Book Title: Raipaseniya Suttam
Author(s): Bechardas Doshi
Publisher: Gurjar Granthratna Karyalay
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( प्राकृत ग्रन्थमालानं. ९ ) रायपसेणइय - सुत्तं welf परिशोधित मूलपाठ - पाठान्तर - विवरण - टिप्पण - विशिष्टानेक परिशिष्टादिभिः संयुतम् (आग पुस्तक) वि. सं. १९९४ संपादक:पंडित बेचरदास जीवराज दोशी सवा वीर संवत २४६४ Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशकःशंभुलाल जगशी शाह गुर्जर ग्रन्थरत्न कार्यालय गांधीरस्तो, अमदावाद मुद्रकपंडित भगवानदास हरखचन्द दोशी शारदामुद्रणालय १५, जैन सोसाइटी, अमदावाद For Private & Personel Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेण प्रवेशक इय सुत्तं ॥३॥ वैदिक परंपरानुं मूळभूत शास्त्र 'वेदो' छे, जरथोस्ती परम्परानुं मूळभूतशास्त्र 'अवेस्ता' छे, बौद्ध परंपरानु मूळभूत शास्त्र पाली 'त्रिपिटक' छे, तेम जैन परंपरानुं मूळभूत शास्त्र द्वादशांग 'गणिपिटक' छे. मूळ जैन आगमो बार अंगोमां बचायेला ः १ आयार, २ सूयगड, ३ ठाण, ४ समवाय, ५ वियाहपण्णत्ति, ६ नायाधम्मकहा, ७ उवासगदसा, ८ अंतगडदसा, ९ अणुत्तरोषवाइअदसा, १० पण्हावागरण, ११ विवाग अने १२ दिहिवाय. समवायमां अंगसूत्रोनो परिचय आप्यो छे त्यां अने नंदीस्त्रमा (पृ० २०९ थी २६६ सुधी) आ बारे अंगोनो सविस्तर परिचय आपेलो छे. वर्तमानमा अगियार अंग उपलब्ध छे अने बारमुं अंग-दिट्टिवाय आज घणा वखतथी विच्छेद पामेलुं छे. तथा जे अगियार अंगो उपलब्ध छे ते पण जेवां हतां तेवां ने तेवां ज आजे छे पम न कही शकाय.' ___ उक्त बार अंगो उपरांत वीजा पण अनेक जिनआगमोनी विद्यमानतानो उल्लेख नंदीसूत्रमा मळे छे. आर्य श्रीदृष्यगणिना शिष्य १ दाखला तरीके आचारांगसूत्रनुं सातमुं अध्ययन 'महापरिणा' उपलब्ध थतुं नथी. प्रश्नव्याकरणनो नंदिसूत्रमा जेत्रो परिचय आप्यो छे ते रीते ए विषयो एमां उपलब्ध थता नथी. आगमनां पदोनी संख्यामा घणो घटाडो थइ गयेलो छे. नंदीसूत्रना उल्लेख प्रमाणे ज्ञाताधर्म कथामा साडात्रण क्रोड कथाओ हती. आ उल्लेख कदाच अतिशयोक्त होय तो पण अत्यारे ए सूप्रना मात्र बीस ज अध्ययन मळे छे ते जोतां एमा घणो घटाडो थयो लागे छे. walr.jainelibrary.org Join Educati o n Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयत्त ||४|| देववाचक क्षमाश्रमणे रचेला उक्त नंदीसूत्रमां समस्त मूळ जैन श्रुतनो नामग्राह सविस्तर उल्लेख आवे छे. तेमां 'गमिकश्रुत े - अग मिकश्रुत' 'अंगप्रविष्टश्रुत' अंगबाह्यश्रुत' 'कालिकत - उत्कालिकत एम अनेक विभागो बतावीने ए क्षमाश्रमणे श्रुतज्ञानने वर्णव्यु छे. तेमां उत्कालिकश्रुतनां नामो गणावतां प्रस्तुत रायपसेणइअने नोंघेलुं छे. ( समितिनुं नंदीसूत्र पृ० २०२ ) नंदीसूत्रमां आवेली रायपसेणइअना नामनी नोंध उपरथी एना समय विशे जरूर थोडं विचारी शकाय ग्रन्थनो समय नंदीसूत्रना प्रणेता देववाचके सूत्रना आरंभमां पोतानी परंपरा बतावेली छे. जेमां पोताना पूर्वपुरुषोनां बीजां अनेक नामो साथे ब्रह्मद्वीपिक शाखाना आर्य सिंहसूरि, माथुरीवाचनाना सूत्रधार आर्य स्कन्दिलाचार्य, आर्य नागार्जुनाचार्य, नागिलकुल (नागेन्द्रकुल) ना आर्य भूतदिन्नाचार्यनां नामो पण नौवेलां छे. कल्पसूत्रमी प्रांत वंचाती स्थविरावलीमां जणाव्युं छे के "आर्य सिंहगिरिना बार शिष्योः आर्य धनगिरि, आर्यवज्र, आर्य समिअ अने आर्य अरिहृदिन्न. तेमां आर्य समिअथी ब्रह्मद्वीपिक शाखानो उद्भव थयो अने आर्य वज्रस्वामीना शिष्य श्रीवज्रसेन द्वारा आर्य नाइली शाखा नीकळी”. २ जेमा वारंवार एकसरखा पाठो आवता होय ते 'गमिक' श्रुत कहेवाय. आ श्रुतमां दृष्टिवादसूत्रनो ज मात्र समावेश थाय छे. आचारांग वगेरे 'अगमिक' श्रुत लेखाय छे. ७ ३ गणधरो रचेलं श्रुत ते 'अंगप्रविष्ट' अने स्थविरोए रचेलं श्रुत ते 'अंगबाह्य श्रुत' समजवु अथवा नियत पाठवालुं श्रुत ते 'अंगप्रविष्ट' श्रुत अने अनियत पाठवाळु श्रुत ते 'अंगबाह्य श्रुत'. ४ जे श्रुत अमुक नियत काळे ज भणी शकाय ते 'कालिक' श्रत अने जेना भणवा माटे कोइ नियत काळ न होय ते 'उत्कालिक श्रुत' Jain Education Intermitional . प्रवेशक jainelibrary.org Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं प्रवेशक ॥५॥ प्रस्तुत नाइली शाखा अने नंदीस्त्रमा सूचवेलु नागिलकुल ए वन्ने एक छे. ब्रह्मद्वीपिक शाखाना उद्भावक आर्य समिअनो समय | वीरात् छहो सैको कही शकाय. अने नागिल शाखाना उत्पादक श्रीवज्रसेननो समय वीरात् सातमो सैको गणी शकाय. पटले नागिल शाखानो समय पण वीरात् सातमो सैको ठरे. आ नागिल शाखामां थयेला भूतदिन आचार्यना शिष्य लोहित्यसूरि अने ते पछी थयेला दृष्यगणिना शिष्य देववाचक. आ गणना द्वारा नंदीसूत्रना प्रणेता देववाचकनो समय वीरात् आठमो वा नवमो सैको सहजे ठरावी शकाय. आ गणनाने साची मानवाने बाध न होय तो प्रस्तुत रायपसेणइअनो समय वीरात् नवमा सैका करतां य पहेलो आवे पटले रायपसेणइअने विक्रमनी पांचमी शताब्दी करतां य पूर्वनुं मानी शकाय. आ एक गणना. नंदीसूत्रमा जैन ग्रन्थो उपरांत वैदिक परंपराना कौटिल्य, घोटकमुख वैशेषिक, षष्टीतन्त्र, माठर, पातंजल वगेरे ग्रन्थोनां नामो पण आवे छे. अने ग्रन्थ तरीके 'बुद्धवचन' नो पण उल्लेख आवे छे. एटले नंदीसूत्रना प्रणेता, माठर अने पतंजलि पछीज होई शके. आ गणनाने आधारे प्रस्तुत रायपसेणइअनो समय माठर अने पतंजलि पहेलांनो ठरे अथवा समसमय पण कही शकाय. आ बीजी गणना. रायपसेणइअमां पपसी राजानी साथे सम्बन्ध धरावती जे बधी हकीकत आवे छे तेने ज मळती हकीकत त्रिपिटिकमांना दीघनिकायमां पायासी राजाना नाम साथे संकळायेली आजे पण उपलब्ध छे. अने तेमा राजा पसेनदीए आपेल राजदेय भागने राजा पायासी भोगवे छे, ए हकीकत पण आपेली छे. ए बधु जोतां दीघनिकायमा आबेली हकीकत अने रायपसेणइअमां आवेली हकीकतनो समान समय कल्पी शकाय, अने ते पण राजा पसेनदीनो जे समय निश्चित थयो होय. ते आ श्रीजी गणना. ___ आ त्रीजी गणना ग्रन्थनी हकीकतना समय उपर प्रकाश पाडे छे, परन्तु ते हकीकत ग्रन्थरूपे लिपिबद्ध क्यारे थई ए विशे कशं सूचवी शकती नथी, ए ख्यालमा रहे. देवद्धिंगणि क्षमाश्रमणे जैन आगमोने वोरात् ९८० मां एटले विक्रमात् छट्ठा सैकामां लिपिबद्ध कर्या के संकलित कर्या पवो मत | Join Education lemona For Private Personel Use Only trainelibrary.org Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेणइय सुत्तं ॥६॥ | जैन परंपरामा प्रचलित छे. ए जोतां प्रस्तुत रायपसेणइअ विक्रमना छठा सैका पहेलानु ठरे. आ चोथी गणना. आम पकंदर जोता प्रस्तुत ग्रन्थनो मोडामां मोडो समय छट्ठो सैको तो खरो ज. ग्रन्थनुं नाम 'नंदीसूत्रना मुद्रित पुस्तकमां रायपसेणिय' एवं नाम मळे छे, त्यारे मारी पासेनी लिखित पोथीओमा केटलेक स्थळे 'रायपसे णइभ' नाम मळे छे. विवरणकार श्रीमलयगिरिसूरि 'रायपसेणीअ' नाम स्वीकारे छे. अने तेनो संबंध संस्कृत 'राजप्रश्नीय' साथे जोडे छे. 'प्रश्न' शब्दनां प्राकृत उच्चारण 'पण्ह' अने 'पसिण' बन्ने थाय छे, परन्तु 'पसेण' एवं थई शकतुं नथी. उच्चारण शास्त्रनी वैज्ञानिक रीतने ध्यानमा लईए तो 'पसिण' रूपसुधीन परिवर्तन उचित लागे छे, अने प्राकृत व्याकरणनी दृष्टिप पण एज घटमान लागे छे छतां 'आर्ष' कहीने 'पसेण' रूपनी पण संगति करवा ललचाईए तो 'आप'ना अपवादनो वधारे पडतो उपयोग थयो गणाय. अने 'आप'ने नामे शुशिअशुद्धिनो विवेक क्यां समजवो ते नकी नहीं थाय. आ सूत्रमा 'राजाप करेल प्रश्नो छे' एम समजीने विवरणकारे सूत्रना नामनो संबंध संस्कृत 'राजप्रश्नीय' शब्द साथे योज्यो जणाय छे. पमनी वात तो खरी छे, परन्तु प्रस्तुत विवरणकार करतां पूर्वना आचार्य तत्वार्थवृत्तिकार गंधहस्ती-आचार्य सिद्धसेन आ सूत्रनु नाम 'राजप्रसेनकीय' जणावे छे, अने वादी देवसूरिना गुरु श्रीमुनिचंद्रसूरि 'राजप्रसेनजित' जणावे छे. में प्राचीन आचा १ प्रस्तुत रायपसेणइय सुत्तमा पण १६५मी कंडिकामां 'नंदिसुत्त'नो उल्लेख आवे छे. ए उल्लेख त्यां ज्ञाननी बधी हकीकत जाणवा माटे संकलनाकारे उमेरेलो छे एम समजवानुं छे. नंदिसुत्त देववाचके करेलु छे ए निश्चित छे माटे केशीश्रमणना मुखमांनो ऐ उल्लेख 'रायपसेणइय' अने 'नंदिसुत्त'ना पौर्वापर्यना साधन तरीके निरुपयोगी छे अथवा नंदिसूत्रमा पण एक 'नंदी' सुप्रनो उल्लेख छे एटले आ वर्तमान नंदिसूत्र करतां कोई बीजुं प्राचीन 'नंदी' होय अने तेनो उल्लेख केशीश्रमण करता होय तो ते पण घटमान खरं. JainEducationindme For Private Personel Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं प्रवेशक ॥७॥ ोप जणावेलां नामोने विशेष प्रामाणिक समजीने अने प्राचीन पाठने आधारभूत राखीने 'रायपसेणइअ' नाम मान्य राण्य छे. जो के नंदीसूत्रना मुद्रित पुस्तकमां 'रायपसेणि' पाठ छे, पण सूत्रोनुं संपादनकाम जोतां ए पाठनी प्रामाणिकता विशे शंका रहे है. अने आ लखती वखते नंदीसूत्रनी लखेली पोथीओ जोवानो समय रह्यो नथी. पटले ज में गंधहस्ती अने मनिचंटसरिने मायाले दीघनिकायमा राजा प्रसेनजितनो उल्लेख आवे छे पथी आ पुस्तकनी अभिधेय वस्तुनो संबंध राजा पायासिना बहाराजा पसे. नजित साथे जोडापलो होय. जो के दीघनिकायमा पण प्रश्नकार तो पायासि ज छे, छतां तेना वडाराजा तरीके राजा प्रसेनजितने नाम होवाथी प्रस्तुत सूत्रनुं नाम पण ते नामे जैन परंपरामा प्रचलित थयु होय. जे आचार्योए 'राजप्रसेनकीय' अथवा 'राजप्रसेनजित' नामो लख्यां छे तेमनी शो कल्पना हशे ते तो केम कहीशकाय? आजकाल वर्तमान रायपसेणइअमां जे हकीकत उपलब्ध छे ते ज हकीकत जो उक्त आचार्य सिद्धसेन गणि अनेकनिक सरिना समयमा उपलब्ध थता रायपसेणइअमां होय तो जे सूत्रमा राजा प्रसेनजितनु नामनिशान पण नथी आवमाना । आचार्योए राजप्रसेनकीय अथवा राजप्रसेनजित एवं जे आप्यु छे ते उपरथी नीचेनो बे कल्पनाओ उठे [१] विवरणकार घणी जग्याए जणावे छे के प्रस्तुत सूत्रमा वाचनाभेदनी बहुलता छे. प दृष्टिप जोतापमानामा पूर्वाचार्योना वखतनी वाचनामां जरूर कोई प्रकारनो पाठभेद होय एम मानवु वधारे पडतुं नथी. पटले उपलब्ध वाचनामां राजा प्रसेनजितनो उल्लेख न होवा छतां ए पूर्वाचार्योना वखतनी वाचनामा राजा प्रसेनजितनो उल्लेख होय एम संभवी शके छे. अने प उल्लेखने आधारे उक्त आचार्योप ए सूत्रनुं नाम 'राजप्रसेनकीय' अथवा 'राजप्रसेनजित' ए, लघु होय तो संगत कवाय. आवा बहथत अने आगमधर आचार्योने माटे एवं कहेवू के तेमणे उक्त नामोनी कल्पना मात्र वर्णविकारनी पिपज को अने आगमनी अंदरनी वस्तुनी उपेक्षा करी छे ए, एमर्नु विशाळ ज्ञान जोता, अजुगतुं लागे छे. [२] पम पण होई शके के मूळ सुत्रमा राजा प्रसेनजितनो उल्लेख पमना वखतमा न रह्यो होय, पण पीप ल lainEducationtent For Private 3 Personal Use Only w jainelibrary.org Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण प्रवेशक इय सुत् ॥८॥ राजा प्रसेनजितनो संबंध होवार्नु जाण्युं होय अने ते आधारे तेमणे राजप्रसेनकीय अथवा राजप्रसेनजित ए, नाम आप्यु होय. आ सिवाय बीजी कोई एची कल्पना ख्यालमा नथी आवती के जे उक्त नामोनो खुलासो आपी शके अने आ सूत्रनां जे नामो ए| आचार्योप लख्यां छे तेने खोटां तो कही ज केम शकाय ? आ सूत्रमा आवती पपसी-प्रदेशीनी हकीकत उपरथी वेबर महाशये 'शयपसेणीय' ने बदले 'रायपपसीय'नी कल्पना करी छे. वस्तु जोतां आ नाम अन्वर्थ लागे छे, पण ए कल्पनाने कशो आधार मळतो नथी. उपांग परंपरा प्रमाणे आ सूत्र सूयगडंग सूत्रनु उपांग कहेवाय छे. आ परंपरामां केटलुं प्रामाण्य छे ए वस्तु विशेष विचारणीय छे. । नंदीसूत्रमा ज्यां श्रुतज्ञानना विभागो कर्या छे तेमां 'अंग' 'उपांग' तरीकेनो विभाग जणातो नथो, परन्तु 'अंग' अने 'अंगबाह्य' एवो विभाग मळे छे. वळी तेमा मात्र अंगोनो ज परिचय आप्यो छे, पण उपांगो विशे के अमुक उपांगना अमुक अंग साथेना संबंध विशे कशु जणाववामां आव्यु नथी, एटले 'अमुक सूत्रो उपांग छे अने ते अमुक सूत्रोनां उपांग छे' एवी मान्यताने प्राचीन शास्त्रोनो टेको न मळे त्यां सुधी ए मान्यता केवळ परंपरा ज गणाय अने ५ परंपरागत मान्यताने स्वीकारतां, इतिहासनी दृष्टिए, बहु विचार करवो पडे. ग्रंथनी वस्तु आ सूत्रमा मुख्य नायक राजा पएसी छे, तदुपरांत, चित्त सारथि, भगवान महावीर, केशीकुमार श्रमण, राजा जितशत्र, राजा सेय, राजा सेयनी राणी धारिणी, पपसीनी राणी सूर्यकांता, तेनो पुत्र सूर्यकांत वगेरे व्यक्तिओ तथा आमलकप्पा नगरी, श्रावस्ती नगरी, श्वेतांबी नगरी, केकयदेश, कुणालदेश वगेरे स्थळोनुं वर्णन आवे छे. ए वर्णन ते वखतनी नगररचना, प्रजानी स्थिति,राजानी स्थिति For Private & Personel Use Only Jain Educationtemaalinal Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेणइय सुतं ॥९॥ अने देशनी स्थिति विशे सारी समज आपे पq छे. आ उपरांत सूत्रनी संकलना करनारे सूत्रनी बधी हकीकत भगवान महावीरना मोढामां मूकेली छे. भगवान महावीर फरता फरता आमलकप्पामां आव्या छे, अने अंबसालवनमां अशोकवृक्षनी नीचे एक मोटी काळी शिलापाट उपर बेठा छे. त्यां एमनी पासे स्वर्गनो सूर्याभदेव पमने वांदवा आवे छे. आ प्रसंगने लईने संकलनाकारे भगवान महावीरनु शारीरिक वर्णन अने एमना आध्यात्मिक भाव बहु सरस रीते बतावेला छे. अने सूर्याभदेवर्नु वर्णन पण ठीक ठीक आपेलुं छे. सूर्याभदेवनुं वर्णन करतां तेना निवासरूप विमानना वर्णने आ सूत्रमा घणा पानां रोक्यां छे. वर्णनकारे सूर्याभदेवना विमाननी प्रत्येक वस्तुनु-नळियां, वळीओ सिक्खेनु-झीणवट भयु वर्णन कयु छे. आ वर्णन पटलु बधुं भरचक थई गयुं छे के सामान्य वांचनारना मन उपर कोई जातनी स्पष्ट आकारनी कल्पना आवी शकती नथी. तोपण जो कोई शिल्पशास्त्री आ वर्णन बहुज धीरज अने खंतथी वांचे तो जरूर तद्दन नवा प्रकारना एक मोटा महालयनी कल्पना करी शके, अने शिल्पविद्याने लगता केटलाक पारिभाषिक शब्दो पण मेळवी शके. एमांना केटलाक शब्दो तो गुजराती अने बीजी भाषामा सारी रीते प्रचलित छे जेमकेः मळमां 'अम्गला' भाषामा 'आगळियो' (पृ० १५८) मूळमां एक 'अम्गलापासाय' शब्द आवे छे जेनो शब्दार्थ 'आगळियानो महेल' एवो थाय छे. (पृ० १५८) ए अर्थ जोतां आ शब्द, बंध करती वखते आगळियो जेना उपर रहे छे ते लाकडाने बतावतो होय पम मालुम पडे छे. भाषामां आ वस्तुने कया शब्दथी संबोधे छे ते जाणवू जोईप. 'मूळमां' 'उत्तरंग' भाषामा 'ओतरंग' (पृ० १५७) मूळमां 'कवेल्लु गुजराती भाषामा 'कवलु'-नळियु (पृ० १५९) आ जातना घणा शब्दो मळे छे. एमांना केटलाक शब्दोना अर्थों गम्य थई शकता नथी. ___ आ सूत्रमा सूर्याभदेव भगवान महावीर पासे आवीने वादन, संगीत अने नाच करे छे अने पछी अभिनयात्मक नाटक करे छे. आने लगतुं वर्णन घणी सुंदर रीते आमां आपेलुं छे एमां संगीतनुं स्वरूप, संगीतना प्रकार, अनेक प्रकारनां वाद्यनां नामो, जुदा जुदा वाद्य वगाडवानी जुदी जुदी रीतो वगेरे हकीकत घणी विशद रीते मूळमां ज बतावेली छे. वादनविद्याविशारद अने संगीतविद्याविशारद माणस प तरफ ध्यान आपे तो घणुं ज न समजी शके एम छे. सूर्याभदेवे भगवान महावीरनी पासे बत्रीश प्रकारनुं अभि Jain Education emanal For Private Personel Use Only jainelibrary.org Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेण इय सुत्तं ॥