाणे देविदे' इत्यादि । टीकार्थ-"तेणं कालेणं तेणं समएणं ईसाणे देविंदे देवराया उत्तरद्ध लोगाहिवई अदावीसविमाण सयसहस्साहिवई" उस काल में और उस समय में उत्तरार्घलोक के अधिपति देवेन्द्र देवराज ईशान इन्द्र का जो कि २८ लाख विमानों का अधिपति है, “सूलपाणी" हाथ में जिसके शूल સૂત્રકાર ઈશાન ઈન્દ્રની વક્તવ્યતાનું કથન કરે છે. 'तेण कालेण तेण समपण ईसाणे दर्विदे'-इत्यादि-सूत्र ४७ टी -'तेण कालेणं तेण समपण ईसाणे दविंदे दबराया उत्तरद्धलोगाहिवई अट्ठावीसविमाणसयसहस्साहिब्रई' र भन त समये उत्तरा बना मधिपति हेवेन्द्र १२ शान छन्द्रनु-२ २८ विमानाना अधिपति छे, 'सूलपाणी' डायमा रम Page #426 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तसूत्रे विमानशतसहस्साधिपतिः अष्टाविंशतिलक्षसंख्यकविमानस्वामी' 'सूलपाणी' शूलपाणिः शूलहस्तः ‘बसहवाहणे' वृषभवाहनः वृषभो वाहनं यस्य स तथा वृषभयानवान् 'मुरिंदे' सुरेन्द्रः स्वलोकवासि देवस्वामी 'अरयंबरवत्थधरे' अरजोऽम्बरवस्त्रधरः अरजोऽम्बरं निर्मलाकाशं, तत्सदृशं स्वच्छं यद् वस्त्रं वसनं तस्य धरः धारकः 'जाव' यावत् यावत्पदेन 'आलइयमालमउडे णवहेमचारुचित्तचंचलकुंडलविलिहिज्जमाणगल्ले महिदिए महज्जुइए महाबले महाजसे महाणुभावे महामुक्खे भासुरबोंदी पलंबवणमालधरे इसाणकम्पे ईसाणवडिसए विमाणे सुहम्माए सभाए ईसाणंसि, सीहासणंसि से णं अट्टावीसाए विमा णावाससयसाहस्सीणं असीईए सामाणियसाहस्सीणं तायत्तीसाए तायत्तीसगाणं चउण्इं लोगपालाणं अटण्हं अग्गमहीसोणं सपरिवाराणं तिण्इं परिसाणं सत्तण्हं अणीयाणं सत्तण्हं अणीयाहिवईणं चउण्हं असीईणं आयरक्खदेवसाहस्सीणं मण्णेसि च ईसाणकप्पवासीणं सत्तण्हं देवाणं देवीण य आहेवच्चं पोरेच्चं सामित्तं भट्टितं महत्तरगत्तं आणाईसरसेणावच्चं कारेमाणे पालेणाणे महयाहयणट्टगीयवाइयतंतीतलतालतुडियघणमुइंगपडुप्पवाइयरवेणं' है “वसहवाहणे" वाहन जिसका वृषभ है, आसन कंपायमान हुआ इसे सुरेन्द्र विशेषण से जो अभिहित किया गया है वह यह प्रकट करता है कि यह ईशान इन्द्र ईशान स्वर्गवासी देवलोकों का पूर्ण रूप से आधिपत्य करता है यह सदा "अरयंबर वत्थधरे" अरजोऽम्बरवस्त्र पहिनता हैनिर्मल आकाश का रङ्ग जैसा स्वच्छ होता है वैसा ही इसके द्वारा पहिने गये वस्त्रों का वर्ण भी स्वच्छ -निर्मल होता है यहां "जाव" यावत्पद से मालझ्यसालमउडे, णवहेमचारुचित्तचंचलकुंडलविलिहिज्जमाणगल्ले, महिद्धिए, महज्जुइए, महाबले, महाजसे, महाणुभावे, महासुक्खे, भासुरवोदी, पलंबवणमालधरे, ईसाण रुप्पे, ईसाणवडिसए, विमाणे, सुहम्माए, सभाए ईसाणंसि सीहासणंसि, से णं अट्ठावोसाए विमाणावाससयसाहस्सीणं असोइए सामाणियसाहस्सीणं तायतीसाए तायत्तीसगाणं चउण्हं लोगपालाणं अट्ठण्ह अग्गमहिसीणं संपरिवाराणं तिण्ह परिसाणं सत्तण्हं अणीयाणं सत्ताह अणोयाहिवईणं चउण्ह असीईणं आयरक्ख देवसाहस्सीणं अण्णेसिं च ना शू छ. 'बलहवाहणे' वृषभ रेमनु न छे. आसन पायभान यु मान सुरेन्द्र વિશેષથી જે અભિહિત કરવામાં આવેલ છે તે આ પ્રકટ કરે છે કે આ ઈશાન ઈન્દ્ર ઈશાન स्वर्गवासी लानु पूर्ष ३५मा माधिपत्य ४३ छे. थे सहा 'अयरंबरवत्थधरे' १२४ અમ્મર વસ્ત્ર ધારણ કરે છે, એ નિર્મળ આકાશને રંગ જેમ સ્વચ્છ હોય છે, તેમજ આ प सीना व पशु स्व- निसाय छे. मी 'जाव' यावत था माल इय मालमउडे, णवहेमचारचित्तवं चलकुंडल विलिहिज्जमाणगल्ले, महिद्धिप, महज्जु. इए, महाबले, महाजसे, महाणुभावे, महासुक्खे, भासुरबोंदी, पलंववणमालधरे, ईसाणकप्पे, ईसाणवडिसए, विमाणे, सुहम्माए सभाए, ईसाणंसि. सीहासणंसि, सेणं अट्ठावीसाए धिमा णावाससयसाहस्सीणं असीहए सामाणियसाहस्सीणं तायत्तीसाए, तायत्तीसगाणं चउण्हं लोगपालाणं अकृण्हं, अगमहिसीणं सपरिवाराणं, तिण्हं परिसाण सतण्हं अणीयाण सतण्हं अणीयाहिविईण चउण्डं असीईण आयरक्खदेवसाहस्तीण अण्णेसिं च ईसाण Page #427 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकाद्वि०वक्षस्कार सू. ४७ भगवतः निर्वाणानन्तरमीशानदेवकृत्यनिरूपणम्४१३ छाया-आलगितमालामुकुटो नवहैमचारुचित्रचञ्चलकुण्डलविलिख्यमानगल्लो महर्द्धिको महाधुतिको महाबलो महायशाः महानुभावो महासौख्यो भास्वरशरीरः प्रलम्बवनमालाधरः ईशानकल्पे इशानावतंसके विमाने सुधर्मायां सभायाम् ईशाने सिंहासने, स खलु अष्टाविशतेः विमानावासशतसाहस्रीणाम् अशीतः सामानिकसाहस्रीणां त्रयस्त्रिंशतस्त्रायस्त्रिंशकानां चतसृणाम् अशीतीनाम् आत्मरक्षकदेवसाहस्रीणाम् अन्येषां च इशानकल्पवासिनां देवानां देवोनां च आधिपत्यं पौरपत्यं स्वामित्वं भर्तृत्वं महत्तरकत्वं आज्ञेश्वरसेनापत्यं कारयन् पालयन् महता अहतनाट्यगीतवाद्यतन्त्रीतलतालत्रुटितघनमृदङ्गपटुप्रवादितरवेण-इति संग्राह्यम् । तत्र-आलगितमालमुकुटः-आलगितौ-स्वस्वोचितस्थाने धृतौ मालामुकुटौ-मालाकिरीटश्च येन स तथाभूतः पुनः नवहैमचारुचित्रचञ्चलकुण्डलविलिख्यमानगल्ल:-नवेनूतने हैम-स्वर्णमये चारुणी-मनोहरे चित्रे-अद्भुते चञ्चले-कायव्यापारवशात् कम्पमाने ये कुण्डले-कुण्डलद्धयं, ताभ्यां विलिख्यमानः-घृष्यमाणो गल्ल:-कपोलो यस्य स तथाभूतः पुन:-महद्धिकः महती-विशाला ऋद्धिः विमानादिसमृद्धिर्यस्य स तथा-सातिशयविमानादिसमृद्धियुक्त इत्यर्थः, तथा-महाद्यतिकः-महती द्युतिः-शरीराभरणादिसम्बन्धिमहादीप्तिसमन्वित इत्यर्थः, महाबल:-महत्-सातिशय बल शारीरं सामथै यस्य ईसाणकप्पवासीणं देवाणं देवीण य आहेवच्चं पोरेवच्चं सामित्तं भट्टित्तं महत्तरगत्तं आणाईसर सेणावच्चं कारेमाणे पालेमाणे महया हय णगीयवाइयतंतीतलतालतुडियघणमुइंगपडुप्पवाइयरवेण" इस पाठ का ग्रहण हुआ है इसका भाव इस प्रकार से है-माला और मुकुट जो कि यथोचित स्थान धारण किये गये थे वे बडे ही इसके सुहावने प्रतीत होते हैं इसने जो कुण्डलकानों में पहिने हुए थे वे नवीन थे, सोने के बने हुए थे, मन को हरण करने वाले थे, बडे अनोखे थे और शरीर के ब्यापार के वश से चञ्चल होते रहते थे, इसलिये उसके दोनों कपोल इसके द्वारा घृष्यमाण होते रहते थे। इसकी विमानादिरूप समृद्धि अल्प नहीं थी-किन्तु महतोबड़ी थी, इसलिये यह सातिशय विमानादि समृद्धिवाला यहां प्रकट किया गया है। इसके शरीर की और शरीर के ऊपर धोरण किये गये आभरणादिकों की युति विशिष्ट प्रभा संपन्न थी। इसका शारीरिक सामर्थ्य सातिशय था अर्थात् पर्वत आदि को ऊखाड देने में इसे जग कम्पवासीण देवाणं देवीण य आहेवच्च पोरेवच्चं सामितं भाट्टित महत्तरगत्तं आणाई. सरसेणाबच्चं कारेमाणे पालेमाणे महयाहयणगीयवाइयतंतीतलतालतुडिय धण मुइंग पडुप्पवाइयरवेण" या 48 अणु ४२वामां मावस छे. मा पाइने माया प्रभारी छયથા સ્થાને ધારણ કરવામાં આવેલાં માળા અને મુકુટ ખૂબ જ સુંદર લાગતાં હતાં. એણે જે નવીન કુંડલે કાનમાં ધારણ કરેલાં હતાં, તે નવા હતા અને તે કુંડલે સુવર્ણના હતાં. મનહર હતાં. અદ્દભુત હતાં અને શરીરના હલન-ચલનથી હાલતા હતાં. એથી તેના બને કપિલે તેનાથી ઘર્ષિત થતા હતા. એની વિમાનાદિ રૂપ સમૃદ્ધિ અ૫ નહતી પણ પુષ્કળ પ્રમાણમાં હતી. એથી જ એમને અહી સાતિશય વિંમાનાદિ સમૃદ્ધવાન તરીકે પ્રકટ કર વામાં આવેલ છે. એના શરીરની અને શરીર પર ધારણ કરવામાં આવેલા આભણાદિકાની ધતિ વિશિષ્ટ પ્રભા સંપન્ન હતી. એનું શારીરિક સામર્થ્ય સાતિશય હતું, એટલે કે પવત Page #428 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४१४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे " स तथा पर्वताद्युत्पाटनसामर्थ्ययुक्त इत्यर्थः, तथा - महायशाः महंदू - विस्तीर्णं यशो यस्य स तथा - विशिष्टवैक्रियादिकरणाचिन्त्य सामर्थ्ययुक्त इत्यर्थः, तथा - महासौख्यः - महत्- प्रचुरं सौख्यं - सुखं प्रभूतसद्वेदनीयोदयाद् स तथा - अत्यन्तमुखयुक्त इत्यर्थः तथा भास्वर - शरीरः - देदीप्यमान देहः, प्रलम्बवनमालाधरः - प्रलम्बा- प्रलम्बमाना या वनमाला तस्या धरः - धारकः, तथा - - ईशानकल्पे ईशानकल्पनामके स्वर्गलोके, ईशानावतंस के विमाने ईशानाव नामके विमाने, सुधर्मायाम् सभायाम् ईशाने ईशाननामके सिंहासने, विराजमानः इत्यध्याहार्यम् सः ईशानेन्द्रः खलु अष्टाविंशतेः विमानावासशतसाहस्त्रीणाम् अष्टाविं शतिलक्षसंख्यक वैमानिकानां देवानाम् अशीतेः सामानिकसाहस्रीणाम् अशीतिसहस्रसंख्यक सामानिकदेवानाम् त्रयस्त्रिंशतः त्रयस्त्रिंशकानाम् त्रयस्त्रिंशत्संख्यकानां गुरुस्थानीय देवानाम् चतुर्णां लोकपालानां सोमादीनां चतुः संख्यकानां लोकपालानाम् सपरिवाराणांस्वस्वसंख्यादिपरिवारसहितानाम् अष्टानाम् अग्रमहीषीणाम तिसृणां परिषदां बाह्यमध्याभ्यन्तरभेदभिन्नस्य परिषत् त्रयस्य सप्तानाम् अनीकानाम् हयादिसैन्यभेदेन सप्तसंख्यकानां सैन्यानाम् सप्तानाम् अनीकाधिपतीनाम् हयाद्यनीकस्वामिनां चतसृणाम् अशीतीनाम् आत्मरक्षकदेव साहस्रीणाम् चतसृषु दिक्षु प्रत्येकस्यां दिशि वर्त्तमानानाम् अशीतिसहस्नात्मरक्षकानामशीतिसहस्रसंख्यकानाम् आत्मरक्षकाणां देवानाम् तथा अन्वेषां च बहूनां सा भी आयास (परिश्रम) नहीं होता था । इसका यश त्रिभुवन में प्रख्यात था । विशिष्ट वैकियादि करने में इसका सामर्थ्य अचिन्त्य था । प्रभूत साता वेदनाम कर्म के उदय से यह प्रचुर सौख्यराशि का स्वामो-भोक्ता था, इसके शरीर की कान्ति भास्वर थो- सदा चमकती रहती थी. यह जिस वनमाला को गले में पहिरे रहता था. वह ऊपर से नीचे तक लटकती रहती थी. यह ईशान नामके कल्प में ईशानावतंसक विमान में सुधर्मा नाम की सभा में स्थित ईशान नामक सिंहासन पर विराजरान रहता, ऐसा यह ईशानेन्द्र २८ लाख वैमानिक देवों का ८० हजार सामानिक देवों का ३३ त्रायस्त्रशक देवो का, सोमादिक चार लोकपालों का, सपरिवार आठ अप्रमहिषियों का, बाह्य, मध्य और आभ्यन्तर तीन सभाओं का हयादि - मेवाले सात सैन्यो का, उनके सात अधिपतियों-सेनापतियों का ८०-८० हजार चारों दिशाओं के आत्मरक्षक देवों का, तथा और भी अनेक ईशान देवलोकवासी देव देवियों વગેરેને ઉખાડવામા એને જરા પણ આયાસ થતા નહીં. એની કીતિ ત્રિભુવનમાં પ્રખ્યાત હતી. વિશિષ્ટ વૈક્રિયાદ્વિ કરવામાં એનું સામર્થ્ય અચિન્ત્ય હતુ' પ્રભૂત સાતા વેદનીય કર્માંના ઉદયથી એ પ્રચુર સૌખ્ય રાશિના સ્વામી એટ્લે કે ભેાકતા હતા એના શરીરની ક્રાંતિ ભાવર હતી સદા ચમકતી રહેતી હતી. એ જે વનમાળાને ગ્રીવામાં ધારણ કરતા હતા તે ઉપરથી નીચે સુધી લટકતી રહેતી હતી. એ ઈંશાન નામક કલ્પમાં ઈશાનાવતું સર્ક વિમાનમાં સુધર્મા નામની સભામાં સ્થિત ઈશાન નામક સિહાસન પર વિરાજમાન રહેતા. એવે એ ઇશાન્દ્ર ૮ લાખ વૈમાનિક દેવા પર, ૮૦ હજાર સામાનિક દેવા પર, ૩૩ ત્રાયસ્ત્રિ’શક દેવા ૫૬, સામાદિક ચાર લેાકપાલે પર, સપરિવાર આઠે અગ્રમહિષીએ પર, માહ્ય, મધ્ય અને આભ્ય'તર ત્રણ સભાએ પર, યાદિ પ્રકારના સાત સૈન્યાપર, તેમના સાત અધિપતિ સેનાપતિઓ- પર, ૮૦-૮૦ હુજાર ચારે દિશાઓના આત્મરક્ષક દેવાના તેમજ મીજા Page #429 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकाद्वि.वक्षस्कार सू.४७ भगवतः निर्वाणानन्तरमीशानदेवकृत्यनिरूपणम् ४१५ देवानां देवीनां च आधिपत्यम् अधिपतित्वम् पौरपत्यं पुरपतित्वं, स्वामित्वं स्वाम्यं, भर्तृत्वम् महत्तरकत्वम् आज्ञेश्वरसेनापत्यम् आज्ञाया ईश्वरः आज्ञेश्वरः, सेनायाः पतिः सेनापतिः आज्ञेश्वरश्चासौ सेनापतिश्चेति आज्ञेश्वरसेनापतिस्तस्य भावस्तत्वं च कारयन् पालयंश्च महता विशालेन अहतनाटयगीतवाद्यतन्त्रीतलतालत्रुटितघनमृदङ्गपटुप्रवादितरवेण अहतो निरवच्छिन्नो यो नाटयगीतवाद्यतन्त्रीतलतालत्रुटितघनमृदङ्गपटुप्रवादितरवः तत्र नाटयं नटकर्म, गीतं प्रसिद्धम् तथा पटुभिः पटुपुरुषैः प्रवादितानि यानि तन्त्रीतलतालत्रुटितघनमृदङ्गरूपाणि वाद्यानि, एतेषां यो रवः शब्दस्तेन सहितान् 'विउलाई भोगभोगाई भुंजमाणे विहरइ' विपुलान् भोगभोगान् भुजानो विहरति । 'अहतनाटयगोतवाद्य' इत्यादिपदे 'वाघ' शब्दस्य पूर्वनिपातः ‘पटुप्रवादित' शब्दस्य परनिपातच आर्षत्वाद बोध्य इति । 'तएणं' ततः भगवतः शरीरत्यागानन्तरं खलु 'तस्स ईसाणस्स देविंदस्स देवरन्नो आसणं चलइ' तस्य ईशानस्य देबेन्द्रस्य देवराजस्य आसनं चलति । 'तएणं से ईसाणे' ततः खलु स ईशानो 'जाव' यावत यावत्पदेन 'देवेन्द्रो देवराजः इति' संग्राह्यः, तथा 'देवराया आसणं चलियं पासइ' देवराजः आसनं चलितं पश्यति, 'पासित्ता ओहिं पउंजइ' का अधिपत्य, पौरपत्य, स्वामित्व, भर्तृत्व, महत्तरकत्व, एवं आज्ञेश्वर सेनापत्य करवाता हुआ उनकी परिपालना करता हुआ सतत निरवच्छिन्न रूप से होने वाले नाटय के गीतों के साथ २ पटुपुरुषों द्वारा बजाये गये तन्त्री, तलताल, त्रुटित, आदि सूप बाजों को तुमुल चित्ताकर्षक ध्वनि से युक्त "विउलाई भोगाभोगाई भुंजमाणे विहरइ" विपुल भोगभोगों को भोगता हुआ अपना समय आनन्द के साथ व्यतीत करता रहता है. यहां "अहतनाट्य गीतवाद्य" आदि पद में वाद्य शब्द का पूर्वनिपात और “पटुप्रवादित" शब्द का परनिपात आर्ष होने से हुआ है। भगवान् ने जब अपने शरीर का परित्याग कर दिया था "तएणं तस्स ईसाणस्स देविदस्स देवरन्नो आसणं चलइ" उस समय इस देवेन्द्र देवराज ईशान इन्द्र का आसन कम्या यमान हुआ "तए णं से ईसाणे जाव देवराया आसणं चलियं पासई" कम्पायमान हुए आसन અનેક ઈશાનદેવલોકવાસી દેવ-દેવાઓ પર આધિપત્ય, પરિપત્ય, સ્વામિત્વ, ભતૃત્વ, મહત્તઋત્વ, તેમજ આરે પર સેના પત્યના રૂપમાં શાસન કરતા તેમની પરિપાંલના કરતે, સતત નિરવચ્છિન્ન રૂપથી અભિનીત થતી નાટ્ય ના ગીતેની સાથે-સાથે પ૮ પુરુષ વડે વગાડવામાં આવેલાં ત ત્રી, તલ લ ત્રુટિન આદિ રૂપ વાદ્યયંત્રોની તુયુલ ચિત્તાકર્ષક ધ્વનિ થી યુક્ત 'विउलाई भोगभोगाई-भुजमाणे विहरइ' विधुत से लोगोन। उप ४२ता पातान। समय सुमेथा ५सार रत . मी 'अहत नाट्रव गोतवाद्य' मा ५६मा we नो पूर्वनिपात अन "पटुप्रवादित" शहोन। पशिनिपात मा वाथी थये छ. भगवाने यारे पोताना शरीरने। परित्याग ४यो, 'तपणं तस्स ईसाणस्स देविंदस्स देवरन्नो आसण चलइ' त समये । हेवेन्द्र १४ ५ शान छन्द्रनु आसन पायमान यु 'तपणं इसाणे जाव देवराया आसणं चलियं पासइ' त्यारे ईशान पायमान थयेर मासन ने नयु 'पासित्ता' तोताना 'ओहि पउंजइ' अवधि ज्ञानने ५युत यु Page #430 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४१६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे दृष्ट्रा अवधि प्रयुनक्ति, 'पउंजित्ता भयवं तित्थयरं ओहिणा आभोएइ' प्रयुज्य भगवन्तं तीर्थ करम् अवधिना आभोगयति निक्षते, 'आभोइत्ता' आभोग्य निरीक्ष्य शकेन्द्रवत् सकलपरिवारसमन्वितोऽष्टापदपर्वते समागत्य वन्दन नमस्कारपूर्वकं भगवन्तं पर्युपास्ते एतदेव सूचयितुमाह-मूले 'जहा सक्के नियगपरिवारेण भाणेयव्यो जाव पज्जुवासइ' इति एवं' एवम्-अनेन प्रकारेण 'सव्वे' सर्वे वैमानिका 'देविंदा' देवेन्द्राः' 'जाव अच्चुए' यावदच्युतः-अच्युतपर्यन्ता 'णियगपरिवारेण' निजकपरिवारेण-स्व स्व परिवारेण सहिता 'भाणेयव्वा' भणितव्याः। 'ए' एवम्-अनेन प्रकारेण-वैमानिकेन्द्रप्रकारेण 'जाव' यावत्-सर्वे यावच्छब्दोऽत्र सर्वार्थे न तु संग्रहार्थे, संग्राह्यपदाभावात्, 'भवणवासीणं इंदा' भवनवासिनाम् इन्द्रा:-विंशतिरपि भवनवासीन्द्राः निज निज परिवारेण सहिता वक्तव्याः, तथा 'वाणमंतराणं' वानव्यन्तराणां-व्यन्तरजातीयानां देवानामपि 'सोलस' षोडश-षोडश संख्यका इन्द्रा कालादयो 'जीइसियाणं दोण्णि' ज्योतिष्कदेवानां चंद्रसूर्य द्वौ इन्द्रो नियगपरिवारेण णेयव्वा' निनिजपरिवारेण सहिता वक्तव्याः, ननु को देखा "पसित्ता ओहिं पउंजए' देखकर उसने अपने अवधिज्ञान को उपयुक्त किया "पउंजित्ता" उपयुक्त करके उसने "भयवं तित्थयरं ओहिणा आभोएइ" तीर्थकर भगवान् को उस अवधिज्ञान द्वारा देखा "आभोइत्ता" देखकर "जहासक्के नियगपरिवारेणं भाणेयवो जाव पज्जुवासई" वह शकेन्द्र की तरह सकल परिवार सहित अष्टापद पर्वत पर आगया और वहां आकर के उसने वन्दन नमस्कार पूर्वक भगवान की पर्युपासना की "एवं सव्वे विं देविंदा जाव अच्चुए णियगपरिवारेणं भाणेयव्वा" इसी प्रकार से अच्युत देवलोक तक के समस्त इन्द्र अपने २ परिवार सहित अष्टापद पर्वत पर आये ऐसा कहना चाहिए, यहां यावत् शब्द सर्वार्थ में प्रयुक्त हुआ है. संग्रहार्थ में नहीं क्योंकि यहां पर संग्राह्य पदों का अभाव है, "एवं जाव भवणवासीणं इंदा वाणमंतराणं सोलस” इसी तरह भवनवासियों के २० इन्द्र, व्यन्तरों के १६ कालादिक इन्द्र, और "जोइसियाणं दोणि' ज्योतिष्कों के चन्द्र और सूर्य ये दो इन्द्र, “णिया परिवारा णेयवा" अपने २ परिवार सहित इस अष्टापद पर्वत पर ऐसा कहना चाहिये. यहाँ शंका 'पंउजित्ता' उपयुक्त शने तो 'भयवं तित्थयरं ओहिणा आभोपइ' तीथ'२ भावानना ते भवधिज्ञान 43 ६शन या 'आभोइत्ता' ६शन रीने ते 'जहा सक्के नियगपरिवारेण भाणेयव्यो जाव पज्जुवासई' शहेन्द्रनी समस: ५२१२ सहित अष्टा५ ५ ५२ भावी और अन्य आवीनत बन्न नमा२ ५४ भगवाननी ५पासना 3री. 'पवं सब्वे देविदा जाव अच्चुए णियगपरिवारेणं भाणेयव्वा' या प्रमाण अत्युत वा५यन्तन। સઘળા ઈન્દ્રો પિત પોતાના પરિવાર સહિત અષ્ટાપદ પર્વત પર આવ્યા એમ કહેવું જોઈએ અહીં યાવત્ શબ્દ સર્વાર્થમાં પ્રયુક્ત થયેલ છે. સંગ્રહાથમાં નહીં કેમકે અહીં સંગ્રહ ४२वा पाने मला छे. 'एवं जाव भवणवासीण इंदा वाणमंतराणं सोलस' से प्रभारी नवनवासीयाना वीस ईन्द्र, व्यत वन१६ से विगेरेन्द्र भने 'जोइसियाणे दोण्णि' यातिाना २ मन सूर्य से मेन्द्र 'णियगपरिवारा णेयवा' पति पाताना પ૨વા૨ સાથે આ અષ્ટાપદ પર્વત પર આવ્યા, એમ કહેવું જોઈએ. અહીંયાં એ જાતની Page #431 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकाद्वि वक्षस्कार सू.४७ भगवतः निर्वाणानन्तरमीशानदेवकृत्यनिरूपणम् ४१७ स्थानाङ्गाद्यागमेषु द्वात्रिंशत्संख्यका व्यतरेन्द्रा उक्ताः, इह तु षोडश कथमुच्यन्ते ! इति चेत्, आह-यद्यपि व्यन्तरेन्द्रा द्वात्रिंशत्संख्यकाः सन्ति, परन्तु न ते सर्वे ऋद्धयादि सम्पमा भवन्ति । तत्र ये महर्टिकाः कालादयः प्रधानन्यन्तरेन्द्रास्ते इह विवक्षिताः, ये लु अल्पमहर्द्धिका अणपन्नीन्द्रादयस्ते इह गौणत्वान्न विवक्षिताः तेषामविवक्षणे न कापि विप्रतिपत्तिः कार्याः, यतो विचित्रा सूत्रकृतो शैली भवति । अत एवोत्तमपुरुषपरिगणनायां प्रतिवासुदेवानामुत्तमपुरुषत्वेऽपि क्वचित् आगमे तत्परिगणना न कृता । यथा समवायाङ्गे 'भरहेरवएसु णं वासेसु एगमेगाए ओसप्पिणीए चउवणं चउवण्णं उत्तमपुरिसा उप्पग्जिसु वा, उप्पज्जिति वा, उप्पज्जिस्संति, 'तं जहा-चउवीसं तित्थयरा वारस चक्कवट्टी नव बलदेवा नव वासुदेवा' छाया-भरतैरवतयोः खल्ल वर्षयोः एकैकस्यामुत्सऐसी की जा सकती है कि स्थानाङ्ग आदि सूत्रों में ३२ व्यन्तरों के इन्द्र कहे गये हैं फिर यहां पर १६ ही इनके इन्द्र क्यों कहे गये हैं ! सो इसका समाधान ऐसा है कि यद्यपि व्यन्तरेन्द्र ३२ ही कहे गये हैं परन्तु यहां जो १६ प्रकट किये गये हैं-वे यह बतलाते हैं कि व्यन्तरों के ३२ इन्द्र सब समान ऋद्धि आदि वाले नहीं हैं किन्तु कालादिक १६ इन्द्र ही महान् ऋद्धिवाले हैं इसलिये ये प्रधान व्यन्तरेन्द्र हैं और इसी कारण इन्हें यहां विवक्षित किया गया है. अल्पऋद्धि वाले अणपत्नीन्द्रादिकों को नहीं विवक्षित किया गया है. उन्हें तो गौण ही रक्खा गया है. इसलिये इस प्रकार के कथन में कोई विप्रति पत्ति जैसी बात नहीं समझनी चाहिये. क्योंकि सूत्रकारों की शैली विचित्र प्रकार की होतो है, इसो का यह प्रभाव है कि जब उत्तम पुरुषों की परिगणना की गई तो उसमें प्रतिवासुदेव को उत्तम पुरुष होने पर भी किसी २ भागम में परिगणना नहीं की गई है, जैसा कि समवायाङ्ग में "भरहेरखए णं वासेसु एगमेगाए मोसप्पिणीए चउवण्णं चउपण्णं उत्तमपुरिसा उप्पग्जिसुवा उपज्जिति वा, उप्पज्जिस्संति वा तं नहा-च उवीसं तित्थयरा, શંકા કરી શકાય કે થાનાંગ વિગેરે સૂત્રોમાં વ્યંતરદેવેના ૩૨ બત્રીસ ઈક કહેવામાં આવેલ છે. તે પછી અહીં તેના ૧૬ સોળજ ઈન્દ્ર કેમ કહયા છે ? આશકાનું સમાધાન એવું છે કે-જે કે વ્યંતર દેવાની સંખ્યા. ૩૨ જ છે પરંતુ અહી જે ૧૬ પ્રકટ કરવામાં આવ્યા છે તે આમ બતાવે છે કે યંતના ૩૨ ઈન્દો સર્વ સમાન ઋદ્ધિ આદિ થી યુક્ત નથી પણ કાલાદિક ૧૬ ઇન્દ્રો જ મહાન ઋદ્ધિવાળા” છે. એથી એએ પ્રધાન યંતરેન્દ્રો છે અને એથી જ એમને અહીં ઉલ્લેખ કરવામાં આવ્યો છે. અહ૫ ત્રાદ્ધિવાળા અણુપનીદ્રાદિકને અહીં ઉલ્લેખ કરવામાં આવ્યો નથી. તેમનું સ્થાન ગૌણ જ માનવમાં આવ્યું છે. એથી આ જાતના કથનમાં કોઈ વિપ્રતિપત્તિ જેવી વાત સમજવી ચગ્ય નથી, કેમકે સૂત્રકારોની શૈલી વિચિત્ર પ્રકારની હોય છે. એનેજ એ પ્રભાવ છે, કે જ્યારે ઉત્તમ પુરૂષની પરિગણુના કરવામાં આવી તે તેમાં પ્રતિવાસુદેવ ઉત્તમ પુરૂષ હોવા छत मामामात प्रमाणे तनी परिगन्य ४२पामा मावा नथी. रेभ'समवायाङ्ग' मा "भरहेरवपसु णं वासेसु एगमेगाए ओसप्पिणीप चउपण्णं चउपण उत्तम पुरिसा उपजिंसु वा उपजिति बा, उप्पज्जिस्सति वा तं जहा-घउवीसं तिस्थयरा ५३ Page #432 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४२८ जम्बूद्वीपप्राप्ति पिण्यां चतुष्पश्चाशत् चतुष्पञ्चाशत् उत्तमपुरुषाः उदपद्यन्त वा, उत्पद्यन्ते वा, उत्पत्स्यन्ते वा, तद्यथा चतुर्विशतिस्तीर्थकराः, द्वादश चक्रवर्तिनो नव बलदेवा नव वासुदेवा इत्यत्र प्रतिवासुदेवा उत्तमपुरुषत्वेन न संगृहीता इति । तथा 'जोइसियाणं दोण्णि' ज्यौतिष्काणां द्वौ इन्द्रौ-चन्द्र सूर्यो, चन्द्रसर्याविति जास्याश्रयेण बोध्यम्, व्यक्त्याश्रयेण तु ते असंख्याता: एते भवनवासिनां व्यन्तराणां ज्योतिष्काणां च इन्द्रा 'णियगपरिवारा' निजकपरिवाराः स्व स्व परिवारेण सहिता 'णेयव्वा' नेतव्याः-भणितव्याः। यथा स्वपरिवारेण सहितः शक्रः समागतस्तथैव सर्वे इन्द्राः स्व स्व परिवारेण सहिताः समागत्य सविधि भगवन्तं प्रणम्य नाति दूरे नाति निकटे कृताञ्जलयः साश्रुनयना स्थिता इति ॥सू० ४७॥ __ इत्थं चतुष्षष्टाविन्द्रेषु समागतेषु शक्रो देवेन्द्रो यत्कृतवांस्तदाह-- __ मूलम्-तए णं सक्के देविंदे देवराया बहवे भवणवइयाणमंतरजोइसवेमणिए देवे एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! गंदणवणाओ सरसाइं गोसीसवरचंदणकट्ठाई साहरह, साहरित्ता तओ चिइगा ओ रएह, एगं भगवओ तित्थयरस्स, एगं गणहराणं एगं अवसेसाणं वारस चक्कवट्टी, नव बलदेवा, नव वासुदेवा" इस पाठ में प्रतिवासुदेव उत्तमपुरुषरूप से परिगणित नहीं किये गये हैं. ज्योतिष्क देवों के जो चन्द्र और सूर्य ऐसे दो इन्द्र कहे गये हैं वे जाति के आश्रयण से कहे गये हैं-नहीं तो वैसे तो ये व्यक्ति की अपेक्षा असंख्यात है। इन भवनवासियों के, व्यन्तरों के और ज्योतिष्कों के इन्द्र अपने २ परिवार से सहित होकर यहां आये ऐसा कह लेना चाहिये, जिस प्रकार अपने परिवार से युक्त होकर शक माया उसी प्रकार से समस्त इन्द्र भी अपने २ परिवार सहित होकर आये और वे सब के सब सविधि भगवान् को नमस्कार कर न उनके अति समोप बैठे और न उन से अति दूर ही बैठे. किन्तु यथोचित स्थान पर आकर बैठे उस समय उनके दोनों हाथ भक्ति के वश से अंजलिरूप में जुड़े हुए थे एवं आँखों में उन सब की शोक के अश्रु भरे हुए थे ॥४७॥ वारस चक्कवट्टी, नव बलदेवा, नब वासुदेवा" आपामा प्रतिवामुहवा उत्तम પુરુષ રૂપથી પરિણિત કરવામાં આવ્યા નથી. જ્યોતિષ્ક દેના જે ચન્દ્ર અને સૂર્ય એવા બે ઈન્દ્રો કહેવામાં આવેલ છે તે જાતિના આશ્રયથી કહેવામાં આવેલ છે. આમ તે તે વ્યક્તિની અપેક્ષા એ અસંખ્યાત છે. એ ભવનવાસીઓના, વ્યંતરાની અને જાતિના ઈન્દ્રો પોતપોતાના પરિવારની સાથે અત્રે આવ્યા. એવું કહેવું જોઈએ. જેમ પોતાના પરિવારથી સંયુક્ત થઈને શક્ર આવ્યું તે પ્રમાણે જ સર્વે ઈન્દ્રો પણ પોત-પોતાના પરિવા રથી સંયુક્ત થઈને આવ્યા અને તેઓ સર્વે સવિધિ ભગવાનને નમન કરીને એકદમ તેમની પાસે પણ નહિ તેમ તેમનાથી વધારે દૂર પણ નહિ આ પ્રમાણે ચગ્ય સ્થાને બેસી ગયા. તે સમયે તેમના બન્ને હાથે ભક્તિવશ અંજલિ રૂપે સંયુક્ત હતા તેમની આંખોમાંથી અશ્રુધારાઓ પ્રહિત થઈ રંહી હતી. કા‘ Page #433 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकाद्विवक्षस्कार सू. ४८ देवागमनानन्तरं इन्द्रकार्यनिरूपणम् ४१९ अणगाराणं । तएणं ते भवणवइ जाव वेमोणिया देवा णंदणवणाओ सरसाइंगोसीसवरचंदणकट्ठाई साह रंति, साहरित्ता तओ चिइगाओ रएंतिएगं भगवओ तित्थयरस्स, एगं गणहराणं, एगं अवसेसाणं अणगाराणं । तएणं से सक्के देविदे देवराया अभिओगे देवे सदावेइ, सदोवित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! खीरोदगसमुद्दाओ खीरोदगं साहरह । तएणं ते अभिआगा देवा खीरोदगं साहरंति ॥ सू० ४८॥ छाया-ततः खलु शक्रो देवेन्द्रो देवराजो बहून् भवनपतिव्यन्तरज्योतिषवैमानिकान् देवान् एवमवादीत्-क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः नन्दनवनात् सरसानि गोशीर्षवरचन्दनकाष्ठानि समाहरत, समाहत्य तिस्रः चितिकाः रचयत, एकां भगवतस्तीर्थकरस्य, एकां गणधरस्य, एकाम् अवशेषाणाम् अमगाराणाम् । ततः खलु ते भवनपति यावद् वैमानिका देवाः नन्दनवनात् सरसानि गोशीर्षवरचन्दनकाष्ठानि 'समाहरन्ति, समोहत्य तिस्रः चितिका रक्यन्ति-एकां भगवतस्तीर्थकरस्य, एकां गणधराणाम् , एकाम् अवशेषाणां अनगाराणाम् । ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराज आभियोग्यान् देवान् शब्दयति, शब्दयित्वा एवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः! क्षीरोदकसमुद्रात् क्षीरोदकं समाहरत । ततः खलु ते आभियोग्या देवाः क्षीरोदकसमुद्रात् क्षीरोदकं समाहरन्ति ॥४८॥ टीका 'तए णं से सक्के' इत्यादि । 'तए णं' तत: चतुष्षष्टीन्द्रसमागमनानन्तरं खलु 'सक्के देदिंदे देवराया बहवे भवणवइ वाणमंतर जोइसवेमाणिए' शक्रो देवन्द्रो देवराजः बहून् भवनपतिव्यन्तरज्योतिषवैमानिकान् चतुर्विधान् ‘देवे' देवान् ‘एवं' एवं वक्ष्यमाणमकारेण-'वयासी' अवादीत् उक्तवान् 'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया" क्षिप्रमेव शीघ्रमेव भो देवानुप्रियाः ! यूयं 'गंदणवणाओ सरसाई' नन्दनवनात सरसानि-स्नि इस प्रकार ६४ इन्द्रों के उपस्थित हो जाने पर शक देवेन्द्र ने जो किया उसका कथन इस प्रकार है-"तएणं सक्के देविंदे देवराया बहवे" इत्यादि। टोकार्थ-इसके बाद "तएणं सक्के देविंदे देवराया बहवे भवणवइ वाणमंतरजोइस वेमाणिए देवे एवं वयासी" देवेन्द्र देवराज शक ने उन उपस्थित हुए समस्त ६४ परिवार सहित भवनपति, वानन्यन्तर, ज्योतिष्क एवं वैमानिक देवेन्द्रोंसे ऐसा कहा-"विप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! नंदणवणामो सरसाइं गोसीसचंदणकट्ठाई साहरह" भो देवानुप्रिय ! तुम सब शोघ्र ही नन्दन( આ પ્રમાણે ૬૪ ઈન્દ્રો જ્યારે ઉપસ્થિત થઈ ગયા ત્યારે શક દેવેન્દ્ર જે કર્યું તેનું उथन ॥ प्रभा छ :–'तए सक्के देविंदे देवराया बहवे-इत्यादि सूत्र ॥४८॥ -त्या२ माई 'तप ण सक्के देविदे देवराया बहवे भवणवइवाणमंतर जोइसिय वेमाणिए देवे एवं वयासी' हेवेन्द्र हेव तपस्थित थये। समस्त-१४, परिवार સહિત ભવન પતિએ વ્યંતર તિષ્ક તેમજ વૈમાનિક દેવેન્દ્રોને. આ પ્રમાણે કહ્યું 'विप्पामेय भो देवाणुप्पिया नंदणवणाओ सरसाइ' गोसीसचंदणकट्ठाई साहरह' हेवा Page #434 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ધર ग्धानि न तु रुक्षाणि, 'गोसीसवरचं दणकट्ठाई' गोशीर्षवरचन्दनकाष्ठानि-गोशीर्ष = गोशी नाम्ना प्रसिद्धं यदूवरं श्रेष्ठं चन्दनं तस्य काष्ठानि 'साहरह' समाहरत = समानयत 'साहरिता' समाहृत्य 'तओ चिइगाओ' तिस्रः चितिकाः = चितात्रयं 'रएह' रचयत, तत्र 'ए' एकां चितिकां 'भगवओ तित्थयरस्स' भगवतस्तीर्थकरस्य कृते रचयत, 'एगं' एकां चितिकां 'गणहरस्स' गणधराणां कृते, 'एगं' एकां च चितिकाम् ' अवसे साणं' अवशेषाणां तीर्थकर गणधरभिन्नानाम् 'अणगाराणं' अनगाराणां - साधूनां कृते रचयत । 'तर णं ते भवणवर जाव वेमाणिया' ततः खलु ते भवनपति यावद् वैमानिकाः भवनपतिव्यन्तर ज्यौतिष वैमानिका 'देवा णंदणवणाओ सरसाई- गोसीसवर चंदणकट्ठाई सारंति' देवा नन्दनवनात् सरसानि गौशीर्षवरचन्दनकाष्ठानि समाहरन्ति 'साहरित्ता' समाहृत्य 'तओ चिरगाओ रएंति' तिखः चितिकाः रचयन्ति । 'एगं भगवओ तित्थयरस्स' atri fafari भगतस्तीर्थकरस्य ऋषभदेव स्वामिनः कृते, 'एगं गणहराणं' एकां चितिकां गणधराणां कृते, 'एगं अवसेसाणं- अणगाराणं' एकां च चितिकाम् अवशेषाणाम् नगाराणां कृते रचयन्ति । 'तरणं से सक्के देविदे देवराया आभियोगे' ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराज अभियोग्यान् = किङ्करभूतान् 'देवे' देवान् 'सद्दावेइ' शब्दयति, 'सद्दावित्ता' शब्दयित्वा ' एवं ' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण 'वयासी' अवादीत् उक्तवान् 'खिप्पामेव ' मनसे सरस गोशीर्षचन्दन की लकडियों को लाओ और "साहरिता" लाकरके " ओ रएइ" तीन चिताओं की रचना करो; इनमें "एगं भगवओ तित्थयरस्स" एक प्रभु तीर्थंकर की, "एगं गणहरस्स" एक गणधर की और "एगं अवसेसाणं अणगाराणं" एक अवशेष अनगारों की' तब उन भवनपति से लेकर समस्त वैमानिक देवों ने नन्दन वन में जाकरके वहां से सरस गोशीर्षचन्दन की लकड़ियों को लेकर पूर्वोक्त तीन चिताओं की रचना की, एक भगवान् तीर्थ · कर के लिये, दूसरी गणधरों के लिये और तीसरी इन दोनों से भिन्न शेष अनगारों के लिये "तएण से सक्के देविंदे देवराया आभिओगे देवे सदावेइ" इसके बाद देवेन्द्र देवराजशक्र ने अभियोग्य जाति के देवों को बुलाया - "सद्दावित्ता एवं वयासी- " बुलाकर उसने ऐसा कहा ओ નુપ્રિયા, તમે સ મળીને શીઘ્ર નન્દન વનમાંથી સરસ ગેાશીષ ચન્દનના લાકડાએ લાવે અને 'साहरिता' सावीने 'तओ बिइगाओ' भित्ता तैयार । 'एग भगवओ तित्थयरस्त' भेड अलु तीर्थ ४२ भाटे 'पगं गणहरस्स' थे गनुधर भाटे भने 'एग अवसेसाण अण गाराण' थे अवशेष अनगारे। भाटे. त्यार माह ते भवनयतिमोथी भांडीने सर्व वैमानि વેએ નન્દન વનમાં જઈને ત્યાંથી સરસ ગેાશીષ ચન્દનના લાકડાએ લાવીને પૂર્વકિત ત્રણ ચિતાની રચના કરી એક ભગવાન તીર્થંકર માંટે, એક ગણધર માટે અને એક येथे अन्नेथी भिन्न शेष मनगारी भाटे. 'तपण से सक्के देविदे देवराया आभिभोगे देवे सहावेह' त्यार माह देवेन्द्र देवरान शडे मालियोग्य लतिना देवाने मोसाध्या 'सद्दावित्ता एवं बयासी' मसावी ने तेभने भा प्रभाो उधु - 'विप्पामेव भो देवाणुपियया खिरोदगसमु जम्बूद्वीपप्रशमसुत्रे Page #435 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि. वक्षस्कार सू. ४९ भगवदादि कलेवरस्नपनादिकनिरूपणम् शीघ्रमेव 'भो देवाणुपिया !' भो देवानुप्रियाः । यूयं 'खीरोदगसमुद्दाओ' क्षीरोदक समुद्रात् ' खीरोदकं' क्षीरोदकं 'सहरह' समाहरत = समानयत 'तए णं से आभिओगा देवा' ततः खलु ते आभियोग्या देवाः क्षीरोदकसमुद्रात् 'खोरोदगं' क्षीरोदकं' साहरंति' समाहरन्ति - समानयन्ति इति ।। सू० ४८ ॥ मूलम् - तए णं से सक्के देविंदे देवराया तित्थगरसरीरंगं खीरोदगेणं पहाणेs हाणित्ता सरसेणं गोसीसवरचंदणेणं अणुलिपइ. - अणुर्लिपित्ता हंस लक्खणं पडसाडयं नियंसेइ नियंसित्ता सव्वालंकारविभूसियं करेs, तणं से भवणवइ जोव वेमाणिया गणहरसरीरगाई अणगारसरीरगाईपि खीरागेणं होवेति पहावित्ता सरसेणं गोसीसवरचंदणेणं अणुलिंपति अणुर्लिपित्ता अहयोई दिव्वाई देवदुसज्यलाई णियसंति नियंसित्ता सव्वालंकारविभूसियोई करेंति, तरणं से सक्के देविदे देवराया ते बहवे भवणव जाव माणिए देवे एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! ईहामिंग उसभ-तुरय जोव वणलयभत्तिचित्ताओ तओ सिबियाओ विउव्वेंह, एगं भगवओ तित्थयरस्स एगं गणहराणं एवं अवसेसाणं अणगाराणं, तरणं ते बहवे भवणवइ जाव वेमाणिया तओ सिबियाओ विउव्वंति, एगं भगवओ तित्थयरस्स एगं गणहराणं एवं अवसेसाणं अणगाराणं, तरणं से सक्के देविदे देवराया विमणे णिराणंदे अंसुपुण्णणयणे भगवओ तित्थयरस्स विणट्ठ जम्मजरामरणस्स सरोरगं सीयं आरु ts आरुहिता चिगाए ठवेइ, तरणं ते बहवे भवणवइ जाव वैमाणिया "स्विपमेव भो देवाणुप्पिया खीरोदगसमुद्दाओ खीरोदगं साहरह" हे देवानुप्रियो ! तुम शोघ्र ही क्षीरोदक समुद्र पर जाओ और वहां से क्षीरोदक लेकर आओ. इस प्रकार इन्द्र की आज्ञा सुनकर 'तणं ते आभिओगा देवा खीरोदगं साहर ति" आभियोग्ग जाति के देव क्षीरोदक समुद्र पर गये और वहां से क्षीरोदक लेकर वापिस आगये ||४८ || दाओ खीरोदंग साहरह' हे हेवानुप्रिय, तमे शीघ्र झारोह क्षीरे वो भी प्रमाणे इन्द्रनी आज्ञा सांलजीने खीरोदगं साहूति' ते सर्व आभियोग्य लतिना हेवा क्षीरोह ક્ષીરાદક લઇ તે પાછા આવ્યા. ૫૪૮૫ ४२१ समुद्र पर लो। मने त्याथी 'तपणं से आभिओगा देवा समुद्र पर गया याने त्यांथी Page #436 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४२३ जम्बू प्रतिस् देवा गणहराण अणगाराणय विणट्ठ जम्मजरामरणाणं सरीरगाई सीयं आरुहेति आरुहिता चिइगाए ठवेंति ॥ सू० ४९॥ छाया—ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजस्तीर्थकरशरीरकं क्षीरोदकेन स्नपयति स्नपयित्वा सरसेण गौशीर्षवरचन्दनेनानु लिम्पति अनुलिप्य हंसलक्षणं पटशाटकं निवासयतिनिवास्य सर्वालङ्कारविभूषितं करोति, ततः खलु ते भवनपति यावद् वैमानिका गणधर शरीरकाणि अनगारशरीरकाण्यपि क्षीरोदकेन स्नपयंति स्नपयित्वा सरसेन गोशीर्षवरचन्दनेनातुलिम्पन्ति, अनुलिप्य अहतानि दिव्यानि देवदूष्ययुगलानि निवासयन्ति निवास्थ सर्वालङ्कारविभूषितानि कुर्वन्ति, ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजस्तान् बहून् भवनपति यावद् वैमानिकान् देवानेवमवदत् - क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः । ईहामृगवृषभ - तुरग - याषद् वनलता भक्तिचित्रास्तिसः शिविका विकुरुत, (तत्र) एकां भगवते तीर्थकराय एकां गणधरेभ्यः पकामवशेषेभ्योऽनगारेभ्थः, ततः खलु ते बहूवः भवनपति यावद् वैमानिकास्तिस्रः शिक्षिकां विकुर्वन्ति, (तत्र) पकां भगवते तीर्थकराय, एकां गणधरेम्यः, एकामवशेषेभ्योSनगारेभ्यः, ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजो विमना निरानन्दोऽश्रुपूर्णनयनो भगवतस्तीर्थकरस्य विनष्टजन्मजरामरणस्य शरीरकं शिविकायामारोपयति आरोग्य चितिकायां स्थापयति, ततः खलु ते बहवो भवनपति यावद् वैमानिका देवा गणधराणामनगाराणां च विनष्टजन्मजरामरणानां शरीरकाणि छिबिकायामारोपयन्ति आरोष्य चितिकायां स्थापयन्ति ॥ सु० ४९ ॥ टीका - - ' तरणं' इत्यादि । ततः - तदनन्तरं - क्षीरोदकसंहरणानन्तरं 'से' सः - पूर्वोक्तः 'सक्के' शक्रः 'देविदे' देवेन्द्रः 'देवराया' थेवराजः 'तित्थयरसरीरगं' तीर्थकर शरीरकं - जिनकलेवरं 'खीरोदगेणं' क्षीरोदकेन- क्षीरसागरानीतजलेन 'ण्णाणेइ' स्नपयतिस्नापितं करोति 'हाणित्ता' स्नपयित्वा 'सरसेणं' सरसेन - सुगन्धबन्धुरेण 'गोसीसवरचंदणं-गोशीर्षवरचन्दनेन - देववृक्ष - सम्भवगोशीर्षाख्योत्तम चन्दनेन 'अणुविई' अनुलिम्पति - अनुलिनं करोति 'अणुलिंपित्ता' अनुलिप्य 'हंसलक्खणं' हंसलक्षणं - हंसवच्छ्वे अब क्षीरोदक आजाने के बाद शक्र की कृति का वर्णन करते हैं- तरणं से सक्के देविंदे देवराया" इत्यादि । टीकाथ - " तए णं से सक्के देविंदे देवराया तित्थगरसरीरगं खीरोदगेणं ण्हाणेइ " इसके बाद देवेन्द्र देवराज शक ने तीर्थंकर के शरीर को उस क्षीरोदक से स्नान कराया और 'हाणित्ता' स्नान करा करके फिर उसे 'सरसेण गोसीसचन्दणेणं अणुलिप्पइ' गोशीर्ष नाम के श्रेष्ठ ક્ષીરાહક લઇ આથ્યા બાદ શકની કૃતિનું વર્ણન કરે છે'तपण' से सक्के देविंदे देवराया || इत्यादि सूत्र ॥४९॥ शब्दार्थ - "तप णं से सक्के देविदे देवराया तित्थगरसरीरंगं खीरोदगेण पहाणेह' ત્યારપછી દેવેન્દ્ર દેવરાજ શકે તીર્થંકર ના શરીરને તે ક્ષીરાદકથી સ્નાનકરાવ્યુ અને જી वित्ता' स्नान तेने 'सरसेण गोसीसवंदणेण अणुलिंपर' गोशीर्ष नामना श्रेष्ठ यन Page #437 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका-द्वि. वक्षस्कार सू.४९ भगवदादिकलेवरस्नपनादिकनिरूपणम् ४२३ तवर्ण 'पडसाडयं' पटशाटकं-शाटकवस्त्रं 'णियंसेइ' निवासयति-परिधापयति 'णियंसित्ता' निवास्य-परिधाय 'सव्वालंकारविभूसिय' सर्वाभरणसमलडकृतं 'करेइ' करोति 'तएणं' ततः-तदनन्तरं भगवच्छरीरस्य शक्रकर्तृक सर्वालङ्कारविभूषितीकरणानन्तरम् खलु 'ते' ते 'भवणवइ जाव वेमाणिया' भवनपति यावद् वैमानिकाः भवनपति वाणमंतर ज्यौतिष्क वैमानिका देवा 'गणहरसरीरंगाई' गणधर शरीरकाणि गणधरकलेवराणि 'अणगार सरीरगाई' अनगारशरीरकाणि अनगाराः साधवस्तच्छरीरकाणि तत्कलेवराणि 'खीरोदगेणं' क्षीरोदकेन-क्षीरसागरानीतजलेन 'पहावेंति' स्नपयन्ति 'पहावित्ता' स्नपयित्वा 'सरसेणं' सरसेन सुगन्धिना 'गोसीसचंदणेणं' गोशीर्षचन्दनेन 'अनुलिपति' अनुलिम्पन्ति 'अनुलिपित्ता' अनुलिप्य 'अहयाई' अहतानि-अखण्डितानि 'दिव्वाई' दिव्यानि-स्वर्गीयाणि उत्तमानि 'देवदूसजूयलाई' देवदृष्ययुगलानि देवपरिधेयवस्त्रद्वयानि, इह बहुवचनं प्रत्येकाणि गणधरानगारशरीराण्यपेक्ष्य 'णियंसति' निवासयन्ति परिधापयन्ति 'णियंसित्ता' निवास्य परिधाप्य 'सव्वालंकारविभूसियाई' सर्वालङ्कारविभूषितानि सर्वाभरणालङ्कृतानि 'करें ति' कुर्वन्ति तए णं' ततः तदनन्तरं खलु गणधरानगारशरीराणां भवनपत्यादिकर्तृचन्दन से अनुलिप्त किया "अणुलिंपित्ता" अनुलिप्त करने के बाद फिर "हस लक्खणं पडसाडयं णियंसेइ” उसे हँस के जैसे श्वेतवर्णवाले शाटक वस्त्र से सुसज्जित किया, "णियंसित्ता" मुसज्जित करने के बाद फिर उसे “सव्वालंकारविभूसियं करेइ" समस्त अलंकारों से विभूषित किया, भगवान् के शरीर के विभूषित किये जाने के बाद "तए णं से भवणवइ जाव वेमाणिया गणहर सरीरगाइं अणगार सरोरगाइंपि खोदोदगेणं व्हावेंति पहावित्ता सरसेणं गोसीसचंदणेणं अणुलिंपित्ता अहयाई दिव्वाइं देवदूसजुयलाई णियंसंति णियंसित्ता सव्वालंकारविभूसियाई करेंति" भवनपति से लेकर वैमानिक तक के देवों ने गणधर के शरीरों को और अनगार के शरीरों को भी क्षीरोदक से स्नानयुक्त किया. स्नानयुक्त करके फिर सरस गोशीर्षक नामक श्रेष्ठचन्दन से अनुलिप्त किया, अनुलिप्त करके अहत दिव्य देवदूष्ययुगल उन शरीरों पर धरे-पहिराये, देवदूष्य युगलों के पहिराने के बाद फिर उन्होंने उन शरीरों का समस्त प्रकार के अलंकारों से न ५ या 'अणुलिंपित्ता' यहनना बेपशन तन हंसलवखणंपडसाडयं णियंसेइ' હસના જેવા સફેત વર્ણવાળ વસ્ત્રથી સુસજજત કર્યું ‘foથસિં' સુસજજીત કરીને तेने 'सव्वालंकारविभूसियं करेह' से म शथी शीलायमान ४यु भगवानना शरीरने विभूषित यो पछी 'तरण से भवणवइ जाव वेमाणिया गणहरसरीरगाई अणमार सरीरगाई खीरोदगेण पहावेति पहावित्ता सरसेण गोसीसचदणेणं अणुलिंपित्ता अहयाई दिव्बाई देवदूसजुयलाई णियसंति णियंसित्ता सव्वालंकारविभूसियाई करें ति' ५छी लपन પતિથી આરંભીને વૈમાનિક પર્યત ના દેવોએ ગણઘરના શરીરને અને અનગરના શારીરને પણ ક્ષીરદક્ષી સ્નાન કરાવ્યું તે સર્વને સ્નાન કરાવીને પછી સરલ ગશીર્ષ નામનાઉત્તમ ચંદનથી લેપક લેપ કરીને દેવદૂષ્ય યુગલ તે શરીર પર પહેરાવ્યા. દેવાધ્ય યુગલ વસ્ત્રો ધારણ કરાવ્યા પછી તેઓએ એ શરીરને સઘળા પ્રકારના અલંકારોથી Page #438 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रशतिसूत्रे कसर्वालङ्करणानन्तरं 'से' सः - पूर्वोक्तः अलङ्कृत जिनकलेवर: 'सक्के' शक्रः 'देविंदे' देवेन्द्रः 'देवराया' देवराजः 'ते' तान् अलङ्कृतगणधरानगारकलेवरान् 'बहवे' बहून् - अनेकन 'भवणव जाव वेमाणिए' भवनपति यावद् वैमानिकान् भवनपतिवाणमन्तरज्योतिष्क वैमानिकान् 'देवे' देवान् ' एवं ' 'एवम् वक्ष्यमाणं वचनम् 'वयासी' अवदत् -अबवीत् 'खिय्यामेव ' क्षिप्रमेव शीघ्रमेव 'भो देवाणुपिया !" भो देवानुप्रियाः ? हे महानुभावाः । 'इहामिग उसभ तुरग जाव वणलयभत्तिचित्ताओ' ईहामृगवृषभ तुरगयावद्वनलता भक्तिचित्राः - ईहामृग वृषभ तुरगनस्कामरविहग व्यालक किन्नररुररुशरभचमरकुञ्जरवनलता भक्ति चित्राः - तत्र - - ईहामृगः वृकाः, वृषभा- वलीवर्दाः, तुरगाः, -अश्वाः नराः - मनुष्याः, मकराःग्राहाः, विहगाः - पक्षिणः, व्यालकाः - सर्पाः किन्नराः - व्यन्तर देवाः, रुरवः - मृगाः, शरभाः अष्टापदाः, चमराः - चमर गावः कुञ्जरा:- हस्तिनः, वनलताः - प्रसिद्धः, एतासां या भक्तयः रचनाविशेषाः, ताभिचित्राः - अद्भुताः 'तओ' तिस्त्रः त्रिसंख्या: 'सिवियाओ' शिबिकाः याप्ययानानि 'पालखी' इति प्रसिद्धाः 'विउच्चह' विकुरुत वैक्रियशक्तयोत्पादयत तत्र ' एगं' एकां - शिबिकां 'भगवओ' भगवते 'तित्थगरस्स' तीर्थकराय - जिनाय ' एवं ' एकाम् अपरां द्वितीयां शिबिकाम् 'गणहराणं' गणधरेभ्यः गणिभ्यः 'एगं' एकाम् अन्यान् विभूषित किया, "तरणं से सक्के देविंदे देवरायो ते वहवे भवणवइ जाव वेमाणि देवे एवं वयासी - " इसके बाद उस देवेन्द्र देवराज शक्र ने उन समस्त भवनपति देवों से लेकर यावत् वैमानिक देवों से इस प्रकार कहा - " विप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! ईहामिग उसभ तुरग जाव वणलय भत्तिचिताओ तओ सिबियाओ विउवेह" हे देवानुप्रियो ! आपलोग ईहामृग, वृषभ, तुरग यावत् वनलताओं के चित्रों से चित्रित तोन शिविकाओं की विकुर्वणा करो. इनमें एक भगवान् तीर्थकर के लिये और एक अवशेष अनगारों के लिये. “तएणं ते बहवे भवणव जाव वेमाणिया तओ सिवियाओ विउव्वंति" इस प्रकार से इन्द्रप्रदत्त आज्ञा के अनुसार उन भवनपति देवों से लेकर वैमानिक तक के देवों ने तीन शिविकाओं की विकुर्वणा की “एगं भगवओ तित्थगरस्स” इनमें एक तीर्थंकर के लिये की गई, "एगं गणहराण" एक गणधरों के अलङ्कृत र्या. 'तरण से सक्के देविदे देवराया ते बहवे भवणवर जाव वेमाणि देवे पर्व वयासी' ते पछी थे देवेन्द्र देवराज राडे से सघना लवनयति देवे। यावत् वैमानि हेवाने या प्रभाव धुं 'खिप्पायेव भो देवाणुपिया ईहामिगाउसभंतुरग जाव वणलय भत्तिचित्ताओ सिवियाओ विउव्वेह' डे हेवानुप्रिया आप डामृग, वृषल, तुरंग यावत् વનલતાએ ના ચિત્રોથી ચિત્રિત એવી ત્રણ શિખિકાએ અર્થાત્ પાલખીઓની વિધ્રુવ ણુા કરાવે તે પૈકી એક ભગવાન્ તીર્થંકરને માટે એક ગણધરા માટે અને એક માકીના અનગાશ भाटे 'तपणं ते बहवे भवणवह जाव वेमाणिया तओ सिबियाओ विउव्वंति' या प्रमाणे द्रे આપેલ આજ્ઞાનુસાર એ ભવનપતિ દેવાથી લઈને વૈમાનિક પર્યન્તના દેવાએ ત્રણ પાલખીमोना विश्र्वशु री. 'पगं भगवओ तित्ययरस्स' ते पछी मे भगवान् तीर्थरने भाटे मनावेझडती. 'रंग गहरा मे गयुधरे। मदे गं अवसेजागं अगवाराग" भी ४२४ Page #439 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू० ४९ कलेवरस्नपनादि निरूपणम् ४२५ तृतीयां शिबिकाम् 'अवसेसाणं' अवशेषेभ्यः जिनगणधरातिरिक्तेभ्यः अणगाराणं' अनगारेभ्यः विकुरुतेति पूर्वेणान्वयः 'तरणं' ततः तदन्तरं खलु शिविकात्रयविकरणार्थशक्राज्ञानन्तरम् 'ते' ते शक्राज्ञप्ताः 'बहवे' बहवः 'भवणवइ जाव वेमाणिया' भवनपति यावद्वैमानिकाः भवनपति ज्योतिष्कव्यन्तरवैमानिकाः देवाः 'तओ' तिस्रः 'सिबियाओ' शिविका: 'विउव्वंति' विकुर्वन्ति, 'तपणं' ततः तदन्तरं खलु शिबिकात्रयविकरणानन्तरम् 'से' सः 'सक्के' शक्रः 'देविंदे' देवेन्द्रः 'देवराया' देवराजः 'विमणे' विमनाः- विषण्णचित्तः 'णिराणंदे' निरानन्दः आनन्दरहितः दुःखी 'असुपुण्णणयणे' अश्रुपूर्णनयनः वाष्पाकुलनेत्रः 'भगवओ' भगवतः 'तित्थयरस्स' तीर्थकरस्य 'विणट्ठजम्मजरामरणस्स ' विनष्ट जन्मजरामरणस्य जन्मवार्धक्यमृत्युरहितस्य भगवत इत्यनेन सम्बन्धः तस्य 'सरीरंगं' शरीरकं - कलेवरं 'सीअं' शिविकायाम् अत्र मूले सप्तम्यर्थे द्वितीया प्राकृतजन्या 'आरुहे ' आरोपयति-आरुढं करोति 'आरुहित्ता' आरोप्य - आरूढं कृत्वा भगवत्कलेवरं 'चिइगाए' चितिकायाम् - चितायाम् 'ठवेइ' स्थापयति' 'तपणं' - ततः - तदनन्तरं भगवच्छरीरस्य चितायां स्थापनानन्तरम् 'ते' ते - वैक्रियशक्त्योत्पादितशिविकायाः 'बहवे' बहवः अनेके 'भवणव जाव वैमाणिया' भवनपति यावद्वैमानिकाः - भवनपति ज्योतिष्कव्यन्तर वैमानिका: 'देवा' देवाः 'गणहराणं' गणधराणां गणिनाम् 'अणगाराणं' अनगाराणाम् 'य' च 'विण जम्मजरामरणाणं' विनष्टजन्मजरामरणनां - जन्मवार्धक्यमृत्युरहितानां 'सरीरगाई' शरीरकाणि 'सीयं' शिविकायां द्वितीयायां तृतीयायां च 'आरुहेति' आरोपयन्तिलिये की गई और “एगं अवसेसाणं अणगाराणं' एक शेष अनगारों के लिये की गई, इसके बाद" एणं से सक्ते देविंदे देवराया विमणे णिराणंदे अंसुपुण्णणयणे भगवओ तित्थगरस्स विण जम्मजरामरणस्स सरोरगं सीयं आरुहेइ" उस देवेन्द्र देवराज शक्र ने विमनस्क और निरानन्द होते हुए अश्रुपूर्ण नयनों से भगवान् तीर्थकर के की जिन्होंने जन्म, जरा और मरण को विनष्ट कर दिया है शरीर को शिविका में आरोपित किया, "आरुहित्ता" शिविका में आरोपित करके फिर "चिइगाए ठवेइ" उसे उसने चिता में रखा, इसके अनन्तर "तएणं ते बहवे भवणवइ जाव वेमाणिया देवा गणहराणं अणगाराणय विणट्ठजम्मजरामरणाणं सरीरगाईं सीयं आरुर्हेति" उन भवनपति देवों से लेकर वैमानिक तक के देवों ने गणधरों और अनगारों खेड माडीना अनगारी भाटे रथवामां आवी ते छ। 'तपणं से सक्के देविंदे देवराया मिणे गिराण दे अंसुपुण्णणयणे भगवओो तित्थगरस्स विणट्टजम्मजरामरणस्स सरीर सीयं आरुहेइ' थे देवेन्द्र देव विमनस् भने निशन मनी ने मांसुभेोथी ભરેલા નેત્રો વડે ભગવાન તીર્થંકર કે જેઓએ જન્મ જરા અને મરણના વિનાશ કરેલ છે तेभना शरीरने पास भी मां पधराव्युः 'आरुहित्ता' पास भी भां पंधरावी ने ते पछी 'चिइगाए टवे' तेने शडे यिता पर भूम्युत्यारमाह 'तपण ते बहवे भवणवइ जाव वेमाणिया देवा गहरा अणगाराणय विणट्ठजम्मजरामरणाण सरीरगाई सीयं आरुहेति ते भवनयति ५४ Page #440 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बुद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे आरूढानि कुर्वन्ति 'आरुहित्ता' आरोप्य आरूढीकृत्य 'चिइगाए' चितिकायां चितायां 'ठवेंति' स्थापयन्ति-निवेशयन्ति ॥सू० ४९॥ अथ चितायां भगवदादिकलेवरस्थापनानन्तरं शक्रादिकृतिमाह मूलम्-तएणं से सक्के देविंदे देवराया अग्गिकुमारे देवे सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया तित्थगरचिइगाए जाव अणगारचिइगाए अगणिकायं विउवह विउवित्ता एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह, तएणं ते अग्गिकुमारा देवो विमणा निरानंदा अंसुपुण्ण णयणा तित्थयरचिइगाए जाव अणगारचिइगाए य अगणिकायं विउव्वंति तएणं से देविंदे देवरायो वाउकुमारे देवे सदावेइ सदावित्तो एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! तित्थयरचिइगाए जाव अणगारचिइगाए य वाउक्कायं विउव्वह विउवित्ता अगणिकायं उज्जालेह तित्थयरसरीरगं गणहरसरीरगाइं अणगारसरीरगाइं च झामेह तएणं ते वाउकुमारा देवा विमणा णिराणंदा अंसुपुण्णणयणा तित्थयरचिइगाए जाव विउव्वंति अग णिकायं उज्जालैंति तित्थयरसरीरगं जाव अणगारसरीरगाणि य झामे ति के कि जिन्होंने जन्म जरा और मरण को सर्वथा विनष्ट कर दिया है शरीरों को शिबका में आरोपित किया, और "आरुहित्ता" आरोपित करके फिर उन्होंने “चिइगाए ठवेंति" उन शरीरों को चिता में रख दिया, ईहामृग-नाम वृक का है, वृषभ नाम बलीवर्द का है, तुरग नाम घोड़ेका हैं नर नाम मनुष्य का है, मकर नाम ग्राह का है, विहग नाम पक्षी का है, यालक नाम सर्पका है. किन्नर व्यन्तरजाति के देवविशेषों का नाम है, रुरु नाम मृग का हैं, शरभ नाम अष्टापद का है, चमर नाम चमरी गाय का है, कुञ्जर नाम हाथी का है. जंगल की लताओं का नाम वनलता है ॥४९॥ દેથી માંડી ને વૈમાનિક સુધીના દેવોએ કે જેમણે જન્મ જશે અને મરણ ને સર્વથા વિનષ્ટ કરી દીધા છે એવા ગણધર અને અનગારના શરીરને શિબિકામાં આરોપિત કર્યા भने 'आरुहिता' मारे,पित ४रीने पछी तेभो 'चिइगाए ठवेति' शरीराने यित। ५२ મૂકી દીધાં, ઈહામૃગ, વૃકનું નામ છે વૃષભ, બલીવઈનું નામ છે. તુરગ, નામ ઘોડાનું छ. न२, मनुष्यनु नाम छे. म४२, श्राइनु नाम छे. विस, पक्षीनु नाम छे. व्यास, સર્ષનું નામ છે. કિન્નર, વ્યન્તર જાતિના દેવ વિશેષનું નામ છે. ૩૩, મૃગનું નામ છે. શભ, અષ્ટાપદનું નામ છે, ચમાર, ચમરી ગાયનું નામ છે. કુંજર, હાથીનું નામ છે. વનલતા, જંગલી લતાએ નું નામ છે. એ સૂત્ર ૪૯ Page #441 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटोद्विवक्षस्कारसू.५० कलेवराणिचितोपरिस्थापनानन्तरिकशक्रादिकार्यनिरूपणम् ४२७ तएणं से सक्के देविंदे देवराया ते बहवे भवणवइ जाव वेमोणिए देवे एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! तित्थयरचिइगाए जाव अणगारचिइगाए अगुरुतुरुक्कघयमधुं च कुंभग्गसो य भारग्गसो य साह रह, तरणं ते भवणवइ जाव तित्थयर जाव भारग्गसो य साहरंति, तएणं से सक्के देविंदे देवराया मेहकुमारे देवे सहावेइ सदावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भा देवाणप्पिया ! तित्थ यर चिइगं जाव अणगारचिइंगं च खीरोदगेणं णिव्बावेह, तर्पण ते मेहकुमारा देवा तित्थयरचिइगंजाव णिवावें ति, तएणं से सके देविदे देवराया भगवओ तित्थयरस्स उवरिलं दाहिण सकहं गेण्हइ ईसाणे देविदे देवरोया उवरिलं वामं सकहं गेण्हइ, चमरे असुरिंदे असुरराया हिडिल्लं दाहिणं सकहं गेण्हइ, बली वइरोयणिदे वइरोयणराया हिट्ठिलं वामं सकहं गेण्हइ, अवसेसा भवणवइ जाव वेमाणिया देवा जहारिहं अवसेसाई, अंगमंगाई, केइ जिणभत्तीए केइ जीयमेयंति कटु केइ धम्मोत्ति कटु गेण्हंति सू० ॥५०॥ छाया-ततः खलु स शको देवेन्द्रो देवराजोऽग्निकुमारान् देवान् शब्दयति शब्दयित्वा एवमवदत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! तीर्थकरचितिकायां यावदनगारचितिकायामग्निकार्य विकुरुत, विकृत्य पतामाक्षप्तिकां प्रत्यर्पयत, ततः स्खलु तेऽग्निकुमारा देवा विमनसो निरानन्दा अश्रुपूर्णनयनास्तीर्थकरचितिकायां यावदनगारबितिकायां चाग्नि कायं विकुर्वन्ति, ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजो वायुकुमारान् देवान् शब्दयति शयित्वा एवमवदत् क्षिप्रमेव भो देवाणुप्रियाः ! तीर्थकरचितिकायां यावदनगारचितिकायां च वायुकुमारं विकुरुत विकृत्य अग्निकायमुज्ज्वलयत तीर्थकर शरीरकं गणधरशरीरकाणि अनगारशरीरकाणि च धमापयत, ततः खलु ते वाउकुमारा देवा विमनसो निरानन्दा अश्रुपूर्णनय. नास्तीर्थक रचितिकायां यावत् विकुर्वन्ति अग्निकायमुज्ज्वलयन्ति तीर्थकरशरोरकं यावदनगारशरीरकाणि च धमापयन्ति, ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजस्तान् बहून् भवनपति यावद् वैमानिकान् देवान् एवमवदत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! तीर्थकरचितिकायां यावदनगारचितिकायामगुरुतुरुष्क घृतमधु च कुम्भारशश्च भाराग्रशश्च संहरत, ततः खलु ते भवनपति यावत् तीर्थकर यावद् भाराग्रशश्च संहरन्ति, ततः खलु सशको देवेन्द्रो देवराजो मेघकुमारान् देवान् शब्दयति शब्दयित्वा एवमवदत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! तीर्थकरचितिकां यावदनगारचितिकां च क्षोरोदकेन निर्वापयत, ततः खलु ते Page #442 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४२८ जम्द्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र मेघकुमारा देवस्तीर्थकरचितिका यावन्निर्वापयन्ति, ततः खलु स देवेन्द्रो देवराजो भगवतस्तीर्थकरस्य उपरितनं दक्षिण सक्थि गृह्णन्ति, ईशानो देवेन्द्रो देवराजः उपरितनं वाम सक्थि गृह्णन्ति, चमरोऽसुरेन्द्रोऽसुरराजोऽधस्तनं दक्षिण सक्थि गृह्णन्ति, बली वैरोचनेन्द्रो वैरोचनराजेाऽधस्तनं वामं सक्थि गृह्णन्ति, अवशेषा भवनपति यावद् वैमानिका देवा यथार्हमवशेषाणि अङ्गाङ्गानि, केचिजिनभक्त्या केचिज्जोतमेतदिति कृत्वा केचिद् धर्म इति कृत्वा गृहन्ति ॥सू० ५०॥ टीका---'तएणं से सक्के' इत्यादि । ततः तदनन्तरं भगवदादिशरीराणां तत्तच्चितासु संस्थापनानन्तरम् खलु स:पूर्वोक्तः शक्रः 'देविंद: देवेन्द्रः 'देवराया' देवराजः 'अग्गिकुमारे' अग्निकुमारान् 'देवे' देवान् 'सदावेइ' शब्दयति 'सदावित्ता' शब्दयित्वा-आहूय ‘एवं' एवं-वक्ष्यमाणम् 'वयासी' अवदत् 'खिप्पामेव' क्षिप्रमेव-शीघ्रमेव 'भो देवाणुप्पिया !' भो देवानुप्रियाः ! हे महानुभावाः ! 'तित्थयरचिइगाए' तीर्थकरचितिकायाम् 'जाव' यावत्-यावत्पदेन-'गणहरचिइगाए' इति संग्राह्यम् तस्य 'गणधरचितिकायाम्' इति छाया, गणधरचितायामिति तदर्थः, 'अणगारचिइगाए' अनगारचितिकायाम् अनगारचितायाम् 'अगणिकायं' अग्निकायम-अग्निम् 'विउव्वह' विकुरुत-वैक्रियशक्त्योत्पादयत 'विउव्धित्ता विकृत्य चिता में भगवान् आदि के शरीरों को रखने के अनन्तर शक आदिकों ने जो काम किया उसे इस सूत्र द्वारा सूत्रकार प्रकट करते हैं --"तए णं से सक्के देविंदे देवराया अग्गिकुमारे" इत्यादि । टीकार्थ-"तएणं' भगवान् आदिनाथ आदि के शीरों को चिताओं में रखने के बाद "देविंदे" देवेन्द्र "दवराया" देवराज "सक्के" शकने "अग्गिकुमारे देवे" अग्निकुमार देवों को "सदावेइ" बलाया "सद्दावित्ता" बुलाकर "एवं वयासी" उन देवों से उसने ऐसा कहा-“भो देवाणुप्पिया" हे देवानुप्रियो ! आपलोग “तित्थगरचिइगाए" तीर्थकर की चिता में यावत् "गणहरचिइगाए" गणघरों की चिता में और “अणगारचिइगाए" अनगारों की चिता में "अगणिकायं विउव्वह" अग्निकाय को-अग्नि की-विकुर्वणा करो-विक्रियाशक्ति से अग्नि को उत्पन्न करो 'विउन्वित्ता' ચિતામાં ભગવાન આદિના શરીરને સ્થાપિત કરીને શક વગેરેએ જે કંઈ કર્યું તેને આ સૂત્ર વડે સૂત્રકાર પ્રકટ કરે છે. __ 'तएण से सक्के देविंदे देवराया अग्गिकुमारे' इत्यादि ॥सूत्र ५०॥ शहाथ-(तएण) सगवान विगेरेना शरीराने किता। ५२ भूया मा (देविदे) हेवेन्द्र (देवराया) हे१२।४ (सक्के) श (अग्गिकुमारे) AS भा२ वान (सदावेइ) सोसाव्या (सदावित्ता) मालावीन (एवं वयासी) ते वान त म प्रमाणे यु-(भो देवाणुप्पिया) हेवानुप्रियेो, तमे (तित्थगरचिइगाए) तीथ ४२नी कितामां यावत् 'गणहरचिइगाए गए धनी यिताम अने (अणगारचिइगाए) अनगारानी चितामा (अगणिकाय विउवह) भनिनायनी-मनिना ४ि२, विडिया शतिथी गनिने ५- ४२। (विउम्वित्ता) Page #443 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका.द्विवक्षस्कार सू.५०कलेवराणि चितोपरिस्थापनानन्तरिकशकादिकार्यान०४२९ वैक्रियशक्त्योत्पाद्य 'एयमाणत्तियं' एतामाज्ञप्तिकाम् इमामाज्ञां पालितां सतीम् ‘पच्चप्पिणह' प्रत्यर्पयत अस्माभिर्भवदाज्ञामग्निविकरणकार्य कृतमिति मदाज्ञां पूर्णां निवेदयत 'तएणं' ततः-तदनन्तरम् खलु अग्निकुमारान्प्रति शक्रस्याग्निकायधिकरणाज्ञानन्ताम् 'ते' ते शक्राज्ञप्ताः 'अग्गिकुमारा' अग्निकुमाराः 'देवा' देवाः 'विमणा' विमनसः विषण्णचित्ताः 'णिराणंदा' निरानन्दाः-आनन्दरहिताः दुःखिनः सन्तः अतएव 'अंमुपुण्णणयणा' अश्रुपूर्णनयना-बाष्पाकुलनेत्राः 'तित्थयरचिइगाए' तीर्थकरचितिकायाम् 'जाव' यावत्-यावत्पदेन-गणहरचिइगाए' इति संग्रहो बोध्यः, तस्य 'गणधरचितिकायाम्' इति छाया गणधरचितायामिति तदर्थः, 'अणगारचिइगाए य' अनगारचितिकायां च अगणिकायं' अग्निकायम्-अग्नि 'विउब्धति' विकुर्वन्ति, 'तएणं' तदनन्तरम् अग्निकुमार देवैः अग्निकायवितुर्वणानन्तरम् ‘से देविंदे देवराया' स: देवेन्द्रः देवराजः 'वाउ कुमारे देवे सदाबेइ' वाउकुमारदेवान् शब्दयति, आह्वयति 'सदाविता' आहूय ‘एवं वयासी' एवमवदत्'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया' क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः 'तित्ययरचिइगाए जाव अणगारचिइगाए' तीर्थकरचितिकायां यावत् अनगारचितिकायां 'याउकायं' वायुकायम् ‘विउवह' वैक्रियशक्ति से अग्नि को उत्पन्न करके 'एयमाणात्तयं" फिर इस मेरी आज्ञा की "यह पालित की जा चुकी है"-इस प्रकार से “पञ्चप्पिणह" हमे खबर दो "तरणं" इसके अनन्तर "ते अग्गिकुमारा देवा" उन अग्निकुमार देवों ने खेद-खिन्न चित्त होते हुए, आनन्द रहित चित्त होते हुए और अश्रुपूर्णनेत्र होते हुए तीर्थंकर की चिता में, यावत् गणधों की चिता में और "अणगारचिइगाए" शेष अनगारों की चिता में "अगणिकायं विउर्वति" अग्निकाय की विकुर्वणा शक्ति से उत्पत्ति को 'तएणं' अग्निकुमार देवोंने तीर्थंकरादि के शरीर में अग्नि काय को विकुर्वणा करने के बाद से देविंदे देवराया' वह देवेन्द्र देवराज ने 'वाउकुमारदेवे सदावेह' वायुकुमार देवों को बुलाया ‘सद्दावित्ता' बुलाकर 'एवं वयासी' उन वायु कुमार देवों को इस प्रकार कहा 'विप्पामेव भो देवाणुप्पिया' हे देवानुप्रिय शीतही 'तिस्थरचिइगाए जाव अण गारचिइगाए' वैठिय तथा नि उत्पन्न प्रशन (एयमाणत्तिय) पछी । भाश आज्ञानु अक्षरशः पालन थ य त्यारे माज्ञानु यथावत् ५सन थई आयुछे' से प्रमाणे (पच्चप्पिणह) अमन ५७२ मापा. (तएण) त्या२ मा (ते अग्गिकुमारा देवा) ते निभार वाय ખેદ ખિન્ન ચિત્તવાળા થઈને અર્થાત્ આનંદ વિહીન થઈને અને અશ્વપૂર્ણ નેત્રવાળા થઈ २ तायनी (यतामां यावत् गधनी (यतामा मन (अणगारचिइगाए) शेष मन. ॥शनी सिता भां (अगणिकायं विउव्वंति) मायनी विपु । तिथी पत्ति ४२१ 'तपणं' अग्निमा२ हवाय तीथ ना शरीरामां मनायनी विशतिथी उत्पत्तिावाद 'से देविदे देवराया त हेवेन्द्र १२२ 'वाउकुमारे देवे सहावेइ' पायुकुमार हेवाने मोसाव्य ''सदावित्ता' Riaraने 'एवं वयासी' मा प्रमाणे छु "खिप्पामेव भो देवाणुपिया' ७ आनुप्रियो मिथी "तित्थगरचिइगाए जाव अण गारचिइगए' ती ४२ नायितामा यावत् शेष अनगारानी यित्तामा पाउकायं' वायुडायने 'विउवह विवित Page #444 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र विकुरुत 'विउव्वित्ता' विकुर्व्य-उत्पाद्य 'अगणिकाय' अग्निम् 'उज्जालेह' उज्ज्वलयतप्रदीपयत प्रदीप्य 'तित्थगरसरीरगं' तीर्थकरशरीरं 'गणहरसरोरगाई गणधरशरीरकाणि 'अगगार सरोरगाई' अनगारशरीरकाणि च 'झामेह' ध्यापयत-तएणं शक्राज्ञा श्रवणानन्तरम् 'ते'ते-पूर्वोक्ताः 'वाउकुमारा' वायुकुमाराः'देवा' देवा 'विमणा'विमनसः विषण्ण हृदयाः 'णिराणंदा' निरानन्दाः आनन्दरहिताः दुःखाकुलाः अतएव 'अंसुपुण्णणयणा' अश्रुपूर्णनयना वाष्पाकुलनेत्राः 'तित्थयर चिइगाए' तीर्थकरचितिकायां जिनचितायाम् 'जाव' यावत्-यावत्पदेन-'गगहरचिइगाए अणगारचिइगाए य अग्गिकायं' इत्यस्य संग्रहः, तस्य च 'गणधरचितिकायाम् अनगारचितिकायाम्' चाग्निकायम् इतिच्छाया, गणिचितायाम् अनगारचितायाम् अग्निमिति तदर्थः 'विउव्यंति' विकुर्वन्ति वैक्रियशक्त्योत्पादयन्ति, तथा 'अग्गिकायं' अग्निकायम्-अग्निम् 'उज्जाले ति' उज्ज्वलयन्ति प्रदीपयन्ति प्रदीप्तेन चाग्निना 'तित्थयरसरीरगं' तीर्थकरशरीरकं 'जाव' यावत्-यावत्पदेन 'गणहरसरीरगाई' इत्यस्य संग्रहः, तस्य च 'गणधरशरोरकाणि' इतिच्छाया, गणधर कलेवराणीति तदर्थः, 'अणगारसरीरगाणि य' अनगारशरीरकाणि च 'झामेंति' ध्मापयन्तिसंयोजयन्ति 'तएणं' ततः तदनन्तरं खलु जिनादिशरीरेषु दहनसंयोजनानन्तरम् 'से' तीर्थकर की चिता में यावत् अनगार की चिता में 'वाउक्कायं' वायुकायको विकुव्वह' विकुर्वित करो 'विउव्वित्ता' वैक्रियशक्ति से उत्पन्न कर के 'अगणि कायं' अग्निकायको 'उज्जालेह' प्रदोप्त करो प्रदीप्त करके 'तित्थगरसरीरगं' तीर्थकरके सरीर को 'गणहरसरीरगाई' गणधरों के शरीर को एवं 'अणगार सरीरगाई' शेष अनगार के शरीर को 'झामेह' अग्निसंयुक्त करो "तएणं ते वा उ कुमारा देवा विमणा निराणंदा असुपुण्णणयणा' इसके बाद उन वायुकुमार देवों ने विमनस्क एवं आनन्द रहित होकर तथा नेत्रों में जिनके अश्रु भरे हुए हैं ऐसे होकर 'तित्थगरचिइगाए' जिनेन्द्रदेव को चिता में “जाव" यावत्-गणधरों को चिता में एवं अनगारों की चिता में अग्निकाय की विकुर्वणा को,तथा “अग्गिकायं उज्जालेंति" उसे प्रदीप्त किया, प्रदीप्त हुई उस अग्नि के साथ फिर उन्होंने “तित्थगरसरीरगं" तीर्थंकर के शरीर को “जाव" यावत्--गणधरों के ४३। 'विउवित्ता' यशस्तिथा वायुयन नशन 'अगणिकायं' -नयन 'उज्जा लेह' प्रहीत ४२ मे प्रमाणे मनयन प्रहात शन 'तित्थगरसरोरगं' ती १२॥ शरीरने यावत् 'गणहरसरीरगाई' रोना शरीरने मार 'अणगारसरीगाई'शेषयनआशना शरीरन 'झामेह' भनियुत४२। (तपण ते वाउकुमारा देवा विणा णिराणदा अंसुपुण्णणयणा) त्या२ मा ते वायुमार तुवामे (भन भरा मान विहान ४२ तम अभीना नेत्रोथी (तित्थगरबिइगाए) मिनेन्द्रनी तिमi (जाव) यावत् १५५शनी (यतामा तमस मनाशी यितामा मनियनी विए। ४२. तेम (अग्गिकायं उज्जालेंति) तर प्रहीत या. प्रदीप थये ते जिननी साथे तेभर (तित्थगरसरीरगं) तीर्थ ४२न। शरीरने यावत् गधराना शरीराने (अणगार सरोरगाणि) मनगारेशना शरीराने Page #445 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीकाद्विवक्षस्कारसू.५०कलेवराणिधितोपरिस्थापनानन्तरिकशक्रादिकार्यनिरूपणम्४३१ सः पूर्वोक्तः 'सक्के शक्रः 'देविदे' देवेन्द्रः 'देवराया' देवराजः 'ते' तान्-पूर्वोक्तान् 'बहवे' बहून् अनेकान् ‘भवणवइ जाव वेमाणिया' भवनपति यावद्वैमानिकान् भवनपतिज्योतिष्कव्यन्तरवैमानिकान् ‘देवे' देवान् ‘एवं' एवं-वक्ष्यमाणं 'वयासी' अवदत् 'खिप्पामेव' क्षिप्रमेव-शीघ्रमेव भो देवाणुप्पिया !' भो देवानुप्रियाः ! हे महानुभावाः 'तित्थगरचिइगाए' तीर्थकरचितिकायां जिनचितायाम् 'जाव' यावत्-यावत्पदेन 'गणहरचिइगाए', इति संग्राह्यम् , तस्य च 'गणधरचितिकायामितिच्छाया, गणधरचितायामिति तदर्थः, 'अणगारचिइगाए' अनगारचितिकायाम् अनगारचितायाम् अगुरुतुरुक्कघयमधुं च' अगुरुतुरुष्कघृतमधु च तत्रागुरु-गुरु, तुरुष्क-यावनधूपविशेष: 'लोहवान इति ख्यातः, घृतं-प्रसिद्धं मधु चैतेषां समाहारद्वन्द्वे कृते तथा अगुरुयावनधूपघृतमधूनि च 'कुंभग्गसो' कुम्भारश:-अनेकघटप्रमाणमगुर्वादि 'य' च-पुनः 'भारग्गसो' 'भाराग्रशः अनेकभारप्रमाणं 'य' च-'साहरह' आनयत 'तएणं' ततः तदनन्तरम् खलु अनेक कुम्भभारप्रमाणागुर्वाद्यानयनाज्ञानन्तरम् , 'ते' ते-आज्ञप्ताः 'भवणवइ जाव' भवनपति यावद्-भवनपति ज्योतिष्कव्यन्तरवैमानिका देवाः 'तित्थयर जाव भारग्गसो' तीर्थकर यावद् भाराग्रशः तीर्थकरेत्यारभ्य 'भाराग्रशश्च' इति पर्यन्तपदानां संग्रहोऽत्र वोध्यः, तथाहि-तीर्थकरचिशरोर को "अणगारसरोरगाई" अनागारों के शरीर को "झामेंति" संयुक्त किया 'तएणं' इस तरह अग्नि के साथ जिनादिकों के शरीर जब संयुक्त हो चुके तब ‘से सक्के' उस शक्रने "देविंदे देवराया' जो देवों का इन्द्र और उनका राजा था "बहवे भवणवइ जाव वेमाणिए देवे एवं वयासी' उन सब भवनपति से लेकर वैमानिक तक के देवों से-इस प्रकार कहा "खिप्पामेव भो देवाणुप्पिा ' हे देवानुप्रियो ! आप लोग बहुत हो जल्दो से “तित्थगरचिइगाए जाव गणहरचिइगाए अगारविहगाए' तीर्थकर की चिता में यावत् गणधरों की चिता में एवं शेष अनगारों की चिता में 'अगुरु तुरुक्क घयमधु च कुंभग्गसो य भारग्गसो य साहरह' अगुरु, तुरुष्क, घृत और मधुको अनेक कुम्भप्रमाण और अनेक भार प्रमाण में डालने के लिये ले आओ "तएणं ते भवणवइ जाव नित्थगर जाव भारग्गसो" तब वे भवनपति से लेकर वैमानिक तक के समस्त देवगण तीर्थंकर को चिता में, गणधरों की चिता में और शेष अनगारों की चिता में (झामेति) सन संयुश्त ४ो. (तपणं) प्रमाणे अनि नी सा2 Cralहिना शरी। न्यारे संयुक्त यां यारे (से सक्के) ते श (देविंदे देवराया) रे देवानन्द्र भने तेना २ ते. (बहवे भवणवई जाव वेमाणिए देवे एवं वयासो) तेथे ससवनपतिमोथी मां वैमानिः सुचाना हेवा मा प्रमाणे तु (खिप्पामेव भो देवानुप्पिया) 3 हे॥नुप्रिया. तमे ४४५ शlu (तित्थगर चिइगाए जाव गणहरचिईगाए अणगार જો તીર્થકરની ચિતામાં યાવત ગણધરની ચિતામાં તેમજ શેષ અનગારની ચિતામાં (अगुरु तुरुक्कययमधु च कुप्रग्गलो य भारगिसों य साहरह) मगर, तु३०४. धृत भने मधुन भने म प्रमाणु अने अने मा२ प्रमामा मामाटे सावा. (त एणं ते भवणवइ जाव तित्थगाः जाव भारग्गसो) त्यारे ते मनपतिथी महाक मानि Page #446 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४३२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र तिकायां गणधरचितिकायाम् अनगारचितिकायाम् अगुरुतुरुष्कघृतमधु च कुम्भायशश्च भाराग्रशश्चेति पर्यवसितम्, 'साहरंति' संहरन्ति - आनयन्ति 'तरणं' ततः - तदनन्तरम् खलु कुम्भभाराग्रप्रमाणा गुर्वादिसंहरणानन्तरम् 'से' सः - पूर्वोक्तः 'सक्के' शक्रः 'देविंदे' देवेन्द्रः 'देवराया' देवराजः 'मेहकुमारे' मेघकुमारान् 'देवे' देवान् 'सदावेइ' शब्दयति- आमन्त्रयति 'सावित्ता' शब्दयित्वा आमन्त्र्य ' एवं ' एवं वक्ष्यमाणम् 'वयासी' अवदत् 'खिप्पामेव' क्षिप्रमेव 'भो देवाणुपिया !" भो देवानुप्रियाः । हे महानुभावाः ! ' तित्थयर चिइगं' तीर्थकरचितिकाम् 'जाव' यावद् - यावत्पदेन 'गणहर चिइगं' इति संग्राह्यम् तस्य च गणधरचितिकाम्' इतिच्छाया, गणधरचितामिति तदर्थः 'अणगारचिड्गं च' अनगारचितिकां च अनगारचितां च 'खोरोदगेणं' क्षीरोदकेन - क्षीरसमुद्रत आनीतजलेन 'णिव्यावेह' निवापयत - विध्यापयत 'तरणं' ततः - तदनन्तरं खलु क्षीरोदकेन जिनादि चिता निर्वापणाज्ञानन्तरम्, 'ते' ते - आज्ञप्ताः 'मेहकुमारा' मेघकुमाराः 'देवा' देवा: 'तित्थयरfari' तीर्थकरचितिकां 'जाव' यावत् - यावत्पदेन 'गणहरचिग अणगारचिह्नगं य' इत्यस्य संग्रहः, तस्य च 'गणधर चिति कामनगार चितिकांच' इतिच्छाया, 'गणधरचितमनगारचितां चेति तदर्थः 'णिव्वावेति' निर्वापयन्ति विध्यापयन्ति 'तरणं' ततः - तदनन्तरं खलु क्षीरोदकेन जिनादि चिता निर्वापणानन्तरम् ' से' सः - पूर्वोक्तः 'देविदे' देवेन्द्रः डालने के लिये अनेक कुंभ प्रमाण और अनेक भार प्रमाण अगुरु, तुरुष्क, घृन और मधु ले आए "तणं क् विंदे देवराया मेहकुमारे देवे सदावेइ" इसके बाद देवेन्द्र देवराज उस शक मेघकुमार देवों को बुलाया "सदावित्ता एवं वयासी" और बुलाकर उनसे ऐसा कहा - “विपामेव भो देवा ! तित्थगरचिइगे जाव अणगार चिड्गं च" हे देवानुप्रियो ! आप लोग शीघ्र हो तीर्थकर की चिता को यावत् गणधरों की चिता को एवं शेष अनगारों की चिता को 'खीरोदगेणं णिव्वावेह' क्षीरसागर से लाये हुए जल से बुझा दों "तएणं ते मेहकुमारा देवा तित्थगरचिइगं जाव गणहरचिइगं अणगारचिइगं य णिव्वावेंति" तब उन मेघकुमार देवों ने तीर्थकर की चिताको यावत् गणधरो की चिताको अनगारों की चिता को क्षीरसागर से लाये સુધીના સમસ્ત દેવગણેાએ તી કરની ચિતામાં, ગણધરોની ચિતામાં અને શેષ અનગારાની ચિતામાં નાખવામાટે અનેક કુંભ પ્રમાણ અને અનેક ભાર પ્રમાણુ અગુરુ. તુરૂષ્ક, ધૃત अने मधु सर्प खाव्या. (तप णं सक्के देविदे देवराया मेहकुमारे देवे सहावेइ) त्यार माह देवेन्द्र देवरा ते शडे मेधभर देवाने मोलाच्या "सदावित्ता एवं वयासी” भने मेलावीने तेमने या प्रमाणे छु "विपामेव भो देवाणुपिया ! तित्थगरचिइगे जाव अणगार चिग च" हे हेवानुप्रियो ! खाय सर्वे शीघ्र तीर्थ ४२ नीयिता ने यावत् गणुधरौनी यिताने ते शेष अनगारानी यिताने "खीरोदगेणं णिव्त्रावेद" क्षीरसागरमाथी स यावेला सथी शांत रे। "तपणं ते मेहकुमारा देवा तित्थगरचिइगं जाव गणहरचिगं अणगारचिग य णिव्वावेंति" त्यारे ते भेघकुमार हेवा तीर्थ उरनी यिताने यावत् श ધરાની ચિતાને અને અનગારોની ચિતાને ક્ષીર સાગર માંથી લઈ આવેલા પાણી વડે શાં Page #447 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीकाद्वि०वक्षस्कारसू.५० कलेवराणिचितोपरिस्थापनानन्तरिकशक्रादिकार्यम् ४३३ 'देवराया' देवराजः 'भागवो' भगवता 'तित्थयरस्स' तीर्थकरस्य 'उवरिल्लं' उपरितनं 'दाहीणं' दक्षिणं 'सकहं सक्थि-ऊरुम् दक्षिणभागस्थोरुसम्बन्ध्यस्थि 'गेण्हइ' गृह्णाति तथा 'ईसाणे' ईशानः 'देविदे' देवेन्द्रः 'देवराया' देवराजः 'उवरिल्लं' उपरितनं 'वाम' वामं 'सकह' सक्थि-उरुम् वामभागस्थोरुसम्बन्ध्यस्थि 'गेण्हइ' गृह्णाति तथा 'चमरे' चमरः 'असुरिंदे' असुरेन्द्रः 'असुरराया' अमुरराजः 'हिडिल्लं' अधस्तनं 'दाहिणं' दक्षिणं 'सकह' सक्थि-ऊरु दक्षिणभागस्थोरुसम्बन्ध्यस्थि 'गेण्हइ' गृह्णाति 'बली' बली 'वइरोयर्णिदे' वैरोचनेन्द्रः 'वइरोयगराया' वैरोचनराज: 'हिटिल्लं' अधस्तनं 'सकह' सक्थिऊरुम् अधस्तनभागस्थोरुसम्बन्ध्यस्थि 'गेण्हइ' गृहाति-चिनोति 'अवसेसा'अवशेष । अवशिष्टाः शक्रायतिरिक्ताः 'भवणवइ जाव वेमाणिया' भवनपति यावद्वैमानिकाःभवनपतिज्योतिष्कव्यन्तरवैमानिकाः 'देवा' देवाः 'जहारिहं' यथाई यथायोग्यम् यथा स्यात्तथा 'अवसेसाई' अवशेषाणि-अतिरिक्तानि शक्रादि गृहीतातिरिक्तानि 'अंगमंगाई हुए जल से बुझा दिया "तएण से देविंदे देवराया भगवओ तित्थगरस्स उवरिल्लं दाहिणं सकहं गेण्हह" जब क्षीरसागर के जल से वे तीर्थकर आदि का चिताएँ अच्छी तरह बुझ गई तो फिर उस देवेन्द्र देवराज ने भगवान् तीर्थ कर की उपरितन दक्षिण हड्डो को-दक्षिण भागस्थ उरु सम्बन्धि हड्डी को उठाया 'ईसाणे देविंदे देवराया उवरिल्लं वामं सकहं गेण्हइ' देवेन्द्र देवराज ईशान इन्द्र ने उपरितन वामभाग के उरु की हड्डी को उठाया तथा "चमरे-असुरिंदे असुरराया हिदिल्लं दाहिणं सकहं गेण्हई' असुरेन्द्र असुरराज चमर ने अधस्तन दक्षिण हड्डी कोदक्षिणभागस्थ उरु संबन्धी अस्थि को उठाया 'बली वइरोयणिंदे वइरोवणराया हिंदिल्लसकहं गेण्हइ' वैरोचनेन्द्र वैरोचनराज बलि ने अधस्तन हडूडी को-अधस्तन भागस्थ उरु सम्बन्धी अस्थि को उठाया “अवसेसा' बाकीके-शक्रादिकों से अतिरिक्त भवनपति से लेकर वैमानिक तक के देवों ने “जहारिहं भवसेसाई अगमंगाई' यथायोग्य अवशिष्ट अंगो की हड्डियों को उठा ४. "तएणं से देविदे देवराया भगवओ तित्थगरस्स उवरिल्लं दाहिणं सकहं गेण्हह" જ્યારે ક્ષીરસાગરના પાણીથી તે તીર્થંકર વગેરેની ચિતાઓ સંપૂર્ણ રીતે ઓલવાઈ ગઈ ત્યાર બાદ તે દેવેન્દ્ર દેવરાજે ભગવાન તીર્થંકરની ઉપરિતન દક્ષિણ અસ્થિને-દક્ષિણ ભાગ स्थत समधि मस्थिने सीधी "ईसाणे देविदे देवराया उवरिल्ल वाम सकहं गेण्हा" देवेन्द्रदेव शान छन्द्र परितन वामनानी स्थित सीधी तमा "चमरे अस. रिंदे असुरराया हिठिल्लं दाहिण सकह गेण्हइ" मसुरेन्द्र असुर यमरे अस्तन दक्षिण अ-स्थिन-क्षिण भागस्थ तत्स मधी अस्थिने-साधी. "बली वरोअणिदेवररोअणराया हिठिल्लं सकहं गेण्हइ" रोयनेन्द्र वैशयन २०११ मलिये मरतन अस्थि-मस्तन मागस्य तत्समधी अस्थिन सीधी "अवसेसा" शेष- शिवायना-भवनपतिथी भांडन वैमानि अधीना हेवाये "जहारिहं अवसेसाई अंगमंगाई" યથાયોગ્ય અવશિષ્ટ અંગેના અસ્થિઓને ઉઠાવ્યા શક્રાદકો દ્વારા ગૃહીત અસ્થિ સિવા Page #448 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४३४ जम्बूद्वोपप्रज्ञप्तिसूत्रे अङ्गाङ्गानि प्रत्येकमङ्गानि सर्वाङ्गास्थोनि गृह्णाति तत्र 'केइ' केचित् देवाः 'जिणभत्तीए' जिनभक्त्या-जिनानुरागेन गृह्णाति 'केइ केचित् देवाः 'जीयमेयं' जीतमेतत्-जीताख्यः कल्पोऽयम् 'इतिक?' इति कृत्वा इति बुध्वा गृह्णाति 'केइ' केचित् ‘धम्मोत्ति कटु' अस्माकमयं धर्म इति कृत्वा इति वुध्वा 'गेहंति' गृह्णाति ॥सू०५०॥ अथास्थिसंचयनविध्यनन्तरजातं विधिमाह तए णं से सके देविदे देवराया बहवे भवणवइ जाव वेमाणिए देवे जहारिहं एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया. सव्वरयणामए महइमहालए तओ चेइयथूभे करेह, एगं भगवओ तित्थयरस्स चिइगाए एगं गणहरचिइगाए एगं अवसेसाणं अणगाराणं चिइगाए, तएणं ते बहवे जाव करें ति, तएणं ते भवणवइ जाव वेमाणिया देवा तित्थयरस्स परिणिव्वाणमहिमं करें ति, करित्ता जेणेव नंदीसखरे दीवे तेणेव उवाच्छंति, तएणं से सके देविंदे देवराया पुरच्छिमिल्ले अंजणगपब्बए अट्ठाहियं महामहिमं करेइ, तएणं सक्कस्स देविंदस्स देवरायस्स चत्तारि लोगपाला चउसु दहिमुहगपवएसु अट्ठाहियं महामहिमं करेंति, ईसाणे देविंदे देवरायो उत्तरिल्ले अंजणगे अट्ठाहियं महामहिमं करें ति चमरो य दाहिणिल्ले अंजणगे तस्स लोगपाला दहिमुहगपब्बएसु बली पच्चथिमिल्ले अंजणगे तस्स लोगपाला दहिमुहगेसु, तएणं ते बहवे भवणवइवाणमंतर जाव अट्ठाहियाओ महा-महिमाओ करेति करित्ता जेणेव साइं २ विमाणाई जेणेव साई २ भवणाई जेणेव साओ २ सभाओ सुहम्माओ जेणेव सगा २ माणवेगो चेइयखंभा तेणेव लिया, इनमें "केइ" कितनेक देवोंने 'जिणभत्तीए' जिनेन्द्र की भक्ति से 'केइ जीयमेय इति. कटु' कितनेक देवों ने यह जीत नामका कल्प है इस अभिप्राय से "केइ धम्मो ति कट्ट गेण्हंति' कितनेक देवों ने हमारा यह धर्म है इस ख्याल से उन हड्डियो को उठाया ॥सू०५०॥ यनी अस्थियान-साधी. समांथा (केइ) मा वामे "जिणभत्तीए" निन्दनी मतिया "केइ जोतमेयं इति कटु" ais वाले भातनाम ४६५ छ मा भनिभायथा कह धम्मोत्ति कटूटु गेण्हंति" ४ तुवाच्य सभारी मा २४ छे, यासपी मास्थએને ઉઠાવ્યા. સૂત્ર, ૫ Page #449 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्विश्वक्षस्कार सू.५१ अस्थिसंचयनविध्यनन्तरिकविधिनिरूपणम् ४३५ उवागच्छंति उवागच्छित्ता वइरामएसु गोलबट्टसमुग्गएसु जिणसकहाओ पक्खिवंति अग्गेहिं वरेहिं मल्लेहि य अच्चेति अच्चित्ता विउलाई भोगभोगाई भुंजमाणा विहरंति सू० ५१ छाया-ततः स्खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजः बहून् भवनपति यावद् वैमानिकान् देवान् यथार्हमेवमवदत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! सर्वरत्नमयान् महतिमहतस्त्रीन् चैत्यस्तूपान् कुरुत तत्र एकं भगवतस्तीर्थंकरस्य चितिकायाम्, एक गणधरचितिकायाम् एकमवशेषाणामनगाराणाम् ततः खलु ते बहवो यावत् कुर्वन्ति, ततः खलु ते बहवो भवनपति यावद् वैमानिका देवास्तीर्थकरस्य परिनिर्वाणमहिमानं कुर्वन्ति, कृत्वा यत्रैव नन्दीश्वरवरो द्वीपः तत्रैव उपागच्छन्ति, ततः खलु स शक्रो देवेन्द्रो देवराजः पौरस्त्येऽञ्जनकपर्वते अष्टाह्निकं महामहिमानं कुर्वन्ति, ततः खलु शक्रस्य देवेन्द्रस्य देवराजस्य चत्वारो लोकपालाः चतुर्यु दधिमुखकपर्वतेषु अष्टालिकं महामहिमानं कुर्वन्ति, ईशानो देवेन्द्रो देवराजः औत्तराहेऽञ्जनकेऽष्टाह्निकं तस्य लोकपालाश्चतुर्यु दधिमुखकेषु अष्टाह्निकं चमरश्च दाक्षिणात्येऽञ्जनके तस्य लोकपाला दधिमुखकपर्वतेषु, वलिः पश्चिमेऽञ्जनके तस्य लोकपाला दधिमुखकेषु, ततः खलु ते बहवो भवनपतिव्यन्तर यावत् अष्टाह्निकान् महामहिम्नः कुर्वन्ति कृत्वा यत्रैव स्वानि २ विमानानि यत्रैव स्वानि २ भवनानि यत्रैव स्वाः २ सभाः सुधर्माः यत्रैव स्वकाः २ माणवकाः चैत्यस्तम्भाः तत्रैव उपागच्छन्ति उपागत्य वज्रमयेषु गोलवृत्तसमुद्केषु जिनसक्थीनि प्रक्षिपन्ति, प्रक्षिप्य अग्यवरैर्माल्यैश्च गन्धैश्चाचन्ति अर्चित्वा विपुलान् भोगभोगान् भुजाना विहरन्ति । सू० ५१॥ टीका--'तए णं से सक्के' इत्यादि । ततः तदनन्तरं-जिनादि सक्थिग्रहणानन्तरम् खलु सः-पूर्वोक्तः शक्रः 'देविंदे' देवेन्द्रः 'देवराया' देवराजः 'बहवे' हुन्-अनेकान् 'भवणवइ जाव वेमाणिए' भवनपति यावद्वैमानिकान् भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्क इस प्रकार से जब वे चतुनिकाय के देव हड्डियों का चयन कर चुके तब क्या हुआइस बात को अब सूत्रकार प्रकट करते हैं---"तएणं से सक्के देविंदे देवराया बहवे भव. णवई' इत्यादि। टोकार्थ-'तएणं' हड्डियों के चयन हो चुकने के बाद 'सक्के देविंदे देवराया' देवन्द्र देवराज शक ने 'बहवे भवणवइ जाव वेमाणिए देवे जहारिहं एवं वयासी' उन समस्त भवनपति से लेकर આ પ્રમાણે જ્યારે તે ચતુનિકાયના દેવેએ અસ્થિઓનું ચયન કરી લીધું ત્યાર બાદ શું થયું. આ વાતને હવે સૂત્રકાર પ્રકટ કરે છે– 'त एण' से सक्के देविदे देवराया बहवे भवणवई' इत्यादि, सूत्र ॥५१॥ शाथ-"त एण" अस्थियाना ययन मा "सक्के" देविदे देवराया" हेवेन्द्र १२ श "बहवे भवणवई जाव वेमाणिए देवे जहारिहं एवं वयासो" त समस्त भवनपति Page #450 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र वैमानिकान् ‘देवे' देवान् 'जहारिहं' यथाई यथायोग्यम् ‘एवं' एवम्-वक्ष्यमाणम् 'वयासी' अवदत्-अत्रवीत् 'भो देवाणुप्पिया' भो देवानुप्रियाः हे महानुभावाः ! 'सव्वरयणामए' सर्वरत्नमयान् सर्वात्मना रत्नमयान् 'महइमहालए' महातिमहतःअतिविस्तीर्णान् (तो) त्रीन् (चेइअथूभे) चेत्यस्तूपान् चैत्याः चित्तानन्दकास्तूपा चैत्यस्तूपास्तान् (करेह) कुरुत सम्पादयत चितात्रयभूमिष्विति शेषः तत्र (एग) एकं चैत्यस्तुपम् (भगवओ) भगवतः (तित्थगरस्स) तीर्थकरस्य (चिइगाए) चितिकायां चिताभूमौ कुरुत (एगं) एकं चैत्यस्तुपम् (गणहरचिइगाए) गणधरचितिकायां गणिचिताभूमौ कुरुत (एग) एकं तदन्यं तृतीयं चैत्यस्तूपम् (अवसेसाणं) अवशेषाणाम् अवशिष्टानाम् (अणगाराणं) अनगाराणां साधूनां (चिइगाए) चितिकायां चि. ताभूमौ कुरुत, (तए) ततः तदनन्तरम्-चैत्यस्तूपत्रयकरणाज्ञानन्तरम् (ण) खलु (ते) ते आज्ञप्ताः (बहवे) बहवः अनेके (जाव) यावत् यावत्पदेन "भवनपतिव्यन्तरज्यो तिष्कवैमानिकाः सर्वरत्नमय,न महातिमहतस्रीन चैत्यस्तपान्" इति संग्राह्यम् (करेंति) कुर्वन्ति सम्पादयन्ति (तए) ततः तदनन्तरम् चैत्यस्तूपत्रयकरणानन्तरम् (णं) वैमानिक तक के देवों से यथायोग्य रूप से इस प्रकार कहा-'भो देवाणुप्पिया ! सव्वरयणामए महइ महालए तओ चेइयथूभे करेह' हे देवानुप्रियो ! तुम लोग समस्त रत्नों के बने हुएसर्वात्मना-रत्नमय ऐसे तोन चैत्य स्तूपों की-चित्त को आनन्द उपजाने वाले स्तूपों की चिता त्रय भूमियों में रचना करो 'एग भगवओ तित्थगरस्स चिइगाए एगं गणहरचिरगाए एगं अव. सेसाणं अणगाराणं चिइगाए' इनमें एक चैत्य स्तुप, तीर्थ कर भगवान् की चिता में, एक गणधरों की चिता में, और एक अवशेष अनगारों की चिता में 'तएण-ते बहवे जाव करेंति' इसके बाद उन भवनपति से लेकर वैमानिक तक के देवों ने जहाँ जहां चैत्य स्तूप बनाने को कहा गया था वहां वहां उन तीन सर्व रत्नमय चैत्य स्तूपों की रचना कर दी 'तएणं ते बहवे भवणवइ नाव वेमाणिया देवा तित्थगरस्स परिणिबाणमहिमं' इस के बाद उन समस्त भवनपति - - साथी भांडी वैमानिसुधीना हेवाने यथायोग्य ३५मा याप्रमाणे यु-"भो देवाणुप्पिया! सम्वरयणामए मैंहइमहालए तओ चेइअथूमे करेह" हेपानुप्रिया! तमे सवरत्नનિર્મિત એટલે કે સર્વાતમના રનમય એવા ત્રણ ચેત્ય સ્તૂપની-ચિત્તને આનંદ આપે तवा स्तूयोनी-(यतात्रय भूमि५२ २यना ४२। “एगं भगवो तित्थगरस्स बिगाए, एनं गणहर चिइगाए पगं अवसेसाणं अणगाराणं चिरगाए" मेमा ४ चैत्यस्तू५ तीर्थ ४२ भगवान ની ચિતામાં એક ગણધરોની ચિતામાં અને એક અવશેષ અનગારાની ચિતા માં તૈયાર ४२. 'तएणं ते बहवे जाव करें ति' त्या२ पाहते मनपतिथी महान वैमानि सुधान। દેવાને જ્યાં જ્યાં ચૈત્ય સ્તૂપ તૈયાર કરવા માટે કહેવામાં આવ્યું હતું, ત્યાં ત્યાં સર્વ રત્ન भय र शैत्य स्तूपानी स्यना ४री. 'त एणं ते बहवे भवणवई जाव वेमाणिया देवा तित्थ Page #451 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका द्वि. वक्षस्कारः सू.५१ अस्थिसंचयनविध्यनन्तरिकविधिनिरूपणम् ४३७ खलु (ते) ते (बहवे) बहवः अनेके (भवणवइ जाव वेमाणिआ) भवनपति यावद्वैमानिकाः (भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकाः (देवा) देवाः (तित्थगरस्स) तीर्थकरस्य जिमस्य (परिणिव्वाणमहिम) परिनिर्वाणमहिमानं मोक्षगमनोत्सव (करेंति) कुर्वन्ति (करित्ता) कृत्वा (जेणेव) यत्रैव मूले सप्तम्यर्थे तृतीया प्राकृतत्वजन्मा बोध्या (नंदीसरवरे) नन्दीश्वरवरः तदाख्यः (दीवे) द्वीपः (तेणेव) तत्रैव अत्रापि मूले प्राकृतत्वादेव सप्तम्यर्थे तृतीया (उवागच्छति) उपागच्छन्ति (तए) ततः तदन्तरं भवनपत्यादीनां नन्दीश्वरद्वीपोपगमनानन्तरम् (ण) खलु (से) सः पूर्वोक्तः (सक्के) शक्रः (देविदे) देवेन्द्रः (देवराया) देवराजः (पुरच्छिमिल्ले) पोरस्त्य-पूर्वदिग्भवे (अंजणगपव्वए) अजनकपर्वते (अट्ठाहि) अष्टाह्निकम् अष्टाभिर्दिनैः सम्पाद्यम् (महामहिम) महामहिमानं महोत्सवं (काति) कुर्वन्ति सम्पादयन्ति (तए) ततः शक्रस्याष्टाहिक भगवन्निणि महिमकरणानन्तरम् (f) खलु (सहस्स) शक्रस्य (देविंदस्स) दवेन्द्रस्य (देवरायस्स) देवराजस्य सम्बन्धिनः (चत्तारि) चत्वारः (लोगपाला) लोकपालाः (चउसु) चतुषु (दहिमुहगपव्यएम) दधिमुखकपर्वतेषु (अट्ठाहियं) अष्टाह्निकं (महामहिम) महामहिमानं (काति) कुर्वन्ति (ईसाणे) ईशानः (देविंदे) देवेन्द्रः (देवराया) देवराजः से लेकर वैमानिक तक के चतुर्विध निकाय के देवों ने तीर्थकर भगवान् के निर्वाण कल्याण की महिमा मोक्ष गमन का उत्सव किया "करित्ता जेणेव नन्दो सरवरे दीवे तेणेव उवागच्छन्ति' मोक्षगमन का उत्सव करने के बाद वे चतुर्विध निकाय के देव फिर जहां परे नन्दीश्वर नामका द्वोप था वहां पर गये "तए णं सक्के देविंदे देवराया पुरच्छिमिल्ले अंजणगपवए-अद्वाहियं महामहिमं करेति' वहां जाकर देवेन्द्र देवराज शक ने पूर्व दिशा में स्थित अंजनक पर्वत पर अष्टाह्निका महोत्सव-जो कि आठ दिनों तक लगातार होता रहता है-किया "तएणं सक्कस्स देविदस्स देवरायस्स चत्तारि लोगपाला चउसु दहिमुहगपव्वएसु अढाहियं महामहिम करें ति" इसके बाद देवेन्द्र देवराज शक्र के चार लोकपालों ने चार दधिमुख पर्वतों पर अष्टान्हिका महोत्सव किया "ईसाणे देविंदे देवराया उत्तरिल्ले अंजणगे अट्टाहियं" देवेन्द्र देवराज गरस्स परिणिव्वाणमहिम करेइ' त्या२ मा समस्त भवनपतिथी भांडीन वैमानि भी ના ચતુવિધ નિકાયના દેએ તીર્થકર ભગવાનના નિર્વાણ કલ્યાણની મહિમાની–મોક્ષગમनसनी मायन। २. 'करित्ता जेणेव नंदीसरवरे दीवे तेणेव उवागच्छति' मोक्ष ગમનના ઉત્સવ બાદ તે ચતુર્વિધ નિકાયના દેવે જ્યાં નંદીશ્વર નામે દ્વીપ હતો ત્યાં ગયા 'त एणं सक्के देविदे देवराया पुरच्छिमिल्ले अंजणगपचर अट्टाहि महामहिमं करेंति ત્યાં જઈને દેવેન્દ્ર દેવરાજ શક પૂર્વ દિશામાં સ્થિત અંજનક પર્વત પર અષ્ટાંબ્રિકા એટલે , माहिस सुधी तार पाते। २९ छे-ते भत्सनी यात ४0 'त पण सक्कस्स देविंदस्स देवरायस्स चत्तारि लोगपाला चउसु दहिमुहगपव्वपसु अठ्ठाहिरं महामहिम करेंति' त्यार माह हेवेन्द्र १२।०४ शनायारा यार हथिy५ ५ त५२ माहिर Page #452 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४३८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे (उत्तरिल्ले) औत्तराहे उत्तरदिग्भवे (अंजणगे) अञ्जनके अजननामकपर्वते (अट्ठाहियं) अष्टाह्निकं महिमानं करोति (तस्स) तस्येशानस्य देवेन्द्रस्य देवराजस्य सम्बिन्धिनः (लोगपाला) लोकपालाः (चउसु) चतुर्यु (दहिमुहगेसु) दधिमुखकेषु दधिमुखपर्वतेषु (अट्ठाहियं) अष्टाह्निकं महामहिमानं कुर्वन्ति (चमरो अ) चमरश्वासुरेन्द्रोसुरराजः (दाहिणिल्ले) दाक्षिणात्ये दक्षिणदिग्भवे (अंजणगे) अन्जनके अञ्जनपर्वते अष्टाह्निकं महामहिमानं करोति (तस्स) तस्य चमरस्यासुरेन्द्रस्यासुरराजस्य सम्बन्धिनः (लोगपाला) लोकपालाः (दहिमुहगपबएम) दधिमुखकपर्वतेषु अष्टाह्निकं महामहिमानं कुर्वन्ति (बली)बलि: वैरोचनेन्द्रो वैरोचनराजः (पच्चथिमिल्ले) पश्चिमे (अंजणगे) अञ्जनके अजनपर्वते अष्टाह्निकं महामहिमानं करोति (तस्स) तस्य बलेः सम्बन्धिनः (लोगपाला) लोकपालाः (दहिमुहगेसु) दधिमुखकेषु दधिमुखपर्वतेषु अष्टाह्निकं महामहिमानं कुर्वन्ति (तए) ततः -तदन्तरं शनादिबलिपर्यन्तेन्द्राणामष्टाह्निक महामहिमकरणानन्तरम् (णं) खलु (ते) ते पूर्वोक्ताः (बहवे) बहव अनेके (भवणवइवाणमंतर जाव) भवनपति व्यन्तर यावत् भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकाः (अट्टाहिआओ) अष्टाह्निकान् (महामहिमाओ) महामहिमानः, मूले प्राकृतत्वात्स्त्रीत्वम् (करेंति) कुर्वशान ने उत्तरदिशा के अञ्जन नाम के पर्वत पर अष्टान्हिक महोत्सव किया 'तस्स लोगपाला च उसु दहिमुहे सु अट्टाहियं करें ति" देवेन्द्र देवराज ईशान के चार लोकपालों ने चार दधिमुख पर्वतों पर अष्टान्टिक महोत्सव किया; "चमरो य दाहिणिल्लं अंजणगे तस्सलोगपाला दहिमुहपचासु" असुरेन्द्र असुरराज चमर ने दिक्षिण दिशा के अञ्जनपर्वत पर अष्टान्हिक महोत्सव किया और उसके लोकपालों ने चार दधिमुखपर्वतों पर अष्टान्हिक महोत्सव किया "बली" वैरोचनेन्द्र वैरोचनराज बलि ने "पञ्चस्थिमिल्ले अंजणगे तस्स लोगपाला दहिमुहगेसु" पश्चिम दिशा के अंजन पर्वत पर अष्टान्हिक महोत्सव किया और उसके चार लोकपालों ने दधिमुख पर्वतों पर अष्टान्हिक महोत्सव किया, 'तएणं ते बहवे भवणवइवाणमंतर जाव अट्राहियाओ महामहिमाओ करे ति" इस तरह जब शक से लेकर बलितक के इन्द्र अष्टान्हिका महोत्सव कर भखासक या 'इसाणे देविदे देवराया उत्तरिल्ले अंजणगे अट्ठाहियं वन्द हे शान Biहिशाना मन नाम: ५वत ५२ मष्टाह: महात्सव ४या. 'तस्स लोगपाला चउसु दहिमुहेसु अट्ठाहियं करेंति' देवेन्द्र हे१२शानना यार सोपालो यार धिभुम ५। ५२ अटा९ि५४ मा यो 'चमरोअ दाहिणिल्ले अंजणगे तस्स लोकपाला दहिTagg અસુરેન્દ્ર અસુરરાજ ચમરે દક્ષિણ દિશા ના અંજન પર્વત પર અષ્ટાહિક મહાન કયાં અને તેના કપાલએ દધિમુખ પર્વત પર અષ્ટાહિક મહોત્સવ કર્યો वैशयन- द्रशयन २४ सिय पच्चथिमिल्ले अजणगे तस्स लोगपाला दहिमहगेस' પશ્ચિમ દિશાના અં જન પર્વત પૂર અષ્ટાડિક મહોત્સવ કર્યો અને તેને ચાર લેકપોલેએ भुग ५५ ते नी ०५२ मा९ि७४ भोत्सव ४ये. 'त पणं ते बहवे भवणवइ वाणमंतर . जाव अट्टाहियाओ महामहिमाओ करें ति म प्रमाणे भयारे शथी भांडी समि अधीन। Page #453 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका द्वि० वक्षस्कार सू० ५१ अस्णिसंवयन विध्यनन्तरिकविधिनिरूपणम् ३३९ न्ति (करित्ता) कृत्वा (जेणेव) यत्रैव (साइं २) स्वानि २ निजानि २ (विमाणाई) विमानानि (जेणेव) यत्रैव (साइं २) स्वानि २ (भवणाइं) भवनानि (जेणेव) यत्रैव (साओ २) स्वाः २ (सभाओ) सभाः (सुहम्माओ) सुधर्माः देवसभाः (जेणेव) यत्रैव (सगा २) स्वकाः २ निजाः (माणवगा) माणवकाः माणवकनामान इत्यर्थः (चेइअखंभा) चैत्यस्तम्भाः आह्लादकस्तम्भाः (तेणेव) तत्रैव (उवागच्छंति) उपागच्छन्ति (उवागच्छित्ता) उपागत्य (वइरामएसु) वज्रमयेषु (गोलवट्टसमुग्गएसु) गोलवृत्तसमुद्गकेषु वर्तुलाकारभाजनविशेषेषु (जिनसकहाओ) जिनसक्थीनि मृले स्त्रीत्वं प्राकृतत्वमूलकम् (पक्खिवंति) प्रक्षिपन्ति स्थापयन्ति (पक्खिवित्ता) प्रक्षिप्य-संस्थाप्य जिनसक्थिदशनादि (अग्गेहिं) अय्यैः उत्तमैः अग्रेरितिच्छाया पक्षे प्रत्यग्रः (वरेहि) वरैः प्रकृष्टै महद्भिरित्यर्थः (मल्लेहि) माल्यः (अ) च (गंधेहि अ) गन्धैश्च (अच्चेति) अर्चन्ति पूजयन्ति (अच्चित्ता) अर्चित्वा पूजयित्वा (विउलाई) विपूलान् (भोगभोगाई) भोगभोगान् भोग्यभोगान् मले नपुंसकत्वं प्राकृतत्वम्लकम् (भुंजमाणा) भुजानाः अनुभवन्तः चके तब भवनपति से लेकर वैमानिक तक के समस्त देवों ने अष्टान्हिका महोत्सव किया 'करित्ता जेणेव साई २ विमाणाइ जेणेव साई२ भवणाई जेणेव साओ २ सभाओ सुहम्माओं जेणेव साणं २ माणवगा चेइयखंभा तेणेव उवागच्छंति" अष्टान्हिका महोत्सव करके फिर वे सब के सब इन्द्रादिक देवलोक जहां अपने २ विमान थे, जहां अपने २ भवन थे जहां अपनी २ पुधर्मा सभाएं थो और जहां अपने२ माणवक नामके चैत्यस्तम्भ थे वहां पर गये, “उवागच्छित्ता" वहां जाकर "वरामएसु गोलवट्टसमुग्गएसु जिनसकहाओ पक्खिवंति" उन्होंने वनमय गोलवृत्त समुद्गाकों में वर्तुलाकार भाजनविशेषो में उन जिनेन्द्र की हड्डियों को रख दिया "पक्खिवित्ता अग्गेहि वरेहि मल्लेहिं य गंधेहि अच्चेंति" रख करके फिर उन्होंने उत्तम या नवोन श्रेष्ठ बड़ो २ माल्यों से एवं गन्ध द्रव्यों से उनकी पूजा की "अच्चित्ता विउलाई भोगभोगाई भुंजमाणा विहरीत" पूजन ઈન્દોએ અષ્ટાણિક મહેસ સમ્પન્ન કર્યા ત્યારે ભવનપતિથી માંડીને વૈમાનિક સુધીના सवा मटा९६४ मास ४ा. 'करिता जेणेव साई २ विमाणाई जेणेव साई साई भवणाई जेणेव सामओ २ सभाओ सुहम्माओ जेणेव साणं २ माणवग चेइयखंभा તેર વાછતિ અષ્ટાહક મહત્સવ કરીને પછી તે સર્વ ઈન્દ્રાદિક જયાં પિત– પિતાના વિમાનો હતાં જયાં પિતા પોતાના ભવને હતાં, જયાં પોત પોતાની સુધર્મા समाय। ती भने यो पातपोवन माधुवर नाम शैत्य मेहता, त्यां गया, 'उवागपिछता त्यो ४२ 'वइरामपसु गोलवसमुगएसु जिनसकहाओ पक्खिवंति भये વળમય ગોલવૃત્ત સમુદ્રમાં-વર્તુલાકાર ભાજન વિશેષોમાં–તે જિનેન્દ્રની અસ્થિઓને प्रस्थापित र्या. 'पक्खिवित्ता अग्गेहिं वरेहिं मल्लेहिं य गंधेहिं अ अच्चेति' प्रस्थापित ४शन પછી તેમણે ઉન કે નવીન શ્રેષ્ઠ મોટી-મેટી માળાઓથી તેમજ ગન્ધ દ્રવ્યથી તેમની પૂજા ४१. 'अंचित्ता, विउलाई भोगभोगाई भुंजमाणा विहरंति' ५ ४शन पछी । सवे Page #454 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे (विहरंति) विहरन्ति आसते । ननु चारित्रादि गुणरहितस्य जिनशरीरस्य जिनसक्थ्यादेश्च पूजनमनुचितम् इति चेन्मेवम्-भावजिनो यथा बन्धस्तथा नामस्थापना द्रव्य जिना अपि बन्धास्तदा द्रव्यजिनरूपस्य जिनशरीरस्य भावजिनरूपजिनशरीरावयवसक्थ्यादीनां च वन्धत्वमिति तन्नानुचितम्, जिनशरीरावयवसक्थ्यादेर्भावजिनरूपत्वेना बन्धत्वे गर्भतयोत्पन्नमात्रस्य "समणे भगवं महावीरे" इत्याधभिलापेन सूत्रकृतां सूत्रकरणं शक्राणां शक्रस्तवनप्रयोगादिकं चानुचितं स्यादिति, अतएव जिनसक्थ्यायाशातनामयशीला देवास्तत्र कामासेवनादौ न प्रवर्तन्त इति ॥५१॥ इति तृतीयारकः समाप्तः करके फिर वे सब के सब अपने २ स्थानों पर रहते हुए आनन्द के साथ विपुल भोग भोगों को भोगने में लग गये, यहां पर ऐसी शंका हो सकतो है-चारित्रादि गुण रहित जिन शरीर का और जिन हड्डियों का पूजन करना अनुचित है-सो इसका उत्तर ऐसा हैं कि जिस प्रकार से भावजिन वन्द्य होते हैं उसी प्रकार से नाम जिन, स्थापना जिन और द्रव्य जिन भी वन्ध होते हैं, इस तरह द्रव्यजिनरूप जिन शरीर का भावजिनरूप जिनशरीर का तथा उनके अवयव भत अस्थि आदिको का वन्दन करना कोई अनुचित नहीं हैं यदि ऐसा कहा जाय किं जिन शरीर के अवयवभूत हड्डियों आदि में भावजिनरूपता नहीं रहती है इसलिये उन्हें बन्ध नहीं मानना चाहिये तो इसका समाधान ऐसा है कि जब जिन गर्भ में आते हैं तो उस समय जो “समणे भगवं महावीरे" इस प्रकार से सूत्रों की रचना करते हैं तथा इन्द्र उनका स्तवन करते हैं यह सब अनुचित माना जाना चाहिये, परन्तु नहीं माना गया है, इसी प्रकार जिन सक्य्यादि की भाशातना के भय से डरे हुए देव वहां कामसेवन आदि कार्य में प्रवृत्ति नहीं करते हैं ॥५१॥ ॥ तृतीयारक समाप्त ॥ પિતાપિતાના સ્થાને પર નિવાસ કરતાં આનંદ પૂર્વક વિપુલ ભેગ–ભેગો ભેગવવા લાગ્યા. અહીં એવી શંકા થઈ શકે કે ચારિત્રાદિ ગુણ વિહીન જિન શરીરનું અને જિન અસ્થિ એનું પૂજન કરવું અનુચિત છે, તે આનો જવાબ આ પ્રમાણે છે કે જેમ ભાવજિન વા હોય છે. તેમજ નામ જીન સ્થાપનાજી છે અને દ્રવ્યજિન પણ વંઘ હોય છે. આ પ્રમાણે અજિન રૂ૫ જિન શરીરનું ભાવાજન રૂપે શરીરનું તેમજ તેમના અવયવભૂત અસ્થિ આદિકેનું વંદન કરવું કેઈ પણ રીતે અનુચિત નથી. જે આ પ્રમાણે કહેવામાં આવે કે જિન શરીરના અવયવભૂત અસ્થિ વગેરેમાં ભાવજિન રૂપતા રહેતી નથી, એથી તેમને વન્ય ગણવા ગ્ય નથી તે આનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે જ્યારે જિન ગર્ભમાં આવે છે. त मते २ समणे भगवं महावीरे 1 प्रमाणे सूत्रांनी स्यना रे छ. तभ चन्द्र તેમનું સ્તવન કરે છે તે આ બધું અનુચિત ગણાવું જાઈએ પણ આવું માનવામાં આવ્યું નથી. એથી જ જિન એસ્થિ વગેરેની આશાતના ના ભયથી સંત્રસ્ત થયેલા દે ત્યાં કામ સેવન વગેરે કામમાં પ્રવૃતિ કરતા નથી. એ સૂત્ર ૫૧ | તૃતીયારક સમાપ્ત. Page #455 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४१ प्रकाशिका टीका. द्विवक्षस्कार सू. ५२ चतुर्थारकस्वरूपनिरूपणम् अथ चतुर्थारकस्वरूपं निरूपयति मूलम्-तीसे णं समाए दोहिं सागरोवमकोडाकोडीहिं काले वीइक्कते अणंतेहिं वण्णपज्जवेहिं तहेव जाव अणंतेहिं उट्ठाणकम्म जाव परिहायमाणे २ एत्थ णं दूसमसुसमा णामं समा काले पडिवज्जिसु समणाउसो ! तीसे णं भंते ! समाए भरहस्स वासस्स केरिसए आगारभावपडोआरे पण्णत्ते ? गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव मणोहिं उवसोभिए, तं जहा कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चेव, तीसे णं भंते ! समाए भरहे मणुआणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते ? गोयमा ! तेसिं मणुयाणं, छबिहे संघयणे छेविहे संठाणे बहुइं धणूई उद्धं उच्चत्तेणं जहण्णेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं पुवकोडी आउअं पालेति पालित्ता अप्पेगइया णिरयगामी जाव देवगामो अप्पेगइया सिज्जति जाव सबदुक्खाणमंतं करेंति, तीसे णं समाए तआ वंसा समुपन्जित्था, तं जहा-अरहंतवंसे १ चक्कट्टि वंसे २ दसावंसे ३ तीसेणं समाए तेवीसं तित्थयरा इक्कारसचक्कवट्टो णव बलदेवा ण वासुदेव। समुप्पज्जित्था ।सू० ५२॥ ___ छाया-तयां खलु समायां द्वाभ्यां सागरोपम कोटीभ्यां काले व्यतिक्रान्ते अनन्तैर्वर्णपर्यवैः तथैव यावदनन्तैः उत्थानकर्म यावत् प रेहोयमानः २ अत्र खलु दुखमयुषमानाम समा कालः प्रत्यपद्यत भमणाऽऽयुष्मन्!तस्यां खलु भदन्त! समायां भरतस्य वर्षस्य कीडश आकारभावप्रत्यवतारः प्रशप्तः?, गौतम! बहुसमरमणीयो भूमीभागः प्रज्ञप्तः, स यथानामकः आलिङ्गपुष्करमितिया यावत् मणिभिरुपशोभितः, तद्यथा-कृत्रिमैत्र वैव अकृत्रिमप्र वैव, तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरते मनुजानां कीदृशक आकारभावप्रत्यवतारः प्रज्ञतः?, गौतम ! तेषां मनुजानां पविध संहननं षइविध संस्थान बहूनि धषि ऊर्ध्वमुच्यत्वेन जघन्येनान्तर्मुहूर्तम् उत्कर्षेण पूर्वकोट्यायुष्कं पालयन्ति पालयित्वा अपये के निरयगामिनो यावत् देवगामिनः अप्येकके सिध्यन्ति बुध्यन्ते यावत् सर्वदुक्खानामन्तं कुर्वन्ति, तस्यां खल समायां त्रयो वंशाः समुदपद्यन्त, तद्यथा-अर्हवंशः १ चक्रवर्तिवंशः २ दशाहवंशः ३ तस्यां खलु समायां त्रयोविंशतिस्तीर्थकरा एकादश चक्रवर्तिनो नव बलदेवा नव वासुदेवाः समुदपधन्त ॥ सू० ५२ ॥ Page #456 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रतिसूत्रे टीका-"तीसेण समाए" इत्यादि-तस्याम् पूर्वोक्तायां खलु समायां काले (दोहिं) द्वाभ्यां (सागरोवमकोडाकोडीहिं) सागरोपमकोटाकोटीभिः-सागरोपमकोटाकोटीद्वयेनेति पदद्वयस्यार्थः, 'प्रमिते' इतिशेषः, तस्यानन्तरवर्तिना 'काले' इत्यनेन सम्बन्धः 'काले' काले समये 'वीइक्कते' व्यतिक्रान्ते व्यतीते सति 'अणं तेहिं अनन्तैः 'वण्णपज्जवेहि' वर्णपर्यवैः-वर्णा-शुक्लादयस्ते च पर्यवाः पर्यायाः गुणाः वर्णपर्यवास्तैस्तथा शुक्लादिवर्णरूपगुणैः 'पर्यवः पर्यायः, गुणः, विशेषः, धर्म' इत्येते समानाथकाः, 'तहेव' तथैव द्वितीयारकप्रतिपत्तिक्रमवद् बोध्यम्, 'जाव' यावत्' 'अणंतेहिं' अनन्तैः 'उहाणकम्म जाव' उत्थानकर्म यावत् उत्थानकर्मबलवीर्य पुरुषकार पराक्रमैरनन्तगुणपरिहान्या 'परिहायमाणे २' परिहीयमानः २ 'एत्थ' अत्र अत्रान्तरे ‘णं' खलु (दूसमसुसमा) दुष्षमसुषमा 'णाम' नाम 'समा' कालः (पडिवग्जिसु) प्रत्यपद्यते (समणाउसो)! श्रमणाऽऽयुष्मन्! हे श्रमण ! हे आयुष्मन् ! अथ पूर्वारकवद भरतस्वरूपं निरूपयितुं संवदति (तीसेणं भंते !) तस्यां खलु भदन्त ! हे महानुभाव ! (समाए) समायां काले (भरहस्स) भरतस्य तदाख्यस्य (वासस्स) वर्षस्य (केरिसए) कीदृशक:-कीदृशः (आगारभावपडोयारे) आकारभावप्रत्यवतारः स्वरूप-तद्गतपदार्थसहितप्रादुर्भावः (पण्णत्ते) प्रज्ञप्तः ? (गोयमा !) अब सूत्रकार चतुर्थारक का स्वरूप कहते हैं 'तीसेणं समाए दोहिं सागरोवमकोडाकोडीहिं' इत्यादि सूत्र-५२ टीकार्थ-जब दो कोटाकोटी सागरोपम प्रमाण तृतीय काल समाप्त हो गया तव (अणतेहि वण्णपज्जवेहिं तहेव जाव अणंतेहि उदाण कम्म जाव परिहायमाणे २ एत्थ णं दूसम सुसमा णाम समा काले पडिवज्जिंसु समणाउसो) अनन्त शुक्लादिगुण रूप पर्यायों को हीनता वाला यावत् अनन्त उत्थान, बल वीर्य, पुरुषकार पराक्रम रूप पर्यायो की हीनता वाला दुष्षमसुषमा नामका चतुर्थ काल हे श्रमण आयुष्मन् ! प्रारम्भ हुआ यहाँ यावत् शब्द से द्वितीय आरक में जिस प्रकार से वर्णपर्यायों से लेकर पुरुषकार प्रराक्रम तक का पाठ कहा गया है -वैसा हो वह सब पाठ यहां पर भी कह लेना चाहिये "तीसेणं भंते ! समाए भरहस्स वासस्स केरिसए आगार હવે સૂત્રકાર ચતુર્ધારકનું સ્વરૂપ કહે છે.'तीसेणं समाए दोहिं सागरोवमकोडाकोडिहिं'-इत्यादि सूत्र ॥ ५२ ॥ ટીકાર્થ-જ્યારે બે કોટી કોટી સાગરોપમ પ્રમાણ તૃતીય કાળ સમાપ્ત થયો. ત્યારબા तेहिं वण्णपज्जवेहिं तहेव जाव अणतेहिं उठाणकम्म जाव परिहायमाणे २ पत्थ ण दुसम सुसमा णाम समा काले परिवजिजसु समणाउसो) 3 श्रम आयु भन् मनतात ગણ ૩૫ પર્યાની હીનતા વાળા યાવત્ અનંત ઉત્થાન, બલ, વીર્ય, પક્ષકાર પરાક્રમ ૩૫ પયૉની હીનતા વાળા દુષમ સુષમાં નામક ચતુર્થી કાળ પ્રારંભ થયે. અહી યાત પરથી દ્વિતીય આરકમાં જેમ વણું પર્યાથી માંડીને પુરુષકાર પરાક્રમ સુધીના પાઠ ગ્રહણ या छतभर ता8 मही' ५५ थय छ. "तीसे णं भंते ! समाप भरहस्स वासस्स केरिसए आगारभावपडोयारे पण्णत्ते" महन्त ! मा यतु भारत - Page #457 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका वि. वक्षस्कारः सू.५२ चतुर्थारकस्वरूपनिरूपणम् गौतम ! तस्य (बहुसमरमणिज्जे)बहुसमरमाणीयः अत्यन्तसमतलोऽत एव रमणीयः सुन्दरः (भूमिभागे) भूमिभागः भूमिप्रदेशः (पण्णत्ते) प्रज्ञप्तःस कीदृशः इत्याह-'से' सः (जहाणामए) यथानामकः (आलिंगपुक्खरइ वा) आलिङ्गपुष्करमिति वा-आलिङ्ग:-मुरजो वाधविशेषः तस्य पुष्कर-चर्मपुटं तदत्यन्तसमतल भवतीति तत्तुल्यसमतलत्वात् तदेवइतिशब्दो हि सादृश्याथेकः, वा शब्द: समुच्चयाकः, एवमग्रेपि (जाव) यावत्-यावस्पदेन-"मुइंगपुक्खरेइ वा सरतलेइव वा, करतलेइ वा, चंदमंडलेइ वा, सूरमंडलेइ वा आयंसमंडलेइ वा, उरभचम्मेइ वा, उपभचम्मेइ वा, वराहचम्मेइ वा, सीहचम्मे इव वा, वग्घचम्मेइ वा, मिगचम्मेइ वा, छगलचम्मेइ वा,दीवियचम्मेइ वा,अणेगसंकुकीलगसहस्सवितह णाणाविह पंचवण्णेहि" इति संग्राह्यम्, तच्छाया-"मृदङ्गपुष्करमिति वा, सरस्तलमिति वा, चन्द्रमण्डलमिति वा,सूरमण्डलमिति आदर्शमण्डलमिति वा, उरभ्रचर्मेतिवा, वृषभचर्मेति वा वराहचर्मेतिवा, सिंह चर्मेति वा, व्याघ्र वर्मेति वा, मृगचर्मेति वा छालचर्मेति वा द्वीपिकचर्मेति वा, अनेकशङ्ककीलकसहस्रविततः नानाविधपञ्चवर्णैः" इति, एतद्वयाख्या राजप्रश्नीयमत्रस्य पञ्चदशसूत्रस्य मत्कृतसुबोधिनी टीकातो बोध्या, (मणोहिं) मणिभिः (उवसोभावपडोयारे पण्णत्ते" हे भदन्त् ! इस चतुर्थकाल में भरत क्षेत्र का स्वरूप कैसा कहा गया है ? इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु श्री कहते हैं-"गोयमा ! बहुसरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, से जहामए अलिंगपुक्खरेइवा जाव मणीहिं उवसोभिए" हे गौतम ! उस चतुर्थ काल में इस भारतक्षेत्र की भूमि अत्यन्त समतल वाली थो अत एव वह रमणीय-सुन्दर थी वह ऐसो समतल वाली थी कि जैसा मुरज मृदंग नामक वाद्य विशेष का चर्मपुट समतल वाला होता हैयहां इति शब्द सादृश्यार्थक है और वा शब्द समुच्चयार्थक है यहां पर यावत् शब्द से-'मुइंगपुक्खरेइवा, सरतले इवा, करतलेइवा, चंदमंडलेइवा, सूरमंडलेइवा, आयसमण्डलेइवा, उरम्भचम्मेइवा, उसम चम्मेइवा, वराहचम्मेइव, सीडचम्मेइवा, वग्गचम्मेईवा, मिगचम्मेइवा, छागलचम्मेइवा, दीवियचम्मेइवा, अणेगसंकुकीलग सहस्सवितए णाणाविह पंचवण्णेहिं" इस पाठ का ग्रहण हुआ है इस पाठ के पदों की व्याख्या राजप्रश्नीय सूत्र के १५वें सूत्र की सुबोधिनी टीका से जान लेना ક્ષેત્રના સ્વરૂપ વિષે શું કહેવામાં આવ્યું છે ? તે આ પ્રશ્નના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે'गोयमा! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा जाव मणीहि उवलोभिए" गौतम, ते यतुर्थ म त भरत क्षेत्रनी भूमि सत्यात समतल ती, એથી તે રમણીય સુંદર હતી, મુરજ નામક વાઘ વિશેષને ચર્મપુટ જે પ્રમાણે સમતલ વાળ હોય છે, તે પ્રમાણે જ તે ભૂમિ સમતલવાળી હતી. અહીં દૈતિ” શબ્દ સાદડ્યાર્થક छ भने 'पा' शसभुश्याथ छे. मी यावत् ७४थी "मुइंगपुक्खरेइ वा, सरतलेइ वा करतलेइ वा, चंदमंडलेड वा, सूरमंडलेइ वा आयंसमंडलेइ वा उरभचम्मेइ वा, उसमचम्मेह वा, वराहचम्मेइ वा, वग्धचम्मेइ वा, सीहचम्मेइ वा, मिगचम्मेइ वा, छागलबम्मेइबा, दीवियचम्मेइवा, अणेग संकुकीलगसहस्सवितए णाणाविह पंचव. पहि" मा पा सहीत थय। छे. मा पानी पहानी व्याच्या २१४ प्रश्नीय सूत्र' ना સૂત્ર નં. ૧૫ ની સુબોધિની ટીકા પરથી જાણી લેવી જોઈએ. તે ભૂમિ અનેક પ્રકારના Page #458 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ધર जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ० भिए) उपशोभितः - अलङ्कृतः, (तं जहा) तद्यथा (कित्तिमेहिं चैव अकित्तिमेहिं चेव) कृत्रिमैश्चेव अकृत्रिमैश्चैव - स्वाभाविकैः कारुनिर्मितेश्च मणिभिरुपशोभित इत्यर्थः, इति भरतर्षभभूमिभागवर्णनम् अथ दुष्पमसुषमा कालोत्पन्न भरत क्षेत्रभवमनुजान् वर्णयितुं संवदति (तीसे) तस्या दुष्पमसुषमायां (ं) खलु (भंते ! ) भदन्त ! हे महानुभाव: ( समाए) समाय काले (भरहे) भरते -भरत क्षेत्रे वर्षे (मणुयाण) मनुजानां मनुष्याणां (केरिसए) कीदृशक :Area: (आयारभाव पडोयारे) आकारभावप्रत्यवतारः - स्वरूप संहननसंस्थानोच्चत्वादिपदार्थसहित प्रादुर्भावः (पण्णत्ते) प्रज्ञप्तः ? अस्य प्रश्नस्योत्तरं भगवानाह - ( गोयमा ! ) गौतम ! (तेसिं) तेषां दुष्षमसुषमासमोत्पन्न भरतवर्षीयाणाम् (मणुयाणं ) मनुजानां (छव्विहे) षड्विधं षट्प्रकारकं (संघयणे) संहननं शरीरं (छवि) षड्विधं (ठाणे) संस्थानम् आकार : ( बहूई) बहूनि - अनेकानि (धणू) धनूंषि (उद्धं) ऊर्ध्वम् (ऊच्चतेण) उच्चत्वेन प्रज्ञप्तम् तच्च ते (जहण्णेणं) जघन्येन - अपकर्षेण (अंतोमुडुतं) अन्तर्मुहूर्त्तम् (उको सेणं) उत्कर्षेण-उत्कृष्टतया (पुव्वकोडो आउअं) पूर्व कोट्ययुष्कम् - पूर्वकोटिमायुः ( पालेंति) चाहिये • वह भूमि अनेक प्रकार के पांचवर्णों के मणियों से उपशोभित थो "कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चेव" इन मणियों में कृत्रिम मणि भी थे और अकृत्रिम मणि भी थे इस प्रकार से, चतुर्थ काल के समय की भूमिकावर्णन कर अब सूत्रकार इस चतुर्थ काल में उत्पन्न हुए मनुष्यों का वर्णन करने के लिये कहते हैं- "तीसे णं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाणं केरिसए आयारभाव - पडोयारे पण्णत्ते" इसमें गौतम प्रभु से ऐसा पूछते हैं - हे भदन्त उस चतुर्थ काल के मनुष्यों का स्वरूप कैसा कहा गया हैं ? अर्थात् इनका स्वरूप संहनन, संस्थान एवं उच्चत्वादि पदार्थ सहित प्रादुर्भाव कैसा बतलाया गया है. इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु कहते है - 'गोयमा तेसिं मणुयाणं छव्विहे संघयणे" हे गौतम चतुर्थ काल के मनुष्यों के ६ प्रकार का संहनन कहा गया "है तथा वह " बहूई घणूई उद्धं उच्चत्तेणं" अनेक धनुष का ऊंचाई वाला कहा गया है. इस काल के मनुष्यों की आयु जघन्य से " अन्तोमुहुत्तं " एक अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट से “पुन्वकोडी आउयं पालेंति" एक पूर्वकोटि की कही गई है. इतनी बड़ो आयु को भोगकर "अप्पेपांच वर्षो ना भजियोथी उपशोभित हुती. “कित्तिमेहिं चेव अकित्तिहिं चेष" मे मधुએમાં કુત્રિમ મણિએ પણ હતા. અને અકૃત્રિમ મણિએ પણ હતા. આ પ્રમાણે ચતુ કાળના સમયની ભૂમિનું વર્ચુન કરીને હવે સૂત્રકાર આ ચતુર્થ કાળમાં ઉત્પન્ન થયેલ भाशुसोनुं वाबुन श्वा भाटे याप्रमाणे आहे छे - "तीसेण भते । समाप भर वाले - याण के रिसए आया रभाव पडोयारे पण्णत्ते” आमा गौतमस्वामी प्रभुने भा प्रमाणे प्रश्न છે કે હે ભદન્ત તે ચતુર્થી કાળના માણુસાનુ સ્વરૂપ કેવું કહેવામાં આવ્યું છે. આ પ્રશ્ન ना उत्तरमा प्रभु - "गोयमा ! तेसि मणुयाणं छब्बिहे संघयणे" हे गौतम ! तु अपना भासेो ना ६ प्रहारना संडेनन वामां माया छे तेम४ त 'बहु धनू उ उच्चत्तेणं” अने४ धनुषो भेटसी या घरावता हता. आ अपना भाणुसो तु आयुध न्यथी “अंतोमुडुत्त” मे अन्तर्मुहूर्तनी भने उत्कृष्टथी "पुव्वकोडी आउयं पालेति” Page #459 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कार सू० ५२ चतुर्थारकस्वरूपनिरूपणम् ४४५ पालयन्ति अनुभवन्ति (पालित्ता) पालयित्वा तत्र (अप्पेगइया) अप्येकके केचित (णिरयगामी) निरयगामिनः नरकगामिनः (जाव) यावत्- यावत्पदेन- "तिर्यग्गामिनः, मनुष्य गामिनः" इति संग्राह्यम्, (देवगामो) देवगामिनः (अप्पेगइया) अप्येकके केचित् मनुनाः (सिज्झंति) सिध्यन्ति सिद्धि प्राप्नुवन्ति (बुझंति) बुध्यन्ते- बोधं केवल ज्ञानं प्राप्नुवन्ति 'जाव' यावत् - "मुच्चति, परिणिव्याअंति" इति संग्राह्यम्, तस्य "मुच्यन्ते परिनिर्वान्ति" इतिच्छाया, तत्र मुच्यन्ते इत्यस्य सकलकर्मबन्धान्मुक्ता भवन्तीत्यर्थः, परिनिर्वान्ति- पारमार्थिकमुखं प्राप्नुवन्ति, 'सव्वदुक्खाणमंत' सर्वदुःखानामन्त नाशं करेंति' कुर्वन्ति, अथ पूर्व समाप्ती विशेषमाह -'तोसे' तस्यां 'ण' खलु 'समाए' समायां काले 'तो' त्रयः- त्रिसंख्याः 'वंसा' वंशाः वंशा इव वंशाः प्रवाहाः- आवलिकाः, न तु सन्तानरूपाः परम्पराः परस्परं पितृपुत्रपौत्रप्रपौत्रादिव्यवहाराभावात् 'समुप्पज्जित्था' समुदपद्यन्त- समुत्पन्ना अभूवन् 'तं जहा' तद्यथा 'अरहंतवंसे' अहवंशः १ 'चकवट्टिवंसे' चक्रवर्तिवंशः २ 'दसारवंसे' दशाहवंशः ३ तत्र दशाहवंशः- दशार्हाणां बलदेववासुदेवानां वंशो दशाहवंशः, यदत्र दशारशब्देन बलदेववासुदेवयोर्ग्रहणं तदुत्तरसूत्रबलादेव बोध्यम, गइया" कि तनेक जीव "णिरयगामी" नरकगामी होते है, "जाव" यावत् कितने क जीव तिर्यगामी होते हैं, कितनेक जीव मनुष्य गामी होते हैं और कितनेक जीव "देवगामी" देवगामी होते हैं. तथा कितनेक जीव सिझंति" सिद्धि गति को प्राप्त होते है. 'बुज्झति" जाव मुच्चंति, परिणिव्वाअन्ति" कितनेक केवलज्ञान को प्राप्त करते हैं, यावत् सकल कमों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और पारमार्थिक सुख को प्राप्त कर लेते है "सव्वदुक्खाणमंतं करेंति" और समस्त दुःखों का अन्त कर देते हैं तीसे समाए तओ वंसा समुप्पज्जित्था-तं जहा-अरहंतवंसे चक्कबट्टिवंसे २ "दसारवंसे" उस काल में ३ तीन वंश उत्पन्न हुए-एक अर्हद्वंश दूसरा चक्रवर्ति वंश और तीसरा दशाह वंश इन अर्हन्त प्रभु की जो वंश, है वह अहवंश और चक्रवर्ती का जो वंश हैं वह चक्रवर्ति वंश है तथा बलदेव और वासुदेवों के वंश को दशाहे वंश कहा गया हैं. यहां पर जो दशार पार पाम सारे . मायु आयु लामा “अप्पेगइया" tearn can "णिरयगामी" ४ आभी डाय छे. यावत् ८मा । तिमी हाथ छ.४८ वा मनुष्यभाभी डाय छ सन ४८४ 01 "देवगामी विशाभा हायर तभाटा ७ "सिझति सिद्धितिने प्रात ४२ छे. "बुझंति जाव मुच्चति परिणिवा अति टमा ७वा ज्ञान प्राप्त ४२ छ. यावत् सण ४ाना भवनाथी भात थतय छ, पारमाथि सुमन प्रात ४३ छ. “सम्बदुक्खाणमंतं करेंति" भने समर जनमत ४३॥ ना छ. 'तीसे समाप तओ वसा समुप्पजित्था तं जहा अरहंतवंसे चक्कवद्रिवंसे २ दसारवंसे' तणमा त्रए व उत्पन्न थया-मे म शाल ચક્રવતિ વંશ ત્રીજે દશાઈ વંશ. એ ત્રણે માં જે અન્ત પ્રભુના વંશ છે, તે અંશ અને ચકવતીના જે વંશ છે તે ચક્રવતી વંશ છે. તેમજ બલદેવ અને વાસુદેવના વંશને દશાહ વશ કહેવામાં આવે છે. અહી જે દર શબ્દથી બલદવ વાસુદેવનું ગ્રહણ કરવામાં Page #460 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रशप्तिसूत्रे अन्यथा दशाईशब्देन वासुदेवानामेव प्रतिपाद्यतया ग्रहणं स्यादिति 'अहयं च दसाराणं' इति वचनात्, यद्यपि प्रतिवासुदेववंशोऽत्र नोक्तः तथापि उपलक्षणात् सोऽपि ग्राह्यः, तदनुक्तो कारणं च उपाङ्गानामङ्गानुयायित्वमिति स्थानाङ्गे वंशत्रयस्यैव प्रतिपादनात्, तत्कारणं च प्रतिवासुदेवानां वासुदेववध्यतया पुरुषोत्तमत्वानभ्युपगम इति वृद्धा आहुः एतदेवाह-'तीसेणं समाए तेवीस तित्थयरा इकारस चक्कवट्टी णव बलदेवा णव वासुदेवा' इति "तस्यां समायां त्रयोविंशतिस्तीर्थकरा एकादश चक्रवर्तिनः ऋषभभरतयोस्तृती यारके जननात्, नव बलदेवा नव वासुदेवाः, तत्र वासुदेवापेक्षया बलदेवानां ज्येष्ठत्वेन प्रागुपादानम्, एवं चोपलक्षणात्प्रति वासुदेववंशोऽपि ग्राह्यः 'समुप्पजित्था' समुदाद्यन्त । सू०५२॥ इति चतुर्थाऽरक उक्तः ४ । शब्द से बलदेव और वासुदेव का ग्रहण किया गया है वह उत्तर सूत्र के बल से ही ग्रहण किया गया है नहीं तो फिर प्रतिपाद्य होने के कारण वासुदेवों का ही ग्रहण होना चाहिये था 'अहयंच दसाराणं" इस वचन के अनुसार यद्यपि यहां पर प्रति वासुदेव का वंश नहीं कहा गया है तथापि उपलक्षण से वह भी यहां पर ग्राह्य है उसे जो यहां स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है उसका कारण उपाङ्ग अङ्गानुयायी होते हैं इस नियम के अनुसार स्थनाङ्ग में वंशत्रय का प्रतिपादन हैं तथा प्रति वासुदेव वासुदेव के द्वारा वध्य होते हैं इस कारण उन्हे उत्तम पुरुषों में परिगणित नहीं किया गया है ऐसा वृद्ध कहते हैं उस चतुर्थ काल में ही तेवीसं तित्थयरा इक्कारस चक्कवट्टी णव बलदेवा" २३ तीर्थंकर ११ चक्रवर्ती नौ वलदेव और नौ वासुदेव होते है यहां २३ तीर्थकर इसलिये कहे गए हैं कि ऋषभदेव भरत क्षेत्र में तृतीय आरक में हुए हैं वासुदेव की अपेक्षा बलदेव ज्येष्ठ होते हैं इसलिए उन्हे पाठ में प्रथम कहा गया है इस तरह उपलक्षण से प्रतिवासुदेव का वंश भी गृहीत हुआ जानना चाहिए-चतुर्थ आरक समाप्त-५२ આવેલ છે તે ઉત્તર સૂત્રના બળથી ગ્રહણ કરવામાં આવેલ છે, નહીંતર પછી પ્રતિપાદ્ય હોવાને લીધે વાસુદેવેનું જ ગ્રહણ થવું જોઈએ એવું જ વરાળ આ વચન મુજબ યદ્યપિ અત્રે પ્રતિ વાસુદેવને વંશ કહેવામાં આવેલ નથી, તથાપિ ઉપલક્ષણથી તેનું પણ અહીં ગ્રહણ થયું છે. તેને જે અત્રે સ્પષ્ટ રૂપમાં પ્રદર્શિત કરવામાં આપેલ નથી. તેનું કારણું ઉપાંગ અંગાનુયાયીઓ હોય છે. આ નિયમ મુજબ સ્થાનાંગ માં વંશત્રય નું પ્રતિપાદન છે તેમજ પ્રતિવાસુદેવ વાસુદેવ વડે વધ્ય હોય છે, તેથી તેમની ઉત્તમ પુરુષોમાં પરિગણુના ४२वामा भावी नथी. वु वृद्धो ४९ छे. ते यतुर्थ ४ाण भir "तेवीस तित्थयरा इक्कारस चक्कवट्टो णव बलदेवा" २३ तीथ ४२।, १२ 34तासो, न सजव। भने નવ વાસુદેવ હોય છે. અહીં તીર્થકરો એટલા માટે કહેવામાં આવેલ છે કે અષભ દેવ ભરતક્ષેત્રમાં તૃતીય આરકમાં થયા છે. વાસુદેવની અપેક્ષા બળદેવ ચેષ્ટ હોય છે. એથી તેમને પાઠમાં પ્રથમ કહેવામાં આવેલ છે. આ પ્રમાણે ઉપલક્ષણથી પ્રતિવાસુદેવને વંશ પણ ગૃહીત થયા છે, તેમ સમજવું. પરા ચતુર્થ આરક સમાસ Page #461 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीकाद्वि०वक्षस्कारसू. ५३ पञ्चमारकस्वरूपनिरूपणम् अथ पञ्चमोऽरको वर्ण्यते मूलम् - तीसे णं समाए एक्काए सागरोवमकोडाकोडीए बायाली साए वाससहस्सेहि ऊणिआए काले वीइक्कंते अनंतेहि वण्णपज्जवेर्हि तव जाव परिहाणीए परिहायमाणे २ एत्थणं दुसमा णामं समा काले पडिवज्जिस्सइ समणाउसो ! तीसेण भंते ! समाए भरहस्स वासस्स केरिसए आगारभाव पडोयारे भविस्सइ ? गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे भfares से जहाणामए आलिंगपुक्खरेव वो मुईंगपुक्खरेइ वा जाव णाणामणिपंचवण्णहि कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चैव तोसे णं भंते ! समाए भरइस्स वासस्स मणुआणं केरिसए आयारभावपडीयारे पण्णत्ते ? गोयमा ! तेसि मणुयाणं छव्विए संघयणे छव्विए संठाणे बहु ईओ रयणीओ उद्धं उच्चत्तेणं जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं साइरेगं वाससयं आउअ पालेति पालिता अप्पेगइआ णिरयगामि जाव सव्वदु क्खाणमंत करेन्ति, तोसेणं समाए पच्छिमें तिभाए गणधम्मे पासं धम्मे भे जायते धम्मचरणे अवोच्छिज्जिस्सइ ||सू० ५३ ॥ --- छाया तस्यां खलु समाया मेकया सागरोपमकोटाकोट्या द्विचत्वारिंशता वर्षसहरूनितायां काले व्यतिक्रान्ते ऽनन्तैर्वर्णपर्यवैः तथैव यावत् परिहान्या परिहीयमानः २ अत्र खलु दुष्षमा नाम समा कालः प्रतिपत्स्यते श्रमणाऽऽयुष्मन् 1, तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरतस्य वर्षस्य कीटशक आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यति ? गौतम ! बहुलमरमणीय भूमिभागो भविष्यति, स यथानामकः आलिङ्गपुष्करमिति वा मृदङ्गपुष्करमिति बा यावद् नानामणि पञ्चचणैः कृत्रिमैश्वेव अकृत्रिमैश्चैव तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरतवर्षस्य मनुनानां षड्डूबिधं संहननं षडूविधं संस्थानं बहुब्यो रत्नयः ऊर्ध्वमुच्चत्वेन जघम्येनान्तर्मुहूर्त्तम् उत्कर्षेण सातिरेकं वर्षशतमायुष्कं पालयन्ति पालयित्वा अप्येकके निरयगामिनो यावत् सर्वदुःखानामन्तं कुर्वन्ति, तस्याः खलु समायाः पश्चिमे त्रिभागे गणधर्मः पाखण्डधर्मो राजधर्मो जाततेजाः धर्म चरणं च व्युच्छेत्स्यते ॥ ५३ ॥ : टीका - "तीसे णं समाए " इत्यादि-तस्यां दुष्षम सुषमायां खलु समायां काले (एकाए) एकया एक संख्यया (सागरोवमकोडाकोडीए) सागरोपमकोटाकोटया- एकेन कोटाकोटि पंचम आरक का वर्णन - 'ती से णं समाए एक्काए सागरोवम' - इत्यादि सूत्र - ५३ टीकार्थ-उस काल में जब चतुर्थकाल समाप्त हो चुका तब धीरे ४४७ ४२ हजार वर्ष कम एक कोटा कोटी सागरोपम प्रमाण वाला धीरे "अणतेहिं वण्णापनवेहिं तहेव जाव परिहाणीए परि Page #462 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सागरोपमेनेति पदद्वयार्थः (बायालीसाए) द्विचत्वारिंशता (वाससहस्सेहि) वर्षसहसः द्विचत्वारिंशत्सहस्रवरितिपदद्वयार्थः (अणिआए) अनितायां न्यूनीभूतायां समायामिति पूर्वे णान्वयः, तस्यां तद्रूपे (काले) काले (वीइकंते) व्यतिक्रान्ते- व्यतीते सति (अणतेहिं) अनन्तैः अन्तरहितैः वण्णपज्जवेहि) वर्णपर्यवैः शुक्लादि- वर्णविशेषैः (तहेव) तथैव चतु. रिकवदेव (जाव) यावत् गन्धपर्यवैरित्यारभ्य अनन्तबलवीर्यपुरुषकारपराक्रमैरनन्तगुणेति यावत्पदं संग्राह्यम्, तत्रानन्तगुणेत्यस्याग्रेतनेनान्वयः (परिहाणीए) परिहान्या-अनन्तगुणपरिहान्या अनन्तगुणहासेन एषां व्याख्या द्वितीयारकवर्णने गता (परिहायनाणे२) परिहीयमानः २ इसन २ काल उपतिष्ठति (एत्थ) अत्र अत्रान्तरे (णं) खलु (दुसमा) द्षमा (णाम) नाम (समा) (काले काल:)(पडिवजिजस्सइ) प्रतिपत्स्यते उपस्थास्यति अत्र वक्तुरपेक्षया भविष्यकालनिर्देशः(समणाउसो)श्रमणाऽऽयुष्मन् ! हे श्रमण ! हे आयुष्मन् ! अथ दुषमायां भरतस्वरूपं निरूपयितुं संवदति (तीसे) तम्यां दुष्षमायां समायां (ण) खलु (भंते) भदन्त! महानुभावः (समाए) समायां (काले भरहस्स) भरतस्य (वासस्स) वर्षस्य (केरिसए) कीदृशकः कीदृशः (आगारभावपडोयारे) आकारभावप्रत्यवतारः, इदं प्राग्वत् (पण्णत्त) प्रज्ञप्तः । अस्य प्रश्नस्योत्तरं भगवानाह-(गोयमा !) गौतम ! (बहुसमरमणिज्जे) बहुसमरमणीयः अत्यन्तसमतलोऽत एव रमणीयः- सुन्दरः (भूमिभागे) भूमिभागः भूमि प्रदेशः (भविस्सइ) भविष्यति (से) सः भूमिभागः (जहागामए) यथानामकः हायमाणे" अन्तरहित वर्णपर्याय के यावत् गन्धपर्याय के अनन्त बल वीर्य पुरुषकार पराक्रम अनन्तगुणरूप से घट जाने पर 'समणाउसो' हे श्रमण आयुष्मन् ! 'स्थ णं दूसमा णाम समो काले पडिवज्जिस्सइ' इस भरत क्षेत्र में दूष्पमा नामका पांचवा काल लगेगा यहां पर यह भविष्यत्काल का निर्देश वक्ता की अपेक्षा से किया गया है । 'तीसेणं भंते ! समाए भरहस्स केरिसए आगारभावपडोयारे पण्णत्ते' हे भदन्त ! इम पंचम काल के समय में भरत क्षेत्र का आकार भाव प्रत्यवतार-स्वरूप-कैसा कहा गया है इस गौतमके प्रश्न के उत्तर में प्रभु कहते है-“गोयमा बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे भविस्सइ, से जहाणामए आलिंगपुक्खरेइ वा પંચમ સ્મારકનું વર્ણન 'तीसेण समाए एक्काए सागरोवम'-त्यादि सूत्र-५३ ટીકાર્યું–તે કાળે જ્યારે ૪૨ હજાર વર્ષ કમ એક કેટ કેટી સાગરોપમ પ્રમાણુવાળે यतु ण समास थये। त्यारे धाम धाम "अणंतेहिं वण्णपजवेहिं तहेव जाव परिहाणोप परिहायमाणे" अन्त २डित व पर्यायान। यावत् अन्य पर्यायाना मनतवीय मायुभिन् । 'पत्थ णं दूसमाणाम समा काले पडिवजिस्सई' । भरतक्षेत्रमा हुषमा नामना પાંચમાં કાળ ને પ્રારંભ થશે. અહીં ભવિષ્યકાળને ઉલ્લેખ વક્તાની અપેક્ષાએ કરવામાં मावत छे. 'तीसेणं भंते समाए भरहस्स केरिसर आगारभावपडोयारे पण्णत्ते' महન ! આ પંચમ કાળના સમયમાં ભરતક્ષેત્રના આકાર ભાવ પ્રત્યકાર-સ્વરૂપ-કેવું કહેवामां भाव छ? गौतमना मानना पसमांछे-बहसमरमणिज्ने भूमि Page #463 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका.द्विवक्षस्कार सू. ५३ पञ्चमारकस्वरूपनिरूपणम् ४४९ (आलिंगपुक्खरेइ वा) आलिंङ्ग पुष्करमिति वा आलिङ्ग:-मुरजो वाद्यविशेषः, तस्य पुष्करं चर्मपुटं तदत्यन्तसमतलं भवतीति तत्तुल्यसमतलत्वात्तदेव इति । इति शब्दोहि साहश्यार्थकः वा शब्दः समुच्चयार्थकः, एवयग्रेऽपि (मुइंगपुक्खरेइ वा) मृदङ्गपुष्करमिति वा (जाव) यावत् इह यावत्पदेन 'सरतलेइ वा' इत्यादीनां सङ्ग्रहः ५१ एकपञ्चाशत्तमसूत्रे कृतस्तदनुसारेण बोध्यः, तेषां व्याख्या च तद्वत् (णाणामणिपंचवण्णेहि) नानामणिपञ्चवर्णैः नाना-नानाविधैः मणिभिः कीदृशैः पञ्चवर्णैः कृष्णनीलशुक्लहारिद्रलोहितः पुनः कोशैस्तै :(कित्तिमेहि चेव अकित्तिमे हि चेव) कृत्रिमैश्चैव अकृत्रिमैश्चैव रचितैः स्वाभाविकैश्च मणिभिरूपशोभितो भूमिभागो भरतवर्षस्य भविष्यतीति प्रयोगः पृच्छकापेक्षया, अत्र भूमेबहुसमरमणीयत्वादिकं चतुर्थारकतो हीयमान २ कालक्रमेणात्यन्तं हीनं बोध्यम्, ननु “खाणुबहुले विसमबहुले” इत्यादिनाऽधस्तनसूत्रेण लोकप्रसिद्धेन च विरुध्यते ___ मुइंगपुक्खरेइ वा जाव सरतलेइवा' हे गौतम उस समय में उस भरत क्षेत्र का भूमिभाग ऐसा अत्यन्त समतलबाला, रमणोय होगा जैसा कि वाद्यविशेष मुरज [मृदंग] का पुष्कर-चर्मपुट अत्यन्त समतल वाला होता है मृदङ्ग का मुख समतल वाला होता है. यहां "इति" शब्द सादृश्यार्थक है और "वा" शब्द समुच्चयार्थक हैं. इस तरह से इन शब्दों के सम्बन्ध में आगे भी जानना चाहिये. यहां यावत्पद से "सरतलेइवा" इत्यादि पद का संग्रह हुआ है. यह संग्रह ५१ वे सूत्र में किया गया प्रकट किया है. भरतक्षेत्र का यह भूमिभाग (णाणामणि पंच वण्णेहिं कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चेव) अनेक प्रकार के पांच वर्णों वाले कृत्रिम मणियों से एवं अकृत्रिम मणियों से उपशोभित होगा यहां पृच्छक की अपेक्षा से भी यह भविष्यकाल का प्रयोग हुआ है. यहां भूमिभाग में बहुसमरणीयता आदि चतुर्थ आरक की अपेक्षा होयमान हीयमान कालक्रम के अनुसार अत्यन्त हीन जाननीचाहिये. यहां ऐसो आशंका नहीं करनी चाहिये-"खाणु बहुले विसम बहु" इत्यादि सूत्र द्वारा पंचम काल में भरतक्षेत्र को भूमि स्थाणु बहुल आदि रूप भागे भविस्सइ ले जहा णामए आलिंगपुक्खरेइ वा मुइंगपुक्खरेइ चा जाव सरतले ) હે ગૌતમ તે સમયે આ ભરત ક્ષેત્રને ભૂ-ભાગ એ અત્યંત સમતલ, રમણીય થશે २वा वाचविशेष भु२४ (भृग) ना, पु०४२-यभट अत्यात समता डाय छे. भृह ગનું મુખ સામત હેય અહીં “ઈતિ” શબ્દ સાદસ્થાÈક છે અહીં “ઘ' શબ્દ સમુચ્ચયાર્થક છે. આ પ્રમાણે આ શબ્દોના સંબંધુંમાં આગળ પણ જાણવું જોઈએ. અહીં યાવત પદથી "सरतलेइवा" त्याहि पहनु भय थयुछे. सावन (५१) ॥ सूत्रमा यावत् पहथा अंडात सव' ५। ५४८ ४२वामां मावस छे. भरतक्षेत्र मा भूभिला (णाणामणि पंचवण्णेहि कित्तिमेहिं चैव अकित्तिमेहिं चेव) मन न पाय पवार. कृत्रिम मा એ તેમજ અકૃત્રિમ મણિઓથી ઉપબિત થશેઅહીં પૃચ્છકની અપેક્ષાએ પણ ભવિષ્ય ત્કાલને પ્રયોગ કરવામાં આવેલ છે. આ ક્ષેત્રના ભૂમિભાગની બહુમરમણીયતા વગેરે ચતુર્થ આરની અપેક્ષાએ હીયમાન કાલક્રમ મુજબ અિત્યંતહીન સંમજવી. અહી આ જાતની ४ वी न 'खाणु बहुले विसमबहुले" त्याहि सूत्र 3 ५यमणमा १२त Page #464 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे इति चेन्मैवम्- बहुलशब्देन स्थाणुकण्टकविषमतादीनां प्राचुर्यमुक्तं नहि पष्ठारक इवैकान्तिकत्वम् तेन क्वचिन्महानदीगङ्गादितटादौ महारामादौ वैताढय गिरो निकुळजादौ वा बहु समरमगोयत्वादिकमुपलभ्यते एवेति न विरोधः, अथ दुष्षमाकाल जातानां भरतवर्षीयमनुजानामाकारादिकान् निरूपयितुं संवदति (तीसे) तस्यामित्यादि प्राग्वत् नवरं (बहुईओ) बह्यः (रमणीयो) रम्य:- हस्ताः ऊर्वभुच्चत्वेन सप्तहस्तोन्नतत्वात्, यद्यपि कोषे रत्निशब्दो बद्धमुष्टिकहस्तार्थकस्तथापि स्वसिद्धान्तपरिभाषयात्र पूर्णहस्तपरो गृह्यते । ते मनुनाः (जहण्णेणं) जघन्येन अपकृष्टतया (अंतोमुहुत्तं) अन्तर्मुहूर्त्तम् (उक्कोसेणं) उत्कर्षेण उत्कृष्टतया (साइरेग) सातिरेकं किंश्चिदधिकसहितम् (वाससयं) वर्षशतम् शतं से वर्णित की गई है फिर यहां आप वहुसमरमणीय आदि पद द्वारा उसमें बहुसमरमणीयता का कथन कैसे करते हैं? क्योंकि सूत्र में बहुलपद प्रयुक्त हुआ है सो यह पद यह प्रकट करता है कि इस काल में स्थाणु कण्टक, विषमता आदि की प्रचुरता रहेगी. परन्तु छठे आरक की तरह यह इनकी प्रचुरता एकान्त रूप से यहां नहीं रहेगी इससे कहीं २ महानदी गाङ्गा आदि के तटादि में बड़े बड़े वगीचा आदि को में वैताब्यगिरि के निकुञ्जादिकों में बहसमरमणीयता भूमिभाग में उपलब्ध हो ही रही है. अतः प्रतिपादन में कोई विरोध जैसी बात नहीं है. अब इस काल में उत्पन्न हुए मनुष्यों का आकार निरूपण करने के निमित्त सूत्रकार कहते हैं. इसमें गौतम ने प्रभु से ऐसा पूछा है-(तीसेणं भंते समाए भरहस्स वासस्स मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते) हे भदन्त उस काल के भरतक्षेत्र के मनुष्यों का भाकारभाव प्रत्यवतार-संहनन, संस्थान, शरीर की ऊँचाई आदि-कैसा होगा इसके उत्तर में प्रभु कहते है । (गोयमा तेसिं मणुयाणं छबिहे संघयणे, छविहे संठाणे बहुईओ रयणीओ उद्धं उच्चतेणं जहणणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं साइरेगं वाससयं आउयं पालेति) हे गोतम उस समय के ક્ષેત્રની ભૂમિ સ્થાણુ બહુલ બાદિ રૂપથી વાત કરવામાં આવેલ છે તે પછી અહીં તમે બહુસમરમણીય વગેરે પર વડે તેમાં બહુ મરમણીતાનું કથન કેવી રીતે કરે છે ? કેમકે સૂત્રમાં બ પદ પ્રયુક્ત થયેલ છે. તે આ પદ આપાન સ્પષ્ટ કરે છે કે આ કાળમાં સ્થાણુ કંટક, વિષમતા વગેરેની પ્રચુરતા રહેશે. પણ છઠ્ઠા આરકની જેમ મા એમની પ્રચુરતા એકાંત રૂપમાં અહીં રહેશે નહીં. એથી યગ્ન-ચત્ર મહાનદી ગંગા વગેરેની તટાદિમાં મોટા મોટા બગીચાઓમાં, વૈતાઢયગિરિના નિકુંજાદિકમાં બહુસમરમણીયતા ભૂમિભાગમાં ઉપલબ્ધ થઈ જ રહી છે. એથી પ્રતિપાદનમાં કોઈ પણ રીતે વિરોધ છે એવું લાગતું નથી. હવે સૂત્રકાર આ કાળમાં ઉત્પન્ન થયેલા મનુષ્યના આકાર નિરૂપણ કરવાના હેતુથી કહે છે. આ समयमा गौतम असुन माम प्रश्न २ छ-(तीसे णं भंते ! समाए भरहस्स वासस्त मणुयाणं रिसए आयारभावपडोयारे पण्णत्ते) महन्त ! तणमा सस्तक्षेत्रमा भनध्याना આકાર ભાવ-પ્રત્યવતા૨-સે હનન, સંસ્થાના શરીરની ઉચાઈ વગેરે કવો હશે ? भी प्रा छ-(गोयमा! तेसि मणुयाणं छविहे संघयणे छविहे संठाणे बहुईओ रयणोमो उद्धं उच्चत्तेणं ज़हणेणं अंतो मुहुत्तं उक्कोसेणं साइरेगं वाससय आउयं पालेंति) Page #465 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कारः सू.५३ पञ्चमारकस्वरूपनिरूपणम् वर्षाणि किञ्चिदधिकानि (आउअं) आयुष्कम् आयुः (पालेति) पालयन्ति अनुभवन्ति (पालित्ता) पालयित्वा अनुभूयायुस्तत्र (अपाड्या) अप्ये कके केचित् (णिरयगामी) निरयगामिनः (जाव) यावत् अत्र यावत्पदेन- "तिर्यग्गामिनः, मनुष्यगामिनः देवगामिनः, अप्येकके सिध्यन्ति बुध्यन्ते मुच्यन्ते परिनिर्वान्ति" इत्येषां सङ्ग्रहो बोध्यः एतद्वथाख्याऽव्यवहितपूर्वकता ग्राह्या, (सव्वदुक्खाणमंतं) सर्वदुः स्वानामन्तं नाश (करेंति) कुर्वन्ति, पुनरपि दुष्षमायाः समायाः पश्चिमत्रिभागे निजज्ञाति प्रभृति धर्मव्युच्छेदनार्थमाह(तीसे) तस्याः दुष्षमायाः (ण) खलु (समाए) समायाः कालस्य (पच्छिमे) पश्चिमे पाश्चात्ये अन्तिमे (तिभागे) त्रिभागे भागत्रये अंशत्रितये (गणधम्मे) गणेधर्म समुदायधः मनुष्यों के ६ प्रकार का संहनन होगा छह प्रकार का संस्थान होगा-इत्यादिरूप से वह सब कथन पहिले कहे गये जैसा ही जानना चाहिये विशेष उनको सात हाथ की ऊँचाई वाला शरीर होगा यद्यपि कोष में बद्धमुष्टि हाथ को "रत्नि" शब्द से कहा गया है, फिर भी सिद्धान्त की परिभाषा के अनुसार यहां प्रे हाथ को ही रनि शब्द से पकड़ा गया है यहां के मनुष्य उस काल में जघन्य अन्तर्मुहूर्त की आयुवाले और उत्कृष्ट से कुछ अधिक १ सौ वर्ष की आयु वाले होगें इतनी आयु को भोगकर (अप्पेगइया) कितनेक मनुष्य (णिरयगामी) नरकगामी होंगे (जाव सव्वदुक्खाणमंतं करेंति) यावत्-कितनेक तिर्यग्गतिगामा होंगे कितनेक मनुष्यगतिगामी होंगे कितनेक देवगतिगामी होंगे, तथा कितनेक "मिध्यन्ति' सिध्दिपद को प्राप्त करेगे "बुद्धयन्ति" केवल ज्ञान से चराचर लोग का अवलोकन करेंगे "मुच्यन्ते" समस्त कर्मों से रहित हो जावेगें "परिनिर्वान्ति-शोतीभूत हो जावेगें और समस्त दुखों का अन्त करदेगें पंचम काल में जो जीवों के मुक्ति प्राप्त करने का यह कथन किया है वह चतुर्थ भारे में उत्पन्न हुए जीव का ही समझना चाहिये, पंचम आरे में उत्पन्न हुए जीवों का नहीं (तीसेणं समाए હે ગૌતમ ! તે કાળના મનુષ્યના ૬ પ્રકારના સંહનો હશે, ૬ પ્રકારના સંસ્થાને હશે, વગેરે રૂપમાં આ બધું કથન પહેલા જે પ્રમાણે કહેવામાં આવ્યું છે, તેમજ સમજી લેવું જઇએ. વિશેષ તેમનું સાત હાથની ઊંચાઈ વાળું શરીર હશે. જો કે કેશમાં બદ્ધ મુષ્ટિ હાથને “નિકહેવામાં આવેલ છે. પણ સિદ્ધાન્તના પરિભાષા મુજબ અહી આખા હાથને રવિન” શબ્દ વડે માનવામાં આવેલ છે. અહીંના મનુષ્યો તે કાળમાં જઘન્ય અન્તર્મહત્ત જેટલું આયુષ્ય ધરાવતા અને ઉત્કૃષ્ટ કરતાં કંઈક વધારે એક સો વર્ષ જેટલું આયુષ્ય ધરા वनाश, माटमआयुष्य सागवान (अप्पेगइया) टा: मनुष्य। (णिरयगामी) न२४भाभी थी. (जाप सव्वदुक्खाणमंतं करेंति) यावत् टस तिय गतिमी यशे, - ar भनण्यात भाभी यश. ४८४ गतिगामी यश तभन्दा सिरिता पहन प्रात ४२२. 'बुध्यन्ति" qण ज्ञानथा न्याय२ सानुमान ४२. "मच्यन्ते, सभथा २लित थशे. 'परिनिर्वान्ति शीतीभूत थ भने समस्त पानी અન્ત કરશે. પંચમકાળમાં જીવેડની મુક્તિ પ્રાપ્ત કરવા સંબધી જ આ કથન અત્રે સ્પષ્ટ કરવામાં આવેલ છે તે ચતુર્થ આરામાં ઉત્પન્ન થયેલ જીવો માટે જ સમજવું જોઇએ. Page #466 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे निजज्ञातिधर्मः (पासंडधम्मे) पाखण्ड धर्मः-शाक्या-दि धर्मः (राजधम्प्रे) राजधर्मः निग्र हातग्रहादि नृपधर्मः (जाय तेए) जात तेजाः अग्निः से हि अतिस्तिग्ने सुषमसुषमादौ अतिरूक्षे दुष्षमदुष्षमादौ च नोत्पद्यत इति, अग्नेरनुस्पादाद मिनिमितको रन्धनादि व्यवहारोऽपि (धम्मचरणे) धर्मचरणं चरणधर्म:- संयमरूपो धर्मः, सातत्यादत्र पदव्यत्ययः (अ) च चकाराद् गच्छव्यवहारोऽपि (वोच्छिज्जिस्सइ) व्युच्छेत्स्यते व्युच्छेदं प्राप्स्यति ब्युच्छिन्नो भविष्यति, सम्यक्त्वधर्मस्तु केषाञ्चित्सम्भवत्यपि, बिलवास्तव्यानां हि अतिक्लिष्टत्वेन चारित्रासम्भवः, अतएव प्रज्ञप्त्यामुक्तम्-. "ओसण्ण धम्मसन्नप्पभट्टा" इति 'अव सन्न धर्मसन्नप्रभृष्टाः इतिच्छाया धर्मासक्तिप्रभ्रष्टाःजना अवसन्नम् शिथिलं सम्यक्त्वं प्राप्नुवन्ति इत्यर्थः इति सम्यक्त्वं कचित्प्राप्यतेऽपि प्रायः इति पञ्चमो अरकः ॥ सू० ५३॥ ___ अथ षष्ठारकं निरूपयितुमुपक्रमतेमूलम-तोसे णं समाए एक्कवीसाए वाससहस्से काले विइक्कते अणंतेहिं वण्णपज्जवेहि गंधपज्जवेहिं रसपज्जवेहि फालपज्जवे हे जाव परि पच्छिमे तिभागे गणधम्मे पासंडधम्मे रायधम्मे जायतेए धम्म चरणे अच्छजिस्सइ). उस काल में पाश्चात्य विभाग में अंशत्रितय में -गणधर्म-समुदायधर्म-निजज्ञातिधर्म--पाखण्डधर्म-शाक्यादिधर्म-निग्रहानिग्रहादिरूप नृपधर्म, जाततेज-अग्नि, धर्माचरण-संया रूपधर्म, एवं गछन्यवहार यह सब व्युच्छिन्न हो लावेगा. अग्नि जब रहेगी नहीं तो अग्निनिमित्तक जो रन्धनादि व्यवहार है वह भी सब व्युच्छिन्न हो जावेगी. हां कितनेक जीवों के सम्यक्त्वरूप धर्म होता रहेगा. परन्तु बिलों में रहनेवालों के अतिक्लिष्ट होने के कारण चरित्र नहीं होगा, इस लये प्रज्ञापना में "ओसणं धम्मसन्नपब्भट्ठा" धर्मासक्ति से भ्रष्ट मनुष्य शिथिल सम्यक व को प्राप्त करते हैं ऐसा कहा गया है तात्पर्य कहने का यही है कि किन्हीं किन्हीं जीव के इस झाला में भी सम्यक्त्व प्राप्त होता रहेगा ॥ सू०५३॥ ५यम मारामा ५.1 थये । भाट म ४थन र ४२वाम. मस नथी. (तीसेणं समाए पच्छिमे तिभागे गणधम्मे पासंडधम्मे रायधम्मे जायतेए धम्मचरणे अवोच्छिन्जिस्सइ) a मां पाश्चात्य विभागमा मात्रतयi-गणु-मुदाय -निराशातिय पाम यम-॥४याधि-नहानिया३५ २ ५५भी, नत -मन, घाय२५-सय. મરૂપધર્મ અને ગુચછ વ્યવહાર એ સર્વેછિન્ન-વિચ્છિન્ન થઈ જશે. અગ્નિ જ્યારે રહેશે નહીં ત્યારે અગ્નિ નિમિત્તિક જે રન્ધનાદિ વ્યવહાર છે, તે પણ સંપૂર્ણ રૂપમાં છિન્ન-વિછિન્ન થઈ જશે. હા કેટલાક જીવ ને સમ્યકત્વ રૂપધમ થતું રહેશે. પણ બિલમાં રહેનારાઓ માટે Kaise हवा महल यात्रि शे. नहि. मेथी ४ प्रज्ञापनामा "ओसणं धम्मसन्न प्पभट्टा" धर्मासतिथी ब्रट मनुष्य शिथिल सभ्यइत्यने प्रात ४२ छ. माम मां पावर છે. તાત્પર્ય કહેવાનું આ પ્રમાણે છે કેટલાક અને તેને કાળ માં પણ સમ્યક્ત્વ પ્રાપ્ત થતું રહેશે. ૫૩ Page #467 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५३ प्रकाशिकाटीकाद्विवक्षस्कारसू. ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् होयमाणे२ एत्थणं दूसमदममाणामं समा काले पडिवज्जिस्सइ समणाउसो तीसे णं भंते समाए उत्तमकट्ठपत्ताए भरहस्स वासस्स केरिसए आयार भावपडोयारे भविस्सइ ? गोयमा ! काले भविस्सइ हाहोभूए भंभाभूए कोलोहलभूए समाणुभावेण य खरफरुसधूलिमइला दुव्विसही वाउला भयंकरा य वाया संवट्टगा य वाइंति इह अभिक्रवणं धूमाहिति अ दिसा समंता रउस्सला रेणुकलुसतमपडलणिरालोआ समयलुक्खयाए णं अहिअं चंदा सीअंमोच्छिहिंति अहिअ सूरिआ तविस्संति, अदुत्तरं च णं गोयमा! अभिक्खणं अरसमेहा विरसमेहा खारमेहा खत्तमेहा अग्गिमेहा विज्जुमेहा विसमेहा अजवणिज्जोदगा वाहिरोगवेदणोदीरणपरिणामसलिला अभगुण्णपाणिअगा चंडानिलपहततिक्खधाराणिवातपउरं वासं वसिहिति, जे णं भरहे वासे गामागरणगरखेडकब्बडमडंबदोणमुहपट्टणानगगयं जणवयं चउप्पयगवेलए खहयरे पक्खिसंधे गामारण्णप्पयारणिरए तसे अ पाणे बहुप्पयारे रुक्खगुच्छगुम्मलयवल्लेिपवालंकुरमादीए तणपणस्सइकाइए ओसहीओ अ विद्धं से हिंति पव्वयगिरि डोंगरुत्थलभट्ठिपादीए अ वेयड्वगिविज्जे विरावेहिंति, सलिलबिलविसमगणिण्णुण्णयाणि अगंगासिंधुवेज्जाइं समीकरेहिति, तोसे णं भंते! समाए भरहस्स पासस्स मूमीए केरिसए आगा रभावपडोआरे भविस्सइ ?, गोयमा! भूमी भविस्सइ इंगा लभूआ मुम्मुरभूआ छारिअभूआ तत्तकवेल्लुअभूआ तत्तसमजाइभूआ धूलिबहुला रेणुबहुला पंकबहुला पणयबहला चलणिबहुला बहणं धरणि गोअराण सत्ताणं दुण्णिक्कमायावि भविस्सइ । तोसेणं भंते ! समाए भरहे वासे मणुआणं केरिसए आयारभावपडोआरे भविस्तइ ?, गोयमा ! मणुआ भविस्संति दुरूवा दुबणा दुगंधा दुरसा दुकासा अगिट्ठा अकंता अप्पिा असुभा अमणुण्णा अमणामा हीणस्सरा दीणस्सरा अणिट्ठस्सरा अकंतस्सरा अपियस्सरो अमणामस्सरा अमणुण्णस्सरा अणादेज्जवयण. पच्चायाता णिल्लज्जा कूडकवडकलहबंधवेरनिरया मज्जायातिकमप्पहाणा Page #468 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बुद्धीपप्रज्ञप्तिसूत्र अकज्जणिच्चुज्जुया गुरुणिओगविणयरहिया य विकलरूवा परूढणहकेस. मंसुरोमा काला खरफरुससमावण्णा फुट्टसिरा कविलपलियकेसा बहुण्हा. रुणिसंपिणद्धदुइंसणिज्जरूवो संकुडिअवलीतरंगपरिवेढिअंगमंगा जरापरि. णयब थेरगणरा पविश्लपविसडिअदंतसेढी उभडघडमुहा विसमणयणवंक णासा वंकवली विगयभेसणमुहा ददुविकिटिभसिब्भफुडिअफरुसच्छवो चित्तलंगमंगा कच्छूरवसराभिभूआ खरतिक्षणक्खकंडूइअविकयतणू टोल गतिविसमसंधिबंधणा उक्कडुअट्टिअविभत्तदुबलकुसंघयणकुप्पमाणकुलेठिआ कुरूवो कुट्ठाणासणकुसेज्जकुभोइणो असुइणो अणेगवाहिपोडिअंगमंगा खलंत विब्भलगई णिरुच्छाहा सत्तपरिवज्जिया विगयचेट्टा णट्ठतेआ अभिक्खणं सीउण्हखरफरुसवायविज्झडिअमलिणपंसुरओ गुडि अंगमंगा बहुकोहमाणमायालोमा बहमोहा असुभदुक्खभागी ओसणं धम्मसण्णसम्मत्तपरिभट्टा उक्कोसेणं रयणिप्पमाणमेत्ता सोलसवीसइवासपरमाउसो बहुपुत्तणत्तपरियाल पणयबहुला गंगासिंधूओ महाणईओ वेयड्ढे च पव्वयं नीसाए बावत्तरि णिगोअबीअं बीअमेत्ता बिलवासिणो मणुआ भविस्संति, ते णं भंते! मणुआ किमाहारिस्सतिगोयमा! तेणं कालेणं तेणं समएणं गंगासिंधुओ महाणइओ रहपहमित्तवित्थराओ अक्खसोअप्पमाणमेत्तं जलं वोज्झिहिंति सेवि अ णं जले बहुमच्छकच्छमाईण्णे णो चेवणं आउबहुले भविस्सइ।तएणं ते मणुया सूरुग्गमणमुहुत्तंसि अ सूरस्थमणमुहुतंसि अ बिलेहितो णिद्धाइस्संति बिलेहितो णिद्धाइत्ता मच्छकच्छमे थलाई गाहेहिति मच्छकच्छभे थलाइं गाहेत्ता सीआतवतत्तेहिं मच्छकच्छभेहिं इक्कवीसं वाससहस्साई वित्ति कप्पेमाणा विहरिस्संति । ते णं भंते ! मणुआ णिस्सीला णिव्वया णिग्गुणा णिम्मेरा णिप्पच्चक्खाणपोसहोववासा ओसणं मंसाहारा मच्छाहारा खुड्डाहारा कुणिमाहारा कालमासे कालं किच्चा कहिं गच्छिहिंति कहिं उववज्जिहिति, गोयमा ! ओ बोझिहितिला ते मणुया सूखलहितो णि Page #469 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टिका० द्वि० वक्षस्कार सू० ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् सणं णरगतिरिक्खजोणिएसु उववज्जिहितिं । तीसे णं भंते समाए सीहा वग्धो बिगा दीविआ अच्छा तरस्सा परस्सरा सरभसियाल विराडसुणगा कोलसुणगा ससगा चित्तगा चिल्ललगा ओसणं अंसाहारा मच्छाहारा खोदाहारा कुणिमाहारा कालमासे कालं किच्चा कहिं गच्छिहिंति कहिं उववन्जिहिति ? गोयमा ! ओसणं णरंग-तिरिक्खजोणिएसु उववज्जिहिंति, तेणं भंते ! ढंका कंका पोलगा मग्गुगा सिही ओसण्णं मंसाहारा जाव काहे उववज्जिहिंति ? गोयमा ! ओसणं णरगतिरिक्खजोणिएसु जाव उवज्जिहिति ।।सू० ५४॥ छाया--तस्यां खलु समायामेकविंशत्या वर्षसहस्र (प्रमिसे) काले व्यतिक्रान्ते अनन्तैर्वर्णपर्यवर्गन्धपर्यवै रसपर्यवैः स्पर्शपर्यवैः यावत् परिही पमानः २ अत्र खलु दुष्षमदु. षमा नाम समा कालः प्रतिपत्स्यते श्रमणाऽऽयुष्मन् ! तस्यां खलु भदन्त ! समायामुत्तमकाष्ठाप्राप्तायां भरतस्य वर्षस्य कोदशकः आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यति, गौतम ! कालो भविष्यति हाहाभूतो भम्माभूतः कोलाहलभूतः समानुभावेन च खरपरुषधूलिमलिना दुर्विषहा व्याकुला भयङ्कराश्च वाताः संवर्तकाश्च वान्ति, इह अभीक्ष्ण २ धूमायिष्यन्ते दिशः समन्तात् रजस्वला रेणुकलुषतमःपटलनिरालोकाः समयरूक्षतया खलु अधिकं चन्द्राः शोतं मोक्ष्यन्ति अधिक सुर्यास्तप्स्यन्ति, अथोत्तरं च खलु गौतम ! अभीणमरसमेघा विरसमेघाः क्षारमेघा शुत्रमेघा अग्निमेधा विद्युन्मघा विषमेधा अयापनीयोदकाः व्याधिरागवेदनोदीरणा परिणामलिला अमनाशपानीका चण्डानिलपहततीक्णधारानिपातप्रचुरं वर्ष वर्षिष्यन्ति, येन भरतवर्षे ग्रामाकरनगरखेटकर्बटमडम्बद्रोणमुखपत्तनश्रमगतं जनपद चतुष्पद्गवेलकान् स्नचरान् पक्षिसंघान् ग्रामारण्य चारनिरतान् त्रसांश्च प्राणान् बहुप्रकारान् वृक्षगुच्छ गुल्मळतावल्लीप्रवालाकुरादिकान् तृणवनस्पतिकायिकान् ओषधोंश्च विधायष्यन्ति, पर्वतगिरिडुङ्गरोत्स्थलभ्राष्टादकान् च वैतादयगिरिवर्जान् विलापयिष्यन्ति, सलिलविलविषमगतनिम्नानतानि च गङ्गासिन्धुवर्जानि समीकरिष्यन्ति, तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरतस्य वर्षस्य भूमेः कीदृशक आकारभावप्रत्यवतारः प्रशप्तः?, गौतम ! भूमिभविष्यात अङ्गारभूता मुर्मुरभूता क्षारिकभूता तप्तकवेल्लुकभूता तप्त समज्योतिता धालबहुला रेणुबहुला पङ्कबहुला प्रणयबहुला चलनिबहुला बहूतां धरणि गोचाराणां सत्वानां दुनिष्क्रमा चापि भविष्यति, तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरते वर्षे मनुजानां कीहशक आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यात ?, गौतम! मनुजा भविष्यन्ति दूसरा दुर्वर्णा दुर्गन्धा दूरसा दुःस्पर्शा अनिष्टा अकान्ता प्रिया अशुभा अमनोज्ञा अमनोऽमा हीनस्वरा दानस्वरा अनिष्टस्वरा अकान्तस्वरा अप्रियस्वरा अमनोऽमस्वरा अमनोज्ञ स्वरा अनादेयवचनप्रत्याजाता निर्लज्जा कूटकपटकलहबन्धवैरनिरता मर्यादातिक्रमप्रधाना अकार्यनित्योद्यता गुरुनियोगविनय Page #470 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे हिताश्च विकलरूपाः परूढ नखकेशश्मश्रु रोमाणः कालः खरपरुषश्यामवर्णाः भ्रष्टशिरसः कपिलपलितकेशाः बहुस्नायुनि संपिनद्धदुर्दशनीयरूपाः सङ्कुटि (चि) त वलीतरङ्गपरिवेष्टिताङ्गाङ्गाः जरापरिगता इव स्थविरकनराः प्रविरलपरिषण्णदन्तश्रेणयः उद्भटघटामुखाः विषमनयनवक्रनासाः वक्रवलयः विकृतभीषणमुखा ददुविकिटिभसिध्मस्फुटितपरुच्छ्वयः चित्रलाङ्गाङ्गाः कच्छुकसरा (कण्डु विशेषा) भिभूताः खरतीक्ष्णनखकण्डूयित विकृततनवः टोलाकृति विषम सन्धिबन्धनाः उत्कटुकास्थि कविभक्तदुर्बल कुसं हनन कुप्रमाण कुसंस्थिता कुरूपा कुस्थानाSsसनकुशय्यकु भोजिनः अशुचयः अने कव्याधिपीडिताङ्गाङ्गास्वर्लाद्वह्वलगतयः निरुत्साहाः सत्वपरिवर्जिता विगतचेष्टाः नष्टतेजसः अभीक्षणं शीतोष्णखर परुषवातमिश्रित मलिनर्पासुरजोगुण्ठिताङ्गाङ्गाः बहुकाधमानमायालोभाः बहुमोहाः अशुभदुःखभागिनः अवसन्नं धर्मसंज्ञा सम्यक्त्वपरिभ्रष्टा उत्कर्षेण रत्नि प्रमाणमात्राः षोडशवि शतिवर्षपरमायुषः बहुपुत्रनत्पृपरिवारप्रणयबहुलाः गङ्गासिन्धूमहानद्यो वैताढ्य च पर्वतं निश्रया द्वासप्ततिः निगोदा बीजे वीजमात्राः बिलवासिनो मनुजा भविष्यन्ति ते खलु भदन्त मनुजा किमाहरिष्यन्ति ?, गौतम ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये गङ्गासिन्धूमहानद्यौ रथपथमात्र विस्तारे अक्षस्रोतः प्रमाणमात्रं जलं वक्ष्यत्तः तदपि च जलं बहुमत्स्यकच्छपाकीर्णम् नैव खल्वप् बहुलं भविष्यति ततः खलु ते मनुजा सूरास्तमनमुहूर्त्ते च विलेभ्यो निर्धाविष्यन्ति विलेभ्यो निर्धाव्य मत्स्यकच्छपान् स्थलानि ग्रहिष्यन्ति मत्स्यकच्छपान स्थलानि ग्राहयित्वा शीतातपतप्तैः मत्स्यकच्छपैरेकविंशतिं वर्षसहस्त्राणि वृत्तिं कल्पयन्तो विहरिष्यन्ति । ते खलु भदन्त ! मनुजाः निः शीलाः निर्वताः निर्गुणाः निर्मर्यादाः निष्प्रत्याख्यान पोषधोपवासाः अवसन्नं मांसाहाराः मत्स्याहाराः क्षौद्राहाराः कुणपाहाराः कालमासे कालं कृत्वा क्व गमिष्यन्ति क्व उपपत्स्यन्ते?, गौतम ! अवसन्नं नरकतिर्यग्योन्योरुपपत्स्यन्ते । तस्यां खलु भदन्त ! समायां सिंहाः व्याघ्राः वृकाः द्वीपिकाः ऋक्षाः तरक्षाः पराशराः (खङ्गिनः) शरभशृगालविडालश्वानः (शुनकाः) कोल शुनकशशकाः चित्रकाः बिल्ललकाः (श्वापदाः) अवसन्नं मांसाहाराः मत्स्याहाराः क्षौद्राहाराः कुणिपाहाराः कालमासे कालं कृत्वा क्व गामिष्यन्ति क्व उपपत्स्यन्ते १, गौतम ! अवसन्नं नरकतिर्यग्योन्योरुपपत्स्यन्ते !, ते खलु भदन्त ! डङ्काः कङ्काः पिलकाः मद्गुकाः शिखिनः अवसन्नं मांसाहाराः यावत् क्व गमिष्यन्ति क्व उपपत्स्यन्ते ?, गौतम ! अवसन्नं नरकतिर्यग्योन्योः यावत् उपपत्स्यन्ते ॥ सू० ५४ ॥ टीका- “ती से णं समाए" इत्यादि - तस्यां दुष्षमायां खलु समायां 'काले अब छट्टा आरक का प्रारम्भ करते हैं 'ती सेणं समाए एक्कवीसार वाससहस्सेहिं' इत्यादि सूत्र - ५४ टीका - अवसर्पिणी का दुष्षमा नामका पाँचवां आरक जो कि २३ हजार वर्षका कहा --- હવે છઠ્ઠા આરાના પ્રારંભ કરીએ છીએ. 'ती सेणं समाए एक्कवीसाए वाससहस्सेहिं' इत्यादि सूत्र - ५४ ટીકા-અવાણીને દુખમાનામક પાંચમા આરક કે જે ૨૧ હજાર વર્ષ જેટલે Page #471 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कारः सू.५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् ४५७ एकवीसाए, एकविंशत्या एकविंशतिसंख्यकैः ( वाससहस्सेहिं) वर्षसहस्रैः प्रमिते (काले ) काले समये (विकते) व्यक्तिक्रान्ते व्यतीते (अनंतेहिं) अनन्तैः निरवधिकैः (वण्णपज्जवेहिं ) वर्णपर्यवैः वर्णपर्यायै ( गन्धपज्जवेहिं ) गन्धपर्यवैः गन्धपर्यायैः (रसपज्जवेहिं ) रसपर्यवैः सपर्यायैः (फासपज्जवेहिं) स्पर्शपर्यवैः स्पर्शपर्यायैः (जाव) यावत् अत्र यावत्पदेन (अणं तेहि संघयणपज्जवेहिं अणतेर्हि संठाणपज्जवेहिं अणंतेहि उच्च तपज्जवेहि अणंतेहिं अगुरुलहुज्जवेहिं अणंतेहिं उद्वाणकम्मबलवारिअरिसक्कार परक्कम पज्जवेर्हि अनंतगुणपरिहाणीए) एषां पदानां सग्रहो बोध्यः एतच्छाया - अनन्तैः संहननपर्यवैः अनन्तैः संस्थानपर्यवैः अनन्तैरुच्च त्वपर्यवैः अनन्तैरायुपर्यवैः अनन्तैर्गुरुलघुपर्यवैः अनन्तैरुत्थानकर्मबलवीर्य पुरुषकार पराक्रमपर्यवैः अनन्तगुणपरिहान्या इति एतदीयोऽर्थः द्वितीयार के सुषमाकालवर्णनप्रसङ्गे उक्त इति ततो ग्राह्यः (परिहायमाणे २) परिहीयमानः २ हानिं गच्छन् २ काल उपस्थितो भवति, ( एत्थ ) अत्र अत्रान्तरे (णं) खलु (दुसमदुसमा ) दुष्षम दुष्षमा एतन्नाम्नी (णामं ) नाम प्रसिद्धा (समा) समो काळ अमुमेवार्थ स्पष्टीकर्तुमाह (काळे) कालः समयः (पाडिवज्जिस्सइ) प्रतिपत्स्यते उपस्थास्यति (समणाउसो) श्रमणाssयुष्मन् ! हे श्रमण हे आयुष्मन् ! (तीसे) तस्यां दुष्षमदुष्पमायां (णं) खलु (भंते ) भदन्त हे महानुभाव ( समाए) समायां कालापरपर्यायाम् यद्वा । ( उत्तमकट्टपत्ताए) इत्यस्य उत्तमकष्टप्राप्तायाम् इतिच्छाया तत्पक्षे परमकष्टप्राप्तायाम् इत्यर्थः (भरहस्स) भरतस्य भरत - है जब व्यतीत हो जावेगा और कालक्रम से (अणतेहिं वण्णपज्जवेहिं गन्धपज्जवेहिं रसपज्जवेहि फासपज्जवेहिं जाव परिहायमाणे २ एत्थणं दूसमदूममाणामं समा काले पडिवज्जिस्सइ समणाउसो) अनन्तवर्णपर्यायें, अनन्त गन्धपर्यायें, अनन्त रसपर्यायें अनन्तस्पर्श पर्यायें, और यावत्पदग्राह्य (अणतेहि संघयणपज्जवेहिं, अणंतेर्हि संठाणपञ्जवेहिं) अनन्त संहनन पर्यायें, अनन्त संस्थानपर्यायें, (अहिं अगुरुलहुज्जवेहिं अणंतेहिं उट्ठाणकम्मबलवीरियपुरिसक्कार परक्कमपज्जवेहिं अनंतगुणपरिहाणीए) अनन्त अगुरुलघुपर्यायें अनन्तउत्थान कर्म, बल, वीर्य पुरुषकार पराक्रम पर्यायें अनन्तगुणरूप से घटती जावेगी तब हे श्रमण आयुष्मन् ! दुष्षमदुष्षमा नामका छट्टा आरा प्रारम्भ हो जावेगा (तीसे णं भंते समाए उत्तमकट्टपत्ताए भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभाव - वामां आवे छे. न्यारे व्यतीत थर्म नशे भने असमथी (अणतेहिं वण्णपज्जवेहि गन्धपज्जवेहिं रसपज्जवेहिं फासपज्जवेहिं जाव परिहायमाणे २ पत्थणं दूसमदूसमा णामं समा काले पडिवज्जिस्सह समणाउलो) न्यारे अनंतवर्थ पर्याय अन अन्धपर्याय, अनंतरस पर्यायो, अनंत स्पर्श पर्यायाने यावत्पाद्य (अणंतेहिं संघयणपज्जवेहिं अणतेहि संठाणपज्जवेहि) अनंत सडनन पर्याय अनंत संस्थान पर्याय, ( अणतेर्हि अगुरुलहुज्जवेहिं अणतेहि उठाणकम्मबलवीरियपुरिसक्कार परक क्रमपज्जवेहिं अनंत गुणपरिक्षाणीप) अनंत अगुरुलघु पर्याय। अनंत र उत्थानउर्भ, जणवीर्य, पुरुषार पराभ પાઁયા અનંત રૂપમાં ઘટિત થતા જશે ત્યરિ હું શ્રમણ આયુષ્માન્ ! દુષ્કર્મ દુષ્ટમાનામક छठ्ठो भारे। आरंभ थशे, "तीलेणं भंते ! समाए उत्तम कट्टपत्ताप भरदस्त वासस्ल फेरि ५८ Page #472 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५८ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे नाम्नः (वासस्स) वर्षस्य (केरिसए) कीदृशकः कीदृश (आयारभावपडोयारे) आकारभावप्रत्यवतारः प्रागुक्ताथेकमिदम् (भविस्सइ) भविष्यति अस्य प्रश्नस्योत्तरं भगवानाह(गोयमा) गौतम (काले) कालः (भविस्सइ) भविष्यति स कीदृशः इत्याह (हाहाभूए) हाहाभूतः हाहेत्याकारकं दुःखार्तलोकैः क्रियमाणं शब्दं भूतः प्राप्तः भू प्राप्तावात्मनेपदोतिभूधातोः क्त प्रत्ययान्तोऽयम्, स पुनः (भंभाभूए) भम्भाभूतः भम्भा-भेरी सेव भूतः जातः जनक्षयहेतुकशून्यत्वात् भेरीसदृशान्तःशून्यःस पुनः (कोलाहलभूए) कोलाहलभूतः कोलाहलम् आर्तपक्षिरुतं भूतः प्राप्तस्तथा (समाणुभावेण) समानुभावेन समा-काल विशेष: तस्यानुभावः सामर्थ्यम् समानुभावस्तेन तथा कालविशेषप्रभावेन (अ) च चशब्दोऽत्र वाच्यान्तरसूचनार्थः(खरफरुसधूलिमइला) खरपरुषधूलिमलिनाः खरेषु कठोरेषु परुषाः कठोरा खरपरुषा परमकठोरा ते चतेधूलिमलिनाः धूलिभिः रजोभिः मलिनाः मलाकुलाः वाताः इत्यग्रेतनेनान्वयः ते कीदृशाः ? इत्याह (दुविसहा) दुर्विषहा अतिदुः सहाः तथा (वाउला) व्याकुलाः व्याकुलयन्तीति व्याकुलाः व्याकुलोकारकाः अतएव (भयंकरा)भयङ्कराः भयोत्पादकाः य च (वाया) वाता: वायव (संवट्टगा) संवर्तकाः तृणकाष्ठादीनामेकदेशाद्देशान्तरे स्थापकाः (य) च वाता इति पूर्वेण सम्बन्धः (वाइंति) वान्ति गच्छन्ति इह (इह) आस्यां यडोयारे भविस्सइ) हे भदन्त इस अवसर्पिणीकाल के इस दुष्षम दुष्पमानामके फालके समय में जब कि यह अपनी उत्कृष्टस्थिति भी आ जावेगा भरत क्षेत्र का आकार भाव प्रत्यवतार-स्वरूप कैसा होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में प्रभु श्री कहते हैं-(गोयमा ! काले भविस्सइ हाहाभूए भंभा. भूए, कोलाहलभूए, समाणुभावेण य खरफरुसधूलिमइला दुन्विसहा वाउला भयंकरा य वाया संवाय वाइंति) हे गौतम ! यह काल ऐसा होगा कि इसमें दुःख से त्रस्त हुए लोक हाहाकार करेंगे मेरी की तरह यह काल जनक्षय की हेतु भूत होने के कारण भीतर में शून्य रहेगा यह कोलाहलभूत होगा ऐसा ही इसकाल का प्रभाव कहा गया है इस में जो वायु वहेगा वह कठोर से कठोर होगा धूलि से मलिन होगा, दुर्विषह-दुःख से सहन करने योग्य-होगा, व्याकुलता का उत्पादक होगा भयप्रद होगा इस वायु का नाम संवर्तक वायु होगा-क्योंकि यह तृणकाष्ठादिको एक देश से देशान्तर में पहुंचाने वाला होगा (इह अभिक्खणं धुमाहितिअदिसा समंता र उस्सला पडोयारे भविस्सइ' मत ! मा भवसा ना मा हाम ૮૫માં નામના કાળના સમયમાં જ્યારે આ પોતાના ઉત્કૃષ્ટસ્થિતિ સુધી પહોંચી જશે ત્યાર ભરતક્ષેત્રને આકાર ભાવ પ્રત્યવતાર–સ્વરૂપ કેવા હશે ? આ પ્રશ્નના જવાબમાં પ્રભુ छ-(गोयमा ! काले भविस्सइ हा हा भूए भंभाभूए कोलाहलभूए, समाणुभावेण य स्वर फरुस लिमइला दुब्विसहा बाउला भयंकरा य वाया संवट्टगाय वाइंति) गीतम એ કાળ એ થશે કે એમાં દુઃખથી સંત્રસ્ત થયેલા લોકો હાહાકાર કરશે ભેરીની જેમ એ કાળ જનક્ષયને હેતુભૂત હવાબદલ ભીતરમાં શૂન્ય રહેશે. એ લાહલભૂત થશે એવો જ આ કાળના પ્રભાવ કહેવામાં આવેલ છે. એમાં જે વાયુ વહેશે તે કઠોરમાં કઠોર હશે, ધૂલિથી માલન હશે. દુર્વિસહ-દુઃખથી સહ્ય હશે. વ્યાકુળતા ઉત્પન્ન કરે તે હશે, ભયપ્રદ હશે. આ વાયુનું નામ સંવર્તક વાયુ હશે. કેમકે એ તૃણુ-કાઠાદિકેને એક દેશમાંથી Page #473 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका.द्विवक्षस्कार सू. ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् ४५९ दुप्पमदुष्षमायां समायाम् (अभिक्खणं) अभीक्ष्णमभीक्ष्णम् वारंवारम् (धूमाहिति) धृमायिव्यन्ते धृममुगिरिष्यन्ति (अ) च (दिसा) दिशाः कीदृश्यो दिशः ? (समंता रउस्सला) समन्ताद् रजस्वला सर्वतो रजोयुक्ताः तथा (रेणुकलुसतमपडलणिरालोआ) रेणुकलुषतमपटलनिरालोकाः रेणुभिः रजोभिः कलुषाः म्लानाः अतएव तमःपटलनिरालोकाः तमःपटलेन अन्धकारसमूहेन निरालोकाः प्रकाशवर्जिताः । तथा अस्यां दुष्षमदुष्षमायां समायां (समयलुक्खयाएणं) समय रुक्षतया समयस्य कालस्य रुक्षतया खलु-निश्चयेन(अहियं) अधिकं प्रचुरम् अपथ्यं वा (सीयं)शीतं-हिमं(चंदा) चन्द्राः (मोच्छिहिति) मोक्ष्यन्तिपातयिष्यन्ति वर्षयिष्यन्ति तथा (अहियं) अधिकम् अहितं वा यथा स्यात्तथा (सूरिया) सूर्याः (तविस्सति) तप्स्यन्ति तापं मोक्ष्यन्ति । अयं भावः-कालरौक्ष्येण जीवानां शरीराणि रूक्षाणि भविष्यन्ति, ततश्च तेषां जोवानां शीतोष्णजनितोऽधिकः पराभवो भविष्यतीति । अथ पुनर्यद दुष्पमदुष्षमायां समायां भविष्यति तदाह-(अदुत्तरं) इत्यादि। (अदुत्तरं च णं) अथोत्तरम् एतदनन्तरम् अग्रेच खलु (गोयमा) हे गौतम ! (अभिक्खणं) अभीक्षण-पुनः पुनः (अरसमेहा) अरसमेधाः-अरसा:-रसरहिताश्च ते मेघाश्चेति, स्वादुरसवर्जितजलवर्षिमेघा रेणुकलुसतमपड़लणिरालोआ समयलुक्खयाएणं अहिअं चन्दा सीअं मोच्छिहिति, अहिअं सुरिमा तविस्संति) इस दुष्षमदुषमा काल में दिशाएँ निरन्तर धूमके जैसीप्रतीत होगी अर्थात् दिशाएँ धमका वमन करनेवाली होगी चारों ओर से इनमें धूलि धूलि ही छाई रहेगी इस कारण वे अन्धकार से युक्त होने के कारण प्रकाश से रहित बन जायेगी तथा इस दुष्षम दुष्षमाकाल में काल के अनुसार रुखापन होने के कारण (अहियं सीअं चंदा.) अधिक मात्रा में या अपध्यरूप में अर्थात् सहन न की जासके इस रूप में हिम की वर्षा चन्द्र करेंगे सूर्य इतनी अधिक उष्णता की वर्षा करेंगे कि जिसे सहन करना बड़ा भारी कठिन हो जायगा तात्पर्य यह है काल की रूक्षता के निमित्त से जीवों के शरीर रूक्ष होगें. अतः शीत और उष्ण की अधिकता से जीवों को महान् कष्ट का सामना करना होगा. (अदुत्तरं) इसके वाद (गोयमा !) हे गौतम (अभिवणं) देशान्तरमा पाडयाना२ शे. (इह अभिक्खण धूमाहितिअदिसा समंता रउस्सला रेणुकलु सतमपडलणिरालोमा समयलुक्याएणं अहियं चंदा सीअं मोच्छिहिंति अहिले सरिआ तविस्संति)ो हुभ हुभामilgunमो सतत धूम-२वीप्रतीत थरी थेट ધૂમનું વમન કરનારી થશે. ચોમેર એમાં ધૂળ જ છવાઈ રહેશે. એથી તે અંધકારાવૃત્ત થવાથી પ્રકાશ રહિત થઈ જશે તથા એ દુષમ દુષમકાળમાં કાળ મુજબ રૂક્ષતા હોવા બદલ (अहियसीयं चंदा.) मधिमात्रामा अथवा म५थ्य३५i मेट सहन न थ थे રૂપમાં ચન્દ્ર હિમવર્ષા કરશે. સૂર્ય એટલી બધી માત્રામાં ઉષ્ણુતાની વર્ષા કરશે કે તે અસહ્ય થઈ પડશે. તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે કાલની રૂક્ષતાને લીધે જીવોના શરીર રૂક્ષ થશે એથી शासन मन्ने ४ पाथी ७वान महान् ४०८ यशे.(अदुत्तरं) त्या२ मा (गोयमा . Page #474 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रशप्तिसूत्रे इत्यर्थः, (विरसमेहा) विरसमेघाः-जलीयरसविरुद्धरसयुक्तजलबर्षिमेघाः, अमुमेवार्थ स्पष्टप्रतिपत्तये प्राह-(खारमेहा) क्षारमेघाः सर्जादिक्षारसदृशरसयुक्तजलवपिमेघाः(खत्तमेहा) खात्रमेघाः-कारीषरसमयजलवर्षिमेघाः(अग्गिमेहा) अग्निमेघाः-अग्निवहाहकारिजलवर्षिमेघाः (विज्जुमेहा) विद्युन्मेधाः-विद्युत्पातकारिणो मेघाः (विसमेहा) विषमेघाः-विषवत्प्राणघातकजलवार्षिमेधाः (अजवणिज्जोदगा) अयापनीयोदकाः अयापनीयं-निर्वाहायोग्यम् उदकं-जलं येषां ते तथा निर्वाहायोग्यजलवषिणो मेघाः, (वाहिरोगवेदणोदीरणपरिणामसलिला) व्याधिरोगवेदनोदोरणपरिणामसलिला:-व्याधयः चिरकालघातिनः कुष्ठादयः रोगाः -सद्योघातिनःशूलादयः' तज्जनिता या वेदना-व्यथा, तस्या उदीरणम्-अमाप्तेऽपिसमये उदयावलिकायां प्रवेशनं तदेव परिणामः-परिपाको यस्य तादृशं सलिलं जलं येषां तथा व्याध्यादिकारि जलवर्षका मेघाः, अतएव (अमणुण्णपाणिअगा) अमनोज्ञपानीयका:-अम नोज्ञम् अरुचिरं पानीयकंजलं येषां ते-अरुचिजलवर्षिणो मेघाः, एवंविधाः सर्वे मेघाः (चंडानिलपहततिक्वधारा-णिवायपाउरं) चण्डानिलप्रहततीक्ष्णधारा-निपात-प्रचुरम्चण्डानिलेन-प्रचण्डवायुना प्रहतानां प्रकीर्णानां विक्षिप्तानां तीक्ष्णधाराणां-बलवद्धाराणां यो निपातः निपतनं, स प्रचुरो=बहुलो यस्मिन् स तथा तम्(वासं)वर्ष-वृष्टि(वासिहिति) वर्षिष्यन्ति । अनेन वर्षणेन यद् भविष्यति तदाह 'जेणं भरहे' इत्यादि । (जे णं)येन वर्षबार बार (अरसमेहा विरसमेहा खारमेहा स्वत्तमेहा अम्गिमेहा विज्जुमेहा विसमेहा अजवणिज्जोदगा) स्वादुरसवर्जित जलवर्षीमेघ-जलीय रस से विरुद्ध रसयुक्त जलवर्षी मेघ, खारमेघ-सर्जादिसार सदृश रसयुक्त जलवर्षीमेघ खारमेघ कारीषरस सदृश नलवर्षी मेघ अग्निमेघ-अग्नि तुल्य दाहकारी जलवर्षी मेघ, विद्युत्मेघ-विद्युत्पात कारी मेघ, विषमेघ विषके जैसे प्राणघातक जल वरसानेवाले मेघ, निर्वाह के अयोग्य जल को वरसानेवाले अयापनीयोदक मेघ, (वाहिरोगवेदणोदीरणपरिणामसलिला) असमय में चिर कालघाती कुष्ठादिक रोग रूप परिणामोत्पादक नल वाले मेघ, सद्योपाती शूलादि वेदनाकारक जलवाले मेघ कि जिनका (अमणुण्णपाणि अगा) पानी अरुचि कारक होगा-ऐसे अरुचिकारक नल को वरसाने वाले मेघ, ऐसी वर्षा करेंगे गीतम! (अभिक्खणं) पारा२ (अरसमेहा घिरसमेहा खारमेहा खत्तमेहा अग्गिमेहा विज्जुमेहा विसमेंहा अजवणिजोदगा) २१दुरसति rahषी भा-neीय रसथी खि રસયુક્ત જલમે, ખારેમેઘા-સાદિ સારસદશ રસયુક્ત જલવષી મેઘા, ખારમે-કારીષ રસસદશ જલવષી મેઘ, અગ્નિ મેઘ-અગ્નિતુલ્ય દાહકારી જલવષી મેઘા, વિધુભેઘ-વિદ્યત્યાત કારી મે, વિષમેઘે-વિષ જેવી પ્રાણુ ઘાતક જલવૃષ્ટિ કરનારા મેઘો નિર્વાહ-અગ્ય rance ४२ना२। अयापनायो मधे(वाहिरोगवेदणोदीरणपरिणामसलिला)समयमा (५२. કાળ ઘાતી કુઠાદિક રોગરૂપ પરિણામોત્પાદકજલયુક્ત મે, સોઘાતી શૂલાદિ વેદના ક રક सयुक्त भेधा, मनु (अमणुण्णपाणि अगा) पाली अ४ि थशे, सेवा (५४८२४ જલવૃષ્ટિ કરનારા મેઘા, એવી વર્ષા કરશે કે જેમાં વૃષ્ટિધારા પ્રચંડ પવનના આઘાતેથી Page #475 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीकाद्विवक्षस्कारसू. ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् णेन पूर्वोक्ता मेघा(भरहे वासे)भारते वर्षे (गामागर-णगर-खेड-कब्बड-मडंब-दोणमुह-पट्टणासम-गयं)ग्रामाकरनगर-खेट-कर्बट-मडम्ब-द्रोणमुख-पट्टना-श्रम-गतं, तत्र -ग्रामो-वृतिवेष्टितः आकरः-सुवार्णरत्नाधुत्पत्तिस्थानम्, नगरम्-अष्टादशकरवर्जितम् खेटं धूलि-प्राकारपरिक्षिप्तम कवटम्-कुत्सितनगरं, मडम्ब-सार्धक्रोशद्वयान्तग्रीमान्तर हितम, द्रोणमुखं जळस्थलपथोपेतो जननिवासः पत्तनं समस्तवस्तुप्राप्तिस्थानम्, तद् द्विविधं जलपत्तनं स्थलपत्तनं चेति, निगमः प्रभूततरवणिग्जननिवासः आश्रमः यः पूर्व तापसैरावासितः पश्चादपरोऽपि जनो यत्रागत्य वसति सः, एतेषां द्वन्द्वः, तत्रगतं स्थितं (जणवयं) जनवज-जनसमूह विध्वंसयिष्यन्तीत्यग्रेण सम्बन्धः। तथा-ग्रामादिगतान् (चउप्पय-गवेलए)चतुष्पदगवेलकान् चतुष्पदा महिष्यादयः गाव:-गोजातीयाः पशवः, एलका:-मेषास्तान् तथा(खहयरे) खेचरान् वैताव्यवासिनो विद्याधरान् पुनः(पक्खिसंघ) पक्षिसंघान् पक्षिसमूहान् अथवा(खह यरे पक्खिसंघ)खेचरान् पक्षिसंघान-आकाशचारिणः पक्षिसमूहान् तथा(गामारण्णपयारणिकि जिस में जल की धारा प्रचण्ड पवन की चपेटों से इधर उधर विस्वर जावेगी और जनों की ऊपर तीक्ष्ण विशिष्ट आधातों को वह करानेवाली होगी (जे णं भरहे वासे, गामागरणगरखेडकब्बडमंडबदोणमुहपट्टणासमगयं जणवयचउप्पयगवेलए वहयरे पक्खिसंघे) इस वृष्टि से भरत क्षेत्र में स्थित वृतिवेष्टित ग्रामों में, आकर-सुवर्णादिकी स्वानों में अष्टादश करवर्जित नगरों मे, धुलि प्राकार परिक्षिप्त खेटों ग्रामों में, कुत्सितनगर रूप कर्बटों में अढाइ कोश के भीतर २ ग्रामान्तर रहित मडम्बों मे, जलीय मार्ग से युक्त जननिवासरूप द्रोणमुखों में समस्त वस्तुओं की प्राप्ति के स्थान भूत पत्तनों में-जह पत्तों में एवं स्थलपत्तनों में दोनों प्रकार के पत्तनों में, प्रभुततर वणिग्जनों के निवासभूत निगमो में पूर्व में तापसजनों द्वारा आवासित पश्चात् और दूसरे जन जहां आकर रहने लग गये हैं , ऐसे स्थानरूप आश्रमों में रहने वाले मनुष्यों का वे मेघ विनाश करेंगें । तथा उन ग्रामादिकों में रहे हुए चतुष्पदों का महिषी आदिकों का गोजातीय पशुओंका एलकों-मेषों का खेचरो-वैताब्यगिरिवासी विद्याधरों का (पक्खिसंघे) पक्षिसमूहो का अथवा આમ તેમ વેરાઈ જશે. અને તે લાકે ઉપર તે તીણ વિશિષ્ટ આપઘાત કરનારી થશે. (जे णं भरहे वासे, गामागरणगरखेडकब्बडमडंबदोणमुहपट्टणासमगयं नणवयचउप्पयगवेलए खहयरे परित्रसंघ) मा वृष्टिया भरतक्षेत्रमा स्थित वृत्ति albटत आमामा, मा४२ सुत्रદિની ખાણમાં, અષ્ટાદશ કરવજિત નગરોમાં, ઘેલિ પ્રાકાર પરિક્ષિત ખેટ ગ્રામમાં, કુત્સિત નગર રૂપ કMટેમાં, અઢી ગાઉનિ અંદર ગામાન્તર રહિત મડબામાં, જલીય માગથી યુક્ત જનનિવાસ રૂ૫ દ્રોણમુખમાં, સમસ્ત વસ્તુઓની પ્રાપ્તિના સ્થાન ભૂત પત્તનમાં, જલપત્તનેમાં અને સ્થલ પત્તનોમાં–અને પ્રકારના પત્તામાં, પ્રભૂતતર વણિજનેના નિવાસબૂત નિગમામાં, પહેલાં તાપજને દ્વારા આવાસિત અને તપશ્ચત બીજા લેકે જ્યાં લાગ્યા હોય એવા સ્થાન રૂપ આશ્રમમાં રહેનારા માણસને તે મેઘે વિનાશ કરશે તેમજ તે ગ્રામા દિકમાં રહેનારાં ચતુષ્પદેના માહિષી વગેરેનો, જાતીય પશુઓને, અલકમેને– मेय-वैतान्यगिरि निवासी विद्याधराने। (पक्विसंधे) पक्षी-सभूडानी मथवा मास Page #476 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे रए तसे अ पाणे बहुप्पयारे) ग्रमारण्यप्रचारनिरतान् साँश्च प्राणान् बहुप्रकारान् ग्रामेषु अरण्येषु च यः प्रचारः-संचारस्तत्र निरतान्=तत्परान् बहुप्रकारान्=अनेकविधान त्रसान् प्राणान् द्वीन्द्रियादीन् प्राणिनश्च तथा(रुक्ख-गुच्छ-गुम्म लय-वल्ली पवालं-कुरमादीए)वृक्ष:गुच्छ गुल्म-लय-वल्लिप्रवालाङ्कुरादिकान् , तत्र वृक्षाः-आम्रादयः गुच्छाः वृन्ताकीप्रभृतयः गुल्मा:-नवमालिकादयः, लता-अशोकलतादयः, वल्लयः वालुङ्कयादयः प्रवालाः प्रवाला: पल्लवा:अङ्कराः शाल्यादीनाम् अभिनवोद्भेदा:एते आदौ येषां ते तथा तान् वृक्षाधङकुरान्त प्रभृतोन(तणवणस्सइकाइए) तृणवनस्पतिकायिकान् तृणवद् वनस्पतयः तृणवनस्पतयः, त एव काया:-शरीराणि ते विद्यन्ते येषां ते तथा तान् बादरवनस्पतिकायिकान् तृणसाधयं चात्र बादरत्वेन, सूक्ष्माणां तेषां तैरुपधातासंभवादिति, तथा (ोलहो भो य) ओषधीः शाल्यादिरूपाश्च (विद्धं सेहिति) विध्वंसयिष्यन्ति-नाशयिष्यन्ति । तथा-ते मेघाः(वेयड्ढगिविज्जे) पर्वतगिरिडुंगरोत्स्थलभ्राष्टादिकान्-तत्र पर्वतनतात्-उत्सव विस्तारणात् पर्वताः क्रीडापर्वताः गृणन्ति-शब्दायन्ते जनं निवासभूतत्वेनेति गिरयः डुङ्गानि धूल्युच्छ्यरूपाणि भ्राष्ट्राः पांस्वादिवर्जितभूमयः तत एतेषां द्वन्द्वे ते अदिर्येषान्ते तथा तान् आदि शब्दात् प्रासादशिखरादि परिग्रहः वैतव्यगिरिवर्जान शाश्वतान् वैताख्यान वजयित्वा(पव्यय-गिरिडोंगरुत्थल भट्टिमादीए) पर्वतगिरि डुङ्गरोत्स्थलभ्राष्ट्रादीन् तत्र-पर्वताः पर्वणाँ तननाद= आकाशचारो पक्षियों को (गामारण्णपयारणिरए तसे अ पाणे बहुप्पयारे) ग्राम एवं जंगल में चलने फिरने वाले अनेक प्रकार के त्रसजीवों का-द्वीन्द्रियादिक प्राणियों का (रुक्खगुच्छ गुम्मलतावल्ली पवालंकुरमादीए) आम्रादिक वृक्षों का, वृंताकी आदि गुच्छो का नवमल्लिका आदि गुल्मों का अशोकलता आदि लताओं का वालुको आदि वल्लियों का फलस्वरूप प्रवालों का और शालि आदिकों के नवीन उभेदरूप अङ्कुरों का इत्यादि तृणवनस्पति कायिकरूप बादर वनस्पति कायिकों का (सूक्ष्मवनस्पतिकायिकों नहीं क्योंकि इनके द्वारा इनका विनाश नहीं हो सकता है) तथा (ओसहीमोय) शाल्यादिरूप औषधियों का वे मेघ (विद्धंसेहिति) विनाश करेंगे तथा वे मेध (वेयगिरिवज्जे पव्वय गिरिडोंगरुत्थल भट्टिमादीए अविरावेहिति) शाश्वत पर्वत वैताढ्यगिरि को छोड़कर ऊर्जयन्त वैभार आदि क्रीडा पर्वतों को गोपालगिरि चित्रक्ट आदि पर्वतों को यारा पक्षीमाना (गामारण्णपयारणिरए तसे अ पाणे बहुप्पयारे) ग्राम मनमा वियना। मने प्रा२न सना-बान्द्रयाहि प्राणायाने। (रुक्खगुच्छगुम्मलतावल्ली पवालंकुरमादीए) भाम्राहि वृक्षाना, वृती वगेरे गुरछाना. नम! वगैरे गुस्माना અશોકલતા આદિ લતાઓને વાસુકી વગેરે વલીઓને પલવરૂપ પ્રવાલે અને શાંતિ વગેરેના નવીન ઉભેટ રૂપ અંકુરોને-તૃવવસ્પતિ કાયિક રૂપ માદર વનસપતિ કાયિકને (સૂવમવનપતિ કાયકનો નહિ કેમકે તેમના વડે એમને વિનાશ થઈ શકે તેમ નથી) તેમજ (ओसहोओय) श.याहि३५ औषधियाना ते भेधे। 'विद्धसेहिंतो' विनाश ४२ मत भधा (वेयगिरिवज्जे पन्वयगिरिडोंगरुत्थलभट्टिमादीए अविरावेहिति) शाश्वत यवत વિતાવ્ય ગિરિને બાદ કરીને ઊજયન્ત વૈભાર વગેરે કીડા પર્વતને. ગોપાલગિરિ ચિત્રકૂટ Page #477 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टिका० द्वि० वक्षस्कार सू० ५४ षष्ठारक स्वरूपनिरूपणम् ४६३ विस्तारणात् पर्वताः=क्रीडापर्वता उज्जयन्तवैभारादयः, गिरयः गृणन्ति शब्दायन्ते जनं निवासभूतत्वेनेति गिरयः गोपालगिरि चित्रकूटप्रभृतयः डुङ्गानि शिलासमूहाः चोरसमूहा वा सन्त्येष्विति डुङ्गराः शिलोच्चय मात्ररूपाः उत्स्थलानि - उन्नतानि स्थलानि धूलिसमू हरूपाणि, भ्राष्टाः = पास्वादिवर्जिता भूमयः, तत्र एषां द्वन्द्वः ते आदौ येषां ते तथा तान् प्रासादशिखरादीनां संग्रहः, एतान् सर्वान् । (विरावेहिंति) विद्रावयिष्यन्ति - नाशयिष्यन्ति । तथा ते मेधा : (गंगासिंधुवज्जाइं) गङ्गासिन्धुवर्जीनि शाश्वत नदीं गङ्गाँ सिन्धुं च वर्जयित्वा (सलिलविलविसमगत्तणिण्णुण्णयाई) सलिलबिलाविषमगर्त्तः निम्नोन्नतानि सलिलबिलानि भूनिर्झराः, विषमगर्त्ताः दुष्पूरश्वभ्राणि तथा निम्नोन्नतानि निम्नानि च तानि उन्नतानि चेति तथा तानि उच्चावचानीत्यर्थः, एषां द्वन्द्वस्तानि सलिलविलप्रभृतीनि सर्वाणि जलस्थानानि ( समीकरेर्हिति ) समीकरिष्यन्ति समानानि करिष्यन्तीति । अथ गौतमस्वामी पुनः पृच्छति (तीसे भंते) इत्यादि । (तीसे णं भंते ! समाए) तस्यां खलु भदन्त ! समायां हे भदन्त ! तस्यां खलु दुष्पमदुष्मायां समायां (भरहस्स वासस्स ) भारतस्य वर्षस्य (भूमी) भूमेः (केरिसए) कीदृशः (आगारभाव पडोयारे) आकार भावप्रत्यवतारः आकाराः आकृतयः, भावाः पर्यायाः तेषां प्रत्यवतारः आविर्भावो (भविस्सइ) भविष्यति ? | भगवानाह - ( गोयमा !) हे गौतम ! तस्यां दुष्षमदुष्षमायां समायां (भूमी) भूमिः (भविस्सइ) भविष्यति, शिला समूह जहां होते हैं या चोर समूह जिन में निवास करते हैं ऐसे डूंगरो को - बड़ी २ शिलाओं वाली उन्नतटेकरियों को, धूलि समूहरूप उन्नत स्थलों को, और पांसु आदि से रहित वडे पठारों को इत्यादि समस्त स्थानों को नष्ट कर देगे (सलिलविलविसमगत्तणिण्णुण्णयाणि गंगा सिंधु वज्जाई समीकरेंति) शाश्वत नदी गंगा और सिन्धु को छोड़कर जमीन के ऊपर के झरनों को, विषम गढ्ढो को, - नीचे २ पसरे हुए पात्रों के द्रह को, तथा नीचे ऊंचे जल स्थानों को पन सब को बराबर बना देगे - समान - एकसा कर देगे (तीसे णं भंते ! समाए भरहस्स वासरस भूमि केरिसए आयारभाव पडोयारे भविस्सइ) अब गौतम प्रभु से ऐसा पूछते है - हे भदन्त ! उस दुष्षम दुष्षमा नाम के आरे में भरत क्षेत्र का आकार भाव प्रत्यवतार - स्वरूप कैसा होगा ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं - ( गोयमा ! भूमी भविस्सइ इंगालभूआ, मुम्मुर भुआ વગેરે પવ તને, શિલાસમૂહ જ્યાં હોય છે અથવા ચાર સમૂહે જેમાં નિવાસ કરે છે એવા પ તના, માટી-માટી શિલાએ વાળા ઉન્નત ટેકરીએના, ધૂલિસમૂહ રૂપ ઉન્નત સ્થલે1ને અને પાંસુ આદિથી રહિત વિશાળ પઢારે ને! તેમજ સમસ્ત સ્થાનેાનો નાશ કરશે (હિત बलविसमगत णिण्णुण्णयाणिअ गंगासिन्धुवज्जाई समीकरेंति) शाश्वत नही गाने સિન્ધુને બાદ કરીને પૃથ્વી ઉપરના સ્રોતેને, વિષમ ખાડાએ ને, નીચે પ્રસરેલા પાણીનાં द्रहाने, तेभन नीचे अथे ४वस्थानाने ते सरभारी नाम समान असे नांणशे (तीसेण भंते ! समाए भरहस्स वासस्स भूमिप केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सह डे गौतम પ્રભુને આ પ્રમાણે પૂછે છે- હે ભદન્ત ! તે દુખમા નામના આરામાં ભરતક્ષેત્રના આકારलव प्रत्यवता२-२१३५ ठेवु इथे ? कोना क्वाणमा प्रभु हे छे - ( गोयमा ! भूमिभचि Page #478 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४६४ जम्बूद्वीपप्रशप्तिसूत्रे कीदृशी भूमिर्भविष्यति? इत्याह(इंगालभूया) अङ्गार भूता अङ्गारः ज्वालारहिताग्निपिण्डस्तद्वद् भूता- तत्सदृशी, (मुम्मुरभूया) मुर्मुरभूता तुषाग्निरूपा (छारियभूया) क्षारिकभूता भस्मसदृशी (तत्तकवेल्लुअभूया) तप्तकटाहसदृशी 'कवेल्लु इति कटाहार्थे देशी शब्दः (तत्तसमजोइभूया) तप्तसमज्योतिर्भूता-तप्तेन तापेन समो यो ज्योतिः अग्निः स तप्तसमज्योतिः= सर्वदेशावच्छेदेन समानज्वालवान् अग्निः तद्भूताः तत्सदृशी (धूलिबहुला) धूलिबहुलाधूलि:=पांशुः, सा बहुला=पचुरा यस्यां सा धूलिभूयिष्ठा (रेणुबहुला) रेणुबहुला-रेणुःवालुका, सा बहुला-प्रचुरा यस्यां सा-वालुकाभूयिष्ठा(पंकबहुला) पङ्कबहुला पङ्कः कर्दमो बहुलो यस्यां सा प्रचुरकर्दमयुक्ता (पणयब हुला) पनकबहुला-पनक:-प्रतलकर्दमो बहुलो यस्यां सा प्रचूरप्रतलकदेमयुक्ता, (चलणिबहुला) चलनीबहुला-चलनी-चरणप्रमाणः कर्दमः सा बहुला यस्यां सा तथा-चरणप्रमाणकर्दमेन प्रचुरतया युक्ता, अतएव(बहूणं) बहूनां(धरणिगोयराणं) धरणिगोचराणां पृथ्वीस्थितानां(सत्ताणं)सत्त्वानां प्राणिनां दुन्निककमायावि) दुनिष्क्रमा दुःखेन निष्क्रमो-निष्क्रमणं यस्याः सा दुरतिक्रमणीया चापि (भविस्सई) भविष्यति । गौतमस्वामी पुनः पृच्छति (तीसेणं भंते ! समाए) तस्यां खलु भदन्त ! छारिमभूधा तत्तकवेल्लुअभूआ तत्तसमजोइ भूआ फूिलबहुला रेणुबहुला, पणयबहुला, चलणिबहुला, बहुणं धरणिगोअराणं सत्ताण दुण्णिकमायावि भविस्सइ) हे गोतम ! उस दुष्षम दुष्षमा काल में यह भूमि अङ्गार भूत ज्वालारहित अग्निपिण्ड जैसी, मुर्मुररूप तुषाग्नि जैसी क्षारिकभूत-गर्म २ भस्म जैसी, तप्त कटाह जैमी 'कवेल्लुअ' यह देशी शब्द हैं और कटाह अर्थका वाचक हैं तप्तसमज्योति जैसो-सम्पूर्ण देश में समान ज्वालावाली अग्नि जैसी होगी एवं प्रचुर पांशुवाली होगो, प्रचुररेणु वाली होगी प्रचुर पङ्कवाली होगी. प्रचुर पनक -पतले कीचड वाली होगी, पैर जिसमें समस्त डूब नावे ऐसी प्रचुर कर्दम वाली होगी. अतएव चलने वाले मनुष्यों को इसके उपर चलने फिरने में वड़ा भारी कष्ट होगा-वे बड़ी मुश्किल से इस के ऊपर चलफिर सकेंगें . (तीसेणं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाण केसरिए आयारभावपडोयारे स्सइ गालभूआ, मुम्मुरमूआ छारिअभूआ तत्तकवेल्लुअभूआ तत्तसमजोइभूआधुलिबहुला रेणुबहुला, पंकबहुला, पणयबहुला, चलणि बहुला धरणि गोअराण सत्ताणं दुण्णिक्कमायावि भविस्सइ) ३ गीतम! a पम पमi imमां भा भूमि सारभूत was भनि ( २वी भुभु°२ ३५तुषावी क्षारभूत मनरम २वी, ahies २३ 'कवेल्लु આ દેશી શબ્દ છે અને કટાહ અથવાચક છે–તમસમોતિ જેવી સંપૂર્ણ દેશમાં સમાન વાલા વાળી અગ્નિ જેવી થશે અને પ્રચુર પાંશુવાળી થશે. પ્રચુરણુવાળા થશે, પ્રચુર પંકવાળી થશે. પ્રચુર પાક-પાતળા કાદવવાળી થશે, પગ જેમાં સંપૂર્ણ રૂપમાં પેસી જાય એવા પ્રચુર. ૨ કાદવળી થશે. એથી ચાલનારા માણસને એની ઉપર અવર-જવર કરવામાં ભારે કષ્ટ थरी तया भुश्सीथी येनी ५२ १२-१२ ४२। शशे. (तीसेणं भंते ! समाए भरहे वासे मणुयाण केरिसप आयारभावपडोयारे भविस्सइ) 3 RErd! मां भरत क्षेत्रमा भारत Page #479 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका. द्विवक्षस्कार सू. ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् ४६५ समायां हे भदन्त! तस्यां खलु दुष्पमदुष्पमायां समायां(भरहे वासे) भारते वर्षे (मणुयाणं) मनुजानां (केरिसए) कीदृशकः (आयारभावपडोयारे) आकारभावप्रत्यवतारो (भविस्सइ ) भविष्यति ? । भगवानाह - ( गोयमा !) हे गौतम ! तस्यां दुष्पमदुष्पमायां समायां (मणुभा) मनुजाः (भविस्संति) भविष्यन्ति, कोदृशास्ते मनुना भविष्यन्ति ? इत्याह-(दुरूबा) दूरूपाः दुष्टम् =अशोभनं रूपम् आकारो गेषां ते तथा अशोभनाकतिकाः (दुवण्णा) दुर्वर्णाः दुष्टो वर्णों येषां ते तथा दुष्टवर्णयुक्ताः (दुगंधा) दुर्गन्धाः दुर्गन्धयुक्तशरोराः (दुरसा) दूरसा: दुष्टरसयुक्ताः (दुफासा) दुस्पर्शा:-कठोरादिदुष्टस्पशयुक्ताः अतएव ( अणिट्टा ) अनिष्टाः अनभिलपणीयाः अनिष्टमपि किंचित् कमनीयं भवतोत्यत आह -( अकंता) अकान्ताः अकमनीयाः अकमनीयमपि किंचित्कारणवशात् प्रीतये भवतीत्यत आह- (अप्पिया) अप्रियाः अप्रीतिस्थानभूताः, अप्रियत्वं च तेषां कस्मात् ? इत्याह-(अपुभा) अशुभाशुभभावरहिता अशुभा अपि केचित् आन्तरिकसंवेदनेन शुभरूपेण ज्ञायन्ते इत्यतस्तन्निषेधाय प्राह-अमनोज्ञाः मनोज्ञाः शुभत्वेन मनोविषयोभूताः, न मनोज्ञाः-अमनोज्ञाः-मनसाऽपि शुभतयाऽप्रतीयमानाः, अमनोज्ञा भविस्सइ) हे भदन्त ! उस काल में भारत क्षेत्रमें मनुष्यों का स्वरूप कैसा होगा ? उत्तर में प्रभु कहते हैं-(गोयमा! मणुआ भविस्संति दुरूवा, दुव्वणा, दुगंधा, दुरसा, दुफासा, अणिट्ठा, अकंता, अप्पिा , असुभा, अमणुण्णा, अमणामा, हीणस्तरा, दीणस्सरा, अणिट्ठस्सरा, अकंतस्परा, अपियस्सरा, अमणामस्सरा, अमणुण्णस्सरा अणादेज्जवयणपच्चायाया णिलज्जा, कूडकवडकलहबंधवेरनिरया मज्जायातिक्कमप्पहा गामकाजणिच्चुज्जुया गुरुणिोगविणयरहियाय) हे गौतम ! उस दुष्षम दुष्षमा कालके मनुष्य अशोभन रूपवाले अशोभन आकृति वाले, दुष्ट वर्णवाले, दुष्टगन्ध वाले-दुर्गन्धयुक्त शरीरवाले दुष्टरस युक्त शरीरवाले एवं दुष्टस्पर्शयुक्त शरोरवाले होगें अत एव वे अनिष्ट अनभिलषणीय-होगें अनिष्ट होने से वे अकान्त अकमनीय होगें अकमनीय होने से वे अप्रीति के स्थानभूत होगें. क्योंकि ये शुभभावों से रहित होगें अमनोज्ञ होगें-ये शुभ है-इस रूप से ये मन के विषयभूत नहीं होंगे अर्थात् इन्हें देखकर मन यह कभी नहींविचारेगा किये शुभ हैं! तथा स्मरण હે ભગવન તે કાળમાં ભરત ક્ષેત્રમાં માણસોનું સ્વરૂપ કેવું હશે ? જવાબમાં પ્રભુ કહે છે(गोयमा ! मणुआ भविस्संति दुरूवा, दुव्वण्णा दुगंधा, दुरसा, दुफासा, अणिट्ठा, स. कता, अपिआ, असुभा, अमणुण्णा अमणामा, हीणस्सरा, दोणस्सरा, अणिट्ठस्सरा, अकेसरा, अपियस्सरा, अमणामस्सरा, अमणुण्णस्सरा, अणादेज्जवयणपच्चायाया णिलाजा, कूडकवडकलहबंघवेरनिरया मज्जायातिक्कमप्पहाणा अकज्जणिच्चुज्जुया गुरुणिओगविणयर हिया य) गीतम! षमाना मनुष्य। मान ३५वाणा, मसन याति વાળા. દટવર્થવાળા, છગન્ધવાળો-દુર્ગન્ધયુક્ત શરીરવાળા, દુરસયુક્ત શરીરવાળા અને દુષ્ટ સ્પેશયુક્ત શરીરવાળા થશે. એથી તેઓ અનિષ્ટ- અનભિલષણીય-થશે. અનિષ્ટ હોવાથી તેઓ અકાન્ત-અકમનીય થશે. અકમનીય હોવાથી તેઓ અપ્રીતિના સ્થાન બત થશે. કેમકે એ આ અભિભાવનાઓથી રહિત થશે. અમનોજ્ઞ થશે-એએ એમ છે-આ રૂપમાં Page #480 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अपि पदार्थाः कदाचित् स्मरणावस्थायां मनोज्ञा इवाभान्ति अतएवाह-(अमणामा) अमनोऽमाः-मनसा अभ्यन्ते-गम्यन्ते स्मरणावस्थायां ये ते मनोऽमाः, न मनोऽमा इत्यमनोऽमाः स्मरणावस्थायामपि मनसः प्रतिकूला इत्यर्थः, अथवा- एकार्थका एते शब्दा अतिशयानिष्टतासूचनाय । तथा-( हीणस्सरा) हीनस्वराः-हीनः स्वरो येषां ते तथा-रुग्णस्वरसदृशस्वरयुक्ताः (दीणस्सरा) दीनस्वराः दीनः स्वरो येषां ते तथा-दीन जनस्वरसदृशस्वरयुक्ताः (अणिहस्सरा) अनिष्टस्वरा:-अनिष्ठः श्रवणारमणीयः स्वरो येषां ते तथा-कर्णकटुस्वरयुक्ताः अतएव (अप्पियस्सरा) अप्रियस्वरा:-अप्रियः स्वरो येषां ते तथा कर्णप्रियस्वरयुक्ताः अतएव (अमणुण्णस्सरा) अमनोज्ञस्वराः= अशोभनस्वरयुक्ताः, तथा (अमणामस्सरा) अमनोऽमस्वराः सर्वथा मनः प्रतिक्लस्वरयुक्ताः, तथा-(अणादेजवयणपच्चायाया) अनादेयवचनप्रत्यायाता:-अनादेयम् अशोभनत्वादस्पृहणीयं वचनं प्रत्यायातं जन्म च येषां ते तथा-अस्पृहणीयवचना अस्पृहणीयजन्मानश्चेत्यर्थः, तथा (जिल्लज्जा) निर्लज्जा: लज्जारहिताः (कूडकवडकलहवहबंधवेरनिरया) कूट कपट कलहवधबन्धवैरनिरताः-कूट-कूटद्रव्यं भ्रान्तिजनकद्रव्यं, कपट:-परप्रतारणाय वेषान्तरकरणं, कलहः युद्ध, अवस्थामें भी ये मनके प्रतिकूल ही प्रतिभासित होंगे अथवा ये सब शब्द अतिशयरूप से अनिष्टता को ही सूचना करने के लिये पर्यायवाचीरूप से प्रयुक्त हुए हैं। तथा इनका जो स्वर होगा वह रुग्ण व्यक्ति के स्वर के जैसा होगा, दीनजनों का जैसा स्वर होता है वैसा इनका स्वर होगा, सुनने में कानों को इन का स्वर अरमणीय होगा इसलिए ये अनिष्ट स्वर वाले होगें. कर्णक टुस्वर से ये युक्तहोगें अत एव ये अप्रिय स्वरवाले होगें. इनका स्वर मन को विलकूल नहीं रुचेगा इसलिये ये अमनोज्ञ स्वरवाले होगें इनके स्वर की याद आनेपर भी मनग्लानि से भर जावेगा इसलिये ये अमनोऽमस्वर वाले होगें इनके वचन सुनने तककी भी इच्छा कोई नहीं करेगा. और न कोई इनके जन्मपाने की सराहना ही करेगा, ये सब लज्जाहीन होगें कूटमें-भ्रान्ति जनक द्रव्य में, कपट में-पर को प्रतारण करने के लिये वेषान्तर कर ने में-कलह-झगड़ा लडाई कर એએ મનના વિષયભૂત થશે નહિં અર્થાત્ એમને જોઈને કોઈ પણ દિવસે આ જાતને વિચાર નહીં થશે કે એ ઓ શુભ છે. તેમજ સમરણ અવસ્થામાં પણ એને મનમાટે પ્રતિકળજ પ્રતિભાસિત થશે. અથવા એ બધા શબ્દો અતિશય રૂપમાં અનિષ્ટતાને જ સૂચિત કરવા માટે અત્રે પર્યાયવાચીના રૂપમાં પ્રયુક્ત થયેલા છે. તેમજ એમને જે સ્વર થશે તે ૩ણ વ્યક્તિના સવર જે થશે. દીનજનોને જેસ્વર હોય છે, તે એમને સ્વર થશે. કોને માટે એમને સ્વર અરમણીય થશે એટલે કે કણે કટુ શબ્દ તેઓ ઉચ્ચારશે એથી એઓ અનિષ્ટ સ્વરવાળા થશે. કર્ણ કટુ સ્વરથી એ યુક્ત થશે, એથી એ અપ્રિયસ્વરવાળા થશે. એમને સ્વર મનને બિલકુલ ગમશે નહિ તેથી એ અમને સ્વરવાળા થશે. એમને સ્વરની સ્મૃતિ થતાં જ મન લાનિ યુક્ત થઈ જશે. એથી એ અમનેમ સ્વરવાલા થશે. એમના વચનને સાંભળવાની પણ કઈ ઈચ્છા કરશે નહિ, અને એમના જન્મ ને લઈને પણ કેઈ સરાહના કરશે નહિ. એ સર્વે નિર્લજજ થશે કૂટમાં–બ્રાન્તિ Page #481 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टिका० द्वि० वक्षस्कार सू० ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् ४६७ वधः चपेटादिभिस्ताडनं, बन्ध: - रज्जुभिर्नियमनम्, वैरं = शत्रुता, एषां द्वन्द्वः, तत्र निरताः = संलग्नाः, तथा (मज्जायातिक्कमप्पहाणा ) मर्यादाऽतिक्रमप्रधानाः - मर्यादा - व्यवस्था, तस्या अतिक्रमे - उल्लङ्घने प्रधानाः - प्रमुखाः (अकज्ज णिच्चुज्जुया अकार्यनित्योद्युक्ताः - अकार्ये - अकर्त्तव्ये कर्मणि नित्यं सर्वदा उद्युक्ता :- संलग्नाः, तथा (गुरुणिओग विणयर हिया) गुरुनियोगविनयरहिताः गुरूणां - मातापित्रादिकानां यो नियोगः--नियोजनं संयोजनं, तत्र यो विनयः विनीततातन्नियोगस्वीकाररूपा तेन रहिताः - मातापित्रादि गुरुजनाज्ञोल्लङ्घका इत्यर्थः (य) च - पुन: (विकलरूवा) विकलरूपाः - विकलम् - असंपूर्ण रूपम् - आकारो येषां ते तथा नेत्राद्यङ्गवैकल्येन असम्पूर्णाङ्गोपाङ्गाः, तथा (परूढणह के समंसुरोमा ) प्ररूढनखकेशश्मश्रुरोमाणः - प्ररूढानि संस्काराभावात् प्रकृष्टतया वृद्धिं गतानि नखकेशश्मश्रु रोमाणि येषां तथा (काला) कालाः कृष्णवर्णाः कृतान्तवत् क्रूरा वा (खरफरुस सामवण्णा) खरपरुषश्यामवर्णाः - खरपरुषाः - प्रकृष्टकठोरस्पर्शाश्च ते श्यामवर्णाः श्यामवर्णवन्तश्च ये ते तथास्पर्शतः सातिशयकठोराः वर्णतश्च नोलीभाण्डे निक्षिप्तोत्क्षिप्तवस्त्रवत् नीला इत्यर्थः, तथा ने में, वध चपेटा आदि द्वारा ताडना - करनेमें वन्ध में - रज्जु आदि द्वारा दूसरों को बांधने में, वैर में शत्रुता करने मे, ये संलग्न रहेगें - ऐसे कार्यों में ये विशेषरूप से रत रहा करेंगे! मर्यादाव्यवस्था के अतिक्रमण करने में ये कटिबद्ध रहेंगे । एवं माता पिता आदिरूप गुरुजनों की विन यादि क्रिया करना उनको आज्ञा मानना आदि बातों को ये परवाह तक भी नहीं करेगें. (विकरूवा ) इनके अंङ्गोपाङ्ग पूर्ण नहीं होगें किसीन किसी अङ्ग उपाङ्ग से ये हीन रहेंगे. तथा ( परूढणह के समं सुरोमा ) इनके नख वडे रहेगें, इनके मस्तक के बाल संस्कार रहित होने से बड़े रहेगें. दाढ़ी के बाल और मूछों के बाल भी आवश्यकता से अधिक वृद्धिंगत होगें. (काला खरफरूस सामवण्णा, फुसिरा, कपिलपलियकेसा, बहुण्हारुणि संपिणद्ध दुद्द सणिज्जरुवा संकुडिअचलितरंगपरिवेढिअंगमंगा जरा परिणयत्व थेरगणरा पविरलपविसइ अ दंतसेढी, उब्भडधडमुहा ) वर्णर्मे बिलकुल काले होगें, अथवा कृतान्त की तरह क्रूर होंगे. इनके शरीर का स्पर्श बहुत अधिक જનક દ્રષ્યમાં, કપટમાં-પરને પ્રતારણુ કરવામાટે વેષાન્તર કરવામાં, કલહ-કલહ-કંકાસ કર, વામાં, વધ ચપેટા આદિ દ્વારા તાડના કરવામાં બંધમાં રજજુ આદિ દ્વારા ખીજાને માંધ વામાં, વૈરમાં શત્રુતા કરવામાં એએ સલગ્ન રહેશે. એવા કાર્યાં માં તે વિશેષ રૂપથી રત રહેશે. મર્યાદા-વ્યવસ્થા-કે અતિક્રમણ કરવામાં એએ કટિબદ્ધ રહેશે તેમજ માતાપિતા વગેરે ગુરુજનાની વિનયાદિ ક્રિયા કરવામાં, તેમની આજ્ઞા માનવી વગેરે વાતાની येथे। परवा कुरशे नही (विकलरूबा) सेभना यांगे पूर्ण थशे नहि. अने मग उपांगथी थे। डीन रहेशे, तेभर (परूढणह के समंसुरोमा) खेभना भाथाना वाज સ’સ્કાર રહિત હાવાથી મોટા રહેશે. દાઢી અને મૂછેાના વાળ પણ આવશ્યકતા કરતાં વધારે भोटा रहेशे (काला खरफरुससामवण्णा, फुट्ठसिरा, कपिलपलियकेला बहुपहारुणि संपि द्धदुसणिज्जरुवा संकडिअचलितरंगपरिवेदिअंगमंगा जरापरिणयव्वथेरगणरा पविरलपविसइ अ दंतसेढी, उब्भडघडमुहा) येथे वर्षाभां साथ अणा थशे, अथवा द्रुतान्तनी Page #482 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे (फुदृसिरा) स्फुटितशिरसः स्फुटतानि-रेखावत्त्वात् स्फुटितानीव शिरांसि-मस्तकानि-येषां ते तथा-रेखायुक्त शिरस इत्यर्थः, तथा (कविलपलिअकेसा) कपिलपलितकेशा:-कपिला:कपिलवर्णाः धूम्रवर्णाः पलिता:-श्वेतवर्णाश्च केशा येषां ते तथा धूम्रवर्णश्वेतवर्णकेशधारिणः (बहुण्हारुणिपिणद्ध दुइमणिज्जरूवा) बहु स्नायु-निसंपिनद्ध दुर्दर्शनीयरूपा बहुभिःबहुसंख्यकाभिः स्नायुभिः - अङ्गप्रत्यङ्गन्धिबन्धनरूपाभिः वस्नसाभिः निसंपिनद्धाःअतीव संनिबद्धाः, अतएव दुर्दर्शनीयरूपाः दुर्दर्शनीय रूपं येषां ते तथा-अशोभनाकृतिकाः, ततः पदद्वयस्य कर्मधारयः. तथा ( संकुडिअवलीतरंगपरिवेढियंगमंगा) संकुटितवलीतरङ्गपरिवेष्टिताङ्गाङ्गाः-वल्यः रेखात्मकास्त्वविकारास्तासां ये तरङ्गा-परम्पराः तैः परिवेष्टितानि-व्याप्तानि अगानि-अवयवा यस्मिस्तद वलीतरङ्गपरिवेष्टि• ताङ्गम्, संकुटितं-संकोचमुपगतं तथाविधमङ्ग येषां ते तथा रेखायुक्तसंकुचितशरीरा इत्यर्थः, अतएव (जरापरिणयव्व थेरगगरा) जरापरिणता इव स्थविरकनराः-वार्धक्यमुपगता वृद्धनरा इव प्रतीयमानाः वृद्धसादृश्यमेव प्रकटयति (पविरलपरिसडियदंससेडी) प्रविरल-परिशटित दन्तश्रेणयः प्रविरलाः-पृथक पृथक स्थिताः परिशाटिता:परिशाटमुपगता दन्तश्रेणिः - दन्तपंक्ति र्येषां ते तथा- सान्तरालपरिपतितदन्तश्रेणियुक्ता इत्यर्थः, अतएव (उब्भडघटमुहा) उद्भटघटमुखाः-उद्भटं-विकट घटमुखमिव मुखं येषां ते तथा अल्पदन्तवत्वेन घटमुखतुल्यमुखयुक्ताः, तथा-(विसमणयणवंकणासा) विषमनय, नवक्रनासाः विषमे-अतुल्ये नयने-नेत्रे वक्रा-कुटिला नासा - नासिका च येषां ते तथा कठोर होगा तथा नीलो भाण्ड में बा(२ डालने से जैसा वस्त्र में नील रंग गहरा जम जाता है वैसा ही गहरा वह श्यामवर्ण-नोठ रंग- इनके शरीर का होगा. इनके मस्तक रेखाओं से युक्त होंगे इन्के मस्तक के जो केश होंगें वे कपिल वर्णवाले-घूमके जैसे वर्णवाले और सफेद रंग के होंगे. इनको आकृति अनेक स्नायु जाल से घिरी हुइ रहने के कारण दुर्दर्शनीय रहेगी. इनका अङ्गरेखात्मक बलियों को परम्परा से- झुर्रियों से व्याप्त रहेगा. संकोच युक्त होगा अतएव ये ऐसे देखने पर प्रतोत होंगे कि मानो वृद्धावस्था से आलिङ्गितवृद्जन हो हैं इनको दन्त पक्ति विरल होगी और वह भी सडो हुइ होगी-या परिपतित होगी. इनका मुख इससे ऐसा लगेगा कि मानों यह घडे का हि विकृत मुख है. (विसमणयणवंकणासा) इनके दोनों नेत्र बराबर नही होंगे-अतुल्य होंगे और नाक इनको कुटिल होगी(वंकवली विगयभेपणमुहा) व ठो विकार वाला होने से एवंજેમ-કુર થશે. એમના શરીરને પશે એકદમ વધારે કઠોર થશે તેમને ની વીભાંડમાં વારં વાર ઝબળવાથી જેમ વસ્ત્રમાં નીલરંગ ઘેર જામી જાય છે તે જ ઘેરો શ્યામવર્ણ નીલરંગ-એમના શરીરને થશે. એમના મસ્તકે રેખાએથી યુક્ત થશે, એમના મસ્તકના વાળ કપિલવાવાળા ધુમાડાના જેવાવર્ણવાળા અને સફેદ રંગવાળા થશે. એમની આકૃતિ અનેક સ્નાયુજાલ વેષ્ટિત હેવાથી દુર્દશનીય રહેશે. એમનું અંગ રેખાત્મક કરચલીઓથી બાત રહેશે. સંકેચ યુક્ત થશે એથી જોવામાં એવા લાગશે જે કે જાણે વૃદ્ધાવસ્થાથી આલિંગિત થયેલ વૃદ્ધજન જ છે. એમની દંતપંક્તિ વિરલ થશે અને તે પણ સડી ગયેલી હશે અથવા પરિપબિત થશે. એમનું મુખ એનાથી એવું લાગશે કે જાણે તે ઘડાનું જ વિકત મુખ छ. (विसमणयणवंकणाला) मना मन्ने नेत्र २५२ नही मतुल्य अने Page #483 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीकाद्वि०यक्षस्कारसू. ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् विषमनेत्रकुटिलनासिका युक्ता इत्यर्थः, तथा-(वंकवलीविगयभेसणमुहा) वक्रवली विकृतभोपणमुखाः-वर्क-कुटिलं वलीविकृतं-वली विकारयुक्तम् अतएव भीषणं भयानकं मुखं येषां ते तथा-कुटिलत्वेन रेखा विकारोपगतत्वेन च भयानकमुखयुक्ताः, (ददुकिटिभ-सिब्भ फुडिअफरुसच्छवी) दद्रु-किटिभ-सिध्म-स्फुटित-परुष- च्छवयः दद्र किटिभसिध्मानि कुष्ठभेदाः, तैः स्फुटिता परुषा कठोरा च छविः शरीरचर्म-येषां ते तथा-दद्रुकिटिभसिध्मेति रोगत्रयजनित स्फुटितकठोरशरीरचर्मधारिण इत्यर्थः, अतएव(चित्तलंगमंगा)चित्रलाङ्गाङ्गाः चित्रलानि कर्बुराणि अङ्गानि अवयवा यस्मिस्तादृशम् अङ्गं शरीरं येषां ते तथाकर्बुरवर्णावयवयुक्तशरीरा इत्यर्थः, तथा (कच्छूखसराभिभूया) कच्छ्रखसराभिभूताः-कच्छूः पामा, खसरः कण्डुरोगविशेषः, ताभ्याम् अभिभूताः व्याप्ताः, अतएव (खर-तिक्ख-णक्ख कंड्रइय-विकय-तणू)खरतीक्ष्णनखकण्डूयितविकृतत नवः-खराः कर्कशाः तीक्ष्णाः निशिताः ये नखास्तैर्यत् कण्डूयित कण्डूयनं तेन विकृता विकारमुपगता सत्रणा तनुः शरीरं येषां ते तथास्ताः कर्कशनिशितनख कण्डूयनजनितवणयुक्तशरोरा इत्यर्थः तथा-(टोलगतिविसमसंधिबंधणा)टोलगतिविषमसन्धिबन्धनाः-टोला:-जन्तुविशेषाः, देशीयोऽयं शब्दः, तेषां गतिरिव गतियेषां ते तथा उष्ट्रादिजन्तुगति सदृशगतियुक्ताः, तथा-विषमाणि वैषम्यमुपगतानि असमानि सन्धिबन्धनानि सन्धिरूपाणि बन्धनानि येषां ते तथा, पदद्वयस्य कमधारयः तथा-(उक्कुडुअद्विअविभत्तदुब्बलकुसंघयणकुप्पमागकुसंठिा) उत्कुटुकास्थिकविभक्तदुर्वलकुसंहननकुप्रमाणकुसंस्थिताः उत्कुटुकानि यथास्थान स्थितिरहितानि यानि अस्थिकुटिल होने से इन का मुख देखने में भयङ्कर होगा (ददुकिटिभसिब्भफुडिअ परुसच्छवी) इनके शरीर का चमड़ा दाद, किटिभ-खाज, सिध्म-से हुआ इन चर्मविकारों से भरा हुआ होगा अतएव वह बहुत ही अधिक कठोर होगा, और इमो कारण उसके शरीर का हरएक अवयव चित्रलवर्बुर होगा (कच्छ खसराभिभूया)कच्छु पामा और खसर-कण्डुरोग से इनका शरीर व्याप्त रहेगें अत एव-(खर-तिविणक्ख-कडूइय-विक्रय-तणू)खर-ककेश एवं तीक्ष्ण नम्वों द्वारा खुजाया गया उनका शरीर विकृत-ना हुआ होगा और जगह २ उसमें घाव होंगे(टोल गति-विसम संधिबंध गा) इन की चाल उष्ट्रादि की चाल जैसी-होगी सन्धिबंधन इनके विषम होगे (उक्कुडु अद्विअविभत्त दुव्वल कुसंधय ग कुप्पमाण कुसंठिया) इन के शरोर-को अस्थियां उत्कुटु क-यथास्थान की स्थि.ते से समनु नाटि से (वंकवलीविगयभेसणमुहा) यमनु भुम ४२यदी माया विकृत तभर दुटिस वाथी वा भय ४२ साजरी (क्रिटिसिब्भफुडिअपरुसच्छवी) એમના શરીરનું ચામડું, કૂ, કિટિભ-ખાજ, સિધમ વિગેરે વિકારોથી વાપ્ત થશે, એથી તે ઘણુંજ કઠોર હશે અને એથી જ તે શરીરને દરેકે દરેક અવયવ ચિત્રલ–કબુર–ડશે, (कच्छूख पराभिभूया) ४२५ पामा मने पस२-रोगथी ०५१ २ मेथी (म्बर-तिकवणक्खकडूइय-विक्रय तणू) ५२-४४२॥ भने तीन पडे भाणे मनु शरी२ वित / गयेश भने ४४ ४॥ण तमो या शे. (टोलगतिविसमसंधिबंधणा) अमनी ट्रानीमा थशे. अमना समिधन विषम शे. (उक्कुटुअट्रिअविभत्तदुव्वलकुसंधयणकुप्पमाणकुसंठिया) सभनी शरीरनी अस्थिया 62યથાસ્થાનની સ્થિતિથી રહિત હશે, અને વિભકત પરસ્પરમાં સંશ્લેષથી રહિત થશે એ એ Page #484 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कानि कीकसानि 'हड्डी' ति प्रसिद्धानि, तानि विभक्तानि परस्परमसंश्लेषेण स्थितानि येषां ते तथा, पुन:-दुर्बला:बलरहिताः, कुसंहननाः कुत्सितसंहननाः सेवार्तसंहननयुक्ता इत्यर्थः, कुप्रमाणाः कुत्सित-होनं प्रमाणं येषां ते तथा हीनप्रमाणयुक्ताः कुसंस्थिताः कुत्सिताकारयुक्ताः, एषां पदानां कर्मधारयः, अतएव (कुरूवा) कुरूपाः कुत्सितरूपयुक्ताः, तथा-( कुट्ठाणासण-कुसेज्जकुभोइणो) कुस्थानासनकुशय्या कुभोजिन:कुस्थाने कुत्सितस्थाने आसनम् उपवेशनं येषां ते कुस्थानासनाः, कुत्सिता शय्या येषां ते कुशय्याः, कुत्सितं भुनते ये ते कुभोजिनः कृत्सितान्नभक्षणशीलाः, एषां, पदानां कर्मधारयः, तथा (असुइणो) अशुचयः-शुद्धिरहिताः, 'अश्रुतयः' इतिच्छायापक्षे शास्त्रज्ञानवर्जिता इत्यर्थः (अणेगवाहिपीलिअंगमगा) अनेाव्याधिपीडिताङ्गाङ्गाः अनेक व्याधिभिः बहुविधैरोगैः पीडितानि व्यथामुपगतानि अङ्गानि अवयवा यस्मिंस्तत्तादृशमङ्गं शरीरं येषां ते तथा-विविधव्याधिपरिपीडितशरीर इत्यर्थः । तथा (खलंतविभलगई) स्खलद् विह्वलगतयः-स्खलन्तीसंचलन्तो विजला-विक्लवा अशक्ता च गतिर्येषां ते तथा मदोन्मत्तवद् गमनशीला इत्यर्थः, तथा (णिरुच्छाहा) निरुत्साहा:-उत्साहरहिताः (सत्तपरिवजिया) सत्त्वपरिवर्जिताः आत्मबलववर्जिताः अतएव (विगयचेट्ठा) विगतचेष्टाः विगताः चेष्टा येषां ते तथा चेष्टा रहिता इत्यर्थः, तथा-(नट्ठतेआ) नष्टतेजसः नष्टानि रहित होंगी, और विभक्त-परस्पर में संलेप से रहिन -होगी ये सब के सब दुर्बल बलरहित, कुसंहनन कुत्प्तित संहननवाले-सेवात्त संहननवाले और कुप्रमाण-हीन प्रमाणवाले होगें तथा कुसंस्थित-कुत्सित आकारवाले होगें अत एव ये कुरूप-कुत्सितरूप युक्तहोंगें तथा ये(कुदाणासणकुसेज्जभोइणो) खोटी गन्दी जगह में उठेगें और वैठेंगे इनका विस्तर-या शय्या कुत्सित होगी तथा ये कुत्सित अन्न भोजो होंगे (असुइणो) शुद्धिसे ये रहित होंगे या शास्त्र ज्ञान से ये रहित होगें(अणेगवाहि पीली अंगमंगा) इनके शरीरका प्रत्येक अवयव अनेक व्याधियों रोगों से ग्रसित होगा (स्वलंत विमल गई) मदोन्मत्त पुरुष को गतीको तरह इनकी गती होगी अर्थात् मदोन्मत्त की गति लड़खड़ातो होती है ऐसी ही इनकी गति होगी (णिरुच्छाहा) इनमें किसी भी प्रकार का उत्साह नहीं होग। (सत्तपरि वज्जिया) सत्त्व-आत्मबल से ये रहित होगें (विगयचेदा) चेष्टा इनकी સવે દુર્બલબલરહિત, કુસંહનન કુત્સત સંહનનાળા–સેવાર્તા સંહનનવાળા અને પ્રમાણહીન પ્રમાણવાળા થશે તથા કુસંસ્થિર-કુતિયત આકારવાળા થશે એથી એ એ કુરૂપ-કપા सित३५युत थशे. तेमा । (कुट्ठाणासण कुसेज भोइणी) १२-naanwi 0मेस.शे. समनी शय्या पुत्सितशे (असुइणो) शुद्धिया से थे। २हित शे. २५041 शत्रज्ञानथी । हित शे. (अणेगवाहिपीलिअंगमंगा) समना शरीरना हरे हरे अवयव अनविध व्याधिया-शेगोथी अमित शे. (खलंतविब्भलगई) महा-भत्त रुपनी गतिनी જેમ એમની ગતિ હશે એટલે કે મમત્તની ગતિ લથડતી હોય છે. એવી જ એમની ગતિ शे (णिरुच्छाहा) अमनामा ५ नो असा नतिरी (सत्तपरिवज्जिया) सत्यमात्म थीम्समाहित शे. (विगय चेट्रा) मेमनी नष्ट थशे.अर्थात या Page #485 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि वक्षस्कारः सू.५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् ४७१ , तेजांसि येषां ते तथा - निष्प्रभा इत्यर्थः, तथा ( अभिक्खणं) अभीक्ष्णं सततं (सीउण्ह - खर - फरुस - वाय-विज्झडिअ मलिण-पंसु-रओ-गुंडियंग मंगा) शीतोष्ण-खर-परुप-वात- मिश्रितमलिन- पांशु-रजोऽवगुण्ठिताङ्गाङ्गाः शीताः शीतस्पर्शाः, उष्णः = उष्णस्पर्शाः खराः, तीक्ष्णाः पुरुषाः, कटोरा ये वाताः, वायवस्तैः मिश्रितानि व्याप्तानि, 'विज्झडिय' इति मिश्रितार्थे देशी शब्द:, अतएव मलिनानि मालिन्यमुपगतानि तथा-पांसुरजोऽवगुण्ठितानि पांसवो = धूलयस्तेषां यानि रजांसि = सूक्ष्मकणास्तैरवगुण्ठितानि अङ्गानि अवयवा यस्मिंस्तादृशमङ्ग शरीरं येषां ते तथा शीतोष्णखर परुषव्याप्तत्वेन मलिना धूलिसूक्ष्मांशसंवलिशरीराश्चेत्यर्थः, तथा (बहुको हमाणमायालो भा) बहुक्रोधमानमायालोभा-बहवः क्रोधमानमायालोमा येषां ते तथा प्रचुर क्रोधमानमायालोभयुक्ताः (बहुमोहा) बहुमोहाः प्रचुरमोहयुक्ताः, (असुभदुःखभागी) अशुभदुःखभागिन:- नास्ति शुभं शुभकम येषां ते अशुभाः शुभकर्मवर्जिताः, अतएव दुःखभागिनः- दुःखभाजः पदद्वयस्य कर्मधारयः, तथा - (ओसvi) वाहुल्येन (धम्मसण्णसम्मत्तपरिभट्ठा) धर्मसंज्ञासम्यक्त्व परिभ्रष्टाः धर्मसंज्ञा धर्मश्रद्धा सम्यक्त्वं जनमताभिरुचिस्ताभ्यां परिभ्रष्टाः च्युताः, बाहुल्यग्रहणेन कदाचिदेते सम्यग्दृष्टयो अपि भवन्तीति सूचितम्, तथा ( उक्को सेणं) उत्कर्षेण ( रयणिप्पमाण मे हो जावेगी अर्थात् ये किसी भी प्रकार को चेष्टा वाले नहीं होगें चेष्टा से रहित ही होगा ( न तेआ) इनका शरीर फीका कान्ति रहित ही होगा, (अभिक्खणं सीउण्हखरफरु सवायविज्झडिअ मलिणं सुरभोगुंडियंग मंगा ) इनका शरीर निरन्तर शीतस्पर्श वाली उष्णस्पर्श वालो, तीक्ष्ण, कठोर, वायु से व्याप्त रहेगा अत एव वह मलिनता युक्त होगा और धूलि के छोटे छोटे कणों से वह अगुण्ठित रहेगा ( बहु को इमाणमायालोमा ) इनके क्रोध, मान, माया और लोभ ये कषायें प्रचुर मात्रा में रहेगो (बहुमोहा) मोह ममता- इनमें बहुत अधिक होगी ( असुभदुक्खभागी) शुभ कर्मों से ये रहित होगें इसलिये दुःखों के ही ये पात्र होगें, तथा - (ओसण्णं धम्मसण्ण सम्मत्तपरिब्भट्ठा) ये प्रायः धर्मश्रद्धा और सम्यक्त्व से परिभ्रष्ट होंगे यहां जो प्रायः शब्द प्रयुक्त हुआ है उस से यह प्रगट किया गया है कि कदाचित् ये सम्यग्दृष्टि भो होंगे । तथा - ( उक्कोसेणं स्यणिप्पमाणमेत्ता ) यागु लतनी येष्टावाणा थशे नही-येष्टारहित थशे. (नट्ठतेआ) शेभनु शरीर रीड - કાંતિ રહિત હશે. (अभिक्खणं सीउन्हखरफरुसवाय विज्झडिअमलिणपंसुर ओगुंडियंगमंगा) भनु शरीर निरंतर शीतस्यर्शवाणा, उष्णस्पर्श वाजा, तीक्ष्य, उठोर वायुथी व्याप्त રહેશે, એથી તે મલિનતા યુક્ત હશે અને ધૂલિના નાના-નાના કણા થી તે અવગુ‘તિ रडेशे (बहु कोहमाणमायालोभा) भने ोध, मान, माया भने बोल थे उषायो प्रयुर मात्रामा रहेश. (बहु मोहा) भोई भमता - शेभनामां मडु न वधारे प्रमाणुभां थशे, (असुभदुक्खभागी) शुलम्भैथी येथे रहित इथे मेथी भे थे। दुःमलागी थशे तथा (ओसण्णंधम्मसण्णसम्मत्तपरिभट्ठा) येथे। प्रायः धर्म, श्रद्धा अने सभ्यत्वथी परिभ्रष्ट शे. अड्डी ने प्रायः शब्दवायी 'ओसण्ण' शब्द प्रयुक्त थयेस छे. तेनाधी या वात प्रकुट वामां भावी छेउहायित येथे। सम्यग्दृष्टि सम्पन्न पशु थशे. तथा (उक्कोसेणं स्यणिपमाण Page #486 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४७२ जम्बूद्वीपप्रशतिसूत्रे चा) रत्निप्रमाणमात्राः रत्निः हस्तः चतुर्विंशत्यङ्गुलप्रमाणस्तत्प्रमाणा मात्रा परिमाणं येषां ते तथा हस्तप्रमाणशरीरा इत्यर्थः, तथा (सोलसवीसइवासपरमाउसो ) षोडशविशतिवर्ष परमायुष्कः पोडशभ्यो वर्षेभ्य आरभ्य विंशतिं वर्षाणि यावत् उत्कृष्टायुष्का, तथा (बहुपुत्तणत् परियालपणयबहुला ) बहुपुत्रनप्तु परिवारप्रणय बहुलाः बहवः प्रचुरा ये पुत्रा नृप्तारः - पौत्रा दौहित्राथ तद्रूपो यः परिवारस्तत्र वहलः = प्रचुरः प्रणयः = स्नेहो येषां ते तेषां पुत्रपौत्रादिरूपपरिवारे प्रचुरप्रीतिमन्त इत्यर्थः, सल्पेनैव कालेन यौवनोदयात अल्पेऽप्यायुषि ते प्रचुरपुत्रपौत्रादिसम्पन्ना भवन्तीति । एवं भूतास्ते मणुजा भविव्यन्तीति । ननु तदानीं तेषां गृहाद्यभावेन ते क्व निवसन्तीत्याशङ्कामपनेतुमाह (गंगासिंधू महाणईओ वेग्रइदं च पञ्चयं नीसाए ) गङ्गासिन्धू महानद्यौ वैताचं च पर्वतं निश्राय - गङ्गसिन्ध्वो महानद्यौ वैताढ्यं च पर्वतं निश्राय गङ्गासिन्ध्वोर्महानद्यौ वैताढ्यस्य पर्वतस्य च निश्रां कृत्वा 'बावन्तरि णिओगबोयं बीयमेत्ता बिलवासिणो मणुआ भविसंति' द्वासप्ततिर्निगोदवीजं बीजमात्रा बिलवासिनो मनुजा भविष्यन्ति द्वासप्ततिसंख्यका बिलवासिनो - बिलेषु निवसनशीला मनुजाः = मनुष्या भविष्यन्ति कीदृशा एते भवि व्यन्ति ? इत्याह- निगोद्वीजं - निगोदानां = भविष्यन्मनुज कुटुम्बानां बीजमिव - कारणमिव, भविष्यतां मनुजानां हेतुभूतत्वादेते निगोदबीजमित्युच्यन्ते इतिबोध्यम्, तथा चैते इनके शरीर को ऊँचाई उत्कृष्ट से२४ अंगुल प्रमाण - एक हाथ की होगी (सोलसवीसइवासपरमाउ सो) इनको उत्कृष्ट आयु १६ वर्ष से लेकर २०वर्ष तक होगा (बहुपुत्तणत्तु परियालपणय बहुला) अनेक पुत्र एवं नातीरूप परिवार में प्रचुर प्रणय -स्नेह-से ये युक्त होंगे क्यों कि थोड़े से ही काल में ये यौवनावस्थावाले होजावेंगे इस कारण अल्प आयु में भीं ये प्रचुर पुत्र पौत्रादिपरि वार वाले होजावेंगे यदि यहां पर कोई ऐसी आशंका करे कि उससमय में इनके गृहादि अभाव से इनका निवास कहां पर होगा तो इस शङ्का की निवृत्ति के लिये सूत्रकार कहते हैं (गंगासिंधुओ महाणईओ वेयडुंच फवयं नोसाए बावतारं नियोगबीयं बोयमेत्ता बिलवासिणो मया भविस्संति) ये गंगा और सिन्धु जो महानदियां है उनके एवं वैताढ्य पर्वत के सहारे पर रहेंगे विलवासी मनुष्य७२ होगें इन से फिर भविष्यत् मनुष्यों के कुटुम्बों की सृष्टि होगी मेन्ता) खेभना शरीरनी या उत्कृष्टथी २४ अंगुस प्रभार मे हाथ भेटसी इशे (सोलसवीसइवास परमाउसो) मनी उत्ष्ट मायु १६ वर्षथी भांडीने २० वर्ष सुधी खरी (बहु पुत्तणत्त परियालपणय बहुला ) अने पुत्र अने पौत्र३य परिवारमा प्रयुर अशुद्ध-स्नेहा એએ યૌવનાવસ્થા સમ્પન્ન થઇ થશે. એથી અલ્પ આયુમાં પણ એએ પ્રચુર પુત્ર પૌત્રાદિ પિરવાર વાળા થઈ જશે. જો અહી કોઈ એવી આશંકા કરે કે તે સમયમાં એમને ગૃહાદિના અભાવથી એએ નિવાસ કયાં કરશે ? તે આ શંકાની નિવૃત્તિ માટે સૂત્રકાર કહે छे- (गंगासिंधूओ महाणईओ वेयडूढंच पव्वयं नोसाए बावन्तरि णियोगबीयं बीयमेत्ता बिलवासिणो मया भविस्संति) येथे गंगा भने सिंधु तेभन वैताढ्य पर्वतना આધારે રહેલ. ખિલવાસી મનુષ્યા ૭ર હશે. એમનાથી ફરી ભવિષ્યત્ મનુષ્યનાં કુટુ બેની Page #487 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४७३ प्रकाशिका टिका० द्वि० वक्षस्कार सू० ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् बीजमात्रा:-बीजस्येव मात्र परिमाणं येषां तथा, स्वरूपतः स्वल्पा इत्यर्थः । हे गौतम ! दुष्षमदुष्षमायां समायां 'दुरूवा' इत्यारभ्य बिलवामिनः' इत्यन्तविशेषणपदैनिरूपिता मनुजा भविष्यन्तीति भवद्भिर्विज्ञेयम् । पुनीमतस्वामी पृच्छति-(तेणं भंते मणुआ किमाहरिस्संतिः) ते खलु भदन्त ! मनुजाः किमाहरिष्यन्ति, हे भदन्तः ! दुष्षमदुष्पमासमोत्पन्ना मनुष्या किंविधमाहारं कुर्वन्ति ? इति गौतम स्वामिनःप्रश्नः । भगवानाह (गोयमा) हे गौतम ! (तेणकालेणं तम्मिन् काले दुष्षमदुष्पमालक्षणे काले (तेणं समएणं ) तस्मिन् समये दुषमायाःप्रान्तभागे (गंगासिंधुओ महाणईओ) गङ्गासिन्धू महानद्यौ, कीदृश्यौ महानद्यौ ! (रहपहमित्तवित्थराओ ) रथपथमात्रविस्तरे-रथस्य पन्था रथपथः रथगमनमार्गः, तत्परिमाणो विस्तरो विस्तारो ययोस्ते तथाविधे, ( अक्खसोयपमाणमेतं ) अक्षस्रोतः प्रमाणमात्रम् अक्ष: चक्रं तस्य यत् स्रोतो-रन्धं तत्प्रमाणा = तत्परिमाणा मात्राप्रमाणम् अवगाहनाप्रमाणं यस्य तत्तथाविधं (जल) जल (वोज्झिहिति) वक्षतः । गङ्गासिन्ध्वोर्महानधोविस्तारो रथपथमात्रप्रमाणो जलावगाहप्रमाणं रथचक्रस्नोतःपरिमितं च भवतीति बोध्यम् इति भावः । (से वि य णं जले) तदपि च जलं (बहुमच्छकच्छभाइण्णे) ये स्वरूप से स्वल्प होंगे इस तरह हे गौतम ! दुष्पमदुष्पमा काल में 'दूरूवा' पद से लेकर 'विलवासिनः' इस अन्तिम विशेषण रूप पदों तक के पदों द्वारा हमने छठवें आरे-काल के मनुष्यों का वर्णन किया अब गौतम स्वामी पुनः प्रभु से ऐसा पूछते हैं -(तेणं ! भते मणुआ कमा हरिस्संति) हे भदन्त ! वे छद्रे आरे के मनुष्य कैसा आहार करेंगे ? उत्तर में प्रभुकहते हैं (गोय मा! तेणं कालेणं तेणं समएणं गंगा सिन्धुओं महाणईओ) हे गौतम! उमकाल में और उस समय में गंगा एवं सिन्धू नाम की दो नदियां रहेगी ये नदियां (रहपमित्त वेत्थराओ) रथ के गमन मार्ग का जितना प्रमाण होता है उतने प्रमाण के विस्तार वाली होंगी (अक्खसोयपमाणमेत्ता) इन में रथ के चन्द्र के छिद्र के बराबर जिसकी अवगाहना का प्रमाण होगा इतना जल बहता रहेगा अर्थात् इनकी गहराई बहुत थोड़ी होगी, रथ के चक्र के छेद की जितनी गहराइ होती है उतनी गहराई वाला उनमें जल रहेगा (से वि य णं जले बहु मच्छकच्छभाइण्णं णो चेव સષ્ટિ થશે. એઓ સ્વરૂપમાં સ્વલ્પ હશે. આ પ્રમાણે હે ગૌતમ દુષમદુષમકાળમાં 'दुरूवा' ५६थी भांडन "विलवासिनः" मा मतिम विशेषण ३५ ५:ो सुधीन हो ? અમે છઠ્ઠા આરાના વખતના મનુષ્યનું વર્ણન કર્યું છે. હવે ગૌતમ સ્વામી ફરીથી પ્રભુશ્રીને प्रल ४रे छ- (तेणं भंते ! मणुआ किमाहरिस्संति) मत ! ते ७१। आराना मनुध्या उवा माला ७२१ सभी प्रभु ४९ छ-(गोयमा ! तेणं कालेण तेणं समपण गंगा सिंधूभो महाणईओ) गौतम ! तभी मने ते समयमा ॥ मने सिन्धु नाम के नही100 से मान्न नदीमे। (रहपहमित्तवित्थराओ) २थना गमन मागनु प्रमाण डाय छ, तरक्षा प्रभा २८मा विस्तारवाणी , (अक्खसोयपमाणमेत) अन्न नहीयोमा રથના ચન્દ્રના છિદ્ર તુલ્ય જેની અવગાહનાનું પ્રમાણુ હશે, તેટલું પાણી વહેતું રહેશે. એટલે કે એ બનેની કઢાઈ સાવ ઓછી હશે. રથના ચક્રના છિદ્રની જેટલી ઊંઢાઈ હાય Page #488 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तसूत्रे बहुमत्स्य कच्छपाकीर्ण बहुभिः मत्स्यैः कच्छपैश्च आकीर्ण = व्याप्तम् प्रचुरमी नकूर्मव्याप्तं भविष्यति । तथा - ( णो चेव णं आउबहुले भविस्सइ) नो चैव खलु अब्बहुलं भविष्यति = तज्जलं च सजातीयाप्काय बहुलं नैव भविष्यति । अथं कश्चित् हिमत्यरकव्यवस्था नास्तीति पूर्वाचार्यैः प्रतिपादितम् तर्हि तगतपद्महृदाद् निर्गतयोगङ्गासिन्धु नदीप्रवाहयोर्नियतत्वेन पूर्वोक्तरूपौ प्रवाहौ कथं संगच्छेते ? इत्यत्राह - गङ्गापप्रातकुण्डान्निर्गमानन्तरं क्रमेण कालप्रभाववशाद् भरतभूमौ प्रचण्डतापैर परजलेषु शुष्केषु समुद्रप्रवेशे गङ्गासिन्ध्वोः सूत्रोक्त प्रमाणजलावशेषे तावन्मात्रजलवाहित्वं तयोरिति न कश्चिद् दोषः । (तरणं ) ततः खलु - जलस्याल्पत्वात् खलु (ते मणुया) ते मनुजाः ( सूरुग्गमणमुहतसि अ सूरत्थमणमुहुत्तंसि अ ) सरोद्गमनमुहूर्त्ते च सुरास्तमन मुहूर्त्ते सूर्योदयकाले सूर्यास्तकाले च (बिलेहिंतो ) बिलेभ्यः 'णिद्धाइस्संति' निर्धाविष्यन्ति = त्वरितगत्या गमिष्यन्ति बिलेहिंतो (णिद्धाइत्ता) बिलेभ्यो निर्धाव्य च ४७४ - णं बहुले भविस्सइ) उसमें भी अनेक मत्स्य और कच्छप रहेंगे इस जल में सजातीय अप्काय के जीव नहीं होंगे हां कोई ऐसी आशंका कर सकता है - क्षुल्लहिमवान् पर्वत पर अरक व्यवस्था नही हैं वहां जो पद्म नामका हृद है उससे ही ये गङ्गा और सिन्धु नाम की नदियां निक ली हैं अतः इन नदियों का प्रवाह नियत होता है फिर पूर्वोक्त रूप से अपने इनके जो प्रवाह कहे हैं वे कैसे कहे है ? तो इस आशंका का उत्तर है - गङ्गा प्रपात कुण्ड से निर्गमन के अनन्तर क्रमशःकाल के प्रभाव से भरतक्षेत्र में प्रचण्ड ताप द्वारा अन्य जलों के शुष्क हो जाने पर समुद्र के प्रवेश के समय इन गङ्गा और सिन्धु नदियों में पूर्वोक्त प्रमाण वला जल अवशेष रहता है अतः ये उतने ही प्रमाण वाले जल को बढ़ाती हैं अतः इसमें शङ्क जैमो कोई बात नहीं है । (तणं ते मणुआ सूरुग्गमणमुहुत्तंसि अ सूरत्थमणमुहुत्तंसि अ विलेहिंतो णिद्वाइस्संति) वे बिलवासी मनुष्य जब सूर्योदय होने का समय होगा तब और जब सूर्यास्त होने का समय होगा तब अपने अपने बिलोंसे बाहर निकलेंगे और (बिलेहिंतो णिद्धाइत्ता) बिलोंसे वेग पूर्वक हे तेटसी अंडाई भेट पाणी खेमनामां रडेशे (से वि य णं जले बहुमच्छकच्छभाइण्णं णो चेव णं आउबहुले भविस्सा) तेमां पशु ने मत्स्यो भने रहेशे से पालीभां સજાતીય અકાયના જીવ! નહિ થશે. અહીં કાઈ આ પ્રમાણે શંકા કરી શકે કે ક્ષુલ્લહિમવાન પર્વત પર અક વ્યવસ્થા નથી. ત્યાં જે પદ્મ નામક હૃદ છે. તેમાંથી જ ગ`ગા અને સિંધુ નામક નદીએ નીકળી છે. એથી આ નદીઓના પ્રવાહ નિયત હાય છે. તા પછી પૂર્વોક્ત રૂપથી આપે એમના જે પ્રવાહા કહ્યા છે, તે કયા આધારે કહ્યા છે ! તા આ આશંકાને જવાબ આ પ્રમાણે છે-ગ`ગા પ્રપાત્ ડથી નિગમન પછી ક્રમશઃ કાળના પ્રભાવ થી ભરતક્ષેત્રમાં પ્રચંડ તાપ દ્વારા અન્ય જલાશયો શુષ્ક થઈ જાય ત્યારે સમુદ્ર પ્રવેશ ના સમયે, એ ગંગા અને સિન્ધુ નદીએમાં પૂર્વોક્ત પ્રમાણુ વાળું પાણી અશિષ્ટ રહે છે. એથી એએ તેટલા જ પ્રમાણવાળા જળને પ્રવાહિત કરે છે, એથી અહી` શંકા જેવી કઈ बात नथी. (तपणं ते मणुआ सूरुग्गमणमुहुत्तंसि अ सूरत्थमणमुहुत्तंसि अ विलेहितो णिज्राइस्संति) તે ખિલવાસી મનુષ્ય જ્યારે સૂર્યદય થવાનેા સમય થશે ત્યારે અને જ્યારે સૂર્યાંસ્ત થવાના - Page #489 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका. द्वि०वक्षस्कार सूं. ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् કુંડળ (मच्छकच्छ भे) मत्स्य कच्छपान जाद् गृहीत्वा (थलाई गाहिंति ) स्थलानि ग्रादयिष्यन्ति = तटदेशे समानयिष्यन्ति, (मच्छ कच्छभे थलाई गाहेत्ता) मत्स्य कच्छपान स्थलानि ग्राहयित्वा = मत्स्यकच्छपान् तटप्रदेशे समानीय (सीआतवतत्तेहिं ) शीतातपतप्तैः रात्रौ शीतेन दिवसे चातपेन तप्तैः = शुष्करसैः (मच्छकच्छ भेहि) मत्स्यकच्छपैः (इक्लबसं वाससहस्सा) एकविंशतिं वर्षसहस्राणि (विति कप्पे माणा ) वृत्ति कल्प यन्तः = जीविकां कुर्वन्तो (विहरिस्संति) विहरिष्यन्ति = स्थास्यन्ति । दुष्षम दुष्षमायां समायामग्ने विध्वंसेन आममत्स्यकच्छपानाम् अतिरसानां तज्जठराग्निना परिपाका - संभवेन तत्कालसमुत्पन्ना मनुजास्तान् मत्स्य कच्छपान् शीतातपतप्तानेव भोक्ष्यन्ते इत्युक्तं 'सीयातवतत्तेहिं' इति । पुनगौतमस्वामी पृच्छति - ( तेण भंते! मणुया) ते खलु भदन्त ! मनुजा:- हे भदन्त ! ते षष्ठारकोत्पन्ना मनुष्याः (णिस्सीला) निश्शीला: निकलकर वे (मच्छकच्छभे) मत्स्यो और कच्छपों को जल से पकड़ेंगे और पकड़कर (थलाहिंगाहित) उन्हें ये जमीनपर - तट प्रदेश पर - बाहर ले आवेगे ( मच्छकच्छभे थलाई गाहेत्ता सीआतवतत्तेहिं मच्छकच्छभेहिं इक्कवीसं वाससहस्साइं वित्ति कप्पेमाणा विहरिस्संति ) फिर ये उन मच्छ कच्छपों को रात में शीत में और दिन में धूप में सुखावेंगे इस प्रकार करने से उनका रस जब शुष्क हो जावेगा - अर्थात् वे सब शुष्क हो जायेंगे तब ये उनसे अपनी क्षुधा की निवृत्ति करेंगे इस तरह से ये आरे की स्थिति जो २१ हजार वर्ष की है वहां तक करते रहेंगे ! तात्पर्य यही है कि छठे आरे में अग्निका तो विध्वंस हो जावेगा और आम - गीले-मच्छ कच्छपो कोतो कि जिनमें रस की अधिकता रहती हैं इनकी जठराग्नि पचा नहीं सकेगी इस कारण उस काल में उत्पन्न हुए मनुष्य उन मत्स्य कच्छपों को शोत और आतप में डालकर उन्हें सुखाकर ही खावेंगे यही वात "सीयातवतत्तेहिं" पाठ द्वारा प्रकट की गई है । समय हुशे त्यारै पोतपोताना मिसीभांथी महार नीशे अने (विलेहिंतो णिद्धान्ता) मिसमांथी वेग पूर्व: नीजीने तेथे (मच्छकच्छसे) भत्स्यो भने उच्छयाने पाशुीमांथी, घडशे अने पडीने (थलाहिं गाहेहिति) तेमने भीन उपर तट प्रदेश उपर-महार व्यावशे. (मच्छकच्छ मे थलाई गाहेत्ता सीआतवतत्तेहि मच्छकच्छपेहि इक्कीसं वाससहस्सा वित्त कप्पेमाणा विहरिस्संति) पछी मेथे ते २२ राशीतमां मने દિવસમાં તડકામાં સૂકવશે. આ પ્રમાણે કરવાથી તેમના રસ જ્યારે શુષ્ક થઇ જશે, એટલે કે તેઓ સવે શુષ્ક થઈ જશે, ત્યારે એએ તેમનાથી પેાતાની બુભુક્ષા મટાડશે આ પ્રમાણે આ આરાની સ્થિતિ ૨૧ હજાર વર્ષ જેટલી છે ત્યાં સુધી એએ તેમ કરતા રહેશે. તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે છઠ્ઠા આરામાં અગ્નિને વિનાશ થઇ જશે અને આમ--ભીના-મચ્છ—કચ્છ પાને કે જેમનામાં રસની અધિકતા રહે છે, એમની જઠરાગ્નિ પચાવી શકશે નહી. આ કારણે તે કાળમાં ઉત્પન્ન થયેલા મનુષ્યેા તે મત્સ્ય કચ્છપેાને શીત અને તપમાં નાખીને तेभने सुवीने ४ जशे से वात "सीयातवतत्तहि' पाठ वडे अट वामां भाषी है. हवे गौतम स्वामी श्री अलुने या प्रमाणे पूछे छे - (तेण भंते । मणुया) डे लहांत !. Page #490 -------------------------------------------------------------------------- ________________ عمومی امام مهم مصاص نفسه فه ی تی و जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे = शीलवर्जिताः दुराचाराः (णिव्वया) निव्रताः = महाव्रताणुव्रतवर्जिताः अनुव्रतमूलगुणरहिता इत्यर्थः, (णिग्गुणा) निर्गुणाः = उत्तरगुणवर्जिताः (णिम्मेरा) निर्मर्यादाः = . कुलादिमर्यादापरिवर्जिताः, (णिप्पच्चक्खाणपोसहोववासा) तत्र निष्प्रत्याख्यानपोषधोपवासाः प्रत्याख्यानानि पौरुष्यादिनियमाः, पोषधोपवासाः अष्टम्यादि पर्वोपवासाः, तेभ्यो निष्क्रान्ता येते तथा पोरुष्यादि नियमान् अष्टम्यादिपर्वोपवासांश्च आनाचरन्तः, (ओसणं) बाहुल्येन (मंसाहारा) मांसाहारामांसभक्षिणः पश्चादीनां मांस भक्षणशीलाः (मच्छाहारा) मत्स्याहागः = मत्स्यभोजिनः (खुड्डाहारा) रुद्राहाराः तुच्छाहाराहरणकारिणः तथा (कुणिमाहरा) कुणपाहारा: बसादि दुर्गन्धाहारकारिणः सन्तः (कालमासे कालं किच्चा) कालमासे कालं कृत्वा (कहिं गच्छिहिति) का गमिष्यन्ति कस्मिन् स्थाने गति करिष्यन्ति ? (कहिं उववजिहिंति) क्वउपपत्स्यन्ते = कुत्र जनिष्यन्ते ? इति । भगवानाह (गोयमा!) हे गौतम ! (ओसणं) बाहुल्येन (णरगतिरिक्खजोणिएसु) नरकतिर्यग्गतिषु (गच्छिहिति) गमिष्यन्ति = गतिभाजो भविष्यन्ति (उपवन्जिहिति) उपपत्स्यन्ते = उत्पत्तिभाजो भविष्यन्ति । पुन गौतमस्वामी पृच्छति-(तीसे ण भंते ! समाए ) तस्यां अब गोतम स्वामी पुनः प्रभु से ऐसा पूछते हैं - "तेणं भंते ! मणुया'? हे भदन्त ! ये छठे आरे में उत्पन्न हुए मनुष्य जो कि (णिस्सोला) शील से वर्जित दुराचार वाले होंगे. (णिन्वया) महाव्रत और अणुव्रतों से रहित रहेंगे-अनुव्रत और मूलगुणों से रहित रहेंगे(णिग्गुणा) उत्तर गुणों से रहित रहेंगे (णिम्मेरा) कुलादि मर्यादा से परिवर्जित रहेंगे (णिप्पच्चक्वाणपोसहोववासा) पौरुषि आदि नियमों के और अष्टमी आदि पर्व सम्बन्धी उपवासों के आचरण से रहित रहेंगे, (ओसण्णं मंसाहारा मच्छाहारा खुड्डा हारी, कुणिमा हारा) प्रायः मांस ही जिनका आहार होगा मत्स्यों को जो खावेंगे, तुच्छ आहार करेंगे और वसादि दुर्गन्ध आहार करनेवालेहोंगे (कालमासे कालं किच्चा कहिं गच्छहिंति, कहिं उवव. ज्जिहिति) कालमास में मरकर कहां पर जावेंगे ? कहां पर उत्पन्न होवेंगे? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-(गोयमा ! ओसणं णरगतिरिक्खजोणिएसु गच्छिहिंति उववजिहिंति) हे गौतम ! प्रायः कर के ये नरक गति और तिर्यञ्च गति में जावेंगे और वहीं पर उत्पन्न होंगे पुनः से छ!! मारामा अत्यन्न थये। मनुष्य। २ (णिस्सीला) शा वाताशयाशयरी (णिव्वया) माथी जान थरी-मनुबनी अने भूणगुणेथी २डित शे. (णिगुण्णा) उत्तम शुशीथी २हित शे, (णिम्मेरा) gall मर्यादा थी परिव त श (णिप्पच्चक्खाणपोसકોણaar) પરિષિ વગેરે નિયમ અને અષ્ટમી વગેરે પર્વે સંબંધી ઉપવાસના આચરણ थीडित थशे, (ओसणं मंसाहारा मच्छाहारा खुडाहारा कुणिमाहारा) प्राय: भांडा , मत्स्यभक्षी. थशे. तु माहा२ ४२शे मन वसाह ५ माडा२ भक्षी थशे. (काल मासे काल किच्चा कहिंगच्छिाहति कहिंउववजितहिति) आभासमा भर प्राशन ज्यांश १ : 6-4 थशे सेना भामांप्रमुछे-गोयमा! ओसण्णं णरगतिरिक्खजोणिपसु गच्छिहिंति उअवजिहिति ३ गौतम!प्रायः शने से थे। न२४ गति सतिय"य गतिमा अने त्यi or Gu-न थशे. ३२री गौतम स्वामी प्रसुन प्रश्न ४२ छ.- (तोसेणं Page #491 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीकाद्वि०वक्षस्कारसू. ५४ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् ४७७ खलु भदन्त ! समायां (सीहा) सिंहाः (वग्या) व्याघ्राः (विगा) वृकाः (दीविया) द्वीपिकाः (अच्छा) ऋक्षा:= भल्लूकाः (तरक्खा) तरक्षाः व्याघ्रजातिविशेषाः वन्यपशुविशेष: (परस्सरा)पराशराः 'गेंडा, इति भाषा प्रसिद्धाः (सरभसियालबिराल मुणगा) शरभ. श्रृगालबिडालशुनकाः-तत्र शरभाः = अष्टापदाः, शृगाला: = जम्बूकाः बिडाला:मार्जाराः शुनकाः कुक्कूराः एतेषां पदानामितरेतरयोगद्वन्द्वः तथा (कोलसुणगा) कोलशुनका: आरण्याः शूकराः (ससगा) शशकाः = (चित्तगा ) चित्रकाः तथा (चिल्ललगा) चिल्ललकाः=श्चापदविशेषाः, । एते सर्वे जन्तवः ( भोसण्णं ) बाहुल्येन (मंसाहारा) मांसाहाराः (मच्छाहारा) मत्स्याहाराः (खोदाहारा) क्षुद्राहाराः क्षुद्रं= तुच्छम् आहारो येषां ते तथा नीरसधान्याहारिण इत्यर्थः (कुणिमाहारा) कुणपाहारा:-कुणपः शवः तस्य मांसादिरपि कुणपः, स आहारो येषां ते तथामांसवसाद्याहारिणश्च सन्तः (कालमासे कालं किच्चा) कालमासे कालं कृत्वा (कर्हि गच्छिहिंति ? कहिं उववज्जिहिति) क्व गमिष्यन्ति ? क्य उत्पत्स्यन्ते ? इति गौतमस्वामिनः प्रश्नः। भगवानाह-(गोयमा) हे गौतम! एते सिहादयः (ओषणं) प्रायः बाहुल्येन (णरगतिरिक्खजोणिएस) नरकतिर्यग्योनिकेषु जीवेषु (गच्छिहिंति उववज्जिहिति) गौतम स्वामो प्रभु से पूछते हैं- “ तीसेणं भंते ! समाए सोहा वग्धा विगा, दीविया, अच्छा, तरक्खा, परस्सरा) हे भदन्त ! उस छटे आरे में शेर, व्याघ्र, वृक, द्वीपिक, चीता, रोछ, तरक्ष-व्याघ्रजाति का हिंसक जानवर विशेष और परस्मर-गेंडा, हाथी, (सरभसियालविरलसुणगा) तथा शरभ-अष्टापद-शृगाल-विडाल-मार्जार शुनक-कुत्ते (कोल पुणगा जंगली कुत्ते, (ससगा) स्वरगोश, (चित्तगा) चित्रक,(चिल्ललगा) चिल्ललक-श्वापदविशेष ये सब जानवर (ओसणं) प्रायः करके (मंसाहारा) मांसाहारी (मच्छाहारा) मत्स्याहारी (खोद्दाहारा) क्षुद्राहारी नीरसधान्य आहारी (कुणिमाहारी) कुणव-शबके आहारो तथा मांसवसा आदि के आहारी होते हैं तो ये सब भी (कालमासे कालं किच्चा कहिं गच्छिहिंति कहिं उववज्जिहिंति) कालमास में मरण कर के कहां जावेंगे? कहां उत्पन्न होवेंगे ! इसके उत्तर में प्रभु कहते है (गोयमा ! ओसणं णरगतिक्ख जोणिएसु) हे गौतम! ये सब पूर्वोक्त मांसाहारादि विशेषण भते ! समाए सीहा वग्घा, विगा, दीविया, अच्छा, तरक्खा, परस्सरा) महत! त छ। माराम (सपाच, ४, ५४, याता, छ, तक्ष-वाचनातनु &ि४ जनविशेष सन ५२२१२-731, हाथी (सरमसियाविरालसुणगा) तथा श२४-मण्टा५६. श्रास, (स-मा२, शुन:-त । (कोलसुणगा) वन्यतये।, (ससगा) ससला। (चित्तगा) यित्र। (चिल्ललगा) Fice-२.५४ विशेष मां प्राणी (ओसण्णं) प्राय: शन (मंसाहारा) मसाला (मच्छाहारा) मत्स्याला (खोद्दाहारा) क्षुदाकारी-नीरस धान्य मातारी (कुणिमाहारा) शुक्-श-माहा मग भांस-१सा माहिन माला डाय छ. तो पछी समय (कालमासे कालं किच्चा कहिं गच्छहिंति कहिं उववज्जिहिति) માસમાં મરણ પ્રાપ્ત કરીને કયાં જશે ? કયાં ઉત્પન્ન થશે ? એના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે— (गोयमा! ओसण्णं णरगतिरिक्खजोणिपसु) 3 गौतम ! मे । सवे पूरित मांसाहारा Page #492 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे गमिष्यन्ति उपपत्स्यन्ते इति । पुनगौतमस्वामी पृच्छति (ते णं भंते ! ढंका कका पीलगा मगुगा सिही) ते खलु भदन्त ! ढङ्काः कङ्काः पीलकाः मद्गुकाः शिखिनः, तत्र-ढङ्काः काकविशेषाः, कङ्का: लोहपृष्ठाख्याः पक्षिण:-'लोह पृष्टस्तु कङ्कः स्यात्' इत्यमरः, पीलकाः, पक्षिविशेषाः, मद्गुका:-जलवायसाः, शिखिनः मयूराः, त एते पक्षिणः (असणं) प्रायः (मंसाहारा जाव) मांसाहारा यावत् यावत्पदेन-'मत्स्याहाराः क्षुद्राहाराः कुणपाहाराः' इति पदत्रयं संग्राह्यम् मांसाहारादि विशिष्टाः सन्तः (कहिं गच्छिहिंति कहि उववन्जिहिति ? ) क्व गमिष्यन्ति क्व उत्पत्स्यन्ते ? । भगवानाह-(गोयमा) हे गौतम ! (भोसणं) प्रायः (णरगतिरिक्खजोणिएम) नरकतिर्यगयोनिकेषु (जाव) यावत् (उववज्जिहिति) उत्पत्स्यन्ते यावत्पदेन--'गमिष्यन्ति' इति संग्राह्यम् ॥ सू० ५४ ॥ षष्ठारकः प्ररूपितः, तत्प्ररूपणेन अवसर्पिणीकालोऽपि प्ररूपितः, सम्प्रति पूर्वोदिष्टा मुत्सर्पिणी तत्प्रथमारकादि प्ररूपणापूर्वकं प्ररूपयति__ मूलम्-तीसे णं समाए इक्कवीसाए वाससहस्से हि काले वीइकंते आगमिस्साए उस्स प्पिणीए सावणबहुलपडिवए बालेवकरणसि अभीइणक्खत्ते चोइस पढमसमये अणं तेहिं वणपज्जवेहिं जाव अणंत गुणपरिवद्धीए परिवुद्धेमाणे २ एत्थ णं दूसमदूसमा णामं समा पडिव. ज्जिस्सइ समणाउसो ! तोसे णं भंते ! समोए भरहस्स वासस्स केरिवाले व्याघ्र आदि जानवर प्रायः करके नरकगति या तिर्यगति में मरण कर के जावेंगे वहां पर उत्पन्न होंगे। (तेणं भंते ढंका कंका पीलगा, मग्गुआ सोही) हे भदन्त ! ढंक-काकविशेष, कंकवृक्ष फोडा पक्षो, मद्रक- जल कौवा, एवं शिखी- मयूर, (ओसणं मंसाहारा जाव कहिं गच्छहिंति, कहिं उववज्जहिंति) ये सब पक्षो, जो की प्रायः मांस का आहार करते हैं, योवत्मत्स्यों का आहार करते हैं क्षुद्राहार करते हैं, कुणपाहार करते हैं कालमास में मर कर कहां जावेंगे! कहां उपन्न होंगे इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-(गोयमा!) ओसणं णग्गतिरिक्ख जोजिएसु) हे गौतम! ये जीव प्रायः करके नरक और तिर्यग्योनिकों में (जाव गच्छिहिति) होंगे यावत् जावेंगे एवं वहीं पर (उववज्जिहिंति) उत्पन्न होंगे ॥सू०५४।। વિશેષ વાળા સિંહ, વાઘ વગેરે પ્રાણીઓ ઘણું કરીને નરક ગતિ અથવા તે તિર્યગતિમાં भ२५ प्राप्त 30 शे भने त्यो पन्न थशे. (तेण भंते ढंका, कंका पीलगा मग्गुआ सिहो) 3 महन्त ! ४-४ विशेष, ४' वृक्ष ३७ पक्षी ( 1) भद्र vaौमा भने शिभी-भयू२ (ओसण्णं मांसाहारा जाव कहि गच्छहिति कहि उवज्जिहिति) को अधा પક્ષીઓ કે જેઓ પ્રાયઃ માંસાહાર કરે છે, વાવ મસ્યાહાર કરે છે, ક્ષુદ્રાહાર કરે છે, કુણ પાર કરે છે, કાલમાસમાં મૃત્યુ પ્રાપ્ત કરીને ક્યાં જશે ? કયા ઉત્પન્ન થશે ? એના नाभा भूछ -(गोयमा ! ओलण्णं णरगतिरिक्खजोणिपस) गीतमा न्य। प्रायः न२४ भने तिय योनिमा (जाव) यावत (गच्छिहिति) २४ भने hior (उववन्जिहिति) उत्पन्न यशे, ॥५४॥ Page #493 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि. वक्षस्कारः सू. ५५ अवसर्पिण्याः प्रथमारकादि निरूपणम् ४७९ सए आगारभावपडोयारे भविस्सइ ? गोयमा ! काले भविस्सइ हाहाभूए भंभामूए, एवं सो चेव दूसमदृसमावेढओ णेयव्वो। तीसे णं समाए एक्कवीसाए वाससहस्सेहिं काले विदाकंते अणंतेहिं वण्णपज्जवेहिं जाव अणंतगुणपरिवुद्धीए परिवद्धेमाणे परिवद्धेमाणे एत्थ णं दूसमा णामं समो काले पडिवज्जिस्सइ समणाउसो! ॥सू० ५५॥ छाया-तस्यां खलु समायाम् एकविंशत्या वर्षसहस्रैः काले व्यतिक्रान्ते आगमिष्यन्त्यामुत्सपिण्यां श्रावणबहुलप्रतिपदि बालवकरणे अभिजिन्नक्षत्रे चतुर्दशप्रथमसमये अनन्तैर्वणपर्यवैर्यावत् अनन्तगुणपरिवृद्धया परिवर्द्धमानः परिषद्धमानः, अत्र खलु दुषमदुष्षमा नाम समा कालः प्रतिपत्स्यते, श्रमणायुष्मन् ! । तस्यां खलु भदन्त । समायां भरतस्य वर्षस्य कीदृश आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यति ? गौतम ! कालो भविष्यति हाहाभूतो भम्भाभूतो एवं स एव दुष्षमदुष्षमावेष्टको नेतव्यः तस्याः खलु समायां एकविशत्या वर्षसहस्त्रैः काले व्यतिक्रान्ते अनन्तवर्णपर्यवैर्यावत् अनन्तगुणपरिवृद्धया परिवर्द्धमान: परिवर्द्धमानः, अत्र खलु दुष्षमा नाम समा कालः प्रतिपत्स्यते श्रमणायुष्मन् ! सू० ५५॥ टीका-"तीसेणं समाए" इत्यादि । (समणाउसो !) श्रमणायुष्मन् । हे आयुष्मन् श्रमण! (तीसेणं समाए) तस्याः खलु समाया: अवसर्पिण्यवयवरूपायो दुष्षमानाम्न्याः (इक्कवीसाए वाससहस्सेहिं) एकविंशत्या वर्षसहस्रः प्रमिते (काले वीइक्कंते) काले व्यतिक्रान्ते सति (आगमिस्साए उस्सप्पिणीए) आगमिष्यन्त्याम् आगामिन्याम् उत्सपिण्याम् (सावणबहुलपडिवए) श्रावणबहुलप्रतिपदि-पूर्वावसर्पिण्या आषाढपूर्णिमान्तिम इस प्रकार छठे आरे की प्ररूपणा करदेने से अवमर्पिण काल प्ररूपण हो जता है । अब सुत्रकार पूर्वोद्दिष्ट काल अवसर्पिणी काल की उसके प्रथमारक आदि की प्ररूपणा करते हुए प्ररूपणा करते हैं। तीसेणं समाए इक्कवीसाएवाससहस्सेहिं काले वोइक्कते-इत्यादिसूत्र-५५ टीकार्थ-(समणा उसो) हे श्रमण आयुष्मन् ! (तीसेणं समाए) उस अवसर्पिणी के अवयवरूप दुष्पमा नामक मारे को (इक्कवोसाए वाससहस्सेहिं वोइक्कते) २१ इक्कोस हजार वर्ष रूप स्थिति के समाप्त हो जाने पर अर्थात् २१ हजार वर्षे का पंचम काल निकल जाने पर (आगमिस्साए उस्सप्पिणीए) आने वाले उत्सर्पिणो काल में (सावण बहुलपडिवए) श्रावण मास की कृष्णपक्ष की प्रतिपदा આ પ્રમાણે છઠ્ઠા આરાની પ્રરૂપણ કરવાથી અવસર્પિણી કાળની પ્રરૂપણ થઈ જાય છે. હવે સત્રકાર પદ્વિષ્ટ અવસર્પિણી કાલની તેના પ્રથમ આરક વગેરેની પ્રરૂપણ કરે છે– तोसे ण समाए इक्कवीसाए वाससहस्सेहि काले विईक्कते-इत्यादि-सूत्र ॥५५॥ टी10-(समणाउसो) श्रम मायुध्मन् । (तीसे णं समाए) त सपियीन। अवयव ३५ हुषमा नाम भारानी (हक्कवीसाप वाससहस्सेहि वीइक्कते) २१. વર્ષરૂપ સ્થિતિ જ્યારે સપૂર્ણ થઈ જશે એટલે કે ૨૧ હજાર વર્ષને પંચમકાળ નીકળી ora (आग्रमिलाए उस्सपिणोए) यारे भाग माना। उत्सपि मां-लावण बहुल Page #494 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४८० जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे समये परिसमाप्तेः श्रावणमासस्य कृष्णप्रतिपत्तिथौ (बालवकरणं सि) बालवकरणे-बालव नामके करणे (अभीइनक्खत्ते) अभिजिन्नक्षत्रे चन्द्रेण साद्धं योगमुपागते सति. (चोइसपढमसमये)चतुर्दश प्रथम समये चतुर्दशानां कालविशेषाणां यःप्रथम: समय उच्छवासो निःश्वासो वा तस्मिन्-चतुर्दशकालविशेषाणां प्रारम्भक्षणे, चतुर्दशकालविशेषास्तु निःश्वासादुच्छ्वासात् वा गणनीयाः, तथाहि नि:श्वास उच्छ्वासोवा १, प्राणः २, स्तोकः ३, लवः ४, मुहूर्तम् ५, अहोरात्रः ६, पक्षः ७, मासः ८, ऋतुः ९, अयनम् १०, संवत्सरः ११, युगं १२, करणं १३, नक्षत्रम् १४ इति । समयस्य निर्विभागत्वेनाद्यन्तव्यवहाराभावादावलिकायाश्चाव्यवहार्यत्वादत्र समयपदेन निःश्वासोच्छ्वासयोरेकतरग्रहणम् । अत्रेदं बोध्यम् तिथि में पूर्व अवसर्पिणीकाल के आषाढ मास की पूर्णिमा रूप अन्तिम समय की परिसमाप्ति होने पर (बालवकरणंसि अभिइणक्वत्ते) बालव नामके करणमें चन्द्र के साथ आभजित् नक्षत्रका योग होनेपर (चोदसपढमसमये) चौदह कालों का जो उच्छ्वास या निःश्वास रूप प्रथम समय है उस समय (अणंतेहिं वण्णपज्जवेहिं जाव अणंतगुणपरिवड्ढोए परिवड्ढमाणे २ एत्थणं दूसम दूसमा णामं समा पडिवज्निस्सइ)अनन्त वर्ण पर्यायों से यावत्- अनन्त गन्ध पर्यायो से, रस पर्यायों से अनन्त स्पर्श पर्यायों से, संहनन पर्यायों से अनन्त संस्थान पर्यायों से अनन्त उच्चत्व पर्यायों से अनन्त आयुष्क पर्यायों से अनन्त गुरुलघुपर्यायों से अनन्त उत्थान, कर्म, वल वीर्य, पुरुषकार पर्यायों से अनन्त गुण वृद्धि वाला होता हुआ दुष्षमदुष्षमा नाम का काल प्रारम्भ होगा. चौदह प्रकार के काल इस प्रकार से हैं निःश्वास अथवा उच्छवास १ प्राण २ स्तोक ३ लव ४ मुहूर्त २, अहोरात्र ६ पक्ष ७मास ८ ऋतु ९, अयन १०, संवत्सर ११ युग १२ करण १३, और नक्षत्र १४ समय काल का निर्विभाग अंश है-इसलिये इसमें आदि अन्त का व्यवहार नहीं होता है तथा आवलिका रूप काल में अव्यवहार्यता है इसलिये पडिवए) श्रावण मासनी पक्षनी प्रतिपहा तिथिमा पूर्व अपसपी आना अषाढ भासनी लिमा तिथि ३५ मतिम समयनी समाप्ति २६ शे (बालवकरण सि अभिइणक्खत्ते) मा नामना ४२मा यन्द्रनी साथै भनित नक्षत्रनो योथरी त्यारे (चोइसपढमसमये) यतु । गोन। २२वास निवास ३५ प्रथम समय छत समये (अणंतेहि वण्णपज्जवेहि, जाव अणंत गुणपरिवुइढीए परिबडूढमाणे २ एत्थणं दूसमदूसमाणामं समा पडिवज्जिसइ) मन त पर्यायाथी, यावत सनत - पयायोथी, मन तरस પર્યાથી અનંત પશે પર્યાથી, અનંત સંડનન પર્યાથી, અનંત સંસ્થાન પર્યાથી, અનત ઉચ્ચત્વ પર્યાચોથી, અનંત આયુષ્ક પર્યાથી અનંત અગુરુલઘુ પર્યાયથી, અનંત ઉત્થાન, કર્મ, બળવીર્ય પુરૂષકાર પર્યાથી, અનંત ગુણ વૃદ્ધિયુક્ત થતો આ દુષમ દુષમા નામને કાળ પ્રારંભ થશે. ચતુર્દશ પ્રકારના કાળે આ પ્રમાણે છે નિઃશ્વાસ અથવા श्वास (१) प्राय (२) स्। (3) a५ (४), मुत्त (५), अडा२।३ (९), ५२ (७), मास (८) *तु (e) अयन (१०), सबस२ (११) युग (१२) ४२६ (13) सने नक्षत्र (१४) समय બને નિર્વિભાગ અ શ છે. એથી એમાં આદિ અંતને વ્યવહાર થતો નથી તથા આ Page #495 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० बक्षस्कार: सू० ५५ षष्टारकस्वरूपनिरूपणम् एतेषां चतुर्दशानां कालविशेषांणां यः प्रथमसमयः स एवोत्सर्पिणी प्रथमारक प्रथमसमयः अवसर्पिणी सम्बन्धिनामेषां निःश्वासादि चतुर्दशानां कालविशेषाणां द्वितीयाषाढपौर्ण सो चरमसमय एव परिसमाप्तत्वात् । अत्रेदमायातम् यद्वा खल अवसर्पिण्यादि महाकालः प्रथमतः प्रवृत्तो भवति तदैव खलु तदवान्तरभूताः सर्वेऽपि निःश्वासादयश्चतुर्दशकालविशेषा युगपत्प्रवृत्ता भवन्ति, ततश्च स्वस्व प्रामाणसमाप्तौ ते समाप्ति गच्छन्ति, एवं प्रवमानाः समाप्नुवन्तश्च ते निःश्वासादिकालविशेषा महाकालपरिसमाप्तौ समाप्ति गच्छन्तीति । अत्रेदं कश्चित् सन्दिहति ऋतुराषाढादौ प्रवर्त्तते इति शास्त्रे कथितम् उत्सर्पिणी श्रावणादौ प्रवर्त्तते इत्यत्र प्रोच्यते, ततश्च य एत्र चतुर्दशानां कालविशेषाणां प्रथम समय पद से यहां पर उच्छवास निःश्वास में से एक तर का ग्रहण किया गया है और यहां से चतुर्दश काल विशेषों की गणना की गई है यहां ऐसा समझना चाहिये इन चौदह कालो का जो प्रथम समय है वही उत्सर्पिणी काल के प्रथम आरक का प्रथम समय है क्योंको अवसर्पिणीकाल सम्बन्धी इन चौदह निःश्वासादि काल विशेषो की द्वितीय आषाढ पौर्णमासी के चरम समय में ही परिसमाप्ति हो जाता है । तात्पर्य इस कथनका ऐसा है जब अवसर्पिणो आदि रूप महा काल प्रथमतः प्रवृत्त होता है उसी समय तदवान्तरभूत सब ही निःश्वासादिरूप चौदह काल विशेष युगपत् प्रवृत्त होते हैं और जब अपना२ प्रमाण समाप्त हो जाता है तब वे सब हो निःश्वासादिरूप चौदह काल विशेष युगपत् प्रवृत्त होते हैं और जब अपना प्रमाण समाप्त हो जाता है तब वे सब समाप्त हो जाते हैं इस प्रकार से प्रारम्भ हुए और समाप्त हुए वे निःश्वासादि कालविशेष महाकाल की परिसमाप्ति होते ही समाप्ति को प्राप्त हों जाते हैं यहां कोई ऐसी आशंका करता है कि ऋतु आषाढ की आदि में प्रवृत्त होती है ऐसा शास्त्र में कहा गया है और तुम यहां ऐसा कहते हो कि उत्सर्पिणी श्रावण मास की आदि में प्रवृत्त होती વલિકારૂપકાળમાં અવ્યવહા તા છે, એથી સમયપદથી અહીં ઉચ્છ્વાસ નિઃશ્વાસમાંથી એકતરનું ઢણુ કરવામાં આવેલ છે. અને અહીંથી ચતુર્દ શકાળ વિશેષેાની ગણુના કરવામાં આવી છે. એવુ અહીં' સમજવું જોઇએ. એ ચતુ`શ કાલેાને જે પ્રથમ સમય છે તેજ ઉત્સર્પિણી કાળના પ્રથમ આરકના પ્રથમ સમય છે, કેમકે—અવસર્પિણીકાળ સંબંધી એ ચતુ શ નિઃશ્વાસાદિ કાળ વિશેષેાની દ્વિતીય આષાઢ પૌણુ માસીના ચર× સમયમાં જ પરિસમાપ્તિ થઈ જાય છે. તાત્પર્યં આ કથનનું આ પ્રમાણે છે કે જ્યારે અવસર્પિણી આદિપ મહાકાળ પ્રથમતઃ પ્રવૃત્ત થાય છે તે જ સમયે તદવાન્તર ભૂત સવ” નિઃશ્વાસાદિ રૂપ ચતુ ક્રેશ કાળ વિશેષ યુગવત્ પ્રવૃત્ત થાય છે અને જયારે પેાતાતાનું પ્રમાણ સમાપ્ત થઈ જાય છે. ત્યારે તેઓ બધા જ સમાપ્ત થઈ જાય છે. આ પ્રમાણે પ્રારંભ થયેલ અને સમાપ્ત થયેલ તે નિ:શ્વાદિ કાળ વિશેષ મહાકાળની પસિમાપ્તિ થતાં જ સમાપ્ત થઈ જાય છે. અહીં કાઇ એવી આશંકા કરે છે કે ઋતુ અષાડની સ્માદ્રિમાં પ્રવૃત્તાય છે, એવું ६१ ४८१ Page #496 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे समयः स एव उत्सर्पिण्याः प्रथमसमय इति न संगच्छते, ऋत्वर्धस्य परिसमाप्तत्वादिति । अत्राह-श्रावणादिः प्रावृट्, आश्विनादिवर्षाः, मार्गशीर्षादिः शरत्, माघादि हेमन्तः, चैत्रादिर्वसन्तःज्येष्ठादि गीष्मः-इति रूपेण मृतुक्रमस्याचार्यप्रोक्तत्वेनागमसम्मतत्वानुमानात कस्मिन्नपि पक्षे न कश्चिद् दोष इति । (अणतेहिं वण्णपज्जवेहि) अनन्तैर्वर्णपर्यवैः अनन्तसंख्यकैर्वर्णपर्यायः (जाव) यावत-यावत्पदेन (अणंतेहिं गंधपज्जवेहि, अणतेहिं रसपज्जवेहिः अणंतेहिं फासपज्जवेहिः अणतेहि संघयणपज्जवेदिः अणंतेहिं संठाणपज्जवेहि अणं तेहिं उच्चत्तपज्जवेहि अणंतेहिं आउपज्जवेहि अणंतेहिं गुरुलहुपज्जवेहि अणंतेहि अगुरुलहुपज्जवेहि अणं तेहिं उठाणकम्मबलवीरियपुरिसक्कारपज्जवेहिं) इति संग्राहयम् । छाया-अनन्तैगन्धपर्यवैः अनन्तै रसपर्यवैः अनन्तैः स्पर्शपर्यवैः अनन्तः संहननपर्यवैः अनन्तैः संस्थानपर्यवैः अनन्तैः उच्चत्वपर्यवैः अनन्तैः आयुः पर्यवैः अनन्तैर्गुरुलघुपर्यवैः अनन्तैरुत्थानकम-बल-वीर्य-पुरुषकारपर्यवैः इति । एतानि पदानि पूर्व व्या. ख्यातानि । एतैरनन्तसंख्यकवर्णनादिभिः कृत्वा (अणंतगुणपरिवद्धीए) अनन्तगुणपरिवृद्धया ( परिवुद्धे माणे २) परिवर्द्धमानः २ सन् ( एत्थ णं) अत्र खलु -अत्रान्तरे खलु (समदुसमाणाम) दृष्षमदुप्षमा नाम (समा काले) समा कालः (पडिवज्जिस्सइ) प्रतिपत्स्यते-प्राप्तो भविष्यति । इति । भगवदुक्तौ गौतमस्वामी पृच्छतितीसेणं भंते !' इत्यादि (भंते !) हे भदन्त ! (तीसेणं समाए) तस्यां खलु समायां (भरहस्स वासस्स) भरतस्य वर्षस्य (केरिसए) कीदृशक:-किंविधः (आगारभावपडोयारे) है अतः जो ही चौदह कालों का आदि समय है वही उत्सर्पिणी का प्रथम समय है ऐसा कथन संगत नही होता है क्योंकि आधी ऋतु की परिसमाप्ति होजाती है तो इसका समाधान ऐसा हे कि- श्रावणादि प्रावृट् आश्विनादि वर्षा, मार्गशीर्षादि शरत्, माघादि हेमन्त, चैत्रादि वसन्त, और ज्येष्ठादि ग्रीष्म ऋतु हैं । इस रूप से आचार्य ने ऋतुकम कहा है अतः आगम सम्मत अनुमान से इस पक्ष में भी कोई दोष नहीं है। अब गौतम स्वामी प्रभु से ऐसा पूछते हैं-(तीसे णं भंते समाए भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ) हे भदन्त इस उत्सर्पिणी काल के प्रथम आरे में भरत क्षेत्र का શાસ્ત્રનું કથન છે અને તમે અહીં આમ કહે છે કે ઉત્સર્પિણી શ્રાવણ માસના આદીમાં પ્રવૃત્ત થાય છે. એથી જે ચતુર્દશ કાળને આદી સમય છે. તે જ ઉત્સપીને પ્રથમ સમય છે, એવું કથન સંગત લાગતું નથી. કેમકે અધી ઋતુની પરીસમાપ્તી થઈ જાય છે. તો આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે શ્રાવણુદી પ્રવૃત્ત આશ્વિનાદિ વર્ષા માર્ગશી ષદિ શરદ માઘાદિ હેમન્ત, ચૈત્રાદિ વસત અને જયેષ્ઠાદિ ગ્રીષ્મઋતુ છે એ રીતે આચાર્યોએ ઋતુ ક્રમનું વર્ણન કર્યું છે. એથી આગમસમ્મત અનુમાનથી આ પક્ષમાં કોઈ પણ જાતને દોષ નથી. હવે ગૌતમ સ્વામી પ્રભુને આ પ્રમાણે પૂછે છે કે (तीसेणं भते समाए भरहस्स वासस्स केरिसर आयोरभावपडोयारे भविस्स) ભદન્ત ! આ ઉત્સર્પિણી કાળના પ્રથમ આરામાં ભરતક્ષેત્રને કેવો આકાર–ભાવ–પ્રત્યવતાર Page #497 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कारः सू० ५५ षष्ठारकस्वरूपनिरूपणम् आकारभाव-प्रत्यवतारो (भविस्सइ) भविष्यति ?। भगवानाह (गोयमा 1) गौतम ! (काले भविस्सइ) कालो भविष्यति (हाहाभूए भंभाभूए) हाहाभूतो भम्भाभूतः (एवं सो चेव दूसमसमा वेढओ) स एव दुष्षम दुष्षमावेष्टकः अवसर्पिणी वर्णनप्रसङ्गे पूर्वमुक्तः सकलोऽपि दुष्पमदुष्षमावर्णकग्रन्थसन्दर्भो (णेयव्वो) नेतव्यः-उन्नेय । इत्थं दुष्षमदुष्षमा समां वर्णयित्वा सम्प्रति दुषमा वर्णयति 'तोसेण' इत्यादि । (समणाउसो !) हे श्रमणायुष्मन् ! (तीसेगं समाए) तस्याः दुष्षमदुष्षमायाः खलु समाया: (एकवीसाए वाससहस्से हिं) एकविंशत्या वर्षसहस्रः प्रणिते (काले वीइक्कंते) व्यतिक्रान्ते-व्यतीते सति (अणं तेहिं वण्णपज्जवेहिं) अनन्तैर्वर्णपर्यवैः (जाव) यावत्-यावत्पदेन-(अणंतेहिं रसपज्जवेहिं) इत्यादीनि पूर्वोक्तानि सकलान्यपि पदानि संग्राह्याणि, ततश्च अनन्तवर्णरसादि पर्यायाणामित्यर्थः (मणंतगुणपरिवुद्धोए) अनन्तगुणपरिवृद्धया (परिबर्तमाणे २) परिवमानः परिवर्द्धमानः सन् (एत्थ णं) अत्र खलु उत्सर्पिण्या (दूसमा णामं समा काले) दुष्षमा नाम समा कालः (पडिवज्जिस्सइ) प्रतिपत्स्यते-आगमिष्यतीति ॥