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________________ २६८ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे दायाद इति यावत्, 'कम्मयर एडवा' कर्मकरकइति वा ? कर्मकरकः = गृहसम्बन्धिसामान्य कार्यसम्पादक इति । गौतमस्वामिनः प्रश्न श्रुत्वा भगवानाह 'समणाउसो ! णो इण ठे समट्ठे' हे आयुष्मन् श्रमण ! नो अयमर्थः समर्थः, यतः 'ते मणुया ववगय अभिजोगा' ते मनुजा व्यपगताभियोगाः - व्यपगतः = दूरीभूतः अभियोगः कार्यं कर्त्तु परप्रेरणा येभ्यस्ते तथा भूताः 'पण्णत्ता' प्रज्ञप्ताः । तस्मिन् काले स्वस्वामिभावादि संवन्धाभा वान्न कस्यापि कंचित् प्रति प्रेरकत्वमस्तीति बोध्यमिति । गौतमस्वामी पुनः पृच्छति'अfor णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे मायाइवा पियाइवा भायाइ वा भगिणीइवा भजाइवा पुत्वा धूयाइवा सुण्डाइवा' हे भदन्त ! तस्यां खलु समायां भरते वर्षे अस्ति किं माता इति वा ! पिता इति वा ! भ्राता इति वा भगिनी इतिवा पुत्रः इति वा दुहिता इति वा स्नुषा पुत्रवधूः इति वा भगवानाह - 'हंता ! अस्थि' हन्त गौतम ! अस्ति किन्तु कोई प्रेष्य-प्रेषणाई दूत आदि होता है ? क्या कोई शिष्य होता है ? मृता-त्रेतन लेकर नियत काल तक काम करने वाला होता है ? क्या कोई दायाद धन का हिस्सेदार होता है ? क्या कोई गृहसंबंधी सामान्यकार्य करने वाला होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते है-" णो इणट्टे समट्टे" हे गौतम! यह अर्थ समर्थ नहीं है क्योंकि "ववगय आभियोगा णं ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो " हे श्रवण आयुष्मन् ? वे मनुष्य कार्य करने के लिये जिनसे परप्रेरणारूप अभियोग दूर हो गया है ऐसे होते हैं । अर्थात् उस काल में स्वस्वामिभाव आदि रूप संबंध का अभाव रहता है इस लिये कोई किसो प्रति प्रेरक नहीं होता है " अस्थि णं भंते ! तीसे समाए भरहे वासे मायाइ वा पियाइ वा भायाइ वा, भागिणीइ वा, भजाइ वा पुत्तेइ वा, धूयाइ व', सुहाइ वा " हे भदन्त ? उस वर्तमान सुषम सुषमा काल में भरतक्षेत्र में माता होती है क्या ? पिता होता है क्या ? भ्राता होता है क्या ? बहिन होती है क्या ? पुत्र होता है क्या ? दुहिता-पुत्री होती है क्या ? पुत्र वधू होती है क्या ? अर्थात् उस काल में क्या भरतक्षेत्र में पिता पुत्र, पति पत्नी आदि संबंध होते है क्या ? इसके उत्तर में प्रभु करते हैं - "हंता, अस्थि णो चेव णं तेसिं माणं હોય છે ?ભૃતક– વેતન લઈને નિયતકાલ સુધી કામ કરનાર હાય છે ? શું કેાઈ દામાદ ધન નાહિસ્સેદાર-હાય છે ? શુ' કાઈ ગૃહ સબંધી સામાન્ય કાર્યો કરનાર ઢાય છે ? એના भवाणभां प्रभु कुडे छे - " णो इण्ट्ठे समट्टे” गौतम ! म अर्थ समर्थ नथी डेभरे "ववगय अभिओगाण ते मणुया पण्णत्ता समणाउसो !” हे श्रम आयुष्मन् ! ते भनु ખ્યા કાય કરવા માટે જેમની ઉપરથી પરપ્રેરણા રૂપ અભિયાગ દૂર થઈ ગયા છે, એવા હોય છે. એટલે કે તે કાળમાંવસ્વામિભાવ વગરે રૂપ સંબધના અભાવ રહે છે. એથી अने २४ ३५ तु नथी. "अत्थिण भंते तीसे समाए भरहे वासे मायाइ वा पिया वा भाया वा भगिणीइ वा भज्जाइ वा पुत्तेइ वा धूयाइ वा सुहाइ वा " 6 लहन्त ! તે સુષમ સુષમા કાળમાં ભરત ક્ષેત્રમાં માતા હોય છે ? પિતા હોય છે ? ભાઈ હોય છે ? मडेन होय छे, पुत्र होय छे हुद्धिता-पुत्री - होय छे ? पुत्र वधू होय ? भेट डे ते अणमां. ભરત ક્ષેત્રમાં પિતા, પુત્ર પતિ, પત્ની વગેરે સબધેા હોય છે ? એના જવાબમાં પ્રભુ કહે Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003154
Book TitleAgam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherJain Shastroddhar Samiti Ahmedabad
Publication Year1980
Total Pages994
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_jambudwipapragnapti
File Size29 MB
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