१०॥ नयात्मक नाटक करी बताव्युं छे. ए अभिनयोमा केटलाक अभिनयो प्राकृतिक छे. सागरना तरंगनो अभिनय, चंद्रना ऊगवानो अभिनय, सूर्यना ऊगवानो अभिनय, हाथीनी गतिनो अभिनय वगेरे अनेक विचित्र विचित्र अभिनयो बतावेला छे. तदुपरांत पमा लिपिना अभिनयो पण बताव्या छे. अने तेमा मात्र पांच वर्गना अक्षरोना अभिनयो नेधेिला छे. 'क'नो अभिनय पटले 'क'नी आकृति जेवो अभिनय करीने गान करवू, नाचवु अने बगाडवु. एज रीते बीजा बधा अक्षरोना अभिनय विशे समजवानुं छे. ए अभिनयमा स्वरोने, अन्तस्थ अक्षरोने अने श ष स ह ने स्थान नथी ते खास विचारवा जेवू खरं. भामांना केटलाक अभिनयोनां नाम भरतना नाट्यशास्त्रमा पण आवे छे. आनी नोंध में मारा भगवतीसूत्रना अनुवादना खण्ड बीजाना पृष्ठ ४४ मां टिप्पणमा आपी छे. नाटकनी अन्दर बत्रीशमुं अभिनयात्मक नाटक विशेष ध्यान खेचे एवं छे, पमा सूर्याभदेवे भगवान महावीरना जीवनना प्रसंगो अभिनयमा उतार्या छे. भगवाननी बालक्रीडा, भगवाननी कामभोगनी लीला, भगवाननी दीक्षा, भगवाननी तपश्चर्या, भगवाननी केवलज्ञाननी प्राप्ति, भगवानk तीर्थप्रवर्तन अने भगवाननुं निर्वाण आ प्रसंगोनो अभिनय करी बताव्यो छे. ज्यारे सूर्याभदेव भगवान पासे नाटक करवा आव्यो त्यारे तेणे भगवाननी ए माटे सम्मति मागी. भगवाने पने सम्मति न आपतां मौन राख्यु. सूर्याभदेवे बे-त्रण वार पूछयं, तो पण भगवाने मौन ज राख्यु. अने तेम छतां सूर्याभदेव तो नाटक करीने ज रह्यो.आ बधी हकीकत विशेष विचारणा मागे छे. आ जमानामां जेओ द्रव्यपूजाने वधू महत्त्व आपे छे तेओ आ तरफ वधू लक्ष्य करशे तो तेमने भगवानना मौननो खरो अर्थ समजाशे, विवरणकार मलयगिरिए भगवानना मौननो एवो अर्थ काढ्यो छे के गौतमादि श्रमणोने स्वाध्यायमां विघ्न आवे माटे भगवाने एने सम्मति न आपी. ज्यारे मलयगिरि जेवा आचार्य, भगवानना मौननो आवो अर्थ करे छे अने आवी भक्तिने साधुओने माटे स्वाध्यायनी विघातक समजे हे त्यारे अत्यारनी आ जातनी द्रव्यभक्तिनो प्रकार साधुओने माटे स्वाध्यायनो विघातक खरो के नहीं ये जरूर विचारणीय छे. बीजं गमे तेम हो परन्तु प्राचीन काळनी अभिनयविद्या, संगीतविद्या अने वादनकळा उपर सूर्याभदेवना नाटकनुं प्रकरण ऐतिहासिक दृष्टिप विशेष प्रकाश पाडे एवं छे. माटे अभिनय विद्याना जिज्ञासुओ भरतर्नु नाट्यशास्त्र, आ प्रकरण, ए बन्ने साथे राखीने Jain Education tema For Private Personal Use Only ainelibrary.org Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत् प्रवेशक ॥११॥ जोशे तो आधुनिक रंगभूमि उपर तेओ कोई नवी कल्पना जरूर करी शकशे. आ ग्रन्थना मूळनुं प्रमाण अनुष्टुप श्लोकनी गणतरीप २१२० श्लोक लगभगर्नु तथा टीकार्नु प्रमाण ३७०० श्लोक जेटलुं छे. ग्रंथनी भाषा मूळसूत्रनी भाषा आर्षप्राकृत छे. आ सूत्रनी भाषानुं आर्षप्राकृतपणु एटलुं स्पष्ट छे के ए विशे कई चर्चा करवा जेवू रहेतुं नथी. मूळसूत्रमा पवा घणा शब्दो छ जे गुजराती शब्दो साथे भारोभार साम्य धरावे छे. प दृष्टिप गुजराती भाषाना अने जुनी गुजराती भाषाना इतिहासना अभ्यासीए आ सूत्र तेम ज अन्य जैन सूत्रो अवश्य वांचवा जोईप. कर्ता अने टीकाकार आ ग्रन्थना मूळसूत्रना कर्ता विशे कोई चोक्कस नाम जणावी शकातुं नथी. परन्तु भगवान महावीर पासेथी सांभळेली हकीकत कोई गुरू कोई शिष्यने कहेता होय पयो भास रचनाशैली जोतां थाय छे. परन्तु आखो ग्रन्थ जोवा छतां कोई पण विशिष्ट कर्तानो उल्लेख मळी शकतो नथी. पटले एना कर्ता सम्बन्धी शोध करवानी बाकी रहे छे. सांप्रदायिक मान्यता प्रमाणे अंगवाह्य श्रुतनी रचना स्थविरो करे छे ए जोतां कोई स्थविर मुनिए आ सूत्र रच्यु होय एम कही शकाय. ___ आ सूत्रना टीकाकार आचार्य मलयगिरि सम्बन्धी विशेष हकीकत उपलब्ध थई नथी. तेओ आचार्य हेमचन्द्रना समसमयी छे ए वात निर्विवाद छे. तेमणे अंग उपांग वगेरे उपर अनेक टीकाओ रची छे, अने तेओ एक टीकाकार तरीके घणी ज ख्याति पामेला आचार्य छे. तेमनी टीकामा घणी जग्याए तेमनु स्वतन्त्र व्यक्तित्व पण मालुम पडे छे. तेमणे अनेक टीकाओ रच्या छतां कोई पण जग्याए पोतानो कशो परिचय आप्यो नथी एनुं कारण ते समये इतिहास लखवानो रीवाज नहीं कहेवा करतां तेमनी नम्रता कहेवी ए विशेष उचित छे. तेओ वैयाकरण पण हता. तेमणे एक व्याकरण पण रच्यु हतुं. अने पोतानी टीकामा घणे स्थळे पोताना Jain Education lemon jainelibrary.org Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेण इय सुत्तं ॥१२॥ व्याकरणनो उपयोग कयों छे. तेओ प्राय.तना पंडित होवा उपरान्त देश्यप्राकृतना पण पंडित इता. तेथीज तेमणे तेमनी टीकाओमां देश्य शब्दोना अर्थों समजाववा माटे 'अभिमानचिह्न' नामना देशी कोशकारनो उल्लेख करीने तेम ज कशा उल्लेख विना पण देशी कोशनां प्रमाणो जग्याए जग्याए आपेलां छे. तेमनी टीकाओमा घणी वस्तुओ तद्दन नवी ज जाणवा मळे छे. कोई जिज्ञासु मात्र तेमनी टीकाओ उपर निबन्ध लखे तो तेमनी विचारसरणीनो नवीनता जरूर प्रकाशमा आवे. तेओ श्रद्धालु छे छतां अनुगामी नथी एम चोकस मालुम पडे छे. जिज्ञासुनुं जीवनवृत्त आ सूत्र वांचनाराए एमांथी खास शु सार लेघानो छे तेनी समजनी खातर आ नीचे आ सूत्रना मूळ नायकर्नु घणु संक्षिप्त वृत्तान्त आपवामां आव्यु छः आ समग्र ग्रंथर्मा एक जिज्ञासुनी जीवनकथा आलेखापली छे. ग्रंथकारे वाचकोनी जिज्ञासाने उत्तेजित करवा, जिज्ञासुनी जीव नीनो जे उत्तरभागx छे ते पूर्वभागमा उत्तेजक भाषाद्वारा वर्णवेलो छे अने तेनो जे पूर्वभाग छे ते उत्तरभागमां सांकळेलो छे. आपणे अहीं उत्तरभागमा वर्णवाएली अनुकरणीय जीवनी विशेज विचार करवानो छ. संवादकथा जेवी जीवनीद्वारा पण 'आपणा वर्तमान जीवनमा क्यां केवो अने कई रीते फेरफार करीए तो कल्याणमार्गनी प्राप्ति माटेनो आपणो चालु प्रयास सफळ थइ शके' ए स्पष्ट समजी शकाय एम छे xआ उत्तरभाग वांचनार जिज्ञासु नीचेनां पद्योनो भाव बराबर लक्ष्यगत करेः 'देवादिगतिभंगमा जे समजे श्रुतज्ञान, माने निज मत वेषनो आग्रह मुक्तिनिदान". "जे जिनदेह प्रमाणने समवसरणादि सिद्धि, वर्णन समजे जिननुं रोकी रहे निजबुद्धि."-श्रीमद् राजचंद्र. For Private Personal use only JainEducation in Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयत्त जिज्ञासुनुं नाम पपसी छे. अहीं तेने एक क्रूर राजा तरीके ओळखावेला छेतेनो एक मित्र कहो, अमात्य कहो के सारथि कहो, ते चित्त नामे कल्याणमित्र छे. ए राज्यकर्मकुशळ अने विशेष समयक्ष छे. ग्रंथकारना कहेवा प्रमाणे पपसीनो पिता अने पितामह पण तेनी जेवो ज क्रूर हतो अने मातामही तो धर्मनिष्ठ श्रमणोपासिका हती अने जीव अजीव तत्त्वोनी जाणकार हती पसीनुं वर्णन आपतां मूळकार कहे छे के ते अधार्मिक खंड रौद्र साहसिक अने घातक हतो, श्रमण ब्राह्मण गुरुजन कोईनो विनय न करतो, एटलुं ज नहीं पण ए पोताना देशनो कारभार सुद्धां बरावर न चलावतो. 'शरीरथी जुदो एक आत्मा छे', 'मरण पछी जन्मांतर छे' 'पुण्यपापनी प्रवृत्तिद्वारा ज सुखदुःखनुं निर्माण छे' एवा एवा ख्यालोने ते स्वीकारतो नहि. तेने लीधे ज संभव छे के ते पवो क्रूर अने अविनयी थई गयो होय. तेनो कल्याणमित्र चित्त, पपसीना ए ख्यालो संबंधे बहारथी तो उदासीन तटस्थ जेबो रहेतो, पण पोताना मित्र राजाने प संबंधे कवानो - समजाववानो अवसर तो ते शोध्या ज करतो. एक प्रसंगे चित्त, राजकीय कार्य माटे राजधानी छोडी बीजे गाम गयो, त्यां ते, श्रीपार्श्वनाथ भगवाननी परंपराना केशी नामना मुनिनो धर्मोपदेश सांभळी तेमनो अनुयायो थयो - श्रमणोपासक थयो. ए चित्ते पोताना गुरुभूत मुनिने पोताना राजानी मान्यताओ विशे वात करो अने राजानी ए मान्यताओने लीधे पोताना देशनी दुःखमय कथनी कही संभळावी अने ए दुःखमय स्थितिमांथी देशने अने राजाने छोडबवा अने ते अर्थ पोतानी राजधानीमां पधारवा ते मुनिराजने तेणे आग्रह भर्यु आमंत्रण आप्युं अने साथै उमेर्यु के, आप आवशो तो राजा जरूर सुधरो जशे अने ते द्वारा अमारो - अमारा आखा देशनो देशनी समस्त जनतानो उद्धार करवानुं श्रेय आपने मशे. राजानो कर स्वभाव अने नास्तिकता भरेला ख्यालो जाणी केशी मुनि चित्तना ते आमंत्रणनो प्रथम तो अस्वीकार कर्यो अने तेना समर्थनमा जणान्युं के चित्त ! जे वनमां घणां दुष्ट श्वापदो रहेत होय ते वनमां वसतुं सलामत कहेवाय ? तेम जे नगरमां Jain Education Interational प्रवेशक ||१३|| Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेणइय सुतं ॥१४॥ क्रूर राजानुं शासन प्रवर्त्ततुं होय त्यां आवq शुं श्रेयरूप छे? पछी तो ते चित्ते केशी मुनिने कर्तुं के स्वामी ! आप देवानुप्रियने पएसी राजानुं शुं काम छे? राजधानीमां बीजा घणा य सार्थवाहो इभ्यो वसे छे, तेओ आपनो आदर करशे अने खानपान वगेरेनी विपुल सामग्रीद्वारा आपनो सेवा करशे. चित्तनुं ए जातनुं सुव्यवस्थित आग्रहभर्यु आमंत्रण जाणी केशी मुनिए कहां के, एम छे तो वळी प्रसंगे वात-फरतां फरतां त्यां आवी जशु. __ पछी तो चित्त राजधानी सेयवियामां आव्यो, पोताना गुरुसंबंधे तेने भारे खटको हतो तेथी आवतांज तेणे बगीचाना माळीओने बोलाव्या अने तेमने भारपूर्वक भलामण करी के, आपणी आ राजधानीमां श्रीकेशी नामना एक मोटा ज्ञानी मुनिराज आववाना छे, तेओ आपणा बगीचामां ऊतरशे, तो तेओ ज्यारे पधारे त्यारे तमो बधा तेमनो बहु विनयपूर्वक आदर करजो, तेमने वांदजो-नमजो अने खानपाननी सामग्रीद्वारा तेमनो सत्कार करजो. वखत जतां केशो मुनि पण गामेगाम फरता फरता राजा पपसीनी राजधानीमां जाधी पहोंच्या. चित्ते तेमनो खूब आदर कयों अने कह्य के हुं आपनी पासे राजा पपसीने कोईनेकोई व्हाने लावीश तो खरो ज, पछी आप तेने धर्म अधर्मनी समजण पाडशो, राजाने समजावर्ता जरा पण ग्लान न थशो-कंटाळशो नहि, तेम ज तेने जे समजावq होय ते नीडर थईने समजावजो, एमां लेश पण अचकाशो नहि. चित्तनी तो पहेलेथीज इच्छा हती के श्रोकेशी मुनि अने राजा पएसीनो समागम थाय तो राजानी वृत्तिमां कोमळता आवे अने तेम थाय तो केकय देशनी प्रजा पण सुखी थाय. बराबर लाग जोईने एक बार चित्ते काः महाराज! आपणे त्यां कंबोज देशना पेला जे चार घोडाओ आवेला छे तेमनी तो हजु परीक्षा पण न करी, ते हवे क्यारे करवाना छो? Jain Education malla |ww.lainelibrary.org Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुतं Jain Education राजाए कहांः चित्त ! आजे ज करीए, चाल तैयार था अने ए घोडाओने धरमां नाखी रथ जोडी लाव. रथम बेसी अश्वपरीक्षा माटे बहार नीकळ्या. चित्त सारथिप रथने पूरपाट हांकी मूक्यो, बहु दूर जई पहोंच्या. राजा तो थाकी गयो अने गरमी तथा धूळथी गभरायो. एणे रथने पाछो वळाव्यो. चतुर अने समय चित्ते विश्रांति माटे ते ज बगीचो पसंद कर्यो ज्यां तेना गुरु केशी मुनि ऊतर्या हता. बगीचामां घोडा छोड्या, तेमने चारो नाख्यो अने बन्ने जण थाक खावा बेठा. एवामां राजा पसीने काने केशी मुनिनो घेरो अवाज अथडायो. राजा बडबड्योः आ मुंडको अहीं आटले हेटे थाक खावा आव्या द्वीप तोपण सुखे निरांते बेसवा देतो नथी, आ ते आवडो मोटो घोंघाट शेनो ? चित्ते घणी ज नम्रताथी पोताना प्रिय राजाने मुनिनो परिचय कराव्यो अने तेमनी विद्वत्तानी थोडी प्रशंसा पण करी. सरळ स्वभावी राजा मुनिने मळवा उत्सुक थयो भने बन्ने जणा-राजा अने अमात्य मुनिश्री पासे पहोंच्या. राजा आत्मा जन्मांतर अने पुण्य पाप संबंधेनी पोतानी जिज्ञासा मुनि समक्ष रजु करी अने कहांः हे श्रमणायुष्मन् ! में आत्मा वगेरे तत्वोने शोधवा प्राप्त करवा घणा घणा प्रयोगो करी जोया छतां अत्यारसुधीमां हुं प प्रयोगोमां अफळ नीड्यो छु अने अत्यारसुधीना मारा जातजातना ए प्रयोगो उपरथी हुं एवा निर्णय उपर आव्यो छु के आत्मा नथी, जन्मांतर नथी अने पुण्य-पाप पण नथी. आ संबंधे आप कोई नवो प्रयोग बतावशो वा आपना विचारो प्रकट करशो तो कृपा थशे. श्रीकेशी मुनि राजानी जिज्ञासा अने आत्मानी शोध माटेनी तालावेली बराबर समजी गया. राजा रजु करेली साफ साफ वातो द्वारा मुनिराजे तेना मानसनी स्थिति जाणी. 'आ राजा गतानुगतिक नथी' 'हा जी हा भणे वो नथी' पण शुद्ध परीक्षाद्वारा विशुद्ध प्रयोगद्वारा वस्तुतत्त्वने शोधनारो - समजनारो साचो ग्राहक छे, खरो जिज्ञासु छे, ए बाबतनी प्रवेशक ।।१५।। Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेणइय सुत्त ॥१६॥ पाकी खात्री थई. वळी, राजा उपर करतानो वा अधार्मिकतानो जे आरोप छे ते आरोप मात्र छे, दृष्टिमेदतुं परिणाम छे. जेम कोई शोधक, पोताना जीवननी शुद्धि माटे वा पोते स्वीकारेला मार्गनी परीक्षाद्वारा पाकी खात्री करया माटे अनेक प्रयोगो करे-पोता उपर के बीजा उपर अनेक क्रियाओ करे, एवो कोई पण शोधक, गतानुगतिक लोकोनी नजरमां धूनी वा र ज लेखावानो, तेम आ राजा क्रूर लेखायो छे एवो अभिप्राय मुनिराजे राजा माटे बांध्यो. __राजाए आत्मानी शोध माटे जे जे प्रयोगो करेला ते बधा मुनिराजे सावधानताथी सांभळ्या. ते प्रत्येक प्रयोग पाछळ राजानी प्रखर तर्कशक्तिनुं बळ हतुं ते पण तेमना समजवामां आव्यु. मुनिराजे राजाने कहा: पपसी! ते श्रम तो खूब कयों छे पण तारो प श्रम शरूआतथी ज विपरीतता भणी जनारो होई तने तेमां संतोष के शांति न मळे ए बनवा जेवू छे. राजाना प्रयोगो संबंधे चर्चा करतां कया प्रयोगमां कयो कयो दोष हतो ए हकीकत मुनिराजे स्पष्ट कही बतावी अने छेवटे कह्यु के, पएसी! जे वृक्ष नीचे आपणे बेठा छोए तेनां पांदडां कोण हलावे छे? ऊडीने आपणा तरफ आवती आ धूळ कोण ऊडाडे छे ? शुं तुं ते पांदडां हलावनारने वा धूळ ऊडाडनारने जोई शके छे ? पपसी बोल्योः महाराज! हलावनार तो पवन छे, पण हूं तेने जोई शकतो नथी. मुनि बोल्याः पएसो! पवन तो रूप रस गंध स्पर्श अने शब्दवाळो छे छतां आपणे तेने नरी आंखे जोई शकता नथी, तो रूप रस गंध स्पर्श अने शब्दथी पर रहेला आकार विनाना पचा अमूर्त आत्माने आपणे नरी आंखे शी रीते निहाळी शकीए ? आत्मा आंखनो वा बीजी कोई इन्द्रियनो विषय नथी, माटे तेने शोधवा ते करेला भौतिक प्रयोगो तदन नकामा नीवडे ए बनवाजोग छै; ए तो एक मात्र अनुभवनो ज विषय छे. Jain Education in intre For Private & Personel Use Only www.tainelibrary.org Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं प्रवेशक ॥१७॥ हा, ए खरं के, ते जे प्रयोगो पेला चोरना शरीर उपर कर्या तेज प्रयोगो तारा पोताना शरीर उपर अजमाव्या होत तो कदाच तने आत्मानी प्रतीति थात खरी. हजु काई वखत वीत्यो नथी. तुंएज प्रयोगो तारी पोतानी जात उपर-तारी इंद्रियो मन, शरीर अने संकल्पो उपर अजमावीश तो तने 'आत्मा छे' एवी खात्री थया विना नहि रहे. पएसी! आत्मानी पूर्णतया प्रतीति थाय ए माटे हुँ पण मारी जात उपर घणा आकरा प्रयोगो अजमावी रह्यो छु, तेथी मने आत्मानी प्रतीति तो छे, पण हजु तेनी पूर्णतया प्रतीति-आत्मानो पूर्ण साक्षात्कार-वीजा घणा आकरा प्रयोगोनी राह जुए छे. ए बधा आकरामां आकरा प्रयोगोनी कसोटीमाथी अणीशुद्ध रीते पसार थई शकीश तो ज हुँ पूर्ण आत्माने अनुभवी शकीश. पपसी! आत्मानो अनुभव मेळववा अने तेनो सर्व प्रकारे साक्षात्कार पामवा तारे अंतर्मुख थर्बु पडशे. रूप रस गंध स्पर्श अने शब्दजन्य सुखोने मेळववा मन अने इंद्रियो जे दोडादोडी करी रह्यां छे तेमने तारे संयममा राखवां पडशे; आ स्थूळ शरीर सुख पामेते करमाई न जाय, ते माटे तुं जे हजारो प्रयत्नो सेवी रह्यो छे अने ए प्रयत्नो माटे हजारो मानवोनी शक्तिनो उपयोग करी रह्यो छे ते बधुं तारे जतुं कर पडशे. आत्मसुख आत्माद्वारा ज वेदी शकाय छे. आत्मा पोताना सुखथी संतुष्ट छे. "आत्मन्येव आत्मना तुष्टः" ए सिद्धांतने तारे जीवनव्यवहारमा सावधानीथी आचरवो जोईशे. खरं कहुं तो आपणे बधा शरीर, इंद्रिय, मन अने संकल्पोथी ऊपजतां सुखमां संतोष मेळवी अने ते ज सुखने परमसुख मानी तेनी पाछळ पड्या छीए अने ते मिथ्या प्रयासने कीधे ज आत्मसुखनो स्वाद चाखी शकता नथी. जेम एक व्यापारी व्यापार अर्थ देशांतरमां जाय. ते एवी मोटी आशा राखे के हुं लक्षाधिपति थाउं. रस्तामा जतां तेने एक निधान मळी जाय अने तेमांथी ते मात्र हजार मुद्रा पामी पाछो वळे अने ते द्वारा ज संतुष्ट थई जेमतेम जीवननिर्वाह करे. तेने बीजो व्यापारी समजण आपे के, भाई ! आ हजार मुद्राने व्यापारमा रोकी तेमांथी दसगुणी के शतगुणी बीजी मुद्रा कमा, पण ते साहस Jain Education intern al For Private & Personel Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत ॥१८॥ Jain Education I विनानो पम करतां भय पामे छे अने मळेली हजार मुद्रा वयक चाली जाय तो पछी शुं थाय ? एम समजी साहस करवा समर्थ थतो नथी. पोते अनेक साहसिकोने प रीते लक्षाधिपति थरला नजरे प्रत्यक्ष जुए छे छतां तेनो पूर्वग्रह छूटतो नथी, तेम आपणे पण शरीर, इंद्रिय, मन अने संकल्पोथी ज थतां सुखोमां सपडाया छीप. तेथी प सुखने छोडी वा ए सुख उपर अंकुश मुकी अंतर्मुख थई शकता नथी. पूर्वग्रहजन्य सुखो छोडतां आपणे आपणी जातने अशरण दुःखी अने कष्टमय थई गपली कल्पीप छीप. पएसी ! ज्यांसुधी आपणे आपणा पूर्वग्रहनो ए ग्रंथि मेदीने आगळ न वधीप त्यांसुधी आत्माना अनुभव माटेना आपणा सर्व प्रयासो नर्या फांफां छे. साहस कर्या बिना छूटको ज नथी. अहीं तो “माथा साटे माल छे." "महीं पड्या ते महासुख माणे” एज म्याय छे. माटे तारे हवे आज प्रयोग करवानो रह्यो अने हुं तारी जिज्ञासा अने आत्मानुभव संबंधी तालावेलीथी जाणी शकुं हुं के ए प्रयोगने अंते विजय तारो ज छे. पपसी ! ए प्रयोग तो घणा लोको करे हे पण सेमांना केटलाक तो साधनोमां ज अटकी पडे छे, केटलाक बाह्य प्रवृत्तिमां ज फलाई जाय छे, केटलाक नरी प्रतिष्ठामां ज पटकाई पडे छे, माटे तारे ए प्रयोग करतां बराबर विवेक सावधानी राखवी जरूरी छे. सांभळ, "कोई क्रियाजड थई रह्या शुष्क ज्ञानमां कोई, बाह्य क्रियामां राचता अतभेद न कांई. " "बंध मोक्ष छे कल्पना भाखे वाणी मांहि व मोहावेशमां शुष्कज्ञानी से अहि. " "वैराग्यादि सफळ तो जो सह आतमशान, तेमज आतमज्ञाननी प्राप्तितणां निदान. " "त्याग विराग न चित्तमां थाय न तेने ज्ञान, अटके त्याग विरागमां तो भूले निजभान. "ज्यां ज्यां जे जे योग्य छे तह समजवूं तेह, त्यां त्यां ते ते आचरे आत्मार्थी जन एह. " प्रवेशक Lainelibrary.org Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं प्रवेशक ॥१९॥ "होय मुमुक्षु जीव ते समजे एह विचार, होय मतार्थी जीव ते अवळो ले निर्धार." "बाह्य त्याग पण ज्ञान नहीं ते माने गुरु सत्य, अथवा निजकुळधर्मना ते गुरुमांज ममत्व."-श्रीमद् राजचंद्र. || तात पएसी! तारे एकडे एकथी शरू करवान छे, गभरावानुं कशुं कारण नथी. ते अत्यारसुधीमां इन्द्रियोना मनना अने संकल्पोना जे घोडा पूरपाट दोडाव्या छे अने ते अथें कोईना पण सुखनी परवा करी नथी ते बराबर नथी कयु. हवे तारे ए घोडाने अंकुशमां लाववा पडशे. सर्वथा इष्ट तो ए छे के ए घोडानो वेग तद्दन बन्ध ज थई जाय; पण ए एकदम तो न ज बने ते हुं मारा अनुभवथी समजु छु, माटे जतने ए प्रवृत्ति क्रमपूर्वक करवानी सूचना करुं छः प्रथम तो तारे तारा पूर्वग्रहो धीरे धीरे छोडवा, अहिंसा-सर्वप्राणिप्रेम-वृत्ति केळववी, ए माटे प्रथम तो तारे तारी निकट बसता मानवीओना सुखदुःख जापावा प्रयत्न करवो अने एमना जीवनविकासने रुंधनारांप दुःखो मटाडवा माटे अखिन्नपणे भरचक उद्यम सेववो तथा ए माटे तारे तारी पोतानी जातनो भोग आपयो पडे तोपण जरूर आपचो. एक ज वार तुं ए रीते तारी जातनो भोग आपीश त्यारे तने जरूर आत्मानी झांखी थवानी ए खात्रीथी मान अने पछी जेम जेम ए तारो आपभोग वधतो जशे तेम तेम तने तारा आत्मार्थने लगता प्रयासमा वधुने वधु सफळता मळशे. श्रीकेशी मुनिराजे जे काई कडं ते बधुं राजा परसीए ध्यानपूर्वक-घणी ज सावधानताथी-सांभळधु-अवधार्यु अने तेनुं मनन करी ते धोरणे जीवननो अखतरो करवानो तेने ऊमळको पण थई आव्यो.. राजाने तेनी सरळ प्रकृति अने आत्मार्थ सम्बन्धी तालावेलीने लीधे ए बधुं तद्दन नर्बु छतां अजमाववा जेवू तो लाग्यु ज. पछी तो तेणे "सेवे सद्गुरु चरणने त्यागी दई निजपक्ष, पामे ने परमार्थने निजपदनो ले लक्ष." "प्रत्यक्ष सद्गुरुयोगथी स्वच्छंद ते रोकाय, अन्य उपाय कर्या थकी प्राये बमणा थाय." Jain Educationtlimalamal For Private Personel Use Only Mainelibrary.org Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुतं ॥२०॥ "मानादिक शत्रु महा निज छंदे न मराय, जातां सद्गुरु शरणमां अल्पप्रयासे जाय." - श्रीमद् राजचंद्र. आ पद्योक्त भावने लक्ष्यमां राखी राजाप साधना शरू करी अने गुरुराजना कहेवा प्रमाणे पोतानी जात उपर ज अखतरो शरू कर्यो. साधनाने मंगळमय करवा माटे प्रथम तो राजा परसीए पोताना गुरुदेव केशी मुनिने क्षमा आपवा माटे प्रार्थ्या, राजाप भरसभामां जणायुंके, आ पवित्र मुनिराजनो में घणो अविनय कर्यो छे ते बदल ते महात्मा मने क्षमा करवा कृपा करे ए मारी तेमने नम्र विनंती छे. पछी तो राजाए पोतानी सर्व संपत्तिना चार सरखा भाग कर्या, जेमांनो एक भाग मात्र तेणे दान मांटे ज योज्यो अने दानधर्मने दानपारमिताने - केळवतो राजा पोतानी साधनामां लयलीन रहेवा लाग्यो. हवे ते पटलो वध साधनामय बनवा लाग्यो के, तेने पोतानी प्रिय राणीनी पण भोगसाधन तरीकेनी विस्मृति थवा लागी, एटलुंज नहि पण राणी राजाने विष आप्युं अने ते राजानी जाणमां आव्युं छतां तेनुं एक संवाडुं पण न फरक्युं तेने पोताना देहनी एटली वधी विस्मृति थई गई के देहनो नाश करनारी राणी माटे तेने मनमां कशुं ज न ऊग्युं ते तद्दन स्वस्थ रह्यो अने " आत्मन्येव आत्मना तुष्टः "नी परिस्थितिए लगभग पहोंचु पहोंचु थतां सूर्याभ-सूर्य जेवी झगारा मारती दिव्य-स्थितिने पाम्यो अने छेवटे* विदेह थई ज्योतमां ज्योतनी दशाने ते अनुभवशे. गतानुगतिकता, अंधश्रद्धा, परीक्षणशक्तिनो विरोध वा अभाव, नवा नवा प्रयोगोने विवेकपूर्वक खेडवानुं साहस न होवुं, पूर्वग्रहनो अत्यधिक पक्षपात, कोईएक जातनी विवेक विनानी स्थितिचुस्तता, जिज्ञासा ज न थवी, तर्कशक्तिनो दुरुपयोग, आडंबरप्रियता, मुंझ. aणने दबावी देवानी वृत्ति, शांत करवा माटे मुंझवणने प्रकट करवानी अशक्ति वा प्रकट करतां कोई जातना भयनी आशंका इत्यादि अनेक दुर्गुणो मुमुक्षु जिज्ञासुना जीवनविकासनो संहार करे छे. * श्री केशी मुनिराज अने राजा पसीना संवादमा में जे नवनीत जोयुं छे ते अहीं जणावेलुं छे. Jain Education ema onal प्रवेशक Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयत्त कथानायक परसीमां आ दुर्गुणो न होवाथी ज ते विदेह स्थितिने पामे छे, प आपणे ध्यानमा राखवा जेतुं छे. समजुं हुं त्यां सुधी आ सूत्रनो स्वाध्याय करनारे राजा परसीना चित्त शुद्धीकरणने ज ध्यानमा राखवानुं छे. ए सिवाय धर्मने नामे कषाय वत्रे प रीते आ सूत्रनो उपयोग करवो घटित लागतो नथी. [ एक विलक्षण समानता ] बौद्ध परंपरा अने जैनपरंपरा प बधेनुं एक नाम श्रमणपरंपरा छे. ते बन्नेमां अनेक प्रकारनी समानताओ रहेली छे. शब्दरचनानी, भाव संकलनानी, श्रमणना आचारबंधारणनी वा केटलीक खास खास शब्दोनी समानताओ उपरांत आखेआखां आख्यानोनी समानता पण मळी आवे छे. जे आख्यान आ परसीनुं आख्यान वांचकोनी दृष्टिसमक्ष छे ते आखुं आख्यान जेवुं ने तेवुं ज बौद्ध परंपराना 'दीघनिकाय ' नामना सुत्तपिटक ग्रंथमां पायासिसुत्तना मथाळा नीचे नोंघेलुं छे. पसीना आ आख्यानमां मुख्य नायक पपसी हे त्यारे बौद्ध आख्यानमां नायक पायासी छे. उपदेष्टा त्यां कुमार काश्यप छे त्यारे अहीं केशीकुमार छे बन्ने उपदेश पांचसो भिक्षुओना अधिष्ठाता के अने उपदेशनुं स्थान बन्ने स्थळे सेतविया - सेतव्या नगरी है. कल्याणमित्र अहीं चित्त छे त्यारे त्यां खत्त छे. प्रष्टव्य स्थानो-परलोक नथी, कोई औपपातिक सत्ता नथी अने सुकृत दुष्कृतरूप कर्मोंनुं फल नथी-ए बधां बन्नेमां समान छे. आ प्रष्टव्यो संबंधे जे जे प्रतिवचनो अने तेमने लगती युक्तिप्रयुक्तिओ आवी छे ते बधीय बन्नेमां लगभग समान है. पेला कंबोज देशना घोडानी हकीकत जे अहींना आख्यानमां छे ते पायासीनी कथामां नथी जणाती अने पपसीनुं जे भावी वृत्तांत आ आख्यानमां पूर्वमां नोंघेलुं छे ते पायासीना आख्यानमां क्रम प्रमाणे छेवटे जणावेलुं छे. तदुपरांत सूर्याभदेवे करेली नाट्य रचना अने बीजी विधिओ ते पायासीना आख्यानमांथी नीकळी गई छे. Jain Education tertional प्रवेशक ॥२१॥ w.jainelibrary.org Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुतं ॥२२॥ आ रीते थोडो घणो फेरफार छतां मूळ वस्तु बन्ने आख्यानमां बराबर सचवाएली छे ए विवाद विनानुं छे. आ उपरथी आ आख्याननी अतिहासिक किंमत घणी वधी जाय छे। अने आ बन्ने भिन्नभिन्न परंपराओ पण केवी रीते समानताना प्रवाहमां वही रही छे ते पण जणाई आवे छे. राजा पसेनजित अने पपसी वा पायासी ए बन्ने एक नथी प वस्तु कोई न भूले. आ माटे विशेष जाणवानी इच्छावाळाए पाली टेक्स्ट सोसाईटी तरफथी बहार पडेल अने श्री. टी. डबल्यु. राईस डेविडझ संपादित 'दीघनिकाय 'नी १९०३ नी आवृत्तिनुं पृ० ३१६थी ३५८ सुधीमांनुं 'पायासीसुतंत' नामनुं प्रकरण जोबुं, हिन्दी भाषानुं पुस्तक जोवा इच्छनारे महाबोधि ग्रन्थमाळा तरफथी प्रसिद्ध थयेल अने राहुल सांकृत्यायने अनुवादित करेल 'दीघनिकाय' ग्रन्थमांनुं पृ. १९९थी २११ सुधीमांनुं 'पायासिराजज्ञ सुत्त' नामक प्रकरण जोबुं. पालीटेक्स्ट सोसाईटीवाळु 'दीघनिकाय' वापरवा देवा माटे शेठ अगरचंद भैरवदान शेटियानो हुं आभारी छु. संशोधननां साधनो आ सूत्रना संपादन माटे में हस्तलिखित सात अने पक समितिवाळी मुद्रित प्रत एम आठ प्रतोनो उपयोग कर्यो छे. जेमांनी पांच प्रतो पाटणथी आवेली छे अने वे प्रतो भावनगरथी आवेली छे. पाटणथी आवेली मूळनी त्रण प्रतोनो परिचय आ प्रमाणे छेः ए त्रणे प्रतोनो संकेत आ रीते में राख्यो छे. Jain Education international १ मूळनी प्रत पा. १ २ पा. २ ३ " 31 पा. ३ प्रवेशक w.jainelibrary.org Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुतं पा. १- आ प्रतिनां पानां ३४ छे. प्रत्येक पानानी लंबाई १२ || इंच अने पहोळाई ५ इंचनी छे. प्रत्येक पानामां पंदर लाइनो अने प्रत्येक लाइनमां लगभग ६० थी ६५ अक्षरो छे. आ प्रतना अंतमां पुष्पिकामां संवत लख्यो नथी, परन्तु लिपि अने कागळ उपरथी एम कही शकाय के ए प्रत ३००-४०० वर्षनी जुनी होवी जोईए. आमां प्रस्थान २१२० श्लोकनुं आप्युं छे. आनी पुष्पिका आ प्रमाणे छेः नमो जिणाणं । जियभयाणं । नमो सुयद्देवयाए भगवतीए । नमो अं भगवतो अरहतो । पस्से सुपसे पस्सवणीए नेमो छ। रायप्पसेणइय सूत्रं समाप्तं । पा. २ - आ प्रतनां पानां ४७ छे. प्रत्येक पानानी लंबाई ११ ॥ इंच अने पहोळाई ४॥ इंच छे. प्रत्येक पानामा १२ थी १४ पंक्तिओ अने प्रत्येक पंक्तिमा लगभग ४५ थी ५० अक्षरो छे. आम ग्रंथान २०७९ श्लोकनुं छे. आ प्रतमां पडिमात्रा छे. आ प्रत वि. सं. १६०४मां लखायेली छे. पनी पुष्पिका आ प्रमाणे छे: ५ आ ग्रन्थना अन्तमा आपेली अने बधी प्रतिओमां मळती मूळपाठनो पुष्पिकामा 'भगवतो अरहतो परसे सुपसे परसवणीए नमो' एवं कोई जग्याए, 'भगवतो अरहउ पासे सुपरसे परसवणीए नमो' एवं अने कोई जग्याए 'भगवउ अरहउ पासस्स । पस्से सुपस्से परसवणीं नमो' आवा आवा अनेक प्रकारना पाठो मळे छे. अने तेना अर्थ माटे आज सुधी कशी प्रयत्न थयो होय एम लागतुं नथी. हुं पण एनो शुद्ध अर्थ करी शकुं एम जणातुं नथी छतां मारी कल्पना प्रमाणे ए पाठने आ रीते वांचवामां आवे तो तेनो कंईक अर्थ नीकळी शके: 'नमो भगवतो अरहतो पासस्स । पएसिस्स पण्हे पण्णवणोए नमो' एटले के आदिना वाक्यथी भगवान पार्श्वनाथने नमस्कार थाय छे अने पाछळना वाक्यथो प्रदेशी राजाना प्रश्नाने बतावनार आ सूत्रने नमस्कार कर्यो छे. आ वाक्योमांना बेवडा 'स' 'ण' जेवा देखाय छे तेथी ज 'पस्से' नुं 'पण्णे' अने 'परसवणीए ' नुं 'पण्णवणीए' कल्पवुं ठीक लागे छे. खरी रीते तो आवा घणा उताराओने सामे राखीने पछी ज योग्य निर्णय करी शकाय. Jain Educationterational प्रवेशक ॥२३॥ w.jainelibrary.org Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुतं प्रवेशक ॥२४॥ नमो जिणाणं । नमो सुपदेवयाए भगवईप । नमो पण्णत्तीए भगवईए । णमो भगवओ अरहउ पासे सुपस्से पस्सवणी णमो । रायपसेणीयं संमत्तं । ___ संवत् १६०४ वर्षे मार्गवदि ५ गुरवासरे। श्रीवृधतपापक्षे महोपाध्याय श्री ४ श्री जयमंदिरगणिगरुभ्यो नमः भट्टारिक श्री श्री ४ श्री कल्याणरत्नसूरिगुरुभ्यो नमः ॥ पं. श्री वद्यारत्नमुनिपरिभोग्यं स्वयं विलोकनार्थ राजप्रस्नी उपांगसूत्र वाचनार्थ ज्ञातव्यः॥ पा. ३-आ प्रतनां पाना ४८ छे. प्रत्येक पानानी लंबाई ११ इंच अने पहोळाई ४॥ इंच छे. प्रत्येक पानामा १५ पंक्ति अने प्रत्येक पंक्तिमा ४० थी ४५ अक्षरो छे. आमां ग्रंथान २१२० श्लोकनुं छे. आ प्रत वि. सं. १६१९नी छे. पनी पुष्पिका ओ प्रमाणे छे: ___णमो जिणाणं । जेभइयाणं । णमो सुयदेवताए भगवतीए । णमो पण्णत्तिए भगवतीए। नमो भगवतो। अरहतो पस्सेसु । पस्से | पस्सवणीए णमो। इति रायपसेणी सूत्रं संम्मत्तं समाप्तं । संवत् १६१९ वर्षे ।। माघमासे । कृष्णपक्षे । त्रयोदशी तिथौ । शुक्रवारे । पूर्वानक्षत्रे । सिद्धनामजोगे । लग्निक दिने । श्रीमज्जोधपुरे ॥ राजाधिराय महाराय श्रीमालदेवपट्टे श्री राय श्री चंद्रसेनराज्ये ॥ लिखितं । श्री कोरंटगच्छे । वा. श्री आसदेवपट्टे भोजदेव । जइतिलक भोजदेवपट्टे वा. श्री देवकलसपट्टे वा. श्री देवसुंदरशिप्य ग. देवमूर्ति । तत् शिष्य श्री देवप्रभुणा राजप्रश्नी ग्रन्थं लिलेषि । आ उपरांत टीकाथाळी जे चार प्रतोनो उपयोग कर्यो छे तेनो संकेत नीचे प्रमाणे राख्यो छः पा. ४ मात्र टीकावाळी पाटणथी मळेली प्रत. पा. ५ मात्र टीकावाळी भा. १ टीका तथा मूळवाळी भावनगरथी मळेली प्रत. भा. २ Jain Education For Private Personal Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं प्रवेशक ॥