सू०५५ ॥ कैसा आकार भाव प्रत्यवतार स्वरूप होगा इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-(गोयमा) हे गौतम ! (काळे भविस्सइ, हाहाभूए भंभाभूए एवं सोचेव दूसमदूसमा वेढओ) यह काल ऐसा होगा कि जैसा अवसर्पिणो काल के वर्णन में छठे आरे का वर्णन हाहाभूत भंभाभून आदि पदो द्वारा किया जा चुका है अतः जैसा वर्णन वहां किया गया है वैसा हो वह वर्णन इस प्रसङ्ग में यहां पर भी जानलेना चाहिये इस प्रकार से उत्सर्पिणी के प्रथम भारे रूप दुष्पम दुष्षमा का वर्णन करके अब सूत्रकार इनके द्वितीय आरे का वर्णन के प्रसङ्ग में कहते है-(तोसे णं समाए एकवीसाए वाससहस्सहिं कडे विइक्कंते) जब उत्सर्पिणो का यह दुष्पमदुष्षमा नाम का १प्रथम काल जो कि २१ हजार वर्ष का है समाप्त होजावेगा तब (अणंतेहिं वण्णपज्जवेहि जाव अणंतगुणपरिवुड्ढोए परिवड्ढेमाणे एत्थणं दूसमा णाम समा काले पडिवज्जिस्सइ) तब धीरे २ काल के प्रभाव से अनन्त शुल्कादिवर्ण पर्यायों से यावत् -अनन्त रस आदि पूर्वोक्त पर्यायों से अनन्तगुण परिवर्द्धित होता हुआ दूसरा दुष्षमा नाम का आरा प्रारम्भ होगा ॥५५॥ मेट५१३५ थरी. मेना स्वासमा प्रभु -(गोयमा ! काले भविस्सइ, हाहाभूए, भभाभूए एवं सो चेव दूसमदूसमावेढओ) से मेवा थशे २। मसपिणी मना વર્ણનમાં છે. આનું વર્ણન હા હાભૂત, ભંભાભૂત વગેરે પદવડે સ્પષ્ટ કરવામાં આવેલ, છે. એથી જે પ્રમાણે ત્યાં વર્ણન કરવામાં આવેલ છે. તેવું જ વર્ણન આ પ્રસંગે અહીં પણ જાણી લેવું જોઈએ. આ પ્રમાણે ઉત્સર્પિણીના પ્રથમ આરા રૂપ દુષમ દુષમાનું વર્ણન કરીને व सार सेना द्वितीय माराना तन-प्रसंगमा ४ छ-(तीसेण समाए पक्कवीसाए घाससहस्सेहिं काले विइक्कते) यारे साना साहुपम पम नमन। १ प्रथम २ २ १२ १२८ छे. समास यश त्यारे (अणतेहिं वण्णपज्जवेहिं जाव अणंतगुणपरिखुड्डीए परिवडूढेमाणे पत्थणं दूसमाणामं समा काले पडिवजिजस्सइ) त्यारे धीमें ધીમે કાળના પ્રભાવથી અનંત શુક્લાદિ વર્ણ પર્યાયોથી યાવત-અનંત રસ આદિ પૂક્તિ પયાથી અનંત ગુણ પરિવતિ, તે બીજે દુષમા નામક આરાને પ્રારંભ થશે. પપ Page #498 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४८४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अस्या उत्सर्पिणी दुष्पमायाः अवसर्पिणी दुष्षमाया वैशिष्यमाह मूलम् - तेणं काळेणं तेणं समएणं पुक्खलसंवट्टए णामं महामहे पाउ भविस्es भरप्पमाणमित्ते आयामेणं तदणुरूवं च णं विक्खभवाहल्लेणं तर से पुक्खलसंवट्टए महामे हे खिप्पामेव पतणतणाइस्सइ खिप्पामेव पतणतणाइत्ता. खिप्पामेव पविज्जुआइस्सइ, खिप्पामेव पविज्जुआइत्ता, खिप्पामेव जुग मुसलमुट्ठिप्यमाणमित्ताहिं धाराहि ओघमेधं सत्तरतं वासं वासिस्सइ, जेणें भरहस्स वासस्स मूमिभाग इंगालभूयं मुम्मुरभूयं छारि यभूयं तत्तकवेल्लुगभूयं तत्तसमजोइभूयं णिव्वाविस्ततित्ति । तंसि च णं पुक्खसि महामेहंसि सत्तरतं णिवत्तितंसि समाणंसि एत्थ णं खीरमे णामं महामेहे पाउ भविस्सइ भरहप्पमाणमित्ते आयामेणं तदगुरुवं चणं विभवाहल्लें ! तर णं से खीरमेहे णामं महामहे खिपा मे पतणतणाइस्सर जाव खिप्पामेव जुगमुसलमुट्ठि जाव सत्तस्तं वासं वासिस्सs, जेणं भरहवासस्स भूमीए वण्ण गंधं रसं फासं च जणइस्सइ, तंसि च णं खौरमेहंसि सत्तरत्तं णिवत्तितंसि समाणंसि इत्थणं घयमेहे नामं महामे हे पाउन्भविस्सुइ भरहप्पमाणमेते आयामेणं. तदणुरुवं च णं विक्खभाहल्लेणं । तएण से घय मेहे महा मेहे खिप्पामेव पतणतणाइस्सर जाव वासं वासिस्सइ, जे णं भरहस्स वासस्य भूमीए सिणेहभावं जणइस्सइ तंसि च णं घयमेहंसि सत्तरतं णिवत्तितंसि समाणंसि एत्थणं अमयमेहे णामं महामेह पाउभविस्सइ भरहप्पमाणमित्तं आया मेणं जाव वासं वासिस्सइ जे णं भरवा से रुक्खगुच्छ गुम्मलय वल्लितणपव्वगहरितओसहि पवालंकु रमाइए तणवणस्सइकाइए जणइस्सइ तेसि च णं अमयमहसि सत्तरत्तं णिवत्तितंसिसमासि एत्थ णं रसमे हे नामं महामेहे पाउ भविस्सइ भरहप्पमाणमित्रो आयामेणं जाव वासं वासिस्सइ जेणं तेर्सि बहूणं रुक्खगुच्छ-गुम्मवल्लि - तण - पचग हरित - ओसहि. पवालं - कुरमादीणं - तित्त- कडुयलय- कसाय - अंबिल- मुहुरे पंचविहे रसविसेसे जणइस्सइ । तए णं भरहे वासे भविस्सs परूढ - रुक्ख-गुच्छ गुम्म-लय- वल्लि - तणपव्वयग Page #499 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कारः सू० ५६ अवसपपिणी दुष्षमारक वैशिष्य निरूपणम् ४८५ हरिय-ओसहिए उवचिय-तय-पत्तपवालंकुर-पूप्फ-फल समुइए सुहो वभोगे यावि भविस्सइ ॥ सू ५६ ।। छाया-तस्मिन् काले तस्मिन् समये पुष्करसंवत्तको नाम महामेघः प्रादुर्भविष्यति- भरतप्रमाणमात्र आयामेन तदनुरूपं च खलु विष्कम्भवाहल्येन । ततः खलु स पुष्करसंवतको महामेघः क्षिप्रमेव प्रस्तनिष्यति, क्षिप्रमेव प्रस्तन्य क्षिप्रमेव प्रविद्योतिष्यते, क्षिप्रमेव प्रविद्युत्य क्षिप्रमेव युग-मुसल-मुष्टि-प्रमाण-मात्राभिर्धागभिः ओघमेघ सप्तरात्र बर्ष बर्षिष्यति यः स्खल भरतस्य वर्षस्य भूमिमागम् अङ्गारभूतं मुमुरभूतं क्षारिकभूतं ततकटाहभूतं तप्तसमज्योतिभूतं निर्वापयिष्यतीति । तस्मिश्च खलु पुष्करसंवर्सके महामेधे सप्तरात्रं निपतिते सति अत्र खलु क्षीरमेघो नाम महामेघः प्रादुर्भविष्यति भरतप्रमाणमात्र मायामेन तदनुरूपश्च खलु विष्कम्भबाहल्येन । ततः खलु स क्षीरमेघो नाम महामेघः क्षिप्रमेव प्रस्तमिष्यति यावत् क्षिप्रमेव युगमुसलमुष्टि यावत् सप्तरात्रं वरं वर्षिष्यति, यः खलु भरतवर्षस्य भूमौ वर्ण गन्ध रसं स्पर्श च जनयिष्यति, तस्मिश्च खलु क्षीरमेधे सप्तरात्र निपतिते सति अत्र खलु घृतमेधा नाम महामेघः प्रादुर्भविष्पति भरतप्रमाणमात्र आयामेन तदनुरूपश्च खलु विष्कम्भशाहल्येन । ततः खलु घृतमेघो नाम महामेघः क्षिप्रमेय प्रस्तनिष्यति यावत् वर्ष वर्षिष्यति, यःखलु भरतस्य वर्षस्य भूमौ स्नेहभावं जनयिष्यति, तस्मिश्च खलु घृतमेचे सप्तरात्रे निपतिते सति अत्र खलु अमृतमेघो नाम महामेघः प्रादुभविष्यति भरत प्रमाणमात्र आयामेन, यावद् वर्ष वर्षिष्यति, यः खलु भारते वर्षे वृक्षगुल्म-लता-वल्ली-तृण-पर्वत-हरितको-पधिप्रवाला-कुरादिकान् तृणवनस्पति कायिकान् जनयिष्यति, तस्मिश्च खलु अमृतमेघे सप्तररात्रं निपतिते सति अत्र खलु रसमे घो नाम महामेघः प्रादुर्भविष्यति भरत प्रमाण मात्र आयामेन यावद् वर्ष वर्षिष्यति यः खलु तेषां बहूनां वृक्ष-गुल्म-गुच्छलता-बल्लि-तृण-पर्वतग-हरितौषधि-प्रवाला-कुरादिकानां तिक्तकटुक-कशया-म्ल-मधुरान् पश्वविधान रसविशेषान् जनयिष्यति । ततः खलु भरतं वर्ष भविष्यति प्ररूढ वृक्ष-गुच्छ-गुलम-लता-वल्ली-तृण-पर्वतक-हरितकौ-षधिकम् उपचित्तस्वरत्र-प्रवाला-कुर-पुष्प-फल-समुदित-सुखोपभोगं चापि भविष्यति ॥सू०॥ ५६॥ टीका-'तेणं कालेणं' इत्यादि । (तेण कालेणं) तस्मिन् काले उत्सर्पिण्या द्वितीयारकलक्षणे (तेण समएणं) तस्मिन् समये-उत्सर्पिणीगतद्वितीयारकप्रथमसमये (पुक्खलसंव इस उत्सर्पिणी के दुष्षमा आरे में अवसर्पिणो के दुष्पमा आरे की अपेक्षा जो विशिष्टता है उसका वर्णन करते हुए सूत्रकार कहते हैं । तेणं कालेणं तेणं समएणं पुक्खलसंवट्टए णामं महामेहे' इत्यादि. टीकार्थ-इस उत्सर्पिणी के द्वितीय आरक रूप दुष्षमा काल में इसकाल के प्रथम આ ઉત્સપિણીના દુષમા આરામાં અવસર્પિણીના દુષમા આરાની અપેક્ષાએ જે વિશિ. ટતા છે. તેનું વર્ણન કરતાં સૂત્રકાર કહે છે– 'ते णं कालेणं तेणं समएण पुक्खलसंवट्टए णामं महामेहे' इत्यादि. सू. ५६॥ Page #500 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४८६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्र ट्टए णाम) पुष्कलसंवतको नाम-पुष्कलं-सकलम् अशुभानुभावरूपं भारतवर्षीयपृथिवी. रौक्ष्यदाहादिकं प्रशस्तेन स्त्रोदकेन संवर्तयति दूरिकरोति यः सः-एतन्नामको (महामेहे) महामेधः (पाउभविस्सइ) प्रादुर्भविष्यति उत्पत्स्यते । कियत्प्रमाण उत्पत्स्यते ? इत्याह(भरहप्पमाणमित्त आयामेण) भरतप्रमाणमात्र आयामेन-दैर्येण भरतक्षेत्रप्रमाणः एकसप्तत्यधिक चतुश्शतोतरचतुर्दशसहस्रयोजन प्रमाण इत्यर्थः, (तपणुरूवं च णं विक्खंभवाहल्लेणं) तदनुरूपश्च खलु विष्कम्भवाहल्येन-विष्कम्भेण-विस्तारेण बाहल्येनस्थोल्येन च खलु-निश्चयेन तदनुरूपः भरतक्षेत्रप्रमाणानुरूपः ! 'तयणुरूवं' इत्यत्रार्षत्वान्नपुंसकत्वम् एवमग्रेऽपि (तएणं) ततः खलु (से पुक्खल पंवए) पुष्कलसंवर्तको नाम (महामेहे) महामेधः पर्जन्यादीन् त्रोन् मेघानपेक्ष्य महान् विशालो मेघो महामेघः (खिप्पामेव) क्षिप्रमेव-झ. टित्येव (पतणतणाइस्सइ) प्रस्तनिष्यति-प्रकर्षेण गर्जिष्यति, (खिप्पामेव पतणतणाइत्ता) समय में-पुष्कलसंवर्तक नामका (महामेहे) महामेध (पा उब्भविस्सइ) प्रकट होगा 'पुष्कलसंवर्तकऐसा जो महामेघ का नाम कहा गया हैं वह गुणानुरूप नाम है क्योंकि भरत क्षेत्र को पृथिवी की रुक्षता को दाहकता आदि को जो कि इसमें अवप्तर्पिणी के छठे आरे में और उत्सर्पिणी के प्रथम आरक में आगइ थी प्रशस्त अपने उदक के द्वारा दूर कर देता है । (भरहप्पमाणमित्ते आयामेणं तयणुरूवं च णं विक्खभवाहल्लेणं) इस पुष्कलसंवर्तक महामेघ का प्रमाण जितना भरत क्षेत्र का प्रमाण है उतना होगा अर्थात् यह १४४७१ योजन का लम्बा होगा तथा भरत क्षेत्र का जितना विष्कम्म और स्थौल्य है उतने हो प्रमाणवाला इसका विष्कम्भ और स्थौल्य होगा-"तयणुरूव" मैं जो नपुंसक लिङ्ग का निर्देश किया गया है वह आर्ष होने से किया गया हैं इसी तरह से आगे भी जानना चाहिये, (तएणं से पुक्खलसंवट्टए महामेहे खिप्पामेव पतणतणाइस्सइ विप्पामेव पविग्जुआइस्सइ) इसके बाद वह पुष्कल संवर्तक-पर्जन्या दि तीनमेधों की अपेक्षा विशालतावाला महामेघ बहुत हो शीघ्रता से गर्जना करेगा (विप्पामेव | ટીકાથ–આ ઉત્સર્પિણીના દ્વિતીય આરક રૂપ દુષમાકાળમાં આ કાળના પ્રથમ સમયમાં पुस ४ नमः (महामेहे) महामेध (पाउभविस्सइ) 432 थशे. पुस ४' मे જે મહામેઘનું નામ આપવામાં આવેલ છે, તે ગુણનુરૂપ નામ છે કેમકે ભરતક્ષેત્રની પૃથિન વીની રૂક્ષતાને-દાહકતા આદિને કે જે એમાં અવસર્પિણીના છઠ્ઠા એરામાં અને ઉત્સર્પિણી ના પ્રથમ આરકમાં આવી ગઈ હતી–તેને તે મહામેઘ પિતાના પ્રશસ્ત ઉદકવડે દૂર કરી દે छ (मरहप्पमाणमिते आयामेण "तयणुरूवं च ण विक्खंभवाहल्लेण) मा पुसवत' મહામેઘનું પ્રમાણ જેટલું ભરતક્ષેત્રનું પ્રમાણ છે તેટલું થશે. એટલે કે આ ૧૪૪૭૧ યોજન જેટલો લાંબો થશે તેમજ ભરતક્ષેત્રને જેટલો વિખંભ અને સ્થૌલ્ય છે તેટલા જ પ્રમાણ જેટલો माना Ora मने स्योदय थशे. तयगुरूव" wiरे नसासिने न ३ ४२पामा આવેલ છે તે આર્ષ હોવાથી કરવામાં આવેલ છે. આ પ્રમાણે જ આગળ પણ સમજવું नये (तए ण से पुक्खलसंवट्टए महामेहे निप्पामेव पतणतणाइस्सइ खिप्पामेव पविज्जु आइस्सर) त्या२ मा त पु०४८ सपत ४-५ न्याय भवानी अपेक्षा तिवाणी Page #501 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि वक्षस्कारः सू० ५६ अवसपर्पिणी दुष्पमारक वैशिष्य निरूपणम् ४८७ क्षिप्रमेव प्रस्तन्य-प्रगW (खिप्पामेव) क्षिप्रमेव (पविज्जुआइस्सइ) प्रविद्योतिष्यते-विधुद्भिर्युक्तो भविष्यति (खिप्पामेव पविज्जुआइत्ता) क्षिप्रमेव प्रविधुत्य (खिप्पामेव) जुगमुसलमुट्टिप्पमाणमित्ताहि) युगमुशलमुष्टिप्रमाणमात्राभिः युगं-रथ शकटाद्यङ्गभूतं 'जूआ' इति लोकप्रसिद्धम्, मुसलं-प्रसिद्ध, मुष्टिःबद्धालिकः पाणिः, एतत्प्रमाणा मात्रा यासां ताभिस्तथाभूताभिः (धाराहि) धाराभिः (ओहमें हं) ओघमेघम्-ओघेनसामान्येन प्रवृत्तो मेघो यस्मिस्तत्तथाविधं (सत्तरत्तं) सप्तरात्रं-सप्ताहोरात्रान (वास) वर्ष-वृष्टिं (वासिस्सइ) वर्षिष्यति करिष्यति (जे णं) यः खलु यो महामेघः खलु (भरहस्स वासस्स) भरतस्य वर्षस्य (भूमिभाग) भूप्रदेशं कीदृशं भूभागम् ? इत्याह - इंगालभूयं' इत्यादि । (इंगालभूयं) अङ्गारभूतम्-अङ्गारसदृशं (मुम्मुरभ्यं) मुर्मुरभूतम्-विस्फुटितप्रदेशाङ्गारतुल्यं (छारियभूयं) क्षारिकभूतं भस्मीभूतं (तत्तकवेल्लुगभूय) तप्तकटाहभूतं संतप्तकटाहसदृशमिति । एतादृशं भूभाग (णिव्वाविस्सतित्ति) निवापयिष्यतीति-शमयिष्यतीति । (तसि च णं पुक्ख. लसंवट्टगंसि महामेहंसि) तस्मिंश्च खलु पुष्कलसंवर्तके महामेवे (सत्तरत)सप्तरात्रं सप्ताहोत्रान् निरन्तरं (णिवत्तितंसि समाणंसि) निपतिते सति (एत्थ णं) अत्र खलु (खोरमेहे णाम महामेहे) क्षोरमेघो नाम महामेघः (पाउभविस्सइ) प्रादुर्भविष्यति-उत्पत्स्यते (भरपतणतणाइत्ता) गर्जना करके (खिप्पामेव पविग्जुआइस्सइ) फिर वह शीघ्र ही विद्युतोंविजलियों से युक्त हो जावेगा अर्थात् उसमें-बिजलियां चमकेगो (खिप्पामेव पविज्जुआइत्ता विप्पामेव जुगमुसलमुट्ठिप्पमाणमित्तेहिं ओधमेघं सत्तरत्तं वासं वासिस्सइ) विजलियों के चमकने बाद फिरे वहां महामेध जुआ प्रमाण, मुप्तल प्रमण तथा मुष्टि प्रमाण वाली धाराओं से सात दिन रात तक कि जिनमें सामान्य रूप से मेघ का सद्भाव रहेगा वर्षा करता रहेगा (जेणं भरहस्स वाप्तस्स भूमिए सिणेहभावं जणइस्मइ) यह मेघ भरत क्षेत्र के भू प्रदेश को कि जो अङ्गार के जैसा एवं तुषाग्नि के जैसा बन रहा था और भस्मीभूत हो चुका था तथा तप्त कटाह के जैसा जल रहा था बिलकुल शान्त कर देगा-शीतल कर देगा-(तंसि च णं पुक्खलसंवगंसि महामेहंसि) इस प्रकार उस पुष्कल संवर्तक महामेघ के (सतरत्तं णिवत्तितंसि समाणंसि) सात दिन रात तक निरन्तर वरमहामघमती शीघ्रताथी ना ४२. (खिप्पामेव पतणतणाहत्ता) गनाशन (त्रिप्पामेव पविज्जुआइस्लाइ) पछी त शी विधुनोथी युक्त थशे स तमाथी दाना सायरी. (खिप्पामेव पविज्जुआइत्ता खिप्पामेघ जुगमुसलमुट्ठिप्पमाणमित्तेहि ओघमेघसत्तरतं वासं वासिस्सइ) पीजीमान यसमा ५छी महाभ यू प्रमाण, भूसस પ્રમાણ તથા મુષ્ટિ પ્રમાણ જેવી ધારાઓથી સાત દિવસ સુધી કે જેમાં સામાન્યરૂપથી મેઘना सलाव २शे वर्षा ४२। २. (जे णं भरहस्ल वासस्स भूमीए सिणेहभावं जणहस्सइ) આ મેઘ ભરતક્ષેત્રના ભૂપ્રદેશને કે જે અંગાર જે તેમજ તુષાગ્નિ જે થઈ રહ્યો છે અને ભસ્મીભૂત થઈ ચૂકર્યો હતે તથા તમ કટાહની જેમ સળગી રહ્યો હતો તેને સંપૂર્ણતઃ શાન્ત ४२३, शीतल ४२३. (तसि च णं पुक्खलसंवदृगंसि महामेंहसि) प्रमाणे ते पुसस'४ भलाम (सत्तरत्तं णिवतितसि समाणंसि) सात -त्रि सुधा सतत १२सशे त्या२ माई Page #502 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૪૮૮ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे हप्पमाणमेत्ते आयामेणं) भरतप्रमाणमात्र आयामेन (तयणुरूवं च णं विक्खंभवाहल्लेणं) तदनुरूपश्च स्खलु विष्कम्भवाहल्येन । (तए णं) ततः खलु (से खीरमेहे णामं महामेहे) स क्षीरमेघो नाम महामेघः (खिप्पामेव) क्षिप्रमेव (पतणतणाइस्पइ) प्रस्तनिष्यति, (जाव विप्पामेव जुगमुसलमुट्टि जाव सत्तरत्तं वासं वासिस्सइ) यावत् क्षिप्रमेव युगमुसलमुष्टि यावत् सप्तरात्रं वर्ष वर्षिष्यति । अत्र यावत्पदसंग्राहयाणि पदानि अस्मिन्ने। सूत्रे पौंतानि अनुसन्धेयानि, व्याख्याऽपि तत एवाऽवबोध्येति । (जे णं) यः खलु क्षीरमेघो नाम महामेघः खलु (भरहवासस्स भूमीए) भरतवर्षस्य भूमेः (वण्णं गन्धं रसं फासं च जणइस्सइ) वर्ण गन्धं रसं स्पर्श च जनयिष्यति । वर्णादयश्चात्र शुभा एवं ग्राह्याः, येभ्यो लोकः सुखमनुभवति, अशुभवर्णादयस्तु पाक्कालिकाः सन्त्येवेति । अत्रेदं शङ्कते-यदि क्षीरमेघः शुभवर्णादीन् जनयति, तदा तरुपत्रादिषु नीलो वर्णः, जम्बूफलादिषु कृष्णो, मरीचादिषु कटुको रसः कारवेल्लादिषु तिक्तः, चरणकादिषु रूक्षः स्पर्शः, सुवर्णादिषु सने पर (एत्थणं खीरमेहे णामं महामेहे पाउब्भविस्सइ) फिर यहां क्षीरमेघ नाम का महामेघप्रकटित होगा (भाहप्पमाणमेत्ते आयामेणं) इसको भो लम्बाई भरत क्षेत्र प्रमाण जितनी होगी (तयणुरूवं च णं विखवाहल्लेण) और भरत क्षेत्र प्रमाण हो इसका विष्कम्भ और बाहल्य होगा (तएणं से खीरमेहे णा महामेहे खिप्पामेव पतणतणाइस्सइ) वह क्षीरमेध बहुत ही जल्दी गर्जना करेगा (जाव खिप्पामेव जुगमुसलमुट्ठि जाब सत्तरत्तं वासं वासिरसइ) यावत् वह बहुतही शोघ्रता के साथ विजुलियों को चमकावेगा और बहुत हो शीघ्र फिर वह जुआ प्रमाण मुसल प्रमाण और मष्टि प्रमाण वाली धराओं से सात दिन रात तक वर्षा करता रहेगा (जे णं भरहवासस्स भमीए वणं गंधं रसं फासं च जणइस्सइ) इससे वह क्षोरमेघ भरत क्षेत्र की भूमि के वर्ण. गंध रस, और स्पर्श को शुभ बनादेगा-क्योंकि इसके पहिले वहां के वर्णादिक अशुभ थे यहां कोई ऐसो आशंका कर सकता है कि यदि क्षीर मेघ शुभवर्णादिकों को कर देता है तो फिर तरुणपत्रादिकों में नील, नम्बूफ आदि को में कृष्णवर्ण, मगेवादिको में कट रस, करेला पत्थणं खीरमेंहे णाम महामेंहे पाउभविस्सइ) महा. क्षीरभे नाम महाभ पट यश (भरहप्पमाणमेत आयामेणं) मनी मा ५९ मरतक्षेत्रमा प्रभाठeal थरी (तयणरूवं सण विक्खभबाहल्लेणं) भने भ२1क्षेत्र प्रमाणे मना किन भने मारस्य थशे. (तपणं से खीरमेहे णाम महामेहे खिप्पामेव पतणतणाइस्सइ) ते क्षी२ मे नामने। महामेध मई शीना ४२से. (जाव खिप्पामेव जुगमुसलमुहिजार सत्तरत्त वार्स वासिस्सह) यावत् તે અતીવ શીરતાથી વીજળીને ચમકાવશે અને બહુ જ શીવ્રતાથી તે યૂકા પ્રમાણે, મૂસલ પ્રમાણ અને સુષ્ટિ પ્રમાણે જેટલી ધારાઓથી સાત દિવસ-રાત્રિ સુધી વર્ષા કરતો રહેશે. (जे णं भरहवासस्स भूमीप वण्ण गन्धं रसं फासं च जणइस्सइ) मेथी ते क्षारमय न२. તક્ષેત્રની ભૂમિના વર્ણ, ગબ્ધ, રસ અને સ્પર્શને શુભ બનાવી દેશે કેમકે એના પહેલાં ત્યાંના વણદિક અશુભ હતાં . અહીં કેઇ એવી આશંકા કરી શકે છે કે જે ક્ષીરમેઘ વર્ણાદિકને શભ કરી દે છે તો પછી તર-પત્રાદિકમાં નીલ, જબુફલાદિકામાં કૃષ્ણ વર્ણ, મરચાર્દિકોમાં Page #503 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कारः सू० ५६ अवसपर्पिणी दुष्षमारक वैशिष्य निरूपणम् ४८९ गुरुः, क्रकचादिषु स्वरः-इत्यादयोऽशुभवर्णादयः कथं संभवन्ति ? इति चेदाह-यद्यपि नीलादयोऽशुभपरिणामाः, तथापि तेऽनुकूलवेद्यतया शुभा एव । यथा श्वेतो वर्णों यद्यपि शुभ एव,तथापि कुष्ठादिगतः प्रतिकूलवेद्यतयाऽशुभ एव भवतीति (तसि च णं खीरमेहसि सत्तरतसिणिवत्तितंसि समाणंसि) तस्मिंश्च खलु क्षीरमधे सप्तरात्रं निपतिते सति (एत्थ णं) अत्र खलु (घयमे हे णाम महामेहे) घृतमेघो नाम महामेघः (पाउब्भविस्सइ) प्रादुर्भविष्यति (भरहप्पमाणमित्ते आयामेणं, तयणुरूवं च णं विक्खंभेणं) भरतप्रमाणमात्र आयामेन तदनुरूपश्च खलु विष्कंभवाहल्येन (तएणं से घयमेहे णाम महामेहे) ततः खलु स घृतमेघोनाम महामेघः (खिप्पामेव) क्षिप्रमेव (पतणतणाइस्सइ) प्रस्तनिष्यति. (जाव वासं वासिस्सइ) यावत् वर्ष वर्षिष्यति, (जे णं भरहस्स वासस्स भूमीए सिणेहभावं जणइस्सइ) यः खलु भरतस्य वर्षस्य भूमौ स्नेहभावं-स्निग्धतां जनयिष्यति (तंसि च णं घयमेहंसि सत्तरत्तं मिवत्तितंसि समाणसि) तस्मिंश्च खलु घृतमेघे सप्तरात्रं निपतिते सति, (एत्थणं) अत्र आदि में तिक्त रस चणा आदि में रूक्ष स्पर्श, सुवर्ण आदिको में गुरुस्पर्श, कच, करोंत, आदि में कठोर स्पर्श, इत्यादि ये अशुभ वर्णादिक कैसे संभवित होते हैं ? तो इसका उत्तर ऐसा हैकि यद्यपि नीलादिक अशुभ परिणाम रूप हैं परन्तु ये अनुकूल वेद्य होने के कारण शुभ ही हैं, जैसे श्वेतवर्ण यद्यपि शुभ ही होता है, परन्तु जब यह कुष्ठादिगत होता है तो वह प्रतिक्ल वेद्य होने से अशुभरूप ही होता है (तसिणं खीरमेहंसि सत्तरत्तंति णिवत्तितंसि समाणंसि) जब वह क्षीरमेघ सात दिन राततक बराबर-निरन्तर-वरसता रहेगा-तब उसके अनन्तर ही (घयमेहे णामं महामेहे) यहां घृतमेघ नाम का महामेध (पाउभविस्सई) प्रकट होगा. यह मेघ भी (भर हप्पमाणमित्त आयामेणं तयणुरूवं च णं विक्खमेणं बाहल्लेणं) भरत क्षेत्र-प्रमाण लम्बा होगा और भरतक्षेत्र प्रमाण हो चौड़ा और मोटा होगा. (तएणं से घयमेहे णाम महामेहे खिप्पामेव पतणतणाइ स्सइ) प्रकट होने के बाद ही वह धृतमेध गर्जना करेगा-(जाव वासं वासिस्सइ) यावत् वर्षा करेगा (जेणं भरहस्स वासस्स भूमीए सिणेइभावं जणइत्सइ) इससे भरत क्षेत्र की भूमि में स्नेह भावકરસ, કારેલા વગેરેમાં તિક્તરસ, ચણા આદિમાં રૂક્ષ-સ્પ, સુવર્ણ આદિકમાં ગુરુસ્પશ ક્રકચ-કરવત વગેરેમાં કઠેર સ્પર્શ વગેરે એ અશુભ વર્ણાદિકે કેવી રીતે સંભવિત હોય છે? તે આને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે નીલાદિક જે કે અશુભ પરિણામ રૂપ છે પણ એ એ અનુકૂલ વેધ હોવાથી શુભ જ છે. જેમ વેતવણું શુભ જ હોય છે, પરંતુ જ્યારે એ ४.४ाशित डाय छ । प्रतिस वेध वाथा अशुभ ३५४ गाय छे. (तंसि णं खीरमेहंसि सत्तरसि णिवत्तितंसि समाणंसि) न्यारे क्षीरभेध सात हिवस भने त संधी सतत पता २२शे, त्या२मा (धयमेहे णामं महामेहे) मी घतमे नम: महामन (पाउभविस्सइ) ५४८ थरी. म. भेघ ५९५ (भरहप्पमाणमित्रो आयामेण तयणुरूवं च णं वि. क्खमेण बाहल्लेण) भरतक्षेत्र प्रमाण की या वाणे। म वि . (तपणं से घयमेहे णाम महामेहे खिप्पामेव पतणतणाइस्सइ) ४८ थामा ते धृतभेध गन ४२२. (जाव वास बासिस्सइ) यापत् वर्षा ४२). (जे णं भरहस्स वासस्स भूमिए सिणेहभाव जणइस्सइ) Page #504 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४९० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे खउ (अमेगामं महामेदे पाउनविस भरहष्यमाणमित्ते आयामेणं जाव वासं वासिस्सर) अमृतमेवो नाम महामेघः प्रादुर्भविष्यति भरतप्रमाणमात्र आयामेन यावद् वर्षं वयति (जेणं) यः खलु = योऽमृतमेघः खलु (भरहे वासे) भरते वर्षे ( रुक्ख - गुच्छ - गुम्म-लय- वल्लि - तण - पञ्चग- हरितग—ओस हिपवालं - - कुरमाईए) वृक्ष - गुच्छ गुल्म- लता - वल्ली-तृण-पर्वग - हरितकौ - पधि- प्रवालाङ्कुरादिकान् - वृक्षाः - शाखिनः, गुच्छा:= स्तबकाः गुल्माः स्कन्धरहिता वनस्पतिविशेषाः, लतावल्लीति पदद्वयं यद्यपि समानार्थकं तथापि कथंचिद् भेदमुपादाय पदद्वयमुपात्तम्, तृणानि उशीरादीनि, पर्वगाः ==पर्वजा इक्षुप्रभृतयः हरितकानि = दूर्वादीनि ओषध्यः शाल्यादयः, प्रवाला : - पल्लवाः, अङ्कराः =त्रीह्यादिबीजसूचयः, इत्येते आदौ - प्रारम्भे येषां ते तथा तान् ( तणवणस्सइकाइए ) तृणवनस्पतिकायिकान् बादरवनस्पतिकायिकान् (जणइस्सइ) जनयिष्यति = उत्पादयिष्यति ( तंसि च णं अमय मेहंसि) तस्मिंश्च खलु अमृतमेवे सत्तरतं णिवत्तितंसि समास ) सप्ररात्रं निपतिते सति (एत्थ णं) अत्र खलु पञ्चमो (रसमेt णामं महास्निग्धताहो जावेगी ( तंसि च णं घयमेइ सि सत्तरत्तं णिवत्तितंसि समाणंसि) इस तरह यह तमेघ सात दिन रात तक लगातार वर्षता रहेगा इसी के अनन्तर (एत्थणं अमयमे हे पाउन्भविस्सइ भरहप्पमाणमित्ते आयामेणं जाव वासं वासिस्सइ ) यहां अमृतमेघ नामका महामेघ प्रकट होगा यह लम्बाई में चौड़ाई में और स्थूलता में भरतक्षेत्र की लम्बाई चौडाई एवं स्थूलता के ही बराबर होगा. यह भी सात दिन रात तक अमृत की वरसा करता रहेगा (जे णं भरहे वासे रुक्ख गुच्छ - गुम्म -लय- वल्लि - तण - पव्वग - हरितग-ओसहि-पवालं कुरमाइए ) यह मेत्र भरत क्षेत्र में वृक्षों को, गुच्छों को, स्कन्ध रहित वनस्पतिविशेषों को, लताओं को, बल्लिओं को, अशीरादिक तृणों को, पर्वज इक्षु आदिकों को दूर्वादिक हरी वनस्पति को, शाली आदिक औषधियों को, पत्ते आदिरूप प्रवालों को वहि आदि बीज सूचीभूत अङ्कुरों को इत्यादि बादर वनस्पति कायिकों को उत्पन्न करेगा (तंसि च णं अमय मेहंसिसाथी भरतक्षेत्रनी भूमिमां स्नेहभाव-स्निग्धता थई नशे, ( तंसि च णं घयमेहंसि सत्तरतं णिवत्तितंसि समाणसि) या प्रमाणे या घृतभेध सातद्विवस भने रात सुधी सतत वर्षते । रडेशे. त्यारमा ( एत्थ णं अमयमेहे पाउन्भविस्सह भरप्यमाणमित्त आयामेणं जाव वासं वासिस्सइ) अडीं अमृतमेव नाम महामेघ अट थशे. या मेघ सार्थ होजाई अने સ્થૂલતામાં ભરતક્ષેત્ર જેટલી લંબાઈ, પહેળાઈ અને સ્થૂલવાળા થશે. આ પણ સાત દિવસ अनेरात सुश्री अमृतनी वर्षा ४२शे (जे णं भरहे वासे रुक्ख गुच्छ गुम्म-लय-बल्लि-तण पत्र- हरितग-ओ-हि-पवाल कुमाइए) आ भेत्र भरत क्षेत्रमां वृक्षोने, गुरछाने, ५°धરહિત વનસ્પતિ વિશેષને લતાએને, વલ્લિએને અશીરાદિક તૃણ્ણાને, પજ ઈક્ષુ આફ્રિ કેને દ્રિક લીલી વનસ્પતિને, શાળી આદિક ઔષધિઓને, પાંદડા આદિ રૂપ પ્રવાલેને, શ્રીહિં આદિ ખીજ સૂચીભૂત અંકુરને ઈત્યાદિ ખાદરવનસ્પતિકાયિકે,ને ઉત્પન્ન કરશે, (કું सिचणं अमयमेहसि सत्तरत निर्वात तंसि समाणसि) मा प्रमाणे अमृतमेध सात दिवस भने Page #505 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि वक्षस्कार: सू० ५६ अवसपर्पिणी दुष्पमारक वैशिष्य निरूपणम् ४९१ मेt) रसमेघो नाम महामेघ: ( पाउब्भविस्सइ) प्रादुर्भविष्यति (भहरण्यमाणमित्ते आयामेणं) भरतप्रमाणमात्रं आयामेन (जाव वासं वासिस्सर) यावद् वर्ष वर्षिष्यति (जेणं) यः खलु (ते सिं) तेपां = पूर्वोक्तानां (बहूणं) बहूनां - बहुसंख्यकानां (रुक्ख गुच्छ गुम्म-लयवल्लि - तण-पत्र - हरित - भोसहि- पवालं- कुरमाईण) वृक्ष - गुच्छ - गुल्म- लता - वल्ली-तृणपर्वग हरितौ - षधि - प्रवाला- -कुरादीनां (तित्त-कटुय - कसाय-महुरे ) तिक्त कटुककषायाम्-मधुरान् (पंचविहे रसविसेसे) पञ्चविधान् रसविशेषान् - तिक्तादीन् पञ्च - प्रकारान् रसान् (जणइस्सइ) जनयिष्यति = उत्पादयिष्यति । पञ्चविधेषु रसेषु तिक्तो रसो निम्बादिषु, कटुको मरीचादिषु कषायो हरीतक्यादिपु, अम्लश्चिञ्चादिषु, मधुरश्व शर्करादिपु बोध्यः । लवणरसस्य मधुरादि संसर्गजत्वेन न पृथगुपन्यासः । पञ्चानां प्रयोजनं यद्यपि सूत्रे एव प्रोक्तं तथापि स्फुटतरप्रतिपत्तये पुनरप्यत्रोच्यते तथाहि - पुष्कलसत्तरतं वित्तितंसि समाणस ) इस प्रकार से यह अमृतमेत्र सात दिन रात तक वरसता रहेगा- इसी के भीतर (एत्थणं रसमेहे णामं मह मेहे पाउब्भविस्सइ) यहां एक और महामेघ प्रकट होगा - जिसका नाम रसमेघ होगा. यह रसमे भो ( भरहप्पमाणमित्तं आयामेण जाव वासं वासिस्सइ) | लम्बाई चौड़ाई एवं स्थूलता में भरत क्षेत्र की लम्बाई चौडाई और स्थूलता के बराबर का होगा और यह भी भरतक्षेत्र की भूमिवर सात दिन रात तक लगातार वर्षता रहेगा (जेणं बहूणं रुक्ख-गुच्छ - गुग्म - लय - वल्लि - तण - पव्वग - हरित - प्रोसहिं - पवालंकुरमाईणं तित्त, कडुय - कसाय - अत्रिल - महुरे ) यह रस मेघ अनेक वृक्षों में, गुच्छों में, गुल्मों में, लताओ में वल्लियों में, तृणों में पर्वतो में हरित दुर्वादिकों में औषधियों में प्रवालों में और अंकुरादिको में तिक्त, कटुक, कषायला, आम्ल और मधुर (पंचविहे रसविसेसे) इन पाँच प्रकार के रसविशेषों कटुक (इ) उत्पन्न करेगा. इन पांच प्रकार के रसों में तिक्तरसनिम्ब आदिकों में, रस मरीच आदि में कषायरस हरोतकी आदिकों में, अम्लरस चिञ्चा ईमली आदिकों में और मधुर रस शर्करा आदिकों में होता है. लवणरस मधुरादि के संसर्ग से उत्पन्न होता है. रात सुश्री वर्षत रहेशे. मानो अंहर ४ ( पत्थ णं रसमेहे णामं महामेहे पाउब्भविस्सर) सहीं मेड जीले महामेघ अस्ट थशे. नेनु नाम रसमेध शे. आरसमेध पशु (भरहप्प माणमित् आयामेणं ज्ञाव वास वासिस्सह) संमा, पडणार्थ खाने स्थूलतामां भरतक्षेत्रना પ્રમાણ જેટલા હશે આ પણ ભરતક્ષેત્રની ભૂમિપર સાત દિવસ અને રાત સુધી સતત વર્ષાંતે रडेशे. (जेणं बहूण रुक्खगुच्छ गुम्मलय वल्लि तण पञ्चग हरित ओसहिं पवालंकुरमाईणं तित्त, कडुय कसाय अबिल महुरे) से रसभेध अने वृक्षोमां, गुरछाम, गुदभोमां बनाओमां, વલિએમાં, તૃણેામાં પ તામાં, હરિત ર્વાદિકમાં, ઔષધિઓમાં, પ્રવાલામાં અને અંકુરાદિ अभांतित, उटु, कुषायसा, आम् अने मधुर (पंचविहे रसविसेसे) थे पांथ प्रारना रसविशेषाने (जणस्स) उत्पन्न ४२. ये पांय प्राश्ना रसोभां तितरस निम महिमां, टु રસ મરીચ આફ્રિકામાં કષાયરસ હરીતકી આફ્રિકામાં, અમ્લરસ ચિંચા આમલી આફ્રિકામાં અને મધુરસ શર્કરા આદિકામાં હોય છે. લવણરસ મધુરાન્તિકાના સ ંસગ થી ઉત્પન્ન થાય છે એથી Page #506 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४९२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे संवर्तकाभिधस्य प्रथममेघस्य प्रयोजनं भरतभूमेर्दाहोपशमः, द्वितीयस्य क्षीरमेघस्य भरतभूमौ वर्णादिजननम्, तृतीयस्य घृतमेघस्य भरतभूमौ स्निग्धतासंपादनम्, ननु क्षीरमेधेनैव शुभवर्णगन्धादि निष्पत्तौ सत्यां तत्सह भाविनी स्निग्धताऽपि स्वयमेवायातेति घृतमेयो निष्प्रयोजनः ? इति चेदाह-क्षीरमेधेन शुभवर्णगन्धादीनामुत्पत्ती तत्सहभाविनी स्निग्धता भरतभूमौ यद्यपि स्वयमेवायाति तथापि प्रचुरतरस्निग्धतासंपादनमेव घृतमेघप्रयोजनम्, दृश्यते चापि क्षीरादधिका स्निग्धता घृते इति न कश्चिद् दोष इति । चतुर्थस्य अमृतमेघस्य वृक्षाधुत्पादनं प्रयोजनं पञ्चमस्य च रसमेघस्य वृक्षादिषु यथायोग्य रसोत्पादइसलिये उसका स्वतन्त्ररूप से कथन नहीं किया गया है. पांच मेघों का प्रयोजन यद्यपि सूत्र में ही कह दिया गया है तथापि स्फुटतर प्रतिपत्ति के लिये फिर से यहां वह कहा जाता है. पुष्कल संवर्तक प्रथममेघका भरतक्षेत्र की भूमिका दाहशमित करना यह प्रयोजन है. द्वितीय क्षीरमेघ . का भरतक्षेत्र की भूमि में शुभवर्णादिका उत्पन्न करना यह प्रयोजन है. तृतीय वृतमेघ का भरतक्षेत्र की भूमि में स्निग्धता को उत्पत्ति करना यह प्रयोजन है । शंका-घृतमेघका जो प्रयोजन आपने भरतक्षेत्र को भूमि में स्निग्धता का आपादन करने रूप प्रकट किया है सो जब क्षीरमेघ से ही शुभवर्ण शुभगन्ध आदि की भरतक्षेत्र की भूमि में निष्पत्ति हो जायगी तो शुभवर्ण गन्धादि के साथ होने वाली स्निग्धताभी अपने आप आ जावेगी फिर इस घृतमेघका प्रयोजन तो कुछ ही रहता नहीं है इसे निष्प्रयोजन मानने की क्या आवश्यकता है ? सो इसका समाधान ऐसा है कि यह बात ठीक है कि शुभवर्णादिकों की निष्पत्ति में तत्सहभाविनी स्निग्धता का संपादन करना ही घृतमेघ का प्रयोजन है. यह बात तो प्रत्यक्ष से ही प्रतीत होती देखी जाती है, कि क्षार से अधिक स्निग्धता घत में है इल्यादि. अतः घृतमेध का काम निष्फल नहीं है-सफल है- चतुर्थ जो अमृतमेघ है-उसका સ્વતંત્રરૂપમાં કથન કરવામાં આવ્યું નથી, પાંચ મેઘનું પ્રયોજન જે કે સૂત્રમાં જ સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યું છે તે પણ સ્કુટર પ્રતિપત્તિ માટે ફરીથી અહીં તે વિષે સ્પષ્ટતા કરવામાં આવેલ છે. પુષ્કલ સંવર્તક પ્રથમ મેઘનું પ્રયોજન ભરતક્ષેત્રની ભૂમિને દાહ શમિત કરો તે છે. બીજા ક્ષીરમેઘનું પ્રયોજન ભરતક્ષેત્રની ભૂમિમાં શુભ વર્ણાદિક ઉત્પન કરવારૂપ. તૃતીય મેઘનું પ્રયોજન છે ભરતક્ષેત્રની ભૂમિમાં સ્નિગ્ધતાની ઉત્પત્તિ કરવીતે શંકા-તમે ઘતમેઘનું પ્રયોજન જ્યારે ભરતક્ષેત્રની ભૂમિમાં સિનગ્ધતાનું અપાદન કરવું એવું પ્રકટ કરેલ છે તો ક્ષીરમેઘથી જ જયારે શુભઘણું શુભગધ વગેરેની ભતક્ષેત્રની ભૂમિમાં નિષ્પત્તિ થઈ જશે તો શુભવણું ગધાદિની સાથે આવનારી સિનગ્ધતા . પણ આપમેળે જ આવી જશે તે પછી આ વૃત મેઘનું પ્રજન તો કંઈ દેખાતું જ નથી. તે શું એને નિપ્રયોજન માનવામાં કંઈ વધે છે તે આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે જો કે શુભવદિકેની નિપત્તિમાં સહભાવિની સ્નિગ્ધતા આપમેળે જ આવી જાય છે પણ પ્રચુરતર સિનગ્ધતાનું સંપાદન કરવું ઘનમેઘનું પ્રોજન છે એ વાત તે સ્પષ્ટ જ છે કે ક્ષીર કરતા વધારે નિગ્ધતા ઘીમાં છે. એથી ઘુતમેઘનું કામ નિષ્ફળ નથી સફળ છે. ચતુર્થ જે અમૃતમેઘ છે, તેનું પ્રજન Page #507 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० बक्षस्कारः सू० ५६ उत्सर्पिणी दुष्षमारकवैशिष्यनिरूपणम् ४९३ नम । ननु अमृतमेधेन वनस्पतौ जनिते सति वर्णादिसहितस्यैव वनस्पतेरुपलभ्यमानत्वेन वर्णादि सह भाविनी रसस्यापि सुतरामुत्पत्तो रसमेवो निष्प्रयोजनः ?, इति चेदाह-यद्यप्यमृतमेवेन सामान्यरस उत्पाद्यते तथापि स्वस्वयोग्यरसनिष्पादनं रसमेघस्यैवेति न ककश्चिदोष इति । इत्थं पञ्च भिर्मेधै स्वस्वकार्ये संपादिते सति यादृशं भरतवर्षस्वरूपं भावि तदुच्यते-तएणं, इत्यादि । (तए णं) ततः खलु (भरहे वासे) भरतं वर्षे पउढ-रुक्खगुच्छ-गुम्म-लय-वल्लि-तण-पधग-हरित-ओसहिए) प्ररूढ वृक्ष-गुच्छ-गुल्म लतावल्लो तृण पर्वग-हरितौ-पधिकं प्ररूढाः समुत्पन्नाः वृक्षगुच्छादिहरितोषध्यन्ता यत्र तत्तादृशं (भविस्सइ) भविष्यति, तथा-(उवचिय तयपत-पवालं-कुर-पुप्फ-फल-समुप्रयोजन वृक्षादि को उत्पादन करना है. और पांचवां जो रसमेघ है उसका प्रयोजन वृक्षादिकों में यथायोग्य रस का उत्पन्न करना है। शंका-जब अमृत मेघ से ही भरतक्षेत्र की भूमि में वनस्पति का उत्पादन हो जाता है तो वर्णादि सहित ही उनका उत्पादन होता है. वर्णादि रहित रूप में तो उनका उत्पादन होता नहीं है। फिर जब वर्णादि सहित हो उनका उत्पादन होता है तो वर्णादि सहभावी जो रस है वह तो उनमें अपने आप हो उत्पन्न हो जाता होगा फिर रस को उत्पन्न करने वाला रस महामेघ का मानना निष्प्रयोजन प्रतीत होता है- सो ऐसी शंका ठोक नहीं है क्योंकि स्व स्व योग्य रस का निष्पादन करना ही इस रस महामेघ का काम है वैसे तो अमृत मेघ से सामान्यतः रर्स उत्पन्न करा हो दिया जाता है । इस तरह से इन पांच मेवों द्वारा अपना अपना कार्य संपादित हो जाने पर जैसा भारत वर्ष का आगे स्वरूप हो जाता है अब सुत्रकार उसोका कथन करते हैं- (तएणं भरहे वासे पउढ रुक्ख-गुच्छ-गुम्म-लय-वल्लि-तणपवग-हरित-ओसहिए भविस्सइ) इसके बाद भरतक्षेत्र जिसमें वृक्ष से लेकर हरित औषधि तक વૃક્ષાદિકની ઉત્પત્તિ કરવી છે, અને પાંચમે જે રસમેઘ છે, તેનું પ્રયોજન વૃક્ષાદિકોમાં યથાગ્ય રસાત્તિ કરવી તે છે. શંકા-જયારે અમૃત મેઘથી જ ભરત ક્ષેત્રની ભૂમિમાં વનસ્પતિનું ઉત્પાદન થઈ જાય છે. વનસ્પતિ વદિ સહિત ઉત્પન્ન થાય છે વદિ રહિતરૂપમાં વનસ્પતિનું ઉત્પાદન થતું નથી વદ સહિત જ જ્યારે તેમનું ઉત્પાદન થાય છે તે વર્ણાદિ સહભાવો જે રસ છે તે પણ તેમનામાં આપ મેળે જ ઉત્પન થશે જ તે એ પરિસ્થિતિમાં સને ઉત્પન્ન કરનારા રસ મહામંત્રનું કથન અહીં નિપ્રયજન પ્રતીત થાય છે એવી શંકા પણ અહીં યોગ્ય નથી. કેમકે સ્વ-સ્વ રસનું નિપાદન કરવું એ જ એ રસમહામેઘનું કામ છે, આમ તે અમૃત મેઘથી જ સામાન્યતઃ રસ ઉતપન્ન કરાવવામાં આવે જ છે. આ પ્રમાણે આ પાંચે મેઘો વડે પોત પોતાના કાર્ય સંપાદિત થઈ ગયા પછી ભારતષનું સ્વરૂપ કેવું હશે ? એ સંબંધમાં સૂત્રકાર કહે थे- (तपणे भरहे घासे परूढरुक्ख-गुच्छ-गुम्म लय-बल्लि-तण-पव्यग-हरितोसहिए भविस्सइ) या पाभ वृक्षथी भांडारित मोषधी सुधी 4.५तिमा उत्पन्न | युटी छ मेयु सरतक्षेत्र १५' थ a तमना (उवचिय-तय पत्त-पवालं-कुर-पुप्फ-फल Page #508 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे इए) उपचित-वर-पत्र-प्रबालाकुर-पुष्प-फल-समुदितम् तत्र उपचितानि परिपुशनि यानि वस्त्रावालाङ्कर पुष्पफलानि-त्वक त्वचा-वल्कलम्, पत्रं-पण, प्रबालं= किसलयम्, अङ्करः अभिनवोद्भिद् व्रोह्यादि बीजसूचिः, पुष्पं प्रसूनं फलं प्रसिद्धम्, एते. पामितरेतरयोगद्वन्द्वः तानि तथोक्तानि तैः सुमुदितं-व्याप्तम्,अत एव (सुहोवभोगे यावि) सुखोपभोग-सुखेन अनायासेन उपभोगस्त्वपत्रादीनां यस्मिंस्तत्तथाविधं चापि (भविस्सइ) भविष्यति । एतेनोत्सपिण्या द्वितीयारके भरतवर्षे वनस्पतीनां, बनस्पतिषु च पुष्पफलानां सत्ता प्रदर्शिता, ततश्च भरतवर्षस्य मुखोपभोगता सूचितेति ॥ सू० ५६ ॥ अथोत्सपिणी दुष्षमाकालसंभवा मनुष्यास्तादृशं भरतवर्षे दृष्ट्वा किं करिष्यन्ति ? इत्याह--- मलम्- तएणं ते मणुया भरहं वासं परूढ-गुच्छ-गुम्म-लय -वल्लि-तण-पव्वय-हरिय-ओसहीयं-उवचिय-तय-पत्त-पवालं-कुर -पुष्फ-फल-समुइयं सुहोवभोगं जायं जायं चावि पासिहिति, पासित्ता बिलेहितो णिद्धाइस्संति, णिद्धाइत्ता हट्ठतुट्ठा अण्णमण्णं सद्दाविस्संति, सदावित्ता एवं वदिस्संति जाए णं देवाणुप्पिया! भरहे वासे परूढरुक्ख-गुच्छ-गुम्म-लय-वल्लि-तणे-पन्वय-हरिय जाव सुहोवभोगे तं जे णं देवाणुप्पिया ! अम्ह केइ अज्जप्पभिइ असुभं कुणिमं आहारं आहारिस्सइ से णं अणेगोहिं छायोहिं वज्जणिज्जेत्ति कटु संठिइं ठवे' स्संति ठवित्ता भरहे वासे सुहं सुहेणं अभिरममाणा अभिरममाणा विहरिस्संति ॥सू० ५७॥ वनस्पतियां उत्पन्न हो गई है ऐसा हो जावेगा-तथा उवचिय-तय-पत्त-पवालं-कुर-पुप्प-फल -समुइए) परिपुष्ट वल्कलों, पत्तों, किसलयो, अंकुरों, ब्राही आदिके बीजों के अग्रभागों, पुष्पा, और फलों से व्याप्त होकर (सुहोवभोंगे याविभविस्सइ) जिसमें त्वक् पत्रादि का उपभोग अना. यास से है. ऐसा वह भरतक्षेत्र हो जावेगा. इस तरह के इस कथन से उत्सर्पिणी के इस द्वितीय आरक में भरतक्षेत्र में वनस्पतियों का सद्भाव और उनमें पुष्पफलादिकां का सद्भाव प्रकट किया गया है और इससे उसमें सुखोपभोगता बतलाई गई है ।५६॥ समुइए) परिपुष्ट पक्षी ५itो , सलये, २, बीहि वगेरेना, मीना भय-माजोपयो भने सविगेरेथी यात २/२ (सुहोवभोगे यावि भविस्सइ) मा १3 पत्रा6 पास અનાયાસ રૂપમાં થઈ શકશે એવું તે ભરતવર્ષ થશે. આ જાતના આ કથનથી ઉત્સર્પિણીના એ દ્વિતીય આરકમાં ભરતક્ષેત્રમાં વનસ્પતિઓના સદભાવ અને તેમાં પુષ્કલાદિકેને સદુભાવ પ્રકટ કરવામાં આવેલ છે અને એથી તેમાં સુખોપભોગતા બતાવવામાં આવેલ છે પદા Page #509 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - प्रकाशिका टीकाद्विवक्षस्कारः सू० ५७ उत्सपिणीदुष्षमाकालगतमनुष्यकर्तव्यनिरूपणम् ४९५ छाया-ततः खलु ते मनुजा भरतं वर्ष प्ररूढगुच्छ गुल्म लता बल्लीतृणपवंग हरितोषधिकम् उचित- त्वक्पत्र-प्रवाला- कुर-पुष्प-फल-समुदितं सुखोपभोगं जातं चापि द्रक्ष्य न्ति दृष्ट्वा विलेभ्यो निर्धाविन्ति निर्धाव्य हृष्टतुष्टा अन्योऽन्य शब्दयिष्यन्ति शब्दयित्वा एवं वदिष्यन्ति जातं खलु देवानुप्रियाः भरतं वर्ष प्ररूढ-वृक्ष-गुच्छ-गुल्म-लता-वल्ला तृणपर्वग हरित यावत् सुखोपभोगम् तद यः खलु देवानुप्रियाःअस्माकं कोऽपि अद्यप्रभृति अशुभं कुणपम आहारम् आहरिष रति स खलु अनेकाभिश्छायाभिवर्जनीय इति कृत्वा सीस्थति स्थापयिष्यन्ति स्थापयित्वा भरते वर्षे सुखं सुखेन अभिरममाणा अभिरममाणा विहरिष्यन्ति सू०५७॥ टीका- "तए णं" इत्यादि । (तए णं) ततः खलु ( ते मणुया) ते मनुना: भरतवर्षस्थितास्तत्कालीना मनुष्याः (भरहं वासं) भरतं वर्ष (परूढ-गुच्छ-गुम्म-लय वल्लि तण-पव्यय हरिय-ओसहीय) प्ररूढ-गुच्छ--गुल्म-लता-वल्ली-तृण-पर्वग-हरितौ-पधि. कम् (उवचिय-तय-पत्त-पवालं-कुर-पुप्फ-फल-समुइयं) उपचित-त्वपत्र-प्रवाला कुर-पुष्प फल-समुदितं (सुहोवभोगं) सुखोपभोगं (जायं जायं चावि) जातं जातं चापि-प्राचुर्येण समुत्पन्नं चापि (पासिहिति) द्रक्ष्यन्ति-अवलोकयिष्यन्ति, 'परूढ गुच्छ' अव सूत्रकार यह प्रकट करते हैं कि उत्सर्पिणो के दुष्षमाकाल में उत्पन्न हुए ये मनुष्य इस प्रकार के भारत वर्ष को देखकर क्या करेंगे "तए णं ते मणुया भरहं वासं परूढ गुच्छ-गुम्म-लय-वल्लि' इत्यादि-५७टोकार्थ-भरत क्षेत्र में स्थित हुए तत्कालीन वे मनुष्य (भरहं वासं) भरतक्षेत्र को (परूढ गुच्छ गुम्मलयवल्लि तण पव्वय हरिय ओसहीय)प्ररूढ गुच्छों वाला, प्ररूढ गुल्मेवाला, प्ररूढ लताओं एवं वल्लियों वाला प्ररूढ तृण और पर्वन वनस्पतियों वाला, प्ररूढ हरित और औषधियांवाला (उवचिय तय पत्तपवालं कुरपुप्फफलसमुइयं) उपचित हुए छालों के समूह उपचित पत्तों के समूह वाला, उपचित हुए प्रबालों वाला, उपवित हुए अंकुरो वाला, उपचित पुष्पां बाला, उपचित हुए फलेवाला, अतएव (सुहोवभोगं जायं जायं चावि पासिहिति) देखेंगे तो હવે સૂત્રકાર એ સ્પષ્ટ કરે છે કે ઉત્સર્પિણી ના દુપમા કાળમાં ઉત્પન્ન થયેલા એ મનુષ્યો એ પ્રકારના ભરતવર્ષને જોઈને શું કરશે ? 'तए णं ते मणुया भरतं बासं परूढगुच्छगुम्मलयबल्लि' इत्यादि सूत्र ॥५॥ थ-भरतक्षेत्रमा स्थित ने-actan ते मनुष्य। (भरह वासं) भरतक्षेत्र (परूढ गुच्छ गुम्मलयवल्लितणपव्वय हरियओलहोय) १३० १२छोवाणु ३८ सुक्ष्मीवाणु, ५३८ सतायोजन વલિ વ , પ્રરૂઢ તૃણ અને પર્વજ વનસ્પતિઓવાળું, પ્રરુઢ હરિત અને ઔષધિઓવાળું (उचियतयपत्तपवालंकुरपुप्फफल समुईए) [यत थी सोना सभूल पाणु पयित થયેલા પાંદડાઓના સમૂહવાળું, ઉપસ્થિત થયેલા અંકુરોવાળું ઉચિત પુષ્પોવાળું પ્રવાલ વાળ અને ઉપચિન થયેલા ફલોવાળું ઉપચત થયેલ અંકુરવ ળું ઉચિત થયેલ पु०यावाणु मने पायत थयेावाणु अथा (सुहोवभोग जायं जायं चाव पासिहिति) Page #510 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४९६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे इत्यादि-'मुहोवभोगं' इत्यन्तपदत्रयस्यार्थः पञ्चपञ्चाशत्तमे सूत्रेऽवलोकनीय इति (पासिता) दृष्ट्वा अवलोक्य (विलेभ्यः (णिद्धाइस्संति) निर्धाविष्यन्ति-निर्गमिष्यन्ति (णिद्धा. इत्ता) निर्धाव्य-निर्गम्य (हतुट्ठा) हृष्टतुष्टाः-हृष्टाः आनन्दिताश्च ते तुष्टा:-संतोषमुपगताश्चेति तथा-आनन्द संतोष चोपगता इत्यर्थः (अण्णमण्णं) अन्योन्यम् परस्परं (सद्दा. विति) शब्दयन्ति, (सद्दावित्ता) शब्दयित्वा (एवं वदिस्संति) एवं वदिष्यन्ति-कथयिष्यन्ति, किं कथयिष्यन्ति ! इत्याह 'जाए ण' इत्यादि । (जाए णं) जातं खलु (देवाणुप्पिया ! ) देवानुपियः (भरहे वासे) भरतं वर्षे (परूढ-रुक्ख-गुच्छे-गुम्म-लय-वल्लितण-पव्यय-हरिय जाव सुहोवभोंगे) प्ररूढ़-वृक्ष-गुच्छ -गुल्म-लता-वल्लि-तृण-पर्वगहरित यावत् सुखोपभोगम् , (तं जे णं देवाणुप्पिया अम्हं केइ) तद् यः खलु देवानुप्रियाः ! अस्माकं कश्चित्-हे देवानुप्रियाः भरतवर्षस्य वृक्षगुच्छगुल्मलतादिसंपन्नत्वेन मुखोपभोग्यत्वात् अस्माकं मध्ये यः कश्चित् (अज्जप्पभिई) अधप्रभृति अधारभ्य (असुभं कुणिमं आहार) अशुभं कुणपम् आहारमअप्रशस्तं मांसाहारम् (आहारिस्सइ) आहरिष्यति (से णं) स खलु (अणेगाहिं छायाहिं) एनेकाभिश्छायाभिः अनेकसंख्यक पुरुषच्छाया यह क्षेत्र सुख से उपभोग करने योग्य हो चुका है इस प्रकार का (पासित्ता) ख्याल करके वे (बिलेहितो णिद्धाइस्संति) अपने अपने विलों से बाहर निकल आयेंगे. और (णिद्धाइत्ता) बाहर निकल कर के फिर वे (हट्टतुट्ठा अण्णमण्णं सदाविति) वडे ही आनन्द से और संतोष से युक्त हुए आपस में एक दूसरे के साथ विचार विनिमय करेंगे (सदावित्ता एवं वदिस्संति विचार विनिमय करके फिर वे इस प्रकार से एक दूसरे से कहेंगे (जाएणं देवाणुप्पिया ! भरहे वासे परूढरुक्ख-गुच्छ-गुम्म-लय-वल्लि-तण-पचय-हरिय-जाव सुहोवभोगे) हे देवानुप्रियो ! भरत क्षेत्र वृक्षों से, गुच्छों से, गुल्मों से, लताओं से, वल्लियों से, तृणों से एवं हरित दर्वादिको से युक्त होकर सुखोपभोग बन गया है (त जे णं देवाणुप्पिया अहं केइ अज्जप्पभिइ असुभं कुणिमं आहारं आहरिस्सइ) अतः अब जो कोई हे देवानुप्रियो ! हम लोगों में से आज से लेकर अशुभ, अप्रशस्त-आहार करेगा (से णं अणेगाह छायाहिं वजणिज्जति) वह अनेक पुरुषों मनुष्य नशे मा क्षेत्र सुभोपलाग्य य युध्य छे तेमासत (पासित्ता) प्यास उशन तमा (बिलेहितो णिद्धाहस्संति) तपाताना माथी मा२ नीजी मावशे मन (निद्धाइत्ता) पहार निजी पछी तय। (हहतुट्टा अण्णमण्णं सहर्विति) गहु मानहित अने सतुष्ट थये तसा ५२२५२ - भीनी साथे विया२ विनिमय ४२ (सहवित्ता, एवं वदिस्संति) विया२ विनिमय ४शन पछी तेथे या प्रमाणे मीलने ४डेशे (जए णं देवाण प्पिया ! भरहे वासे पउढरुक्खगुच्छगुम्मलयवल्लितणपब्धयहरिय जाव सुहोवभोगे) 3 દેવાનુપ્રિય ભારતક્ષેત્રન ક્ષોથા, ગુચ્છાથી, ગુલમથી લતાએથી વલિઓથી તેમજ હરિત દૂર वृहि था युत थछन सुजाय भोग्य भनी आयुछे (तंजेण देवुणुप्पिया अम्हं केइ अजप्प मिइ असुभ कुणिम आहारं आहरिस्सइ) मेथी थी आदाभाथी ३ ५९२ देवानुप्रिय।। अशुभ-मप्रशस्त हार ४२६० (से णं अण्णे णादि छाहिं वणिज्जति) ते भने Page #511 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकाद्विवक्षस्कारः सू० ५७ उत्सर्पिणीदुष्षमाकालगतमनुष्यकर्तव्यनिरूपणम् ४९७ प्रमाणं व्यवधाय (वज्जणिज्जेत्ति कटु) वर्जनीया इति कृत्वा स्वस्वसमूहतः पृथक्करणीयाः तत्संसर्गः सर्वथा वर्जनीय इति निश्चित्य (संठिई ठवेस्संति) संस्थिति स्थापयिष्यन्ति व्यवस्थां करिष्यन्ति (संठिई ठवेत्ता) संस्थितिं स्थापयित्वा (भरहे वासे)भरते वर्षे (मुहं सुहेणं सुख सुखेन सुखं यथा स्यात्तथा सुखेन-अनायासेन (अभिरममाणा २) अभिरममाणाः २-क्रीडन्तः २ (विहरिस्संति) विहरिष्यन्ति कालं यापयिष्यन्ति ॥सू० ५७॥ मूलम-तीसेणं भंते ! समाए भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ ? गोयमा! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे भविस्सइ जाव कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चेव । तीसेणं भंते ! समाए मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ ? गोयमा ! तेसिणं मणुयाणं छविहे संघयणे छविहे संठोणे बहुईओ रयणीओ उइदं उच्चत्तेणं जहण्णेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं साइरेगं वासस्यं आउयं पालेहिंति, पालित्ता अप्पे गइया णिस्यागामी जाव अप्पेगइया देवगामी ण सिझंति ॥ सू० ५८ ॥ ____ छाया-तस्यां सल भदन्त ! समायां भरतस्य वर्षस्थ कीदृशक आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यति ? गौतम ! बहुसमरमणीयो भूमिभागो भविष्यति यावत् कृत्रिमैश्चैव अकृत्रिमैप्रचैव । तस्यां खलु भदन्त समायां मनुजानां कीदृशक आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यति? गौतम ! तेषां खलु मनुजानां, षविधं संहनन, षइविध संस्थान बह्निः रत्नी: उर्ध्वमुञ्चत्वेन, जघन्येन, अन्तर्मुहूत्तम् उत्कर्षेण सातिरेकं वर्षशतम् आयुष्कं पालयिष्यति, पालयित्वा अप्येकके नियगामिनो यावत अप्येकके देवगामिनः न सिध्यन्ति ॥५८॥ की छाया प्रमाण में वर्जनोय हो जावेगा-अर्थात् हम लोग अपने समुदाय से उसे पृथक्कर देंगे. और उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखेंगे. इस प्रकार (कटु) से निश्चयकरके (संठिई ठवेस्संति) वे व्यवस्था करेंगे । इस प्रकार की (संठिई ठवित्ता भरहे वासे) व्यवस्था करके फिर वे (सुह सुहेणं अभिरममाणा २ विहरिस्संति) इस भरत क्षेत्र में बड़े ही आनन्द के साथ विना किसी बाधा के विविध प्रकार की क्रीडाओं को करते हुए अपने समय को निकालेंगे ॥५॥ इस उत्सर्पिणी के दुष्षमाकाल में भरत क्षेत्र के और उसमें स्थित मनुष्यों के आकार भाव અનેક પુરૂષોને છાયા પ્રમાણમાં વર્જનિય થઈ જાય એટલે કે અમે તેને પિતાના સમુદાયમાંથી જુદા જુદા કરી મૂકીશુ અને તેના સાથે કોઈ પણ જાતને સંબંધ કરીશુ નહીં આ प्रभा निश्चय श२ (संठिई ठवेस्संति) तेसो व्यवस्था ४२. मा प्रभाधे (संठि ठवित्ता भरहे वासे) व्यवस्था ४शन पछी त (सुहं सुहेणं अभि-रममाणा २ बिहरिस्सति) मा भरत ક્ષેત્રમાં બહુ જ આનંદપૂર્વક બાધા રહિત થઈને વિવિઘ પ્રકારની ક્રીડાઓ કરતાં પોતાના સમयने व्यतीत ४२ ॥ ५७ ॥ ઉત્સર્પિણીના દુષમકાળમાં ભરત ક્ષેત્રના અને તેમાં સ્થિત મનુષ્યના આકારભાવ ६३ Page #512 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४९८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे टीका-"तीसे णं भंते !" इत्यादि । (तीसे णं भंते ! समाए) तस्यां खलु भदन्त समायां ! हे भदन्त उत्सर्पिणी संबन्धियां दुष्षमायां समायां (भरहस्स वासस्स) भरतस्य वर्षस्य भरतक्षेत्रस्य (केरिसए आयारभावपडोयारे) कीदृशक आकार भावप्रत्यवतारः प्रज्ञप्तः प्ररूपितः ? (बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे भविस्सइ) बहुसमरमणीयो भूमिभागो भविष्यति (जाव कित्तिमेहिंचेव अकित्तिमे हिंचेव) यावत् कृत्रिमैश्चेव अकृत्रिमश्चव । अत्र यावत्पदेन (से जहा नामए आलिंगपुक्खरेइ वा) इत्यारभ्य (फित्तिमेहिं चेव) इत्यवधिकः पाठः संग्राह्य इति । गौतमस्वामी पुनः पृच्छति-(तीसेणं भंते ! समाए) तस्यां खलु भदन्त । समायां दुष्षमायां समायां (मणुयाणं) मनुजानां (केरिसए) कीदृशकः (आयारभावपडोयारे ) आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यति ? भगवानाह (गोयमा ।) गौतम ! (तेसि णं मणुयाणं ) तेषां खलु मनुजानां (छबिहे) पविध-पदप्रकारकं (संघयणे) प्रत्यवतार के विषय में सूत्रकार कथन करते हैं 'तीसेण भंते ! समाए भरहस्सवासस्स केरिसए'। टीकार्थ-गौतम ने प्रभु से ऐसा पूछा है (तीसे ण भंते ! समाए भरहस्त वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ) हे भदन्त ! उत्सर्पिणी सम्बन्धी इस दुष्षमा काल में भरत क्षेत्र को आकार भाव का प्रत्यवतार स्वरूप-कैसा होगा ? इस प्रकार गौतम के पूछने पर प्रभु ने कहा है (गोय. मा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे भविसस्सइ) हे गौतम ! उस काल में भरत क्षेत्र का भूमिभाग बहु सममरणीय होगा (जाव कित्तिमेहिं चेव अकित्तिमेहिं चेव) यावत् वह कृत्रिम अकृत्रिम मणियो से सुशोभित होगा यहां यावत्पद से यही "मालिंगपुक्खरेइवा" इस पाठ से लेकर "कित्तिमेहिं चेव" तक का पाठ गृहीत हुआ है अब गौतम प्रभु से ऐसा पूछते हैं-(तीसे णं भंते ! समाए मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ) हे भहन्त ! उस दुष्षमा नाम के आरे में मनुष्यों का आकार भाव का प्रत्यवतार स्वरूप कैसा होगा ! इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-(गोयमा ! तेसिणं मणुयाणं छविहे संघयणे छविहे संठाणे, बहुईओ रयणोओ उ8 उच्चत्तेणं) हे गौतम ! उन मनुष्यों के પ્રત્યવતાર ના સંબંધમાં સૂત્રકાર કથન કરે છે तीसेण भंते ! समाए भरहस्स वसस्स केरिसए, इत्यादि सत्र २८ टी--गीतमे प्रभुने मा प्रमाणे प्रश्रय (तीसेण भंते ! समाए भरहस्स वासस्ल केरिसप आयारभावपडोयारे भविस्सइ) महन्त सपि[ी संधी से दुषमा मां ભરત ક્ષેત્રના આકારભાવના પ્રત્યવતાર એટલે કે સ્વરૂપ કેવું હશે ? આ પ્રમાણે ગૌતમસ્વામીએ प्रश्न ४ा पछी प्रभुमे यु (गोयमा ! बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे भविसस्तइ) गीतम! सभा मत क्षेत्रने भूमिमा महुसभरभनीयथ (जाव कित्तिमेहि चेव अकित्तिहिं चेव) यावत तेतिम मतिम माथी सुशामित थशे मही यावत् ५४था"आलिंगपुक्खरेइवा" पा8 as "कित्तिहि चे" सुधाता ५४ यात थ छे. १३ गौतम स्वामी ओम पूछे छ (तीसेण भंते ! मणुयाणं केरिसर आयार भाव पडोयारे 3 महन्त ! तदुपरनाम साराभां મનુષ્યના આકાર ભાવના પ્રત્યવતાર (એટલે કે સ્વરૂપ કેવું હશે? એના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે (गोयमा! तेसिण मणुयाण छविहे संघयणे, विहे संठाणे बदुईओ रयणीओ उट्ठ उच्चत्ते ण) Page #513 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि वक्षस्कारः सू० ५९ दुष्षमसुषमासमा निरूपणम् ४९९ संहननं शरीरास्थिरचना भविष्यति, (छव्विहं) पइविधं षट्प्रकारकम् (संठाणं) संस्थानम् आकारो भविष्यति, तथा ते मनुजाः (बहुईओ रयणीओ) बह्वीः रत्नीः (उड्ढं उच्चतेणं) ऊर्ध्वमुच्चत्वेन भविष्यति, तथा (जहण्णेणं) जघन्येन (अंतोमुहुत्तं ) अन्तर्मुहूर्तम् (उक्कोसेणं) उत्कर्षेण (साइरेगं वाससय) सातिरेक वर्षशतं किञ्चिदधिक वर्षशतम् (आउयं) आयुष्कं जीवितकालं (पालेहिति) पालयिष्यन्ति, (पालित्ता) पालयित्वा (अप्पेगइया) अप्येकके केचित् (णिरयगामी) निरयगामिन नारका (जाव) यावत्-यावत्पदेन-अप्येकके तिर्यग्गामिनः अप्येकके मनुष्यगामिन इति संग्राह्यम्, तथा-(अप्पेगइया देवगामी) अप्येकके देवगामिनो भविष्यन्ति, परन्तु तत्र काले संजाता मनुष्याः (ण सिझंति) न सिध्यन्ति सिद्धिगतिगामिनो न भवन्तीति ॥ सू० ५८ ॥ ___ अथ दुष्षमसुषमां समां वर्णयति मूलम्-तीसेणं समाए एक्कवोसाए वाससहस्सेहिं काले वीइक्कते अणंतेहिं वण्णपज्जवहिं जाव परिवड्ढेमाणे २ एत्थ णं दूसमसुसमा णामं समा काले पडिवज्जिस्सइ समणाउसो तीसे णं भंते ! समाए भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ ? । गोयमा । बहुसमरमणिज्जे जोव अकित्तिमेहिं चेव । तेसि णं भंते ! मणआणं केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ ? गोयमा ! तेसिणं मणुयाणं छविहे संघ यणे, छबिहे संगणे, बहूई धणूई उद्धं उच्चत्तेणं जहणणेणं अंतोमुहुत्तं ६ प्रकार का तो संहनन होगा, ६ प्रकार का संस्थान होगा और शरीर की ऊँचाई अनेक हस्त प्रमाण होगी. (जपणेणं अंतोमुहुत्तं उकोसेणं साइरेगं वापसयं आउयं पालेहिति) इनकी आयु का प्रमाण जघन्य से एक अन्तर्मुहूर्त का और उत्कृष्ट कुछ अधिक १०० वर्ष का होगा (पलित्ता अप्पेगइया णिरयगामी, जाव अप्पेगइया देवगामी) आयु की समाति के अनन्तर कितने क तो इनमें से नरकगति में ज.वेंगे यावत् कितनेक तिर्यग्गति में जावेंगे, कितनेक मनुष्यगति में जावेंगे और कितनेक देवगति में जावेंगे परन्तु (न सिझंति) सिद्धगति में कोई नहीं जावेगा ॥सू०५८॥ હે ગૌતમ! તે મનુષ્યને ૬ પ્રકારનું તે સંહનન થશે, ૬ પ્રકારનું સંસ્થાન થશે અને શરીરની अया अने। स्त प्रमाण २जी शे (जहण्णेणं अंतोमुहुत्त उक्कोसेण साइरेगं वाससयं आउयं पालेहिति) मेमनी आयुष्यनु प्रभा धन्यथा ये मतभुइतनु भने ४४ पधारे १०० वर्ष २८ . (पालित्ता अप्पेगया णिरयगामी, जाव अप्पेगइया देवगामी) मायुष्यनी समाप्ति ५छी उis तो मेमनामांथा न२४ गतिमाशे यात કેટલાક તિર્થન્ ગતિમાં જશે, કેટલાક મનુષ્ય ગતિમાં જશે અને કેટલાક દેવગતિમાં જશે ५ (न सिज्झंति) सिद्धगति भगवी शश नहि. ॥ ५८ ॥ Page #514 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे उक्कोसेणे पुवकोडी आउयं पालेहिंति, पालित्ता अप्पेगइआ णिस्यगामी जाव अंत करेहिति । तीसेणं समाए तओवंसा समुपज्जिस्संति, तं जहातित्थगवंसे चक्कवट्टिवंसे दसावंसे । तीसेणं समाए तेवीसं सित्थगरा, एक्कारस चकवही णव बलदेवा णव वासुदेवा समुप्पज्जिस्संति सू०५९। छाया-तस्यां खलु समायाम् एकविंशत्या वर्षसहनैः काले व्यतिक्रान्ते अनन्तैर्वर्णपर्यवैर्या वत् परिवर्द्धमानः परिबर्द्धमानः अत्र खलु दुष्षमसुषमा नाम समा कालः प्रतिपत्स्यते श्रमणायुष्मन् ! तस्यां खलु भदन्त ! समायां भरतस्य वर्षस्य कीदृश आकारभावप्रत्यवतारो भवि प्यति ? गौतम ! बहुसमरमणीयो यावत् अकृत्रिमैश्चैव । तेषां खलु भदन्त ! मनुजानां कोशक आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यति ? । गौतम! तेषां खलु मनुजानां षड्विधं संहननं षविधं संस्थानं बहूनि धनुषि ऊर्ध्वमुच्चत्वेन जघन्येन अन्तर्मुहूर्तम् उत्कर्षेण पूर्वकोटोम् आयुष्क पालयिष्यन्ति पालयित्वा अप्येकके निरयगमिनो यावत्अन्तं करिष्यन्ति । तस्यां खलु समायां त्रयो घंशा समुत्पत्स्यन्ते तद्यथा-तीर्थकरवंशः चक्रवर्तिवंश २, दशाहवंशः तस्यां खलु समायां प्रयोविंशति स्तोर्थकराः एकादश चक्रवर्तिनः नव बलदेवाः नब वासुदेवाः समुत्पत्स्यन्ते ॥सू ५९। टीका - "तीसे णं समाए" इत्यादि । (समणाउसो) श्रमणायुष्मन् हे आयुष्मन् श्रमण (तीसेणं समाए) तस्यां खलु समायाम् (एक्कवीसाए वाससहस्से हि) एकविंशत्या वर्षसहस्रः प्रमिते (काले वीइक्कंते ) काले व्यतिक्रान्ते (अणंतेहि वण्णपज्जवेहि) अनतैवर्णपर्यवैः (जाव) यावत्-यावत्पदेन (अणं तेहिं गंधपज्जवेडिं) इत्यारभ्य (अणंतपरिवुइढीए) इत्यन्तः पाठः संग्राह्यः, (परिवड्ढेमाणे२) परिवर्द्धमान: २ (एत्थ णं) अत्र खलअस्मिन् भरते वर्षे खलु (दूसमसुसमा णामं समा काले) दुष्पमसुषमा नाम समा काल: ॥ उत्सर्पिणी के दुप्पम सुषमा का वर्णन'तीसे णं समाए एक्कवीसाए वाससहस्से हिं काले वीइक्कंते' इत्यादि सूत्र-५९ टीकार्थ-(समणाउसो) हे आयुष्मन् श्रमण (तोसेणं समाए) उस उत्सर्पिणी में (एककवीसाए वाप्तसहस्से हिं) २१हजार वर्ष प्रमाण वाला जच (काले वीइक्कंते) यह दुष्षमा नाम का द्वितीय काल समाप्त हो जावेगा तब (अणंतेहिं वण्णपज्जवेहि जाव परिवड्ढेमाणे२ एत्थणं दूसमसुसमा गामं समा काले पडिवग्जिस्सइ) अनन्त वर्ण पर्यायों से यावत् अनन्त गंध आदि पर्यायों से अनन्त गण सूप में ઉત્સર્પિણીના દુષમસુષમાનું વર્ણન--- 'तीसेणं समाए एक्कवीसाए वाससहस्सेहिं काले वोइक्कंते इत्यादि सूत्र ॥५॥ Act-- (समणाउसो) 3 आयु भन् श्रम ! (तीसे णं समाए) asसपिणीमा ( एक्कबीसाए वाससहस्सहिं) २१ १२ वर्ष प्रभारवाणे न्यारे (काले वीइक्कते) से सुषमा नाम द्वितीय समास थ ४श त्यारे (अणंतेहिं वण्णपज्जवेहि जाप परिवडे. माणे २पत्थ ण समसुसमा णामं समा काले पडिवज्जिसई) अनंत १९ पर्यायोथी यावत અનંત ગંધ આદિ પર્યાયાથી અનંત ગુણ રૂપમાં વૃદ્ધિ ગત થતા આ ભરતક્ષેત્રમાં દુષમ Page #515 -------------------------------------------------------------------------- ________________ NAVNAVM प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कारः सू० ५९ दुष्षमसुषमासमा निरूपणम् ५०१ (पडिवज्जिस्सइ) प्रतिपत्स्यते समापन्नो भविष्यति । (तीसेणं भंते ! समाए) तस्यां खलु भदन्त ! समायां (भरहस्स वासस्स) भरतस्य वर्षस्य (केरिसए) कीदृशकः (आया. रभावपडोयारे) आकारभावप्रत्यवतारो ( भविस्तइ ) भविष्यति ? इति गौतम प्रश्नेभगवानाह-'गोयमा ! गौतम ! ( बहुसमरमणिज्जे जाव अकित्तिमे हिं चेव) बहुसमरमणीयो यावत् अकृत्रिमैश्चैव । अत्र यावत्पदेन (भूमिभागे भविस्सइ) इत्यरभ्य (कित्तिमेहिं चेव) इत्यन्त ! पाठः संग्राहयः । पुनगौतमस्वामी पृच्छति तेसिणं भंते ! मणुयाणं) तेषां खलु भदन्त ! मनुजानां हे भदन्त ! तेषामुत्सर्पिणीदुष्षम सुषमाकालभाविनां मनुष्याणां (केरिसए आयारभावपडोयारे) कीदृशक आकारभाव प्रत्यवतारो ( भविस्सइ) भविष्यति ? । भगवानाह- (गोयमा ! ) गौतम (तेसि णं मणुयाणं) तेषां खलु मनुजानां ( छबिहे संघयणे) षड्विधं संहननं ( छविहे संठाणे पविधं संस्थानं च भविष्यति, तथा-ते मनुजाः (बहूई धण्इं उद्धं उच्चत्तेणं) बहूनि वृद्धिं गत होता हुआ इस भरत क्षेत्र में दुष्पमसुषमा नाम का तृतीय काल प्राप्त हो जावेगा (तीसेणं भंते ! समाए भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ) गौतमने प्रभु से ऐसा पूछा है कि हे भदन्त ! जब यह काल भरतक्षेत्र में अवतीर्ण हो जावेगा तो भरतक्षेत्र का आकार भाव का प्रत्यवतार स्वरूप कैसा होगा? इस प्रश्न के उत्तरे में प्रभु ने कहा है हे गौतम! इस आरे में भरतक्षेत्र का भूमिभाग बहु सम रमणीय होगा यावत् अकृत्रिम पंचवर्णों के मणियों से वह उपशोभित होगा. यहां यावत्पद से "भूमिभागे भविस्सइ" यहां से लेकर "कित्तिमेहि चेव" तक का पाठ गृहीत हुआ है. अब गोतमस्वामो पुनः प्रभु से ऐसा पूछते हैं- ( तेसिणं भंते ! मणुयाणं केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ) हे भदन्त ! इस काल के मनुष्यों का स्वरूप कैसा होगा ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं- (गोयमा ! तेसिणं मणुयाणं छविहे संघयणे छबिहे संठाणे बहुइं धणूई उड्ढं उच्चत्तेण) हे गौतम ! उत्सर्पिणो के दुष्षमासुषमा कालभावी मनुष्यों के छह प्रकार के संहनन होंगे छह प्रकार के संस्थान होंगे-तथा इनके शरीर की समानामतीय प्राप्त थशे. (तोसे णं भंते ! समाए भरहस्स बास्सस केरिसर आयारभावपडोयारे भविस्सइ) गौतमे प्रभुने माप्रमाणे ५२४ मत ! यार से आग ભરતક્ષેત્રમાં અવતીર્ણ થઈ જશે ત્યારે ભરતક્ષેત્રના આકાર–ભાવને પ્રત્યવતાર એટલે કે વરૂપ કેવું હશે ? આ જાતના પ્રશ્નના જવાબમાં પ્રભુ કહે છે–હે ગૌતમ ! એ આરામાં ભરતક્ષેત્રને ભૂમિભાગ બહુ સમરમણીય થશે. યાવત્ અકૃત્રિમ પાંચવર્ણોના મણિઓથી તે मित यश सही यावत् ५४था (भूमिभागे भविस्सइ) महीधी भांडीने (कित्तिमें हि चेव) सुधीना ५ गडीत थये। छे. वे गौतम स्वामी पुन: प्रभु २ मोजतना प्रश्न ४२ छ-तेसीणं भले ! मणुयाण केरिसए आयारभावपडोयारे भविस्सइ) महन्त ! 241 आणना भनव्यानु३५ बुशे ? नाममा प्रभु ४९ छे-(गोयमा ! तेसि णं मणुयाणं छविहे संघयणे छबिहे सठाणे बहुई धणूई उड्द उच्चत्तेणं) 3 गौतम उत्सपिना દુષમા સુષમા કાળના ભાવી મનુષ્યના ૬ પ્રકારના સહનનો થશે, ૬ પ્રકારના સંસ્થાને Page #516 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५०२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे धनूंषि उर्ध्वमुच्चत्वेन भविष्यन्ति, तथा (जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पुन्चकोडी) जघन्ये नान्तर्मुहूर्त्तम् उत्कर्षेण पूर्वकोटिम् (आउयं) आयुष्कं ( पालेहिंति) पालयिष्यन्ति (पालित्ता) पालयित्वा (अप्पेगइया णिरयगामी जाव अंत करेहिति) अध्येकके निरयगामिनो यावत् अन्तं करिष्यन्ति यावत्पदसंग्राह्यपाठमनुसृत्यैवमर्थो बोध्यस्तथाहि - केचिद् मनुष्या नरकगामिनो भविष्यन्ति केचित् तिर्यग्गामिनो भविष्यन्ति केचिन्मनुष्यगा - मिनः केचिच्च देवगामिनो भविष्यन्ति केचिच्च सिद्धिगतिगामिनो भविष्यन्तीति । तस्यां समायां ये मनुष्यवंशाः प्रचलिष्यन्ति तानाह - ( ती सेणं समाए ) तस्यां खलु समायां (तओ वंसाः) त्रयो वंशाः (समुप्पज्जिस्संति) समुत्पत्स्यन्ते समुत्पन्ना भविष्यन्ति (तं जहा ) तद्यथा - (तित्थगरवंसे) तीर्थकर वंशः तीर्थङ्करसन्तानपरम्परा (चक्कवट्टिवसे) चक्रवर्तिवंशः चक्रवर्त्तिसन्ततिपरम्परा, (दसारखं से) दशार्हवंशः यदुवंशश्चेति । तस्यां समायां कियत्कियत्संख्यकाञ्चक्रवर्त्त्यादयः समुत्पत्स्यन्ते ? इत्याह- (तीसेणं भंते ! समाए) तस्यां ऊँचाई अनेक धनुष प्रमाण होगो ( जहण्गेणं अतो मुहुत्तं उक्कोसेणं पुत्र्वकोडी आउयं पाछेहिंति) इनकी आयु जघन्य से एक अन्तर्मुहूर्त को और उत्कृष्ट से एक पूर्वकोटि तक की होगी (पालित्ता अप्पेगइया णिरयगामी, जाव अंतं करेहिंति) इतनी लम्बी आयु का भोग करके जब ये मरेंगे तो इनमें से कितनेक मनुष्य तो नरक में जायेंगे और कितनेक मनुष्य यावत् समस्त शारीरिक और मानसिक दुःखो का विनाश करेंगे यहाँ यावत्पद से संग्राह्य पाठ इस प्रकार से हैं- " केचित् मनुष्याः नरक गामिनो भविष्यन्ति केचित् तिर्यग्गामिनो भविष्यन्ति केचित् मनुष्यगामिनो भविष्यन्ति केचित् देवगामिनो भविष्यन्ति केचित् सिद्धगतिगामिनो भविष्यन्ति” इस यावत्पद गृहीत पाठ का अर्थ स्पष्ट है. (तीसेणं समाए तओ बंता समुप्यज्जिस्संति) उस उत्सर्पिणी काल के इस तृतीय आरक में तीन वंश उत्पन्न होगे - ( तं जहा ) जो इस प्रकार से हैं - ( तित्थगरवसे, चक्कवट्टिवसे) एक तीर्थकर वंश, द्वितोय चक्रवर्ती वंश तृतीय दशार्ह वंश - यदुवंश (तीसे णं समाए थशे तेम ४ खेमना शरीरनी अयाई भनेउ धनुष प्रमाण भेटली डशे. (जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेणं पुब्वकोडी आउयं पालेहिति) खेभनु आयुष्य धन्यथी ये मन्तर्भुत भेट भने उत्कृष्टथी से पूर्व अटि सुधी डशे. (पलित्ता अप्पेगइया णिरयग्रामी, जाब अंत करेहिति) मासु हीर्घ आयुष्य लोगवीने न्यारे येथे भर पामशे त्यारे खेभनाમાંથી કેટલાંક મનુષ્યે તે નરકમાં જશે અને કેટલાક અનુષ્યે। યાવતુ સમસ્ત શારીરિક અને માનસિક દુ:ખાનેા વિનાશ કરશે. અહી' યાવત્ પદથી સંગ્રાહ્ય પાઠ આ પ્રમાણે છે"केचित् मनुष्याः नरकगामिनो भविष्यन्ति केचित् तिर्यगामिनो भविष्यन्ति केचित् मनुष्यगामिनो भविष्यन्ति केचित् देवगामिनो भविष्यन्ति केचित् सिद्धगतिगामिनो भविष्यन्ति' यावत् पहथी गृहीत मे पाहतो अर्थ स्पष्ट ४ . ( तोसेणं समाए तओ वसा समुपज्जस्संति) ते उत्सर्पिणी अजना से तृतीय आरम्भ वंशी उत्पन्न थशे ( तं जहा ते या प्रमाणे छे. (तित्थगरवंसे, चक्कलट्टि वैसे, दसारवंसे) मे तीर्थ ४२ वंश, द्वितीय यत्रतवंश ने तृतीय हशा वंश यहुवंश (तीसेणं समाप तेबीसं Page #517 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० बक्षस्कारः सू० ६० सुषमदुष्षमाकालनिरूपणम् खलु भदन्त ! समायां (तेवीसं तित्थगरा) त्रयोविंशतिस्तीर्थकराः (एक्कारस चक्कवट्टी) एकादश चक्रवर्तिनः (णव बलदेवा) नव बलदेवाः नवसंख्यका बलदेवाः (णव वासुदेवा) नव वासुदेवाः नवसंख्यका वासुदेवाश्च (समुप्पज्जिस्संति) समुत्पत्स्यन्ते उत्पन्ना भविप्यन्तीति ॥ सु. ५९ ॥ अथ सुषमदुष्पमाकालं वर्णयति मलम्-तोसे पं समाए सागरोवमकोडाकोडीए बायालोसाए वाससहस्सेहिं ऊणियाए काले वीइक्कते अणंतेहिं वण्णपज्जवेहिं जाव अणंतगुणपरिखुड्ढीए परिवुड्ढेमाणे २ एत्थ णं सुसमदूसमा णामं समाकाले पडिवज्जिस्सइ समणाउसो! सा णं समा तिहा विभजिस्सइ-पढमे तिभागे, मज्झिमे तिभागे पच्छिमे तिभागे। तीसे णं भंते ! समाए पढमे तिभाए भरहस्स बोसस्स के रिसए आगोरभावपडोयारे भविस्सइ ? गोयमा! बहुसमरमणिज्जे जाव भविस्तइ, मणुयाण जोवेव ओसप्पिणी पच्छिमे तिभागे वत्तव्वया सा भाणियव्वा, कुलगरवज्जा उसभसामिवज्जा। अण्णेपढंति.तंजहा तीसे णं समाए पढमे तिभाए इमे पण्णरस कुलेगरा समुपज्जि स्संति तं जहा-सुमई जाव उसमे सेसं तं चेव दंडणोइओ पडिलोमाओ णेयवाओ. तीसे णं समाए पढमेतिभागे रायधम्मे जाव धम्मचरणे य वोच्छिज्जिस्सइ । तीसे णं समाए मज्झिमपच्छिमेसु तिभागेसु जाव पडममज्झिमेसु वत्तव्वया ओसप्पिणीए सा भाणियव्वा । सुसमा तहेव, सुसमासुसमावि तहेव जाव छबिहा मणुस्ता अणुमज्जिस्संति जाव सण्णि चोरी ॥ सू० ६० ॥ छाया-तस्यां खलु समायां सागरोपमकोटी कोटयां द्विवत्वारिंशता वर्षसहरुनिकायां काले प्रतिक्रान्ते अनन्तै र्वणपर्यवैर्यावत् अनन्तगुणरिवृद्धया परिबर्द्धमानः परिवर्द्धमान अत्र तेवीसं तित्थगरा, एककारस, चारवट्टो, णव बलदेवा, णच वासुदेवा समुपा नरसंति) उस उत्सर्पिणी काल के इस तृतीय आरक में २३ त थ का ११ चक्रवर्ती, नो वलदेव, और नो वासुदेव उत्पन्न होंगे ॥५९।। तित्थगरा, पक्कारस चक्कवट्टो णव वथदेबा णब वासुदेवा समुपज्जिस्संति) asafael કાળના એ તૃતીય આર.માં ૨૬ તીર્થંકરો, ૧૧ અફવતીએ. નવ બળદે અને નવ વાસુદે पन्न थशे. ॥ ५ ॥ - - Page #518 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५०४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे खलु सुषमदुष्षमा नाम समा कालः प्रतिपत्स्यते श्रमणायुष्मन् ! सा खलु समा त्रिधा विभक्ष्यते प्रथमस्त्रिभागः १ मध्यमस्त्रिभागः पश्चिमस्त्रिभागः । तस्यां खलु भदन्त ! समायां प्रथमे त्रिभागे भरतस्य वर्षस्य कीदृशक आकारभावप्रत्यवतारो भविष्यति गौतम ! बहुस मरमणीयो यावद् भविष्यति मनुजान या एव उत्सर्पिण्यां पश्चिमे त्रिभागे वक्तव्यता सा मणितव्या कुलकरवर्जा ऋषभस्वामिवर्जा । अन्ये पठन्ति तस्यां खलु समायां प्रथमे त्रिभागे इमे पञ्चदश कुलकराः समुत्पत्स्यन्ते तद्यथा सुमति र्याविद् ऋषभः शेषं तदेव दण्डनोतयः प्रतिलोमा नेतव्याः तस्यां खलु समायां प्रथमे त्रिभागे राजधर्मो यावत् धर्मवरणं च व्युच्छे त्स्यति । तस्यां खलु समायां मध्यमपश्चिमयोस्त्रिभागयोर्यावत् प्रथममध्यमयोर्वक्तव्यता अवसर्पिण्यां सा भणितव्या सुषमा तथैव सुषमसुषमा तथैव यावत् षड्विधा मनुष्या अनु सक्ष्यन्ति यावत् संशिचारिणः ॥सू० ६०॥ टीका - "तीसेणं समाए " इत्यादि । (समणाउसो !) श्रमणायुष्मन ! हे आयुमन् ! (तीसेणं समाए ) तस्यां खलु समायां तस्यां दुष्षमसुषमायां खलु समायां (सागरोवमकोडाकोडीए) सागरोपमकोटीकोय्यां (बायालीसाए वाससहस्सेहिं ) द्वित्वारिंशता वर्षसहस्रैः द्विचत्वारिंशत्सहस्रवर्षैः (ऊणियाए) ऊनिकायां न्यूनायां (काले वीइ 'क्id) कालव्यतिक्रान्ते व्यतीते सति - द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्त्रो ने दुष्पमासुषमारूप काले व्यतीते सति (अणं तेहिं वण्णपज्जवेहिं जाव अनंतगुणपरिबुड्ढीए परिवुड्ढेमाणे २) अनन्तै वर्णपर्यवैर्यावत् अनन्तगुणपरिवृद्धया परिवर्द्धमानः २, यावत् पदेनात्र 'अनंतेहिं गंधपज्जवेहिं' इत्यादि पूर्वोक्तः पाठः संग्राह्य : ( एत्थ णं) अत्र खल अस्मिन् भरतक्षेत्रे खलु (सुसमद् समा णामं समा काले) सुषमदुष्पमानाम समा कालः उत्सर्पिण्या चतुर्थारकलक्षणः कालः 'ती सेणं समाए सागरोवम कोडाकोडीए बायालीसाए वाससहस्सेर्हि, इत्यादि टीकार्थ -- हे आयुष्मन् श्रमण ! उत्सर्पिणी के ४२ हजार वर्ष का १ सागरोपम कोटाकोटि प्रमाणवाले इस तृतीय आरक की परिसमाप्ति हो जाने पर (अणंतेहि वण्णपज्ञ्जदेहिं जाव अनंतगुण परि बुड्ढीए परिवुड्ढे माणे २ एत्थणं सुसमदूपमा णामं समा काले पडिवज्जिस्सइ समणाउसो) अनन्त वर्णों से यावत् अनंनगुग वृद्धिले वर्जित होता हुआ इस भरतक्षेत्र में सुषम दुष्षमानामका चतुर्थ आरक लगेगा अवतरित होगा (सा णं समा तिहा विमजिस्इ) इस आरक 'तीसेण समाए सागरोवम कोडा कोडीए बायालीसाए बाससहस्सेहिं इत्यादि सूत्र ||६०|| ટીકા –હે આયુષ્મને શ્રમણુ ! ઉત્સપિ†નીના ૪૨ હજાર વર્ષે કમ ૧ સાગરોપમ કટાર્કટિ प्रभावाना या तृतीय भारसुनी क्यारे परिसमाप्ति थ नशे त्यारे (अनंतेहिं वण्णदज्जवे हिं जात्र अणतगुणपरिबुड्ढीप परिवुड्ढेमाणे २ पत्थणं सुसमद्समा णामं समा काले पडिवजिसइ समणा उसो) मनतवर्श पर्यायाथी यावत् अनंत गोवृद्धिथी वर्धमान मे भश्तक्षेत्रमां सुषमहुष्षभानाम अतुर्थ भार सागरी मेट से अवतरित थशे. ( सा णं समा तिहा विभजित्सई) से मारना ऋतु लागो थशे. ( पठमे तिभागे, मज्झिमे तिभागे पच्छि मेति भागे) मां मे प्रथम त्रिला थशे. द्वितीय मध्यमत्रिभाग यशे मने तृतीय प चम Page #519 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकाद्विवक्षस्कारः सू० ६० सुषमदुष्षमाकालनिरूपणम् ५०५ (पडिवज्जिस्सइ) प्रतिपत्स्यते प्राप्तो भविष्यति । अस्याः समाया भागत्रयं भवतीति तद् दर्शयति साणं' इत्यादि । ( साणं समा तिहा विभज्जिस्सइ) वा खलु समा त्रिधा विभङ्क्ष्यते सासुषमदुष्पमारूपासमा भागत्रयेण विभक्ता भवति । तत्र प्रत्येकभागं नामनिर्देश पूर्वकमाह - 'पढमे तिभागे, इत्यादि । ( षढमे तिभागे मज्झिमे विभागे, पच्छिमे तिभागे) प्रथमस्त्रिभागो, मध्यमस्त्रिभागो पश्चिमस्त्रिभाग इति । 'त्रिभाग' इत्यस्य 'तृतीयो भाग इत्यर्थः । एवं सुषमदुष्पमायाः समाया भागत्रयं प्रदर्श्य सम्प्रति प्रथम त्रिभागस्याकारभावं जिज्ञासमानो गौतमस्वामी पृच्छति - 'तीसे णं भंते' ! इत्यादि । (तीसे णं भंते । समाए) तस्याः खलु भदन्त ! समायाः ( पढमे तिभाए) प्रथमे त्रिभागे (भरइस्स वासस्स) भरतस्य वर्षस्य (केरिसए) कीदृशकः (आगारभाव पडोयारे) आकारभावप्रत्यवतारो (fates ) भविष्यति ? । भगवानाह - ( गोयमा !) गौतम ! ( बहुसमरमणिज्जे) बहुसमरमणीयो (जाव) यावद् (भविस्सइ) भविष्यति । अत्र यावत्पदेन स एव वर्णनक्रमः संग्राह्यो योऽवसर्पिण्या: सुषमदुष्षमा समा निरूपणावसरे भरत क्षेत्रस्य वर्णन - क्रमो वर्णित इति । मनुष्याणां विषये गौतमप्रश्नो भगवदुत्तरं च अवसर्पिण्या: के तीन भाग होंगे (पढमेति भागे, मज्झिमे ति भागे, पच्छिमे तिभागे) इन मेंएक प्रथम त्रिभाग होगा द्वितीय मध्यम त्रिभाग होगा और तृतीय पश्विम त्रिभाग होगा इनमेंसे जो 'पढमेतिमाए' प्रथम त्रिभाग है - तीसरा भाग है- (तीसेण भंते ! समाए भरहस्स वासस्स केरिसए आयारभाव - पडोयारे भविस्सइ) हे भदन्त ! उस प्रथम त्रिभाग में भरत क्षेत्र का स्वरूप कैसा होगा ? इसके उत्तर में प्रभु कहते है- (गोयमो ! बहु समरमणिज्जे जाव भविस्सइ) हे गौतम ! प्रथम त्रिभाग में भरत क्षेत्र का भूमिभग बहुत समरमणोय होगा। यहां यावत्पद से वही वर्णन क्रम संग्राह्य हुआ है जो अवसर्पिणी के सुषमा आरक के दुषमा आरक के निरूपण के समय में भरत क्षेत्र का वर्णित किया गया है (मणुयाणं जा चेव ओसप्पिणी ए पच्छिमे वत्तव्वया सा भाणियव्वा कुलगरबज्जा उस सामिवज्जा) अवसर्पिणीसम्बन्धी सुषम दुष्षमा के पश्चिम त्रिभाग में जैसा मनुष्यों का वर्णन किया गया है वैसा ही वर्णन कुल करके वर्णन को और ऋषभस्वामी के वर्णन को छोड़ कर यहां पर भी करलेना चाहिये. क्यों कि अवसर्पिणी के सुषमदुष्षमा के पश्चिम त्रिभाग में जिन दण्डनीतियों प्रवृत्ति कुलकरों ने की है और ऋषभस्वामी ने जो अन्तपाक आदि किया ओं का और शिल्प त्रिभाग थशे भांथा ? (पढमे तिभाए) प्रथम त्रिभाग छे अर्थात्त्रिने लाग छे, (तीसेण भसे ! समाए भरइस्स वसिस्स के रिसए आयारभाव पडोयारे भविस्सा) डे लहन्त ! ते प्रथम त्रिभागभांलरतक्षेत्रनु स्व३५ ठेवु इशे ? मेनाभ्वाभां प्रभु हे छे (गोयमा बहुसमरमणिज्जे जाघ भविस्सइ) हे गौतम! प्रथम त्रिभागमा लस्तक्षेत्र भूमिला बहुसमरमणीय थशे. અહીં યાવત્ પદથી તે પ્રમાણે જ વણુન ક્રમ સગ્રાહ્ય થશે કે જે પ્રમાણે અવસર્પિણીના सुषभ-हुषमा आरम्ना नि३षाणु समयमा भरतक्षेत्र वानरवामां आव्यु छे. (मणुयाणं जा चेव ओसप्पिणीए पच्छिमे वत्तव्वया सा भाणियव्वा कुलगरवज्जा उसभलामिवज्जा) अवસર્પિણી સંબંધી સુષમ દુષમાના પશ્ચિમ ત્રિભાગમાં જેવું મનુષ્યાનુ વણ્ન કરવામાં આવ્યુ છે, ६४ Page #520 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५०६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सुषम दुष्पमायाः पश्चिमत्रिभागवर्णनप्रसङ्गे मनुष्यविषये यादृशो गोतमप्रश्नः यादृशं च भगवदुत्तरं तत्सर्वमिहापि कुलकरवर्णनम् ऋषभस्वामिवर्णनं च परित्यज्य संग्राह्यम् । एतदेव - दर्शयति (मणुयाणं जा चेव ओसपिगीए पच्छिमे वत्तव्वया सा भाणियच्या कुलगरवज्जा उसमसामिवज्जा) मनुजानां याचैव अवसर्पिण्यां पच्छिमे त्रिभागे वक्तव्यता सा भणितव्या कुलकरवर्जा ऋषभस्वामिव इति । अयं भावः अवसर्पिणी सम्बन्धि सुषमदुमायाः पश्चिमत्रिभागे काले यादृशं मनुजानां वर्णनं गतं तादृशमेव वर्णनमत्रापि वक्तव्यम्, परन्तु कुलकरवर्णनम् ऋषभस्वामिवर्णनं चात्र न वक्तव्यम् यतोऽवसर्पिण्या: सुषमदुष्पमायाः समायाः पश्चिमे त्रिभागे या दण्डनीत्यादयः कुलकरै: प्रवन्ते, ऋषभस्वा, मिना च या अन्नकादिक्रियाः शिल्पकलाचोपदर्यन्ते ताश्रोत्सर्पिण्या: सुषमदुष्पमायाः समायाः प्रथमे त्रिभागे न प्रवर्त्त्यन्ते न चाप्युपदश्यन्ते । अयं भावः उत्सर्पिण्या द्वितीयारके ये कुलकरा भवन्ति तत्प्रवर्त्तितदण्डनीत्यादीनामेव चतुर्थारकेऽनुवृत्तिर्भवति पाकादिक्रियाणां शिल्पकलानां चापि पूर्वप्रवृत्तानामेत्र तत्रानुवृत्तिर्भवतीति तत्तत्प्रतिपादकपुरुषानावश्यकतेति अवसर्पिणीतृतीयारक पश्चिमत्रिभागकालवर्णने कुलकरवर्णनमृषभस्त्रामिवर्णनं च वर्जयित्वा सर्व वाच्यमिति । अथवा 'ऋषभस्वामिवर्जा' इत्यस्य 'ऋपभस्त्राकलाओं का उपदेश किया है वे सब उत्सर्पिणी के सुषमदुष्षमा नामके प्रथम त्रिभागमें प्रचारित नहीं हुई और न उपदिष्ट ही हुइ हैं तात्पर्य कहने का यह है उत्सर्पिणी के द्वितीय आरक में जो कुलकर होते हैं उनके द्वारा प्रवर्तित दण्डनीत्यादिकों की हीं चतुर्थ आरक में अनुवृत्ति होती हैं तथा पूर्वप्रवृत्त ही पाकादि क्रियाओं को की और शिल्प कलाओं को भी वहां पर अनुवृत्ति होती है इसीलिये यहां इनके प्रतिपादक पुरुषों की अनावश्यकता प्रकट की गई है और ऐसा कहा गया है कि अवसर्पिणी के सुषम दुष्षमा के पश्चिम त्रिभाग के वर्णन के समय मनुष्यों का जैसा वर्णन किया गया है वैसा वह सब वर्णन कुलकर और तीर्थकर मस्वामो के वर्णन को छोड़कर कहलेना चाहिये अथवा "ऋषभस्वामो बर्जा" का अभिप्राय ऋषभस्वामी તેવુ' જ વર્ણન ફક્ત કુલકરના તેમજ ઋષભ સ્વામીના વનને બાદ કરીને અહી પણ સમજવુ' જોઇએ. કેમકે અવસર્પિણીના સુષમ દુષમાના પશ્ચિમ ત્રિભાગમાં જેટલા પ્રકારની દંડનીતિઓની પ્રવૃત્તિ કુલકરાએ કરેલી છે અને ઋષભ સ્વામીએ જે અન્યપાક વગેરે ક્રિયા આના અને શિલ્પકલામેના ઉપદેશ કર્યો છે. તે ખધુ ઉત્સર્પિણીના સુષમદુષ્ટમાના પ્રથમ ત્રિભાગમાં પ્રચલિત થયું નથી અને ઉપદ્મિષ્ટ પશુ થયું નથી. તાત્પ આ પ્રમાણે છે કે ઉત્સર્પિણીના દ્વિતીય આરકમાં જે કુલકર હેાય છે, તેમના વડે પ્રતિંત દ ંડનીતિ વગેરેની જ ચતુર્થાં આકમાં અનુવૃત્તિ હોય છે તેમ જ પૂર્વ પ્રવૃત્ત પ!કાદિ ક્રિયાએની અને શિલ્પ કળાએની પણ ત્યાં અનુવૃત્તિ થતી એટલા માટે અહીં એમના પ્રતિપાદક પુરુષોની અનાવ શ્યકતા પ્રકટ કરવામાં આવી છે અને એવું કહેવામાં આવ્યુ છે કે અવર્ષિણીતા સુધન ક્રુષ્ણમાના પશ્ચિમ ત્રિભાગના વન સમયે મનુષ્યાનુ જે પ્રમાણે વર્ણન કરવામાં આવેલુ છે, તેવું જ વણુ ન કુલકર અને તી કર ઋષભસ્વામોના વર્ણનને બાદ કરીને સમજવુ Page #521 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० बक्षस्कार: सू० ६० सुषमदुष्षमाकालनिरूपणम् ५०७ " म्यभिलाप' इति भावः । ततश्च ऋषभस्वामिनोऽभिलापं वर्जयित्वा भद्रकृन्नामकस्य तीर्थङ्करस्याभिलापो वक्तव्य इत्यभिप्रायः । अत्रेदं बोध्यम् - उत्सर्पिण्यां चतुर्विंशतितमतीर्थ कृतोऽभिलापोऽवसर्पिण्यां संजातस्य प्रथमतीर्थकरस्य सदृशः प्रायस्त्वं भद्र कृती वर्णने कलापदेशाभिलापाभावेन बोध्यमिति । अत्र कुलकरविषये वाचनाभेदमाह - 'अण्णे पढति' इत्यादि । (अण्णे पदंति) अन्य पठन्ति - अपरे आचार्या एवं पाठभेद वदन्ति, तथाहि - (तीसे णं समाए पढमे तिभाए इमे पण्णरस कुळगरा - मुप्पनिस्संति, तं जहा सुमई जा उसमे सेसं तं चैव ) तस्यां खलु समायां प्रथमे त्रिभागे इमे पञ्चदश कुलकराः समुत्पत्स्यप्ते, तद्यथा-सुमतिर्यावदृषभः, शेषं तदेव । अयमिहाभिप्रायः केषां चिन्मते उत्सर्पिणीसम्बन्धिसुषमदुप्पमायाः प्रथमे त्रिभागे सुमतिमारभ्य ऋषभपर्यन्ताः संबंधी अभिलाप है, सो इस अभिलाप को छोड कर भद्रकृत् नामके तीर्थकर का अभिलाप कहना | इस कथन का तत्पर्य ऐसा है कि उत्सर्पिणी के २४ वे तीर्थकर का अभिलाप प्राप्त करके अवसर्पिणी में उत्पन्न हुए प्रथम तीर्थंकर के जैसा ही कहना चाहियें. क्यों कि इन दोनों में प्रायः करके समान शोलता है । अभिलाप की प्रायः समानता है ऐसा जो कहा गया है वह भद्रकृत तीर्थंकर के वर्णन में कलादिक के उपदेश के अभिलाप के अभाव से कहा गया है ऐसा जानना चाहिये. यहां कुलकर के विषयमें जो वाचनाभेद है उसे सूत्रकार "अपने पति " इस सूत्र द्वारा प्रकट करते हैं इसमें उन्होंने यह समझाया है कि कितनेक आचार्य ऐसा पाठ भेद कहते हैं - (र्त से णं समाए पढमेतिभाए इमे पण्णरसकुलगरा समुपजिस्संति तं जहा सुमई जाव उसमे सेसं तंचेव) उत्सर्पिणो सम्बन्धी सुषमदुष्षमा के प्रथम विभाग में ये १५ कुलकर उत्पन्न होंगे जैसे सुमति यावत् ऋषभ अर्थात् प्रथम सुमति कुलकर और अन्तिम ऋषभ कुलकर बाकी के जो १३ मध्यके ओर कुलकर हैं उनका नाम पूर्व में प्रकट हो करदिया गया है तथा इन १५ कुलकरों में से ५-५ कुलकरों द्वारा जो जो दण्डनींती चालू की जाती है ले. करमस्वामीवज' ने अभिप्राय ऋषलस्वामी संबंधी अलिसाय छे, तो એ અભિલાષને બાદ કરીને ભદ્રકૃતનામક તીથંકરના અભિલાપ કહેવે. આ કથનનું તાત્પય આ પ્રમાણે છે કે ઉત્સવિંશીના ૨૪મા તીર્થંકરના અભિલાષ પ્રાપ્ત કરીને અવસર્પિણીમાં ઉત્પન્ન થયેલ પ્રથમ તી કરના જેવા જ અભિલાપ કહેવા જોઇએ. કારણ કે એ બન્નેમાં ઘણું કરીને સમાનશીલતા છે, અભિલાપની પ્રાયઃ સમાનતા છે આમ જે કહેવામાં આવેલ છે, તે ભદ્રકૃત તીર્થંકરના વર્ણનમાં કલાર્દિકના ઉપદેશના અભિલાપના અભાવથી કહેવામાં આવેલ છે. એવુ' સમજવુ જાઇએ. અહીં કુલકરના સંધમાં જે વાચના लेह छे, तेने सूत्र " अण्णे पढति" से सूत्र वडे प्रस्ट रे छे. ते आम सभलव्यु छे टाउ मायाय वा पाडलेहने। उस्लेज हरे हे - (तीसे णं समाए पढमेतिभाए इमे पण्णरस कुलगरा समुजिस्सति तं ब्रहा सुमई जाव उसमे सेसं तं चेब) उत्सर्पिणी समधी सुषभदुष्षभाना પ્રથમત્રિભામાં એ ૧૫ કુલકર ઉત્પન્ન થશે. જેમ કે સુમતિચાવત્ ઋષભ સ્વામી એટલે કે પ્રથમ સુમતિ કુલકર અને અ`તિમ ઋષભસ્વામી કુલકર શેષ જે ૧૩ મધ્યના ખીજા કુલકરા છે, Page #522 -------------------------------------------------------------------------- ________________ no. 1464AAAAAna. जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पञ्चदशसंख्यकाः कुलकरा वर्णनीयाः। एतेषु चश्चदशसु कुलकरेषु सर्वप्रथमः सुमतिः सर्वा न्तिमश्च ऋषभः, मध्यस्थिताश्च त्रयोदश कुलकराः पूर्वोक्तनामान एव । तथा पञ्चभिः कुलकरैर्या या दण्डनीतयः प्रवर्त्यन्ते तास्ता अपि पूर्वोक्ता एवावसेया इति । अतः परो यो विशेषस्तमाह'दंडणीईओ' इत्यादि । (दंडणीईओ पडिलोमाओ णेयवाओ) दण्डनीतयः प्रतिलोमा नेतव्याः-अवसर्पिणी सम्बन्धिसुषमदुष्षमायामेकैक कुलकरपञ्चककृता या या दण्डमीतयः प्रोक्ताः, तत्प्रतिकूला दण्डनीतयोऽत्र वक्तव्या इति । अयं भावः अवसर्पिण्या: सुषमदुष्षमायां प्रथमकुलकरपञ्चकसमयेऽपराधस्याल्पत्वेन हाकारो दण्डम् । द्वितीयकुलकरपञ्चकसमये तु जघन्यमध्यमरूपापराधद्वयस्य सद्भावात् माकार-हाकार-रूपं दण्डद्वयम् । तृतीयकुलकरपञ्चकसमये तुत्कृष्टमध्यमजघन्यरूपापराधत्रयसद्भावात् जघन्येऽ पराधे हाकारो दण्डं, मध्यमे माकारो दण्डम्, उत्कृष्टे तु धिक्कारो दण्ड मिति । उत्सर्पिण्यां सुषमदुष्षमायाः प्रथमे त्रिभागे प्रथमकुलकरपञ्चकसमये स्वपराधस्य जघन्यमध्यमोस्कृष्टतया जघन्य अपराधे हाकारो मध्यमे माकारः उत्कृष्टे तु धिक्कारः। द्वितीयकुलकर वह भी पूर्व में प्रकट कर दी गइ है परन्तु इन दण्ड नीतियोमें जो उत्सर्पिणी काल के इस आरे के प्रयोग में भिन्नता है वह इस प्रकार से है -(दण्डणोईओ पडिलोमाओ) अवसर्पिणी के सुषम दुष्पमा में प्रथम कुलकर पञ्चम के समय में अपराध को अल्पता होने से हाकार दण्डणोति प्रयुक्त हुई हैं। द्वितीय कुलकर पञ्चक के समयमें जघन्य और मध्यम अपराधो के सद्भाव से हाकार और माकार ये दो दण्ड नीतियां प्रयुक्त हुई है तथा तृतीय कुलकर पञ्चक के समय जघन्य, मध्यम और धिक्कार ये तीनों ही दण्डनीतियां प्रयुक्त हुई हैं ऐसा पहिले प्रकट किया जा चुका हैं - परन्तु उत्सर्पिणो के इस सुपमदुष्षमा नाम के आरे में प्रथम विभाग में प्रथम कुलकर पञ्चक के समय में तीनों प्रकारके अपराधों के सद्भाव से जघन्य अपराध में हाकार, मध्यम अप राध में माकार ओर उत्कृष्ट अपराध में धिक्कार इन तीनों दण्डनीतियों से, द्वितीय कुल कर पंचक તેમના નામ પહેલાં પ્રકટ કરવામાં આવેલ છે. તથા એ ૧૫ કુલકરોમાંથી ૫, ૫ કુલકર વડે જે-જે દંડનીતિ ચાલુ કરવામાં આવે છે, તે પણ પહેલાં પ્રકટ કરવામાં આવી છે. પણ એ દંડનીતિઓમાંથી જે ઉત્સર્પિણી કાલના એ આરાના પ્રયાગમાં ભિન્નતા છે. તે આ प्रमाणे छ-(दण्डणोईओ पडिलोमाओ) असायीन। सुषम दुषमामा प्रथम ga४२ ५'यકના સમયમાં અપરાધની અપતા હોવાથી હાકાર દંડનીતિ પ્રયુકત થયેલી છે. દ્વિતીય કુલકર પંચકના સમયમાં જઘન્ય અને મધ્યમ અપરાધેના સદભાવથી હાકાર અને સાકાર એ બે દંડનીતિઓ પ્રયુક્ત થઈ છે. તથા તૃતીય કુલકર પંચકના જઘન્ય. મધ્યમ અને ઉત્કૃષ્ટ અપરાધાના સદભાવથી હાકાર, માકાર અને ધિકકાર એ ત્રણે દંડનીતિઓ પ્રયુક્ત થયેલી છે. આ પ્રમાણે પહેલાં પ્રકટ કરવામાં અાવેલ છે. પશુ ઉત્સર્પિણીના એ સુષમદુષમાં નામક આરામાં પ્રથમત્રિ ભાગમાં પ્રથમ કુલકર પંચકના સમયમાં ત્રણ પ્રકારના અપરાધના સદૂભાવથી જઘન્ય અપરાધમાં હાકાર. મધ્યમ અપરાધમાં સાકાર અને ઉત્કૃષ્ટ સમયમાં ધિક્કાર એ ત્રણ દંતનીતિઓથી, દ્વિતીય કુલકર પંચકના સમયમાં જઘન્ય અને મધ્યમ Page #523 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि वक्षस्कारः सू०६० सुषमदुष्षमासमाकालनिरूपणम् ५०९ पञ्चकसमयऽपराधस्य जघन्यमध्यमत्वेन जघन्येऽपरावे हाकारो मध्यमे च माकारः । तृतीयकुलकरपञ्चकसमये त्वपराधस्य जघन्यत्वेन हाकारमात्र दण्ड मिति । 'दंडणीईओ' इत्यस्योपलक्षणत्वेन शरीरप्रमाणायुष्क प्रमाणादिकं चापि यथासंभवं प्रातिलोम्येन विज्ञेयमिति । 'अण्णे पढ़ति' इत्यादि रूपस्य वाचनान्तरीयपाठस्यायमभिप्राय:- राजधर्मस्य कालप्रभावेण अनारके क्रमशो ब्यवच्छेदात् जनानां च भद्रप्रकृतिकत्वेनाल्पापराधकारित्वाद्, राज्ञां चाऽप्यनुग्रदण्डत्वादपराधदण्डयोरबारकेऽल्पता भविष्यति । ततोऽरिष्टनामचक्रवर्तिकुलोत्पन्नाः पञ्चदश कुलकरा भविष्यन्ति, तदितरे च राजानस्तद्व्यवस्थापितमर्यादारक्षका भविष्यन्ति । ततः कालक्रमेण सर्वेऽप्यहमिन्द्रत्वं प्रतिपन्ना भविष्यन्ति । अत्र य ऋषभनामा सर्वान्तिमः कुलकरः स ऋषभाभिवतीर्थ करादन्योऽबसेयः । तत्र काले च तत्स्थानीयोऽन्तिमस्तीर्थकरो भद्रकन्नामा भविष्यति । अयं च प्रस्तुतारके एकोननवके समय में जघन्य ही अपराध के सद्भाव से हाकार और माकार दण्डनोतियों से एवं तृतीय कुलकर पञ्चक के समय में केवल जधन्य हो अपराध के रह जाने के कारण एक हाकार हो दण्ड नीति से काम लिया जाता है (दण्डणीईओ) यह पद उपलझण रूप है इस कारण शरीर प्रमाण, आयुष्क प्रमाण, आदि की भी यथासंभव प्रति लोमता है यह बात प्रकट को गइ जाननो चाहिये (अण्णे पढंति) इत्यादि रूप वाचनान्तरीय पाठ का यह अभिप्राय है-राजधर्म का कालप्रभाव से इस आरक में क्रमशः व्यवच्छेद हो जावेगा क्योंकि मनुष्य धीरे-धीरे भद्र प्रकृतिवाले हो जायेंगे इससे उनमें अल्पापराधकारिता आती जावेगी राजाजन भी तीन दण्ड देने वाले नहीं होंगे इसलिये अपराध और दण्ड की अल्पता हो जावेगी अरिष्ट नामक चक्रवर्ती के कुल में उत्पन्न हुए १५ कुलकर होंगे इनसे भिन्न जो राजाजन होंगे वे उन कुलकरों को व्यवस्थापित मर्यादा केरक्षक होंगे धीरे-धारे जैसा जैसा काल व्यतीत होता जावेगा वैसे सब मनुष्य अहमिन्द्रत्व को प्राप्त होते जावेंगे इसमें सर्वान्तिम ऋषभ नाम का कुल कर होगा -इम काल में अन्तिम तीर्थकर भद्रकृत नाम का होगा अवसर्पिणो काल के इस रे में जैसे चौवीस तीर्थ करों मे से અપરાધના સદૂભાવથી હાકાર અને માકાર દંડનીતિઓથી તેમજ તૃતીય કુલકર પંચકના સમયમાં કેવલ જઘન્ય અપરાધ જ શેષ રહેવાથી એક હાકાર દંડનીતિથી કામ ચલાવવામાં भाव छ. (दण्डणीईओ) से ५६ 64क्षय ३५ छ. मेथी शरीर प्रमाणु, मायु, प्रमा, कोश्नी पर यथा संभव प्रतिभता छ. यात ४८४२वाभा मावताछ. (अण्णे पढति) ઈત્યાદિ રૂપ, વાચનાન્તરીય પાઠનો એ અભિપ્રાય છે–રાજધર્મનો કાલ પ્રભાવથી એ આરકમાં ક્રમશઃ વ્યવચ્છેદ થઈ જશે કેમકે માણસ ધીમે-ધીમે ભદ્ર પ્રકૃતિવાળા થઈ જશે એથી તેમનામાં અલ્પાપરાધ કારિતા આવતી જશે. રાજાઓ પણ તીવ્ર દંડ આપનારા નહિ થશે. એથી અપરાધ અને દંડની અ૯પતા થઈ જશે, અરિષ્ટ નામક ચક્રવતિના કુળમાં ઉત્પન થયેલા ૧૫ કુલકરે થશે. એમનાથી ભિન્ન જે રાજાએ થશે, તેઓ તે કુલકરેની વ્યવસ્થાપિત મર્યાદાના રક્ષક થશે. ધીમે-ધીમે જેમ-જેમ કાળ વ્યતીત થતો જશે તેમ-તેમ સર્વ મનુ અહમિત્વને પ્રાપ્ત કરતા જશે, એમાં સર્વાન્તિમ ઋષભ નામક કુલકર થશે, એ કાળમાં Page #524 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५१० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र त्या पक्षरतिक्रान्ते समुत्पत्स्यते इत्यगमेऽभिहितम् । अवसर्पिणीकाले यः प्रथमस्तीर्थकर. स्तत्स्थाने उत्सर्पिण्यां चतुर्विशतितमस्तीर्थङ्करो भवतीति बोध्यम् । इह ये पञ्चदश कुल. कराः प्रोक्ताः, तत्र अन्यान्यागमे अन्यमन्य नामोपलभ्यते, तथाहि स्थानाङ्गस्य सप्तमे स्थानके सप्त कुलकराः प्रोक्ताः, तत्र सुमतिनाम नोक्तं, दशमे तु दश कुलकराः मोक्ताः, परन्तु तत्र 'सुंमति' इति नाम प्रोक्तं, 'मुंमति' इति आषशैल्या प्रसाध्य तच्छाया 'सुंमति' इति कथंचिद् भविष्यति, तथापि तन्नाम तत्र षष्ठकुलकरस्थाने पठितं, न तु प्रथमतीर्थ, करस्थाने । अत्रैव प्रथमे त्रिभागे किं किं वस्तु व्युच्छेदं प्राप्स्यतीति जिज्ञासायामाह 'तीसे णं समाए पढमे तिभागे रायधम्मे जाव धम्मचरणे य वोच्छिजिस्सइ' इति । तस्यां खलु प्रथम तीर्थकर आदिनाथ हुए कहे गये है वैसे ही चौबीस तीर्थकर यहां पर भी होंगे पर यहां इनकी उत्पत्ति पहिला चौवोसमां तीर्थकर होगा फिर तेबोसमा तीर्थकर होगा इस रूप से होगी इस तरह ऋषभनाथ भगवन् का स्थानीय अन्तिम चौवोसमां तीर्थकर जो होगा उसकानाम भद्रकृत होगा यह इस काल में ८९ पक्ष प्रमाण जब यह काल व्यतीत हो जावेगा तब होगा ऐसा आगम में कहा गया है अवप्तर्षिणी काल में जो प्रथम तीर्थकर है उसके स्थान में उत्सर्पिणी काल में २४ वां तीर्थकर होता है यहां जो १५ कुलकर कहे गये हैं उनके भिन्न २ दूसरे आगमों में नाम पाये जाते हैं । जैसे-स्थानाङ्ग के सप्तम स्थानक में सात कुलकर कहे हुए हैंसो उनमे सुपति कुलकर ऐसा नाम नहीं है दशवें स्थानक में १० कुलकर कहे हुए है सो वहां सुमति ऐसा नाम कहा गया हैं यदि आर्षशैली से ऐसा कहा गया है हम इस बात को मान कर सुमति के स्थान में सुमति ऐसाहो जायगा यह मान लें तब भी यह नाम वहां छठे कुलकर के स्थान में पठित हुआ है प्रथम तीर्थ कर के स्थान में नहीं । (तोसेणं समाए पढमे तिभाए रायधम्मे जाव धम्मचरणे अवोच्छिजिंस्सइ) उत्सर्पिणी के इस चतुर्थ आरक में प्रथम અંતિમ તીર્થકર ભદ્રકૃત નામે થશે. અવસર્પિણી કાળના એ આરામાં જેમ ૨૪ તીર્થકરોમાંથી પ્રથમ તીર્થંકર આદિનાથ થયા છે, આમ કહેવામાં આવ્યું છે, તેમજ ૨૪ તીર્થકરો અહીં પણ થશે. પરંતુ અહીં એમની ઉત્પત્તિ પહેલાં ૨૪ મા તીર્થંકર થશે, ત્યારબાદ ૨૩ માં તીર્થકર થશે આ ક્રમથી તીર્થંકર થશે. આ પ્રમાણે ઇષભનાથ ભગવાનને સ્થાનીય અંતિમ ૨૪ મે તીર્થંકર જે થશે તેનું નામ ભદ્રકૃત થશે, એ આ કાળમાં ૮૯ પક્ષ પ્રમાણ જ્યારે આ કાળ વ્યતીત થઈ જશે. ત્યારે થશે. આમ આગમનું વચન છે. અવસર્પિણી કાળમાં જે પ્રથમ તીર્થકર છે, તેના સ્થાને ઉત્સર્પિણ કાળમાં ૨૪ તીર્થકર હોય છે. અહી જે ૧૫ કુલકર કહેવામાં આવેલ છે, તેમના ભિન્ન-ભિન્ન બીજા આગમોમાં નામે જોવા મળે છે. જેમ કે “સ્થાનાના સપ્તમ સ્થાનકમાં સાત કુલકર થયા છે એવું કહેવામાં આવ્યું છે. તો તેઓમાં સુમતિ કુલકર એવું નામ નથી. ૧૦માં સ્થાનકમાં ૧૦ કુલકરો કહેવામાં આવ્યા છે. ત્યાં સંમતિ એવું નામ કહેવામાં આવ્યું છે જે આર્ષ શૈલીથી એવું કહેવામાં આવ્યું છે એમ અમે આ વાત માનીએ તો સુમતિના સ્થાને સુમતિ એવું થઈ જશે. એવું માની લઈએ તે પણ એ નામ Page #525 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका द्वि० वक्षस्कारः सू० ६० सुषमदुष्षमासमाकालनिरूपणम् ५११ समायाम् प्रथमे त्रिभागे राजधर्मोयावद् धर्मचरणं च व्युच्छेत्स्यति विनाशं प्राप्स्यति, अत्र यावत्करणात् गणधर्मः पाखण्डधर्मश्च ग्राह्यः, अथ शेष विमागद्वयवक्तव्यतां प्रतिपादयितुमाह तीसेण समाए मज्झिम पच्छिमेसु तिभागेसु जाव पढममज्झिमेसु वत्तव्वया ओसप्पि. णीए सा भाणियया' इति. तम्यां खलु समायां मध्यम पश्चिमयोस्त्रिभागयोः यावत् प्रथ ममध्यमयोः - अर्थयोजनेन औचित्यात् मध्यम प्रथमयोरित्यासेयम्, अन्यथा शुद्धप्रातिलोम्यासमवेन अर्थानुपपत्तिरापद्यत । या वक्तव्यता अवसर्पिण्यामुक्ता सा भणितव्या,इत्येवं रीत्या चतुर्थारकः सम्पन्न:, अथ पञ्चमषष्ठौ आरको अतिदिशन्नाह -' सुसमा तहेव सुसमासुसमाबि तहेव जाव छव्विहा मणुस्सा अणुसज्जिस्संति जाव सण्णिचारी' इति, सुषमा-पञ्चमसमास्वरूपः कालः, तथैव अवसर्पिणी द्वितीयारकवद् बोध्या, सुषमसुषमा षष्ठसमालक्षणः कालः षष्ठारक इत्यर्थः साऽपि तथैव- अवसर्पिणी प्रथमारकवद् बोध्या, कियत्पर्यन्तमत्र विज्ञातव्यमिति जिज्ञासायामाह-यावत् षविधाः मनुष्याः अनुसंक्ष्यन्ति संततिधारया अनुवर्तिष्यन्ति यावत् शनैश्चारिणः, संज्ञिचारिण इति भावः । अत्र यावत्पदान पूर्वो काः पद्मगन्धादय एव ग्रहोतव्याः ॥पू. ६०॥ इतिश्री वश्वविख्यात-जगद्वल्लभ-प्रसिद्धवाचकपञ्चदेशभाषाकलित-ललितकलापालपकप्रविशुद्धगद्यपद्यानैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्री-शाहू छत्रपतिकोल्हापुररायप्रदत्त-जैनशास्त्राचार्य,-पदभूषित-कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारी जैनाचार्य जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्री-घासीलाल-प्रतिविरचितायां श्रीजम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रस्य प्रकाशिकाख्यायां व्याख्यायां ॥ द्वितीयवक्षस्कारः समाप्तः॥ त्रिभाग में राअधर्म यावत् गणधर्म, पाखण्ड धर्म नष्ट हो जायेंगे (तोसे गं समाए मज्झिमच्छिमेसु तिमाएसु जाब पढममज्झिमेसु वत्तव्वया ऑसप्पिणीए सा भाणियव्वा) इस आरक के मध्यम और पश्चिम विभाग की वक्तव्यता अवसर्पिणी के चतुर्थ आरक के प्रथम और मध्यम के विभाग जैसो है। सुसमा तहेव ( सुसमसुसमा वि त व जाव छव्विहा मणुस्सा अणुलजिस्संति जाव सण्णि चारी) सुषमा और सुषमा सुषमा काल को वकव्यता जैसी अवसर्पिणी काल की प्ररूपणा करते समय कही गई हैं वैसी ही है । ॥६॥ द्वितीयवक्षस्कार का वर्णन समाप्त । त्या ७३४१४२न। स्थानमा पठित थये छे. प्रथम तीर्थ ४२नस्थानमा नहि. (तीसे णं समाए पढमें तिभाए रामधम्मे जाव धम्मचरणेअ वोच्छिजिस्लइ) सत्सपिशीना से तथा मा२४भां प्रथम विभाग २१५ यावत धर्म, पायम नाश पामशे. (तीसे णं समाए मम्झिमपच्छिमेसु तिभा पसु जाव पढममज्झिमेंसु वत्तव्वया ओसप्पिणीए सा भाणिદર) એ આરકમના મધ્યમ અને પશ્ચિમ ભાગની વક્તવ્યતા અવસર્પિણીના ચતુર્થ આરકના प्रथम मन मध्यम विभाग की छे. (सुसमा तहेव सुसमकलमा विसुतहेव जाव छविहा मणुस्सा अणुलज्ज़िस्संति जाब सण्णिवारो) सुषमा भने सुषमा सुषमा नी तयता જે પ્રમાણે અવસર્પિણી કાળની પ્રરૂપણ કરતાં કહેવામાં આવી છે, તેવી જ છે. તે ૬૦ છે બીજા વક્ષસ્કારનું ગુજરાતી ભાષાંતર સમાપ્ત Page #526 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५१२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तृतीय वक्षस्कारः प्ररम्भयते अथ वर्ण्यमानस्यैतद्वर्षस्य नाम्नः प्रवृत्ति निमित्तं प्रष्टुकामः गौतमः प्रह- "सेकेणढणं" इत्यादि । मलम्-से केणढणं भंते ! एवं वुच्चइ भरहेवासे २ ? गोयमा ! भरहे णं वासे वेअद्धस्स पब्बयस्स दाहिणेणं चोदसुत्तरं जोअणसयं एक्कारस य एगूणवोसइभाए जोअणस्स अबाहाए लवणसमुदस्स उत्तरेणं चोद्दसुत्तरं जोअणसयं एक्कारस य एगूणवीसइभाए जोअणस्स अबाहाए गंगाए महाणईए पच्चत्थिमेणं सिंधूए महाणइए पुरथिमेणं दाहिणद्ध भरहमज्झिल्लतिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थणं वीणी याणामं रायहाणी पण्णत्ता, पाइणपडीणाययों उदीणदाहिणविच्छिन्ना दुवालस जोयणायामा नवजोअण विच्छिण्णाधणवइमति णिम्माया चामीयरपागाराणाणा मणि पंचवण्णकविसीसग परिमंडिआभिरामा अलकापुरी संकासा पमुइय पक्कीलिया पच्चक्खं देवलोगभूआ रिद्धिस्थिमिअ समिद्धा पमुइयजणजाणवया जाव पडिरूवा ।। सू० १॥ छाया-तत् केनार्थेन भदन्त ! एव मुच्यते भरतवर्षम् २१ गौतम! भरते खलु वर्षे बैताढयस्य पर्वतस्य दक्षिणेन चतुर्दशोत्तरं योजनशतम् एकादशचैकोन विशति भागान् योजनस्याबाधया लवणसमुद्रस्योत्तरेण चतुर्दशोत्तरं योजनशतम् एकादशचैकोनविंशतिभागान् योजनस्था बाघया गङ्गाया महानाद्याः पश्चिमेन सिन्ध्वाः महानाद्याः पौरस्त्येन दक्षिणार्द्धभरतमध्यम तृतीयभागस्य बहुमध्यदेशभागे, अत्र स्खलु विनीता नाम राजधानी प्रक्षप्ता पूर्वापरयी दिशोरायता उत्तरदक्षिणयो विस्तीर्णा द्वादश योजनायामा, नवयोजन विस्तीर्णा धनपतिमत्या निमिता चामीकरप्राकाराः, नानामणि पञ्चवर्णकपिशीर्षपरिमण्डिताऽभिरामा अलकापुरी संकाशा, प्रमुदितप्रक्रीडीता, प्रत्यक्ष देवलोकभूता, ऋद्धस्तिमित समृद्धा' प्रमुदितजनजानपदा यावत् प्रतिरूपा ॥ सू० १ ॥ टीका “सेकेणटेणं" इत्यादि । (से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ भरहे वासेर अथ सम्पूर्णभरतक्षेत्रस्वरूपश्रवणानन्तरं गौतमः पृच्छति तत्केनार्थेन खलु भदन्त ! एवमु * तृतीय वक्षस्कार का वर्णन प्रारम्भ * से केणटेणं भंते एवंवुच्चइ भरहेवासे २-इत्यादि सूत्र તૃતીય વક્ષસકારનું વર્ણન પ્રારંભ से केणहे णं भंते ! एवं बुच्चइ भरहेवासे-इत्यादि सूत्र-१ Page #527 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० १ भरतवर्ष नामकारणनिरूपणम् च्यते भरतवर्ष २ ? इति अस्मिन् क्षेत्रे भरतचक्रवती आसीद् अतएवास्य भरतं वर्षमिति नाम जातम् इति भगवान् प्रदर्शति-'गोयमा' इत्यादि- 'गोयमा ! भरहे णं वासे वेयड्ढस्स पव्ययस्स दाहिणेणं' भगवानाह-हे गौतम ! भरते खलु बर्षे वैताव्यस्य पर्वतस्य दक्षिणे दक्षिदिग्पति भागे इत्यर्थः 'चोदसुत्तरं जोयणसयं एकारस एगूणवीसइभाए जोयणस्स अबाहाए' चतुर्दशोत्तरं योजनशतम् एकादशचैकोनविंशतिभागान् योजनस्य अबाधया अन्तरं कृत्वा 'लवणसमुदस्स उत्तरेणं चोइसुत्तरं जोयणसयं एक्कारसय एगूणवीसइभाए जोयणस्स अबाहाए तथा लवणसमुद्रस्योत्तरे-दक्षिणलवणसमुद्रस्य उत्तरेभागे, चतुर्दशोत्तरं योजनशतम् एकादश चैकोनविंशतिभागान् योजनस्य अबाधया-अन्तरं कृत्वा, पूर्वापरसमुद्रयो गङ्गा सिन्धुभ्यां व्यवहितत्वान्न तद्विवक्षा कृता 'गंगाए महाणईए पच्चत्थिमेणं' गङ्गाया महानद्या पश्चात्ये पश्चिमायाम् ‘सिंधूए महाणईए पुरथिमेणं' सिन्ध्वा महानद्याः पूर्वस्यां दिशि'दाहिणद्धभरहमज्झिल्लतिभागस्स बहुमझदेसभाए'दक्षिणार्द्धभरतस्य मध्यमत. टीकार्थ-- १ इस सूत्र द्वारा श्री गौतम स्वामीने प्रभु से इस प्रकार पूछा है-कि (से केणद्वेणं भंते ! एवं वुच्चइ भरहे वासे २) हे भदन्त ! इस भरत क्षेत्र का नाम भरत क्षेत्र ऐसा किस कारण से रखा गया है ? इसके उत्तर में प्रभु श्री कहते हैं ( गोयमा ! भरहे णं वासेवेअद्धस्स पव्वयस्स दाहिणेणं चोद्दसुत्तरं जोयणसयं एक्कारसय एगूणविसइभाए जोय णस्स अनहाए लवणसमुदस्स उत्तरेणं) हे गौतम ! भरत क्षेत्र के वैताढ्य पर्वत के दक्षिण भाग में-११४११योजन के अन्तराल से तथा दक्षिण लवण समुद्र के उत्तर भाग में-११४ १९ ..योजन के अन्तराल से ( गंगाए महाणइए पचत्थिमेणं ) गंगा नदी की पश्चिम दिशामें (सिंधए महाणईए पुरथिमेणं ) सिन्धुनदीकी पूर्वदिशामें (दाहिणद्धभरहमज्झिल्लतिभागस्स टी -20 सूत्र 43 गीतमस्वामी प्रभुने माप्रमाणे प्रश्न ४य छ । (से केणटेणं भंते एवं बुच्चइ भरहेवासे २) डन्त ! म भरतक्षेत्र नाम भरतक्षेत्र मेशन शा २५था प्रसिद्ध थयछ १ अनावमा प्रभु ४३ छ (गोयमा! भरहेणं वासे वेअद्धस्स दाहिणेणं चोद्दसुत्तर जोयणसयं एक कारसय एगूणवीसइभाए जोयणस्स अवाहाए लवणसमुहस्स उत्तरेण) હિ ગૌતમ ! ભરતક્ષેત્રના વૈતાઢ્ય પર્વતના દક્ષિણભાગથી ૧૧૪૧ યોજના અંતરાલથી તેમજ इक्षिय १५ समुद्रना उत्तरभागमा ११४-११११८ यानन मतलथी (गंगाए महाणईए पञ्चथिमेणं) मा महानहानी पश्चिम दिशाम (सिंधूए महाणईए पुरस्थिमेण सिधु नहीनी पूर्ण हिशामा (दाहिणभरहमज्झिल्लतिभागस्स बहुमज्झदेसभाए) मने क्षिा मरतना भयतताय भागना पर मध्यप्रदेश सभा (पत्थ णे बिणीआ णाम रायहाणी पण्णत्ता) વિનીતા નામક એક રાજધાની કહેવામાં આવેલ છે. ૧૧૪ જનની ઉત્પત્તિ–ને પ્રકાર આ પ્રમાણે છે. ભરતક્ષેત્રને વિસ્તાર ૫૨૬૬૧૯ ચીજન જેટલે છે, વૈતાદ્યપર્વતનો વ્યાસ ૫૦ જન જેટલું છે. તો આને ભરતક્ષેત્રના વિસ્તારમાંથી બાદ કરીએ તો ૪૭૬ ૪૧૯ એજન શેષ ६५ Page #528 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५१४ जम्बूद्वोपप्रज्ञप्तिसूत्रे तीयभागस्य बहुमध्यदेशभागे, 'एत्थणं विणीआ णामं रायहाणी पण्णत्ता' अत्र खलु एतादृशे किल क्षेत्रे विनीता अयोध्या नाम्नी राजधानी प्रज्ञप्ता । साधिक चतुर्दशाधिक योजनशताङ्कोत्पत्ति प्रकारः प्रदर्श्यते-तथाहि भरतक्षेत्रम् षड्विंशत्यधिकपश्वशतानि ५२६ योजनानि षट् ६ कला योजनैकोनविंशतिभागरूपा विस्तृतम्, अस्मात् पञ्चाशत् ५० योजनानि वैताब्यगिरिव्यासरूपाणि शोध्यन्ते, जातम् ४७६.६ कलाः,दक्षिणोत्तरभरतार्द्धयो विभजनया एतस्याः २३८३. कलाः, इयतो दक्षिणार्द्धभरतव्यासाद् 'उदीणदाहिणविस्थिन्ना' इत्यादि वक्ष्यमाणवचनात् विनी ताया विस्ताररूपाणि नव योजनानि शोध्यन्ते, जातम् २२९ ३ कलाः, अस्य बहुमज्झदेसभाए ) और दक्षिणार्ध भरत के मध्यम-तृतीय भागके बहुमध्य देशभाग में ( एत्थ ण विणीआ णाम-रायहाणी पण्णत्ता ) विनीता नाम की एक बहुत प्रसिद्ध राजधानी कही गई है । ११४ योजन को उत्पत्ति का प्रकार ऐसा है-भरत क्षेत्र का विस्तार ५२६६ योजन का है वैताढ्य पर्वतका व्यास चोडाइ ५० योजन का है सो इसे भरत क्षेत्र के बि स्तार में से घटादेनेपर४७६६, योजन रह जाते हैं. दक्षिणार्ध भरत और उतरार्ध भरत में इन्हें विभक्त करने पर२३८. -योजन आते हैं । अव दक्षिणार्ध भरत व्यास में से विनीता के विस्ताररू प नौ योजन घटाने पर२२९२ आते हैं । इसके मध्य भाग में नगरी हे सो इस प्रमाण को आ धा करने पर ११४ योजन प्रमाण आजाता है बचे हुए एवं योजन के १९ -भाग करने पर और उनमें ३ कलाओं को मिलाने पर हुए-२२ को आधा करने पर ११ कला आजाती है यह विनीता नामकी नगरी (पाईण पडोणायया ) पूर्व से पश्चिम तक लम्बी है ( उदीणदाहिणवित्थिन्ना) રહે છે. દક્ષિણ ભારત અને ઉત્તરાર્ધ ભારતમાં એમને વિભક્ત કરીએ તો ૨૩૮-૩૧૯ એજન થાય છે. હવે દક્ષિણાઈ ભરતભાસમાંથી વિનીતાના વિસ્તાર રૂપ નવ યજન બાદ કરીએ તે ૨૨૯-૩૧૧ આવે છે. એના મધ્યભાગમાં નગરી છે. તે આ પ્રમાણને અર્ધ" કરીએ તો ૧૧૪ યે જન પ્રમાણુ આવી જાય છે. શોષ તેમજ જનાના ૧૯ ભાગ કરવાથી અને તેમાં ૩ કલાઓ ઉમેરવાથી ૨૨ થયા અને હવે રર ના બે ભાગ કરીએ તે તેના અધી ૧૧ કલાઓ मालय छे. मे विनीत नमे नगरी (पाईण पड़ीणायया) पूर्वथा पश्चिम सुधी aisी Page #529 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० १ भरतवर्षनामकारणनिरूपणम् च मध्यभागे नगरीत्यर्द्ध करणे ११४ चतुर्द्दशोत्तरयोजनशतम् जातम् अवशिष्टस्यैकस्य योजनस्य एकोनविंशतिभागेषु कलात्रयक्षेत्रे सति जाताः २२ तदर्द्धम् ११ एकादश कला इति, तामेव विशेषणै विशिनष्टि- 'पाईण पडीणायया' इत्यादि । 'पाईण पडीणायया' पूर्वापरयो दिशोरायता 'उदीणदाहिणवित्थिन्ना' उत्तरदा क्षिणयो विस्तीर्णा 'दुवालस जोयणायामा' द्वादशयोजनायामा 'णवजोयण वित्थि ण्णा' नत्र योजनविस्तीर्णा 'धणवइमतितिणिम्माया' धनपतिमत्या उत्तरदिक् पालबुद्धया निमिता, निपुण शिल्पिविरचितम्या तिसुन्दरत्वात् 'चामीयरपागारा' चामीकरप्राकारा स्वर्ण नयप्राकारयुक्का 'णाणामणिपंचबण्णा कविसीसगपरिमंडियाभिरामा नानामणिपञ्चवर्णकपिशीर्षकपरिमण्डिता अतएवाभिरामा मनोहरा 'अलकापुरी संकासा' अलकापुरी संकाशा - धनदपुरीसन्निभा 'पमुहयपक्कीलिया' प्रमुदितप्रकीडिता, प्रमुदितजनयोगात् नगयपि 'तात्स्य्यात् तद्वयपदेश' इति न्यायात् प्रमुदिता तथा प्रक्रीडिता और उत्तर से दक्षिण तक चौड़ी है. (दुवालसजोयणायामा) इस तरह इसकी लम्बाई १२-योजन की है (णवजोयण विस्थिणा ) और नौ योजन की इसकी चौड़ाई है । ( घगवइमति णिम्मया ) कुवेर ने उत्तर दिशा के अधिपति ने इसे रचा है ( चामीयर पागारा) स्वर्णमय - प्राकार से यह युक है. ( णाणामणि पंचवण्ण कविसोसगपरिमडियाभिरामा ) पांचवर्णवाले अनेक मणियों से इसके गुरे बने हुए हैं उनसे यह परिमंडित हैं अतः देखने में यह बड़ी सुन्दर लगती है. (अलका पुरी संकासा ) इसलिये यह ऐसी प्रतीत होती है कि मानों यह धनद - कुवेर - को ही नगरी है. ( मुइय पक्कीलिया ) यहां पर रहने वाले सदा प्रसन्नचित रहते हैं और अनेक प्रकार की क्रीडाओं के रसमें सराबोर -रहते हैं - इस कारण यह नगरो भी उनके सम्बन्ध से प्रमुदित और प्रक्रीडित बनी रहती है. ( पच्चक्खं देवलोगभूया ) देखने वालों के लिये यह नगरी साक्षात् देवलोक के समान लगती है. (रिद्धत्थिमियसमिद्धा ) यह नगरी विभव, भवन आदि के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हुए हैं इसमें रहने वालों को स्वचक और परचक्र का बिलकूल भय नहीं रहता है तथा धन छे, (उदीण दाहिणबित्थिन्ना) भने उत्तरथी दक्षिण सुधी पडोजो छे. (दुवालसजोयणायामा) या प्रमाणे येनी साई १२ येन भेटली छे. (णबजोयणवित्थिण्णा) अने नव योजन भेटसी सेनी पडोजाई छे. (घणवइमति णिम्मया) उत्तर द्विशाना अधिपति धेरै खेनी २यना ४५। छे. (चामीयरपागारा) अभय आरथी से युक्त छे. ( णाणामणि पंचवण्ण कविसीसग परिमंडियाभिरामा) पांच वाजा भने मषिोथी सेना भंगरायो भनेसा छे. तेमनाथी थे परिमंडित छे. येथी लेवामां मे खूप सुंदर सागे छे. (अलकापुरी संकासा) मेथी थे सेवी प्रतीत थाय छे है ये से धन-डुमेर-नी नगरी छे, (पमुह पक्कोलिया) अडी रहेनारा सर्व प्रसन्नत्ति रहेछ भने भने अहारनी ક્રીડાએના રસમા મગ્ન રહે છે. એથી આ નગરી પણ તેમના સંબંધથી પ્રમુદ્રિત અને प्रीडित रहे छे, (पच्चक्खं देवलोगभूया) नेनाराम भाटे से नगरी साक्षात देवखेो नेवी लागे छे, (रिद्धस्थिमिय सनिद्धा) से नगरी विल, भवन यहि वडे समृद्धि सम्पन्न थाह ५१५ Page #530 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५१६ जम्ब्रोप्रशप्तिसूत्र क्रीडावन्तस्तादृशा ये जनास्तद्योगान्नगर्यपि प्रक्रीडिता 'पच्चक्खं देवलोगभूया प्रत्यक्ष देवलोकभूता साक्षादेवलोकसमाना, 'रिद्धिस्थिमियसमिद्धा, ऋदस्तिमित समृद्धा सुद्धा विभवभवनादिभि वृद्धिमुपगता स्तिमिता-स्वपरचक्र भयरहिता स्थिरेति यावत्, समृद्धा धनधान्यसमेधितात्प्रमुदिता जना नागरिकाः, 'पमुइय जण जाणवया, प्रमुदितजन जानपदा 'जाव पडिरूवा, यावत् प्रतिरूपा, प्रमुदितजनजानपदेति विशेषणं प्रमुदितप्रक्रीडितेति विशेषणस्य हेतुभूततया न पौनरुक्त्यमित्यलमधिकपल्लवितेन ॥सू० १॥ नन्वेवं प्रस्तुत भरतक्षेत्रस्य नाम प्रवृत्तिः कथं जाता ? इत्याह-"तत्थणं इत्यादि मूलम-तत्थ णं विणोवाए रायहोणीए भरहे णामं राया चाउरंत चक्कवट्टो समुप्पजित्था, महया हिमवंत महंतमलयमंदर जाव रज्जं पसासे माणे विहरइ । बिइओ गमो रायवण्णगस्स इमो, तत्थ असंखेज्ज कालवासं तरेण उप्पज्जए जसंसो उत्तमे अभिजाए सत्तवीरिय परक्कमगुणे पसत्थ वण्ण सरसार संघयणतनुगबुद्धिधारणमेहासंठाण सीलप्पगई पहाणगावच्छायागइए अणेगवयणप्पहाणे तेअ आउबलवीरियजुत्ते अझुसिरघणणि चिअलोह संकलणाराय वइरउसह संघयण देहधारी झस १ मिगार २ जुग ३ बद्धमोणग ४ भद्दमाणग ५ संख ६ छत्त ७ वीअणि ८ पडाग ९ चक्क १० णंगल ११ मुसल १२ रह १३ सोथिअ १४ अंकुस १५ चंदा १६ इच्चा १७ अग्गि १८ जूय १९ सागर २० इंदज्झय २१ पुहवि २२ पउम २३ कुंजर २४ सीहासण २५ दंड २६ कुम्भ २७ गिरिवर २८ तुरगवर २९ वरमउड ३० कुंडल ३१ गंदावत्त ३२ धणु ३३ कोंत ३४ सागर ३५ भवणविमाण ३६ अणेगलक्षण पसत्थ सुविभत्त चित्तकर धान्य आदि की वृद्धि के कारण यहां के समस्त नागरीक जन सदा आनन्द-आनन्द में ही डूबे रहते है । ( जाव पडिरूवा ) इस कारण यावत् यह नगरी प्रतिरूप है- अन्य नगरी इसके जैसी नहीं हैं- 'अनुपमरूपवाली है प्रमुदितजनजानपदा' यह विशेषण " प्रमुदितप्रक्रीडित"इस विशेषण का हेतु-भूत है. इस कारण यहां पुनरुति दोष नहीं आता है ।। १ ।।। છે, એમાં રહેનારાઓને સ્વચક્ર અને પર ચક્રનો ભય એકદમ લાગતું નથી, તેમજ ધનધાન્ય આદિની સમૃદ્ધિને લીધે અહીં રહેનાર સર્વ નાગરિકે સર્વદા આનંદ મગ્ન જ રહે छ, (जाव पडिरूवा) रथी यावत से नगरी प्रति ३५ छ, मी नगरी सन २॥ समृदनथी. मेमनुपम ३५वती छ, “प्रमुदितजनजानपदा" से विशेष "प्रमुदितप्रक्रीडित" એ વિરોષણ માટે હેતુભૂત છે. એથી અહીં પુનરુક્તિ દોષ નથી, એ સૂત્ર ૧ Page #531 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० वक्षस्कारः सू० २ भरतक्रवर्तिनः उत्पत्यादिनिरूपणम् ५१७ . चरणदेसभागे उद्धामुह लोमजाल सुकुमालणिद्ध मउआवत्त पसत्थलोम विरइअसिखिच्छच्छण्णविउलवच्छे देसखेत्तसुविभत्तदेहधारी तरुणरवि रस्सिबोहिअवरकमल विबुद्धगब्भवण्णे हयपोसणकोससण्णिभ पसत्थ पि द्रुत णिरुवलेवे पउमुप्पलकुंदजाइजूहियवर चंपगणागपुप्फसारंगतुल्लगंधी छत्तीसा अहिअ पसत्थ पत्थिवगुणे हे जुत्ते अब्बोच्छिण्णातपत्त पागड उभयजोणी विसुद्धणिअगकुलगयणपुण्णचंदे चंदे इव सोमयाए णयणमण णिव्वुइकरे अक्खोभे सागरोव थिमिए धणवेइव्व भोगसमुदयसव्वयाए समरे अपराइए परम विक्कमगुणे अमर वई समाण सरिसरूवे मणुअवई भरहचक्कवट्टी भरहं मुंजइ पणट्ठसत्त ॥ सू०२॥ छाया- तत्र खलु विनीतायां राजधान्यां भरतो राजा चातुरन्तचक्रवर्ती समुदपद्यत, महाहिमवन्महन्मलयमन्दरयावद्राज्य प्रशासयन् विहरति । द्वितीयो गमो राजवर्णकस्यायम् तत्र असंख्येयकाल वर्षान्तरेण उत्पद्यते वशस्वी, उत्तमः, अभिजातः सत्त्ववीर्य पराक्रमगुणः प्रशस्त सारसंहननतनुकबुद्धिधारणमेधा संस्थानशीलप्रकृतिकःप्रधानगौर. वच्छायागतिकः अनेक वचन प्रधानः, तेज आयु बलवीर्ययुक्तः अशुपिर घणनिचितलोहसूलनारीचवर्षभ संहननदेहधारी झष १ युग २ भृङ्गार ३ वर्द्धमानक ४ भद्रासन ५ शङ्ख ६ छत्र ७ व्यजन ८ पताका९ चक्र १० लङ्गूल ११ मुसल १२ रथ १३ स्वस्तिका १४ ङ्कुश १५ चन्द्रा १६दित्या १७ ग्नि १८ यूप सागरे २० न्द्रध्वज २१ पृथ्वी २२ पद्म २३ कुञ्जर २४ सिंहासन २२ २६ कूर्म २७ गिरिवर २८ तु रगवर २२ वरमुकुट ३० कुण्डल ३१ नन्द्यावत ३२ धनुः ३३ कुन्त २४ सागर ३५ भवन विमाना ३६ नेकलक्षण प्रशस्त सुविभ क्त चित्रकरचरणदेशभागः ऊर्ध्वमुखलोमजाल सुकुमाल स्निग्ध मृदुकावत प्रशस्त लो मविरचित श्रीवत्सछन्नबिपुलवक्षस्कः, देशक्षेत्र सुविभक्तदेहधारी, तरुणरविरशिम बोधितवरकमल विद्ध गर्भवर्णः, हयपोसनकोशसन्निभपृष्ठान्तनिरूपलेपः, पद्मोत्पल कुन्द जाति यूथिकवरचम्पकनाग पुष्प सारङ्गतुल्य गन्धो, षटूत्रिंशता अधिक प्रशस्त पार्थिवगुणैयुक्तः अव्यवच्छिन्नातपत्रः, प्रकटोभययोनिकः, विशुद्ध निजककुलगगन पूर्णचन्द्र इव सोमतया नयनमनसो निवृतिकर, अक्षोभः, सागर इव स्तिमितः, धनपति रिव भाग समुद सद् द्रव्यतया, समरे अपराजितः, परम विक्रमगुणः, अमरपतिसमान सहशरूपः, पनुमपतिः भहतचक्रवर्ती भरत भुङ्क्ते प्रणष्टशत्रः ॥ सूत २॥ टीका-'तत्थणं विणीयाए रायहाणीए भरहे णामं कराया तत्र खलु विनीतायाम् अयोध्यायां राजधान्यां भरतो नाम राजा,सच वासुदेवोऽपिस्यात् तथा सामन्तादिरपि स्यात् अतस्तयोावृत्त्यर्थमाह-'चाउरंतचकवट्टी' चातुरन्तचक्रवर्ती, चत्वा Page #532 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५१८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे रोऽन्ताः-पूर्वापरदक्षिणसमुद्रास्त्रयः चतुर्थों हिमवान् इत्येवं स्वरूपास्ते सन्ति वश्यतया अस्येति चातुरन्तः सचासौ चक्रवर्ती चेति चातुरन्तचक्रवर्ती 'समुप्पज्जित्था, समुदपद्यत आसोदित्यर्थः स कीदृशः ? इत्याह -'महयाहिमवंतमहं मलय मंदर जाव रज्जं पसासेमाणे विहरइ, महाहिमबन्महन् मलयमन्दर यावद्राज्यं प्रशासयन् विहरति, यावत्पदात् प्रथमोपाङ्गतः, माहिंदसारे इत्यारभ्य समग्रो राजवर्णको ग्राह्यः राजा औपपातिके एकादश सूत्रे द्रष्टव्यः तथाहि-महाहिमवान् हैमवत हरिवर्षक्षेत्रयो विभाजकः कुल पर्वतः तद्वत् महान् तथा मलयमन्दरमहेन्द्राणां पर्वतविशेषाणां सार इव सारो यस्य स तथा अन्त बलं यद्वा मलयादिविसारः प्रधानो यः स तथा पर्वतानां तध्ये मलयादयः पर्वतविशेषाः प्रधानास्तथाऽयमपि अन्य नरेन्द्राणां मध्ये प्रधान इतिभावः, एतादृशविशेषणविशिष्टः राजा राज्यं प्रशासयन् पालयन् विहरति इत्यत एव भरतं वर्षमिति नन्वेवमपि शाश्वती भरतनाम प्रवृत्तिः तत्थणविणीयाए रायहाणीए भरहेणाम'-इत्यादि सूत्र २ टोकार्थ—उस विनीता नाम की राजधानी में ( भरहेणामं राया चाउरंतचक्कवट्टी समुपज्जित्था ) भरत नाम का चातुरन्त चक्रवर्तीराजा उत्पन्न हुआ-पूर्व पश्चिम और दक्षिण दिग्वर्ती तान समुद्र और चतुर्थ हिमवान् पवत जिस राजा के आधोन होते हैं वह चातुरन्त कहलाता है. ऐसा चातुरन्त चक्रवर्ती राजा जो होता है वह चातुरन्त चक्रवर्ती राजा कहा जाता है । ( महया हिमवंत महंतमलयमंदर जाव रज्जं जाव पसासे माणे विहरइ ) यह चातुरन्त चक्रवर्ती भरत राजा हिमवान् पर्वत के, मलय पर्वत के, मंदर पर्वत के और महेन्द्र पर्वत के जैसा विशिष्ट अन्तर्बल वाला था- अथवा मलयादि पर्वतों के जैसा प्रधान था ये मलयादि पर्वत अन्य पर्वतो के बीच में प्रधान रूप से परिगणित हुए हैं इसी - तरह से यह राजा भी अन्य राजाओं के बीच में प्रधान रूप से उल्लिखित होता था ऐसा यह राजा यावत् राज्य-का शासन करता हुआ-हर तरह से उसका संरक्षण और संभाल करता हुआ आनन्द से रहता था. इस कारण-इस क्षेत्र का नाम भरत क्षेत्र ऐसा हुआहैतत्थ णं विणीयाए रायहाणीप भरते णाम-इत्यादि सूत्र--॥२॥ t-(नाता नाम: २००४ पानीमा (भरहेणामं राया चाउरंत चक्कवट्टो समुप्पजित्था) भरत नामे मे यातुरन्त यती २i Gruन्न थयेपूर्व-पश्चिम मन દક્ષિણ દિગ્ગત ત્રણ સમુદ્રો અને ચતુર્થી હિમવાનું પર્વત જે રજાની અધિનતામાં હોય છે. તે ચાતુન્ત છે. એ જે ચાતુરન્ત ચક્રવતી રાજા હોય છે, તેને ચાતુરન્ત ચક્રવતી રાજા हवामा भाव छ. (महया हिमवंतमहतमलयमंदर जाव रज जाव पसासे माणे विहरह) એ ચાતુરન્ત ચક્રવતી ભરત રાજા હિંમવાનું પર્વતના, મલય પર્વતના, મંદર પર્વતના અને મહેન્દ્ર પર્વતના જેવું વિશિષ્ટ અન્તર્બળ ધરાવતા હો અથવા મલયાદિ પર્વતની જેમ તે પ્રધાન હતો. એ મલયાદિ પર્વત અન્ય પર્વતેમાં પ્રધાન રૂપમાં પરિગતિ થયા છે, આ પ્રમાણે જ એ રાજા પણ અન્ય રાજાઓની વચ્ચે પ્રધાન રૂપથી ઉલિખિત થતો હતો. એ તે રાજા થાવત રાજા-શાસન સંભાળતો, દરેક રીતે તેનું સંરક્ષણ અને તેની સંભાળ કરતે Page #533 -------------------------------------------------------------------------- ________________ anvannow प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० २ भरतचक्रवर्ति उत्पत्यादि निरूपणम् १९ श्रूयते तत् कथम् ? तदभावे च 'सेत्तं' इत्यादि वक्ष्यमाणं निगमनमपि असम्भवीत्याङ्कय प्रकारन्तरेण तत्तत्कालाभवि भरत चक्रवर्तुद्देशेन राजवर्णकमाह -'विइओ गमो राजवण्णगस्स इपो' द्वितीयो गमः पाठविशेषो राजवर्णकस्यायम् तत्थ असंखेज्ज 'कालवासंतरेण उप्पज्जए' तत्र तस्यां विनीतायाम् नगर्या, असंख्येयः कालो ये वर्षे स्तानि वर्षाणि असंख्येयानीत्यर्थः तेषामन्तरेण असंख्यातकालनन्तरम् अयमर्थ प्रवचने हि कारस्यासंख्येयता असंख्येयेरेव वर्षे यंाहयते अन्यथा समयापेक्षयासंख्येया युष्कत्व व्यवहारप्रसङ्गः, तेनासंख्येयवर्धात्मकासंख्येयकाले गते एकस्माद् भरतचक्रवर्तिनोऽपरोभरतचक्रवर्ती यतः प्रकृतक्षेत्रस्य भरतेति नाम प्रवर्तते स उत्पशंका- यह ट क है जो भरत क्षेत्र इस प्रकार के नामकरण में आपने कारण बताया है परन्तु शश्वतो जो भरत क्षेत्र" इस नाम की प्रवृत्ति सुनी जाती है वह कैसे संगत होती है यदि ऐसी बात न हो तो फिर “से तं इत्यादिरूप से जो निगमन सुत्र है. वह असंभवित हो जाता है ? तो इस शंका के समाधान निमित्त सुत्रकार प्रकारान्तर से तत्काल भावी भरत नाम चक्रवर्ती के वर्णन के उद्देश्य से राजा का वर्णन करते हैं-'विइओ गमो राजवण्णगस्स ईमो" जो वर्णन इस प्रकार से है-(तत्त्थ असंखेज कालवासंतरेण उप्पज्जए जसंसो उत्तमे अभिजाए सत्तवोरिय परक्कमगुणे) उस विनीता में असंख्यात काल तक के अनन्तर -जो काल वर्षो द्वारा असंख्यात होता है ऐसे वे वर्ष असंख्यात होते हैं-उन असंख्यात वर्षों के बाद जिस से इस क्षेत्र का नाम भरत ऐसा प्रचलित होता है ऐसा भरत चक्रवर्ती उत्पन्न होता है. यहां जो काल में वर्षों की अपेक्षा लेकर असंख्यातता प्रकट की गइ है सो प्रवचन की मान्यतानुसारे ही प्रगट को गई है क्यों कि प्रव वन में असंख्यात वर्षों को लेकर हो काल में असंख्यात काल का व्यवहार हुआ है समयों की अपेक्षा काल में असंख्यातता का व्यवहार कल्पित આનંદ પૂર્વક રહેતો હતો. એથી એ ક્ષેત્રનું નામ ભરતક્ષેત્ર એવું થયું છે. શંકા–આ બરાબર છે કે ભરતક્ષેત્રનું નામ પ્રચલિત થયું તેમાં તમે આ કારણ સ્પષ્ટ કર્યું પણ શાશ્વતી જે ભરતક્ષેત્ર એ નામની પ્રવૃત્તિ સાંભળવામાં આવે છે, તે કેવી રીતે સંગત થઈ શકે ? ने से वात डाय नलित। पछी 'सेत्त' त्याहि ३५मा २ निगमन पूत्र छे. ते मसलવિત થઈ જાય છે? તે એ શંકાના સમાધાન માટે સૂત્રકાર પ્રકારાન્તરથી તત્કાલ ભાવી भरत नाम, यती ना पनने आनुसक्षीने शवशुन रे छ-"बिइओ गमो राजवण्णगस्स इमो" ते १४ मा प्रमाणे छे-(तत्थ असं खेज्जकाल घासंतरेण उप्पज्जए जसंसी, अभिजाए सत्तवीरिय परक्कमगुणे) त विनीतानगरीमा असभ्य पछी-२ વર્ષો દ્વારા અસંખ્યાત હોય છે, એવા તે વર્ષો અસંખ્યાત હોય છે. તે અસંખ્યાત વર્ષો પછી–જેના વડે આ ક્ષેત્રનું નામ ભરત આ નામે પ્રખ્યાત થયું, એ તે ભરત ચક્રવતી રાજા ઉત્પન્ન થાય છે. અહીં જે ક ળમાં વર્ષોની અપેક્ષાએ અસંખ્યતતા પ્રકટ કરવામાં આવી છે, તે પ્રવચનની માન્યતાનુસાર જ પ્રકટ કરવામાં આવી છે. કેમકે પ્રવચનમાં અસંખ્યાત વર્ષોને લઈને જ કાળમાં અસંખ્યાત કાળને વ્યવહાર થયા છેસમાની અપેક્ષાએ કાળમાં અસં. Page #534 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५२० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 啮 यते इति सच कीदृश इत्याह- 'जसंसी उत्तमे अभिजाए. यशस्वी कीर्त्तिमान् उत्तमः शलाका पुरुषत्वात् अभिजातः कुलीनः श्री ऋषभादिवंश्यत्वात् 'सत्तवीरिय परक्कमगुणे, सत्त्वं- साहसं वीर्यम्-आन्तरं बलम, परक्रमः शात्रुवित्रासनशक्तिः ऐते गुणा यस्य सत्त्ववीर्यपराक्रमगुणः एतेन राज्योचितसर्वातिशायि गुणवत्वमुक्तम् पसत्थवण्णसरसारसंघयण तनुगबुद्धिधारण मेहासंठाण सीलप्पई' प्रशस्तवर्ण स्वरसार संहनन तनुकबु द्विधारणमेधा संस्थान शील प्रकृतिकः, तत्रः प्रशस्ताः - तत्कालवर्त्ति जनापेक्षया श्लाघनीयाः वर्णः देहकान्तिः, स्वरो ध्वनिः सारः शुभपुद्गलोपचयजभ्यो धातुविशेषः, संहननम् अस्थिनिचयरूपम् तनुकं शरीरम् धारणा अनुभूतार्थधारणाशक्ति: मेधा हेयोपादेयधीः, संस्थानं यथास्थानमङ्गोपाङ्गविन्यासः शीलम् आचारः प्रकृतिस्वभावः, एतेषां द्वन्द्वोत्तरं प्रशस्ता वर्णादयोऽर्थाः यस्य स तथेति बहुव्रीहि: 'पहाणगावच्छायागईए, किया जावे तो फिर इस काल में मनुष्यों में असंख्याता पुष्कत्व का व्यवहार प्रसङ्ग प्राप्त होता है. अतः काल में असंख्येयता असंख्यात वर्षों की अपेक्षा से ही मानना चाहिये इस तरह जब असंख्यात वर्षों तक असंख्यात काल व्यतीत हो चुके तब एक भरत चक्रवर्ती के बाद दूसरा भरत चक्रवर्ती कि जिससे भरत क्षेत्र का भरत ऐसा नाम प्रचलित होता है उत्पन्न होता है यह भरत चक्रवर्ती (नसंसी उत्तमे अभिजाए) यशस्वी कीर्ति संपन्न होता है, उत्तम शलाका पुरुष होने से श्रेष्ठ होता है तथा अभिजात - कुलीन होता है क्यों कि यह ऋषभादि का वंशज होता है ( सत्तवीरियपरक्कम गुणे ) इसमें सत्त्व साहस वीर्य आन्तर बल, पराक्रमशत्रु विनाशन शक्ति ये सब गुण होते हैं. इस पद द्वारा उसमें राजन्य के उचित सर्वाति शायी गुणवत्ता प्रगट की गई है. (पसत्थ वण्ण सर सार संघयण तनुगबुद्धिधारण मेहा संठाण सोलप्पई) अन्य राजाओं की अपेक्षा इसका वर्ण देहकान्ति, स्वर ध्वनि, सार शुभपुद्गलोपचय जन्य धातुविशेष, संहनन अस्थिनिचय तनु शरर धारणा अनुभूत अर्थ की धारणा शक्ति ખ્યાતતાને વ્યવહાર થયે નથી. જો સમયની અપેક્ષાએ કાળમાં અસ ખ્યાતતાના વ્યવહાર કલ્પિત કરવામાં આવે તે પછી એ કાળમાં મનુષ્યેમાં અસંખ્યાતાયુકતના વ્યવહાર પ્રસંગ પ્રાપ્ત થાય છે. એથી કાળમાં અસ ધ્યેયતા અસંખ્યાત વષેની અપેક્ષાથી જ માનવી જોઈએ આ રીતે જ્યારે અસંખ્યાત વર્ષો સુધી અસ`ખ્યાત વો વ્યતીત થઈ ચૂકયાં ત્યારે એક ભરત ચક્રવતી પછી બીજો ભરત ચક્રવતી -કે જેમનાથી ભરતક્ષેત્રનું નામ ભરત આ પ્રમાણે પ્રખ્યાત थाय छे - उत्पन्न थाय छे से भरत यवर्ती (जसंसी उत्तमें अभिजाप ) - यशस्वी - श्री त સપન્ન હાય છે, ઉત્તમ શલાકા પુરુષ હેાવાથી-શ્રેષ્ઠ હાય છે તેમજ અભિજાત કુલીન હોય छे. डेभड़े थे ऋषलाहि वंश होय छे. ( सत्तवरिय परक्कमगुणे) मां सत्त्व- साहुस વીય—ાંતર ખળ, પરાક્રમ-શત્રુ વિનાશન શક્તિ એ સર્વે ગુણુ હાય છે, એ પદ વડે તેમાં रामन्यना उचित सर्वात शायी गुणवत्ता प्रवामां भावी छे. (पसत्थ वण्ण सरसार संघयण तनुग बुद्धिधारण मेंहा संठाण सोलप्पई) अन्य रामयोनी अपेक्षा सेनेो वायुદેહ કાંતિ, સ્વર-વનિ, સાર શુભ પુદ્ગલેાપચય જન્ય ધાતુ વિશેષ, સંહનન—એસ્થિનિચય / Page #535 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० २ भरतचक्रवर्ति उत्पत्यादिनिरूपणम् अत्रापि द्वन्द्वोत्तरं प्रधाना अनन्यवर्तिनो गौरवादयोऽर्था यस्य स प्रधान गौरवच्छायागतिकः, तत्र गौरवम् अभिमानः छाया शरीरशोभा, गतिः संचरणमिति, 'अणे'अनेकवचनप्रधानः अनेकवाचनिकेषु श्रेष्ठः सकलवक्तृश्रेष्ठा इत्यर्थः वच नप्रकार वायम् "सत्यं शौचमनायासः मङ्गलं प्रियवादिता इत्यादि । 'तेय आउवलवीरिजुत्ते' तेजआयु बलवीर्ययुक्तः तत्र तेजः परैरसहनीयः प्रतापः अयुर्बलं पुरुषायुषं वीर्यम् आत्म समुत्थं तैः युक्तः एतेन जरारोगादिनोपहतवीर्यत्वं नास्येति सिद्धम् ' अज्जु - रणणिचिय लोहसंकरणारायवइरउसहसंघयण देहधारी, अशुषिरघणनिचितलोहशङ्ख लनाराच वज्रर्षभ संहननदेहधारी, तत्र अशुषिरा निच्छिद्रा अतएव घननिचिता अत्य न्तघना या लोहशृङ्खला तदिव नाराचवज्रऋषभं प्रसिद्धा वज्रऋषभनाराचं संहननं यत्र तं तथाविधं देहं धरतीत्येवं शील:, 'झस १ जुन २ भिंगार ३ बद्धमाणग ४ भर्दमाणग ५ शंख ६ छत्त ७ वीअणि ८ पडाग ९ चक्क १० जंगल ११ मुसल १२ रह १३ सोत्थिय १४ अंकुस १५ चंदा १६ इच्च १७ अग्गि १८ जूय १९ सागर २० इंदझय वच्छायागइए) गौरव - स्वाभिमान - छाया शरीर शोभा और गति असाधारण ये सभ इसमें असाधारण होते है | ( अगवयगपहाणे ) यह सकल वक्ताओं में श्रेष्ठ वक्ता होता है. (तेअ आउचलवोरियजुत्ते) तेज - जिसे दूसरे जन सहन नहीं कर सकें ऐसे प्रताप, आयु, बल, और बीर्य से यह युक्त होता हैं, इससे जरा रोग आदि से यह उपहत वोर्य वाला नहीं होता है यह बात सिद्ध होती है ( अज्जुसिरवणणिचिय लोहसंकलणारायवइरउ सहसंघयण देहधारी) निच्छिद्र अतएव अत्यन्त घनी जो लोह श्रृङ्खला उसके जैसा इनका वज्र ऋषभ नाराच संहनन वाला देह होता है (इस १ जुग २ भिंगार ३ बद्धमाणग ४ भद्दमाणग ५ संख ६ छत्त ७ बीअणि ८ पडाग ९ चक्क १० जंगल ११ मुसल १२, रह १३, सोत्थिय १४ अंकुस १५, चंदा १६, इच्च १७, अग्गि १८, जूय १९, सागर २०, इदझय २१, पुहवि २२. पउम તનુ-શરીર, ધારણા-અનુભૂત અર્થાંની ધારણા શક્તિ-મેધા-હેયાપાદેયવિવેચક બુદ્ધિ સંસ્થાન અંગેાપાંગવિન્યાસ, શીલ-આચાર અને પ્રકૃતિ-સ્વભાવ એ સર્વે તત્કાલવતી મનુષ્યાની अपेक्षा श्लाघनीय-प्रशंसनीय होय छे. (पहाणग़ारवच्छायागइप) औरव-स्वाभिमान- छाया शरीर शोला भने गति असाधारषु थे सर्वे शेभ असाधारण होय छे. (अणेग बयणप्पहाणे) ये सब बता श्रेष्ठ वता होय छे.' (तेअआउबलवी रियजुत्ते) ते४ - ने બીજા માણસે સહન કરી શકે નહિ એવેા પ્રતાપ, આયુ, બળ અને વીર્યાંથી એ યુક્ત હોય છે. એથી જરારાગ આદિથી એ ઉપહત-વીય વાળા થતા નથી એ વાત સિદ્ધ થાય છે. (अज्झु सिरघण णिचिय लोहसंकलणारायवहर उ सहसंघयणदेहधारी) निछिद्र मेथी अत्यंत સાન્દ્ર જે લેહશુ'ખલા હોય છે. તેના જેવા એને વઋષભ, નારાચ સ’ટુનનવાળા हेड होय छे. (झस १, जुग २, भिंगार 3, बद्धमाणग ४, भद्दमाणग ५, संख ६, छत्त १ सत्यं शौचमनायासः मङ्गलं प्रियवादिता" इत्यादि ये वक्ता के गुण कहे गये है । २ "सत्यं शौचमनायासः मङ्गल प्रियवादिता" वगेरे वताना गुथे हेवामा भन्या छे, ६६ ५२१ Page #536 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५२२ जम्बूद्वीप्राप्तिसूत्रे २१ पुहवि २२ पउम २३ कुंजर २४ सोहापण २५ दंड २६ कुम्म २७ गिरिवर २८ तुरगवर २२ वरमउड ३० कुंडल ३१ गंदावत्त ३२ घणु २३ कोत ३४ गागर ३५ भवणविमाण ३६ अणेगलक्षण पसत्थसुविभत्तचित्तकरचरणदेसभाए' तत्र झसो मीन: १ युगं शकटाङ्गविशेषः २, भृङ्गारो. जलभाजनविशेषः ३, वर्द्धमानकः शरावः ४, भद्रासनम् ५, शङ्खो दक्षिणावत्तः ६, छत्रं प्रसिद्धम् ७, व्यजनं व्यजनकम् 'पंखा इतिप्रसिद्धम् ८ पताका ९ चक्रम् १० लाङ्गलम् हलम् ११, मुसलम् १२, रथ १३, स्वस्तिकम् १४, अकुंशः १५, चन्द्रः १६, आदित्या १७, ग्नी प्रसिद्धौ १८ यूपो यज्ञस्तम्भः १९, सागर समुद्रः २०, इन्द्रध्वजः २१, पृथ्वी २२, पद्म २३, कुम्जराः प्रसिद्धाः २४, सिंहासनम् २५, दण्ड २६, कूर्म २७, गिरिवर २८, तुरगवर २९, वरमुकुट ३०, कुण्डलानि व्यक्तानि ३१, नन्धावतः प्रतिदिग् नवकोणकः स्वस्तिका ३२, धनु: ३३, कुन्तः भल्लुकः ३४, गागरः स्त्रीपरिधानविशेषः ३५, भानविमानम् ३३, एतेषां द्वन्द्वोत्तरम् एतानि प्रशस्तानि माङ्गल्यानि, सुविभकानि अतिशयेन २३, कुंजर २४, सीहासण २५, दंड, २६,कुम्म २७, गिरिवर २८, तुरगवर २९, वरमउड ३०, कुण्डल ३१, णंदावत्त ३२, धणु ३३, कांत ३४, गागर ३५, भवणविमाण ३६, (अणेगलक्खण पसत्थसुविभत्तचित्तकरचरणदेसभाए) इनकी हथेलियों में और पगथलियों में एक हजार प्रशस्त एवं विभक्त रूप में रहे हुए सुलक्षण होते हैं उनमें से कितने सुलक्षणों के त्रिलोक गम-इस प्रकार से है-झस-मीन-युग-जुआ-भंगार जलभा जनविशेष, वर्द्धमानक शराव-भद्रासन, दक्षिणावर्त शंख छत्र व्यजन-पंख, पताका चक्र लांगल, हल मुसल, रथ, स्वस्तिक, अंकुश, चन्द्र, आदित्य, सूर्य, अग्नि यूप-यज्ञस्तम्भ, सागर-समुद्र, इन्द्रध्वज, पृथिवी, पद्म, कुञ्जर, हेस्ती-सिंहासन. दण्ड. कूर्म-कछुमा. गिरिवर श्रेष्ठपर्वत. तुरगवर-श्रेष्ठ घोड़ा, वरमुकुट, कुण्डल, नन्द्यावर्त्त, - हर एक दिशा में नौकोणों वाला स्वस्तिक, धनुष, कुन्त, भल्लुक- भाला, गागर- स्त्री परिधान विशेष, और भवन विमान इन पदार्थों के वहां जो चिह्न ७, बीअणि ८, पडाग ९, चक्क १०, जंगल ११, मुसल १२, रह, १३,सोस्थिय १४, अंकुस १५, चंदा १६, इच्च १७, अग्गि-१८, जूय-१९, सागर २०, इंदज्झय २१, पुहवि २२, पउम २३, कुजर २४, सीहासण २५, दंड २६, कुम्म २७, गिरिवर २८, तुरगवर २९, वरमउड ३० कुंडल ३१, णंदावत्त ३२, घणु-33, कोंत २४, गागर ३५, भवणविमाण 38, अणेगलक्खण पसत्थसुविभत्तचित्तकरचरणदेसभाप) मेमनी थेनीमा भने रान तणी. યામાં એક હજાર પ્રશસ્ત તેમજ વિભક્ત રૂપમાં રહેલા સુલક્ષણ હોય છે. તેમાંથી કેટલાંક સુલક્ષણે આ પ્રમાણે છે–ઝમ-મીન, યુગ -જુઆ, ભંગાર-જલ ભાજન વિશેષ पद मान-शराव, मद्रासन, पक्षियावत शम, छत्र, व्य -५ , ५ , २, Cine, ga, भूसर २५, स्वस्ति, मश. यन्द्र, साहित्य, सूर्य, नि, यू-यज्ञस्तभ, साग२समुद्र, धन्द्र , ५५, १२-स्ती सिंहासन, ६७, म ४ायमे, रिचर-श्रेष्ठ पत તરગવર-શ્રેષ્ઠ ઘાડો, વરમુકુટ, કંડલ, નન્દાવ7–દરેક દિશામાં નવ ખૂણાઓ વાળે સ્વસ્તિક ધનુષ, કુન્ત, ભલુક-ભાલે, ગાગર–સ્ત્રો પરિઘાન વિશેષ અને ભવન-વિમાન, એ પદાર્થોના Page #537 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ वक्षस्कारः २ भरतचक्रवर्तिउत्पत्यादिनिरूपणम् .૨૩ afar, यानि अनेकानि अष्टोत्तरसहस्त्रप्रमाणानि लक्षणानि तैश्वित्रो - विस्मयकरः कर चरणयोर्देशभागो यस्य स तथा, तीर्थकृतामिव चक्रवर्त्तिनामपि अष्टाधिक सहस्रलक्षणानि भवन्ति उक्तंच मूलम् - "पागय मणुआणं बत्तीसं लक्खणानि असयं । बलदेव वासुदेवाण अट्टसहस्से चक्कवट्टि तित्थगराणं ॥ इति ॥ छाया - "प्राकृत मनुजानां द्वात्रिंशल्लक्षणानि अष्टशतम् । बलदेव वासुदेवानाम् अष्टसहस्रं चक्रवर्ति तीर्थकराणाम् ॥” इति उद्धामुहलोमजाल सुकुमालणिद्धमउआवत्तपसत्थलोम विरइ असि रिवच्छण्ण विउलवच्छे तत्र ऊर्ध्वमुखं भूमेरुद्गच्छताम् अंकुराणामिल येषां तानि ऊर्ध्वतुखानि यानि लोमानि तेषां जालं समूहो यत्र स तथा सुकुमालस्निग्धानि नवनीतपिण्डादिद्रव्याणि तद्वत् मृदुकानि कोमलानि तथा आवर्तैः दक्षिणावर्तैः प्रशस्तानि माङ्गल्यानि यानि लोमानि तैर्विरचितो यः श्रीवत्सः चिह्नविशेषः ततः पूर्वपदेन कर्मधारयः तेन छन्नम् आच्छादितं युक्तमित्यर्थः विपुलं वक्षो वक्षस्थलं यस्य स तथा 'देसखेत्तसुविभत्तदेहधारी' देशक्षेत्र सुविभक्तदेहधारी, देशे कोशलदेशादौ, क्षेत्रे तदेक त होते हैं वे सब आपस में एक दूसरे से अलग ५ होते हैं और मंगलकारी होते हैं । इन चिह्नों से युक्त उनके हाथ और पैर बडे सुहावने लगते हैं । १००८ लक्षण जिस प्रकार से तीर्थकरों के होते हैं वैसे ही वे चक्रवर्तियों के भी होते है उक्तं च पागय मणुआणं बत्तीसलक्खणानि अठ्ठयं । - बलदेववासुदेवाणं अटूसहस्सं चक्कट्टिवतित्थगराणं" ॥१॥ ( उद्धामुह लोमजालसुकुमालणिद्धमउआवत्त पसत्थलो मविरइ असिविच्छच्कृण्ण विउलच्छे इनका वक्षःस्थल विपुल होता है और वह उर्ध्वमुखवाले, तथा नवनीत पिण्डादि के जैसे मृदुता - वा एवं दक्षिणावर्त्त वाले ऐसे प्रशस्त बालों से- रोमों से चित- बनेहुए श्रीवत्सचिन्ह विशेष से आच्छादित - युक्त रहते है ( देस खेत्त सुविभत्तदेहधारी ) देश - कोशल देश आदि में और क्षेत्र उसके अवयवभूत विनीता आदि नगरी में यथास्थान जिसमें अवयवों की रचना हुई है ચિહ્નો ત્યાં અકિત હાય છે, તે બધાં પરસ્પર એક-ખીજાથી અલગ-અલગ હોય છે, અને મગળ કારી હાય છે. એ ચિત્રોથી સમ્પન્ન તેમના હાથ અને પગ અતીવ સુંદર લાગે છે ૧૦૦૮ લક્ષણે। જેમ તીર્થંકરાને હોય છે, તેમ જ એ બધાં લક્ષણા ચક્રવતી એને પણ ડાય छे. उधुं हे - पागय मणुआण बत्तीस लक्खणानि अट्ठसयं । बलदेव वासुदेवाणं अइसहस्सं चक्कवट्टितित्थगराण ॥ १ ॥ - (उद्धामुहलोम जाल सुकुमार्लाणद्धमउआवत्तपसत्थलोमबिरइ असिरिवच्छच्छण्णविउलवच्छे) मनु वक्षस्थण वियुद्ध होय छे। अने ते उत्राणा तेन नवनीत पिंडाहिना भ भृतावाणा भने दृक्षिणावर्त्त वाणा मेवा प्रशस्तवाणे थी- युक्त रहे छे. (देस खेत्त सुविभत्तदेह Page #538 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे देशभूतविनीतानगर्यादौ सुविभक्तो यथास्थानविनिविष्टावययो यो देहस्तं धरतीत्येवं शीलः भरतक्षेत्रे तत्कालावच्छेदेन न भरतचक्रतोऽपरसुन्दराकृतिरभूदित्यर्थः 'तरुण रविरस्सिबोहियवरकमलविबुद्धगम्भवण्णे' तरुणरविरश्मिबोधितवरकमलविबुधगर्भवर्णः तरुणरविरश्मिभिः उद्गच्छत्सूर्यकिरणः बोधितं विकासित यद्वरकमलं श्रेष्ठकमलं तस्य विबुधो विकस्वशे यो गर्भो मध्यभागस्तद्वद्वर्णः शरीरकान्तिर्यस्य स तथा काञ्चनवर्णशरीर 'इत्यर्थः हयपोसणकोससण्णिभपसथपिट्टतणिरुवलेवे' हयपोसन कोशपन्निभपृष्टान्तनिरुपलेपः हयपोसनं हयापानं तदेव कोशइव कोशः सुगुप्तत्वात् तत्सन्निभः प्रशस्तः पृष्ठस्य पृष्ठभागस्य अन्तः चरमभागोऽपानं तत्र निरुपलेपो लेपरहित पुरीषकत्वात् 'पउमुप्पलकुदजाइजू हियवरचंपगणागपुप्फसारंगतुल्लगंधी' पद्मोत्पल कुन्दजातियूथिकवरचम्पकनागपुष्पसारङ्गतुल्यगन्धी तत्र पद्म प्रसिद्धम्, उत्पलं कमलविशेषः, 'कुन्दजाति यूथिकाः प्रसिद्धपुष्पविशेषाः वरवम्मको-रानवम्पकः, नागपुष्यं णागकेसरकुसुमम्, सारङ्ग. पदैकदेशे पदसमुदाय ग्रहणात् सारङ्गपदेन सारङ्गमदः कस्तुरीति प्रसिद्धः। एतेषां तुल्यो गन्धः यस्य स तथा, सुगन्धयुक्तदेह इत्यर्थः 'छत्तीसा अहिअ पसत्थ पत्थिवगुणेहिं जुत्ते' पत्रिंशता अधिक प्रशस्तपार्थिवगुणैर्युक्तः, ते च गुणास्तावत् ऐसा उनका देह एक हो होता है अर्थात् उस काल में ऐसा सुन्दर आकार वाला शरीर किसीका नहीं होता है (तरुणरविरस्सि बोहि अवरकमलविबुद्धगम्भवण्णे ) इनके शरीर की कान्ति तरुण रवि से- निकलते हुए सूय की किरणों से विकसित हुए कमल के गर्भ के वर्ण की जैसी होती है। अर्थात् सुवर्ण के जैसा वर्णवाला इनका शरीर होता हैं. (हयपोसणको मसण्णिभ पसत्थ पिठंतणिरुवलेवे ) इनका जो गुदा भाग होता है वह घोडे के गुदाभाग की तरह पुरीष से अलित रहता है (पउमुप्पल कुंदजाइजुहियवरचंपगणागपुप्फसारंगतुल्लगंधी ) इनके शरीर की गन्ध पद्मउत्पल, कुंद- चमेली या मोरघा का पुष्प, वर चम्पक- राजचम्मक- नाग पुष्प- नागकेशर- एवं सागङ्ग- पदैकदेश में पदसमुदाय के ग्रहण के अनुसार कस्तुरीइनकी जैसी गंध होती है वैसी होती है ( छत्तीसाअहिअ पसत्य पत्थिवगुणेहिं जुत्ते ) ३६ જા)દેશકોશલ દેશ આદિમાં અને ક્ષેત્ર તેના અવયવભૂત વિનીતા આદિ નગરીમાં યથાસ્થાન જેમાં અવયની રચના થઈ છે, એ તેમને દેહ એક જ હોય છે. એટલે કે તે કાળમાં सवास १२ मारवाणे हेड नेय नथी. ति। (तरुणरविरस्सिबोहिअवरकमलविबुद्ध. गब्भवण्णे) मना शरीरनी ४iति d०५ विथी नीndi सूर्यना (२थी विसित भAના ગર્ભને વશું જેવી હોય છે. એટલે કે સુવર્ણ જેવા વર્ણવાળા એમનો દેહ હ ય છે. (हयपोसण कोससण्णिभपसथपिट्ठतणिरुपलेवे) अमन शुद्धामा डाय छ, त उना शामा २म पुषिथी मा छे. (पउमुप्पलकुंद जाइ जूहिवरचंपगणागपुप्फ सारंगतुल्लगंधी) मेमना शरीरनी गध पद्म, ५३, ४-यमेal है भाराना पु.५, १२ ચંપક, રાજચંપક, નાગપુ૫-નાગકેશર તે જ સારંગ-પક દેશમાં પદસમુદાયના ગ્રહણ भरमस्तुरीनी २वी गाय छे, तेवी य छे. (छत्तीसा अहिअपसत्थपत्थिव Page #539 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू) २ भरतचक्रवर्ति उत्पत्यादिनिरूपणम् ५२५ 'अव्यङ्गो १, लागाप्र्गों २, रूपसम्पत्तिभृतनुः ३, इत्यारभ्य ताचिकः साविको नृपः ३६ इत्यन्ताः पत्रिंशत्परिमिता विज्ञेयाः 'अयोच्छिा गातपत्ते' अव्यवच्छिन्नातपत्रः, अव्यवच्छिन्नम्-अखण्डितमातपत्रं यस्य स तथा एकछत्रराज्यधारीत्यर्थः एतेनास्य पितृपितामहक्रमागतराज्यभोक्तृत्वं सूचितम् अथवा तस्य प्रभुत्वं केनापि बलीयसा रिपुणा न व्यवच्छिन्नमिति सूचितम् । 'पागडउभयजोणी' प्रकटोभययोनिकः, प्रकटे विशदाबदाततया जगद्विख्याते उभययोन्यौ मातृपितृपक्षरूपे यस्य तथा, निर्मलजननीजनकोभयपक्षवानित्यर्थः अतएव 'विमुद्धणिगकुलगयणपुण्णचंदे इव सोमयाए णयगमगणिबुईकरे' तत्र विशुद्ध कलङ्करहितं यन्निनककुलं तदेव गगनं तत्र पूर्णचन्द् इव सोमतया मृदुस्वभावेन नयनमनसो निवृत्तिकरः आनन्दकरः, 'अक्खोभे' अक्षोभः भयरहितः, 'सागरोवथिमिए' सागर इव स्तिमितः अधिक प्रशस्त पार्थिव गुणों से ये युक्त होते हैं वे गुण इस प्रकार से हैं- अव्यङ्ग १ लक्षणापूर्ण २ रूसंपत्तियुक्त शरीर ३, यहां से लेकर तात्विक और सात्विक तक इस प्रकार ये३६ हो जाते है । "अवोच्छिण्ण तात्ते" इसका एकच्छत्र राज्य होता है, इसलिए इनका राज्य पितृ पितामह की वंश परम्परा से चला हुआ आता हैं यह बात इस बात से सूचित को गइ है अथवा इनका प्रभुत्व किसी अन्य बलिष्ठ शत्रु के द्वारा छिन्न भिन्न नहीं किया जा सकता है ऐसा भी समझा जा सकता है। (पागड उभयजोणो ) इन के मातृ पितृ पक्ष जगत मे विख्यात होता है । (विसुद्धणियगकुलगयणपुण्णचंदे इत्र सोमयाए णयण मण वुई करे ) अत एव ये अपने कलङ्क विहीन कुलरूप गगन मंडल में मृदु स्वभाव के कारण पूर्ण चन्द्र मण्डल की तरह नेत्र और मन को आनन्द करने वाले होते हैं । ( अक्खो भे सागरोव थिमिए धणवइव्व भोग गुणेहि जुत्ते) 38 अघि प्रशस्त पाथिवणेथा ससा संपन्न होय छे. ते गुहे। अव्यङ्ग ક્ષorgઈ રૂપસ પત્તિ યુક્ત શરીર ત્યાંથીલઈને સાત્વિક સુધી એ ગુણે ની ૩૬ સંખ્યા થઈ જાય छ.'अव्वोच्छिण्णातपत्त' मेनु से ४२०३२४य डाय छे. समनुशय पितृ-पितामडानी वश પરંપરાથી ચાલ્યું આવતું હોય છે, એ વાત એનાથી સૂચિત કરવામાં આવી છે. અથવા એમનું પ્રભુત્વ કઈ પણ બીજા શત્રુ વડે છિન્ન-ભિન્ન કરી શકાતું નથી. એવું ५४ सभ७ शहीसे छीये. (पागउउभयजोणी) मेमनी मातृ-पितृ पक्ष आतमा विध्यात हाय छे. (विसुद्ध णियगकुलगयण पुण्णचंदे इव सोमयाए णयणमणणिवुईकरे) मेथी એ પોતાના કલંકહીન કુલ રૂપ ગગનમંડળમાં મૃદુસ્વભાવને લીધે પૂર્ણ ચન્દ્ર મંડળની १ अव्यङ्गो १ लक्षणापूर्णो २रूपसंपत्तिभृत्तनुः 3 अमदो ४ जगदोजस्वी ५ यशस्वीच ६ कृपोलुहृत् ७ । कलासुकृतकर्मा ८ च. शुद्धराजकुलोद्भवः ९ । वद्धानुगः १० त्रिशति ११ श्च पुजारागी १२ प्रजा गुरू १३ । समर्थनःदमर्थानां त्रयाणां सममात्रया १४ । कोशवान् १५ सत्यसन्धानः १६ चेरहम् १७ दूरमत्रहग १८ आसिद्धि को योगी १९ च प्रवीणः शस्त्र २० शास्त्रयोः २१ । निग्रहा २२ नुग्रहपरो २३ निलञ्च दूरशिष्टयोः २४ उपायार्जित राज्य श्री २५ दुनिशौण्डो २६ धुवजयी २७ । न्यायप्रियो २८ न्यायवेत्ता २९ व्यसमानाव्यपासकः ३० । अधर्मवीर्या ३१ गाम्भीर्यो ३२ दार्य ६३ चातुर्यभूषितः ३४ प्रणयाधिकक्रोध ३५ तात्विकः सात्विको नृपः ३६ Page #540 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जेम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सागरप्रस्तावात् क्षीरसमुद्रादिः स इव स्तिमितः स्थिरश्चिन्ताकल्लोलवर्जितो न पुनहीयमानवर्धमानकल्लोललवगसमुद्रइवास्थिरस्वभाव इत्यर्थः 'धणवइव्व भोगसमु-दयसहव्ययाए' धनपतिरिव कुबेर इव भोगस्य. समुदयः-सम्पदुदयस्तेन सह सद्विद्यमानं द्रव्यं यस्य स भोगसमुदय सद्व्यम्तस्य भावस्तत्ता तया, भोगोपयोगि भोगाङ्ग समृद्ध इत्यर्थः (समरे अपराइए) समरे-संग्रामे अपराजितः-पराजयमप्राप्तः (परमविक्रमगुणे) परमविक्रमगुणः उत्कृष्टपराक्रमगुणयुक्तः (अमरवइसमाणसरिसरूवे) अमपतेः शक्रस्य समानं सहशमत्यर्थतुत्यं रूपं यस्य सोऽमरपति समानसदृशरूपः, इन्द्रसमानरूपसम्पत्तिमानित्यर्थः (मणुअवई) मनुजपतिः नगराधिपतिः (भरहचकवट्टी) भरतचक्रवती उत्पद्यते इति पूर्वेण सम्बन्धः, अथोत्पन्नः सन् किं कुरुते इत्याह-(भरह) इत्यादि ( भरहं भुंजइ पणदृसत्तू ) अनन्तरसूत्रे एवं प्रदर्शितस्वरूपो भरतत्तक्रवर्तीभरतं भुकते-शास्तीति, प्रणष्टशत्रुरिति स्पष्टम्, अत इदं भरतक्षेत्र मुच्यते इति निगमनमग्रे वक्ष्यते ॥ सू० २ ॥ समुदयसव्वयाए समरे अपराइए परमविक्कमगुणे अमरवइ समाणसरिसरूवे) निर्भय होते हैं, क्षीरसमुद्र आदि को तरह ये चिन्ता रूप कल्लोलों से वर्जित रहते हैं कल्लोलों से हीयमान वर्धमान लवण समुद्र की तरह ये अस्थिर स्वभाव वाले नहीं होते हैं कुबेर के जैसे ये भोगों के समुदाय में अपने विद्यमान द्रव्यों को खर्च करने वाले होते हैं अर्थात् विद्यमान द्रव्य के अनुसार ये भोगोपभोगों को भोगने वाले होते हैं । समराङ्गण में इन्हें कोई परास्त करने वाला नहीं होता है- ये अपराजित होते हैं। क्योंकि ये जिस पराक्रम गुण से युक होते हैं वह उनका उत्कृष्ट होता है । उनका रूप शक के समान बहुत ही अधिक सुन्दर होता है। ( मणुमवई भरह चक्कवट्टी भरहं भुजइ पण्णद्वसत्तू ) इस प्रकार के इन पूर्वोक्त समस्त विशेषणों से संपन मनुजाधिपति भरत चक्रवर्ती इस भरत क्षेत्र का शासन करते हैं उस समय इनका कोइ भी शत्र प्रतिपक्षी- नहीं रहता है समस्त शत्रुगण नष्ट हो जाता है इस कारण हे गौतम ! इस क्षेत्रका नाम भरत क्षेत्र इस प्रकार से कहने में आया हैं ॥२॥ रेम नत्र मन भनन मान मापना२ डाय छे. (अक्खोमे सागरोव थिमिए धणवईव्व भोगसमुदयसव्वयाए समरे अपराइए परमविक्कमगुणे अमरवइसमाण सरिसरूवे) निर्भय य छे, क्षीर समुद्र कोरेन नेम अस। (यन्त३५ yearala વજિત રહે છે. કલ્લોલથી હીયમાન, વર્ધમાન લવણ સમુદ્રની જેમ એ અસ્થિર સ્વભાવવાળા હોતા નથી. કુબેરની જેમ એ ભેગેના સમુદાયમાં પોતાના વિદ્યમાન દ્રવ્યોને ખચ કરતા હોય છે. એટલે કે વિદ્યમાન દ્રવ્ય મુજબ એઓ ભેગેપગેને ભેગવનાર હોય છે. રણાંગણમાં એ અપરાજિત હોય છે. કેમકે એઓ જે પ્રરાક્રમ ગુણથી યુકત હોય છે. તે તેમના ઉત્કૃષ્ટ હોય છે. તેમનું રૂપ શક્ર જેવું અતીવ સુંદર હો भरहवककवट्टी भरह भुजइ पणदृसत्त) मा प्रमाणे मे पूत समस्त विशेषगाथा સમ્પન મનુજાધિપતિ ભરત ચક્રવતી એ ભરનક્ષેત્રનું શાસન કરે છે. તે સમયે એમને કંઈ પણ શત્રુ પ્રતિપક્ષી રહેતું નથી. સમસ્ત શત્રુઓને વિનાશ થઈ જાય છે. એથી હે ગૌતમ ! આ ક્ષેત્રનું નામ ભરત ક્ષેત્ર કહેવામાં આવ્યું છે. મે ૨ Page #541 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० ३ भरतचक्रवतिनः दिग्विजयादिनिरूपणम् ५२७ अथ प्रस्तुत भरतस्य दिग्विजयादिवक्तव्यतामाह-(तए णं) इत्यादि। मूलम्-तए णं तस्स भरहस्स रण्णोअण्णया कयाइ आउहघर सालाए दिव्वे चक्करयणे समुप्पज्जित्था,तएणं से आउहघरिए भरहस्स रण्णा आउहघरसालोए दिव्यं चक्करयणं समुप्पण्णं पासइ पासित्तो हट्टतुट्ट चित्त माणंदिए नंदिए पीइमणे परमसोमणस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहिअए जेणामेव दिव्वे चक्करयणे तेणामेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता तिक्खुतो आ याहिणं पयाहिणं करेइ करित्ता करयल जाव कटु चक्करयणस्स पणामं करेइ करित्ता आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइपडि णिक्खमित्ता जेणामेव बाहिरि आ उवट्ठाणसाला जेणामेव भरहेराया तेणोमेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता करयल जाव जएणं विजएणं वद्धावेइ वद्धावित्ता एवं वयासी एवं खलु देवाणु प्पियाणं पिअट्टयाए पियं णिवेएमो पियं मे भवउ, तए णं से भरहेराया तस्स आउहघरिअस अंतिए एअमटुं सोच्चाणिसम्म हट्ठ जाव सोमणस्सिए नि असिअवरकमलणयणवयणे पयलिअवरकडग तुरिअ केऊर मउड कुंडलहार, विरायंतरइअवेच्छे पालंब पलंबमाणघोलंतभूसणधरे ससंभमं तुरिअं चवलं णरिंदे सीहासणाओ अब्भुट्टेइ, अब्भुट्टित्ता पायपीढाओ पच्चोरुहइ पच्चोरुहित्ता पाउआओ ओमुअइ ओमुइत्ता एगसाडिअं उत्तरासंगं करेइ करित्ता अंजलिमउलिअग्गहत्थे चक्करयणाभिमुहे सत्तट्ठपयाई अणुगच्छइ अणुगच्छित्ता वामं जाणुं अंचेइ अचित्ता दाहिणं जाणु धरणितलंसि णिहटूठु करयल जाव अंजलिं कटु चक्करयणस्स पणामं करेइ करित्तो तस्स आउहघरिअस्स अहामोलिअं मउडवज्जं ओमोअं दलइ दलित्ता विउलं जीविआरिहं पीइदाणं दलइ दलित्ता सक्कारेइ सम्माणेइ सक्करेत्ता सम्माणेत्ता पडिविसज्जेइ पडिविसज्जित्ता सोहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे सण्णिसण्णे । तएणं से भरहे राया कोडंबियपुरिसे सहावेइ सदावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पिआ!विणीअंशयहाणि सभितर बाहिरिअं आसिअसंमज्जिअ सित्त सुइगरत्थं तस्वीहिंअं मंचाइमंचकविणाणाविह Page #542 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५२८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे रागवसणऊसिअझयपडागाइपडागमंडिअं लाउल्लोइअमहिअंगोसीस सरस रत्त चंदणकलसं चंदणघरसुकय जावगंधुधुआभिरामं सुगंधवरगंधिअं गंध पट्टिभूअं करेह कारवेह करेत्ता कारवेत्ताय एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह । तए णं ते कोडंबिय पुरिसा भरहेणं रण्णा एवं वुत्ता हेट्ठ० करयल जाव एवं सामित्ति आणाए विणएणं वयण पडिसुगंति पडिसुणित्ता भरहस्स अंतिआओ पडिणिक्खमंति पडिणिक्खमित्ता विणीअंशयहाणी जाव करेत्ता कारवेत्ता य तमाणत्तिअंपञ्चप्पिणंति । तएणं णं से भरहे राया जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ योगच्छित्तो मज्जणघरं अणपविसइ अणु पविसित्ता समुत्तजालाकुलाभिरामे विचित्तमणिश्यण कुट्टिमतले रमणिज्जे ण्हाणमंडवंसि णाणामणिरयणभत्तिचित्तंसि पहाणपीढंसि सुहणिसण्णे सुहोदएहिं गंधोदए हिं पुप्फोदएहिं सुद्धोदएहिअ पुण्णे कल्लाणगपवर मज्जणविहीए मज्जिए तत्थ कोउअसएहिं बहुविहेहिं कल्लाणगपवरमज्जणावसाणे पम्हल सुकुमालगंधकासाइअ लूहिअंगे सरससुरहि गोसीस चंदणाणलित्तगत्ते अहयसुमहग्घद्सरयणसुसंवुडे सुइमालावण्णगविलवणे आविद्धमणिसुषण्णेकप्पिअहारद्धहार तिसरिअपालंबलंबमाणकडिसुत्त सुक यसोहे पिणद्ध गेविज्जगअंगुलिज्जगललिअंगयललियकयाभरणेणाणामणि कडगतुडिअथंभिअभूए अहिअसस्सिरीएकुंडलउज्जोइआणणे मउदित्त सिरए हारोत्थय सुकयवच्छे पालंबपलंबमाण सुकयपडउत्तरिज्जे मुदि ओ पिंगलंगुलिए णाणामणिकणगविमलमहरिहणिउणोअविअमिसि मिसिंतविरइअ सुसिलिट्ठविसिट्ठलट्ठसंठिअ पसत्थ आबिद्ध वीखलए किं बहुणा ? कप्परुक्खए चेत्र अलंकिअ विभूसिए णरिदे सकोरंट जाव चक्कचामर वालवीअंगे मंगलजयसद्दकयालोए अणेगगणणायग दंणणा यग जाव अ संधिवाल सद्धिं संपरिखुडे धवल महामेहणिग्गए इव जाव ससिब्ब पियदंसणे णरवई धूवपुप्फ गंधमल्लहत्थगए मज्जणघराओ पडिणि क्खमइ पडिणिक्खमित्ताजेणेव चक्करयणे तेणामेव पहारेत्थ गमणाए ॥३॥ Page #543 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० बक्षस्कारः सू० ३ भरतराज्ञः दिग्विजयादिनिरूपणम् ५२९ छाया-ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञोऽन्यदा कदाचिद् आयुधगृहशालार्या दिव्यं चक्ररत्नं समुदपद्यत, ततः खलु स आयुधगृहिको भरतस्य राक्षः आयुधगृहशालायां दिव्यं चक्ररन्नम् समुत्पन्न पश्यति, दृष्ट्वा च हृष्ट तुष्ट चित्तमानन्दितः नन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमनस्थितः हर्षपशविसर्पहृदयः यत्रैव दिव्यं चक्ररत्न तत्रैव उपागच्छति, उपागत्य त्रिः कृत्वः आदक्षिणप्रदक्षिणं करोति, कृत्वा करतल यावत् कृत्वा चक्ररत्नस्य प्रणाम करोति, कृत्वा आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्कामति, प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाहिरिका उपस्थानशाला यत्रैव भरतो राजा तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य करतल यावत् जयेन विजयेन वर्द्धयति, वर्द्धयित्वा एवमबादीत्-एवं खलु देवानुप्रियाणाम् आयुधगृहशालायां दिव्यं चक्ररत्नं समुत्पन्नं तदेतत् खलु देवानुप्रियाणां प्रियार्थतायै प्रिय निवेदयामः प्रियं भवतां भवतु, ततः खलु स भरतो राजा तस्य आयुधगृहिकस्य अतिके पतमर्थम् श्रुत्वा निशम्य हृष्ट यावत् सौमनस्यितः विकसितवरकमलनयनवदनः प्रचलितबरकटकत्रुटितकेयूरमुकुटकुण्डलहारविराजमानरतिदवक्षस्कः प्रालम्बप्रलम्बमानघोलद् भूषणधरः ससम्भ्रम त्वरितं चपलं नरेन्द्रः सिंहासनादभ्युत्तिष्ठति, अभ्युत्थाय पादपीठात् प्रत्यवरोबति, प्रत्यवरुह्य पादुके अवमुञ्चति, अवमुच्य एकशाटिकम् उत्तरासङ्ग' करोति कृत्वा अञ्जलिमुकुलिताग्रहस्तः चक्ररत्नाभिमुखः सप्ताष्टपदानि अनुगच्छति, अनुगत्य वामं जानुम् आकुञ्चयति, अकुच्य दक्षिण जानु धरणीतले निहत्य करतल यावदजलिं कृत्वा चक्ररत्नस्य प्रणाम करोति, कृत्वा तस्यायुधगृहिकस्य यथा मालितं मुकुटवर्जम् अवमोचक ददाति, दत्वा सत्कारयति, सन्मानयति, सत्कृत्य सन्मान्य प्रतिविसर्जयति, प्रतिविसl सिंहासन वरगतः पूर्वाभिमुखः सन्निषण्णः । ततः खलु स भरतोराजा कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति. शब्दयित्वा एवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः! विनीतां राजधानी साभ्यन्तरबाहिरिकाम् आसिक्तसमार्जितसिक्तशुचिकरथ्यान्तरवीथिकाम् मञ्चातिमञ्चकलिताम् नानाविधराग वसनोच्छ्रितध्वजपताकातिपताकमण्डिताम्, लापितोल्लोचितमहितां लिप्तोल्लोचित महिताम्वा, गोशोर्षसरसरक्तचन्दनकलशाम् चन्दनगृहसुकृत यावद्गन्धोद्धुताभिरामाम् सुगन्धवरगन्धिताम् गन्धवर्तिभूताम् एतामाप्ति प्रत्यर्पयत ततः खलु ते कौटुम्बिकपुरुषाः भरतेन राज्ञा एव मुक्ताः सान्तः हृष्ट तुष्ट० करतल यावत् एवं स्वामिन् ! आशायाः विनयेन वचनं प्रतिशण्वन्त प्रतिश्रुत्यः भरतस्य अंतिकात् प्रतिनिष्कामन्ति प्रतिनिष्क्रम्य विनीतां राजधानी यावत् कृत्वा कारयित्वा च तामाक्षप्ति प्रत्यर्पयन्ति । ततः खलु स भरतो राजा यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैवोपागच्छति , उपागत्य मज्जनगृहम् अनुप्रविशति अनुप्रवश्य समुक्तिजालाकुलाभिरामे विचित्रमणित्नकुट्टिमतले रमणीये स्नानमण्डपे नानामणिरत्नभक्तिचित्रे स्नानपीठे सुखनिषण्णः शुभोदकैः सुखोदकैर्वा गन्धोदकैः पुष्पो दकैः शुद्धोदकैश्च, पुनः कल्याणकारिबरमजनविधिना मज्जितः तत्र कौतुकशतैः बहुविधैः कल्याणक प्रबरमजनावसाने पक्षमलसुकुमालगन्धकाषायिकी रूक्षिताङ्गः सरससुरभिगोशीर्षबन्दनानुलिप्तगात्रः अहत सुमहार्घदुष्यरत्नसुसंवृत्तः शुचिमालावर्णकविलेपनः आविद्ध Page #544 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५३० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मणिसुवर्णः कल्पितहारार्द्धहारत्रिसरिकपालम्बप्रलम्बमानकटिस्त्रसुकृतशोभः, पिनद्धग्रेवे यकाऽगुलीयक ललिताङ्गकललितक चाभरणः, नानामणिकटकत्रुटिकस्तम्भितभुजः अधिक. सश्रीका, कुण्डलोदद्योतिताननः' मुकुटदीप्तशिरस्कः, हारावस्तृतसुकृतवक्षस्कः, प्रलम्बप्रलम्बमान सुकृतपटोद्योरोयका, मुद्रिकापिङ्गलागुलिकः नानामणि कनकविमल माहाधनिपुण 'ओअवि' परिकर्मित' मिसमिसेत' दीप्यमाना विरचितसुश्लिष्टविशिष्टलष्टसंस्थितप्रशस्ताविद्ध वीरवलयः, किं बहुना कल्पवृक्षक इव अलङ्कृतो विभूषितश्च नरेन्द्रः सकोरण यावत् चतुप्रचामर वालवीजिताङ्गः, मङ्गल जय जय शब्दकृतालोकः, अनेक गण नायक दण्डनायक यावत उतसन्धिपालैः साई संपरिखतः धवलमहामेघ निर्गत व यावत शशीव प्रियदर्शना नरपतिः धूपपुष्पगन्धमाल्यहस्तगतो मज्जनगृहात् प्रतिनिष्कामति, प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव चक्ररत्नं तत्रैव प्रधारितवान् गमनाय ॥ सू ३ ॥ टीका-"तए णं" इत्यादि । 'तए णं' ततोमाण्डलिकत्वप्राप्त्यनन्तरं खलु 'तस्स भरहस्स रण्णो' तस्य भरतस्य राज्ञः 'अण्णया कयाइ' अन्यदा कदाचित्-अन्यस्मिन् कस्मिंश्चित् काले माण्डलिकत्वं पालयतः वर्षसहस्रेगते सति 'आउहघरसालाए' आयुधगृ. इशालायां शस्त्रागारशालायाम् 'दिव्वे चक्करयणे समुप्पज्जित्था' दिव्यं चक्ररत्नं समुदपद्यतसमुत्पन्नम् 'तए णं' ततश्चक्ररत्नोत्पत्तेरनन्तरं खलु ‘से आउहघरिए' स आयुधगृहिकः-आयुधगृहशालारक्षकः 'भरहस्स रण्णो आउहघरसालाए दिव्वं चक्करयणं समुप्पण्णं पासइ' भरतस्य राज्ञः आयुधगृहशालायां दिव्यं चक्ररत्नं समुत्पन्न पश्यति 'पासित्ता' दृष्ट्वा 'हतुदृचित्त माणदिए' हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः, हृष्टतुष्टः-अतीवतुष्टः तथा चित्तेन __ आनन्दितः अत्र मकार आर्षत्वात्,यद्वा हृष्टतुष्टम्-अत्यथं तुष्टं हृष्टं वा-'अहो मया इदमपूर्व "भरतचक्रवर्ती का दिग्विजयादि का वर्णन" तएणं भरहस्स रण्णो अण्णया कयाइ' इत्यादि -सूत्र ३ टीकार्थ-(तरूणं) माण्डलिकत्व प्राप्ति के अनन्तर (तस्स भरहस्स) उस भरत की (अण्णया कयाइ) किसी एक समय जब को माण्डलिकत्व पदमें रहते रहते एक हजार वर्ष व्यतीत होगये तब- (माउहघरसालाए) शस्त्रागारशालामें (दिवे चक्करयणे समुपज्जित्था) दिव्य चक्ररत्न उत्पन्न हुमा ( तएणं से आउहधरिए भरहस्स रण्णा आउह धरसालाए दिव्वं चक्करयणं समुप्पण्णं पासइ ) जब आयुधशाला के रक्षक ने भरत की आयुधशाला में दिव्य चक्ररत्न उत्पन्नहुआ देखा तो ( पासित्ता ) देखकर वह ( हट्ट तुट्ठ चितमाणंदिए नंदिए पीइमणे परमसोमण __ "भरत २४तानी यानुन, 'त पणं तस्स भरहस्स दण्णो अण्णया कयाई' इत्यादि-सू० ४ बाय-तपण) issa प्राप्ति ५छी (तस्स भरहस्स) ते सतनी (अण्णया कयाई) १४ मे समये न्यारे भis४१ ५६ ५२ सभासीन २डेतों मे २ वर्ष यतात थगया त्यारे (आउहघरसालाप) शनाया२॥णाभा (दिध्वे चक्करयणे समुप्प Page #545 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका वक्षस्कारः सू० ३ भरतराशेः दिग्विजयादिनिरूपणम् ५३१ दृष्ट' मिति विस्मितं तुष्टं 'सुष्टु जातं यन्मयैव प्रथममिदमपूर्व दृष्टं यन्निवेदनेन स्वप्र. भुर्मा प्रोतिपात्रं करिष्यतो'ति सन्तोषमापन्नं यत्र तद् यथास्यात्तथा आनन्दितः प्रमोद प्रकर्षतां प्राप्त इत्यर्थः 'नदिए' नन्दितः मुखप्रसन्नतादिभावैः समृद्धिमुपगतः 'पीइमणे' प्रोतिमनाः प्रीतिः मनसि यस्य स तथा 'परमसोमणास्सए' परम सौमनस्थितः, परमं सौमनस्यं सुमनस्कत्वं जातमस्येति परमसौमनस्यितः, एतदेव व्यनक्ति 'हरिसवसविसपद्हदयः, हर्षवशेन विसर्पद् उल्लसद् हृदयं यस्य स तथा, एतादृशः आयुधशालारक्षक: 'जेगामेव दिवे चकारयणे तेणामेव उवागच्छइ' यत्रैव दिव्यं चक्ररत्न तत्रैवोपागच्छति, 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ' त्रि:कृत्व:-त्रीन् वारान् आदक्षिणप्रदक्षिणं दक्षिणहस्तादारभ्य प्रदक्षिण करोति, 'करेत्ता' कृत्वा च 'करयल जावस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहिअए जेणामेव दिवे चक्करयणे तेणामेव उवागच्छइ ) हृष्ट तुष्टअत्यन्त तुष्ट हुआ और चित्त में आनन्दित हुआ यहां प्राकृत होने के कारण मकार लाक्षणिक है अथवा वह हृष्ट तुष्ट हुआ इसका तात्पर्य ऐसाभी होता है कि वह बहुत अधिक तुष्ट हुआ और यह मैंने अपूर्व ही वस्तु देखो है इस ख्याल से विस्मित भी हुआ तथा बहुत अच्छा हुआ जो मुझे ही इस अपूर्व वस्तु के सर्व प्रथम दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है अबतो मैं इस बात को खबर अपने स्वामी के निकट भेजूंगा - और उनका प्रीतिपात्र बनने का सौभाग्य प्राप्त करूँगाइस प्रकार के विचार से वह संतुष्ट हुआ और आनन्द युक्त हुआ तथा नंदितहुमा मुख प्रसन्नता आदि भावों से वह समृद्धि को प्राप्त हुआ उसके मन में परम प्रीति जगी ( परमसोमणस्सिए) वह परम सौमनस्यित हुआ हर्ष के वश से उसका हृदय उछलने लगा और फिर वह जहां पर वह दिव्य चक्ररत्न था वहां पर गया(उवाग्गच्छिता तिवक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ करिता करयल जाव कट्टु चक्करयणस्स पणामं करेइ) वहाँ जाकर के उसने तीनबार आदक्षिण प्रदक्षिण किया दक्षिण हाथ की तरफ से लेकर वायें हाथ की तरफ तीन प्रदक्षिणाएं की तीन प्रदक्षिणा करके फिर उसने करतल यावत् करके चक्ररत्न को प्रणाम किया यहां यावत्पद से"करयल ज्जित्था) हिय २२पन्न यु. (तए णं से आउहरिए भरहस्स रण्णो आउह घरसालाए दिव्वं चक्करयणसमुप्पण्ण पासइ) यारे मायुध माना २क्ष भरतनी आयुध. शामा हिय य२न उत्पन्न थयेनयुता (पासित्ता) ने न ते (हतुट्टचित्तमाणं दिए नंदिए पीहमणे परमसोमणस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहिअए जेणामेव दिव्वे चक्करयणे तेणामेव उबागच्छइ) हष्ट-तुष्ट सत्यंत तुष्ट थये। मने वित्तमा मानहित या. અહીં પ્રાકૃત હોવાથી મકાર લાક્ષણિક છે. અથવા તે હુષ્ટ તુષ્ટ થયો એનું તાત્પર્ય આ પ્રમાણે પણ થાય છે કે તે બહુ જ વધારે તુષ્ટ થયા અને મેં અપૂર્વે વતુ જ જોઈ છે. એ વિચારથી વિસ્મિત પણ થયે તથા બહુ જ સારું થયું કે જે સર્વ પ્રથમ એ અપૂર્વ વસ્તુના દર્શનનો લાભ મને જ મળે. હવે તે એ વાતની જાણ હું મારા સ્વામીને કરીશ. એ જાતના વિચારથી તે સંતુષ્ટ થયે અને આનંદ યુકત થયે તેમ જ નંદિત થશે. મુખ प्रसन्नता मा साथी त समृद्धिन प्राप्त थयो. तेना भनमा ५२म प्रीति Mon (परम - - - Page #546 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५३२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कट्टु चकरयणस्स पणामं करेइ' अत्र यावत्पदात् 'करयल पडिग्गहिअं दसणहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि' इति संग्राह्यम्, करतलपरिगृहीतं दशनखं सिरसावर्त्त मस्तके अञ्जलिं कृत्वा, करतळाभ्यां परिगृहीतः करतलपरिगृहीतस्तं, दशकरद्वयसम्बन्धिनो नखाः समुदिता यत्र तं शिरसि मस्तके आवर्त्तः - आवर्त्तनं प्रादक्षिण्येन परिभ्रमणं यस्य तं तादृश मस्तके अव्जलिं कृत्वा चक्ररत्नस्य प्रणामं करोति 'करेत्ता' कृत्वा च 'आउह घरसालाओ पडिणिक्खमइ' आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिक्रम्य निर्गत्य च ' जेणामेव बाहिरिआ उवट्टाणसाला जेणामेव भरहे राया तेणामेव उवागच्छ' यत्रैव बाहिरिका आभ्यन्तरापेक्षया बाह्या, उपस्थानशाला आस्थानमण्डपः यत्रैव च भरतो राजा तत्रैवोपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य च 'करयल जाव जएणं विजएणं वद्धावे ' अत्रापि 'करयल जाव'त्ति करतल परिगृहीतं दशनखं शिरसावत्तं मस्तके अञ्जलिं कृत्वा जयेन विजयेन वर्द्धयति-स आयुधगृहिको जयविजयाभ्यां ' त्वं वर्द्धस्व' इत्याशिषं ददातीत्यर्थः 'वद्धावित्ता एवं वयासी' वर्द्धयित्वा च एवमवादीत् - एवं वक्ष्यमाण पडिग्गहि दसणहं सिरखावत्तं मत्थए अंजलि" इस पाठक संग्रह हुआ है इसका भाव ऐसा है कि चक्ररत्न को प्रणाम करते समय उसने दोनो हाथों की अंजलि इस प्रकार की बनाई कि जिसमें १० अगुलियों के नख आपस में मिल जावें इस प्रकारसे अंजलि बनाकर उसने उस अंजलि को मस्तक की दाहिनी और से बाई ओर तीन बार फिराया- इस ढंग से उसने उसे प्रणाम किया (करिता आउहघरसालाए पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमिता जेणामेव बहिरिआ उवद्वाणसाला जेणामेव भरहे राया तेणामेव उवागच्छइ) प्रणाम करके फिर वह उस आयुधशाला से बाहर निकला और निकल कर जहाँ बाहिरी उपस्थानशाला ( बाहरी कचहरी थी और उसमें जहाँ भरत राजा बैठे थे वहां पर आया ( उवागच्छित्ता ) वहां आकरके ( करयल जाव जएणं विजसोमस्सिए) ते परम सौमनस्थित थयो- दुर्षाविशथी तेनुं हृदय छजना सायुं भने पछी ते ज्यां ते हिव्य रत्न तु त्यां गये. ( उवाग्गच्छित्ता तिक्खुतो आयाहिणपयाहिणं करे करिता करयल जांव कट्टु चक्करयणस्स पणामं करेइ) त्यां धने तेथे नागु बार દક્ષિણ પ્રદક્ષિણા કરી—દક્ષિણ હાથ તરફથી લઈને ડાબા હાથ તરફે ત્રણ પ્રદક્ષિણાએ કરી ત્રણ પ્રદક્ષિણા કરીને પછી તેણે કરતલ યાવત્ કરીન ચક્રરત્નને પ્રણામ કર્યાં અહી' યાવત્ थी (करयल डिगहि दसणहं सिरसावत्तं मत्थप अंजलि) मा पाउने संग्रह थयेले। છે. એને ભાવ આ પ્રમાણે છે કે ચક્રરત્નને પ્રણામ કરતી વખતે તેણે બન્ને હાથેાની અજળિ આ પ્રમાણે બનાવી કે જેમાં ૧૦ આંગળીઓના નખા પરસ્પર મળી જાય આ પ્રમાણે અજળિ બનાવીને તેણે તે અંજળિને મસ્તકની જમણી બાજુથી ડાબી બાજુ ત્રણ વખત ईवी. या रीते तेथे प्रणाम अर्था (करिता आउद्दघरसालाप पडिणिक्खमइ पडिणिक्खभित्ता जेणामेव बाहिरिआ उवट्ठाणसाला जेणामेव भरहे राया तेणामेव उवागच्छछ) પ્રણામ કરીને પછી તે આયુધ શાળામાંથી બહાર નીકળ્યા અને નીકળીને જયાં બહાર Page #547 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ• वक्षस्कारः सू० ३ भरतराज्ञः दिग्विजयादिनिरूपणम् प्रकारेण उक्तवान् , किं तदित्याह-'एवं खलु देवाणुप्पियाण आउहघरसालाए दिव्वे चक्करयणे समुप्पण्णे त एयणं देवाणुप्पियाणं पियट्टयाए पियं णिवेएमो पियं भे भवउ' एवं खलु इत्थमेव यदुच्यते मया तद् सर्वथा सत्यमेव यद्देवानुप्रियाणाम् आयुधगृहशालायां शस्त्रागारशालायां चक्ररत्न समुत्पन्न तदेतत् खलु देवानुप्रियाणां प्रियार्थतायै-प्रीत्यर्थ प्रियम् इष्टं निवेदयामः एतत् प्रियनिवेदनं प्रियम् 'भे' भवतां भवतु . ततो भरतः किं कृतवान् इत्याह-'तए णं' इत्यादि । 'तए णं से भरहे राया तस्स आउघरिअस्स अंतिए एयमढे सोच्चा णिसम्म हट्ठ जाव सोमणस्सिए' ततः खलु स भरतो राजा तस्य आयुधगृहीकस्य अन्तिके एतमर्थ श्रुत्वा निशम्य हृष्ट यावत् सौमनस्यित,तत आयुधगृहिकस्य आयुधशालारक्षकस्य अन्तिके समीपे एतं चक्ररत्नोत्पत्तिरूपम् अर्थ श्रुत्वा निशम्य ह्रद्यवधार्य इष्ट यावत्सौमनस्यितः, अत्र यावत्पदात् पूर्ववद् बोध्यम् । तथा-'विभसियवर कमलणयणवयणे' विकसितवरकमलनयनवदनः तत्र-विकसिते वरकमलवन्नयनवदने यस्य स तथा-प्रफुएणं वद्धावेइ) उसने पूर्वोक्तानुसार भरत राजा को प्रणाम किया और आपकी जय हो आपकी विजय हो इस प्रकार जय विजय के शब्दों को उच्चारण करते हुए उसने उन्हें बधाइ दी ( वद्धावित्ता एबं वयासी ) बधाई देकर के फिर उसने ऐसा कहा( एवं खलु देवाणुप्पियाणं आउहधरसालाए दिव्वे चककरयणे समुप्पण्णे ) हे देवानुप्रिय ! आपकी आयुधशाला में आज दिव्यचक्ररत्न उत्पन्न हुआ है ( तं एअण्णं देवाणुप्पियाणं पियद्रयाए पिअं णिवेएमो ) तो हे देवानुप्रिय ! मैं आप की प्रीति के लिये आया है ( पिअं भे भवउ तएणं से भरहे राया तस्स आउहधरिअस्स अंतिए ए अमट्ट सोच्चा णिसम्म हट जाव सोमणस्सिए ) यह मेरे द्वारा निवेदित हुआ अर्थ आपको प्रिय हो इस प्रकार उस आयुधशाला के मनुष्य से सुनकर के और उसे हृदय में धारण करके वह भरत राजा हष्ट यावत् सौमतस्थित हुआ यहां पर भी यावत्पद से पूर्वोक्त पाठ गृहीत हुआ है । (वियसियवरकमलणयणवयणे पयलिअवरकडगतुडिअकेऊर मउड कंडल हारविरायंतरइवच्छे पालवपलंबमाण घोलंत भूषण धरे) उसके सुन्दर दोनो नेत्र और मुख श्रेष्ठ कमल के जैसे विकसित हो गये, चक्ररत्न की उत्पत्ति के श्रवण से जनित ઉપસ્થાન શાળા હતી (બહાર કચેહરી હતી અને તેમાં જ્યાં ભારત રાજા બેઠા હતા ત્યાં गया. (उवागच्छित्तो) त्यां न (करयल जाव जपण विजएणं बद्धावेइ) तेथे पताનુસાર ભરત રાજાને પ્રણામ કર્યા અને તમારે જય થાઓ, તમારે જય થાઓ, આ પ્રમાણે "य-विनय श यरता ad तभत वधामी मापी. (वद्धमवित्ता एवं वयासी) वधामा मापात ५छी तो यु (एवं खलु देवाणुप्पियाणं आउहघरसालाप दिव्वे चक्करयणे समुप्पण्णे) यानुप्रय ! तारी आयुधशामां मारे ६०य यन पन्नथय छ. (तं पअण्णं देवाणुप्पियाण पियट्टयाए पिअणिवेएमो) । वानुप्रिय ! तमाश पासेट अथ विनिवेदन ४२५ म.ये। छु. (पि मे भवउ तए णं से भरहे राया तस्स आउहधरोअस्स अंतिए एअमé सोच्चा णिसम्म ह९ जाव सोमणस्सिए) भा। पर Page #548 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ल्लवरपङ्कजलोचनमुखः. तथा-'पयलियवरकडगतुडियकेऊरमउडकुंडलहारविरायंतरइम वच्छे'प्रचलितवरकटकाटितकेयूरमुकुटकुण्डलहारविराजमानरतिदवक्षस्कः, तत्र प्रचलितानि चक्ररत्नोत्पत्तिश्रवणजनितसम्भ्रमातिशयात् कम्पितानि वरकटके प्रधानवलये त्रटिके बाहुरक्षको केयूरे वाहोरेव भूषगविशेषौ मुकुटं कुण्डले च यस्य स तथा सिंहावलोकनन्यायेन भूयः प्रचलितशब्दस्य ग्रहणात् प्रचलितहारेण विराजमानरतिदम् आनन्ददं वक्षो यस्य स तथा पश्चात् पदद्वयस्य कर्मधारयः, 'पालंबपल बंमाणघोलंतभूसणधरे' प्रालम्ब प्रलम्बमान घोलद्भूषणधरः, तत्र प्रलम्बमानः सम्भ्रमादेव पालम्बो झुमकं यस्य स पालम्बप्रलम्बमानः,घोलद दोलायमान भूषण धरित यः स घोलभूषणधरःततः पदद्वयस्य कर्मधारयःअत्र 'पालंबपलंबमाण' इत्यत्र पदव्यतिक्रमः आषत्वात् एतादृशः सन् भरतो राजा 'ससंभमं तुरिअं चवलं सिंहासणाओ अन्भूट्टेइ' ससंभ्रम सादरं सोत्सुकं वा त्वरितं-मानसौत्सुकयं वा यथास्यात्तथा चपलं-कार्योत्सुक्यं यथास्यात्तथा नरेन्द्रो भरतः सिंहासनादभ्युत्तिष्ठत्ति 'अब्भुट्टित्ता' अभ्युत्थाय 'पायपीढाओ' पादपीठात् पदासनात् 'पच्चोरुहाइ' प्रत्यवरोहति अवतरति 'पच्चोरुहित्ता पाउआओ ओमुअइ' प्रत्यवरुह्य अवतीर्य पादुके पादत्राणे अवमुश्चति त्यजति 'ओमुइत्ता' अवमुच्य त्यक्त्वा 'एगसाडिअं उत्तरासंगं करेई' एकःशाटो अत्यंत संभ्रम के वश से हाथों के श्रेष्ठ कटक, त्रुटिक- बाहुरक्षक, मुकुट और कुण्डल चञ्चल हों उठे वक्षस्थल पर विराजित हार हिलने लगा. गले में लटकती हुइ लम्बी २ पुष्पमालाएं चञ्चल हो उठो अनेक आभूषण आनन्दातिरेक के मारे शरीर में कसकने लगे इस प्रकार से वह प्रफुल्लित नेत्र और मुखवाला होकर एवं कटक, कुण्डल तथा लटकती हुइ मालाओं को शरीर पर धारण कर (ससंभमं तुरियं चवलं णरिंदं) बड़ी उतावल से या बड़ी उत्कंठा से अपने कार्य की सिद्धि में चञ्चल जैसा बन कर वह भरत राजा (सिंहासणाओ अन्भुदेइ ) सिंहासन से उठा ( अब्भुद्वित्ता पायपीढ़ाओ पच्चोरुहइ) और उठकर वह पाद पीठ पर पैर रख कर नीचे उतरा ( पच्चोरुहित्ता पाउयाओ ओमुयइ ) नीचे उतर करके उसने दोनो पैरो में पहिरी हुई खडाऊं को उतार दिया- (ओमुइत्ता एगसाडिअं उत्तरासंगं करेइ) वडाऊँओं को उतार कर फिर નિવેદત એ અર્થ તમને પ્રિય થાઓ. આ પ્રમાણે તે આયુધશાળાના માણસના વચન સાંભળીને અને તેને હદયમાં ધારણ કરીને તે ભરત રાજા હૃષ્ટ યાવત સૌમનસ્થિત થયે. આ यावत् ५४थी पूर्वात ५४ गडीत थये। छे (वियसियवरकमलणयणवयणे पयलिअवर कडगतुडिअकेऊर कुंडलहारविरायंतरइवच्छे पालंबपलत्रमाणघालंत भूसणधरे) तना અને સુંદર નેત્રો અને મુખ શ્રેષ્ઠ કમળની જેમ વિકસિત થઈ ગયાં ચક્રરત્નની ઉત્પત્તિ જનિત અત્યંત સંભ્રમના વંશથી હાથના શ્રેષ્ઠ કટક, ત્રુટિક–બાહુરક્ષક, મુકુટ અને કુંડળે ચંચળ થઈ ગયા. વક્ષસ્થળ-સ્થિત હાર હાલવા લાગ્યો. ગળામાં લટકતી લાંબી-લાંબી પુષ્પ માળાએ ચંચળ થઈ ગઈ અનેક આભૂષણે આનંદાતિરેકથી શરીરમાં સળકવાં લાગ્યાં આ પ્રમાણે તે પ્રકુલ્લિત નેત્ર અને મુખવાળે થઈને તેમજ કટક, કુંડળ તથા લટકતી માળાसाने शरी२ ५२ था२९५ ४शन (ससे भमं तुरियं चवलं गरिंद) ये GIquथी अथवा Page #549 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ• वक्षस्कारः सू० ३ भरतराज्ञः दिग्विजयादिनिरूपणम् ५३५ यत्र स एकशा टकम् अखण्डशाटकम् अस्यूतमित्यर्थः करोति 'करेत्ता' कृत्वा 'अंजलिमुउलि अग्गहत्थे'अजलिना मुकुलितौ कुड्मलाकारीकृतौ अग्रहस्तौ हस्ताग्रभागौ येन सोऽञ्जलिमुकुलिताग्रहस्तः 'चकरयणाभिमुहे' चक्ररत्नाभिमुखे भूत्वा 'सत्तहपयाई अणुगच्छइ' सप्तवा अष्टौ वा पदानि अनुगच्छति सिंहासनादग्रे गच्छति 'अणुगच्छित्ता' अनुगत्य 'वामं जाणु अंचेइ' वामं जानुम् आकुञ्चयति-ऊवं करोति 'अवेत्ता' आकुच्य-ऊर्ध्व कृत्वा'दाहिणं जाणु धरणोतलंसि णिहट्ट करयल जाव अंजलिं कट्टु चक्करयणस्स पणामं करेइ' दक्षिणं जान धरणीतले निहत्य-निवेश्य करतलपरिगृहीतं दशनखं शिरसावर्त मस्तके अजलि कृत्वा चक्ररत्नस्य प्रणामं करोति 'करेत्ता' कृत्वा 'तस्स अउहघरिअस्स अहामालिअ मउडवज्जं ओमोअंदलई' तस्याऽऽयुधगृहिकस्य 'यथामालितं' यथा धारितं यथा परिहितम् अवमुच्यते-परिधीयते यः सोऽवमोचकः-आभरणविशेषस्तं मुकुट वर्ज मुकुटं विना सर्वभूषणं ददाति, मुकुटस्य राजचिह्नालङ्कारत्वेनादेयत्वात् 'दलित्ता' उसने एक शाटिक- विनाजुड़ाहुआ- उत्तरासङ्ग धारण किया- (करित्ता अंजलि मलिअग्ग हत्थे चक्करयणाभिमुहै सत्तट्ठपयाइ अणुगच्छइ ) ऊत्तरासङ्ग धारण करके फिर उसने अपने दोनो हाथों को कुड्मलाकारीकृत किया और चक्ररत्न की तरफ उन्मुख होकर वह- (सत्तद्र पयाई अणुगच्छइ) सात आठ पैर आगे चला-(अणुगच्छिता वामं जाणुं अंजेइ, अचेत्ता दाहिणं जाणुं धरणो तलंसि णिहटु करयल जाव अंजलिं कटु चक्करयणस्त पणामं करेइ ), आगे चलकर उसने फिर अपने बाये जानु को ऊँचा किया ऊंचा करके फिर उसने अपने दक्षिण जानु को जमीग पर रखा और करतल परिगृहीतवालो, दश नखों के आपस में जोडने वाली ऐसी अजलि को तीनवार आदक्षिण प्रदक्षि करते हुए चक्ररत्न को प्रणाम किया ( करेत्ता तस्स અતી ઉત્કંઠાથી તે પોતાના કાર્યની સિદ્ધિમાં ચ ચળ જે થઈને તે ભરત રાજા (fહાसणाओ अब्भुइ) सिंहासन पथ से थो. (अब्भुट्टित्ता पायपीढाओ पच्चोरुहाइ) भने अमा छन त पापी 6५२ ५५ भूटीन नीय उती. (पच्चोरुहित्ता पाउयाओ ओमुयइ) नाय तरी तमन्२ पगमा परेका पाहुणे उतारी नाभी. (ओमुइत्ता पगसाडि उत्तरासंगं करेइ) पास तारीने पछी तणे ४ साटि-२ सिवे-उत्तरास घा२५ यु-(करित्ता अंजलिमुउलिअग्गहत्थे चक्करयणाभिमुहे सत्तट्ठपयाई अणुगच्छद) ઉત્તરાસંગ ધારણ કરીને પછી તેણે પિતાના અને હાથને કુહૂમલા કારે કરીને અને ચક્રરત त२६ 6-y५ थने त ( सत्तहपयाई अणुगच्छइ ) सात-मा8 असा माण ध्ये। (अणुगच्छित्ता बाम जाणु अंचेइ अंचेत्ता दाहिणं जाणु धरणीतलंसि णिहटूटुकरयल जाव अंजलि कटूटु चक्करयणस्व पणामं करेइ) मा वधान २ ते पातानी मी जानु ( धू न ઊરો કરીને પછી તેણે પોતાની જમણી જાનુ (ઘૂંટણ)ને પૃથ્વી પર મૂકી અને કરતલ પરિગ્રહી. તવાળી, દશનોને પરસ્પર જોડનારી એવી અંજલિકરીને ત્રણવાર આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણા કરતાં २४२नने पहनी . (करेत्ता तस्स अउहपरिअरस अहामालिअंमउडवज्जं ओमोऊ दलइ दलहत्ता विउलं जीविआरिहं पीइदाण दलइ) वदन शन पछी त भरत साये Page #550 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे दत्त्वा 'विउलं जीविआरिहं पीइदाणं दलइ' विपुलं-प्रचुरं जीविकाईम्-आजीविकायोग्यं प्रीतिदानं ददाति 'दलित्ता' दत्वा 'सक्कारेइ सम्माणेइ' सत्कारयति वस्त्रादिना सन्मानयति वचनबहुमानेन 'सक्कारता सम्माणेत्ता' सत्कृत्य सन्मान्य च 'पडिविसज्जेइ' प्रतिविसर्जर्यात स्वस्थानगमनाय समादिशति । 'पडिविसज्जेत्ता' प्रतिविसयं 'सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे सण्णिसण्णे' सिंहासनवरगतः श्रेष्ठसिंहासनस्थितः पूर्वाभिमुखः सन्निषण्णः उपविष्टः। अथ भरतो यत्कृतवान् तदाह-'तएणं' इत्यादि । 'तएणं से भरहे राया कोडुंबियपुरिसे सदावेइ' ततः खलु स भरतो राजा कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति अवयति 'सद्दावेत्ता' शब्दयित्वा च 'एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत उक्तवान् किमुक्तवानित्याह-'खिप्पामेव' इत्यादि 'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! विणीयं रायहाणि सभिंतरबाहिरियं' क्षिप्रमेव शीघ्रमेव भो देवानुप्रियाः ! विनीतां राजधानी साभ्यन्तरबाहया अन्तर्बाह्याम् अन्तर्बाह्यभागसहिता 'आसिय संमज्जियसित्त सुइगरत्थंतरवीहियं' तत्र आसिक्त संमाजित सिक्त शुचिक रथ्यान्तर वीथिकाम् आसिक्ता गन्धोआउधरिअस अहामालिअं मउडवज्जं ओमोऊ दलइ दलइता विउलं जीविआरिहं पोइदाणं दलइ) प्रणाम करके फिर उस भरत राजा ने उस आयुध गृहिक के लिये अपने मुकुट को छोड़ कर बांकी के सब पहिरे आभूषण उतार कर दे दिये और भविष्य में उसकी आजीविका चलती रहे इसके योग्य विपुल प्रीतिदान दिया ( दलित्ता सक्कारेइ, सम्माणेइ, सक्कारेत्ता, सम्माणेता, पडिविप्लज्जइ, पडिविसज्जेत्ता सीहासण वरगए पुरत्थाभिमुहे सपिणसण्णे ) विपुल प्रीतिदान देकर फिर उसने उसका वस्त्रादि के द्वारा सन्मानकिया, बहुमान द्वारा उसका सन्मान किया इस प्रकार उसका सत्कार और सन्मान करके फिर उसने उसे विसर्जित कर दिया विसर्जित करके फिर वह अपने श्रेष्ठ सिंहासन पर पुर्वदिशा की आत તે આયુધ ગૃહિકને પિતાના મુકુટ સિવાય ધારણ કરેલાં બધાં આભૂષણે ઉતારીને આપી દીધો અને ભવિષ્યમાં તેની આજીવિકા ચાલતી રહે તે પ્રમાણે વિપુલ પ્રમાણમાં પ્રીતિદાન આપ્યું (दलित्ता सक्कारेइ सम्माणेइ, सक्कारेत्ता, सम्मोणेत्ता पडिविसज्जेइ, पडिविसज्जेत्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे सण्णिसण्णे) विपुल प्रीतिहान सापाने तो तेनु राशि સન્માન કર્યું, બહુમાન વડે તેનું સન્માન કર્યું. આ પ્રમાણે તેને સત્કાર અને સન્માન કરીને પછી તેણે તેને વિસર્જિત કરી દીધો. વિસર્જિત કરીને પછી તે પિતાના શ્રેષ્ઠ સિંહાसन 6५२ पूर्व दिशा त२५ भु५ ४शने सारी शत सी गयी. (तएणं से भरहे राया कोड वियपुरिसे सद्दावेइ) त्या२ मा ते भरत राये पोताना मि मासान सोसाव्यां (सहावित्ता एवं वयासी) अने मालावीन तेमन तेथे । प्रभारी ४ (खिप्पामेव भो देवाणुपिया? विणीअं रायहाणि सब्मितरवाहिरिबं आसियसमन्जियसित्त सुइगरत्यंतरवीहियं मंचाई मंचकलिअ) हेवानुप्रिया ! तमे सौ शीध्र विनीत रामपानी ને અંદર અને બહારથી એકદમ સ્વચ્છ કરે, સુગંધિત પાણીથી સિંચિત કરે, સાવરણીથી કરો સાફ કરે, જેથી રાજમાર્ગો અને અવાન્તરમાર્ગે સારી રીતે સ્વચ્છ થઈ જાએ. દર્શન Jain Education international Page #551 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० वक्षस्कारः ३ भरतराज्ञः दिग्विवियादिनिरूपणम् _____ ५३७ दकादिभिरीषत्सित्ता, संमार्जिता संमार्जनैः परिस्कृता अतएव शुचिका संमृष्टा रथ्या राजमार्गोऽन्तरवीथी च अवान्तरभागो यस्यां सा तथा ताम् 'मंचाइमंचकलियं' तत्र मश्चातिमञ्चकालिताम् मञ्चा:-मालकाः दर्शकजनोपवेशनार्थम् अतिमञ्चाः तेषामप्युपरि ये तैः कलिता युक्ता ताम् 'णाणाविह रागवसण ऊसिअझयपडागाइपडागमंडियं' तत्र नानाविधो रागो-रजनं येषु तानि वसनानि वस्त्राणि येषु तादृशा ये उच्छ्रिता उर्वीकृता ध्वजाः-सिंहगरुडादिरूपकोपलक्षिता बृहत्पट्टरूपाः पताकाश्च तदितररूपाः, अतिपताकाः तदुपरि वर्तिन्यः पताकास्ताभिर्मण्डिताम् 'लाउल्लोइयमहियं' तत्र लापितोल्लोचितम हितां यद्वा लिप्तोल्लोचितमहिताम्, तत्र लापितं छगणादिना लेपनम्, उल्लोचितं सेटिकादिना कुड्यादिषु धवलनं ताभ्यां महितमिव महितं शोभितं प्रासादोदि यस्यां सा तथा ताम्, यद्वा लिप्तं छगणादिना, उल्लोचितम् उल्लोच युक्तं प्रासादादि यस्यां सा तथा ताम् 'गोसीससरसरत्तचंदणकलसं' गोशीर्षसरसरक्तचन्दनकलशां तत्र गोशीर्षैः सरसरक्तचन्दनैश्च युक्ताः शोभाथ कलशाः यस्यां ताम् 'चंदणघडसुकय जाव गंधुधुयाभिरामं चन्दनघटसुकृत यावद्गन्धोधृताभिरामाम् अत्र यावत्पदेन 'चंदण घड मुँह करके अच्छी तरह से वैठ गया (तएणं से भरहे राया कोडंबियपुरिसे सद्दावेइ) बादमें उस भरत राजा ने अपने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया (सहावित्ता एवं वयासी) और बुलाकर उनसे उसने ऐसा कहा – (विप्पामेव भो देवाणुप्पिया विणीअं रायहाणि सभितरबाहिरिझं आसिय संमज्जियसित्तसुइगरत्थंतरवीहियं मंचाइमंचकलिअं) हे - देवानुप्रियो ! आपलोग बहुत ही जल्दी विनीता राजधानी को भीतर और बाहर से बिलकुल साफ सुथरी करो सुगंधित पानी से उसे सिञ्चित करो, बुहारी से कूडा कचरा निकाल कर उसकी सफाइ करो की जिससे राजमार्ग और अवान्तर मार्ग अच्छी तरह साफ सुथरे हो जावें दर्शकजनों के बैठने के लिये मंचों के ऊपर मंचो को सुसज्जित करो (णाणाविहरागवसणऊसिम झयपडागाइपडागमंडियं) अनेक प्रकार के रंगों से रंगे हुए वस्त्रों की ध्वजाओं से पताकाओं से-कि जिनमें सिंह गरुड आदि के चिह्न बने हों तथा अतिपताकाओं से-इन पताकाओं के उपर फहरातो हुइ बड़ी२ लम्बी पताकाओं से-उसे मण्डित करो (लाउल्लोइयमहियं ) जिनकी नोचेकी जमीन गोबर आदि से लिपी हो और चूने की कलई से जिनकी दीवार पुती हों ऐसे प्रासादादिको वाली उसे बनाओ (गोसीससरसरत्तचंदणकलसं) शोभा के निमित्त हर एक दरवाजे पर ऐसे कलशों को रखो कि जो गोशीर्षचन्दन से और रक्तचंदन से उपलिप्त हो (चंदनघडसुकय जाव गंधुद्ध्याभिरामं) अने सपा माटे भयानी 6५२ भयो। सुस ४२१. (णाणाविहरागवसणऊसिअझय पडागाइ पडागमंडियं) अने तन माथी गाया पत्रानी माथी-पतासाथी કે જેની અંદર સિંહ, ગરુડ વગેરેના ચિહ્નો હોય તેમજ અતિ પતાકાઓથી-એ પતાકાઓની ઉપર ફરકતી બહુજ મૉટી-મેટી લાંબી પતાકાઓથી-વિનીતા નગરીને મંડિત કરો (ला उल्लोइय महिय) रेमनीनीयानी भूमि छ। गेरेथा विस्त डाय अने यूनानी थी Page #552 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५३८ जम्बूद्वीप्राप्तिसूत्रे सुकयतोरण पडिदुवारदेसभायं आसत्तोसत्तविउलबट्टवग्धारिय मल्लदामकलावं पंचवण्णसरस सुरभिमुक्कपुप्फपुंजोवयारकलियं, कालागुरुपवरकुंदुरुक्कतुरुक्कधुवडज्झंतमघमघंत गंधुदुयाभिरामं' इति पर्यन्तं ग्राह्यम् । तत्र चन्दनघटसुकृततोरणप्रतिद्वारदेशभागाम्, तत्र चन्दनघटाश्च सुकृतानि सुष्टुकृतानि मुष्टुतया निवेशितानि तोरणानि च प्रतिद्वारदेशभागे यस्याः सा तथा ताम् यत्र प्रतिद्वारे चन्दनयुक्त घटाः सुष्टुतोरणानि च सन्तीत्यर्थः, आसक्तोसक्त विपुलवृत्तावतारितमाल्यदामकलापाम्, तत्र आसक्तो भूमिसंसक्तः, उत्सतः-उपरि संसक्तः, विपुलो विस्तीर्णः, वृत्तो वर्तुलो गोलकारः, उपरिदेशात अवतारितः प्रलम्बमानीकृतः, माल्यानि पुष्पाणि तेषां दामानि मालाः तेषां माल्यदाम्नां कलापः-समूहो यस्यां सा तथा ताम् पंचवर्णसरससुरभिमुक्त पुष्पपुजोपचारकलिताम्, तत्र पञ्चवर्णानि कृष्णनीलादि पञ्चवर्णयुक्तानि सरसानि सुरभीणि सुगन्धीनि च तानि मुक्तानि विकीर्णानि यानि पुष्पाणि तेषां पुजैरुपचाराः-रचनाविशेषाः, तैः कलितां युक्ताम्, कलागुरुप्रवरकुन्दरुष्कतुरुष्कधूपदह्यमानातिशयगन्धोधुताभिरामाम्, तत्र कालागुरु प्रवरकुन्दरुष्कतुरुष्काः श्रेष्ठगन्धद्रव्यविशेषाः प्रसिद्धाः, धूप प्रसिद्धः एते दह्यमाना अग्नौ प्रक्षिप्यमाणास्तेषां 'मघमघंत' अतिशयितो यो गन्धः उधुत:-सर्वतः प्रसृतः तेन प्रत्येक द्वार पर चन्दन के घड़ो को तोरण के आकार में स्थापित करो यहां यावत्पदसे "चंदण घडसुकय तोरण पडिदुवारदेसभायं आसत्तोसत्तविउलवटेवग्धारिय मल्लदामकलावं, पंचवण्णसर. ससुरभिमुक्कपुप्फपुंजोवयारकलियं, कालागुरुपवर कुंदरुक्क तुरुक्क धूवडझंतममघमघंत गंधुद्ध्याभि. राम) इस पाठ का संग्रह हुआ है . इसका भाव ऐसा है किऐसी लटकती हुइ मालाओ के समूह से इस नगरी को अलड्कृत करो कि जो मालाओं का समुदाय ऊपर नीचे दोनों ओर से पानी के छिड़काव से तर हो रहा हो विस्तीर्ण हो गोल हो और ऊपरकी ओर नीचे की ओर लटकता हुआ हो,नगरी में ऐसे पांच वणों के पुष्पों विखरो कि जो सुरमित हो सुगंधित हों- एवं सरस है-शुष्क नहीं हो नगरी को और अधिक सुगंधित बनाने के लिये कालागुरु, प्रबलश्रेष्टकुन्दरुष्क और तुरुष्क - लोमान, इन सबधूपों को सुगंधित द्रव्य २भनी हावाल सापेसा डाय सेवा प्रासाहिवाणी नगरीने अनावीन (गोसीस सरसरत्तचंदणकलसं) शामा-निमित्त २४ द्वा२ ५२ मेवा ।। भू। है रेया गोशी यहन अने २४त हनथी पति य. (चंदणघडसुकय जाव गंधुधुयाभिरामं) हरे४ द्वा२ ५२ हनन शान तोरनामा४२मा स्थापित ४२१. अही यावत् ५४थी (चंदणघडसुक यतोरणपडिदुवारदेसभाय आसत्तोसत्तविउलवट्टबग्धारियमल्लदामकलावं, पंचवण्ण सरस सुरभिमुक्क पुप्फ पुंजोवयारकलियं, कालागुरु, पवरकुंदरुक्कतुरुक्कधूवडज्झंत मघमघंत गद्धधूयाभिराम) मा पाउन सब या छे. मेन माप 1 प्रमाणे छे सेवा લટતી માળાના સમૂહોથી આ નગરીને અલંકૃત કરે કે જે નાળાઓના સમુદા ઉપર નીચે બંને તરફથી પાણીનો છંટકાવથી તરબોળ થઈ રહ્યા હોય, તે વિસ્તાણું હોય, ગોળ હોય અને ઉપરથી નીચે લટકતી હોય, આ નગરીમાં એવાં પાંચવણેના પુપોને વિકીર્ણ Page #553 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० ३ भरतराशदिग्विजयादिनिरूपणम् ५३९ अभिरामाम् । अतएव' सुगंधवरगंधियं' सुगन्धवरगन्धिताम् 'गंधवट्टिभूयं' गन्धवर्तिभूताम् सुगन्धवर्तिकारूपाम् ईदृशविशेषणविशिष्टाम् 'करेह कारवेह' कुरुत स्वयम् कारयत परैः 'करेत्ता, कारवेत्ता' य कृत्वा कारयित्वा य 'एय माणत्तियं पच्चप्पिणह' एतामाज्ञप्तिकांप प्रत्यर्पयत एतामाज्ञप्तिम्-आज्ञां प्रत्यर्पयत समऽर्पयत ततस्ते किं कुर्वन्तीत्याह-'तए णं' इत्यादि । 'तए णं ते कोडुंबियपुरिसा भरहेणं रण्णा एवं वुत्ता समाणा' ततः खलु ते कौटुम्बिकपुरुषाः भरतेन राज्ञा एवमुक्काः सन्तः ततो भरताज्ञानन्तरं ते कौटुम्बिकपुरुषाः राजसेवकाः भरतेन राज्ञा एवमुक्तप्रकारेणोक्ताः सन्तः 'हट० करयल जाव' इष्टाः करतल यावत तत्र इष्टाः करतल यावत परिगृहीतं दशनखं शिरसावत्त मस्तके अजलिंकृत्वा ‘एवं सामित्ति ! आणाए विणएणं वयणं पडिसुणंति' एवं स्वामिन् ! आज्ञाया विनयेन वचनं प्रतिशृण्वन्ति एवं स्वामिनः यथाऽऽयुष्मन्तः आदिशन्ति तथेति कृत्वा आज्ञायाः विनयेन वचनं प्रतिशृण्वन्ति स्वीकुर्वन्तोति ततस्ते किं कुर्वन्तीत्याह—'पडिसु. णित्ता भरहस्स अंतियाो पडिणिक्खमंति' प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य भरतस्य राज्ञोऽन्तिकात् विशेषों को – अग्नि में जलाओ एवं अतिशयरूप से इनके निकले हुए धूम की गन्ध से उसे सुगंधो का भंडार बनाओ "सुगंधवरगंधिअं गंधवटिभूअं करेह कारवेह" यहीबात इन पदों द्वारा विशेषरूप से पुष्ट की गइ है 'करेह' क्रियापद का अर्थ है आप सब इस बात को स्वयं करो तथा "कारवेह" दूसरो' से भी कराओ "करेत्ता कारवेत्ता य एयमाणत्तिअं पञ्चपिणह" इस प्रकार आदेश देने के बाद उस चक्रवर्ती ने उनसे साथ२ मैं ऐसा कहा कि "हमें तुम लॉग" यह सब कहागया काम हमने पूरा कर लिया" इसबात की ख्वर देना (तएणं तं कोडुंबिय पुरिसा भरहेणं रण्णा एवंवुत्ता समाणा हट्ट करयलजाव एवं सामित्ति आणाए विणएणं वयणं पडिसुणंति" इस प्रकार से अपने अधिपति भरत राजा द्वारा आज्ञा पत हुए वे कौटुम्बिक पुरुष वहुत ही अधिक प्रमुदित हुए उन्होंने दोनो हाथों को पूर्वोक्तरूप से जोड़ कर के एवं उनकीकृत अञ्जलिको मस्तक पर दाहिनी ओर से बांई ओर को घुमाकर કરે કે જે સુરભિત હય, સુગંધિત હોય તેમજ સરસ હોય એટલે કે શુષ્ક ન હોય. નગરીને અતીવ સુગંધિત બનાવવા માટે કાલાગુરુ, શ્રેષ્ઠ કુષ્ક અને તુરુક-લેબાન એ સર્વધૂને-સુગંધિત દ્રવ્ય વિશેષોને-અગ્નિમાં પધરાઓ અને અતિશય રૂપમાં એમનાથી नाता भनी थी तन समधने २ अनावी हो. "सगंधवरगंधिगंधवटिभ करेह कारवेह' मे पात से पोपडे विशेष ३५मा पुष्ट ४२वाम मावी छे. "करेह" या पहने। अर्थ छ-तभे सो भनीने से आम ४२ तथा "कारवेह' भीत। पासेथी ५ शव।. 'करेत्ता कारवेत्ता य एयमाणत्ति पच्चप्पिणइ' मा प्रमाणे माहेश मापात ચક્રવતીએ તેમને આમ કહ્યું કે કામ પૂરું થાય એટલે તમે સવે અમને આ રીતે ખબર माया तमे रे म अमन सो पर्यु a मम सारी शa y३ ४यु छे. (तपणं तं कोई बियपुरिसा भरहेणं रण्णा एवं बुत्ता समाणा हट्ट करयल जाव एवं सामित्ति आणाए बयणं पडिसुणंति) मा प्रमाणे पाताना मधिपति १२ २00वारा माज्ञापित येतौटु Page #554 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे प्रतिनिष्क्रामन्ति 'पडिणिक्खमित्ता, विणीयं रायहाणि जाव करेता कारवेत्ताय तमाणत्तियं पच्चप्पिणंति' प्रतिनिष्क्रम्य च विनीतां राजधानी यावत्पदेनानन्तरोक्तसकलविशेषणविशिष्टां कृत्वा कारयित्वा च तामाज्ञाप्तिं भरतस्य प्रत्यर्पयन्ति । अथ भरतः किं कृतवानित्याह-'तए णं से' इत्यादि । 'तए णं से भरहे राया जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ' ततः खलु स भरतो राजा यत्रैव मज्जनगृहम् स्नानगृहम् तत्रैवोपागच्छति 'उवागच्छित्तामज्जणघरं अणुपविसइ' उपागत्य च मज्जनगृह-स्नानगृहम् अनुप्रविशति अणुपविसितासमुत्तजालाकुलाभिरामे विचित्तमणिरयणकुट्टिमतले रमणिज्जे पहाणमंडसि'अनुप्रविश्य समुक्तेन मुक्ताफलयुक्तेन जालेन गवाक्षेन आकुलो व्याप्तोऽभिरामश्च यः तस्मिन् , विचित्रमणिरत्नमयम् 'कुट्टिमतल' बद्धभूमिका यत्र स तथा तस्मिन् , अत एव रमणीये स्नान मण्डपे 'णाणामणिरयणभत्तिचितसि, ण्हाणपीढ़सि मुहणिसण्णे' नानाविधानां मणीनां के अपने स्वामी की प्रदत्त आज्ञा को विनय पूर्वक स्वीकार किया (पडिसुणित्ता भरहस्सअंतियाओ पडिणिस्वमंति) आज्ञा को स्वीकार करके फिर वे भरत महाराज के पास से वापिस चले आये (पडिणिक्वमित्ता विणीयं रायहाणि जाव करेत्ता कारवेत्ताय तमाणत्तिय पच्चप्पिणंति) वापिस आकर उन्होंने विनीताराजधानी को जिस प्रकार से सुसज्जित मादि करने के लिए भरत राजा ने उन्हों से कहा था उसी प्रकार से पूर्वोक्त विशेषण विशिष्ट करके और उस भरताज्ञा को पूर्ण सधजाने की खवर भरत महाराज के पहुँचादो (तए ण से भरहे राया जेणेव मज्जणघरे, तेणेव उवागच्छइ) अपनो आज्ञा पूर्ण रूप से सम्पादित हो गइ जान कर भरत महाराज स्नान शाला की ओर गये (उवागच्छित्ता मज्जणघरं अणुपविसइ) वहां माकर वे उस स्नान गृह के भीतर प्रविष्ठ हुए (अणुपविसित्ता समुत्ताजालाकुलाभिरामे विचित्तमणिरयणकुट्टिमतले रमणिज्जे पहाणमंडवंसि) प्रविष्ठ होकर वे मुक्ताजाल से व्याप्त गवाक्षों वाले तथा जिसका कुटिमतल अनेकमणिओ एवं रत्नों से खचित हो रहा है ऐसे स्नान मंडप में रखे हुए (हाणपीढंसि जाणामणिभत्तिचित्तंसि) स्नानपीठ पर जो कि अनेक મ્બિક પુરૂષો બહુજ પ્રમુદિત થયા તેઓએ પૂર્વોક્ત રૂપમાં બને હાથની અંજલિ બનાવીને તેને મસ્તક પર જમણી તરફથી ડાબી તરફ ફેરવીને પિતાના સ્વામીએ આપેલી આજ્ઞા सविनय स्वीतरी. (पडिसुणित्ता भरहस्स अंतियाओ पडिणिक्खमंति) माज्ञा वारीन पछी ते भरत मा२।४ पासेथी ५।छ। माया (पडिणिक्खमित्ता विणीयं रायो हाणि जाव करेत्ता कारवेत्ता य तमाणत्तियं पच्चप्पिणंति) पाछा मावान तेमणे भरतराज २ शत આદેશ આપેલ તે મુજબ વિનીતા રાજધાનીને સારી રીતે સુસજજ કરીને અને કરાવીને तमाम पूर्ण थवानी २ भरत महा पासे पडायास (त एणं से भरहे राया जेणेव तेणेव उवागच्छइ) पाताना माज्ञानु सम्पूपरीत पासन यु छ, से सूचना समजते मरत ना२।०४ तानशा त२३ गया. (उवागच्छित्ता मज्जणधरं अणुपविसइ) i ने तेसो त स्नानमा प्रविष्ट थया. (अणुपविसित्ता समुत्ताजालाकुलाभिरामें विचित्तमणिरयणकुट्टिमतले रमणिज्जे ण्हाणमंडवसि) प्रविष्ट थानत भुताna. Page #555 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० ३ भरतराज्ञःदिग्विजयादिनिरूपणम् ५४१ रत्नानां च भक्तयो यथोचित्येन रचनास्ताभिः चित्रे विचित्रे, स्नानपोठे स्नानयोग्यासने सुखेन निषण्णः उपविष्टः 'सुहोदएहि,गंधोदएहि, पुप्फोदएहिं, सुद्धोदएहिं य' शुभोदकैः तीर्थोदकैः यद्वा सुखोदकैः नात्युष्णैः नातिशीतैः, गन्धोदकैः तत्र चन्दनादिमिश्रितजलैः पुष्पोदकै. कुसुमवासितैः शुद्धोदकैः-स्वच्छपवित्रजलैश्च 'मज्जिए' इत्यग्रेण सह सम्बन्धः तथा 'पुण्ण कल्लाणगपवरमज्जणविहीए मज्जिए तत्थ कोउयसएहिं, बहुवि हे हिं ? पूर्णकल्याणकारिप्रवरमज्जनविधिना मज्जनविधिपूर्वकं मज्जितः स्नपितोऽन्तःपुरवृद्धाभिरिति बोध्यम् । कथम् इत्याह-(तत्थ) इत्यादि । (तत्थ कोउयसएहिं बहुविहे हिं) तत्र स्नानावसरे कौतुकानां-रक्षादिनां शतैः, यद्वा कौतुहलिकननैः स्वसेवा सम्यक् प्रयोगार्थ दर्यमानैः कौतुकशतैः आश्चर्यजनककथानकरूप कुतूहलैः, बहुविधैः, अनेकप्रकारैः सह स्नपितः अथ स्नानानन्तरविधिमाह-(कल्लाणग) इत्यादि । (कल्लाणग पवर मज्जणावसाणे) कल्याणकप्रवरमज्जनावसाने-स्नानानन्तरम् (पम्हलसुकुमालगंधकासाइय लूहियंगे) पक्ष्मलसुकुमारगन्धकाषायिकीरूक्षिताङ्गः, तत्र पक्ष्मलया-पक्ष्मवत्या आए। सुकुमारया सुकोमलया गन्धप्रधानया काषायिक्या काषायेण पोतरक्तवर्णाश्रय रजनीय वस्तुनारक्ता काषायिकी तया कषायरक्तया शाटिकयेत्यर्थः रूक्षितं रूक्षीकृतं प्रोछितमिप्रकार की मणियो और रत्नों द्वारा कृत चित्रो से विचित्र है (युनिसणे) आन्नद पूर्व विराज मान हो गये. (सुहोदएहिं गंधोदएहिं पुप्फोदएहिं सुद्धोदएहि अ पुण्णकल्लाणगश्वरमजणविहीए मज्जिए)वहां पर उन्हें शुभोदकों से तीर्थोदकोसे अथवा न अतिगरम और न अति ठंडा ऐसे पानी से गन्धोदकों से चन्दनादि मिश्रित जल से पुष्पोदकों से फूल सुवासितपानो से और शुद्धोदकों से स्वच्छ पवित्र जल से पूर्ण कल्याणकारी प्रबरमजन विधिपूर्वक अन्तःपुर की वृद्धास्त्रियो ने स्नान कराया (तत्थ को उयसएहिं बहुविहेहिं कल्लाण पवरमज्जणावसाणे पम्हल सुकुमारगंधकासइअ लुहिअंगे) वहा स्नान के अवसर भे कौतुहलिक जनोने अनेक प्रकार के कौतुक दिखाये जिन मे अपने द्वारा की गई सेवा के सम्यक् प्रयोग दिखाये गये थे जब कल्याणकारक सुन्दर-श्रेष्ट-स्नान क्रिया समाप्त हो चुकी तब उसके बाद उनका शरीर पश्मल रुएँ वाली सुकुमार सुगंधित तौलिये से पोंछा गया और फिर (सरस सुर हगोसीसથી વ્યાસ ગવાક્ષેવાળા તેમજ અનેક મણિઓ અને રત્નોથી ખચિત કુદ્ધિમતલવાળા મંડપમાં भूसा (ण्हाणपीढंसि णाणामणिभत्तिचितसि) स्नान पीठ ५२ ३२ मने प्रारभरिया अने. रत्ना द्वारा तयित्रोथा वियित्र छ. (सुहनिसण्णे) भान पूर्व विमान 25 गया. (सुहोदपहिं गंधोदपहिं पुप्फोदएहिं सुद्धोदपहिं अ पुण्णकल्लाणगपवरमज्जणविहिए मज्जिए) ત્યાં તેમણે શુભેદકથી-તીર્થોદકથી અથવા વધારે ન ઉષ્ણ અને ન વધારે અતિ શીત એવા શીતલ પાણીથી, ગન્ધદકોથી ચન્દનાદિ મિશ્રિત પાણીથી, પુદકેથી પુષ્પવાસિત પાણીથી અને શુદ્ધોદકથી સ્વચ્છ પવિત્ર જલથી પૂર્ણ કલ્યાણકારી પ્રવ૨ મજજનવિધિપૂર્વક અન્તઃ पुरनी वृद्धासीमासे स्नान व्यु. (तत्थ कोउयसएहिं बहुविहेहिं कल्लाणगपवरमज्जणावसाणे पम्हलसुकुमारगंधकासाइअ लूहिअंगे) त्यां स्नान ४२वाना असरमा श्रीतूस Page #556 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५४२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे त्यर्थः अङ्गं यस्य स तथा (सरससुरहिगोसीसचंदणाणुलित्तगत्ते) सरससुरभिगोशीर्षचन्दानुलिप्तगात्रः, रसेन सहिताः सरसास्तैः सुरभिगोशीर्षचन्दनैरनुलिप्तं गात्रं यस्य स तथा, (अहयसुमहग्घदुस्सरयणसुसंवुडे) अहतं मलमूषिकादिभिरनुपद्रुतम् सुमहाघं बहुमूल्यकं यदुष्यरत्नं प्रधानवस्त्रम् तत्सुसंवृतं सुष्टुपरिहितं येन स तथा, अत्र च वस्त्रसूत्रं पूर्व योजनीयं चन्दनमूत्रं पश्चात्, नहि स्नानोस्थित एव चन्दनेन वपु विलिम्पतीति विधिक्रमः (सुइमाला वणगविलेवणे) शुचिमालावर्ण कविलेपनः शुचि पवित्रं माला पुष्प माला वर्णकविलेपनं मण्डनकारि कुडकुमादि विलेपनं एतद् द्रव्यं यस्य स तथा, पूर्व सूत्रे वपुः सौगन्ध्यार्थमेव विलेपनमुक्तम् अत्र तु वपुर्मण्डनायेति विशेषः (अविद्धमणिसुवण्णे) आविद्धानि परिहितानि मणिसुवर्णानि येन स तथा, अनेन रजताधलङ्कारनिषेधः सूचितः, मणिसुवर्णालङ्कारानेव विशेषत आह -(कप्पियहारद्धहारतिसरिय पालंबपलबमाण कडिमुत्तसुकय सोहे) कल्पितहारार्द्ध हारत्रिसरिकपालम्बमान कटिसूत्रसुकृतशोभः, तत्रकल्पितो यथास्थानं विन्यस्तो हारः-अष्टादश सरिकः, अर्द्धहारः-नवसरिकः त्रिसरिकश्च चंदणाणुलित्तगत्ते) उनके शरीर पर सरस सुरभि गोशीर्ष चन्दन का लेप किया गया(अहयसुमहग्ध दुस्सरयणसुसंबुडे) फिर मल मूषिका आदि से अनुगद्रुत एवं वेशको कीमतो दूष्य रत्न-प्रधानवस्त्र उसे पहिरायागया (सुहमा का वण्णगविलेवणे) अच्छो पवित्र मालायों से और मण्डण कारी कुंकम आदि विलेपनों से वह युक्त किया गया यहां वस्त्र सूत्र की योजनो पहिले करना चाहिये और चन्दन सूत्र की पश्चात् -क्योंकि स्नान से उठाहुआ व्यक्ति उठने हो चन्दन से लेप करता है ऐसा विधिक्रम नहीं है । ___ तथा पूर्वसूत्र में शरीर को सुगंधित करने के लिये ही विलेपन कहा गया है और यहां उसे माण्डित करने के लिये विलेपन कहा गया हैं (आविद्धमगिसुवण्णे) मणि और सुवर्ण के बने हुए आभूषण उसे पहिराये गये (कप्पिमहारद्धहारतिसरिअपालं बमाण कडिसुत्तसुकयसोहे) इनमें हार अट्ठारह लरका हार नौ लरका अर्द्धहार, और तिसरिक -हार ये सब यथास्थान જને અનેક પ્રકારના કૌતુકો બતાવ્યા. જેમાં પિતાના વડે કરવામાં આવેલી સેવાઓના સમ્યક પ્રગ બતાવવામાં આવ્યા. જ્યારે કલ્યાણકારક સુન્દર શ્રેષ્ઠ–નાનક્રિયા પૂરી થઈ ચૂકી ત્યારે તેમને દેહ પફમમલ-રૂવાવાળા-સુકુમાર સુગંધિત ટુવાલથી લુછવામાં આવ્યો मन या२ माह (सरससुरहिगोसीम चंदणाणुलित्तगत्ते) तमना र ५२ सरस सुरलि गाशीष यन्नन५ ४२वामा माव्या. (अहयसुमहग्धदुस्सरयणसुसंवुडे) त्या२ मा मल भूषि४ वगेरेथा अनुपद्रुत मन मभूख्य इभ्यरत्न-प्रधान-पखे। तेने घडेराव्या, (सुहमा लावणगविलेवणे) श्रेष्ठ पवित्र मानाथी भने म उन म साह विपनाथा ते યુક્ત કરવામાં આવ્યા. અહીં વસ્ત્રસૂત્રની યેજના પહેલા કરવી જોઈએ અને ચંદન સૂત્રની તત્પશ્ચાત્ કેમકે સ્નાન પછી તરત જ વ્યકિત ચંદનને લેપ કરે છે, એ વિધિક્રમ નથી તેમજ પૂર્વસૂત્રમાં શરીરને સુગંધિત કરવા માટે જ વિલેપન કહેવામાં આવેલ છે અને અહીં तेने माहित ४१५॥ माट विवेपन ४ामां आवे छे. (आविद्धमणिसुबण्णे) मा भने Page #557 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० वक्षस्कारः सू० ३ भरतराज्ञः दिग्विजयादिनिरूपणम् ५४३ हारएव येन स कल्पितहारार्द्धहारत्रिप्तरिकः,प्रलम्बमानः प्रालम्बो-झुम्बनकं यस्य स प्राल. म्बप्रलम्बमानः लम्बायमानझुम्बनकयुक्तः तथा (पालबपलंचमाण)माम्लबप्रलम्बमान इत्यत्र पदव्यत्ययः आपत्वात् तथा-कटिसूत्रेण-कटया भरणेन सुष्ठुकृता शोभा यस्य स कटिसूत्रसुकृतशोभः, ततः पदत्रयस्य कर्मधारयः, अथवा कल्पितहारादिभिः सुकृता शोभा यस्य स तथा (पिणद्धगेविज्जग अंगुलिज्जगललियकयाभरणे) पिनद्धानि-बद्धानि ग्रैवेयकाणि कण्ठाभरणानि अङ्गुलीयकानि अङ्गुलीयाभरणानि येन स पिनद्धप्रैवेयका गुलीयकः, तथा ललिते सुकुमारे अङ्गके मुख्दौ ललितानि शोभावन्ति कचानां-केशानाम् आभरणानि-पुष्षादीनि यस्य स ललिताङ्गक ललित कचाभरणः, ततः कर्मधारयः, अत्रोक्तद्वयविशेषणेन आभरणाङ्कारकेशालङ्कारौ उक्तौ । अथ सिंहावलोकन्यायेन पुनरपि आभरणालङ्कारं वर्णयन्नाह -(णाणामणिकडगतुडिय थंभियभुए)नानामणिकटकत्रुटिकस्तम्भितभुजः नानामणीनां कटकटिकैः-हस्तबाहाभरणविशेष बहुत्वात् स्तम्भिता विव स्तम्भितौ भुजौ यस्य स तथा (अहियसस्सिरीए) अधिकसश्रीकः, अत्यन्तशोभासहितः (कुंडल. उज्जोइआणणे) कुण्डलोद्योतिताननः कुण्डलाभ्याम् उयोतितं-प्रकाशितमाननं मुखं यस्य स तथा (मउडदित्तसिरए) मुकुटदीप्तशिरस्कः मुकुटेन दीप्तं प्रकाशितं शिरो यस्य स तथा (हारोत्थय सुकयवच्छे) हारावस्तृतसुकृतवक्षस्कः हारेण अवस्तृतम् आच्छादितं उसे पहिराये गये लटकताहुओ झुम्चनक उसे पहिरायागया कटिसूत्र उसे पहिरोय गया इस से उसकी शोभा में चार चांद लग गये (पिनद्धगेविज्जग अंगुलिज्जग ललिअगय ललिअकयाभरणे णाणामणि कडगतुडिअर्थमिअभए ) प्रेवेयक-कण्ठाभरण-पहिराये गये, अंगु लियों में अङ्गुलीयक अंगठियां पहिरायी गई तथा सुकुमार मस्तकादि के उपर शोभावाले केशों के आभारण रूपपुष्पादिक निहितकिये गये ( णाणामणिकडग तुडिय थंभियभुए ) नाना मणियों के बने हुए कटक और त्रुटित उसकी भुजाओं में पहिराये गये (अहियसस्सिरीए) इस तरह की सजावट से उनकी शोभा और अधिक हो गई (कुण्डल उज्जोइआणणे) उसका मुखमण्डल कुण्डलों की मनोहर कान्ति से प्रकाशित होनया (मउडदित्तसिरीए) मुकुट को झल झलाती दीप्ति से उनका मस्तक चमकने लगा हारोत्थय सुसवानिमित आभूषण ने प२।०यां. (कपिअहारद्धहारतिसरिअपालबमाणकडिसुत्तसुकय सोहे) माभूषणेमा ७१२-अढा२ से२ने। २ न१ सेरने। म डा२ अ सिरिस હા એ બધા તેને યથા સ્થાન પહેરાવવામાં આવ્યા. તેથી તેની શોભા ચાર ગણું વધી 5. (पिनद्धगेविजगअंगुलिज्जगललिअगय ललिअकयाभरणे णाणामणिकडगतुडिअथंभिअभप) अवय- २ | पडामा माव्या, मांजणीयामा म मुसीय भुदि। ५७रावी તેમજ સુકુમાર મસ્તકાદિ ઉપ૨ શાભા સંપનવાળાના આભરણ રૂપ પપાદિક ધારણ यां. (णाणामणि कडग तुडियर्थभियभुए) अने मणिमाथी निमित ४८४ अन त्रुटित तेन भुलयामा घडेराव्या. (अहियसस्सिरीए) मा प्रभारी सन्तथी तेनी शे.मा घणी वघी गई. (कुण्डलउज्जोईआणणे) तेनु भुमम होनी भना२ ४iतिथी शिय Page #558 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५४४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तेनव हेतुना दर्शकजनानां सुकृतम् आनन्दप्रदं वक्षो यस्य स तथा । (पालंबवलंब माणसुकयपड उत्तरिज्जे) प्रलम्बप्रलम्बमानसुकृतपटोत्तरीयः प्रलम्बेन दीर्घेण प्रलम्बमानेन-दोलायमानेन सुकृतेन सुष्ठु निर्मितेन पटेन-वस्त्रेण उत्तरीयम् उत्तरासङ्गो यस्य स तथा (मुहियापिंगलंगुलीए) मुद्रिकापिङ्गलाङ्गुलिकः मुद्रिकाभिः अगुलीयकैः पिङ्गलाः पिङ्गलवर्णा अमुल्यो यस्य स तथा णाणामणि कणगविमल महरिह णिउणोयविय मिसि मिसिंतविरइय सुसिलिट्ठविसिट्ठलट्ठसंठियपसत्थआविद्धवीरवलए) नानामणि कन कविमलमहाधं निपुण परिकर्मित दीप्यमान विरचित सुश्लिष्टविशिष्ट लष्टसंस्थित प्रशस्ताविद्ध वीरवलयः। तत्र नानामणि जटितसुवर्णम् अतएव विमलं स्वच्छं महाध बहुमुल्यकं निपुणन शिल्पिना (ओयविय) ति, परिकर्मितम् (मिसि मिसिंत) त्ति, दीप्यमानं विरचितं-निर्मितं सुश्लिष्टं सुसन्धिविशिष्टम् लष्टं मनोहरं संस्थितं संस्थान यस्य तत् तथा, पश्चात्पूर्वपदैः कर्मधारयः, एवं विधं प्रशस्तम् आविद्धम् परिहितं वीरवलयं येन स तथा तदन्योऽपि यः कश्चित् वीरव्रतधारी भवेत् तदा स मां विजित्य मोचयत्येतद्वलयमिति स्पर्द्धया यत् परिधीयते तद्वीरवलयमित्युच्यते (किं बहुणा) किं कयवच्छे हार से आच्छादित हुआ उनकी वक्षःस्थल दर्शकजनों को आनन्दप्रद . बनगया (पालंच पलंबमाण पुकयपडउत्तरिज्जे) झूलते हुए लम्बे सुकृत पट से उसका उत्तरासङ्गकिया गया अर्थात् बहुत ही सुन्दर लम्बे लटकते हुए वस्त्रका दुपटा उनके कंधे पर सजायागया था जो कि हवा के मन्द २ झोके से हिल रहा था (मुद्दियापिंगलंगुलोए) नो मुद्रिकाएं -अंगूठियां उसकी अंगुलियो में पहिराई गई थी उनसे उसको वे सब अंगुलियां पिङ्गलवर्णवाली ग्रतीत होने लगी णाणामणि कणगविमलमहरिहणिउणोअविअभिसिभिसंत विरइ अ सुसिलिट विसिट्र लट्र संठिअ पसत्थ आविद्ववीरवलए ) अनेक मणियों से खचित सुवर्ण का वीरवलय जो किस्वच्छ और वेश कीमती था, निपुण शिल्पी द्वारा जिसका निर्माण हुआ था, सन्धि जिसकी वड़ी सुन्दर थी, देखने में जो वड़ा सुहावना था, उसने अपने हाथ में पहिरा हुआ था जो कोई वीरव्रत धारी योद्धा मुझे परास्त करके मेरे इस वीर वलय को मुझ से छुडा लेगा वही इस आयु. (मउडदितसिरीए) भुशुटनी जती सिथी तभनु मस्त: यमायु. (हारो त्थय सकयवच्छे) हारथी माछोहित ये तन पक्षस्थ श भाटे सान हसनी अयं. (पालंब पलंबमाणसकयपडउत्तरिज्जे) खu aiमा सहत पटयी तन। त्तरासस બનાવીને પહેરાવવામાં આવ્યું. એટલે કે બહુજ સુંદર લાંબા લટકતા વસ્ત્રોને દુપટ્ટો તેના ખભા પર મૂકવામાં આવ્યું. તે દુપટ્ટો પવનના મંદ મંદ ઝોકાઓથી હાલી રહ્યો पा. (मुदियापिंगलंगुलीए) २ मुद्रिा। यही तनी मागणीसाभां पडेशपामा भावी ती तथा तनी गधी भांजीये। पीतव वाणी माती ती. (णाणामणिकणग विमलमहरिहणि उणा अविअमिसिमिसंत विरइअसुसिलिट्ठ विसिह लट्ठ संठिअ पसत्थ आविद्धवीरवलए ) अने४ भागमा ५ ५थित सुणतुं २१२७ अने पहभूख्य કે જેનું નિર્માણ ઉત્તમ શિલ્પીઓએ કર્યું હતું, જેની સંધિ અત્યંત સુંદર હતી Page #559 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू. ३ भरतराज्ञः दिग्विजयादिनिरूपणम् बहुनाः वर्णितेन (कप्परुक्खए चेत्र अलंकिय विभूसिए) कल्पवृक्ष इव अलङ्कतो विभूषितश्व, तत्र कल्पवृक्षः पत्रादिभिरलतः फल पुष्पादिभिश्च विभूपितः राजा तु मुकुटादिभिरलङ्कृतः वस्त्राभरणादिभिश्च भूषित इति (गरिंदे) नरेन्द्रः (सकोरंट जार चउचामर बालबोइअंगे) सकोरण्ट यावत् चतुश्चामर बालवीजिताङ्गः अत्र यावत्करणात् (सकोरंटमल्लदामेगं छत्तेणं धरिज्नमाणेगं) इति ग्राह्यम्, सकोरण्टानि-कोरण्टाभिधान कुसुमस्तबकवन्ति, कोरण्टपुष्पाणि हि पीतवर्णानि मालान्ते शोभायें दीयन्ते, मालायै हितानि माल्यानि - पुष्पाणि. तेषां दामानि-माला यत्र तत्तथा, एवं विधेन छत्रेण ध्रियमाणेन, विराजमान इति चतुर्णाम् अग्रतः पृष्ठतः पार्श्वयोश्च वीज्यमानस्वात् चतुः सङ्ख्यकानां चामराणां वाले वीजितम् स्पर्शितमङ्गं यस्य स तथा शिरसि ध्रियमाणेन कोरण्ट सपीतकुसुमस्तबकयुक्तपुष्पमालासुसज्जितछत्रेण विरानमानः चतुः संख्याक चामर वालवीजितशरीरश्चेत्यर्थः (मंगल जय जय सद्दकयालोए) मङ्गल जय जय शब्दकृतालोकः मङ्गलभूतो जयजयशब्दो जनैः कृतः आलोके दर्शने संसार में विशिष्ठ वीर माना जायगा इस प्रकार को स्पर्धा से जो वलय धारण किया जाता है वही वीरवलय कहा गया है। (किंवहुणा ) और अधिक क्या कहा जावे ( कप्परुक्खएचेव मलंकि वेभूसिएणरिंदे सकोरंटजाव च उचामर वालवीइअंगे) इस तरह वह नरेन्द्र मुकुट आदि कों द्वारा अलंकृत हु प्रा और वस्त्राभरणादिकों द्वारा भूषित हुआ वस्त्रादिकों द्वारा अलंकृत हुए और फल 'पुष्पादि को द्वारा विभूषित हुए कल्पवृक्ष के जैसा प्रतीत होने लगा उस समय उसके मस्तक ऊपर यावत्पद द्वारा गृहीतपदों के अनुसार कोरंट पुष्पों स्तबकों की माला से युक छत्र धारियों ने ताने हुए थे । चामर ढोरनेवाले उपके पोछे पोछे और सन्मुख खडे होकर एवं दाई बाई ओर खड़े होकर चामर ढोर रहे थे। इसलिये वालों से उसका शरीर स्पर्शित हो रहा था ( मंगल जय जय सहकयालोए ) उपके दिखते ही लोग जय हो जय हो इस प्रकार के જોવામાં જે અત્યંત સુંદર લાગતું હતું, તેણે પિતાનાં હાથમાં પહેર્યું હતું. વીરત્રતધારી દ્ધો મને પરાજિત કરીને મારા આ વિવલયને મારી પાસેથી જૂટવી લેશે, તેજ યોદ્ધા આ સંસારમાં વિશિષ્ટ વીર તરીકે પ્રસિદ્ધ થશે આ જાતની સપર્ધાથી જે पसय धारण ४२वाभां मावे छे. तेन वीरवसय ४डेवामा माव छ. (किं बहुणा) अने पधारे हीये. (कप्परुक्खए चेव अलंकिअविभूसियरिंदे सकोरंट जाव चउचामर चालवीइअंगे) प्रमाणे ते नरेन्द्र भुशुट वगेरेथी त यये, मने पसाभराहिકેથી ભૂષિત થયે તે વસ્ત્રાદિકથી અલંકૃત અને ફળપુપાદિકથી વિભૂષિત થયેલ કલ્પવૃક્ષની જેમ રોભવા લાગ્યો. તે સમયે તેના મસ્તક ઉપર યાવત પદ દ્વારા ગૃહીત પદે મુજબ કરંટ પુના સ્તનકેની માલાથી યુક્ત છત્રો છaધારીઓએ તાણેલા હતા. ચામર ઢોળનારાઓ તેની પાછળ અને સન્મુખ ઊભા થઈને તેમજ ડાબી અને જમણી બાજુ ઊભા થઈને ચામર ઢળતા હતા. એથી ચામનાવાળેથી તેને દેહ સ્પેશિત થઈ २हो तो. (मंगलजय जयसहकयालोप) तेन तi or a य था, ४५ थाया' ar. maraw uwarmumnama Page #560 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सम्मुखे सति यस्य स तथा ( अणेगगणणायग दंडणायग जाव दूय संधिवाल सद्धिं संपरिवुडे ) अनेक गणनायकदण्डनायक यावत् दृत सन्धिपालः साढे संपरिवृत्तः, अनेके गणनायकाः-मल्लादिगण मुख्या:, दण्डनायकाः-तन्त्रपालाः (कोष्ठपाल) यावत् (ईसर तलवर माडंबियकोडु बियमंतिमहामंति गणग दोवारिय अमच्च चेडपीढमद्दणगरणिगम सेष्टि सेणावइ सत्थावाह) इति ग्राह्यम्, तत्र ईश्वरा:-युवराजाः अणिमाधेश्वर्ययुक्ता वा, तलवरा:-परितुष्टनृपदत्तपट्टबन्धविभूषिता राजसदृशाः, माडम्बिका:-छिन्नमडम्बाधिपाः, कौटुम्बिका:-कुटुम्बमुख्याः, मन्त्रिणः महामन्त्रिणः, गणका:-गणितज्ञा भाण्डागरिका वा, दौवारिका:-प्रतीहाराः, अमात्यः राज्यकार्याधिष्ठायका, चेटाः पादमूलिका दासा वा, पोठमर्दाः-आस्थाने आसन्नासन्न सेवकाः समवयस्का इत्यर्थः, नगरम् तात्स्थ्यात्तद् व्यपदेशेन नगरनिवासिप्रभृतयः, निगमाः वणिनः श्रोष्ठिनः-श्रीदेवताध्यासित सौवर्णपट्टभूषितोत्तमाङ्गाः, अथवा नगराणां निगमानांच वणिग्यासानां श्रेष्ठिनो महत्तराः, सेनापतयः-चतुरङ्गसैन्यनायकाः, सार्थवाहाःमाङ्गलिक शब्दों का उच्चारण करने लगते. ( अणेग गणणायादंड ण या जाव दूमसंधिवाल सद्धिं संपरिवुडे ) अनेक गणनायकों से अनेकदण्ड नायकों से, यावत्-"इसर तलवर माडंचियकोडंपिय मंति महामंती गणदोवारिय अमच्च चेढ़ पीढमद्दणगरनिगमट्टि से नावह सत्यवाह" अनेक ईश्वरों से,-युवराजो से, अथवा अणिमादिरूप ऐश्वर्य से युधिनी पुरुषों से अनेक तलवरों से-परितुष्ट हुए नृा के द्वारा प्रदत्त पट्टवन्ध से विभूषित हुए राजा जैसे पुरुषों से, अनेक माडम्विकों से-छिन्न मडम्बाधिपतियो से, अनेक कुटुम्ब के मुवियों से, अनेक मंत्रियों से अनेक महामंत्रियों से, अनेक गना से गणितज्ञों से, अथवा भण्डारिया अनेक द्वारपालो से अनेक अमात्यों से, राजकार्य के अधिष्ठायकेंअनेक चेटें से नोकर चाकरा से अनेक पीठमदों से -समवयस्क अङ्गरक्षकों से, अनेक नगर नेवासियों से, अनेक नि ।मों से वणिग्जनों से अनेक श्रेष्ठियों से,-श्री देवता से युक्त पट्टबन्ध जिनके मस्तक पर सुशोभित है ऐसे नगर मा प्रभारी भांजलि शोना २ यार । ४२१॥ वाय. (प्रणेग गणापगदंडणायग जाव दूअसंधिवालसद्धि संपरिबुडे) अने मनायथी, अने ६ नायोथा यावत् (इसर तल वर मादुबिय कोकुंबियमंति महामंति गणदोवारिय अमञ्च चेढपीढमहणगरणिगमसेठि सेणावई सत्थवाह) अनेश्वराथी, युवरालथी मा म ३५ मेधाथी युति बनी પુરુષોથી, અનેક તલવારથી પરિતુષ્ટ થયેલા નૃપ વડે પ્રદત્ત પટ્ટપથી વિભૂષિત થયેલા જ જા જેવા પુરુષોથી, અનેક માંડબિકોથી-છિન્ન મંડપાધિપતિઓથી, અનેક કુટુંબના મુખિયાઓથી, અનેક મંત્રિયોથી અનેક મહામંત્રીઓથી, અનેક ગણુ કોથી, ગણિતોથી અથવા ભંડારીએથી, અનેક દ્વારપાલોથી, અનેક અમાત્યથી: રાજકારના અધિષ્ઠાયકોથી, અનેક ચેટથી નોકરોથી અનેક પીઠમાઁથી સમવયસ્ક અંગરક્ષકોથી અનેક નગરનિવાસીએથી, અનેક નિગમથી વણિજનથી, અનેક શ્રેષ્ઠિઓથી શ્રીદેવતાથી યુક્ત પટ્ટબંધે જે મના મસ્તકે પર સુશોભિત છે એવા નગર શ્રષ્ઠીએથી અનેક સેનાપતિઓથી ચતુરંગ Page #561 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कार: सू० ३ भरतराज्ञः दिग्विजयादिनिरूपणम् 1 सार्थनायकाः, दूताः - देशान्तरवासि राजा देशनिवेदकाः, सन्धिपालाः- राज्यसन्धिरक्षकाः एतेषां द्वन्द्वः तैः सार्द्ध संपरिवृत्तः समन्तात् परिकरितः नृपतिः मज्जनगृहात् परिनिष्क्रामतीति सम्बन्धः किं भूतः (धवलमहामेह णिग्गए इव जाव सव्वि पियदंसणे ) धवलमहामेघ निर्गत इव यावत् शशिरिवप्रियदर्शनः तत्र धवलमहामेघः - सच्छ. शरन्मेघः तस्मान्निर्गतः शशीव चन्द्र इव प्रियदर्शनः अत्र यावत्पदात् (ग्रहगणदिपन्त रिक्खतारागणाणं मज्झे) ग्रहगणदीप्यमान ऋक्षतारागणानां मध्ये तथा च यथा चन्द्रः शरदभ्रपटलनिर्गत इव ग्रहगणानां दीप्यमानऋक्षाणां शोभमान नक्षत्राणां, तारागणानां च मध्ये वर्त्तमान इव प्रियदर्शनो भवति तथा भरतोऽपि सुधा धवलीकृत मज्जनगृहान्निर्गतो ऽनेकगणनायकादि परिवार मध्ये वर्तमानो प्रियदर्शनोऽभवेदितिभावः, पुनः कीदृशो नृपतिः प्रतिनिष्क्रामतीत्याह - ( धूवपुष्फ गंध मल्लहत्थगए) धूप पुष्पगन्धमाल्यहस्तगतः, तत्र धूपपुष्पगन्धमाल्यानि सुगन्धद्रव्योपकरणानि हस्तगतानि यस्य स तथा तत्र धूपो दशाङ्गादिः, पुष्पाणि प्रफुल्ल कुसुमानि गन्धाः MANISTANITERESTS. सेठों से, अनेक सेनापतियों से चतुरङ्गसैन्य के नायकों से, अनेक सार्थवाहों से सार्थ के नायक अनेक दूतें । से- देशान्तर वासी राजादेशनिवेदकों से, एवं अनेक सन्धिपालों से राज्यसन्धि रक्षा से, विराहुआ वह नृपति मज्जनगृह से बाहर निकला (धवलमहामेह निगर इव नाव ससिव पियदंसणे ) उस समय वह देखने ऐसा नय प्रतत होता था कि जैसा धवल महामेघ से निर्गत चन्द्र देखने में प्रिय प्रतीत होता है. यहां यावत्पद से "गहगणदिपंत क्खितारागणणं मज्झे" इस पाठ का ग्रहण हुआ है. इसका भाव ऐसा है कि निसप्रकार शरदभ्रपटल के भीतर से निकलता हुआ चन्द्रमन्डल देदिप्यमान नक्षत्रों एवं तारागण के मध्य में वर्तमान होता हुआ नियदर्शनवाला होता है उसी तरह भरत राजा भी सुधाघवलोकृत मज्जनगृह से निकलने पर अनेक गणनायकादि परिवार जनों के चोच में वर्तमान हुए निदर्शनवाले हुए. ( धूत्रपुप्फगन्धमल्लहत्थगए. मज्जणघराओ पाडिणिक्खमइ ) मज्जनगृह से बाहर निकलते समय उसके हाथ में धूप दशाङ्गादि धूप, प्रफुल्लित कुसुम गन्ध द्रव्य और माल्यસૈન્યના નાયકાથી, અનેક સાથ' વાહેાથી સાના નાયકોથી, અનેક દ્વાયી દેશાન્તવાસી રાજાદેશ નિવેદકાથી તેમજ અનેક સંધિપાલેાથી રાજ્યસધિરક્ષકેાથી વીટળાયેલે તે નૃપતિ भन्छन गृह (स्नानगृह) थी मडार भाव्य (धवल महामेहणिग्गर इव जाव ससिव्व पिय दंसणे) ते समये ते लेवामां मेव। प्रिय बाधव महामेघथी निर्भत् चन्द्र लेवामां प्रिय लागे छे. अहीं यावत् पहथी (गहगणदिप्पंतरिक्खतारागणाणं मज्झे) આ પાઠ ગ્રહણ્ થયા છે. આના ભાવ આ પ્રમાણે છે કે જેમ શરૠભ્રપટલમાંથી નિત ચન્દ્રમડળ દેદીપ્યમાન નક્ષત્રો તેમજ તારાગણેાની વચ્ચે સુથેાભિત પ્રિયદર્શીનીય હેય છે, તેમજ ભરત રાજા પણ સુધા ધવલીકૃત મજ્જન ગ્રેડમાંથી ખડાર નીકળીને અનેક ગનાયકાદિ परिवार सोनी व सुशोजित थते। प्रियदर्शी थये, (धूव पुप्फ गन्धमल्लहत्थगए मजणधराओ पडिगिक्खमई) भनन गृहमांथी नीती वणते तेना डाथमां धूप दशांगा ધૂપ પ્રફુલ્લિત કુસુમ, ગન્ય દ્રવ્ય અને માન્ય ગ્રથિત પુષ્પા એ બધાં સુગંધિત પદાર્થાં હતા ५३७ Page #562 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे गन्धद्रव्याणि माल्यानि ग्रथितपुष्पाणि एताणि हस्ते गतानि प्राप्तानि यस्य स तथा (मज्जणघराभो पडिणिक्खमई) मज्जनगृहात्प्रतिनिष्क्रामति (पडिणिक्खमित्ता) प्रति. निष्क्रम्य (जेणेव आउहघासालाजेणेव चक्करयणे तेणामेव पहारेत्थ गमणाए) यत्रैव आयुधगृहशाला यत्रैव च चक्ररत्नं तत्रैव प्रधारितवान गमनाय-गन्तुं कामः प्रावर्तत इत्यर्थः ।। सु० ३ ॥ अथ भरतगमनानन्तरं यथा तदनुचराश्चक्रुस्तथाऽऽह तए णं" इत्यादि । मूलम्-तए णं तस्स भरहस्स रण्णो बहवे ईसरपभिइओ अप्पेगइया पउमहत्थगया अप्पेगइया उप्पलहत्थगया जाव अप्पेगइया सय सहस्सपत्तहत्थगया भरहं रायाणं पिट्ठओ २ अणुगच्छति । तए णं तस्स भरहस्स रण्गो बहूइओ-'खुज्जाचिलाइवामणिवडभीओ बब्बरो बउसियाओ। जोणियपल्हवियाओ इसिणिय थारुकिणियाओ ॥१|| लासिय लउसिय दमिलीसिंहलितह आरखी पुलिंदीय । पक्कणि बहलो मुरंडी सबरीओ पारसीओय ॥ २ ॥ अप्पेगइया वंदणकलसहत्थगयाओ चंगेरी पुप्फ पडलहत्थगयाओ भिंगार आदंसथालपातिसुपइट्टगवायकग करंडपुप्फचंगेरीमल्लवण्ण चुण्णगंधहत्थगयाओ वत्थ ओभरण लोमहत्थय चंगेरीपुप्फपडलहत्थगयाओ जाव लोमहत्थगयाओ अप्पेगइयाओ सीहासणहत्थगयाओ छत्त चामरहत्थगयाओ तिल्लसमुग्गयहत्थगयाओ तेल्ले कोट्ठसमुग्गे पत्तेचाए अंतगरमेला य । हरियाले हिंगुलए मणोसिला सासव समुग्गे ॥१॥ अप्पेगइयाओ तालियंटहत्थगयाओ अप्पेगहयाओ धूवकडुच्छय हत्थगयाओ भरहं रायाणं पिट्ठओ२ अणुगच्छति तए णं से भरहे राया सबिड्डीए सबवलेणे सव्वसमुदएणं सव्वायरेणं सम्बनिभूसाए सबग्रथित पुष्प ये सब सुगन्धित सामग्रा था ( पडिनिस्खमित्ता ) मननगृह से निकलकर वे ( जेणेव आउहबरसाला) जहां उनको अ युधयशाला थी ( जेणेव चकमायणे ) और उपमें भ जहां पर चक्ररत्न था (तेण मेव पहारेत्य गमणाए) उसी ओर वे चलने लगे ।३ । (जिखमत्ता) मनभांथा नागान त (जेणेव आउहघासाला) rui तभनी माघशाती, (जेणेव चक्करयणे) मन तमा ५ यरत्न तु. (तेणामेव पहारेत्या गमणाप) तत२५ तथा य.. . ॥३॥ Page #563 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू०४ भरतराज्ञः गमनानन्तरं तदनुचर कार्यानरूपणम् ५४९ विभूईए सम्बवत्थपुफपल्लालंकारविभूसाए सातुडिय सहमण्णियाएणं महया इड्ढोए जाव महया वस्तुडि अजमगपवाइएणं संख पणवपद्रह भेरिझल्लरिखरमुहिमुरजमुइंगदुंदुहि निग्घोसणाइएणं जेणेव आउहघरमाला तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता आल्लोए चक्करयणस्स पणामं करेइ करेत्ता जेणेव चक्करयणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता लोमहत्वयं परामुसइ परोमुसित्ता चक्करयणं पमज्जइ पमज्जित्ता दिबाए उदगधाराए अब्भुक्खेइ अब्भुक्खित्ता सरसेणं गोसीसचंदणेणं अशुलिंपइ अणुलिं पित्ता अग्रहिं वरेहिं गंधेहिं मल्लेहि य अच्चिणइ पुरफारुहणं मल्लगंधवण्ण चुण्णवत्थारुहणं आभरणारुहणं करेइ करित्ता अच्छे हे सण्हेहें सेएहिं रयणामएहिं अच्छरसतिंडले हे चक्कस्यणस्स पुरओ अट्ठमंगलए आलिहइ तं जहा-सोत्थियसिविच्छ णंदियावत्त वद्धमाणग भदासण मच्छकलसदेप्पण अट्ठमंगलए आलिहिता काऊगं करेइ उवयारंति किंते? पाद्रलमल्लियचंपगअसोगपुण्णोगचूय मंजरिणवमालियरकुलतिलगकणवी रकुन्द कोज्जय कोरंटय पत्तदमणयवग्सुरहि सुगंधगंधियस्स कयग्गहगहियकरयलपब्मट्ठविप्पमुक्कस्स दसवण्णस्म कुसुमणिगरस्स तत्थ चित्तं जाणुस्से हप्पमाणमित्तं ओहिनिगरं करेत्ता चंदप्पभवइस्वेरुलिय विमलदंडं कंचणमणिरयणभत्तिचित्तं कालागुरुपवरकुंदुरुक्कतुरुक्कधूव; गंधुत्तमाणविद्धं च धूववट्टि विणिम्मुअंत वेरूलियमयं करूच्छुयं पग्गहेत्तु; पयते धूवं दहइ, दहेत्ता सत्तट्ठपयाई पञ्चसक्कइ, पञ्चासक्कित्ता वामं जाणं अंचेइ जाव पगामं करेइ, करिता आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ पर्डि णिक्खमित्ताजेणेव बाहिरिआ उवट्ठाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवा गच्छइ उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे सण्णिसीअइ सण्णि सीएत्ताअट्ठारससेणिपसेणीओ सदावेइ सदावेत्ता एवं वयोसी खिप्पामेव; भेो देवाणुप्पिया! उस्सुक्कं उक्करं उक्किट्ठ अदिज्जं अमिज्जं अभप्पवेसं अदंडकोदंडिम अधरिमं गणिआवरणाउइज्ज कलियं अणेगतालाय; Page #564 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६५० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे राणचरियं अणधु अमुइंगं अमिलायदामं पमुइय पक्कीलियसपुरजणजाणवयं विजय वेजइयं चक्करयणस्स अट्टाहियं महामहिमं करेहि करिता ममेअ माणत्तियं खिप्पामेव पच्चपिगह तर णं ताओ अट्ठारस से णिप्प सेणीओ भरणं रन्ना एवं वुत्ताओ समाणीओ हट्ठाओ जाव विणणं पडित पडिणित्ता मरहस्स रण्णो अंतिआओ पडिणिक्ख में ति पडिणिक्खनित्ता उसुक्कं उक्करं जावं करेंति य कार्खेति य करेत्ता कारवेता जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता जाव तमाणत्तियं पच्चपिति ॥ सृ० ४ ॥ छाया - ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञो बहवः ईश्वर प्रभृतयः अत्येके पद्महस्तगताः अप्येके उत्पलहस्तगताः, यावत् अध्ये के शतसहस्र पत्रहस्तगताः, भरतं राजानं पृष्ठतः पृष्ठतोऽ नुगच्छन्ति । ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञो वहव्यः- कुब्जाः चिलात्यो वामनिकाः बडभिका बर्ष बकुशिकाः जोनिक्यः । पल्हविकाः ईसिनिकाः थारूकिनिकाः ||१|| लासिक्यो लकुशक्योद्रविड्यः सिंहल्य आरण्यः पुलिन्द्रयः । पक्कण्यो बहल्यो मुरूण्डयः शबर्यः पारसीकाः ॥२॥ अप्येकिकाः वन्दनकलशहस्तगताः चंगेरीपुष्पपटल हस्तगताः भृङ्गारादर्श स्थालपात्री सुप्र तिष्ठक घातकरकरत्नकरण्डपुष्पचंगेरीमाल्य वर्णचूर्णगन्धहस्तगताः यावत् लोमहस्तगताः अप्येकिकाः सिहासनहस्तगताः, छत्रचामरहस्तगताः, तैलसमुद्रक हस्तगताः, तैलं कोष्ठसमुद्गकं पत्र चोयं च तगरम् पला च हरितालं हिङ्गुलकं मनः शिला सर्षपसमुद्गम् ॥ १ ॥ अप्येकिकास्तालवृन्तः हस्तगताः, अध्येकिका धुपकच्छुक हस्तगताः भरतं राजान पृष्ठतः पृष्ठतोऽनुगच्छन्ति, ततः खलु स भरतो राजा सर्वद्वर्या सर्वद्युत्या सर्वबलेन सर्वसमुदयेन सर्वादरेण सर्वविभूषया सर्वविभूत्या, सर्ववस्त्रपुष्पमाल्यालङ्कारविभूषया सर्वत्रुटितशब्दसन्निनादेन महत्या ऋद्धया यावद् महता वरत्रुटितयमकसमक प्रवादितेन शङ्खपणवप यह मेरी झल्लरी खरमुखीमुरन मृदङ्गदुन्दुभिनिर्घोषनादितेन यत्रैव आयुधगृहशाला तत्रैवोपागच्छति उपागत्य आलोके चक्ररत्नस्य प्रणाम करोति, कृत्वा यत्रैव चक्ररत्न तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य लोमहस्तकं परामृशति परामृश्य चक्ररत्नं प्रमार्जयति प्रमार्ण्य दिव्यया उदकधारया अभ्युक्षति, अभ्युक्ष्य सरसेन गोशीर्षचन्दनेनानु लिम्पति, अनुलिप्य अग्रे वर र्गन्धै मस्यैिश्वाचयति पुष्पारोपण माल्यगन्धवर्णचूर्ण वस्त्रारोपणमाभरणारोपणं करोति कृत्वा अच्छैः श्लक्ष्णैः श्वेतैः रजतमयेः अच्छरसतण्डुलैः चक्ररत्नस्य पुरतोऽष्टाष्टमङ्गलका नि आलिखति तद्यथा - स्वस्तिक श्रीवत्सनन्द्यावर्त्तबर्द्धमानक भद्रासनमत्स्य कलशदर्पणाष्टकमङ्गलकानि आलिय कृत्वा करोति उपचारमिति कोऽसौ (उपचारः ) ? Page #565 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० पक्षस्कारः सू०४ भरतराज्ञः गमनानन्तर तदनुचरकायनिरूपणम् ५५१ पाटलमल्लिकचम्पकासोकपुन्नागआम्रमञ्जरी नवमालिक बकुलतिलककणवीरकुन्दकुम्जक कोरण्टक पत्रदमनकवरसुरभिसुगन्धन्धितस्य करग्रहगृहोतकरतलप्रभ्रष्टविप्रमुक्तस्य दशार्द्धवर्णस्य कु उमनिकरस्य तत्र चित्र जानून्सेधप्रमाणमात्रम् अवधिनिकरं कृत्वा चन्द्रप्रभवजवैडूर्यविमलदण्डम् काञ्चनमणिरत्नभक्तिचित्रम् , कृष्णागुरुप्रवरकुन्दुरुष्कतुरुक धूपगन्धोत्तमानुविद्ध विनिमुञ्चन्तम् , धैर्यमय कईच्छुकं प्रगृह्य 'प्रयतः' धूपं दहति, दर वा सप्ताष्ट पदानि प्रत्यपसर्पति, प्रत्यपसर्प्य वाम जानुम् अञ्चति, यावत् प्रणामं करोति, कृत्वा आयुधगृहशालतःप्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाहिरिका उपत्स्थानशाला यत्रैव सिंहा सनं तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखः सन्निषीदति, संनिषध अष्टादशश्रेणप्रश्रेणीः शब्दयति, शदयित्वा पवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! उच्छुल्काम् उत्कराम् उत्कृष्टाम् अदेयाम् अमेयाम् अभटप्रवेशिकाम् अदण्डकुदण्डिमाम् अधरिमाम् गणिकावर नाटकीयकलिताम् अनेकतालाचरानुचरिताम् अनुद्धृतमृदङ्गाम् भम्लानमाल्यदाम्नीम् प्रमुदितप्रक्रोडितलपुरजनजानपदाम् , विजयवैयिकीम् , चक्ररत्नस्य अष्टाह्निकां महामहिमां, कुरुत, कृत्वा मम पतामाक्षप्तिकां क्षिप्रमेव प्रत्यर्पयत। ततःखलु ता अष्टादश श्रेणिप्रश्रेण्यः भरतेन राक्षा एवमुक्ताः सत्यः हृष्टाः यावत् विनयेन प्रतिशृण्वन्ति, प्रतित्य भरतस्य राज्ञः अन्तिकात् प्रतिनिष्कामन्ति, प्रतिनिष्क्रम्य उच्छुल्काम् उत्कराम यावत् कुर्वन्ति च कारयन्ति च कृत्वा कारयित्वा यत्रैव भरतो राजा तत्रैवोपागच्छन्ति उपागत्य यावत् तामाक्षप्तिका प्रत्यर्पयन्ति ॥ सू०४॥ टीका-"तएणं" इत्यादि । (तएणं तस्स भरहस्स रण्णो बहवे ईसरपभिइओ) ततः खलः तस्य भरतस्य राज्ञो बहव इश्वरप्रभृतयः ततो भरतस्य गमनसमये खलु तस्य भरतस्य राज्ञो बहवो जना ईश्वरप्रभृतयः तलवरादारभ्य सन्धिपालान्ता यावत्पद संग्राह्याः पूर्ववत् (अप्पेगइया पउमहत्थगया) अप्येके पद्महस्तगताः करगृहीतकमलाः (अप्पेगइया उप्पलहत्थगया) अप्येकके उत्पलहस्तगताः उत्पलानि कमलप्रभेदाः तानि हस्तगतानि 'तएणं तस्स भरहस्स रणो'-इत्यादि सू०-४ टीकार्थ-(तएणं तस्स भरहस्स रण्णो बहबे ईसर पभिइमओ) उस भरत राजा के चलने के समय उसके अनेक ईश्वर आदिजन तलवर से लेकर संधिपाल तक के समस्त मनुष्य - (भम्हं रायाणं पिओ२ अणुगच्छंति) उस भरत राजा के पिछे २ चलने लगे. इनमें से (अप्पेगइया पउमहत्थगया) कितनेक व्यक्तियों के हाथ में पद्म था (अप्पेगइया उप्पलह स्थगया) कितनेक व्यक्तियो । 'तप ण तस्स भरहस्स रण्णो'–इत्यादि स्त्र-॥४॥ टी--(तपण तस्स भरहस्स रण्णो बहये ईसर पभिइओ) ते सत meanाभ्योत समये अन४ श्व२ मा सपथा मांसन सघिपाल सुधीना सब मनुष्य। (भरहं रायाण पिट्टो २ अणुगच्छति) a w२त २नी -पाछ यासा साया. मे भनुम्यामांची (अप्पेगइया पउमहत्थगया) मा भनु याना साथमा ५ो तi. (अप्पेगरया उप्पल हत्थ गया) टा भनुन्याना कायामा ५8 Sai. (जाव अप्पेगइया सयसहस्सपत्तहत्य Page #566 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५५२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसू येषां ते तथा (जाव अप्पेगइया सयसहस्सपत्तहत्यगया) यावत्पदेन (अप्पेगइया कुमु यहत्थगया अप्पेगइया नलिण हत्थगया अप्पेगइया सोगंधिय हत्थगया, अप्पेगइया पुंडरीयहत्थगया, अप्पेगइया सहस्सपत्तहत्थगया (इति संग्राह्यम्, तथा च अप्येके कुमुदहस्तगताः, अपये के नलिनहस्तगताः, अप्ये के सौगन्धिकस्तगताः,अप्येके पुण्डरीकहस्तगताः अप्येके सहपत्रहस्तगताः, अप्येके शतसहस्रपत्रहस्तगताः, लक्षपत्रकमलहस्तगताः (भरहं रायाणं पिट्टओ अणुगच्छति) भरतं राजानं पृष्ठतः पृष्ठतः पृष्ठभागे क्रमेण अनुगच्छन्ति अनुअनुयान्ति । (तएणं तस्स भरहस्स रण्णोबहुईओ) ततः सामन्त नृपानुगमनानन्तरम् तस्य भरस्य राज्ञः सम्बन्धिन्यो बहूव्यो दास्यो भरतं राजानं पृष्ठतः पृष्ठतोऽभुगच्छन्ति इतिपूर्वेण सम्बन्धः कास्ता इत्याह (खुज्जा चिलाइ वामणि वडभीभी बब्बरी बउसिआओ। जोणियपल्हवियाओ ईसिणियथारू किणियाओ ॥१॥ लासिअलउसिज्ज दमिलीसिंहलि तह आरबी पुलिंदी । पक्कणि बहलिमुरंडी सबरीओ पारसीओअ ॥२॥ के हाथ में उत्पल था - (जाव अप्पेगइया सयसहस्सपत्त हत्थगया) यावत् कितनेक व्यक्तियो। के हाथ में कुमुद था, कितनेक व्यक्तियों के हाथ में नलिन था, कितनेक व्यक्तियों के हाथ में सौगंधिक था कितनेक व्यक्तियो के हाथ में पुण्डरीक था, कितनेक व्यक्तियो के हाथ में सहस्त्र पत्तों वाला कमल था और कितने क व्यक्तियो के हाथ में शत सहस्त्र पत्तो वाला कमल था (तएणं तस्स भरहस्स रपणो वहईओ खुज्जा चिलाइवामणि वड भी मो वची बडसियाओ जोणिय पल्हवियाओ इसिणिय थारु किणियाओ ।।१।। - लामिअल सिग्न दमिली पिहलो तह आरबी पुलिंदीअ । पक्कणि बहलिमुरंडी सचरी ओ पारसी मो अ ।।२।। इन सब सामन्त नृपो के पीछेજા) યાવત્ કેટલાક મનુષ્યના હાથમાં કુમુદે હતાં, કેટલાક માણસોના હાથમાં નલિન હતાં, કેટલાક મનુષ્યના હાથમાં સૌગ ધિક હતા, કેટલાક મનુના હાથ માં પુંડરિકો હતા, કેટલાક મનુષ્યના હાથમાં સહસ્ત્રદલ કમળા હતાં અને કેટલાક મનુષ્યોના હાથમાં 1-सखल भणे। तi (तए ण तस्स भरहस्स रपणो यहईओ खुजा चिल्लाह वामणिवडभीओ वम्बरीबउसियाओ, जोणियपहावयाओ ईसिणिय थारु किणियाओ ॥१॥ लासिअल उसिज्जवमिलीतह आरबी पुलिदोअ। पक्कणि बहलि मुरंडी सपरीओ पारसीओअ२ १ यहाँ यावत्पद से "अप्पेगइया कुमुयहत्थगया, अप्पेगइया नलिण हत्थगया, अप्पेगइया सोगंधिय हत्थ ग़ाया, अप्पेगइया पुंडरीय हत्थगया, अप्पेगइया सहस्सपत्त हत्थगया” इस पाठ का संग्रह हुआ है ये सब यद्यपि कमल के ही भेद है. परन्तु इनमें क्या२ भेद है यह अन्य ग्रन्थों में लिखा जा चुका है अतः वहाँ से यह विषय जान लेना चाहिये . १ मी यापही "अप्पेगया कुमुदहत्थाया, अप्पेगड्या, नलिण इत्थगया, अप्पेगईया सोगंधिय हत्थगया, अप्पेगड्या पुंडरीय हत्थगया, अप्पेगश्या सहस्सपत्तहस्थराया' मा પાઠનો સંગ્રહ થયો છે. એ બધાં જો કે કમળના જ પ્રકારે છે, છતાંએ એમનામાં શેર ભેદ છે. એ વાત અન્ય ગ્રન્થમાં સપષ્ટ કરવામાં આવી છે એથી તે ગ્રંથોમાંથી એ વિષે જાણ नत्र. Page #567 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ह. वक्षस्कारः सू० ४ भरतराशः गमनानन्तरं तदनुचरकार्य निरूपणम् ५५३ छाया- कुब्जाश्चिलात्यो वामनिका वडभिका बर्बयों बकुशिकाः । जोनिक्यः पलहविका ईसिनिकाः थारुकिनिकाः ॥१॥ लासिक्यो लकुसिक्यो द्रविडयः सिंहल्य आरव्यः पुलिन्द्रयः । पक्कण्यो बहल्यो मुरुण्डयः शबर्यः पारसिकाः ॥२॥ तत्र कुब्जाः वक्रजङ्घाः, चिलात्यः चिलातदेशोद्भवाः, वामनिकाः, अतिलघुशरीराः लघूनतहदयकोष्ठावा' वडभिकाः महडकोष्ठा वक्राधः कायावा बर्बौं-बर्बर. देशोत्पन्नाः, बकुशिका:-बकुशदेशोद्भवा जोनिक्यो-जोनकदेशजाः, पल्हविका पल्हवदेशोत्पन्ना, ईसिनिकार, ईसिनिक देशभवाः, थारुकिनिकाः थारुकिनदेशोत्पन्नाः, लासिकिन्यो-लासकदेशोद्भवाः, लकुशदेशनाः, द्रविड्यो-द्रविडदेशनाः, सिंहल्य:-सिंहलदेशनाः आरब्यः-आरबदेशजाः, पुलिन्द्रयः पुलिन्द्रदेशजाः, पक्कण्यः पक्रकणदेशजाः, बहल्यो वहलिदेशजाः, मुरुण्ड्यो मुरूण्डदेशजाः, शबर्यः-शबरदेशजाः, पारसीका:-पारसदेशजाः, अत्र चिलात्यादयोऽष्टादश पर्वोक्तानुसारेण तत्तद्देशोद्भवत्वेन तत्तन्नामिकाः, कुब्जादयस्तु तिनो विशेषणभूता विज्ञातव्याः, अथ यथा प्रकारेणोपकरणेन ताः भरतमनुजग्मुस्तथा चाह --(अप्पेगइया) इत्यादि । (अप्पेगइया वंदणकलसहत्थगयाओ) अप्येकिकाः वन्दनकलशहस्तगताः, तत्र वन्दनकलशा:-मगल्य घटा हस्तगता यासां तास्तथा (चंगेरीपुप्फ२ जिनकी जंघाएं वक्र है जो चिलात देश में उत्पन्न हुइ है तथा जो अतिलघु शरीर वाली है अथवा जिनका नाभि से नीचे का शरीर भाग वक्र है ऐसी बर्बर देश की दासियां, वकुश देश की दासियां, जोनक देश की दासियां, पल्हव देश की दासियां, ईसिनिक देश को दासियां, थारुकिन देश की दासियां, लासक देश की दासियां, लकुश देश की दासियां, द्रविड देश की दासियां सिंहल देश की दासियां,अरब देश की दासियां, पुलिन्द्र देश की दासियां पक्कण देशको दासियां बहली देश को दासीयां, मुरण्डदेश की दासीयां, शबर देश की दासीयां, पारस देश की दासीयां, इस प्रकार की ये १८ देशोंकी दासियां-चली (अप्पेगइया वंदणकलसहत्थगयाओ चंगेरी पूप्फपडलहत्थगयाओ ) इनमें से कितनीक स्त्रियों-दासियों के हाथ में मङ्गल कलश એ સર્વે સામન્ત નૃપેની પાછળ જેમના સાથળો વક્ર છે, જેઓ ચિલાત દેશમાં ઉત્પન્ન થઈ છે, તેમજ જેઓ અતિ લઘુ શરીરવાળી છે અથવા જેમનું નાભિથી નીચેનું શરીર વક્ર છે, એવી ખબર દેશની દાસીએ, વકુશ દેશની દાસીઓ જોનક દેશની દાસીએ, પલ્લવદેશની દાસીએ ઇસનિક દેશની દાસીએ, થારુકિત દેશની દાસીએ, લાસક દેશની દાસીએ લકુશ દેશની દાસીઓ, દ્રવિડ દેશની દાસીઓ સિંહલ દેશની તાસીઓ, અરબ દેશની દાસીઓ, પુલિન્દ્ર દેશની દાસીઓ, પકણ દેશની દાસીએ, બહલિ દેશની દાસીએ મુરંદેશની દાસીઓ, શબર દેશની દાસીએ, પારસ દેશની દાસીએ, આ પ્રમાણે अढार शिनी हसीसी याला al. (अप्पेगइया चंदण कलसहत्थगयाओ चगेरी पुष्फ पडलहत्थगयाओ) थे हासीमामांथा दी हसीना खायामा म ४।। ता, કેટલીક દાસીઓના હાથમાં ફેલની નાની છાબડી હતી અને તેમાં અનેક જાતના Page #568 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पडलहत्थगयाओ) चन्नेरी पुष्पपटलहस्तगताः, तत्र च जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तसूत्रे पुष्पपटलं चङ्गेरीपुष्पपटलम् चरी कुसुमसमूहः तत् हस्तगतं यासां तास्तथा (भिंगार आदंसथालपाती सुपरट्टगवायकरगरयणकरंड पुप्फ चंगेरी मल्लवण्णचुण्णगंध हत्थगयाओ ) भृङ्गारादर्श स्थालपात्रीसुप्र तिष्ठकवातकर करत्नकरण्डपुष्प चङ्गरीमालयवर्णचूर्णगन्धहस्तगताः, तत्र भृङ्गारकः ( झारी) ति भाषा प्रसिद्धः आदर्श दर्पण: स्थाल: महतीस्थाली, पात्री लघुस्थाली सुप्रतिष्ठा सुस्थापनं भवति यस्मिन् स सुप्रतिष्ठकः पूर्णघटाद्याधारमात्रविशेषः वातकरकः घटविशेषः रत्नकरण्डः (करंडिया) इति भाषाप्रसिद्धो रत्नाधारपात्रविशेतः, अतः परं नवरं पुष्प चङ्गतः आरभ्य माल्यादिपद विशेषितास्तत्तच्वय्य ज्ञातव्या स्तथा च पुष्पचङ्गेरीमाल्यचङ्गेरी, वर्णचङ्गेरी, चूर्णचङ्गेरी, गन्धचङ्गेरी एता हस्तगता यासां तास्तथा ( वत्थ आभरणको महत्ययचंगेरी पुप्फपडलहत्थगयाओ) वस्त्राभरणलोमहस्तक चङ्गेरी पुष्पपटलह. स्तगताः तत्र लोमहस्तक बद्धमयूरपिच्छसमूहः पुष्पपटल पुष्पसमूहः अतिरिक्तानि प्रसिथे, कितनीक दासियो के हाथ में चंगेरी में पुष्पो का समूह था. (भिंगार आदंस थाल पाति सुपइद्रुगवाय करगरयणकरंड पुप्फचंगेरी मल्उवण्णचुण्ण गंधहत्थग़याओ ) कितनीक दासियों के हाथ में भृङ्गारकथा-झारी थी. कितनीक दासियों के हाथ में आदर्श-दर्पण था. कितनी दासियों के हाथ में स्थाल - बडेर थाल थे कितनीक दासियों के हाथ में छोटोर थालियां थी, कितनीक दासियों के हाथ में सुप्रतिष्ठ पूर्ण घटो आदि के आधार भूत पात्रविशेष थे, कितनीक दासियों के हाथ में वातकरक-घटविशेष-थे, कितनीक दालियों के हाथ में रान करण्ड-रत्नों को रखने के पात्र विशेष थे इसी तरह से किन्हीं२ दासियो के हाथ में पुष्प चंगेरी, किन्हीं२ दासियों के हाथ में वर्ण चङ्गेरी, किन्हीं२ के हाथ में चूर्ण चङ्गेरी और किन्हीं के हाथ में गन्ध चङ्गेरी थी (वत्थ आभरणोमहत्थय चंगेरी पुप्फ पडल हत्थगयाओ जाव लोमहत्थ गया ओ ) किन्हीं २ दा. मियो के हाथ में वस्त्र थे, किन्हीं२ दासियो के हाथ में आभरण थे किन्हीं२ द सियो के हाथ पुष्प तां. ( भिंगार आदस थाल पाति सुपरट्टगवायकरगरगणकरंड नुप्फ बंगेरी मल्लवण्णघुण्णगंध हत्थगयाओ ) डेटसी हासी मोना हाथ मां, श्रृंगार। हता, डेंटली દાસીએના હુ થેામાં-આદશ ---ણા હતાં. કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં સ્થાલે-માટા-માટા થાળે! હતા. કેટલીક દાસીએના હાથેામાં નાની-નાની થાળીએ હતી. કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં સુપ્રતિષ્ઠકા-પૂર્ણ ઘટ-વગેરેના આધાર ભૂતપાત્ર વિશેષ હતા. કેટલીક દાસીએના હાથે માં વાતકરક-ઘટ વિશેષ-હતા. કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં રત્ન કરડ-રત્નેને મૂકવા મટેના પાત્ર વિશેષેા હતાં. આ પ્રમાણે જ કેટલીક દાસીએના હાથેામાં પુષ્પની નાની છાબડી ખેા, કેટલીક દ!સીએના હાથેામાં રંગભરેલી નાની છાખડીઓ, કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં ચૂત્રુ ભરેલી નાની છાબડીએ અને કેટલીક દાસીએના હાથેામાં સુગન્ધ-પદાર્થોં लरेसी नानी छाणडीओ हुती. ( वत्थ आभरण लोमहत्थयचंगेरी पुप्फपडलहत्थगयाओ जाय लोमहत्थगयाओ) उसी हासी खोना हाथां वस्त्र हुता डेटसी हासी खाना हाम આભરણા હતાં, કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં લેામહસ્તકે હત', એટલે કે મયૂરના પિચ્છ ५५४ Page #569 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकातृ वक्षस्कारः सू० ४ भरतराज्ञः गमनानन्तरं तदनुचरकार्य निरूपणम् ५५५ द्वान्येव तानि हस्तगतानि यासां तास्तथा (जावको महत्थगयाओ) यावत् लोमहस्तगताः आबद्धमयूरपिच्छहस्तगताः, इत्यर्थः (अप्पेगइयाओ सीहासणहत्थगयाओ) अप्येकिकाः सिंहासन हस्तगता (छत्तचामरहत्थगयाओ) अप्येकिकाः छत्रचामर हस्तगताः (दिल्लसमुग्गय हत्थगयाओ) तथा अप्येकिकाः तैल समुद्राः तैल भाजन विशेषास्तद्धस्तगताः अत्र समुद्रक सङ्ग्रहमाह तेल्ले कोट्ठे समुग्गे पत्ते चोएअ तगरमेला य हर हिंगुल मणोसिला सासवसमुग्गे ||१|| तैलं कोष्ट समुद्रकः पत्रं चोयं च तगरम् एला च । हरिताल हिङ्गुलकं मनः शिला सर्पपसमुद्गः ॥१॥ एवम् कोष्ठसमुद्गाः कोष्ठभाजन विशेषाः तद्धस्तगताः, एवं पत्रसमुद्गक चोय समुद्गक हस्तगताः तगरसमुद्रकहस्तगताः, एलासमुद्ग कहस्तगताः, हस्तगताः, में लोम हस्तक थे- मयूर के पिच्छो को बनी हुइ मयूरपिच्छिकाएँ थी किन्हीं दासियों के हाथ में पुष्पपटल - पुष्प समूह - था बाकी के इस सूत्रगत पद सुगम है । ( जाव लोमहत्थगयाओ) तथा कितनी दासियां ऐसी थी कि जिनके हाथ में यावत् आबद्ध मयूरपिच्छो की पोटलियां थी (अप्पेगइयाओ सीहा सणहत्थगयाओ ) कितनीक दासियां ऐसी थी कि जिनके हाथ में सिंहासन था. ( छत्तचामरहत्थगयाओ ) कितनोक दासियां ऐसी थी कि जिनके हाथ में छत्र, चमर ये दोनो वर एं थी. ( तिल्लसमुग्गयहत्थगयाओ ) कितनी दासियां ऐसी थी कि जिनके हाथ में तेल के रखने का पात्र विशेष था समुद्र कद का अर्थ पात्र विशेष है. का संग्रह इस गाथा द्वारा इस प्रकार से कहा गया है। समुद्रक तेल्ले, कोटुसमुग्गे पत्ते चोए अ तगर मेलाय | हरिआ हिंगुलिए मणोसिला सासवसमुग्गे ॥ १ ॥ इस के कितनी दासियों के हाथ में कोष्ठसमुद्र थे, कितनीक दासियों के हाथ में अनुसार पत्र समुद्र थे, कितनीक दासियों के हाथ में चोय समुद्रक थे, कितनीक दासियों के हाथ में કૈાથી નિમિ`ત મયૂર પિચ્છિકા હતી કેટલીક દાસીએના હાથેામાં પુષ્પપટલેા-પુષ્પ સમૂહ હતા. આ સૂત્રના શેષ પદોની વ્યાખ્યા સરલ छे. (जाव लोमहत्थगयाओ) तेमन डेटली દાસ એ એવી હતી કે જેમના હાથેામાં યાવત આખદ્ધ મયૂર પિછે.