२५॥ पा. ४-आ प्रतनां पानां ६९ छे. प्रत्येक पानानी लंबाई १०॥ इंच अने पहोळाई ४m इंच छे. प्रत्येक पानामा १५ पंक्तिओ अने प्रत्येक पंक्तिमा ५५ थी ६० अक्षर छे. आमां टीकार्नु ग्रन्थान ३७७५ श्लोकनुं छे. आ प्रत वि. सं. १५७५ लखायेली छे. पनी पुष्पिका आ प्रमाणे छः इति मलयगिरिविरचिता राजप्रश्नीयोपांगवृत्तिका समर्थिता ॥ छ॥ स्वस्ति संवत् १५७५ समये वैशाष शुदि १३ शुक्रवासरे। श्रीखरतरगच्छे भट्टारक श्री जिनराजरि तत् सिष्य उपाध्या श्री राजसुंदर तस्यार्थे सांभवत्यागोत्रे साधु श्री गोपीचन्द लिखापितं दत्तं । पा. ५-आ प्रतना पानां ५९ छे. प्रत्येक पानानी लंबाई १३॥ इंच अने पहोळाई ५ इंच छे. प्रत्येक पानामा १६ पंक्तिमो अने प्रत्येक पंक्तिमा लगभग ६५ अक्षरो छे. आमां ग्रन्थान ३७०० श्लोकनुं छे. आ प्रत वि. सं. १४८५ मां लखायेलो छे. आमा पडिमात्रा छे. पाटणनी पांच प्रतोमां आ प्रत विशेष सुंदर छे. एनी पुष्पिका आ प्रमाणे छः इति मलयगिरि विरचिता राजप्रश्नीयोपांगवृत्तिकाः समर्थिता। समाप्तमिति । प्रत्यक्षर गणनया ग्रंथाग्रे । प्रत्यक्षरगणनातो ग्रन्थमानं विनिश्चितं । सप्तत्रिंशत् शतान्यत्र श्लोकानां सर्वसंख्यया ॥ संवत् १४८५ वर्षे भाद्रवा सुदि ३ शुक्रे उपांगवृत्तौ समाप्तमिति विप्र वैजनाथेन लिखितं । भा. १-आ प्रतनां पानां १२८ छे, आ त्रिपाठ प्रत छे. प्रत्येक पानामां बच्चे मूळ अने उपर नीचे टीका छे. आ प्रतनी लंबाई १० इंच अने पहोळाई ४ इंच छे. त्रिपाठ होवाथी पंक्ति तथा अक्षरोनी गणना एकसरखी जळवाई नथी. आमां मूळनें ग्रंथान २०७२ भने टीकामां ३७०० श्लोकनुं छे, आ प्रत वि. सं. १६८५नी छे. आनी पुष्पिका आ प्रमाणे छेः श्री णमो जिणोण णमो सुयदेवयाए भगवइए नमो पण्णत्तिए भगवीए णमो भगवउ अरहउ पासस्स | पस्से सुपस्से पस्सवणीं णमो Jain Educati onal For Private Personal use only . . Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेणइय सुत्तं ॥२६॥ रायपसेणीयं सम्मत्तं । संवत् १६८५ वर्षे फाल्गुणमासे शुक्लपक्षे अष्टम्यां तिथौ संपूर्ण राजप्रश्नीउपांगमिति । इति श्री मलयगिरिविरचिता राजप्रश्नीयोपांगवृत्तिः समर्थिता। भा. २-आ प्रतनां १४४ पानां छे. आ त्रिपाठ प्रत छे. प्रत्येक पानामां वच्चे मूळ अने उपर नीचे टीका छे. प्रत्येक पानानी लंबाई ९॥ इंच अने पहोळाई ४ इंच छ. त्रिपाठ होवाथी पंक्ति तथा अक्षरोनी गणना एकसरखी जळवाई नथी. आ प्रतमा लख्या संवत् नथी आप्यो छतां अक्षरो अने कागळो जोतां लगभग ४०० वर्षनी होवी जोईए, आमां मूळनें ग्रंथात २१०० अने टीकार्नु ३६५० | श्लोक- आप्यु छे. पनी पुष्पिका आ प्रमाणे छः नमो जिणाणं । जियभयाणं नमो सुयदेवताए भगवतीए नमो भगवतो अरहतो । पस्से सुपस्से पस्सवणीए नमो। इति श्री रायप्पसेणइयं सूत्रं समाप्त । अधरीकृतचिन्तामणिकल्पलताकामधेनुमाहात्म्याः। विजयंतां गुरुपादा विमलीकृतशिष्यमतिविभवाः ॥ राजप्रश्नीयमिदं गम्भीराथै विवृण्वता। कुशलं यदवापि मलयगिरिणा साधुजनस्तेन भवतु कृती॥ इति श्रीमलयगिरिविरचितायां श्रीराजप्रश्नीयोपांगवृत्तिः समाता । आ रोते पंदरमा सैकाथी मांडीने सत्तरमा सैका सुधीमां लखायेली सात प्रतोनो में उपयोग कयों छे. आ प्रतोमा पाटणनी 'पा. ५' संज्ञावाळी अने 'भा. २' संज्ञावाळी ए बे प्रतो सरखामणीमां वधारे शुद्ध कही शकाय. बीजी प्रतो पण बहु ज भूलोवाळी तो न |ज कही शकाय. For Private Personel Use Only Jain Education in inelibrary.org Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुतं Jain Education आ ग्रन्थनुं संशोधन करती वखते में मूळ पाठनो निर्णय विवरणने आधारे ज करेलो छे भने ज्यां विवरण नथी त्यां अर्थष्टो अने हस्तलिखित प्रतोनो आधार लीघेलो छे. समितिवाळी आवृत्तिमां छापेल मूळ घणे स्थळे विवरणनी साथे मेळ खातुं नथी, त्यां विवरणनी प्रतीको विशेष प्रामाणिक मानी मूळ तरीके राखेली छे अने ज्यां मूळ अने विवरणनो दूर न करी शकाय एवो विसंवाद छे त्यां कांई पण फेरफार कर्यो नथी, परन्तु टिप्पणमां मूळ अने विवरणना पाठभेदनो उल्लेख कर्यो छे. वळी केटलेक स्थळे केवळ विवरण ज छे, पण मूळपाठ उपलब्ध नथी त्यां जीवाजीवाभिगमनो आधार लईने ते मूळपाठ टिप्पणर्मा टांकी बताव्यो छे. आचार्य मलयfire faarai घणी जग्याए लख्युं छे के अहीं घणो वाचनाभेद छे, अहीं घणो पाठभेद छे, ए हकीकत खास खास स्थळे टिप्पणमां स्पष्टीकरण साथै जणावी छे. वाचनाभेदने लगता टीकाकारना उल्लेखो जोतां एम जणाय छे के घणे स्थळे आ सूत्रमां बहु पाठभेद थह गयेलो होवो जोईप. ज्यां सुधी आवा भिन्न भिन्न पाठो विशे चोक्कस निर्णय न थई शके त्यांसुधी कोई पण जातनुं पृथक्करण कर्या सिवाय के पाठान्तरो आप्या सिवायनुं आगमोनुं मुद्रण के उत्कीर्णीकरण (पत्थरमां कोतरखं ते) पुरातत्त्वनी दृष्टिए विश्वासपात्र न लेखाय. शुद्ध साहित्यनी दृष्टिप आगमोनुं मुद्रण कर होय तो कोई पण जातनो आग्रह राख्या सिवाय तेमनुं संशोधन थ जोई. अने ते संशोधन करवा माटे आगमना अनेक अभ्यासीओए मळीने अनेक प्रतिओनो उपयोग करचो जोइए. उपरान्त मूळपाठना शुद्धीकरण माटे आगमनी निर्युक्ति, भाग्य, चूर्णि अने टीकानो खास आधार लेवावो जोईए. तेम करवा छतां य ज्यां मूळ अने नियुक्ति वगेरेमां जे कांई भेद जेवुं जणाय तेनी पण नोंध लेबावी जोईए. समितिए जे आगमो छपावेला छे ते सारी रीते शोधाया ज नथी. तेमां पाठांतर, प्रस्तावना, परिचय के अर्थभेदने लगतां टिप्पणो वा टीकामां आवेला अवतरणोनुं स्पष्टीकरण वगेरे कशुं ज आपवामां आव्युं नथी. पटलुंज नहीं पण मूळ पाठ पण विनकाळजीथी छपायेलो छे. आ संबंधी विशेष विस्तारथी लखवानुं के उदाहरण आपत्रानुं आ स्थळ नथी, छतां मात्र जाणनी खातर एक चे उदाह रणो आपीप छीपः प्रवेशक ||२७|| jainelibrary.org Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेणइय सुत् ॥२८॥ सूत्रकृतांग सूत्रना पहेला अध्ययनना त्रीजा उद्देशानी श्रीजी गाथा तेमां आ रीते छपायेली छः उदगस्स पभावेणं सुकं सिग्धं तर्मिति उ।। आ गाथा उपरनी टीका जोतां तेनुं शुद्धरूप आरीते होइ शके: उद्गस्स पभावेणं सुक्कंसि घंतर्मिति उ । रायपसेणइम सूत्रमा समितिनी आवृत्तिमा [पृ० ८८ प्रथम बाजु] मूळमां 'जोयणं उब्वेहेणं जोयणं विक्खंभेणं' एयो पाठ छे अने | तेना विवरणमा 'अर्धक्रोशम्-अर्धगव्यूतमुधेिन अर्धक्रोश विष्कम्भतः' आवो मूळना भावथी जुदा भाववाळो पाठ छे. आ पाठमां मूळमां 'योजन' नुं माप बताव्युं छे त्यारे विवरणकार 'अर्धकोश'नुं माप बतावे छे. आ कांई साधारण विसंवाद न गणाय! । रायपसेणइअ सूत्रमा समितिनी आवृत्तिमां [पृ० ८८] मूळमां 'दस जोयणाई उव्वेहेणं' पाठ छे अने तेना विवरणमा 'द्वासप्ततियोजनानि' पाठ छे. 'दस योजन'विवरण करतां आगमनो अभ्यासी विवरणकार 'बहोतेर योजन' केम लखी शके ? ___ आ रीते आगमना छपायेला प्रत्येक पुस्तकमां मूळ अने विवरणमां घणाय विसंवादो रही गया छ, जेना निराकरण माटे संपादके अक्षर पण पाड्यो नथी तेम तेनी नोंध पण लीधी नथी. ज्यारे के अत्यार आगमच छपायेला आगमोमां आ प्रमाणे मूळ तेमज विवरणनो विसंवाद छे, मूळना शुद्ध पाठो अनिश्चित छे अने विवरणकारे अनेक पाठमेदो नोंघेला छे त्यारे अमुक प्रकारना पाठनो निर्णय कर्या विना ते आगमोने शिलारूढ करवा तेमां पारमार्थिक दृष्टिप आगमनी पूजा छे खरी? संपादनशैली आ मुद्रणमां विवरणमा आघेली मूळनी प्रतीको मूळमां ज आवो जती होवाथी ते विवरणमां मूकवामां आवी नथी. परन्तु ज्यां आवश्यक जेवू जणायुं त्यां ते प्रतीको राखवामां आवी छे. बीजु मूळपाटना जे जे शब्दो उपर विवरण छे त्यां मूळना शब्दो उपर Jan Educatonem For Private Personal Use Only wiljainelibrary.org Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं प्रवेशक ॥२९॥ तेम ज विवरणना शब्दो उपर अंको मूकवामां आव्या छे. वांचनार मूळ शब्दनु विवरण क्यां छे ते सहेलाईथी मेळवी शके ए उद्देशथी आ प्रमाणे करवामां आन्यु छे. विवरणमा ज्या ज्या व्याकरण के कोशना अवतरणो आपेला छे, ते अवतरणो विवरणमाथी ससेडीने नीचे टिप्पणमां मूकेला छे, अने ते अवतरणोनां स्थळो मळी शक्यां एटलां मेळवीने नोंधेलां छे. विवरण वांचनार सळंग विवरण वांची शके ते माटे आ प्रमाणे अवतरणो टिप्पणमा मूक्यां छे. अने बनी शके पटलुं विवरणने स्पष्ट करवामां आब्युं छे. कोई जग्याप विवरणमां अंकोनो क्रम एकसरखो नथी रह्यो तेनु कारण विवरणनी अन्वयवाळी शैली छे. मूळपाठना वर्णकोनी पूर्ति माटे अने मूळना बीजा केटलाक पाठो समजाववा माटे उववाइअसूत्र, जीवाजीवाभिगमसूत्र अने नंदीसूत्रनो आ सूचना संपादनमा उपयोग करवामां आव्यो छे. प्रस्तुत ग्रन्थना ५९ मा पाने वीसमी कंडिकामां 'देवाई' एबुं पद छे. तेनुं जे विवरण विवरणकारे करेलुं छे ते विचारणीय छे. मारा विचार प्रमाणे 'देवाइ' एक पद नथी पण विवरणकारे तेने 'देवादि' कहीने एक पद का छे. मारा अभिप्रायने श्रीअभयदेवसूरिनो टेको पण छे. [जुओ पृ० ५९ ५ शब्द उपरतुं टिप्पण] सूत्रमांना चालु विषयने समजवा माटे ते ते स्थळे हांसियामां मथाळां मूकेलां छे. टिप्पणमा केटलाक मूळ शब्दोने प्रचलित भाषाना शब्दो साथे सरखावेला छे. पाछळ आ सूत्रनो सारभूत अनुवाद मूळसूत्रनी कंडिकावार मूक्यो छे. अनुवादमा पण उपयुक्त टिप्पणो आपेलां छे. ग्रन्थनी पाछळ विशेष नामोनो अने खास खास उपयुक्त पवा ऐतिहासिक शब्दोनो पृष्टवार अकारादि अनुक्रम आपेलो छे. आभार पाटणनी प्रतो मोकलवा माटे पूज्यपाद प्रवर्तक श्रीकांतिविजयजीना शिष्य प्रशिष्य मुनिराज श्रीचतुरविजयजी अने पुण्यविजयजीनो हुँ अनुगृहीत ढुं. अने भावनगरनी बन्ने प्रतो माटे धर्मबंधु रा. रा. कुंवरजीभाई तेमज शेठ डोसाभाई अभेचंदनी पेढीनो ९ आभार Jain Educat i onal W w.jainelibrary.org Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेशक रायपसेणइय सुत् मार्नु छु. आवां प्रकाशनो बहार पाडवां ए पक ज माणस माटे बहु मुश्केल वात होवा छतां आ सूत्रने प्रसिद्ध करवा माटे श्रीगुजरग्रन्थरत्न कार्यालयवाळा भाई शंभुलाल जगशीभाई शाहने हुँ अभिनन्दन आपुं . आ प्रकाशनमा केटलीक खामीओ रही गई छे अने ते मारा ध्यान वहार नथी, परन्तु नबळी आंखवाळो पकलो हुं, खूब इच्छा थतां, ए खामीओने दूर करी शक्यो नथी. कोई आगमप्रेमी आ प्रकाशन मारफत आगमना विशेष शुद्धीकरण माटे पूर्वोक्त रीते प्रयत्न करशे तो हुं मारा आ प्रयत्नने सफळ थयो मानीश. ॥३०॥ १२/व, भारतीनिवास सोसाईटी एलिसब्रिज अमदावाद. बचरदास. Jain EducatInterational For Private & Personel Use Only Tww.jainelibrary.org Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं विषयानुक्रम | विषयानुक्रम ॥३ ॥ कंडिका विषय विवरणकारे कल्पेलो 'रायपसेणइय' नो शब्दार्थ विवरणकारे दर्शावेलुं 'रायपसेणइय'र्नु उपांगपणु १ 'आमलकप्पा' नगरीनुं वर्णन २ 'अंबसालवण' चैत्यर्नु वर्णन ३ 'असोगवर' वृक्षनुं वर्णन । ४ 'पृथ्वी शिलापाट' नुं वर्णन ५ आमलकप्पाना राजा 'सेअ'नुं वर्णन ६ 'सेअ'नी राणी धारिणीनुं वर्णन ७ 'भगवान महावीर' पधार्यानुं वर्णन ८ भगवान महावीरना शरीरनुं वर्णन ९ भगवान महावीरना गुणनुं वर्णन १० 'पर्षदना निर्गम' नुं वर्णन कंडिका विषय ११ 'पर्षदना विसर्जन'नुं वर्णन १२-१३ सूर्याभदेवे भगवान महावीरने जोयाचं वर्णन १४-१५ सूर्याभदेवे भगवान महावीरनी स्तुति कर्यानी हकीकत १६-१७ भगवानने जोया पछी सूर्याभदेवने थयेलो विचार १८ सूर्याभदेवे आभियोगिक देवोने करेली आज्ञा १९ ए आभियोगिको भगवान पासे आव्या २० भगवान अने आभियोगिक देवोनी बातचीत २१ आभियोगिक देवो भगवानना निवासनी आसपासन बधुं स्थळ साफ करे छे २२ -निवासनी आसपास सुगंधी पाणी छांटे छे २३-२४ -निवासनी आसपास फूलो घरसावे छे JainEducation For Private Personel Use Only dainelibrary.org. Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तं विषयानु क्रम ॥३२॥ कंडिका विषय २५-२६ सूर्याभदेवे पोताना सेनापतिने आपेली आज्ञा २७ श्रीभगवान महावीर पासे आववा माटे देवोर्नु सज थर्बु २८-२९ भगवान पासे जवा माटे विमान रचवानी आज्ञा ३०-४० विमाननी रचनानुं वर्णन ४१ विमानमा आवेला प्रेक्षागृहमंडपोन वर्णन ४२ प्रेक्षागृहमां आवेला अखाडानुं वर्णन तथा अखाडानां मणिपीठीका अने सिंहासननु वर्णन ४३-सिंहासन उपरना विजयदृष्य अने त्यां लटकायेला घडा जेवडां मोतिओना झुम्मरनुं वर्णन ४४ भद्रासनोनुं वर्णन ४५ यानविमाननु वर्णन ४६ परिवार साथे सूर्याभना विमानारोहणनुं वर्णन ४७-४८ यान विमाननुं प्रस्थान अने सूर्याभर्नु भगवंत पासे पहोंचवू ४९-५० श्रीमहावीर भगवान अने सूर्याभदेवनी वातचीत ५१ भगवाननो उपदेश कंडिका विपय ५२ सूर्यामे करेला प्रश्नो ५३ भगवाननो प्रत्युत्तर ५४ 'हे भगवान! हुं नाट्यना प्रकारोने भजवी बतायुए रीते भगवानने सूर्याभे करेली विनंती ५५ सूर्याभनी ए विनंती तरफ भगवाननो अनादर-मौन ५६-५७ सूर्याभे नाटयप्रयोग करी बताववा करेलो भक्तिपूर्वक प्रयत्न-सूर्याभना जमणा हाथमाथी १०८ देवकुमारो ना नीकळवानुं वर्णन ५८ डाबा हाथमाथी १०८ देवकुमारीओना नीकळवार्नु वर्णन ५९ प्रत्येक प्रकारना एकलो आठ वाजां अने एकसो आठ वाजां बगाडनारनुं वर्णन तथा विशेष प्रकारनां वाजानां नामो ६०-६१ नीकळेला देवकुमारोने अने देवकुमारीओने नाट्य प्रयोग करी बताववानी सूर्याभनी आज्ञा ६२-६३ देवोना संगीतर्नु, नाचनु अने वाजां वगाडवानुं वर्णन ६४-६५ शंख अने खरमुखी वगेरे वाजांओने वगाडवानी रीतो JainEducation For Private Personel Use Only Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं विषय विषयानु ॥३३॥ कंडिका अमे नाटकनी अद्भुतता ६६ प्रथम प्रकारचें नाटक-स्वस्तिक वगेरे आठ मंगळोनो अभिनय ६७ बीजा प्रकारचं नाटक-सागर तरंग वगेरेनो अभिनय ६८ नाटकनो त्रीजो प्रकार-बळद-घोडो-वनलता बगेरेनो ___ अभिनय ६९ चोथु नाटक-चक्र-चक्रानो अभिनय ७० पांच, नाटक-चंद्रावलि वगेरेनो अभिनय ७१ छट्टु नाटक-चंद्र ऊगवा वगेरेनो अभिनय ७२ सातमु नाटक-चंद्रागमन वगेरेनो अभिनय ७३ आठमुं नाटक-चंद्रग्रहण वगेरेनो अभिनय ७४ नवमुं नाटक-चंद्रनुं आथमवू वगेरेनो अभिनय ७५ दसमुं नाटक-चंद्रमंडल वगेरेनो अभिनय ७६ अग्यारमुं नाटक-वृषभनी अने सिंहनी ललित गति वगेरेनो अभिनय ७७ बारमुं नाटक-सागरना आकारमगेरेनो अभिनय कंडिका विषय ७८ तेर, नाटक-चंपानगरी वगेरेनो अभिनय ७९ चौमुं नाटक-मत्स्यांड बगेरेनो अभिनय ८० पन्नरमाथी ओगणीस, नाटक-क ख वगेरे वर्गीय २५ व्यंजनोना आकारनो अभिनय ८१ बीसमुं नाटक-अशोकना पल्लव वगेरेनो अभिनय ८२ पकवीस, नाटक-पद्मलता वगेरेनो अभिनय ८३ २२-२३-२४-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१, नाटक द्रुत वगेरेनो अभिनय ८४ ३२ मुं नाटक-भगवान महावीरनी बालक्रीडा-कामभो गनी लीला अने तेमनां निर्वाण वगेरेनो अभिनय ८५ तत-वितत-घन-अने शुषिर ५ चार जातनां चाजां ओनुं वगाडवू ८६ उत्क्षिप्त वगेरे चार प्रकारचें संगीत ८७ अंचित वगेरे चार प्रकारर्नु नृत्य ८८ दाष्टान्तिक वगेरे चार प्रकारनो अभिनय ८९ नाटक पूरुं थया पछी सूर्याभदेव पोताना परिवार साथे wi Jain Educatio .jainelibrary.org n al Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण विषयानुक्रम इय सुत्तं ॥३४॥ कंडिका विषय पोताने स्थाने चाल्यो गयो ९०-९४ सूर्याभनी देवमाया विशे शंकाशील गौतमनो प्रश्न अने भगवाननो उत्तर ९५-९६ सूर्याभदेवतुं विमान क्या छ ? पयो गौतमनो प्रश्न ___ अने भगवाननो उत्तर ९७ विमानना प्राकारचं वर्णन ९८-१०७ विमानना बारणानुं वर्णन १०८-११० विमाननी आजुबाजुना वनखंडो अने तेनां तृणोना मधुर ध्वनिनुं वर्णन १११ ए वनखंडोमांना जलाशयोनुं अने तेमनी अंदरना पाणीनुं वर्णन ११२-११६ उत्पातपर्वतो वगेरे क्रीडास्थळोजें वर्णन ११७-१२२ चार प्रासादो, उपकारिकालयन अने पद्मवरवेदि कानुं वर्णन १२३ सुधर्मा सभानुं अने मंडपोर्नु वर्णन १२४ वज्रमय अखाडानुं वर्णन तथा चार जिननी प्रतिमा कंडिका विषय ओर्नु वर्णन १२५ चैत्यवृक्षोनुं वर्णन १२६ चैत्यस्तंभनु वर्णन अने ते स्तंभनी वच्चेना शिकामां श्री जिनना साथळना हाडकांनु वर्णन १२७ मणिमय पीठिका अने देवशयनीयर्नु वर्णन १२८ वज्रमय शस्त्रभंडारनुं वर्णन १२९ सिद्धायतन अने तेमांनी पकसोने आठ जिनप्रतिमा ओर्नु वर्णन १३० छत्रधारक चामरधारक प्रतिमाओन तथा नागनी, भूतनी अने यक्षनी प्रतिमाओनुं वर्णन तथा एकसोने आठ घंटो वगेरेनुं वर्णन १३१ उपपात सभा-अभिषेक सभा-अलंकार सभा-व्यवसाय सभानु तथा व्यवसाय सभामां आवेला पुस्तकनु अने पुस्तकनां पानां, शाही, अक्षरो वगेरेनुं वर्णन १३२ सूर्याभदेवनो जन्म अने तेनो पोताना कर्तव्य विशेनो विचार Jain Educatie intern al For Private & Personel Use Only मw.jainelibrary.org Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तं विषयानुक्रम ॥३५॥ कंडिका विषय १३३ सूर्याभदेवना सामानिक देवोए करेली कर्तव्य मार्गनी सूचना १३४-१३६ सूर्याभदेवर्नु स्नान, तेनो इंद्राभिषेक तथा अभि पेकनी प्रवृत्तिथी थपलो देवोने आनंद वगेरेनुं वर्णन १३७ सूर्याभदेवे पहेरेला वस्त्र अने आभूषणोनुं वर्णन १३८-१३९ सूर्याभदेवे पुस्तक वांची ते द्वारा धार्मिक व्यवसाय नी माहिती मेळवी अने पूर्वोक्त सिद्धायतनमा आवेली जिनप्रतिमाओनी पूजा करी तेमनी स्तुति करी तेनु वर्णन तथा पोताना आखा विमाननी अंदरनी पूत ळीओ वगेरेनी अर्चना करी अने करावी तेनुं वर्णन १४० सूर्याभदेवनो परिवार अने तेनी सभाना भभकानुं वर्णन १४१ सूर्याभदेवे आवु स्वर्गीय सुख शाथी मेळव्युं ? एवो गौतमनो प्रश्न अने तेना जवाबमां भगवाने कही संभळावेली राजा पएसीनी कथा कडिका विषय राजा पएसीनी कथा १४२ केयि' नामनो अर्ध आर्य देश अने 'सेयविया' नगरीनुं वर्णन तथा राजा पपसीनुं वर्णन १४३ पएसीनी राणीनी हकीकत १४४ पपसीना मोटापुत्रनी हकीकत १४५ पपसीना मोटाभाई चित्त सारथिर्नु वर्णन १४६ कुणाल देशनी सावत्थी नगरी तथा तेना राजा जित शत्रुनुं वर्णन तथा चित्त सारथिनु सावत्थी तरफ जवानुं वर्णन १४७ पार्थापत्य केशीकुमारनुं वर्णन १४८ केशीकुमार पासे जता लोकोनुं वर्णन १४९ चित्त सारथिन केशिकुमार पासे जq १५०-१५१ चित्तसारथि श्रमणोपासक थयो १५२ चित्तनु सेयविया तरफ प्रयाण १५३ सेयविया तरफ आववा माटे चित्ते केशिश्रमणने करेली Jain Educatie interational For Private & Personel Use Only Iww.jainelibrary.org Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुतं ॥३६॥ Jain Education Inthanes कंडिका विषय विनती अने पपसी अधार्मिक होवाथी चित्तनी ए विनंतिनो अस्वीकार १५४ वीजा केटलाय गृहस्थो आपनो आदर करशे माटे परसीथी आपने शुं काम छे ? एम कही चित्ते सेयविया आववा केशिने करेलो आग्रह १५५ केशिश्रमणना आदर माटे चित्ते पोताना उद्यानपालकोने करेली भलामण १५६ चित्त सेयविया जईने राजा परसिने मळ्यो १५७ केशीकुमार भ्रमण सेयविया पहोंच्या अने चित्तसारथिना माळीओप तेमने सत्कार्या १५८ चित्तसारथि केशीकुमार पासे गयो १५९ चित्ते तेमने राजा परसीने धर्मबोध आपवा विनंती करी. धर्म सांभळवानी तक मळवा अने न मळवा बाबत कुमारभ्रमणनुं विवेचन केशीश्रमण १६० घोडानी परीक्षाने व्हाने राजा पएसीने पासे लई जवानो चित्तनो संकल्प कंडिका विपय १६१ चित्तसारथी पपसीने भ्रमण पासे लई गयो १६२ केशीश्रमणने जोईने राजा पपसीने धरली अरुचि १६३ चित्तसारथिए राजा पपसीने आपली केशीश्रमणनी ओळखाण १६४ भ्रमण अने राजा बच्चेनी वातचीत १६५ श्रमणनी विद्वत्ता विशे राजाप करेली पडपूछना उत्तरमां श्रमणे करेलुं पोताना ज्ञाननुं विवेचन १६६ 'जीव अने शरीर जुदां जुदां छे' एवो केशीश्रमणनो मत १६७ जीव अने शरीर जुदां जुदां होय तो मारो अधर्मी दादो श्रमणना कहेवा प्रमाणे नरके गएलो होवो जोईए अने एम होय तो ते त्यांथी मने नरकन दुःख बाबत सूचना करवा केम न आवे ? आजसुधी नथी आव्यो माटे जीव अने शरीर जुदां जुदां नथी पण एक छे १६८ भ्रमणः पपसी ! तारी पट्टराणी साधे जारकर्म करनारने तुं सखतमां सखत सजा करे अने एवी सजानो विषयानु क्रम Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विषयानु रायपसेणइय सुत्तं क्रम ॥३७॥ कंडिका विपय सूचना आपवा ते जारीने, पोताने घरे तुं थोडीवार माटे पण न जवा दे तेम नरकपालो सजा पामेला नारकीने थोडीवार माटे पण छूटो भूकता नथी माटे ज तेओ-सजा पामेला नारकीओ-अहीं आवी शकता नथी अने पम छे माटे जीव अने शरीर जुदा जुदां छे पण एक नथी. नारकी अहीं न आवी शके तेनां कारणोनी चर्चा जीव अने शरीर जुदां जुदां होय तो मारी धर्मात्मा दादी श्रमणना कहेवा प्रमाणे स्वर्गे गपली होची जोईप अने पम होय तो ते त्यांथी मने स्वर्गनां सुखो बाबत सूचना करवा केम न आवे? आजसधी नथी आवी माटे जीव अने शरीर जुदा जुदां नथी पण एक छे. देव अहीं न आवी न शके तेनां कार णोनी चर्चा १७० स्वर्गमां गपलो प्राणी स्वर्गीय भोगोनी आसक्तिने । कंडिका विषय लीधे अहीं न आवी शके माटे जीव नथी एम न कहेवाय १७२ लोढानी कुंभीमां नाखेला चोरना उदाहरणथी अजीववाद १७२ सज्जड बंध करेला घरमांथी जेम शब्द बहार आवे छे तेम सज्जड बंध करेली कुंभीमांथी जीव नीकळी शके छे १७३ मरेलो चोर कुंभीमां कृमिरूप थयो छे माटे अजीववाद १७४ तपेला लोढामां जेम अग्नी पेसे छे तेम काणां वगरनी कुंभीमां पण जीवो पेसे छे १७५ बाळ अने युवकना उदाहरणथी अजीववाद १७६-१७८ युवकना बीजा प्रकारना उदाहरण द्वारा जीववाद १७९ जीवताना अने मुपलाना वजनमा फरक नथी माटे जीव नथी १८० पवनथी भरेली कोथळीमां अने खाली कोथळीमा बज ननो फरक नथी माटे पवन नथी? lain Education For Private Personel Use Only ainelibrary.org Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तं विषयानुक्रम ॥३८॥ कंडिका विषय १८१ चोरना शरीरने चीरी चीरीने जोयां छतां जीव न भळा यो माटे जीव नथी १८२ अरणीना लाकडाने चीरी चीरी अग्निने जोनारनी पेठे पएसी राजानी मूढता १८३ तमे दक्ष थईने मारु अपमान केम करो छो? एम पपसी बोल्यो १८४ क्षत्रियर्षदा वगेरेना नियमोनुं वर्णन १८५ व्यवहारना चार प्रकार १८६ आत्माने हथेळीमा न बतावी शकाय? ए प्रश्ननो उत्तर-मूर्त वायु पण न जोई शकाय तो अमूर्त आत्मा केम जोई शकाय? १८७ हाथीना अने कंथवाना जीवनी समानता विशे प्रश्नोत्तर १८८ मारी परंपरा केम छोडं? एम पपसीनु कथन १८९ खोटी परंपरा छोडवी ज जोईप पg उदाहरण साथे समर्थन कंडिका विषय १९० पपसीनी धर्म सांभळवानी वृत्ति १९१ आचार्योना प्रकार अने तेनी सेवानी पद्धतिओ १९२-पएसीए मागेली सविनय क्षमा १९३-केशीनी धर्मदेशना १९४-१९९ जैन धर्म स्वीकार्या पछी तुं अरमणीय न थईश एम उदाहरणो साथेनु केशीनु कथन २००-२०१ पपसीप करेली पोताना धननी सुव्यवस्था अने लीधेलां व्रतोतुं पालन २०२-२०३ धर्मदृष्टिनी प्रवळताने लीधे परिग्रहादि तरफ पपसीनी अल्पवृत्ति तेथी राजाने मारवानो राणीनो संकल्प २०४ मार्यों गयेलो पएसी क्षोभ पामतो नथी अने पोताना धर्मने याद करतो मरण पामी सूर्याभ देव थयो। __ २०५-२०६ १४१ मी कंडिकामा पूछेला प्रश्ननो जवाब पूरोथयो Jain Education in tarilla For Private Personel Use Only wwwainelibrary.org Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुतं Jain Education कंडिका विषय २०७-२१५ सूर्याभ देव च्यवीने महाविदेहमां हृढप्रतिश नामे जन्म पामी निर्वाण पामशे ए हकीकत अने दृढप्रतिज्ञनुं सविस्तर जीवनचरित्र २०९ - दृढप्रतिशना जन्मसंस्कार - नामकरण - अन्नप्राशन वगेरे संस्कारो २१० -- हृढप्रतिशनी साचवणीमाटे पांच दायणो तथा आर्य अने अनार्यकुळनी दासीओ तथा अनेक कंचुकीओवर्षधरो - कृत्रिम होजडाओ tones कंडिका विपय २११ – दृढप्रतिज्ञे करेलुं बहोंतेरकळानुं प्रयोगात्मक अध्ययन २१२ - दृढप्रतिशना गुरुनुं सन्मान २१३ – प्रतिशनुं अनेक भाषाविशारदपणुं अने भोगसमर्थता २१४ - भोगो भोगववा माटे मातापिताए दृढप्रतिशने करेलु आमंत्रण २१५ – दृढप्रतिज्ञानी अनासक्तवृत्ति अने निर्वाणप्राप्ति २१६ - प्रश्नकार गौतमनो विहार २१७ - सूत्रसमाप्ति अने अंतिम मंगलमय नमस्कार विषयानु क्रम ॥३९॥ jainelibrary.org Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inthang For Private & Personel Use Only Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पाठमेद रायपसेण-1 इयं । वाचनाभेद सुधारो भने वधारो ॥४ ॥ १ पाठभेद अने २ वाचनाभेद १ ज्या ज्या टोकाकारे पाठमेद बताव्या छे त्यां त्यां बधे टिप्पणमां ए वातने नोंधी बतावी छे. २ टीकाकारे बेत्रण ठेकाणे विशेष वाचनामेदनी सूचना करो छे ते सूचना, विचारक वाचकना ध्यान उपर आवे माटे तेने मोटा जाडा अक्षरमा छापेली छे. आवा विशेष वाचनाभेद पृ० २१९ पं० १२ । पृ० २४१ पं० ११। पृ० २५९ पं०७। उपर छे. मारी समज प्रमाणे आ वाचनामेद विशेष अर्थसूचक छे तेथी आगमार्थना जिज्ञासुओ अने अनाग्रही वाचको ए बाबत जरूर विचारशे. १सुधारो अने २ वधारो १-सुधारो पृ० पं० अशुद्ध-- पृ० पं० अशुद्ध - शुद्ध टिप्पणगत वाक्य, शब्दनी साथे जोडीने पांचवू ८ १ आसित्तोसित्त आसत्तोसत्त अर्थात् 'वागव्यापारनियमेन ८ ८ आसिक्तावसिक्त आसक्तात्सक्त परिशुद्ध प्रतिभाति एम वांचq ४१ ३ सिरसा कंठे माल- सिरसाकंठेमाल १०५ १२ पानिय ४७ ५ तिर्यक तिर्यक् २१३ ८ ११३ २१३ अने आ पछीना पण ८८१३ का विकुरो- -का चिकुरा खोटा अंको सुधारीने वाचवा. ९३ ११ 'पारनियमेन' इत्यादि बारमी पंक्तिना 'वाग्व्या' । २१३ १३ [पृ० पं०] [पृ० १९ पं०८] पानीय ॥४१॥ Jain Education Lional For Private & Personel Use Only wiw.jainelibrary.org Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेन इयं । ॥४२॥ ३३४ ३३५ १३ भिथ्या ३३५ पपसि (हांसियामां) ३४१ ६ गंधव्वणकट्ट गूजराती-सार पृ० ४६ पं० १३ कागडाना बच्चा जेवा पपसि (हांसियामां) पपसी मिथ्या पपसी गंधव्वणट्ट लीला अरीठा जेवा-जुओ टीका पृ० ८४ : टिप्पण आ सिवाय बीजी पण जे काई कानो, मात्रा वा अक्षरनी अशुद्धिओ रही गई होय ते, गुणज्ञ वाचक सुधारीने वांचवा कृपा करशे. २ - वधारो पृ० पं० २४ १४ 'जोणिसुद्धो' आ गाथा जीतकल्पभाष्यमा १९९७ मी छे पृ० १७१. ३४ ६ मूळ 'आगासफालिहमपणंने बदले टीकानी बघी Jain Education intentional प्रतोमां 'आगासफालियामरणं' एवो पाठ छे. ३४ १४ 'टि' शब्द विवरण- " तटि' - विस्तारित-" औपपातिक वृत्ति पृ० २१ । ९८ ९ 'चकला' शब्दनुं विवरण - "चक्कलानि पादानामधः प्र देशाः " जीवाजीवाभिगमविवरण प्र०पू० २१० पं० ४. १९२ १२ 'पsिहत्थे' इत्यादि वचन 'अभिमानचिह्न' नामना देशी-कोशकारनुं छे एम नंदीसूत्रनो टीकामां पृ० ४६ पं० ११ मां लखेलुं छे. केटलेक स्थळे मूळ पाठ उपर अंक आप्यो छे छतां टीकामां से अंकवाळो शब्द नथी त्यां टीकाकारे ए शब्दनी व्याख्या नथी करी ए बताववा मूळपाठ उपर अंक राख्यो छे. टीकाकारे साक्षी तरीके वापरेला ग्रंथो औपपातिक सूत्र जीवाजीवाभिगममूलटीका सुधारो अने वधारो 118211 Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । संकेतो, स्पष्टीकरण ॥४३॥ 'श्लोक १संपादके उपयोगमा लीधेला ग्रंथोनी यादी अने २ संकेतोनुं स्पष्टीकरण भाष नाम संकेत पाइअलच्छीनाममाला १ औपपातिक वृत्ति औ० वृ० जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्ति अमरकोश शाताधर्मकथावृत्ति हैमशब्दानुशासन हैमश० अथवा हेम० हैमअनेकार्थकोश काशिकावृत्ति २-श्लो व्याख्याप्रज्ञप्तिमूल अने वृत्ति भरतप्रणीत नाट्यशास्त्र गा० गाथा हैमअभिधानचिन्तामणि हैमअभिधानचिन्ता लि. लिखित देशीनाममाला देशीना० देशीनाम० श्रीपुण्य० श्रीपुण्यविजयजी महाराज पासेर्नु जीवाजीवाभिगमसूत्र जीवाजीवा० व० वर्ग जीवाजीवाभिगमसूत्रविवरण जीवा० वि० राय०वि० । राजप्रश्नीयविवरण-श्री मलयगिरिजीनुं पंचकल्पभाष्य राय०विव० श्लोकवार्तिक श्लो० वा० वि० वा० विवरण बाह्य पाठ ॥४३॥ Jain Education a l For Private Personal Use Only avanelorery.org Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ For Private & Personel Use Only Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ नमो तस्स समणस्स भगवओ वद्धमाणस्स ॥ रायपसेणइयं। आचार्यश्रीमलयगिरिविहितविवरणयुतम् रायपसेणइयं। विवरणकारकल्पितः रायपसेणइयशब्दार्थः ॥१॥ 0000000 प्रणमत वीरजिनेश्वरचरणयुगं परमपाटलच्छायम् । अधरीकृतनतवासवमुकुटस्थितरत्नरुचिचक्रम् ॥ राजप्रश्नीयमहं विवृणोमि यथाऽऽगमं गुरुनियोगात् । तत्र च शक्तिमशक्तिं गुरवो जानन्ति का चिन्ता॥ अथ कस्माद् इदमुपाङ्ग राजप्रश्नीयाभिधानमिति ? उच्यते, इह प्रदेशिनामा राजा भगवतः केशिकुमारश्रमणस्य समीपे यान् जीवविषयान् प्रश्नानकार्षीत् , यानि च तस्मै केशिकुमारश्रमणो मणभृत् व्याकरणानि व्याकृतवान् , यच्च व्याकरणसम्यकपरिणतिभावतो बोधिमासाद्य मरणान्ते शुभानुशययोगतः प्रथमे सौधर्मनाम्नि नाकलोके विमानमाधिपत्येनाध्यतिष्ठत् , यथा च विमानाविपत्यप्राप्त्यनन्तरं सम्यगवधिज्ञानाभोगतः श्रीमद्धर्धमानखामिनं भगवन्तमालोक्य भक्त्यतिशयपरीतचेताः सर्वखसामग्रीसमेत Jain Educat i on For Private & Personel Use Only Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। विवरणकारदर्शितं'रायपसेणइय' सूत्रस्य उपाङ्गत्वम् ॥२॥ इहावतीर्य भगवतः पुरतो द्वात्रिंशद्विधि नाटथमनरीनृत्यत् , नर्तित्वा च यथाऽऽयुष्कं दिवि सुखमनुभूय ततश्युत्वा यत्र समागत्य मुक्तिपदमवाप्स्यति, तदेतत् सर्वमस्मिन् उपाङ्गेऽभिधेयम् , परं सकलवक्तव्यतामूलम्-'राजप्रश्नीय' इति-राजप्रश्नेषु भवं राजप्रश्नीयम् । ____ अथ कस्याङ्गस्य इदमुपाङ्गम् ? उच्यते, सूत्रकृताङ्गस्य, कथं तदुपाङ्गतेति चेत् , उच्यते, सूत्रकृते ह्यङ्गे अशीत्यधिकं शतं किया| वादिनाम् , चतुरशीतिः अक्रियावादिनाम् , सप्तषष्टिः अज्ञानिकानाम् , द्वात्रिंशत् बैनयिकानाम्-सर्वसंख्यया त्रीणि शतानि त्रिपष्टयधिकानि पाखण्डिकशतानि प्रतिक्षिप्य स्वसमयः स्थाप्यते । उक्त च नन्द्यध्ययने-"सूयगडे णं असीयस्स किरियावाइसयस्स, चतुरा| सीईए अकिरियावाईणं, सत्तट्ठीए अण्णाणियवाईणं, बत्तीसाए वेणइयवाईणं-तिहं तेसट्ठाणं पासंडियसयाणं वूह किच्चा ससमए ठाविअइ"त्ति [नन्दीसूत्र--अङ्गप्रविष्टाधिकार पृ० २१२] प्रदेशी च राजा पूर्वम्-अक्रियावादिमतभावितमना आसीत् , अक्रियावादिमतमेव चावलम्ब्य जीवविषयान् प्रश्नानकरोत् , केशिकुमारश्रमणश्च गणधारी सूत्रकृताङ्गसूचितमक्रियावादिमतप्रक्षेपमुपजीव्य व्याकरणानि व्याकार्षीत, ततो यान्येव सूत्रकृताङ्गसूचितानि केशिकुमारश्रमणेन व्याकरणानि व्याकृतानि तान्येवात्र सविस्तरमुक्तानीति सूत्रकृताङ्गगतविशेषप्रकटनाद् इदमुपाङ्गं सूत्रकृताङ्गस्येति । एतद्वक्तव्यता च भगवता वर्द्धमानखामिना गौतमाय साक्षादभिहिता, तत्र यस्यां नगर्या येन प्रक्रमेण अभ्यधीयत तदेतत् सर्वमभिधित्सुरिदमाह १ "सूत्रकृते अशीत्यधिकस्य क्रियावादिशतस्य, चतुरशीतेः अक्रियावादिनाम् , सप्तषष्टेः अज्ञानिकानाम् , द्वात्रिंशतो वैनथिकानाम्-सर्वसंख्यया प्रयाणां त्रिषष्टयधिकानां पाखण्डिशतानां ब्यूहम्-प्रतिक्षेपं कृत्वा स्वसमयः स्थाप्यते” इति नन्दीसूत्रस्य श्रीमलयगिरिकृता वृत्तिः। For Private Personel Use Only Jan Educationamenal jainelibrary.org Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इयं। 