ની પાટલીઓ હતી. ( अपेगइयाओ सीहासणहत्थगयाओ) डेटसी सीओ खेत्री इती नेमना हाथामा सिहासन इता तथा (छत्तवामर हत्थगयाओ) डेटसी हासी वीडती है मना हाथाभा छत्र, याभर से मन्ने वस्तुओ हुती. (तिल्लसमग्गय हत्थगयाओ) डेटसी हासी थे। मे કે જેમના હાથેામાં તેલ ભરવાના પાત્ર વિશેષ હા. મમુગ્ગુ' શબ્દને અથ પાત્ર વિશેષ થાય છે. સમુદ્બક'ને સગ્રહુ આ ગાથા વડે આ પ્રમણે સ્પષ્ટ કરવાં મઆવેલ છે. तेल्ले, कोट्ठसमुग्गे पत्ते चोप अ तगर मेलाय । हरिआ हिंगुलिप मणोसिला सासत्रसमुग्गे ॥ १ ॥ Page #570 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६५६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे हरिताल समुद्गक हस्तगताः हिङ्गुलकसमुद्गक हस्तगताः, मनः शिला समुगद्गकहस्तगताः सर्पपसमुगद् कहस्तगता इति । (अप्पेइयाओ तालिअंटहत्थगयाओ अप्पेगइयाओ धूव कडुच्छुयहत्थगयाओ भरहं रायाणं पिओ २ अणुगच्छंति) अध्येकिकाः तालवृन्तहस्तगताः, तत्र तालवृन्तं व्यजनं यासां तास्तथा, अध्येकिकाः धूपकडुच्छुकहस्तगताः = धूपाधान कडुच्छुकपात्रपाणयः, भरतं राजानं पृष्ठतः पृष्ठतोऽनुगच्छन्ति । अथ यया समृद्धचा भरतो राजा आयुधशालागृहं गतवान् तामाह - (तएणं) इत्यादि (तएण से भरहे राया) ततः खलु स भरतो राजा (जेणेव आउघरसाला तेणेव उवागच्छ इ) यत्रैव आयुधगृहशाला तत्रैवोपागच्छतीति अग्रेण सम्बन्धः सः किम्भूतस्तत्राह - (सव्विढिए) सर्वद्वर्या सकळालङ्कारादिरूपया लक्ष्म्या युक्त इति गम्यं पुनः (सव्वजुइए) सर्वद्युत्या सर्वदीप्त्या (सव्ववलेणं) सर्वबलेन - सर्वसैन्येन, (सव्वसमुदएणं) सर्वसमुदयेन - परिवारादि समुदायेन (सव्वायरेण) सर्वादरेण चक्ररत्नभक्ति बहुमानेन (सव्वविभूसार ) सर्वविभूषया सर्वशोभया (सव्वविभूईए) सर्वविभूत्या सर्व - सम्पत्त्या सह तथा (सव्ववत्थपुप्फमल्लालंकारविभूसाए) सर्ववस्त्रपुष्प माल्यालंकारविभूपया (सव्वतुडिय सद्दसण्णिणाएणं) सर्वत्रुटितशब्दसंनिनादेन सर्वेषां त्रुटितानां तूर्याणां वाद्यविशेषाणां यः शब्दो ध्वनिर्यश्व सं= सङ्गतो निनादः = प्रतिध्वनिस्तेन, अथ सर्वशब्देन अल्पीयोsपि निर्दिष्टं भवति ततश्च न तथा विभूतिर्वर्णिता भवतीति आशङ्कमानं प्रत्याह(महया इड्ढीए) इत्यादि । (महया इड्ढीए जाव) महत्या ऋद्धया यावत्, तत्र ऋद्धिरैश्वम् यावत्पदात् धुत्यादि परिग्रहः (महया वरतुडियजमगसमगपवाइएणं) महता वरत्रुटितहरिताल समुद्रक थे, कितनीक दासियों के हाथ में हिङ्गुलक समुग्दक (डबूशा ) थे कितनोक दासियों के हाथ में मनः शिला समुद्गक थे और कितनीक दासियों के हाथ में सर्षप समुद्रक थे. इसी तरह से कितनीक दासियों के हाथ में ( तालिअंट हत्थगयाओ ) तालपत्र - - पंखा व्यजन • बीजना था - ( अप्पेगइया धूव कडुच्छुय हत्थगयाओ ) और कितनींक दासियों के हाथ में धूप रखने के कडाह थे. ( भरहं रायाणं पिट्ठओ २ अणुगच्छं ते) ये सब दासियां भी भरत राजा के पीछे चल रही थी (तए णं से भरहे राया सव्विड्ढोए सव्वज्जुइए सम्वबलेणं - सव्वसमुदएणं सव्वायरेणं सन्वविभूसाए सब्वविभूईए सव्व वत्थ पुप्फ गंध मल्लालं कारविभूसाए - એ મુજબ કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં કાઠે સમુદૃગા હતા, કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં પત્ર સમુદ્ગકેા હતા. કેટલીક દાસીએના હાથેામાં ચાય સમુદ્ગક હતા. કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં તગર સમુગા હતા. કેટલીક દાસીઓના હાથામાં તિાલ સમુદ્ હતા. કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં Rsિ'ગુલક સમુદ્ના હતા, કેટલીક દાસીઓના હાથેામાં મન:શિલા સમુદ્ગકા હતા અને કેટ્લીક દાસીએના હાથેામાં સ`પ સમુદગકા હતા. આ પ્રમાણે डेंटली हासीखना हाथ मां (तालिअटहत्थगयाओ) तासवृत्रो - पं भागो-हता (अप्पेगइया धूकड छुयहत्थगयाओ) मने उसी हासीखना हाथोमां धूप भूस्वानी छाती (भरहं रायाणपिओ २ अणुगच्छति) ये सर्वे हासी पशु लरत રાજાની Page #571 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तृ० वक्षस्कारः सू ४ भरतराज्ञः गमनानन्तर तदनुचरकार्यनिरूपणम्५५७ यमकसमक प्रवादितेन तत्र महता-बृहता वरत्रुटितानां श्रेष्ठ तुर्याणां यमकसमकं युगपत्प्रवादितं प्रवादनं शब्दकरणं तेन (संखपणवपडहभेरिझल्लरिखरमुहि मुरज मुइंग दुंदुहि निग्घोसणाइएणं) शङ्खपणवपटह भेरीझल्लरीखरमुखीमुरजमृदङ्गदुन्दुभिनिर्धोपनादितेन, तत्र शख:-प्रसिद्धः, पणवो लघुपटहः, पटहस्तु स एव महान् (ढोल) इति भाषा प्रसिद्धः, भेरी ढक्का, झल्लरी-वलयाकारा (शालर) इति भाषा प्रसिद्धा, खरमुखी-काहला भिधोसम्वतुडिम सद्द सणिणएाणं महया इढोअ जाव महया बरतुडिअ जमगसमगपवाइएणं संख पणवपडहभेरिझल्लरिवरमुहि - मुरज मुइंगदुंदुहिणिग्घोसणाइएणं जेणेव आउइघासाला तेणेव उवागच्छइ) इस तरह के ठाट बाट से चलता हुआ वह भरत राजा जहां पर आयुध शाला थी वहां पर आया . ऐसा यहां सम्बन्ध लगा लेना चाहिये । भरत राजा के सम्बन्ध में सूत्रकार कथन करते हुए कहते हैं कि उस समय वह भरत राजा समस्त अलङ्कारों से विभूषित था इसलिये संम्पूर्ण दीप्ति से वह चमक रहा था। समस्त सेना उसके साथ२ चल रही थी। समस्त परिवार उसका उसके साथ साथ था । चक्ररत्न के भक्ति के प्रति बहुमान उसके हृदय में हिलोरे ले रहा था, आदरणीय जन के या आदरणीय वस्तु के दर्शन करने के लिये जिस वेषभषा से जाना चाहिए ऐसे समस्त वेषभूषा से वह सुसज्जित था इस तरह वह भरत राजा अपनी समस्त राज्यविभूति के साथ आयुधशाला में आने के लिये चला आ रहा था समस्त वस्त्र,पुष्पमाल्य एवं अलङ्कारों से विभूषित हुए उस भरत राजा के आगे२ भिन्न प्रकार के बाजे बजते हुए आरहे थे। इनकी ध्वनि और प्रतिध्वनि से पुरस्कृत हुए एवं अपनी महर्द्धिक यावत् द्यति आदि से सौभाग्य की पराकाष्ठा को प्राप्त हुए वे भरत राजा बड़े जोर से एक साथ बजाए गये श्रेष्ठ शंख, - पणव, - लघुपटह, पटह - विशाल, पटह - ढोल, भेरी, - झालर, स्वरमुखी मृदङ्ग, पापायी २ही ती.(तए ण से भरहे राया सव्विइढीए सम्धज्जुइए सव्व बलेण सव्व समुदपण सव्वायरेण सव्वविभूसाए सव्वविभूईए सव्ववत्थपुप्फगंधमल्लाल कारविभूसाए सव्वडिअसहसणिणापणं महया इड्ढीए जाव महया वरतुडि अजमगसमग पवाइएणं संखपणवपडह मेरिझल्लरिखरमुहिमुरजमुइंग दुंदुहिणिरघोसणाइपण जेणेव आउछ घरसाला तेणेव उवागच्छइ) ndi 83भा था यात ते सरत जय सोय શાળા હતી, ત્યાં ગયે. આ જાતને અર્થ અત્રે સમજી લેવું જોઈએ. ભરત રાજાના સંબધમાં સૂત્રકાર કથન કરે છે કે તે સમયે તે ભરત રાજા સર્વ અલંકારોથી વિભૂષિત હતો. એથી તે સંપૂર્ણ દીપ્તિથી પ્રકાશિત થઈ રહ્યો હતો. સંપૂર્ણ તૈન્ય તેની સાથે-સાથે ચાલી રહ્યું હતું તેને સમગ્ર પરિવાર તેની સાથે સાથે ચાલતે હતો. તેના હદયમાં ચક્રરત્ન પ્રત્યે અતીવ ભક્તિ તેમજ બહુમાન ઉપન થયાં. આદરણીય જન અથવા આદરણીય વસ્તુના દર્શન માટે જે વેષભૂષાથી જવું જોઈએ એવી સમસ્ત વેષભૂષાથી સુસજજ હતો. આ પ્રમાણે તે ભરત રાજા પિતાની સમસ્ત રાજ્ય વિભૂતિની સાથે આયુધશાળા તરફ જઈ રહ્યો હતો. સમસ્ત વચ્ચે, પુષ્પમાલય તેમજ અલંકારોથી વિભૂષિત થયેલા તે ભરત રાજાની આગળ ભિન્ન-ભિન્ન પ્રકારના વાજા વાગતા Page #572 -------------------------------------------------------------------------- ________________ www.amund ५५८ जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्रे वाद्यविशेषः, मुरजो, मृगश्च वाद्यविशेषौ दुन्दुभिः वाद्यविशेष एव, एषां निर्घोषनादि तेन, तत्र निर्वोपो महाअनि नांदितं च प्रतिवनिस्तेन सह यत्रैव आयुधशाला तत्रैवोपागच्छति (उवागच्छित्ता आलोए चक्करयणस्स पणामं करेइ) उपागत्य आलोके दर्शने सत्येव चक्ररत्नस्य प्रणाम करोति, चक्ररन्नं प्रणमतीत्यर्थः, आयुधवरस्य देवाधिष्ठितत्वात् (करेता जेणेव चक्करयणे तेणेव उवागच्छ६) कृत्वा प्रणाम विधाय यत्रैय चक्ररत्नं तत्रैव उपागच्छति (उवाच्छित्ता लोमहत्वयं परामुसइ) उपागत्य लोमहस्तकं परामृशतिसमीपं गत्वा लोमहस्तकं मयूरपिच्छप्रमार्जनिकाम्, परामृशति गृह्णाति (परामुसित्ता चक्करयणं पमज्जइ) परामृश्य गृहात्वा चक्ररत्नं प्रमार्जयति, (पज्जित्ता) प्रमाये (दिव्वाए उदग धाराए अब्भुक्खेइ) दिव्ययोदकधारया अभ्युक्षति सिञ्चति प्रक्षालयतीत्यर्थः (अब्भुक्खिता) अभ्युक्ष्य प्रक्षाल्य (सरसेणं गोसीसचंदणेणं अणुलिंपइ) सरसेन सुन्दरेण गोशीपचन्दनेन-एतन्नामक श्रेष्ठचन्दनविशेषेण अनुलिम्पति चर्चयति (अणुलिंपित्ता) अनुलिम्प्य (अग्गेहि वरेहिं गंधेहिं मल्लेहिय अच्चिणइ) अप्रैः नूतनैः, वरैः श्रेष्ठ गन्धेर्माल्यैश्च अर्चयति (अच्चिणित्ता ) अर्चयित्वा ( पुप्फारुहणं मलगंधवण्णचुण्णवत्थारुहणं आभऔर दुन्दुभि इन सबका ध्वनि और प्रतिध्वनि के साथ२ जहां पर आयुधशाला थी वहां पर आये। ( उवागच्छित्ता आलोए चारयणस्स पणामं करेइ) वहां पर आकर के उन्होने उस चक्ररत्न के दिखने पर उसे प्रणाम किया । क्यो कि यह देवाधिष्ठित था । (करेत्ता जेणेव चक्करयणे तेणेव उवागच्छइ) प्रणाम करके फिर वे जहां पर वह चक्ररत्न था वहां पर गये । (उवगच्छित्ता लोमहत्थयं परामुसह, परामुसित्ता चककरयणं पमज्ज३, पमज्जिता दिवाए उदगधाराए अब्भुक्खेड) वहाँ जाकर उन्होने मयूर पिच्छ का बनी हुइ प्रमार्जनी को उठाया , उठाकर उससे उन्होने चक्ररत्न की सफाई की। सफाई करके फिर उन्होने उस पर निर्मल जल को धारा छोड़ी (अ०भुक्वित्ता सरसेणं गोसीसचंदणेणं अनुलिपइ) जल धारा करके फिर उन्हो ने उस पर सरस गोशीर्ष चंदन से लेप किया - (अणुलिंपित्ता अग्गेहिं वरेहिं गंधेहिं मलेहिं अभिवणइ) लेप करके अपनवीन एवं श्रेष्ठ गन्धद्रव्यों से और पुष्पों से उन्हो ने उसकी पूजा की (अच्चिणित्ता पु'फारहणं मल्लगंधवण्णહતા તેમની ધ્વનિ પ્રતિધ્વનિથી પુરસ્કૃત થયેલા તેમજ પોતાની મહ િયાવત હતિ અહિથી સૌભાગ્યની પરાકાષ્ઠાએ પહોચેલા ત ભરત રાજા બહુજ જોરથી એકી સાથે વગાડાયેલા श्रेड शो, पशु-मधु५८४, ५८४-पिशाण, ५८8-ढोa, लेरी-ब२, ५२मुभा. भृग અને હું દુભી એ સર્વની ઇવનિ અને પ્રતિધ્વનિની સાથે સાથે જ્યાં આયુધશાળા હતી. ત્યાં a in माव्य। (उवागच्छित्ता आलोए चक्करयणस्स पणामं करेइ) त्यां पायाने तो a यत्न प्राम. तापिडित तु, (करेत्ता जेणेव वकारयणे तेणेव उवागच्छइ) प्रम ४शन पछी त न्यो २५४२(न त्यां गया. (उवागच्छिता लोमहत्थयं परामुसइ, परामुसित्ता चक्करयणं पमजइ पज्जित्ता दिब्धार उदगधाराए અમું) ત્યાં જઈને તેણે મયુર નિર્મિત પ્રમાનીને હાથમાં લીધી અને તેના વડે તેણે ચક્રરત્નની સફાઈ કરી સફાઈ કરીને પછી તેણે તેની ઉપર નિર્મળ જળધારા છોડી Page #573 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टिका तृ० वक्षस्कारः सू०४ भरतराज्ञः गमनानन्तरं तदनुचर कार्यनिरूपणम् ५५९ रणारुणं करेइ) पुष्पारोपणं माल्यगन्धवर्ण चूर्णवस्त्रारोपणम् आभरणारोपणं करोति, पुष्पारोपणं माल्यारोपणम्, गन्धारोपणं वर्णारोपणं चूर्णारोपणं वस्त्रारोपणम् आभरणारोपणं करोति (करिता) कृत्वा (अच्छेहि सहेहि सेएहिं रयणामएहिं अच्छरसातंडुले हिं चकरयणस्स पुरओ अट्ट मंगलए आलिहइ) अच्छेः श्लक्ष्णैः श्वेतैः रजतमयैः अच्छरसतण्डुलैश्चरत्नस्य पुरतः अष्टाष्टमङ्गलकानि आलिखति, तत्र - पुष्पाद्यारोपणं विधाय अच्छेः निर्मलैः श्लक्ष्णः अतिचिक्कणः श्वेतैश्वेत र्णैः, रजतमयैः, रजत निर्मितैः, अतएवं अच्छरसतन्दुलैः चक्ररत्तस्य पुरतः, अष्टाष्टमङ्गलकानि आलिखति तान्येव दर्शयति - ( तं जहा ) तद्यथा ( सोत्थिय ) इत्यादि । (सोत्थियसिरिवच्छणं दिआवत्तवद्धमाor भासणमच्छकलसदप्पण अट्टमंगलए) स्वस्तिक १ श्रीवत्स २ नन्द्यावर्त्त ३ वर्द्धमानक ४ भद्रासन ५ मत्स्य ६ कलश ७ दर्पणा ८ ट मङ्गलकानि, इमानि अष्ट मङ्गलकानि (आलिहित्ता) आलिख्य आकारविशेषकरणेन (काऊणं कृत्वा - अन्तर्वर्णकादि भरणेन पूर्णानि विधाय (करेइ उवयारंति) करोति उपचारमिति उपचारं करोतीति (किंते) इति कोऽसौ उपचारः ? तमेव दर्शयति- ( पाडलमल्लिअ चंपगचुण्ण वत्थारुहणं आभरणारुहणं करेइ) पूजा करके फिर उन्होने उसपर पुष्प चढाये मालाएँ चढाइ गन्ध द्रव्य चढाया, सुगंधित चूर्ण चढाया, वस्त्र चढाया, और आभरण चढाये । ( करिता अच्छे सहि सेहिं रयणाम एहिं अच्छरसातंडुलेहिं चक्करयणस्स पुरओ अट्ठट्ठ मंगलए अ. लिइ) पुष्पादि चढाकरके फिर उन्हो ने उस चक्ररत्न के समक्ष स्वच्छ स्निग्ध, श्वेत ऐसे रजतमय स्वच्छ सरस तंदुलों से चावलों से - आठ२ मङ्गल द्रव्य लिखे । ( तं जहा ) उन मङ्गल द्रव्यों के नाम इस प्रकार से हैं - (सोत्थिय सिरिवच्छदिआवत्त वद्धमाणग भदासण मच्छकलस दप्पण अट्ठ मंगलए ) स्वस्तिक १, श्री वरस २, नन्द्यावर्त्त ३, वर्द्धमानक ४, भद्रासन ५, मत्स्य ६, कलश ७, और दर्पण ८, इन आठ मंगल द्रव्योंको (आलिहित्ता) लिख करके (काऊणं करेइ उवयारंति) तथा उनके भीतर आकारादिवर्णो को लिखकर के इस प्रकार से उनका उपचार किया (पाडल मल्लिअचंपगअसोक पुण्णागचुअ मंजरिणवमालिअ (किते) जैसे - (अब्भुक्खित्ता सरसेण गोसीस चंदणेण अनुलिपर) ४धारा अर्ध्या पछी तेथे तेनी उपर गोधर्षयन्ननु बेपन यु. ( अणुर्लिपित्ता अग्गेदिं वरेहिं गंधेहिं मल्लेद्दि अचिणइ) લેપ કરીને અગ્રનવીન તેમજ શ્રેષ્ડ ગન્ય દ્રવ્યેથી અને પુષ્પાથી તેણે તેની પૂજા કરી. (अचित्ता पुप्फारुणं मल्लगंधबण्णचुण्णवत्थारुणं आभरणारुहण करेंह) पूल अरीने પછી તેણે તેની ઉપર પુષ્પ ચઢવ્યાં, માળાએ ધારણ કરાવી ગન્સ દ્રવ્યેા ચઢાવ્યાં, સુગन्धित यूर्य थढायुं, वस्त्र यढा भने अलर यढाव्यां (करिता अच्छेहिं सहेहिं परिणाम अच्छरसातंडुलेहिं चक्करयणस्सपुरओ अट्ठट्ठ मंगलप आलिहइ) पुण्य વગેરે ચઢાવાને તેણે તે ચક્રરત્નની સામે સ્વચ્છ, સ્નિગ્ધ, શ્વેત એવાં રજતમય સ્વચ્છ સરસ तडुबोथी - योमायोथी आह आह मंगल द्रव्यो मातेच्या (तं जहा ) મગળ દ્રબ્યાના नाभी आ प्रमाणे छे - ( सोत्थिय' सिरिवच्छ मंदिआवत्तवद्धमाणमच्छकललपण अड्ड - - 1 Page #574 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५६० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे असोगपुण्णाग चूयमंजरीणवमालिअबकुलतिलगकणवीरकुंद कोज्जयकोरंटयपत्तदमणयवरसुरहिसुगंधगंधिअस्स) पाटलमल्लिकचम्पकाशोकपुन्नागाम्रमजरीनवमालिका बकुलतिलककणवीरकुन्दकुब्जककोरण्टकपत्रदमनकवरसुरभिसुगन्धगन्धितस्य इत्यादि षष्ठयन्तपदानां (पुष्पनिकरस्य) इत्यग्रेण सम्बन्धः, तत्र पाटलं-पाटलपुष्पम् मल्लिका-विचकिलपुष्पम् (वेली) इति भाषायां प्रसिद्धम्, चम्पकाशोकपुन्नागाः प्रसिद्धाः आम्रमञ्जरी बकुलः केसरः तिलको यः स्त्रीकटाक्षनिरीक्षितो विकसति तत्पुष्पम्, कणवीरकुन्दे प्रसिद्ध कुब्जकं कूब इति नाम्ना वृक्षविशेषस्तत्पुष्पम्, कोरण्टकं-तन्नामक पुष्पविशेषः पत्राणि मरुबक पत्रादीनि दमनकः स्पष्टः एतैर्वरसुरभिः-अत्यन्त सुरभिः तथा सुगन्धाः शोभनचूर्णास्तेषां गन्धो यत्र स तथा तस्य (कयग्गहगहियकरयलपन्भट्ठविप्पमुक्कस्स) कचग्रहग्रहीतकरतलप्रभ्रष्टविप्रमुक्तस्य युवत्याः पञ्चाङ्गुलिभिः केशेषु ग्रहणं कचग्रहः तन्न्यायेन गृहीतस्तथातदनन्तरं करतलाद्विप्रमुक्तः सन् प्रभ्रष्टः (पतितः) तस्य (दसद्धवण्णस्स) दशार्द्धवर्णस्य पश्चवर्णस्य (कुसुमणिगरस्स) कुसुमनिकरस्य पुष्पपुञ्जस्य (तत्थ चित्तं जाणुस्सेहप्पमाणमित्तं ओहिनिकरं करेत्ता) तत्र चित्रं जानत्सेधप्रमाणमात्रम् अवबकुलतिलग करणवीरकुंद कोज्जय कोरंटय पत्तदमणयवरसुरहि :सुगन्धगन्धिअस्स क्यग्गहगहियकरयल पब्भट्ठविप्पमुकास्स दसद्धवण्णस्स - पुप्फणिगरस्स) हर एक मंगल द्रव्य के चित्र के भितर बनाये गये प्रत्येक वर्ण पर उसने पाटल पुष्पों को गुलाब के फूलों को चढ़ाया। मल्लिका मोघरा - के पुष्पों को चढाया, चम्पक वृक्ष के पुष्पों को चढाया , अशोक वृक्ष के पुष्पों को चढाया. पुनाग वृक्ष के पुष्पो को चढाया, आम्र वृक्ष की मंजरी चढायी, नवमल्लिका. बकुल. तिलक, कणवीर-कनेर-कुन्द-कुजक, कोरंट, मरुबा, और दमनक इन सबके पुष्पों को चढाया । ये सब पुष्प अपनी सुगंधित गंध से महक रहे थे-अर्थात् ताजे थे-कुम्हलाये हुए नहीं थे । जिस प्रकार सदय होकर युवा पुरुष अपनी तरुण भार्या के राति काल में बहुत धिमे से हाथ द्वारा केशग्रह करलिया करता है और बाद में उसे छोड़ देता है । उसी प्रकार से चढ़ाते समय भरत राजा ने उन पुष्पो को पांचो अंगुलियो से पकड़ कर के उन लिखित वर्णादि के ऊपर मंगलए) स्वस्ति१, श्रीवत्स 3, न-धावत्त' 3, पद्धमान ४, मद्रासन ५, मत्स्य, ६, ४१ ७ अन ४५८, 48 भर द्रव्याने (आलिहिता) मीन (काऊणं करेइ) उवयारंति) तमस तमनी ५१२ मा पनि समान २॥ प्रमाणे तेमन। ५या२ या (किं ते) २५३ (पाडलमल्लिअ चंपगअसोक पुण्णागचूअमंजरिणवमालिचबकुलतिलगकण वीरकुदकोज्जयकोरंटयपत्तदमणयवए सुरहिसुगंधगंधिभस्स कयगगहगहिअकरयलपन्भट्टधिप्प मुक्कस्स दसद्धवप्णस्स पुप्फणिगरस्स) हरे४ ४२४ भ द्र०यना यिनी २०४२ नावामा આવેલા દરેક દરક વણું ઉપર તેણે પાટલ પુષ્પ ચઢાવ્યાં, મલ્લિકા-મોગરાના પુપિો ચઢાવ્યાં ચમ્પક વૃક્ષના પુષ્પ ચઢાવ્યાં, અશક વૃક્ષના પુષ્પ ચઢાવ્યાં, પુન્નાગ વૃક્ષના પુષ્પ ચઢાવ્યાં આમ્રવૃક્ષની મંજરીએ ચઢાવી, નવલિકા, બકુલ, તિલક, કણવીર કનેર, કુન્દ, કુજક, કરંટ, મરુઆ અને દમનક એ સર્વના પુષ્પ ચઢાવ્યાં. એ સર્વે પુપે તાજા હતાં, મ્યાન Page #575 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू०४ भरतराज्ञः गमनानन्तरं तदनुचरका र्यनिरूपणम् ५६१ धिनिकरं कृत्वा तत्र चक्ररत्नपरिकभूम्यां चित्रम् आश्चर्यजनकं जानूत्सेधप्रमाणेन जङ्घा यावदुच्चत्व प्रमाणेन प्रमाणोपेतपुरुषस्य चतुरङ्गुलचरणस्य चतुर्विंशत्यङ्गुलजानूच्चत्वसंमेलने नाष्टाविंशत्यङ्गुलरूपेण समाना मात्रा यस्य स तथा तम् अवधिना मर्यादया निकरं विस्तारं कृत्वा निधाय ( चंदप्पभवइरवेरुलि अविमलदंड) चन्द्रप्रभवज्रवैडूर्यविमलदण्डम्, तत्र चन्द्रप्रभाः चन्द्रकान्तमण्यः वज्राणि - हीरकमणयः - वैडूर्याणि तन्नामक मणयः तद्वत् तन्मयो वा विमलो दण्डो यस्य स तथा तम् (कंचणमणिरयणभत्तिचित्तं) काञ्चनमणिरत्नभक्तिचित्रम् । तत्र काञ्चनमणिरत्नानां सुवर्णमणिरत्नविशेषाणां भक्तयः - विभक्तयो रचनाः ताभिश्चित्रम् (कालागुरुपवर कुंदरुक्क तुरुक्क धूवगंघुत्तमाणुविद्धंच धूववर्द्धि) कृष्णागुरुप्रवरकुन्दुरुष्कतुरुष्कधूपगन्धोत्तमानुविद्धां च धूपवर्तिषु तत्र कृष्णा गुरुवरकुन्दुरुरुतुरुषाणां तत्तन्नामकसुगन्धिद्रव्यविशेषाणां यो धूपो गन्धोत्तमः सौरभोत्कृष्टः तेन अनुविद्धा व्याप्ता तां धूपवत्तिं धूपश्रेणिं च (विणिम्यंत) विनिर्मुञ्चन्तं त्यजन्तं ( वेरुलियमयं कडुच्छ्रयं पग्गहेतु पयते धूवं दहइ) वैर्यचढाया । वे पुष्प पांच वर्णों के थे । (तत्थ चित्तं जाणुस्सेइप्पमाणमित्तं ओहिणीगरं करेत्ता ) इन पुष्पों को वहां उसने इतनी मात्रा में चढाया की वहां उनकी ऊँचाई जानु के प्रमाण के बराबर अर्थात् २८ अंगुल प्रमाण हो गई- इसतरह आश्चर्यकारक चढाये हुए फुलों की माला चढ़ा करके उस भरत राजा ने (चंदप्यभव इर वेरुलिअविमल दंड़ कंचणमणिरयणभत्तिचित्तं कालागुरुपवर कुंदुरुक्कतुरुक्कं धूवगंधुत्तमाणुविद्धं च धूववर्द्धि) फिर चन्द्रकान्त मणियों के, हीरा के एवं वैडूर्यमणियों के जैसे विमल दण्डवाडे अथवा इन मणियों से निर्मित हुए दण्ड वाले एवं काञ्चन और मणिरत्नों से जिस में अनेक प्रकार के चित्रों की रचना हो रही है और जो काला गुरु, प्रव र कुन्दुरुष्क से बनी हुइ धूप की उत्तम गंत्र से व्याप्त होरहा है तथा जो धूप की श्रेणि को (विणिम्मुयंत ) निकाल रहा है ऐसे ( वेरुलियमयं कडुन्छुयं पग्गहेत) वैडूर्य मणि के बने हुए धूप दहन पात्र को हाथ में लेकर के ( पयते) बड़ी सावधानी से आदर पूर्वक उसने (धूवं दह ) ન હતા. જેમ યુવા પુરુષ સય થઈને તિકાલ વખતે પેાતાની તરૂણી ભાર્યાંના કેશેા ધીમેથી પેાતાના હાથમાં પકડે છે અને ત્યાર બાદ છેાડી દે છે, તેજ પ્રમાણે ભરત રાજાએ પુષ્પા ચઢાવતી વખતે તે પુષ્પાને પાંચે આંગળીએથી પકડીને તે લિખિત વર્ણાદિકની ઉપર ચઢાવ્યાં ते पुष्पांना तां. (तत्थ चित्तं जागुस्सेहपमाणमित्तं ओहिणीगरं करेता) से पुण्याने તેણે ત્યાં આટલી બધી માત્રામાં ચઢાવ્યાં કે ત્યાં તેમની ઉંચાઇ જાનુના પ્રમાણુ સુધી એટલેકે ૨૮ અંશુલ પ્રમાણુ થઇ ગઈ, આ પ્રમાણે સારી એવી આશ્ચય કારક માત્રામાં પુષ્પા ચઢાવીને ते भरत रानमे (चंदष्पभवइरवे रुलिअ विमलदंडं कंचणमणिरयणभित्तिचित्तं कालागुरुपवर कुंदुरुक्क तुरुक्कध्वगंधुत्तमाणुविद्धं च धूववट्टि) त्यार माह यन्द्रात भणियोना हीराना તેમજ વ ણુઓના જેવા વિમળ દડવાળા અથવા એ મણુિએથી નિર્મિત દડવાળા તેમજ કાંચન અને મણિરત્નથી જેમાં અનેક પ્રકારના ચિત્રોની રચના થઈ રહી છે અને જે કાલાગુરુ પવર કુંદરુષ્ક અને તુરુષ્ક નિમિ`ત ધૂપની ઉત્તમ સુગધિથી જે વ્યાપ્ત છે અને ७१ Page #576 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५६२ जम्बूद्रोपप्रतिसूत्रे मयं कडुच्छुकं प्रगृत्य प्रतो धूपं दहति तत्र वैडूर्यमयं वैरत्नघटितम्, कडुच्छुकं - धूपाधानकपात्रं प्रगृव गृहीत्वा ( प्रयतः) आद्रियमाणो धूपं दहति (दहेत्ता) दग्धा (सत्तट्ठपयाई पच्चीसक्कर) सप्ताष्टपदानि प्रत्यवष्वष्कति परावर्त्तते तत्र धूपं दग्ध्वा प्रमार्जनादि हेतु विशेषेण सन्निधीयमानचक्ररत्ने अत्यासन्नतया मत्कृताशातना माभूयादित्यभिप्रायेण स राजा सप्ताष्टपदानि प्रत्यपसर्पति पश्चादपसरति इत्यर्थः (पच्चोसक्कित्ता) प्रत्यवष्वष्क्य परावर्त्य (वामं जाणु अंचे जाव पणामं करेई) वामं जानुम् अञ्चति यावत् प्रणामं करोति, तत्र वामं जानुम् अञ्चति आकुञ्चयति ऊर्ध्वं करोति यावत्करणात् (दाहिणं जाणुं धरणियलंसि निहट्ट करयलपरिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं) इति संग्रहः, दक्षिणं जानुं धरणी तळे निहत्य करतल परिगृहीतं दशनखं शिरसावत्तं मस्तके अञ्जलिं कृत्वा प्रणामं करोति मनोऽभीष्टार्थ सिद्धि - दायकमिदमितिबुद्धया प्रीतः सन् प्रणमतीत्यर्थः (करेत्ता) प्रणामं कृत्वा (भाउघरसालाओ पडिणिक्खमइ) आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति (पडिणिक्ख धूप जलाया । (दहेत्ता सत्तटुपयाई पच्चीसक्कइ ) धूप जलाकर फिर वह वहां से सात आठ पग पीछे लौटा अर्थात् मेरे द्वारा किसी भी प्रकार से चक्ररत्न की अशातना न हो जावे इस ख्याल से वह धूप जलाकर पीछे वहां से सात आठ पैर दूर हो गया (पन्चोसक्कित्ता वामं जाणु अंचेइ) वहां से ७-८ पैर दूर हो कर उसने अपनी बाइ जानु को ऊपर उठाया (जाव पण्णामं करेई ) यावत् प्रणाम किया यहाँ यावत्पदसे (दाहिणी जाणुं धरणिय लंसि निहटुटु करयलपरिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि ) इस पाठ का संग्रह हुआ है इस पाठका तात्पर्य ऐसा है कि जब उसने अपनी बांइ जानु को ऊपर की ओर उठाया तब उसने अपनी दाहिनी जानु को भूतल पर रखा और दशों नख अंगुलियों के परस्पर में मिल जावें इस ढंग से अंजलिबना कर और उसे दाहिनी ओर से बाई ओर तक मस्तक के ऊपर से तीन बार घुमाकर प्रणामक्रिया (करेत्ता ) प्रणाम करके ( आउहघरसालाओं पडिणिक्खमइ) फिर वह आयुध शाला से बाहर निकला (पडिणिखमित्ता जेणेव वाहिरिया उवद्वाणसाला नेमांथी धूपनी श्रेणी ओ (विणिम्मुयंत) नीजी २डे हे मेवा (वेरुलियमयं कदुच्यं पग्गहेतु) वैडूर्य भविनिर्मित धूयहडेन पात्रने डाथमां बहने (पयत्ते) बहुत सावधानी पूर्व ते आदर पूर्व तेथे (धुवं दहइ) धूपने तेमां सजाये (दहेना सतट्ठपयाई पच्चोसक्कड) ધૂપ સળગાવીને પિછે તે ત્યાંથી સાત-આઠ પગલાં પાછા ફર્યાં, એટલે કે માપ વડે કાય પણ રીતે ચક્રરત્નની અશાતના ન થાય એ વિચારથી તે ધૂપ સળગાવીને પછી સાત-આઠ भगवां त्यांथी दूर भूसी गये. (पच्चोसक्कित्ता वामं जाणु अंचेइ) त्यांथी सात-पायां पाछा मसीने तेथे पोताना डमा छूटने उपर उठाव्यो. (जाब पणामं करेइ ) यावत् प्रशुभ अर्था, अडीं यावत् पश्री (दाहिणं जाणु धरणियलंसि निहटु करयल परिग्गाहियं दसनहं सिरसम अंजलि) या पाउना साथ थयो छे. या तात्पर्य प्रभा छे જ્યારે તેણે પેાતાના ડાબા ઘૂંટણુને ઉપર ઉઠાવ્યા ત્યારે તેણે પેાતાના જમણા ઘૂંટણને પૃથ્વી ઉપર મૂકયા અને આંગળીએના દશે દશ નખા પરસ્પર સમ્મિલિત કરીને પછી Page #577 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० ४ भरतराज्ञः गमनानन्तर तदनुचरकार्यनिरूपणम्५६३ मित्ता) प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य (जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ) यत्रैव बाहिरिका उपस्थानशाला यत्रैव सिंहासनं तत्रैव उपागच्छति (उवागच्छित्ता) उपागत्य (सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे सण्णिसिइ) सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखः पूर्वदिशाभिमुखः सन्निषीदति उपविशति (सण्णिसीइत्ता) संनिषध (अट्ठारससेणिप्पसेणीओ सदावेइ) अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणिः शब्दयति तत्र अष्टादश श्रेणी:-कुम्भकारादिप्रकृतीः, प्रश्रेणी:-तवान्तरभेदान् शब्दयति आह्वयति (सदावेत्ता एवं वयासी) शब्दयित्वा एवं-वक्ष्यमाणप्रकारेणाऽवादीत् उक्तवान् । अष्टादशश्रेणिश्रेणयश्चमा: (कुंभार १ पट्टइल्ला २ सुवण्णकाराय ३ सूक्कारा य ४ गंधव्वा ५ कासवगा ६ मालाकाराय ७ कच्छकरा ८ ॥१॥ तंबोलिमा ९ य एए नवप्पयाराय नारुआ भणिआ। अहणं णवप्पयारे कारुअ वण्णे पयक्खामि ॥२॥ चम्मयरु १ जंतपीलग २ गंधि ३ छिपाय ४ कंसकारे ५ य । सीवग ६ गुआर ७ भिल्ला ८ धीवर ९ वण्णाइ अट्ठदस ॥३॥ सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे सण्णिसीअइ) वहां आकर वह पूर्वदिशा की ओर मुँह करके उत्त सिंहासन पर बैठ गया (सण्णिसीइत्ता ) बैठकर ( अट्ठारस से णि रसेगोओ सदावेइ ) उसने अष्टादश श्रेणी प्रश्रेणी को प्रजाजनों को बुलाया- (सहावेत्ता एवं वयासी) और बुलाकर उन से ऐसा कहा- वे अष्टादश श्रेणि प्रवेणि इस प्रकार से है-"कुंभार १ पट्टइल्ला २ सुवण्णकारा ३ य सूवकारीय ४ गंधव्वा ५, कासबगा ६ मालाकाराय ७ कच्छकरा ८ ॥ १ ॥-तंबोलियाय एए नवप्पयारा य नारुआ भणिआ" अहणं णवप्पयारे कारु अवण्णे पयक्वामि ॥२॥ चम्मयरु १ जंतपीलग २ गंधिअ ३ छिपाय ४ कंसकारे ५ य, सीवग ६ गुआर ७ भिल्ला ८ धीवर ९ वण्णाइ अट्ठदस ॥३॥ चित्रकार आदिक भी इन्हीं में अन्तर्भूत हो जाते हैं । उस भरत અંજલિ બનાવીને તે અંજલિને જમણું તરફથી ડાબી તરફ મસ્તક ઉપર ત્રણ વાર ફેરવીને प्रामा (करेत्ता) प्रथम ४ीने (आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ) त्या२ मा त मायुपशाणामांथी महा२ नीजी गये. (पर्डािणक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेत्र उवागच्छइ) ५२ ना ५ ते यां या स्थाना मेसवानी २४२या ती अने तमा ५६ च्या सिंहासन हेतु त्यो माव्या. (उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे सण्णिसीअइ) त्या भावाने ते पूर्व दशा त२६ भुम ४शन ते सिहासन ७५२ मेसो गये. (सण्णिसोइत्ता) मेसीने (अट्ठारससेणिप्पसेणीओ सदावेइ) ते मटाश श्रेणी-श्रेणिना जानाने माय. (सहावेत्ता एवं वयासी) अने બે લાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું તે અષ્ટાદશ એણિ પ્રશ્રેણિના પ્રજાજનો આ પ્રમાણે छे—(कुंभार १. पट्टइल्ला २, सुवणकारा ३, य सूचकाराय ४, गंधया ५, कावगा६. मालाकाराय ७, कच्छ करा ८॥१! तंबोलियाय एए नवप्पयाराय नारुआ भणीआ अहणं णवप्पयारे कारुअवण्णे पयक्खामि ॥२ चम्मयरु १ जंतपीलग २, गधि ३ छिपाय ४, कंलकारे ५ य, सीबग ६ गुआर ७, भिल्ला ८, धीवर ९ वण्णाइ अढदस 13 ચિત્રકારો વગેરે પણ એમનામાં અન્તત થઈ જાય છે. તે ભારત રાજાએ રિજનોને Page #578 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वी प्रज्ञप्तिसूत्रे चित्रकारादयोऽपि एतेष्वेवान्तर्भवन्ति, अथ पौरजनान् प्रति किमवादीत् इत्याह(खिप्पामेव ) इत्यादि । (खिप्पामेव भो देवाणुपिया ! उस्सुक्कं उक्करं उक्किट्ठे अदिज्जं अमिज्जं अभडप्पवेसं अदंडकोदंडिमं अधरिमं गणियावरणाडइज्ज कलियं अणेग तालायराणुचरिये अणुद्धयमुइंगं अमिलायमल्लदामं पमुइय पक्कीलिय सपुरजणजाणवयं विजयवेजइयं चक्करयणस्स अट्ठाहियं महामहिमं करेह करिता ममेयमाणत्तियं खिप्पामे पञ्चहि ) क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! उच्छुल्काम् उत्कराम् उत्कृष्टाम् अदेयाम् अमेयाम् अभटप्रवेशाम् अदण्ड कुदण्डिमाम् अधरिमाम् गणिकावर नाटकीयकलिताम् अनेकतालाचानुचरिताम् अनुद्भूतमृदङ्गाम् अम्लानमाल्यदाम्नीम्, प्रमुदितप्रक्रीडितसपुरजन जानपदाम्, विजयवैजयिकीम्, चक्ररत्नस्य अष्टाह्निकां महामहिमाम्, कुरुत, कृत्वा मम एतामाज्ञप्तिकां क्षिप्रमेव प्रत्यर्पयत, तत्र क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! चक्ररत्नस्य अष्टानाम् अह्नां समाहारोऽष्टाहं तदस्ति यस्यां महामहिमायां सा अष्टाहिका तां महामहिमां कुरुतेति कृत्वा मम एताम् अग्रवर्त्तिनीमाज्ञप्तिकां क्षिप्रमेव शीघ्रमेव प्रत्यर्पयत समर्पयत इति चाग्रेण सम्बन्धः, अथ क्रमशः विशेषणानि व्याख्यायते उच्छुल्कामित्यादि तत्र उन्मुक्तं त्यक्तं शुल्कं विक्रेतव्य वस्तु प्रति राजदेयं द्रव्यं यस्यां सा तथा ताम् एवमुत्कराम्, तत्र उन्मुक्तः करो गवादीन् प्रति प्रतिवर्ष राजदेयं द्रव्यं यस्यां सा तथा ताम् एवम् उत्कृष्टाम्, तत्र उत्-उत्मुक्तं कृष्टं - कर्षण - लभ्यवस्तु ग्रहणाय आकर्षणमित्यर्थः यस्यां सा तथा ताम् अदेयामिति, विक्रय राजा ने उन पौरजनों से क्या कहा सो प्रकट किया जाता है - ( विप्पामेव भों देवाणुपिया । उस्सुक्कं उक्करं ऊविकट्टंभदिज्जं अभिज्जं अभडप्पवेसं अदंडकोदंडिमं अधरिमं गणियावरणा . डइज्जकलियं अणेगतालायराणुचरियं अणुद्धयमुइंगं अमिलाय मल्लदामं पमुइयपक कीलिय सपुरजण जाणवयं विजयवे जईअं चक्करपयस्स अट्ठाहियं महामहिम करेह करिता ममेयमाणत्तिये खिप्पामेव पच्चपिणह ) हे देवनुप्रियो ! तुम शीघ्र ही अष्टान्हिका महोत्सव करो - इस में विक्रय वस्तु पर जो राज्य कर चुगो लगती है ऊसे माफ करदो गाय आदि के ऊपर जो प्रतिवर्ष राज देय द्रव्य लिया जाता है उसे भी उन्मुक्त कर दो लभ्यवस्तु को ग्रहण करने के लिये जो भूमि એટલે કે નગરવાસીઓને શુ કહ્યુ તે વિષે હવે સ્પષ્ટ अश्वामां आवे छे - ( खिप्पामेव भो देवाविया ! उस्सुक्कं उक्कर उक्किट्ठे अदिज्जं अभडप्पवेसं अदंडकोदंडिमं अधरिम गणियावरणाज्जकलियं अणेग तालायराणुवरिय अणुद्ध्यभुइंग अमिलाय मल्लदाम मुइय पक्कीलिय सपुर जणजाणवयं विजयवेजइअं चक्करयणस्स अट्ठाहियं महामहिमं करे करिता ममेयमाणत्तियं विप्पामेव पच्चपिणढ) हे देवानुप्रियो ! तमे अष्टाश्रिमहे।ત્સવ ઉજવા તેમાં વિક્રય વસ્તુ પર જે રાજય કર ટેકસ લે છે. તેને માફ કરી દો. ગાય વગેરે ઉપર જે દર વર્ષે રાજદેય દ્રવ્ય લેવામાં આવે છે તેને પણ માર્ક કરી દે. લભ્ય વસ્તુને ગ્રહણ કરવા માટે જે ભૂમિ વગેરને ખેડવામાં આવે છે, તેને પણ આઠ દિવસ માટે ખધ કરી દો. તથા જેના ઉપર જે કઈ પણ લેણ દેણુ હોય તે પણ બંધ કરી છે અથવા તે આ મહેાત્સવ ५६४ Page #579 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० ४ भरतराज्ञःगमनानन्तर तदनुवरक कार्य निरूपणम् ५६५ निषेधेन न विद्यते देयम्, दातव्यं द्रव्यं यस्यां सा तथा ताम् न केनापि कस्मै अपि देयमित्यर्थः, अमेयामिति, क्रयविक्रयनिषेधेनैव अविद्यमानमातव्याम्, अभटप्रवेशा मिति, न विद्यते भटानां-राजपुरुषाणाम् आज्ञादायिनां प्रवेशः कुटुम्बगृहेषु यस्यां सा तथा ताम्, अदण्डकुदण्डिमामिति, दण्डेन लभ्यं द्रव्यं दण्डयः कुदण्डेन निवृत्तं कुदण्डिम-राजद्रव्यं तन्नास्ति यस्यां सा तथा ताम्, तत्र दण्डो यथापराधं राजग्राह्य द्रव्यं कुदण्डस्तु राजकर्मचारिणां प्रज्ञाद्यपराधात् अपराधिनो महत्यपराधे अल्पम् अल्पापराधे चाधिकं यथोचितरहितं राजग्राहयं द्रव्यम् इति विज्ञेयम्, अधरिमामिति (अविद्यमानं धरिमम् ऋणद्रव्यं यस्यां सा तथा ताम् उत्तमर्णाधर्मणाभ्याम् ऋणार्थम् अन्योन्यं न विवदनीयं मत्तः द्रव्यं नीत्वा मुत्कलनीयं दातव्यमित्यर्थः गणिकावरनाटकीय कलितामिति) गणिकावरैः विलासिनीप्रधानैः नाटकीयैः नाटकप्रतिबद्धपात्रः कलिता शोभिता या सा तथा ताम्, नाटकादि शोभितामित्यर्थः अनेकताला चरानुचरितामिति, तत्र (अनेके ये तालाचराः प्रेक्षाकारि विशेषास्तैरनुचरिताम्आसेविताम् अनुद्धृतमृदङ्गामिति) अनु-आनुरूप्येण मृदङ्गसम्बन्धि विधिना उद्धृताः वगैरह का जीतना होता है उसे भी आठ दिन के लिये बन्द कर दो जिस पर जिस का कुछ भी लेना देना हो उसे भो बन्द करे दो अथवा इस महोत्सव के होने तक कोइ रोजगार-व्यापार-आदि न करे ऐसी राजाज्ञा की घोषणा कर दो क्रय विक्रय के निषेध हो जाने के कारण कोई भी व्यक्ति नापने, गिनने आदि की वस्तु के लेन देन का ब्य वहार न करे, आज्ञा प्रदान करने वाले राजपुरुषों का कुटुम्बी जनों के गृहों में प्रवेश न हो अपराध हो जाने पर दण्ड रूप में जो अपराध के अनुसार अपराधो से राजद्रव्य लिया जाता है वह न लियाजावे राज्य कर्मचारीयों के द्वारा छोटे बड़े अपराध हो जाने पर जो उनसे जुर्माना के रूप में थोड़ा या बहुत इच्छानुसार दण्ड वसूल किया जाता है उसे न लिया नावे-कर्जदार से कर्ज देने वाला व्यक्ति अपने ऋण को वसूल करने के लिये विबाद न करे किन्तु वह द्रव्य मुझ से लेकर दिया जावे और ऊनके झगडे को शान्त कर दिया जावे । बिलासिनियों के नाटकीय पुरुषों द्वारा इस में खूब धार्मिक नाटक किया जाबे, इस उत्सव को देखने के लिये अनेक जन आवे रात दिन इस उत्सब में मृदङ्ग धनि होती रहे, जो मालाएँ इस થાય ત્યાં સુધી કંઈ પણ જાતને વેપાર વગેરે થાય નહિ એવી રાજાજ્ઞાની ઘોષણા કરી દે ય-વિક્રય ઉપર પ્રતિ બંધ થઈ ગયા પછી કઈ પણ માણસ માપી શકાય કે ગણી શકાય એવી બધી વસ્તુઓની આપ-લે બંધ કરી દે આજ્ઞા પ્રદાન કરનાર રાજ પુરુષે ને કુટુંબી જનેના ગૃહમાં પ્રવેશ ન થાય. અપરાધ થઈ જાય તો દંડ રૂપમાં જે અપરાધ મુજબ અપરાધી પાસેથી રાજદ્રવ્ય લેવામાં આવે છે, તે લેવાનું બંધ કરી દે. રાજ્ય કર્મચારીઓ વડે નાના-મોટા અપરાધ બદલ તેમની પાસેથી દંડ સ્વરૂપ જે તે કંઈ પણ ડું-ઘણું ઈચ્છા મુજબ દંડ વસૂલ કરવામાં આવે છે, તે લેવામાં ન Page #580 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्र कलाकौशलदर्शनार्थमूर्ध्व क्षिप्ता मृदङ्गा यस्यां सा तथा ताम् । अम्लानमाल्यदाम्नीमिति तत्र अम्लानानि म्लानिरहितानि माल्यदामानि पुष्पमालाः यस्यां सा तथा ताम्, म्लानपुष्पमालाः निःसार्य अभिनवाः २ दीयन्ते इत्यर्थः (प्रमुदितप्रक्रीडितसपुरजनजानपदामिति) तत्र प्रमुदिताः सानन्दाः प्रक्रीडिताः क्रीडितुमारब्धाः सपुरजनाः अयोध्यावासिजनसहिताः जनपदाः कोशल देशबासिनो जना यत्र सा तथा ताम् , विजयवैजयिकीमिति, तत्र अतिशयेन विजयो विजय-विजयः स प्रयोजनं यस्यां सा तथा ताम् अस्मिन्नायुधरत्ने सम्यगाराधिते सति तत् रत्नं मदभीष्ट मनोरथं महाविजयरूपं सर्वथा साधयिष्यतीति बुया विजय प्रयोजनमुक्त्वा अष्टाहिकां महामहिमां कुरुतेति (तए णं ताओ अट्ठारस सेणिप्पसेणीओ भरहेणं रन्ना एवं वुत्ताओ समाणीओ हट्ठाओ जाव विणएणं पडिसुणेति) ततः खलु ता अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणयः भरतेन राज्ञा एवमुक्ताः सत्यः हृष्टाः यावद् विनयेन प्रतिशृण्वन्ति, अत्र यावत्पदात् करतलपरिगृहीतं दशनखं उत्सव के समय इधर उधर लटकायी जावे वे म्लान न होने पावे “पमुइअ पककीलिम सपुरजणजाणवयं" हर एक विनितावासी जन इस उत्सब में मुदित मन बन कर कोशल देश वासियों के साथ २ नाना प्रकार की क्रीडाएँ करे "विजयवेजइअं" ऐसे इस अष्टान्हिका महोत्सव की इस आयुधरत्न की अच्छी तरह से आराधना करने के निमित्त आयोजना करो। क्योंकि यह आयु धरत्न अब सम्यक् प्रकार से आराधित हो जावेगा तो नियम से वे इससे मुझे इच्छित विजय रूप फलको प्राप्ति होजावेगी। इस प्रकार से व्यवस्था करके फिर हमने आपकी आज्ञानुसार इस महोत्सब सफल करने की व्यवस्था करली है ऐसी शीघ्र ही खबर हमे दो (तएणं ताओ अदारस सेणिप्पसेणीओ भरहेणं रन्ना एवं वुताओ समाणीओ हटाओ जाव विणएणं पडिसुणेति) इस प्रकार से भात राजा के द्वारा कहे गये वे श्रेणि प्रश्रेणिरूप प्रजाजन हर्ष से बहुत अधिक आनन्दित हुए संतुष्ट हुए एवं भरत राजा की आज्ञा को उन्हाने विना अनुनय किए स्वीकार लियाँ स्वीकार करते समय उन सपने दोनों हाथों को बड़ी विनय के साथ जोड़ो यहां पर અવે કજદાર પાસે થી કર્જ આપનાર માણસ પોતાના ઋણની વસૂલાત કરવા માટે વિવાદ કો નહિ પણ તે દ્રવ્ય મારી પાસેથી લઈને આપી દે અને આ પ્રમાણે તે ઝગડાને અંત થાય. વિલાસનીઓના નાટકીય પુરુષ વડે એ ઉત્સવમાં ઉત્તમ ધામિક નાટક ભજવવામાં આવે એ ઊજવને જોવા માટે ઘણાં લોકે આ રાત-દિવસ એ ઉત્સવમાં મૃદંગ-વનિ થતું २४.२ भाणायाने उत्सवमा मामतेम सटवाभां मावे ते मान थाय नहि. (पमुइअपक्कीलिअ सपुरज जाण वय) ४२४ विनीतवासी से समां मुहित मनवाया था। शिवशालीशानीसाथ साथेमन:विधीस।४रे. (विजय वेजइ) साप्रमाणे अष्टालि મહોત્સવથી એ આયુધ ૨ નની સારી રીતે આરાધના કરવા માટે આયેાજના કરે. કેમકે એ આયુધ૨ન જ્યારે સારી રીતે આરાધિત થઈ જશે ત્યારે નિયમથી એના વડે મને ઇરછત વિજય રૂપ કળની પ્રાપ્તિ થઈ જશે. આ પ્રમાણે વ્યવસ્થા કરીને પછી વ્યવસ્થા થઇ ગયાની મને ખબર आपा. (त एणं ताओ अठारस सेणिप्पसेणोमो भरहेणं रन्ना एवं वुत्ताओ समाणीओ हट्ठाओ जाव विणएण पडिसुणेति) 241 प्रमाणे सरत २ पडे माज्ञापित थव्याशि પ્રશ્રેણિ રૂપ પ્રજાજન વર્ષ થિ અત્યધિક આનંદિત થયા, સંતુષ્ટ થયા અને ભરત રાજાની આજ્ઞાને તેમણે વગર કોઈ પણ જાતની આના કાનાએ સ્વીકારી લીધા. આજ્ઞા સ્વીકાર કરતી Page #581 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० ४ भरतराज्ञः गमनानन्तरं तदनुचरकार्य निरूपणम् ५६७ शिरसावत्तं मस्तके अञ्जलिं कृत्वेति ग्राह्यम् विनयेन प्रतिशृण्वन्ति विनयपूर्विकामाज्ञप्तिकां स्वीकुर्वन्ति इत्यर्थः (पंडिसृणित्ता) प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य (भरहस्स अंतियाओ पडिणिक्खमेंति) भरतस्य राज्ञः अन्तिकात् समीपात् प्रतिनिष्क्रामन्ति निर्गच्छन्ति ' परिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य - निर्गत्य (उस्मुकं उक्करं जाव करेंति य कारवेंति य) उच्छुकाम् उत्तरां यावत्कुर्वन्ति च कारयन्ति च भरताज्ञानुसारेण । (करेत्ता कारवेत्ता) कृत्वा कार - यित्वा च ( जेणव भरहे राया तेणेव उवागच्छति) यत्रैव भरतो राजा तत्रैवोपागच्छन्ति ( उवागच्छित्ता) उपागत्य ( जाव तमाणत्तियं पच्चष्पिणंति यावत् ताम् आज्ञप्तिकाम् आज्ञां प्रत्यर्पयन्ति समर्पयन्तीति ।। सू० ४ ॥ यावत्पद से ( करतलपरिगृहीत दशनखं शिरसावर्त मस्तके अंजलि कृत्वा) ऐसा पाठ संग्रहीत हुआ है । ( पडिणित्ता) भरत राजा की आज्ञा को स्वीकार करके (भरहस्स रण्णो अंतियाओ पडिणिक्खमेंति) फोर वे सबके सब भरत राजा के पाससे वापिस अपने स्थान पर लौट आए ( पडिणिक्खमित्ता उस्सुक्कं उक्करं जाव करेंति अ कारवेंति अ) लौटकरके उन्होंने भरत राजा की आज्ञानुसार नगरी में अष्टाह्निका महोत्सव किया और करवाया जिस प्रकार से इस महोत्सव को उच्छुल्का आदि रूप से व्यवस्था करने को आज्ञा राजाने दी थी वैसी हो वह सब व्यवस्था उन्होंने उस की और करवायी । (करेत्ता कारवेत्ता जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छन्ति ) इस उत्सव को करके और कराके फिर वे जहाँ पर भरत राजा था वहाँ पर आये (उवागच्छित्ता जाव तमा पत्तियं पञ्चपिणंति) वहाँ आकर हे राजा जैसी आज्ञा महोत्सव करने कराने की आपने दी थी उसी के अनुसार हमलोगों ने उसे किया है और कराया है ऐसी खबर उन्होंने राजा को आकर के देदी ॥ ४ ॥ वणते तेभवे योताना भन्ने हाथोथी सविनय प्रमाणु अर्या. अहीं यावत् पढथी ( करतलपरिगृहीतं दशनखं शिरसावत मस्तके अंजलिं कृत्वा) व पाठ संग्रहीत थये। छे (पडिसुणित्ता) भरत राजनी आज्ञान स्त्री४.२ ४रीने (भरहस्सरण्णो अंतियाओ पडिणिक्ख में ति) पछी तेथे। सर्वे भरत राम पासेथी पाछा पोतपोताना स्थान पर भावी गया. (पंडिणिक्ख मत्ता उत्सुक्कं उक्करं जाव करेंतिअ कारवेतिअ) पाछा इरीने तेथे भरतराजनी આજ્ઞા મુજખ નગરીમાં માહ્નિકા મહે।ત્સવ ઊજવ્યે. અને ઊજવાળ્યે, જે પ્રમાંણે એ મડાત્સવની ઉથ્થુલ્ક વગેર રૂપથી વ્યવસ્થા કરવાની એ જ્ઞા રાજાએ આપી હતી તેવી જ व्यवस्था ते ते उत्सवमा पुरी भने ४२.वडावी (करेत्ता कारवेत्ता जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छन्ति) से उत्सवने वादी नेपछी ते भरत रान तो त्यां याव्या ( उवागच्छित्ता जाव तमाणत्तियं पञ्च पिणंति) त्यां खावीने तेयोराने या प्रमाणे मर આપી કે હે રાજા મહેસ્રવ ઊજવવાની જેવી આજ્ઞા આપશ્રીએ આપી હતી તે મુજબ અમે જે તે મહાત્સવ ઙ્ગજન્યેા છે, અને ઊજવાવ્યા છે ॥ ૪ ॥ Page #582 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अथ अष्टाह्निका महामहिमा समाप्त्यनन्तरं किमभवदित्याह “तए णं" इत्यादि । मूलम्-तएणं से दिवे चक्करयणे अट्ठाहियाए महामहिमाए निव्वत्ताए समाणीए आउहघस्सालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता अंतलिक्खपडिवण्णे जक्खसहस्ससंपरिवुडे दिवतुडियसहसण्णिणाएणं आपूरेते चेव अंबरतलं विणीयाए रायहाणीए मझमज्झेणं णिगच्छइ णिगच्छित्ता गंगाए महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलणं पुरत्थिमं दिसि मागहतित्थाभिमुहे पयाते आविहोत्था, तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं गंगाए महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरथिमं दिसिं मागह तित्थाभिमुहं पयातं पासइ पासेत्ता हट्टतुट्ठ जाव हियए कोडंबियपुरिसे सद्दावेइ सदावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! आभि सेक्कं हत्थिरयणं पडिकप्पेह हयगयरहपवरजोहकलियं चाउरंगिणि सेण्णं सण्णाहह, एतमाणत्तियं पञ्चप्पिणह, तएणं ते कोडुबिय जाव पच्चप्पिणंति, तएणं से भरहे राया जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता मज्जणघरं अणुपविसइ, अणुपविसेत्ता समुत्तजालाभिरामं तहेव जाव धवलमहामेह णिग्गए इव ससिब पियदंसणे णवई मज्ज णघराओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता हयगयरहपवरवाहणभडचड. गरपहकर संकुलाए सेणाए पहिअकिट्टी जेणेव बाहिरिआ उवट्ठाणसाला जेणेव अभिसेक्के हत्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता अंजण गिरिकडगसण्णिभं गयवई णनई दुरुढे । तएणं से भरहाहिवे परिंदे हारोत्थए सुकयरइयवच्छे कुंडलउज्जोइआणणे मउडदित्तसिरए णरसीहे णरवई गरिदे णवसहे मरुयरायवसभकप्पे अब्भ हिय रायतेअलच्छीए दिप्पमाणे पसत्थ मंगलसरहिं संथुव्वमाणे जयसद्दकयोलोए हत्थिखंधवरगए सकोरंटमल्लदामेणं छत्तेणं धरिज्जमाणेणं सेयवर चामराहिं उधुबमाणीहि २ जक्ख सहस्ससंपरिखुडे वेसमणि चेव धणवई अमर वइसण्णिभाइ इड्डीए पहियकित्तो गंगाए Page #583 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कार: सू० ५ अष्टाव्हिका समाप्त्यनन्तरीयकार्य निरूपणम् ५६९ महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं गामागरणगरखेड कब्बडमंडब दोणमुहपट्टणासम संवाह सहस्समंडियं थिमियमेइणीयं वसुहं अभिजिणमाणे २ अग्गाई वराई स्यणाई पडिच्छमाणे २ तं दिव्वं चक्करयणं अणुगच्छमाणे २ जोयणंतरियाहि वसहोहिं वसमाणे २ जेणेव मागहतित्थे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता मागहतित्थस्स अदूरसामंते दुवालसजोयणायामं णव जोयणविच्छिण्णं वरणगरसरिच्छं विजयधावारनिवेस करेइ करिता वढइरयणं सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी खप्पामेव भो देवाप्पिया ! ममं आवासं पोसहसालं च करेइ करिता ममेयमाणत्तियं पच्चष्पिणाहि तए णं से बढइश्यणे भरहेणं रण्णा एवं समाणे तु चित्तमानंदिए पीइमणे जाव अंजलि कट्टु एवं सामी तहत्ति आणा विणणं वयणं पडिसुणेइ पडिणित्ता भरहस्स रण्णोआवसहं पोसहं सालं च करेइ करिता एयमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चप्पिति, तणं से भरहे राया आभिसेक्काओ हत्थिरयणाओ पच्चोoes पच्चोरुहित्ता जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पोसहसालं अणुपविसइ अणुपविसित्ता पोसहसालं पमज्जइ पमज्जित्ता दम्भसंथारगं संथ संथरित्ता दव्भसंथारंगं दुरूहइ दुरुहितो मागहतित्थकुमारस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्हइ पगिन्हित्ता पोसहसालाए पोसहिए बंभयारी उम्मुक्कमणिसुवण्णे ववयगमालावण्णगविलेवणे णिक्खित्तसत्थमुसले दग्भसंथारोवगए एगे अबीए अट्ठमभत्तं पडिजागरमाणे २ विहरs । तरणं से भरहे गया अट्टभसंसि परिणममाणंसि पासह सालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवद्वाणसाला देणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता कोडबियपुरिसे सक्षवे सद्दावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुपिया हयगयरह पवरजोहकलियं चाउरंगिण सेणं सण्णा हेह चाउग्घंटं आसरहं पंडिकपेह तिटुक मज्जणघरं अणपविसइ अणुपविसित्ता समुत्त तहेब जाव ७२ Page #584 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्धोपप्राप्तिसूत्रे धवलमहामेहणिग्गए जाव मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता हयगयरहपवखाहण जाव सेणावइ पहियकित्ती जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चाउग्घंटे आसरह तेणेव उवागच्छइ उवाग-च्छित्ता चाउग्घटं आसरहं दुरूहे ॥ सू० ५ ॥ छाया-ततः खलु तद्दिव्यं चक्ररत्नम् अष्टाहिकायां महामहिमार्या निर्वृतार्या सत्याम् आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य अन्तरिक्षं प्रतिपन्नं यक्षसहस्रसंपरिवृतम्, दिव्यत्रुटितशब्दसन्निनादेन आपूरय दिवाम्बरतलं विनीतायाः राजघान्याः मध्य मध्येन निर्गछति निर्गत्य गङ्गाया महानद्या दाक्षिणात्येन कूलेन पौरस्त्यां दिशं मागधतीर्थाभिमुख प्रयातं अप्यभवत्, ततः स्खलु स भरतो राजा तं दिव्य चक्ररत्नं गङ्गाया महानद्या दाक्षिणात्येन कूलेन पौरस्त्यां दिशं मागधतीर्थाभिमुखं प्रयातं पश्यति, दृष्ट्वा हृष्टतुष्ट यावद्धृदयः कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति शब्दयित्वा एवमवादीत्-क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! आभिषेक्यं हस्तिरत्नं प्रतिकल्पयत हयगजरथप्रवरयोधकलितां चातुरङ्गिणी सेनां सन्नाहयत, पतामाज्ञप्तिकां प्रत्यर्पयत, ततः खलु ते कौटुम्बिक यावत् प्रत्यर्पयन्ति, ततः खलु स भरतो राजा यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैवोपागच्छति उपागत्य मज्जनगृहम् अनुप्रविशति अनुप्रविश्य समुक्तजालाभिरामं तथैव यावत् धवलमहामेघ निर्गत इव शशीव प्रियदर्शनो नरपतिः मज्जनगृहात् प्रतिनिष्क्रामति प्रतिनिष्क्रम्य हयगजरथप्रवरवाहन चउगर पहकरत्ति' विस्तारवृन्दसंकुलया सेनया प्रथितकीर्तिः यत्रैव वाहिरिका उपस्थानशाला यत्रै वाभिषेक्यं हस्तिरत्नं तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य अञ्जनगिरिकटकसन्निभं गजपति नरपति दुरूढे । ततः खलु स भरताधिपो नरेन्द्रः हारावस्तृतसुकृतरतिदवक्षस्कः कुण्डलोद् द्योतिताननः मुकुटदीप्तशिरस्कः नरसिंहो नरपति नरेन्द्रो नरवृषभः मरुद्राजवृषभकल्पः अभ्यधिराजतेजो लक्ष्म्या दीप्यमानः प्रशस्तमङ्गलशतैः संस्तूयमानः जयशब्दकृतालोकः हस्तिस्कन्धवरगतः सकोरण्टमाल्यदाम्ना छत्रण ध्रियमाणेन श्वेतवरचामरैरुद्धयमानैः२ पक्ष सहस्रसंपरिवृतः वैश्रमणइव धनपतिः अमरपतेः सन्निभया ऋद्धया प्रथितकीर्तिः गङ्गाया महानद्याः दाक्षिणात्ये कूले ग्रामाकरनगरनेट कर्बट मडम्ब द्रोण नुख पत्तनाऽऽश्रमसंवाह-सहस्रमण्डितां स्तिमितमेदनीकां वसुधाम् अभिजयन् अभिजयन् अग्याणि वराणि रत्नानि प्रती च्छन् २ तद्दिव्यं चकरत्नम् अनुगच्छम् अनुगच्छन् योजनान्तरिताभिर्वसतिभिर्वसन् वसन् यत्रैव मागधतीर्थ तत्रैवोपागच्छति उपागत्य मागधतीर्थस्याऽदूरसामन्ते द्वादशयोजनायाम नवयोजनविस्तीर्ण वरनगरसदृशं विजयस्कन्धावारनिवेशं करोति कृत्वा वर्द्धकिरत्नं शब्दयति शब्दयित्वो एवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ममावासं पौषधशाला च कुरु कृत्वा मम पतामाक्षप्तिका प्रत्यर्पय, ततः खलु स वर्द्धकिरत्नो भरतेन राक्षा एवमुक्तः सन् हष्तुष्ट चित्तानन्दितः प्रीतिमनाः यावत् अञ्जलिं कृत्वा एवं स्वामिन् तथेति आज्ञाया विनयेन वचनं प्रतिशृणोति, प्रतिश्रुत्य भरतस्य राज्ञः आवासं पौषधशालां च करोति, कृत्वा एतामाज्ञप्तिकां क्षिप्रमेव प्रत्यर्पयति, ततः खलु स भरतो राजा आभिषेक्यात् हस्तिरत्नात् प्रत्यवरोहति, प्रत्यबरुह्य यत्रैव पौषधशाला तत्रैवोपागच्छति उपागत्य पौषधशालामनु मविशत, अनुपविश्य पौधशाला प्रमार्जयति प्रमाय॑ दर्भसंस्तारकं संस्तृणाति, Page #585 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकातृवक्षस्कारः सू०५ अष्टाह्निकासमाप्त्यनन्तरोयकार्यनिरूपणम् ५७१ संस्तीर्य दभंसस्तारकं दुरूहति, दुरूह्य मागधतीर्थकुमारस्य देवस्य अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति, प्रगृह्य पौषधशालायां पौषधिकः ब्रह्मचारी उन्मुक्तमणिसुवर्णः व्यपगतमालावर्णकविलेपनः निक्षिप्तशस्त्रमुसलः दर्भसंस्तारोपगतः एकः अद्वितीयः अष्टमभक्तं प्रतिजाग्रत् प्रतिजाग्रत् विहरति । ततः खलु स भरतो राजा अष्टमभक्ते परिणमतिपौषधशालातः प्रतिनिष्क्रामति, प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाहिरिका उपस्थानशाला तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति शब्दयित्वा एवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! हयगजरथप्रवरयोधकलितां चतुरङ्गिणों सेनां सन्नाहयत चातुर्घण्टम् अश्वरथं प्रतिकल्पयत इति कृत्वा मज्जनगृहमनुपविशति, अनुप्रविश्य समुक्त तथैव यावत् धवलमहामेघ निर्गतो यावत् मज्जनगृहात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य हयगजरथप्रवरवाहन यावत् सेनापति प्रथितकीर्तिः यत्रैव बाहिरिका उपस्थानशाला यत्रैव चातुर्घण्टोऽश्वरथस्तत्रैवोपागच्छति उपागत्य चातुर्घण्टम् अश्वरथं दुरूढे ॥ सू० ५॥ टीका-"तए णं" इत्यादि । 'तए णं से दिव्वे चक्करयणे अट्ठाहियाए महामहिमाए निव्वत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमई' ततः तदनन्तरं खलु तदिव्यं चक्ररत्नम् अष्टाहिकायां महामहिमायां महोत्सवरूपायाम् निर्वृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्कामति निर्गच्छति (पडिणिक्खमित्ता) प्रतिनिष्क्रम्य (अंतलिक्खपडिवण्णे जक्स्वसहस्स संपरिखुडे) अन्तरिक्षप्रतिपन्न नभः प्राप्तं यक्षसहस्रसंपरिवृतं चक्रधरचतुईशरत्नानां प्रत्येकं देवसहस्राधिष्ठितत्वात् (दिव्वतुडियसहसण्णिणाएणं आपू. 'तएणं से दिव्वे चक्कयणे अट्ठाहियाए महामहिमाए' इत्यादि । टीकार्थ-(तएणं से दिव्वे चक्करयणे) इसके बाद वह चक्ररत्न जब की (अट्ठाहियाए महामहिमाए निवत्ताए समाणीए) अष्टाह्निका महोत्सव अच्छी तरह से समाप्त हो चुका (आउहघरसालाओ) आयुधगृहशाला से (पडिणिक्खमइ) निकला (पडिणिक्वमित्ता) निकलकर वह (अंतलिक्खपडिवण्णे) अन्तरीक्ष आकाश में अधर चलने लगा (जक्ख सहस्ससंपरिडे) वह १ हजार यक्षों देवों से घिरा हुआ था क्योंकि चक्रवती के चौदह रत्नों में से प्रत्येक रत्न १ 'त एणं से दिवे चक्करयणे अठ्ठाहियाए महामहिमाप' - इत्यादि सूत्र - ५॥ टीकार्थ (त एणं से दिव्वे चक्करयणे) त्या२ माह ते यन योरे (अठ्ठाहियाए महामहिमाप नित्ताप समाणीए) अष्टालि भडास सारी शेते सम्पन्न : यूईये। (आउहघरसालाओ) आयुध गृहशाणाथी (पडिणिक्खमइ) नीयु (पडिणिक्खमित्ता) नीजीनत (अंतलिक्खपडिवणे) मतरीक्ष माशमा मद्धर यास वायुं (जक्ख सहस्ससंपरिडे) ते २४ ॥२ यक्षा-वाथा પરિવૃત્ત હતું, કેમકે ચક્રવતીના ચતુર્દશ રનેમાંથી દરેક રત્ન એક હજાર દેથી અધિષ્ઠિત હોય (दिव्वडय सद्द संण्णिणाएणं आपूरे ते चेव अंबरतलं विणीयाए रायहाणीए मज्झं मज्झेणं Page #586 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५७२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे रेते चेव अंबरतलं विणीयाए रायहाणोए मज्झ मज्झेणं णिगच्छइ) दिव्यत्रुटितशब्द सन्निनादेन दिव्यानां देवकृतानां त्रुटितानां तुर्याणां वाद्यविशेषाणां यः शब्दो-ध्वनि: यश्च सङ्गतो निनादः प्रतिध्वनिस्तेन आपूरयदिवाम्बरतलं शब्दव्याप्तं नमः कुर्वदिवेत्यर्थः विनीतायाः राजधान्याः मध्यं मध्येन-मध्यदेशभागेन निर्गच्छति (णिगच्छित्ता) नित्य (गंगाए महाणइए दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरत्थिमं दिसिं मागहतित्थाभिमुहे पयाए यावि होत्या' गङ्गायाः-गङ्गानाम्न्याः महानद्याः दाक्षिणात्ये दक्षिणभागवत्तिनि कूले-समुद्रपार्श्ववर्तिनि तटे इत्यर्थः उभयत्र णं शब्दो वाक्यालंकारे अयं भावः विनीता समश्रेणौ हि पूर्वदिशि वहन्ती गङ्गा मागधतीर्थस्थाने पूर्व समुद्र प्रविशति तच्च तटं दक्षिणभागवर्तित्वेन दाक्षिणात्यमिति व्यवहियते । अतएव दाक्षिणात्येन कूलेन पौरस्त्यां पूर्वी दिशं मागधती भिमुखं प्रयातं चलितम् अप्यासीत् (तए णं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं गंगाए महाणइए दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरत्थिमं दिसि मागहतित्थाभिमुहं पयातं पासइ) ततः हजार देवों से अधिष्ठित होता है । (दिव्वतुडियसहसण्णिणाएणं आपरेते चेव अंबरतलं विणीयाए रायहाणोए मज्झं मझेणं णिग्गच्छइ) उस समय अम्बरतल दिव्यवाजों के निनाद एवं प्रतिनिनादों से गंज रहा था अतएव ऐसा प्रतीत होता था कि मानों यह चक्ररत्न ही आकाशको • शब्द से व्याप्त हुआ जैसा कर रहा है। इस तरह से आकाश में अद्धर चलता हुआ वह चक्ररत्न विनीता राजधानी के ठीक बीच में से होकर निकला (णिग्गच्छित्ता) निकलकर वह (गंगाए महाणईए दाहिणिल्लेणं कूळेणं पुरत्थिमं दिसिं मागहतित्थाभिमुहे पयाए यावि होत्या) गंगामहानदी के दक्षिणदिशावर्ती कूल से होता हुआ पूर्वदिशा को ओर रहे हुए मागधतीर्थ की तरफ चला । यहां सूत्र में दोनों "णं" वाक्यालंकार में प्रयुक्त हुए हैं। विनीता की समश्रेणि में पूर्वदिशा की ओर बहती हुई गंगा मागधतीर्थ स्थान में पूर्व समुद्र में गिरती है अतः वह तटदक्षिण भागवर्ती होने के कारण (दाक्षिणात्य) इस पद से व्यवहृत हुआ है ! इसी कारण यहां ऐसा कहा गया है (तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं गंगाए महाणईए दाहिणिल्लेणं क्लेणं णिगच्छइ) ते मते २ त हिव्य पालमाना निनाई भने प्रतिनिनाहीथी गुरित २j હતુંએથી એવું લાગતું હતું કે જાણે એ ચક્રરન જ આકાશને શખિત કરી રહ્યું છે. આ પ્રમાણે આકાશમાં અદ્ધર ચાલતું તે ચક્રરત્ન વિનીતા રાજધાનીની ઠીક વચ્ચે થઈને પસાર થયું. 'णिगच्छित्ता' पसारथईन ते (गंगाप महाणईए दाहिणिल्लेण कूलेणं पुरत्थिमं दिसिं मागइतित्थाभिमुहे पयाए यावि होत्था) 0 मानहानी ६क्षिण दिशा-२३॥ રાથી પસાર થતું પૂર્વ દિશા તરફના માગધ તીર્થ તરફ ચાલવા લાગ્યું. અહી સૂત્રમાં બને “” વાકયાલંકારમાં પ્રયુક્ત થયેલ છે. વિનીતાની સમશ્રેણિમાં પૂર્વ દિશા તરફ વહેતી ગંગા મગધ તીર્થસ્થાનમાં પૂર્વ સમુદ્રમાં મળે છે. એથી તે તટ દક્ષિણ ભાગવતી હોવા मह "क्षिणात्य" से यहथी व्यवाहत ये छे. मेथी । सही माप्रमाणे वाम माव्यु छे. (त एणं से भरहे राया तं दिव्यं चिक्करयण गंगाए महणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरस्थिम दिसिं मागहतित्थाममुह पयातं पासइ) भरत २० न्यारे ते हिय यनने जा Page #587 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका त. वक्षस्कारः सू० ५ अष्टाह्निकासमाप्त्यनन्तरीयकार्यनिरूपणम् ५७३ खलु स भरतो राजा तद्दिव्यं चक्ररत्नं गङ्गाया महानद्या दाक्षिणात्येन कूलेन पौरस्त्यापूर्वी दिशं मागधतीर्थाभिमुखं प्रयातं चलितं पश्यति (पासित्ता) दृष्ट्वा (हट्टतुट्ट जाब हियए कोडुबियपुरिसे सदावेइ) हृष्टतुष्ट यावद्हृदय इति इष्टतुष्ट श्चित्तानन्दितः परमसौमनस्थितः हर्षवश विसर्पहृदयः कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति आह्वति (सदावेत्ता) शब्दयित्वा (एवं वयासी) एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् कथितवान् (खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! आभिसेक्क हत्थिरयणं पडिकप्पेह) क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! आभिषेक्यम् अभिषेक योग्य हस्तिरत्नं पट्टहस्तिनं प्रतिकल्पयत-सज्जीकुरुत (हयगयरहपवरजोहकलियं चाउरंगिणिसेण्णं सग्णाहेह) हयगजरथप्रवरयोधकलितां चातुरङ्गिगी सनां सन्नाहयत सज्जी कुरुत (एयमाणत्तिय पच्चप्पिणह) एतामाज्ञप्तिकाम् आज्ञा प्रत्यर्पयत (तए णं ते कोडुंबिय जाव पच्चप्पिणंति) ततः खलु ते कौटुम्बिक यावत्प्रत्यर्पयन्ति तथा च ते कौटुम्बिक पुरुषाः पुरस्थिमं दिसि मागहतित्थाभिमुहं पयायं पासइ) भरत राजा ने जब उस दिव्य चक्ररत्न को गंगा महानदी के दक्षिणदिशा के तट से पूर्वदिशाकी ओर वर्तमान मागध-तीर्थकी तरफ से जाता हुमा देखा तो (पासित्ता) देखकर वह (हट्ठतुट्ठ जाव हियए कोंडुबियपुरिसे सहावेइ) हृष्ट और तुष्ट हुआ, चित्तमें आनन्दित एवं परम सौमस्थित हुवे उसने हर्ष से उछ ठते हुए हृदय संपन्न बनकर कौटुंबिक पुरुषों को बुलाया और ( सदावेत्ता ) बुलाकर उनसे (एवं वयासी) ऐसा कहा-(खितामेव भो देवाणुप्पिया ! आभिसेक हस्थिरयणं पडिकप्पेह) हे-देवानुप्रियो ! तुम लोग शीघ्र ही अभिषेक योग्य प्रधान हाथी को-पढ़ हाथी-को सुसज्जित करो। (हगयरहपवर जो हकलियं चाउरंगिणि सेण्णं सण्णाहेह) तथा - हय-गज-रथ प्रबर-योधायों से युक्त चातुरंगिणीसेना को सुसज्जित करो। (एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह) जैसी आज्ञा यह मैने तुमको दी है उसके अनुसार सब काम करके फिर हमें खबर दो । (तएणं ते कोबिअपुरिसा जाव पच्चप्पिणंति) भरत राजा के द्वारा इस प्रकार से आज्ञप्त हुए वे कौटुम्बिक जन हृष्ट तुष्ट हुए एवं चित्त મહાનદીના દક્ષિણ દિશાના તટથી પૂર્વ દિશાના તરફ વર્તમાન માગધ તીર્થ તરફ જતું જોયું તો (पासित्ता) नन त (हट्ठ तु? जाव हियए कोदुविय पुरिसे सहावेइष्ट भने तुट यये.. ચિત્તમાં આનંદિત તેમજ પરમ સૌમ-નસ્થિત થઈને, હર્ષાવિષ્ટ થઈને કૌટુંબિક પુરુષને Rani भने (सहावेत्ता) मावावीन ते (एवं बयासी) मा प्रमाणे धुं-(स्त्रिप्पामेव भो देवाणुपिया ! आभिसेक्कं हत्थिरयण पडिकप्पेह) आनुप्रियो ! तमे यथाशी अलि योग्य प्रधान हाथीन-पाथीन सुस०४१ २. (हयगय रह पवर जोहकलिय चाउरंगिणि सेण्णं सण्णाहेह तम 64-10-२२-१२ योद्धामोथा युक्त यतु सेनान सुस २१. (पयमाणत्तियं पच्चप्पिणह) आज्ञा मे तमने । छ त भुण मधु अम सन शन ५छ। भने सूयना मा. (त एण ते कोडुबि पुरिसा जाव पच्चपिणति) भरत २०॥ 43 मा प्रमाणे पास थये। तोटु मिनेट-तुष्ट यया अने Page #588 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५७४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे भरतेन राज्ञा एवं उक्ताः सन्तः हृष्टतुष्टचित्तानन्दिताः राज्ञोक्तं सर्वमाभिषेक्य हस्तिसेनादि सज्जीकरणरूपं कार्य कृत्वा राज्ञे तामाज्ञप्तिकां प्रत्यर्पयन्तीति, (तएणं से भरहे राया जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ) ततः खलु स भरतो राजा यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैवोपागच्छति (उवागच्छित्ता) उपागत्य (मज्जणघरं अणुपविसइ) मज्जनगृहमनुप्रविशति, (अणुपसित्ता) अनुप्रविश्य, (समुतजालाभिरामे तहेब जाव धवलमहामेहणिगए इव ससिव्य पियदसणे णवरई मज्जनघराओ पडिनिक्खमइ) समुतजालाभिरामे तथैव यावत् धवलमहामेघ निर्गत इव शशोव प्रियदर्शनो नरपतिः मज्जनगृहात् प्रतिनिष्क्रामति, तत्र समुक्तेन मुक्ताफलयुक्तेन जालेन गवाक्षेण अभिरामः मुन्दरो यस्तस्मिन् तथैव यावत्पदात् विचित्रमणिरत्नकुट्टिमतले अतएव रमणीये एतादृशविशेषणविशिष्टे स्नानमण्डपे नानामणिरत्नभक्तिचित्रे स्नानपीठे सुखेनोपविश्य स्नपितः स्नानानन्तरं च धवलमहामेघात् स्वच्छशरन्मेवात् निर्गत इव शशीव चन्द्रइव प्रियदर्शनो नरपतिः भरतो राजा सुधाधवलीकृतात् मज्जनगृहात्प्रतिनिष्क्रामतीतिभावः (पडिणिक्खमित्ता) प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य में आनन्दित हुए और राजा भरत ने जैसा करने का उन्हे आदेश दिया था बैसा सत्र उन्होंने करके पीछे इसकी खबर भरत राजा के पास भेज दी (तएणं से भरेहे राया जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ) इसके बाद वे भरत राजा जहां पर स्नानगृह था-बहां पर गये (उवागच्छित्ता मज्जणघरं अणुपविसइ, अणुपविसित्ता समुत्तजालाभिरामे तहेव जाव धवलमहामेहणिग्गए इव ससिव्व पिंय दंसणे णरवई मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ) वहाँ जाकर वे मज्जनगृह में प्रविष्ट हुए । प्रविष्ट होकर वे उस स्नान मंडप में कि जिसकी खिरकियां मुक्ताफल से खचित हो रही हैं और इसी कारण जो बड़ा मनोरम बना हुआ है , एवं यावत्पदानुसार जो विचित्र मणिरत्नों की भू मवाला है रखे हुए नानामणियों की रचनावाले स्नान पीठ पर सुख से बैठ गये । वहां पर उन्होंको अच्छी तरह से स्नान कराया गया स्नान के बाद फिर वे भरत राजा धबल महामेघ-स्वच्छ शरद काल के मेध से निर्गत शशी-चन्द्रमा की तरह उस मज्जनगृह से बाहर निकले । उस समय वे देखने में बड़े ही सुहावने लग रहे थे। (पडिणिक्खमित्ता ચિત્તમાં આનંદિત થયા અને રાજા ભરતે જે પ્રમાણે કરવાને તેમને આદેશ આપે હતે. त मधु सम्पन्न रीने तेभर मरत ना पासे सूचना मादी. (त एण से भरहे राया जेणेव म जणघरे तेणेव उवागच्छद)त्यारा ते भरत २amrयां स्नान गृड हेतु, त्यां गया. (उवागच्छित्ता जेणेव मज्जणधरं तेणेवयअणुपविसइ, अणुपविसित्ता समुत्तजालाभिरामे तहेव जाव धवल महामेहणिग्गए इव ससिव्य पियदंसणे णरवई मज्जणधराओ पडिणिक्खमई) त्यां न ते मन मा प्रविष्ट था. प्रविष्ट थने ते नी माशय। મુક્તાફળથી ખચિત છે અને એથી જ જે અતી મનોરમ લાગે છે તેમજ યાવત્ પદાનસાર જે વિચિત્ર મણિરત્નની ભૂમિવાળું છે એવા. મંડપમાં મૂકેલા નાના મણિઓથી ખચિત સ્નાન પીઠ ઉપ૨ સુખપૂર્વક બેસી ગયો. ત્યાં તે રાજાને સારી રીતે અને કરાવી વામાં આવ્યું. સ્નાન કરાવ્યા બાદ તે ભરત ૨ાજ ધવલ મહામેઘ-સ્વછ શરત કાલીન મેઘથી નિર્ગત શશી-ચંદ્ર-ની જેમ તે મજજનગૃહમાંથી બહાર નીકળ્યા. તે સમયે તેઓ Page #589 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटोका तृ० वक्षस्कारः सू० ५ अष्टालिकामहामहिमासमाप्त्यनन्तरीयकार्यनिरूपणम् ५७५ (हयगयरहपबरवाहणभडचडगरपहकरसंकुलाए सेणा पहियकित्ती जेणेव बाहिरिया उवद्या णसाला जेणेव आभिसेक्के इत्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ) हयगजरथप्रवरवाहनभटचडगरपहकर संकुलया सेनया प्रथितकीर्तिः यत्रैव बाह्योपस्थानशाला यत्रैव आभिषेक्यं हस्तिरत्नं तत्रैवोपागच्छति, तत्र हयगजरथाः प्रवराणि वाहनानि भटा:-योद्धारः तेषां (चडगरपहकरत्ति ) विस्तारवृन्दम् तेन संकुलया व्याप्तया सेनया साद्ध प्रथितकीतिः विख्यातकीर्तिमान् भरतो राजा यत्रैव बायोपस्थानशाला यत्रैव च आभिषेक्यम् अभिषेकयोग्यं हस्तिरत्नं पट्टहस्तिवरः तत्रैवोपागच्छति (उवागच्छित्ता) उपागत्य (अंजणगिरिकड़गसण्णिभं गयवई गरवइ दुरूढे) अजनगिरिकटकसन्निभं गजपति नरपतिर्दरूढे, तत्र अञ्जनगिरेः-अजनपर्वतस्य कटको नितम्बभागः तत्सन्निभं गजपति-राजकुजरं नरपति भरतो दुरूढे-आरूढ इति । अथ गजारूढश्च राजा चकरत्न प्रदर्शितमार्गे गच्छति कीदृश्या ऋद्धया तदाह(तए ण से) इत्यादि । (तए णं से भरहाहिवे णरिंदे) ततः खलु स भरताधिपो नरेन्द्रः (हारोत्थय सुकयरइयवच्छे) हारावस्तृत सुकृतरतिदवक्षस्कः तत्र हारेण अवस्तृतम् आच्छादितम् अतएव सुकृतं मनोहरं तेनैव हेतुनो रतिदं प्रदर्शकजनानामानन्दप्रदं वक्षो यस्य स तथा (कुंडलउज्जोइयाणणे) कुण्डलोद् घोतिताननः कुण्डलाभ्यामुधोतितंप्रकाशितम् आननं मुखं यस्य स तथा (मउडदित्तसिरए) मुकुटदीप्तशिरस्कः, मुकुटेन दीप्तं प्रकाशितं शिरो मस्तकं यस्य स तथा (णरसीहे) नरसिंहः शूरत्वात् (णरवई) हयगयरहपवरवाहणभडचडगरेहपहकरसंकुलाए सेणाए पहिअकित्ती जेणेव बाहिरिया रवद्राण साला जेणेव अभिसेक्के हत्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ) मज्जनग्रह से बाहर निकलकर वे भरत राजा कि जिनकी कीर्ति हय-गज, रथ-श्रेष्ठ-वाहन-और योद्धाओं के विस्तृत वृन्द से व्याप्त सेना के साथ विख्यात हैं जहां बाह्य उपस्थानशाला थी और उसमें भी अभिषेक योग्य हस्तिरत्न थापटहाथी था-वहां पर आये । (उवागच्छित्ता) वहां आकरके (अंजण गिरि कडगसन्निभं गयवई णरवइ दुरूढे) वे नरपति अञ्जनगिरि के कटकनितम्बभाग-के जैसे गजपति पर अरूढ हो गये (तएणं से भरहाहिवे णरिंदे हारोत्थय सुकयरइयवच्छे कुंडल उज्जोइआणणे मउडदित्तसिरए णरसी वाभा अतीव सोहाभ! andl ता. (पडिणिक्खमित्ता हयगयरहपवरवाहणभडचडग रपहकर संकुलाए सेणाए पहिअकित्ति जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव आभिसेके हत्थिरयणे तेणेव उवागप्छई) मनभांथी १७२ नीणीने ते भरत २ જેમની કીર્તિ હય-ગજ રથ-શ્રેષ્ઠ વાહન અને દ્ધાઓને વિસ્તૃત વૃન્દથી વ્યાસ સેના સાથે વિખ્યાત છે-તે જયાં બાહ્ય ઉપસ્થાન શાળા હતી અને તેમાં પણ જ્યાં અભિષેક योग्य रित२.न तुं मेट ५८ हाथी ता-यां माल्या. (उधागच्छित्ता) त्यां आवीन (अंजणगिरि कडगसंन्निभं गयवई णरवई दुरूढे) ते नरपति Arन गिरना ४४४-नित भाग-4 पति ७५२ सभा३८ 45 गया. (तएणं से भरहाहिवे गरिदे हारोत्थयसुकयरइयवच्छे कुडल उज्जोइआणणे मउडदित्तसिरए णरसीहे पर Page #590 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे नरपतिः स्वामित्वात् (णरिंदे) नरेन्द्रः परमैश्वर्ययोगात् (गरवसहे] नरवृषभः स्वीकृत कृत्य संपादकत्वात् (मरुयरायवसभकप्पे) मरुद्राजवृषभकल्पः; तत्र मरुतो देवाः व्यन्तरादयस्तेषां राजानः इन्द्रास्तेषां मध्ये वृषभाः मुख्याः सौधर्मेन्द्रादयस्तत्कल्पः तत्सदृश इत्यर्थः (अब्भहियरायतेअलच्छीए दिप्पमाणे) अभ्यधिक राजतेजो लक्ष्म्या दीप्यमानः (पसत्थ मंगलसएहि संथुव्वमाणे) प्रशस्तमङ्गलशतैः संस्तूयमानो बन्दिभिरिति (जय सई कगलोए) जय शब्दकृतालोकः जयशब्दः कृतः आलोके दर्शने सत्येव यस्य स तथा (हत्थिखंधवरगए) हस्तिस्कन्धवरगतः प्राप्तः (जेणेव मागहतित्थे तेणेव उवागच्छइ) यत्रैव मागधतीर्थ तत्रैवोपागच्छति केन सह तत्राह-'सकोरंट मल्लदामेणं छत्तणं धरिज्जमाणेणं' सकोरण्टमाल्यदाना छत्रेण ध्रियमाणेन सह 'सेयवरहे णरवइ णरिंदे णरवसहे मरुअरायवसभकप्पे अभहिजरायते अलच्छीए दिपमाणे) इसके वाद वे भरताधिप नरेन्द्र कि जिनका वक्षःस्थल हार से व्याप्त हो रहा है, इसी कारण जो बडा हो सुहावना लग रहा है और देखनेवाले मनुष्यों के लिए आनन्दप्रद हो रहा है, मुखमण्डल जिनका दोनों कर्ण के कुण्डलों से उद्योतित हो रहा है मुकुट से जिनका मस्तक चमक रहा है शूरवीर होने के कारण जो मनुष्यों में सिंह के जैसे प्रतीत हो रहे हैं, स्वामी होने से जो नर तमा न के प्रतिपालक-बने हुए हैं, परम ऐश्वर्य के योग से जो मनुष्य में इन्द्र के तुल्य गिने जा रहे हैं, स्वकृत कृत्य के संपादक होने के कारण जो नर वृषभ माने जा रहे हैं व्यन्तरादिक देवों के इन्द्रो के बीच में जो मुख्य-जैसे बने हुए है-बहुत अधिक राजतेज की लक्ष्मी से जो चमक रहे हैं (पसत्थमंगलसरहिं संथुत्रमाणे) बन्दिजनों द्वारा उच्चरित सकड़ो मंगलवाचक शब्दों से जो संस्तुत हो रहे है तथा (नयसद्दकयालोए) आपकी जय हो, जय हो, इस प्रकार से जो दिखते ही लोगों द्वारा कृत शब्दों से पुरस्कृत किये जारहे हैं (हत्थिखधवरगए) अपने पट्ट हाथी पर बैठे हुए (जेणेव मागहतित्ये तेणेव उवागच्छइ) जहाँ पर वई परिंदे णरवसहे मरुअरायवसभकप्पे अब्भहिअरायते अलच्छीए दिप्पमाणे) त्यार माह તે ભારતાધિપતિ નરેન્દ્ર કે જેમનું વક્ષસ્થળ હારથી વ્યાપ્ત થઈ રહ્યું છે, એથી જે બહુ જ સેહામણું લાગી રહ્યું છે, અને જેનારા મનુષ્ય માટે જે આનંદ પ્રદ થઈ રહ્યું છે, મુખ -મંડળ જેમના બન્ને કર્ણના કુંડળેથી ઉદ્યોતિત થઈ રહ્યું છે, મુકુટથી જેમનું મસ્તક ચમકી રહ્યું છે, શૂરવીર હોવાથી જે મનુષ્યોમાં સિંહવત પ્રતીત થઈ રહ્યા છે, સ્વામી હવાથી જે નર સમાજ માટે પ્રતિ-પાલક રૂપ છે, પરમ એશ્વર્યના યુગથી જે મનુષ્યમાં ઈન્દ્ર તુલ્ય ગણાય છે, સ્વકૃત કૃત્યના સંપાદક હોવાથી જે નર-વૃષભ તરીકે પ્રખ્યાત છે, વ્યન્તાહિક દેના ઈન્દ્રોની વચ્ચે જે મુખ્ય જેવા છે. અત્યધિક રાજ તેજની લહમીથી જે तेजस्वी थई २॥ छ (पसत्थमंगलसहि संथुव्वमाणे) पहने। १3 यास्ति सहसावि भ वाय शहाथी २ संस्तुत थई २। छ, भन (जय सहकयालोए) ‘તમારી યે થાઓ, જય થાઓ' આ પ્રમાણે જેમના દર્શન થતાં જ જે લેકે વડે भण शहाथी पुरस्कृत थ/ २॥ छ (हत्थिखधवरगए) ताना साथी ५२. a (जेणेव मागहतित्थे तेणेव उवागच्छह) rul d भागतार्थ तु, त्यो मान्य। Page #591 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राशिकाटिकातृ वक्षस्कारः सू०५अष्टाह्निकामहामहिमासमाप्त्यनन्तरीयकार्यनिरूपणम् ५७७ चामराहिं उधुबमाणोहिर' तथा श्वेतवर चामरैरुत्धूयमानैः २ सह वोज्यमानैः सह इति 'जक्खसहस्ससंपरिवुडे' यक्षसहस्रसंपरिवृत्तः, यक्षाणां देव विशेषाणां सहस्त्राभ्यां, संपरिवृतः चक्रवर्तिशरीरस्य व्यन्तरदेव सहस्रद्वयाधिष्टितत्वात् 'वेसमणे चेव धणवई' वैश्रवण इव धनपतिः धनस्वामी कुबेर इव 'अमरवइ सण्णिभाए इड्ढीए पहियफित्ती' अमरपति सन्निभया इन्द्रसदृश्या ऋद्धया प्रथितकी तिः विस्तृतकीर्तिः 'गंगाए महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं' गङ्गायाः महानधाः दाक्षिणात्येन दक्षिणदिगवस्थितेन कूलेन तटेन 'गामागरणगरखेडकब्बडमडंबदोणमुहपट्टणासमसंवाहसहस्समंडियं' ग्रामाकरनगरखेटकबंटमडम्बद्रोणमुखपत्तनाऽऽश्रमसंवाहसहस्त्रमण्डताम्, तत्र-ग्राम:-वृतिवेष्टितः, आकरः सुवर्णरत्नाद्युत्पत्तिस्थानम्. नगरं प्रसिद्धम्. खेटम् -धूलिप्राकारपरिवह मागध तीर्थ था वहां पर आये जिप्त समय ये भरत राना हाथी के ऊपर बैठे हुए इस तीर्थ की तरफ आ रहे थे-उस समय इनके ऊपर-सकोरंट कोरंट पुष्पों की माला से युक्त छत्र छत्रधारियों ने तान रक्खा था (सेयवरचामराहिं उधुव्वमाणीहिं २ जक्खसहस्ससंपरिखुडे वेसमणे चेव धणवई अमरवइसन्निभाए इड्ढीए पहिअकित्ती) इसके ऊपर चामर ढोर ने वाले जन बार २ श्वेत श्रेष्ठ चामर ढोर रहे थे क्योकि चक्रवर्ती का शरीर दो हजार देवा से अधिष्ठित होता है कुबेर के जैसे ये धन के स्वामी थे और इन्द्र के जैसे ऋद्धि से ये विस्तृत कीती वाले थे. (गंगा महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं) ये महानदी गंगा के दाक्षिणात्यकूल से पूर्वदिग्वर्ती मागधतीर्थ की ओर चले उस समय ये (गामागरनगर खेटकब्बडमडंबदोणमुह पट्टणासम) वृति वेष्टित ग्रामों से, सुवर्ण रत्नादिक की उत्पत्ति स्थान रूप आकरों से, नगरों से, धुलिके प्राकार से परिवेष्टित खेटों से, क्षुद्र प्राकार से वेष्टित कर्बटों से ढाई कोश तक प्रामान्तर से रहित मडम्बो (छोटा गाम) से, जल मार्ग एवं स्थल मार्ग से युक्त जन निवास रूप द्रोणજે વખતે એ ભરત રાજા હાથી ઉપર સવાર થઈને એ તીર્થ તરફ આવી રહ્યા હતા, તે સમયે તેમની ઉપર સકરંટ-કરંટ પુષ્પોની માળાથી યુક્ત છત્ર છત્રધારીએાએ તાણ शम्युं तु. (सेयवरचामराहिं उडुब्वमाणीहिं २ जक्खसहस्स पंपरिबुडे वेसमणे चेव धणवई अपरवइ सन्निभाए इड्ढीए पहिअकित्ती) सनी ०५२ यभर ढोनारामा વારંવાર વેત-શ્રેષ્ઠ ચામર ઢાળી રહ્યા હતા. બે હજાર દેવેથી તેઓ આવૃત હતા કેમકે. ચક્રવતિનું શરીર બેહજાર દેવોથી અધિછિત હોય છે. કુબેર જેવા એઓ ધનસ્વામી હતા सनद्रनावी *द्धिथी से। विस्तृत विता . (गंगा महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं) मे । महानदी गाना क्षिय सथी पु हिवती भाग तीय २५ २वाना थया.ते समये । (गामागरनगरखेडकब्बडमडबदोणमुहपट्टणासम) वृति वटत श्रामाथी, सुपण त्नानि अपत्ति स्थान ३५ माशथी, नगशथी, ધૂલિના પ્રાકારોથી પરિવેષ્ટિત બેટથી, ક્ષુદ્ર પ્રાકારટિત કર્બટેથી, અહી ગાઉ સુધી ગામાન્તર-રહિત મડંબેથી, જલમાર્ગ અને સ્થળમાર્ગથી યુક્ત જનનિવાસ રૂપે Page #592 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५७८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वेष्टितम्, कर्बटम् क्षुद्रपाकारवेष्टितं लघु नगरम्, मडम्ब-साईकोशद्वयान्तरेण ग्रामान्तररहितम्, द्रोणमुखं-जलस्थलपथोपेतो जननिवासः, पत्तनं-समस्तवस्तु प्राप्तिस्थानम् शकटादिभिनौं भिर्वा यद्गम्यं, तत्पत्तनम्, यत् केवलं नौभिरेव गम्यं तत् पट्टनम् उक्तं च "पत्तनं शकटैगम्यं घोटकैनौ भिरेव च । नौभिरेव च यद्गम्यं पट्टनं तत् प्रचक्षते ॥१॥ __ आश्रमः-तापसैरावासितः पश्चादपरोऽपि जनस्तत्रागत्य वसति, संवाहः-कृषीवलैर्धान्यरक्षार्थ निर्मितं दुर्गभूमिस्थानम् , पर्वतशिखरस्थितजननिवासः समागतप्रभूतपथिकजननिवासो वा तेषां सहस्रैर्मण्डिताम् (थिमियमेइणीयं वसुहं अभिजिणमाणे अभिजिणमाणे) स्तिमितमेदनीकां वसुधाम् अभिजयन् अभिजयन्, तत्र नृपस्य प्रजापि यत्स्यात् स्तिमिता भयरहितत्वेन स्थिरा मेदिनी-मेदिन्याश्रितजनो यस्थां सा तथा ताम् एवंविधां वसुधाम् अभिजयन् अभिजयन् तत्रत्याधिप वशीकरणेन स्ववशे कुर्वन् २ इत्यर्थः। (अग्गाई वराइं रयणाई पडिच्छमाणे पडिच्छमाणे) अग्र्याणि वराणि अत्यन्तमुत्कृष्टानि रत्नानि तत्तज्जातिप्रधानवस्तुनि प्रतीच्छन् प्रतीच्छन् गृह्णन् २ (तं दिव्यं चक्करयणं अणुगच्छमाणे अणुगच्छमाणे) तदिव्यं चक्ररत्नम् अनुगच्छन् अनुगच्छन् चक्ररत्नप्रदर्शितमार्गेण चलन् चलन्नित्यर्थः (जोयणंतरियाहिं मुखों से समस्त वस्तुओं की प्राप्ति के स्थान रूप पत्तनों से अथवा शकटादि से या नोका से गम्यरूप पत्तनों से केवल नौका से ही गम्यरूप पट्टनों' से तपसी जनो द्वारा आवासित पश्चात् अपरजन द्वारा भी ठहरने योग्य ऐसे आश्रमों से कृषीवलों पर्वतशिखर स्थित जननिवासरूप अथवा समागत प्रभूत पथिक जन निवासरूप संवाहों से मण्डित (थिमियमेइण यं वसुहं अभिजिण. माणे २) ऐसी स्थिर प्रजाजनोवाली वपुधा को वहां के अधिपति को अपने वश में करते हुए (अग्गाई वराई रयणाई पडिच्छमाणे २) एवं उनसे नजराने के रूप में उत्कृष्ट रत्नों को-तत्तज्जाति में प्रधान भूत वस्तुओं को स्वीकार करते हुए (तं दिव्यं चक्करयणं अणुगच्छमाणे) तथा चक्ररत्न द्वारा प्रदर्शित मार्ग से चलते हुए (जोयणंतरियाहि व सह हिं वसनाणे वसमाणे) और દ્રોણ મુખેથી, સમસ્ત વસ્તુઓના પ્રાપ્તિ સ્થાન રૂપ ૫ત્તનથી અથવા શકટાદિથી અથવા નૌકાઓથી ગમ્ય રૂપ પત્તથી, ફક્ત નૌકાઓથી જ ગમ્યરૂપ પટ્ટનથી, તાપસી જને વડે આવાસિત તેમ જ અપર જર્ન વડે પણ નિવાસ એગ્ય એવા આશ્રમેથી, કૃષકે વડે ધાન્યરક્ષાર્થ નિમિત દુગભૂમિ રૂ૫ સંવાહથી અથવા પર્વત શિખર સ્થિત જન નિવાસ રૂપ અથવા સમ મન પ્રભૂત પથિ જન નિવ ય રૂપ સાહોથી મંડિત (શિબિર मेरणीयं बस अभिजिमाणे २) स स्थि२ प्रत वसधाने. त्यांना अधिपतिन चाताने मन ४२ता (अम्गाई वराई रयणाई पडिच्छमाणे २) तेभर मनी पासेथी નજરાણાના રૂપમાં ઉત્કૃષ્ટ રને-તત્તજજતિમાં પ્રધાન બુત વસ્તુ બેને સ્વીકારતા રવીકારતાં (तं दिव्वं चक्करयणं अणुगच्छमाणे) तम य२१ ६२ प्रशित भाग थी याता (जोयणंतरियाहि वसहीहि वसमाणे) मन थे, मे 2016५२ पोताना ५५ (१) पत्तनं शकटैगम्यं घोटकैभिरेवच, नौभिरेवच यद्यं पट्टनं तत् प्रचक्षते" Page #593 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटोका तृ० वक्षस्कारः सू० ५ अष्टातिकामहामहिमा समाप्त्यनन्तरीयकार्यनिरूपणम् ५७९ सहीहिं समाणे वसमाणे ) योजनान्तरिताभिर्वसतिभिः - विश्रामैः वसन् वसन् एकस्माद्विश्रामात् चतुः क्रोशात्मकं योजनं गत्वा परं विश्रामम् उपादत्ते इत्यर्थः ( जेणेव मागह तिथे तेणेव उवागच्छइ ) यत्रैव मागधतीर्थं तत्रैव उपागच्छति ( उवागच्छित्ता) उपागत्य (मागइतित्थस्स अदूरसामंते दुवालसजोयणायामं णव जोयणवित्थिष्णं वरणगरसरिच्छं खंधावारनिवेसं करे३) मागवतीर्थस्य अदूरसामन्ते दूर च सामन्तं च दूरसामन्तं ततोऽन्यत्र नातिदूरे नातिसमीपे यथोचितस्थाने द्वादशयोजनायामं नवयोजनविस्तीर्ण वरनगरसदृशं विजयस्कन्धावारनिवेशं सैन्यनिवासस्थानं करोति (करिता ) कृत्वा (बड्ढइरयणं सदावेइ ) वर्द्ध किरत्नं-सूत्रधारमुख्यं शब्दयति आति (सदावित्ता) शब्दयित्वा ( एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! ) एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रिय ! ( मम आवासं पोसहसालं च करेहि) मम कृते आवास निवासस्थानं पोषधशालां च कुरु ( करिता ) कृत्वा (ममेदमाणएक एक योजन पर अपना पडाव डालते हुए (जेणेव मागतित्थे तेणेव उवागच्छइ) जहां वह मागधी था वहां पर आये (उवागच्छित्ता) वहां आकर के इन्होंने (मागह तित्थस्स अदूरसामंते दुवालस जोयणायामं णत्र जोयणवित्थिण्णं वरणगर सरिच्छं विजयखंधावारनिवेस करेइ) उस मागधतीर्थ के अदूरसामंत प्रदेश में-न अतिदूर और नहि अति निकट ऐसे उचित स्थान में - अपने नौ योजन का विस्तार वाला एवं १२ योजन की लम्बाई वाला कटक को - सैन्य का निवासस्थान बनाया अर्थात् पूर्वोक्त प्रमाणवाले स्थानपर अपना सैन्य ठहराया (करिता वड्ढरयणं सदावेइ) उस स्थान पर सैन्य ठहराकर फिर उसने सूत्रधारों के मुखिया को बुलाया (सदावित्ता एवं वयासी) और बुलाकर उससे ऐसा कहा - ( विपामेव भो देवाणुपिया ! मम आवासं पोसहसा - लंब करे) हे देवानुप्रिय ! तुम शोत्र हो मेरे लिए एक निवास स्थान और पौषघशाला को निर्माण करो (करिता ममेयमाणत्तियं पञ्चविपणा हि ) निर्माण करके फिर मुझे मेरी आज्ञा के अनुनामता (जेणेव मागहतित्थे तेणेव उवागच्छइ) नयां भागध तीर्थ तु, त्यां गया. ( उवागच्छित्ता) त्यां भावीने तेभो ( मागइतित्थस्स अदूरसामंते दुवालसजोयणायाम णव जोयणवित्थिण्णं वर णगरसरिच्छ विजय संधावार निवेस करेइ) ते भागध तीर्थंनी અદ્રષ્ઠમીપ પ્રદેશમાં-અર્થાત્ ન અતિ દૂર કે ન અતિ નિકટ એવા ઉચિત સ્થાનમાંપેાતાના નવ ચેાજન વિસ્તાર વાળા અને ખાર ચેાજન લંબાઈ વાળા કટક સૈન્યનુ નિવાસ સ્થાન મનાવ્યુ એટલે કે પૂર્વોક્ત પ્રમાણવાળા સ્થાનમાં તેણે પેાતાના સૈન્યનેા પડાવ नाच्यो (करिता वड्ढद्दरयणं सदावेइ) ते स्थान पर सेनाने भुभम साथीने यछी तेथे सूत्रधाराना भुमिया ने मोसान्यो ( सहावित्ता एवं वयासी) ने मोलवीने तेथे मां प्रमाणे उर्धु - (खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! मम आवासं पोसहसालं च करेहि) डे દેવાનુપ્રિય ! તમે શીઘ્ર મારા માટે એક નિવાસ સ્થાન અને પૌષધશાળાનું નિર્માણ કરે. (करिता ममेयमाणत्तियं पच्चप्पिणाहि ) निर्माण उरीने पछी भने थे भाज्ञा मुभ्य अभ Page #594 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५८० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे त्तियं पच्चपिणाहि ) मम एतामाज्ञप्तिकां प्रत्यर्पयेति (तरणं से बड्ढइरयणे भरहेणं रण्णा एवं वुत्ते समाणे हतुट्ठ चित्तमाणं दिए पोइमणे जाव अंजलि कट्ट एवं सामी तहत्ति आणाए विणणं वयणं पडिसुणे३) ततः खलु स वर्द्धकिरत्नो भरतेन राज्ञा एवमुक्तः सन् हृष्टतुष्ट चित्तानन्दितः प्रीतिमनाः यावत् पदात् करतलपरिगृहीतं दशनखं शिरसावर्तं मस्तके अञ्जलिं कृत्वा एवं स्वामिन् तथेति इत्युवा आज्ञया विनयेन वचनं प्रतिशृणोति अङ्गी करोति ( पडिणित्ता) प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य (भरहस्स रण्णो आवसई पोसहसालं च करेइ) भरतस्य राज्ञ आवासं पौषशालां च करोति (करिता ) कृत्वा सम्पाद्य (एयमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चष्पिणाति) एताम् उक्तविधाम् आज्ञप्तिकां राजाज्ञां क्षिप्रमेव प्रत्यर्पयति परावर्तयति (तए णं से भर राया आभिसेक्काओ हत्थिरयणाओ पच्चोरुहइ ) ततः खलु स भरतो राजा आभिषेक्यात् हस्तिरत्नात् प्रत्यवरोहति अबत्तरति ( पच्चोरु हित्ता) प्रत्यवरुह्य अवतीर्य सॉर काम हो जाने की खबर दो- (त एणं से वडूढइरयणे भरहेणं रण्णा एवं वुत्ते समाणे हट्ट तुट्ठ चित्तमाणंदिए पीईमणे जाव अंजलि कट्टु एवं सामी तहत्ति सामी आणाए विणणं वयणं पडिसुणे ) इस प्रकार भरत के द्वारा कहा गया वर्द्धकिरत्न हृष्टतुष्ट होता हुआ अपने चित्त में आनन्दित हुआ उसके मनमें प्रीति जगी यावत् अंजलिको जोड़कर उसने फिर ऐसा कहा है स्वामिन् ! जैसी आपने आज्ञा दी है उसी के अनुसार काम होगा इस तरह कहकर उसने प्रभु की आज्ञा को बडी विनय के साथ स्वीकार किया (पडिसुणित्ता भरहरूस रण्णो आवसहं पोसहसालं च करेइ) आज्ञा स्वीकार कर के फिर उसने वहां से आकर भरत राजा के निमित्त निवास स्थान और पौषधशाला का निर्माण किया (करिता एयमागत्तियं खिप्पामेव पच्चप्पि ति ) निर्माण कार्य समाप्त होते हो फिर उसने राजा को आज्ञायथावत् पालित हो चुकी है. इसकी खबर शीघ्र हो भरत राजा के पास पहुंचा दो । ( तरणं से भरहे राया आभिसेक काओहस्थिरयणाओ पच्चोरुहइ ) भरत राजा अपनी कृताज्ञानुसार कार्य पूरा हुआ सुनकर अभिषेक सम्पन्न थर्ड ज्वानी सूचना आयो (त पणं से वड्ढद्दरयणे भरहेणं रन्ना एवं वुतें समा - वित्तमादिए पीईमणे जाव अंजलि कट्टु एवं सामी तहत्ति सामी आण (ए विणणं वर्षण पाडगे) अ प्रमाणे भरत रानवडे आज्ञप्त ते वर्द्धन हृष्ट-पुष्ट થતા પાતાના ચિત્તમા બત દે। થયા. તેના મનમાં પ્રીતિ ઉત્પન્ન થઈ, યાત્રત્ અંજલિ જોડીને પછી તેણે આ પ્રમાણે કહ્યું-હું સ્વામિન્ ! જે પ્રમાણે આપશ્રીએ અજ્ઞા કરી છે, તે મુજબ કામ સમ્પન્ન થશે આ પ્રમાણે કડીને તેણે પ્રભુની આજ્ઞાને બહુજ વિનય પૂર્ણાંક स्त्री ४२ री ( पडिणित्ता भरइस्ल रण्णो आवसहं पासहसालं च करेइ) खाज्ञा स्वीકાર કરીને પછી તેણે ત્યાંથી આવીને ભરત રાજા માટે નિવાસ સ્થાન અને પૌષધશાળ તુ निर्माणु यु. ( करिता एमाणत्तियं खिप्पामेव पञ्चविणंति) निर्माणु अर्य सुन्न थतां જ તેણે રાજાજ્ઞાનું પાલન થઇ ચૂકયુ' છે તે અંગેની ખખર રાજા પાસે પહેાંચાડી. તે પળ से भरहे राया आभिसेक्काओ हत्थिरयणाओ पच्चोरुहद्द) भरत भडाराम पोतानी माज्ञ Page #595 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका त•षक्षस्कारः सू०५अष्टालिकामहामहिमासमाप्त्यनन्तरीयकार्यनिरूपणम्५८२ (जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ) यत्रैव पौषधशाला तत्रैवोपागच्छति (उवागच्छिता) उपागत्य (पोसहसालं अणुपविसइ) पौषधशाला मनुप्रविशति (अणुपविसित्ता) अनुप्रविश्य (पोसासालं पमज्जइ) पौषधशालां प्रमाजेयति (पमज्जित्ता) प्रमाज्य (दब्भसंथारगं संथरइ) दर्भसंस्तारकं दर्भासनं विस्तारयति (संथरित्ता) संस्तीर्य (दमसंथारग दुरूहइ) दर्भसंस्तारकम् अर्धतृणहस्तपरिमित दर्भासनम् दुरूदति आरोहति उपविशति (दुरूहिता) आरुह्य (मागहतित्थकुमारस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्डइ' मागधतीर्थकुमारस्य साधनाय अष्टमभक्तं प्रगृह्नाति तत्र अष्टम भक्तमिति उपवासत्रयमुच्यते तद् अष्टमभक्तं प्रगृहानि (पगिण्हित्ता) प्रगृह्य (पोसहसालाए पोसहिए, बंभयारी, उम्झ मगिसुवणे ववगयमालावण्ण गविलेवणे, निक्खित्तसत्यमुसले,दभसंथारोवगए एगे अबीए अट्टमभक्तं पडिजागरमाणे पडिजागरमाणे) पौषधशालायां पौषधिकः पौषयवान् ब्रह्मचारी उन्मुतमणिसुवर्णः-त्यक्तमणिसुवर्णाभरणः, व्यपगतमालावर्णकविलेपनः,तत्र व्यपगतानि त्यक्तानि मालावर्णकविलेपनानि-स्रक् चन्दनविले पनानि येन स तथा, निक्षिप्तयोग्य पट्ट हाथो से नीचे उतरे ओर ( जेणेव पोपहसाला तेणेव उवागच्छइ ) जहां पषधशाला थो उस ओर चल दिये (उवागचित्ता पोसहसालं अणुपविसइ) वहाँ भाकर वे पोषपशाला में प्रविष्ट हुए (अणुपविसित्ता) प्रविष्ट हो कर के उन्होंने (पोसहसालं पमज्जइ) पौषधशाला का प्रमार्जन किया । ( पज्जित्ता दम्भसंथारंग संथरइ ) प्रमार्जन करके फिर वहां पर उन्होंने अढाई हाथ का दभे का आसन बिछाया (संथरित्ता दब्भसंथारगं दुरूहइ) बिछाकर फिर वे वैठ गये ( दुरूहित्ता मागहतित्थकुमारस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्हइ ) वहां बैठ कर उन्हो ने मागधतीर्थ कुमार को साधना के लिये तीन उपवास धारण किये (पागाण्हत्ता पोसहसालाए पोसहिए बंभयारी उम्मुक्कमणिसुवणे ववयमा लावण्णगविलेवणे णिक्खित्तसत्थमुमके दम. संथारोवगए णो अबीए अट्ठमभत्तं पडिजागरमाणे २) तान उपवास धारण करके वे पोषधवाले, ब्रह्मचारी एवं उन्मुकमणि सुवर्णाभरणवालें होगये उन्होने स्रक् चन्दनविलेपन तब कोर મુજબ કાર્ય સમ્પન્ન થઈ ચૂકયું છે તે વાત સાંભળીને અભિષેક ચોગ્ય પદહાથી ઉપરથી नाय तर्या अने (जेणेब पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ) यां पोषयातीत तर २वाना थया (उवागच्छित्ता पोसहसाल अणु विसइ) i भावीन. तस। पीपयश जाभा प्रविष्ट थया. (अणुपबिसित्ता) प्रविष्ट थंधने तेमणे (पोसहसाल पमज्जइ) पौषशा. मातुं प्रभान यु:(पज्जित्ता दम्भसंथारग संथरइ) प्रमान शने पछी त यां अटी डाय प्रमाण २८९ औसत पाययु. (संथरित्ता दब्भसंथारगं दुरूहइ) पाथरीन पीतेसात मासन 6५२ सी . (दुहित्ता मागहतित्थ कुमारस्स देवस्स अद्रमभत्तं पगिण्डर) त्यां मेसीने तभणे भासवतीय उभारनी साधना माटे ३ वासे घाया. (पगिण्हित्ता पोसहसालाप पोपहिए बंभयारी उम्मुक्कपणि सुवण्णे ववगयमालावणको घणे अबीए अट्टमभत्त पडिजागरमाणे) पास-- मम धारण करीन तस।पोरन બ્રહ્મચારી અને ઉન્મુક્ત પણ સુવે ભરણુવાળા થઈ ગયાતેમણે સ-ચંદન વિલેપન વગેરે Page #596 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५८२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे शस्त्रासलः, निक्षिप्तं हस्ततो विमुक्तं शस्त्रं मुसलं च येन स तथा, दर्भसंस्तारोपगतः सार्धद्वयहस्तपरिमितादर्भासनोपविष्टः एकः आन्तर व्यक्तरागादि सहायवियोगात् , अद्वितीयः तथाविध पदात्यादि सहायविरहात् अष्टमभक्तं प्रतिजाग्रन् प्रति जाग्रन् पालयन् पालयन् विहरति तिष्ठति (तए णं से भरहे राया अट्ठमभत्तसि परिणममाणंसि पोसहसालाओ पडिणिक्वमइ) ततः खलु स भग्तो राजा अष्टमभक्त परिणमति पूर्यमाणे परिपूर्णप्राये सति पौषधशालातः प्रतिनिष्क्रामति-निर्गच्छति (पडिणिक्खमित्ता) प्रतिनिष्क्रम्य (जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ) यत्रैव बाह्योपस्थानशाला तत्रैवोपागच्छति (उबागच्छित्ता) उपागत्य (कोडुंबियपुरिसे सहावेइ) कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति आह्वयति (सदावित्ता) शब्दयित्वा आहूय (एवं वयासो) एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अबादीत् उक्तवान् (खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया (हयगयरहपवरजोहकलियं चाउरंगिणिं सेणं सण्णाहेह) क्षिप्रमेव शीघ्रमेव भो देवाणुप्रियाः ! हयगजर यप्रवरयोधकलिताम्-अश्वहस्तिरथप्रवरसैनिकैः युक्तां चातुरङ्गिणी सेना दिया हाथ से शस्त्र छोड़ दिया मुसल छोड़ दिया २॥ढाई हाथ प्रमाण दर्भासन पर विराजमान वे आन्तरिक व्यक्त रागादिक के परिहार कर देने से एक अद्वितीय - होगये उनके पास में उस समय सेना आदि का एक भी जन नहीं रहा इस प्रकार से उन्होंने सविधि पोषध का पालन किया (तरणं से भरहे राया अट्ठमभत्तं सि परिणम माणसि पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ । सविधि पोषधका जब वे पालन कर चुके अर्थात् उसकी आराधना समाप्त हो चुका - तब वे पोषधशाला से बाहर आये (पडिौणखमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छद) पोषधशाला से बाहर आकर फिर वे जहां बाह्य उपस्थान श ला थो यहां पर आये (उवागच्छित्त कोडुबियपुरिसे सद्दावेइ) वहाँ आ करके उन्होंने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया (सद्दावित्ता ऐवं वयासी-) बुला करके के उनसे उन्होंने ऐसा कहा-(खप्पामेव भो देवाणुप्पिया! हय गय रह पवरजोहक लयं चाउरंगिणिं सेणं सण्णा हेह) हे देवानुप्रियो ! तुमलोग शीघ्र ही સવે ત્યજી દીધા. હાથમાંથી શસ્ત્ર ત્યજી દીધું, મુસલ ત્યજી દીધું, અઢિ હાથ પ્રમાણ દર્શાસન ઉપર વિરાજમાન તે ભરત મહારાજા આંતરિક વ્યક્ત રાગાદિકના પરિવારથી અદ્વિતીય થઈ ગયા. તેમની પાસે તે સમયે સેના વગેરે નો એક પણ માણસ હતો નહિ આ પ્રમાણે तभरी यथाविधि पौषधनु पालन यु. (त एणं से भरहे राया अट्ठमभत्तसि परिणम माणंसि पोतहसोलाओ पडिणिक्खमइ) यथाविधि न्यारे त पौषधनु पासन ४३ यूयो એટલે કે તેની આરાધના પૂરી થઈ ચૂકી ત્યારે તેઓ પૌષધશાળામાંથી બફા૨ આવ્યા (पडिणिक्ख मत्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ) पौषशाणामांथा ५६२ भावान ५छी तसे| यां या ५थान शाकाहुती त्या मा०यI, (उवागच्छित्ता कोड बियपुरिसे पहावेह) त्यां मावाने भयौटुभि ५३पाने al. (सहावित्ता एवं वयासी) aal मधे प्रमाणे धु. (खिप्पामेब भो देवाणुप्पिया ! हय गय रह पर जोहकलियं चाउरंगिणि सेणं सण्णाहेह) हेवानुप्रियो ! तमे शीघ्रमेव हय. Page #597 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीकात वक्षस्कारः सू० ५अष्टाह्निकामहामहिमासमाप्त्यनन्तरीयकार्यनिरूपणम्५८३ सन्नाहयत-सज्जी कुरुत, (चाउग्धंट आसरहं पडिकप्पेह) तथा चतस्रो घण्टा अवलम्बिता यत्र स तथा तादृशम् अश्वरथम्, अश्वबहनीयो रथः अश्वरथः तं प्रतिकल्पयत सज्जी कुरुत (त्तिकटु मज्जनघरं अणुपविसइ) इतिकृत्वा मज्जनगृहमनुप्रविशति (अणुपविसित्ता) अनुप्रविश्य (समुत्त तहेव जाव धबलमहामेह णिग्गए जाच मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ) समुत तथैव यावत् धवलमहामेघ निर्गतो यावत् मज्जनगृहात् प्रतिनिष्क्रामति, तत्र समुक्तनालाकुलाभिगमे इत्यादि विशेषणविशिष्टे स्नानमण्डपे नानामणिरत्नभक्तिचित्रे स्नानपीठे सुखेनोपविश्य स्नपितः स्नानानन्तरं च धवलमहामेघान्निर्गतः शशीव प्रियदर्शनो नरपतिः भरतः सुधाधवलीकृतात् मज्जनगृहात् प्रतिनिष्क्रामतीति भावः (पडिणिक्खमित्ता) प्रतिनिष्क्रम्य (हयगयरहपवरवाहण जाव सेणावइ पहियकित्ति जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ) हयगजरथप्रारवाहन यावत् सेनापतिप्रथितकीर्तिः यत्रैव बायोपस्थानशाला यत्रैव चातुर्घटोऽश्वरथः तत्रैवोपागच्छति, व्याख्या च पूर्ववत् बोध्या (उवागच्छित्ता) उपागत्य (चाउग्घंटे आसरह) चातुर्घण्टम् अश्वरथं दुरूढे आरोहति स्म इति ॥सू० ५॥ हय. गज, रथ एवं श्रेष्ठ योधाओं से युक्त सेना को तैयार करों-(चाउग्घंटे आसरहं पडिकप्पेह) तथा जिसमें चार घंटे लटक रहे हो ऐसे अश्वरथ को-अश्वों द्वारा चलने वाले रथ को सज्जित करो (त्तिक१) इस प्रकार कहकर वे (मज्जणघरं अणुपविसइ) स्नान गृह में प्रविष्ट हो गये (अणुपविसित्ता समुत्त तहेव जाव घवल महामेह णिग्गए जाव मज्जणघराओ पडिणिक्खकइ) वहां जाकर वे पूर्वोक्त मुक्ता जाला कूल आदि विशेषणों से अभिराम स्नान मंडप में रखे हुए पूर्वोक्त" नानामणि भक्ति पत्र" विशेषगवाले स्नान पोठ पर आनन्द के साथ बैठ गए वहां पर उन्हे स्नान कराया गया-स्नान करने के बाद वे धवलमेघ से निर्गत चन्द्र मण्डल की तरह उस स्नान घर से बाहर निकले (पडिणिक्खमित्ता हय गय रह पवर वाहण जाव सेणाबइ पहियकित्तो जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चा उग्घंटे आसरहे तेणेव उवागच्छद) इन सूत्र पदों की गर. २थ तमा वार श्रेष्ठ योध्धामाथी युत सेना तैयार ४२१. (चाउग्घटं आसरहं पडिकप्पेइ) तमश नेमा यार घटा टी २ लाय, मेवा २थने अश्वोथी यावामा माव सेवा २५ ने सति ४२।, (त्ति कटु) 41 प्रभारी डीन ते (मज्जणधरं अणुपविसइ) स्नान गृहभां प्रविष्ट थया. (अणुपविसित्ता समुत्त तहेव जाव धवल महामेहणिग्गए जाव मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ) त्यो न त पूवात भुतire माहि विशे. पाथी भनिराम स्नानभ७५ मा भूसा पूरित "नानामणि भत्तिचिस" विशेषवाणा સ્નાન પીઠ ઉપર આનંદ પૂર્વક બેસી ગયા. ત્યાં તેમને સ્નાન કરાવવામાં આવ્યું. સ્નાન કર્યા પછી તેઓ ધવલ મેઘથી નિર્ગત ચન્દ્ર મંડલની જેમ તે નાનગૃહમાંથી બહાર નીકज्या. (पडिणिक्खमित्ता हय गय रह पवर बाहण जाब सेणावइ पहियकित्ती जेणेव बाहिरिया उवाणसाला जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ) मे सूत्रहीनी Page #598 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीप्रमाप्तिसूत्रे अथ कृतस्नानादि विधिर्भरतो यच्चक्रे तदाह 'तएणं से' इत्यादि मूलम्- तएणं से भएहे गया चाउरघंटं आसरहं दुरूढे समाणे हएगयरहपवरजोहकलियाए सद्धि संपरिवुडे महया भडचडगरपहगरवंदपरिक्खित्ते चक्करयणदेसियमग्गे अणेगरायवरसहस्साणुयायमग्गे महया उक्किट्ठ सीहणायबोलकलकलरवेणं पक्खुभिय महासमुदरवभूयंपिव करेमाणे २ पुरथिमदिसाभिमुहे मागहतित्थेणं लवणसमुदं ओगाहइ जाव से रहवस्स्स कुप्परा उल्ला, तएणं से भरहे राया तुरगे निगिण्हई निगिण्हित्ता रहं ठवेइ ठवित्ता धणुं परामुसइ तएणं तं अइरूग्गय बालचंदइंदधणुसंकासं दरियदप्पियदढघणसिंगरइयसारं उरगवरपवरगवलपवरपरपरहुयभमरकुलणीलिणिद्धं धंतधोयप, णिउणोवियमिसिमिसिंत मणिरयणघंटियाजालेपरिक्खित्तं तडित्तरुणकिरणतवणिज्जबद्धचिंधं ददरमलयगिरिसिहरकेसरचामरबालद्ध चंदचिंधं कालहरियरत्तपीयसुक्किल्ल बहुण्हारुणि संपिणद्धजीवं जीवियंतकरणं चलजीवं धणूं गहिऊण से णबई उसुंच वखइरकोडियं वइरसारतोंड कंचनमणिकणगरयणधोइट्ठ सुकयपुंख अणेगमणिरयणविविहसुविरइयनामचिंधं वइसाई ठाईऊणट्ठाणं आयतकण्णायतं च काऊण उसुमुदारं इमाइं वयणाई तत्थ भाणिय से णवई-हंदि सुणं तु भवंतो बाहिरओ खलु सरस्स जे देवा । णागासुरा सुवण्णा तेसिं खु णमो पणिवयाणि ॥१॥ हंदि सुणंतु भवंतो अभितरओ सरस्स जे देवा णागासुरा सुवण्णा सव्वे मेते विसयवासी ॥२॥ इति कटु उसुं णिसिरइत्ति-'परिंगरणिगरिअमज्झो वाउद्घय सोभमाणकोसेज्जो चित्तेण सौभए धणुवरेण इंदोब्ब पच्चक्खं ॥३॥ तं चंचलायमाणं व्याख्या पहिले को गइ व्याख्या के ही अनुरूप है (उवागच्छित्ता चाउग्घंटं मासरहं दुरूहे) भश्वरथ के पास पहुंचक कर वह उस पर बैठ गया ॥५।। याभ्या रखi ४२वामां आवस व्याच्या भुग. (उवागच्छित्ता चाउग्घंटं आसरह दरूहे ) भवरथ पासे पांयीन तम्मा तनी 6५२ सवा२ २. ॥५॥ Page #599 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० स्नानादिनिव्रत्यनम्तरीय भरतकार्यनिरूपणम् ५८५ पंचमिचंदोवमं महाचाव । छज्जइ वामे हत्थे णवइणोतं मि विजयमि ॥४॥ तए णं से सरे भरहणं रण्णा णिसट्टे समाणे खिप्पामेव दुवाल-- सजोयणाई गंता मागहतित्थाधिपतिस्स देवस्स भवणंसि निवइए, तएणं से मागहतित्थाहिवई देवे भवणंसि सरं णिवइअं पासइ पासित्ता आसुरुत्ते रुत्ते रुद्वे चंडिक्किए कुविए मिसिमिसेमाणे तिवलियं भिउर्डि णिडाले साहग्इ साहरित्ता एवं वयासी-केस णं भो एस अपत्थियपत्थए दुरंतपंतलक्खणे हीणपुण्णचाउद्दसे हिरिसिरिपरिवज्जिए जेणं मम इमाए एणुरूवाए दिव्वाए देविद्धीए दिवाए देवजुईए दिव्वेणं दवाणुभावेणं लद्वाए पत्ताए अभिसमण्णागयाए उप्पिं अप्पुस्सुए भवणंसि सरं णिसिरइत्तिकटु सीहासणाओं अब्भुटठेइ अब्भुट्टित्ता जेणेव से णामाहयंके सरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता तं णामाहयंकं सरं गेण्हइ णामकं अणुप्पवाएइ णामक अणुप्पवाएमाणस्स इमे एयारूवे अज्झथिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था उप्पणे खलु भो जंबुद्दोवे दीवे भरहे वासे भरहे णामं राया चाउरंतचक्कवट्टी तं जोयमेयं तीय पच्चुपण्णमणागयाणं मागहतित्थकुमाराणं देवाण राईणमुक्त्थाणीयं करेत्तए तं गच्छमि गं अहंपि भरहस्स रण्णो उवत्थाणीयं करेमित्तिकटु एव संपेहेइ ।।सू० ६॥ __छाया-ततः खलु स भरतो राजा चातुर्घण्टम् अश्वरथमारूढः सन् हयगजरथ प्रवरयोधकलितया सार्द्ध संपरिवृतः महाभटचडगरपहकरवृन्दपरिक्षिप्तः चक्ररत्नादेशितमार्गः अनेकराजवरसहस्रानुयातमारो, महता उत्कृष्टसिहनादबोलकलकलरवे सितमहासमदरवभूतमिव कुबन्नपि पौरस्त्यदिगभिमुखो मागधतीर्थन लवणसमुद्रम् अवगाहते यावत तस्य रथवरस्य कूपरौ आद्रौं स्याताम्, ततः खलु स भरतो राजा तुरगान् निगृह्णाति, निगृह्य रथं स्थापयति स्थापयित्वा धनुः परामृशति, ततः खलु तत् अचिरोद्तबालचन्द्रेन्द्रधनुःसंकाशं वरमहिषप्तदपित दृढघनश्टङ्गाग्रसारम्, उरगवरप्रवर गा. लप्रबलपरभृतभ्रमरकुलनीलोस्निग्धपातधौतपृष्ठम्, निपुणौपित देदीप्यमान मणिरत्नघण्टिकाजालपरिक्षिप्तम्, तडित्तरुणकिरणतपनीयबद्धचिह्नम्, दर्दरमलयगिरिशिखरकेसरचामर बालार्द्धचन्द्रचिह्नम् काल हरितरक्तपीत शुक्ल बहुस्नायुसम्पनद्धजीवम्, जोवितान्तकरणम्, चलजीवम्, स नरपतिः धनुः, इधुं च गृहीत्वा वरवज्रकोटिकम्, वज्रसारतुण्डम् कञ्चनमणिकनकरत्नधौतेष्टसुकृतपजम्, अनेकमणिरत्नविविधसुविरचितनामचिह्नम्, वैशाखमा, Page #600 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५८६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे स्थानं स्थित्वा इषु चोदारम् आयतकायतं कृत्वा तत्र इमानि वचनानि स नरपतिरभाणीत् हन्दि ! शृण्वन्तु भवन्तो बहिस्तात् खलु शरस्य ये देवाः । नागासुराः सुपर्णाः तेभ्यः खलु नमः प्रणिपतामि ।।१॥ हन्दि ! शण्वन्तु भवन्तोऽभ्यन्तरतः शरस्य ये देवा: नागा सुराः सुपर्णाः सर्वेते मम विषयवासिनः ॥१२॥ इति कृत्वा इषु विसृजति, परिकरनिगडितमध्यः, वातोद्धृतशोभमानकौशेयः मित्रेण धनुर्वरेण शोभते इन्द्र इव प्रत्यक्षम् ॥ ३॥ तं चञ्चलायमानं पञ्चमीचन्द्रोपमं महा. चापम राजते वामें हस्ते नरपतेः तस्मिन् विजये ॥४। ततः खल व शरो भरतेन राज्ञा निसृष्टः सन् क्षिप्रमेव द्वादश योजनानि गत्वा मागधतोऽधिष्ठतेर्देवस्य भवने निपतितः, ततः स्खलु स मागधतीर्थाधिपतिर्देवो भवने शरं निपतितं पश्यति, दृष्ट्वा आशुरुप्तः, रुष्टः, चाण्डिक्यितः, कुपितः, क्रोधाग्निना दीप्यमानः, त्रिवलिकां भृकुर्टि सहरति संहृत्य एवमपादीत् कः खलु भो एषः अप्रार्थितप्रार्थिकः दुरन्तप्रान्तलक्षणः, हीनपुण्यचातुर्दशा, ही थी परिवर्जितः यः खलु मम अस्या एतद्रूपाया दिव्यायाः, देवऋद्धयाः, दिव्यायाः देवधुतेः, दीपेन देवानुभावेन लब्धायाः प्राप्ताया अभिलमन्वागताया उपरि उत्सुकः भवने शरं निसृजतोति कृत्या सिंहासनादभ्युत्तिष्ठतीति, अभ्युत्थाय यत्रैव स नामाइताङ्कः शरस्तत्रै. वोच्छत उगमय तं नामाहा शरं गृति, नामाङ्कनुप्रधान पति नामाङ्कम तुपया. बयतोऽयम् एसपः आध्यात्मिक विन्तिः प्रार्थिनः मनोगतः सं हलः समुपद्यत उत्पन्नः बलु भो ! जम्बद्वीपे द्वोपे भरते बर्षे भरतो नाम राजा चातुरन्तचक्रवर्ती तत् जीतमेत् अतीत प्रत्युत्पन्नानागतानां मागधतीर्थकुमाराणां देवानां राज्ञाम् उपस्थानिकं कर्तुम् तत् गच्छामि खलु अहमपि भरतस्य राज्ञ उपस्थानिकं करोमि, इति कृत्वा एवं संप्रेक्षते ॥सू०६॥ टीका- "तएणं से" इत्यादि । 'तए णं से भरहे राया चाउग्घंटं आसरई दुरूढे समाणे' ततः खलु स भरतो राजा चतस्रो घण्टाः सन्ति अस्येति चातुर्घण्टः चतुघण्टायुक्तस्तम् अश्वरथं दुरूढे आरूढः सन् 'हयगयरहपवरजोहकलियाए सद्धिं संपरिखुडे' हयगजरथप्रवरयोधकलितया सार्द्ध संपरिवृतः, तत्र हयगजरथप्रवरयोधैः कलितया युक्तया टीकार्थ-'तएणं से भरहे राया चाउग्घंटं आसरह' इत्यादि सूत्र-६ टीकार्थ-(तएणं) इसके अनन्तर (से भरहे राया) वह भरतराजा (चाउग्घंटें आसरह) चार घण्टों से युक्त अश्वथ पर (दुरूढे समाणे) आसीन होकर (लवणसमुई ओगाहइ) लवण समुद्र में प्रवेश किया ऐसा यहां सम्बन्ध है । (हयगयरहपवाजोह कलियाए सद्धिं सं परिवुडे) उस समय उसके 'त पणं से भरहे राया चाउग्घटं आसरह' इत्यादि ॥ सूत्र-६॥ थ-(त पण ) त्या२ मा ( से भरहे राया) ते भरत २० (चाउग्घंटं आसरह) यारधामाथी युटत अ५२५ 3५२ (दुरूढे समाणे) मासान थईने (लवणसमुदं ओगाहइ) as समुद्रमा प्रविष्ट था. मेव। सो समय छे. (हयगयरहपवरजोहकलियाए सद्धि संपरिबुडे) ते समय तनी साथे सेना ता. ते सेनामा डय-धा, ४-डाथी, RamRMIRIYAARusam Page #601 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ• वक्षस्कारः सू० ६ स्नानादिनिव्रत्यनन्तरीय भरतका निरूपणम् ५८७ सेनया साध संपरिवृतः -संपरिवेष्टितः, तथा 'महया भडचडगरपहगरवंदपरिक्खित्ते' महाभटचडगरपहकरवृन्दपरिक्षिप्तः, तत्र महाभटानां संग्रामाभिलाषि महायोधानाम् 'चडगरत्ति' विस्तृताः विविधाः 'पहगरत्ति' समूहाः तेषां यद् वृन्दं तेन परिक्षिप्तः - परिकारितः 'चक्करयणदेसियमग्गे' चक्ररत्नदेशितमार्गः तत्र-चक्ररत्नेन देशितः प्रदशिंतो मार्गों यस्मै स तथा 'अणेगरायवरसहस्साणुयायमग्गे' अनेकराजवरसहस्रानुयातमार्गः, तत्र अनेकेषां राजवराणां मुकुटधारिराजानां सहस्रेरनुयातः अनुगतो मार्गःपृष्ठभागो यस्य स तथा 'महया उकिट्ट सीहणायबोलकलकलरवेणं पक्खुभिय महासमुदरबभूयं पिव करेमाणे २ पुरस्थिमदिसाभिमुहे मागहतित्थेणं लवणसमुदं ओगाहा' महता उत्कृष्ट सिंहनाद बोल कलकलरवेण प्रक्षुभित महासमुद्ररवभूतमिव कुर्वन् २ पौरस्त्यदिगभिमुखो मागधतीर्थेन लवणसमुद्रम् अवगाहते, तत्र-महता विशालेन उत्कृष्टिः आनन्दध्वनिः, सिहनादः प्रसिद्धः बोलः अव्यक्तध्वनिः, कलकलश्च तदितरो ध्वनिः तल्लक्षणो यो रबः शब्दः तेन प्रक्षुभितः महावायुवशात् उत्कल्लोलो यो महासमुद्रस्तस्य रवभूतमिव महासमुद्रशब्दमयमिव आकाशं कुर्वन् पूर्वदिगभिमुखो मागध नाम्ना तीर्थेन तीर्थेपाश्चभागेन लवणसमुद्रमवगाहते प्रविशति । कियत् अवगाहते इत्याह-'जाव से' साथ सेना थी उस सेना में अधिकसंख्यक हय-घोड़ा-गज-हाथी-रथ, और श्रेष्ठ योधा थे । इन सब से वह घिरा हुआ था (महया भड चडगर पहगरवंदपरिक्खित्ते) गहासंग्रामाभिलाषी योधाओं का परिकर उसके साथ२ चल रहा था (चक्करयणदेसियमग्गे) गन्तव्यस्थान का मार्ग उसे चकरत्न बतला जाता था (अणेगरायवरसहस्साणुयायमग्गे) अनेक मुकुटधारी हजारों श्रेष्ठराजा उसके पिछे २ चल रहे थे । (महया उक्किट्ठ सोहणाय बोल कलकलरवेणं पक्खुभिय महासमुदरवभूयं पिव करेमाणे२ पुरस्थिमदिसाभिमुहे मागहतित्थेणं लवणसमुदं ओगाहइ) उत्कृष्ट सिंहनाद के जैसे बोल के कल कल शब्द से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानों समुद्र अपनी कल्लोलमालामाँ से हो क्षुभित हो रहा है और यह उस क्षुभित हुए समुद्र का हो गर्जन शब्द है इसमें आकाश मंडल गुंज उठा था जब वह लवण समुद्र में प्रवेश करने जा रहा था तब वह पूर्व दिशा की २५ अने श्रेष्ठ योद्धामा खता. से सर्वथा ।वृत्त थयेटी त (महया भडवडगरपहगरवंदपरिक्खित्ते) मा सामाभितापी योद्धाओने। ५२४२ (समूह) तेनी साथ-साथ यासी २ह्यो ता. (चक्करयणदेसियमग्गे) गन्तव्य स्थानने। भागत ५४२त्न सतावत' हेतु (अणेगरायवरसहस्साणुयायमग्गे) मन भुयारी । श्रेष्ठ २। । तना पा पाछयादी २ह्या ता. (महया उक्किट्ट सीहणायबोलकलकलरवेणं पक्खुभियमहा समुद्दरवभूयं पिव करेमाणे २ पुरत्थिमदिसाभिमुहे मागहतित्थेणं लवणसमुदं ओगाहइ) ઉત્કૃષ્ટ સિંહનાદ જેવા અવાજના કલ-કલ શબ્દથી એવી પ્રતીતિ થઈ રહી હતી કે જાણે સમુદ્ર પોતાની કલૅલ, માળાઓથી શુભત ન થઈ રહ્યો હોય અને એ તે ક્ષુબ્ધ સમુદ્રની ગજેના જ શબ્દ છે. એથી આકાશ મંડળ ગુંજી રહ્યું હતું. જયારે તે લવણ સમુદ્રમાં પ્રવિષ્ટ થવા જઈ રહ્યો હતો ત્યારે તે પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને માગધ તીર્થમાં થઈને Page #602 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५८८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र इत्यादि । 'जाव से रहवरस्स कुप्परा उल्ला' यावत् तस्य रथवरस्य कूपरौ आद्रौं स्याताम्, तत्र-रश्वरस्य कूपाविव कूर्पगै कूपराकारत्वात् रथचक्रावयवौ आ भवेताम् 'तए णं से भरहे राया तुरगे निगिण्हई' ततः खलु स भरतो राजा तुरगान अश्वान् निगृह्णाति-स्थिरीकरोति 'निगिण्हित्ता' तुरगान् निगृह्य 'रहं ठवेइ' रथं स्थापयति 'ठवेत्ता स्थपयित्वा 'धणुं परामुसइ' धनुः परामृशति स्पृशति रहातीत्यर्थः 'तए णं' ततः खलु ततो-धनुः परामर्शानन्तरं खलु स नरपतिः इमानि वक्ष्यमाणानि वचनानि 'भाणीय त्ति' अभाणीत् इति सम्बन्धः किं कृत्वा इत्याह-धनुगृहीत्वा धनुश्च किमाकारक तत्राह- तत् धनुः 'अइरुग्गयवालचंदइंदधणुसंकासं' अचिरोद्गतबालचन्द्रेन्द्रधनुः संकाशम्, तत्र अचिरोद्गतः तत्कालोदितः यो बालचन्द्रः -शुक्लपक्ष द्वितीयांचन्द्रस्तेन ओर मुंह करके मागध तीर्थ से होकर लवण समुद्र में प्रविष्ट हुआ था । (जाव से रहवरस्स कुप्परा उल्ला) जब वह लवणसमुद्र में प्रविष्ट हुआ तो वह इतना ही गहरा वहां था कि उसके रथ के पहियों के अवयव ही गीले हो पाये (तएणं से भरहे राया तुरगे निगिण्हई) भरत राजा ने अपने रथ के घोड़ों को रोक दिया (निगिणित्ता रहं ठवेइ) घोड़ों के रुकते ही रथ भी खड़ा हो गया (ठवेत्ता धणुं परामुसइ) रथ के खड़े होते ही भरत महाराजा ने अपने धनुष को उठाया (एणं) इसके बाद उस भरत राजा ने इस प्रकार से कहा ऐसा यहां सम्बन्ध है । जिस धनुष को भरत राजा ने उठाया था उसकी विशेषता प्रकट करने के लिये सूत्रकार कहते हैं(अइरुग्गय बालचंद इंदधणुसंकासं दरियदप्पिय दढधणसिंगरइयप्तारं उरगवरपवरणवल पवर परपरहुयभमरकुलणीलणिद्धं ) उसका अकार अचिरोद्गत बालचन्द्र के जैसा एवं इन्द्र धनुष के जैसा था। यहां अचिरोद्गत बालचन्द्र से शुक्लपक्ष को द्वितीया का चन्द्र गृहीत हुआ है क्योंकि यहो पतला और विशेषरूप में वक्र धनुष के जैसा होता है। इसी तरह से वर्षाकाल के समय जो गगन में इन्द्रधनुष उद्गता हुआ दिखलाई देता है वह भी इन्द्रधनुष के जैसा ही साव समुद्रमा प्रविष्ट थये। 6. (जाव से रहवरस्स कुप्परा उल्ला) यारे a anty સમુદ્રમાં પ્રવિષ્ટ થયો ત્યારે તે આટલે જ. ઊંડે હતો કે તેનાથી તેના રથના ચક્રોના અવयो । साना था . (तपणं से भरहै राया तुरगे निगिण्हई) भरत शो पाताना रचना पास। २४ी हया. (निगिहित्ता रहं ठवेइ) घास। मया तथा २थ ५९ अमे२हो. (ठवेत्ता धणु परामुसइ) २५ मे २ह्यो : २४ भ२ २२ पोताना नुध्यने यु. (त एणं) त्या२ माह ते परत २० मा श्रम ४यु-मेव। सो स्थान સંબંધ છે. જે ધનુષને ભારતરાજાએ ઉઠાવ્યું હતું, તેના વિશેષતા પ્રકટ કરતા સૂત્રકાર छे-(अश्रुग्गयबालचंदईदधणुसंकासं दरियदप्पियढघणसिंपरइयमारं उरगवर पयरणवल पवर परपरहुय भमरकुलगीलणिद्ध) तेन या२ मशिगत माय । તેમજ ઈન્દ્રધનુષ જેવો હતો. અહ' અવિરદ્ ગત બ લચંદ્રથી શુકલ પક્ષની દ્વિતીયાનો ચંદ્રગૃહીત થયું છે. કેમકે એજ પાતળે અને વિશેષ રૂપમાં વક્ર ધનુષ જેવો હોય છે. આ પ્રમાણે વર્ષાકાળના સમયે જેમ ગગનમાં ઈન્દ્રધનુષ ઉદગત થતું જોવા માં આવે છે. તેમ ત Page #603 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० ६ स्नानादिनि व्रत्यनन्तरीय भरतकार्यनिरूपणम् ५८९ तथा इन्द्रधनुषा च अतिवक्रतया संकाशं-सदृशं यत्तत्तथा, पुनश्च 'परमहिसदरिय दविय दढघणसिंगरइअसारं' वरमहिप दृप्तदप्पितदृढघनशृङ्गतिदसारम्, तत्र दृप्तदर्पितः सञ्जातदतिशय यो वरमहिषः वाहद्विषोत्तमः तस्य दृढं निबिडपुग्दलानेष्पन्नम् अतएव घनंछिद्ररहितं यत् शृंगं रतिदं-रमणीयं तद्वत् सारं संश्रेष्ठं तत्सदृशसापरयुक्तमित्यर्थः पुनश्च कीदृशम् 'उरगवरपवरगवल वरपरहुयभमरकुलणीलिणिद्धधंतधोयपट्ट' उरगवरप्रवरगवलप्रवरपरभृतभ्रमरकुलनीलीस्निग्धध्मातधौतपृष्ठम्, तत्र -उरगवरो-भुजगश्रेष्ठः प्रवरगवलं प्रधानमहिषशृङ्गम्, प्रवरपरभृतः -श्रेष्ठकोकिलः, भ्रमरकुलं मधुकरसमूहः, नीली-गुलिका एतानीव स्निग्धं कालकान्तियुक्तं, ध्मातमिव ध्मातम्-तेजसा जाज्वल्यमानं धौतमिव धौत-निर्मलं पृष्ठं पृष्ठभागो यस्य तत्तथा 'णिउणोविय मिसि मिसिंतमणिरयणघंटियाजालपरिक्खित्तं निपुणौपित देदीप्यमानमणिरत्नघण्टिका जालपरिक्षिप्तम्, तत्र-निपुणेन-शिल्पिना ओपिताः उज्ज्वालिताः अतएव देवीप्यमानाः मणिरत्नघण्टिकाः तासां यज्जालं समूहः तेन परिक्षिप्तं वेष्टितं यत्तत्तथा, पुनश्च कीदृशम् 'तडित्तरुणकिरणतवणिज्जबद्धचिंध' तडित्तरुणकिरणतपनीयवद्धचिह्नम्, तत्र तडिदिव विद्युदिवतरुणाः नवीनाः किरणा यस्य तत्तथा, एवं विधस्य तपनीयस्य सुवर्णस्य सम्बन्धीनि तपनीयमयानीत्यर्थः बद्धानि चिह्नानि यत्र तत्तथा चाकचिक्ययुक्त नानाविधसुवर्णचिह्नयुक्तमित्यर्थः 'पुनश्च-दहरमलयगिरिसिहरकेसरचामरबालद्धचंद चिंधं' ददेर मलयगिरिवक्र होता है अतः धनुष की वक्रता प्रकट करने के लिये इन दोनों का साम्य यहां बतलाया गया है। तथा अहंकार से गीले हुए श्रेष्ठ महिष के निबिडपुद्गलो से निष्पन्न अतएव छिद्ररहित ऐसे रमणीय शृङ्ग के जैसे मजबूत एवं श्रेष्ठ नाग की प्रधान महिष शृङ्ग की श्रेष्ठ कोकिल की भ्रमर कुलको एवं नीली गुटिका की जैसी कालो कान्ति वाले (धंत धोयपटुं) तेज से जाज्वल्यमान, तथा निर्मल पृष्ट भाग बाले (णि उण विअभिसिमिसंत मणिरयणघंटियाजा परिक्खित्तं) निपुण शिलियों द्वारा उज्वालित की गई अतएव देदीप्यमान ऐसी मणिरत्न घंटिकाओं के समूह से वेष्टित (तडित्तरुणकिरणतवणिज्जबद्धचिंध) विजली के जैसो नवीन किरणों वाले सुवर्ण से निर्मित जिसमें चिन्ह हैं (ददर मलया रिसिहरकेसरचामरबालद्धचंदविंध) दईर પણ ઈન્દ્રધનુષ જે જ વક્ર હોય છે એથી ધનુષની વકતા પ્રકટ કરવા માટે એ બનેની સમાનતા. અહીં સ્પષ્ટ કરવામાં આવી છે. તેમજ અહંકારથી ગાવિત થયેલા શ્રેષ્ઠ મહિષના નિબિડ પુદગલોથી નિષ્પન્ન એથી છિદ્રરહિત એવા રમણીય કંગ જેવા સુદઢ અને શ્રેષ્ઠ નાગની પ્રધાન મહિષથંગની શ્રેષ્ઠ કોકિલની, ભ્રમર કુલની તેમજ નીલી ગુટિક જેવી કાળી तिवाणा (धत धोयपट) ते४ थी भयान, तथा निमल पृष्ठभागवाजा (णिउणोविअमिसिमिसतमणिरयणघंटियाजालपरिक्खित) (नपुण शिहि५। 3 Graleत ४२पामा मापी मेथी दायमान थेवी मशिन घटियाना समूडाथी त (तडित्त रुणकिरणतवणिज्जबद्धचिंधं ) विधुत नवीन. (७२014 सुथी निमतमा थिहोछे. (दहरमलयगिरिसिहरकेसरचामरबालद्धचंदचिंधं ) ४६२ मन मलयागरिंना Page #604 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५९० अम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे शिखर केसरचामरवालार्द्धचन्द्रचिह्नम्, तत्र दर्दरमलय नामकगिर्यो: - यानि शिखराणि तत्सम्बन्धिनो ये केसराः- तत्रत्य सिंहस्कन्धकेशाः चामरवाला:- चमरगोपुच्छकेशाः एते तथा अर्द्धचन्द्राश्च खण्डचन्द्रप्रतिविम्बानि चित्ररूपाणि एताशानि चिह्नानि यत्र तत्तथा, धनुषि सिंह केशरबन्धनं शौर्यातिशयख्यापनार्थ, चामरवालबन्धम् अर्धचन्द्र चित्रम् च शोभातिशय दर्शनार्थमिति विज्ञेयम्, पुनश्च 'कालहरियरत्तपीयमुक्किल्लब हुहारुणि संपिणद्धजीवं' कालहरितरक्तपीतशुक्ल - बहुस्नायुपिनद्धजीवम्, तत्र कालहरित रक्तपीतशुक्लवर्णाः याः बहवः स्नायवः शरीरान्तर्वर्तिनाडी विशेषाः ताभिः संपिनद्धावद्धा जीवा प्रत्यञ्चा यस्य तत्तथा 'जीबियंतकरणम्' जीवितान्तकरणं रिपूणां जीवननाशकम् 'चलजीवं' चलजीबम्, चला चञ्चला जीवा प्रत्यञ्चा यस्या तत्तथा एतादृशं पूर्वोक्ताने कविशेषणविशिष्टम् 'घणूं गहिऊण से णरवई उसुं च' स नरपतिः धनुः इषु वाणं च गृहीत्वा, पूर्वोक्तानि पदानि धनुषो विशेषणानि साम्प्रतं बाणविशेषणानि प्राह - ' वरवइरकोडियं' वरवज्रकोटिकम्, तत्र वरवज्रमय्यौ श्रेष्ठहीरकजfeat कोट्या उभयप्रान्तौ यस्य स तथा ताम् पुनश्च 'वइरसारतोंर्ड' वज्रसारतुण्डम् वज्रवत् सारम् अभेद्यत्वेन अभङ्गुरं तुण्डम् अग्रभागो यस्य स तथा तम्, पुनश्च कीशम् 'कंचणमणिकणगरयणधोइडसुकयपुंखं' काञ्चनमणिकनकरत्नधौ तेष्टसुकृतप्रुङ्खम्, तत्र - काञ्चनेति काञ्चनखचिताः मणयः कनकेति कनकखचितानि रत्नानि प्रदेश विशेषे यस्य सः तथा धौत इव धौतो निर्मलत्वात् इष्टो धानुष्काणामभिमतः सुकृतो निपुण शिल्पिना निमितः पुङ्खः पृष्ठभागो यस्य स तथा तम् 'अणेगमणिरयणविवि सुविरइयनामचिंधं' अनेकमणिरत्न विविध सुविरचितनामचिह्नम्, तत्र अनेकैः मणिरत्नैः विविधं - नानाप्रकारं सुविरचितं निर्मितं नामचिन्हं भरत चक्रिनामवर्णपक्तिरूपं यत्र स तथा तम् एतादृशविशेषणविशिष्टम् इषुं गृहीत्वा पुनः किं कृत्वा तत्राह और मलयगिरि के शिखर के सिंहस्कन्धकेश, चामर वाल चामर गोपुच्छ केश एवं अर्द्धचन्द्र ये जिसमें चिह्नरूप से बने हुए हैं । (काल हयिरत्तपीय सुकिल्ल बहुण्हारुणिसंपिणद्धजीवं) कालादिवर्णवाली स्नायुओं से जिसकी प्रत्यचा बँधी हुई है । (जीविअंतकरणं चलजीवं घं गहिऊण) जो शत्रुओं के जीवन का अन्त करने वाला है तथा जिसकी प्रत्यश्वा चंचल है ऐसे धनुष को हाथ में लेकर ( स णरवइ) उस भरत राजा ने (उसुंच वरवइरकोडिअं वहर सार - तोंडं, कं चणमणिकणगरयणघो इसुकयपुंखं अगमणिरयणविविध सुविर इयनामचिधं वइसाहं શિખરના સિદ્ધ સ્કન્ધ ચિકુર, ચામર-ખાલચખર, ગેાપુચિકર તેમજ અદ્ધ ચન્દ્ર એ थिन्डो मां थिन्ड ३पे छे. (कालहरियरत्तीय सुकिल्ल बहुण्हारुणि संप - णद्ध जीव) असाहि वर्ष युक्त स्नायुयोथी निर्मित मां प्रत्यया भाद्ध छे. ( जीवि अंतकरणं चलजीवं घणूं गहिऊण) ने शत्रु मारे अन्तर छेतेनी अत्य या यथण छे, शेव धनुषने हाथमां ने ( स णरवइ) ते भरत रान्नये (उसु चवरवरकोडिअं वहूर सारतोंड, कंचणमणिकणगरयणधोइड्ढलुकयपुंख अणेगमणिरयण Page #605 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० बक्षस्कारः सू० ६ स्नानादिनिवत्यनन्तरीय भरतकार्यनिरूपणम् ५९१ -'वइसाहं गईऊण ठाणं' वैशाख वैशाखनामकं स्थानं पादन्यासविशेषरूपं स्थित्वा कृत्वा, वैशाखस्थानकं पादौ विस्तारौ कार्यो, समहस्तप्रमाणतः वैशाखस्थानके वत्स ! कूट लक्ष्यस्य वेधने ॥१॥ इति । इयं पुत्रं प्रति पितुरुक्तिः। पुनरपि किं कृत्वा इत्याह -'आयतकण्णायतं च काऊण उपु मुदारं इमाइं वयणाई तत्य भाणीय से परवई' इति इषु मुदारं च उद्भटम् आयतकर्णायतम्, आयतं प्रयत्नयुक्तं यथा स्यात् तथा कर्णपर्यन्तम् आयतम् आकृष्टं कृत्वा तत्र इमानि वक्ष्यमाणानि वचनानि स नरपतिः अभाणीत् उक्तवान् 'हंदि सुणंतु भवंतो बाहिरो खलु सरस्स जे देवा' हन्दि इति संबोधने हे देवाः ! शृण्वन्तु भवन्तः शरस्य मत्प्रयुक्तस्य बाणस्य बहिस्तात् बहिर्भागे ये देवा अधिष्ठायकास्ते इत्यर्थः केच ते इत्याह-'णागासुरासुवण्णा तेसिं खु णमो पणि वयामि' नागा-नागकुमाराः, असुरा:-असुरकुमाराः, सुपर्णाः-सुपर्णकुमाराः तेभ्य: ठाईऊण ठाणं आयत कण्णायतंच काऊण उसुमुदारं) जिसकी दोनों कोटियां श्रेष्ठ वज्र की बनी हुइ है अभेद्य होने से मुख जिसका वज्र के जैसे सार वाला है-जिसके प्रदेश विशेष में चन्द्रकान्त आदि मणियां काश्चन से बद्ध हैं निर्मल होने से जिसका पृष्टभाग धोये के जैसा साफ है, धनुर्धारियों को जो अभिराम है । एवं निपुण शिल्पी द्वारा जो बनाया गया है ऐसे पृष्ट भाग वाले बाण को कि जिसमें अनेक मणियों एवं रत्नों के द्वारा नामरूपचिह्न अंकित किया गया है। पादन्यासविशेष में स्थित होकर धनुष पर चढाया और उसे कान तक बड़ी सावधानी के साथ खींचकर (इमाइं वयणाई तत्थ भाणीय) ऐसे वचन कहे । (हंदि ! सुणंतु भवंतो वाहिरो खलु सरस्स जे देवा) मेरे द्वारा प्रयुक्त क्षेत्र कि बहिर्भाग में रहे हुए जो अधिष्ठायक देव हैं वे सुनें (नागासुरा सुवण्णा तेसिं खु णमो पणिवयामि) मैं नागकुमार असुरकुमार सुवर्णविविहसुविरइय नामधिं वइसाहं ठाइ ऊण ठाणं आयत कण्णायतं च काऊण उसु मुद्रारं) नी मन्नटियो श्रे० १०बनी मनेसा छ भने बाथी भुमरेनु परे સાર સંપન છે. જેના પ્રદેશ વિશેષ માં ચંદ્રકાંત વગેરે મણિઓ કાચનથી બદ્ધ છે તેમજ કકેતનાદિ ૨ પણ જેમાં કાંચન થી બદ્ધ છે. નિર્મલ હોવાથી જેનો પૃષ્ઠ ભાગ પ્રક્ષાલિત કરવામાં આવ્યો હોય તે પ્રમાણે સ્વચ્છ છે, ધનુર્ધારી ઓના માટે જે અભિરામ રૂપે છે તેમજ નિપુણ શિપી વડે જે બનાવવામાં આવ્યું છે. એવા પૃષ્ઠ ભાગ વાળા બાણું ને કે જેમાં અનેક મણિઓ તેમજ તેને વડે નામ રૂપ ચિન્હ અંકિત કરવામાં આવેલ છે. પાદન્યાસ વિશેષમાં સ્થિત થઈને તે બાણને ધનુષ ઉપર ચઢાવ્યું અને કાન સુધી બહુજ सावधानी पू याने (इमाई वयणाई तत्थ भाणीय) 241 प्रमाणे वयना ४ai-(हंदि ! सुणंतु भवंतो वाहिरओ खलु सरस्स जे देवा) भा२।१३ प्रयुत क्षे। नाडिमा २७. ना२।२ यि ३ छ a सला . (णागासुरा सुवण्णा तेसिं खु णमो परिवयामि) (१) भरत चक्रवर्ती ऐसा नोम उसमें लिखा था (२) वैशाखनामकं पादौ सविस्तारो कार्यों समहस्त प्रमाणतः । वैशाखस्थानके वत्स ! कूटलक्ष्यस्य वेधने ॥१॥ (२) भरत यता' या प्रमाणे तमा नाम समेसु हेतु Page #606 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५९२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे खलु निश्चयेन नमोऽस्तु विभक्ति परिणामात् तान् प्रणिपतामि- नमस्करोमि । यद्यपि नम इति पदेनैव नमस्कारस्य गतार्थता स्यात्तथापि 'प्रणिपतामि' इति पुनरुक्तिर्भरतचक्रिणो भक्तयतिशयख्यापनाय अनेन शरप्रयोगाय साहाय्यकारकाणां बहिर्भागवासिनां देवानां सम्बोधनमुक्त्वा अथाभ्यंतर भागवर्त्ति देवान् सम्बोधयितुमाह- 'हंदि सुतु भवंतो अभितर सरस्स जे देव। । णागा सुरा सुवण्णा सवे मे ते विसयवासी ॥ २ ॥ 'हंदि' इति सम्बोधने हे देवाः ! शृण्वन्तु भवन्तोऽभ्यन्तरतः आभ्यन्तराः शरस्य ये देवा नागा अमुराः सुपर्णाः सर्वे ते मे मम विषयवासिन:- मम देशवासिनः तान् प्रणिप तामीति सम्बन्धः । तथा च सर्वे एते देवा मदाज्ञा वशंवदत्वेन मत्प्रयुक्तस्य शरप्रयोगस्य सर्वथा सहायकत्वेन स्थास्यन्तीति बुद्धया नमस्करणम् । यद्यपि एते देवा राज्ञ कुमार इन सबके लिये नमस्कार करता हूँ यद्यपि यहां पर प्रयुक्त नमः शब्द से ही नमस्कार करने की बात आ जाती है, परन्तु फिर भी जो " पणिवयामि " शब्द का प्रयोग किया है । वह भरत चक्री की भक्ति की अतिशयता ख्यापन करने के लिये किया गया है। इस तरह सर प्रयोग के लिये साहाय्य करने वाले बहिर्भाग वासी देवों को संबोधित करके अब वह आभ्यन्तर वर्ती देवों का संबोधन करता है- (हंदि सुणंतु भवंतो अभितरओ सरस्स जे देवा - णागासुरा सुवण्णा सव्वे मेते विसयवासी ||२|| - यहां “हंदि" पद सम्बोधन में प्रयुक्त हुआ है । मेरे में रहनेत्राले जो नागकुमार, असुरकुमार, सुवर्णकुमार नाम के देव हैं - वे सब सुनें - मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ । यहां जो चक्रवर्ती ने ऐसा कहा है उसका अभिप्राय ऐसा है कि ये सब देव मेरी आज्ञा के वशवर्ती होने के कारण मेरे द्वारा छोड़े गये बाण के सब प्रकार से सहायक होंगे हो इस कारण मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ । यद्यपि कोई ऐसी आशंका यहां करे कि जब ये देव राजा के आधिन होने रूप से निर्धारित हैं तो फिर उन्हें नमस्कार करना उसका अनुचित है | હું નાગકુમાર, અસુર કુમાર, સુવર્ણ કુમાર એ સવ માટે નમસ્કાર કરું છુ. જો કે અહી प्रयुक्त 'नमः' शी नमस्र खानी बात भावी लय छे पछतां "पणिवयामि" शो प्रयोग वा आवे छे ते भरत राहीनी लतिनी अतिशयता या પન કરવા માટે કહેવામાં આવેલ છે. આ પ્રમાણે માણુ પ્રયેગમાં સહાયભૂત થનારા અદ્ધિભાંગવાસી દેવાને સએ!ધિત કરીને હવે તે આભ્ય ંતરવતી દેશને સોધન કરે છે. (हंदि तु भवतो भितरओ सरस्त जे देवा-जागासुरा सुवण्णा सव्वे भंते विलय - वासी ॥ २ ॥ मड़ी "हंदि" यह संभोधन माटे प्रयुक्त थयेस छे. भारा દેશમાં રહેનારા ने नागकुमार, असुरकुमार, सुत्र कुमार नाम व छे, तेथे सर्वे सांगणा-हुते મને સને નમસ્કાર કરૂ છું મહીં જે ચક્રવર્તી એ આ પ્રમાણે કહ્યુ` છે. તેને અભિપ્રાય આ પ્રમાણે છે કે એ સર્વે દેવે મારી આજ્ઞા મુજબ ચ!લનારા છે. તેથી મારાવડે છેડવામાં આવેલ ખણુને સવ રીતે સહાયભૂત થશે જ. એથી હું તેમને નમસ્કાર કરૂં છું જો કે આડો કોઈ એવી આશંકા કરી શકે તેમ છે કે જયારે એ દેવે રાજાને આપીને Page #607 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीकातृ वक्षस्कारः सू० ६ स्नानादिनिवत्यनन्तरीयभरतकार्यनिरूपणम् ५९३ आज्ञा वशंवदत्वेन निर्धारिता स्तर्हि तस्य नमस्कारोऽनुपपन्नः इति नोद्भावनीयम्. क्षत्रियाणां शस्त्रस्य नमस्कार्यत्वे व्यवहारदर्शनात् चक्ररत्नस्येव. तेन तदधिष्ठातूणामपि स्वाभिमत कार्यसाधकत्वेन नमस्कारस्येष्टत्वात् 'इति क उसुं णिसिरइत्ति' इति कृत्वा-निवेद्य इपुं-बाणं निसृजति मुञ्चति । भरतस्यैतत्प्रस्ताववर्णनाय गाथा द्वयमाह परिगरणि रियमझो वाउद्धय सोभमाणकोसेज्जो।। चित्तेण सोभए धणुवरेण इंदोव्व पच्चक्खं ॥३॥ तं चंचलायमाणं पंचमि चंदोवमं महाचावं ।। छज्जइ वामे हत्थे णरवइणो तंमि विजयंमि ॥४॥ छाया- परिकरनिगडितमध्यो वातोद्धतशोभमानकौशेयः । चित्रेण धनुर्वरेण शोभते इन्द्र इव प्रत्यक्षम् । ३। तं चञ्चलायमानं पश्चमी चन्द्रोपमं महाचापम् । राजते वामे हस्ते नरपतेस्तस्मिन् विजये । ४ । तत्र परिकरण-मल्लकच्छबन्धेन युद्धोचितवस्त्रबन्धविशेषेण, निगडितं-सुबद्धं मध्यं-मध्यभागः कटिभागो यस्य स तथा सो यह शंका ठीक नहीं हैं क्योंकि चक्ररत्न की तरह जब क्षत्रियों को शस्त्र नमस्कार्य हैं तो जो उनके अधिष्ठायक देव हैं उन्हे राजा नमन करे इसमें कोई अनुचित बात नहीं है । कारण कि वे भी राजा के अभिमत कार्य में साधक होते हैं । (इति कटु इसु निसिरइत्ति) ऐसा कहकर उसने बाण को छोड़ दिया । भरत के इसी प्रस्ताव को वर्णन करने के लिये ये दो गाथाएँ कही गई हैं परिगरणिगरियमझो वाउ यसोभमाणकोसेज्जो । चित्तेण सोभए धणुवरेण इंदोव्व पच्चक्खं ॥१॥ तं चंचलायमाणं पंचमि चंदोवर्म महाचावं । छज्जइ वामे हत्थे परवइणो तंमि विजयंमि ॥२॥ जिस प्रकार आखाडे में उतरते समय पहिलवान अपनो कांछ को बांधलेता है उसी प्रकार मागधतीर्थेश के साधने के लिये धनुष पर बाण चढा कर छोड़ने के समय उस भरत राजा ने છે જ તે પછી તેમને નમસ્કાર કરવા ઉચિત કહેવાય નહિ. તે આ શંકા બરાબર નથી કેમ કે ચક્રરત્ન ની જેમ જયારે ક્ષત્રિઓને શસ્ત્ર નમસ્કાર્ય છે તે તેમના અધિષ્ઠાયક દેવ છે, તેમને રાજ નમન કરે તેમાં કેઈિ અનુચિત વાત નથી કારણ કે તેઓ પણ રાજાના भलिभत भां स य छे. (इति कटूटु इसु निसरइत्ति) मा प्रमाणे ४हीन ते मार છેડી દીધું. ભરતના એ પ્રસ્તાવને સ્પષ્ટ કરવા માટે આ બને ગાથાઓ કહેવામાં આવી છે परिगरणिगरियमझो वाउद्घय सोभमाणकोसेज्जो । चित्तण सोभए धणुवरेण इंदोव्व पच्चक्खं ॥१॥ तं चंचलायमाणं पंचमि चंदोवम महाचा । छज्जइ वामे हत्थे णरवइणो तमि विजयंमि ॥२॥ જે પ્રમાણે અખાડામાં ઉતરતી વખતે પહેલવાન કછેટે બાંધે છે, તેમજ માગધ તીથે શને સાધવા માટે ધનુષ ઉપર બાણુ ચઢાવીને છેડતી વખતે તે ભરત રાજાએ પણુ પિતા Page #608 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५९४ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे वातेन-प्रस्तावात् समुद्रपवनेन उद्भूतम्-उत्क्षिप्तं शोभमानं कौशेयं-वस्त्रविशेषो यस्य स तथा, चित्रेण धनुर्वरेणं शोभते 'स भरतः' इन्द्र इव प्रत्यक्षम् साक्षात् तत्प्रागुक्त स्वरूपं महोचापं चञ्चलायमानं सौदामिनीयमानम्, आरोपित गुणत्वेन पञ्चमीचन्द्रोपमम्, पञ्चमीचन्द्र उपमा यत्र तम् 'छज्जई' राजते प्रकाशते, कुत्र इत्याह -वाम हस्ते नरपते श्चक्रिणो भरतस्य तस्मिन् विनये मागधतीर्थेश साधनरूपो । 'तए णं से सरे भरहेणं रण्णा णिसिटे समाणे खिप्पामेव दुवालसजोयणाई गंता मागहतित्थाहिवइस्स देवस्स भवर्णसि निवइए' ततः खलु स शरी भरतेन राज्ञा निसृष्टः सन् क्षिप्रमेव द्वादशयोजनानि गत्वा मागधतीर्थाधिपतेः देवस्य भवने निपतितः 'तए णं से मागहतित्थाहिवई देवे भवणंसि सरं णिवइयं पासइ' ततः खलु स मागधतीर्थाधिपतिः देवो भवने स्वकीय स्थाने शरं निपतितं पश्यति 'पासित्ता' दृष्ट्वा आसुरत्ते' आशु शीघ्रं रक्तः क्रोधोदयाद् स्फुरितकोपानल: 'रुटे चंडिक्किए' रुष्टः- उदितक्रोधः चाण्डिभी अपनी धोती को कांछ को बांध लिया था इससे उसके शरीर का मध्य भाग कटि भाग सुदृढ बन्धन से बद्ध हो जाने के कारण बहुत मजबूत हो गया था अथवा - युद्धोचित वस्त्र बन्धन विशेष से उसका मध्यभाग कटिभाग बँधा हुआ था इसने जो कौशेय वस्त्र विशेष पहिर रखा था वह समुद्र के पवन से धीरे२ उस समय हिल रहा था अतः वाम हाथ में धनुष लिये हुए वह भरत राजा प्रत्यक्ष इन्द्र के जैसा प्रतीत हो रहा था। तथा वाम हाथ में जो पूर्वोक्तरूप से वर्णित धनुष था वह विजली की तरह चमक रहा था- एवं शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के चन्द्र जैसा प्रतीत हो रहा था. (तएणं से सरे भरहेण रण्णा णिसिटे समाणे विप्पामेव दुवालसजोयणाइं गंता भोगहतित्थाहिवइस्स देवस्त भवणंसि निवइए ) जब भरत राजा ने वह बाण छोड़ा तो छूटते ही १२ योजन तक जाकर मागधतोर्थ के अधिपति देव के भवन में पड़ा । (तएणं से मागइतित्थाहिवई भवणंसि सरं निवइयं पासइ) उस मागधतीर्थाधिपति देव ने ज्योंही अपने भवन में गिरेहुरु बाण को देखा तो ( दृष्ट्वा )देखकर ( आसुरत्ते रुठे चंडक्किए कुविए मिसमिसेमाणेति) वह क्रोध से ની છેતીની કાંછને બાંધી લીધી. એથી તેના શરીરને મધ્યભાગ એટલે કે કટિભાગ સુદ બન્ધનથી આબદ્ધ થઈ જવા બદલ બહુજ મજબૂત થઈ ગયે અથવા યુદ્ધોચિત વસ્ત્ર અન્યન વિશેષથી તેને મધ્યભાગ કટિભાગ આબદ્ધ હતો. એણે જે કશેય વસ્ત્ર વિશેષ ધારણ કરેલું હતું, તે સમુદ્રના પવનથી ધીમે-ધીમે તે વખતે હાલી રહ્યું હતું એથી ડાબા હાથમાં ધનુષ ધારણ કરેલ તે ભરત રાજા પ્રત્યક્ષ ઈન્દ્ર જેવું લાગતું હતું. તથા વામ હસ્તમાં જે પૂર્વોક્ત રૂપમાં વર્ણિત ધનુષ હતું તે વિદ્યુત ની જેમ ચમકી રહ્યું હતું તેમજ शुसपक्षनी पंचमी तिथिन। यदमागतुतु, (तएणं से सरे भरहेण रण्णा णिसिटे समाणे खिप्पामेव दुवालसजोयणाई गंता मागहतित्थाहिवइस्स देवस्स भवणंसि निवइए) यारे भरत शनये साथ छ। युतायता १२ योन सुधी४२ भाष ताथाना मधिपति विना भवनमा ५.यु. (तपणं से मागहतित्थाहिवई भवसि सरं यं पासइ) ते भाग तीर्थाधिपति देव यारे पोताना भवनमा ५डेडं माने तो Page #609 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू०६ स्नानादिनिवत्यनन्तरीयभरतकार्यनिरूपणम् ५१५ क्यितः-सञ्जातचाण्डिक्यः अतिक्रोधयुक्त इत्यर्थः, 'कुविए' कुपितः-प्रवृद्ध क्रोधोदयः 'मिसिमिसेमाणे त्ति' कोपाग्निना दीप्यमान इव दन्तरोष्ठं दशन् मिसमिसशन्द कुर्वाण इत्यर्थः 'तिवलियं भिउडि पिडाले साहरइ' त्रिवलिकां तिस्रो वलयः प्रकृष्ट क्रोधोदितललाटरेखा रूपा यस्यां सा तथा तां तथाविधां भृकुर्टि संहरति निवेशयति आकर्षयतीत्यर्थः 'संहरित्ता' संहृत्य ‘एवं वयासी' एवमवादीत् उक्तवान् 'केस णं' इत्यादि 'केस णं' भो एस अपत्थियपत्थए दुरंतपंतलक्खणे होणपुण्णचाउद्दसे हिरिसिरि. परिवज्जिए जेणं मम इमाए एयाणुरूवाए दिव्वाए देविड्ढीए दिव्वाए देवजुईए दिव्वेणं दिव्वाणुभावेणं लद्धाए पत्ताए अभिसमण्णागयाए उपि अपपुस्सुए भवणंसि सरं णिसिरइत्ति का सीहासणाओ अब्भुढेइ' कः खलु भो एष: अप्रार्थितप्रार्थकः दुरन्तप्रान्तलक्षणः हीनपुण्णचातुर्दशः ही श्री परिवजितः यः खलु मम अस्या एतद्पायाः दिव्यायाः देवऋद्धयाः दिव्याया देवधुतेः दिव्येन देवानुभावेन लब्धायाः प्राप्ताया अभिसमन्वागताया उपरि आत्मना उत्सुकः भवने शरं निसृजतीति कृत्वा रक्त-आग-बबूला हो गया-क्रोध के उदय से जग गई है क्रोध रूपी अग्नि जिसकी ऐसा बन गया-जिसने यह वाण फेंका है उसके ऊपर व गुस्सेमें भर गया -अत एव उसके रूपमें रौद्रभाव झलकने लग गया और उदित क्रोध के वशवर्ती होकर वह दांतों से अपने होठों को डसता हुआ मिसमिसाने लग गया (तिवलिय भिउडिं णिडाले साहरइ) उसी समय उसकी भ्रकुटि त्रिवाल युक्त होकर ललाट पर चढ गई - टेडी हो गई ( संहरित्ता एवं वयासो) भृकुटि ललाट पर चढाकर वह फिर ऐसा सोचने लगा ( केसणं भो एस अपस्थियपत्थए दुरंतपतलक्षणे होणपुण्णचाउद्दसे हिरिसिरिपरिवज्जिए जेणं मम इमाए एयाणुरूवाए दिवाए देविद्धोए दिव्याए देवजुईए दिवेणं देवाणुभावेणं लद्वाए पत्ताए अभिसमण्णागपाए उप्पि अप्पुस्सुए भवणंसि सरंणितिरइत्ति कटु सीहासणाओ अब्भुटेइ) अरे ! ऐसा यह- कौन अप्रार्थित प्रार्थी-मरण का अभिलाषो हुआ है - अर्थात् ऐसा कौन है जो मेरे साथ युद्ध का अभिलाषी होकर अपनी अकाल (दृष्ट्वाधने (आसुरत्तेरुठे चंडक्किए कुविए मिसमिसे माणेति) ते अधथी २४त २४ गया. ક્રોધના ઉદયથી ક્રોધ રૂપી અગ્નિ જેમાં પ્રકટ થયા છે. એવે તે થઈ ગયે. જેણે આ બાણ ફેંકયું તેની ઉપર તે ક્રોધાવિષ્ટ થઈ ગયો. એથી તેના રૂપમાં રૌદ્રભાવ ઝળકવા લાગ્યો અને કોધવશવતી થઇને તે દાંત પીસવા લાગ્યા અને હોઠ કરડવા લાગે (તિe૪ નવ णिडाले साहरइ) ते मत ना भूटिविनास युत थ 8 साट ५२ २ढी - १: 20 मई (संहरित्ता एवं घयासी) मृकुटि सट ५२ यढावीन तो मा प्रभावी वियार ध्या. (केस ण भो एस अपत्थियपत्थए दुरंतपंतलक्खणे हीणपुण्णचाउदसे हिरिसिरिपरिवज्जिए जे ण मम इमाए एयाणुरूवाप दिव्वाए देविद्धीए दिव्वाप देवजुईए दिवेणं देवाणुभावेणं लद्धाए पत्ताए अभिसमण्णागयाए उप्पिं अपुस्सुए भवणंसि सरं णिसिरइत्ति कटु सीहासणाओ अब्भुढेइ) अरे ! अस माथित प्राथी'મરણાભિલાષી થયો છે. એટલે કે એ કેણ છે કે જે મારી સાથે યુદ્ધ કરવા તૈયાર થયે Page #610 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सिंहासनादभ्युत्तिष्ठति इति, तत्र कः खलु अनिदिष्टनामकः भो इति सम्बोधने देवानां मध्ये एष:-बाणप्रयोक्ताः, अप्रार्थितप्रार्थक इति, अप्रार्थितम्-अमनोरथगोचरीकृतम् प्रस्तावात् मरणं तस्य प्रार्थकोऽभिलाषी, यो मया सह युयुत्सुः स मरणमभिवाञ्छतीतिभावः, दुरन्तप्रान्तलक्षण इति तत्र दुरन्तानि दुष्टावसानानि प्रान्तानि -तुच्छानि लक्षणानि यस्य स तथा अशुभलक्षण सम्पन्न इत्यर्थः हीनपुण्यचातुर्दश इति, हीनायां पुण्यचतुर्दश्यां जातो हीनपुण्यचातुर्दशः कृष्णचतुर्दशी जात इत्यर्थः, ही श्री परिवर्जित इति, हिया-लज्जया श्रिया शोभया च परिवर्जितः-रहितः यः खलु मम अस्याः प्रत्यक्षानुभूयमानायाः दिव्यायाः प्रधानायाः देवाः देवानाम् मृद्धिः धनरत्नादिसम्मत् देवद्धिः तस्याः, दिव्याया देवधुतेरिति, देवानां द्युतिदें। वधतिः-देवशरोराभरणादिसम्पत् तस्याः तथा दिव्येन देवानुभावेन देवभवप्रभावेण लब्धाया:-जन्मान्तरोपाजितपुण्येन स्वायत्तीप्राप्तायाः-अधुनोपस्थिताया अभिसमन्धागतायाः भोग्यत्वेन अधीनया उपरि अल्पोत्सुकः प्राणत्राणोत्साहवर्जितः, यो मम भवने शरं निसृजति बाणं प्रक्षिपति इति कृत्वा इत्युक्त्वा सिंहासनादभ्युत्तिष्ठति (अब्भुद्वित्ता) अभ्युत्थाय (जेणेव से णामायके सरे तेणेव उवागच्छइ) यत्रैव नामामृत्यु का बुला रहा है मेरी समझमें वह कुलक्षगो है अशुभ लक्षणो वाला है होन पुण्य चातुर्दश है हीन - पुण्यवाली चतुर्दशो में - कृष्ण चतुर्दशी के दिन – उसका - जन्म हुआ है तथा वह श्रो हो से रहित है कि जिसने मेरो इस प्रत्यक्ष में अनुभूयमान प्रधान देवर्द्धि - धनरत्नादिरूप सम्पत्ति के ऊपर देवद्युति के ऊपर – देव शरीर, आभरणादि की कान्ति के ऊपर जो कि मैंने दिव्य देवानुभावसे-जन्मान्तरोपार्जित पुण्य से अपने अधीन की है तथा जिसके भोगने का मुझे ही अधिकार है बाण का वार किया है-ज्ञात होता है वह अल्पोत्सुक है-प्राण त्राण के उत्साह से वर्जित हो चुका है-नहीं तो उसे मेरे भवन में बाण छोड़ने का क्या अधिकार था ऐसा सोच कर वह शीघ्र ही सिंहासन से उठ बैठा (अभुद्वित्ता जेणेव से णामायके सरे तेणेव उवाग छई) और उठ कर वह जहां पर वह नामाङ्कित बाण पड़ा हुआ था वहां पर आया-(उवागછે. અને પિતાના અકાલ મૃત્યુને બોલાવી રહ્યો છે. મને લાગે છે કે તે કુલક્ષણ છે, એથભ લક્ષણે વાળે છે, હીનyય ચાતુર્દશ છે.-હીન પુણ્યવાળી ચતુર્દશીમાં કૃષ્ણ ચતુર્દશીના દિવસે તેનો જન્મ થયો છે. તેમજ તે શ્રી-ઢી થી રહિત છે. કેમકે તેને મારી આ પ્રત્યક્ષમાં અનુભૂયમાન પ્રધાન દેવદ્ધિ-ધનર-નાદિરૂપ સમ્પત્તિ ઉપર–દેવ શુતિ ઉપર–દેવ શરીર, આભરણદિની કાંતિ ઉપર કે જે મેં દિવ્ય દેવાનુભાવથી જન્માનપાત પ્રબળ પુણ્યથી સ્વાધીન બનાવી છે તેમજ જેને ભેગવવા ને અધિકાર મને જ પ્રાપ્ત થયેલ છે-બાણ પ્રહાર કર્યો છે. મને લાગે છે કે તે અપસુક છે, પ્રાણત્રાણના ઉત્સાહથી વજિત થઈ ચૂક છે, નહીંતર તે મારી ઉપર બાણ છોડવાનું સાહસ જ કેવી રીતે કરી શકે ? આ प्रभारी विया२ शन a Ra (सासन 6५२थी 6 5 गये. (अब्भुद्वित्ता जेणेव णामाहंके सरे तेणेव उवागच्छइ) मन मे थ ल्यो त नमति मा ५९ Page #611 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ• वक्षस्कारः सू० ६ स्नानादिनिव्रत्यनन्तरोय भरतकार्यनिरूपणम् ५९७ हताङ्कः नामाङ्कितः शरः तत्रैवोपागच्छति, तत्र नामरूपोऽहतः-अखण्डितः अङ्कःचिन्हं यत्र स तथा नामाङ्कित इत्यर्थः (उवागच्छित्ता) उपागत्य (तं णामाहयंक सरं गेण्हइ) तं नामाहताङ्क शरं गृह्णाति (णामंकं अणुप्पवाएइ) नामाङ्कम् अनुप्रवाचयति वर्णानुपूर्वोक्रमेण पठति (णामकं अणुप्पवाएमाणस्स इमे एयारूवे अज्झथिए चिंतीए पत्थिए कप्पिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था) नामाङ्कम् अनुप्रवाचयतोऽयं वक्ष्यमाण एतद्पो वक्ष्यमाणस्वरूप आध्यात्मिकः चिन्तितः प्राथितः कल्पितः मनोगतः संकल्पः समुदपद्यत, तत्र आत्मनि अधि अध्यात्म तत्र भवः आध्यात्मिकः आत्मविषय इत्यर्थः अङ्कुरइव चिन्तित इति, संकल्पश्च द्विधा ध्यानात्मकः चिन्तात्मकश्च तत्राद्यः स्थिराध्यवसायलक्षणः, द्वितीयश्चलाध्यवसायलक्षणः, अस्मिन् पक्षे चिन्तितः-चिन्तात्मकः चेतसोऽनवस्थितत्वात् प्रार्थितः-प्रार्थनाविषयः अयं मे मनोरथः फलवान् भूयादित्यभिलापात्मक इत्यर्थः पुष्पित इव कल्पितः = स एवं च्छित्ता तं णामाहयंक सरं पगेण्हइ ) वहां आकर के उसने उस नामाङ्कित बाण को अपने हाथ में उठा लिया । (णामकं अणुप्पवाएइ) और नाम के अक्षरों को वाचा ( णामक अगुप्पवाएमाणस्स इमेण्याचे अज्झस्थिर पत्थिर मगागर संकरपे समुपजत्था ) नामांकित अक्षरों को वाचते हुए उसे ऐसा वक्ष्यमाण स्वरूप वाला आध्यात्मिक, चिन्तित, प्रार्थित, कल्पित, मनोगत, संकल्प उत्पन्न हुआ। वह संकल्प आत्मा में उत्पन्न हुआ इसलिये उसे आध्यात्मिक कहा है चिन्ता युक्त होने से वह चिन्तित था । संकल्प दो प्रकार का होता है-एक ध्यानात्मक और दूसरा चिन्तात्मक । इनमें पहिला स्थिर अव्यवसायरूप होता है। क्यों को यह तथाविध दृढ संहननादिगुण वालों के होता है, दूसरा चलाध्यवसाय रूप होता है। और यह तथाविध दृढ़संहननादि गुणवालों से भिन्न जीवों के होता है उनमें से यह संकल्प चित्त की अनवस्थितिरूप होने से चिन्तित था ऐसा संकल्प अनभिलाषात्मक भी हो सकता है । इसके लिये कहा गया है कि नहीं यह उसका संकल्प प्रार्थित था अभिलाषा जन्य था अर्थात् यह मेरा संकल्प फग्राही होगा डत त्यां गया. (उवागच्छिता तं णामाहयक सरं गेहइ) isतत नामांतिने पोताना हायमांदी (णामक अगुपचापह) सने नामता २५५२। पांच्या, (णामंक अणुप्पवाएमा गस्त इमे एपारूवे अज्झस्थिए पत्थिर मणोगए संकप्पे समुपज्जित्था) નામાંકિત અક્ષરો વાંચીને તેને એ વફ્ટમાણું સ્વરૂપ વાળે આધ્યાત્મિક ચિંતિત, પ્રાથિત કહિપત, મને ગત સંક૯પ ઉપન થયા. તે સંક૯૫ આત્મામાં ઉતપન થયા એ આધ્યાત્મિક કહેવામાં આવ્યો છે. ચિત્તાયુક્ત હવા બદલ તે ચિંતિન્ હતું. સંક૯૫ બે પ્રકારના હોય છે-એક દવાનામક અને બીજે ચિન્તામક એમાં પ્રથમ સ્થિર અધ્યવસાય રૂપ હોય છે કેમકે એ તથાવિધ દઢ સંહનાનાદિ ગુણવાળાઓને થાય છે. બી જે સંક૯૫ ચલાધ્યવસાય રૂપ હોય છે અને તે તથાવિધ દઢ સંહનાનાદિ ગુણવાળાઓથી ભિન્ન જીવે ને હેાય છે, તેમનામાં આ સંકલપ ચિત્તની અનવસ્થિતિ રૂપ હેવા બદલ ચિંતિત હતે. એવો સંકલપ અનભિલાષામક પણ થઈ શકે એથી કહેવામાં આવેલ છે કે આ સંકલપ meanemone Page #612 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे व्यवस्थायुक्तः सर्वथा राजयोग्यापहारप्रदानेन मया राजा सत्कार्यः इति कार्याकारण बिचारः द्विपत्रित इव मनोगतः न बहिर्वचनेन प्रकाशितः एवंविधः संकल्पः समुदपद्यत, तमेवाह-(उप्पण्णे खलु भो) उत्पन्नः खलु निश्चयेन भो इत्यामन्त्रणे (जंबुहोवे दीवे भरहे णामं राया चाउरंत चक्काट्टो) जम्बूद्वीपे द्वोपे भरते वर्षे भरतो नाम राजा चातुरन्तचक्रवत्तों (तं जीयमेयं तीय पच्चुप्पण्णमणागयाणं मागहतित्थ. कुमाराणं देवाणं राईगमुवत्थाणीयं करेत्तए) तत् तस्माज्जीतमेतत् अतीतप्रत्युत्पन्नानागतानां मागधतीर्थकुमाराणाम्, मागधतीर्थस्य अधिपतयः कुमाराः मागधतीर्थकुमाराः तेषां तनामकानां राज्ञां नरदेवानाम् उपस्थानिक प्राभृतं कर्तुम् (तं गच्छामि णं अहं पि भरहस्स रण्णो उवत्थाणीयं करेमि त्तिकट्टु एवं संपेहेइ) तत् गच्छामि खलु अहमपि भरतस्य राज्ञश्चक्रिण उपस्थानिकं करोमि इति कृत्वा इति मनसि विचिन्त्य एवं वक्ष्यमाणं निजऋद्धिसारं संप्रेक्षते पर्यालोचयति ॥सू० ६॥ ततः किं करोति इत्याह- "संपेहेत्ता" इत्यादि। मूलम्-संपेहेत्ता हारं मउडं कुंडलाणि य कडगाणि य तुडियाणि य वत्थाणि य आभरणानि य सरं च णामाहयंकं मागहतित्थोदगं च गेण्हइ ऐसा अभिलाषा वाला था तथा उसने इसे अभी तक मन में ही रखा था बाहिर किसी को वचन द्वारा नहीं कहा था-इसलिये वह मनोगत था (उप्पण्णे खलु भो जंबुद्दोवे दीवे भरहे णामं राया चाउरंतचक्कवट्टी) ओह ! जम्बूद्वीप में भरत क्षेत्र में चा रन्त चक्रवर्ती भरत नाम का राजा उत्पन्न हुआ है-(तं जीयमेयं तीयपच्चुप्पण्णमणागयाणं मागहतित्थकुमाराणं देवाणं राईणमुव स्थाणीयं करेत्तए) अतः अतीत प्रत्युत्पन्न मागध तोर्थ के अधिपति कुमारों का यह जीत-परम्परागत व्यवहार-है कि वे उसे नजराना-भेट-उपस्थित करें-(तं गच्छामि अहंपि भरहस्त रणो उवत्थाणीयं करेमित्ति कटु एवं संपेहेइ) तो अब मैं चल और चढ़कर भरत राजा को नजराना उपस्थित करूँ इस प्रकार से विचार करके फिर उसने नजराना प्रदान करने के योग्य वस्तुओं के सम्बन्ध में विचार किया- ॥६॥ તેને પ્રાથિત હતા અને તે અભિલાષાજન્ય હતે એટલે કે એ મારે સંકલપ ફલગ્રાહી થશે એવી અભિલાષા યુક્ત હતે. તેમજ તેણે અત્યાર સુધી તેને પિતાના મનમાં જ રાખ્યો डतो. पानी पासे ५५ वयन द्वारा प्राट नडता, मेथी ते मनोगत ता. (उप्पण्णे खलु भो जंबुद्दोवे दीवे भरहे णामं राया चाउरतवकवट्टो) मोह ! यूद्वीपमा सरत क्षेत्रमा यातुरन्त यता' भरत नामे स पन्न थये। छे (तं जीयमेयं तीयपच्चुप्पण्णमणागयाणं मागहतित्थकुमाराणं देवाणं राईण उवत्थाणीयं करेत्तए) मेथी - તીત પ્રત્યુત્પન્ન માગધ તીર્થના અધિપતિ કુમારોને આ જીત-પરંપરાગત વ્યવહાર–છે કે तयातन न (लेट) रे. (तं गच्छामि अहंपि भरहस्स रण्णो उवत्थाणीयं करेमि. त्ति कटूटु एवं संपेहेइ) तो वहु भने ४७ने सरत ने नसरा उपस्थित કરૂં આ પ્રમાણે વિચાર કરીને પછી નજરાણું યોગ્ય વસ્તુઓના વિષે વિચાર કર્યો છે સૂત્ર ૬ Page #613 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ पक्षस्कारः सु.७ मागधातीर्थाधिपतेः भरतं प्रत्युपस्थानीयार्पणम् ५९९ गिण्हित्ता ताए उक्किट्ठाए तुडियाए चवलाए जयणाए सीहाए सिग्घाए उडुयाए दिवाए देवगईए वीईवयमाणे वीईवयमाणे जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छद उवागच्छित्ता अंतलिक्खपडिवण्णे सखिखिगीयाइं पंच वण्णाई वत्थाई पवरपरिहिए करयलपरिग्गहियं दसणहं सिर जाव अंजलि कट्टै भरहं रायं जएणं विजएणं वद्धावेत्ता एवं वयासी अभिजिएणं देवा णुप्पिएहिं केवलकप्पे भरहे वासे पुरथिमेणं मागहतित्थमेराए तं अहणं देवाणुप्पियाणं विसयवासी अहणं देवाणुप्पियाणं आणत्ती किंकरे आहण्णं देवाणुप्पियाणं पुरथिमिल्ले अंतवाले तं परिच्छंतु णं देवाणुप्पिया ! ममं इमेयाख्वं पीइदाणं त्तिक? हारं मउडं कुंडलाणि य कडगाणि य जाव मागहतित्थोदगं च उवणेइ, तएणं से भरहेराया मागहतित्थकुमारस्स देवस्स इमेयारूवं पीइदाणं पडिच्छइ पडिच्छित्ता मागहतित्थकुमारं देवं सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारेत्ता सम्माणेत्ता पडिविसज्जेइ तएणं से भरहे राया रहं परावत्तेइ, परावत्तेत्ता मागहतित्थेगं लवणसमुद्दाओ पच्चुत्तरइ पच्चुत्तरित्ता जेणेव विजयखंधावाणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता तुरए णिगिण्हइ णिगिण्हित्ता रहं ठवेइ ठवित्ता रहाओ पच्चोरुहइ पच्चोरुहिता जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता मज्जगघरं अगुपविसइ अगुपविसित्ता जाव ससिव्व पियदंसणे णखई मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव भोयणमंडवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता भायणमंडवंसि सुहासणवरगए अट्ठमभत्तं पारेइ पारित्ता भोयणमंडवाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे णिसीयइ णिसोइत्ता अठारस सेणिप्पसेणीओ सहावेइ सदवित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! उस्सुक्कं उक्करं जाव मागहतित्थकुमारस्स देवस्स अट्टाहियं महामहिमं करेइ करित्ता मम एयमाणित्तियं Page #614 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -~~~~ ~ ६०० • जम्बुद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पच्चप्पिणह, तएणं ताओ अट्ठारससेणिप्पसेणीओ भरहणं रण्णा एवं वुत्ताओ समाणोओ हट्ठ जाव करेंति करित्ता एयमाणत्तियं पचप्पिणति, तएण. से दिवे चक्करयणे वइरामयतुंबे लोहियक्खामयारए जंबुणयणे मीए णाणामणिखुरप्पथालपरिगए मणिमुत्ताजालभूसिए सणंदिघोसे सखिखिणीए. दिवे तरुणरविमंडलणिभे णाणामणिरयणघंटियाजालपरिक्खित्ते सव्वोउअसुरभि कुसुम आसत्तमल्लदामे अंतलिक्खपडिवण्णे जक्खसहस्ससंपरिखुडे दिव्वतुडियसहसण्णिणादेणं पूरेंते चेव अंवरतलं णामेण य सुदंसणे णवइस्स पढमे चक्करयणे माग हतित्थकुमारस्त देवस्स अट्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता दाहिणपच्चत्थिमं दि.से वरदामतित्थाभिमुहे पयाए यावि होत्था ॥सू०७॥ छाया-संप्रेक्ष्य हारं मुकुटं कुण्डलानि च त्रुटिकानि च वस्त्राणि च आभरणानि च शरं च नामाहताङ्क मागधतीर्थोदकं च गृह्णाति गृहीत्वा तया उत्कृष्टया त्वरया चपलया चपलया यत्नया सिंहया उद्धृतया दिव्यया देवगत्या व्यतिवजन् यत्रैव भरतो राजा तत्रैव उपागच्छति, उपागत्य अन्तरिक्षप्रतिपन्नः सकिंकिणीकानि पञ्चवर्णानि वस्त्राणि पवरपरिहितः करतलपरिगृहीतशिरयावत् अञ्जलिं कृत्वा भरतं राजानं जयेन विजयेन बर्द्धयति, बर्द्धयित्वा एवमवादीत, अभिजित खलु देवानुप्रियैः केवलकल्पं भरतं वर्षे पौरस्त्ये मागधतीर्थमर्यादया तदहं खलु देवानुप्रियाणाम् विषयवासी अह देवानुप्रियाणामाज्ञप्तिकिङ्करः अहं देवाणुप्रियाणां पौरस्त्योऽन्तपालः तत् प्रतीच्छन्तु खलु देवाणुप्रियाः मम एतद्रूपं प्रीतिदानम् इतिकृत्वा हारं मुकुटं कुण्डलानि च कटकानि च यावत् मागधतीर्थोदकं च उपनयति, ततः खल स भरतो राजा मागधतीर्थकुमारस्य देवस्य इमेतद्पं प्रीतिदानं प्रीतिच्छति प्रतीष्य मागधतीर्थकुमारं देवं सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सन्मान्य च प्रतिविसर्जयति ततः खल स भरतो राजा रथं परावर्तयति, परावर्त्य मागधतीर्थेन लवणसमुद्रात् प्रत्यवतरति प्रत्यवतीर्य यत्रैव विजयस्कन्धावारनिवेशो यथैव बाह्या उपास्थानशाला तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य तुरगान् निगृहाति निगृह्य रथं स्थापयति, स्थापयित्वा रथात् प्रत्यवरोहति, प्रत्यवरुह्य यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैवोपागच्छति उपागत्य मज्जनगृहमनुप्रविशति, अनुप्रविश्य यावत् शशीव नियनो नतिः मजनशहात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव भोजनमण्डपस्तत्रैवोपागच्छति उपागत्य भोजनमण्डपे सुखासनवरगत अष्टमभक्तं पारयति पारयित्वा भोजनण्डपात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला यत्रैव सिंहासनं तत्रैवोपागच्छति उपागत्य सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखो निषीदति, निषद्य अष्टादश श्रेणी प्रश्रेणी: Page #615 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीकातृ० वक्षस्कारः सू० ७ मागधतीर्थाधिपतेः भरतं प्रत्युपस्थानीयार्पणम् ६०१ शब्दयति शब्दयित्या एघमादोत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! उच्छुल्काम् उत्करां यावत् तीर्थकुमारस्य देवस्य अष्टाहिका महामहिमां कुरुत कृत्वा मम एतामाज्ञप्तिका प्रत्यर्पयत ततः खलु ताः अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणयः भरतेन राशा एवम्, उक्ता सत्यः हृष्टयावत् कुर्वन्ति, कृत्वा एतामाक्षप्तिका प्रत्यर्पयन्ति ततः खलु तद्दिव्यं चक्ररत्न बज्रमय तुम्बं लोहिताक्ष रत्नमयारकं जाम्बूनद नेमि नानामणिक्षुरप्रस्थालपरिगतं मणिमुक्ताजालभूषितम्, सनन्दि. घोषम् सकिङ्किणीकम्, दिव्यम् तरुणरविमडलनिभम्। नाना-मणिरत्नघण्टिकाजालपरिक्षिप्तम् सर्व सुरभिकुसुमासक्त माल्यदाम अन्तरिक्ष प्रतिपन्नम् यक्षसहस्त्रसंपरिवृतम्, दिव्य त्रुटितशब्द सन्निनादेन पूरयदिव च अम्बरतलम् नाम्ना च सुदर्शनम् नरपतेः प्रथमम् चक्ररत्नम्, मागधतोर्थकुमारस्य देवस्य अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालतः प्रतिनिष्कामति प्रतिनिक्रम्य दक्षिणपश्चिमां दिशं वरदामतीर्थाभिमुखं प्रयातं चलितं चाप्यभवत् ॥सू० ७॥ टीका-(संपेहेत्ता) इत्यादि। (संपेहेत्ता) संप्रेक्ष्य-पर्यालोच्य (हारं मउडं कुंडलाणि य कडगाणि य तुडियाणि य वत्थाणि य आभरणानि य सरं च णामाहयंकं मागहतित्थोदगं च गेण्हइ) हारम्अष्टादशादिसरिकमुक्ताहारम् तत्र मुकुटं-शिरोभूषणम्, कुण्डलानि च, कर्णभूषणानि, कटकानि च- हस्ताभरणानि, त्रुटितानि च बाहाभरणानि, वस्त्राणि च नानामणिरत्नादि खचित परिधेयपट्टवस्त्राणि भरतस्य प्रत्यप्पणाय शरं-बाणं च, नामाहताएं भरतेति नामाङ्कितचिन्हं शरं च मागधतीर्थोंदकं च-राज्याभिषेकोपयोगि मागधतीर्थजलं च एतानि गृह्णाति (गिण्हित्ता) गृहीत्वा (ताए उनिकट्ठाए तुरियाए चवलाए जवणाए सीहाए सिग्याए उद्धृयाए दिव्वाए देवगइए वीईवयमाणे वोईवयमाणे जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छइ) तया उत्कृष्टया त्वरितया चपलया जया सिंहया शीघ्रया उद्धतया दिव्यया देवगत्या व्यतिव्रजन व्यतिव्रजन् यत्रैव भरतो राजा तत्रैवोपागच्छति, 'संपेहेत्ता हारं मउडं कुंडलाणि य' इत्यादि सू०-७ टीकार्थ-(संपेहेत्ता) अच्छी तरह से विचार करके (हारं मउडं कुंडलाणि य कडगाणि य तडियाणि य वत्थाणि य आभरणाणि य सरं च णामाहयंकं मागहतित्थोदगं च गेण्हइ) उसने हार, मुकुट, कुण्डल, कटक, त्रुटित-बाहुके आभरण, नानामणिरत्नादिक से खचित पहिरने योग्य वस्त्र भरत के नाम से अङ्कित बाण एवं मागधतीर्थ का राज्याभिषेकोपयोगी उदक लिया-(गिण्हित्ता ताए उक्किदाए तुरिआए चवलाए जयणाए सीहाए सिग्धाए उबूआए दिव्बाए देवगईए वीईवय संपेहेता हारं मउडं कुंडलाणिय' इत्यादि सू०७॥ मोकार्थ-संपेहेत्ता)सारीशa विया२४शन (हारं मउडं कुडलाणिय कडगाणि य तुडियाणिय, वत्थाणिय आभरणानि य सरं च णामाहयंकं मागहतित्थोदगं च गेण्हह) तार.भुश કુંડળ, કટક, ત્રુટિત-બાહુના આભરણુ વિશેષ નાનામણિ રત્નાદિકથી ખચિત પહેરવા ગ્ય વસ્ત્રો ભરતના નામથી અંકિત બાણ તેમ જ માગતીર્થનું રાજ્યાભિષેક એગ્ય ઉદક એ अधी तयाबीधी. (गिण्हित्ता ताए उक्किट्ठाए तुरिआए चवलाए जयणाप सीहाए सिग्याए उद्धआए दिव्वाए देवगईए वीईवयमाणे२ जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छा) Page #616 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६०२ जम्बूद्धीपप्रप्तिसूत्रे तत्र तया उत्कृष्टया गत्या त्वरया आकूलया न स्वाभाविन्या, चपलया कायतोऽपि चण्डया, जवनया वेगवत्या सिंहया-तदाढयस्थैर्येण, उद्धृतया- दतिशयेन जयिन्या विपक्षजेतृत्वेन छेकया निपुगया दिव्यया देवगत्या आकाशमार्गगमनेन व्यतिवजन् व्यतित्रजन् यत्रैव भरतो राजा तत्रैवोपागच्छति (उवागच्छित्ता) उपागत्य (अंतलिक्खपडिवण्णे सखिखिणीयाई पंचवण्णाई वत्थाई पवरपरिहिए करयलपरिग्गहियं दसणहं सिर जाब अंजलि कटु भरहं रायं जएणं विजएणं बद्धावेइ) अन्तरिक्षप्रतिपन्न: सकिंकिणीकानि पञ्चवर्णानि वस्त्राणि प्रवरं परिहितः करतलपरिगृहीतं दशनखं शिर यावत् अज्जलिं कृत्वा भरतं राजानं जयेन विजयेन वर्द्धयति, तत्र अन्तरिक्षप्रतिपन्नः आकाशगतो देवानामभूमिचारित्वात् सकिंकिणीकानि-क्षुद्रघण्टिका सहितानि पञ्चवर्णानि च कृष्णनोलपीतरक्तशुक्लवर्णानि च वस्त्राणि प्रवरं विधिपूर्वकं यथा स्यात् तथा परिहितः माणे२ जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छइ) इन सब उपहार करने योग्य वस्तुओं को लेकर वह उत्त उत्कृष्ट, त्वरित, चपल, अति महान् वेग से आरब्ध होने के कारण सिंहगामि जैसी शीघ्रतावाली, उद्धृत दिव्य देवगति द्वारा चलता चलता जहां भरत राजाथा वहां पर -आया गति के इन विशेषणों की व्याख्या पहिले की जा चुकी है । (उवागच्छित्ता अंतलिक्वपडिवन्ने सखिखिणिआई पंचवण्णाई वत्थाई पवरपरिहिए करयलपरिग्गहिरं दसणहं सिरआवत्तं जाव अंजलि कटु भरहं रायं जएणं विजएणं वद्धावेइ) वहां आकरके उसने क्षुदघंटिकाओं से युक्त ऐसे पांच वर्णों वाले वस्त्रों को पहिरे हुए ही आकाश में खड़े-खड़े दश नख जिसमें मिल जावें ऐसी अंगुली करके और उसे मस्तक पर धर करके भरत राजा को जय विनय शब्दों का उच्चारण करते हुए ही बधाई दी यहां जो उसे क्षुद्र घंटिकाओं से युक्त वस्त्र पहिरे हुए प्रकट किया गया है उसका तात्पर्य यही है कि उसने उन घंटिकाओं से उत्थित शब्दों द्वारा यही प्रकट सर्वजन समक्ष किया मैं आपका प्रकटरूप में सेवक हूँ गुप्तरूप में नहीं (वद्धावित्ता एवं वयासी) वधाई સવે ઉપહાર વસ્તુઓ લઈને તે ઉત્કૃષ્ટ, ત્વરિત, ચપળ અતિ મહાન વેગથી આ૨ બ્ધ હોવાથી સિંહ ગતિ જેવી શીવ્રતાવાળી, ઉદ્ધત દિવ્ય દેવગતિથી ચાલતા-ચાલતે જ્યાં ભરતરાજ હતું, ત્યાં આવ્યો. ગતિના એ સર્વે વિશેષણની વ્યાખ્યા પહેલાં કરવામાં આવી છે. (उवागच्छित्ता अंतलिक्खपडिवन्ने सखिखिणी आइ पंववण्णाई वत्थाई पवरपरिहिए करयलपरिग्गहिरं दसणहं सिर जाव अंजलिं कटु भरहं राय जएण विजएणं वद्धावेइ) त्यां આવીને તેણે ક્ષુદ્રઘંટિકાઓથી યુક્ત એવા પાંચવવાળ વસ્ત્ર પહેરીને આકાશમાં જ ઊભા રહીને દસનખો જેમાં સંયુક્ત થઈ જાય એવી અંજલી બનાવીને અને તેને મસ્તક ઉપર મૂકીને ભરત રાજાને જય-વિજ્ય શબ્દ સાથે અભિનંદન વધામણી આપ્યા. અહીં જે ક્ષુદ્ર ઘંટિક યુક્ત વસ્ત્રો પહેરેલા છે. એવો ઉલ્લેખ છે તેનું તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે. છે તે ઘટિકાઓથી ઉસ્થિત થતા શબ્દો વડે એજ વાત સર્વ લોકો સમક્ષ પ્રગટ री हु तारे 2 ३५भा से छु, शुस ३५मा नहि. (वद्धावित्ता एवं वयासी) मान Page #617 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० बक्षस्कारः सु० ७मागघतीर्थाधिपतेः भरतं प्रत्युपरथानीयार्पणम् ६८ धारितः । किमुक्तं भवति इत्याह- किंकिणी ग्रहणेन तस्य, किंकिणी समुत्थशब्देन सर्वजन - समक्षं सेवकोऽस्मि न तु गुप्तरूपेणेति ज्ञापनार्थम्, करतलपरिगृहीतं दशनं शिरसावते मस्तकेऽञ्जलिं कृत्वा भरतं राजानं चक्रिणं जयेन विजयेन - जयविजयशब्देन वर्द्धयति 'बद्धावित्ता' वर्द्धयित्वा' एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादात् 'अभिजिएणं देवाfoot केवल भरहे वासे पुरत्थिमणं मागहतित्थमेराए तं अहण्णं देवाणुप्पियाणं विसवासी अहणं देवाणुपियाणं आणत्ती किंकरे अहण्णं देवाणुप्पियाणं पुरथिमिल्ले अंतवाले तं पडिच्छंतु णं देवाणुपिया ! ममं इमेयारूवं पीइदाणं तिकट्ट हारं मड कुंडलाणि य कडगाणि य जाव मागदवित्थोदगं च उवणेइ' अभिजितं खलु देवानुप्रियैः केवलकल्पं भरतं वर्षं पौरस्त्ये मागधतीर्थमर्यादया तदहं खलु देवानुप्रियाणां विषयवासी, अहं खलु देवानुप्रियाणां पौरस्त्योऽन्तपालः तत्प्रतीच्छन्तु देवानुप्रियाः ! ममेदम् एतद्रूपं प्रीतिदानम् । इतिकृत्वा हारं मुकुटं कुण्डलानि च यावत् मागधतीर्थोदकं च उपनयति 'देवाणुपिएहि' देवानुप्रियैः - 'केवलकप्पे' केवलकल्पं - केवलज्ञानसदृशं सम्पूदेकर के फिर उसने ऐसा कहा - ( अभिजिएणं देवाणुप्पिएहिं केवलकप्पे भरहे वासे पुरत्थिमेणं मागतित्थमेश तं अहणे देवाणुप्पियाणं विसयवासी अहण्णं देवाणुप्पियाणं आणत्ती किंकरे अहणं देवाणुपियाणं पुरत्थिमिल्ले अंतवाले तं पडिच्छंतुणं देवाणुपिया ममं इमेयारूवं पीइ दाणं तिकट्टु हारं मउडं कुंडलाणिय कडगाणिय जाव मागहतित्थोदगं च उवणेइ) आप देवानुप्रिय के द्वारा केवल कल्प- समस्त भरत क्षेत्र पूर्व दिशा में मागधतीर्थ तक अच्छी तरह से जोत लिया गया है, मैं आप देवानुप्रिय के द्वारा जिते गए देश का निवासी हूँ, में आपका आज्ञप्ति किंकर हूँ में आप देवानुप्रिय का पूर्व दिशा का अन्तपालहूं इसलिये आप देवानुप्रिय मेरे इस प्रीतिदान को भेंट को स्वीकार करें ऐसा कह कर उसने उसके लिये हार, मुकुट, कुण्डल, कटक यावत् मागध तीर्थ का उदक दे दिया । पौरस्त्य अन्तपाल शब्द का भावार्थ ऐसा है कि पूर्व दिशा में आपके द्वारा जो शासित देश है उस देश का मैं शत्रुओं आदिके द्वारा जायमान नन्दन आपने पछी तेथे या प्रभाउ- अभिजिपणं देवाणुप्पिएहि केवलकप्पे भरहे वासे पुरत्थिमेणं मागहतित्थमेराप तं अहणणं देवाणुप्पियाणं विसयवासी अहण्णं देवाणुपियाण आणत्ती किंकरे अहण्हं देवाणुपियाणं पुरात्थिमिल्ले अंतवाले तं पडिच्छंतु णं देवाशुपिया ! ममं इमेयारूवं पीइदाणं तिकट्टु हारं मउडं कुण्डलाणि य कडगाणि य जाव मागहत्थोदगं च उणे) आय हेवानुप्रिय वडे ठेवा उदय- समस्त - लस्तक्षेत्र पूर्व हिशामां માગધતીથ સુધી સારીરીતે જીતીલેવામાં આવ્યું છે. હું આપ દેવાનુપ્રિય વડે વિજિત દેશાના નિવાસી છું. હું આપશ્રીના આજ્ઞપ્તિ કિંકર છું. હું. આપ દેવાનુપ્રિયા પૂ દિશાના અંતપાલ છું એથી આપ દેવાનુપ્રિય મારા આ પ્રીતિદાનને-ભેટને સ્વીકારકરો આ પ્રમાણે કહીને તેણે તેમના માટે હાર, સુટ, કુંડળ, કટક યાવત્ માગષતીયનું ઉદક એ સર્વ વસ્તુઓ અપિત કરી. પૌત્સ્ય અન્તપાલ શબ્દના ભાવાર્થ આ પ્રમાણે છે કે પૂર્વ દિશામાં આપ વડે શાસિત જે દેશ છે. તે દેશનેા હું. શત્રુએ વગેરે દ્વારા જાયમાન Page #618 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र र्णमित्यर्थः 'भरहे वासे' भरत वर्ष भरतक्षेत्रम् 'पुरस्थिमेणं' पौरस्त्ये पूर्वस्यां दिशि खलु 'मागहतित्थमेराए' मागधतीर्थमर्यादया मागवतीर्थपर्यन्तम् 'अभिजिएण' अभिजितं खलु निश्चयेन 'तं' तस्मात् कारणात् 'अह' अहं खलु देवाणुप्पियाणं' देवानुप्रियाणां भवतां 'विसयवासी' विषयवासी देशवासी 'अहण्णं' अतएव अहं खलु 'देवाणुप्पियाणं' देवानुप्रियाणाम् 'आणत्तिकिंकरे' आज्ञप्तिकिङ्करः आज्ञाकारी सेवकः 'अहण्णं' अहं खलु 'देवाणुप्पियाणं' देवानुप्रियाणाम् 'पुरस्थिमेणं' पौरस्त्यः -पूर्वदिक् सम्बन्धी 'अंतवाले' अन्तपालः, अन्नं-त्वदाज्ञप्ति देश सम्बन्धिनं पालयति रक्षयति रिवादि सर्वोपद्रवेभ्य इति अन्तपाल:-त्वदादेशरक्षकोऽस्मि 'तं' तत् तस्मात् कारणात् 'पडिच्छंतु णं देवाणुप्पिया' प्रतीच्छन्तु-गृह्णन्तु खलु भो देवानुप्रियाः! 'मम' मम 'इम' इदं पुर उपस्थापितम् ‘एयारूवं' एतद्रूपं प्रत्यक्षानुभूयमानस्वरूपम् 'पीईदाणं' प्रीतिदानम् उपहाररूपम् 'तिकट्ठ' इति कृत्वा इति विज्ञप्य ‘हारं' हारं-मुक्ताहारम् 'मउड' मुकुटम् 'कुंडलाणि य' कुण्डलानि च 'कडगाणि य' कटकानि च हस्तभूषणानि च यावत् नामाङ्कितवाणम् 'मागहतित्थोदगं च' मागपतीर्थोदकं च-राज्याभिषेकोपयोगि मागधतीर्थजेलं च 'उवणेइ' उपनयति-भरतक्रिणे प्राभृती करोति अर्पयतीत्यर्थः, 'तएणं से भरहे राया मागहतित्थकुमारस्स देवस्स इमेयारूवं पीइदाणं पडिच्छई' ततस्तदनन्तरं खलु स भरतो राजा मागधतीर्थकुमारनाम्नो देवस्य इदम् एत दूपं प्रीतिदानं प्रतीच्छति स्वीकरोति 'पडिच्छित्ता' प्रतीष्य स्वीकृत्य 'मागहतित्थकुमारं देवं सकारेइ सम्माणेइ' मागधतीर्थकुमारं देवं सत्कारयति अनुगमनादिना सन्मानयति मधुरवचनादिना 'सकारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सन्मान्य च 'पडिविसज्जेई' प्रति विसर्जयति स्वस्थानगमनाय अनुमन्यते 'तएणं से भरहे राया रहं परावत्तेइ' ततः खलु स भरतो उपद्रवों से रक्षा करने वाला हूँ यहां यावत् शब्द से नामांकित बाण गृहीत हुआ है। (तएणं से भरहे राया मागहतित्थकुमारस्स देवस्स इमं एयारूवं पीइदाणं पडिच्छइ) भरत राजा ने भी मागधतीर्थ कुमार देव के इस प्रकार के इस प्रीतिदान को-भेंट को-स्वीकार कर लिया(पडि. च्छित्ता मागहतित्थकुमारं देवं सक्कारेइ, सम्माणेइ) भेंट स्वीकार करके फिर उस भरत राजा ने उस मागधतीर्थ कुमार का अनुगमनादि द्वारा सत्कार किया और मधुर वचनादि द्वारा सन्मान किया (सक्कारित्ता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) सत्कार एवं सन्मान करके फिर उसे विसर्जित उपद्रवाथी २१॥४२॥२ छु.. मी यावत् २०४थी नामiहित मानुष्य थयुं छे. (तपणे से भरहे राया मागहतित्थकुमारस्स देवस्स इमं पयरूवं पीइदाणं पडिच्छइ) सरत शाये १५ भाग ती भा२ हेवनामा तना से प्रीतिवान (लेट) नो स्पी२ या. (पडिच्छिता मागइतित्थकुमार देवं सकारेइ, सम्माणेइ) मटन स्वा२शन पछी सरत રાજાએ તે. માગધ તીર્થ કુમારનો અનુગામનાદિ દ્વારા સત્કાર કર્યો અને મધુર વચનાદિ द्वारा तनुसन्मान यु. (सक्कारिता सम्माणित्ता पडि विसज्जेइ) स४२ अने सन्मान Jश पछी त विहाय माची. (त पणं से भरहे राया रहं परावत्तेइ) त्या२ मा ते Page #619 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटोका त वक्षस्कारः सू० ७ मागधतीर्थाधिपतेः भरतं प्रत्युपस्थानीयार्पणम् ६०५ राजा रथं परावर्तयति निवर्तयति 'परावत्तित्ता' परावर्त्य 'मागहतित्थेणं लवणसमुद्दामो पच्चुत्तरइ' मागयतीर्थेन लवणसमुद्रात् प्रत्यवतरति 'पच्चुत्तरित्ता' प्रत्यवतीर्य 'जेणेव विजयखंधावारणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव विजयस्कन्धावारनिवेशो यत्रैव च बाह्या उपस्थानशाला तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'तुरए णिगिण्हइ' तुरगान् निगृह्णाति-स्थिरी करोति 'निगिण्हित्ता' निगृह्य 'रई ठवेइ' रथं स्थापयति 'ठवित्ता' स्थापयित्वा 'रहाओ पच्चीरुहइ' रथात् प्रत्यवरोहति अवतरति ‘पच्चोरुहित्ता' प्रत्यवरुह्य 'जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैवोपागच्छति ‘उवागच्छित्ता' उपागत्य 'मज्जणघरं अणुपविसई' मज्जनगृहम् अनुप्रविशति 'अनुपविसित्ता' अनुप्रविश्य 'जाव ससिव्व पियदंसणे' यावत् शशीव प्रियदर्शन: 'णरवई मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ' नरपतिः मज्जनगृहात् प्रतिनिष्कामति अत्र पूर्व कर दिया । (तएणं से भरहे राया रहं परावत्तेइ) इसके बाद उस भरत राजा ने अपने रथ को लौटाया ( परावत्तित्ता मागहतित्थेणं लवणसमुद्दाओ पच्चुत्तरइ ) और लौटाकर मागधतीर्थ से होता हुआ वह लवण समुद्र से वापिस भरत क्षेत्र की ओर आ गया (पच्चुत्तरित्ता जेणेव विजयखंधावारणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ ) और आकर के वह जहां पर विजयस्कन्धावार का निवेश था-पडाव पड़ा हुआ था और उसमें भी जहां पर बाह्य उपस्थान शाला थी वहां पर आया । (उवागच्छित्ता तुरए निगिण्हइ) वहां आकरके उसने घोड़ों को रोक दिया (निगिहित्ता रहं ठवेइ, ठवित्ता रहाओ पच्चोरहइ पच्चोरुहिता जेणेव मज्जगघरे तेणेव उवागच्छइ) घोड़ो को रोक करके उसने फिर रथ खड़ा कर दिया । रथ के खड़े होते ही वह उस रथ से निचे उतरा और उतरकर फिर वह जहां पर स्नानगृह था वहां पर आया (उवागच्छित्ता मज्जणघरं अणुपविसइ) वहां आकर वह स्नानगृह में प्रविष्ट हुआ (अणुपविसित्ता जाव ससिव्व पियदसणे णरवई मज्जणघराओ पडिनिक्खमई) वहां प्रविष्ट होकर उसने पूर्ववत् स्नान किया स्नान करने के अनन्तर फिर धवल महामेध से निकलते हुए चन्द्र के भरत शो पातान। २थ पाछ। पायी. (परावत्तित्ता मागहतित्थेणं लवणसमुहाओ पच्चुत्तरइ) मने पाछ। वजी भाग तीर्थ भांथी ५सार य न समुद्र तथा पाछ। भरत क्षेत्र त२५ मापी गये। (पच्चुत्तरित्ता जेणेव विजयखंधावारणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवटाणसाला तेणेव उवागच्छइ) अने भावीन. न्यi विय २४ धावा२નિવેશ હતે-પડાવ હતો, અને તેમાં પણ જ્યાં બાહ્ય ઉપસ્થાન શાળા હતી ત્યાં આવ્યું (उवागच्छित्ता तुरए निगिण्हइ) त्यां मावीन तेणे घामाने भाराच्या (निगिण्हित्ता रहं ठवेइ ठवित्ता रहाओ पच्चोरुहइ पश्चोरुहिता जेणेव मज्जणधरे तेणेव उवागच्छद) धायाने ઉભા રાખીને પછી તેણે સ્થ ઊભરાખ્યો. રથ ઊભે રહેતાં જ તે રાજા રથ ઉપરથી નીચે ઉતયો सन नाय तरीन पछी यां स्नानस -त्यां गये। (उवागच्छित्सा मज्जणघर अणुपविसइ) त्या आवीन स्नानसभा प्रविष्ट था. (अणुपविसित्ता जाव ससिव्व पियदसणे परवई मज्जणघराओ पडिनिक्खमई) त्यो प्रविष्ट य न तो पूर्ववत् स्नान थु, स्नान Page #620 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६०६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वत् स्नानविध्यनन्तरं धवलमहामेवान्निगच्छन् चन्द्र इव सुधाधवलीकृतमज्जनगृहात् प्रियदर्शनः स भरतः चक्री निर्गच्छतीतिभावः 'परिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'जेणेव भोयणमंडवे तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव भोजनमण्डपस्तत्रैवोपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'भोयणमंडवंसि सुहासणवरगए अट्ठमभत्तं पारेइ' भोजनमण्डपे सुखासनवरगतः सन् अष्टमभक्तं पारयति उपवासत्रयानन्तरं पारगां करोतीत्यर्थः 'पारिता' पारयित्वा पारणां कृत्वा 'भोयणमंडवाओ पडिणिक्खमई' भोजनमण्डपात प्रतिनिष्क्रामति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'जेणेव बाहिरिया उवद्वाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला यत्रैव सिंहासनं तत्रैवोपागच्छति ‘उवागच्छित्ता' उपागत्य 'सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे णिसोअइ' सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखः पूर्वाभिमुखः निषीदति उपविशति 'णिसीइत्ता' निषध उपविश्य 'अट्ठारस सेणिप्पसेणीओ सदावेइ' अष्टादश श्रेणि प्रश्रेणीः शब्दयति आह्वयति 'सदावित्ता' शब्दयित्वा आहूय एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् अथ किमवादीत् इत्याहजैसे प्रिय दर्शन वाला वह भरत राजा उस सुधाधवलो कृत स्नान घर से बाहर आया । (पडिणिक्खमित्ता जेणेव भोयणमंडवे तेणेव उवागच्छइ ) स्नान घर से बाहर आकर के फिर वह जहां भोजन शाला थी वहां पर आया (उवागच्छित्ता भोयणमंडवंसि सुहासणवरगए अट्ठमभत्तं पारेइ) वहां आकर के उसने भोजन मंडप में सुखासन पर बैठ कर अष्ठभक्तकी पारणा की (पारिता भोयणमंडवाओ पडिणिक्वमइ) पारणा कर के फिर वह भोजन शाला से बाहर आया (पडि. णिक्वमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ) बाहर आकर के फिर वह जहां वाह्य उपस्थानशाला थी और उसमें भी जहां पर सिंहासन था वहां परआया ('उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णितीअइ) वहां आकर के वह पूर्व दिशा की ओर मुँह करके सिंहासन पर बैठगया (णिसीइत्ता अट्ठारससेणिप्पसेणीमओ सद्दावेइ) वैठकर फिर उसने १८ श्रेणि प्रश्रेणियों को बुलाया-(सहावित्ता एवं वयासी) बुलाकर उसने ऐसा कहा -खिप्पामेव કરીને પછી ધવલમહામેઘથી નિષ્પન્ન ચન્દ્ર જે પ્રિયદશી તે ભરત રાજા તે સુધાધવલીકૃત स्नानलमाथी सा२ माया. (पडिणिक्वमित्ता जेणेव भोयणमंडवे तेणेव उवागच्छइ) स्नान घरमाथी मार नाजीने पछी तयां Annual Ri गये. (उवागच्छित्ता भोयणमंडवंसि सुहासणवरगए अट्ठमभत्तं पारेइ), त्यो मापीन तासन भ७५मा सुसासन ७५२ । सने त्या२ मा त म मरतनी पा२। ४२१. (पारित्ता भोयणमंडवाओ पडिणिक्खमइ) पारया रीने पछी सनशाणामांथा ॥३॥२ माव्या. (पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ) मह(२ वी पछी ल्या माघ स्थानशामाता मन तमा ५y rयां सिंहासन हेतु त्यां माये।. (उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णिसीअइ) त्या मापान के पूर्व हित२५ भुमशन सिंहासन ५२ मेसी गयी. (णिसिइत्ता अठ्ठारस सेणिप्पसेणीओ सदावेइ) मेसीने पछी तणे १८ श्रेलि-प्रथिनाata माया, (सद्दावित्ता एवं वयासी) मावावी मा प्रमाणे | Page #621 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० ७ मागधतीर्याधिपतेः भरतं प्रत्युपस्थानीयार्पणम्६०७ 'खिप्पामेव भो ! देवाणुप्पिया' इति, क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! 'उस्मुक्कं उक्करं जाव मागहतित्थकुमारस्स देवस्स अट्टाहियं महामहिमं करेह' उच्छुल्काम् उत्करां यावत् मागधतीर्थकुमारस्य देवस्य विजयोपलक्षिकाम् अष्टाहिकां अष्टदिनसम्पाधां महामहिमां महान् महिमा यस्यां सा ताम् कुरुत तत्र-उच्छुल्कामिति उन्मुक्त:-त्यक्तः शुल्क:-राजकीयदेयद्रव्यं यस्यां सा तथा ताम् यावत् पदात् उच्छुल्कादि सर्व विशेषणविशिष्टां कुरुतेति सम्बन्धः 'करित्ता' कृत्वा मम एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह' मम एताम् आज्ञप्तिकां प्रत्यर्पयत-परावर्तयत 'तए णं ताओ अट्ठारससेणिप्पसेणीओ भरहेणं रण्णा एवं वुत्ताओ समाणीओ हट्ट जाव करेंति' ततः खलु ता अष्टादश श्रेणि प्रश्रेणयः भरतेन राज्ञा एवम् उक्ता आज्ञप्ताः सत्यः हृष्ट यावत् तुष्टानन्दितहृदयाः राजोदितामष्टाहिकां कुर्वन्ति 'करित्ता' कृत्वा 'एयमाणत्तिय पञ्चप्पिणंति' एतामाज्ञप्तिकां प्रत्यर्पयन्ति समर्पयन्ति । 'तए णं से दिव्वे चक्करयणे' ततः खलु तत् दिव्यं चक्ररत्नम् 'वइरामय तुंबे वज्रमयतुम्बम्, तत्र वज्रमयं हीरकखचितं तुम्बम्-अरकनिवेशस्थानं यत्र तत्तथा पुनः कीदृशम् भो देवाणुप्पिया ! उस्सुक्कं उक्करं जाव मागहतित्थकुमारस्स देवस्स अट्टाहियं महामहिमं करेह) हे देवानुप्रियो ! तुम सब मिलकर मागधतीर्थ कुमार देवके विजय के उपलक्ष में आठदिन तक खूब ठाट बाटसे उत्सवकरो इसमें राजकीय देव द्रव्य माफ करो, चुङ्गो(जकात)वगैरह प्रजाजनोसे नलिया जाये ऐसी व्यवस्था करदो (करित्ता मम एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह) यह सब करके फिर मुझे इसकी खबर दो (तएणं ताओ अट्ठारस सेणिप्पसेणीओ भरहेणं रण्णा एवं वुत्ताओ समाणीओ हट्ट जाव करेंति) इस प्रकार भरतराजाद्वारा आज्ञप्त किये वे अष्टादश श्रेणिजन बहुत ही हर्षितएवं तुष्ट चित्त हुए राजोदित आठदिन तक के महामहोत्सवकरने में तल्लीन होगये (करित्ता एयमाणत्तियं पच्चप्पिणंति) महामहोत्सव करके" हमने आपकी आज्ञानुसार सब काम विधिवत् करलिया है" इस वात की खवर राजा के पास पहूंचादो (तएणं से दिव्वे चक्करयणे वइरामय तुंवे) इसके बाद ४धु-(खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! उस्सुक्कं उक्करं जाव मागहतित्थकुमारस्स देवस्स अद्राहियं महामहिमं करेह) पानुप्रिया ! मे सी भजीन भागध तीर्थ भार पर વિજ્ય મેળવ્યું તે ઉપલક્ષ્યમાં આઠ દિવસ સુધી બહુ જ ઠાઠ-માઠથી ઉત્સવ કરે. એમાં રાજકીય દેવ દ્રવ્ય માફ કરે, પ્રજાજનો પાસેથી કર લેવામાં ન આવે, આ જાતની વ્યવસ્થા 1. (करित्ता मम पय माणत्तियं पञ्चप्पिणह) आधु ४शन पछी भने सूचना मापा. ( तएणं ताओ अट्ठारससेणिप्पसेणीओ भरहेणं णा एवं वुत्ताओ समाणीओ हद जाव कति) म प्रमाण सरत २000 3 माशत थयात मष्टाहश श्रेय-श्रेलि भने। બહુ જ હર્ષિત તેમ જ તુચ્છચિત્ત થયા. તેઓ ૨ાદિત આઠ દિવસ સુધીના મહા મહેसवनी ०५वस्थामां deela गया. (करित्ता एयमाणत्तियं पच्चप्पिणंति) महाभाडीસવ કાર્ય સ૫ન કરીને તેમણે રાજા પાસે આ જાતની સૂચના મોકલી કે અમોએ भा५श्रीनी आज्ञा भु२४०५ स महामोत्सव आय यथाविधि सम्पन्न युछे. (तपणं से दिवे चक्करयणे वइरामयतुबे) त्यार पाहत य२लनु भ२४-निवेश स्थान १००मय Page #622 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'लोहियक्ख रयणमयारए, लोहिताक्षरत्नमयारकम्, लोहिताक्षा रत्नमया अरका यत्र तत्तथा पुनः कीदृशम् 'जंबूणयणेमिए' जाम्बूनदनेमिकम् जाम्बूनदं रक्तसुवर्ण तन्मयो नेमिः धारा यत्र तत्तथा 'णोणामणि खुरप्पथालपरिगए' नानामणि क्षुरप्रस्थालपरिगतम्, तत्र नानामणिमयम् अन्तः क्षुरपाकारत्वात् क्षुरप्ररूपं स्थालम्-अन्तः परिधिरूपं तेन परिगतं यत्तत्तथा 'मणिमुत्ताजालभूसिए' मणिमुक्ता नालाभ्यां भूषितम्, नन्दि:-भम्भामदङ्गादि दिशविधतूर्यसमुदायस्तस्य घोषस्तेन सहितं यत्तत्तथा, पुनः कीदृशम् 'सखिं खिणीए' सकिङ्किणीकम्, किङ्किणीभि:-क्षुद्रघण्टिकाभिः सहितं सकिङ्किणीकम्, पुन: कीदृशम् 'दिवे' दिव्यम्. दिव्यमिति विशेषणस्य प्रागुक्तत्वेऽपि प्रशस्तताऽऽतिशय ख्यापनार्थ पुनः कथनम् 'तरुणरविमंडलणिभे' तरुणरविमण्डलनिभम्, तत्र तरुणरवेमण्डलसदृशम् मध्याह्नसूर्यसदृशम् तेजोयुक्तं गोलाकारं च 'णाणामणिरयणघंटियजालपरिक्खित्ते' नानामणिरत्नघण्टिकाजालपरिक्षिप्तम् तत्र नानामणिरत्नघण्टिकानां यत् जालं वह दिव्यचक्ररत्न की जिसका अरक निवेशस्थान वज़मय है आयुध गृहशाला से बाहर निकला ऐसा सम्बन्ध यहां लगा लेना चाहिये अब वह चक्ररत्न कैसा था-इमी सम्बन्ध में दिये गये पदों को व्याख्या की जाती है- (लोहियक्स्वामयारए) इसके जो अरकथे वे लोहिताक्षरत्न के बने हुए थे (जंबूणयणेमीए) इसकीनेमि-चक्र धारा-जाम्बूनद् सुवर्ण की बनी हुइ थी (णाणामणिखुरप्पथालपरिगए) यह अनेक मणियों से निर्मित अन्तः परिधिरूप स्थाल से यह युक्त था (मणिमुत्ताजालपरिभृसिए) मणि और मुक्का जालों से यह परिभूषिन था (सणंदिघोसे) द्वादश प्रकार के भम्भामृदङ्ग अदि तूर्य समूह को जैसो आवाज होती है ऐसो इम को आवाज थी (सखि त्रिणीए दिवे तरुणरत्रिमंडलणिभे, णाणामणिरयणघंटियाजालपरिकिंवत्ते क्षुद्र घटिकाओं से यह विराजित हैं। यह दिव्य अतिशय रूप में प्रशस्तथा मध्याह्न का सूर्य जिस प्रकार तेजोविशेष से युक्त रहता है उसी प्रकार के तेजोविशेष से यह युक था गोठ आकार वाला था अने. कमणियों एवं रत्न की घंटिकाओं के समूह से यह सर्व ओर से व्याप्त था (मन्चो उयसुरभिછે, આયુધશાળામાંથી બહાર નીકળ્યું. એ સંબંધ અહીં જાણી લેવે જોઈએ. હવે તે ચકરતન કેવું હતું. એ સંબંધમાં જે પદો આપવામાં આવ્યા છે તેમની વ્યાખ્યા ४२वामां आवे छे (लोहियावामयारए) सेना २ अ।। ता ते येताक्षरत्नांना ता. (जंबुणयणेमीए) अनी नभि-यधारा-४ मून सुवष्णु नी मनेली ती. (णाणामणि खुरप्प थालपरिगए) ते भने मणुिथी निर्मित सन्त: ५२धि ३५ स्थाव श्री युततु (मणिमुत्ताजालपरिभुसिए) म भने भुताnatथी से परिभूषित तु (सणंदिघोसे) ६६ પ્રકારના ભમ્મામૃદંગ વગેરે સૂર્ય–સમૂહ ને જે અવાજ હોય છે, એ એને અવાજ हता. (सखिखिणीए दिवे, तरुणरविमंडलणिमे, णाणामणिरयणघंटियाजालपरिक्खित्ते) ક્ષુદ્રઘંટિકાઓથી એ વિરાજિત હતું. એ દિવ્ય અતિશયરૂપમાં પ્રશસ્ત હતું મધ્યાહ્ન નો સૂર્ય જેમ તેજેવિશેષથી સમન્વિત હોય છે. તેમજ એ ચક્રરત્ન પણ તેવિશેષથી સમન્વિત હતું. એ ગાળ આકાર વાળું હતું, અનેક મણિએ તેમજ રત્નની ઘટિકાઓના સમૂહથી मेयारे मागुमेथी व्यास हेतु, (सम्वोउयसुरभिकुसुमआसत्तमल्लदामे, अंतलिखपडिवन्ने, Page #623 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू०७ मगधतीर्थाधिपतेः भरतं प्रत्युपस्थानोयार्पणम् ६०९ समूहस्तेन परिक्षिप्तं सर्वतो व्याप्तं यत्तत्तथा 'सब्बोउयसुरभिकुसुम आसत्तमल्लदामे' सर्वर्तुक सुरभिकुसुमासक्तमाल्यदामम्, सर्वेषाम् ऋतूनां सम्बन्धीनि यानि सुरभि कुसुमानि-सुगन्धिपुष्पाणि तैः आसक्ताः-युक्ता माल्यदामानः पुष्पमाला यत्र तत्तथा 'अंतलिक्खपडिवण्णे' भन्तरिक्षप्रतिपन्नम्-गगनतलगतम् 'जक्खसहस्स संपरिवुडे' यक्षसहस्रसंपरिवृतम् यक्षेत व्यन्तरदेवनिकायः, 'दिव्चतुडियसदसण्णिणादेणं पूरेते चेव अंबरतलं' दिव्यत्रुटितशब्दसन्निनादेन पूरयदिव अम्बरतलम्, तत्र दिव्यानाम् त्रुटितानों तुर्यवाविशेषाणां यः शब्दः ध्वनि यश्च सङ्गतो निनादः प्रतिध्वनिः तेन अम्बरतलं पूरयदिव 'णामेणय सुदंसणे' नाम्ना च सुदर्शनम् 'णरवइस्स पढमे चक्करयणे' नरपतेः चक्रिणो भरतस्य प्रथमम् आद्यं प्रधानं च सर्वरत्नेषु वैरिविजये सर्वत्रामोघशक्तिकत्वात् चक्ररत्नम् 'मागहतित्थकुमारस्स देवस्स अट्ठाहियाए महामहिमाए णिव्यताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ' मागधतीर्थकुमारस्य देवस्य विजयोपलक्षे अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्कामति निर्गच्छति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य 'दाहिणपच्चत्थिमं दिसिं वरदामतित्थाभिमुहे पयाए याचि होत्था' दक्षिणपाश्चात्यां-दक्षिणपश्चिमां दिशम् नैऋत्यकोणमाश्रित्य वरदामतीर्थाभिमुखं प्रयातं-चलितं चाप्यभवत् ॥९० ७॥ कुसुम आसत्त मल उदामे अंतलिक्खपडिवन्ने, जक्ख सहस्सपरिवुडे) समस्त ऋतुओं के सुरमित कुसुमों को निर्मित मालामों से यह सुशोभित था, आकाश में ठहरा हुआ था हजार यक्षों से यह परिवृत था (दिव्य तुडिय पद्द पणिणाएणं पूरते चेव अंबरतलं णामेणं सुदंसणे णरवहस्स पढ मे चक्करयणे) दिव्य तय वाद्यविशेषों के शब्द से एवं उनकी संगत ध्वनियों से अम्बर तल को भर सा रहा था, नाम इसका सुदर्शन था ऐसा यह भरत चक्रवर्ती का-प्रथम-आध, तथा सर्वरत्नों में श्रेष्ठ वैरिजनों के विनय करने में सर्वत्र अमोघ शक्ति वाला होने से प्रधान चक्ररत्न था ऐसा यह चक्ररत्न (मागहतित्थकुमारस्त देवस्स अट्ठाहिआए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउहघर सालाओ पडिणिक्खमइ) जब मागधतीर्थ कुमार को भात चक्रवर्ती ने अपने वश में करलिया तब उसके उपलक्ष में किये आठदिन के महामहोत्सव के निष्पन्न हो जाने पर आयुधशाला गृह जक्खसहस्सपरिवुडे) सर्व ऋतुमाना सुरमित भुमान भागामाया में सुशामितहत से माशां मस्थित तु सहर रक्षाथी थे वृत्त तु. (दिब्वतुडियसद्दस. ण्णिणापणं परेंते चेव अबरतलं णामेणं सुदंसणे गरवइस्स पढमे चक्करयणे) हिच्यतय વાઘ વિશેને શબ્દથી તેમજ તેમની સંગત કવનિઓથી તે બરતલને પૂરિત કરતું હતું. એવું એ ભરત ચક્રવતીનું પ્રથમ–આઘ તેમજ સર્વરત્નોમાં શ્રેષ્ઠ, વરિઓ ઉપર વિજય મેળવવામાં સર્વત્ર અમોઘ શક્તિ ધરાવનાર હોવાથી એ પ્રાન ચક્રરત્ન હતું એવું આ ચક્રરત્ન कमासदेवम्स अदाहिआए महामहिमाए णिवत्ताप समाणीप आउघरसालाओ पडिणिक्खमइ) यारे वतीय उभारने सरत २४ता पाताना शमां शसीधा. ત્યાર બાદ તે આ નંદના ઉપલક્ષ્યમાં આઠ દિવસને મહામહોત્સવ સમ્પન કરવામાં આવ્યું Risuaa Page #624 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मूलम् — “तरणं भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं दाहिण पच्च त्थिमं दिसिं वारदामतित्थाभिमुहं पयायं चावि पासइ पासत्ता हट्टतुट्ठ • कोडं बियपुरिसे सहावे सद्दावित्ता एवं वयासी खिप्पा मेव भो देवाणुपिया ! हयगयरहपवरचाउरंगिणीं सेण्णं सण्णाद्देह आभिसेक्कं हत्थtयणं पडिकप्पेह तिकट्टु मज्जणघरं अनुपविसइ अनु पविसित्ता तेणेव कमेणं जाव धवलमहामेहणिग्गए जाव सेयवरचामराहि उव्वमाणीहि उव्वमाणीहिं माइअ वरफलय पवर परिगर खेड वरकम्मकवयमाढी सहस्सक लिए उक्कड वर मउड तिरीड पडाग झय वेजयंति चामर चलंत छत्तंधयारकलिए असि खेवणि खग्ग चाव णाराय कणय कप्पणि सूल लउड (ॲडिमाल धणुह तोण सरपहरणेहि य कालणीलरुहिरपीय सुक्किल्ल अणेग चिंध सय सष्णिविट्टे अफोडिय सोहणाय छेलिय हयहेसिय हत्थिगुलुगुलाइय अणेग रह सयसहस्स– घणघणेंत णीहम्ममाणसदसहिएण जमगसमगभंभाहोरंभकिर्णित खरमुहि मुकुंद संखि अपरिलि वच्चग परिवाइणि वंसवेणु वीपंचि महति कच्छभि रिगिसिगिय कलताल कंसताल करघाणुत्थिएण महया सदसणिणादेण सयलमवि जीवलोयं पूरयंते बलवाहणसमुदपणं एवं जक्खसहस्स परिवुडे वेसमणे चेव धणवई अमरखइ सण्णिभाइ इद्धीए पहियकित्ती गामागरणगरखेडकञ्चड तहेव सेसं जाव विजयखंधावारणिवेस करेइ करिता वद्धइरयणं सदावेइ सदावित्ता एवं वयासीखिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! मम आवसहं पोसहसालं च करेहि ममेयमाणत्तियं पच्चपिणहि ||८|| ६१० से बाहर निकला ( पडिणिक्खमित्ता दाहिणपच्चत्थिमं दिसिं वरदामतित्थामिमुहे पयाए यावि होत्था ) और निकल कर वह दक्षिण पश्चिम दिशा के कोने में नैऋत्य कोने को आश्रित करके वरदाम तीर्थ की और चलने लगा ||७|| सेना पछी ते इरीयांथी डार नीयु, (पडिणिक्खमित्ता दाहिणपच्चथिमं दिसिं वरदामतित्थाभिमुद्दे पयाप याविहोत्था भने नाणीने ते दृक्षिण पश्चिम दिशाना કાણમાં નૈઋત્યકોણને આશ્રિત કરીને વરદામ તી તરફ ચાલવા લાગ્યું. સૂત્ર છા Page #625 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तृ•वक्षस्कारः सू० ८ भरतराज्ञः वरदामतीर्थाभिगमननिरूपणम् ६११ छाया-ततः खलु स भरतो राजा तद्दिव्यं चक्ररत्नं दक्षिण पाश्चात्यां दिश वरदामतीर्थाभिमुखं प्रयातं चापि पश्यति, दृष्ट्वा हृष्ट तुष्ट० कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति शब्दयित्वा एबम् अवादीत्-क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! हयगजरथप्रवरचातुरंगिणी सेनां सन्नाहयत आभिषेक्य हस्तिरत्नं प्रतिकल्पयत इति कृत्वा मज्जनगृहम् अनुप्रविशति अनुप्रविश्य तेनैव क्रमेण यावत् धरलमहामेघनिर्गतो यावत् प्रवेतवरचामरै रुद्वयमानै रुद्भूयमानैः हस्तपाशित वरफलक प्रवरपरिकरखेटकवरवर्मकवचमाढय सहस्रकलितः उत्कट वरमुकुटकिरीट पताकध्वजवैजयन्ती चामर बलच्छवान्धकारकलितः, असि क्षेपिणी खग चाप नाराच कणक कल्पनीशूललगुडभिन्दिपालधनुस्तूणशरप्रहरणैश्च कालनीलरुधिरपीत शुक्लाने कचिह्नशतसन्निविष्टम् आस्फोटितसिंहनाद सेंटित हय हेषित हस्तिगुलगुलायितानेकरथशतसहस्रानुकरणशब्दनिहन्यमानशब्दसहितेन यमकसमकभम्भाहोरम्भा क्वणिता खरमुखी मुकुन्द शङ्खिका पिरलीवञ्चक परिवादिनी वंशवेणु विपञ्ची महतो कच्छपो भारतोरिगसिरिका तलताल कांस्यताल करध्धानोत्थितेन, महता शब्दसन्निनादेन सकलमपि जोवलोकं पूरयन् बलवाहनसमुदयेन एवम् यक्षसहस्त्रपरिवृत्तो वैश्रमणो धनपतिरिव अमरपति सन्निभया ऋद्धया प्रथितकीर्तिः ग्रामाकरनगरखेटकर्बट तथैव शेषं यावत् विजयस्कन्धावारनिवेशं करोति, कृत्वा वर्द्धकिरत्नं शब्दयति, शब्दयित्वा एवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुपिय ! मम आवासं पौषधशालां च कुरु मम पतामाक्षप्तिकां प्रत्ययर्पय ।सू० ८॥ टीका-'तए ' इत्यादि । 'तए णं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं' ततः खलु स भरतो राजा तद्दिव्यं चक्ररत्नम् 'दाहिणपच्चत्थिमं दिसिं' दक्षिणपाश्चात्यां दक्षिणपश्चिमां दिशं नैऋत्यकोणं पति 'वरदामतित्थाभिमुहं पयातं चावि पासइ' वरदामतीर्थाभिमुखं प्रयातं चापि पश्यति पासित्ता' दृष्ट्वा 'हट्ट तुट्ट० कोडुंबियपुरिसे सदावेई' हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः सन् कोटुम्बिकपुरुषान् प्रधानराजसेवकान् शब्दयति आहेयति 'सदावित्ता' शब्दयित्वा-आहूय 'एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् 'तएणं भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं', इत्यादि टीकार्थ-(तएणं) इसके बाद (भरहे राया) भरत राजा ने जब (तं दिव्वं चक्करयणं) उस दिव्य चक्ररत्न को (दाहिण पच्चत्थिमं दिसि वरदामतित्याभिमुहं पयायं चावि पासइ) दक्षिण-पश्चिम दिग्वर्ती नैऋत्यकोण की ओर वरदाम तीर्थ की तरफ जाते हुए देखा--तब (पासित्ता हट्ठ तुट्ठ कोडुंबियपुरिसे सदावेइ) देखकर उसने अपने कौटुम्विक पुरुषों को, प्रधान सेवकों को बुलाया (महावित्ता एवं वयासी) और बुलाकर उसने ऐसा कहा-(विप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! हय 'तपणं भरहे राया त दिव्वं चक्करयणं' इत्यादि सू० ॥८॥ (त एणं) त्या२ माह (भरहे राया) सरत २ यारे (तं दिव्वं चक्करयण) a यनने (दाहिणपच्चस्थिम दिसि वरदातित्थाभिमुहं पयायं चावि पासइ) इक्षिण पश्चिम हिता नैऋत्य र त२३ १२४ाम तीर्थ त२३ raiयु त्यारे (पासित्ता हट्ठ तुकृ कोई. बिय परिसे सहावेइ) बनते पाताना टु४ि पुरुषाने, प्रधान राम सेवनासाव्या. Page #626 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६१२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे उक्तवान् 'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया !' क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! 'हयगयरहपवरचाउरंगिणिं सेणं सण्णाहेह', हयगजरथप्रवरचातुरङ्गिणों सेनां सन्नाहयत-सज्जीकुरुत , 'आभिसेक हत्थिरयणं पडिकप्पेह' आभिषेक्यं हस्तिरत्नं प्रतिकल्पयत 'त्तिकटु मज्जणघरं अणुपविसई' इतिकृत्वा इति कथयित्वा मज्जनगृहम् अनुप्रविशति 'अणुपविसित्ता' अनुप्रविश्य 'तेणेव कमेणं नाव धवलमहामेहणिग्गए' तेनैव क्रमेण पूर्वोक्तस्नानाधिकारसूत्रपरिपाटया स्नानादिविधं समाप्य यावत् धवलमहामेघनिर्गतश्चन्द्र इव सुधाधवलीकृत मज्जनगृहात् स चक्री-भरतो निर्गच्छतीतिभावः । तदनन्तरं नरपतिश्चक्री भरतो गजपतिमारोहति केन सहित आरोहतीत्याह-'जाव सेयवर चामराहिं उद्धव्यमाणीहिं उद्धव्यमणीहि' यावत् सकोरण्टमाल्यदाम्ना छत्रेण ध्रियमाणेन सहितस्तथा श्वेतवरचामरः अग्रतः पृष्ठतः पार्श्वयोश्च चतुर्भिः प्रकारकैः स्वच्छश्रेष्ठ चामरेरुद्धूयमानै-रुद्धयमानैः-वीज्यमानैवींज्यमानैः सहितः स नरपतिः गजपति मारोहति इतिभावः । अथ यथाभूतो भरतो वरदामतीर्थ गय रह पवर चाउरंगिणिं सेणं-तण्णाहेह) हे देवानुप्रियो ! तुम लोग शीघ्र हो हय-घोड़ा ओं से हाथियों से रथों से एवं प्रबल श्रेष्ठ योधाओं से युक्त चातुरंगिणी सैन्य की तैयारी करोअर्थात् उसे सजाकर तैयार रखो तथा (आभिसेक्कं हत्थिरयणं पडिकप्पेह तिकटु मजणवरं अणुपविपइ) आभिषेक्य-राजा के सवारी के योग्य हस्तिरत्न को भी सजाओ। ऐसा कहकर वह मज्जनगृह में-स्नानघर में- प्रविष्ट हो गया-(अणुपविसित्ता) मज्जनगृह में प्रविष्ट होकर (तेणेव कमेणं जाव धवलमहामेहणिग्गए जाव सेयवरचामराहिं उद्धृत्वमाणीहिं २ ) वह भरत चक्री पूर्वोक्त स्नानाधिकार सुत्र परिपाटी के अनुसार स्नानादिविधि को परिसमाप्त कर के यावत् धवलमहामेध से निर्गत चन्द्रकी तरह धवलीकृत उस मज्जनगृहसे निकला और निकल कर फिर वह गजपति पर आरूढ हुआ जब वह गजपति पर बैठ गया तब उसके ऊपर छत्रधारियों नेकोरन्ट पुष्पों की मालाओं से युक्त छत्र तान दिये । तथा आगे से पिछे से और दोनों पार्श्व भागों से (सहावित्ता एवं वयासी) अन मासावीन तमने प्रमाण यु-(खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! हयगयरहपवरचाउरंगिणिं सेण्णं सण्णाहेह ) देवानुप्रिया! तम यथा શીધ્ર યો–ઘોડા, ગજ, રથ તેમજ પ્રવર શ્રેષ્ઠ યોદ્ધાઓથી યુક્ત ચાતુરંગિણ સેના સુસજિત हसरत सु रीने तयार से. तथा-(अभिसेक्कं हत्थिदयणं पडिकप्पेह तिकटटमजणवरं अणुविसइ) समप्रत्य साना सवाशया५तिरत्नन ५५ सुस। २। भाभहीने मन भा-स्नान उभा प्रविष्ट था. (अणुपविसित्ता) भनन मां प्रविष्ट थन (तेणेव कमेणं जाव धवलमहामेहणिग्गए जाव सेयवरचामराहिं उद्धवमाजीहि २) ते भरत ती पूर्वात स्नानाधि४२ सूत्र परियारी भु ना विधिन વતાવીને યાવત ધવલ મડામેઘથી વિનિર્ગત ચન્દ્રની જેમ ધવલી કૃત તે મજજન ગૃહમાંથી બહાર નીકળ્યા અને નીકળીને પછી તે ગજપતિ ઉપર આરૂઢ થેયે. જ્યારે તે ગજપતિ ઉપર બેસી ગયો ત્યારે તેની ઉપર છત્રધારકે એ કરંટ પુષ્પની માળાઓથી યુક્ત છત્રો તાયાં. તેમજ આગળ-પાછળ અને બને પાશ્વભાગ તરફ ચામર ઢાળનારાઓએ શ્વેત Page #627 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका त. वक्षस्कारः सू०८ भरतराज्ञः वरदामतीर्थाभिगमननिरूपणम् ६१३ प्राप्तः यथा च वरदामतीर्थ स्कन्धावारनिवेशमकरोत्तथाह-अत्र सूत्रे वाक्यद्वयं, तत्र चादिवाक्ये तहेव सेसं' इत्यतिदेशपदेन सूचिते सूत्रे 'जेणेव वरदामतित्ये तेणेव उवागच्छई' इत्यनेन अन्वयः कार्यः स भरतो यत्रैव वरदामतीथै तत्रैव आगच्छति, द्वितीयवाक्ये च 'विजयखंधावारणिवेसं करेइ' इत्यनेनान्वयः किं लक्षणः स राजा इत्याह -'माइय' इत्यादि 'माइय वरफलय पवरपरिगर खेडयवरवम्म कवयमाहोसहस्सकलिए' हस्तपाशित वरफलक प्रवरपरिकरखेटकवर वर्म कवयमाढयसहस्रकलितः, तत्र-'माइय' त्ति देशीयशब्दः हस्तयाशितार्थे तेन हस्तपाशितं वरफलकं ढाल' इति नाम्नालोके प्रसिद्ध येषां ते तथा प्रवरः परिकरः-प्रगाढ गात्रिकाबन्धः खेटकं च वंशशलाकादिमयं येषां ते तथा वरवर्मकाचमाढयः-सन्नाहविशेषा येषां ते तथा ततः पदत्रयस्य कर्मधारयः तेषां सहस्रः-वृन्दवृन्दैः समूहै: कलितो युक्तो यः स तथा, राज्ञां हि संग्रामप्रयाणसमये युद्धाङ्गानां सह सश्चरणस्यावश्यकत्वात् पुनश्च कीदृशः 'उकडवरमउडतिरीडपडागझयवेजयंति चामरचलंतछत्तधयारकलिए' उत्कटवरमुकुटकिरीटपताकवनवैजयन्ती चामर चलउसके ऊपर चामर ढोरने वालों ने श्वेत चामर ढोरना प्रारम्भ करदिया। अब सूत्रकार यह प्रकट करते हैं कि वह भरत चक्रो कैसा होकर वरदामतीथे पर गया और किस तरह से उसने वरदामतीर्थ पर अपने स्कन्धावार को ठहराया तथा वह भरत चको कैसा था? अब पहिले भरत चको के सम्बन्ध में ही विशेषणों द्वारा उसकी विशेषता प्रकट की जाती है । (माइय वरफलय पवरपरिंगर खेडेय वरवम्मकवयमाढीसहस्तकलिए) यहां "माइय" यह देशो शब्द है और यह हाथ में पकड़ने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इस तरह जिन्होंने अपने-अपने हाथों में वरफलक-ढाल ले रखी है, श्रेष्ठ कम्मर बन्ध से जिनका कटिभाग खूब कसकर बचा हुआ है । तथा वंश की शलाकाओं से निर्मित जिनके खेटके-बाण हैं, एवं दृढवद्ध कवच-जहर वख्तर-से जो सज्जित हैं ऐसे हजारों योधाओं से वह भरत चक्रो युक्त था (उक्कड वरम उड तिरोडपडाग झय वेजयंति चामरचलंतछत्तंधयारकलिए) उन्नत एवं प्रवर-श्रेष्ठ मुकुट-राजचिह्नविशेषित शिरोभूषण किरीट શ્રેષ્ઠ ચામર ઢળવા માંડૂયા. હવે સૂત્રકાર એ વાત પ્રકટ કરે છે કે તે ભરત ચકી કે થઈ ને વરદામ તીર્થ ઉપર ગયે અને કેવી રીતે તેણે વરદામ તીર્થ ઉપર પોતાના સ્કન્ધાવારનો પડાવ નાખે. તેમજ તે ભરતચક્રી કે હતો કે હવે સર્વપ્રથમ વિશેષણો વડે ભરતચક્રીના स ni विशेष प्रगट तय सूत्रा२ ४ छ (माइयवर फलय पवरपरिगरखेडयवरवम्मकवय माढीसहस्सकलिए) मला 'माइय' से शी श६ छ भने हाथमा ५४७१। માટેના અર્થમાં પ્રયુક્ત થયેલ છે. આ પ્રમાણે જેમણે પોત-પોતાના હાથ માં વરફલકેઢાલલઈ રાખી છે, શ્રેષ્ઠ કમરબંધથી જેમને કટિ ભાગ બહુ જ કસીને બાંધવામાં આવ્યું છે. તેમજ વંશની શલાકાઓથી નિર્મિત જેમના ખેટકે-બાણે છે–તેમજ દઢ બદ્ધ કવચઅર્થાત્ જે મજબૂત કવચથી સુસજિજત છે. એવા સહો દ્ધાએથી તે ભરતચકી યુક્ત हतो. (उक्कड वरमउडतिरोडपड़ागझयवेजयंति चामरचलंतछत्तंधयारकलिप) उन्नत તેમજ પ્રવર શ્રેષ્ઠ મુગુર-રાજચિન્હ વિશેષિત શિરાભૂષણ કિરીટ-સદશ શિરોભૂષણ પતાકા For Privata & Personal Use Only Page #628 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे च्छत्रान्धकारकलितः, तत्र - उत्कटवराणि उन्नतप्रवराणि मुकुटानि राजचिन्हविशेषितशिरोभूषणानि किरीटानि मुकुदसदृश शिरोभूषणानि पताका लघुपटरूपा, ध्वजा बृहत्पटरूपाः वैजयन्त्यः पार्श्वतः लघुपता कि काद्वयसंयुक्ताः पताका एव, चामराणि तथा चच्छत्राणि च तेषां सम्बन्धि यदन्धकारं - छायारूपम् तेन कलितः युक्तः, अत्र अन्धकारशब्देन मुकुटादीनां छाया गृह्यते, तेन आत्मजनितक्लेशरहित इति भावः पुनर्भरतमेव विशिनष्टि(असिखेवणि खग्गचावणारायणयकप्पणिसूललउड भिंडिमालधणुह लोग सरपहरणे हि य) अक्षेिपणी खड्गचापनाराचकणककल्पनी शूललगुडभिन्दिपालधनुस्तूण शरप्रहरणैश्च (सहिए) संयुक्तः तत्र असय: -खड्गविशेषाः क्षिप्यन्ते सीसकगुटिका याभिरिति क्षेपिण्यः (गोफण ) इति लोकप्रसिद्धाः, खड्गाः सामान्यतः, चापाः धनुंषि नाराचा:- सर्वलोहबाणाः, कणकाः वाणविशेषाः कल्पन्यः लघुखड्गाः शूलानि प्रसिद्धानि लगुडाः यष्टिविशेषाः भिन्दिपालाः हस्तक्षेप्याः महाफला दीर्घा आयुधविशेषाः, धनूपि वंशमयबाणासनानि, तूणाः - तुणीराः बाणकोशा इत्यर्थः शराः - सामान्य बाणाः इत्यादिभिः प्रहरणैश्च किमाकारकैरुक्तप्रहरणैः कलित इत्याह- ( काळणील) इत्यादि (काळणील रुहिर पीय सुल्लि अनेगचिंधसयसण्णिविद्वे) काल नीलरुधिरपीतशुक्ला ने कचिन्हशत सन्नि ફર્જી मुकुट सदृश शिरोभूषण पताका लघुपताकाएँ, ध्वजाएँ बड़ोर पताकाएँ, वैजयन्ति पार्श्वभाग में छोटी २ दो पताकाओं से युक्त पताकाएँ, चामर एवं छत्र इनकी छाया से वह युक्त है (यहां अंधकार पद से मुकुटादिकों की छाया गृहित हुई है अतः इस प्रकार के कथन से आतपजनित क्लेश से रहित वह भरत चक्री प्रकट किया गया है ) ( असिखेवणि खग्ग चाव णारायकणय कप्पणिसूल लउडभिंडिमालधणुह तोण सरपहरणेहिय) असि तलवार विशेष, क्षेपणी-गोफन, खड्ग सामान्य तलवार, चाप - धनुष, नाराच - सर्प रूप से बने हुए लोहे के बाण, कणक - वाणविशेष कल्पनी लघुखङ्ग, शूल, लगुड- यष्टि विशेष, भिन्दिपाल - वल्लम महाफलवाला लम्बा आयुधविशेष धनुष - वंशमय बाणासन, तूण - माथा, शर- सामान्य बाण, इन सब प्रहरणों से जो कि (कालनील रुहिर पिय सुक्किल्ल अणेगचिंधसयसण्णिविट्ठे) काले, नोले, लाल, पीले और सफेद सघुपताभो, ध्वन्यो विशाल पता थे। वैश्यंती पार्श्वभागमा नानी-नानी मे पताઆથી યુક્ત પુનાકાએ ચામર તેમજ છત્ર એ સવ ની છાયાથી તે યુક્ત હતા, (અડી અધકાર પદ્મથી મુકુટાદિકાની છાયા ગૃહીત થઈ છે, એથી આ જાતના કથનથી આતપ જનિત કલેશથી रहित ते भरतयी प्रवास छे ) ( असिखेव णिखड़गवावणारायणय कप्पणि सूललउडभि डिमालधणुद्दतोण सरपहरणेहिय) असि अवर विशेष क्षेपणी जे ধুशु, अग- सामान्य तलवार न्याय-धनुष्य, नाराय-याउनु ने अ-मालुવિશેષ, કલ્પનીલ-ખડૂગ-શૂલ લગુડ યષ્ટિ વિશેષ ભિન્દિપાલ-બલમ-મહાલક ચુકતસુદીધ આયુવિશેષ ધન-વ’શમય ખાણાસન. તૃણ-તુણીર, શર્-સામાન્ય માણુ, એ સવ હરણાથી (कालणीलरुहिरपीय सुविकल्ल अणेगविधसयस णिविट्ठे) अजा, नीला, सास, चीजा અને શ્વેત રંગામા અનેક સહસ્રો ચિહ્નોથી યુક્ત હતાં એટલે કે એ સર્વે ચિન્હા જાતિની डे Page #629 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू०८ भरतराज्ञः वरदामतीर्थाभिगमननिरूपणम् ६१५ विष्टम्, तत्र - रुधिरशब्दो रक्तार्थे प्रयुक्तः तेन कालनीलरक्तपीतशुक्लवर्णानि जातितः पञ्चवर्णानि व्यक्तितस्तु तदवान्तरभेदात् अनेकरूपाणि यानि चिन्हशतानि तानि सन्नि विष्टानि स्थापितानि यस्मिन् तत्तथा तत् यथास्यात्तथेति क्रियाविशेषणतया बोध्यम् । कोऽर्थः ? राज्ञां हि शस्त्राध्यक्षास्तत्तज्जातीयतत्तदेशीयशस्त्राणां तस्यैव परिज्ञानाय शस्त्रकोशेषु उक्तरूपाणि चिन्हानि निवेशयन्ति शस्त्रेषु च तत्तद्वर्णमयान् कोशान् कुर्वन्तीत्यर्थः, :, पुनश्च राजसामग्री कथनद्वारा भरतराजानमेव विशिनष्टि (अष्फोडिय सीहणाय छेलिय हयहेसिय हत्थिगुलगुलाइय अणेग रहसयसहस्सघणघणे तणी हम्ममाणसदसहिण ) आस्फोटित सिंहनादसेंटित हयहेषित हस्तिगुलुगुलायिताने करथशतसहस्रघनघनेति निहन्यमानशब्दसहितेन, तत्र आस्फोटितं भुजास्फोटरूपं सिंहनादः सिंहस्येव शब्दकरणम् 'छेलिय' त्ति सेंटितं हर्षोत्कर्षेण सीत्कारकरणम् हयहेषितम् हणणेति तुरङ्गशब्दः, हस्तिगुलगुलायितं - गजगज्जितम् अनेकानि यानि रथशतसहस्राणि लक्षपरिमितानि तेषाम् 'घणघणत' त्ति घणघणशब्दः, अयं स्थानामनुकरणशब्दः तथा निहन्यमानानामश्वानां च तोत्रादि शब्दास्तैः सहितेन तथा 'जमग समगर्भभारंगों के अनेक सैकड़ो चिन्हों से युक्त थे अर्थात् ये सब चिह्न जातो की अपेक्षा पांच वर्णों के ही थे परन्तु व्यक्ति की अपेक्षा अवान्तर भेदों को लेकर ये सैकड़ों की संख्या में थे क्योंकि ऐसा देखा जाता है कि राजाओं के शस्त्राध्यक्ष तत्तज्जातीय तत्तद्देशीय शस्त्रों के परिज्ञान के निमित्त शस्त्रकोशों के ऊपर उक्तरूप वाले चिह्न बना देते हैं और शस्त्रों के ऊपर भी तत्तद्वर्णमय अनेक चिह्न कर दिया करते हैं ऐसे शस्त्रों से वह भरत चक्री युक्त था, तथा (अप्फोडियसीहणाय छेत्रिय हयहेसियःश्रिगुलगुलाइय अणेगरहसय सहस्सघणघणे तणी हम्ममाणसद्द सहिएण) जब भरत चक्र) इस सत्र युद्ध सामग्री से युक्त हुआ चला जा रहा था उस समय उसके साथ के कितने योद्धाजन भुजाओं को ठोकते हुए साथ में चल रहे थे । कोइर योद्धा जन सिंह के जैसे शब्दों की ध्वनी करते हुए चले जा रहे थे । कोइ२ योद्धा हर्ष के उत्कर्ष से सीत्कार शब्द करते हुए आगे बढ रहे थे। साथ में घोड़ाओ की हिनहिनाहट के शब्द गूंज रहे थे । हस्तिगुलगुलायित हाथियों की चिंघाड होती जा रही थी, लाखों रथों की चित्कार ध्वनि निकल रही थी । અપેક્ષાએ પાંચ વષ્ણુના જ હતાં, પરંતુ વ્યક્તિની અપેક્ષાએ અવાન્તર ભેદથી એ સહસ્રોની સંખ્યામાં હતાં કેમકે આમ જોવામાં આવે છે કે રાજાએ)ના શસ્ત્રાધ્યક્ષ તત્તજાતીય, તત્તદેશીય શસ્ત્રોના પરિજ્ઞાન-નિમિત્ત શસ્ત્રકે શાની ઉપર ઉપર્યુક્ત ચિન્હા મનાવી દે છે. અને શસ્ત્રોની ઉપર પશુ તંત્તદ્વણુ મય અનેક ચિન્હા કરી નાખે છે. એવાં શસ્ત્રોથી તે ભરત ચક્રી युक्त हुतो. ते ( अप्फोडियसीहणाय छेलियहयहेसिय हत्थि गुलगुलाइय अणेगरहस्यसदस्स घणघणतणीहम्मूमाणसद्द सूहिरण) क्यारे भरत यही भाजी युद्ध-सामग्री था સુસજ્જ થઈને જઈ રહ્યો હતેા, તે સમયે તેની સાથેના કેટલાક ચાહા ભુજા ઠાકતા એટલે કે યુદ્ધ માટે અમે તત્પર છીએ આ જાતના ભાવ વ્યકત કરતા સાથે ચાલી રહ્યા હતા. કેટલાક ચાન્દ્રાએ સિંહ જેવી ગર્જના કરતા ચાલી રહ્યા હતા, કેટલાક વૈદ્ધા હર્ષાવિષ્ટ થઈને સીત્કાર શબ્દ કરતા-કરતા આગળ ધપી રહ્યા હતા. ઘેાડાએ ના હુણુહણાટથી દિશાએ વ્યાપ્ત થઈ રહી હતી, ચુસ્તિ ગુલલાયિત-હાથીએની ચીલથી મહાશબ્દ થઈ રહ્યો Page #630 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६१६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे होरं भकिणित खरमुहिमुगुदसंखिय पिरली बच्चगपरिवाइगि वंसवेणुविपंचि महति कच्छविभिरियारिगसिरिगतलतालसताल करघाणुत्थिरण' यमकसमकभम्भाहोरम्भावाणिता स्वरमुखो मुकुन्द शखिका पिरलीपच्चकारिवादिनी वंशवेणुविपञ्ची महती कच्छपी भारती रिगसिरिकानलतालकांस्यतालकरध्मनोत्थितेन, तत्र 'जमगसमगे' ति-युगाद्वाद्यमानेभ्यः भम्भा-ढक्का, होरम्भा-महाढक्का, क्यणिता-काचिद् बीणा स्वरमुखी काहलीति प्रसिद्धाः, मुकुन्दो मुरनविशेषः, शखिका-लघुशङ्खरूपा पिरलीवच्चकौ-तृणरूपवाद्य विशेषौ, परिवादिनो सप्ततन्त्रीवोणा वंशः-प्रसिद्धः, वेणुवंश विशेषः, विपञ्चीतितन्त्री वीणा महतीसप्ततन्त्रीका कछपी-कच्छपाकारो वाद्यविशेषः, भारतीवीणा, रिगसिरिका-घर्यमाणवादिनविशेषः, तलं-हस्तपुटं तालाः वाद्यविशेषः, कांस्यताला:-प्रसिद्धाः, करध्मानं-परस्परं हस्तताडनम् एतेभ्यो वादितवाद्यविशेषेभ्य उत्थितेन निःसृतेन उत्पन्नेनेत्यर्थः 'महया सद्दसण्णेिणादेणं' महता शब्दसन्निनादेन तत्र महता विपुलेन शब्दसन्निनादेन ध्वनिप्रतिध्वन्यात्मकेन 'सयलमवि सईसजनों द्वारा घोडों को ताडनां के निमित्त प्रयुक्त किये गये कोड़ो का आबाज भर्स रही थी। तथा ( जमगसमग भंभा होरंभ किणित खामुहि मुगुंदसंवियपिरली कचग परि वाणि वं वेणु विपंचि महतिकच्छ विभिरिया रिंगसिरिगतलतालकंसताल करधाणुस्थिएण) एक साथ वजाये गये भंभा-ढक्का, होरम्भा-महाढक्का, कूणिता-वीगा, खर मुखी- काइलो, मुकुन्द - मुरज विशेष, शङ्खिका-छोटी शंखी, पिरली, वच्चक(ये दोनों वाद्यविशेष घासके तृणों से बनाये जाते हैं) परिवादिनी-सप्ततन्त्री वीणा,वंश-वांसुरी, वेणु-विशेष प्रकार की वांसुरी, विपञ्चो-वीणा महती-कच्छपो-सात तारोंवाली कच्छपकेजैसे आकार की वीणा-तमूरा, भारती वीणा, रिगतिरिका घिसने पर जो वजता है ऐसा वाचविशेष, तर हथेली की आवाज, जिसे ताल कहा जाता है कांस्यताल एवं करध्मान- प्रापस में हाथों का ताडन इन सबके रन्पन हुए (महया सह सन्निनादेन) विपुल शब्दों की ध्वनि एवं प्रतिधनि होती नारहो थो इससे (मय उमवि जीवलोयं હતો. સાઈ વડે ઘડાઓની તાડના-નિમિત્ત જે કોડાએ ફટકારી રહ્યા હતા તેને અવાજ 25 रखी तो तमस (जमग-समग भंभा होरंभ किर्णित खरमुहि मुगुद संखियपिरलीवच्चग परिवाइणि वसवेणुविपंचि महति कच्छविभिरियारिगसिरिग तलतालकंसतालकर धाशुन्थिएण) येही साथे 4113414 मावा AHI-681, २ मा - माद, शित.-वी। भरभुड़ा-दी, भुन्ह-भु२४ Cशष, श४ि-छोटी-शमी, विरी, वय (सन्या पन्न વાદ્ય-વિશે ઘાપના તૃણોથી બનાવવામાં આવે છે.) પરિવાદિની-સતન્ની વીણુ,-વંશ વાંસળી વેણુ-વિશેષ પ્રકારની-વાં મળી, વિચી-વીણા, મહતી-કુછવી–સાતતારોવાળી છપ જેવા આકારવાળી વીણ, તંબૂરો, ભારતી વીણ, રિગસિરિકા-ઘસવાથી જે વાગે છે એ જાતનું વાઘવિશેષ, તલ-હથેળીના અવાજ કે જેને તાલ કહેવામાં આવે છે, કાંસ્યતાલ તેમજ કરपान-५१२५२ थानु तन, में अब भी उत्पन्न थये। (महया सहसन्निनादेन) विधु शहाने पनि मन प्रतिवान शह 25 २यो हता, मेथी (सयलमवि जीवलोयं परयंते) Page #631 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ वक्षस्कारः सु० ८ भरतराशः घरदामतीर्थाभिगमननिरूपणम् ६१७ जीवलोयं पूरयंते' सफलमपि जीवलोकं पूरयन् 'बलवाहणसमुदएणं' बलवाहनसमुदयेन, तत्र बलं चातुरङ्गसैन्यम्, वाहन-शिविकादि, एतयोः क्रमेण यः समुदयः समूहः वेन युक्तो भरतः पुनश्च कीदृशः 'एवं जक्खसहस्सपरिवुडे वेसमणे चेव धणवई' एवम् अमुना प्रकारेण 'जक्ख सहस्सपरिवुडे' यक्षसहस्रपरिवृतः यक्षाणां देवविशेषाणां सहस्त्र संपरिवृतः 'वेसमणे चेव धणवई' वैश्रमणः धनपतिरिव कुबेर इव सम्पत्तिशाली भरतोऽपि यक्षसहस्रद्वयसंपरिवृतः चक्रवर्तिशरीरस्य व्यन्तरदेव सहस्त्रद्वयाधिष्टितत्वादितिभाव: तथा 'अमरवइ सण्णिभाए इडूढीए पहियकित्ती' अमरपतेः इन्द्रस्य सन्निभया सदृश्या द्धया प्रथितकीतिः, प्रख्यातकीतिः 'गामागरणगरखेडकब्बडतहेव सेसं जाव विजयखंचावारणिवेसं करेइ' अत्र 'तहेव सेसं' इत्यतिदेशपदेन सूचितानि यावत् पदान्तरगतानि च सर्वाणि विशेषणानि सुलभतया ज्ञानार्थम् एकीकृत्य लिख्यन्ते यथा 'गामागरणगरखेडकब्बडमडंबदोणमुह पट्टणासमसंवाहसहस्समंडियं थिमियमेइणीयं वमुई अभिजिणमाणे अभिजिणमाणे अग्गाई वराई रयणाई पडिच्छमाणे पडिच्छमाणे तं दिव्वं चक्करयणं अणुगच्छमाणे अणुगच्छमाणे जोयणंतरियाहि वसहीहि वसमाणे वसपाणे जेणेव वरदामतित्थे तेणेव उवागच्छइ' ग्रामाऽऽकर नगरखेटकर्बटमडम्बद्रोणमुखपत्तनाश्रमसंवाहसहस्त्रमण्डितां स्तिमितमेदनीकां वसुधाम् अभिजयन् अभिजयन् अग्र्याणि वराणि रत्नानि प्रतोच्छन् प्रतीच्छन् तद्दिव्यं चक्ररत्नम् अनुगच्छन् अनुगच्छन् योजनान्तरिताभिर्वसतिभिर्वसन् वसन् यत्रैव वरदामतीर्थः तत्रैव उपागच्छति तत्र ग्राम:प्रसिद्धः, आकरः-खनिः नगरं प्रसिद्धम् 'खेड' खेटम्-धूलिप्राकारयुक्तं लघुनगरम्, पूयंते) वह भरत चक्रो सकल जीवलोक को व्याप्त कर रहा था तथा (बलवाहणसमुदएणं) बल -चतुरङ्ग सैन्य और वाहन शिबिकादि के समुदाय से वह भरत चक्रो युक्त था (एवं जक्खसहस्सपरिवुडे, वेसमणे चेव धणवई) अतएव हजार यक्ष से परिवृत हुए धनपति के जैसा सम्पति शाली वह भरत चक्री प्रतीत होता था क्योंकि चक्रवर्तीका शरीर दोहजार व्यन्तर देवों से अधिष्ठित होता है (अमरपति सण्णिभाइ इदीए पहियकित्ती गामागरणगरखेडकव्वड तहेव सेसं जाव विजयखंधावारणिवेसं करेइ) तथा इन्द्र के जैसी ऋद्धि से वह भरत चक्री प्रख्यात कीर्ति वाला था इस तरह होता हुआ वह भरतचक्री हजारों ग्रामों से हजारों खानों से-सुवर्णादि के भरत यही सब ने व्यास ४२ २pो हता, तया (बलवाहणसमुदपणं) waथत सैन्य अने पालन-शिनि पोरेना समुदायथा ते परत यी युतता (पवं जक्खसहस्सपरिवुडे, वेसमणे चेव धणवई) मेथी सहस याथी परिवृत्त थये शल ધનપતિ જે સમ્પત્તિશાલી લાગતો હતો. કેમકે ચક્રવતીનુ શરીર બે હજાર વ્યન્તર દેવેથી अधिष्ठित डाय छ. (अमरपतिसण्णिभाए इद्धीए पहियकित्ती गामागरखेडकब्बड तहेव सेसं जाव विजयखंधावारणिवेसं करेइ) तथा चन्द्र २वी ऋद्धिथी सरत यही अभ्यात કીર્તિવાળા હતા. આ પ્રમાણે સુસજજ થઈને તે ભરત ચાકી સહસ્ત્રો ગ્રામેથી સહસ્ત્ર ખાણેથી Page #632 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्योपप्राप्तिसूत्रे यद्वा नदीभिः पर्वतैर्वा वेष्टितं नगरम्, 'कव्वड' कर्बट कुत्सितनगरम् ‘मडंब' मडम्बो ग्रामविशेषः यस्य चतुर्दिक्षु. सार्ध योजनद्वयपर्यन्तं द्वितीय ग्रामो न भवेत् सः 'दोणमुह' द्रोणमुखम, जलस्थलमार्गकं नगरम् ‘पट्टण' पत्तनम्-सर्ववस्तु प्राप्तिस्थानम् 'आसम' आश्रम: तापसादे निवासस्थानम् 'संवाह' संवाहः दुर्गविशेषः यत्र कृषीवलाः धान्यादीनि रक्षितुं स्थापयन्ति एतेषां 'सहस्स मंडियं' सहस्त्रैर्मण्डिताम् 'थिमियमेइणीयं' स्तिमितमेदिनीकाम्, स्तिमिता स्थिरा मेदिनी जनसमूहः यस्यों सा तथा ताम् 'वसुहे' वसुधाम् 'अभिजिणमाणे' २ अभिजयन् अभिजयन् अन्यराजाधिकारात् बलात् स्वाधिकारे आनयन् २ 'अग्गाईवराई रयणाई पडिच्छमाणे पडिच्छमाणे' अग्र्याणि प्रधानानि वराणि श्रेष्ठानि रत्नानि प्रतीच्छन् प्रतीच्छन्-स्वीकुर्वन् स्वीकुर्वन् 'तं दिव्वं चक्करयणं अणुगच्छमाणे अणुगच्छमाणे' तदिव्यं चक्ररत्नम् अनुगच्छन् अनुगच्छन् तत्पृष्ठतो व्रजन् व्रजन् 'उवागच्छइ' उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'वरदामतित्थस्स अदरसामंते दुवालसजोवणायाम णवजोयण वित्थिन्नं विजयखंधावारणिवेसं करेइ' वरदामतीर्थस्य 'अदरसामन्ते उत्पत्तिस्थानोंसे-धूलि प्राकार युक्त हजारों लघुनगरों से अथवा नदियों से या पर्वतों से परिवेष्टित नगरों से, हजारों कर्वटों से-कुत्सिननगरों से चारों दिशाओ में सार्धयोजन द्वय तक द्वितीय ग्राम रहित मडम्बो से, जलस्थल मार्गवाले द्रोणमुखो से सर्ववस्तुओं की प्राप्ति के स्थानभूतपत्तनों से, माश्रमांसे-तापसादिके निवासभूत स्थानों से तथा जहां पर कृषकवर्ग धान्यादिकों के रक्षानिमित्त स्थापित करते हैं ऐसे संवाहो से मण्डित, एवं जनसमूह जिसमें स्थिर है ऐसी मेदिनी-वसुधा को अपने अधिकार में लेता २ तथा श्रेष्ठ रत्नों को नजराने के रूप में स्वीकार करता २ तथा दिव्य चक्ररत्न के पोछे २ चलता २ तथा एक योजन के अन्तराल से पडाव डालता २ जहां वरदाम तीर्थ था वहां पर आया । यहां पर इस पूर्वोक्त व्याख्या का मूल पाठ ऐसा है-(गामागरणगरखेडकब्बडमडंबदोणमुहपट्टणा समसंवाहसहस्समंडियं थिमियभेइणीयं, वसुहं अभिजिणमाणे २ अग्गाई वराई रेयणाई पडिच्छमाणे २ तं दिव्वं चक्करयणं अणुगच्छमाणे २ સુવર્ણાદિકના ઉત્પત્તિ સ્થાનેથી ધૂલિ પ્રાકાર યુકત સહસ્ત્રો લઘુ નગરથી અથવા નદીએથી કે પર્વતેથી પરિવેષ્ટિત નગરથી સહસ્ત્ર કબૂટોથી-કુત્સિત નગરથી, ચારે દિશાઓમાં સાદ્ધજનશ્ચય સુધી દ્વિતીય ગ્રામ રહિત મર્ડથી, જલ સ્થલ માર્ગવાળા દ્રોણામુખેથી સર્વવસ્તુઓ મળી શકે એવા પ્રાપ્તિ સ્થાન ભૂત પત્તનેથી આશ્રમથી-તા પસાદિના નિવાસભૂત સ્થાનેથી તેમજ જ્યાં કૃષકવર્ગ ધાન્યાદિકની રક્ષા માટે નિર્મિત કરે છે એવા સંવાહાથી, મંડિત તેમજ જનસમૂડ જેમાં સ્થિર છે એવી મેદિની-વસુધાને પિતાને આધીન બનાવતે તેમજ શ્રેષ્ઠ રને નજરાણાના સ્વરૂપમાં સ્વીકાર કરત–તેમજ દિવ્ય ચક્રરત્નની પાછળ-પાછળ ચાલતા ચાલતે તથા એક યાજનેના અંતરાલથી પડાવ નાખતા–નાખતે જ્યાં વરદામ તીર્થ હતું ત્યાં આવ્યો. અહીં એ પૂર્વોક્ત વ્યાખ્યાને મૂળપાઠ આ પ્રમાણે છે(गासागरणगरखेडकब्बडमडंब-दोणमुहपट्टणासमसंवाहसहस्समण्डियं थिमियमेइणीयं, वसुई अभिजिणमाणे २ अग्गाई वराई रयणाई पडिग्छमाणे २ तं दिव्वं चक्करयणं अणुग Page #633 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका टं० वक्षस्कार: सू०८ भरतराज्ञः वरदामतीर्थाभिगमननिरूपणम् ઘર नातिदूरे नातिसमीपे यथोचितस्थाने द्वादशयोजनायामं नवयोजनविस्तीर्ण विजयस्कन्धावारनिवेशं करोति 'करिता' कृत्वा 'बद्धइरयणं सदावेइ' वर्द्धकिरत्नं शब्दयति आह्वयति 'सद्दावित्ता' शब्दयित्वा आहूय ' एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् 'विपामेव भो देवाणुपिया ! मम अवसई पोसहसालं च करेहि ममेय यमाणत्तियं पच्चविणाहि' क्षिप्रमेव भो देवानुप्रिय ! मम आवासं पौषधशालां च कुरु मम तामाज्ञप्तां प्रत्यय ॥०८ ॥ अथ राऽऽज्ञप्त्यनन्तरं कीदृशं वर्द्धकिरत्नं कीदृशं च वैनयिकमाचचारेत्याह - " तर णं से" इत्यादि । मूलम् — तरणं से आसमदोणमुहगामपट्टणपुरवरख्धावारगिहावर्णविभागकुसले एगासीति पयेसु सव्वेसु चैव वत्सु णेगगुणजाणए पंडिए विहिष्णू पणयालीसाए देवयाणं वत्थुपरिच्छाए मिपासेसु भत्तसालासु कोट्टणिसुय वासघरेसु य विभागकुसले छेज्जे वेज्झे य जोयतरिया वसहीहिं वसमाणे वसमाणे जेणेव वरदामतित्थे तेणेव उवागच्छ३) वहां आकर -के उसने वरदामतीर्थ के न अतिनिकट और न अतिदूर किन्तु यथोचितस्थान में १२ योजन चौड़ा और नो योजन लंबा ऐसा अपना विजयस्कन्धावार ठहरादिया इस सम्बन्ध में पाठ ऐसा है - ( उवागच्छित्ता वरदामतित्थस्स अदूरसामंते दुबालसजोयणायामं णवतोयणवित्थिन्नं विजयखंधावारणिवेसं करेइ) इतने विस्तीर्ण स्कन्धावार को ठहराकर फिर उसने अपने (बद्ध - रयणं सदावेइ) वर्द्धकी रत्न को बुलाया (सदावित्ता एवं वयासी) उसे बुलाकर के फिर उसने ऐसा कहा - ( खिप्पामेव भो देवाणुविया ! मन आवसहं पोसहसाव करेहि, ममेय माणत्तियं पञ्चपि s) हे देवानुप्रिय ! तुम शीघ्र ही मेरे निमित्त एक आवास और एक पौषधशाला बनाओ - फिर इसकी बन जानेपर मुझे खबर दो ॥सू०८ || च्छमाणे २ जोयणंतरियाहिं वसहीहिं वसमाणे वसमाणे जेणेव वरदामतित्थे तेणेव उवाરાજી) ત્યાં આવીને તેણે વરદામ તી'ની ન અતિનિકટ અને ન અતિદૂર પણ યથેાચિત સ્થાન પર ૧૨ ૨ાજન પહેાળા અને નવચેાજન દીઘ એવા વિસ્તૃત ક્ષેત્રમાં વિજય કન્યાवार नाथ्यो, या सौंध याप्रमाणे - ( उवागच्छित्ता वरदामतित्थस्स अदूरसामंते दुवाल सजोयणायामं णवजोयणवित्थिन्नं विजयखंधावारणिवेसं करेइ) भावा विस्तीर्षे २४न्धावार (सैन्य ) ना पडाव नाभी ने छी तेथे ताना ( वद्धइरयणं सहावेह) १द्धी २त्तने मासाव्या. (सद्दावित्ता एवं वयासी) तेने मोद्यावीने पछी रामसे आ प्रमाणे धु (खप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! मम आवसहं पोसहसालं च करेहि ! ममेय माणत्तियं पच्चपिजाहि) हे देवानुप्रिय ! तभे यथा शीघ्र भाग भाटे से भावास नमोः पौषधशाषी બનાવડાવે અને પછી મને સૂચના આપેલ. ટા & 3 Page #634 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६० जम्बुद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे दाणकम्मे पहाणबुद्धी जलयाणं भूमियाण य भायणे जलथलगुहासुजतेसु परिहासु य कालनाणे तहेव सद्दे वत्थुप्पएसे पहाणे गन्भिणि कण्णरुक्खवल्लिवेढियगुणदोसविआणए गुणड्ढे सोलसपासायकरणकुसले चउसट्टि विकप्पवित्थियमई गंदावत्तेय वद्धमाणे सोत्थिय रुअग तह सबआ भद्दसण्णिवेसे य बहु विसेसे उदंडिय देवकोट्ठदारुगिरि खायवाहणविभागकुसले इय तस्स बहु गुणद्धे थवइश्यणे परिंदचंदस्स। तवसंजमनिबिडे किं करवाणी तुवट्ठाई ॥१॥ सो देव कम्म विहीणा खंधावारं गरिंदवयणेणं । आवसहभवणकलियं करेइ सव्वं मुहुत्तेणं ॥२॥ करेत्ता पवरपोसहघरं करेइ करित्ता जेणेव भरहे राया जाव एतमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चप्पिणइ, सेसं तहेव जाव मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ ॥सू०९॥ ___छाया- ततः खलु तझाश्रमद्रोणमुखग्रामपत्तनपुरवरस्कन्धावारगृहापणविभागकुशलम् एकाशीतिपदेषु सर्वेषु चैव वास्तुषु अनेकगुणज्ञायकं पण्डितम्, विधिज्ञम् पञ्चचत्वारिंशतो देवानां वास्तुपरीक्षायां वास्तुपरिच्छदे वा नेमिपार्वेषु भक्तशालासु कोहनीषु च वासगृहेषु च विभागकुशलम् छेधे वेध्ये च दानकर्माणि प्रधानबुद्धिः, जलगानां भूमिकामा व भाजनं जलस्थलगुहासु यन्त्रेषु परिखासु च कालक्षाने तथैव शब्दे वास्तुप्रदेशे प्रधानम, गम्भिणो कन्यावृक्षवल्लिवेष्टितगुणदोषविनायकं गुणाढथं षोडशप्रासादकरणकुशलं चतु:पष्टिविकल्पविस्तृतमति नन्द्यावर्ते च वर्द्धमाने स्वस्तिके रुचके तथा सर्वतोभद्रसन्निवेशे च बहुविशेषम् उद्दण्डिकदेवकोष्टदारुगिरिखातवाहनविभागकुशलम् एतत् तस्य बहुगुणाढयं स्थपतिरत्नं नरेन्द्रचन्द्रस्य । तपः संजमनिविष्ट किं करवाणि इत्युपतिष्ठते ॥१॥ तद् देवकर्मविधिना स्कन्धावारं नरेन्द्रवचनेन ।। आवासभवनकलितं करोति सर्व मुहूर्तेन ॥ ५॥ कृत्वा प्रवरपौषधगृहं करोति, कृत्वा यत्रैव भरतो राजा यावत् एताम् आज्ञप्तिको क्षिप्रमेव प्रत्यर्पयति, शेषं तथैव यावत् मजनगृहात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाधा उपस्थानशाला यत्रैव चातुर्घण्टोऽश्वरथः तत्रैव उपागच्छति ॥ सू०९॥ Page #635 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकार्टीका ४० वक्षस्कारः सू० ९ आज्ञप्त्यनन्तरं वर्द्धकोरत्नस्य कौशल्यनिरूपणम् ६२१ टीका-"तए णं से" इत्यादि । 'तए णं से' ततः खलु तत् वर्द्धकिरत्नमहम् 'किंकरवाणा तु वहाइ' किंकरवाणि किं करोमि आदिशन्तु देवानुप्रिया मया किं कर्तव्य मित्युक्त्वा भरतचक्रिसमीपे उपतिष्ठते इत्यग्रेण सम्बन्धः । कीदृशं वर्द्धकिरत्नमित्याह'आसमदोणमुह' इत्यादि 'आसमदोणमुहगामपट्टणपुरवरखंधावारगिहावणविभागकुसले' आश्रमद्रोणमुखग्रामपत्तनपुरवरस्कन्धावारगृहापणविभागकुशलम्, तत्र-आश्रमादायः एतस्मात्पूर्व अष्टमसूत्रे व्याख्यातार्थाः, स्कन्धावारगृहापणाः प्रसिद्धा एव एतेषां विभागे विभागरूपेण रचनायां कुशलं निपुणम्, अथवा "पुरभवनग्रामाणां ये कोणा स्तेषु निवसतां दोषाः । श्वपचादयोऽन्त्यजान्तास्तेष्वेव विवृद्धिमायान्ति ॥१॥" इत्यादि योग्यायोग्यस्थानविभागज्ञम्, पुनश्च कीदृशम् 'एगासीतिपयेमु सव्वेसु चेव वत्थूस णेगगुणजाणए पंडिए' एकाशीति पदेषु सर्वेष्वेव वास्तुषु अनेकगुणज्ञायक पण्डितम्, तत्र एकाशीतिः पदानि विभागाः विभक्तव्यवास्तुक्षेत्रभागाः तानि यत्र तानि तथा एवंविधेषु वास्तुषु गृहभूमिषु सर्वेष्वेव एव शब्दात् चतुःषष्टिपदशतपदरूपेषु 'तएणं से आसम दोणमुहगामपट्टणं-इत्यादि० सूत्र -९ टीकार्थ-इसके बाद उस वर्द्ध कि रत्न ने "मैं क्या करूं, मेरे योग्य माप देवानुप्रिय आदेशदें-मुझे क्या करना चाहिये ऐसा कहकर वह भरत चक्रो के पास पहुँचा ऐसा यहाँ सम्बन्ध है वह वर्द्धकी रत्न कैसा था-इस सम्बन्ध में सूत्रकार आने विचार कोप्रकट करते हुए कहते हैं- ( आसमदोणमुहगामपट्टणपुरवरखंबावारगिहावणविभागकुस) वह वर्द्धकिरत्न आश्रमद्रोणमुखग्राम, पत्तन, पुरवर, स्कन्धावारगृहापण इनको विभाग रूप से रचना करने में निपुण था, अथवा-"पुरभवनग्रामाणां ये कोनास्तेषु निवसता दोषाः । श्वपचादयोऽन्त्य जान्तास्तेष्वेव विवृद्धिमायान्ति ॥१॥ इत्यादि कथन के अनुसार योग्यायोग्य स्थान के विभागका जानने वाला था (एगासीतिपदेसु सम्वेसु चेव वत्थूपुणेगगुण जाणए पंडिर) तथा ८१ विभाग-विभकव्य वास्तुक्षेत्र खण्डवाली ऐसो गृह भूमियो में तथा इसी प्रकारकी ६४ खण्ड वालो ओर १०० पद-खंडवाली 'तपणं से आसमदोणमुहगामपट्टण-इत्यादि, ॥सू०९।। ટીકર્થ – ત્યાર બાદ તે વદ્ધક રને હું શું કરું, હે દેવાનુપ્રિય ! મને આપશ્રી મારા ચોગ્ય આદેશ આપે, મારે શું કરવું જોઈએ? આમ કહીને તે ભરત ચક્રી રાજા પાસે ગયે. આ રીતે અહીં સંબંધ છે. તે વહેંકી રત્ન કેવો હતો ? આ સંબંધમાં સૂત્રકાર પિતાના विया। मा प्रमाणे ०५४d रे छ-(आसमदोणमुहगामपट्टणपुरवरखंधावारगिदावणविभागकुसले) तीरत्न आश्रम द्रोपभुमयाम, पत्तन, पु२५२, १४-यापार, १५ मे सनी વિભાગ રૂપમાં રચના કરવામાં નિપુણ હતાં અથવા 'पुरभवनग्रामाणां ये कोनास्तेषुनिवसतां दोषाः । श्वपचादयोऽन्त्यजान्तास्तेष्वेव विवृद्धिमायान्ति ॥१॥ ययन भुयायायाय स्थानन विभागात ज्ञाता ना. (एगासीति पदेसु सव्वेसु चेव वत्थुतु णेगगुणजाणए पंडिप) मा ८१ विभाग विभ:10 वास्तुक्षेत्र અંડવાળી એવી ગૃહભૂમિકાઓમાં તથા એજ પ્રકારની ૬૪ ખંડવાળી અને ૧૦૦ પદ ખંડ Page #636 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वास्तुषु च अनेकेषां गुणानामुपलक्षणत्वाद् दोषाणां च ज्ञायकम् सदसद् विवेकिनी बुद्धिः पण्डा पण्डाद्धिर्यस्येति पण्डितम् सातिशयबुद्धियुतम् 'विहिण्णू पणयालीसाए देवयाण' विधिज्ञ पश्चचत्वारिंशतो देवतानाम् उचितस्थाननिवेशनादिविधिज्ञमित्यर्थः तथा 'वत्थु परिच्छाए' वास्तुपरीक्षायां च विधिज्ञमिति योज्यम् तद्विधिश्च "गृहमध्ये हस्तमितं खात्वा परिपूरितं पुनः श्वभ्रम् । यद्यूनमनिष्टं तत् समे समम् धन्यमधिकं चेत् ॥२॥ इत्यादि, अथवा वास्तूनां परिच्छदे आच्छादनं कटकम्बादिभिरावरणं तत्र विधिज्ञम्, यथास्थानकटकम्बादिविनियोजनात् तथा-'णे मिपासेसु भत्तसालासु कोट्टणिसु य नेमिपाश्र्वेषु सम्प्रदायगम्येषु स्थानेषु भक्तशालासु-रसवतीशालासु कोहनीषु, कोर्ट-दुर्ग स्थायिराजसत्कं नयन्ति प्रापयन्ति आगन्तुकराज्ञामिति व्युत्पत्त्या कोट्टन्यः-याः कोट्टग्रहणाय प्रतिकोट्टभित्तय उत्थाप्यन्ते तासु तथा-'वासघरेसु य विभागकुसले' तथा वासगृहेषु शयनगृहेषु विभागकुशलं-पथौचित्येन विभागकरणे निपुणम्, तथा 'छेज्जे वेज्झे य दाणकम्मे पहाणबुत्ती' छेद्ये वेध्ये च दानकर्मणि प्रधानबुद्धिः, तत्र छेद्यं-छेदना, काष्ठादि, वेध्यं गृहभूमियों में अनेक गुण एवं दोषों का ज्ञाता था, पण्डित था-सअसद का विवेक करने वाली बुद्धिरूप पण्डा से युक्त था सातिशय बुद्धिवाला था (विहिण्णू पणयालीसाए देवयाग) ४५ देवताओं को उचित स्थान में वैठाने आदि की विधि का ज्ञाता था (वस्थुपरिच्छाए) वास्तु परीक्षा में विधिज्ञथा-वह विधि इसप्रकार से है-"गृहमध्ये हस्तमितं खात्वा परिपूरितं पुनः- श्वभुम्, यधूनमनिष्टं तत् समे समं धन्यमधिकंचेत् ॥१॥-इत्यादि-अथवा-मकानों को ऊपर से ढकने में जो ढकने के काम में आने वाले कट कम्ब आदिरूप आवरण है, उस सम्बन्ध में विधिज्ञथा (णेमि पासेसु भत्तसालानु कोणिसु य वासधरेसु य विभागकुसले) सम्प्रदायगम्य नेमिपार्थो में, भक्तशालाओं में भोजन घरों में, कोनियों में कोट्टग्रह के लिये जो प्रतिकोभित्तियां उठाइ जाती है उनमें तथा शयन गृहों में यथोचित रूप से विभाग करने में कुशल था, तथा-छेज्जे, वेज्झे, વાળી ગૃહભૂમિકાના અનેક ગુણ તેમજ દેને તે જ્ઞાતા હતા પડિત હતે. સત્ અસ विवे: ४२नारी भुद्धि३५ थी त युत तो असे सातिशय भुद्धिवाणोतो, (विहिण्णू पणयालीसाए देवयाणं) ४५ देवतासान येय स्थान मेस। कोरे विधिनात ज्ञाता डत. (वस्थु परिच्छाप) पातु परीक्षामा विधिज्ञ डा. विधि 41 प्रभारी छ "गृहमध्ये हस्तमित खात्वा परिपूरितं पुनः श्वभूम् , यधनमनिष्टं तत् समे सम घन्यमधिकं चेत् ॥१॥ ઇત્યાદિ અથવા મકાનને ઉપરથી આચ્છાદિત કરવા માટે ઉપયોગી એવા કટકમ્બા આદિ ३५ सावरणे। छसमयमा विधिज्ञ खता. (णेमिपासेसु भत्तसालासु कोणिसुय पासधरेसुय विभागकुसले) सहाय य म पाव भां, मत शाजामा नानीमा કેદનીમાં કોટ ગ્રડ માટે ફિલાને સરફરવા જે પ્રતિ કટાભિત્તિઓ ઉઠાવવામાં આવે છે, તે સંબંધમાં તેમજ શયન ગૃહમાં યથાચિત રૂપથી વિભાગ કરવામાં તે કુશળ હતા, તેમજ (छेज्जे, वेज्झे, अ दाणकम्मे, पहाणबुद्धी, जलयाणं भूमियाणय भायणे जलथल गुहासु जंतेसु Page #637 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ• वक्षस्कारः सू०९ अज्ञप्त्यनन्तरं वर्द्धकीरत्नस्य कौशल्यनिरूपणम् ६२३ वेधनाहं तदेव, दानकर्म-अङ्कनाथ गैरिकरक्तसूत्रेण रेखादानकर्म तत्र प्रधानबुद्धि विशेषज्ञम्, विशेषरूपेण ज्ञायकमित्यर्थः, पुनश्च कीदृशम् 'जलयाणं भूमियाण य भायणे, जलगानां जलगतानां भूमिकानां जलोत्तरणार्थकपद्याकरणाय भाजनं यथोचित्येन विमाजकम्, च शब्द: समुच्चये उन्मग्नानिमग्नानघयुत्तरे तस्यैतादृशसामर्थस्य सुप्रतीतत्वात् पुनश्च कीशम् 'जलथलगुहार जंतेमु परिहासु य कालनाणे तहेव सद्दे वत्थुप्पएसे पहाणे' जलस्थळगुहासु यन्त्रेषु परिखासु च कालज्ञाने तथैव शब्दे वास्तुप्रदेशे प्रधानम्, तत्र जलस्थलगुहासु-जलस्थलयोः सम्बन्धिनीषु गुहासु इव गुहासु सुरङ्गास्वित्यर्थः तथा यन्त्रेषु घटीयन्त्रादिषु, परिखासु प्रतीतासु, च शब्दः समुच्चये कालज्ञाने चिकीर्षितवास्तु प्रशस्ताप्रशस्तलक्षणपरिज्ञाने "वैशाखे श्रावणे माघे, फाल्गुणे क्रियते गृहम् । शेषमासेषु न पुन:, पौषो वाराहसम्मतः ॥१॥ इत्यादिके तथैवेति वाच्यान्तरसंग्रहे शब्दे शब्दशास्त्रे सर्वकलाव्युत्पत्ते रेतन्मूलकत्वात्, वास्तुप्रदेशे-गृहक्षेत्रकदेशे “ऐशान्यां देवगृहं महानसं चापि कार्यमाग्नेयाम् । नैऋत्यां भाण्डोपस्करोऽर्थधान्यानि मारुत्याम् ॥१॥" इत्यादि अदाणकम्मे, पहाणबुद्धी, जलयाण भूमियाण य भायणे जलथलगुहासु जंतेसु परिहासुअ कालनाणे) छेदन करने योग्य काष्ठादि, वेधने योग्य काष्ठादि एवं दान कर्म-अङ्कनार्थ गैरिक धातु से रक किये हुए डोरे से निशानी करना-इन सब में प्रधान बुद्धि वाला था अर्थात् इन सबको विशेषरूप से जाननेवाला था........यथोचितर ति से विभाजक था जलसम्बन्धी एवं स्थल सम्बन्धी गुफाओं की जैसी गुफाओं में-सुरङ्गो में, घटोयंत्रादिको में, परिवाओं में-खातिकाओं में, काल ज्ञान में चिकीर्षित वास्तु के प्रशस्त अप्रशस्तरूप परिज्ञान में-जैसे-"वैशाखे श्रावणे, माघे, फाल्गुने क्रियते गृहम् । शेषमासेषुन पुनः पौषो वाराहसम्मतः ॥१॥ (तहेव सहे वत्थुप्प एसे पहाणे गम्भिणिकण्णरुक्ख वलिलवेढिअ गुणदोसविणए गुणड्ढे) इसीतरह शब्द शास्त्र में अर्थात् व्याकरण शास्त्रमें वास्तु प्रदेश में-ग्रह क्षेत्रके एकदेशमें-जैसे-“ऐशान्यां देवग्रहं महानसं चापि कार्यमाग्नेय्याम् । नैऋत्यां भाण्डोपस्करोऽर्थधान्यानि मारुत्याम् ॥ण।इत्यादिरूप से गृहावयवविभाग में परिहासुभ कालनागे) छन ४२॥ यय 10816, धन योग्य भर डानमा અંકનાર્થી શૈરિક ધાતુથી રક્ત કરવામાં આવેલા ને દોરાથી નિશાની કરવી–વગેરે કામોમાં તે પ્રધાન બુદ્ધિવાળ હતા અર્થાત્ એ સર્વેને તે વિશેષ રૂપમાં જાણતો હતો. યાચિત રીતિથી વિભાજક હતો, જલ સંબંધી તેમજ સ્થળ સંબંધી ગુફાઓની જેવી ગુફાઓમાં-સુરંગમાં ઘટીયંત્રાદિકમાં, પરિખાઓમાં ખાતિકાઓમાં, કાળજ્ઞાનમાં, ચિકીર્ષિત વસ્તુના પ્રશસ્ત, અપ્રશસ્ત રૂપ પરિજ્ઞાનમાં જેમકે – वैशाखे श्रावणे माघे, फाल्गुने क्रियते गृहम् । शेषमासेषु न पुनः पौषो वाराहसम्मतः ॥१॥ (तहेव सद्दे वत्थुप्पपसे पहाणे गम्भिणि कण्णरुक्खावल्लेिवेढिअ गुणदोसविमाणए गुणड्ढे) मा प्रमाणे श६ शास्त्रमा ट ०या४२६१ शास्त्रमा प्रदेशमा-खत्रमा देशमा-२४-"ऐशान्यां देवगृह महानसं चापि कार्यमाग्नेय्याम् । नैऋत्यां भाण्डोपस्करोऽर्थधान्यानि मारुत्याम् ॥ rul ३५थी डायविशाराम, शास्त्रोत विक Page #638 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६२४ . जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे गृहावयव विभागे शास्त्रोक्तविधिविधाने प्रधान मुख्यम्, पुनश्च कीदृशम् 'गम्भिणिकण्णरुक्खवल्लिवेढिय गुणदोसविधाणए' गभिंगी कन्यावृक्षवल्लिवेष्टितगुणदोषविज्ञायकम्, तत्र-गर्मिण्यः-जातगर्भा वल्यः फलाभिमुखवल्लय इत्यर्थः कन्या इव कन्या अफला: अथवा दूरफलावा वल्लयः वृक्षाश्च वास्तुक्षेत्रप्ररूढाः वल्लिवेष्टितानि-भावे क्तप्रत्ययविधानात् वल्लिवेष्टनानि वास्तु क्षेत्रोद्गतवृक्षेषु आरोहणानि एतेषां ये गुणदोषास्तेषां विज्ञायकं विशेषरूपेण जानति, ते चेमे "गर्भिणी वल्लिास्तुप्ररूढा आसन्नफलदा कन्या च सा तत्रैव नासन्नफला, वृक्षाश्च प्लक्षवटाश्वत्थोदुम्बराः प्रशस्ताः आसन्नाः कण्टकिनोरिपुभयदा" इत्यादि, प्रशस्तद्रुमकाष्ठं वा गृहादि प्रशस्तम् वल्लिवेष्टितानि प्रशस्तवल्लिसम्बन्धीनि प्रशस्तानि गृहमहीषु न चाप्रशस्तवल्लिसम्बन्धीनि पुनश्च 'गुणहढे' गुणाढयम् प्रज्ञाधारणाबुद्धिहस्तलाघवादिगुणयुक्तम्, तथा 'सोळसपासायकरणकुसणे' षोडश प्रासादकरणकुशलम्, तत्र षोडश प्रासादाः सान्तनस्वस्तिकादयो भूपतिगृहाणि तेषां करणे कुशलं निपुण मित्यर्थः, तथा 'चउसद्विविकप्पवित्थियमई' चतुः षष्टिविकल्पविस्तृतमतिः, तत्र-चतुःषष्टिविकल्पाः गृहाणां वास्तुप्रसिद्धा तत्र विस्तृता अमृढा मतिर्यस्य तत्तथा, विकल्पानां चतुःषष्टिरेवम्-प्रमोदविजयादीनि षोडशगृहाणि शास्त्रोक्तविधिविधान में वह प्रधान था मुख्य था गर्भिणी बेलों के अर्थात् फलामि मुखबेलो के, कन्या के जैसी अफल-अथवा दूरफल वाली बेलों के और वृक्षों के- वास्तु क्षेत्र प्ररूढ वृक्षों के ऊपर वल्लियों के वेष्टनों के गुण और दोषों का जानने वाला था, जैसे-गर्भिणी वल्लि वस्तु प्ररूढा आसन्नफलदा कन्याच सा तत्रैव नासन्नफला, वृक्षाश्च प्लक्षवटाश्वत्थोदुम्बरा प्रशस्ता भासन्ना कण्टकिनो रिपुभयदा" इत्यादि "प्रशस्तद्रुमकाष्ठंवा गहदि प्रशस्तं, वरिल वेष्टित्तनि प्रशस्तवल्लिसम्बधीनि प्रशस्तानि गृहमहीषु न चाप्रशस्तवल्लिसम्बन्धीनि" वह वर्द्ध कीरत्न गुणाढ्यथा-प्रज्ञाधारणाबुद्धिसे एवं हस्तलाघवादि गुण से युक्त था (सोलसपासायकरणकुसले) सान्तन स्वस्तिक आदि के भेद से सोलहप्रकार के प्रासादों के भूपतिगृहों,के बनाने में वह कुशल था (च उसट्ठिविकप्पवित्थियमई) वास्तुशास्त्रप्रसिद्ध६४ प्रकार के गृहो के निर्माण में वह अमूढमतिवाला था ६४प्रकार के गृह इस प्रकार से है-"प्रमोदविजयादीनि षोडशगृहाणि पूर्व વિધાનમાં તે પ્રધાન હતે, મુખ્ય હતે સગર્ભાલતાઓના એટલે કે ફળાભિમુખ લતાઓના, કન્યા જેવી અફળ અથવા દૂર ફળવાલી લતાઓના અને વૃક્ષોના વાહતુક્ષેત્ર પ્રરૂઢવૃક્ષની ઉપરની aaz वेष्टनाना शुमन पानात ज्ञाता हता, रेभ गर्भिणी वल्लिास्तुप्ररूढा आसन्न फलदा, कन्या च सा तत्रैव नासन्नफला, वृक्षाश्च प्लक्षवटाश्वत्थोदुम्बराः प्रशस्ताः आसन्ना कण्टकिनो रिपुभयदाः इत्यादि "प्रशस्तद्रुमकाष्ठं वा गृहादि प्रशस्त, वल्लिवेष्टितानि प्रशस्तवल्लिसम्बधीनि प्रशस्तानि गृहमहीषु न चाप्रशस्तवल्लिसम्बन्धीनि" ag રત્ન ગુણાઢ્યું હતું, પ્રજ્ઞા-ધારણ બુદ્ધિથી તેમજ હસ્તલાઘવાદિ ગુણેથી યુક્ત હતો તેમજ (सोलस पासायकरणकुसले) सान्तन शस्ति पणेरेना था सो रना प्रासाहीना भूपति डोन नियमात . (च उसट्टिविकप्पवित्थिय मई) वास्तु शास्त्र પ્રસિદ્ધ ૬૪ પ્રકારના ગૃહના નિર્માણમાં તે અમુઢ મતિવાળો હતે. ૬૪ પ્રકારના ગૃહે આ Page #639 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० बक्षस्कारः सू०९ आशप्त्यनन्तरं वर्द्धकीरत्नस्य कौशल्यनिरूपणम् ६२५ पूर्वद्वाराणि स्वस्तनादीनि षोडशदक्षिणद्वाराणि धनदादीनि, षोडश उत्तरद्वाराणि दुर्भगा. दीनि षोडश पश्चिमद्वाराणि पुनश्च कीदृशम् 'णंदावत्तेय वद्धमाणे सोस्थिय रुयग तह सव्वओभद्द सण्णिवेसे य बहुविसेसे' नन्द्यावर्त्त-गृह विशेषे एममग्रेतने विशेषणेष्वपि. च शब्दः समुच्चये, वर्द्धमाने स्वस्तिके रुचिके तथा सर्वतोभद्रसन्निवेशे च बहुविशेषः प्रकारो ज्ञेयतया कर्त्तव्यतया च यस्य तत् बहुविशेषम्, नन्द्यावर्तादिगृहविशेषस्त्वयं वराहोक्तः "नन्द्यावर्तमलिन्दैः शालाकुड्यात् प्रदक्षिणान्तगतैः । द्वारं पश्चिममस्मिन् विहाय शेषाणि कार्याणि ॥१॥ इत्यादि पुनश्च कीदृशम् 'उदंडिय देव कोहदारुगिरिखायवाहणविभागकुसले' उद्दण्डिकदेवकोष्ठदारु गिरिखातवाहनविभागकुशलम्-तत्र उध्वं दण्डे भवं उद्दण्डिक:ध्वजः देवा इन्द्रादि प्रसिद्धाः, कोष्ठः उपरितनगृहम्, धान्यकोष्ठो वा, दारुणि- वास्तुचितकाष्ठानि, गिरयो-दुर्गादिकरणार्थ जनाबासयोग्याः पर्वताः, खातानि-पुष्करिण्यादिकानि वाहनानि शिबिकादीनि एतेषां विभागे कुशलम्-सर्वथा निपुणम् 'इअ तस्स बहुगुणद्धे थवह रयणे गरिंदचंदस्स'इत्युक्तप्रकारेण बहु गुणाढ्यं तस्य नरेन्द्रचन्द्रस्य भरतचक्रिणः स्थपतिरत्नं वर्द्धकिरत्नम् 'तवसंयमनिविटे किं करवाणी तु वट्ठाई' तपः संयमाभ्यां द्वाराणि, स्वस्तनादीनि षोडश दक्षिणद्वाराणि, धनदादीनि षोडश उत्तरद्वाराणि, दुर्भगादीनि षोडश पश्चिमद्वाराणि" णंदावत्ते य वद्धमाणे सोस्थियरुयगतह सवओभदसण्णिवेसेय बहुविसेसे) नन्यावर्त, वर्द्धमान, स्वस्तिक, रुचक तथा सर्वतोभद्रसन्नि वेश इनके निर्माण कार्य में वहबहुत विशेषज्ञ था-नन्द्यावर्तादिगृहविशेषके सम्बन्धमें वराह ने ऐसा कहा है नन्द्यावर्तमलिन्दैः शालाकुड्यात् प्रदक्षिणान्तगतैः ।। द्वारं पश्चिममस्मिन् विहाय शेषाणि कार्याणि ॥१॥ इत्यादि (उइंडियदेवकोट्ठदारुगिरिखायवाहणविभागकुसले ) उद्दण्डिक-ध्वज, इन्द्रादिक देव, ऊपर का गृह-कोष्ठ, अथवा धान्यकोष्ठ दार-गृह के योग्य काण्ठ, कोठ आदि बनाने के लिये जनावासयोग्य पर्वत, वात-पुष्करिणी मादि एवं वाहन शिबिकादिक-इनके विभाग में वह कुशल था, (इय तस्स बहुगुणद्धे थवइरणये परिंदचंदस्स-तवर्सजमनिविटे किं करवाणीतु वढाई) इस पूर्वोक्त प्रकार प्रभार छ-प्रमोदविजयादीनि षोडश गृहाणि पूर्वद्वाराणि, स्वस्तनादीनिषोडश दक्षिण द्वाणि धनदादीनि षोडश उत्तरद्वाराणि दुर्भगादीनि षोडश पश्चिमद्वाराणि णंदावत्ते य पद्धमाणे सोत्थियरूयगतह सवओभह सण्णिवेसेय बहुविसेसे) नन्धावत, पद्धमान स्वस्ति या તેમજ સર્વતૈભદ્રસન્નિવેશ એ સર્વેના નિર્માણ કાર્યમાં તે ખૂબ જ વિશેષજ્ઞ હતે. નન્હાદિવર્તાદિ ગૃહવિશેષના સંબંધમાં વરાહે આ પ્રમાણે કહ્યું છે – नन्द्यावर्तमलिन्दैः शालाकुड्यात् प्रदक्षिणान्तगतैः . द्वारं पश्चिममस्मिन् विहाय शेषाणि कार्याणि ॥१॥ इत्यादि । (उइंडिय देवकोट्टदारुगिरिखायवाहणविभागकुसले) 3-4r, छन्द्राहि हेव, ઉપરનું ઘર-કેષ્ઠ, અથવા ધાન્ય કઠ, દારુ-યોગ્ય કાઠ, કેઠ વગેરે બનાવવા માટે જનાવાસ ચોગ્ય પર્વત, ખાત-પુષ્કરિણી વગેરે તેમજ વાહન-શિબિકાદિક-એમના વિભાગમાં તે કુશળ डतो. (इयतस्स बहुगुणद्ध थवहरयणे परिंदचंदस्स-तव संजमनिवि? किं करवाणी तु वढाई) એ પૂર્વોક્ત પ્રકાર મુજબ અનેક ગુણ સમ્પન તે ભરતચક્રી-પિતરન-વદ્ધકિરન કે જેને Page #640 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे निर्विष्टं लब्धमिति कि करवाणीत्यादि तु प्राग्योजितमेव । 'सो देव कम्मविहिणा खंधावारणरिंदवयणेणं । आवसहभवणकलियं करेइ सव्वं मुहुत्तेणं ॥२॥ तद् वर्द्धकिरत्नम् देवकर्मविधिना देवकृत्यप्रकारेण चिन्तितमात्रकार्यकरण रूपेणेत्यर्थः स्कन्धावारं नरेन्द्रवचनेन आवासा राज्ञां गृहान् भवनानीतरेषां तैः कलितं करोति सर्व मुहूर्तेन निर्विलम्बमित्यर्थः 'करेत्ता' कृत्वा 'पवरपोसहघरं करेइ' प्रवरपौषधगृहं करोति-श्रेष्ठ पौषधशालां निर्माति 'करित्ता' कृत्वा 'जेणेव भरहे राया जाव एतमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चप्पिणइ' यत्रैव भरतो राजा यावत्पदात् तत्रैवोपागच्छति एतां राज्ञां पूर्वोक्ताम् आज्ञप्तिकाम् आज्ञां क्षिप्रमेव शीघ्रमेव राज्ञे प्रत्यर्पयन्ति समर्पयन्ति 'सेसं तहेव जाव मज्जनघराओ पडिणिक्खमइ' शेषं तथैव पूर्ववदेव यावत् पदात् स राजा स्नानाथ मज्जनगृहं प्रविष्टवान् स्नपितः सन् यथा धवलमहामेघानिर्गतश्चन्द्र इव सुधाधवली कृतमज्जनगृहात् प्रतिनिष्काके अनुसार अनेक गुणों से युक्त ऐसा वह भरत चक्री का स्थपितरत्न-वर्द्धकिरत्न कि जिसे भरत चक्री ने तप एवं संयम से प्राप्त किया है कहने लगा-कहिये मैं क्या करूं-(सो देवकम्मविहिणाखंधावारणरिंदवयणेणं-आवसहभवनकलियं करेइ सव्वं मुहेत्तणं) इस प्रकार कहकर वह राजा के पास आगया और उसने चिन्तित मात्र कार्य करने की अपनी शक्ति के अनुसार नरेन्द्र के लिए प्रासाद और दूसरों के लिए भवनों को एक मुहूर्त में तयार कर दिया (करेत्ता पवर पोसहघरं करेइ) यह सब काम एक ही मुहूर्त में निष्पन्न करके फिर उसने एक सुन्दर पौषधशाला तैयार करदी-(करित्ता जेणेव भरहे राया जाव एयमाणत्तिय खिप्पामेव पच्चप्पिणइ) यथोचित रूप से पौषधशाला निष्पन्न करके फिर वह जहाँ पर भरतचक्री थे वहां गया और राजा को पूर्वोक्त आज्ञाकी पूर्ति की खवर शीघ्र ही उन्हे कर दी. (सेसं तहेव जाव मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ) इसके बाद का शेष कथन पूर्वोक्त रूप से ही है यावत् वह स्नानगृह से बाहिर निकला यहाँ तक का यहों यावत्पदसे " स राजा स्नानाथ मज्जनगृहं प्रविष्टवान् स्नापितः सन् यथा धवलमहामेघान्निर्गतश्चन्द्र इव सुधा धवलीकृत मज्जनगृहात् प्रतिनिष्कामति" इस पाठ का ભરતચક્રીએ તપ તેમજ સંયમથી પ્રાપ્ત કરેલ તે છે–તેવર્ધકીરને કહેવા લાગે-બેલે હું શું ॐ ? (सो देवकम्मविहिणा खंधावारणरिंदवयणेणं-आवसहभवणकलियं करेइ सव्वं मुहुत्तेणं) मा प्रमाणे हीन ते २ पासे भावी गयी, अन ते पातानी शितितमात्र કાર્ય કરવાની દૈવી શક્તિ મુજબ નરેન્દ્ર માટે પ્રાસાદ અને બીજાઓ માટે ભવને એક भूत भांश निमित ४री यां(करेत्ता पवरपोसहघरं करेइ) से मधु म ४ भूह तभा नि५-न रीने पछी त मे सुह२ पौषधशा तैयार ४॥ धी. (करित्ता जेणेव भरहे राया जाव एयमाणत्तिय खिप्पामेव पच्चप्पिणइ) यथायित ३५मा पौषधशासनिपान કરીને પછી તે ક્યાં ભરતકી હતાં ત્યાં ગયે અને રાજાની પુક્તિ આજ્ઞા પૂરી કરી છે, मेवी ने सूचना मा. (सेसं तहेव जाव मज्जणघराओ पडिणिखमइ) सेना पछीनुथन પૂર્વોક્ત રૂપમાં જ છે. યાવત્ સ્નાનગૃહમાંથી બહાર નીકળે, અહીં સુધી અરો યાવત ५६थी "स राजा स्नानाथै मज्जनगृहं प्रविष्टवान् स्नपितः सन् यथा धवलमहामेधाग्निर्ग: Page #641 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटोका ४० वक्षस्कारः सू० १० रथवर्णनपूर्वक भरतस्य रथारोहणम् ६२७ मति-निगच्छति 'पडिणिक्खमिता' प्रतिनिष्क्रम्य-निर्गत्य 'जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव उवागच्छई' यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला यत्रैव चातुर्घण्टे चत्वारो घण्टा अस्य तत् तपा एवं भूतमध्वरयं तत्रैव उपागच्छति, स भरतो राजेति ॥१९॥ मलम्-उवागच्छित्ता तएणं तं धरणितलगमणलहुं ततो बहुलक्खणपसत्थं हिमवंतकंदरंतरगिवाय संवद्धिवचित्ततिणिसदलिय जम्बुणय सुकयकूबरं कणयदंडियारं पुलयवरिंद गीलसासगपवालफलिहवररयणले ठुमणिविद्मविभूसियं अडयालीसाररइयतवणिज्जपट्टसंगहियजुत्ततुंब पघसियपसियनिम्मियनवपट्टपुट्ठपरिणिट्ठियं विसिट्ठलट्ठणवलोहबद्धकम्म हरिपहरणरयणसरिसचक्कं कक्केयणइंदनीलसासगसुसमाहियवद्धजालकडगं पसत्थवित्थिन्नसमधुरं पुरवरं च गुत्तं सुकिरण तवणिज्जजुत्तकलिय कंकटयणिजुत्तकप्पणं पहरणाणुजायं खेडगकणग धणुमंडलग्गवरसत्तिकोंततोमरसरस य बत्तीसतोणपरिमंडिअं कणगरयणचित्तं जुत्तं हलीमुहबलागगयदंतचंदमोत्तियतणसोल्लिय कुंदकुडयवरसिंदुवारकंदलवरफेणणिगरहारकासप्पगासधवलेहिं अमरमणपवणजेइणचवलसिग्धगामो हे चउहि चामराकणगविभूसिअंगेहिं तुरंगेहिं सच्छत्तं सज्झयं सघं सपडागं सुकयसंधिकम्मं सुसमाहिय समणकणगगंभीरतुल्लघोसं वरकुप्परं सुचक्कं वरनेमीमंडलं वरधारातोंडं वरखइबद्धतुंबं वरकंचणमूसियं वरायरियणिम्मियं वरतुरगसंपउत्तं वरसारहिसुसंपग्गहियं वरपुरिसे वरमहारहं दुरूढे आरूढे पवररयणपरिमंडियं कगयखिखिगीजालसोभियं अउज्झं सोयामणिकणगतवियपंकय जासु भगजलगजलियसुयतांडरागं गुंजद्धबंधुजीवगरत्तहिंगुलगणिप्रहण हुआ है। प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला यत्रैव चातुर्घटं अश्वरथं तत्रैव उपागच्छति " स्नानगृहसे बाहर निकल कर फिर वह भरतचको अपनी बाह्य उपस्थानशालामें जहां पर चातुर्बेट अश्वरथ था वहां पर आया॥९॥ तश्चन्द्र इव सुधाधवलोकृत मज्जनगृहात् प्रतिनिष्कामति' । ५७ ७ थय। छे. प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला यत्रैव चातुर्घटं अश्वरथं तत्रैव उपागच्छति" સ્નાનગૃહમાંથી બહાર નીકલીને પછી તે ભરતયકી પિતાની બાધા ઉપસ્થાન શાળામાં જ્યાં ચાતુર્ઘટ અશ્વરથ હતું ત્યાં આવ્યું છેલ્લા Page #642 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६२८ गरसिंदूररुइलकुंकुम पारेवयचलणणयणकाइलदसणावरणरइतातिरेगरत्तासोगकण के सुयगयता लुसुरिदगोवगसमप्पभप्पगासं बिंबफलसिलप्पवालउट्ठितसुरसरिसं सव्वोउअसुरहिकुसुम आसत्तमल्लदामं ऊसियसेयज्झयं महामेहर सियगंभीरणिद्धघोसं सत्तुहिअयकंपणं पभाए य सस्सिरीयं णामेणं पुहविविजयलंभंति विस्सुतं लोगविस्सुतजसोऽहयं चाउग्घंटं आसरहं पोसहिए णवई दुरूढे तरणं से भर गया चाउरटं आसरहं दुरूढे समाणे सेसं तहेव दाहिणाभिमुहे वरदामतित्थेण लवणसमुदं ओगाहइ जाव से रहवरस्स कुप्परा उल्ला जाव पोइदाणं से णवरिं चूडामणि च दिव्ां उरत्थगेविज्जं सोणिअसुत्तगं कडगाणि य तुडियाणि य जाव दाहिणिल्ले अंतवाले जाव अट्ठाहियं महामहिमं करेइ, करिता एयमाणत्तियं पञ्चपिणs, तर णं से दिव्वे चक्करयणे वरदामतित्थकुमारस्स देवस्स अट्ठाहियाए महामहिमाए निव्वत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता अंतलिक्खपडिवण्णे जाव पूरन्ते चेव अंबरतलं उत्तरपच्चत्थिमं दिसिं पभासतित्थाभिमुद्दे पयाते यावि होत्था, तरणं से भर गया तं दिव्वं चक्करयणं जाव उत्तरपच्चत्थिमं दिसिं तहेव जाव पच्चत्थिमदिसाभिमुहे पभासतित्थेण लवणसमुहं ओगाes, ओगाहित्ता जाव से रहवरस्स कुप्परा उल्ला जाव पीइदाणं से णवरं मालं मउडिं मुत्ताजालं हेमजाल कडगाणिय तुडियाणि य आभरणाणि य सरं च णामाहयंकं पभासतित्थोद्गं च गिण्हs गिण्हित्ता जाव पच्चत्थिमेणं पभासतित्थमेराए अहरणं देवाणुप्पियाणं विसयवासी जाव पच्चत्थिमिले अवाले, सेसं तहेव जाव अट्ठाहिया निव्बत्ता ॥सू०१०॥ जम्बूद्वीपप्तसूत्रे छाया - उपागत्य ततः खलु तं धरणितलगमनलघु ततो बहुलक्षण प्रशस्तं हिमवत् कन्दरान्तरनिर्वातसंवर्द्धितचित्र तिनिशदलिकं जाम्बूनद सुकृतकूबरं कनकदण्डिकारं पुलकवरेन्द्र नीलसासकप्रवालस्फटिकवररत्न लेण्डुमणिविद्रुमविभूषितम्, अष्टाचत्वारिंशदररचिततपनीय पट्टसंगृहीत युक्ततुम्बम् प्रधर्षित प्रसितनिर्मित नवपट्टपृष्ठपरिनिष्ठितम् विशिष्ट Page #643 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० १० रथवर्णनपूवर्क भरतस्य रथारोहणम् प्रकाशम् लष्टनवलोदवर्धकर्माण हरिप्रहणरत्नसदृशचकम् कर्केचनेन्द्रीनीलशस्यक सुसमाहितबद्धजालकटकम् प्रशस्त विस्तीर्णसमधुरम्, पुरवरं च गुप्तम्, सुकिरणतपनीययोत्ककलितम्, कटकनियुक्त कल्पनम्, प्रहरणानुयातम्, खेटक कणकधनुर्मण्डलारावरशक्ति कुन्ततोमरशरशतद्वात्रिंशत्तणपरिमण्डितम्, कनकरत्नचित्रम्, युक्तम्, हलीमुखबलाकगजदन्तचन्द्रमौक्तिकमल्लिकापुष्प कुन्दकुटजवर सिन्दुवारकन्दलवरफेननिकर हारकाश प्रकाशधवलैः अमेरमनः पवनजयि चपलशीघ्रगामिभिः चतुर्भिः चामरा कनकविभूषिताङ्गकैः तुरगैः सच्छत्र सध्वजं सघण्टं सपताकं सुकृत सन्धिकर्माणम् सुसमाहित समरकगकगम्भीरतुल्यघोषम्, वरकूर्परं सुखकं वरनेमीमण्डलं वरधूस्तुण्डं वरवज्रबद्धतुम्बं वरकाञ्चनभूषितं वराचार्य निर्मितं वरतुरगसम्प्रयुक्तं वरसारथिसुसंप्रगृहीतं वरपुरुषो वरमहारथं दुरूढे आरूढे प्रवररत्न मिण्डितं कनककीङ्किणीजालशोभितम् अयोध्यं सौदामिनो कनकतप्तपङ्क नजपाकुसुमज्वलितशुकतुण्डरागं गुआर्द्धबन्धुजीवकरक्त हिगुलक निकर सिन्दूररुचिरकुङ्कुमपारावतचरणनयनको किल दशनावरणरतिदाऽतिरक्ताशोककनक किंशुकगजतालु सुरेन्द्रगोपकसमप्रभबिम्बफलशीलामवालोत्तिष्टत्सूरसदृशं सर्वर्तुकसुरभिकुसुमासक्तमाल्यदामानम् उच्छ्रितश्वेतध्वजं महामेघर सितगम्भीर स्निग्धघोषं शत्रुहृदय कम्पनं प्रभाते च सश्रीकं नाम्ना पृथ्वोविजयलाभमिति विश्रुतं लोकविश्रुतयशाः, अहतम्, चातुर्घण्टमश्वरथं नरपति दुरूढें, ततः खलु स भरतो राजा चातुर्घण्टमश्वरथं दुरूढः सन् शेषं तथैव दक्षिणाभिमुखा वरदामतीर्थेन लवणसमुद्रमवगाहते यावत् तस्य रथवरस्य कूर्परी आर्द्रा भवतः यावत् प्रीतिदानं तस्य, नवरं चूडामणि दिव्यम् उरस्थग्रैवेयकं श्रोणिसूत्रकं कटकानि च त्रुटिकानि च यावत् दाक्षिणात्योऽन्तपालः यावत् अष्टादिकां महामहिमां कुर्वन्ति कृत्वा पतामाशतिक प्रत्यर्पयन्ति, ततः खलु तद्दिव्यं चक्ररत्नं वरदामतीर्थ कुमारस्य अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्क्रामति प्रतिनिष्क्रम्य अन्तरिक्षप्रतिपन्नं यावत् पूरयदिव अम्बरतलम् उत्तरपाश्चात्यां दिशं प्रभासतीर्थाभिमुखं प्रयात चाप्यभवत्, ततः खलु स भरतो राजा तदिव्यं चक्ररत्नं यावत् उत्तरपाश्चात्यां दिशं तथैव यावत् पश्चिमदिशाभिमुखो प्रभासतीर्थेन लवणसमुद्रम् अवगाहते, अवगाह्य यावत् रथवरस्य कूर्परौ आर्द्रा यावत् प्रीतिदानं तस्य नवरं मालां मौलिम्, मुत्काजालं हेमजालं कटकानि च त्रुटिकानि च आभरणानिच शरं च नामाहताङ्कं प्रभासतीर्थोदकं च गृहाति, गृहीत्वा यावत् पाश्चात्ये प्रभास कीर्थमर्यादया अहं खलु देवानुप्रियाणां विषयवासी याबत पाश्चात्योऽन्तपालः शेष तथैव यावत् अष्टाहिका निवृत्ता ॥सू० १०॥ टीका - " उवागच्छित्ता तरणं" इत्यादि । उपागत्य ततः खलु 'तं' तं प्रसिद्धम् 'वरपुरिसे वरमहारहं दुरूढे' वरपुरुषो भरतचकी वरमहारथं दुरूढ इत्यग्रे सम्बन्धः कीदृशं ( उवागच्छित्ता तरणं तं धरणितलगमणलहु ) इत्यादि . १० ॥ टीकार्थ - (उवागच्छित्ता) वहां आकरके वह वर पुरुष भरतचकी उस वरमहारथ पर सवार 'उवागच्छित्ता तरणं तं धरणितलगमणलहुँ' इत्यादि ॥ सू०|| टीकार्थ (उवागच्छित्ता) त्यां भावीने ते वर पुरुष भरत यही ते वरमहारथ पर सवार ६२९ Page #644 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६३० जबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे महारमित्याह-'धरणितलगमणलहुं' धरणितलगमने लघु शीघ्रं -शीघ्रगामिनम् 'बहु लक्खणपसत्यं' बहुलक्षणप्रशस्तम् अनेकशुभलक्षणसंयुक्तम्, पुनश्च कीदृशम् 'हिमवन्त कंदरंतरणिवायसंबद्धियचित्ततिणिसदलियं' हिमवतः कन्दरान्तरनिर्वात संवर्द्धितचित्रतिनिशदलिकम्, तत्र-हिमवतः क्षुद्रहिमालयगिरेः निर्वातानि-वायुरहितानि यानि कन्दरान्तराणि तत्र संवद्धिताश्चित्राः विविधास्तिनिशाः रथरचनात्मकवृक्षविशेषाः त एव दलिकानि दारुणि यस्य तम्, तिनिशनामक सुचारुदारुनिर्मितम् 'कंदरंतरणिवाय' इति मूले पदव्यत्ययः आर्षत्वात् 'जबूणय सुकयकूबरं' जाम्बूनद सुकृतकूबरम् तत्र-जाम्बूनदं जम्बूनदनामकं सुवर्णम् तेन सुकृतं सुघटितं कूबरं युगन्धरं यत्र (तथा युआ इति भाषा प्रसिद्धम्) तम् 'कणय दंडिया' कनकदण्डिकारम्, तत्र कनकदण्डिका:-कनकमयलघुदण्डरूपा अरा यत्र स तथा तम्, पुनश्च कीदृशम् 'पुलयवरिंद णीलसासगपवालफलिहवरणयणलेठुमणिविदुमविभूसियं' पुलकवरेन्द्र नोलसासकप्रवालस्फटिकरत्नलेष्टुमणि विद्रुमविभूषितम्, तत्र पुलकानि वरेन्द्रनीलानि सासकानि रत्नविशेषाः प्रवालानि स्फटिकवररत्नानि च प्रसिद्धानि, लेष्टवो विजातीय रत्नानि, मणय:-चन्द्रकान्तादयः विद्रुमः हुआ-ऐसा आगेके पदके साथ सम्बन्ध है अब यहां पहिले यह प्रकट किया जाता है कि वह महारथ कैसा था-(धरणितलगमणलहुं ) वह पृथिवी तल पर चलने में बहुत शीघ्रता वाला था ( बहुलक्खण पसस्थ, हिमवंत कंदरंतरणिवाय संवद्धिचित्ततिणि सदलियं ) अनेक शुभलक्ष ह युक था हिमवान् पर्वत के वायुरहित भीतर के कन्दरा प्रदेशों में संबद्धित हुए विविध रथ रचनात्मक तिनिश वृक्षविशेषरूप काष्ठ से वह बना हुआ था. ( कंदरंतरणिवाय) इस मूल पद में आर्ष होने से पदव्यत्यय हो गया है. ( जंबूणयसुकयकूबरं ) जम्बूनद नामक सुवर्ण का इसका युगन्धर- जुआ था. ( कणय दंडिआरं ) इसके अरककनक मय लघु दण्डरूपमें थे (पुत्र्यवरिंदणीलसासगपवालालहवररयणलट्ठमणिविदुविभूसियं ) पुलक, वरेन्द्र नीलमणि, सासक, प्रवाल, स्फटिकमणि, लेष्ट-विजातिरत्न चन्द्रकान्त आदि मणि एवं विद्रुम इन सब प्रकार के रत्नादिकों से वह विभूषित था (अडयालोसाररइयतवणिज्जपट्टसंगहियजुत्ततुंब) થયે. આ જાતને આગળનાદ સાથે સંબંધ છે. અત્રે પહેલાં એ પ્રકટ કરવામાં આવે છે કે તે महा। वो ता. (धरणितलगमणलहुँ) ते पृथिवीत ५२ शी तिथी याना तो. (बहुलक्खणपसत्थं, हिमवंतकंडरंतरणिवाय संवद्धिय चित्ततिणि सदलिय) मने शुभसाथी તે યુક્ત હતે. હિમવાન પર્વતના વાયુરહિત અંદરના કંદરા પ્રદેશમાં સંવદ્વિત થયેલા विविध २थरचनात्म तिनि वृक्षविशेष३५ ४थी ते मना तो. (कंदरंतरणिवाय) मे भूहमा भाडावाधा पयत्यय थयेर छे. (जंबूणयसुकयकूबर) पून: नाम सुवर्ण निमित थे २थना धूसरी ता. (कणयदंडिआर) मेना है। भय धु' ३५मां ता. . ( पुलयवरिंदणीलसासगपवालफलिहवररयणलहमणिविद्दुमविभूसिय) ya, વરેન્દ્રનીલમાણ, સાસક, પ્રવાલ, ફિટિકમણિ, લેખુ વિજાતિરત્ન, ચન્દ્રકાંત આદિ મણિ તેંમજ विद्यम से समान नाहीत विभूषित त. (अडयालीसाररइय टट्तबणिज्जप Page #645 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० १० रथवर्णनपूर्वकं भरतस्य रथारोहणम् ६३१ प्रवालविशेषः तैः विभूषितः तथा तम् ' अडयालीसाररइयतवणिज्जपट्टसंगहिय जुत्ततुंबं ' अष्टाचत्वारिंशदररचित तपनीय पट्टसंगृहीत युक्ततुम्बम्, तत्र - रचिताः - सुष्ठुनिर्मिताः प्रतिदिशं द्वादश २ सद्भावात् उभयत्र अष्टाचत्वारिंशदरा यत्र ते तथा, अब 'अडयालीसार रइय' इति मूलसूत्रे 'रइय' इति विशेषणस्य पूर्वे प्रयोक्तव्ये परनिपातः प्राकृतत्वात् तथा तपनीयप है: रक्तस्वर्णमयपट्टिकः लोके महल इति प्रसिद्धैः संगृहीते दृढीकृते तथा युक्ते यथा - योग्येनाति लघुनी नाति महती ततः पदत्रयस्य कर्मधारये कृते सति एतादृशे तुम्बे यस्य स तथा तम् 'पवसिय पसिय निम्मिय नव पट्टपुट्टपरिणिट्टियं' प्रघर्षितप्रसित - निर्मित नवपट्टपृष्ठ परिनिष्ठितम्, तत्र प्रघर्षिताः - प्रकर्षेण घृष्टाः प्रसिता प्रकर्षेण बद्धा fear निर्मिताः निवेशित: नवाः नूतनाः पट्टा: पट्टिका यत्र तत् तथाविधं यत्पृष्ठं चक्रपरिधिरूपं गोलाकाररूपं 'हाल' इति प्रसिद्धम्, तत्परिनिष्ठितं सुनिष्पन्नं कार्यनिर्वा कत्वेन यस्य स तथा तम् 'विसिट्ठ लट्ठणवलोहबद्धकम्म' विशिष्टलष्टन व लोह बद्धकर्माणम्, तत्र विशिष्टलष्टे - अतिमनोहरे नवे नबी ने लोह बधे लोहश्चर्मरज्जुके तयोः कर्मकार्य वर्तते यत्र स तथा तम पुन कीशम् 'हरिपहरणरयणसरिसचक्कं' हरिप्रहरणरत्न सदृशचक्रम्, तत्र हरिः वासुदेवः तस्य प्रहरणरत्नं चक्ररत्नं तत्सदृशे चक्रे चक्रद्वयं स तथा तम्, पुनश्च 'कक्केयण इंदनीलसागसुसमाहियबद्धजालकडगं' कर्केतनेन्द्रनीलप्रत्येक दिशा में १२ - १२ - होनेसे ४८ इसमें अरे थे रक्त स्वर्णमय पट्टकों से महलुओं से- दृढोकृत तथा उचित्त इसके दोनों तुंबे थे (पघसियपसियनिम्मिय नवपट्टपुट्टपरिणिट्ठियं ) इसका पुठी में जो पट्टिकाए लगी हुई थी - वे प्रघर्षित थी - खुब - घिसी हुई थी-अच्छी तरह से उसमें बद्ध थो और अजीर्ण थी, नवीन थी (विसिठ्ठलट्ठणव लोहबद्ध कम्मं) विशिष्ट लष्ट- अति मनोहर - नवीन लोहे से इसमें काम किया गया था अर्थात् मजबूती के लिए जगह २ इसमें नवीन नवीन लोहे की को एवं उनकी सुन्दर पत्तियें लगी हुई थी अथवा टीका के अनुसार इसके अवयव नवीन लोहे से एवं नवीन चर्म को रज्जुओं से जकडे हुए थे ऐसा अर्थ होता हैं । (हरिपहरणरयणसरिस चक्क) इसके दोनों पहिये वासुदेव के चक्ररत्नके जैसे गोल थे (कक्कयणईंदणील सासग सुसमाहिय बद्धजालकडगं ) इसमें जो जालसमूह था वह कर्केतन चन्द्रकान्तादि मणियों से, इन्द्रनीलसंगहियजुत्ततुंबं ६२४ दिशामा १२-१२ आम अधा भजीने ४८ भरता. त स्वणुभय पट्टोथी-भटुथी - हृढीत तेभ यि सेना भन्ने तुमा इता. (पघसियापसियनिम्मियनव पट्टपुट्ट परिणियिं) सेना युडीमां ने पट्टि ती ते अधर्षित हुती भूम धसामेली हुती. सारी रीते तेमां भद्ध हुती भने अर्थ हुती, नवीन हुती. (विसिट्ठ लट्टणवलाह बद्धकम्म) (वशिष्ट--यति भूनोहर-नवीन सोम श्री तेमां अमरे तु खेखे ! મજબૂતી માટે સ્થાન-સ્થાનમાં તેમાં નવીન-નવીન લેખડની ખીલીએ તેમજ પત્તિએ લાગેલી હતી. અથવા ટીકા મુજબ તેના અવયવે નવીન લેખંડથી તેમજ નવીન ચની રજુએથી આમનું हुता. आवो अर्थ थाय छे. (हरिपहरणरयणसरिसबक्कं खेना भन्ने चैडा वासुदेवना यडेरत्न वा गोज ता. (कक्केयण इंदणोल सासग सुसमाहिय बद्धजालकडगं) मेमां ने लव समूह बत। ते तन यन्द्रअंताहि, भशिमोथी इन्द्रनी Page #646 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्धोपप्राप्तिस्त्र शस्यकमुसमाहितबद्धनालकटकम् , तत्र कर्केतन:-चन्द्रकान्तादिमणिः, इन्द्रनील:-इन्द्रइव नीलः श्यामः खरवादर पृथ्वीकायात्मकनीलरत्नविशेषः, शस्यक:-रत्नविशेषः रत्नत्रय सुष्टु सम्यग् आहितं निवेशितं कृतसुन्दर संस्थानमित्यर्थः ईदृशं बद्धं जाल कटकंजालकसमूहो यत्र स तथा तम्, तथा 'पसत्थ वित्थिन्न समधुरं' प्रशस्तविस्तीर्णसमधूरम् प्रशस्ता विस्तीर्णा समा वक्रता रहिता धूयंत्र स तथा तम् तथा 'पुरवरं च गुत्तं' पुरवरं च गुप्तम् पुरमिव गुप्तं श्रेष्ठसूरमित्र सुरक्षितम् समन्ततः अयं भावः रथेहि प्रायः सर्वतो लोहादिमयी आवृत्तिर्भवति, प्रवरदृष्टान्तकथनेनायमर्थः सम्पद्यते यथा पुरम् अस्त्र शस्त्र सेनादि भिमुरक्षितं तथा रथोऽपि सुरक्षितस्तम्, पुनश्च कीदृशम् 'मुकिरणतवणिज्ज जुत्तकलियं' मुकिरणतपनिययोक्त्रकलितम्, तत्र मुकिरणं सुष्टु कान्तिकं यत्तपनीयं सुवर्ण तन्मयां योक्त्रां तैः कलितस्तथा तम्, योक्त्रेण हि वोदूस्कन्धे युगं बध्यते इति 'कंकटयणिजुत्तकप्पणं' कंकटकनियुक्तकल्पनम्, कंकटका:-सन्नाहा कवचास्तेषां नियुक्ता स्थापिता कल्पना रचना यत्र स तथा तम् यथाशोभं तत्र सन्नाहाः स्थापिताः सन्तीतिभावः, तथा-'पह रणाणुजायं' प्रहरणानुयातम्, प्रहरणैशस्त्रैरनुयातो भृतयुक्तः इत्यर्थः स तथा तम्, एतदेव व्यक्ति आह-'खेडगकणगधणुमंडलग्गवरसत्तिकोंततोमरसरस य बचीसतोणपरिमंडियं' खेटककनकधनुमण्डलायवरशक्तिकुन्ततोमरशरशतद्वात्रिंशत्तूणपरिमण्डितम् , तत्र खेटकानि फलकानि 'ढाल' इति भाषा प्रसिद्धानि कणकाः-बाणविशेषाः धनमणियों से एवं शस्यक-रत्नविशेष-से सुन्दर आकारवाला बना हुआ था (पसत्थवित्थिन्नसमधुरं ) इसकी धुरा- अग्रभाग प्रशस्त थी, विस्तीर्ण थी और सम-वक्रतारहित थी (पुरवरं च गुत्तं ) श्रेष्ठ पुरकी तरह यह सुरक्षित था (सुकिरण तवणिज्जजुत्तकलियं ) सुष्टु किरणवाले तपनीय सुवर्ण की इसको बैलों के गलों में डालने वाली रस्सी थी ( कंकटणिज्जुत्त. कप्पणं) ककटक-सन्नाह कवचों की इसमें रचना हो रही थी तात्पर्य इसका यही है कि इसकी विशिष्ट शोभा बढाने के लिए इसमें जगह २ कवच स्थापित हो रहे थे. (पहरणाणुजायं) प्रहरणों से- अत्र शस्त्र आदिको से भरा हुआ था. जैसे-(खेडगकणगधणु मंडलग्गवरसत्तिकोत तोमरसरस य बत्तिस तोणपरिमंडियं ) इसमें खेटक-ढाले-रखी हुई थी, कणक-विशेष प्रकार के बाण रखेहुए थे. धनुष रखे हुए थे, मण्डलान-विशेष प्रकार की तलवारें रखी हुई थो समरिमाथा तभर शस्य:-२न विशेषथा सु१२ मारवागारतो. (पसत्थ विस्थिन्न समधुर) मेनी ५२६ (अमा) प्रश1 ता, विस्तात भने सम-assita. (पुरवरं च गुत्त) श्रेष्ठ पुरनी भये सुरक्षित ता. (सुकिरण तवणिज्जजुत्तकलिय) - होना मामा नासी २३श सु २५ तपनीय सुपणना मनाती. (कंकटय णि पणं) ४४८४-सन्ना वयाना अमां श्यना थई २४ी हुती. तात्य भानु मा પ્રમાણે છે કે એની વિશિષ્ટ ભાવૃદ્ધિ માટે એમાં સ્થાન–સ્થાન ઉપર કવચ સ્થાપિત કરેલા ii. (पहरणाणुजाय) प्री -१-४२। आथी परिपूरित २ -(खेडग कणगधणु मंडलग्गवरसत्तिकोततोमरसरस य बत्तीसतोणपरिमडिय) मा पेट-दा . Page #647 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तृवक्षस्कारः सू० १० रथवर्णनपूर्वक भरतस्य रथारोहणम् पि प्रसिद्धानि मण्डलामाः खड्गविशेषाः वरशक्तयः त्रिशूलानि कुन्ताः भल्ला इति प्रसिद्धाः तोमराः बाणविशेषाः शराणां शतानि येषु तादृशा ये द्वात्रिंशत्तूणाः भस्त्रकास्तै: परिमण्डितो यः स तथा तम् तथा 'कणगरयणचित्तं' कनकरत्नचित्रम्, सुवर्ण रत्नविशेषैः परिमण्डितम् तथा 'जुत्तं' युक्तं तुरगैरित्यग्रेण सम्बध्यते तुरगैः किं विशिष्टैरित्याह' हलीमुहबलागगयदंतचंदमोत्तियतणसोल्लिअकुंदकुडयवरसिंदुवारकंदलवरफेणणिगरहासकासप्पगासधवले" हलीमुखबलाकगजदन्तचन्द्रमौक्तिक 'तणसोल्लिअ' मल्लिका पुष्प कुन्दकुटजवरसिन्दुवारकन्दल वरफेननिकरहारकाशप्रकाशधवलैः, तत्र-हलीमुखं रूढिगम्यम्, बलाको बकः गजदन्तचन्द्रौ-प्रसिद्धौ मौक्तिकम् मुक्ताफलम् 'तणसोल्लिअत्ति' मल्लिकापुष्पं कुन्दम् श्वेतपुष्पविशेषः कुट जानि कुटजपुष्पाणि, वरसिन्दुवाराणि निर्गुण्डीपुष्पाणि कन्दलानि कन्दलनामकवृक्षविशेषपुष्पाणि वरफेननिकरः वरफेनसमूहः हारो मुक्ताहारः काशाः तृणविशेषास्तेषां प्रोक्तानां यः प्रकाशः उज्ज्वलता तद्वत् धवलैः धवलवर्णैः, पुनश्च कीदृशैः 'अमरमणपवणजइणचवलसिग्धगामीहि' अमरमनःपवनजयिचपलशीघ्रगामिभिः, तत्र अमराः देवा मनांसि चित्तानि पवनो वायुः तान् वेगेन जयति इति वर शक्ति-त्रिशूल रखे हुए थे. किन्तु-भाले रखे हुए थे, तोमर-विशेष प्रकार के बाण रखे हुए थे, सैकड़ों सामान्य बाण जिनमें रखे हुए हैं ऐसे ३२ भाथे इसमें रखे हुए थे. (कणगरयणचित्तं) इसमें जो चित्रबने हुवे थे वे कनक और रत्नों द्वारा अतिरमणीय बने हुए थे. ( हलीमुहबलागगयदंतचंदमोत्तियतणसोल्लिय कुंदकुडयवरसिंदुवारकंदलवरफेणणिगरहासकासप्पगासधवलेहिं) इसमें जो 'जुत' घोड़े जुते हुए थे-वे हलीमुख, बगला, गजदन्त, चन्द्रमा-मौक्तिक, मल्लिका पुष्प, कुन्दकुष्प, कुटजपुष्प, निर्गुण्डी पुष्प, कन्दल नामक वृक्षविशेष के पुष्प, सुन्दर फेन का समूह, हार,-मुक्ताहार और काश-तृणविशेष इनकी जैसी-उज्ज्वलता वाले थे-अर्थात् धवल वर्ण के थे ( अमरमणपवणजइण चवलसिग्घगामीहिं ) जैसी देवों की, मनकी, वायुकी, गति होती है उस गति को भी परास्तकरनेवाली इनको चपलताभरी शीघ्र गति थी. उस गति से મકેલી હતો. કણક-વિશેષ પ્રકારના બાણે મૂકેલા હતા. ધનુષ મૂકેલા હતા, મંડલાગ્ર-વિશેષ પ્રકારની તલવારે મૂકેલી હતી. વરશક્તિ-ત્રિશૂલ મૂકેલા હતાં. કુંત-ભાલાએ-મૂકેલા હતા. તેમર-વિશેષ પ્રકારના બાણે મૂકેલાં હતા. સહસ્ત્રો સામાન્ય બાણે જેમાં મૂકેલા છે, એવા 3२ तपा। मेमा भू तi. (कणगरयणचित्त) समाथि बने। तो, नमाने २ननिमित पाथी अत्यंत रमणीय nisal. (हलीमुहबलागदंतचंदमोत्तियतण सोल्लियकुंदकुडयवरसिंदुवारकंदलवरफेणणिगरहासकासप्पगासवलेहिं) मेमा २ 'गुत' घोडाय। ઐતરેલા હતા, તે હલીમુખ, બગલા, ગજદન્ત, ચન્દ્રમા, મૌક્તિક, મલિકા પુષ્પ,કુન્દ પુપ, કુટજ પુષ્પ, નિગુડી પુષ્પ, કંદલ નામક વૃક્ષવિશેષના પુષ્પ, સુન્દર ફીણ સમૂહ હાર-મુક્તાહાર અને કાશ-તૃણ વિશેષ એ સર્વ પદાર્થો જેવા ઉજજવળતા વાળા હતાં. એટલે કે ધવલવ वाणा . (अमरमणपवणजइण चवल सिग्घगामीहिं) २वी वानी, भननी, वायुनी गति હોય છે, તેમની ગતિ ને પણ પરાસ્ત કરનારી એમની ચપળતાભરી શીવ્ર ગતિ હતી, તે ८० Page #648 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६३४ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे अमरमन:पवनजयिनः अतएव चपलं शीघ्रम् अतिशयशीघ्रं गामिनो गमनशीलाः इति चपलशीघ्रगामिनः, अमरमनःपवनजयिनश्चते चपलशीघ्रगामिनश्चेति ते तथा तैः पुनश्च कीदृशैः 'चउहिं चामरा कणेगविभूसिअंगेहिं' चतुर्भिः चतुः संख्याकैः चामरैः तथा कनकैश्च विभूषितमङ्ग येषां ते तथा तैः, अत्र चामरशब्दस्य स्त्रीत्वम् आर्षत्वात् 'तुरगेहि एतादृशविशेषणविशिष्टैः तुरगैः अश्वः युक्तं रथमिति पूर्वमेवोक्तम् अथ पुनारथं विशिनष्टि 'सच्छत्तं सच्छत्रम् छत्रेण सहितम् 'सज्झयं' सध्वजम् ध्वजैः सहितम् 'सघंट' सघण्टम् घण्टाभिः सहितम् 'सपडागं' सपताकम् पताकाभिः सहितम् 'सुकयसंधिकम्म' सुकृतसन्धिकर्माणम् सुकृतं सुष्टु निर्मितं सन्धिकर्म सन्धियोजनं यत्र स तथा तम् 'सुसमाहिय समरकणगगंभोरघोसं' सुसमाहितसमरकनकगम्भीरघोषम्, तत्र-सुसमाहितः-सुष्टु यथोचित स्थाननिवेशितो यः समरकणक:-संग्रामवाद्य विशेष: तस्य वीराणां वीररसोत्पादकत्वेन तुल्यो गम्भीरो घोषः गम्भीरात्मकध्वनिर्यस्य स तथा तम् 'वरकुप्परं' वरकूर्परम् वरे कूपरो कूर्पराकारौ पिञ्जनके इति प्रसिद्ध रथावयवौ यस्य स तथा तम् 'मुचक्कं वरनेमी मंडलं' सुचक्रम् वरनेमीमण्डलम्-प्रधानचक्रधारावृत्तम् 'वरधारातोंडं' वरधूस्तुण्डं वरे शोभमाने धृस्तुण्डे धूव्वीवरे अवयव विशेषौ यस्य स तथा तम् 'वरवइरबद्धतुंबं, तत्र-वरवेगपूर्वक इनके चलने का स्वभाव था ( चउहिं चामराकणगविभूसिअंगेहिं ) चार चामरों से एवं कनकों से इन का अंग विभूषित था, यहां चामर शब्द को जो-स्त्रीलिङ्ग में लिखा गया है वह आर्ष होने से लिखा गया है ऐसे विशेषणविशिष्ट घोड़ों से युक्त वह रथ था, तथा ( सच्छत्तं, सज्झय, सघंट, सपडाग, सुकयसंधिकम्मं, सुसमाहिय समरकणगगंभीरघोसं, वरकुप्परं) यह रथ छत्र सहित था, ध्वजा सहित था, घंटाओं से युक्त था, पताकाओंसे मंडित था, संधियों की इसमें अच्छी तरह से योजना की गई. थी जैसा घोष यथोचित स्थानविशेष में नियोजित संग्राम वाधविशेष का होता है उसी प्रकार का इसका गम्भीरघोष था. इसके कूपर दोनों अवयवविशेष-बड़े सुन्दर थे ( सुचक्कं वरनेमीमंडल ) सुन्दरचक्रधार वाले इसके सुन्दर दोनों ( वरधारातोंडं ) इसके युग के दोनों कोने बड़े सुन्दर थे ( वरवइरबद्धतुंबं ) इसके दोनों शतिथी यासवानी मनी ती. (चउहि चामराकणगविभूसिअंगेहिं) या२ यमराया તેમજ કનકેથી એમના અંગે વિભષિત હતા. અહીં “ચામર’ શબ્દને જે સ્ત્રીલિંગમાં પ્રયક્ત કરવામાં આવેલ છે, તે આર્ષ હોવાથી પ્રયુકત કરેલ છે. એવા વિશેષ વિશિષ્ટ ઘડાઓથી ते २५ युत उता. तथा (सच्छत्तं सज्झयं सघंटे सपडाग सुकयसंधि कम्म सुनमाहिय समरकणग गम्भीरघोसं वरकुष्परं) २थ छत्र सहित हता, सहित sil' ઓથી યુકત હતા. પતાકાઓથી મંડિત હતા, એમાં સંધિઓની યેજના સરસરીતે કરવામાં આવી હતી. જે ઘોષ યથોચિત સ્થાન-વિશેષમાં નિયજિત સંગ્રામવાઘવિશેષને હોય છે, તે જ પ્રમાણે એને ગંભીર ઘેડ્યું હતું. એના કુ-બને અવયવ વિશેષા–અતીવ સુંદર di, (सुचक्क वरनेमीमंडल) सु४२ ययुटत अनु नेभी मज तु. (वरधारा तोंड) सना युगना मन्ने भूमि मी सुंदर ता. (वरवइरयतुंब) ना - तुम 08.100 Page #649 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० १० रथवर्णनपूर्वकं भरतस्य रथारोहणम् वज्रबद्धतुम्बम्, वाचन:-श्रेष्ठहीरकैः बद्धे तुम्बे यस्य स तथा तम् 'वरक चणभूसियं वरकाञ्चनभूषितम् श्रेष्ठसुवर्णभूषितम् 'वरायरियनिम्मियं' वराचार्यः प्रधानशिल्पी तेन निर्मितः 'वरतुरगसंपउत्तं' वरतुरगसंप्रयुक्तम् वरतुरगैः श्रेष्ठाश्वः संप्रयुक्तः युक्तः स तथा तम् 'वरसारहिसुसंपग्गहियं' वरसारथिसुसंप्रगृहीतम्, वरेण-निपुणेन सारथिना सुसंप्रगृहीतः स्वायत्तिकृतो यः स तथा तम् 'वरपुरिसे' इत्यादि तु पूर्वमेव योजितम् वरपुरूषः श्रेष्ठपुरुषः सुराजा भरत उक्तं बिशिष्टं रथमारूढे इति 'दृरूढे आरूढे' इत्यत्र समानार्थक पदद्वयोपादानं षट्खंडाधिपति भरतचक्रो सुखपूर्वकम् रथमारूढ इति ज्ञापनार्थ विज्ञेयम् उक्तमेवार्थ पुनः रथविषये प्राह-'पवररयणपरिमंडियं' इत्यादि प्रवररत्नपरिम-ण्डितम् उत्तमरत्नैः परिशोभितम्-युक्तम् 'कणयखिंखिणीजालसोभियं' कनककिङ्गिणीजालशोभितम् सुवर्णनिर्मितकिङ्किणीसमूहभूषितम् 'अउज्झ' अयोध्यम्-अनभिभवनीयम् पराभवरहितं पुनश्च कीदृशम् 'सोयामणि कणगतविअपंकयजामुअणजलणजलियमुअतोंडरागं' सौदामिनोकनकतप्तपङ्कजजपाकुसुमज्वलनज्वलितशुकतुण्डरागम्, तत्र सौदामिनी विद्युत् तप्तं यत् कनकं सुवर्णम् तच्चानलोत्तीण रक्तवणं भवति पङ्कजं कमलम्, तच्च सामान्यतो रक्तं वर्ण्यते 'जामुअण' त्ति जपाकुसुम-रक्तवणेविशिष्टजपाकुसुमनामक पुष्पविशेष: 'जलणजलिय त्ति' ज्वलनज्वलितः ज्वलितज्वलनः प्रदीप्ताग्निः अत्र पदव्यत्ययः प्राकतुंब श्रेष्ठ वज्ररत्न से बद्ध थे ( वरकंचणभूतिय ) यह श्रेष्ठ सुवर्ण से मूषित था ( वरायरियनिम्मियं ) यह श्रेष्ठ शिल्पी के द्वारा बनाया गया था ( वरतुरगसं उत्तं ) श्रेष्ठ घोडे इसमें जुते थे (वरसारहिसुसंपग्गहिय) श्रेष्ठ निपुण सारथि द्वारा यह चलाया जाता था, ऐसे इन विशेषणों से विशिष्ट (वरमहारह) उस श्रेष्ट महारथ पर (वर पुरिसे) वह सुराजा छखंडके अधिपतिमरत (दुरूढे मारूढे ) बैठा यहां समानार्थक दुरुढ और आरूढ ये जो दो पद प्रयुक्त साथ २ किये गये हैं सो वे ये प्रकट करते हैं भरत चक्री उस रथ पर सुख पूर्वक बैठा (पवररयणपरिमंडियं) यह रथ उत्तम रत्नों से शोभित था (कणयखिखिणीजालसोभियं) सुवर्ण की बनी हुई छोटी-२ घटिकाओं से यह शोभित था ( अउज्झं) इसका कोई भी शत्रु पराभव नहीं कर सकता था (सोआमणिकणगतवियपंकयजासुअणजलणजलियसुअतोंडरागं) इसकी रकता सौदामिनी२त्नयी आमद्ध ता. (वरकंचणभूसिंयं) मे २५ श्रे ४ सुवथा भूषित हता. (वरायरियनिम्मिय) से शिक्षा द्वारा निमितता. (वरतरगसंपउत्तं) 20 घासी समांतर ता. (वरसारहिसुसंपग्गहियं) श्रेष्ठ निपुर सावि द्वारा ते ४ामा मापता तो. मेवाने विशेषगाथा विशिष्ट (वरमहारह) महारथ ५२ (वरपुरिसे) तेसुरा छ मधिपति भरत (दुरूढे आरूढे) सवार थय।. डी समानाथ ३० भने मा३० मे २२ पह। साथસાથે પ્રયુકત કરવામાં આવેલ છે, તેથી આમ પ્રકટ થાય છે કે ભરત ચક્રી તે ઉ૫૨ સુર मेह। (पवररयण परिमंडियं) ते २थ हत्तभरत्नाथालित हुता. (कणयखिखिणीजालसोभियं) सुवर्ण नी नानी-नानी घटियाथी ते सुशामित ता. (अउज्झं) शत्रुमाथी अरेय खता. (सोमणिकणगतवियपंकयजासुअणजलण जलिय सुअतोंडराग) मेनी २४तासीहामिनी Page #650 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६३६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तत्वात् 'सुअतोंडरागं' शुकतुण्डम् शुकमुखम् एतेषां राग इव रागो रक्तता यस्य स तथा तम् 'पुनश्च कीदृशम् 'गुंजद्धबंधुजीवग रतहिंगुलग णिगर सिंदूररुइलकुंकुमपारेवय चरणयण कोइलदसणावरणरइता तिरेगरत्तासोग कणग केसुय गयतालसरिंदगोवगसमप्पमप्पगासं' गुजार्द्धबन्धुजीवकरक्तहिङ्गुलकनिकर सिन्दूररुचिरकुङ्कुमपारावतचरणनयनको किलदशनावरण र विदातिरक्ताशोककनककिंशुक गजतालु सुरेन्द्रगोपकसमप्रभप्रकाशम्, तत्र गुजार्द्धम् रक्तिकार्धरागभागः बन्धुजीवकं द्विप्रहरविकाशिरक्तपुष्पम्, रक्तः संमर्दितो हिंगुलकनिकरः सिदूरम् प्रसिद्धम्, रुचिरं मनोज्ञं चाक्यचिक्यरक्ततायुक्तम् कुङ्कुमम् पारावतचरणः कपोतचरणः, नयनकोकिलः कोकिलनयनद्वयम् अत्र पदव्यत्ययः आर्षत्वात् दशनावरणम् अधरोष्ठः, रतिदो मनोहरः अतिरक्तः अधिकारुणोऽत्यन्तलालिमायुक्तोऽशोकः अशोकतरुः, इदृशं च तथैव कनकं किंशुकं पलाशपुष्पम् तथा गजतालु हस्तितालु सुरेन्द्रगोपको वर्षासु रक्तवर्णः क्षुद्रजन्तुः विशेषः एभिः समा-सदृशी प्रभा - छविः तथा एवंविधः प्रकाशः तेजः समूहो यस्य स तथा तम्, पुनश्च कीदृशम् । 'बिम्बफल सिलप्पवाल उद्वितस्वरसरिसं' बिम्बफल श्लीलप्रवाळ यद्वा शिलप्रवालोत्तिष्ठतसूरसदृशम् तत्र बिम्बफलं - प्रसिद्धम् 'सिलप्पवाल' ति अत्र अश्लील शब्द इव श्रियं लातीति श्लीलम् एवंविधं यत्प्रवालं श्लीलप्रवालं परकर्मित विद्रुमः यद्वाशिळाप्रवालं शिलाशोधितविद्रुमः तथा उत्तिष्ठत्सूर :- उद्गच्छत्सूर्यः तेषां सदृशो यः स तथा तम्, 'सव्वोउय सुरहि कुसुमआसत्तमल्लदामं' सर्वर्तुकसुरभिकुसुमासक्तमाल्यदामानम्, तत्र सर्वर्तुकानि षड् ऋतुभवानि यानि विजलो, तप्त सुबर्ण - अग्नि से उसी समय निकले हुए सुवर्ण पङ्कज- रक्तकमल, जपाकुसुम, प्रदीप्त अग्नि और शुककी चोंच इनकी रक्तता जैसी थी ( गुंजद्ध बंधुजीवग, रत्तहिंगुल गणिगर, सिंदूर रुइर कुंकुम, पारेवयचरणयण कोईलद सनावरण रइदातिरेगर त्तासोग कणगके सुयगयतालु सुरिंदगोवगसमप्पभपगासं) इसको छवि और तेजः प्रकाश रत्तीके अर्धभाग बन्धुजीवक - द्विप्रहर प्रकाशोरक्त पुष्प, रक्तहिंगुलक, निकर, सिन्दूर, रुचिरकुंकुम, पारावतचरण, कोकिनेत्र, दशना वरण-अधरोष्ठ, रतिद मनोहर, एवं अतिरिक्त अशोक वृक्ष, कनक किंशुक पुष्प; गजतालु, एवं सुरेन्द्रगोपक - जुगनु, इन सबकी छवि और तेजः प्रकाश के जैसा था (बिंब फलमिलपवालउद्वितसुरसरिसं सव्वोउयसुरहिकुसुम आसत्त मल्लदामं, उसिय सेयज्झयं ) यह रथ - विद्युत्, तप्तसुत्र - अमिथी तर ४ मा अढेसा सुवथु, ४४-२४८ ४भाग, क्याशुभ प्रदीप्त व्यक्ति ने पोपटनी ययु लेवी हुती. (गुजद्ध बन्धुजीवग, रतहिं गुलगणिगर सिदूररुहर कुंकुम परिवयवरणणयण कोइल सनावरण इदाति रेगरतासोग कणग केसुयगयतालु सुदिगोवगलमध्यभागासं) सेनी छमिये रोग अाश रतीने म ભાગ, મન્યું જીવક-દ્ધિ પ્રહર પ્રકાશી રક્ત પુષ્પ, હિં'ગુલક, નિકર, સિંદૂર, રુચિર કર્યું, પારાવતા ચરણુ, કેકિલ નેત્ર, દનાવરણુ-અધરા, રતિઃ મનેાહર, અતિરક્ત અશેક વૃક્ષ, કનક કશુક પુષ્પ, ગજતાલુ તેમજ સુરેન્દ્ર ગાયક એટલે કે ખદ્યોત એ સર્વ જેવુ . (विफलसिलप्पवाल उट्ठितसुरसरिसं सव्वोउयसुरद्दिकुसुम आसत्तमबलदामं उसि Page #651 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० १० रथवर्णनपूवर्क भरतस्य रथारोहणम् ६३७ सुरभिणि कुसुमानि अग्रथित ससुगन्धपुष्पाणि माल्पदामानि-ग्रथितपुष्पाणि यत्र स तथा तम् 'ऊसियसेयज्झयं' उच्छितश्वेतध्वजम् उच्छ्रितः ऊ/कृतः श्वेतध्वजो यत्र स तथा तम् 'महामेहरसिय-गंभीहणिद्धघोसं' महामेघरसितगम्भीरस्निग्धघोषम्, महामेघस्य यद्रसितं -गर्जितं तद्वद् गम्भीरः स्निग्धः स्नेहरसयुक्तः घोषो यस्य स तथा तम् 'सत्तुहिययकंपणं' शत्रुहृदयकम्पनम्, शत्रुहृदेयकम्पजनकम् 'पभाएय' प्रभाते च अष्टमतपःपारणकं दिवसे प्रातः काले आसन्नपारितपौषधवतः सन् नरपतिः अश्वरथं दुरूढे इत्यग्रे सम्बन्धः कीदृशं रथम् इत्याह 'सस्तिरीयं' सश्रीकं शोभायुक्तम् ‘णामेणं पुहविविजयलंभतिविस्सुतं' नाम्ना पृथ्वीविजयलाभमिति विश्रुतं प्रसिद्धम्, रथेऽस्मिन् समारूढः' सन् पुरुषो भूविजयं लभते इति सान्वर्थकम् 'अहयं' अहतम् सर्वावयवयुक्तम् 'चाउग्घंटं चातुर्घण्टं चतस्त्रो घण्टा यस्य स तथा तम् 'आसरहे' अश्वरथम्, कीदृशो राजेत्याह'पोसहिए' पौषधिकः आसन्नपारितपौषधव्रतः पुनश्च कीदृशः 'लोगविस्सुतजसो' लोकविश्रुतयशाः लोकविख्यातकीतिः ‘णरवई' नरपतिः चक्री भरतः सर्वविशेषणविशिष्टमश्वरथं दुरूढे आरूढ इति । अथ रथारोहानन्तरं भरतः किं कृतवान् इत्याह-'तएणं से' इत्यादि 'तएणं से भरहे राया चाउग्घंटं आसरहं दुरूढे समाणे सेसं तहेव' ततः खलु स भरतो राजा बिंबफल कुंदरीफल, शिलाप्रवाल-परिकर्मितविद्रुम, यद्वा शिलाशोधित विद्रुम, एवं उगता हुआ सूर्य इनका जैसा रंग होता हैं वैसे हि रंग वाला था, समस्त शत्रुओं के पुष्पों के मालाएँ इस पर पड़ी हुई थी, इसके ऊपर बहुत उन्नतश्वेतध्वजा फहरा रही थी ( महामेहरसिय गंभोरगिद्धघोसं ) महामेध की गर्जना .के जैसा इसका गंभीर स्निग्ध घोष था, (सतुहिययकपणं) शत्रुजनके हृदय को यह कपकपी छुड़ने वाला था ( पभाए म सस्सिरीअं णामेण पुहविविजयलंभंति विस्सुतं लोगविस्सुतजसोऽहयचाउग्घंटे आसरह पोसहिए णरवई दुरूढे, तएणं से भरहे राया चाउग्घंटं आसम्हं दुरूढे सेसं तहेव दाहिणमुहेगं वरदामतित्थेणं लवणसमुदं ओगाहइ) प्रातः काल जबकि अष्टम (तेला) तपस्या का पारणा था और पौषधका पारणा किये हुए बहुत समय नहीं हुआ था ऐसा वह नरपति शोभायुक्त तथा पृथिवी-- विजयलाभ इस नाम से प्रसिद्ध एवं सर्वावयवयुक्त ऐसे उस चार घंटाओं से सहित अश्वस्थ पर असेयज्झयं) से २५ मिमण, , शिक्षा प्रवास-परिमित विभ, अथवा शिक्षाશેધિત વિદ્રમ, તેમજ ઉદિત સૂર્ય જેવા રંગવાળે હતે. સમસ્ત શત્રુઓના પુછપાની માળા એ રથ ઉપ૨ પડેલી હતી. એ રથ ઉપર એકદમ ઉનત એક વેત વજા ફરકી રહી હતી. (महामेहरसियगम्भीरणिद्धघोसं) महामेवनी ना२३ मेने। नियघोष ता. (सत्तहिययकंपणं) शत्रुसोनाल्याने ते नार ते. (पभाए अ सस्सिरी णामेणं पुहविविजयलंभंति विस्तुतं लोगविस्सुतजसोऽहयवाउग्घंटं आसरहं पोसहिए णरवई दुरूढे तपणं से भरहे राया चाउग्घंटे आसरहं दुरूढे सेसं तहेव दाहिणामुहेणं वरदामतिस्थेण लवणसमुहं ओगाहइ) प्रात: समये न्यारे २५टम तयानी पारा ती अन पोषयनी પારણુને પણ વધારે સમય થયો ન હતો, એવા સમયે ભાયુક્ત તે નરપતિ પૃથિવી વિજય Page #652 -------------------------------------------------------------------------- ________________ र सत्रे ६३८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे चातुर्धण्टम् अश्वरथम् आरूढः सन् शेषं तथैवेति वचनात् 'हयगयरहपवरजोहकलियाए सद्धिं संपरिवुडे महया भडचडगरपहगरवंदपरिक्खित्ते चकरयणदेसियमग्गे अणेग रायवरसहस्साणुयायमग्गे महया उक्किट सीहणायबोलकलकलवेणं पक्खुभिय महासमुद्दरवभूयं पिव करेमाणे' इत्यन्तं ग्राह्यम् हयगजरथप्रवरयोधकलितया साई संपरिवृतः महाविस्तारवत्समूहवृन्दपरिक्षिप्तः चक्ररत्नादेशितमार्गः अनेकराजवरसहस्त्राणुयातमार्गः महता उत्कृष्ट सिंहनाद बोलकलकलरवेण प्रक्षुभितमहासमुद्ररवभूतमिव कुर्वन् कुर्वन 'दाहिणाभिमुहे वरदातित्थेणं लवणसमुदं ओगाहइ' दाक्षिणात्यभिमुखो वरदामतीर्थेण-वरदामनाम्नाऽवतरणमार्गेण लवणसमुद्रमवगाह ते प्रविशति कियदृरं लवणसमुद्रमवगाहते इत्याह-'जाव से रहवरस्स कुप्परा उल्ला' यावत् तस्य रथवरस्य कूपरौ-कूपराकारौ रथावयवौ भाद्रौं स्याताम् आर्दीभूतौ भवेताम् 'जाव पीइदाणं से' यावत् प्रीतिदानं तस्य वरदामतीर्थाधिपदेवस्य अत्रापि यावत् पदात् मागधदेवसाधनाधिकारोक्तं प्रीतिदानपर्यन्तं सूत्रं ग्राह्यम् विलोकनीयं च अत्रैव तृतीय वक्षस्कारे ६-७ सूत्रे चढा. "लोयविस्सुय जसो" यह भरतचक्री का विशेषण है और इसका अर्थ लोक में जिसका यश विख्यात है ऐसा है 'पोसहिए" यह भो भरतचक्री का विशेषण है और इसका अर्थ पौषधवत की पारणा किये जिसे विशेष समय नहीं हुआ है ऐसा है । "तएणं से भरहे राया" इत्यादि- जब भरत महाराजा अश्वरथ पर बैठ चुके-तब वे "हयगयरहपवरजोहकलियाए सद्धिं संपरिवुडे महया भडचडगर पहगरवंदपरिक्खित्ते चक्करयणदेसियमग्गे, अणेगराजन्यवर सहस्साणुयायमग्गे, महया, उक्किट सीहणाय बोलकलकलरवेणं पक्खुभिय महासमुद्दरवभूयंपिव करेमाणे२" इस पूर्वकथित पाठ के अनुसार दक्षिणदिशा की ओर मुंह किये हुए वरदाम नाम के अवतरण मार्ग से होकर लवण समुद्र में उतरे (जाव से रह बरस्स कुप्परा उल्ला) यावत् उनके उस रथ के कूर्पराकारवाले रथावयव ही गीले हो पाये इतनो दर तक ही वे उस लवण समुद्र में गये (जाव पोइदाणं से) यावत् वहां पर यावत्पद से मागध લાભ એ નામથી પ્રસિદ્ધ તેમજ સર્વાવયવ યુક્ત એવા તે ચાર ઘંટાએથી મંડિત રથ ઉપર सवार था. "लोयविस्सुयजसो" मे भरती भाट प्रयुत विशेषण छ. मन यन। अथ छ यात. 'पोसहिए' से सतया माटे प्रयुत विशेषण छे. मने से विशेषा शहना भय छ-२२ पौषध व्रतनी पार पछी मधिर समय च्या नथी. 'तपणं से भरहे. राया' यानि, ब्यारे ते मरत २IM A२५ 8५२ सा२ २७ गयो त्यारे तय। (हयगयरहपवरजोहकलियाए सद्धि संपरिवुडे महया भडचडगरपहारवंदपरिक्खित्ते चक्कायणदेसियमग्गे अणेगराजन्यबरसहस्साणु थायमग्गे महया उक्कि सीहणाय बोलकलकलरवेणं पक्खु भयमहासमुदरतभूयं विव करेमाणे) में पूरे ४थत ५४ मुमक्षिष्य દિશા તરફ મુખ કરીને વરદામ નામક અવતરણ માર્ગથી પસાર થઈને લવણ સમુદ્રમાં પ્રવિણ यया. जाव से रहवरस्स कुप्परा उल्ला' यावतू मना २५ना ५२३४२ वा स्थापया भीना था टस ४२ सुधीर सुभद्रमा गया (जाव पीइदाणं से) यावत त्यां तेभर Page #653 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० वक्षस्कारः सू०१. रथवर्णनपूर्वकं भरतस्य रथारोहणम् ६३९ 'पीइदाणं से' प्रीतिदानं तस्य नोर्थ राजदेवस्य स भरतः स्वीकरोतीतिभावः ततः स चक्रो भरतः तं देवं सत्कारयति सम्मानयति प्रतिविसर्जयति च भक्तिपूर्वकं वरदामतीर्थाधिपदेवः भरताय किं किमर्पयति इत्याह 'वरं चूडामणि य दिव्वं रत्थगेविज्जगं सोणिसुत्तगं कडगाणि य तुडियाणि य' मागधतीर्थाधिप देवकुमारापेक्षया नवरम् अयं विशेषो चूडामणि च दिव्यं मनोहरं सर्वविषापहं सर्वविषहरणकरम् शिरोभूषणविशेषम् मुकुटं तथा उरस्थं वक्षस्थल तत्र भूषणविशेषम् ग्रैवेयकं ग्रीवाभरणं श्रोणिसूत्रकं कटिमेखलाम् कंदोरा इति भाषा प्रसिद्धम् कटकानि च हस्ताभरणानि त्रुटिकानि च बाहाभरणानि च कियरपर्यन्तं वक्तव्यमित्याह-'जाव दाहिणिल्ले अंतवाले' इति यावद्दाक्षिणात्योऽन्तपाल इति अत्र प्रीतिदानं ददाति राजा च प्रीतिदानं स्वीकरोति वाक्यप्राभृतौ पढौकभरतकृततत्स्वीकरणतीर्थाधिपदेवसन्मानेन विसर्जनरथपरावृति स्कन्धावारप्रत्यागमन मज्जनगृहगमनस्नानभोजनकरणश्रेणिप्रश्रेणि शब्दनादि प्रतिपादकसूत्रं वक्तव्यम्, मागधदेवसाधनाधिकारोक्तं सर्व नेयमितिभावः कियत्पर्यन्तमित्याह-अत्र यावत्पदात् अश्वदेव के अधिकार में कहा गया प्रोतिदान तक का सूत्रपाठ गृहीत हुआ है । इसे यहाँ पर तृतीय वक्षस्कार के ६-७-वें सूत्र में देखलेना चाहिये । इस प्रीतिदान को स्वीकार करने के बाद भरत चक्रीने उस देव का सत्कार किया सन्मान किया और फिर उसे विसर्जित कर दिया भक्ति पूर्वक वरदामतीर्थाधिप देव ने भरत चक्री के लिये क्या२ दिया- इसे यो जानना चाहिये(णवरं चूडामणिं य दिव्वं उरत्थगेविज्जगं सोणिअसुत्तगं कडगाणि य तुडियाणि य) मागधतीर्थाधिप देवकुमार की अपेक्षा वरदामतीर्थाधिप देवने चूडामणि, जो कि दिव्य था सर्व प्रकार के विषों का हरने वाला था ! ऐसा शिरोभूषण दिया। वक्षःस्थल का भूषणदिया, अवेयक ग्रीवा का आभरण दिया, श्रेणिसूत्रक-कटिमेखला दी । कटक दिये और बाहु के आभरणदिये । और फिर उसने कहा कि मैं आपका यावत् दाक्षिणात्य उदन्त पालहूं यहां वह प्रीतिदान देता है। राजा उस प्रीतिदान को स्वोकार कर लेता है तो इन सब के सम्बन्ध में आगत सूत्रपाठ વરદામ તીર્થાધિપ દેવનું પ્રીતિપાદન સ્વીકાર કરેલ છે. અહીં યાવત પદથી માગધ દેવના અધિકારમાં વર્ણિત પ્રીતિદાન સુધીને સૂત્રપ ઠ સંગૃહીત થયેલું છે. એ વિષયને લગતું વર્ણન આ ગ્રંથના તૃતીય વક્ષસ્કારના સૂત્ર ૬ અને ૭ માંથી જાણી લેવું જોઈએ. એ પ્રીતિદાનનો સ્વીકાર કર્યા પછી ભારતચક્રીએ તે દેવતાને સકૃત તેમ જ સમ્માનિત કરીને પછી તેમનું વિસર્જન કરી દીધું. વરદામ તીર્થાધિપ દેવે ભરતચકી માટે ભક્તિપૂર્વક શું-શું આપ્યું, એ વિષે સ્પષ્ટતા Rai १२ छ-(णवरं चुडामणिय दिव्वं उरत्थगेविजग सोणिसुत्तगू कडगाणि य तडियाणि य) भागवताथाथि हमारना अपेक्षा १२६मतीयाधिस यूमिशि-२०य તેમજ સર્વ પ્રકારના વિષને હરનાર હરે, એવું શિરોભૂષણ આપ્યું. તે દેવે વક્ષ સ્થળનું આભૂષણ આપ્યું. શિવેયક ગ્રીવાનું આમરણ આપ્યું. શ્રેણિસૂત્રક-કટિમેખલા આપી. કટકો આપ્યા અને બાહના આભરણે આપ્યાં અને ત્યાર બાદ તેણે કહ્યું કે હું આપશ્રીને યાવત્ દાક્ષિત્ય ઉદન્તપાલ છું. અહીં તે પ્રીતિદાન આપે છે. રાજા તે પ્રીતિદાનને સ્વીકાર કરી લે છે Page #654 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ~ .. जम्बूद्वीपप्रक्षप्तिसूत्रे निग्रहरथस्थापनधनुःपरामर्शवा गोत्क्षेप कोपोत्पादकोपापनयननिर्द्धिसार प्रीतिदान सूत्राणि मागवतीर्थदेवसूत्राधिकारवद् विज्ञेयानि नवरं "जाव अट्ठाहियं महामहिमं करेंति" अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणयोऽष्टाहिकां महामहिमां कुर्वन्ति 'करित्ता' कृत्वा वरदामतीर्थाधिपदेस्य विजयोपलक्षिकामष्टाहिकां महामहिमाम्-महान् महिमा यस्या सा तथा तां कुर्वन्ति विधास्यन्ति विधाय 'एयमाणत्तियं पच्चप्पिणंति' एतां भरतादिष्टामाज्ञप्तिका स्वस्वामिभ्यो भरतेभ्यः प्रत्यर्पयन्ति परावर्तयन्ति तदनु अथ प्रभास तीर्थाधिपसाधनायो विजयाणपक्रमते-'तएणं' इत्यादि 'तएणं से दिव्वे चक्करयणे वरदामतित्थकुमारस्स देवस्स अट्टाहियाए महामहिमाए निव्वत्ताए समाणीए आउहघरसालाको पडिनिक्खमई' ततः खलु तदिव्यं चक्ररत्न वरदामतीर्थकुमारस्य देवस्य अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्याम् मागधतीर्थ कुमार के प्रकरण में जैसा कहा गया है वैसा ही यहां पर वह सब कथन समझलेना चाहिये । अर्थात् वरदामतीर्थ कुमादेव भरत चक्रो के लिये शिरोभूषणादिक भेट में देता है । वह उसे स्वीकार कर लेता है। भरत चक्री उसका सन्मानादि कर विसर्जन कर देता है। फिर वह वहां से अपने रथ को लौटा लेता है और अपने स्कन्धावार में आ जाता है। वहां आकर वह मज्जन गृह में चला जाता है वहां स्नान करके भोजन शाला में आकर वह भोजन से निवृत्त होकर के श्रेणिप्रवेणि जनों के बुलाता है इत्यादि पव कथन यहां मागधनोर्थकुमार देव के प्रकरणानुसार हो है । (जाव अट्ठादियं महामहिमं करेंति) यावत् वे सब श्रेणिप्रश्रेणिजन वरदामतीर्थाधि। देव के विनयोपलक्ष्य में आठदिन का महोत्सव करते हैं (करेत्ता) और यह सब करके फिर वे नरेश भरत चको को (एयमाणत्तियं पच्चप्पिणंति) इसकी-कार्य हो जाने की खबर दे देते हैं (तएणं से दिवे चक्करयणे वरदामातत्थकुमारस्त देवस्स अट्ठाहियाए महामहिमाए निवत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ ) इस तरह वरदामतीर्थाघिदेव कुमार के विजयोपलक्ष्य में किया गया वह ८ दिन का महामहोत्सव जब निष्पन्न તે આ સંબંધમાં આગત સૂત્રપાઠ માગધતીર્થ કુમારના પ્રકરણમાં જે પ્રમાણે કહેવામાં આવેલ છેએ જ રીતે અહીં પણ તે સર્વકથન જાણી લેવું જાઈએ, એટલે કે વરદામતીર્થ કુમાર દેવ ભરતચક્રી માટે શિરાભૂષણાર્દિક ઉપહારના રૂપમાં આપે છે. તે ઉપહાર ભરતચક્રી સ્વીકાર કરી લે છે. ભરતચક્રી તે દેવનું સમ્માન આદિ કરીને વિસર્જન કરી દે છે. ત્યાર બાદ તે ત્યાંથી પિતાને રથ પાછો વાળે છે અને પિતાના સ્કન્ધાવામાં આવી જાય છે. ત્યાં આવીને તે મજ શાળામાં જતો રહે છે. ત્યાં સ્નાન કરીને જોજનશાળામાં આવીને તે ભેજનથી નિવૃત્ત થઈને શ્રેણિ-પ્રશ્રેણિ જનેને બોલાવે છે. ઈત્યાદિ સર્વકથન અહીં માગધતીકુમાર निवृत्त 5 श्रा-प्राहिय महामहिमं करेंति) यावत ४३ प्र४२१ भुरा छे. (जाव अठ्ठाहियं महामहिमं करेति) यावत् त सव પ્રણે જ વરદા મતીર્થાધિપ દેવના વિજયપલક્ષ્યમાં આઠ દિવસને મહત્સવ કરે છે. (करित्ता) भने भानुभायोशन ५ रीने ५छी तो पाताना नरेश सरतहीन (प्यमाणत्तियं पच्चपिणंति) से माती on अरे छे. (तएणं से दिव्वे चक्करयणे वरदामतित्थकुमारस देवस्ल अहाहियाए महामहिमाए निवत्ताए समाणीप आउहघरसा. Page #655 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० १० रथवर्णनपूर्वकं भरतस्य रथारोहगम् ६४१ आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्कामति पडिणि खमिता' प्रतिनिष्क्रम्य 'अंजलिखपडिवण्णे जाव पुरंते चेव अंबरतलं उत्तरपच्चत्थिमं दिसिं पभासतित्थाभिमुहे पयाएयावि होत्था' अंतरिक्षप्रतिपन्नं गगनगतं यावन् दिव्यत्रुटित वाधविशेषशब्दसन्निनादेन अम्बरतलं पूरयदिव उत्तरपाश्चात्याम उत्तरपश्चिमां वायवी दिशं प्रभासतीर्थाभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत्, अत्र शुद्धदक्षिणवर्तिनो वरदामतीर्थतः शुद्धपश्चिमवर्तिनि प्रभासे गमनाय इत्थमेव पथः सरलत्वात्, अन्यथा वरदामतः पश्चिमागमने अनुवारिधिवेलं गमनेन प्रभासतीर्थप्राप्तिः दूरेण स्यात् इति, प्रभासनाम तीर्थ यत्र सिंधुनदी समुद्रं प्रविशति, 'तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं जाव उत्तरपच्चस्थिमं दिसिं तहेव जाव पच्चत्थिमदिसाभिमुहे पभासतित्थेणं लवणसमुदं ओगाहेइ' ततः खलु स भरतो राजा तद्दिव्यं चक्ररत्नं यावदुत्तरपाश्चात्याम् उत्तरपश्चिमां वायवी दिशं प्रभासतीर्थाभिमुखं प्रयातं प्रयाणं कुर्वन्तं पश्यतीति यावत्पदाद् बोध्यम् यत्र यवत्पदात् 'पासइ' इत्यारभ्य पूर्ववत्सर्व ग्राह्यम् हो चुकता है-तब वह दिव्य चक्ररत्न आयुधगृह शाला से बाहर निकलता है। (पडिणिक्खमित्ता अंतलिक्खपडिवन्ने जाव ते चेव अंबरतलं उत्तर पच्चत्थिमं दिसिं पभासतित्थाभिमुहे पयाए यावि होत्था) वहां से बाहर निकल कर बह आकाश तल में यावत् रहता हुआ ही दिव्य त्रुटित वाचविशेष के शब्द सन्निनाद से अम्बर तल को भरता२ सा उत्तर पाश्चात्यदिशा की ओर अर्थात् वायव्यदिशा में रहे हुए प्रभासतीर्थ की ओर चलने लगता है। क्योंकि वहां से यहां मानेका यही सीधा सरल रास्ता है। अन्यथा वरदामतीर्थ से पश्चिमागमन में यदि समुद्र की वेला से होकर प्रभासतीर्थ में जाया जावे तो इससे प्रभासतीर्थ बहुत दूर पड़ जाता है। यह प्रभासतीर्थ जहां सिन्धु नदी समुद्र में प्रवेश करती है वहीं पर है । (तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं जाव उत्तरपञ्चत्थिमं दिसिं सहेव जाव पञ्चस्थिमदिसाभिमुहे पभासतित्थेण लवणसमुदं मोगाहेइ) इसके बाद वह भरतचक्री जब अपने दिव्य चक्ररत्न को उत्तर पाश्चात्यलाओ पडिमिक्खमइ) मा प्रमाणे १२हम तीर्थाधिपति हे सुमारना वियोपयमा पारस કરવામાં આવેલ તે આઠ દિવસનો મહત્સવ સમાપ્ત થયે ત્યારે તે દિવ્ય ચક્રરન આયુધ मामाथी पा२ नीले छे. (पडिणिकनिमित्ता अंतलिक्खपडिवन्ने जाव पूर्यते चेव अंबरतलं उत्तरपच्चत्थिम दिसि पभासतित्थाभिमुहे पयाए याविहोत्था) त्यांथी माडर નીકળીને તે આકાશતલમાં યાવત્ સ્થિત રહીને જ દિવ્ય ત્રુટિત વાધવિશેષના શબ્દ શક્નિનાદથી અમ્મર તલને સપૂરિત કરતું ઉત્તર પાશ્ચાત્યદિશા તરફ એટલે કે વાયવ્ય દિશા તરફ આવેલા પ્રભાસતી તરફ ચાલવા લાગે છે. કેમકે અહીંથી ત્યાં પહોંચવાને સીધેસરલ રરતા એજ છે. જે વરદામતીર્થથી પશ્ચિમાગમનમાં સમુદ્ર–વેલા ઉપર થઈને પ્રભાસતીર્થ તરફ પ્રયાણ કરવામાં આવે તે એથી પ્રભાસતીર્થ પર્યાપ્ત દૂર થઈ પડે છે. આ પ્રભાसती या भिन्धु नही समुद्रमा प्रवेश छे त्यांत छ. (तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चमकरणं जाव उत्तरपच्चत्थिम दिलितहेव जाव पच्चत्थिमदिसाभिमुहे पभासतित्थेणं लवण. समई ओगाहेड) त्या२ मा भरती यारे पोताना हिव्य यत्नाने उत्तर पाश्चात्यदिशा Page #656 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६४२ जम्बूद्वीपसूत्रे तथैव पूर्वोक्तानुसारेणैव यावत् पश्चिमदिशाभिमुखं प्रभासतीर्येण लवणसमुद्रमवगाहतेप्रविशति 'ओगाहित्ता' अवगाह्य कियत्पर्यन्तमवगाहते इत्याह 'जाव से रहवरम्स कुप्परा उल्ला' यावत्तस्य रथवरस्य कूर्परौ कूर्पराकाररथावयवविशेषौ आद्र स्याताम् जातौ कित् पर्यन्तं वक्तव्यमित्याह 'जाव पीइदाणं' प्रीतिदानपर्यन्तं मागधदेव साधनाधिकारोक्तं सूत्रं ग्राह्यम् 'से' प्रभासतीर्थाधिपदेवस्य प्रीतिदानं चक्री भरतः स्वीकरोतीतिभावः पूर्ववत् सर्व ग्राम् परन्तु प्रीतिदानम् 'णवरं वरदामतीर्थाधिपदेवापेक्षया अयं विशेषः तमेव दर्शयति'माल मउडिं मुत्ताजालं हेमजाल कडगाणिय तुडियाणि आभरणाणिय सरं च मामाहयंक पभासतित्थोदगं च गिन्ह' तत्र 'माल' मालां - रत्नमालाम् 'मउर्डि' मुकुटम् 'मुत्ताजालं' मुक्ताजालं दिव्यमौक्तिकम् 'हेमजाल' कनकराशिम्, कटकामि च हस्ताभरणानि, त्रुटिकानि च - बाह्वाभरणानि नामाहताङ्कं शरं च प्रभासतीर्थोदकं च गृह्णाति 'मिण्डिचा ' गृहीत्वा 'जाव पच्चत्थिमेणं पभासतित्थमेराए' यावत् पाश्चात्ये पश्चिमदिग्भागे प्रभासदिशा - वायवीविदिशा की ओर प्रभासतीर्थ की तरफ जाता हुआ देखता है तो वह पहिले जैसा कहा जा चुका है उसी तरह से सब कार्य करता है और पश्चिमदिशा की ओर सन्मुख होकर वह प्रभासतीर्थ से लवण समुद्र में प्रवेश करता है । ( ओमाहित्ता जाव से रहवरस्सं कुप्पारा उल्ला) वहां वह ईतनी ही दूर जाता है कि जिससे उसके रथ के कूर्पराकार वाले अग्रवही गोले हो पाते हैं । (जाव पीइदाणं से णवरं मालं मउडिं मुत्ताजालं हेमजालं कडगापणि डिआणि आभरणाणि अ सरंच णामाहयंकं पभासतित्थोदगंच गिण्हइ) वहां पहुँच कर वह अपने घोड़ो को ठहरा लेता है और रथ को खडा कर लेता है रथ के खड़ा होते ही वह धनुष को हाथ में लेकर उस पर बाण का आरोपण करता है । और फिर उसे छोड़ता है वह बाण प्रभासतीर्थाधिप देव के भुवन में जाकर पड़ता है । प्रभासतीर्थाधिप देव कुमार को भवन में खड़े हुए बाण को देख कर क्रोध जगता है। जब उसका क्रोध शान्त हो जाता है तब वह अपनी ऋद्धि के अनुसार भरत चक्री के पास आकर उनकी शरण स्वीकार करलेता है और इस उपવાયવી વિદિશા તરફ એટલે કે પ્રભાસતી તરફ પ્રમાણુ કરતું જુવે છે ત્યારે પહેલાં કહ્યું છે તે પ્રમાણે જ તે સવકાર્ય સમ્પન્ન કરે છે અને પશ્ચિમ દિશા તરફ સન્મુખ થઈને તે प्रभासतीर्थ थी सवाशु समुद्रमां प्रवेश रे छे (ओगाहित्ता जाव से रहवरस्त कुप्पराउल्ला) ત્યાં તે એટલે દૂર સુધી ગમન કરે છે કે જેથી તેના રથના પરાકારવાળા અયવા જ ભીના शडे छे. (जाव पीइदाणं से णवरं मालं मउडिं मुत्ताजालं हेमजालं कड़गाणिभ अतुडिआणि आभरणाणि अ सरंच णामादर्यकं पभासतित्थोदगं च गिण्हर) त्यां पडीચીને તે પેાતાના ઘેાડાઓને થભાવે છે અને રથને ઊભેા રાખ્યા. થ ઊભે રાખીને તત જ તે પેાતાના હાથમાં ધનુષ લે છે અને તે ધનુષ ઉપર મનુ આર ણ કરે છે અને ત્યાર બાદ બાજુ લક્ષ્ય તરફ છેડે છે. તે ખાણ પ્રભાસતીર્થો ધપદેવકુમારના ભવનમાં પડે છે. પાતાના ભવનમાં પડેલા અણુને જોઈને તે ક્રષિત થઈ જાય છે. જયારે તેને ક્રોધ શાંત થઈ જાય છે ત્યારે તે પેાતાની ઋદ્ધિ મુજબ ભરતચક્રીની પાસે આવીને તેમનું શરણુ સ્વીકારે Page #657 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका ठीका ४० वक्षस्कारः सू० १० रथवर्णनपूर्वक भरतस्य रथारोहणम् ६४३ तीर्थमर्यादया 'अहण्णं देवाणुप्पियाणं विसयवासी जाव पच्चथिमिल्ले अंतवाले' अहं खलु देवानुप्रियाणां पाश्चात्योऽन्तपाल: 'सेसं तहेव जाव अट्टाहिया निव्वत्ता शेषम् उक्तातिरिक्तं प्रीतिदानोपढौकन स्वीकरणसुरसन्मानन विसर्जनादि तथैव मागधतीर्थाधिपसुराधिकार इव वक्तव्यं यावत् अष्टाहिका निवृत्ता ॥९० १०॥ अथ सिन्धुदेवी साधनाधिकारमाह-'तएणं से' इत्यादि । मूलम्- तएणं से दिवे चक्करयणे पभासतित्थकुमारस्स देवस्स अट्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जाव पूरेते चेव अंबस्तलं सिंधुए महाणईए दाहिणिल्लेणं क्लेणं पुरच्छिमं दिसि सिंधुदेवीभवणाभिमुहे पयाते यावि होत्था। तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं सिंधूए महाणईए लक्ष्य में वह उनके लिये प्रीतिदान देता है। इस प्रीतिदान में वह जैसा पहिले कहा गया है वह (से णवरं मालं मउडि मुत्ताजालं हेमजालं कडगाणि य तुडियाणि य आभरणाणि य सरंच) इत्यादि सूत्र द्वारा प्रकट कर दिया गया है-प्रीतिदान में उसने रत्न माला मुकुट, दिव्य मौक्तिक कनकराशि-कटक हस्ताभरण त्रुटिक बाहाभरण, नामाङ्कित बाण और प्रभास तीर्थ का जलदिया (गिहित्ता जाव पचत्थिमेणं पभासतित्थमेराए अहण्णं देवाणुप्पियाणं विसयवासी जाव पच्चस्थिमिल्ले अंतवाले सेसं तहेव जाव अट्ठाहिया निव्वत्ता) भरतचक्री ने इस प्रीतिदान को स्वीकार करलिया। फिर उसने उसका सन्मान सत्कार किया और बाद में उसे विसर्जित करदिया बाद में भरत चक्री वहां से अपने रथ को लौटाकर जहां अपनी सेना का पड़ाव हुआ था वहां मागया । इत्यादि सब कथन जैसा मागधतीर्थाधिप देव के प्रकरण में लिखा जा चुका है । वैसा ही यहां पर कह लेना चाहिये यावत् अष्ट दिवस का महोत्सव समाप्त होगया ॥१०॥ છે અને એ ઉપલક્ષ્યમાં તે તેમના માટે પ્રીતિદાન આપે છે. એ પ્રીતિદાનમાં જેમ પહેલાં वामां मा०युंछ मधु (से णघर मालं मउडि मुत्ताजालं हेमजाल कडगाणिय तुडियाणि याभणाणि य सरंच) प्रत्याहि सूत्र व ५४८ ४२वामां आवे छे. प्रीतिहान त રનમાળા મુકુટ દિવ્ય મૌક્તિક કનકરાશિ કટક હસ્તાભરણ ત્રુટિક–બાહુ આભરણ નામાંકિત म. अने प्रभासतीय नु सबस्तुमा माची. (गिण्हित्ता जाव पच्चत्थिमेणं पभास तित्थमेराए अहण्णं देवाणुप्पियाणं विसयवासी जाव पच्चस्थिमिल्ले अन्तवाले सेसं तहेव जाव अढहिया निव्वत्ता) भरतय४ी मे से श्रीतिहाननी स्वी१२ च्या. पछी त तनु सम्मान કર્યું તેને સત્કાર કર્યો. અને પછી તેનું વિસર્જન કર્યું. ત્યાર બાદ ભરતચક્રી ત્યાંથી પિતાના રથને પાછું વાળીને જ્યાં સેનાને પડાવ હતાં ત્યાં આવ્યો ઈત્યાદિ સર્વ કથન જેવું માગધતીર્થદેવના પ્રકરણમાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યું છે તેવું જ અત્રે જાણી લેવું જોઈએ. યાવત આઠ દિવસને મહત્સવ સમાપ્ત થયે. ૧૦ Page #658 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्धोपप्राप्तिसूत्रे दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरत्थिमं दिसिं सिंधुदेवीभवणाभिमुहं पयातं पासइ, पासित्ता हट्टतुट्ठ चित्त तहेब जाव जेणेव सिंधूए देवीए भवणं तेणे व उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सिंधूए देवीए भवनस्स अदूरसामंते दुवालजोयणायामं वजोयणवित्थिन्नं वरनगरसरिच्छं विजयखंधावारणिवेसं करेइ जाव सिंधुदेवीए अट्ठमभत्तं पगिण्हइ पगिण्हिता पोसहसालाए पोसहिए बंभयारी जाव दम्भसंथारोवगए अट्ठमभत्तिए सिंधुदेवि मणसि करेमाणे चिट्ठइ । तएणं तस्स भरहस्स रण्णो अट्ठमभत्तंसि परिणममाणंसि सिंधूए देवीए आसणं चलइ, तएणं सा सिंधुदेवी आसणं चलियं पासइ पासित्ता ओहिं पउंजइ, पउंजित्ता भरहं रायं ओहिणा आभोएइ, आभोए त्ता इमे एआरूवे अब्भत्थिए चिंतिए पथिए मणोगए संकप्प समुप्पज्जि स्था उप्पण्णे खलु भो जंबुद्दीवेदीवे भरहे वासे भरहे णामं गया चाउरंत चक्करखट्टी. तं जीयमेयं तोअ पच्चुप्पण्णमणागयाणं सिंधूणं देवीणं भर हाणं राईणं उवत्थाणियं करेत्तए, तं गच्छामि णं अहंपि भरहस्स रण्णा उवत्थाणियं करोमि त्ति कटु कुंभट्ठसहस्सं रयणचित्तं णाणामणि कणगरयणभत्तिचित्ताणि य दुवे कणगभदासणाणि य कडगाणि य तुडियाणि यजाव आभरणाणि य गेण्हइ गेण्हित्ता ताए उक्किट्ठाए जाव एवं वयासी अभिजिएणं दवाणुप्पिएहिं केवलकप्पे भरहे वासे अहण्णं देवाणुप्पियाणं विसयवासिणी अहणं देवाणुप्पियाणं आत्तिकिंकरी तं पडिच्छंतु णं देवाणुप्पिया! मम इमं एयारूवं पीइदाणं तिकटु कुभट्ठसहस्सं रयणचित्तं णाणामणि कणग कडगाणि य जीव सो चेव गमो जाव पडिविसज्जेइतएणं से भरहे गया पोसहसालाओपडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता बहाए कयवलिकम्मे जाव जेणेव भोयणमंडवे तेणेव उनागच्छइ, उवागच्छित्ता भोयणेमंडवंसि सुहासवरगए अट्ठमभत्तं परियादियइ परियादिएत्ता जाव सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णिसीयइ णिसीएत्ता अट्ठारससेणि प्पसेणीओ सदावेइ सहवित्ता जाव अट्ठाहियाए महामहिमाए तमाणत्तियं पच्चप्पिणंति ॥सू० ११॥ Page #659 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तृ० वक्षस्कारः सू० ११ सिन्धुदेवीसाधननिरूपणम् ६४५ छाया-ततः खलु तद् दिव्यं चक्ररत्नं प्रभासतीर्थकुमारस्य अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सल्याम् आयुधशालातः प्रतिनिष्कामति, प्रतिनिष्क्रम्य यावत् पूरयदिव अम्बरतलं सिन्ध्वा महानद्यः दाक्षिणात्येन कूलेन पौरस्त्यां दिश सिन्धुदेवी भवनाभिमुख प्रयातं चाप्यभवत् । ततः खलु स भरतो राजातद्दिव्यं चक्ररत्नं सिन्ध्वाः महानद्याः दाक्षिणात्येन कलेन पौरस्त्यां दिश सिन्धुदेवी भवनाभिमुख प्रयातं पश्यति, दृष्ट्वा हृष्टतुष्ट चित्त तथैव यावत् यत्र सिन्ध्या देव्याः भवन तत्रैव उपागच्छति, उपागत्य सिन्ध्वाः देव्याः भवनस्य अदूरसामन्ते द्वादश योजनयामं नवयोजनविस्तीर्ण वरनगरसदृशम् विजयकन्धावारनिवेश करोति यावत् सिन्धुदेव्याः अष्टमभक्त प्रगृहाति, प्रगृह्य पौषधशालायां पौषधिको ब्रह्मचारी यावद् दर्भसंस्तारकोपगतः अष्टमभक्तिकः सिन्धुदेवों मनसि कुर्वन् तिष्ठति । ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञोऽष्टमभको परिणमति सिन्ध्वा देव्या आसनं चलितं, ततः खलु सा सिन्धु देवी आसने चलितं पश्यति, दृष्ट्वा आधि प्रयुनकित, प्रयुज्य भरतं राजानम् अवधिना आभोगति, अयमेतद्रूपः आध्यात्मिकश्चिन्तितः प्रार्थितो मनोगतः सङ्कल्पः समुदपद्यत, उत्पन्नः खलु भो जम्बूद्वीपे द्वीपे भरते वर्षे भरनो नाम राजा चातुरन्तचक्रवर्ती तज्जीतमेतत् अतीतवर्तमानानागतानां सिन्धूनां देवीनां भरतां राज्ञाम् उपस्थानिक कर्तुम्, तद्गच्छामि खलु अहमपि भरतस्य राज्ञ उपस्थानिकं करोमीति कृत्वा कुम्भाष्टसहनं रत्नचित्र नानामाणिकनकरत्ने च द्वे कनकमद्रासने च कटकानि च त्रुटिकानि च य आभरणानि च ग्रहाति, गृहीत्वा तया उत्कृष्टया यावत् अभिजितं खल देवानप्रियः केवलकल्प भरत वर्षम् अहं खलु देवानुप्रियाणां विषयवासिणी, अहं खलु देवानुप्रियाणाम् आशप्ति किङ्करी तत्प्रतीच्छन्तु खलु देवानुप्रियाः! ममेरम् एतदूपं प्रीतिदानमिति कृत्वा कुम्भाटसहस्त्रं रत्नचित्र नानामणिकनक कटकानि च यावत् स एव गमः यावत् प्रनिविसर्जयति, ततः खलु सं भरतो राजा पौषधशालात प्रतिनिष्कामति, प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैव उपागच्छति, उपागत्य स्नातः कृतबलिकर्मा यावत् यत्रैव भोजनमण्उपस्तत्रैव उपागच्छति, उपागत्य भोजनमण्डपे सुखासनवरगतः अष्टम भक्तं यावत् सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखो निषीदति निषद्य अष्टादशश्रेणीप्रश्रेणीः शब्दयति, शब्दयित्वा यावद् अष्टाह्निकायां महामहिमायां तामाक्षप्तिकां प्रत्यर्पयन्ति ॥ सू० ११॥ टीका- "तएणं से" इत्यादि । 'तएणंसे दिवे चक्करयणे पभासतित्थकुमारस्स देवस्स अट्टाहियाए महामहिमाए णिव्वत्ताए समाणीए आउघरसालाओ पडि सिन्धु देवी साधनाधिकार कथन'तएणं से दिव्वे चक्करयणे पभासतित्थकुमारस्स' इत्यादि सूत्र ॥११॥ टीकार्थ- इस प्रकार से वह दिव्य चक्ररत्न प्रभासतीर्थ कुमार के विजयोपलक्ष्य में किये आठ दिन तक के महामहोत्सव समाप्त हो जाने पर (आउइघरसालाओ पडिणिक्खमइ) आयु સિન્ધદેવી સાધનાધિકાર કથન 'त एणं से दिवे चक्करयणे पभासतित्थकुमारस्स' इत्यादि सूत्र-॥११॥ ટકાથ-આ પ્રમાણે તે દિવ્ય ચક્રરત્ન પ્રભાસતીર્થકુમારના વિજયેપલયમાં આયોજિત आ सनो भत्सव समास थ गये त्यारे (आउधरसालाओ पडिणिक्खमइ) मायुध Page #660 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे णिक्खमइ' ततः खलु तदिव्यं चक्ररत्नं प्रभासतीर्थकुमारस्य देवस्य अष्टाहिकायां अष्टदिवसावसानं यस्या सा ताम् महामहिमायां निवृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालातःप्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'जाव पूरेते चेव अंबरतलं यावत् दिव्यत्रुटित नामकवाधविशेषशब्दसन्निनादेन अम्बरतलं गगनतलं पूरयदिव 'सिंधूए महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरस्थिमं दिसिं सिंधुदेवीभवणाभिमुहे पयाते यावि होत्था' सिन्ध्वाः महानद्याः दाक्षिणात्येन दक्षिणेन कूलेन पौरस्त्यां पूर्वी दिशम् सिन्धुदेवी भवनाभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत्, अयं विशेषः पूर्वो दिशमित्यत्र पश्चिमदिरवर्तिनः प्रभासतीर्थत आगच्छन् वैतादयगिरिकुमारदेव सिसाधयिषया तद्वासकूटाभिमुखं जिग्मीषु: प्रथमतः अनुपूर्वमेव याति स तच्च दिग्विभागज्ञानं नकराइति भाषा प्रसिद्धं जम्बूद्वीपप्रकाशकपत्रे द्रष्टव्यम् ततः सुतरां ज्ञानं भविष्यति सिन्धुदेवी गृहाभिमुखं च चक्ररत्नं प्रयातम् ननु सिन्धुदेवो भवनम् अत्रैव सूत्रे उत्तरभरतामध्यखण्डे सिन्धुकुण्डे सिन्धुद्वीपे वक्ष्यते तत्कथमत्र तत्सम्भव इति चेन्न महर्दिकदेवीनां मूळस्थाधगृह शाला से बाहर निकला (पडिणिक्वमित्ता जाव पूरेते चेव अंबरतलं सिधूए महाणईए दाहिणिल्लेणं कुलेणं पुरच्छिमं दिसिं सिंधुदेवी भवणाभिमुहे पयाए यावि होत्था) निकल कर वह यावत्- दिव्यत्रुटित नामक वाचविशेष के शब्द सन्निनाद द्वारा गगन तल को भरता भरता सा सिन्धु महानदी के दक्षिण कूल से होता हुआ पूर्वदिशामें सिन्धुदेवी के भवन की ओर चला । "पूर्वदिशामें" जो ऐसा कहा है सो उसका तात्पर्य ऐसा है कि पश्चिमदिग्वर्ती प्रभास तीर्थ से आता हुआ भरत चक्री वैतादयगिरि कुमार देव को वश करने की इच्छा से उसके वासमत क्ट की तरफ जाने का अभिलाषी होता है। सो पहिले उसे पूर्वदिशा में ही जाना होता है। यह दिग्विभागका ज्ञान जम्बूद्वीप के नक्शे से अच्छी तरह हो जाता है । सिंधुदेवी के घर की तरफ चक्ररत्न चला ऐसा जो यहां कहा गया है सो सिन्धुदेवी के भवन का कथन तो इसी सूत्र में उत्तर भरतार्ध के मध्यम खण्डार्ध सिन्धु कुण्ड में सिन्धुद्वीप में कहा जावेगा तो फिर शामांथा महा२ नीज्यु. (पडिणिक्खमित्ता जाव रेते चेव अंबरतलं सिधूप महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेण पुरच्छिमं दिसि सिंधु देवो भवणाभिमुहे पयाए याविहोत्था) નીકળીને તે યાવત્ દિવ્ય ત્રુટિત નામક વાઘવિશેષના શબ્દ સન્નિનાદ વડે ગગનતલને સપૂ. રિત કરતું સિન્થ મહાનદીના દક્ષિણ. કુલથી પસાર થઈને પૂર્વ દિશામાં સિધુ દેવી નાં ભવન તરફ ચાલ્યું. “પૂર્વ દિશામાં” આવું જે કથન છે તેનું તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે પશ્ચિમ દિવતી પ્રભાસતીર્થ તરફથી આવતો ભરતચક્રી વૈતાત્યગિરિ કુમારદેવને વશ કરવાની ઈચ્છાથી તેના વાસભૂત મૂકુટ તરફ જવા અભિલાષા કરે છે. એથી પહેલાં પૂર્વ દિશા તરફ જ તેનું જવાનું થાય છે. એ દિગ્વિજય ભાગનું જ્ઞાન જંબુદ્વીપના માનચિત્રથી સારી પેઠે થઈ જાય છે. સિધુ દેવીના ઘર તરફ ચકરત્ન ચાલ્યું. આમ જે વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે તે સિધુ દેવીના ભવનનું કથન તે એજ સૂત્રમાં ઉત્તર ભરતાર્ધના મધ્યમ ખંડમાં સિંધુ કંઠમાં સિન દ્વીપમાં વર્ણવવામાં આવશે જ તે પછી અહીં તેને સદૂભાવ શા માટે કહો Page #661 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका ४० वक्षस्कारः सू० ११ सिन्धुदेवीसाधननिरूपणम् ६४७ नादन्यत्रापि भवनादिसम्भवेन नानुपपत्तेः, यथा प्रथमस्वर्गस्थ सौधर्मेन्द्राधग्रमहिषीणां सौधर्मादि देवलोके विमानसद्भावेपि नन्दीश्वरे कुण्डलेवा राजधान्यः, अस्या एव देव्या असंख्येयतमे द्वीपे राजधान्यः सिन्ध्वावर्तनकूटे च प्रासादावतंसक इति, एवं च सिन्धुद्वीपे देवीभवनसद्भावेऽपि सूत्रबलादत्रापि तदस्तीति ज्ञायते, तदनु भरतः किं कृतवान् इत्याह-'तएणं' इत्यादि 'तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं सिंधुए महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरथिमं दिसि सिंधु देवी भवनाभिमुखं पयातं पासइ' ततः खलु स भारती राजा तदिव्यं चक्ररत्नं सिन्ध्वा महानद्यः दाक्षिणात्येन दक्षिणेन कूलेन तीरेण पौरस्त्यां पूर्वाम् दिशं सिन्धुदेवी भवनाभिमुखं प्रयातं पश्यति 'पासित्ता' दृष्टा 'हतुट्ठ चित्त तहेव जाव' हृष्टतुष्ट चित्तानन्दितः अतिशयप्रमोदमापन्नः सन् चक्रीयहां उसका सद्भाव होना कैसे कहा ? उत्तर-महर्द्धिकदेवियों के भवन मूलस्थान से अन्यत्र भी होते है इसलिये ऐसा कथन यहां अयुक्त नहीं है। जैसे सौधर्मादि इन्द्रों की अग्रमहिषियों के विमान सौधर्मादि देवलोकों में होते हैं फिर भी नन्दीश्वर द्वीप में अथवा कुण्डल द्वीप में इनकी राजधानीयां है, अथवा इसो सिन्धुदेवी की राजधानी असंख्यातवे द्वीप में है और सिद्धावर्तन क्ट में इसका प्रासादावतंसक है। इसी तरह सिन्धु द्वीप में सिन्धु देवी के भवन का सद्भाव होने पर भी इसी सूत्र के बल से अन्यत्र भी वह है ऐसा जाना जाता है ऐसा होने पर भी "सिन्धूए देवीए भवणस्स अदूरसामंते" इत्यादि वक्ष्यमाण सूत्र पाठ-"खंधावारे निवेसं करेई" यहां तक का संगत बैठ सकेगा, नहीं तो वह भी विघटित हो जावेगा। (तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं सिंधूए महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरस्थिमं दिसि सिंधुदेवी भवणाभिमुहे पयायं पासइ) जब भरत राजाने उस दिव्य चक्ररत्न को सिन्धु महानदी के दक्षिण तट से होते हुए पूर्वदिशा में सिन्धु देवी के भवन की ओर जाते हुए देखा तो वह (पासित्ता) देखकर (हट्ठ तुट्ठ चित्त तहेव जाव जेणेव सिंधूए देवीए भवणं तेणेव છે ? ઉત્તરમહદ્ધિક દેવીઓના ભવને મૂલસ્થાનથી અન્યત્ર પણ હોય છે. એથી આ કથન અહી અયુકત નથી. જેમ સૌધર્માદિ ઈન્દ્રોની અગ્રમહીષિઓના વિમાને સીધર્માદિ દેવકમાં હોય છે છતાંએ નન્દીશ્વર દ્વીપમાં અથવા કુંડળીમાં એમની રાજધાનીએ છે. અથવા એજ સિન્ધદેવીની રાજધાની અસંખ્યાતમાં દ્વીપમાં છે અને સિદ્ધાવર્તન કુટમાં આનું પ્રાસાદાવતંસક છે. એ જ રીતે સિમ્બુદ્વીપમાં સિધુ દેવીના ભવનને સદૂભાવ છે છતાં એ એજ સૂત્રના બળથી અન્યત્ર પણ તેની સંભાવના છે એવું જાણવામાં આવે છે. એવું હોય तर "सिन्धूए देवीए भवणस्स अदूरसामंते" त्या पक्ष्या सूत्रा "खंधाबारे निवेसं करेह मही सुधानो सात / ५. नही तो ५ विधरित थशे. (तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं सिंधूप महाणईए दाहिणिल्लेणं कूलेणं पुरथिम दिसि सिंधुदेवी वणाभिमुहे पयायं पासइ). न्यारे भरत येत ०५ :રત્નને સિંધુ મહાનદીના દક્ષિણ તટ ઉપર થઈને પૂર્વ દિશામાં સિધુ દેવીના ભવન તરફ नयुताते (पसित्ता) न (हहतुहचित्त तहेव जाव जेणेव सिंधूए देवीए भवणं Page #662 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६४८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे षटखंडाधिपति भरतस्तथैव यावत् अत्र यावत् पदात् नन्दितःप्रोतिमानाः,परमसौमस्यितः हर्षवश विसप्पंद हृदय इति ग्राह्यम् एतादृशो भरतः 'जेणेव सिंधुए देवीए भवणं तेणेव उवागच्छई' यत्रैव सिन्धुदेव्या भवनं निवासस्थानम् तत्रैवोपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'सिंधूए देवीए भवणस्स अदूरसामंते' सिन्ध्या देव्या भवनस्य अदरसामन्ते नातिदुरे नातिसमीपे यथोचितस्थाने 'दुवालसजोयणायाम णवजोयणवित्थिन्नं वरणगरसरिच्छं विजयखंधावारणिवेसं करेइ द्वादश योजनायाम,नव योजनविस्तीर्ण वरनगरसदृशं विजयस्कन्धावारनिवेशं सेनानिवेशं करोति 'जाव सिंधु देवीए आढमभत्तं पगिण्डइ' अत्र यावत्पदात् वर्द्धकिरत्नशब्दायनपौषधशाला निर्मापनादि सर्व ग्राह्यम्, तेन पौषधशालायां सिन्धुदेव्याः साधनाय भरतो राजा अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति 'पगिण्हित्ता' प्रागृह्य पोसहसालाए पोसहिए बंभयारी जाव दब्भसंथारोवगए अट्ठमभत्तिए सिन्धुदेविं मणसि करेमाणे चिट्ठई' उवागच्छइ) बहु आनन्दित एवं संतुष्ट चित्त हुआ यहां यावत् शब्द से-नन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमनस्यितः हर्षवशविसर्पद्धदयः" इन पदों का संग्रह हुआ है । इन पदों की व्याख्या यथास्थान की जा चुकी है। ऐसे विशेषणों से विशिष्ट वह भरतचक्रो जहां पर सिन्धु देवी का भवन था-निवासस्थान था वहां पर आया (उवागच्छित्ता) आकर के (सिंधुए देवीए भवणस्स अदूरसामंते) उसने सिन्धुदेवी के भवन पास ही यथोचितस्थान में (दुवालसजोयणायाम णव जोयणवित्थिन्नं, वरणगरसरिच्छं विजयखंधावारणिवेसं करेइ) अपना १२योजन लम्बा और नौ योजन चोड़ा श्रेष्ठनगर के जैसा विजयस्कन्धावार निवेश किया-सेना का पडाव डाला (जाव सिंधु देवीए अट्रमभतं पगिण्इइ) यहां यावत् पद से वर्द्धकि रत्न को बुलाना, पौषध शाला का निर्मापण आदि कार्यों के निर्माण आदि सम्बन्ध कहना इत्यादि सब कथन पूर्व में किये गये कथन के अनुसार समझ लेना चाहिये । पौषधशाला में बैठकर भरत राजाने सिन्धु देवो को अपने वश में करने के लिये तीन उपवास किये । (पगिण्हित्ता पोसहसालोए पोसहिए बंभयारी जाव दब्भसंथारोवगए अट्टमभत्तिए सिंधू देविं मणसि करेमाणे चिट्ठइ) तीन उपवास लेकर वह पौषध व्रत तेणेव उवागच्छइ) ते २० मती मान हित तमा सतुष्ट चित्तवाणी प्या. अही यावत् शथी "नन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमस्यितः हर्षवशविसर्पद्धदयः" से पहन सड થયે છે. એ પદોની વ્યાખ્યા યથાસ્થાને કરવામાં આવેલ છે. એવા વિશેષણોથી વિશિષ્ટ a ari (स-हवा अवनत-नवासस्थान त त्या माव्या. (उवागच्छित्ता) त्या भावाने (सिंधूप देवीए भवणस्स अदूरसामंते) तो सिन्धुवाना सपननी पासे र यथायित स्थानमा (दुवालसजोयणायाम णवजोयणवित्थिन्न, वरणगरसरिच्छ विजयखंधावारणिवेसं करेइ) पाताना १२ या airl सन ८ रन पहाणेश्रेष्ठ नगर व विय न्यावा२ निवेश ध्या-थेट ५१ नाय. (जाव सिंधूदेवीए अठ्ठमभत्तं पगिण्हइ) अहो यावत् ५६थी १२नने मोजाव्यो, पौषधशाला निर्माण व्युत्या પૂર્વ વણિત સર્વ કથન અધ્યાહત કરી લેવું જોઈએ. પૌષધશાળામાં બેસીને ભરત રાજાએ सिन्धुवान पान ११ ४२॥ मारे ५५ र्या (पगिण्हित्ता पोसहसालाए Page #663 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका ४० वक्षस्कारः सू. ११ सिन्धुदेवीसाधननिरूपणम् ६४९ पौषधशालायां पौषधिका-पोषधव्रतवान् अतएव 'बंभयारी' ब्रह्मचारी 'जाव दमसं. थारोबगए' यावदर्भसंस्तारकोपगतः सार्द्धवयहस्तपरिमितदर्भासने उपविष्टः सन् अत्र यावत्पदात् उन्मुक्तमणिसुवर्ण इत्यादि सर्वे पूर्वोक्तं ग्राह्यम् अष्टमभक्तिक:-कृताष्टमतपाः सिन्धुदेवी मनसि कुर्वन् तिष्ठति । 'तएणं तस्स भरहस्स रण्णो अट्ठमभत्तसि परिणममाणंसि सिधूए देवीए आसनं चलइ' ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञोऽष्टमभक्ते परिणमतिपरिपूर्णप्राये जाते संगच्छति सति सिन्ध्वा देव्या आसनं सिंहासनं चलति 'तएणं सा सिंधु देवी आसणं चलियं पासइ' ततः खलु सा सिन्धुदेवी आसनं-स्वसिंहासनं चलितं पश्यति 'पासित्ता' दृष्ट्वा 'ओहिं पउंजई' अवधिं प्रयुक्त-अवधिना ज्ञानेन पश्यति 'पउंजित्ता' प्रयुज्य 'भरहं रायं ओहिणा आभोएई' भरतं राजानम् अवधिना अवधिज्ञानेन, अभोगयति उपयुङ्क्ते जानातीत्यर्थः 'आभोइत्ता' आभोग्य उपयुज्य ज्ञात्वा तस्याः सिन्धुदेव्याः 'इमे एयारूवे अझथिए चिंतिए कप्पिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था' अयमेतद्रूपो वक्ष्यमाणस्वरूपः, आध्यात्मिकः आत्मगत अङ्कुर वाला अतएव ब्रह्मचारी भरत चको २॥ हाथ प्रमाण दर्भासन पर पूर्वोक मण सुवर्ण दि सबका परित्याग करके बैठ गया, और सिन्धु देवो का मनमें ध्यान करने लगा । (तरणं तस्स भरहस्स रण्णो अट्ठमभत्तंसि परिणममाणसि सिधूर देवीए मासणं चलइ) जब उस भरत राजा को अट्ठम भककी तपस्या पूरी होने को आई कि उसी समय सिन्धु देवी का आसन कंपायमान हुआ। (तएणं सा सिंधु देवी मासणं चलियं पासइ) सिन्धु देवीने ज्यों ही कंपित हुए अपने आसन को देखा तो (पासित्ता मोहिं पउंजइ) उसी समय उसने अपने अवधि ज्ञान को जोड़ा-अर्थात् अवधिज्ञान का प्रयोग किया (पउंजित्ता भरहं रायं ओहिणा आभोएइ) अवधिज्ञान का प्रयोग करके उसने उसके द्वारा भरत राजा को देखा (आभोइत्ता इमेएयारूवे अज्झथिएचिंतिए कप्पिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था)राजा को देखकरउसेआध्यात्मिक चितितकल्पितप्रार्थितमनोगत संकल्प उत्पन्न हुआ। संकल्प के इन विशेषणों की व्याख्या पीछे की जा चुकी है। इन विशेषणों का तात्पर्यार्थ ऐसा हैपोसहिप बंभयारी जाव दब्भसंथारोवगए अट्टमभत्तिए सिंधुदेविं मणसि करेमाणे चिट्टइ) ત્રણ ઉપવાસ લઈને તે પૌવધ વ્રતવાળા એથી બ્રહ્મચારી ભરતૈચક્રી અઢી હાથ પ્રમાણ દર્ભ સન ઉપર પૂવોક્ત મણિ સુવર્ણાદિ સર્વને પરિત્યાગ કરીને બેસી ગયા અને સિધુ દેવીનું भनमा ध्यान ४२१॥ काय.. (तपणं तस्ल भरहस्स रणो अट्ठमभत्तसि परिणममाणंसि सिंधूप देवीए आसणं चलइ) न्यारे a १२ २०जनी मम सतनी तपस्या सभात थवा भावी ते समये सिन्धु वानुमासन पायमान थयु. ( तपणं सा सिन्धु देवी आसणं चलियं पासइ) सिधुवारे न्यारे पातानुसासन ४पित यतु न्यु (पासित्ता ओहिं पउंजा) तरतrad पाताना अवधिज्ञानर न्यु टवणे पोताना भवधिशानन प्रयास ४ी. (पउंजित्ता भरहं रायं मोहिणा आभोपइ) अधिज्ञानना प्रयोग रीन ते तेना पडे भरतनन नया. (आमोइत्ता इमे एयारूवे अज्झथिए चिंतिए कप्पिए पत्थिए 'मणोगव संकप्पे समुप्पज्जित्था) २ तना मनमा आध्यात्मि, यितित, प्रावित - Page #664 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६५० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसू इव, ततः चिन्तितः पुनः पुनः स्मरणरूपो विचारो द्विपत्रित इव कल्पितः स एव व्यवस्थायुक्तः महतोऽस्याऽनुरूपं सत्कार विशेषं करिष्यामीति कार्याकारेण परिणतो विचार: पल्लवितः इव ३, प्रार्थितः - स एव इष्टरूपेण स्वीकृतः पुष्पित इव ४, मनोगतः सङ्कल्पः - मनसि दृढरूपेण स्थितः 'इदमेव मया कर्त्तव्यम्' इति विचारः फलित इव ५, समुदपद्यत - समुत्पन्नः स च कः सङ्कल्प इत्याह- 'उप्पण्णे खलु भो जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे भरहे णामं राया चाउरंतचक्कवट्टी, तं जीयमेयं तीय पच्चुपण्णसणागयाणं सिंधूणं देवीणं भरहाणं राईणं उवत्थाणीयं करेत्तर' उत्पन्नः खलु भो जम्बूद्वीपे - जम्बूद्वीप नामक द्वीपे भरते वर्षे भरतो नाम राजा चातुरन्तचक्रवर्ती समाकि जिस प्रकार बीज भूमि में रहकर पहिले अङ्कुर के रूप में पनपता है उसी प्रकार यह संकल्प भी आत्मा में अङकुर रूपमें उद्भुत हुआ अतः उसे अध्यास्म पद से यहां विशेषित किया गया । यह बार२ उसके स्मरण में जब आने लगा तब यह द्विपत्रित उसी अङ्कुर की तरह चिन्तित पद से विशेषित किया गया है। जब यही संकल्प " इस महान् पुरुष का मैं 'इसी के अनुरूप सत्कार करूंगा" इस प्रकार की व्यवस्था वाला बन गया तब यह कल्पित पद से विशेषित किया गया है । ऐसा करने से हो मेरा काम फलित हो सकेगा । इस प्रकार इष्ट रूप से यह मान्य हो चुका तब यह प्रार्थित पद से विशेषित किया गया है। तथा इस विचार रूप संकल्प को उसने जब तक वचन द्वारा बाहिर प्रकाशित नहीं किया तब तक वह मनोगत रहने के कारण मनोगत बनारहा इसलिये उसे मनोगत पद से विशेषित किया गया है । (उप्पण्णे खलु भो जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे भरहे णामं राया चाउरंत चक्कवट्टी तं जीयमेयं तीय पच्चु - पण मणागयाणं सिघृणं देवीणं भरहाणं राईणं उवत्थाणिअं करेत्तए) जंबूद्वीप नाम के द्वीप में મનેાગત સંકલ્પ ઉત્પન્ન થયા. સંકલ્પના એ ઉલ્લેખિત વિશેષ©ાની વ્યાખ્યા પહેલાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવી છે. એ વિશેષણાનું તાત્પય આ પ્રમાણે છે-કે જેમ ખી ભૂમિમાં રહીને પહેલાં અકુરના રૂપમાં ઉર્દૂભવે છે તે જ પ્રમાણે એ સ’કલ્પ પણ આત્મામાં અંકુશના રૂપમાં ઉદ્ભભૂત થયા. એથી તે સ’કલ્પને પ્રથમ અધ્યાત્મ પદ્મથી અહીં વિશેષિત કરવામાં આવેલ છે, એ જ્યારે વાર વાર તેના સ્મરણુમાં આવવા લાગ્યા ત્યારે એ દ્વિપત્રિત તે અંકુરની જેમ ચિંતિત પદ્મથી વિશેષિત કરવામાં આવેલ છે. જ્યારે એ જ સ ક “એ મહાપુરુષના હૈ એના અનુરૂપ સત્કાર કરીશ'' એ જાતની વ્યવસ્થાયુક્ત થઈ ગયા ત્યારે તે સંકલ્પ કહિપત પદ્મથી વિશેષિત કરવામાં આવેલ છે. આ પ્રમાણે કરવાથી જ મારું' કામ ફલિત થઇ શકશે. આ રીતે એ સંકલ્પ ઇષ્ટ રૂપથી માન્ય થઈ ગયા ત્યારે તે પ્રાચિત પદ્મથી વિશેષિત કરવામાં આવેલ છે. તેમજ એ વિચારરૂપ સ’કહપને તેણે જ્યાં સુધી વચન દ્વારા બહાર પ્રગટ કર્યો નહી ત્યાં સુધી તે મનેાગત હાવાથી મનેાગત નામથી સમેાધિત થયે!. એથી જ તેને મનजत पहुथी विशेषित उरवामां आवे छे. (उप्पण्णे खलु भो जबुद्दीवे दोवे भरहे वासे भरहे णामं राया चाउरंतचक्कवट्टी तं जीयमेयं तीय पच्चुप्पण्णमणामयाणं सिधूणं देवीण भराणं राईण उवत्थाणिअं करेत्तए) द्वीप नामना द्वीपमां भरतक्षेत्रमां भरत नाभे- राम Page #665 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० ११ सिन्धुदेवीसाधननिरूपणम् ६५१ याति-तज्जीतमेतत् आचार एषः अतीतवर्तमानानागतानां सिन्धूनां सिन्धुनाम्नीनां देवीनां भरतानां राज्ञाम् औपस्थानिक नजराणा इति लोके प्रसिद्धं प्राभृत कत्तुं वर्तते इति 'तं गच्छामि णं अहं पि भरहस्स रण्णो उत्थाणियं करेमि त्तिक? कुंभट्ठसहस्सरयणचित्तं णाणामणि कणगरयणभत्तिचित्ताणिय देवगणगभदासणाणि य कडगाणिय तुडियाणिय जाव आमरणाणिय गेण्हइ गिण्हित्ता' तद्गच्छामि खलु अहमपि भरतस्य राज्ञश्चक्रिणः उपस्थानिक प्राभूत करोमीति कृत्वा मनसि विचार्य 'कुंभट्टसहस्त रयणचित्त' कुम्भाष्टसहस्ररत्नचित्रम्-कुम्भानामष्टोत्तरं सहस्रं रत्नचित्रम् नानामणिकनकरत्नभक्तिचित्रे च द्वे सुवर्णभद्रासने च नानामणिकनकरत्नानां भक्तिःविविधरचना तया चित्रे विचित्रे च दे सुवर्णभद्रासने कटकानि च हस्ताभरणानि त्रुटिकानि च बाहाभरणानि यावदाभरपानि च गृह्णाति गृहीत्वा 'ताए उक्किट्टाए जाव एवं वयासी' तया उत्कृष्टया गत्या यावत पदात् त्वरया आकूलया न स्वाभाविन्या चपलया कायतोऽपि चण्डया, रौद्रया अत्युत्कर्षयोगेन, सिंहया तदाढर्थ स्थैर्येण, उद्धृतया दातिशयेन जयिन्या विपक्षजेतृत्वेन भरत क्षेत्र में भरत नाम का राजा उत्पन्न हुआ है । तो अतीत अनागत एवं वर्तमान सिंधु देवियों का यह कुल परम्परा का आचार है कि वे उन भरत के चक्रवर्तियों को नजराना प्रदान करें अतः (गच्छामिणं अहं पि भरहस्स रण्णो उवत्थाणियं करेमित्ति कटु कुंभट्टसहस्सरयणचित्तं णाणामणिकणगरयणभत्तिचित्ताणिय देवगणभदासणाणि य कडगाणि य तुडियाणि य जाव भाभरणाणि य गेण्हइ) मैं जाऊँ और मैं भी उन भरत महाराजा को भेट प्रदान करूँ ऐसा विचार करके उसने १००८ कुंभ और नानामणियों एवं कनक रत्न की रचना से जिसमें अनेक चित्र हो रहे हैं ऐसे दो भद्रासन, तथा कटक हस्ताभरण, और त्रुटित-बाहु के आभरणों को उसने लिया ( गिमिहत्ता ताए उक्किट्ठाए जाव एवं पयासी ) उन्हे लेकर वह उसे उत्कृष्ट मादि विशेषणोंवाली गति से चलती-२ जहां पर सेना का पडाव रखकर भरत महाराजा था वहां ઉન્ન થયેલ છે. અતીત અનાગત તેમજ વર્તમાન સિદેવીઓને એ કુલપરંપરાગત मायार छ तयात बरतना यतिमान न महान ४२. माटे (गच्छामिणं अहंपि भास रणो उपस्थाणियं करेमित्ति कट्टु कुंभट्ट सहस्सरयणचित्तं णाणामणिकणगएयणमत्तिचित्ताणि य देवगणभदासणाणि य कडगाणि य तुडियाणि य जाव आभरणाणि यण्डइ) मनहुँ ५y a w२ ने नारा हान माम विचार शने તે ૧૦૦૮ કુંભ અને અનેક મણિએ તેમજ કનક, રત્નની રચનાથી જેમાં અનેક ચિત્રો બહિત છે એવા બે ઉભમ ભદ્રાસને તેમજ કટક-હસ્તાક્ષર અને ત્રુટિત–બાહુના આભરણે ये आभूष। तले लीय. (गिण्हित्ता ताप उक्किट्ठाए जाव एवं वयासी) सव मामूબાને લઈને તે ઉત્કૃષ્ટ વગેરે વિશેષણવાળી ગતિથી ચાલતી-ચાલતી જ્યાં ભરત રાજા હતા, ત્યાં આવી. ગતિના ઉત્કૃષ્ટ વગેરે વિશેષણે યાવત્ પદથી ગૃહીત થયેલા છે તે આ પ્રમાણે -"स्वरया चपलया, चण्डया, रौद्रया, सिंहया, उद्धृतया, जयिन्या, छकया, दिव्यया" त्यां Page #666 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६५२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे छेका निपुणया दिव्यया देवगत्या आकाशमार्गगमनेन व्यतिव्रजन् यत्रैव भरतो राजा तत्रैवोपागच्छन्ति उपागत्य अन्तरिक्षप्रतिपन्ना सा सिन्धुदेवी करतल यावदव्जलिं कृत्वा जय विजयशब्देन वर्द्धयति वर्द्धयित्वा एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तaat किमुक्तवती इत्याह- 'अभिजिएणं' इत्यादि 'अभिजिएणं देवाणुप्पिएहिं केवलकभर वासे अण्णं देवाणुप्पियाणं विसयवासिणी अहण्णं देवाणुपियाणं आणत्तिकिंकरी त पडिच्छंतु णं देवाणुप्पिया ! मम इमं एयारूवं पीइदाणं तिकटु कुंभट्टसहस्सं रयणचित्तं णाणामणिकणगकडगाणिय जाव सो चेव गमो जाव पडिविसज्जे ' अभिजितं खलु देवानुप्रियैः श्रीमद्भिः केवलकल्पं - केवलज्ञानसदृशं सम्पूर्ण भरतं वर्षम् भरत क्षेत्रम् तेन हेतुना अहं खलु देवानुप्रियाणां भवतां विषयवासिनी देशवासिनी अहं खलु देवानुप्रियाणाम् आज्ञप्तिकिङ्करी आज्ञाङ्किता सेविका तत् तस्मात् प्रतीच्छन्तु गृहन्तु खलु देवानुप्रियाः ! मम इदमेतद्रूपं प्रीतिदानम् इति कृत्वा कथयित्वा कुम्भाष्टसहस्रं रत्नचित्रम् अष्टोत्तरसहस्त्रपरिपूरितं कुम्भं तथा नानामणिकनकरत्नभक्तिचित्रे पर आयी - उत्कृष्ट आदि गति के, जो विशेषण पद यावत्पद से गृहीत हुए है वे इस प्रकार से हैं-त्वरया, चपलया, चण्डया, रौद्रया, सिंहया, उद्भूतया, जयिन्या, छेकया, दिव्यया," वहां आकरके वह आकाश मार्ग में ही स्थित रही नीचे नहीं उतरी वहीं खड़ी - २ उसने दोनों हाथों की अंजलि बनाकर और उसे मस्तक पर रखकर पहिले भरत महाराजाको जयविजय शब्दों से वधाई दी । वधाई देकर फिर उसने इस प्रकार उनसे कहा - ( अभिजिएणं देवापिएहिं केवलकप्पे भरहे वासे अहण्णं देवाणुप्पियाणं विसयवासिणी अहण्णं देवाणुपियाणं आणत्तिकिंकरी ते पडिच्छतु णं देवाणुप्पिया ! मम इमं एयारूवं पीइदाणं तिकट्टु कुभट्ठसहस्सं रयणचित्तं णाणामणि कणगकडगाणिय जाव सोचेव गमो जाव पडिविसज्जेइ ) आप देवानुत्रिय ने केवल कल्प- सम्पूर्ण भरत क्षेत्र - जीत लिया है। मै भी आप देवानुप्रिय के ही देश की निवासिनी हूं- अतः आप देवानुप्रिय की मैं आज्ञाकिङ्किरीहूं - आज्ञाकी सेविकहूँ इसलिये आप देवानुप्रिय मेरे द्वारा दिये गये इस प्रीतिदान को स्वीकार करें । ऐसा निवेदन करके उसने १००८ कुभ तथा नानामणियों, कनक एवं रत्नों से जिनमें रचना આવીને તે આકાશમાગમાં જ ચ્યવસ્થિત રહી. નીચે ઉતરી નહી'. ત્યાં ઊભી રહીને જ તેણે બન્ને હાથેાની અંજલિ બતાવીને અને તે અંજલિને મસ્તક પર મૂકીને સવ પ્રથમ ભરત રાજાને જય-વિજય શબ્દોથી વધામણી આપી. વધામણી આપીને પછી તેણે આ પ્રમાણે - (अभिजिणं देवाणुपिएहि केवलकप्पे भरहे वासे अहरणं देवाणुवियाणं विसयवासिणी अहणं देवाणुपियाणं आणत्तिकिंकरी तं पडिच्छन्तु णं देवाणुप्पिया ! मम इमं पयारूवं पीइदाणं तिकट्टु कुम्भहसइस्लं रयणचित्तं णाणामणि कणग कडगाणि य जाव सोचैव गमो जाव पडिविसज्जेह) साथ हेवानुप्रिये डेवलप - लस्तक्षेत्र सीधुं छे. પણ આપ દેવાનુપ્રિયના દેશમાં જ રહેનારી છું'. એથી આપ દેવાનુપ્રિયની જ હું આજ્ઞા કિંકરી છું—ખાનાની સેવિકા છું. એથી આપ દેવાનુપ્રિય મારા વડે આપવામાં આવેલ આ પ્રીતિદાનને ગ્રંચુ કરો. આ પ્રમાણે નિવેદન કરીને તેણે ૧૦૦૮ કુંભા તથા નાનામણિ, Page #667 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तु वक्षस्कारः सू० ११ सिन्धुदेवीसाधननिरूपणम् च द्वे कनकभद्रासने सिंहासनद्वयं कटकानि च यावत् स एव मागधदेवगमोऽत्रानुसर्तव्यः यावत् प्रति विसर्जयति यावत्पदात् स भरतः प्रीतिदनं स्वीकरोति ततस्तां देवों सत्कारयति सन्मानयति प्रतिविर्जयति च स्थानगमनाय अनुमन्यते बाणप्रयोगमन्तरेणैव सिन्धुदेव्याः साधनं जात मितिभावः तदुत्तरविधिमाह-'तएणं' इत्यादि 'तएणं से भरहे राया पोसहसालाओ पडिणिक्खमई' ततः खलु स भरतो राजा पौषधशालातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'जेणेव मज्जनघरे तेणेव उवागच्छई' यत्रैव मज्जनगृहं-स्नानगृहम्, तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'हाए कयबलिकम्मे जाव जेणेव भोयणमंडवे तेणेव उवागच्छई' स्नातः कृतबलिकर्मा-काकेभ्यो दत्तान्नभागः सन् यावत् यत्रैव भोजनमण्डपस्तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'भोयणमंडवंसि मुहासणवरगए अट्ठममत्तं परियादियइ' भोजन हो रही हैं ऐसे दो कनक मय भद्रासनों को, दो कटको को एवं त्रुटितो की भेंट रूप में महाराजा भरत चक्री के लिये प्रदान किये । यहां पर मागध देव के प्रकरण में कहा गया सब विषय यावत्पद से गृहीत हुआ है-अतः सिन्धु देवी द्वारा प्रदत्त सब नजराना महाराना भरतचक्रः ने स्वीकार कर लिया । और फिर उनका सम्मान और सत्कार के साथ उसने सिन्धु देवी को विसर्जित कर दिया यहां यह विशेष कथन जानना चाहिये कि महाराजा भरतचक्री ने जो सिन्धुदेवो को वश में किया है वह विना बाण के प्रयोग के किया है ( तपणं से भरहे राया पोसहमालामो . पडिणिर्खमइ ) इस के बाद भरतचक्रो पौषधशाला से बाहर आये (पडिणिक्खमित्ता जेणेव मजणघरे तेणेव उवागच्छइ ) और बाहर आकर के वे जहां पर स्नान गृहथा वहां पर गये। ( उवागच्छित्ता हाए कयबलिकम्मे नाव जेणेव भोयणमंडवे तेणेव उवागच्छइ ) वहां जाकर उन्होंने स्नान किया और स्नान करके बलिकर्म किया -काक आदिकों के लिये अन्न का विभाग किया। फिर वे वहां भोजन मंडप में भाये ( उवागच्छित्ता भोयणमंडवंसि सुहासनवरगए अट्ठमभत्तं परियादियइ ) वहां आकर के वे उस भोजन मंडप में सुखासन से बैठ કનક તેમજ રત્નોથી જેમાં રચના થઈ રહી છે એવા બે કનક ભદ્રાસને, બે કટકા તેમજ ત્રુટિતે ભરતચક્રીને અર્પણ કર્યા. અહીં મગધદેવના પ્રકરણમાં વર્ણિત સમસ્ત વિષય યાવત પદથી ગૃહીત થયેલ છે. આમ સિધુ દેવી દ્વારા પ્રદત્ત સવ નજરાણું ભરતચી ગ્રહણ કરી લીધું અને પછી સન્માન અને સત્કાર સાથે તેણે સિધુરીને વિસજિત કરી દીધી. અહીં એ વિશેષ કથન જાણવું જોઈએ કે ભરતચીએ જે સિન્ધદેવીને વશમાં કીધી તે मा नाप्रयोग विना (तपणं से भरहे राया पोसहसालामो पडिणिक्खमा) त्यार माह सरतही पाषाणामांथी हार माया. (पडिणिक्खमिसा जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ) भने महा२ मावीन्यां स्नान तु त्यां गया. (उपागच्छित्ता पहाए कयबलिकम्मे जाव जेणेव भोयणमड़बे तेणेव उपागच्छद) त्यां ४२ तभर स्नान ४यु भने स्नान કરીને બલિકમ કર્યું એટલે કે કાક વગેરે માટે અન્નને ભાગ કર્યો. પછી તે ત્યાંથી ભેજનું भ७५i व्या. (उवाच्छित्ता भोयणमंडवंसि सुहासणवरगप अट्ठभणते परियादियइ) त्या Page #668 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मण्डपे सुखासनवरगतः अष्टमभक्तं परिपारयति, 'परियादिएत्ता' परिपार्य 'जाव सीहासनारगतः श्रेष्ठसिंहासनोपविष्टः 'पुरत्थाभिमुहे णिसोयइ' पौरस्त्याभिमुखः निषीदति उपविशति 'णिसीएत्ता' निषध उपविश्य 'अट्ठारत सेणिप्पसेणीओ सद्दावेइ' अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणी: शब्दयति आवयति 'सदावित्ता' शब्दयित्वा आहूय 'जाव अट्टाहियाए महामहिमाए तमाणत्तिय पच्चप्पिणंति' यावत्ताः श्रेणि प्रश्रेणयोऽष्टाहिकाया महामहिमायाः ताम् आज्ञप्तिका प्रत्यर्पयन्ति समर्पयन्ति यथाऽष्टाहिकोत्सवः कृत इति ॥सू०११॥ अथ वैताब्यमुरसाधनमाह- "तएणं से" इत्यादि । मूलम्- तएण से दिव्वे चक्करयणे सिंधूए देवीए अट्ठाहीयाए महामहीमाए णिवत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ तहेव जाव उत्तरपुरस्थिमं दिसिं वेयद्धपब्बयाभिमुहे पयाए यावि होत्या. तए णं भरहे राया जाव जेणेव वेयद्धपब्बए जेणेव वेयद्धस्स पब्बयस्स दाहिणिल्ले णितबे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता वेयद्धस्स पब्बयस्स दाहिणिल्ले णितंबे दुवालसजोयणायामं णवजोयणवित्थिन्नं वरणगरसरिच्छं विजयखंधावारनिवेसं करेइ करित्ता जाव वेयद्धगिरिकुमारस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्हइ पपिण्हित्ता पोसहसालाए जाव अट्ठमभत्तिए वेयद्धगिरिकुमारं देवं मणसि करेमाणे चिट्ठइतएणं तस्स भरहस्स रण्णो अट्ठमभत्तसि गये और बैठकर उन्होंने भष्टमभक्त की पारणा की ( परियादियत्ता जाव सीहासनवरगए पुरस्थाभिमुहे णिसीयइ ) अष्टम भक्तकी पारणा करके सिंहासन पर बैठ गये ( णिसीएत्ता अष्ट्रारस सेणिप्पसेणीओ सदावेइ ) सिंहासन पर बैठकर फिर उन्होंने १८ श्रेणी प्रश्रेणिजनों को बुलाया (सदावित्ता) बुलाकरके ( जाव अट्ठाहियाए महामहिमाए तमाणत्तियं पच्चप्पिणंति) यावत् उन श्रेणी प्रश्रेणीजनों ने आठ दिन का महामहोत्सव किया । और इसकी खवर "हमलोगोंने आठ दिन का महामहोत्सव कर लियाई । ऐसो खवर पीछे राजा के पास भेजदी ॥सू०११॥ આવીને તે ભેજન મંડપમાં સુખાસન પૂર્વક બેસી ગયા અને બેસીને તેમને અષ્ટમ ભક્તની ५.२ . (परियादियत्ता जाव सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णिसीयइ) अष्टम सतनी પારણા કરીને પછી તે યાવત પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને સિંહાસન ઉપર બેસી ગયા. (णिसीइत्ता अट्ठारस सेणिप्पसेणीओ सहावेड) सिंडासन ७५२ मेसीन पछी तेभर १८ र प्रविनासाव्या. (सहावित्ता) लावीन (जाव अट्ठाहियाए महामहिमाए तमाणत्तियं पञ्चदिपणंति) यावत् ते ऋण-प्रबिनाये हसन महाभत्सव ध्या. अने महाમહોત્સવ સમ્પન્ન થઈ જવાની સૂચના રાજાને આપી. ૧૧ Page #669 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६५५ प्रकाशिका टीका ४० वक्षस्कारः सू० १२ वैताढयगिरिकुमारदेवसाधनम् परिणममाणसि वेयद्धगिरिकुमारस्स देवस्स आसणं चलइ एवं सिंधुगमो णेयब्बो, पीईदाणं आभिसेक्कं रयणालङ्कारं कडगाणि य तुडि. याणि य वत्थाणि य आभरणाणि य गेण्हइ, गिण्हित्ता, ताए उक्किहाए जाव अट्ठाहियं जाव पच्चप्पिणंति । तएणं से दिव्वे चक्करयणे अट्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए जाव पच्चत्थिमं दिसिं तिमिसगुहाभिमुहे पयाए यावि होत्था, तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं जाव पच्चत्थिमं दिसिं तिमिसगुहाभिमुहं पयातं पासइ, पासित्ता हट्टतुट्ठ चित्त जाव तिमिसगुहाए अदूरसामंते दुवालस जोयणायाम णवजोयणवित्थिन्नं जाव कयमालस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्डइ पगिण्हित्ता पोसहसालाए पोसहीए बंभयारी जाव कयमालगं देवं मणसि करेमाणे करेमाणे चिट्ठइतएणं तस्स भरहस्स रण्मो अट्ठमभत्तंसि परिणममाणंसि कयमालस्स देवस्स आसगं चलइ तहेव जाव वेयद्धगिरिकुमारस्स णवरं पोईदाणं इत्थीरयणस्स तिलगचोदसं भंडालंकारं कडगाणि य जाव आभरणाणि य गेण्हइ गिण्हित्ता उक्किट्ठाए जाव सक्कारेइ सम्भाणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ जाव भोयणमंडवे तहेव महामहिमा कयमालस्स पच्चप्पिणंति ॥१२॥ छाया-ततः खलु तदिव्यं चक्ररत्न सिन्ध्वा देव्याः अष्टाहिकायां महामहिमायाँ निचायाम्, सत्याम्, आयुधगृहशालातः तथैव यावत् उत्तरपौरस्त्यां दिशं वैताव्यपर्वताभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत् , ततः खलु स भरतो राजा यावत् यत्रैव वैताब्यपर्वतः यात्रैव वैताव्यस्य पर्वतस्य दाक्षिणात्ये नितम्बे तत्रैवोपागच्छति, उपागत्यवैताव्यस्य पर्वतस्य दाक्षिणात्ये नितम्बे द्वाददशयोजनायाम नवयोजनविस्तीर्ण धरणगरसदृश विजयस्कन्धावारनिवेशं करोति, कृत्वा यावत वैतादयगिरिकुमारस्य देवस्य अष्टमभक्त प्रगृ. हाति प्रगृह्य पौषधशालायां यावत् अष्टमभक्तिकः वैताढथगिरिकुमारं देवं मनसि कुर्वन् तिष्ठति, ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञः अष्टमभक्त परिणमति वैतादयगिरिकुमारस्य देवस्व आसनं चलति, एवं सिन्धुदेव्याः गमो नेतव्यः , प्रीतिदानम् आभिषेक्यम् रत्नालङ्कार कटमानि च त्रुटिकानि च वस्त्राणि आभरणनि च गृणाति गृहीत्वा तया उत्कृष्टया यावत् अष्टाहिकां यावत् प्रत्यर्पयन्ति । ततः खलु हिव्यं चक्ररत्नम् अष्टाहिकार्या महामहिमायाँ निवृत्तायां सत्यां यावत् पाश्चात्यां दिशं तिमिस्रगुहाभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत् , ततः खलु स भरतो राजा तदिव्यं चक्ररत्नं यावत् पाश्चात्यां दिशं तिमिस्रगुहाभिमुखं प्रयातं पश्यति, Page #670 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - ~ ६५६ जम्बूद्धीपप्रप्तिसूत्रे दृष्ट्वा हृष्टतुष्ट चित्त यावत् तिमिसगुहाया अदुरसामन्ते द्वादशयोजनायाम नवयोजनविस्तीर्ण यावत् कृतमालस्थ देवस्य अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति, प्रगृह्य पौषधशालायां पौषधिको ब्रह्मचारी यावत् कृतमालकं देवं मनसि कुर्वन् तिष्ठति, ततः खलु तस्य भरतस्य राक्षः अष्टममक्ते परिणमति कृतमालस्य देवस्य आसनं चलति तथैव यावत् वैताढयगिरिकुमारस्य नवरं प्रीतिदानं स्त्रीरत्नस्य तिलकचतुर्दशं भाण्डालंकारं कटकानि च यावत् आभरणानि च गृकाति, गृहीत्वा तया उत्कृष्टया यावत् सत्कारयति, सन्मानयति, सत्कार्य सम्मान्य प्रतिविसर्जयति यावत् भोजनमण्डपे, तथैव महामहिमां कृतमालस्य प्रत्यर्पयन्ति ॥सू० १२॥ टीका-'तएणं से इत्यादि 'तए णं से दिवे चक्करयणे सिंधूए देवीए अट्टाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउद्दघरसालाओ तहेव जाव उत्तरपुरस्थिम दिसि वेयद्धपव्वयाभिमुहे पयाए यावि होत्था" ततः खलु तदिव्यं चक्ररत्नं सिन्ध्वाः सिन्धुनाम्न्याः देव्याः विजयोपलक्षिकायाम् अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालातस्तथैव पूर्ववदेव निष्कामति-प्रतिनिष्क्रम्य यावत् अनेक वाद्यविशेषाणां ध्वनि प्रतिध्वन्यात्मकशब्दैः गगनतलं पूरयदिव उत्तरपौरस्त्याम्-उत्तरपूर्वा दिशम् ईशानकोणवैताढयपर्वताभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत् प्रस्थितं जातम् सिन्धुदेवी भवनतो वैतान्यमुरसाधनार्य वैताढयसुरावासभूतं वैताढयक्टं गच्छतश्चक्ररत्नस्य ईशानदिश्येव मुष्ठु पन्था 'तएणं से भरहे राया जाव जेणेव वेयद्धपब्बए जेणेव वेयदस्स तएणं से दिवे चक्करयणे सिंधए देवीए" इत्यादि । सूत्र-१२ टीकार्थ-तएणं से दिव्वे चक्करयणे) इसके बाद वह दिव्य चक्ररत्न (सिंधूए देवीए अट्टाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए उहघरसालाओ तहेव जाव उत्तरपुरस्थिमं दिसिंवेयद्धपन्वयाभिमुहे पयाए यावि होत्था) सिन्धुदेवी के विजयोपलक्ष्य में कृत महामहोत्सव समाप्त हो जाने पर आयुध गृहशाला से पूर्व की तरह ही बाहर निकला और निकलकर यावत् अनेक वाचविशेषों के ध्वनि प्रतिध्वनिरूप शब्दों द्वारा गगनतलको भरतारसा उत्तर पूर्व दिशा में ईशान कोण में स्थित वैताढय पर्वत को ओर चला सिन्धु देवो के भवन से वैताढयसुरसाधन के लिये वैतादय पुरावासभूत वैतादयकूट की ओर जाते हुए चक्ररत्नको ईशानदिशामें ही सरल "तएण से दिवे बकरयणे सिंधूप" इत्यादि सूत्र ॥१२॥ टी - (तपणं दिब्वे चक्करयणे) त्यार माह त य यत्न (सिधूए देवीए अट्ठाहियाए महामहिमाप णिवत्ताप समाणीए आउघरसालाओ तहेव जाव उत्तरपुरस्थिमं दिसि वेयद्धपब्वयाभिमुहे पयाप यावि होत्था) सिन्धुवान (ar21५३क्ष्यमा मडामोत्सव माया. જિત કરવામાં આવ્યો તે જ્યારે સમ્પન્ન થઈ ગયા ત્યારે તે પહેલાંની જેમ જ આયુધગ્રહશાળામાંથી બહાર નીકળ્યો અને નીકળીને યાવત અનેક વાઘ વિશેના વિનિ પ્રતિનિ રૂપ શબ્દો દ્વારા ગગનતલને સમ્પરત કરતું ઉત્તર પૂર્ણ દિશામ-શાન કેશુમાં સ્થિત વૈતાઢ્ય પર્વતની તરફ ચાલ્યું. સિન્દુ દેવીના ભાનથી વૈતાઢ્યપુર સાધન માટે વૈતા ત્યસુરાવાસભૂત વૈતાઢ્યક્ટ તરફ પ્રયાણ કરતાં ચકરીને ઈશાનદિશામાં જ સરલતા થઈ. Page #671 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० १२ वैताढ्य गिरिकुमार देवसाधनम् ६५७ 9 पत्रयस्स दाहिणिल्ले णितंबे तेणेव उवागच्छइ' ततः खलु स भरतो राजा यावत् यत्रैव वैतादयः पर्वतः यत्रैव च वैताढयस्य पर्वतस्य दाक्षिणात्यो दक्षिणार्द्धभरतपार्श्ववर्ती नितम्बः मूलभागस्तत्रैव उवागच्छति, अत्र यावत्पदात् वैताढ्य पर्वताभिमुखं प्रयातं चक्ररत्नं पश्यति, दृष्ट्वा हृष्टतुष्ट चित्तानन्दितः परमसौमनस्थित भरतो राजा इति संग्राह्यम् 'उवागच्छत्ता' उपागत्य 'वेयद्धस्स पव्वयस्स दाहिणिल्ले तिंबे दुवालसजोयणयामं णवजोयणवित्थिन्नं वरणगर सरिच्छं विजयखंधावारनिवेस करेह' वैताढ्यस्य पर्वतस्य दाक्षिणात्ये दक्षिणार्द्ध भरतपार्श्ववर्त्तिनि नितम्बे मूलभागे द्वादशयोजनायामं द्वादश योजनदैर्ध्य नवयोजनविस्तीर्णं षट्त्रिंशत्तमक्रोशविस्तीर्णम्, वरनगरसदृशं श्रेष्ठनगर तुल्यम् विजयस्कन्धावारनिवेशं सेनानिवेशम् करोति 'करिता ' कृत्वा 'जाव वेयद्धगिरिकुमारस्स देवस्स अट्टमभत्तं परिण्ह' अत्र यावत्पदात् वर्द्धकिरत्नशब्दापन पौषधशाला विधापनादि सर्वं नेतव्यम्, तेन पौषधशालायां वैतान्यगिरिकुमारस्य देवस्य साधनायेति रास्ता पड़ा इसी लिये वह इस मार्ग से गया ( तरणं से भरहे राया जाव जेणेव वेयद्ध पव्वए जेणेव वेयद्धस्स पवयस्स दाहिणिल्ले णितंवे तेणेव उवागच्छइ) इसके बाद वह भरत ant यावत् जहां पर वैताढ्य पर्वतथा, और जहां पर वैताढ्य पर्वतका दाक्षिणात्य दक्षिणार्द्ध भरतका पार्श्ववर्ती नितम्ब था - मूल भागथा वहां पर आया - यहां यावत्पद से यह पाठ गृहीतहुआ है - " वैताढ्य पर्वताभिमुखं प्रयातं चक्ररत्नं पश्यति दृष्ट्वा हृष्ट तुष्ट चित्तानंदितः परमसौमनस्थितः भरतो राजा" । ( उवागच्छित्ता वेयद्धस्स पत्त्रयस्स दाहिणिल्के णितंबे -दुवालस जोयणायामं णवजयणवित्थिन्नं वर गगर सरिच्छं विजयखंधावारनिवेस करेइ ) वहां आकर के उसने वैताढ्य पर्वत के दाक्षिणात्य नितम्ब पर दक्षिणार्द्ध भरत पार्श्ववर्ती मूल भाग पर - १२ योजन की लंबाई वाले और ७ योजन की चौड़ाई वाले श्रेष्ठ नगर तुल्य विशाल सैन्य का पडाव डाला (करिता जाव वेयद्धगिरी कुमारस्स देवस्स अट्टममन्तं पण्डिइ) पडाव डाल कर यावत् उसने वैताढ्य गिरि कुमार देव को साधन करने के लिए अष्टम भक्त का व्रत मेथी ते या भागथी गयु (त पणं से भरहे राया जाव जेणेव वेयद्धपव्वप जेणेव वेद्धस्स व्वयस्स दाहिणिल्ले णितूंबे तेणेव उवागच्छ) त्यारमा ते लस्तयी यावत् જ્યાં વૈત જ્ય પર્વત હતા અને જ્યાં વૈતાઢ્ય પર્વતના દાક્ષિણાત્ય દક્ષિણા ભરતનાપાન વતી નિતમ્બ-મૂળભાગ હતા ત્યાં આવ્યા. અહીંયાં યાવત્ પદથી આ પાઠ ગૃહીત થયે ४- "वैताढ्य पर्वताभिमुखं प्रयातं चक्ररत्नं पश्यति दृष्ट्वा, हृष्ट तुष्ट चित्तानन्दितः परमसौमनस्थितः भरतो राजा" । (उवागच्छित्ता वेथद्धस्स पञ्चयस्स दाहिणिस्ले णितंघे दुबालसजोयणायाम णवजोयणवित्थिन्नं वरणगरसरिच्छं विजयखंधावारनिवेस करेइ) त्यां भावाने તેણે વૈતાઢ્ય પર્વતના દાક્ષિણાત્ય નિતંબ પર દક્ષિણૢાદ્ધ ભરત પાવતી મૂળ ભાગ ઉપર ૧૨ ચેાજન જેટલી લખાઈવાળા અને નવ ચેાજન પહેાળાઈ વાળા શ્રેષ્ઠ નગર તુલ્ય વિશાળ सैन्यने। पडाव नाथ (करिता जाव वेयद्धगिरिकुमारस्त देवस्स अट्टमभन्त पगिण्हर) पढाव નાખીને યાવત્ તેણે વૈતાઢ્યગિરિ કુમાર દેવની સાધના માટે અષ્ટમભક્ત વ્રત ધારણ કર્યું. ८३ Page #672 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६५८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे शेषः अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति 'पगिण्डित्ता' प्रगृध 'पोसहसालार जाव अमभत्तिए वेयद्धगिरिकुपारं देवं मणसि करेमाणे करेमाणे चिट्ठ' पौषधशालायां यावत्करणात् पौषधिकः पौषधतवान् अतएव ब्रह्मचारी दर्भसंस्तारकोपगतः सार्द्धद्वयहस्तपरिमित दर्भासने उपविष्टः उन्मुक्तमणिसुवर्णालङ्कार इत्यादि सर्वं पूर्वोक्तं ग्राह्यम् अष्टमभक्तिकः कृताष्टमतपाः, वैताढ्य गिरिकुमारं देवं मनसि कुर्वन् कुर्वन् ध्यायं ध्यायंस्तिष्ठति । 'तए णं तस्स भरहस्स रण्णो अहममत्तंसि परिणममाणंसि वेयद्धगिरिकुमारस्स देवस्स आसणं चलइ' ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञः अष्टमभक्ते परिणमति परिपूर्ण प्राये जायमाने सति वताढ्यगिरि कुमारस्य देवस्य आसनं सिंहासनम्, चलति एवं सिंधुगमो णेयव्वो' एवं सिन्धुदेव्याः गमः सदृशपाठो नेतव्यः-स्मृतिपथम् आनयितव्यः इदं च सिन्धुदेव्या अतिदेशकथनं तद्बाणव्यापारमन्तरेणैवायमपि साध्यः इति सादृश्यख्यापनार्थं तथा च वैताढगिरिकुमारो देवः ससिंहासनं चलितं पश्यति, दृष्ट्वा अवधिं प्रयुङ्क्ते धारण किया (परिहित्ता पोसहसालाए जाव अद्रुममत्तिए वेयड्डुगिरिकुमारं देवं मणसि करेमाणे२ चिट्ठइ) अष्टमभक्त को धारण करके पौषधशाला में पौषधवन वाले अत एव ब्रह्मचारी तथा दर्भ के संथारे पर आसीन - २ || हाथ प्रमाण दर्भासन पर स्थित एवं मणिमुक्ता आदि के अलङ्कारों से विहीन हुए ऐसे उस महाराजा भरत चका ने पूर्व में कहे अनुसार वैताढ्य - गिरी कुमार का मन में ध्यान करना प्रारम्भ किया (तपणं तस्स भरहस्स रणों अट्ठमभत्तंसि परिणममाणसि वेयड्ढ गिरिकुमारस्स देवस्स असणं चलइ ) इसके बाद महाराजा भरत चक्री का जब अष्टम भक्त समाप्त प्रायः होने को आया तब ( एवं सिंधुगमो णेयब्वो ) इसके • बाद जैसा-सिन्धु देवी के साधन प्रकरण में कहा गया है वैसा कथन यहां जानना चाहिये अर्थात् जिस प्रकार भरत चक्री ने सिन्धु देवी को विना बाण के वश में किया उसी प्रकार से इसे भी विना-बाण के वश में किया इस तरह जब वैतादयगिरी कुमार देवने अपना आसन कंपित होते हुए देखा तो देखकर उसने अपने अवधि को उपयुक्त किया उससे (गिता पोसहसालाप जाव अट्ठमभत्तिए वेयड्ढगिरिकुमारं देव मणसिकरेमाणे २ चिट्ठर ) अष्टभलत धारण ४रीने पौषधशाणायां पौषधवतवाना मेथी ब्रह्मयारी तेभन દના સથારા ઉપર સમાસીન ર।। હાથ પ્રમાણુ દર્ભાસન ઉપર સ્થિત. મણિમુક્તા માદિ અલ કારાથી વિદ્વીન થયેલા એવા તે ભરતચક્રી પૂ’માં કહ્યાં મુજમ જ વૈતાઢયગિરિ કુમારદેવના ध्यानां वित्त व पा. (तरण तस्स भरद्दस्त रण्णो अट्टमभसंसि परिणममाणंसि वेयइढगिरिकुमारस्स देवस्स आसणं चलइ) त्या बाई न्यारे भरतयडीनु अष्टभलत व्रत संभात प्रायः तु त्यारे नेताढ्यगिरि कुमार देव आसन उपायमान थथु. ( एवं सिंधुगमो णेयव्वो) त्यार माह ने अमा सिन्धु देवीना उडेवामां आछे ते प्रभा જે અહીં પણ સમજવું એટલે કે જેમ ભરતચક્રીએ સિન્ધુદેવીને વગર ખાદ્યે જ વશમાં કરી તેમજ તે વૈતાઢ્યગિરિ કુમાર દેવને પણ પેાતાના જશમાં કર્યાં. આ પ્રમાણે જ્યારે વૈતાઢ્ય. ગિરિ કુમાર દેવે પેાતાનું આસન કૅપિત થતુ જોયુ. તે ખા જોઈને તેણે પેાતાના વિષે Page #673 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तृ० वक्षस्कारः सू० १२ वैतादयगिरिकुमारदेवसाधनम् ६५९ प्रयुज्य भरतं राजानम् अवधिज्ञानेन आभोगर्यात जानाति आभोग्य ज्ञात्वा तस्य वैता - गिरिकुमारस्य देवस्य अयमेतद्रूपो वक्ष्यमाण स्वरूपः आध्यात्मिक ::: - आत्मगत अङ्कुर इव, ततश्चिन्तितः पुनः पुनः स्मरणरूपो विचारो द्विपत्रित इव कल्पितः - स एव व्यवस्था युक्तः विचारः पल्लवित इव ३, प्रार्थितः स एवेष्टरूपेण स्वीकृतः पुष्पित इव ४, मनोगतः संकल्पः मनसि दृढरूपेण विषयः सत्कारार्हस्य तत्साधित मदायत्तीकृत सत्कारवस्तुभिस्तद्योग्यं सत्कारं करिष्यामि, इति विचारः फलित इव ५, समुत्पन्नः, स च कः सङ्कल्प इत्याह-उत्पन्नः खलु भो जम्बूद्वीपे द्वीपे - जम्बूद्वीपनामके द्वीपे भरते वर्षे भरतो नाम राजा चातुरन्तचक्रवर्ती तज्ञ्जीतमेतत् जीताचार एषः अतीतवर्त्तमानानागतानां वैतादयगिरिकुमाराणां देवानां भरतानां राज्ञाम् उपस्थानिकं प्राभृतं कर्त्तुं वर्त्तते इति, तद्गच्छामि खलु अहमपि भरतस्य राज्ञश्चक्रिण उपस्थानिकं करोमीति विचार्य 'पीइदाणं अभिसेक्कं रयणालंकारं कडगाणि य तुडियाणि य वत्थाणि य आभरणाणि य गेव्हइ' प्रीतिदानम् अभिषेक्यम् - अभिषेकयोग्यं राजपरिधेयम्, रत्नालंकारं मुकुटम्, कटकाि च हस्ताभरणानि त्रुटिकानि च बाह्वाभरणानि, वस्त्राणि च आभरणानि च गृह्णाति 'गिoिहत्ता' गृहीत्वा 'ताए उक्किट्ठाए जाव अट्ठाहियं जाव पच्चष्पिणंति' तथा उत्कृष्टया उसने भरत राजा को अपना ध्यान करते हुए देखा जाना तब उस वैताढ्य गिरि कुमार देव के मन में ऐसा आध्यात्मिक चिन्तित, कल्पित प्रार्थित पुष्पित, मनोगत, संकल्प विचार प्रकट हुआ कि जंबूद्वीप में भरत क्षेत्र में भरत नाम का चातुरन्त चक्रवर्ती महाराजा उत्पन्न हुआ है तो अतीत, अनागत, वर्तमान काल के समस्त वैताढयगिरी कुमार देवों.: का ऐसा परम्परा से चला आया यह आचार व्यवहार है कि वे उसे नजराना दें तो में: चलूँ और उसे मेट करूं ऐसा विचार कर (पीइदाणं आभिसेक्कं रयणालंकारं कडगाणिय तुडियाणिय वत्थाणिय आभरणानिय गेण्हइ) उसने प्रीतिदान में देने के निमित्त अभिषेकयोग्य राजपरिधेय रत्नालंकार- मुकुट कटक त्रुटिक बस्त्र, और आभरण लिये (गिहिचा ताए उक्किट्ठाए जाव पच्चपिणंति) और लेकर वह उत्कृष्ट आदि विशेषणों वाली गति જ્ઞાનના ઉપયોગ કર્યો. અધિજ્ઞાનમાં તેણે ભરતી રાજાને તેના જ ધ્યાનમાં લીન જોયા. ત્યારે તે વૈતાધ્યગિરિ કુમાર દેવના મનમાં એવા આધ્યાત્મિક, ચિન્તિત, કલ્પિત, પ્રાર્થિત, પુષ્પિત, મનેાગત સંકલ્પ–વિચાર પ્રકટ થયા કે જ બુદ્વીપ નામક દ્વીપમાં, ભરતક્ષેત્રમાં ભરત નામ ચાતુરન્ત ચક્રવર્તી રાજા ઉત્પન્ન થયા છે. તેા અતીત, અનાગત, વર્તમાન કાળના સવ વૈતાઅગિરિ કુમાર દેવાના વંશ પરંપરાથી એવા આચાર-વ્યવહાર ચાલતા આવે છે કે તે ચક્રવિત એવા ભરત રાજાને નજરાણુ આપે તે હું જાઉં અને તેને નજરાણું આપુ' આમ विचार रीने (पीइदाणं अभिसेक्क देणालंकार कडगाणि तुडियाणिय वत्याणिय आभ रणाणि य गेव्हर) ते वैवाव्यशिर कुमार देवे राजने प्रानिमा वा भाटे अभिषे योग्य राज्परिधेय-रत्नावार, भुकुट, ४:४, त्रुटि, वस्त्र ने आभरणे। बीधां. (गिव्हिन्ता ताप उक्किट्ठा जाव आट्ठाहियं जाव पच्चपिणंति) अने ते सर्व नेते उष्कृष्ट माहि Page #674 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६६० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे गत्या यावत् अष्टाहिकां महामहिमां यावत् प्रत्यर्पयन्ति - समर्पयन्ति, अत्र प्रथमो यावच्छन्दः उक्तातिरिक्त विशेषणसहितां गतिं प्रीतिवाक्यं प्राभृतोपनयनग्रहणे सुरसन्मानन विसर्जने स्नानभोजने श्रेणि प्रश्रेण्यामन्त्रणं बोधयति, द्वितीयस्तु यावच्छन्दः अष्टाहिकाऽऽदेशदानकरणे इति सूचयति । अथ तमिश्रा गुहाधिपकृतमाल सुरसाधनार्थमुपक्रमते 'तर णं' इत्यादि 'तए णं से दिव्वे चक्करयणे अद्वाहियाए महामहिमाए णिव्वचाए समाणीए जाव पच्चत्थिमं दिसिं तिमिसगुहाभिमुद्दे पयाए यावि होत्था' ततः खलु तद्दिव्यं चक्ररत्नम् अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्याम् अर्थाद् वैताढ्य - गिरिकुमारस्य देवस्य विजयोपलक्षिकायां यावत् पाश्चात्यां पश्चिमां दिशं तमिस्रा गुहाभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत् प्रस्थितमभूत् प्रस्थितजातम् वैतान्यगिरिकुमारसाधनस्थानस्य तमिश्रायाः पश्चिमवर्त्तित्वात् 'तए णं से भरहे राया तं दिव्यं चक्करयणं जाव पच्चत्थिमं दिसिं तिमिसगुहामिमुहं पयातं पास' ततः खलु स भरतो राजा तद्दिव्यं चक्ररत्नं यावत् से चल कर जहां पर महाराजा भरत नरेश था वहां पर आया इत्यादि और सब आगे का कथन महामहोत्सव करने तक और उसकी भरत नरेशको सूचना देने तक का यहां पर करना चाहिये | यह सब कथन पीछे लिखा ही जा चुका है अतः वहीं से इसे देख लेना चाहिये यही बात यहां पर आये हुए यावत् शब्द सूचित करता है । तमिश्रा गुहाधिप कृतमालदेव साधन वक्तव्यता - (तएण से दिव्वे चक्करयणे अट्ठा हिया महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए जाव पच्चरिथमं दिसिं तिमिसगुहाभिमुहे पयाए यावि होथा ) जब वैतादयगिरिकुमार देव के विजयोपलक्ष्य में ८ दिन का महामहोत्सव समाप्त हो चुका तब वह दिव्य चक्ररत्न पश्चिमदिशा में वर्तमान तिमिस्रा गुहा की तरफ प्रस्थित हुआ क्यों कि वैतादयगिरीकुमार को साधन करने का स्थान तिमिस्रा गुहा की पश्चिम दिशा में है (तएण से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं जाव पच्चत्थिमं दिसिं तिमि - વિશેષણાવાળી ગતિથી ચાલીને જ્યાં ભરત નરેશ હતા ત્યાં આા, ઇત્યાદિ આગળનું' સ`થન-મઠ્ઠામહેન્સિવ સમ્પન્ન કરવા તેમજ તે ઉત્સવની પૂર્ણ થવાની ભરત નરેશને સૂચના આપવા સુધીનુ' અહી' જાણી લેવુ જોઇએ. એ બધું કથન પહેલાં સ્પષ્ટ કરવામાં આબુ જ છે. એથી બધું ત્યાંથી જ જાણી લેવુ જોઇએ. અહી યાવત પદથી એજ વાત સ્પષ્ટ કરવામાં આવી છે. तमिश्रागुहाधिप कृतमालदेवसाधनवक्तव्यता (त एण से दिव्वे चक्करयणे अठ्ठाडियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए जाब पच्चथिमं दिसि तिमिसगुहाभिमुद्दे पवार यावि होत्था) क्यारे वैताढ्ययगिरि कुमार देवना विश्वચેપલક્ષ્યમાં ૮ દિવસનેા મહામહેાત્સત્ર સમ્પન્ન થઇ ચુકયો ત્યારે તે દિવ્ય ચક્રરત્ન ૫ શ્ચમ દિશામાં વર્તમાન તિમિસ્રાગુડાની તરફ પ્રસ્થિત થયું કેમકે વતાટ્યગિરિ કુમારને સધાતું स्थान तभिस्त्रा गुडानी पश्चिम दिशामा छे. (तपण से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयण Page #675 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकशिका टीका ४० वक्षस्कारः सू० १२ वैताढयगिरिकुमारदेवसाधनम् ६६१ पाश्चात्यां पश्चिनां दिशं तमिश्रागुहाभिमुख प्रयातं-प्रस्थितं पश्यति 'पासित्ता' दृष्ट्वा 'हतुद्वचित्त जाब तिमिसगुहाए अदूरसामने दुवालसजोयणायाम णव जोयणबिस्थिन्नं जाव कयमालस्स देवस्स अट्टमभत्तं पगिण्हइ'हृष्टतुष्ट चित्तानन्दितः यावत् परमसौमनस्यितः स भरतः तमिस्रागुहायाः अदूरसामन्ते नातिदुरे नातिसमीपे उचितस्थाने द्वादशयोजनायामं नवयोजनविस्तीर्णं वरनगरसदृशं विजयस्कन्धावारनिवेशं सेनानिवेश करोति 'करित्ता' कृत्वा यावत् पदात् वर्द्धकिरत्नशब्दापनपौषधशालाविधापनादि सर्व नेतव्यम् , तेन पौषधशालायां कृतमालस्य देवस्य साधनाय अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति 'पगिण्हित्ता' प्रगृद्य 'पोसहसालाए पोसहिए बंभयारी जार कयमालगं देवं मणसि करेमाणे करमाणे चिदुइ' पौषधशालायां पौषधिकः पौषधव्रतवान् अतएव ब्रह्मचारी यावत्करणात दर्भसंस्तारकोपगतः साद्वयहस्तपरिमित दर्भासने उविष्टः, उन्मुक्तमणिसुवर्णालङ्कार इत्यादि सर्व सगुहाभिमुखं पयातं पासइ) जब भरत राजा ने उस दिव्य चक्ररत्न को यावत् पश्चिमदिशा में तमिस्रा गुहा की ओर जाते देखा तो (पासिता) देखकर वह (द्वतुट्ठ चित्त जाव तिमिसगहाए अदूरसामते दुवालसजो यणायाम णवजोयण वस्थिण्णं जाव कयमालस्स देवस्स अमभत्तं पगिण्हइ ) हर्षित एवं संतोषित्त हुआ यावत् उसने तमिस्त्रा गुहा के पास में ही न उससे- अधिक दूर और न उसके अधिक निकट-किन्तु समुचित स्थान में ही-१२ योजन के लंबे एवं नो योजन विस्तार वाले अपने विशाल सैन्य का पडाव डाला यावत् कृतमाल देव को साधने के निमित्त उस ने अष्टम भक्त को तपस्या को स्वीकार की यहां यावत् शब्द से वर्द्धकिरत्न का बुलाना पौषधशाला के बनाने का आदेश देना आदि आदि पूर्वोक्त-सब प्रकरण लगा लेना चाहिये (पगिणिहत्ता पोसहसालाए पोसहिर बंभयारो जाव कयमालगं देवं मणसिकरेमाणे २ चिट्ठइ ) इस प्रकार पौषधशाला में पौषध व्रतको धारण कर एवं ब्रह्मचर्यव्रत वाला वह भरत नरेश यावत् कृतमाल- देव का मन में ध्यान करने लगा यहां यावत् शब्द से "दर्भासनसंस्तारकोपगतः उन्मुक्तमणि सुवर्णालङ्कारः" इत्यादि पूर्वोक्त सब पाठ जाव पच्चस्थिम दिसि तिमिसगुहाभिमुखं पयातं पासई) यारे १२ मे तय रत्नने यावत् पश्चिम दिशामा तभिसा शुख त२५ तुयुत। (पासित्ता) बनते (हट्ठ तुट्ठ वित्त जाव तिमिसगुहाए अदूरसामंते दुवालसजोयणायाम णवजोयणवित्थिण्ण जाव कयमालस्स देवस्त अहमभत्त पगिण्हइ) इति तम सताषित यत्त थये। માવત તેણે તમિક્ષા ગુડની પાસે જ તેનાથી વધારે દૂર પણ નહિ અને અધિક નિકટ પણ નહિ પણ સમુચિત સ્થાનમાં–૧૨ જન જેટલો લાંબા અને નવ જન પ્રમાણે પહેલા પિતાના વિશાળ સન્યને પડાવ નાખ્યો. યાવત કૃત માલદેવને સાધવા માટે તેણે અષ્ટમમતની તપસ્યા સ્વીકાર કરી અહી' યાવત શબ્દથી વદ્ધકિરનને બોલાવ, પૌષધશાળાના નિર્માણ માટે ने माहेश साप। पोरे पूर्वात सन ५४२६५ ६यट1 ४२ न. (पगिण्हित्ता पोसहसालाए पोसहिए बंभयारी जाव कयमालग देव मास करेमाणे २ चिट्ठइ) मा प्रभाग પૌષધશાળામાં પૌષધવ્રતવાળે તેમજ બ્રહ્મચારી ભરત નરેશ યાવત કૃતમાલ દેવનું મનમાં Page #676 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६६२ जम्बुद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ग्राह्यम् अष्टमभक्तिकः कृताष्टमतपाः कृतमालकं देवं मनसि कुर्वन् ध्यायं २ स्तिष्ठति 'तए णं तस्स भरस्सरणो अट्टमभत्तंसि परिणममाणंसि कयमालस्स देवस्स आसणं चलई' ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञश्चक्रवर्त्तिनः अष्टमभक्ते परिणमति परिपूर्ण प्राये जायमाने सति कृतमालस्य देवस्य आसनं सिंहासनं चलति 'तहेव जाव वेयद्ध गिरिकुमारस्स' तथैव पूर्ववदेव यावत् वैतादयगिरिकुमारस्य सदृश पाठो नेतव्यो यावत्पदात् सर्वं प्राग्वत् 'णवरं पोइदाणं इत्थीरयणस्स तिलाचोदसं भंडालंकारं कडगाणि य जाव आभरणाणि गेors' नवरम् अयं विशेषः स्त्रीरत्नस्य कृते तिलकं ललाटाभरणं रत्नमयं चतुर्द्दशं यत्र ततिलकचतुर्दशम् ईदृश भाण्डालङ्कार शब्दस्य प्राकृतत्वात् अलङ्कारशब्दस्य परनिपाते संस्कृते पूर्वनिपातोचितत्वात् अलङ्करभाण्डम् आभरणकरण्डकम्, कटकानि च स्त्रीपुरुषसाधारणानि बाह्राभरणानि यावत् आभरणानि च गृह्णाति, चतुर्द्दशाभरणानि चैवम् 'हार १ दहार २ इग ३ कणय ४ रयण ५ मुत्तावली ६ उ केऊरे ७ । कडए ८ तुडिए ९ ग्रहण हुआ जानना चाहिये (तरणं तस्स भरहस्स रण्णी अट्टमभत्तंसि परिणममाणंसि कयमालदेवस्त आसणं कंपइ ) जब उस भरत राजा को अष्टम भक्त की तपस्या समाप्त होने के सन्मुख हुआ तब कृतमाल देव का आसन कंपायमान हुआ, (तहेव जाव वेयड्ढगिरि कुमारस्स) यहां पर इस समय वैतादयगिरिकुमार देव के प्रकरण में जैसा कथन किया जा चुका है वह सब यहां पर समझ लेना चाहिए (णवरं पीइदाणं इत्थीरयणस्स तिळगचोदसं भंडालंकारं कडगाणि अ जाव आभरणाणि अ गेण्डइ) प्रीतिदान में वहां के कथन से यहां अन्तर है और वह इस प्रकार से है-प्रीतिदान में उसने भरत राजा को देने के लिये स्त्रीरत्न के निमित्त रत्नमय १४ ललाट-आभरण जिसमें हैं ऐसे अलङ्कार भाण्ड को-आभरण करण्डक को - स्त्री पुरुष साधारण कटकों को, यावत् आभरणों को लिया वे १४ आभरण इस प्रकार से हैं - ( हार १द्धहार ५ इग ३ कणय ४रयण २ मुत्तावली ६ उ केऊरे ७ कडए ८ तुडिए ९ मुद्दा १० कुंडल ११ उरसुत्त १२ चूलमणि १३ तिलयं १४ ) (परिव्हित्ता ताए उक्किट्ठाए ध्यान ४२वा साग्येो, अड्डी यावत् शब्दथी 'दर्भासनसंस्तार कोपगः उन्मुक्तमणिसुवर्णालङ्कारः" त्याहि पूर्वोत सर्व पाड संगृद्धीत थथे। छे. (तपणं तस्स भरहस्स रण्णो अठममन्त सि परिणममाणसि कयमालदेवस्स आसणं कंपइ) क्यारे ते भरत राजनी अष्टमभत तपस्या समाप्त थवा भावी ते सभये इतभासद्देवनु आसन पायमान थयु (तहेव जाव वेयइटगिरि कुमारस्स) भी वैताढ्य गिरि कुमारदेवना प्राप्रमाणे स्थन वामां आयु छे, ते मधु अहीं सम सेवु लेये. (णवर पीइदाणं इत्थीरयणस्स तिलगचोइसे भंडालंकारं कडगाणि अजाब आभरणाणि अ गेण्हर) प्रीतिदानना उथनमा अड्डी ते उथन ४२तां अ ंतर छे. अने તે અતર આ પ્રમાણે છે પ્રી તાનમાં તેણે ભરત રાજાને આપવા માટે સ્ત્રીરત્નમાટે રત્નમય ૧૪ લલાટ-આભરણા જેમાં છે એવા અલકાર ભાંડ-આભરણુ કરડક,–સ્ત્રી પુરુષ સાધારણ उटा, यावत् आभर सीधां ते १४ आभर प्रमाणे छे - ( हार १, द्धहार २, इ ३, कणय ४, रयण ५, मुत्तावली ६, उ केऊरे ७, । कडप ८, तुडिए ९, मुद्दा १०, कुंडल Page #677 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कार: सू० १३ सुषेण सेनापतेर्विजयवर्णनम् ६६३ मुद्धा १० कुंडल ११ उरसुत १५ चूलमणि १३ तिलयं || १४ || १ || ' ति तावत् पर्यन्तं वक्तव्यं यावद् भोजनमण्डपे भोजनम्, तत्रैव मग सुरस्येव महामहिमा अष्टाहिका कृतमालस्य प्रत्यर्पयन्त्याज्ञां श्रेणिप्रश्रेणयः इति ॥ १२ ॥ मूलम् - तरणं से भरहे राया कयमालस्स अट्ठाहियाए महामहिमा ए णिवत्ता समाणीए सुसेणं सेणावई सदावेय सहावेत्ता एवं वयासी गच्छाहिणं भो देवाणुपिया ! सिंधुए महाणईए पच्चत्थिमिल्लं णिक्खुडं ससिंधुसागरगिरिमेरागं समविसमणिक्खुडाणि य ओ अवेहि ओअवे अग्गाईं वराई रथणाई पडिच्छाहि अग्गाई वराई रयणाणि पडिच्छित्ता ममेयमणत्तियं पच्चष्पिणाहि तरणं से सेनावई बलस्स णेया भर संमि विस्सुयजसे महाबलपरक्कमे महप्पा ओअंसी तेयलक्खण जुत्ते मिलक्खुभासाविसारए चित्त चारुभासी भरहे वासंमि णिक्खुडाणं निण्णाण य दुग्गमाण य दुष्पवेसाण य वियाणए अत्थसत्थकुसले रयणं सेणावई सुसे भरणं रण्णा एवं वत्ते समाणे हट्टतुट्ट चित्तमाणं दिए जावं करयलपरिग्गहियं दसणहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु एवं सामी ! तहत्ति आणाए विणणं वयणं पडिसुणेइ, पडिणित्ता मरहस्त रणो अंतियाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेव सए आवासे तेणेव उवागच्छ, उवागच्छिता कोडंबियपुरिसे सहावे, जाव सक्कारेइ- सम्माणे ) इन सब आभरणों को लेकर वह कृतमाल देव उस देव प्रसिद्ध उत्कृष्ट आदि विशेषणो वाली गति से चलता हुआ महाराजा भरत राजा के पास आया इत्यादि सच कवन यहां वे श्रेणिश्रेणिजन हम आठ दिन का महामहोत्सव कर चुके हैं ऐसी खबर पोछे भरत नरेश को देते हैं यस तक का जैसा पहिले किया जा चुका वैसा ही कथन कर लेना चाहिये ॥ १२ ॥ ११, उरसुत्त १२, चलमणि १३, तिलयं १४) पण्डित्ता ताए उक्किट्ठाए जाव सकारेह सम्माणेइ) मे सर्व आभरणाने बधने ने द्रुतमासहे ते देवप्रसिद्ध त्ष्ट हि विशेषવાળી ગતિથી ચાલતા થાલતા તે ભરત રાજા પાંસે આવ્યો. ઇત્યાદિ સકથન અહી· તે શ્રેણિપ્રશ્રેણિ જને-અમે ૮ ઢિંત્રસને મહામહેત્સવ સમ્પન્ન કર્યાં છે . એવી સૂચના ભરતચીને આપે છે. અહી સુધી પહેલાંની જેમજ બધું કથન જાણી લેવુ જોઇએ, ૫૧ાા Page #678 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६६४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सदावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पियाः आभिसेक्क हत्थिरयण पडिकप्पेह हयगयरहपवर जाव चाउरंगिणि सेण्णं सण्णाहेह त्तिकट्ट जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता मज्जणधरं अगुपविसइ अणुपविसित्ता पहाए कयवलिकम्मे कयकोउय मंगलपायच्छित्ते सनद्धबद्धवम्मियकवए उप्पिलिय सरासणपट्टिए पिणद्ध गेविज्ज वद्ध अविद्र विमलवरचिंधपट्टे गहियाउहप्पहरणे अणेगगणनायग दंडनायग जाव सद्धिं संपरिखुडे सकोरंटपल्लदामेण छत्तेण धरिज्जमाणेणं मंगलजयस दकयालोलोए मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाण साला जेणेव ओभिसेक्के हत्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरुढे। तए णं से सुसेणे सेणावई हत्थिखंधवरगए सकोरंट मल्लदामेण छत्तेणं धरिज्जमाणेणं हयगयरहपवरजोहकलियाए चाउरंगिणीए सेणाए सद्धिं संपरिबुडे महया भडचडगरपहगर वंदपरिक्खित्ते महया उक्किट्टि सीहणाय बोलकलकलसदेणं समुदखमयंपिव करेमाणे करेमाणे सबिद्धीए सव्वज्जुईए सव्वबलेणं जाव निग्धोसनाइएणं जेणेव सिंधु महाणई तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता. चम्मरयणं परामुसइ तएणं तं सिविच्छ सरिसरूवं मुत्ततारद्धचंदचित्तं अयलमकंपं अमेज्जकवयं जंतं सलिलासु सागरेसु य उत्तरणं दिव्वं चम्मरयणं सणसत्तरसाइं सब धण्णाई जत्थ रोहंति एगदिवसेण वावियाई वासं णाऊण चक्कवट्टिणा परा मुंढे दिवे चम्मरयणे दुवालस्स जोयणाइं तिरियं पवित्थरइ तत्थ साहियाई तएणं से दिव्वे चक्करयणे सुसेणसेणावइणा परामुढे समाणे खिप्पामेव णावाभूए जाए आविहोत्था तएणं से सुसेणे सेणावइ स खंधावाखलवाहणे णावाभूयं चम्मरयणं दुरुहइ दुरूहित्ता सिंधुं महाणई विमलजलतुंगवी चिं णावामूएणं चम्मरयणेणं सबलवाहणे ससेणे समुत्तिण्णे तओ महाणइ मुत्तरितु सिंधुं अप्पडिहयसासणे अ सेणावइ कहिंचि गामगरणगर पव्व Page #679 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका ४० वक्षस्कारः सू० १३ सुषेणसेनापतेर्विजयवर्णम् याणि खेडकब्बडमडंबाणि पट्टणाणि सिंहलए बब्बरए य सव्वं च अंगलोयं बलायोलोयं च परमरम्म जवणदीवं च पवरमणिरयणग कोसागारसमिद्धं आरबके गेम के य अलसंड विसयवासीय पिक्खुरे कालमुहे जोणएय उत्तरवेयद्ध संसियाओ य मेच्छजाइ बहुप्पगारा दाहिण अवरेण जाव सिंधु सागरंतो ति सव्वपवर कच्छं चओ अवेऊण पडिणिअत्तो बहुसमरमणिज्जे य भूमिभागे तस्स कच्छस्स सुहणिसण्णे ताहे ते जणवयाण णगराण पट्टणा णय जे य ताहिं सामिया पभूया आगरपत्ती य मंडलपतीय पट्टणपती य सव्वे घेत्तूण पाहुडाईआभरणाणि भूसणाणि रयणाणि य वत्थाणि य महरिहा णि अण्णं च जं वरिष्टुं गयारिहं जं च इच्छिअव्वं एअं सेणावइस्स उवणे ति मत्थयकयंजलिपुडा पुणरवि काऊण अंजलिं मत्थयंमि पणयातुन्मे अम्हे ऽत्थ सामियादेवयव सरणा गया भो तुब्भ विसयवासिणोत्ति विजयं जंप माणा सेणावइणा जहारिहं ठविउ पूइअ विसज्जिआणिअत्ता सगाणि णगराणि पट्टणाणि अणुपविट्ठा, ताहे सेणावई सविणओ घेत्तण पाहुडाइं आभरणाणि भूसणाणि रयणाणि य पुणरवि तं सिंधुनामधेज्ज उत्तिण्णे अणहसासणवले, तहेव भरहस्स रण्णो णिवेएइ णिवेइत्ता य अप्पिणिता य पाहुडाई सक्कारिय सम्माणिए सहरिसे विसज्जिए सगं पडमंडव मइगए, ततेणं सुसेणे सेणावई हाए कयवलि कम्मे कयकोउयमंगलपायच्छित्ते जिमिअभुतुत्तगगए समाणे जाव सरसगासीसचंदणुक्खित्तगायसरीरे उप्पिं पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइंगमत्थएहिं वत्तीसइ वद्धेहिं णाडएहिं वरतरुणी संपउत्तेहिं उवणच्चिज्जमाणे २ महया हयणट्रगीअवाइअ तंतीतलतालतुडिअघणमुइंगपडुप्पवाइअरवे णं इट्टे सहफरिसरसरूवगंधे पंचविहे माणुस्सए काम भोगे भुजमाणे विहरइ सू०१३॥ ___छाया-ततः खलु स भरतो राजा कृतमालस्य अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्यां सुषेण सेनापति शब्दयति शब्दयित्वा एवमवादी-गच्छ खलु भो देवानुपिय ! सिध्वा महानद्याः पाश्चात्य निष्कुटं ससिन्धुसागरगिरिमर्यादं समविषमनिष्कुटानि च साधय, ८४ Page #680 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्रे साधयित्वा अग्रयाणि वराणि रत्नानि प्रतीच्छ, अग्रयाणि वराणि रत्नानि प्रतीष्य ममैतामाज्ञप्तिका प्रत्यर्पय, ततः खलु स सेनापतिः बलस्य नेता भरते वर्षे विश्रुतयशाः, महाबलपराक्रमः, महात्मा, ओजस्वी तेजोलक्षणयुक्तः, म्लेच्छभाषाविशारदः, चित्रचारुभाषी, भरते वर्षे निष्कुटानां निम्नानांच दुर्गमानां च दुष्प्रवेशानां च विशायकः, अस्त्रशस्त्रकुशलः अर्थशास्त्र कुशलो वा रत्न सेनापतिः सुषेणं भरतेन राशा एव मुक्तः सन् हृष्टतुष्ट चित्तानन्दितः यावत् करतलपरिगृहीत दशनखं शिरसावत्त मस्तके अंजलि कृत्वा एवं स्वामिन् ! तथेति आशा याः विनयेन वचनं प्रतिश्रृणोति, प्रतिश्रत्य भरतस्य राक्षः अस्तिकात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिक्रम्य यत्रैव स्वस्य आवासः तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति शब्दयित्वा पवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रिय ! आभिषेक्यं हस्तिरत्नं प्रतिकल्पय हयगजरथ प्रवर यावत् चातुरङ्गिणों सेनां सन्नाहय इति कृत्वा यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैवोपागच्छति उपागत्य मज्ज-गृहमनुप्रविशति अनुप्रविश्य स्नगतः कृतबलिकर्मा कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्तः सन्नद्धबद्धवम्मितकवचः, उत्पीडितशरासनपट्टिकः, पिनद्धप्रै वेयबद्धाविद्ध विमलवरचिह्नपट, गृहीतायुधप्रहरणः, अनेक गणनायक दंडनायक यावत्साद्ध संपरिवृतः सकोरण्डमाल्यदाम्ना छत्रेण ध्रियमाणेन मङ्गल जयशब्दकृतालोको मज्जनगृहात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाह्या उपस्थाशाला यत्रैव आभिषेक्यं हस्तिरन्नं तत्रैवो पागच्छति, उपागत्य आभिषेक्यं हस्तिरत्नं दरूढः। ततः स्खल स सुषेणः सेनापतिः हस्तिस्कन्धवरगतः सकोरण्ट माल्यवास्ना छन्त्रण ध्रियमाणेन हयगजरथप्रवरयोधकलितया चातुनङ्गिण्या सेनया सार्द्ध संपरिवृतः महता भट 'चडगपहगर' विस्तारवृन्द परिक्षिप्तःमहतोत्कृष्टसिंहनाद बोलकलकलशब्देन समुद्ररवभूतमिव कर्वन कुर्वन् सर्वद्धिकः सर्वद्यतिकः सर्वबलेन यावत निर्घोषनादेन यत्रैव सिन्ध महानदी तत्रैवोपागच्छति, उपागल्य, चर्मरन्नं परामृशति, ततः खलु तत् श्रीवत्ससहशम् मुक्ततारार्द्ध चन्द्रचित्रम् अचलम् अकम्पम् अभेद्यकवचम् यत् तत् सलिलासु सागरेषु चोत्तरण दिव्यं चर्मरत्नम् शणसप्तदशानि सर्वधान्यानि यत्र रोहन्ने एकदिवसेनोप्तानि, वर्षे राज्ञा चक्रवत्तिना परामृष्टं दिव्यचर्मरत्न द्वादशयोजनानि तिर्यक् प्रविस्तृणाति तत्र साधिकानि, ततः खलु तहिव्यं चर्मरत्नं सुषेण सेनापतिना पराष्टं यत् क्षिप्रमेव नौभूतं जातं चाप्यभवत् । ततः बलु सः सुषेणः सेनापतिः सस्कन्धावारबलवाहनः नौभूतं चर्मरत्नम् आरोहति, आरुह्य सिन्धु महानदी विमलजलतुङ्गवीचिं नौभूतेन चर्मरत्नेन सबलवाहनः स सैन्यः समुत्तीर्णः, ततो महानदी सिन्धुमुत्तीर्य अप्रतिहतशासनश्च सेनापतिः क्वचित् प्रामाकरनगरपर्वतान् खेट कटमडम्बानि पत्तनानि सिंहलकान् बर्बरकाँश्च पर्व च अङ्गलोक बलावलोकं च परमरम्यम्, यवनद्वीपं च प्रथरमणिरत्नकोशागारसमृद्धम्, आरबकान् रोमांच अलसण्ड विषयवासिनश्च पिक्खुरान् कालमुखान् जोनकांश्च उत्तरवैताव्यसंश्रिताश्च म्लेच्छजाती बहुप्रकारा, दक्षिणापरेण यावत् सिन्धुसागरान्त इति, सर्वप्रवरं कच्छं च 'ओअवे उण' साधयित्वा प्रतिनिवृत्तो बहुसमरमणीये च भूमिभागे तस्य कच्छस्य सुखनिषण्णः, तस्मिन् काले ते जनपदानां मगराणां पत्तनानां च ये च स्वामिकाः प्रभूताः आकरपत यश्च मण्डलपतयश्च पत्तनपतयश्च सर्वे गृगत्वा प्राभृतानि आभरणानि भूषणानि रत्नानि च वस्त्राणि च महा_णि अन्यच्च यद्वरिष्ठं राजाहं यच्च एष्टव्यम् एतत् सेनापते Page #681 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० वक्षस्कारः सू० १३ सुषेणसेनापतेवियजवर्णम् ६६७ रुपनर्यान्त, मस्तककृताञ्जलिपुटार, पुनरपि मस्तके अञ्जलिं कृत्वा प्रणताः यूय मस्माकमत्र स्वामिनः देवतामिव शरणागताः स्मो वयं युष्माकं विषयवासिन इति विजयं जल्पन्तः सेनापतिनायथाई स्थापिताः पूजिता विसर्जिताः निवृत्ताःस्वकानि स्वकानि नगराणि पत्तनानि अनुप्रविष्टाः। तस्मिन् काले सेनापतिः सविनयो गृहीत्वा प्राभृतानि आभरणानि भूषणानि रत्नानि च पुनरपि ताँ न्धुिनामधेयामुत्तीणः अक्षतशासनबलः तथैव भरतस्य राज्ञो निवेदयति निवेदयित्वा च प्राभूतानि अर्पयित्वा च (स्थितः) सत्कारितः सम्मानितः सहर्षः बिसृष्टः स्वकं पटमण्डपमधिगतः । ततः खलु सुषेणः सेनापतिः स्नातः कृतबलिकर्मा कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्तः जिमितभुक्त्युत्तरागतः सन् यावत् सरसगोशीर्षचन्दनोक्षित गात्रशरीरः उपरि प्रासादवरगतः स्फुटद्भिः मृदङ्गमस्तकैः द्वात्रिंशद्बद्धैर्नाटकैः वरतरूणी सम्प्रयुक्तैः उपनृत्यमानः २, उपगीयमानः २, उपलभ्य (लाल्य) मानः २, महताऽहतनाटय गीतवादित तन्त्री तल ताल त्रुटित घनमृदङ्गपटुप्रवादितरण इष्टान् शब्दस्पर्श रसरूपगन्धान पञ्चविधान मानुष्यकान् कामभोगान् भुजानो विहरति ॥सू० १३॥ टीका-'तए णं से' इत्यादि । 'तए णं से भरहे राया कयमालस्स अट्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए सुसेणं सेणावई सद्दावेइ' ततः खलु स भरतो राजा चक्रवर्ती कृतमालस्य विजयोपलक्षिकायाम् अष्टाहिकायां महामहिमाया निवृत्तायां समासायां सत्याम् सुषेणं सुषेणनामकं सेनापति शब्दयति अह्वयति 'सदावित्ता' शब्दयित्वा आहूय एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् ‘गच्छाहिणं भो देवाणुप्पिया। सिंधए महाणईए पच्चथिमिल्लं णिक्खुड ससिंधु सागरगिरिमेरागं समविसमणिक्खुडाणियो अवेहि' गच्छ खलु भो देवानुप्रिय ! सेनापते सुषेण ! सिन्ध्वा महानद्याः पाश्चात्यं 'तएण से भरहे राया कयमालस्स अट्ठाहियाए'-इत्यादि सूत्र-१३. टीकार्थ-जब श्रेणि प्रश्रेणिजनों ने कृतमाल देव को साधने के निमित्तकिये गये भरत राजा को उनके द्वारा आदिष्ट आठ दिन तक के महामहोत्सव हो जाने की खबर दे दी तब भरत-राजा ने (ससेणं सेणावई सद्दावेइ) सुषेण नाम के सेनापति को बुलाया (सहावित्ता एवं वयासी) और बलाकरके उससे ऐसा कहा-(गच्छाहिणं भो देवाणुप्पिय ! सिंधूए महाणईए पच्चस्थिमिल्लं णिक्खुड ससि-न्धुं सागरगिरिमैरागं समविसमणिक्खुडाणि अ ओअवेहि) हे देवानु प्रिय । तुम 'तपण से भरहे राया कयमालस्स अट्ठाहियाए' इत्यादि-सूत्र-॥१२॥ ટીકા-કતમાલદેવને સાધ્યા પછી ભારત મહારાજાએ શ્રેણી પ્રશ્રેણી જનેને આઠ દિવસનો મહામહેન્ન આયોજિત કરવાની આજ્ઞા આપી. ભરત મહારાજાની આજ્ઞા મુજબ મહામહોત્સવ सन २४ भवानी ने भग२ माथी त्यारे १२० २१ (सुसेण सेणाव सहावेइ) सस नाम सेनातिन बोलाव्य. (सहावित्ता एवं वयासी) मन मोवी ने आ अमान . (गच्छाहिण भो देवाणुपिया ! सिधूप महाणइए पच्चस्थिमिल्लं णिकरपुर ससिन्धु सागरगिरिमेरागं समविसमणिक्खुडाणि भ ओअवेहि) पानुप्रिय! तम Page #682 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६६८ बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पश्चिमदिग्वर्त्तिनं निष्कुटं कोणस्थित भरत क्षेत्रखण्ड रूपम्, इदं चक्रुर्विभाजकै विर्भक्तमित्याह'ससिंधु सागरगिरिमेरागं' इति ससिन्धुसागरगिरिमर्यादम् तत्र पूर्वस्यां दक्षिणस्यां च सिन्धुर्नदी पश्चिमायां सागरः - पश्चिमसमुद्रः उत्तरस्यां गिरिर्वैतादयः एतैः कृता मर्यादा विभागरूपा तया सहितम् यत् तत्तथा एभिः कृतविभागमित्यर्थः ' समविसमणिक्खुडाणि य' समविषमनिष्कुटानि च समानि च समभूमिभागवर्त्तोनि विषमाणि च - दुर्गभूमिभागवर्त्तीनि च यानि निष्कुटानि अवान्तरक्षेत्रखण्डरूपाणि तानि तथा 'ओअवेहि' साधय तत्र विजयं कुरु अस्मद् आज्ञां प्रवर्तय 'ओअवेत्ता' साधयित्वा 'अग्गाई' वराई' रयणाई पडिच्छादि' अाणि कानि वराणि प्रधानानि रत्नानि स्वस्वजातौ उत्कृष्टवस्तूनि प्रतीच्छ गृहाप 'पडिच्छित्ता' प्रतीष्य गृहीत्वा 'ममेय माणत्तियं पच्चप्पिणाहि' मम एतामाज्ञप्तिकां प्रत्यय ततो भरतेन आज्ञापिते सति सुषेणो सेनापतिः यादृशो गुणी यथा च कृतवान् तथाsss - 'तर णं से सेणावई बलस्स णेया भरहे वासंमि विस्सुयज से महाबलपरकमे महप्पा ओसी अलक्खणजुत्ते मिलक्खुभासाविसारए चित्तचारुभासी' ततः खलु स सुषेणः सेनापतिः बलस्य हस्त्यादिस्कन्धरूपस्य नेता स्वामी स्वातन्त्र्येण प्रवर्तकः भरते सिन्धु महानदी के पश्चिमदिग्वर्ती भरतक्षेत्र खण्डरूप निष्कुट प्रदेश को जो कि पूर्व में और दक्षिण दिशा में सिन्धु महानदी के द्वारा, पश्चिम दिशा में पश्चिम समुद्र के द्वारा और उत्तर दिशा में वैतानामक गिरि के द्वारा विभक्त हुआ है तथा वहां के सम विषमरूप - अवान्तर क्षेत्रों को हमारे अधीन करो. अर्थात् वहां जाकर तुम हमारी व्याज्ञा के वशवर्ती उन्हें बनाओ (ओमवेत्ता - अग्माई वराई रयणाई पडिच्छाहि) हमारी आज्ञा के वशवर्ती उन्हें बनाकर वहां से तुम श्रेष्ठ नवीन रत्नों को-अपनी२ जाति में उत्कृष्ट वस्तुओं को ग्रहण करो (पडिच्छित्ता ममेयमाणित्तियं पच्चष्पिणाहि ) ग्रहण करके फिर हमें हमारी इस आज्ञा की पूर्ति हो जाने की खबर दो (तते णं से सेणाबाई बलस्स आ भर हे वासंमि विस्सुअजसे महाबलपरक्कमे महप्पा ओअसी तेय लक्खण जुत्ते मिलक्खु भासा विसारए चित्तचारुभासी) उस प्रकार से भरत के द्वारा आज्ञप्त हुआ वह सैन्य का नेता સિન્ધુ મહાનદીના પશ્ચિમ દિગ્વતી ભરતક્ષેત્ર ખ’ડરૂપ નિષ્કુટ પ્રદેશને કે જે પૂર્વમાં અને દક્ષિણમાં સિન્ધુ મહાનદી વડે પશ્ચિમ દિશામાં પશ્ચિમ સમુદ્ર વડે અને ઉત્તર દિશામાં વૈતાઢ્ય નામક ગિરિ વડે વિભક્ત છે, તેમજ ત્યાંના બીજા સમ-વિષમ રૂપ અવાન્તર ક્ષેત્રાને અમારે અધિન કરો. અર્થાત્ ત્યાં જઈને તમે અમારી આજ્ઞાવતી તેમને મના (ओअवेत्ता अग्गाईं वराई रयणाई पडिच्छाहि) भारी खाज्ञा वशवर्ती अनावीने त्यांथी तभे नवीन रत्नाने हरैः प्राश्नी उत्कृष्टतम वस्तुमने श्रषु । (पडिच्छित्ता ममेश्रमाणत्तियं पच्चप्पिणाहि श्ररीने पछी आज्ञा पूरी थवानी अमने सूचना आये।. (त पणं सेणापई बलस्स आ भरहे वासंमि विस्सुअजसे महाबलपक्कमे महप्पा ओअसी तेयलक्खणजुत्ते मिलक्खुभासाविसारपचितचारुभासी) मा प्रमाणे भरत द्वारा आज्ञप्त थयेसो ते सेनापति सुषेषु है જેને યશ ભરતક્ષેત્રમાં પ્રખ્યાત છે એના જેના પ્રતાપથી ભરતની સેના પ્રાક્રમશાલી માન Page #683 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ० वक्षस्कारः सू० १३ सुषेण सेनापतेविजयवर्गनम् वर्षे विश्रतयशा:-विख्यातकीर्तिः, महाबलपराक्रमः-महतः बलस्य सैन्यस्य भरतचक्रवर्तिसम्बन्धिनः, पराक्रमो यस्मात् स तथा, एतेन 'मोअंसी' इति पदेन पौनरुक्त्यम् 'महप्पा' महात्मा उदात्तस्वभावः विपुलाशयवान् 'ओअंसी' ओजस्वी आत्मना वीर्याधिकः प्रकर्षात्मशक्तिवान् 'तेअलक्खणजुत्ते' तेजो लक्षणयुक्तः तेजसा शरीरेण लक्षणैश्च सत्त्वादिभिः सम्पन्नः प्रशस्तगुणयुक्तः 'मिलक्खुभासाविसारए' म्लेच्छभाषाविशारदः म्लेच्छभाषासु-पारसी आरबी प्रमुखासु विशारदः पण्डितः अतएव 'चित्त चारुभासी' चित्रचारुभाषी चित्रं विविधं चारु गुणोपेतं भाषते इत्येवं शीलः आग्राम्यापि गुणोपेतभाषणशील: पुनश्च ‘भरहे वासंमि निक्खुडणं निण्णाण य दुग्गमाण य दुप्पवेसाण य विआणए अत्थसत्थकुसले रयणं सेणावई सुसेणे भरहेणं रण्णा एवं वुत्ते समाणे हट्ट तुट्ट चित्तमाण दिए जाव करयलपरिग्गहियं दसणह सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कटु एवं सामी ! तहत्ति आणाए विणएणं वयणं पडिसुणेइ' भरतेवर्षे भरतक्षेत्रे निष्कुटानाम् अवान्तरक्षेत्रखण्डरूपाणाम् , निम्नानां च गम्भीरस्थानाम् दुर्गमानां च दुःखेन गन्तुं शक्यानाम् , दुष्प्रवेशानां च दुःखेन प्रवेष्टुं शक्यानां भूभागानां विज्ञायकः तद्बासीव प्रचार चतुरः, अस्त्रशस्त्र कुशलः तत्र अस्त्रं बाणादिकः शस्त्रं खड्गादिकं तत्र कुशल प्रसिद्धः सुषेण सेनापति कि जिस का भरत क्षेत्र में यश प्रख्यात है जिससे भरत की सेना पराक्रम शाली मानी जाती है जो स्वयं-तेजस्वी है जिस का स्वभाव उदात्त है-विपुल आशय-वाला है शरीर संबंधी तेज से, एवं सत्त्वादि लक्षणों से जो संपन्न है म्लेच्छमायामों का-पारसी आरबी, आदि भाषामों का जो बिशिष्ट ज्ञाता है और इसी से जो विविध प्रकार की भाषाओं को सुन्दर ढंग से बोलता है (भरहे वासंमि णिक्खुडाणं निण्णाय दुग्गमाणय दुप्पवेसाणय विआणए अत्थसत्थकुसले स्यण सेणावई सुसेणे-भरहेणं रण्णा एवं वुत्ते समाणे हट्ट तुट्ट चित्तमाणदिए जाव करयलपरिग्गहियं दसणहं सिरसावत्त मत्थए अजलिं कटु एवं सामी ! तहत्ति आणाए विणएणं वयणं पडिसुणेइ) जो भरत क्षेत्र में भवान्तर क्षेत्र खण्ड रूप निष्कुटों जिस में हरेक कोइ प्रवेश नहीं कर सके गंभीर-स्थानों का दुर्गम स्थानों का एवं जिनमें प्रवेश बड़ी कठिनाइ से किया जा सके ऐसे स्थानो का विज्ञायक है विशेष रूप से जानने वाला है अस्त्र शस्त्र संचालन में बाणादिरूप अस्त्र एवं વામાં આવે છે. જે સ્વયં તેજસ્વી છે, જેને ભાવ ઉદાત્ત છે. વિપુલ આશય વાળે છે. શરીર સંબંધી તેજથી તેમજ સત્યાદિ લક્ષણેથી જે સંપન્ન છે. મ્લેચ્છ ભાષાઓ ફાસી, અરબી વગેરે ભાષાઓને જે વિશિષ્ટ જ્ઞાતા છે. એથી જ જે વિવિધ પ્રકારની ભાષાઓને सु४२ थी मालीश छे. (भरहे वासंमि णिक्खुडाण निष्णाय दुग्गमाण य दुप्पवेसाणयविआणए अत्थसत्थ कुले रयण सेणावइ सुसेणे भरहेण रण्णा एवंवुत्ते समाणे हट्ट-तुट्ट चित्तमाणदिए जाव करयलपरिग्गहियं दसणहं सिरसावत्तं मत्थर अंजलि कटु एवं सामी तहत्ति आणाप विणएणं वयण पडिसुणेइ) ले सरत क्षेत्रमा अपान्तर क्षेत्र न ३५ लिटारमा દરેક કેઇ પ્રવેશી શકે નહિ, એવાં ગંભીર સ્થાને, દુગમ સ્થાને કે જેમાં પ્રવેશ કરવું અતીવ દુષ્કર કાય છે. તેવા સ્થાને વિજ્ઞાપક છે. વિશેષ રૂપથી જાણકાર છે. અસ્ત્ર શસ્ત્ર સંચાલનમાં બાણદિ Page #684 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अर्थशस्त्रकुशलो वा अर्थशास्त्र नीतिशास्त्रादि तत्र कुशलः निपुणः रत्नं रस्नस्वरूपः सेनापतिः-सर्व सेनाप्रधानः सुषेणः-तन्नामको भरतेन राज्ञा चक्रवर्तिना एवमुक्तः सन् हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः यावत् पदात् नन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमनस्यितः, करतलपरिगृहीत दशनखं शिरसावत्त मस्तके अञ्जलिं कृत्वा तत्र करतलाभ्यां परिगृहीतो यस्तं तथा दशरद्वयसम्बन्धिनो नखाः समुदिताः तत्र स तथा तं मस्तके अजलिं कृत्वा एवम् उक्तवान् एत्रं स्वामिन् ! यथा श्रीमान् आदिशति तथेति तथास्तु इति कृत्वा आज्ञायाः स्वामिशासनस्य विनयेन विनयपूर्वकं वचनं प्रतिशणोति स्वीकरोति 'पडिसुणित्ता' प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य 'भरहस्स रणो अंतियाओ पडिणिक्खमइ' भरतस्य राज्ञः अन्तिकात् समीपात् प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति पडिणिक्खमित्ता) प्रतिनिष्क्रम्य 'जेणेव सए आवासे तेणेव उवागच्छति' यत्रैव स्वस्य आवासः निवासस्थानं तत्रैव उपागच्छति आगच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य स सुषेणः-'कोडुंबियपुरिसे सदावेई' कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति आह्वयति 'सदावित्ता' शब्दयित्वा आहूय एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् खनादिरूप शस्त्र के द्वारा प्रहार करने में-कुशल है अथवा अर्थ शास्त्र में निपुण है इसी-कारण उसे सेनापतिरत्न कहा गया है ऐसे उस सेनापतिरत्न सुषेण से भरतचक्री ने जब पूर्वोक्त रूप से कहा तो वह अपने स्वामी की बात को सुनकर बहुत ही अधिक हर्षित एवं संतुष्ट चित्त हुआ "यहां प्रयुक्त हुए-यावत्पद से " नन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमनस्थितः॥ इन पदों का ग्रहण हुआ है उसने दोनों हाथों को दशों नख जिसमें मिलजाबें एसे अंजुलि के रूप में करके-और उसे मस्तक पर से घुमा करके उस प्रकार से कहा हे स्वामिन् ! आपकी आज्ञा हमें प्रमाण है इस प्रकार कहकर उसने स्वामी के आज्ञा के वचनों को विनय के-साथ स्वीकार कर लिया (पडिसु णित्ता भरहस्स रण्गो अतिया ओ पडिणिक वमइ) स्वीकार करके फिर वह भरत राजा के पास से चला आया-(पडिणिक्खमित्ता जेणेव सए आवासे तेणेव उवागच्छइ) वहां से आकर वह जहां अपना घर था वहां आया-(उवागच्छित्ता कोडुबियपुरिसे सद्दावेइ) वहां आकर के उस सुषेण ने अपने को कौटुंबिक पुरुषों को बुलाया (सद्दावित्ता एवं वयासी) बुला कर फिर उनसे उसने રૂપ શાસ્ત્ર તેમજખડગ દિ રૂપ શસ્ત્ર વડેપ્રહાર કરવામાં જે કુશળ છે અથવા અર્થશાસ્ત્રમાં નિપુણ છે. એથી જ તેને સેનાપતિ રત્ન કહેવામાં આવેલ છે. એવા તે સેનાપતિ રતન સુષેણને તે ભરતચકીએ જ્યારે પૂર્વોક્ત રૂપમાં કહ્યું ત્યારે તે પોતાના સ્વામીની વાતને સાંભળીને ખૂબજ હર્ષિત તેમજ सतट (यत्त थय। महा प्रयुत च्ययावतपथा (नन्दितः प्रीतिमनाः परम सौमनस्यितः) એ પદેનું ગ્રહણ થયું છે. તે સેનાપતિએ બને હાથના દશ નખે જેમાં સંયુક્ત થઈ જાય તેમ અંજલિના રૂપમાં બનાવીને અને તેને મસ્તકે ફેરવીને આ પ્રમાણે કહ્યું – સ્વામીન : આપશ્રીની આજ્ઞા મારા માટે પ્રમાણું રૂપ છે આમ કહીને તેણે સ્વામીની આજ્ઞાના વચને सविनय Nalथा (पडिसुणित्ता भरहस्स रण्णो अंतियाओ पडिणिक्खमइ) स्वी४१२ ४शन पछी त मरत २001 पासेथी । २हो, (पडिणिक्खमित्ता जेणेव सए आवासे तेणेव उवागच्छइ) त्यांचा मावीन तयi तानु घ२ तुं त्यो माया. (उवागच्छित्ता कोडंबिय Page #685 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० १३ सुषेणसेनापतेर्विजयवर्णनम् ६७१ 'farerna भो देवाणुपिया ! आभिसेक्क हत्थिरयणं पडिकप्पेह' क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! आभिषेक्यम् अभिषेकयोग्यं हस्तिरत्नं प्रधानहस्तिनं प्रतिकल्पयत सज्जीकुरुत ' हयगय रहपवर जाव चउरंगिणिं सेण्णं सण्णा हेह' हयगजरथप्रवर यावत् पदात् योधकलितां चातुरङ्गिणीं सेनां सन्नाहयत सन्नद्धां कुरुत 'तिकट्टु' इतिकृत्वा 'जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छद्द' यत्रैव मज्जनगृहं स्नानगृहं तत्रैव उपागच्छति 'वागच्छित्ता' उपागत्य 'मज्जणघरं अणुपविस' मज्जनगृहम् अनुप्रविशति 'अणुपविसित्ता' अनुप्रविश्य 'हाए' स्नातः 'areलिकम्मे' कृतबलिकर्मा - कृतं बलिकर्म येन स तथा वायसादिभ्यो दत्तान्नभागः 'कयकोउयमंगलपायच्छत्ते' कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्तः कृतं कौतुकेन कुतूहलेन मङ्गलं पापशान्त्यर्थे प्रायश्चित्तं च येन स तथा 'सन्नद्धं शरीरारोपणात् बद्धं कसाबन्धनतः व लोह कत्तादिरूपं सञ्जातमस्येति वर्मितम् एतादृशं कवचं तनुत्राणं यस्य स तथा, पुनश्च कीदृशः सुषेण: 'उप्पी लिय सरासणपट्टिए' उत्पीडितशरासन पट्टिक: उत्पीडिता - गाढं गुणारोपणाद् ऐसा कहा - (खिप्पामेव-भो देवाणुप्पिया ! आभिसेक्कं हत्थिरयणं पडिक पेह) हे देवानुप्रियो ! तुम लोग बहुत ही शीघ्र अभिषेक योग्य प्रधान हस्ती को लज्जित करो ( हयगयरहपवर जाव चरंगिण सेण्णं ण्णा हेह) तथा हय, गज रथ, प्रवर, पदाति जनों से युक्त चतुरंगिणी सेना को सज्जित करो (इति कट्टु जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ ऐसा आदेश अपने कौटुम्बिक पुरुषों को देकर वह जहां पर स्नान गृह था वहां पर आगया (अणुपविसित्ता हाए कयबलिकम्मे ) वहां पर आकर के उसने स्नान किया और वलिकर्म किया काक आदिकों के लिये अन्न का वितरण किया ( कयकोउय मंगलपायच्छित्ते) कौतूहल से मंगल और दुस्वप्न शान्त्यर्थ प्रायश्चित किया ( सन्नद्रवद्ध वम्मिय कवए) शरीर पर आरोपण कर के वर्मितलोह के मोटे २ तारों से निर्मित हुए कवच को कसा बन्धन से बांधा - खूव - जकड़ कर शरीर पर बन्धन से बद्ध कर पहिरा (उप्पोलिय सरा सणपट्टिए) धनुष पर बहुत ही मजबूती के साथ प्रत्यञ्चा का आरोपण पुरिसे सहावेइ) त्यां यवाने ते सुषेषु पोताना होटुभिः पुरुषाने मोलाच्या ( सदावित्ता एवं वयासी) मोसावीनेपछी ते सुषेषु तेभने या प्रमाणे उधु - खिप्पामेव भो देवाणुपिया ! अभिसेक हत्थरयणं पडिकप्पेह ) हे देवानु प्रिये ! तभे बोझे मेहम शीघ्र अभिषे योग्य प्रधान हस्तिने सुषनित छिरे । ( हयगय रहपवर जाव चउरंगिणिं सेण्णं साहेद ) तेय, ४, २२, प्रवर पहाति बनोथी युक्त सेवा यतुरंगीली सेना ४। (इतिकटु जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ) पोताना मैटुमि पुरुषोंने थे। आदेश आयीने ते ल्यां स्नान गृह हेतु त्यां भावी गये। (अणुपविसित्ता पहाए कयर्बालकम्मे) ત્યાં આવીને તેણે સ્નાન કર્યું" અને મલિક ક" કાક વગેરે માટે અન્નનુ વિતરણ કર્યુ ( कयक जयमंगलपायच्छत्ते ) तूइसी मंगल भने दुस्वप्न शान्त्यर्थ प्रायश्चित यु ( सन्नद्धवद्ध वम्मिय कवए) शरीर पर आरोप अरीने पति बोना भोटा मोटा તારેથી નિમિત વચને ક અન્યનથી આદ્ધ કર્યુ એટલે કે એકદમ મજબૂતીથી उवयने मध्यु ( उद्यीलिय सरालपट्टिए ) धनुष्य उपर यूजर मन्यूतीथी प्रत्ययानु R. Page #686 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६७२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे दृढीकृता शरासनपट्टिका धनुर्दण्डो येन स तथा 'पिणद्धगेविज्जबद्ध आविद्ध विमलवरचिंधपट्टे' पिनद्धग्रैवेयबद्धाविद्धविमलवरचिह्नपट्टः, पिनद्धं ग्रैवेयं-ग्रीवात्राणकं ग्रीवाभरणं वा येन स तथा वद्धो-ग्रन्थिदानेन आविद्धः परिहितो मस्तकावेष्टनेन विमलवरचितपट्टो वीरातिवीरता सूचकवस्त्रविशेषो येन स तथा, पिनद्धग्रैवेयश्चासौ बद्धाविद्धविमलवरचिन्हपदृश्चेति स तथा 'गहियाउहप्पहरणे' गृहीतायुधप्रहरणः गृहीतानि आयुधानि प्रहरणानि च शास्त्रास्त्राणि येन स तथा, आयुधप्रहरणयोस्तु क्षेप्याक्षेप्यकृतो विशेषो बोध्यः, तत्र क्षेप्यानि बाणादीनि आक्षेप्यानि खगादीनि, अथवा गृहीतानि आयुधानि प्रहरणाय येन स तथेति । 'अणेगगणनायक दंडनायक जाव सद्धिं परिवुडे' अनेक गणनायकदण्डनायक यावत् संपरिवृतः तत्र अनेके-बहवः गणनायकाः मल्लादि गणमुख्याः , दण्डनायकाः तन्त्रपाला, यावत् पदात् ईश्वरतलवरमाडम्बिककौटुम्बिकमन्त्रिमहामन्त्रि गणकदौवारिकाऽमात्यचेटपीठमईनगरनिगमश्रेष्ठिसेनापतिसार्थवाहसन्धिपालाः ग्राह्याः तैः साद्धं संपरिवृतः-युक्तः पुनः कीदृशः मुषेणः 'सकोरंटमल्लदामेणं छत्तेणं धरिज्जमाणेणं' सकोरण्टमाल्यदाम्ना छत्रेण ध्रियकिया (पिणद्धगेविज्जवद्ध आविद्ध विमलवरचिंधपट्टे) गले में हार पहिरा तथा-मस्तक पर अच्छी तरह से गांठ से बांधकर विमल वर चिन्ह पट्ट-वीरातिवीरता का सूचक-वस्त्र विशेषबांधा (गहियाउहप्पहरणे) हाथ में आयुध और प्रहरण लिए-आयुध और प्रहरण में क्षेप्या क्षेप्यकृत विशेषता है और कोइ विशेषता नहीं है । बाणादिक क्षेप्य और खड्ग आदि आक्षेप्य हैं । अथवा प्रहरण के लिये-शत्रुओं पर प्रहार-करने के लिये जिसने आयुधको लिये है ऐसा भी अर्थ 'गृहीतायुधप्रहरण' इस पद का हो सकता है "अणेग गणणायक दंडनायग जाव सद्धिं संपरिवुडे, इस समय यह अनेक गणनायकों से-मल्लादिगण मुख्यजनों से अनेक दंडनायको से अनेक तन्त्रपालों से, यावत्पदगृहीत अनेक इश्वरों से अनेक तलवरों से अनेक मोडम्बिकों से अनेक कौटुम्बिकों से, अनेक मंत्रियों से अनेक महामंत्रियों से अनेक गण को से अनेक दौवारि को से अनेक अमात्यों से अनेक चेटों से अनेक पीठमर्द को से अनेक नगर निगम के श्रेष्ठियों से आरोप यु (पिणद्धगेविजवद्ध आविद्ध विमलवरचिंध पट्टे) गजामा हार ધારણ કર્યો મસ્તક ઉપર સારી રીતે ગાંઠ બાધીને વિમલવર ચિન્હ પટ્ટ – વીરાતિવીરતા सूय यस विशेष माश्यु (गहियाउहप्पहरणे) साथमा आयुध भने प्रहर। सीधा યુધ અને પ્રરણમાં ક્ષેધ્યાક્ષેપકૃત વિશેષતાજ છે, બીજી કોઈ વિશેષતા નથી, બાણ વગેરે શ્રેષ્ઠ અને ખડગ વગેરે આક્ષે છે. અથવા – પ્રહરણ માટે – શત્રુઓ ઉપર પ્રહાર ४२वा माटो आयुधो धारण अर्या छे. सेवा ५५ अथ' (गृहीतायुधप्रहरणः) मा पहना था छ. (अणेग गण णायक दंड नायग जाव सद्धिं संपरिखुडे) समय से मने गए નાયકાથી–મલાદિગણુ મુખ્ય જનથી, અનેક દંડ નાયકથી, અનેક ત–પાલેથી, યાવત પદ ગૃહીત અનેક ઈશ્વરથી, અનેક તલવથી, અનેક માડંબિકોથી, અનેક કૌટુંબિકથી. અનેક મંત્રી માથી અનેક મહામંત્રિઓથી, અનેક ગણકેથી, દૌવારિકેથી, અનેક અમાત્યાથી, અનેક ચેટથી, અનેક પીઠમકેથી, અનેક નગર નિગમના શ્રેષ્ઠિઓથી, અનેક સેનાપતિ Page #687 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका त. वक्षस्कारः सू० १३ सुषेण नापतेविजयवर्णनम् ___ ६७३ माणेन तत्र सकोरण्टानि कोरण्टनामककुसुमस्तवकयुक्तानि कुखुमपुष्पाणि हि पीतव र्णानि मालान्ते शोभार्थ दीयन्ते मालायै हितानि माल्यानि-पुष्पाणि तेषां दामानि माला: यत्र तत् तथा एवंविधेन छत्रेण आतपनिवारकेण ध्रियमाणेन शिरसि (विराजमान:) 'मंगलजयसद्दकयालोए' मङ्गलजयशब्दकृतालोकः, मङ्गलभूतः जयशब्दः कृत आलोके दर्शने सति यस्य स तथा एवंभूतः सुषणः 'मजणघरालो पडिणिक्खमइ' मज्जनगृहात् प्रतिनिष्क्रामति निःसरति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निसृत्य 'जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव आभिसेक्के हत्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला सभाशाला यत्रैव आभिषेक्यम् अभिषेकयोग्यं हत्थिरयणं 'तेणेव उवागच्छइ' तत्रैवोपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य आभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरूढे' आभिषेक्यं हस्तिरत्नं दुरुढम् आरूढः 'तए णं से सुसेणे सेणावई हत्थिखंधवरगए' ततः खलु स सुषेण:-सुषेणनामक सेनापतिः हस्तिस्कन्धवरगतः प्राप्तः 'सकोरंटमल्लद मेणं छत्तणं धरिज्जमाणेणं' सकोरण्टमाल्यदाम्ना छत्रेण ध्रियमाणेन सह 'विराजमानः' पुनः कीदृशः 'हयगयरहपवर जोह कलियाए चाउरंगिणीए सेणाए सद्धिं संपरिबुडे' हयगजरथप्रवरयोधकलितया अश्वहस्तिअनेक सेनापतियों से अनेक सार्थवाहों से और अनेक सन्धिपालों से युक्त हो गया था (सकोरंट मल्लदामेण छत्तणं धरिग्जमाणेणं) कोरंट पुष्पों के माला से युक्त ऊपर ताने गये छत्ते से यह सुशोभित हो रहा थो (मंगल जयसद्दकयालोए) इसके दिखते ही लोग मंगलकारी जय २ शब्द का उच्चारण करने लग जाते ऐसा यह सुषेण सेनापति रत्न (मज्जणघराओ पडिणिक्वमह) स्नानगृहसे बाहर निकला (पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठोणसाला जेणेव आभिसेक्के हस्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ) बाहर निकल कर यह उपस्थानशाला में आया वहां आकर फिर यह जहां आभिषेक्य हस्तिरत्न था वहां पर गया (उवागच्छित्ता आभिसेक्कं हत्थिरयण दलढे) वहां जाकर यह आभिषेक्य हस्तिरत्न के ऊपर सवार हो गया-(तएणं से सुसेणे सेणावई हत्थिखंधवरगए सकोरंटमल्लदामेणं छत्तेण धरिज्जमाणेण हयगयरह पवर जोहकलियाए चाउरंगिणीए सेणाए सद्धिं संपरिबुडे) इस के अनन्तर वह सुषेण सेनापति हाथी के स्कन्ध पर अच्छी तरह साथी, अन सापालथी भने भने सघिपामाथी युद्धत य गयो सता. (सकोरंट मल्लदामेणं छत्तेण धरिज्जमाणेण) २२ पु०पनी भाणाथी युरत 6५२ तामां मावत सशतिथ होत. (मंगल जयसहकयालोए) मन नतional Heशय-य शहरयार १२वा वागता मेवा सुन सेनापतिल (मज्जणघराओ पडिणि खमइ) स्नान माथी महा२ नीयो. (पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव अभिसेक्के हस्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ) पा२ नीजाने से स्थानशाणामा भाव्या. भावान पछी से स्यां मानिध्य स्तिन हेतु त्या माव्यो. (उवागच्छित्ता आभिसेक्कं हत्थिरयण दुरूढे) त्यांगन से सानिध्य स्तिरत्न 6५२ सवार २४ गयो. (त पण से सुसेणे सेणावई हत्थिखंधवरगए सकोरंटमल्लदामेणं छत्तेणं धरिज्जमाणेण हयगयरहपवरजोहकलियाए चाउरगिणीप सेणाए सद्धि संपरिडे) सेना पछी त सुषेय Page #688 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६७४ जम्बूद्रोपप्रज्ञप्तिसूत्रे रथश्रेष्ठयोधयुक्तया चतुरङ्गिण्या सेनया साई अश्व स्तरथपदाति सेन या सह संपारवृतः युक्तः 'महया भडचडगरपहगरवंदपरिक्खित्ते' महता भटविस्तारवृन्द परिक्षिप्तः तत्र महता विपुलेन, भटा:-योद्वारस्तेषां 'चडगर पहगरत्ति' विस्तार वृन्दम् तेन परिक्षिप्तः तेन युक्तः 'महया उक्किद्विसीहणाय बोलकलालसदेणं समुहरवभूयं पिर करेमाणे करमाणे सबिडीए सबज्जूईए सन्धबलेणं जाव निग्घोसनाइएणं जेणे सिंधु महाणई तेणेव उवागच्छइ' उवागच्छित्ता चम्परयणं परामुमई' महता उत्कृष्टः सिंहनाद बोल कलकलशब्देन समुद्ररवभूतमिव कुर्वन् २ सर्वद्धा सर्वद्युत्या, सर्वबले न यावत् निर्धापनादेन सह यत्रैव सिन्धुर्महानदी तत्रैवोपागच्छति उपागत्य, तत्र महतामहता रवेण उत्कृष्टिः-आनन्दध्वनिः, सिंहनादः प्रसिद्धः, बोलो वर्णरहितो ध्वनिः कलालश्च तदितरो ध्वनिः, तल्ल. क्षणो यः शब्दः रवः तेन समुद्ररवभूतमिव प्राप्तमिव दिगमण्डलं कुर्वन् कुर्वन् सर्वर्या सर्वधुत्या, सर्वबलेन, तत्र-सर्वद्धा सर्वया समस्तया दया आभरणादि रूपया लक्ष्म्या : युक्तः तथा सर्वधुत्या सर्वकान्त्या सर्वेबलेन सर्वसैन्येन एवं यावत् निर्घोषनादेन वाधविशेषशब्देन सह वर्तमानः स सुषेण ः यत्रैव सिन्धुर्महानदी तत्रैवोपागच्छति 'उवागच्छित्ता' से वैठा हुमा कोरंट पुष्पों की माला से विराजित ध्रियमाण छत्र से सुशोभित हुमा तथा हय गज रथ एवं प्रवर योधाओं से सहित चतुरंगिणी सेना से घिरा हुआ ( महया भडचढगरपहगरवंदपरिक्खित्ते ) विपुल योद्धाओं के विस्तृत वृन्द से युक हुमा नहां पर सिन्धु नदी थो वहां पर आया-इस प्रकार से यहा संबंध लगा लेना चाहिये साथ में चलने वाली चतरंगिणी सेना की (सक्किट्रिसीहणाय बोल-कलकलसदेणं समुद्दरवमयंपिव करेमाणे २ सन्धिद्धोए सव्वज्जुईए सव्वबलेणं नाव पिग्घोसनाइएणं जेणेव सिन्धू महाणई-तेणेव उवागच्छद) उत्कृष्ट आनन्द ध्वनि से सिंहनाद से अव्यक्त-ध्वनि से एवं कल कल शब्द से समुद्र ही मानों गर्न रहा है इस प्रकार से यह दिग् मण्डल को क्षुभित करता जा रहा था इस तरह अपनी पूर्ण विभति से एवं सर्व द्युति से तथा मर्व बल से यावत् बाघ विशेष के शब्दों से युक्त हुआ यह सुषेण सेनापति रत्न जहां पर सिन्धु नदो थी वहां पर आ पहुंचा (उवागपिछत्ता चम्मरयणं परा સેનાપતિ હાથીના સ્કધ ઉપ૨ સારી રીતે બેઠેલે કરંટ પુષ્પની માળાથી વિરાજિત. પ્રિય. માણુ છત્રથી સુશોભિત થયેલે તેમજ-ય, ગજ, રથ, તેમજ પ્રવર યોદ્ધાઓથી યુક્ત તથા यती सेनाथी परिवृत्त येal. (महयाभडबडगरपहगर वंदपरिक्तित्ते) विपुल योदीએના વિસ્તૃતવૃદથી યુક્ત થયેલે, જ્યાં સિધુ નદી હતી, ત્યાં આવ્યો. આ પ્રમાણે અહીં समय me a ४ साथ यातनारी यतुर (गी सेनानी (उक्किट्ठसीहणाय बोलकलकलमदेणं समुहरवभूय पिव करेमाणे २ सव्बिद्धीए सव्वज्जुईए सव्व बलेणं जाय णिग्घोसनाइएणं जेणेव सिन्धुमहाणइ तेणेव उपागच्छद) Gट मान पनिथी, सिरનાદથી, અવ્યક્ત ઇવનિથી તે જ કલ–કલ શબ્દથી, જાણે કે સમુદ્ર જ ગર્જના કરી રહ્યો હોય, આ પ્રમાણે એ દિગમંડળને મુભિત કરતો પ્રયાણ કરી રહ્યો હતો. આ પ્રમાણે પોતાની પૂર્ણ વિભૂતિથી તેમજ સવદ્યુતિથી તથા સર્વ બળથી યાવત્ વાધવિશેષના શબ્દોથી યુક્ત Page #689 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका ४० वक्षस्कारः सू० १३ सुषेणसेनापतेषिजयवर्णनम् उपागत्य चर्मरत्नं परामृशति स्पृशति, चर्मरत्नवर्णनमाह-'तए णं' इत्यादि 'तए णं तं' ततः खलु तच्चर्मरत्नम् 'सिरिवच्छसरिसरूपं' श्रीवत्ससदृशरूपम् तत्र श्रीवत्ससदृशं मानलिकस्वस्तिकविशेषः श्रीवत्साकारं रूपं यस्य तम तथा ननु अस्य श्रीवत्साकारत्वे चत्वारोऽपि प्रान्ताः समविषमाः भवन्ति तथा च अस्य चर्मरत्नस्य किरातकृतवृष्टयुपद्रवनिवारणार्थ तिर्यग विस्तृतेन वृत्ताकारेण छत्ररत्नेन सह कथं सङ्घटनास्यादिति चेन स्वतः श्रीवत्साकारमपि सहस्त्रदेवाधिष्ठितत्वात् यथाऽवसरं चिन्तिताकारमेव भवतीत्यनुपत्यभावात् 'मुत्ततारद्ध चंदचित्तं' मुक्त तारार्द्धचन्द्रचित्रम्, तत्र मुक्तानां मौक्तिकानां ताराणां तारकाणाम् अर्द्धचन्द्राणां च चित्राणि-आलेख्याणि यत्र तत्तथा पुनः कीदृशं चर्मरत्नम् 'अयलमकंप' अचलमकम्पम्, चञ्चलता रहितम् अकम्पं कम्परहितम् तत्रअचलम् अकम्पम् द्वौ सदृशार्थको शब्दो अतिशय सूचको तथा च अत्यन्तदृढपरिमाण भरतमुसइ) वहां भाकर के इसने चर्मरत्न का स्पर्श किया ( तएणं तं सिरिवच्छसरिसरूवं मुत्ततारद्ध चंदचित्त अयलमकंपं अमेग्न कवयं) वह चर्मरत्न श्रीवत्स के जैसे आकार वाला था माङ्गलिक स्वस्तिक विशेष का नाम श्रीवत्स है यहा ऐसी भाशंका हो सकती है कि जब वह चर्मरत्नका श्री वत्स के जैसे-आकार था तो श्रीवत्स के तो चारों प्रान्त समविषम होते हैं फिर इस की किरातकृत वृष्टि रूप उपद्रव को निवारण करने के लिये विस्तृत किये गये गोल आकार वाले छत्र के साथ सङ्गटना कैसे होसकेगी! तो इस आशंका (समाधान ऐसा हैं कि वह चर्मरत्नस्वतः तो श्री वत्स के जैसे आकारवाला है परन्तु देवाधिष्ठित होने के कारण यह यथावसर चिन्तित आकार वाला हो जाता है इसलिये इस कथन में कोइ अनुपपत्ति जैसी बात नहीं है । इस चर्मरत्न में मुक्ताओं के और अर्द्धचन्द्र के चित्र बने हुए थे । यह अचल और अकम्प होता है यद्यपि अचल और अकम्प ये दोनों शब्द समानार्थक है इसलिये जहां समानार्थक दो शब्द आते हैं ये अतिशय के सुचक होते हैं इस तरह भरतचक्री का सकल सैन्य भी यदि उसे चलाना कॅपाना चाहे तो थ त सुषे सेनापतिरत्न ज्या सिन्धु नही ती या पडयो. (उधागच्छित्सा चम्मरयणं परामुसइ) त्यां पहायान तेरी यमरत्नन। १५श या. (न एणं ते सिरिवच्छसरिसरूवं मुत्ततारसुखं वचितं अयलमकंपं अमेज्जकवयं) यमरत्न श्रीवत्सरा साइत માંગલિક સ્વસ્તિક વિશેષનું નામ શ્રીવત્સ છે. અહીં એવી આશંકા થઈ શકે તેમ છે કે જ્યારે તે ચર્મરત્ન શ્રીવત્સના જેવા આકારવાળું હતું તે શ્રીવત્સના તે ચારે ચાર પ્રાન્ત સમવિષમ હોય છે. તે પછી એ કિરાતકૃત વૃષ્ટિરૂપ ઉપદ્રવના નિવારણ માટે વિસ્તૃત કરવામાં આવેલ લાકૃત છત્રની સાથે સંઘટના કેવી રીતે થઈ શકશે ? તે એ આશંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે તે ચર્મરત્ન સ્વતઃ તો શ્રીવત્સના આકાર જેવું છે. પણ દેવાધિષ્ઠિક હોવાથી એ યથાવસર ચિંતિત આકારવાળું થઈ જાય છે. એથી આ કથનમાં કેઈ અનુયપત્તિ જેવી વાત નથી. ચર્મરત્નમાં મુક્તાઓના તારકાએ અને અદ્ધચન્દ્રના ચિત્રો બનેલા છે. એ અચલ અને અકમ્પ હોય છે. જો કે અચલ અને અકમ્પ બન્ને શબ્દો સમાનાર્થક છે એથી જ જ્ય સમાનાર્થક બે શબ્દો આવે છે તે અતિશય સૂચક હોય છે. આ પ્રમાણે ભારતચકીની સંપૂર્ણ Page #690 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૬૭૬ जम्बूद्दपप्रज्ञप्तिसूत्रे चक्रिसकलसैन्याक्रान्तत्वेऽपि न मनागपि कम्पते इतिभावः पुनः कीदृशं चर्मरत्नम् 'अभेङजकवयं' अभेद्यकवचम् अभेद्यं दुर्मेधं कवचमिव अभेद्यकवचम् वज्रपञ्जरमिव दुर्भेदमितिभावः 'जंतं सलिलासु सागरेसु य उत्तरणं' सलिलासु सागरेषु च उत्तरणयन्त्रम्, तत्र सलिलासु नदीषु सागरेषु समुद्रेषु चोत्तरणयन्त्रं पारगमनोपायभूतम् 'दिव्वं चक्करयणं' दिव्यं देवकृतप्रातिहार्य देवकृत स्तुति सम्पन्नमित्यर्थः चर्मरत्नं चर्मसु प्रधानम् अनलजलादिभिरनुपघात्यवीर्यत्वात् पुनः 'सणसत्तरसाई' सव्वण्णाई' जत्थ रोहंति एगदिवसेण वाविभाई' यत्र शण सप्तदशानि सर्वधान्यानि रोहन्ते एकदिवसेनोप्तानि, तत्र शणं - शणधान्यम् सप्तदशसप्तदश - संख्यापूरकं येषु तानि शणमप्तदशानि सर्वधान्यानि यत्र रोहन्ते जायन्ते एकदिवसेनोप्तानि, एयं सम्प्रदायः गृहपतिरत्नेन अस्मिश्चर्मणि धान्यानि सूर्योदये उप्यन्ते अस्तसमये च लूयन्ते इति, सप्तदश धान्यानित्विमानि, "सालि १ जव २ वीहि ३ भी वह जरा सा भी कंपित नहीं हो सकता है यहो बात यहां सूचीत की गई है जिस प्रकार वज्रपञ्जर दुर्भे होता है उसी प्रकार से यह भो दुर्भेद्य था (जंतं सलिलासु सागरे सुय उत्तरणं) इसके बल से चक्रवर्ती का समस्त कटक नदीयों को और सागरों को समुद्रों को पार कर देता है । अर्थात् नदियों के और समुद्रों के पार करने में यह एक आयभूत यंत्र हैं । (दिव्वं चम्मरयणं सणसत्तरसाईं सव्वघण्णाई जत्थ रोहंति एगदिवसेण वाविआई ) यह देव कृत परि हार्य रूप होता है - देवकृतस्तुति सम्पन्न होता है । अन्नजलादि से इसका उपघात नहीं हो सकता है क्योंकि यह ऐसी हो शक्ति सम्पन्न होता है अतः यह समस्त प्रकार के चमड़ों में प्रधान होने से चर्मरत्न कहा गया है । इसके बोयेगये शण और १७ प्रकार के धान्य ही एक दिन में उत्पन्न हो जाते हैं । फलित हो जाते हैं । शण धान्यका नाम शण हैं । ऐसा सम्प्रदाय हैं कि गृहपति रत्न द्वारा इस चर्मरत्न पर सूर्योदय के समय धान्य बोदिये जाते हैं और मस्त के समय में काटलिये जाते हैं उन १७ प्रकार के धान्यों के नाम इस प्रकार से हैं - " सालि १जव સેના પણુ જો તેને ચાલિત કરવા-કપિત કરવા પ્રયત્ન કરે તે પશુ તે સડે જ પણ કપિત થઈ શકે નહિ. એ જ વાત અત્રે સૂચિત કરવામાં આવી છે જેમ વ પજર દુલે ઘ હાય छे, तेमन से पशु हुलेध तुं. (जंत सलिलासु सागरेसु य उत्तराणं) सेना मजथी य વીનું સમર કટક નદીઓને અને સાગરે ને, સમુદ્રોને પાર કરી જાય છે. એટલે કે नहीओ। अने समुद्रोने पर वाम से मे महत्त्वपूर्ण यंत्र छे. (दिव्व चम्मरयणं सणसत्तरसाई सव्वधण्णाई जत्थ रोहंति एगदिवसेण वाविआई) मे देवड्ठ्ठत परिहार्य ३५ હાય છે. દેવકૃત્ત સ્તુતિ પ્રખ્યન્ત હય છે, અન્નજળ વગેરેથી એના ઉપઘાત થઈ શકતા નથી. કેમકે એ એવી જ શક્તિયો સમ્પન ડેાય છે. આમ એ સમસ્ત પ્રકારના ચર્ચામાં પ્રધાન હાવાથી ચરત્ન કહેવામાં આવ્યું છે. એના વડે વિપત શણુ અને ૧૭ પ્રકારના ધાન્યા એક ડિવસમાં જ ઉત્પન્ન થઇ જાય છે...ફલિત થઇ જાય છે. શત્રુ ધાન્યનું નામ શત્રુ છે એવે સમ્પઢાય (રિવાજ) છે ગૃહપતિ રત્ન વડેએ ચમ રત્ન ઉપર સર્વોદય સમયે ધાન્યો વિપત કરવામાં આવે છે અને સૂર્યાસ્ત થાય તે સમયે માન્યોની લણણી કરવામાં આવે છે / Page #691 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तृ वक्षस्कारः सू०१३ सुषेणसेनापतेर्विजयवर्णनम् ६७७. कुदव ४ रालय ५ तिल ६ मुग्ग ७ मास ८ ववल विणा १० । तुभरि ११ भरि १२ कुलत्या १३ गोहुम १४ णि फार १५ अवसिं १६ सगा १७॥१॥ सूर्ये उदिते सति प्रथमप्रहरे उप्यन्ते, द्वितीय प्रहरे जलादिना दीयते तृतीय प्रहरे धान्यानि पक्वानि भवन्ति चतुर्थे प्रहरे लूयन्ते निष्पूयन्ते ततो यथास्थानं सेनाविभागे तत्तत्स्थाने पेष्यन्ते इति । शालिः १ प्रसिद्धः, जवः २ प्रसिद्ध, ब्रीहिः ३ धान्यविशेषः, कोद्रवः ४ प्रसिद्धः, रालय ५ धान्य विशेष, तिलः ६, मुद्गः७, माष:८, चपल:९ चौला इति प्रसिद्धः, चणकः २वीहिं३ कुद्दव ४रालय २तिल ६ मुग्ग , मास ८ चवल ९चिणा १० । तुअरि ११मसुरि१२ कुलत्था १३ गोहुम १४ णिप्फाव १५ अयसि १६ सणा"१७॥१॥ ___सूर्य के उदय होने पर प्रथम प्रहर में ये धान्य बो दिये जाते है द्वितीय प्रहार में इन्हें जलादि देकर बढाया जाता है, तृतीय प्रहर में ये पक्व हो जाते हैं और चतुर्थ प्रहर में ये काटलिये जाते हैं । फिर यथास्थान ये सेना विभाग में जगह२ भेजदिये जाते हैं । शालिनाम धान्य का है । जव-जौ कानाम है। ब्रीहि एक प्रकार का धान्य विशेष होता है । कोद्रव-कोदो का नाम है यह बुन्देल खण्ड प्रान्त मेंबहुत अधिक होता है । तथा आदि वासियो में इसके खाने का बहुत अधिक प्रचार है। रालि यह भी एक प्रकार का अनाज विशेष है। खाने में यह बहुत हल्का होता है । यह बीमारी में पथ्य के रूप में प्रयुक्त होता है । तिल जिसे तिल्ली कहते हैंतिल्ली भी एक प्रकार का अनाज है-इस का तेल निकाल कर और इसके लड्डु बनाकर लोग खाने के काम में इसका व्यवहार करते हैं । मुग्द-मुंग का नाम है । मास-उडद का नाम है चवल चौला का नाम है। इसके मुंगाड़ा बडे अच्छे एवं स्वादिष्ट बनते हैं । लोग ईसे सिझाकर और उस में नमक मसाला मिलाकर खाते हैं । चणक नाम चना का है । तुअर जिसे त १७ ॥२॥ धान्यो मा प्रमाणे छ-"सालि १, जव २, वीहि ३, कुद्दव ४, रालय ५, तिल ६, मुग्ग ७, मास ८, चवल ९, विणा १०। तूअरि ११, मसूरि १२, कुलत्था १३, गोहुम १४, णिप्फाव १५, अयसि १६, सणा १७ ॥ સૂર્યોદય થાય કે તરત જ પ્રથમ પ્રહરમાં એ ધાન્યો વપિત કરવામાં આવે છે. બીજા પ્રહરમાં એમને પાણી વગેરેથી સિંચિત કરીને વન્દ્રિત કરવામાં આવે છે. ત્રીજા પ્રહરમાં એ ધાન્ય પરિપકવ થઈ જાય છે. અને ચતુર્થ પ્રહરમાં એમની લલણી કરવામાં આવે છે. પછી સેને વિભાગમાં યથાસ્થાન ઠેક ઠેકાણે એ ધાને મોકલી આપવામાં આવે છે. શાલી ધાન્યનું નામ છે. યવ-જવનું નામ છે. ત્રાહિં એક પ્રકારનું ધાન્ય વિશેષ હોય છે. કદ્રવ કોદરાનું નામ છે. આ ધાન્ય બુંદેલખંડ પ્રાન્ત માં બહુ જ થાય છે. તેમજ આદિવાસી લોકો એ ધાન્યને ખાવામાં ખૂબ જ ઉપયોગ કરે છે. રાલિ એ પણ એક પ્રકારનું અન્ન વિશેષ છે. પચવામાં એ બહુ જ હલકું હોય છે. આ ધાન્ય બીમારીમાં પથ્યના રૂપમાં પ્રયુક્ત થાય છે. તિલ જેને તલ કહી એ છીએ. તિલ પણ એક પ્રકારનું અન્ન છે. આ માંથી તેલ કાઢીન અને એનાથી લાડવા બનાવીને લેકે ખાય છે. મુદ્દગ-મગનું નામ છે. માસ-અડદનું નામ છે. ચવલ-ળાનું નામ છે. એ શેકીને પણ ખવાય છે. શેકવાથી એ સ્વાદિષ્ટ થઈ જાય છે. Page #692 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - ६७८ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे १० चणा इति प्रसिद्धम् तूवरिका ११ तुअर इति भाषा प्रसिद्धम् , मसूरः १२ प्रसिद्धः, कुलत्थः १३ प्रसिद्धः, गोधूमः १४ प्रसिद्धः, निष्पावः १५ धान्यविशेषः, अतसी १६ धान्यविशेषः, 'अळसी' प्रसिद्धः, शणः १७ धान्यविशेषः, अन्यत्र चतुर्विशतिरषि उक्तानि, लोके च क्षुद्रधान्यानि बहूनि, पुनश्चर्मरत्नस्य विशेषणमाह-वासं' इत्यादि 'वासं गाउण चकवट्टिणा परामुढे दिव्वे चम्मरयणे दुवालसजोयणाई तिरिअं पवित्थरइ' वर्ष-जलदवृष्टिं ज्ञात्वा राज्ञा चक्रवर्तिना भरतेन परामृष्टं-स्पृष्टम् दिव्यं चर्मरत्नं द्वादश योजनानि अष्टाचत्वारिंशक्रोशकानि तिर्यक् प्रविस्तृताणि वर्द्धते, ननु द्वादशयोजनावधि तस्थुषश्चक्रवर्ति स्कन्धावारस्य अवकाशाय द्वादशयोजनप्रमाणमेव इदं विस्तृतं युज्यते किमधिक अरहर कहा जाता है धान्य विशेष है इसकी दाल गुलाबोरंग की होती है तथाखाने में यह सुपाच्य होती है। कुलत्थ नामकुलथो का है-यह जंगलो धान्य है विना बोये चौमासे में यह पैदा होती है गोधूम नाम गेहूं का है निष्पात्र यह भी एक प्रकार का धान्य विशेष है-ठपका आकार सेम-बालोर के बीज के जैसा होता है । गुजरात तरफ इसका भोजन में शाक के रूप में बहुत प्रयोग देखने में आता है । अतसी यह भी एक प्रकार का धान्य विशेष है। यह तिल्ली की तरह नुकीला ओर चपटा होता है । परतिल्ली से बड़ाहोता है इसे भाषा मे अलसो कहा जाता है । शण भी यह भी एक प्रकार का धान्यविशेष है । कहीं कहीं धान्यों की संख्या २४ भी कही गइ है क्योंकि लोक में क्षुद्र धान्य बहुत है (वासं णाउग वनदिणा परामुढे दिवे चम्मरयणे दुवालसजोयणाई तिरिअं पवित्थरइ ) वर्षा की आगमन देख कर-जान कर-भरत चक्रवर्ती द्वारा स्पृष्ट हुभा वह दिव्य चर्मरत्न कुछ अधिक १२योजना तक तिर्यक् विस्तृत हो गया । यही ऐसी आशंका हो सकती हैं कि चक्रवर्ती का सैन्य तो લોકો આને રાંધીને અને તેમાં મીઠું-મસાલા મિશ્ર કરીને ખાય છે. ચણક-ચણાનું નામ છે. તુઅર-તુવેરને કહે છે. એ પણ ધાન્યવિશેષ છે. મસૂર પણ એક પ્રકારનું અન્ન વિશેષ છે. એની દાળ ગુલાબી રંગની થાય છે. તેમજ ખાવામાં કે સુયાય હાય છે. કલ નામકળથીન છે. એ જ ગલી ધાન્ય છે. વપિત કર્યા વગ૨ જ ચતુર્માસમાં એ ઉત્પન્ન થઇ જાય છે. ગોધૂમ-ઘઉંનું નામ છે. નિપાવ એ પણ એક પ્રકારનું અને વિશેષ છે. એનો આકાર સેમ- વાળનાબી જેવો હોય છે. ગુજરાતમાં એનો ભેજનમાં શાકના રૂપમાં બહુ જ પ્રયોગ જેવામાં આવે છે. અતસી આ પણ એક પ્રકારનું અન્ન વિશેષ છે. એ તલ જેવું અદાર અને ચપટું હોય છે. પણ તલ કરતાં મોટું હોય છે. આને ભાષામાં અલસી કહેવામાં આવે છે. શણુ આ પણ એક પ્રકારનું ધાન્ય વિશેષ છે. કેટલાક સ્થાનોમાં ધાન્યની સંખ્યા ૨૪ रेटी ५५ वामां आपीछे भाभा क्षुद्र पान्योनी सध्या पधारे छे. (वासं णाउणचक्कवट्टिणा परामुढे दिवे चम्मरयणे दुवालसजोयणाई तिरि पवित्थरह) वर्षानु मायમન જઈને-જાણીને-ભરતચક્રી વડે પૃષ્ટ થયેલું તે દિવ્ય ચર્મરત્ન કઈક વધારે ૧૨ જન સુધી નિયંક વિસ્તૃત થઈ ગયું. અત્રે એવી પણ આશંકા થઈ શકે કે ચક્રવતીનું સૈન્ય ૧૨ જન જેટલા વિસ્તારવાળું હતું જ તો પછી તેટલા વિસ્તારવાળા સૈન્યને પણ એ Page #693 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ• वक्षस्कारः सू०१३ सुषेणसेनापतेर्विजयवर्णनम् ६७९ विस्तारेण इति चेन्न चमच्छत्रयोः अन्तराल पूरणाय तथोक्तत्वात् इति 'तत्थ साहियाई' तत्र उत्तरभरत-मध्यखण्डवर्ति किरातकृतमेघोपद्रवनिवारणादि कार्ये साधिकानि किन्चिदधि कानि 'तएणं से दिवे चम्मरयणे मुसेणसेणावइणा परामुढें समाणे विप्पामेव णावाभूए जाए यावि होत्था'ततः खलु तद्दिव्यं चर्मरत्नं सुषेणसेनापतिना परामृष्टं स्पृष्टं सत् क्षिप्रमेव शीघ्रमेव नौभूतं महानद्यत्ताराय नौ तुल्यं जातं चाप्य भवत्-नावाकारेण जातम्, 'तएण से मुसेणे सेणावई सखंधावारबलवाहणे णावाभूयं चम्मरयणं दुरुहइ, ततः चर्मरत्न नौ भवनानन्तरं खलु स सुषेणः सेनापतिः-सेनानी: सस्कन्धावारबलवाहन: स्कन्धावारस्य-सैन्यस्य ये बलवाहने इस्त्यादि चतुरङ्ग शिविकादि रूपे ताभ्यां सह वर्तते यः स तथा एवं भूतःसन् नौभूत चर्मरत्नं दुरूह्य आरुह्य सिंधु महाणई' सिन्धु सिन्धुनाम्नी महानदीम् विमलजलतुङ्ग वीचिम्, विम जलस्य स्वच्छोदकस्य तुङ्गाः अत्युच्चाः वीचयः कल्लोलाः यस्यां सा तथा ताम् 'णावाभूएणं चम्मरयणेणं' नौभूतेन चर्मरत्नेन 'सबलवाहणे' सबलवाहनः बलवाहनाभ्यां हस्त्यादि चतुरङ्गशिविकादिरूपाभ्यां सह वर्त्तते यः स तथा 'सेणे' ससेनः सेनास१२ बारह योजन के विस्तार वाला ही था तो फिर उतने बिस्तार वाले सैन्य को अपने भीतर स्थान देने के लिये चर्मरत्न को भी उतना ही बढना चाहिये था यह अधिक क्यों वढा १५ योजन प्रमाण ही इसे बढना चाहिये था। तो इसका उत्तर ऐसा है कि यह जो इतना बढा सो चर्म और छत्र के अन्तराल को पूरा करने के लिये ही बढा (तत्थ सहियाई) यही बात इस सूत्र पाठ द्वारा पुष्ट की गई है-उत्तर भरत मध्यखण्डवर्ती किरात द्वारा कृत मेघ के उपद्रव को रोकने के लिये ही यह १२ योजन प्रमाण से कुछ अधिक विस्तृत हुआ । (तएणं से दिव्वे चम्मरयणे सुसेणसेणावइणा परामुढे समाणे खिप्पामेव णावाभूए जाए ) वह दिव्य चर्मरत्न सुषेण सेनापति द्वारा स्पष्ट होता हुआ शोघ्र ही नौका रूप हो गया । (तएणं से सुसेणे सेणावई सखंधावार बलवाहणे णावाभूयं चम्मरयणं दूरूहइ) इसके अनन्तर वह सुषेण सेनापति स्कन्धावार के बल और बाहन -हस्त्यादि चतुरंग एवं शिविकादि रूप बाहन से युक्त हुआ उस नोभूत चर्मरत्न पर सवार हो गया ( दुरूहित्ता सिंधु महाणई विमलजलतुङ्गवीचिं णावाદિવ્ય ચર્મરત્નની અંદર સ્થાન આપવા માટે તેને પણ આટલું જ વિસ્તૃત કરવું જ જોઈએ તો એને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે એ જે ઉપર્યુક્ત પ્રમાણ જેટલું વિસ્તત થયું છે તે यर्भ मन छत्रना अंतराने २ ४२॥ ४ विस्तृत यु तु. (तत्थसहियाई) से। વાત એ સૂત્રપાઠ વડે પુષ્ટ કરવામાં આવી છે. ઉત્તર ભારત ખંડવતી કિશત દ્વારા કૃત મેઘના ઉપદ્રવને રોકવા માટે જ એ ૧૨ ચાજન પ્રમાંથી કંઈક વધારે વિસ્તૃત થયું હતું. (त एणं से दिवे चम्मरयणे सुसेणसेणावइणा परामुढे समाणे खिप्पामेव णावाभूए કપ) તે દિવ્ય ચ રત્ન સુષેણ સેનાપતિ વડે પૃટ થતાં જ એકદમ નૌકા ૩૫ થઈ ગયું. (त एणं से सुसेणे सेणावई सखंधावारबलवाहणे णावाभूयं चम्मरयण दुरुहइ) अना પછી તે સુહાણ સેનાપતિ સ્કધાવારના બળ (સેના અને વ હેન-હત્યાદિ ચતુરંગ તેમજ शिमि१३५ पानथी युत थये। नौ। ३५ ते यमल 6५२ सवार २४ गयो. (दुरुहिता सिंधुमहाणई विमलजलतुङ्गवीचिं णावाभूएण चम्मरयणेण सबलवाहणे ससेणे समु Page #694 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६८० जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्रे हितः सुषेन नामा सेनापतिः 'समुत्तिण्णे' नदी समुत्तीर्णः ततो महाणई मुत्तरितुं सिंधु अप्पडिहय सासणेय सेणावई, ततो महानदी सिन्धुमुत्तोये अप्रतिहतशासन:-अखण्डिताज्ञः से नापतिः 'कहिं चि गामागरणगरपव्ययाणि' क्वचिद्द ग्रामाकरनगरपर्वतान् 'खेडकब्बड-मडं. बाणि' अत्रापि क्वचिच्छब्दस्य सम्बन्धस्तेन क्वचित् खेटकर्बटमडम्बानि, तत्र खेटाः धूलिका प्राकारवेष्टितनगरम् कर्बटः कुत्सितनगरम् मडम्बः ग्रामविशेषः साईक्रोशद्वयान्तीमान्तर रहितः यस्य चतुर्दिक्षु-पट्टणानि' सर्ववस्तुप्रातस्थानानि तथा सिंहलए सिंहलकान् सिंहलदे. शोद्भवान् 'बब्बरए' बर्बरदेशोत्पन्नान् 'सव्वं च' सर्वं च 'अंगलोयं बलायालोयं च' अङ्गलोक बलाकालोकं च 'परमरम्म' परमरम्यम् एतद्वयम् म्लेच्छ जातीय निवासस्थानम्'जवणदीवं च' यवनद्वीपं च द्वीपविशेषम् चकागः समुच्चयार्थाः कोदृशं द्वीपम् ‘पवरमणिरयण कणगकोसागारसमिद्धं' प्रवरमणि रत्नकनककोशागारसमृद्धम् तत्र प्रवराणां श्रेष्ठानां मणि रत्नकन कानां कोशागाराणि भाण्डाराणि तैः समृद्धम् 'आरबके' आरबकान् आरबदेशोद्भवान् 'रोमकेय' रोमकांश्च रोमकदेशोत्पन्नान् 'अलसंडविसयवासीय' अलसण्डविषयवाभूएणं चम्मरयणेणं सबलवाहणे ससेणे समुत्तिण्णे) उस पर सवार होकर भरत महाराजा की आज्ञा का पालक वह सिन्धु महानदी को कि जिसमें निर्मल जल की वड़ो तरंगे उठ रही हैं अपने बल एवं वाहन के साथ उस नौका भूत चर्म रत्न से पार कर गया । (तओ महाणइ मुत्तरित्तु सिन्धु अप्पडिहयसासणे अ सेणावइ कहिं चि गामागरणगर पव्वयाणि खेट कब्बडमडंबाणिं पट. टणाणि सिंहलए बव्वरए अ सब्वं च अंगलोअं बलायालोअंच परमरम्मं जवणदी पवरमणिरयणकणगकोसागार समिद्धं ) सिन्धु महानदी को पार करके जिस की आज्ञा अखंडित है ऐसा वह सेनापति कहों पर ग्राम, नगर पर्वतों को कहो पर खेट कर्बट, मडंयो को कहीं कहिं पर पटनों को तथा सिहलकों को -सिंहल देश में उत्पन्न हुए मनुष्यों को बर्बरकों को बर्बर देश में उत्पन्न हुए मनुष्यों को म्लेच्छ जातियजन के आश्रयभूत तथा प्रवर मणिरत्न एवं कनक के भाण्डारों अतएव परम रम्य ऐसे अंग लोक को, बलावलोक को तथा जवनद्वीपको (मारबक)आरबकों को अरबदेश के निवासियों को, (रोमकेअ) रोमक देश के निवासियों को નિજ તે નૌકા ઉપર સવાર થઈને ભરતની આજ્ઞાનો પાલક તે જેમાં નિર્મળ જવાના વિશાળ તરંગે ઉઠી રહ્યા છે એવી સિંધૂ મહાનદીને પિતાના બળ (સૈન્ય) અને વાહન સાથે पार शगया. (तओ महाणईमुत्तरितु सिन्धु अप्पडिहयसासणे अ सेणावई कहिं चि गामागरणगरपव्वयाणि खेटकब्बडमडंबाणि पट्टणाणि सिंहलए बब्बरए अ सव्वं च अंग लोअंबलायालोअं च परमम्मंजवणदो पवरमणिरयणकणग कोसागारसमिद्ध) स-५ भारीનદી પાર કરીને જેની આજ્ઞા અખંડિત છે, એ તે સેનાપતિ કયાંક ગ્રામ, નગર પવતાને કયાંક બેટ–કબૂટ, મને કયાંક પટ્ટોને તેમજ સિંહલકેને--સિંહલ દેશમાં ઉત્પન્ન થયેલા મનને, બબરને–બબ૨ દેશમાં ઉત્પન્ન થયેલા મનુષ્યોને, છ જાતીય કેના અ શ્રયબત તેમજ પ્રવરમણિરત્ન તથા કનકના ભંડાર અએવ ૫૨મરમ્ય એવા અંગે લોકોને બલાવ લેકને તેમજ યવનદ્વીપને (આરબક) આરબકોને-અરબદેશમાં નિવાસ કરનારા લોકેને Page #695 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ० वक्षस्कारः सू० १३ सुषेणसेनापतेविजयवर्णनम् ६८१ सिनश्च अलसण्डनामक देशवासिनः पिक्खुरे' पिक्खुरान् ‘कालमुहे' कालमुखान् ‘जोण एय' जोनकांश्च म्लेच्छविशेषान् 'ओअवेऊणत्ति पदेन योगःअथ एतैः साधितैरशेषमपि निष्कुटं भरतखण्डसाधितं नवेत्याह-'उत्तरवेअद्ध संसियाओ य' उत्तरवैताव्यसंश्रिताश्च तत्र उत्तरः उत्तरदिग्वर्ती वैतादयः इदं हि दक्षिणसिन्धुनिष्कुटान्तेन अस्मात् वैताढयः उत्त रस्यां दिशि वर्तते इति, त संश्रिताश्च तदुपत्यकायां स्थिताश्च उत्तरवैताढयनिवा सिनः कीदृशाः 'मेच्छजाइ बहुप्पगारा' म्लेच्छ-जातीबहुप्रकाराः उक्तव्यतिरिक्ता इत्यर्थः 'दाहिण अवरेण' दक्षिणापरेण-नैऋतकोणेन 'जाव सिंधुसागरं तोत्ति' यावत् सिन्धु सागरान्त इति सिन्धुनदीसङ्गतःसागरःमध्यमपदलोपी समासः स एव अन्तःपर्यवसानं ताव दवधि इति भावः 'सबपवरकच्छं च' सर्व प्रवरं-सर्वश्रेष्ठं कच्छं च कच्छदेशम् 'ओमवे ऊण 'साधयित्वा स्वाधीनं कृत्वा विजीत्य 'पडिणिअत्तो' प्रतिनिवृत्तः पश्चात् 'बहुसमरम णिज्जेय भूमिभागे तस्स कच्छस्स सुहणिसण्णे' पश्चात बहुसमरमणीये च भूमिभागे 'तस्स कच्छस्स सुहणिसण्णे' पश्चात् बहुसमरमणीये च भूमिभागे तस्य कच्छदेशस्य सुखेन निषण्णः निर्बाधस्थाने स्थितः इत्यर्थः स सुषेणः सेनापतिरिति । ततः किं जात मित्याह-'ताहे' इत्यादि 'ताहे' तस्मिन् काले ते इति तदस्योत्तरवाक्ये 'सव्वे घेतण' इत्यत्र व्यवहरितः सम्बन्धो बोध्यः 'जणवयाण' जनपदानां देशानाम् 'णगराण पट्टणाण य' नगराणां पत्तनानां च 'जे य तहिं सामिया'ये च तत्र तस्मिन् निष्कुटे कोणवत्ति(अलसंडविसय वासी) और अलसण्ड देश निवासियों को तथा (पिक्खुरे)पिक्खुराको (कालमुहे) कालमुखों का (जोणए अ) नोनकों को-म्लेञ्छविशेषों को, तया (उत्तरवेअद्धसंसिआओ य मेच्छजाइ बहुप्पगारा दाहिण अवरेण जाव सींधुसागर तोत्ति सवपवरकच्छं च ओअऊण) उत्तर वैताठ्य में संश्रित-उसकी तलहरी हरी में वसी हुइ-अनेक प्रकार को म्लेच्छ जाति को नैऋत कोण से लेकर सिन्धुनदी जहां सागर में मिली है वहां तक के समस्त प्रदेश को और सर्वश्रेष्ठ कच्छ देश को अपने वश में करके (पडिणिअत्तो) पीछे लौट आया (बहुसमरमणिज्जे अ भूमिभागे तस्स कच्छस्स सुहणि सण्णे) और लौटकर वह सुषेण सेनापति कच्छदेश के बहुसमरमणीय भूमिभाग में आकर के सुखपूर्वक ठहर गया । (ताहे तेइंजणवयाण णगराण पट्टणाण य जे अ (रोमकेअ) राम देशना निवासीमान (अलसंडविसय वासी अ) भने म हेश निवासी भान तथा (पिक्खुरे)पि४भुशन, (कालमुहे) मु.ने (जोणए अन्न ने-७ विशेषआने तथा (उत्तरवेअद्धसंखिआओ य म्लेच्छ नाई बहुप्पगारा दाहिण अवरेण जाव सिंधु सागरं तोत्ति सव्वपवरकच्छं च ओअवेऊण) उत्त२ वैताव्यमा सश्रित-तनी तटीभाभी નિવાસ કરતા અનેક પ્રકારની મ્લેચ્છ જતિઓને તેમજ નૈઋત્ય કાણથી માંડીને સિંધ નદી જ્યાં સાગરમાં મળે છે ત્યાં સુધીના સર્વ પ્રદેશને અને સર્વશ્રેષ્ઠ કચ્છ દેશને પિતાના पसमा ४शन (पडिणिअत्तो) पाछ। माना गया. ( बहुसमरमणिज्जे अ भूमिभागे तस्स कच्छस्स सुहणिसण्णे) अने, मवीन ते सुषेण सेनापति ४२७ देशना अतीव सम श्भीय भूमि भागमा आव २ सुमपू४ २।४१४ गया. ( ताहे ते जणवयाण णगराण पडणाण य जे तहिं समिमा पभूआ आगरपती अ मंडलपती अ पट्टणपती असन्चे Page #696 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૨૮૨ जम्बूद्वीपप्रशप्तिसूत्रे भरतक्षेत्रखण्डरूपे स्वामिकाः चक्रवर्तिमुषेण सेनान्योरपेक्षया अल्पर्दिकत्वेनाज्ञातस्वामिनः इत्यज्ञातार्थे क प्रत्ययः 'पभूया आगरपत्तीय' प्रभूताः आकरपत्तयश्च तत्र ये च प्रभूताः बहवः आकराः सुवर्णाधुत्पत्तिभुवस्तेषां पतयः ‘मंडलपतीय' मण्डलपतयश्च देशकार्यनियुक्ताः मण्डलपतयः 'पट्टणपतीय' पत्तनपतयश्च 'सव्वे घेत्तूण' ते सर्वे गृहीत्वा आदाय 'पाहुड़ाई आभरणाणि भूसणाणि रयणाणि य वत्थाणिय महरिहाणि अण्णं च जं वरिटं रायारिहं जं च इच्छिअव्वं एयं सेणावइस्स उवणेति मत्थयकयंजलिपुडा' प्राभृतानि उपायनानि आभरणानि-अपरिधेयानि भूषणानि उपाङ्गपरिधेयानि रत्नानि च वस्त्राणि च महार्याणि च बहुमूल्यकानि अन्यच्च यद्वरिष्ठं प्रधानं वस्तुहस्तिरथादिक राजाई राजोपनयनयोग्यं यच्च एष्टव्यम् अभिलाषयोग्यम् एतत्सर्व पूर्वोक्तं सेनापतेःसेनापति सुषेणमुपनयन्ति उपढौकयन्ति मस्तककृताञ्जलिपुटाः सन्तः 'पुणरवि काऊण अंजलिं मत्थयंमि पणया' ते तत्रत्य स्वामिनः दत्तप्राभृतोत्तरकाले परावर्तनसमये पुनरपि भूयोऽपि मस्तके अञ्जलिं कृत्वा प्रणताः नम्रत्वमुपागताः 'तुब्भे अम्हेऽस्थ ताहिं समिपा पभूमा आगर पतो अ मंडलपती अ पट्टणपती अ सवेधेतूणं पाहुडाई, आभरणाणि, भूसणाणि, रयणाणि, वत्थाणि अ, महारिहाणि अण्णं च जं वरिष्टुं रायारिहं जं च इच्छिमव्वं अ सेणावइस्स उवणेती मत्थयकयंजलिपुडा) तब जो जनपदों के, नगरों के, पट्टनों के वहां चक्रवर्ति एवं सुषेण की अपेक्षा अल्प ऋद्धि वाले होने से अज्ञात स्वामी थे (अल्पार्थ में यहां क प्रत्यय हुआ है) स्वर्णादिकों की उत्पत्ति के स्थानों के जो स्वामो थे। मण्डलपति थे, एवं पत्तनपति थे वे बहुमूल्य प्राभृतों-भेटों-को ले लेकर बहुमूल्य आभरणों को लेकर बहुमूल्यभूषणो-ऊपाङ्ग परिधियों को ले लेकर बहुमूल्य रत्नादिकों को ले लेकर बहुमूल्य वस्त्रों को लेकर तथा अन्य और भी वरिष्ठ हस्ति रथ आदिक राजा को भेंट में देने योग्य वस्तुओं को एवं चाहना के योग्य चीजों को ले लेकर सेनापति सुषेण के पास आये। और दोनों हाथ को जोड़ कर लाई हुइ अपनी वस्तुओं को उसे भेंट के रूप में प्रदान को । (पुणरवि काऊण अंजलिं मत्थयंमि पणया तुब्भे अम्हेऽत्थ समिमा) तदा लौटते समय उन्होंने पुनः अंजलि करके घेत्तूण, पाहुडाई आभरणाणि भूसणाणि , रयणाणि , वत्थाणि अ , महारिहाणि, अण्णं च जं वरिष्टुं रायारिहं जं च इच्छिअव्वं अ सेणावहस्स् उवणे ति मत्थयकयंजलिपुडा) ત્યારે જે જનપદના, નગરોના, પટ્ટનેના ત્યાં ચક્રવતી અને સુષેણની અપેક્ષા અ૯૫ઍદ્ધિपामा हवाथी अज्ञात भी ता. ( अडी सपा मां ' ' प्रत्यय यये। छ. ) सुप - Cોની ઉત્પત્તિ ના સ્થાનના જે સ્વામી હતા. મંડળપતિઓ હતા તેમજ પત્તનપતિઓ હતા તેઓ સર્વ બહુમૂલ્યવાન પ્રાભૃત – ભેટેને લઈને બહુમૂલ્યવાન આભરણેને લઈને બહુમૂલ્યવાન ભૂષણે – ઉપાંગ પરિધિઓને લઈને, બહુમૂલ્યવાન રત્નાદિકેને લઈને, બહુમૂલ્યવાન વસ્ત્રોને લઈને તેમજ અન્ય કેટલાંક વરિષ્ઠ હસ્તિ, રથ વગેરે રાજાને ભેટમાં આપવા ગ્ય વસ્તુઓને તેમજ ગમી જાય અને મેળવવાની ઇચ્છા થાય એવી ગ્ય વસ્તુઓને લઈને સેનાપતિ સુષેણુની પાસે આવ્યા અને બંને હાથ જોડીને સાથે લાવેલી વસ્તુઓ Page #697 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६८३. प्राकशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सु० १३ सुषेणसेनापतेर्विजयवर्णनम् सामिआ देवयंव सरणागयामो तुब्भं विसयवासिणोत्ति विजयं जंपमाणा' यूयमस्माकम् अत्र स्वामिकाः - स्वामिनः देवतामिव शरणागतास्मो वयं युष्माकं विषयवासिनः देशवासिनः भवद्भिः अस्मदेशविजीतत्वात् भवतामेवायं देश इति, इतिविजयं - विजयसूचकं वचो जल्पन्तः तदनु सेनापतिः किं कृतवान इत्याह- सेणावरणा जहारिहं ठविय पूइय विसज्जिया णिअत्ता सगाणि नगराणि पट्टणाणि अणुपविट्ठा' सेनापतिना सुषेण माम्ना यथा यथौचित्येन स्थापिताः नगराद्याधिपत्यादि पूर्वकार्येषु नियोजिताः ततः पूजिताः वस्त्रादिभि आदरसूचकवचोभिश्च निसर्जिताः स्वस्थानगमनायानुज्ञाताः निवृत्ता - प्रत्यावृत्ता सन्तः स्वकानि निजानि नगराणि पत्तनानि च अनुप्रविष्टाः गताः विसर्जनानन्तरं सेनापतिर्यत् कृतवान् तदाह- 'ताहे' इत्यादि । ' ताहे सेणावई सविणयो वेचूण पाहुडाई और उसे मस्तक पर लगा करके बड़ी नम्रतासे युक्त होकर ऐसा कहा को-आप हमारे स्वामी है । (देवयं व सरणागयामो) हम देवता की तरह आपकी शरण में आये हुए हैं (तुन्भं विसयवासिणोत्ति विजयं जयमाणा सेणावइणा - जहारिहं ठविय पूइय विसज्जिया णियत्ता सगाणि नगराणि पट्टणाणि अणुपविट्ठा) हम आपके ही देशवासी हैं आप यद्यपि हमारे देश से विजातीय हैं तो भी यह देश अपका ही है । इस प्रकार से विजय सूचक वचन कहते हुए उन सब को सेनापति ने उनके ही नगराधिपत्यादिरूप पूर्व के प्रस्थापित अपने अपने अधिकार स्थानों पर यथावत् प्रस्थापितकर के उनको वहां से विसर्जित कर दिये विसर्जित करने के पहले सुषेण सेनापति ने उन सभी को यथायोग्य वस्त्रादि अर्पित कर उनका सत्कार किया. एवं आदर पूर्वक के वचनों द्वारा उनका सम्मान किया इस प्रकार अपने अपने स्थान पर जाने के लिए सेनापति के द्वारा विसर्जित हुए वे अधिकारी आदिजन अपने अपने नगर एवं पत्तनादि में जा बसे उनके जाने के अनन्तर सेनापतिने क्या किया उस विषय में सूत्रकार कहते हैं - ( ताहे सेणावई सविणओ तेनी समक्ष सेटना ३५मां भूडी. ( पुणरवि काऊन अर्जालि मत्थयमि पणया तुम्भ अम्हे Sथ समिआ ) भन्न पाछा बजती वमते ते संगति मनावने । तेने भरत भूमीने यूज नम्र पणे याप्रमाणे अद्धुं -डे आपश्री अभारा स्वाभी छे। (देवयं व सरनागयामो) अभे देवतायोनी प्रेम आापना शरणे माव्या छाये. ( तुब्भं विसयवासिणो त्ति विजय जंपमाणा सेणावरणा जहारिहं ठविय पुइय विसज्जिया वियत्ता सगाणि नगराणि पट्टणाणि अणुपविट्ठा) अभे आपश्रीना देशेना ४ रहेनारा छीथे यायश्री જો કે અમારા દેશથી વિજાતિય છે છતાં એ આ દેશ આપશ્રીના જ છે. આ પ્રમાણે વિનય સૂચક વચના કહેનારા તેએક્ સને સેનાપતિ સુષેણે તેમના જ નગરાધિપત્યાદિ રૂપ પૂ પ્રસ્થાપિત હાદ્દાઓ ઉપર યથાવત્ ચાલુ રાખીને તેમને વિસર્જિત કરી દીધા. વિસર્જિત કર્યા પહેલાં સેન પતિ સુષેણે તેમને વસ્ત્રાદિ અપી'ને તેમના સત્કાર કર્યો અને આદર પૂર્વક વચા વડે તેમનુ સન્માન કર્યુ હતુ. આ પ્રમાણે પેત પેાતાના સ્થાને ઉપર જવા માટે સેનાપતિ વડે વિસર્જિત કરવામાં આવેલા તે સવ અધિકારી વગેરે લેાકો પેાત પેાતાના નગરી તેમજ પત્તન તરફ જતા રહ્યા. તેએ સવ જતા રહ્યા ત્યારબાદ સેનાપતિએ શું કર્યુ” એ Page #698 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६८४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे आभरणाणि रयणाणिय पुणरवि तं सिंधुनामधेज्जं उत्तिण्णे अणहसासणबले तहेव भरहस्स रणो णिवेएइ' तस्मिन् काले सेनापतिः-सेनानीः सुषेणः सविनयः अन्तर्धतस्वामिभक्तिकः सन् 'धेतूण' गृहीत्वा प्राभूतानि आभरणाणि भूषणानि रत्नानि च पुनरपि भूयोऽपि तां सिन्धुनामधेयाम् महानदीमुत्तीर्णः 'अणहसासणबले' अक्षतशासनबलः, तत्र अणह शब्दोऽक्षतपर्यायो देशीशब्दस्तेन अणहम् अक्षतं कचिदपि अखण्डितं-शासनम् आज्ञा बलं च यस्य स तथा तहेव' भरहस्स रन्नो' तथैव यथार स्वयं स्वाधीनं कृतवान् तथा २ भरतस्य राज्ञः-भरताय राज्ञे निवेदयति-कथयति णिवेइत्ता य' निवेद्य च निवे दनं कृत्वा 'अप्पिणिता य पाहुडाई प्राभृतानि अर्पयित्वा च प्रस्थितः ततो भरतो यत्कृतवान् तदाह- 'सक्कारिय सम्माणिए सह रिसे विसज्जिए सगं पडमंडवमईगए' ततः घेत्तूण पाहुडाइं आभरणाणि भूमणाणिय पुणरवि तं सिंधुणामधेग्ज उत्तिण्णो) विनय पूर्वक जिसने अपने हृदय में स्वामी भक्ति धारण की थी ऐसे सुषेण सेनापति ने भेट में प्राप्त हुए सभी प्राभृतांको अर्थात् आभूषणादि को एवं रत्नों को लेकर सिंधुनदी को पार की. (अणयसा. सणबले) वह सुषेण सेनापति अक्षत शासन एवं अक्षत बल वाला था यहां 'अणह' यह शब्द देशी है एवं अक्षत का वाचक हैं शासन शब्द का अर्थ आज्ञा एवं बलका अर्थ सैन्य है इस प्रकार अक्षत शासन एवं बल युक्त सुषेण सेनापति ने (भरहस्स रण्णो णिवेदेइ) जिस क्रम से विजय प्राप्त किया उसे यथाक्रम सभी वृत्तांत आ करके भरत राजा से कहे-(णिवेइत्ता य अप्पिणित्ता य पाहुडाइं सकारिम सम्माणिए सहरिसं विसज्जिए) सब समाचार कह कर और भेटमें प्राप्त सब वस्तुओं को भरत के लिये देकर के उनके द्वारा प्रचुर द्रव्यादिसे सत्कारित हुआ और बहुमान सूचक शब्दों से और वस्त्रा दिकोसे सम्मानित हुआ वह सुषेण सेनापति हर्षसहित विसर्जित होकर-(सगंपडमंडवमइगए) अपने पटमंडपमें-दिब्य पटकृतमंडप में अथवा समयमा सूत्रा२ ४ छ-(ताहे सेणावइसविणओ घेत्तूण पाहुडाई आभरणाणि भूसणाणिय पुनरवि तं सिधुणामधेज उत्तिण्णो। विनय सहित २ पोताना हायनी १२ स्वामिनी ભત ધ રણ કરી રાખી છે. એવા તે સુષેણ સેનાપતિએ ભેટમાં પ્રાપ્ત કરેલા સર્વ પ્રાજૂ ताने सामने भूषवान तम २त्नाने न सिंधू नहीन पा२ ४३१. (अणयसासण बले ) से सुषेय सेनापति क्षत शासन तम अक्षत म सनतो. ही "अणह" આ શબ્દ દેશી શબ્દ છે. અને અક્ષતને પર્યાયવાચી છે શાસન શબ્દને અર્થ આજ્ઞા અને બળનો અથ સૈન્ય છે. આ પ્રમાણે અક્ષત શાસન અને બળ સમ્પન્ન થયેલા તે સુષેણ सेनापति (भरहस्ल रपणो णिवेपइ) २ भथी विभय प्राध्या इता. तभथी अधा समाया। विगतकारशीने द्या.(णिवेइत्ता य अप्पिणित्ता य पाहुडाई सक्कारिए असम्माणिए सहरिसं विसज्जिए) A समाचारे ४ीन भने लेटमा त स परंतु न भने ભરત રાજાને આપી ને તથા તેમના વડે પ્રચુર દ્રવ્યાદિથી સસ્કૃત થઈને બહુમાન સૂચક શબ્દોથી અને વસ્ત્રાદિકથી સન્માનિત થઈને તે સુષેણ સેનાપતિ હર્ષ સહિત રાજા પાસેથી विसति ने (सगं पडमंडयमइगप) पाताना ७५मा हिय ५कृत भयमा अथवा Page #699 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटोका तृ० वक्षस्कारः सू० १३ सुषेणसेनापतेविजयवर्णनम् प्रभुणा स्वामिना भरतेन सुषेणः सेनापतिः सत्कारित प्रचुरद्रव्यादिभिः, सम्मानितो बहुमानवचनादिभिः वस्त्रादिभिश्च अतएव सहर्षः प्राप्तप्रचुरसत्कारत्वात् विसृष्टः स्वस्थानगमनाय अनुज्ञातः सन् स-सेनापतिः स्वकं निजं पटमण्डपं-दिव्यपटकृतमण्डपं मध्यमपदलोपी समासः षटमण्डपोपलक्षितं प्रासादं वा सुषेणः सेनापतिः अतिगतः प्राविशत् 'तएणं सुसेणे सेणावईण्हाए कयबलिकम्मे कयकोउयमंगलपायच्छित्ते' ततः खलु स सुषेणः सेनापतिः स्नातः कृतबलिकर्मा-बायसादिभ्यो दत्तान्न भागः कृतकौतुक मङ्गलप्रायश्चित्तः सन् 'जिमिय भुत्तत्तरागए समाणे जाव' जिमितः भुक्तवान् राजविधिना, भुक्त्युत्तरं-भोजनोत्तरकाले आगतः सन् उपवेशनस्थाने, अत्र यावत् पदात् 'आयंते चोक्खे परमसुई भूए' इतिग्राह्यम् , आचान्तः शुद्धोदकेन कृतहस्तमुखशौचः चोक्षो लेपसिक्थाद्यपनयने, अतएव परमशुचीभूतः इदं च पदत्रयम् भुत्तुत्तरागए समाणे' इति पदात् पूर्व योज्यम् तथैव शिष्ट ननक्रमस्य दृश्यमानत्वात् पुन: सेनापतिः कीदृशोऽभूत इत्याहसरस गोसीस इत्यादि सरसगोसीस चंदणाणुक्खित्तगायसरीरे,सरस-गोशीर्षचन्दनोक्षितगा पटमंडप से उपलक्षित प्रासादमें-आगया (तएणं से सुमेणे सेणावई बहाए कयीलकम्मे कयकोउयमंगलपायच्छित्ते) वहां आकर के उस सुषेण सेनापति ने स्नान किया बलिकर्म कियाकाक आदि कों के लिये अन्न का विभागकिया-कौतुक मंगल प्रायश्चित किया(जिमियभुतुतरागए समाणे) बाद में राजविधि के अनुसार भोजन किया भोजन करने के बाद फिर वह उपवेसन स्थान में आया-यहां यावत्पद से-"आयते, चोक्खे परमसूईभूए" इन पदों का ग्रहणहुआ है भोजन कर चुकने पर शुद्ध जल से हाथ मुंह धोना इसकानाम आचान्त है शरीर पर पड़े हुए खाने के सीत आदि को दूर करना-इसका नाम चोक्ष है इस प्रकार सब १कार से शरीर को हाथ-मुह आदि धोकर और उसपर पडे हुए भोजन के अंश को हटाकर बिल कुल साफ सुथरा बनालेना इसका नाम परमशुचो भूत होना है इस पदत्रय की योजना "भुत्तुत्तरागए समाणे" इस पद से पूर्व करनी चाहिये क्योंकि शिष्ट जनो में इसी प्रकार का क्रम देखा गया है । (सरसमोसीसंचदणाणुक्खित्तगायसरीरे) ५८५थी पक्षित प्रासामा भावी जया. (तएणं से सुसेणे सेणावई पहाए कयवलिकम्मे कयकोउयमंगलपायच्छित्ते ) त्या मापाने ते सुखन सेनापतिथे स्नान यु. मतिम કર્યુ – કાક વગેરેને મ ટે અન્ન ભાગ અપત કરીને કૌતુક મંગળ અને પ્રાયશ્ચિત કર્યા (जिमिय भुत्तुत्तरागए समाणे) २०१६ २.विवि भु से न यु And ४शन पछी तपवेशन स्थानमा माये। मही यावत् ५६थी (आयंते चेक्खे परमसूई મુe ) એ પદેનું ગ્રહણ થયું છે. ભાજન કર્યા પછી શુદ્ધ પૂણીથી હાથ મો ધોવાં તે આચાન્ત કહેવાય છે. શરીર ઉપર પડેલા ભેજનના સીત વગેરે દૂર કરવા તે ચેક્ષ કહેવાય છે. આ પ્રમાણે સર્વરીતે હાથ મો વગેરે સ્વચ્છ કરીને અને શરીર ઉપર પડેલા ભેજનના કણેને હટાવીને શરીરને એકદમ સચછ બનાવી લેવું. તેનું નામ પરમ શુચીભૂત છે. એ પદત્રયની या (भुत्तुत्तरागप समाणे) पहानी पूर्व ४२वी मवेक्षित छ भ, शिष्ट साभां Page #700 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जेम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे शरीरः तत्र सरसेन गोशीर्षचन्दनेन उक्षिप्ताः सिक्ताः गात्रे शरीरे भवा गात्राः शरीरावयवाः वक्षाप्रभृतयो य: शरीरे तदेवं भूतं शरीरं यस्य स तथा अत्र यच्चन्दनेन सेचनमुक्तम् तत् मार्गमननितवपुस्तापव्यपोहाय 'उपि पासायवरगए' उपरि प्रासादवरगतः प्रासादवरं प्राप्तः स सेनापतिः सुषेणः 'फुट्टमाणेहि' स्फुटद्भिरिव अतिरभसा, स्फालनवशात् विदलद्भिरिव मुइंगमत्थएहि' मृदङ्गमस्तकैः तत्र मृदङ्गानां मृदङ्ग नामक वाद्य विशेषाणां मस्तकानीवमस्तकानि उपरितनभागाः उभयपाधैं चर्मोपनद्धपुटानीति तैः वत्तीसइ वद्धेहि' तथा द्वात्रिंशताऽभिनेतव्यप्रकारैः पात्रैर्वा बद्धैः उपसम्पन्नँ 'णाडएहिं' नाटकैः प्रसिदैः तथा 'वरतरुणी संपउत्तेहि' वरतरुणीभिः सुभगाभिः स्त्रीभिः संप्रयुक्तैः प्रारब्धैः' 'उवणच्चिज्ज माणे २' उपनृत्यमानः २ नृत्यविषयी क्रियमाण तदभिनयपुरस्सर नर्तनात्, ‘उवगिज्जमाणे २' उपगीयमानः २ तद्गुणग्रामात् 'उवलालि (लभि) जमाणे' उपलालिज्यमानः तदोप्सिताथेसम्पादनात् महयाहयणट्ट गोय वाइय तंतीतलतालतुडियजब सुषेण सेनापति भोजनादिकार्य से बिल कुल निवृत्त होकर निश्चिन्त हो चुका तब उसके शारीरिक अवयवों पर सरसगोशीर्ष चंदन छिडका गया यहां जो “गात्र शरीर" एकार्थक-वाचक दोशब्द प्रयुक्त हुए हैं सो इनमें गात्र शब्द का अर्थ-शारीरिक अवयव है ऐसे छाती आदिअवयव जिसके शरीर में है वह "सरसंगोशिर्षचन्दनोरिक्षप्तगात्रशरीरः" है यहां जो चन्दन से सेचन होना कहागया है वह इस बात को प्रगट करने के लिए कहा गया है कि उस चन्दन के सेचन से शुषेण सेनापति को जो मार्ग में चलने के कारण शारीरिक श्रम जन्यताप हुओ वड़ शान्त होगया (उप्पि पासायवरगए) इसके बाद वह सुषेण सेनापति अपने श्रेष्ट प्रासाद में पहुंचा वहां पर उसने पांच प्रकार के मनुष्य संबंध कामभोगों को भोगा ऐसा सम्बन्ध यहां लगा लेना चाहिये. (फुडमाणेहिं मुइंगम. स्थएहिं वत्तिसइबद्धेहि ण डाहिं वरतरुणीसंपउत्तेहिं उवणचिज्जमाणे २ उवगिज्जमाणे२ सतना भयामा आवे छे. (सरस गोसीसचंदणाणुक्खितगायसरीरे) न्यारे સુખે સેનાપતિ ભેજનાદિ કાર્યથો એકદમ નિશ્ચિત થઈ ગયા-ત્યારે તેના શારીરિક અવય ७५२ सरस गायन Bizामा मायु ही रे (गायसरीर) मे साथ पाय બે શબ્દ પ્રયુકત થયા છે તો એમાં ગાત્ર શબ્દનો અર્થ શારીરિક અવય. શતી વિગેરે જેના શરીરમાં છે. તે જ “સરસ ગેશીષ ચન્દનેક્ષિત ગાત્ર શરીર છે. અહીં જે ચન્દનથી સિંચિત થયેલું એવું કહેવામાં આવ્યું છે. તે આ વાતને પ્રકટ કરવા માટે કહેવામાં આવ્યું છે. કે તે ચંદનન સે મનથી સુ સેના પતિને જે માગમાં ચાલવાથી શારીરિક श्रम गन्य ता५ ५ ते ७५मित 45 mय (उदिप पासायवरगए) त्यार त સુષેણ સેનાપતિ પિતાના શ્રેષ્ઠ પ્રાસાદ માં ગયે ત્યાં તેણે પાંચ પ્રકારના મનુષ્ય સંબંધી आम नागीन सागच्या या स म द (फुट्टमाणेहिं मुइंगमस्थएहि बत्तिसइबद्धहि णाडपहिं वरतरुणिसंपउत्तहिं उवणचिज्जमाणे २ उगिज्जमाणे २ उवला लिज्जमाणे महयाहयणगीअवादित तंतितलतालतुडिअ घणमुइंग पटुप्पवाइयरवेणं Page #701 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ट. वक्षस्कारः स्० १३ सुषेणसेनापतेर्विजयवर्णनम् ६८७ घणमुग डुप्पवाइयरवेण महताऽहतनाट्य - गीतवादिततन्त्रात लतालतूर्यधनमृदङ्ग पटुवादितरवेण तत्र महता प्रधानन बृहता वा वेणेति सम्बन्धः अहतः अनुबद्धो रवस्येति विशेषणम् नाटयं नृतं तेन युक्तं नाट्यगीतं तच्च वादितानिच तानि शब्दवन्ति कृतानि तन्त्री च वीणा तौ च हस्तौ तालाश्व केशिकातुडियत्ति, तुर्याणि च पटहादीनि बादिततन्त्रीतलताळतूर्याणि तानि च तथा घनो मेघः तदाकारो यो मृदङ्गो ध्वनिगाम्भीर्य साधर्म्यात् सचासौ टुना दक्षेण प्रवादितश्च यः स मृदपटुवादितः सचेति द्वन्द्वे तेषां खः शब्दः तेन करणभूतेन अथवा 'आहयत्ति' आख्यानक प्रतिबद्ध यन्नाटकं तेन युक्तं यत्तद् गीतम् शेषं तथैव इह च मृदङ्गग्रहणं तूर्येषु मध्ये तस्य प्रधानत्वात् 'इट्ठे इष्टान् इच्छावि षयी कृतान् 'सफरिस रसरुवगंधे' शब्दस्पर्शर सरूपगन्धान् 'पंचविहे' 'पञ्चविधान्' 'माणुस्तर' मनुष्यकान् मनुष्यसम्बन्धिनः 'कामभोगे' कामभोगान् कामांश्च भोगांव उवलालिज्जमाणे २ महया हयणगी भवदिततंतीतल ताल तुडेअ घण मुइंगपडुप्पवाइयरवेणं इट्ठे सदफरिसरसरूवगंधे पंचविहे माणुस्सर कामभोगे भुजमाणे विहरइ) जिस समय वह अपने श्रेष्ट प्रासाद पर पहुँचा उस समय वहां पर मृदंग बजाये जा रहे थे ३२ प्रकार के अभिनयों से युक्त नाटक उसके निमित्त पात्रों द्वारा किये जा रहे थे इन नाटकों में काम करने वाली नाटकिय वस्तुओं को अभिनय द्वारा प्रकट करने वाली सुन्दर २ तरुण स्त्रियां थी वे उसमें नृत्य करती यी उसे यह सेनापति देखता था जिस बात को यह चाहता था उसी बात के अनुरूप नृत्यादी क्रियाओ से वे उसके मन को अनुरंजित करती थी नाटक में गाये गये गितों के अनुसार ह्रीं उन नाटकों मे बाजे बजाये जा रहे थे तन्त्रों भी बजा यी जा रही थी, ताल भी दिये जारहे थे पटह बजाये जारहे थे घन के जैपो मृदङ्गों की ध्वनि निकल रही थी इन सब वादित्रों को बजाने वाले वादक जन अपनी अपनी वाच क्रिया में बहु अधिक दक्ष थे इननाटकों में जो गीत गाये जाते थे वे सब नाटकीय आख्यातकों के सम्बन्ध से सम्बन्धित थे इस तरह यह सुषेण सेनापति अपनी इच्छा के अनुसार पांच प्रकार के शब्द, इट्ठे सदफरिसर सरूवगंघे पंचविहे माणुस्सप कामभोगे भुजमाणे विहरह) ने समये તે પેાતાના શ્રેષ્ટ પ્રાસાદ ઉપર પહોંચ્યા તે વખતે ત્યાં મૃગા વગાડવામાં આવી રહ્યાં હતાં તેના માટે રૂ૨ પ્રકારના અભિનયાથી યુક્ત નાટકે વિવિધ પાત્ર વડે ભજવવામાં આવી રહ્યાં હતાં, એ નાટકાની કથા વસ્તુઓને વિવિધ પ્રકારના અભિનયાથી સુ ંદર તરુણ શ્રીએ તેમાં નૃત્ય કરી રહી હતી. તેને તે સેનાપતિ જોતા હતા. જે વાતને એ સેનાપતિ ઈચ્છતે તે મુજબ જ તે સ્ત્રિએ નૃત્યાદિ ક્રિયાઓ વડે તેના મનને જિત કરતી હતી. નાટયમાં ગાવામાં આવતાં ગીતા મુજબ જ તે નાટકેમાં વાદ્યો વગાડવામાં આાવી રહ્યાં હતાં, તંત્રી પણ વગાડવામાં આવી રહી હતી, તાલ પણુ આપવામાં આવતા હતા. પટહા વગાડવામાં આવી રહયા હતા, વાદળા જેવા ગંભીરમૃદંગામાંથી નિ નીકળી રહ્યો હતા. એ સવ વાદિત્રા વગાડનાર વાદ્યક કલાકારા પેાતાની કળામાં ખહુ જ દક્ષ હતા, તે સવ નાટકામાં જે ગીત ગાવામાં આવતા હતા. તે સર્વે નાટકીય આખ્યાનકાથી સંબધિત હતા. આ પ્રમાણે તે સુષેણ સેનાપતિ પાતાની ક઼ચ્છામુજબ પાંચ પ્રકારના શબ્દો સ્પશ', Page #702 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६८८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे इति प्राप्तसंज्ञकान् तत्र शब्दरूपे कामौ स्पर्शरसगन्धा भोगा इति समयपरिभाषा, 'भुंजमाणे' भुञ्जानः अनुमवन् स सेनापतिः सुषेणो विहरतीति ॥ ०१३ ॥ अथ तमिस्रा गुहाद्वारोद्घाटनायोपक्रमते 'तएणं से' इत्यादि । मूलम-तरण से भरहे राया अण्णया कयाई सुसेणं सेणावई सदाas सावित्ता एवं वयासी गच्छणं खिप्पामेव भो देवाणुपिया तिमिसगुहाए दाहिणिल्लम्स दुवारस्स कवाडे विहाडेहि विहाडित्ता मम एय माणत्तियं पच्चष्पिणाहि त्ति, तरणं से सुसेणे सेणावई भरणं रण्णा एवं वत्समाणे तु चित्तमाणदिए जाव करयलपरिग्र्गाहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि कट्टु जाव पडिसुणेइ पडिणित्ता भरहस्स रण्णो अंतियाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव सए आवासे जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता दव्भसंधारगं संथर, जाव कयमालस्स देवस्स अट्ठमभत्तं परिण्हइ पोसहसालाए पोसहिए भयारी जाव अट्ठमभत्तसि परिणममाणंसि पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता हाए कयबलिकम्मे कयकोउयमंगलपायच्छिते सुद्धप्पावेसाई मंगलाई वत्थाई पवरपरिहिए अप्पमहग्घाभरणालंकियसरीरे धूव पुष्पगंध मल्लहत्थगए मज्जणघराआ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खभित्ता जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा तेणेव पहारेत्थ गमणाए तरणं तस्स सुसेणस्स सेणावइस्स बहवे राईसरतलवरमाडंबिय जाव सत्तापयियो अप्पेगइया उप्पलहत्थगया जाव सुसेणं सेणावई पिट्ठओर अणुगच्छंति, तरणं तस्स सुसेणस्स सेणावइस्स बहईओ खुज्जाओ चिलाइआओ जाव इंगिअ चिंतिअ पत्थि विआणिआउ णिउणकुसलाओ विणीआओ अप्पेगइआओ कलसहत्थगयाओ जाव अणुगच्छंतीति । तएण से सुसेणे सेणावई सव्विदीए सव्वजुईए स्पर्श, रस, रूप और गन्ध से संबंन्धित पांच प्रकार के मनुष्यभव मे भोगने के योग्य काम भोगा को भोगने लगा ॥१३॥ રસ, રૂપ અને ગધથી સંબંધિત પાંચ પ્રકારના મનુષ્ય ભત્રમાં ભેળવવા યોગ્ય કામ લેગે લાગવવા લાગ્યા. ૫૧૩ગા Page #703 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० १४ तमिस्रागुहाद्वारोद्घाटननिरूपणम् ६८९ जाव णिग्घोसणाइएणं जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स् दुवारस्स कवाडा तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता आलोए पणामं करेs करिता लोमहत्थेण पमज्जइ पमज्जित्ता दिव्वाए उदगधाराए अक्खे अब्भुक्खित्ता सरसेणं गोसीसचंदणेण पंचंगुलितले चच्चए दलइ दलित्ता अग्गेहि वरेहिं गंधेहिय मल्लेहिय अच्चिणित्ता पुप्फारुहणं जाव वत्थाहणं करेइ करिता आसत्तोसत विपुल वट्ट जाव करेइ करिता अच्छे सिरिणामहिं अच्छरसा तंडुलेहिं तिमिस्स गुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडं पुरओअट्ठट्ठमंगलए आलिहइ तं जहा सोत्थिय सिखिच्छ जाव कयग्गहगहिअ करयलप भट्ट चंदप्पभवइरवेरुलिअ विमिल दंडं जाव धूवं दलयइ दलयित्ता वाम जाणुं अंचेइ अंचित्ता करयल जाव मत्थए अंजलि कट्टु कवाडाणं पणामं करेइ करिता दंडरयणं परामुसइ तरणं तं दंडरयणं पंच लइअं वइरसारमइअं विणासणं सव्वसत्तसेण्णाणं खधावारे णरवइस्स गडद रिविसमपन्भारगिरिवरपवायाणं समीकरणं संतिकरं हितकरं रणोहियइच्छिअमणोरहपुरगं दिव्व मप्पsिहयं दंडरयणं गहाय सत्तट्ठपयाई पच्चीसक्कइ पच्चासक्कित्ता तिमिस्सगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडे दंडरयणेणं महया महया सद्देणं तिक्खुत्तो आउडेइ तरणं तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा सुसेणे सेणावइणा दंडरपणेणं महा महया सदेणं तिक्खुत्तो आउडिआ समाणा महया महया सद्देणं कोंचाखं करेमाणा सरसरस्स सगाईं सगाईं ठाणाईं पच्चोसक्कित्था तरणं से सुसेसेावई तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडे विहाडे विहाडित्ता जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता जाव भरहं रायं करयलपरिग्गहियं जपणं विजएणं वद्धावे, वद्धावित्ता एवं वयासी विहाआिण देवाणुप्पिया तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुबारस्स कवाडा एयणं देवाणुप्पियाणं पियं णिवेएमो पियं मे भवउ तरणं से भरहे राया सुसेणस्स सेणावइस्स अंतिए एयम सोच्चा निसम्म ८७ Page #704 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे हट्ठतुट्ठ चित्तमाणदिए जाव हिअए सुसेणं सेणावई सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारित्ता सम्भोणित्ता कोडुबियपुरिसे सदावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! आभिसेक्कं हत्थिरयणं पडिकप्पेह हयगयरह पवर तहेव जाव अंजणगिरिक्डसण्णिभं गयवरं णरवई दुरूढे ॥सू०१४॥ छाया-ततः खलु स भरतो राजा अन्यदा कदाचित् सुषेण सेनापति शब्दयति शब्दयित्वा एवमवादीत् गच्छ खलु क्षिप्रमेव भो देवानुप्रिय ! तमिस्रा गुहाया दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ विघाटय, विघाटय मम एतामाज्ञप्तिकां प्रत्यर्पय इति, ततः खलु स सुषेणः सेनापतिः भरतेन राशा एवमुक्तः सन् हृष्टतुष्ट चित्तानन्दितः यावत् करतलपरिगृहोतं शिरसावत्त मस्तके अञ्जलिं कृत्वा यावत् प्रतिशृणोति, प्रतिश्रुत्य भरतस्य राज्ञः अन्तिकात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव स्वस्य आवासः यत्रैव पौषधशाला तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य दर्भसंस्तारकं संस्तृणाति, यावत् कृतमालस्य देवस्य अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति, पौषधशालायां पौषधिक: ब्रह्मचारी यावत् अष्टमभक्ते परिणमति, पौषधशालातः प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव मजनगृहं तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य स्नातः कृतवलिकर्मा कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्तः शु. छप्रावेशानि मङ्गलानि वस्त्राणि प्रवरपरिहितः अल्पमहा_भरणालङ्कृतशरीरः धूपपुष्पगन्धमाल्यहस्तगतः मजनगृहात् प्रतिनिष्क्रोमति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव तमिस्राया गुहाय द्वारस्य कपाटौ तत्रैव गमनाय प्रधारितवान् ततः खलु तस्य सुषेणस्य सेनापतेः बहव्यो राजेश्वरतळवरमालम्बिक यावत सार्थवाहप्रभृतयः अप्येकका उत्पलइस्तगता यावत सुषेणं सेनापति पृष्ठतः २ अनुगच्छन्ति, ततः खलु तस्य सुषेणस्य सेनापतेः बयः कुब्जाः चिलात्याः यावत्हङ्गितचिन्तितप्रार्थितविशायिकाः निपुणकुशलाः विनीताः अप्येककाः कलशहस्तगताः यावद् अनुगच्छन्तोति । ततः खलु स सुषेणः सेनापतिः सर्वद्धर्या सर्वयुत्या सर्वद्यु. स्यावा यावत् निर्घोषनादितेन यत्रैव तमिस्रागुहाया दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ तत्रैव उपागच्छति उपागत्य आलोके प्रमाण करोति, कृत्वा लोमहस्तकं परामृति परामृश्य तमिस्रागुहायाः दक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ लोमहस्तकेन प्रमार्जयति प्रमार्य दिव्यया उदकधारया अभ्युक्षति, अभ्युक्ष्य सरसेन गोशीर्षचन्दनेन चचितं पञ्चांगुलितलं ददाति दत्वा अग्रः वरैर्गन्धैश्च माल्यैश्च अर्चयति अर्थयित्वा पुष्पारोपण यावत् वस्त्रारोपणं करोति कृत्वा आसक्तोत्सत विपुलवत यावत् करोति कृत्वा अच्छैः प्रलक्ष्णैः रजतमयैः आच्छरसतण्डुलैः तमिस्त्रागुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्थ कपाटयोः पुरतः अष्टाष्टमङ्गलकानि आलिखति तत स्वस्तिक श्रीवत्स यावत् कचग्रहगृहीतकरतल प्रभ्रष्ट चन्द्रप्रभवज्रवैयविमलदण्डं यावत् धूपं दहति, वामं जानुम् अञ्चति अश्चित्वा करतल यावत् मस्तके अञ्जलिकृत्वा कपाटयोः प्रणामं करोति कृत्वा दण्डरत्नं परामृशति, ततः खलु तद् दण्डरत्नं पञ्चलतिकं वज्रसारमयं विनाशनं सर्वशत्रुसेनानां, स्कन्धावारे नरपतेः गर्तदरीविषमप्राग्भार गिरिवर प्रपातानां समीकरण शान्तिकरं शुभकरं हितकरं राशो हृदखेप्सितमनोरथ पूरकं दिव्यमप्रतिहतम्, दण्डरनं गृहीत्वा सप्तष्ट पदानि प्रत्यवश्वष्कते प्रत्यवष्वष्कय तमिस्रागुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ दण्डरत्नेन महता २ शब्देन त्रिः कृत्व: आकुट्टयति ततः खलु तमिस्रागुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटा सुषेणसेनापतिना वण्डरस्नेन महता २ शम्देन Page #705 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० १४ तमिस्रागुहाद्वारोद्घाटन निरूपणम् त्रिकृत्वः आकुट्टितौ सन्तौ महता शब्देन कौंचारवं कुर्वन्तौ 'सरसरस्स' अनुकरणशब्देन, स्वके स्थाने प्रत्यवाष्वष्किषाताम् स्वकाभ्यां स्थानाभ्यां प्रत्यवस्तृतौ इति वा ततः खलु स सुषेणः सेनापतिः तमिस्रगुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ विघाटयति विघाटय यत्रैव भरतो राजा तत्रैव उपागच्छति, उपागत्य यावत् भरतं राजानं करतलपरिगृहीतं जयेन विजयेन वर्द्धापयति वर्द्धापयित्वा पवम् अवादीत् विघाटितौ खलु देवानुप्रिय ! afar गुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ, एतदेव देवानुप्रियाणां प्रियं निवेदयामः प्रियं भवतां भवतु ततः खलुस भरतो राजा सुषेणस्य सेनापतेः अन्तिके पतम् अर्थं श्रुत्वा निशम्य हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः यावद् हृदयः सुषेणं सेनापति सत्कारयति सन्मानयति, सत्कार्य सन्मान्य कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति शब्दयित्वा एवम् अवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! अभिषेक्यम् हस्तिरत्नं प्रतिकल्पयत हयगजरथप्रवर तथैव यावद् अञ्जनगिरिकूटसन्निभं गजवरं नरपतिः दूरूढे ॥ सू० १४॥ टीका- 'तणं से इत्यादि 'तरणं से भरहे राया अण्णया कयाई सुसेणं सेणावइँ सदावेइ' ततः खलु स भरतो राजा अन्यदा कदाचित् अन्यस्मिन् कस्मिश्चित् काले सुषेणं सेनापतिं शब्दयति आह्वयति 'सावत्ता एवं वयासी' शब्दयित्वा आहूय, एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् 'गच्छ विपामेव भो देवाणुप्पिया' गच्छ खलु क्षिप्रमेव भो देवानुप्रिय ! 'तिमिसगुहाए | तमिस्त्रागुहाद्वार का उद्घाटन- 'तरण से भरtराया अण्णया कयाई' -- इत्यादि ० १४ ॥ टीका 'तएण से भरहे राया अण्णया कयाई) एकदिन की बात है कि भरत राजा (सुसे णं सेणावई सदावेइ ) सुषेण सेनापति को बुलाया - (सद्दवित्ता एवं वयासी) बुलाकर उस से ऐसा कहा - (गच्छणं ख़िपामेव भो देवाणुप्पिया ! तिसिगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडे विहाडेहि ) हे देवानुप्रिय ! तुम शीघ्र ही जाओ - और तमिस्त्रागुहा के दक्षिण भाग के द्वार के विडों को खोलो (विहाडित्ता) और खोल कर ( मम एयमाणत्तियं पञ्चपिणाहि ) मुझे पिछे खबर दो - - તમિસ્રાણુહાદ્વારનુ ઉદ્ઘાટન 'तपण से भरहे राया अण्णया कयाई छत्याहि ६९१ टीअर्थ - (त पणं से भरहे राया अण्णया कयाइ) मे हिवसनी वात हे हे भरत रानमे (सुलेण सेणाव सहावेह) सुणेषु सेनापतिने मासान्या (सहावित्ता एवं वयासी) मोसावाने तेने या प्रभाषे ऽधु ं (गच्छणं खियामेव मेा देवाणुपिया ! तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवास्स कवाडे वाडेहि ) हे हेवानु प्रिय ! तमे शीघ्र भवे। भने तभिस्त्रागुडाना दृक्षिष्ट भागना द्वारना उभाडने उद्घाटित उरो (विहाडित्ता) उद्घाटित हरीने (मम पयमाणत्तियं • Page #706 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बुद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे दाहिणिस्स दुबार कवाडे विहाडेहि' तमिखागुहायाः दाक्षिणात्यस्य - दक्षिणभागस्य द्वारस्य कपाटौ विघाटय-सम्बद्धौ उत्पाटय 'विहाडित्ता' विघाटय उद्घाटय 'मम एयमाणत्तियं पच्चष्पिणाहि त्ति' मम एताम् उक्तप्रकारामाज्ञप्तिकाम् आज्ञां प्रत्यर्पय समर्पय इति 'तणं से सुसेणे सेणावई भरहेणं रण्णा एवं वुत्ते समाणे' ततः खलु स सुषेणः सेनापतिः भरतेन राज्ञा एवम् उक्तप्रकारेणोक्तः सन् 'हट्ठतु चित्तमाणंदिए जाव' हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः यावत् पदात् नन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमनस्थितः इति संग्राह्यम् 'करयल परिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु जाव पडणेह' करतलपरिगृहीतं शिरसावते मस्तके अञ्जलिं कृत्वा यावत् पदात् एवं स्वामिन ! यथा श्रीमान् भवान् आदिशति तथाsस्तु इति कृत्वा अज्ञायाः विनयेन वचनं प्रतिशृणोति स्वीकरोति 'पडिणित्ता' प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य स सुषेणः सेनापतिः 'भरहस्स रण्णो अंतियाओ पडिणिक्स्वमइ' भरतस्य राज्ञः अन्तिकात् समीपात् प्रतिनिष्क्रामति निस्सरति, 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निःसृत्य ६९२ (तएण से सुसेणे सेणावर भरणं रण्णा एवं बुत्ते समाणे हक तुटु चित्तमाणदिए जाव करयल परिग्गाहियं दसणहं सिरसावत्तं मत्थए अनलि कट्टु नाव परिसुणेइ) इस प्रकार से अपने स्वामी भरत राजा के द्वारा आज्ञप्त हुआ सुषेण सेनापति हृष्ट तुष्ट होता हुआ चित्त में आनन्दित हुआ यहां यावत्पद, से “ प्रीतिमनाः परमसौमनस्थितः " इनपदों का ग्रहण हुआ है उसने उसी समय अपने दोनों हाथों की अंगुली इस प्रकार से बनाइ कि जिसमें अंगुलियों के दशों हि नख एक दूसरी अंगुली के नखों के साथ लग गये उस अंजली को उसने अपने मस्तक पर रखा - और यावत् - "हेस्वामिन् ! आपने जो मुझे आदेश दिया है मैं उसको उसी प्रकार से पालन करूंगा" इस प्रकार कह कर उसने प्रभु की प्रदत्त आज्ञा बड़ी विनय के साथ स्विकार करली (पडिड़ित भरहस्स रण्णो अंतियाओ पढीनिक्खमइ) प्रभु की आज्ञा स्विकार करके फिर वह पच्चष्पिणाद्दि) पछी भने अमर आये. (त एणं से सुसेणे सेणावर भरणं रण्णा एवं वुत्ते समाणे हट्ट तुट्ठ चित्ताणंदिर जाव करयलपरिग्गद्दियं दसणई सिरसावत्तं मत्थर अजलि कट्टु जाव पडणे) या प्रमाणे पीताना स्वामी भरत रान्न वडे भाज्ञप्त थथेो। ते सुणेषु सेनापति हृष्ट-तुष्ट तेन वित्तमां मोनहित थये। यावत् पहथी 'प्रीतिमनाः परमसौमन स्थितः 'ये होतु ग्रहलु युं छे. तेथे तर पोताना मन्ने हाथोनी भांगजी थे। खेवी રીતે મનાવી કે જેથી માંગળીએના દશેક્શ ના દરેકે દરેક નખની સાથે સ'લગ્ન થઈ ગયા તે અલિને તેણે પાતાના મસ્તક ઉપર મૂકી અને યાવત્—હૈ સ્વામિન્ આપશ્રીએ મને જે આદેશ આપ્યા છે, હું તે આદેશનુ યથાવત્ પાલન કરીશ આ પ્રમાણે કહીને તેણે अलुनी आज्ञा विनयपूर्व स्वीरी सोधी (पडिलुणिन्ता भरहल रण्णा अंतियाओ पडिणिक्खमइ) प्रभुनी आज्ञा स्वीअरीने पछी ते तरत बहार भावी गये। 'पडिणिक्खमित्ता नेणेव सपआवाले जेणेव पोलहसाला तेणेव उधागच्छ महार भावीने ते ज्यां पोतानो Page #707 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः स्० १४ तमिनागुहाद्वारोदाटननिरूपणम् ६९३ 'जेणेव सए आवासे जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव स्वस्य स्वकीयस्य आवासः-निवासस्थानं यत्रैव पौषधशाला तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य स सुषेणः सेनापतिः 'दब्भसंथारगं संथरइ' दर्भसंस्तारकं सार्द्ध द्वयहस्तपरिमितं दर्भासनं संस्तृणाति विस्तृणाति 'जाव कयमालस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्हइ' यावत् करणार वर्द्धकिरत्नशब्दापनपौषधशाला विधापनादि सर्व ग्राह्यम् , तेन पौषधशालायां कृतमालस्य देवस्य साधनाय अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति 'पगिण्हित्ता' प्रगृह्य 'पोसहसालाए पोसहिए बंभयारी जाव अट्ठमभत्तसि परिणममाणंसि पोसहसालाओ पडिणिक्खमई' पौषधशालायां पौषधिकः पौषधव्रतवान् अतएव ब्रह्मचारी यावत् पदात् उन्मुक्तमणिसुवर्णालङ्कार इत्यादि संग्राह्यम् अष्टमभक्ते परिणमति 'परिपणे जायमाने सति' पौषधशालातः प्रतिनिष्क्रामति, 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य 'जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छई' स सुषेणः सेनापतिः वहां से शीघ्र ही बाहर आगया-(पडिणिक्वमित्ता जेणेव सए आवासे जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ) वहां आकर वह जहां पर अपना आवास था और जहां पर पौषधशाला थो- वहां पर आया (उवागच्छित्ता दब्भसंथारगं संथरइ) वहां आकर के उसने २॥ हाथ प्रमाण दर्भासन बिछाया-- (जाव कयमालस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्हइ) यावत् कृतमालदेव को वश में करने के लिए उसने अष्टमभक्त की तपस्या धारण करली यहां यावत् से पदसे वर्द्धकिरत्न का बुलाना, पौषधशाला का निर्मापण करने का आदेश देना आदि सब प्रकरण जैसा पिछे लिखा जा चुका है वैसाहो यहां गृहीत हुआ है(पगिण्हित्तासहसालाए पोसहिए बंभयारी जाव अट्ठमभत्तंसि परिणममाणप्ति पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ) अष्टम भक्त को तपस्या धारण करके पौषध शाला में पोषधव्रत वाला वहब्रह्मचारी यावत् मणिमुक्तादि केअलङ्कारों से रहित बनकर कृतमालदेव का मनमें ध्यान करने लगा यहां पर जैसा कि पूर्व प्रकरण में लिखा जाचुका है वह सब ग्रहण कर लेना चाहिये जब सुषेण सेनापति का गृहीत अष्टम भक्त का तप समाप्त हो चुका तब वह पौषधशाला से बाहर निकला-(पडिणिक्खमित्ता जेणेव मजणघरे तेणेव उवागच्छइ) और बाहर निकल भावास भन या पोषण ती त्या माव्या (उवागच्छित्ता दम्भसंथारगं संथरह) त्यां भावीन तो २॥ काय प्रमाणे मसिन पाथर्यु (जाव कयमालस्स देवस्स अट्ठमभत्त पगिण्हर) યાવત્ કૃતમાલ દેવને વશમાં કરવા માટે તેણે અષ્ટમ ભકતની તપસ્યા ધારણ કરી લીધી. અહીં યાવત પદથી વહેંકિરત્નને બોલાવ, પૌષધશાળાના નિર્માણ માટે તેને આદેશ આપ વગેરે સર્વ ઘટનાઓકે જેના વિષે પહેલાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવેલ છે. તે અત્રે પણ સમજવી. (पगिण्हित्ता पासहसालाए पासहिए बंभयारी जाव अg'मभत्तसि परिणममाणसि पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ) मष्टम सतनी तपस्या धा२५ प्रशन पौषधशालामा पौषत पाणी તે બ્રહ્મચારી યાવત્ મણિમુકતાદિ અલંકારોથી રહિત બને તે મનમાં કુતમાલદેવનું ધ્યાન કરવા લાગ્યો અહીં જે પ્રમાણે પૂર્વ પ્રકરણમાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યું છે તે પ્રમાણેનું કથન ગ્રહણ કરવું જોઈએ જ્યારે સુષેણ સેનાપતિની અષ્ટમભકત તપસ્યા સમાપ્ત થઈ ગઈ ત્યારે Page #708 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे यत्रैव मज्जनगृहं-स्नानगृहं तत्रैव उपागच्छति ‘उवाच्छित्ता' उपागत्य ‘ण्हाए कयबलिकम्मे' स्नातः कृतबलिकर्मा वायसादिभ्यो दत्तान्न भागः पुनः कीदृश 'कयकोउयमंगलपायच्छित्ते' कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्तः पुनश्च 'सुद्धप्पावेसाइं मंगलाई वत्थाई पवरपरिहिए' शुद्ध प्रावेशानि सभा प्रवेशयोग्यानि मङ्गलानि-मङ्गलकारकाणि वस्त्राणि प्रवराणि परिहितः परिगृहीत :अप्पमहग्घाभरणालंकिरिय सरीरे' अल्पमहा_भरणालङ्कृतशरीरः तत्र अल्पम् अल्पभारं महायं बहुमूल्यकमाभरणं तेन अलङ्कृतं शोभितं शरीरं यस्य स तथा एवम् 'धूवपुप्फगंधमल्लहत्थगए' धूपपुष्पगन्धमाल्यहस्तगतः तत्र धूपपुष्पगन्धमाल्यानि हस्ते गतानि यस्य स यथा एवंभूतः सेनापतिः 'मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ मज्जनगृहात् स्नानगृहात् प्रतिनिष्कुमति निःस्सरति 'पडिजिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निःसृत्य 'जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स कवाडा तेणेव पहारेत्थ गमणाए' यत्रैव तमिस्रागुहायाः दाक्षिणात्यस्य दक्षिणभागवर्तिनो द्वारस्य कपाटौ कपाटश्च कपाटश्च त्रिषु स्यादररं न ना इति वाचस्पतिः तत्रैव गमनाय प्रधारि तवान् गमनसंकल्पं कृतवान् कर वह जहां स्नान गृह था वहां पर गया-(उवागच्छित्ता) वहां जाकर के (हाए कयबलिकम्मे कयको उयमंगलपायच्छित्ते)उसने स्नान किया बलिकर्म किया-काक आदिको के लिये अन्न का वितरण किया , फिर कौतुक मंगल प्रायश्चित्त किये-बादमें (सुद्धप्पावेसाई मंगलाई वत्थाई पवरपरिहिए) सभामें प्रवेश करने के लायक, मङ्गल कारक सुन्दर वस्त्रों को पहिरा (अप्पम इग्धाभरणालंकियसरीरे धृवपुप्फगंधमल्लहत्थगए-मज्जगघराओ पडिणिक्खमइ) शरीर पर अल्प पर कीमत में बहुत मूल्य वाले आभरणों को धारण किया हाथ में धूप, युष्प गंध, एवं मालाएँ लीं इस प्रकार से मज धज कर वह स्नान घर से बाहर आया (पडिणिक्वमित्ता जेगेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा तेणेव पहारेत्थ गमणाए) बाहर आकर वह जहां पर तिमिस्त्रागुहा के दक्षिण भागवर्ती द्वारों के किवाड थे उस ओर चल. दिया-(तएणं तस्स सुसेणस्स सेणावइस्स बहवे) उस समय उस सुषेण-सेनापति के अनेक पौधशाणामांधी पार नीज्यो. (पडिणिक्खमित्ता जेणेव मज्जणधरे तेणेव उवागच्छइ भने पार नीजी२. ५i स्नान गृह हेतु त्यां गये.. (उवागच्छित्ता) त्यां ने (ण्हाए कयबलिकम्मे कयकाउयमंगलपायच्छित्ते) तेथे स्नना यु भनेपछी मसी में यु એટલે કે કાક વગેરેને અન્ન વિતરિત કર્યું ત્યારબાદ કૌતુક મંગળ અને પ્રાશ્ચિત્ત વિધિ सम्पन्न ४१. अना ५छ। (सुद्धप्पावेसाइं वत्थाई पवरपरिहिए) सभामा प्रवेश ४२१॥ योग्य भय ४२४ वस्त्र पर्या (अप्पमहग्धाभरणालंकियसरीरे धूव पुष्पगंधमल्ल हत्थगए मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ) शरीरे 6५२ ५८५ ५ पहुभूख्य सासर धारण र्या डायमा ધૂપ પુષ્પ ગંધ તેમજ માળાએ લીધી અને આ પ્રમાણે સુસજજીત થઈને તે નાનગૃહમાંથી बहा२ माव्या. (पडिणिमित्ता जेणेव तिमिसगुहाए दाहिल्लस्स दुवारस्स कवाडा तेणेव पहारेत्थ गमणाए) ११२ वी यो तिमिसालाना दक्षिण भागवती द्वारा पाटो sala त२३ २वाना थये।. (त एणं तस्स सुसेणस्स सेणावइस्स बहवे) a समये तसुषे Page #709 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० ३ पक्षस्कारः सू० १४ तमिस्रागुहाद्वारोद्घाटननिरूपणम् ६९५ 'तए णं तस्स सुसेणस्स सेणावइस्स बहवे राइसरतलवरमाडं विय जाव सत्थवाहप्पभियओ' ततः तमिस्रागुहागमनसङ्कल्पानन्तरं खलु तस्य सुषेणस्य सेनापतेः बहवः राजेश्वर तलवर माडम्बिक यावत् कौटम्बिक इभ्यश्रेष्ठी यावत् सार्थवाहप्रभृतयः सेनापति मनुगच्छन्तीत्यग्रेण सम्बन्धः अत्र यावत् पदात् गणनायक दण्डनायक मन्त्रिमहामन्त्रीत्यादयः पूर्वोक्ताः सर्वे ग्राह्याः 'अप्पेगइया उप्पलहत्थगया जाव सुसेणं सेणावई पिट्टओ २ अणुगच्छति' राजेश्वरादीनां मध्ये अप्येके उत्पलहस्तगता:-उत्पलानि कमलानि हस्ते येषां ते तथा, एवं सर्वाण्यपि विशेषणानि अत्र भरतस्य चक्ररत्नपूजां कर्तुमुधतस्येव वाच्यानि यावत् पदात् अप्येके कुसुमहस्तगताः अप्येके नलिन हस्तगताः, अप्येके सौगन्धिक हस्तगताः अप्येके पुण्डरीकहस्तगताः अप्येके सहस्रपत्रहस्तगताः इति संग्राह्यम् एते एवंभूताः सन्तः सुषेणं सेनापतिं पृष्ठतः २ अनुगच्छन्ति यान्ति 'तएणं तस्स सुसेणम्स सेणावइस्स बहूईओ खुज्जाओ चिलाइयाओ जाव इंगियचिंतियपत्थियविआणिआउ णिउण(राईसरतलवरमाडंबिय जाव सत्थवाहप्पभियओ अप्पेगइया उप्पलहत्थगया जाव सुसेणं सेणावई पिट्ठओ पिट्ठओ अणुगच्छंति) राजेश्वर तलवर मडम्बिक यावत् सार्थवाह आदि जन उस सुषेण सेनापति के पीछे यावत् उत्पल को लिये हुए चल रहे थे. यहां प्रथम यावत् शब्द से "गणनायक, दण्ड नायक' मंत्री, महामंत्री आदि जनों का ग्रहण हुआ है, इनमें कितनेक तो अपने अपने हाथों में उत्पल लिये हुए थे 'तथा द्वितीय यावत् पदानुसारः' कितनेकने अपने अपने हाथों में कुसुम लिये हुए थे, कितनेकने अपने अपने हाथों में नलिन-कमल विशेष-लिये हुए थे. कितनेकने अपने अपने हाथोंमें सौगन्धिक-कमल विशेष लिये हुए थे कितनेकने अपने अपने हाथों में पुण्डरीक लिए हुए थे. कितनेकने अपने अपने हाथों में सहस्त्रदलों वाला कमल लिये हुए थे" इन पदों का ग्रहण हुआ है। (तएणं तस्स सुसेणस्स सेणावइस्स बहुइओ खुजाओ चिलाइयाओ जाव इंगिय चिंतिय पत्थिय विआणिआउ निउणकुसलामओ विणीयाओ सेनापतिना मन (राइसर तलवर माडंबिय जाव सत्थवाहप्पभियओ अप्पेगइया उप्पलहत्थ गया जाव सुसेण सेणावई पिओ पिट्ठओ अणुगच्छंति २श्वरी, तलवारी, भांति यावत સાર્થવાહ વગેરે લોકો જે સુષેણ સેનાપતિની પાછળપાછળ યાવત્ ઉત્પલો લઈને ચાલી રહ્યા હતા. અહીં પ્રથમ યાવત શબદથી ગણનાયકે, દંડ નાયકે, મંત્રીઓ, મહામંત્રીઓ વગેરેનું ગ્રહણ થયું છે. એમાં કેટલાક કે તે પોત પોતાના હાથમાં ઉપલો લઈને ચાલી રહ્યા હતા. તેમજ દ્વિતીય યાવત પદાનુસાર કેટલાક પોત પોતાના હાથમાં પુષ્પો લઈને ચાલી રહ્યા હતા. કેટલાક પિતાના હાથમાં નલિને-કમળ વિશેષો-લઈને ચાલતા હતા. કેટલાક હાથમાં સૌગંધિકે (કમલ વિશેષ) લઈને ચાલતા હતા કેટલાક હાથમાં પંડરિકે લઈને ચાલતા હતા. કેટલાક પિતાના હાથમાં. સહસ્ત્રદલ કમળે લઈને ચાલતા हेत. स. ५:ो अ यया छे. (तपणं तस्स सुसेणस्स सेणावइस्स बहुइओ खुजाओ चिलाइयाओ जाव इंगिय चिंतिय पत्थिय विमाणिआउ निउणकुसलाओ विणीयाबी Page #710 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे कुसलाओ विणोआओ अप्पेगइयाओ कलसहत्थगयाओ जाव अनुगच्छंतीति' न केवलं राजेश्वरप्रभृतयः सुषेणं सेनापति मनुगच्छन्ति अपितु किङ्करी जना अष्टादश दास्यः अपि कास्ता इत्याह कुब्जाः-बक्रजङ्घाः, चिलात्या:-चिलातदेशोद्भवाः यावत्पदात् वामनिकाः वडभिकाः, बर्बर्यः बकुशिकाः, जोनिक्यः, पल्हविका इत्यादयोऽष्टादश तत्तदेशोद्धवत्वेन तत्तन्नामिकाज्ञेयाः, कुब्जा वामनिका वडभिका इत्येतातिरस्तु विशेषणभूताः इत्यादिपूर्ववत् तत्र पूर्वापेक्षयाऽयं विशेषः किं लक्षणाश्चय्यः ? 'इंगीय चिंतिय पत्थियविआणिआऊ' इङ्गितचिन्तितप्रार्थित विज्ञायिकाः, तत्र इङ्गितेन नयनादि चेष्टयैव कथनादिभिः चिन्तितं प्रभुणा मनसि संकल्पितं यद्यत् प्रार्थितं तस्य विज्ञायिकाः याः ताः तथा, तथा निपुणकुशलाः अत्यन्त कुशलाः, तथा विनीताः आज्ञाकारिण्यः अप्येकिकाः अप्पेगइयाओ कलसहत्थगयाओ जाव अणुगच्छंति) केवल सुषेण सेनापति के पीछे पीछे राजेश्वर आदि जनमंडलीही नही चल रहा था कन्तु उनके पीछे पीछे १८ प्रकार की दासियां भी चल रही थी-उनके नाम इस प्रकार से हैं-कोई कोई दासियां चिलात देशोद्भवाथी, इसलिये उन्हें चिलात कहा गया है. यावत्पद से गृहीत कोई कोई दासियां बर्बर देश की थी इसलिये उन्हें बर्बरी कहा गया है . कोई बकुश देश को थी इसलिये उन्हें बकुशिका कहा गया है कोई कोई जोनिक देश को थी इसलिये उन्हें जोनिकी कहा गया है 'कोह कोइ पन्हवदेशकी थी इसलिये उन्हें पल्हविका कहा गया है . इनमें कितनोक दासियां कुब्जा वक्र नहाओं वाली थी, कितनीक बामन-बोने शरीर वाली थी. और कितनीक दासियां बदनिका थी ये सब चेटियां-दासियां नयनादिकी चेष्टा से ही कथन की तो बात दूर ही रही प्रभु के द्वारा चिन्तित मन में संकल्पित किये गये विषय को, तथा प्रार्थित्त विषय को जान जाती थी तथा ये अपने काम में निपुण कुशल-अत्यन्त कुशल थी साथ साथ में अप्पेगश्याओ कलसहत्थगयाओ जाव अणुगच्छति) मुंगे सेनापतिना पाछ पाछ त રાજેશ્વર વગેરે જનમંડળી જ ચાલી રહી હતી એવું નથી પણ તેની પાછળ ૧૮ પ્રકારની દાસીઓ પણ ચાલી રહી હતી. તેમનાં નામ આ પ્રમાણે છે. કેટલીક દાસીઓ ચિલાત શેદભવી હતી, એથી તેમને ચિલાત કહેવામાં આવે છે, ચાવત પદથી ગૃહીત કેટલીક દાસીઓ બM૨ દેશની હતી, એથી તેમને ખબરી કહેવામાં આવી છે. કેટલીક દાસીઓ બકુશ દેશની હતી, એથી તેમને બકુશી કહેવામાં આવી છે. કેટલીક દાસીઓ જેનિક દેશની હતી એથી તેમને નકી કહેવામાં આવી છે. કેટલીક દાસીઓ પહહવ દેશની હતી એથી તેમને પહહવિકા કહેવામાં આવી છે. એ દાસીઓમાં કેટલીક દાસીએ કુજ વક્રજંઘાએ વાળી હતી. કેટલીક વામન ઠીંગણું શરીરવાળી, કેટલોક દા સીએ વડમિકા હતી, એ બધી દાસીઆમાંથી કંઈક કહ્યા પહેલાં જ નયનાદિની ચેષ્ટાઓથી, પ્રભુ વડે ચિંતિતમનમાં સંક્રપિત કરવામાં આવેલા વિષયને તથા પ્રાતિ વિષયને જાણી લેતી હતી, એ દાસીઓ પોતાના કામમાં નિપુણ કુશળ–અત્યંત કુશળ હતી, એ દાસીએ વિનીત અને આજ્ઞા કારિણી પણ હતી. એમાં કેટલીક દાસીઓના હાથમાં ચન્દનના કળ હતા અહી યાવત્ પદથી પ Page #711 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू०१४ तमिस्रागुहाद्वारोद्घाटननिरूपणम् कलशहस्तगताः यावत् अनुगच्छंति, यावत् पदात् पूर्वोक्तं सर्व ग्राह्यम् 'तएणं से मुसणे सेणावई सव्विद्धीए सव्वजुइ जाव णियोसणाइएणं जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस दुवारस्स कवाडा तेणेव उवागच्छइए' ततः तमिस्रागुहाभिमुखगमनान्तरं खलु स सुषेण: सेनापतिः सर्वद्धर्या सर्वया ऋद्धया आभरणादि रूपया लक्ष्म्या तथा सर्वयुत्या सर्वकान्त्या युक्तः सन् यावन्निर्घोषनादितेन पूर्वोक्तसमस्तवाधसहित निर्घोष नामक वाद्यविशेषशब्देन यत्रैव तमिस्रागुहाया दाक्षिणात्यस्य-दक्षिणभागवर्तिनो द्वारस्य कपाटौ तत्रैवोपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य-कपाटसमीपमागत्य 'आलोए पणानं करेइ' आलोके दर्शनमात्रे एव कपाटयोः प्रणामं करोति 'करित्ता' कृत्वा 'लोमहत्थगं परामुसइ' लोमहस्तकं प्रमार्जनिकां परामृशति हस्तेन स्पृशति गृह्णातीत्यर्थः 'परामुसित्ता' परामृश्य गृहीत्वा 'तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडे लोमहत्येणं पमज्जइ' तमिस्त्रा गुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ लोमहस्तकेन प्रमार्जनिकया प्रमाजयति 'पमज्जित्ता' प्रमाय॑ 'दिवाए उदगधाराए अन्भुक्खेइ' दिव्यया उदकधारया अभ्युक्षति सिंचति स्नपयतीत्यर्थः, 'अब्भुक्खित्ता' अभ्युक्ष्य सिक्त्वा ये विनीत आज्ञा कारिणी थी. इनमें कितनीक दासियों के हाथ में चन्दन के कलश थे. यहां यावत्पद से पूर्वोक्त सब विषय गृहीत हुआ है . (तएणं से सुसेणे सेणावई सम्विद्धीए सव्वजुईए जाव णिग्घोसणाईएणं जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुबारस्स कवाडा तेणेव उवागच्छइ )इस प्रकार वह सुषेण सेनापति अपनी समस्त ऋद्धि से और समस्त पुति से युक्त हुमा यावत् बांजों के गडगडाहट के साथ साथ जहां पर तिमिस्रा गुहा के दक्षिण द्वार के किवाड़ थे वहां पर आ पहुचा. (उवागच्छित्ता आलोए पणामं करेइ , करिता लोम हत्थगं परामुसइ.) वहां आकर उसने उन कपाटों को दिखते ही प्रणाम किया प्रणाम करके फिर उसने लोमहस्तक प्रमानिका- को उठाया (परामुसित्ता तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्त कवाडे लोम हत्थेणं पमज्जइ )उसे उठाकरके उसने तिमिस्र गुफा के दक्षिण दिग्वीदा रके कपाटों को साफ किया-(पमज्जित्ता )साफ करके (दिव्वाए उदगधाराए अन्भुक्खेह ) फिर उन पर उसने दिव्य-उदक की धारा छोडी अर्थात् दिव्य उदक धारा के उन पर छोटे ४ सव विषय संडीत थय। 2. (त पणं से सुसेणे सेणावह सम्विद्धीए सव्वजुइए जार णिग्घोसणाइए णं जेणेव तिमिस गुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा तेणेव उवागच्छ) આ પ્રમાણે તે સુષેણ સેનાપતિ પિૉની સમસ્ત ધિઅને સમસ્તઘતિથી યુકત થયેલે યાવત વાલોના ધ્વનિ સાથે જ્યાં તિમિસ્રા ગુહાના દક્ષિણ દ્વારના કમાડ હતાત્યાં આવી પહોંચ્યા 'उवाच्छित्ता आलोप पणाम करेइ करित्ता लोमहत्थगं परामुसाइ) त्या भावीनता ડેને જોઈને પ્રણામ કર્યા પ્રણામ કરીને પછી તેણે લેમ હસ્તક પ્રમાનિકા હાથમાં લીધી. 'परामसित्ता तिमिसगुहाए दाहीणिल्लस्स दुवारस्स'कवाडे लोमहत्थेणं पमज्जह) डायमा asa तिभित्र गुडाना क्षिपिता द्वारा पाने साई ध्या(पमज्जित्ता) साई चीन 'दिव्वाए उदगधाराप अम्भुक्खेइ) पछी त भनी ७५२ हिय था। हीरो , Page #712 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६९८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'सरसेणं गोसीसचंदणेण पंचंगुलितले चच्चए दलइ' सरसेन रससहितेन गोशीर्षचन्दनेन गोरोचनमिश्रितचन्दनविशेषेण चर्चितम् अनुलिप्तम् पञ्चांगुलितलं ददाति 'दलइत्ता अग्गेहिं वरेहिं गधेहिय मल्लेहिय अच्चिणेइ' अग्रैः-अपरिभुक्तैः अभिनवैरित्यर्थः वरैः श्रेष्ठैः गन्धैश्च माल्यैश्च अर्चयति स सुषेणः सेनापतिः कपाटौ पूजयति 'अच्चिणित्ता' अर्चयित्वा 'पुप्फारुहणं जाव वत्थारुहणं करेइ' पुष्पारोपणम् यावत् वस्त्रारोपणम् यावत् पदात् माल्यारोपणे वर्णारोपणं चूर्णारोपणम् आभरणारोपणं करोति 'करित्ता' कृत्वा 'आसत्तो सत्तविपुलवट्ट जाव करेइ' आसक्तोत्सतविपुलवतयावत्करोति तत्र आसक्तः आ अवाङ्मुखः अधोमुखो भूत्वा सक्तः भूमौ संलग्नः उत्सतः उ-उपरि संबद्धः यः विपुल: विशालः वर्तः गोलाकारः यावत् चाक्यचिक्ययुक्तः मुक्कादामविलम्बिविम्बः वितानः चंदनवा इति भाषाप्रसिद्धः सः सौन्दर्यादि गुणग्रामगरिष्ठो यथा स्यात् तथा करोति-संयोजयति । 'करित्ता' कृत्वा 'अच्छेहि' अच्छैः बिमलैः 'सण्हेहिं' श्लक्ष्णै अतिप्रतलै चिक्कदिये(अब्भुस्खेत्ता सरसेणं गोसीसचदणेणं पंचगुलितले च वए दलइ) दिव्य उदक धारा के छीटे देकर फिर उसने सरस गोशीर्ष चन्दन से-गोरोचनमिश्रित चन्दन से--अनुलिस पञ्चाङ्गलितल दिया अर्थात् गोशीर्ष चन्दन के वहां पर हाथे लगाये-(अग्गेहिं वरेहि गंधेहिय मल्छेहिय अच्चिणेइ) इसके बाद फिर उस सुषेण सेनापतिने उन कपाटों को अभिनव श्रेष्ट गन्धों से और मालाओं से पूजा की. (अच्चिणित्ता पुप्फारुहणं जाव वत्थारुहणं करेइ) पूजा करके फिर उसने उनके ऊपर पुष्पों का आरोहण यावत् वस्त्रों का आरोहण किया । यहां यावत्पद से "माल्यारोपणं वारोपणं चूर्णारोपणं आभरणारोपणं करोति" इस पाठ का संग्रह हुआ है (करित्ता आसत्तोसत्तविपुल वट्ट जाव करेइ) इन सब वस्तुओं का वहां पर आरोपण करके फिर उसने उनके ऊपर एक चन्दरवा ताना जो आकार में गोल था। तथा विस्तृत था । नीचे की ओर उसकामुख यावत् वह चाक्यचिक्य से युक्त था । मुक्ता दाम से वह विशिष्ट था। तथा जिस प्रकार से उसके सौन्दर्य की अभिवृद्धि हो-इस ढंग से वह सजाया गया था। (करित्ता अच्छेहि सण्हेहि हव्यधाराना तमनी. 6५२ ७iटनाच्या (अब्भुक्खेत्ता सरसेण गोसीसचंदणेणं पंचंगुलितले चच्चए दलइ) 8 पान ७in 02 पछी तो स२स शीष यह था मोशेयर મિશ્રિત ચન્દનથી અનુલિપ્ત પંચાંગુલિતલ એટલે કે એ શીષ ચંદનના ત્યાં હાથના થાપાએ साव्या. (अग्गेहि वरेहि गंधेहिय मल्लेहिय अच्चिणेइ) त्या२ माह ते सुषेण सेनापति पाटानी लिन श्रे०१ धाथी भने भाजपाथी पूल ४N 'अच्चिणिता पुष्फारुहणं जाव वत्थारुहणकरेह ) पू. ४शन त तमनी ५२ पनुमा यावत् १२त्रानुसार १ माडी याय.प.५६ यी (माल्यारोपणं वापिणं चुरोपणं आभरणारोपणं करोति) 20 48 ना सह थथे। छे. (करित्ता आसत्तौ सत्त विपुल वट्ट जाव करेइ) ये स १२तुमानु' તેમની ઉપર અરોપણ કરીને પછી તેણે તેમની ઉપર એક વિસ્તૃત, તેમજ ગોળ ચંદરવો બાંધે તે ચંદરવાની નીચેનો ભાગ ચાકચિક્યથી (ચ કકદાર) યુકત હતો. તેમજ જે રીતે તે ચરવાના સૌન્દર્ય માં અભિવૃદ્ધિ થાય તે રીતે તેને સુસજિજત કરવામાં આવ્યો હતે. Page #713 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० १४ तमिस्रागुहाद्वारोद्घाटननिरूपणं ६९९ गैरित्यर्थः 'सेहिं' श्वेतै रययामएहिं ' अच्छरसतण्डुलैः तत्र अच्छो निर्मलो रसो बिम्बो येषां ते अच्छरसाः प्रत्यासन्न वस्तु प्रतिविम्वाधारभूता इव अतिविमला इति भावः एवं भूतैः तण्डुलै : 'तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडाणं पुरओ अट्ठ मंगलए fort' तमिस्रागुहायाः दाक्षिणात्यस्य दक्षिणदिगवर्त्तिनो द्वारस्य कपाटयोः पुरतः अग्रे अष्टाष्टमङ्गलानि स्वस्तिकादयोऽष्टाष्टमाङ्गल्यवस्तुनि आलिखति अ 1-1 सावचनात् प्रत्येकमष्टौ अष्टौ आलीखतीति विज्ञेयम्, तान्येव अष्टप्रदश्यन्ते 'तं जहा । सोत्थिय सिरिच्छं जाव' इति तद्यथा स्वस्तिक १ श्री वत्स २ यावत् नन्दिकावते ३. वर्द्धमानक ४ भद्रासन ५ कलश ६ मत्स्य ७ दर्पणानि अष्टमङ्गलकानि 'आलिहिता' रययामएहिं अच्छर सातंडुलेहिं तिमिस्सगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडाणं पुरओ अट्ठ मंगलए आलिहइ ) चन्दरवा को किवाड़ों के ऊपर बांधकर फिर उसने स्वच्छ महीन चांदी के चावलों से कि जिनमें स्वच्छता के कारण पास में रही हुई वस्तुओं का प्रतिविम्ब पड़ता था । तिमिस्रगुहा के दक्षिण द्वारवर्ती उन किवाड़ों के समक्ष आठ आठ मंगल द्रव्यों का आलेखन किया अर्थात् प्रत्येक मंगल द्रव्य आठ आठ की संख्या में लिखे । "तं जहा " वे आठ मंगल द्रव्य इस प्रकार से हैं --(सोत्थिय - सिरिबच्छ जाव कयग्गह गहिय करयलपन्भट्ठचंदप्पभवइरवेरुलियविमलदंड) स्वस्तिक, श्री वत्स यावत्-नन्द्यावर्त, वर्द्धमानक, भद्रासन, कलश, मत्स्य और दर्पण । यहां यावत् पद से इस पाठ का ग्रहण हुआ है । (आलिहित्ता काऊरं करे, वारं पाडलमल्लिय चंद्रगअसोग पुण्णाग चूयमंजरी णत्रमल्लिय वकुलतिलग कणवीर कुंदकोज्जय कोरंटय पत्तदमणयवरसुरहिं सुगंधगंधियस्स) इस पाठ का अर्थ इस प्रकार से है- एक एक को आठ आठ रूप में लिखकर फिर उसने उन पर रंग भरा रंग भरकरके फिर उसने उन सब का इस प्रकार से उपचार किया गुलाबके फूल, बेलाके फूल, चम्पक के फूल, अशोक के फूल, करिता अच्छे सण्हेहि रययामपहि अच्छरसातंडुलेहि तिमिस्स गुहाप दार्हिणिल्लस्स दुवारस्य कवाडाणं पुरओ अट्ठट्ठमंगलप आलिहा ) यंदरखाने पाटोनी उपर गांधीने पछी તેણે સ્વચ્છ ઝીણા ચાંદીના ચાખાથી કે જે ચાખાએામાં સ્વચ્છતાને લીધે પાંસે મૂકેલી વસ્તુઓનુ પ્રતિષિ’ખ પડી રહ્યું હતું તિમિસ્ર ગુહાના દક્ષિણુ દ્વારવતી તે કપાટોની સામે આઠ આઠ માંગલ દ્રવ્યેાનું આલેખન કર્યું એટલે કે પ્રત્યેક મંગળ દ્રવ્ય આડે આઠ જેટલી A'vani avu. (á 1) À is an ad. (alfeau-faftass: जाव कयग्गहगहियकरयलप भट्ट ? चंदप्पभवइरवेरु लिय विमलदंड ) स्वस्ति, श्रीवत्स यावत् नधानत, पचमान, भद्रासन, उद्वशः मत्स्य अने हर्ष शु. अडी यावत पहथी आ चाहना संग्रह थयो छे, (आलिहित्ता काउरं करेइ, उवयारंति किंते पाडलमल्लिय चंपग असोग पुण्णाग चूथ मंजरीणवमल्लिय बकुल तिलगकणबीर कुंदकीजय कोरंटय पन्त दमणयवरसुरहि सुगंधगंधियस्स) भा પાઠના અર્થ આ પ્રમાણે છે-એક એક-મગળ દ્રશ્યને આઠ આઠ રૂપમાં લખીને તેણે તેમનો ઉપર રંગ ભર્યાં. રંગ ભરીને પછી તે તેણે તે સર્વોના આ પ્રમાણે ઉપચાર કર્યાં. ગુલાબના પુષ્પા વેલાના પુષ્પા, ચંપકના પુષ્પા” Page #714 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नम्बूद्धोपप्राप्तिसूत्रे मालित्य आकारं कृत्वा 'काऊरं' अन्तवर्णकादि भरणेन पूर्णानि कृत्वा 'करेइ उवयारं जि' करोति उपचारमिति कोऽसौ उपचार इत्याह 'किंते' ! कोऽसौ तत्राह- 'पाडलमदिलय चंपग असोग पुण्णाग चूयमंजरी णवमालिय बकुलतिलग कणवीरकुंदकोज्जय कोरंटय पत्तदमणय वरसुरहि सुगंधगंधियस्स' पाटल मल्लिका चम्पकाशोक पुन्नाग चूतमजरी नवमालिका बकुलतिलक कणवीरकुन्द कुब्जक कोरण्टकपत्रदमनक वरसुरभि मुगन्धगन्धिकस्य तत्र पाटलं-पाटलपुष्पम् (गुलाब) इति प्रसिद्धम् मल्लिका-मल्लिका विकचितपुष्पम् (वेलोति) भाषाप्रसिद्धम् चम्पका शोकपुन्नागाः पुष्पविशेषाः, चूतमउजरी आम्रमञ्जरी, बकुल: केसरो यः स्त्रीमुख सीधुसिक्तो विकसति तत्पुष्पम् , तिलको यः स्त्री कटाक्षनिरीक्षितो विकसितो भवति तत्पुष्पम् , कणवीर कुन्दे प्रसिद्ध, कुब्जकम् कुलो नाम वृक्षविशेषस्तत्पुष्पम् , पत्राणि दमनकः पुष्पविशेषः एतैः वरसुरभिः अत्यन्त सुरभिः तथा मुगन्धाः शोभनचूर्णाः तेषां गन्धो यत्र स तथा तस्य अत्र तद्धितलक्षण इक् प्रत्ययः ततः विशेषणद्वयस्य कर्मधारयो बोध्यः इदञ्च कुसुम निकरस्येत्यस्य विशेषणम् यावत् पद्ग्राह्यम् , पुनश्च ‘कयागहगहिय करयल पन्भट्ट चंदप्पभवइरवेरुलियविमलदंडं जाव धृवं दलयइ' कचग्रहग्रहीत करतल प्रभ्रष्ट चन्द्रप्रभवज्रबैयविमलदंडं यावत् धूपं दहति, अत्र कचग्रहेत्यादेः प्रभ्रष्टेत्यन्तस्य कचग्रहगृहीत करतलविप्रमुक्त प्रभ्रष्टस्य दशार्दवर्णस्य पञ्चवर्णस्य कुसुमनिकरस्य पुष्पपुञ्जस्य तत्र चित्र जानुत्सेधप्रमाणमितम् अवधिनिकरं कृत्वा एतावत्पर्यन्तं तात्पर्यम्, तत्र कचग्रहो विलासार्थ युवत्याः पञ्चाङ्गुलिभिः केशेषु ग्रहणं तन्यायेन गृहीतः तथा तदनन्तरं करतलाद्वि प्रमुक्तः सन् प्रभ्रष्टः पतितः तस्य तथा दशार्द्धवर्णस्य पञ्चवर्णस्य कुसुमनिकरस्य पुष्पराशेः तत्र कपाटपरिकरभूमौ जान्त्सेधप्रमाणमितम् जानुं यावदुच्चत्वप्रमाणपरिमितम् अष्टाविंशत्यंगुलरूपम् अवधिनिकरम् अवधिना मर्यादया निकरं विस्तारङ्कृत्वा 'चंदप्प वडरवेरुलियविमलदंड जाव धृवं दहइ' चन्द्रप्रभाः चन्द्रकान्ताः वज्राणि-हीरकाः वैडूर्याणि वैडर्यनामक रत्नानि वज्रञ्चमणि रत्नभक्तिचित्रमित्यारभ्य कडुच्छुकं प्रगृह्य पुन्नागके फूल, आम्रकी मञ्जरी, बक्लकी केशर-तिलक के पुष्प, कनेर के पुष्प, कुब्जक के पुष्प, दमनक मरुवां-के पुष्प जो कि बहुत ही सुगंध से युक्त होते हैं उन पर चढाये इसके बाद उसने कचग्रह की तरह गृहीत पश्चात् करतल से प्रभ्रष्ट दशार्दू वर्ण वाले पुष्पनिकर का वहां पर जानुत्सेधप्रमाण परिमित ढेर कर दिया फिर जिसका दंड चन्द्रकान्त वज्र एवं वैडूर्य से निर्मित हुआ है तथा यावत्पद गृहीत जिस में काञ्चन मणि और रत्नों से नाना प्रकार के અશેના પુ પુનાગના પુષ્પ, આમ્રની મંજરી, બકુલના કેશર, તિલકના પુષ્પો, કણેર ના પુપે કુકના પુપો, દમનક મરવાના પુપ કે જેઓ અતીવ સુગંધિત હોય છે. તેમની ઉપર ચડાવ્યાં. ત્યારબાદ તેણે કચ ગ્રહની જેમ ગૃહિત પશ્ચાત કરતલથી પ્રભ્રષ્ટ દશાબ્ધ વર્ણના ૫૫ નિકરને ત્યાં જાન્સેધ પ્રમાણે પરિમિત ઢગલો કર્યો. પછી જેમની દાંડી ચન્દ્રકાન્ત, વજા તેમજ વૈડૂર્યથી નિર્મિત થયેલી છે તેમજ યાવત પદ ગૃહીત જેમાં કાંચન મણી Page #715 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका १० ३ वक्षस्कारः सू० १४ तमिस्रागुहाद्वारोद्धाटननिरूपणम् ७.१ प्रयतः इत्यन्तं ग्राह्यम् एतादृश विशेषणविशिष्टम् ‘कडच्छुकं' धूपाधानपात्रम् प्रगृह्य ग्रहीत्वा 'प्रयत:' सादरः आद्रियमाणो-धूपं ददाति दहतीत्यर्थः 'दहित्ता' दग्ध्या 'वाम जाणुं अवेइ दाहिणं जाणुं धरणियलंसि निहट्टु' इत्यपि ग्राह्यम् तथा च वामं जानुम् अञ्चति ऊर्ध्वकरोती, दक्षिण जानुं धरणीतले निहत्य स्थापयिवा पातयित्वा करयल जाव मत्थए अजलिं कटु कवाडाणं पणामं करेइ' करतल परिगृहीतं दशनख शिरसा-वते मस्तके अजलिङ्कृत्वा कपाटयोः प्रणाम करोति नमनीय वस्तुनः उपवारे क्रियमाणे आदावन्ते च प्रणामम्य शि ष्टव्यवहारौचित्यात् 'करित्ता' कृत्वा दंडरयणं परामुसइ' दण्डरत्नं परामृशति स्पृशति गृहाति 'तएण ते दडरयणं' ततः तदनु दण्डरत्नस्पर्शानन्तरं खलु तद्दण्डरत्न कीदृशं तदित्याह 'पंचलइयं' पञ्चलतिकम् पञ्चलतिका कत्तलिकारूपाः अवयवा यत्र तत्तथा पुनश्च कीदृशम् 'वइर सारमइअं 'वज्र सारमयम् वज्रस्य यत्सारं प्रधानद्रव्यं तन्मयम्-उद् घटितम् वज्रस्य यत्सारं प्रधानद्रव्यं तन्मयम्-तद् घटितम् वज्रवद् पुनश्च 'विणासणं सव्वसत्तू सेण्णणं' सर्वशत्रु सेनानां विनाशनं विनाशकम् पुनश्च कीदृशम् ‘खंधावारे परवइस्स गड्ढदरिविसमपन्भारगिरिवरपवायाणं समीकरण' स्कन्धावारे नरपतेः गत्तेंदरी विषमप्रायभारगिचित्र बनाये गये है ऐसे धूपकटाह को हाथ में लेकर बड़ी सावधानी से उसमें धूप जलाई (दहित्ता वामं जाणु अंचेई दाहिणं जाणुं धरणियलंसि निह १ करयल जाव मत्थए अंजलिं कटु कवाडाणं पणाम करेइ) धूपजला कर फिर उसने अपनी बाई जान को घुटने को जमीन से ऊपर रखा और दक्षिण जानु को जमीन पर स्थापित किया और दोनों हाथों की इस ढंग से अंजलि बनाइ कि जिसमें दो अंगुलियों के नख आपस में मिल जावे ऐसी अंजलि बनाकर उसने उस अंजलि को मस्तक पर रस्त्रकर दोनों किवाडों को प्रणाम किया क्योंकि नमनीय वस्तु के उपचार में मादि और अन्त में उसे प्रणाम किया जाता है ऐसा शिष्ट जनों का व्यवहार है । (करित्ता दंडरयणं परामुसइ) प्रणाम करके फिर उसने दण्डरत्न को उठाया (तएणं तं दंडरयणं पंचलइअं वइरसारमइअं विणासणं सव्व सत्तसेण्णाणं खधावारे णरवइस्स गड्डदारिविसमपब्भार. गिरिवरपवायाणं समीकरणं संतिकरं सुभकरं हितकरं रण्णो हियइच्छिय मणोरह पूरगं दिव्वमप्पडि. અને રનથી વિવિધ પ્રકારનાં ચિત્ર તૈયાર કરવામાં આવ્યાં છે એવા ધૂપકટાહ-ધૂપદાનીને साथमा न भूमा सावधानीथीत धू५ ४८मा ५५ संजाये। (दहित्ता वामं जाणु अचेह दाहिणं जाणु धरणियलंसि निहट्ट करयलजाव मत्थए अंजलि कट्ठ कवाडाण पणाम करेइ) ધૂપ સળગાવીને પછી તેણે પોતાના વામ ઘૂંટણને જમીન ઉપર સ્થાપિત કર્યો. અને બંને હોચાની આ પ્રમાણે શ્રદ્ધા બનાવી છે જેમાં દશ દશ આંગળીએાના નખ પરસ્પર ભેગા થઈ જય એવી આંગળીની મદ્રાબનાવીને તેણે તે અંજલીને મરતક ઉપર મૂકી અને બંને કપાટો પ્રણામ કર્યા. કેમકે નમનીય વસ્તુના ઉપચારમાં આ% તેમજ અંતમાં તેને પ્રણામ કરવામાં भाव छ, मेवा शिष्टाया२ छे. (करित्ता दंडरयण परामुसइ) प्रणाम ४शन त । रत्नन यु (त एणं तं दंडरयणं पंवलइअवहरसारमइ विणासणं सब्यसत्तुसेण्णाणं खंधावारे ग्वइस्स गडदरि विसमपन्भारगिरिवरपघायाणं समीकरणं संतिकरं सुभकरं हितकरं रणोहिय इच्छिय मणोहरपूरगं दिब्वमप्पडियं दंडरयणं गहाय सह पयाई पञ्चोलक्कई ) सेना भयो यdिst-salest ३५ ता. मे २त्न पना સાથી બનેલું હતું. સર્વ શત્રુઓ તેમજ તેમની સેનાઓને તે વિનષ્ટ કરનાર હતું રાજાના Page #716 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्वृद्धीपप्रचप्तिसूत्रे रिवरप्रपातानां समीकरणम् तत्र नरपतेः राज्ञः स्कन्धवारे सेनासमूहसन्निवेशे प्रस्तावाद् गन्तु प्रवृत्ते सति गर्तः गड्डा, इति भाषाप्रसिद्धम् दरी कन्दरा विषमः उन्नताऽवनता प्रारभाराः प्रकृष्टभाराः गिरिवरा अत्र गिरिशब्देन क्षुद्रगिरयो ग्राह्याः ये यात्रोन्मुखानां राज्ञां गच्छन्तः सैन्यसमूहस्य विध्न कराः सन्ति प्रपाताः गच्छतां जनानां स्खलनहेतवः पाषाणाः तेषां समीकरणम् समभागापादकम् 'संतिकर' शान्तिकरम् उपद्रवशान्तिकारकम् ननु यदि उपद्रवोपशामकं तत् तर्हि सति दण्डरत्ने सगरसुतानां ज्वलनप्रभ नागधिप कृतोपद्रवः कथं नोपशशाम इति चेन्न सोपक्रमोपद्रव विद्रावण एव तस्य सामर्थात अनुक्रमोपद्रव विद्रावणे सर्वथा तस्य सामर्थ्याभावात् अतएव विजयमाने वीरदेवे कुशिष्यमुक्ता तेजोलेश्या सुनक्षत्र सर्वानुमतो अन गारो भस्मतां निनायः, 'सुभकरं' शुभकरम् --कल्याणकरम् 'हितकर' हितकरम् उतैरेव गुणा रुपकारकारकम्, पुनः कोदृशम् 'रण्णो हिय इच्छियमणोरहपूरगं' हयं दंडरयणं गहाय सत्तट्ठपयाई पच्चोसक्कइ ) इसदण्ड के अवयव-पञ्चलति का कत्तलिका रूप थे-यह दण्डरत्न वज्र के सार से बना हुआ था समस्त शत्रुओं का और उनकी सेनाओं का यह विनाश करने बाला था ! राजा के सेना समूह के सन्निवेश में -पडाव में गड्ढों को दरीयों को,-कन्दराओं को-ऊंचे नीचे छोटे छोटे पर्वर्ती को, यात्रा के सन्मुख होकर जानेवाले राजाओं की सेना के फिसलकर गिरने में -कारणभूत होते हैं ऐसे पाषाणों को यह सम कर देता है तथा यह-शान्तिकर होता है-उपद्रवों को दूर कर देता है। यहां ऐसी आशंका हो सकतो है कि यदि यह दण्डरत्न उपद्रवों को शान्त करने की शक्तिबाला है तो दण्डरत्न के होने पर भी सगर के पुत्रोंका ज्वलनप्रभनागाधिप द्वारा किया गया उपद्रव शान्त क्यों नहीं हो पाया तो इसका समाधान ऐसो है की यह दण्डरत्न-सोपक्रम उपद्रवों को हो शान्त करने में शक्ति वाला होता है। अनुपक्रम उपद्रवो को शान्त करने की शक्तिवाला नही होता है इसलिए वीर देव के विद्यमान होने पर कुशिष्यमुक्त --तेजोलेश्या ने सुनक्षत्र और सर्वानुमति नामक दो अनगारों को भस्म कर दिया। यह चक्ररत्न शुभकर कल्याणकर होता है एवं हितकर उक्तगुणो द्वारा उपकार સૌન્ય સમૂહને રાગ્નિવેશમાં પડાવમાં ખાડાઓને હરિઓને કંદરાઓને ઊંચા નીચા પર્વને યાત્રા કરતી વખતે રાજાઓની સેના જેમના ઉપરથી લપસી પડે એવા પાષાણને એ સમ કરી નાખે છે. તેમજ એ શાંતિકર હોય છે. ઉપદ્વવેનું ઉપશમન કરે છે અહીં એવી શંકા થાય છે કે જે એ દંડરત્ન ઉપદ્રવને શાંત કરી શકે એવી શકિત ધરાવતું હોય તો દંડરત્ન હોય તે પણ સગરના પુત્રોનું જવલન પ્રભનાગાધિપ વડે કરવામાં આવ્યું તે વખતે ઉપદ્રવને ઉપશમ કેમ થયું નહી તો આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે આ દંડ રત્ન સોપક્રમ ઉપદ્રવ ને શાંત કરવા સમર્થ હોય છે અનુક્રમ ઉપદ્રને શાંત કરવાની શક્તિ એમાં હોતી નથી. અને એથી જ વીરદેવ વિદ્યમાન હતો છતાં એ કુશિષ્ય મુકતતે લેયાને સુનક્ષત્ર અને સર્વાનુમતી નામક બે અનગારે ને ભરામ કરી નાખ્યા. એ सरत्न शुभ७२-पक्ष्याय ४२ सोय छे. तेभर हित४२ हाय छे (रण्णो हिय इच्छिय मणोरह Page #717 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिकाटीका तु० ३ वक्षस्कारः सू० १४ तमिस्रागुहाद्वारोद्घाटननिरूपणम् राज्ञः चक्रवर्त्तिनो हृदयेच्छितमनोरथपूर कम्, गुहाकपटोदघाटनादिकार्य करणसमर्थत्वात् 'दिव्वं' दिव्यम् - यक्षसहस्राधिष्ठितमित्यर्थः 'अप्पडिहयं' अप्रतिहतम् - क्वचिदपि प्रतिघातमापन्नम् 'दंडरयणं' दण्डरत्नम् - दण्डनामकं रत्नम् 'गहाय' हस्ते गृहीत्वा 'सत्तपयाई पच्चसक्क ' सप्ताष्टपदानि प्रत्यवष्वष्कते अपसर्पति स सुषेणः सेनापति रिति अत्र सेनापतेः सप्ताष्टपदापसरणं प्रजिहीर्षोः दृढतरप्रहारकरणाय पच्चीस कित्ता' प्रत्यवष्वष्कय - सप्ताष्टपदानि अपसृत्य 'तिमिस्सगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडे दंडरयणेण महया महया सद्देणं तिक्खुत्तो आउडेइ' तमित्रगुहायाः दाक्षिणात्यस्य दक्षिणभागवर्तिनो द्वारस्य कपाटौ दण्डरत्नेन महता महता शब्देन त्रिःकृत्व-त्रीन् वारान् आकुयति ताडयति अत्र इत्थंभूतलक्षणे इति तृतीया, यथा प्रकारेण महान् शब्दः उत्पद्यते तथा प्रकारेण ताडयतीत्यर्थः ततः किं जातमित्याह - ' तरणं' इत्यादि करनेवाला होता है । ( रण्णो हियइच्छिय मणोग्हपूरगं ) चक्रवर्ती के हृदय में वर्तमान- इच्छित मनोरथ को पुरा करने वाला है क्यों की यहां गुहा के कपाटों के उद्घाटन आदि कार्योंको करता है । (दिव्यं) यक्ष सहस्र से यह अधिष्ठित होने के कारण दिव्य कहा जाता है (अप्पडियं) यह कहीं भी प्रतिघात को प्राप्तनहीं होता है इसलिए अप्रतिहत कहा गया है इस प्रकार के इन पूर्वोक विशेषणों से युक्त (दंडरयण गहाय दण्डरत्न को हाथ में लेकर ) सत्तट्ठपयाई पच्चीसकईवह सुषेण सेनापति सात आठ पैर पीछे हटा यहां जो प्रतिजिहीर्षसुषेण सेनापति का सात आठ पैर पिछे हटना प्रकट किया गया है वह उसके द्वारा दृढतर प्रहार प्रकट करने के लिए है (पञ्चो कित्ता) सात आठ पैर पिछे हटकर के (तिमिस्सगुहाए दाहिणिल्लस्स दुबारस्स कवाडे दंडरयणेणं महया २ सदेणं तिक्खुत्तो आउडेइ) फिर उस सुषेणसेनापति ने तिमिस्र गुहा के दक्षिण दिग्वर्ती द्वार के किवाडों को दण्डरत्न से जोर जोरसे जिससे शब्दों का निकलना हो इस रूप से तीनचार ताडित किया किवाड़ों पर तीन बार जोर २ से दण्ड कहा गया पूर) यावती ना यमां विद्यमान छत मनोरथ मे रत्नपूर होय छे. भ मे थारत्न गुझना पाटोने उद्घाटित वा वगेरे अरे छे. (दिव्वं) यक्षसहस्त्रोथी भे अधिष्ठित डोवा महस हिव्य वामां आवे छे ( अप्पडिहयं ) मे यत्न अर्थ पशु स्थाने પ્રતિઘાત દશાને પામતું નથી. એથી જ એને અપ્રિત કહેવામાં આવે છે. આ પ્રમાણે એ पूर्वोठित विशेषोधी युक्त ( दंडरयणं गहाय ) इंडेशनने हाथनां सह ने (सत्तट्ठ पयाई पच्चीसकर ) ते सुषेषु सेनापति सत या उगलां पाछे। अस्यो अडी ने प्रतिद्धीषु સુષેણુ સેનાપતિને સાત આઠ ડગલાં પીછે ડઠ કરવાનું લખ્યું છે તે તેના વડે દઢતર પ્રહાર प्रडेंट रवा भाटे उडेमां आवे छे. (पच्त्रोसकित्ता) उगवा पाछो भसीने 'तिमिस्स गुहा दाहलल दुवारस्स कवाडे दंडरयणेणं मद्दया २ सद्देणं तिक्खुत्तो आउडेइ) પાં તે સુષેણુ સેનાપતિએ તિમિસ્ર ગુહાના દક્ષિણુ દિગ્વતી દ્વારના કપાટાને દંડ રત્નથી હેર-જોરથી કે જેનાથી શબ્દ થાય એવી રીતે ત્રણુ વાર તાડિત કર્યા. એટલે કે કમાડા ઉપર ७०३ Page #718 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७०४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'तरणं तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा सुसेणसेणवरणा दंडरयणेणं महया महया सद्देण कौंचारखं करेमाणा' ततः आकुट्टनादनु खलु तमिस्रगुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ सुषेणनाम्ना सेनापतिना दण्डरत्नेन महता महता शब्देन त्रिः कृत्वः - त्रीन् वारान् आकुट्टितौ सन्तौ महता महता शब्देन दीर्घतरनिनादिनः क्रौंचस्य पक्षिविशेषस्येव बहुव्यापित्वात् य आरवः शब्दः तं कुर्वाणौ 'सरसरस्स सि अनुकरणशब्दस्तेन तादृशं शब्दं कुर्वाणो 'सगाई सगाई' स्वके स्वके- स्वकीये स्वकीये 'ठाणाई' स्थानेऽवष्टम्भभूत तोडकरूपे ' पच्चीस कित्था ' प्रत्यवाष्वाष्किषाताम् स्वस्थानात् प्रत्यपससर्पतुः 'तरण से सुसेणे सेणावई तिमिसगुहाए दाहिणिल्लदुवारस्स कवाडे विहाडे ' ततः कपाटप्रत्यपसर्पणादनु खलु स सुषेणः सेनापतिः तमिस्त्रागुडायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटी विघाटयति उद्घाटयति यद्यपि इदें सूत्रमावश्यकचूर्णी वर्द्धमानसूरिकृतादिचरिते च न दृश्यते, तदाऽव्यवहित पूर्वसूत्रे एव कपाटोद्घाटनम् अभिहितम्, यदि चैतत्सूत्रादर्शानुसारेण इदं सूत्रमवश्यं व्यारत्न पटका (तणं तिमिस गुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा सुसेणसेणावइणा दंडरयणेण महया २ सद्देणं तिखुत्तो आउडिया समाणा महया २ सदेणं कोचारवणं करेमाणी) इसतरहतिमिस्र गुहा के दक्षिणदिग्वर्ती द्वार के किवाड़ जो कि सुषेण नामक सेनापति रत्न के द्वारा तीन -बार दण्ड रन के पटकने से जोर जोर का शब्द जिस प्रकार निकले इस ढंग से पटकने पर, दीर्घतर शब्द करनेवाले क्रौंच पक्षी की आवाज की तरह आवज करते हुए तथा ( सरसरस्स सगाई २ ठाणई) सर सर इस तरह का शब्द करते हुए अपने स्थान से विचलित हों गयेसरक गये (तएण से सुसेणे सेणावई तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुबारस्स कवाडे विहाडेइ) इसके बाद उस सुषेण सेनापतिने तिमिस्र गुहाके दक्षिण दिग्वर्ती किबाडों को उद्घाटित कर दिया यद्यपि यह सूत्र आवश्यक चूर्णी में और वर्द्धमान सूरि कृतादि चरित्र में नहीं उपलब्ध होता है इसकारण व्यवहित पूर्व सूत्र में ही कपाटोद्घाटन कहा गया है. ऐसा जानना चाहिए। और यदि भक्षु वार लेर-लेस्थी 'डरत्न पछाडयो (तरणं तिमिसगुहाए दाहिणिलस्स दुवारस्स कवाडा सुसेजसेणावरणा दंडरयणेण महया २ सद्देणं तिखुत्तो आउडिया समाणा महया २ सणं कोचारवं करेमाणा ) या प्रमाणे तिभिखा गुशना दक्षिणु द्विश्वर्ती द्वाश्ना કમાડા કે જેમને સુષેણ સનાપતિએ ત્રણ વાર ઢંડ રત્નના જોર જોરથી શબ્દ થાય તેમ પ્રતાડિત કર્યાં અને પ્રતાડિત થવાથી દીધ`તર અવાજ કરનારા ક્રૌંચ પક્ષની જેમ અવાજ डरता तथा (सरसस्स सगाई २ ठाणा ) सर સર આ પ્રમાણે શબ્દ કરતા પેાતાના સ્થાનથી વિચલિત થઈ ગયા એટલે કે કમાડા પેાતાના સ્થાન પરથી ખસી ગયા. (સાળં से सुसेणे सेजावई तिमिसगुहाए दाहिणिलस्स दुवारस्स कवाडे विहाडेह) त्यारमां ते सुरेष्ट સેનાપતિએ તિમિસ ગુફાના દક્ષિણ દિશ્વતી ક્રમાડા;ને ઉદ્ઘાટન કર્યા જોકે આા સૂત્ર આવશ્યક ચૂર્ણિમાં અને વષૅમાન સૂરીકૃતાઢી ચારિત્રમાં ઉપલબ્ધ થતું નથી એથીજ અન્યવહીત પૂર્વ સૂત્રમાં જ કપાટટ્ટુઘાટન કહેવામાં આવ્યુ છે. અને જો એ સૂત્ર અહી Page #719 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ वक्षस्कारः स० १४ तमिस्रागुहाद्वारोद्धाटननिरूपणम् ७०५ ख्येयं भवेत्तदा पूर्वसूत्रे 'सगाइं सगाइं ठाणाई' इत्यत्र आर्षत्वात् पश्चमी व्याख्येया तेन स्काभ्यां स्थानाभ्यां कपाटद्वयसम्मीलनास्पदाभ्यां प्रत्यवस्तृताविति-कश्चिद्वि. क सेनावित्यर्थः तेन बिघाटनार्थकमिदं न पुनरुक्तमिति 'विहाडेत्ता' विघाटय 'जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छइ' यत्रेव भरतो राजा तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'जाब भरहं राय करयल परिग्गहियं जएणं विजएणं वद्धावेई' सुषेणः सेनापतिः यावत् भरतं राजामं स्वस्वामिनम् , करतलपरिगृहीतं दशनख शिरसावत मस्तके अञ्जलिङ्कृत्वा जयेन विनयेन -जयविजयशब्दाभ्यां वर्द्धयति-अशीर्वचनं ददाति 'वद्धावेत्ता एवं वयासी' बर्द्धयित्वा एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् 'विहाडिया ण देवाणुप्पिया तिमि पगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारम्स कनाडाए जण्णं देवाणुप्पियाणं पियं णिवेएमो पियंभे भवउ' विघाटितौ-उत्पाटितौ खलु हे देवानुप्रियाः ! हे प्रभवः ! तमिसागुहायाः दाक्षिणात्यस्य दक्षिणभागवत्तिनो द्वारस्य कपाटौ एतत्खलु देवानुप्रियाणां देवानुप्रियेभ्यः प्रभुभ्यः प्रियं निवेदयामः, अत्र निवेदकस्य सेनापतेरेकत्वात् क्रियायाम् यह सूत्र यहां कहा गया है तो इसके अनुसार 'सगाई सगाई ठाणाई' यहां पर पंचमी विभक्ति समझकर वे दोनों किवाड़ अपने अपने स्थान से कुछ खुलगये ऐसा समझना चाहिये. इस कारण पुनरुक्ति का दोषयहां नहीं आता है। (विहाडेता जेणेव भरहे राया तणेव उवागच्छद) किवाड़ों को खोलकर फिर वह सुषेण सेनापति जहांभरत राजा थे वहां पर गया (उवाच्छित्ता जाव भरह रायं करयलपरिग्गहियं जएणं विजएणं वद्धावेइ) वहां जाकर महाराजा उसने यावत भरत राजा को दोनों हाथ जोड़कर जय विजय शब्दो द्वारा बधाई दी (बद्धावेत्ता एवं वयासी) वधाई देकर उसने उनसे ऐसा कहा (विहाडियाणं देवाणुप्पिया ! तिमिसगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा एअण्णं देवाणुप्पियाणं पियं णिवेएमो पियं भे भव उ) हे देवानुप्रिय ! तिमिस्रगुहाके दक्षिदिग्वर्ती द्वार के किवाड उद्घाटित हो चुके हैं मैं इस देवाणुप्रिय के प्रिय अर्थको आप से निवेदन करता हूं यह आप के लिए इष्ट संपादक होवे. "णिवेडामा मान्छे त भुम (सगाई सगाई ठाणाई) महा ५ 24 ( त समलने તે બન્નેકમાડે પિતાના સ્થાન પર થી થડા ઉઘડી ગયા એમ મ જવુ કારણથી અહી पुनति होष यता नथी (विहाडेत्ता जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छद ) 43.२ Balटित ४२रीने पछी ते सुमे सेनापतियां मरत २ ते त्यांच्या (उव गच्छित्ता जाव भरतं रायं करयलपरिरगहियं जएणं विजएण वद्धाइ) यात सरत २.नेने हाथ डीन राय विभय श६ वडे थामा मापा (वद्धावेत्ता एवं वयासी) धामणी पीतेम । प्रमाणे निवहन यु 'विहाडियाण देवाणुप्पियातिमिस गुहाए दाहिणिलस्स दुवारस्त कवाडाए जण्ण देवाणुपिपयाणं पियं णिवेण्मो पियं मे भवउ) હે દેવા નુપિય! લિમિસ્ત્ર ગુફાના દક્ષિણ દિગ્વતી દ્વા૨નાં કમાડે ઉદ્ઘાટિત થઈ ગયાં છે. હું દેવાનુપિય. આપશ્રીના પ્રિય અર્થને આપશ્રી સમક્ષ નિવેદન કરું છું એ આપશ્રી માટે ष्टि स५६४ था। णिवेएमो' भा २ मजयनने प्रयास ४२वामां आवे छ त समस्त Page #720 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७०६ जम्बूद्वीपप्रशप्तिसूत्रे एकवचनस्यौचित्येन यन्निवेदयाम इत्यत्र बहुवचनं तत्सपरिकरस्यापि आत्मनो निवेदकत्व ख्यापनार्थ तच्च बहूनामेकवाक्यत्वेन प्रत्योत्पादनार्थम् अथवा अस्मदो द्वयोश्चेति सूत्रेण एकत्वे द्वित्वे च विवक्षिते बहुवचनम् इति बोध्यम् ऐतत् , प्रियम् इष्ट-अभीष्टं भे भवतां भवतु ततो भरतः किं कृतवान् इत्याह-'तएणं' इत्यादि 'तएणं से भरहे राया सुसेणस्स सेणावइस्स अंतिए एयमढे सोच्चा निसम्म हतुट्ठ चित्तमाणं दिए जाव हिअए सुसेणं सेणावई सक्कारेइ सम्माणेइ' तत:-कपाटोद्घाटननिवेदनानन्तरं खलु स पटखंडाधिपति भरतो राजा सुषेणस्य सेनापतेः अन्तिके समीपे एतमर्थ कपाटोद्घाटननिवेदनानन्तरं खलु स भरतो राजा सुषेणस्य सेनापतेः अन्तिके समीपे एतमर्थ कपाटोद्घाटनारूपं श्रुत्वा निशम्य हृदये अवधार्य हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः यावदहृदयः सुषेणं-तन्नामानं सेनापति सत्कारयति बहुमूल्य द्रव्यादिभिः सन्मानयति प्रियवचो भिः, सन्मानयति प्रियववोभिः 'सकारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सन्मान्य च 'कोडुंबियपुरिसे सदावेइ' कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति आहयति 'सदावित्ता एवं एमो” मैं जो बहुवचन का प्रयोग किया गया है वह समस्तपरिकर सहित सेनापति के निवेदन करने को प्रकट करने के लिए किया गयाहै अर्थात् सब परिवार मिलकर सेनापति के मुखसे यह शुभ संबाद का अपनेराजा भरत से निवेदन कर रहे हैं ऐसा जानना चाहिए अथवा-"अस्मदो द्वयोश्च" इस सूत्र से एकत्वअथवा द्वित्व विवक्षित होने पर भो बहुवचन प्रयुक्त होजाता है. इसके अनुसार यहां बहुवचन प्रयुक्त हुआ है। (तएणं से भरहे राया सुसेणस्स सेणावहस्स अंतिए एयमदूं सोचा निसम्म हट्ट तुट्ठ चित्तमाणदिए जाब हियए सुसेणं सेणावई सकारेइ' सम्मोणेइ) इसके बाद भहतराजाने सुषेण सेनापति से इस अपके अभीष्ट अर्थ संपादित होने की बात सुनी तो वह उसे सुनकर और उसे हृदय से निश्चिय कर हृष्ट तुष्ट चित्तानंदित हुआ यावत् उसका हृदय आनन्द से उछलने लगा और उसने उसी समय सुषेगसेनापति का बहुमूल्य द्रव्यादि प्रदान करके सत्कार किया और प्रियवचनों द्वारा उसका सन्मान किया. (सक्कारित्ता सम्माणित्ता कोटुंबियपुरिसे सद्दावेइ) सत्कार सन्मान करके फिर उसने कौटुम्बिक पुरुषों પરિકર સહિત સેનાપતિના નિવેદન કરવા માટે પ્રકટ કરવામાં આવેલ છે એટલે કે સમસ્ત પરિકર મળીને સેનાપતિના મુખથી એ શુભ સંવાદ પોતાના રાજા ભરતને નિવેદન કરે છે આમ સમજવું જોઈએ અથવા અરમોદોઢ એ સૂત્રથી એકવ અથવા દ્વિવ વવક્ષિત હોવા છતાંએ બહુવચન પ્રયુક્ત થઈ જાય છે. એ મુજબ અહીં બહુ ચન પ્રયુક્ત થયેલ છે. (तपणं से भरहे राया सुसेणस्स सेणावइस्स अंतिए एयमढे सोच्चा निसम्म हट्ट तुह चित्तमाणदिए जाव हियए सुसेण सेणावई सक्कारेइ सम्मानेइ) त्या२ मा १२ समये સુષેણ સેનાપતિના મુખથી રાભિષ્ટ અર્થ સંપાદિત થવા સંબંધી વાત સાંભળી અને તે પછી તે વાત હુદયમાં નિશ્ચિત કરીને તે રજા હg-તુષ્ટ ચિંતાનંદિત થયે યાવત્ તેનું હદય આનંદથી ઉછળવા લાગ્યું અને તેણે તેજ સમયે સુષેણ સેનાપતિને બહુમૂલ્ય દ્રવ્ય Allहान शने सा२ ४यो मने प्रियवयनाथी तेनु सन्मान यु. (सरकारिता Page #721 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० बक्षस्कारः सू० १५ तमिस्रागुहा दक्षिणद्वारोद्घाटननिरूपणम् ७०७ वयासो' शब्दयित्वा आहूय एवं वक्ष्यमाण प्रकारेण अवादीत् उक्तवान् 'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया!' क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! 'आभिसेक्कं हत्थिरयणं पडिकप्पेह' अभिषेक्या-अभिषेकपोग्य पट्टहस्तिनं साहस्तिप्रधानमित्यर्थः हस्विरत्नं प्रतिकल्पयत सज्जीकुरुत ‘हयगयरहपवर तहेव जाव अंजणगिरिकूडसण्णिभं गयवरं करवई दूरूढे ' हयगजरथ प्रवर तथैव यावत् अञ्जनगिरिकूटसन्निभम् अञ्जनपर्वतकूटवत् कृष्णवर्णमुच्चं च गजवरं हस्तिश्रेष्ठं नरपतिः भरतो राजा दृरूढे आरूढः सन् यत्कृतवान् तदाह ॥सूत्र१४॥ गजरूढः सन् नृपतिः यत्कृतवान्तदाह ---- 'तए णं' इत्यादि। मूलम्-तएणं से भरहे राया मणिरयणं परामुसइ तोतं चउ रंगुलप्पमाणमित्तं च अणग्य तंसि छलंसं अणोवमजुई दिन मणिरयण पतिसम वेरु लिअं सबभूअकंत जेणय मुद्धागएणं दुक्ख ण किंचि जाव हवइ आरोग्गे य सव्वकालं तेरिच्छिअ देवमाणुसकयाय उवसग्गा सव्वे ण करेंति तस्स दुक्खं संगामेऽपि असत्थाज्झो होइ णरोमणिवरं धरतो ठिय जोवण केसअवट्ठियणहो हवइ य सव्वभयविप्पमुक्को तं मणिरयणं गहाय से णरवई हत्थिरयणस्स दाहिणिल्लाए कुंभीए णिक्खिवइ तएणं से भरहाहिवे णरिंदे हारोत्थए सुकयरइयवच्छे जाव अमरवइसण्णिभाए इद्धीए पहियकित्ती मणिरयणकउज्जोए चक्करयणदेसियमग्गे अणेगरायसहस्साणुयायमग्गे महया उक्किट्ठ सीहणाय बोलकलरवेणं समुदरवभूअंपिव करेमाणे करेमाणे जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्ले को बुलाया- (सहावित्ता एवं वयासी) बुलाकर उनसे उसने ऐसा कहा- (विप्पामेव भो देवानुप्पिया ! आभिसेक्कं हस्थिरयणं पडि कप्पेह) हे देवानुप्रियो ! तुम बहुत ही जल्दी आभिषेक्य हस्तिरत्न को- अभिषेक योग्य प्रधान हस्ति को सजाओ (हय गयरह पवर तहेव जाव अंजनगिरि कूडसण्णिभं गयवई णरवई दुरूढे) इसके बाद हय, गज, रथ प्रवर यावत् अंजनगिरि के कुट जैसे श्रेष्ठ हस्ती पर भरतराजा आरूढ हुआ -॥१४। सम्माणिता कोडुंबिय पुरिसे सदावेइ ) सार तभार सन्मान अरीने पछी तो भी पुरुषो मोवाया (सदाबित्ता एवं बपासो) मानते पुरुषोन तो मा प्रभार ४ (निप्पामेव भा देवाणुपिया ! आभिसेक हस्थिरयण पडिकप्पेह) देवानुप्रियो ! तमे मई शी मान५५२ २नने मनिष याय प्रधान तीन सुसnिd ४२।. (हयगयरह पर तहेव जाव प्रजणागेरि कूडसहणिभं गयवईणरवई दुरूढे) त्या२ मा ख्य, ७, २थ, १२ यावत मनजिनिट श्रेष्ट सस्ती ०५२ १२२ ॥३० था. सू१४॥ Page #722 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७०८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे दुवारे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता तिमिसगुहं दाहिणिल्लेणं दुवारेणं अई सन्धियारनिवहं । तरणं से भरहे राया छत्तलं दुवालसंसिअं अट्टकण्णियं अहिगरणिसंटियं अट्ठ सोवण्णिय कागणिरयणं परामुसइति तरणं तं चउरंगुलप्पमाणमित्तं अट्ठसुवण्णं च विसहरणं अडलं चउरंससंठा ठि समतलं प्राणुम्माणजोगा जतोलागे चरंति सव्वजणपन्नवगा इव चंदो णइव तत्थ सूरे ण इव अग्गी णइव तत्थ मणिणो तिमिरं णासेंति अंधयारे जत्थ तयं दिव्वं भावजुत्तं दुवालसजोयणाई तस्स लेसाउ विवर्द्धति तिमिर निगरपडिसेहिआओ रर्त्ति च सव्वकालं खंधावारे करेइ आलोअं दिवसभूअं जस्स पभावेण चक्कवट्टी तिमिसगुहं अतीति सेण्णसहिए अभिजेतुं बितियमद्धभरहं रायवरे कागणि गहाय तिमिसगुहाए पुरच्छि मिल्लपच्चत्थिमिल्लेसुं कडएसुं जोयणंतरियाई पंचधणुसयविक्खभाई जोयगुज्जोयकराई चक्कणेमी संठियाई चंदमंडलपडिणिकासाईं एगूण पण मंडलाई आलिहमाणे आलिहमाणे अणुष्पविसइ तरणं सा तिमिस गुहा भरणं रण्णा तेहिं जोयणंतरिहि जाव जोयणुज्जोयकरेहिं एगूण पण्णाए मंडलेहि अलिहिज्जमाणेहिं आलिहिज्ज माणेहिं खिप्पामेव आलोगभूया दिवसभूया जाया यावि होत्था || सू०१५|| , , छाया - ततः खलु स भरतो राजा मणिरत्नं परामृशति 'तोतं' इति सम्प्रदायगम्यम् चतुरंगुलप्रमाणमितं व अनर्घम् त्र्यत्रम्, षडसम्, अनुपमतिद्युतिं दिव्यम्, मणिरत्नपतिसमम्, बैड्यै सर्वभूतकान्तम्, येन च मूर्द्धगतेन न दुःखं किञ्चित् यावद् भवति आरोग्यं च सर्वकालम् तिर्यदेव मनुष्यकृताः उपसर्गाश्च सर्वे न कुर्वन्ति तस्य दुःखम्, संग्रामेऽपि अशस्त्रवध्यो भवति 'नरो मणिवरं धरन् स्थितयौवनकेशावस्थितनखी भवति च सर्वभयविप्रमुक्तः तत् मणिरत्नं गृहीत्वा स नरपति: हस्तिरत्नस्य दाक्षिणात्ये कुम्मे निक्षिपति ततः खलु स भरताधिपो नरेन्द्रो हारावस्तृतः सुकृतरतिदवक्षस्कः यावत् अमरपतिसन्निभया ऋद्धया (युक्तः) प्रथितकीर्तिः मणिरत्नकृताद्योतः चक्ररत्नदेशितमार्गः अनेकराज सह'स्त्रानुयातमार्गः महतोत्कृष्ट सिंहनादबोल कलकलरवेण समुद्ररवभूतामिव कुर्वन् यत्रैव तमि गुहाया दाक्षिणात्यं द्वारं तत्रैवोपागच्छति उपागत्य तमिस्रा गुहां दाक्षिणात्येन द्वारेणाश्येति शशीव मेघान्धकारनिवहम् । ततः खलु स भरतो राजा षट्तलं द्वादशास्त्रम्भष्टकणिकम् अधिकरणिसंस्थितम् अष्ट सौवर्णिकम् काकणीरत्नम् परामृशति । ततः खलु तत् चतु रङ्गुल प्रमाणमितम् अष्टसुवर्ण व विषहरणम् अतुलं चतुरस्रसंस्थानसंस्थितं समतलं मानोम्मा Page #723 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका - ३ वक्षस्कारः सू० १५ तमिखागुहाया दक्षिणद्वारोद्घाटननिरूपणम् ७०९ नयोगाः यतो लोके वरन्ति सर्वजनप्रज्ञापकाः नापि चन्द्रो नवा तत्र सूर्यः नवाऽग्निःनर्वा तत्र मणयः तिमिरं नाशयन्ति अन्धकारे यत्र तकत् दिव्यं प्रभावयुक्तं द्वादशयोजनानि तस्य लेश्याः विवर्द्धन्ते तिमिरनिकर प्रतिषेधिकाः रत्नं च सर्वकालं स्कन्धावारे करोति दिवस भूतम् आलोकं करोति ' यस्य प्रभावेण चक्रवर्त्ती तमिस्रां गुहाम् अत्येति सैन्यसहितो द्वि तीयमर्द्ध भरतम् अभिजेतुम् राजवरः का कर्णो गृहीत्वा तमिस्रागुहायाः पौरस्त्यपाश्चात्ययोः कटकयोः योजनानन्तरितानि पञ्चधनुः शतविष्कभाणि योजनोद्योतकराणि चक्रनेमि संस्थि तानि चन्द्रमण्डल प्रतिनिकाशानि एकोनपञ्चाशतं मण्डलानि आलिखन् अनुप्रविशति, ततः खलु सा तमिस्रागुहा भरतेन राज्ञा तैयजनान्तरितैः यावद् योजनोद्योतकरैरे कोनपञ्चाशता मण्डलैः आलिख्यमानैः आलिख्यमानैः क्षिप्रमेव आलोकं भूता उद्योतं भूता दिवसभूता जाता चाप्यभवत् ॥ सू० १५ ॥ टीका- 'तरणं से' इत्यादि । 'तरणं से भरहे राया मणिरयणं परामुसद्द' ततो गजारोहणानन्तरं खलु स भरतो राजा मणिरत्नं परामृशति हस्तेन स्पृशति किं विशिष्टं तदित्याह - 'तोतं, इति सम्प्रदायगम्यं विशिष्टाकार सम्पन्नम् सुन्दरम् तथा 'चउरंगुलप्पमाणमितं चतुर मैंलप्रमाणमात्रं च तत्र चतुरंगुलप्रमाणा मात्रा दैर्येण यस्य तत्तथा चशब्दाद् द्वयं पृथुलमिति ग्राह्यम् तदेवाह 'चउरंगुली दुअंगुलविहुलोअमणी' इति 'अणग्धं, अनर्घम् - अमूल्यं न केनापि तस्यार्थः मूल्यं कर्त्तुं शक्यते इत्यर्थः पुनः कीदृशम् 'तंसिअं' हाथी के ऊपर बैठकर भरतराजाने क्या किया सो कहते हैं तपणं से भर गया मणिरयणं' - इत्यादि सू-१५ टीकार्थ - (तएण से भरसे राया मणिरयणं परामुप्सइ) भरत राजा ने जब कि वह गज श्रेष्ट पर अरूढ हो चुका तत्पश्चात् मणिरत्न को छुआ यह मणिरत्न - (तोतं चउरंगुलप्पमाणमित्तं च अणग्धं तंसिअं छलंसं भणोवमजुइँ दिव्वं मणिरयणपतिसमं वेरुलियं सव्वभूयतं) तोत था इस पद का अर्थ संप्रदाय गम्य है अर्थात् विशिष्ट आकार से युक्त सुंदरता वाला तथा प्रमाण में यह चार अंगुल का था. अर्थात् यह चार अंगुल का लम्बा था. और दो अंगुल का मोटा था क्योंकि" चउरंगुलो दु अंगुल पिहुलोमणी " ऐसा कहाग या है. अनर्घ्य था - इसका मूल्य नहीं था अमूल्य था- હાથી ઉપર બેસીને ભરત રાજાએ જે કાર્ય કર્યું' તેનુ ંવન કરે છે. टीडार्थ - ( ते पंण से भरहे राया मणिरयणं इत्यादि) सू. १५ (त पण से भरहे राया मणिरयण परामुसह ) क्यारे भरत रान्न गम श्रेष्ट हस्ती રત્ન પર આરૂઢ થઇ ગયા ત્યાર બાદ તેણે મણિરત્નના સ્પર્શ કર્યાં. એ મણિરત્ન (સેત च रंगुलप्पमाणमित्तं च अणग्धं तसियं छलंसं अणावमजुइ दिव्वं मणिरयणपतिसम वेरु लियं सव्वभूयवंत) ततु 'तो' यही अर्थ सम्प्रहाय गभ्य छे. ते प्रभाણુમાં એ મણિરત્ન ચાર અતુલ જેટલુ હતુ અટલે કે એ ચાર અંશુલ જેટલું લાંબુ અને शुप्रभा भटु तु म 'बरं'गुला दुअंगुल बिहुलायमणी याप्रमाणे वामां આવ્યુ છે. એ મણિરત્ન અનઘ્ય હતું, એની કીમત થઈ શકે તેમ ન હતુ અર્થાત્ - w Page #724 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७१० बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे त्र्यम् तिस्रोऽस्रयः कोटयो कोणाः यत्र तत्तथा ईद्रशं सत् 'छलंस षडस्त्रं षट्कोटिकम् लोsपि प्रायो वैडूर्यस्य मृदङ्गाकारत्वेन प्रसिद्धत्वान्मध्ये उन्नतवृत्तत्वेनान्तरितस्य सहज सिद्धस्य उभपान्तवर्तिनोऽस्त्रित्रयस्य सत्चात् ननु घुडस्त्रमित्यनेनैव सिद्धे यत्र saमित्युक्तिः किमर्था इति चेन्न उभयोरन्तरयो निरन्तर कोटिषट्कभवने नापि पडत्रतायाः सम्भवात् तद्व्यवच्छेदार्थम् त्र्यत्रं सत् पडत्रमित्युक्तेः तथा 'अणो जुई' अनुपमद्युर्ति अनुपना द्युतिर्यस्य तत्तथा पुनः कीदृशम् 'दिव्यं' दिव्यम्- 'मणिरयणपति' मणिरत्नपतिसमम् मणिरत्नेषु पूर्वोक्तेषु पतितमम् श्रेष्ठम् सर्वोत्कृष्टत्वात् 'वेरु लिअं' वैडूर्यम् वै इर्य नातीयम् 'सव्वभूयतं' सर्वभूतकान्तम् सर्वेषां भूतानां कान्तं - काम्यम् सकलजनमनोहारकम् इत्यर्थः 'जेणय मुद्धा गएणं दुक्खं ण किंचि जाव हवइ' येन च मुर्द्धगतेन शिरोधृतेन हेतुभूतेन न किञ्चिद् यावद् दुःखं भवति जायते ' आरोग्गे य सव्व काले, आरोग्यं नैरुज्यं च सर्वकालं भवति, तेरच्छ अदेवमाणुसकयाय उवसग्गा सव्वेण कोई इसकी कीमत नहीं कर सकता था. आकार में यह तिकोण था - तिखूंटा था परन्तु यह षट् पेला था. लोक में भी प्रायः वैडूर्यमणि मृदङ्गाकार रूप से प्रसिद्ध है इससे बीच में उन्नत वृत्त हो जाने के कारण आजू बाजू में तोन तीन कोटिका सद्भाव स्वभावत: आजाता है. यहां ऐसी आशंका तो हो सकती है कि जब यह षट्पेला कहा गया है तो फिर इसे तिखूंटा कहने का क्या कारण है ? तो इसका उत्तर यह है कि आजू बाजू में भी षट् पेड़ता का सद्भाव इस तरह से न बन जाबे इस बात को निराकरण करने के लिये "त्र्यस" पद स्वतन्त्र रूप से कहा गया है. अर्थात् यह तिखूंटा होता हुआ भी षट् पेला था द्युति अनुपम थी यह दिव्य था. मणि एवं रत्नों में यह सर्वोत्कृष्ट होने से उनका पतिसम था यह वैडूर्यजाती का था. यह सर्वभूतकान्तथा. समस्त प्राणियों की चाहना के योग्य था - ( जेण य मुद्धागएणं दुक्खं न किंचि जाब हवइ, आरोग्गे अ सव्वकालंतिरिच्छिय देव माणुसकया य सव्वे ण करेंति तस्स दुक्खं) इसे मस्तक અમુલ્ય હતું એની કાઇપણરીતે કિ ંમતથઈજશકતીનહતી આકારમાં એ ત્રિકાણુ હતુ' પણ એ ષડૂપેલા હતુ લેાકમાં પણ વૈય`મણિ મૃદંગાકાર રૂપમાં પ્રસિદ્ધ છે જ એથી જ વચ્ચેથી ઉન્નત વૃત્ત હાવાથી ખન્ને તરફથી ત્રણત્રણ કેટીને સદભાવ સ્વભાવતઃ આવી જાય છે. અત્રે એવી આશકા થઈ શકે તેમ છે. કે જયારે એ ષયેલા કહેવામાં આવેલ છે. તે પછી આને ત્રણ ખુણાવાળું શા કારણથી કહેવામાં આવેલ છે? તે આ શંકાને જવામ આ પ્રમાણે છે કે બન્ને તરફ ષટપેલતાની સદ્ભાવના થઇ ન જાય તેના માટે જ ‘ત્ર્યક્ષ’ પદનુ કધન અત્રે સ્વતંત્ર રૂપમાં કરવામાં આવેલ છે. એટલે કે આ ત્રણ ખૂણીયુ' હતુ છતાં ષપેલા હતુ. આ રત્નની શ્રુતિ અનુપમ હતી. એ દિવ્ય હતુ. મણુિ તેમજ રત્નામાં એ સદેત્કૃષ્ટ હેવા બદલ પતિસમ હતુ. એ વૈડૂ' જાતિનુ` હતુ` એ સવ ભૂતકાન્ત હતુ समस्त प्राशुयोनी थाना योग्य तु (जेणय मुद्घागरणं दुक्खं न किंचि जाव हवर आरोगेअ सव्वकालेतिरिच्छिय देवमाणुसकया य सब्वे ण करेंति तस्स दुक्खं ) એ રત્નને મસ્તક ઉપર ધારણ કરવાથી ધારણ કર્યાં ને કાઇ પણ જાતની તકલીફ કે ચિંતા Page #725 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० ३ वक्षस्कारः सू. १५ तमिस्रागुहाया दक्षिणद्वारोद्घाटननिरूपणम् ७११ करेंति तस्स दुक्ख' तिर्यङ् देवमनुष्यकृताः च शब्दस्य व्यवहितसम्बन्धादुपसर्गाश्च सर्वे न कुर्वन्ति तस्य मणिरत्नधारकस्य दुःखम् 'संगामे वि असत्थवज्झो होइ' संग्रामेऽपि अशस्त्रवध्यो भवति तत्र संग्रामेऽपि बहुविरोधिसमरे अल्पविरोधियुद्धे वा न शस्त्रवध्योऽशस्त्रवध्यः शर्वध्यो न भवति. 'णरो मणिवरं धरेंतो ठिय जोव्वण केप अवडिय णहो हवइ सबभयविप्पमुक्को' नरो मणिवरं धरन् स्थितयौवनकेशावस्थितनखो भवति च सर्वभयविप्रमुक्तः तत्र नरो मणिवरं मणिश्रेष्ठ धरन् दधत् स्थितविनश्वरभावमनापन्न यौवन युक्त्वं यस्य स तथा केशैः सहावस्थिताः अवद्धिष्णवो नखा यस्य स तथा स्थित यौवनश्वासौ केशावस्थितनखश्चेति स्थितयौवनकेशावस्थितनखः तथा सर्वभयविप्रमुक्तः सकलत्रासविमुक्तश्च भवति. 'तं मणिरयण गहाय से णरवई हत्थिरयणस्स दाहिणिल्लाए कुंभीए णिक्खिवई' तत् पूर्वोक्त विशेषणविशिष्टं मणिरत्नं गृही त्वा हस्ते गृहीत्वा स नरपतिः भरतः हस्तिरत्नस्य गजश्रेष्ठस्य दाक्षिणात्ये दक्षिणभागवर्तिनि कुम्भे निक्षिपति निबध्नाति कुभीए इत्यत्र स्त्रीत्वं प्रकृतत्वात् 'तएणं से भरहाहिवे णरिंदे हारोस्थए सुकयरइयवच्छे' ततः खलु स भरताधिपो नरेन्द्रः नरपतिः धारण कर्ता को किसोभी प्रकार का दुःख नहीं होता है. अर्थात् इसके मस्तकपर धारण करतेसमस्त दुःख धारण कर्ता के नष्ट हो जाते हैं सदा काल धारण कर्ता नीरोग रहता है इसमणिरत्न को धारण करनेवाले के ऊपर किसी भी समय तिर्यञ्च देव और मनुष्य कृत उपसर्ग जरा सा भी कष्ट नहीं दे सकते हैं. (संगामे वि असत्थवज्झो होइ णरो मणिवरं धरेतो ठिमजोव्वणकेस अवद्रियणहो हवइ अ सव्वभयविप्पमुक्को) संग्राम में मी बड़े से बड़े युद्ध मे भी इस रत्न को धारण किये हुए मनुष्य शस्त्रों द्वारा भी वध्यनहीं हो सकता है धारण कर्ता का यौवन सदाकाल स्थिर रहता है इसके नख और केश नहीं बढ़ते है. यह सर्व प्रकार के भय से रहित होता है (तं मणिरयण गहाय से णबई हस्थिरयणस्स दाहिणिल्लाए कुभीए णिक्खिवइ) इस प्रकार के इन पूर्वोक्त विशेषणों वाले मणिरत्न को लेकर उस नरपतिने उसे हस्तिरत्न के दाहिने कुम्भ में बांध दिया (तएणं से भरहाहिवे णरिंदे हारोत्थए सुकयरइयवच्छे जाव अमरवइ सण्णिभाए થતી નથી. એટલે કે એને ધારણ કરતાં જ ધારણ કરનારના સર્વ દુઃખ નાશ પામે છે. ધારણ કરનાર સદાકાળ નિરોગી રહે છે. એ મણિ રત્નને ધારણ કરનાર ઉપર કે ५५ समये तिय. देव भने मनुष्य पसीनी अस२ थती नथी (संगामे वि असत्थवज्झो होइ णरो भणिवरं धरे तो ठिअजोव्वणकेस अवट्ठियणहो हवइअ सव्वभयविप्पमकको) सयाममा ५९ मय ४२मा भय ४२ युद्ध Hi ५ मे २नने या२५ ४२नार મનુષ્ય શસ્ત્ર વડે પણ વધ્ય થઈ શકતો નથી. ધારણ કરનારનું યૌવન સદા કાળ સ્થિર રહે .नानम अने व वधता नथी । स २ना भयोथी भुत २ छ. (तं मणि - रयण गहाय से रवई हत्थिरयणस्स दाहिणिल्लाए कुभीए णिक्खिवइ ) मा प्रमाणे તે પૂર્વોકત વિશેષ વાળા મણિરત્નને લઈને તે નરપતિએ હસ્તી રતનના દક્ષિણ તરફના नयमा wiधी द्वीधु (तएणं से भरहादिवे णरिंदे हारोत्थर सुकयरइयवच्छे Page #726 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७१२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे हारावस्तृतः धृतमुक्तादिहारः पुनः कीदृशः 'सुकय रइयवच्छे' सुकृतरतिदवक्षस्कः सुकृतं सुरोत्या रचितम् चतुष्पष्टि शरहारादिभिः अतएव रतिदं प्रमोदजनकं वक्षो यस्य स तथा पुनश्च 'जा आमरवइ सन्निभाए इद्धीए पहियकित्ती मणिरयणक रज्जोए' तत्र अमरपति सन्निभया-इन्द्रतुल्यया ऋद्धया-आभरणादिरूपया लक्ष्म्या युक्तः तथा प्रथितकोतिः विख्यातयशाः तथा मणिरत्नकृतोद्योतः मणिरत्नकृतप्रकाशःपुनश्च कीदृशो राजा भरतः 'चक्करयणदेसिय मग्गे अणेगराय सहस्साणुयायमग्गे' चक्ररत्नदेशितमार्गः चक्ररत्नेन देशितः प्रदर्शितो मार्गों यस्मै स तथा, तथा अनेकराजसहस्रानुयातमार्गः अनेकराजसह बैरनुचलितमार्गः चक्ररत्नप्रदशितानुसारेण गच्छतो भरतस्य अनु पश्चात् मुकुटधारिण अनेके राजानः प्रचलन्तीत्यर्थः पुनश्च कीदृशः 'महया उक्लिट्ठ सीहणाय बोलकलकलरवेणं समुद्दरवभूयं पित्र करेमाणे जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्ले दुवारे तेणेव उवागच्छई' महतोत्कृष्ट सिंहनादबोलकल कलरवेण समुद्ररवभूतामिव कुर्वन् कुर्वन् यत्रैव तमि सागुहाया दाक्षिणात्यं द्वारं तत्रैवोपागच्छति तत्र महता विशालेन उत्कृष्टः सिंहनादः बोलो अव्यक्तवनिः) वर्णरहितध्वनि तथा कलकलश्च तदितरोव्यक्तध्वनिः तल्लक्षणो यो रवः शब्दः तेन समुद्रवं भूतमिव समुद्रवं प्राप्तमिव गुहामिति गम्यम्, अत्र भूगतो इति सौत्रो धातुः तस्मात्त प्रत्यये भूतामिति कुर्वाणः२ यत्रैव तमिस्रागुहायाः दाक्षिणात्यं दक्षिणभागवति द्वारं तत्रैवोपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य स राजा भरतः 'तिमिसगुई इद्धिए पहिअकित्ती मणिरयणक उज्जोए चारयणदेसियमग्गे अनेगरायसहस्साणुअयमग्गे महया उक्किट्ट सोहणायबोलकल कलावेणं समुद्दरवभूय पिव करमाणे २ जेणेव तिमिस गुहाए दाहिणिल्ले दुवारे तेणेव उवागच्छइ) गले में धारण किया है मुक्तादिका हार जिसने, तथा चौसठ लरके हार से जिसका वक्षस्थल प्रमोदजनक हो रहा है यावत् अमरपति को जैसी ऋद्धि से जिसकी कीर्ति विख्यात हो रही है आभरणादि रूप कान्ति से जिसके चारों ओर उद्योत फैल रहा है. चक्ररत्न जिसे गन्तव्य मार्ग का निर्देश कर रहा है. जिसके पीछे पीछे हजारों राजा चल रहे हैं जोर जोर से सैन्य जनादि द्वारा किये गये समुद्र के रव जैसे सिंहनाद के शब्दों से अन्यक शब्दो से और कल कल रख से दिमडल को व्याप्त करता करता वह भरत राजा जहां पर तिमिस्रागुहा का दक्षिणदिग्वर्ती द्वार था वहां पर आया (उवागच्छित्ता तिमिसगुहं दाहिणिल्लेणं जाव अमरवइ सण्णिभाए। इद्धीए पहिअकित्तो मणिरयणक उज्जोए चक्करयणदेसिय मग्गे अणेगरायसहस्ताणुयायमग्गे महया उक्किसीहणाथ बोल कलकलरवेणं समुदरवभूयं) पिव करेमाणे २ जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिल्ले दुबारे तेणेव उवागच्छइ ) श्रीवामणे સકતાદિને હાર ધારણ કર્યો છે તેમજ ૬૪ લડીના હારથી જેનું વક્ષસ્થળ પ્રમાદજનક થઈ રહ્યું છે. યાવત્ અમર પતિ જેવી અધિથી જેની કી વિખ્યાત થઈ રહી છે. આભરણજિ. કાંતિથી જેની ચારે બાજુ બે પ્રકાશ વ્યાપ્ત થાય છે. જેને ગતવ્ય માર્ગ ચક્ર નિર્દિષ્ટ કરી રહેલ છે જેની પાછળ પાછળ હજારો સજાએ ચાલી રહ્યા છે જેના સૈન્યના પ્રયાસથી સમદ્ર તેમજ સિંહના જેવા અવાજથી દિગૂ મંડળ વ્યાસ થઈ રહ્યું છે એ તે ભરત રાજા Page #727 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० १५ तमिस्रागुहाया दक्षिणद्वारोद्घाटननिरूपणम् ७१३ दाहिणिल्लेणं दुवारेण अईइ ससिव्च मेहंघयारनिवह' तमिस्रागुहां दाक्षिणात्येन द्वारेणात्येति प्रविशति शशीव चन्द्रइव मेघान्धकारनिवहं मेघजनितान्धकारसमूहं शशीव चन्द्रव प्रविशतीत्यर्थः ' तरणं से भरहे राया छत्तलं' ततः गुहाप्रवेशानन्तरं खलु स भरतो राजा षट् तलम् चत्वारि चतसृषु दिक्षु द्वे तूर्ध्वमधश्वेत्येवं पद संख्यकानि तानि यत्र तत्तथा तानि च त्रिध्यखण्डरूपाणि यैर्भूमौ अविषमतया तिष्ठन्ति इति, पुनः कीदृशम् 'दुवाल संसिअं' द्वादशास्रम् 'अकणियं' अष्टकर्णिकम् - कर्णिकाः कोणा ः यत्र अश्रित्रयं मिलति तेषां चाधः उपरि प्रत्येकं चतुर्णी सद्भावात् अष्टकोणकम् ' अहिगर णिसंठिअं' अधिकरणिसंस्थितम् अधिकरणिः सुवर्णकारोपकरणं तद्वत् संस्थितं संस्थानं यस्य तत्तथा, तत् सदृशाकारं समचतुरस्रत्वात्, आकृतिस्वरूपं निरूप्य अस्य तौल्यमानमाह - 'अट्ठसोवfort' अष्ट सौवर्णिकम् अष्टसुवर्णामानं यस्य तत्तथा, तत्र सुवर्णमानमिदम् चत्वारि मधुरतृणफलान्येकः श्वेतसर्षपः षोडश श्वेतसर्षपा एक धान्यमाषफलं द्वे धान्यमाषफले एकाः गुरुजा पञ्चगुजाः एकः कर्ममाशः षोडश कर्ममापकाः एकः सुवर्णः' इति एतादृशै रष्टभिः सुवर्णैः काकणीरत्नं निष्पद्यते इति चाधिकारे 'एतानि च मधुरतृण फलादीनि भरतचक्रवर्तिकालसम्भवीन्येव गृह्यन्ते, अन्यथा कालभेदेन तद्वैषम्यसम्भवे काकणीरत्नं सर्वचक्रिणां तुल्यं न स्यात्, तुल्यं चेष्यते तदि' त्येतस्मादनुयोगद्वारवृत्तिवचनात् एतदेशीयादेव स्थानाङ्गवृत्तिवचनात् 'चउरंगुलो मणी पुण तस्सद्धं चैव होइ विच्छिण्णो । चउरंगुलप्यमाणा सुवण्णवर कागणी नेया' ॥१॥ दुवारे अइ सव्वि मेधयारनिवह) वहां आकरके वह जैसे चन्द्र मेघ जनित अन्धकार में प्रविष्ट होता है. उसी तरह से तिमिस्रागुहा में दक्षिण द्वार से प्रविष्ट हुआ (तएणं से भरहे राया छत्तलं दुवालसंसि अटुकण्णिय अहिगरणिसंठिअं अट्ठसोवण्णिय कागणिरयणं परामुसइ) इसके बाद उस भरत राजा ने छह तलवाले - चार दिशाओं के चार तल ओर ऊपर नीचे के दो तल इस प्रकार से छह तलवाले १२ कोटीवाले आठ कोनों वाले, अधिकरिणो सुवर्णकार जिस लोहे की बनी हुई डी पर धरकर सुवर्ण चांदी आदी को हथोड़े से कूटता पीटता है उस पिण्डी के जैसे अकार वाले आठ वर्णों का जितना वजन होता हैं उतने वजन वाले ऐसी काकणी त्यां तिमिस्रा गुडानु दक्षिषु द्वितीय द्वार तु त्यां भ० ( उवागच्छत्ता तिमिस्र गुहं दाहिणिल्लेण दुवारेण अईइ ससिब्बू मेहंधयारनिवहं ) त्यां खावीने ते प्रेम यन्द्र મેઘજનિત અધકારમાં પ્રવેશે છે તેમજ તે તિમિસ્રા ગુહામાં દ્ર ક્ષણ દ્વ થા પ્ર વષ્ટ થયે (तपणं भरहे राया छत्तलं दुबालसंसिय अट्टकण्णिय अहिगरणिसंठियां अट्ठसोत्रण्णय कागणिरयण परासह ) त्यार माह भरत रान्नये है तब बाणा आदि खेला અને ઉપર નીચેના છે તલ, આ પ્રમાણે ૬ તલ વાળા ૧૨ કાટીવાળા આઠ ખુશ વળા અધિકરણી--સુનકાર લાખડની બનેલી જે પીડી ઉંપર મૂકીને સુણુ-ચાંદી ગેરને હથેડીથી ફૂટ પોર્ટ છે, તે પિ`ડી જેવા આાકારવાળા એટલે કે (એરણ જેવા) આઠ સુત્રનું ९० Page #728 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अत्राङ्गुलं प्रमाणाङ्गुलं ज्ञातव्यम् सर्व चक्रवर्तिनामपि काकण्यादि रत्नानां तुल्यप्रमाणत्वात् इति' मलयगिरि कृतबृहत् संग्रहणी बृहद्वृत्तिवचनाच्च केचन अस्य प्रमाणाङ्गुलनिष्पन्नत्वम् केचिच्च ' एगमेगस्स णं रण्णो चाउरंत चक्कवट्टिणो अट्ठ सोवण कागणि रयणे छत्तले दुवाल सिए अट्टकागिणिए अहिगरणिस ठाणसं ठिए पण्णत्ते, एगमेगा कोडोउस्सेहंगुल विक्खंभा तं समणस्स भगवओ महावीरस्स अर्द्धगुलं' इत्यनुयोगद्वार सूत्रबलादुत्सेधाङ्गुल निष्पन्नत्वम् केऽपि च एतानि सप्तै केन्द्रियरत्नानि सर्व चक्रवर्तिना मात्मागुलेन ज्ञेयानि शेषाणि तु सप्तपञ्चेन्द्रियरत्नानि तत्कालिक पुरुषोचित मानानीति प्रवचनसारोद्धारवृत्ति वलादात्मागुल निष्पन्नत्वमाहुः, अत्र च पक्षत्रये तत्त्व निर्णयः सर्वविद्वेद्यः, अत्र च ग्रन्थगौरवभिया बहुवक्तव्यं नोच्यते इति । एतावद्विशेषणविशिष्टम् 'कागणिरयणं परासह त्ति' काकणीरत्नं परामृशति स्पृशति गृह्णातीत्यर्थः इति । अस्य ग्रहणानन्तरं स भरतो राजा यत् कृतवान् तदाह- 'तरणं तं चउरंगुलप्पमाणमित्तं' ततः परामर्शनान्तरं खलु तत् काकणी रत्नं राजवरो गृहीत्वा यावदेकोनपञ्चाशतं मण्डलानि आलिखन् आलिखन् अनुप्रविशतीत्युत्तरेण सम्बन्धः, 'चउरंगुलप्पमाणमित्तं' चतुरलप्रमाणमात्रम्, अस्यैकैका अश्रिचतुरङ्गुलप्रमाणविष्कम्भा द्वादशाप्यश्रयः प्रत्येकं चतुरंङ्गुलप्रमाणा भवन्तीत्यर्थः, अस्य समचतुरस्रत्वादायामो विष्कम्भश्च प्रप्येकं चतुरंगुलप्रमाण इत्युक्तं भवति, यैवात्रिरूध्वकृता आयामं प्रतिपद्यते सैव तिर्यग्व्यवस्थापिता विष्कम्भ - भाग् भवतीत्यायामविष्कम्भयोरेकतरनिर्णयेऽपि अपर निर्णयः स्यादेवेति सूत्रे विष्कम्भस्यैव ग्रहणम्, तद्ग्रहणे चायामोऽपि गृहीत एव, समचतुरस्रत्वात्तस्येति, तदेवं सर्वतचतुरङ्गुलप्रमाणमिदं सिद्धम् तथा 'अट्ठ सुवण्णं च' अष्टसुवर्णं च अष्टभिः सुवर्णैः निष्पन्नम् अष्टसुवर्णम् अष्टसूवर्णं मूलद्रव्येण निष्पन्न मित्यर्थः चकारो विशेषणसमुच्चये सर्वत्र तथा 'विसरणं' विषहरणम् विषं जङ्गमादि भेदभिन्नं तस्य हरणं तावद् जंगमविषनाशकरत्न को उसने उठाया (तपणं तं चउरंगुलप्पमाणमित्तं अट्ठसुवण्णं च विसहरणं अतुल चउरसंठाणसंठिअं, समतल माणुम्माण जोगा जतो लोगे चरंति) इस रत्न को जो १२ - अश्रियां कोटियां थीं वे प्रत्येक चार चार ४-४- अल की थीं। इस तरह इसकी लंबाई और चौडाई चार-चार अङ्गुल प्रमाण होने से यह काकणीरत्न समचतुरस्र कहा गया है इसका वजन आठ सुवर्ण सौनेया के वजन बराबर था तथा यह जङ्गमादि नख दातों के विष को दूर करनेवाला था इसके जैसा और कोई रत्न नहीं था यह समतल वाला था इसी रत्न से जगत में ७१४ बेट वन होय छे. तेटसा वन वाजा सेवा अशी रत्नने 'यु' (तपणं तं चउरगुलप्पमाणमित्तं अट्ठ सुवणं च विसहरणं अडलं चउर ससाणसंठिअं समतल मानु माणजोगा जतो लोगे चर ति) में रत्ननी के १२ अश्री डोटी इती. ते हरे ४-४ અંશુલ જેટલી હતી. આ પ્રમાણે એની લખાઈ અને પહેળાઈ ચાર ચાર અંશુલ પ્રમાણ હાવાથી એ કાકણી રત્ન સમચતુરસ કહેવામાં આવેલ છે. એનુ વજન આહૈં સુવર્ણ સોનૈયાના વજન જેટલુ હતુ. તેમજ એ જગમાદિ નખ-દાંતાના વિષને દૂર કરનાર હતુ. એના Page #729 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० १५ तमिसागुहाया दक्षिणद्वारोद्घाटननिरूपणम् ७१५ मित्यर्थः सुवर्णाष्ट गुणानां मध्ये विषहरणस्य प्रसिद्धत्वात् अस्य हि तथाविध स्वर्णमय त्वादिति 'अउलं' अतुलम् तुलारहितमनन्यसदृशमित्यर्थः अनुपम मित्यर्थः पुनः कीदृशम् 'चउरंससंठाणसंठियं चतुरस्त्रसंस्थानसंस्थितमिति विशेषणं तु पूर्वोक्ताधिकरणि दृष्टान्तेन भाव्यमिति न तु अधिकरणि दृष्टान्ते भाव्यमाने नास्य पूर्वोक्ता चतुरङ्गुलता उपपद्यते अधिकरणेरधः संकुचितत्वेन विषमचतुरत्वादित्याह- 'समतलं' समतलम्-समानि न न्यूनाधिकानि तलानि यस्य तत्तथा अथ काकणी रत्नमेव यच्छन्दगभितवाक्य द्वारा विशिष्टि 'माणुम्माण जोगा जतोलोगे चरंति' मानोन्मानयोगाः यतो लोके चरन्ति, तत्र यतः काकणीरत्नात् मानोन्मान (प्रमाण) योगाः एते मानविशेषव्यवहारा लोके चरन्ति प्रवर्तन्ते इत्यर्थः तत्र मान-धान्यमान सेतिका कुडवादि, रसमानं चतुःषष्टिकादि उन्मानं कर्षपलादि खण्डगुडादि द्रव्यमानहेतुः, उपलक्षणात् सुवर्णादिमानहेतुः प्रतिमानमपि ग्राह्य गुञ्जादि, कि विशिष्टास्ते व्यवहारा: ? 'सव्वजणपण्णवगा' सर्वजनप्रज्ञापकाः सर्वजनानाम् अधमर्गोत्तमर्णानां प्रज्ञापका:-मेय द्रव्याणामियत्तानिर्णायकाः अयमाशयः यथा सम्प्रति आप्तजनकृतनिर्णयात कुडवादिमानं जनप्रत्यायकं व्यवहारप्रवर्तकं च भवति तद्वच्चक्रवर्ति काले कारणिकपुरुषैः काकणिरत्नाङ्कितं तत्तादृशं भवेदित्यर्थः माहात्म्यान्तरमाह-'णइव चंदो ण इव तत्थ सूरे ण इव अग्नी ण इव तत्य मणिणो तिमिरं णासेंति अंधयारे जत्थ तयं दिव्वं भावजुत्तं' नापि चन्द्रः नवा तत्र सूर्यः नवा अग्निः नवा तत्र प्रणयः तिमिरं नाशयन्ति,, यत्रान्ध कारे तकत् दिव्यं प्रभावयुक्तम् तत्र नापि चन्द्रो नवा सूर्यस्तत्र तिमिरम् अन्धकारं नाशयतीति योजनीयम्, अत्र इर्वोक्यालङ्कारे एवं सर्वत्र, नवाऽग्नि दीपादि गतः नवा मणयः तत्र तिमिरं नाशयन्ति, प्रकाशं कत्तु न शक्तवन्तीत्यर्थः, यत्राधिकारे अन्धकारयुक्तत्वेनाभेदोपचारात् अन्धकारवति गिरिगुहादौ तकत् तत् काकणीरत्नं दिव्यं प्रभावयुक्त तिमिरं नाशयति, अथेदं कियत् क्षेत्र प्रकाशयतीत्याह-'दुवालस जोयणाई तस्स लेसाउ विपद्धति' द्वादशयोजनानि तस्य काकणीरत्नस्य लेश्या:-प्रभाः विवर्द्धन्ते' अमन्दाः सत्यः प्रकाशयन्तीत्यर्थः किं विशिष्टा लेश्याः उस समय मान और उन्मान के व्यवहार होते थे (सब्व जण पण्णवगा) जो जनता को मान्य होते थे । (ण इवचंदो, ण इव तत्थ सूरे ण इव अग्गी ण इव तत्थ मणिणो तिमिरं णाति अंध-. यारे तत्थ तयं दिव्वं भावजुत्तं दुवालसजोयणाइं तस्स लेसाउ विवढेति तिमिरणिगरपडिसोहियाओ) जिस गिरिगुफादिगत अन्धकार को चन्द्र- सूर्य अग्नि या और दूसरे मणियों का प्रकाश नष्ट જેવું બીજુ કઈ રન હતું જ નહીં. એ સમતલવાળું હતું. એ રત્નથી જ જગતમાં તે मत मान मन भानना व्यवहारे। सम्पन्न थता हता. (सव्वजणपण्णवगा) २ सनताने मान्यता (णइव चंदो णइव तत्थ सूरे, ण इव अग्गी ण इव तत्थ मणिणो. तिमिरं णासेंति अधयारे तत्थ तयं दिव्वं भावजुत्तं दुवालसजोयणाई तस्स लेसाउ विपद्धति तिमिरणिगरपडिसेहियाओ) ? Rशुपाना भरने यन्द्र सूर्य , અન્ય બીજા મણિઓના પ્રકાશ નષ્ટ કરી શકતા નહી. એ અંધકારને એ પ્રભાવશાળી Page #730 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे प्रभाः इत्याह -'तिमिरगिगरपरि सेहियाओ' तिमिरनिकरप्रतिषेधिकाः तमिस्रागुहायाः पूर्वापरतो द्वादशयोजनविस्तारयोस्तासां प्रसरणात 'रति च सयकालं खंधावारे करेइ आलायं दिवसभूयं नस्स पभावेण चक्कट्टी तिमिसगुहं अतीति सेण्णसहिए अभिजेत्तुं विनियम दमाई' पत्र पर न प छन्दाध्याहारात् अर्थवशाद्विभकिपरिमाणाच्च यद्रत्नं रात्रौ रात्रि रात्रा इत्यर्थः चा वाक्यान्तरारम्भार्थः सर्वकालं स्कन्धावारे दिव भूतं दिवससदृशं यथा दिवसे आलोक स्तथा रात्रौ अपीत्यर्थः आलोकं करोति-प्रकाशयति यस्य प्रभावेण चक्रवत्तों तमिस्रां गुहाम् अत्येति प्रविशति सैन्यसहितो द्वितीय मर्द्धभरतमभिजेतुम् उत्तरभरतं वशीकर्तुम् 'रायवरे कागणिं गहाय तिमिसगुहाए पुरच्छिमिल्लपच्चथिमिल्ले सुकडएसु' राजवरः चक्रवर्ती भरतः काकणों-पदैकदेशे पदसमुदायोपचारात् काकणीरत्नं गृहोत्वा आदाय तमिस्रागुहायाः पौरस्त्यपाश्चात्ययोः कपाटयो:-भित्त्योः प्राकृतत्वाद् द्विवचने बहुवचनम् 'जोयणंतरियाई पंचधणुसयविक्खंभाई जोयणुज्जयकराई चक्कणेमी संठियाई चंदमंडलपडिणिकासाई एगूणपण्णं मंडलाई आलिहमाणे आलि. हमाणे अणुप्पविसई' योजनान्तरितानि प्रमाणांगुलनिष्पन्नयोजनमपान्तराले मुक्तता नहीं कर सकता था उस अन्धकार को यह प्रभावशाली देवाधिष्ठित काकणीरत्न नष्ट कर देता था इस काकणी रत्न की प्रभा-१२ योजन तक के क्षेत्र को प्रकाशित कर देती है (रत्तिच सम्वकालं संधावारे करेइ, आलोअं दिवसभू जस्स पभावेण चक्कवट्टी तिमिसगुहं अतीति सेण्णसहिए वितियमद्धभरह) यह रत्न चक्रवर्ती के सैन्य में दिवस के जैसा ही रात्रि में प्रकाश देता हैउत्तर भरत को वश करने के लिए इसी के प्रकाश में ही चक्रवर्ती तमिस्रागुहा में सैन्यसहित प्रवेश करता है (रायवरे काकर्णि गहाय तिमिसगुहाए पुरथिमिल्लपच्चस्थिमिल्ठेमुं कडएसुं जोयणंतरियाई पंचधनुसयविक्खंभाई) ऐसे पूर्वोक्त विशेषणों वाले काकणी रत्न को लेकर चक्रवर्ती ने तिमिस्रगुहा के पूर्व और पश्चिमदिग्वर्ती किवाड़ो की भोत में एक एक योजन के अन्तरालको और पांचसौ धनुष के विस्तार को छोड़कर (जोयणुज्जय कराई चक्कणेमी संठियाइं चंदमंडलपडिणिकासाई एगणपणं मंडलाई आलिहमाणे आलिहमाणे २) ४९ मंडललिखें-बनाये ये मंडल કાંકિણી રત્ન નષ્ટ કરતું હતું એ કાકણી રત્નની પ્રભા ૬૨ યોજન પ્રમાણ વિસ્તારવાળા क्षेत्र प्रशित ४२ ती ती. ( रत्तिं च सम्वकालं खधावारे करेइ आलोअ दिवसभूभं जस्स पभावेण वक्कवट्टो तिमिसगुहं अतीति सेण्णसहिए बितियमद्धभरहं) न ચકવાના સેવમાં રાત્રામાં દિવસ એટલે જ પ્રકાશ આપતુ હતું ઉત્તર ભારતને વશમાં રવા માટે એના પ્રકાશમાં જ ચક્રવતી તમિસ્ત્ર ગુહામાં સૈન્ય સહિત પ્રવેશ કરે છે, रायवरे काकणिं गहाय तिमिसगुहाए पुरथिमिल्लपच्चस्थिमिल्लेसुं कडएसु जोयणतरियाई पंवणुसयविक्खभाई) सेवा पूर्वात विशेषणे! पण शीतन वन ચક્રવતી તિમિસ્ત્ર ગુહાના પૂર્વ અને પશ્ચિમ દિગ્વતી કમાડાની દિવાલમાં એક એક अन्तरासन भने ५०० धनुश्यना विस्तारने त्याने ( जोयणुजयकराई सरकणेमी संठियाई चंडमंडलपडिणिकासाई एगूणपणं मंडलाइं आलिहमाणे २) ४८ मउगे। v41 Page #731 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० १५ तमिस्रागुहाया दक्षिणद्वारोद्घाटननिरूपणम् ७१७ कृतानि इत्यर्थः पञ्चधनुः शविष्कम्भाणि-भवमाहनापेक्षया उत्सेधांशुलनिष्पन्नपश्चधनुःशतमानविष्कम्भाणि, वृत्तत्वात् विष्कम्भग्रहणेन आयामोऽपि तावानेबावगन्तव्यः, उत्सेधांगुलप्रमीयमाणावगाहना केन चक्रिणा भरतेन हस्तात् नागोरत्नेन क्रिय माणत्वान्मण्डलानाम्, अयं च मण्डलावगाहः स्वस प्रकाश्य योजनमध्ये एव गण्यते अन्यथा ४९ मण्डलानामवगाहे पिण्डी क्रियमाणे गुहाभित्यो रायामः उक्तः प्रमाणाधिकपमाणः प्रसज्येतेति, अतएव च योजनोद्योतकराणि योजनमात्रक्षेत्रप्रकाशकानि, यावन्मण्डलान्तरालं तावन्मण्डलप्रकाश्यं गुहाभित्तिक्षेत्रमित्यर्थः, चक्र नेमिसंस्थितानि चक्रस्य नेमिः-परिधिः तत्संस्थितानि तत्संस्थानि वृत्तानीत्यर्थः तथा चन्द्रमण्डलप्रतिनिकाशानि, चन्द्रमण्डलस्य प्रतिनिकाशानि भास्वरत्वेन सदृशानि 'एगणपण्णं मंडलाई' एकोनपञ्चाशतं मण्डलानि वृत्तसुवर्णरेख रूपाणि, काकणीरत्नस्य सुवर्णमयत्वात 'आलिहमाणे आलिमाणे' आलिखन् आलिखन विन्यस्यन् विन्यस्यन् 'अणुपविसई' अनुप्रविशति गुहामिति बोध्यम्, वीप्सावचनमाभिक्ष्ण्यद्योतनार्थम्, मण्डलालिखनक्रमश्वायं गुहायां प्रविशन् भरतः पाश्चात्यपान्यजनप्रकाशकणाय दक्षिणद्वारे पूर्व दिक्कपाटे एक २ योजन की भूमितक प्रकाश देते थे इनका आकार चक्रनेमि के जैसा तथा भास्वर होने के कारण चन्द्रमंडल के जैसा था इस तरह के मंडलों का आलेखन करता २ वह भरतचक्री (अणुपविसइ) गुहा में प्रविष्ट हुआ (तएण सा तिमिसगुहा भरहेण रण्णा तेहिं जोयणतरिएहिं जाव जोयणुज्जोयकरेहिं एगणपण्णाए मडलेहिं आलिहिज्जमाणेहिं २ खिप्पामेव आलोअभूया उज्जोयभूया जाया यावि होत्था) इस तरह वह तमिस्रागुफा उन एक योजन के अन्तराल से बनाये गये यावत् एक योजन तकप्रकाश देनेवाले उन ४९ चास लिखे गए मडलों से आलोकित हो उठी उद्योतीत हो उठी और जैसे उसमें दिवस का प्रकाश हो गया हो ऐसी होकर वह चमक उठी क्योंकि काकणी रत्नसुवर्णमय होता है इसलिये ये जो मंडल उससे लिखे गये वे वृत्त और हिरण्यरेखारूप थे ये किस २ गुहा के द्वार आदि में लिखे गये इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार से है पाश्चात्य पान्थजनों को प्रकाश देने के लिए दक्षिण द्वार में पूर्वदिक्कपाट में प्रथमમંડળ બનાવ્યા. એમ ડલે એક-એક એજન જેટલી ભૂમીને પ્રકાશિત કરે છે. એ મંડળને આકાર ચક્રનેમિ જે તેમજ ભાસ્વર હોવાથી ચંદ્રમંડળ જે હતા. આ જાતના મંડળનું मालेमन २ तमतयही (अणुविसइ) शुखमा प्रविष्ट था. (त एणं सा तिमिसगुहा भरहेण रण्णा तेहिं जोयणंतरिएहिं जाव जोयणुज्जोयकरेहिं एगूणपणाए मंडलेहिं आलिहिज्जमाणेहिं आलिहिज्जमाणेहि खिप्पामेव आलोअभूया उज्जोयभूया जाया यापि होत्था) मा પ્રમાણે તે તિમસ ગુહા એક ચીજનના અંતરાલથી બનાવામાં આવેલા યાવત એક જન સુધી પ્રકાશ પાથરનાર તે ૪૬ મંડળેથી આલેકિત થઈ ગઈ. અને જાણે કે તેમાં દિવસને પ્રકાશ થઈ ગયો હોય તેમ પ્રકાશિત થઈ ગઈ કેમકે કાકિણીરત્ન સુવર્ણમય હોય છે. એથી એ મંડળે જેને નવડે લખવામાં આવ્યાં હતાં તે વૃ ત અને હિરણ્ય રેખા રૂપ હતા. એ મંડળે કંઈ કંઈ ગુહાના દ્વાર વગેરે ઉપર લખવામાં આવ્યાં એનું સ્પષ્ટીકરણ આ પ્રમાણે Page #732 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७१८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे प्रथमं योजनमुक्त्वा मण्डल मालिखति ततो गोमूत्रिकान्यायेन उत्तरतः पश्चिमदिनकपाटतोड्डके तृतीययोजनादौ द्वितीय मण्डलमालिखति, ततस्तेनैव न्यायेन पूर्वदि कपाटतोड्डके चतुर्थयोजनादौ तृतीयम् ततः पश्चिमदिग्भित्तौ पञ्चमयोजनादौ चतुर्थ ततः पूर्वदिग्भितौ षष्ठयोजनादौ पञ्चमं, ततः पश्चिमदिग्भित्तौ सप्तमयोजनादो षष्ठम्, ततः पूर्वदिम्भित्तो अष्टमयोजनादौ सप्तमम्, एवं तावद् वाच्यं यावदष्टचत्वारिंशत्तमम् उत्तरदिग्द्वारसकपश्चिमदिकपाटे प्रथमयोजनादौ एकानपश्चाशत्तमं चोत्तरदिगद्वारसापूर्वदिक्कपाटे द्वितीययोजनादो आलिखति, एवमेकस्यां भित्तो पञ्चविंशतिः अपरस्यांचतुर्विशतिरित्येकोनपञ्चाशत् मण्डलानि भवन्ति, एतानि च खलु गुहायां तियेय् द्वादशयो जनानि प्रकाशयन्ति, ऊर्वाधाभागेन चाष्टौ योजनानि, गुहाया विस्तरोच्चत्वस्य चक्रमेण एतावत एव सद्भावात्, अग्रतः पृष्ठतश्च योजनं प्रकाशयन्तीति । योजन को छोड़कर प्रथम मंडल उसने लिवा इसके बाद गोमूत्रिकान्याय से उत्तर दिशा में पश्चिमदिक्कपाटतोड्डक में उसने तृतीय योजन को आदि में द्वितीय मंडल लिखा इसी न्याय के अनुसार उसने पूर्वदिक्कपाटतोड्डक में चतुर्थयोजन की आदि में तृतीय मंडल लिखा इसके बाद पश्चिमदिग्भित्ति में पांचवें योजन को आदि में चतुर्थ मंडल लिवा इसके बाद पूर्वदिग्भित्ति में छठे योजन की आदि में पांचवां मण्डल लिखा इसके बाद पश्चि मदिग्भित्ति में सातवें योजन की आदि में छठामण्डल लिखा इसके बाद पूर्वदिग्भित्ति में माठवें योजन की आदि में सातवां मंडल लिखा इस तरह लिखते लिखते उसने उत्तर दिग्द्वार के पश्चिम दिक्कपाट में प्रथमयोजन की अदि में ४८ अडतालीस वां मंडल लिखा और ४९ वां मंडल उत्तरदिग्द्वार के पूर्वदिक्कपाट में द्वितीय योजन की आदि में लिखा इस प्रकार से एकभित्ति में २५ मंडल और दूसरोभित्ति में २४ मंडल लिखे गए मिलकर ४९ मंडल हो जाते हैं । ये मंडल गुहा में तिरछे रूप में बारह છે. પાશ્ચાત્ય પાંથજનોને પ્રકાશ આપવા માટે દક્ષિણ દ્વારમાં પૂર્વદિકકપાટમાં પ્રથમ જનને ત્યજીને પ્રથમ મંડળ તેણે લખ્યું ત્યારબાદ ગોમૂત્રીકાન્યાયથી અર્થાત ચાવતા બળદના સૂત્રના જેવા આકારથી ઉત્તરદિશામાં પશ્ચિમ દિકકપાટહૂકમાં તેણે તૃતીય એજનના પ્રારંભમાં દ્વિતીય મંડળ લખ્યું એ ન્યાય મુજબ તેણે દિકકપાટ તેહુકમાં ચતુર્થ એજનના પ્રારંભમાં તૃતીય મંડળ લખ્યું ત્યારબાદ પશ્ચિમ દિમિત્તિમાં પાંચમા યે જનના પ્રારંભમાં તેણે ચતુર્થ મંડળ લખ્યું ત્યારબાદ પૂર્વ દિભિત્તિમાં ૬ ઠા યોજનાના પ્રારંભમાં પાંચમું મંડળ લખ્યું ત્યારબાદ પશ્ચિમ દિમિત્તિમાં સાતમા એજનના પ્રારંભમાં ૬ઠું મંડળ ૩ખ્યું. ત્યારબાદ પ્રદિભિત્તિમાં આઠમા જનના પ્રારંભમાં સાતમું મડળ લખ્યું આ પ્રમાણે લખતાં લખતાં તેણે ઉત્તર દિશદ્વારના પશ્ચિમ દિકકપાટમાં પ્રથમ યોજનમાંના પ્રારંભમાં ૪૮મું મંડળ લખ્યુ અને ૪૩મું મંડળ તેણે ઉતરદિગૂના પૂર્વદિકકપાટમાં દ્વિતીય એજનના પ્રારંભમાં લખ્યું આ પ્રમાણે એક ભિત્તિમાં ૨૫ મંડળ અને બીજી ભિત્તિમાં ૨૪ મંડળ લખવામાં આવ્યાં આમ બંનેને સરવાળે ૪૯ મંડળ થઈ જાય છે. એ મંડળ ગુફામાં વક્રાકારમાં ૧૨ યોજન સુધી અને ૮ જન સુધી ઊંચે તથા નીચે પ્રકાશ પાથરે છે. કેમ Page #733 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० बक्षस्कारः सू० १५ तमिस्रागुहा दक्षिणद्वारोद्घाटननिरूपणम् ७१९ ननु गोमूत्रिका विरचनक्रमेण मण्डलालिखने कथमेषां योजनान्तरितत्वम् ! यधेकभित्तिगतमण्डलापेक्षया तर्हि योजनद्वयान्तरितत्वमापधेत अन्यथा द्वितीय मण्डस्यैकभित्तिगतत्वप्रसङ्गः तथा सति गोमूत्रिकाभङ्गः अन्यभित्तिगतमण्डलापेक्षया तु तिर्यक साधिक द्वादश योजनान्तरितत्वमिति चेन्न पूर्वभित्तो प्रथमं मण्डलमालिखति, ततस्तसम्मुखप्रदेशापेक्षया योजनातिक्रमे द्वितीयमण्डलमालि बति, ततस्तत्सम्मुख प्रदेशा. पेक्षया योजनातिक्रमे पूर्वभित्तौ तृतीयमण्डलमालिखतीत्यादि क्रमेण मण्डलकरणात् गोमूत्रिकारत्वस्य योजनान्तरितत्वस्य च सुव्यक्ततया सर्वस्य सुस्थत्वात्, अथ पश्चाशद योजन तक और ऊँचे नीचे आठ योजन तक प्रकाश देते है क्योंकि गुहाका विस्तार और उच्चता क्रम से इतनी ही हैं। ये मंडल आगे और पोछे एक योजन तक प्रकाश देते हैं शङ्का-यदि चक्रवर्तीतिमिस्रा गुहा में गोमूत्रिका (चलते बेलके मूतके जैसा आकर) के आकार में ४९ मंडल लिखता है तो फिर इनमें एक एक योजन के अन्तर से लिखने की जो बात कही गई है वह सधती नहीं हैं यदि एक भित्तिगत मंडल की अपेक्षा योजनान्तरिता मानी जावे तो फिर इस तरह से योजनद्वय से अन्तरितता की आपत्ति आती है यदि ऐसा न मानाजाय तो फिर द्वितीय मंडल में एक भित्तिगतता का प्रसंग प्राप्त होगा। इस तरह से होने में गोमूत्रिका के आकार का होना नहीं बन सकता और यदि अन्यभित्तिगत मण्डल की अपेक्षा गोमूत्रिका का आकार कहा जावे तो फिर तिर्यक् में १२ योजन से अधिक को अन्तरितता हो जाती है उत्तर- यह भरत चक्रवर्ती पूर्वदिग्गतभित्ति में प्रथम मंडल लिखता है इसके बाद उसके सम्मुख प्रदेश की अपेक्षा एक योजन छोड़कर द्वितीय मंडल लिखता है फिर उसके सम्मुख प्रदेश में एक योजन छ डकर पूर्वभित्ति में तृतीय मडल लिखता है इत्यादि क्रम से मण्डल करने से वे गौमूत्रिका के आकार के और एक योजन से अन्तरितता वाले हो जाते हैं । पचास योजन को लंबाई वाली કે ગુફાને વિસ્તાર અને તેની ઉગ્રતા ક્રમથી આટલી જ છે. એ મંડળ આગળ અને પાછળ એક જન સુધી પ્રકાશ પાથરે છે, શંકા - જે ચક્રવતી તિમિત્ર ગુફામાં ગેમૂત્રિકાના અર્થાત (ચાલતા બળદના મુતરને જેવો આકાર થાય છે તેવા આકારમાં ૪૯ મંડળે લખે છે તે પછી એમને એક-એક જનના અંતરથી લખવાની જે વાત કહેવામાં આવી છે, તે બરાબર બંધ બેસતી નથી. જે એક ભિત્તિગત મ ડળની અપેક્ષાએ જનારિતા માનવામાં આવે તો પછી આ પ્રમાણે જન દ્રયથી અન્તરિતતાની આપત્તિ આવે છે. જે આ પ્રમાણે માનવામાં આવે નહિ તે પછી મંડળમાં એક ભિત્તિગતતાને પ્રસંગ પ્રાપ્ત થશે? આ પ્રમાણે થાય તે ગોમૂત્રિકાના આકારની સંભાવના જ શકય નથી અને જે અન્યભિત્તિગત્ મંડળની અપેક્ષા ગોમૂત્રિકાને આકાર કહેવામાં આવે તે પછી તિર્યક્રમાં ૧૨ યોજનથી અધિકની અન્તરિતતાં થઈ જાય છે. ઉત્તર - એ ભરત ચક્રવતી પૂર્વદિગ્ગતભિત્તિમાં પ્રથમ મંડળ લખે છે. ત્યાર બાદ તેના સંમુખ પ્રદેશની અપેક્ષાએ એક યજન વિસ્તાર છેડીને દ્વિતીય મંડળ આલેખે છે પછી તેની સામેના પ્રદેશમાં એક જન વિસ્તાર ત્યજીને પૂર્વ ભિત્તિમાં તૃતીય મંડળ લખે છે, Page #734 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७२. जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे योजनायामायां गुहायाम् एकोन पञ्चाशता मण्डलैर्यत्प्रकाशकरणमुक्तं तस्यार्थस्य सुखप्रतिपत्तये संक्षेपेण मण्डलपञ्चकस्य स्थापनां दर्शयति यथा- ?:?:? एवं षट्कोष्ठकपरिकल्पित षड्योजनक्षेत्रे एकस्मिन् पक्षे त्रीणि अन्य तु द्वे एत्युभय सम्मेलने पञ्चमण्डलानि एवमनेन गोमूत्रिका मण्डलविर चनक्रमेण पञ्चाशद् योजनायामायां गुहायामैकोनपश्चाशतोऽपि मण्डल कानां स्थापना आकारः स्वयं विज्ञेयेति । अथ प्रकृतं प्रस्तुयते-'तएणं' इत्यादि । तएणं सा तिमिसगुहा भरहेणं रण्णा तेहिं जोयणंतरिएहिं जाव जोयणुज्जोयकरहिं एगृणपण्णाए मंडलेहिं आलिहिज्जमाणेहिं आलिहिज्जमाणेहिं खिप्पामेव आलोगभूया उज्जोयभूया दिवसभूया नाया याविहोत्था' ततो मण्डलालिखनानन्तरं खलु सा तमिस्रा गुहा भरतेन राज्ञा तैः योजनान्तरितैः यायद्योजनोद्योतकरैः एकोनपञ्चाशता मण्डलैरालिल्यमानैरालिख्यमानः क्षिपमेव आलोकं सौर प्रकाशं भूता प्राप्ता, अत्र भूगतौ इति सत्रियातोः क्त प्रत्ययः एवम् उधोतं चान्द्रप्रकाशंभूता किं बहुना ? दिवसगुफा में जो ४९ मंडल करने की बात कही गई है- वह अच्छी तरह से समझ में आ जावें इसके लिये सूत्रकार ने पांच मंडलों की स्थापना संस्कृत टीका में दिखा करके समझाया है-इस तरह षट् कोष्टक परिकल्पित षट् योजनवाले क्षेत्र में एक पक्ष में तीन और अन्यत्र दो मंडल लिखे जाते है दोनों का जोड़ पांच हो जाता है। इसीतरह गोमूत्रिका के आकार वाले मंडलों की रचना के क्रम से ५० योजन प्रमाण वाली गुहा में ४९ मंडलों की स्थापना स्वयं ही समझ लेना चाहिए (तएणं सा तिमिसगुहा भरहेणं रण्णा तेहिं जोयणंतरिएहिं जाव जोयणुनोयकरेहि एगणपण्णाए मण्डलेहिं आलिहिज्जमाणेहिं २ खिप्पामेव आलोगभूया उज्जोयभ्या दिवसभूया जायायाविहोत्था) एक २ योजन के अन्तराल से, यावत् एक २ योजन तक प्रकाश देनेवाले इन ४९ मण्डलों को इस प्रकार से लिखने के बाद वह तिमिस्रगुहा बहुत हो शोघ्र आलोकमत हो गइ उद्योतभूत हो गइ और दिवस के जैसी होगइ यहां अपिशब्द संभावना अर्थ में प्रयुक्त ઇત્યાદિ કમથી મંડળે આલેખવાથી મૂત્રિકાના આકારના અને એક પેજન જેટલી અંતરિતતાવાળા થઈ જાય છે. ૫૦ ચોજન જેટલી લંબાઈવાળી ગુફામાં જે ૪૯ મંડળે લખવાની વાત કહેવામાં આવી છે તે સારી રીતે સમજમાં આવી જાય એ હેતુથી સૂત્રકારે આ પ્રમાણે પાંચ મંડળોની સ્થાપના સંસ્કૃત ટીકામાં કરીને સમજાવવા પ્રયત્ન કર્યો છે. આ રીતે ષટુ કોષ્ટક પરિકહિત ષડૂ ચો જનવાળ ક્ષેત્રમાં એક પક્ષમાં ત્રણ અને અપત્ર બે મંડળો લખવા માં આવે છે અને સરવાળે પાંચ થઈ જાય છે. આ પ્રમાણે ગોમૂત્રિકાના આકારવાળા મંડળની રચના ક્રપથી ૫૦ એજન પ્રમાણુવાળી ગુફા માં ૪૯ મંડળોની સ્થાપના આપ મેળે જ સમજી લેવી मे. (तपणं सा तिमिसगुहा भरहेणं रण्णा तेहिं जायणतरिएहिं जाव जायणुज्जोयकोहि एगणपण्णाप मण्डलेहिं आलिहिज्जमाणेहिर खिप्पामेघ आलोगभूया उज्जायभया दिवसभया जाया यावि होत्था) - 21नना तथा यावत मे-ये याची પ્રકાશ પાથરનાર એ ૪૯ મંડળોને આ પ્રમાણે લખવાથી તે તિમિસ્ત્ર ગુફા અતીવ શીધ્ર એક ભૂત થઈ ગઈ. અને દિવાના જેવી થઈ પ્રકાશિત થઈ ગઈ અહીં ' પિ” શબ્દ સંભાવનાના Page #735 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ वक्षस्कारः सू०१६ उन्मन्ननिमग्नजलय्यो महानद्योः स्वरूपनिरूपणम् ७२१ भूता दिनपदृशी जाता चासीत् , च समुच्चये अपिः सम्भावनायाम् , तेन नेयं गुहा मण्डलप्रकाशपूर्णा किन्तु सम्भाव्यते आलोकभृता, एवमग्रतनपदद्वयमपि तथाहि नेयं गुहा मण्डलपकाशपूर्णा अपि तु सम्भाव्यते उद्योतभूता तथा नेयं गुहा मण्डलपकाशपूर्णा अपि तु सम्भाव्यते दिवसभूता इति ॥९० १५॥ _अशान्त हे वर्तमानयोः परपारं जिगमिषूणां प्रतिबन्धकीभूतयो रुन्मग्नानिमग्नानायकनद्योः सरूपं प्ररूपयितुकामः प्राह -- "तोसे गं" इत्यादि । मूलम्-तीसे णं तिमिसगुहाए बहुमच्झ देसभाए एत्थणं उम्म. ग्गणिमग्गजलाओ णामं दुवे महाणईओ पण्णत्ताओ जाओणं तिमिस गुहाए पुरच्छिमिल्लाओ भित्तिकडगाओ पढाओ समाणीओ पच्च. त्थिमेणं सिंधु महाणइं समप्पें ति, से केण?णं भते! एवं वुच्चइ उमग्ग. णिमग्गजलाओ महणाइओ?, गोयमा ! जण्णं उमग्गजलाए महाणईए तणंवा पत्तंवा कटुं वा सक्करं वा आसे वा हत्थी वा रहे वा जोहे वा मणुस्से वा पक्खिप्पइ तण्णं उमग्गजला महाणई तिक्खुत्तो आहुणिअ २ एगते थलसि एडेइ, जण्ण णिमग्गजलाए महाणईए तणं वा पत्तं वा कट्ठ वा सक्करं वा जाव मनुस्से वा पक्खिप्पइ तण्णं णिमग्गजलामहाणई तिक्खुत्तो आहुणिअ आइणिअ अंतो जलंसि णिमज्जावेइ, से तेणटेणं गोयमा! एवं वुच्चइ उमग्गणिमग्गजलाओ महाणईओ, तएणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे अणेगराय० महया उक्किट्ठ सीहणाय जाव करेमाणे करेमाणे सिंधूए महाणईए पुरच्छिमिल्लेणं कूडेणं जेणेव उम्पग्गजला महाणई तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता वद्धइरयणं सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाप्पिया ! उम्मगणिमग्गजलासु हुआ है इससे यह समझाया गया है कि वह गुफा मण्डल प्रकाश से पूर्ण न हुई किन्तु ऐसी संभावना होती है कि वह मंडल प्रकाश से पूर्ण सी होगई इसी तरह आलोकादि पदों के सम्बन्ध में भी जानना चाहिये ॥१५॥ અર્થમાં પ્રયુકત થયેલ છે. એનાથી આમ સમજાવવામાં આવ્યું છે કે તે ગુફ મ ડળ પ્રકાશથી પરિપૂર્ણ થા નહિ પણ એવી સંભાવના છે કે તે મંડળોના પ્રકાશથી પરિપૂર્ણ છે ય એવી થઈ ગઈ. આ રીતે આ લોકાદિ પદોના સંબંધમાં પણ જાણી લેવું જોઈએ. સૂત્ર-૧૫ Page #736 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७२२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे महाणईसु अणेगखभसयसण्णिविढे अयलमकंपे अभेज्जकवए सालबणबाहाए सव्वस्यणामए सुहसंकमे करेहि करेत्ता मम एअमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चपिणाहि तएणं से वद्धइश्यणे भरहणं रण्णा एवं वुत्ते समाणे हट्टतुट्ठचित्तमाणदिए जाव विणएणं पडिसुणेइ, पडिसुणित्ता खिप्पामेव उम्मग्गजलासु महाणईसु अणेगखंभसयसण्णिविट्टे जाव सुहसंकमे करेइ करित्ता जेणेव भरहे गया तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता जाव एयमापत्तियं पच्चप्पिणइ तएणं से भरहे राया सखंधावारबले उम्मग्गणिम्मग्गजलाओ महाणईओ तेहिं अणेगखंभसयसण्णिविद्वेहिं जाव सुहसंकमेहिं उत्तरइ, तएणं तीसे तिमिस्सगुहाए उत्तरिल्लस्स दुवारस्स कवाडा सयमेव महया महया कोचारवं करेमाणा रससरस्सग्गाई ठाणाई पच्चोसक्कित्था ॥सू०१६॥ छाया-तस्याः खलु तिमिनागुहायाः बहुमभ्यदेशभागे अत्र खलु उन्मग्ननिमग्नजले नाम्न्यो वे महानद्यौ प्रज्ञप्ने, ये खलु तमिस्रागुहायाः पौरस्त्यात् भित्तिकटकात् प्रव्यूडे सत्यौ पाश्चात्येन सिन्धु महानदी समाप्नुतः, अथ केनार्थेन भदन्त ! एषमुच्यते उन्मग्नजलनिमग्नजले महानद्यौ ? इति गौतम ! यत् खलु उन्मग्नजलायां महानद्यां तुणं वा पत्रं वा काष्ठं वा शर्करा वा अश्वो वा हस्ती वा रथो वा योधो बा मनुष्यो वा प्रक्षिप्यते तत् खलु उन्मग्नजला महानदी त्रिः कृत्वः आधूय आधूय एकान्ते स्थले छईयति यत् खलु निमग्नजलायां महानद्यां तृण वा पत्रं वा काष्ठं वा शर्करा वा यावत् मनुष्यो वा प्रक्षिप्यते तत् खलु निमग्नजला महानदो त्रिः कृत्वः आध्य आधूय अन्तर्जलं निमज्जयति अथ तेनार्थेन गौतम ! एवमुच्यते उन्मग्नजलनिमग्नजले महानद्यौ, ततः खलु स भरतो राजा चक्ररत्न देशितमार्गः अनेकराज० महता उत्कृष्टसिंहनाद यावत् कुर्वन् कुर्वन् सिन्ध्वाः महानद्यः पौरस्त्ये कूटे यत्रैव उन्मग्नजला महानदी तत्रैव उपागच्छति उपागत्य वर्द्धकिरत्नं शब्दयति शब्दयित्वा एवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रिय! उन्मग्ननिमग्न जलयो महानद्योः अनेक स्तम्भशतसन्निविष्टौ अबलाकम्पी अभेद्यकवचौ सालम्बनबाहौ सर्वरत्नमयो सुखसंक्रमो कुरुष्व, कृत्वा मम पताम् आज्ञप्तिकां क्षिप्रमेव प्रत्यर्पय, ततः खलु तत् वर्द्धकिरत्नं भरतेन राशा एवमुक्तं सत् हृष्टतुष्टचित्तानन्दितं यावद् विनयेन प्रतिनोति, प्रतिश्रुत्य क्षिप्रमेव उन्मग्ननिमग्नजलयोमहानद्योः अनेकस्तम्भशतसन्निविष्टौ यावत् सुखसंक्रमौ करोति, कृत्वा यत्रैघ भरतो राजा तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य यावत् एतामाप्तिका प्रत्यर्पयति, ततः खलु स भरतो राजा स स्कन्धावारबलः उन्मग्ननिमग्नजले महानद्यौ ताभ्याम् अनेक स्त. म्भशतसग्निविष्टाभ्यां यावत् सुखसंक्रपाभ्याम् उत्तरति, ततः खलु तस्या स्तमिस्रागुहाया उत्तराहस्य द्वारस्य कपाटौ स्वयमेव महता क्रौश्वारवं सरस्सरत्ति कुर्वाणौ स्वके स्वके स्थाने प्रत्यवाष्वाष्किषाताम् ॥सू० १६॥ Page #737 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ वक्षस्कारः सु०१६ उन्मग्ननिमग्नजलग्यो महानद्योः स्वरूप निरूपणम् ७२३ टीका "तीसेगं" इत्यादि 'तीसेणं तिमिसगुहाए बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं उम्मगणिमगाजलामो णाम दुवे महाणईओ पण्णत्ताओ' तस्याः खलु तमिस्रागुहाया बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु दक्षिणद्वारतः तोड्डक समेनैकविंशतियोजनेभ्यः परतः उत्तरद्वारतः तोड्डकसमेनकविंशतियोजनेभ्योऽर्वाक च उन्मग्ननिमग्नजले नाम्न्यौ उन्मग्नजलानिमग्न नला नाम्न्यौ द्वे महानद्यौ प्रज्ञप्ते 'जाओणं तिमिसगुहाए पुरच्छिमिल्लाओ भित्तिकडगाओ पढाओ समाणीओ पच्चत्थिमेणं सिंधु महाणई समति' ये खलु तमिसागुहायाः पौरस्त्यात् भित्तिकटकात् भित्तिप्रदेशात् प्रव्यूढे निर्गते सत्यौ पाश्चात्येन कटकेन विभिन्नेन सिंधुं महानदी समाप्नुतः प्रविशत इत्यर्थः ‘से केण?णं भंते ! एवं वुच्चइउमग्गणिमग्गजलाओ महाणईओ ?' अथ केनार्थेन भदन्त ! एव मुच्यते उन्मग्नजलनिमग्नजले महानद्यौ इति !, 'गोयमा ! जण्णं उन्मग्गजलाए महाणईए तणं वा पत्तं वा कटुं वा सकरं वा आसे वा हत्थी वा जोहे वा मणुस्सेवा पनिखप्पइ' गौतम ! यत् खलु उन्मग्न गुहा के भीतर वर्तमान उन्मग्ना और निमग्नानदियों के स्वरूप का कथन टीकार्थ :-'तीसेंण तिमिसगुहाए बहुमज्मदेसभाए एत्थणं'-इत्यादि-सूत्र-१६ (तीसेणं तिमिसगुहाए बहुमज्झदेसभाए) उस तिमिस्त्रगुफाके बहु मध्य देश में ( उम्मग्गणिमग्गजलाओ णाम दुवे महाणईओ पण्णत्ताओ) उन्मग्ना और निमग्ना नाम की दो महानदीयां कही गई हैं ये दो नदियां दक्षिण द्वार के तोडक से २१ योजन आगे और उत्तर द्वार के तोडक से २१ योजन पहिले है। (जाओ णं तिमिसगुहाए पुरच्छिमिल्लाओ भित्तिकडगामओ पवढामओ समाणीओ पच्चत्थिमेणं सिंधुमहाणई समप्पेंति ) तिमिस्रा गुफा के पौरस्यभित्ति कटक से भित्ति प्रदेश से निकलती हुई पाश्चात्य भित्तिप्रदेश से होकर सिन्धु महानदी में प्रवेश करती है ( से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ उन्मग्गणिमग्गजलाओ महाणईओ ) हे भदन्त ! इन नदियों का उन्मग्ना और निमग्ना ऐसा नाम किस कारण से कहा गया है ? इसके उत्तर में प्रभुकहते है-( गोयमा ! जण्णं उम्मग्नजलाए महाणईए तणंवा पत्तंबा कट्टवा सक्करं वा आसे वा हत्थी वा जोहेवा मणुस्सेवा पक्खिबइ ) हे गौतम ! जिस कारण से उन्मग्ना महानदी में ગકામાં વિદ્યમાન ઉન્મગ્ના અને નિમગ્ના નદીઓના સ્વરૂપનું કથન : टी--(तीसेणं तीमिसगुहाए बहुमज्झदेसभाए) ते तिमि गुना महु मध्य हेशभां (उमरग णिमग्गजलाओ णाम दूवे महाणईओ पण्णत्ताओ) Grभन मन निभाना नाम મહાનદીઓ છે. એ બે નદીએ દક્ષિણ ધારના હુકથી ૨૧ જન આગળ અને ઉત્તર દ્વારના तथा २१ यस पडत छ. (जाओण तिमिसगुहाए पुरच्छिमिल्लाओ भित्तिकडगाओ पवढाओ समाणोओ पच्चत्थिमेणं सिंधुमहाणई समति) तिभित शुशन। पौरस्त्यत्ति કટકથી-ભિન્ન પ્રદેશથી નીકળીને એ નદીઓ પાશ્ચાત્ય ભિત્તિ પ્રદેશમાં થઈ તે સિંધુ મહાનદીમાં प्रेशरे छ. (से केणटेणं भंते ! एवं बुच्चइ उन्मग्गणिमग्गजलाओ महाणइओ) महन्त ! એ નદીએના ઉન્મગ્ના અને નિમગ્ના એવા નામે શા કારણથી પડયા છે? એના જવાબમાં प्रभु छे. (गोयमा ! जणं उम्मग्गजलाए महाणइए तणंवा पत्तंवा कटुवा सक्करवा आसे Page #738 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७२४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे जलायां महानद्यां तृणं वा पत्र वा काष्ठं वा शर्करा वा पाषाणखण्डः, अश्वो वा हस्ती वा रथो वा योधो वा सुभटः, मनुष्यो वा प्रक्षिप्यते 'तण्णं उम्मग्गजला महागाई तिक्खुत्तो आहुणिअ एगंते थलंसि एडेड' तत् तृणादिकं खलु उन्मग्नजला महानदी त्रिः कृत्वः त्रीन् वारान् आधूय आधूय भ्रामयित्वा भ्रामयित्वा जलेन सदाऽऽहत्या हत्येत्यर्थः एकान्ते प्रदेशादवयसि स्थले स्थाने निर्जलप्रदेशे स्थाने 'एडेह' छर्दयति तीरे प्रक्षिपति इत्यर्थः, तुम्बीफलमिव शिलाः उन्मग्नजले उन्मज्जतीत्यर्थः, अत एवोन्मज्जति शिलादिकम् अस्मादिति उन्मग्नम् 'कृद् बहुलमिति अपादाने क्त प्रत्ययः उन्मग्नं जलं यस्यां सा उन्मजला, अथ द्वितीया नामान्वर्थः ' जण्णं णिमग्गजलाए महाणईए तणं वा पत्तं वा क तृणपत्र काष्ठ, पत्थर के टुकड़े, अश्व, हाथी, योधा अथवा सामान्य कोई भो मनुष्य डाळ दिये जावे तो वह उन्मग्ना महानदी तीन बार उन्हें इधर उधर घुमा-२ कर एकान्त जळ प्रदेश से दूर किसी स्थल में - निर्जल प्रदेश में डाल देती है तुम्बी फल जिस प्रकार पानी में उतराता उतरता तीरपर लग जाता हैं इसी प्रकार इसी में गिरा हुआ हर एक पदार्थ उतराता उतराता तीर पर लग जाता है इस कारण हे गौतम ! इस नदी का नाम उन्मग्ना ऐसा कहा गया है ! ( जण्णं णिमग्गजलाए महाणईए तणंवा पतंवा कटुंवा सक्करं वा जाव मणुस्सेवा पक्विवइ ) जिस कारण से निमग्ना महानदी में तृण, पत्र, काष्ठ पत्थर के छोटे टुकड़े, अश्व हाथी, योधा अथवा सामान्य कोई भी मनुष्य डाल दिये जायें तो वह निमग्ना नाम की महानदी तीन वार उन्हें इधर उधर घुमा घुमा कर अपने हो भीतर कर देती है इस कारण इसका नाम निमग्ना ऐसा कहा गया है। यही वात ( से तेणद्वेणं गोयमा एवं वुच्चइ उम्मग्गणिमग्गज लाओ महाणईओ ) इस पाठ द्वारा कहो गढ़ है । पूर्वमें "कृद्बहुलम् ' सूत्र से अपादान में और यहां अधिकरण में क्त प्रत्यय हुआ हैं । ये दोनों नदियाँ तीन वाहत्थी वा जेा वा मणुस्से वा पक्खिवह) डे गौतम उन्मग्न महानहीमां तृणु, पत्र, कुण्ड, પત્થરના કુકડા, અશ્વ, હાર્થી, ચાઢા અથવા સામાન્ય કેઈ પણુ મનુષ્ય નાખવામાં આવે તે તે ઉન્મના નદી તેમને આમ-તેમ ફેરવી તે એકાંત જળ પ્રદેશમાં-દૂર કાઈ સ્થળમાં—નિજ ળ પ્રદેશમાં નાખી ટ્રુ છે. તે ખી ફળ જેમ પાણીમાં તરતું તરતું કિનારે પહોંચી જાય છે, તેમજ એ નદીમાં પડેલી દરેકે દરેક વસ્તુ તરતી-તરતી કિનારે પહેાંચી જાય છે. એથી જ गौतम ! से नही नाम उन्मना वामां मन्युं छे. ( जण्णं णिमग्गजलाए महाणईए तणं वा पत्तं वा कटुं वा सक्करं वा जाव मणुस्सेवा पक्लिवर) ने अरथी निभग्ना भडाનદીમાં તૃણુ પત્ર, કાષ્ઠ, પથ્થરના નાના-નાના કકડા અશ્વ, હાથી ચાઢા અથવા સામાન્ય કોઇપણુ મનુષ્ય નાખવામાં આવે તે નિમના નામક મઠ્ઠાનઢી ત્રણ વખત તેમને આમ-તેમ ફેરવીને પેાતાની અંદર જ સમાવી લે છે. એથી જ એ મહાનદીનુ નામ નિમગ્ના કહેવામાં मायु छे. मे ४ वात ( से तेणट्टेणं गायमा ! एवं वुच्छह उम्मग्गणिमग्गजलाभ महाणईओ) मे या वडे व्यक्त ४२वामां खावी छे. पूर्व मां 'कृद्-बहुलम् ' सूत्रथी અપાદાનમાં અને અહી' અધિકરણુમાં ‘ત્ત' પ્રત્યય થયેલ છે. એ બન્ને નદીએ ત્રણ Page #739 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० १६ उन्मग्ननिमग्नज लच्यो महानद्योः स्वरूपनिरूपणम् ७२५ वा सक्करं वा जाव मणुस्से वा पक्खिप्पइ' यत् खलु निमग्नजलायां महानद्यां तृणं वा पत्रं काष्ठं वा शर्करा वा यावत् पदात् अश्वो हस्ती वा रथो वा योधो वा मनुष्यो वा प्रक्षिप्यते तण्णं णिमग्नजला महाणई तिक्खुत्तो आहुणि आहुणिअ अंतो जलंसि णिमज्जावेइ' तत् पूर्वोक्तं वस्तु जातं खलु निमग्नजला महानदी त्रिः कृत्वः अधूयाधूय त्रीन् वारान् भ्रमयित्वा भ्रमयित्वा अन्तर्जलम् जलमध्ये किं? निमज्जयति अत एव निवज्जयत्यस्मिन् तृणादिकमखिलं वस्तु जातमिति निमग्नम्, बहुलवचनादधिकरणे क्त प्रत्ययः, निमग्नं जलं यस्यां नद्याम् सा निमग्नजला, से तेणठेणं गोयमा एवं बुच्च उम्मग्गणिमग्ग जलाओ महाणइओ' अथ तेनार्थेन गौतम ! एवमुच्यते उन्मनानमग्नजले महानद्यौ इति, अनयोश्च यथाक्रमम् उन्मज्जकत्वे वस्तु स्वभाव एव इमे च द्वे अपि त्रयोजनविस्तरे गुहाविस्तारायामे अन्योऽन्यं द्वियोजनान्तरे बोध्ये द्वियोजनम् अन्तरम् अनयो यथा गुहामध्यदेशवर्त्तित्वं तथा सुलभबोधाय स्थापनया दर्श्यते यथा४४१७।३।२।३।१४७२ ७६६४१७ अथ दुरant at faबुध्य भरतो यच्चकार तदाह- 'तपणं' इत्यादि 'तरणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे अणेगराय सहस्साणुयायमग्गे' ततः खलु स भरतो राजा चक्ररत्नदेशित मार्गः चक्ररत्नेन देशितो दर्शितो मार्गों यस्मै स तथा, तथा - अनेकराजसहस्रानुयातमार्गः तत्र अनेकैः राजसहसैरनुयातः - अनुचलितो मार्गों यस्य स तथा, चक्ररत्नप्रदर्शितमार्गमनुसृत्य गच्छतः चक्रवर्त्ति भरतस्य पश्चात् अनेके राजानः प्रयान्तीत्यर्थः । 'महया उकि सीहणाय जाव करेमाणे करेमाणे' महतोत्कृष्ट 'सिंहनाद यावद् बोलकल योजन की विस्तार वाली है गुहा का आयाम और विस्तार जैसा इनका विस्तार और आयाम है तथा ये दो-२ योजन के अन्तर वाली हैं। गुहा के मध्यदेश में ये हैं । इनकी स्थापना इस प्रकार से है - ४ १७।३।२।३१७.४ ।। जब भरत ने इन दोनों नदियों को ॥४ १७ दूरावगाह जाना तो उसने क्या किया इस बात को सूत्रकार समझाते हुए कहते हैं - ( तरणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे अगरायवर सहस्साणुयायमग्गे ) चक्ररत्न से जिसे मार्ग दिखाया जा रहा है, एवं जिसके पीछे - २ हजारों राजा महाराजा चल रहे हैं ऐसा वह भरत राजा ( महाया उकि सोह ચેાજન જેટલી વિસ્તારવાળી છે. ગુફાના આયામ અને વિસ્તાર જેવા જ એમના વિસ્તાર અને આયામ છે. તેમજ એ મહાનદીએ એ ચેાજન જેટલા અંતરવાળી છે. ગુફાના મધ્ય हेशभां मे महानही थे। छे. शेभनी स्थापना या प्रमाथे छे - ॥ ४ १७ । ३ । २ । ३ १७ ४ ॥ न्यारे भरतरामसे जन्ते नहीओने ॥ ४१७ इरावगाह लली त्यारे तेथे शु यु. मे वातने सूत्रकार स्पष्ट करतांडे छेडे (तपणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे अगरायवरसहस्सानुयायमग्गे) रत्नथी मेने भार्ग ताववामां भावी रह्यो छे અને જેની પાછળ-પાછળ હજારા રાજા-મહારાજાએ ચાલી રહ્યા છે, એવે તે ભરત Page #740 -------------------------------------------------------------------------- ________________ and.-.. -RAPARINnAPA ७२६ जम्बूदीपप्रज्ञाप्तिसूत्रे कलरवेण समुद्ररवं भूतामिव प्राप्तामिव गुहामितिगम्यम् कुर्वन् कुर्वन् सिंधूए महाणईए पुरच्छिमिल्लेणं कूडेणं जेणेव उम्मग्गजला महाणई तेणेव उवागच्छइ' सिन्ध्वा महानद्याःपौरस्त्ये क्रूले पूर्वतटे उभयत्र णं शब्दो वाक्यालङ्कारे अयमर्थः तमिस्राया अधो भागे वहन्ती सिन्धुस्तमिस्रा पूर्वकटकमवधीकृत्यैवेति, उन्मग्नाऽपि पूर्वकटकान्निर्गताऽस्तीत्युभयोरेकस्थानतासूचनार्थकमिदं सूत्रम्, यत्रैवोन्मग्नजला महानदी तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'वद्धइरयणं सदावेइ' वर्द्धकिरत्नं शब्दयति आह्वयति 'सदावित्ता एवं वयासी' शब्दयित्वा आहूय, एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् किमवादीत् इत्याह-'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! उम्मग्गणिमग्गनलासु महाणइसु अणेगखंभसयसण्णिविठे अयलमकंपे अभेजकवए सालंबणवाहाए सबरयणामए मुहसंकमे करेह' क्षिप्रमेव भो देवानुप्रिय ! उन्मग्ननिमग्नजलयो महानद्योः अनेकस्तम्भशतसन्निणाय जाव करेमाणे २ सिधूए महाणईए पुरच्छिमिल्लेणं डेणं जेणेव उम्मग्गजला महाणई तेणेव उवाग छइ ) जोर-२ से सेनाजनके एवं साथ में चलनेवाले राजा महाराजाओं के सिंहनाद के जैसे बोल से भव्यक्तध्वनि से- एवं कल कल रव से समुद्र के जैसे रख को प्राप्त हुई न हो मानो ऐसो गुहा को करता करता सिंधु महानदी के पूर्व तट पर जहां उन्माना नदी थी वहां पर आया ( उवागच्छित्ता वद्धहरयणं महावेह) वहां आकर के उसने वर्द्धकिरत्न को बुलाया तमिस्रागुहा के अधोभाग में तमिस्रा के पूर्व कटक की अवधि करके ही सिन्धु महानदी वहती है तथा उन्मग्ना महानदी भी तमिस्रा के पूर्व तट से निकलो है इसलिये दोनों नदियों का समागम यहाँ हो जाता है ( सहावित्ता एवं वयाप्ती ) वर्द्धको रत्न को बुला करके उसमे ऐसा कहा (खिप्पामेव भो देवाणुपिया ! उम्म गणिमग्गजलासु महाणईसु अणेगखभसय सण्णिविटे भयलमकंपे अभेनकवए सालवणावाहाए सव्वरयणामए सुहस कमे करेह ) हे देवानुप्रिय! तुम ही उन्मग्ना और निमग्ना महानदियों के ऊपर अनेक सैकड़ों खंभो से युक्त, अचल, २ (महया उक्किट्ठ सीहणाय जाव करेमाणे २ मिधूए महाणईए पुरच्छिमिल्लेणं कूडेणं जेणे व उम्मग्ग जला महाणई तेणेव उवागच्छइ) सेना भर स महारानी तीन यथा થતા સિંહનાદ જેવા અવ્યક્ત દવનિથી તથા કલરવથી સમુદ્રના જેવા વિનિને પ્રાપ્ત થયેલ ન હોય એવી ગુફાને મુખરિત–વનિત કરતો તે રાજા સિંધુ મહાનદીના પૂર્વ તટ ઉપર કે या भानही ती त्या भाव्या. (उवागच्छित्ता वद्धहरयणं सहावेइ) त्या भावीन तय વહરિનને (સુથાર) બેલા તમિસા ગુફાના અધે ભાગમાં તમિસાના પૂર્વકટકની અવધિ કરી ને જ સિંધુ મહાનદી વહે છે. તેમજ ઉમેગ્ના મહાનદી પણ તમન્નાના પૂર્વ તટથી નીકળી थे. मेथी बन्न नही मानी मोसमागम तय छे. (सदावित्ता एवं वयासो) पहिरन नवीन त रातो तेने 24 प्रमाणे यु-(खिप्पामेव भो देवाणुपिया! उम्मग्गणिमग्गजलासु महाणईसु अणेगखंभसयसण्णिविढे अयलमकंपे अमेज्जकवर सालंवणवाहाए सव्वरयणामप सुहसंकमे करेह) देवानुप्रिय! तमे श मन अन निभाना नहीनी ઉપર અનેક હજાર સતાવાળા. અચલ અક૫ તેમજ દઢ કવચની જેમ અભેદ્ય એવા બે Page #741 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सु० १६ उन्मग्ननिमग्नजलय्यो महानद्योःस्वरूप निरूपणम् ७२७ विष्टौ सुखसंक्रमौ सेतु द्वयं कुरुष्वेत्यग्ने सम्बन्धः कीदृशौ तौ इत्याह-अनेकानि स्तम्भशतानि तेषु सन्निविष्टौ-सुसंस्थितौ अथवा अनेकानि स्तम्भशतानि सन्निविष्टानि संलग्नानि ययोः तौ तथा अत एवाचलौ महाबलाक्रान्तत्वेऽपि न स्वस्थानाच्च लतः अकम्पो दृढौ अथवा अचलो गिरिस्तद्वद् अकम्पो मकारोऽलाक्षणिकः अभेधकवचाविव अभेद्यकवचौ दृढो अभेद्यसन्नाहौ जलादिभ्यो न भेदं यातौ जलादिभिरपि अभेद्यो इत्यर्थः, ननु अनन्तरोक्तविशेषणाभ्यामुत्तरतां जनानां तदुपरि पातशङ्काया अभावेऽपि उभयपार्श्वयो जलपातशङ्का स्यादेवेत्याह-सालम्बनबाहौ इति, सालम्बने-उपरिगच्छतां जनानामवलम्बनभृतेन दृढतरभित्तिरूपेण आलम्बनेन सहितौ बाहौ-उभयपाश्र्यो ययोस्तौ तथा, तथा 'सबरयणामए' सर्वरत्नमयौ-सर्वात्मना रत्नमयौ यद्वा सर्वजातीय . रत्नयुक्तौ तथा 'मुहसंकमे' सुस्वसंक्रमौ सुखेन संक्रमः-पादविक्षेपो यत्र तौ, इदृशौ संक्रमौ सेतू कुरुष्व 'करित्ता' कृत्वा 'मम एयमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चप्पिणाहि 'मम एताम आज्ञप्तिकां क्षिप्रमेव शीघ्रमेव प्रत्यर्पयेति । अथ स वर्द्धकिरत्ननामः किं कृतवान् इत्याह 'तएण' इत्यादि 'तएणं से बद्धइरयणे भरहेणं रण्णा एवं वुत्ते समाणे हट्टतुट्ठचित्तमा दिए जाव विणएण पडिसुणेइ ' ततः खलु तत् वर्द्धकिरत्नं भरतेन राज्ञा एवम् उक्त प्रकारेण उक्त - कथितं सत् हृष्टतुष्टचित्तमानन्दितं यावत् विनयेन प्रतिशृणोति स्वीकरोति 'पडिसुणित्ता' प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य 'खिप्पामेव उम्मग्गणिम्मग्गजलासु महाणअकंप तथा दृढकवचके जैसे अभेद्य ऐसे दो पुलों को बनाओ इनपुलों के उभयपाल में आलम्बन हो जिससे उन महानदियों में उनके ऊपर से चलनेवालों में कोई गिर न सके (सम्वरयणामए) दोनों पुल सर्वात्मना रत्नमय हो अथवा सर्वजाति के रत्नो द्वारा निर्मित हुए हो और जिन पर सुखपूर्वक गमनागमन हो सके ( करेत्ता मम एयमाणत्तिय विप्पामेव पच्चप्पिणाहि ) ऐसे दो पुल जब तुम बनाकर तैयार करलो तब हमें इसको पीछे खबर जल्दो से दो (तएणं से बद्धहरयणे भरहेणं रण्णा एवं वुत्ते समोणे हट्टतुट्ठचित्तमाणदिए जाव विणएणं पडिसुणेर) उस वर्द्धकि रत्न ने अपने खामी भरत राजा को आज्ञा को सुना तो वह बहुत ही अधिक हर्षित एवं चित्त में आनन्दित हुआ और यावत् बड़ी विनय के साथ उसने उनकी आशा स्वीकार कर ली (पडिसुणित्ता खिप्पामेव उम्म गाणिमग्गजलासु महाणईसु अणेग खंभसयसण्णिપલે તૈયાર કરો એ પુલના ઉભયપાકમાં આલંબને હોય કે જેથી તેમની ઉપર રે ५सार थनार 5 महानवम्यामां पडेनहि. (सव्वरयणामए) से मन्ने पुसा सामना નમય હોય અથવા સર્વ જાતિના રત્ન દ્વારા નિર્મિત હોય કે જેથી તેમની ઉપરથી પૂર્વક अमन-माभन 5 . (करेत्ता मम एयमाणत्तिय खिप्पामेव पच्चपिणाहि) कोरापन्न सोयारे यार थ य त्यारे तर १ मभने सूचना मापा. (तएणं से वद्धहरयणे भरहेणं रण्णा पवं वुत्ते समाणे हट्ट तुट्ठचित्तमाणदिए जाव विणएणं पडिसणे) व (સથારે) જ્યારે પોતાના સ્વામીની આજ્ઞા સાંભળી તે તે અતીવ હર્ષિત તેમજ ચિત્તમાં આનંદિત થયો. યાવત્ અતીવ વિનમ્રતાથી તેણે પિતાના સ્વામીની આજ્ઞા સ્વીકારી લીધી (पडिसुणित्ता खिप्पामे उमग्गणिमग्गजलासु महाणहसु अणेणखंभसयसणिविढे जाव सहयो Page #742 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७२८ जम्बूद्वीपप्रज्ञाप्तिसूत्रे ईस अणेगखभसयसण्णिविट्रे जाव सहसंकमे करेइ' क्षिप्रमेव उन्मग्ननिमग्नजलयो महानद्योः अनेकस्तम्भशतसन्निविष्टौ यावत् अचलौ अकम्पौ अभेद्य कवचौ सालम्बनबाहो पर्वरत्नमयौ सुखसंक्रमो सेतू-सेतुद्वयं करोति 'करित्ता' कृत्वा जेणेव भरहे राया तेणेव उनागच्छइ' यत्रय भरतो राजा तत्रैव तत् वर्द्धकिरत्नम् स वर्द्धकिः उपाग च्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'जाव एयमाणत्तियं पच्चप्पिणइ' यावत् पूर्वोक्ताम् एताम् राज्ञोक्तप्रकारिकाम् आज्ञप्तिकां (आज्ञां) प्रत्यर्पयति समर्पयति, ननु उन्मग्नजला जलस्थोन्मज्जकत्वस्वभावसिद्धत्वात् कथं तत्र संक्रमार्थकशिलास्तम्भादिन्यासः मुस्थिरो भवति ? सच दीर्घपट्टशालाकारो न च जलोपरि काष्ठादिमयः सम्भवति तस्या सारस्वेन भारासहत्वात् इति चेन्नवर्द्धकिरत्नकृनत्वेन दिव्यशक्ते रचिन्त्यशक्तिकत्वात्, लोक उत्तरति, गुहा च तावन्तं कालमपावृतैवास्ते मण्डलान्यपि तथैव तिष्ठन्ति चक्रवविट्र जाव सुहसंकमे करेइ) भरत राजा की आज्ञा को स्वीकार करके उसने शीघ्र ही उम्मग्ना और निमग्ना नदी के ऊपर पूर्वोक्त अनेक सैकड़ों खम्भों आदि विशेषणों से युक्त दो पुल बना दिये ( करित्तो जेणेव भरहे राया तेणेव उवगच्छइ ) दो पुलों को बनाकर फिर वह जहां पर भरत राजा बिराजमान थे वहां पर माया (उवागच्छित्ता) वहां भाकर के (नाव एयमाणत्तियं पञ्चप्पिणइ) उसने पुलों के पूर्णरूप से निर्माण हो जाने की भरत राजा को खबर दे दी-यहां पर ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए कि उन्मग्ना नदी का तो स्वभाव ऐसा है कि जो भी पदार्थ उसमें गिर जाता है वह उसके ऊपर ही रहता है डूबता नहीं है तो फिर सेतु बनाने के लिये डाले गये पदार्थ उसमें कैसे नीचे पहुँच गये और कैसे वहां में स्थिर होकर जम गये। ये पुल वर्द्धकिरत्न ने बनाये होते हैं इसलिये उसकी शक्ति अचिन्त्य होने के कारण वे वहां पर सुस्थिर रहते हैं और इनके ऊपर से लोक उतरते रहते है. तथा चक्रवती के जीवन तक गुफा खुली हुई रही आती है. और उसमें वे सब मन्डल ज्यों के त्यो उतने ही काल तक बने रहते है. जब चक्रवर्ती दिवंगत हो जाता है करे) १२ नी भाशा स्वीशन त तरत ॥ भन भने निभाना नही ५२ गरे। स्तनावगेरेथा पूति विशेषथा युफ्त थे। म २मणीय सोमनाया. (करिता जेणेष भरहे राया तेणेव उवागच्छद) मे से मनावान ५0 rni भरत विद्यमान उता त्या माये। (उवागच्छित्ता) भावान (जाव पयमाणात्तियं पच्चप्पिणइ) तेथे ya। આજ્ઞા મુજબ જ તૈયાર થઈ ગયા છે, એવી ભરત રાજાને સૂચના આપી અહીં એવી આશંકા કરવી એગ્ય નથી કે ઉત્પના નદી તે સ્વભાવે જ એવી છે કે જે વસ્તુ તેમાં પડી જાય છે, તે તેની ઉપર જ રહે છે, ડૂબતી નથી. તે પછી પુલ બનાવવા માટે નાખવામાં આવેલી વસ્તુઓ તેમાં નીચે સુધી કેવી રીતે પહોંચી અને ત્યાં કેવી રીતે સ્થિર થઈને જામી ગઈ. એ પુલો વદ્ધકિરન બનાવે છે. એથી તેની શક્તિ અચિંત્ય હેવાથી તેઓ ત્યાં સુસ્થિર જ રહે છે અને તેમની ઉપર થઈને લોકે પાર ઉતરતા હે છે. તેમજ ચક્રવતીના જીવનકાળ સુધી ગુફા ખુલી જ રહે છે. તેમાં તે સર્વે મંડળો તેના જીવનકાળ સુધી યથાવત Page #743 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ वक्षस्कारः स. १६ उन्मग्ननिमग्नजलयो महानद्योः स्वरूपनिरूपणम् ७२९ तिनि परलोके गते संयमे गृहीते सति षट्मासपर्यन्तम् सुरक्षितं सेतुद्वयं तिष्ठति सारोद्धारवृत्तेरभिप्रायः, त्रिषष्ठीयाचितचरितेतु "उद्घाटितं गुहाद्वारं गुहान्त मण्डलानि च । तावत् तान्यपि तिष्ठन्ति यावज्जीवति चक्रभृत् ॥१॥ इत्युक्तम् 'सएणं से भरहे राया संखधावारबले उम्मग्गणिमग्गजलाओ महाणईओ तेहि अणेगखभसयसण्णेिविटेहिं जाव सुहसंकमेहिं उत्तरइ' ततः खल्ल स भरतो राजा सस्कन्धावारबल: स्कन्धावाररूपबलसहितः, सैन्यान्वितः उन्मग्ननिमग्नजले महानधौ ताभ्याम् अनेकस्कन्धशतसन्निविष्टाभ्यां यावत् अचलाभ्यामकम्पाभ्याम् अभेद्यकवचाभ्यो सालम्बनबाहाभ्यां सर्वरत्नमयाभ्यां सुखसंक्रमाभ्याम् उत्तरति परपारं गच्छति, एवम् उत्तरतो गच्छति, राजराजे भरते उत्तरद्वारे यज्जातं तदाह - 'तपणं तीसे' इत्यादि 'तएणं तीसे तिमिस्सगुहाए उत्तरिल्लस्स दुवारस्स कवाडा सयमेव महया महया कोंचारवं करेमाणा सरसरस्सग्गाइं सरसरस्सग्गाइं ठाणाई पच्चोसक्कित्था' ततो नद्यतिक्रमणानन्तरं खलु तस्या स्तमिस्रागुहाया औत्तराहस्य द्वारस्य कपाटौ स्वयमेव सेनापति दण्डरत्नाघातमन्तरेण 'महया महया' इति सूत्रदेशेन पूर्वसूत्रस्मरणं तेन 'महया महया या संयम गृहीत कर लेता है. तब वे छह माह तक सुरक्षित रहते हैं. ऐसा सारोद्धार वृत्ति का अभिप्राय है. तथा त्रिषष्ठिया चरित्र में तोउद्घाटितं गुहा द्वारं गुहान्तर्मण्डलानि च । तावत् तान्यपि तिष्ठन्ति यावज्जीवति चक्रभृत् ॥१॥ __ऐसा कहा है (तएणं से भरहे राया सखंधावारबले उम्मग्गणिमग्गजलाओ महार्णईओ तेहिं मणेगखभसयसण्णिविद्वेहिं जाव सुहसंकमेहिं उत्तरइ) इसके बादभरतराजा अपनी पूर्ण सेनासहित उन उन्माना निमग्ना नामको नदियों कोउन अनेक सैकड़ों खंभो वाले पुलों के ऊपर से होकर आनन्द पूर्वक पार कर गया यहां यावत् शब्द से पुलों के जो विशेषण ऊपर में कहे गये हैं वे गृहीतहुए हैं (तएणं तीसेणं तिमिस गुहाए उत्तरिल्लस्स दुवारस्सकवाडा सयमेव महया२ कोचारवं करेमाणा सरसरस्सग्गाइं ठाणाई पच्चोसक्कित्था) दोनों नदियों को पार करके પ્રકાશ પાથરતા રહે છે. જયારે ચક્રવતી દિવંગત થઈ જાય છે. અથવા સંયમ ગ્રહીત કરી લે છે ત્યારે તે ૬ માસ સુધી સુરક્ષિત રહે છે. એ સારોદ્ધાર વૃત્તિને અભિપ્રાય છે. તથા ત્રિષષ્ઠિયા ચરિત્રમાં તે– ___उद्घाटितं गुहाद्वारं गुहान्तमण्डलानि च। तावत् तान्यपि तिष्ठन्ति यावज्जीवति चक्रभृत् आम छे. (त एणं से भरहे राया सखंधावारबले उम्मग्गणिमग्गजलाओ महाणइओ तेहिं अणेगखंभसयसण्णिविट्ठहिं जाव सुहस कमेहि उत्तरइ) त्या२ मा भरत शन ताना સંપૂર્ણ સિન્યની સાથે ઉન્મજ્ઞા અને નિમગ્ના નદીઓને તેમના અનેક સ્તંભેવાળા પુલે ઉપર થઈને આનંદપૂર્વક પાર કરી ગયો. અહીં યાવત શબ્દથી પુલના જે વિરોષ ઉપર वाम माय! छ, ते गृहीत यया छे. (त एर्ण तीसेणं तिमिसगुहाए उत्तरिलस्स दुधारस्स कवाडा सयमेव महयार कांचारवं करेमाणा सरसरस्सग्गाई ठाणाई पच्चासक्कित्था) -२ Page #744 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७३० जम्बूद्वीपप्रशप्तिसूत्रे सद्देणं' महता महता शब्देन इति बोध्यम्, क्रौञ्चारवम् क्रौञ्चस्य - पक्षिविशेषस्येव बहुव्यापित्वात् य आरवः शब्दः तं कुर्वाणा कुर्वन्तो 'सरसरस्सत्ति' अनुकरणशब्दस्तेन तादृशं शब्दमनुकुर्वन्तौ कपाटौ इत्यर्थः 'सगाई सगाई' स्वके स्वके स्वकीये स्वकीये 'ठाणाई स्थाने अवष्टम्भभूततोडकरूपे, 'पच्चोसक्कित्था' प्रत्यवाष्पाकिषाताम् प्रत्यपंससर्पतुः ॥सू०१६॥ अथोत्तरभरतार्द्धविजय विवक्षुम्तत्र विजेतव्यजनस्वरूपमाह 'तेणं कालेणं" इत्यादि। - मूलम्-तेणं कालेणं तेणं समएणं उत्तरड्डभरहे वासे बहवे आवाडाणामं चिलाया परिवसंति, अड्डा दित्ता वित्ता विच्छिण्णविउलभवणसयणासणजाणताहणाइन्ना बहुधणबहुजायरूपरयया आओगपओगसंपउत्ता विच्छड्डिअ पउरभत्तपाणा बहुदासीदासगोमहिसगवेलगप्पभूया बहुजणस्स अपरिभूआ सूरा वीरा विकंता विच्छिण्णविउलबलवाहणा बहुसु समरसंपराएसु लद्धलक्खा याविहोत्था, तएणं तसिमावाडचिलायाणं अण्णया कयाई विसयंसि बहुइं उप्पाइअसयाई पाउभवित्था, तं जहा. अकाले गज्जियं अकाले विज्जुआ अकाले पायवा पुप्फंति अभिक्खणं अभिक्खणं आगासे देवयाओ णच्नंति; तएणं ते आवाडचिलाया विसयंसि बहूई उप्पाइअसयाई पाउन्मूआई पासंति पासित्ता अण्णमण्णं सदावेंती सदावित्ता एवं वयासी एवं खलु देवाणुप्पिया! अम्हं विसयंसि बहूई उप्पाइअसयाई पाउब्भूयाई तं जहा अकाले गज्जिअं अकाले विज्जुआ अकाले पायवा पुप्फंति अभिक्खणं अभिक्खणं आगासे देवयाओ णच्चंतिः तं ण णज्जइ णं देवाणुप्पिया ! अम्हं विसयस्स के मन्ने उबद्दवे भविस्सई तिकटु ओहयमणसंकप्पा चिंतासोगसागरं पविट्ठा करयलपल्हत्थमुहा अट्ठज्झाणोवगया भूमिगयतिमिस्र गुफाके समीप जाने के बाद उस तिमिस्रगुहा के उत्तर दिशा के द्वार के किवार सर सर शब्द जोर जोरसे क्रोच पक्षी के जैसा सर सर करते हुए अपने आप अपने अपने स्थानसे सरक गये खुल गये ।।सू १६॥ નદીઓને પાર કરીને પછી ગુહાની સમીપ આવ્યા ત્યારે તે તિમિસ ગુફાના ઉત્તર દિશાના દ્વારના થાન પરથી સરકી ગયા એટલે કે ખુલી ગયા. તે ૧૬ | કમાડ જોર-જોરથી કૌચ પક્ષી જેવા સર–સ૨ વનિ કરતા કરતા પોતાની મેળે જ પોતાના Page #745 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० बक्षस्कारः सू० १७ उत्तरार्द्धभरतविजेतव्यजनस्वरूपनिरूपणम् ७३१ दिट्ठिआ झिआयंति. तएणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे जाव समुदरवभूअं पिव करेमाणे करेमाणे तिमिसगुहाओ उत्तरिल्लेणं दारेणं णीति ससिब्ब मेहंधरयाणिवहा तए णं ते आवाइविलाया भरहस्स रण्णो अग्गोणीअं एज्जमाणं पासंति पासित्ता आसुरत्ता रुट्ठा चंडिक्किआ कुविआ पिसिमिसेमाणा अण्णमण्णं सदावेंति सहावित्ता एवं वयासी एसणं देवाणुप्पिया ! केइअप्पत्थि अपत्थए दुरंतपंतलक्खणे हीणपुण्णचउद्दसे हिरिसिरिपरिवज्जिए जेणं अम्हं विसयस्स उवार विरिएणं हव्व. मागच्छइ तं तहाणं घत्तामो देवाणुप्पिओ जहाणं एस अम्हं विसयस्स उवरि विरिएणं णो हव्वमागच्छइ तिकट्ठ अण्णमण्णस्स अंतिए एअमटुं पडिसुणेति पडिसुणित्ता सण्णद्धवद्धवम्मियकवआ उप्पीलिअसरासणपट्टिआ पिणद्धविज्जा बद्ध आविद्धवीमलवचिधपट्टा गहिआउहप्प हरणाजेणेव भरहस्स रण्णो अग्गाणीअं तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता भरहस्स.रण्णो अग्गाणीएण सद्धिं संपलग्गा यावि होत्था तएणं ते आवाडचिलाया भरहस्स रण्णो अग्गाणीअं हयमहिअपवरवीरघाइय विवडिअचिंधद्धयपडागं किच्छप्पाणोवगयं दिसोदिसि पडिसेहिति ॥सू०१७॥ छाया-तस्मिन् काले तस्मिन् समये उत्तरार्द्धभरते वर्षे बहव आपाता नाम किराताः परिवसन्ति, आढचाः दृप्ताः वित्ताः विस्तीर्णविपुलभवनशयनासनयानवाहनाकीर्णाः बहुधनबहुजातरूपरसताः आयोगप्रयोगसंप्रयुक्ताः विच्छर्दितप्रचुरभक्तपामाः बहुदासीदासगोमहिषगवेलकप्रभूताः बहुजनेन अपरिभूताशूराः वीराः विक्रान्ताः बिस्तीर्णविपुलबलवाहनाः बहुषु समरसंपरायेषु लब्धलक्षाश्चाप्यभवन ततः खलु तेषाम् आपातकिरातानाम् अन्यदा कदाचित् विषये बहूनि औत्पातिकशतानि प्रादूरभूवन् तद्यथा अकाले गमितम् अकाले विद्यतः अकाले पादपाः पुष्यन्ति अभीक्ष्णम अभीक्ष्णम आकाशे देवताः नत्यन्ति ततः खलु ते आपातकिराताः विषये बहूनि औत्पातिकशतानि प्रादुर्भूतानि पश्यन्ति दष्टा अन्योऽन्य शब्दयन्ति शब्दयित्वा पवमवादिषुः एवं खलु देवानुप्रियाः अस्माकं विषये बहूमि, औत्पातिकशतानि प्रादुर्भूतानि तद्यथा अकाले गजितम् अकाले विद्युत अकाले पादपाः पुष्यन्ति अभीक्षणम् अभीषणम् आकाशे देवताः नृत्यन्ति तन्न ज्ञायते खलु देवानुप्रियाः ! अस्माकं विषयस्य को मन्ये उपद्रवो भविष्यति इति कृत्वा अपहतमनःसंकल्पाः चिन्ताशोक सागरे प्रविष्टाः करतलपर्यस्तमुखाः आर्तध्यानोपगताः भूमिगतदृष्टिकाः ध्यायन्ति ततः खलु स भरतो राजा चक्ररत्नदेशितमार्गः यावत् समुद्ररवभूतामिव कुर्वन् तमिस्रागुहातः औतराहेण Page #746 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७१२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे द्वारेण निरति शशीष मेघान्धकारनिवहात् ततः खलु ते आपातकिराताः भरतस्य रामः भप्रानोकम् पजमाण पश्यन्ति दृष्ट्वा आशुरुप्ताः रुष्टाः चण्डिषियताः मिसिमिसेमाणा दीप्यमानाः अन्योन्यं शब्दयन्ति शब्दयित्वा एषमधादिषुः एष देवानुप्रियाः कधिवत् अप्रार्थितप्रायका तुरन्तप्राम्तलक्षणः हीनपुण्यचातुर्दशः ही भो परिवर्जितः योऽस्माकं विषयस्योपरि वीर्येण हव्यम् आगच्छति तत् तथा खलु क्षिपामो देवानुप्रियाः यथा खलु एषोऽस्माक विषयस्योपरि वीर्येण नो शीघ्रमागच्छेत् इति कृत्वा अन्योऽन्यस्याऽस्तिके पैतमर्थ प्रतिशज्यन्ति प्रतिश्रुत्य सन्नबद्धर्मितकवचाः उत्पीडितशरासनपट्टिकाः पिनवप्रेषया बाषिद्धविमलवरचिन्हपट्टा गृहीतायुधप्रहरणाः यत्रैव भरतस्य राज्ञ अग्रामीकं तत्रैवोपागच्छन्ति उपागत्य भरतस्य राशोऽमानीकेन साई संप्रलग्नाप्रयाप्यभूवन् ततः खलुते आपातकिराता भरतस्य राक्षोऽप्रानीकं हतमथितप्रवरवीरघातिषिपतितचितवजपताक कच्छप्राणोपगतं दिशोदिशि प्रतिषेधयन्ति । सू० १७॥ तेणं काछेणं तेणं समएणं उतरदह भरहे वासे" इत्यादि. टीकार्थ - "तेण कालेणं" इत्यादि । तेणं कालेणं तेणं समएणं उत्तरढमरहे वासे बहवे आवाडा णाम चिलाया परिवसंति' तस्मिन् काले-तृतीयारकप्रान्ते तस्मिन् समये यत्र समये भरतः उत्तरभरतार्द्ध विजेतुं तमिस्रातो निर्याति उत्तरार्द्धभरते उत्तराईभरतनाम्नि वर्षे क्षेत्रे अपाताः --अपाता इति नाम्ना किराताः परिवसन्ति, कीशा'स्ते ? 'अढा' आन्याः धनिनः 'दित्ता' दृप्ताः -दर्पवन्तः 'वित्ता' वित्ताः वित्तमातीयेषु प्रसिद्धाः 'विच्छिण्ण विउलभवणेसयणासणजाणवाहणाइन्ना' विस्तीर्णविपुलभवनशयनासनयानवाहनाकीर्णाः, तत्र विस्तीर्णविपुलानि अति विपुलानि भवनानि येषां ते तथा शयनानि शय्यादीनि, आसनानि फलकादीनि यानानि रथादीनि वाहनानि अश्चादीनि आकीर्णानि जातीगुणसम्पन्नानि येषां ते तथा ततः कर्मधारयः 'बहुधण____"तेणं कालेणं तेणं समपणं उतरड्ढभरहे वासे” इत्यादि सूत्र-१७ ॥ - (तेणं काढणं तेणं समएणं) उस काल में और उस समय में (उत्तरदभरहे वासे) उत्तरार्ध भरत क्षेत्र में (बहवे आवाडा णाम चिलाया परिवसंति) भनेक मापात नाम के किरात रहते थे (भड्ढा दित्ता वित्ता विच्छिण्णविउलभवणसयणासणजाणवाहणाइन्ना) ये किरात जन भनेक विस्तीर्ण भवनों वाले थे अनेक विस्तृत शयन और आसन वाले थे बड़े २ रथों के ये अधिपति थे और भनेकबड़े बड़े घाड़े जो उत्तमोत्तम जाति के थे वे इनके पासमें थे (बहुधणबहु टीकार्थ-(तेणं कालेण तेण समपण) ते ४i अने समयमा (उतरड्ढभर पासे) उत्तरासत क्षेत्रमा (बहवे आवास णाम चिलाया परिवसति) मन, मपात नामशत। २७तात. (अइढा विसा बित्ता बिच्छिण्ण विउलभषण सयणासणजाणवाहणाइन्ना) मे. शित લકો અનેક વિતી ભવનાવાળા હતા. અનેક વિસ્તત શયન અને આસનોવાળા હર મોટા રથોના એ અધિપતિ હતા. અને અનેક ઉત્તમોત્તમ જાતિના મોટા-મોટા ઘડાઓ मेमनी पासे ता. (बहुधणं बहुजायरूवरयया) लिम, परिम. मेय भने परिश्छेहन। Page #747 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ० ३ वक्षस्कारः सू० १७ उत्तरार्द्ध भरत विजेतव्यजन स्वरूपनिरूपणम् ७३३ बहुजायरूवरयया' बहुधनबहुजातरूपरजताः, तत्र बहुप्रभूतं धनम् गणिमधरिममेयपरिच्छेद्यशत् चतुर्विधम्, जातरू रजतानि वर्णरूप्यानि च येषां ते तथा 'आओगओगसंपत्ता' आयोग प्रयोगसंप्रयुक्ताः, तत्र आयोगः - द्विगुणादि वृद्धयर्थं प्रदानं प्रयोगश्च कचान्तरं तौ संप्रयुक्तौ व्यापारितौ यैस्ने तथा 'बिच्छडियपउरभत्तपाणा विच्छर्दितप्रचुर भक्तपानाः, तत्र विच्छर्दिते त्यते बहुतनभोजनावशेषतया विच्छर्दितवती विभूतिमती विविधमक्ष्यभोज्य चोष्य ह्यपेयाहार भेदयुक्ततया प्रचुरे भक्तपाने येषां ते तथा यद्वा विच्छर्दिते- सञ्जातविच्छदै सविस्तारे बहुप्रकारत्वात् प्रचुरे प्रभूते भक्तपाने अन्नपानीये येषां ते तथा, 'बहुदासोदास गोनहिसग वे गप्प भूया' बहुदासी दासगोमहिषroseभूतः, तत्र बहवो दासीदासाः येषां ते तथा गो महिषाश्च प्रसिद्धाः गवेलकाः उरभ्राः एते प्रभूता येषां ते तथा अत्र पदद्वयस्य कर्मधारयः 'बहुजणस्स अपरिभूया' बहुजन अपरिभूताः - व्याप्ताः सूत्रे षष्ठो आर्षत्वात् 'खरा' शूराः प्रतिज्ञान निर्वहणे दाने वा 'वीरा' वीराः संग्रामे 'विक्कता' विक्रान्ताः - भूमण्डलाक्रमणसमर्थाः 'विच्छिण्णनायरूवरयया), गणिमधरीम, मेय, और परिच्छेय के भेद से चार प्रकार के धन से ये युक्त श्रेष्ठवर्ण एवं चांदी के ये मालीक थे (आओगपओगसंपउत्ता) आयोग में धन संपत्ति आदि के बढ़ाने में एवं अनेक कलाओ में ये विशेष पटु थे (विछड्डियपउरभत्तपाणा ) इनके यहां इतने अधिक आदमी भोजनकरते थे कि उनके उच्छिष्ट प्रचुर मात्रा में भक्तपान बचा रहता था. (बहु दासी दास गोमहिसगमेलगप्पभूआ बहुजणस्स अपरिभूया ) इनके पास घर पर काम करने वा अनेकदास एवं दासियां थो तथा अनेक गायें एवं अनेक महिषियां में से और मेड़े थे इनका अनेक जन मिलकर भी पराभव करने में समर्थ नहीं हो सकते ऐसे ये बलिष्टये (सूरा, वीरा, • विवकता, विच्छिण्णवि उलबलवाइण ) ये प्रतिज्ञात अर्थ के निर्वाह करने में शूर थे एवं दानदेने में अथवा संग्राम में ये वीर थे विक्रान्त - भूमंडल के आक्रमणकरने में ये समर्थ थे इनका - ભેદથી ચાર પ્રકારના ધનથી તેમે યુક્ત હતા શ્રેષ્ઠ સુવર્ણ તેમજ ચાંદીના એ માલિક હતા. (माओोगप योगसंपत्ता आयोगमा धनसंपत्ति वगेरेनी वृद्धियां ते अने - मां थे । विशेष टु इत (विछड्डिय पउरभत्तपाणा ) मेमने त्यां भेटला भषां ઢાકા ભેજત કરતા હતા કે તેમના ઉચ્છિષ્ટમાં પ્રચુર માત્રામાં ભક્તપાન વધતું હતું. (बहुदासीदासगोमहिसगवेल गप्पभ्या बहुमणस्स अपरिभूया) भनी पासे घेर भ કરનારાઓમાં અનેક દાસેા તેમજ અનેક દાસીએ હતી. અનેક ગાયે, મીષીઓ એટલે ભેસે। હતી. અને ઘેટાએ। હતા. અનેક લેાકેા મળીને પણુ એમને હરાવી શકતા નહાતા. सेवा से बोडी जणराजा $11. (सूरा वीरा विकता विच्छिष्णवि उलबलवाहणा) येथे। પ્રતિજ્ઞાત અને નિર્વાડ કરવા માટે શૂર હતા. દાન કરવામાં અથવા સગ્રામમાં એ લેાકા વીર હતા. વિક્રાંત ભૂમંડળ પર આક્રમણ કરવામાં એએ સમ હતા. એમની સેના અને गवाह ३५ वाहुन दु:मधी अनाडु वाथी अतिवियुद्ध ता. (बहुसु समर संपरापसु Page #748 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७३४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे विउलबलवाहणा' विस्तीर्णविपुलबलवाहनाः, तत्र विस्तीर्णविपुलानि-अति विशालानि बलवाहनानि सैन्यानि गवादिकानि च दुःखाऽनाकुलत्वाद् येषां ते तथा 'बहुसु समरसंपराएसु लद्धलक्खा' बहुषु समरसम्परायेषु, अनेन चातिभयानकत्वं सूचितम्, समररूपेषु सम्परायेषु युद्धेषु लब्धलक्षाः अमोघहस्ताश्चाप्यभवन सामान्यतो युद्वेषु च वल्गनादिरूपेषु केचन लब्बलक्षाः भवेयुः परं तद् व्यवच्छेदाय समरेषु इत्युक्तम् अथ यत्तेषां मण्डले जातं तदाह-'तएणं' इत्यादि । 'तएणं तेसिमावाडचिलायाण अण्णया कयाई विससि बहुइं उप्पाइयसयाई पाउन्भवित्था' तत् इति कथान्तरप्रबन्धे खलु तेषाम् आपातकिरातानाम् अन्यदा कदाचिद् चक्रवागमनकालात् पूर्वम्, अत्र तेषामित्येतावतैव उक्तेन प्रकरणात् विशेष्य प्राप्तौ यत् आपातकिरातानामित्युक्तम् तद्विस्मरणशीलानां विनेयानां व्युत्पादनायेति विषये देशे बहूनि औत्पातिकशतानि उत्पातसत्कशतानि मरिष्ट अशुभ-सूक्कनिमित्तशतानोत्यर्थःप्रादुरभूवन्-प्रकटीबभूवुः प्रकटीजातानित जहा अकाले गज्जिअं अकाले विज्जुया अकाले पायवा पुप्फति अभिक्खणं अभिक्खणं आगासे देवयाओ णच्चंति'तद्यथा अकाले प्रावृट् कालव्यतिरिक्तकाले गजितम् मेघगर्जना जाता अकाले विद्युतः विद्युल्लताः जाताः अकाले स्वस्थपुष्पकालव्यतिरिक्तकाले पादपाः पुष्यन्ति पुष्पयुक्ता भवन्ति अभीक्ष्णम् अभीक्ष्णम् पुनः-पुनः आकाशे देवताः-भूतविशेषाः नृत्यसैन्य और गवादीरूपबल बाहनदुःख से अनाकुल होने के कारण अतिविपुल था (बहुसु समरसंपराएसु दलक्खा माविहोस्था) समरूप युद्धो में-अतिभयानकसंग्रामों में इनके हाथ अपने लक्ष से कभी विचलित नहीं होतेथे वल्गन आदि रूप माधारण युद्ध में कितनेकव्यक्ति लब्ध लक्ष वा होते हैं परन्तु ये तो भयंकर से भयंकर युद्ध में भी अपने लक्ष्य को वेधने में शक्ति शाली थे - हस्तलाघववाले थे. (तएणं तेसिमावाडचिलायाणं अण्णया कयाई विसयंसि बदई उप्पाइयसयाई पाउन्भवित्था ) एक समय की बात है कि उन मापात किरातों के देश में चक्रवती के आगमन से पहिले सैकड़ो भशुभ सुचकनिमित्त प्रकट होने लगे (तं नहा) को इसप्रकार से हैं -(मका गज्जियं, मकाले विज्जुया, अकाळे पायवा पुप्फंति, अभिक्खणं २ मागासे देवयामो णच्चंति) अकाल में वर्षाकाल के विनाकाल में मेघों का गर्जन होना, लक्खक्खा याविहोस्था) सभ३५ युद्धीभां-मति भयान४ सभामामा, अमना डाय। पाताना લજ્ય પરથી કદાપિ વિચલિત થતા નહિ. વલ્સન વગેરે સાધારણુ યુદ્ધોમાં કેટલાક લેકે લબ્ધ લયવાળા હોય છે, પરંતુ આ આપાત કિરાતો તે ભયંકરમાં ભયકંર એટલે કે મહાભયંકર યુદ્ધ માં પણ લય વધન કરવામાં પણ શક્તિ શાળી હતા. એટલે કે उdaruaam ता. (तपणं तेसिमावाडचिलायाणं अण्णया कयाई विसयंसि बहर उपाइयलयाई पाउभवित्था) से, तनी दात छ मापात ताना देशमा यवतिना मागभन ५gai CM अशुभसूय (नभित्तो ४८ थवा साया. (तं जहा) राप्रमाणे -(अकाले गज्जियं, अकाले विज्जुया, अकाले पायवा,पुप्फंति अभिक्खणं २ आगासे देवयाओ णच्चंति) Ata भां-वाण पिन भेगनाथवी सभा विr Page #749 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० १७ उत्तरार्द्धभरतविजेतव्यजन स्वरूपनिरूपणम् ७३५ न्ति, अथ ते आपात किराताः किं कृतवन्त इत्याह- 'तपणं' इत्यादि 'तरणं ते आवाडचिलाया विससि बहूई उपपाइयसयाई पाउन्भूभाई पासंति' ततः उत्पात भवनानन्तरं खलु ते आपातकिराताः विषये देशे बहूनि औत्पातिकशतानि प्रादुर्भूतानि पश्यन्ति अवलोकयन्ति 'पासित्ता' दृष्ट्वा 'अण्णमण्णं सदावेंति' अन्योऽन्यम् परस्परं शब्दयन्ति आयन्ति 'सद्दावित्ता एवं वयासी' शब्दयित्वा आहूय एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादिषुः उक्तवन्तः किमुक्तवन्तः कीदृशाश्व ते अभूवन् इत्याह- ' एवं खलु' इत्यादि ' एवं खल देवापिया ! अहं विसयसि बहूई उप्पाइयसयाई पाउन्भूयाई तं जहा - अकाले गज्जियं अका विज्जुआ अकाले पायवा पुष्पंति अभिक्खणं अभिक्खणं आगासे देवयाओ णच्चति एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण खलु निश्चये देवानुप्रियाः ऋजुस्वभावाः ! अस्माकं विषये देशे बहूनि औत्पातिकशतानि प्रादुर्भूतानि प्रकटीभूतानि तद्यथा - अकाले गज्जितम् काले विद्युतः काले पादपाः पुष्यन्ति, अभीक्ष्णम् अभीक्ष्णम् आकाशे देवताः - भूतवि. शेषाः नृत्यन्ति 'तं णणञ्जइ णं देवाणुप्पिया! अम्हं विसयस्स के मन्ने उद्दवे भविस्सइ तिकड ओहयमणसंकप्पा चिंतासोगसागरं पविट्टा करयलपलहत्थमुहा अट्टज्झाणोवगया अकाल में विजलियों का चमकना अकाल में वृक्षों का पुष्पित होना, अकाल में बार २ भूतों का नर्तन होना, (तरणं ते आवाजचिळाया विससि बहुई उप्पायसयाई पाउब्याई पासंति) जब उन आपात किरातों ने अपने देश में इन अनेक अशुभ सूचक उत्पातो को होते देखा तो ( पासित्ता अण्णमण्णं सद्दार्वेति सदावित्ता एवं क्यासी) देखकर उन्होने एक दूसरे को बुलाया और बुलाकर आपस में इस प्रकार से कहना प्रारम्भ किया । ( एवं स्वल देवाणुपिया ! अझ विसयसि बहूहं उप्पायसाई पाउब्याई ) हे देवानुप्रियो ! देखो हमारे देश में अनेक सैकड़ो उत्पात प्रकट हो गये हैं - ( तं जहा ) जैसे - ( अकाले गज्जियं, अकाले विज्जुया, अका पायवा पुप्फँति, अभिक्खणं - २ आगासे देवयाओ न चति ) अकाल में गर्जना होती है, अकाल में विजुलियां चमकती है, अकाल में वृक्ष पुष्पित होते हैं, और बार-२ आकाश में भूतादि देव नाचते है (तं ण णञ्जइ णं देवाणुपिया ! अम्हं विसयरस के मन्ने उवहवे जीओ। यभम्वी समाजभां वृक्षो पुष्यित थवा, आजमां वारंवार भूत-प्रेतोनु नर्तन अर्बु (तपणं ते आवाडचिलाया विलयंति बहुई उप्पायसयाई पाउब्भूयाई ) न्यारे ते आपात दिसता पोताना देशमां को अने लतना मशुल सुर्य उत्पात येता या तो (पासिता अण्णमण्णं सहावेंति, सद्दावित्ता एवं वयासी) लेने तेथे गेहूं मीलने मोलाच्या मने जे सावने परस्पर सेवी रीते उडवा साग्या है ( एवं खलु देवाणुपिया ! अझं विसयसि बहू उपाय - सयाइ पाउन्भूयाई) डे हेवानुप्रियो ! तुखेो, अमारा देशमां ने उत्त था. (हा ) ?भडे- (अकाले गज्जियं, अकाले विज्जया, अकाले पायवापुष्कं ति, arrari २ आगासे देवयाओ नच्चंति) अजमां भेघानी गर्जना थाय छे, जमी વીજળીએ ચમકે છે. અકાળમાં વૃક્ષ પુષ્પિત થાય છે અને વાર-વાર આકાશ માં ભૂતાદિ देवेो नान्ये छे. (तं ण णज्जइ णं देवाणुपिया ! अम्हं विसयस्स के मन्ने उवद्दवे भविस्सईन्ति कट्टु ओह मणसंकप्पा चिंतासोगसागरं पविट्ठा करयलपल्दत्यमुद्दा अट्टज्झाणोवगया भूमि - Page #750 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वोपप्रज्ञप्तिसूत्रे भूमिगयदिहिमा सिआयति' तन्नज्ञायते देवानुप्रियाः ! अस्माकं विषयस्य को मन्ये इति वितर्कार्थे निपातः तेन मन्ये इति सम्भावयोमः उपद्रवो भविष्यति इति कृत्वा अप हतमन:संकल्पाः विमनस्काः चिन्ताशोकसागरे चिन्तया राज्यभ्रंशधनापहारादि चिन्तनेन यः शोक एव दुष्पारत्वात् सागरस्तत्र प्रविष्टाः 'करयल पल्हत्थमुहा' करतलपर्यस्तमुखाः करतले पर्यस्तं निवेशितं मुखं यैस्ते तथा, 'अट्ठज्झाणोवगया' आर्तध्यानोपगताः 'भूमिगयदिष्टिा' भूमिगतदृष्टिकाः 'झिआयंति' ध्यायति आर्तध्यानं कुर्वन्ति आपतिते सङ्कटे किंकर्तव्य मिति चिन्तयन्तीति, अथ प्रस्तूयमानं भरतस्य चरित माह-'तएणं' इत्यादि । 'तएणसे' भवहे राया चक्करयणदेसिअमग्गे जाव समुहरवभूअं पिव करेमाणे करेमाणे तिमिसगुहाओ उत्तरिल्लेणं दारेणं णीति ससिव्य मेहंधयारणिवहा' ततः आपातकिरातानां उत्पातचिन्तनसमये खलु स भरतो राजा चक्ररत्नादेशितमार्गः यावत् अनेकराजसहस्रानुयातमार्गः महतोत्कृष्ट सिंहनादबोलकलकलरवेण समुद्रवंभतामिव प्राप्तामिब गुहां कुर्वन् कुर्वन् तमिस्रागुहात: औत्तराहेण द्वारेण निरेति निर्याति कस्मात् क इब भविस्तईत्ति कटु मोहयमणसंकप्पो चिंता सोगसागरं पविट्ठा करयलपल्हत्थमुहा अज्माणोवगया भूमिगयदि ट्ठिया झियायति ) तो हे देवानुप्रियो ! पता नहीं पड़ता है कि हमारे देश में क्या उपद्रव होने वाला है. इस प्रकार कहकर वे सब के सब अपहत मनः संकल्पवाछे होकर विमनस्क बन गये, और राग्यभ्रंश, और धनापहार होने आदि की चिन्ता से भाकुलित होकर शोक सागर में डूब गये तथा आर्तध्यान से होकर वे अपनी२ हथेली पर मुख रखकर बैठ गये और नीचे की मोर दृष्टि लगाकर बिचार करने लगे कि अब हमें क्या करना चाहिए ( तएणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे जाव समुदरवमयंपिव करेमाणे २ तिमिसगुडामो उत्तरिलेणं दारेण णीति ससित्र मेहंपयारणिवहा ) इसके बाद वह भरत राजा कि जिसके भागे २ का रास्ता चक्करस्न बताता जाता है यावत् जिसके पीछे २ हजारों राजा चल रहे हैं. जोर जोर से सिंहनाद के जैसी भव्यक्तम्वनि से एवं कल कल के शब्द से गुहा गयविटिया झियायंति) तो देवानुप्रिया ४४ प ५१२ नथा पता, समाशशमा કઈ જાતનો ઉપદ્રવ થવાનો છે. આ પ્રમાણે કહીને તેઓ સર્વે અપહત મનઃ સંક૯પવાળા થઈ ને વિમનરક બની ગયા. અને રાજ્ય ભ્રંશ અને ધનાપહાર આદિની ચિંતા થી આકુલિત થઈને શક સાગરમાં નિમગ્ન થઈ ગયા. તેમજ આદધ્યાન થી યુક્ત થઈ ને તેઓ પોત પિતાની હથેળીઓ ઉપર મેં રાખીને બેસી ગયા અને નીચેની તરફ દષ્ટિ રાખીને વિચાર ४२वा वाया वे अमारे शु२वु नये. (तपणं से भरहे राया चक्करयणदेसिय मग्गे नाव समुहरवभूयंपिव करेमाणे २ तिमिसगुहाओ उत्तरिल्लेणं दारेणं णोति ससिघ मेहंघयारनिवहा) त्या२ मा भरत २१ २२ म.जना भाग यान नही કરતું જાય છે યાવત જેની પાછળ પાછળ હજાર રાજાઓ ચાલી રહ્યા છે.–ર– જોરથી સિહ નાદ જેવા અવ્યક્ત ધવનથી તેમજ કલ કલના શબ્દથી ગુફાને સમુદ્ર જેવા શબ્દથી Page #751 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू. १७उत्तरार्द्धभरतविजेतव्यजनस्वरूपनिरूपणम् ७३७ शशीव चन्द्र इव मेघान्धकार निवहात् मेघतमः समूहात् । 'तएणं ते आवाडचिलाया भरहस्स रण्णो अग्गाणोअं एज्जमाणं पासंति' ततो गुहातो निर्गमनानन्तरं खलु ते आपातकिराताः भरतस्य राज्ञः अग्रानीकं सैन्याग्रभागम् 'एज्जमाणं' इयदागच्छत् पश्यन्ति 'पासित्ता' दृष्ट्वा 'आसुरुत्ता' आशुरुप्ताः शीघ्रक्रुद्धाः 'रुट्ठाः' तोषरहिताः 'चंडिक्किा ' चाण्डिक्यिताः रोषयुक्ताः 'मिसिमिसेमाणा' क्रोधवशात् दीप्यमानाः 'अण्णमण्णं सदावेंति' अन्योऽन्यं शब्दयन्ति अह्वयन्ति 'सदावित्ता' शब्दयित्वा आहृय 'एवं क्यासी' एवं बक्ष्यमाणप्रकारेण अवादिषुरिति किमवादिषुरित्याह –'एसणं' इत्यादि 'एसणं देवाणुप्पिया! केइ अप्पत्थिअपत्थए दुरंतपंतलक्खणे हीणपुण्णचाउद्दसे हिरिसिरिपरिवज्जिए जेणं अम्हं विसयस्स उवरिं विरिएणं हव्वमागच्छई' एषः खलु देवानुप्रियाः ? कश्चित् अज्ञातनामकोऽप्रार्थितप्रर्थकः दुरन्तप्रान्तलक्षणः हीनपुण्यचातुद्देशेः ही श्री परिवर्जितः यः खलु अस्माकं विषयस्य देशस्य उपरि वीर्येण आत्मशक्त्या 'हव्वं ति' शीघ्रको समुद्र के शब्द से व्याप्त हुई से करता २ उस तिमिस्र गुफा के उत्तर दिशा के द्वार से मेघकृत अंधकार कि समूह से चन्द्रमा की तरह निकला ( तएणं ते आवाडचिलाया भरहस्स रण्णो अग्गाणीयं एउजमाणं पासंति ) उन आपात किरातोने भरत राजा की अग्रानीक कोसैन्यानभाग को आते हुए देखा- (पासित्ता आसुरत्ता रुद्वा चडक्किया कुविया मिसिमिसेमाणा अण्णमण्णं सहावेंति ) देखकर वे उसी समय क्रुद्ध हो गये. रुष्ट-तोषरहित हो गये, रोष से युक्त हो गये, और क्रोध के वश से लाल पीले हो गये. इसी स्थिति में उन्होंने एक दूसरे को बुलाया और (सहावित्ता एवं वयासो) बुलाकर इस प्रकारकहा (एसणं देवाणुप्पिया ! कोइ (अपत्थियपत्थए दुरंतपंतलक्खणे हीणपुण्णचाउद्दसे हिरिसिरिपरिवज्जिए जेणं अम्हं वितयस्स उवरिं विरिएणं हव्व मागच्छइ ) हे देवानुप्रियो ! यह अज्ञात नामवाला कोई व्यक्ति कि जो अपनी मौत का चाहना कर रहा है , तथा दुरन्त प्रान्त लक्षणों वाला है एवं जिस का जन्म हीन पुण्यवाली कृष्णपक्ष की चतुर्दशी में हुआ है तथा जो लज्जा एवं વ્યાસ કરતે તે તમિસ્રા ગુફાના ઉત્તર દિશાના દ્વારથી મેઘકૃત અંધકારના સમૂડમાંથી ચન્દ્ર भानीमनीया. (तपणं ते आवाडचिलाया भरहस्स रणो अगाणोयं पज्जमाणं पासंति) a आपात शत भरत २०ी अयानी ने सैन्याश्रमाने- आता लयो (पासित्ता आसुरत्ता सट्टा चंडक्किया कुविया मिसिमिसेमाणा अण्णमण्णं सदावेंति) ने न तोतरता દ્ધ થઈ ગયા, રુટ તેષરહિત થઈ ગયા રેષથી યુક્ત થઈ ગયા. અને કૈધાવિષ્ટ થઈને લાલ પીળા थध भयावी स्थितिमा तमणे से भागने माता-या अने (सद्दावित्ता एवं वयासी) पीने ५२२५२ मा प्रमाणे ४यु (पलणं देवानुप्पिया! केई अपत्थियपत्थिए दुरंतपंतलवणे हीणपुण्णंचाउबसे हिरि सिरिपरिवजिए जेणं अम्हे विसयस्स उवरिं वोरिएणं हव्व मागच्छइ) देवान અજ્ઞાતનામ ધારી કોઈ પુરુષ કે જે પોતાના મૃત્યુને આમંત્રી રહેલ છે દુરંત પ્રાન્ત લક્ષણે વાળે છે અને જેને જન્મ હીન પુણ્યવાળી કૃષ્ણ પક્ષની ચતુર્દશી ના દિવસે થયેલ છે તથા જે લજજા અને લક્ષમી થી હીન છે– અમારા દેશ ઉપર પોતાની શક્તિ વડે આક્રમણ Page #752 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७३८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मागच्छन्ति 'तं तहाणं धत्तामो देवाणुप्पिा ! जहा णं एस अम्हं विसयस्स उवरि विरिएणं णो हव्वमागच्छइ त्ति कटु अण्णमण्णस्स अंतिए एयमढे पडिसुणेति' तत्तस्मात्तथा खलु इमं भरतराजानमित्यर्थः 'घत्तामो त्ति' क्षिपामो दिशोदिशि विकीर्ण सैन्यं कुर्म इत्यर्थः हे देवानुप्रियाः ! यथा खलु एषोऽस्माकं विषयस्योपरि वीर्येण आत्मशत्या नो 'हव्वं' शीघ्रमागच्छेदिति कृत्वा विचिन्त्यान्योऽन्यस्यान्तिके समोपे एतमर्थ प्रतिश्रुत्य ओमिति प्रतिपाद्य 'सण्णद्धबद्धवम्मियकवआ' समद्धवद्धवम्मितकवचाः, तत्र सन्नद्धं शरीरारोपणात् बद्धं कषाबन्धनतः वर्म लोहकत्तलादिरूपं सञ्जातमस्येति वम्मितम् एतादृशं कवचं तनुत्राणं येषां ते तथा, पुनश्च कीदृशास्ते 'उप्पीलिअसरासणपट्टिआ' उत्पीडितशरासनपट्टकाः, तत्र उत्पीडिता -गाढं गुणारोपणात् दृढीकृता शरासनपट्टिका धनुर्दण्डो यैस्ते तथा, पुनश्च कीदृशाः 'पिणद्धगेविज्जा" पिनद्धौवेयाः तत्र पिनद्धं अवेयं ग्रीवात्राणकं 'बद्ध आविद्ध विमलवरचिंधपट्टा' बद्धाविद्धविमलवरचिह्नपट्टाः, तत्र बद्धो ग्रंथ दानेन आविद्धः -परिहितो मस्तकावेष्टनेन विमलवरचितपट्टो वीरातिवीरतासूचकवस्त्र लक्ष्मी से रहित हुआ है हमारे देश के ऊपर अपनी शक्ति द्वारा आक्रमण करने के लिये मा रहा है (तं तहाणं घत्तामो देवाणुप्पिया ! जहाणं एस भम्हं विसयस्स उवरि विरिएणं णो हव्वमागच्छइ) तो देखो हमलोग अब इसे ऐसा कर दें कि जिससे इसकी सेना हर एक दिशा में छिप जाय अर्थात् इस की सेना इधर उधर भग जाय और यह हमारे देश के ऊपर माक्रमण न कर पावें (त्तिकट्टु अण्णमण्णस्स अंतिए एयमट्टपडिसुणे ति) ऐसा विचार करके उन्होंने कर्तव्यार्थ का निश्चय कर लिया ( पडिसुणित्ता सण्णद्ध बद्धवम्मिय कवया उप्पीलियसरासणपट्टिया पिणद्धगेविज्जा वद्धियाविद्ध विमलवरचिंधपट्ठा) और कर्तव्यार्थ का निश्चय करके वे सबके सब कवच को पहिर कर सन्नद्ध हो गये अपने २ हाथों में उन्होंने ज्या (दोरी) का आरोपण करके धनुष ले लिया ग्रोवा में प्रीवा का रक्षक अवेयक पहिर लिया. तथा वीरातिवीरता का ४२वा भावी रही छे. (तं तहाणं घत्तामो देवाणुप्पिया ! जहाणं एस अम्हं बिसयस्स उवरिं वीरिपण णो हव्वमागच्छइ) देवानुप्रिया ! से अज्ञात नामवाणो माणुस ताना મૃત્યુની ચાહના કરી રહ્યો છે. એ દુરંત પ્રાન્ત લક્ષણે વાળો છે. એજન્મ હીન પુણ્યવાળી કૃષ્ણ પક્ષની ચતુર્દશીના દિવસે થયેલ છે. તેમજ એ લજજા અને લક્ષમી થી રહિત થઈ ગચે છે. એ અમારા દેશ ઉપર પોતાની શક્તિ વડે આક્રમણ કરવા આવી રહ્યા છે. (સં तहाणं घत्तामो देवाणुपिया ! जहाणं एस अम्हं विलयस्स उपरि वीरिएणं णो हव्धमागच्छ1) તો અમે આવું કરીએ કે જેથી એની સેના દિશાઓ માં અદૃશ્ય થઈ જાય એટલે કે એની सेना माम- तेभ नासी ॥ तेथी मे अभा। हेश ७५२ मा ४१ शनल (त्ति कर अण्णमण्णस्त अतिए एयम पडिसुणेति) मा प्रमाणे वियार ४१२ तेभरी ४ व्याय ना निश्चय ४१ सीधा. (पडिसुणित्ता सण्णद्धपद्धवम्मियकवया उप्पीलियसरासणपट्टिया पिण, गेविज्जा वद्धियाविद्ध विमलवरचिंधपट्टा) भने ४ या ना निश्चय श२ तेमा સર્વે કવચ પહેરીને તૈયાર થઈ ગયા અને પોતપોતાના હાથમાં તેમણે જ્યાનું આરોપણ Page #753 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० १७ उत्तरार्द्धभरतविजेतव्यजनस्वरूपनिरूपणम् ७३९ विशेषो यैस्ते तथा, पुनश्च कीदृशास्ते किराताः 'गहि पाउहप्पहरणा' गृहीतायुधप्रहरणाः, तत्र गृहीतानि आयुधानि प्रहरणानि च यैस्ते तथा, प्रहरणयोस्तु क्षेप्याक्षेप्यकृतो विशेषो वोध्यः, तत्र क्षेप्यानि वाणादीनि अक्षेप्यानि खजादीनि योध्यानि, अथवा गृहीतानि आयुधानि प्रहरणाय यैस्ते तथा, एवंभूता आपातकिराताः 'जेणेव भरहस्स रणो अग्गाणीयं तेणेव उवागच्छति' यत्रैव भरतस्य राज्ञोऽग्रानीकं तत्रैवोपागच्छन्ति 'वागच्छित्ता' उपागत्य 'भरहस्स रण्णो अग्गाणीएण सद्धि संपलग्गा यावि होत्था' भरतस्य राज्ञः अग्रानीकेण सन्याग्रभागेन सार्द्धम् योद्धं संप्रलग्नाश्चाप्यभूवन 'तएणं ते आवाड चिलाया भरहस्स रण्णो अग्गाणीमं हयमहियपवरवीरघाइअ विवडिअ चिंधद्धयपडागं किच्छप्पाणोवगयं दिसोदिसि पडि से हिंति' ततः तदनन्तरं खलु ते आपातकिराताः भरतस्य राज्ञः अग्रानीकं सैन्याग्रभाग कीदृशं तत् हतमथितप्रवरवीरघातितचिह्नवजपताकम् तत्र केचिद् हताः केचिद् मथिताः केचिद् घातिताश्र वीराः श्रेष्ठयोद्धारो यत्र तत्तथा एवं विपतिता नष्टाः ध्वनाः गरुडध्वजादयः पताकाश्च तदित्तरध्वजाः सन्ति चिह्न यत्र तत्तथा पश्चात्पदद्वयस्य कर्मधारयः अत्र पूर्वपदे घातितशब्दस्य प्रवरवीशब्दात् पूर्व प्रयोक्तव्यत्वे परप्रयोगः प्राकृतत्वात् तथा कृच्छ्प्राणोपगतम् सूचक विमलवर चिन्ह पट मस्तक पर धारण कर लिया. (गहिया उहप्पहरणा) और अपने अपने हाथों में उन सबने आयुध एवं प्रहरण उठा लिये । इस प्रकार से योद्धाओं के वेष से सज्नित होकर वे (जेणेव भाहस्स रणो अग्गाणोयं तेणेव उवागच्छंति) जहां पर भरत राजा का अग्रानीक (सैन्य) था-वहां पर पहुंच गये। (उवागच्छित्ता भरहस्स रण्णो अग्गाणीएण सद्धिं संपलग्गा याविहोत्था) वहां पर पहुंच कर उन्होंने भरत राजा के अग्रानीक के साथ युद्ध करना प्रारम्भ कर दिया ( तएण ते आवडचिलया भरहस्प रण्णो अग्गाणीय हयहियपवरवीरवाइय विवडियचिंधद्धयपडागं किच्छप्पाणोवगयं दिसोदिसं पडिसेहिति ) उस युद्ध में उन्होंने-आपातकिरातो ने-भरत नरेश को अग्रानीक को ऐसा बना दिया-कर दिया-कि जिसमें कई श्रेष्टवीर योधा मारे गये, कई श्रेष्ठ वीर योधाओंको जख्मी कर दिये गये, एवं कई श्रेष्ठ वीर योधा आघाકરીને ધનુષો હાથમાં લીધા ગ્રીવામાં ગ્રીવારક્ષક દૈવેયક પહેરી લીધું વસતિવીરતા સૂચક (4मसर थिह्न ५८ मत ५२ धा२५यु (गहियाउहप्पहरणा) तमणे पाताना यामा આયુધ અને પ્રહરણે લીધાં આ પ્રમાણે ચાંદ્ધાઓના વેષમાં સુસજજ થઈને તેઓ (વેક भरहस्स रण्णो अग्गाणोयं तेणेव उवागच्छति) ni मरत ना सैन्यायभायता त्यांच्या (उवागच्छित्ता भरहस्स रण्णो अग्गाणीएण सद्धि संपलग्गा याविहोत्था) या पाडयाने तमः भरतराना मयानी साथे युद्ध ४२वानी १३यात 30. (त पणं ते आपातचिलाया भरहस्स रणो अग्गाणीयं हयमहियपवरवीरघाइय विडिय चिघलय पडागं किच्छप्पाणोवगयं दिसोदिसं पडिसेहिति) तयुद्धमा तभणे भरतनरेशनी भयाનીકના કેટલાક શ્રેષ્ઠ વીરેને મારી નાખ્યા. કેટલાક વીર યોદ્ધાઓ ઘવાયા અને કેટલાક વીર દ્ધાઓને આઘાત યુક્ત કરી દીધા તેમજ તેમની પ્રધાન ગરુડ ચિહ્નવાળી ધજાઓ અને Page #754 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तत्र कृच्छ्रेण कष्टेण प्राणान् उपगतं-प्राप्तम् कथमपि धृतप्राणमित्यर्थः दिशोदिशि दिशः सकाशादपरदिशि स्वाभिमदिक् त्याजनेन अपरस्यां दिशि इत्यर्थः प्रतिषेधयन्ति युद्धान्निवर्तयन्ति इत्यर्थः ॥सू०१७|| इतो भरतसैन्ये किं जातमित्याह "तएणं से" इत्यादि । मूलम्-तएणं से सेणाबलस्स णेआ वेढो जाव भरहस्स रण्णो अग्गाणीअं आवाडचिलाएहिं हयमहियपवरवीर जाव दिसोदिसं पडिसेहियं पासइ पासित्ता असुरुत्ते रुट्टे चंडिक्किए कुविए मिसिमिसे माणे कमलामेलं आसरयणं दुरूहइ दुरूहित्ता तएणं तं असीइमंगुलमूसिणवणउइमंगुलपरिणाहं अट्ठसयमंगुलमायतं बत्तीसमंगुलमूसिअसिरं चउरंगुलकन्नागं वीसइ अंगुल बाहागं चउरंगुलजाणूकं सोलस अंगुलजंघागं चउरंगुलमूसिअखुरं मुत्तोलोसंवत्तवलिअमज्झं ईसे अंगुलपणयपढें संणयपटुं संगयपटुं सुजायपटुं पसत्थपढें विसिट्ठपर्ट एणीजाणुण्णय वित्थयथद्धपटुं वित्तलयकसणिवाय अंकेल्लण पहारपरिवज्जिअंग तवणिज्जथासगाहिलाणं वरकणगसुफुल्लथासगविचित्तरयणरज्जुपासं कंचणमणिकणगपयरगणाणाविहघंटिआजालमुत्तिआजालएहिं परिमंडियेणं पट्ठण सोभमाणेण सोभमाणं कक्केयणइंदनीलमरगय गल्लमुहमंडणरइअं आविद्धमाणिक्कसुत्तगविभूसिअंकणगामय पउमसुकयतिलकं देवमइविकप्पिअं सुखरिदवाहणजोग्गा वयं सुरूपं दूइज्जमाणपंचचारुचमरामेलगं धरतं अणब्भवाहं अभेलणयर्ण कोकासिअ बहलपत्तलच्छं सयावरणनवकणगतविअतवणिजेतालुजीहासयंसिरियाभिसेअ घोणं पोक्खरपत्तमिव सलिलबिंदुजुअं अचंचलं चंचलसरीरं चाक्खचरंगपरिवायगोविव हिलीयमाणं हिलीयमाणं खुरचरणचच्चपुडेहिं तवाले कर दिये गये. तथा उनका प्रधान गरुड़ चिह्नवाला ध्वजाएँ और इनसे भिन्न सामान्य वजाएँ भी नष्ट कर दी गई। इससे वे किसी भी तरह से कथकथमपि जीवित बने रहकरबड़ी मुश्किल से अपने प्राणों को बचाकर-वहां से भाग गये और दूसरी ओर चले गये ।।१७।। તેનાથી ભિન્ન સામાન્ય દવાઓને નષ્ટ કરી દીધી. એથી તેમનામાંથી શેષ સૌનિક કથા કમિપિ પ્રાણ બચાવીને ત્યાંથી પલાયન થઈ ગયા અને બીજી તરફ જતા રહ્યા. ૧૭ના Page #755 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृण्वक्षस्कारः सु. १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७४१ धरणिअलं अभिहणमाणं अभिहणमाणं दोविअ चलणे जमगसमगं मुहाओ विणिग्गमंतं व सिग्घयाए मुलाणतंतु उदगमवि णिस्साए पक्कमंतं जाइकुलरूवपच्चयपसत्थवारसावत्तगविसुद्धलक्खर्ण सुकुलप्पसूअं मेहाविभद्दयविणीयं अणुअतणुअसुकुमाल लोमनिद्धच्छवि सुजाय अमरमणपवणगरुलजइणचवलसिग्घगामि इसिमिव खंतिखमए सुसीसमिव पच्चक्खया विणीयं उदगहुतवहपासाणपंसुकद्दमससक्कर सवालुइल्लतडकडेग विसमपब्भारगिरिदरीसु लंघण पिल्लणणित्थारणासमत्थं अचंडपाडियं दंडपाति अणंसुपातिं अकालतालुंच कालहेसि जिय निदगवेसगं जिअ परिसहं जच्चजातीअं मल्लिहाणि सुगपत्त सुवण्ण कोमलं मणाभिरामं कमलामेलं णामेणं आसरयणं सेणावई कमेण समभिरूढे कुचलयदलसामलं च स्यणिकरमंडलनिभं सत्तुजणविणासणं कणगरयणदंडं णवमालिअ पुष्फसुरहिगंधिं णाणामणिलयभत्तिचित्तं च पहोतमिसिमिसित तिक्खधारं दिव्वं खग्गरयणं लोके अणोवमाणं तं च पुणो वंसरुक्खसिंगट्ठिदंत कालायसविपुललोहदंडकवरखइरभेदकं जाव सव्वत्थ अप्पडिहयं किं पुण देहेसु जंगमाणं पण्णासंगुलदीहो सोलससे अंगुलाई विच्छिण्णो । अद्धंगुल सोणीको जेट्टप्पमाणो असो भणिो ॥१॥ असिस्यणं णस्वइस्स हत्थाओ तं गहिऊण जेणेव आवाड़चिलाया तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता आवाडचिलाएहिं सद्धिं संपलग्गे आवि होत्था। तएणं से सुसेणे सेणावई ते आवाडचिलाए हयमहिअ पवस्वीरघाइअ जाव दिसो दिसिं पटिसेहेइ ॥सू० १८॥ छाया- ततः खलु स सेनाबलस्य नेता वेष्टको यावत् भरतस्य राज्ञोऽग्रानीकम् आपातकिरातः हतथितप्रवरवीर यावत् दिशोदिशि प्रतिषेधितं पश्यति, दृष्ट्वा आशुरुतः रूष्टः चाण्डिक्यितः कुपितः मिसिमिसेमाण: कमलामेलम् अश्वरत्नं दूरोहति, दुरूह्य ततः खलुतम् अशीत्यलोच्छ्रितम् नवनवत्यगुलपरिणाहम् अष्टशताछुलायतम् द्वात्रिंशदङ्गुलोच्छ्रितशिरस्क चतुरङ्गुलकर्णकं विंशत्यलोच्छ्रितखुरं मुक्तोलीसंवृतवलितमध्यम् ईषदगुलोप्रणतपृष्ट संनतपृष्ठं संङ्गतपृष्ठं सुजातपृष्ठ प्रशस्तपृष्ठं विशिष्टपृष्ठम् एणा जानून्नतविस्तृतस्तब्धपृष्ठं वेत्रलताकशानिपाताळेलणप्रहारपरिवर्जिताङ्गम् तपनीय स्थासकाहिलाणम् घरकनकसुपुष्पस्थासविचित्ररत्नरज्जुपाश्व काञ्चनमणिकनकप्रवरक नानाविधघण्टिका Page #756 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७४२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे जालमौक्तिकजालकैः परिमण्डितेन पृष्ठेन शोभमानेन शोभमानम् कर्केतनेन्द्रनीलमरकतमसारगल्लमुखमण्डनरचितम् आविद्धमाणिक्यसूत्रकविभूषितं कनकमयपद्मसुकृततिलकं देवमतिविकल्पित सुरवरेन्द्रवाहनयोग्यावजम् सुरूपं द्रवरपञ्चचारुवामरमेलकं धरत् अनभ्रबाहम् अमेलनयनम् कोकासितयहलपत्रलानं सदावरणनघकनकतप्ततपनोयतालुजिह्वाऽऽस्य श्रीकाऽभिषेकघोणं पुष्करपत्रमिव सलिलविन्दुयुतम् अचञ्चलं चञ्चलशरीरं चोक्षचम्कपरिव्राजक इव भिलीयमानम् अभिलीयमानं खुरचरणचच्चपुटैः धरणीतलम् अभिटनदभिध्नदवावपि चरणौ यमकलमकमुखाद्विनिर्गमदिव शीघ्रतया मृणालतन्तूदुकमपि निश्राय निश्राव प्रकामत् जातिकुलरूपप्रत्ययपशस्तद्वादशावत कविशुद्धलक्षणं सुकुलप्रसूतं मेधाविभद्रविनीतम् अणुकतनुकसुकुमारलामस्निग्धच्छवि सुजातामरमनः पवनगरुडजयिवपल. शोघ्रगामीऋषिमिव शान्तिक्षमया सुशाध्यमिव प्रत्यक्षताविनीतम् उदकहुतवहपाषाणपांशकद्देमसशकरसवालुकतटकटकविषमप्राग्भारागरोदरोषु लघणप्रेरणानस्तारणासमथेम् अचण्ड पातित दण्डपाति अनपाति अकालताल च कालहेषि जिनिद्रम् गवेषकम जितपरिपहम् जात्यजातीयम्, माल्लघ्राणम्, शुकपत्रसुवर्णकोमलम्, मनोऽभिरामं कमलामेलम् अश्वरत्न सेनापतिः क्रमेण समभिरूढः कुवलयदलश्यामलं च रजनीकरमण्डलनिभम् शत्रजनविनाशनम् कनकरत्नदण्डम् नवमालिकापुष्पसुरभिगन्धि नाना मणि लताभक्तिचित्रम् च प्रधौत 'मिसिमिसित' तोक्ष्णधारम् दिव्यं खड़्गरत्नम् लोके अनुपमानम् तच्च पुनर्वशरूक्षशृङ्गास्थिरन्त कालायसविपुललोहदण्ड वरवज्रभेदकं यावत् सर्वत्राप्रतिहतम् किं पुनर्जङ्गमानां देहेषु पञ्चाशदशैलानि दीर्घः स षोडशाङ्गुलानि विस्तीर्णः। अङ्गुिलश्रोणिकः ज्येष्ठ प्रमाणोऽसि भणितः ॥१॥ तत् असिरत्नं नरपतेः हस्तात् गृहीत्वा यत्रैव आपातकिराता स्तत्रैब उपागच्छति उपागत्य आपातकिरातेभ्यः सार्द्धम्, संप्रलग्नश्चाप्यभवत् ॥ ततः खलु स सुषेणः सेनापतिस्तानापातकिरातान् हतमथितप्रवरवीरघातित यावद् दिशोदिशि प्रतिषेधयति ॥सू०१८॥ टीका-"तएणं से" इत्यादि 'तएणं से सेणावलस्स णेा वेढो जार भरहस्स रणो अग्गाणीय आवाडचिलाएहिं हयमहियपवरवीर जाव दिसोदिसिं पडिसेहिश्र पासइ' ततः स्वसैन्य प्रतिषेधनादनन्तरं खलु स सेनाबलस्य-सेनारूपस्य बलस्य नेता स्वामीवेष्टकः वस्तुमात्रविषयकोऽत्र भरत सैन्य में क्या हुआ- इसका कथन'तएणं से सेणाबलस्स णेया वेढो जाव भरहस्स' इत्यादि-सू० १८॥ टोकार्थ--(तएण से सेणाबलस्स णेया) जब सेना रूप बल के नेता सुषेण नामकसेनापति ने (भरहस्स रणो) भरत महाराजा के (अग्गाणोयं आवाडचिलाएहिं हयमहियपवरवीरघाइयजाव दिसोदिसं पडिसेअिं पासइ ) अमानीक को आपात किरातों के द्वारा हतमथित प्रवर वीर ભરત સૈન્યમાં શું થયું ? તે સંબંધમાં કથન : 'त एण से सेणाबलस्स णेया वेढो जाव भरहस्स' इत्यादि-सूत्र--१८ ।। टीकार्थ-(त एणं से सेणाबलस्स णेया) न्यारे सेना३५ जना नेता सुषे सेनापति (भरहस्स रणो) भरत सतना (अग्गाणीय आवाडविलाएहि हयमहियपवरवीरघाइय Page #757 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० ३ वक्षस्कारः सू. १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् सेनानी सत्कः सम्पूर्ण पूर्वोक्तो ग्राह्यः स सुषेणः यावत् भरतस्य राज्ञोऽग्रानीकम् अग्रसैन्यसमूहम् आपातकिरातःहतमथित प्रवरवीरघातित यावत् प्रतिषेधितं यावत्पदात् विडिय चिंधदयपडाग किच्छप्पाणोवगयं' इति ग्राह्यम् तथा च केचित् हताः केचित् मथिताः ताश्च प्रवरवीरा यत्र तत्तथा, एवं विपतितचिह्नध्वजपताकम् विपतिताः भ्रष्टाः चिह्नप्रधानाः ध्वजाः गरुडध्वजादयः पताकाः तदितरध्वजाः सन्ति यत्र तत्तथा एवं कृच्छ्रप्राणोपगतम् कृच्छेण कष्टेन प्राणान् उपगतं प्राप्तम् कथमपि धृतप्राणमित्यथः दिशोदिशि अभिप्रेतदिशोऽस्यां दिशि प्रतिषेधितम् आपातकिरातैः युद्धान्निवारितम् अग्रानीकं सैन्यसमूह पश्यति भरतस्य सुषेण नामा सेनापतिः 'पासित्ता' दृष्ट्वा 'प्रामुरुत्त रुढे चंडिक्किए कविए मिसिमिसेमाणे कमलामेलं आसरयणं दुरूहइ' आशुरुप्तः शीघ्रं ऋद्धः रूष्टः तोषरहितः चाण्डिक्यितः रोषयुक्तः कुपितः क्रुद्धः मिसिमिसेमाणः कोपातिशयात् दीप्यमानः-जाज्वल्यमानः कमलामेल नामाश्वरत्नं दुरोहति आरोहति 'दुरुहित्ता' दुरुह्यआख्य अथ अश्वरत्नवर्णनमाह-'तएणं तं असीइमंगुलमसि' इत्यारभ्य 'सेणावई कमेण समभिरूढे' इत्येतदम्तेन सूत्रेण पदयोजना तत इति क्रियाक्रमसूचकं बचनं तं प्रसिद्धगुणं नाम्ना कमलामेलम् अश्वरत्न सेनापतिः क्रमेण सन्नाहादि परिधानविधिना समभिरुतः, आरुढः कीदृशम् अश्वरत्नमित्याह-'असीइमंगुलमूसिभ' इति, अशीत्यगुलोच्छ्रितम् अशीत्यङ्गुलानि उछितम् अशीत्यगुप्रमाणकम् अङ्गुलं यवमानम् इति वाला-जिसमें अनेक योधाआ को मार दिये गये हैं और अनेक श्रेष्ठयोद्धाओंकोजिस में घायल कर दिये गये हैं-ऐसा देवा "यहां यावत् पद से' विवडियचिंघद्धयपडागं, किच्छप्पाणोवगयं" इन पूर्वोक्तविशेषणों का ग्रहण हुआ है । तो ( पासित्ता ) देखकर ही वह ( आसुरत्त. रुद्वे, चंड क्किए, कुविए, मिसमिसेमाणे कमलामेलं आसरहं दुरूहइ) एक साथ ही अत्यंत क्रुध हो गया, उसे थोड़ा सा भी संतोष नहीं रहा, स्वभाव में उसके रोष भर गया इस तरह वह कुपित और कोप के अतिशय से जलता हुआ कमलामेल नाम के अश्वरत्न पर सवार हुआ । अश्वरत्न का वर्णन-(असीइमंगुलमूसिअं) यह अश्वरत्न ८० अस्सो अंगुल ऊँचा था । एक यव का जितना प्रमाण होता है, उतने ही प्रमाण वाला एक अंगुल होता है ऐसा वाचस्पति का मत है माव दिलो दिसि पडिलेहि पासइ) मयाना ने मापात 8!! बडे इतमथित प्र१२ वीर યુક્ત કે જેમાં અનેક દ્ધાઓ હણાયા છે તેમજ અનેક દ્ધાઓ ઘવાયા છે- તેમ જોયું. मही यावत परथी ("विडियचिधद्धयपडागं किच्छप्पाणोवगयं") से पूरित विशेषणेनु प्रड यु. ( पासित्ता) बने ते ( आसुरत्ते, रुटूढे, चंडक्किए, कुविए, मिस. मिसेमाणे कमलामेलं आसरहं दुरूहर) ते मे हुर्थ यो . तेन था। ५५ सताप રહ્યો નહિ, તેના ભાવમાં રોષે ભરાઈ ગયા. આ પ્રમાણે તે કુપિત અને કેપના અતિશય આવેશથી પ્રજવલિત થતા કમલામેલ નામક અશ્વરત્ન ઉપર સવાર થયે, તે અશ્વરનનું वन याप्रमाणे छ- (असीइ मंगुलभूसिअं) मे श्रे४ सय ८० सी ya sal. Page #758 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे वाचस्पतिः तत्र अङ्ग हुलकात् उलः अगुलं चात्र मानविशेषः ‘णवणउइमंगुलपरिणाहं, नबनवत्यगुलपरिणाहम् तत्र नवनवत्यगुलानि- एकोनशताङ्गुलप्रमाणः परिणाहो मध्यपरिधिर्यस्य ततथा पुनः कीदृशम् 'अट्ठसयमंगुलमायतं' अष्टशताङ्गुलमायतम् अष्टोत्तरशताङ्गुलानि आयतं दीर्घम्, सर्वत्र मकारोऽलाक्षणिकः, तुरगाणां तुङ्गत्वं खुरत आरभ्य कर्णावधि परिणाहः विशालता पृष्ठपाश्वोदरान्तरावधि आयामो मुखादापुच्छमूलम् उक्तं च परासरेण "मुखादापेचकं दैर्ध्य पृष्ठपाश्बोंदरान्तरात् । आनाह उच्छ्य: पादाद्, विज्ञेयो यावदासनम् ॥१॥ तत्रोच्चत्वसङ्ख्यामेलनाय साक्षादेव सूत्रकृदाह-'बत्तीस मंगुलमूसिसिर' द्वात्रिंशदगुलोच्छ्रितशिरस्कम् तत्र द्वात्रिंशद् अगुलानि द्वात्रिंशदगुलप्रमाणम् उच्छितं शिरो यस्य तत्तथा. पुनः कीम् 'चउरंगुलकन्नागं' चतुरगुलकर्णकम्-चतुरगुलप्रमाणकर्णकम् इस्वकर्णस्य जात्यतुरगलक्षणत्वात्, अनेन कर्णयोरुच्चत्वेन अस्याश्वअङ्ग शब्द से डल प्रत्यय करने पर अङ्गल शब्द की निष्पत्ति होती है। यह एक प्रकार का मान विशेष है । (णवणउइमंगुलपरिणाह) इस अश्वरत्न की मध्यपरिधि ९९ नन्नाणु अंगुल प्रमाणथी । (अप्स पमंगुलमायत) १०८ एक सौ आठ अंगुल को इसको लम्बाई थी। यहां सर्वत्र मकार अलाक्षणिक है-घोड़ो की ऊंचाई का प्रमाण खुर से लेकर कान तक नापी जाती है परिणाह विशालता-पृष्ठ भाग से लेकर उदर तक मानी जाती है। तथा आयाम-मुख से लेकर पुच्छ के मूल तक गिनी जाती है। परासर ने ऐसा हो कहा हैमुखादापेचकं देय पृष्ठपाश्र्वोदरान्तरात् । आनाह उच्छ्रयः पादाद् विज्ञेयो यावदासनम् ॥१॥ ( बत्तीसमंगुलमुसियसिरं ) ३२ मंगुल प्रमाण इस अश्वरत्न का मस्तक था ( चउरंगुलकन्नागं' चार अगुल प्रमाण इसके कर्ण थे । छोटे कान श्रेष्ठ घोडे होने के चिन्ह माने नाते हैं। इसी से धोड़े का यौवन स्थिर रहता हुआ कहा गया है। यहां पर योजना એક યવનું જેટલું પ્રમાણ હોય છે, તેટલા પ્રમાણુવાળ એક, અંગુલ હોય છે એ વાચસ્પતિને મત છે. અંગ શબ્દને “પ્રત્યય કરવાથી અંગુલ શબ્દની નિષ્પત્તિ થાય छ. प्रा२नु भा५ विशेष छे. (णवणउमंगुलपरिणाहं) से मश्वरत्ननी मध्य परिधि नवा प्रभावामी ती. ( अठ्ठसयमंगुलमायतं) १०८ मे से। मा અંગુલ જેટલી એમની લંબાઈ હતી. અહીં સર્વત્ર મકા૨ અલાક્ષણિક છે. ઘેડાઓની ઊંચાઈનું પ્રમાણુ ખરીથી કાન સુધી માપવામાં આવે છે. પરિણાહ-વિશાલતા-પૃષ્ઠભાગથી માંડીને ઉદર સુધી માપવામાં આવે છે તેમ જ આયામ-મુખથી માંડીને પૂછના મૂળ સુધી માપવામાં આવે છે. પરાસરે આ પ્રમાણે જ કહ્યું છે— मुखादापेचक दैर्ध्य पृष्ठपाचोदरान्तरात् । आनाह उच्छ्रयः पादाद् विज्ञेयो यावदासनम् ॥ (बत्तीस मंगुलमूसियसिरं ) ३२ मत्रीस अya प्रभार से मश्वरत्ननु भरत तु . (चउरं. गुलकन्नाग) यार भya प्रमाण ना ४ (४) ता. नाना न श्रेष्ठ घाना क्षy Page #759 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू०१८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् रत्नस्य स्थिरयौवनत्वममिहितं शक्कुकर्णत्वात् अत्र योजनायाः क्रमप्राधान्येन पूर्वम् कर्णविशेषण शेयं पश्चात् शिरसः अश्वश्रवसो मूर्ध्न उच्चतरत्वात् पुनः कीदृशम् 'वीसह अंगुलवाहाग' विंशत्यङ्गुलबाहाकम्, २० विंशत्यङ्गुलप्रमाणा बाह-शिरोभागाधोवती जानूरोरुपरिवर्ती प्राक्चरणभागी यस्य तत्तथा 'चउरंगुलजाणूक' ४चतुरङ्गुलजानुकम् तत्र चतुरङ्गुलप्रमाणं जानु बाहुजंघासन्धिरूपोऽवयवो यस्य तत्तथा, तथा 'सोलसअंगुलजघागं' षोडशाङ्गुलजंघाकम् तत्र१६षोडशाङ्गुलप्रमाणा जंघा-जान्वधोवर्ती खुरावधिरवयवो यस्य तत्तथा, पुनश्च कीदृशम् 'चउरंगुलमसिअखुरं चतुरगुलोपिछुतखुरम्, तत्र ४चतुरगुलोपिछताः खुराः पादतलरूपाः अवयवा यस्य तत्तथा, एषामवयवानामुच्चत्वमीलने सर्वसाधा ८० अशीत्यङ्गुलरूपा, मकारः सर्वत्रालाक्षणिकः सम्प्रति अवयवेषु लक्षणोपेतत्वं सूचयति 'मुत्तोलीसंवत्तवलिअमज्झं' मुक्तोली संवृत्तवलितमध्यम् तत्र मुक्तोलीनाम अध उपरि च सकीर्णा मध्येतु ईषद्विशाला कोष्ठिका तद्वत् संवतं सम्यग्वर्तुलं वलितं वकनस्वभावं नतुस्तब्धं मध्यं यस्य तत्तथा परिणाहस्य मध्यपरिधिरूपस्यात्रैव चिन्त्यमानत्वादुचिता इयरुपमा 'इसिं अंगुलपणयपी' ईषदडगुलप्रणकी क्रम प्रधानता लेकर पहिले कर्ण का विशेषण पश्चात् शिर का विशेषण जानना । क्योंकि घोडे के दोनों कान मस्तक की आपेक्षा उच्च होते हैं । (बोसइ अंगुलवाहाग ) इसकी शिरोभाग के अधोवर्ती और दोनों जानुओं के उपरिवर्ती ऐसा चरणों का प्रथम भागगर्दन के नीचे का भाग २० वीस अंगुल प्रमाण था (चउरंगुल नाणूक सोलसअगुल जंघाग) चार मंगल प्रमाण इसका जानु था-बाहु और जंघा का सन्धिरूप अवयव था। १६ सोलह अंगल प्रमाण इसकी जंघा थी-जानु के नीचे का खुरों तक का अवयवरूप भाग था ( चउरंगलमसियखुरं ) चार अंगुल ऊँचे इसके खुर थे। ( मुत्तोलीसं वत्तवलियमज्झं ) मुक्कोली-नीचे ऊपर में संकीण तथा मध्य में थोड़ी विशाल ऐसी कोष्ठिका के जैसा इसका अच्छी तरह से गोल एवं वलित वलन स्वभाव को स्तब्ध स्वभाव का नहीं मध्य भाग था ( ईसिं गळ મનાય છે. એનાથી જ ઘડાનું યૌવન સ્થિર રહે છે, આમ કહેવાય છે. અહી જનાની મ પ્રધાનતા લઈને પહેલાં કર્ણ (કાન)નું વિશેષણ અને ત્યાર બાદ શિરનું વિશેષણ જાણવું समाधाना-नानी शिश्ना भपक्षाच्या डाय छ. (बीसद अंगलवाहागं) એની માહા- ( શિરોભાગના અધેવતી અને બને જાનુઓના ઉપરને ચરણેને પ્રથમ भाग-श्रीवानी नायनामा)२० वीस प्रमाण ती. (च उरंगुल जाणूकं सोलस अंगलजंघाग) यार म'ya प्रभासन नुहाग ता-मेले माह भने घाना धि રૂપ અવયવ હતે. ૧૬ સોળ અંગુલ પ્રમાણ એની જંઘા હતી-એટલે કે જાનુની નીચેનો ખાર अधीन। ३५ भासतो. (चउरंगुलमूसियखुरं ) या२ ममुख यायनी भरीया ती (मुत्तोलीसं वत्तवलियमज्झ) भुताना-नीय-५२मां sly तथा मध्यम વિશાળ એવી કેબ્રિકા જેવો અને સારી રીતે ગાળ તેમ જ વલિત–વલન સ્વભાવને, નહિ કે Page #760 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -७४६ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे तपृष्ठम् तत्र ईषदङ्गुलं यावत् प्रणतं नन्तुमारब्धम् अतिप्रणतस्योपवेष्टु दुखावहत्वात् पृष्ठम् पर्याणस्थानं यस्य तत्तथा आरोहकसुखावहपृष्ठकमित्यर्थः, पुनः कीदृशम् 'संणयपटुं' संनतपृष्ठम् तत्र सम्यग् अधोऽधः क्रमेण नतं पृष्ठं यस्य तत्तथा, तथा 'संगयपटुं' संगतपृष्ठम् संगतदेह प्रमाणोचितं पृष्ठं यस्य तत्तथा, तथा 'सुजायपटुं' सुजातपृष्ठम् सुजातं जन्मदोषरहितं पृष्ठं यस्य तत्तथो, तथा 'पसत्यपटुं' प्रशस्तपृष्ठम् तत्र प्रशस्तं शालिहोत्रलक्षणानुसारि पृष्ठं यस्य तत्तथा, किंबहुना ? 'विसिदुपटुं' विशिष्टपृष्ठं प्रधानपृष्ठम् भणितं पृष्ठे पर्याणस्थानवर्णनम्, अथ तत्रैवावशिष्टभागं विशिनष्टि 'एणीजाणुण्णयवित्थयथद्धपटुं' एणीजानुन्नताविस्तृतस्तब्धपृष्टम् तत्र एणी हरिणी तस्याः जानुवदुन्नतम् उभयपार्श्वयो विस्तृतं च चरमभागे स्तब्धं सुदृढं पृष्ठं यस्य तत्तथा, पुनः कीदृशम् 'वित्तलयकसणिवाय अंकेल्लणपहारषरिवज्जिअंग' वेत्रलता कशानिपाताङ्कल्लणप्रहारपरिवर्जिताङ्गम् तत्र वेत्रो जलवंशः लता वेणुलता चर्मदण्डः 'चावुक' इति प्रसिद्धः, तेषां निपातैस्तथा अङ्कल्लणप्रहारैः तर्जनकप्रहारैः तर्जनकविशेषाघातैश्च परिवर्जितम् अश्ववाहमनोऽनुकूलचरित्वात् अङ्गं यस्य तत्तथा, तथा 'तवणिज्जथासगाहिलाणं' तपनीयस्थासकाहिलाणम्, तत्र तपनीयमयाः 'सुवर्णमया:' स्थापणयप, संणयपढें मुजायपट्ट पसत्थप विसिटुपट्ट ) जब आरोहक इसके ऊपर बैठता था तो इसका पृष्ठ भाग थोडे से अंगुल प्रमाण तक झुक जाता था । वह पृष्ठ भाग इसका नीचे नीचे के क्रम से नत था, संगत था-देह प्रमाण के अनुरूप था, सुजात था-जन्म दोष रहित था-तथा प्रशस्त था- शालिहोत्र लक्षण के अनुसार था-अधिक क्या कहें-वह पृष्ठ भाग इसका एक विशिष्ट ही प्रकार का पृष्ठ था ( एणुजाणुण्णयवित्थय थद्ध पटू वित्तलयक सणिवाय अकेल्लणपहारपरिवज्जिअंग ) वह पृष्ट इसका हरिणीको जंघाओं की तरह उन्नत था-और दोनों पार्श्व भागों में विस्तृत था एवं चरम भाग में स्तब्ध था-सुदृढ था । इसका शरीर वेत्र, या लता, या कशा-कोडा, इनके आघातों से तथा इसी प्रकार के और भी जो तर्जनक विशेष हैं उनके आघातों से परिवर्जित था। क्योंकि इसको चाल अपने उपर सवार स्त स्वभावना-ना मध्यमा खत. (ईसिं अंगुलपणयपटुं संणयपटुं सुजायप, पसत्थपहुं विसिवपटट) यारे माह सेनी ५२ मेसता त्यारे ने पृष्ठमा અંગુલ પ્રમાણ જેટલે નગ્ન થઈ જતું હતું. તે પૃષ્ઠ ભાગ એ અને નીચે–નીચેના-ક્રમથી નત હતા, સંગત હતા, દેહ પ્રમાણાનુરૂપ હતા, સુજાત હતા-જન્મ દષથી રહિત હતે. પ્રશસ્ત હતો, શાલિહોત્રના લક્ષણ મુજબ હતું, વધારે શું કહીએ તે અશ્વને પૃષ્ઠભાગ विशि: आरन . (एणु जाणुण्णय वित्थय थद्धपहें वित्त लयकसणिवाय अकेल्लणपहारपरिवज्जिअगं) ते अश्वने। मारिन धामनी म उन्नत હતા અને બને પાશ્વભાગોમાં વિસ્તૃત હતા તેમ જ ચરમ ભાગમાં સ્તબ્ધ હતું, સુદઢ હતા. એ અશ્વનું શરીર વેત્ર, લતા કે કશા (કેડા) એ સર્વ ના આઘાતથી તેમજ એ જાતના બીજા તજનક વિશેષો હોય છે, તેમના આઘાતથી પરિવર્જિત હતું. કેમકે એની ચાલ, Page #761 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् । ७४७ सकाः दर्पणाकाराः अश्वालङ्कारविशेषा यत्र तदेवंविधम् अहिलाणं मुखसंयमनविशेषो यस्य तत्तथा सुवर्णमयलगामयुक्तमित्यर्थः तथा 'वरकणगमुफुल्लथासगविचित्तरयणरज्जुपासं' वरकनकमुपुष्पस्थासकविचित्ररत्नरज्जुपाश्वम् तत्र वरकनकमयानि सुष्ठु शोभमानानि पुष्पाणि स्थासकाश्च अश्वालङ्कारविशेषाः तैर्विचित्रा रत्नमयी रज्जुः पार्श्वयोः पृष्ठोदरान्तवत्येवयव विशेषयोर्यस्य तत्तथा बध्यन्ते हि पट्टिकाः पर्याणदृढीकरणार्थमश्वाकनामुभयोः पार्श्वयोरिति तथा 'कंचणमणिकणगपवरगणाणाविह घंटिआजालमुत्तिाजालएहिं' काञ्चनमणिकनकप्रवरकनानाविधघण्टिकाजालमौक्तिकजालैः तत्र काञ्चनयुतमणिमयानि केवल कनकमयानि च प्रवरकाणि पत्रिकाभिधानभूषणानि अन्तराऽन्तरा येषु तानि तथाभूतानि नानाविधानि घण्टिकाजालानि मौकिकजालानि च तैः 'परिमंडियेणं पटेण सोभमाणेण सोभमाणं परिमण्डितेन विभूषितेन पृष्ठेन शोभमानेन शोभमानम् 'कक्केयणइंदनीलमरगरमसारगल्लमुहमंडणरइअं' कर्केतनेन्द्रनीलमरकतमसारगल्लमुखमंडलरचितम् तत्र कर्केतनः रत्नविशेषः इन्द्रनील: इन्द्रधनुर्वत् नीलः ईषत् नील. वर्णरत्नविशेषः अतसीवर्णवत्, मरकत: नील-रत्नविशेषः दुर्वावर्णवत् मरतगल्लः एकप्रकारक रत्नविशेष तैः रचितं सज्जितं निर्मितं मुखमण्डलं यस्य तत्तथा तत् अथवा अस्य स्थापिहुए चक्रवर्ती के मनोऽनुकूल होती थी। ( तवणिज्जथासगाहिलाणं ) इसके मुख ऊपर की जो लगाम थी वह सुवर्णनिर्मित स्थासकों से-दर्पणाकारके अलङ्कारो से युक्त थी, ( वरकणगसुफुल्ल थासगविचित्तरयणरज्जुपासं ) इसकी तंगरूप जो रस्सी थी वह रत्नमय थी एवं वरकनकमय सुन्दर पुष्पों से तथा स्थासकों से अलंकारविशेषों से विचित्र थी ( कंचणमणिकणगपयरगणाणाविह घंटियाजालमुत्तियाजालएहिं परिमंडियेणं पटेण सोभमाणेण सोभमाणं ) काञ्चन युक्तमणिमय और केवल कनकमय ऐसे पत्रक नामके अनेक भूषण बीच-२ में जिनमें जरे हुए हैं ऐसे अनेक प्रकार के घण्टिकाजालों से तथा मौतिक जोलों से परिमंडित सुन्दर पृष्ठ से जो सुशोभित है। ( कक्केयण इंदणीलमरगयमसारगल्लमुहमंडणरइअं) कर्केतन इन्द्रनीलमणि, मरकतमणि, एवं मसारगल्ल इन सबसे जिसका मुखमंडलसज्जित किया गया है । अनी 6५२ सवार थये। यता ना मन भुराम थती ती. (तवणिजथासगाहिलाण) એના મુખની જે લગામ હતી તે સુવર્ણ નિમિત સ્થાનકેથી દર્પણકારના અલંકારોથી युस्त ता. ( वरकणव सुफुल्लथासगविचित्तरयणरज्जुपासं ) नी त ३५ २ शडती તે રત્નમય હતી તેમજ વર કનકમય સુંદર પુષ્પોથી તથા સ્થાસકેથી અલંકાર વિશેષોથી વિચિત્ર ती. (कंबणमणिकणगपयरगणाणाविह घटियाजालमुत्तियाजालेहिं परिमंडियेणं पटेण सोभमा णेण सोभमाण) यन युत भश्मिय भने ३४त उनभय वा पत्राना अने मानुष। મધ્યમાં જેમનામાં જડિત છે, એવા અનેક પ્રકારના ઘટિકા જાથી તેમજ મૌક્તિક જા हाथी परिभडित सु२ पृष्ठथा रे सुशामित छ. (कक्केयण इंदणीलमरगयमसारगल्लमुह मंडणरइ) तन-छन्द्रनाल म२४तमा भर मसा२१६ मे सवेथा २नु भुम મંડળી સજિત કરવામાં આવેલ છે અથવા એ પૂર્વોક્ત સ્થાપિતકકેતનાદિ માં જેના Page #762 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 982 प्रज्ञप्ति तेषु उक्त रत्नविशेषु प्रतिबिम्बितानि अनेकमुखमण्डलानि तैः रचितं सुशोभितम् पुनः कीदृशमरत्नम् ' आविद्धमाणिक्कमुत्तगविभूसिय' आविद्धमाणिक्य सूत्रकविभूषितम् तत्र आविद्धमाणिक्यं वत्रकम् अमुख भूषण विशेषस्तेन विभूषितं शोभितम् 'कणगमयपउमसुकयतिलकं' कनकमयपद्मसुकृततिलकम् तत्र कनकमयपद्येन सुष्ठुकृतं तिलकं यस्य तत्तथा 'देवमइविकपिअं' देवमतिविकल्पितम् तत्र देवमत्या देवचातुर्येण विविधप्रकारेण कल्पितं सृष्टम् 'सुरवरिंदवाहण जोग्गावयं' सुरवरेन्द्रवाहनयोग्यवज्रम्, तत्र सुरवरेन्द्रवाहनम् उच्चैः श्रवा इन्द्रस्य अश्वः तस्य योग्यः मण्डलीकरणाभ्यासः गोळाकार भ्रमण रूपगमनं तस्येतिभावः तस्याः वज्रम् प्रापकम् व्रजगतावित्यस्माद् च प्रत्ययः तथाः 'सुरूवं' सुरूपम् - सुन्दरम् पुनः कीदृशम् ' दूइज्जमाणपंचचारुचामरामेळगे धरेंत' द्रवत् पश्चचारुचामरमेकं धरत् तत्र द्रवन्ति इतस्ततो दोलायमानानि सहज चश्वलाङ्गत्वाद् गलभामौलिकर्णद्वयमूलनिवेशितत्वेन पश्चसङ्क्षयकानि यानि चारुणि चामराणि तेषां मेलकः एकस्मिन् मूर्द्धनिसङ्गमस्तं धरद् वहत् मूले चामरा इत्यत्र स्त्रीनिर्देशः समयसिद्ध एव अथवा - इन पूर्वोक्त स्थापित कर्केतनादि रत्नों में जिसके अनेक : मुखमंडल प्रतिविम्बित हो रहे हैं, इससे जो बड़ा सुहावना लग रहा हैं । ( आविद्ध माणिक्कसुत्तगविभूसियं ) जिसमें माणिक्य लगे हुए है ऐसे सूत्रक अश्वमुख भूषणविशेष से जो विभूषित है ( कणगामय पउमसुकयतिलकं ) कनकमयपद्म से जिसके मुख ऊपर अच्छी तरह से तिलक किया गया हैं ( देवमइविकप्पियं ) देवोंने अपनी बुद्धि की चतुराई से जिसकी रचना को है ( सुरवरिंदवाहणजग्गावयं सुरूवं दूइज्माण पंचचारुचामरामेलगं घरेंतं ) सुरेन्द्र इन्द्र का जो वाहनभूत अश्व है जिसका कि नाम उच्चैश्रवा है । उसकी जो योग्या - मण्डलाकाररूप भ्रमण - गोलाकार भ्रमणरूप गमन - उस गमन को यह प्राप्त करनेवाला है । अर्थात् इसकी चाल इन्द्र के घोड़ा जैसी है । यह बड़ा सुन्दर है-अच्छे रूप वाला है । पांच स्थानों में गले में भाल में, मौलि में, और दोनों कानों में निवेशित हलते हुए पांच सुन्दर चामरों के मिलाप को जो मस्तक पर धारण करता है । यहां मूल में चामर शब्द को जो बीलिङ्ग रूप से कहा गया है वह स्व समय में इसकी ऐसी અનેક સુખમ’ડલા પ્રતિષિ`ખિત થઈ રહ્યા છે, એથી તે અતીવ સેાહામણા લાગી રહ્યો છે. (विद्धमाणिक्क सुत्त गविभूसियं मां भाषिभ्य भडित छे, सेवा सूत्र अश्वमुख भूषण विशेष- थी ? विभूषित छे. ( कणगामय पउमलुकयतिलकं ) उनप्रभय पद्मथी भेना मुख सुपर सारी रीतेति वामां आवे छे. (देवमहविकप्पियं ) देवी पोतानी युद्धनी माथी लेनी रचना हरी छे. (सुरवरिदवाहणजग्गा वयं सुरुवं दूइज्जमाण पंच चारु चामरामेलगं धरतं) सुरेन्द्र - इन्द्रन ने वाहनभूत अश्व छे, मेनुं नाम हुन्छः श्रवा - તેની જે ચેાગ્યા મંડળાકાર રૂપ ભ્રમણ- ગેાળાકાર ભ્રમણુ રૂપ ગમન- તે ગમનને એ પ્રાસ કરનાર છે. એટલે કે એ અશ્વની ચાલ ઇન્દ્રના અન્ય જેવી છે. એ અશ્વ અતીવ સુદર છે. સુંદર રૂપવાળા છે. પાંચ સ્થાનામાં-ગળામાં, ભાલમાં,મૌલિમાં અને અન્ને કાનેામા નિવે શિત હાલતા પાંચ સુંદર ચામરૈના મિલાપને જે મસ્તક ઉપર પારણુ કરે છે. અહી' મૂળમાં Page #763 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७४९ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सु. १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् गौडमतेन वा चामरा इत्यावन्तः शब्दः अथ देवमतिविकल्पितादि विशेषणविशिष्ट उच्चैःश्रवानाम शक्रहयोऽपि स्यादित्याह-'अणब्भवाई' अनभ्रवाहम्-अनभ्रचारि अभ्र वाहः अथवा अनभ्रवाहम् अभ्रे-आकाशे अनागामि इत्यर्थः इन्द्रतुरगस्तु अकाशमार्गगामी एतावान् भेदः इन्द्राश्वस्तदन्यम् 'अभेलणयणं' अभेलनयनम्-अभेले असंकुचिते नयने यस्य तत्तथा अतएव 'कोकासिअबहलपत्तळच्छं' कोकासिते विकसिते बहले दृढे अनश्रुपातित्वात पत्रले-पक्ष्मवती न तु ऐन्द्र लुप्तिकरोगवशाद्रोमरहित अक्षिणी यस्य तत्तथा 'सयावरणनवकणगतवियतवणिज्जतालुजीहासयं' सदावरणनवकनकतप्ततपनीयतालुजिहास्यम् तत्र सदावरणे शोभार्थ दंशमशकादिरक्षार्थ वा प्रच्छादनपटे नवकनकानि नव्यस्वर्णानि यस्य तत्तथा स्वर्णतन्तु स्यूत प्रच्छादनपटमित्यर्थः, तप्ततपनीयं तापित रक्तसुवर्णम् तद्वद् अरुण तालुजिहे यत्र तदेवंविधमास्यं मुखम् यस्य तत्तथा ततः पूर्व विशेषणेन कर्मधारयः पुनः कीदृशम् 'सिरिआभिसे अघोणं' श्रीकाभिषेकघोणम् तत्र श्रीकाया लक्ष्म्या अभिषेक अभिषेचनं नाम शरीरलक्षणं घोणायां नासिकायां यस्य तत्तथा 'पोक्खरपत्तमित्रसलिलबिंदुजुयं पुष्करपत्रमिव सलिलबिन्दुयुतम् यथा पुष्पकरषत्रं कमलपत्रं हो प्रसिद्धि है इसलिये कहा गया है। अथवा गौड के मतानुसार चामर शब्द आबन्त है इसलिये इसे यहां भाबन्त कहा गया है । ( अणभवाहं ) यह अश्वरत्न अनभ्रचारी था । इन्द्र का अतिप्रिय उच्चैःश्रवा नाम का घोड़ा म_चारी होता है। पर यह ऐसा नहीं था। (अमेलणयणं, कोकासियबहलपत्तलच्छं, सयावरणणवकणगतवियतवणिज्जतालुजीहासय ) इसकी दोनों आंखें असंकुचित थीं । अतएव वे विकसित थीं, बहल-दृढ़-थीं, और पत्रल- पक्ष्मवती थीं। दंशमशकादि के निवारण करने के लिये या शोभा के लिये इसके प्रच्छादन पट में नवीन स्वर्ण के तार गुंथे हुए थे। अर्थात् इसका जो प्रच्छादन पट था वह स्वर्ण के तंतुओं का बना हुआ था। तथा इसके मुख के तालु और जिह्वा ये दोनों तापितरक्त सुवर्ण की तरह अरुण थे । (सिरियाभिसे अघोणं ) लक्ष्मी के अभिषेक का शारीरिक लक्षण इसकी नासिका के उपर था। ચામર શબ્દને જે સ્ત્રીલિંગ વાચક કહેવામાં આવેલ છે, તે તત્કાલીન સમયમાં એની એવી જ પ્રસિદ્ધિ હતી, એથી આમ કહેવામાં આવેલ છે. અથવા ગૌડના મત પ્રમાણે ચામર શબ્દ मासन्त छ. मेथीमन ही मागत वामां मावा छे. (अणम्भवाह) मे શ્રેષ્ઠ અશ્વ અનબચારી હતે. ઈન્દ્રને ઉંચૌઃ શ્રવા નામક અવ અદ્મચારી હોય છે પરંતુ से 24 माशयारी नहत. अमेलणयण कोकासियबहलपत्तलच्छं, सयाधरणणषकणगतवियतवणिज्जतालुजीहासयं ) अनी मन्न पो सथित ती. मेथी ते वि સિત હતી. બહલ- દઢ હતી અને પત્રલ- પમવતી હતી. દંશ મશકાદિ ના નિવારણ માટે અથવા શોભા માટે એના પ્રચ્છાદન પટમાં નવીન સરના તારો ગ્રથિત હતા. એટલે કે જે પ્રચ્છાદન પટ હતું તે સ્વર્ણના તંતુઓથી નિર્મિત હતું. તેમજ એના સુખના તાલ અને लिखो भन्ने तापित २४त सुपानी भ म तi. (सिरियाभिसेमघोणं) सभीना मनिषेनु शारीक्षिोनी नxिt E५२ तुः (पोक्खरपत्तमिवसलिलबिंदुजयं) Page #764 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७५० जम्बूदीपप्रज्ञाप्तिसूत्रे जलान्तरस्थं वाताहतजलबिन्दुयुतं भवति तदेवमपि सलिलं पानीयं लावण्यमित्यर्थः तस्य बिन्दवः छटास्तैर्युतम् अत्र बिन्दुग्रहणेन प्रत्यङ्गं लावण्यं सूचितम् लोकेऽपि प्रसिद्धमेतत् मुखेऽस्य पानीयमिति 'अचंचलं' अचञ्चलम् स्वामिकार्ये स्थिरम् साधुवाहित्वात् 'चञ्चलसरीरं' चश्चलशरीरम् जातीस्वभावात् अथ यदि चञ्चलशरोरं तदाऽमेध्य आवित्र वस्तुष्वपि स्वाङ्गप्रवर्तकं स्यादित्याह-'चोक्ख चरगपरिव्यायगोविव हिलीयमाणं हिलोयमाणं' चोक्षचरकपरिव्राजक इव अभिलीयमानम् अभिलोयमानम् तत्र चोक्षः कृतस्नानादिना पवित्रः चरको-घाटिभिक्षाचरायः द्वित्रिः संघीभूतः सन् भिक्षा चरति स त्रिदण्डी संन्यासि विशेष इत्यर्थः एतादृशः यथा पवित्रः संघीभूतः भिक्षाचरपरिव्राजकः अशुचि संसर्गशङ्कया कुस्सितस्थानतः आत्मानं पृथक् करोति तथा इदमपि अश्वरत्नम् कुत्सितस्थानमार्ग परित्यजन् पवित्रस्थानसुगम्यमार्गमेवाबलम्बते इति भावः परिव्राजको मस्करी भिक्षुः ततश्वर कसहितः परिव्राजकः चरकपरिव्राजकः प्रथमा द्वितीयार्थे तेन चरकपरित्रा(पोक्खरपत्तमिव सलिलबिंदुजुयं ) जिस प्रकार कमल पत्र सलिलबिंदुओं से युक होता है । उसी प्रकार इसका प्रत्येक शरोरिक अवयव लावण्य की बिन्दुओं से-छटाओं युक था । सलिल शब्द से यहां अश्वरत्न के पक्ष से पानोय-लावण्य-गृहोत हुआ है। लोक में भी "अस्य मुखे पानोय' ऐसा व्यवहार होता देखा जाता है। (अचंचलं ) स्वामी के कार्य में यह चञ्चलता से रहित था स्थिरथा- (चंचलसरीरं) परन्तु जातीस्वभाव से ही यह शरीर में चञ्चलतावाला था (चोक्ख वरगपरिव्वायगोविव हिलोयमाणं २ खुरचलणचञ्चपुडेहिं धरणिअलं अभिहणमाणं २ दोविय चलणे जमगसमगं) जिस प्रकार चोखा स्नानादि से शुद्धशरीरवाला- चरक - संन्यासी • मस्करो अशुची पदार्थ के संसर्ग हो जाने की शंका से - अर्थात् अपवित्र पदार्थ का संसर्ग मुझे न हो जावे - इस तरह अपने को सुरक्षित रखता है कुत्सित स्थान से अपने को दूर रखता है उसी तरह यह अश्वरत्न भी उबड़ खाबड अथवा कुत्सित - अपवित्र - स्थानों को छोड़ता हुआ जो पवित्र स्थान और सुगम्य स्थानमार्ग होते हैं उन्हीं का अबलम्बन कर चलता है- चलते જેમ કમલપત્ર સલિલ બિંદુઓથી યુક્ત હોય છે તેમજ એના શરીરને દરેકે દરેક અવયવ લાવણયના બિંદુએથી- કણેથી યુક્ત હતે. સલિલ શબ્દથી અહીં અશ્વરત્નના પક્ષમાં पानीय- सा९य गडीत थयेछे. मां ५५ "अस्य मुखे पानीयं" . जतन व्यवहार वामां आवे छे. (अचंचलं) स्वाभान। अयमा थेnq यांयक्ष्य रहित ता, स्थि२ ते। (चंचलसरीरं) पति स्वमाया से मनु शरी२ यांयक्ष्य युक्त तु (चोख चरग परिव्वायगोविष हिलीयमाणं २ खुरचलणधच्चपुडेहिं धरणिअलं अभिक्षणमाणं २ दोषिय चलणे जमगममगं) २म यामा- स्नानाहिया शुद्ध शरीर वाणे- १२४- सन्यासी મશ્કરી અચિ પદાથના સંસર્ગની આશંકાથી એક અપવિત્ર પદાર્થના સંગ મને ન થાય આમ પોતાની જાતને સુરક્ષિત રાખે છે. કુત્સિત સ્થાનેથી પોતાની જાતને દૂર રાખે છે તેમજ એ અવરત્ન પણ ઉંચા-નીચા અથવા કુત્સિત– અપવિત્ર સ્થાને ત્યજીને જે પવિત્ર સપાન અને સુગમ સ્થાને માર્ગો હોય છે તે માર્ગોને અવલંબીને જ ચાલે છે. Page #765 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृण्वक्षस्कारः सु. १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७५१ जकमिव प्राकृतशैल्या अकार प्रश्लेषात् अभिलीयमानम् अभिलीयमानम्-अशुचिसंसर्गशकया आत्मानं संवृण्वत् संवृण्वत् संगोपयत् संगोपयत् तथा 'खुरचलणचच्चपुडेहिं धरणियलं अभिहयमाणं अभिहयमाणं' खुरचरणचच्चपुटै धरणितलम् अभिनदाभिघ्नत्, तत्र खुरप्रधानाचरणाः खुरचरणास्तेषां चच्चपुटाः आघातविशेषास्तै र्धरणितलम् अभिघ्नदभिन्नत् खुराभिघातविशेषैः पुरोवति भूमितलं क्षोभयत् क्षोभयत् तारयत् तारयत् इत्यर्थः उक्तं च 'यः खुरैः खनेत्पृथिवीमश्वो लोकोत्तरस्मृतः' इति योऽश्वः पृथिवों खनति स श्रेष्ठो अश्व उच्यते इत्यर्थः अश्ववारप्रयोगनतितो हि हयोऽग्रपादौ उदस्यति, तत्रास्यशक्ति विशेषणद्वारेण दर्शयति 'दो वि अचलणे जमगसमग मुहाओ विणिग्गमंतंव' द्वावपि च चरणों यमकसमकं युगपद् मुखाद्विनिर्गमदिव निस्सारयदिव अयमर्थः ? इदमश्वरत्नम् अग्रपादादूर्वा न यत्तथा मुखान्तिकं प्रापयति यथाजन उत्प्रेक्षते इमौ चरणौ मुखाद्विनिर्गमयतीति चोत्प्रेक्षा पुनः क्रियान्तरदर्शनेनैतद्विशिनष्टि 'सिग्घयाए मुलाणतन्तु उदगमविणिस्साए पक्कमंत' शीघ्रतया मृणालतन्तूदकेऽपि निश्राय प्रक्रामत्, तत्र शीघ्रतया लाघव विशेषेण मृणालं कमलनालं तस्या तन्तुः-सूत्राकारोऽवयवविशेषः सच उदकं च तेऽपि निश्राय अवलम्ब्य अन्यद् दुर्गादिकं प्रक्रामत् सश्चरत् अयमर्थः-यथा अन्येषां सञ्चरिष्णुनां जलचरादोनां मृणालतन्तूदके पादावष्टम्भकेन भवतः तथा नास्येति, सूत्रे चैकवसमय यह अपने खुर टापों - प्रधानता वाले - चरणों से - पैरों से - पुरोवर्ती भूमि को आघात युक्त करता ई अर्थात् - क्षुभित करता २ चाल चलता है उक्तंच - " यः खुरैः - स्वनेत्पृथिवीमश्वो लोकोत्तरः स्मृतः" जब यह अपने ऊपर सवार हुए पुरुष के द्वारा नचाया जाता है तब यह अपने आगे के दो पैरों को एक साथ ऊपर को उठाता है - सो उस समय ऐसा ही प्रतीत होता है कि मानों उसके ये दोनो पैर एक साथ ही (मुहाओ घिणिग्गमंतं व इसके मुख से निकल रहे हैं (सिधाए मुणालतंतु उदगमवि णिस्साए पक्कमंतं) इसकी गती इतनी अधिक लाघवविशेष से युक्त होती है कि मृणाल तन्तु और जल ये दोनों भी इसके चलने में सहाय मत हो जाते हैं तात्पर्य यही है कि यह थल की तरह जल के ऊपर भी अच्छितरह चल सकता है और कमल नाल के ऊपर भी सरलता से चल देता है न वह चलते समय पानी में डूबता है ચાલતાં-ચાલતાં એ પિતાના ખુરોથી પુરવતી ભૂમિને તાડિત કરતા-કરતે એટલે કે અમને क्षयरतो-४२ता यावे छे. तय-"यः खुरैः खनेत्पृथिवीमश्बो लोकोत्तरः स्मृतः" જ્યારે એ અશ્વ પિતાનો ઉ૫૨ અરૂઢ પુરુષ વડે નચાવવામાં આવે છે ત્યારે એ પોતાના આગળના બે પગેને એકી સાથે ઉપર ઉઠાવે છે તે તે વખતે આમ પ્રતીત થાય છે કે જાણે सेना ये अन्न पर ही साथ ॥ (गुहाओ विणिग्गमंतं व) मेन भुसभांथी नीजी न रहा डाय ! (सिग्याए मुणालतंतु उदगमविणिस्साए पक्कमंतं ) सनी गति मारी બધી લાઘવ વિશેષ યુક્ત હોય છે કે મૃણાલ તંતુ અને પાણુ એ બને પણ એની ચાલમાં સહાયભૂત થતા હતા. તાતપર્ય આ પ્રમાણે છે કે એ સ્થળની જેમ પાણી ઉપર પણ ચાલી શકતું હતું, અને કમળનાલની ઉપર પણ ચાલી શકતું હતું. તે ચાલતી વખતે Page #766 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे चनमात्वात्, तथा 'जाइ कुलरूवपच्चयपसत्यवारसावत्तगविसुद्धलक्खणं' जाति कुलरूपप्रत्ययप्रशस्त द्वादशावर्त्तविशुद्धलक्षणम् तत्र जातिः - मातृपक्षः कुलं पितृपक्षः रूपं सदाकारसंस्थानं तेषां प्रत्ययो विश्वासो येभ्यः ते च ते प्रशस्ताः प्रदक्षिणावहत्वात् शुभस्थानस्थितत्वाच्च ये द्वादशावर्त्ता देवमणिना नः चक्राकार गोलाकाराः चिह्नविशेषास्ते सन्ति यत्र तत्तथा बहुव्रीहिलक्षणः क प्रत्ययः, विशुद्धानि दोषावर्जितानि लक्षणानि अश्वशास्त्र प्रसिद्धानि यस्य तत्तथा ततः पदद्वयस्य कर्मधारयः, तत्र द्वादशावर्त्ताश्च इमे वराहोता: - ये प्रपाणगळकर्णसंस्थिताः, पृष्ठमघनयनो परिस्थिताः । ओष्ठ सविथ भुजकुक्षि पार्श्वगास्ते ललाटसहिताः सुशोभनाः ॥ १ ॥ प्रपाणम् १ गलः २ कर्णौ ३ पृष्ठम् ४ मध्यम् ५ नयने ६ ओष्ठो ७ सक्थिनी ८ भुजौ ९ कुक्षिः १० पार्थ्यो ११ ललाटम् १२ एतानि द्वादश स्थानानि तुरगस्य एतेषु स्थानेषु स्थिता अपि आवर्त्ताः द्वादशैव सुशोभनाः भवन्ति तथाहि - अत्र वृत्तिलेशः प्रपाणम् १ उत्तरोष्ठतलम् गलः २ कण्ठः यत्रस्थित आवर्त्ती देवमणि नामा हयानां महालक्षणतया प्रसिद्धः कर्णौ ३ प्रसिद्ध एतेषु स्थानेषु संस्थिताः तथा पृष्ठम् ४ पर्याणस्थानम् मध्यं ५ प्रसिद्धम् और न कमल नाल तन्तु उसकी गति से छिन्न भिन्न होते हैं। (जाइ कुलरूवपचचय पसत्थ बारसावत्तग विसुद्ध लक्खणं सुकुलप्पसूभं, मेहाविभद्दयविणीअं, अणुयतणुय सुकुमाललो भनिद्धच्छवि) जाति-मातृ पक्ष-कुलपिन्तृ पक्ष एवं रूप - सुन्दराकार संस्थान- इनका विश्वास जिनसे होता है ऐसे जो प्रशस्त द्वादश आवर्त हैं उनसे यह युक्त था तथा अश्व - शास्त्र प्रसिद्ध विशुद्ध लक्षणों से यह सहित होता है, एवं सुकुल प्रसूत था वराहोक द्वादश आवर्त्त इस प्रकार से हैं- ये प्रपाण गल - कर्ण संस्थिताः पृष्ठ - मध्य नयनो परिस्थिताः, अष्ट-सक्थि भुजकुक्षि पार्श्वगास्ते ललाट सहिताः सुशोभनाः ॥ १॥ प्रमाण - ऊपर के ओष्ठ के तल का नाम है, सो इस प्रपाण गल - कण्ठ के उपर जो आवर्त्त होता है उसका नाम देवमणि हैं और यह आवर्त अश्व के महान होने का लक्षण माना गया है इसी तरह दोनों कानों के ऊपर, पृष्ट भाग के ऊपरतथा पृष्ठ के मध्य में, दोनों પાણીમાં પણ ડૂબતા ન હતા અને કમળનાલ તતુ તેની ગતિથી છિન્નવિછિન્ન પણ થતા न होता. (जाइ कुलरूयपच्चयपसत्थ बारसावत्तग विसुअलक्खणं सुकुलप्पसूभं, मेहाविभदयविणीअं, अणुय तणुय सुकुमाल लोमनिच्छवि) लति – मातृपक्ष - 3, पितृपक्ष ने ३५સુદરાકાર સંસ્થાન—એ સર્વના જેમનાથી વિશ્વાસ થાય છે, એવા જે પ્રશસ્ત દ્વાદશ આવતાં છે તેમનાથી એ યુક્ત હતા, તેમજ અશ્વશાસ્ત્ર પ્રસિદ્ધ વિશુદ્ધ લક્ષણાથી એ સહિત હતા मने ये सुठुज-असूत हुतो. वराडे-त द्वादश भावतो या प्रमाणे -- ये प्रमाण गलकर्णसंस्थिताः पृष्ठ मध्य नयनोपरिस्थिताः । ओष्ठसक्थि भुजकुक्षि पार्श्वगास्ते ललाटसहिताः सुशोभनाः ॥१॥ પ્રપાણ——ઉપરના આòતલનું નામ છે. તે એ પ્રપાણ ગલ-કઠની ઉપર જે આવત ડાય છે, તેનુ' નામ દેવમણિ છે અને એ વત્ત અશ્વની શ્રેષ્ઠતા (મહત્તા)નું લક્ષણુ માનવામાં આવે છે. આ પ્રમાણે બન્ને કાનાની ઉપર પૃષ્ઠ ભાગની ઉપર તેમજ પૃષ્ઠના મધ્યમાં ७५२ Page #767 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७५३ नयने ६ अपि प्रसिद्धे तदुपरि स्थिताः तथा ओष्टौ ७ प्रसिद्धौ सक्थिनी ८ पाश्चात्यपादयोः जानूपरिभागः भुजौ ९ प्राक्पादयो जनपरिभागः कुक्षिः १० अत्र वाम दक्षिणकुक्ष्यावर्त्तस्य गर्हितत्वात् पाख ११ प्रसिद्धौ तद्गताः ललाटं १२ प्रसिद्धं तेन सहिताः अत्र कर्णनयनादि स्थानानां द्विसङ्ख्याकत्वेऽपि जात्यपेक्षया द्वादशैव स्थानानि स्थानभेदानुसारेण स्थानिभेदा अपि आवर्चाः द्वादशैवेति तत् तत्स्थानेषु स्थिताः सन्तः सुशोभनाः- सुभझणा भवन्ति, अन्यत्र स्थानेषु नेत्यर्थः तथा-'सुकुलयसू' सुकुलप्रसूतम् यशास्त्रोक्तक्षत्रियाश्वपि त्रिकम्, तथा 'मेहाविभद्दयविणी' मेवाविभद्रकविनतम् तत्र मेवावि बुद्धिमान् स्वामिपद संज्ञादि प्राप्तार्थधारकम् भद्रकम् अदुटम् विनीतं स्वाभीष्टकारित्वात् अत्र समाहारद्वन्द्वत्वात् एकवद्भावः, तथा 'अणु अणुअ सुकुमाललोम निद्धच्छवि' अणुकतनुकानाम् अतिसूक्ष्माणां सुकुमाराणां सुकोमarai atai स्निग्धश्लाघनीया छविः कान्ति यत्र तत्तथा पुनः कीदृशम् 'सुजायअमरमणपवणगरुळ जइणचवलसिग्घगामी' सुजातामरमनः पवनगरुडजयिचपलशीघ्रगामि' तत्र सुष्ठुयातं गमनं यस्य तत्तथा, अमरमनः पवनगरुडा : देवचित्तवायुगरुडाः प्रसिद्धाः तान् antara जयतीति अमरमन:पवनगरुडजयि, अतएव चपलशीघ्रगामि च अतिशीघ्रगतिकम् पश्चात्पदद्वयस्य कर्मधारयः, तथा कीराहम् 'इसिमिव खंतिखमए' ऋषिम आँखों के ऊपर, दोनों ओष्ठों के उपर, पीछे के दोनों पैरों के घुटना के ऊपर, आगे के पैरों के दोनों घटना के ऊपर, कुक्षि के ऊपर, दाई बाई ओर तथा ललाट के ऊपर ये आवर्त होते हैं । ये कर्णनयनादि १२ स्थान है इन पर ये १२ आवर्त्त चिह्न विशेष होते कहे गए हैं. यह अश्वरत्न मेधावि था स्वामी के पैर के संकेत से स्वामी के भाव को समझ जाने वाला था, भद्रक था. अदुष्ट था. विनीत था, अपने मालोक के इष्ट अर्थ का संपादक होने के कारण नम्र इसके शरीर के ऊपरजो रोमराजि थी- वहबहूत ही अधिक सूक्ष्म एवं सुकुमार भी - तथा स्निग्ध थी (सुजाय अमरमणपघणगरुलजइण चवलसिग्धगामी) यह बडोहि सुन्दर चाल चलता था तथा अपने वेग की अधिकता से यह अमर देव, मन, पवन और गरुड इनके गमन वेग को भी जीत लेने वाला था. इस तरह यह अत्यंत चपल और शीघ्रगामो था. (इमिमिव અને આંખેાની ઉપર, અન્ને એષ્ઠાની ઉપર, પાછળના બન્ને પગેાના ઘૂંટઙ્ગ ઉપર, આગળના પગાના ઘૂંટણ ઉપર, કુક્ષિની ઉપર, ડાબી અને જમણી તરફ તેમજ લલાટના ઉપર એ આવા હાય છે. એ કણ્નયન વગેરે ૧૨ સ્થાને છે. એ બધાંનો ઉપર એ ૧૨ આવત્તાં' ચિહ્ન વિશેષ હોય છે—એવુ કહેવામાં આવે છે. એ અશ્વરન મેધાવી હતા. સ્વામિના પગના સંકેત માત્રથી સ્વામીના ભાવને એ સમજી જતા હતા. એ ભદ્રક હતા, એ અદુષ્ટ હતા. એ વિનીત હતા. પેાતાના માલિકના ઈષ્ટ અને સમ્પાદક હોવાથી એમ હતા એ શરીરની ઉપર જે રામરાજિ હતી, તે ખૂબ જ સક્રમ અને સુકુમાર હતી. તેમ જ સ્નિગ્ધ हृती (सुजाय अमरमणपवनगरुलजइण चवल सिग्धगामि) से सुंदर यास यासतो तो પોતાના વેગની અધિકતાથી એ અમર-દેવ, મન, પવન અને ગરુડના ગમન વેગને પશુ તી Page #768 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७५४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे शान्तिक्षम कम् तत्र क्षान्त्या-क्रोधाभावेन न तु असामर्थ्येन क्षमा तया ऋषिमिव अनगा रमिव क्षमाप्रधानत्वात्तस्य न चरणैर्मर्दकं न च मुखेन दशकं न च पुच्छाघातकमितिभावः तथा 'मुसीसमिव पच्चक्खया विणीयं' सुशिष्यमिव प्रत्यक्षताविनीतम् तेन प्रत्यक्ष विनीतम् मुच्छात्रमिव पुनः कीदृशम् 'उदमहुतवहपासाण पंसुकद्दम मसक्करसवालुइल्लतडकडग विसमपब्भारगिरिदरीमुलंघणपिल्लणणित्थारणासमत्थं' उदकहुतवहपाषाणपांसुकईमसशर्करसवालुकतटकटकविषमप्राग्भारगिरिदरीषु लङ्कनप्रेरणनिस्तारणासमर्थम् तत्र उदकं जलम् अगाधनलम् हुतवहः अग्निः पाषाणः पांसुरेणुः कईमः-पङ्कः सशर्करं लघुपाषाणखण्डः युक्तं स्थानं सवालुक बहुलसिकताकणपुञ्जस्थानं तटं-नदीतटं कटकः पर्वतभामः विषमप्राग्भारकठोरकन्दराः गिरिदर्यः गिरिकन्दरा प्रसिद्धास्तामु सुलकनम् अनायासलंघनम् प्रेरणम्-आरूढस्य पुंसोऽभिमुखदर्शनधावनादिना संज्ञाकरणपूर्वकं प्रवर्त्तनं निस्तारणा तत्पारप्रापणा तत्र समर्थम् तथा 'अचंडपाडियं' अचण्डपातितम्, तत्र न चण्डै:-उग्रैः सुभटैः रणे पातितम् 'दंडपाति' दण्डपाति तत्र दण्डवत् खंसिस्वमए, सुसिसमिव पच्चक्खया विणीयं, उदग, हुतवह, पासाण, पंप्नु, कदम ससक्करसवालु इल्ल तडकडगविसमपब्यार गिरीदरीसु लंघण पिल्लण णित्थारणासमत्थं) क्रोध के अभावरूप क्षमा से वह ऋषि के जेसा था, यह किसी को लात नहीं मारता था और न मुख से किसी को काटता था. तथा पूंछ से किसी को चोट भी न पहुंचाता था. सुशिष्य की तरह यह प्रत्यक्षमें विनीत था “पच्चक्खया" मैं जो प्रत्यक्षता विनीतं" छाया करने पर ता किया गया है वह प्राकृतशैली को लेकर किया गया है. उदक - जल - हुतवह अग्नी, - पाषाण पत्थर, पासु रेणु, कर्दम-कीचड़, लघुपल खंड सहित स्थान, बहुत अधिक रेती ला मैदान, तट- नदीतट- कटक-गिरिनितम्ब, विषम प्राग्भार वाले ऊँचे नीचे स्थान, गिरीकन्दरा, इन सब प्रदेशों का अनायास लङ्घन करना अपने ऊपर बैठे हुए मनुष्य की प्रेरणा के अनुसार उन २ स्थानों पर पहुँचाना, उन्हें पार करना इत्यादि क्रियाओं में यह समर्थ था (अचंडपाडियंसतात. भामरे य५५ भने शीतगामी ता. (इसिमिव खतिखमए, सुसिसमिव, पच्चक्खया विणीयं, उदग,हुतवह, पासाण, पंसु, कद्दम ससक्करसवालुइल्लतडकडग विसम पम्भारगिरिदरीसु लंघणपिल्लणणित्थारणासमत्थं ) अधना समाव३५ क्षमाथी थे અશ્વિવત્ હતું. એ કેઈને પણ લાત નહિ મારતે હતો અને મુખથી પણ કોઈને કરડતો ન હતું. તેમ જ પૂછથી પણ કેઈને એ મારતો ન હતો. સુશિષ્યની જેમ એ પ્રત્યક્ષમાં विनीत तो. “पच्चक्खया" मा “प्रत्यक्षता विनीत" छाया ४२वाथी 'ता' प्रत्यय - ડવામાં આવેલ છે. તે પ્રાકૃતશૈલીના આધારે કરવામાં આવેલ છે. ઉદક-પાણી, હુતવહ–અગ્નિ પાષાણુ-પત્થર, પાંસુ–૨, કર્દમ-કાદવ, લઘુપલ ખંડ સહિત સ્થાન, બહુ જ અધિક રેતાળ महान, तर-नही तट,४८४-नितम, विषम प्रामारवाणुयु-नीस्थान, (२४.४२१, એ સર્વે પ્રદેશોને અનાયાસ ઓળંગવા અને પિતાની ઉપર સવાર થયેલ માણુની પ્રેરણા મુજબ તે સ્થાન સુધી પહોંચવું તે સ્થાને પાર કરવા વગેરે ક્રિયાઓમાં એ અશ્વ સમર્થ Page #769 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तु. वक्षस्कारः सु. १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७५५ पति इत्येवं शीलं दण्डपाति अतर्कितमेव पतिपक्षस्कन्धाबारे पतनशीलम् अनेनास्योस्पतनस्वभावोऽपि सूचितः, तथा 'अणंसुपातिं' अनश्रुपाति तत्र मार्गादि चलनजनितश्रमेषु नाश्रुपातयतीत्येवं शीलम् अनश्रुपाति तथा 'अकालतालुं च' अकालतालुअश्यामतालुकम् श्यामतालुवर्जितं पूर्व रक्ततालुत्वे वर्णितेऽपि यत्पुनकालतालु इति विशेषणं तत्तालुनः श्यामत्वम् अतितरामपलक्षमिति तन्निषेधख्यापनार्थम् च समुच्चये तथा 'कालहेसि' कालहेषि, तत्र काले अराजकानां राजनिर्णयार्थके अधिवासनादिके समये हेपते-शब्दयतोत्येवं शीलं कालहेषि अशुभसमयसूचकं तथा 'जिअनिई गवेसगं' जितनिद्रं गवेषकम् तत्र जितनिद्रा आलस्यं येन तत् जितनिद्रं त्यक्तालस्य मित्यर्थः आलस्य जितम् कार्येषु अप्रमादित्वात् यथा श्रुतार्थे व्याख्यायमाने हयशास्त्रविरोधः दंडपाति अणंसुपाति अकालतालुच कालहेसि जियनिदं गवेसगं) यह अचन्ड पाती-था दण्डपाती था तात्पर्य यही है कि यह विनाविचारे ही प्रतिपक्ष को सेना में दण्ड को तरहआक्रमण करने के स्वभाव बाला था। यहअनुश्रपाती था दुर्दान्त शत्रु सेना को भी देखकर यह कभी आँसु नहीं वहाता था अथवा मार्गादि चलन जन्य श्रम के वशवत्ती हुमा यह कभी घबडाहट से अपनी आँखों से आंसु नहीं निकालता था इसका तालु कृष्णता से वर्जित था समयानुसार ही यह हिनहिनाहट करता था असमय में नहीं अथवा काल में अराजको के राजनिर्णयार्थक अधिवासनादिक के समय में यह अशुभ का सूचक शब्द किया करता था (नियनिदं गवेसगं) यह निद्राविजित नहीं था किन्तु इसने ही निद्रा को आलस्य को अपने वश में कर लिया था । अर्थात् यह आलस्य रहित था-और गवेषक था। मूत्र पुरीष के उत्सर्ग के समय में यह उचित और अनुचित स्थान की खोज करने वाला था "जितनिदं" का अर्थ इसने निद्रा जीत ली थी-अर्थात् इसे निद्रा नहीं आती थी ऐसा हो अर्थ मान लिया जावे तो फिर “सदैव निद्रावशगा, निद्राच्छेदस्य संभवः, जायते संगरे प्राप्ते कर्करस्य च भक्षणे" shi. (अचंडपाडियं दंडपाति अणंसुपातिं अकाल तालु च कालहेसि जियनिहं गवेसर्ग) से અચંડપાતી હત-દંડપાતી હતા, એટલે કે એ વગર વિચાર કર્યો જ પ્રતિપક્ષીની સેના ઉપર દંડની જેમ આક્રમણ કરવાના સ્વભાવવાળો હતો એ અનન્નુપાતી હત. દુત શત્રસેનાને જોઈને પણ એ કદાપિ ૨૩ ન હતો. અથવા માર્ગાદિચલન જન્ય શ્રમથી પીડિત થઈને એ કદાપિ વ્યાકુળ થઈને ૨૭ ન હતું. એને તાલુભાગ કૃષ્ણતાથી વર્જિત હતે. એ સમયાનુસાર જ હણહણાટ કરતો હતો. એટલે કે અસમયમાં એ હણ હણાહટ નહિ કરતે હતે. અથવા કાલમાં અરાજકોના રાજનિર્ણયાર્થીક અધિવાસનાદિકના સમયમાં એ અશુભ सूय५५६ ४२ते। . (जियनिदं गवेसगं) से निद्रावित नहाती. मेणे निदान આલસ્યને પિતાના વશમાં કરી લીધાં હતાં. એટલે કે આલસ્યાદિ રહિત હતે. એ ગષક હતા. માત્ર પરીષના ઉત્સર્ગ સમયે એ ઉચિત અને અનુચિત સ્થાનની શોધ કરનાર હતા. ‘जितनिद्रन अथ निद्रा ती सीधी ती भेटवे मान निद्रा नल भारती હતી, એ જ અર્થ માની લેવામાં આવે તે– Page #770 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तथाहि-'सदैव निद्रावशगा, निद्राच्छेदस्य सम्भवः । जायते सगरे प्राप्ते, कर्करस्य भक्षणे ॥१॥ इति, __यद्वा जितनिद्रत्वं रणावपरप्राप्तत्वाद् अश्वरत्नत्वेनाल्पनिद्राकत्वाच्च, तथागवेपकं-मूत्रपुरोषोत्सर्गादो उचितानुचितस्थनान्वेषकम् तथा 'जिअपरिसंह' जितपरीषहं तातपायातुरत्वेषकम् तथा जिपरिसह' शीतातपाघातुरत्वेऽपि अखिन्नम् रणागणे शत्रपीडिsॉप खिन्नतावर्जितम् तथा 'जच्चजातीअं जात्यजातीयम् तत्र जात्या प्रधाना मातृ शस्तत्र भवं जात्यजातीयम् निर्दोषमातृकमित्यर्थः, निर्दोषपितकत्वं तु प्रागुक्तमेव, ईगुणयुकाहि अश्वः समये स्वामिने न द्रुह्यति तथा 'मल्लिहाणिं' मल्लिघ्राणेम् तत्र मरिक विचकिलकुसुमं तद्वच्छभ्रम् धवलमित्यर्थः ये लेष्मवर्जितं दुर्गन्धिवर्जितअश्लेधमत्वेनानाविलमपूतिगन्धि च घ्राणं-- प्रोयो यस्य तत्सथा, इकारः प्राकृत शैलीभवः तथा 'मुगपत्तमुवण्णकोमलं' शुकपत्रमुवर्णकोमलम्, तत्र शुकपत्रवत् शुकपिच्छवत् सुष्टु वर्गों यम्य तत्तया, कोमलं च कायेन, ततः पदद्वयस्य कर्मधारयः, तथा 'मणोभिरामं' मनोऽभिगमम् अतिसुन्दरम् तथा 'कमलामेलं णामेणं आसरयणं सेणावह कमेण समभिरूडे' कमनामेलं नाम्ना अश्वरत्नं सेनापतिः क्रमेण समभिरूढः आरूढः इति पूर्ववद् व्याख्येपम् इति । ततः सेनापतिः सुषेणः किं कृतवान् इत्याह-'कुवलय' इत्यादि सम्प्रति खड्गरत्नस्वरूपम् वर्णयति 'कुवलयदलसामलं च' कुवलयदलश्यामलम् नीलोत्पलदकसहशम् इस हय शास्त्र से विरोध आता है । अथवा जितनिद्रत्व का भाव ऐसा भी हो सकता है, कि समर के अवसर को प्राप्ति के समय में अश्वरत्न होने से यह अल्पनिद्रा लेता था । ( जित परिसहे ) शोत आतप आदि जन्य क्लेशों को यह कुछ भी नहीं गिनता था, (जच्चजातीयं) मह शुद्ध मातृपक्षका था (मल्लिहाणिसुगपत्तसुवण्णकोमलं मणोभिाम) मोघरे के पुष्प के जैसे इसकी नाक थी । अर्थात् लेष्मा नाक के मैल आदि से विहीन थी शुक के पंखे के जैसा इसका मुहावन वर्ण था और यह शरीर से कोमल था तथा मनोऽभिराम-अति सुन्दर था - ऐसे (कमलामेलं णामेणं आसरयणं सेणावइ कमेण समभिरूढे) कमलामेलक नाम के अश्वरत्न पर मुपेण सेनापति मारूढ हुआ । सदेवनिद्रापशगा निद्राच्छेदस्य संभवः । जायते संगरे प्राप्ते कर्करस्य च भक्षणे ॥ આમ એ હયશાસ્ત્રથી વિરુદ્ધ દેખાય છે. અથવા જિતનિદ્રવ ભાવ એ પણ સંભવી શકે કે સમર ના અવસરની પ્રાપ્તિના સમયમાં અધરન હોવાથી એ અનિદ્રા લેતો હતે. (लित परिसहे) शीत, मात५ वगेरे कान्य ४वेशान थे तुछ समरत न. (जरुच जातीय) से शुद्ध मातृपक्षने। ता. (मल्लिहाणि सुगपत्त सुवण्णकोमलं मणोभिराम) મોગરાના ૫૫ જેવી એની નાસિકા હતી. એટલે કે મા-નાકના મલ આદિથી એની નામિકા શહિત હતી. શુક્રના પાંખ જે એને સહામ વર્ણ હતો. એ શરીરથી સુકેમળ હતે- તેમજ ने भनाभिराम अट मति २ ता. मेवा (कमलामेलं णामेणं आस रयणं सेणावड कमेण समभिरूढे) मा नाम अयरल ५२ ते सुषेण सेनापति सवार थये। Murramme : Page #771 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. वक्षस्कारः सू० १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७५७ च समुच्चये 'रयणिकरमंडलनिभं' रजनिकरमण्डलनिभम्, तत्र रजनिकरमण्डलं - चन्द्रविम्बं तस्य निभं- सदृशं तुल्यम् परिभ्राम्यमाणं यद्वतुलित तेजस्कत्वेन चन्द्रमण्डलाकारं दृश्यते इत्यर्थः, तथा 'सत्तुजणविणासणं' शत्रुजनविनाशनम् रिपुजनविघातकम्, पुनः कीरशम् 'कणगरयणदंडं' कनकरत्नदण्डम्, कनकल्नमयो दण्डो- हस्तग्रहणयोग्यो मुष्टिर्यस्य तत्तथा, तथा 'णवमालिअपुप्फसुरहि गंधि', नवमालिकापुष्पसुरभिगन्धिं तत्र नवमालिकानामकं यत्पुष्पं तद्वत् सुरभिगन्धो यस्य तत्तथा, तथा 'णाणामणिलयत्तिचित्तं च' नानामणिलता भक्तिचित्रम, तत्र नानामणिमय्यो लतावल्ल्याकारचित्राणि तासां भक्तयो - विविधरचनास्ताभिः चित्रम् आश्चर्यकृत्, च विशेषणमुमुच्चये, तथा 'पहोत मिसिमिसिंततिक्खधारं' प्रघौतमिसिमिसेंत तीक्ष्णधारम् तत्र प्रधौता शाणोत्कशनेन निष्किट्टोकृता अतएव 'मिसिमिसेंतत्ति' दीप्यमाना तीक्ष्णा धारा यस्य तत्तथा एतादृशं विशेषणविशिष्टम् 'दिव्वं खग्गरयणं' दिव्यं खगरत्नम् खनजातिप्रधानम् उत्तमखङ्गम् 'लोगे अणोवमाणं' लोकेऽनु खारत्न का वर्णन-( कुवलयदलसमलं स्यणि करमंडलनिभं ) घोड़ा पर सवार होकर सुषेण सेनापति नरपति के हाथ से असिरत्न को लेकर जहां पर आपातकिरात थे वहां पर आया ऐसा यहां पर सम्बन्ध लगा लेना चाहिए-जिस असिरत्न को सुषेण सेनापति ने नरपति के हाथ से लिया वह असिरत्न नीलोत्पलके दलके जैसा श्यामलथा तथा जब वह घुमाया जाता था तो अपने अतुलित तेज से उसका आकार चन्द्रमण्डल के जैसा हो जाता था ( सत्तुजणविणासणं) यह असिरत्नशत्रुजन का विघात करने वाला था। (कणगरयणदंड) इसकी मूठ कनकरत्नकी बनी हुई थी (णवमालियपुप्फसुरहि गंधो) नवमालिकापुप्प के ऐसी इसकी दुरभी गन्ध थी ( णाणामणिलयभत्तिचित्तं च ) इसके अनेक मणियों से निर्मित लताओं के चित्र बने हुए थे। उनसे यह आश्चर्य चकित कर देता था ( पहोत मिसिमिसितं तिक्वधारं) इसकी धार शाण पर चढाई जाने के कारण वहुत हो तोक्ष्ण थो और चमचमाती थी । क्योकि शाण की रगड से किट्टिमा उतर गई थी ! ऐसा ( दिव्वं खग्गरयणं ) वह दिन्य मसिरत्न था ( लोगे ખગરત્નનું વર્ણન (कुवलयदलसामलं रयणिकरमंडलनिभ) । १५२ सवार य ने सुषेय सेनापति નિરપતિના હાથમાંથી અસિરયનને લઈને જ્યાં આપાતકિરાતે હતા ત્યાં આવ્યે. અત્રે એવો સંબંધ જાણી લેવો જોઈએ. જે અસિરનને સુષે સેનાપતિએ નરપતિના હાથમાંથી લીધું તે અસિરને નીલેમ્પલદલના જેવું શ્યામ હતું તેમજ જ્યારે તે ફેરવવામાં આવત त्यापताना तिपय दमन र म anतु तु.(सत्तुजणविणासणं) ये मसिन शत्रु नानु विधात तु. (कणगरयणदंड) अनी भु ४४२लना नबी हती. (णवमालियपुप्फसुरहिगंधि) नवमदिatil पु०५२वी सी-सुरभिसुवास सती. (णाणामणिलयभत्तिचित्त च) मा अने५ मारमाथी निमित बताना (पत्र बनतो . अथा ये सव मांश्चय यति ४२तु तु. (पहोत भिसिभिसितं तिक्खપા) એની ધાર શાણ ઉપર તેજ કરવામાં આવી હતી એથી એ ઘણી તીણ અને महार ता. भोशनी २४थी (हिमा साथ ती. मे (दिव्वं स्नग्गरयणं) Page #772 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७५८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पमानम् उपमावर्जितम् अन्यसरशत्वाभावात् 'तं च पुणो' तच्च पुनर्बहुगुणमस्तीति शेषः कीदृशम् ! 'वंसरुक्खसिंगहिदंतकालायस विपुललोहदंडकवरवइरभेदकं' वंशवृक्षशृङ्गास्थिदन्तकालायस विपुललोहदण्डकवरवज्रभेदकम्, तत्र वंशाः प्रसिद्धाः रुक्षाः- वृक्षाः शृङ्गाणि महिषादीनाम् अस्थीनि प्रसिद्धानि दन्ताः हस्त्यादीनां कालायसं लोहं विपुललोहदण्डकश्च वरवज्र होरकजातीयं तेषां मेदकम् अत्र वज्रकथनेन दुर्भेद्यानामपि भेदकत्वमुक्तम् किंबहुना ? 'जाव सम्वत्थ अप्पडिहयं' यावत्सर्वत्राप्रतिहतम् दुर्भदेऽपि वस्तुनि अमोघशक्तिकमित्यर्थः किं पुण देहेसु जंगमाणं किं पुनजङ्गमानां चराणां पशुमनुष्यादीनां देहेषु, अत्र यावच्छन्दो न सङ्ग्राहकः किन्तु भेदकशक्ति प्रकर्पोक्तयेऽवधि सूचनार्थम् अथ तस्य मानमाह- 'पण्णासंगुलदीहो सोलससे अंगुलाई विच्छिण्णो' पञ्चाशदङ्गुलानि दीर्थों यः षोडशाङ्गुलानि विस्तीर्णः तथा 'अद्धंगुलसोणीको' अ गुलश्रोणिकः तत्र मणोवमाण ) संसार में यह अनुमेय माना गया हैं । क्योंकि इसके जैसे और कोई पदार्थ नहीं है (तंच पुणो वंसरुक्खसिंगट्टि दंतकालायस विपुल लोहदंड कवरवइरभेद)यह वंश-वांस, रुक्खवृक्ष-शृंग-महिषादिको के सींग, हड्डियां, हाथो आदिकोंके दांत, कालायस इस्पात जैसा लोहा, और वर वज्र इन सब को भेद देता है। वज्र के कथन से यहां यह प्रगट किया गया है कि यह दुर्मेध पदार्थों का भी भेदक होता है । और तो क्या-(जाव सव्वत्थ अप्पहिहयं) यावत् यह सर्वत्र अप्रतिहत होता हैं। इस दुर्भेष वस्तु के भेद में भी इसकी शक्ति जब अमोघ होती है तो (किंपुण देहेसु जंगमाणं) फिर जंगम जोवों के देह के विदारण करने में तो इसको बात हो क्या कहनी यह तो उन्हें खेत की मूली की तरह हो काट देता है। यहां यावत्पद संग्राहक नहीं है किन्तु मेदक शक्ति को प्रकर्षता की अवधि का सूचक है। (पण्णासंगुलदोहो सोलस अंगुलाई विच्छिण्णो) यह असिरत्न ५० पचास अंगुल को लम्बा होता है और १६ सोलह अंगुल का चौड़ा होता है । ( अद्धंगुलसेणीको) तथा आधे अंगुल की aहिन्य असिन तु. (लोगे अणोवमाण) संसारमा से अनुपमेय मानवामा मावत छम सेना वा अन्य पार्थ छ । नहि. (तं च पुणो वसरुखसिंगट्टिदंत कालायसविपुललोहदंडकवरवहरभेदक) मे वश-पांस, ३४५-वृक्ष, श्रृंग-महिपाहिहाना શિંગ, અસ્થિ-હાથી વગેરેના દાંત, કાલાયસ-ઈસ્માત જેવું લેખંડ અને વરવા એ સન ભેદન કરે છે. વાના કથનથી એ આ વાત સ્પષ્ટ કરવામાં આવી છે કે એ દર્ભેદ્ય पहायान ५ दश छे. भने भातशु (जाव सव्वत्थ अप्पडिहयं) यावत् से सत्र અપ્રતિહત હોય છે. આ પ્રમાણે દુર્ભે વસ્તુના ભેદનમાં પણ એની શક્તિ જ્યારે અમેઘ डाय छत (किं पुण देहेसु जंगमाणं) पछी गम ना हेडन विही पाम तो વાત જ શી કહેવી. એ તે તેમને સહેજમાંજ કાપી નાખે છે અહીં યાવત પદ્ધ સંગ્રાહક नयी ५AR शतिनी तानी अवधि सूयवे छे. (पण्णासंगुलदीहो सोलसअंगुलाई विच्छिण्णो) मे असिरत्न ५० ५यास भya iभु य छे. अने ११ मन पाहाय छ (अद्धगुठसेणोका) तथा अर्धा की गनी MM 34 छ (जेट्ट Page #773 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० १८ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७५९ अर्द्धाङ्गुलप्रमाणा श्रोणिः बाहल्यं पिण्डो यस्य स तथा, तथा 'जेटुप्पमाणो असी भणिओ' ज्येष्ठप्रमाणोऽसिर्भणितः तत्र ज्येष्ठम् - उत्कृष्टं प्रमाणं यस्य स तथा एवंविधः सोऽसि - भणितः कथितः 'असिरयणं णरवइस्स इत्थाओतं गहिऊण जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवागच्छ' उक्त विशेषणविशिष्टम् तत् असिरत्नं सेनापतिः सुषेणो नरपतेः हस्तात् गृहीत्वा यत्रैव आपातकिराताः तत्रैवोपागच्छति, अस्योत्तरवाक्यस्थ योजना तु प्रागेव कृता 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'आवार्डाचिलाएहिं सद्धिं संपलग्गे यावि होत्था' आपातकिरातैः सार्द्धं संप्रलग्नाश्राप्यभवत् योद्धमिति शेषः, अथ सेनापतेरायोधनादनन्तरं किं जातमित्याह - 'तरणं' इत्यादि 'तरणं से सुसेणे सेणावई ते आवाड चिलाए हयमहिय परवीरघाइअ जाव दिसोदिसिं पडिसेहेर' ततः- आयोधनादनन्तरं युद्धानन्तरम् स सुषेणः सेनापतिः तान् आपातकिरातान् इतमथितप्रवरवीरघातित यावत्पदात् 'विहडिअ चिवद्धय पडागे किच्छप्पाणोवगए' इति ग्राह्यम् दिशोदिशि प्रतिषेधयति अस्य व्याख्या प्रागेव स्पष्टीकृता ॥ सू० १८ || इसकी मोटाई होती हैं । (जेटुप्पमाणो असी भणिओ) इस प्रकार का यह प्रमाण उत्कृष्ट रूप असि-तलवार का कहा गया है । ऐसे (असिरयणं णरवइस्स हत्थाओ तं गहिऊण जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवागच्छइ ) असिरत्न को नरपति के हाथ से लेकर वह सुषेण सेनापति जहां पर आपात किरात थे, वहां पर गया ऐसे इस उत्तर वाक्य की योजना हमने पहिले ही प्रगट कर दी है ( उवागच्छित्ता आवाडचिलाएहिं सद्धिं संपलग्गो याविहोत्था ) वहां पर जाकर आपातकिरातों के साथ उसका युद्ध छिड़ गया ( तरणं सुसेणे सेणावई ते आवाडचिलाए हयमहियपवरवीरघाइअ जाव दिसो दिसिं पडिसेहेइ) युद्ध छिड जाने के बाद उस सुषेण सेनापति ने उन आपातकिरातों को कि जिनके अनेक प्रवर वीर योद्धा जन हतमथित एवं घातित हो चुके हैं तथा जिनकी गरुड आदि चिह्न वाली वजाएँ और पताकाए जमीन के उपर गिर चुकी है । और जिह्नों ने बड़ी मुश्किल से अपने प्राणों को बचा पाया है । एक दिशा से दूसरी दिशा में भगा दिया - इधर उधर खदेड़ दिया ॥ १८ ॥ माणो असी भणिओ) या प्रमाणे थे प्रभाणु उत्सृष्ट ३५थी असि-तसवारत्नना समधमां वामां आवे छे. मेवा (असिरयणं णरवइस्स हत्थाओ तं गहिऊण जेणेव आवाड चिलाया तेणेव उरागच्छ) मे मसिनने नश्यतिना हाथमांथी सहने ते सुषेषु सेनापति જ્યાં આપાત કરાતા હતા ત્યાં ગયા. આ પ્રમાણે અમે પહેલા સ્પષ્ટ કર્યુ ४ छे. (उवागच्छित्ता आवाडविलापहि सद्धिं संपलग्गो यावि होत्या) त्यांने तेथे भाषात हिरात साथै युद्धना आरंभ थे. (तपणं से सुसेणे सेणावई ते आवाड चिलाए इयमहियपवरवीरघाइअ जाव दिसो दिसिं पडिसेहेइ) युद्ध भारंभ थया माह ते सुषेय સેનાપતિએ તે આપાત કિરાતાને-કે જેમના અનેક પ્રવરવીર ચાદ્ધાએ હત-મથિત અને શ્વાતિત થઈ ગયા છે, તેમજ જેમની ગરુડ વગેરેના ચિહ્નવાળી ધ્વજાએ અને પતાકાથ્થી પૃથ્વી ઉપર પડી ગયા છે અને જેમણે બહુ જ મુશ્કેલીથી પેાતાના પ્રાણૈાની સ્વરક્ષા કરી છે-એક દિશામાંથી બીજી ક્રિશામાં નસાડી મૂકયા-આમ-તેમ તગડી મૂક્યા, । સૂત્ર ૧૮ ૫ Page #774 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७६० जम्बूद्वीपप्राप्तिने ... अथ ते किं कुर्वन्तीत्याह ...-'तएणं ते इत्यादि मुलम्-तएणं ते आवाडचिलाया सुसेण सेनावइणा हयमहिया जाव पडिसेहिया समाणा भीआ तत्था वेहिआ उबिग्गा संजायभया अत्थामा अबला अवीरिआ अपुरिसक्कारपरक्कमा अधारणिज्जमिति कटु अणेगाई जोअणाई अवक्कमंति, अवक्कमित्ता एगयओ मिलायंति, मिलाइत्ता जेणेव सिंधू महानई तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता वालुआ संथारए संथरेंति, संथरित्ता वालुओ संथारण दुरुहंति दुरुहित्ता अट्ठमभत्ताई पगिण्हंति पगिण्हित्ता वालुआ संथारोवगया उत्ताणगा अट्ठमभत्तिा जे तेसिं कुलदेवया मेहमुहाणामं गागकुमारा देवा ते मणसी करेमाणा करेमाणा चिट्ठति । तएणं तेसिमावाडचिलायाणं अट्ठम भत्तसि परिणममाणंसि मेहमुहाणं णागकुमाराणं देवाणं आसणाई चलंति, तएणं ते मेहमुहा णागकुमारा देवा आसणाई चलिआई पासंति पसित्ता ओहिं पउंजंति पउंजित्ता आवाडचिलाए ओहिणा आभोएंति अभोइत्ता अण्णमण्णं सदावेति सदावित्ता एवं क्यासी एवं खलु देवाणुप्पिआ ! जंबुद्दीवे दीवे उत्तरद्ध भरहे वासे आवाडचिलाया सिंधूए महाणईए नालुआ संथारोवगया उत्ताणगा अवसणा अट्ठमभत्तिआ अम्हे कुलदेवए मेहमुहे णागकुमारे देवे मणसी करेमाणा करेमाणा चिट्ठति, तं सेअंखलु देवाणुप्पिआ! अम्हं आवडचिलायाणं अंतिए पाउभवित्तए त्तिक? अण्णमणस्स अंतिए एअमटुं पडिसुणेति पडिसुणेत्ता ताए उक्किट्ठाए तुरिआए जाव वीतिवयमाणा वीतिवयमाणा जेणेव जंबुद्दीवेदीवेउत्तरद्धभरहे वासे जेणेव सिंधू महाणई जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवागच्छंति,उवोगच्छित्ता अंतलिक्खपडिवण्णा सखिखिणिआई पंच वण्णाइं पवरपरिहिआ ते आवाडचिलाए एवं वयासी-हंभो आवाडचिलाया ! जण्णं तुम्मे देवाणुप्पिओ ! वालुआ संथारोवगया उत्ताणगा अवसणा अट्ठमभतिआ अम्हे कुलदेवए मेहमुहे जोगकुमारे देवे मणसी करेमाणा करेमाणा चिट्टह Page #775 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रशिका टीका ४० वक्षस्कारः सू० १९ आपातचिलायानां देवोपासनादिकम् ७६१ तएणं अम्हे मेहमुहो णागकुमरा देवा तुब्भं कुलदेवया तुम्हं अंति अण्णे पाउन्भूआ तं वदह णं देवाणुप्पिआ ! किं करेमो केव मे मणसाइए तएणं ते आवाडचिलाया मेहमुहाणं णागकुमाराणं देवाणं अंतिए एअमटुं सोचा णिसम्म हट्टतुट्ठचित्तमाणंदिआ जाव हिअआ उठाए उद्वेन्ति, उतॄत्ता जेणेव मेहमुहा णागकुमारा देवा तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं जाव मत्थए अंजलि कटु मेहमुह णागकुमारे देवे जएणं विजएणं वद्धाति वद्धावित्ता एवं वयासी-एसणं देवाणुप्पिए ! केइ अपत्थिअपत्थए दुरंतपंतलक्खणे जाव हिरिसिरिपरिवज्जिए जेणं अम्हं विसयस्स उवरिं वीरिएणं हव्वमागच्छइ, तं तहा णं घत्तेह देवाणुप्पिआ ! जहा णं एस अम्हं विसयस्स उवरि वीरिएणं णो हव्वमागच्छइ, तएणं ते मेहमुहा णागकुमारा देवा ते आवाडचिलाए एवं वयासी-एस णं भो देवाणुप्पिआ ! भरहे णामं राया चाउरंतचक्कवट्टी महिदीए जाव महासोक्खे,णो खलु एस सक्को केणइ देवेण वा दाणवेण वा किण्णरेण वा किंपुरिसेण वा महोरगेण वा गंधवेण वा सत्थप्पओगेण वा अग्गिप्पओगेण वा मंतप्पओगेण वा उद्दवित्तए पडिसेहित्तए वा, तहाविअ णं तुब्भं पिअट्ठयाए भरहस्स रण्णो उवसग्गं करेमो तिकटु तेसिं आवाडचिलायाणं अंतिआओ अवक्कमंति, अबक्कमिला वेउविअ समुग्घाएणं समोहर्णति. सम्मोहणित्ता मेहाणी विउब्वंति विउव्वित्ता जेणेव भरहस्स रण्णो विजयखंधावारणिवेसे तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता उप्पि विजयक्खंधावारणिवेसस्स खिषामेव पतणुतणायंति. खिप्पाभेव विज्जुयायंति. विज्जुयाइता खिप्पामेव जुगमुसलमुट्टिप्पमाणमेत्ताहिं धाराहिं ओघमेषं सत्तरत्तं वासं वासिउं पवत्ता यावि होत्था ॥सू० १९॥ छाया-ततः खलु ते आपातकिराताः सुषेण सेनापतिना हतमथिताः यावत्प्रतिषेधिताः सन्तो भीताः त्रस्ताः यथिताः उद्विग्नाः सजातभयाः अस्थामानः अबलाः भवीर्याः अपुरुषकारपराकमाः अधारणीयमिति कृत्वा अनेकामि योजनानि अपक्रान्ति, अपक्रम्य एकतो Page #776 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मिलन्ति मिलित्वा यत्रैव सिन्धु महानदी तत्रैवोपागच्छति उपागत्य वालुकासंस्तारकान् संस्तुणन्ति संस्तीर्य घालुकासंस्तारकान् दुरूहन्ति, दुरूह्य अष्टमभक्तानि प्रगृलन्ति, प्रगृह्य वालुका संस्तारोपगताः उत्सामकाः अवसनाः अष्टभक्तिकाः ये तेषां कुलदेवताः मेघमुखाः नाम्ना मागकुमागः देवास्तान् मनसि कुर्वन्त स्तिष्ठन्ति । ततः खलु तेषाम् आपातकिरातानाम् भष्टमभक्ते परिणमति सति मेघमुखानां नागकुमाराणं देवानामासनानि चलन्ति, ततः खलु ते मेघमुखाः नागकुमारा: देवाः आसनानि चलितानि पश्यन्ति, दृष्ट्वा अवधि प्रयुञ्जन्ति प्रयुज्य आपातकिरातान् अवधिना आभोगयन्ति, आभोग्य अन्योऽन्य शब्दयन्ति शब्दयित्वा एवम् अधादिषुः एवं खलु देवानुप्रियाः ! जम्बूद्वीपे द्वीपे उत्तरार्द्धभरते वर्षे आपातकिराताः सिन्ध्यां महानद्यां वालुकासंस्तारकान् उपगताः उत्तानकाः अवसनाः अष्टमभक्तिकाः अस्मान् कुलदेवतान् मेघमुखानामकान् नागकुमारान् देवान् मनसि कुर्वाणाः मनसि कुर्वाणा स्तिष्ठन्ति, तत् श्रेयः खलु भो देवानुप्रियाः ! अस्माकम् आपातकिरातानाम् अन्तिके प्रादुर्भवितुमितिकन्वा अन्योऽन्यस्यान्तिके एतमर्थ प्रतिशृण्वन्ति, प्रतिश्रुत्य तया उत्कृष्टया त्वरितया यावद् व्यतिघ्रजन्तो ध्यतिव्रजन्तो यत्रैव जम्बूद्वीपो द्वीपो यत्रैव उत्सरभरतार्द्ध वर्ष यत्रैव सिन्धु महानदी यत्रैव आपातकिराताः तत्रैव उपागच्छन्ति, उपागत्य अन्तरिक्षप्रतिपन्नाः सकिकिणोकानि पञ्चवर्णानि वस्त्राणि प्रवराणि परिहितास्तान् आपातकिरातान् एवमवादिषुः हं भो आपातकिराताः ! यत् खलु यूयं देवानुप्रियाः ! वालुकासंस्तारकोपगताः उत्तानका अवसना अष्टमभक्तिका अस्मान् कुलदेवता मेघमुखान् नागकुमारान् देवान् मनसि कुर्वाणा मनसि कुर्वाणा स्तिष्टत, ततः खलु वयं मेघमुखा नागकुमारा देवा युष्माकं कुलदेवता युप्माकमन्तिकं प्रादुर्भूताः तद्वदत खलु देवानुप्रियाः ! किं कुर्मः किं वा भवतां मनः स्वादितम्, ततः खलु ते आपातकिराताः मेघमुखानां नागकुमाराणां देवानामम्तिके एतमर्थ श्रुत्वा निशम्य हृष्ट तुष्ट चित्तानन्दिता यावदहृदया उत्थया उत्तिष्ठन्ति, उत्थाय यत्रैव मेघमुखा नागकुमारा देवास्तत्रैव उपागच्छन्ति, उपागत्य करतलपरिगृहीतं यावत् मस्तके अञ्जलि कृत्वा मेघमुखान् नागकुमारान् देवान् जयेन विजयेन वर्द्धयन्ति, पद्धयित्वा एघमवादिषुः एष खलु देवानुप्रियाः। कर अप्रार्थितप्रार्थकः दुरन्तप्रान्तलक्षणः यावत् ही श्री परिवर्जितः यः खलु अस्माकं विषयस्योपरि वीर्येण हव्यमागच्छति, तं तथा खलु प्रक्षिपत हे देवानुप्रियाः ! यथा खलु एषः अस्माकं विषयस्योपरि वीर्येण नो हव्यमागच्छति ततः खलु ते मेघमुखा नागकुमारा देवाः तान् आपातकिरातान् एवमवादिषु- एष स्खलु भो देवानुप्रियाः ! भरतो नाम राजा चातुरन्तचक्रवर्ती महद्धिको यावन्महासौख्यः नो खलु एषः शक्यः केनचिद्देवेन वा दानवेन वा किन्नरेण वा किंपुरुषेण वा महोरगेण वा गंधर्वेण वा शस्त्रप्रयोगेण वा अग्निप्रयोगेण वा मन्त्रप्रयोगेण वा उपद्रवयितुं वा प्रतिषेधयितु वा तथापि च खलु युष्माकं प्रियार्थताय भरतस्य राशः उपसर्ग कुर्मः इति कृत्वा तेषाम् मापातकिरातानाम् अन्तिकादपकामन्ति अपक्रम्य वैक्रियसमुद्घातेन समवनन्ति समपत्य मेघानीकं विकुर्वन्ति विकुळ यत्रैव भरतस्य राज्ञो विजयस्कन्धावारनिवेशः तत्रैवोपगच्छम्ति उपागत्य विजयस्कन्धावारनिवेशस्योपरि क्षिप्रमेव प्रतनुस्तनायन्ते क्षि. प्रमेव विद्युयन्ते विद्युदायित्वा क्षिप्रमेव युगमुसलमुष्टिप्रमाणमिताभि (राभिः भोघमेषं सतरा वर्ष वर्षितुं प्रवृत्तश्चाप्यभवन् ॥ सू० १९ ॥ Page #777 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राशिका टोका तृ. वक्षस्कारः सू० १९ आपातचिलायानां देवोपासनादिकम् टीका- “तए णं से" इत्यादि । 'तए णं से आवाडचिलाया सुसेण सेणावइणा हयमहिया जाव पडिसेहिया समाणा भीया तत्था वहिया उबिग्गा संजायभया भत्थामा अबला अीरिया अपुरिसपरक्कमा अधारणिज्जमिति कटु अणेगाइं जोयणाई अवक्कमंति' ततः खलु ते आपातकिराताः सुषेणसेनापतिना हतमथिताः- केचित् हताः केचिन्मथिता इत्यर्थः यावत्पदात् केचित् घातिताश्च प्रवरवीराः येषु ते हतमथितघातितप्रवीराः एवं विपतितचिह्नध्वजपताकाः भ्रष्टचिह्न प्रधान महाध्वजलघुध्वमाः एवं कुच्छप्राणोपगताः यावत्प्रतिषेधिताः निवारिताः सन्तो भीताः-- भययुक्ताः त्रस्ताः प्रबलघाातव्याप्तत्वात् कातरत्वं प्राप्ताः प्रबल सेनापतिपराक्रमदर्शनात् व्यथिताः- महारैरादिताः प्रत्यङ्गवणव्याप्तत्वात् उद्विग्नाः, अथ पुनर्नानेन साई युध्यामहे इत्याशयवन्तः सञ्जातभयाः-सम्यक् प्राप्तत्रासाः भाविसन्तानकृतविजयाशारहितत्वात् अस्थामान:-- युद्धे स्थातुं तएण ते आवाडचिलाया सुसेणसेणावइणा'- इत्यादि सूत्र-१९ टोकार्थ—'तएण' (ते मावाडचिलाया) इसके बाद वे आपातकिरात जो कि (सुसेणसेणावइणा हयमहिया जाव पडिसेहिया समाणा) सुषेण सेनापति द्वारा हत, मथित, घातित प्रवरयोधाओं वाले हो चुके थे और युद्ध स्थल छोड़कर अपने प्राणों को लेकर भाग गये थे वे अब (भीआ, तत्था, वड़िया, उव्विग्गा, संजायभया अत्थामा, अबला, अवीरिया, अपुरिसक्कारपरककमा अधारणिज्जमिति कटु अगाई जोयणाई अवक्कमंति) भयभीत बनचुके ये प्रबळ आषात से व्याप्त हो जाने से सेनापति के प्रबल पराक्रम को देखने से त्रस्त हो चुके थे-कातर भाव को प्राप्त हो चुके थे, प्रत्यङ्ग में घावों से व्याप्त होने से प्रहारों द्वारा व्यथित बने हुए थे, अब फिर हम इसके साथ युद्ध नहीं करेगे इस प्रकार के आशयवाले हो जाने के कारण उद्विग्न बन गये थे। तथा भाविसन्तानकृत विजयाशा से रहित हो चुकने से उनमें अच्छी तरह से भय समा चुका था । ऐसी सामर्थ्य अब उनमें नहीं रह गई थी जो वे युद्ध में उसके समक्ष (तपणं ते आबाडचिलाया सुसेणसेणावइणा -इत्यादि ॥ सूत्र १९ ॥ टासाथ-पण ते आवाडचिलाया) त्या२ मा मापातशत २।-सुसेण सेणावरणा हयमहिया जाव पडिसेहिया समाणा) सुषेषु सेनापति ०४ त, माथेत, पातित પ્રવર યેધાઓ વાળા થઈ ચુક્યા હતા અને યુદ્ધ સ્થળ છોડીને પોતાના પ્રાણની રક્ષા માટે नासी गया , सेवा तेस। (भीआ, तत्या, बहिया, उव्विरगा, संजायभया, अत्थामा, अबला, अबोरिया, अपुरिसक्कारपरक्कमा, अघारणिजमिति कटूटु अणेगाई जोयणाई अवक्कमंति) ભયત્રસ્ત થઇ ગયા હતા. પ્રબળ આઘાતાથી વ્યાપ્ત થઈ જવાથી. સેનાપતિના પ્રબળ ૫રાક્રમને જેવા થી-ત્રસ્ત થઈ ગયા હતા. કાતર થઈ ગયા હતા. પ્રત્યંગમાં ઘાનાપ્રહાર વ્યાસ હતા તેથી તેઓ પ્રડા દ્વારા વ્યથિત થઈ ચૂક્યા હતા. હવે અમે એની સાથે યુદ્ધ નહિ કરીએ આ જાતના નિશ્ચયવાળા થઈ જવાથી તેઓ ઉદ્વિગ્ન બની ગયા હતા, તેમજ ભાવિસનાનકૃત વિજયાશાથી રહિત થઈ ચૂક્યા હતા તેથી તેમનામાં સંપૂર્ણપણે ભય વ્યાસ થઈ ચૂકર્યો હતો. એવું સામર્થ્ય હવે તેમનામાં રહ્યું જ ન હતું કે જેથી બીજી વખત તેની Page #778 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे विकलाः सर्वतो बलवर्जितत्वात् अबला:- शारीरिकशक्तिविकलाः अवीर्याः- वीर्यरहिताः आत्मसमुत्पन्नोल्लासवर्जितत्वात् , अपुरुषपराक्रमाः-पुरुषकारपराक्रमरहिताःसर्वसाधनवर्जितत्वात् अधारणीयं धारयितुमशक्यं परबलमिति शत्रुसैन्योग्ने स्थानुमसमर्था इति कृत्वा अनेकानि योजनानि अपक्रामन्ति पलायन्ते ततः किं कुर्वन्ति इत्याह-'अवक्कमित्ता' इत्यादि। 'अबकमित्ता' अपक्रम्य पलायित्वा 'एगयो मिलायंति' एकतः-एकस्मिन्स्थाने मेलयन्तिएकत्रो भवन्ति, 'मिलाएत्ता' मेलयित्वा-एकत्रीभूय 'जेणेव सिंधू महाणई तेणे । उवाग च्छंति' यत्रैव खिन्धुमेहानदी तत्रैव उपागच्छन्ति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'वालुया संथारए संथरेंति' वालुकासंस्थारकान् संस्तृणन्ति सिकतामयान् संस्तारकान् कुर्वन्ति 'संथरित्ता' संस्तीर्य 'वालुयासंथारए दुरूहंति' वालुकासंस्तारकान् दूरोहन्ति आरोहन्ति उपविशन्ति 'दुरुहित्ता' दरूद्य आरूह्य उपविश्य 'अट्ठमभत्ताइं पगिण्हंति' अष्टमभक्तानि प्रगृह्णन्ति, 'पगिण्हित्ता' प्रगृह्य 'वालुयासंथारोवगया उत्ताणगा अवसणा अट्ठमभत्तिमा वालुकासंस्तारोपगताः प्राप्तवालुकासंस्ताराः उत्तानकाः ऊर्ध्वमुखशायिनः अवसना:-नग्नाः वस्त्ररहिताः परमातापनाकष्ठमनुभवन्त इत्यर्थः, अष्टमभक्तिकाः दिनत्रयमनाहारिणः ये आपातकिराताः शिरे तक उठा सके, वे बिलकूल शारीरिक शक्ति से हीन हो गये थे। ईसलिये उनसे आत्म समुत्पन्न उल्लास विदाले चुका था, सर्वसाधनों से वर्जित हो जाने के कारण वे पुरुषकार और पराक्रम से इकदम रहित हो चुके थे। और परवल का सामना करना अब सर्वथा अशक्य है इस ख्याल से वे अनेक योजनों तक दूर भाग गये थे। ( अवक्कमित्ता एगयो मिलायति ) भागकर फिर वे एक स्थान पर एकत्रित हुए ( मिलाएत्ता जेणेव सिंधु महाणई तेणेव उवागच्छंति ) और एकत्रित होकर फिर वे सबके सब जहां पर सिन्धु महानदी थी वहां पर आये । (उवाईच्छत्ता वालुआसंथारए संथरेंति) वहां आकरके उन्होंने सिकतामय संतारको को किया, ( संथरित्तो बालया संथारए दुरूहंति ) सिकतामय संथारको को करके किर वे सबके सब अपने बालुकामय संथारों के ऊपर बैठ गये ( दुरूडित्ता अदमभत्ताई पगिण्हंति ) बैठकर वहां पर उन्होंने अष्टम भक्त की तपस्या धारण करलो । (पगिण्हित्ता સામે નએ માથું ઊંચું કરી શકે. તેમની શારીરિક શક્તિ સંપૂર્ણ પણે નાશ પામી હતી. એથી તેમનામથી આત્મસમુત્પન્ન ઉ૯લાસ સમાપ્ત થઈ ચૂક્યા હતા. સર્વસાધનથી વજિત થઈ જવાથી તેઓ પુરુષકાર અને પરાક્રમથી સવિ રહિત થઈ ચૂક્યા હતા. પરબળ સામે લડવું હવે સર્વથા અશકય છે એ વિચારથી તેઓ અનેક ચેજને સુધી કરી નાસી ગયા उता. (अवक्कमित्ता एगयओ मिलायंति) नासीन पछी तमे। मे स्थान मे गया. (मिलापत्ता जेणेव सिंधु महाणा तेणेव उवागच्छति) मन सत्र थन ५० पन्धु मानती त्यो माया. (उवागकिछत्ता वालुआसंथारए संथरेंति) त्यां हेची माय संस्तान०५i. (संरिता बाला संधr Tr કામય સ સ્તારકને બતાવીને પછી તેઓ સવે પોતપોતાના વાલુકામય સંસ્તાર ઉપર બેસી गया. (दुरूहित्ता अट्ठमभसाई पनि ति) साने त्यां भर मटम सतनी त५२या था। ४२. (पणिहित्ता वालुयासंथारोषगया उत्ताणगा अवसणा अदुमभत्तिया ले ते सि कुलदेवया Page #779 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका ठोका तृ. ३ वक्षस्कारः सू. १९ आपातचिलायानां देवोपासनादिकम् ७६५ 'तेसिं कुलदेवया मेहमुहाणामं णागकुमारा देवा ते मणसी करेमाणा करेमाणा चिट्ठति' तेषाम् आपातकिरातानाम् कुलदेवताः कुलवत्सलः मेघमुखाः नाम्ना नागकुमाराः देवास्तान् मनसि कुर्वन्तो मनसि कुर्वन्तस्तिष्ठन्तीति, अथ ते देवाः किं कृतवन्तः इत्याह'तए णं तेसिमावाडचिलायाणं अट्ठमभसि परिणममाणंसि मेहमुहाणं णागकुमाराणं देवाणं आसणाई चलंति' ततः चेतसि चिन्तनानन्तरं खलु तेषामापातकिरातानाम् अष्टमभते परिणमति परिपूर्णप्राये सति मेघमुखानां नागकुमाराणां देवानामासनानि सिंहासनानि चलन्ति 'तएणं ते मेहमुहा णागकुमारा देवा आसणाई चलियाई पासंति' ततः आसनचलनानन्तरं खलु ते मेघमुखा नागकुमारा देवा आसनानि चलितानि पश्यन्ति 'पासित्ता' दृष्ट्वा 'ओहिं पउंजंति' अवधि प्रयुजन्ते -अवधिज्ञानमवलम्बन्ते इत्यर्थः 'पउंजित्ता' प्रयुज्य अवधिज्ञानमवलम्ब्य 'आवाडचिलाए ओहिणा आभाएंति' अवधिना-अवधिज्ञानेन आपातकिरातान् वालुयासंथारोवगया उत्ताणगा अवसणा अट्ठमत्तिया जे तेसिं कुलदेवया मेहमुहाणामं णागकुमारा देवा ते मणस। करमाणा करेमाणाविटुंति ) उस अष्टम भक्त की तपस्या को धारण करते हुए एवं बालुका के संथारे पर बैठे हुए वे नग्न बन कर ऊपर की ओर मुँह करके तीन दिन तक अनाहारावस्था में रहे । और उस तपस्या में उन्होंने जो उनके मेघमुख नाम के कुलदेवता थे उनका ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया । (तएणं तेतिमावाडचिलायाण अदमभसि पारणममागंति मेहमुहाणं जागकुमाराण देवाणं आसणाई चलंति ) जब उन आपातकिरातों को अष्टम भक्त का तपस्या समाप्त होने को आई तब उन मेघ मुख नाम के नागकुमार देवा के आसन कंपायमान हुए (तरणं ते मेहमुहा णागकुमारा देवा आसणाई चलिभाई पासंति ) उन मेघमुख नाम के नागकुमारों ने जब अपने-२ मासनों को कंपित हुआ देखा-तो (पासिता) देखकर उन्होंने ( ओहिं पऊंजंति ) अपने-२ अवविज्ञान को उपयुक्त किया (पउंजित्ता आवाहाचलाए ओहिणा आभाएंति ) अवधिज्ञान को उपयुक्त करके उनमेघमुख नाम के नागकुमार देवों ने अवधिज्ञान से आपातकिरातों को देखा मेहमुहाणामं णागकुमारा देवा ते मणसो करेमाणा २ चिट्ठति) त मटममतना तपस्या ધારણ કરતા અને વાલુકામેય સં થા ઉપર બેઠેલા તએ નગ્ન થઈને ઉપરની તરફ મેરે કરીને ત્રણ દિવસ સુધી અનાહાર અવસ્થામાં રહ્યા. અને તે તપસ્યામાં તેમણે જે તેમના भेषभुमनाम जपता ता तमनु ध्यान ४यु. (तपणं तेसिमावा चलायाणं अटूम जमंसि परिणममास मेहमुहाणं णागकुमाराणं देवाणं आसणाई चलंत) क्यारे ते सात કિરાતોની અષ્ટમભક્તના ત૫ા સમાપ્ત થઈ જવા આવી ત્યારે તે મધમુ અનામક નાગકુમાર देवाना आसनी ४ायमान थयां (तपण ते मेहमुदाणागकुमारा देषा आसणाई लिम નાનસ) જ્યારે તે મેઘમુખ નામક દવાએ પોત-પોતાના આસના વિકપિત થતાં જોયા તે. नासित्ता) नतमय (ओहि पउंजीत) पात पातानु माधज्ञान सप्रयुत . (पर्ष. जिता आवाडचिलाए ओहिणा आभोपंति) Aधज्ञानन G५युत रान त मेवभुमनाभनागभार वामे पातपाताना ज्ञानया मापातारात न या. (माभोरता Page #780 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वोपप्रशप्तिसूत्रे भोगयन्ति जानन्तीत्यर्थः 'आभोइत्ता' आभोग्य-तान् ज्ञात्वा 'अण्णमण सदावेंति' अन्यो ऽन्यं देवान् देवाः शब्दयन्ति आह्वन्ति 'सदावित्ता' शयित्वा तान् आहूय एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणरीत्या अवादिषुः उक्तवन्तः किमुक्तवन्तः, इत्याह-‘एवं खलु देवाणुप्पिआः' एवम इत्थर्मास्त खलुः-निश्चये देवानुप्रियाः ! 'जंवुहोवे दीवे उत्तरद्धभरहे वासे आवाडचिलोया लिंधूप महाणईए वालुया संथारोवगया उत्ताणगा अवसणी अट्ठमभत्तिया अम्हे कुलदेवए मेहमुहे णानकुमारे देवे मणसो करेमाणा करेमाणा चिटुंति' जम्बूद्वीपे द्वीपे उत्तरार्द्ध भरते वर्षे आपातकिराताः सिन्ध्वां महानद्यां वालुकासंस्तारकान् उपगताः प्राप्ताः उत्तानकाः ऊर्ध्वमुखाः ऊर्ध्वमुखशायिनः अवसनाः वस्त्ररहिताः अष्टमभक्तिकाः दिनत्रयमनाहारिणः अस्मान् कुलदेवताः मेघमुखान् मेघमुखनामकान् नागकुमारान् देवान् मनसि कुर्वाणाःमनसि कुर्वागःस्तिष्ठन्तीति तं सेअं खलु देवाणुप्पिया ?' तम् श्रेयः खलु भोदेवा नुप्रियाः ! 'अम्हं आवाडचिलायाणं अंतिए पाउभवित्तएत्तिकटु अण्णमण्णस्स अंतिए एयमद्रं पडिसुर्णेति' अस्माकम् आपातकिरातानामंतिके प्रादुर्भवितुं समीपे प्रकटीभवितुमिति कृत्वा पर्यालोच्य अन्योऽन्यस्यान्तिके एतमर्थम् अनंतरोक्तमभिधेयं प्रतिशृण्वन्ति अभ्यु(आभोइत्ता मण्णमण्णं सदावेंति) देख कर उन्होंने फिर आपसमें एक दूसरे को बुलाया (सद्दावित्ता एवं वयासो) और बुलाकर आपस में इस प्रकार से बातचीत की ( एवं खल्लु देवाणुप्पिया ! जंवुद्दीवेदीवे उत्तरद्धभरहे वासे आवाडचिलाया सिधूए महाणईए वालुयासंथारोवगया उत्ताणगा अवसणा अट्ठमभत्तिया अम्हे कुलदेवर मेहमुहे णाम कुमारे देवे मणसी करेमाण। करेमाणा चिटुंति ) हे देवानुप्रियो ! सुनो-जम्बूद्वीप नाम के द्वोप में उतरार्द्ध भरत क्षेत्र में आपात चिलात नामवाले सिधु महानदी के ऊपर वालुका निर्मित संस्तारकों पर अष्टम भक्त के तपस्या करते हए बैठे हैं उन्होंने वस्त्रों का बिलकूल त्याग कर दिया है. और आकाश को ओर वे अपने-अपने मुख को ऊपर करके अपने कुलदेवता हम मेघकुमार नाम के नागकुमार देवों का ध्यान कर रहे हैं ( त सेयं खलु देवाणुप्पिया ! अम्हं आवाडचिलायाणं अंतिए पा उन्भवित्तए त्तिकट्टु अण्णमण्णस्स अंतिए एयमहूँ डिसुणेति) इसलिये है देवानुप्रियो ! हमलोगों का अण्णमण्णं सहाति) नतम ५छी ५२२५२ २४-भी०१२ मावाव्या. (सदावित्ता एवं बयासी) aवीन भणे ५२०५२ मा प्रमाणे वात। ४२१. (एवं खलु देवाणुप्पिया! जम्बु. दीवे दीवे उतरद्धभरहेवासे आवाडचिलाया सिंधूए महाणईए वालुया संथारोवगया उत्ताजगा अवसणा अट्ठमभत्तिया अम्हे कुलदेवए मेहमुहेणागकुमारे देबे मणसी करेमाणा २ चिट्रंति) पानुप्रिया ! सामी, दी५ नाम द्वीपमा उत्तराद्ध तक्षेत्रमा सायातકિરાતેસિંધુ મહાનદીની ઉપર વાલુકા નિર્મિત સસ્તાર ઉપર અષ્ટમભક્તની તપસ્યા કરતા બેઠા છે. તેમણે વસ્ત્રોનો સાવ ત્યાગ કર્યો છે અને આકાશ તરફ મેં કરીને પોતાના अवता सरले माया सन यान २१ २हा छ. (तं सेयं खलु देवाणुप्पिया ! अम्हं आबाडचियाणं अंतिए पाउभवित्तए त्तिक? अण्णमण्णस्स अंतिए एयमझें पडिसुणेति) એટલા માટે હે દેવાનુપ્રિયે ! આ સ્થિતિમાં આપણા સર્વનું આ કર્તવ્ય છે કે હવે અમે Page #781 -------------------------------------------------------------------------- ________________ anaman.annaa...marat ... ... प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० १९ आपातधिलायानां देवोपासनादिकम् ७६७... पगच्छंति परस्परं साक्षीकृत्य प्रतिज्ञातं कार्यमवश्यं कर्त्तव्यमिति दृढी भवंतीत्यर्थः 'डि मुणेत्ता' प्रतिश्रुत्य अभ्युपगत्य 'ताए क्किट्ठाए तुग्आिए जाव वोतिवयमाणा वीतिवयमाणा जेणेव जंबुद्दीवे दीवे उत्तरद्ध भरहेवासे जेणेव सिंधू महाणई जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवागच्छंति' तेदेवास्तया उत्कृष्टया त्वरितया यावत् चपल्या चण्डया सिंहया दिव्यया देवगत्या व्यतिव्रजन्तो यत्रैत्र जम्बूद्वीपो द्वीपो यत्रैव उत्तरभरतार्द्ध वर्ष यत्रैव सिन्धुमहानदी यत्रैव चापातकिगताः तत्रैवोपागच्छंति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'अंतलिक्खपडिवण्णा सखिखिणियाइं पंचवण्णाई वत्थाई पवरपरिहिया ते आवाडचिलाए एवंचयासी' अंतरिक्षप्रतिपन्नाः आकाशमार्गावलम्बिनः सकिंकिणीकानि पञ्चवर्णानि शुक्लनीलादि पञ्चवर्णयुक्तानि वस्त्राणि प्रवराणि परिहिताः सन्तः तान् आपातकिरातान् एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादिपुः उक्तवन्तः, किमुक्तवन्त इत्याह 'हंभो' इत्यादि 'हभो आवाडचिलाया ! जण्णं तुब्भे देवाणुप्पिया ! वालुयासंथारोवगया उत्साणगा अबसणा अट्ठमभत्तिया भम्हे कर्तव्य है. कि अब हमलोग उन आपातकिरातों के पास चलें इस प्रकार से आपस में विचार करके उनलोगों ने उनके पास आने का निश्चय कर लिया (पडिसुणेत्ता ताए उक्किद्राए तुरियाए जाव वीइवयमाणा-वाइवयमाणा जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवाच्छंति) पूर्वोक्तरूप से निश्चय करके फिर वे उस उत्कृष्ट त्वरित दिव्य देवगति से चलत-२ जहाँ पर जम्बूद्वीप नाम का द्वीप था और उसमें भो जहां पर उत्तरार्द्ध भरत क्षेत्र था और उसमें भी जहां पर सिंधु नाम को महानदी थी वहां पर आये ( उवागच्छित्ता अंतलिक्वपांडवन्ना सखिखिणियाई पंचवण्णाई वत्थाई पवरपरिहिया ते आवाडचिलाए एवं वयासी ) वहां आकर के नोचे नहीं उतरे किन्तु आकाश में हो रहे और वहीं से उन्होंने जोकि क्षुद्र घंटिनाओं से युक्त श्रेष्ठ वस्त्रों को अच्छी तरह से अपने-२ शरीर पर धारण किये हुए हैं उन आपातकिरातों से ऐसा कहा-(हं भो ! आवाडचिलाया ! जण्णं तुब्भे देवाणुप्पिया वालुयासंथारोवगया उत्ताणगा अवसण! अट्ठमभत्तिया अम्हे कुलदेवए मेहमुहे णागकुमारे देवे भणसी करेमाणा-२ चिट्ठह ) हे अपातकिरातो ! जो तुम लोग देवानुप्रिय वालुका निर्मित संथारों के ऊपर नग्न સર્વે તે આપાતકિરાતો પાસે જઈએ આ પ્રમાણે પરસ્પર વિચાર કરીને તેમને તેમની પાસે भवन निश्चय ४0 बीघा. (पडिसुणेत्ता ताए उक्किट्ठाए तुरियाए जाव वोइवयमाणा २ जेणेव जंबुद्दोवे दीवे उताद्धभरहे वासे जेणेव सिंधू महाणई जेणेव आझाडचिलाया तेणेव उवागछति) 0 प्रण निश्वः दाने की तमे स ट त्वरित यावत् दिव्य है. ગતિથી ચાલતા-ચાલતા જ્યાં જબૂદ્વીપ હતો અને તેમાં પણ જ્યાં ઉત્તર! મતક્ષેત્રહ मन त ५५ सिधु नाममानवी ती त्यां माव्या. (उवागच्छित्ता अन्नलिक्ख परिवाना सखिखिणियाई पंचण्णाइ वत्थाई पवरपरिहिया ते आवाडचिलाए एवं पयासी ત્યાં પહોંચીને તેઓ નીચે નહિ ઉતરતા આકાશમાં જ સ્થિર રહ્યા. અને તેથી જ તેમણે કે જેમણે ક્ષુદ્રઘંટિકાઓથી યુક્ત શ્રેષ્ઠવાને સારી રીતે પિતાના શરીર ઉપર ધારણ કરી शल्याछे सेवनागभा२हेवा थे- मापात (शता ने मा प्रमाणे ---( भो ! आवा Page #782 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७६८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कुलदेवए मेंहमुहे णागकुमारे देवे मणसी करेमाणा करेमाणा चिट्ठई' हंभो ! इति सम्बोधने आपातकिराताः यत् णं वाक्यालङ्कारे यूयं देवानुप्रियाः ! वालुका संस्तारकोपगताः उत्तानकाः अवसनाः अष्टमभक्तिकाः अस्मान् कुलदेवताः मेघमुखान् नागकुमारान् देवान् मनसि कुवों गाः मनसो कुर्वाणास्तिष्ठत 'तएणं अम्हे मेहमुहा णागकुमारा देवा तुभं कुलदेवचा तुम्हं अंतिअण्णं पाउन्भूया' ततो वयं मेघमुखा नागकुमारा देवा युष्माकं कुल देवता सन्तो युष्माकमन्तिकं प्रादुर्भूताः-प्रकटीभूताः 'तंवदह णं देवाणुपिया। किं करेमो केब मे मसाइए' तद्वदत खलु देवानुप्रियाः ! किं कुर्मः किं कार्य विदध्मः किंवा 'मे' भनतां मनः स्वादितं मनोऽभीष्टम् अथ कुलदेवता प्रश्नानन्तरं ते आपातकिराताः यदभिलषितवन्तः तदाह-'तएणं' इत्यादि 'तएणते आवाडचिलाया मेहमुहाणं नागकुमाराणं देवाणं अंतिए एयमटुं सोच्चा णिसम्म हट्टतुट्ठचित्तमाणंदिया जाव हियया उट्ठाए उठेति' ततः खलु ते आपातकिराताः मेघमुखानां नागकुमाराणां देवानामन्तिके एतमर्थ प्रोक्तवचनं श्रुत्वा निशम्य बनकर आकाश की ओर मुंह करके अट्ठम भक्त की तपस्या कर रहे हो और अपने कुलदेवता मेघमुख नाम के नागकुमार देवों का मन में ध्यान कर रहे हो ( तएणं अम्हे मेहमुहा णागकुमारा देवा तुभं कुलदेवया तुभं अंतिमण्णं पाउम्भूया ) सो हमारे मेघमुख नाम के नागकुमार देव जो कि तुम्हारे कुलदेवता हैं तुम लोगों के पास आये हैं. (तं वदह णं देवानुप्पिया ! किं करेमो केव भे मणसाइए ?) तो हे देवानुप्रियो आपलोग कहिये. हम लोग क्या करे आपलोगों का मनोभोष्ठित क्या है क्या-आपकी अभिलाषा है. ? (तएणं ते आवाडचिलाया मेहमुहाणं नागकुमागणं देवाणं अंतिए एयम8 सोच् वा णि सम्म हट्ठतु चित्तमाणंदिया जाव हियया उट्ठाए उट्टेति) इस प्रकार का कथन जब उन आयातकिरातों ने उन मेघमुख नाम के नागकुमार देवों से सुना तो यह सुन कर और उसका अच्छी तरह से निश्चय कर वे सब भापातकिरात वडे ही हर्षित हुए और बड़े ही संतुष्ट हुए यावत् उनका हृदय हर्ष के वश चिलाया अण्णं तुम्मे देवाणुपिया बालुयासंथारोगया उत्ताणगा अवसणा अट्ठमभत्तिया अम्हे कुलदेवप मेहमुहे णागकुमारे देवे मणसी करेमाणा २ चिट्ठह) उमाश ! કે જેઓ દેવાનપ્રિય તમે વાલકા નિર્મિત સંથારાઓ ઉપર આસીન થઇને નગ્ન અવસ્થા માં આકાશ તરફ માં કરીને અઠ્ઠમભક્તની તપસ્યા કરી રહ્યા છે અને પોતાના કુલદેવતા भवभुमत नागभार हेवानुभनमा ध्यान रखा छ।. (त एणं अम्हे मेहमुहा णागकुमारा देवा तुभं कुलदेवया तुब्भं अंतिअण्णं पाउम्भूया) तो ममे तमा२। इसकता मेधभुम नाम नामसार हेवा तमारी साभ प्र४८ च्या छीस (तं वदह णं देवाणुप्पिया ! किंकरेमो केव मे मणसाइए ?) तादेवानुप्रिये 1 मोबा, ममे तमा। भाट शु शये. तभारे। भने।२५ श छ ? तभारी अमिता| अभारी समक्ष प्र४८ ४२।. (तपणं ते आवाउचिलाया मेहमुहाण नागहमाराण देवाण अंतिए एयमढं सोचा णिसम्म हट्ठ तुवित्तमाणं दिया जाव हियया उट्ठार उठेत्ति) मा प्रभानु ४थन मापात (शता मेधभुम नाम: નાગકમાર દેના મુખની સાંભળીને અને તે સંબંધમાં સારી રીતે નિશ્ચય કરીને તેઓ Page #783 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका त. वक्षस्कारः सू० १९ आपातचिलातानां देवोपासनादिकम् ७६९ हृदि अवधार्य हृष्टतुष्टचित्तानन्दिताः यावत् हृदयाः परमसौमनस्यिताः सन्तः उत्थया उत्थानम् उत्था ऊर्ध्व भवनं तया उत्तिष्ठति ऊी भवन्तीत्यर्थः 'उहित्ता' उत्थाय जेणेव मेहमुहा णागकुमारा देवा तेणेव उवागच्छंति' ते आपातकिराता यत्रैव मेहमुखा नागकमारा देवा तत्रैव उपागच्छन्ति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'करयलपरिग्गहियं जाव मत्थर अंजलिं कटु मेहमुहे णागकुमारे देवे जएणं विजएणं वद्धावेंति' करतलपरिगृहीतं यावत दशनखं शिरसावत्त मस्तके अनलिं कृत्वा मेघमुखान् नागकुमारान् देवान् जयेन विजयेन च जयविजयशद्वाभ्यां वर्द्धयन्ति 'बद्धावित्ता' वर्द्धयित्वा ‘एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादिषुः उक्तवन्तस्ते आपातकिराताः, किमुक्तवन्त इत्याह-एस णं देवाणुप्पिया! केइ अपत्थियपत्थए दुरंतपंतलक्खणे जाव हिरिसिरिपरिवज्जिए जेणं अम्हं विसयस्स उवरि विरिएणं हव्वमागच्छइ' हे देवानुप्रियाः एष खलु कः अप्रार्थितप्रार्थकः अप्रार्थितम् अमनोरथगोचरीकृतं मरणमिति भावः तस्य प्रार्थको अभिलाषी, तथा दुरन्तपान्तलक्षणः, दुरन्तानि दुष्टावसानानि प्रान्तानि तुच्छानि लक्षणानि यस्य स तथा यावत्पदात् हीनपुण्य से उछलने लगा-यहां यावत्पद ते “परम सौमनस्थिताः सन्तः' इन पदों का ग्रहण हुआ है. वे सबके सब स्वयं खडेहुऐ ( उद्वित्ता जेणेव मेहमुहा णागकुमारा देवा तेणेव उवागछति ) और ऊठकर फिर वे जहां पर मेघमुख नाम के नागकुमार देव थे वहां पर आये. ( उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं जाव मत्थए अंजलिं कटु मेहमुहे णागकुमारे देवे जएणं विजएण वद्धाति ) वहां आकरके उन्होंने दोनों हाथों की अंजलि बनाकर यावत् उसे मस्तक पर घर कर उन मेघमुखनागकुमार देवों को जय विजय शब्दों से वधाई दी. ( वद्धावित्ता एवं वयासी) और वधाई देकर फिर उन्होंने उनसे ऐसा कहा- (एसणं देवाणुप्पिए केई अपत्थियपत्थिए दरंतपंतलक्खणे जाव हिरिसिरि परिवज्जिए जेणं अम्हं विसयस्स उवरि विरिएणं हव्वमागच्छद) हे देवानुप्रिय ! यह कोन है जो हमारे देश पर जबर्दस्ती आक्रमण करके विना मौत के अपनी मौत का अभिलाषी हो रहा है. पता पड़ता है कि हीन पुण्य चतुर्दशी में जन्म हुआ है यह સવેલ અતીવ હર્ષિત તેમજ સંતુષ્ઠ થયા યાવતુ તેમનાં હદયે હષાવેશથી ઉછળવા લાગ્યાં मी यावत् ५४थी (परमसौमनस्थिताः सन्तः) मे ५हनु ७५ थयु छे. तया स मा यया. (उद्वित्ता जेणेव मेहमुहा नागकुमारा देवा तेणेव उवागच्छंति) भने मायने पछी तान्यां भभुम नाम: नागभारे। बता त्या माव्या. (उवागच्छिता करयलपरिगहीयं जाध मत्थप अंजलिं कटु मेहमुहे णागकुमारे देवे जपणं विजएणं वखाति) ni પહાંચી ને તેમણે બને હાથની અંજલિ બનાવીને યાવત્ તે અંજલિ ને મસ્તક ઉપર મૂકી न भुमनागभार हेवाने जय-विजय शहाथी पाभरी मापी. (वडावित्ता एवं वयासी) भने धामणी सापान तमधे तवाने मी प्रमाणे ४थु- (पसणं देगणुपिप केह अपत्थियपत्थिए दुरंतपंतलक्खणे जाव हिरिसिरिपरिवज्जिए जेणं अम्हं विसयस उवरि वीरिएणं हव्वमागच्छद) पानुप्रिय! आप छ? के अभा। वतन 6५२ બલાતું આક્રમણ કરીને વગર મૃત્યુએ પિતાના મૃત્યુને આમંત્રણ આપી રહ્યો છે. એમ Page #784 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७७० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे चतुर्दशः होनायां पुण्य चतुर्द्दश्यां जातो हीनपुण्य चातुर्द्दशः, तत्र चतुर्दशी खलु तिथिर्जन्माश्रिता पुण्या शुभा च भवति साऽतिभाग्यवतो जन्मनि भवति अत आक्रोशता इत्थमुक्ता तया हीनः इत्यर्थः, तथा ही श्रीपरिवर्जितः ह्रिया लज्जया श्रिया शोभया परिवजिंत: : यः खलु अस्माकं विषयस्य देशस्योपरि वीर्येण आक्रमणात्मकशक्त्या हव्यं शीघ्रमागच्छति आक्रमति 'तं तहाणं धत्ते देवाणुपिया ! जहाणं एस अहं विसयस्स उवरिं विरिएणं णो वमागच्छ' हे देवानुप्रियाः । तत् तथा तेन प्रकारेण खलु ऐनम् 'धत्तेह' प्रक्षि पत दूरीकुरुन यथा खलु एषः अस्माकं विषयस्योपरि वीर्येण हव्यं नागच्छेत् अथ यन्मेघमुखा उक्तवन्तस्तदाह-'त एणं ते' इत्यादि' तरणंते मेहमुहा नागकुमारा देवा ते आवाडचिलाए एवं वयासी' ततः खलु ते मेघमुखा नागकुमारा देवाः तान् आपातकिरातान् एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादिषुः कथितवन्तः 'एसणं भो देवाणुप्पि ! भरहे णामं शुभलक्षणों से हीन है केवल दुष्टावसानवाले तुच्छ लक्षणों से ही यह युक्त प्रतीत होता है. यह निर्लज्ज है एवं श्री - शोभा से रहित है. जिसके जन्म समय में चतुर्दशी तिथि पूण्या और शुभ होती वह अति भाग्यवान् होता है. अतिभाग्यशाली के जन्म समय में ही ऐसी चतुर्दशी होती है। यह शब्द जब अधिक क्रोध का आवेग बढा जाता है तब कहा जाता है, ( तहाणं ह देवपिया ! जहाणं एस अम्हं विसयस्स उवरि विरिएणं णो हव्वमागच्छइ) इसलिए हे देवाप्रिय ! इसे तुम इस प्रकार से दूर करो कि जिससे यह हमारे देश के ऊपर जबर्दस्ती आक्रमण नहीं कर पावे. (तपणं ते मेहमुहा णागकुमारा देवा ते अवार्डाचिलाए एवं वयासी एसणं भो देवापिया ! मरहे णामं राया चाउरंत्तचक्कवट्टी महिद्धिए महज्जुईए जाव महासोक्खे, जो स्वलु एस सक्को केणइ देवेण वा दाणत्रेण वा किण्णरेण वा किंपुरिसेण वा महोरगेण वा गंधवेण वा सत्थपओगेण वा संतप्पओगेण वा उद्दवित्तए पडिसेहित्तएवा ) उन आपातकिरतों લાગે છે કે એનેા જન્મ હીન પુણ્ય ચતુઃ શીના દિવસે થયેલા છે. એ શુભલક્ષણૈાથી હીન છે, ફકત દુષ્ટાવસાનવાળા તુચ્છ લક્ષણાથી જ એ યુક્ત પ્રતીત થાય છે. એ નિલજ્જ છે. તેમજ શ્રી-શાભા-થી રહિત છે. જેના જન્મ સમયમાં ચતુશી તિથિ પુણ્યકારક અને શુભ ડાય છે તે અતિ ભાગ્યવાન હેાય છે. અતિ ભાગ્યશાલીના જન્મ સમયે એવી ચતુર્દશી હાય છે. એવા અથ વાચક એ શબ્દ જ્યારે ક્રોધાવેગ વધી જાય છે ત્યારે વ્યંગ્ય માં હેવામાં આવે छे. (तं तहाणं घत्तेह देव णुप्पिया ! जहाणं एस अहं विसयस्ल उवरिं बोरिपणं णो हब्व मागच्छर) मेथी से हेवानुप्रिय ! याने तमेवारी र नसाठी भूझे हे मेथी ये गाभारा वतन (५१ इरीथी मात् आर्डम मेरी शडे नही. (त एणं ते मेहमुद्दा नागकुमारा देवा ते भावाड चिलाए एवं वशसी - एलणं भो देवानुपिया ! भरहे णामं राया वारं वक्त्रट्टी महिद्धिए महज्जुइप जाव महासोक्खे, णी बलु एस सक्को केणइ देवेण वा दाणवेण वा किण्णरेण वा किंपुरिसेण वा महोरगेण वा संधवेण वा सत्ययओगेण वा मंतओगेण वा उद्दवित्तर पडिले हित्तर वा) ते भाषात हिराताना सुमधी આ પ્રમાણે વાત સાંભળીને તે મેઘમુખ નામક નાગકુમાર દેવાએ તેમને આ પ્રમાણે કહ્યુ Page #785 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७७१ प्रकाशिका टीका ० ३ वक्षस्कारः सू० १९ आपात 'बलातानां देवोपासनादिकम् राया चाउरंतचक्कवट्टीमहिद्धीए महज्जुईए जाव महासोक्खे' भो देवानुप्रियाः एषः खलु भरतो नाम राजा चातुरन्तचक्रवर्ती चत्वारोऽन्ताः पूर्वापरदक्षिण समुद्रास्त्रयः चतुर्थोहिमवान् इत्येवं स्वरूपास्ते वश्यतयाऽस्य सन्तीति चातुरन्तः ततश्चक्रवर्त्तिपदेन कर्मधारयः तथा महर्द्धिकः महती ऋद्धिर्निधानादिर्यस्य स तथा, तथा महाद्युतिकः अत्यन्तकां विमानः आभरणरत्नादि सम्पन्नः यावन्महासौख्यः यावत्पदात् 'महाबले महाजसे' महाबलशालीमहायशस्क: अतिसुखसम्पन्नः 'णो खलु एस सक्को केणइ देवेण वा दाणवेण वा किण्णरेण वा किंपुरिसेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा सत्यप्पओगेण वा अग्गिपओगेण वा inपभोगेण वा उदवित्तए पडिसेहित्तए वा' उक्तविशेषणविशिष्टः एष भरतो नो खल्लु शक्यः केनचित् देवेन वा दानवेन वा किन्नरेण वा किंपुरुषेण वा व्यन्तरदेव विशेषेण महोरगेण वा गन्धर्वेण वा शस्त्रप्रयोगेण वा खङ्गादिशस्त्रेण वा अग्निप्रयोगेण वा मन्त्रप्रयोगेण वा, त्रयाणामपि उत्तरोत्तरबलाधिक इति, उपद्रवयितुं वा उपद्रवं कर्तुभ्वा प्रतिषेधयितुं वा निषेधयितुं वा युष्मदेशाक्रमणता निवर्त्तयितुमिति, सर्वत्र वा शब्दः समुच्चयार्थः के मुख से इस प्रकार की बात सुनकर उन मेघमुख नाम के नागकुमारों ने उनसे ऐसा कहा - हे देवानुप्रियो ! यह भरत नाम का महाराजा है. यह पूर्व अपर और दक्षिण इन तीन समुद्रों. का और चतुर्थ हिमवान् इन चार रूप अन्तों का वश करनेवाला है. इसलिए यह चातुरन्त चक्रवर्ती कहा गया है इसको निधानादि ऋद्धि बहुत ही चढ़ा बडी हुई है. आभरणादिकों की कान्ति से सदा यह प्रकाशित रहता है. यावत् यह महा सौख्य का भोका है. यहां यावत्पद से " महाबळे, महाजसे" इन पदों का संग्रह हुआ है यह किसी भी दानव के द्वारा, या किसी भी किन्नर के द्वारा या किसी भी किंपुरुष के द्वारा, या किसी भी महोरग के द्वारा या किसी भी गंधर्व के द्वारा शस्त्र प्रयोग या अनि प्रयोग से या मंत्र प्रयोग से उपद्रवित नहीं किया जा सकता है । और न यह यहां से लोटाया ही जा सकता हैं । " शस्त्रेभ्योऽग्निस्तस्मान्मत्रो बलाधिकः " इस कथन के अनुसार उत्तरोत्तर बलाधिक्य प्रकट करने के लिये" शस्त्र प्रयोग से या अग्नि प्रयोग से या मंत्र प्रयोग से" ऐसा कहा है । यहां सर्वत्र वा शब्द समुच्चહૈ દેવાનુપ્રિયા ! એ ભરત નામે રાજા છે. એ પુત્ર અપર અને દક્ષિણ એ ત્રણે સમુદ્રાને અને ચતુર્થી હિમવાન ને એ ચાર સીમા રૂપ અન્તાને વશમાં કરનાર છે. એથી એને ચાતુરન્ત ચક્રવર્તી કહેવામાં આવેલ છે. એની નિધાન અદિ રૂપ ઋદ્ધિ અતીવ વિપુળ છે. આભરણાદિકાની કાંતિથી એ સર્વાંદા પ્રકાશિત રહે છે. યાવત્ એ મહાસૌખ્યÀ કૂવા છે, मी यावत् पहथी 'महाबले, महाजसे' से होतु श्रथयुं छे से पशु देव वडे કે કાઈ પણ કિન્નર વડે કે કેાઈ પણ કિં પુરુષ વડે કે કેાઈ પણ મહારગ વડે કે કોઈ પણ ગન્ધવ વડે, શસ્રપ્રયાગથી કે અગ્નિપ્રયાગથી તેમજ મત્રપ્રયાગ થી ઉપદ્રવત થઈ શકતા नथी. तथा सेने महीं थी पाछाया देवी शडाता नथी "शस्त्रेभ्योऽग्निस्तस्मान्मंत्रोबलाधिकः " એ કથન મુજખ ઉત્તરાત્તર અલાધિય પ્રકટ કરવામાટે શસ્ત્ર પ્રયાગથી કે અગ્નિ પ્રયાગ થી કે મંત્ર પ્રયાગથી આ પ્રમાણે કહેવામાં આવ્યું છે. અહી સત્ર વદ્ શબ્દ સમુચ્ચ Page #786 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ভঙই जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ' तहावि अ णं तुभं पिट्टयाए भरहरूस रण्णो उवसग्गं करेमोत्तिकट्टु तेर्सि आवाडचिलाया अतिया अवमंति' तथापि इत्थमसाध्ये कार्ये सत्यपि च खलु युष्माकं प्रियार्थतायै प्रीत्यर्थं भरतस्य राज्ञः उपसर्ग कुर्म इति कृत्वा तेषामापातकिरातानामन्तिकाद् अपक्रामन्ति यान्ति इति प्रतिज्ञातवन्तः ततः किं कृतवन्तस्ते देवा इत्याह 'अवक्कमित्ता' अपक्रम्य 'doसमुग्धारणं सम्मोहनंति' इत्यादि वैक्रियसमुद्घातेन उत्तरवै क्रियार्थक प्रयत्नविशेषेण समवघ्नन्ति आत्मप्रदेशान् विक्षिपन्ति शरीराद् बहिर्विकिरन्तीत्यर्थः ' समोहणित्ता मेहाणीअं विउव्वंति' समवहत्य आत्मप्रदेशान् विक्षिप्य तैरात्मप्रदेशे गृहीतैः पुद्गलैः मेघानीकम् अभ्रपटलं विकुर्वन्ति निर्मान्ति 'विउन्त्रित्ता जेणेय भरहरूस रण्णो विजयकखंधावारनिवे से तेणेव उवागच्छंति' विकुर्व्य मेघपटलं निर्माय यत्रैव भरतस्य राज्ञो विजयस्कन्धावारनिवेशः तत्रैव उपागच्छन्ति ' उवागच्छित्ता उपि विजयधावारनिवेस स विपामेव पतणुतणायंति खिप्पामेव विज्जुयायंति' उपागत्य विजयस्कन्धावारनिवेशस्योपरि क्षिप्रमेव प्रततु यथा स्यात् तथा स्तनायन्ते शब्दायन्ते क्षिप्रमेव विद्युदायन्ते यार्थक है | ( तहाविणं तुम्भं पियट्टयाए भरहस्स रण्णो उवसग्गं करेमोति कट्टु तेसि आवाडचिलायाणं अतियाओ अवक कर्मति ) फिर भी हमलोग तुम्हारी प्रीति के लिये भरत राजा को उपसर्गन्वित करेंगे. ऐसा कह कर वे मेघमुख नाम के नागकुमार देव उन आपातकिरात के पास से चक्रे गये । ( अवक्कमित्ता वेउन्त्रिय समुग्धाएणं सम्मोहणंति) चले जाकर उन्होंने वैकिय समुद्धात द्वारा अपने आत्म प्रदेशों को शरीर से बाहर निकाला. ( समोहणित्ता मेहाणो अं विति) शरीर से बाहिर निकाल कर फैलाए गये उन आत्म प्रदेशो द्वारा गृहात पुद्गलों से उन्होंने अभ्रपटल की विकुर्वेणा की. (वित्ता जेणैव भरहस्स रण्णो विजयकखधावारनिवे से तेणेत्र उत्रागच्छंति ) अटल विकुर्वणा करके फिर वे जहां भरत नरेश के स्कन्धावार का निवेश था, वहां पर गये. ( उवागच्छित्ता उपि विजयकखंधावारनिवेसस्स खिप्पामेत्र पतणुतणार्यंति स्विपामेव विज्जुयायंति) वहां जाकर वे विजयस्कन्धावार के निवेश के ऊपर ऊपर याथ छे. (तहावि णं तुब्भं पियट्टयाप भरहस्त रण्णो उवसगं करेमोत्ति कट्टु तेसि आवाडबिलायाणं अंतियाओ अवककमंति) छतां अभे तमारी प्रीतिने वश थाने लरतरालने ઉપસર્ગાન્વિત કરીશું. આમ કહીને તે મેઘમુખ નામક નાગકુમાર દેવે તે આપાતકરાતાની पासेथी भजा २ह्या. (अवक्कमित्ता वेडब्बियसमुग्धारणं समोहणंति) त्यां धने तेथे वैडिय समुद्रात वडे पोताना आत्म प्रदेशाने शरीरमां थी महार छाया (समोहणित्ता मेदाणीअं विव्वति) शरीरमांथी डार हाडीने प्रसृत रेला ते आत्म प्रदेशी वडे गृहीत युद्गल थी तेथे अनी विडा ४ (विव्वित्ता जेणेव भरहस्स रण्णो विजयखंधावारनिवे से तेणेव उवागच्छंति) पटसनी विरुवा उरीने पछी तेथे न्यां रतनरेशन सुन्धावार निवेश इते। त्यां (उवागच्छिता उपि विजयकसंधावारनिवेस्स विष्यामेव पतणुतणायंति विद्यामेव बिज्जुप्रायति) त्यां धने विश्य सुन्धावारना निवेशनी उपर धीमे धीमे ગર્જના કરવા લાગ્યાં. અને શીવ્રતાથી ચમકવા લાગ્યા. વિદ્યુત્તી જેમ આચરણ કરવા Page #787 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कार: सू० २० वर्षावर्षणानन्तरीय भरतकार्य विवर्णनम् ७७३ विद्युदिवाचरन्ति विज्जयायंति विज्जुयायित्ता खिप्पामेव जुगमुसलमुट्ठिप्यमाणमेत्ताहिं धाराहिं ओघमे सत्तरतं वासं वासिउं पवत्ता यावि होत्था' विद्युदायित्वा क्षिप्रमेव युगमुशलमुष्टिप्रमाण मिताभिः धाराभिः ओघमेवं सप्तरात्रं सप्तरात्रिप्रमाणकालेन वर्ष वर्षितुं प्रवृत्ता - चाप्यभवन् ॥ सु. १९ ॥ इति व्यतिकरे सम्बन्धे यद्धरताधिपः करोति तदाह - "तरणं से भरहे" इत्यादि मूलम् - तणं से भर गया उपि विजयक्खंधावारस्स जुगमुसलमुट्ठिप्यमाणमेत्ताहिं धाराहिं ओघमेघं सत्तरतं वासं वासमाणं पासइ पासित्ता चम्मरयणं परामुसइ तए णं तं सिखिच्छसरिसरूवं वढो भाणि - यव्वो जाव दुवालसजोयणाईं तिरिअं पवित्थरइ तत्थ साहियाई तरणं से भरहे राया सक्खंधावारबले चम्मरयणं दुरूहइ दुरूहेत्ता दिव्वं छत्तरयर्ण परामुसइ तरणं णवणउइसहस्स कंचणसला गपरिमंडियं महरिहं अउज्झं णिव्वणसुपसत्यविसिठ्ठलट्ठकं चणसुपुट्ठदंडं मिउराययवट्ट लट्ठ अरविंद कण्णि समाणरूवं वत्थिपए से अ पंजरविराइअं विविहभत्तिचित्तं मणिमुत्त पवाल तत्ततवणिज्ज पंचवण्णिअघोअरयण रूवरइयं रयणमरीईसमोपपणा कप्पकारमनुरंजिएल्लिअं रायलच्छिविधं अज्जुण सुवण्ण पंडुरपच्चत्थु अपट्टदेस भागं तहेव तवणिज्ज पट्ट धम्मंत परिगये अहिअ सस्सिरीअं सारयस्यणिअरविमलपडिपुण्णचंद मंडलस माणरूवं णरिंदवामप्पमाणपगइवित्थडं कुमुदसंडघवलं रण्णो संचारिमं विमाणं सूगतववायवुट्ठिदोसाण यखकरं तवगुणेहिं लद्धं अहयं बहुगुणदाणं उऊण विवरी असुहक यच्छायं । छत्तरयणं पहाणं सुदुलहं अप्पपुण्णाणं ||१|| पमाणराईण तवगुणाण फलेगदे सभागं विमाणवासे वि दुल्लहतरं वग्घारिअमल्लदामकलावं हल्के - २ रूप में गर्जने लगे । और शीघ्रता से चमकने लगे- विजली के जैसे आचरण करने लगे (विज्जुयायित्ता खिप्प: मेव जुगमुसलमुट्ठिप्यमाणमेत्ताहिं धाराहिं ओघमेघं सत्तरसं वासं वासिउं पवत्तायावि होत्था) फिर वे विजलियों को चमकाकर बहुत ही शीघ्रता से युग मुसल, एवं मुष्टि प्रमाण परिमित धाराओं से सात दिन तक पुष्कलसंवर्तक मेघादिको वरसाते रहे || १९ ॥ साग्या. (विज्जुयायित्ता ख्रिप्पामेव जुगमुलल मुट्ठियमाणमेत्ताहिं धाराहिं ओघमेघं सत्तरन्तं वासं वासिउं पवत्तायाविहोत्था) पछी तेथे विद्युते। शुभअवी ने हम शीघ्रताथी युग- मुसल, તેમજ સુષ્ટિ પ્રમાણ પરિમિત ધારાએથી સાત-દિવસ રાત સુધી પુષ્કલ પ્રમાણુથી સંવક મેઘાદિકાને વરસાવતા રહ્યા. ૫૧૯ા Page #788 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७७४ जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्र सारयधवलब्भरस्यणिगरप्पगासं दिव्यं छत्तरयणं महिवइस्स धरणियलपुण्णइंदो । तएणं से दिव्वे छत्तयणे भरहेणं रण्णा परामुट्ठ समाणे खिप्पामेव दुवालसजोयगाइं पवित्थरइ साहिआइं तिरिअं ॥ सू० २०॥ छाया-ततः खलु स भरती राजा विजयधावास्योपरि युगमुशलमुष्टिप्रमाणमिताभिः धारभिः ओघमेघ सप्तरात्रं बर्ष वर्षन्नं पश्यति, दृष्ट्वा चमरत्नं परामशति, ततः खलु तन् श्रीवत्ससहशरूपं वेष्टको भणितच्या यावत् द्वाशयाजनानि तिर्यक प्रविस्तृणाति तत्र साधितानि. ततः खलु स भरतो सस्कन्धाधारबलं चर्मरत्नं दूरोहति दुरूह्य दिव्य छत्ररत्नं परामृशति, ततः खलु नवनवतिसहस्रकाचनशलाकापरिमण्डितम् महाहम् अयोध्यम् निर्वणसुप्रशस्तविशिष्टलष्ट भावनसुपुष्टदण्डम् मृदुराजतवृत्तलष्टाऽरविन्दकणिका समानरूपं घस्तिप्रवेशच्च पजरविराजितं बिविधभक्तिचित्र मणिमुक्ताप्रवालतप्ततपनीयपञ्चणिक धोतरत्नरूपरचितरत्तमरीचिसमर्पणाल्पकरानुजतं राजलक्ष्मीचिह्नम् अर्जुनसुवर्णपाण्डुरप्रत्यवस्तृतपृष्ठदेशभागं तथैव तपनीय पधम्मायमानारगतम् अधिक सश्रीकं शारदरजनिकरविमल अन्तिपूर्णचन्द्रमण्डलपमानरूपम नरेन्द्र व्यायामप्रमाणप्रकृतिविस्तृतं कुमुदसडधवलं राज्ञः संचारिमं सुगतपवालवृदोषागां च क्षयफरम् तपोगुणैः लब्धम् अहतं बहुगुणदानम् ऋतुविपरोत सुखकृतच्छायम् छत्ररत्नं प्रधानं सुदुर्लभमल्पपुण्यानाम्।।१।। प्रमाणराज्ञां तपोगुणानां फलैकदेश नारा विमानवासेऽपि दुर्लभतरं प्रलम्बितमाल्यदामकलापं शारदधवलाभ्ररजनि करप्रकाशं दिव्यं छ रत्नं भरतेन राज्ञा परामृष्टं सत् क्षिप्रमेव द्वादशयोजनानि साधिकानि तिर्यक् प्रविस्तृणाति ॥सू० २०॥ टीका- “तएणं से भरहे" इत्यादि । 'तएणं से भरहे राया उषि विजयक्खंधावारस्त जुगमुसलमुट्टिप्पमाणमेत्ताहिं धाराहि ओघमेघं सत्तरत्तं वासं वासमाणं पासई ततो दिव्यवर्षानन्तरं खलु स भरतो राना विजयस्कन्धावारस्य स्वसैन्यानिकस्योपरि युगमुशलमुष्टिप्रमाणे मिताभिः धाराभिः सप्तरात्रं सप्तरात्रिप्रमाणकालेन वर्ष वर्षन्तम् ओघइस अवसर पर महाराजा भात ने क्या किया इसका कथन टीकार्थ-( तएणं से भरहे राया उधि विजयखंधावारस जुगमुसलमुट्ठिप्पमाणमेत्ताहिं धाराहि ओघमेधं सत्तरत्तं वासं वासमाणं पासइ) जब भरत महारा माने अपने विजय स्कन्धावार निवेश के ऊपर युग, मुशल एवं मुष्टि प्रमाण परिमित धाराओं से पुष्कल संवर्तक अधिकार में कथित वरसा के माफिक सात दिन रात तक बरसते हुए मेवों को देखा तो (पासित्ता એ સમયે ભરત નરેશે શું કર્યું—એ સંબંધમાં કથન टीकार्थ-(तएणं से भरहे राया उवि विजयवंधावारस्स जुगमुसलमु दुप्पमागमेत्ताहिं धाराहि ओघमेधं सत्तरत्तं वासं वासमाण पासइ) यारे भ२२० मे पोताना विसय ४धावा२ના નિવેશ ઉપર, મુશલ તેમજ મુષ્ટિ પ્રમાણ પરિમિત ધારા એધી પુષ્કલ સંવતક અધિકારમાં थित वृष्टि भुन सात-विस रात सुधी परसता मेघा ने यता (पासित्ता चम्मरयणं Page #789 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० २० वर्षावर्षणा तरीय भरतकार्यविवर्णनम् ७७५ मेघ-मुशलधार वृष्टिप्रदमेव पश्यति 'पासित्ता चम्मरयणं परानुसइ' दृष्ट्वा चर्मरत्नं परामृशति स्पृशति गृहाति 'तरणं तं सिरिवच्छसरिसरूवं वेढो भाणियच्वो जाव दुबालसजोयणाई तिरियं पवित्थरइ तत्थ साहियाई' ततः परामर्शानन्तरं खलु श्रीवत्ससदृशरूपं तत् चर्मरत्नं 'act' वेष्टकः वस्तुमात्रविषयको भणितव्यो यावत् द्वादशयोजनानि तत्र साधिकानि ति र्यक् प्रविस्तृणाति 'तणं से भरहे राया सक्खंधारबले चम्मरयणं दुरूहइ' ततः खलु स भरतो राजा सस्कन्धावारबलः चर्मरत्नं दुरोहति 'दुरूहित्ता दिव्वं छत्तरयणं परामुस' दुरुह्य दिव्यं सहस्त्रदेवाधिष्ठितं छत्ररत्नं परामृशति स्पृशति अथ कीदृशं छत्ररत्नमित्याह'तरणं णवण उइ सह सकंचन सलागपरिमंडियं' ततः खलु नवनवतिसहस्रकाञ्चनशलाका परिमण्डितम्, तत्र नवनवतिसहस्रप्रमाणाभिः काञ्चनमयशलाकाभिः परिमण्डितम्, तथा 'महरियं' महाघं बहुमूल्यकं तथा 'अउज्झं' अयोध्यम्-अस्मिन् दृष्टे सति नहि विपक्षभटानां शस्त्रमुत्तिष्ठते इतिभावः पुनः कीदृशं तत् 'णिव्वणसुपसत्यविसिट्ठलट्ठकंचणसुपुट्ठदंड' निर्वणसुप्रशस्त विशिष्टलष्टकाञ्चनसुपुष्टदण्डम् तत्र निर्व्रणः छिद्रादिदोषरहितः सुप्रशस्तः चम्मरयणं परामुसइ ) देखकर उसने चर्मरत्न को उठाया - ( तरणं तं सिविच्छसरिसरूवं वेढो भाणिsat ० ) इस चर्मरत्न का रूप श्रीवत्स के जैसा होता है. इसका वेष्टक वर्णन जैसा पहिले किया गया है वैसा हो यहां पर भी कर लेना चाहिए- यावत् उसने इस चर्मरत्न को कुछ अधिक १२ योजन तक तिरछे रूप में विस्तृत कर दिया - फैलादिया बिछादिया (एणं से भर राया सखंधावारबले चम्मरयणं दुरूहइ दुरुहित्ता दिव्वं छत्तरयणं परामुसइ) इसके बाद भरत महाराजा अपने स्कन्धावाररूपबल सहित उस चर्मरत्न पर चढ गया और चढ़ करके फिर उसने छत्ररत्न को उठाया - (तएण णवणउइ सहरसकेचणस लागपरिमंडियं महरियं अउज्झ णिव्वणसुपसत्यविसिट्ठलट्ठकंचणसुपुट्ठदंड) यह छर्म न ९९ नन्नाणु हजार काश्चन शलाकाओं से परिमण्डित था । बहुमूल्य वाला था, इसे देख लेने पर विपक्षके भटोके शस्त्र फिर उठते नहीं थे ऐसा यह अयोध्य था, निर्व्रण था, छिद्रादि दोषों से रहित था - समस्त लक्षणों से युक्त होने के कारण सुप्रशस्त था। विशिष्टलष्ट - मनोहर था । अथवा - इतना बड़ा छत्रदुर्वह हो परामुस) लेने तेथे उपाउयु (त एणं तं सिरियच्छसरिसरुवं वेढो भाणियव्वो०) ये यर्भरत्ननु ३ श्रीवत्स ने डाय छे. योना वेष्ट विषे पडेलां ने प्रमाणे વન કરવામાં આવ્યુ છે તે પ્રમાણે જ અહી સમજી લેવુ જોઈએ. ચાવત્ તેણે તે ચમ रत्नने अधि १२ रन सुधा त्रासां इमां विस्तृत ४री हीधु (तपणं से भरहे राया सबंधावारबले चम्मरयणं दुरुह दुरुहिता दिव्वं छत्तरयणं परामुस) त्यामा ભરતરાજા પેાતાના સ્કન્ધાવાર રૂપ ખલ સહિત તે ચરત્ન ઉપર ચઢી ગયા અને ચઢીને पछी ते यर्म रत्नने 58व्यु (तपणं णवण उइसहस्सकं वासलागपरिमंडियं महरिहं अविणसुपसत्य विसिट्ठलट्ठकं बणसुपुट्ठदडें) से छत्ररत्न ८ नव्वाणु हुन्नर अंथन शब्दा કાએથી પરિમડિત હતુ. બહુ મુલ્યવાન હતુ, અને જોયા બાદ વિપક્ષના ભટેના શસ્ત્રા ઉંતા નથી. એવુ' એ આયામ હતું, નિર્માંણુ હતુ છિદ્રાદિ દોષાથી એ રહિત હતું સમસ્ત Page #790 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सर्वलक्षणोपेतत्वात् विशिष्टलष्टः मनोहरः यद्वा विशिष्टः अति भारतया एकदण्डेन दुर्बहत्वात् प्रतिदण्डसहितः ईदृशच्चयो लष्टः काञ्चनमयः सुपुष्टोऽतिभारसहस्रत्वात् दण्डो यत्र तत्, तथा, तथा 'मिउरायय वह लट्ठ अरविंदकण्णियसमाणरूवं' मृदुराजत वृत्तलष्टारविन्द - कर्णिका समानरूपम्, तत्र मृदु कोमलं घृष्टमृष्टत्वात् राजतं रजतसम्बन्धि वृत्तलष्ट यदरविन्दं तस्य कर्णिका बीजकोशस्तेन समानं श्वेतत्वान्तत्वाच्च रूपम् आकाशे यस्य तत्तथा, तथा 'fore से पंजरविराइयं' वस्तिप्रदेशे पञ्जरविराजितम् वस्तिप्रदेशो नाम छत्रमध्यभागवत दण्डप्रक्षेपस्थानरूपः तत्र पञ्जरेण पञ्जराकारेण विराजितम् चः समुच्चये तथा ' विविभत्तिचित्तं' विविधभक्तिचित्रम्, तत्र विविधाभिः भक्तिभिः विच्छित्तिभीरचना प्रकारैश्चित्रं चित्रकर्म यत्र तत् तथा पुनश्च कीदृशम् ' मणिमुत्तपवालतत्ततवणिज्ज पंचवणियधोयरयणरूवरइयं' मणिमुकाप्रवाळतप्ततपनीय पञ्चवर्णिकधौतरत्नरूपरचितम्, तत्र मणयः- चन्द्रकान्तादयः मुक्ताप्रवाले प्रसिद्धे तप्तं मृोत्तीर्ण यत्तपनीयं रक्तसुवर्णं पञ्चवर्णिकानि शुक्लनीलादिपञ्चवर्णयुक्तानि धौतानि शाणोत्तारेण दीप्तिमंति जाने के कारण एक दण्ड के द्वारा धारण योग्य नहीं हो सकता है इसलिये एक एक दण्डेवाला होने से यह विशिष्ट ष्ट था । इसमें जो दण्ड लगे हुए थे वे अति भार सहनेवाले होने के कारण अति सुपुष्ट थे और सुवर्णनिर्मित थे. मिउराययव लट्ठ अरविंद कण्णिअसमाणरूवं ) यह छत्र ऊँचा और गोल था- इसलिये इसका आकार चांदी के बने हुए मृदु गोल कमल की कर्णिका के जैसा था ( बस्थिपए से अ पंजरविराइयं ) यह बस्ति प्रदेश में जिसमें दण्ड पोया हुआ रहता है उस बस्ति प्रदेश में अनेक शलाकाओं से युक्त हो जाने के कारण पंजर के जैसा - पीजरे के जैसा प्रतीत होता था. ( विविह भत्तिचित्त ) इस छत्र में अनेक प्रकार के चित्रों की रचना ही हो रही थी उससे यह बड़ा सुहावना लगता था. (मणिमुत्तपवालतत्ततवणिज्ज पंचवण्णियधोयरयणरूवरइयं ) इसमें पूर्णकलशा दिरूपमङ्गल्य वस्तुओं के जो आकार बने हुए थे वे चन्द्रद्रकान्त आदि मणियों से, मुक्ताओं से, प्रवालों લક્ષણેાથી યુક્ત ડાવા બદલ એ સુપ્રશસ્ત હતુ. વિશિષ્ટ લષ્ટ મનેહર હતું અથવા આટલું વિશાલ છત્ર દુહુ થઇ જવાથી એક દંડ દ્વારા ધારણુ ચાગ્ય ન હેાતું, એથી એ અનેક દંડવાળુ હાવાથી એ વિશિષ્ટ લષ્ટ હતું. એમાં જે દંડા હતા તે અતિભારને ખમી શકતા होवाथी अति सुयुष्ट हता भने सुवास निर्मित ता. (मिउराययवट्ट लट्ठ अरविंदकण्ण असमाणरूवं) मे छत्र उन्नत ने गोण तु. मेथी सेना आधर यांहीयी निर्मित भृगोज भजनी व हुतो. (वत्थिपरसे अ पंजरविराइओ) से वस्तिप्रदेशमां प्रेम ४'s પરાવવામાં આવે છે, તે વસ્તિ પ્રદેશમાં અનેક શલાકાએથી યુક્ત હાવાથી પાંજરા જેવું साग तु (विविदभत्तिचित्त ) मे छत्रमनेारना चित्रानी रचना १२वामां भावी हुती. मेथी में अतीव सोडा सागतु तु. ( मणिमुत्तपवाल तत्त तवणिज्जपंचबण्णियधोयरयणरूवरहयं) मां पूर्ण शाहि ३५ भांगण वस्तुमोना ने सारे। मनेबा છે તે ચન્દ્રકાંત વગેરે મણિમેં થી મુક્તાએથી, પ્રવાલેથી તપ્ત સંચામાંથી બહાર કાઢેલા ७७६ Page #791 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७७७ प्रकाशिका टीका तृ०३वक्षस्कारः सु० २० वर्षावर्षणानन्तरीय भरतकार्य विवणनम् कृतानि रत्नानि प्राग् वर्णितस्वरूपाणि तैः रचितानि रूपाणि पूर्णकलशादि चत्वारि महा माङ्गल्य वस्तुनामाकाराः यत्र तत्तथा, मूळे रचितशब्दस्य पदव्यत्ययः प्राकृतत्वात्, तथा ' रयणमरीई समोपणा कप्पकारमणुरंजिएल्लियं' रत्नमरीचिसमर्पणाकल्पकारानुरञ्जितम् तत्र रत्नानां चन्द्रकान्तादि मणीनां मरीचि अतुलतेजः प्रभा तस्या: समर्पणा समारचना तस्यां कल्पकाराः विधिकारिणः परिकर्मकारिण इत्यर्थः विशिष्टशोभाकारिणः तैरनुसम्प्रदाक्रमं रञ्जितं यथोचितस्थाने रङ्गदानात् मकारोऽलाक्षणिकः तथा 'रायलच्छिचिंधं' राजल क्ष्मीचिन्हयुक्तम्' अज्जुण सुवण्णपंडुरपच्चत्थु अपट्टदेयभागं' अर्जुन सुवर्ण पाण्डुरप्रत्यवस्थित पट्टदेशभागम् ' तत्र अर्जुनाभिधेयं नामकं यत्पाण्डुरसुवर्ण तेन प्रत्यवस्थितः - आच्छादितः पृष्ठभागो यस्य तत्तथा, पाण्डुरशब्दस्य पदव्यत्ययः प्राकृतत्वात् ' तदेव तवणिज्जपट्टधम्मंत परिगयं' तथैव तपनीयपट्टमायमानपरिगतम्, तत्र तथैव विशेषणान्तरप्रारम्भे धमायमानं तत्कालध्मानं तत्कालतापितं यत्तपनीयं सुवर्ण तस्य पट्टः तेन परिगतं परिवेष्टितम् चतु पि प्रान्तेषु रक्तसुवर्णपट्टा योजिताः सन्तीतिभावः अत्र ध्मायमानशब्दस्य पदव्यत्ययः प्राकृतत्वात् अत एव 'अहिय सस्सिरीयं' अधिक सश्रीकम् - बहुशोभा सम्पन्नम्, तथा 'सारयरयणियरविमलप डिपुण्णचंद मंडल समाणरूवं' शारदरजनिकर विमलप्रतिपूर्णचन्द्रमण्डलसमानरूपम्, तत्र शारदः शरत्कालिको यः रजनिकरः चन्द्रः तद्वद्विमलं निर्मलम् अतएव प्रतिपूर्णचन्द्रमण्डलसमानरूपं शारद्यपूर्णिमावदुज्ज्वलं ततो विशेषणसमासः 'णरिंदवाममाणपगइ वित्थडं' नरेन्द्रव्यामप्रमाण प्रकृतिविस्तृतम्, तत्र नरेन्द्रः भरतस्तस्य व्यामः से, तप्त - सांचे में से निकले गये सुवर्ण से एवं शुक्ल नीलपीत आदि पंचवर्णों से तथा शाण पर कसकर दीप्ति शाली किये गये रत्नों से बनाये हुए थे. ( रयणमरीई समोपणा कप्पकारमणुरंजिएल्लियं ) इसमें जगह जगह रत्नों की किरणों की रचना करने में दक्ष पुरुषों से क्रमशः रंग भरा हुआ था. (रायलच्छिचिधं, अज्जुणसुवण्ण पंडुरपच्चत्यपट्टदेसभागं ) राजलक्ष्मी के इस पर चिन्ह अंकित थे अर्जुन नाम के पाण्डुर स्वर्ण से इसका पृष्ट देश आच्छादित था ( तदेव तवणिज्ज पधम्मंत परिगयँ ) इसी तरह यह चारों कोनों में रक्तसुवर्ण पट्ट से नियोजित किया हुआ था । ( अहियसस्सिरीयं ) अतएव यह बहुत अधिक सुन्दरता से युक्त बना हुआ था । ( सारयस्यणि अर विमल डिपुण्णचंद मंडलसमाणरूवं ) સુવ થી તેમજ શુનીલ આદિ પાંચ વર્ઘાથી તેમજશાણુ ઉપર ઘસીને દીમિશાલી બનાવે या रत्नोथी मनावेला हुता. (रयण मरीई समोवणाकप्पकार मणुरंजिवल्लिअं) मां रत्नानी કિરણેાની રચના કરવામાં કુશળ પુરુષાથી સ્થાન-સ્થાન ઉપર ક્રમશઃ ર'ગભરેલેા હતેા. (रायलच्छिचिंध अज्जुण्णसुवण्णपंडर पच्चत्थुयपट्टदे सभागं) राक्ष्मीना એની ઉપર ચિહ્નો અંકિત હતાં. અર્જુન નામક પાંડુર સ્વર્ણથી એને પૃષ્ઠ ભાગ સમાચ્છાદિત હતા. ( तहेव तवणिज्जपट्टधम्मंत परिगयं) मा प्रमाणे मे ચારે ચાર ખૂણાઓમાં રકત-સુવ पट्टथी नियोजित ४२वामां आवे तु. ( अहिय सहिसरीयं) मेथी मे भतीत्र सौन्दर्य युक्त मने तु ( सारयरयणिअर विमल पडिपुण्णच दमण्डलसमानरूवं ) शराबी ९८ Page #792 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७७८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तिर्यक् प्रसारितोभयबाहुप्रमाणो मानविशेषस्तेन प्रमाणेन प्रकृत्या स्वभावेन विस्ततम् तथा 'कुमुदसंडधवलं' कुमुदखण्डधवलम् तत्र कुमुदानि-चन्द्रविकाशीनि श्वेतकमलानि तेषां षण्डो वनं तद्वत् धवलम् 'रण्णो संचारिमं विमाणं' राज्ञो भरतस्य 'संचारिमं त्ति' सश्चरणशीलं जङ्गमं विमानम् आश्रयिणां सुखावहत्वात् तथा 'सूरातववायवुट्टिदोसाणय. खयकर सूरातपवातवृष्टिदोषाणां च क्षयकरम्, तत्र सूरातपवात वृष्टयः प्रसिद्धास्तासां ये दोषास्तेषां क्षयकरम्, एतच्छत्रच्छायसमाश्रितानां हि विषादि दोषा अपि न प्रभवन्तीतिभावः. 'तव गुणेहिं लद्धं' तपोगुणैः-पूर्वजन्माचीर्णतपोगुणमहिम्ना लब्धं भरते नेति, अथ गाथा प्रबन्धेन विशेषणान्याह-सूत्रकार: अहयं बहुगुणदाणं उऊण विवरीय सुहकयच्छायं । छत्तरयणं पहाणं सुदुल्लहं अपपुण्णाणं ॥१॥ छाया- अहतं बहुगुणदानम् ऋतूनां विपरीतसुखकृतच्छायम् । छत्ररत्न प्रधानं सुदुर्लभमल्पपुण्यानाम् ॥१॥ शरत्कालीन विमल प्रतिपूर्ण चन्द्रमण्डल के जैसा इसका रूप था। (णरिंदवामप्पमाण पगइवित्थडं) इसका स्वाभाविक विस्तार-नरेन्द्र भरत के द्वारा फैलाये गये दोनों हाथों के बराबर था। साधिक द्वादशयोजन का जो प्रमाण इसका कथन किया गया है वह कारण पाकर यह इतना अधिक फैल जाता है। इस अपेक्षा कहा गया है । ( कुमुदसंडधवलं, रण्णो संचामिबिमाणं सूगतववायवुट्ठिदोसाणं य खयकरं तवगुणेहिलद्धं-अहयं बहुगुणदाणं उऊण विवरीय सुहकयच्छायं) कुमुद के वन के जैसे धवल था महाराजा भरत का यह संचरणशील विमान स्वरूप था सूर्य ताप वात और वृष्टि के दोषों का वि- शक था. अथवा-सूर्यताप वात और वृष्टि का एवं विषादि जन्य दोषों का यह विनाश करने वाला था. क्योंकि इसको छाया में आश्रित हुए प्राणियों के विषादिजन्य सब दोष शान्त हो जाते हैं. वे कुछ भी अपना प्रभाव नहीं दिखा सकते हैं. भरत ने इसे पूर्वजन्म में आचरित किये गये तपोगुण के प्रभाव से लब्ध विमल प्रतिपू यन्द्रमा मेनु ३५ तुं (णरिंदवामप्पमाणपगइवित्थड) अना સ્વાભાવિક વિસ્તાર નરેન્દ્રભરત વડે પ્રસત બન્ને હાથની બરાબર હતું. સાધિક દ્વાદશ જ નન જે પ્રમાણ છત્ર ન વિષે થન કરવા માં આવેલ છે તે કારણ ઉપસ્થિત થતાં જ એ माटर वि.01 यई तय छे. ये अपक्षास ४ामा मावत छ. (कुमुदसंबुधवलं रणो संचारिमं विमाणं सूरातवधायवुट्टिदोसण्ण य खयकरं तबगुणेहिलद्धं महयं पहुगुण दाणं उऊण विवरीय सुहकयच्छायं) मुहवन से घर तु. २० भरतन सय. રણશીલ વિમાનસરૂપ હતું. સૂર્યતાપ, વાત અને વૃષ્ટિના દોષોનું એ વિનાશ કરનાર હતું અથવા સૂર્યતાપ, વાત અને વૃષ્ટિને તેમજ વિષાદિજન્ય દેને એ વિનષ્ટ કરનાર હતા. કેમકે એની છાયામાં આશ્રિત થયેલાં પ્રાણીઓના વિષાદિ જન્ય સવદોષ શાન્ત થઈ જાય | ૯૫માત્રામાં પણ પોતાને પ્રભાવ બતાવી શકતા નથી, ભરતે એને પૂર્વજન્મમાં અચરિત કરવામાં આવેલા તપગુણના પ્રભાવથી ઉપલબ્ધ કરેલું છે. પોતાની જાતને વિશિષ્ટ Page #793 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ट ३वक्षस्कारः सु० २० वर्षावर्षणानन्तरीय भरतकार्यविवर्णनम् ७७९ तत्र अहतं न केनापि रणे खण्डितम् तथा बहुगुणदानं बहूनां गुणानाम् ऐश्वर्यादीनां दानं यस्मै तत्तथा, तथा ऋतूनां विपरीतसुखकृतच्छायम्, ऋतूनां हेमन्तादीनां विपरीता अथवा षष्ठी षष्ठ्याः पञ्चम्यर्थे व्याख्यानेन ऋतुभ्यो विपरीता उष्णत शीता शीतत उष्णा अतएव सुखकृता कृतसुखा सुखदायिनी छाया यस्य तत्तथा, सूत्र क्तान्तस्य परनिपातो 'जातिकालमुखादेर्नवेत्यनेन सूत्रेण विकल्पविधानात् एतादृशं छत्ररत्नम् छत्रेषु उत्कृष्टं प्रधानं छत्रगुणोपेतत्वात् छत्रेषु ये शुभगुणाः तैः युक्तत्वात् पुनः कीदृशम् सुदुर्लभम् अल्पपुण्यानाम् विशिष्टपुण्यरहितानाम् ॥ १॥ ' पमाण राईण तवगुणाण फलेगदेसभागं विमाणवासे वि दुल्लहतरं पुनः कीदृशम् प्रमाणराज्ञां तपोगुणानां फलैकदेशभागं विमानवासेऽपि दुर्लभतरम्, तत्र प्रमाणराजानाम् स्वस्वकालोचितशरीरप्रमाणोपेतराज्ञाम्, तपोगुणानां फलैकदेशभागम् अयमर्थः- चक्रेाधिपपूर्वार्जितम् तपसां फलं सर्वस्वं नवनिधानचतुर्दशरत्नादिषु विभक्तं तस्मात्कारणात् तदेकदेशभूतमिदं छत्ररत्नं विमानकिया है. अपने आपको विशिष्ट योधा माननेवाला कोई भी रणवीर इसे रण में खण्डित नहीं कर सकता है यही बात सूत्रकार ने अहत पद द्वारा प्रकट की है. अनेक ऐश्वर्य आदिगुणों का यह दाता है. इसके धारण करनेवाले को शीतकाल ऋतु जैसा सुख प्राप्त होता है. ( छत्तरयणं पहाणं सुदुल्लई अप्पपुण्णाणं) ऐसा यह प्रधान छत्ररत्न अल्पपुण्यवाले जीवों को प्राप्त नहीं होता है ( पमाण राईण तवगुणाण, फलेगदेसभागं विमाणवासे वि दुल्लहतरं वग्घारियमल्लदामकलावं सारयधवलब्भरयणिगरपगासं दिव्वं छत्तरयणं महिवइस्स धरणिअल पुण्दो ) अपने-अपने काल के अनुसार शरीर प्रमाणोपेत राजाओ के तपोगुणों का यह एक प्रकार का फल माना गया है. तात्पर्य कहने का यह है कि चक्र के अधिपतिओ द्वारा जो पूर्व में तपस्याएँ को जाती है. उनका फत्र नौनिधि एवं चौदह रत्नादिक के रूप से विभक्त हो जाता है-अर्थात् चक्रवर्तियों को नौनिधियां एवं चौदहरत्न प्राप्त होते हैं उन रत्नों में यह छत्र भी एक रत्न माना गया है. ऐसा यह छत्ररत्न विमानो में वास करनेवाले ચેન્દ્વામાનનાર કોઈ પણ રણવીર અને રણમાં ખંડિત કરી શકતા નથી. સૂત્રકારે એજ વાત 'आहत' यह वडे अडेंट मेरी छे ने श्वय वगेरे गुणाने मे आपना३ ४. मेने धार કરનારને શીતકાળમાં ઉષ્ણુ ઋતુની જેમ અને ઉષ્ણુ ઋતુમાં શીત ઋતુની જેમ સુખ પ્રાપ્ત थाय छे, (छत्तरयणं पहाणं सुदुल्लाहं अध्यपुण्णाणं) मेवुं मे प्रधान छत्ररत्न आप एयोध्य वाणा वात्माने प्राप्त धतु नथी. (पमाणराईण तव गुणाण फलेगदेमभागं वमाणवासे वि दुल्हनरं वग्वारियमल्लदामकलावं सारय धवलव्भरयणिगरपगासं दिव्वं छत्तरयणं महिवरल धूरणिअलवण्णइंदो) पोतपोताना अणु भुष शरीर प्रभावित राज्योना તપેાગુણાનુ એ એક જાતનુ ફળ માનવામાં આવે છે. કહેવાનું તાય આ પ્રમાણુ છે કે ચક્રના અધિપતિએ વડે જે પૂ'માં તપસ્યાએ આચરવામાં આવે છે, તેમન' ફળ નવનિધ અને ચતુર્દેશ રત્નાદિકના, રૂપમાં વિભક્ત થઈ જાય છે. એટલે કે ચક્રવતી ને નવનિધિ આ અને ચતુ શ રત્ના પ્રાપ્ત થાય છે તે રત્નામાં એ છત્રને પણ એક રત્ન-માનવામાં આવે Page #794 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८० जम्बुद्वीपप्रज्ञाप्तिसूत्रे वासेऽपि देवत्वेऽपि दुर्लभतरम् , तत्र चक्रवर्तित्वस्यासम्भवात् , तथा 'वग्धारिश्रमल्लदामकलावं' प्रलम्बितमल्लदामकलापम् तत्र 'वग्यारिअ ति' प्रलम्बितो लम्बमानार्थवाचकः लम्बतयाऽवलम्बितो माल्यदाम्नां पुष्पमालानां कलापः समूहो यत्र तत्तथा, सर्वतः पुष्पमालावेष्टित इत्यर्थः, तथा- 'सारय धवलब्भरयणिगरप्पगासं' शारदधवलाभ्ररजनिकरप्रकाशम्, तत्र शारदानि- शरत्कालिकानि धवलानि अभ्राणि वाईलानि तद्वत् प्रकाश:उद्योतो यस्य तत्तथा 'दिव्यं छत्तरयणं महिवइस्स धरणियलपुण्णइंदो' पूर्वोक्त सर्वविशेषणविशिष्टम् दिव्यं सहस्त्रदेवाधिष्ठितं छत्ररत्नं महीपतेः भरतस्य धरणितलस्य पूर्णेन्दुरिव- पूर्णचन्द्र इव पूर्णेन्दु वर्तते । 'तएणं से दिव्वे छत्तरयणे भरहेगं रण्णा परामुट्टे समाणे खिप्पामेव दुवालसनोयणाई पवित्थरइ साहियाई तिरिअं' ततः खलु तत् दिव्यं छत्ररत्नं भरतेन राज्ञा परामृष्टं स्पृष्टगृहोतं सत् क्षिप्रमेव द्वादशयोजनानि अष्टाचत्वारिंशत् क्रोशान् साधिकानि तिर्यक् प्रविस्तृणाति, साधिकत्वं परिपूर्णचर्मरत्नपिधायकत्वेन, अन्यथा किरातकृतवृष्टयुपद्रवः स्वसैन्यस्य दुर्वारः स्यादिति । सू० २०॥ अथ छत्ररत्न प्रविस्तरणानन्तरं भरतो यत् कृतवान् तदाह- "तए णं से” इत्यादि। देवों को अत्यन्त दुर्लभ कहा गया है. क्योंकि वहां पर चक्रवर्तित्व पद को प्राप्ति होती नहीं मानी गई है, यह छत्ररत्न पुष्पों की मलाओं से युक्त रहता है-अर्थात् इसके ऊपर चारों ओर लम्बो २ पुष्यों की मालाएं लटकती रहतो हैं। इसका उद्योत शरत्कालिक धवल मेघ के- जैसा तथा शरत्काक्षि चन्द्र के जैसा है. ऐसा यह पूर्वोक विशेषणेवाला छत्र रत्न महोपति राजा का, ऐसा प्रतीत होता था कि मानो यह धरणितक का पूर्णचन्द्रमण्डल ही है । इस छत्ररत्न को रक्षा करनेवाले एक देव होते हैं । (तएणं से दिवे छत्तरयणे भरहेणं रण्णा पररामु समाणे खिपामेव दुवाल सनोयगाई पवित्थरइ साहियाई तिरियं) जब भरत राजा ने इस छत्र को छुआ-जो शोध हो कुछ अधिक १२ योजन तक तिरछे रूपमें विस्तृत हो गया -ऊपर तन गया-स०२०॥ छत्ररत्न के विस्तृतहो जाने के बाद भरत ने क्या किय इसका वर्णनછે. એવું એ છત્રરત્ન વિમાનમાં વાસ કરનાર દેવને પણ અત્યંત દુર્લભ કહેવામાં આ વેલ છે. કેમકે દેવોને ચક્રવતિપદની પ્રાપ્તિ થતી નથી ત્યાં એ છત્રરત્ન પુષ્પમાળાઓથી મુક્ત રહે છે એટલે કે એની ઉપર મેર લાંબી-લાંબી પુષ્પોની માળાઓ લટકતી રહે છે એને ઉદ્યોત શરત્ કાલિક ધવલ મે જે તથા શરત્ કાલિક ચન્દ્ર જે હોય છે, એવું એ પ્રત વિશેષણોવાળું મહીપતિ ભારતનું છત્રરતન એવું લાગતું હતું કે જાણે એ ધરણિ તલનું પૂર્ણ ચંદ્રમરડળ જ ન હોય. એ છત્રરત્નની રક્ષા કરનારા એક હજાર દેવો હોય છે, (तपणं से दिवे छत्चरयणे भरहेण रणा परामुढे समाणे खिप्पामेव दुवालसजोयणाई पबित्थरह साहियाई तिरियं) भरत २० मे से छत्रने २५ या तरतो વધારે ૧૨ યોજન સુધી વક્રાકારમાં વિસ્તૃત થઈ ગયું–ઉપર આચ્છાદિત થઈ ગયું છે Page #795 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कार सू० २१ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७८१ मूलम्- तएणं से भरहे राया छत्तरयणं खंधावारस्सुवरि ठवेइ, ठवित्ता मणिरयणं परामुसइ वेढो जाव छत्तरयणस्स वत्थिभागंसि ठवेइ, तस्स य अणतिवरं चारुरूवं सिलणिहि अस्थमंत मेत्त सालि जव गोहु ममुग्गमासतिलकुलत्थ सहिग निष्फावचणगकोदव कोत्थुमरिकंगुबरगरालग अणेग धण्णावरणहारिअग अल्लगमूलगहलिद्दलाउअतउसतुंबकालिंगकविट्ठ अंब अंविलिअ सव्वणिप्फायए सुकुसले गाहावइस्यणेत्ति सव्वजणवोस्सुअगुणे । तए णं से गाहावइश्यणे भरहस्स रण्णो तदिवसप्पइण्णणि'फाइअपूइआणं सव्व धण्णाणं अणेगाई कुंभसहस्साई उवट्ठवेंति, तए णं से भरहे राया चम्मरयणसमारूढे छत्तरयणसमोच्छन्ने मणिरयणकउज्जोए समुग्गयभूएणं सुहं सुहेणं सत्तरत्तं परिवसइ- ‘णवि से खुहाणविलिअंणेव भयं णेव विज्जए दुक्खं । भरहाधिस्स रण्णो खंधावारस्स वि तहेव ॥सू० २१॥ छाया- ततः खलु स भरतो राजा छत्ररत्नं स्कन्धावारस्योपरि स्थापयति स्थापयिस्वा मणिरत्नं परामृशति वेष्टको यात् छत्ररत्नस्य वस्तिभागे स्थापति, तस्य च अनतिवरं चाहरूपम् शिला नेहितार्थबमात्र शालि 'शिलानिहितास्तमयन्मित्रशालि' वा यावद् गोधूममुद्नापतिले कुलत्यषष्ठि कनिष्पावणककोद्रवकुस्तुम्भरो कङ्ग वाट्टरालकानेकधान्य वरण हरिनकार्द्रकमूलक हरिद्रालावुक त्रपुष तुम्बकलिङ्गकरित्थामाफ्लिक सर्व निष्पादकम् , सुकुशलं सर्वजनविश्रुतगुणम् । ततः खलु तत् गृहपतिरत्नं भरतस्य राज्ञः तद्दिवसप्रकीर्ण निष्पादित पूतानां सर्वधान्यानामनेकानि कुम्भसहस्राणि उपस्थापति, ततः खलु स भरतो राजा चरित्नसमारूढः छत्ररत्नसमवच्छन्न: मणिरत्नकृतोद्यातः समुद्भू त इव सुखं सुखेन सप्तररवं परिवसति नापि तस्य शुत् नव्यलोकं नैव भयं नैब विद्यते दुःखम्, भरताधिपस्य राज्ञः स्कन्धावारस्यापि तथैव ॥सू० २१॥ टीका- “तएणं से' इत्यादि । 'तए णं से भरहे राया छत्तरयणं खंधावारस्सुवरि ठवेइ' ततः खलु स भरतो राजा छत्ररत्नं स्कन्धावारस्य नियमितस्थानस्थित द्वादशयो _ 'तएणं से भरहे राया छत्तरयणं खंधावारस्मुवरि ठवेइ ' इत्यादि सूत्र -२१टीकार्थ-'तएणं से भरहे राया छत्तरयणं खंधावारस्सुवरि ठवेइ) इस तरह भरत महाराजा છત્રરત્ન વિસ્તૃત થયું ત્યાર બાદ ભરતે શું કર્યું–તે વિશે વર્ણન'तएणं से भरहे राया छत्तरयण खंधावारस्सुवरि ठवेइ' इत्यादि सूत्र-२१॥ टी --(तएणं से भरहे राया छत्तरयणं खंधावारस्सुवरि ठवेइ) प्रमाणे सतराये Page #796 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૭૮ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे जनावधिकसैन्यसमूहस्योपरि स्थापयति 'ठवित्ता मणिरयणं परामुसइ' स्थापयित्वा मणिरत्नं पगमृशति-स्पृशति गृह्णाति 'वेढो जाव त्ति' अत्र मणिरत्नस्य वेष्टको वर्णको यावदिति सम्पूर्णों वक्तव्यः पूर्वोक्तः, स च 'तोतं चउरंगुलप्पमाण' इत्यादिकः 'परामुसित्ता' परामृश्य 'छत्तरयणस्स वत्थिभागं ठवेइ' चर्मरत्नच्छत्ररत्न सम्पुटमिलननिरुद्ध सूर्यचन्द्राद्यालोके सैन्येऽहर्निशमुद्योतार्थ छत्ररत्नस्य वस्तिभागे अत्र वस्ति शब्देन अवयवरूपोऽर्थों गृह्यते तेन छत्रस्य अवयवविशेषे शलाकामध्यभागे मणिरत्नं स्थापयति, नन्वेवं सकलसैन्यानामवरोधे जाते सति कथं तेषां भोजनादि विधिरित्याशङ्कमानं प्रत्याह- गृहपतिरत्नं सर्वमत्र पानादिकं निष्पाद्य सर्वां भोजनव्यवस्थां करोतीति अग्रे ने जब अपने स्कन्धावार के ऊपर छत्ररत्न को तान दिया- तब इसके बाद उसने ( मणिरयणं परामुसइ) मणिरत्न को उठाया (वेढो जाव छत्तरयणस्स वस्थिभागंसि ठवेइ ) इस मणिरत्न का यहां सम्पूर्णवर्णकपाठ " तातं चउरंगुलप्पमाण" यहां तक जैसा पहले कहा गया है वैसा ही कहलेना चाहिए- उस मणिरत्न को उठा करके उसे उसने छत्ररत्न के वस्ति;भाग मेंशलाकाओं के मध्य में रखदिया क्योंकि चर्मरत्न- और छत्ररत्न के परस्पर में मिल जाने से उस समय सूर्य और चन्द्र का प्रकाश निरुद्ध हो गया था इसलिये सैन्य में अहर्निश प्रकाश बना रहे इस अभिप्राय से उसने मणिरत्न को छत्ररत्न की शलाकाओं के मध्य भाग में रखदिया ( तस्सय अणतिवरं चारुरूवं सिलणिहि अत्थमंतमेत्त सालि-जब गोहुम मुग्गमासतिल कुलस्थ मटिगनिम्फावणगकोदव कोथूभरिकंगुवरगरालग अणेगधण्णावरण हारिअग.अल्लग मूलगहबिलाउअत उस तुंबकालिंग कवि? अंव-अंबिलिअ सव्वणि फायए ) अब सूत्र कार चक्रवर्ती के सैन्य को भोजनादिविधि की व्यवस्था करने वाले गृहपतिरत्न के सम्बन्ध में यहां से यह कथन प्रभ करते हैं- इसमें ऐसा कहा गया हैं कि चक्रवर्ती के पास एक गृहपतिरत्न भी होता है यार पाताना २४ धावारनी ७५२ छत्ररत्न all el त्यारे तेरी (मणिरयण परामसइ) मशिन २०यु. (वेढो जाव छत्तरयणस्त वस्थिभागसि ठवेइ) मणिरत्न विश मही सप 8 'तोतं चउरंगुलप्पमाणं' मी सुधीरेम ४ामा मा०यु छ, तर સમજવું જોઈએ તે મણિરત્નને ઉઠાવીને તેણે તે મણિરતનના વસ્તિભાગમાં–શલાકાઓના મધ્યમાં મૂકી દીધું. કેમકે ચમેન અને છત્રરતનને પરસ્પર મળવાથી તે સમયે સૂર્ય અને ચન્દ્રને પ્રકાશ રોકાઈ ગયો હતો. એથી સિન્યમાં અહર્નિશ પ્રકાશ કાયમ રહે તે माटत महिनन छत्र२त्ननी सामाना मध्यभागमा भूटी हीथुतु. (तस्स य भणति बरं चारूरूवं सिलणिहि अस्थमंत मेत्तसालि जब गोहूम मुग्ग मास तिलकुलत्थ सद्विग निप्फाववणगकोदव को|भरिकंगुवरगरालग अणेगधण्णावरण हारिअगअल्लग मूलगालिदलाउअत उस तुंब कालिंग कवि अंवअंबिलिअ सव्वणिपफायए) હવે સત્રકાર ચક્રવતીના સૈન્યની ભેજનાદ વિધિની વ્યવસ્થા કરનાર ગૃહપતિ રનના બધમાં અહીથી કથન પ્રારંભ કરે છે. એ કથનમાં આ પ્રમાણે કહેવામાં આવ્યું છે કે ચક્રવતીની પાસે એક ગૃહપતિ રત્ન હોય છે અને એ રતનજ ચક્રવતીના વિશાળ સૈન્ય Page #797 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ पक्षस्कारः सु० २१ भरतसैम्य स्थितिदर्शनम् ७८३ वक्ष्यते तादृश गृहपतिरत्नस्यैव विशेषणानि दर्शयितुं प्रथममनतिवरं विशेषणं दर्शयन्नाह 'तस्स य अणतिवरं' इत्यादि, इदं च अनतिवरम् इत्यादि पदम् अग्रे वक्ष्यमाणगृहपति रत्नपदस्य विशेषणम् तथा च तस्य च भरतस्य अनतिवरम् - अतिवरम् - अतिप्रधानं वस्तु अपरं नास्ति यस्मात् तत्तथा सर्वोत्कृष्टमित्यर्थः तथा 'चारुरूवं' चारुरूपम् - प्रसिद्धम् अतीव सुन्दराकृतिकं गृहपतिरत्नं कतिविधानि अन्नानि निष्पादयति तत्राह - 'सिलणिहि अ अत्थमंत मेत्त सालि जवगोहूम मुग्गमा सतिल कुलत्थ सद्विगनिष्फावत्तणगको दवकोत्थं भरिकं गुबरगलग अगधण्णावरणहारिभग अल्लगमूलग हलिला अत उसतुंबकालिंग कविट्ठ अंब fare सव्व frontयए' शिलानिहितार्थ यन्मात्र 'अस्तमन्मित्र' वा शालि जव गोधूममुद्गमाष तिलकुलत्थषष्टिकनिष्पावचणककोद्रव कुस्तुम्भरीकङ 'बरग' बरट्ट रालकाने - कधान्यावरणहारित कार्यकमूल कहरिद्राऽलाबुक ऋषतुंबकलिङ्गकपित्थान इम्लिक सर्वनिष्यादकम्, तत्र शिला इव शिला अतिस्थिरत्वेन चर्मरत्नं तत्र निहितमात्राणाम् उत्तमात्राणां न तु लोकप्रसिद्ध भूमिखेटनप्रभृति कर्मसापेक्षाणाम् 'अत्थमंत त्ति' अर्थवतां प्रयोजनाथिनां भोजनादियोग्यानां शाल्यादीनां निष्पादकमित्यग्रे सम्बन्धः शाल्यादीनाम् 'अत्थमंतमेत्त त्ति' अस्तमयति मित्रे-सूर्ये सायंकाले इत्यर्थः, उभयत्र व्याख्याने सूत्रे और वही चक्रवर्ती के इस विशाल सैन्य के भोजनादिकी सुचारु रूपसे व्यवस्था करता है यह गृहपतिरत्न अनतिवर होता है इसके जैसा और कोई श्रेष्ठ नहीं होता अर्थात् यह सर्वोत्कृष्ट होता है तथा यह रूप में भी बड़ा ही सुन्दर होता है यह इतने प्रकार के अन्न को पकाता है "पैदा करता है जैसे "सिलणिहि " आदि यह पहिले प्रकट कर दिया गया हैं कि प्रातः काल तो चर्मरत्न पर अन्न बोया जाता और शाम को वह काट लिया जाकर खाने के योग्य बना दिया जाता है "सिणिहि अत्थमंतमेत्तसालि" यहां "शिलापद" से चर्मरत्न गृहीत हुआ है क्योंकि अतिस्थिर होने से वह शिला के जैसी एकशिला को मानलिया गया है इस चर्मरत्न पर ही वीज बोया जाता है जैसा कि लोक में भूमिका जोतना आदिरूप कार्य किया जाता है। ऐसा यहां कुछ भी नहीं किया जाता है यहां तो सिर्फ बीज उसमें डाला कि इतने ही માટે લેાજનાદિની સુવ્યવસ્થિત રીતે વ્યવસ્થા કરે છે. એ ગૃહપતિરત્ન અનતિવર હોય છે એના જેવું ખીજું કઈ પણ શ્રેષ્ઠ હતુ. નથી એટલે કે એ રત્ન સર્વોત્કૃષ્ટ હોય છે તેમજ એ રૂપમાં પણ અતીવ સુંદર હાય છે. એ એટલી જાતના અન્નાને પકાવે છે-ઉત્પન્ન કરે छे. भेभडे- 'सिलाणिहि' वगेरे मे मधां मन्नो विषे मे सुत्रमांक सां यर्या श्वामां આવી છે. એ આ પ્રમાણે રત્નની એ વિશેષતા છે કે સવારે એ ચરત્ન ઉપર અન્ય વાવ વામાં આવે છે અને સન્ધ્યાકાળે તેની લક્ષણી કરવામાં આવે છે અને તે લેાજન ચેાગ્ય થઈ लय छे. 'सिलाणिहि अत्थमंतमेत्तसालि" अहीं शिक्षा पहथी यर्भरत्न गृहीत थयेलु छे. કેમકે અતિસ્થિર હોવા બદલ અ શિલા જેવી એક શિલા માની લેવામાં આવી છે. એ ચમ્ રત્ન ઉપર જ ખી વાવવામાં આવે છે. જેમ લેાકમાં ભૂમિ વગેરે ને ખેડીને ખી વાવવામાં આવે છે, એવું કંઇ પણ અહી' કરવામાં આવતું નથી. એની ઉપર તે ખી નાખ્યું કે માટલાથી Page #798 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८४ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे पदव्यस्ययेन निर्देशः प्राकृतत्वात् प्रथमप्रहरे वपति द्वितीयप्रहरे सिंचति तृतीय प्रहरे परिपाचयति चतुर्थ प्रहरे निष्पादितमन्नपानादिकमुपभोगाय सर्वत्र प्रेषयतीतिभावः । तत्र शालयः यवाः हयप्रियाः गोधूमाः मुद्गाः माषास्तिलाः कुलत्थाः प्रसिद्धा एवं षष्टिकाः षष्टयहोरात्रैः परिपच्च्यमाना स्तन्दुलाः निष्पावाः धान्यविशेषाः वल्लाः चणकाः कोद्रवाः प्रसिद्धाः 'कोत्थु भरित्ति' कुस्तम्भों धान्यविशेषाः कङ्गयो धान्यविशेषाः बृहच्छिरस्काः 'वरग त्ति' वरहाः रालकाः धान्यविशेषाः अल्पशिरस्काः उपलक्षणात् मसूरादयोऽन्येऽपि धान्यभेदाः ग्राह्याः, अनेकानि धान्या इति धान्यापत्राणि वरणों वनस्पतिविशेषः तत्तत्राणि एतत्प्रभृतीनि यानि हरितकानि पत्रशाकानि मेघनादवास्तुलमात्र से वह सब फूल पक कर शामतक तैयार हो गया और फिर वह भोजन के योग्य बन गया इस तरह का यह सब काम गृहपतिरत्न के ही आधीन होता है यही वार "चर्मरस्ने च सुक्षेत्र इवोत्पाति दिवामुखे, सायं धान्यान्यजायन्तं गृद्रिरत्नप्रभावतः" इस श्लोक द्वारा हैमचन्द्राचार्य ने प्रकट की है यह गृहपतिरत्न इस चर्मरत्न पर प्रथम प्रहर में शालि आदि बीजों का वपन करता है द्वितोय प्रहर में उन्हें पानी देता है तृतीय प्रहर में उन्हें पकाता है और चतुर्थ प्रहर में निष्पादित उस अन्नादि सामग्री को उपभोग के लिये सर्वत्र सेना में भेज देता है जिस भनाज को यह गृहपतिरत्न निष्पादित करके भेजता है- उस अनाज के नाम इस प्रकार से हैं- शालि- धान्य- जिसमें से चावल तैयार होते हैं यव- जौ गोघूम- गेड, मुद्ग- मूंग मास- उड़द तिल- तिली- कुलत्थ- कुलथी, षष्टिक-६० अहोरात में पककर तैयार होनेवाला तन्दुल, निष्पाव- धान्यविशेष, वल्ल चणक- चना, कोद्रव- आदिवासियों का भोज्य- पदार्थ कोदों कुस्तुम्भरी- धान्यविशेष, कङ्गु- कावनी वरगस्ति- वरट्ठ, रालक अल्पशिरस्क उपञ्चक्षण से मसूर आदि और भी अनेक धान्यविशेष, वरणवनस्पतिविशेष, पत्रशाक आदिरूप हरितकाय, आर्द्रक- आदो, मूलक- मूली, हरिद्रा- हल्दी, अलाबुक- तूमड़ी જ સંધ્યાકાળ સુધી તે પાકીને તૈયાર થઈ ગયું અને પછી તે ભેજન માટે ગ્ય થઈ ગયા એ પ્રમાણેનું એ સર્વકાર્ય ગૃહપતિ રત્નને જ આધીન હોય છે. એ જ વાતचर्मरत्ने च सुक्षेत्र इवोत्पत्ति दिवामुखे । सायं धान्यान्यजायन्तं गृहिरत्न प्रभोवतः ॥ એ ક વડે આચાર્ય હેમચન્દ્ર પ્રકટ કરી છે. એ ગૃહપતિરત્ન એ ચમન ઉપર પ્રથમ પ્રહરમાં શાલિ ગેરે બીજોનું વપન કરે છે. બીજા પ્રહરમાં તેમને પાણીથી સિંચિત કરે છે. ત્રીજા પ્રહરમાં તેમને પકવે છે અને ચતુર્થ પ્રહરમાં નિષ્પાદિત તે અનાદિ સામગ્રી ને ઉપભોગ માટે સર્વત્ર સેનામાં મોકલી આપે છે. જે અન્ન ને એ ગૃહપતિરત્ન નિષ્પાદિત કરીને મોકલે છે, તે અન્નેના નામ આ પ્રમાણે છે-શાલિ ધાન્ય–જેમાંથી ચોખા તૈયાર थाय छे. यव-, धूम-ध, भु -भू, भाष-438, dिa-da, सत्य-सथी, पल्टि ૨૦ અહમાં પાકીને તૈયાર થનાર તન્દુલ, નિષ્પાવ-ધાન્ય વિશેષ, વલસૂણુક-ચણા, કેદ્રવ माहिवासी वनुम-sal, पुस्तुमरी-धान्यविशेष शु-४i॥ १२॥स्ति-१२४, शઅહ૫શિરસ્ક ઉપલક્ષણથી મસૂર વગેરે અનેક ધાન્યવિશેષે વરણુ-વનસ્પતિ વિશેષ, પત્રશાક Page #799 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सू० २१ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७८५ कादीनि, पूर्वं च कुस्तुम्भरीशब्देन धान्यभेदः संगृहीतः अनेकधान्यः वरणो वनस्पतिविशेषः इदानों तत्पत्राणां भक्ष्यत्वेन पत्रशाखेषु सङ्ग्रह इति न पौनरुक्त्यम् 'अल्लगमूलगहरिद्दत्ति' आर्द्रकहरिद्रे प्रसिद्ध मूलक हस्तिदन्तकम्, कन्दमूलशाके कथिते, अथ फळशाकान्याह-अलाबुकं तुम्बिः इति-कर्कटिक त्रपुशं तुम्बकं तुम्बिभेदः चिर्भटजातीयं तुम्बक लिङ्ग कपित्थाम्रा इम्लिकः प्रसिद्धाः इदमपि फलशाकोपलक्षणम् अलाबु तुम्बयोलम्बत्ववृत्तत्वकतो भेदः,सच तज्जातीयबीजकृत इति,सर्वशब्देन चोक्तातिरिक्तशाकादीनां संग्रहः, एतेषां शाल्यादीनां निष्पादकम् उत्पादक गृहपतिरत्नं गाथापतिरत्नमित्यर्थः कौटुम्बिक रत्नमित्यग्रे सम्बन्धः । ननु यदि गृहपतिरत्नम् अचिरक्रियया मन्त्रसंस्क्रियया धान्यादिक निष्पादयति तर्हि किं चर्मरत्ने बीजवपनेन ! तन्निरपेक्षतयैव तत् निष्पादयतुः तस्य दिव्यशक्तिकत्वादिति चेन्मैवम् इतरकारणकलापसंघटनपूर्वकत्वेनैव कारणस्य कार्यजनकत्वनियमात्, अतएव सूर्यपाकरसवतीकारा नलादयः सूर्यविद्यामहिम्ना रसवती परिपचन्तोऽपि तन्दुलसूपशाकवेपवारादि सामग्रोरपेक्षन्ते इति अतएव सन्तोपि चर्मरत्नादयो गौणककड़ी, त्रपुष, तुंबक- तूंमडा, लिङ्ग- मातुलिङ्ग, कपित्थ-कैंथ आम्र- आम, अंवलिक- इमली-याआंवला आदि इन सब पदार्थों को कन्दमूलशाकों को पत्रशाकों को फलशाकों को और भनाजों को यह गृहपतिरत्न उत्पन्न करता है इस गृहपतिरत्न को दूसरे शब्दों में गाथापतिरत्न. और कौटुम्बिकरत्न भी कहा गया है यहां ऐसी शंका हो सकती है कि जब यह गृहपतिरत्न बहुत ही शीघ्ररूप से मंत्रशक्ति के बलपर धान्यादिक निष्पन्न कर लेता है तो फिर चर्मरत्न पर बीज बोने की क्या आवश्यकता है वह तो विना चर्मरत्न के भी उन्हें उत्पन्न कर सकता है क्योंकि ऐसी ही उसकी दिव्यशक्ति है । उत्तर इसका ऐसा है कि कार्य का जो जनक होता है वह दूसरे कारण कलापों की संघटना पूर्वक ही विवक्षित कार्य का उत्पादक होता है यदि ऐसा न माना जावे तो सुर्यपाक रसवती बनाने वाले नलादिक संयविद्या के प्रभाव से रसवती को पकाते हुए भी तन्दूल- सूप दाल- आदि सामग्री माहि ३५ हरिताय, माद्र ४-मा, भू- भू रि -स.२, मामा -तूमडी, डी, अyष, तु४-भऽ1, G-भातु , पित्य-थ, मान-माभ, मल-मामी) આમળા વગેરે એ સર્વ પદાર્થોને કન્દમૂળ શાકેને, પત્રશાકને, ફળશાકને અને અનાજોને એ ગૃહપતિરત્ન ઉત્પન્ન કરે છે. એ ગૃહપતિરત્ન ને બીજા શબ્દમાં ગાથા૫તિરન અને કોબિકરત્ન પણ કહેવામાં આવે છે. અહીં એવી શંક્રા થઈ શકે કે જ્યારે એ ગૃહપતિરત્ન અતીવ શીધ્ર રૂપમાં મંત્રશક્તિના બળે ધાન્ય આદિ નિષ્પન્ન કરી લે છે તે પછી ચર્મર ઉપર વપિત કરવાની શી આવશ્યકતા છે. તે તે વગર ચરને પણ બી ઉત્પન્ન કરીને પકવી શકે તેમ છે. કેમકે એવી જ તેનામાં દિવ્ય શક્તિ છે. એને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે કાર્યને જે જનક હોય છે, તે બીજા કારણ કલાપોની સંઘટનાપૂર્વક જ વિવાક્ષત કાર્યોપાદક હોય છે, જે આ પ્રમાણે માનવામાં આવે નહિ તે પાક સવતી બ. નલાદિક સૂર્યવિદ્યાના–પ્રભાવથી રસવતીને પકવે છે છતાં એ તન્દ્રલ-સૂપ-દાળ વગેરે સામ ९९ Page #800 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८६ जम्बुद्वोपप्रतिसूत्रे कारणं भवन्ति गाथापतिरत्नस्तु प्रधानम् नहि प्रधानोऽप्रधानं तिरस्करोति किन्तु तत्सहकारेणैव कार्य करोति अर्थात् चर्मरत्नस्यैकदेशे बीजवपनं करोति तावतैव सकलकार्यस्य सिद्धिर्भवतीतिभावः । अतएव पुनः कीदृशम् 'सुकुसले' सुकुशलम् अतिनिपुणं निजकार्य - विधाविति 'गाहारयणे ति सञ्चजणवीस्सुअगुणे' गृहपतिरत्नमिति सर्वजन विश्रुतणम्, तत्र गृहपतिरत्नम् इति अमुना प्रकारेण सर्वजनेषु विश्रुताः विख्याताः गुणाः यस्य तत्तथा ईदृश विशेषणविशिष्टं गृहपतिरत्नं यदवसरोचितं कृतवान् तदाह - 'तरणं' इत्यादि । 'तणं से गाहावरयणे भरहस्स रण्णो तदिवस पइण्णणिष्फाइअइआणं सवण्णा अणेगाई कुम्भसहस्सा उबट्टवेइ" ततः चर्मरत्नच्छत्ररत्न सम्पुट संघटनानन्तरं खलु तद् गृहपतिरत्नं भरतस्य राज्ञः सएव दिवसस्तदिवसस्तस्मिन् प्रकीर्णकानाम् उप्तानां निष्पादितानां परिपाकदशाः प्रापितानां पूतानां निर्बुसीकृतानां सर्वधान्यानाम् अनेकानि 'कुम्भसहस्राणि' कुम्मानां राशिरूपमानविशेषाणां सहस्राणि उपस्थापयति उपढौ - की अपेक्षावाले क्यों हुए इसलिये यह मानना चाहिये कि मौजूद भी चर्मरत्नादिकतो गोण कारण थे और गाथापति प्रधान कारण था प्रधान कारण अप्रधान - गौण कारण का तिरस्कार नहीं करता है किन्तु उनकी सहायता के बल से हो अपना कार्य करता है यह गाथाप्रति चर्मरत्न के एकदेश में ही बीजवपन करता है परन्तु इतने से हो सकल कार्य की सिद्धि हो जाती है यह गाथापति रत्न सकुशल था इसी कारण अपने कार्यमें बहुत अधिक निपुण कहा गया है ( गाहावरयत्ति सञ्वजणवीस्सु गुणे ) इस तरह का सर्वजनों में प्रसिद्ध हैं गुण जिसके ऐसा यह गाथापति होता है इन पूर्वोक्त विशेषणों से विशिष्ट इस गाथापति रत्न ने उस अवसर पर जो किया उसे (तएण से गाहावइरयणे ) इत्यादि सूत्र द्वारा सूत्रकार ने प्रकट किया है - इसमें यह बतलाया है कि जब चर्मरत्न और छत्ररत्न इन दोनों का मिलान हो चुका तब उस गृहपतिरत्न ने भरत महाराजा के लिये उसीदिन बोये गये और उसदिन पक कर तैयार होने पर काटे गये तथा निर्बुस किये गये समस्त धान्यों के हजारों कुम्भ अर्पणकर दिये कुम्भ यह एक શ્રીની અપેક્ષાવાળા કેમ થયા. એથી આમ માનવું જોઈએ કે ચમ રત્નાદિકની વિદ્યમાનતા તા ગૌણ કારણે હતા અને ગાથાપતિ પ્રધાન કારણ હતા. પ્રધાન કારણુ અપ્રધાન એટલે કે ગૌણુ કારણુ ના તિરસ્કાર (મનાદર) કરી શકે નહી. પણ તેમની સહાયતાનાં મળેજ પેાતાનુ કામ કરે છે. એ ગાથાપતિ ચમ રત્નના એક દેશમાજ ખીજવપન કરે છે પણુ એટલા માત્ર भी ? सल अर्यानी सिद्धि था लय छे से गाथा पतिरत्न- (सुकुसले) मेथी पोताना अर्थभां अतीव नियुष्य वामां आवे छे. ( गाहावइरयणे ति सव्वजणवीस्सुअगुणे) એવું સવાઁજના માં સુપ્રસિદ્ધ છે. ગુણ જેના છે એવા એ ગાથાપિત હાય છે. એ પૂર્વીકત વિશેષણેાથી વિશિષ્ટ એ गाथा पतिरत्न ते अवसरे यु तेने (तरण से गाहा हरयणे) त्याहि सूत्र वडे सूत्रारे ४८ अरे छे. मां थे अट वामां आवे छे જ્યારે ચમ રત્ન અને છત્રરત્ન એ બન્ને રત્નાનુ મિલાન થઇ ગયું ત્યારે ત ગૃહપતિરત્ને ભરત રાજા માટે તે જ દિવસેવાવેલ અને તે જ દિવસે પકવીને તૈયાર થયેલા તેમજ લલણી Page #801 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४० ३ वक्षस्कारः सू० २१ भरतसैन्यस्थितिदर्शनम् ७८७ कयति अर्पयति अनुयोगद्वारसूत्रोक्तं कुम्भमानं त्वेवम् "दो असईओ पसईओ दोपसइओ सेइआ चत्तारि सेइआओ कुडओ चत्तारि कुडया पत्थी, चत्तारि पत्थया आढय, चत्तारि आन्या दोणो, सहि आढ्याइं जहण्णए कुंभे असोति आढयाई मज्झिमए कुंभे, आढयसयं उक्कोसए कुंभेत्ति " व्याख्यानं चात्र-तथाहि-अत्राशति अवामुखहस्ततलरूपमुष्टिः तत्प्रमाणं धान्यमपि अशतिरेवोच्यते, द्वे अशती प्रसूतिः नावाकारतया व्यवस्थापिता प्राजलकरतलरूपोच्यते, द्वे प्रसृती सेतिका मागधदेशप्रसिद्धो मानविशेषः नतु इह प्रसिद्धा तस्याः प्रस्थ चतुर्गुणत्वात्. चतस्रः सेतिका कुडवः पल्लिका समानो माप्यमानविशेष: चत्वारः कुडवाः प्रस्थो माणक समानमाप्यम् चत्वारः प्रस्थाः आढकः सेतिका प्रमाणः चत्वारः आढकाः द्रोणः चतः सेतिका प्रमाणः षष्ठ्याः आढकैः पञ्चदशभिः जघन्यः कुम्भः मशीत्या आढकैः विंशत्या द्रोणैः मध्यम : कुम्भः,तथा आढकानां शतेन पञ्चविंशत्या प्रकार का नाप होता है अनुयोगद्वारसूत्र में इसकी परिभाषा ईस प्रकार से कही गई है"दो असईओ पसईओ दो पसइओ सेईआ चत्तारि सेईआओ कुडओ चत्तारि कुडया पत्थो चत्तारि पत्थया माढयं चत्तारि आढया-दोणो सद्धि आढयाइं जहण्णए कुंभे,असीति आढचाई मज्झिमए कुंभे, आढयसयं उक्कोसए कुंभेति" इसका तात्पर्य यह है-हाथ की हथेली को नीची करके जो मुष्टि बांधी जाती है इसका नाम असति है। इस असति में जितना धान्य आता है उसे ही यहां असति कहा गया है । दो असतियों को-एक प्रसूति होती है इसका आकार नाव के आ कार जैसा होता है हथेली सीधी करके फैलाने पर हथेली नाव के आकार को बन जाती है । इसी का नाम एक प्रमृति है । इस प्रसृति में जितना अनाज भरने पर बनता है उतना ही अनाज एक प्रसृति प्रमाण कहा गया है। दो प्रसूतियों की एक सेतिका होती है यह मगध देश प्रसिद्ध तौल विशेष का नाम है यह यहां प्रसिद्ध नहीं है। चार सेतिकाओं का एक कुडव होता है चार कुडवों का एक प्रस्थ होता है चार प्रस्थों का एक आढक होता है । चार आढकों का કરવામાં આવેલા, નિર્બસ કરવામાં આવેલા સકલ ધાન્યના હજારો કુંભે અર્પણ કરી દીધાં. કુંભ એ એક પ્રકારનું માપ છે. “અનુગ દ્વાર' સૂત્રમાં એ માપની પરિભાષા આ प्रमाणे ३२वाभा मावी छे “दो असईओ पसईओ दो पसइओ सेईआ चत्तारि सेईआओ कुडओ चत्तारि कुडया पत्थो,चत्तारि पत्थया आढय,चत्तारि आढ़या दोणो सहि आढयाई जहण्णए कुमे असीति आढयाई मजिनमए कुमे आढयसयं उक्कोसए कुमेति "मानुतic५ मा પ્રમાણે છે કે હાથની હથેળી ને નીચી કરીને જે મૂઠી વાળવામાં આવે છે, તેનું નામ “અસતિ છે. એ “અસતિમાં જેટલું ધાન્ય સમાય છે, તેને જ અહીં અશતિ કહેવામાં આવેલ છે. બે અશતિઓની એક પ્રસૂતિ થાય છે. એને આકર નાવના જેવો હોય છે. હથેલી સીધી કરીને પહોળી કરીએ તો તે નાના આકાર જેવી થઈ જાય છે. એનું જ નામ એક પ્રસૃતિ છે. એ પ્રસૂતિમાં જેટલું અનાજ છે, તેટલું અનાજ એક પ્રસૂતિ પ્રમાણ કહેવામાં આવે છે. બે પ્રતિઓની એક સેતિકા હોય છે. આ મગધ દેશ પ્રસિદ્ધ તેલ વિશેષનું નામ છે. એ તેલ અહીં પ્રસિદ્ધ નથી. ચાર સેતિકાએ ને એક કુડવ હોય છે. ચાર કુડને એકપ્રસ્થ હોય છે. ચાર પ્રસ્થાને એક આઢક હોય છે. ચાર આઢક નો એક દ્રોણ હોય છે. ૬૦ Page #802 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे द्रौणैः उत्कृष्टः कुम्भः इति, अत्र च 'सव्वधण्णाणं त्ति' सूत्रमुपलक्षणपरं तेन अन्यदपि यसन्यस्य भोज्योपयोगि वस्तु तत्सर्वमुपनयति, एवं सति तत्र भरतः कथं कियत्कालं च स्थितवानित्याह-'तएणं से भरहे राया चम्मरयणसमारूढे छत्तरयणसमोच्छन्ने मणिरयणकउज्जोए समुग्गयभूएण सुह सुहेणं सत्तरत्तं परिवसई' ततः गृहपतिरत्न कृतधान्योपस्थापनानन्तरं स भरतः चर्मरत्नारूढः छत्ररत्नेन समवच्छन्न:-आच्छादितो मणिरत्नकृतोद्योतः समुद्कसम्पुटं भूत इव प्राप्त इव, अत्र भूगतौ इति सौत्रधातोः क्त प्रत्ययः सुखसुखेन सप्तरात्रं सप्तदिनानि यावत् परिवसति, एतदेव व्यक्तीकुर्वन्नाह-'णवि से मुहाण' इत्यादि 'णवि से मुहाण विलिअं णेव भयं णेव विज्जए दुक्खं । भरहाहिवस्स रण्णो खंधावारस्स वि तहेव ॥१॥ ___ अयमर्थ:-नापि 'से' तस्य भरताधिपस्य राज्ञः 'सुहा' क्षुत् क्षुधा बुभुक्षा 'ण विलियं' न व्यलीकं दैन्यमित्यर्थः नैव विद्यते दुःखम् स्कन्धावारस्यापि तथैव यथा भरतस्य न क्षुदादि तथा सैन्यसमूहस्यापि नेत्यर्थः ॥२१॥ ऐक द्रोण होता है। ६० साठ आढकों का एक जघन्य कुम्भ होता है । ८० आढकों का एक मध्यम कुम्भ होता है १०० आढको का एक उत्कृष्ट कुम्भ होता है । "सव्वधण्णाणं" ऐसा कथन उपलक्षण रूप है । इससे और भी जो सैन्य के भोजन में उपयोगी वस्तु होती थी वह सब वह देता था(तएणं से भरहे राया चम्मरयणसमारूढे छत्तरयणसमोच्छण्णे मणिरयणक उज्जोए समुग्गयभूएणं सुहं सुहेणं सत्तरत्त परिवसइ) इस तरह वह भरत नरेश उस वरसात के समय चर्मरत्न पर बैठा हुआ और छत्र रत्न से सुरक्षित हुआ मणिरत्न द्वारा प्रदत्त उठ्योत में सुख पूर्वक सात दिन रात तक रहा (णविसे खुहाण विलिअं णेव भयं णेव विज्जएदुक्ख भरहा हिवस्त रण्णो खधावारस्स वि तहेव) इतने समय तक भरत को न क्षुधाने सताया, न दीनता ने सताया न भय ने सताया और न दुःख ने हो सताया यही अवस्था भरत के सैन्य की भी रह। इस तरह सात दिन तक भरत वहां आनन्द के साथ निर्भयपनेसे अपने स्कन्धावार में रहा ॥२१॥ સાઠ આઢકેનું એક જઘન્ય-પ્રમાણ કુંભ હોય છે. ૮૦ આઢ કોનો એક મધ્યમ કુંભ હોય है. १०० माढाना ये अकृष्ट उपाय छे. 'सव धण्णाण" मे थन Saa. ३५ છે. એનાથી આમ સૂચિત કરવામાં આવે છે કે ભેજન માટે સૈન્ય ને બીજી પણ જે વસ્તુઓ sताती व वस्तुमान के मा५तुतु (तएण से भरहे राया चम्मरयणसमारूढे छत्त रपण समोच्छपणे मणिरयणकउज्जोप समुग्गयभूपण सुहं सुहेण सत्तरसं परिव लाइ) या પ્રમાણે તે ભરત નરેશ તે વર્ષના સમયમાં ચર્મરત્ન ઉપર બેઠેલે અને છત્રરત્નથી સુરક્ષિત ये। मणिरत्न || प्रहत अधेतमा सुंभपू सात-हिवस रात्रि सुधी २ह्यो. (ण वि से खबाणविलिअं णेव भय व विज्जए दुक्ख भरहाहिवस्त रणो खधावारस्स वि तहेवी આટલા સમય સુધી ભારતને ન બુભક્ષા એ સતાવ્યા, ન દીનતાએ સતા, ન ભયે સતા અને ન દુ:ખે સતાવ્યો. અને એ પ્રમાણે ભારતની સેનાની પણ સ્થિતિ રહી. આ પ્રમાણે સાત દિવસ સુધી ભારત ત્યાં આનંદ પૂર્વક પિતાના સ્કધાવારની સાથે રહ્યા ૨૧ Page #803 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८९ प्रकाशिका टी तु० वक्षस्कार: सू० २२ सप्तरात्र्यानंतरीयवृत्तवर्णनम् ततः किं जातमित्याह-'तएणं तस्स" इत्यादि । मूलम्-तए णं तस्स भरहस्स रण्णो सत्तरत्तंसि परिणममाणंसि इमेयारूवे अज्जत्थिए चिंतिए कप्पिए पत्थिए मणीगए संकप्पे समुप्पज्जित्था केसणं भो ! अपत्थियपत्थए दुरंतपंतलक्खणे जाव परिवज्जिए जेणं ममं इमाए एयाणुरुवाए जाव अभिसमण्णागयाए उपि विजयखंधावारस्स जुगमुसलमुट्ठि जीव वासं वासइ । तएणं तस्स भरहस्स रण्णो इमेयारूवं अज्झत्थियं चिंतियं कप्पियं पत्थियं मनोगयं संकप्पं समु प्पणं जाणित्ता सोलसदेवसहस्सा सण्णज्झिउं पव्वत्ता यावि होत्था तएणं ते देवा सण्णद्धबद्धवम्मियकवया जाव गहिआउहप्पहरणा जेणेव ते मेहमुहा णागकुमारा देवा तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता. मेहमुहे णागकुमारे देवे एवं वयासी हंभो! मेहमुहा णागकुमारा! देवा अप्पथिअपत्थगा जाव परिवज्जिया किण्णं तुभि ण याणह भरहं रायं चाउरंतचक्कवट्टि महिद्धियं जाव उद्दवित्तए वा पडिसेत्तिए वा तहावि णं तुम्मे भरहस्स रणो विजयखंधावारस्स उप्पिं जुगमुसलमुट्ठिप्पमाणमित्ताहिं धाराहिं ओघमेघं सत्तरत्तं वासह, तं एवमवि गते इत्तो खिप्पामेव अवक्कमह अहव णं अज्ज पासह, चित्तं जीवलोगं, तए णं ते मेहमुहा णागकुमारा देवा तेहिं देवेहिं एवं वुत्ता समाणा भीया तत्था वहिआ उब्बिग्गा संजायभया मेघानीकं पडिसाहरति पडिसाहरित्ता जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता आवाडचिलाए एवं वयासी एसणं देवाणुप्पिया ! भरहे राया महिद्धिए जाव णो खलु एस सक्का केणइ देवेण वा जाव अग्गिप्पओगेण वा जाव उवदवित्तए वा पडिसेहित्तए वा तहावि अणं ते अम्हेहिं देवाणुप्पिया ! तुभं पियट्टयाए भरहस्स रणो उवसग्गे कए, तं गच्छह णं तुब्मे देवानुप्पिया ! हाया कयबलिकम्मा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता उल्लपडसाडगा ओचूलगणिअच्छा अग्गाई वराई स्यणाई गहाय पंजलिउडा पायवडिआ भरहं रायाणं सरणं उवेह, Page #804 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७९० ... जम्बूद्धोपप्रज्ञप्तिसूत्रे पणिवइअवच्छला खलु उत्तमपुरिसा णत्थि मे भरहस्स रण्णोअंतिया ओ भयमिति कटु, एवं वदित्ता जामेव दिसि पाउन्भूया तामेव दिसि पडिगया।तएणं ते आनाडचिलाया मेहमुहहिं णागकुमारहिं देवेहि एवं वुत्ता समाणा उठाए उट्ठति, उद्वित्ता पहाया कयबलिकम्मा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता उल्लपडसाडगा ओचूलगणिअच्छा अग्गाई वराई रयणाई गहाय जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं जाव मत्थए अंजलि कटु भरहं रायं जएणं विजएणं वद्धाविति वद्धावित्ता अग्गाइं वराइं स्यणाई उवणेति, उवणित्ता एवं वयासी-'वसुहर गुणहर जयहर हिरिसिरि धिकित्तिधारकरिंद। लक्खणसहस्सधारक रायमिदं णेचिरं धारे ॥१॥ हेयवइ गयवइ णवइ णवणिहि बइ भरहवास पढमवई । वत्तीस जणवयसहस्सरायसामी चिरंजीव ॥२॥ पढमणरीसर ईसर हिअ ईसर महिलिआ सहस्साणं । देवसय साहसीसर चोदस रयणी सर जसंसी ॥३॥ सागर गिरि मेराग उत्तर वाईण मभिजिअं तुमए । ता अम्हे देवाणुप्पियस्स विसए परिवसामो॥४॥ अहोणं देवाणु. प्पियाणं इड्डो जुई जसेबले वोरिए पुरिसकारपरक्कमे दिव्वा देवजुई दिवे देवाणुभावे लद्धे पत्ते अभिसमण्णागए, तं दिट्ठाणं देवाणुप्पिया णं इद्धो एवं चेव जाव अभिसमेण्णागए. तं खामेम णं देवाणुप्पिया खमंतु णं देवाणुप्पिया खंतुमरहतुणं दवाणुप्पिया! णोइ भुज्जोभुज्जो एवं करणयाए त्तिकटु पंजलिउडा पायवडिआ भरहं गयं सरंग उजवेति । तएणं से भरहे राया तेसिं आवाडचिलायोणं अग्गोइं वराई रयणाई पडिच्छंति पडिच्छित्ता ते आवाडचिलाए एवं वयासी गच्छहणं भो तुम्भे ममं बाहुच्छाया परिगहिया णिभया णिरुबिग्गा सुहं सुहेणं परिखसह, णस्थि मे कत्तो वि भय पत्थि तिकटु सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारेत्ता सम्मा णेत्ता पडिवितज्जेइ । तएणं से भरहे राया सुसेणं सेगावई सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी गच्छाहिणं भो देवाणुप्पिया ! दोच्चंपि सिंधुए Page #805 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० २२ सप्तराव्यानंतरीयवृत्तवर्णनम् १९१ महोणइए पच्चत्थिमणिक्खुडं ससिंधुसागरगिरिमेरागं समविसम णिक्खुडाणि अ ओअवेहि ओअवित्ता अम्गाई वराई रयणाइं पडिच्छाहि पडिच्छित्ता मम एय माणत्तियं खिप्पामेव पच्चपिणाहि जहा दाहिणिलस्स ओयवणं तहा सव्वं भाणिव्वं जाव पच्चणुभवमाणेो विहरंति ॥सू० २२। छाया-ततः स्खलु तस्य भरतस्य राज्ञः सप्तररात्रे परिणमति अयमेतद्पोऽभ्यर्थितः चिन्तितः कल्पितः प्रार्थितः मनोगतः सङ्कल्पः समुदपद्यत,कः स खलु भोः ! अप्रार्थितप्रार्थको दुरन्तप्रान्तलक्षणो यावत् परिवर्जितः यः स्खलु मम अस्यामेतपायां यावदभिसमन्वागतायाम् उपरि विजयस्कन्धावारस्य, युगमुसलमुष्टि यावत वर्ष वर्षति । ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञः इदमेतद्रूपम् अभ्यथितं चिन्तितं कलितं प्राथितं मनोगतं संकल्प समुत्पन्नं ज्ञात्वा षोडशदेव सहस्त्राः सन्नधुप्रवृत्ताप्यभवन् , ततः खलु ते देवाः सन्नद्धबद्धर्मितकवचाः यावत् गृहीतायुधप्रहरणाः यत्रैव ते मेघमुखाः नागकुमाराः देवास्तत्रैव उपागच्छन्ति, उपागत्य मेघमुखान् नागकुमारान् देवान् एवमवादीत् भो ! मेघमुखाः नागकुमाराः! देवाः अप्रार्थितप्रार्थकाः यावत् परिवर्जिताः किं खलु यूयं न जानीथ भरतं राजानं चातुरन्तचक्रवर्तिनं महर्द्धिकं यावत् उपद्रवयितुं वा प्रतिषेधयितुं वा, तथापि खलु यूयं भर. तस्य राज्ञो विजयस्कन्धावारस्योपरि युगमुसलप्रमाणमिताभिर्धाराभिः ओघमेघ सप्तरात्र वर्ष वर्षत, तत् एवमपि गते इतः क्षिप्रमेव अपकामत अथवा खलु अद्य पश्यत चित्रं जीवलोकम्, ततः खलु ते मेघमुखा नागकुमारा देवाः तैः देवैः एवमुक्ताः सन्तः भीताः प्रस्ताः वाधिताः उद्विग्नाः सातभयाः मेघानीकं प्रतिसंहरन्ति, प्रतिसंहृत्य यत्रैव आपातकिराताः तत्रैव उपागच्छन्ति उपागत्य आपातकिरातान् एवमवादिषुः एषः खलु देवानुप्रियाः। भातो राजा महद्धिको यावत् नो खलु एष शक्यते केनापि देवेन वा यावत अग्निप्रयोगेण वा यावत् उपद्रवयितुं वा प्रतिषेधयितुवा तथापि च खलु अस्माभिः देवानुप्रियाः! युष्माकं प्रीत्यर्थ भरतस्य राक्षः उपसर्गः कृतः तद्गच्छत देवानुप्रियाः! यूयं स्नाताः कृतबलिकर्माणः कौत कमलप्रायश्चित्ताः आर्द्रपटशाटकाः अवचूलकनियत्थाः अग्रयाणि वराणि रत्नानि गृहोत्वा प्राञ्जलिकृताः पादपतिताः भरतं राजानं शरणम् उपेत प्रणिपतितवत्सलाः खलु उत्तमपुरुषाः नास्ति भवतां भरतस्य राज्ञोऽन्तिकाद् भयमिति कृत्वा एवम् उदित्वा यामेव दिश प्रादुर्भूताः तामेव दिशं प्रतिगताः । ततः खलु ते आपातकिराताः मेघमुखैः नागकुमार देवैः एवमुक्ताः सन्तः उत्थया उत्तिष्ठन्ति, उत्थाय स्नाताः कृतबलि कर्माणः कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्ताः आद्रपटशाटकाः अवचूलकनियत्थाः अग्र्याणि वराणि रत्नानि गृहीत्वा यत्रैव भरतो राजा तत्रवोपागच्छन्ति उपागत्य करतलपरिगृहीतं यावत् मस्तके अञ्जलिं कृत्वा भरतं राजानं जयेन विजयेन वद्धयन्ति वर्द्धयित्वा अग्र्याणि वराणि रत्नानि उपनयन्त उपनीय एवमवादिषुः हे वसुधर! गुणधर ! जयधर! ही श्री धृति कीर्तिधारक! नरेन्द्र लक्षण सहस्त्रधारक! नः राज्यमिद चिरं धारय ॥१॥ Page #806 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७९२ हयपते ! गजपते ! नरपते । नवनिधिपते ! भरतवर्ष प्रथमपते ! द्वात्रिंशज्जनपदसहस्त्रराज स्वामिन् ! चिरं जीव ॥२॥ प्रथम नरेश्वर ! ईश्वर ! महिलिका सहस्त्राणां हृदयेश्वर ! देवशतसहस्त्राणामीश्वर ! चतुर्द्दशरत्नेश्वर ! यशश्विन् |३|| सागरगिरिमर्यादम् उत्तरावाचीन मभिजितं त्वया । तस्माद् वयं देवानुप्रियस्य विषये परिवसामः ॥४॥ जम्बूद्वीपप्रप्तिसूत्रे अहो खलु देवानुप्रियाणाम् ऋद्धि द्युतिर्यशो बलं वीर्य पुरुषकारः पराक्रमः दिव्याः देवद्युतिः दिव्यो देवानुभावो लब्धः प्राप्तः अभिसमन्वागतः तत् दृष्ट्वा खलु देवानुप्रियाणाम् ऋद्धिः पवमेव यावत् अभिसमन्वागतः, तत् क्षमयामः खलु देवानुप्रियाः । क्षमतां खलु देवानुप्रियाः । क्षन्तु मर्हन्तु खलु देवानुप्रियाः । नैव भूयोभूयः एवं करणतायै इति कृत्वा प्राञ्जलिकृताः पादपतिताः भरतं राजानं शरणमुपयान्ति ततः खलु स भरतो राजा तेषामापातकिरातानामग्र्याणि वराणि रत्नानि प्रतिच्छति प्रतीच्छ्य तानापातकिरातान् एवमवादीत् गच्छत खलु भोः । यूयं मम बाहुच्छायया परिगृहीताः निर्भयाः निरुद्विग्नाः सुखं सुखेन परिवसत, नास्ति भवतां कुतोऽपि भयमस्तीति कृत्वा सत्कारयति, सन्मानयति सत्कार्य सन्मान्य प्रतिविसर्जयति । ततः खलु स भरतो राजा सुषेणं सेनापतिं शब्दयति । शयित्वा एवमवादीन् गच्छ खलु भो देवानुप्रिय ! द्वितीयमपि सिन्ध्वा महानद्याः पश्चिमं निष्कुटं ससिन्धुसागरगिरिमर्यादं समविषमनिष्कुटानि च 'ओअवेहि' साधय साधयित्वा अयाणि वराणि रत्नानि प्रतीच्छति प्रतीष्य मम पतामाज्ञतिकां क्षिप्रमेव प्रत्यर्पय यथा दाक्षिणात्यस्य 'ओभवणं' साधनम् तथा सर्व भणितव्यम् यावत् प्रत्यनुभवन् विहरंति ||सू०२२|| टीका - - " तरणं तस्स भरहरूस" इत्यादि । 'तरणं तस्स भरहस्स रण्णो सत्तरसि परिणममाणंस इमेयारूवे अज्झत्थिए चिंतिए कप्पिए पन्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था' ततः तदनन्तरं खलु तस्य भरतस्य राज्ञः सप्तरात्रे परिणमति सति अयमेतद्रूपः सप्त रात्रिषु व्यतीतासु वर्षानिरोधविषयको विचारो भरतस्य मनसि एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण जातः तत्र प्रथमम् ' अज्झत्थिए ' आध्यात्मिक आत्मनि जातोंsकुर 'तएणं तस्स भरहस्स रण्णो सत्तर त्तंसि परिणममाणंसि' इत्यादिसूत्र - २२ टीकार्थ - (तएणं तस्स भरहस्स रण्णो) जब भरतराजा के वहां रहते २ (सत्तर तंसि परिणममाणंसि) सात दिन रात समाप्त हो चुके तब (इमेयारूवे अज्झत्थिए चितिए कप्पिए पत्थिए मणोगए कप्पे समुपज्जत्था ) उसे ऐसा मनोगत संकल्प उत्पन्न हुआ यहां संकल्प के 'आध्यात्मिक, चिन्तित, कल्पित, प्रार्थित' इन विशेषणां की जगह २ व्याख्या कर दी गइ हैं अतः वहीं से इसे 'तपणं तस्स भरहस्स रण्णो सत्तरत्तनि परिणममाणंसि' इत्यादि सूत्र - २२ ॥ टीडार्थ - (त पण तस्स भरहस्स रण्णो) क्यारे भरत राज्जने त्यां रतां - रतां (सत्तरतंसि परिणममाणसि) सात दिवस अने रत्रियो। पूरी थई त्यारे - (इमेयारूवे अज्झfree चितिए कणिए पत्थिए मणोगर संकप्पे समुपज्जित्था ) तने थे। मनोगत स ंप्रदय Page #807 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० २२ सप्तरात्र्यनंतरीयवृत्तवर्णनम् ७९३ इव' १ तदनु 'चिंतिए' चिन्तितः पुनर्वर्षानिरोधविषयक विचारः स्मर्यमाणो द्विपत्रित इव जातः२ तदनु 'कप्पिए' कल्पितः स एव वर्षानिरोधविषयको विचारः व्यवस्था युक्त मेवं वर्षानिरोधं करिष्यामीति कार्याऽकारेण परिणतः पल्लवित इव जातः३ ततः 'पत्थिए' प्रार्थितःस एव विचार इष्टरूपेण स्वीकृतः पुष्पित इव संवृत्तः ४ ततः 'मणोगए संकप्पे' मनोगतः संकल्पः मनसि दृढ़रूपेण निश्चयः मया इत्थमेव वर्षानिरोधः कर्तव्य इति विचारः फलित इव ५ 'समुप्पज्जित्था' समुदपद्यत । एतादृशो विचारो वर्षानिरोधविषयकः समभवदिति । तदेवाह- केसणं' इत्यादि 'केस णं भो ! 'अपत्थियपत्थए दुरंतपंतलक्खणे जाव परिवज्जिए जेणं ममं इमाए एआणुरुवाए जाव अभिसमण्णागयाए उप्पिं विजयखंधावारस्स जुगमुसलमुट्टि जाव वासं वासइ ? कः एषः खलु भोः सैनिकाः शणुत ! अप्रार्थितप्रार्थकः तत्र अप्रार्थितम् अमनोरथगोचरीकृतं प्रसङ्गात् मरणं तस्य प्रार्थकः मरणेच्छुरित्यर्थः, तथा दुरन्तप्रान्तलक्षणः दुरन्तानि दुष्टावसानानि प्रान्तानि तुच्छानि लक्षणानि यस्य स तथा अर्थात अशुभलक्षणयुक्तः यावत् पदात् 'होनपुण्णचाउद्दसे, हिरिसिरिपरिवज्जिए' इति ग्राह्यम् 'हीनपुण्णचाउद्दसे' होनपुण्यचातुर्दशः हीनायां पुण्यचतुर्दश्यां जातः जन्म यस्य स इति हीनपुण्य-चातुर्दशः चतुर्दशी तिथि जन्माश्रिता पुण्या शुभा च भवति तया रहितः अत आक्रोशता इत्थमुक्ता तथा 'हिरिसिरिपरिवज्जिए' ह्रीश्रीपरिवर्जितः हिया लज्जया श्रिया शोभया परिवर्तितः, यः खलु मम अस्यामेतद्रूपायां यावदिव्यायां देवानामिव ऋद्धिः देवस्य वा राज्ञ ऋद्धिर्देवर्द्धि स्तस्यां सत्याम् एवं दिव्यायां देवधुतौ देवस्य वा राज्ञो धुतिः दिव्येन देवानुभावेन देवानामिव योऽनुभावः प्रभावस्तेन सह लब्धायां प्राप्तायामभिसन्वागतायां सत्याम् उपरि स्कन्धावारस्य-द्वादश योजनस्थितसैन्यसमूहस्य देखलेनी चाहिये । (केस णं भो ! अपस्थियपत्थिए दुरंतपंतलक्खणे जाव परिवज्जिए जेण मम इमाए ए आणुरूवाए जाव अभिसमण्णागयाए उपि विजयखंधावारस्स जुगमुसलमुद्वि जाव वासं वासइ) अरे ! यह कौन ऐसा अपनी अकाल मृत्यु की चाहना वाला तथा दुरन्त प्रान्त लक्षणों वाला यावत् निर्लज्ज शोभाहीन व्यक्ति है, जो मेरी इस कुलपरम्परागत दिव्य देवर्द्धि के-देवोकी जसो ऋद्धि के होने पर, दिव्य देवद्युति एवं दिव्य देवानुभाव के होने पर भी सेना के ऊपर युग, उसल्या- स५६५॥ "आध्यात्मिक, चिन्तित, कल्पित, प्रार्थित थे विशेष संग હીંત થયાં છે. એમની વ્યાખ્યા આ ગ્રંથમાં અનેક સ્થાને કરવામાં આવી છે. એથી જિજ્ઞાસુ भना त्यांथी को विशे यु (केस ण भो! अपत्थियपस्थिए दुरंतपतलक्खणे जाव परिवज्जिए जे ण मम इमाए पाणुरूवाए जाव-अभिलमण्णागयाउम्पि विजयखंधावारस्ल जुगमुसलमुट्ठि जाव वासं वासइ) अरे ! ये 3 पोतानी मा मायुनी ४२७। ४२ નાર તેમજ દુરંત પ્રાત લક્ષણે વાળ યાવત નિર્લજજ શોભા હીન માણસ છે કે જે મારી આ કુલ પરંપરાગત દિવ્ય દેવધિને–દેવે જેવી ઋદ્ધિ હોવા છતાં, દિવ્ય દેવઘુતિ તેમજ દિવ્ય દેવાનુભાવ હોવા છતાં એ, મારી સેના ઉપર યુગ; મુસળ તેમજ મુષ્ટિ Page #808 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'जुगमुसलमुठि जाव त्ति' युगमुसलमुष्टिप्रमाणमात्राभिर्धाराभिः वर्ष वर्षति वृष्टि करोति । प्रचण्डवृष्टिं करोतीत्यर्थः 'तए ण तस्स भरहस्स रण्णो इमेयारूवं अन्भत्थियं चिंतिय कप्पियं पत्थियं मणोग संकप्पं समुप्पणं जाणित्ता सोलसदेवसहस्सा सण्णज्झिउं पवत्ता यावि होत्था', ततः उक्तचिन्तासमुत्पत्यनन्तरं खलु तस्य भरतस्य राज्ञः इममेतद्रपम्-एतादृशम् अभ्यर्थितं चिन्तितं कल्पितं प्रार्थितंमनोगतं संकल्पं समुत्पन्न ज्ञात्वा चतुर्दशरत्नाधिष्ठायकदेवसहस्त्राणि चतुर्दश द्वे सहस्रे स्वाङ्गाधिष्ठातृ देवभूते इत्येवं षोडश देवसहस्त्राः सन्नद्ध प्रवृत्ताश्चाप्यभवन् सङग्रामं कर्तुम् उद्यता अभूवन जाताः कथं सन्नधु प्रवृत्ता इत्याह-'तरणं ते देवाः सण्णद्धबद्धवम्मियकवया जाव गहि आउहप्पहरणा जेणेव ते मेहमुहा णागकुमारा देवा तेणेव उवागच्छंति' ततः खलु ते षोडसहशस्त्रसंख्यका देवाः सन्नबद्धवम्मितकवचाः सन्नद्धं शरीरारोपणात् बद्धं कसाबन्धनतः अतएव वर्म लोहकत्तलादि रूपं सजातमस्येति वम्मितम् शरीरे संलग्नीकतम् एतादृशं कवचं शरीरत्राणकं येषां ते तथा तथा यावत् पदात् उत्पीडितशरासन पट्टिकाः पिनद्धग्रेवेयबद्धाविद्धविमलवरचिन्हपट्टाश्च तत्र उत्पीडिताः गाढं गुणारोमुसल एवं मुष्टि प्रमाण जलधाराओं से यावत् वरसा बरसा रहा है ? (तए णं तस्स भरहस्स रण्णो इमेयारूवे अज्झत्थियं चिंतियं कप्पियं पत्थियं मणोगयं संकप्पं समुप्पण्णं जाणित्ता सोलसदेवसहस्सा सण्णज्झिउं पवत्ता यावि होत्था) इस प्रकार के आध्यात्मिक, चिन्तित, प्रार्थित मनोगत उद्भूत हुए भरत राजा के संकल्प को जान कर के १६ हजार देव-१४ रत्नों के १४ हजार और अपने शरीर के रक्षक २ हजार देव इस प्रकार से मिलकर १६ हजार देव संग्राम करने के लिये उद्यत हो गये (तए णं ते देवा सण्णद्धबद्धवम्मियकवया जाव गहिमाउहप्पहरणा जेणेव ते मेहमुहा णागकुमारा देवा तेणेव उवागच्छंति) तब वे देव सन्नद्धवद्ध वर्मित कवच यावत् गृहीत आयुध प्रहरण होकर जहां वे मेघमुख नामके नागकुमार देव थे वहां पर आये 'सण्णद्धबद्धगहिआ उहप्पहरणा' इन पदों की व्याख्या पीछे कई जगह की जा चुकी है अतः वहीं से इसे देखनी चाहिये यहां यावत्पदसे 'उत्पीडितशरासनपट्टिकाः पिनद्धग्रैवेयबद्धाबिद्धविमलवरचिह्नपट्टाश्च' इन प्रमाण धारासायी यावत् वृष्टि ॥ २१ छ त पण तस्स भरहस्स रण्णो इमेयारूवे अज्झस्थियं चिंतिय कप्पियं पत्थिय मणोगय संकप्पं समुप्पण्णं जाणित्ता सोलसदेवसहस्सा सण्णज्झिउं पवत्ता यावि होत्था) ॥ तन माध्यात्मि(शत प्राथित मनोगत ઉદ્દભુત થયેલા ભરત નરેશના સંક૯૫ ને જાણ ને ૧૬ હજાર દે-૧૪ ના ૧૪ હજાર અને તેમના શરીરના રક્ષક બે હજાર આ પ્રમાણે મળીને ૧૬ હજાર દે સંગ્રામ કરવા Gधत य गया. (तएणं ते देवा सण्णद्धबद्धवम्मियकवया जाव गहिआउहप्पहरणा जेणेव ते मेहमुहा णागकुमारा देवा तेणेव उवागच्छंति ) त्या त हेवे। सन्नद पद्ध. વમિત કવચ ચાવ-ગૃહીત આયુધ પ્રહરણ વાળા થઈ ને જ્યાં તે મેઘમુખ નામે નાગ भारता त्यां पांच्या. “सणद्धवद्धगहिआउहप्पहरणा" से पहोनी व्याच्या પાછળ અનેક સ્થાને કરવામાં આવી છે. એથી જિજ્ઞાસુજનેએ ત્યાંથી જાણી લેવું અહી Page #809 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारः सू० २२ षप्तरात्र्यनंतरीयवृत्तवर्णनम् ७९५ पणात् दृढीकृताः शरासनपट्टिकाः धनुर्दण्डाः यैः ते तथा, तथा पिनद्धं परिधृतं ग्रैवेयकं ग्रीवात्राणकं ग्रीवाभरणं वा यैस्ते तथा, बद्धो ग्रन्थिदानेन आविद्धः परिहितो मस्तकावेटनविमलवरचिह्नपट्टो वीरातिवीरतासूचक वस्त्रविशेषो यैः ते तथा पश्चादुभयोः कर्मधारयः तथा गृहीतायुधप्रहरणाः गृहीतानि आयुधानि प्रहरणानि च यैस्ते तथा आयुधप्रहरणयोस्तु क्षेप्याक्षेप्यकृतो विशेषो बोध्यः तत्र क्षेप्यानि बाणादोनि, अक्षेप्यानि खड्गादीनि अथवा गृहीतानि आयुधानि प्रहरणाय यैस्ते तथा, एवंभूताः सन्तः यत्रैव मेघमुखाः नागकुमारा देवाः आसन् तत्रैव उपागच्छन्ति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'मेहमुहे णागकुमारे देवे एवं वयासी' मेघमुखान् नागकुमारान् देवान् एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादिषुः 'हंभो ! मेहमुहा णागकुमारा ! देवा अप्पत्थियपत्थगा जाव परिवज्जिआ किण्णं तुभि ण जाणह भरहं रायं चाउरंतवक्कवहि महिद्धियं जाव उद्दवित्तए वा पडिसेहित्तए वा तहावि णं तुम्भे भरहस्स रण्णो विजयखंधावारस्स उपि जुगमुसलमुट्टिप्पमाणमित्ताहिं धाराहिं ओघमेघं सत्तरत्तं वासं वासह' हंभो ! मेघमुखाः नागकुमाराः ! देवाः अप्राथितप्रार्थकाः मरणेच्छवः यावत् पदात् दुरन्तप्रान्तलक्षणाः हीनपुण्यचातुर्दशाः ही श्री परिवर्जिताः हीनपुण्यचातुर्दशाः पुण्य चतुर्दशीतिथिजन्मरहिताः ही श्री परिवर्जिताः पदोंका संग्रह हुआ हैं । इन पदों की व्याख्या यथास्थान की जा चुकी है अतः वहीं से यह भी देखी जा सकती है (उवागच्छित्त।) वहां आकर के (मेहमुहे णागकुमा रे देवे एवं वयासो) उन्होंने मेघमुख नामके उन नागकुमार देवांसे इस प्रकार कहा -(हंभो ! मेहमुहा णागकुमारा देवा ! अप्पत्थियपत्थगा जाव परिवज्जिआ किण्णं तुभि ण जाणह भरहं रायं चाउरंतचक्कवहि महिड्ढियं जाव उद्दवित्तए वा पडिसेहित्तए वा तहावि णं तुब्भे भरहस्स रण्णो विजयखंधावारस्स उपि जुगमुसल मुट्टिप्पमाणमित्ताहिं धाराहिं ओघमेघं सत्तरत्तं वासं वासह) हे मेघमुख नामके नागकुमार देवो ! हमें ज्ञात होता है कि तुम अब अकाल में ही अपनी मृत्यु के अभिलाषी बन गये हो तुम्हारे सब के लक्षण ये अभीष्टार्थक साधन नहीं हैं। वे सर्वथा तुच्छ है तुम्हारा जन्म हीन पुण्य चतुर्दशी का हुआ प्रतीत होता है तुम सब के सब बिलकुल बेशरम हो और शोभा से तिरस्कृत यावत पहथी “उत्पीडितशरासनपट्टिकाः पिनद्धौवेयबद्धाविद्धविमलवरचिन्हपाश्च" એ પદેને સંગ્રહ થયો છે. એ પદોની વ્યાખ્યા પણ યથાસ્થાને કરવામાં આવી છે. જિજ્ઞાसुमनाने त्यांची थी वे (उवागच्छित्ता) त्यां पडांयीन (मेहमुहे णागकुमारे देवे एवं वयासी) तमणे मेधभुम नाम नागभार हे ने या प्रमाणे यु-( हं भो! मेह मुहा णागकुमारा देवा ! अपत्थियपत्थगा जाव परिवज्जिया किण्णं तुब्भि ण जाणह भरहं रायं चाउरंतचक्कट्टि महिढिय जाव उद्दवित्तएवा पडिसेहित्तएवा तहावि णं तुम्मे भरहस्स रणो विजयखंधावारस्त उप्पि जुगमुसलमुट्ठिप्पमाणमित्ताहिं धाराहिं ओघमेघं सत्तरत्त वास वासह) 3 मेधभु५ नाम नागभार हे! अमन १२ छ। તમે હવે અલપકાળમાં જ મરણ પામશે. તમારા સવના આ લક્ષણે અભીષ્ટાર્થક સાધન નથી આમ સર્વથા તુચ્છ છે. તમારો જન્મ હીન-પુણ્ય ચતુર્દશીના દિવસે થયેલે પ્રતીત થાય Page #810 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७९६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सन्तः किमिति प्रश्ने न जानीथेत्यत्र काकुपाठेन व्याख्येयम् तेन न जानीथ कि यूयम् ! अपि तु जानीथ भरतं राजानं चातुरन्तचक्रवर्तिनम् आचतुःसमुद्रान्तकरग्राहिणम् महद्धिकं महती ऋद्धिर्यस्य स तथा त लक्ष्मीसम्पन्न मित्यर्थः यावत् पदात् 'महज्जुइए महाणुभावे महासोक्खे' इति विशिष्टम् यदेष न कैश्चिदपि देवदानवादिभिः शस्त्रप्रयोगादिभि रुपद्रवयितुं वा प्रतिषेधयितुंवा शक्यते इति, तथापि खलु जगत्यजय्यं जेतुमशक्यं जानतोऽपि खलु यूयं-मेघमुखाः नागकुमाराः भरतस्य राज्ञो विजयस्कन्धावारस्योपरि युगमुसलमुष्टिप्रमाणमात्राभिः धारानिः ओघमेघ सप्तरात्रं सप्त रात्रिप्रमाणकालेन वर्ष वर्षत 'तं एवमवि गते इत्तो खिप्पामेव अवक्कमह अहव णं अज्ज पासह चित्तं जीवलोगं' तत् तस्मात् एवमपि गते अतीते अविचारितकार्ये कृते सत्यपि किं बहु अधिक्षिपाम: ? इतः स्थानात् क्षिप्रमेव पश्चात्तापपूर्वकं स्वापराधं क्षमापयन्तः अपक्रामत अपयात दूरमपसरतेत्यर्थः अथवा विकल्पान्तरे खलु यदि नापकामत तर्हि अद्य साम्प्रतमेव पश्यत किये हुए हो क्या तुम चातुरन्त चक्रवर्ती भरत राजा को नहीं ज नते हो-तुमने नहीं सुना है कि वह आसमुद्रान्त करग्राहो है । महती ऋद्धि वाला है यावत् वह महाद्युति वाला महाप्रभाव वाला, महासौख्य का भोक्ता है किपी भी देव दानव आदि में ऐसी शक्ति नहीं है जो शस्त्रादिको द्वारा उसे उपद्रव युक्त कर सके या यहां से उसे पीछे वापिस कर सके इस प्रकार से इस जगत में अजेय हुए भरत राजा को जानते हुए भी आपलोग उसको सेना के ऊपर युग मुसल, एवं मुष्टि प्रमाण जैसी जलधाराओं से पुष्कल संवर्तक मेघ की तरह सात दिन से वृष्टि वरसा रहे हो (तं एवमविगते इत्तो विप्पामेव अवककमह, अहव णं अज्ज पासह चित्तं जोव लोगं) तुमने यह काम बिना विचारे हो किया है अब हम इस पर तुम्हें कितना तिरस्कृत करे अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम सब इस स्थान से अपने अपराध की पश्चात्ताप पूर्वक क्षमा मांगते हुए शोघही चले जाओ । यदि नहीं जाते हों अभी ही तुम सब चित्र जीव लोक को-वर्तमान भव से अन्य છે. તમે સર્વે નિર્લજજ છો અને શોભાથી તિરસ્કૃત થયેલા છે. શું તમે–ચાતુરત ચક્રવતી ભરત રાજાને જાણતા નથી. તમને ખબર નથી કે તે ભરત નૃપતિ આસમુદ્રત કર ગ્રાહી છે. તે મહતી દ્વિવાન છે યાવત્ તે મહાદ્યુતિવાન મહા પ્રભાવવાન અને મહાસાખ્ય કતા છે. કોઈ પણ દેવ, દાનવ વગેરેમાં એવી શક્તિ છે જ નહિ કે જે શસ્ત્રાદિકે વડે તેને ઉપદ્રવ યુક્ત કરી શકે. અથવા તો તેને અહીંથી પાછા હઠાવી શકે. આ પ્રમાણે આ જગતમાં અજેય તે ભરત રાજા ને જાણવા છતાંએ તમે તે રાજાની સેના ઉપર યુગ, મુસલ તેમજ મુષ્ટિ પ્રમાણ જેવી જળધારાઓથી પુષ્કળ સંવર્તક મેઘની જેમ સાત-દિવસ રાત્રિ था वृष्टि १२सावी २था छ।. (त एवमविगते इत्तो स्त्रिप्पामेव अवक्कमह, अहव णं अज्ज, पालह चित्तंजीवलोगं ) तमे २मा म १२ वियाये ४ यु" छे. मे तमने al પ્રમાણ માં તિરસ્કૃત કરીએ. હવે તમારી ભલાઈ એમાં જ છે કે તમે સવે આ સ્થાનથી પોતાના અપરાધની પશ્ચાત્તાપ પૂર્વક ક્ષમાયાચના કરતાં યથાશીવ્ર અહીંથી પલાયન થઈ જાઓ. જો તમે અહીંથી જશે નહીં તે હમણું જ સવે ભિન્ન જીવ લેકને–એટલે કે वत भान समांथी अन्य भवन-ite मृत्यु २ पामशा. (तपणं ते मेहमुहा णागकुमारा Page #811 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सु० २२ सप्तरात्र्यनंतरीयवृत्तवर्णनम् ७९७ चित्रं जीवलोकम् वर्तमानभवादन्यं भवम् अपमृत्युं प्राप्नुतेत्यर्थः 'तएणं ते मेहमुहा णागकुमारा देवा तेहिं देवेहिं एवं वुत्ता समाणा भीया तत्था वहिया संजायभया मेघानीकं परिसाहरंति' ततः खलु ते मेघमुखा नागकुमारा देवाः तैः षोडशसहस्त्रसंख्य कैः देवैरेवमु काः सन्तः भीताः त्रस्ताः वधिताः सञ्जातभयाः मेघानीकम्-घनदं प्रति संहरन्ति अपहरन्ति 'परिसाहरित्ता जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवागच्छंति' प्रतिसंहृत्ययत्रैव आपातकिराताः तत्रैव उपागच्छन्ति 'उवागचित्ता आवाडचिलाए एवं वयासी' उपा. गत्य मेघमुखाः नागकुमाराः आपातकिरातान् एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादिषुः उक्तवन्तः किमुक्तवन्त इत्याह-'एस णं देवाणुप्पिया! भरहे राया महड्ढिए.जाव णो खलु एस सक्का केणइ देवेण वा जाव अग्गिप्पआगेण वा जाव उवद्दवित्तए वा पडिसोहित्तए वा तहावि अणं ते अम्हेहिं देवाणुप्पिया! तुब्भं पिअट्टयाए भरहस्स रण्णो उवसग्गे कर' हे देवानुप्रियाः एषः खलु भरतो राजा महद्धिको यावत् महासौख्यः चातुरन्तचक्रवर्ती वर्तते न खलु भव को-अकाल मृत्यु को-देखते हो (तएणं ते मेहमुहा णागकुमारा देवा तेहिं देवेहिं एवं वुत्ता समाणा भीया तत्था बहिया संजायभया मेघानीकं परिसाहरंति) इस प्रकार से उन १६ हजार देवो द्वारा डाटे गये वे मेघमुख नाम के नागकुमार देव बहुत ही अधिक रू में भयभीत हो गये त्रस्त हो गये व्यथित या बाधित हो गये, और संजात भयवाले बन गये अतः उसी समय उन्होने धनघटा को अपहृत कर लिया (परिसाहरित्ता जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवागच्छंति) अपहृत करके फिर वे जहां पर ओपात किरात थे वहां पर आये (उवागच्छित्ता आवाडचिलाए एवं क्यासी) वहां आकर के उन्होंने उन आपात किरातों से ऐसा कहा--(एस णं देवाणुप्पिया! भरहे राया महद्धिए जाव णो खलु एस सक्का केणइ देवेण वा जाव अग्गिप्पआगेण वा जाव उद्दवित्तए वा पडिसेहित्तए वा तहावि अ णं ते अम्हेहि देवाणुपिया ! तुम्भं पिअट्टया भरहस्त रणो उवसग्गे कए) है देवानुप्रियो ! यह भरतराजा है और यह महर्दिक है यावत् महासौख्य संपन्न है। चातुरन्तचक्रवर्ती हैं यह किसी भी देव द्वारा यावत् किसी भी दानव द्वारा या किसी भी देवा तेहिं देवेहिं एवं वुत्ता समाणा भीया तत्था बहिया संजायभया मेघानोकं परिसाहरति ) मा प्रभात १९२ देव। ( घत थय। ते भवभुम नाम नागभार લે અતી ભય સત્રસ્ત થઈ ગયા, વ્યથિત કે વધિત થઈ ગયા, અને સાતભય વાળા सनी गया. मेथी ते क्षण तमा धन घटायान अपहत बीघा. ( परिसाहरिना जेणेव आवाडचिलाया तेणेव उवागच्छति) सात शन पछी तमा न्या मापात (शता ता त्यां गया. ( उवागच्छित्ता आवाचिलाए एवं वयासो) त्यां नमो सापात शिताने या प्रमाणे ४थु. (एसणं देवाणुदिपया ! भरहे राया महद्धिप जाव णो खल पस सक्का केणइ देवेण वा जाव अरिगप्पओगेण वा जाव उद्दवित्तए वा पडिसोहित्त एवा तहाविअणं ते अम्हेहि देवाणुप्पिया ! तुब्भं पिअद्वयाए भरहस्स रण्णो उसने ) હે દવાનપ્રિયે ! એ ભરત રાજ્ય છે. એ મહ િક છે યાવતું મહા સૌખ્ય સસ્પન છે. એ ચાતરક્ત ચક્રવતી છે. એ કોઈ પણ દેવ વડે યાવત્ કોઇ પણ દાનવ વડે અથવા Page #812 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वोपप्राप्तिसूत्रे एषः केनापि देवेन वा यावत् दानवेन वा किन्नरेण वा किंपुरुषेण महोरगेण वा गन्धर्वेण वा शस्त्रप्रयोगेण वा अग्निप्रयोगेण वा यावत् मन्त्रप्रयोगेण वा उपद्रवयितुं वा प्रतिषेधयितुं वा युष्मद्देशाक्रमणतो निवर्तयितुम् तथापि इत्थमसाध्ये कार्ये सत्यपि च खलु अस्माभिर्देवानुप्रियाः ! युष्माकं प्रीत्यर्थ भरतस्य राज्ञः उत्सर्गः कृतः 'तं गच्छ। णं तुम्भे देवाणुप्पिया ! हाया कयबलिकम्मा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता उल्लपडसाडगा ओचलगणिअच्छा अग्गाइं वराई रयणाई गहाय पंजलिउडा पायवडिआ भरहं रायाणं सरणं उवेह' तत् तस्मात् गच्छत खलु देवानुप्रियाः ! ययम् आपातकिराताः स्नाताः कृतबलिकर्माणः वायसादिभ्यो दत्तान्नभागाः कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्ताः तथा आर्द्रपटशाटकाः आद्रौं सधः स्नानवशाज्जलमिश्रितौ पटशाटकौ उत्तरीयपरिधाने येषां ते तथा एतेन सेवाविधौ अविलम्बः सूचितः, तथा 'अवचूलकनियत्था' अवचूलकम् अधोमुखाञ्चलम्-मुत्कलाचलम् यया स्यात् तथा नियत्थं नियमितं येषां ते तथा प्रक्षरज्जलं वस्त्रं परिधाय गन्त व्यमित्यर्थः अनेनाबद्धकच्छत्वं सूचितं तदुपदर्शनेन स्वदैन्यं सूचितमिति । बद्धकच्छत्वदर्शने हि शूरत्वसूचक उत्कटत्वसम्भावनाया जनप्रसिद्धत्वात् अग्र्याणि बहुमूल्यकानि वराणि श्रेष्ठानि रत्नानि गृहीत्वा प्राञ्जलिकृताः कृतप्राञ्जलयः पादपतिताः चरणन्यस्तमस्तकाः किन्नर द्वारा या किसी भी किंपुरुष द्वारा या किसी भी महोरग द्वारा या किसी भी गंधर्व द्वारा शस्त्र प्रयोग से या अग्नि प्रयोग से यावत् मन्त्र प्रयोग से न उपद्रवित किया जा सकता है और न आपके देश परसे आक्रमण करने से हटाया ही जा सकता है। परन्तु फिर भी हमने जो इस प्रकार के असाध्य होने पर भी इस भरतराजा के ऊपर उपद्रव किया है वह केवल आपकी प्रीति के निमित्त ही किया है (तं गच्छह णं तुम्मे देवाणुप्पिया ! व्हाया कय बलिकम्मा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता उल्लपडसाडगा ओचूलगणिअच्छा अग्गाई वराइं रयणाई गहाय पंजलि उडा पायवडिया भरहं रायाणं सरणं उवेह) तो अब हे देवानुप्रियो ! तुम जाओ और स्नान करो बलि कर्म करो एवं कौतुक मंगल प्रायश्चित्त करो। यह सब करके फिर तुम सबके सब गोले धोती ‘दुपट्टे पहिने ही उनके प्रान्त भागों से जल जमीन पर गिरता जावे ऐसी अवस्थावाले होकर કઈ પણ કિન્નર વડે અથવા કઈ પણ જિંપુરૂષ વડે કે કોઈ પણ મહારગ વડે કે કોઇ પણ ગંધર્વ વડે કઈ પણુ શસ્ત્ર પ્રયોગ થી કે અવિન પ્રગથી યાવત મખ્ય પ્રગથી એ ઉપદ્રવિત કરવામાં આવી શકતું નથી તેમજ એ નરેશને તમારા દેશ પરથી આક્રમણ કરતાં ઢાવી પણ શકાય નહિ. અસાધ્ય હોવા છતાંએ અમે એ ભરત ન રશ ઉ૫ર ઉપદ્રવ કથી छ, ते मात्र तमारी प्रीति ने न ४. 'तं गच्छह णं तुम्मे देवाणुपिया । पहाया कयबालिकम्मा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता उल्लपडसाडगा ओचूलगणिअच्छा अग्गाई वराई रयणा गहाय पंजलिउडा पायवडिया भरतं रायाणं सरणं उवेह) तडवे वानु પ્રિયે ! તમે જાઓ અને સ્નાન કરે, બલકર્મ સમ્પન કરો તેમજ કૌતુક મંગળ પ્રાયશ્ચિત કરે. એ સર્વ સમ્પન કરીને પછી તમે બધા ભીના તી–દુઘટ્ટા પહેરીને જ એટલે કે જે છેતી-દુપટ્ટાઓના પ્રાન્ત ભાગમાં થી પાણી જમીન ઉપર ટપકી રહ્યું હોય એવી Page #813 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० २२ सप्तरात्र्यनंतरीयवृत्तवर्णनम् ७९९ भरतं राजानं शरणमुपेयात् स्वीकर्तव्यम् इत्यर्थः 'पणिवयवच्छला खलु उत्तमपुरिसा णत्थि मे भरदस्त रण्णो अंतियाओ भयमिति कट्टु, एवं वदित्ता जामेत्र दिसिं पाउन्भूया तामेव दिसिं पडिगया' प्रणिपतितवत्सलाः प्रणम्रजनानुरागिणः खलु निश्चये उत्तम पुरुषाः भवन्ति अतः नास्ति मे भवतां भरतस्य राज्ञोऽन्तिकाद्भयमिति कृत्वा आपातकिरातान् प्रति उक्तरीत्या उपदिश्य यस्याः दिशः प्रादुर्भूता आगतवन्तः तामेवदिशं प्रतिगताः प्रतिगतवन्त परावर्तिताः इत्यर्थः ते मेघमुखा नागकुमाराः इति अथ भग्नेच्छा म्लेच्छा आपातकिराताः यच्चक्रुः तदाह-'तरणं' इत्यादि । 'तए णं ते आवाडचिळाया मेहमुद्देहिं नागकुमारेहिं देवेहिं एवंवृत्ता समाणा उठाए उट्ठेति' ततः खलु ते आपातकिराताः मेघमुखैः नागकुमारैः देवैः एवमुक्ताः सन्तः उत्थाया उत्थानेन उत्तिष्ठन्ति 'उट्ठित्ता व्हाया कयबलिकम्मा' उत्थाय स्नाताः कृतबलिकर्माणः वायसादिभ्यो दत्तान्नभागाः 'कयकोउय मंगळपायच्छित्त' कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्ताः 'उल्ल पडसाडगा' मार्द्रपटशाटका: 'ओचूलगणि अच्छा' अवचूलकनियत्था सन्तः प्रक्षरज्जलं वस्त्रे परिधाय ' अग्गाईं वराई रयणाई गाय जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छंति' अय्याणि वराणि रत्नानि गृहीत्वा यत्रैव भरतो तथा बहुमूल्य श्रेष्ठ रत्नो को लेकर एवं हाथों को जोड़कर भरतराजा की शरण में जाओ वहां नाकर तुम सब उनके पैरो में गिर जाना (पणिवइयवच्छला खलु उत्तमपुरिसा णत्थि मे भरहस्सरण्णो) उत्तमपुरुष जो होते हैं वे प्रणिपतित वत्सल होते हैं - अपने प्रति झुकनेवाले जनो में अनुरागी होते हैं इसलिये आपलोगों को भरत नरेश के पास अब कोई भय नहीं है । इस प्रकार से आपात किरातों को समझा बुझाकर वे जिस दिशा से आये थे उसी दिशा तरफ चले गये अब जिनकी इच्छा पर पानी फिरे गया है ऐसे उन म्लेच्छ आपातकिरातों ने जो किया वह इस प्रकार से है - (तए णं ते आवाडचिलाया मेहमुहेहिं नागकुमारेहिं देवेहिं एवं वृत्ता समाणा उदाए उट्ठेति) अब मेघमुख नामके नागकुमारों के द्वारा पूर्वोक्त प्रकार से समझाये गये वे आपातकिरात अपने आप उठे (उट्ठित्ता पहाया कयबलिकम्मा कयको उयमंगलपायच्छित्ता उल्लपडसाडगा ओचूलસ્થિતિમાં જ, બહુમૂલ્ય શ્રેષ્ઠ રત્નાને લઇ ને તેમજ હાથ જોડીને ભરત રાજાનીં શરણમાં लग्यो. त्यांने तमे सर्व तेना यशोभां घडी लगे। (पणिवयवच्छला खलु उत्तमपुरिसा णत्थि मे भरद्दस्ल रण्णो) ने उत्तम पुरुष होय छे, ते अतित वत्सस होय છે. તેમની સામે જેએ નમ્ર થઇ ને જાય છે તેઓ તેમના અનુરાગ ને મેળવે છે, એથી તમે સ* ભરત નરેશ ની પાસે જાવા હવે ત્યાં કાઇ ભય તમને નથી. આ પ્રમણે આપાત કરાતાને સમજાવીને તે દેવા જે દિશામાંથી આવ્યા હતા, તે દિશા તરફ જ તા રહ્યા. હવે જેમની ઇચ્છા ઉપર પાણી ફરી વળ્યું છે એવા તૈ મ્લેચ્છ આપાતકિરાત્તા એ જે કંઇ ¥र्युं ते या प्रमाणे छे. ( तप णं ते आवाडचिलाया मेहमुहेहिं नागकुमारेहिं देवेहि एवं बुता समाणा उट्ठाप उट्ठेति ) व मेवभु नाम नागकुमारी वडे पूर्वेति प्रारथी सभ જાવવામાં આવેલા તે भाषा छ। पोतानी मैंने उभा थया ( उट्ठिन्ता व्हाया कयबलिकम्मा कयको उय मंगलपायच्छत्ता उल्लपडसाडगा ओचुलगणियच्छा अग्गाई Page #814 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८०० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे राजा तत्रैव उपागच्छन्ति 'उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं जाव मत्थए अंजलि कट्टु भरहं रायं जपणं विजएणं वद्धाविति' उपागत्य करतळपरिगृहीतं यावत् दशनखं शिरसावर्त्त मस्तके अञ्जलिं कृत्वा भरतं राजानं जयेन विजयेन बर्द्धयन्ति 'वद्धावित्ता' वर्द्धयित्वा 'गाई वराई रयण' इं उवणेंति, उवणित्ता एवं वयासी' अय्याणि वराणि रत्नानि उपनयन्ति प्राभृति कुर्वन्ति उपनीय प्राभृतीकृत्य एवम् वक्ष्यमाणप्रकारेण ते आपातकिराताः आवादिषुः उक्तवन्तः किमुक्तवन्त इत्याह- 'वसुहर' इत्यादि'वसुहर गुणहर जयहर हिरिसिरिधी कित्तिधारकणरिंद ! लक्खणसहस्सधारक ! रायमिदं णे चिरंधारे ॥ १ ॥ हे वसुधर द्रव्यधर षट्खण्डवर्त्तिद्रव्यपते ! अथवा तेजोवर ! गुणधर औदार्यादि गुणधारक ! जयधर विद्वेषिभिरघर्षणीयः शत्रुविजयकारक ही श्री धी कीर्त्तिधारक नरेन्द्र तत्र हूी:गणियच्छा अग्गाई वराई रयणाई गहाय जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छाते) और उठ कर फिर उन्होने स्नान किया बलिकर्म किया कौतुक मंगल, प्रायश्चित्त किये और फिर वे सबके सब जिनके अग्रभागों से पानी निचुडता हुआ चला जा रहा है ऐसे अधोवस्त्रों को पहिरे हुए ही बहुमूल्य श्रेष्ठ रत्नों को लेकर जहां पर भरत नरेश था वहां पर आये (उवागच्छिता करयलपरिग्गहियं जाव मत्थए अंजलि कट्टु भरहं रायं जएणं विजएणं वद्धाविंति ) वहां आकरके उन्होंने दोनों हाथों को जोड़कर और उसकी अंजुलि की मस्तक पर घुमाकर भरतनरेश को जय विजय शब्दों द्वारा बधाई दी (वद्धावित्ता अम्गाई, वराई रयणाई उवर्णेति) और वधाइ देकर फिर उन्होने बहुमूल्य श्रेष्ठरत्नो को भेंट के रूप में उनके समक्ष रख दिया ( उवर्णिता एवं वयासी) भेंट के रूप में रत्नो को रख कर फिर उन्होंने ऐसा कहा - (वसुहर ! गुणहर ! जयहर ! हिरिसिरि घी कित्तिधारक गरिंदलक्खणसहस्त धारक ! रायमिदं णे चिरं धारे) हे वसुधर- षट्खण्डवर्ति द्रव्यपते ! अथवा हे तेजो घर ! हे गुणधर - औदार्य शौर्यादिगुण धारक ! हे जयधर-शत्रुओ द्वारा अघर्षणीय । शत्रुविजय वराई रयणाई गहाय जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छंति ) भने उला ४ ने तेमा સ્નાન કર્યુ, મલિક કર્યુ અને કૌતુક મૉંગળ, પ્રાયશ્ચિત્ત કર્યાં અને પછી તે સવે જેમના અગ્રભાગેાથી પાણી ટપકો કહ્યું છે એવાં અધેવસ્ત્ર પહેરીને જ, બહુ મૂલ્ય શ્રેષ્ઠ रत्नाने वर्धने यां भरत नरेश हते, त्यां खाव्या. ( उवागच्छत्ता करयलपरिग्गहियं जाव म अलि कट्टु भरहं रायं जपणं विजपणं वद्धाविति) त्यां पयीने तेथे जन्ने हाथ જોડી ને અને તે હાથાની અંજલિને મસ્તક ઉપર ફેરવી ને ઝ્ય વિજય શબ્દો વડે તેને वधामणि आयी, ( वद्धावित्ता अग्गाई वराई रयणाई उवर्णेति) भने वधाभी भायीने तेम महुभूय श्रेष्ठ रत्नो लेटना इमां तेनी समक्ष भूही हीषां ( उवणित्ता एवं वयासी ) लेटना ३५मां रत्ना भूडी ने पछी तेमाने या प्रमाणे - ( वसुहर ! गुणहर ! जयहर fafe सिरि धी कित्तिधारक ! णरिंद - लक्खणसहस्सधारक ! रायमिं इणे चिरं घारे ) डे વસુધર-ખંડ વિત દ્રવ્યપત્તે ! અથવા હે તેોધર ! હે ગુણધર ! ઔદા શૌર્યાદિ ગુણ धा२४ ! हे न्यधर ! शत्रु वडे अधर्षीय ! शत्रु विनय ४।२४ ! डे हो, श्री लक्ष्मी, धृति સ તાષ, કીર્તિ યશના ધારક ! હૈ નરેન્દ્ર લક્ષણ સહસ્ર ધારક! અથવા-હે નરેન્દ્ર-નર સ્વા " Page #815 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० २२ सप्तरात्र्यनंतरीयवृत्तवर्णनम् लज्जा श्रीः-लक्ष्मीः धृतिः- धैर्यम् कीर्तिः यशः एतेषां धारकः नरेन्द्र नरस्वामिन् लक्षणसहस्त्रधारक ! तत्र लक्ष्यन्ते चिह्नयन्ते यैः तानि लक्षणानि हस्तादि विद्याधनजीवितरेखारूपाणि तेषां तहस्त्रं तस्य धारकः तस्य सम्बोधने हे लक्षणसहस्रधारक ! 'रायमिदं णे चिरंधारे' नः अस्माकम् इदम् राज्यं चिरंधारय पालय अस्मद्देशाधिपतिर्भव चिरं कालं यावदिति गाथार्थः ॥१॥ "हयवइ गयवइ णरवइ णवणिहिवइ भरहवासपढमवई । वत्तीस जणवय सहस्सराय सामी चिरं जीव ॥२॥" हे हयपते ! हे गजपते ! हे नरपते ! नवनिधिपते ! हे भरतवर्षप्रथमपते ! द्वात्रिंशज्जनपदसहस्त्राणां द्वात्रिंशदेशसहस्त्राणाम् ये राजानः तेषां स्वामिन् । चिरं जीव चिरकालं जीवन धारय अयम् अस्या गाथाया अर्थः ॥२॥ कारक ! हे हो श्रीलक्ष्मी, धृति संतोष, कीर्ति-यश के धारक ! नरेन्द्रलक्षणसहस्त्रधारक ! अथवा-हे नरेन्द्र नर-स्वामिन् ! हे लक्षणसहस्त्रधारक ! विद्या, धन, जीवन आदि को हजारों रेखाओं को चिह्नों को धारण करने वाले ! आप हमारे इस राज्य का चिर काल तक पालन करो-आप हमारे देश के चिरकाल तक अधिपति बनो ॥१॥ 'हयवइ गयवइ णरवई णवणिहिवइ भरहवास पढमवई । वत्तीसजणवयसहस्सरायसामी चिरं जीव ॥२॥ पढमणरीसर ईसर हिअईसर महिलियासहस्साणं । देवसयसाहसीसर चोद्दहरयणीसर जसंसी ॥३॥ सागरगिरिमेरागं उत्तरवाईणमभिजिथं तुमए । ता अम्हे देवाणुप्पियस्त विसए परिवसामो ॥४॥ हे हयपते ! हे गजपते ! हे नरपते ! हे नवनिधिपते ! हे भरतक्षेत्रप्रथमपते ! हे द्वात्रिशज्जनपद सहस्त्र नरपति स्वामिन् ! आप चिरकाल तक इस धरा धाम पर जीवितरहे ॥२॥ મિન ! હે લક્ષણુ સહસ્ત્ર ધારક-વિદ્યા, ધન, વગેરેની હજાર રેખાઓ ચિન્હને ધારણ કરનાર ! આપશ્રી અમારા એ રાજ્યનું ચિરકાળ સુધી પાલન કરે, આપશ્રી અમારા દેશના ચિરકાળ સુધી અધિપતિ બની. ૧ "हयवइ गयवइ णरवइ णवणिहिवइ भरहवासपढमवई । बत्तीस जणवय सहस्सरायसामी चिरं जीव ॥२॥ पढमणरोसर इसर हिअइसर महिलिया सहस्साणं । देवसय साहसीसर चोद्दहरयणीसर जसंसी ॥3॥ सागर गिरि मेरागं उत्तरवाईण मभिजिअ तुमए । ता अम्हे देवाणुप्पियस्स विसप परिवसामो ॥४॥ હે હપતે ! હે ગજપતે ! હે નરપત ! હે નવનિધિપતે ! હે ભરત ક્ષેત્ર પ્રથમપતે ! હે દ્વાન્નિશજજન પદ સહસ્ત્ર નરપતિ સ્વામિન્ ! આપશ્રી ચિરકાળ સુધી આ ધરાધામ Page #816 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८०२ "पढमणरीसर ईसर हियईसर महिलिया सहस्साणं । देवसय साहसीसर चोदस रयणोसर जसंसी ॥ ३॥" हे प्रथमरेश्वर ! हे ऐश्वरर्यधर ! हे महिलिकासहस्राणां चतुःपष्टि स्त्रीसहस्राणां हृदयेश्वर प्राणवल्लभ ! देवशतसहस्त्राणां रत्नाधिष्ठातृमागधतीर्थाधिपादि देवलक्षाणामीश्वर ! चतुर्द्दशरत्नेश्वर ! चक्ररत्नछत्ररत्नादमधिपते ! यशस्विन ! इति तृतीय गाथार्थः ॥ ३॥ "सागर गिरिमेरागं उत्तरवाईण मभिजिअं तुमए । ता अम्हे देवाणुप्पियस्स विसए परिवसामो ||४|| जम्बूद्वीपप्रतसूत्रे तथा ' सागर गिरिमेराग' सागर गिरिमर्यादम् तत्र सागरः पूर्वापरदक्षिणा रूपः समुद्रः, गिरिः - हिमवान् तयोः मर्यादा अवधिर्यत्र तत् सागरगिरिमर्यादम् पूर्वापरदक्षि दिक्जये समुद्रावधिकम् उत्तरतो हिमाचलावधिकम् यत् 'उत्तरवा ईणमभिजिअं तुमए' उत्तरावाचीनम् उत्तरार्द्धदक्षिणार्धभरतं सम्पूर्ण भरत मित्यर्थः तत् त्वयाऽभिजितम् स्वायत्तीकृतम् 'ता' तस्मात् 'अम्हें' वयम् देवानुप्रियस्य विषये देशे परिवसामः युष्माकं प्रजारूपेण निवसामः इत्यर्थः इति चतुर्थगाथाया अर्थ: बोद्धव्यः || ४ || 'अहो णं देवाणुपियाणं इड्ढीजुई जसे बले वीरिए पुरिसक्का परक्कमे दिव्या देवजुई दिव्वे देवाणुभावे लद्धे पत्ते अभिसमण्णागए' तत्र अहो इति आश्चर्ये खलु देवानुप्रियाणाम् श्रीमतां ऋद्धिः सम्पत् द्युतिः प्रभा यशः कीर्त्तिः बलं शारीरिकशक्तिः वीर्यम् आत्मशक्तिः हे प्रथम नरेश्वर ! हे इश्वर ऐश्वर्यधर ! हे चतुष्षष्ठीसहस्त्र नारीहृदयेश्वर हे रत्नाधिष्ठायक, मागध तीर्थाधिपादिदेवलक्षेश्वर ! हे चतुर्दशरत्नाधिपते ! हे यशस्विन् ! || ३ | आपने पूर्व, एवं पश्चिम, दक्षिण समुद्र तक के एवं क्षुद्रहिमाचलतक के उत्तरार्द्ध दक्षिणार्ध भरत को परिपूर्ण भरत क्षेत्र को भावी में भूतवदुपचार की अपेक्षाकर के अपने वश में कर लिया है. अतः अब हम आप देवानुप्रिय के ही देश में रहने वाले बन गये हैं । हम आपकी ही प्रजा रूप हो गये हैं |४॥ अहोणं देवापियाणं इढड्रीजुई जसे बले वीरिए पुरिसक्कारपरक कमे दिव्वा देवजुई दिव्वे देवाणुभावे लद्वे पत्ते अभिसमण्णागए) यहां अहो यह शब्द आश्चर्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । आप देवानुप्रिय की ऋद्धिसम्पन्, द्युति, प्रभा यश-कीर्ति, बल शारीरिक शक्ति, वीर्य - आत्मशक्ति, पुरुषकार - पौरुष और पराઉપર જીવિત રહેા. રા હું પ્રથમ નરેશ્વર ! હે ઈશ્વર અધર ! હું ચતુષ્ઠી સહસ્ત્ર નારી હૃદયેશ્વર ! હે રત્નાધિષ્ઠાયક, માગધતીર્થાધિપદિ દેવલક્ષેશ્વર ! હું ચતુર્દેશ રત્નાધિપતે हे यशश्विन् ॥3॥ आयुश्री पूर्व, पश्चिम क्षिय समुद्र सुधीना तेभन क्षुद्र हिमाચલ સુધીના ઉત્તરાદ્ધ-દક્ષિણાદ્ધ ભરતને-પરિપૂર્ણ ભરત ક્ષેત્ર તે-ભાવીમાં ભૂતવદુચારના અપેક્ષાએ પેાતાના વશમાં કરી લીધુ છે. એથી હવે અમે સવે આપ દેવાનુપ્રિયના જ દેશवासी यह गया छीमे. सभे आपश्रीनी अन्न यह गया छीथे ॥४॥ ( अहोणं देवाशुप्पिया इड्ढी जुइ जसे बले वीरिए पुरिसककारपरक्कमे दिव्वे देवाणुभावे लद्धे पत्ते अभिसमण्णागर ) अहीं' 'हे' से श આશ્ચય અથ માં પ્રયુક્ત થયેલ છે. આપ દેવાનુ Page #817 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सु० २२ सप्तराव्यनन्तरीयवृत्तवर्णनम् ८०३ पुरुषकारः पौरुषं पराक्रमः विक्रमः, मृद्धयादोनि आश्चर्यकारकाणि कुत इत्याह-'दिव्या देवजुई' इत्यादि । दिव्या सर्वोत्कृष्टा देवस्येव द्युतिः यस्य स देवधुतिः एवं दिव्यो देवानुभावो देवानुभागोवा लब्धः प्राप्तः अभिसमन्वागतो देवधर्मप्रसादादिति, परतः श्रुतेऽपि गुणातिशये आश्चर्योत्पत्तिः स्यात् दृष्टे तु सुतरामित्याशयेनाह-'तं दिट्ठा ' इत्यादि 'तं दिट्ठा णं देवाणुप्पियाणं इड्ढी एवं चेव जाव अभिसमण्णागए ' तद् दृष्टा खलु देवानुप्रियाणाम् ऋद्धिः सम्पत्, चक्षुः प्रत्यक्षेण अनुभूता श्रवणतो दर्शनस्यातिसंवादकत्वात् अद्भताश्चर्यजनकत्वात् एवं चैवेति उक्तन्यायेन दृष्टा देवानुप्रियाणां द्युतिः, एवं यशो बलादिकमपि दृष्टमित्यादि वक्तव्यम्, यावदभिसमन्वागत इतिपदे यावत्पदसंग्रहस्तु 'इड्ढीजसे बले वीरिए' इत्यादिकम् अनन्तरोक्त एव बोध्यम् 'तं खामेमु ण देवाणुप्पिया !" तत् क्षमयामः खलु देवानुप्रियाः ! क्यम् ‘खमंतु णं देवाणुप्पिया !' भववालचेष्टितं क्षमन्तां देवानुप्रियाः ! 'खंतुमरहंतु णं देवाणुप्पिया ।' क्षन्तु मर्हन्तु क्षमां कत्तुं योग्या क्रम विक्रम ये सब ही बड़े आश्चर्यकारक है. क्योंकि आपको सर्वोत्कृष्ट देव के जैसी धुति है, सर्वोत्कृष्टदेव के जैसा आपका प्रभाव है. यह सब आपने देव एवं धर्म के प्रसाद से ही लब्धकिया है. प्राप्त किया है और अभिसमन्वागत किया है. दूसरों के मुख से गुणातिशय के सुनने पर आश्चर्य होता है परन्तु जब वह स्वयं आखों से देखलिया जाता है तो आश्चर्य की सीमा नहीं रहती है,। (तं दिवाणं देवाणुप्पियाणं इड्ढो एवं चेव जाव अभिसमण्णागए, तं खामेमु णं देवाणुप्पिया खमंतु णं देवाणुप्पिया ! खंतुमरहंतु णं देवाणुप्पिया!) हमलोगों ने आप देवानुप्रिय की ऋद्धि अपनी आखों से देखली है. इसी प्रकार से आप का यश बल और वीर्य भी देखलिया है. यहां यावत्पद से"इइढी जसे बले"इन्हीं पदों का संग्रह हुआ है. इसलिये हे देवानुप्रिय! हम अपने अपराधों को आप से क्षमा करवाते हैं क्योंकि हमें पश्चात्ताप हो रहा है. हमारे इस बालचेष्टित क्रियाको आप देवानुप्रिय क्षमा करें. आप देवानुप्रिय ! हमें क्षमा करने के योग्य है. क्योंकि आप बहुत बड़े सदाप्रियन द्धि-सम्पत्. धुति, प्रभा-यश-हीत, म २४ शक्त, वीय-मात्मशत, પુરૂષકાર-પૌરૂષ અને પરાક્રમ વિક્રમ એ સર્વે અતીવ આશ્ચર્ય કારક છે. કેમકે આપશ્રીની સર્વોત્કૃષ્ટ દેવના જેવી ઘુતિ છે, સત્કૃષ્ટ દેવના જે આપશ્રીને પ્રભાવ છે. એ બધું આપ તો તે ના પ્રસાદ થી જ મેળવ્યું છે. પ્રાપ્ત કય* છે અને અભિસમનવાગત કર્યું છે. બીજાઓના મુખથી ગુણાતિશયની વાત સાંભળવાથી આશ્ચર્ય થાય છે પણ જ્યારે તે ગુણેના मार ने मांगी थी नये त्यारे असीम पाश्चर्य थाय छे. (तं दिवाण देवाणुप्पियाणं इद्री एवं चेव जाव अभिसमण्णागए, तं खामेमु णं देवाणुपिया! खमंतु णं देवाणुप्पिया! खतमरहंतु ण देवाणुपिया!) गमे सवे साये २५ पानुप्रियनी द्ध २५ यक्षु થી જોઈ લીધી છે. એ પ્રમાણે તમારા યશ બળ અને વીર્ય પણ અમે જોઈ લીધાં છે. अही यावत् ५४था "इइढी जसे बले " म यहाना सई थय। छे. अथाह અમારા થયેલ અપરાધ બદલ અમે સવ આપ શ્રી પાસેથી ક્ષમા યાચીએ છીએ. અમને ભારે પશ્ચાત્તાપ થઈ રહ્યો છે. અમારી બાળ-ચેષ્ટાઓને આપી દેવાનુપ્રિય ક્ષમા કરે આ૫ દેવાનુપ્રિય! Page #818 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८०४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र भवन्तु देवानुप्रियाः! 'णाइ भुज्जो भुज्जो एवं करणयाए त्तिक? पंजलि उडा पायवडिभा भरहं रायं सरणं उविति' 'णाई' त्ति नैव 'आई' इति निपानोऽवधारणे निश्चयार्थे भूयो भूय वारंवारं एवं करणतायै सम्पत्स्यामहे एवमपराधं न करिष्याम: इतिभावः इति कृत्वा प्राञ्जलिकृताः बद्धाञ्जलिपुटाः पादपतिताः भरतं महाराजानं शरणम् उपयान्ति प्राप्नुवन्ति । ___ अथ प्रसन्नताभिमुखभरतकृत्यमाह-'तएणं से' इत्यादि 'तएणं से भरहे राया तेसिं आवाडचिलायाण अग्गाई वराइं रयणाई पडिच्छंति पडिच्छित्ता ते आवाडचिलाए एवं वयासी' ततः खलु स भरतो राजा तेषामापातकिरातानाम् अग्र्याणि वराणि रत्नानि प्रतीच्छति स्वी करोति,प्रतीष्य-स्वीकृत्य तानापातकिरातान एवं वक्ष्यमाणप्रकारेणअवादीत् उक्तवान् 'गच्छह णं भो तुम्भे मम बाहुच्छाया परिग्गहिया णिब्भया णिरुधिग्गा सुहं सुहेणं परिवस' गच्छत खलु भोः ! देवानुप्रियाः ! यूयं स्वस्थानमिति शेषः, बाहुच्छायया परिगृहीताः स्वीकृताः मया शिरसि दत्तहस्ताः इत्यर्थः निर्भयाः भयरहिताः निरुद्भिग्नाः उद्वेगरहिताः सन्तः सुख मुखेन अतिशयसुखेन परिवसतः निवाः कुरुन 'णत्थि भे कत्तो वि भयमथि त्ति शय वाले हैं । (णाइ भुज्जोर एवं करणयाए त्ति कटु पंजलिउडा पायडिया भरहं र यं सरणं उविंति) अब हमलोग भविष्य में ऐसा नहीं करेंगे ऐसा कह कर उन आपातकिरातों ने दोनों हाथों को जोड़ कर उनकी अंजलि बनाई और फिर वे भरत राजा के पैरों में पतित हो गये-गिर गये. इस तरह वे भरत की शरण में प्राप्त हो गये. (तए णं से भरहे राया तेसिं आवाडचिलायाणं अग्गाइं वराई रयणाणि पडिच्छंति, पडिच्छित्ता ते आव! डचिलाए एवं वयासी) उन भरत राजाने उन मापात किरातों को भेट स्वरूप प्रदान किये गये मन-बहुमूल्य वर श्रेष्ठ रत्नों को स्वीकार करलिया और स्वीकार करके फिर उसने उन आपात किरातों से ऐसा कहा- (गच्छहणं भो तुब्भे ममं बाहुच्छाया परिग्गहिया णिब्भया णिरुव्विग्गा सुहं सुहेण रिवसह) हे देवानुप्रियो ! अब आपलोंग अपने २ स्थान पर जाओ आप सब मेरी बाहु छाया से परेगृहोत हो चुके हो निर्भय होकर एवं उद्वेगरहित होकर सुखपूर्वक रहो. (णत्थि मे कत्तो वि भयमस्थिति कटु सकारेइ, सम्माणेइ) अमन क्षमा ४२वा योग्य छ।. भई मा५ श्री महान् साशय सम्पन्न छ.. (णाइ भुज्जो २ पवं करणयाए त्तिक१ पंजलिउडा पायवडिया भरहं रायं सरण उचिंति) वे पछी ભવિષ્યમાં અમે આમ નહિ કરીએ આ પ્રમાણે કહીને તે આપાતકિરાએ બને હાથને જોડીને અંજલિ બનાવી અને પછી તેઓ સર્વ ભરત રાજાના ચરણોમાં પડી ગયા. આમ तभर नरेश भरतनुश२५ प्रान ज्यु. (तए ण भरहे राया तेसिं आवाडचिलायाणं अग्गाई पराई रयणाणि पडिच्छति, पडिच्छित्ता ते आवाचिलाए एवं वयासी) तसरत રાજાએ તે આપાત કિરાતના ભેટ સ્વરૂપે મૂકેલાં-અગ્રવ્ય-બહુમૂલ્ય અને શ્રેષ્ઠ રનોને સ્વીકરી ani भने वीर ४शने पछी ad ते आपात २ ताने या प्रमाणे धु-(गच्छह भो तुम्मे मम बाहुच्छाया परिग्गहिया णि भया णिरुव्विग्गा सुहं सुहेण परिवसह) वानुપ્રિયે ! હવે તમે સર્વ પિોત-પોતાના સ્થાને પ્રયાણ કરો. તમે બધા મારી બાહુ છાયાથી પશ્ચિહીત થઈ ચૂક્યા છે. હવે નિર્ભય થઈને તેમ જ ઉદ્વેગ રહિત થઈને સુખપૂર્વક રહે. Page #819 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८०५ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० २२ सप्तराव्यनन्तरीयवृत्तवर्णनम् कटु सक्कारेइ, सम्माणेइ, सक्कारेत्ता सम्माणेत्ता पडिविसज्जेइ' नास्ति 'भे' भवतां कुतोऽपि कस्मादपि भयमस्ति इति कृत्वा इत्युक्त्वा सत्कारयति आसनादिना सम्मानयति मधुरवचनादिना सत्कार्य सम्मान्य प्रति विसर्जयति स्वस्थानगमनाय अतिदिशति प्रेषयति। 'तएणं से भरहे राया सुसेणं सेणावइं सदावेइ सहावित्ता एवं वयासी' ततः आपातचिलातानां गमनानन्तरं खलु स षट्खंडाधिपतिः भरतो राजा सुसेणं सेनापति शब्दयति आह्वयति शब्दयित्वा आहूय एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् ‘गच्छाहि णं भो देवाणुप्पिया ! दोच्चं पि सिंधुए महाणईए पच्चत्थिमं णिक्खुडं ससिंधुसागरगिरिमेरागं समविसमणिक्खुडाणि अ ओअवेहि, गच्छ खलु भो देवानुप्रिय ! सुषेण सेनापते ! द्वितीयमपि पूर्वसाधितनिष्कुटापेक्षया अन्यं सिन्ध्वाः महानद्याः पश्चिम-पश्चिमभागवर्ति निष्कुटं कोणस्थितभरतक्षेत्ररूण्डरूपम् इदं च कैविभक्तमित्याह-ससिन्धुसागर गिरिमर्यादम् तत्र-सिन्धुः नामा महा नदी सागरः पश्चिमसमुद्रः गिरिः उत्तातः क्षुल्लहिमवगिरिः दक्षिणतो वैतादयगिरिश्च एतैः कृता मर्यादा विभागरूपा तया सहितं यत्त. त्तथा, एतैः कृतविभागमित्यर्थः 'समविसमणिक्खुडाणि य' समविषमनिष्कुटानि च तत्र समानि समभूमिभागवर्तीनि विषमाणि च दुर्गभूमिभागवर्तीनि यानि निष्कुटानि आपलोगों को किसी से भी अब भय नहीं रहा है ऐसा कह कर उन भरत राजा ने उन्हें सत्कृत और सन्मानित किया (सकारेत्ता सम्माणेत्ता पडिविसज्जेइ) सत्कृत सन्मानित करके फिर उन्होंने उन्हें अपने २ स्थानों पर चले जाने का आदेश दे दिया. (तएणं से भर हे रायों सुसेणं सेणावई सद्दावेइ) इसके बाद भरत राजाने सुषेण सेनापति को बुलाया-और (सदावित्ता एवं वयासी) बुलाकर उससे ऐसा कहा -(गच्छाहि णं भो देवाणुपिया ! दोच्चंपि सिंधूए महाणईए पच्चास्थमं णिक्खुडं ससिन्धु सागरमेरागं समविसमणिक्खुडाणि अ ओअवेहि) हे देवानुप्रिय! अब तुम पूर्वसाधित निष्कुट की अपेक्षा द्वितीय सिन्धु महानदी के पश्चिम भारवर्ती कोणमें स्थित भरतक्षेत्र में जाओ यह सिन्धु नदी पश्चिमदिग्वर्ती समुद्र तथा उत्तर में क्षुल्लहिमवगिरि और दक्षिण में वैतादयगिरि इनसे विभक्त हुथा है और वहां प्रमभूमिगावतों एवं दुर्गभूमि भारवर्ती जो अवान्तर क्षेत्रखण्ड(त्थि मे क.तो वि भयमरिथ ति कटूटु सक्कारेइ, सम्माणेइ) तभनवे छन। ५ भय नथी. मामाने भरत २IMसे तेभने सत्कृत भने सम्मानित ४ा. (सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) साइन अने सन्मानित ४ीने पछी तेणे भने पातपाताना स्थान पाना माहेश माध्यो. (तएणं से भरहे राया सुसेण सेणावई सद्दावेइ) त्या२ मा भरत राय अषेश सेनातिनावी २ मा ५ धु-(गच्छाहि ण भो देवाणुदिपया ! दोच्चपि ए महाणईए पच्चिारथम णिकखुर्ड ससिन्धुसागरमेरागं समविसमणिक्खडाणि अ ओअवेहि) 3 वानुप्रिय ! वे तमे पूर्व साधित निटनी अपेक्षा द्वितीय सिन्ध મહાનદીના પશ્ચિમ ભાગવતી કેણમાં ધન ભરતક્ષેત્રમાં જાઓ. એ ફોત્ર સિંધુ નદી પશ્ચિમ દિગ્વતી સમુદ્ર તથા ઉત્તરમાં સુલ હિમવંત ગિરિ અને દક્ષિણમાં વૈતાઢય ગિરિ એમનાથી સંવિભક્ત થયેલ છે. અને ત્યાં સમભૂમિ ભાગવતી તેમજ દુર્ગભૂમિ ભાગવતી જે અવાનાર Page #820 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अवान्तरक्षेत्र खण्डरूपाणि तानि तथा 'ओअवेहि' साधय तत्र विजयं कृत्वाऽस्मदाज्ञां प्रवर्त्तय 'ओभवेत्ता अग्गाई वराई रयणाई पडिच्छाहि' साधयित्वा विजित्य अय्याणि वराणि प्रधानानि रत्नानि स्व स्वजातौ उत्कृष्टवस्तूनि प्रतीच्छ गृहाण 'पडिच्छित्ता' प्रतीष्य गृहीत्वा 'मम एयमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चपिणाहि ममैताम् उक्तानुसारिणीम् आज्ञप्तिकां क्षिप्रमेव प्रत्यर्पय समर्पय 'जहा दाहिणिल्लस्स ओअवणं तदा सव्वं भाणियव्वं जाव पच्चणुभवमाणे विहरइ' यथा दाक्षिणात्यस्य सिन्धु निष्कुटस्य 'ओअवणं' साधनं 'तहा सव्वं भाणियव्वं तथा सर्वे भणितव्यं तावत्सर्वे भणितव्यं वक्तव्यम् 'जाव पच्चणुभवमाणा विहरंति' तावद्वक्तव्यं यावत्सेनानीर्भरतविसृष्टः पञ्चविधान् कामभोगान् प्रत्यनुभवन् विहरतीति ।। ५०२२ ।। तदनन्तरं किं जातमिति निरूपयन्नाह - मूलम् तपणं दिव्वे चक्करयणे अण्णया कयाई आउघरसालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता अंत लिक्खपडिण्णे जाव उत्तरपुरच्छिम दिसिं चुल्लहिमवंत पब्वयाभिमुद्दे पयाते यावि होत्या, तरणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करणं जाव चुल्लहिमवंतवासहरपव्वयस्स अदूरसामंते दुवालसजोयणायामं जाव चुलहिवंतगिरिकुमारस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिues, तहेव जहा मागहतित्थस्स जाव समुदवभूअपिव करेमाणे करेमाणे रूप निष्कुट हैं वहां पर विजय प्राप्त कर हमारो आज्ञा को स्थापितकरो. (ओअवेत्ता अग्गाई वराई रयणाई पडिच्छाहि) ऐसा करके बहुमूल्य श्रेष्ठ रत्नों को अपनी २ जाति में श्रेष्ठ उत्कृष्ट वस्तुओं को भेटरूप में स्वीकार करो (पडिच्छित्ता मम एयमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चष्पिणाहि ) स्वीकार करके मेरी इस आज्ञा की पूर्ति हो जाने की पीछे हमें खबर दो (जहा दाहिणिल्लस्स ओअवणं तहा सव्वं भाणि जाव पच्चणुभवमाणा विहरंति) जैसा दाक्षिणात्य - दक्षिणदिग्वर्ती-सिन्धु नदी निष्कुट के विजय करने का प्रकरण " यावत् पच्चणुभवमाणा विहरंति" इस सूत्र पाठ तक कहा जा चुका है. वैसा ही वह सब प्रकरण यहां भी कहलेना चाहिये || २२ | हइ, ८०६ क्षेत्र ३ हे त्यां विनय आसरी अभारी आज्ञा त्यां स्थापित पुरे. (ओभवेत्ता अग्गाई' वराई' रयणाई पडिच्छाहि) साम हरीने महुभूय श्रेष्ठ रत्नाने पातपातानी लतिभां श्रेष्ठ- पृष्ट वस्तु/ने लेट ३५मां स्वीर रे। (पडिच्छित्ता मम एयमाणत्तियं खिप्पामेव पच्चपणाहि ) स्वी४२ ४रीने भारी या आज्ञानु पालन पूरीते उरीने पछी भने सूचना आपे।. (जहा दाहिणिल्लस्स-ओअवणं तदा सव्वं भाणियव्वं जाव पच्चणुभवमाणा विह रंति) भेषु हाक्षित्य-दक्षिणुद्दिश्वत सिन्धु नही निष्ठुटना विश्य-प्र४२५ " यावत् पच्चणुभवमाणा विरंति” यो सूत्रपात सुधी वामां आवे छे. तेवुन मधु र भत्रे समन्यु लेखे. ॥२२॥ Page #821 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० वक्षस्कारः सू० २३ उत्तरदिग्वर्तिनिष्कुटविजयानंतरीयवृत्तवर्णनम् ८०७ उत्तरदिसाभिमुहे जेणेव चुल्लहिमवंतवासहरपब्बए तिक्खुत्तो रहसिरेणं फुसइ फुसित्ता तुरए णिगिण्हइ णिगिण्हित्ता तहेव जाव आयतकण्णायतं च काऊण उसुमुदारं इमाणि वयणाणि तत्थ भाणीअ से णरवई जाव सव्वे मे ते विसयवासित्ति कटु उद्धं वेहासं उसु णिसिरइ परिंगरणिगरणिअमज्झे जाव तएणं से सरे भरहेणं रण्णा उड्दे वेहासं णिसढे समाणे खिप्पामेव बावत्तरि जोयणाई गंता चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्म देवस्स मेराए णिवइए तएणं से चुल्लहिमवंतगिरिकुमारे देवे मेराए सरं णिवइअं पासइ पासित्ता आसुरत्ते रुट्टे जाव पीइदाणं सबोसहिं च मालं गोसीसचंदणं कडगाणि जाव दहोदगं गेण्हइ गेण्हित्ता तोए उक्किट्ठाए जाव उत्तरेण चुल्लहिमवंतगिरिमेराए अहण्णं देवाणुप्पियाणं विसयवासी जाव अहण्णं देवाणुप्पियाणं उत्तरिल्ले अंतवले जाव पडिविसज्जेइ ॥ सू० २३ ॥ छाया-ततः खलु तदिव्यं चक्ररत्नम् अन्यदा कदाचित् आयुधगृहशालातः प्रतिनिक्रामति प्रतिनिष्क्रम्य अन्तरिक्षप्रतिपन्नम् यावत् उत्तरपौरस्त्यां दिशि क्षुद्रहिमवत्पर्वताभिमुख प्रयातं चाप्यभवत् । ततः स्खलु स भरतो राजा तदिव्यं चक्ररत्नं यावत्क्षुद्रहिमवगिरिकुमारस्य देवस्य अष्टमभक्त प्रगृह्णाति तथैव यथा माग धतीर्थस्य यावत् समुद्ररवभूतमिव कुर्वन् कुर्वन् उत्तरदिशाभिमुखं यौव क्षुद्रहिमबद्वर्षधरपर्वतः तत्रैव उपागच्छति उपांगत्य क्षुद्रहिमवद् वर्षधर पर्वत' त्रिः कृत्वः रथशिरसा स्पृशति, स्पृष्टा तरगानू निगृह्णाति निगृह्य तथैव यावत् आयतकर्णायतं च कृत्वा इषुमुदारम् इमानि वचनानि तत्र अभाणीत् स नरपतिः यावत् सर्वे मे ते विषयवासीति कृत्वा ऊध्य विहायसि इषु निसृजति परिकरनिगडितमध्यो यावत् ततः खलु स शरः भरतेन राज्ञा अर्थ विहायसि निसृष्टः सन् क्षिप्रमेव द्वासप्ततिं योजनानि गत्वा क्षुद्रहिमगिरिकुमारस्य देवस्थ मर्यादायां निपतितः ततः खलु स क्षुद्रहिमवद्गिरिकुमारो देवः मर्यादायां शर निपतित पश्यति दृष्ट्वा आशुरुतो रुष्टो यावत् प्रीतिदानं सवौषधीश्च मालां गोशीर्षचन्दनं च कटकानि यावत् द्रहोदकं च गृह्णाति गृहीत्वा तया उत्कृष्टया यावत् उत्तरस्यां क्षुद्रहिमवगिरिमर्यादायाम् अहं खलु देवानुप्रियाणां विषयवासो यावत् अहं खलु देवानुप्रियाणाम औत्तराहोऽन्तपालो यावत् प्रतिविसर्जयति ॥सू०२३॥ टीका-'तएणं' इत्यादि 'तएणं तं चक्करयणे अण्णया कयाई आउघरसालाो पडिणिक्खमइ' ततः 'तएणं से दिव्वे चक्करयणे अण्णया कयाई' इत्यादि. ॥२३॥ टोकार्थ-इस तरह उत्तरदिग्वर्ती निष्कुटों का विजय करने के बाद से (दिव्वे चक्करयणे) वह दिव्य Page #822 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८०८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे औत्तराहसिन्धुनिष्कुटसाधनानन्तरं खलु तदिव्यं चक्ररत्नम् अन्यदा कदाचित् अन्यस्मिन् कस्मिंश्चित् समये आयुषगृहशालातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति निस्सरति इत्यर्थः 'पडिणिक्खमित्ता' निःसृत्य प्रतिनिष्क्रम्य बहिनिर्गत्य' अंतलिक्खपडिवण्णो जाव उत्तरपुरत्थिमं दिसि चुल्लहिमवंतपव्वयाभिमुहे पयाते यावि होत्था' अन्तरिक्षप्रतिपन्नम् गगनदेशस्थितं यावत्पदात् यक्षसहस्त्रपरिवृतं दिव्यत्रुटितवाद्यविशेषशब्दसन्निनादेन अम्बरतलं पूरयदिव एतेषां पदानां सङ्ग्रहः उत्तरपौरस्त्यायां दिशि ईशाने कोणे क्षुद्रहिमवत्पर्वताभिमुखं क्षुद्रहिमाचलगिरिसंमुखं प्रयातं गतं चाप्य भवत् 'तएणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं जाव चुल्लहिमवंतवासहरपव्ययस्स मदरसामंते दुबालसजोयणायामं जाव चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्स देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्हइ' ततः खलु स भरतो राजा तद् दिव्यं चक्ररत्नं यावत् अभिक्षुद्रहिमवद्गरि प्रयातं दृष्ट्वा कौटुम्बिकपुरुषाज्ञापनं हस्तिरत्नप्रतिकल्पनं सेनासन्नाहनं स्नानविधानं हस्तिरत्नारोहणं मार्गागतपुरनगरदेशाधिवशीकरणं चक्ररत्न (अण्णया कयाई) किसी एक समय (आउहघरसालाओ) आयुवगृहशाला से (पडिणिक्वमइ) निकला और (पडिणि खमित्ता अंतलिक्खपडिवन्ने जाव उत्तरपुरच्छिमं दिसिं चुल्लहिमवंत पन्वयाभिमुहे पयाए यावि होत्था) निकलकर वह आकाश प्रदेश से ही- ऊपर रहकर ही-यावत् उत्तर पूर्वदिशा में-ईशान विदिशा में क्षुद्र हिमवत् पर्वत को तरफ चला यहां यावत्पद से-"जक्खसहस्स संपरिवुडे दिव्य तुडियपद्दसणिणाएणं ते चेव अंबातलं" इन पदों का संग्रह किया गया है. (तएणं से भरहे राया तं दिवं चवकरयणं नाव चुल्लहिमवंतवासहरपव्वयस्स अदूर सामंते दुवालमजोयणायाम जाव चुल्लहिमवंतगिरि कुमारस्त देवस्स अट्ठमभत्तं पगिण्हइ) क्षुद्र हिमवंत पर्वत की ओर जाते हुए उस दिव्य चक्रात को देख कर भरत राना ने क टुम्बिक पुरुषों को बुलाना, उन्हें भाज्ञा देना, हस्तिरत्न की तैयारी करवाना, सेना की तैयारी करवाना फिर स्नान करना, हस्तिरत्न पर मारोहण करना, मार्गगत पुर के नगर के एवं देश के अधिप. 'तएणं से दिवे चक्करयणे अण्णया कयाइ ' इत्यादि सूत्र-॥२३॥ टी-1 प्रमाणे उत्त२ हिवता' निट। 8५२ विश्य भेव्या माह (से दिवे चक्करयणे) ते ६०य य २९न (अण्णया कयाई) ४ मे १५ते (आउघरसालाओ) आयुध शाणामांथा (पडिणिक्खमइ) बहार नीज्युमने (पडिणिक्वमित्ता अंतलिक्ख पडिवन्ने जाव उत्तरपुरच्छिमं दिसि चुल्लहिमवंतपव्वयभिमुहे पयाए यावि होत्था ) महार નીકળીને તે આકાશ પ્રદેશથી જ એટલે કે અદ્ધર રહીને જ યાવત્ ઉત્તર-પૂર્વ દિશામાં-ઈશાન Caleni-क्षुद्र हिमवत् ५ तनी त२३ यात्यु. मड़ी यावत् ५४था-"जक्स्वसहस्त संपरिबुडे दिव्वडियसहसण्णिणापणं पूरेते चेव अंबरतल” से पहोने। स यथे। छे. (तएणं से भरहे राया तं दिव्यं चक्करयणं जाय चुल्लहिमवंतवासहरपव्वयस्स अदूरसामते दुवालसजोयणायाम जाव चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्स देवस्त अट्टमभत्तं पगिण्हइ) ક્ષુદ્ર હિમવંત પર્વત તરફ પ્રયાણ કરતાં તે દિવ્યચક્રરત્નને જોઈને ભરત રાજા એ કૌટુંબિક પુરૂષોને બોલાવ્યા અને તેમને આજ્ઞા આપી તમે હસ્તિરત્નને તૈયાર કરો સેના તૈયાર કરો. Page #823 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - ~ ~ ~ ~ - ~ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सु० २३ उत्तरदिग्वर्तिनिष्कुटविजयानन्तरीयवृत्तवर्णनम् ८०९ त्प्राभृतस्वीकरणं चक्ररत्नानुगमनं योजनानन्तरितवसतिवसनं च करोतीत्यादि पिण्डार्थः प्रथमयावत्पदग्राह्यः, अत्र यावत्पदात् एतावद् वृत्तान्तं ज्ञातव्यम् ततः क्षुद्रहिमवर्षधरपर्वतस्य अदरसामन्ते क्षुद्रहिमवगिरिसमापे द्वादश योजनायामम् अष्टाचत्वारिंशत्क्रोशपरिमितायामम् अत्र यावत्पद त् नव योजनविस्तीर्णादि विशेषणं विशिष्टं स्कन्धावारं निवेशयति वर्द्धकि त्नं शब्दयति, पौषधशालां विधापयति पौषधं च करोतीत्यादि बिज्ञेयम् क्षुद्रहिमवद्विरिकुमारस्य देवस्य साधनाय पौषधशालायाम् अष्टमभक्तं प्रगृहाति इत्यर्थः । 'तहेव जहामागहतित्थस्स जाव समुदरवभूयंपिव करेमाणे करमाणे उत्तरदिसाभिमुहे जेणेवचुल्लहिमवंतवासहरपव्यया तेणेव उवागच्छइ' अत्र 'तहेव' तथैव इति पदवाच्यम् अष्टमभक्तप्रतिजागरणं तियों का वश में करना उनके द्वारा प्रदत्त भेट स्वीकार करना चक्ररत्न के पीछे २ चलना एक २ योजन के अन्तर से पडाव डालना" इत्यादिरूप से यहां सब कथन जैसा कि पीछे किया जाचुका है. कर लेना चाहिये यहो वात यहां पर आगत प्रथम यावत्पद ने प्रकट की है. चक्रवर्ती भरत राजा ने क्षुदहिमवत्पर्वत के अदूर सामन्तस्थान में अर्थात् उसके पास में १२ बारह योजन को लम्बाई वाले और नौ योजन की चोड़ाई वाले अपने कटक को ठहरा दिया.यहां पर आगत पद से" नव योजन विस्तीर्ण मादि"पूर्वोक्तविशेषणों का ग्रहण हुआ है. फिर उसने अपने वर्द्धकीरत्न को बुलाया उससे पौषधशाला बनाने को कहा- उसने पौषधशाला का निर्माण कर दिया उसमें स्थित होकर भरत ने पोषध किया. इत्यादि- सब कथन जान लेना चाहिये. इस तरह सर्व कार्य हो चुकने के बाद भरत राजा ने पोषधशाला में बैठ कर क्षुद्र हिमवद्गिरिकुमार देव को साधने के लिये अष्टम भक्त की तपस्या करना प्रारम्भ कर दिया (तहेव जहा मागहतित्थस्स जाव समुद्दरवभूयपिव करेमाणे २ उत्तरदिसाभिमुहें जेणेव चुल्लहिमवंतवासहरपव्वए तेणेव उवागच्छइ) यहां માર્ગવત પુરના, નગરના તેમજ દેશના અધિપતિઓને વશમાં કરે, તે અધિપતિએ ભેટ સ્વરૂપે જે કંઈ આપે તે સ્વીકાર કરો, ચક્ર રત્નની પાછળ-પાછળ ચાલે, એક જનના અન્તથી તમે પડાવ નાખે.” ઈત્યાદિ રૂપમાં અત્રે બધું કથન જેમ પહેલાં કહેવામાં આવ્યું छ त समावु नये. ये बात सही प्रयुत प्रथम 'यावत्' पह द्वा२४८ ४२. વામાં આવી છે. ચક્રવતી ભરત રાજાએ શુદ્ર હિમવત્પર્વતના અદૂર સામત સ્થાનમાં અર્થાત તેની પાસે ૧૨ યોજન જેટલી લંબાઈવાળા અને ૨ પેજન જેટલો પહેળાઇ વાળા પોતાના કટકને પડાવ નાખ્યો. અહીં આવેલા આ ગત પદથી–“નવ જન વિસ્તીર્ણ વગેરે” પ્ર. ફત વિશેષનું ગ્રહણ થયું છે. ત્યાર બાદ તેણે પોતાના વદ્ધકિરન ને બોલાવ્યો અને તેને પૌષધશાળાનું નિર્માણ કરવા માટે કહ્યું. વર્લ્ડરિને આજ્ઞા મુજબ તરત જ ષિધ શાળા બનાવી આપી તેમાં સ્થિત થઈને ભરત નરેશે પૌષધ વ્રત કર્યું. ઈત્યાદિ બધું કથન જાણી લેવું જોઈએ, આ પ્રમાણે સર્વકાર્યો પૂરા થઈ ગયા પછી ભારત રાજાએ પૌષધશાળામાં બેસીને ક્ષુદ્ર હિમવ૬ ગિરિ કુમાર દેવને સાધવા માટે અષ્ટમ ભકતની તપસ્યા પ્રારંભ श. ( तहेव जहा मागहतित्थस्स जाव समुदरवभूयंपिव करेमाणे २ उत्तरदिसाभिमहे जेणेव चुल्लाहमवंतवासहरपव्वए तेणेव उवागच्छइ) सही प्रयुक्त "तथैव' ५६ १3 ". १०२ Page #824 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८१० जम्बूद्वोपप्रप्तिसूत्रे तत्समापन कौटुम्बकाज्ञापनं सेनासज्जीकरणम् अश्वरथप्रतिकल्पनं स्नानविधानम् अश्वरथारोहणं चक्ररत्नमार्गानुगमनं च करोतीत्यादि विज्ञेयम् तथैव मागधतीर्थस्य मागधतीर्थराजदेवस्य यावद् समुद्ररवभूतामिव समुद्ररवं प्राप्तमिव भूगतौ इति सौत्रो धातुः तस्मात् तः सैन्यसयुत्थ कल करवेण पृथिवीमण्डलं कुर्वन् कुर्वन उत्तरदिगभिमुखो यत्रैव शुद्रहिमवर्षधरपर्वतः तत्रैव उपागच्छति समीपं याति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'चुल्लहिमवंतवासहरपव्वयं तिक्खुत्तो रहसिरेणं फुसइ' क्षुद्रहिमवद् वर्षधरपर्वतं त्रिकृत्वः त्रीन् वारान् रथाग्रभागेन काकमुखेन स्पृशति अतिवेगप्रवृत्तस्य वेगिपदार्थस्य पुरस्थ प्रतिबन्धकभित्त्यादि संघटने त्रिस्ताडनेन वेगपातदर्शनादत्र त्रिरित्युक्तम् ‘फुसित्ता तुरए णिगिण्हई' स्पृष्ट्वा वेगप्रवृत्तान् तुरगान चतुरः अश्वान् निगृह्णाति स्थापयति 'णिगिण्हित्ता तहेव जाव आयतकण्णायतं च काऊण उसमुदारं इमाणि वयणाणि तत्थ भणीभ से हरवई जाव सव्वे आगत "तथैव" पद के द्वारा वाच्य “प्रष्टमभक्त के दिनों में जगना फिर उसका समापन करना कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाकर उन्हें आज्ञा देना, सेना को तैयारी करवाना, अश्वरथ की तैयारी करके उसे उपस्थित करने की बात कहना, स्नान करना, अश्वरथ पर सवार होना चक्ररत्न द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर गमन करना इत्यादि ये सब कार्य हुए हैं अर्थात् भरत चक्रवर्ती ने. पहिले कहे गये अनुसार ही इन सब कार्यों को किया ऐसा जानना चाहिये. यावत् सैन्य समुत्थ कल २ रव से मानों पृथिवी मंडल पर समुद्र का रव ही आकर व्याप्त हो गया है इस तरह से पृथिवी मंडल को करता २ वह भरत राजा उत्तर दिशा को ओर बढ़ता हुआ जहां पर क्षुद्रहिमवान् पर्वत था. वहां पर आया (उवागच्छित्ता चुल्लहिमवंतवा सहरपव्वयं तिक्खुत्तो रहसिरेणं फुसइ) चूंकि अश्वरथ का वेग तीव्र था इससे क्षुद्र हिमवत्पर्वत से रथ का शिरोभाग तोन वार टकराया (फुसित्ता तुरए णिगिण्हइ) अश्वरथ का अग्र भाग जब क्षुद्रहिमवत्पर्वत से तीन बार टकरा गया- तब उसने वेग से चलते हुए चारों घोड़ों को थामलिया (णिगिणिहत्ता મ ભફતના દિવસમાં જાગરણ કરવું, પછી તેનું સમાપન કરવું, કૌટુંબિક પુરુષોને બેલાવી ને તેમને આજ્ઞા આપવી, સેના સુસજજ કરાવવી, અધરથની તૈયારી કરીને તેને ઉપસ્થિત કરવાની આજ્ઞા આપવી, સ્નાન કરવું, અશ્વરથ ઉપર સવારી કરવી, ચરત્ન દ્વારા પ્રદર્શિત માગ ઉપર ગમન કરવું “ઇત્યાદિ સર્વ કાર્યો સમ્પન કર્યા આમ સમજવું ભરત નરેશે પહેલાં કહ્યાં મુજબ જ એ સર્વ કાર્યો ને સમ્પન્ન કર્યા એવું “તર્થવ શબ્દનું તાત્પર્ય છે. યાવત્ સૈન્ય સમુથ કલકલ નિનાદથી જાણેકે પૃથ્વીમંડળ ઉપર સમુદ્ર જન જ આવી ને વ્યાપ્ત થઈ ન ગયું હોય આ પ્રમાણે પૃથ્વીમંડળ ને પિતાના સૈન્ય સંચારણથી મુખરિત કરતો તે ભરત નરેશ ઉત્તર દિશા તરફ પ્રયાણ કરતો જ્યાં સુદ્ર હિમવાત પર્વત हता त्या पडल्या. (उवागच्छित्ता चुल्लहिमवंतवासहरपव्ययं तिक्खुत्तो रहसिरेण फुसइ) અશ્વરથની ગતિ તીવ્ર હતી તેથી ક્ષુદ્રહિમવત્ પર્વત થી તે અશ્વરનો શિરોભાગ ત્રણ पार अथाये.. (फुसित्ता तुरप णिगिण्हइ) अश्वथन। ५ मा न्यारे क्षुद्र भियतने व पार मथाये। प्यारे तथा याता यारे घामाने शया. (णिगिण्हित्ता तहेव Page #825 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू. २३ उत्तरदिग्वर्तिनिष्कुटविजयानन्तरीयवृत्तवर्णनम् ८११ मे ते विसयवासीति कटु उद्धं वेहासं उसुं णिसिरइ परिगरणिगरिअमज्झे जाव' चतुरोपितुरगान् निगृह्य तथैव मागधतीर्थाधिकारवदेव यावद् आयतकर्णायतं इषुमुदारमिति अत्र 'तहेव' त्ति वचनात् स्थस्थापनं धनुग्रहणं बाणग्रहणं च वक्तव्यम् ततः तम् उदारम् उद्भटम् इथु बाणं यावदायतकायतम् आयतं प्रयत्नयुक्तं यथा भवति तथा कर्ण यावत् कर्णपर्यन्तम् आयतम् आकृष्टं कृत्वा तत्र इमानि वचनानि अभाणीत् स नरयतिः अत्र यावत् पदेन'हं. दि सुणंतो भवंतो' इत्यादि गाथाद्वय वाच्यं सर्वे मे ते देशवासिनः इति पर्यन्तम् एतस्य विशेषतो व्याख्यानं तृतीयवक्षस्कारे षष्ठसूत्रे विलोकनीयम् इति कृत्वा इत्युच्चार्य ऊर्ध्वमू उपरि विहायसि आकाशे क्षुद्राहिमवगिरिकुमारस्य तत्रावाससंभवात् इषु बाणं निसृजति मुञ्चति 'परिगरणिगरिअमज्झो जावत्ति' अत्र यावत्पदात् बाणमोक्षप्रकरणाधीतं परिपूर्ण गथाद्वयं वक्तव्यमिति तथा चतहेव जाव आयतकण्णायतं च काऊण उसुमुदारं इमाणि वयणाणि तत्थ भणीअ से णरवई जाव सव्वमेते विसयवासीत्ति कटु उद्धं वेहासं उसुं णितिरइ परिगरणिगरिअमझे जाव) चारों घोड़ो को थाम कर के मागधतीर्थाधिकार में कहे गये अनुसार उसने फिर अपने धनुष को उठाया बाण को उठाया फिर बाण को धनुष पर स्थापित किया और फिर उसने धनुष पर आरोपित करके उस उदार उद्भट धनुष को कान तक खेंचा कान तक धनुष खेंचकर फिर उसने इस प्रकार के इन वचनों को कहा- "हंदि सुणंतो भवंतो" ये वचन पूर्वोक्त इन दो गाथाओं में प्रकट कर दिये गये हैं सो वे ही वचन "सब आप लोग मेरे देश निवासी हैं यहांपर भी कहना चाहिए इनकी व्याख्या तृतीय वक्षस्फारमें छटवें सूत्र में की गई है सो वहीं से इसे जानलेनी चाहिये ऐसा कहकर उसने अपने बाण को ऊपर आकाशमें छोड़ा क्यों कि वहीं पर क्षुद्रहिमवद्गिरि कुमार का आवास था । “परिगरणिगरिअमज्झो जावत्ति” यहां यावत्पद से- "बाणमोक्षप्रकरण में कथित परिपूर्णगाथाद्वय कहलेनी चाहिये । तथा च -- जाव आयतकण्णायतं च काऊण उसुमुदार इमाणि वयणाणि तत्थ भणीअ से णरवई जाव सव्व मेते विसयवासीत्ति कट्टु उद्ध वेहासं उसुं णिसिरह परिगरणिरिअमझे जाव ) ચારે ઘોડાઓને થંભાવીને માગધતીર્થાધિકારમાં કહ્યા મુજબ તેણે પિતાના ધનુષ ને હાથમાં લીધું. બાણું હાથમાં લીધુ, બાણ ને ધનુષ ઉપર સ્થાપિત કર્યું અને પછી ધનુષ ઉપર આરોપિત કરીને તે ઉદાર ઉદભટ ધનષ કાન સુધી ખેંચી ને પછી તેણે આ પ્રમાણે કહ્યું–“દંત્ર सुणतो भवंतो" से क्या पूर्वेति मे मे आयाममा ४८ ४२वाम मा छे. तसे વચને-“આપ સર્વ મારા દેશવાસી છે. અહીં પણ સમજવાં જોઈએ. એ વચનેની વ્યાખ્યા તૃતીય વક્ષસ્કાર'માં ૬ ઠા સૂત્રમાં કહેવામાં આવી છે તે જિજ્ઞાસુઓ ત્યાંથી જ જાણવા યત્ન કરે. આમ કહીને તેણે પોતાના બાણને ઉપર આકાશમાં છેડયું કેમકે ત્યાંજ ક્ષુદ્ર હિમવ૬ ગિરિ કુમારને આવાસ હતે. 'परिगरणिगरिअमज्झो जावत्ति" मी यातू ५४थी any मोक्ष प्र४२मा अथित પરિપૂર્ણ ગાથાદ્વય કહેવી જોઈએ Page #826 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८१२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे परिगरणिगरिअ मज्झो वाउद्धअ सोभमाणकोसेज्जो । चित्तण सोभए धणुवरेण इंदोव्व पच्चक्खं ॥१॥ तं चंचलायमाणं पंचमिचंदोवमं महाचावं । छज्जइ वामे हत्थे णरवइणो तंमि विजयंमि ॥२॥ छाया-परिकरनिगडितमध्यो वातोद्धृत शोभमानकौशेयः । चित्रेण शोभते धनुर्वरेणेन्द्र इव प्रत्यक्षम् ॥१॥ तच्चञ्चलायमानं पञ्चमी चन्द्रोपमं महाचापम् । राजते वामे हस्ते नरपते स्तस्मिन् विजये ॥२॥ बाणं मुश्चन् भरतः कीदृशःइत्याह-'परिकर' इत्यादि । परिकरनिगडितमध्यः इति तत्र परिकरः मल्लकच्छबन्धः युद्धोचितवस्त्रबन्धविशेषस्तेन निगडितं सुवद्ध मध्यं मध्यभागो यस्य स तथा, तथा, बातोद्धत शोभमानकौशेयः वातेन समुद्रवातेन पवनेन उद्धतम् उत्क्षिप्तं शोभमानं कौशेयं वस्त्रविशेषो यस्य स तथा अवशिष्टपदानि प्रसिद्धान्येव' ततःकि जातमित्याइ -'तए णं से' इत्यादि । 'तए णं से सरे भरहेणं रण्णा उर्दु वेहासं णिसटे समाणे खिप्पामेव बावत्तरि जोयणाई गंता चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्त देवस्स मेराए णिवइए' ततःखलु स शरोपरिगरणिगरिअमज्झो वाउद्धअमोभमाण कोसेज्जो । चित्तेसोभए धणुवरेण इंदोव्व पच्चक्खं । १॥ तं चंचलायमाणं पंचमिचंदोवमं महाचावं । छज्जा वामे हत्थे नरवइणो तंमि विजयंमि ॥२॥ बाण को छोड़ते समय भरत महाराजा कैसा प्रतीत हुआ-यही बात इस गाथाद्वय में प्रगट की गई है-जिस समय भरत राजा ने बाण छोड़ा उस समय उसने मल्ल की तरह अपनी कच्छा को अच्छी तरह से बांधलिया था कटिभाग कोभी खूब अच्छी तरह से कसकर बांध लिया था उसके द्वारा धारणकिये कौशेय वस्त्र उस समय समुद्र की उत्थ वायु से धीमे धीमे कंपित हो रहा था, अतः वह उस धनुषवर से ऐसा प्रतीत होता था, कि मानों साक्षात् इन्द्र ही यहां उपस्थित हुआ है। बाकी के गाथोक्त पदों को व्याख्या सुगम है। (तए णं से सरे भरहे णं तथा च-परिगरणिगरिअमज्झो वाउद्धअ सोममाणकोसेजो। चित्तण सोभए धणुवरेण इंदोव्व पच्चक्खं ॥१॥ तं चंचलायमाणं-पंचमिचंदोवमं महाचावं ।। छज्नइ वामे हत्थे नरवइणो तंमि विजयमि ॥२॥ બાણ છોડતી વખતે ભરત નરેશ કે સુશોભિત થયો, એજ વાત એ ઉપયુંકત ગાથા દ્વયમાં પ્રકટ કરવામાં આવી છે. જે સમયે ભરત રાજાએ બાણ છેડૂયું તે સમયે તેણે મહલ (પહેલવાન) ની જેમ પિતાની કચ્છા ને સારી રીતે બાંધી લીધી. કમરને પણ સારી રીતે કસીને બાંધી લીધી તેણે કશેય વસ્ત્ર ધારણ કરેલું હતું. તે વસ્ત્ર સમુદ્રમાંથી પ્રવાહિત થતા વાયુંચી મંદ-મંદ રૂપે. કેપિત થઈ રહ્યું હતું. એથી ધનુષધારી તે રાજા, એમ લાગતું હતું કે જાણે સાક્ષાત્ ઈન્દ્ર જ ત્યાં ઉપસ્થિત થયેલ ન હોય શેષ ગાથાત પદોની વ્યાખ્યા સુગમ छ. (तपणं से सरे भरहेणं रण्णा उड्दं वेहासं णिसढे समाणे खिप्पामेव बावत्तरि जोयणाई Page #827 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कार सू० २३ उत्तरदिग्वर्तिनिष्कुटविजयानंतरीयवृत्तवर्णनम् ८१३ भरतेन राज्ञा ऊर्ध्व विहायसि निसृष्टो मुक्तः सन् क्षिप्रमेव शीघ्रमेव द्वासप्ततिं योजनानि गत्वा क्षदहिमवगिरिकुमारस्य देवस्य मर्यादायाम् अवधिभूतोचितस्थाने निपतितः 'तएणं से चुल्लहिमवंतगिरिकुमारे देवे मेराए सरं णिवइ पासइ' ततः खलु स क्षुद्रहिमवगिरिकुमरो देवः मर्यादायां शरं निपतितं पश्यति 'पासित्ता' दृष्ट्वा आसुरुत्ते रुटे जाव पीइदाणं सव्वोसहिं च मालं गोसीसचंदणं कडगाणि जाव दहोदगं च गेण्हइ' आसुरूत्तो रुष्ट इत्यदि विशेषणविशिष्टो यावत्करणात् भ्रुकुटिं करोति अधिक्षिपति भरतेति नामाङ्कितं शरं गृहाति ना म च वाचयति इत्यादि ग्राह्यं प्रीतिदानं सर्वोवधीः फलपाकान्तवनस्पतिविशेषान राज्याभिषेकादि योग्यान्, मालां कल्पद्रुमपुष्पमालाम् गोशीर्षचन्दनं च हिमवत्कुञ्जभवं कटकानि यावत्पदात् त्रुटितानि बाहाभरणानि वस्त्राणि आभरणानि भरतेति नामाङ्कितं शरं चेतिरण्णा उड्ढे वेहासं णिसट्टे समाणे विप्पामेव बावत्तरि जोयणाई गंता चुल्लहिमवंतगिरि कुमारस्स देवस्स मेराए णिवइए) ऊपर आकाश में भरत महाराजा के द्वारा छोडा गया वह बाण शीघ्र हो ७२ बहत्तर योजन तक जाकर क्षुद्र हिमवन्त कुमार देव के स्थान की हद में पड़ा (तए णं से चुल्लहिमवंतगिरि कुमारे देवे मेराए सरं णिवडियं पासइ) बाण को अपनी हदमें पड़ा हुआ जब उप्स क्षुदहिमवन्तगिरिकुमार देव ने देखा तो (पासित्ता आसुरत्ते रुटे जाव पीइदाणं सव्वीसहिं च मालं गोसीसचंदणं कडगाणि जाव दहोदगं च गेण्हइ) देखकर वह इकदम क्रोध से लाल हो गया । रुष्ट हो गया यावत् शब्द से यहां ऐसा पाठ गृहीत हुआ है उसकी भृकुटो चढ़ गई, उसने बाणफेंकने वाले का तिरस्कार किया तथा भरत इस नाम से अङ्कित उप्त बाण को उसने उठालिया और उस पर लिखे हुए नाम को उसने वांचा" इत्यादि पूर्वोक्त पाठ गृहीत हुआ है। तव फिर उसने भरत महाराजा को भेट में देने के लिए सर्वोषधियों को फलपाकान्तवनस्पतिविशेषों को जो कि राज्याभिषेकादि के योग्य थे। कल्पवृक्ष के पुष्पों को माला को, गोशीर्ष चन्दन को, कटकों को यावत्पदगृहीत त्रुटितों को- बाहुओं के आभरणों को- वस्त्रों को एवं 'भरत' इस नाम से गंता चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्स देवस्स मेराए णिवइए) 6५२ माशमा २१ २00१ મુફત તે બાણ શીધ્ર ૭ર જન સુધી જઈને ક્ષુદ્ર હિમવનકુમાર દેવના સ્થાનની સીમાં માં पड्यु. (तए णं से चुल्लहिमवंर्तागरिकुमारे देवे मेरा ५ सरं णिवडियं पासइ) न्यारे त क्षुद्र 4-1 (२ उमारे मात्र ने पातानी सौभामा ५९ युत। (पासित्ता आसुरत्ते रूठे जाव पीईदाणं सव्वोसहिं च मालं गोसीसचंदणं कडगाणि जाव दहोदगंच गेण्हइ) જોઈ ને તે એકદમ ક્રોધથી રાતે ચેળ થઈ ગયે. રુષ્ટ થઈ ગયે. યાવત શબ્દ થી અહીં આ પ્રમાણે પાઠ સ ગૃહીત થયો છે તેની ભૂરી વક થઈ ગઈ. તેણે બાણ ચલાવનારનો તિરસ્કાર કર્યો. અને ભરત નામાંકિત તે બાણને તેણે ઉપાડયું. તથા તે બાણ ઉપર લખેલા નામને તે વાગ્યું. ઈત્યાદિ પૂફત પાઠ અત્રે ગૃહીત થયા છે. ત્યારબાદ તેણે ભરતરાજા ને ભેટ માં અર્પિત કરવા માટે સવષધિઓને ફળપાકાત વનસ્પતિ વિશેષોને કે જે રાજ્યાભિષેકાદિ વિધિઓ માટે આવશ્યક હોય છે. કલ્પવૃક્ષના પુષ્પોની માળાને, ગશીર્ષ ચન્દનને, કટોને, યાવત પદથી સંગૃહીત ત્રુટિતેને- બાહુઓના આભરણેને વસ્ત્રોને, ભતનામાંક્તિ Page #828 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८१४ जम्बूद्वोपप्रज्ञप्तिसूत्र ग्राहयं द्रहोदकं च पद्म द्रहोदकं गृहाति गिण्डित्ता' गृहीत्वा 'ताए उक्किट्ठाए जाव उत्तरेणं चुल्लहिमवंतगिरिमेराए अहणं देवाणुप्पियाणं विसयवासी जाव अहण्णं देवाणुप्पियाणं उत्तरिल्ले अंतवाले जाव पडविसज्जइ' तया उत्कृष्टया यावत् पदेन दे गत्या व्यतिव्रजति भरतान्तिकमुपसपंति विज्ञापयति चेति विज्ञेयम् उत्तरस्यां क्षुद्रहिमवद्गिरेः मर्यादायाम् अहं खलु देवानुप्रियाणं विषयवासी यावत्पदात् अहं खलु देवानुप्रियाणं किंकर इति ग्राह्यम् अहं खलु देवानुप्रियाणाम् औत्तराहो लोकपालः अत्र यावत्पदात् प्रीतिदानमुपनयति तद् भरतः प्रतीच्छति देवं सत्कारयति सम्मानयति इति ग्राह्यम्, तथा कृत्वा च प्रतिविसर्जयति निजभवनगमनाय आज्ञापयतीत्यर्थः ।। सू २३ ॥ अथ अधिकोत्साहात् अष्टभक्तं तपस्तीरयित्वा कृतपारणक एव अवधिप्राप्त दिग्विजयाङ्क कर्तुकामः श्री ऋषभभूः ऋषभकूटगमनाय उपक्रमते " तएणं से" इत्यादि। ____मूलम्-तए णं से भाहे राया तुरए णिगिण्हइ णिगिण्हित्ता रहं परावत्तेइ परीवचित्ता जेणेव उसहकूडे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता उसहकूडं पव्वयं तिक्खुत्तो रहसिरेणं फुसइ फुसित्ता तुरए णिगिण्हइ णिगिअङ्कित बाण को तथा पद्मद के जल को साथ में लिया। (गेण्हित्ता ताए उक्किट्ठाए जाव उत्तरेणं चुल्लहिमवंतगिरिमेराए अहण्णं देवाणुप्पियाणं विसयवासी नाव अहण्णं देवाणुप्पि. यणं उत्तरिल्ले अंतवाले जाव पडिविस जइ) और लेकर वह उस प्रसिद्ध देवगति से भरत के पास चला वहां पहुँचकर उसने उनसे ऐसा निवेदन किया- उत्तरदिशा में क्षुद हिमवत् पर्वत को हद में-मै आप देवानुप्रिय के अधीनस्थ देश का निवासी हूँ। यहां यावत्पदसे "अहं खलु देवाणुप्रियाणां किंकरः” इस पाठ का ग्रहण हुआ है। मैं आप देवानुप्रियका उत्तर दिशा का लोकपाल हूं यहां यावत् पद से "प्रातिदानमुपनयति, तद् भरतः प्रतीच्छति, देवं सत्कारयति, सम्मान यति" इन पदों का संग्रह हुआ है । सत्कार सम्मानकर फिर वह भरत नरेश उसे विसर्जित कर देता है-अपने भवन में जाने के लिए उसे आज्ञा देता है ॥२३॥ मापन तथा पान ने साथे साघi. (गिण्हित्ता ताए उक्किद्वाए जाव उत्तरेणं चुल्लहिमवंतगिरिमेराए अहणं देवाणुप्पियाण विसयवासी जाव अहण्णं देवाणुपियाणं उरिल्ले अंतवाले जाव पडिविसज्जइ) अने १४२ ते पोतानी सुप्रसिद्ध २१ गतिथी ભરત રાજા પાસે જવા રવાના થયે. ત્યાં પહોંચીને તેણે તે રાજાને આ પ્રમાણે વિનંતિ કરી કે હે દેવાનુપ્રિય ! ઉત્તર દિશામાં ક્ષુદ્ર હિમવંત પર્વતની સીમામાં સિથત તેમજ આપ श्रीन। अधीनस्थ देशना निवासी छु. मी यावत् ५४थी “अहं खलु देवानुप्रियाणां किंकरः " माया सात थये. छ. हुआ५ हेवानुप्रियने। उत्तर nि त२६ना हाल छु मही यावत् ५४थी "प्रीतिदानमुपनर्यात, तद् भरतः प्रतीच्छति, देवं सत्कारयति, सम्मानयति' से पहीन सय थये। छ. स२ तथा सन्मान ४शन ते मरतेन्द्र. २ तेने વિસજિત કરી દે છે. પિતાના ભવ માં જવાની તેને આજ્ઞા આપે છે. સૂત્ર-૨૩ Page #829 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कार: सू० २४ ऋषभक्टविजयवर्णनम् ८९५ ण्हित्ता रहं ठवेइ ठवित्ता छत्तलं दुवालसंमिअं अट्ठकण्णिअं अहिगरणिसंठिअं सोवण्णिअं कागणिश्यणं परामुराइ परामुसित्ता उसभकूडस्स पब्वयस्स पुरथिमिल्लसि कडगंसि णामगं ओउडेइ-ओसप्पिणी इमीसे तइआए समाइ पच्छिमे भाए । अहमंसि चक्कवट्टी भरहो इअ नामधिज्जेणं ॥१॥ अहमंसि पढमगया अहयं भरहाहियो णवरिंदो। णस्थिप्रह पडिसत्तू जिअंमए भारहं वासं ॥२॥ इति कटु णामगं आउडेइ णापणं आउडित्ता रहं परावत्तेइ परावत्तित्ता जेणेव विजयखंधावारणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता जाव चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्म देवस्स अट्ठाहिआए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जाव दाहिणं दिसि वेअद्भपव्वयाभिमुहे पयाते यावि होत्था ॥सू०२४॥ . छाया-ततः खलु स भरतो राजा तुरगान् निगृह्वाति निगृह्य रथं परावर्तयति परावयं यत्रैव ऋषभकूटं तत्रैव उपागच्छति उपागत्य ऋषभकूट पर्वतं त्रिः कृत्वः रथशिरसा स्पृशति स्पृष्ट्वा । तुरगान् निगृह्णाति निगृह्य रथं स्थापयति स्थायित्वा षटूतलं द्वादशास्रिकम् अष्ट कणिकम् अधिकरणिसंस्थितं सौवणिक कोकणीरत्नं परामृशति परामृश्य ऋषभक्टस्य पर्वतस्य पौरस्त्ये कटके नामकम् आजुडति-अवसर्पिण्याः अस्याः तृतीयायाः समायाः पश्चिमे भागे । अहमस्मि चक्रवर्ती भरत इति नामधेयेन ॥ अहमस्मि प्रथम राजा अहं भरताधिपो नरवरेन्द्रः । न स्ति मम प्रति शत्रुः जितं मया भारत वर्षम् ॥२।। इति कृत्वा नामकम् आजुडति नामकम् आजुड्य रथं परावत्त यति परावर्त्य यत्रैव विजयस्कन्धावारनिवेशो यत्रैव बाहिरिका उपस्थानशाला तत्रैव उपागच्छति उपागत्य यावत् क्षुद्रहिमवद् गिरिकुमारस्य देवस्य अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तार्या सत्याम् आयुध गृहशालातः प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य दक्षिणां दिशं वैताढय स्वताभिमुख प्रयाते चाप्यभवत् ॥सू०२४॥ टीका - "तएणं से" इत्यादि । 'तएणं से भरहे राया तुरए णिगिण्हइ णिगिण्हित्ता रहं परावत्तेइ ' ततः हिमवत्साभरत का ऋषभकूट को और गमन'तएणं से भरहे राया तुरए णिगिण्हइ" - इत्यादि सू० २४ टोकार्थ- (तएणं) हिमवत् साधन करने के बाद (से भरहे राया तुरए णिगिण्हइ) उस ભરત મહારાજાનું ઋષભક્ટ તલ્ફ પ્રયાણ तपण से भरहे गया तुरए-णिगिण्हइ “इत्यादि ॥२४ टी--(तएणं) हिमवतनी साधना ४ मा (से भरहे राया तुरए णिगिण्हइ) ते Page #830 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८१६ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे धनानन्तरं खलु स भरतो राजा तुरगान चतुरोऽपि अश्वान् निगृह्णाति चतुर्पु मध्ये दक्षिणपावस्थतुरगौ आकर्षति वामपार्श्वस्थतुरगौ पुरस्करोतीत्यर्थः अश्वान् निगृह्य रथं परावर्त्तयति निवर्तयति 'परावत्तित्ता' परावर्त्य निवर्त्य 'जेणेव उसहकडे तेणेव उवागच्छई' यत्रैव ऋषभकूटम् तन्नामकः पर्वतः तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'उसहकूडं पचयं तिक्खुत्तो रहसिरेणं फुसइ' ऋषभकूट पर्वतं त्रिः कृत्वः वारत्रयं रथशिरसा रथाग्रभागेन स्पृशति परामृशति 'फुसित्ता तुरए णिगिण्हइ' स्पृष्ट्वा प्रामृश्य तुरगान् निगृहाति अनिरोधयति 'णिगिहित्ता रहं ठवेइ' अश्वान् निगृह्य रथं स्थापयति 'ठवित्ता' स्थापयित्वा 'छत्तलं दुवालसंसि अट्टकण्णिअं अहिगरणिसंठिअं सोवण्णेियं कागणिरयणं परामुसइ' स भरतो राजा काकणीरत्नं परामशति गृहातीत्युत्तरेण सम्बन्धः किं विशिष्टं तदित्याह-'छत्तल, षट्तलम् तत्र चत्वारि चतसृषु दिक्षु द्वे तूर्ध्वमधश्चेत्येवं षट् षट् संख्याकानि तलानि अधोभागा यत्र तत्तथा तानि च अत्र मध्यखण्डरूपाणि यै भूमौ अविषमतया तिष्ठन्तीति, तथा 'दुवालसंसि' द्वादशास्त्रिकम् द्वादश अधः उपरि तिर्यक् चतसृष्वपि दिक्षु प्रत्येकं चतसृणामस्त्रीणां सद्भावात् अत्रयः कोटयः आकारभरत राजा ने धौड़ों को खड़ा किया-दक्षिण पावस्थ घोड़ों को खेंचा और वाम पार्श्वस्थ घोड़ों को आगे किया-इस तरह से करके उसने (रहं परावत्तेइ) रथ को लौटाया ( परावत्तित्ता जेणेव उसहकूडे तेणेव उवागच्छइ) रथ को लौटाकर मोड़करःजहां ऋषभकूट था वह वहां पर आया ( उवागच्छित्ता उसहकूटं पव्वयं तिक्खुत्तों रहसिरेणं फुसइ) वहां आकर के उसने ऋषभकूट पर्वत का रथ के अग्रभाग से तीन बार स्पर्श किया (फुप्तित्ता तुरए णिगिण्इइ) तीन बार स्पर्श करके फिर उसने घोड़ों को चलने से रोका- ( णिगिण्हित्ता रहं ठवेइ) घोड़ों को रोक कर उसने रथ खड़ा किया ( ठवित्ता छत्तलं दुवालसंसि अट्टकण्णिअं अहिगरणिसंठि सोवणियं कागणिरयणं परामु सह) रथ खड़ा करके उसने काकण) रत्न को उठाया-यह काकणीरत्न ६ तलौ वाला होता हैचार दिशाओं में ४तल और ऊपर नीचे में १-१ तल-इस तरह से इसके ये ६ तल होते हैंतथा इसमें १२ कोटियां होती है- ये कोटियां एक प्रकार के आकार विशेषरूप होती है । आठ ભરત મહારાજાએ ઘોડાઓ ને ઊભા રાખ્યાં. દક્ષિણ પાશ્વસ્થ ઘોડાઓને ખેંચ્યા અને વામपाश्वस्थ घामाने माग र्या. या प्रमाणे ४शन तेणे (रह परावत्तेइ) २थ पाछ। ३२०य। ( परावत्तित्ता जेणेव उसहकूडे तेणेव उवागच्छइ ) २थने पाछ। ३२वीन ते भरत नरेश यi पट हा त्यां गया. (उवागच्छित्ता उसहकूड़ पव्वयं तिक्खुत्तो रहसिरेणं फुसइ) त्यां पायीन ते ऋषभ पतन। २थना सभागथी मत २५0 या (फुसित्ता तुरप णिगिहइ) ay quत २५श ४शन पछी तणे पायाने माराया. ( णिगिण्हित्ता रहं ठवेइ) घामाने सीने त २५ असे राज्य.. (ठवित्ता छत्तलं दुपालसंसिअ अट्ठकण्णिअं अहिगरणिल ठिअं सोवण्णिय कागणिरयणं परामुसइ) २थ अमे। ખીને તેણે કાકણી ૨નને હાથમાં લીધું. એ કાકણ ને ૬ તલ વાળું હોય છે. ૨ દિશાઓમાં ૪ તલ અને ઉપર-નીચે એક–એક તળ. આ પ્રમાણે સર્વે મળીને એ રનને ૬ છ તળ હોય છે. એ રત્નમાં ૧૨ કટિઓ હોય છે. એ કટિઓ એક પ્રકારના આકાર Page #831 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० २४ ऋषभकूटविजयवर्ण नम् विशेषाः यत्र तत्तथा पुनः कीदृशम् 'अट्टकण्णि' अष्टकणिकम् कर्णिका कोणा। यत्र अस्त्रित्रयं मिलति तेषां चाध उपरि प्रत्येकं चतुर्णा सद्भावात् अष्टकर्णिकाः यत्र तत्तथा पुनश्च 'महिगरणिसंठिअं' अधिकरणिसं स्थितम् अधिकरणिः-सुवर्णकारोपकरणं 'एरण'इति भाषाप्रसिद्धम् तद्वत् संस्थितं-संस्थानम् आकारविशेषो अवयवसन्निवेशो यस्य तत्तथा तत् सदृशाकार मित्यर्थः समचतुरस्रत्वात् पुनश्च कीदृशम् 'सोवणियं' सौवणिकं सुवर्णमयम् अष्टसुवर्णमयत्वात्, तत्र केच अष्ट सुवर्णा इत्याह-'चत्वारि मधुरतृणफलान्येकः श्वेतसर्षपः षोडशश्वेतसर्पपाः एकं धान्यमाषफलं ! द्वे धान्यमाषफले एका गुजाः एकः कर्ममाषक: षोडशकर्ममाषका एकः सुवर्ग इति, एतादृऔरष्टभिः सुवर्णैः काकणीरत्नं निष्पद्यते इति एतादृशविशेषणविशिष्टं काकणीरत्नं परामृशति गृह्णाति 'परामुसित्ता' परामृश्य काकणीरत्नं गृहीत्वा 'उसभकूडस्स पव्वयस्स पुरथिमिल्लसि कडगंसि णामग आउडेइ ? ऋषभकूटस्य पर्वतस्य पौरस्त्ये पूर्वभागवत्तिनि कटके मध्यभागे नामकं नामेव नामकम् स्वार्थे कः आजुडति सम्बद्धं करोति लिखतीत्यर्थः केन प्रकारेण लिखतीत्याह-गाथाइसके कोने होते हैं- जहां तीन कोटिया मिलती है। ये आठ कोने रूप कर्णिकाएँ उनके नीचे ऊपर प्रत्येक में ४-४ होती है । इस काकणी रत्न का संस्थान अधिकरणी जैसा होता है जिसे एरण कहा गया है। इस पर सुवर्णकार सोनेचांदी के आभूषणों को कूट २ कर बनाता है । यह समचतुरस्र होता है इसीलिये इसे एरण के जैसा कहा गया है। (सोवण्णियं) यह अष्ट सुवर्णमय होता है। ये अष्टसुवर्ण इस प्रकार से निष्पन्न होते हैं-चार मधुर तृण फलों का एक श्वेत सर्षप होता है । सोलह श्वेतसर्षपों का एक उडद के दाने के समान का वचन होता है। दो उडदों के बराबर वजनवाली एक गुञ्जा-रत्ति होती है । और १६ रत्तियों का एक सुवर्ण होता हैऐसे आठसुवर्ण के बराबर इसका वजन होता है। (परामुसित्ता) इस प्रकार के विशेषणों से विशिष्ट काकणीरत्न को लेकर (उसभकूडस्स पव्वयस्स पुरथिमिल्लंसि कडगंसि णामगं आउडेइ) उसने ऋषभकूट पर्वत के पूर्व भागवर्ती कटक पर- मध्यभाग में- अपना नाम लिखा- "नामक" में | વિશેષ રૂપ હોય છે એ રનને આઠ ખૂણાઓ હોય છે. ત્યાં ત્રણ કટિઓ મળે છે. એ આઠ ખૂણાઓનાં રૂપમાં જે કર્ણિકાઓ હોય છે, તેમની નીચે અને ઉપર પ્રત્યેક માં ૪,૪ ખૂણાઓ હોય છે. એ કાકણી રત્નનું સંસ્થાન અધિકરણી જેવું હોય છે. જેને એરણ કહેવામાં આવે છે. સુવર્ણકાર એની ઉપર સુવણે ચાંદીના આભૂષણે કૂટી-ફૂટીને તૈયાર કરે છે. એ સમચતુરસ્ત્ર હોય छ. मेथी १ मे २त्नने २ ४वामां मा०यु छे. (सोणियं) से मट सुप भय હોય છે. એ અષ્ટ સુવણે આ પ્રમાણે નિષ્પન્ન હોય છે. ચાર મધુર તૃણ કુપનું એક વેત સરસવ હોય છે. ૧૬ વેત સ૨સેવનું વજન એક અડદ બરાબર હોય છે. બે અડદની બરાબર વજનવાળી એક ગુંજા-પત્તિ હોય છે. ૧૬ રત્તિઓનું એક સુવર્ણ હોય છે. એવા मासुवानी ॥१२ मेनुं न डाय छे (परामुसित्ता) मा जतना विशेषगाथा विशिष्ट ४४४ी २लने वन (उसभकूडस्स पव्वयस्स पुरथिमिल्लसि कड़गंसि णामग आउडेइ) તેણે કહષભકૂટ પર્વતના પૂર્વ ભાગવતી કટક ઉપર મધ્ય ભાગમાં–પિતાનું નામ લખ્યું Page #832 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८१८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे द्वयम् 'ओसप्पिणी' इत्यादि 'ओसप्पिणी इमीसे तइयाए समाए पच्छिमे भाए' 'ओसपिणी' अवसर्पिण्याः अत्र षष्ठी लोपः प्राकृतत्वात् अस्याः तृतीयायाः समायाः तृतीयारकस्य पश्चिमे भागे तृतीये भागे इत्यर्थः । अहमंसि चक्कवट्टी भरहो इअ नामधिज्जेणं ॥ १ ॥ द्वितीय गाथामाह - अहमस्मि चक्रवर्ती भरत इति नामधेयेन नाम्ना 'अहमंसि पदमराया, अहयं भरहाइवो णरवरिंदो । णत्थि महं पडिसत्तू जिथं मए भारहं वासं || २ || अहमस्मि प्रथमराजा प्रथमशब्दस्य प्रधानपर्यायत्वात् अहं भरताधिपः - भरतक्षेत्राधिपः नवरा :सामन्तादयः तेषामिन्द्रः नास्ति मम प्रतिशत्रुः - प्रतिपक्षः जितं मया भारतं वर्षम् ||२|| 'त्ति कडु' इति कृत्वा 'णामगं आउडेइ' नामकम् आजुडति लिखति अस्य त्रस् निगमार्थकत्वान्न पौनरुक्त्यम् 'णामगं आउडित्ता रहं परावतेइ' नामकम् आजुड्य लिखिस्वार्थ में "क" प्रत्यय किया गया है- अपने नामको उस भरत नरेश ने किस प्रकार से लिखा इसे प्रगट करने वाली ये दो गाथाएँ हैं "ओप्पणी इसे तइआए समाइ पच्छिमे भाए । अहमंसि चक्कवट्टी भरहो इअ नामधिज्जेणं ॥ अहमंसि पढमराया अहह्यं भरहा हिवो णरवरिंदो । णत्थिमहं पडिसत्तू जिथं मए भारहं वासं ॥२॥ इनका अर्थ इस प्रकार से हैं - इस अवसर्पिणी काल के तृतीय आरे के पश्चिम भाग मेंतृतीय भाग में मैं भरत नाम का चक्रवर्ती हुआ हूं, १ और मैं ही यहां - भरत क्षेत्र में कर्मभूमि के प्रारम्भ में सर्व प्रथम राजा हुआ हूं। यहां प्रथम शब्द प्रधानपर्याय का वाची है । सामन्त आदि का मैं इन्द्र के जैसा इन्द्र हूं मेरा कोई शत्रु नहीं है । मेरे षट् खण्डमण्डित भरत क्षेत्र में मेरा अखण्ड साम्राज्य स्थापित हो चुका है । (इति कट्टु णामगं आउडेइ) इस प्रकार से उसने अपना परिचयात्मक नाम लिखा (णामगं आउडित्ता रहं परावत्ते इ) नाम लिख करके फिर “नामकं” भां स्वार्थ भां 'क' प्रत्यय सगाडवामां आवे छे, पोतानु नाम ते भरत नरेशे કેવી રીતે લખ્યુ. આને પ્રકટ કરવા માટે આ એ ગાથા ओसप्पिणी इमीसे तइआए समाइ पच्छिमे भाए । अहमंसि areaट्टी भरहो इ अ नामधिज्जेणं ॥१॥ अहमंसि पढमराया अहयं भरहाहियो णरबरिंदों । णत्थिमहं पडिसत्तु जिअं मप भारहं वासं ॥२॥ એ ગાથાઓનેા અથ આ પ્રમાણે છે- એ અવસર્પિણી કાળના તૃતીય આરકના પશ્ચિમભાગમાં- તૃતીય ભાગમાં- હુ. ભરત નામે ચક્રવર્તી થયા છું. !૧॥ અને હું જ મહી ભરતક્ષેત્રમાં કમ ભૂમિના પ્રાર ભમાં સર્વપ્રથમ રાજા થયા છુ, અહીં પ્રથમ શબ્દ પ્રધાનને પર્યાય વાચક છે. એટલે કે પ્રથમ શબ્દના અર્થ પ્રધાન અથવા મુખ્ય થાય છે. સામન્ત વગેરેમાં હુ' ઈન્દ્ર જેવા છું, મારા કાઇ શત્રુ નથી, ષટ્ ખંડ મંડિત આ ભરતક્ષેત્રમાં મારૂ अखंड साम्राज्य स्थपाई यूग्युं छे. ( इति कट्टु णामगं आउडेइ ) मा प्रमाणे तेथे पश्यियात्मा पोतानु नाम सभ्यु ( णामंग आउडित्ता रहं परावत्तेइ ) नाम सजीने पछा तेथे त्यांथी पोताना स्थने पाछे। वाल्यो ( परावत्तित्ता जेणेव विजयखंधावारणिवेसे जेणेव છે Page #833 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८१९ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारासू० २४ ऋषभकूटविजयवर्णनम् त्वा रथं परावत्तियति 'परावत्तित्ता' परावर्त्य 'जेणेव विजयखधावारणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव विजयस्कन्धावारनिवेशो यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'जाव' अत्र यावत्पदात् तुरगान् निगृह्णाति रथं स्थापयति ततः स्थनात् प्रत्यवरोहति मज्जनगृहं प्रविशति प्रविश्य स्नाति मज्जनगृहात्प्रतिनिष्क्रामति भुङ्क्ते बाह्योपस्थानशालायां सिंहासने उपविशति श्रेणी प्रश्रेणीशद्वयति क्षुद्रहिमवद्गिरिकुमारस्य देवस्यअष्टाहिकाकरणम् अष्टदिनपर्यन्तंमहामहोत्सवं सन्दिशति ताश्च कुर्वन्ति आज्ञप्तिकां च प्रत्यर्पयन्तीति ग्राह्यम् 'चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्स देवस्स अट्टाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ' ततश्च तदिव्यं चक्ररत्नम् क्षुद्रहिमवद्गिरिकुमारस्य देवस्य अष्टाहिकायां तदेव विजयोपलक्षिताष्टदिनपर्यन्तायां महामहिमायां महोत्सव विशेषायां निवृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालतः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य 'जाव दाहिणि उसने वहाँ से अपने रथ को लौटाया (परावत्तित्ता जेणेव विजयखंधावारणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्टाणसाला तेणेव उवागच्छइ) रथ को लौटाकर फिर वह जहां पर विजयस्कन्धावार का पडाव पड़ा हुआ था, और उसमें भी जहां पर बाह्य उपस्थानशाला थी वहां पर आया । (उवागच्छित्ता जाव चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्स अट्टाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ) बहां आकर के उसने यावत् क्षुद्रहिमवगिरिकुमार नाम के देव के विजयोपलक्ष्य में आठ दिन तक महामहोत्सव किया जब आठ दिन का महामहोत्सव समाप्त हो चुका- तब वह चक्ररत्न आयुधशाला से बाहर निकला- यहाँ जो "यावत्" शब्द का प्रयोग हुआ है उससे "तुरगान् निगृह्णाति,- रथं स्थापयति, ततः प्रत्यवरोहति, मज्जनगृहं प्रविशति, स्नाति, मज्जनगृहात्प्रतिनिष्क्रामति, भुङ्क्ते वाह्योपस्थानशालाया-सिंहासने उपविशति, श्रेणीप्रश्रेणी शब्दयति, क्षुद्रहिमवद्गिरि कुमारस्य देवस्य अष्टान्हिका करणं अष्टदिनपर्यन्तं सन्दिशति, ताश्च कुर्वन्ति, आज्ञप्तिकां च प्रत्यर्पयन्ति" इस पाठ का ग्रहण हुआ है। इन पदों की बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ ) २थन पाछ। पान पछी त च्या विजय સ્કંધાવારનો પડાવ હતો અને તેમાં પણ કર્યા બાહ્ય ઉપસ્થાન શાળા હતી ત્યાં આવ્યા. ( उवागच्छित्ता जाव चुल्लहिमवंतगिरिकुमारस्स देवस्स अठ्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीप आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ) त्यां भावीन તેણે યાવત્ ક્ષુદ્ર હિંમવંત ગિરિકુમાર નામક દેવના વિજયપલક્ષ્યમાં આઠ દિવસ સુધી મહામહેત્સવ ઉજળે. જ્યારે આઠ દિવસને મહામહોત્સવ સમાપ્ત થઈ ગમે ત્યારે તે ચક્કર આયુધ શાળામાંથી બહાર नीज्युं मही २ यावत्' शान। प्रयोस ७२वाभा मा छे, तनाथी "तुरगान् निगृह्णाति रथं स्थापयति, ततः प्रत्यवरोहति, मजनगृहं प्रविशति, स्नाति, मजनगृहात्प्रतिनिष्कामति, भुङ्क्ते, बाह्योपस्थानशालायां सिंहासने उपविशति, श्रेणीप्रश्रेणि शब्दयति, क्षुद्रहिमवद् गिरिकमारस्य देवस्य अष्टाहिकाकरणं अष्टदिनपर्यन्तं सन्दिशति, ताश्च कुर्वन्ति, आज्ञप्तिकांच प्रत्यर्पयन्ति ये 48 संगृहीत थये। छ. से पहोनी व्याज्या ५७i यथास्थाने Page #834 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८२० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र दिसि वेयद्धपचयाभिमुहे पयाते यावि होत्था' तदिव्यंचक्ररत्नम् दक्षिणां दिशमुदृिश्य वैतान्यपर्वताभिमुखं प्रयातं चाप्यासीत् चाप्यभवत् ।।०२४॥ ___ मूलम् -तए णं से भरहे राया तं दिव्यं चक्करयवण जाव वेअद्धस्स पवयस्स उत्तरिल्ले णितंबे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता वेअद्धस्स उत्तरिल्ले णितंबे दुवालजोयणायाम जाव पोसहसालं अणुपविसइ जाव णमिविणमीणं विज्जाहरराईणं अट्ठमभत्तं पगिण्हइ पगिरिहत्ता पोसहसोलाए जाव णमिविणमि विज्जाहररायाणो मणसी करेमाणे २ चिट्ठइ, तए ण तस्स भरहस्स रण्णो अट्ठमभत्तंसि परिणममाणंसि णमिविणमी विज्जाहररायाणो दिवाए मईए चोइअ मई अण्णमण्णस्स अतिअंपाउन्भवति, पाउन्भवित्ता एवं वयासी उप्पण्णे खलु भो देवाणुप्पिया ! जंबुद्दीवे दीवे भरहे राया चाउरंतचक्कवट्टी तं जीअमेयं तीयपच्चुप्पण्णमणागयाणं विज्जोहरराइणं चक्कवट्टीणं उवत्थाणिअं करेत्तए, तं गच्छमो णं देवाणुप्पिया ! अम्हे वि भरहस्स रण्णो उवत्थाणिअं करेमो इति कट्ट विणमीणाऊणं चक्कवट्टी दिवाए मईए चोइअमई माणुम्माणप्पमाणजुत्तं तेअस्सि रूवलक्खणजुत्तं ठिअजुव्वणकेसवट्ठिअणहं सव्वरोगणासणिं बलकरि इच्छिअसोउण्हकासजुत्तं-तिसु तणुअं तिसु तंबं तिवलीगतिउण्णयं तिगंभीरं । तिसु कालं तिसु सेअं तिआयतं तिसुअविच्छिण्णं ॥१॥ समसरीरं भरहे वासंमि सबमहिलप्पहाण सुंदरथणजघणवरकरचलण णयण सिरसिजदसणजणहिअरमणमणहरि सिंगारागार जाव जुत्तोवयारकुसलं अमरवहणं सुरुवं रूवेणं अणुहरंति सुभदंमि जोब्बणे वट्टमाणि इत्थीरयणं णमी अ रयणाणि य कडगाणि य तुडिआणि य गेण्हइ, गेण्हित्ता व्याख्या पूर्व में यथास्थान की जा चुकी है। अतः वहीं से ज्ञात कर लेनी चाहिये । (पडिणिक्वमित्ता जाव दाहिणिं दिसि वेयद्धपव्वयाभिमुहे पयाए यावि होत्था) आयुधगृहशाला से बाहर निकल कर वह चक्ररत्न दक्षिण दिशा की ओर वैताड्यपर्वत की तरफ चल दिया ॥२४॥ स्पष्ट ४२वामा मावी छ. मेथी जिज्ञासुमागे त्यांथा Me से ये. (पडिणिक्खमित्ता जाव दाहिणि दिसि वेयद्धपव्वयाभिमुहे पयाप यावि होत्था ) सायुधशाणामांयी बहार નીકળીને તે ચક્રરત્ન દક્ષિણ દિશા તરફ વૈતાઢય પર્વતની તરફ રવાના થયું મેરા Page #835 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सु०२४ नमीदिनमीनामानौ विद्याधर राज्ञोःविजयवर्णनम् ८२५ ताए उक्किठाए तुरिआए जाव उठूआए विज्जाहरगइए जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता, अंतलिक्खपडिवण्णा सखिखिणीयाइं जाव जएणं विजएणं वद्धावेंति वद्धावित्तो एवं वयासी अभिजिएणं देवाणुप्पिया ? जावअम्हे देवाणुप्पिआणं आणत्तिकिंकरा इति कटुतं पडिच्छंतु णं देवाणुप्पिआ ! अम्हं इमं जाव विणमी इत्थीरयणं णमी रयणाणि समप्पेइ । तएणं से भरहे राया जाव पडिविसज्जेइ पडिविसज्जित्ता पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्वमित्ता मज्जणघरं अणुपविसइ अणुपविसित्ता भोअणमंडवे जाव नमीविनमीणं विज्जाहरराईणं अट्ठाहिअमहामहिमा, तए णं से दिवे चक्करयणे आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ जाव उत्तरपुस्त्थिमं दिसि गंगादेवी भवणाभिमुहे पयाए यावि होत्था, सच्चेव सव्वा सिंधुवत्तव्वया जाव नवरं कुंभट्ठसहस्सं रयणचित्तं णाणामणि कणगरयणभत्तिचित्ताणि अ दुवे कणगसीहासणाई सेसंतंचेव जाव महिमत्ति ॥सू०२५॥ छाया ततः खलु तदिव्यं चक्ररत्नं यावद् वैताढयस्य पर्वतस्योत्तराहो नितम्बः तत्रैव उपागच्छति उपागत्य वैताढयपर्वतस्यौत्तराहे नितम्बे द्वादशयोजनायाम यावत्पौषधशालामनु प्रविश ति,यावत् नििवनम्योः विद्याधरराकोः अष्टमभक्तं प्रगृह्नति प्रगृह्य पौषधशालायां यावत् नमिः विनमि विद्याधरराजानो मनसि कुवाणो मनास कुवाणास्तष्ठीत, ततः खलु तस्य भरतस्य राक्षः अष्टमभक्ते परिणमति नमिविनमि विद्याधरराजानौ दिव्यया मत्या चोदितमती अन्योऽन्यस्यान्तिकं प्रादुर्भवतः प्रादुर्भूय एवमवादिष्टाम् उत्पन्नः खलु भो देवानुप्रियाः जम्बूद्वीपे द्वीपे भरते वर्षे भरतो राजा चातुरन्तचक्रवर्ती तस्माज्जीतमेतत् अतीतवर्तमानानागतानां विद्याधरराज्ञां चक्रवर्तिनामुपस्थानिकं कत्तुं तद्गच्छामः खलु देवानुप्रियाः ! वयमपि भरतस्य राज्ञ उपस्थानिकं कुर्म इति कृत्वा विनमिः राजानं चक्रवर्तिनं दिव्यया मत्या चोदितमतिः मानोन्मानप्रमाणयुक्तां तेजस्विनी रूपलक्षणयुक्तां स्थितयौवनकेशावस्थितनखाम सर्वरोगनाशिनी बलकरीम् इच्छित्तशीतोष्णस्पर्शयुक्तां त्रिषु तनुकां त्रिषु ताम्रां त्रिवलीक ज्युन्नतां त्रिगम्भीराम् । त्रिषु कृष्णां त्रिषु प्रवेतां त्रिषु आयतां त्रिषु च विस्तीर्णा समशरीरां भरते वर्षे सर्वमहिलाप्रधानां सुन्दर स्तनजघनकरबरणनयनसिरसिज दशनजनहृदयरमण मनोहरी शृङ्गारागार यावत् युक्तोपचारकुशलां अमरवधूनां सुरूपं रूपेण अनुहरन्ती सुभद्रां भद्रे यौवने वर्तमानां स्त्रीरत्न नमिश्च रत्नानि कटकानि च त्रुटिकानि च गृह्णाति गृहीत्वा तया उत्कृष्टया त्वरितया यावदुद्धतया विद्याघरगत्या यत्रैव भरतो राजा तत्रैव उपागच्छतः उपागत्य अन्तरिक्षप्रतिपन्नौ सकिंकिणीकानि यावत् जयेन विजयेन वर्द्धयतः वर्द्धयित्वा एवमवादिष्टाम् अभिजितं खलु देवानुप्रियाः ! यावत् आवाम् देवानुप्रियाणमाज्ञप्तिकिङ्करावितिकृत्वा तत्प्रतीच्छन्तु देवानुप्रियाः ! अस्माकमिदं यावत् विनमिः स्त्रीरत्नं नमिश्च रत्नानि समर्पयति ततः खलु स भरतो राजा यावत् प्रतिविसर्जयति प्रतिविसृज्य Page #836 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ૮૨૨ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पौषधाशालातः प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य मज्जनगृहमनुप्रविशति अनुप्रविश्य भोजनमण्डपे यावत् नमिविनम्योः विद्याधरराज्ञोः अष्टाहिकां महामहिमाम्, ततः खलु तद्दिव्यं चक्ररत्नम् आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्कामति यावदुत्तरपौरस्त्यां दिशं गङ्गादेवी भवनाभिमुख प्रयातं चाप्यभवत् सैव सर्वा सिन्धुवक्तव्यता यावत नवरं कुम्भाष्टसहस्रं रत्नचित्रं नानार्माणकनकरत्नभक्तिचित्राणि च द्वे कनकसिंहासने शेषं तदेव यावत् महिमेति ॥सू० २५॥ टीका-'तएणं से भरहे" इत्यादि । __ 'तएणं से भरहे राया तं दिव्यं चक्करयणं जाव वेअद्धस्स पव्वयस्स उत्त. रिल्ले णितं तेणेव उवागच्छइ' ततः खलु स भरतो राजा तदिव्यं चक्ररत्नं यावद् यावत् पदात् दक्षिणस्यां दिशि वैताट्यपर्वताभिमुखं प्रयातं पश्यति दृष्ट्वा हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः इत्यादि सर्व वक्तव्यम् । ततः वैताट्यस्य पर्वतस्य औत्तराहो नितम्बः उत्तरपार्श्ववर्ती कटकः अधोभागः तत्रैव उपागच्छति ‘उवागच्छित्ता' उपागत्य ‘वेयद्धस्स परयस्स उत्तरिल्ले नितंबे दुवालसजोयणायामं जाव पोसहसालं अणुपविसइ जाव' वैताव्यस्य पर्वतस्य औत्तराहे-उत्तरपार्ववर्तिनि नितम्बे गिरेः समीपभागे अधः प्रान्ते द्वादशयोजनाऽsयामम् द्वादशयोजनदैर्घ्यम् अत्र यावत्पदात् नवयोजनविस्तीणं वरनगरसदृशम् स्कन्दावार "तए णं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं'-- इत्यादि सू० २५॥ टीकार्थ-(तए णं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं जाव वेयद्धस्स पव्वयस्स उत्तरिल्ले णितंबे तेणेव उवागच्छइ) इसके बाद जब भरत राना ने उस दिव्य चक्ररत्न की यावत् दक्षिण दिशा में वैताढयगिरि की ओर जाते हुए देखा तो देखकर वह बहुत ही अधिक हृष्ट एवं तुष्ट चित्त हुआ। इसके बाद जहां वैताढ्य पर्वत का उत्तरदिग्वर्ती नितम्ब था-अधोभाग था- वहां पर वह आया (उवागच्छित्ता वेयद्धस्स पव्वयस्स उतरिल्ले णितंवे दुवालसजोयणायाम जाव पोसहसालं अणुपविसइ) वहां आकर के उसने वैताढ्य पर्वतके उत्तरदिपवर्ती नितम्ब पर गिरिसमीप में--अधः प्रान्त में-द्वादश योजन की लम्बाई वाले एवं नौयोजन की चौड़ाई वाले श्रेष्ठनगर के जैसे अपने स्कन्धा 'तपणं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयण' ॥ इत्यादि सूत्र. २५ ॥ टी -(तए णं से भरहे राया तं दिव्वं चक्करयणं जाव वेयद्धस्स पव्वयस्ल उत्त. ल्ले णितबे तेणेव उवागच्छइ) त्या२ मा यारे भरत २१ त हिय २२त्नने यावत् દક્ષિણ દિશામાં વૈતાઢય ગિરિ તરફ જતું જોયું તે જોઈને તે બહુ જ દુષ્ટ તેમજ તુષ્ટ ચિત્તવાળો થયો. ત્યાર બાદ જ્યાં વૈતાઢય પર્વતને ઉત્તર દિશા તરફ ને નિતંબ હ–અધે ભાગ ता, त्यात माव्या. (उवागच्छित्ता वेयद्धस्स पव्वयस्स उत्तरिल्ले णितंवे दुवालसजोयणायाम जाव पोसहसालं अणुपविसइ) त्या भावीन तेणे वैता८य ५ तत्त२६ती' गित ५२ ગિરિ સમીપ-અધ: પ્રાન્ત માં-દ્વાદશયોજન જેટલી લંબાઈ વાળા અને નવજન પ્રમાણ વાળા શ્રેષ્ટ નગર જેવા પિતાના સ્કન્ધાવાર નો પડાવ નાખ્યા પછી પૌષધશાળામાં શ્રી મહારાજ ભરત Page #837 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० २ नमीविनमीनामानौविद्याधरराज्ञोः विजयवर्णनम् ८२३ निवेशमिति करोतीति वाच्यम्, पौषधशालां स भरतोऽनुप्रविशति । अत्र यावत्पादात् पौषध विशेषणानि सर्वाणि वक्तव्याणि 'णमिविणमिणं विज्जाहरराईणं अट्ठमभत्तं पगिण्हइ' नमिविनम्योः प्रथमतीर्थकर श्रीऋषभस्वामि महासामन्तकच्छमहाकच्छपुत्रयोः विद्याधरराज्ञोः साधनाय अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति 'पगिण्हित्ता' प्रगृह्य अष्टमभक्तमवधार्य 'पोपहसालाए जाव णमि विणमि विज्जाहररायाणो मणसी करेमाणे करमाणे चिदुइ' पौषधशालायां यावत्पदातू अवस्तृतकुशासनोपविष्टो मुक्तभूषणालङ्कारो ब्रह्मचारी पौषधिक इत्यादि विशेषणविशिष्टो भरतः नमिविनमि विद्याधरराजानौ मनसि कुर्वाणो मनसि कुर्वाणस्तिष्ठति अनयोरुपरि बाणमोक्षणेन प्राणघातनं न क्षत्रियधर्म इति बुद्धया सिन्ध्वादि देवीनामिव अनयोर्मनसि वार का पडाव डाला फिर उस पौषधशाला में भरत नरेश ने प्रवेश किया। यहां पर जो यावत् शब्द आया है उससे इस पाठ में पौषध के जितने विशेषण पहिले कहे जा चुके हैं, वे सब कहदेना चाहिये यह प्रगट किया है "णमि विणमिणं विज्जाहरराहणं अट्ठमभत्तं पगिण्हई) पोषधशाला में प्रविष्ट होकर उस भरत राजा ने श्री ऋषभ स्वामी के महाप्तामन्तकच्छ के पुत्र एवं विद्याधरों के राजा ऐसे नमि और विनामेको अपने वश में करने के लिये अष्टम भक्त की तपस्या धारण करली। (पगिण्हित्ता पोसहसालाए जाव णमिविणमिविज्जाहररायाणो मणसो करेमाणे २ चिदुइ) अष्टमभक्त की तपस्या धारण करके पौषधशाला में यावत्पदगृहीत वे भरत राजा कुशासन पर उवविष्ट हो गये । समस्त भूषण एवं अलङ्कारों का उन्होंने परित्याग कर दिया। वे ब्रह्मचारी बन गये । इत्यादि पूर्वोक्त समस्त विशेषणां से विशिष्ट हुए उन भरत राजा ने नमि विनमिराजामों को जो कि विद्याधरों के स्वामी थे, किस प्रकार से वश में छिया जावे क्योंकि इनके ऊपर बाण का छोड़ना और उससे इनका प्राणघात करना यह क्षत्रिय धर्म नहीं है, अतः सिन्धआदि देवियां की तरह इन दोनों के इन्हें अपने मन में करने रूप साधनोपाय में वे प्रवृत्त हो નરેશે પ્રવેશ કર્યો. અહીં જે યાવત શબ્દ આવેલ છે તેનાથી એ પાઠમાં પૌષધ અંગેના જેટલાં विषण isai Bामा माव्यांछे ते मया यही ५५ अ ४२ नये. "णमि विणमिण विज्जाहरराईणं अहमभत्तं पगिण्हइ" पौषधशामा प्रविष्ट नेते भरत राय श्रीम દેવસ્વામી ના મહાસામન્ત કચ્છના પુત્ર તેમજ વિદ્યાધરોના રાજા એવા નમિ અને વિનમિને पोताना शमा ४२१॥ माटे मष्टमसतनी तपस्या धारण ४२१. (पगिण्हित्ता पोसहसालाए जावणमिविणमि विजाहररायाणा मणली करेमाणे २ चिट्ठइ) मटममतनी तपस्या पाय ખીને ષધશાળામાં યાવત પદ ગ્રહીત તે ભારત રાજ કુશના આસન ઉપર ઉપવિષ્ટ થઈ ગયા સમસ્ત ભૂષણ અને અલંકારેને તેમણે પરિત્યાગ કર્યો. તેઓ બ્રહ્મચારી બની ગયા ઈત્યાદિ પત સમસ્ત વિશેષણોથી વિશિષ્ટ થયેલા ત ભરત રાજાએ નમિ– વિનમિ રાજને કે જેઓ વિદ્યાધરોના સ્વામી હતા તેમને કેવી રીતે વશમાં કરી શકાય? કેમ કે તેમની ઉપર ખાણ વગેરે શસ્ત્રોનો પ્રયોગ કરી તેમને હણવા, તે ક્ષત્રિચિત ધર્મ નથી એથી સિવું વગેરે દેવીની જેમજ એ બને ને પિતાના વશમાં કરવા માટે જે સાધનને ઉપયોગ થઈ શકે Page #838 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रशतिसूत्रे करणमात्ररूपे साधनोपाये प्रवृत्त इत्यर्थः 'तए णं तस्स भरहस्स रण्णो अहमभत्तंसि परिणममाणंसि णमि विणमि विज्जाहररायाणो दिव्वाए मईए चोइयमई अण्णमण्णस्स अंतिअं पाउन्भवंति' ततः तदनन्तरं खलु तस्य भरतस्य राज्ञः अष्टमभक्ते परिणमति सति परिपूर्णप्राये जायमाने सति नमी विनमी विद्याधरराजानौ दिव्यया दिव्यानुभावज नितत्वात् मत्या ज्ञानेन चोदितमती प्रेरितमतिको अवधिज्ञानाद्यभावेऽपि यत्तयो भरतमनोविषयकज्ञानं तत्सौधर्मेशान देवीनां मनः प्रविचारीदेवानां कामानुषक्तमनोज्ञानमिव दिव्यानुभावादवगन्तव्यम्, अन्यथा तासामपि स्वविमानचूलिकाध्वजादि विषयकावधिमतीनां रमणेच्छा ज्ञानासम्भवेन सुरतानुकूलचेष्टोन्मुखत्वं न सम्भवेदिति, एतादृशौ सन्तौ तौ अन्योऽन्यस्य अन्तिकं समीपं प्रादुर्भवतः 'पाउन्भवित्ता एवं वयासी' प्रादुर्भूय प्रकटीभूय एवं वक्ष्यमाणप्रका रेण अवादिष्टाम् उक्तवन्तौ किमुक्तवन्तौ इत्याह- 'उप्पण्णे खलु' इत्यादि । 'उप्पण्णे खलु भो ૮૨૪ गये । (तए णं तस्स भरहस्त रण्णो अट्ठमभत्तंसि परिणममाणसि परिणममाणंसि णमिविणमी विज्जाहररायाणो दिव्वाए मईए चोइयमई अण्णमण्णस्स अंति पाउन्भवंति ) भरत राजा की अष्टम भक्त की तपस्या जब पूर्ण होने की आई तब नमि और विनभि दोनों विद्याधर राजा दिव्यानुभावजनित होने से दिव्य ऐसे अपने ज्ञान द्वारा प्रेरित मतिवाले बन कर आपस में एक दूसरे के समीप आये । यहां दिव्य ज्ञान से भरत के मन की बात जानने का जो उल्लेख किया गया है । सो इनके अवधिज्ञान तो था ही नहीं फिर भी उन्होंने जो उसके मन की बात जानली वह सौधर्मेशन की देवियां जिस प्रकार मनः प्रविचारि देवों के दिव्यानुभाव से (कामानुषक्तमनोविज्ञान वालो होती है । उसी तरह से इन्होंने भी दिव्यानुभाव से भरत के मन के भाव को जानलिया ऐसा समझना चाहिये । यदि ऐसो वात न मानी जावे तो फिर अपने विमान की चूलि - का की ध्वजमान जाननेवाले अवधिज्ञान वालो उन देवियों में उनके रिरंसा ज्ञान के अभाव से सुरतानुकूल काम चेष्टा के प्रति उन्मुखता नहीं बन सकती है । ( पाउन्भवित्ता एवं वयासी) मां प्रवृत्त थया ( तप णं तस्स भरहस्स रण्णो अट्टममत्तंसि परिणममाणंसि णमि विणमी विजाहररायाणो दिव्वाप मईए चोईयमई अण्णमण्णस्स अंतिअं पाउब्भवंति ) श्रीभरत મહારાજાની અષ્ટમ ભકત ની તપસ્યા જ્યારે પૂરી, થવા આવી ત્યારે નમિ અને વિનમિ બન્ને વિદ્યાધર રાજાએ દિવ્યાનુભાવજનિત હેાવાથી દિવ્ય એવા પેાતાના જ્ઞાન વડે પ્રેરિત થઈ ને પરસ્પર એક બીજાની પાસે આવ્યા. અહી દિબ્ય જ્ઞાનથી ભરતરાજાના મનની વાત જાણવા અંગેના જે ઉલ્લેખ કરવામાં આવે છે તે તેમને અધિજ્ઞાનતા હતુ નહિ છતાંએ જે તેમણે તેના મનની વાત જાણી લીધી તે સૌઘમે શાનની દેવીએ જેમ મનઃ પ્રવિચારિ દેવાના દ્વિવ્યાનુભાવથી કામાનુષષ્કૃત મને। વિજ્ઞાનવાળી હોય છે, તે પ્રમાણે જ એમણે પણ દિવ્યાનુભાવથી ભરતના મનના ભાવ જાણી લીધે. આમ સમજી લેવુ... જોઈ એ જો આ પ્રમાણે માનવામાં આવે નહીં તે પછી પેાતાના વિમાનની ચૂલિકાથી ધ્વજામાન જાણનાર અવધિજ્ઞાનવાળી તે દેવીઓમાં તેમના રસાજ્ઞાનના અભાવથી સુરતાનુકૂલ કામચેષ્ટા પ્રત્યે ઉન્મુખતા સંભવી शतेभ नथी. ( पाउन् प्रवित्ता एवं वयासी ) मा प्रमाणे तेथे मन्ने पासे भावी ने Page #839 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारासू०२५ नमोबिनमीनामानौ विद्याधरराशो:विजयवर्णन ८२५ देवाणुप्पिया ! जंबुद्दिवे दीवे भरहे वासे भरहै राया चाउरंतचक्कवट्टी तं जी अमेअं. तीपच्चुप्पणमणागयाणं विज्जाहरराईणं चक्कवट्टीणं उक्त्थाणीयं करेत्तए' उत्पन्नः खलु भो देवानुप्रियाः ! जम्बूद्वीपे द्वीपे जम्बूद्वीपनामक मध्यजम्बूद्वीपे भरते वर्षे भरतखण्डे श्री भरतो नाम महाराजा चातुरन्तचक्रवर्ती चत्वारोऽन्ताः त्रयः पूर्वापादक्षिणपमुद्राः चतुर्थों हिमालय गिरवर इत्येवं रूपास्ते वश्यतया सन्ति यस्य स चातुरन्तः स चासो चक्रवर्ती च इति चातुरन्तचक्रवर्ती तत् तस्माज्जोतमेतत् एष आचारक्रमः अतीतवर्तमानानागतानां विद्याधरराज्ञां चक्रवर्तीनामुपस्थानिक रत्नादिना प्राभृतं कर्तुम् अर्पयितुम् 'तं गच्छ मो णं देवाणुप्पिया । अम्हे वि भरहस्स रण्णो उवत्थाणियं करेमो तत् तस्मात्कारणात् गच्छामः खलु देवाणुप्रियाः ! वयमपि भरतस्य राज्ञ उपस्थानिकं कुर्मः 'इतिकटु' इति कृत्य इति अन्योऽयं भणित्वा 'विणमो' विनमिः उत्तरश्रेण्यधिपतिः सुभद्रां नाम्ना स्त्रीरत्न नमिश्च दक्षिणश्रेण्यधिपतिः रत्नानि कटकानि त्रुटिकानि च गृह्णाति इत्यग्रेऽन्वयः अथ विनमिः कीदृशः सन् किं कृत्वा सुभद्रा कन्यारत्नं गृह्णाति इत्याह-पंकणं चक्कट्टि दिव्वा मईए चोइयमई' दिव्यया मत्या दिव्येन ज्ञानेन नोदितमतिः प्रेरितः सन् चक्रवर्तिनं राजानं इस तरह वे एक दूसरे के पास आकर विचार करने लगे (उप्पण्णे खलु भो देवाणुप्पिया ! जंबुदीचे दीवे भरहे वासे भरहे राया, चाउरंतचक्कवट्टो तं जीममेअं) हे देवानुप्रिय ! जम्बूद्वीप नाम के हो। में भरत क्षेत्र में चातुरन्त चक्रवर्ती भरत नाम के राजा उत्पन्न हुए हैं। तो यह आचार है । (तोअपच्चुप्पण्णमणागयणं विज्जाहरराईणं चक्कवट्टीणं उवत्थाणिभं करेत्तए) अतीत वर्तमान और अनागत विद्याधरराजाओं का कि वे चक्रवर्तियों के लिये भेट में रत्नादिक प्रदान करे। (तं गच्छामो देवाणुप्पिया ! अम्हे वि भरहस्स रण्णो उवत्थाणियं करेमो) तो हे देवानुप्रिय चलो- हमलोग भी भरत राजा के लिये मेट देवें (इति कटु) इस प्रकार से परस्पर में विचार विनिमय करके (विणमी) उत्तर श्रेणी के अधिपति विनमी ने सुभद्रा नाम का स्त्रीरत्न को प्रदान किया और दक्षिण श्रेणी के अधिपति नमि ने रत्न को कटक और त्रुटिक प्रदान किये ऐसा यहाँ सम्वन्ध लगा लेना चाहिये । (णाऊणं चकवहिं दिवाए मईए चोइअमई) वियार ४२वा या. (उप्पण्णे खलु भो देवाणुप्पिया! जबुहिवे दीवे भरहे वासे भग्हे गया, चाउरंतचावट्टी तं जीअमेअं) . पानुप्रिय! भूदीय नाम द्वीपभां भरतक्षेत्रमा यातुरन्त यती भरनामे २०१५-ययाछे मापणे। ये मायार छ (नीअपच्चुप्पण्णमणागयाण विज्जाहरराईणं चक्कवट्टीण उत्थाणि करेत्तए) सतात, पत मान भने અનાગત વિદ્યાધર રાજાઓને કે તેઓ ચક્રવર્તીઓ માટે ભેટ રૂપમાં રત્નાદિક પ્રદાન કરે (तं गच्छामो देवाणुप्पिया! अम्हेवि भरहस्स रण्णा उवत्थाणियं करेमो ) तो देवानुप्रिय, यावा, अभेसा। ५५ भरत महा10 भाटलेट अपि थे. (इति कटु) मा प्रभार प२२५२ वियविनिमय ४शन (विणमी) उत्तर श्रेाना अधिपति विनमा सुभद्रा नाम સ્ત્રીરત્ન પ્રદાન કર્યું અને દક્ષિણ શ્રેણીના અધિપતિ નમિએ રનના કટક અને ત્રુટિ પ્રદાન यो सवा अथ ही ants नई से. (णाऊणं चक्कट्टिं दिव्याए मईए चोइ. १०४ Page #840 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे भरतं ज्ञात्वा तस्मै उपहारं प्रदातुं तदनुरूपां सुभद्रां स्त्रीरत्नं गृह्णातीत्यर्थः। अतएव अनन्तरोक्तसूत्रतः चक्रवर्तित्वे लब्धेऽपि यत् 'णाऊणं चक्कट्टि ' इत्याधुक्तं तत् सुभद्रा स्त्रीरत्नमस्यैवोपयोगि इति योग्यता ख्यापनार्थमवसेयम्, तत्र कीदृशीं सुभद्रामित्याह-'माणुम्मागप्पमाणजुत्तं' मानोन्मानप्रमाणयुक्ताम्, तत्र मानं जलद्रोणप्रमाणता उन्मानम् तुलारोपितस्यार्द्धभारप्रमाणता, यश्च स्वमुखानि नव समुच्छ्रितः स प्रमाणोपेतः स्यात् अयम्भावः जलपूर्णायां पुरुषत्रमाणादोषदतिरिक्तायां महत्यां कुण्डीकायां प्रवेशितो यः पुरुषः सारपुग्दलोचितो जलस्य द्रोणं त्रिटङ्क सौवणिक गगनापेक्षया द्वात्रिंशत्सेरप्रमाणं निष्काशयति जलद्रोणोनावा तां पूरयति स मानोपेतः, तथा सारपुद्गलोचितत्वादेव यस्तुलायामारो पितःसन् अर्द्धभार तुलयति स उन्मानोपेतः, तथा यद्यस्य स्वकीयेन अङ्गुलेन द्वादशाङ्गुक्योकि विनमिने यह बात अपने दिव्यानुभाव जनित ज्ञान से जान ली थी, कि भरत नाम का चक्रवर्ती राजा उत्पन्न हुआ है और उसके लिये विद्याधर राजा मेट देते है। इसी कारण उसने स्त्रीरत्न चक्रवर्ती के लिये दिया अतः अब जिस स्त्रीरत्न को चक्रवर्ती के लिये भेंट स्वरूप में विनमि ने प्रदान किया वह स्त्रीरत्न कैपा था इस बात को सूत्रकार प्रगट करते हुए कहते हैं- (माणुम्भाणप्पमाणजुत्तं तेअरिंस रूवलक्खणजुत्तं ठियजुव्वणकेसवट्ठियणहं सवगणासणि वलकरिं, इच्छिअसीउण्हफासजुत्तं) कि वह सुभद्रा नाम का स्त्रीरत्न मान उन्मान एवं प्रमाण से युक्त था तात्पर्य इसका ऐसा है कि सार पुद्गलों से उपचित पुरुष का जितना प्रमाण होता है, उससे भी कुछ अधिक प्रमाण वाली एक वड़ो कुण्डिका में जल भर दो और उसमें उस पुरुष को प्रवेश कराओ उसके प्रवेश करने पर उसके भातर से त्रिटङ्क सौवर्णिक गणना की अपेक्षा य द ३२ सेर जल बाहर निकल आता है तो वह पुरुष मानोपेत माना जाता है। और वही सार पुद्गलोपचित पुरुष तराजू पर तौलने व हजार पल प्रमाण वजन में तुलता है तो वह उन्मानोपेत कहा जाता है। तथा जिप्त व्यक्ति का जितना अंगुल है उस अंगुल से १२ अंगुल अमइ ) म विनभित्र सवात पाताना हव्यानुमा भनित ज्ञानथी जी सीधी। ભરત નામક ચક્રવર્તી રાજા ઉત્પન્ન થયેલ છે. અને તેને વિદ્યાધર રાજા ભેટ આપે છે. એથી જ તેણે ચક્રવર્તી માટે સ્ત્રી-રત્ન આપ્યું હવે જે સ્ત્રી-રતન ચક્રવર્તી માટે ભેટ સ્વરૂપમાં વિનમિએ અર્પિત કર્યું તે સ્ત્રીરતન કેવું હતું, તે વાતને સૂત્રકાર આ પ્રમાણે પ્રગટ કરે छ- ( माणुम्माणप्पमाणजुत्तं तेअस्सि रूवलक्खणजुत्तं ठियजुवणकेसबटियणहं सव्व रोगणासणि बलकरि, इच्छिा सीउण्डफासजुत्तं ) त सुभद्रा नाम स्त्री-रत्न मान ઉન્માન અને પ્રમાણુથી યુક્ત હતું. તાત્પર્ય આમ છે કે સાર પુદ્ગલેથી ઉપચિત પુરુષનું જેટલું પ્રમાણ હોય છે તેના કરતાં પણ કઈક વધારે પ્રમાણુવાળી એક મોટી કંડિકામાં પાણી ભરે અને તેમાં તે પુરૂષને પ્રવિષ્ટ કરાવો તે પ્રવિષ્ટ થાય અને તેની અંદરથી ત્રિક સૌવર્ણિક ગણનાની અપેક્ષાએ જે ૩૨ શેર જેટલું પાણી બહાર નીકળી આવે તો તે પુરૂષ ને માનપત માનવામાં આવે છે. અને તે જ સાર પુદ્ગલે પચિત પુરૂષને ત્રાજવા ઉપર તેલવા માં આવે છે તેનું વજન ૧ હજાર પલ પ્રમાણ જેટલું થાય તે તેને ઉન્માનપત કહેવામાં For Private & Parsonál Use Only . . . . Page #841 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कार: सू०२५ नमीविनमीनामानौ विद्याधर राज्ञोः विजयवर्णनम् ८२७ लानि मुखं प्रमाण युक् अनेन च मुखप्रमाणेन नवमुखानि समुच्छ्रितः पुरुषः प्रमाणयुक्तः स्यात्, प्रत्येकं द्वादशाङ्गुलै नवभिर्मुखैर मुलानामष्टोत्तरशतं सम्पद्यते, ततश्चैतावदुछ्रयः पुरुषः प्रमाणयुक्तः स्यात् एवं सुभद्रापि मानोन्मानप्रमाणयुक्ता तथाभूताम् पुनश्च कीदृशीम् 'तेअस्सि' तेजस्विनीम् विलक्षण तेजः सम्पन्नां तथा 'रूवलक्खणजुत्तं' रूपलक्षणयुक्ताम् तत्र रूपम्, अतीव सुन्दराकारः लक्षणानि च छत्रादीनि तै र्युक्ताम्, तथा 'ठिअजुब्वर्णकेसवण' स्थितयौवन केशावस्थितनखाम् तत्र स्थितम् अविनाशित्वाधौवनं यस्याः सा तथा एवं केशवदवस्थिताः अवर्धिष्णवो नखाः यस्याः सा तथा ततः पदद्वयस्य कर्मधारये तां तथा 'सव्वरोगणासर्णि' सर्वरोगनाशनीम् तदीय स्पर्शमहिम्ना सर्वेरोगाः नश्यन्तीत्यर्थः तथा 'बलकरिं' बलकरीम् - बलवृद्धिकरीम् नापरस्त्रीणामिव अस्याः परिभोगे परिभोक्त क्षय इत्यर्थः तथा 'इच्छ्रिय सीउन्हफासजुत्तं' इच्छित शीतोष्णस्पर्शयुक्ताम् तत्र इच्छित्ता : इप्सिताः ऋतुविपरीतत्वेन इच्छागोचरीकृताः ये शीतोष्णस्पर्शास्तै र्युक्ताम्उष्णता शीतस्पर्शाम् शीतऋतौ उष्णस्पर्शाम् मध्यमतीमध्यमस्पर्शामिति भावः । तिस्रु तणुअं तिसु तंबं तिवलिगतिउण्णयं तिगंभीरं । तिसु कालं तिसु सेअं ति आयतं तिसु अ विच्छिणं ॥१॥ त्रिषु तनुकां त्रिषु ताम्रां त्रिवलिकत्र्युन्नतां त्रिगम्भीराम् । त्रषु कृष्णां त्रिषु श्वेतां त्र्यायतां त्रिषु च विस्तोर्णाम् ॥ १॥ तत्र- - त्रिषु तनुकां त्रिषु स्थानेषु मध्योका जिसका मुख होता है : वह मुख प्रमाण से जो ९ मुख का होता है । अर्थात् १०८ अगुल का ऊँचा होता है । वह प्रमाणोपेन कहा जाता है। ऐसे मान, उन्मान और प्रमाण से युक्त वह सुभद्रारत्न था तथा वह सुभद्रारत्न तेजस्वी था विलक्षण तेज से युक्त था, सुन्दर आकार वाला था छत्रादि प्रशस्तलक्षणों से युक्त था. स्थिर यौवन वाला था. केश की तरह इसके नख अवर्धिष्णु थे- समस्त रोग इसके स्पर्शमात्र से नष्ट हो जाते थे, वलकी वृद्धि करने वाला था. दूसरी स्त्रियों की तरह यह सुभद्रा अपने भोक्ता पुरुष के बल को क्षय करने वाली नहीं थी. शोत काल में यह सुभद्रारत्न उष्णस्पर्शवाला रहता था. और उष्णकाल में यह शीतस्पर्शवाला हो जाता था, तथा मध्यम ऋतु में यह मध्यमस्पर्शवाला बन जाता था यह सुभद्रारत्न तीन स्थानों में આવે છે. તેમને જે પુરૂષના જેટલા પ્રમાણુવાલે અંગુલ હોય છે, તે અંગુલથી ૧૨ અગુલ જેટલું જેનુ મુખ હાય છે તેને મુખપ્રમાણ માનવામાં આવે છે. એવા સુખપ્રમાણુથી જે પુરુષ ૯ મુખ જેટલે હાય છે અટલે કે ૧૦૮ અંશુલ જેટલેા ઊંચા હોય છે, તેને પ્રમાણેાપેન કહેવામાં આવે છે. એવા માન, ઉન્માન અને પ્રમાણુથી યુક્ત તે સુભદ્રા નામક સ્ત્રી-રત્ન કંતુ. તેમજ તે સુભદ્રા સ્ત્રી-તેજસ્વી હતુ તે વિલક્ષણ તેજથી સમ્પન્ન હતું. આકારે તે સુભદ્રા સ્ત્રી-રત્ન સુન્દર હતું. છત્રાદિ પ્રશસ્ત લક્ષણેાથી તે યુક્ત હતું. સ્થિર યૌવનવાળુ` હતુ`. વાળની જેમ એના નખા અવધિષ્ણુ હતાં એના સ્પ’માત્રથી જ સમસ્ત રોગે! નાશ પામતા હતા. તે ખળબુદ્ધિ કરનાર હતું, ખીજી સ્ત્રીએની જેમ તે સુભદ્રા પેાતાના ઉપલેાકતા પુરૂષના ખળને ક્ષય કરનાર ન હેાતી. શીત કાળમાં તે સુભદ્રારન ઉષ્ણુ સ્પર્શવાળું રહેતું હતુ' અને ઉષ્ણકાળમાં એ શીતસ્પર્શ વાળું થઇ જતું હતું. તેમજ મધ્યમ ઋતુમાં એ મધ્યમ સ્પર્શ Page #842 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४२८ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे दरतनुलक्षणेषु तनुकाम् कृशाम् पुनः कीदृशी वर्तते तदाह त्रिषु ताम्रां त्रिषु दृगन्तापरयोनिलक्षणेषु स्थानेषु ताम्राम्-रक्ताम् तथा-त्रिवलिकाम्-त्रयो वलयो मध्यवर्ति रेखारूपाः यस्याः सा तथा ताम् त्रिवलिकत्वं स्त्रीणा मति प्रशस्यं पुंसां तु न तथाविधम् । तथा व्युताम्-त्रिषु स्थानेषु स्तनजघनयोनिलक्षणेषु उन्नताम् तथा त्रिगम्भीराम् त्रिषु नाभिसत्त्व स्वररूपेषु गम्भीरां धृतगाम्भीर्याम् तथा त्रिषु कृष्णाम् त्रिषु रोमराजी चूचुक कनीनिकारूपेषु अवयवेषु कृष्णां कृष्णवर्णाम् तथा त्रिषु श्वेतां त्रिषु दस्मितचक्षुर्लक्षणेषु श्वेतवर्णाम् तथा व्यायताम् त्रिषु वेणीबाहुलता लोचनेषु आयतां दोर्घाम् तथा त्रिषु च विस्तीर्णाम् त्रिषु श्रोणिचक्रजघनस्थली नितम्बस्थानेषु विस्तीर्णाम् ॥१॥ तथा 'समसरीरं' समशरीराम् समं चतुरस्त्रं संस्थानं यस्या सा समचतुरस्रा समसंस्थानत्वात् तथा-'भरहे वासंमि स सबमहिलप्पहाणं' भारते वर्षे भरतक्षेत्र सर्वमहिलाप्रधानाम् पुनः कीदृशी सुभद्राम्‘सुंदरथणजघणवरकरचलणणयणसिरसिजदसणेजण - मध्यमें कटिभागमें, उदर में एवं शरीर में कृश था. तीन स्थानों में नेत्र के प्रान्त भागो में, अघरोष्ठ में, एवं योनिस्थान में रक्त-लाल था, त्रिवलियुक्त था. तोन स्थानों में स्तन जघन एवं योनिरूप स्थानों में उन्नत थां. तीन स्थानों में नाभि में, सत्त्व में और स्वर में गंभीर था. तीन स्थानों में रोमरानि चुचुक, और कनिनोका में कृष्णवर्णोपेत था. तीन स्थानों में दन्त स्मित और चक्षुरूप स्थानों में श्वेतवर्णोपेत था. तीन स्थानों में वेणी, बाहुलता और लोचन रूपस्थानों में- यह लम्बाई युक्त था तथा तीन स्थानों में- श्रोणिचक्र, नघनस्थली और नितम्ब इनमें चौड़ाई से युक्त था. इस सब विशेषणों का कथन करने वालो गाथा इस प्रकार से है __ "तिसु तणुअंतिसु तंब तिवलीग ति उण्णयं ति गंभीरं । तिमु कालं तिसु सेअं तिमायत तिसुय विच्छिण्णं ॥१॥ (समसरीरं) समचतुरस्रसंस्थानवाला होने से यह सुभद्रारत्न बहुसमरभणोय शरीरवाला था. (भरहे वासंमि सव्वमहिलप्पहाणं) भरत क्षेत्र में यह रत्न समस्त महिलाओं વાળ થઈ જતું. હતું. એ સુભદ્રા સ્ત્રી ૨ની મધ્યમાં-કટિ ભાગમાં ઉદરમાં અને શરીરમાં એ ત્રણ સ્થાન માં કૃશ હતું. ત્રણ સ્થાનોમાં–નેત્રના પ્રાન્ત ભાગમાં, અધરાષ્ટ્રમાં તેમજ નિસ્થાનમાં એ લાલ હતું. તે ત્રિવલિ યુક્ત હતું. ત્રણ સ્થાનમાં-સ્તન જઘન અને ચનિ રૂપ સ્થાનેમાં તે ઉન્નત હતું. ત્રણ સ્થાનેમાં નાભિમાં સત્તામાં અને સ્વરમાં એ ગંભીર હતું. ત્રણ સ્થાનમાં-મરાજિ, ચુચુક અને કનીનિકામાં એ કૃષ્ણવર્ણોપેડ હતું, ત્રણ સ્થાનમાં દત્ત, સ્મિત અને ચક્ષુ રૂપ સ્થાનોમાં એ વેતવર્ણોપેત હતું. ત્રણ સ્થાનમાં વેણી, બાહલતા અને લેાચન રૂપ સ્થાનમાં એ લંબાઈ યુત હતું. તેમજ ત્રણે સ્થાને માં શ્રેણિચક્ર જઘન સ્થલી અને નિતંબ એ સ્થાનમાં એ પહેલાઈયુફત હતું. એ સર્વે વિશેષણનું કથન પ્રકટ કરનારી ગાથા આ પ્રમાણે છે – "तिसु तणुअं तिसु तंब तिवलीग ति उण्णयं तिगभीरं । तिसु कालं तिसु से ति आयतं तिसुय विच्छिण्ण ॥९॥ (समसरीर) सभयतुरस्त्र संस्थान पाडापाथी सुभद्रारत्न समशरी२ पातु (भरहे वासंमि सव्व महिलपहाणं) भरत क्षेत्र मे न समस्त मलिना ये Page #843 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सू०२५ नमीबिनमीनामानौ विद्याधर राज्ञोःविजयवर्णनम्८२९ हिअयरमणमणहरिं' सुंदरस्तनजघनवरकरचरणनयनसिरसिजदशनजनहृदयरमणमनोहरीम्, तत्र सुन्दरं मनोहरम् स्तनजघनवरकरचरणनयनं यस्याः सा तथा शिरसि जायन्ते ये ते शिरसिजाः केशाः दशनाः दन्तास्तैः जनहृदयरमणीं द्रष्टपुरुषचित्तप्रसन्नकरी अतएव मनोहरो चित्तहारिका पश्चात् कर्मधारयः एवंभूता या सा तथा ताम् तथा'सिंगारागार जाव जुत्तोवयारकुसलं' श्रृङ्गारागार यावद् युक्तोपचारकुशलाम् अत्र यावत्पदात् श्रृङ्गारागारचारुवेषां सङ्गतगतहसित भणितचेष्टितविलाससललितसंलापनिपुणामिति संग्राह्यम् तथा च शङ्गारागारचारुवेषाम् शृङ्गारस्य प्रथमरसस्यागारं गृहमिव चारुः सुन्दरो वेषो यस्याः सा तथा ताम्, तथा सङ्गताः उचिताः गतहसितभणितचेष्टितविलासाः यस्याः सा तथा ताम् तत्र गतं गमनं हसितं स्मितं भणितं वाणी चेष्टितं च नेत्रचेष्टा तथा सह कलितेन प्रसन्नतया ये संलापाः परस्परभाषणलक्षणास्तेषु निपुणा या सा तथा ताम, तथा युक्तोपचारकुशलाम् युक्तः-संगताः ये उपचाराः लोकब्यवाहारास्तेषु कुशला निपुणा या सा तथा ताम् तथा 'अमरवहणं सुरूवं रूवेणं अणुहरंतीं' अमरवधूनां देवाङ्गनानां सुरूपं सौन्दर्य रूपेण निजेन अनुहरन्तीम् अनुकुर्वन्तीम् तथा . के बीच में प्रधान रत्न था. ( सुन्दरथणजघणवरकरचलणणयणसिरसिजदसण जणहि अयरमणहरि) इसके स्तन, जघन, एवं कर द्वय ये सब सुन्दर थे. दोनों चरण बड़े ही मनोज्ञ थे. नेत्र दोनों बहुत अधिक लुभावने वाले थे. मस्तक के केश एवं दन्तपक्ति द्रष्ट पुरुष के चित्त को आनन्दकारी थे. अतः यह सुभद्रारत्न बड़ा हो मनोहर था. ( सिंगारागार जाव जुत्तोवयारकुसलं ) इसका सुन्दर वेष प्रथमरसरूप शृङ्गार ही का धर था. यावत् संगत लोक व्यवहारों में यह सुभद्रारत्न बहुत ही अधिक कुशलता पूर्ण था. यहां यावत्पद से- “चारुवेषां, संगतगतहसितभणितचेष्टितविलाससललितसंलापनिपुणाम्" इन पदों का ग्रहण हुआ है. इन की व्याख्या इस प्रकार से है- इसका गमन, इसका हास्य, इसको मुस्क्यान, इसका बोलना, इसका वाणी, इसका चेष्टित-नेत्र चेष्टा, और प्रसन्नता पूर्वक किये आलाप ये सब हो अनोखे थे. अर्थात् यह सुभद्रारत्न. इन सब गमनादिरूप कार्यों में बहुत ही उत्तमतालिये. हुए था (अमरवहूणं सुरूवंरूवेणं प्रधान न तु. (सुंदरथणजघनवरकरचलण णयणसिरसिजदसण जणहिअयरमण मणहरि) એના સ્તને, જઘન અને કરદ્વય એ સેવે સુંદર હતાં. બન્ને ચરણે ખૂબજ મઝા | હતા. બન્ને નેત્રો અતીવ આકર્ષક હતા. મસ્તકના વાળ અને દંત પંક્િત દષ્ટ પુરુષના ચિત્તને मापना। ता. मा प्रभाए म सुभद्रा२त्न मताव मना२तु (सिगारागार जाव जुत्तोवयारकुसल) अने। सु२ वेष प्रथम २स ३५ श्रृंगारनु घर तु यावत् समता व्यवहारमा से सुभद्रात सती सुशणता पूर्ण तु. मी यावत् ५४थी "चारुवेषां, संगतगतहलितभणित, चेष्टितविलाससललितसंलापनिपुणाम् ) पहनु अक्षय थयु छ. પદેની પાખ્યા બા પ્રમાણે છે-એ સુભદ્રાસ્ત્રીરન નું ગેમન, હાસ્ય, મુસકાન, બેલવું, છે, ચેટિત, નેત્ર-ચેષ્ટા અને પ્રસન્નતાપૂર્વક કરવામાં આવેલા આલાપ એ સર્વે અદભુત હતાં. એટલે કે એ સુભદ્રાન એ સવે ગમનાદિક રૂપ કાર્યોમાં અતી ઉત્તમતા યુકૃત હતું Page #844 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८३० जम्बुद्वोपप्रप्तिसूत्रे 'मुभदंभईमि जोव्वणे वट्टमाणिं इत्थीरयणं' भद्रे कल्याणकारिणी यौवने वर्तमानां सुभद्रां तत् नामकं स्त्रीरत्नम् विनमिः गृह्णाति 'नमी रयणाणि अ कडगाणि य तुडि-- याणि य गेण्हइ' नमिश्च रत्नानि च कटकानि च त्रुटिकानि च गृह्णाति एतत्पदस्यार्थः प्राक्कथित एवेत्यलं पुनरुपादानेन 'गिण्डित्ता' गृहीत्वा 'ताए उक्किट्ठाए तुरियाए जाव उद्धयाए विज्जाहरगईए जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छति' तया उत्कृष्टया त्वरितया यावदुद्धतया विद्याधरगत्या यत्रैव भरतो राजा तत्रैव द्वौ उपागच्छतः तत्र तया उत्कृष्टया उत्कर्षयुक्तया त्वरया आकुलया न स्वाभाविन्या यावत्पदात् चपलया अतिवेगेन चण्डया प्रबलया रौद्रया अत्युत्कर्षयोगेन सिंहया सिहसदृशदाढर्य सिंहसदृशपराक्रमशालि गत्या उद्भूतया दतिशयेन जयिन्या विपक्षजेतृत्वेन छकया निपुणया दिव्यया विद्याधरगत्या उत्तरश्रेण्याधिपति दक्षिणश्रेण्याधिपती विनमीनमी यत्रैव भरतो राजा तत्रैव उपागच्छतः 'उवाईच्छत्ता'उपागत्य 'अंतलिक्खपडिवण्णा सखिखिणीयाइं जाव जएणं अणुहरंती सुभदं भईमि जोव्वणे माणि इत्थीरयणं, णमीय रयणाणि य कडगाणि य, तुडियाणि य गेण्हइ) यह अपने रूप से देवाङ्गनाओं के सौन्दर्य का अनुकरण करता था. ऐसे विशेषणों से विशिष्ट तथा भद्र-कल्याणकारी-योवन में स्थित ऐसे स्त्रोरत्नरूप सुभद्रारत्न को विनमिने लिया और नमिने अनेकरत्नों को कटकों को और त्रुटिकों को लिया (गिण्हित्ता जेणेव भर हे राया, तेणेव उवागच्छई) इन सबको लेकर फिर वे जहां पर भरतमहाराजा थे वहां पर आये. (ताए उक्किदाए तुरियाए जाव उद्भूयाए विज्जाहरगईए) आते समय वे साधारणगति से नहीं चले किन्तु उत्कृष्ट गति से ही चले. वह-उनकी उत्कृष्ट गति भी ऐसी थी कि जिसमें स्वरा-भरी हई थी. शीघ्रता से युक्त थी. इससे उन्होंने मार्ग में कहीं पर भी विश्राम नहीं किया. त्वरा युक्त होने पर भी वह ऐसा नहीं थी. कि जिसमें अनुद्धतता हो किन्तु उद्धृतता से छलांगों से वह यक्त थी अतः जैसी विद्याधरों की गति होती है. इसी प्रकार की गति से चलकर वे भरत (अमरवण सुरूवं रूवेणं अणुहरंतों सुभदं भमि जोव्वणे वट्ठमाणिं इत्थीरयण, णमीय रयणाणि य कडगाणि य तुडियाणि य गेण्हइ) मे सुभद्रास्त्रोकन ३५मा वाशनासाना સૌંદર્યનું અનુકરણ કરનાર હતું. એવા વિશેષાથી વિશિષ્ટ તેમજ ભદ્ર-કલ્યાણકારી યૌવનમાં સ્થિત એવા સ્ત્રી-નરૂપ સુભદ્રાનને વિનમિએ સાથે લીધું અને નમિએ અનેક રનોને, नभने त्रुटिन बीघi. (गिण्हित्ता जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छइ) से सबने सन पछी तयायां २० ता त्यां गया. (ताए उक्किट्ठार तुरियाए जाव उर्दू याप विज्जाहरगईए) ति १wa तसा से साधारण गतिथी गमन ४यु नहि ५ ष्ट ગતિથી ગમન કર્યું તે તેમની ઉત્કૃષ્ટ ગતિ પણ એવી હતી કે જેમાં ત્વરા હતી, શીવ્રતા હતી. એથી તેમણે માગ માં કેઈ પણ સ્થાને વિશ્રામ લીધે નહિ. ત્વરા યુફત હોવા છતાંએ તે એવી નહતી કે જેમાં અનુદ્ધતતા હોય પણ ઉદ્ધુતતાથી છલંગથી-તે યુક્ત હતી. આ પ્રમાણે જેવી વિદ્યાધરની ગતિ હોય છે, એવી જ ગતિથી ચાલીને તેઓ ભરતરાજાની પાસે गया. ही यावत् ५४थी "चपलया चण्डया, रोइया, सिंहया, जयिन्या" से विशेषणानु' - Page #845 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कार सू०२५ नमीविनमीनामानौविद्याधरराज्ञोः विजयवर्णनम् ८३१ विजएणं बद्धाविति' तत्र अन्तरिक्षप्रतिपन्नौ गगनस्थितौ विनमी नमी सकिंकिणीकानि क्षुद्रघण्टिका युक्तानि यावत्पादात् पञ्चवर्णानि शुक्लनीलपीतरक्तहरितपञ्चवर्णमिश्रितानि वस्त्राणि प्रवराणि परिहितौ धारितवन्तौ जयेन विजयेन जयविनयशब्दाभ्यां वर्द्धयतः 'वद्धावित्ता एवं वयासी' वयित्वा एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादिष्टाम् उक्तवन्तौ किमुक्तवन्तावित्याह-'अभिजिएणं देवाणुप्पिया ! जाव अम्हे देवाणुप्पियाणं आणत्तिकिंकरा इति कटु तं पडिच्छतु णं देवाणुप्पिया ! अम्हं इमं जाव विणमी इत्थीरयणं णमी रयणाणि समप्पेइ' अभिजितं स्ववशे कृतं खलु भो देवानुप्रियाः ! यावत्पदात् सर्व राजा के पास आये. यहां यावत्पद से "चपलया चण्डया, रोइया सिंहया जयिन्या" इन विशेषणां का ग्रहण हुआ है. (उवागच्छित्ता अंतलिखपडिवन्ना सखिखिणीयाई जाव जएणं विजएणं वद्धाति) वहां आकर वे नोचे नहीं उतरे किन्तु आकाश में हो वे ठहर रहे. जिन वस्त्रों को ये उस समय धारण किये हुए आये थे वे वस्त्र उनके क्षुद्र घंटिकाओं से युक्त थे. और पांचोवर्णों से-शुक्ल, नील, पीतरक्त और हरित-इन पांच प्रकार के रंगों से-रंगे हुए थे. अतएव अवर-श्रेष्ठ थे. आकाश में ठहरे हुए ही इन विनमि और नमिने भरत को जय विजय शब्दों से बधाया (वद्धावित्त। एवं वयासी) और वधाकर-वधाई देकर फिर इस प्रकार से कहा(माभजिएणं देवाणुप्पिया ! जाव अम्हे देवाणुप्पियाणं आणत्ति किंकरा इति कटूटु तं पडच्छंतु णं देवाणुपिया ! अम्हं इमं जाव विणमी इत्थीरयणं णमी रयणाणि समप्पेइ) हे देवानुप्रिय ! आपने विजय प्राप्त कर लिया है. यहां आगत यावत्पद मागधगम को वक्तव्यता प्रकट करता है. इसलिये मागध प्रकरण में जो कहा गया है वह सब यहां पर कह लेना चाहिये. इस प्रकार से हम आपके आज्ञप्ति किंकर है" कहकर फिर उन्होंने ऐसा कहाकि हे देवानुप्रिय ! आप हमारो इस भेंट को स्वीकार करें इस प्रकार कह कर विनमि ने स्त्रीरत्न को और नमिने रत्नादिको घडण थयुछे. (उवागच्छित्ता अंतलिक्खपडिवन्ना सखिखिणोयाइ जाव जपणं विजएणं वद्धावेंति) त्या पायाने तेथे। नीयता नहीं ५ माशमा ४ स्थिर द्या. २ वस्त्राने તેમણે તે વખતે ધારણ કરેલાં હતાં, તે વચ્ચે શુદ્રઘંટિકાઓથી યુક્ત હતાં. અને પાંચ વણથી-શુકલ, નીલ, પાત-રકૃત અને હરિત એ પાંચ પ્રકારના રંગથી રંગેલા હતાં. એથી એ વ શ્રેષ્ઠ હતાં. આકાશમાં સ્થિર રહીને જ એ વિનમિ અને નમએ ભરત મહારાજાને नय- विय शहाथी धामी मावी. (वद्धावित्ता एवं वयासी) मन वधामा मापी पछी मा प्रभारी बु. ( अभिजिपणं देवाणुपिया ! जाव अम्हे देवाणुप्पियाणं आणत्तिकिंकरा इति कट्टु तं पांडच्छतु ण देव तं पडिच्छतु णं देवाणुप्पिया! अम्हं इमं जाव विणमी इत्थीरयणं णमी रयणाणि समप्पेइ ) 3 देवानुप्रिय ! मा५श्री विश्य प्रात यो छे. सही मावा થાવત્ પદથી મગધ ગમની વકતવ્યતા પ્રકટ કરવામાં આવી છે, એથી માગધ પ્રકરણમાં જે કહેવામાં આવ્યું છે તે બધું અહીં કહેવું જોઈએ. આ પ્રમાણે અમે આપશ્રીના આજ્ઞપ્તિ કિંકરે આજ્ઞા પાલકે છીએ. આ પ્રમાણે કહીને પછી તેમણે આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! આપશ્રી અમારી આ ભેટને સ્વીકારે. આ પ્રમાણે કહીને વિનમિએ સ્ત્રી-રતન અને Page #846 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८३२ अम्बूद्वीपप्रशतिसूत्रे मागधगमवद् वाच्यम् 'नवरं उत्तरेणं चुल्लहिमवंत मेराए' उत्तरतः क्षुद्र हिमवद्विरिमर्यादम् इति 'अम्हे णं देवापियाणं विसयवासिणोत्ति' आवां देवानुप्रियाणाम् आज्ञप्तिकिङ्कराविति कृत्वा तत्प्रतीच्छन्तु अङ्गीकुर्वन्तु खलु देवानुप्रियाः ! अस्माकमिदं यावत्पदात् एतद्रूपं प्रीतिदानमिति कृत्वा विनमिः उत्तरश्रेण्याधिपतिः स्त्रीरत्नं समर्पयति नमिः दक्षिणण्याधिपतिः विविधप्रकाराणि रत्नानि तस्मै राज्ञे उपहाररूपेण ददातीत्यर्थः 'तए णं से भरहे राया जाव पडिविसज्जेइ' ततः स्त्रीरत्न- रत्नसमर्पणानन्तरं खलु स भरतो राजा यावत् पदात् प्रीतिदानग्रहणसत्कार सम्मानादि ग्राहम् प्रतिविसर्जयति तौ विनमि नमी स्वस्व गृहगमनाय आदिशति 'पडिविसज्जित्ता' तौ विद्याधराधिपौ प्रतिविसृज्य आदिश्य 'पोसह सालाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता मंज्जणघरं अणुष्पविसइ' स भरतो राजा पौषधशा लातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य मज्जनगृह स्नानगृहम् अनुप्रविशति 'अणुपविसित्ता' मज्जनगृहम् अनुप्रविश्य स्नानविधिः पूर्णोऽत्रवाच्यः, ततः 'भोयणमंडवे को भरत राजा के लिये भेंट में दे दिया. (नवरं उत्तरेणं चुल्लहिमवंत मेराए अम्हे देवाणुप्पियाणं विसयत्रासिणोत्ति) भेंट देने के साथ २ उन्होंने" हम दोनों क्षुद्रहिमवत्पर्वत की हद में आगत उत्तरश्रेणिके अधिपति विनमि और नमि विद्याधराधिपति हैं और अब आपके ही देश के निवासी बन चुके है" इस प्रकार से अपना परिचय दिया. (तएणं से भरहे राया जाव पडिविसज्जेइ) इस प्रकार उनके द्वारा भेट में प्रदत्त स्त्रोरत्न एवं रत्नादिक को स्वीकार करके भरत राजा ने उनका सत्कार किया और सम्मान किया बाद में उन्हें अपने अपने स्थान पर जाने का आदेश दे दिया (डिविसज्जित्ता पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ) इस प्रकार उन्हें विसर्जित करके भरत राजा पौशाला से बाहर निकले ( पडिणिक्खमित्ता मज्जणघरं अणुप्पविसइ) बाहर निकल कर वे स्नान घर में गये. (अणुपविसित्ता भोयणमंडवे जाव णमि विनिर्माणं विज्जाहरराईणं अट्ठाहिय महामहिमा ) वहां पहुँच कर उन्होंने स्नान किया यहां पर स्नानविधि का पूर्णरूप से वर्णन कर लेना चाहिये. नभि रत्नाहि. भरत रान ने बेटमां आध्यां (नवरं उत्तरेण चुल्लहिमवंतमेराप अम्हे देवाणुपिया णं विसयवासिणोन्ति) लेट आयवानी साथै साथै तेली "अमे मन्ने क्षुद्रद्धिમવપ તની સીમામાં આવેલા ઉત્તર શ્રેણિના અધિપતિ વિનમિ અને નમિ વિદ્યાધરાધિપતિ એછીએ અને હવે અમે આપશ્રીના દેશના જ નિવાસીએ થઇ ગયા છીએ. આા પ્રમાણે पोतानी योजयाशु आयी. (तपण से भरहे राया जाव पडिविसज्जेद) मा प्रमाए । तेभना વડે ભેટમાં પ્રદત્ત સ્ત્રીરત્ન તેમજ રત્નાદિક ને સ્વીકારી ને ભરત મહારાજાએ તેએ બન્નેનો સત્કાર કર્યાં અને તેમે બન્નેનુ સન્માન કર્યુ. ત્યાર બાદ બન્નેને પાત-પેાતાના સ્થાને ज्वानो राल मे आहेश मध्ये (वडिविसज्जित्ता पोसहसालाओ पडिणिक्खमई) | प्रभा તેએ બન્નેને વિસર્જિતકકરીને ભરત રાજા पौषध शाजा भांथी महार नीज्या (पडिक्aिमित्ता मज्झणधरं अणुप्पविसइ) महार नीजी ने ते राल स्नान धरमां गया. ( अणुप· विसित्ता भोयणमंडवे जाव णामि विनिमीणं विज्जाहरराईणं अट्ठाहिय मद्दामहिमा) Page #847 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारःसू०२५ नमोबिनमोनामानौ विद्याधरराशो:विजयवर्णनम् ८३३ जाव नामिविनमीणं विज्जाहरराईणं अट्टाहिय महामहिमा' ततो भोजनमण्डपे पारण वाच्यम् यावच्छवादेव श्रेणिप्रश्रेणिशब्दनम् अष्टाहिकाकरणाज्ञापनमिति ततः नमिविनम्यो विद्याधरराज्ञोरष्टाहिकां महामहिमां कुर्वन्तीति आज्ञां च राज्ञे भरताय प्रत्यर्पयन्तीति बोध्यम् 'तए से दिव्वे चक्करयणे आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ जाव उत्तपुरस्थिमं दिसिं गंगादेवीभवणाभिमुहे पयाए यावि होत्था' ततः नमिविनमिसाधनानन्तरं खलु तदिव्यं चक्ररत्नम् आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छतीत्यादिकं प्राग्वत् यावत्पदादवसेयम् अयं विशेषः उत्तरपौरस्त्यां दिशम् ईशान दिशं वैताव्यतो गङ्गादेवी भवनाभिमुखं गच्छतः ईशानकोणगमनस्य ऋजुमार्गत्वात् गङ्गादेवी भवनाभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत् 'सच्चेव सव्वा सिंधुवत्तव्यया जाव नवरं कुंभट्ठसहस्सं रयणचित्तं णाणामणिकणगरयणभत्तिचित्ताणि य दुवे कणगसीहासणाई सेसं तं चेव जाव महिमत्ति' सेव फिर वहां से वे भोजन मंडप में गये. वहां उन्होंने पारणा को यहां यावत् शब्द से इस कथनका संग्रह हुआ जानना चाहिए- कि फिर उन्होने श्रेणी प्रश्रेणो जनों को बुलाया उन्हें आठ दिन तक लगातार महामहोत्सव करने की आज्ञा दी. उन्होंने भरत राजा की आज्ञा से नमिविनमिविषाधर राजाओं के विनयोपलक्ष्य में आठ दिन तक ठाठ वाटसे महोत्सव किया और उस महोत्सव के पूर्णरूप से संपादन हो जाने की खबर राजा को कर दी" (तए णं से दिवे चक्करयणे ओउहधरसालाओ पडिणिक्खमई) इसके बाद वह चक्ररत्न आयुधगृहशाला से बाहरनिकला (जाव उत्तरपुरस्थिमं दिसिं गंगादेवीभवणाभिमुहे पयाए यावि होत्था) और यावत् वह इशानदिशा में गंगा देवी के भवन को ओर चला. क्योंकि वैताढ्य से गङ्गादेवी के भवन की ओर जाने वाले को ईशान दिशा में जाने का मार्ग सरल है. (सच्चेव सबा सिंधुवत्तवया जाव नवरं कुंभट्टसहरसं रयणचित्तं णाणामणिकणगरयणभत्तिचित्ताणि य दुवे कणगसीहासणाई सेसं तंचेव जाव महिमत्ति) वहो पूर्वोक समस्त सिन्धु प्रकरण में कही गइ वक्तव्यता अब यहां पर कह लेना चाहिये. परन्तु ત્યાં પહોંચીને તેમણે સ્નાન કર્યું. અહીં નાનવિધિનું સંપૂર્ણ રૂપમાં વર્ણન કરવું જોઈએ. પછી તે ત્યાંથી ભેજન મંડપમાં ગયા. ત્યાં તેમણે પારણુ કર્યા. અહીં યાવત શબ્દથી એ કથન સંગૃહીત થયેલ છે. કે પછી તેમણે શ્રેણી–પ્રશ્રેણી જનેને બે લાવ્યા અને આઠ દિવસ સુધી સતત મહામહોત્સવ કરવાની તેમને આજ્ઞા આપી. તેમણે ભરત મહારાજાની આજ્ઞાથી નમિ-વિનમિ વિદ્યાધર રાજાઓ ઉપર વિજય મેળવે તે વિજયેપલક્ષ્યમાં આઠ દિવસ સુધી ઠાઠ માઠથી મત્સવ કર્યો અને તે મહોત્સવ પૂર્ણ રૂપે સંપાદિત થયો છે એની सूचना शतने मापी (तरण से दिव्वे चक्करयणे आउहघरसालाओ पडिणिक्खमई) त्या२ मत यत्न भायुधशामामाथी मा२ नीज्यु. (जाव उत्तरपुरस्थिमं दिसि गंगा देवी भवणाभिमुहे पयाप यावि होत्था) सने यापत् ते शान शाम हवाना ભવનની તરફ રવાના થયું કે મકે વૈતાદ્રયથી ગંગાદેવીના ભવન તરફ જનારાને ઇશાન દિશામાં से पधारे सरस ५3 छ. (सच्चेव सव्वा सिंधु वृत्तव्वया जाव नवरं कुंभट्ठसहस्सं रयणचित्तं णाणामणि कणगरयण भत्ति चित्ताणि य दुवे कणगसीहासणाई सेसं तं चेव , Page #848 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८३४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्रे सर्वा सिन्धुवतव्यता सिन्धुदेवी वक्तव्यता गङ्गाभिलापेन विज्ञेया इयं च वक्तव्यता अस्मि उन्नेव तृतीयवक्षस्कारे एकादशसूत्रे विशेषरूपेण द्रष्टव्या यावत्प्रीतिदानमिति गम्यम्: तात्पर्यन्तं वाच्यं नवरम् अयं विशेष:- कुम्भाष्टसहस्रं कुम्भानाम् अष्टोत्तरसहस्रं अष्टोत्तरं सहस्रं कुम्भं रत्नचित्रं रत्नविचित्रम्, नानामणिकनकरत्न भक्तिचित्रे च नानामणिकनक: रत्नमयी भक्तिः - विच्छित्तिः तया चित्रे विचित्रे च द्वे कनकसिंहासने शेषं माभृतग्रहणसन्मानदानादिकं तथैव पूर्ववदेव यावदष्टाहिका महामहिमेति बोध्यम् ॥ सू. २५ । अथातो दिग्यात्रामाह - 'तरणं से दिव्वे' इत्यादि । मूलम् - तरणं से दिव्वे चक्करयणे गंगाए देवीए अट्ठाहियाए महामहिमा निव्वत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमइ पाडणिक्खमित्ता जाव गंगाए महाणईए पच्चत्थिमिल्लेणं कूलेणं दाहिणदिसि खंडवा गुहा भिमु पयाए यावि होत्था त एणं से भरहे राया जाव जेणेव खंडप्पवायगुहा तेणेव उवागच्छर्इ उवागच्छित्ता सव्वा कयमालकवत्तव्या यव्वा णवरि णट्टमालगे देवे पीतिदाणं से अलंकारिअ भंड कडगाणि य सेसं सव्वं तहेव जाव अट्ठाहिया महामहिमा । तए णं से भरहे सिंधु स्थान में गङ्गा पद लगाकर अभिलाप करना चाहिये. यह वक्तव्यता इसी ग्रन्थ में तृतीय वक्षस्कार के ११ वें सूत्र में विशेषरूप से प्रतिदान पर्यन्त कही गई है-सो वही प्रीतिदान पर्यन्त को वक्तव्यता यहां पर भो समझलेनो चाहिये. हां उस वक्तव्यता से जो इस वक्तव्यता में अन्तर हैं। वह ऐसा है कि गंगा देवी ने भरत नरेश के लिये भेंट में १००८ कुम्भ जो रत्नों से विचित्र हो रहे थे. दिये तथा अनेक मणियों से एवं कनक तथा रत्नों से जिनमें रचना हो रही है. ऐसे दो कनक सिंहासन दिये. वाकी का ओर सब कथन प्राभृतका स्वीकार करना सम्मान करना आदिरूप जो है वह सब माठ दिन के महोत्सव पर्यन्त जैमा पहिले कहा गया है वैसा ही है । ।। सू. २५॥ जाव महिमति) पूर्वोत सिंधु मां ने बतव्यता वामां भावी छे ते अड्डी उडेवा જોઈએ. પણ અહી સિંધુના સ્થાને ગંગાપદ લગાડી ને અભિલાષ કરવે જોઇએ. એ વક્તવ્યતા આ જ ગ્રન્થમાં તૃતીય વક્ષસ્કારમાં ૧૧ માં સૂત્રમાં વિશેષ રૂપ માંથી પ્રીતિ દાન સુધી કહેવામાં આવી છે. તે પ્રીતિદાન સુધીની વક્તવ્યતા અહીં' પણ જાણી લેવી જોઇએ. તે વક્તવ્યતા અને આ વક્તવ્યતામાં અંતર આ પ્રમાણે છે કે ગગાદેવીએ ભરત નરેશ માટે લેટમાં ૧૦૦૮ કુંભા કે જેએ રત્નાથી વિચિત્ર પ્રતીત થતા હતા, આવ્યા તેમજ અનેક માણુિએ થી, કનક તથા રત્નાથી જેમનામાં રચના થઈ રહી છે, એવા એ કનકસિંહાસને આવ્યાં. શેષ સવ કથન પ્રાકૃત (લેટ) સ્વીકાર કરવી, સન્માન કરવુ વગેરે છે તે સ` આઠ દિવસ મહાસત્ર સુધીનું કથન પહેલાં પ્રકટ કરવામાં આવ્યુ' છે અહી પણ તે પ્રમાણે જ સમજી લેવુ' लेखे. ॥सूत्र२५॥ Page #849 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सु० २६ भरतराशः दिग्यात्रावर्णनम् राया णट्टमालगस्स देवस्स अट्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए सुसेणं सेणावई सद्दावेइ सदावित्ता जाव सिंधुगमो णेयवो जाव गंगाए महाणईए पुरथिमिल्लं णिक्खुडं सगंगासागरगिरिमेरागं समविसमणिक्खुडाणि य ओअवेइ ओअवित्ता अग्गाणि वराणि रयणाणि पडिच्छइ पडिच्छित्ता जेणेव गंगा महाणई तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता दोच्चंपि सखंधावाखले गंगामहाणई विमलजलतुंगवीइं णावाभूएणं चम्मरयणेणं उत्तरइ उत्तरित्ता जेणेव भरहस्स रण्णो विजयखंधोवारनिवेसे जेणेव बाहिरिया उबट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता आभिसेक्काओ हत्थिरयणाओ पच्चोरुहइ पच्चोरुहिता अग्गाइं वराई स्यणाई गहाय जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं जाव अंजलिं कटु भरहं रायं जएणं विजएणं वद्धावेइ वद्धावित्ता, अग्गाइं वराइं रयणाई उवणेइ । तए णं से भरहे राया सुसेणस्स सेणावइस्स अग्गाइं वराई रय गाई पडिच्छई पडिच्छित्ता सुसेणं सेणावई सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारित्ता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ । तए णं से सुसेणे सेणीवई भरहस्स रण्णो सेसंपि तहेव जाव विहरइ, तए णं से भरहे राया अण्णया कयाइ सुसेणं सेणोवइरयणं सदावेई सदावित्ता एवं वयासी गच्छण्णं भो देवाणुप्पिया! खंडगप्पवायगुहाए उत्तरिल्लस्स दुवारस्स कवाडे विहोडेइ विहाडित्ता जहा तिमिसगुहाए तहा भाणियव् जाव पियं मे भवउ, सेसं तहेव जाव भरहो उत्तरिल्लेणं दुवारेणं अईइ, ससिव मेहंधयारनिवहं तहेव पविसंतो मंडलाइं आलिहइ, तीसेणं खड्गप्पवायगुहाए बहुमज्झदेसभाए जाव उम्मग्गणिमग्गजलोओ णामं दुवे महाणईओ तहेव नवरं पच्चत्थिमिल्लाओ कडगाओ पबूढाओ समाणोओ पुरथिमेणं गंगं महाणई समप्पेंति सेसं तहेवे णवरि पच्चथिमिल्लेण कूलेणं गंगाए संकमवत्तव्वया तहेव त्ति, तएणं खडगप्पवायगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा सयमेव महया महया कोंचावं करेमाणा करेमाणा सरसर स्सगाई ठाणाई पच्चोसक्कि Page #850 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे स्था, तएणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे जाव खंडप्पवाय गुहाओ देविखणिल्लेणं दारेणं णीणेइ ससिब्ब मेहंधयारनिवहाओ ॥सू०२६॥ छाया-ततः खलु तद्दिव्य चक्ररत्नं गङ्गाया देव्याः अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालातःप्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यावद् गङ्गायाःमहानद्या पश्चिमे कले दक्षिणदिशि खण्डप्रपातगृहाभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत्, ततः खलु स भरतो राजा यावत् यत्रैव खण्डप्रपातगुहा तत्रैव उरागच्छति उपागत्य सर्वा कृतमालवक्तव्यता नेतव्या नवरं नाट्यमालको नृत्तमालको वा देवः प्रीतिदान तस्य अलाङ्कारिकभाण्डं कटकानि च शेषं सर्व तथैव यावत् अष्टाहिका महामहिमा । ततः खलु स भरतो राजा नाट्यमालकस्य नृत्तमालकस्य वा देवस्य अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्यां सुषेणं सेनापति शब्दयति शब्दयित्वा यावत् सिन्धुगमो नेतव्यः, यावद् गङ्गायाः महानद्याः पौरस्त्यं निष्कुट सगङ्गासागरगिरिमर्यादं समविषमनिष्कुटानि च ओअवेति साधयति साधयित्वा अग्र्याणि पराणि रत्नानि प्रतीच्छति प्रतीष्य, यत्रैव गङ्गामहानदी तत्रैव उपागच्छति उपागत्य द्वितीय मपि सस्कन्धावारबलः गङ्गामहानदी विमलजलतुङ्गवीचि नौभूतेन चर्मरत्नेन उत्तरति, उत्तीर्य यत्रैव भरतस्य राज्ञो विजयस्कन्धावारनिवेशो यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला तत्रैव उपागच्छति उपागत्य अत्र्याणि वणि रत्नानि गृहीत्वा यत्रैव भरतो राजा तत्रैव उपागच्छति उपागत्य करतलपरिगृहीतं यावदञ्जलिं कृत्वा भरतं राजानं जयेन विजयेन वर्द्धयति चयित्वा अग्र्याणि वराणि रत्नानि उपनयति, ततः खल स भरतो राजा सुषेणस्य सेनापतेः अत्र्याणी वराणि रत्नानि प्रतीच्छति प्रतीष्य सुषेणं सेनापति सत्कारयति सन्मानयति सत्कार्य सन्मान्य प्रतिविसर्जयति, ततः खलु स सुषेणः सेनापतिः भरतस्य राज्ञः शेषमपि तथैव यावत् विहरति, ततः खलु स भरतो राजा अन्यदा कदाचित् सुषेणं सेनापतिरत्नं शब्दयति शब्दयित्वा एवम् अवादीत् गच्छ खलु भो देबानुप्रियः खण्डप्रपातगुहायाः औत्तराहस्य द्वारस्य कपाटौं विघाटय विघाट्य यथा तमिस्त्रगुहायाः तथा भणितव्यं यावत् प्रियं भवतां भवतु शेषं तथैव यावत भरतः ओत्तराहेण द्वारेण गच्छति, शशीव मेघान्धकारनिवहम् तथैव प्रविशन् मण्डलानि आलिखति तस्याः खलु खण्डप्रपातगुहाया बहुमध्यदेशभागे गाजत जननिमग्नजले नाम्म्यो द्वे महानद्यो तथेव नवर पाश्चात्यात कटकात प्रव्यद, पौरस्त्येन गङ्गां महानदी समाप्नुतः, शेषं तथैव नवरं पाश्चात्येन कूलेन गङ्गायाः संक्रमवक्तव्यता तथैव इति ततः खलु खण्डप्रपातगुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ स्वयमेव महता महतो कौवारवं कुर्वाणौ 'सरसरस्ल' अनुकरणशब्दं कुर्वाणौ स्वके स्थाने प्रत्यवाष्वविकषाताम्, ततः खलु स भरतो राजा चक्ररत्नदेशितमार्गों यावत् खण्डप्रपातगुहातो दाक्षि जात्येन द्वारेण निरेति शशीव मेघान्धकारनिवहात् सू २६॥ टीका "तएणं से दिव्वे" इत्यादि । 'तएणं से दिव्वे चक्करयणे गंगाए देवीए अट्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउहघरसालाओ पडिणिक्खमई' ततः खलु गङ्गादेवी साधनानन्तरं खलु तदिव्यं Page #851 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४०३ वक्षस्कारःसू. २६ भरतराशः दिग्यात्रावर्णनम् चक्ररत्नं गङ्गायाः तन्नाम्न्याः देव्याः अष्टाहिकायां महामहिमायाम् उत्सवरूपायां महान् महिमा अस्ति यस्यां सा तथा तस्यां निवृत्तायां सत्याम् आयुधगृहशालात:शस्त्रागारभवनतः प्रतिनिष्क्रामति चक्ररत्नं निगच्छति 'पडिणिक वमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'जाव गंगार महाणईए पच्चत्यिमिल्छेणं कूलेगं दाहिणदिसि खंडप्पवायगुहाभिमुहे पयाए यावि होत्था' यावत् गङ्गायाः मेहानद्याः पाश्चात्ये पश्चिमे कूले दक्षिणदिशि खण्डप्रपातगुहाभिमुखं प्रयातं प्रस्थातुं चाप्यभवत् आसीत् अत्र यावत् अन्तरिक्षप्रतिपन्न यक्षसहस्त्रसंपरिवृतं दिव्यत्रुटितवाद्यविशेषशब्दसन्निनादेन आपूरयदिव अम्बरतलं चक्ररत्नमिति ग्राह्यम् 'तएणं से भरहे राया जाव जेणेव खंडप्पवायगुहा तेणेव उवागच्छइ' ततः खलु स भरतो नाम महाराजा यावत्. अत्र यावत्पदात् चक्ररत्नं पश्यति दृष्ट्वा हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः, नन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमनस्यितः हर्षवश विसर्पद् हृदय इति, द्वादशसूत्रे अस्मिन्नेव तृत्तीयवक्षस्कारे इयं वक्तव्यता द्रष्टव्या सर्व तावद् वाच्यम् 'तएणं से दिवे चक्करयणे गंगाए देवोए अढाहियाए " इत्यादि. २६॥ टोकार्थ- 'तएणं से दिव्वे चक्कर यणे गंगा र देवोए अट्ठाहियाए महामहिमाए निवत्ताए समाणोए) जब गंगा देवी के विजयोपलक्ष्य में किया गया आठ दिन का महोत्सव समाप्त हो चुका तब वह दिव्य चक्ररत्न 'आ उहघरमाल ओ' आयुधगृह शाला से (पडिणिक्खमइ) निकला और (पडिणिक्खमित्ता जाव गंगाए माणईए पञ्चस्थिमित्रेणं कूलेणं दाहिणदिर खंडपवायगुहाभिमुहे पयाए यावि होत्था) मिलकर वह यावत् गंगा महानदोके पश्चिम कूल से होता हुआ दक्षिण दिशा में खंडप्रपात गुहा की तरफ चलने लगा यहां यावत् शब्द से अन्तरिक्ष प्रतिपन्न यक्ष सहस्त्र परिवृत आदिपाठ गृहीत हुआ है. (तएणं से भरहे राया जाव जेणेव खंडप्पवायगुहा तेणेव उवागच्छइ) जबभरत महाराजा ने चक्ररत्न को खंडप्रपात गुहा की ओर जाते देखा तो यावत् वह भी जहां खण्डप्रपात नाम की गुफा थी. उसो ओर पहुंचा. यहां यावत्पाठ से "पश्यति दृष्ट्वा हृष्ट तुष्ट चित्तानंदितःप्रीतिमनाः परम सौमनस्थितः हर्षवशविसर्पद् हृदयः " यह पाठ तृतीय वक्षस्कार में 'तपणं से दिवे चक्करयणे गंगाए देवोए अट्ठाहियाए ?' इत्यादि-सूत्र, २६।। टोकार्थ-(तएणं से दिवे चक्करयणे गंगाए देवीए अट्ठाहियाप महामहिमाए निवत्ताप समाणीए) न्यारे वीना विभय५७क्ष्यमा माnिd 413 (१४ न। भोत्सव सभास थ याये। त्यारे ते हिय ४२त्न 'आउहघरसालाओ' आयुध३२॥णा भांथा (पडिणि. डा२ . नान्यु. सन (पोडणिक्खोमत्ता जाव गंगा महाणईए पच्चस्थिमिल्लेण कूलेणं दाहिणदिसि खड़प्पवाय गुहाभिमुखे पयाए यावि होत्था) नागीन ते यावत् ॥ મહાનદીના પશ્ચિમ કૂલ પર થઈ ને દક્ષિણ દિશામાં ખંડ પ્રપાત ગુહા તરફ ચાલવા લાગ્યું. અહીં યાવત્ શબ્દથી અન્તરિક્ષ પ્રતિપન યક્ષ સહસ્ત્ર પરિવૃત વગેરે પાઠ ગૃહીત થયેલ છે. (तपणं से भरहे राया जाव जेणेव खंडप्पायगुहा तेणेव उवागच्छद) च्यारे भरत शन्तब्य ચક્રરત્નને ખંડ પ્રપાત ગુહા તરફ જતું જોયું તો તે પણ જ્યાં ખંડ પ્રપાત નામક ગુફા હતી तत२३ ५ . मी यावत् पा8थी “पश्यति दृष्ट्वा हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः प्रोतिमनाः परमसौमनस्थितः हर्षवशविसर्पदहादयः" से 6 तृतीय पक्षमा म वामां -- Page #852 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८३८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे यावत् खण्डप्रपातगुहाया मागच्छतीति पिण्डार्थः, ततः यत्रैव खण्डप्रपातगुहा तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'सव्वा कयमालकवत्तव्यया णेयव्या' सर्वा कृतमालवक्तव्यता तमिस्त्रागुहाधिपसुरवक्तव्यता नेतव्या ज्ञातव्या 'णवरं णमालगे देवे पीइदाणं सेआलंकारियभंड कडगाणि य सेसं सव्यं तहेव जाव अढाहियमहामहिमा' नवरम् अयं विशेषः नाटयमाल को देवः प्रीतिदानं 'से' तस्य अलंकारिकभाण्डम् आभरणभ्रतभाजनम्, कटकानि च शेषम् उक्तविशेषातिरिक्तं सर्वम् तथैव पूर्ववदेव सत्कारसन्मानादिकं कृतमालदेवतावद् वक्तव्यम् याउदष्टाहिका महामहिमेति 'तएणं से भरहे राया गट्ठमालगस देवस्स अट्टाहियाए महिमाए णिवत्ताए समाणोए सुसेणं सेणावई सद्दावेइ' ततः खलु स भरतो राजा नाट्यमालकस्य देवस्य अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृतायां परिपूर्गागं सत्यां सुषेणं सेनापति शब्दयति आह्वयति 'सदावित्ता' शब्दजैसा कहा गया है वैसा ही यहां पर संगृहीत हुआ है (उवागच्छित्ता सवा कयमालगवतव्वया णेयवा णवरि णहमालगे देवे पीइदाणं से आलंकारियभंड कडगाणि य सेसं सव्वं तहेव अद्वाहिया महा महिमा)वहां पहुंचकर उसने जो कार्य वहां पर किया वह कृतमालक देव की वक्तव्यता में जैसा कहा गया है वैसा ही यहांपर जानना चाहिये. कृतमालक देव तमिस्त्रा गुहा का अधिपति देव है. उस वक्तव्यता में और इस वकव्यता में यदि कोई अन्तर है. तो वह ऐसा है कि नाटयमालक देवने भरतके लिये प्रोतिदान में आभरणों से भरा हुआ भाजन और कटकदिये इससे अतिरिक्त और सब अवशिष्ट कथन सत्कारसन्मान आदि करने का कृतमालक देव की तरह से ही आठदिन तक महामहोत्सव करने तक का है. (तएणं से भरहेराया णट्टमालगस्स देवस्स अट्टाहिआए महिमाए णिवत्ताए समाणीए सुसेणं सेणावई सद्दावेइ) जच नाट्य मालक देव के विजयोपलक्ष्य में कृत आठ दिन का महोत्सव समाप्त हो चुका तव भरत महाराजा ने अपने सुषेण सेनापति को बुलाया (सदा वित्ता जाव सिंधुगमो गेयव्यो' बुचकर उसने जो उससे कहा वह सब सिंधुनदी के प्रकरण मावत प्रमाण पत्र ५५५ सगडीत यये. छ. (उवागच्छित्ता सव्वा कयमालगवतव्यया णेयधा णवरि णमालगे देवे पीइदाणं से अलंकारियभंड़ क.डगाणिय सेसं सव्वं तहेष अट्टाहिया महामहिमा) त्यां पडांयी ने तो २ यो त्यो या ते विषेतमा: દેવની વક્તવ્યતા માં જેમ વર્ણવવામાં આવેલ છે તેમ અહીં પણ જાણી લેવું જોઈએ. કૃતમાલક દેવ તમિસ્રા ગુહાને અધિપતિ દેવ છે. તે વતવ્યતામાં અને આ વક્તવ્યતામાં તફાવત આટલે જ છે કે નાટ્યમાલક દેવે ભરત મહારાજા માટે પ્રીતિદાનમાં આભરણે થી પ્રતિ ભાજન અને કટકો આપ્યા. એના સિવાયનું શેષ બધું કથન સત્કાર, સન્માન વગેરે કરવા અંગેનું કૃતમ લક દેવની જેમ જ આઠ દિવસ સુધી મહામહોત્સવ કરવા સુધીનું છે. (तपणं से भरहे राया णट्ठमालगस्स देवस्स अट्ठाहिआए महिमाप णिवत्ताए समाणीप सुसेणं सेणावई सहावेइ परेनदय भावना विये.५सयमा आयोजित 18 हिवस सुधान। મહોત્સવ સે પૂર્ણ થઈ ચૂક્યો ત્યારે ભરત રાજાએ પોતાના સુષેણ નામક સેનાપતિ ને બેલા व्यो. (सहावित्ता जाव सिंधुगमो णेवो) मालवी ने तेथे सेनापति कछुत Page #853 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कार: सू० २६ भरतराशः दिग्यात्रावर्णनम् ८३९ fear भय 'जाव सिंधुगमो णेपव्त्रों' यावत् परिपूर्णः सिन्धुगमः नेतव्यः ज्ञातव्यः 'एवं वयासी गच्छाणिं भो देवाणुविया | सिंधुए' इत्यादिकः सिन्धुनदी निष्कुट - साधनपाठो गङ्गाभिलापेन नेतव्यः ग्रहीतव्यः अस्मिन्नेव वक्षस्कारे त्रयोदशसूत्रे सिन्धु नदी निष्कुटसाघनपाठो द्रष्टव्यः 'जाव गंगाए महाणईए पुरत्थिमिल्लं णिक्खुड सगंगासागरगिरिमेरागं समविसमणिक्खुडाणि य ओअवेइ' यावत् गङ्गाया महानद्याः पौरस्त्यं पूर्वदिग्वर्त्ति निष्कुटं कोणस्थित भरत क्षेत्रखण्डरूपम् इदं च कैर्विभाजकैः विभक्तमित्याह सगंगासागर रिमर्यादम्, तत्र पश्चिमतः गङ्गाः पूर्वतः सागरः दक्षिणतः गिरिः वैताढ्य गिरिः उत्तरतश्च क्षुद्रमिवद् गिरिः एतैः कृता या मर्यादा विभागरूपाः तया सह वर्तते यत्तत्तथा, एतैः कृतविभागमित्यर्थः 'समविसमणिक्खुडाणि य' समविषमनिष्कुटानि च तत्र समानि च समभूमिभागवर्त्तीनि विषमाणि च दुर्गभूमिभागवतनि यानि निष्कुटानि अवान्तरक्षेत्र खण्डरूपाणि तानि तथा 'ओअवेहि' साधय तत्र प्रयाणं कृत्वा विजयं कुरू 'ओअवेत्ता' साधित्वा विजित्य 'अग्गाणि वराणि रयणाणि पडिच्छेहि' अाणि अग्रेगण्याणि वराणि श्रेष्ठानि रत्नानि स्वस्वजातौ उत्कृष्टवस्तूनि प्रतीच्छ गृहाण 'तरणं से सेणावई जेणेव गंगामहाणई तेणेव उवागच्छइ' ततः खलु स सेनापतिः सुषेण नामकः यत्रैव गङ्गा महानदी तत्रैव उपागच्छति उवागच्छित्ता' उपागत्य 'दोच्चंपि सकखधामें जैसा कहा गया है. वैसा ही जानना चाहिये. परन्तु यहां वह प्रकरण सिन्धु नदी के स्थान में गङ्गा शब्द को जोड़कर कहा जावेगा जैसे "गच्छाहि णं भी देवाणुनिया !" हे देवानुप्रिय ! सुषेण ! तुम जाओ और गंगामहानदी के 'पुरथिमिल्लं णिक्खुड सगंगासाग' गिरिमेराग समन् विसमणिक्खुडाणि य ओअवेहि " । पूर्वदिग्वर्ती निष्कुट - भरत क्षेत्र को जो कि पश्चिम में गङ्गासे पूर्व में समुद्र से दक्षिण में वैताव्यगिरि से और उत्तर में क्षुद्र हिमवत्पर्वत से विभक्त हुआ है. उसे साधो और उसके सम विषमरूप जो अवान्तर क्षेत्र खंड है. उन्हें साधो अपने वश में करों और उन्हें वश में करके वहां से प्राप्त अपनी अपनी जाति मे उत्कृष्ट वस्तुओं को प्रीतिदान में प्राप्त करो. (तए णं से सेणावई जेणेव गंगा महाणई तेणेव उवागच्छई) इस तरह से भरत राजा द्वारा कहा गया वह सुषेण सेनापति जहां गंगा महानदी थी वहां पर गया. ( उवा બધું બંધુ નદીના પ્રકરણમાં જેમ કહેવામાં આવ્યુ છે તેવું જ અત્રે પણ સમજવું પણ गड्डी सिन्धु नहीना स्थाने गंगा शब्द लेडवे पडशे. प्रेम है- “गच्छाहि णं भो देवाणुपिया !" हे हेवानुप्रिय ! सुषेषु तभे लगे। भने गंगा महानहीना (पुत्थिमिल्लं णिकखुड़े संगंगासागर गिरिमेगं समविसमणिक्खुडाणिय ओअवेहि) हिवती निष्ठुट - भरत क्षेत्रने જે પશ્ચિમમાં ગંગામહાનદીથી પૂર્વ માં સમુદ્રથી, દક્ષિણમાં દ્વૈત દ્વેષ ગિરિથી અને ઉત્તરમાં ક્ષુદ્ર હિમવત્ તથી વિકૃત થયેલ છે. તેને સાધા અને તેના સમ-વિષમ રૂપ જે અવાન્તર ક્ષેત્રખંડ છે, તેમને સાધા, પાતાના વશમાં કરા અને તેમને વશમાં કરીને ત્યાંથી પ્રાપ્ત પાતपोतानी लतियां उत्कृष्ट होय तेवी वस्तुम्पने प्रीतिद्वानां प्राप्त १२ । (तरण से सेणावई जेणेव गंगा महाणईते णेव उवागच्छई) मा प्रभाये भरत रान वडे भाज्ञ थये। ते सुषेय Page #854 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८४० जम्बूद्धीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वारबले गंगामहाणई विमलजलतुंगवीई णावाभूएणं चम्मरयणेणं उत्तरइ सस्कन्धावारबलः स्कन्धावारसैन्यसहितः सेनापतिः सुषेणः सेनापतिः द्वितीयमपि गङ्गायाः महानद्याः विमलजलतुङ्गवीचिम् निर्मलोदकोस्थितकल्लोलम् अतिक्रम्य नौभूतेन चर्मरत्नेन उत्तरति पारं गच्छति 'उत्तरित्ता' उत्तीर्य पारं गत्वा 'जेणेव भरहस्स रणो विजयखंधावारणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छई' यत्रैव भरतस्य राज्ञो विजयस्कन्धावारनिवेशः यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला तत्रैव उपागच्छति ‘उवागच्छित्ता' उपागत्य 'आभिसेक्काओ हत्थिरयणाभो पच्चोरुहइ' आभिषेक्यात् अभिषेकयोग्यात प्रधाना हस्तिरत्नात् प्रत्यवरोहति अधस्तात् अवतरति 'पच्चोरुहिता' प्रत्यवरुह्य 'अग्गाइं वराई रयणाई गहाय जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छई' अग्र्याणि वराणि श्रेष्ठानि रत्नानि गृहीत्वा यत्रैव भरतो राजा तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'करयलपरिग्गहियं जाव अंजलिं कटु भरहं रायं जएणं विजएणं वद्धावेइ' करतलपरिगृहीतं यावत्पदात् दशनखं शिरसावर्त मस्तके अजलिं कृत्वा भरतं राजानं जयेन विजयेन जयगच्छित्ता दोच्चंपि सक्खंधावारबले गंगा महाणई विमल जलतुंगवीई णावा भूएणं चम्मरयणेणं उत्तरइ) वहां जाकर उसने अपने स्कन्धावाररूप बलसहित होकर जिसमें विमल जल की बड़ी २ लहरे उठ रही है. ऐसी उस गंगामहानदी को नौका भून हुए चर्मरत्न के द्वारा पारकिया (उत्तरित्ता नेणेव भरहस्स रण्णो विजयखंधावार णिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छद) पार करके फिर वह जहां पर भरत महाराजा का विजयस्कन्धावार का पडाव था. और जहां पर बाह्य उपस्थानशाला थो वहां पर आया (उवागच्छित्ता अभिसेक्काओ हत्थिरयणाओ पच्चोरुहइ) वहां आकर वह अभिषेक्य-आभिषेक योग्य-प्रधान-हस्तिरत्न से नीचे. उतरा (पच्चोरुहित्ता अग्गाई वराई रयणाणि गहाय जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छइ) नीचे उतर कर वह श्रेष्ठ रत्नों को लेकर जहां भरत राजा थे वहां पर आया. (उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं जाव अंजलिंकट्टु भन्हं रायं जएणं विजएणं वद्धावेइ) वहां आकर के उसने दोनों हाथों को जोड़कर और सेनापति यi ॥ महानही ली त्यां गये. (उवागच्छित्ता दोच्चपि सक्खंधावारबले गंगा महाणई विमलजलतुंगवोइ णावाभूएणं चम्मरयणेण उत्तरइ) त्या न तेणे याताना કંધાવાર રૂપ બલસહિત સુ સજજ થઈને–જેમાં વિમલ જળની વિશાળ તરંગો લહેરાઈ २ही छ मेवी ते 10 महानहीने नीभूत थये। ते यमरत्न डे पार ४२री. ( उत्तरित्ता जेणेव भरहस्स रणो विजयखंधावारणिवेसे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवाTest) પાર કરીને પછી તે જ્યાં ભરત રાજાનો વિજય અંધાવા૨–પડાવ-હતા અને જ્યાં माघ ५यान शाणा की त्यां मय.. (उबागच्छित्ता अभिसेक्काओ हत्थिरयणाओ पच्चो દ) ત્યાં આવીને તે આભિય-અભિષેક યોગ્ય-પ્રધાન હસ્તિરત્ન ઉપરથી નીચે ઉતર્યા. (पच्चोरुहिता अग्गाई वराइं रयणाणि गहाय जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छइ) नीय तरी ते श्रेष्ठ २त्नाने नयां भरत महारा ता त्या माव्या. (उवागच्छित्ता कर. यलपरिग्गदियं जाब अंजलि कटूटु भरहं रायं जपणं विजएणं वद्धावेइ) त्या गावी ते Page #855 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सु० २६ भरतराशः दिग्यात्रावर्णनम् ८४१ विजयशब्दाभ्यां वर्द्धयति 'पद्धावित्ता' वर्द्धयित्वा स सेनापतिः 'अग्गाइं वराइं रयणाई उवणेई' अग्र्याणि बराणि रत्नानि उपनयति अर्पयति राज्ञः समीपम् आनयति इत्यर्थः 'तए णं से भरहे राया सुसेणस्स सेणावइस्स अग्गाई वराई रयणाई पडिच्छई' ततः आनयनानन्तरं खलु स भरतो राजा सुषेणस्य सेनापतेः अग्र्याणि वराणि रत्नानि प्रतीच्छति गृह्णाति 'पडिच्छित्ता'प्रतीष्य गृहीत्वा 'सुसेणं सेणावई सक्कारेइ सम्माणे सक्कारिता सम्माणेित्ता पडिविसज्जेइ' स भरतो राजा सुषेणं सेनापति सत्कारयति वस्त्रालङ्कागदि पुरस्कारैः सन्मानयति मधुरवचनादिभिः, सत्कार्य सन्मान्य च प्रतिविसर्जयति निजनिवासस्थान प्रतिगन्तुमाज्ञापयतीत्यर्थः 'तएणं से सुसेणे सेणावई भरहस्स रण्णो से संपि तहे व जाव विहरइ' ततः खलु भरतस्य राज्ञः सेनापतिः स सुषेणः शेषमपि अवशिष्टमपि तथैव पूर्वोक्त सिन्धुनिष्कुटसाधनवदेव यावत् स्नातः, कृतवलिकर्मा, कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्त इत्यारभ्य यावत्प्रासादवरं प्राप्तः सन् इष्टान् इच्छाविषयीकृतान् शब्दस्पर्शरसरूपगन्धान् पञ्चविधान मानुष्यकान् मनुष्यसम्बन्धिनः कामभोगान् तत्र शब्दरूपे कामौ स्पर्शरसगन्धाः भोगाः उन्हें अंजलि के रूपमें कर भरतमहाराजा को जय विजय शब्दों से वधाई दी (बद्धावित्ता अग्गाई वराई रयणाई उवणेइ) वधाई देकर फिर उसने श्रेष्ठ रत्नों को उसके लिये अर्पित किया-राना के पास उन्हें रक्स्वा (तएणं से भरहे राया सुसेणस्स सेणावइस्स अग्गाईवराइ रयणाई पडिच्छइ) भरतनरेश ने उस सुषेण सेनापति के उन प्रदत्त श्रेष्ठ रत्नों को स्वीकार करलिया. (पडिच्छित्ता सुसेणं सेणावई सकारेइ सम्माणेइ) स्वीकार करके फिर उसने सुषेण सेनापति का सत्कार और सन्मान किया-(सक्कारित्ता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) सत्कार सन्मान कर फिर भरत नरेश ने उसे विसर्जित कर दिया. (तएणं से सुसेणे सेणावई भरहस्स रण्णो से संपि तहेव जाव विहरइ) इसके वाद भरत नरेश के पास से आकर वह उस सुषेण सेनापति ने स्नान किया बलि कर्म किया कौतुकमंगल प्रायश्चित किये यावत् वह अपने श्रेष्ठ प्रासाद में पहुंचकर. इच्छानुसार शब्द, स्पर्श, रस रूप और गंध विषयक पांच प्रकार के कामभोगों को भोगने लगा. शब्द रूप બને હાથો ને જોડી ને અને તેમને અંજલિ રૂ૫માં બનાવીને ભરત મહારાજાને જય-વિજય शन्। पडे धामी मापी. (बद्धावित्ता अग्गाई वराई रयणाई उवणेइ) वधामा मापीने पछी तणे त भरत महान 08 २ मति -२१Mनी सा श्रे० २त्नां भूया. (तपणं से भरहे राया सुसेणस्स सेणावइस्स अग्गाई वराई रयणाई पडिच्छइ) १२ नरेश सुबे नापति महत्तानाना स्वी२ या. (पडिच्छित्ता सुसेणं सेणावई सक्कारेइ सम्मान स्वी॥२ ४१२ ५७) तणे सुषेय सेनापतिन। सा२ च्या माने सन्मान यु (सक्कारित्ता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) स२ भने सन्मान शन पछी १२त नरेशेते सुषेषु सेनापति ने माहधू विसति या. (तपणं से सुसेणे सेणावई भरहस्स रण्णो सेपि तहेव नाव विहरइ) त्यारोह मत नरेश पासेथी पाताना मावास-स्थान 64२ मावी सुषेय सनाપતિએ કનાન કર્યું, મલિક કર્યું, કૌતુક મંગળ, પ્રાયશ્ચિત્ત કર્યા. યાવતુ તે પોતાના શ્રેષ્ઠ પ્રાસાદમાં પહોંચીને ઈચ્છાનુસાર શબ્દ, સ્પર્શ, રસ રૂપ અને ગંધ વિષયક પાંચ પ્રકારના Page #856 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८४२ जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्रे इति तान् भुजान्: अनुभवन् विहरति तिष्ठति 'तएणं से भरहे राया अण्णेया कयाइ सुसेणं सेनावइरयगं सद्द वेई' ततः गङ्गानिष्कुट साधनानन्तरं खलु स भरतो राजा सुषेणं सेनापतिरत्नं शब्दयति आह्वयति 'सद्दावित्ता' शब्दयित्वा आहूय एवं वयासी' एवं -वक्ष्यमाणप्रकारेण अपादीत् उक्तवान् किमवादीत् इत्याह-'गच्छ णं भो देवाणुप्पिया ! खंडगप्पवायगुहाए उत्तरिल्लस्स दुवारस्स कवाडे विहाडेइ ? गच्छ खलु देवानुप्रिय ! खण्डप्रपातगुहायाः औत्तराहस्य द्वारस्य कपाटौ विघाटय उद्घाटय 'विहाडित्ता' विघाटय उद्घाटय 'जहा तिमिसगुहाए तहा भाणियव्वं जाव पियं मे भवउ' यथा तमिस्रागुहायाः तथा महतिविशालाया खण्डप्रपातगुहाया अपि भणितव्यं तावत्पर्यन्तं यावत् प्रियं भवतां भवतु तमिस्रागुहाविषयः अस्मिन्नेव वक्षस्कारे चतुर्दशसूत्रे विलोकनीयम् ‘सेसं तहेव जाव भरहो उत्तरिल्लेणं दुवारेणं अईइ ससिय मेहंधयारनिवहं' शेषम् अवशिष्टं तथैव पूर्ववदेव तावत् भणितव्यम् यावत् मेघान्धकारनिवहं-मेघान्धकारसमूहं शशीव चन्द्रइव स भरतः औत्तराहेण द्वारेण तमिस्त्रागुहाम् अत्येति प्रविशति 'तहेव पविसंतो मंडलाई ये काम माने गये हैं और स्पर्श रस गन्ध ये भोग माने गये हैं। (तएणं से भरहे राया अण्णया कयाई सुसेणं सेणावइरयणं सदावेइ) गंगा के निष्कुटों के साधने के बाद किसी एक समय भरत राजाने सुषेण सेनापति रत्न को बुलाया (सदावित्सा एवं वयासी) बुलाकर उससे ऐसा कहा(गच्छण भो देवाणुप्पिया खंडपवायगुहाए उत्तरिल्लस्म दुवारस्त कवाडे विहाडेइ) हे देवानुप्रिय तुम जाओ और खण्डप्रपात गुहा के उत्तर दिग्वर्ती द्वार के किवाड़ो को खोलो. (जहा तिमिस गुहाए तहा भाणियव्वजाव पियं मे भवउ) यहां जैसा कथन तमिस्त्रागुहा के सम्बन्ध में कहा जा चुका हैं वैसा ही कथन खण्डप्रपात गुहाके सम्बन्ध में भी आपका कल्याण हो यहां तक के पाठ का कर लेना चाहिये, तमिस्त्रागुहा के सम्बन्ध में कथन इपी वक्षस्कार के १४ वे सूत्र में किया गया है. सो वहां से यह विषय जाना जा सकता है (सेसं तहेव जाव भरहो उत्तरिल्लेणं दुवारेणं अईइ ससिच मेहंधयारनिवहं) इससे आगे का कथन पूर्वोक्त जैसा है यावत् जिस प्रकार चन्द्र मेघवत अन्धकार में प्रवेश करता है उसी प्रकार उस भरत ने उत्तर द्वार से કામ ભેગે ભેગવવા લાગ્યો. શબ્દ અને રૂપ એ કામો માનવામાં આવ્યા છે. અને સ્પર્શ, २स, अन्य थे लोग मानवामा माया छ (तएणं से भरहे राया अण्णया कयाई सुसेणं सेणावहरयणं सदावेह) गाना निमुटने त्या पछी त मायेसुषेय सेनापति व्या.(सदावित्ता एवं वयासो) मलावीन तन या प्रमाणे बु-गच्छ गं भी देवाणुपिया ! खंडप्पवायगुहाए उत्तरिल्लस्स दुवारस्ल कवाडे विहाडेइ) वानुप्रिय ! तमे त्राथीनतम अने मात गुडाना उत्तपती दाना भा. वा. (जहा तिमिस गुहाए तहो भाणियब्वं जाव पियं मे भवउ) २ ४थन तमिसा गुना समय मा वामां આવ્યું છે, તેવું જ કથન અત્રે ખંડપ્રપાત ગુફાના સંબંધમાં પણ તમારું કલ્યાણ થાઓ અહીં સુધી સમજી લેવું જોઈએ. તમિસ્રા ગુફાના સંબંધમાં કથન આજ વક્ષસ્કારના ૧૪ મા सूत्रमा ४२वाभा मावस छे. तो त्याथी म विषय meeी शय तम छ. (सेसं तहेव जाव भाहो उत्तरिल्लेणं दुवारेणं अईइ ससिव्व मेहंधयारनिवहं) माना ५छानु थन पूर्वरित रेवु Page #857 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० २६ भरतराशः दिग्यात्रावर्णनम् आलिहइ' तथैव भरतस्य राज्ञः तमिस्रागुहाप्रवेशानुसारेणैव स सुषेण : सेनापतिः खण्डप्रपातगुहां प्रविशन् मण्डलानि एकोनपश्चाशत् संख्याकानि आलिखति, अत्र गुहाकपाटोद्घाटनाज्ञापनादिकम् एकोनपञ्चाशन्मण्डलालेखनान्तं सर्व तमिस्रागुहायामिव विज्ञेयम् अत्र विशेषमाह-'तीसेणं इत्यादि । 'तीसे गं खंडगप्पवायगुहाए बहुमज्झदेसभाए जाव उम्मग्गणिमग्गजलाओ णामं दुवे महाणईओ तहेव णवरं पच्चथिमिल्लाओ कडगाओ पवूढाओ समाणीओ पुरस्थिमेणं गंग महाणइं समति' तस्याः खण्डप्रपातगुहायाः बहुमध्यदेशभागे यावत्पदात् 'एत्थ णं' इति पदमात्रमवसेयम् उन्मग्ननिमग्नजले नाम्नी द्वे महानद्यौ स्तः तथैव तमिनागुहागतोन्मग्नानिमग्ना नदीगमेन ज्ञातव्ये अस्मिन्नेव तृतीयवक्षस्कारे षोडशसूत्रे द्रष्टव्यम् नवरम् अयं विशेषः खण्डप्रपातगुहायाः पाश्चात्यात् पश्चिमभागकटकात् द्वे अपि उक्तउन्मग्ननिमग्नजलेनाम्नो महानद्यौ प्रव्यूढेनिर्गते सत्यो पौरस्त्येन-पूर्वेण गङ्गामहानदों समाप्नुतः प्राप्नुतःप्रविशतः 'सेसं तहेव गवरं पच्चथिमिल्लेणं तमिस्रागुहा में प्रवेश किया (तहेव पविसंतो मडलाई आलिहइ)भरत महाराजाके खण्ड प्रपात गुहा में प्रवेश के अनुसार ही सुपेण सेनापति ने वहां पविष्ट होकर ४९ मंडल लिखे यहां गुहा के कपाटो को खोलने से लेकर ४९ मंडलों के लिखने तक का जितना वर्णन हैं वह सब जैसा तमिनागुहा के प्रकरण में किया गया ई-वैसे ही है (तीसे णं खडप्पवाय गुहाए बहुमज्झदेसभाए जाव उम्मग्गणिमग्गजलाओ णाम दुवे महाणईओ तहेव गवरं पच्चस्थिमिल्लाओ कडगाओ पवूढाओ समाणोओ पुरस्थिमेणं गंग महाणई समति) उस खण्डप्रपात गुहा के बहुमध्यदेशभागमें यावत्-आगत -ठोक इसीस्थान पर-उन्माना और निमग्ना नाम की दो महानदियाँ बहती है इनका स्वरूप तमिस्त्रागुहा की इसी नाम की नदियों के जैसा है १६ वें सूत्र में इसो वक्षस्कार के वर्णन में यह कथन किया गया है परन्तु जो उस-वर्णन से इस वर्णन में विशेषता है वह इस प्रकार से है स्खण्डप्रपातगुहा के पश्चिमभाग में जो कटक है उस कटक से ये दोनों महानदियां निकली है और पूर्व दिशा की ओर से ये गङ्गा नाम की महानदी में मिली है । (सेसं तहेव णवरं पच्चજ છે. યાવત્ જેમ ચન્દ્ર મેઘાવૃત્ત અંધકારમાં પ્રવેશે છે તેમજ તે ભરત મહારાજાએ ઉત્તર हाथी भिसागुमा प्रवेश यो. (तहेव पविसंतो मंडलाई आलिहा ) भरत मनोरम ખંડ પ્રપાત ગુફામાં પ્રવેશ કર્યો તેમ જ સુષેણ સેનાપતિએ પણ ત્યાં પ્રવિષ્ટ થઈને ૪૯ મંડૂલે લખ્યા. અહીં ગુફાના કમાડ ખેલવાથી માંડીને ૪૯ મંડલે લખવા સુધી જેટલું વર્ણન छ, तभिसा शुाना प्रभा ४२वामा मा छेते. छे. (तीसेणं खंडप्पवायगुहाए वहुमज्नदेसभाए जाव उम्मग्गणिमग्गजलाओ णामं दुवे महाणइओ तहेव णवर पच्चथिमिल्लाओ कडगाओ पवूढाओ समाणोओ पुरस्थिमेण गंगं महाणई समति) म પ્રપાત ગુફાના બહુ મધ્ય દેશ ભાગમાં યાવત્-બરાબર એ જ સ્થાન પર ઉમેગ્ના અને નિમગ્ન નામક બે મહાનદીઓ વહે છે. એ નદીઓનું સ્વરૂપ તમિસ્યા ગુફાની એ જ નામની નદીએ જેવું જ છે, ૧૬ માં સૂત્રમાં આજ વક્ષસકા૨ના વર્ણનમાં એ કથન કહેવામાં આવેલ છે. પણ તે વર્ણનથી આ વર્ણનમાં જે વિશેષતા છે, તે આ પ્રમાણે છે.–ખંડપ્રપાત ગુફાના Page #858 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कूलेणं गंगाए संकमवत्तव्वया तहेव त्ति' शेषम् अवशिष्टं विस्तारायामो द्वेधान्तरादिकं तथैव पूर्वपदर्शितानुसारणव तमिस्रागतोक्त नदी द्वयप्रकारेण विज्ञेयम् नवरं विशेषस्तु गङ्गायाः पाश्चात्यकूले संक्रमवक्तव्यता-सेतूकरणाज्ञादानतद्विधानोत्तरणादिकं ज्ञेयं तथैव प्राग्वत् विज्ञेयम् इति षोडशसूत्रे अस्मिन्नेव वक्षस्कारे द्रष्टव्यम् 'तए णं खंडगप्पवायगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्प कबाडा सयमेव महया महया कोचारवं करेमाणा करेमाणा सरसरस्सगाई ठाणाई पच्चोसक्कित्था' ततः खलु खण्डप्रपातगुहायाः दाक्षिणात्यस्य द्वारस्य कपाटौ स्वयमेव सेनापति दण्डरत्नाघातमन्तरेणैव 'महया महया' इति देशेन पूर्वसूत्रस्मरणं तेन 'महया महया सद्देणं' महता महता शब्देनेति बोध्यम् क्रोञ्चारवं क्रोश्चस्य पक्षिविशेषस्येव वहुव्यापित्वात् य आरवः शब्दः तं कुर्वाणौ कुर्वन्तौ 'सरसरस्सत्ति' अनुकरणशब्दस्तेन तादृशं शब्दमनुकुचेन्तो 'सगाई सगाई' स्वके स्वके 'ठाणाई' स्थाने पच्चोसक्कित्था' प्रत्यवाष्पष्किषाताम् प्रत्यपससर्पतुः प्रत्यवसर्पितवन्तौ स्वयम् उद्घाटितवन्तौ 'तए णं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे जाव खंडगप्पवायगुहाओ दक्खि णिल्लेणं दारेणं णीणेइ ससिव्व मेहंधयारनिवहामो'ततःखलु स षड्खण्डाधिपतिर्भरतो स्थिमिल्लेण कूलेण गंगाए संकमवत्तव्वया तहेवंति ) इन दोनों नदियों के आयाम विस्तार उद्वेध अन्तर मादि का सब कथन तमिस्त्रा गुहागत उक्त नदीद्वय के जैसा हो है यहां की इन दोनों नदियों का प्रवेश गंगा के पश्चिम तट में हआ है अर्थात तमिस्रा गहा को इन दोनो नदियों का प्रवेश सिन्धु नदि से हुआ है और यहां की इन दोनों नदियों का प्रवेश गंगा नदी में हुआ है। बाकी का और सेतु आदि बनाने आदि का सब कथन पहिले जैसा किया गया है वैसा ही है । (तए णं खंडप्पवायगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा सयमेव महया महया कोचारवंकरेमाणा करेमाणा सरसरस्सगाई ठाणाई पच्चोसक्कित्था)खंडप्रपात गुहा का दक्षिण द्वार के किवाड क्रौंचपक्षी के जैसा शब्द करते हुए अपने आप सेनापति के दण्डरत्नके आघातके विना अपने २ स्थान से सरक गये (तएणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे जाव खंडगप्पપશ્ચિમ ભાગમાં જે કટક છે, તે કટકથી એ બન્ને નદીએ નીકળી છે. અને પૂર્વ દિશા તરફ थारे मन नही । नाम भानही मां भणी छे. (सेसं तहेव णवर पच्चत्थिमिल्लेण कूलेण गंगाए संकमवृत्तव्वया तहेवंति) से भन्ने नवीन मायाम-विस्तार, - અન્તર વગેરે સર્વ કથન તમિસ્રા ગુહાગત પૂત નદી દ્રય જેવું જ છે. અહીંની બને નદીઓને પ્રવેશ ગંગાના પશ્ચિમ તટમાં થયેલ છે. એટલે કે તમિસા ગુફાની એ બને નદીઓને પ્રવેશ સિન્હનદીઓમાં થયેલ છે. અને અહીંની બને નદીઓને પ્રવેશ ગંગા નદીમાં થયેલો છે. શેષ સેતુ વગેરે બનાવવા સંબંધી સર્વ કથન પહેલાં જેવું જ અો પણ સમ . (तए ण खंडप्पवोयगुहाए दाहिणिल्लस्स दुवारस्स कवाडा सयमेव महया २ कोंचारवं करेमाणा २ सरसरस्सगाइ ठाणाई पच्चासक्कित्था) प्रपात शुशना दक्षि द्वारन। मा। કોંચ-પક્ષીના શબ્દ જેવા શબ્દ કરતાં પિતાની મેળે જ સેનાપતિના દંડરત્નના પ્રહાર વિના पोताना स्थान 6५२ थी मसी गया. (तपणं से भरहे राया चक्करयणदेसियमग्गे जाव Page #859 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कार सू०२६ भरतराक्षः दिग्यात्रावर्णनम् ८४५ नाममहाराना चक्ररत्नदेशितमार्गः यावत्पदात् अनेकरानवरसहस्रानुयातमार्गः महतोत्कृष्टसिंहनादबोलकलकलरवेण प्रक्षुभितमहासमुद्ररवभूतामिव प्रप्तामिव गुहां भू गतौ इति सौत्रधातोः क्तः कुर्वाणः कुर्वाणः खण्डप्रपातगुहातो दाक्षिणात्येन द्वारेण मेघान्धकारनिवहात् मेघान्धकारसमुहात् शशीव चन्द्रहव निरेति निर्गच्छति ननु चक्रवत्तिनां तमिस्रया गुहया प्रवेशः खण्डप्रपातया गुहया निर्गमः, तत्र किं कारणम् ?, खण्डप्रपातया प्रवेशः तमिस्रया निर्गमोऽस्तु, प्रवेशनिर्गमरूपस्य कार्यस्य उभयत्र तुल्यत्वात् इति चेन्न तमिखया प्रवेशे खण्डप्रपातया निर्गमे च सृष्टिः, तया च क्रियमाणस्य तस्य प्रशस्तो. दकत्वात्, अन्यच्च खण्डप्रपातया प्रवेशे आसन्नोपस्थीयमानऋषभकूटे चतुर्दिक पर्यन्त साधनमन्तरेग नामन्यासोऽपि न स्यादिति ॥स्०२६॥ वायगुहाओ दक्विणिलेणं दारेण णोणेइ ससिच मेहंघयारनिवहाओ) इसके बाद चक्ररत्न जिसे गन्तव्यमार्ग प्रकट कर रहा है ऐसा वह भरत नरेश यावत् खण्डप्रपातगुहा से दक्षिण के द्वार से होकर अंधकार समूह से चन्द्र की तरह निकला यहां यावत्पाठ से "अनेकराजवर सहस्त्रानुयातमार्गः" इत्यादि विशेषणों द्वारा “महासमुद्रवभूतमिव” इस विशेषण तक वर्णन जैसा पीछे तमिस्रागुहा के प्रकरण में किया गया है-वैसा ही वह सव वर्णन यहां पर भी कर लेना चाहिये ऐसा सूचित किया गया है । वहां ऐसी आशंका होती है कि चक्रवर्तियों का जो तमिस्रागुहा से प्रवेश और खण्डप्रपात गुहा से निर्गम होता है इसका क्या कारण है। ऐसा क्यों नहीं होता है कि खण्डप्रपात गुहा से उनका प्रवेश हो और तमिस्नागुहा से उनका निर्गम हो ! क्योकि प्रवेश और निर्गम रूप कार्यों की उभयत्र तुल्यता है। तो इसका समाधान ऐसा है-ऐसा जो कहा सो उनमें यह कारण है कि इस तरह से प्रवेश और निर्गम जो करता है वह चक्रको प्रशस्त फल वाला खंडगप्पवायगुहाओ दक्खिणिल्लेणं दारेणं णीणेइ ससिव्व मेहंधयारनिवहाओ) त्या२मा य રત્ન જેને ગન્તવ્ય માર્ગ પ્રકટ કરી રહ્યું છે. એને ભરત નરેશ યાવત્ ખંડ પ્રપાત ગુફાના દક્ષિણ દ્વારથી પસાર થઈને ચન્દ્રની જેમ અંધકાર સમૂડ માંથી નીકળ્યા. અહીં યાવત पहनाया था “अनेक राजवरसहस्रानुयातमार्गः' या विशेषणे। पडे “महासमुद्ररत्न भूतामिव" से विशेष सुधी वन ५ai तमिस्त्री सुशना ५४२मा ४२वामां माल छ, તેવું જ સર્વ વર્ણન અહીં પણ કરી લેવું જોઈએ. આમ સૂચિત કરવામાં આવે છે. અત્રે એવી આશંકા થાય છે કે ચક્રવતીઓને જે તમિસ્રા ગુફામાં પ્રવેરા અને ખંડપ્રપાત ગુફામાંથી નિગમ હોય છે. એનું કારણ શું છે? એવું કેમ થતું નથી કે ખડપ્રપાત ગુફામાંથી તેમને પ્રવેશ થાય અને તમિસા ગુફામાંથી તેમનું નિર્ગમન થાય કેમ કે પ્રવેશ અને નિગમન રૂપ કાર્યોની ઉભયત્ર તુલ્યતા છે. તે આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે એવું જે કહેવામાં આવ્યું છે તે તેમાં એ કારણ છે કે આ પ્રમાણે પ્રવેશ અને નિર્ગમન જે કરે છે. તે ચક્રી પ્રશસ્ત ફળવાન થાય છે. બીજી વાત એ છે કે ખંડપ્રપાત ગુફાથી પ્રવિષ્ટ થઈએ તે ઋષભક્ટ આ ના પડે છે તે તેની ઉપર ચતુદિકુ પર્યત સાધ્ય વગર નામન્યાસ એટલે કે-નામ सयु ५५ शय तु नथी. ॥सूत्र-२६॥ Page #860 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८४६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे अथ दक्षिणभरतार्द्धागतो भरतो यत्कृवान् तदाह - " तरणं से भरहे" इत्यादि । मूलम् -तरण से भर गया गंगाए महाणईए पञ्चत्थिमिल्ले कुले दुवालसजोयणायामं णव जोयणविच्छिण्णं जाव विजयखंधावारणिवेस करेइ अवसिद्धं तं चैव जाव निहिरयणाणं अट्ठमभत्तं परिण्इ, तरणं से भर गया पोसहसालार जाव विहिरयणे मणसि करेमाणे करेमाणे चिट्ठइति, तस्स य अपरिमियरत्तस्यणा धुअमक्खयमध्वया सदेवा लोको पचयंकरा उवगया णव णिहिओ लोगविस्सुयजसा, तं जहा - " ने सप्पे पंडुअए २, पिंगलए ३, सव्वरयण४, पहपरमे ४ | काले६, अ महाकाले ७, माणवगे महानिहीद, संखे ॥१॥" 'सप्पंमि णिवेसा गामागरणगरपट्टणाणं च । दोणमुहमवाणं संधावारावणगिहाण || १ || गणिअस्स य उप्पत्ती माणुम्माणस्स जं पमाणं च । धण्णस्स य वीआण य उप्पत्ती पंडुए भणिया ॥ २ ॥ सव्वा आभरणविही पुरिसाणं जा य होइ महिलाणं । आसाण य हत्थोण य पिंगलगणिहिमि सा भणिया ||३|| रयणाई सव्वश्यणे चउदस विवराई चक्कवट्टिस्स । उप्पज्जेते एगिंदियाई पंचिदियाई च ||४|| वत्थाणय उप्पत्ती णिष्फती चैव सव्वभत्तीणं । रंगाणय धोव्वाणय सव्वा एसा महापउमे ॥५॥ कले कालण्णाणं सव्वपुराणं चतिसु वि वंसेसु । सिप्पस कम्माणि य तिष्णि पयाए हिय कराणि ॥ ६ ॥ लोहस्स य उप्पत्ता होइ महाकालि आगरा णं च । रुपस्स सुवण्णस्स य मणिमुत्तसिलप्पवालाणं ॥७॥ जोहाणय उपपत्ती आवरणाणं च पहरणाणं च । सव्वाय जुण माणवगे दंडणीई य ॥ ८ ॥ होता है दूसरी बात यह है कि खण्डप्रपात गुहा से प्रवेश करने पर ऋषभकूट आसन्न पड़ता है सो उस पर चतुर्दिक. पर्यन्त साधते ने विना नामन्यास नाम लिखना भी नहीं होता है सु०॥ २६ ॥ Page #861 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८४७ प्रकाशिका टीका १०३ वक्षस्कारःसू०२६ दक्षियर्द्धगतभरतकायेवर्णनम् पट्टविही णाडगविही कबस्स य चउव्विहस्स उप्पत्ती। संखे महाणिहिंमी तुडिअंगाणं च सव्वेसि ॥९॥ चक्कट्ठ पइट्ठाणा अठुस्सेहाय णव य विक्खंभा । बारस दीहा मंजूससंठिआ जण्हवीइ मुहे ॥१०॥ वेरुलिअ मणि कवाडा कणगमया विविहिरयणपडिपुण्णा । ससिसुरचक्कलक्खण अणुसम वयणोववत्ती वा ॥११॥ पलिओवमट्टिईआ णिहि सरिणामा य तत्थ खलु देवा । जेसिं ते आवासा अक्किज्जा आहि वच्चाय ॥१२॥ एए णव णिहि रयणा पभूय धणरयण संचय समिद्धा। जेव समुपगच्छंति भरहाविव चक्कवट्टीणं ॥१३॥ तएणं से भरहे राया अट्ठमभत्तंसि परिणममाणंसि पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ एवं मज्जणघरपवेसो जाव सेणिपसेणि सदा वणया जोव गिहिरयणाणं अट्ठाहियं महामहिमं करेइ, तएणं से भरहे राया णिहिरयणाणं अठ्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणोए सुसेणं सेणावइरयणं सदावेइ, सदावित्तो एवं वयासी गच्छण्णं भो देवाणुप्पि या ! गंगा महाणईए पुरथिमिल्लं णिक्खुडं दुच्चंपि सगंगासागागिरिमेरागं समविसमणिक्खुडाणि य ओअवेहि ओअवित्ता एयमाणत्तियं पच्चप्पिणाहित्ति । तएणं से सुसेणे तंचेव पुत्ववेणियं भाणियव्वं जावओअवित्ता तमाणत्तिय पच्चप्पिणइ पडिविसज्जेइ जाव भोगभोगाई भुञ्जमाणे विहरइ । तएणं से दिव्वे चक्करयणे अन्नया कयाइ आउह घरसालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता अंतलिक्खपडिवण्णे जक्खसहस्स संपरिबुडे दिवतुडिय जाव आपूरेते चेव विजयखंधावार णिवेसे मज्झं मज्झेणं णिग्गच्छइ, दाहिणपच्चत्थिमं दिसिं विणीयं रायहाणि अभिमुहे पयाए यावि होत्था।तएणं भरहे राया जाव पासइ पसिताहठ्ठतुट्ठ जोव कोडुंबियपुरिसे सद्दावेइ महावित्ता एवं वयोसी-खिप्पोमेव भो देवाणुप्पिया! आभिसेक्कं जाव पच्चप्पिणंति ॥ सू०२७॥ Page #862 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८४८ जम्बूद्वोपप्रप्तिसूत्रे छाया-ततः खलु स भरतो राजा गङ्गायाः महानद्या पाश्चात्ये कूले द्वादशयोजनायाम नवयोजनविस्तीर्ण यावत् विजयस्कन्धावारनिवेश करोति, अवशिष्टं तदेव यावत् निधिरत्नानाम् अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति, ततः खलु स भरतो राजा पौषधशालाया यावत् निधिरत्नानि मनसि कुर्वन् तिष्ठतीति, तस्य च अपरिमितरक्तनयनाः ध्रुवाक्षया व्ययाः सदेवाः लोकोपचयंकराः उपगताः नवनिधयो लोकविश्रुतयशस्काः, तद्यथा-नै सर्पः १, पाण्डुकः२, पिङ्गलकः ३, सर्वरत्नम् ४, महापद्यम् ५, कालश्च ६ महाकालः ७, माणवको महानिधिः ८, शङ्खः ९ ॥१॥ नैस निवेशा: ग्रामाकर नगरपत्तनानां च । द्रोणमुखमडम्बानां स्कन्धावारापण गृहाणाम् १ गणितस्य चोत्पत्तौ मानोन्मानस्य यत्प्रमाण च । धान्यस्य च बीजानां चोत्पत्तिः पाण्डुके भणिता सर्व आभरणविधिः पुरुषाणां यश्च भवति महिलानाम् । अश्वानां च हस्तिनां च स पिङ्गलकनिधौ भणितः ३॥ रत्नानि सर्वरत्ने च चतुर्दशापि वराणि चक्रवर्तिनः उत्पद्यन्ते एकेन्द्रियाणि पञ्चेन्द्रियोणिच४॥ वस्त्राणां चोत्पत्तिःनिष्पत्तिश्चैव सर्वभक्तीनाम् । रङ्गानां च प्रक्षालनानां सर्वा चैषा महापद्मे ५॥ काले कालज्ञानं सर्व पुराणं च त्रिष्वपि वशेषु । शिल्पशतं कर्माणि च त्रिणि प्रजायाः हितकराणि ६॥ लोहस्योत्पत्ति भवति महाकाले चाकराणाम् । रूप्यस्थ सुवर्णस्य च मणिमुक्ताशिला प्रवालानाम् ७ ॥ योधानां चोत्पत्तिरावरणानां च प्रहरणानां च । सर्वा च युद्धनीति माणवके दण्डनीतिश्च ८॥ नृत्यविधिः नाटकविधिः काव्यस्य च चतुर्विधस्योत्पत्तिः । शङ्ख महानिधौ त्रुटिताङ्गानां च सर्वेषाम् ॥९॥ चक्राष्टप्रतिष्ठानाः कष्टोत्सेधाश्च नव च विष्कम्भाः। द्वादश दोघी मञ्जषावत्संस्थिताः जाह्नव्याः मुखे १०॥ वैडूर्यमणिकपाटाः कनकमयाः विविधरत्नप्रतिपूर्णाः । शशि सूर चक्रलक्षणा अनुसम वदनोत्पत्तिकाः ११ ॥ पल्योपस्थितिका निधिसदृग्नामानः तत्र च खलु देवाः। येषां ते आवासा अकेया आधिपध्याय १२|| पते नव निधिरत्नाः खलु प्रभूत धनरत्न सञ्चयसमृद्धाः । ये वशमुपगच्छन्ति भरताधिप चक्रवर्तिनाम् १६॥ ततः खलु स भरतो राजा अष्टमभक्ते परिणमति पौषधशालातः प्रतिनिष्कामति, एवं मज्जनगृहप्रवेशो यावत् श्रेणि प्रश्रेणि शब्दपनया यावत निधिरत्नानाम् तष्ठाहिकां महामहिमां करोति, ततः खलु स भरतो राजा निधिरत्नानाम् अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायां सत्यां सुषेणं सेनापतिरात्न शब्दयति शब्दयित्वा एवम् अवादीत् गच्छ खलु भो देवानुप्रिया !गङ्गायाः महानद्याः पौरस्त्यं निष्कुटं द्वितीयमपि सगङ्गासागररांगरीमर्यादं समविषमनिष्कुटानि च 'ओअवेहि' साधय साधयित्वा एतामाक्षप्तिको प्रत्यर्पय इति । तत; स्खलु स सुषेणः तदेव पूर्ववणित भणितव्यं यावत् साधयित्वा ताम् आज्ञाप्ति का प्रत्यर्षयर्यात प्रतिविसर्जयति यावत् भोगभोगान् भुजानो विहरति । ततः खलु तद्दिव्यं वक्ररत्नम् अन्यदा कदाचिद् आयुधगृहशालानः प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य अन्तरिक्ष प्रतिपन्नं यक्ष सहस्त्र सपरिवृत्त दिव्यत्रु यावत् आपूरयदिव विजयस्कन्धावारनिवेशं णध्यमध्येन निर्गच्छति दाक्षिणात्य प्राश्चात्याँ Page #863 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वक्षस्कारः सू० २७ दक्षिणाद्धगत भरतकार्यवर्णनम् ८४१ दिशि विनीतां राजधानीमभिमुख प्रयात चाप्यभवत् ततः खलु स भरतो राजा यावत पश्पति दृष्ट्वा हृष्तुष्ट यावत् कीटुम्बिक पुरुषान् शयित शब्दयित्वा एवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रिया ! अभिषेक्यं यावत्प्रत्यर्पयन्ति ॥सू०२७॥ टीका-"तए णं से भरहे राया" इत्यादि । 'तए णं से भरहे राया गंगाए महागाईए पच्चत्थिमिल्ले कूले दुवालसनोयणायामं णवजोयणेविच्छिण्णं जाव विजयक्खंधावारणिवेसं करेइ' ततो गुहानिर्गमानन्तरं खलु स श्रीभरतो महाराजा गङ्गाया महानद्याः पाश्चात्ये पश्चिमे कूले-तटे द्वादशयोजनायामम्, द्वादशयोजनानि अष्टाचत्वारिंशत् क्रोश परिमितानि आयामो दैर्ध्य यस्य स तथा तम् एवं नवयोजनविस्तीर्णम् नवयोजनानि पत्रिंशत् क्रोशपरिमितानि विस्तीर्णानि विष्कम्भानि यस्य स तथा तम् यावत् पदात् वरनगरसदृशं विजयस्कन्धावारनिवेशं विजयाय यः स्कन्धावारः 'छौनी' इति भाषा प्रसिद्धः तस्य निवेशः योजना तं करोति 'अवसिटुं तंचेव जाव निहिरयणाणं अट्ठमभत्तं पगिण्हइ' अवशिष्टम् वर्द्धकिरत्नशब्दज्ञापनादिकं तदेव यन्मागधदेवसाधनावसरे प्रोक्तमिति अस्मिन्नेव तृतीयवक्षस्कारे सप्तमसूत्रे मागधदेवसाधनपाठो द्रष्टव्यः यावत् शब्दात् पौष 'तएणं से भरहे राया गंगाए महाणईए'-इत्यादि सूत्र-२७॥ टीका-(तए ण से भरहे राया गंगाए महाणईए पच्चस्थिमिल्ले कूले दुवालसोयणायामं णवजोयणविच्छिण्णं जाव विजयखंधावारणिवेसं करेइ) गुहा से निकलने के बाद भरत राजा ने गंगा महानदी के पश्चिम दिग्वर्ती तट पर १२ योजन प्रमाण लम्बो और ९ योजन प्रमाण चौड़ी अतएव एक सुन्दर नगर जैसी दिखने वाली बिजय सेना का निवास पडाव छावनो डाला-(अवमिद्रं तं चेव जाव निहिरयणाणं अटूमभत्तं पगिण्हइ ) यहां से आगे का और सब कथन जैसा मागधदेव के साधन प्रकरण में कहा गया है वैसा पौषधशाला में दर्भ के आरन पर बैठने मादि तक का यहां पर जानना चाहिए मागध देव के साधन करने का प्रकरण इसी तृतीयवक्षस्कार के सप्तम सूत्र में कहा गया है इस प्रकार से सब कुछ पूर्वोक्तरूप से (तए णं से भरहे राया गंगाए महाणईप) इत्यादि-सूत्र-२७' । साथ-(तए ण से भरहे राया गंगाए महाणईए पच्चस्थिमिल्ले कूले दुवालसजोयणायाम णवजोयणविच्छिण्ण जाव विजयक्खंधावारणिवेसं करेइ) शुसमांथ ભરતરાજાએ ગગા મહાનદીના પશ્ચિમ દિશ્વતી તટ ૫૨ બાર યોજન પ્રમાણ લાંબી અને જિન પ્રમાણુ પહોળી એથી જ એક સુંદર નગર જેવી સુશોભિત દેખાતી વિજય સેનાને निवास ५ नाय! (अवसिद्वं तं चेव जाव निहिरयणाण अट्ठमभत्त पगिण्हइ) ही થી આગલન બધું કથન જેમ માગધદેવના સાધન પ્રકરણમાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવેલ છે. તેવુંજ પૌષધશાળામાં દર્ભના અસિન ઉપર બેસવા સુધીનું અહીં જાણી લેવું જોઈએ માગધ દેવને સાધના કરવા અંગેનું પ્રકરણ આજ તૃતીય વક્ષસ્કારના સપ્તમ સૂત્રમાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવેલું છે. આ પ્રમાણે સર્વ કથન પૂર્વોક્ત રૂપમાં સંપન્ન કરીને ભરત મહારાજાએ ૯ નિધિઓ भने १४ रत्नाने साधा मादे मम सतनी तपस्या धा२५४री. (तपणं से भरहे राया १०७ . Page #864 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८५० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिम धशालां दर्भसंस्तारक संस्तरणादि सर्व विज्ञेयम् निधिरत्नानां साधनाय अष्टमभक्तं प्रगृह्णाति करोति 'तएणं से भरहे राया पोसहसालाए जाव णिहिरयणे मणसि करेमाणे करेमाणे चिट्ठइ त्ति' ततः खलु स भरतो महाराजा पौषधशालायां यावत् निधिरत्नानि मनसि कुर्वन् मनसि कुर्वन् मनसि ध्यायन् मनसि ध्यायन् तिष्ठति यावत्पदात् पौषधिक इत्यारभ्य एकः अद्वितीय इति पर्यन्तं पदकदम्बकं संग्राह्यम् । इत्थमनुतिष्ठतः तस्य भरतस्य किं जातमित्याह-'तस्स' इत्यादि 'तस्स य अपरिमियरत्तरयणा धुमक्खयमव्वया सदेवा लोकोपचयंकरा उवगया णवणिहिओ लोगविस्मुअजसा' तस्य भरतस्य च शन्दोऽर्था न्तरारम्भे नवनिधयः उपागताः समीपमागताः इत्यग्रेण सम्बन्धः कीदृशास्ते निधयः अपरिमितरतरत्नाः अपरिमितानि असीमितानि अपाराणीत्यर्थः रक्तानि रक्तवर्णानि उपलक्षणात् कृष्णनीलपीतशुक्लाधनेकवर्णानि येषु ते तथा, पदार्थाः साक्षादेव उत्पद्यन्ते करके भरत महाराजा ने नौ निधियां एवं चौदह रत्नों को साधन के लिये अष्टमभक्त की तपस्या धारण करली(तएणं से भरहे राया पोसहमालाए जाव निहिरयणे मणसि करेमाणे२चिद्रइ) उस अष्टम भक(तेले)कीतपस्यामें उस चक्रवर्ती श्रीभरत नरेशने नौ निधियों का और १४ रत्नों का अपने मन में ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया यहां यावत् शब्द से-“पौषधिकः" इस पद से लेकर ''एकः अद्वितीयः" पद तक का पदसमूह गृहीत हुआ है (तस्स अपरिमियरत्तरयणा धुवमक्खयमव्वया सदेवा लोकोपचयंकरा उवगया णवणिहियो लोगविस्सुयजसा) उस भरत राजा के पास अपरिमित रक्तवर्ण के, कृष्णवर्ण के, नीलवर्ण के पीतवर्ण, के, शुक्लवर्ण के और हरितवर्ण के इत्यादि अनेक वर्ण के रत्नों वाली तथा जिनका यश लोक में व्याप्त हो रहा है ऐसे नौ निधियां अपने अपने अधिष्ठापक देवो सहित उपस्थित हुई यहां अनेक वर्णों वाले रत्न जिनमें रहते हैं ऐसा जो कहा गया है वह उनके मत की अपेक्षा से कहा गया है जो ऐसा मानते हैं कि नौनिधियों में ये वक्ष्यगाण पदार्थ साक्षात् उत्पन्न होते हैं शाश्वति कल्प पुस्तक इन पोसहसालाए जाव-निहिरयणे मणसि करेमाणे २ चिट्टइ) ते अष्टममततai) तपस्यामा त ભરત નરેશે ૯ નિધિઓનું અને ૧૪ રત્નનું પિતાના મનમાં થાન શરૂ કર્યું આજ અહી यावत पहथी-पौषधिक: "५४थी भांडीने एकः 'अद्वितीयः" ५४ सुधीन। ५६ सभूडो गृहीत यया छे. (तस्स अपरिमियरसरयणाधुवमक्खयमव्वया सदेवा लोकोपचयंकरा उवगया णव णिहिओ लोगविस्सुयजसा ) त भरत मालनी पामे अपरिमित २५ूतना , goવણના, નીલવર્ણના, પીતવર્ણન, શુકૂલ વર્ણન અને હરિત વર્ણના વગેરે અનેક વણને રત્નવાળી તેમજ જેમને યશ લોકમાં વ્યાપ્ત થઈ રહ્યો છે એવા ૯ નિધિઓ પોત–પિતાના અધિષ્ઠાપક દેવ સહિત ઉપસ્થિત થયા. અહીં અનેક વર્ષોવાળા રને જેમાં રહે છે, આમ જે કહેવામાં આવ્યું છે તે તેમના મતની અપેક્ષાએ કહેવામાં આવેલ છે. જે આ પ્રમાણે માને છે કે નવ નિધિઓમાં એ વક્ષ્યમાણુ પદાર્થો સાક્ષાત ઉત્પન્ન થાય છે. શરુવતિ કહ૫ પુસ્તક વગેરે પુસ્તકોમાં વિશ્વની સ્થિતિ પ્રકટ કરવામાં આવી છે. કેટલાકના મત મુજબ ક૯૫ પુસ્તક પ્રતિપાદ્ય પદાર્થો સાક્ષાત્ એ નિધિઓમાં ઉત્પન્ન થાય છે તેમજ એ Page #865 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तुं०३ वंश्नस्कार: सुं० २७ दक्षिणार्द्धगतभरत कार्यवर्णनम् ८५१ इति, कल्पपुस्तकप्रतिपाद्याः अर्था साक्षादेव तत्रोत्पद्यन्ते इति तथा ध्रुवाः निश्चलाः तथाविधपुस्तक रूप स्वरूपस्यापरिहाणेः अक्षयाः अविनश्वराः अवयविद्रव्यस्य अपरिहा : अव्ययाः तदारम्भकम देशापरिहाणेः अत्र प्रदेशापरिहाणि युक्तिः समयसंवादिनी पद्मवrवेदिका व्याख्या समये निरूपितेति ततोऽवसेया अत्र पदद्वये मकारोऽलाक्षणिकः ततः पदत्रयस्य कर्मधारयः सदेवाः अधिष्ठायकदेवकृत सान्निध्या इत्यर्थः लोकोपचयङ्करा अस्य तीर्थकरादिवत् साधुत्वम् यद्वा अनुस्वारः आर्यत्वात् लोकोपचयङ्कराः -वृत्तिकल्पक कल्पपुस्तकप्रतिपादनेन लोकानां पुष्टिकारकाः लोकविश्रुतयशस्काः लोकविख्यात कीर्त्तयः 'एवं विशेषणविशिष्टा नवनिधयः उपागताः ' अथ नामतः तान् नवविधीन उपदर्शयति 'तं जहा ' इत्यादिना सप्पे १ पंडुअए २ पिंगलए ३ सव्वरयण ४ महपउमे ५ काले ६ अ महाकाले ७ माणव महानिही ८ संखे ९ । १ । तत्र नैसर्पः नैसर्पस्य देवविशेषस्यायं नैसर्पः पुस्तकों में विश्व की स्थिति कही गई हैं किन्ही २ के मतानुसार कल्प पुस्तक प्रतिपाद्य पदार्थ साक्षात् उन निधियों में उत्पन्न होते हैं तथा ये ध्रुव है क्यों कि तथाविध पुस्तक वैशिष्ट्य रूप स्वरूप इनका नष्ट नहीं होता हैं, अवयव द्रव्य की अविनाशिता को लेकर ये अक्षय है, तदारम्भक प्रदेशों की अविनाशिता को लेकर ये अव्यय है, प्रदेशों की अपरिहीनता के सम्बन्ध में युक्ति सिद्धान्त के अनुसार पद्मवरवेदिका की व्याख्या करते समय कही जा चुकी हैं, इसलिये जिज्ञासु जनको वहीं से इसे देखलेनी चाहिए, "धुवमक्स्वयं" में मकार का प्रयोग मलाक्षणिक है, "लोकोपचयङ्कर" पद की निष्पत्ति " तीर्थंकर" पद की निष्पत्ति की तरह से ही जाननी चाहिये अथवा आर्ष होने के कारण यहां अनुस्वार कर दिया गया हैं वृत्तिकल्पक कल्पपुस्तक के प्रतिपादन से ये लोकों की पुष्टि कारक होती हैं उन नौ निधियों के नाम इस प्रकार से कहा गया है - 'नेसप्पे १, पंडुभए २, पिंगलए ३, सव्वरयण ४ महपउमे ५ | काले ६ महाकाले ७ माणवगे महानिही ८ संखे ९ ॥ ९ ॥ (१) नै सर्पनिधि - यह नैसर्पनामक देव से अधिष्ठित होती है (२) पाण्डक निधि. यह निधि पण्डुक नामक देव से अधिष्ठित होती है (३) पिंगलक निधि - यह पिंगलक नामक देव से अधिધ્રુવ છે. કેમ કે તથાવિધ પુસ્તક વૈશિષ્ટય રૂપ સ્વરૂપ એમનું નાશ પામતુ નથી અવયવી દ્રવ્યની અવિનાશિતાને લઈને એએ અક્ષય છે. તદ્વાર ભક પ્રદેશાની અવિનાશિતાને લઈને એ અવ્યય છે. પ્રદેશોની અપરિહીનતાના સબંધમાં યુકૃિત સિદ્ધાન્ત મુજબ પદ્મવરવેદિકાની વ્યાખ્યા કરતી વખતે કહેવામાં આવી છે. એથી જિજ્ઞાસુએ ત્યાંથી જ જાણુવા પ્રયन ४२. ' धुवमक्खयं" भां भारने प्रयोग अवाक्षलिङ छे. 'लोकोपचयङ्कर" पहनी निंव्यत्ति "तीर्थंकर" यहनी निष्यत्तिनो प्रेम भगवी लेडो अथवा भार्ष होवाथी सही અનુસ્વાર કરવામાં આવેલ છે. વૃત્તિકલ્પક કલ્પપુસ્તકના પ્રતિપાદનથી એ લાકો માટે પુષ્ટિ ४।२४ हाय छे. ते नव निधियो ना नाभो या प्रमाणे छे ने सप्पे - पंडुमए-२, पिंगलप - ३, सव्वरयण-४, महपउमे-५, कालेय-६, महाकाले - ७, माणवगे महानिद्दी-८, संखे ॥८॥१॥ Page #866 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८५३ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र एवमग्रेऽपि इत्थमेव विज्ञेयम् अथ यत्र निधौ यदाख्यायते तदाह-तत्र प्रथमे नैसधिष्ठातृदेवस्य नैसख्यिनिधौ ‘णे सप्पमि' इत्यादि तत्र-नैसर्प-नैसख्ये निधौ निवेशाः स्थापनानि स्थापनविधयो ग्रामादीनां गृहप. यन्तानां व्याख्यायन्ते तत्र ग्रामः-वृत्तिवेष्टितः, आकर:-सुवर्णरत्नाद्युत्पत्तिस्थानम् नगरम् अष्टादश करवर्जितम्, पत्तनं समस्तवस्तुप्राप्तिस्थानम्, शकटादिभिः नौभिर्वा यग्दम्यं तत्पत्तनं यत्केवलं नौभिरेव गम्यं तत् पट्टनम् उक्तश्च-पत्तनं शकटैगम्यं घोटकैििभरेव च नौभिरेवच यद्गम्यं पट्टनं तत्प्रचक्षते । द्रोणमुखम्-जल-स्थलमार्गगमनयोग्यस्थानम्, मडम्बम् ष्ठित होती है. (४) सर्वरत्ननिधि-यह सर्वरत्न नामक देव से अधिष्ठित होती है (५) महा पद्म निधि. यह महापद्मनामक देव से अधिष्ठित होती है (६) कालनिधि-यह काल नामक देव से अधिष्ठित होतो है. (७) महाकाल निधि-यह महाकाल नामक देव से अधिष्ठित होती है. (८) माणवकनिधि यह माणवक नामक देव से अधिष्ठित होतो है. और (९) शंखनिधि यह शङ्ख नामक देव से अधिष्ठित होती है. 'णेसप्पंमि णिवेसा गामामरणगर पट्टणाणं च दोणमुह मडवाणं खंधावारावणगिहाण १ नैसर्प नामकी निधि में ग्राम, आकर, नगर, पट्टण, द्रोहमुख, मडंब, स्कन्धावार, आपण और भवन, उनकी स्थापन विधि रहती है वृत्ति-वाड से जो आवेष्टित होता है उसका नाम प्राम है. जहां पर सुवर्ण रत्न आदिकों की उत्पत्ति होती है उसका नाम आकर है अठारह प्रकार के टेक्स से जो रहित हैं उसका नाम नगर है. समस्त वस्तुओं की प्राप्ति का जो स्थान है उसका नाम पत्तन है. अथवा वेलगाड़ो द्वारा या नौकाओं द्वारा जहां पर जाने का मार्ग होता है. उसका नाम पत्तन है. अथवा जलयान द्वारा हो जहां पर जाया जा सकता है वह पट्टण है ... उक्तंच-पत्तनं शकटैर्गम्यं घोटकैनौभिरेव च । नौभिरेवच यद्गम्यं पट्टनं तत्प्रचक्षते १ (૧) નૈસર્ષનિધિ-એ નિધિ સર્પનામક દેવથી અધિઠિત હોય છે. (૨) પાંડનિધિએ નિધિ પાક નામને દેવથી અધિઠિત હોય છે. (૩) પિંગલક નિધિ- એ પિંગલક નામક દેવથી અધિઠિત હોય છે. (૪) સર્વરતનનિધિએ સર્વરનનામક દેવથી અધિષ્ઠિત હોય છે. (૫) મહાપદ્ધનિધિએ મહાપદ્મનામક દેવથી અધિષ્ઠિત હોય છે. (૬) કાલનિધિએ કાલ નામક દેવથી અધિષિત હોય છે. (૭) મહાકાલ નિધિ–એ મહાકાલ નામક દેવથી અધિષ્ઠિત હોય છે. (૮) માણવકનિધિ- એ માણવક નામક દેવથી અધિષ્ઠિત હોય છે. અને (૯) શંખનિધિ એ શેખ નામક દેવથી અધિછિત હોય છે. णेसप्पमि णिवेसा गामागरणगर पट्टणाणं च । दोणमुह मडंबाणं खधावारावण गिहाणं ॥२॥ નસ" નામક નિધિમાં ગ્રામ અકર, નગર, પટ્ટણ, દ્રોણુમુખ, મડંબ, સ્કન્ધાવાર, આપણું અને ભવન એમની સ્થાપના વિધિ રહે છે વૃત્તિ-વાડ-થી જે આવેષ્ટિત હોય છે, તેને ગ્રામ કહેવામાં આવે છે. જયાં સુવર્ણરત્ન વગેરેની ઉત્પત્તિ હોય છે, તેનું નામ આકર છે. અઢાર પ્રકારના કરોથી જે રહિત હોય છે. તે નગર કહેવાય છે. સમસ્ત વસ્તુઓની પ્રાપ્તિનું જે સ્થાન છે. તે પત્તન કહેવાય છે. અથવા બળદ ગાડી વડે કે ના વડે જ્યાં જઈ શકાય છે તેનું નામ પણ છે. અથવા જ લયાને દ્વારાજ જ્યાં જઈ શકાય છે તે પત્તન છે Page #867 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ८.३ वक्षस्कारः सू०२७ दक्षिणाद्धगतभरत कार्यवर्णनम् ८५.३ - सार्द्धक्रोशद्वयान्तरेण ग्रामान्तररहितम् वसतिरिति । स्कन्धावारः- कटकम् आपणो हट्टः गृहम् भवनम् उपलक्षणात् खेटकर्बटादि परिग्रहः खेट -धूलिकाप्राकारवेष्टितम् नदी पर्वतवेष्टितं च नगरम्, कर्वटम् क्षुद्रप्राकारवेष्टितं कुत्सितनगरम्, एतेषां स्थापनविधयो नै सर्पाये निधौ भवन्तीत्यर्थः ॥ १ ॥ अथ द्वितीयं पाण्डुकाधिष्ठातृदेवस्य पाण्डुकनामक निधिस्वरूपं तत्र यानि उत्पद्यन्ते तान्याह - तत्र गणितस्य संख्याप्रधानतया व्यवहर्त्तव्यस्य दीनारादेः नारिकेलादेव च शब्दात्परिक्ष्यस्य मौक्तिकादे रुत्पत्तिप्रकारः वर्णनम्, तथा मानं सेतिकादि तद्विषयो यः सोऽपि मानमेव मेयं पाय्येन पाइलोति लोकप्रसिद्धेन मातुं योग्यम्, तथा उन्मानं जलमार्ग से भी और स्थलमार्ग से भी जहां पर सुविधासे जाया जाता है वह द्रोणमुख है। जहां पर ढाई कोश पर्यन्त आस पास में कोई भी ग्रामान्तर नहीं होते हैं उसका नाम मडम्ब हैं । स्कन्धावार नाम कटक का है । जिसे भाषा में छावनी कहा गया है । आपण नाम बाजार का है. और गृह नाम भवन का है । उपलक्षण से यहाँ पर खेट कर्बेट आदि स्थानों का भी ग्रहण हुआ है । धुलिका के प्राकार कोट से परिवेष्टित हुए स्थान का नाम खेट है । नदी एवं पर्वत से वेष्टित हुवे स्थान का नाम नगर है, क्षुद्र प्राकार से परिवेष्टित कुत्सि - तनगर का नाम कर्बेट है इनसब की स्थापना करने की विधियां नैसर्प नाम की निधि में होती हैं । दूसरी पण्डुकनिधि है - इसके सम्बन्ध में ऐसा कथन है । गणिस्स य उत्पत्ती माणुम्माणस्स जं पमाणंच घण्णस्स य बीआण य उत्पत्ती पंडुए भणिया । संख्या प्रधान होने से व्यवहर्तव्य दीनार आदि का अथवा नारिकेल आदि का तथा परीक्ष्य मौक्तिकादि का कथन तथा मान- सेतिका आदि रूप तौल का तथा इस तौल के विषयभूत पदार्थ का उन्मान तुला, कर्ष- तोला इनका और इनके द्वारा जो तौले जाते पदार्थ है, त-पत्तनं शकटैर्गम्य घोटके नौ भिरेव च । नौभिरेवच यद्गम्यं पट्टनं तत्प्रचक्षते || १॥ જળમાગ થી અને સ્થલ મા`થી પણ જ્યાં જઇ શકાય છે, તે દ્રોણુ મુખ છે. જ્યાં અઢી ગાઉ સુધી ખીજા ગ્રામા હૈાતા નથી. તેનુ' નામ મડ બ છે. કોંધાવાર નામ કેટકનુ છે. જેને हिन्दी भाषामा 'छावनी' उडे हे या मनानु नाम से खाने गुड लवननु नाम छे. ઉપલક્ષણથી અહી ભેટ, કટ વગેરે સ્થાનો તુ પશુ ગ્રહણ થયું છે. ધૂલિકાના પ્રકારકાટ—થી પરિવેષ્ટિત થયેલા સ્થાનનું નામ બેટ છે. નદી અને પત થી વેષ્ટિત સ્થાનનુ નગર છે. ક્ષુદ્ર પ્રાકારથી પવિષ્ટિત થયેલા કુત્સિત નગરનુ નામ કટ છે. એ સવની સ્થાપના કરવાની વિધિએ નૈસર્પનામક નિધિમાં હાય છે. નામ गणियरस य उपपत्ती माणुम्माणस्स जे पमाणं च । घण्णस्स य बीआणय उप्पत्ती पंडुप भणिया ॥२॥ સંખ્યા પ્રધાન હેાવાથી વ્યવહતવ્ય દીનાર વગેરેનું અધવા નારિકેલ વગેરેનું તેમજ પરીક્ષ્ય મૌતિકાદિનું કથન તેમજ માન-સેતિકા આદિ રૂપ તેલનુ તેમજ એ તેલના વિષયભૂત પદાર્થનું ઉન્માન, તુલા ક—તેાલા એમનુ અને એમના વડે જે તોલવામાં આવે છે એવા જે પદાથો છે તેમનું તથા ધાન્ય શાલિ વગેરે અને ખીજનું આ પ્રમાણે એ સવની Page #868 -------------------------------------------------------------------------- ________________ arwwwwwwwwwwwwwwwwww - जम्बूद्वीपप्रतिसूत्रे तुलाकर्षादि तद्विषयं यत्तदपि उन्मान खण्डगुडादि धरिमजातीयघनमित्यर्थः तस्य च यत्प्रमाणं लिङ्गविपरिणामेन तत्पाण्डुके भणितमिति सम्बन्धः, धान्यस्य शाल्यादे वीजानां च वापयोग्यधान्यानामुत्पत्तिः पाण्डुके निधौ भणिता ॥२॥ अथ तृतीयं पिङ्गलकाधिष्ठातृदेवस्य पिङ्गलकनामकनिधिरूपं तत्र सर्वाभरणविधि च आह-"सत्या" इत्यादि तत्र सर्वा आभरणविधिः यः पुरुषाणां यश्च महिलानां तथा श्वानां हस्तिनां च स यथौचित्येन पिङ्गलनामनि निधौ भणिता मूले सा भणितेति स्त्रीलिंगप्रयोगः निधेः प्राकृतभाषायामापत्वात् इति पदे आभरणस्य प्रयोजनं भवति तदा तथाभूतानि आभरणानि निष्काश्यते । सर्वा रत्नाधिष्ठातृदेवस्य चतुर्थ सर्वरत्नाख्यनिधिस्वरूपमाह रयणाई' इत्यादि । तत्र रत्नानि चतुर्दशापि वराणि चक्रवर्तिनश्चक्रादीनि चक्रदण्डासिछत्रचर्ममणिकाकेणीति सप्त एकेन्द्रियाणि सेनापति गाथापति वर्द्धकी पुरोहित अश्व हस्ति स्त्री समाख्यानि सेनापत्यादीनि च सप्त पञ्चेन्द्रियाणि सर्वरत्ने सर्वरत्नाख्ये महानिधी उत्पद्यन्ते इत्यर्थः ।।४॥ अथ पञ्चमे महापद्माधिष्ठातृदेवस्य महापद्मनिधौ येषां या उनका तथा धान्य शालि आदि का और बीज का इस तरह इन सब के नापने तौलने की विधि का परिमाण इस दूसरी निधि में रहता है ! अर्थात् कौन वस्तु कितनी है ? किंतने वजन की है ! इत्यादि का सब हिसाब किताब यही निधि करती है . तृतीय निधि-सव्वा आभरण विही पुरिसाणं जा यहोइ महिलाणं । आसाण य हत्थीण य पिंगलणिहिंमि सा य भणिया "३" सर्व प्रकार के पुरुषों के एवं महिलाओं के घोड़ों के एवं हाथियों के आभरणों की विधि इस तृतीय पिङ्गल निधि में रहती है . चतुर्थ निधि-रयणाई सम्वरयणेच उद्दस वि वराई चक्कट्टिस्स उप्पज्जते.एगिदियाई पंचिंदियाइंच"४" सर्व रत्ननाम की निधिमें चौदह रत्न जो को चक्रवर्ती को प्राप्त होते हैं उत्पन्न होते हैं इन માપવા-તેલવાની વિધિનું પરિમાણુ બીજા નિધિમાં રહે છે. એટલે કે કઈ વસ્તુ કેટલી. છે, કેટલા વજનવાળી છે, વગેરેને હિસાબ-કિતાબ એ નિધિ કરે છે. તૃતીયનિધિ सव्वा आभरणविही पुरिसाण जा य होइ महिलाण । आसाण य हत्थीण य पिंगलणिहिमि सा भणिया ॥३॥ સર્વ પ્રકારના પુરુષોનાસ્ત્રીઓના, ઘોડાઓના અને હાથીઓના આભરણેની વિધિ એ ત્રીજી પિંગલ નિધિમાં રહેલી છે. यतु निधि- रयणाई सम्वरयणे चउहस वि वराईचक्कवहिस्स। उप्पज्जते पगिदियाई, पंचिदियाई च ॥४॥ સવ તન નામક નાધમાં ચતુર્દશરને કે જે ચક્રવતી ને પ્રાપ્ત હોય છે. તે ઉત્પન્ન થાય એ ૧૪ રત્નમાં સાત રત્ન-ચક્રરત્ન, દંડરન, અસિરત્ન, છત્રરત્ન, ચર્મરત્ન, મણિરન અને કાકણ રત્ન એ બધા રસ્તે એકેન્દ્રિય હોય છે. અને એમના, સિવાય સેનાપતિ Page #869 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका १०३ वक्षस्कारःसू०२७ दक्षिणार्द्धगतभरतकार्यवर्णनम् उत्तपत्तिः येषां या निष्पत्तिश्च सा उच्यते साधारणान्यपि चक्रादीनि सेवनापत्यादीनि एतानि प्रभावात् विशिष्टतराणि भवन्ति रत्नपदं वाच्यानि भवन्तीति 'वत्थाण य' इत्यादि । तत्र सर्वेषां वस्त्राणां च या उत्पत्तिः तथा सर्वभक्तीनां वस्त्रगत सर्वरचनानी रङ्गानां च माग्जिष्ठा रागाणां 'धोधणय' त्ति सर्वेषां प्रक्षालनविधीनां च या निष्पत्तिः सा सर्वा महापद्मे महापद्मनामकनिधौ वर्तते महापद्मनिधेः शुक्लरक्तादि गुणोपेतत्वात् वस्त्रादीनां स निधिः स्वच्छरक्तादिभावं वस्त्रादीनां करोति चतुरशीति लक्षाणां हस्तीनामश्वानां षण्णवति कोटिसंख्यावतां मनुष्याणां वस्त्राणि समुत्पाद्य समर्पयतीति ।। ___ अथ षष्ठो निधिः अथ कालाधिष्ठातृदेवस्य कालनिधिस्वरूपं कालनामनि निधौ च यानि वस्तूनि सन्ति तान्याह-'काले कालण्णाणं' इत्यादि । तत्र काले कालनामनि निधौ कालज्ञानं समस्त ज्योतिः शास्त्रानुबन्धिज्ञानम् तथा त्रिष्वपि वंशेषु त्रयो वंशा तीर्थकरवंशश्चक्रवत्तिवंशाः बलदेववासुदेववंशाश्च इत्येतेषु त्रिष्वपि १४ रत्नों में सात रत्न चक्ररत्न, दण्डरत्न, असिरत्न, छत्ररत्न चर्मरत्न, मणिरत्न एवं काकणीरत्न ये सात-रस्न एकेन्द्रिय होते हैं : और इनके अतिरिक्त सेनापति गाथापति, वर्द्धकी, पुरोहित अ.श्व हस्ति, एवं स्त्री ये सात रत्न पञ्चेन्द्रिय होते हैं. पंचमी निधि वस्थाणय उप्पत्ती णिप्फत्ती चेव सव्वभत्तीणं रंगाण य धोच्च.ण य सव्वा एसा महापउमे'५' इस महापद्म नाम की पांचवी निधि में समस्त प्रकार के वस्त्रों की उत्पत्ति तथा वस्त्रगत रचनाओं की रंगोंकी,और वस्त्रों के धोने की विधि निष्पन्न होती हैं ! क्योकि यह महापद्मनिधि शुक्ल रक्त आदि गुणों से युक्त होती है. इसलिये यह निधि वस्त्रों को भिन्न २प्रकार के रंगों से रंगना तथा उन्हे धोकर साफ करना, एवं चौरासी लाख हाथियों के और घोडों के तथा ९६ करोड मनुष्यों के वस्त्रों को बनाकर उन्हें समर्पण करना यह सब काम इसी निधि का है। छठी निधि काले कालण्णाणं सवपुराणं च तिसु वि वंसेसु । सिप्पसयं कम्माणि य तिण्णि पयाए हियकराणि "" इस काल नाम को छठी निधि में समस्त ज्योतिःशास्त्रानुबन्धी ज्ञान तथा तीर्थकर पश चक्रवर्तिवंश और बलदेव वासुदेव वंश इन तीन वंशों में जो शुभाशुभ हो चुका है होने ગ, થાયતિ, વધેકી પુરોહિત, અશ્વ, હતિ અને સ્ત્રી એ સાત રને પંચેન્દ્રિય હોય છે. पंचमी निधि-वत्थोणय उप्पत्ती णिप्फत्ती चेव सव्वभत्तीणं । रंगाण य धोव्वाण य सव्वा पसा महापउमे ||५|| એ મહાપવનામક પાંચમી નિધિમાં સર્વ પ્રકારના વૃની ઉત્પત્તિ તેમજ વસ્ત્રગત સમસ્ત ૨ચનાએાની ૨ગાની અને વસ્ત્રાવિગેરેને ધાવાની વિધિ નિમ્ન હોય છે. કેમ કે જો મહાપાનિધિ શુકલકત વગેરે ગુણેથી યુકત હોય છે. એથી આ નિધિ વાને ભિન્ન-ભિન્ન પ્રકારના રાથી રંગવા તેમજ તેમને પ્રક્ષાલિત કરવાં. ૮૪ લાખહાથાએાના અને ઘેાડાના તથા ૯૬ કરોડ મનુચ્ચેના વસ્ત્રને બનાવીને તેમને અ૫વો, એ બધુ કામ એ નિધિન છે. छठीनिधि काले कालण्णाणं सवपुराणं च तिसु वि वंसेसु ।। सिप्पसय कम्माणिय तिण्णि पया हियकराणि ॥६॥ એ કાલ નામક છટ્ઠી નિધિમાં સમસ્ત જ્યોતિ–શાસ્ત્રાનુબધી જ્ઞાન તીર્થકર ભગવાનને વંશ, ચકવતી વંશ અને બલદેવ-વાસુદેવ એ ત્રણ વંશમાં જે શુભાશુભ થઈ ચૂકયુ છે થવાનું છે. Page #870 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८५६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वंशेषु सर्व पुगणं च यद्भाव्यं यच्च पुराणं व्यतीतम् उपलक्षणात् वर्तमानं च शुभाशुभं तत्सर्वम् अत्र कालाख्यनिधौ वर्तते इतो महानिधितः ज्ञायते इत्यर्थः तथा शिल्पशतं विज्ञानशतम् घटलोहचित्ररस्त्रनापितशिल्पानां पञ्चानामपि प्रत्येकं विंशतिभेदातू कर्माणि च कृष्यादोनि जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदभिन्नानि त्रीणि एतानि प्रजायाः हितकराणि निर्वाहाभ्युदयहेतुत्वात् एतत् सर्वम् अत्र कालनामनि निधो अभिधीयते । अत्र कालनिधी मूलोक्तानि सर्वाण्यपि वस्तुज्ञानानि विद्यन्ते तानि च पुण्यप्रभावात् चक्रवर्तिनः समीपे समुपस्थापितानि भवन्तीत्यर्थः । अथ सप्तमो निधिः महाकालाधिष्ठातृदेवस्य सप्तमं महाकालनिधिस्वरूपं तत्र च येषामुत्पत्तिः तामाह-'लोहस्स य इत्यादि । मूलम्-लोहस्स उप्पत्तो होइ महाकालि आगराणं च । रुप्पस्स सुवण्णस्स य मणिमुत्तसिलप्पवालाणं ॥७॥ छाया-लोहस्य चोत्पत्ति भवति महाकाले चाकराणाम् । रूप्यस्य सुवर्णस्य च मणिमुक्ताशिला प्रवालानाम् ॥७॥ तत्र लोहस्य च नानाविधस्य उत्पत्ति भवति महाकाले महाकालनामनि निधौ' तत्र तदुत्पत्तिराख्यायते इत्यर्थः, तथा रुप्यस्य सुवर्णस्य च मणिमुक्ताशिलाप्रवालानाम् तंत्र मणयः -चन्द्रकान्तादयः मुक्ताः मुक्ताफलानि शिलाः स्फटिकादयः प्रवालाश्च इति वाला है एवं हो रहा है वह सब रहता है . तात्पर्य यह है कि इस निधि से समस्त शुभाशुभ जाना जाता है. शिल्पशत-घर-लोह, चित्र, वस्त्र एवं नापित इन पांच शिल्पों के प्रत्येक शिल्प के २० - २० भेद है इस तरह से यह शिल्पशत तथा कृषि वाणिज्य आदि तीन कर्म-जो कि उत्तम, मध्यम एवं जघन्य के भेद से तोन प्रकार के हैं और जिन से प्रजाजनों का निर्वाह होता है उनका अभ्युदय होता हैं-जाने जाते हैं। सप्तमनिधि-लोहस्सय उप्पत्ती होइ महाकालि आगराणंच रुप्पस्स सुवण्णस्स य मणिमुत्तसिलप्पवालाणं। . इस महाकाल नामकी निधि में नाना प्रकार की लोहे की उत्पति बताई गई है . तथा चांदो, सोना मणि, मुक्ता शिला-स्फटिक आदि, एवं प्रवाल-मूंगा इत्यादि की खानों की उत्पत्ति बताई गई हैं। થઈ રહયુ છે તે બધુ રહે છે તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે એ નિધિથી સમસ્ત શુભ-અશુભ જાણવામાં આવે છે. શિ૯પશત ઘટ-લેહ, ચિત્ર, વસ્ત્ર તેમજ નાપિત એ પાંચ શિપનો દરેકે દરેક શિ૯૫ના-૨૦૨૦ ભેદે છે આ પ્રમાણે આ શિ૯૫શત તેમજ કૃષિ, વાણિજ્ય વગેરે ત્રણ કર્મ કે જે ઉત્તમ મધ્યમ અને જઘન્યના ભેદથી ત્રણ પ્રકારના છે. અને જેમનાથી પ્રજાએ નનિર્વાહ થાય છે, તેમને અસ્પૃદય થાય છે–જાણવામાં આવે છે. सप्तमनिधि-लोहस्स य उत्पत्ती होइ महाकालि आगराणंच | रुप्पस्स सुवण्णस्स य मणिमुत्तसिलप्पवालाणं ||८ll એ મહાકાલ નામક નિધિમાં અનેક પ્રકારના લોખંડની ઉત્પત્તિ બતાવવામાં આવી છે. તેમ ચાંદી, સેનામણિ, મુક્તાશિલા રફટિક વગેરે તેમજ પ્રવાલ-મૂંગા વગેરેની ખાની ઉત્પત્તિ બતાવવામાં આવી છે, Page #871 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ.३ वनस्कारः सू० २७ दक्षिगाई गतभरतकार्यवर्णनम् ते तथा तेषां च सम्बन्धिनाम् आकराणां 'खानि' इति प्रसिद्धानामुत्पत्ति भवति महाकालनामनिनिधौ इति योगा। . अथाष्टमो निधिः अष्टमे माणवकाधिष्ठातृदेवस्य माणवकनिधिस्वरूपं तत्र च यानि सन्ति तान्याह -'जोहाण य' इत्यादि । तत्र योधानां शूराणां च शब्दात् कातराणामुत्पत्तिरभिधीयते तथा आवरणानां च शरीररक्षकाणां वस्तूनां कवचादीनामुत्पत्तिानं च यत्र प्रहरणानां स्वगादीनां च सर्वा च युद्धनीतिः गरुड़ शकटचक्रव्यूहरचनादि लक्षणा सर्वापि च दण्डनोतिः दण्डेन उपलक्षिता नीति दण्डनीतिः सामदामदण्डभेदतश्चतुर्विधा माणवकनाम्नि निधौ अभिधीयते ततः प्रवर्तते ज्ञायते इत्यर्थः । अथ नवमो निधिः अथ नवमे शङ्खाधिष्ठातृदेवस्य शङ्खनामक महानिधिस्वरूपं तत्र च येषामुत्पत्तिस्तामाह-' णट्ट विही' इत्यादि । तत्र सर्वोऽपि मनोहादजनक नृत्यविधिःद्वात्रिंशत्सहस्रभेदभिन्नगात्रसंचालनलक्षणनाटयकरणप्रकारः' सर्वोऽपि च नाटकविधिः द्वात्रिंशत् भेदभिन्न अभिनेयप्रवचनअष्टम निधि-जोहाण य उष्पत्ती आवरण णं च पहरणाणंच सव्वा य जुद्धीई माणवगे दंडणीइय'८' इस माणवक नामको आठवीनिधि में योद्धाओं की कायरो को आवरणों-शरीररक्षक कवचादि वस्तुओं की समस्त प्रकार के प्रहरणों-हथियारों की युद्ध नीति -गरुड, शकट, चक्रव्यूह आदिरूप से रचना वाले युद्धों की नीति की तथा साम-दाम, दण्ड, एवं भेद इन चार प्रकार की राजनितियों की उत्पत्ति कही गई होती है . अर्थात् इस निधि से इन समस्त वस्तुओं की उत्पत्ति का ज्ञान चक्रवर्ती को प्राप्त होता है ! नववीं निधि-णविहीणाडगविहो कव्वस्स य चउम्विहस्स उपत्ती संखे महाणिहिम्मि तुडिअंगाणंच सव्वेसि "९" इस शंखनाम की निधि में नाटयविधि की ३२ हजार नाटकाभिनयरूप अंग संचालन करने के प्रकार की नाटक विधि ३२ प्रकार के नृत्य गोत वाजों का अभिनेय वस्तु से मिलता अष्टमनिधि-जोहाण य उत्पत्ती आवरणाण च पहरणाणं च । सव्वा य जद्धणीई माणवगे दंडणीह य ॥८॥ એ માણવક નામક આઠમી નિધિમાં યોધ્ધાઓની, કાયરની–આવરણેની શરીર રક્ષક કવચાદિ વસ્તુઓની સમસ્ત પ્રકારના પ્રહરણે શો ની યુદ્ધનીતિ ગરુડ, શકટ, ચક્રબૃહ વગેરે રૂપમાં રચનાવાળા યુધોની નીતિની તેમજ સામ, દામ દંડ અને ભેદ એ ચાર પ્રકારની નીતિઓની ઉત્પત્તિ કહેવામાં આવે છે એટલે કે એ નિધિથી એ સમસ્ત વસ્તુઓની ઉત્પત્તિનું જ્ઞાન ચક્રવતીને પ્રાપ્ત થાય છે. नवमी निधि-णट्टविही णाडगविही कव्वस्स य चउब्धिहस्स उपपत्ती। संखे महाणिहिम्मि तुडिअंगाणं च सव्वेसिं ॥९॥ એ શંખ નામક નિધિમાં નાટયનિધિની ૩૨ સહસ્ત્ર નાટકાભિનય રૂપ અંગ સંચાલન કરવાના પ્રકારોની નાટયરિધિ રૂર પ્રકારના નૃત્ય-ગીતવાદ્યોની અભિનય વસ્તુથી સંબદ્ધ પ્રદર્શ Page #872 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८५८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे प्रपश्ञ्चनप्रकारः नृत्यवाद्यगीतादि यावन्नाटकम् प्रकारः इत्यर्थः तथा चतुर्विधस्य काव्यस्य ग्रन्थस्य धर्म १ अर्थ २ काम ३ मोक्ष ४लक्षण पुरुषार्थ निबद्धस्य अथवा संस्कृत १ प्राकृता २ पश३ संकीर्ण ४ भाषानिवद्धस्य गद्य १ पद्य २ व ३ चौर्ण ४ पदवद्धस्य वा उत्पत्तिः निष्पत्तिः तद्विधिः, तत्र आद्यं काव्यचतुष्कं धर्मार्थादि प्रसिद्धम् द्वितीयचतुष्के संस्कृतप्राकृतव प्रसिद्धमेव अपभ्रंशः तत्तद्देशेषु शुद्धतया भाषितम् सङ्कीर्ण भाषा शोरसैन्यादि भाषा तनिबद्धस्य तथा तृतीयचतुष्के गद्यम् अच्छन्दोबद्धं शस्त्रपरिज्ञाध्ययनवत्, पद्यं - छन्दोबद्धं विमुक्तयध्ययनवत् गेयम् निषाध ऋषभ - गान्धार - षड्ज-मध्यम- धैवत, परिशोधित तन्त्री लयसमन्वितं गेयं भवति तत्र गान्धाररीत्या बद्धं परिशोधितं गानयोग्यम्, गेयमिति, चौर्णम् बाहुलक विधि बहुलं गमपाठबहुलं निपात बहुलं निपाताव्ययबहुलम् ब्रह्मचर्याध्ययनपहुआ प्रदर्शन के प्रकार की तथा धर्म अर्थ काम और मोक्ष इन पुरुषार्थों के प्रतिपादन करने वाले ग्रन्थों को अथवा संस्कृत, प्राकृत अपभ्रंश और संकीर्ण इन चार प्रकार की भाषाओं - में निबद्ध ग्रन्थों को अथवा गद्य, पद्य, गेय और चौर्ण पदों बद्ध ग्रन्थ - इनकी और समस्त प्रकार के त्रुटिताङ्गों की निष्पत्ति होती है, इन में धर्मार्थादि पुरुषार्थं चतुर्थष्टय से निबद्ध जो चतुर्विध काव्य है वह तो प्रसिद्ध है तथा द्वितीय प्रकार का चतुर्विध काव्यभो जो कि संस्कृत प्राकृत भाषाओं में निबद्ध हुआ है. प्रसिद्ध है, अपभ्रंश काव्य निबद्ध होता है. तथा शौरसेनी आदि भाषाओं में जो काव्य निवद्ध होता है वह संकीर्ण भाषा निबद्ध काव्य है । तृतीय चतुष्क वह है जो भिन्न भिन्न देशों की भाषाओं में जो काव्य शस्त्र परिज्ञाध्ययन की तरह छन्दो रचना से निबद्ध नहीं होता है वह पथ काव्य है निषाघ, ऋषभ गान्धार षड्ज मध्यन और इन स्वरो में निबद्ध होता है और इन्ही के अनुरूप तन्त्रीलय आदि से समन्वित होता हुआ गाने के लायक होता है वह गेय काव्य है. जो काव्य ब्रह्मचर्याध्ययन पद की तरह बाहुलक विधि बहुल होता है । गम पाठ बहुत होता है । निपात बहुल होता है निपात अव्यय નના પ્રકારની તેમજ ધર્મ, અર્થ, કામ અને મેક્ષ એ પુરુષાર્થોનુ પ્રતિપાદન કરનારા ગ્રન્થાની અથવા સસ્કૃત, પ્રકૃત અપભ્રંશ અને સંકીણુ એ ચ૨ પ્રક:રની ભાષાએમાં નિબદ્ધ થ્રન્થાની અથવા ગદ્ય-પદ્ય ગેમ, અને ચૌર્ણ પદો થી બદ્ધ ગ્રન્થ-એમની અને સમસ્ત પ્રકારના ત્રુટિતાંગાની નિષ્પત્તિ હોય છે. એમાં જે ધર્યાં પુરૂષાથ ચતુષ્ટયથી નિમાઁ ચતુર્વિધ કાવ્યા છે તે તેા પ્રસિદ્ધ છેજ તેમજ દ્વિતીય પ્રકારના ચતુતિ ધ્ કાવ્યે પણ કે જે સરસ્કૃત, પ્રકૃત ભાષા એમાં તિબદ્ધ થયેલાં છે, પ્રસિદ્ધ છે. અપભ્રંશ કાવ્ય તે છે કે જે મન્ન મિન્ન દેશેાની ભાષાએમાં નિબદ્ધ હોય છે. તથા શૌરસેની વગેરે ભાષાઓમાં જે કાવ્યેા નિષદ્ધ હોય છે તે સંકીણુ ભાષા નિબદ્ધ કાવ્ય છે. તૃતીય ચતુષ્કમાં જે કાવ્ય શાસ્ત્ર પિ જ્ઞાઘ્યયનની જેમ છને રચનાથી નિબદ્ધ હાતુનથી તે પદ્ય કાવ્ય છે. નિષાધ, ઋષભ, ગાંધાર, ષડૂજ, મધ્યમ અને શ્વેત એ સ્વરમાં નિબદ્ધ હોય છે. અને એમના અનુરૂપજ તન્ત્રીલય વગેરેચી સન્ધિત થઈને ગાવાલાયક હોય તે ગેયકાવ્ય કહેવાય છે. જે કાવ્ય બ્રહ્મચર્યાધ્યયન પદની જે માહુલક બહુલ હોય છે. ગમ પાઠ બહુલ હોય છે. નિપાત । Page #873 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ०३ वक्षस्कारःसू०२७ दक्षिणागतभरत कार्यवर्णनम् ८५९ दवत् एतावद्गद्यादि चतुष्कपदबद्धस्य वा उत्पत्तिः शङ्खनामनि महानिधौं भवति । तथा त्रुटिताङ्गानांच तूर्याङ्गानां सर्वेषां गेयपदेन कथितानां वा तथा वाद्यभेदभिन्नाना मुत्पत्तिः शङ्खे महानिधौ भवतीति । यदा चक्रवर्ती स्व विजयं करोति तदनन्तरं गंगामुखवासिनो नवनिधयश्चक्रवर्त्तिनो भाग्योदयात् पातालमार्गेण चक्रवर्त्मधिष्ठितग्रामे आगत्य वसंत तथा यदा चक्रवर्त्तिनां प्रयोजनं जायते तदा ते निधयश्चक्रवर्त्ति पाखं भजन्ते तानेव निधीन् साधारणप्रकारेण अतः परं निरूपयन्नाह – 'चक्कड' इत्यादि । तत्र चक्राष्टप्रतिष्ठानाः प्रत्येकमष्ट चक्रेषु प्रतिष्ठानम् अवस्थानं येषां ते तथा, यत्र यत्र वाहयन्ते तत्र तत्र अष्टचक्रप्रतिष्ठिता एव वहन्ति, अत्र अष्टपदं चक्रशब्दात् पूर्वं प्रयोक्तव्यं पर प्रयोगः प्राकृतत्वादवसेयः अष्टोत्सेधाश्व अष्टौ योजनानि उत्सेधः उच्चैस्त्वं येषां ते तथा नव च योजनानीति गम्यते विष्कम्भाः विष्कम्भेण विस्तारेण नवयोजन विस्तारा इत्यर्थः, द्वादशयोजनानि दीर्घाः आयामाः मञ्जूषावत्संस्थिताः जाहृत्र्यांः बहुल होता है । वह चौर्ण काव्य है । इस आठवीं शङ्ख निधि में ही समस्त प्रकार के बाजों की उत्पत्ति होती है । जब चक्रवर्ती विजय प्राप्त करने को निकलता है तब गंगा मुखवासी ये नौ निधियां चक्रवर्ती के भाग्योदय से पाताल मार्ग से आकर चक्रवर्ती के रास्ते में आनेवाले ग्राम में : आकर वस जाती है । और जब चक्रवर्ती को कोई मतलब हांसिल करना होता है काम पड़ता है 1 तो फिर ये चक्रवर्ती के पास आ जाती है । चक्क पट्टाणा असेहा य णवय विक्खंभा । बारह दीहा मंजूस संठिया जण्हवी मुहे ||१०॥ प्रत्येक निधिका अवस्थान आठ २ चक्के ऊपर रहता है. जहां २ ये लेजाई जाती हैं। उस्सेध - उँचाईआठ २ यो-: योजन की इनकी लम्बाईसमुद्र में प्रवेश करती वहीं वहां वे आठ चक्रों के ऊपर प्रतिष्ठित हुइ हो जाती हैं । इनका जन को होता है. विस्तार इनका नौ योजन का होता है. बारह होती है. तथा इनका आकार मंजूषा के जैसा होता है जहां से गंगा वहां पर ये नौनिधियां रहती है ! મહુલ ડાય છે, નિપાત અવ્યય બહુલ હોય છે. તે ચૌણ કાવ્ય છે એ માઢમી શખ નિધિમાં સર્વ પ્રકારના વાઘોની ઉત્પત્તિ હાય છે જ જ્યારે ચક્રવતી' વિજ્ય પ્રાપ્તકરવા નીકળે છે ત્યારે ગંગામુખવાસી એ નવ નિધિ ચક્રવતીના ભાગ્યેાદયથી પાતાળ મા થી આવીને ચક્રવતીના મમાં પડનારા ગ્રામામાં આવીને વસી જાય છે. અને જ્યારે ચક્રવતીને કેઈ પણ કાર્યની સિદ્ધિ મેળવવી હાય છે કેાઈ કામ આવી જાય છેત્યારે એ સિદ્ધિએ ચક્રવતી પાસે આવી જાય છે. चक्कड पहाणा अस्लेहा य णव य विक्खभा । बारहदीदा मंजूस संठिया जान्हवी मुद्दे ॥ १० એમાંથી દરેક નિતુિં અવસ્થાન આઠ-આઠે ચક્રની ઉપર રહે છે, જ્યાં જ્યાં એ નિધિએ લઈજવામાં આવે છે ત્યાંત્યાં તેએ આઢચક્રો ની ઉપર છે. એમની ઉંચાઇ ( ઉત્સેધ ) આઠ આઠ ચેાજન જેટલી હાય છે, ચાજન જેટલા હાય છે. ૧૨ ચેાજન જેટલી એમની લખાઈ હૈાંય છે. પ્રતિષ્ઠિત થઈનેજ જાય એમના વિસ્તાર ૯ તેમજ એમના આકાર Page #874 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्मूद्धीपप्रज्ञप्तिसूत्रे गङ्गाया मुखे यत्र महानदीगङ्गा समुद्रं प्रविशति तत्र एते नवनिधयः सन्तीत्यर्थः तथा तत्र वैडूर्यमणिकपाटाः वैडूर्यमणिमयाः खचिताः कपाटाः येषां ते तथाभूताः, कनकमयाः सौवर्णाः, पुनः कथंभूताः विविधरत्नप्रतिपूर्णाः विविधैः अनेकप्रकारकैः रत्नः प्रतिपूर्णाः शशिसूरचक्रलक्षणाः शशिखरचक्राकाराणि लक्षणानि चिह्नानि येषां ते तथाभूताःअनुसमवदनोपपत्तिकाः अनुरूपा, समा अविषमा, वदनोपपत्तिः द्वाररचना येषां ते तथाभूताः नवनिधयः । तथा तत्र पल्योपमस्थितिका पल्योपमा स्थिति र्येषां ते तथाभूताः, निधिसदृग्नामान: निधिसदृशानि नामानि येषां ते तथाभूताः खलु निश्चये यत्र च निधिषु ते देवाः येषां देवानां ते एव निधयः आवासाः आश्रयाः कीदृशास्ते अक्रेयाः अक्रयणीयाः किमथमित्याह-आधिपत्याय आधिपत्यहेतवे कोऽर्थ तेषामाधिपत्यार्थी काश्चित् मूल्यदानादिभिः क्रेतुं न शक्नोति इति किन्तु पूर्व सुचरितमहिम्नै वेत्यर्थः वेरुलिय मणिकवाडा कणगमया विविहरयणपडिपुण्णा । ससिसूर चक्कलक्खण अणुसमवयणोववत्तीया ॥११॥ इनके किवाड वैर्यमणि के बने हुए होते हैं ये स्वयं स्वर्णमय होतो है अनेक रत्नों से ये प्रतिपूर्ण होती हैं. इनमें जो चिह्न होते हैं वे शशि के सूर्य के और चक्र के आकार के होते हैं.' इनके द्वारों की रचना अनुरूप और सम-अविषम होती है ।। पलिमोवमदिईया णिहिसरणामा य तत्थ खलु देवा । जेसिंते आवासा अक्किज्जा आहिवच्चा य ।१२। प्रत्येक निधि के रक्षक देव की स्थिति एक पल्योपम की होती है.जैसा निधि कानाम है वैसा ही रक्षक देवों का भी नाम होता है ये देव उन्हीं निधियों के सहारे पर रहते हैं. अतः ये निधियां उसके आवासरूप होती है.इन्हें कोई आधिपत्य के लिये खरीद नहीं सकता है ये तो भाग्यशाली चक्रवर्तियों को पूर्वचरित पुण्य प्रभाव से ही प्राप्त होती है ॥१२॥ મંજૂષા (પેટી) જે હોય છે. જયાંથી ગંગા સમુદ્રમાં પ્રવેશ કરે છે ત્યાં એ નવना२३ छ. वेरुलियमणिकवाडा कणगमया विविहरयणपडिपुण्णा। सिसूरचक्कलक्खण अणुसमवयणोववत्तीया ।१६॥ એમના કમાડ વૈર્યમણિના બનેલા હોય છે. એ સ્વર્ણમય હોય છે. અનેક રત્નથી એ પ્રતિપૂર્ણ હોય છે. એમનામાં જે ચિહ્નો હોય છે તે શશી, સૂર્ય અને ચક્રાકાર હોય છે. એમનો કારોની રચના અનુરૂપ અને સમ–અવિષમ હોય છે. पलिओवमट्टिईया णिहिसरणामाय तत्थखलु देवा । जेसिते आवासा अक्किज्जा आहिसच्चा य ।१२।। પ્રત્યેક નિધિના રક્ષક દેવની સ્થિતિ એક પપમ જેટલી હોય છે. જે નામ નિધિનું છે તે જ નામ થી તેના રક્ષક દેવે પણ સંબોધાય છે. એ દેવે તે નિધિઓના સહારે જ રહે છે, એથી એ નિધિએ તેમના આવાસ રૂપ હોય છે. આધિપત્ય મેળવવાની ઈચ્છાથી ઈપણ એમને ખરીદી શકતું નથી એ તો માત્ર ભાગ્યશાળી ચક્રવતીઓને પૂર્વચરિત પ્રય પ્રભાવથી જ પ્રાપ્ત થાય છે ૧રા Page #875 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कार-सू० २७ दक्षिणार्द्धगतभरतकार्यवर्णनम् ८६१ तत्र एते नवनिधयः प्रभूतधनरत्नसंचयसमृद्धा ये भरताधिपानां षट्खण्डभरतक्षेत्राधिपानां चक्रवर्तिनः वशमुपगच्छन्ति वश्यतां यान्ति, एतेन वासुदेवानां चक्रवर्तित्वेऽ. पि एतद्विशेषणप्रतिषेधो भवति ॥१३॥ अथ षट्खण्डदत्तदृष्टि भरतो यथोत्सहते तथा प्राह-'तए णं' इत्यादि । 'तए णं से भरहे राया अट्ठमभत्तसि परिणममाणंसि पोसहसालाओ पडिणिक्वमइ' ततः खलुस श्रीमद्भरतो महाराजा अष्टमभक्त परिणमति-परिपूर्णे जायमाने सति पौषधशालातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति एवंमज्जनघरप्पवेसो जाव सेणिप्पसे णि सदावणया जाव णिहिरयणाणं अट्ठाहियं महामहिमं करेइ' एवं मन्ननगृहप्रवेशः मज्जनगृहे स्नानार्थ प्रवेशो यस्य स तथा यावत्पादात् कृतस्नानः ततो निर्गच्छतीत्यादि बोध्यम् ततः श्रेणिप्रश्रेणिशब्दापनता श्रेणिप्रश्रेण्यः आह्वानं यावत् निधिरत्नानां प्रोतनवानाम् अष्टाहिका महोमहिमां एए णवणिहिरयणा पभूय धणरयणसमिद्धा । जेव समुवगच्छंति भरहाविव चक्कवट्टीणं ॥१३॥ इन नवनिधियों के प्रभाव से इनके अधिपति को अपार धन रत्नादिरूप समृद्धि का संचय होता रहता है. क्योंकि ये निधियाँ स्वयं अपार धन रत्नादि संचय से समृद्ध होती हैं । ये भरतक्षेत्र के छह खंडों का विजय करनेवाले चक्रवर्तियों के ही वश में रहती है इस तहर वासुदेव भी अर्धचक्री होते हैं. परन्तु वे उनके वश में नहीं होती हैं । क्योंकि ये तो पूर्ण चक्रवर्ती राजा के ही वश में रहती । (तएणं से भरहे राया अद्रमभत्तसि परिणममाणंसि पोसहसालाओ पडिणिस्वमइ) जब भरत नरेश को अदम भक्त की तपस्या परिपूर्ण हो गइ तब वह पौषधशाला से बाहिर निकला (एवं मज्जनघरप्पवेसो जाव सेणिप्पसेणो सद्दावेइ हाया जाव णिहिरयणाणं अट्ठाहियं महामहिमं करेह ) और निकल कर वह स्नान घर में गया-वहाँ अच्छी तरह से स्नान किया फिर वहां से निकल कर वह भोजनशाला में गया इत्यादि रूप से सब कथन पूर्वोक्त जैसा ही यहाँ पर कह लेना चाहिये इसकेबाद उसने श्रेणि प्रश्रेणिजनो को बुलाया और निधिरत्नों की वश्यता के उपलक्ष्य पए णवर्णािहरयणा पभूयधणरयणसमिद्धा । जेव समुवगच्छंति भरहाविव चक्कवट्टीणं ॥१३॥ એ નવનિધિઓના પ્રભાવથી એમના અધિપતિને અપરિમિત ધન-રત્નાદિ રૂપ સમૃદ્ધિનું સંચયન થતું રહે છે. કેમકે એ નિધિએ જાતે અપારધન-રતનાદિ સંચયથી સમૃદ્ધ હોય છે. એ ભરતક્ષેત્રનાં ૬ ખંડે ઉપર વિજય મેળવનાર ચક્રવતીઓના વશમાં જ રહે છે. આ પ્રમાણે વાસુદેવપણુ અર્ધચક્રી હોય છે, પણ એ તેમના વશમાં રહેતી નથી. કેમકે એઓ પૂર્ણ ५वती । शमा १ २७ छे. ( तपणं से भरहे राया अहमभत्तं सि परिणममोणंसि पोसहसालाओ पडिणिक्ख मह ) ४ारे भरतनरेशनी ममतनी तपस्या पर यह म त्यारे त पौषधशाणामांथा बहार नाय! (एवं मज्जनधरपवेसो जाब सेणिप्पसेणी सहावेइ हाया जाव णिहिरयणाण अठ्ठाहियं महामहिम करेइ) मने नीजीन स्नानઘરમાં ગયા. ત્યાં તેણે સારી રીતે સ્નાન કર્યું પછી ત્યાંથી નીકળી ને તે ભેજનશાળામાં ગયા ઇત્યાદિ રૂપથી બધું કરનpક્ત જેવું જ અહીં પણ અધ્યાહુત કરી લેવું જોઈએ, ત્યારબાદ --- - -- -- Page #876 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८६२ जम्बूद्धोपप्रतिसूत्रे करोति 'तए णं से भरहे राया णिहिरयणाणं अट्ठाहियाए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए सुसेणं सेणावइरयणं सदावेइ ततः रवलु स भरतो राजा निधिरत्नानां प्रोक्तनवानां वश्य. ता जनितोपलक्षितायाम् अष्टाहिकायां महामहिमायां निवृत्तायाम् सम्पन्नायाम् सत्यां सुषेणं तन्नामानं सेनापतिरत्नं सेनापतिश्रेष्ठ शब्दयति आवयति सदावित्ता एवं वयासी' शब्दयित्वा तम् आय एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् किमुक्तवान् इत्याह -'गच्छण्णं भो देवाणुप्पिया ! गंगा महाणईए पुरथिमिल्लं णिकावुडं दुच्चंपि सगंगासागरगिरिमेरागं समविसमणिक्खुडाणि य ओअवेहि ओअवेत्ता एयमाणत्तियं पच्चप्पिणाहित्ति' गच्छे खलु भो देवानुप्रिय ! सुषेण ! सेनापते गङ्गायाः तन्नाम्न्याः महानद्याः पौरस्त्यं पूर्व भागवत्ति द्वितीयमपि निष्कुटं कोणस्थित भरतक्षेत्रखण्डरूपम् इदं च कैर्विभाजितमित्याह-सगङ्गासागरगिरिमेरागं सगङ्गासागरगिरिमर्यादम् तत्र पश्चिमायां दिशि गङ्गा पूर्वदक्षिणयो दिशोः सागरौ, उत्तरस्यां दिशि गिरिः वैताढ्यपर्वतः कृताया मर्यादा क्षेत्रविभागरूपः तया सह वर्तते यतत्तथाविधम्, तथा 'समविसमणिक्खुडाणि य' समविषमनिष्कुटानि च तत्र समानि समभूमिभागवर्तीनि विषमाणि च उन्नतावनतदुर्गभूमिभागवतीनि च यानि निष्कुटानि अवान्तरभरतक्षेत्रखण्डरूपाणि तानि 'ओप्रवेहि' साधय विजयी भूत्वा तत्र स्वाज्ञां प्रवर्तय इत्यर्थः 'ओअवेत्ता' साधयित्वा विजयं प्राप्य एताम उक्तप्रकाराम् आज्ञप्तिको महयं प्रत्यर्पय इति 'तए णं से सुसेणे तं चेव पुव्यवणियं में आठ दिनों तक उत्सव करने का उन्हें आदेशदिया जब यह महोत्सव समाप्त हो चुका तब उसने सुषेण सेनापति रत्न को बुलाकर उससे ऐसा कहा - (गच्छण्णं भो देवाणुपिया गंगा महाणईए पुरिथिमिल्ल णक्खुडं दुच्चंपि सगंगासागरगिरमेरागं समविसमणिक्खुडाणि य ओअवेहि ओ. अवेत्ता एयमाणत्तियं पच्चप्पिणाहि) हे देवानुप्रिय ! सुषेण सेनापते ! तुम गंगानदी के पूर्व भागवर्ती भरत क्षेत्र वण्डरूप निष्कुट प्रदेश में जो कि पश्चिमदिशा में गंगा से पूर्व दक्षिणदिशा में दो सागरों से और उत्तर दिशामें गिरि वैताढ्य से विभक्त हुआ है. जाओ-तथा वहाँ के जो समविषम अवान्तर क्षेत्ररूप निष्कुट प्रदेश है. उन्हें अपने वश में करो वहाँ अपनी आज्ञा चलाओं और यह सब काम कर के फिर हमें इसको खबर दो (तएणं से सुसेणे तंचेव पुव्वતેણે શ્રેણી–પ્રશ્રેણીજનેને બોલાવ્યા અને નિધિરત્નોની વણ્યતાના ઉપલક્ષ્યમાં આઠ દિવસ સધી ઉત્સવ કરવાને તેમને આદેશ આપે. જ્યારે તે મહોત્સવ સમ્પન્ન થઈ ગયે. ત્યાર ते सेनापति २त्न माताये। अने तने मा प्रमाणे ह्यु. (गच्छण्णं भो देवाणुपिया गंगामहाणईप पुरथिमिल्लं णिक्खुई दुच्चपि सगंगासागरगिरिमेराग समविसर्माणक्खुडाणि य ओअवेहि ओअवेत्ता एयमाणत्तिय पच्चप्पिणाहि) देवा પ્રિય સુષેણુ સેનાપતે તમે ગંગા નદીના પૂર્વીભાગવતી ભરતક્ષેત્ર ખંડરૂપ નિષ્ફટ પ્રદેશમાં–કે ર પશ્ચિમ દિશામાં ગંગાથી, પૂર્વ દિશામાં બે સાગરેથી, અને ઉત્તર દિશામાં ગિરિ વૈતાચથી, વિભક્ત થયેલ છે -જાવે. તથા ત્યાંના જે સમ -વિષમ અ ાન્તર ક્ષેત્ર રૂપ નિષ્ફટ પ્રદેશ છે તે પ્રદેશોને તમે પિતાના વશમાં કરો. ત્યાં તમે પેતાની આજ્ઞા પ્રચલિત કરી Page #877 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारासू०२७ दक्षिणार्द्धगतभरतकार्यवर्णन म् ८६३ भाणियव्वं ततः स्वामिनो षदखंडाविपतिश्री मझरतराजस्य आज्ञप्त्यनन्तरं खलु स सुषेणः सेनापतिः तं निष्कुटं साधयतीत्यादि, तदेव पूर्ववर्णितम्-दाक्षिणात्यसिन्धुनिष्कुटवर्णितं तत्सर्वम् अत्रापि भणितव्यं वक्तव्यम् कियत्पर्यन्तमित्याह-'जाव ओअवित्ता' इत्यादि 'जाव ओअवित्ता तमाण त्तियं पच्चप्पिणइ पडिविसज्जेइ' यावन्निष्कुटम् साधयित्वा विजित्य ताम् उक्तानुसारिणीम् आज्ञप्तिकां स्वामिने भरताय प्रत्यर्पयति समर्पयति प्रतिविसर्जयति च तं सुषेणं सेनापतिं निजनिवासस्थानगमनाय स राजा भरतः आज्ञापयतीत्यर्थः 'जाव भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरई' विसृष्टः सन् स सुषेण: यावत्पदात् स्नातः इत्यारभ्य यावत्प्रासादवरं प्राप्तः सन् इष्टान् शब्दस्पर्शरसरूपगन्धान पञ्चविधान् मानुष्यकान् भोगभोगान् कामभोगान् तत्र शब्दरूपे कामौ स्पर्शरसगन्धाभोगाः इति तान् भुनानः अनुभान् विहरति तिष्ठति 'तएणं से दिवे चक्करयणे अन्नया कयाइ आउहघरसाला मो पडिणिक्खमई' ततो गङ्गादक्षिणनिष्कुटविजयानन्तरं खलु तद् दिव्यं चक्ररत्नम् अन्यदा कदाचिद् आयुधगृहशालातः प्रतिनिष्कामति निर्गच्छति'पडिणिक्खमित्ता'प्रतिनिष्क्रम्य बहिनिर्गत्य 'अंतलिक्खपडिवण्णे नक्खसहस्सवण्णिय भाणियव्वं) इस प्रकार की माज्ञा जब भरतमहाराजा ने अपने सुषेण सेनापति को दी तब उस सुषेण सेनापति ने उस निष्कुट को अपने वश में कर लिया इत्यादि रूप से जैसा वर्णन पीछे किया गया है. वैसा हो वह सब वर्णन यहाँ पर पीछे उसने इस बात की भरत राजा को खबर दी यहाँ तक का कर लेना चाहिये भरत नरेश ने उस सुषेण सेनापति को सत्कार एवं सन्मानित कर विसर्जित किया (जाव भोगभोगाइं भुं नमाणे विहरइ ) यावत्पद से यहाँ "उस सुषेण सेनापति ने घर पर पहुंच कर स्नान किया आदि रूप पीछे कहा गया सब पाठ यहाँ गृहीत हुआ है" इस तरह वह अपने श्रेष्ठ प्रासाद में रहता हुआ भोग भोगों को भोगने लगा (तएणं सं दिव्वे चक्करयणे अन्नया कयाइ आउघरसालाओ पडिणिक्वमह) गंगानदी के दक्षिण निष्कुट प्रदेशों को विजित कर लिया गया तब इसके बाद वह चक्ररत्न किसी भने मधु सम्पन्न श तमे अमन सूयना मापा. (तपणं से सुसेणे तं चैव पुष्ववणियं भाणियव्वं ) मा प्रा२नी माज्ञा न्यारे सरत न पाताना सुषेन सेनापतिने આપી ત્યારે તે સુષેણુ સેનાપતિએ તે નિકુટ પ્રદેશને પોતાના વશમાં કરી લીધા, વગેરે જે વર્ણન પહેલાં કરવામાં આવ્યું છે. તેવું જ બધું વર્ણન અહીં પણ સમજવું જોઈએ ત્યારબાદ તે સુષણ સેનાપતિએ એ વાતની ભરત રાજાને સૂચના આપી. ભરત નરેશે તે સુણ સેનાપતિને સરકાર અને તેનું સન્માન કર્યું અને ત્યાર બાદ તેને જવાની આજ્ઞા भापी. (जाव भोगभोगाई भुनमाणे विहरइ ) यावत् ५४थी मी त सुमेध सेनापति से ઘેર પહોંચીને સ્નાન કર્યું વગેરે રૂપમાં પાઠ પહેલાં વર્ણવવામાં આવેલ છે તે અહીં સંગૃહીત થયો છે. આ પ્રમાણે તે પિતાના શ્રેષ્ઠ પ્રાસાદમાં રહેતે અનેક ભેગેને ભેગવવા લાગ્યો. (तपणं से दिवे चकारयणे अन्नया कयाइ आउहघरसालाओ पडिणिक्खमह) ગંગાનદી ના દક્ષિણ નિકુટ-પ્રદેશને જયારે જીતી લીધા ત્યાર બાદ તે દિવ્ય ચક્રરત્ન કોઈ Page #878 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८६४ जम्बूद्वीपप्राप्ति संपरिवुडे दिव्धतुडिय जाव आपूरेते चेव विजयखंधावारणिवेसं मझ मज्झेणं गिगन्छ। दाहिणपरवत्यिम दिसिं विगोयं रायहाणि अभिमुहे पयाए यावि होत्था' तद् दिव्यं चक्ररत्नम् अन्तरिक्षप्रतिपन्नम् गगनतलस्थितम्, यक्षसहस्रसंपरिवृत्तम् यक्षसहस्त्रः युक्तम्, दिव्य त्रुटित यावत् अत्र यावत्पदेन दिव्यत्रुटिततलतालघनमृदङ्गपटुवादितदिव्यरवेण वाद्यविशेषमन्निनादेन शब्दबाहुल्येन गगनतलमिति ग्राह्यम् आपूरयदिव विन पस्कन्धावारनिवेशं मध्यपथ्येन-विजयस्कन्धावारस्य मध्यभागेन निर्गच्छति दक्षिण पाश्चात्यां दक्षिणपश्चिमां दिशं नैऋतींदिशं प्रत विनीता राजधानी लक्षीकृत्य अभिमुखं प्रयातं चाप्यभवत् आसीत् 'तए णं से भरहे राया जाव पासइ, पासित्ता हहतुट्ठजाव काटुंबिय पुरिसे सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! आभिसेकं जाव पच्चविणंति' ततः चक्ररत्नप्रस्थानानन्तरं खलु स भरती महाराजा यावत् पश्यति दृष्ट्वा हृष्टतुष्ट यावत् स राजा परखण्डाधिपतिर्भरतः कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति आयति शब्दयित्वा आहूय एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् क्षिप्रमेव शीघ्रमेव भो देवानुप्रिया ! आभिषेक्यम् अभिषेकयोग्यं यावत्प्रत्यर्पयन्ति । अथ प्रथम यावत्पदात् एकसमय आयुधगृहशाला से बाहर निकला और (पडिणिक्वमित्ता) निकल कर (अंतलिक्खपडिवण्णे जक्स्व सहस्स संगरिवुडे दिव्यतुडिय जाव आते चेव विनयक्खंधावारनिवेसं मज्झं मझेणं निगच्छइ दाहिणपञ्चस्थिमं दिसि विणोयं रायहाणिं अभिमुहे पवाए यावि होत्था) आकाश मार्ग से जाता हुआ वह चक्ररत्न जो कि एक हजार यक्षों से सुरक्षित था । दिव्यत्रुटित यावत् रव से आकाश मंडल को व्याप्त करता विजयस्कन्धाबार निवेश के ठीक बीच में से होकर निकला और नैऋती दिशा तरफ जो विनीता नामकी राजधानी है उस ओर चल दिया (तएणं से भरहेराया जाव पासइ) भरत नरेश ने विनीता राजधानी की ओर चक्ररत्न को जाते हुए जब देखा तो (पासित्ता हट्ठ तुट्ठ जाव कोडुंबिय पुरिसे सद्दावेइ) देखकर उसको हर्षका ठिकाना नहीं रहा उसने उसी वख्त कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया (सहावित्ता एवं वयासी) और बुलाकर उनसे ऐसा कहा (खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! आभिसेक्कं हत्थिरयणं जाव पच्चप्पिणति) हे देवानुप्रियो. समये भायुधशाणामाथी बहा२ नीयु भने ( पडिणिक्खमित्ता) जीन (अंत लिक्खपडिवण्णे जक्खसहस्ससंपरिबुडे दिव्वतुडिय जाव आपूरेंते चेव विजयखंधा वारनिवेस मज्झ मज्झेणं निगच्छह दाहिणपच्चत्थिमं दिसि विणायं रायहाणि अभिमुहे पयाए यावि होत्था) शमाथी प्रयाय ४२तुतेयत्न २ मे सस यक्षो થી સુરક્ષિત હતું–દિવ્ય–ત્રુટિત યાવત્ રવથી આકાશ મંડળ ને વ્યાપ્ત કરતું વિજ્ય સ્કંધાવાર નિવેશની ઠીક મધ્યમાંથી પસાર થઇ ને નીકળ્યું. અને નૈઋત્ય દિશા તરફ વિનીતા नाम शबानी छ, ते त२५ रवाना थयु (तपण से भरहे राया जाव पासइ भरत नरेश विनीत पानी त२३ २४२त्नने तु युत ( पासित्ता हट्ट-तुट्ट जाव कोडंबिय पुरिसे सदावेद ) त ५२म त यया तभर तरत होटुमि पुरुषोन मेय (सदावित्ता एवं वयासी ) मन मावीन तमन भरत नरेश मा प्रमाणे ह्यु -(खिप्पामेव भो देवाणुप्पिा आभिसे क्कं हत्थीरयणं जाव पच्चपिएणति) 3 हेवानुप्रियो Page #879 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८६५ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू. २७ दक्षिणार्द्धगतभरतकार्यवर्णनम् गगनत गादि विशेषणयुक्तं तद्दिव्यं चक्ररत्नमिति ग्राह्यम् । द्वितीय यावत्पदात् हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः प्रोतिमनाः परमसौमनस्थितः हर्षवश विसर्पद हृदयः इति ग्राह्यम् । तृतीय यावत्करणात् हस्तिरत्नं प्रतिकल्पयत, सेनाः सन्नाहयत इति आज्ञापयति स भरत तेच कौटुम्बिकपुरुषा। सवै कुर्वन्ति आज्ञां च प्रत्यर्पयन्ति समर्पयन्ति इतिग्राह्यम् ॥२७॥ . अथातमेवार्थ दिगविजयकालाद्यधिकार्थविवक्षया विस्तरवाचनया चाह"तएणं से,, इत्यादि। ___ मूलम् -तए णं से भरहे राया अज्जिअरज्जो णिज्जिअसत्तू उप्पण्ण सम्मत्तरयणे चक्करयणप्पहाणे णवणिहिवई समिद्धकोसे वत्तीसरायवरसहस्साणुयायमग्गे सट्ठीए वरिससहस्सेहिं केवलकप्पं भरहं वासं ओयवेइ ओयवेत्ता कोडुबियपुरिसे सदावेइ, सदावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! आभिसेक्कं हत्थिरयणं हयगयरह तहेव अंजणगिरिकूडसण्णिभं गयवइं गरवई दुरूढे । तएणं तस्स भरहस्स रण्णो आभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरूढस्स समाणस्स इमे अट्ठ मंगलगा पुरओ अहाणुपुव्वीए संपट्ठिआ तं जहा-सोत्थिअ सिविच्छ जाव दप्पणे, तयणतरं च णं पुण्णकलसभिंगार दिव्या य छत्तपडागा जाव संपट्ठिआ, तयणंतरं च वेरुलिअभिसंत विमलदंडं जाव अहाणुपुवीए संपट्ठिअं, तयणंतरं च णं सत्त एगिदियरयणा पुरओ अहाणुपुब्बी ए संपत्थिया, तं-चक्करयणे१, छत्तरयणे २, चम्मरयणे३, दंडरयणे ४, असिरयणे ५, मणिरयणे ६, कागणिरयणे ७, । तयणंतरं च ण णव महाणिहिओ पुरओ अहाणुपुबीए संपट्ठिआ, तं जहा णेसप्पे पंडयए जोव संखे, तयणंतरं च णं सोलस देवसहस्सा पुरखो अहाणुतुम लोगों शीध्र ही आभिषेक्य हस्तिरत्न को एवं सेना को सुसज्जित करो यावत् भरत नरेश के द्वारा आज्ञप्त हुए उन कौटुम्बिक पुरुषों ने आभिषेक्य हस्तिरत्न का एवं सेनाको सुसज्जित कर दिया. इसके बाद भरत नरेश के पास उनको आज्ञा को पूर्ति हो जाने की खबर भेज दी॥२७॥ તમે શીઘ આભિષકેય હસતીરત્નને તેમજ સેનાને સુજિજત કરે, યાવત ભરત નરેશ વડે આજ્ઞપ્ત થયેલા તે કૌટુંબિક પુરુષોએ અભિષેક્ય હસ્તિ-રતન તેમજ સેનાને સુસજિજત કરી ત્યારબાદ ભારત નરેશની પાસે તેમની આજ્ઞા પૂરી થઈ ચૂકી છે, તે અંગે ની સૂચના મોકલી ॥ सूत्र २७ ॥ .१०९ Page #880 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८६६ जम्बूद्वीपप्राप्तिसत्रे पुबीए संपट्ठिआ, तयणंतरं च णं बत्तीसं रायवरसहस्सा अहाणुपुबीए संपटिआ, तयणंतरं च णं सेणावइस्यणे पुरओ अहाणुपुवीए संपट्टिए, एवं गाहावइस्यणे वद्धइस्यणे पुरोहिअरयणे, तयणंतरं च णं इत्थिरयणे पुरओ अहोणुपुवीए संपट्टीए तयणंतरं च णं बत्तीसं उडुकल्लाणिआ सहस्सा पुरओ अहाणुपुबीए संपट्ठिआ तयणंतरं च णं बत्तीसं बत्तीसइबद्धा णाडगसहस्सा पुरओ अहाणुपुवीए संपट्ठिया तयणतरं च णं तिण्णि सट्ठा सुअसया पुरओ अहाणुपुबीए संपट्ठिया तयणंतरं चणं अट्ठारस सेणिप्पसेणीओ पुरओ अहाणुपुब्वोए संपट्ठिया तयणंतरं च णं चउरासीई आससयसहस्सा पुरओ अहाणुपुवीए संपट्ठिया तयणंतरं च णं चउरासीइं हथिसयसहस्सा पुरओ अहाणुपुव्वी संपट्ठिया तयणंतरं च छण्णउई मणुस्स कोडिओ पुरओ अहाणुपुबीए संपट्टिआ तयणंतरं च ण बहवे राईसरतलवर जाव सत्थवाहप्पभिईओ पुरओ अहाणुपुव्वीइ संपट्ठिया तयणतरं च णं बहवे असिग्गाहा लट्ठिग्गाहा कुंतग्गाहा चावग्गाहा चामरग्गाहा पासग्गाहा फलगग्गाहा परसुग्गाहा पोत्थयग्गोहा वीणग्गाहा अग्गाहा हडप्फग्गाहा दीविअग्गाहा सरहिं सएहिं रूवेहि, एवं वेसेहि चिंधेहिं निओएहिं सहि२ वत्थेहिं पुरओ अहाणुपुबीए संपत्थिया तयणंतरं च णं बहव दंडिणो मुंडिणो सिहंडिणो जडिणो पिच्छिणो हासकोरगा खेड्डकारगा दवकारगा चाडुकारगा कंदप्पिआ कुकुइआ मोहरिआ गायंता य दीवंता य (वायंता) नच्चंताय हसंता य रमंता य कीलता य सासेंता य सोवेंता य जावेंतायरावंताय सो ता य सोभावता य अलोअंता य जयजयसहं च पउंजमाणा पुरओ अहाणुपुत्वीए संपट्टिआ, एवं उववाइअगमेण जाव तस्स रण्णो पुरओ मह आसा आसधरा उभओपासिं णागा णागधरा पिट्ठओ रहा रहसंगेल्ली अहाणुपुबीए संपट्ठिआ इति । तए णं से भरहाहिवे णरिंदे हारोत्थए सुकयरइयवच्छे जाव अमरखइ सण्णिभाए इदीए पहियकित्ती चक्करयणदेसियमग्गे अणेगरायवरसहस्साणुयायमग्गे जाव समुद्दव भृऔपव Page #881 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारः सु० २८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णनम् ८६७ करेमाणे करेमाणे सव्विद्धीए सव्वज्जुईए जाव णिग्घोसणाइयरवेणं गामागरणगरखेडकब्बडमंडब जाव जोयणतरियाहिं वसहीहि वसमाणे वसमाणे जेणेव विणीआ गयहाणी तेणेव उपागच्छइ उवागच्छित्ता विणीआए रायहाणीए अदूरसामंते दुवालसजोयणायाम णवजोयणवित्थिपणं जाव बंधावारणिवेसं करेइ करित्ता बद्धइरयणं सदावेइ, सदावित्ता जाव पोसहसालं अणुपविसइ अणुपविसित्ता विणीयाए रायहाणीए अट्ठमभत्तं पगिण्हइ पगिण्हित्ता जाव अट्ठमभत्तं पडिजागरमाणे पडिजागरमाणे विहरइ ॥ सू.२८॥ छाया-ततः खलु स भरतो राजा अर्जितराज्यः निर्जितशत्रुः उत्पन्नसमस्तरत्नः चक्ररत्नप्रधानः नवनिधिपतिः समृद्धकोशः द्वत्रिंशद्राजवरसहस्रानुयातमार्गः षष्टया वर्षसहस्रः केवलकल्प भरतर्ष साधर्यात साधयित्वा कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति शब्दयित्वा एवम् अवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! आभिषेक्यं हस्तिरत्नं हयगजरथ तथैव अंजनगिरिकूटः सन्निभ गजपति नरपतिः दुरूढः । ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञः आभिषेक्यं हस्तिरत्नं दुरुढस्य सतः इमानि अष्टाष्ट मङ्गलकानि पुरती यथानुपूर्त्या संप्रस्थितानि तद्यथा-स्वस्तिक श्रीवत्स यावत् दर्पणः, तदनन्तरं च खलु पूर्णकलशभृङ्गारदिव्या च छत्रपताका यावत् संप्रस्थिता, तदनन्तरं च वैडूर्य दीप्यमान विमलदंडयावत् यथानुपूर्व्या संप्रस्थितम्, तदनन्तरं च खलु सप्त एकेन्द्रियरत्नानि पुरतः यथानुपूा संस्थितानि तद्यथा चक्ररत्नम् १ छत्ररत्नंर चर्मरत्न ३ दण्डरत्नम् ४ असिरत्नं ५ मणिरत्नं ६ काकणीरत्नं ७ तदनन्तरं च खलु नव महानिधयः पुरतो यथानुपूा संप्रस्थिताः, तद्यथा नैसप्पः पाण्डुका यावच्छङ्खः तदनन्तर खलु षोडशदेवसहस्राः पुरतो यथानुपूा संप्रस्थिताः, तदनन्तरं च खलु द्वात्रिंशद् राजवरसहस्राः यथानुपूा संप्रस्थिताः तदनन्तरं च खलु सेनापतिरत्नं पुरतो यथानुपूर्त्या संप्रस्थितम् एवं गाथापतिरत्न वद्धकिरत्नं पुरोहितरत्नं च, तदनन्तरं च खलु स्त्रीरत्नं पुरतो यथानु पूा संप्रस्थितम्, तदनन्तरं च खलु द्वात्रिंशत् ऋतु कल्याणिकाः सहस्राः यथानुपूर्त्या पुरत; संप्रस्थिताः, तदनन्तरं च खलु द्वात्रिंशत् जनपद कल्याणिसहस्राः पुरतः यथानुपूर्त्या संप्रस्थिताः, तदनन्तरं च खलु द्वात्रिंशत् द्वात्रिंशत् बद्धा नाटकसहस्त्राः पुरतः यथानुपूा संप्रस्थिताः तदनन्तरं च खलु त्रीणि षष्टानि रूपशतानि पुरतो यथानुपूर्त्या संप्रस्थितानि, तद नन्तरं च खल अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणयः पुरतो यथानुपूा संप्रस्थिताः, तदनन्तरं च खल चतुरशीतिरश्वशतहस्राः पुरतो यथानुपूर्व्या संप्रस्थिताः तदनन्तरं च खलु चतुरशीतिः हस्तिशतसइस्राः पुरतो यथानुपूर्या संप्रस्थिताः, तदनन्तरं च खलु षण्णवति मनुष्याणां कोटयः पुरतः यथानुपूर्त्या संप्रस्थिताः, तदनन्तरं च खलु बहवो राजेश्वर तलवर यावत् सार्थवाह प्रभृतयः पुरतो यथानुपूा संस्थिताः तदनन्तरं च खलु बहवः असिग्राहाः, यष्टिग्राहाः कुन्तग्राहाः, चापग्राहाः, चामरग्राहाः, पाशमाहाः, फलकग्राहाः, परशुग्राहाः, पुस्तकग्राहाः, वीणाग्राहाः, कुंतग्राहाः, हडप्फग्राहः, दीपिकाग्राहाः स्वकैः स्वकैः रूपैः एवं वेषः चिह्नः नियोगैः स्वकैः स्वकैः पुरतो यथानुपूर्व्या संप्रस्थिताः तदनन्तरंः च खलु बहवो दण्डिनो मुण्डि नः शिस्त्रण्डिनः जटिनः पिच्छिनः हास्यकारकाः खेड्डकारकाः द्रवकारकाः . चाटुकारकाः कान्दपिकाः कौत्कुच्यकारिणः मुखराः गायन्तश्च वादयन्तश्च नृत्यन्तश्च हसन्तश्च रममाणा Page #882 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रै श्व क्रोडयन्तश्च शासयन्तश्च श्रावयन्तश्च रावयन्तश्च शोभमानाश्च शोभयन्तश्च आलोकमानाश्च जयजयशब्दं च प्रयुञ्जानाः पुरतो यथानुपूा सम्पस्थिताः एवम् औपपातिकगमेन यावत् तस्य राक्षः पुरतो महाश्वाः अश्वधराः उभयतः पार्श्वयोः नागाः नागधराः पृष्ठतः रथाः रथसङ्गेल्यः यथानुपूल संस्थिताः इति । ततः खलु स भरताधिपो नरेन्द्रः हारावस्तृतः सुकृतरतिदवक्षस्को यावत अमरपतिसन्निभया ऋद्धथा प्रथितकीत्तिः चक्ररत्नदेशितमार्गः अनेकराजवरसहस्रानुयातमार्गः यावत् समुद्ररवभूतामिव कुर्वन् कुर्वन् सर्वद्धर्या सर्वद्युत्या यावन्नि?षनादितरवेण ग्रामाकरगरखेटकर्बटमडम्ब यावत् योजनान्तरिताभि वसतिभिः वसन् वसन् यत्रैव विनीता राजधानी तत्रैवोपागच्छति उपागत्य विनीताया राजधान्याः अदूरसामन्ते द्वादशयोजनायाम नवयोजन विस्तीर्णं यावत् स्कन्धावारनिवेशं करोति कृत्वा वद्धकिरत्नं शब्दयति शब्दयित्वा यवत् पौषधशाला मनुप्रविशति अनुप्रविश्य विनीतायाः राजधान्याः अष्टमभक्त प्रगृह्णाति प्रगृह्य यावत् अष्टमभक्त प्रतिजाग्रद् प्रतिजापद् विहरति ।।सू० २८|| टीका-'तएणं से' इत्यादि । 'सएणं से भरहे राया' ततः तदनन्तरं खलु स भरतो राजा 'अज्जियरज्जो' अनितराज्यः तत्र अर्जितं बाहुबलाद् उपार्जितं राज्यं येन स तथाभूतः तथा 'णिज्जिय सत्त' निर्जितशत्रु: तत्र निर्जिताः वशीकृताः शत्रयो रिपवो येन स तथाभूतः, तथा 'चक्करयणप्पहाणे' चक्ररत्नप्रधानः तत्र चक्ररत्नं प्रधानं सर्वरत्नेषु श्रेष्ठं यस्य स तथाभूतः तथा 'णव णिहिवई' नवनिधिपतिः तत्र नवानां नेसर्प पाण्डुकादि नामकानां निधीनां पतिः तथा 'समिद्धकोसे समृद्धकोश:न्तत्र समृद्धः सम्पन्नः कोशः भाण्डागारः यस्य स तथाभूतः तथा 'बत्तीसरायवरसहस्साणुयायमग्गे' द्वात्रिंशद्राजवरसहस्त्रानुयातमार्गः तत्र द्वात्रिंशद्राजवरसहस्रैरनुयातः अनुगतः मार्गों यस्य स तथाभूतः महाराजाश्रीभरतस्य पृष्ठभागे अनेके राजमु प्रवरा मुकुटधारिणो राजानः भरतप्रदर्शितमार्गे प्रचलन्तीत्यर्थः एवंभूतः (तएणं से भरहे राया अज्जि अरज्जो णिज्जियस त्त)-इत्यादि टोकार्थ-(तएणं भरहे राया अज्जियरज्जो णिज्जियसत्तू) इसके बाद जिसने अपने बाहु बल से राज्य को उपार्जित किया है और शत्रुओं को जिसने परास्त कर अपने वश में कर लिया है ऐसे उस भरतमहाराजा ने (चक्कर यणप्पहाणे) कि जिसके समस्त रत्नों में एक चक्ररत्न तो प्रधान है. (णवणिहिवइ) तथा जो नौ निधिओं का अधिपति बन चुका है (समिद्धकोसे) कोश-भाण्डागार-जिसका कोष बहुत सम्पन्न है । (बतीसरायवरसहस्साणुयायमग्गे)३२ बत्तीस हजार मुकुटबद्ध उत्तमराजवंशी राजा जिसके पोछे २ चलते हैं । (सट्टीए वरिससहस्सेहिं केवल टीज-तपणं से भरहे राया अज्जिअरजो णिज्जियसत्त) त्या२णारे भरत शलये પિતાના બાહુબળથી રાજ્યપાર્જિત કર્યું છે અને શત્રુઓન જેણે પરાસ્ત કર્યા છે અને પિતાન Avi र्या छ, मेवात सरत भड। २० मे. (चक्करयणप्पहाणे)ना समस्त २त्तामा मे यरत्ननी प्रधानता छे. (णवणिहिवइ) तथा नवनिधि माने। अधिपति थ यूध्ये छ, ( समिद्धकोसे ) शमाए ॥२ रेन। पति-सम्पन्न छ. (वत्तीसरायवर सहस्सागुयायमग्गे) ३२ र भुटप २०४१ शीशन नी पा -या या छे. (सटोप वरिस सहस्सेहिं केवल कप्पं भरहं वार्स ओअवेइ) १० १२ वर्ष सुधा विनय यात्रा पशन Page #883 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू०२८ राज्योपाजनानन्तरीयभर त कार्यवर्णनम् ८६.९ सन् स षट्खण्डाधिपति भरतो राजा' सट्टीए वरिससहस्सेहिं केवलकप्पं भरहं वासं ओअवेइ' षष्टया वर्षसहस्त्रैः षष्टिसहस्रसंख्यकवर्णैः केवलकल्पम् - परिपूर्ण भरतवर्षं साधयति शत्रून् विजित्य स्वाधीनं करोतीत्यर्थः ' ओअवेत्ता' साधयित्वा 'कोडुंबिय पुरिसे सद्दावेइ ' कौटुम्बिक पुरुषान् शब्दयति आह्वयति 'सद्दावित्ता एवं वयासी' शब्दयित्वा अहूय एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् 'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ।" क्षिप्रमेव शीघ्रमेव भो देवाणुप्रियाः ! 'आभिसेक्कं हत्थिरयणं हयगयरह तहेव अंजणगिरिकूड सण्ण गवई रवई दुरूढे ' आभिषेक्यम् पट्टहस्तिरत्नम् हस्ति श्रेष्ठम् इदं च पदं इस्ति वर्णकस्मारकम्, तथा हयगजरथेति पदं सेनासन्नाह स्मारकम् तथैव पूर्ववदेव तेनैव प्रकारेण स्नानविधि भूषणविधि सैन्योपस्थितहस्तिरत्नोपागमनानि वक्तव्यानि अञ्जनगिरिकूटसन्निभम् – अजन पर्वतशृङ्गसदृशम् सादृश्यं च कृष्णवर्णत्वेन उच्चत्वेन च बोध्यम् एवंविधं गजरत्नं हस्तिश्रेष्ठं नरपतिः भरतो राजा दुरूढः आरूढवान् 'तरणं तस्स भरहसरण आभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरुढस्स समाणस्स इमे अट्ठ मंगलगा पुरओ अहाणु पं भरहं वासं ओमवेंइ ) ६० हजार वर्ष तक विजय यात्रा कर सम्पूर्ण इस भारत क्षेत्र को अपने वश में किया (मोभवेत्ता कोडुंबियपुरिसे सदावेइ) इस प्रकार से सम्पूर्ण भारत को साघ कर - अपने वश कर भरत राजा ने अपने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया (सदावित्ता एवं वयासी) और बुलाकर उनसे ऐसा कहा - (खिप्पामेव भो देवाणुपिया ! आभिसेक हत्थिरयणं हयगयरह तव अंजणगिरिकूडसण्णिमं गयवई णरवई दुरूढे ) हे देवानुप्रियो ! तुम लोग शोध ही आभिषेक्य हस्तिरत्न को और हयगजरथ एवं प्रवर सैन्य को इत्यादि रूप से पूर्व की तरह यहाँ पर स्नानविधि, भूषणविधि सैन्योपस्थिति, एवं हस्तिप्नोपस्थिति कहलेनी चाहिये | भरत महाराजा अंजनगिरि के शिखर जैसे गजरत्न पर आरूढ हो गये । यहां हस्तिरत्न को जो अजनिगिरि के कूट जैसे कहा गया है, उसका कारण हस्तिरत्न को कृष्णता और ऊँचाई है । (तणं तस्स भरहस्त रण्णो आभिसेवकं हत्थिरयणं दुरूढस्स समाणस्स इमे अट्ठ- गलगा पुरओ अहाणुपुवीए संपट्टिया) जब हस्तिरत्न पर आरूढ हुए भरत राजा चलने को तैयार मे भरतक्षेत्र ने पोताना शमां यु. ( ओअवेत्ता कोडुंबियपुरिसे सदावेद्द) मा प्रभा સંપૂર્ણ ભારતને સાધીને-પેાતાના વશમા કરીને ભરત રાજાએ પેાતાના કૌટુંબિક પુરુષોને साव्या. (सद्दावित्ता एवं वयासो) भने साने ते पुरुषोने ते राम मा प्रमाणे. (विपामेव भो देवाणुपिया आभिसेक्कं हत्थिरयणं हयगयरह तहेव अंजगिरिकूडसणिभं गयवई णरवई दुरूढे) हे हेवानुप्रियो तभे यथाशीघ्र आभिषेज्य हस्ति રત્ન ને અને હય ગજ રથ તેમજ પ્રબલ સૈન્યને સુસજ્જ કરેા. ઇત્યાદિરૂપમાં અહીઁ પહેલાંની જેમજ સ્નાનવિધિ, રૌન્ચાપસ્થિતિ તેમજ હસ્તિરત્નાપસ્થિતિ જાણી લેવી જોઇએ. ભરત મહા રાજા અજન ગિરિના શિખર જેવા ગજરત્ન ઉપર આરૂઢ થઇ ગયા. અહીં હસ્તિરત્નને જે અંજન ગિરિના ફ્રૂટ જેવુ કહેવામાં આવ્યું છે, તેનું કારણુ હસ્તિરત્નની કૃષ્ણુતા અને ઉંચાઇને वर्धने उडेल छे. (तपणं तस्स भरद्दस्स रण्णो अभिसेक्कं हत्थिरयण दूरूढस्स समाणस्स इमे Page #884 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८७० जम्बूद्वोपप्रप्तिसूत्रे पुवीए संपट्टिा' ततः खलु भरतस्य राज्ञ आभिषेक्यम् अभिषेकयोग्यं हस्तिरत्नं दुरुढस्य आरूढस्य सतः इमानि स्वस्तिकादीनि अष्टाष्टमङ्गलकानि पुरतः अग्रे यथानुपूां यथाक्रम संप्रस्थितानि चलितानि कानि च तानि इत्याह- ' तं जहा' इत्यादि 'तं जहा-सोत्थिय सिरिवच्छ जाव दप्पणे' तद्यथा-स्वस्तिक,१ श्रीवत्स २, यावत् दर्पणाः३। अत्र यावत्पदात् नन्दिकावर्त४, वर्धमानक५, भद्रासन६, मत्स्य, कलशाः८, इति ग्राह्यम् 'तयणंतरं च णं पुण्णकलसभिंगार दिव्या य छत्तपडागा जाव संपट्ठिया' तदन्तरं च खलु पूर्णकलशभृङ्गाराः तत्र पूर्णजलभृतः कलशः भृङ्गाराश्चेत्यर्थः तत्र कलशाः लोकप्रसिद्धाः भृङ्गाराः पात्र विशेषाः ज्झारी' इति भाषाप्रसिद्धाः समाहारद्वंद्वादेकवद्भावः नपुंसकत्वञ्च इयं कलशादि जलपूर्णत्वेन चित्रलिखितकलशादिना भिन्ना तेन चित्रलिखित कलशादिभ्यो न पौनरुक्त्यमित्यर्थः। दिव्या प्रधाना चः समुच्चये स च व्यवहितसम्बन्धः छत्रपताका च यावत्पदात् 'सचामरा दंसणरइय आलोयदरिसणिज्जा वाउद्ध्यविजयवेजयंती अन्भुस्सिया गगणतलमणुलिहंती पुरभो अहाणुपुबीए' इति ग्राह्यम् तेन तत्र सचामरा - चामरयुक्ता दर्शने प्रस्थातु र्दष्टिपथे रचिता मङ्गल्यत्वात् अतएव आलोकेशकुनानुकूल्यदर्शने दर्शनीया द्रष्टु योग्या वातोद्धृत विजयवैजयन्ती वातेन, वायुना उद्धता कम्पिता विजयसूचिका वैजयन्ती पार्श्वतो लघुपताकाद्वययुक्तः पताका विशेषाः हुए तो उनके आगे आठ आठ की संख्या में आठ मंगल द्रव्य सर्वप्रथम प्रस्थित हुए (तं जहा) वे आठ मंगल द्रव्य नामतः इस प्रकार से हैं-(सोत्थिय, सिरिवच्छ जाव दप्पणे) स्वस्तिक श्रीवत्स, यावत् नन्दिकावर्त, वर्द्धमानक, भद्रासन, मत्स्य, कलश, एवं दर्पण (तयणंतरं च णं पुण्णकुलसभिंगार दिव्वाय छत्तपडागा जाव संपट्टिया) इनके बाद पूर्ण कलश-निर्मल जल से भरा हुआ कलश भृङ्गार- झारी एवं दिव्य प्रधान छत्रयुक्त पताकाएँ यावत् प्रस्थित हुई । यहाँ यावत्पद से "सचामरा दंसणरइय आलोय दरिसणिज्जा वाउद्धय विजयवेजयंति अभुस्सिया गगणतलमणुलिहंती पुरो अहापुवीए" इस पाठ का संग्रह हुआ है (तयणंतरं च वेरुलिय भिसंत विमल दंड जाव अहाणुपुवीए संपट्टियं) इनके बाद वैडूर्यमणि निर्मित विमल दण्ड वाला छत्र प्रस्थित हुआ यहां यावत्पद से-"पलंब कोरंट मल्ल दामोवसोहियं चंदमंडलनिभं ससित्तूयं विमलं आयवत्तं पवरं सिंहासणं च मणिरयणपायपीढं स पाउआ जोगसमाउत्तं बहुकिंकर कम्मकर पुरिसपायत्त परिक्खिअट्ठमंगलगा पुरमओ अहाणुपुवीए संपट्ठिया) ॥२ स्तिरत्न ५२ समा३० थये। भरत महा રાજા ચાલવા પ્રસ્તુત થયા તે તેમની આગળ આઠ-આઠની સંખ્યામાં આઠ મંગળ દ્રવ્ય सब प्रथम प्रस्थित थयां. (तं जहा) मा भगत-द्रव्ये ना नामे। प्रभारी छ-(सोत्थिय सिरिवच्छ जाव दप्पणे ) स्वस्ति, श्रीवत्सयावत नवित्त वद्ध भान४, भद्रासन, मत्स्य ४थ मने ६५.५ (तयणंतरं च णं पुण्णकलसभिंगार दिव्वा ‘य छत्तपडागा जाव सपट्टिया ) त्यामा पूर्ण ४५श ११ सरित ४१श २ आरी तमा हिय प्रधान छत्रयुत तास। यावत प्रस्थित थ ही यात ५४थी (सबामरा दसणरइय आलोय Page #885 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारःसू०२८ राज्योपार्जनानन्तरीय भरतकार्यवर्णनम् ८७१ सर्वत्र विशेषण समासः 'अब्भुस्सिया ' अत्युच्छ्रिता अत्युन्नता अतएव गगनतलम तुलिखन्ति पुरतः अग्रतः यथानुपूर्व्या यथाक्रमं सम्प्रस्थिता प्रचलिता पूर्णघटादयो विजयवैजयन्ती च उक्तविशेषणविशिष्टा सत्यः अत्युच्चतया पुरतः यथाक्रमं सम्प्रस्थिता इत्यर्थः ' तयणंतरं च वेरुलिय भिसंतविमलदंडं जाव अहाणुपुत्रीए सम्पद्वियं' तदनन्तरं च वैडूर्यमयः रत्ननिर्मितः ‘भिसंतत्ति' दीप्यमानो विमलो दण्डो यस्मिंस्तत्तथा भूतम् वैडूर्यमणिरत्नमिति खचितदण्ड़विशिष्टं छत्रमित्यर्थः । इदं च पदं यावत्पदान्तरगताऽतपत्र विशेषणम् यावत्पदात् 'पलंच कोरण्ट मल्लदामोव सोहियं चंदमंडलनिभं समृसियं विमलं आयवत्तं पवरं सीहासनं च मणिरयणपायपीढं सपाउआजोगसमाउत्तं बहुर्किकरकम्मकरपुरिसपायत्त परिक्खितं पुरओ अहाणुपुव्वीए संपहियं त्ति' इति ग्राह्यम् पुनः कीडशमात्तपत्रं छत्रम् प्रलम्ब कोरण्टमाल्यदामोपशोभितम् प्रलम्बेन लम्बमानेन कोरण्टस्य कोरण्टनामक पुष्पस्य माल्यदाम्ना - पुष्पमालया उपशोभितं पुनः कीदृशं चन्द्रमण्डलनिभ ं चन्द्रमण्डलसदृशम् उज्ज्वलत्वात् समुच्छ्रितम् ऊर्ध्वोकृतं विमल धवलमातपत्रं छत्रम्, प्रवरं श्रेष्ठ सिंहासनं च ततः सिंहासनविशेषणानि प्रोच्यन्ते मणिरत्न इत्यादीनि तत्र मणिरत्नमयं पादपीठं यत्र चरणौ निक्षिप्य सिंहासनोपरि समानीतो भवति तत्पादपीठमुच्यते पुनः कीदृशम् - स्वपादुकायोगसमायुक्तम्- स्वः स्वकीयो यो पादुकायोगःतं पुरओ अहाणुपुवीए संपट्टियं त्ति" इस पाठ का संग्रह हुआ है इस पाठगतपदों की व्याख्या इस प्रकार से है जो छत्र प्रस्थित हुआ वह कोरण्ट पुष्पों की लम्बी २ दो मालाओं से सुशोभित था । चन्द्रमण्डल के जैसा उज्वल था तथा वह बन्द नहीं था । खुला हुआ था और ऊँचा था एवं आगन्तुक मैल से यह रहित था । इसलिए विमल था । इसके बाद सिंहासन प्रस्थित हुआ यह सिंहासन मणिरत्न के बने हुए पादपीठ से युक्त था । इसी पर पैर रखकर राजा उस सिंहासन पर चढ़ता था तथा यह सिंहासन पादुकायोग से समायुक्त था । खड़ा रखने के स्थानद्वय से सहित था । अनेक किङ्कर एवं पदातियाँ के समूह से परिक्षिप्त था। चारों ओर से घिरा हुआ दरिसणिजा वाउय विजयवेजयंति अम्भुसिया गगणतलमणु लिहंति पुरओ अहाणुपुव्वीप" थे पाहता संग्रह थये। छे. (तयणंतरंच वेरुलिय भिसंत विमल दंड जाव अहाणुपुव्वीए संपट्टियं) त्यार माह वैडूर्यमा निर्मित विभस इंडयुक्त छत्र अस्थित थयु. अहीं यावत् पडथी " ( पलंबकोरंटमल्लदामोव सोहियं चंद मंडलनिभं समूसियं विमलं आयवत्तं वरं सीहासणं च मणिरयणपायपीढं सपा आजोगसमा उत्तं बहुकिंकरकम्मकरपुरिस पायत्तपरिक्खित्तं पुरओ अहाणुपुव्वीप संपत्ति ) ये पाठनो संग्रह थयो छे. खे પાઢગત પદેાની વ્યાખ્યા આ પ્રમાણે છે. જે છત્ર પ્રસ્થિત થયું તે કારટ પુષ્પાની લાંખી લાંખી માળાએથી સુશેાભિત હતુ, તે ચન્દ્રમડલ જેવું ઉજ્જવળ હતુ. તેમજ તે અંધ નહેતુ પ્રસ્ફુટિત હતુ. અને ઉંચુ હતુ અને આગન્તુક મેલથી એ રહિત હતું, એથી એ વિમળ હતું. ત્યાર ખાદ સિંહાસન પ્રસ્થિત થયુ' એ સિહાસન મણિરત્ન નિર્મિત પાણી Page #886 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पादरक्षणयुगं तेन समायुक्तम्, पुनः कीदृशं तत् बहुकिङ्कर कर्मकर पुरुषपादात परिक्षिप्तम्, बहुकिङ्कराः प्रतिकर्मपृच्छाकारिणः स्वामीनमापृच्छय कार्यकारिण इत्यर्थः भृत्याः कर्मकराः कार्यकणिः ततो ऽन्यथाविधास्ते च ते पुरुषाचेति बहुकिङ्करकर्म कर पुरुषास्तैः पदातीनां समूहः पादातं पदातिसमूहस्तेन च परिक्षिप्तं सर्वतो वेष्टितं वैधृतत्वादेव पुरतो यथानुपूर्व्या यथाक्रमं संप्रस्थितम् 'तयणंतरं च णं सत्त एगिंदिय दियरयणा पुरओ अहाणुपुवीए संपत्थिया' तदन्तरं च खलु सप्त एकेन्द्रियरत्नानि पृथिवी परिणामरूपाणि पुरतः संप्रस्थितानि चलितानि कानि च तानि इत्याह ' तं जहा ' इत्यादि ' तं जहा चक्करयणे १, छत्तरयणे२, चम्म त्यणे३, दंडरयणे, असिरयणे५, मणिरयणे ६, कागिणिरयणे ७ तद्यथा चक्ररत्नम् १, छत्ररत्नम् २, चर्मरत्नम् ३, दण्डरत्नम् ४, असिर त्नम् ५, मणिरत्नम् ६, काकणीरत्नम् ७ । ' तयणंतरं च णं णव महाणिहिओ पुरओ अहाणुपुत्रीए संपट्टिमा' तदन्तरं च खलु नत्र महानिधयः नैसर्पादि शङ्खान्ताः पुरतः अग्रतो यथानुपूर्व्या यथाक्रमं संप्रस्थिताः पातालमार्गेणेति गम्यम् अन्यथा तेषां निधिव्यवहार एव न सङ्गच्छते, तदेव निधिनां निधित्वं यत् भूम्यामधोऽवस्थायित्वं तद् यदि चक्रवर्तिना सह उपरि चलेत्तदा तेषां निवित्वमेव अतस्ते निघय उपरि यच्छत्रश्चकथा । (तयतरं च पत्त एगिंदियरयणा पुरमो अहाणुपुत्रीए संपत्थिया) इसके बाद सात एकेन्द्रिय रत्तु-चक रत्न, छत्ररत्न, चर्मरत्न, दण्डरत्न, असिरत्न, मणिरत्न और काकणोरत्न – ये सब रत्न यथानुपूर्वी चले ( तयणंतरं च णं णव महाणिहिओ अहाणुपुवीए संपट्टिया) इनके बाद पाताल मार्ग से होकर नौ महानिधियां प्रस्थित हुई । निधियों में यही निधित्व है । कि वे भूमि के नीचे रहती है ये अगर चक्रवर्ती के साथ ऊपर होकर दिखती हुई चले तो उनका निधित्व ही समाप्त हो जावेगा । इसलिए ये चक्रवर्ती को लक्ष्य करके भीतर २ हो चलती है । इन निधियों के नाम नैसर्प पाण्डुक यावत् शंख है। यहां यावत्पद से ये अवशिष्ट छह निधियां गृहीत हुई हैं- उनके नाम इस प्रकार से हैं- पिंगलक, सर्वरत्न महापद्म, काल, महाकाल, माणवक और થી યુક્ત હતું. એની ઉપર પગ મૂકી ને રાજા તે સિ`હાસન ઉપર આરૂઢ થતા હતા. એ સિહાસન પાદુકાયગ થી પણુ સમાયુક્ત હતુ. એટલે કે ખડાઉ મૂકવાના સ્થાનય યુક્ત હતુ અને કિંકરા, કકરેા તેમજ પદ્યાતીએના સમૂહોથી પરિક્ષિપ્ત હતુ. મેર એ सर्वथा व्यास हेतु ( तयण तरंच णं सत्त पगिदियरयणा पुरओ अहाणुपुव्वोप संपत्थिया) ત્યાર ખાદ સાત એકેન્દ્રિયરત્ન -ચક્રરત્ન, છત્રરત્ન, ચમ રત્ન, દડરન, અત્તિરત્ન મણિરત્ન, रत्न से सरत्नो यथानुपूर्वी यादयां - ( तयणंतरंच णं णव महाणिहिमो पुरंओ अहाणुपुप संपडिया) त्यारमाह याताज भार्ग थी थपने नव महानिधियो પ્રસ્થિત થયા. નિધિએમાં એજ નિધિત્વ છે કે તેએ ભૂમિની નીચે રહે છે. જો એ નિધિએ ચક્રવતી ની સાથે ઉપર થઈને બધાં જઈ શકે એવી રીતે ચાલે તે તેમનુ નિધિત્વજ સમાપ્ત થઇ જશે. એથી ચક્રવતી ને લક્ષ્ય કરીને તેએ અંદર જ ચાલે છે. આ નિધિએના નામે નૈસર્પ, પાંડુક યાવત્ શંખ છે. અહીં યાવત પદથી અવશિષ્ટ નિધિયા સંગ્ ८७२ Page #887 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारः सू०२८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णनम् ८७३ बर्तिन लक्षीकृत्य भूम्यामधोभागे एव प्रचलति इतिभावः। केचते इत्याह- . 'सं जहा' इत्यादि 'तं जहा-णेसप्पे पंडुयए जाव संखे' नैसर्पः१ पाण्डुकः२ यावच्छंखः अत्र यावत्पदात् पिङ्गलकः३, सर्वरत्नम्४, महापद्मम् ५, कालश्च६, महाकाल:७, माणवको महानिधिः८, शङ्क:९ एतेषां ग्रहणे एतेषामर्थाः पूर्वसूत्रे द्रष्टव्याः 'तयणंतरं च णं सोलस देवसहस्सा पुरओ अहाणुपुवीए संपद्विया' तदन्तरं च खलु षोडशदेवसहस्राणि पुरतो यथानुपूा सम्पस्थितानि. 'तयणंतरं च णं बत्तीसं रायवरसहस्सा अहाणुपुवीए संपट्ठिया' तदन्तरं च खलु द्वात्रिंशदाजदरसहस्राणि-द्वात्रिंशत्संख्यकाः मुकुटधारिणो राजश्रेष्ठाः पुरतो यथानुपूर्त्या सम्प्रस्थितानि 'तयणंतरं च णं सेणावइरयणे पुरओ अहाणुपुष्वीए संपटिए' तदन्तरं च खलु सेनापतिरत्नं सुषेणनामकम् यथानुपूर्व्या पुरतः सम्प्रस्थितम् ‘एवं गाहावडरवणे वढ्ढइरयणे पुरोहियरयणे' एवम् अमुना प्रकारेण गाथापतिरत्नम्, वर्द्धकिरत्नं पुरोहितरत्नम् एतत् त्रयं पुरतो यथानुपूर्व्या संप्रस्थितम् तत्र अयं विशेषः पुरोहितरत्नं-शान्तिकर्मकारकः सङ्ग्रामे प्रहारार्दितानां मणिरत्नजलच्छटया वेदनोपशामकमितिभावः । हस्त्यश्वरत्नगमनं तु हस्त्यश्वसेनाभिः सहैव तेन नात्र कथनम् शङ्ख इनके सम्बन्ध में कथन मभो अभी किया जा चुका है। (तयणंतरं च सोलस देबसहस्सा पुरभो अहाणुपुवीए संपट्ठिया) इनके बाद सोलह हजार देव१४ चौदह रत्नों के १४ हजार देव और चक्रवर्ती शरीर के रक्षक २ हजार देव मिलकर १६ हजार देव यथानुपूर्वी चले (तयणंतरं च णं बत्तीसं रायवरसहस्सा अहाणुपुवीए संपट्ठिया) इनके वाद ३२ हजार मुकुट वद्ध राजा जन चले (तयणंतरं च णं सेणावइरयणे पुरओ अहाणुपुत्वोए संपट्टिए) ईनके बाद सेनापतिरत्न प्रस्थित हुआ (एवं गाहावहरयणे वद्वइरयणे पुरोहियरणे) बाद में गाथापतिरत्न उसके बाद वर्द्धकिरत्न, बाद में पुरोहितरत्न ये ३ रत्न चले । यह पुरोहित रत्न शान्ति कर्म कारक होता है। संग्राम में प्रहार आदि से पीडित हुए सैनिक जने की मणिरत्न के जल के छीटों से यह वेदना को शान्त करता है हस्तिरत्न और अश्व रत्न सेना के साथ हो चले है। इसलिए इनके गमन का હીત થયા છે એ અવશિષ્ટ નિધિઓ ના નામો આ પ્રમાણે છે. પિંગલક, સર્વ રત્ન, મહાપદ્ય કાળ, મહાકાળ, માણવક અને શંખ એના સંબધમાં હમણાંજ પહેલાં સ્પષ્ટતા કરવામાં આવી छ. (तयणतरंच सोलस देवसहस्ला पुरओ अहाणुपुवीए संपट्ठिया) त्यामा से २, દે ચતુર્દશના ૧૪ હજાર દેવ અને ચક્રવતી-શરીરના રક્ષક બે હજાર દેવે આમ अथा भजी १६ M२ २८ । यथानुपूवी याया. (तयणतरं च णं वत्तीसं रायवरसहस्सा बहाणुपुव्धीए संपठिया) त्या२ मा ३२ १२ भुट गई । यास्यां (तय तरं च सेणाघहरयणे पुरओ अहाणुपुत्वीर संपट्टिया ) त्यामा सेनापति रन प्रस्थित ययु. (एवं गाहावहरयणे वड्दहरयणे पुरोहियरयणे ) त्यामा गाथातिरल એનાં પછી વકિરન, એના પછી પુરોહિત રત્ન એ ત્રણ ૨ ના ચાલ્યા. એ પુરોહિતરત્ન શાંતિ કર્મકારક હોય છે. સંગ્રામમાં પ્રહાર આદિથી પીડિત થયેલા સૈનિકની મણિરત્નના જળના છાંટાથી એ રન વેદનાને શક્તિ કરે છે. હસ્તિરત્ન અને અશ્વરન, સેનાની સાથે Page #888 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८७४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ' तयणंतरं चणं इत्थिश्यणे पुरओ अहाणुपुव्वीए' तदन्तरं च खलु स्त्रीरत्नं सुभद्रानामकम् पुरतो यथानुपूर्व्या संप्रस्थितम् ' तयणंतरं च णं बत्तीसं उउकल्ळाणिया सह - स्सा पुरओ अहाणुपुव्वीए० ' तदन्तरं च खलु द्वात्रिंशद् ऋतु कल्याणिका सहस्राणि द्वात्रिं . शत् ऋतुकल्याणिकाः ऋतुषु षट्स्वपि कल्याणिकाः ऋतुविपरीतस्पर्शत्वेन शीतकाले उष्णस्पर्शः उष्णकाले शीतस्पर्शः इत्यादिरूपेण सुखस्पर्शाः अथवाऽमृतकन्यात्वेन सदा कल्याणकारिण्यः राजकन्यास्तासां सहस्राणि पुरतो यथानुपूर्व्या यथा ज्येष्ठलघुपर्याय सम्प्रस्थितानि जन्मान्तरोपचित प्रकृष्टपुण्यप्रकृतिमहिम्ना राजकुलोत्पत्तिवद् यथोक्तलक्षणगुणसम्भवात् ' तयणंतरं च णं बत्तीसं जणत्रय कल्लाणिया सहस्सा पुरओ अहाणुपुवीए संपहिए' तदन्तरं च खलु द्वात्रिंशज्जनपदकल्याणिका सहस्राणि । भरतचक्रवर्तिनः चतुः षष्टिसहस्त्रसंख्यकाः स्त्रियो भवन्ति तासु एता द्वात्रिंशत् सहस्र संख्यकाः कल्याणिका इति । तत्र द्वात्रिंशज्जनपदाः जनपदाग्रगण्य इत्यर्थः पदैकदेशे पदसमुदायोपचारात् ' तावतीभिर्जन पदाग्रणी कन्याभिरावृतः' इति, एवंविधाः कल्याणिकाः कल्याणकारिण्यो राजकन्यकाः इत्यर्थः समर्थविशेषणेन विशेष्यं लभ्यते इति लक्षण गुणयोगात् तास सहस्राणि पुरतः यथानुपूर्व्या यथाज्येष्ठलध्वनुक्रमेण सम्प्रस्थितानि चलितानि कथन नहीं किया (तयणंतरं च इत्थिरयणे पुरओ अहाणुपुत्र्वोए ) बाद में स्त्रीरत्न चला ( तयर्णं तर चणं बत्तीसं उडुकल्लाणिया सहस्सा पुरमो अहागुपुव्वोए) बाद में ३२ हजार ऋतुकल्याण कारिणियां- राजकुलोत्पन्न कन्याएँ - चली जिनका स्पर्श ऋतुविपरीत - शीतल काल में उष्णस्पर्श रूप और उष्णकाल में - शीतस्पर्शरूप हो जाता था-चली इनमें ऐसा गुण जन्मान्तरोपचित-प्रकृष्ट पुण्य प्रकृति को महिमा से राजकुल में उत्पत्ति हो जाने की तरह उत्पन्न हो जाता है । (तय णं तरं च ण बत्तोसं जणवय कल्लाणिया सहस्सा पुरओ अहाणुपुत्रवीए संपठिया) इनके बाद ३२ हजार जनपद कल्याण कारिणियां चली चक्रवर्ती के १४ हजार स्त्रियां होती हैं । उनमें ये ३२ हजारहोती हैं । इनके साथ जनपद के अग्रणिननों की मुखियाजनों को इतनी हो कन्याएँ और साथ रहता है इसलिए इन्हें जनपद कल्याण कारिणियां कहा गया है । (तयणंतरं च णं बत्तीसं याध्यां मेथी खेमना गमनतुं प्रथम सत्रे ४२वामां माभ्यु नथी. (तयणंतर व इस्थिरयणे पुरओ अहाणुपुत्रीप) त्यार माह स्त्री रत्न यास्यु. ( तयणंतरंच बत्तीसं उडुकल्लाणिया सहस्सा पुरओ अहो०) त्यार माह २ २ ऋतुयारियो - राहुलત્પન્ન કન્યાએ ચાલી. જેમને સ્પર્શ ઋતુ વિપરીત-શીતકાળમાં ઉષ્ણ સ્પરૂપ અને ઉષ્ણુ કાળમાં શીત સ્પરૂપ થઇ જાય છે—ચાલી, એ સકન્યાએમાં એ ગુણુજન્માન્તરાપચિતપ્રકૃષ્ટ પુણ્ય પ્રકૃતિના મહિમાથી જેમ રાજકુળમાં ઉત્પત્તિ થઈ છે. તેમજ ઉત્પન્ન થઈ જાય छे, ( तयणंतर च बत्तीसं जणवयकल्लाणिया सहस्सा पुरओ अहाणुपुत्रीप संपट्ठिए) त्यारમાદ ૩૨ હજાર જનપદ કલ્યાણ કાણ્ણિીએ ચાલી. ચક્રવત્તીને ૬૪ હજાર સ્ત્રીએ ડાય છે. તેમાં એ ૩૨ હજાર પશુ હાય છે. એમની સાથે જનપદના અણિજનાની-મુખિયાજને નીએટલી જ કન્યાએ ખીજા સાથે રહે છે, એથી જ એમને જનકયાણ કારિણી કહેવામાં Page #889 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारः सू०२८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णम् ८७५ 'तयणंतरं च णं बत्तीसं बत्तीसह बद्धा णाडगसहस्सा पुरओ अहाणुपुबीए' तदनंतरंच खलु द्वात्रिंशद द्वात्रिंशद बद्धानि द्वात्रिंशता पात्र बंद्धानि संयुक्तानि नाटकसहस्राणि पुरतः अग्रतो यथानुपूर्व्या यथाक्रमं प्रथमं प्रथमोढापितृप्राभृतीकृतनाटकं ततस्तदनन्तरोढा नाटकमित्यादिसम्प्रस्थितानि एतेषां चोक्तसंख्याकत्वं द्वात्रिंशता राजवरसहौः स्वस्वकन्यापाणिग्रहणहेतौ प्रत्येकं करमोचनसमयसमर्पितैकैकनाटकसद्भावात् 'तयणंतरं च णं तिन्निमहासूअसया पुरओ अहाणुपुबीए संपद्रिया' तदन्तरं च खलु त्रीणि षष्टानि षष्टयधिकानि सूपशता नि सूपानां पदैकदेशे पदसमुदायोपचारात् सूपकाराणाम् शतानि त्रिषष्टयधिकशतानीत्यर्थः पूरतो यथानुपूर्व्या संप्रस्थितानि 'तयणंतरं च णं अट्ठारससेणिप्पसेणीओ संपट्टिया' तदन्तरं च खलु अष्टादश कुम्भकाराधा श्रेणयःतदवान्तरभेदाःप्रश्रेणयःपुरतो यथानुपूर्व्या संप्रस्थिता:अष्टादश श्रेणयश्चेमाः मूलम्-कुम्भकार१, पट्टइल्ला२,सुवण्णकाराय३,स्वकाराय४ । गंधव्या५ कासवगा६ मालाकाराय७ कच्छकरा८ ॥९॥ तंबोलिया९ य एए नवप्पयारा य नारुपा भणिया ।। अहणं णवप्पयारे कारुअव्वण्णे पबक्खामि ॥२॥ वत्तीस इवद्धा णाडगसहस्सा पुरओ अहाणुपुव्वोए संट्ठिया) बाद-३२-३२-पात्रो से बद्ध ३२ हजारनाटक चले । ये ३२ हजार राजाओं द्वारा अपनी कन्याओं के पाणिग्रहणोत्सव में करमीचन के समय में चक्रवर्ती को एक २ नाटक दिया जाता है। इसलिए ये ३२ हजार हो जाते हैं (तयणंतरं च णं तिन्निसट्टा सूपसया पुरो अहाणुपुवीए संपट्ठिया) इन नाटको के बाद ३६० सूपकार- पाच जन प्रस्थित हुए। (तरणतरं च णं अट्ठारससेणिप्पसेणीओ संपट्टिया) इनके बाद १८ श्रेगो प्रश्रेणि नन प्रस्थित हुए। २८ प्रश्रेगियां इस प्रकार से हैं-कुंभकार १ पट्टइल्ला सुवण्णकाराय ३ सूवकाराय ४ गंधब्बा ५ कासवगा ६ मालाकाराय ७ कच्छकरा ८ ॥१॥ तंबोलिया ९ य एए नवप्पयाराय नारु आ भणिया अहणं णवप्पयारे कारुअवण्णे पवस्वामि ॥२॥ भाव। छे. (तयणंतरं च ण बत्तीसं बत्तीसइवद्धा णाडग सहस्ला पुरओ अहा० संपट्टिया) ત્યાર બાદ કર-૩૨ પાત્રોથી આ બદ્ધ ૩૨ હજા૨ નાટક ચાલ્યા. એ ૩૨ હજાર ૨ાજાએ વડે પિતાની કન્યાઓના પાણિગ્રહણમહોત્સવમાં કરમેચનના સમયમાં ચક્રવત્તી ને એક–એક નાટક भावामा मावे छे. याम थे 3२ २ थाय छे. (तयणतरच ण तिन्निसट्टा सूपसया पुरओ अहाणुपुष्पीए संपट्टिया) ये नाट। पछी ३९० सू५४।२।-पायना-प्रस्थित थया. (तयण तर च ण अट्ठारस सेणिपसेणोओ संपठिया) त्य२ मा १८ श्रेशि-श्रेशिनी प्रस्थित थया. १८ श्रेलिया मा प्रभार छ-कुभकार१, पट्रइल्ला-२, सुवण्णकाराय ३. सूचकाराय-४, गंधव्वा-५, कासवगा ६, मालाकाराय-७, कच्छकरा-८, ॥१॥ - तषोलिया९, य एए नवप्पयाराय नारुआ भणिया । ... अहणं णवप्पयारे कोरुसवण्णे पवक्खामि ॥२॥ - Page #890 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्धोपप्रप्तिसत्र चम्मयरु१ जंतपीलग२ गंच्छिअ३ छिपाय४ कंसकारे ५य। सीवग६ गुआर७ भिल्ला८ धीवर९ वण्णाइ अनुदस॥३॥ छाया-कुम्भकार:१ पटेलाश्च(ग्राम मुखिकाः)२ स्वर्णकाराः३ सूपकाराश्व४ । गन्धर्वा(गायका)५ काश्यपकाश्च नापिताः६ मालाकाराश्व७ कक्षकरा८ ॥१॥ ताम्बूलिकाश्चते९ खल्वेते नव प्रकाराश्च नारुकाः भणिताः । अथ खलु नव प्रकारान् कारुकवर्णान् प्रवक्ष्यामि ॥२॥ चर्मकार१ जन्त्रपीलकर ग्रन्थिक३ छिपक ४ कंशकाराश्च ५ । सीवक६ गोपाल७ भिल्ल८ धीरवान्९ अष्टादशवर्णान् ॥३॥ ... 'तयणंतरं च णं चउरासीइं आससय सहस्सा पुराओ अहाणुविए संपडिया' तदन्तरं च खलु चतुरशीतिश्च शतसहस्राणि चतुरशीतिलक्षसंख्यकहस्तिनः पुरतो यथानुपूा संस्थितानि 'तयणंतरं च णं छण्णउई मणुस्स कोडीओ पुरभो अहाणुपुवीए संपट्टिया' तदन्तरं च खलु षण्णवति मनुष्याणां पदातीनां कोटयः षण्णवति कोटिसंख्यकाः पदातयः पुरतो यथानुपूा संप्रस्थिताः 'तयणंतरं च णं बहव राईसर तलवर चम्मयरु १ जंतपीलग २ गंच्छिम ३ छिपाय ४ कंसकारे ५ य सीवग ६ गुआर ७ भिल्ला ८ धीवर ९ वण्णाइ अट्ठदस ॥३॥ कुंभकार-मिट्टी के वर्तन बनानेवाला पटेल २ गाम का मुखिया स्वर्णकार ३ सुनार. सूपकार-रसोइबनानेवाला ४, गंधर्व ५ गायक काश्यपक-नापित नाई-वालबानानेवाला ६, मालाकार-माली ७, कच्छकर ८ और ताम्बूलिक-पानबेचनेवाला तंबोली ये ९ प्रकार के नारुक कहे गये हैं । तथा चर्मकार-चमार-जूते बनानेवाला १, यन्त्रपीलक-तेली २ प्रन्थिक ३, छिपक-छोपा ५, कंशकरतमेरा ५, सीवक-द ६, गोपाल-ग्वाल ७ भिल्ल ८ और धीवर ये ९ प्रकार के कारुक कहे गये हैं। (तयणंतरंच णंच उरासीई आससयसहस्सा पुरओं महाणुपुवीए संपट्ठिया) इनके बाद ८४ लाख घोडे प्रस्थित हुए (तयणंतरंचणं छण्णउई मणुस्स कोडीओ अहाणुपुवीए संपट्टिया) इनके वाद ६ करोड़ मनुष्यराशि पदातियो का चम्मयरू १, जंत पीलग२ गंच्छिअ३, छिपाय ४, कंसकारे ५ य सीवग ६, गुआर ७, भिल्ला ८, धीवर ९, वण्णाइ अट्ठदस ॥ ३ ॥ | કુંભકાર–૧, કુંભાર માટીના વાસણે બનાવનાર, પટેલ-૨, ગામને મુખી, સુવર્ણકાર - सोनी, सू५४१२-२से। ये ४, गध-५, आय, १५५४ नापित-ना-पण मनावનાર વાળંદ ૬ માલાકાર-માળી-૭, કચ્છકર-૮ અને તાંબૂલિક-પાન વિક્રેતા તંબાળી, એ નવ પ્રકારના નાક કહેવામાં આવ્યા છે તેમજ ચમકાર-ચમાર જેડા બનાવનાર-મચી ૧, યન્ત पी४१,-तबार, अन्थि3, छि५४-छीपा-४, ५४२-तभे२१५, सी4-४०६, गोपास-पास ભરવાડ ૭, ભિલ-ભીલ ૮ અને ધીવર-મચ્છીમાર એ ૯ પ્રકારના નારુકે કહેવામાં આવ્યા છે. (तयणतर च ण चउरांसोई आससयसहस्सा परओ अहाणुपुठवीए संपट्ठियो) त्यमा ८४ माघाये। प्रस्थित थया. ( तयणंतर च णं छण्ण उई मणुस्स कोडीओ पुरभो अहाणुपुव्वीए संपट्टिया ) त्यामा ८६ ४२७ २८el मानव महिनी पहाती सोना Page #891 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका १०३ वक्षस्कारःसू. २८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णनम् ८७७ नाव सत्यवाहप्पभिईओ पुरओ अहाणुपुच्चीए संपट्ठिआ' तदन्तरं च खलु बहवो राजानो माण्डलिका; ईश्वराः-युवराजाः तलवराः नगररक्षका यावत्सार्थवाहप्रभृतयः पुरतः यथानुपूर्व्या संप्रस्थिताः अत्र-यावत्पदा माडम्बिक कोटुम्बिक मन्त्रि महामन्त्रि गणक दौवारिक अमात्य चेटपीठमईकनगरनिगम श्रेष्ठि सेनापति सार्थवाहाः इति ग्राह्यम् । तत्र-माडम्बिकाः मडंबो ग्रामविषेशः यस्य ग्रामस्य चतुर्दिा सार्द्ध तृतीय, कोशद्वयपर्यन्त ग्रामान्तरं न भवति सः तस्याधिपतिः तद्बहुवचने-मड बाधिपतयः, कौटुम्बिका:परिवारस्थायिनो माता पिताभ्रातभगिन्यादयः, मन्त्रिणः, सचिवा अमात्याः, महामन्त्रि ण, - सर्वोच्चामात्याः प्रधानमन्त्रिणः, गणकाः - ज्योतिषिकाः, दौवारिकाः - द्वारपालकाः, अमात्या - राज्याधिष्ठायकाः, चेटाः - दासा वा, पीठमाः - आस्थाने आसन्नासन्नसेवकाः समवयस्या इत्यर्थः, नगरम् प्रसिद्धम्, निगमाः - कारणिका वणिजो समूह चली (तयणंतरं चणं बहवे राईसर तलवर आव सत्थवाहप्पभिइओ पुर मो अहाणुपुष्व ए संपट्रिया) इस जनसमूह के बाद अनेक राजा-मांडलिकजन, ईश्वर युवराज, तलवर नगर रक्षक यावत् सार्थवाह मादिजन चले यहाँ यावत्पद में माडम्बिक, कोटुम्बिक मन्त्री महामन्त्री गणक-ज्योतिषी' दौवारिक, अमात्य चेट पोठमई अंगरक्षक नगरनिगम के श्रेष्टि जन, सेनापति" इन सबका ग्रहण हुआ है। जिस ग्राम के आस पाम दाई कोश तक दूसरा ग्राम नहीं होता है उसका नाम मडंब है इस मडंब ग्राम रूप विशेष-का जो अधिपति होता है वह माडम्बिक कहा गया हैं कुटुम्बिजन-माता पिता आदि-कोटुम्कि कहे गये हैं, मंत्री महामंत्री प्रधान ये भिन्न २ पद के अनुसार होते हैं गणक नाम ज्योतिर्विद का हैं जिसे भाषा में ज्योतिषी कहा गया है द्वारपाल का नाम दौवारिक है राज्य के अधिष्ठापक हाते हैं उन्हें अमात्य कहा जाता है दाप्ती दास आदि चेट कहलाते है पीठमर्द अङ्गरक्षक को कहते है जिसे अंग्रेजी में बोडीगार्ड कहा गया है अथवा जो समानवय के होते हैं वे भी पीठमर्द कहे जाते हैं। यादी. ( तयणंतर च णं बहवे राइसरतलवर जाव सत्थवाहप्पभिइओ पुरओ अहाणुपुख्खीए संपट्टिया) से निभूड ५७ी अने-मislerने।, श्वरयुवरात, નગર રક્ષક યાવત સાર્થવાહ વગેરે લોકો ચાલ્યા. અહી યાવત પહથી માડુંબિક કૌટુંબિક, મન્ત્રીઓ, મહામન્તોએ ગણુક-ષિીઓ દૌવારિક અમા ચેટ-પીઠમાઁ અંગરક્ષક, નગરનિગમના શ્રેષ્ટિજને, સેનાપતિઓ એ સર્વનું ગ્રહણ થયું છે. જે ગ્રામની આસપાસ અઢી ગાઉ સુધી અન્ય ગ્રામ હોય નહિ તેનું નામ મડંખ છે. એ મોંબ વિશેષ ને જે અધિપતિ હોય છે. તે માટુંબિક કહેવાય છે. કૌટુંબિકજન, માતા પિતા વગેરે ને કૌટું. બિક કહેવામાં આવ્યા છે. મંત્રી, મહામંત્રી પ્રધાન એ એ ભિન્ન પદ, સજબ હોય છે. ગણક નામ જ્યોતિર્વેિદનું છે, જેને હિન્દી ભાષામાં જ્યોતિષી કહેવામાં આવે છે દ્વારપાળ નું નામ દૌવારિક છે. રાજ્યના જે અધિષ્ઠાપક હોય છે તેને અમાત્ય કહેવામાં આવે છે. દાસી-દાસ વગેરેને ચેટ કહેવામાં આવે છે, પીઠમદ અંગરક્ષક ને કહે છે. જેને અંગ્રેજીભાષામાં બોડીગાર્ડ કહેવામાં આવે છે. અથવા જેઓ સમાનવાયના હેય છે તેઓને પીઠમ Page #892 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८७८ प्रज्ञप्ति वा, श्रेष्ठिनः प्रसिद्धाः, सार्थवाह प्रभृतयः प्रभृतिपदात् दूतसन्धिपालेति ग्राह्यम् । दुताः प्रसिद्धाः सन्धिपाळा: राज्यसन्धिरक्षकाः एषां द्वन्द्वः एते पुरतो अग्रतः यथानुपूर्व्या सम्प्रस्थिताः ' तयणंतरं च णं वहवे असिग्गाहा लट्ठिग्गाहा कु तग्गाहा चावग्गादा चामरगाहा पारगाहा फलगग्गाहा परसुग्गाहा पोत्थयग्गाहा वोणग्गाहा कूअग्गादा ssesगाहा दीविगाहा सएहिं सएहि खवेहिं एवं वेसेहिं चिंधेहिं नियोएहिं सएहिं २ - वत्थे पुरओ अहाणुपुब्वीए संपत्थिया' तदनन्तरं च खलु बहवः असिग्राहाः, खङ्गग्राहिणः, तथा केचिद यष्टिग्राहाः - यष्टिकाग्राहिणः, दण्डग्राहिण इत्यर्थः कुन्ताः भल्कधारिणः केचित् चापग्राहाः धनुग्रहिणः चामरग्राहाः, पाशग्राहा:- पाशाः द्यूतोपकरणानि तद्ग्राहाः, परशुग्राहाः परशत्रः कुठाराः तद्ग्राहा पुस्तकग्राहा: पुस्तकानि शुभाशुभपरिज्ञानहेतुभूत पुस्तकादि तद्ग्राहाः वीणाग्राहा: 'कुमग्गाहा' कुतपग्राहाः कुतपाः तैलादि भाजनानि तद्ग्राहाः, हड़ फग्राहा:- हडप्फः ताम्बूलार्थे पूगिफलादिभाजनं तद्ग्राहाः दीपि काग्रहाः प्रसिद्धाः एते च स्वकीयैः रूपैः आकारैः एवं स्वकीयैः स्वकीयैः वेषैः निगमनाम वणिक्जनी का है बाकी के शब्दों का अर्थ स्पष्ट है यहाँ प्रभृति शब्द से दूतसन्धिपाल का ग्रहण हुआ है दूत- राजा के संदेशवाहक होते हैं एवं सन्धिपाल राज्य की संधि के रक्षक होते हैं । ( तयणंतरं चणं बहने असिग्गाहा लट्ठिग्गाहा कुंतगाहा चावग्गाहा चामरग्गाहा पासग्गाहा फलगग्गाहा परसुग्गाहा पोत्थयग्गाहा, वीणग्गाहा कूअग्गाहा, हडफगाहा, दौविअगाहा सहि सएहिं, रूवेहिं एवं वेसेडिं, चिधेर्हि, निओएहिं सएहिं सएहिं वत्थेहिं पुरओ - हाणुपुवीए संपत्थिया) इनके बाद अनेक असि तलवारग्राही जन अनेक यष्टि ग्राही जन, अनेक मल्लघारी जन अनेक धनुर्धारोजन, अनेक ध्वाजोप करण धारीजन, अनेक फलकग्राहीन, अनेक परशुग्राहीजन अनेक शुभाशुभ परिज्ञान के जानने के लिये पुस्तकों को लेकर चलने वाले जन अनेक वीणाधारीजन अनेक तैल आदि के रखने के कुतुप को लेकर चलने वालेजन अनेक सुपारी आदिरूप पानकी सामग्री से भरे हुए डिब्बों को लेकर चलने वाले जन एवं अनेक કહેવામાં આવે છે. નિગમ નામ વણિક જનેનુ' છે શેષ શબ્દોના અર્થ સ્પષ્ટ જ છે, અહીં अमृते शहथी इतसन्धयायः नु ग्रहण थयु ं छे, इतो- राजना स'देशवाई हैं। होय है. तेभन सन्धिपास सन्यनी सन्धिना रक्ष होय छे. ( तयणंतर च णं बहवे असिग्गाहा लट्ठग्गहा, कुंतग्गाहा चावग्गाहा चामरग्गाहा, पासुग्गाहा, फलगग्गाहा, पर सुग्गाहा, पोत्थयग्गाहा, वीणग्गाहा, अग्गाहा, हडफगाहा, दीबिअग्गाहा, सहि सप, रूवेहिं एवं वेलेहिं विधेहि, निआप हे सहि २ वत्थेहि पुरओ अहाणुपुत्रीए संपत्थिया ) त्यार बाह અનેક અસિ તલવાર ગ્રાહીજને, અનેક યાદ-(લાકડી) ગ્રાહીજનો, અનેક મલ્લધારી જના અનેક ધનુષીરીજને, અનેક વજોપકરણધારીજને અનેક લક ગ્રાહીજને, અનેક પશુગ્રાહી જૂના, અનેક શુશુભ પિરજ્ઞાનને જાણવામાટે પુસ્તકાને લઈ ને ચાલનારાના, અનેક વીણાધારીજને અનેક તેલ આદિના કુતા લઈ ને ચાલનારા જના અનેક સેાપારો વગેરેરૂપ પાનની સામગ્રી ભરીને ડબ્બાએ લઈને ચાલનાર જને તેમજ અનેક દીવાઓ ને લઇ ને Page #893 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सु० २८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णनम् ८७९ वस्त्रालङ्काररूपै चिंधैः - अभिज्ञानैः 'चिन्हे' नियोगैः - व्यापारैः स्वकीयैः स्वकीयैः वस्त्रैः पत्यै सहिताः सन्तः पुरतो यथानुपूर्व्या सम्प्रस्थिताः 'तयणंतरं च णं घडवे दंडिणो मुडिण सिहंडिगो जडियो पिच्छिणो हासकारगा खेडकारगा दवकारगा चाडुकारगा कंदपिआ कुकुइआ मोहरिआ गायंता व दीवंता य (वायंता) नच्चता य हसंता य रमता य कीलंता य साता य सावेंता य जावेंता य रावेंता य सोता यसोभावताय आलोअंता य जयजयसद्दं च पउंनमाणा पुरओ अहाणुपुच्चीए संपड़िया' तदनन्तरं च खलु बहवो दण्डिनः दण्डधारिणः केचित् मुण्डिनः अपनी तकेशाः शिखण्डिनः शिखाधारिणः केचित् जटिनः जटाधारिणः तथा पिच्छिनः मयू रादि पिच्छादिधारकाः तथा हास्यकारकाः तथा खेडकारकाः खेडं धूतविशेषस्तत्का स्काः तथा द्रवकारकाः; केलिकराः चाटुकारकाः प्रियवादिनः कान्दपिकाः कामकथा कारिणः 'कक्कुआ' कोत्कुच्यकारिणो भाण्डाः भाण्डचेष्टाकारिण इत्यर्थः 'मोहरिया दीपों को लेकर चलने वाले जन जा कि अपने २ कार्य के अनुरूप वेश भूषा से सज्जित थे एवं अपने नियोग में अशून्य थे चले ( तयणंतरंचणं बहवे दंडिणो, मुंडिगो, सिहंडिगो, afe पिच्छिण हासकारगा, खेडकारगा, दवकारगा चाटुकारगा, कंदप्पिमा कुकुइआ, मोहरिआ, गायंताय दोपंता (वायंताय) नच्चताय इसंताय कीलंताय सासेंताय सावेंताय, जावेंताय रावेंताय सोमे॑तान्य सोभावताय आलोयंताय जयजयसद्दंच पजमाणा पुरओ अहाणुपुब्वीए संपट्टिया) इनके बाद अनेक दंडधारीजन, अनेक शिखंडी - जिनके मस्तक के बाल मुंडाये जा चुके है - ऐसेजन अनेक शिखंडी जिनके मस्तक पर केवल एकचोटी हो है ऐसे जन, अनेक जटाधारीजन अनेक मयूर आदि के पिच्छों को धारण करनेवाले जन अनेक हँसी उत्पन्न करानेवाले जन अनेक द्यूत आदि में प्रवृत्ति कराने वाले ऐसे खेड'कारक जन अनेक द्रवकारक क्रीडा आदि में प्रवृत्ति कराने वाले जन, अनेक चाटुकारी खुशामद करनेवाले जन, अनेक कामकथा करनेवालेजन, अनेक कौत्कुच्य - कायकी कुचेष्टा करनेवाले भाण्डजन, अनेक भाण्डચાલનારા જના કે જેઓ પાત-પેાતાના કાર્ય ને અનુરૂપ વેશભૂષાથા સુસજ્જ હતા અને भाताना नियोग मां अशून्य हुता-यास्या. ( तयणंतरं च बहवे दंडिणो मुंडिणो, सिहंडिपो, जडिगो, पिच्छिणो, हासकारगा, खेडुकारगा, दवकारगा, खाडुकारगा, कंदपिआ, कुकुआ मोहरिआ, गायंताय दीवनाय (वायताय) नच्चताय, हसंताय, कीलंताय, साताय, सावेंताय, जावैताय, रावेंताय सोमे॑ताय सोभावेंताय आलोयंताय, जयजयस च पजमाणा, पुरओ अहाणुपुव्वीप संपट्टिया) त्यारमा धारी, अने સુડીજના જે ના મસ્તકના વાળો મુંડિત કરવામાં આવ્યા છે એવાલેક, અનેક શિખ ડીએ-જેનાં મસ્તક ઉપર એકજ ચેટલી છે એવ લેાકે, અનેક જટાધારી જને, અનેક મયૂર વગેરેના પિચ્છાને ધારણ કરનારા લોકો અનેક હસાવનારા લેાકેા અનેક દ્યૂત આદિ માં પ્રવૃત્તિ કરનારા લેકે અર્થાત ખેડૂડકારક જને અનેક દ્રવકારક ક્રીડા વગેરેમાં પ્રવૃત્તિ ફરનારા ઢાકા, અનેક ચાઢુકારી ખુશામાઁ કરનારા લૈકા અનેક · કામકથા કરનાશ, લેાકેા Page #894 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८८०. जम्बूद्वीपप्रप्तसूत्रे मुखाः वाचालाः असम्बद्धप्रलापिन इत्यर्थः, गायन्तश्च दीव्यन्तश्च क्रीडयन्तः वादयन्तश्च वादित्राणि नृत्यन्तश्च, हसन्तश्च रममाणाश्च अक्षादिभिः क्रीडयन्त प्रमोदजनक्रीडया क्रीडां कुर्वन्तः शासयन्तश्च परेभ्यो गानादी शिक्षयन्तः श्रावयन्तश्च मनोभिरोचकवचनादि श्रावयन्तः जल्पन्तश्च कल्याणप्रदवाक्यानि रावयन्तः शब्दान् कारयन्तः स्वप्रोक्तवाक्यानि अनुवादयन्त इत्यर्थः शोभमानाश्च मनोज्ञवेषादिना स्वयम् शोभयन्तश्च परान् मनोज्ञवेषादिना आलोकमानाश्च पुण्यशालिनं भरतचक्रिण राजराजस्यावलोकनं कुर्वन्तः जयजयशब्दं च प्रयुजानाः पुरतो यथानुपूर्व्या पूर्वोक्तपाठक्रमेण सम्प्रस्थिताः ' एवं उववाइय गमेण जाव : तस्सरणो पुरओ महमायासधरा उभओ पासिं जागा णागधरा पिट्टओ रहा रहसंगेल्ली अहाणुपुच्चीए संपट्टिया' इति एवम् उक्तक्रमेण औपपातिकगमेन प्रथमोपाङ्गगत पाठेन तावद्वक्तव्यं यावत् तस्य भरतस्य राज्ञः पुरतः महाश्वाः बृहत्तुरङ्गाः अश्वघरा अश्वधारक पुरुषाः गजरत्नारूढ भरतस्य उभयतः द्वयोः पर्श्वयोः नागाः हस्तिनः नागधराः हस्तिधारक पुरुषाच पृष्टतः पृष्टभागे रथारथसङ्गल्ली रथसमुदाय देशीयोऽयं शब्दः जन, अनेक वाचालजन - असंबद्ध प्रलापोजन, गाते हुए भिन्न २ प्रकार को क्रीडा करते हुए, अनेक बादित्रों को बजाते हुए नृत्यकरते हुए, हँसते हुए, अक्ष आदि के द्वारा खेलते हुए प्रमोदजनक क्रीडा करते हुए, दूसरों को गान आदि सिखाते हुए, मनोभिरोचक वचनों को सुनाते हुए, मीठे २ शब्दों को दूसरों के प्रति उच्चारण करते हुए, अपने ही द्वारा कहे गये वचनों का अनुवाद करते हुए मनोज्ञवेष आदि से अपने को और दूसरों को सज्जित करते हुए, एवं राजाओं के राजा पुण्यशाली भरत चक्रों का अवलोकन करते तथा जय जय शब्द का प्रयोग करते हुए प्रस्थित हुए ( एवं उववाइयगमेणं जाव तस्स रण्णो पुरओ मह आसा आसघरा उभओ पासि णागा णागधरा पिट्ठओरहा रहसंगेल्लो अहाणुपुत्रीए संपट्टिया) इस तरह प्रथम उपाङ्ग औपपातिक सूत्र के पाठ के अनुसार यहाँ “उस भरत राजा के आगे बड़े घोड़े, अव धारक पुरुष दोनों ओर हाथी, हस्तिधारक पुरुष, पीछे रथ और रथों का समूह चला" અનેક કીકુત્સ્ય-કાયાની કુચેષ્ડા કરનારા-ભાંડજના, અનેક વાચાલ જને, અસ’બહું પ્રલાપીभना, गाता-गातां भिन्न प्रभारी डीडीओ रता, मने वाघो वजाडता, नृत्य ४रता, હસતા, અક્ષ વગેરે દ્વારા રમતા, પ્રમોદકારી ક્રીડાએ કરતા ખીજાઓને સંગીત વગેરે કલા શીખવતા, મનેાભિરેાચક વચનાં સંભળાવતા. બીજાના માટે મધુર શબ્દો એટલતા પેાતેકહેલા વચનાને અનુવાદિત કરતા મનેાજ્ઞવેષ વગેરેથી પેાતાની જાતને અને ખીજાઓને સુસજ્જિત કરતા, રાજાઓના પણ રાજા પુણ્યશાળી ભરતચક્રીના દન કરતા તથા જય भ्य शब्दाने उच्चारता अस्थित थया ( एवं उववाईयगमेण जात्र तस्स रण्णों पुरओ महमासा आसरा उभओ पालि जागा णागाधरा पिट्ठओ रहा रहसंगेल्ली अहाणुपुव्वीप संपट्टिया ) मा प्रभावे प्रथम उपांग सोपपातिक सूत्र ना या भुभम सही " ते भरत રાજાની આગળ મેાટા-મૈાના ઘેાડા, અશ્વધારક પુરુષો, બન્ને તરફ હાથીએ હસ્તિધારક પુરૂષો પાછળ રથ અને અનેક રથેાના સમૂહા ચાલ્યાં, એ પાઠ સુધીનું કથન અપેક્ષિત છે, Page #895 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू. २८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णनम् ८८६ - च समुच्चये यथानुपूर्त्या संप्रस्थिताः अत्र यावत् पदेन सवर्णक सेनाङ्गानि संगृह्यन्ते । 'तयणंतरं च णं तरमल्लिहायणाणं हरिमेला मउलमल्लिअच्छाणं चंचुच्चि ललिअ पुलिअ चलचवल चचलगईणं लंघणवग्गणधावण धोवण तिवइजइण सिक्खियगईणं ललंत लामगललायवरभूसराणं मुहमंडगओचूलग-थासग अहिलाणचामरगंड परिमंडि यकडोणं किंकग्वरतरुणपरिग्गहिआ अट्ठसय वरतुरगाणं पुरओ अहाणुपुबीए संपट्टियं' तदनन्तरं च खलु तरमल्लिहायनानां तत्र च तरो वेगो बालं वा इति 'मल्ल मल्लिधाणे' इत्यस्मात् धातोः भवति तथा च तरमल्ली तरधारकः वेगादि कारकः हायन: सम्बसरोऽस्ति येषां ते तथाभूताः नवतरुणा इत्यर्थः तेषाम् इदं च वक्ष्यमाण वरतुरङ्गाणामित्यस्य विशेषणम् पुनश्च कीदृशानाम् 'हरिमेलामउलमल्लिअच्छाणं' हरिमेला मुकुलमल्लिकाक्षाणाम् हरिमेला वनस्पति विशेषस्तस्याः मुकुला कुडमलं कलिका मल्लिका च विचकिल नामक शुभ्रपुष्पं तद्वद् अक्षिणी नेत्राणि येषां ते तथाभूता: तेषां शुक्लाक्षाणामित्यर्थः, पुनश्च कोदृशानाम् 'चंचुच्चिय ललिय पुलिय चळ चवल चंचलगईणं' चञ्चुचित चलित पुलित चल चपलचञ्चलगतीनाम् चञ्चुरितम् कुटिलगमनम् अथवा चन्चुः शुकचञ्चुः तद्वद् वक्रतया इत्यर्थः उच्चितम् उच्छ्रिताकरणम् पादस्योत्पाटनं चन्चुच्चित तच्चलितं च विलासयुक्ता गतिः पुलितं च गतिविशेषः एवंविधा तथा चल: बायुः तद्वत् शीघ्रगामित्वात् तद्वच्चपला चञ्चला अतीव चपला गति र्येषां ते तथा अतीव इस पाठ तक कथन करना चाहिये यहाँ यावत् पद से सवर्णक सेनाङ्गों का ग्रहण हुआ है। (तयणतरंचणं तरमल्लिहायणाणं हरिमेला मउलमल्लिअच्छाणं चंचुच्चिअललिअपुलिस चलचवलचंचलगईणं लंघणवग्गण धावण धोवण तिवइ जइण सिक्स्वियगइणं ललंतलामगललाय. वरभूसराणं मुहमंडगओचलगथासग महिलाण चामरगंडपरिमंडियकडीणं किंकरवरतरुणपडिग्गाहया अद्रसयं वरतुरगाणं पुरओ अहाणुपुवीए संपट्टियं) इनके बाद तरमल्लिहायन वेग धारण कराने वाला हैं वर्ष जिन्हो के ऐसे नवीन-तरुण तथा हरिमेला नामक वनस्पति विशेष की कलिका के जसे एवं मोंघरों के पुष्प जैसी शुभ्र आस्खों वाले, तथा वायु के जैसे शीघ्र गामी होने से. पुलितगति से चाल चलनेवाले, टांपों का आस्फोटन करते हुए चलनेवाले विलाम्युक्त गतिव ले, . અહીં યાવત પદથી સવક સેનગેનું ગ્રહણ થયું છે. (तयणंतरं च णं तरल्लिहायणाणं हरिमेला मउलमल्लिअच्छाणं चंचुच्चिअललिम पुलिअचलचवलचंचलाईण लंघणवग्गणधावणधोवणतिवइ तइग सिक्खियगईणं ललंनलामगललायवरभूसराण मुहमंडगओचलग थासग अहिलाण चामरगडपरि-मंडियकडीणं.. किंकर वरतरुण पडिग्गहिया अढसय वरतुरगाणं पुरओ अहाणुपुव्वीप संपट्ठियं ) ત્યારબાદ તરમલિહાયવેગધારણ કરનાર છેવર્ષ જેના એવા નવીન, તરુણ તથા હરિમેલા નામક વનસ્પતિ વિશેષની શુદ્ધ કલિકા જેવી અને મોઘરાના પુષ્પ જેવી શુભ્ર આંખેવાળા તથા વાયુની જેમ શીઘગામી હોવાથી પુલિત ગતિથી ચાલ ચાલનારા, ટાપનું આસ્ફયન કરતા ચાલનારા, વિલાસ યુક્ત ગતિવાળા, લંઘન ક્રિયામાં–ખાડા આદિને Page #896 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८८२ जम्बूद्वीपप्रप्तिसत्रे चपल-तुरंगा तेषां पुनः कीदृशानाम् वरतुरङ्गानाम् 'लंघणवग्गणधाणधोरणतिवइजइण सिक्खियगईणं' लंधनवल्गन-धारणधोरणत्रिपदिजयिशिक्षितगतीनाम् सूत्रे प्रकृतत्वात् पदव्यत्यासः तत्र शिक्षितम् अभ्यस्तं लंघन गर्दादेरतिक्रमणं उल्लंघनं वल्गनम् उत्कूदनम् धावनम्-शोघ्रगमनम् त्वरितं वेगेन गमनम् धोरणं गतिचातुर्यम् तथा त्रिपदी भूमौ त्रिपदा स्थानम् जयिनी अन्यस्य गति जयनशीला गतिश्च येषाम् ते तथा अत्र शिक्षितपदं सर्वतः आदौ प्रयोक्तव्यं मूले पद व्यत्ययः प्राकृतत्वात् पुनः कीदृशानाम् 'ललंतलामगललायवरभूसणाणं' ललद्रम्य गललातवरभूषणानाम् ललन्ति दोलायमानानि 'लाम' इति रम्याणि गललातानि कण्ठे न्यस्तानि वरभूषणानि श्रेष्ठालङ्कारा येषां ते तथा तेषाम् तथा 'मुहमंडग ओचूलग थासग अहिलाण चामरगंडपरिमंडियकडीणं' मुखभाण्डकावचूळस्थासकाहिलाण चामर गण्डपरिमण्डितकटीनाम् तत्र मुखमण्डकं मुखाभरणम् अवचूला प्रलम्बगुच्छाः स्थासकाः दप्पणाकारा अश्वालङ्काराः अहिलाणं मुखसंयमनम् एतानि सन्ति येषामिति मुखभाण्डकावचूलस्थासकाहिलाणाः अत्र मत्वर्थीयलोपो द्रष्टव्यः तथा चामरगण्डैः चामरदण्डै परिमण्डिता शोभिता कटिः कटिप्रदेशो येषां ते तथा भूतास्तेषाम् बहुव्रीहे पश्चात् कर्मधारयः पुनः कीदृशानाम् 'किंकरवरतरुणपरिग्गहियाणं' किङ्कर-वरतरुणपरिगृहीतानाम् किङ्कराः अश्वानां किङ्करभूताः ये वरतरुणाः वर युवपूरुषास्तैः परिगृहीतानाम् अवलम्बितानाम् 'अट्ठसयं वरतुरगाणं पुरो अहाणुपुवीए संपटियं' त्ति अष्टशतम् अष्टोत्तरं शतम् उक्तविशेषणविशिष्ठानां वरतुरगाणां पुरतः अग्रे यथानुपूर्त्या यथाक्रम संप्रस्थितम् अत्राष्टाशतमित्युपलक्षणं तेन चतुरशीत्यश्वानामन्यत्र कथितानां संग्रहो भवतीति ज्ञातव्यम् । अथ गजाः 'तयणंतरं च णं ईसिदंताणं ईसिमत्ताणं लंघन क्रिया में गतं आदि के लंधन करने में शिक्षित, कूदने की क्रिया में शिक्षित, धावन क्रिया में शिक्षित भूमि में तीन पैरों से खडे होने की क्रिया में शिक्षित, तथा अन्य को गति को परास्त करनेवाली गतिवाले, गलो में लटकते हुए रम्य श्रेष्ट आभूषणों वाळे, मुख के आभूषणों से. अपचलों से लम्बे २ गुच्छों से, स्थासकों से-दर्पण के जसे अश्वालङ्कारों से अहिलाणलगामों से युक्त, तथा चामर दण्डों से सुशोभित कटि प्रदेशवाले, किंकर मृत श्रेष्ठ युवा पुरुष जिन्हें पड़े हुए हैं ऐसे १०८एकसो पाठ धोड़े प्रस्थित हुए यह१०८पद उपलक्षणरूप है इसलिये यहाँ ८४ लाख घोड़ों का संग्रह हुआ जानना चाहिये (तयणंतरंचणं ईसिदंताणं ईसीमत्ताणं સાળંગવામાં શિક્ષિત થયેલા, કૂદવાની ક્રિયામાં શિક્ષિત ધાવન ક્રિયામાં શિક્ષિત, ભૂમિમાં ત્રણ પગ ઉપર ઉભા રહેવાની ક્રિયામાં શિક્ષિત તેમજ બીજાઓની ગતિઓને પરાસ્ત કરનારી ગતિ વાળા, ગ્રીવા એમાં ઝૂલતા રમ્ય શ્રેષ્ઠ આભૂષણે વાળા, મુખના આભૂષાથી.. અવર્લેના લાંબા-લાંબા ગુચ્છાઓથી, સ્થાથી-દર્પણ જેવા અશ્વાલંકારોથી અહિ થી યુક્ત તથા ચામર દ ડાથી સુશોભિત કટિ પ્રદેશ વાળા કિંકર ભ્રત શ્રેષ્ઠ યુવા પુરુષોએ જેમને પકડી રાખ્યા છે એવા ૧૦૮ ઘોડાઓ પ્રસ્થિત થયા. આ ૧૦૮ ५६ ३५क्षY ३५ छ. से पहथी भत्रे ८४ वा घामाना सडथये। छे. (तयणंतर Page #897 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका १.३ वक्षस्कारः सू०२८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णनम् ८८३ ईसितुंगाणं ईसि उच्छंगउन्नयविसालधवलदंताणं कंचणकोसीपविट्ठदंताणं कंचणमणि रयणभूसियाणं वरपुरिसारोहगसंषउत्ताणं गयाणं अट्ठसयं पुरओ अहाणुपुवीए संपत्थियं त्ति' तदनन्तरं च खलु ईषदान्तानाम्-मनाग्ग्राहितशिक्षाणम् इदं च वक्ष्यमाणगजाना मित्यस्य विशेषणम् पुनश्च कीदृशानाम् ईषन्मत्तानाम्-मनाग युवत्वमापन्नानं यौवनारम्भवर्तित्वात् पुनः कीदृशानाम् इषतुङ्गानाम् ईषदुच्चानाम् तस्मादेव 'ईसि उच्छंग उन्नय विसालधवलदंताणं, ईषदुच्छङ्गोन्नतविशालधवलदन्तानाम् ईषदुच्छङ्ग, उत्सङ्गः पृष्टदेशः तस्मिन् ईषदुत्सङ्गे किञ्चित्पृष्टदेशभागे उपरि उन्नता मेरुदण्डा अधो भागे च विशालाश्च उदरापरपर्यायावयव विशेषाः योवनारम वितित्वादेव ते च ते धवलदन्ताश्च ते सन्ति येषां ते तथा भूतास्तेषाम् पुनः कीदृशानां गजानां काञ्चन कोशी प्रविष्टदन्तानाम्-काश्चनकोश्यः सुवर्णखोलाः ताप्नु प्रविष्टा दन्ताः येषां ते तथाभूताः तेषाम् तथा काञ्चनमणिरत्न भूषितानां काञ्चनानि सुवर्णानि मेणयः चन्द्रकान्तादयः रत्नानि च अन्ये बहुमुल्यकरत्नविशेषास्तैः भूषिताः शोभिताः ये ते तथाभूताः तेषाम् पुनः कीदृशानाम् वरपुरुषरोहकसंप्रयुक्तानाम् वरपुरुषाः श्रेष्टपुरुषाः ये रोहकाः आरोहकाः निषादिनस्तैः सम्प्रयुक्ताः ईसितुंगाणं ईसिउच्छंग उन्नवि मालधवलदंताणं कंचणकोडोपविद्वदंताणं कंचणमणिरयणभूसियाणं वरपुरिसारोहणसंपउत्ताणं गयाणं अट्ठसयं पुरओ अहाणुपुबीए संपत्थियंत्ति) इनके बाद हाथियों का झुण्ड प्रस्थित हुआ ये हाथी जिनके अभी पूर्णरूप से दांत बाहर नहीं निकल पाये थे-किन्तु कुछ २ रूप में ही जिनके दांत बाहर निकले थे ऐसे थे इसी कारण जो पूर्णरूप से युवावस्था संपन्न नहीं थे-युवत्व की ओर बढ़ रहे थे प्री ऊँचाई जिनमें अभी प्रकट नहीं हो सकी था, पृष्ठ देश भी जिनका पूरा ऊँचा नहीं हो पाया थो, ऐसे उस ईषदुन्नतपृष्ठ देश में जिनका मेरुदण्ड कुछ २ ऊँचा था तथा अधोभाग में उदरापरपर्यायरूप . अवयव विशेष विशाल थे दांत इनके बिलकुल शुभ्र थे वे सुवर्णनिर्मित खोली से मावृत थे ये सुवर्णो से चन्द्रकान्त आदि मणियो से एवं बहुमूल्य रत्नविशेषों से शोभित थे इनके ऊँपर अश्व चण ईसिदंताणं ईसिमत्ताणं ईसितुंगाणं ईसिउच्छंग उन्नविसाल धवल दंताणं कंचण कोसीपविट्ठदंताणं कंचणर्माणरयणभूसियाणं वरपूरिसारोहणसंपत्ताणं गयाणं अट्ठसय पुरओ अहाणुपुव्वीए संपत्धित्ति) त्यारा हाथीमाना समूड प्रस्थित थी. ये डाथामा જેમના દાંતે હજી પૂર્ણ રૂપમાં બહાર પણ નીકળ્યા હતા, પણ છેડા-છેડા દાંત જેમના બહાર નીકળ્યા છે એવા હતા, એથી એ હાથીઓ પૂર્ણ રૂપમાં યુવાવસ્થા સમ્પન્ન થયા ન હતા. યુવાવસ્થા તરફ એ હાથીએ વધી રહ્યા હતા. પૂરે પૂરી ઊંચાઈ પણ એ હાથીઓની હજી પ્રકટ થઈ ન હતી, એ હાથી એના પૃષ્ઠભાગ પણ હજી સંપૂર્ણ રૂપમાં ઊંચા થયે ન હતો, એ વા એ ઈષદુ ઉન્નત પૃષ્ટ દેશમાં જેમને મેરુદંડ થેડ–ડો ઉંચો હતે. તથા અધ ભાગમાં ઊદર ઉપ૨ પર્યાયરૂપ અવયવ વિશેષો વિશાળ હતા એ હાથીઓના દાંતે એકદમ શુભ્ર હતા. એ દાંત સુવર્ણ નિર્મિત પત્રથી આવૃત્ત હતા એ હાથીએ સુવ– ણેથી, ચન્દ્રકાંત વગેરે મણિએથી તેમજ બહુમૂલ્ય રત્નવિશેષો થી શોભિત હતા, એમની Page #898 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८८४ जम्वृद्धोपप्रप्तिसूत्रे ये ते तथाभूताः तेषाम् एवं भूतानां गजानां हस्तिनाम् अष्टशतम् अष्टोत्तरशतं पुरतो यथानुपूा क्रमेण सम्प्रस्थितम् । अथ रथाः तयणंतरं च णं सछत्ताणं सज्झयाणं सघंटाणं साडागाणं सतोरणवराणं सरिघोसाणं सखिखिणो जालपरिक्खिताणं हिमवंत कंदरंतरणिवाय संवद्धिय चित्ततिणिस कणगमणिजुत्तदारगाणं कालायससुकयणेमिजत कम्माणं सुसिलिम्वत्तमंडलधुर णं आइण्णवरतुरग संपउत्ताणं कुसलणरच्छेअ सारहिम संपग्गहियाणं बत्तीसतोरणपरिमंडियाणं सकंकडवडेंसगाणं सचावसर पहरणावरण भरिअ जुद्ध सज्जाणं अट्टसयं रहाणं पुरो अहाणुपुबीए सपद्वियं'इति स्थानां विशेषणानि आहतदनन्तरं च खलु रमणीयाति रमणीय सच्छत्राणां छत्रयुक्तानां सध्वजानां महाध्वजसहितानां सघण्टानाम् घण्टिकायुक्तानां सपताकानां लघुध्वजसहितानां सतोरणवगणां श्रेष्टतोरणयुक्तानाम् अत्र तोरणं द्वारस्य अवयवविशेषः यद्वा तोरणम् 'मेहराव' इति भाषाप्रसिद्धं तद्युक्तानां सनन्दिघोषाणां नन्दिधोषाः युगपद् द्वादशप्रकारक वाद्योत्थितध्वनिविशेषाः तेः सहितानां सकिङ्किणीजालपरिक्षिप्तानां परिक्षिप्तक्षुद्रघण्टिकापड्किविशेषयुक्तानां हिमवत् कन्दरान्तरनिर्वातसंवदितचित्रतिनिश कनकमणियुक्तदारुकाणाम्' तत्र हिमवतः क्षुद्रहिमवतःक्षुद्रहिमवद्गिरेः निर्वातानि वातरहितानि यानि कन्दरान्तके चालन क्रिया में पटुतर विषादोजन बैठे हुए थे ऐसे ये हाथी १०८एकसो आठ थे (तयणंतरंचणं सछत्ताणं सज्झयाणं सघंटाणं,सपडागाणं, ततोरण वराणं सणंदिघोसाणं सखिखिणीजालपरिक्खित्ताणं हिम-वंतकंदर तरणिवाय संवद्धिय चित्ततिणिसकणग मणिजुत्तदारुगाणं ) इनके बाद रथ संप्र स्थित हुए ये रथ छत्रों सहित थे, वजा सहित थे घंटाओं सहित थे पताकाओं-लधुध्वजाओसहित थे श्रेष्ठ तोरणों से युक्त ये द्वार के अवयवविशेष का नाम तोरण है जिसे भाषा में मेहराव कहा जाता है। नंदिघोष से समन्वित थे एक साथ जो बारह प्रकार के बाजे बनते हैं और उनसे जो ध्वनिका अंबार निकलता है उसका नाम नन्दिघोष है छोटी २ घटियों का जाल तरतीब बार इनके ऊपर विछा हुमा था इनमें जो फलक-विशेष प्रकार के पटिये लगाये गये थे-वे क्षुद्र हिमवगिरि की निर्वात कन्दरा के बीच में-भीतर संवद्धित हुए विविध ઉપર અશ્વ સંચાલન ક્રિયામાં પટુતર લેકે કરતાં પણ વિશેષ પટુ એવા વિષાદી અને ता. अवा मे हाथी १०८ ता. (तयणंतरचणं सछत्ताणं सज्झयाणं सघंटाणं सपडागाणं, सतोरणवराणं, सणंदिघोसाणं सखित्रिणीजालपरिक्खित्ताणं हिमवंतकंदरतरणिब्बायसंवद्धिय चित्तग्गितिणिसकणगमणिजुत्तदारुगाण) त्या२मा २थे। सस्थित थया. मे २थे। छत्री सहित ता. जी सहित हता, घंटासा सडित ता, पतासाલદેવજીએ-સહિત હતા. તારાથીયુક્તહત દ્વારના અવયવ વિશેષનું નામ તારણ છે. જેને हिन्दी भाषामा 'महेराब' हुवामां भावछ. नहिधावथी समन्वितता.अहीसाथेरेसार પ્રકારના વાદ્યો વગાડવામાં આવે અને તેમાથી જે ધ્વનિ નીકળે છે તેનું નામ નંદિઘોષ છે. નાની-નાની ઘંટડીઓનો સમહ કમિશઃ એમની ઉપર આડૂત હતા. એમની અંદર જે કલક વિશેષ પ્રકારના પાટિયા લગાડવામાં આવ્યા હતા–તે ક્ષુદ્ર હિમવર્દ ગિરિની નિર્વાત Page #899 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारः सु० २८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णनम् ८८५ राणि दरीमध्यानि तत्र संवद्धिताः वृद्धि प्राप्ताः चित्राः विविधाः अनेकप्रकारकाः तिनिशाः तन्नामक वृक्षविशेषाः तेषामेव कनकमणियुक्तानि दारुणि काष्टविशेषफल कानि येषु तेतथा तेषाम् पुनः कीदृशानाम् कालायस सुकृत नेमियन्त्रकर्मकाणम् कालायसः लोहविशेषः तेन सुकृतं सुरचितं नेमियन्त्रं नेमिः चक्रपरिधिः तस्योपरि भागे वर्तमानं यन्त्रं तस्य कर्म गतिक्रिया येषां ते तथा पुनः कीदृशानाम् मुश्लिष्ठवृत्तमण्डलधुराणां मुश्लिष्टं सुसङ्गतं वृत्तमण्डलं चक्रोपरिभागेवर्तुलाकाररूप धुरं धुरायेषां ते तथा तेषाम् पुनः आकीर्ण वरतुरगसंप्रयुक्तानाम् आकोयन्ते व्याप्यन्ते जवादि गुणैरिति आकीर्णाः वरतुरगाः श्रेष्ठाश्वाः ते मुसंप्रयुक्ताः सुष्टुसम्यग्योजिताः येषु ते तथा पुनः कीदृशानाम् कुशलनरच्छेकसारथि मुसंप्रगृहीतानां कुशलाः निपुणाः नरच्छेकाः मनुष्येषु चतुराः तैः सुसंप्रगृहीताः सुष्टु सञ्चालिताः ये ते तथा तेषाम् पुनः कीदृशानां द्वत्रिंशत्तूणपरिमण्डितानां द्वात्रिंशत् द्वात्रिंशत्संख्यकाः तूणाः बाणाधारभूताः तैः मण्डिताः शेभिताः ये ते तथभूतास्तेषाम् पुनः कीदृशानाम् सकङ्कटावतंसकानां सङ्कटाः कवचाः अवतंसकः शिरस्त्राणभूताः शिरोवेष्टनरूपा आभरणविशेषा स्ते सन्ति येषु ते तथाभूतस्तेषाम् पुनः कीदृशानाम् सचापशर प्रहरणावरणभरितयुद्ध सज्जानाम् चापाः धषि तैः सहिताः शराः वाणाः तथा तिनिस वृक्षों के बने हुए थे और कनक एवं मणियों से स्वचित थे. (कालायस सुकयणेमिजतकम्माण सुसिलिट्ठवत्तमंडलधुराण आइण्णपरतुरगसंपउताण) कालाय तलोहविशेष-से 'सुरचित चक्रपरिधि के उपर वर्तमान यन्त्र को गतिक्रिया 8 युक्त थे. इनकी धुरा सश्लिष्ट सुसंगत एवं गोल मंडल वाली था. अपने वेग से युक्त ऐसे श्रेष्ठ घाडे इनमें जुते हए थे. (कुसलनरच्छेक सारथि सुसंपग्गहियाण) कुशल सारथियों द्वारा जो कि रथ संचालक मनुष्यों के बीच में श्रेष्ठ माने जाते थे ये संचालित हो रहे थे. (बत्तीसतोणपरिमंडियाणं सकेकडवडे सगाणं सचाव सरपहरणावरणभरिअजुद्धसम्जाणं अट्ठसय रहाण पुरओ अहाणुफवीए संपद्रिय) ३२ बाणों के धरने के स्थान भूत तोणों से-भागों से परिमंडित थे ये सकट कवच और अवतंसक-शिरस्त्राणभूत-आवरणविशेषों से भरे हुये थे, धनुष-वाण-प्रहरण, और કદરાના મધ્યમાં-અંદર સંવર્જિત થયેલા વિવિધ તિનિશ વૃક્ષોના બનાવેલા હતા. તેમજ इन भने भणिया थी थे (ता . ( कालायस सुकयणेमिजतकम्माणं सुसिलिट्ठवत्तमंडलधुराण आइण्णवरतुरगसुसंपउत्ताणं सायस-या विशेष थी सुथित य. પરિધિની ઉપર વિદ્યમાન મન્નની ગતિ કિયા થી એ યુક્ત હતા. એ રથની ધુરા સુષ્ટિ , સુસંગત તેમજ ગોળ- મંડલવાળી હતી પિતાના વેગથી યુક્ત એવા શ્રેષ્ઠ घोडाया से रथामा नेता ता. (कुसलनरन्छेकसारथि सुसंगहियाणं)शल साथिये। વો કે જેઓ ૨થ સંચાલક મનુષ્યમાં શ્રેષ્ઠ માનવામાં આવતા હતા એ ૨થા સંચાલિત થઈ रघा उता. (बत्तीसतोणपरिमंडियाणं सकंकरवडेंसगाणं सचावसरपहरणावरणभरिअजुद्धसज्जाण अहसय रहाण पुरओ अहाणुपुव्वीए संपट्टियं) ३२ मत्रीश माने भूवाना स्थान શ્રત તાણે થી તૂણીરેથી એ રસ્થાથી મંડિત હતા. એ રથા સકકટ, કવચ અને અવતંસક Page #900 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८८६ अम्बूद्धोपप्रज्ञप्तिसूत्र प्रहरणानि आयुधानि अस्यादीनि आवरणानि कवचानि तैः भरिताः परिपूरिताः अतएव युद्धसज्जाः सङग्रामसज्जिताः ये ते तथाभूतास्तेषां रथानाम् अष्टशतम् अष्टोत्तरश तम् पुरतो यथानुपूर्त्या यथाक्रमं सप्रस्थितं संचलितम् । अथ पदातयः-'तयणंतरं च णं असिसत्ति कुंत तोमरसूललउड भिडिपालधणुपाणिसज्ज पाइत्त णीयं पुरओ अहाणुपुयोए संपत्थियं त्ति' तदनन्तरं च खलु असिशक्ति कुन्ततोत्ररशूललगूडभिन्दिपाल धनुःपाणिसज्जं पदात्यनीकं पादचारी सैन्यसमूहः पुरतो यथानु पूा सम्प्रस्थितमिति तदनन्तरं च खलु पदात्यनीकं पादचारकसैन्यसमूहः पुरतो यथानुपूा सम्प्रस्थितं तत् इत्याह-'असि' इत्यादि । 'असिशक्तिकुन्ततोमरशुललगुड भिन्दिपालधनुःपाणि सज्जम्-तत्र आसः खड्गः, शक्तिः त्रिशूलं कुन्तः प्रसिद्धः तोमरः बाणविशेषः शूलम् एकशुलं लगुडःप्रसिद्धः भिन्दिपालः शस्त्रविशेषः धनुः प्रसिद्धम् एते पाणी हस्ते यस्य तत् यथा सज्जं सङ्ग्रामादि स्वामि कार्ये तत्परम् एवंभूतं सत् तत् संस्थितमित्यर्थः। 'तरणं से भरहाहिवे णरिंदे हारोत्थय सुकयरइयवच्छे जाव अमरवइ सण्णिभाए इद्धोए पहियकित्ती चक्करयणदेसिमग्गे अणेगरायवरसहस्साणुयायमग्गे' ततः खलु स महाराजो भरताधिपो नरेन्द्रः हारावस्तृतमुकृतरतिदवक्षस्को - यावत् आयुध इनमें जगह जगह पर रखे गये थे. अतएव ऐसा प्रतोत होता था कि मानो ये रथ युद्ध के निमित्त ही सज्जित करने में आये हैं. ऐसे ये रथ १०८ थे. (तयणंतरंचणं. असि. सत्ति कुंत. तोमर. सुल. लउड, भिंडियालघणुपाणिसज्जपाइत्ताणीयं पुरमओ महाणुपुव्वीए संपत्थियं ) इनके बाद अगे पदात्य नीक-पैदल सेना समूह चला इसमें प्रत्येक सैनिक के हाथ में असि-तलवार शक्ति-त्रिशूल, कुन्त, भाला, तोमर बाणविशेष, शूललगूडलाठी, भिन्दिपाल-शस्त्रविशेष एवं धनुष ये सब थे. (तएणं से भरहाहिवे णरि दे हारोत्थयसुकयरइयवच्छे जाव अमरवइ सण्णिमाए इद्धीए पहियकित्ती, चक्करयणदेसियमग्गे, अणेणरायवरसहस्साणुयायमग्गे जाव समुदरवभूयपिव करेमाणे २ सव्विद्धोए सव्वज्जुईए जाव णिग्योશિરસ્ત્રાણભૂત આવરણ વિશે થી અલંકૃત હતા. ધનુષ, બાણુ પ્રહરણ અને આયુધ એ રથ માં સ્થાન સ્થાન ઉપર મૂકવામાં આવ્યા હતા. એથી એની પ્રતીતી થતી હતી કે જાણે એ ૨થે યુદ્ધ માટે જ સુ જિજત કરવામાં આવ્યા ન હોય ! એ રથે ૧૦૮ હતા. (तयणंतरचणं असिसत्तिकुततोमरसूल, लउड, भिडियाल धणुपाणिसज्ज पाइत्ताणीयं परओ अह.णुपूव्वीप संपत्थियं) त्या२मा माग माग पहात्यनी: पति सेनानी સમૂહ ચાલે. એ પદાતિ સેનાના દરેક દરેક સનિકના હાથમાં અસિ તલવાર, શક્તિत्रिशूल, हुत-बे, ताभ२ मा विशेष, शूल, स-साडी, मिया शस्त्र विशेषतम १५५ से मयां म-शखो तi (तपणं से भरहाहिवे णरिंदे हारोत्थयसुकय रइयवच्छे जाव अमर वह सण्णिभाप इद्धीप पहियकित्ती चक्करयणदेसियमग्गे, अणेगरायवर सहस्साणुयायमग्गे जाव समुद्दबभू यंपिवकरेमाणे २ सघिद्धीए सवज्जुईए जाव णिग्घोस Page #901 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० २८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरतकार्यवर्णनम् ८८७ तत्र हारेण-मुक्ताहारेण अवस्तृतम् आच्छादितम् अतएव सुकृतरतिदं सुष्ठुचिततया आनन्दजनकं वक्षो वक्षःस्थलं यस्य स तथा, अत्र यावत्पदात् कुण्डलोद्योतिताननः प्रलम्बप्रालम्बमानसुकृतपटोत्तरीयः इति ग्राह्यम्, पुनः कीदृशः सः तत्राह'अमरवइ' इत्यादि 'अमरबइ सण्णिभाए' अमरपतिसन्निभया इन्तुल्यया ऋद्धया भवनाभरणादि लक्षणया सम्पदा (युक्तः), तथा प्रथितकीतिः विख्या :यशाः तथा चक्ररत्नदेशितमार्गः चक्ररत्नेन देशितः प्रदर्शितो मार्गों यस्मै स तथा, तथा अनेक राजवरसहस्त्रानुयातमार्गः-अनेकराजवरसहस्त्रैः अनुयातः अनुगतो मार्गों यस्य भरतस्य स तथा तस्य मुकुटधारिणोऽनेकसहस्रा गजप्रवरा राजानः षड्खण्डाधिपतिर्भरतप्रदर्शितमार्गे प्रचलन्तीस्यर्थः दिग्विजयाथ गमनसमये सेनादिकानां शब्दमुपमानेन दर्शयन्नाह-'जाव समुद्दरवभूयंपिव करेमाणे करमाणे सव्वद्धीए सव्वज्जुइए जाव णिग्योसणाइयरवेणं' यावत्समुद्ररवभूतामिव समुद्रशब्दं प्राप्तामिव मेदिनीमिति गम्यम् अत्र यावत्पदात् त्रुटित वाविशेष शब्दसन्निनादेन अश्वगज सैन्यादि शब्दबाहुल्येन च समुद्ररवं प्राप्तमिव मेदिनी कुर्वन् सणाइयरवेणं गामागरणगरखेडकव्वडमडंब जाव जोयणंतरियाहिं वसहीहिं वसमाणे २ जेणेव विणीया रायहाणी तेणेव उवागच्छइ) इस तरह के ठाठ बाट से सजित हुआ जिसका समस्त राजवैभव जिसके आगे २ चल रहा है ऐसे वे भरत जहाँ पर अपनी विनीता नाम की राजधानी थी वहाँ पर आये ऐसा सम्बन्ध यहाँ पर लगाना चाहिये, अपने ममस्त गनसी टाठ बाट से चलने वाले भरत राजा का वक्षस्थल मुक्ताहार से आच्छादित था अत एव वह देखने वालो को आनन्द दायक बना हुआ था यावत् कुण्डल की कान्ति से मुखको आभा द्विगुणित होकर बाहर फैल रही थी, बहुत हो सुन्दर ढंग से लम्बे अधोवस्त्र और उत्तरीयवस्त्र इन्होंने पहिरे हुए थे अमरपति जैसा ऋद्धि से युक्त थे, इनका यश चारों दिशाओं में प्रख्यात हो चुका था विनीता राजधानी का और जानेवाले निष्कंटक मार्ग को बतानेवाला चक्ररत्न इनके आगे २ जा रहा था अनेक श्रेष्ठ राजाओं का सहस्त्र इनके पीछे २ चल रहा था, सेना मादिजनों के उत्थित हुए शब्दों से उस समय यह भूमंडल को, समुद्र के तूफानी शब्दों से जाइयरवेण गामागर गरखेड कव्वडमडंब जाव जोयण तरियाहि वसहिहि वसमाणे २ जेणेव विणीया रायहाणी तेणेव उवागच्छद) मा ततन 18-मार थी यासना२। भरत જાનું વક્ષસ્થલ મુક્તાહાર થી સમલંકૃત હતુ. એથી દર્શકો માટે તે આહલ દક બની ગયું હતુ યાવત્ કંડલની કાંતિ થી મુખની આભાદ્વિગુણિત થઈ ને બહાર પ્રપરી રહી હતી. અતીવ સુદર ઢંગ થી એ રાજાએ અધોવસ્ત્ર અને ઉત્તરીય વચ્ચે ધારણ કરેલા હતા એ નૃપતિ અમર પતિ (ઇન્દ્ર) જેવી અદ્ધિ થી યુક્ત હતા. એમનો યશ મેર દિશાએ માં પ્રખ્યાત થઈ ચૂક્યો હતો. વિનીતા રાજધાની તરફ જતું અને નિષ્કટક માર્ગ બતાવનારું ચક્રરત્ન એમની આગળ-આગળ ચાલી રહ્યું હતું અનેૐ શ્રેષ્ઠ રાજાઓ ને સમૂહ એમની પાછળ– પાછલ ચાલી રહ્યો હતે પિતાની સેના વગેરે થી ઉસ્થિત શબ્દ થી તે સમયે ભૂમંડલને જાણે સમુદ્રના તોફાન થી ઘર શબ્દ થયોન હાય, આમ બતાવતા તે નૃપ ભરત ચાલી Page #902 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८८८ - जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे कुर्वन् सर्वद्धर्या हस्त्यश्वादि सर्व सम्पदा सर्वद्युत्या मणिमुकुटादि त्या सर्व कान्त्या यावत् निर्घोषनादितेन यावत्पदात् भेरी झल्लरी मृदङ्गानेकवाद्यपरिग्रहः तेषां निर्घोषनादितेन माध्वनिप्रतिरवेण ( युक्तः ) स महाराजो भरतः 'गामागरणगरखेड कब्बडमडब जोरिया सहोहिं वसमाणे बरमाणे जेणेव विणीया रायहाणी तेणेव उवागच्छर' ग्रामाकरनगर खेटकर्बट मडम्ब यावद् योजनान्तरिताभिः योजन व्यवहिताभिः वसतिभिः निवासस्थानैः वसन् वसन् निवसन् निवसन् यत्रैव विनीता तन्नाम्नी राजधानी तत्रैव उपागच्छति स भरतः । यावत्पदात् द्रोणमुख पत्तनाश्रम सम्बन्ध सहस्रमण्डितं स्तिमितमेदिनीकाम् उपद्रवरहितेन स्थिरमेदिनीस्थजनां वसुधामभिजयन् २ अय्याणि उत्तमोत्तमानि वराणि रत्नानि प्रतीच्छन् तद्दिव्यं चक्ररत्नमनुगच्छन् अनुगच्छन् इति ग्राहयम् ग्रामाकरनगरादोनां तु अस्मिन्नेव वक्षस्कारे अव्यवहित पड्विंशति सूत्रे द्रष्टव्यम् ' उवागच्छित्ता' उपागत्य ' विणीयाए रायहाणीए अदुरसामंते दुवालस जोयणायामं णवजो यणवित्थिन्नं जाव खंधावारनिवेस करेइ' विनीता राजधान्याः राजधानीभूतनगर्याः विनीता अदूरसामन् नातिदूरे नातिसमीपे द्वादशयोजनायामम् अष्टाचत्वारिशत्क्रोशर्पा र मितदैर्घ्यम्, नवयोजनविस्तीर्ण षट्त्रिंशत्क्रोश विस्तार भूतं यावत्स्कन्धावारनिवेशं करोति । अत्र यावत्पदात् वरनगरसहव्याप्त हुआ नही मानों ऐसा करता २ चल रहा था और हस्त्यश्वादि रूप अपनी सम्पत्ति से मणिमुकुटादिकों की चुति से एवं शारीरिक कान्ति से दिग्मंडल को आश्चर्य चकित करता हुआ आ रहा था साथ में अनेक प्रकार के बाजे बजते हुए आ रहे थे इस तरह वे भरत राजा ग्राम आकर नगर खेट, कर्बट आदि स्थानों में चार २ कोश से अन्तर से अपनी सेना का पडाव डालते २ और वहाँ के निवासियों द्वारा प्रदत्त प्रोति दान को स्वीकार करते २ जहाँ पर विनीता नाम की राजधानी थी वहाँ पर आ पहुँचे ग्राम आकर आदि पदों की व्याख्या इसी प्रकरण में २६ वे सूत्र में अभी २ की गई है सो वहीं से देख लेनी चाहिये (उवागच्छित्ता विणोयाए अदुरसामंते दुवालसजोयणायामं णव जोयणवित्थिन्नं नाव स्वधावा निवेस करेइ) विनीता राजधानी के पास आकर इन्होंने अपनी सेना की ४८ कोश लम्बो રહ્યો હતા. તેમજ હસ્તિ અશ્વબાદિ રૂપ પેાતાની સમ્પત્તિ થી, મક્ત્તિ મુકુટાદિની દ્યુતિ થી તેમજ શારિરીક કાંતિ થી દિગ્મંડલ ને આશ્ચય ચકિત બનાવ તા ચાલી રહયા હતા. તેની સાથે અનેક પ્રકારના વાદ્યો વગાડનારા બેા વાદ્યો વગાડતા ચાલી રહ્યા હતા. આ પ્રમાણે ते भरत रान् ग्राम, भा४र, नगर, जेड, मुंड, वगेरे स्थानोभां यार-यार गाना अ ंतर થી પાતાની સેનાના પડાવ નાખતા નાખતા અને ત્યાંના નિવાસીએ દ્વારા પ્રદત્ત પ્રીતિદાનને સ્વીકારતા સ્વીકારતા જ્યાં વિનીતા નામે રાજધાની હતી ત્યાં પહોંચ્યા ગ્રામ, આકર વગેરે પદાની વ્યાખ્યા આ પ્રકરણમાં જ ૨૬માં સૂત્રમાં હમણાં જ કરવામાં આવી છે તે જિજ્ઞાસુ न त्यांची लगी बे (उवागच्छित्ता विणीयाप अदूरसामंते दुवाल सजोयणायाम जब जोयणवित्थिम्न जाव खंधाबार निवेस करेह) विनीता राजधानी पासे पनि તે રાજા એ પેાતાની સેનાના ૪૮ ગાઉ વાંમા અને ૩૬ ગાઉ પહેળા પડાવ નાખ્યું. એ Page #903 -------------------------------------------------------------------------- ________________ काशिकाठीका तृ. ३ वक्षस्कारः सु० २८ राज्योपार्जनानन्तरीयभरत कार्यवर्णनम् ८८९ शमिति ग्राह्यम् । 'करिता' कृत्वा 'वढइरयणं सद्दावेइ सदावित्ता जाव पोसहसालं arrfans' वर्द्धरित्नं शब्दयति आह्वयति शब्दयित्वा आहूय यावत् पौषधशालामंतुविशति अत्र यावत्पदात् पौषत्रशाला निर्माणार्थ वर्द्धकि आज्ञापयति स च पौषधशालां करोति कृत्वा उक्तामाज्ञप्तिकां राज्ञे भरताय समर्पयतीति ग्राह्यम् ' अणुपविसित्ता' अनुयि 'विणीयाए राहाणीए अमभत्तं पगिण्डइ' विनीतायां राजधान्याम् अष्टमभक्तं प्रति अत्र विनताधिष्ठायकदेव साधनाय । ननु इदमष्टमानुष्ठानम् अनर्थकं विनीता को भरतस्य पूर्वमेव तदविकारे स्थितत्वादिति चेन्मैवं निरुपद्रवेण वासस्यैयर्थिमित्यभिप्रायात् पण्डित्ता' प्रगृय 'जाव अपभत्तं पडिजागरमाणे २ विहरइ ' यावत् अष्टमभक्तं प्रतिजाग्रत् विहरति तिष्ठति स भरतः इति भावः ॥ २८ ॥ और ३६ कोश तक को चौड़ी छावनी डाली यह छावनी का स्थान विनीतानगरों के पास ही था यह एक श्रेष्ट नगर के जैसा उस समय प्रतीत होता था (करिता वेद्धइरयणं सदावेइ) सेना का पड़ाव डालेकर फिर भरत गरेशने अपने वर्द्धकिरत्न को बुलाया (सदावित्ता जाव पोसह साल अणुपविसंह) और पौषशाला के निर्माण करने को आज्ञा प्रदान की आज्ञानुसार उसने पौषत्रशाला का दिया और पीछे पौषध, शाला के निर्माण हो जाने की स्ववर श्रीभरत नरेश के पामपहुंचा भरतनरेश उस पौषधशाला में आ गये (अनुपविसित्ता विणोयाए रायहाणीए अट्टमभत्तं परिण्डइ) वहाँ आकर उन्होंने विनीता नगरोके अधिष्ठायक देव को वशमें करने के लिये अष्टमभक्त की तपस्या धारण क (पनिहिता जाव अट्टमभतं पडिजागर माणेर विहरह) और धारण करके यावत् वे उसमें छी तरह से सावधान होगये यहां ऐसी आशंकाहो सकती है कि यहां पर जो भरत नरेशने अट्टम (क) तपस्या धारण का वह तो एक प्रकार से अनर्थक जैसी ही प्रतीत होती है क्योंकि विनीता राजधानी तो पहिले से उनके सर्वाधिकार में स्थित थो सो इसका समाधान ऐसा है कि बिना किसी પડાવ વિનીતા નગરીની પાસે જ હતા એ પડાવ કજનોને એક શ્રેષ્ઠ નગર જેવાજ प्रतीत थता इतेो (करिता वड्ढइरयणं सदावेइ) सेनानी पडाव नाजीने पछी भरत नरेशे पोताना वडिलने मेाव्य (सदावित्ता जाव पोसहसाल अणुपविस) भने मोसावाने તેને પૌષધશાલા નિર્માણુ કરવાતી આજ્ઞા આપી. આજ્ઞા મુજબ તે વદ્ધ કીરને પૌષધશાલા માવી અને પછી પૌષધશાલા નિમિત થઈ ગઈ છે એવી સૂચના ભરત નરેશ પાસે પહોંચાડી, अनिरेश ते पोषशामा रह्यो (अणुपविसित्ता विणीयाए रायहाणी अट्टमभन्त्त eit) ત્યાં પહેાંચીને ભરત નરેશે વનીતા નગરીત અધિષ્ઠાયક દેવને વશમાકરવા માટે म भनी तपस्या ४० (गिण्डित्ता जाव अट्टमभत्तं पडिजागरमाणे पडिजागर माणे विरह) मने ध२ उरीने यावत् ते ते सारी रीते प्रावधान थाई गये। भत्रे क्षेत्री અશંકા ઉદ્દભવી શકે તેમ છે કે, અહીં જે ભરત નરેશે અઠ્ઠમ ભક્તની તપસ્યા ધારણ કરી તે તે એક રીતે અનથક જેવી જ પ્રતીત થાય છે, કેમકે વિનીતા રાજધાની તે પહેલે થી જ તેમના સર્વાધિકારમાં હતી” તે આ શંકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે છે કે વગર ફાઈ Page #904 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८९० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे ___यदा स भरतो दिगविजयं कृत्वा आगच्छति स्वराजधानी तदा तत्र किं करोति तत्राह-" तएणं से" इत्यादि । मुलम्-तए णं से भरहे राया अट्ठमभत्तंसि परिणममासि पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता कोडंबिय पुरिसे सहावेई सहावित्ता तहेव जाव अंजणगिरिकूडसण्णिभं गयवई णरवई दुरूढे तंचेव सव्वं जहा हेट्ठा णवरिं णव महाणिहिओ चत्तारि सेणाओण पविसति सेसो सोचेव गमो जाव णिग्घोसणाइएणं विणीयाए रायहाणीए मज्झं मज्झेण जेणेव सए गिहे जेणेव भवणवरखडिंसगपडिदुवारे तेणेव पहारेत्थ गमणाए, तएणं तस्स भरहस्स रण्णो विणीयं रायहाणि मज्झं मज्झेणं अणुपविसमाणस्स अप्पेगइया देवा विणीयं रायहाणिं सम्भंतरबाहिरियं आसिअसम्मज्जिओवलितं करेंति अप्पेगइया मंचाइमंचकलियं करेंति एवं सेसेसु वि पएसु अप्पेगइया णाणाविहरागवसणुस्सिय घय पडागामंडितभूमियं अप्पेगइया लाउल्लोइयमहियं करेंति अप्पेगइया जाव गंधवट्टिभूयं करेंति, अप्पे गइया हिरण्णवासं वासिंति सुवण्णरयणवइरआभरणवासं वासेंति, तएणं तस्स भरहस्स रण्णो विणीयं रायहाणी मज्झं मज्झेणं अणुपविसमाणस्स सिंघाडग जाव महापहेसु बहवे अत्थथिआ कामथिआ भोगत्थिा लाभत्थिआ इद्धिसिआ किबिसिआ कारबाहिआ कारोडिआ संखिआ चक्किआ णांगलिआ मुहमंगलिआ वद्धमाणया लंख मंख माइआ ताहिं ओरालाहिं इट्टाहिं कंताहिं पिआहिं मणुन्नाहिं मणामाहिंधण्णाहिं सिवाहि मंगल्लाहिं सस्सिरीआहिं हिअयगमणिज्जाहिं हिअयपल्हायणिज्जाहिं वग्ग्रहिं अणुवरयं अभिणंदंता य अभिथुणंताय एवं वयासी-जय जय गंदा जय जयभद्दा ! भदंते अजियं जिणाहि जिअं पालयाहि उपद्रव के वहां पर वास बना रहे तथा प्रजाजन सुख शांति से रहें-इसके लिये यह तपस्या उन्होंने धारण की अतः इसमें सार्थकता ही है निरर्थकता नहीं। ॥२८॥ પણ જાતના ઉપદ્રવે ત્યાં પોતાના વાસ રહે તથા પ્રજા સુખ શાંતિ પૂર્વક રહી શકે-એટલા માટે આ તપસ્યા તેમણે ધારણ કરી. એથી આ તપસ્યા સાર્થક જ કહેવાય, નિરર્થક નહીં ૨૮ Page #905 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तु.३ वक्षस्कारः सू० २९ स्वराजधान्यां श्रीभरतकार्यदर्शनम् ८९१ जिअमज्झे वसाहि इंदोविव देवाणं चंदोविव ताराणं चमरोविव असुराणं धरणोविव नांगाणं बहूहिं पुव्वसयसहस्साणं बहूईओ पुवकोडीओ बहूईओ पुबकोडाकोडीओ विणीयाए रायहाणीए चुल्लहिमवंतगिरिसागरमेरागस्स य केवलकप्पस्स भरहस्स गामागरणगर खेड-कब्बड दोणमुह पट्टणासमसण्णिवेसेसु सम्मं पयापालणोवज्जिअ लद्धजसे जाव आहेवच्चं पोरेवच्चं जाव विहराहि त्तिकटु जय जय सई पउंजंति, तए णं से भरहे राया गयणमाला सहस्सेहिं पिच्छिज्जमाणे २ वयणमाला सहस्सेहिं अभिथुव्वमाणे २ हिअयमाला सहस्सेहिं उण्णं दिज्ज माणे मणोरहमालासहस्से हिं विच्छिप्पमाणे २ तिरूवसोहग्गगुणेहिं पिच्छिज्जमाणे २ अंगुलिमालासहस्सेहिं दाइज्जमाणे २ दाहिणहत्थेणं बहणं णरणारीसहस्सेणं अंजलिमालासहस्सेहिं पडिच्छमाणे पडिच्छमाणे भवणपंती सहस्साणं समइच्छमाणे २ तंती तल तुडिय गीय वाइयरवेणं मधुरेणं मणहरेणं मंजुमंजुणा घोसेणं अपडिबुज्झमणे २ जेणेव सए गिहे जेणेव सए भंवणवरवडिंसयदुवारे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता आभिसेक्कं हत्थिरयणं ठवेइ ठवित्ता हत्थिरयणाओ पच्चोरुहइ पच्चोरुहित्ता सोलसदेवसहस्से सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता बत्तीसं रायसहस्से सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता सेणावइरयणं सकारेइ सम्माणेइ सकारिता सम्माणित्ता एवं गाहावइरयणं वद्धइरयणं पुरोहियरयणं सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारित्ता सम्माणित्ता तिण्णिसट्टे सूअसए सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता अट्ठारससेणिप्पसेणीआ सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता अण्णे वि बहवे राईसर जाब सत्थवाहप्पभिईओ सकारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ इत्थीरयणेणं बत्तीसाए उडुकल्लणिया सहस्सेहिं बत्तोसाए जणवयकल्लाणिया सहस्सेहिं बत्तीसाए बत्तीसइबद्धेहिं णाडयसहस्सेहिं Page #906 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AM~ ८९२ ___ अम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सद्धि संपरिखुडे भवणवरवसिगं अईइ जहा कुबेरोव्व देवराया केलासः सिहरिसिंग भूअति तए णं से भरहे राया मित्तणाइणिअगसयणसंबंधिपरिअणं पच्चुवेक्खइ पच्चुवेक्खिता जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता जाव मज्जणघराओ पडिकखमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव भोअणमंडवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता भोयणमंडवंसि सुहासणवरगए अट्टमभत्तं पारेइ पारित्ता उप्पिं पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइंगमत्थएहि बत्तीसइबद्धेहि णाडएहिं उवलालिज्जमाणे २ उवणच्चिज्जमाणे २ उवगिज्जमाणे २ महया जाव भुंजमाणे विहरइ ।। सू०।२९॥ . छाया-ततः खलु स भरतो राजा अष्टमभक्ते परिणमति पौषधशालातः प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य कौटुम्भिकपुरुषान् शब्दयति शब्दयित्वा तथैव यावत् अञ्जनगिरिकूटसन्निभं गजपति नरपतिः दुरूढः । तदेव सर्वं यथा अधः नवरं नव महानिधयः चतस्रः सेनाः न प्रविशन्ति शेषः स एव गमो यावत् निघोषनादितेन विनीताया राजधान्या मध्यं मध्येन यत्रैव स्वकं गृहं यत्रैव भवनवरावतंसकस्य प्रतिद्वारं तव गमनाय प्रधारितवान् ततः बलु तस्य भरतस्य राज्ञो धिनीतां राजधानों मध्यमध्येन अनुप्रविशतः अप्येके देवा विनीतां राजधानी साभ्यन्तस्वाह्याम् आसिक्कसम्मार्जितोपलक्षितां कुर्वन्ति अप्येके मञ्चातिमञ्चकलितां कुर्वन्ति अप्येके नानाविधरागवसनोच्छ्रितध्वजपताकामंडितभूमिका लापितोल्लोचित महितां कुर्वन्ति अप्येके एवं शेषेाप पदेषु, अप्येके यावत् गन्धवर्तिभूतां कुर्वन्ति अप्ये के हिरण्यवर्ष वर्षन्ति सुवर्णरत्नवज्राभरणवर्ष वर्षन्ति ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञोविनीतां राजधानी मध्यमध्येन अनुप्रविशतः श्रृङ्गाटक यावत् महापथेषु बहवोऽर्थार्थिनः कामाथिनो भोगार्थिनो लाभार्थिनः ऋद्धयेषाः किल्बिषिकाः कारोटिकाः कारवाहिकाः शांत्रिकाः चाक्रिकाः लाङ्गालकाः सुभटाः मुखमाङ्गलिकाः पुष्यमानकाः वर्द्धमानकाः लङ्वमखमा दिकाः ताभिः उदाराभिः इष्टाभिः कान्ताभिः प्रियाभिः मनोज्ञाभिः मनोमाभिः शिवाभिः धन्याभिः मङ्गलाभिः सश्रोकाभिः हृदयगमनीयाभिः हृदयप्रल्हादनीयाभिः वाग्मिः अनुपरसम् अभिनन्दन्तश्च अभिष्टुवन्तश्च एवम् अवादिषुः जय जय नन्दा! जय जय भद्रा ! भद्रं ते भजित जय जितं पालय जितमध्ये वस इन्द्र इव देवानाम्, चन्द्रइव ताराणाम् चमर इव असुराणाम्, धरण इव नागानाम्, बहूनि पूर्व शतसहस्राणि बहीः पूर्वकोटीः वही पूर्वकोटाकोटीः विनीतायाः राजधान्याःक्षुद्रहिमवनिरिसागरमर्यादाकस्य च केवलकल्पस्य भारतवर्षस्य ग्रामाकरनगरखेटकर्बटमडम्बद्राणमुख रत्तनाश्रमसन्निवेशेषु सम्यक् प्रजापालनोपार्जितलब्धयशस्कः महता यावत् आधिपत्यं यावत् विहर इति कृत्वा जय जय शब्दं प्रयुञ्जन्ति, ततः खलु स भरतो राजा नयनमालासहस्त्रैः प्रेक्ष्यमाणः प्रेक्ष्यमाणः वचनमालासहस्त्रैरभिष्टुबन्तः, अभिटुवन्तः हृदयमालासहस्त्रैः पूर्णपुनःपुनर्वा-दीयमानः पूर्ण दीयमानः मनोरथमालासहस्त्रैः वि. क्षिप्यमाणः विक्षिप्यमाणः कान्तिरूपसौभाग्यगुणैः प्रेक्ष्यमाणः प्रेक्ष्यमाणः अङगुलिमालासहस्त्रैः Page #907 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० २९ स्वराजधान्यां श्री भरतकार्यदर्शनम् दर्यमान दक्षिणहस्तेन बहूनां नरनारी सहस्राणाम् अलिमालासहस्राणि प्रतीच्छन् प्रतीच्छन् भवनपकि सहस्राणि समतिक्रमन् समतिक्रमन् तन्त्रीतलतालत्रुटितगीतवादितरवेण मधुरेण मनोहरेण मजुज्जुनाघोषेण अप्रतिबुध्यमानः अप्रतिबुध्यमानः यत्रैव स्वकं गृहं यौव भवनबरावतसकस्य द्वारं तत्रैवोपागच्छति उपागत्य आभिषेक्यं हस्तिरत्नं स्थापयति स्थापयित्वाभाभिषेक्यात् हस्तिरत्नात् प्रत्यवरोहति प्रत्यवरुह्य षोडषदेवसहस्त्रान् सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सम्मान्य द्वात्रिंशतं राजसहस्रान् सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सम्मान्य सेनापतिरत्नं सस्कारयति सम्मानर्यात सत्कार्य सम्मान्य एवं गाथापतिरत्नं वर्तकिरत्नं पुरोहितरत्नं सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सम्मान्य त्राणि पष्टानि सूशतानि सत्कारयति सम्मानयति लत्कार्य सम्मान्य अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणी: सत्कारयति सम्मानर्यात सत्कार्य सम्मान्य अन्यानपि बहून् राजेश्वर यावत् सार्थवाहप्रभृतीन् सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सम्मान्य प्रतिविसर्जर्यात । स्त्रीरत्नेन द्वात्रिंशता ऋतुकल्याणिकासहस्त्र द्वात्रिंशता जनपदकल्याणिको सहस्त्रैः द्वात्रिशताः द्वात्रिंशद्व? नाटकसहस्त्रैः सार्द्ध सम्परिवृतो भवनवरावतंसकम् अत्येति यथाकुबेरो देवराज इव कैलासशिखरिश्रंगभूतमिति । ततः खलु स भरतो राजा मित्रशातिनिजकस्वजनसम्बन्धिपरिजनं प्रत्युपेक्ष्यते प्रत्युपेक्ष्य यत्रैव मज्जनगृहं तव उपागच्छति उपागत्य यावत् मज्जनगृहात् प्रतिनिष्कार्मात प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव भोजनमण्डपस्तस्त्रैव उपागच्छति उपागत्य भोजनमण्डपे सुखासनवरगतः अष्टमभक्त पारयति पाराविया उपरिप्रासावागतः स्फुटद्भिः मृदङ्गमस्तकैःद्वात्रिशद्वद्ध नाटकै रूपलाल्यमान उपलाल्यमानःउप नृल्यमानः उपनृत्यमानः उपगीयमान उपगीयमानः महता यावत् भुजानो विहरति। सू०२९ ॥ - टीका-"तएणं से" इत्यादि। 'तएणं से भरहे राया अट्ठमभत्तंसि परिणममाणंसि पोसहसालाओ पडिणिक्खमई ततः खलु तदनन्तरं किल पडूखण्डाधिपतिः स भस्तो राजा अष्टमभक्ते परिणमति सति परिपूर्णे जायमाने सति पौषधशालातः प्रतिनिष्कामति निगच्छति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'कोडुबियपुरिसे सद्दावेइ' ____ राजधानी में भरत का कर्तव्य(तएणं से भरहे राया अट्ठमभत्तंसि परिणममाणंसि-इत्यादि सूत्र-२९ टीकार्थः (तएणं से माहे राया) इसके बाद वह श्री भरत महाराजा (अदम मत्तीस परिणममाणसि) अट्ठमभक्तको तपस्या समाप्त हो जाने पर (पोसहसालामो पडिणिक्खमइ) पौषधशाला से बाहर निकला (पंडिणिक्वमित्ता) और बाहर निकल कर (कौटुंबियपुरिसे सदावेइ) उपने अपने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया (सहावित्त एवं व्यासी) बुलाकर उनसे ऐसा कहा રાજધાનીમાં ભારતનું કર્તવ્ય (तपण से भरहे राया अट्ठमभत्त सि परिणममाणसि) इत्यादि सूत्र --२९॥ टी -(तपणं से भरहे राया) त्यार पाहते मरत रात (अट्ठमभत्तं सि परिणममाणीस) अटम भनी तपस्या पूरी करे पछी (पोसहसालामओ पडिणिक्खमइ) पौषधशालामाथी US नीच्या (पडिणिक्खमित्ता) भने २ नीजीने (कोड बियपुरिसे सहावेइ) सले Page #908 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ~ ~ ~ - ~ - ~ ८९४ जम्वृद्धोपप्रतिसरे कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति आहयति 'सदायित्ता' शब्दयित्वा आहूय तहेव जाव' तयैव पूर्ववदेव यावत् अत्र यावत्पदात् आभिषेक्यगजपतिसज्जीकरणमज्जनगृहस्नानकरणादि रूपः सर्वो आलापको ग्राह्यः तदनन्तरम् 'अंजणगिरिकूडसणिभं गयवई परवई दुरूहे' अजनगिरिकूटसन्निभम्-अजनपर्वतशृङ्गसदृश्यं सादृश्यं च उच्चत्वेन कृष्णवर्णत्वेन च बोध्यम् गजपतिम्, पट्टहस्तिनं नरपतिः राजा भरतः दुरूढः आरूढः 'तं चेव सव्वं जहा हेटा' तदेव सर्व तथा वक्तव्यम् यथा 'हेहा' अधस्तनपूर्वसूत्रो यादृशसामग्रीविशिष्टस्य विनीतातो गमनसमये वर्णन कृतं तथाऽत्रापि प्रवेशे वक्तव्यम् इत्यर्थः, अत्र विशेषमाह 'णवरं णव महाणिहिओ चत्तारि सेणाओ ण पविसति सेसो सोचेव गमो जाव णिग्योसणाइएणं विणीयाए रायहाणीए मज्झं मज्झेणं जेणेव सए गिहे जेणेव भवणवरवर्डिसगपडिदुवारे तेणेव पहारेत्थ गमणाए' नवरम् अयं विशेषः नैसदिशसान्ताः नव महानिधयो न प्रविशन्ति तेषां मध्ये एकैकस्य निधेविनीताप्रमाणत्वात् भो देवानुप्रियो ! तुम आभिषेक्य हस्तिरत्न को सनित करो इत्यादि पूर्वकथित सब कथन जैसा कि पहिले कहा जा चुका है वह सभी कथन यहां पर मज्जनगृह प्रवेश, स्नान करने तक का ग्रहण कर लेना चाहिये उसके बाद वह (अ ननगिरिकूडसविणभं गयवइ णरवई दुख्ढे) नरपति श्री भरत महाराजा उस अजनगिरि के जैसे गनपति पर आरूढ हो गया (तै चेव सव्वं जहा हेढा) यहां अब सब वर्णन जैसा विनीता राजधानी से विनय करने को निकलने समय पीछे किया जा चुका है. इसी तरह का वह सब कथन यहां प्रवेश करते समय भी कह लेना चाहिये. (णव णवमहाणिहिओ चत्तारि सेणामओ ण पविसंति सेसो सो चेव गमो नाव णिग्धोसणाइएणं विणीयाए रायहाणीए मझ मझेणं जेणेव सए गिहे जेणेव भवणवरवडिंसगपडिदुवारे तेणेव पहारेथ गमणाए) परन्तु प्रवेश करते समय इतनी विशेषता हुई कि विनीता राजधानी में महानिधियों ने प्रवेश नहीं कियाक्यों कि एक एक महानिधि का प्रमाण विनीता राजधानी के बराबर था. अतः वहां उन्हें स्थान पोतानाही मि ५३वान मेव्या (सहावित्ता एवं पयासी)मावावीनतमन प्रभाधु હે દેવાનુપ્રિ તમે ઓભિષેકય હસ્તિરત્ન ને સજિજત કરો વગેરે સર્વકથન પહેલાં મુજબજ અત્રે પણ સમજવું. અહીં મજન ગૃહમાં પ્રવેશ તથા નાન કરવા સુધીના પાક સંગૃહીત થયેલ છે, सयु सभात्यारा (अजनगिरीकूडसण्णिम गयवहंणरवई दूरूढे)नरति सरत ते मन निसदृश पति ७५२ मा३० 45 गया. (तं चेव सवं जहा हेट्ठा)मडी मधुबन જેવું વિનીતા રાજધાની થી નિકળતી વખતે-વિજય મેળવવા માટે પહેલા સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યું છે. તેવું જ તે બધું કથન અહીં પ્રવેશ કરતી વખતે પણ પૂર્વકથન પ્રમાણે યથાર્થ સમજી લેવું જોઈએ (णवरं णव महाणिहिओ चत्तारि सेणाओ ण पविसंति सेसो सो क्षेत्र गमो जावणिग्घोसणाइपन विणीयाए रायहाणीए मज्झ मज्झेणं जेणेव सए गिहे जेणेव भवणवरवडिं सगपडिदुवारे तेव पहारेत्थ गमणाप)५९ प्रवेश २ती मते माटात विशेष विनीता पानीमा महा નિધિઓએ પ્રવેશ કર્યો નહીં. કેમકે એક–એક મહાનિધિનું પ્રમાણ વિનીતા રાજધાનીની બરાબર Page #909 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ४०३ वक्षस्कारःस. २९ राजधान्यां श्री भरतकार्यदर्शनम् ८९५ कस्माते तत्रावकाशः तथैव चतस्त्रः सेना अपि न प्रविशन्ति शेषः स एव गमः अर्जितराज्यो निर्जितशत्रुरित्यादि ममग्रोऽपि पाठो वक्तव्यः यावन्नि?षनादितेन अत्र यावत्पदात् भेरी मल्लरी मृदङ्गादीनां ग्रहः तेषां निर्घोषनादितेन महाशब्दप्रतिशब्देन (युक्तः) स भरतो विनीताया राजधान्याः मध्यमध्येन यत्रैव स्वकं स्वकीयं गृहं राजभवनम्, यत्रैव भवनवरावतंसकप्रतिद्वारं तत्रैव गमनाय गन्तु प्रधारितवान् प्रवृत्तवान् । प्रविशति भरते चक्रवर्तिनि आभियोगिकदेवाः यथा २ वासभवनं परिष्कुर्वन्ति तथा माह-'तएणं' इत्यादि 'तए णं' तस्स भरहस्स रणो विणीयं रायहाणि मज्झं मज्झेणं भणुपविसमाणस्स अप्पेगइया देवा विणीयं रायहाणि सम्भंतरबाहिरियं आसिमसम्मज्जियोवलितं करेंति' ततः खलु तदनन्तरं किल, तस्य भरतस्य राज्ञो बिनीतां राजधानी मध्यमध्येन अनुप्रविशतोऽपि वाढम् एके केचन आभियोगिका आज्ञाकारिणो न्यन्तरदेवाः साभ्यंतरवाह्याम् अभ्यन्तरे बाह्ये च विनोतां राजधानीम् आसिक्त सम्माही कैसे प्रा होता. इसी तरह चार सेनाओं ने भी वहां प्रवेश नहीं किया. बाकी का और सब कथन यहां पर पूर्व के ही पाठ जैसा जानलेना चाहिये है. इस प्रकार पूर्वोक्त जो कि गडगडाहट ध्वनि के साथ वह भरत राजा विनोता राजधानी के बीचों वीच से होते हुए जहां पर अपना गृह था राज भवन था और उसमें भी जहां पर प्रासादावतं सक द्वार था उसी ओर चले. भरत चक्रवर्ती के प्रवेश द्वार पर प्रवेश करने पर आभियोगिक देवों ने क्या किया इस बात को प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं-(तएणं तस्स भरहस्स रण्णो विणीयं रायहाणि मज्झं मज्झेणं अणुपविसमाणस्स अप्पेगइया देवा विणीयं रायहाणिं सर्भतरबाहिरियं आसियसम्मग्नि योवलितं करेंति) जब भरत राजा विनीता राजधानी में प्रवेश करने के लिये उसके ठीक बीचों बोच के मार्ग से आ रहे थे उस समय कितनेक आज्ञाकारी व्यन्तररूपदेव आभियोगिक देवों ने उस विनीता राजधानी को भीतर बाहर से जल से सिश्चित कर तर कर दिया कूडा करकट को झ ड बुहारकर साफ कर दिया હતું એથી તેમને ત્યાં સ્થાન મલે જ કેવીરીતે આ પ્રમાણે ચાર પ્રકારની સેના પણ તેમાં પ્રવિષ્ટ થઈ નથી. શોષ બધું કથન અહિં પૂર્વ પાઠવત્ સમજવું જોઇએ આ પ્રમાણે પૂર્વોક્ત કે જે ગડ ગાહટવનિ સાથે તે ભરત નરેશ વિનીતા રાજધાની વચ્ચે થઈ ને જયાં પોતાનું ભવન હતી રાજ ભવન હતું. અને તેમાં પણ જ્યાં પ્રાસાદાવતં કદ્વાર હતું તે તરફ રવાના થયે. ભારતે ચકવતીએ ક્યું રે પ્રવેશ દ્વારમાં પ્રવેશ મેળવ્યું તે વખતે આભિયોગિક દે એ શું કર્યું ? मेवात ४८ ४२१। माटे सूत्रसर ४ छ- (तपणं तस्ल भरहस्स रणे। विणीयं राय. हाणि मजा मझेण मणुपविसमाणस्स अप्पेगड्या देवा विणीय रायहाणिं सम्भंतरबाहिरिय आसियसम्मजिजयोवलित करें ति) यारे भरत २० विनीता यानीमा प्रवेश ४२१। भारत રાજધાનીના ઠીક મલમાં આવેલા માર્ગ ઉપર થઈને જઈ રહ્યો હતો તે સમયે કેટલાક આજ્ઞાકારી ચંતર રૂપ દેવે, આભિયોગિક દેવેએ તે વિનીતા રાજધાનીને અંદર અને બહાર જલસિચિને કરી તરબોળ કરી દીધી હતી. કચરાને સાવરણીથી સાફ કર્યો અને ગોમયાદિથી લિસકરીને રાજ જાની વચ૭ બનાવી દીધી હતી. આ પ્રમાણે તે રાજધાનીને તે દેએ સાફ કરી નાખી હતી કે Page #910 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्राप्तिहले . जितोपलिप्तां कुर्वन्ति जलसेचनेन सम्माणिकया सम्मार्जनेन गोमयाधुपले पुनेन च परिष्वन्तोत्यर्थः, 'अप्पेगइया मंचाइमंचकलियं करेंति' अप्येके केचन देवाः दर्शनार्थिनासु पवेशनाय मञ्चानिमश्चकलितां मश्चाः प्रसिद्धाः तेषामुपरि स्थिताः ये मञ्चाः ते अतिमः चा स्तैः कलितां युक्तां, विनीतां कुर्वन्ति एवं सेसेसु वि पएसेसु एवम् अमुना प्रकारेण शेषेष्वपि अवशिष्टेष्वपि त्रिकचतुष्कचत्वरमहापथसहितराजधानीपर्यन्तेषु, प्रदेशेषु बोध्यम् 'अप्पेगइया णाणाविड रागवसणुस्सिय घयपडागामंडियभूमियं अपेगइया लाउल्लोइयमहियं करेंति' अप्येके केचन देवा नानाविधरांगव ननोंच्छूित-ध्वजपताकामण्डितभूमिकामू तत्र नानाविधः रागो-रञ्जनं येषु तानि मनिष्ठादि रूपाणि वसनानि वस्त्राणि तेषु उच्छ्रिताः ऊवीकृताः ध्वजाः सिंहगरूडादि रूपयुक्त बृहत्पट्टरूपाः पताकाश्च तैः मण्डितासुशोभिता भूमिः यस्यां सा तथा तां कुर्वन्ति अप्येके देवाः लापितोल्लोचितमहिंतां तत्र 'लापितं छगणादिना लेपनम् उल्लोचित सेटिकाहिना कुड्यादिषु धवलनं महितमिव महित युक्तम् अतिप्रशस्तं प्रासादादि यस्यां सा तथा तां कुर्वन्ति 'अप्पेगइया जाव और गोमयादि से लिप्तकर उसे सुथराकर दिया इस तरह से उसे ऐसी बिल्कुल परिष्कृत कर दिया कि जिसे वहाँ धूलि एवं कचरा का निशान भी देखने को न आवे. और गोमयादि से लिपपोत कर जमीनको इतनी परिष्कृत कर दी कि जिससे उसमें कहीं पर भी गर्त आदि के होने का चिन्ह तक दिखाई न पड़े तथा (अप्पेगइया मंचा ईमंचकलियं करेंति) कितने क आभियोयिक देवो ने उस विनीती राजधानी को मंचातिमंचों से युक्त कर दिया जिससे अपने प्रिय नरेश को देखने के लिये उपस्थित हुइ जनमंडली इन पर बैठकर सुस्ता ले (एवं सेसेस वि पए मु) इसी प्रकार से त्रिक चतुष्क चत्वर और महापथ सहित राजधानी के समस्त रास्तों में सफाई आदि का काम कर आभियोगिक देवों ने उन २ स्थानों को भी मंचातिमश्चों से युक्त कर दिया (अप्पेगइय णाणाविहरागवसणुस्सिय घयपडागामंडियभूमियं, अप्पेगइया ला उल्लोइयमहियं करें ति) कितनेक देवों ने उस गजवानी को अनेक रंगों के बस्त्रों क बनाई गई ऊँचो २ ध्वजाओं से और पताझाा से प्रण्डिन भूमिवाला कर दिया કોઈ પણ સ્થાને કચરો દેખાતું ન હતું, તે દેએ ગમયા દિથી લીપીને જમીનને એવી રીતે પરિષ્કૃત કરી નાખી. હતી કે જેથી તેમાં કઈ પણ સ્થાને ગવગેરેના ચિહ્નો પણ દેખાતા नाता. तम(अप्पेगइया मंचाइ मंत्रालयं करेति) 28 मामय वातविनीता જધાનીને મંચાતિમંચથી યુક્ત બનાવી દીધી હતી, જેથી પિતાના પ્રિય નરેશના દર્શન भाट उपस्थित थlal - मंदी भय ५२ मेसी ने श्रम व श. (एवं सेसेस वि परसु) मा प्रमाणे नि यतु४ २.१२ अने म५५ सहित २४ यानाना समस्त રકતાઓમાં સ્વચ્છતા વગેરેનું કામ સંપનન કરીને આભિયોગિક દેવોએ તે સ્થાને ઉપર પણ भयातिमाया मनावा पा. (अप्पेगइया जाणाविहरागवसणुस्सिय घयपडागामंडियभूमिय, अपपेगइया लाउल्लोइयमहियं करें ति) 2 येत राधानात अने४२शाना था નિર્મિત ઊંચી ઊચી વજાએથી અને પતાકાઓથી વિભૂષિત ભૂમિવાળી બતાવી દીધી. તેમજ કેટલાક દેવે સ્થાન સ્થાન ઉપર ચંદરવાએ તાણીને તે ભૂમિને સુસજિજડ કરી, Page #911 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ६.३ वक्षस्कारः सू० २९ स्वराजधान्यां श्रीभरतकार्यदर्शनम् ८९७ गंधवट्टिभूयं करेंति' अप्येके देवाः यावद् गन्धवर्तिभूतां गन्धवोत्तयुक्तां कुर्वन्ति' अत्र यावत्पदात् 'गोसीससरसरत्तचंदणकलसं, चंदणघडसुकय जाव गंधुद्धयाभिरामं सुगंधवरगंधियं' इति गोशीर्षसरसरक्तचन्दनकळशाम्, तत्र गोशीर्ष सुगन्धितचन्दनविशेषः तस्य सरसं जलयोगेन घर्षणद्वारा आर्दीभूतं यद्रक्तचन्दनं तेन युक्ताः कलशा घटाः शोभा) सन्ति यस्यां सा तथा साम् पुनःचन्दनघट सुकृत-यावद्गन्धोद्धुताभिरामाम् सुकृताः सुरचिताः चन्दनघटाः चन्दनयुक्तकलशाः अतएव यावद्गन्धोडूताः समस्तगन्धैः व्याप्ताः अतएव अभिरामा: मनोहराः ते सन्ति यस्यां सा तथा ताम् सुगन्धवरगन्धितां श्रेष्ठसुगन्धैः सुवासितां मुगन्धितां च गन्धवत्ति भूतां कुर्वन्ति इत्यर्थः' 'अप्पेगइया हिरण्णवासं वासिंति' अप्येके देवाः हिरण्यवर्ष-रजतवर्षणं वर्षन्ति 'सुवण्णरयणवइरआभरणवासं वासेंति' सुवर्णरत्नवत्राभरणवर्षे वर्षन्ति सुवर्णवर्षे चन्द्रकान्तादि रत्नवर्ष वजवर्षम् अत्र वज्रपदेन हीरकादीनि बोध्यानि कट काष्टादशसरिक नवसरिक यावन्निसरिकादयाभरणवर्षे केचिदेवाः वर्षन्तीत्यर्थः 'तए तथा कितनेक देवों ने जगह २ चंदोवा तानकर उसे सुसज्जित कर दिया अथवा लीपकर और फिर कलई से पोतकर प्रासादादिकों की भित्तियोको अतिप्रशस्त कर दिया (अप्पेगइया जाव गंधवट्टिभ्यं करेंति) कितनेक देवों ने उसे गन्ध की वर्ती जैसा बना दिया यहां के यावत्पद से "गोसीससरसरत्तचंदणकलसं, चंदणघडसुफयजाव गंधुझ्याभिरामं सुगन्धवरगंधियं" इस पाठ का संग्रह हुआ है इस पाठ का अर्थे ऐसा हैं कि शोभा के लिए गोशीर्ष चन्दन से उपलिप्त सरसरक्त चन्दन के कलश राजद्वार पर कितनेक देवों ने रख दिये थे. जगह २ देवों ने चन्दन के कलशों को तोरण के रूप में सजाकर स्थापित कर दिया था. इससे इन सुगन्धि से यह विनीता नगरी गंधकीवर्तिका रूप जैसी बन गई थी (अप्पेगइया हिरण्णवासं वासिंति, सुवण्णरयणवइरभाभरणवासं वासेंति) कितनेक देवोंने उस विनीता नगरी में रजत चाँदी की वर्षा की, कितनेक देवों ने सुवर्ण, रत्न वन और आभरणों की-अठारह लरवाले हारों की, नौ लरवाले हारों की एवं तीन लरवाले हारों દીધી. અથવા લીપીને અને પછી ચુનોથી ઘેાળી ને પ્રાસાદાદિક ની ભીતેને અતિ પ્રશસ્ત शीधी. (अप्पेगइया जाय गंधवट्टिभूयं करेंति) 2 वा भूमिन धनी तापी सनावी पी. सही यावत् ५६ आवे छ तनाथी-"गोसीससरसरत्तचंदन कलसं.चंदणघडसुकय जाव गंधध्याभिरामं सुगंधवरगंधियं" से पाइन। सडथये। छे. એ પાઠને અર્થ આ પ્રમાણે છે કે શેભા માટે ગશીર્ષ ચન્દન થી ઉપલિપ્ત સરસરકત ચંદનના કળશો રાજદ્વાર ઊપર કેટલાક દેએ મૂકી દીધા હતા. સ્થાન–સ્થાન ઊપર દે એ ચંદનના કળશેને તાણેના આકારમાં સુસજજ કરીને સ્થાપિત કરી દીધા હતા. એવી से सुगायत पहा था ये विनीत नगरी अन्धनी पति सी मनी 5 ती. (अप्पे गया हिरण्णवास वासिंति, सुवण्णरयणवइराभरणवासं वासिति) ४ा वास તે વિનીતા નગરીમાં ૨જત ચાંદીની વર્ષા કરી. કેટલાક દેવે એ સુવર્ણ, રત્ન વા, અને આભરણેની વર્ષા કરી, અઢાર લડીવાલા હારની, નવ લડીવાલા હાની, અને ત્રણ લડી. Page #912 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८९८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे णं तस्स भरहस्स रण्णो विणीयं रायहाणीं मज्झ मज्झेणं अणुष्पविसमाणस्स सिंघाडग जाव महापदेसु' ततः खलु तदनन्तरं किल तस्य भरतस्य राज्ञः विनीतां तन्नाम्नीं राजधानी मध्यं मध्येन मध्यभागेन अनुप्रविशतः भृङ्गाटक यावन्महापथेषु महापथपर्यन्तेषु स्थानेषु अत्र यावत्पदात् त्रिकचतुष्कादि परिग्रहः' बहवे अत्थत्थिया' बहवः अर्थार्थिकाः अर्थार्थिनः द्रव्यार्थिनः 'कामत्थिया' कामार्थिनः मनोहरशब्दरूपार्थिनः 'भेगस्थिया' भेगार्थिकाः मनोज्ञ गन्धरसस्पर्शार्थिनः 'लाभत्थिया' लाभार्थिकाः भोजनमात्रादि प्राप्त्यर्थिनः' इद्धिसिया' ऋध्येषिकाः ऋद्धिं गवादि संपदम् इच्छन्ति एषयन्ति वा ऋद्ध्येषाः तएव ऋध्ये षिकाःस्वार्थे इक् प्रत्ययविधानात् 'किञ्चिसिया' किल्बिषिकाः परविद्रोहकत्वेन भांडचेष्टाकारिणो भाण्डादयः 'कारोडिया' कारोटिकाः ताम्बूलसमुद्रवाहका : 'कारवाहिया' कारवाहिकाः करं राजदेयं द्रव्यं वहन्त्येवं शीलाः कारवाहिन इत्यर्थः ' संखिया' शांखिकाः शंखग्राहिणः शंखवादका इत्यर्थः 'चfreer' चाक्रिका: चक्रग्राहिणो भिक्षुका 'गंगलिया' लाङ्गलिकाः हलावलम्बन काष्ठसदृशास्त्रधारिण सुभटा: 'मुहमंगलिया, मुखमाङ्गलिकाः चारणादयः 'पूसमाणया' पुष्यमानकाः शाकी तथा और भी आभरणों की आभूषणों की वर्षा की (तए णं तस्स भरहस्त रण्णो विणीयं रायहाणि मझं मझेणं अणुष्पविसमाणस्स सिंघाडग जाव महापहेसु) जब वह श्री भरत महाराजा ने विनींता राजधानी में मध्य के मार्ग से प्रवेश किया तब वहां के त्रिक चतुष्क आदि महापथ के मार्गों में (बहवे अत्यत्थिया भोगत्थिया कामत्थिया लाभत्थिया इद्धिसिया किब्बिसिया कारोडिया) अनेक अर्थाभिलाषी जनों ने, अनेक भोगाभिलाषी जनों ने, अनेक कामाभिलाषी जनों ने, अनेक लाभार्थी जनों ने, अनेक गवादिसंपत्ति की अभिलाषावालेजनों ने अनेक किल्बिधिक - भाण्ड आदि-जनों ने, अनेक कारोटिका - ताम्बूल समुद्रवाह कजनों ने (कारबाहिया) अनेक कारवाहिक राजदेय द्रव्यको बकाया रखनेवाले जनों ने, अनेक (संखिया) शाङ्खिक - शङ्खबजाने वाले जनेां ने, अनेक ( चक्किया) चाक्रिक- भिक्षुक जनों ने, अनेक (गंगलिया) लाङ्गलिक-हलके अवलम्बन भूत काष्ठ के जैसे अस्त्रधारी सुभटों ने (मुहमंगलिया ) वाला डारानी, तथा अन्य पशु मालरगोनी-- माभूषणोनी वर्षा पुरी (तपणं तस्स भरहस्स रण्णो विणीयं रायहाणि मज्झ मज्झेण अणुयविसमाणस्स सिंघाडग जाव महापहेसु) જ્યારે ભરત રાજાએ વિનીતા રાજધાનીના મધ્યમાગ મા પ્રવેશ કર્યો ત્યારે ત્યાંનાં ત્રિક यतुष्ठ वगेरे भडायथना भागोभी (बहवे अत्थत्थिया भोगत्थिया कामत्थिया लाभ त्थिया, इद्धिसिया किब्बिलिया कारोडिया) अनेक अर्थालिसाषी बने!, अने लेोगालिद्यापी જનાએ અનેક કામાથી જનાએ, અનેક લાભાથી જનાએ, અનેક ગવાદિની સૌપત્તિ મેળવવાનિ અમિલાષા રાખતારા જતેાએ, અનેક કિલ્મિષિક–ભાંડમાદિ જનેાએ, અનેક કારેટિક तां समुङ्गवाह बने थे (कारवाहिया) ने अरवाडि राज्य द्रव्य भाष्य नथीमेवानी, मने४ (संखिया) शांभि शं वांडनाश नाथे अने: ( चक्किया) ચાક્રિક ભિક્ષુક જાએ, અનેક (गलिया) લાંગલિકાએ અવલખન ભૂત देवा अस्त्रधारण १२२ सुभटे, (मुहम गलिया) भने भुमभांगविभो भारबा કામના Page #913 -------------------------------------------------------------------------- ________________ .८९९ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० २९ स्वराजधान्यां श्री भरतकार्यदर्शनम् कुनिकाः शकुनशास्त्रज्ञाः 'बद्धमाणया" वर्द्धमानका: मंगलघटधारकाः 'लंखमंखमाइया' लसमकमादिकाः तत्र वंशादेपरि ये वृत्तं नृत्य दर्शयन्ति ते लङ्काः नटादयः मङ्खाचित्रफलकहस्ताः भिक्षुकाः गौरीपुत्रनाम्ना प्रसिद्धाः मायिकाः मायाविनः प्रोक्ता एते पुरुषाः 'ताहिं' ताभिः 'ओरालाहिः' औदाराभिः उदारयुकाभिः, 'इटाहिं' इष्टाभिः अभिप्रेताभिः, 'कंताहिं' कान्ताभि मनोहराभिः, 'पियाहिं' प्रियाभिः प्रीतियुक्ताभिः, 'मणुन्नाहि' मनोज्ञाभिः, 'म. णामाहि' मनोऽमाभिः मनसाऽम्यन्ते प्राप्यन्ते पुनः पुनः स्म णतो यास्ताभिः मनोऽनुकूलाभिरित्यर्थः, 'सिवाहि' शिवाभिः, कल्याणयुक्ताभः “धण्णाहि' धन्याभिः, प्रशंसायुक्ताभिः 'मंगलाहिं' मंगलाभिः मङ्गलयुक्ताभिः, 'सस्पिरीयाहिं;' 'सश्रीकाभिःलालित्यौदार्यादिगुणशोभिताभिः 'हिययगमणिज्नाहिं' हृदयमगनीयाभिः हृदङ्गमाभिः, 'हिययपल्हायणिज्जाहिं' हृदयप्रहलादनीयाभिः हृदयप्रमोदनीयाभिः, 'वग्गूर्हि' वाग्भिः इति अध्याहार्यम्, 'अणुवरयं' अनुपरतम् उपरतस्य विरामस्य अभाव अनुपरतम् यथा स्यात्तथा न विरम्येत्यर्थः 'अभिणंदंताय' अभिनंदनं धन्यासि अभिनन्दन्त, 'अमिथुणताय' अभिष्टुवन्तश्च अभिष्टुतिं कुर्वन्तश्च एवं वक्षमागप्रकारेण आदिषुः उकवन्तः किमुक्तवन्त इत्याहअनेक मुखमाङ्गलिको ने, चारणादिकां ने-(पूसमाणया) अनेक शकुन शास्त्रज्ञों ने (बद्धमाणा) अनेक बर्द्धमानकों ने मङ्गलघटधारने, (लखमंखमाइया) वंशादि के ऊपर जो तमाशे को दिखाते हैं ऐसे अनेक नटों ने अनेक लोगों ने-चित्रफलको को हाथ में लेकर भिक्षा मांगने वाले भिक्षुको ने एवं अनेक मायावियो रे--इन्द्र बालकोने-जादूगरों ने (ताहिंमोरालाहिं इट्ठाहि) उन उदार, इष्ट (कंताहि) कान्त मनोहर (पियाईि) प्रीतियुक्त (मणुनाहिं) मनोज्ञ (मनोमाहिं) एवं बारबार याद करने योग्य ऐसी (वग्गूर्हि) वाणियों द्वाग-वचनों द्वारा-जो कि (सिवाहिं) कल्याण युक्त थी (धण्णार्षि) प्रशं गयुक्त थी, (मंगलाहिं) मंगलयुक्त थी. (सस्सिरीयाहिं) लालित्य औदार्य आदि गुणों से शोभित थी (हिययपल्हायणिज्जाहिं) एवं हृदय को प्रमुदित करनेवाली थी (अणुवाय) विनाविराम लिये हो --विना रुके हो (अभि गंदंताय अभिथुणंताय जयजयणंदा, जयजय भद्दा) अभिनन्दन करते हुए, अभिष्टुतिहिणे, (पूसमाणया) भने शन शास्त्रज्ञामे, (वद्धमाणया अने परभानीय मत बसपार, (खमखमाइया) श६.७५२२ मे नावछे सेवा भने नये. અનેક લેકેએ-ચિત્રફળને હાથમાં લઈને ભિક્ષા માગનારાભિક્ષુકેએ અને અનેક मायावीसमेन्द्रन ग रोस(ताहिं ओरालाहिं इट्ठाहिं)ते ॥२, ॐष्ट(कंताहि) sid, भनी २ (पियाहिं) प्रीतियुक्त (मणुन्नाहिं) मना २ (मनोमाहि) तेभ वावा२ या ४२वायोग्य सेवा (वग्गूहि) वाशीमा -वयना १ २ (सिवाहिं) ४दया। युत ता (धण्णाहिं) प्रा युत ती, (मंगलाहिं) भसयुत ती (सस्लिरीयाहिं) तित्य, मोहाय', मा शुरथा सुशामितती . (हिययपल्हायणिज्जाहि) तमस यने प्रभुहित ४२नाश ती. (अणुवरयं) बा२ विराम बीधा सतत (अभिणंदंताय अभिथुणंताय जय जयणंदा जय मय भद्दा) मलिनन्दन ४२di, अनि टुति-स्तुति ४२तां ॥ प्रमाणे 'घु न ! मान Page #914 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९०० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'जय जय गंदा' इत्यादि 'जय जय गंदा' हे नन्द हे आनन्द स्वरूप ! भरत ! 'जय जय भदा' हे भद्र ! कल्याण का चक्रवर्तिन् जय जय अजितशत्रून् विजयस्व विजयस्व 'जय जय भद्दा !' हे भद्र ! कल्याणस्वरूप ! जय जय 'भदंते' ते तुभ्यं भद्रं कल्याणं भूयात् 'अनियं जिणाहि' अजितम् अपराजितं प्रतिशत्रु जय विजयस्व 'जिय पालयाहि' जितम् आज्ञावशंवदं पालय रक्ष 'जियमज्झे वसाहि' जितमध्ये आज्ञावशंवदमध्ये वस-तिष्ठ जितपरिजनैः परिवृतो भव इत्यर्थः 'इंदोविव देवाणं' इन्द्र इव देवानां वैमानिकानां मध्ये सर्वत ऐश्वर्यवान् इत्यर्थः 'चंदोविव ताराणं' चन्द्र इव ताराणां नक्षत्राणां मध्ये चन्द्रमा इव 'चमरो विव असुराणं' चमर इव असुराणां दाक्षिणात्यानाम पुराणां मध्ये चमर नामकासुरेन्द्र इव 'धरणो विव नागाणं' धरण इव नागानाम्-नागानां मध्ये धरणनामक नागकुमार इव 'बहूइं पुव्वसयसहस्साई' बहूनि पूर्वशतसहस्त्राणि बहूनि पूर्वलक्षाणि 'बहूईभो पुचकोडीओ' बहीः पूर्वकोटीः 'बहूईओ कोडाकोडीभो' बहीः पूर्व कोटाकोटीः 'विणीयाए रायहाणीए' विनीतायाः राजधान्याः प्रजाः पालयन् 'चुल्ल हिमवंतगिरिसागरमेरागस य' क्षुल्लहिमवनिरिसागरमर्यादाकस्य च क्षुल्लहिमवगिरिः पस्यां दिशि क्षुद्रहिमवत्पर्वतः अपरत्र च दिशात्रये प्रयः सागराः तैः कृताया स्तुति करते हुए ऐसा कहा-है नन्द ! आनन्द स्वरूप भरत चक्रवर्तिन् ! तुम्हारा जय हो तुम अजित शत्रुओं पर विजय पाओ हे भद्र-कल्याणस्वरूप भरत ! तुम्हारी वारंवार जय हो (भदंते) तुम्हारा कल्याण हो (अजियं निणाहि) जिसे दूसरा वीर परास्त नहीं कर सके ऐसे शत्रु को तुम परास्त करो, (जियं पालयाहि) जो तुम्हारी आज्ञा माननेवाले हैं उनकी तुम रक्षा करो (जियमज्झे वसाहि) जित व्यक्तियों के बीच में आप रहो-अर्थात् परिजनों से आप सदा परिवृत्त बनेरहो (इंदोविव देवाणं) वैमानिक देवों के बीच में इन्द्र की तरह (चंदोविव ताराण) ताराओं के बीच में चन्द्र की तरह (चमरोविष असुराण) असुरों के बीच में अपुरेन्द्र असुरराज चमर को तरह (धरणोविव नागाणं) नागकुमारों के बीच में धरण नामक नागकुमार की तरह तुम (बहूई पुवसयसहस्साई) अनेक लाख पूर्वतक (बाइओ कोडाकोडीओ) अनेक कोटाकोटी पूर्वतक (विणीयाए रायहाणीए) विनीता राजधानी की प्रजा का पालन करते हुए (चुल्लहिસ્વરૂપ ભરત ચક્રવતી ! તમારો જય થાઓ, તમે અજીત શત્રુઓ ઉપર વિજય મેળવે. હે भद्र, ४८या ११३५ भरत ! तभा पार पा२ सय था(भईते) तभार ४८या था। (अजियं जिणाहि) २२ भान वी२ वी शो नहि मेवा शत्रुतमे ५२२रत ४. (भियं पालयाहि) २३ तभारी माज्ञानु पासन रेछ भनी तमे २क्षा २२. (जियमझे पसाहिर વ્યક્તિઓને આપે જીતી લીધેલ છે તેમની વચ્ચે તમે રહો એટલેકે જિનેથી તમે સર્વદા પરિવૃત્ત २१.. (इंदोविव देवाण) वैमानि वाम तमे धन्द्रनी म (चंदोधित्र ताराण) तारामाना पस्ये यन्द्रनारेम, (चमरोविव असुराण) असुरोनी थ्ये मसुरेन्द्र सु२२। यभरनारेम(ध रणो विध नागाण) नागभारे नी पश्ये घर नाम नागभारनी रेम (बहूई पुखसयसह. स्लाई) भने पूर्व सुधा (बहूईओ कोडाकोडीओ) भने टाटी वसुधा (विणीयाए Page #915 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० २९ स्वराजधान्यां श्री भरत कार्यदर्शनम् ९०१ मर्यादा अवधिः सा अस्ति यस्मिन् तत्तथा तस्य एवंभूतस्य च 'केवलकप्पस्स' केवलकल्पस्य सम्पूर्णस्य ‘मरहस्स वासस्स' भारतवर्षस्य 'गामागरणगरखेड कब्बडमडंबदोणमुहपट्टणासमसण्णवेसेसु' ग्रामाकरनगरखे टकर्बट मडम्ब द्रोण मुखपत्तनाश्रम सन्निवेशेषु तत्र ग्रामः प्रसिद्धः आकरः यत्र सुवर्णाद्युत्पद्यते नगरम् - प्रसिद्धम् खेटः धूलिका प्राकारसहितं नदी पर्बतवेष्टितं च नगरम् कर्बटः कुत्सितनगरम् मडम्बम् एकयोज - नान्तरग्रामरहितम् द्रोणमुखम् जलस्थलप्रवेशम् पत्तनम् - प्रसिद्धम् आश्रमं तापसानां निवासस्थानम् नगरबाह्यप्रदेश: आभीरादि निवासस्थानम् सन्निवेशा: आगन्तुक निवासस्थानानि तेषु 'सम्मं' सम्यक्कू 'पयापाळणोवज्जिय लद्धजसे' प्रजापालनोपार्जितलब्धयशस्कः सम्यक् प्रजापालनेन उपार्जितम् एकत्रीकृतं यल्लब्धं निजभुजपराक्रमैः प्राप्तं यशो येन स तथा पुनः कीदृशः 'महया जाव आहेवच्चं पोरेवच्चं जाव विहरइ' महता यावत् आधिपत्यं पौरपत्यं यावत् विहर विचर, अत्र प्रथमयावत्पदात 'महयाहयणमवंत गिरिसागरमे रागरस य केवलकप्पस्स भरहस्स वासरस गामागरण गरखेड कब्बड मडंब दोणमुहपट्टणास मसण्णिवेसेसु) उत्तर दिशा में क्षुद्र हिमवत्पर्वत एवं तीन दिशाओं में तीन सागरों द्वारा जिसकी मर्यादा की गई हैं ऐसे इस केवल कल्प- सम्पूर्ण भरत क्षेत्र के ग्राम, आकर नगर खेट कर्बेट, मडम्ब, द्रोणमुख, पत्तन, और सन्निवेश इन संबस्थानों में ( सम्म) अच्छी तरह से ( पयापालणो वज्जियलद्धजसे महयाजाव आहेवच्चं पोरेवच्चं जाव विहरइ ) प्रजाजनों के पालन से उपार्जित किये हुए तथा अपने भुज पराक्रम से प्राप्त हुए यश से समन्वित हुए दक्ष बजानेवालों के हाथों से जोर २ से जिनमें समस्त प्रकार के वाजे बजावे जा रहे हैं ऐसे विविध नाटकों को एवं गीतों को देखते हुए सुनते हुए विपुल भोग भोगों के भोगभोग पद की व्याख्या पोछे की जा चुकी है, ग्राम आकर आदि स्थानों का स्वरूप भी पीछे के tri में प्रकट कर दिया है एवं "महया के जाव" से गृहीत नाट्यगीत वादिततन्त्रीतल०" पां रायद्दाणीप) विनीता राजधानी नी अनुपालन उतi ( चुल्लहिमवंत गिरिसागर मेरा rta य केवलकप्पस्स भरहस्त वासस्स गामागरणगरखेड कब्बड मड' बदोणमुहपट्टणालमणिसेसु) उत्तर दिशामा क्षुद्र हिभवत्पूर्वत सुनेत्रा हिशायामां त्र सागरी वडे જેની સીમા નિશ્ચિત કરવામાં આવી છે, એવા એ કેવલ૫-સ પૂર્ણ ભરતક્ષેત્રના ગ્રામ, આકર, નગર, ખેટ, કખટ, મડબ, દ્રોણુમુખ, પત્તન અને સન્નિવેશ એ સર્વ સ્થાને માં (सम्म) सारीरीते (पयापालणोवज्जियल द्धजले महया जाव आहेवच्चं पोरेवच्चं जाव विहरह) अन्जना पासनथी समुपाति ते पोताना न पराभथी प्राप्त यशथी समन्वित થયેલા ચતુર વાદ્ય વગાડનારાઓના હાથાથી જોર-જોરથી જેમાં સર્વ પ્રકારના વાદ્યો વગાઢવામાં આવી રહ્યાં છે,એવા વિવિધ નાટકોને તેમજ ગીતાને જોતાં, સાંભળતાં વિપુલ ભેગ ભાગાને ભાગવતા ભાગ' પદની વ્યાખ્યા ર્વે કરવામાં આવી છે. ગ્રામ આકર આદિ સ્થાનાનું स्वयम स्पष्ट वामां आवे छे. तेमन "महया जाव" थी गृहीत 'नाट्यगीतवादित तन्त्रीतल० " पहानी व्याच्या पाशु डेटा स्थानां भाव छे. Page #916 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसू वाइयतीतलतालतु डियघणमुइंग पडुष्पवाइयरवेण विउलाई भोगभोगाई भुंजमाणे ' इति संग्रह : महताऽहतनाट्यगीतवादित तन्त्रीतलताळतूर्य घनमृदङ्गपटुप्रवादितरवेण विपु लान भोगभोगान् भुञ्जानः, तत्र महता प्रधानेन बृहता वा रवेणेत्यग्रे सम्बन्धः, अतः अनुबद्धो वस्येति विशेषणम् नाटयं नृत्तं तेन युक्तं गीतं तच्च वादितनि च तानि शब्दयुक्तानि कृतानि तन्त्री च वीणा तलौ च हस्तौ तालाश्च कंशिका : 'तुडिय त्ति' तूर्याणि च पटहादीनि यानि तानि अहत नाट्यगीतवादिततन्त्रीतलतालतूर्याणि इति इतरेतरद्वन्द्वः तानि च तथा घनो मेघः तत्सदृशो यो मृदङ्गो ध्वनि गाम्भीर्यसात् स चासौ पटुना दक्षेण प्रवादितश्च यः स धनमृदङ्गपटुप्रत्रादितः सचेति अन नाट्यगीतवादिततन्त्री त लतालतूर्य धनमृदङ्गपटुप्रवादिता इति पुनः इतरेतर द्वन्द्वः तेवां रवः शब्दः तेन करणभूतेन अत्र मृदङ्गग्रहणं वाद्येषु मध्ये प्रधानमिति बोध्यम् विपुलानि प्रचुराणि भोगभोगान् भुञ्जानः भुञ्जन् आधिपत्यं पौरवत्यं यावत् अत्रापि यावत्पदात् 'सामित्तं मट्टित्तं महत्तरगतं आणाईसर सेणावच्च कारेमाणे पालेमाणे' त्ति स्वामित्वं भर्तृत्वं महत्तरत्वम आज्ञेश्वरसेनापत्यं कारयन् पालयन् इति ग्राह्यम्, विहर विचरणं कुरु 'तिकट्टु जय जय सदं पउंजंति' इति कृत्वा - इत्युक्त्वा जय जय शब्द प्रयुञ्जन्ति प्रयुञ्जन्ते वदन्तीत्यर्थः 'तपणं से भरहे राया णयणमालासहस्सेहिं पिच्छिज्जमाणे २' ततः खलु स भरतो राजा दर्शकप्रजागणानाम् नयनमालासह नैः प्रेक्ष्यमाणः २ अवलोक्यमानः २ 'वयणमाळा सहस्सेहिं अभिधुव्वमाणे २' वचनमाला क व्याख्या भी कई स्थलों पर लिखी चुकी है, अतः वहीं से इसे जान लेनी चाहिये हर एक जगह इन की व्याख्या लिखने से ग्रन्थ का कलेवर वढजाने का भय रहता है, यहां मृदङ्ग का ग्रहण वाद्यों में प्रधान होने से किया गया है, और अपने साम्राज्य के अन्तर्गत मनुष्यों का आधिपत्य पौरपत्य यावत् करते हुए आनन्द साथ अपने समय का सदुपयोग करो, यहां पद यावत् शब्द से " सामित्तं, भट्टित्तं, महत्तरगत्तं आणाईसरसेणावच्चं कारेमाणे" इन पदों का संग्रह हुआ है, (तिकट्टु जयजयसई पउंजति) इस प्रकार कहकर उन सबनेपुनः आपकी जय हो जय हो इस प्रकार से जय जय शब्द का उच्चारण किया (तएण से भरहे राया णयणमालासहस्से अभिवमाणे २) बारंबार हजारों वचनावलियों से स्तुत होते हुए (हिययमालासह - ९०२ એથી ત્યાંથીજ એ સંબંધમાં જાણી લેવુ જોઇએ, દરેક સ્થાને એની વ્યાખ્યા લખવાથી ગ્રં'થ નું કલેવર વિસ્તૃત થઇ જાય તેવા ભયની સઝાવના રહે છે. અહીં મૃદંગતુ ગ્રહણુ વ દ્યોમાં પ્રધાન હાવાથી કરવામાં આવેલ છે. અને પેાતાના સામ્રજ્યની અંદર મનુષ્યોનુ આધિપત્ય, પૌરપત્ય યાવત્ કરતાં આનંદ પૂર્વક પોતાના સમયના સદુપયેગ કરે. અહી યાવત્ શબ્દ थी "सामित्त भट्टित्त, महत्तरगतं आणाईसरसेगावच्चं कारेमाणे मे पहानी संग्रह ये छे. (त्ति कट्टु जय-जयसद्द पउंजति) प्रमाणे उडीने तेथे सर्व श्रीथी 'आपने। भय थामो, नय था।” या प्रमाये - ४ शहने वालाभ्यां (तपण से भरहे राया गयणमालासहस्सेहि अभिधुनमाणे २) वारंव२ ४शे वयमाथी स्तुति अरता (हिययमाला सहस्सेहि पिच्लिज्जमाणे २) या प्रमाणे ते रत रान्न इन्नरो नेत्र Page #917 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वनस्कारः सु० स्व राजधान्यां श्रीभस्त कार्यदर्शनम् ९०३ सहस्त्रैः अभिष्ट्रयमानः २ 'हिययमालासहस्से हिं उण्णं दिऊ जमाणे २' हृदयमालापहः पूर्ण दीयमानः पूर्णं दीयमानः दर्शकप्रजागणहृदयसहस्त्रेषु पूर्णतया निजवासस्थानं दोय. मानः इत्यर्थः मनोरहमालासहस्सेहिं विच्छिपमाणे मनोरथमाल सहसः विच्छप्यमानःविशेषेण स्पृश्यमानः 'कतिरूवसोहग्गगुणेहिं पिच्छिन्नमाणे पिच्छिन्नमाणे कान्ति' रूप भाग्यगुणैः प्रेक्ष्यमाणः २ 'अंगुलिमालासहस्से हि दाइज्जमाणे २' अङ्गुलि. मालासहस्रः दर्यमानः२ 'दाहिणहत्थेणं बहणं णरणारीः सहस्साणं अंजलि मालासहस्साई पडिच्छेमाणे पडिच्छेमाणे दक्षिणम्तेन बहनां नरनारी सहस्त्राणाम् अनलिमालासहस्त्राणि प्रतीच्छन् प्रतीच्छन्स्वीकुर्वन् स्वीकुर्वन् 'भवणपंती ससाई समइच्छमाणे २' भवनमालासहस्त्राणि समतिक्रमन समतिक्रमन् उल्लङ्घयन् र अनेक भवनानि तंतीतल तुडियगीयवाइयरवेणं' तन्त्रीतलतूयं गीतवादितरवेण तत्र गीतम् गानविशेषः तच्च वादितानि च शब्दवन्ति कृतानि तन्त्री च वीणा तलौ च . स्तौ तूर्याणि च पटहादि वाद्यविशेषा; यानि तानि गीतवादित तन्त्रीतलतूयर्याणि मूले प्राकृतत्वान् आर्षत्वाद्वा पदव्यत्ययः तेषां रवा-शब्दस्तेन 'मधुरेणं' मधुरेण ‘मणहरेणं' मनोहरेण मनोज्ञेन सेहिं पिच्छिज्जमाणे २) इस तरह वे भरत राजा हजारों नेत्रपंक्तियों द्वारा वारंवार देखे जाते हुए (वयणमालासहस्सेहिं अभिथुव्वमाणे २) बारबार हजारों वचनावलियों से स्तुत होते हुए (हिययमालासहस्सेहिं उण्णं दिज्जमाणे २) हजारों दर्शक जनों के हृदयों में अपना पूर्ण रूप से स्थान बताते हुए (मणोरहमालासहस्सेहि विच्छिप्पमाणे) जनता के हजारों मनोरथों द्वारा विशेष रूप से स्पष्ट होते हुए (कंतिरूव सोहग्गगुणेहिं पिच्छिज्जमाणे २) कान्तिरूष एवं सौभाग्य गुणों को लेकर जनता के द्वारा अपने २ नेत्रों को पसार २ कर देखे गये (अंगुलिमाला सहस्से हिं दाइज्जमाणे २) हजारों अंगुलियों द्वारा बारंबार दिखाये गये (दाहिणहत्थेणं बणं णरणारीसहस्साणं अंजलिमालासहस्साई पडिच्छेमाणे पडिच्छेमाणे)अपने दक्षिण हाथ से अनेक हजारों नर नारी जनों द्वारा कृत हजारों अंजुलियों को बार बार स्वीकार करते २ (भवणपंती सहस्साई समइच्छमाणे २) हजारों भवनों की श्रेणि को पार करते २ (तंतीतलाडियगीयवाइयरवेणं)गीतों में ५तिमे। 43 ॥२१२ १श्यमान थता (वयणमालासहस्सेहिं अभिथुव्वमाणे २) पा२ १२ गरे। क्यनाणा थी सस्तूयमानयता, (हिययमाला सहस्सेहिं उण्णं दिज्जमाणे २) गरे। BA'नानायोमास पूण ५0 पोतार्नु स्थान बनाता, (मणोरहमाला सहस्सेहि विच्छिप्पमाणे) नरे। मनोरथे। व विशेष ३५मा २५ यता, (कंतिरूव सोहग्ग गुणेहिं पिच्छिज्जमाणे २) iति, ३५ अनेकौमाय शुशान ने प्रल 43 साश्चर्य दृष्टिथी वायस (अंगुलिमालासहस्से हिं दाइज्जमाणे २) m in १ पारंवार LAGट ४२रायेस (दाहिणहत्थेणं बहूणं णर णारी सहस्साणं अंजलिमालासहस्साई पद्धिच्छेमाणे २) पोताना भए। थथी हुजरे। नर-नारी। वडेरे मसिमे अनाववाभां भावीछे, तेना वारंवार १२ ४२तो,(भवणपंती सहस्साई समइच्छमाणे २) गरे। सपनानी २भय श्रेणी माने पा२ ४२ते। (ततीतलतुडियगीयवाइयरवेणं) onlii inता, तन्al, ne Page #918 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९०४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मंजुमंजुणा' मञ्जुमजुना अतिसरलेन 'घोसेणं' घोषेण शब्देन “अपडिबुज्झमाणे २' अप्रतिबुध्यन्र अन्यद्वस्तु अजानन् अजानन् तत्रैव शब्दे लीनत्वात् 'जेणेव सए गिहे जेणेव स भवणवर्डिसयदुवारे तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव स्वकं गृहम् पैत्र्यं राजभवनं यत्रैव स्वकं भवनावतंसकद्वारं जगद्वर्ति वासगृहशेखरी भूतराज योग्यवासगृहप्रतिद्वारमित्यर्थः तत्रैव उपागच्छति स भरतः 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'आभिसेक्कं हत्थिरयणं ठवे ' आभिषेक्यम् हस्तिरत्नम् प्रमुखपट्टहस्तिनं स्थापयति' ठवित्ता' स्थापययित्वा' आभिसेक्काओ हथिया पच्चोरूहइ' आभिषेक्यात् पट्टहस्तिनः हस्तिरत्नात् प्रत्यवरोहति उत्तरति 'पच्चोरुहित्ता प्रत्यवरूह्य ऊत्तीर्य 'सोलसदेव सहस्से सक्कारेइ सम्मानेइ' षोडशदेवसहस्राणि सत्कारयति अंजलिप्रभृतिभिः सम्मानयति अनुगमन दिना 'सक्कारिता संमानित्ता' सत्कार्य सम्मान्य 'बत्तीसं रायसहस्से सक्कारेइ सम्माणे ' द्वात्रिशतं राजसहस्त्राणि सत्कारयति सम्मानयति 'सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य' सेणावइरयणं सक्कारेइ सम्माणेइ 'सेनापतिरत्नं बजते हुए तन्त्री तल त्रुटित वाद्य विशेष- इनकी तुमुल गडगडाहट के साथ २ (मधुरेणं मणहरेणं मंजु मंजुणा घोसेणं मपडिबुज्झमाणे अप्पडिबुज्झमाणे जेणेव सए गिहे जेणेव सए भवणवर्डिसयदुवारे ! तेणेव उवागच्छइ) तथा होते हुए मधुर मनोहर, अत्यंत कर्णप्रिय घोष में तल्लीन होने के कारण अन्य किसी दूसरी वस्तु की ओर ध्यान नहीं देते हुए वे भरत नरेश जहां पर पैतृक राजभवन था और उस में भी जहां पर जगद्वर्ती वासगृहों में मुकुट रूप अपना निवासस्थान था उसके द्वार पर आये (उवागच्छित्ता आभिसेक्कं हत्थिरयणं ठवेइ) वहां व्याकर उन्होने अपने आभिषेक्य हस्ति रत्न को खड़ा कर दिया (ठवित्ता आभिसेक्काओ हत्थिरयणाओ पच्चो रूइइ) आभिषेक्य हस्तिरत्न को खडा करके फिर वे उससे नीचे उतरे (पच्चोरुहित्ता सोलसदेवसहरुले सक्कारेइ सम्माणेइ ) नीचे उकर उन्हों ने सोलह हजार देवों का अनुगमनादि द्वारा सत्कार किया और सन्मान किया (सक्कारिता सम्माणित्ता वत्तो रायसहस्से सक्कारेइ, सम्माणेइ) देवों का सत्कार और स न्मान करके फिर उन्हों ने ३२ हजार राजाओं का सत्कार एवं सन्मान किया (सक्कारिता सम्माणित्ता सेणावइरयणं सक्कारेह संमाणेइ) सत्कार सन्मान करके फिर अपने सेनापतिरत्न का त्रुटित - वाद्यविशेष - सर्वना तुमुख गडगडाहट युक्त शहू साथै (मधुरेणं मणहरेणं मंजु मंजुणा घोसेणं अपडिबुज्झमाणे अपडिबुज्झमाणे जेणेव सप गिहे जेणेव सप भवणवडिसयदुवारे ! तेणेव उवागच्छ) तेन मधुर, मनोहर, अत्यंत प्रिय घोषमां तस्सीन होवाथी मील કાઈપણ વસ્તુ તરફ જેનું ધ્યાન નથી એવા તે ભરત નરેશ જ્યાં પૈતૃક રાજભવન હતું અને તેમાં પણ જ્યાં જગદ્વતી વાસ ગૃઢામાં મુકુટરૂપ પેાતાનું નિવાસસ્થાન હતુ, તેના દ્વારસામે चहान्यां (उवागच्छत्ता अभिसेक्कं हस्थिरयणं ठवेइ) त्यां भावीने तेथे पोताना भाभिवेश्य इस्तिशन ने उलाराजीने पछी तेथे नीये . (पच्चारुहिता सोलसदेव सहस्से सकाइ सम्माणे) नीचे उतरीने तेथे सोजर देवानी अनुगमनाहि वडे सत्तार या ाने सन्मान म्यु (सक्कारित्ता सम्माणित्ता बत्तीसं रायसहस्से सक्कारेद्द सम्माणे) देवाना સત્કાર અને સન્માન કરીને પછી તેમણે ૩૨ હજાર રાજાઓ ના સત્કાર તેમજ સન્માન Page #919 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ६.३ वक्षस्कारः सू० २९ स्वराजधान्यां श्रीभरतकार्यदर्शनम् ९०५ सत्कारयति सम्मानयति 'सक्कारित्ता सम्माणिचा' सत्कार्य सम्मान्य ‘एवं गाहावहरयण बद्धइरयणं पुरोहियरयणं सक्कारेइ सम्माणेइ' एवम् अमुना प्रकारेण गाथापतिरत्नं बर्द्धकिरत्न पुरोहितरत्नं च सत्कारयति सम्मानयति 'सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य 'तिणि सट्टे सूअसर सक्कारेइसम्माणेई' त्रीणि षष्टानि-षष्टयधिकानि सूपशतानि रसवतीकारशतानि सत्कारयति सम्मानर्यात 'सकारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य 'अट्ठारस से णिप्पसेणीओ सक्कारेइ सम्माणेइ' अष्टादश श्रेणिः प्रश्रेणी: सत्कारयति सम्मानयति 'सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य अण्णे विं बहवे राईसर जाव सत्यवाहप्पभि ईओ सक्कारेइ सम्माणेइ' अन्यानपि बहून् राजेश्वर यावत्सार्थवाहप्रभृतीन सत्कारयति सम्मानयति अत्र यावत्पदात् माडम्बिक कोटुम्बिक मन्त्रि महामन्त्रि गणकदोवारिकाऽमासत्कार और सन्मान किया (सक्कारिता सम्माणित्ता एवं गाहावइरयणं वद्धइग्यणं पुरोहियरयणं सक्कारेइ सम्माणेइ) सेनापतिरन के सत्कार और सम्मान हो जाने के बाद फिर उन्होंने गाथापति रत्न का बर्द्धकिरत्न का एवं पुरोहितरत्न का सत्कार और सन्मान किया(सक्का रत्ता संमाणित्ता तिण्णिसढे सूयसए सक्कारेइ संमाणेइ) इन सबके सत्कार और सम्मान हो चुकने पर उम भरत नरेशने तीनसौ ६० रसवती कारकों का रसोईयों का-सत्कार एवं सन्मान किया (सकारिता संमाणित्ता अट्ठारससेणिप्पसेणीओ सक्कारेइ, सम्माणेइ) इन का सत्कार सन्मान हो जाने के बाद फिर भरत राजा ने अठारह श्रेणिप्रश्रेणि जनों का सत्कार और सम्मान किया (सकारित्ता संमाणित्ता अण्णे वि बहवे राईसर नाव सत्यवाहपभिईओ सक्कारेइ, सम्माणेइ) इनका सत्कार सन्मान हो जाने पर फिर भरत राजा ने और भी अनेक राजेश्वर आदि से लेकर सार्थवाहो तक के जनसमूह का सत्कार और सन्मान किया यहां यावत्पदसे "माडम्बिक, कौटुम्बिक, यु (सककारिता सम्माणित्ता सेणावहरयणं सक्कारे संमाणेइ) सत्४२ तेभर सन्मान श ने पछी पोताना सेनापति ना तेथे सत्तार यो मन तेनु सन्मान यु. (सकारिता सम्माणित्ता एवं गाहावइ रयणं बद्धहरयणं पुरोहियरयण सक्कारेह सम्माणेइ) सेनापति રત્નને સત્કાર અને સન્માન કરીને પછી તેણે ગાથાપતિ રતનને વર્ધકિરત્ન ને અને पडित न । सत्तार भने सन्मान यु (सक्कारित्ता संमाणित्ता तिण्णि सटे सूक्सए सक्कारेह संमाणेह) मे सपना स४२ मन सन्माननी विधि समास व त्या२ माह ते ભરત નરેશે ત્રણસે સાઈઠ રસવતીકારક-સેઈથાઓનો સત્કાર કર્યો અને તેમનું सन्मान' (सक्कारिता सम्माणित्ता अट्ठारस सेणिपसेणीओ सक्कारेई, सम्माणेड) સવની સત્કાર અને સમાન વિધિ સમાપ્ત થઈ ત્યાર બાદ ભરત મહારાજા એ અદ્ર ૨ શ્રેણિ प्रश्रेलिताना सार यो अन तमनुसन्मान यु (पक्कारित्ता संमाणिता अण्णे वि बहबे राईसर जाव सत्थवाहप्पभिईओ सक्कारेइ सम्माणेइ) मे सपनो सरा२सन સમ્માન વિધિ પૂરી કર્યા પછી ચક્રવતી શ્રી ભરત રાજાએ બીજા પણ અનેક રાજેશ્વર આદિથી માંડી ને સાર્થવાહ સુધીના જન સમૂહને સત્કાર કર્યો અને તેમનું સન્માન કર્યું मही यावत ५४ माईषिक, कौटुबिक मंत्री, महामंत्री, गणक, दौवारिक, अमात्य ११४ Page #920 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navavan जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे त्यवेटपीठमईक नगरनिगम श्रष्ठि सेनापति तथा सार्थवाह प्रभृति पदात् दतसन्धिपाल एतानि पदानि ग्राह्यानि एतेषां व्याख्यानम् एतत् सूत्राव्यवहिते सप्तविंशतितमे सूत्रे द्रष्टव्यम् 'माकारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य 'पडिविसज्जेइ प्रतिविसर्जयति निजवासगमनाय सर्वान् आदिशतीत्यर्थः, अथ स पटखंडाधिपतिः श्री भरतो महाराजा यावत् परिच्छदः यथा वासगृहं प्रविशति तथा माह 'इत्थीरयणेणं इत्यादि इत्थीरयणेणं बत्तीसाए उडुकल्लाणिया सहस्सेहि बत्तीसाए जणवयम्लाणिया सहस्सेहिं बत्तीसाए बत्तीसइबदेहि णाडयसहस्सेहि सद्धि संपरिबुडे भवणवरवडिसगं अईइजहा कुबेरोव्व देवराया केलाससिहरिसिंगभूयंति' स्त्रीरत्नेन सुभद्रया तथा द्वात्रिंशत्संख्याका ऋतुकल्याणिका सहस्रैः द्वत्रिंशत् सहस्रसंख्यायुक्ताभिः अमृतकन्यात्वेन सदा ऋतुषु षट्सु कल्याणीभिः राजकन्याभिः तथा द्वात्रिंशता जनपदकल्याणिका सहस्त्रैः द्वात्रिंशत्सहस्त्र संख्यायुक्ताभिः जनपदाग्रणी कल्याणिकाभिः राजकन्याभिः, तथा द्वात्रिंशता द्वात्रिंशद ब? द्वात्रिंशत्पात्र युक्तैः नाटकसहस्त्रैः द्वात्रिंशत्पात्रबद्ध द्वात्रिंशत्सहस्त्रसंख्यकनाटकैः सार्द्ध संपरिवृत्तः वेष्टितः भवनवरावतंसकं श्रेष्ठभवनावतंसकं स्वप्रधान राजभवनम् अत्येति प्रविशति स भरतः तत्र मंत्री महामंत्री गणक दौवारिक, अमात्य, चेटपीठमर्दक, नगर निगम श्रेष्ठी, सेनापति दूत सन्धिपाल इन सबका ग्रहण हुआ है इन पदों की व्याख्या २७ वे सूत्र में कर दी गई है। (सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) सत्कार सन्मान करके फिर भरत राजा ने इन्हें अपने २ स्थान पर जाने की आज्ञा दे दी (इत्थीरयणेणं बत्तीसाए उड्डुकल्लाणिया सहस्सेहिं वत्तीसाए जणवयकल्लाणिया सहस्सेहिं बत्ती बदेहि गाउयसहस्सेहिं सद्धि संपरिवुडे भवणवरवहिंसर्ग भईइ नहा कुबेसेव्व देरावया केल ससिंहरिसिंगभूयंति) इसके अनन्तर सुभद्रा नामक स्त्रीरत्न एवं ३२ हजार ऋतुकल्याणिकामों से छ हो ऋतुमों में आनन्ददायनी राजकन्यामों से ३२ हजार जनपदाग्रणियों की कन्याओं से एवं ३२-३२ पात्रों से संबद्धित ३२ हजार नाटकों से युक्त हुमा वहकुबेर के जैसा भरत राजा ने कैसगिरि के शिखर के तुल्य अपने श्रेष्ठ. भवनावतंसक के भीतर अपने - प्रधान रानभवन के भीरत प्रवेश किया पेट, पीठमर्दक, नगरनिगम श्रेष्ठि सेनापति संघिपाल मेसहोड या छ. ये પદોની વ્યાખ્યા ૨૭માં સૂત્રમાં કરવામાં આવી છે. (सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) सर्वन सततम सम्मानित ४शन श्रीमत साये मनपातपाताना स्थान ५२ भवानी माज्ञा आपी. (इत्थिरयणेणं बत्तीसाप उडकल्लाणियासहस्सेहिं बत्तीसाप जणवयकल्लाणियासहस्सेहिं बत्तीसहबद्धहिं णाडय सहस्सेहिं सद्धि संपरिबुडे भवणवरवडिंसगं अईइ नहा कुबेरोव्व देवराया केलाससिहरि सिंगमयति) त्या२ मा सति सुभद्रा नाम श्री २त्नथी, ३२ M२ *तुयायियोथी । તુઓમાં આનંદદાયિની રાજકન્યાઓથી, ૩૨ હજાર જનપદાગ્રણીઓની કન્યાઓથી તેમજ ૩૨-૩૨ પાત્રથી સંબદ્ધ ૩૨ હજાર નાટકથી સમન્વિત થયેલ અને કુબેર જે લાગતે તે ભરત રાજા કૈલાસ ગિરિના શિખર તુલ્ય પિતાના શ્રેષ્ઠ ભવવતંકની અંદર Page #921 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारः सु० २९ स्व राजधान्यां श्रीभरतकार्यदर्शनम् ॥ कोहशो भरतः कीदृशश्च राजभवनमित्याह-'जहा कुबेरोव्व' इत्यादि। यथा कुबेर इव देवराजः कैलासशिखरशृङ्गभूतमिति यथा कुबेरः तथा देवराजः लोकपालो भरतोऽपि संपत्तिशालीतिभावः यथा कैलासं-स्फटिकाचलं किं स्वरूपं भवनावतंसकं शिखरि शृङ्गे पर्वतशिखरं तद्गतं तत्सदृशं भरतस्य राजभवनमपि सादृश्यं च उच्चत्वेन सुन्दरत्वेन चेतिभावः 'तएणं से भरहे राया मित्तणाइणिअगसयणसंबंधिपरिअणं पच्चुवेक्खइ' ततः खलु स भरतो महाराजा मित्रज्ञाविनिजकस्व जनसम्बन्धिपरिजनं प्रत्युपेक्षते, ततः खल्ल तदनन्तरं किल स महाराजा भरतः मित्राणि मुहृदः निजकाः मातापितृभ्रात्रादयः । स्वजनाः पितृव्यादयः, सम्बन्धिनः-श्वसुरादयः परिजना:-दासादयः अत्र एकवद्भावात् एकवचनं द्वितीयान्तं समस्तपदं बोध्यम् प्रत्युपेक्षते कुशलप्रश्नादिभिरापृच्छय संभाषते इत्यर्थः अथवा चिरकालाददृष्टत्वेन मित्रादीन् स्नेहदृशा पश्यतीत्यर्थः ‘पच्चुवेक्खित्ता' प्रत्युपेक्ष्य 'जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ' यथैव मज्जनगृहं स्नानगृहं तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'जाव मज्जणधराओ पडिणिक्खमई' यावत् मज्जनगृहात् स्नानगृहात् प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति स भरतः, अत्र यावत्पदात् तत्रैव कृतस्नानः सन इति बोध्यम् 'पडणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य-निर्गत्य 'जेणेव भोयणमंडवे तेणेव उवागच्छइ' यत्रैव भोजनमण्डपः भोजनालयः तत्रैव उपागच्छति'उवागच्छित्ता उपागत्य 'भोय(तएणं से भरहे राया मित्तणाइणियगतयणसंबंधिपरिअणं पच्चुवेक्खइ) वहां जाकर उस भरत महाराजा ने अपने मित्र जनों से अपने माता पिता भाई आदि जनों से, स्वजनोंसे काका आदि जनों से श्वसूर आदि सम्बन्धी जनों से, और दास आदि परि ननो से कुशलता पूछी अथवा चिरकाल के बाद देखने से मित्रादिकों को उसने स्नेह को दृष्टि से देखा (पच्चुबे. विवत्ता जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागन्छइ) सब के साथ संभाषण करने या स्नेहाद्र दृष्टि से देखने के अनन्तर वह भरत नरेश जहां पर स्नानगृह था वहां पर गया (जाव मज्जणघरामो पडिणिवस्वमइ) वहां पर जाकर के उसने -- यावत् - स्नान किया, और स्नान करके फिर वह स्नान घर से (पडिणिस्वमित्ता) बाहिर मा करके (जेणेष भोयणमंडवे तेणेव उवागच्छह) जहां पर भोजन मंडप था वहां पर आया (उवागच्छित्ता भोयणमंडवंसि सीहासणवरगए अट्ठमभत्तं पारेइ)वहां आकर पोताना प्रधान मननी म४२ प्रविष्ट थयो. (नपणं से भरहे राया मित्तणाइणियग सयणसंबंधिपरिअणं पच्चुवेक्खई) त्यां पांयान त मरत सनये .ताना मित्राननी પિતાના માતા-પિતા, ભાઈ વગેરેની, સ્વજનેતી કાકાવિગેરેની શ્વશુરવિગેરે સંબંધી જન ની અને દાસ-દાસી પરિજનાની કુશળતા પૂછીઅથવા જેમને તે ચિરકાળ પછી જે शाये! छे सेवा त भित्रा न त मरा४ श्री मरते स्ने ष्टिया नया. (पच्चुवेक्खिता जेणेव मजझणधरे तेणेव उवागच्छइ) सबनी साथ समाप ा मा भय। સને તેહ દષ્ટિથી જોયા બાદ તે ભરત નરેશ જ્યાં નાન ગૃહ હતું ત્યાં गये। (जाव मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ) त्यां ने ते. यावत् स्नान यु भने स्नान ४२१२ पछी त स्नान परथी (पडिणिक्खमित्ता) मा२ मावान (जेणेव भोयणमंडवे तेणेव Page #922 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २०८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मंडसि सुहासणवरगए अट्टमभत्तं पारेइ' भोजनमण्डपे सुखासनरवगतः सन् स भरतः अष्टमभक्तं पारयति अहोरात्रं दिनत्रयमुपोष्य ततः परं पारणां करोतीत्यर्थः 'पारिता' पारयित्वा पारणां कृत्वा उपि पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइंगमत्थएहिं बत्तीसइब दे हिं गाड एहि उवलालिज्जमाणे उवलालिज्जमाणे उवणच्चिज्जमाणे उवणच्चिमाणे उवगिजमाणे वगिज्जमाणे महया जाव भुंजमाणे विहरई' उपरि प्रासादवरगतै स्फुटद्भिः मृदङ्गमस्तकैः द्वात्रिंशब्दद्धैः नाटकैरुपलाल्यमानः २ उपनृत्यमानः २ उपगीयमानः २ महता यावत् भुञ्जानो विहरति तिष्ठति स भरतः अत्र यावत् आहतनाट्य तवादित तन्त्रीतलतालतूर्य घनमृदङ्ग | दुवादितरवेण विपुलान् भोगभोगान् इति ग्राहम् एषां व्याख्यानम् अस्मिन्नेव सूत्रे पूर्वे द्रष्टव्यम् ॥०२९ ॥ मूलम् - तए णं तस्स भरहस्स रण्णो अण्णया कयाई रज्जधुरं चिंतेमाणस इमेयारूवे जाव समुप्पज्जित्था, अभिजिए णं मए णिअगबलवीरिअपुरिसक्कार परक्कमेण चुल्ल हिमवंत गिरिसागरमेराए केवलकप्पे मरहे वासे, वह एक श्रेष्ट सुखासन पर बैठ गया और उसने अपने द्वारा गृहीत अट्टमभक्त की तपस्या की पारणा किया ( पारिता उपि पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइंगमत्थएहिं बत्तीस इबद्धेहिं णाडएहि उवलालिङनमाणे २ उवणचिजमाणे २ उवगिजमाणे महया नाव भुंजमाणे विहइ ) पारणा करके वह भरत अपने श्रेष्ठ प्रासाद के भीतर चला गया और वहां वह जिनमें मृदङ्गो की अविरलध्वनि हो रही है ऐसे ३२ पात्रों से बद्ध नाटको द्वारा बारंबार उपलालित होता हुआ, बार२ नृत्यां का अवलोकन करता हुआ बारंबार गायकों के गानो द्वारा स्तुत होता हुआ यावत् भोगभोगों को भोगने लगा यहां यावत्पद से " अहत नाट्यगीतवादित तन्त्री तलतालत्रुटितवनमृदङ्गः पटुवादितरवेण विपुलान् भोगभोगान्" इस पाठ का संग्रह हुवा है । नाट्य गीत आदि पदों की व्याख्या पीछे कई स्थलो पर लिखी जा चुकी है अतः उसे वहीं से जानलेनी चाहिये ॥ २९॥ उवागच्छा) नयां लोन मंडप तो, त्यां गया. ( उवागच्छन्ता भोयणमंडवंसि सीहासण arre अट्टमभतं परेइ) त्यांने ते श्रेष्ठ श्रेष्ट सुभासन उपर मेसी गया भने तेथे पोतानी वडे गृहीत अष्टम बहुत तयस्थाना पारा र्ध्या (पारिता उपि पासायवर गप कुट्टमा हि मुइंगमत्यपछि बत्तीसइवद्धेहिं णाडपहि उवलालिजमाणे २ उवणमित्रजमाणे २ गजमा २ महया जाव भुंजमाणे विहरह) पार! ४ने पछी ते भरत महाराल પેાતાના શ્રેષ્ઠ પ્રાસાદ ૧ અંદર ગયા. અને ત્યાં તે જેમાંમૃદ ંગેને અવિરલ ધ્વનિ થઇ રહ્યો છે. એવા ૩ર પાત્રાથી ખદ્ધ નાટકા વડે વરંવાર ઉપલાલિત થતા વારંવાર નૃત્યેનું અવલે ન કરતે વારંવાર ગાયકેાના સંગીતથી સસ્તુત થતા યાવત્ ભેગભેગા ભાગવવા લાગ્યા અહી यावत् पहथी “अहतनाट्यगीतवादित तन्त्रीतलतालतूर्यघ नमृदङ्ग "टुप्रवादितरवेण विपुलान्भोग भोगान्" मे पाउने सथयो छे. नाट्य गीत वगेरे पहोनी व्याभ्या पडेसां स्थओं पर इरवामां भावी छे. मेथी निज्ञासु भनी त्यांथी लगी . ॥२९॥ Page #923 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ० ३ वक्षस्कारःसू० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेक विषयक निरूपणम् तं सेयं खलु मे अप्पाणं महया रायाभिसेएणं अभिसेएणं अभिसंचावित्तएतिकट्टु एवं संपेहेति संपेहित्ता कल्लं पाउप्पभाए जाव जलते जेणेव मज्जणघरे जाव पडिणिक्ख इ पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवद्वाणसाला जेणेव सीहामणे तेणेव उवागच्छर्इ उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमु सियति णिसीइत्ता सोलसदेवस हस्से बत्तीस रायवरसह - स्से सेणावइरयणे जाव पुरोहियरयणे तिणि सट्ठे सूअसए अट्ठारस सेणिपसेणीओ अण्णेअ बहवे राईसर तलवर जाव सत्थवाहप्पभियओ सहावे सदावित्ता एवं व्यासी अभिजिएणं देवाणुप्पिया! मए णिअगबल वीरिअ जाव केवलकप्पे भरहे वासे तं तु मे णं देवाणुप्पिया ! ममं महया महया रायाभिसेयं वियरह, तए णं से सोलसदेव सहस्सा जाव - पभियओ भरणं रण्णा एवं वृत्ता समाणा हट्टतुट्ठ करयल मत्थए अंजलि कट्टुभहस्सरणो एयम सम्मं विणएणं पडिसुर्णेति तए णं से भरहे राया जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छर्इ उवागच्छित्ता जाव अट्ठमभत्तिए पडिजारमाणे विहरहू । तए णं से भरहे राया अट्टमभत्तंसि परिणममाणसि आभिओगिए देवे सद्दावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाप्पिया ! विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए एगं महं अभियमण्डवं विवेह विव्वित्ता मम एयमार्णात्तयं पच्चपिगढ । तणं ते भिओगा देवा भरहेण रण्णा एवं वृत्ता समाणा हट्ठतुट्ठा जाव एवं सामित्तिआणाए विणणं वयणं पडिसुर्णेति पडिणित्ता विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरत्थिमं दिसीभागं अवक्कमति अवक्कमित्तावेउच्चियसमुग्धारणं समोहणंति समोहणित्ता संखिज्जाई जोयणाई दंड णिसिरंति, तं जहां रयणाणं जाव रिट्ठाणं अहावा यरे पुग्गले परिसा डेंति परिसाडित्ता अहासुहुमे पुग्गले परिआदिअंति, परिआदित्ता दुच्चपि वेउव्वयसमुग्धारण जान समोहति समोहणित्ता बहुसमरमणिज्जं भूमिभाग विउव्वंति से जहानामए आलिंगपुक्खरेइ वा तस्सणं बहुसरेम ० " 'तणं तस्स भरइस्सरण्णा अण्णया कयाइं । इत्यादि टीकार्य - तरणं तस्स भरहस्स रण्णो अण्णया कयाइ रज्जधुरं चिंतेमाणस्प इमेयारूवे नाव . समुपज्जित्था ) एक दिन की बात है कि जब श्री भरत राजा अपने राज्य शासन के. ९०९ Page #924 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९१० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे णिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थणं महं एग अभिसेयमंडवं विउव्वंति अणेगखंभसयसण्णिविढे जाव गंधवट्टिभूयं पेच्छाघरमंडवंवण्णगो ति, तस्सणं अभिसेयमंडवस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थणं महं एंग अभिसेयपे विउव्वंति अच्छं सहं, तस्स णं अभिसेयपेढस्स तिदिसिं तओ तिलोवाणपडिस्वए विउबंति तेसिणं तिसोवाणपडिरूपगाणं अपमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते जाव तोरणा, तस्स णं अभिसेयपेढस्त बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते तस्सणं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस बहुमज्झदेसभाए एत्थण महं पगं सीहासणं विउव्वंति तस्संग सीहासणस्स अयमेयारूबे वण्णावासे पण्णत्ते जाव दामवण्णगं समत्तंति तए ण ते देवा अभिसेयमंडवं विउव्वंति विउवित्ता जेणेव भरहे राया जाव पच्चप्पिणंति । तए णं से भरहे राया आभिओगाणं देवाणं अंतिए एयमढे सोच्चा णिसम्म हट्ट तुट्ठ जाव पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता कोडुंबियपुरिसे सहावेइ सदावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिाया ! आभिसेक्कं हत्थिरयणं पडिकप्पेह पडिकप्पित्ता हयगय जाव सण्णाहेता एयमाणत्तिवं पच्चप्पिणह जाव पच्चप्पिणति तएणं से भरहे राया मज्जणघरं अणुपविमइ जाव अंजणगिरिकूडसंण्णिभं गयवई णवईदूरूढे तए णं तस्स भरहस्स रण्णो अभिसेक्कं हत्थिायणं दूरूढस्स समाणस्स इमे अट्ठमंगलगा जो चेव गमो विणीयं पविसमाणस्त सोचेव णिक्खममाणस्स वि जाव अप्पडिबुज्झमाणे विणीयं रायहाणीयं मझं मज्झेगं गिगच्छइ णिग्गच्छित्ता जेणेव विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए अभिसेयमंडवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छिताअभिसेय मंडवदुवारे आभिसेक्कं हत्थिरयणं ठावेइ ठवित्ता आमि सेक्काओहत्थिरयणाओ पच्चोरुहए पच्चोरुहिता इत्थीरयणेणं बत्तीसाए उडुकल्लणिया सहस्सेहि बत्तीसाए जगवयकल्लाणिया सहस्सेहिं बत्तीसाए बत्तीसइ बद्धेहिं णाडगसहस्सेहि सद्धिंसंपरिखुडे अभिसेयमंडवं अणुपविसइ, . Page #925 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारः सु० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेक विषयक निरूपणम् ९११ अणुपविसित्ता जेणेव अभिसेयपेढे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता अभिसेयपेढं अणुपपदाहिणी करेमाणे करेमाणे पुरत्थिमिल्लेणं तिसावाण पडिरूवरणं दूरूहइ दुरूहित्ता जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पुराभिमु सणसण्णेति । तरणं तस्स भरहस्स रण्णो बत्तीसं रायसहस्सा जेणेव अभिसेयमंडवे तेणेव उवागच्छइ उर्वागिच्छित्ता अभिसेयमंदवं अणुपविसंति अणुपविसित्ता अभिसेयपेढं अणुप्पयाहिणी करेमाणा अणुप्पयाहिणी करेमाणा उत्तरिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएण जेणेव भरहे राया तेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता करयलजाव अंजलि कट्टु भरहं रायाणं जणेणं विजएणं बद्धावेंति वद्धावित्ता पच्चासण्णे नाइदूरे सुस्सूसमाणाजाव पज्जुवासंति । तएणं तस्स भरहस्स रण्णो सेणाव - इरयणे जाव सत्थवाहपभिईओ तेऽवि तहचेव णवरं दाहिणिल्लेणं तिसावाणपडिरूवएणं जाव पज्जुवासंति ॥ सू० ३०॥ छाया - ततः खलु तस्य भरतस्य राशोऽन्यदा कदाचित् राज्यधुरं चिन्तयतः अयमेतद्रूपो यावत् समुपयत अभिजितं खलु मया निजक बलवीर्य पुरुषकार पराक्रमेण क्षुल्लहिमवद्भिरिसागर मर्यादया केवलकल्पं भरतं वर्षम्, तच्छ्रेयः खलु मे आत्मानं महता राज्याभिषेकेण अभियेकेण अभिषेचयितुमिति कृत्वा एवं सम्प्रेक्षते सम्प्रेक्ष्य कल्ये प्रादुष्प्रभाते यावत् ज्वलिते यत्रैव मज्जनगृहं यावत् प्रतिनिष्क्रामत प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला यत्रैव सिंहासनं तत्रैव उपागच्छति उपागत्य सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखः निषीदति निषद्य षोडशदेसहस्रान् द्वात्रिशतं राजवरसहस्रान् सेनापतिरत्नं यावत् पुरोहितरत्नं त्रीणि षष्टानि सुपशतानि अष्टादश श्रेणि प्रश्रेणीः अन्यान् च बहून् राजेश्वर तलवर यावत् सार्थवाह प्रभृतीन् शब्दयति शब्दयित्वा पवमवादीत् अभिजितं खलु देवानुप्रियाः ! मया निजकबलवीर्य यावत् केवलकल्पं भारतं वर्ष तत् यूयं खलु देवानुप्रियाः ! मम महाराज्याभिषेकं वितरत । ततः खलु षोडशदेव सहस्त्राः यावत्प्रभृतयो भरतेन राज्ञा पवमुक्ताः सन्तः हृष्टतुष्ट करतल यांच मस्तके अञ्जलिं कृत्वा भरतस्य राज्ञमपतमर्थ सम्यग् विनयेन प्रतिशृण्वन्ति ततः खलु स भरतो राजा यत्रैव पौषधशाला तत्रैव उपागच्छति उपागत्य यावत् अष्टमभक्तं प्रतिजाग्रत् विहरति ततः खलु स भरतो राजा अष्टमभक्ते परिणमति अभियोग्यान् देवान् शब्दयति शब्दयित्वा पवम् अवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! विनीताया राजधान्याः उत्तरपौरस्त्ये दिग्मागे एकं महान्तम् अभिषेकमण्डपं विकुर्वत विकुर्व्य मम पतामाशतिकां प्रत्यर्पयत ततः बल ते अभियोग्याः देवाः भरतेन राज्ञा एवमुक्ताः सन्तः हृष्टतुष्टाः यावत् एवं स्वामिन् ! इति आशाया विनयेन वचनं प्रतिश्रुण्वन्ति प्रतिश्रुत्य विनीताया राजधान्याः उत्तरपौरस्त्ये Page #926 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे दिग्भागे अपकर्मान्ति अपक्रम्य वैक्रियसमुदघातेन समवनन्ति समवहत्य संख्येयानि योजनानि दण्डं निसृजन्ति तद्यथा रत्नानां यावत् रिष्टानां यथा बादरान् पुद्गलान् परिशातयन्ति परिशात्य यथा सूक्ष्मान् पुद्गलान् पर्यादस्ते पर्यादाय द्वितीयमपि वैक्रियसमुद्घातेन यावत् समबन्धन्ति समवहत्य बहुसमरमणीयं भूमिभागं विकुर्वन्ति तद्यथानामकः आलिंग्यपुष्करः इति वा, तस्य खलु बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यरेशभागे अत्र खलु एक महान्तम् अभिभषेकमण्डपं विकुर्वन्ति, अनेकस्तम्भतसन्निविष्टं यावद् गन्धवत्तिभूतं प्रेक्षागृह मण्डपवर्णकः इति, तस्य खलु अभिषेकमण्डपस्य बहुमध्यदेश भागे अत्र खलु महान्तमेकम् अभिषेकपीठं त्रिकुर्वन्ति अच्छे श्लक्ष्णम्, तस्य खलु अभिषेकपीठस्य त्रिदिशं त्रीन् त्रिसोपानप्रतिरूपकान् षिकु तेषां स्वलु त्रिलोपान प्रतिरूप हाणाम् अयमेतद्रूपो वर्ण व्याः प्रज्ञप्तः यावत् तोरणम् तस्य खलु अभिषेकपीठस्य बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः तस्य खलु बहुसमरमजीयस्थ भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु पकं सिंहासनं विकुर्वन्ति तस्य बलु सिंहासनस्य अयमेतद्रूपो वर्णकव्यासः प्रज्ञप्तो यावदामवार्णकं समाप्तमिति । ततः चलु ते देवा अभिषेकमण्ड विकुर्वन्ति विकुर्व्य यत्रैव भरतोराजा यावत् प्रत्यर्पयन्ति । ततः खलु स भरतो राजा अभियोग्यानां देवानामन्तिके पतम श्रुत्वा निशम्य इष्टतुष्टयावत् पौषधशालातः प्रतिनिष्क्रामति प्रतिनिष्क्रम्य कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति शयित्वा एवमवादीत् क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः ! अभिषेक्यं हस्तिरत्नं प्रतिकल्पयत प्रतिकल्प्य हयगज यावत् सन्नाहयत एतामाज्ञसिकां प्रत्यर्पयत यावत्प्रत्यर्पयन्ति । ततः खलु स भरतो राजा मज्जनगृहम् अनुप्रविशति यावद् अञ्जनगिरिकूटसन्निभं गजपति नरपति: दूरूढः । ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञ आभिषेक्यं हस्तिरत्नं दुरूढस्य सतः इमानि अष्टावष्टौ मङ्गलकानि य एव गमो विनीतां प्रविशतः स एव निष्क्रामतोऽपि यावत् प्रतिबुध्यन् २ विनातां राजधानीं मध्यंमध्येन निर्गच्छति निर्गत्य यत्रैव विनीता या राजधान्या उतरपौरस्त्ये दिग्भागे अभिषेकपण्डपस्तत्रैव उपागच्छति उपागत्य अभिषेकमण्डपद्वारे अभिषेक हस्तिरत्नं स्थापयति स्थापयित्वा अभिषेक्वात् हस्तिरत्नात् प्रत्यवरोहति पत्यवरुय स्त्रीरत्नेन द्वात्रशिता ऋतुकल्याणिकासहस्रैः द्वात्रिंशता जनपदकल्याणिकासहस्रैः द्वात्रिंशता द्वात्रिंशद् बद्वै र्नाटकसहस्रैः साद्ध संपरिवृतोऽभिषेकमण्डपम् अनुप्रविशति अनुप्रविश्यत्रैव अभिषेकपीठं तत्रैव उपागच्छति उपागस्य अभिषेकपीठमनुप्रदक्षिणी कुर्वन् अनुप्रदक्षिणी कुर्वन् पौरस्त्येनत्रि सोपानकप्रतिरूपकेन दूरोहति दूरुह्य यत्रैव सिंहासनं तत्रैव उपागच्छति उपागत्य पौरस्त्याभिमुखः सन्निषण्णः इति । ततः खलु तस्य भरतस्य द्वात्रिंशद्राज नह स्त्राणि यत्रैत्र अभिषेकमण्डपः तत्रैव उपागच्छन्ति उपागत्य अभिषेकमण्डपम् अनुप्रविशन्ति अनुप्रविश्य अभिषेकपोठम् अनुप्रदक्षिणो कुर्वन्तः अनुप्रदक्षिणीकुर्वन्तः उत्तरेण त्रिसोपान प्रतिरूपकेण यत्रैव भरता राजा तत्रैव उपागच्छन्ति उपागत्य करतल यावद् अञ्जलिं कृत्वा भरतं राजानं जयेन विजयेन वर्द्धयन्ति वर्द्धयित्वा भरतस्य राशो नात्यासन्ने नातिदूरे शुश्रूषमाणाः यावत् पर्युपासते ततः खलु तस्य भरतस्य राशः सेनापतिरत्नं यावत्सार्थवाह प्रभृतयस्तेऽपि तथैव नवरं दाक्षिणात्येन त्रिसोपानप्रतिरूपकेण बाबत पर्युपास्ते ||सू० ३०॥ Page #927 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टोका तृ०३ वक्षस्कारःसू० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम टोका- 'तए णं तस्स' इत्यादि 'तए णं तस्स भरहस्स रण्णो अण्णया कयाइ रज्जधुरं चिंतेमाणस्स इमेयारूवे जाव समुप्पज्जित्था' ततः खलु तदनन्तरं किल तस्य षट्खण्डाधिपतेर्भरतस्य राज्ञः अन्यदा कदाचिद् अन्यस्मिन् कस्मिंश्चित्काले राज्यधुरं राज्यभारं चिन्तयतः अयमेतद्रूपो यावत्समुदपद्यत समुत्पन्नः अत्र यावत्पदात् 'अज्झथिए चिंतिए कप्पिए पत्थिए मणोगए संकप्पे' एतेषां सङ्ग्रहः तत्र अयमेतद्रूपः स राज्यभारविषयकविचारः 'अज्झथिए' आध्यात्मिकः प्रथमम् आत्मनि जातोऽङ्कुर इव तदनु'चिंतिए' चिन्तितः पुनः पुनः स्मरणरूपः सएव विचारो द्विपत्रित इव समुत्पन्नः २, तदनु 'कप्पिए' कल्पितः व्यवस्थायुक्तः इत्थंरूपेण राज्यभारव्यवस्था करिष्यामीति कार्याकारण स एव परिणतो विचारः पल्लवित इव जातः३, तदनु 'पत्थिए' प्रार्थितः स एव विचारः भार को चलाने के सम्बन्ध में विचारमग्न थे तब उन्हें इस प्रकार का संकल्प उत्पन्न हुआ यहां यावत्पद से संकल्प के “अज्झथिए चिंतिए, कप्पिए, पत्थिए मणोगए संकप्पे"इन विशेषण पदों गृहीत हुए है। इन पदों की व्याख्या इस प्रकार से है-यह संकल्प सर्व प्रथम अङ्कर के जैसा मात्मा में उत्पन्न हुआ इस कारण इसे आध्यात्मिक कहा गया है. फिर बार २ भरत चक्री ने इसे याद किया इसलिये द्विपत्रित अर्कुर की तरह इसे चिन्तित विशेषण से विशिष्ट किया गया है फिर यही विचार व्यवस्थायुक्त बनगया-मैं इसी प्रकार से राज्य मारकी व्यवस्था करूंगा" इस रूप से वह कार्य के आकार में परिणत हो गया अतः वह कल्पित पद से कहा गया है. इष्ट रूप से यह विचार स्वीकृत हो गया इसलिये इसे, 'पत्थिए' पद से अभिहित किया गया है. तथा-इसे अभी तक “तपणं तस्स भरहस्स रणो अण्णया कयाइ" इत्यादि सूत्र-३०॥ साथ-(तएणं तस्स भरहस्स रण्णो अण्णया कयाइ रज्जधुरं चिंतेमाणस्स इमेयारूवे जाव समुप्पज्जित्था) स४ [६वसना पात छ त्या भावना . ચલાવવાના સંબંધમાં વિચારમગ્ન હતા. ત્યારે તેમના અન્ત:કરણમાં એ જાતને स३६५ मव्यो मडीयावत् पहथी सं४६पना "अज्झथिए चितिए कप्पिए पत्थिए मणोगए संकप्पे' से विशेष पहोना संड थयोछे. समनी व्याच्या प्रभार છે. એ સંક૯૫ સર્વ પ્રથમ અંકુરની જેમ આત્મામાં ઉદ્ભવ્યો એથી આને આધ્યાત્મિક કહેવામાં આવેલ છે. પછી ભરત ચક્રીએ આને વારંવાર યાદ કર્યો એથી આ દ્વિપત્રિત અંકુરની જેમ આને ચિતિત વિશેષણથી વિશિષ્ટ કહેવામાં આવેલ છે. પછી એજ વિચાર વ્યવસ્થાયુક્ત બની ગયો. “હું આ પ્રમાણેજ રાજ્યભારની વ્યવસ્થા કરીશ” એ રૂપમાં એ સંક૯૫ કાર્ય રૂપમાં પરિણત થઈ ગયે એથી એ કલ્પિત પદથી સ્પષ્ટ કરવામાં भाव छ. ४ट ३५थी से विया२ स्वीकृत 25 गया. मेथी मान पत्थिर' पहथी भनिહિત કરવામાં આવેલ છે. તથા આ સંબંધમાં હજી સુધી ચકવતી એ કેઈનેય કહ્યુનથી ११५ Page #928 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९१४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे इष्टरूपेण स्वीकृत पुष्पित इव४ 'मणोगए' मनोगत: मनसि दृढरूपेण निश्चयः 'संकप्पे' सङ्कल्पः इत्थमेव मया कर्त्तव्यमिति राज्यभारविषयको विचारः फलित इव समुत्पन्नः ५, स च कः सङ्कल्प इत्याह- 'अभिजिए णं इयादि । 'अभिजिएणं मए णिअगवलवीरियपुरिसक्कारपरकमेणं चुल्लहिमवंत गिरिसागरमेराए केवलकप्पे भरहे वासे तं सेयं खलु मे अप्पाणं महया रायाभिसेrण अभिसेएणं अभिसिंचावित्तए चिकट्टु एवं संपेहेइ' अभिजितं खलु मया 'राज्ञा' चक्रवर्त्तिना भरतेन निजकबलवीर्यपुरुषकारपराक्रमेण निजकं - स्वकीयं बलम् - शरीरशक्तिः वीर्यम् आत्मशक्तिः पुरुषकार :- पौरुषम् पराक्रमः परेषु शत्रुषु आक्रमण - क्तिः परपराजयशक्तिरित्यर्थः अत्र समाहारद्वन्द्वः तत् निजकबलवीर्य पुरुषकार पराक्रमम् तेन कारणभूतेन अत्र समाहारद्वन्द्वाद् एकवचनं नपुंसकत्वञ्च बोध्यम् क्षुल्लहिमवद्गिरसागरमर्यादा उत्तरस्यां दिशि क्षुल्लहिमगिरि क्षुद्रहिमवत्पर्वतः अपरत्र च दिशात्रये सागराः त्रयः समुद्रास्तैः कृतायाः मर्यादा अवधिः तथा केवलकल्पं सम्पूर्ण भारतं वर्षम् अभिजित मिति पूर्वेण सम्बन्धः तच्छ्रेयः खलु मे ममात्मानं महता राज्याभिषेकेण राज्याभिषेकरूपेण अभिषेकेन अभिषेचयितुम् अभिषेकं कारयितुम् इतिकृत्वा भारतं क्षेत्र षट्खण्ड रूपमभिजितमिति एवं प्रकारेण सम्प्रेक्षते - राज्याभिषेकं विचारयति स भरतः । चक्रवर्ती ने किसी से कहा नहीं इसलिये मन में हीं वर्तमान होने के कारण इसे मनोगत कहा गया है । जो भरतचक्री को संकल्प उत्पन्न हुआ वह इस प्रकार से हैं - ( अभिजिएणं मए णियग बलवोरियपुरिसक्कारपरक्कमेणं चुल्लहिमवंत गिरिसागरमेराए केवलकप्पे भरहे वासे तं सेयं खलु मे अप्पाणं महया रायाभिसेएणं अभिसेए णं अभिसिंचावित्तए त्ति कट्टु एवं संपेहेइ) मैंने अपने बल से शारीरिक शक्ति से, और वीर्य से, आत्मबल से तथा पुरुषकार पराक्रम से शत्रुओं को पराजित करने की शक्ति से उत्तर दिशा में जिसकी मर्यादारूप क्षुद्रहिमवत्पर्वत पड़ा हुआ है और तीन दिशाओं में जिसकी तीन समुद्र पड़े हुए हैं ऐसे इस सम्पूर्ण भरत क्षेत्र को मैंने अपने वश में कर लिया है. इसलिये अब मुझे यही योग्य हैं कि मैं राज्य में अपना अभिषेक कराऊं इस प्रकार का विचार कर फिर उसने ऐसा सोचा - (कल्लं पाउप्पभाए जाव जलते ) कल जब रजनी प्रभात प्राय हो जावेगी और सूर्य की प्रभा चारों ओर फैल એથી મનમાંજ વિદ્યમાન ાવાથી બને વાત કહેવામાં આવેલ છે. ભરત ચક્રીને જે स४८५ उद्दभव्यो ते या प्रमाणे छे- (अभिजिवणं मए णियगबलवीरियपुरिसक्कारपरककमेणं चुल्लहिमवंत गिरिसागरमेराप केवलकप्पे भरहे वासे तं सेयं खलु मे अप्पाणं महया रायाभिपूर्ण अभिसेवणं अभिसिंवावित्तव तिकट्टु एवं संपेहेइ) में पोताना माथी શારીરિક શક્તિથી અને વીર્ય થી આત્મપ્રલથી તેમજ પુરુષકાર પરાક્રમથી શત્રુઓને પરાજિત કરવાની શક્તિથી ઉત્તરર્દશામાં જેની મર્યાદ. રૂપ ક્ષુદ્રહિમવત ઉભે છે.અને ત્રણ દિશાઓમાં સમુદ્ર છે. એવા આ સ ંપૂર્ણ ભરત ક્ષેત્રને મેં પેાતાના વશમાં કરી લીધુ છે. એથી હવે મારા માટે એજ ચેાગ્ય છે કે રાજ્ય પર્ મારે અભિષેક કરાવડાવુ, આ પ્રમાણે વિચાર अरीने च्छा तेथे मी प्रमाणे वियार हुये (कलं पाउप्पभाए जाव जलते) असे प्रभात હું * Page #929 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारः सू० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयक निरूपणम् ९१५ अथ विचारोत्तरकालिक कार्यमाह - 'संपेहित्ता' इत्यादि 'संपेहित्ता' सम्प्रेक्ष्य विचार्य 'कल्लं पाउप्पभाअए जाव जलंते' कल्ये आगामिनि प्रभाते प्रादुष्प्रभाते प्रभायुक्ते यावद् ज्वलिते सूर्ये प्रकाशिते सतीत्यर्थः ' जेणेव मज्जणघरे जाव पडिणिक्खमइ' यत्रैव मज्जनगृहं स्नानगृहं यावत् प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति स भरतः, अत्र यावत्पदात् प्रविशति निमज्जति निमज्ज्य इति ग्राह्यम् 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'जेणेव बाहिरिया उवद्वाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छ' यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला सभामण्डपः यत्रैव सिंहासनं तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'सीहासणवरगए पुरत्याभिमुद्दे णिसीय ' सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखो निषीदति सिंहासने उपविशति स भरत: 'णिसोइत्ता' निषद्य - उपविश्य "सोलसदेव सहस्से " षोडशदेवसहस्राणि देवानित्यर्थः 'बत्तीसं रायवरसहस्से' द्वात्रिंशतं राजवरसहस्राणि द्वात्रिंशतं सहस्राणि राजवरान् इत्यर्थः ' सेणावरयणे जाव' सेनापतिरत्नं यावत् पुरोहितरत्नम् अत्र यावत्पदाद् गाथापतिरत्नं बर्द्धकिरत्न मितिग्राह्यम् 'तिण्णि सट्टे असए ' त्रीणि पष्टानि षष्ट्यधिकानि सूपशतानि अत्र जावेगी, तब यह राज्याभिषेक का कार्य प्रारम्भ कराऊंगा ( जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ जाव पडिणिक्खमइ) दूसरे दिन जब प्रातः काल हो गया और सूर्य की प्रभा फैल गई तब वे भरत राजा जहां पर स्नान गृह था वहां पर गये वहां जाकर उन्होंने अच्छी तरह से स्नान किया और स्नान करके फिर वे स्नानशाला से बाहर आगये बाहर आकर के वे ( जेणेव बाहिरिया उवाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ) जहाँ पर बाह्य उपस्थानशाला थी और जहां पर सिंहासन था वहां पर गये (उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णिसीयइ) वहां जाकर वे पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठ गये (जिसीइत्ता सोलसदेवसहस्से बत्तीसं रायवरसहस्से सेणावइरयणे जाव तिणिसट्टिसूअसए अट्ठारससेणिपसेणीओ अण्णेय बहवे राईसर तलवर जाव सत्थवाहपभिईओ) बैठ कर उन्होंने १६ हजार देवों को ३२ हजार श्रेष्ठ राजाओं को सेनापति रत्न को, यावत् पुरोहित रत्न को गाथापति रत्न को तोनसौ ६० रसवतीकारकों થશે અને સૂર્યના કિરણેા ચામેર પ્રસરી જશે ત્યારે આ રાજ્યાભિષેકનુ કાર્ય પ્રારંભ કરાવીશ ( जेणेव मज्जणघर तेणेव उवागच्छर जाव पडिणिक्खमइ) मील हिवसे न्यारे सवार थ અને સૂર્યની પ્રભા પ્રસરી ગઈ ત્યારે તે ભરત રાજા જ્યાં સ્નાન ગૃહ હતું ત્યાં ગયા. ત્યાં જઇને તેણે સારી રીતે સ્નાન કર્યું. સ્નાન કરીને પછી તે સ્નાન શાલામાંથી બહાર આવ્યે. बहार भावी ने (जेणेव बाहिरिया वट्टाणसाला जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छ) नया माह्य अपस्थान शासाहती मने क्या सिंहासन हेतु त्या गया. ( उवागच्छित्ता सीहा सण - बरगए पुरस्थाभिमुद्दे णिसीयइ) त्याने ते पूर्व दिशा तर मुख हरीने मेसी गया. (fणसीइत्ता सोलसदेव सहस्से बत्तीसं रायवरसहस्से सेणावहरयणे जाव तिरिण लट्ठिस्यसप अट्ठारस सेणिप्पसेणिओ अण्णेय बहवे राईसर तलवर जाव सत्थवाहम्पभिइओ) मेसीने તેમણે ૧૬ હજાર દેવાને, ૩૨ હજાર શ્રેષ્ઠ રાજાઓને, સેનાપતિ, રત્નેને, યાવત્ પુરાહિત Page #930 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९१६ अम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सुपशब्दस्य सूपकारशतानि त्रिषष्टयाधिकशतानि खूपकारान् - रसवतीकारान् इत्यर्थः 'अट्ठारस सेणिप्पणीओ' अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणी: 'अण्णेय बहवे राईसर तलवर जाव सत्थवाद - 'पभियम' अन्यांश्च बहून् राजेश्वर तलवर यावत् सार्थवाह प्रभृतीन् शब्दयति आह्वयति अत्र यावत्पदात् माम्बिक कौटुम्बिकमन्त्रिमहामन्त्रि गणकदौवारिकामात्य चेटपीठमर्दनगर निगम श्रेष्ठसेनापतिसार्थवाहदूतसन्धिपालपदानि ग्राह्यानि एतेषां व्याख्यानम् अस्मि नेव तृतीयवक्षस्कारे सप्तविंशतितमे सूत्रे द्रष्टव्यम् 'सद्दावित्ता' शब्दयित्वा आहूय एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् किमुक्तवान् इत्याह- 'अभिजिएणं' इत्यादि 'अभिजिएणं देवाणुपिया ! मए णिअगबलवीरिअ जाव केवलकप्पे भरह वासेत तुम्भेणं देवाणुपिया ! मम महया रायाभिसेयं वियरह' अभिजितं खलु देवानुप्रिया ! मया निजकबलवीर्य यावत् - निजकबलवीर्यपराक्रमेण क्षुद्र हिमवद्विरिसागरमर्यादया केवलकल्पम् सम्पूर्ण भारतं वर्षम् तत् तस्मात् यूयं खलु देवानुप्रियाः मम महाराज्याभिषेकं वितरत - कुरुत 'तपणं से सोलसदेवसहस्सा जाव पभिइओ भरहेणं रण्णा एवं बुत्ता समाणा हट्ट करयल मत्थए अंजलिं कट्टु भरहस्स रण्णो एयमहं सम्मं विणणं को, अठारह श्रेणिप्रश्रेणि जनों को दूसरे और भी अनेक राजेश्वर तलवर यावत् सार्थare आदि कों को बुलाया यहां आगत यावत्पद से" कौटुम्बिक मंत्री, महामंत्री, गणक दौवारिक अमात्य चेट, पीठमर्द, नगर निगम श्रेष्ठिजन सेनापति, सार्थवाह दूत, सन्धिपाल" इन सबका ग्रहण हुआ है. (सदावित्ता एवं वयासी) बुलाकर भरत महाराजा ने उन से ऐसा कहा - (अभिजिएणं देवाणुप्पिया ! मए णियगबलबीरिय जाव केवलकप्पे भर हे वासे) हे देवानुप्रियो ! मैंने अपने बलवीर्य एवं पुरुषकार पराक्रम से इस सम्पूर्ण भरत खण्ड को अपने वश में कर लिया है. (तं तुब्भेणं देवाणुपिया ! मम महया रायाभिसेयं वियरह) इसलिये हे देवानुप्रियो ! आप सब वडे ठाट बाट से मेरा राज्याभिषेक करो. (तएण से सोलसदेव सहस्सा जाव प्पभिइओ भरहेणं रण्णा एवं वुत्ता समाणा हट्ठ तुट्ठ करयलमत्थए अंजलि कट्टु भरहरु रण्णो एयमहं सम्मं विणएणं पडिसुगांत) इस प्रकार श्री भरत महाराजा द्वारा રત્નને, ગથાપતિ રત્નને ૩૬૦ રસવતી કારકાને ૧૮ શ્રેણિ પ્રશ્રેણિ જનોને બીજા અનેક રાજેश्वरे। तसवरे। यावत् सार्थवाह। विगेरे ने गोसाव्या. सहीं आवेला यावत् पहथी "माडंबिक, कौटुम्बिक, मंत्री, महामंत्री, गणक, दौवारिक, अमात्य, चेटपीठमर्द, नगर निगम श्रेष्ठिजन, सेनापति, सार्थवाह, दूत, सन्धिपाल” मे सर्व पहोनुं श्रणु थयु छे. (सद्दाविता एवं वयासी) मेोसावीने भरत रानमे तेमने आ प्रमाणे उह्यु. (अभिजिपणं देवाणुपिया ! मणियगबलवीरय जाव केवलकप्पे भरहे वासे) हे देवानुप्रिये। ! में स्वणसवीर्य तेभ पुरुषार पर भथी या सम्पूर्ण भरत मउने वशमां री सीधे छे. (तं तुब्भेणं देवाणु पिया ! मम महया रायाभिसेयं वियरह) मेथी हे देवानुप्रियो ! तमे सर्वे पूजन हाई-भा थी भारी राज्याभिषे४ पुरे. (तपणं से सोलसदेव सहस्सा जावप्यभिइओ भरतेणं रण्णाएवं ता समाणा दट्ठ-तुट्ट करयल मत्थर अंजलि कट्टु भरहस्स रण्णो एयमहं सम्मं विणणं T Page #931 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सु० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम ९१७ पडिमुणेति' ततः खलु तदनन्तरं किल तानि षोडशदेवसहस्राणि यावत्प्रभृतयः यावत्पदा द्वात्रिंशत् राजवरसहस्त्राणि सेनापतिरत्नगाथापतिरत्न बर्द्धकिरत्न पुरोहितरत्नानि त्रीणिषष्ठ्यधिकानि सूपकारशतानि अन्ये च बहवो राजेश्वर तलवर यावत् सार्थवाहप्रभृतयः भरतेन राज्ञा एवम् उक्तप्रकारेण उक्ताः आज्ञप्ताः सन्तः 'हट्टतुट' त्ति इहैकदेशभूतमपि इदं पदं पूर्णतया तदधिकारसूत्रार्थस्मारकम् तेन हृष्टतुष्टचित्तानन्दिताः नन्दिताः मुमनसः परमसौमनस्थिताः हर्षवशविसर्पद् हृदयाः सन्तः एवमेव अग्रेऽपि करतलपरिगृहीतं दशनख शिरसावर्त मस्तके अञ्जलिं कृत्वा भरतस्य राज्ञः एतम् अनन्तरोदितम् अर्थम् सम्यग् विनयेन विनयपूर्वकं प्रतिशन्ति स्वीकुर्वन्ति अथ यथा जलात् लब्धाऽऽत्मलामा कृषिर्जलेनैव बर्द्धते तथा तपसा प्राप्तं राज्यं तपसैव अभिनन्दतीति चेतसि चिन्तयन् भरतो यत्कृतकहे गये वे सोलह हजार देव बहुत ही अधिक हर्षित एवं संतुष्ट चित्त हुए और उन्होंने दोने हाथों की अंजुलि करके एवं उसे मस्तक पर धारणकरके भरताहाराजाका इस कथन को अच्छी तरह से विनय पूर्वक स्वीकार कर लिया। यहां यावत्पद से "इसी प्रकार से भरतमहाराजाद्वारा कहे गये. ३२ हजार राजा जन, सेनापतिरत्न, गाथा पतिरत्न, वर्द्धकिरत्न, पुरोहितरत्न, तीनसौ साठ सूपकारजन , तथा-और भी दूसरे राजेश्वर तलवर यावत् सार्थवाह आदिजन-भी बहुत ही अधिक हर्षित, एवं संतुष्ट चित्त: हुए और उन्होंने भी दोनों हाथों की अंजुलिबना करके एवं उसे मस्तक पर धारण करके भरत महाराजा के इस कथन को अच्छी तरह से विनय पूर्वक स्वीकार कर लिया” इस पाठ का संग्रह हुआ है. "हद तुः" इस कथित पद से ऐसा "हृष्ट तुष्टचित्तानन्दिताः, सुमनसः परमसौमनस्यिताः हर्षवशविसर्पद हृदयाः " यह पाठ यहां लगा लेना चाहिये इसी प्रकार “करतलपरिगृहीतं दशनखं शिरसावर्त" इतना पाठ करतल के साथ और लगा लेना चाहिये. जिस प्रकार जल से प्राप्त मात्म लाभ वाली कृषि जल से ही वृद्धिंगत होती है, उसी प्रकार तप से ही प्राप्त हुआ राज्य पडिसुणेति) मा प्रमाणे भरत महाराज व मास थयेा ते सास २ वा अतीय અધિક હર્ષિત તેમજ સંતુષ્ટ ચિત્ત થયા અને તેમણે પોતાના બન્ને હાથની અંજલિ બનાવીને અને તેને મસ્તકે મૂકીને ભરત રાજાની એ આજ્ઞાનો સારી રીતે અને વિનયપૂર્વક સ્વીકાર કરી લીધે. અહીં યાવત્ પદથી આ પ્રમાણે જ ભરત રાજા દ્વારા આજ્ઞપ્ત થયેલા ૩૨ હજાર રાજાઓ સેનાપતિ રત્ન ગાથા પતિરત્ન, વર્ધકિરન. પુરોહિતરત્ન, ૩૬૦ સૂપકારજનો તેમજ બીજા પણ રાજેશ્વર તલવર ચાવત સાર્થવાહ વગેરે લકેપણ અતીવ અધિક હર્ષિત તેમજ સંતુષ્ટ ચિત્ત થયા અને તેમણે પણ પોતાના બન્ને હાથની અંજલિ બનાવીને અને તેને મસ્તક ઊપર ધારણ કરીને ભારત રાજાની એ આજ્ઞાને સારી રીતે સવિનય સ્વીકારી લીધી. “એ પાઠને संघड थयो छे. “हहतु?” से अथित ५४थी । “इष्ट तुष्ट चित्तानन्दिताः सुमनस परमसौमनस्थिताः हर्षवशविसर्पद हृदयाः" मा ५४सुधान।।8 सही व ले. माप्रमाणे "करतलपरिगृहीतं दशनखं शिरसावर्त" मट पा8 '४२त' साथे वनस જેમ પાણીથી પ્રાપ્ત આત્મલાભવાળી ખેતીની ઉપજ પાણથીજ સંવદ્વિત થાય છે તેમજ Page #932 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५१८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे वान् तदाह'तणं से' इत्यादि 'तरणं से भरहे राया जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छ' तदनन्तरं खलु स भरतो राजा यत्रैव पोषधशाला तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'जाव अमभत्तिए पडिजागरमाणे विहर' यावत् अष्टमभक्तिकः सन् अष्टमभक्तं प्रतिजाग्रत् विहरति तिष्ठति अत्र यावत्पदात् त्यक्तालङ्कारशरीरः त्यक्तस्नानः विस्तारितदर्भासनोपविष्टः ब्रह्मचारी इति ग्राह्यम् ' तरणं से भरहे राया अहममत्तंसि परिणममाणंस आभिओगिए देवे सदावेइ सद्दावित्ता एवं व्यासी' ततः खलु स भरतो राजा अष्टम परिणमति परिपूर्णे जायमाने सति आभियोग्यान् आज्ञाकारिणः देवान् शब्दयति आह्वयति शब्दयित्वा आहूय एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् किमुक्तवान् इत्याह- 'खिप्पामेव' इत्यादि खिप्पामेव भो देवाणुपिया ! विणीयाए यहाणीए उत्तरपुरत्थिमे दिसीमाए एगं महं अभिसेयमंडवं विउब्वेह विवित्ता मम एयमाणत्तियं पच्चपिणढ' क्षिप्रमेव शीघ्रमेव भो देवानुप्रियाः ! विनीतायाः तप से ही वृद्धिंगत होता है. इस प्रकार चित्त में सम्यक विचार करते हुए भरतमहाराजा ने जो किया उसे अब सुत्रकार प्रकट करते हुए कहते हैं- (तएणं से भरहे राया जेणेव पो सहसाला तेणेव उवागच्छइ) इसके बाद भरतमहाराजा जहां पर पौषध शाला थी वहां पर लाये- (उवागच्छित्ता जाव अट्ठमभत्तिए पडिजागरमाणे विहरइ) वहां आकर के अष्टमभक्तिक- बन गये. और सावधानी से गृहीत व्रत को आराधना करने लगे. यहां यावत् शब्द से ( त्यक्तालङ्कारशरीरः, व्यक्तस्नानः विस्तारितदर्भासनोपविष्टः ब्रह्मचारी " इस पाठ का ग्रहण हुआ है. । (तपणं से भर राया अट्टमभत्तं परिणममाणंसि आभिओगिए देवे सदावेइ) इसके बाद भरतमहाराजा ने अट्ठम भक्त की तपस्या समाप्त होनेपर आभियोगिक देवों को बुलाया. ( सदावित्ता एवं वयासी) और बुलाकर उनसे ऐसा कहा – (त्रिप्पामेव भो देवाणुपिया ! विणोयाए रायहाणीए उत्तर पुरत्थि मे दिसोभाए एवं महं अभिसेयमंडवं विउब्वेह) हे देवानुप्रियो ! तुमलोग बहुत शीघ्र विनीता राजधानी के ईशान कोन में एक विशाल अभिषेक मण्डप निर्मित करो. (विउब्वित्ता मम एयતપથી પ્રાપ્ત રાજ્ય તપથીજ વૃદ્ધિગત હોય છે. આ પ્રમાણે ચિત્તમાં વિચાર કરતાં શ્રી ભરત महा रामसे हैं यु ते. विषहवे सूत्रकार स्पष्टता उरतांडे छे - (तएणं से भरते राया जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ ) ત્યાર માદ ભરત મહારાજા જ્યાં પૌષધशाजा हती त्यां गया. ( उवागच्छित्ता जाव अट्टमभत्तिए पडिजागरमाणे विहरह) त्यां આર્ચીને ત અષ્ટમ ભક્તિકથઇ ગયા અને સાવધાની પૂર્વક ગૃહીત વ્રતની આરાધના કરવા साग्या अडीं यावत् शब्दथी (त्यक्तालङ्कारशरीरः त्यक्तस्नानः, विस्तारितदर्भासनोपविष्टः ब्रह्मचारी) “मा पाउनुहुनु थ्यु छे (तपणं से भरते राया अट्टमभत्तंसि परिणममाणसि अभिओगिर देवे सहावेइ) त्यार माह भरत महाराज से न्यारे अष्टमभानीतपस्या पूरीधर्ध त्यारे आयोगद्वेवो ने मोसाव्या. (सद्दावित्ता एवं वयासी) मने सोसावीने ते देवाने या प्रमाणे उद्धुं (खिपामेव भो देवाणुपिया ! विणीयाए रायहाणीप उत्तरपुरत्थिमे दिलीभाए एवं महं अभिसेयमंडवं विउब्वेह) हे हेवानुप्रियो ! तमे अतीव शीघ्र विनीता रा धानी नाईशान अणुभां मे विशाल अभिषे मंडप निर्मित ४२ । (विउग्वित्ता मम एय Page #933 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारः सू० ३. भरतराक्षः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् ९१९ राजधान्याः उत्तरपौरस्त्ये दिग्भागे ईशानकोणे तस्यात्यन्त प्रशस्तत्वात् एकं महान्तं महत्वपूर्णम् अभिषेकमण्डपम् अभिषेकाय गज्यभिषेकाय मण्डपो ऽभिषेक मण्डपस्तम् यद्वा राज्याभिषेकयोग्यमण्डपं विकुर्वत रचयत विकुऱ्या रचयित्वा ममैताम् आज्ञप्तिका प्रत्यर्पयत समर्पयत 'तएणं ते आभियोगा देवा भरहेणं रण्णा एवं वुत्ता समाणा हतुट्टा जाव एवं सामित्ति आणाए विणएणं वयणं पडिमुणेति' ततः खलु ते आभियोग्याः देवाः भरतेन राज्ञा एवम् उक्तश्कारेण उक्ताः आदिष्टाः सन्तः इष्टतुष्टचित्तानन्दिताः सुमनसः परमसौमनस्थिताः हर्षवशविसर्पद हृदयाः एवं स्वामिन् ! यथैव यूयमादिशत आज्ञायाः स्वामिनामनुसारेण कूर्म इत्येवं रूपेण विनयेन वचनं प्रतिशण्वन्ति अङ्गीकुर्वन्ति, पडिमुणित्ता' प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य 'विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमं दिसीभागं अवक्कमंति' ते देवाः विनीताया राजधान्याः उत्तरपौरस्त्यं दिग्भागम् ईशानकोणम् अपकामन्ति गच्छन्ति 'अवक्कमित्ता' अपक्रम्य गत्वा 'वेउव्वियसमुग्धाएणं समोहणंति' वैक्रियसमुदघातेन ईशानकोण वैक्रियकरणार्थक प्रयत्नविशेषेण समबध्नन्ति आत्मप्रदेशान दुरतो विक्षिपन्ति तत् स्वरूपमेव व्यक्ति 'समोहणित्ता संखिज्जाई' इत्यादि 'समोहणि. त्ता' समवहत्य आत्मप्रदेशान् दृरतो विक्षिप्य 'संखिज्जाइ जोयणाई दंडं णिसिरंति' संख्येयानि योजनानि दण्डं दण्ड इव दण्डः ऊर्ध्वाध आयतः शरीरबाहल्यो जीवप्रदेमाणत्तियं पच्चप्पिणह) और निर्मित करके मेरी इस आज्ञा को पीछे मुझे वापिस करो अर्थात् मंडपनिर्मित हो जाने की खबर मेजो। (तएणं ते आभिमोगा देवा भरहेणं रण्णा एवं वुत्ता समाणा हट्ट तुद्वा जाव एवं सामित्ति माणाए विणएणं वयणं पडिसुणेति) इस प्रकार से भरतमहाराजा द्वारा कहे गये वे आभियोगिक देव हृष्ट तुष्ट आदि विशेषणों से विशिष्ट हुए और कहने लगे-हे स्वामिन् ! जैसा आपने आदेश दिया है उसीके 'मनुसार हम सब कार्य करेगें इस प्रकार कहकर उन्होंने विनयपूर्वक भरत महाराजा कोआज्ञा को स्वीकार कर लिया (पडिसुणित्ता विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमं दिसीभागं अवक्कमंति) भरत महाराजा की प्राज्ञा को स्वीकार करके वे विनीता राजधानी के ईशान कोने में चले गये (अवक्कमित्ता वेउव्वियसमुग्धाएणं समोहणंति) वहां जाकरके उन्होंने वैक्रियसमुद्धातद्वारा अपने आत्मप्रदेशों को बाहर निकाला-(समोहणित्ता संविमाणत्तिय पच्चप्पिणह) मने निमित शन पछी माशापुरी यानी मन असर मापा. (तपणं ते अभिओगा देवा भरहेण रण्णा एवं वुत्ता समाणा हट्ठ-तुजाव एवं सामित्ति आणाप विणपणं वयणं पडिसुणेति) मा प्रमाण भरत महा। 3 मास यात આમિગિક દેવે હષ્ટ તુષ્ટ વિગેરે વિશેષણેથી વિશિષ્ટ થયા અને કહેવા લાગ્યા છે સ્વામિન જે પ્રમાણે આપશ્રીએ અમને આજ્ઞા કરી છે તે મુજબ અમે તમામ કાર્ય સંપૂર્ણ કરીશ मा प्रभारी होने तभो सविनय श्रीमतरानी माज्ञाने शिरोधाय 37. (पडिसुणित्ता विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमं दिसीभागं अवक्कमंति) भरत शनी माशा शिशपाय ४शन तमामधा विनीता यानी शान मां सता रहा (अवक्कमित्ता वेउवियसरमुधारणं समोहणंति) त्यांईन म य समुद्धाता पालाना मात्म Page #934 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९२० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे शस्तं निसृजन्ति-शरीराद्वहि निष्काशयन्ति निमृज्य च तथाविधान पुदगलान् आददते इति एतदेव दर्शयति 'तं जहा रयणाणं' इत्यादि 'तं जहा रयणाणं जाक रिट्ठाणं अहा बायरे पुग्गले परिसाडेंति' तद्यथा रत्नानां कर्केतनादोनां यावद् रिष्टानां रत्नविशेषाणां सम्बन्धिनो यथाबादरान् असारान् पुग्दलान् परिशातयन्ति त्यजन्ति अत्र यावत्पदात् 'वइराणं वेरुलियाणं लोहि अक्खाणं मसारगल्लाणं हंसगब्भाणं पुलयाणं सोगंधिआणं जोईरसाण अंजणाणं अंजणपुलयाण जायसवाणं अंकाणं फलिहाणं'इति सङ्ग्रहः वज्राणां हीरकाणां वैाणां लोहिताक्षाणां मसारगल्लानां हंसगर्भाणां पुलकानां सौगन्धिकानां ज्योतिरसानाम् अजनानाम् अञ्जनपुलकानाम् जातरूपाणाम् सुवर्णरूपाणाम् अङ्कानाम् स्फटिकानाम् एतेषां तत्तद् रत्नविशेषाणां सङ्ग्रहः परिसाडित्ता'परिशात्य असारान् पुग्दलान् परित्यज्य 'अहासुहुमे पुग्गले परिआदिअंति' यथा सूक्ष्मान् सारान् पुद्गलान् पर्याददते गृह्णन्ति परिआदिइत्ता'पर्यादाय-सूक्ष्मान् पुग्दलान् गृहीत्वा दुच्चपि वेउब्धियसमुग्धाएणं जाव समोहणंति' 'चिकीर्षिताभिषेक मण्डपनिर्माणार्थम् द्वितीयमपि वारं वैक्रियसमुद्घातेन यावत् समवघ्नन्ति आत्मप्रदेशान् दूरतो विक्षिपन्ति 'समोहणित्ता' समवहत्य विक्षिप्य 'बहुसमरमणिज्ज भूमिभागं विउव्वंति' बहुसमरमणीयं भूमिभाग विकुर्वन्ति 'से जहानामए आलिंगपुक्ख. ज्जाइं जोयणाई दंडं णिसिरंति,) उन्हें बाहर निकाल कर संख्यातयोजनों तक उन्हें दण्डके आकार में परिणमाया (तं जहा-रयणाणं जावरिट्ठाणं अहाबायरे पुग्गले परिसाडेंति) और इनके द्वारा उन्होंने रत्नों के यावत् रिष्टो के रत्न विशेषों के सम्बन्धो जो असार बादर पुद्ग्ल थे उन्हें छोड़ दिया-यहां यावत्पद से "वइराणं, वेरुलियाणं, लोहि अक्खाणं, मसारगल्लाणं, हंसगम्भाणं, पुलयाणं, सोगंधियाणं, जोईरसाणं, अंजणाणं, अंजणपुलयाणं, जायरूवाणं, अंकाणं, फलिहाणं" इस पाठका संग्रह हुआ है.(पडिसाडित्ता अहासुहुमे पुग्गले परिआदिअंति) उन्हें छोड़कर उन्होंने यथासूक्ष्मसार पुद्गले को ग्रहण कर लिया. (परिसाडित्ता दुच्चंपि वेउब्वियसमुग्घा एणं जाव समोहर्णति) सारपुद्गलों को ग्रहण करके उन्होंने चिकोर्षित मंडप के निर्माण के निमित्त द्वितीय वार भी वैक्रियसमुद्धात किया. (समोहणित्ता बहुसमरमणिज्ज भूमिभाग विउव्वंति,) द्वितीयवार प्रशोने पर दया (समोइणित्ता खिज्जाई जोयणाई दंड णिसिरंति) प्रशाने महार दीन भने सध्यातरीन सुधारमा परित ४ा (तं जहा रयणाणं जाव रिट्टाणं अहा बायरे पुग्गले परिसाउंति) मन तमना पडे तभणे २त्नी यावत् (२०टो-२त्नविशेषाथी सम्म २ असार मा६२ युगात तेमन छ।उया माडी यावत् ५४थी 'वहराणं, वेरुलि याणं, लोहिअक्खाणं, मसारगल्लाणं हंसगम्भाणं जोइरसाण अंजणाण, अंजणपुलयाणं, जायरूवाणं, अंकाणं, फलिहाणं" मे पान। सड थयो छे. (पडिसाडित्ता अहासुहुमे पुग्गले परिआअंति) तेमन छहीन भए यथा सूक्ष्मसार हगवान अ५ री बाधा (परिआदित्ता दुच्चपि वेउब्वियसमुग्धाए ण जाव समोहण ति) सार हगवान अ५ रीन तेभर मिश्रीत मननिर्माण मोट भी त५९ यि समुद्धात श्या. (समोहणित्ता बहुलमरमणिज्ज भूमिभाग विउव्वंति) भील १मत समुद्धात ४रीन तमले सन् Page #935 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका १.३ वक्षस्कारः सू० ३० भरतराक्षः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् ९२१ रेइवा' तद्यथानाम :: आलिङ्ग्यपुष्कर इति वा, आलिङ्गितुं योग्यः कमलबीजकोशः कमलमध्यभाग इत्यर्थः ननु रत्नादीनां पुद्गला औदारिकास्ते वैक्रियसमुद्धाते कथं ग्रहणयोग्याः ? इति चेत् उच्यते औदारिका अपि ते पुद्गला गृहीताः सन्तो वैक्रियतया परिणमन्ते, पुग्दलानां तत्तत्सामग्रीवशात् तथा तथापरिणमनात् अतो न कश्चिद्दोषलेशोऽपीति, पूर्ववैक्रियसमुद्धातस्य जीवप्रयत्नरूपत्वेन क्रम क्रम मन्दमन्दतरभा वापन्नत्वेन क्षोणशक्तिकत्वात् इष्टकार्यसिद्धेः। अथ समभूमिभागे आभियोग्यास्ते देवाः यत्कृतवन्तः तदाह-'तस्सण बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झ देसभाए एत्थ णं महं एगं अभिसेयमण्डवं विउव्वति' तस्य खलु बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु महान्तम् एकमभिषेकमण्डपं विकुर्वन्ति निर्मान्ति मण्डपस्य विशेषमाह 'अणेगखंभसयसण्णिविटं जाव गंधटिभूयं पेच्छाघरमंडववण्णगोत्ति' अनेकममुद्धात करके उन्होंने बहुमगरमणीय भूमिभाग की विकुर्वणा की-- (से जहानामए आलिंगपुक्खरे हवा) वह बहुसमरमणीय भूमिभाग आलिङ्ग पुष्कर के जैसा प्रतीत होता था-कमलबीज का नाम मलिङ्गपुष्कर है. शंका-रत्नादिकां के पुद्गल औदारिक होते हैं वे वैक्रियसमुद्धात द्वारा ग्रहण योग्य कैसे हो सकते हैं. ! तो इप आशंका का उत्तर ऐसा है कि औदारिक भी वे पुद्गल गृहोत होते हुए वैक्रियरूप से परिणम जाते हैं, क्योंकि तत्तत्सामग्री के वश से पुद्गलों का उस उस स्वभावरूप से परिणमन हो जाता है. इसलिए यहां कोई भी दोष संभवित नहीं होता है. पूर्व वैक्रियसमुद्धात जीवका एक प्रकार का प्रयत्न विशेषरूप था. इसलिए उसमें क्रम क्रम से मन्द मन्दतर रूपता आने के कारण वह क्षीण शक्तिवाला हो जाता है. इसलिये इससे इष्ट कार्य सिद्ध नहीं होता है. (तस्म णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमग्झदेसभाए एत्थ णं एगं महं अभिसेयमंडवं विउव्वति) उस बहुसमरमणीय भूमिभाग के ठीक मध्यभाग में एक विशाल अभिषेक मंडप की उन्होंने विकुर्वणा को- वैक्रियशक्ति द्वारा एक विशाल अभिषेक मंडप बनाया भरमणीय भनागनी (पाशी. (से जहानामए आलिंगपुक्खरेइ वा) ते पहुसम. ૨મણીય ભૂમિભાગ આલિંગ પુર જેવા પ્રતીત થતા હતા. કમલ બીજ નું નામ અલિંગ પુષ્કર છે. શંકા–રનાદિકના પ્રદૂગલે ઔદારિક હોય છે. તે વૈક્રિય સમુઘાત દ્વારા ટા કવીરીતે થઈ શકે છે. તે આ આશંકાને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે તે પુદ્ગલે ઔદારિક છે છતાંએ ગૃહીત થઈ ને વિક્રિયરૂપમાં પરિગત થઈ જાય છે. કેમકે તત્ તત્ સામગ્રીના વશથી પુગલનું તત્ તત્ સ્વભાવ રૂપથી પરિણમન થઈ જાય છે એટલામાટે અહી કેઈપણ જાતના દેશની સંભાવના ઉત્પન થતી નથી. પૂર્વ ક્રિય સમુઘાત જીવનું એક પ્રકારનું પ્રયન વિશેષ રૂ૫હતું. એથી તેમાં ક્રમશઃ મન્દમદતર રૂપતા આવવા થી તે ક્ષીણુ શક્તિયુંકત થઈ जय छे. अथा सनाथी सिद्ध यतु नथी. (तस्स णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए पन्थ ण पगं महं अभिसेयमंडवं विउठवंति) ते मसभरमणीय ભૂમિભાગના ઠીક મધ્યભાગમાં એક વિશાળ અભિષેક મંડપની તેમણે વિદુર્વણ કરી. એટલે કે वैश्य शशि भर से विशाण अभिषे भ७५नु निर्भाष्य ज्यु (अणेगखंभलयसण्णि Page #936 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९२२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे स्तम्भशतसन्निविष्टम् अनेकानि स्तम्भशतानि अनेकशतानि स्तम्भाः सन्ति यत्र स तथाभूतस्तम्, यावद् गन्धवतिभूतम् गन्धर्वत्तियुक्तम् अत्र यावत्पदात् राजप्रश्नीयोपाङ्गगत सूर्याभदेवयानविमानवर्णको ग्राहयः स च कियत्पर्यन्तमित्याह-यावदगन्धवतिभूतमिति विशेषणम् अतएव सूत्रकार एव साक्षादाह-'पेच्छाघरमंडववण्णगोत्ति 'प्रक्षागृहमण्डपवर्णको ग्राह्य इति तस्स णं अभिसेयमंडवस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थणं महं एगं अभिसेयपेढं विउव्वंति अच्छं सण्हं' तस्य खलु अभिषेकमण्डपस्य बहुमध्यदेशभागे अत्र खलु महान्तम् एकमभिषेकपीठं विकुर्वन्ति अच्छम् अस्तरजस्कत्वात् श्लक्ष्णं निर्मलमित्यर्थः सूक्ष्मपुग्दलनिर्मितत्वात् 'तस्स णं अभिसेयपेढस्स तिदिसिं तो तिसोवाणपडिरूवए विउच्चंति' तस्य खलु अभिषेकपीठस्य त्रिदिशि त्रीन् त्रिसोपानप्रतिरूपकान विकुर्वन्ति 'तेसिंगं तिसोवाणपडिरूवगाणं अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते जाव तोरणा' तेषां खलु त्रिसोपानप्रतिरूपकाणाम् अयमेतद्रूपः वापी त्रिसोपानप्रतिवर्णनादि प्रतिपादयन्नाह-'तस्स गं'इत्यादि 'तस्स णं अभिसेयपेढस्स बहुसमरमणिज्जे भूमिभाए पण्णत्ते' तस्य खलु अभिषेकपीठस्य बहुसमरमणियो भूमिभागः प्रज्ञप्तः 'तस्स गं (अणेगखंभसयसण्णिविटुं नाव गंधवट्टिभूयं पेच्छाघरमंडववण्णगोत्ति)यह मंडप से कड़ों खंभों से युक्त था. यावत् सुगन्धित धूपबत्तियों से यह महक रहा था. यावत् पद से यहां गजप्रश्नीय उपाङ्ग में वर्णित सूर्याभदेवकी विमान वक्तव्यता यावत् गंधवर्ती भूत इस विशेषण तक गृहीत हुई है. इसी बात को सूत्रकार ने "प्रेक्षागृहमंडपवर्णक" इस पद द्वारा माक्षात् कहा है. (तस्स णं अभिसेय. मंडवस्म बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महं एगं अभिसेयपेट विउव्वति) उस अभिषेक मंडप के ठोक मध्यभाग में एक विशाल अभिषेक पीठ नो (अच्छं मण्ह) अच्छा धूलि विहीन था और सूक्ष्म पुद्गलों से निर्पित होने के कारण लक्ष्ण था. (तस्मणं अभिसेयपेढस्स तिदिसिं तओ तिसोवाणपरिरूवए विउवंति) उस अभिषेक पीठ की तीन दिशाओं में उन्होंने तीन त्रिसोपान प्रतिरूपक विकुवितकिये (तसि णं तिसोवाणपडिरूवगाणं अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते जाव तोरणा) उन त्रिसोपान प्रतिरूपकों का इस प्रकार से वर्णन तोरणों तक लिया गया है. "तस्स णं बहुसमरमणिज्ज. विट्ट जाव गंधवट्टिभूय पेच्छाघरमंडव वण्णगोत्ति) से भ७५ 8२। थानासोथी यात હતો. યાવતું સુગંધિત ધૂપવર્તિકાઓથી એ મહેકી રહ્યો હતો. યાવત પદથી અહીં રાજપ્રશ્રીય ઉપાંગમાં વણિત સૂર્યાભદેવની વિમાન વકતવ્યતા યાવત્ ગંધવતિભૂત એ વિશેષણ सुधा गृहीत छ. से वातन सूत्र॥२- "प्रेक्षागृहमंडपवर्णक" से ५४५ साक्षात ३५. म.४री छे. (तस्त णं अभिसेयमंडवस्स बहुमज्झदेसभाए पत्थणं महं एगं अभिसेयपेढं विउव्वति) ते मामले मना ४६म मध्यभागमा से विशाल मनिष पानी भर वि । 31. ये राभिषे पी8 (अच्छं सण्ड) ०७-धूलि विडीन तुमने सूक्ष्म पु। साथी मितवा . स तु . (तस्स णं अभिसेयपेढस्स तओ तिसोवाणपरिरूवप विउठ्वं त) मसिषे, पीउनी यहिशायमा तभत्र विसापान प्रति३५। विवित .. (तेसिणं तिलोवाणपडिरूवगाण अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते जाव तोरणा) त्रिसे। Page #937 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू. ३० भरतराशराज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् ९२३ बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमझदेसमाए एत्थ णं महं एगं सीहासणं विउव्वंति' तस्य खलु बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेश भागे अत्र खलु महत् एकं सिंहासनं विकुर्वन्ति 'तस्स णं सीहाणस्स अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते जाव दामवण्णगं समति' तस्य खलु सिंहासनस्य अयमेतद्पो वर्णव्यासः प्रज्ञप्तः कथितः सच विजयदेवसिंहासनस्यैव ज्ञातव्यः यावदामवर्णकम् यावद्दाम्नां वर्णको यत्र तत्तथाभूतम् समस्तम् सम्पूर्ण सूत्रं वाच्यमिति शेषः। 'तएणं ते देवा अभिसेयमंडबं विउव्वंति' ततः खलु ते देवाः उक्तविशेषणविशिष्टम् अभिषेकमण्डपं विकुर्वन्ति 'विउव्बित्ता' विकुष्य निर्माय 'जेणेव भरहे राया जाव पच्चप्पिणति' यत्रैव भरतो राजा यावत्प्रयर्पयन्ति-यावत्पदात् यत्रैव भरतो राजा तत्रैव ते देवा उपागच्छन्ति उपागत्य उक्ताम् आज्ञप्तिकां भरताय राज्ञे समर्पयन्तीत्यर्थः। 'तए णं से भरहे राया आभिओगाणं देवाणं अंतिए एयमहूँ सोच्चा णिसम्म हट्ठतु? जाव पोसहसाळाओ पडिणिकम्खमइ' ततःस्खलु स भरतो महाराजा आभियोंग्यानामाज्ञाकारिणां देवानाम् अन्ति के एतम् उक्तप्रकारकम् अर्थ विषयं श्रुत्वा निशम्य सम्यक्प्रकारेण स्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थणं एगं महं सीहासणं विउव्वंति, तस्स णं सीहासणस्स अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते जाव दामवण्णगं सम्मत्तंति" विजयदेव के सिंहासन का जसा वर्णन किया गया है वर्णन वही सब दामवर्णन तक का यहां पर भी ग्रहण करलेना चाहिये "तएणं ते देवा अभिसेयमडव विउध्वति" इस तरह का जब अभिषेक मडप विकुर्वित हो चुकातब (विउवित्तिा जेणेव भरहे राया जाव पच्चविणंति") उन देवों ने मडा की पूर्णरूप से. विकुर्वणा हो जाने की खवर महाराजा भरत के पास मेज दी. यहां यावत्पद से "तेणेव ते देवा उवागच्छंति. उवागच्छित्ता आणत्तियं" इस पाठ का ग्रहण हुआ है । (तए ण से भरहे राया आभिमोगाणं देवाण अतिए एयमटुं सोचा णिसम्म हद्वतुद्ध जाव पोसहसालाओ पडिणिक्खमह ) श्री भरत महाराजा ने माभियोग्य देवों से जब यह सब समाचारज्ञात किये तो वह छखंडोंके अधिपति श्री भरत महागना बहुत ही हर्षित एवं पान प्रति३५छानु मा प्रमाणे वन तारणो सुधा ४२वामां आवे छे. “तस्स ण बहुसम रमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थण एगं महसोहासण विउव्वंति तस्सण सीहासणस्स अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते जाव दामवण्णगं सम्मत्तंति" (arयवना सिહાસનનું જે પ્રમાણે વર્ણન કરવામાં આવેલું છે તેમજ “દામ સુવીનું વર્ણન અહીં પણ श्र९४२ से. "तएणं ते देवा अभिसेयम डवं विउव्वंति'' 41 प्रमाणे यारे मेंभिषे भ७५ विधुतिय यूये। त्यारे (विउवित्ता जेणे व भरहे गया जाव पच्चप्पिત્તિ) તે મંડપોની પૂર્ણરૂપથી તૈયાર થઈ જવાની સૂચના તે દેવોએ રાજા પાસે પહોંચાડી मही यापत ५४थी "तेणेव ते देवा उवागच्छति उवागच्छिता" से ५४४ थयो छे. (तपणं से भरहे राया आभिओगाणं देवाण अंतिए एयम सोच्चा णिसम्म हट्ठ तुद्र जाव पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ) श्री भरत माय रे भाभियोग । पाथी Page #938 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९२४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ज्ञात्वा हृदि अवधार्य हृष्टतुष्ट यावत् पौषधशालातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति अत्र यावत्पदा हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमनस्थितः हर्षवशसिर्पद हृदय इति ग्राह्यम् 'पडिमिक्लमित्ता' पौषधशालातः प्रतिनिष्कम्य बहि निर्गत्य 'कोडुंबियपुरिसे सदावेइ सदायित्ता एवं क्यासी' कोटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति आह्वयति शब्दयित्वा आहूय एवं वक्ष्यमाण प्रकारेण अवादीत् उक्तवान् 'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! आभिसेक्कं हस्थिरयणं पडिकप्पेह' क्षिप्रमेव शीघ्रातिशीघ्रमेव भो देवानुप्रियाः! आभिषेक्यम् अभिषेकयोग्य हस्तिरत्नं प्रधानपट्टहस्तिनमित्यर्थः प्रतिकल्प्य सज्जीकृत्य, 'हयगय जाव सण्णाहेह' हयः गज यावत् सन्नाहयत मत्र यावत्पदात् हयगजरथप्रवरयोधकलितां चातुर्राङ्गणी चत्वारिहयादीनि अङ्गानि यस्याः सा तथाभूता.तां सेनां सन्नाहयत. सज्जीकुरुत 'सण्णाहेत्ता' सन्नाहयित्वा सज्जीकृत्य 'एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह जाव पच्चप्पिणंति' एताम् उक्तप्रकाराम् आज्ञप्तिकां प्रत्यर्पयत समर्पयत यावत्प्रत्यर्पयन्ति । कार्य सम्पाद्यकथयन्तीत्यर्थः अत्र यावत्पदात् ते देवानुप्रियाः राज्ञ आज्ञानुसारेण हयादि सज्जीकरणसंतुष्ट चित्त हुआ और पौषधशाला से बाहर आया यहां यावत्पद "हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः प्रीतिमनाः परमसौमनस्यितः हर्षवशविसर्पद हृदयः” यह पूरा पाठ यहां पर लिया गया है। (पडिणिक्खमित्ता कोडुंबियपुरिसे सदावेइ ) पौषधशाला से बाहर आकर उसने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया (सदावित्ता एवं वयासी) बुलाकर उनसे भरत महाराजा ने ऐसा कहा(खिप्पामेव भो देवणुप्पियाआभिसेक्कं हत्थिरयणं पडि कप्पेह) हे देवानुप्रियो तुम लोग जितनी जल्दी हो सके उतनोजल्दो अपने आभिषेक्य हस्तिर को सज्जित करो (पडि फप्पित्ता हय गय जाव सण्याहेह) सज्जितकरके हयगज एवं प्रवर योधाओं से कलित चतुरंगिणी सेना को भी सज्जित करो (सण्णाहेत्ता एयमाणत्तिय पच्चप्पिणह) सज्जित करके फिर मुझे खवर दो यहां यावत्पद से-ऐसाप्रकरण समझ लेना चाहिये-कि उन कौटुम्बिक पुरुषों ने महाराजा भरत के कहे अनुसार आभिषेक्य हस्तिरत्न को एवं चतुरंगिणी सेना को सज्जित कर दिया और એ સમાચાર સાંભળ્યા છે તે અતીવ હર્ષિત તેમજ સંતુષ્ટ ચિત્તવાળે થયે. અને પૌષધशाम थी महा२ माव्या मही यावत् ५६ थी "हृष्टतुष्टमित्तानन्दितः प्रीतिममाः परमसौमनस्यितः हर्षवशविलपद् हृदयः” थे रे। 48 सहीत थथे। छे. (पडिणिक्खमित्ता कोडंबियपुरिसे सहावेइ) पोषणामांथा मा२ मावाने तेथे जौटुमि पुरुषोन मोला या. (सहावित्ता एवं वयासी) मावावीन ते पुरुषोन तेथे ा प्रमाणे ४यु-(खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! आभिसेक्क हत्थिरयण पडिकप्पेह) हेवानुप्रियो । तमे शातिशा मा. निय स्तरन ने सुसभित ४२१. (पडिकपिपत्ता हय गय जाव सण्णाहेइ) Arord કરીને હય-ગજ તેમજ પ્રવર દ્ધાએથી કલિત ચતુરગિણી સેનાને પણ સજિજત કરો (साणाहेत्ता एयमाणत्तिय पच्चप्पिणह) सland शने पछी भने ५१२ सा. सही યાવત્ પદથી આજાતનું પ્રકરણ સમજી લેવું જોઈએ કે તે કૌટુબિંક પુરુષોએ રાજા ભર(ાના આદેશ મુજબ આભિષેકય હસ્તિરત્ન તેમજ ચતુરંગિણી સેનાને સુસજિજત કરી Page #939 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कार: सू० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयक निरूपणम ९२५ रूपं कार्य सम्पादितं कृत्वा उक्ताम् आज्ञप्तिकां राज्ञे समर्पयन्तीत्यर्थः 'तए णं से भरहे राया मज्जधर अणुपविसइ जाव अंनणगिरिकूडसण्णिभं गयवई णरवइ दुरूटे'- ततः खल स भरतो राजा मज्जनगृहं स्नानगृहम् अनुप्रविशति यावत् अत्र यावत्पदात् अनुप्रविश्य स्नानविधिः ततो मज्जनगृहात् निर्गत्य इति ग्राह्यम् ' अन्जन गिरिकूटमन्निभम् अजनपर्वतशृङ्गसदृशम् सादृश्यञ्च उच्चत्वेन कृष्णत्वेन च बोध्यम् गजपति प्रधानपट्टहस्तिनं नरपतिः दूरूढः आरूढः 'तएणं तस्स भरदस्स रण्णो आभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरूटस्स समाणस्स इमे अट्टमंगलगा जो चेव गमो विणीय पविसमाणस्स सोचेष खिममाणस्स वि जाव अपडिबुज्झमाणे विणीयं रायहाणीं मज्झ मज्झेणं णिग्गच्छन्' ततः खलु तदनन्तरं किल तस्य भरतस्य गज्ञः आभिषेक्यम् पट्टहस्तिरत्नं दुरूढस्य आरू ढस्य सतः इमानि अष्टावष्टौ मङ्गलकानि पुरतः अग्रे सम्प्रस्थितानीति शेषः, य एव गमो विनीतां तन्नाम्नीं राजधानीं प्रविशतः स एव गमः निष्क्रामतोऽपि निर्गच्छ" सज्जित कर देने की स्वबरभरत नरेश के पास भेज दी ( तरणं से भरहे राया मज्जणघरं अणुपविसइ) स्वत्रर पाते ही वहभरत नरेश स्नान गृहमें गये (जाव अंजणगिरिकूड संणिभं गवई णरवइ दुखढे) यावत्-वहां जाकर उसने स्नान किया फिर वह मज्जनगृह से बाहर आबा बाहर आकर वह नरपति भरत महाराजा अंजनगिरि के सदृशगजपति पर आरूढ होगये (तर णं तस्स भरहरु रण्णो अभिसेक्कं हत्थिरयणं दूरुदस्स समाणस्स इमे मट्टमंगलगा जो चेन गमो विणीयं पविसमाणस्स सोचैव णिक्स्वममाणस्स वि जाव अपडिबुज्झमाणे विणीयं रायहाणियं म मज्झेणं णिग्गच्छइ) जब भरत महाराजा आभिषेक्यहस्तिरत्न पर आरूढ हो रहे थे उस समय उनके आगे सबसे पहले आठ आठ की संख्या में आठ महा मंगल द्रव्यप्रस्थित हुए इस तरह ' जैसा पाठ विनीता राजधानी से भरतके निकलने के प्रकरण में और फिर विनीता राजधानी में विजय करके वापिस पाने के प्रकरण में प्रतिपादित किया जाचुका है वही सब पाठ यहां "बजते हुए बाजों की मञ्जुध्वनि से जिनका चित्त अन्यत्र नहीं लगा है उन्हीं के शब्दों के भने तिने पछी रान्त पासे मे अगेनी सूचना मोठसावी हीधी. (तपणं से भरहे राया मज्जणघर अणुपर्विस) सूयना भगतांन ते भरत नरेश स्नान घर तरह गया. (जाव अंजणगिरिकूडसण्णिभं गइवह णरवई दुरूढे) यावत त्यां ने स्वान यु में પછી તે મજ્જન ગૃહમાં થી બહાર આવ્યા. બહાર આવીને તે નરપતિ અંજનગિરિ સદૃશ गभ्यति उपर भा३८ थ गया. (तपणं तस्स भरहस्त रण्णो आभिसेवकं हस्थिरयण दुरूढस्स- समाणस्स इमे अट्ठट्ठ मंगलगा जो वेव गमो विणीयं पविसमाणस्स सो वेव णिकममाणस्स वि जाव अपडिबुज्झमाणे विणीयं रायहाणीयं मज्झ मज्झेण णिग्गच्छ જ્યારે શ્રી ભરતરાજા આભિષેકય હસ્તિરત્ન ઉપર આરૂઢ થઈ રહ્યા હતા, તે સમએ તેમની આગળ સર્વ પ્રથમ આઠે આઠની સખ્યામાં આઠ માઁગલ દ્રવ્યેા પ્રસ્થિત થયા આરીતે જેવા પાઠ વિનીતા રાજધાની થી ભરત મહારાજાનીકળ્યા તે પ્રકરણમાં આવેલ છે, તેમજ જેવા પાઢ વિનીતા રાજધાની માં વિજય સપાહિતકરીને પછી પુનઃ પ્રવિષ્ટ થયા તે પ્રકરણમાં આવેલ Page #940 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्वृद्धीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तोऽपि तस्य भरतस्य कियदन्तमित्याह यावदप्रतिबुध्यन अप्रतिबुध्यन् विनीता राजधानी मध्यं मध्येन मध्यभागेन निर्गच्छति निष्क्राति 'णिग्गच्छित्ता' निर्गत्य निष्काम्य 'जेणेव विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए अभिसेयमंडवे तेणेव उवागच्छइ' स भरतः यत्रैव विनीताया राजधान्याः उत्तरपौरस्त्ये दिग्भागे ईशानकोणे अभिषेकमण्डपः तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'अभिसेयमंडवदुवारे आभिसेक्कं हत्थिरयणं ठावेइ' अभिषेकमण्डपबहिरि आभिषेक्यं पट्टहस्तिरत्नं स्थापयति 'ठाविता' स्थापयित्वा 'आभिसेक्काओ हस्थिरयणाओ पच्चोरुहइ' आभिषेक्यात् अभिषेकपट्टहस्तिरत्नात् प्रत्यवरोहति अवतरति 'पच्चोरुहित्ता' प्रत्यवरुहय अवतीर्य 'इत्थीरयणेणं बत्तीसाए उडुकल्लाणिया सहस्सेहिं बत्तीसाए जणवयकल्लाणिया सहस्सेहि बत्तोसाए बत्तोसइबद्धेहिं णाडगसहस्सेहिं सद्धिं संपरिवुडे अभिसेयमंड श्रवण में आसक्त है" इस कथिन पाठ तक यहां पर भी ग्रहण करलेना चाहिये इस तरह की स्थिति में होते हुए वे भरत नरेश विनीता राजधानो के ठीक बोच के मार्ग से होकर निकले (जिग्गच्छित्ता जेणेव विणीयाए रायहाणोए उत्तरपुरस्थिमे देसीभाए अभिसे यमंडवे तेणेव उवागच्छद) बाहर निकल कर वे चक्रवर्ती श्री भरत महाराना जिस और बिनोता रानधानी का इशान कोण एवं जहां पर रमणीय अभिषेक मंडप था वहां पर आये (उवागच्छित्ता अभिसेयमंडवदुवारे आभिसेक्कं हत्थिरयण ठावेइ ) वहांआकर उन्होंने आभिषेक्य मंडप के द्वार पर अपने आमिषेक्य हस्तिरत्न को खड़ा करदिया (ठावित्ता आभिसेककाओ हत्थिरयणामो पच्चोरुहइ) खडा करके वे उस भाभिषेक्यहस्तिरत्न से नीचे उतरे ( पच्चोरुहित्ता इत्थीरयणेणं बत्तीसाए कल्लाणियासहस्सेहिं बत्तीसाए जणवयकल्लाणियासहस्सेहिं बतोसाए बत्तीसइबद्धेहिं णाडगसहस्सेहिं सद्धिं संपरिवुडे ) नीचे उतर कर स्त्रीरत्न सुभद्रा आदि बत्तीस हजार ऋतुकल्याणि का राजकन्याओं से ३२ हजार जनपद के मुखियाओं को कल्याणकारिणि कन्यकाओं से છે, તે પાઠ એટલે કે “વાગતા વાઘોને મંજુધ્વનિ થી જેનું ચિત્ત અન્યત્ર સંલગ્ન થયું નથી, તેવા વાઘોને સાંભળવામાં જ જે આસકત છે' એ કથિત પાઠ સુધી અત્રે પણ પાઠ સંગૃહીત થયું છે. આ પ્રમાણે ઠાઠ-માઠ થી ભારત નરેશ વિનીતા રાજધાની ના ઠીક મધ્યમાં આવેલા भाभा २ नीv41. (णिगच्छित्ता जेणेव विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमे दिसी भाए अभिसेयम डवे तेणेव उवागच्छइ) मा२ नीजीने तसा (वनीता यानी ना शान माय मामिष महतो, त्यो ५i-या. (उवागच्छित्ता अभिसेयमंडवदृवारे आभिसेवक हत्थिरयणं ठावेइ) त्यां पायीन तभ माभिषेश्य भन द्वारनी स. मामिषेय स्तिक ने अभुश यु. (ठावित्ता आभिसेक्काओ हस्थिरयणाओ पच्चोरुहइ) २.भान. ते शामिषेय स्तरत्न ७५२ थी नीये तर्या. (पच्चोरुहित्ता हत्थीरयणेण बत्तीसाए जगवयकल्लाणियासहस्सेहिं बत्तीसइबद्धेहिं णाडगसहस्सेहिं सद्धि सपरिवुड) नीये उतरीन खी २ल सुभद्रा, मने ३२२ ऋतु स्यापि २१४ न्यास। ૩૨ હજા૨ જનપદના મુખીઓની કલ્યાણકારિણી કન્યાઓ અને ૩૨–૩૨ પાત્રોથી બદ્ધ Page #941 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टाका तृ०३ वक्षस्कारःसू० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम ९२७ अणुपविसइ' ? ततः स भस्तो राजा स्त्रीरत्नेन सुभद्रया द्वात्रिंशता ऋतुकल्याणिका सहस्त्रैः ऋतुविपरीतस्पर्शत्वेन शीतकाले उष्णस्पर्शः ग्रीष्मकाले शीतस्पर्श इत्यादिरूपेण ऋतुषु सुखस्पर्शदायिकानां स्त्रीणां द्वात्रिंशता सहस्बैरित्यर्थः यद्वाऽमृतकन्यात्वेन सदा कल्याणकारिकाकन्यकासहस्त्ररित्यर्थः तथा द्वात्रिंशता जनपदकल्याणिकासहस्त्रैः जनपदाः पर्दैकदेशे पदसमुदायोपचारात् जनपदाग्रगण्यः याः कल्याणिकाः सदा कल्याणकारिण्यो राजकन्या इत्यर्थः तासां द्वात्रिंशतासहस्त्ररित्यर्थः तथा द्वात्रिंशता द्वात्रिंशद्व? नाटकमहस्त्रैः द्वात्रिंशद्वद्धैः द्वात्रिंशता पात्रः बद्धैः संयुक्तैः द्वात्रिंशता नाटकप्तहस्त्रैः साद्ध सम्परिव्रतः सम्परिवेष्टितः सन् स भरतः अभिषेकमण्डपम् अनुप्रविशति 'अणुपविसित्ता, अनुप्रविश्य 'जेणेव अभिसेयपेढे तेणेव उवागच्छई' यत्रैव अभिषेकपीठं तत्रैव उपागच्छति स भरतः 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'अभिसेयपेढं अणुप्पदाहिणी करेमाणे अणुप्पदाहिणी करेमाणे पुरथिमिल्लेणंतिसोवाणपडिरूवएणं और ३२-३२ पात्रों से बद्ध ३२ हजार नाटकों से सहित हुए वे ( अभिसेयमंडवं अणुपविसइ ) अभिषेक मंडप में प्रविष्ट हुए ( अणुपविसित्ता ) अभिषेक मंडप में प्रविष्ट होकर (जेणेव अभिसे यपीढे तेणेव उवागच्छइ)फिर वे जहां अभिषेक पीठ था वहां पर गये (उवागच्छित्ता अभिपेयपेढं अगुपदाहिणीकरेमाणे २ पुरथिमिल्लेणं तितोवाणपडिरूवएणं दुरूहइ) वहां जाकर के उन भरत राजा ने उस अभिषेकपीठ को तीन प्रदक्षिणाएं की फिर वे पूर्वभागावस्थित त्रिसोपान प्रतिरूपक से होकर उस पर चढ गये (दुरुहिता) वहां चढ़कर वे (जेणेव सीहासणे तेणेव स्वागछइ) जहांपर सिंहासन था वहां पर आये-(उवागच्छित्ता) वहां आकर (पुरस्थाभिमुहे सण्णिसण्णेत्ति) वे पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके उम पर अच्छी तरह से बैठ गये (तए णं तस्स भरहस्स रण्णो बत्तीसं रायमहस्सा जेणेव अभिसेयमंडवे तेणेव उवागच्छंति ) इसके बाद उस भरतराजा के ३२ हजार राजा जन जहां पर अभिषेक मण्डप था वहां पर आये ( उवागच्छित्ता अभिसेयमंडवं अणुपविसंति ) वहां आकर के वे अभिषेक मंडप में प्रविष्ट उ२ २ नाट? थी पश्विष्टित येतात भरतराज (अभिसेयमंडवं अणुपधि सइ) अनि भ७५मा प्रविष्ट थय। (अणुपविसित्ता) अभिषे भयमा प्रविष्ट थईन. (जेणेव अभिसेय पीढे तेणेव उपागच्छद) ५७ सय अभिषे४ पा8 खतु त्या पां241 (उवागच्छित्ता अभिसेयपे अनुप्पदाहिणी करेमाणे २ पुरथिमिल्लेणं तिसीवाणपडिरूवएणं दुरुहा ) ત્યાં તે જઈને શ્રી ભરત રાજાએ તે અભિક પીઠની ત્રણ પ્રદક્ષિણા કરી. પછી તેને પૂર્વ ભાગાવસ્થિત ત્રિપાન પ્રતિરૂપકો ઉપર આરૂઢ થઈ ને તે પીઠ ઉપર ચઢી ગયા. (दुरूहिता) त्यां यहीन तेस। (जेणेव सीहासणे तेणेव उघागच्छइ) न्यासिंहासन बत. या माव्या. ( उवागच्छित्ता) त्यां स.वीने (पुरस्थाभिमुहेसण्णिसण्णेत्ति) ता५५' हिशा त२३ भुम ४शन सन ७५२ सारी शत सी गया. (तपणं तस्स भरहस्स रण्णो बत्तीस राय सहस्सा जेणेव अभिसैयमंडवे तेणेव उवागच्छति) त्या२ मात ભરત મહા રાજાના ૩૨ હજાર રાજાઓ જયાં આભિક મંડપ હતા ત્યાં આવ્યા. (ા. गग्छिचा अभिसेयमंडव अणुपविसंति ) त्या भावीन तमा भमि भ७५ प्रdिe Page #942 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९२८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसने दूरूइइ' अभिषेकपीठम् अनुप्रदक्षिणी कुर्वन् अनुमदक्षिणी कुर्वन् पौरस्त्येन पूर्वभागाधस्थितेम त्रिसोपानप्रतिरूपकेण दुरोहति-आरोहति दुरूह्य आरूख 'जेणेव सीहासणे तेणेव उसगाई' यत्रैव सिंहासनं तत्रैव उपामच्छति स मरतः उवाच्छित्ता' उपागत्य 'पुरस्थाभिमुहे मणिमसण्णेत्ति' पौ.स्त्याभिमुखः पूर्वाभिमुखो भूत्वा सन्निषण्णः सम्यक्सया यौचित्येन उपविष्टः । 'तएणं तस्स भरहस्स रणो बत्तीसं रायसहस्सा जेणेव अभिसेयमंडावे तेणेव : उवागच्छति ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञो द्वात्रिंशद्राजसहस्राणि द्वात्रिंशत्सहखाणि राजानः यत्रैव अभिषेकमण्डपः तत्रैव उपागच्छन्ति, 'उवागच्छित्ता' मागत्य 'अभिसे यमंडवं अणुपविसति' ते गजानः, अभिषेकमण्डपम् अनुप्रविशन्ति 'अणुपविसित्ता' अनुप्रविश्य 'अभिसेयपेढं अणुप्पयाहिणी करेमाणे अणुप्पयाहिणी करेमाणे उत्तरिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं जेणेच भरहे राया तेणेव उवागच्छति' अभिषेकपीठम् अनुप्रदक्षिणी कुर्षन्तः अनुप्रदक्षिणी कुर्वन्तः औत्तराहेण त्रिसोपानप्रतिरूपकेण यत्रैव भरतो सना तत्रैव उपागच्छन्ति 'उचागच्छित्ता' उपामत्य 'करयल जाव अंजलिं कटु भरह रायाणं जएणं विजएणं वद्धाति' करतल परिगृहीतं दशनखं शिरसाव मस्तके अजलि कृत्वा भरतं राजानं जयेन विजयेन च जयविजयशब्दाभ्यां ते द्वात्रिंशत्सहस्राणि राजानो बर्द्धयन्ति 'वद्धावित्ता' वर्द्धयित्वा 'तस्स भरहस्स रण्णो णच्चासण्णे पाइदरे मुस्वसमाणा जाव पज्जुवासंति तस्य भरतस्य राज्ञेनात्या सन्ने नातिदूरे शुश्रूषमाणाः सेवमानाः सन्तो हुए (. अणुपविसित्ता अभिसेयपेढं अणुप्पयाहिणीकरेमाणा २ उत्तरिलेणं तिसोवाणपडिरूवएणं जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छति) प्रविष्ट होकर उन्होंने अभिषेक पीठ की तीन प्रदक्षि. णाएँ द) और फिर वे उत्तरदिगवर्ती त्रिसोपान से होकर उसपर चढ गये एवं जहां पर भरत महाराजा थे वहां परे भाये (उवागच्छित्ता) वहां पर आकरके उन्होने (करयल नाव अंजलिं कुटु भरहं रायाणं जएणं विजरणं वद्धाति) दोनों हाथों की अंजुलि बनाकर और उसे मस्तक पर धरकर भरत राजा को जय विजय शब्दो द्वारा वधाई दी (वद्धावित्ता तस्स भरहस्स रणौ णच्चामपणे पाइदूरे सुस्सूसमाणा जाव पज्जुवासंति) वधाई देकर फिर वे ३२ हजार राजा भरत महागना के पास यथोचित स्थान पर सेवा करतेहुए बैठ गये यहां पर यावत् शब्द से १६ हजार देवांका ग्रहण हुआ है क्योंकि ये देव भी चक्रवर्ती की थया. (अणुवि सत्ता अभिसेयपेढं अनुष्पयाहिणी करेमाणा २ उत्तल्लेिणं निलोकाणपडि. सपणे जेणेष भरहे राया तेणेव उवागच्छति) प्रविष्ट थईन तभोमसि पीना ત્રણ પ્રદક્ષિણ કરી અને ત્યારબાદ તેઓ ઉત્તરદિન ત્રિપાન ઉપર થઈને તેની ઉપર यही गया. अन ल्यind on उता त्यां गया. (उवागच्छित्ता) त्या भावाने तमधे (करयल जाख अंजलि कट्टुं भरहं रायाण जपणं विजएणं वद्धाति) बन्ने बानी बनाया, અને તેને મસ્તક ઉપર મૂકીને ભરત રાજાને જય-વિજય શબ્દો વડે વધામણી આપી. (बंद्धावित्ता तस्स भरहस्स रणो णच्चासण्णे णाइदूरे सुस्सूसमाशा जाव पज्जुबासंति) વધામણી આપીને પછી તે ૩૨ હજાર રાજા ભરત રાજાની પાસે યથેચિત સ્થાન ઉપર સેવા કરતા બેસી ગયો અહીં. યાવતૂપદ થી ૧૬ હજાર દેવેનું ગ્રહણ થયું છે કેમકે એ દે પણ ચટ્ટ Page #943 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः खू० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयक निरूपणम ९२९ यात्रत्पर्युपासते मत्र यावत्प्रदात् षोडशदेवसहस्राणि इतिप्रायम् एते देवा अपि पर्युपासते 'सरणं तस्स भरहस्स रण्णो सेणावइरपणे नाव सत्यवाप्यभिईओ तेऽवि तहचेव णकरं दाहिणिरलेणं. तिसोवामप्रडिरूपएवं जाव. पज्जुवासंति' ततः खलु तदनन्तरं किल तस्य भरतस्य राज्ञः सेनापतिरत्नं यावत् सार्थवाहप्रभृतयः तेऽपि तथैव पूर्ववदेव तथा द्वात्रिंशत्सहस्रसंख्यकाः राजानः प्रथमं यत्र अभिषेकपण्डवः तत्र उपागच्छन्ति तवोऽभि मण्डपमनुप्रविशन्ति तथा तेऽपीतिभावः नवरं पूर्वापेक्षयोऽयं विशेषः दाक्षिणास्येन द्वारेण त्रिसोपानप्रतिरूपकेण यावत् पर्युपासते अत्र यावत्पदात् दक्षिणद्वारेण मिसोपान प्रतिरूपकेण यत्र भरतो राजा तत्र उपागच्छन्ति ततोऽञ्जलिमुक्त विशेषणविशिष्टं कृत्वा जय विजयशब्दाभ्यां वर्द्धयन्ति, ततः तस्य राज्ञो नातिदूरे नाति समीपे शुश्रूषमाणाः सन्तः ते पर्युपासते इति क्रमो बोध्यः 'सेणावहरयणे जाव' अत्र यावत्पदात् सेना पतिरत्न, गाथापतिरत्न वर्द्धकिरत्न पुरोहितरत्नानि श्रोणि षष्ट्यधिकानि सुपकारशतानिमादशश्रेणिमश्रेणयः, अन्ये च बहवो राजेश्वर तलवर यावत् सार्थवाहप्रभृतयो ग्राह्याः ॥३०३० ॥ - सेवा करते हैं ( तरणं तस्स भरहरूस रण्णो सेणावइरयणे जाव सत्थवाहपभिईमो लेंडवि तह चैव जबरं दाहिणिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं जाव पज्जुबासंति) इसके बाद उस भरत महाराजा का सेनापतिरत्न मुषेण यावत् पार्थवाह आदि जन ये सब भी पूर्व की तरह ही अभिषेक मन्डप में आये यहां पर इन के आनेका और आकरके यथोचित स्थान पर बैठ जानेक का सब कथन जैसा ३२ हजार राजाओं के आने के और यथोचित स्थान पर बैठने तक के सम्बन्ध में किया गया है वैसा ही कर लेनाचाहिये परन्तु इस कथन में उस कथन की अपेक्षा यही विशेषता है कि ये सब सेनापति आदि जन दक्षिण दिग्वर्ती त्रिसोपान से होकर अभिषेक पीठ पर चढे सेनापतिरत्न के साथ जो बादलद आया है उससे गाथापतिरत्न वर्द्धकिरत्न, पुरोहितरत्न इन तीन रत्नो का, ३६० रसोईयों का भोजन पकाने वालोका श्रेणिप्रश्रेणिजनों का तथा अन्य और भी अनेक राजेश्वर तलवर आदिका ग्रहण हुआ है। सू० ३० ॥ वर्तीनी सेवामां रहे छे. (तपणं तस्स भरइस्स रण्णो सेणावरयणे जाव सत्थवाहस्य मिईओ dsfa asa - वरं दाहिमिल्लेण तिसोवाणपडिरूवेण जांव पज्नुवासति ) त्यार माहते श्रीभरत રાજાના સેનાપતિરત્ન સુષેણુ ચાવત સાથે વાતુ વગેરે લેાકા પણ પૂર્વવત્ અભિષેક મ’ડપમાં આવ્યા. અહીં એ સવે લેાકે આવ્યા અને આવીને યથાચિત સ્થાન ઉપર બેસી ગયા એ અંગે જે પ્રમાણે ૩૨ હજાર રાજાઓ અંગે જે પ્રમાણે કહેવામાં આવ્યું છે તેવુ જ થન સમજી લેવું જોઈએ. પણ આ કથન માં તે કથનની અપેક્ષાએ એજ વિશેષતા છે કે એ સવે સેના પ્રતિ વગેરે લેાક દક્ષિણ દિગ્ધ ત્રિસેપન ઉપર થઇને માણિષેય પીઠ ઉપર ચઢી ગયા. સેનાપિત રત્નની સાથે જે યાવત્ પદ આવેલ છે, તેનાથી ગાથાપિત રત્ન, વન્દ્વ'કિરન પુરાહિત રત્ન એ ત્રણ રત્ના નું. ૩૬૦ સૂપકારોનુ -ભાજન બનાવનારા રસેાઇઆઆનું, શ્રેણિ-પ્રશ્રેણિ જનાનું તેમજ અન્ય પણ અનેક રાજેશ્વર તલવર વગેરેનું ગ્રહણ થયું છે. સૂત્ર-૩ના १.१७ Page #944 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९३० ___जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे मूलम्-तएणं से भरहे राया आभिओगे देवे सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! ममं महत्थं महग्धं महरिहं महारायाऽभिसेयं उवट्ठवेह तएणं ते आभिओगिका देवा भरहेणं रण्णा एवं वुत्ता समाणा हट्ठतुट्ठ चित्ता जाव उत्तरपुरस्थिमं दिसीभागं अवक्कमंति अवक्कमित्ता वेउब्वियसमुग्घाएण समोहणंति. एवं जहा विजयस्स तहा इत्थंपि जाव पंडगवणे एगओ मिलायंति एगओ मिलाइत्ता जेणेव दाहिणद्धभरहे वासे जेणेव विणीया रायहाणी तेणेव उवागच्छंति उवाग च्छित्ता विणीयं रायहाणी अणुप्पयाहिणी करेमाणा २ जेणेव अभिसेयमंडवे जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता तं महग्धं महरिहं महारायाभिसेयं उवट्ठति, तएणं तं भरहं रायाणं बत्तीसं रायसहस्सा सोभणंसि तिहिकरणदिवसणक्खत्तमुहत्तंसि उत्तरपोट्टवयाविजयंसि तेहिं साभाविएहि य उत्तरवेउबिएहि य वरकमलपइट्ठाणेहिं सुरभिवरवारि पडिपुण्णेहिं जाव महया महया रायाभिसे एणं अभिसिंचंति अभिसेओ जहा विजयस्स अभिसिंचित्ता पत्तेअं २ जाव अंजलिं क१ ताहिं इटाहिं जहा पविसंतस्स भणिया जाव विहराहीत्तिकटु जयजयसदं पउंजंति। तए गं तं भरहं रायाणं सेणावइरयणे जाव पुरोहियरयणे तिण्णिय सट्ठा सृयसया अट्ठारस सेणिप्पसेणीओ अण्णेय बहवे जाव सत्थवाहप्पभिइओ एवं चेव अभिसिंचंति तेहिं वरकमलपइट्ठाणेहिं तहेव जाव अभिथुगंति य सोलसदेवसहस्सा एवं चेव णवरं पम्हसुकुमालए जाव मउडं पिणछेति,तयणंतरं च णं दद्रमलयसुगंधिएहिं गंधेहिं गायाहिं अब्भुक्खेंति दिव्वं च सुमणोदामं पिणछेति, कि बहुणा ! गंठिम वेढिम जाव विभूसियं करेंति, तएणं से भरहे राया महया महया रायाभिसेएणं अभिसिंचिए समाणे कोडंबियपुरिसे सद्दावेइ सदावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! हत्थिखंधवरगया विणीयाए रायहाणीए सिंघाडग चउक्क चच्चर जाव महापहपहेसु महया महया सद्देणं उग्घोसेमाणा उग्घोसेमाणा Page #945 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारः सू० ३१ भरतराशः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् ९३१ उस्सुक्कं उक्करं उक्किट्ठ अदिज्जं अमिजं अब्भडपवेसं अदंडकुदंडिमं जाव सपुरजणवयं दुवालससंवच्छरिअं पमोयं घोसेह ममेय माणत्तियं पच्चप्पिणहित्ति, तएणं ते कोडुबियपुरिसा भरहेण रण्णा एवंवुत्ता समाणा हट्ठतुट्ठचित्तमाणंदिया पीइमणा हरिसवसविसप्पमाणहियया विणएणं वयणं पडिसुणेति पडिसुणित्ता खिप्पामेव हत्थिबंधवरगया जाव घोसंति घोसित्ता एयमाणत्तियं पच्चप्पिणंति तएणं से भरहे राया महयामहया रायाभिसेएणं अभिसित्ते समाणे सीहासणाओ अब्भुट्टेइ अब्भुट्टित्ता इत्थीरयणेणं जाव णाडगसहस्से हिं सद्धि संपरिवुडे अभिसेयपेढाओ पुरथिमिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पच्चोरहइ, पच्चोरुहिता अभिसेयमंडवाओ पङिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव अभिसेक्के हत्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अंजणगिरिकूडसण्णिभं गयवइं जाव दूरूढे। तएणं तस्स भरहस्स रण्णो बत्तीसं रायसहस्सा अभिसेयपेढाओ उत्तरिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पच्चोरुहंति, तरणं तस्स भरहस्स रण्णो सेणावइरयणे जाव ‘सत्थवाहप्पभिईओ अभिसेयपेढाओ दाहिणील्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पच्चोरुहंति, तएणं तस्स भरहस्स आभिसेक्कं हत्थिरयणं दूरूढस्स समाणस्स इट्टे अट्ठमंगलगा पुरओ जाव संपत्थिया जोऽवि य अइगच्छमाणस्स गमो पढमो कुबेरावसाणो सोचेव इहंपि कमो सकारजढो णेयव्यो जाव कुबेगेव देवराया केलाससिहरिसिंगभूयंति। तए णं से भरहे राया मज्जणघरं अणुपविसइ अणुपविसित्ता जाव भोयणमंडवंसि सुहासणवरगए अट्ठमभत्तं पारेइ पारित्ता भायणमंडवाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता उप्पि पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइंगमत्थएहिं जाव भुजमाणे विहरइ तएणं से भरहे गया दुवालससंवच्छरियंसि पमोयंसि णिव्वत्तसि समाणंसि जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता जाव मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जाव सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे णिसीअइ Page #946 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९३२ जम्बुद्धीपप्रज्ञप्तिसूत्र णिसीइत्ता सोलसदेवसहस्से सकारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ पडिविसज्जित्ता बत्तीसं रायवर सहस्सा सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता सेणावइरयणं सकारेइ सम्माणेइ सकारिता सम्माणित्ता जाव पुरोहियरयणं सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारित्ता सम्माणित्ता एवं तिण्णि सढे सुत्रयारसए अट्ठारस सेणिप्पसेणीओ सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्मणित्ता अण्णे य बहवे राइसर तलवर जावे सत्थवाहप्पभिइओ सक्कारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता पडिपिसज्जेइ पडिविसज्जित्ता उप्पिंपासायवरगए जाव विहरइ ॥सू०३१॥ छाया-ततः खलु स भरतो राजा आभियोग्यान् देवान् शब्दयति शब्दयित्वा एवं अवादीक्षिप्रमेव भो देवानुप्रिया ! मम महार्थम् महाघम् महार्हम् महाराज्याभिषेकमुपस्थापयत । ततः खलु ते आभियोग्या देवाः भरतेन राशा एवमुक्ताः सन्तः दृष्टतुष्ट चिस यावत् उत्तरपौरस्त्यं दिग्भागम् अपकामन्ति अपक्रम्य वैक्रियसमुद्घातेन समवनन्ति, एवं यथा विजयस्य तथा इत्थमपि यावत् पण्डकवने एकतो मिलन्ति एकतो मिलित्वा, यत्रव दक्षिणाभारतवर्षवर्ष यत्रैष विनीता राजधानी तत्रैव उपागच्छन्ति उपागत्य विनीता राजधानीमनुप्रदक्षिणी कुर्वन्तः अनुप्रदक्षिणी कुर्वन्तः यत्रैव अभिषेकमंडपो यत्रैष भरतो राजा तत्रैव उपागच्छन्ति उपागत्य तत् महाथ महाघ महाहं महाराज्याभिषेकम् उपस्थापयन्ति, ततः खलु तं भरतं राजानं द्वात्रिंशद्राजसहस्राणि शोभने तिथिकरणदिवसनक्षत्रमुहूर्ते उत्तरप्रौष्टपदा विजये तैः स्वाभाविकैश्च उत्तरवैक्रियैश्च वरकमलप्रतिष्ठानैः सुरभिवरवारिप्रतिपूर्णः यावत् म. हता महता राज्याभिषेकेण अभिषिञ्चन्ति अभिषेको यथा विजयस्य, अभिषिच्य प्रत्येकं प्रत्येक यावत् अञ्जलिं कृत्वा ताभिरिष्टाभिः यथा प्रविशतो भणिता यावत् विरह इति कृत्वा जय जय शब्दं प्रयुञ्जन्ति | ततः खलु तं भरतं राजानं सेनापतिरत्नं यावत् पुरोहितरत्नम् त्रीणि च षष्ठानि सूपशतानि अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणयः अन्ये च बहवो यावत् सार्थवाहप्रभृतयः पवमेव अभिषिञ्चन्ति तैः वरकमलप्रतिष्ठानैः तथैव यावत् अभिष्ट वन्ति च षोडशदेवस. हस्राणि पवमेव नवरं पक्षमसुकुमारया योवत् मुकुट पिनह्यन्ति। तदनन्तरं च खलु दर्दरमलयसुगन्धितैः गन्धैः गात्राणि अभ्युक्षन्ति दिव्यं च सुमनोदाम पिनह्यन्ति किं बहुना ? प्रन्थिमवेष्टिम यावत् विभूषितं कुर्वन्ति । ततः खलु स भरतो राजा महता महता राज्याभिषेकेण अभिषिक्तः समानः कौटुम्बिापुरुषान् शब्दयति शयित्वा एषम् अवादीत्-क्षिप्रमेव भो देवानुप्रियाः! हस्तिस्कन्धवरगताः विनोताया राजधान्याः शृङ्गाटक त्रिकचतुष्कचत्वर यावत् महापथपथेषु महता महता शब्देन उद्घोषयन्तः उच्छुल्कम् उत्करम् उत्कृष्टम् अदेयम् अमेयम् अभटप्रवेशम् अदण्डकुदंडिमम् यावत् सपुरजनजानपदम् द्वादशसंवत्सरिकं प्रमोदं घोषयत, घोषयित्वा मम पतामाज्ञप्तिकां प्रत्यर्पयत इति ततः खलु ते कौटम्बिकपुरुषाः Page #947 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका १०३ वक्षस्कारःस. ३१ भरतरावराज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् ९३३ भरतेन राक्षा पवमुक्ताः सन्तः हृष्टतुष्टचित्तानन्दिताः प्रीतिमनसः हर्षवशविसर्पद् हृदयाः विनयेन वचनं प्रतिशृण्वन्ति प्रतिश्रुत्य क्षिप्रमेव हस्तिस्कम्धवरगताः यावद् घोषयन्ति घोषयित्वा एतामाक्षप्तिकाम् प्रत्यर्पवन्ति । ततः खलु स भरतो राजा महता महता राज्याभिषेकेण अभिषिक्तः सन् सिंहासनाद् अभ्युत्तिष्ठति अभ्युत्थाय स्त्रीरत्नेन यावत् नाटकसहस्त्रैः सार्द्धम् सं परिवृतोऽभिषेकपीठात् पौरस्त्येन त्रिसोपानप्रतिरूपकेण प्रत्यवरोहति प्रत्यवरुह्य अभिषेकमण्ड गत् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव आभिषेक्यं हस्तिरत्नं तत्रैव उपागम्छति उपागत्य अअर्नागरिकूटसन्निभं गजपतिं यावद् दुरुढः । ततः खलु तस्य भरतस्य राज्ञो द्वात्रिंशद्राजसहस्राणि अभिषेकपीठात् औत्तराहेण त्रिसोपानप्रतिरूपण प्रत्यवरोहन्ति । ततः खलु तस्य भरतस्य राक्षः सेनापतिरत्नं यावत् सार्थवाहप्रभृतयः अभिषेकपीठात् दाक्षिणात्येन त्रिसोपानप्रतिरूपकेण प्रत्यवरोहन्ति । ततः खलु तस्य भरतस्य राक्ष आभिषेक्यं हस्तिरत्नं दुरूढस्थ सतः इमानि अष्टाष्टमङ्गलकानि पुरतो यावत् सम्प्रस्थितानि योऽपि च अतिगच्छतो गमः प्रथमः कुबेरावसानः स एव क्रमः इहापि स कारवर्जितो नेतव्यो यावत् कैलासशिखरिशृङ्गभूमिति। ततः खलु स भरतो राजा मजनगृहम् अनुप्रविशति अनुप्रविश्य यावत् भोजनमण्डपे सुखासनवरगतः अष्टमभक्त पारयति पारयित्वा भोजनमण्डपात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य उपरि प्रासादवरगतः स्फुटङ्गि मृदङ्गमस्तकै र्यावद् भुजानो विहरति । ततः खलु स भरतो राजा द्वादश सम्वत्सरिके निवृते सति यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैव उपागच्छति उपागत्य यावद् मज्जनगृहात् प्रतिनिष्कामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला यावत् सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुस्खो निषोदति निषद्य षोडशदेवसहस्राणि सत्कारयति सम्मानयति सस्कार्य सम्मान्य प्रतिविसर्जयति प्रतिविसृज्य द्वात्रिंशद्राजवरसहस्राणि सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सम्मान्य यावत् सेनापतिरत्नं सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सम्मान्य यावत् पुरोहित ने सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सम्मान्य प्रोणि षष्टावि सूपकारशतानि अष्टादशश्रेणिप्रश्रेणीः सत्कारयति सम्मान यति सातार्य सम्मान्य अन्यांश्च बहून् राजेश्वर तलवर यावत् सार्थवाह प्रभृतीन् सत्कारयति सम्मानयति सत्कार्य सम्मान्य प्रतिविसर्जयति प्रतिधिसृज्य उपरि प्रासाववरगतो यावत् विहरति ।सू० ३१ ।। 'टीका-'तएणं से' इत्यादि । 'तएणं से भरहे राया आभिओगे देवे सहावेइ' ततः खलु तदनन्तरं किल स भरतो राजा आभियोग्यान् आज्ञाकारिणो देवान् शब्दयति आवयति 'तएणं से भरहे राया आभियोगे देवे सद्दावेई' इत्यादि टीकार्थ-(एणं से भरहे राया भाभिओगे देवे सदावेह) इसके बाद उस भरत महाराजा ने आभियोग्यदेवों को बुलाया (सहावित्ता एवं वयासी) और बुलाकर उन अज्ञाकारी 'तपणं भरहे राया आभिओगे देवे सहावेह' या टी -(तएणं से भरहे राया आभिओगे देवे सहावेह) त्या२ मा भरत शनये मालियोनि वोन दाव्या. (सदायित्ता पर्व वयासी) अने लावीन ते मारी मानियो । Page #948 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९३४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'सद्दावित्ता' शब्दयित्वा आहूय एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् 'खिप्पामेव भो देवानुप्रिया ! मम महत्थं महग्घं महरिहं महारायाऽभिसेयं उवटुवेह' क्षिप्रमेव शीघ्रातिशीघ्रमेव भो देवानुप्रियाः ! मम 'महत्थं' महार्थम् महान् अर्थः मणिकनकरत्नादिक उपयुज्यमानो व्याप्रियमाणो यस्मिन् स तथाभूतस्तम्, तथा महार्घम् महान् अर्थः यत्र स तथा भूतस्तम् तथा महार्हम् महत् उत्सवमईतीति महाई:- उत्स योग्यवाद्यविशेषस्तम् एवंभूतं महाराज्याभिषेकं उपस्थापयत सम्पादयत 'तए णं ते आभि मोइया देवा भरहेणं रण्णा एवं वृत्ता समाणा हट्ठतुट्ठ चित्त जाव उत्तरपुत्थिमं दिसी भागं अवक्कमंति' ततो भरतस्य राज्ञ आज्ञप्त्यनन्तरं खल्वेते आभियोग्या देवा भरतेन राज्ञा एवमुकाः सन्तो दृष्टतुष्ट चित्त यावद् उत्तरपोरस्त्यं दिग्भागम् ईशानकोणम् अपक्रामन्ति गच्छन्ति, अत्र यावत्पदात् हष्टतुष्ट वित्तानन्दिताः प्रीतिमनसः परमसौमनस्यताः हर्षवशतिपेद् हृदयाः करतलपरिगृहीतं दशनखं शिरसावर्त्त मस्तके अञ्जलिं कृत्वा एवं स्वामिनः ! यथैव यूयम् आदिशथ तथैव आज्ञया अनुसारेण वयं कुर्म इत्येवं रूपेण विनयेन वचनं प्रतिशृण्वन्ति प्रतिश्रुत्य इति ग्राह्यम् । 'अवक्कमित्ता' अपक्रम्य गत्वा 'वेउच्चियसमुग्धारणं' समोहणंति 'वैक्रियसमुद्घातेन वैक्रियकरणार्थक प्रयत्नविशेषेण समवनन्ति आभियोग्यदेवों से ऐसा कहा - ( खिप्पामेव भो देवाणुपिया, मम महत्थे महस्वं महरिय महारायाभिसेयं उदुवेह ) हे देवानुप्रियो ! तुमलोग शघ्र ही माणिकरत्नादिरूप पदार्थ जिसमें सम्मिलित हों, तथा जिसमें आई हुई वस्तुएं सब विशेष मूल्यवाली हों एवं जिसमें उत्सव के योग्य व विशेष हां ऐसे महाराजाभिषेक के योग्य सामग्री का प्रबन्ध करो (तएणं ते आभिओगिया देवा भरणं रण्णा एवं वृत्ता- समाणा हट्ठट्ठचित्तनाव उत्तरपुरत्थिमं दिसीभागं अवक्कमंति) इस प्रकार श्रीभरत महाराजा के द्वारा कहे गये वे आभियोगिक देव बहुत अधिक हर्षित एवं संतुष्ट चित्त हुए यावत्-वे ईशान कोने में चले गये यहां यावत्पद से "चित्तानन्दिताः प्रीतिमनसः " आदि पूर्वोक पाठगृहोत हुआ है और यह पाठ पडिणित्ता" पद तक गृहीत हुआ है (अवक्कमित्ता - वे उब्वियमुग्धाएणं समोहणंति ) ईशानदिशा में जाकर - उन्होंने वैकियसमुद्वातद्वारा हवा ने या प्रभा ४धुं- (खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! मम महत्थे महग्ध महरियं महारायाभिसेय उववेद) हे देवानुप्रियो ! तुमे बोई शीघ्र भाषी रत्नाहि ३५ पार्थो मां સમ્મિલિત હાય, તથા જેમાં આવેલ સવ વસ્તુએ મૂલ્યવાન્ હાય, તેમજ જેમાં ઉત્સવ योग्य वाद्य विशेष होय सेवी महाराज्याभिषेक भाटे योग्य सामग्रीनी व्यवस्था रे।. (तपणं ते अभिओगिया देवा भरहेणं रण्णा एवं वृत्ता समाणा हट्ठ-तु चित्त जाव उत्तरपुरतिथमं दिलीभागं अवक्कमति) या प्रमाने भरत भडारा वडे याज्ञथयेाते लियेोगिवे। ખૂબ અધિક કૃષિત તેમજ સ`તુષ્ટ ચિત્ત થયા યાવત્ તે ઈશાન કાણુ તરક रह्यो. अही आवेला यावत् पहथी “वित्तानन्दिताः प्रीतिमनसः " मयूर्वोक्त पाठन स गृह थयेोसो छे, रमने से पाठ "पडिणित्ता" यह सुश्री गृडीत थयेले छे. (अवक्कमित्ता विमुग्धापणं समोहणंति) ईशान शुभांर्धन तेभल वैयि समुद्दधात वडे જતા Page #949 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० ३१ भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम ९३५ आत्मप्रदेशान् बहिः दूरतो विक्षिपन्ति एवं जहा विजयस्स तहा इत्थंपि जाव पंडगवणे एगओ मिलायति' एवम् इत्थं प्रकारमभिषेकसूत्रम् यथा विजयस्य-जम्बूद्वीपविजयद्वारा धिपदेवस्य तृतीयोपाङ्गे प्रोतम् 'तहा इत्थंपि' तथाऽत्रापि विज्ञेयम् यावत् पण्डकवने एकतः एकत्र मिलन्ति अब च यावत्पदात् सर्वापि अभिषेक सामग्री वक्तव्या साचोत्तरत्र जिनजन्माधिकारे पञ्चमवक्षस्कारे पत्राकाररीत्या विंशत्युत्तरशते सूत्रे नि नदत्ताङ्करीत्या पञ्चमवक्षस्कारे अष्टमसूत्रे वक्ष्यते तत्र तत्सूत्रस्य साक्षाद्दर्शितत्वात् तत एव सर्व द्रष्टव्यम् । 'एगो मिलाइत्ता' एकतः- एकत्र मिलित्वा 'जेणेव दाहिणद्धभर हे बासे जेणेव विणीया रायहाणी तेणेव उवागच्छंति' यत्रैव दक्षिणाईभारतवर्ष यौव विनीता राजधानी तत्रैव ते देवाः उपागच्छन्ति 'उबागच्छि ता' उपागत्य 'विणीयं रायहाणि अणुप्पयाहिणी करेमाणा अणुप्पयाहिणी करेमाणा जेणेव मभिसेयमंडवे जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छंति' विनीतां राजधानीम् अनुप्रदक्षिणी कुर्वन्तः अनुप्रदक्षिणो कुर्वन्तः यत्रैव अभिषेकमण्डपो अपने आत्मप्रदेशो को बाहर निकाला (एवं जहा विजयस्स तहा इत्थंपि ज.व पंडगवणे-एगमो मिलायंति) इस तरह जम्बूद्वीप के विजयद्वारके अधिपति देव-विजय के प्रकरण में तृतीय उपाङ्ग में अभिषेक-सूत्र कहा गया है उसी प्रकार से यहां पर भी वही अभिषेक-सूत्र, यावत् वे सबके सब पण्डक वन में एकत्रित होजाते हैं यहां तक का कहलेना चाहिये । यहां यावत् पद से समस्त अभिषेक समाग्रंगृहीत हुई है. वह आगे जिनजन्माधिकार में पंचम वक्षस्कार में पत्राकाररीत्या १२० सुत्रमें और मेरे द्वारा दत्त अङ्करीति से पंञ्चमवक्षस्कार में आठवे सूत्रमें कहो जावेगी अतः वहीं से यह सब जानने में आजावेगी. (एगओ मिलित्ता) पंडक वन में एकत्रित होकर (जेणेव दाहिणभरहे वासे जेणेव विणोया रायहाणी तेणेव उवागच्छति)वे सब के सब देब जहां दक्षिणार्द्ध भरतक्षेत्र था. और इसमें भी जहां विनीता राजधानी थी वहां पर आये (उबागच्छित्ता विणीयं रायहाणी-अणुप्पयाहिणी करेमाणे २ जेणेव अभिसे पमंडवे जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छंति) वहां आकर के उन्होंने उस विनीता राजधानी की तीन प्रदक्षिणाएं की बाद में जहां अभिषेक पाताना मात्मप्रशाने शरीरथा पडा२४ाव्या. (एवं जहा विजयस्त तहा इत्थंपि जाव पंडग. वणे एगो मिलायंति)मा प्रमाणे दीपना वियदाना मधिपति देव-पियन। ५४२६५ માં તૃતીય ઉપાંગમાં અભિષેક સૂત્ર કહેવામાં આવેલ છે તે પ્રમાણે જ અહીં પશુ અભિષેક સૂત્ર યાવત્ તે સર્વ પંડકંવનમાં એકત્ર થઈ જાય છે. અહીં સુધી પાઠ ગ્રહણ કરે જોઈએ. અહીં યાવત પદથી સમસ્ત અભિષેક સામગ્રી ગૃહીત થયેલી છે. તે આગળ જિન જન્માધિ કારમાં, પંચમવક્ષસ્કારમાં, પત્રાકાર રીત્યા ૧૨૦ મા સૂત્રમાં અને મારા વડે દત્ત અંક રીતિથી પંચમવક્ષસ્કારના આઠમાં સૂત્રમાં કહેવામાં આવશે. એથી જિજ્ઞ સ ઓ એ અંગે त्यांथी - Myा प्रयत्न ४२. (एग मी मिलित्ता) ५७४ बनभां मेत्र न. (जेणेव दाहिणभरहे वासे जेणेव विणोया रायहाणी तेणेव उवागच्छंति) ते स वो न्यi विनीता साधानी ती त्यां माया. (उवागच्छित्ता विणीयं रायहाणों अणुप्पयाहिणी करेमाणे २ जेणेव अभिसेयमंडवे जेणेव भरहे राया तेणेव उवागच्छंति) त्या आधीन तेभरे Page #950 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्मूदीपप्रज्ञप्तिसूत्रे यत्रैव श्री भरतो राजा तत्रैव उपागच्छन्ति 'उजागच्छित्ता' उपागत्य तं महत्थं महग्धं महरिहं महारायाभिसेयं उववेति' ते देवाः तत् पूर्वोक्तं महाथ महार्घ महाई महाराज्याभिषेक महाराज्याभिषेकोपयोगिक्षीरोदकायस्करणमित्यर्थः उपस्थापयन्ति उपढौकयन्ति राज्ञः समीपे आनयन्तीत्यर्थः वैक्रियशक्त्या निष्पादितानि सर्वाणि रत्नगजाश्वादीनि बहुम्ल्यानि वस्तूनि आनीय समर्पयन्तीति। अथ पूर्वकृत्यं पूर्वमुत्त्वा उत्तरकृत्यमाह-'तएणं' इत्यादि तएणं तं भरहं रायाण बत्तीसं गयसहस्सा सोभणसि तिहि करणदिवसणकमतमुहुत्तंसि उत्तरपोद्ववया विजयंसि तेहिं साभाविएहिय उत्तरवे उधिएहि य वरकमल पइट्ठाणेहिं सुरभिवरनारिपडिपुण्णेहि जाव महया महया रायाभिसेएणं अभिसिंचंति' ततः खलु तं भरतं राजानंद्वात्रिंशद्रानसहखाणि शोभने निर्दोषगुणयुक्त तिथिकरणदिवसनक्षत्रमुहूर्ने अत्र समाहारद्वन्द्वः ततः सप्तम्येकवचनम् तत्र तिथिः रिक्तार्केन्दुदग्धादिदुष्टतिथिभ्यो भिन्ना जयादितिथिः । करणं विशिष्ट दिवस: दुर्दिनग्रहणोत्पातदिनादिभ्यो भिन्नदिवस: नक्षत्रं राज्याभिषेको. मंडप और उसमें भी जहां चक्रवर्ति श्री भरत महाराजा थे वहां पर वे आये(उवागच्छित्ता तं महत्थं महग्धं पहरिहं महारायाभिसेयं उववे ति) वहां आकर के उन्हों ने उस महार्थ महार्घ एवं महार्ह महाराजाभिषेक को समस्त सामग्री को राजाके समक्ष उपस्थित कर दिया अर्थात् वैक्रियशक्ति द्वारा निष्पादित-समस्त रत्न गन, अश्व आदिरा बहुमूल्य वस्तुओं को लाकर समर्पित करदिया (तए णं तं भरहं रायाणं वत्तीसं रायसहस्सा सोभणसि तिहिकरणदिवसणक्खत्तमुहुरासि उत्तरपोट्टवया विजयंसि तेहिं साभाविए हिय उत्तरवे उब्वि एहिय वर कमल पइट्टाणेहिं सुरभिवरवारिपडिपुण्णेहिं जाव महया २ रामाभिसेएणं अभिसिंचंति) इस के बाद श्रोभरत महाराना का उन ३२ ह नार गजाओं ने निदोषगुणयुक्त तिथि करण दिवस-नक्षत्र समन्धित मुहूर्त में अभिषेक किया रिता आदि दुष्ट तिथियों से भिन्न जो जयादितिथियां होती हैं वे शुभतिथियां मानो जाता हैं करण नाम विशिष्ट दिवस का है. यह दिवस दुर्दिन, ग्रहण, उत्पात आदि से भिन्न-रहित होता है. राज्य में अभिषेक-के योग्य जो श्रवण आदि वर नक्षत्र તે વિનીતા રાજધાનીની ત્રણ પ્રદક્ષિણા કરી. ત્યાર બાદ જ્યાં અભિષેક મંડપ અને તેમાં ५ बयां मरत २० ता त्या माव्या. (उवागच्छित्सा तं महत्थं महग्धं महरिहं महाराया भिसेयं उवट्ठवेति) त्या मापान भरे महाथ, मडा सन महा महान्यामिनी સમસ્ત સામગ્રીને રાજાની સામે મૂકી દીધી. અર્થાત વૈક્રિય શક્તિ વડે નિષ્પાદિત સમસ્ત २त्न, १४ अश्व, मा ३५ पहुभूस्य वस्तुमाने लावीन सभापत ४२. (तपणं तं भरहं रायाणं बत्तीसं रायसहस्सा सोभणसि तिहिकरणदिवसणक्खत्तमुहुत्त सि उत्तरपोट्टवया विजयसि तेहिं सामाधिपहिय उत्तरवेउविरहिय वरकमलपइट्ठाणेहिं सुरभिवरवारिपडिपुण्णेहिं जाव महया २ रायाभिसेपणं अभिसिनति) त्यारा भरत जना त ३२ र રાજાઓએ નિર્દોષ ગુણ યુક્ત તિથિ, કરણ દિવસ નક્ષત્ર-સમન્વિત મુહૂત માં અભિષેક કર્યો. રિક્તા વગેરે દુષ્ટ તિથિઓથી ભિન્ન જે જય આદિ તિથિઓ હોય છે તેને શુભતિથિઓ માનવામાં આવે છે. કરણ નામ વિશિષ્ટ દિવસનુ છે. એ દિવસ દુદન, ગ્રહણ, ઉત્પાત Page #951 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तु.३ वक्षस्कारः सू० ३१ भरतराशः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् ९३७ पयोगि श्रवणादि त्रयोदश नक्षत्राणामन्यतरत् उक्तञ्च" अभिषिक्तो महीपालः श्रुति ज्येष्ठो लघुघुवैः । मृगानुराधा पौष्णैश्च चिरं शास्ति वसुन्धराम्। १ । इति मुहूर्त्तः अभिषेकोत्तनक्षत्र समानदेवत इति तस्मिन् उत्तरप्रौष्ठपदाविजये - उत्तर प्रौष्ठपदा उत्तरभाद्रपदा नक्षत्रं तस्य विजयो नाम मुहूर्त्तः अभिजिदाह्वयः क्षण तस्मिन् अयं भावः- मुहूर्त्तापरपर्यायः पञ्चदशक्षणात्मके दिवसेऽष्टमक्षणः, तल्लक्षण चेदं ज्योतिः शास्त्रे प्रसिद्धम् द्वौयामौ घटिका न्यूनौ द्वौ यामौ घटिकाऽधिकौ । विजयोनाम योगोऽयं सर्वकार्यप्रसाधकः ॥१॥ त तस्तैः पूर्वोक्तैः स्वाभाविकै रुचरवैक्रियैश्च वरकमलप्रतिष्ठानैः वरकमले प्रतिष्ठानं स्थिति येषां ते तथा भूतास्तैः अष्ट सहस्रघटैरितिगम्यं पुनः कीदृशैः सुरभि वरवारिप्रतिपूर्णैः श्रेष्ठसुगन्धिजलव्याप्तैः यावद् महता महता गरीयसा राज्याभिषेकेण अभिषिश्चन्ति अ हैं उनमें से कोई एक नक्षत्र का होना ही शुभ नक्षत्र कहा गया है. उक्तंच अभिषिक्तो महीपालः श्रुति ज्येष्ठालघुधुवैः । मृगानुराधा पौष्णैश्च चिरं शास्ति वसुन्धराम् ॥ १ ॥ अभिषेक के समय उक्त नक्षत्रों का समान देवता वाले होना-यह मुहूर्त कहा गया उत्तर प्रोष्ठपदा विजय का तात्पर्य है उत्तरभाद्रपदा नक्षत्र का विजय- अभिजितनामका क्षण में 'यह अभिषेक किया गया तात्पर्य यह है दिन पञ्चदशक्षणात्मक दिवस होता है इसमें अष्टम क्षणरूप मुहूर्त होता है. उसका लक्षण ज्योतिशशास्त्र - में ऐसा कहा गया है द्वौ यमौ घटिकान्यनौ द्वौ यामौ घटिकाधिको विजयोनाम योगोऽयं सर्वकार्य प्रसाधकः ॥ १ ॥ ઉત્તર નક્ષત્રો છે, भरत महाराजा का जो राज्याभिषेक किया गया वह सुरभिजल से परिपूर्ण हुए स्वाभाविक कलशों द्वारा तथा उत्तरविक्रिया से देवों ने जिन्हें विकुर्वित किया है. ऐसे ऐसे कलशों द्वारा किया गया । ये कलश श्रेष्ठ कमलों के ऊपर स्थापित किये हुए थे तथा संख्या में १००८, थे. यह अभिषेक साधारण रूप से करने में नहीं आया किन्तु बड़े भारी ठाठ बाट से ही करने વગેરેથી ભિન્ન રહિત-હાય છે. રાજ્યમાં અભિષેક ચાગ્યજે શ્રવણ આદિ તેમનામાંથી કઇ એક નક્ષત્ર હાય તે જ શુમ કહેવાયછે. ઉક્ત ચअभिषिक्तो महीपालः श्रुतिज्येष्ठ लघु ध्रुवेः । मृगानुराधा पौष्णैश्च चिरशास्ति वसुन्धराम् ॥ १०॥ અભિષેક વખતે ઉક્ત નક્ષત્રના સમાન દેવતાવાળા થવુ એ મુહૂત કહેવામાં આવે છે. ઉત્તર પ્રૌષ્ઠાના વિજયનુ તાપ છે, ઉત્તરભાદ્રપદા નક્ષત્રને વિજય-અભિજીત નામણ તે ક્ષણમાં અભિષેક કરવામાં આવ્યેા. તાત્પર્યં આ પ્રમાણે છે કે દિવસ-પોંચદશ ક્ષણાત્મક દિવસ હાય છે. એમાં અમ ક્ષણુ રૂપ મુહૂત કેાય છે. એનુ લગ્નગુ યૈતિષ શાસ્ત્રમાં આ પ્રમાણે કહેવામાં આવેલ છે 1: या घटिका न्यूनौ द्वौ यामौ घटिकाधि हो । विजयोनाम योगोऽयं सर्व कार्य प्रसाधकः ॥१०॥ ભરતને જે રાજ્યાભિબેક કરવામાં આવ્યેા તે સુરભિ જલથી પરિપૂર્ણ થયેલા સ્વાભાવિક કળશે। વર્ક તેમજ ઉત્તરવિક્રિયાથી જેમને દેવા એ વિકવિંત કર્યા છે એવા કળશેાવર્ડ કરવામાં આવ્યું. એ કળશે શ્રેષ્ઠ કમળાની ઉપર સ્થાપિત કરવામાં આવ્યા હતા. સંખ્યા માં એ કળશેા ૧૦૦૮ હતા. એ અભિષેક સાધારણ રૂપમાં આયેજિત થયા નહિં પણ ભારે ઠા ११८ Page #952 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९३८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे यावत्पदात् 'चंदणकयवच्चएहिं आविद्धकंठेगुणेहिं पउमुप्पलपिहाणेहिं करयलपरिग्गहिएहि असहस्सेणं सोवण्णियकलसाणं जाव असहस्सेणं भोमेज्जाणं' इत्यादि पाठो ग्राह्यः अयं च विस्तररूपेण उत्तरत्र जिनजन्माभिषेकप्रकरणे पञ्चमवक्षस्कारे एकविंशत्युत्तरशते सूत्रो १२१ निजदत्ताङ्करीत्या पञ्चमवक्षस्कारे दशमसूत्रो१०द्रष्टव्यः। तत्रैव अस्य साक्षा दर्शितत्वात् सर्वेषां प्रत्येक व्याख्यानमपि तत्रैव द्रष्टव्यम्। तथा च पुनः कीदृशैः चन्दनकृतव्यत्ययैः चन्दनकृतव्यतिक्रमैः चंदनचचिंतदेहः पुनः भाविदकण्ठेगुणैः गुणैराविद्धकण्ठरित्यर्थः पद्मोत्पलपिधानैः कमलोत्पलाच्छादनैः करतलपरिगृहीतैः हस्ततलपरिधृतैःएवमुक्तप्रकारेण विशेषणविशिष्टैः अष्टसहस्रेण सौवर्णिककलशानाम् यावअष्टसह स्रेण भोमेयानां च अष्टसहस्रसंख्यक सौवर्णिककलशैः अष्टसहस्त्रसंख्यक भौमेयकलशैश्च सर्वोदक :सर्वमृत्सवौं षधि प्रभृति वस्तुभि महता महता राज्याभिषेकेण अभिषिञ्चतीत्यर्थः अभिसेओ जहा विजयस्स' अभिषेको यथा विजयस्य जम्बूद्वीपविजयद्वाराधिपदेवस्य जीवाभिगमोपाङ्गे प्रोक्तस्तथाऽ. त्रापि बोदव्यः 'अभिसिंचित्ता' अभिषिच्य 'पत्तेयं पत्तेयं जाव अंजलिं कटु साहि' इद्वाहिजहा पविसंतस्स भणिया जाव विहराहि तिकडु जय जय सदं पउंति'प्रत्येक प्रत्येकंप्रातिनृपं में माया-इसी बात को प्रकटकरने के लिये “महया २ रायाभिसेएणं" ये पद यहां प्रयुक्तहुए हैं यहां प्रयुक्त हुए यावत्पद से "चंदणकयचच्चेहिं, आविद्धकंठे गुणेहिं, पउमुप्पलपिहाणेहिं, करयलपरिग्गहिएहिं अट्ठसहस्सेणं सोवण्णियकलसाणं, जाव असहस्सेणं भोमेज्जाणं" इत्यादि पाठ गृहीत हुआ है यदि इसपाठ को देखना हो तो यह विस्ताररूप से आगे जिनजन्माभिषेक के प्रकरण में पंचमवक्षस्कार में १२१ वें सूत्रमें और मेरे द्वारा प्रदत्त अङ्करीति के अनुसार १० वें सूत्र में मानेवाला है वहीं से इसे देखना चाहिये । (अभिसेओ जहा विजयस्स) इस तरह महाराजा भरत का अभिषेक इस प्रकार से हुआ कि जैसा अभिषेक जम्बूद्वीप के द्वारके अधिपति विनय देवका हुआ कहा गया है यह अभिषेक जोवाभिगम उपाङ्ग में वर्णित हुआ है (अभिसिंचित्ता पत्तेयं पत्तेय जाव अंजलिं कटु ताहिं इट्टाहिं जहा पविसंतस्स भणिया जाव विहराहि तिकटु जय २ सदं पउंति) भरत महाराजा का भाउथा सम्पन्न थय। उता. माशय प्रगट ४२। भाट 'महया २ रायाभिसेपणं" से ५४ मत्र प्रयुत च्ये छे. सही प्रयुत थये यावत् ५४थी "चंदणकयनउचेहिं आविद्धकंठेगुणेहिं, पउमुप्प लपिहाणेहि, घरकमलपरिग्गहिएहिं अट्ठसहस्लेणं सोवग्णियकलसाणं, जाव अटूठसहस्सेण भोमेज्जाण" त्याहि ५४ सगडीत थयो छे. नसे પાઠ અંગે જાણકારી મેળવવી હોય તે એગળ જિન જન્માભિષેક પ્રકરણમાં, પંચમવક્ષસ્કારમાં, ૧૨૧ માં સૂત્રમાં અને મારા વડે પ્રદત્ત અકરીતિ મુજબ ૧૦ માં સૂત્રમાં આપવામાં આવેલ છે તેથી તે સંબંધ માં ત્યાંથી સમજી લેવું જાઈ છે. ત્યાં એ અંગે સવિસ્તર વર્ણન કરવા Hi मा छे. (अभिसे ओ जहा विजयस्स) AM भरतन मनि ॥ प्रभार सम्पन्न થયે કે જે રીતે જ બુદ્વીપના દ્વારના અધિપનિ વિજય દેવને થયો. એ અભિષેકનું વર્ણન लालिम Sinwi ४२वामा भाव छे. (अभिसिंचित्ता पत्तये पत्तेयं जाव अंजलि कटु Page #953 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारः सू० ३१ भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयक निरूपणम् ९३९ यावद् अञ्जलिं कृत्वा ताभिरिष्टाभिः अत्रापि 'कंताहिं जाव वग्गूहिं अभिनंदता य अभिथुणंताय एवं वयासी - जय जय गंदा ! जय जय भद्दा ! भदं ते अजियं जिणाहि' इत्यादि पाठो तथा ग्राहय : 'जहा पविसंतस्स भणिया जाव विहराहि' यथा विनीतां प्रविशतो भरतस्य अर्थाभिलाषि प्रमुखपाचकजनै भणिता आशीरिति गम्यम् कियत्पर्यन्तमित्याह 'यावद् विहर' इति विहरेति पर्यन्तमित्यर्थः इति कृत्वा जय जय शब्दं प्रयुञ्जन्ति' तए णं तं भरहं रायाणं सेणावहरयणे जाव पुरोहियरयणे तिष्णि य सट्टा समस्याहारस अ सेणिपीओ अण्णेय बहवे जाव सत्यवाहष्पभिइओ एवंचेव अभिसिचंति' ततो द्वात्रिंशद्राजसहस्राभिषेकानन्तरं खलु तं भरतं सेनापतिरत्नं यावत्पुरोहितरत्नं त्रीणि च षष्ठानि षष्ट्यधिकानि अभिषेक करके फिर प्रत्येक ने यावत् अंजलि करके उन उन इस कान्त यावत् वचनों द्वारा उन का अभिनन्दन एवं संस्तवन करते हुए इस प्रकार से कहा (जय जय गंदा ! जय जय भद्दा भदं ते अत्रियं निणाहि ) हे नन्द - आनन्दस्वरूप भरत ! तुम्हारी जय हो जय हो हेभद्र ! कल्याण स्वरूप - भरत ! तुम्हारी बारवार जय हो तुम्हारा कल्याण हो वीरो द्वारा भी परास्त नहीं किये जासकने वाले ऐसे शत्रु को तुम परास्त करो० इत्यादि रूप से जैसा यह पाठ २९वें में इसी वक्षस्कार के कथन में कहा गया है वैसा ही यहां पर भी वह ग्रहण करना सूत्र चाहिये (जहा पविसंतस्त भणिया जाव विहाहि ) जिस प्रकार से विनीता में प्रवेश करते समय भरत के प्रति " यावत् विहर" इसपाठ तक अर्थाभिलाषो से लेकर पाचक तक के जनों ने शुभाशीर्वाद प्रकट किया उसी प्रकार से यहाँ पर भो वही आशीर्वाद उसी रूप में प्रत्येक नृपने प्रकट किया ऐसाजानना चाहिये (तरण भरहं रायाणं सेनावइरयणे जाव पुरोहियरयणे तिष्णिय सट्टा सुअसया अट्ठारससेणिष्पसेणीओ अण्णेय बहवे जाव सत्थवाहप्पभिइओ एवं चेन अभिसिंचंति) इसके बाद भरत राजा का सेनापतिरत्न ने यावत् पुरोहित रत्न ने, ३६० रसवतीताहि इट्ठाहिं जहा पविसंतस्स भणिया जाव विहराहि ति कट्टु जय २ सह पउ जंति) ભરત રાજાને અભિષેક કરીને પછી દરેકેયાવત અંજલિ મનાવીને તે તે ઇષ્ટ-કાન્ત થાવત્ क्यने। वडे तेमनु अभिनंदन तेभन स्तवन ४२ र प्रभा उधुं - ( जय-जय णंदा ! जय जय भदा ! भद्द ते अजियं जिणाहि ) डे नन्ह ! मानं स्व३५ महाशन भरत । तमारे। જય થાઓ, જય થાએ હું ભદ્રે ! કલ્યાણુ સ્વરૂપ ભરત ! તમારે વાર વાર જય થાઓ, તમારૂં કલ્યાણ થાએ. વીરા દ્વારા પણુ અપરાજિત શત્રુને તમે પરાસ્ત કરે. વગેરે રૂપમાં જેવા આ પાઠ ૨૯મા સૂત્રમાં આજ ‘વક્ષસ્કાર’ માં કહેવામાં આવેલ છે, તેવા જ પાઠ અત્રે પણ समवे. ( जहा पविसं तस्स भणिया जाव विहराहि ) प्रेम विनीतामा प्रवेश अरती વખતે ભરત પ્રત્યે ચાલત વિહર” એ પાઠ સુધી અર્થોભિલાષી થી માંડીને પાચસુધીના જનાએ જેમ શુભાશીર્વાંઢો પ્રકટ કર્યાં. તેમ જ અત્રે પણ તે પ્રમાણે જ આશીર્વાદો દરેક रामये आउट यो सेम लधुवु लेये. (तपणं तं भरह रायाणं सेणावहरयणे जाव पुरोहियरयणे तिणिय सहा सुभसया अट्ठारस से दिवसेणीओ अण्णेय बहवे जाब : सत्थवाहपभिइओ एवं चेव अभिसिवंति) त्यारभाई भरत राम સેનાપતિ રત્ને યાવત્ પુરા Page #954 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९४० जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सूपशतानि सूपकारशतानि अष्टादश श्रेणिप्रश्रेणयः अन्ये च बहवो यावत्सार्थवाहप्रभृतयः एवमेव उक्तप्रकारेण राजान इव अभिषिञ्चन्ति'सेणावहरयणे जाव पुरोहियरयणे' अत्रे यावत्पदात् 'गाहावइरयणे वड्ढइरयणे' इति ग्राह्यम तथाच सेनापतिरत्नं पुरोहितरत्नं गाथापतिरत्नं वर्द्धकिरत्नं पुरोहितरत्नं चेति बोध्यम् द्वितीय यावत्पदात् राजेश्वरतलवरमाडम्बिक कौटुम्बिकमन्त्रि महामन्त्रि गणकदौवारिकामात्यचेटपीठमर्दनगरनिगमश्रेष्ठिसेनापतयो ग्रायाः यावत्सार्थवाहप्रभृतयः अत्त्र प्रभृतिपदात् सार्थवाहदूतसन्धिपालाः, अस्मिन्नेव वक्षस्कारे सप्तविंशतितमे सूत्रे एतेषां व्याख्यानं द्रष्टव्यम् 'तेहिं वरकमलपइट्ठाणेहिं तहेव' तैः पूर्वोक्तः वरकमल पतिष्ठान:-वरकमले प्रतिष्ठानं स्थितिर्येषां ते तथाभूतास्तैः तथैव पूर्वोक्तप्रकारेणैव कलशविशेषणादिकं विज्ञेयम्"जाव अभिथुगंति य' यावद् अभिष्टुवन्ति च यावत्पदात् अभिनन्दन्ति इति ग्राहयम्' 'सोलसदेवसहस्सा एवंचेव' ततः सर्वतः पश्चात् षोडशदेवसहस्राणि षोडशसहस्रसंख्यकदेवाः एवमेव उक्तपकारेणेव अभि. पिञ्चन्ति अभिनन्दन्ति अभिष्टुवन्ति च आभियोग्यसुराणाम् अन्तिमोऽभिषेकस्तु तद्भरतस्य मनुष्येन्द्रत्वेन मनुष्याधिकाराद् मनुष्यकृताभिषेकानन्तरभावित्वेन बोध्यंः यद्वा देवानां चिन्तितमात्र तदात्वसिद्धिकारकत्वेन अन्ते तथाविधोत्कृष्टाभिषेकविधानार्थम् अत्र यो कारकों ने १८ श्रेणिप्रश्रेणिजनों ने तथा अन्य और भी अनेक सार्थवाह आदिजनों ने इसी प्रकार से अभिषेक किया "सेणावइरयणे जाव पुरोहियरयणे" आगत यावत्पद से "गाहावहरयणे वड्वहरयणे" इन दो रत्नों का ग्रहण हुआ है. तथा द्वितीय यावत्पद से राजेश्वर तलवर माडम्बिक कौटुम्विकमन्त्री, महामन्त्री, गणक, दौवारिक अमात्य, चेट पीठमर्द, नगर निगम श्रेष्टी, सेनापति तथा सार्थवाहके प्रभृतिपद से दूत और सन्धिपाल इनका ग्रहण हुआ है. इनका व्याख्या न इसी वक्षस्कार के प्रकरण में २७ वे सूत्र में किया जाचुका है. (तेहिं वरकमलपइट्टाणेहिं) सेना पति से लेकर दूत और सन्धिपाल तक के इन समस्त जनोंने श्रेष्टकमल पर स्थापित किये गये कलशों द्वारा ही भरत नरेश का अभिषेक किया और पूर्वोक्तरूप से ही उनका अभिनन्दन और संस्तवन किया (सोलसदेवसहस्सा एवंचेव) इसी प्रकार से १६ हजार देवों ने भी अभिषेक હિતરનથી માંડીને ૩૬૦ રસવતી કારકોએ, ૧૮ શ્રેણિ પ્રશ્રેણી જનેએ તેમજ અન્ય પણ अन सार्थ वा महिना मे मा प्रमाणे मभिषे ध्ये. "सेणावहरयणे जाव पुरोहियरयणे" मा वाध्य भागात यावत् ५४ था “गाहावह रयणे वडढइरयणे" से मेनोन ગ્રહણ થયેલ છે. તેમજ દ્વિતીય યવત્ પદથી “રાજેશ્વર, તલવર, મોડુંબિક, કૌટુંબિક મંત્રી મહામંત્રી, ગણુક, દૌવારિક, અમાત્ય, ચેટ, પીઠમર્દ, નગર નિગમ શ્રેષિ, સેનાપતિ તેમજ થેના “પ્રકૃતિ પદથી કુત અને સંધિપાલ એ સર્વપદ ગ્રહણ થયા છે એ સર્વન याज्यान मा0 पक्ष४२ ४२मा २७मां सूत्रमा ४२वामा मावस छे. (तेहि वरकमल पहाणेहिं) सेनापतिथी भासनेत भने सविपास सुधीना से सना श्रेष्ठ भो। પર પ્રસ્થાપિત કરવામાં આવેલા કળશ વડે ભરત નરેશ ને અભિષેક કર્યો અને પૂર્વોક્ત ३५मा तमनु मलिन हैन भने सस्तवन यु. (सोलस देवसहस्सा एवं चेव) मा Page #955 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू. ३१ भरतराज्ञराज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् ९४१ विशेषस्तमाह 'णवरं पम्हलसुकुमालाए जाव मउडं पिणद्धेति' नवरं अयं विशेषः पक्ष्मलसुकुमारया पक्षमलया पक्ष्मवत्या सुकुमारया अतिकोमलया च अस्य च पदस्थ यावत्पदगृहीते गन्धकाषायिक्या लघुशाटिकया गात्राणि रूक्षयन्ति इत्यग्रे सम्बन्धः यावत् पिनयन्ति अस्य च पदस्य यावत्पदगृहीतं विचित्ररत्नोपेतं मुकुटमित्यत्राग्रे सम्बन्धः अत्र यावत्पदात्' 'गंधकासाइ एहिं गायाइं लूहेंति सरसगोसीसचंदणेणं गायाइं अणुलिपंति अणुलिंपित्ता नासाणीसास वायवोज्झं वण्णफरिसजुत्तं हयलालापेलवाइरेगं धवलं कणगखइअंतकम्मं आगासफलिहसरिसप्पभं अहयं दिव्यं देवदूसजुयलं णिसावेति णिअंसावित्ता हारं पिणद्वेति पिणद्धित्ता एवं अद्धहारं एगावलि मुत्तावलिं स्यणावलिं पालंबं अंगयाइं तुडियाई कडयाइं दसमुद्धियाणंतंग कडिमुत्तगं वेअच्छगसुत्तगं मुरविं कंठपुरविं कुडलाई चूडामणि चित्तरयणुक्कंडत्तिगन्धकाषायिक्या सुरभिगन्धकषायद्रव्यपरिकर्मितया लघुशाटिकया इति गम्यं गात्राणि भरतदेहावयवान् रूक्षयन्ति ते देवाःप्रोग्छन्तीत्यर्थः रूक्षयित्वा सरलेन गोशोषचन्दनेन गात्राणि अनुलिम्पआदि किया (णवरं पम्हलसुकुमालाए जाव मउडं पिणद्वेति) परन्तु देवों ने इतना विशेषकार्य और किया कि भरत नरेश के शरीर का उन्होंने प्रोञ्छन अतिसुकुमार-पक्ष्मल-रुओं वाली तौलिया, से किया. और उनके मस्तकपर मुकुट रखा यहां यावत्पदसे गृहीत पाठका इस प्रकार से सम्बन्ध है-"गंधकाषायिक्या लघुशाटिकया गात्राणि रूक्षयन्ति' इसके बाद 'गंधकासाइएहिं गायाई लूहेंति, सरसगोसीसचंदणेण गायाई अणुलिपति अणुलिंपित्ता नासाणीसासवायवोज्झं चक्खुहरं वण्णफरिसजुत्तं हयलालापेलवाइरेगं धवलं, कणगखइयअंतकम्मं आगासफलिहसरिसप्पमं अहयं दिव्वं देवदूसजुयलं णिअंसावेंति णिभंसावित्ता हारं पिणद्वेति पिणद्धित्ता एवं महारं एगावलिमुत्ता वलि रयणावलि पालंबं अंगयाइं तुडियाई कडयाई दसमुद्धियाणतगं कडिपत्तगं वेअच्छगसुत्तगं मुरविं कंठमुरविं कुण्डलाइं, चूडामणिं, चित्तरयणुक्कंडंत्ति" यह पाठ है. इसका तात्पर्य ऐसा है कि जब उन देवों ने सुगंधित सुकुमार तौलिया-से भरत महाराजा के शरीर को पोंछ दिया प्रमाणे १६ १२ हेवासे ५५ ममिको वोरे विधि सम्पन्न श. (णवर पम्हल सुकु मालाए जाव मउड पिणद्वंति) ५ हेवाये माशु विशेष ३५मा धारे भरत नरेश ના શરીરનું તેમણે પ્રોસ્કન-અતિ સુકુમાર–પમલ રુંવાવાળા અંગેછા થી-કર્યું. અને मस्तनी ५२ भुट भू.यावत् ५४थी सगडात ५।४ २५ प्रमाणे छ-गंधकाषायिक्या लय शाटिकया, गात्राणि रूक्षयन्ति" त्या२माह "गंवकासाइपहि गायालहंति. सरस गोलीपचंदणेणं गायाई अणुपंलिपंति, अणुलिपित्ता नासाणीसासवायवोझ चक्खुहर वण्णफरिसजुत हयलालापेलवाइरेगं वलं, कणगखइय . अंतकम्म आगासफलिह सरिसप्प अहयं दिव्वं देवदूसजुयल णिसावेंति णिअंसावित्ता हारं पिणद्धेति, पिणद्धिता एवं अद्धहारं पगावलि मुत्तावलिं, रयणावलिं पालब अंगयाई तुडियाई कडयाई दसमुद्धियाण ग कडिसुतग वेअच्छा - सुत्तग मुरवि कंठमुरवि कुडलाई, चूडामणि चित्तरयणुक्कडंति' मेनु तात्पर्य या प्रमाणे छत वा सुध1, सुकुमार अगछ। થી ભરત રાજાના શરીર ને લડ્યું ત્યાર બાદ તેમણે તેમના શરીર ઉપર ગોશીષચંદન નું Page #956 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९४२ जम्मूदीपप्रज्ञप्तिसूत्र न्ति अनुलिप्य देवदृष्ययुगलं देववस्त्रयुग्मं निवासयन्ति-परिधापयन्ति इति योगः कीदृशं तदित्याह 'नासाणीसासवायवोज्झं'नासिकानिःश्वासवातवाहयम् नासिकानिःश्वासवातेन वाह्यं दुरापनेयं लक्ष्णतरमित्यर्थः अयम्भावः महावातस्य का कथा नासिका वातोऽपि स्वसूक्ष्म बलेन तद वस्त्रयुगलम् अन्यत्र प्रापयति, तथा चक्षुईरम् -नयनसुखकरम् रूपातिशयत्वात् तथा वर्णस्पर्शयुक्तम् अतिशायिना वर्णेन स्पर्शेन च युक्तम् पुनः कीदृशं तत् 'हयलाला. पेलवाइरेग' हयलालापेलवातिरेकम्-हयलाला -अश्वमुखजलं तस्मादपि पेलवं कोमलम् अतिरेकम् अतिरेकेण अतिशयेन अतिविशिष्टमृदुत्वलघुत्वगुणोपेतमितिभावः, तथा धवलं निर्मलं कनखचितान्तकर्म-कनकेन सुवर्णेन खचितानि विच्छुरितानि अन्तकर्माणि अश्चळयो वा न लक्षणानि यस्य तत्तथाभूतम् तथा आकाशस्फटिकसदृशप्रभम् आकाशस्फटिको नाम अतिस्वच्छस्फटिकविशेषस्तत्सदृशो प्रभा दीप्ति यस्य तत्तथाभूतम् अहतं छिद्ररहितं नवीनमित्यर्थः दिव्यं दिव्यकान्तिमत् इत्थमुक्तविशेषणविशिष्टम् देवदृष्ययुगल निवासयन्ति परिधापयन्ति निवास्य 'हारं पिणदंति' हारं पिन धन्ति ते देवाः चक्रवर्तिनो भरतस्य कण्ठप्रदेशे हारम् अष्टादशसरिक बध्नन्ति 'पिणदेत्ता' हारं तब उसके बाद उन्होंने फिर उनके शरीरपर गोशीर्षचन्दन का लेप किया लेपकरके फिर उन्होंने देवदृष्य युगल पहिराया. यह देवदूष्य-युगल इतना अधिक वजन में कम था कि वह नाक की वायु से भी हलने लग जाता इस तरह से यहां देवदूष्य युगल का पतलापन प्रकट किया हैं, मओ अधिक पतला होता हैं वही वजन में कम होता है तथा यह देवदूष्य युगल रूपातिशय वाला होनेसे नयनोंको सुख उपजाने वाला था वर्णस्पर्श से - अतिशायी वर्ण से और अतिशायी स्पर्श से युक्त था हय-अश्व के मुखकी लाला-जैमी कोमल होती है ऐसा ही कोमल यह था आगन्तुक मल से विहीन होने के कारण यह निर्मल था. इसकी जो किनार थी वह सुवर्ण- से खचित थी. आकाशस्फटिक अतिस्वच्छस्फटिक विशेष की तरह इसको दीप्ति थी. यह महत छिद्ररहित था. अर्थात् नवोन था. और दिव्य था-दिव्यकान्ति से सुशोभित था. इस तरह के इन विशेषणों से युक्त देवदूष्य युगल को पहिराकर फिर उन्होंने उनके गले में हार पहिराया લેપન કર્યું. લેપન કરીને પછી તેમણે દેવદૂષ્ય યુગલ ધારણ કરાવ્યું. એ દેવદૂષ્ય યુગલ વજનમાં એટલું હલકુ હતું કે તે નાકના શ્વાસોચ્છવાસથી પણ હાલતુ હતુ. આ પ્રમાણે અહીં દેવદુષ્ય હોય છે યુગલનું છીણ પણું પ્રકટ કરવામાં આવેલ છે. જે વધારે સ્ત્રી ઓછું હોય છે. તેમજ એ દેવદૂષ્ય જુગલ રૂપતિશયવાળું હોવાથી નયને ને સુખ આપનાર હત. વર્ગ પશથી -અતિશયી વર્ણ થી અને અતિશાયી સ્પર્શ થી–એ યુક્ત હતું. હયઅશ્વના મુખની લાળ જેવી કેમલ હોય છે, એવું જ કેમલ એ હતું. આગતુક મળથી વિહીન હોવા બદલ એ નિમલ હતું. એની જે બેડરડતી તે સુવર્ણ ખચિત હતી. આકાશ ફિટિક અતિ સ્વચ્છ સ્ફટિક-વિશેષની જેમ એની દીપ્તિ હતી. એ અહત છિદ્ર રહિત હત. એટલે કે નવીન હતું. અને દિવ્ય હતું. દિવ્ય કાંતિથી સુશોભિત હતું. આ પ્રમાણેના એવિશેષણેથી યુક્ત દેવદૂષ્ય યુગલ ને ધારણ કરાવીને પછી તેમણે તેમના ગળામાં હાર Page #957 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९४३ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सु० ३० भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयक निरूपणम् पिना एवं अद्धहारं गावलिं ' इत्यादि । एवम् एतेन अभिलापेनार्द्धहारादीनि वक्तव्यानि यावन्मुकुटमिति तत्र अर्द्ध हारं नवसरिकम् एकाबलीम् मुक्तावलीम मुक्ताफलमयीम्, कनकावलों कनकमणिमयीं रत्नावलीम् रत्नमयीम् प्रालम्बं तपनीयमयं विचित्रमणिरत्नभक्तिचित्रं शरीरप्रमाणम् आभरणविशेषम् अङ्गदे त्रुटिके च बाहुभूषणे कटके हस्तभूषणे दशमुद्रिकानन्तकं- हस्ताङ्गुलिमुद्रिका दशकम्, कटिसूत्रिकं पुरुष कट्याभरणम् वैकक्ष्यसूत्रकम् उत्तरासङ्गम् दुपट्टा इति भाषाप्रसिद्धम् मुखीं मृदङ्गाकारमाभरणम्, कण्ठमुरखों - कण्ठासन्नं तदेव, कुण्डले प्रसिद्धे, चूडामणि शिरोविशिष्टभूषणम् चित्ररत्नोत्क विचित्ररत्नोपेतं मुकुटं ते देवा: पिनह्यन्ति इति ' तयणंतरंच णं ददरमलय सुगंfree गंधेहिं गायाईं अब्भुक्खेतिं' तदनन्तरं च खलु दर्दरमलयसुगन्धितैः दर्दरमलयहार पहिराकर फिर अहार एकावची मुकावली रत्नावली इन गछे के आभूषणों को पहिराया १८ लर का हार होता है ९ नवलरका अर्ध हार होता है प्रालम्ब पहिराया यह प्रालम्ब एक प्रकार का आभरणविशेषरूप होता है. तपनीय सुवर्ण का यह बना हुआ होता है. और अनेक प्रकार के मणियों और रत्नों के द्वारा इसमें चित्र बने रहते हैं । तथा यह जितना शरीर होता है उसी प्रमाण में बना हुआ होता है । इसके पहिराने के बाद फिर उसे अङ्गद पहिराये गये त्रुटित बाहु के आभूषण पहिराये गये. कटक हाथके आभूषण बलय पहिराये गये दश अंगुलियो में दश मुद्रिकाएं पहिराइ गइ कटि में कटिसूत्र करधौनी पहिराया. शरीर पर - दुपट्टा उड़ाया, कानों में मुरवी पहिराई कंठ में मुखी - कानों के चारों ओर कानों को घेरनेवाला आभूषण - पहिराया यह कान से निकल जाने पर कंठ तक लटकने लगता है इसलिये इसे कंठमुरवी कहा गया है, पुनः कानों में कुंडल भी पहिराये माथे पर चूडामणि शिरोभूषण-पहिराया ( तयणंतरं च णं ददरमलयसुगन्धिरहिं गंधेहिं गायाइ अब्भुक्खेति ) इन सब आभूषण પહેરાબ્યા. હાર પહેરાવીને પછી અધ હાર, એકાવલી મુક્તાવલી, રત્નાવલી અને ગળાના આભૂષણ્ણા પહેરાવ્યા. ૧૮ લડીનેા હાર હોય છે. હું લડીનેા અ` હાર હાય છે. પ્રાલમ પહેરાવ્ચે-એ પ્રાલખ એક પ્રકારનું આભરણુ વિશેષ રૂપ હાય છે. તપનીયસુવણ નિર્મિત એ હોય છે. અનેક પ્રકારના મણુિએ અને રત્ના વડે એમાં ચિત્ર અનેલા હોય છે, તેમજ એ શરીરના પ્રમાણના આધારે બનેલ હોય છે. એ પહેરાવ્યા પછી તે રાજાને અગદ' ધારણ કરાવવામાં આવ્યા. ત્રુટિત બાહુના-માણેા પહેરાવવામાં આવ્યા. કટક હાથના આભૂષણે, વલયે પહેરાવામાં આવ્યા. દશ આંગળી એમાં દશ મુદ્રિકાએ પહેરાવી. કટિમાં ટિસૂત્ર એટલે કે કઢોરા પહેરાવત્રામાં આવ્યેા. શરીર ઉપર એક મૂકવામાં આવ્યેા. કાનામાં કુંડલ પહેરાવવામાં આવ્યા. કંઠમાં સુરવી એટલે કે કાનામાં કાનાને ચામેરથી આવૃત કરી તે એવુ' આભૂષણ પહેરાવવામાં આવ્યું. એ કાનમાંથી નીકળી જાય ત્યારે કંઠે સુધી લટકવા માંડે છે. એથી જ એ આભૂષણ ને કંઠસુરવી કહેવામાં આવેલ છે. ફ્રી કાનામાં કુ ળે પહેરાવ્યા, મસ્તક ઉપર ચૂડામણિ-શિરાભૂષશુ પહેરાવ્યું. અને ત્યાર ખાદ વિચિત્ર રત્નાથી युक्त भुट पराववामां आव्या (तयणंतरं च णं ददरमलय सुगंधिपहिं गंधेहिं गाया Page #958 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्बृद्धीपप्राप्तिसूत्रे सम्बन्धिनो ये सुगन्धाः शोभनवासाः चन्दनवृक्षादयस्तेषां गन्धो येषु द्रव्येषु ते तथा भूतास्तैः गन्धैः काश्मोरकपूरकस्तुरोप्रभृति गन्धवद्रव्यैः गात्राणि अभ्युक्षन्ति सिञ्च- . न्ति ते देवाः भरतस्य । अयं भाषः ददेरमलय गिरिसम्बन्धिचन्दनादिमिश्रितानेकमुरभिद्रव्यघुसृणरसच्छटकान् कुर्वन्ति भरतवासंसौति भरतशरोरे च 'दिव्वं च सुमणोदाम पिणति' च पुनः दिव्यं सुमनोदाम कुसुममालां पिनद्यन्ति परिधापयन्ति किंबहुना? उक्तेनेति शेषः 'गंठिमवेढिम जाव विभूसियं करेंति' ग्रन्थिमवेष्टिम यावद् विभूषितं कुवन्ति अत्र यावत्पदात् 'पुरिमसंघाइमेणं चउबिहेण मल्लेणं कप्परुक्खयं पिव समलंकिय' त्ति ग्राह्यम् ग्रन्थन ग्रन्थः ते निवृत्तं ग्रन्थिमम् यत् सूत्रादिना ग्रथ्यते तद् ग्रन्थिममिति भावः, ग्रथितं सद् वेष्टयते यत्तद् वेष्टिमम् येन वंशशला कादिमय पञ्जरादि पूर्यते तद्वत् पूर्यते इति पूरिमम्, यत्परस्परं नालं संघात्यते तत् संघातिमम् एवंविधेन तेन - ग्रन्धिमवेष्टिमपूरिमसंघातिमेन चतुर्विधेन माल्येन कल्पवृक्षमिव समलंकृतविभूषितं भरतचक्रिवर्तिनं कुर्वन्ति ते देवाः अथ कृताभिषेको भरतो यत्कृतवान् तदाह-. 'तएणं से भरहे राया महया महया रायाभिसेएण अभिसिंचिए समाणे कोडुबियपुरिसे सद्दावेइ' ततः खलु तदन्तरं किल स भरतो राजा महता महता राज्याभिषेकेण अभिषिक्तः सन् कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति आवयति 'सदावित्ता' शब्दयित्वा आहूय 'एवं वयासी' एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत् उक्तवान् 'खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया' हस्थिखंधवरगया द्वारा भरतचक्री के शरीर की सजावट हो जानेके बाद फिर उन देवों ने उनके शरीर पर चन्दन वृक्ष आदि का गंध जिन्हो में संमिलित हैं ऐसे काश्मीर केशर, कर्पूर और कस्तुरी आदि सुगन्धित द्रव्यों को छिड़का (दिव्वं च सुमणोदामं पिणद्वेति) और फिर पुष्पो की मालाएँ उन्हें . पहिराई अधिक क्या कहा जाय-(गंठिमवेढिम जाव विभूसियं करेंति) उन देवों ने उस भरत चक्री को प्रन्थिम, वेष्टिम, पूरिम और संघातिम इन चारों प्रकार की मालाओं से ऐसा सुशोभित एवं अलंकृत कर दिया कि मानो यह कल्पवृक्ष हो है । (तएणं से भरहे राया महयार रायाभिसेएण अभिसिंचिए समाणे कोडुबियपुरिसे सद्दावेइ) जब भरत नरेश पूर्वोक्त प्रकार : से राज्याभिषेक की समस्त सामग्री से अभिषिक्त हो चुके-तब उन्होंने कौटुम्बिक पुरुषों को अब्भुक्खे ति) को सव आभूष। 43 १२तयीन शरीर ने समस्त शन पछी वा એ તેમના શરીર પર ચંદન-વૃક્ષ આદિની સુગંધિ જેમાં સમ્મિલિત છે એવા કાશ્મીર કેશર. २ भने ४२तूरी वगेरे सुगधित द्रव्य। ७iटूया. (दिव्वं च सुमणोदामं पिणद्धे ति) मन पछी पुयानी भाजाय a सजन धारण ४२शवाम मावी वधारे शुडीस (गठिमवेढिम जाव विभूसियं करेति) ते वो ते भरत यीन अन्यिम, वेष्टिम, पूरिम सने संधातिम એ ચારે પ્રકારની માળાએથી એવી રીતે સુશોભિત તેમજ સમલંકૃત કરી દીધા કે જાણે a४६५वृक्ष ४ नाय ! (तए ण से भरहे राया महया २ रायाभिसेपण अभिसिंचिए समाणे कोई बियपुरिसे सदावेइ) न्यारे भरत नरेश पूरित प्रारथी शल्याभिषनी सा साभश्री 43 मनिषित २६ २७या त्यारे तेम पौमि पुरुषोने वय1. (सहावित्ता . Page #959 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तु.३ वक्षस्कारः सू० ३१ भरतराशः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् ९४५. विणीयाए रायहाणीए सिंघाडगतिगचउक्कचच्चरजाव महापहपहेसु महया महया सद्देणं उग्घोसेमाणा उग्धोसेमणा उस्पुक्क उक्करं उक्किट्ठ अदिज्ज अमिज्ज अब्भडपवेसं अदंडकदंडिम जावं सपुरजणजाणवयं दुवालस संवच्छरियं पमोयं घोसेड घोसित्ता ममेय माणत्तियं पच्चप्पिणहत्ति' तत्र क्षिप्रमेव शीघ्राति शीघ्रमेव भो देवानुप्रियाः! यूयं हस्तिस्कन्धवरगताः श्रेष्ठहस्तिस्कन्धेषु आरूढाः सन्तः विनीताया राजधान्याः शृङ्गाटकत्रिकचतुष्कचत्वर यावद् महापथपर्थेषु स्थानेषु महता महता शब्देन उद्घोषयन्तः उदघोषयन्तः जल्पन्त: जल्पन्तः आभीक्ष्ण्ये द्विवेचनम् उच्छुल्कम् उत्करम् उत्कृष्टम् अदेयम् अमेयम् अभटप्रवेशम् अदण्डकुदण्डिमम् यावत् सपुरजनजानपदम् द्वादशसंवत्सरिकम् प्रमोदं घोषयत घोषयित्वा मम एतामाज्ञप्तिका प्रत्यर्पयत इति तत्र द्वादशसम्वत्सरिकम् द्वादशसंवत्सराः वर्षाणि कालो मानं यस्य स द्वादशसंवत्सरिकस्तं प्रमोदहेतुत्वात् प्रमोदः उत्सवस्तं घोषयत उच्चस्वरेण प्रकाशयत कीदृशं प्रमोदं तत्राह-उच्छुल्कमित्यादि । उन्मुक्तं त्यक्तं शुल्क विक्रेतव्य वस्तु प्रति राजदेय द्रव्यं यस्मिन् प्रमोदे स तथाभूतस्तम् तथा उत्करम् उन्मुक्तः त्यक्तः करः गवादीन् प्रति प्रतिवर्ष राजदेयं द्रव्यं यस्मिन् स तथाभूतस्तम्, तथा उत्कृबुलाया-(खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! हत्थिखंधवरगया विणीयाए रायहाणीए सिंघाडगतिगचउक्कचच्चर महया २ सहेण उग्घोसेमाणा २) हे देवानुप्रियो ! तुम सब हाथी के ऊपर बैठकर बड़े जोर से विनीता राजधानी के जितने भी शृङ्गाटक, त्रिक, चतुष्क, चत्वर, आदि महापथ तक के मार्ग हैं उनमें सब में ऐसी घोषणा करो कि (उस्सुक्कं उक्कर उक्किट्ठ अदिज्ज अमिज अब्भडपवेसं अदंडकुदंडिमं जाव सपुरजणजाणवयं दुवालससंवच्छरियं पमोयं) पुरवासी समस्त जन और मेरे राज्य में रहनेवाले जन सब १२ वर्ष तक उत्सव करें-उस उत्सव में विक्रेतव्यवस्तु पर जो राज्य की ओर से टेक्स लिया जाता है वह माफ किया गया है गाय आदि जानवरों पर जो प्रतिवर्षे कर राज्य की ओर से निर्धारित किया हुआ है यह भी माफ कर दिया गया है, बेचने पर जो सरकारी टेक्स लिया जाता है वह भी माफ कर दिया गया है तथा मुनाफा से वस्तु बेचकर जो द्रव्य अर्जित किया जाता है, वह पवे घयाली) भने मारावीने २॥ प्रमाणे ४७यु.(त्रिपामेव भो देवाणुप्पिया! हस्थिधवर विणीयाए रायहाणीए, सिंधाटगतिगचउक्कचच्चर महया २ सदेण उग्घोसेमाणा ૨) હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે સર્વે હાથી ઉપર બેસીને ખૂબ જોરથી વિનીતા રાજધાની નો જેટલાંઠંગાટક, ત્રિકે, ચતુ કે, ચત્વરો વગેરે મહાપથેના માગે છે, તે સર્વમાં એવી An (उस्सुक्कं उक्करं उकि अदिग्ज अभिज्ज अब्भडपवेसं अदंडकुदंडिम माव सपरजणाणवयं दुवालसर्सवच्छरियं पमोय) पुरवासी नाभाशयमां રહેનારા અને સર્વે ૧૨ વર્ષ સુધી ઉત્સવ કરે. તે ઉત્સવ માં વિકેય વસ્તુ ઉપર જે રાજા તરફ શી ટેકસ (કર) લેવામાં આવે છે, તે માફ કરવામાં આવેલ છે. ગાય વગેરે પશુઓ પર જે દર વર્ષે રાજ તરફ થી કર નિયોરિત કરવામાં આવેલ છે તે પણ માફ કરવામાં આવેલ છે. વસ્તના વિય ઉપર જે સરકારી ટેક્સ લેવામાં આવે છે તે પણું માફ કરવામાં ..११९: Page #960 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९४६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे ष्टम् उत् उन्मुक्तं त्यक्तं कष्टं कर्षणम् लभ्यवस्तुतो मूल्यकर्षणमित्यर्थः यस्मिन् स तथा भूतस्तम् तथा अदेयम् विक्रयनिषेधेन न विद्यते देयं दातव्यद्रव्यं यस्मिन् स तथा भूतस्तम् विक्रयकररहितम् इत्यर्थः पुनः कीदृशम् अमेयम् क्रयविक्रयनिषेधेन न विद्यते मेयं मातुं योग्यं वस्तु यस्मिन् स तथाभूतस्तम् क्रयवस्तुन एतावदेव प्रमाणं क्रिय वस्तुन तावदेव नियमरहितम् पुनः कीदृशम् अभटप्रवेशम् न विद्यते भटानां राजपुरु पाणां प्रवेशः कुटुम्बगृहेषु यस्मिन् स तथाभूतस्तम् द्वादशवर्षपर्यन्तं कोऽपि राजपुरुषः कस्यापि गृहे नागच्छतु इत्यर्थः पुनः कीदृशम् अदण्डकुदण्डिमम् दण्डेन लभ्यं द्रव्यं दण्डः कुदण्डेन निर्वृत्तं कुदण्डिमं राजद्रव्य तन्नास्ति यस्मिन् स तथाभूतस्तम्, अत्र च दण्डो नाम यथापराधं राजग्राह द्रव्यम् कुदण्डस्तु राजकर्मचारिणां प्रज्ञाद्यपराधात् अपराधिनो -महत्यपराधे अल्पम् अल्पापराधे चाधिकं यथोचितरहितरहितं राजग्राह द्रव्यमिति विज्ञेयम् । यावत् सपुरजनजानपदं द्वादशसंवत्सरिकं प्रमोदम् उत्सव घोषयत घोषयित्वा ममतामातिकां प्रत्यर्पयत समर्पयत अत्र यावत्पदात् अधरिमम् गणिकावर नाटकीयकमुनाफा भी माफ कर दिया है अर्थात् जिस मूल्य से जो वस्तु बाहर से आवे - वह वस्तु उसी मूल्य से बेंची जावें इसमें क्षतिकी पूर्ति राज्य की ओर से होगी नाप तौलसे कोई वस्तु नहीं बेची जावेगी तथा कुटुम्बी जनों के घरों में १२ वर्ष तक राज्य के किसी भी कर्मचारी का प्रवेश नहीं होगा क्योंकि वह वर्जित कर दिया गया है किसी भी प्रजाजन पर या राजकर्मचारी पर अपराध के होने पर या जो जुर्माना लिया जाता है वह १२ वर्ष तक नहीं लियां जावेगा अपराध के होने पर अपराध की मात्रा के अनुसार राजग्राह्य द्रव्य का नाम दण्ड हैं और राजकर्मचारी की भूल होने पर बड़े अपराध में थोड़ा राज्यग्राम लेना और थोड़े से अपराध हो जाने पर अधिक द्रव्य लेना - जुर्माना कर देना यह कुदण्ड है- ये दोनों प्रकार के दण्ड राज्य की तरफ से १२ वर्ष तक स्थगित ( माफ कर दिये गये हैं. इस प्रकार की घोषणा करके" मुझे इसकी पीछे खबर दो यहां पर यावत्पद से - " अधरिमम्, गणिकाઆવે છે. એટલે જે કિંમતમાં જે વસ્તુ મહારથી આવે તે વસ્તુ તેજ કિંમતમાં વેચવામાં આવે. એમાં ક્ષતિ પૂર્તિ રાજા તરફથી કરવામાં આવશે. માપ તેલ થી કાઈ પણ વસ્તુ વેચવામાં આાવશે નહિં. તેમજ કૌટુંબિક માણસેાના ઘરમાં ૧૨ વર્ષ સુધી રાજ્યના કાઈ પણ કમ ચારીના પ્રવેશ થશે નહીં. કેમકે એ અંગે આજ્ઞા કરવામાં આવી છે. કાઈ પણ પ્રજાજન અથવા રાજકમ ચારી ઉપર અપરાધ હાવા બદલ જે જુર્માના કે અર્થ ઈ ડ લેવામાં આવે છે તે ૧૨ વર્ષ સુધી લેવામાં આવશે નહી. અપરાધ થાય અને તે અપશયની માત્રા મુજબ રાજગ્રાહ્ય દ્રવ્યનું નામ દંડ છે. અને રાજકર્મચારીની ભૂલ થાય ત્યારે મોટા અપરાધ બદલ કમ રાજગાદી લેવા, અને નાના અપરાધ યિ ત્યારે વધરિ દ્રવ્ય કેવું દડ કરવા એ કુદંડ છે. એ મને પ્રકારના ઈંડા રાજ્ય તરફ થી ૧૨ વર્ષ માટે સ્થગિત કરવામાં આવે છે એટલે કે માž કરવામાં આવે છે. આ પ્રમાણે ઘેષણા કરીને મને એ અંગેની अमर आयो, अहीं यावत् यह थी “अधरिमम्, गणिकावरनाटकीय कलितम्, अनेक 3 Page #961 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका ०३ वक्षस्कारः सू० ३१ भरतराज्ञः राज्याभिषेक विषय कॉनरूपणम् ९४७ लितम् अनेक तालाचरानुचरितम् अनुद्भूतमृदङ्गम् अम्लानमाल्यदामानम् प्रमुदित मक्री - डितसपुरजनजानपदम् विजयवैजयिकम् इति ग्राहम् पुनः कीदृशमुत्सवम् अधरिमम् न विद्यते धरिमम् कस्यापि ऋणद्रव्यं यस्मिन् स तथाभूतस्तम् अयम्भावः उत्तमर्णाधमर्णाभ्यां परस्परम् ऋणनयनार्थं न विवदनीयम् उत्सवेऽस्मिन् राजगृहात् देयद्रव्यं नीत्वा अधमर्णेन उत्तमर्णाय दातव्यमिति पुनः कीदृशम् गणिकावरनाटकीयकलितम् गणिकाबरैः विलासिनी प्रधानैः नाटकीयैः नाटकप्रतिबद्धपात्रैः कलितः शोभितो यः स तथा भूतस्तम् चतुर्गणिकायुक्तमुत्सवं कुरुत न तु व्यभिचारार्थम् अनेकतालाचरानुचरितम् अनेके ये ताळाचराः प्रेक्षाकारि विशेषास्तैरनुचरितः सेवितो यः उत्सवः स तथाभूतस्तम् तथा अनूहून मृदङ्गम् अनु आनुरूप्येण मृदङ्गसम्बन्धिविधिना उध्दूताः कलाकौशलदर्शनार्थम् ऊर्ध्वं क्षिप्ताः मृदङ्गाः यस्मिन् स तथा भूतस्तम् मृदंगादिवाद्ययुक्तम् तथा अम्लानमाल्यदामानम् अम्लानानि म्लानरहितानि माल्यदामानि पुष्पमालाः यस्मिन् स तथाभूतस्तम् अभिनवमालायुक्तमुत्सर्वं कुरुत इत्यर्थः पुनः कीदृशम् प्रमुदितप्रकोडित सपुरजनजानपदम् प्रमुदिताः सानन्दा प्रक्रीडिता तत्र क्रीडितुमारब्धाः सपुरजनाः अयोवर नाटकीय कलितम्, अनेकतालाचरानुचरितम्, अनुद्भूतमृदङ्गम्, अम्लानमाल्यदामानम्, प्रमुदितप्रक्रीडितसपुरजनजानपदम्, विजयवैजयन्तीकम् " इस पाठ का ग्रहण हुवा है इस गृहोत पाठ का भाव यह है ऋणदाता और ऋणगृहीता इन दोनों को अपना ऋण वसूल करने के लिये परस्पर में लड़ाइ झगडा करना या उसपर कचहरी में जाकर अभियोग दायर करना ये सब बाते १२ वर्ष तक बन्द कर दी गई है. कर्जदार अपने कर्ज को चुकाने के लिये राज्य कोष से पैसा ले जावे और ऋण दाता के ऋण की पूर्ति कर देवे गणिकाजनों द्वारा १२ वर्ष तक - जनता इस उत्सव में मनमाना उत्सव करावे कोइ इनके साथ व्यभिचारक्रिया न करें अनेक - प्रेक्षाकारी विशेषों से यह उत्सव आसेवित होता रहे. अपनी अपनी कला मे कुशलता दिखाने के लिये मृदङ्गवादक जन खूब जिस प्रकार से बजाने में उनको वादन कुशलता प्रगट होसके इस प्रकार प्रकट करने में स्वतन्त्र हैं, इस उत्सव में पुष्प मालाओं का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया तालावरानुचरितम्, अनुद्भूतमृदङ्गम्, अम्लानमाल्यदामानम्, प्रमुदितप्रकीडितसपुरजनजानपदम् विजयवैजयन्तिकम् ” से पाठ श्र थयो छे से शृडीत पाहतो लावा પ્રમાણે છે ઋણ દાતા અને ઋણુ ગૃહીતા એએ બન્નેને ઋણુ સૂલી માટે પરસ્પર લવું, કાટમાં ફરિયાદ કરવી અને કેસ દાખલ કરવા, એ સર્વ વાતા ૧૨ વર્ષ સુધી સ્થગિત કરવામાં આવી છે. કદાર પેાતાના કને ચુકત્રવા માટે રાજ્ય કાષથી નાણાં લઈ જઈશકે છે અને આમ ઋણુ દાતાના ઋણની પૂર્તિ કરી દેવી. ગણિકાઓ વડે ૧૨ વર્ષ સુધી જનતાના એ ઉત્સવમાં ઈચ્છા મુજબ ઉત્સવા આયાજિત કરાવડાવે. કાઈ તેમની સાથે વ્યભિચાર કરે નહી. અનેક પ્રેક્ષાકારી વિશેષેાથી એ ઉત્સવ આસેવિત થાય. પેાત પેાતાની કળામાં કુશળતાં ખતાવવા માટે મૃદંગ વાદક જે રીતે વગાડવાથી તેમની કુશળતા પ્રકટ થાય તે રીતે વગાડીને કુશળતા બતાવી શકે છે. એ ઉત્સવમાં ફૂલની માળાઓના પ્રચુર માત્રામાં ઉપયોગ Page #962 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९४८ जेम्पूछीपप्रज्ञप्तिसूत्र ध्यावासि ननसहिताः जनपदाः कोशलदेशवासिनो जनाः यत्र स तथाभूतस्तम्, तथा विनयवैयिकम् अतिशयेन विजयो विजयः स प्रयोजनं यस्मिन् स तथाभूतस्तम् एतावद्विशेषणविशिष्टं द्वादशसंवत्सरिकं प्रमोदम् उत्सवमुद्घोषयत उच्चस्वरेण सर्वप्रजाजनान् अवबोधयत इति घोपयित्वा ममैतामाज्ञप्तिका प्रत्यर्पयत समर्पयत इति,अथ ते कौटुम्बिकपुरुषाः राज्ञ आज्ञानुसारेण यथा प्रवृत्तवन्त स्तथाऽऽह 'तएणं' इत्यादि । 'तएणं ते कोडुनिपुरिसा भरहेण रणा एवं वुत्ता समीणा हट्टतुट्ठचित्तमाणंदिया पीइमणा हरिसवससिपमागहियया विणएणं वयण पडिसुणेति' ततः खलु तदनन्तरं किल ते कौटुम्बिकपुरुषा. भरतेन राज्ञा एवम् उक्तप्रकारेण उक्ताः आज्ञप्ताः सन्तः हृष्टतुष्टचित्तानन्दिताः प्रीतिमनसः परमसौमनस्यिताः हर्षवशविसर्पद हृदयाः भूत्वा विनयेन विनयपूर्वकम् वचनं प्रतिशण्वन्ति स्त्रीकुर्वन्ति 'पडिसुणित्ता' प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य 'खिप्पामेव हत्थिखंधवरगया जाव घोसंति' क्षिप्रमेव शीघ्रमेव हस्तिस्कन्धवरगताः श्रेष्ठहस्तिस्कन्धेषु समारूढाः सन्तः ते कोटुम्बिकपुरुषाः यावद् घोषन्ति अत्र यावत्पदात् विनीतायाः राजधान्याः शनाटक त्रिकवतुष्कचत्वरचतुर्मुखमहापथपथेषु महता महता शब्देन उद्घोषयन्त उद्घोषयन्तः जावे कोशल देशवासी समस्त जन अयोध्या वागी जनों के साथ मिलकर आनन्द पूर्वक भिन्न २ प्रकार की क्रीडाओं से खेल तमाशों से इस उत्सव को सफल करें-जगह २ इस उत्सव की माराधनामें विनय वैजन्तियां फहराई जावे इस प्रकार के इन पूर्वोक्त विशेषणों वाले उत्सव होने की तुम घोषणा करो (तएणं ते कोडुंबियपुरिसा भरहेण रण्णा एवं वुत्ता समाणा हट्ट तु चित्ताणंदिया पाइमणा हरिसवसविसप्पमाणहियया विणएणं वयणं पडिमुणंति) इस प्रकार भरत राजा द्वारा आज्ञप्त हुए वे कौटुम्बिक पुरुष बहुत अधिक हृष्ट और तुष्ट चित्त हुए उनका मन प्रीतियुक्त हो गया उनका हृदय आनन्द से उछलने लगा बड़ी विनय के साथ उन्हों ने अपने स्वामी की आज्ञा के बनने को स्वीकार किया (पडिसुणित्ता खिप्पामेव हथिखंधवरगया नाव घोसे ति) स्वीकार करके वे शीघ्र ही हाथी पर बैठ कर अयोध्या राजधानी के शृङ्गाटक आदि मार्गोपर गये . और जोर २ से उच्छुल्क आदि पूर्वोक्त विशेषण संपन्न उत्सव होने को घोषणा करने लगे કરવામા આવે. કેશલ દેશ વાસી સમeત જને અયોધ્યાવાસી જના સાથે મળીને આનંદ પૂર્વક ભિન્ન ભિન્ન પ્રકારની કીડાઓથી-રમત થી એ ઉત્સવને સફળ બનાવે. ઠેક-ઠેકાણે એ ઉત્સવની આરાધનામાં વિજયજયન્તીઓ. લહેરાવવામાં આવે. આ પ્રમાણે એ પૂર્વોક્ત વિશેષ aliस मोनी तमे घोषः। ४२. (तएण ते कोड बियपुरिसा भरहेण रण्णा एवं वुत्ता साणा हट्ट-तुट्ट चित्ताणंदिया पीहमणा हरिसवसविसप्पमाणहियया विणएणं वयण पंडिसगंति) मा प्रम भरत २i डे मा थाहामि पुरुषो मत्यधिष्ट आने તુષ્ટ તતવાળા થયા. તેમનું મન પ્રીતિયુક્ત થયું અને તેમનું હૃદય આનંદ થી ઉછળવા લાગ્યું मती नम्रतापूर्व४. मणे पाताना स्वामीनी माज्ञाना क्या स्वीजरी सीधी. (पडिसुणित्ता त्रिपामेव हत्थिखं बबरगया जाव घोसेंति) वी॥२ ४शन त। शीध्र हाथी ५२ सीन એવા રાજધાનીના શ્રે ગાટક આદિ માર્ગો ઉપર ગયા અને જોર જોરથી ઉછુક આદિ Page #963 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सु० ३१ भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम् । उच्छुल्कम् उत्करम् उत्कृष्टम् अदेयम् अमेयम् अभटप्रवेशम् अदण्डकुदण्डिमम् अधरिमम् गणिकावरनाटकीयकलितम् अनेकतालाचरानुचरितम् अनुध्दतमृदंगम् अम्लानमाल्यदामानम्, प्रमुदितप्रक्रीडितसपुरजनजानपदम्, विजयवैजयिकम् इति ग्राह्यम्, तत्र.शङ्गाटकं 'सिंघाडा' इति भाषा प्रसिद्ध जलजफलं तदाकारं स्थानं त्रिकोणमित्यर्थः, त्रिकम्मिलितत्रिमार्गस्थानम्२,चतुष्कम् यत्र चत्वारो मार्गाःमिलन्ति तत् 'चोराहा' इति भाषाप्रसिद्धम् ३, चत्वरम् - बहुमार्गसंमेलनस्थानम् चतुर्मु खम्-चतुरिस्थानम् आगन्तुका दीनां विश्रामस्थानम् ५, महापथ:-राजमार्गः ६,पन्थाः-रथ्यामार्गः तेषु सप्तसु .स्थानेषु ते कौटुम्बिकपुरुषाः पट्टहस्तिस्कन्धारूढाः सन्तः - उच्छुल्कमित्यादि विशेषणविशिष्टं द्वादशसंवत्सरिकं . राज्याभिषेकोपलक्षकं प्रमोदम् उत्सवं घोषयन्ति उच्चस्वरेण सर्वजनान् अवबोधयन्तीत्यर्थः 'घोसित्ता' घोषयित्वा 'एयमाणातयं पच्चप्पिणंति' ते कोटुम्बिकपुरुषाः एताम् उक्त प्रकारिकाम् आज्ञप्तिकां राज्ञे भरताय प्रत्यापर्यन्ति समर्पयन्तिा .. अथ भरतो यत्कृतवान् तदाह 'तए णं से' इत्यादि । 'तएणं से भरहे राया महया महया रायाभिसेएणं अभिसित्ते प्रमाणे सोहासणाओ अब्भुटेइ' ततः खलु तदनन्तरं किल स भरतो राजा महता महता राज्याभिषेकेण अभिषिक्तः सन् सिंहासनात् अभ्यु. त्तिष्ठति 'अन्भुट्टित्ता' अभ्युत्थाय. 'इत्थिरयणेणं जाव णाडगसहस्सेहि सद्धि संपरिखुडे अभिसेयपेढामो पुरथिमिल्लेण तिसोवाणपडिरूवएणं पच्चोरुहंति' स्त्रीरत्नेन सुभ. द्रया. यावत् नाटकसहस्त्रैः साद्धं संपरिवृतः संपरिवेष्टितः सन् स भरतो राजा अभिषेकसिंधाडे के आकर का जो मार्ग होता है उसका नाम शृङ्गाटक है जहां पर तीन मार्ग माकर मिलते हैं उसका नाम त्रिक है. जहां पह चार रास्ता आकर मिलते हैं उसका नाम चतुष्क है. इसे चौराहा कहते हैं । अनेक मागे जहां पर आकर मिलते हैं उसका नाम चत्वर है जिस स्थानमें चार द्वार होते हैं उसका नाम चतुर्मुख है. राजमार्ग का नाम महापथ है गलिमार्ग का नाम पथ हैं (तएणं से भरहे राया महया २ रायाभिसेएणं अभिसित्ते समाणे सोहासणाओ भन्भुटेइ) भरत राजा जब उनका राज्य के योग्य अभिषेक से अभिषेक हो चुका तब वे सिंहासन से उठे और (अम्भुट्टित्ता इत्थिरयणे ण जाव णाडग सहस्से हिंसद्धि संपरिबुडे अभिसेयपीठामोपुरस्थिभिलणं तिसोवाणपडिरूपएणं पच्चोरुहति) उठकर स्त्रीरत्न के साथ २ यावत् हजारों પક્તિ વિશેષ૬ સપન ઉત્સવ જવાની ઘોષણા કરવા લાગ્યા. શિઘડાના જેવો આકાર જે માગને હોય તેનું નામ શૃંગાટક કહેવામાં આવે છે. જ્યાં ત્રણ માર્ગે આવીને મને છે. તેના નામ ત્રિક છે, અને ચારમાર્ગ મળે તેનું નામ ચતુક છે. એને ચકલે પણ કહે છે. અનેક માર્ગે જ્યાં આવીને મળે છે. તેનું નામ ચવર છેજે સ્થાનમાં ચાર દ્વાર હેય છે, તેનું નામ ચતુર્મુખ છે. રાજમાર્ગોનું નામ મહાપથ છે, ગલીના भागन नाम ५५ छ. (तएणं से भरहे राया महया २ रायाभिसेएणं अभिसिसे सम्मणे.सीहासणाओ अन्भुटेइ) 1. योग्य मेवी मनिषेविषयी भरत २ लायाविषय भयो त्यारे तसा सिंहासन परथी असा था अन अम्भुद्रित्ता इत्थिरयणे जाव णाडगसंहस्सेहिं सद्धि संपरिवुडे अभिसेयपीढाओ पुरथिमिल्लेयेण तिसोबाण Page #964 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे पीठात् पौरस्त्येन त्रिसोपानप्रतिरूपकेण प्रत्यवरोहति अवतरति अत्र यावत्पदात् द्वात्रिशता ऋतुकल्याणिका सहस्त्रैः द्वात्रिंशता जनपदकल्याणिकासहस्त्रैः द्वात्रिशता द्वात्रिशब्दद्धैः एतेषां संग्रहः व्याख्यानं तु एतेषाम् अव्यबहितपूर्वसूत्रे एव द्रष्टव्यम् 'पच्चोरुहिता' प्रत्यवरुह्य अवतीर्य 'अभिसेयमंडवामी पडिणिक्खमइ' स भरतः अभिषेकमण्डपात् प्रतिनिष्कामति निर्गच्छति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'जेणेव आभिसेक्के हस्थिरयणे तेणेव उवागच्छई' यत्रैव अभिषेक्यम् अभिषेकयोग्यं हस्तिरत्न प्रधानपट्टहस्तिनं तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'अंजनगिरिकूडसन्निभं मयवई जाव दुरूढे , अञ्जनगिरिकूटसन्निभम्-अजनपवेशृङ्गसदृशम् सादृश्यञ्च कृष्णवर्णत्वेन उच्चत्वेन च बोध्यम् गनपति पट्टहस्तिनं यावद दूरूढः आरूढ़ः अत्र यावत्पदात् नरपतिरिति ग्राह्यम् 'तए णं तस्स भाहस्स रण्णो बत्तीसं रायसहस्सा अभिसे यपेढाओ उत्तरिल लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पचोरुहति' ततः खलु तदनन्तरं किल तस्य भरतस्य राज्ञः द्वात्रिंशद्राजसहस्राणि अभिषेकपोठात् औत्तराहेणत्रिसोपानप्रतिरूपकेणप्रत्यवरोहन्ति नाटकों के साथ २ वे उस अभिषेक पीठ से पूर्व के त्रिसोपान प्रतिरूप से होकर नीचे उतरे यहां यावत् पद से जितना भी ऋतुकल्याणि का कन्याजन आदिरूप परिकर उनके साथ था वह सब गृहीत हुआ है । (पच्चोरुहित्ता अभिसे यमंडवाओ पडिणिक्खमइ) और उतर कर वे उस अभिषेक मन्डप से बाहर आये (पडिणखमित्ता जेणेव भाभिसक्के हस्थिरयणे तेणेव उवागच्छइ) और बाहर आकर वे जहां पर आभिषेक्य हस्तिरत्न खड़ा था वहां पर आये (उवागच्छित्ता अंजणगिरि कूडसणिभं गयवई जाव दूरूढें) वहां आकर वें उस अंजन गिरि के शिवा जैसे हस्तिरत्न पर यावत् चढगये-बैठ गये यहां यावत्पद से "नरपति" पद का ग्रहण हुआ है। (तरणं तस्स भरहस्स रण्णो बत्तीसं रायसहस्सा अभिसेयपेढाओ उत्तरिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएण पच्चोरुहंति) इसके वाद ३२ हजार राजाजन उस अभिषेकपीठ से उत्तर दिग्वर्ती त्रिसोपान प्रतिरूपक से होकर नीचे उतरे ॥ (तएणं पडिरूवण पच्चोरुहंति) SHIN२ खी-२ननी साथ-साथे यावत् उन्न। नानासाथસાથે તેઓ તે અભિષેક પીઠ ઉપરથી પૂર્વના ત્રિ-સો પાન પ્રતિરૂપક ઉપર થઈને નીચે ઉતર્યા. અહીં યાવત પદથી એટલે ઋતુ કલ્યાણિકાઓ વગેરે પરિકર તેમની સાથે હતો ते संगृहीत थये. (पच्चोरुहित्ता अभिसेयमंडवाओ पडिणिक्खमइ) मने तरीन तसे! a. म४५५थी बा२ मा-या. (पडिणिक्वमित्ता जेणेव आभिसेक्के इत्थिरयणे तेणेव उवागच्छह) भने हार मावान त यां मानिय स्तिरत्न तु त्यां मच्या. (उवागच्छित्ता अंजणगिरिकूडसण्णिभं गयवई जाव दुरूढे) त्या मावान तेयात અંજનગિરિના શિખર સંદશ હસ્તિન ઉપર યવત આરૂઢ થયા બેસી ગયા. અહીં યાવત્ पही "भरपति" ५४नु अणु यु. (तएणं तस्स भरहस्स रण्णो बत्तीस राय सहस्साअभिसेयपेढ़ाओ उत्तरिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पच्चोव्हंति) त्यार माह ३२ र રાજાએ તે અભિષેક પીઠ ઉપરથી ઉત્તર દિગવત ત્રિપાન પ્રતિરૂપક ઉપર થઈને નીચે Page #965 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० ३१ भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयकनिरूपणम ९५१ अक्तरन्ति 'तएणं तस्स भरहस्स रणो सेणावइरयणे जाव सत्थवाहप्पभिईओ अभि. सेयपेढाओ दाहिणिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पच्चोरुहंति'ततः खलु तस्य श्रीभरतस्य महाराज्ञः सेनापतिरत्नं यावत् सार्थवाहप्रभृतयः अभिषेकपीठात् दाक्षिणात्येन त्रिसोपान प्रतिरूपकेण प्रत्यवरोहन्ति अवतरन्ति अत्र. यावत्पदात् गाथापति वर्द्धक पुरोहितरत्नानि, त्रोणि षष्टयधिकानि३६० सूपकारशतानि अष्टादशश्रेणिप्रश्रेणयः भन्ये च बहवो राजेश्वरतलवरमाडम्बिककौटुम्बिकमन्त्रिमहामन्त्रिगणकदौवारिकाऽऽमात्यचेटपीठमर्दनगरनिगम -- श्रेष्टिसेनापतिसार्थवाहतसन्धिपाला ग्राह्याः राजेश्वरादि सन्धिपालान्तानां व्याख्यानम् अस्मिन्नेव वक्षस्कारे सप्तविंशतितमे सूत्रे द्रष्टव्यम् । अथ यया रीत्या पट्खण्डाधिपतित्रका वर्ती भरतो महाराजा विनी ताराजधानीप्रविष्टवान्तांरीतिमाह'तएणं तस्स' इत्यादि । 'तपणं तस्स भरहस्स रण्णो आभिसेक्कं हस्थिरयणं दूरूढस्स समाण स इमे अट्ठ मंगलगा पुरओ जाव संपत्थिया' ततः खलु तदनन्तरं किल तस्य भरतस्य राज्ञः आभिषेक्यम् अभिषेकयोग्य हस्तिरत्नं श्रेष्ठपट्टहस्तिनं दुरूढस्य आरूढस्य सतः इमानि स्वस्तिक १ श्रीवत्स २ तस्स भरहस्स, रणो सेणावइरयणे नाव सत्थवाहप्पभिईओ अभिसेयपेढ़ाओ दाहणिल्लेण तिसो. वाण पडिरूवएणं पच्चोरहंति) इसके बाद उस भरत नरेश का सेनापतिरत्न यावत् सार्थवाह आदिजन उस अभिषेक पीठ से दक्षिणदिग्वी त्रिसोपान से होकर नीचे उतरा यहां यावत्पदसे "गाथापतिरत्न, वर्द्धकिरत्न, पुरोहितरत्न, ३६० सूपकारजन तथा श्रेणिप्रश्रेणि जन एवं अन्य और भी राजेश्वर तलवर, माडम्बिक, कौटुम्विक, मंत्री, महामन्त्री, गणक, दोवारिक, अमात्य, चेट, पीठमर्द, नगर निगम श्रेष्ठि जन, सेनापति, सार्थवाह दूत और सन्धिपाल" इन सबका ग्रहण हुआ है ॥ (तएणं तस्स भरहस्स रण्णो भाभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरुढस्स समाणस्स इमे अट्ठ मंगलगा पुरमओ नाव संपत्थिया) भरत राजा जब भाभिषेक्य हस्तिरत्न पर अच्छी तरह से बैठ चूके तब उनके आगे सबसे पहिले वे आठ आठ की संख्या में आठ मंगळ द्रव्य प्रस्थित हुए-यहां यथाक्रम जाव शब्द यावल्पद से गृहीत तया(तपण तस्स भरहस्सरण्णो सेणावहरयणे जाव सत्थवाहप्पभिईओ अभिसेय पेनी दाहिणिल्लेण तिसोवाणपडिरूवपणं पचोरुहति) तयारमाह ते सरत नरेश नु सेनापति માવત સાથે વાહ વગેરે જ તે અભિષેક પીઠ ઉપરથી દક્ષિણ દિગ્વતી ટિસો પાન ઉપર થઈ शनीय ता. महा यावत ५६थी "गाथापतिरत्न, बद्ध किरत्न पुरोहितरस्न, ९० सपकार" तम ऋण-प्रशिनासन भी पY शरेश्वर, तवरे, मामि, और AI, मंत्रीमा, महामंत्री, गोवार, समात्यो, पेटी, पीईभी, नगरनिगम नी, सेनापति, सार्थवाडी, त। मन सन्धिपा से सवनडए थयु छे. (तरण तस्स मरहस्ल रणो आभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरुढस्ल समाणस्स इमे अट्ट अट्ठ मंगलगा पुरो माव संपत्थिया) भरत यारे मालिषय स्तिन 8५२ सारी.रीत मा३८ या ત્યારે તેમની આગળ સર્વ પ્રથમ આ પ્રમાણે આઠ-આઠની સંખ્યામાં આઠ મંગળ દ્ર સ્થિત થયા, અહી યાવત પદથી જે આઠ દ્રવ્યો સંગૃહીત થયા છે તે અહિ મંગળ કળ્યા Page #966 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९५२ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे नन्द्यावर्त्त ३ वर्धमानक ४ भद्रासन ५ मत्स्य ६ कलश ७ दर्पण ८ नामकानि अष्टाष्ट मङ्गलकानि प्रत्येकम् अष्टौ अष्टौ संमेलने सति चतुः षष्टितमसंख्यकानि मङ्गालकानि इत्यर्थः पुरतो यावत् संप्रस्थितानि यावत्पदात् यथानुपूर्व्या यथाक्रममिति ग्राह्यम् 'जोऽवि य अगच्छमाणस्स गमो पढमो कुबेरावसाणो सोचेव इहंपि कमो सक्कारजढो णेयब्वो' योऽपि च अतिगच्छतः विनीतां प्रविशतो भरतस्य क्रमः परिपाटी प्रथमः अधस्तनसूत्रो तो भरतविनीता प्रवेशवर्णकः कुबेरावसानः कुबेरदृष्टान्तभावितस्त्रावसानः स एव क्रमः इपि सत्कारविवर्जितो--सत्कारादिरहितो नेतव्यः ग्राह्यः अयं भावः पूर्वं प्रवेशे षोडशदेवसहतद्वात्रिंशद्रा जसहखादीनां सत्कारो यथा भरतेन राज्ञां विहितस्तथा नात्रेति, अस्य च सत्कारस्य द्वादशवार्षिकोत्सव निर्वत्तनोत्तरकाले एव अवसरप्राप्तत्वात् लोकपालः स भरतो राजा निजराजभवन प्रतिद्वारमागत्य हस्तिरत्नात् प्रत्यवरुद्य स्त्रीरत्नेन सुभद्रया द्वात्रिं - शता ऋतुकल्याणिकासहस्त्रैः, द्वात्रिंशता जनपदकल्याणि कासहस्त्रैः द्वात्रिंशता द्वात्रिंशद्बद्धैः हुआ उन अष्ट मंगलद्रयों के नाम - स्वस्तिक, श्रीवत्स, नन्यावर्त वर्द्धमानक, भद्रासन, मत्स्य, कलश, एवं दर्पण" इस प्रकार से हैं (जे वि य अगच्छमाणस्स गमो पढमी कुबेरासाणो सो चेव इहपि कमो सक्कारजढ़ो णेयव्वो) भरत के अयोध्या में प्रवेश करते समयं जैसा पाठ कुवेर की उपमा तकका कहा गया है वैसा हो वह पाठ यहां पर भी कळेना चाहिये परन्तु यहां केवल इतनी सी ही विशेषता है कि यहां पर सम्मिलित ज नों का सत्कार नहीं कहा गया है अर्थात् भरत ने अयोध्या में प्रवेश करते समय सोह हजार देवों का एवं हजारों राजा आदि जनों का सत्कार किया ऐसा कथन किया जा चुका है पर यहां वह कथन नहीं किया गया है क्योंकि वह कथन तो १२ वर्ष के उत्सव की परिसमाप्ति के बाद ही किया जायगा इस तरह चलते. २ वे लोकपाल भरत अपने राजभवन के प्रतिझर पर आकर हस्तिरत्न से नीचे उतरे और स्त्रीरत्न - सुभद्रा ३२ हजार ऋतुकल्याण कारिका कन्यायों ३२ हजार जनपदाप्रणियों की कल्याणकारिणि कन्यायों एवं ३२નામા આ પ્રમાણે છે स्वस्ति श्रीवत्स, नन्द्यावर्त वर्द्धमान, मद्रासन, मत्स्य, पुजश, तेभन शु. ( जे वि य अगच्छमाणस्ल गमो पदमो कुबेरावसाणो सो चेव इद्दपि कमो Rearraat doat) भरतना अयोध्या प्रवेश अगेनो पाठ देवा पाठ सुमेरनी उपभा સુધી કહેવામાં આવેલ છે. તેવેજ પાઠ અત્રે પણ સમજવા. પણ અહીં આટલી વિશેષતા છે કે અહીં સમ્મિલિત થયેલા લાકાના સત્કાર અંગે કહીં પણું કહેવામાં આવ્યું નથી. એટલે કે ભરત રાજાએ માધ્યામાં પ્રવેશ કરતી વખતે સાળ હજાર દેવા તેમજ સહુમા રાજા વગેરે લેાકાના સત્કાર કર્યાં, પરન્તુ આવું કથન અહીં કરવામાં આવ્યું નથી. કેમકે તે સ્થન તા ૧૨ વર્ષીય ઉત્સવની સિમાપ્તિ પછી જ કરવામાં આવશે. આ પ્રમાણે ચાલતાં ચાલતાં તે લોકપાલ ભરત પેાતાના રાજભવનના પ્રતિદ્વારની સામે આવીને હસ્તિરત્ન ઉપરથી નીચે હતાં અને આ રત્ન સુભદ્રા, ૩૨ હજાર ઋતુ કલ્યાણકારિકા કન્યાએ, ૩૨ હજાર જન પ્રાગણીઓની કયાણુ કારિણી કન્યા તેમજ ૩૨–૩ર પાત્ર બદ્ધ કર હજાર. નાટકોથી Page #967 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सु० ३१ भरतराज्ञः राज्याभिषेकविषयक निरूपणम् ९५३ नाटक सहस्त्रैः सार्द्धं संपरिवृत्तो भवनवरावतंसकं स्वराजभवनं प्रविशति तत्र कीदृशो राजा कीदृशं च राजभवनं तत्राह - ' जाव कुबेरोव्व देवराया कैलासं सिहरि सिंगभूअंति' यावत् सर्वतोभावेन कुबेरो देवराज इव-यथा कुबेरो देवराजः तथा अयमपि लोकपालो भरतो देवराजः यथा च कैलासं स्फटिकाचलं किं लक्षणं भवनवरावतंसकं शिखरिशृङ्ग पर्वतशिखरं तद्भूतं तत्सदृशमुच्चत्वेन भरतस्य राजभवनमित्यर्थः ' तर णं से भरहे राया मज्जणघरं अणुपविसई' ततः खलु स भरतो राजा मज्जनगृहं स्नानगृहम् अनुप्रविशति 'अणुपविसित्ता जाव' अनुप्रविश्य यावत् अत्र यावत्पदात् कृतस्नानः सन् ततो निःसृत्य भोजन मण्डपमुपागच्छति उपागत्य ' भोयणमंडवंसि सुहासणवरगए अट्टम - भत्तं पारेइ' भोजनमण्डपे भोजनशालायां सुखासनवरगतः सन् अष्टमभक्तं पारयति अहोरात्रत्रयात्मकं दिनत्रयमुपवासं कृत्वा ततः परम् अष्टमभक्तेन पारणां करोति स भरत इत्यर्थः 'पारेता' पारयित्वा पारणां कृत्वा 'भोयणमंडवाओ पडिणिक्खमइ' भोजनमण्डपात् भोजनशालातः प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति 'पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य ' उपि पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइंगमत्थएहिं जाव भुंजमाणे विहरइ' उपरि प्रासादवरगतः श्रेष्ठप्रासादमवस्थितः सन् स भरतो राजा स्फुटद्भिः मृदङ्गमस्तकैः ३२ पात्रबद्ध ३२ हजार नाटकों से युक्त हुए भवनवरावतंसक स्वराजभवन में प्रविष्ट हुए (जाव कुवेरोव देवराया कैलासं सिहरिसिंगभूअंति") जिस प्रकार कुबेर कैलास पर्वत के भीतर प्रविष्ट होता है उपी प्रकार वे भरत राजा कैलास के शिखर जैसे ऊंचे अपने राजभवन में प्रविष्ट हुए (तरणं से भरहे राया मज्जणघरं अणुपविसइ) राजभवन में प्रवेश करने के बाद वे भरत महाराजा स्नानगृह में गये और वहां अच्छी तरह से स्नान किया फिर वे वहां से निकले और निकलकर (भोयणमंडवं से सुहासणवरगए अट्टमभत्तं पारेs) भोजन मन्डप में गये वहां जाकर उन्होंने सुखासन से बैठ कर अष्टम भक्त तपस्या की पारणा की (पारेता भोयणमण्डवाओ पडिणिक्खमइ) पारणा करके फिर वे वहां से चले आये और आकर ( पडिणिक्खमित्ता उपि पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइंगमस्थएि जाव भुंजमाणे विहरइ) अपने भवनावतंसक स्वराजभवन में आये और वहां आकरके के युक्त थयेला लवनवशक्ती स्वराज भवनमा प्रविष्ट थया. (जाव कुबेरोव्व देवराया केलास सिहरिसिंगभूअंति) प्रेम उमेर सास पर्वतां प्रविष्ट थाय छे, तेमन ते भरत राज्य उपासना शिमेर वा अन्य पोताना रान भवनमा प्रविष्ट थया. (तपणं से भरहे राया मज्जणघरं अणुपविस) भवनमा प्रष्ट थया ખાદ્ય તે ભરત રાજા સ્નાન ગૃહમાં ગયા त्यांते सारी रीने स्नान यु पछी तेथे त्यांथी नउज्यां भने नीजीने (भोयण मंडवाओ सुद्दाणवरगए अट्टमभत्तं पारेइ) लोन मंडपां गया त्यांने ते सुष्णाસનમાં બેસીને અષ્ટમ लत तपस्याना पारणार्या (पारेता भोयणमंडवाओ पडिणिक्खमह) पारा पुरीने पछी तेथे त्यांथी आव्या मने मावीने (पडिणिक्खमित्ता उपि पासायवर गए कुट्टमाणेहिं मुहं गमत्थपहिं जाव भुंजमाणे विहरह) पोताना लत्रनावत सड़ स्वरानभवन १२० Page #968 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९५४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे यावद् भुजानो विहरति तिष्ठति अत्र यावत्पदात् द्वात्रिंशद्वद्धैः नाटकैः वरतरुणीसं - प्रयुक्तैः उपनृत्यमानः २ उपगीयमानः २ उपलालिज्यमानः २ महताऽहतनाट्यगीत - वादिततन्त्रीतलतालतूर्य घनमृदङ्गपटुप्रवादितरवेण इष्टान् शब्दस्पर्शरसरूपगन्धान् पञ्चविधान् मानुष्यकान् कामभोगान् इति ग्राह्यम् । अत्र स्फुटद्भिः अतिरभसा स्फालनवशात् विदद्भिः मृदङ्गमस्तकैः मृदङ्गानां मृदङ्गनामकवाद्यविशेषाणां मस्तकानि उपरितनभागास्तैः तथा द्वात्रिंशन्दद्वैः द्वात्रिंशता अभिनेतव्यप्रकारैः पात्रैः व बद्धैः उपसम्पन्नैर्नाटकैः तथा वरतरुणीसंप्रयुक्तैः वरतरुणोभिः सुष्ठु युवतिस्त्रीभिः सम्प्रयुक्तैः कृतसंप्रयोगैः उपनृत्यमानः २ नृत्यविषयी क्रियमाणः २ तदभिनयपुरस्सरं नर्त्तनात् तथा उपगीयमानः २, तद्गुणगानात्, तथा उपलालिज्यमानः २, तदीप्सितार्थ सम्पादनात् तथा महताऽहत नाट्यगीतवादिततन्त्रीतलता लतुर्यघनमृदङ्गपटुप्रवादितरवेण तत्र - महता प्रधानेन बृहता वा इत्यस्य रवेणेत्यग्रे सम्बन्धः अहतः - अनुबद्धो रवस्येति विशेषणम् नायं नृत्तं तेन युक्तं गीतं तच्च वादितानि च शब्दवन्ति कृतानि तन्त्री च वीणा तौ च हस्तौ तालाच कंशिकाः तूर्याणि च पटहादीनि इति वादिततन्त्रीतलतालतूर्याणि तानि च तथा घनो मेघः तदाकारो यो मृदङ्गो ध्वनिगाम्भीर्य साधर्म्यात् स चासौ पटुना दक्षेण प्रवादितश्च यः स घनमृदङ्गपटुप्रवादितः सचेति अहतनाट्यगीतवादिततन्त्रीतलताळतूर्यधनमृदङ्गपटुप्रवादिता इति इतरेतरद्वन्द्रः तेषां रवः तेन करणभूतेन महता रवेण शब्देन अत्र च मृदङ्गग्रहणं वाद्येषु प्रधानं बोध्यम् । इष्टान् - इच्छा विषयी कृतान् शब्दस्पर्शरसरूपगन्धान् पञ्चविधान मानुष्यकान् कामभोगान् तत्र शब्दरूपे काम स्पर्श सरगन्धा भोगा इति समयपरिभाषाः भुञ्जानः अनुभवन् विहरति तिष्ठति स भरतः इति 'तए णं से भरहे राया दुवालससंवच्छरिअसि पमोअसि समाणसि जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छन्' ततः खलु तदन्तरं किल स भरतो राजा बजते हुए मृदङ्गादिकों की तुमुल ध्वनि पूर्वक सांसारिक विविध प्रकार के कामभोगों के सुखों को भोगते हुए अपना समय व्यतीत करने लगे यहां यावत्पद से " द्वात्रिंशद्वद्वैः ना टकैः वरतरुणीसं प्रयुक्तैः अनृत्यमानः २ उपगीयमानः २ उपलालिज्यमानः २ महताऽऽहत नाटयगीतवादिततन्त्रीतलतालतूर्येष नमृदङ्ग पटुप्र वादितरवेण इष्टान् शब्दस्पर्शर सरूपगन्धान् पञ्चवि धान् मानुष्यकान् कामभोगान्" इस पाठ का ग्रहण हुआ है इन पदों की व्याख्या यथास्थान कई बार की जा चुकी है (तरणं भरहे राया दुवाल संवच्छरिअंसि मोअंसि समासि માં આવ્યા. અને ત્યાં આવીને તેએ વાગતા મૃદુ'ગાર્દિકાના તુમુલ ધ્વનિ સાથે સાંસારિક વિવિધ પ્રકારના કામભાગેાને, સુખાને ભાગવતા ૨ પેાતાના સમય પસારકરવાલાગ્યા. અહીં यावत् पहूथी " द्वात्रिंशद्बद्धैः नाटकैः वरतरुणीसं प्रयुक्तैः उपनृत्यमानः २ उपगीयमानः २ उपलालिज्यमानः २ महताऽऽहतनाट्यगीतवादिततन्त्रीतलतालतूर्यधनमृदङ्ग पटुप्रवादितरवेन इष्टान् शब्दस्पर्श र सरूपगन्धान् पञ्चविधान मानुष्य कानू कामभोगान्" એ પાઠ ગ્રહણ થયા છે. એ પદોની ન્ય ખ્યા યથાસ્થાન वामां भावी छे, (तपणं भरहे Page #969 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका १०३ वक्षस्कार-सू. ३१ भरतराशराज्याभिषेकधिषयकनिरूपणम् ९५५ द्वादशसम्वत्सरिके द्वादशसम्वत्सराः वर्षाणि कालो मानं यस्य स तथा भूतस्तस्मिन् प्रमोदे महाराज्याभिषेकजनितमहोत्सवे समाप्ते व्यतीते सति यत्रैव मज्जनगृहम् स्नानगृहं तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'जाव मज्जवराओ पडिणिक्खमई' यावद् मज्जनगृहात् स्नानगृहात् प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति स भरतः, अत्र यावत्पदात् कृतस्नानः इति बोध्यम् 'पडिणिक्खमित्ता' प्रकृतिनिष्क्रम्य निर्गत्य' जेणेत्र बाहिरिया उवट्ठाणसाला जाव सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे णिसीयई' यत्रैव बाह्या उपस्थानशाला सभामण्डपः यावत् सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखः पूर्वाभिमुखः निषीदति सिंहासने उपविशति स भरत इत्यर्थः, अत्र यावत्पदात् यत्रैव च सिंहासनं तत्रैव उपागच्छति उपागत्य इति बोध्यम् 'णिसीयित्वा' निषध उपविश्य 'सोलसदेवसहस्से सक्कारेइ सम्माणेइ' षोडशदेवसहस्राणि-षोडषसहस्त्रसंख्यकान् देवान् इत्यर्थः सत्कारयति सम्मानयति 'सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य च 'पडिविसज्जेइ' तान् देवान् प्रति विसर्जयति स्वनिवासस्थानं गन्तुम् आज्ञापयतीत्यर्थः 'पडिविसज्जित्ता' प्रतिविसर्घ्य तथाऽऽदिश्य 'बत्तीसं रायवरसहस्सा सक्कारेइ सम्माणेई'द्वात्रिंषद् राजवरसह. जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ) जब १२ वर्ष तक किया गया उत्सव समाप्त हो चुका तब वे भरत नरेश जहां पर मज्जन-स्नान-गृह-था वहां पर आये। (उवागच्छित्ता जाव मज्जणबराओ पडिणिक्खमइ) वहां भाकरके उन्होंने अच्छी तरह से स्नान किया (पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जाव सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णिसीयइ) फिर वहां से बाहर आये और बाहर आकर यावत् वे पूर्वदिशा की ओर मुख करके श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठ गये यहां आगत यावत्पद से “जहां सिंहासनथा वहां पर वे आये" इन पदों का संग्रह किया गया है (णि पीयित्ता सोलसदेवसहस्से सक्कारेइ, सम्माणेइ,) वहां बैठ कर उन्होने उन १६ हजार देवों का सत्कार और सन्मान किया (सक्कारित्ता सम्माणित्ता पडिवि. सज्जेइ) सत्कार सन्मान करके उन्हें विसर्जित कर दिया (पडिविसज्जित्ता बत्तीसं रायवरसहस्सा सक्कारेइ सम्माणेइ) देवों को विसर्जित करके फिर भरत नरेश ने ३२ हजार राया दुवाससंवच्छरिअंसि पमोयसि समाणंसि जेणेव मज्जणधरे तेणेव उवागच्छद) पारे ૧૨ વર્ષ સુધી જવામાં આવેલ ઉત્સવ સમાપ્ત થઈ ગયા ત્યારે તે ભરત મહારાજા જયો Har-नान ७-तु त्यां गया. (उवागच्छित्ता जाव मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ) यां मावान भणे सारी रात स्नान ४यु: (पडिणिक्खमित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जाव सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णिलीयइ) पछी त्यांथी मा२ मा०या मन महार આવીને યાવત્ તેઓ પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને શ્રેષ્ઠ સિંહાસન ઉપર બેસી ગયા. અહીં આવેલા યાવત પદથી જ્યાં સિંહાસન હતું તેઓ ત્યાં આવ્યા “એ પદે ગ્રહણ થયા છે. (णिसीयित्ता सोलस देषसहस्से सक्कारेइ, सम्माणेइ) त्यां सीने म त १६ र देवानी स२ मन तमनुसन्मान यु (सक्कारित्ता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) सत्तार भने सन्मान शनवाने ते भरत शनी विसतिश द्वीचा. (पडिविसज्जित्ता - Page #970 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९५६ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे स्राणि द्वात्रिंशत्सहस्त्रसंख्यकान् राजवरान् सत्कारयति सम्मानयति 'सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य 'पडिविसज्जेइ' प्रतिविसर्जयति स्ववासगमनाय आज्ञापयति स भरतः 'कारिता सम्माणिता' तान् राजवरान् सत्कार्य सम्मान्य च ' सेणावहरयणं सक्कारेइ सम्माणे ' सेनापतिरत्नं सत्कारयति सम्मानयति 'सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य च 'जाव पुरोहियरयणे सक्कारेइ सम्माणे ' यावत् पुरोहितरत्नं सरकारति सम्मानयति अत्र यावत्पदात् गाथापतिरत्नं वर्द्धकिरत्नं च ग्राह्यम् "सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य च ' एवं तिष्णिसद्वे सूवयारसए अट्ठारस सेणिप्प सेणीओ सक्कारेइ सम्माणे ' एवम् उक्तरीत्या त्रीणि षष्टानि षष्ठयfarara aartaafन त्रिषष्ट्यधिकशतसंख्यकान् सूपकारान् इत्यर्थः तथा अष्टादशश्रेणिश्रेणी: च सत्कारयति सम्मानयति 'सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य सम्मान्य च 'अण्णे य बहवे राईसरतलवर जाव सत्यवाप्यभिइओ सक्कारेइ सम्माणे ' अन्यांश्च राजाओं का सत्कार एवं सन्मान किया (सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) उनका सत्कार सन्मान करके फिर विसर्जित कर दिया (पडिविसज्जित्ता ) इन्हें विसर्जित करके (सेणावरयणं सक्कारेह, सम्माणेइ) फिर उस भरत नरेश ने सेनापतिरत्न का सत्कार और सन्मान किया (सक्कारिता सम्माणित्ता जाव पुरोहियरयणे सक्कारेइ सम्माणेइ) सत्कार सन्मान करके उसे विसर्जित कर दिया इसके बाद उसने गाथापतिरत्न का और बर्द्धकिरत्न का सत्कार सन्मान किया इन्हें सत्कृत और सम्मानित कर विसर्जित कर दिया बाद में उसने पुरोहित रत्न का सत्कार और सम्मान किया फिर उसे भी विसर्जित कर दिया ( एवं तिणिसट्टे सुवयारसए अट्ठारस सेणिपसेणीओ सक्कारेश, सम्माणेइ) इसी तरह उसने ३६० सुपकारों को सत्कृत और सम्मानित किया और उन्हें विसर्जित कर दिया १८ श्रेणि प्रश्रेणीजनों को सत्कृत सन्मानित कर विसर्जित कर दिया (अण्णेय बहवे राईसर तलवर जाव बत्तीसं रायवरसहस्सा सक्कारेइ सम्माणेइ) देवाने विसति अरीने पछी भरत नरेश ३२ डलर राजमोनो सत्र भने ते सर्व सन्मान यु (सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) तेभने। सत्हार सेने ते सर्वांनुं सम्मान उरीने भरत रान्नखे तेमने विसर्जित दीघा (पडिविसज्जित्ता) भने तेभने त्रिसति श्रीने (सेणावहरयणं सकारे, सम्माणेइ) पछी ते भरत नरेशे सेनापतिरत्न नो सत्र अने तेमनुं सन्मान ठयु मने (सक्कारिचा सम्माणित्ता जाव पुरोहियरयणे सक्कारेइ सम्माणेह) यावत्सत्र तेभन सन्मान કરીને તેમને વિસર્જિત કરી દીધા. ત્યાર માદ તેણે ગાથાપતિ રત્ન અને વ કિન અને પુરાહિત રત્નના સત્કાર અને સન્માન કર્યુ” અને તેમને સત્કૃત અને સન્માनित पुरीने विसर्भित पुरी हीधा ( एवं तिण्णिसट्टे, स्वयारसप अट्टारस सेणिप्पसेणी ओ कारे, सम्माणे३) या प्रमाणे तेथे ३६० सूपाराने સત્કૃત અને સન્માનિત કર્યાં અને ત્યાર બાદ તેમને વિસર્જિત કરી દીધા. આ પ્રમાણે ૧૮ શ્રેણે પ્રશ્રેણીજનાને महद्भुत भने सन्मानित हुर्ष्या अने त्यार माह तेभने विसभित उरी हीधा. ( अण्णे य बहवे Page #971 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० ३२ भरतराज्ञः रत्नोत्पत्तिस्थाननिरूपणम ९५७ बहून् राजेश्वर तलवर यावत् सार्थवाहप्रभृतीन् सत्कारयति सम्मानयति' सक्कारिता सम्माणित्ता' सत्कार्य मम्मान्य च 'पडिविसज्जेई' प्रतिविसर्जयति स्वनिवासस्थान गमनाय आज्ञापयति स भरत इत्यर्थः 'पडि विसज्जित्ता' प्रति विसय तथाऽऽज्ञाप्य 'उधि पासायवरगए जाव विहरइ, उपरि प्रासादवरगतः श्रेष्ठप्रासादं प्राप्तः सन् स भरतो राजा यावद विहरति तिष्ठति अत्र यावत्पदात् स्फुटद्भिः मृदङ्गः द्वात्रिंशब्दद्धैर्नाटकैः वरतरुणी संप्रयुक्तः उपनृत्यमान:२ उपगीयमानः २ उपलालिज्यमानः २ महताऽहतनाट्यगीतवादिततन्त्रीतलतालतूर्यघनमृदङ्गपटुप्रवादितरवेण इष्टान शब्दस्पर्शरसरूपगन्धान पश्चविधान् मानुष्यकान् कामभोगान् एतेषां पदानां संग्रहः व्याख्यानं तु अस्मिन्नेव सूत्रे पूर्वे विलोकनीयम् ॥सू०३१॥ ___ अथ चतुर्दशरत्नाधिपते भरतस्य यानि रत्नानि यत्रोत्पद्यन्ते तत्तथाऽऽह-"भरहस्स" इत्यादि । मूलम्-भरहस्स रण्णो चक्करयणे १दंडरयणे २ असिस्यणे३ छत्तस्यणे ४ एते णं चत्तारि एगिदियरयणा आउहघरसालाए समुप्पण्णा चम्मरयणे १ मणिरयणे २ कागणिरयणे ३ णव य महाणिहओ एएणं सिरिघरंसि समुप्पण्णा सेणावइरयणे १, गाहोवइरयणे २ वद्धइरयणे ३ पुरोहियरयणे ४ एए णं चत्तारि मणुअरयणा विणीयाए रायहाणीए समु. प्पण्णा, आसरयणे १ हत्थिरयणे २एए णं दुवे पंचिंदियरयणा वेयद्धसत्थवाहपभिइओ सक्कारेइ सम्माणेइ) इसी तरह अन्य और भी अनेक राजेश्वर त घर यावत् सार्थवाह आदि को को सत्कृत किया और सन्मानित किया (सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) सत्कृत सम्मानित कर उन्हें फिर उसने विसर्जित कर दिया (पडिविसजिता उपि पासायरगवए जाव विहरइ) विसर्जित करके फिर वह भरत नरेश अपने प्रासादवरावतंसक राजभवन में चला गया और वहां जाकर उसने मनुष्यभव सम्बन्धी इष्ट कामभोगो को भोगते हुए अपने समय को व्यतीत किया यहां यावत्पद से पूर्व की तरह "स्फुटद्भिः मृदङ्गैः द्वात्रिंशद्बद्ध टिकैः" इत्यादिरूप से पाठ का संग्रह हुआ है ॥स्० ३१।। राईसरतलघर जाव सत्यवाहप्पभिइओ सकारेइ सम्माणेइ) मा प्रमाणे मील ५५ अने, २२ व२, ३२ यावत सार्थ । सान सहन अने सन्मानित ो. (सक्कारिता सम्माणित्ता पडिविसज्जेइ) सततभा सम्मानित ४रीन भने विससित शहीचा. (पडिविसज्जित्ता उपिपासायवरगए जाव विहरइ) विसतिश ५छते २. नरेश પિતાના પ્રાસાદવરાવત સક રાજભવનમાં જતા રહ્યા ત્યાં જઈને તેમણે મનુષ્યભવ સંબંધી ઈષ્ટકમ ભેગેને ભેગવતાં ભાગવતાં પોતાનો સમય પસાર કર્યો અહીં યાવત્ પદથી પૂર્વની रेम "स्फुटद्भिः मृदङ्गैः द्वात्रिंशद्वद्धर्नाटकैः” पोरे 18 सहीत थये। छे. ॥सू. 3१। Page #972 -------------------------------------------------------------------------- ________________ MAAAAAAAAAAAAAAA ९५८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे गिरिपायमूले समुप्पण्णा सुभदा इत्थीरयणे उत्तरिल्लाए विज्जाहरसेढीए समुप्पण्णे ॥सू०३२॥ छाया-भरतस्य राज्ञः चक्ररत्नम्। दण्डरत्नम् असिरत्नम्३ छत्ररत्नम् ४ एतानि खलु चत्वारि एकेन्द्रियरत्नानि आयुधगृहशालायां समुत्पन्नानि, चर्मरत्नम् १ मणिरत्नम् २ काकणीरत्नम् ३ नव च महानिधयः एते खलु श्रीगृहे समुत्पन्नाः सेनापतिरत्नम् १ गाथा पतिरत्नम् २ वर्द्धकिरत्नम् ३ पुरोहितरत्नम् ४; एतानि खलु चत्वारि मनुजरत्नानि विनीतायां राजधान्यां समुत्पन्नानि, अश्वरत्नम् १, हस्तिरत्नम् २, एते खल द्वे पञ्चेन्द्रियरत्ने वैतादयगिरिपादमूले समुत्पन्ने सुभद्रा स्त्रीरत्नम् औत्तराहायां विद्याधर श्रेण्यां समुत्पन्नम् ॥सू३२॥ टीका-"भरहस्स रण्णो" इत्यादि । 'भरहस्स रण्णो चक्करयणे १ दंडरयणे २ अ. सिरयणे ३ छत्तरयणे ४ एतेणं चत्तारि एगिदियरयणे आउहघरसालाए समुप्पण्णा' भरतस्य राज्ञः चक्ररत्नम् १ दण्डरत्नम् २ असिरत्नम् ३ छत्ररत्नम् ४, एतानि खलु चत्वारि एकेन्द्रियरत्नानि आयुधगृहशालायां समुत्पन्नःनि 'चम्मस्यणे १ मणिरयणे २ कागणिरयणे ३ णक्य महाणिहओ एएणं सिरिधरंसि समुप्पण्णा' चर्मरत्नम् १ मणिरत्नम् काकणी रत्नम् ३ नव च महानिधयः नैसर्प १पाण्डुक २पिङ्गलक ३ सर्वरत्न ४महापद्म ५काल ६ महाकाल ७ माणवकमहानिधि ८ खड्ग ९ नामधेयाः नैसर्यादिदेव विशेषाधिष्ठिताः एते खलु चर्मरत्नादि त्रयं नैसदि नव महानिधयश्च श्रीगृहे भाण्डागारे समुत्पन्नानि एतेन च प्रोता नव महानिधयः शाश्वतभाररूपाः कथमुत्पद्यन्ते इत्याशङ्कमानोऽपि परास्ततां गतः “सेणाइवरयणे १ गाहावइरयणे २ बद्धइरयणे ३ पुरोहिशरयणे ४ एएणं चत्तारि ___ अब भरत राजा के जौ कि चौदह रत्नों का अधिपति होता है, कौन कौन रत्न कहां कहां उत्पन्न होते हैं यह प्रकट किया जाता है-'भरहस्स रण्णा चक्करयणे १ दंडरयणे असिरयणे' इत्यादि सूत्र-३२ - टीका-भरहस्स रण्णो चक्करयणे, दडायणे, असिरयणे, छत्तरयणे' भरत चक्रवर्ती के चक्ररत्न, दण्डरत्न र असिरत्न ३ छत्ररत्न (एते णं चत्तो) ये चार रत्न जोकि(एगिदियर यणा) एकेन्द्रिय रत्न है (आउधरतालाओ समुपणा) आयुध गृह शालामें उत्पन्न होते हैं (चम्मरयणे, मणिरयणे, कागणिरयणे, णवय महाणिहओ एए णं सिरिघरंसि समुप्पण्णा) चर्मरत्न मणिरत्न, काकणिरत्न, तथा नौ महानिधियां ये सब श्रीगृह में-भांडागार में--उत्पन्न होते हैं । (सेणावहरयणे,गाहावइरयणे,वद्धहरयणे, - હવે ભરત મહારાજા કે જે ચૌદાના અધિપતિ છે, તેમના કયા કયા ૨૦ને કયા કયા ઉત્પન્ન થાય છે તે બતાવવામાં આવે છે 'भरहस्स रण्णो चक्करयणे १ दंडायणे २ असिरयणे' इत्यादि सूत्र-३२॥ साथ :- मरत पतीना यरल १, ६७२त्न २, मसि२९न 3, अने छत्ररत्न (एतेणं चत्तो०) से यार रत्ना १२ (पमिदिएरयणा) मेन्द्रिय २त्ना छ, (आउघरसालाओ समुप्पण गा) मायुध शाखामi 4.1 या छे. (चम्परयणे, मणिरयणे, कागणिरयणे, णवय महाणिहिओ एपण सिरिघरंसि समुपण्णा) यमन, भागुन, ४२त्न तथा नव ___ Page #973 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका १.३ वक्षस्कारः सू० ३२ भरतराशः रत्नोत्पत्तिस्थामनिरूपणम् ९५९ मणुअरयणा विणीयाए रायहाणीए समुप्पण्णा' सेनापतिरत्नं १ गाथापतिरत्नं २ बर्द्धकिरत्नं ३ पुरोहितरत्नम् ४ एतानि खलु चत्वारि मनुजरत्नानि विनीतायां राजधान्यां समुत्पन्नानि 'आसरयणे १ हत्थिरयणे २ एएणं दुवे पंचिंदियरयणा वेअद्धगिरिपायमूले समुप्पण्णा' अश्वरत्नम् : हस्तिरत्ने २ एते खलु द्वे पञ्चेन्द्रियतिर्यगरत्ने वैतादयगिरेः पादमूले मूलभूमौ समुत्पन्ने जाते । 'सुभदा इत्थी रयणे उत्तरिल्लाए विज्जाहार सेढोए समुप्पण्णे' सुभद्रा सुभद्रानामकं स्त्रीरत्नम् औत्तराहायाम् उत्तरस्यां विद्याधरश्रेण्यां समुत्पन्नम् ॥ २३२॥ . अथ षट्खण्डं भरतं पालयन् चक्रवर्ती भरतो यथा प्रवृत्तवान् तथाऽऽह---"तए णं से भरहे' इत्यादि। __ मूलम्-तए णं से भरहे रायो चउदसण्हं रयणाणं णवण्हं महाणिहीणं सोलसण्हं देवसाहस्सीणं बत्तीसाए रायसहस्साणं बत्तीसाए उडुकल्लाणिया सहस्साणं बत्तीसाए जणवयकल्लाणियासहस्साणं बत्तीसाए बत्तीसइबद्धाणं णाडगसहस्साणं तिण्हं सट्ठीणं सूवयारसयाणं अट्ठासण्हं सेणिप्पसेणीणं चउरासीइए आससयसहस्साणं चउरासीइए दंतिसयसहस्साणं चउरासीइए रहसयसहस्साणं छण्णउइए मणुस्सकोडीणंबावत्तरीए पुरवरसहस्साणं बत्तीसाए जणवयसहस्साणं छण्णउइए गामकोडोणं णवणउइए दोणमुहसहस्साणं अडयालीसाए पट्टणसहस्साणं चउव्वीसाए कब्बङपुरोहियरयणे एएणं चत्तारि मणुअरयणा विणोयाए रायहाणीए समुप्पण्गा) सेनापति रत्न, गाथापतिरत्न, वद्धकिरत्न, और पुरोहितरत्न ये चार मनुष्यरत्न विनीता राजधानी में उत्पन्न होते हैं (आसरयणे, हस्थिरयणे एए णं दुवे पंचिंदियरयणा वेअद्धगिरिपायमूले समुप्पण्णा) अश्वरत्न, और हस्तिरत्न, ये दो पंचेन्द्रियतिर्यगत्न वैताढयगिरि की तलहटी में उत्पन्न होते हैं (सुभद्दाइत्थी (यणे उत्तरिल्लाए विग्जाहर सेढाए समुप्पण्णे) तथा सुभद्रा नाम का जो स्त्रीरत्न है वह उत्तरविद्याधरश्रेणी में उत्पन्न होता है ।सू ० ३२॥ महानिधिया स स श्रीमां -Hist२ मा ५-न थया छ. (सेणावइरयणे, गाहावइरयणे, वद्धइरयणे, पुरोहियरयणे, एपणं चत्तारि मणुअरयणा विणीयाए रायहाणीप समप्पण्णा) सेनापतित्न, आयपतित्न ३२ मने पुरे.डितरत्न से यार मनुष्यरत्ना aldi Aधानीमा 4-4 या छे. (आसरयणे, हस्थिरयणे, एएणं दुवे पंचिंदियग्यणा वेअद्धगिरिपाय मूले समुपपण्णा) २५३२. मने तिथे ये पथन्द्रिय तियरत्न वैतादय शिनी तणेटीमा -1 च्या छे. (सुभद्दा इत्थोरयणे उत्तरिल्लाए विज्जाहर सेढोए समुप्पण्णे) तथा सुभद्रा नाम स्त्री २९न छ । उत्तर वियर श्रेणीमा उत्पन्न ये छे. सूत्र-३२॥ Page #974 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे सहस्साणं चउव्वीसाए मडंबसहस्साणं वीसाए आगरसहस्साणं सोलसण्हं खेडसहस्साणं चउदसण्हं संवाहसहस्साणं छप्पण्णाए अंतरोदगाणं एगूणपण्णाए कुरज्जाणं विणीयाए रायहाणीए चुल्लहिमवंतगिरिसागरमेरागस्स केवलकप्पम्स भरहस्स वासस्स अण्णेसिं च बहूणं गईसरतलवर जाव सत्यवाहप्पभिईणं आहेवच्चं पोरेवच्चं भट्टितं सामित्तं महत्तरगतं आणाईसरसेणावच्चं कारेमाणे पालेमाणे ओहयणिहएसु कंटएसु उद्धिअमलिएसु सबसत्तुसु णिज्जिएसु भरहाहिवे णरिंदे वरचंदणचच्चिअंगे वरहाररइयवच्छे वरमउडविसिट्ठए ववत्थभूसणधरे सव्योउअसुरहि कुसुमवरमल्लसोभियसिरे वरणाडगनाडेइज्जवरइत्थिगुम्मसद्धिं संपरिवुडे सम्बोसहि सब्बरयण सव्वसमिइसमग्गे संपुण्णमणोरहे हयामित्तमाणमहणे पुवकयत बप्पभावनिविट्ठसंचियफले भुंजइ माणुस्सए सुहे भरहे नामधेज्जे ति ॥सू०३३॥ छाया-ततः खलु स भरतो राजा चतुर्दशानां रत्नानां नवानां महानिधीनां षोडशानां देवसहस्रानां द्वात्रिंशतो राजसहस्त्राणाम्, द्वात्रिंशत् ऋतुकल्याणिका सहस्त्राणाम्, द्वात्रिंशतो जनपदकल्याणिका सहस्राणाम् द्वात्रिंशतो द्वात्रिंशब्दद्धानां नाटकसहस्त्राणा त्रयाणां षष्टानां सूपकारशतानाम् अष्टादशानां श्रेणिप्रश्रेणीनाम् , चतुरशीते अश्वशनसहस्राणाम् , चतुरशीतेः दन्तिशतसहस्राणाम् , चतुरशीतेः रथशतसहस्राणाम् षण्णवतेः मनुष्यकोटीनाम्, द्वासप्ततेः पुरवरसहस्राणाम् द्वात्रिंशतो जनपदसहस्राणाम्, षण्णवतेः ग्रामकोटीनाम्. नवनवतेः द्रोणमुखसहस्त्राणाम्,अष्टाचत्वारिंशतः पत्तनसहस्राणाम् चतुविंशतः कर्बटसहस्राणाम्, चतुविशतेः मडम्बसहस्राणाम् विंशतेराकरसहस्राणाम् षोडशानां खेटसहस्राणाम् चतुर्दशानां संवाहसहस्त्राणाम् षट्पञ्चाशतोऽन्तरोदकानाम् एकोनपञ्चाशतः कुराज्यानाम् विनीताया राजधान्याः क्षुल्लहिमवद् गिरिलागरमर्यादाकस्य केवल कल्पस्य भारतबर्षस्य अन्येषां च बहुनां राजेश्वरतलवर यावत् सार्थवाहप्रभृतीनाम् आधिपत्य पौरपत्यं भर्तृ स्वं स्वामित्वं महत्तरत्वम् आशेश्वरसेनापत्यं कारयन् पालयन् उपहतनिहतेषु कण्टकेषु उद्धृतमर्दितेषु सर्वशत्रषु निर्जितेषु भरताधिपो नरेन्द्रः वरचन्दन-चर्वित्ताङ्गः वरहाररतिदवक्षस्कः वरमुकुट विशिकः वरवस्त्राभूषणधरः सर्वतुक सुरभिकुसुमयरमाल्यशोभितशिरस्कः वरनाटकनाटकीय वरस्त्री गुल्मसार्द्ध संपरिवृतः सवौषधिसर्वरत्नसर्वसमितिसमग्रः सम्पूर्णमनोरथः हताभित्रमानमयनः पूर्वकृततपःप्रभावनि विष्ट संविनफलानि भुङ्क्ते मानुष्यकानि सुखानि भरतो नामधेय इति ॥स:३३।। Page #975 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सू० ३३ षट्खण्डं पालयतो भरतस्य प्रवृत्तिनिरूपणम् ९६१ टीका-"तएणं से" इत्यादि 'तए णं से भरहें राया चउदसण्हं रयणाणं' तेवः परखण्डभरतसाधनानन्तरं खलु स भ तो महाराना चतुर्दशरत्नादीनां सार्थवाहप्रभूत्यन्तानामाधिपत्यादिकं कारयन् पालयन् मानुष्यकानि सुखानि भुङ्क्ते इत्यग्रे सम्बन्धः वाडि चतुद्देशानां रत्नानाम् एकेन्द्रियाणां चक्ररत्नादि काकणीरत्नान्तानां सप्तानाम् पञ्चेन्द्रियाणां सेनापतिरत्नादि सुभद्रारत्नान्तानां सप्तानाम् संमीलने च चतुर्दशरत्नानामित्यर्थः अधिपत्यादिकम् तथा 'णवण्हं महाणिहीण' नवानां नैसर्पादि शान्तानां तत्तहेवाधिष्ठितानां महानिधीनाम् आधिपत्यादिकम् तथा 'सोळसण्हं देवसाहस्सीणं' षोडशानां देवसाहस्रीणाम् षोडशसहस्रसंख्यकानों देवानामित्यर्थः आधिपत्यादिकम् तथा 'बत्तीसाए रायसहस्साणं' द्वात्रिंशतो राजसहस्राणाम् द्वात्रिंशत्सहस्रसंख्यकानां राज्ञामित्यर्थः आधिपत्यादिकम् तथा 'बत्तीसाए उडुकल्लाणियासहस्साणं' द्वात्रिंशतः ऋतुकल्याणिकासहस्राणाम् द्वात्रिंशसंख्यक ऋतुकल्याणिकास्त्रीणामित्यर्थः आधिपत्यं स्वामित्वादिकम् अत्र ऋतुकल्याणिकाः इत्यस्य ऋतुविपरोतस्पर्शत्वेन शीतकाले उष्णस्पर्श उष्णकाले शीतस्पर्शःइत्यादि रूपेण सुखस्पर्शा:अथवाऽमृतकन्यात्वेन सदा सर्वऋतुषु कल्याणकारिण्यो राजकन्यकाःइत्यर्थों बोध्यः। तथा'वत्तीसाए जणवयकल्लाणिया सहस्साणं' द्वात्रिंशतः जनपदकल्याणिका सहस्राणार द्वात्रिंशत्सहस्त्रसंख्यायुक्तानां जनपदाग्रणी कल्याणिकानां राजकन्यकानामित्यर्थः आधिपत्यादिकम् तथा 'बत्तीसाए बत्तीसइबद्धाणं णाडपसहस्साणं' द्वात्रिंशतो द्वात्रिंशदबद्धानां नाटकसहस्त्राणाम् द्वात्रिंशतो द्वात्रिंशतापात्रैः बद्धानां युक्तानां नाटकसहस्राणाम् द्वात्रिंशत्सहस्त्रसंख्यकानां द्वात्रिंशत्पात्रबद्धनगटकानामित्यर्थः तथा 'तिण्हं सट्ठोणं सूत्रयारसयाणं' त्रयाणां षष्टानां षष्ठयधिकानां सूपकारशता'तएणं से भरहे राया चउदसण्हं रयणाणं णवण्हं' इत्यादि सूत्र-३३ टोकार्थ-(तए णं से भरहे राया) षट्खण्डात्मक भरतक्षेत्र के साधन करने के बाद वे भरत चक्र वर्ती (चउदसण्हं रयणाणं णवण्हं महाणिहीणं सोलसण्हं देवसाहस्सोणं बत्तीसाए रायसहस्साणं बत्तीसाए उडुकल्लाणियासहस्साणं बत्तीसाए जणवयकल्लाणियासहस्साणं बत्तीसाए बत्तीसइबद्धाणं णाडगसहस्साणं) चौदह रत्नों का नौ महानिधियों का सोलह हजार देवों का बत्तीस हजार राजाओंका बत्तीस हजार ऋतुकल्याणकारिणी कन्याओं का ३२-३२ पात्र बद्ध ३२ हजार नाटकों का (तिण्हं सट्ठीणं सूबयारसयाणं अट्ठारसण्हं सेणिप्पसेणीणं चउ (तएणं से भरहे राया चउद्दसण्हं रयणाणं णवण्ह) इत्यादि-सूत्र ३३ ।। टीशर्थ:- (तएणं से भरहे राया) १३ माम भरतक्षेत्र साधन ३५ मन०या मी (स्वाधीन मनाव्या माह) ते सरत यती (घउदसण्हं रयणाणं णवण्हं महाणिहीणं सोलसण्हं देवसाहस्सीणं बत्तीसाए रायसरस्साणं बत्तीलाए उडुकल्लाणिया सहस्साणं वत्तीसाप जणवयकल्लाणिया सहस्साणं बत्तीसार बत्तीसहवद्धाणं णाडगसहस्साणं) यह शरत्ना, નવ મહાનિધિઓ, સેળ સહસ્ત્ર દેવા, ૩૨ સહસ્ત્ર રાજાઓ, ૩ર સહસ્ત્ર ઋતુકલ્યાણકારિણ अन्याय, उसस्तनपक्षीयानी न्यास।.३२-३२ पात्र ३२ सहस्त्रनाम (तिण्डं १२१ -- Page #976 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे माम् त्रिषष्ठयाधिकसहस्रसंख्यकम्पकाराणां पाचकानामित्यर्थः तथा 'अठारसण्हं सेणिप्पसेणीणं' अष्टादशानां श्रेणीप्रश्रेणीनाम् अत्र अष्टादश कुम्भ कारायाः श्रेणयः तदवान्तरभेदाः प्रश्रेणयो बोध्याः तथा 'चउरासीइए आससयसहस्साणं' चतुरशी तेरश्वशतससाणाम्-चतुरशीतिलक्षसंख्यकानामश्वानामित्यर्थः तथा 'चउरासीइए दंतिसयसहस्साणं' चतुरशीते र्दन्तिशतसहस्त्राणाम् चतुरशीतिलक्षसंख्यक हस्तिनामित्यर्थः तथा 'चउरासीइए रहसय सहस्साण'चतुरशीते रथशतसहस्राणाम् चतुशीतिलक्षसंख्यकरथानाम् प्रोक्तानामेतेपामाधिपत्यादि कम तथा'छण्णउइए माणुस्तकोडीणं'षण्णवते मनुष्यकोटीनाम् षण्णवतिकोटिसंख्यकमनुष्याणामाधिपत्यादिकम् तथा 'बावत्तरीए पुरवरसहस्साणं' द्वासप्ततेः पुरवरसहस्राणाम् द्वासप्ततिसहस्त्रसंख्यकानां श्रेष्ठनगराणाम् आधिपत्यादिकं तथा' बत्तीसाए जणवयसहस्साणं' द्वात्रिंश्तो जनपदसहस्राणाम्-द्वात्रियत्सहस्रसंख्यक-जनपदानां देशानाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'छण्णउइए गामकोडीणं' षण्णवतेः ग्रामकोटीनाम् षण्णवतिकोटिसंख्यकानां ग्रामाणाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'णवणउइए दोणमुहसहस्साणं' नवनवते. द्रोणमुखसहस्राणाम् नवनवतिसहस्रसंख्यकानाम् द्रोणमुखानाम् पाटलिपुत्रपद जळस्थलमार्गोपेतानां जननिवासस्थानानाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'अडयालीसाए पट्टणसहस्साणं' अष्टाचत्वारिंशतः पत्तनसहस्राणाम्-अष्टाचत्वारिंशत्सहस्रसंख्यकानां पत्तनानां समस्तवस्तुप्राप्तियोग्यस्थानानाम् । उक्तश्च-शकटादिभि नौभिर्वा, यद्गम्यं तत्पत्तनं हि इति । आधिपत्यादिकम् तथा 'चउरीसाए कब्बडसहस्साणं' चतुर्विशते कटसहस्राणाम् चतुर्विशतिसहस्ससंख्यककर्बटानाम् क्षुद्रप्राकारवेष्टितकुत्सितनगराणाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'चउव्वीसाए मडंबसहस्साणं' चतुर्शितेः मडम्बसहस्राणाम् रासीइए आससयसहस्साणं चउरासीइए दंतिप्सयतहस्ताणं चउरासीइ ए रहसयसहस्साणं छण्ण उइए माणुस्सकोडीणं बावत्तरीए पुरवरसहस्साणं बत्तीसाए जणवयसहस्साणं) ३६० सूपकारों का १८ श्रेणी प्रश्रेणीजनों का ८४ लाख घोडों का ८४ लाख हाथियों का ८४ लाख रथों का ९६ करोड़ पैदल मनुष्यों का ७२ हजार पुरवरों का ३२ हजार जनपदोका (छण्णउइए गाभकोडोणं णवणउइए दोणमुहसहस्साणं, अडयालोसाए पट्टगतहस्ताणं, चउम्वोसाए कवडसहस्साणं, च उव्वीसाए मडंबसहस्साणं) ९६ करोड़ ग्रामों का, ९९ हजार द्रोण मुखों का, ४८ हजार पट्टणों का, २४ हमार कटों का, २४ हजार मडंबो का, (बीसाए आगरसहस्साणं, सोलसण्हं सहीणं स्वयार सयाराणं अट्ठारसण्हं सेणिप्पसेणोणं चउरासीइए आससय सहस्साणं चउरासीहए दंतिसयसहस्साणं चउरासीप रहसयसहस्साणं छण्णउइए माणुस्सकोडीणं बावत्तरीप पर बरसहस्साणं बतीसाप जणवयसहस्साणं)3१० सूपारे। १८ श्रेष्मी-प्रश्रेषी ना. ८४ मधा'ડાએ ૮૪ લાખ હાથીએ,૮૪લાખ ર,૯૬ કરોડ મનુષ્ય,૭૨ હજાર પુરવ,૩૨ હજાર જનપદે, (खण्णउहप गामकोडीणं णवणउहप दोणमुहसहस्साणं,अडयालोसाए पट्टणसहस्साणं,चउव्वीसा पकवडसहस्साणं, चउरीसाए मडंबलहस्साणं)८६४२।७ श्रामी, ८८3१२ द्रोभुमो,४८७२, ५४५), २४ ७२ ४ २४, ७०२ भा.(वीसाप आगरसहस्साणं सोलसण्डं खेडसहस्साणं Page #977 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारः सू० ३३ षट्खण्डं पालयता भरतस्य प्रवृत्तिनिरूपणम् ૨૬ चतुर्विंशतिसहस्रसंख्यक मडम्बानाम् सार्द्धक्रोशद्वयान्तरेण ग्रामान्तररहितवसतीनाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'वोसाए 'आगरसहस्साणं' विंशतेः आकरसहस्राणाम् - विंशतिसहस्रसंख्यकानाम् आकराणाम् सुवर्णरत्नाद्युत्पत्तिस्थानानाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'सोलसं खेडसह स्साणं' षोडशानां खेटसहस्राणाम् षोडशसहस्रसंख्यक खेटानाम् धूलिकाप्राकारनदीपर्वतैः वेष्टितनगराण्णाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'चउदसण्डं संवाहसहस्ताणं' चतुर्दशानां सम्वाह सहस्राणाम् चतुर्दशसहस्रसंख्यक सम्वाहानाम् दुर्गमस्थानानाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'छप्पण्णाएं अंतरोदगाणं' पद पञ्चाशतोऽन्तरोदकानाम् पद पञ्चाशत्संख्यकानाम् अन्तरोदकानां जलान्तर्वर्तिसन्निवेश विशेषाणाम् आधिपत्यादिकम्, तथा 'एगूणपण्णा कुरजाणं' एकोनपञ्चाशतः कुराज्यानां भिल्लादिराज्यानाम् आधिपत्यादिकम्, तथा' विणीयाए रायहाणीए चुल्ल हिमवंतगिरिसागर मेरागस्स केवळ कप्पस्स भरहस्स वासस्त' विनीतायाः राजधान्याः क्षुद्र हिमवद्द्विरिसागरमर्यादाकस्य उत्तरस्यां दिशि क्षुद्रहिमद्विरिः शेष पूर्वादिदिशात्रये त्रयः सागराः तैः कृता मर्यादा अवधिर्यस्य यत्र वा तत थाभूतं तस्य केवलकल्पस्य सम्पूर्णस्य भारतवर्षस्य च आधिपत्यादिकम्, तथा 'अण्णेसिं च बहूणं राईसरतलवर जाव सत्थवाहप्पभिईणं' अन्येषां च बहूनां राजेश्वर तलवर या - त्सार्थवाह प्रभृतीनाम् अत्र यावत्पदात् 'माम्बिक कौटुम्बिकमन्त्रिमहामन्त्रि गणक दौवारिकामात्यचे पोठमर्द नगर निगम श्रेष्ठि सेनापतिसार्थवाहदूतसन्धिपालपदानि ग्राह्माणि एतेषां व्याख्यानम् अस्मिन्नेव वक्षस्कारे सप्तविंशतितमे सूत्रे द्रष्टव्यम्' ' आहेवच्च खेटसहस्ताणं, चउद मण्हं संवाहसइस्साणं, छप्पण्णाए अंतरोदगाणं, एगूणपण्णाए कुरजाणं विणीयाए रायहागीए चुल्लहिमवंतगिरिसागरमे रागस्त केवलकप्परस भरहरस वासस्स) २० हजार आकरों का, १६ हजार खेटों का, १४ हजार संवाहो का ५६ अंतरोदेकों, का, ४९ कुराज्यों का विनीता राजधानी का तथा उत्तरदिशा में क्षुद्रहिमवगिरि एवं पूर्वादिदिशात्रय में समुद्रमर्यादावाले सम्पूर्ण भरतक्षेत्र का ( अण्णेसि बहूणं राईसरतैलबर जाव सत्थवाहपभिर्द्दणं आहेवच्चं पौरेवच्चं भट्टित्तं सामित्तं महत्तरगतं आणाईसरसेणाचउदसहं संवाह सहस्साणं, छप्पण्णाए अंतरोदगाणं, एगूणपण्णाप, क्रूरज्जाणं विमीया राहाणीए चुल्लहिमवंत गिरिसागर मेरागस्ल केवलकप्पस्स भर इस्स बासस्स) ३० सहस्त्र आरो, ६ र ट १४ र संवा, यह अ ंतरी', ४८ पुरायो, વિનીતા રાજધાની તેમજ ઉત્તર દિશામાં ક્ષુદ્ર હિમવદ્ ગિરિ અને પૂર્વાદે દિશાત્રયમાં સમુદ્ર भर्याद्वावाणु' संपूर्थ भरत क्षेत्र (अण्णेसिं च बहूणं राईसरतल वर जाव सत्थवाहपणि (१) जलान्तर्वर्ती सन्निवेशों का नाम है । (२) भिल्लादिकों के राज्य का नाम कुराज्य है । (३) इन सबका स्वरूप एवं ग्राम, आकर, जनपद, द्रोणमुख, संवाहन आदि का स्वरूपपीछे स्पष्ट किया जा चुका है । (१) सान्तवती सन्निवेशानु नाम छे. (२) लिल्लाहिडाना राज्यनुं नाम राज्य छे. (3) मे सर्वनु स्व३५ ते ग्राम, ख४२, ४नपढ, द्रोणुभु, संवाह સ્વરૂપ પહેલાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવેલ છે. वगेरेनु Page #978 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अम्वृद्धीपप्रचप्तिसूत्रे पोरेवच्चं भट्टित्तं सामित्तं महत्तरगत्तं आणाईसरसेणावच्चं कारेमाणे पालेमाणे' आधिपत्यम् अधिपते र्भावः मुख्यत्वम् पौरोवृत्यम् पुरोवर्तित्वम् अग्रेसरता भर्तृत्वं पतित्वम् स्वामित्वम् नायकत्वम् महत्तरत्वम् अतिशयमहत्वम् आज्ञेश्वरन्वम् सेनापत्यं सेनानेतृत्वम् कारयन् पाव्यन् रक्षयन् मुखानि भुङ्क्तेस भरतः केषु सत्सु स सुखानि भुङ्क्ते इत्याह 'ओहयणिहएम' इत्यादि 'ओहयणिहएमु कंटएसु' उपहतनिहतेषु कण्टकेषु तत्र उपहतेषु विनाशितेषु निहतेषु च अपहृतसकलप्तमृदिषु कण्टकेषु तत्स्वरूपेषु गोत्रजशत्रुषु तथा 'उद्धियमलिएमु सव्वसत्तुसु' उद्ध्तमर्दितेषु सर्वशत्रुषु तत्र उद्धृतेषु देशान्निर्वासितेषु मर्दितेषु च मानहानि प्रापितेषु सर्वशत्रुषु अगोत्रजवैरिषु एतत्सर्व कुतोभवतीत्याह 'णिजिएसु' निर्जितेषु भग्नबलेषु सर्वशत्रुषु मोक्तप्रकारद्वयशत्रुषु, अत्र सर्वशत्रुषु इति पदं देहली प्रदीपन्यायेन उभयत्र सम्बन्धः, कीदृशो भरतः सुखानि भुङ्क्ते इत्याह--'भरहाहिवे' इत्यादि 'भग्हाहिवे परिदे' भरताधिपो नरेन्द्रः 'वरचंदणचच्चिअंगे' वरचन्दनबच्च कारेमाणे पालेमाणे) तथा और भो अनेक राजेश्वर तलवर आदि से लेकर सार्थवाह संक के जनों का आधिपत्य करते हुए अप्रेलरपना करते हुए भर्तृत्व-स्वामोपना करते हुए उनका संरक्षणत्व करते हुए उनका नेतृत्व करते हुए, उनका सेनापत्य करते हुए और अपनी माज्ञा का उन सब से पालन करवाते हुए, (माणुस्से सुहे भुंजइ) मनुष्यभव संबन्धी सुखों को भोगते हुए अपना ममय शान्ति के साथ व्यतीत करने लगे (मोहय निहएसु कंटएसु) क्योंकि उनके गोत्रज एवं अगोत्र न समस्त शत्रु नष्ट हो चुके -थे एवं वे शत्रु सम्पत्ति विहीन हो चुके थे (उद्रियमलिएसु सनसत्तुसु) देश से निर्वासित हो चुके थे मानहानि युक्त हो चुके ये (णिज्जिएसु) सेना विहीन हो चुके थे (भरइाहिवे णरिंदे) इस कारण सम्पूर्ण ६ खंडवाले भरत क्षेत्र के अधिपति ये बन चुके थे और नरों में-प्रजाजनो मे-ये इन्द्रके जैसे चक्रवर्तित्व की अनुपम असाधारण विभूति से युक्त होने के कारण । मान्य हो चुके थे हर समय (वरचंदणचच्चियंगे) इनका शरीर श्रेष्ठ चन्दन से चर्चित बना मावच्चं पोरेवच्चं भडित्तं सामित्तं महत्तरगतं आणाईसर-सेणावच्च कारेमाणे पाले माणे) तमना भील ५५ भने २२वर तपथी भांडीने साया सुधीना ५२ આધિપત્ય કરતાં, અગ્રગામિત્વ કરતાં, ભતૃ વકરતાં, સેનાપત્ય કરતાં અને પિતાની शनु सर्पन पासन रावतi (माणुस्से सुहे भुजइ) मनुष्यभर समधी सुमोने तापातानासमय शतपू४ व्यतीत ४२५1 amया. (ओहयनिहएसु कंटएम) भ તેમના ગોત્રજ અને અગાત્રજ સમસ્ત શત્રુઓ નાશ પામ્યા હતા. અને તેઓ સંપત્તિ विडीन / या . (उद्धियमलिएसु सव्वसत्तसु) शिथी ५७२ ते निवासित यूयाता, भान बानि युदत / यूइया उता. (णिज्जिएसु) सेना विलीन ईयूच्या H.. (भरहाहिवे परिंदे) 20 सपूम' पा भरतक्षेत्रना मेमा मधिपति / ચૂક્યા હતા. અને નરોમાં–પ્રજા જનમાં-એ ભરત નૃપતિ ઈન્દ્ર જેવા ચક્રવતી ત્વની અનુપમ-અસાધારણ વિભૂતિથી યુક્ત હોવા બદલ સમ્માન્ય થઈ ચૂક્યા હતા. દર વખતે Page #979 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ.३ वक्षस्कारः सू० ३३ षट्खण्डं पालयतो भरतस्य प्रवृत्तिनिरूपणम् ९६५ चर्चिताङ्गः वरचन्दनेन श्रेष्ठचन्दनेन चर्चितं समण्डलं कृतम् अङ्गं यस्य स तथाभूत: पुनः कीदृशः 'वरहाररइयवच्छे' वरहाररतिवक्षस्कः वरहारेण श्रेष्ठमुक्तादिहारेण रतिदंद्रष्टणां नयनसुखकारकं वक्षो वक्षस्थलं यस्य स तथाभूतः पुनः कीदृशः 'वरमउडविसिहए' वरमुकुटविशिष्टकः श्रेष्ठशिरोभूषणमुकुटधारणेन विशेष शोभामापन्नः तथा 'वरवत्थभूसणभरे' वरवस्त्रभूषणधरः, पुनः कोदृशः 'सब्बोउयसुरहिकुसुमवरमल्लसोभियसिरे' सर्वतुक सुरभिकुसुमवरमाल्यशोभितशिरस्कः सर्वर्तुकसुरभिकुसुमानां वरमाल्यैः श्रेष्ठ मालाभिः शोभितशिरस्कः, पुनः कीदृशः 'वरणाडग णाडइज्जवरइत्थिगुम्मसद्धिं संपरिबुड़े' वरनाटक वरनाटकीय वरस्त्रीगुल्मसार्द्ध संपरिवृतः तत्र वरनाटकानि पात्रादि समुदायरूपाणि नाटकीयानि च नाटकप्रतिबद्धं पात्राणि तैः तथा वरस्त्रीणां गुल्मम् अव्यक्तावयव विभागवृन्दं तेन च साद्धै सम्परिवृतः युक्तः गुल्मेत्यत्र तृतीयालोप आर्षत्वात्, पुन: कोदृशः 'सम्वोसहि सव्वरयण सव्वसमिइसमग्गे' सौंपधि सर्वरत्नसर्वसमितिसमग्रः सर्वोषध्यः पुनर्नवाद्याः, सर्वरत्नानि कर्केतनादीनि सर्वसमितयः अभ्यन्तरे बाह्ये च पर्षदस्ताभिः समग्रः सम्पूर्णः अतएव 'संपुण्णमणोरहे' सम्पूर्णमनोरथः सर्वमनोरथैः पूर्णः पुनः कीदृशः 'हयामित्तमाणमहणे' हतामित्रमानमथनः हतानां बलवीर्यपराक्रमरहता था (वरहाररइयवच्छे) वक्षःस्थल पर दृष्टा जन को आनन्दप्रद श्रेष्ठ हार विराजित रहता था (वरम उडविसिट्टाए) मस्तक श्रेष्ठ मुकुट से विशेष से शोभा संपन्न बना रहता था (वरवत्थभूसणधरे) अति सुन्दर वस्त्रों को एवं भूषणों को ये धारण किये हुए रहते थे (मन्वोउयसुरह कुसुमवरमल्लप्सोभियसिरे) इनका मस्तक समस्त ऋतुओं के सुरभित कुसुमों की श्रेष्ठ मालाओं से विभूषित रहता था, (वरणाडगणाडइज्ज वरइत्थिगुम्मसद्धिं संपरिडे) श्रेष्ठ नाटको, श्रेष्ठ नाटकीय अभिनयों, और श्रेष्ठ स्त्रियों के अव्यक्त अवयव विभागसमूह से ये सदा घिरे हुए रहते थे (सव्वोसहिसव्वरयणसव्वसमिइसमग्गे) सर्व प्रकार की पुनर्नवा आदि ओषधियों से, कर्केतनादि समस्त रत्नों से और बाह्य आभ्यन्तर परिषदारूप समिति से ये हरे भरे बने रहते थे अतएव (संपुण्णमणो रहे) कोइ भी इतका मनोरथ अधूरा (वरचंदणवच्चियंगे) समनु शरीर श्रेष्ठ यन्दनथी यति (सि.) २७तु तु (वरहाररइयवच्छे) वक्षस्थल ५२ ४श भाटे मान प्र श्रेष्ठ डा२ विलित रहेता तो. (वरमउडविसिटए) भरत श्रेष्ठ भुट थी सविशेष शोभासम्पन्न २९तु (वरवत्थभूसणधरे) मति सु१२ १२त्री अने आभूषाने थे। परी रामता ता. (सव्वोउय सुरहि कुसुमवरमल्स सोभियसिरे)भनु मस्त। स तुमेना सुमित उसुकोनी श्रेष्ठभागामाथी विलित २३तु तु. (वरणाडगणाडहज्जवरात्थिगुम्मसद्धिं संपरिवुडे) श्रेष्ठ नाटी, श्रेष्ठ नाटकीय અભિનય અને શ્રેષ્ઠ સ્ત્રીઓના અવ્યકત અવયવ વિભાગ સમૂહથી એ સર્વદા પરિવૃત્ત २उता उता. (सव्वोसहिसव्वरयण सव्वसमिइसमग्गे)स प्रअरनी पुनर्नवा वगेरे ઔષધીઓથી, કતનાદિ સમસ્ત રત્નથી અને બાહ્ય આત્યંતર પરિષદારૂપ સમિતિથી यो प्र मान २उता डा. मेथी (संपुण्णमणोरहे) ओमनी 54 भना२५ सपू २९ Page #980 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे रहितत्वेन जीवन्मृतानाम् अमित्राणां शत्रूणां मानमथन: मथिताभिमानः एवं मोक्तविशेपणविशिष्टः स भरतो राजा कीदृशानि सुखानि भुङ्क्ते इत्याह 'पुवकयतवप्पभावनिविट्टसंचियफले' पूर्वकृततपःप्रभावनिविष्टसंश्चितफलानि पूर्वकृततपःप्रभावेण पूर्वे पूर्वजन्मनि कृतं सम्पादितं यत्तपः तपस्या तस्य यः प्रभावो महिमा तेन निविष्टसश्चितस्य निकाचिततया संचितस्य तस्यैव ध्रुवफलत्वात् फलानि फलभूतानि 'भुंजइ माणुस्सए सुहे भरहे णामधेज्जेत्ति' भुङ्क्ते मानुष्यकानि सुखानि भरतो नामधेय इति-कीदृशो भरतः ? अस्मिन् भरतक्षेत्रे प्रथम भरताधिपत्वेन प्रसिद्धं नामधेयं नाम यस्य स नामधेयो भरतो भरत नाम्ना प्रसिद्धो राजा उक्तविशेषणविशिष्टानि मानुष्यकानि मनुजसम्बन्धीनि मुखानि कामभोगादीनि भुङ्क्ते इत्यर्थः ॥सू० ३३॥ : अथ अस्य नरदेवस्य भरतस्य धर्मदेवत्वप्राप्तिमूलमाह-तएणं से' इत्यादि । मूलम्-तए णं से भरहे राया अण्णया कयाई जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता जाव ससिव्व पियदंसणे णखई मज्जणघराओपडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव आदसघरे जेणेव सी हासणे तेणेव उ. वागच्छइ उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णिसीअइ णिसीइत्ता आदंसघरंसि अत्ताणं देहमाणे चिट्ठइ तएणं तस्स भरहस्स रण्णो सुभेणं परिणामेणं पसत्थेहिं अज्झवसाणेहिं लेसाहिं विसुज्झमाणीहिं विसुज्झमाणीहि इहापोहमग्गणगवेसणं करेमाणस्स तयावरणिज्जाणं कम्माणंखएणं नहीं रहता था सब हो मनोरथ इनके परिपूर्ण होते रहते थे (हयामित्तमाणमहणे) बलवीर्य एवं पराक्रम से रहित हो जाने के कारण जीते हुए भी मरे के जैसे बने हुए शत्रुओं के ये मानरूपोनशा के उतारने वाले थे ऐसे इन विशेषणों से युक्त भरत चक्रवर्ती (पुत्रकयतवप्पभावनिविसंचियफले) इन्हें जो इच्छानुसार निरन्तर मनुष्यभव संबन्धी भोगों की प्राप्ति हुई थी वह सब इनके द्वारा पूर्वभव में संपादित तप के प्रभाव का निकाचित रूप फल है। (मुंबइमाणुस्सए सुहे भरहे णामधेग्जेत्ति) ये भरत राजा भोगभूमिको समाप्ति होने पर सर्वप्रथम ही भरतक्षेत्र के चक्रवर्ती हुए हैं ॥सू.३३॥ नहता.मनास मनोरथे। परिक्ष यता ता. (हयामित्तमाणमहणे) सवायतमा પરાક્રમથી હીન થઈ જવા બદલ અર્થાત્ પરાજિત થયેલા હોવા છતાં એ મૃતવત થયેલા શત્રુએાના માનરૂપી મદને એએ ઉતારનાર હતા. એવા એ વિશેષણેથી યુતિ ' ता. (पुव्ध कयतवप्पभावनिविदृसंचियफले) अभने २ ४२छ। भु५ सतत मनुष्य સંબંધી ભેગેની પ્રાપ્તિ થયેલી, તે એમને વડે પૂર્વભવમાં સંપાદિત તપના પ્રભાવનું નિमाथित ३५ ॥ छ, (भुजह माणुस्सए सुहे भरहे णामधेज्जेति) से सरत शामिनी પસિમાપ્તિ થઈ તે પછી સર્વ પ્રથમ જ ભરતક્ષેત્રના ચક્રવતી થયા છે. સૂ૦૩૩ાા Page #981 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कार-स. ३४ नरदेव भरतस्य धर्मदेव त्वप्राप्तिनिरूपणम् ९६७ कम्मरयविकिरणकरं अपुव्वकरणं पविट्ठस्स अणंते अगुत्तरे निव्वाघाए निरावरणे कसिणे पडिपुण्णे केवलवरनाणदंसणे समुप्पण्णे, तएण से मेरहे केवली सयमेवाभरणालंकारं ओमुअइ ओमुइत्ता सयमेव पंचमुट्ठियं लोअं करेइ करित्ता आयंसघराओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता अंते उरमझमज्झेणं णिगच्छइ णिगच्छिता दसहिं रायवरसहस्सेहिं सद्धिं संपरिखुडे विणीयं रायहाणि मज्झं मज्झेणं णिग्गच्छइ णिग्गच्छित्ता मज्झदेसे सुहं सुहेणं विहरइ विहरित्ता जेणेव अट्ठावए पब्वए तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता अट्ठावयं पवयं सणिों सणिअंदुरूहइ दुरुहित्ता मेघघणसण्णिकासं देवसण्णिवायं पुढविसिलापट्टयं पडिलेहेइ पडिलेहित्ता संलेहणाझसणाझूसिए भत्तपाणपडिआइक्खिए पाओवगए कालं अणवकंखमाणे अणवकंखमाणे विहरइ । तएण से भरहे केवली सत्ततरं पुव्वसयसहस्साई कुमारवासमज्झे वसित्ता एगं वाससहस्सं मंडलियरायमज्झे वसित्ता छपुव्वसयसहस्साई वाससहस्मूणगाइं महारायमज्झे वसित्ता तेसीइ पुव्वसयसहस्साई अगाखासमझे वसित्ता एगं पुव्वसयसहस्सं देसूणगं केवलिआउं पाउणित्ता तमेव बहुपडिपुण्ण सामन्नपरिआयं पाउणित्ता चउरासीइपुवसयसहस्साइं सव्वाउयं पाउणित्ता मासिएणं भत्तेणं अपाणएणं सवणेणं णक्खत्तेणं जोगमुवागएणं खीणे वेअणिज्जे आउए णामे गोए कालगए वीइक्कंते समुज्जाए छिण्णजाइजरामरणबंधणे सिद्धे बुद्धे मुत्ते परिणिव्वुडे अंतगडे सव्वदुक्खप्पहीणे ।।सू. ३४॥ - छाया-ततः खलु स भरतो राजा अन्यदा कदाचित् यत्रैव मज्जनगृहं तत्रैव उपागच्छति उपागत्य यावत् शशोव प्रियदर्शनो नरपतिः मज्जनगृहात् प्रतिष्क्रामति प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव आदर्शगृहं यत्रैव सिंहासन तत्रैव उपागच्छति उपागत्य सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुखो निषीदति, निषद्य आदर्शगृहे आत्मानं पश्यन् पश्यन् तिष्ठति । ततः खलु तस्य भरतस्य राशः शुमेन परिणामेन प्रशस्तैः अध्यवसानैः लेश्याभि विशुद्धयन्तीभिः इहापोहमार्गणगवेषणं कुर्वतः तदाधरणीयानां कर्मणां क्षयेन कर्मरजोविकरणकरम् अपूर्वकरणं प्रविष्टस्य अनन्तम् अनुत्तरम् निर्व्याघातं निरावरणं कृत्स्नं प्रतिपूर्ण केवलवरज्ञानदर्शनं समुत्पन्नम् ततः खलु Page #982 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९६८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रे स भरतः केपली स्वयमेव आभरणालङ्कारम् अवमुञ्चतिअवमुच्य स्वयमेव पञ्चमुष्टिकं लोचं करोति, कृत्वा आदर्शगृहात्प्रतिनिष्क्रामति प्रतिनिष्क्रम्य अंतःपुरमध्यंमध्येन निर्गच्छति निर्गत्य दशभिः राजवरसहस्रः सार्द्ध संपरिवृतो विनोतां राजधानी मध्यमध्येन निर्गच्छति निर्गत्य मध्यदेशे सुखं सुखेन विहरति विहृत्य यत्रैव अष्टापदः पर्वतस्तत्रैव उपागच्छति उपागत्य मष्टापदं पर्वतं शनैः शनैः दुरोहति दुरूहय मेधधनसन्निकाश देवसन्निपातं पृथिबी शिलापट्टकं प्रतिलेखयति प्रतिलिख्य संल्लेखनाजोषणाजुष्टो झुषितो वा भक्तपानप्रत्याख्यातः पादपोपगतः कालम् अनवकाङ्क्षन् अनवकाङ्क्षन् विहरति, ततः खलु स भरतः केवली सप्तसप्ततिं पूर्वशतसहस्राणि कुमारवासमध्ये उषित्वा एक वर्षसहस्रं माण्ड लिकराजमध्ये उषित्वा षट् पूर्वशतसहस्राणि वर्षसहस्रोनानि महाराजमध्ये उषित्वा त्र्यशीतिं पूर्वशतसहस्राणि अगारवालमध्ये उषित्वा एकं पूर्वशतसहस्र देशोनं केवलिपर्याय प्राप्य तदेव बहुप्रतिपूर्व श्रामण्यपर्यायं प्राप्य चतुरशीति पूर्वशतसहस्राणि सर्वायुः प्राप्य मासिकेन भक्तेन अपानकेन श्रवणेन नक्षत्रेण योगमुपागतेन क्षीणे वेदनीये आयुषि नाम्नि गोत्रे कालगते व्यतिक्रान्ते समुद्यातः छिन्नजाति जरामरणबन्धनः सिद्धो बुद्धो मुक्तः अन्तगतः सर्वदुःखप्रहीणः ॥सू०३४॥ ... टीका " तएणं से” इत्यादि । 'तएणं से भरहे राया अण्णया कयाई जेणेव • मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ ' ततः वर्षसहस्रोनषट्पूर्वलक्षावधिसाम्राज्यानुभवना'नन्तरं खलु स भरतो राजा अन्यदा कदाचित् अन्यस्मिन् कस्मिंश्चित् काले यत्रैव मज्जनगृहं स्नानगृहम् तत्रैव उपागच्छति । उवागच्छित्ता' उपागत्य 'जाव ससिव्व पिअदसणे णरवई मज्जणघराओ पडिणिक्खमइ ' यावच्छशीव प्रियदर्शनो नरपतिः भरत राजा मज्जनगृहात्प्रतिनिष्कामति निर्गच्छति अत्र यावत्पदात् यथा चन्द्रः स्वच्छ.. नरदेव भरत को धर्मदेवत्व की प्राप्ति होने का कारण - 'तएणं से भरहे राया अण्णया कयाइं जेणेव मज्जणघरे" इत्यादि सूत्र-३४ : टीकार्थ (तएणं से भरहे राया अण्णया कयाई जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ) एक दिन की बात है कि १ हजार वर्ष कम ६ लाख पूर्व तक साम्राज्य पद भोगने के बाद वे मत सजा जहां पर स्नान गृह था वहाँ पर गये (उवागन्छित्ता जाव ससिव्व पियदसणे णरवई " मज्जणधरामो पडिणिस्वमइ) वहां जाकर शशि के जैसे प्रियदर्शनवाले वे भरत राजा मज्जनगृह से वापिस बाहर निकले यहां यावत्पद से" यथा स्वच्छमेघान्निर्गच्छन् सन् चन्द्रः નરદેવ ભરતને ધર્મદેવત્વની પ્રાપ્તિ શા કારણુથી થઈ ? તે સંબંધમાં કથન(तएणं से भरहे राया अण्णया कयाई जेणेव मज्जणघरे) इत्यादि सूत्र-३४॥ पीतार्थ:-(तपणं से भरहे राया अण्णया कयाई जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छह) એક દિવસની વાત છે કે એક સહસ વર્ષ કમ ૬ લાખ પૂર્વ સુધી પામ્રાજ્ય પર ભેગવ્યા माइते भरत २amriस्तान तु त्यां गया. (उवागच्छित्ता जाव सिव पियदसणे गवई मज्जघराओ पडिणिखमइ) त्यां न शशी । प्रियशी ते भरत रा मन समांथा पापा नाvil, मी यावत् ५४थी "यथा स्वच्छ मेधान्निर्गच्छन् सन् चन्द्रः • Page #983 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका त.३ वक्षस्कारः सू० ३४ षट्स्खण्डं पालयतो भरतस्य प्रवृत्तिनिरूपणम् ९६९ मेघान्निर्गच्छन् सन् प्रियदर्शनो भवति तथाऽयमपि भरतः सुधाधवलितमज्जनगुहानिर्गच्छन् प्रियदर्शन इति पडिणिक्खमित्ता' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य जेणेव भादंसघरे जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ ' यत्रैव आदर्शगृहं दर्पणगृहम् यत्रैव च सिंहासनं तत्रैव उपागच्छति · उवागच्छित्ता' उपागम्य 'सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुरेणिसीयइ ' सिंहसनवरगतः श्रेष्ठसिंहासने उपविश्येत्यर्थः पौरस्त्याभिमुखः पूर्वाभिमुखो भूत्वा निषीदति उपविशति स भरतः णिसीइत्ता' निषध उपविश्य 'आदसघरंसि अत्ताणं पेहमाणे पेहमाणे चिट्टइ' आदर्शगृहे आत्मानं पश्यन् पश्यन् तत्र प्रतिविम्बितं सर्वा स्वरूपं स्वशरीरं प्रेक्षमाणः प्रेक्षमाणः तिष्ठति आस्ते स भरतः । 'तएणं इत्यादि । 'तण प्रियदर्शनो भवति, तथाऽयमपि भरतः सुधाधवलितमज्जनगृहान्निर्गग्छत् प्रियदर्शनः" इस कथन का संग्रह किया गया है. इसका अर्थ सुगम है. (पडिणिक्खमित्ता जेणेव आदंसघरे जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ) बाहर निकल कर फिर वे जहां पर आदर्श गृह (अरिसा भवन) था और उसमें भी जहां पर सिंहासन था. वहां पर आये. (उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे णिसीयइ) बहां आकर वे पूर्वदिशा को ओर मुँह कर के सिंहासन पर बैठ गये (णिसोहचा आदंसघरंसि अत्ताणं देहमाणे चिर) वहां बैठे २ वे अपने पडे हुए-प्रतिबिम्ब को बार २ निहार ने लगे अपने प्रतिबिम्ब को निहारते २ उनकी दृष्टि अपनी अङ्गुली से गिरि हुई मुद्रिका-अरठीपर -पड़ गई. उसे देखकर उन्होंने अपनी-अंगुली को दिन में ज्योत्स्ना से फीकी पड़ी हुइ शशिकला के समान देखा-देखकर उन्होंने वि वार किया कि ओह-यह अञ्जली अगुठी से विरहित होकर शोभा विहीन होगई है. इस प्रकार विचार करते हुए उन भरत ने अपने शरीर के-और २ अवयवों को आभरण विहीन कर दिया तो ये सब-अवयव भो शोभा से विहीन हुए उन्हें दिखने लगे. तब, उन्होंने समस्त मङ्गों से आभूषणों को उतारना प्रारम्भ कर दिया. (तएणं प्रियदर्शनी भवति तथाऽयमपि भरतः सुधाधवलितमज्जनगृहान्निर्गतः प्रियदर्शनः' मा ४थनना सब ३२वामा मावस छे. मानो अर्थ सुगम छे, (पडिणिक्खमित्ता जेणेव भादंसघरे जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ) पहारीजी छान्यो (मन) तुमने तेमाप या सिंहासन तु त्या मा०या. (उवागच्छित्ता सीहासणघरगए पुरस्थाभिमुहे णिसोयइ) त्यांना पूर्व हिश त२३ भुमशन सिंहासन ०५२ समासीन 45 गया. (णिसीइत्ता आदसघरंसि अत्ताणं देहमाणे चिट्ठइ) या मेसीन તેઓ પોતાનાં પ્રતિબિંબ ને વારે ઘડીએ જોવા લાગ્યા. પિતાના પ્રતિબિંબને જોતાંજોતાં તેમની દૃષ્ટિ પિોતાની આંગળીથી સરી પડેલી મુદ્રિકાં–અંગુઠી–ઉપર પડી ગઈ. તેને જોઈને તેમણે પિતાની આંગલીને દિવસમાં જ્યોન્ના રહિત શશિકલાની જેમ કાંતિહીન જોઈ તેરીતે જોઈને તેમણે વિચાર કર્યો કે અરે ! એ આંગળી અંગુઠીથી વિરહિત થઈને શોભા વિહીન થઈ ગઈ છે. આ પ્રમાણે વિચાર કરતાં કરતાં તે ભરતે પિતાના શરીરના બીજા અંગોને પણ આભાર વિહીન કરી દીધાં. આમ સર્વ અંગો પણ શેભા વિહીન થઈ ગયાં ત્યાર माह तभपाताना समस्त भागो उपरथी आभूषणो उतinelai (तपण तस्स भरास्स १२२ Page #984 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिहले. तस्स भरहस्स' तताखलु तस्य भरतस्य राज्ञः 'मुभेणं परिणामेणं'शुभेन परिणामेन-मांसभूषविष्ठायमलैः परिपूर्णमिदं शरीरं किं सुशोभम् इदश्च कर्पूरकस्तूरीप्रभृतीन्यपि पयत्ययेव । यत्प्रातः संस्कृतं धान्यं तन्मध्याझे विनश्यति । तदीयरसनिष्पन्ने, काये का नाम सारता ॥१॥ इति शरीरासारत्वभावनारूपया जीवपरिणत्या 'पसत्येहि बावसाणेहि प्रशस्तैः अध्यवसानैः - मोक्तस्वरूपैः मनः परिणामैः 'लेस्पाहिं' लेश्याभिः शुक्लादि द्रव्योपहितजीवपरिणतिरूपाभिः 'विमुज्झमाणीहिं विमुज्झमाणीहि' विधुदयन्तीभिर्विशुद्धयन्तीभिः - उत्तरोत्तरविशुद्धिमापद्यमानाभिरापद्यमानाभिः 'ईहापोशमग्गणमवेषणं करेमाणस्स' निराकरणवपुर्वैरूपप्यविषयकम् ईहापोहमार्गणगवेषणं कुर्वत तत्र ईहादिपदेभ्यः प्रथमम् अवग्रहस्य उल्लेखः तथा च अवग्रहेहापोहमार्मणगवेषअमिति, तत्र लोके अवग्रहो यथा दूरस्थ पुरोवर्तिनि वस्तूनि किमिदमिति ज्ञानम् । ततः हास्वरूपमाह - ईहनम् ईहा नामजात्यादि कल्पनारहित सामान्यज्ञानोत्तरं विशेषनि. अया विचारणा इहा यथा स्पर्शनेन्द्रियेण स्पर्शसामान्य ज्ञाते सति स्पर्शः ? इति मावान्धकारे. चक्षुष्मतोऽपि विचारणा प्रवर्तते, एवं स्थाणुर्वा पुरुषो वा इति विचारणा तथा प्रकृते सा शोभा अलङ्कारसन्नियोगशिष्टशरीरे अलङ्कारजन्या औपाधिकी असा स्वभाविकीति ईहा ततोऽपोहस्वरूपमाह - अपोहनम् अपोहः मंतिज्ञानस्य तस्स भरहस्स रपणो मुभेणं परिणामेणं पसत्थेहिं अज्शवमाणेहिं ले साहिं विसुज्झमाणीहिं विसुज्झमाणीहि ईहापोहमग्गणमवेसणं करेमाणस्स) जब वे समस्त अंगों से आभूषणों को उतार चुके तब उसके बाद-उनके अन्तरङ्ग में ऐसा शुभ परिणाम जगा कि यह शरीर मांस, मूत्र, विष्ठा आदि मलों से परिपूर्ण है, इसमें शोभा जैसी वस्तु क्या है ? यह तो ऐसा है. कि कपर कस्तुरी आदि बस्तुओं को भी दूषित बना देता है. जो धान्य प्रातः संस्कृत-पकाया जाता है-वह मध्याह-में विनष्ट हो जाता है. उसके रससे निष्पन्न हुए- इस कार्य में सारता जैसी '. चीन क्या है, इस प्रकार की शरीर की असारताका चिन्तवन करने रूप जीवपरिणति से-तथा प्रशस्त अध्यवसायों से-मनोविचार धाराओं से-एवं प्रतिक्षण विशुद्ध होती जाती लेश्याओं से योग की- प्रवृत्तियों से-निरावरण शरीर की विरूपता विषयक ईहा अपोह, मार्गण और गवेरणो सुमेणं परिणामेणं पसत्थेहिं अज्झवसाणेहिं लेसाहिं विसुज्झमाणीहिं विसुज्झमाणोहि ईहापोहमग्गणगवेसणं करेमाणस्स) न्यारे समस्त सभी 6५२थी मासूषो। उतायूइया ત્યારે તેમના અંતરમાં એવી શુભભાવના ઉદ્દભવી કે આ શરીર, માંસ, મૂત્ર, વિષ્ઠા વગેરે મળથી પરિપૂર્ણ છે. એમાં શભા જેવી વસ્તુ કઈ છે ? આતે એવું છે કે કપૂ૨ કસ્તૂરી વગેરે સુગંધિત વસ્તુઓને પણ પ્રષિત બનાવી દે છે. જે ધાન્ય સવારે પકવવામાં આવે છે, તે મધ્યાહ્નમાં વિનષ્ટ થઈ જાય છે, તેના રસથી નિષ્પન્ન થયેલા આ કાર્યમાં સારવાન જેવી વસ્તુ કઈ છે ? આ પ્રમાણે શરીરની અસારતાનું ચિત્તવન કરવા રૂપ જીવરિતિથી તેમજ પ્રશસ્ત અધ્યવસાયથી–મને વિચારધારાઓથી તેમજ પ્રતિક્ષણ વિશુદ્ધ થતી વેશ્યાઓથી–ગની પ્રવૃત્તિઓથી-નિરાવરણ શરીરની વિરૂપતા વિષયક ઈહા, અપહ Page #985 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सु० ३४ षट्खण्डं पालयतो भरतस्य प्रवृत्तिनिरूपणम् अवग्रहादि भेदचतुष्टये तृतीयभेदे योऽपायः स एव अपोहः, सच सामान्य ज्ञा नोत्तरं कालं विशेषनिश्चयार्थं विचारणायां प्रवृत्तायां तदनुगुणदोषविचारणाजनितो निश्चयः । यथा लोके किमयं कमलनालस्पर्श: : आहोस्वित भुजङ्ग स्पर्शः । इति वि चारणायां मृणालस्यैव स्पर्शः एवं स्थाणुरेव न पुरुषः वल्ली उत्सर्पणादि धर्माणां तत्र सद्भावात् इत्ययं निश्चयः पुरुषमपनुदति । अत्यन्तशीतलत्वादि गुणवत्त्वात् इत्यस्यैचायमिति निश्चयोऽन्यं भुजङ्गस्पर्शम् अपनुदति तथा प्रकृते सा शोभा औषधिक्येव न स्वाभाविकी तस्याः अलङ्कारादि बाह्यवस्तुसंसर्गजन्यत्वस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । ततो मार्गणा स्वरूपमाह अस्याः शोभायाः प्रकर्षापकर्षो बाह्यवस्तु प्रकर्षापकर्षानु . विधायिनौ इत्यन्वयधर्मालोचनं मार्गणा यथा लोके स्थाणौ निश्चेतव्ये तत्र वल्ली उत्सर्पणादयो धर्माः संभवन्ति । ततो गवेषणस्वरूपमाह - प्रवृतस्याः तस्याः शोभायाः स्वाभाविकत्वे उत्तानां भारभूतस्य आभरणस्य वपुषि धारणबुद्धिर्न स्यादिति व्यतिरेकधर्मालोचनम् गवेषणम्, यथा स्थाणौ शिरः कण्डूयनादयः पुरुषधर्माः न दृश्यन्ते षण करते २ (तयावरणिज्जाणं क्रम्माणं स्वएणं कम्मरयत्रिकिरणकरं अपुव्यकरणं पविरस अर्णते अणुत्तरे निव्वाधार निरावरणे कसिणे पडिपुण्णे केवलवरनाणदंसणे समुप्पणे) तंदा वरणीय कर्मों के क्षय से कर्मरज को विकीर्ण करने वाले अपूर्व करणरूप शुक्लध्यान में वे भरतमहाराज प्रविष्ट हो गये सो उसी समय उनके अनन्त अनुत्तर, व्याघात रहित निरावरण, - कृत्स्न एवं प्रतिपूर्ण ऐसे केवलज्ञान और केवलदर्शन उत्पन्न हो गये. यहां जो ईहापोह आदि पद आये हैं सो उनके सम्बन्ध में ऐसा विचार है सब से पहिले अवग्रह रूप ज्ञान होता है, और यह "यह कुछ है" इस रूप होता है. अवग्रह में अवान्तर सत्ता विशिष्ट वस्तु का ग्रहण होता है. जैसे दूरस्थ -सामने रही हुइ वस्तु को देखकर ऐसा विचार आता है कि यह कुछ है. इसके बाद अवप्र गृहोत अर्थ में विशेष जानने की आकांक्षा जगती है तब विचार होता है कि यह जो कुछ रूप में प्रतिभासित हो रहा है सो क्या भार्गाने गवेषारता उरतो. (तयावरणिज्जाणं कम्माणं खपणं कम्मरय विकिरण करं अपु करणं पविस्स अणते अणुत्तरे निव्वाधार निरावरणे कसिणे पडिपुणे केवलवरनाणदंसणे समुपणे), तावशीय उर्भाना क्षयथी उर्भर ने विडीर्ण भएनाश अपूर्व ४५ ३५ શુફલધ્યાનમાં તે ભરત નૃપતિ મહારાજ મગ્ન થઈ ગયા. અને તેજ ક્ષણે તેમના અનંત અનન્તર વ્યાઘાત રહિત નિરાવરણ, કૃત્સ્ન તેમજ પરિપૂર્ણ એવા કેવળજ્ઞાન અને કેવળ દર્શન ઉત્પન્ન થયાં. અહીં જે ઇાપેાહ વગેરે પદે આવેલા છે તે તે સબંધમાં આ વિચાર છે કે સર્વાં પ્રથમ અવગ્રહ રૂપ જ્ઞાન હોય છે. અને આ એ કંઈક છે” એ રૂપમાં હાય છે. અવગ્રહમાં અવાન્તર સત્તા વિશિષ્ટ વસ્તુએનું ગ્રહણ થાય છે જે મ દૂરસ્થ પણ સામે જ દેખાતી વસ્તુને જોઈને આમ વિચાર થાય છે કે એ કંઈક છે. ત્યારબાદ અવગ્રહ ગૃહીત અર્થમાં વિશેષ જાણવાની આકાંક્ષા જાગ્રત થાય છે. તે વખતે વિચાર ઉદ્દભવે છે કે એ જે કંઈક પ્રતિભાસિત થઈ રહ્યું છે તે શું છે ? શું તે મકતા છે કે વા છે ? આ - ९.०१ Page #986 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अम्वृद्धीपप्राप्तिसूत्र है! क्या बकपङ्क्ति-हैं या ध्वजा है ! इस प्रकार के जायमान संदेह को दूर करने के लिये निश्चय की ओर झुकते हुए ज्ञान का नाम ईहा है. जैसे यह ध्वजा होनी चाहिये. ईहा के बाद बिलकुल निश्चय-करने वाले ज्ञान का नाम अवाय-अपोह है-जैसे-यह-ध्वजा हो है. तथा अन्यान्य धर्म का पालोचन करना-इसका नाम गवेषण है. टोकाकार ने अवग्रह आदिकों केस्वरूप को इस प्रकार से समझाया है. जैसे-चक्रवर्ती ने-विचारा-शरीर में शोभा है. यह अवग्रह उसे ज्ञान हुआ-पर इसके बाद उप्ते ऐसा संशय ज्ञान हुआ कि यह शारीरिक शोभा अलङ्कार जन्य है. या स्वाभाविकी है ? संशय को दूर करने के लिये निश्चय की ओर झुकता हुआ ईहाज्ञान उसे इस प्रकार से हुआ कि यह अलङ्कार विशिष्ट शरीर की शोभा अलङ्कार जन्य होनी चहिये । इसके बाद फिर उसे ऐसा अवाय -अपोह-ज्ञान हुआ कि यह शारीरिक शोभा औपघिकी ही है स्वाभाविकी नहीं है। मतिज्ञान के जो सिद्धांतकारों ने अवग्रह आदि ४ मेद प्रकट किये हैं और उनमें एक अवाय नामका भेद प्रकट किया है उसी का नाम यहां अपोह कहा गया है। यह शारीरिक शोभा औपधिकी इसलिये निश्चित हुइ कहि गइ है कि यह अलंकारादिरूप बाह्य वस्तु के संसर्ग से जन्य हुई है. यह प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध हो रही है। इस शारीरिक शोभा के जो प्रकर्ष और अप्रकर्ष धर्म हैं वे बाह्य वस्तु के प्रकर्ष और अप्रकर्ष के अनुविधायी है इस तरह अन्वयरूप धर्म की आलोचना करने का नाम मार्गणाहै व्यतिरेक धर्म का आलोचन करना इसका नाम गवेषण है । और वह इस प्रकार से है ---यदि उप शारीरिक शोभा को स्वाभाપ્રમાણે જે સંદેહ ઉત્પન્ન થાય તેને દૂર કરવા માટે નિશ્ચય તરફ ઉન્મુખ થતા જ્ઞાનનું નામ ઈહા છે. જેમ કે એ વજા જ હોવી જોઈએ. ઈહા ૫છી એકદમ નિશ્ચય કરાવનારુ જ્ઞાન – અવાય–અપહ છે. જેમકે – એ ધ્વજા જ છે. તથા અન્ય ધર્મનું આલેચન કરવું ગવેષણ છેટીકાકારે અવગ્રહ વગેરેના સ્વરુપને આ પ્રમાણે સમજાવ્યું છે કે જેમ ચક્રવતીએ વિચાર કર્યો કે શરીરમાં શભા છે. એ અવગ્રહ રૂપ તેને જ્ઞાન થયું પણ ત્યારબાદ તેને આવું સંશય જ્ઞાન થયું કે એ શારીરિક શોભા અલંકારજન્ય છે-કે સ્વાભાવિકી છે ? એ સંશયને દૂર કરવા માટે નિશ્ચય તરફ ઉમુખ થતું ઈહાજ્ઞાન તેને આ રીતે થયું કે એ અલંકાર વિશિષ્ટ શરીરની શોભા અલંકાર જન્ય જ હોવી જોઈએ. ત્યારબાદ તેને એવું અવાય-અપહ-જ્ઞાન થયું કે એ શારીરિક શોભા ઔષધિકી જ છે-સ્વાભાવિકી નથી. સિદ્ધાન્તકારોએ મતિજ્ઞાનના જે અવગ્રહ વગેરે ૪ ભેદ પ્રકટ કર્યા છે અને તેમનામાં એક અવાયનામક ભેદ પ્રકટ કરેલ છે, તેનું જ નામ અહીં અપહ છે. એ શારીરિક શોભા ઔપશ્ચિકી એટલા માટે નિશ્ચિત થયેલી પ્રકટ કરવામાં આવી છે કે એ અલંકારાદિ ૫ બાહ્ય વસ્તુના સંસર્ગથી જન્ય છે. એ વાત પ્રત્યક્ષ પ્રમાણુથી સિદ્ધ થઈ રહી છે એ શારીરિક શેભાના જે પ્રકર્ષ અને અપ્રકર્ષ ધર્મો છે તે બાહય વસ્તુના પ્રકર્ષ અને અપ્રકર્ષના અનુવિધાયી છે. આ પ્રમાણે અન્વય રુપ ધર્મની આલોચના કરવાનું નામ માર્ગણ છે. – વ્યતિરેક ' આલેચન કરવું એ ગષણ છે. અને તે આ પ્રમાણે છે-જે એ શારીરિક શભા સ્વાભાવિક રુપમાં માનવામાં આવે તે પછી ભારભૂત આભૂષણે શરીર ઉપર શામાટે ધારણ કરવામાં Page #987 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका रीका ४०३ पक्षस्कारःस. ३४ नरदेव भरतस्य धर्मदेव त्वप्राप्तिनिरूपणम् ९७६ इति ईहादीनां व्यख्यानम् । पुनः कीदृशस्य भरतस्य 'तयावरिज्जाणं कम्माणं खएणं' तदावरणीयानां केवलज्ञानदर्शननिबन्धकानां चतुर्णा ज्ञानावरणीय १ दर्शनावरणीय २ मोहनीय ३ अन्तराय ४ रूपाणां घातिकर्मणां क्षयेण सर्वथा जीवप्रदेशेभ्यः तदीय पुद्गलपरिशाटनेन 'कम्मरयविकिरणकर' कर्मरजसा विकिरणकरं विक्षेपकरम् निवारकमित्यर्थः 'अपुवकरणं' अपूर्वकरणम् अनादौ संसारे अप्राप्तपूर्व ध्यान शुक्लध्यानं प्रविष्टस्य प्राप्तस्य एवंभूतस्य भरतस्य 'अणं ते अनुत्तरे निवाघाए निगवरणे कसिणे पडिपुण्णे केवलवरनाणदंसणे समुपण्णे' अनन्तम् अप्रतिपादितत्वेन पर्यवसानरहितत्वात् अनुत्तरम् न विद्यते उत्तरम् उच्चतरं (प्रधानम् ) यस्मात्तदनुत्तरम् अनन्यसदृशम् निर्व्यापातं व्याघातरहितम् निरावरणम् कटकुडयादिआवरणसहितं प्रतिबन्धकीभूतावरणरहितम् कु. विक माना जावे तो फिर भारभूत गहनों को धारण क्यों किया जाता है। इससे यह जाना जाता है कि यह स्वाभाविक नहीं है । इसतरहसे यह अवग्रहादिकों का स्वरूप यहां हमने प्रकट किया है। इससे टोकाकार का अभिप्राय जो टोका में लिखा गया है, वह स्पष्टरूप से हृदयंगम किया जा सकता है । टीकागत विचारधारा विलकूल स्पष्ट है । अतः उसका भाव लेकर यह स्पष्टीकरण किया गया है। केवलज्ञान और केवलदर्शन को आवरण करने वाले ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणोय, मोहनीय और अन्तराय, ये चार कर्म है । इन्हें घातिकर्म भी कहा गया है। इनका अब सर्वथा क्षय हो जाता है। अर्थात् ये जीव के प्रदेशों से बिलकूल नष्ट हो जाते हैं । तब केवलज्ञान और केवलदर्शन उत्पन्न होते हैं। यहां "अपुवकरणं " पद शुक्लध्यान का वाचक है। इस अनादि संसार में यह ध्यान अप्राप्त पूर्व होता है ये केवलज्ञान और केवलदर्शन अप्रतिपाती होते हैं इसलिये एक बार प्राप्त होने पर फिर छूटते नहीं हैं इसलिये उन्हें अनन्त कहा गया है इनके जैसा और कोई उत्कृष्ट ज्ञान दर्शन नहीं हैं इसलिये इन्हें अनुत्तर कहा गया है। इनका कटकुडयादि से आवरण नहीं होता है । इसलिये इन्हें निर्व्याघात कहा गया है। આવે છે. એથી એનિશ્ચય થાય છે કે એ સ્વાભાવિક નથી. આ પ્રમાણે એ અવગ્રહાદિકનું સ્વરુપ અત્રે અમે પ્રકટ કર્યું છે એથી ટીકાકારે પોતાના જે અભિપ્રાય ટીકામાં ૨૫ષ્ટ કર્યો છે તે હદયંગમ થઈ જાય છે. ટીકાગત વિચારધારા એકદમ સ્પષ્ટ જ છે. એથી તેને ભાવ લઈને જ એ સ્પષ્ટીકરણ કરવામાં આવેલ છે. કેવલજ્ઞાન અને કેવલદર્શનને આવૃતા કરનારા જ્ઞાનાવરણીય, દર્શનાવરણીય, મેહનીય અને અંતરાય એ ચાર કર્મો છે. એમને ઘાતિક પણ કહેવામાં આવેલ છે. એમને જ્યારે સર્વથા ક્ષય થઈ જાય છે એટલે કે એ જીવોના પ્રદેશથી એકદમ નષ્ટ થઈ જાય છે ત્યારે કેવલજ્ઞાન અને કેવલशन उत्पन्न याय छे. मी " अपुव्वकरणं" ५६ शुस ध्यान पाय छे. से मनाह संसारमा એ ધ્યાન અમાસ પૂર્વ હોય છે. એ કેવળજ્ઞાન અને કેવળર્શન અપ્રતિપાતી હોય છે. એથી એક વાર પ્રાપ્ત થઈ જાય તે પછી છૂટતા નથી. એથી જ એમને ‘અનંત કહેવામાં આવેલ છે. એમના જેવું અન્ય કોઈ પણ ઉત્કૃષ્ટ જ્ઞાન-દર્શન નથી, એથી જ એમને અનુત્તર કહેવામાં આવેલ છે. એમનું કટ-કયાદિથી આવરણ થતું નથી એથી જ એમને નિર્યાઘાત કહેવામાં Page #988 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १९७४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे समस्तं सकल पदार्थविषयत्वात् प्रतिपूर्णम् सूत्रतोऽक्षरमात्रादि न्यूनतया रहितं सर्वप्र'माणोपेतम् एतावच्चतुष्टयविशेषणविशिष्टं केवलवरज्ञानदर्शनं समुत्पन्नम् । अथोत्पन्न"केवलः किं करोतीत्याह - तर णं इत्यादि । 'तए णं से भरहे केवली सयमेवाभरणालंकार ओमुअ' ततः केवलज्ञानानन्तरं खलु स भरतः केवली स्वमेव आभरणालंकारं 'माल्यरूपम् अत्रमुञ्चति त्यजति मत्र भूषणालङ्कारस्य वस्त्रमाल्यालंकारयोरवग्रहः 'ओमुइ'ता' अवमुच्य त्यक्त्वा 'सयमेव पंचमुट्टि लोअं करेइ' स्वयमेव पञ्चमुष्टिकं लोचं करोति 'करिता ।' कृत्वा उपलक्षणात् सन्निहित देवतयाऽर्पितं साधुलिङ्गं 'भरहे केवळी सदोरय मुह पत्ति रहरणं गोच्छगं पडिग्गदं देवदसं वत्थं पडिच्छइ' भरतः केवली सदोरकमुखव त्रिकरजोहरणं गोच्छक पात्रं देवदृष्यं वस्त्रं गृहीत्वा साधुवेषं धृत्वा 'आयसधराओ -पडिणिक्खमइ' आदर्शगृहात्प्रतिनिष्क्रामति निर्गच्छति स भरत: केवली 'पडिfuaafnat' प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य 'अंतेउर मज्झमज्झेणं निग्गच्छर' छन्तः पुरमध्यं मध्येन निर्गच्छति प्रतिनिष्क्रामति 'णिग्गच्छित्ता' निर्गत्य 'दस सहस्रायवरे saft पव्वज्जं देहि तओ पच्छा तेहिं सर्द्धि विहारं करीय, लक्खपुत्र्वं संजमं पालिय' दशसहस्रारजवरसहस्रान प्रतिबोध्य, प्रव्रज्यां ददाति ततः पश्चात् तैः सार्द्धं विहारं कृतवान् । 'दसहि रायवरसहस्सेहिं सद्धिं संपरिवुडे विणीयं रायहाणीं मज्झं मझेणंसकल त्रिकालवर्ति पदार्थों को ये उनको अनन्त पर्यायों सहित हस्तामलकवत् जानते हैं इसलिये इन्हें कृत्स्न कहा गया है। सूत्र की अपेक्षा ये अक्षर मात्रा आदि कं न्यूनता रहित होते हैं इसलिये इन्हें प्रतिपूर्ण कहा गया है. (तपणं से भरहे केवली सयमेवाभरणालंकार ओमुअइ) इसके बाद उस भरत केवली ने अपने आप हो अवशिष्ट माल्यादिरूप आभरणों को एवँ वस्त्रादिकों को छोड़ दिया (ओमुइत्ता सयमेव पंचमुट्ठियं लोअं करेइ) छोड़कर फिर उन्होंने पंचमुष्टिक केशोंका लोंच किया (करिता आयंसघराओ पडिणिक्खमइ ) पंचमुष्टिक केशलोच करके सन्निहित पास में रहे हुए देव द्वारा अर्पित साधुलिङ्ग को ग्रहण करके धारण करके वे आदर्श भवन से बाहर निकले ( पडनिमित्ता अंनेउर मज्झमज्झेणं णिगच्छई ) बाहर निकलकर वे अपने આવેલ છે. સકલ ત્રિકાલવર્તિ પદાર્થોને એએ તેમની અનંતપર્યાયેા સહિત હસ્તામલકવત્ જાણે છે. એથી જ એમને કૃત્સ્ન કહેવામાં આવે છે. સૂત્રની અપેક્ષાએ એ અક્ષર માત્રા વગે. रैनी न्यूनताथी रहित होय . मेथी ४ भने प्रतिपूर्ण वामां आवे छे. (तप णं से भर हे केवली सयमेवाभरणालंकारं ओमुअइ) त्यारभाह ते भरत वसी मे पोतानी भेजे अवशिष्ट महियादि ३५ आभरणो ते वस्त्राने पशु त्यहीघां (ओमुहत्ता सयमेव पंचमुट्ठियं लोअं करेइ) त्यने पूछा तो पथभुष्टि प्रेशसुचन यु. ( करिता घराओ पडिणिक्खमइ) पन्यभुष्टि शयन हरीने सन्निहित निस्ट भूला देव द्वारा અર્પિત સાધુલિંગને ગ્રહણ કરીને-ધારણ કરીને તે આદશ” ભવનમાંથી બહાર નીકળી गया. ( पडिणिक्खमित्ता अंते उर मज्झ मझेणं णिगच्छई ) मबार नीणीने तेथे पोताना अतपुरनी वस्ये थाने भवनमांथी मडार नीजी गया. 'दल सहस्स रायवरे पडिबोहिय पज्जं देहि तओ पच्छा तेहिं सद्धि विहारं करिअ लक्खपुव्वं संजम पालिय' हसडलर Page #989 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ०३ वक्षस्कारःसू० ३४ षट्खण्डं पालयतो भरतस्य प्रवृत्तिनिरूपणम ९७५ णिग्गच्छई' दशभी राजवरसह संपरिघृतो सार्द्ध विनीतायाः राजध न्या:मध्यंमध्येन निगच्छति निग्गच्छित्ता'मिर्गस्य मज्मदेसे मुहं सुहेणं विहरइ'मध्यदेशे कोशलदेशस्य मध्ये मुखं मुखेन विहरति स केवली भरतः 'विहरित्ता' विद्वत्य 'जेणेव अट्टाए पवए तेणेव उवागछछ' यत्रैव अष्टापदः पर्वतः तत्रैव उपागच्छति 'उवामच्छित्सा' उपागत्य 'अट्ठावयं पव्वयं सणिों सणि दुरूहइ' मष्टापदं पर्वतं शनैः शनैः दुरोहति आरोहति 'दुरूहि त्ता' दुरून आरुह्य 'मेघघणसण्णिकासं देवसण्णिवायं पुढवि सिलावट्टयं पडिले हे इ' मेघधनसन्निकाशंपनमेघसन्निकाशम् सान्द्रजळदश्यामम् मूले पदव्यत्ययः प्राकृतत्वात् देवसन्निपातम् देवानां सन्निपातः आगमनं रम्यत्वात् यत्र स तथा भूतस्तम् पृथिवीशिलापट्टकम् आसनविशेष प्रतिलेखयति केवलित्वे सत्यपि व्यवहारप्रमाणीकरणार्थ दृष्टया निभालयति अंतःपुर के बीच से होकर राजभवन से चले गये. ( णिमाकिछत्ता दमसइस्सरायवरे पडिबोहिय पव्वज्ज देह तओ पच्छा तेहिं सद्धि विहारं करिअ लवखपुव्वं संजमं पालिय'दस हजार राजाओं को प्रतिबोधित करके उन सबको दीक्षादी तदन्तर उनके साथ विहार करके लाख पर्व पर्यन्त संयमका पालन किया 'द सहिं रायवरसहस्सेहिं सद्धि संपवुिडे विणोयं राजहाणी मज्झं मझेणं पिागच्छई) उस समय उनके साथ १० हजार राजा थे उनके साथ साथ ये विनीता राजधानी के ठीक बीचों बीच के रास्ते से होकर निकले थे (णिग्यच्छित्ता मज्झदेसे सुहं सुहेणं विहरइ) और निकलकर इन्होंने मध्य देश में कोशल देश में सुख पूर्वक विहार किया ( विहरित्ता जेणेव अट्टावए पव्वए तेणेव उवागच्छइ) विहार करके ये फिर जहां पर अष्टापदपर्वत था, उसके पास आये । (उवागच्छित्ता अट्ठावयं पव्वयं सणिय सणियं दुरुहइ) वहां आकर ये उस पर बड़ी सावधानी से चढे ( दुरुहित्ता मेघधणसंण्णिकासं देवप्तण्णिवायं पुढविसिलापट्टयं पडिलेहेइ ) चढकर इन्होंने पृथिवीशिलापट्टक को जो कि सन्द्र जलधर के जैसा श्याम था और रम्य होने से जहां देवगण आया करते थे, प्रतिलेखना की । यद्यपि ये केवली थे, परन्तु फिर भी व्यवहारधर्म को प्रमाणित करने के लिये इन्होने अपनी दृष्टि से उसे अच्छी तरह જાઓને પ્રતિબંધિત કરીને તેઓ ને દીક્ષા આપી તે પછી મના સાથે વિહાર કરીને લાખ पूर्व ५4-1 सयभनु पालन यु. (णिगच्छ्रित्ता दसहिं गयवरसहस्से हिं सद्धिं संपरिबुडे विणीयं रायहाणी मज्झं मझेण णिगच्छइ) मते तेनी साथै १०७२ सन। હતા. તે સર્વ રાજાઓની સાથે-સાથે એ વિનીતા રાજધાનીના ઠીક મધ્યમાગ માંથી '५सार था. (णिग्गच्छित्ता मज्झदेसे सुहं सुहेण विहरह) भने ५सा२ ४ २ तभी अध्यादेशमा शशमां सुभपूर्व विहा२ व्या. (विहरित्ता जेणेव अट्ठावप पव्वयं तेणेव उवागच्छइ ) विडा२ ४शने थे अटाप पतनी पासे सच्या. (उवागच्छिता अट्ठावयं पव्वयं सणियं सणियं दुरुहइ) त्यां पीने से तना ६५२ सावधानी पू४ अदया. (बुसहित्ता मेघघणसंण्णिकासं देवसण्णिवायं पुढविसिलापट्टयं पडिलेहेइ) सढी ने अमन પૃથિવી શિલાપટ્ટની કે જે સાન્દ્ર જલધરવતુ શ્યામ હતું અને રમ્ય હોવાથી જ્યાં દેવ વિશે આવ્યા કરતા હતા–પ્રનિલેખના કરી. જો કે એ એ કેવલી હતા છતાં એ વ્યવહાર અને પ્રમાણિત કરવા માટે તેમણે પોતાની દૃષ્ટિ થી પૃથ્વીશિલાપટ્ટને સારી રીતે જોયું. Page #990 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्पूछीपप्रज्ञप्तिसूत्रे 'पडिछेहिता' प्रतिलिख्य सिंहावलोकनन्यायेन अत्रापि आरोहतीति बोध्यम् 'संलेहणा भूसणाझूसिए' संस्लेखना जोषणाजुष्टः संलिख्यते-कुशी क्रियते शरीरकषायाधनया इति संलेखना तपो विशेषलक्षणा तस्याः जोषणा सेवना तया जुष्टः सेवितः झुषितो वा क्षषितो यः स तथाभूतः 'भत्तपाणपडिभाइक्खिए' भक्तपानप्रत्याख्यातः-प्रत्याख्यातभतपानः प्रत्याख्याते भक्तपाने येन स तथाभूतः मूले तान्तस्य परनिपातः प्राकृतत्वात् 'पाओवगए' 'पादपोपगतः-पादो वृक्षस्य भूगतो मूलभागः तस्यैत्र अप्रकम्पतया उपगतम् अवस्थानं यस्य स तथाभूतः 'कालं अणवकंखमाणे २ विहरई' कालं मरणम् अनवकांक्षन् अवाञ्छन् विहरति'तएणं से भरह केवली सत्ततर पुव्वसयसहस्साइं कुमारवासमझे वसित्ता' ततः खलु स भरतः केवली सप्तसप्ततिं पूर्वशतसहस्राणि सप्तसप्तति लक्षाणि कुमारवासमध्ये कुमारभावे उषित्वा 'एग वास सहस्सं मंडलियरायमज्झे वसित्ता' एक वर्षसहस्रं माण्ड लिकराजा एकदेशाधिपतिः भावप्रधानत्वान्निर्देशस्य माण्डलिकत्वं तन्मध्ये उषित्वा 'छपुवसयसहस्साई वाससहस्सूणगाई महारायमज्झे वसित्ता' षट्पूर्वशतसहस्राणि वर्षसह नानि महाराजमध्ये चक्रवर्तित्वे उषित्वा 'तेसीइ पूवसयसहस्साई अगारवासमझे से देखा । ( पडिलेहित्ता संछेहणाझूसणाझूसिए भत्तपाणपडिआइक्खिए ) अग्छी तरह से देखने रूप प्रतिलेखना करके ये उस पर चढ गये और काय एवं कषाय जिसके द्वारा कृश की जाती है ऐसो संलेखना को इन्होंने बड़े आदर भाव से धारण कर लिया और भक्तपान का प्रत्याख्यान कर दिया । (पाओवगए कालं अणवकं खमाणे २ विहरइ ) एवं पादपोपगमन सन्थारा अंगीकार कर लिया पादपोपगमन सन्थारे में जीव वृक्ष की तरह अप्रकम रूप से अवस्थित हो जाता है । इस सन्थारा को धारण करने पर उन्होंने अपने मरण की आकांक्षा नहीं की (तएणं से भरहे केवली सत्ततरं पुन्वसयसहस्साई कुमारवासमझेवसित्ता एगं वाससहस्सं मंडलियरायमाझे बसिता छ पुव्वसयसहस्साई वाससहस्सूणगाइं महारायमज्झे वसित्ता तेसीइपुखसयसहस्साई अगारवासमझे वसित्ता ) इस तरह वे भरत केबली ७० लाख पूर्व तक कुमार काल में रहे एक लाख पूर्व तक मांडलिक राजा रहे १ हजार वर्ष कम छ लाख पूर्व तक महाराज पद (परिलेहिता सलेहणा झूसणारसिप भत्तपाणपडिआइक्खिप) सारी शत शन ३५ प्रति લેખના કરીને એ એ તેની ઉપર ચઢી ગયા. અને કાય તેમજ કષાય જેના વડે કૃશ કર વામાં આવે છે, એવી સંખનાને એમણે ખૂબ જ આદરપૂર્વક ધારણ કરી અને ભક્ત पाननु अत्याध्यान यु. ( पाओवगए कालं अणवस्खमाणे २ विहरइ) तेभर पायाગમન સન્થોરો અંગીકૃત કર્યો. પાદપો ગમન સંથારામાં જીવ વૃક્ષની જેમ અપ્રક રૂપથી અવસ્થિત થઈ જાય છે. એ સંથોરાને ધારણ કર્યા પછી તેમણે પોતાના મૃત્યુની આકાંક્ષા કરી ला. (तए णं से मरहे केवली सत्ततरं पुख्घ सयसहस्लाई कुमारवासमझ वसित्ता एगं वाससहस्सं मंडलियरायमझे वसित्ता छ पुग्धसयसहस्साई वाससहस्सूणगाई महाराय मझे वसित्ता तेसीह पुखसयसहस्साई अगारवासमझे वसित्ता) मा प्रमाणे त भरती ૭૦ લાખ પૂર્વ સુધી કુમાર કાળમાં રહ્યા. એક લાખ પૂર્વ સુધી માંડલિક રાજા રહ્યા, Page #991 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशिका टीका तृ. ३ वक्षस्कारः सु० ३४ षट्खण्डं पालयतो भरतस्य प्रवृत्तिनिरूपणम् ९७ वसित्ता' ज्यशीति पूर्वशतसहस्त्राणि लक्षाणि अगारवाममध्ये उषित्वा गृहीत्वेत्यर्थः 'एग पुव्वसयसहस्सं देसूणगं केवलिपरिआय पाउणित्ता' एक पूर्वशतसहस्रम् अन्तर्मुहत्तोनं केवलिपर्यायं प्राप्य पूरयित्वा तमेव बहुपडिपुण्णं सामन्नपरिआयं पाउणित्ता' तदेव पूर्वशतसहन बहुप्रतिपूर्णम् -संपूर्णम् तेन अन्तर्मुहर्तेनाधिकमित्यर्थः श्रामण्यपर्याय यतित्वं प्राप्य 'चउरासीइ पुन्चसयसहस्साइं सवाउअं पाउणित्ता' चतुरशीति पूर्वशतसहस्राणि लक्षाणि सर्वायुः परिपूर्य 'मासिएणं भत्तेणं अपाणएणं सवणेणं णक्खत्तेणं जोगमुवागएण' मासिकेन भक्तेन मासोपवासैरित्यर्थः, अपानकेन पानकाहारवर्जितेन श्रवणेन नक्षत्रेण योगमुपागतेन चन्देण सहेति गम्यम् 'खीणे वेअणिज्जे आउए णामे गोए' क्षीणे वेदनीये आयुषि नाम्नि गोत्रे च भवोपग्राहि कर्मचतुष्टयक्षये इत्यर्थः 'कालगए वीइक्कते समुज्जाए छिण्णजाइजरामरणबंधणे 'कालगतः मरणं प्राप्तः व्यतिक्रान्तः व्यतीतः समुघातः निगतः छिन्नजातिजरामरणबन्धनः 'सिद्ध बुद्धमुत्ते परिणिव्वुडे अंतगडे सव्वदुक्खप्पहीणे' सिदों में - चक्रवर्ति पद में रहे और तेईस लाख पूर्व तक गृहस्थावस्था में रहे, ( एगं पुव्वसयसहस्स देसूणगं केलिभ'उं पाउणित्ता तमेव बहुपडिपुण्णे सामन्नपरिमायं पाउणित्ता चउरासी पुख सयसहस्साई सव्वाउयं पाउणित्ता मासिएणं भत्तेणं अपाणएणं सवणेणं णवत्तेणं जोगमुवागएणं खोणे वेऊणिज्जे आउए णामेगोए कालगए विइक्कंते समुज्जाए छिण्ण जाइजरामरणबंधणे सिद्ध बुद्धे मुत्ते परिणिवुडे अन्तगडे सव्वदुक्खप्पहीणे) कुछकम अर्थात् अन्तर्मुहर्तकम एक लाख पूर्व तक केवलि पर्याय में रहे इप्त प्रकार से अपनी पूरी ८४ लाख पूर्व की आयुको भोग करके वे भरत केवली एक मास के पूरे संथारों से भक्तपान का सर्वथा परिवर्जन करने रूप सन्थारे से -श्रवण नक्षत्र के साथ योग को प्राप्त चन्द्र के समय में वेदनीय आयु,नाम गोत्र इन चार भवोंपग्राही चार अधातिया कर्मों के क्षय हो जाने पर कालगत हो गये अर्थात् सिद्ध अवस्थायुक्त बन गये मोक्ष में विराजमान हो गये. जाति जरा और मरण के बन्धन से रहित हो गये. सिद्ध हो ૧ હજાર વર્ષ કમ ૬ લાખ ૫ સુધી મહારાજ પદમાં ચક્રવતી પદે રહ્યા. અને ૨૩ લાખ ५ सुधी स्थास्थामा २ हा ।. ( पगं पुव्वसयसहस्स देसूणगं केवलिनाउं पाउणित्ता तमेव बहुपडिपुण्णं सामण्णपरिआय पाउणित्ता चउरासी पुव्वसयसहस्साई सव्वाउयं पाउणित्ता मासिपणं भत्तेणं अपाणएण सवणेणं णक्खत्तेणं जोगमुवागपण स्त्रीणे वेऊणिब्जे आउए णामे गोए कालगए वोइक्कंते समुज्जाए छिण्णजाइजरामरणबंधणे सिखे बुद्धे मुत्ते परिणिव्वुडे अन्तकडे सब्वदुक्खपहीणे )४४ ४४ मेटले अन्त त भ मे army સુધી તેઓ કેવલિ પર્યાવમાં રહ્યા. પૂરા એક લાખ વર્ષ સુધી શ્રમણ્ય પર્યાયમાં રહ્યા. આ પ્રમાણે પિતાની સંપૂર્ણ ૮૪ લાખ પૂરના આયુષ્યને ભેળવીને તે ભરત કેવલી એક માસના પૂરા સંથારાથી–ભકત પાનનું સંપૂર્ણ રૂપમાં પરિવર્જન કરવા રૂપ સંથારાથી–શ્રવણ નક્ષત્રની સાથે વેગ પ્રાપ્ત ચન્દ્રના સમયમાં વેદનીય, આયુ, નામ, ગોત્ર એ ચાર-ભપગ્ર હી ચાર અઘાતિયા કર્મો જ્યારે ક્ષય થઈ ગયા ત્યારે કાલગત થયા, એટલેકે સિદ્ધાવસ્થા યુક્ત બની ગયા–મેક્ષમાં વિરાજમાન થઈ ગયા. જાતિ, જરા અને મરણના બંધનથી રહિત થઈ ગયા, १२३ Page #992 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिरले तुदी सुक्तः परिनिवृत्तः अन्तगतः सर्वदुःखप्रहीणः । इति भास्तचकिचरियं' इति भरतचक्रिचरितम् । अत्र इति शब्दोऽधिकाररिसमाप्तिधोलकः, स नायम् ‘से केणढणं मंते एवं वुच्चई भरहे वासे २'इति सूत्रेण नासवर्थ पृच्छतो गौतमस्य प्रतिवचनाय तत्थणं विणीआए रायहाणीए मरहे णाम राया चाउfeamही समुप्पडिजत्था'इस्यदि सूत्रै भरतचरितं प्रपश्चितम् तच्च परिसमाप्तमित्यर्थः, व भरतः स्वामित्वेन अस्थासतीति निरुक्तवशाद् भरतं क्षेत्रमिति तात्पर्यार्थः ॥ सू०३४॥ अब प्रकारान्तरेण नामान्बर्थमाह - "भरहे अ इत्थ" इत्यादि। - भूलम्- भरहे अ इत्थ देवे महिड्डीए महज्जुईए जाव पलिओवमदिइए पखिसइ से एएणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ भरहे वासे २ इति । अदुत्तरं च णं गोयमा ! भरहस्स वासस्स सासाए णामधिज्जे पण्णत्ते, जंण कयाइ ण आसि ण कयाइ णस्थि ण कयाइ ण भविस्सइ भुर्विच भाइअ भविस्साइ अ धुवे णिअए सासए अक्खए अबए अवट्ठिए गिडचे भरहे वासे ।सू० ३५॥ गये-कृतकृत्य हो गये, बुद्र हो गये-लोकालोक के ज्ञाता हो गये मुक्त हो गये-अन्तरङ्ग बहिरङ्ग कर्म कलंक से रहित हो गये. परिनिवृत्त हो गये-शीतिभूत निरञ्जन हो गये । अन्तर्गत हो गए। और सर्व दुःखो से सर्वथा रहित हो गये। ऐसा यह भरत चक्री का चरित्र है । यहां इति शब्द अधिकार की परिसमाप्ति का सूचक है। वह अधिकार ऐसा है कि "से केणद्वेणं भंते ! एवं धुन्चइ भरहे वासे २" जब गौतमस्वामी ने पूछा था कि हे भदन्त । इस क्षेत्र का नाम भरत ऐसा क्यों हुआ है । तो उसके उत्तर में ही प्रभू ने यह "तत्थ गं विणीयाए रायहाणीए भरहे णामं राया चाउरंतचक्कवट्टो समुप्पज्जित्था" ऐसा कथन सूत्रों द्वारा किया है । अर्थात् इस क्षेत्र का * मरतक्षेत्र नाम पड़ने का कारण भरत राज का यहां का अधिपति होना है। इसी कारण भरत राजा का यहां चरित्र विस्तार से कहा गया है । भरत चरित्र समाप्त ॥ सू०३४ ॥ & થઈ ગયા. કૃતકૃત્ય થઈ ગયા. બુદ્ધ થઈ ગયા. લેાકાલેાકના જ્ઞાતા થઈ ગયા. મુકત થચયા. અંતરંગ બહિરંગ કર્મ કલંકથી રહિત થઈ ગયા. પરિનિવૃત્ત થઈ ગયા-શીતિભૂત તિરંજન થઈ ગયા. અંતર્ગત થઈગયા. અને સર્વ દુઃખોથી સર્વથા રહિત થઈ ગયા. એવું આ ભરતચક્રીનું ચરિત્ર છે. અહીં “ઇતિ” શબ્દ અધિકા૨ની પરિસમાપ્તિ ને સૂચવે છે. એ અધિबरमा प्रभार छठे “से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ भरहे वासे २" न्यारे गौतमराभागे प्रश्न કરી કે હે ભદ ત આ ક્ષેત્રનું નામ ભરત એવું શા કારણથી પડયું તે એના ઉત્તરમાં પ્રભુએ * "तत्व ण विणीयाए रायहाणीप भरहे णाम राया चाउरंतचक्कवट्ठी समुप्पज्जित्था': એવું કથન સૂત્રો દ્વારા કર્યું છે. એટલે કે ભરત રાજા આ ક્ષેત્રના અધિપતિ હતા એથી આ ક્ષેત્રનું નામ ભરત ક્ષેત્ર પહયું છે. એટલા માટે જ અહીં ભરતના ચરિત્રનું વિસ્તાર પૂર્વક વર્ણન કરવામાં આવેલું છે. ભરત ચરિત્ર સમાપ્ત- સૂ૦૩૪ Page #993 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राविमा टीका १०३ वक्षस्कारःसू० ३५ प्रकारान्तरेण भरतेति नामान्वर्थता छाया-भरतश्चात्र देवो महर्द्धिको महाद्युतिको यवत् पल्योपमस्तिकः परिवति तत् सोनार्थेन गौतम ! एवमुच्यते भरतं वर्ष २ इति । अदुत्तरं च खलु गौतम ! भरतस्य वर्षस्य मश्वत नामधेयं प्राप्तम् यन्न कदाचित् नासीत् न कदाचित् नास्ति न कदाचिन्न भविष्यति अभूच्च भवति च भविष्यति च ध्रुवम् नियतम् शाश्वतम् अक्षयम् अव्ययम् अवस्थितम् नित्यं भरतं वर्षम् ॥सू०३५॥ टीका--- "भरहे अ इत्थ" इत्यादि । 'भरहे अ इत्थ देवे' भरतश्चात्र अस्मिन् भारते देवः 'महिड्डीए महज्जुइए जाव पलियोवमटिइए परिवसइ' महद्धिका- महती ऋद्धिः- विभवादि सम्पत् यस्य म तथाभूतः, तथा- महाद्युतिकः- महती धुतिः कान्ति यस्य स तथाभूतः, यावत् पल्योपमस्थितिक:- पल्योपमस्थिति र्यस्य स तथाभूतः परिवसति, अत्र यावत्पदात् महायशस्कः महासौख्यो महाबलः इति ग्राह्यम् ‘से एएणटेणं गोयमा !' तद् भरतेति नाम 'एतेनार्थेन गौतम' ‘एवं वुच्चइ भरहे वासे २ इति' एवमुच्यते भरतं वर्ष भरतं वर्षमिति । योगिकयुक्त्या नाम उत्तम् । अथ तदेव रुढया दर्शयति 'अदत्तरं च णं गोयमा' अत्तरम् अथापरम् चः समुच्चये 'ण' वाक्यालंकारे हे पौतम ! 'भरहस्स वासस्स सासए णामधिज्जे पण्णत्ते' भरतस्य वर्षस्य शाश्वतं नामधेयं प्रकारांतर से " भरतक्षेत्र नाम होने का कथन'भरहे अ इत्थ देवे महिड्ढोए महज्जुईए जाव' -इत्यादि सू. ३५ ' टोका--'भरहे अ इत्थ देवे" इस भरत क्षेत्र में भरत नाम का देव जो कि (महि इढीए महज्जुइए जाव पलिओवमट्ठिइए परिवसइ) महती विभवादिरूप सम्पत्तिवाला है। महती शारीरिक कान्ति और आमरणों की प्रभा से जो सदा प्रकाशशील रहता है यावत् जिसकी १ पल्योपम की स्थिति है-रहता है। यहां यावत्पद से महायशस्कः महासौख्यः, महावला" इन विशेषणपदों का प्रहण हुआ है । ( से एएणद्वेणं गोयमा ! एवं बुचइ भरहे वासे २) इस कारण हे गौतम ! भरतक्षेत्र ऐसा नाम मैंने इस क्षेत्र का कहा है। इस तरह यौगिक रीति से नाम प्रकट कर अब सूत्रकार रूढ से इसका ऐसा नाम प्रकट करते हैं (मदुत्तरं च णं गोयमा ! भरहस्स वासस्स सन्तरथी "मरत क्षेत्र नाम प्रसिद्ध यु-त अग-४थन " " भरहे अ इत्थ देवे महिड्ढए महज्जुईए जाव' इत्यादि सूत्र- ३५॥ A--(भरहे अ इत्थ देवे) से भारत क्षेत्र मा भरत नाम४ व २ (महिड्ढीप महज्नु इए जाव पलिओवर्माट्राइए परिवसइ) महती विमा ३५ सम्पत्तिकायत छ, भरती શારીરિક કાંતિ અને અભરની પ્રભાવી જે સર્વદા પ્રકાશીત રહે છે યાવત જે ની પહોમ नी स्थिति छ-निवास ४२ छ मही यावत् ५४थी “ महायशस्कः, महासौख्यः, महाबाट" विशेष पहानु ह यु छे. (से पएणडे णं गोयमा ! एवं वुच्चइ भरहे कासे २) એથી હે ગૌતમ ! ભરત ક્ષેત્ર એવું નામ મેં આ ક્ષેત્રનું કહ્યું છે એ પ્રમાણે યૌગિક शतिथी नाम ४८ ४शन वे सुत्रा२ ३ढियी अनु नाम ४८ रे छ. (अदुत्तरं चण गोयमा भरहस्स वासस्स सासए णामधिज्जे पण्णत्ते ) गौतम ! मरतक्षेत्र नाम Page #994 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 980 जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे निनिर्मित्तकम् अनादि सिद्धत्वादेवलोकादिवत् प्रज्ञप्तम्, तत्र शाश्वतत्वमेव व्यक्त्या दर्शयति-'जंण कयाइ ण आसि ण कयाइ ण भविस्सइ यन्न कदाचित् नासीत्,न कदाचित् नास्ति न कदाचित् न भविष्यति 'भुवि च भवइ अ भविस्सइ अ' अभूच्च भवति च भविष्यति च 'धुवे णि भए सासए अक्खए अबए अद्विए णिच्चे भरहे वासे' ध्रुवं नित्यं शाश्वतम् अक्षयम् अव्ययम् अवस्थितम् स्थिरम् नित्यं भरतं वर्षमिति / एतेन भरत नाम्नश्चक्रिणो देवाच्च भरतवर्षनाम प्रवृतं भरतवर्षाच्च तयो म भरतं स्वकीयेन अस्यातीति निरुक्तवशेन प्रावर्ततेति अन्योऽन्याश्रय दोषो दुर्निवार इति वचनीयता निरस्ता // सू० 35 // इति श्री विश्वविख्यात-जगद्वल्लभ-प्रसिद्धवाचक पञ्चदशभाषाकलित-ललितकलापालापक प्रविशुद्धगद्यपद्यानैकग्रन्थनिर्मापकवादिमानमर्दक श्री-शाहू छत्रपति कोल्हापुरराजप्रदत्त- 'जैनशास्त्राचार्य' पदभूषित-कोल्हापुरराजगुरु बालब्रह्मचारी जैनाचार्य जैनधर्मदिवाकर पूज्यश्रीघासीलाल-प्रतिविरचितायां श्री जम्बूद्विपप्रज्ञप्तिसूत्रस्य प्रकाशिकाख्यायां व्याख्यायां तृतीयो वक्षस्करः समाप्तः // 3 // सासए णामधिज्जे पण्णत्ते) हे गौतम ! भरतक्षेत्र का भरतक्षेत्र ऐसा नाम देवलोक इस नाम की तरह निनिमित्तक है-शाश्वत है / क्योंकि (जं ण कयाह ण आसि ण क्याई ण भविस्तइ)यह नाम पहिले भूतकाल में नहीं था ऐसी बात नहीं है, वर्तमान में ऐसा इसका नाम नहीं है यह बात भी नहीं है और मागे भी इसका ऐसा नाम नहीं रहेगा यह बात भी नहीं है / (भुविं च भवइ अ भविस्सइ अ) क्योंकि ऐसा इसका नाम रहा है, है, और आगे भी रहेगा (धुवे, णिअए, सासए अक्खए, अव्वए, अव्वट्ठिए, णिच्चे भरहे वासे) इसका कारण यही है कि यह भरत क्षेत्र ध्रव है, शाश्वत है, अक्षय है, अव्ययरूप है, अवस्थित है, और नित्य है / इस प्रकार के इस कथन से अन्योन्याश्रय दोष का परिहार हो जाता है // सू०३५॥ __ श्री जैनाचार्य जैनधर्म दिवाकर पूज्य श्री घासीलालबतिविरचित जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्र की प्रकाशिका व्याख्या में तीसरा वक्षस्कार समाप्त / / 3 // खबार से नाम भुस निमित्त छ. - शाश्वत छ. म (जं ण कयाइ ण आसिण कयाइण भविस्सइ) ये नाम भूतभा न तु मे नथी,वर्तमानमा मेनु નામ નથી, એવું પણ નથી અને ભવિષ્યમાં પણ એનું એવું જ નામ રહેવાનું નથી, એવું 5 नयी. ( भुविं च भवअ भविस्सइ अ) उभ से मानु नाम रघु छ. छे भने विमा 54 222. (धुवे णिअप, सासए, अक्खए, अव्वए, अहिए, णिच्चे भरहेवासे) એનું કારણ આ છેકે આ ભરતક્ષેત્ર પ્રવ છે, શાશ્વત છે, અક્ષય છે, અવ્યય રૂપ છે, વસ્થિત છે અને નિત્ય છે. આ પ્રકારના આ કથનથી અન્યોન્યાશ્રય દેષને પરિહાર થઈ જાય છે. 5 સૂત્ર-૩માં શ્રી જૈનાચાર્ય જૈનધર્મદિવાકર પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલવૃતિ વિરચિત જમ્બુદ્વીપ પ્રાપ્તિ સૂત્રની પ્રકાશિકા વ્યાખ્યાનો ત્રીજો પક્ષકાર સમાપ્ત છે 3