'आमलक|प्पा' वर्ण नम् ॥३॥ [१] 'ते णं काले णं ते णं समए णं आमलकप्पा नामं नयरी होत्था-रिद्ध-स्थिमिय-समिद्धा जाव [पंमुइयजण-जाणवया आइण्णजणमणूसा [१] १ते णं काले णं ते ण'इत्यादि । 'ते' इति प्राकृतशैलीवशात् 'तस्मिन्' इति द्रष्टव्यम्-अस्थायमर्थः-यस्मिन् काले भगवान वर्द्धमानस्वामी स्वयं विहरति स्म तस्मिन्निति । 'ण'इति वाक्यालङ्कारे, दृष्टश्चान्यत्रापि 'ण'शब्दो वाक्यालङ्कारार्थः-यथा-"इमा णं पुढवी" [इत्यादाविति । 'काले अधिकृतावसपिणीचतुर्थविभागरूपे,अत्रापि 'ण'शब्दो वाक्यालंकृतौ । तेणं समए ण' समयोऽवसरवाची, तथा च लोके वक्तार:-'नाद्याप्येतस्य वक्तव्यस्य समयो वर्चते-किमुक्तं भवति-नाद्याप्येतस्य वक्तव्यस्यावसरो वर्तते इति । 'तस्मिन् इति यस्मिन् समये भगवान् सूर्याभदेववक्तव्यतामचकथत् तस्मिन् समये आमलकल्पा नाम नगरी अभवत् , ननु इदानीमपि सा नगरी वर्तते ततः कथमुक्तम् 'अभवत् इति ? उच्यते, वक्ष्यमाणवर्णकग्रन्थोक्तविभूतिसमन्विता तदैवाभवत् , न तु विवक्षितोपाङ्गविधानकाले, तदपि कथमवसेयम् ? इति चेत् , उच्यते, अयं कालः अवसर्पिणी, अवसपिण्यां च प्रतिक्षणं शुभा भावा हानिमुपगच्छन्ति, एतच्च सुप्रतीतं जिनवचनवेदिनाम् अतः 'अभवत्' इत्युच्यमानं न विरोधभाक् । सम्प्रत्यस्या नगर्या वर्णकमाह-२ऋद्धा-भवनः पौरजनैश्चातीव वृद्धिमुपागता, "ऋधि वृद्धौ”[दिवादि-४३-धातुपारायण]इति वचनात् । ३स्तिमिता-स्वचक्रपरचक्रतस्करडमरादिसमुत्थभयकल्लोलमालाविवर्जिता। ४समृद्धा-धनधान्यादिविभूतियुक्ता, ततः पदत्रयस्य विशेषणसमासः। यावच्छब्देन-५प्रमुदिताः-प्रमोदवन्तः प्रमोदहेतुवस्तूनां तत्र सद्भावात् , जना-नगरीवास्तव्यलोकाः जान पदा:-जनपदभवाः तत्र प्रयोजनवशाद् आयाताः सन्तो यत्र सा प्रमुदितजन-जानपदा।६मनुष्यजनैराकीर्णा, प्राकृतत्वात् पदव्यत्ययः। Jain Education remona For Private Personel Use Only w rjainelibrary.org Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥४॥ हैलसयसहस्ससंकिट्ठविगिट्ठलट्ठपण्णत्तसेउसीमा कुक्कुडसंडेयगामपउरा उच्छु-जव-सालिकलिआ गो-1 महिस-गवे-लगप्पभूया आयारवंतचेइय-जुवइविसिट्ठसन्निविट्ठबहुला उक्कोडिय-गाय-गठिमेद-सकर-खंडरक्वरहिया "खेमा "निरुवद्दवा सुभिक्खा "वीसत्थसुहावासा अंणेगकोडिकोडुंबियाइण्णणिव्युत्तसुहा नँडनह-जल्ल-मल्ल-मुट्टिय-वेलंबग-कहग-पवग-लासग-आइक्खग-लंख-मंख|७हलानां शतैः सहस्रैश्च संकष्टा-विलिखिता विकृष्टा-नगर्या द्रवर्तिनी बहिर्वतिनीति भावः, लष्टा-मनोज्ञा प्राज्ञैः-छेकैराप्ता प्रा छेकपुरुषपरिकर्मिता इति भावः-सेतुसीमा कुल्याजलसेक्यक्षेत्रसीमा यस्याः सा हलशतसहस्रसंकृष्टविकृष्टलष्टमाशाप्तसेतुसीमा। कुक्कुटसम्पात्या ग्रामाः सर्वासु दिक्षु विदिक्षु च प्रचुरा यस्याः सा कुक्कुटसण्डेयग्रामपचुरा।९इक्षु-यव-शालिकलिता। १०गावो-पलीव : महिषा:-प्रतीताः गाव:-स्त्रीगव्यः एडका:-उरभ्राःते प्रभृता यस्यां सा तथा। ११आकारवन्ति-सुन्दराकाराणि चैत्यानि, युवतीनां चपण्यतरुणीनामिति भावः-विशिष्टानि सन्निविष्टानि-सत्रिवेशपाटका इति भावः-बहुलानि-बहूनि यस्यां सा तथा। १२उत्कोटा-लखा तया चरन्ति उत्कोटिकास्तैः गात्रभेदैः-शरीरविनाशकारिभिः ग्रन्थिभेदैः-ग्रन्थिच्छेदैः तस्करैः खण्डरक्षः-दण्डपाक्षिक रहिता, अनेच १ तत्रोपद्रवकारिणामभावमाह । १३'क्षमा अशिवाभावात् । १४निरुपद्रवा राजादिकृतोपद्रवाभावात् । १५सुभिक्षा भिक्षुकाणां भिक्षायाः सुलभत्वात् । १६विश्वस्तसुखावासा-विश्वस्तो-निर्भयः सुखमावासो लोकानां यस्यां सा तथा । १७ अनेककोटीभिः-अनेककोटिसंख्याकैः कौटुम्बिकैराकीर्णा निर्वृत्ता सन्तुष्टजनयोगात् शुभा शुभवस्तूपेतत्वात् , ततः पदत्रयस्य कर्मधारयः। १८नटा-नाटयितारः, नर्तका ये नृत्यन्ति, जल्ला:-राज्ञः स्त्रोत्रपाठकाः, मल्लाः प्रतीताः मौष्टिका-मल्ला एव ये मुष्टिभिः प्रहरन्ति, विडम्बका:-विदूषकाः, कथकाः-प्रतीताः, Jan Education in For Private Personal use only Snelibrary.org Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। तुणइल्ल-तुंबवीणिय-अणेगतालाचराणुचरिया आराम-उजाण-अगड-तलाग-दीहिय-वप्पिणगुणोववेया - विद्धबिउलगंभीरखात-फलिहा चैक-गय-मुसंढि-ओरोह-सयग्धि-जमलकवाडघणदुप्पवेसा धणुकुडिलवंकपागारपरिक्खित्ता कविसीसयवद्दरइयसंठियविरायमाणा अद्यालय-चरिय-दार-गोपुर-तोरण-उन्नय-सुविप्लवका-ये उत्प्लवन्ते नद्यादिकं वा तरन्ति, लासका:-ये रासकान् गायन्ति, जयशब्दप्रयोक्तारो वा भाण्डा इत्यर्थः, आख्यायिका:-ये | शुभाशुभमाख्यान्ति, लङ्काः-महावंशागखेलकाः, मङ्खा:-चित्रफलकहस्ता भिक्षुकाः, 'तूणइल्ल'-तूणाभिधानवाद्यविशेषवन्तः, तुम्बवी-५ ॥५॥ णिका:-तुम्बवीणावादकाः अनेके च ये तालाचराः-तालादानेन प्रेक्षाकारिणः, एतैः सर्वैरनुचरिता-आसेविता या सा तथा । १९आरामाः यत्र माधवीलतागृहादिपु दम्पत्यादीनि आगत्य रमन्ते,उद्यानानि-पुष्पादिमवृक्षसंकुलानि उत्सवादी बहुजनभोग्यानि,'अगड'त्ति-अवटाः कूपाः तडाकानि-प्रतीतानि, दीधिका:-सारिण्यः, 'वप्पिण'त्ति-केदाराः, एते गुणोपपेता-रम्यतादिगुणोपपेता यस्यां सा तथा। २० उचिद्ध-उण्डम् विउलं-विस्तीर्णम् गम्भीरम्-अलब्धमध्यम् खातम्-उपरिविस्तीर्णम् अधःसङ्कचितम् परिखा च-अध उपरि च समखातरूपा यस्यां सा तथा २१चक्राणि-प्रहरणविशेषरूपाणि, गदाः-प्रहरणविशेषाः, मुपण्ढयोऽप्येवंरूपाः, अवरोधः-प्रतोलीद्वारेवन्तः- १० प्राकारः सम्भाव्यते, शतघ्न्यो-महायष्टयो महाशिला वा याः पातिताः शतानि पुरुषाणां नन्ति, यमलानि-समस्थितद्रव्यरूपाणि यानि कपाटानि धनानि च-निश्छिद्राणि तैर्दुष्प्रवेशा या सा तथा। २२ 'धणुकुडिल' कुटिलं धनुस्ततोऽपि वक्रेण प्राकारेण परिक्षिप्ता या सा तथा। २३कपिशीर्षकैर्वृत्तरचितसंस्थितैः चर्तुलकृतसंस्थानैर्विराजमाना-शोभमाना या सा तथा। २४ अट्टालका:-प्राकारोपरिभृत्याश्रयविशेषाः चरिका अष्टहस्तप्रमाणो मार्गः द्वाराणि-भवन-देवकुलादीनाम् गोपुराणि-प्राकारद्वाराणि तोरणानि च उन्नतानि-उच्चानि यस्यां सा तथा, JainEducatiote For Private 3 Personal Use Only witjainelibrary.org Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं। भत्तरायमग्गा छेयायरियरइयदढफलिह-इंदकीला "विवणि-वणिच्छित्त-सिप्पिआइण्णनिव्वुयसुहा "सिंघाडग-तिय-चउक-चचर-पणियापणविविहवसुपरिमंडिया सुरम्मा नैरवइ-पविइण्णमहिवइपहा अणेगवरतुरगमत्तकुंजर-रहपहकर-सीय-संदमाणीआइण्णजाणजोग्गा विमउलनवनलिणसोभियजला पंडुरवरभवणपंतिसुविभक्ताः-विविक्ताः राजमार्गा यस्यां सा तथा। ततः पदद्वयस्य कर्मधारयः । २५छेकेन-निपुणेन आचार्यण-शिल्पोपाध्यायेन रचितो दृढः-बलवान् परिधः-अर्गला इन्द्रकीलश्च-संपाटितकपाटद्वयाधारभूतः प्रवेशमध्यभागो यस्यां सा तथा । २३विपणीनां-वणिक्-५ पथानां हट्टमार्गाणाम् वणिजां च क्षेत्रं-स्थानं सा विपणिवणिक्षेत्रं तथा शिल्पिभिः कुम्भकारादिभिर्निवृतैः-सुखिभिः शुभैः-स्वस्वकर्मकुशलैराकीर्णा । प्राकृतत्वाच्च सूत्रेऽन्यथा पदोपन्यासः ततः पूर्वपदेन कर्मधारयः।२७शृङ्गाटकत्रिकचतुष्कचत्वरैः पणितानि-क्रयाणकानि तत्प्रधानेषु आपणेषु यानि विविधानि वसूनि-द्रव्याणि तैश्च परिमण्डिता। शृङ्गाटकम्-त्रिकोणं स्थानम् , त्रिकम्-यत्र रथ्यात्रयं मिलति, चतुष्कम्-रथ्याचतुष्कमीलनात्मकम् , चत्वरम्-बहुरथ्यापातस्थानम् । २८सुरम्या-अतिरम्या। २९नरपतिना-राज्ञा प्रविकीर्णो-गमनागमनाभ्यां व्याप्तो महीपतिपथो-राजमार्गो यस्यां सा तथा । ३० अनेकैर्वरतुरगाणाम् , मत्तकुञ्जराणाम् , रथानां च पहकरैः-सङ्घातैः तथा शिविकाभिः स्पन्दमानीभिः यानः युग्यैश्च आकीर्णा-व्याप्ता या सा तथा । आकीर्णशब्दस्य मध्यनिपातः प्राकृतत्वात् । तत्र शिबिकाः कूटाकारेणाच्छादिता जम्पानविशेषाः,स्पन्दमानिका:-पुरुषप्रमाणा जम्पानविशेषाः,यानानि-शकटादीनि,युग्यानि-गोल्लविषयप्रसिद्धानि द्विहस्तप्रमाणानि वेदिकोपशोभितानि जम्पानान्येव । ३१विमुकुलैः-विकसितैर्नवैनलिनैः-कमलैः शोभितानि जलानि यस्यां सा तथा।। ३२ पाण्डुरवरभवनपक्तिमहिता । Jain Educatonemoga For Private & Personel Use Only Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। महिया उत्ताणयनयणपिच्छणिज्जा] पौसादीया दैरिसणिजा अभिरूवा पैडिरूवा। [२] तीसे णं आमलकप्पाए नयरीए बहिया उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए अंबसालवणे नामं चेइए होत्था- बसालवलिचिरातीते पुव्यपुरिसपण्णते पोराणे सहिए कित्तिए नाए सच्छत्ते सज्झए सघंटे सपडागे पडागाइपडागमंडिएग' चैत्यस्य सलोमहत्थे कयवेयडिए लाइयउल्लोइयमहिए गोसीससरसरत्तचंदणदद्दरदिण्णपंचंगुलितले उवचियचंदणकल से वर्गनम् ३३उत्तानकनयनप्रेक्षणीया इति मुगमम् । ३४प्रासादेषु भवा प्रासादीया-प्रासादबहुला इत्यर्थः । अत एव ३५दर्शनीया द्रष्टुं योग्या. प्रासादानामतिरमणीयत्वात् । तथा ३६अभि द्रष्ट्टन प्रति प्रत्येकमभिमुखमतीव चेतोहारित्वात् रूपम्-आकारो यस्याः सा अभिरूपा।। ७॥ एतदेव व्याचष्टे-३७प्रतिरूपा प्रतिविशिष्टम्-असाधारणम् रूपम्-आकारो यस्याः सा प्रतिरूपा॥ [२] १ तस्यां 'ण' इति पूर्ववत् । २ आमलकल्पायां नगयां ३ बहिः ४ उत्तरपौरस्त्ये-उत्तरपूर्वारूपे ईशानकोणे-इत्यर्थः-दिग्- | मागे। ५ 'अम्बसालवणे' इति आम्रः शालेश्च अतिप्रचुरतयोपलक्षितं यद् वनं तद् आम्रशालवनम् तद्योगात चैत्यमपि आम्रशालवनम् ६ चितेः-लेप्यादिचयनस्य भावः कर्म वा चैत्यम् तच्च इह संज्ञाशब्दत्वात् देवताप्रतिबिम्बे प्रसिद्धम् ततस्तदाश्रयभूतं यद् देवताया गृहं १० तदप्युपचारात् चैत्यम् तचेह व्यन्तरायतनं द्रष्टव्यम् न तु भगवतामहतामायतनम् । ७ होत्थति अभवत् । तच किंविशिष्टमित्याह चिरातीतम् पूर्वपुरुषप्रज्ञतम् पुराणम् शब्दितम् कीर्तितम् ज्ञातम् सच्छत्रम् सध्वजम् सघण्टम् सपताकम् पताकातिपताकामण्डितम् सलोमहस्तम् | कृतवितर्दिकम् +लाइय-उल्लोइय-महियं गोशीर्षसरसरक्तचन्दनदर्दरदत्तपञ्चाङ्गुलितलम् उपचितचन्दनकलशम् चन्दनघटसुकृततोरणप्रतिद्वारदेशभागम् + "लाइयं भूमेश्छगणादिना उपलेपनम् उल्लोइयं कुड्यमालानां सेटिकादिभिः संमृष्टीकरणम् ततस्ताभ्यां महितम्-पूजितम् तत् लाइय Jan Educatinta For Private Personal Use Only Jaw.jainelibrary.org Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ዘሪ Jain Education | चंदणघडसुकयतोरण पडिदुवारदेसभाए आसित्तोसित्तविलवहवग्वारियमल्लदामकलावे पंचवण्णसरससुरभि मुक्कपुप्फपुंजोवयारकलिए कालागुरु- पथरकुंदुरुक्क - तुरुक्कधूमघमघंतगंधुद्धूयाभिरामे सुगंधवरगंधगंधिए गंधवहिभूए ण्ड णहग-जल- मल्ल-मुट्ठिय-बैलंबग - पवग-कहग-लासग-आइक्खग-लंख-मंख-तृणइल- तुंबवीणियभुयग मागहपरिगए बहुजण जाणवयस्स विस्य कित्तिए बहुजणस्स आहुस्स आहुभिज्जे पाहुणिज्जे अच्चणिजे वंदणिजे नम॑सणिज्जे पूयणिजे सकारणिले सम्माणणिज्जे कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं विणएणं पज्जुवासणिज्जे दिव्वे सच्चे सच्चोवाए जागसहस्स भागपडिच्छए बहुजणो अच्चेइ आगम्म अंबसालवणचेइयं अंबसालवणचेइयं ] ८ 'चिरातीते पुराणे' यावच्छन्दकरणात् 'सद्दिए कित्तिए नाए सच्छते सज्झए' इत्यादि - औपपातिकग्रन्थप्रसिद्धवर्णकपरिग्रहः । आसिक्तावसिक्तविपुलवृत्तलम्बमानमाल्यदामकलापम् पञ्चवर्ण - सरस सुरभिमुक्तपुष्पपुञ्जोपचारकलितम् कालागुरु- प्रवरकुन्दुरुक्क - तुरुष्कधूपमघमघायमानगन्वोद्भूताभिरामम् सुगन्धवरगन्धगन्धितम् गन्धवर्तिभूतम् नट-नर्तक जल-मल - मौष्टिक - विडम्बक- प्लवक - कथक - रासक- आख्यायक-लख-मङ्ख-तूणिकतुम्बवणिक - भुजग (भुजगा भोगिनः ) मागधपरिगतम् बहुजन - जानपदस्य विश्रुतकीर्तितम् बहुजनस्य आहोतुः आहवनीयम् प्राहवनीयम् अर्चनीयम् वन्दनीयम् नमस्यनीयम् पूजनीयम् सत्कारणीयम् सम्माननीयम् कल्याणम् मङ्गलम् दैवतम् चैत्यम् (इव) विनयेन पर्युपासनीयम् दिव्यम् सत्यम् सत्योपायम् यागसहस्रभागप्रतीच्छकम् बहुजनः अर्चति आगम्य आम्रशालवनचैत्यम् आम्रशालवनचैत्यम् । १० उल्लोइय-महियं” — औपपातिकवृत्तिः * विवरणकारनिर्दिष्टः एष चैत्यवर्णकपरिग्रहः औपपातिकप्रन्थमाश्रित्य इह मूले एव संकलितः । Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण *[से' णं अंबसालवणे चेइए एगेणं महया वणसंडेणं सवओ समंता संपरिक्खित्त । से णं वणसंडे किण्हे किण्होभासे नीले नीलोभासे हरिए हरिओभासे सीए सीओभासे गिद्धे णिद्धोभासे तिन्वे तिब्बोभासे, किण्हे किण्हच्छाए नीले नीलच्छाए हरिए हरियच्छाए सीए सीअच्छाए णिद्धे णिद्धच्छाए तिव्वे तिव्वच्छाए घणकडिअकडिच्छाए रम्मे महामेहणिकुरंबभूए पासाइए दैरिसणिजे अभिरुवे पडिरूवे] । ॥९॥ एवंरूपं च चैत्यवर्णकमुक्त्वा वनखण्डवक्तव्यता वक्तव्या । सा चैवं-१ 'से गं अंबसालवणे चेइए एगेणं महया वणसंडेणं ५ सव्वओ समंता संपरिक्खित्ते, से णं वणसंडे किण्होभासे इत्यादि यावत् 'पासाइए दरिसणिज्जे अभिरूवे पडिरूवे'। तत्र २ प्रसादीयम-कृष्णावभासत्वादिना गुणेन मनःप्रसादहेतुत्वात् ३ दर्शनीयं चक्षुरानन्दहेतुत्वात् ४ अभिरूपप्रतिरूपशब्दार्थः प्राग्वत् , तत उक्तम्'जाव पडिरूवे'। *तद आम्रशालवन चित्यम् एकेन महता वनसण्डेन सर्वतः समन्तात् संपरिक्षितम् । स वनसण्डः कृष्णः कृष्णावभासः नीलः नीलावभासः हरितः हरितावभासः शीतः शीतावभासः स्निग्धः स्निग्धावभासः तीत्रः तीत्रावभासः कृष्णः कृष्णच्छायः नीलः नीलच्छायः हरितः हरितच्छायः शीतः शीतच्छायः स्निग्धः स्निग्धच्छायः तीवः तीव्रच्छायः घणकडिअकदिच्छाए रम्यः महामेघनिकुरम्बभूतः प्रतिरूपः । ४ "अन्योन्यं शाखानुप्रवेशाद् बहलनिरन्तरच्छायः"-औ० ० । Jain Education intern al For Private & Personel Use Only daw.jainelibrary.org Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय। ॥१०॥ [३] ['तस्स णवणसंडस्स बहुमज्झदेसभाए इत्थ णं भह एंगे असोगवरपायवे [पन्नत्ते दुरुग्गयकंदमूल 'असोगवरवट्ट-लट्ठसंधि-असिलिटे "घण-मसिण-सिणिद्ध-अणुपुव्विसुजाय-निरुवहत-उव्विद्ध-पवरखंघे अणेगणरप-| पायव [३] अशोकवरपादपस्य पृथिवीशिलापट्टकस्य च वक्तव्यता औपपातिकग्रन्थानुसारेण ज्ञेया+ । अस्या व्याख्या-१तस्य 'ण'इति वर्णनम् पूर्ववत् २ वनखण्डस्य ३बहुमध्यदेशभागे ४ अत्र एतस्मिन् प्रदेशे ५ महान् ६ एकः ७ अशोकवरपादपः ८ प्रज्ञप्तस्तीर्थकर-गणधरैः। स च किम्भूतः ? इत्याह-'जाव पडिरूवे' अत्र 'यावत् ' शब्देन ग्रन्थान्तरप्रसिद्ध विशेषणजातं सूचितम् । ९ दूरम् उत्-4 प्राबल्येन गतं कन्दस्याधस्तात् मूलं यस्य स दूरोद्गतकन्दमूलः तथा वृत्तभावेन परिणतः-एवं नाम सर्वासु दिक्षु विदिक्षु च शाखाभिः प्रशाखाभिश्च प्रसृतो यथा वर्तुलः प्रतिभासते इति, तथा लष्टा:-मनोज्ञाः सन्धयः-शाखागता यस्य स लष्टसन्धिः तथा अश्लिष्ट:-अन्यैः पादपैः सहासम्पृक्त:-विविक्त इत्यर्थः। ततो विशेषणसमासः स च पदद्वयमीलनेनावसेयः बहूनां पदानां विशेषणसमासानभ्युपगमात् । तथा १० घन:-निबिडः, मसृणः-कोमलत्वक न कर्कशस्पर्शः, स्निग्धः-शुभकान्तिः, आनुपूर्व्यामूलादिपरिपाटया सुष्टु जन्मदोषरहितं यथा भवति एवं जातः आनुपूर्वीसुजातः, तथा निरुपहत:-उपदेहिकाद्युपद्रवरहितः, उद्विद्धः-१० उच्चः,प्रवर:-प्रधानः स्कन्धो यस्य स घनमसृणस्निग्धानुपूर्वीसुजातनिरुपहतोद्विद्धप्रवरस्कन्धः । तथा ११ अनेकस्य नरस्य-मनुष्यस्य ये प्रवरा:-प्रलम्बा भुजाः-बाहवः तैरग्राह्यः-अपरिमेयः अनेकनरप्रवरभुजाग्राह्यः-अनेकपुरुषव्यामैरपि अप्रतिमेयस्थौल्य इत्यर्थः । तथा + सा च वक्तव्यता औपपातिकग्रन्थमाश्रित्य अत्रैव मूले संयोजिता। विवरणकारसूचित ग्रन्थान्तरप्रसिद्ध विशेषणजातम् मूलेन सह निवेशितम् । Jain Education emanal For Private & Personel Use Only w jainelibrary.org Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । वरभुयअगेज्झे, कुसुमभरसमोणमंत-पत्तल-विसाल-साले में हुकरि- भमरगण-गुमगुमाइय- गिलित- उड्तसस्सिरीए गौणासउणगणमिहुणसुमहुर- कण्णसुह-पलत्त- सद्दमहुरे कैंसविकुसविसुद्धरुक्खमूले पाँसादीए रि १३ कुसुमभरेण - पुष्पसम्भारेण सम्-ईषदवनमन्त्यः पत्रसमृद्धा: - "पत्तसमिद्धं तिक्खं च पत्तलं "[ ]इति वचनात् - विशालाः - विस्तीर्णाः शाला:- शाखा यस्य स कुसुमभरसमवनमत्पत्र लविशालशालः । तथा १४ मधुकरीणां भ्रमराणां च ये गणाः 'गुमगुमायिता' गुमगुमायन्ति स्म - कर्मकर्तृत्वात् कर्तरि 'क' प्रत्ययः - गुमगुमेति शब्दं कृतवन्तः सन्त इत्यर्थः, निलीयमानाः - आश्रयन्तः उड्डीयमानाः- तत्प्रत्यासन्नमाकाशे परिभ्रमन्तः तैः सश्रीकः मधुकरीभ्रमरगणगुमगुमायित निलीयमानोड्डीयमानसश्रीकः । तथा १५ नानाजातीयानां शकुनगणानां यानि मिथुनानि - स्त्रीपुंसयुग्मानि तेषां प्रमोदवशतो यानि परस्परसुमधुराणि अत एव कर्णसुखानि - कर्णसुखदायकानि प्रलप्तानि - भाषणानि - शकुनगणानां हि स्वेच्छया क्रीडतां प्रमोदभरवशतो यानि भाषणानि तानि 'प्रलप्तानि ' इति प्रसिद्धानि ततः 'पलत्त' इत्युक्तम्| तेषां यः शब्दो - ध्वनिः तेन मधुरः नानाशकुनगणमिथुनसुमधुर कर्ण सुखप्रलप्तशब्दमधुरः । तथा १६ कुशा-दर्भादयः त्रिकुशा- वल्वजा| दयः तैर्विशुद्ध-रहितं वृक्षस्य - सकलस्याशोकपादपस्य - इह मूल शाखादीनामपि आदिमो भागो लक्षणया प्रोच्यते यथा 'शाखामूल- १० मिदम्' 'प्रशाखा मूलमिदम्' इत्यादि ततः सकलाशोकपादपसत्कमूलप्रतिपत्तये वृक्षग्रहणम् - मूलं यस्य स कुशविकुशविशुद्धवृक्षमूलः १७ यचैवंविधः स द्रष्टृणां चित्तसन्तोषाय भवति, तत आह-प्रासादीयः - प्रसादाय - चित्तसन्तोषाय - हितः तदुत्पादकत्वात् प्रासादीयः । १८ S "पत्तसमिद्धं पत्तलं" - पाइअलच्छीनाममाला अङ्क ३४८। " पत्तल - पडुवइया पत्तिसमिद्धं चैव तिक्खम्मि" - देशीनाममाला वर्ग ६ गा० १४ । Jain Education termonal ॥ ११ ॥ jainelibrary.org Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥१२॥ सणिजे अभिरुवे पंडिरूवे] ___ [से णं असोगवरपायवे अन्नेहिं बहहिं तिलएहिं लउएहिं छत्तोवगेहिं सिरीसेहिं सत्तवण्णेहिं दधिवन्नेहिं लोदेहिं धवेहिं चंदणेहिं अज्जुणेहिं नीवहिं कयंबेहिं फणसेहिं दाडिमेहिं तालेहिं तमालेहिं पियालेहिं पियंगूहिं रायरुक्खेहिं जाव नंदिरुक्खेहि सव्वओ समंता संपरिक्खित्त । ते णं तिलगा जाव नंदिरुक्खा कुसविकुसविसु. द्वरुक्खमूला मूलमतो केंदमंतो जाव खंधिमन्तो तैयामन्तो सालमन्तो पंवालमन्तो पत्तमन्तो-पुप्फमन्तो-अत एव दर्शनीयो-द्रष्टुं योग्यः । कस्मादित्याह १९ अभिरूपः द्रष्टारं द्रष्टारं प्रति-अभिमुखं न कस्यचिद् विरागहेतू रूपम्-आकारो| यस्यासावभिरूपः एवंरूपोऽपि कुतः ? इत्याह २० प्रतिरूपः-अतिविशिष्टम् सकलजगदसाधारणं रूपं यस्य स प्रतिरूपः । १ ‘से णं असोगवरपायवे' इत्यादि 'जाव नंदिरुस्खेहि' इत्यत्र च्यावच्छब्दकरणात् २एते च तिलक-लवक-च्छत्रोपग-शिरीषसप्तपर्ण-दधिपर्ण-लुब्धक-धव-चन्दन-अर्जुन-नीप-कदम्ब-फनस-दाडिम-ताल-तमाल-प्रियाल-प्रियङ्ग-राजवृक्ष-नन्दिवृक्षाःप्रायः सुप्रसिद्धाः । ३ 'ते णं तिलगा जाव नंदिरुक्खा कुसविकुस'इत्यादि । ते तिलका यावन्नन्दिवृक्षाः कुशविकुशविशुद्धवृक्षमूलाः । अत्र व्याख्या पूर्ववत् । ४ मूलवन्तः मूलानि प्रभूतानि दूरावगाढानि च सन्त्येषामिति मूलवन्तः। ५कन्दः एषामस्तीति कन्दवन्तः । *यावच्छब्दकरणात् । अस्य व्याख्या-इह मूलानि सुप्रतीतानि यानि कन्दस्याधः प्रसरन्ति, कन्दास्तेषां मूलानामुपरिवर्तिनस्ते अपि प्रतीताः। ६खंधी-थुडम् ७त्वक्-छल्ली ८शाला:-शाखाः९प्रवाल:-पल्लवाङ्करः १०पत्रपुष्पफलबीजानि सुपसिद्धानि । सर्वत्रातिशयेन क्वचिद् * अत्र 'यावत्' शब्देन यत् सूचितम् तदत्र मूले एव स्थापितम् । Join Educatio n al For Private Personal Use Only orary.org Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसण- इयं। ॥१३॥ फलमन्तो-बीयमन्तो अणुपुव्विसुजायरुइलयभावपरिणया एंगखंधी अणेगसाहप्पसाहविडिमा अणेगनरवामसुप्पसारियअगिज्झघणविपुलवदृखंधा अच्छिद्दपत्ता अविरलपत्ता अवाईणपत्ता भूम्नि वा 'मतुप्' प्रत्ययः।१ आनुपूर्व्या-मूलादिपरिपाटथा सुष्टु जाता आनुपूर्वीसुजाताः रुचिराः-स्निग्धतया देदीप्यमानच्छविमन्तः तथा वृत्तभावेन परिणता वृत्तभावपरिणताः, किमुक्तं भवति?-एवं नाम सर्वासु दिक्षु विदिक्षु च शाखाभिः प्रशाखाभिश्च प्रसृता यथा वर्तुलाः संजाता इति, आनुपूर्वीसुजाताश्च ते रुचिराश्च आनुपूर्वीसुजातरुचिराःते च ते वृत्तभावपरिणताश्च आनुपूर्वीसुजातरुचिरवृत्तभाव-५ परिणताः ते तथा। २ तिलकादयः पादपाः प्रत्येकमेकस्कन्धाः, प्राकृते *चास्य स्त्रीत्वमिति 'एगखंधी' इति सूत्रपाठः। ३ तथा अनेकाभिः शाखाभिः प्रशाखाभिश्च मध्यभागे विटपः-विस्तारो येषां ते तथा। ४ तिर्यग् बाहुद्वयं प्रसारणप्रमाणो व्यामः-व्यामीयन्ते परिच्छिद्यन्ते रज्ज्वादि अनेनेति व्यामः-बहुलवचनात् करणे "क्वचित्" [५-१-१७१ हैमश०] इति 'ड'प्रत्ययः-अनेकनरव्यामैःपुरुषव्यामैः सुप्रसारितैरग्राह्यः अप्रमेयः घनो-निविडो विपुल:-विस्तीर्णो वृत्तस्कन्धो येषां ते अनेकनरव्यामसुप्रसारिताग्राह्यघनविपुलवृत्तस्कन्धाः। तथा ५ अच्छिद्राणि पत्राणि येषां ते अच्छिद्रपत्रा:-किमुक्तं भवति ?-न तेषां पत्रेषु वातदोषतः कालदोषतो वा १० गडरिकादिरीति+रुपजातो येन तेषु पत्रेषु छिद्राण्यभविष्यनित्यच्छिद्रपत्राः अथवा एवं नाम अन्योऽन्यं शाखाप्रशाखानुप्रवेशात् पत्राणि पत्राणामुपरि जातानि येन मनागपि अपान्तरालरूपं छिद्रं नोपलक्ष्यते इति । तथा चाह-६ 'अविरलपत्ता' इति, अत्र हेतौ प्रथमा, ततोऽयमर्थ:-यत: अविरलपत्रा अतोऽच्छिद्रपत्राः। अविरलपत्राः इत्यपि कुतः' इत्याह-७ अवातीनपत्राः वातीनानि-बातोपहतानि * अस्य 'खंध' शब्दस्य। + अतिवृष्टि-अनावृष्टिप्रमुखोपद्रवविशेषः ईतिः । Jain Educati onal | Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेग अणईइपत्ता 'निद्भूयजरढपंडुपत्ता नवहरियभिसंतपत्तभारंधयारगंभीरदरिसणिज्जा उवनिग्गयनवतरुणपत्तपल्लवकोमलउज्जलचलंतकिसलसुकुमालपवालसोभियपवरवरंकुरग्गसिहरा निचं कुसुमिया ॥१४॥ वातेन पातितानीत्यर्थः, न वातीनानि अवातीनानि पत्राणि येषां ते तथा-किमुक्तं भवति ?-न प्रबलेन खरपरुपेण वातेन तेषां पत्राणि भूमौ निपात्यन्ते, ततोऽवातीनपत्रत्वादविरलपत्रा इति अच्छिद्रपत्रा इति । १ 'अच्छिद्रपत्राः' इत्यत्र प्रथमव्याख्यानपक्षमधिकृत्य हेतुमाह-'अणईइपत्ता न विद्यते ईतिः-गड्डरिकादिरूपा येषां तानि अनीतीनि, अनीतीनि पत्राणि येषां ते अनीतिपत्राः, अनीतिपत्रत्वाच्च ५ अच्छिद्रपत्राः। २ निर्द्धतानि-अपनीतानि जरठानि पाण्डुपत्राणि येभ्यस्ते निर्धतजरठपाण्डुपत्रा:-किमुक्तं भवति ?-यानि वृक्षस्थानि जरठानि पाण्डुपत्राणि वातेन निङ्ख्य निद्धृय भूमौ पातितानि, भूमेरपि च प्रायो निर्धय निर्धूयान्यत्रापसारितानीति ।३ नवेनप्रत्यग्रेण हरितेन-नीलेन भासमानेन स्निग्धत्वेन वा दीप्यमानेन पत्रभारेण-दलसञ्चयेन यो जातोऽन्धकारस्तेन गम्भीरा:-अलब्धमध्यभागाः सन्तो दर्शनीयाः नवहरितभासमानपत्रमारान्धकारगम्भीरदर्शनीयाः तथा ४ उपविनिर्गतः निरन्तरविनिर्गतैरिति भावः, नवतरुणपत्रपल्लवैः तथा कोमलैः-मनोज्ञैः उज्ज्वलैः-शुद्धैः चलभिः-ईषत्कम्पमानैः किशलयैः-अवस्थाविशेषोपेतैः पल्लबविशेषैः तथा सुकुमारैः प्रवालैः-पल्लवाङ्करैः शोभितानि वराङ्कराणि-बराङ्करोपेतानि अग्रशिखराणि येषां ते उपविनिर्गतनवतरुणपत्रपल्लबकोमलोन्ज्वलचलत्किशलयसुकुमालप्रवालशोभितवराङ्कराग्रशिखराः। इह अङ्कर-प्रवालयोः कालकृतावस्थाविशेषाद् विशेषो भावनीयः। तथा ५ नित्यम् सर्वकालम्-पट्खपि ऋतुषु इत्यर्थः । ६ कुसुमिताः कुसुमानि-पुष्पाणि संजातान्येषामिति कुसुमिताः, तारकादिदर्शनाद 'इत'प्रस्थयः । Jain Education manal For Private Personel Use Only Hijainelibrary.org Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । 'निचं मउलिया निच्चं लवइया निच्चं श्रवइया निच्चं गुलइया "निच्चं गोच्छिया 'निच्चं जमलिया 'निच्चं जुयलिया 'निच्चं विणमिया 'निच्चं पणमिया "निच्चं सुविभत्तपडिमंजरिवर्डिसयधरा "निच्चं कुसुमियमउलिय-लवइय-थवइय-गोच्छिय- जमलिय- जुयलिय - विणमिय- पणभिय- सुविभत्तपडिमंजरिवर्डिसयधरा "सुक-वरहिण-मयणसलागा - कोइल - कोरुग-कोभव- भिंगारक - कोंडलग - जीवंजीवक - नन्दीमुख-कविल-पिङ्गलक्खग - कारंडव-चक्रबाक - कलहंस- सारस अणेगस उणगणमिहुणवियरियस होन्नइयमहुरसरणाइया १ नित्यं - सर्वकालं मुकुलितानि, मुकुलानि नाम कुद्मलानि कलिका इत्यर्थः । २ पल्लविताः । ३ नित्यं स्तवकिताः स्तबकभारवन्त इत्यर्थः । ४ नित्यं गुल्मिताः स्तबकगुल्मौ गुच्छविशेषौ । ५ नित्यं गोच्छवन्तः ६ नित्यं यमलम् - नाम - समानजातीययोयुग्मम् तत् संजातमेपामिति यमलिताः । ७ नित्यं युगलिता युगलम् - सजातीयविजातीययोर्द्वन्द्वम् तदेषां संजातमिति युगलिताः । तथा ८ नित्यं - सर्वकालं फलभरेण विनताः - ईपन्नताः, तथा ९ नित्यं महता फलभरेण प्रकर्षेणातिदूरं नताः प्रणताः । तथा १० नित्यं सर्वकालं सुविभक्त:- सुविच्छित्तिकः प्रतिविशिष्टो मञ्जरीरूपो योऽवतंसकस्तद्धरास्तद्धारिणः । एवं सर्वोऽपि कुसुमितत्वादिको धर्म एकैकस्य वृक्षस्योक्तः । साम्प्रतं केषाञ्चिद् वृक्षाणां सकलकुसुमितत्वादिधर्मप्रतिपादनार्थमाह- ११ 'निच्चं कुसुमियम उलिय' इत्यादि । किमुक्तं भवति - केचित् कुसुमिताद्येकैकगुणयुक्ताः केचिद् समस्तकुसुमितादिगुणयुक्ता इति, अत एव 'कुसुमिय-मउलिय' - इत्यादिपदेषु कर्मधारयः । तथा १२ शुक्र - बर्हिण - मदनशालिका - कोकिला - कोरक - कोभव- भिङ्गारक - कोण्डलक- जीवजीवक - नन्दीमुख- कपिल - पिङ्गलाक्ष-कारण्डव-चक्रवाक कलहंस-सारसाख्यानामनेकेषां शकुनगणानां मिथुनैः - स्त्रीपुंसयुक्तैर्यद् विचरितम् - इतस्ततो गमनम् यच्च शब्दो Jain Education emonal ॥१५॥ Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१६॥ सुरम्मा संपिंडियदरियभमर-महुयरिपहकरपरिलिंतमत्तछप्पयकुसुमासवलोलमहुरगुमगुमंतगुंजतदेसभागा अम्भितरपुप्फफला बाहिरपत्तोच्छण्णा पत्तेहि य पुप्फेहि य उच्छन्नपलिच्छिन्ना 'नीरोगका "अकंटका अतिकम् उन्नतशब्दकम् मधुरस्वरं च नादितम्-लपितं येषु ते तथा-अत एव १ सुरम्याः सुष्ठु रमणीयाः-अत्र शुकाः कीराः, बहिणो मयूराः, मदनशालिकाः शारिकाः, कोकिला:-पिकाः, चक्रवाक-कलहंस-सारसाः प्रतीताः, शेषास्तु जीवविशेषा लोकतो वेदितव्याः। तथा २ सम्पिण्डिताः-एकत्र पिण्डीभूताः दृप्ताः-मदोन्मत्तया दर्पाध्माता भ्रमरमधुकरीणां पहकराः सङ्घाता:-"पहकर-ओरोह| संघाया"[ ] इति *देशीनाममालावचनात्-यत्र ते सम्पिण्डितप्तभ्रमरमधुकरीपहकराः, तथा परिलीयमाना:-अन्यतः आगत्याश्रयन्तः मत्ताः पदपदाः कुसुमासवलोला:-किजल्कपानलम्पटाः मधुरं गुमगुमायमानाः गुञ्जन्तश्च-शब्दविशेषं च विदधाना देशभागेषु येषां ते परिलीयमानमत्तषट्पदकुसुमासवलोलमधुरगुमगुमायमानगुञ्जदेशभागाः। गमकत्वादेवमपि समासः ततो भूयः पूर्वपदेन विशेषणसमासः । तथा ३ अभ्यन्तराणि अभ्यन्तरभागवःनि पुष्पाणि च फलानि च पुष्पफलानि येषां ते तथा।४ बहिस्तः पत्रैश्छन्नाः-व्याप्ताः बहिःपत्रच्छन्नाः । तथा ५ पत्रैश्च पुष्पैश्च अवच्छन्नपरिच्छन्नाः-अत्यन्तमाच्छादिताः। तथा ६ नीरोगकाः-रोगवर्जिताः । ७ अक-१० ___* आचार्यहेमचन्द्रविरचितायां देशीनाममालायां नैतद् वचनं दृश्यते । अत एतद् वचनं संभवेत् ततोऽपि प्राचीनतरायां कस्यांचिद् देशीनाममालायाम् । धनपाल-हेमचन्द्रनिर्मितयोः पाइअलच्छी-देशीनाममालयोः 'ओरोह' शब्दो न दृश्यते समूहवाची अतः अस्मिन् वचने 'पहकरपयर-ओह-संघाया' इति पाठः साधुतरः स्यात् । “पहयरो गणो पयरो। ओहो निवहो संघो संघाओ"-पाइअल० अं०१८। "पग्गेज-पाइयरा णियरे"-दे० ना० वर्ग ६ गा० १५। Jain Education For Private Personel Use Only Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । Jain Education ॥१७॥ 'साउफला निद्धफला णाणाविहगुच्छ गुम्ममंडवगसोहिया विचित्तसुहकेउबहुला "वावि-पुक्खरिणी-दीहियासु य सुनिवेसियरम्मजालघरगा 'पिंडिमनीहारिमसुगंधिसुहसुरभिमणहरं च महया गंधद्धणि मुंचंता सुहसेउ - केउबहुला अणेगरह - सगड - जाण - जुग्ग- गिल्लि थिल्लि - सिविय संदमाणियापडिमोयणा ष्टककाः- कण्टकरहिताः, न तेषां प्रत्यासन्ना बब्बूलादिवृक्षाः सन्तीति भावः । तथा १ स्वादूनि फलानि येषां ते खादुफलाः । २ तथा स्त्रिग्धानि फलानि येषां ते स्निग्धफलाः । तथा प्रत्यासन्नैः ३ नानाविधैः - नानाप्रकारैर्गुच्छेः वृन्ताकीप्रभृतिभिः गुल्मैः नवमालिकादि ५ भिर्मण्डपकैः शोभिताः - नानाविधगुच्छगुल्ममण्डपकशोभिताः । तथा ४ विचित्रैः - नानाप्रकारैः शुभैः- मण्डनभूतैः केतुभिः - ध्वजैर्वहुलाः व्याप्ताः विचित्र शुभकेतुबहुलाः । तथा ५ वाप्यश्चतुरस्राकाराः, ता एव वृत्ताः पुष्करिण्यः, यदिवा पुष्कराणि वर्त्तन्ते यासु ताः पुष्करिण्यः, दीर्घिकाः - ऋजुसारिण्यः, वापीषु पुष्करिणीषु दीर्घिकासु च सुष्ठु निवेशितानि रम्याणि जालगृहकाणि येषु ते वापी - पुष्करिणीदीर्घिकासु सुनिवेशितरम्यजालगृहकाः । ६ तथा पिण्डिमा पिण्डिता सती निर्धारिमा दूरं विनिर्गच्छन्ती पिण्डिमनिहरिमा तां सुगन्धिम् सुगन्धिकाम् शुभसुरभिभ्यो गन्धान्तरेभ्यः सकाशात् मनोहरा शुभसुरभिमनोहरा तो च- 'महया' इति प्राकृतत्वात् द्विती यार्थे तृतीया - महतीम् - इत्यर्थः - गन्धधाणि यावद्भिर्गन्धपुद्गलैर्गन्धविपये गन्धधाणिरुपजायते तावती गन्धपुद्गलसंहतिः - उपचाराद- गन्धधाणिरित्युच्यते, तां निरन्तरं मुञ्चन्तः । तथा ७ शुभाः प्रधाना इति -सेतवः - मार्गाः आलवालपाल्यो वा केतवः-ध्वजाः बहुलाः- बहवो येषां ते तथा । ८ 'अणेगरह- सगड-जाण- जुग्ग *गिल्लि थिल्लि सिविय संदमाणियपडिमोयणा' इति, रथा द्विविधाः -- * 'गिल्लि' - "हस्तिनः उपरि कोल्लररूपा या मानुषं गिलतोय" - औ० वृ० । लोकभाषायां 'अंबाडी' इति प्रसिद्धा । विल्लि - "लाटानां यानि ational Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥१८॥ || 'पासाईया दरिसणिज्जा अभिरूवा जाव पडिरूवा । तेणं तिलगा जाव नन्दिरुक्खा अन्नाहिं बहहिं पउमलयाहिं नागलयाहिं असोगलयाहिं चंपगलयाहिं च्यलयाहिं वणलयाहिं वासंतियलयाहिं अइमुत्तयलयाहिं कुंदलयाहिं सामलयाहिंसव्वतोसमंता संपरिक्खित्ता। ताओ णं पउमलयाओ जाव सामलयाओ निचं कुसुमियाओ निचं मउलियाओ निचं लवइयाओ निच्च थवइयाओ निच्च गुच्छियाओ निच्चं गुम्मियाओ निच्चं जमलियाओ निच्च जुयलियाओ निच्चं विणमियाओ निच्चं पणमियाओ सुविभत्तपडिमंजरिवडिंसगधरीओ निच्चं कुसुमियमउलियथवइयलवइयगुम्मियजम: क्रीडारथाः संग्रामरथाश्च, शकटानि प्रतीतानि, यानानि-सामान्यतः शेषाणि वाहनानि, युग्यानि-गोल्लविषयप्रसिद्धानि द्विहस्तप्रमाणानि [चतुरस्राणि] वैदिकोपशोभितानि जम्पानानि, शिबिका:-कूटाकारणाच्छादिता जम्पानविशेषाः, स्पन्दमानिकाः-पुरुषप्रमाणजम्पानविशेषाः, अनेकेपां रथशकटादीनाम् अधोऽतिविस्तीर्णत्वात् प्रतिमोचनं येषु ते तथा। १ 'पासादीया' इत्यादिपदचतुष्टयं प्राग्वत् । 'तेणं तिलगा' इत्यादि पाठसिद्धम् । नवरम् २ 'नागलयाहिं ति नागा:-द्रुमविशेषाः ३ 'वणलयाहिं' ति बना अपि दुमवि- १० शेषाः, द्रुमाणां च लतात्वम् एकशाखाकानां द्रष्टव्यम् ये हि दुमा ऊर्ध्वगतैकशाखा न तु दिग्विदिक्झमृतबहुशाखाः ते लता इति प्रसिद्धाः । ४ एतच्च समस्तं प्राग्वद् (पृ.१५ पं० १२ अं०५) व्याख्येयं । अड्डपल्यानानि तानि अन्यविषयेषु 'थिल्लीओ' अभिधीयन्ते' औ० वृ० । थिल्लि-वे घोडानी बगी ?-थिल्लि-ठेला गाडी ? Join Education emanal Hainelibrary.org Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । लियजुयलियगुच्छियविणभियपणमियसुविभत्तपंडिमंजरिवर्डिसगधरीओ संपिंडियदरियममर - महुयरिपहकरपरिलिंतमत्तछप्पय कुसुमास वलोल महरगुमगुमेंतगुंजंतदेस भागाओ जाव पासादीयाओ दरिसणिजाओ अभि रूवाओ पडिरूवाओ । ॥१९॥ are i असगवर पायवस्स उवरिं बहवे अ अट्ठ मङ्गलगा पन्नत्ता । तं जहा- सोत्थिय- सिरिवच्छ-'न. न्दियावत्त-माणग-मैहासण- कैलस-मैच्छ-देपणा सव्वरयणामया अच्छा सैंण्हा लॅण्हा घट्टा मट्ठा णीरया ५ १ तस्य 'णं' इति प्राग्वत् । २अशोकवरपादपस्य उपरि बहूनि ४ + अष्टावष्टौ मङ्गलकानि प्रज्ञप्तानि । ५ तद् यथा - ६ स्वस्तिकः । ७ श्रीवृक्षः । ८ *नन्द्यावर्त्तः क्वचिद् - 'नन्दावत्त' - इति पाठः, तत्र 'नन्दावर्त्तः' इति शब्दसंस्कारः । ९ - वर्द्धमानक्रम् शरावसंपुटम् । १० भद्रासनम् । ११ कलशः । १२ मत्स्ययुग्मम् । १३ दर्पणः - एतानि चाष्टावपि मङ्गलकानि १४ सर्वरत्नमयानि । १५ अच्छानि -आका - शस्फटिकवदतीव स्वच्छानि । १६ श्लक्ष्णानि - श्लक्ष्णपुद्गलस्कन्धनिष्पन्नानि श्लक्ष्गनिष्पन्नपटवत् । १७ लण्हानि - मसृणानि घुण्डित - पटवत्। १८ घृष्टानीव घृष्टानि खरशाणया पाषाणप्रतिमावत् । १९ मृष्टानीव सृष्टानि सुकुमारशाणया पापाणप्रतिमेव । २० अत एव १० + " 'अष्टौ अष्टौ' इति वीप्साकरणात् प्रत्येकं ते अष्टौ इति वृद्धाः । अन्ये तु अष्टौ इति संख्या, अष्टमङ्गलकानि इति च संज्ञा " औ० वृ० ।: "श्रीवत्सः तीर्थकर हृदयावयवविशेषाकारः " - औ० वृ० । “श्रिया युक्तो वत्सो वक्षः अनेन श्रीवत्सः रोमावर्तविशेषः " - अभिधान० कां० २ श्लो० १३६ । * “ नन्यावर्तः प्रतिदिनत्रकोणः स्वस्तिकविशेषः रूढिगम्यः "- औ० वृ० । = " वर्धमानकम् शरावम्, पुरुषारूढः पुरुषः इत्यन्ये " - औ० वृ० । Jain Education territional w.jainelibrary.org Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥२०॥ 'निम्मला निप्पंका निकंकडच्छाया सप्पमा समिरीया संउज्जोया पासादीया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा। तस्स णं असोगवरपायवस्स उँवरिं बहवे "किण्हचामरज्झया"नीलचामरज्झया लोहियचामरज्झया होलिदृचामरज्झया सुकिल्लचामरज्झया अच्छा सँण्हा लण्हा रुप्पपट्टा वंदरामयदंडा जैलयामलगंधिया सेरम्मा पा. मादीया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा।। नीरजांसि-स्वाभाविकरजोरहितत्वात् । १ निर्मलानि-आगन्तुकमलाभावात् । २ निष्पानि-कलङ्कविकलानि कर्दमरहितानि वा। ३ निष्कङ्कटा-निष्कवचा-निरावरणा निरुपघातेति भावार्थः--छाया-दीप्तिर्येषां तानि निष्कङ्कटच्छायानि । ४ सप्रभाणि खरूपतः प्रभावन्ति ५ समरीचीनि बहिर्विनिर्गतकिरगजालानि । अत एव ६ सोयोतानि-बहिर्व्यवस्थितवस्तुस्तोमप्रकाशकराणि । ७ 'पासाइया' इत्यादिपदचतुष्टयव्याख्या पूर्ववत् । ८ तस्य 'ण' इति प्राग्वत् । ९ अशोकवरपादपस्य १० उपरि ११ बहवः १२ कृष्णचामरध्वजाः, चामराणि च धजाश्च चामरध्वजाः कृष्णाश्च ते चामरध्वजाश्च कृष्णचामरध्वजाः । एवं १३ नीलचामरध्वजाः, १४ लोहितचामरध्वजाः, १५ हारिद्रचामरध्वजाः, १० १६शुक्लचामरध्वजाः। एते च कथम्भृताः? इत्याह-१७ अच्छा:-स्फटिकवदतिनिर्मलाः। १८ श्लक्ष्णाः-श्लक्ष्णपुद्गलस्कन्धनिष्पन्नाः। १९ रुप्या रूप्यमयः वज्रमयस्य दण्डस्योपरि पट्टो येषां ते रूप्यपट्टाः। 'वहरदण्डा' इति २० वज्रः-वज्ररत्नमयः दण्डो रूप्यपट्टमध्यवर्ती येषां ते वज्रदण्डाः। तथा २१ जलजानामिव-जलजकुसुमानां पद्मादीनामिव अमलो गन्धो येषां ते जलजामलगन्धकाः । अत एव २२ सुरम्या:-अतिशयेन रमणीयाः। २३ 'पासाइया' इत्यादि पूर्ववत् । Jain Education emanal For Private & Personel Use Only Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । तरस णं असोगवर पायवस्स उवरिं बहवे छत्ताइच्छत्ता पेडागाइपडागा घंटाजुयला चामरजुयला उप्पलह| त्थगा पउमहत्थगा कुमुयहत्थगा नैलिणहत्थगा सुभगहत्थगा सोगंधियहत्थगा पौंडरियहत्थगा " महापोंड - रियहत्थगा सयपत्त हत्थगा सहस्सपत्तहत्थगा सव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरुवा] [४] [[सणं असोगवरपायवस्स "हेट्ठा ऐत्थ णं ऐंगे १ 'तस्स णं'इति प्राग्वत् । २अशोकवरपादपस्योपरि ३बहूनि छत्रातिच्छत्राणि छत्रात्-लोकप्रसिद्धाद् एकसंख्या काद् अतिशायीनि छत्राणि उपर्यधोभागेन द्विसंख्यानि त्रिसंख्यानि वा छत्राणि छत्रातिच्छत्राणि । तथा ४ बह्वयः पताकाभ्यो लोकप्रसिद्धाभ्योऽतिशायिन्यः पताकाः पताकातिपताकाः । ५बहूनि तेष्वेव छत्रातिच्छत्रादिषु घण्टायुगलानि । ६ चामरयुगलानि । तथा ७तत्र तत्र प्रदेशे उत्पलहस्तका:- उत्पलाख्या जलजकुसुमसंघातविशेषाः । एवं ८ पद्महस्तकाः ९ कुमुदहस्तकाः १० नलिनहस्तकाः ११ सुभगहस्तकाः १२ सौगन्धिकहस्तकाः १३ पुण्डरीकहस्तकाः १४ महापुण्डरीक हस्तकाः १५ शतपत्रहस्तकाः १६ सहस्रपत्रहस्तकाः । ७ उत्पलं-गर्दभकम्। ८ पद्मं - सूर्यविकाशि पङ्कजम् ९ कुमुदं - कैरवम् । १० नलिनम् - ईषद्रक्तं पद्मम् । ११ सुभगं - पद्मविशेषः १० १२ सौगन्धिकं - कल्हारम् १३ पुण्डरीकं श्वेताम्बुजम् १४ तदेवातिविशालं महापुण्डरीकम् १५ - १६ शतपत्र - सहस्रपत्रे पत्रसंख्याविशेषावच्छिन्नौ पद्मविशेषौ । एते च छत्रातिच्छत्रादयः सर्वेऽपि १७ सर्वरत्नमयाः - सर्वात्मना रत्नमयाः १८ 'अच्छा सहा' इत्यादि विशेपणजातं पूर्ववत् ( पृ० १९ पं० ८ अं० १५) । [४]१९तस्य 'णं’इति प्राग्वत् । २० अशोकवरपादपस्य । २१ अधस्तात् । अशोकवरपादपस्य यदधः २२ अत्र 'नं' इति पूर्ववत् । २३एको 'पुढविसि लापट्टय वर्णनम् ॥२१॥ Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । HAI | मह]पुढविसिलापट्टए। वत्तव्वया उववातियगमेणं नेया। [पंन्नते 'ईसिखंधासमल्लीणे विखंभायाम-सुप्पमाणे किण्हे अंजणग-घण-कुवलय-हलधरकोसेजसरिसे आगास-केस-कजल-ककेयण-इंदनील-अयसिकुसुमप्पगासे भिंग-अंजणभंगभेय-रिट्ठग-नीलगुलिय-गवलाइरेगे भमरनिकुरुंबभूए 'जंबूफल-असणकुसुमबंधण-नीलुप्पलपत्तनिकर-मरगय-आसासग-नयणकीय-असिवन्ने "निद्ध घेणे अज्झसिरे रूबंगपडिरूवगदरिसणिज्जे ६महान् १ पृथ्वीशिलापट्टकः २ प्रज्ञप्तः । कथम्भूतः ? इत्याह-३ इह स्कन्धः स्थुडमित्युच्यते, तस्याशोकवरपादपस्य यत् स्थुडं तत् । ईषद्-मनाक् सम्यग् लीनस्तदासन्न इत्यर्थ इति । ४ विष्कम्भेणायामेन च शोभनम्-औचित्यानतिवति प्रमाणं यस्य स विष्कम्भायामसुप्रमाणः। ५ कृष्णः । कृष्णत्वमेव निरूपयति ६ अञ्जनको-वनस्पतिविशेषः घनो-मेघः कुवलयं-नीलोत्पलम् हलधरकोशेयं-बलदेववस्त्रं तैः सदृशः-समानवर्णः। ७ आकाशं धुलीमेघादिविरहितम् केशाः-शिरसिजाः, कजलं-प्रतीतम् कर्केतनेन्द्रनीलौमणिविशेषौ, अतसीकुसुमं प्रसिद्धम् एतेषामिव प्रकाशो-दीप्तिर्यस्य स तथा । ८ भृङ्गः-चतुरिन्द्रियः पक्षिविशेषः अञ्जनं-सौवीराजनम् तस्य भनेन-विच्छिच्या भेदः-छेदोऽञ्जनभङ्गभेदः रिष्टको-रत्नविशेषः नीलगुटिका:-प्रतीताः गवलं-माहिषं शृङ्गम् तेभ्योऽपि | १० कृष्णत्वेनातिरेको यस्य स तथा । ९ अत्र भूतशब्दः औपम्यवाची-यथा अयं लाटदेशः मुरलोकभूतः-सुरलोकोपमः इत्यर्थः-ततोऽयमर्थः-भ्रमरनिकुरुम्बोपमः । १० जम्बूफलानि प्रतीतानि असनकुसुमबन्धनं-असनपुष्पवृन्तम् नीलोत्पलपत्रनिकरः मरकतमणिः प्रतीतः आसासको-बीयकाभिधानो वृक्षः, नयनकीकः नेत्रमध्यताराः, असिः-खड्गम् तेषामिव वणों यस्य स तथा। ११ स्निग्धो न तु रूक्षः । १२ घनो-निविडो न तु कोष्ठक इव मध्यशुपिरः। १३ 'अज्झुसिरे' इति श्लक्ष्णशुषिररहितः। १४ रूपकाणां यानि-तत्र Jain Educate intellig For Private Personal Use Only How.jainelibrary.org Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । 'सेअराय वर्णनम् ॥२३॥ आयंसगतलोवमे सुरम्मे सीहासणसंठिए सुरूवे मुत्ताजालखड्यंतकम्मे आइणग-रूत-चूर-नवणीय-तूलफासे | संवरयणामए अच्छे जाव पडिरूवे । ५] तित्थ णं आमलकप्पाए नयरीए सेओकराया होत्था भैहयाहिमवंत-महंतमलय-मंदर-महिंदसारे अचंतविसुद्धरायकुलवंसप्पसूए' निरंतरं रायलक्खणविराइयंगमंगे संक्रान्तानि प्रतिरूपकाणि प्रतिबिम्बानि तैः दर्शनीयो रूपकातिरूपकदर्शनीयः। १ आदर्शतलोपमः-आदर्शो-दर्पणस्तस्य तलं तेन ५ समतयोपमा यस्य स आदर्शतलोपमः । २ सुष्टु मनांसि रमयतीति सुरम्यः “कृद् बहुलम्”[ ] इति वचनात् कर्तरि 'य'प्रत्ययः। ३ सिंहासनस्येव संस्थित-संस्थानं यस्य स सिंहासनसंस्थितः । अत एव ४ सुरूपः-शोभनम् रूपम्-आकारो यस्य स सुरूपः । इतश्व सुरूपो यत आह-५ मुक्ताजालानि-मुक्ताफलसमूहाः खचितानि अन्तकर्मसु-प्रान्तप्रदेशेषु यस्य स मुक्ताजालखचितान्तकर्मा । ६ आजिनक-चर्ममयं वस्त्रम् रूत-प्रतीतम् ब्रो-वनस्पतिविशेषः नवनीतं-म्रक्षणम् तुलं-अर्कतूलम् तेषामिव कोमलतया स्पर्शो यस्य स आजिनकरूतबूरनवनीततूलस्पर्शः । ७ 'सव्वरयणामए' इत्यादिविशेषणकदम्बकं प्राग्वत् (पृ० १९५०८ अं० १४)। [५] ८तस्यां ९आमलकल्पायां नगर्या १०श्वेतो नाम राजा।११महाहिमवान् हैमवतस्य क्षेत्रस्योत्तरतः सीमाकारी वर्षधरपर्वतः,मलयःपर्वतविशेषः सुप्रतीतः, मन्दरो-मेरुः महेन्द्रः-शक्रादिको देवराजः तद्वत् सारः-प्रधानः-महाहिमवत्-महामलय-मन्दर-महेन्द्रसारः । तथा १२ अत्यन्तविशुद्ध राजकुलवंशे प्रसूतः अत्यन्तविशुद्धराजकुलवंशप्रसूतः। तथा १३निरन्तरम्-अपलक्षणव्यवधानाभावेन राजलक्षणैः * सेणिए राया भा० । सेणिओ राया पा० १-३ (३ लि० स० वि० व० १६१९) Jain Educa t ional For Private & Personel Use Only Howw.jainelibrary.org Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२४॥ बहजणबहमाणपूइए सव्वगुणसमिद्ध खत्तिए भुइए मद्धाभिसित्ते माउपिउसुजाए दयपत्ते सीमंकरे सीमंधरे "खेमंकरे "खेमंधरे "मणुस्सिदे जणवयपिया जणवयपाले राज्यसूचकैलेक्षणैर्विराजितानि अङ्गमङ्गानि-अङ्गप्रत्यङ्गानि यस्य स निरन्तरराजलक्षणविराजिताङ्गमङ्गः। तथा १बहुभिर्जनैःबहुमानेन-- अन्तरङ्गप्रीत्या पूजितो बहुजनबहुमानपूजितः । कस्मात् ? इत्याह-२सर्वैः शौर्योपशमादिभिर्गुणैः समृद्धः-स्फीतः सर्वगुणसमृद्धः ततो बहुजनबहुमानपूजितः गुणवत्सु प्रायः सर्वेषामपि बहुमानसम्भवात् । तथा ३क्षत्रस्थापत्यं क्षत्रियः "क्षत्रादियः"[६-१-९३ हैमश०] इति 'इय' प्रत्ययः, अनेन नवमाष्टमादिनन्दवत् राजकुलप्रसूतोऽपि न हीनजातीयः, किन्तु उत्तमजातीयः इत्यावेदितम् । तथा ४ मुदितः सर्वकालं हर्षवान् , प्रत्यनीकोपद्रवासम्भवात् , तदसम्भवश्च प्रत्यनीकानामेवाभावात् । तथा चाह-५ प्रायः सर्वैरपि प्रत्यन्तराजैः प्रतापमसहमानैः 'नान्यथाऽस्माकं गतिः' इति परिभाष्य मूर्धभिः-मस्तकैरभिषिक्तः-पूजितो मृर्द्धाभिषिक्तः। तथा ६ मातृपितृभ्यां सुजातो मातृपितृसुजातः, अनेन समस्तगर्भाधानप्रभृतिसम्भविदोपविकलः इत्यावेदितः। तथा ७ +दयाप्राप्तः स्वभावतः शुद्धजीवद्रव्यत्वात् । तथा ८ सेवागतानामपूर्वापूर्वनृपाणां सीमां-मर्यादां करोति यथा 'एवं वर्तितव्यमेवं न' इति सीमङ्करः । तथा ९ पूर्वपुरुषपरम्परायातां स्वदेशप्रवर्त्तमानां सीमां-मर्यादां धारयति-पालयति न तु विलुम्पतीति सीमन्धरः । तथा १० क्षेम-वशवत्तिनां उपद्रवाभावं करोति क्षेमङ्करः चौरादिसंहारात् । तथा ११ तद् धारयति आरक्षकनियोजनात् क्षेमन्धरः । अत एव १२ मनुष्येन्द्रः। तथा १३ जनपदस्य पितेव जनपदपिता । कथं पितेव ? इत्यत आह-१४जनपदपाल:-जनपदं पालयतीति जनपदपालः, ततो भवति जनपदस्य पितेव । * " 'मुइएत्ति निर्दोषमातृकः । यदाह-मुइओ जो होइ जोणिसुद्धो"-औ० वृ० । + " 'दयपत्ते'त्ति प्राप्तकरुणागुणः "-औ० वृ० । JainEducation tremitional For Private Personal Use Only jainelibrary.org Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । जणवयपुरोहिए 'सेउकरे केउकरे नरपवरे पुरिसवरे पुरिससीहे पुरिसवग्धे पुरिसआसीविसे पुरिसवर पोंडरीए पुंरिसवरगंधहत्थी अंडे दित्तं वित्तं "वित्थिन्नविपुलभवण-सयण - आसण- जाण - वाहणाहण्णे बहुधण - बहुजा यरुव- रजए ओग-पओगसंपत्ते विच्छडियपउरभत्तपाणे तथा १ जनपदस्य शान्तिकारितया पुरोहित इव जनपदपुरोहितः । तथा २ सेतुः मार्गस्तं करोतीति सेतुकरः - मार्गदेशक इति भावः ३ केतुः - चिह्नं तत् करोतीति केतुकरः- अद्भुत संविधानककारीति भावः । तथा ४ नरेषु मनुष्येषु मध्ये प्रवरो - नरप्रवरः । स ५ च सामान्यमनुष्यापेक्षयापि स्यात् अत आह-५ पुरुषेषु - पुरुषाभिमानिषु मध्ये वरः - प्रधानः उत्तमपौरुषोपेतत्वादिति पुरुषवरः । यतः ६ पुरुषः सिंह इवाप्रतिमल्लतया पुरुषसिंहः । ७ तथा पुरुषो व्याघ्र इव शूरतया पुरुषव्याघ्रः । ८ पुरुषः आशीविष इव दोषविनाशनशीलतया पुरुषाशीविषः । ९ पुरुषः वरपुण्डरीकमिवोत्तमतया भुवनसरोवरभूषकत्वात् पुरुषवरपुण्डरीकः । १० पुरुष: वरगन्धहस्तीव परान् असहमानान् प्रतीति पुरुपवरगन्धहस्ती, ततो भवति पुरुपवरः । तथा ११ आदयः - समृद्धः । १२ दीप्तः शरीरत्वचा देदीप्यमानत्वात् हसो वा सारिमानमर्दनशीलत्वात् । अत एव १३वितो - जगत्प्रतीतः । यदुक्तम् आढ्यः इति तदेव सविस्तरमुपदर्शयति- १४ विस्तीर्णानि - विस्तारवन्ति विपुलानि - प्रभूतानि भवनानि - गृहाणि शयनानि आसनानि च प्रतीतानि यानानि - रथादीनि वाहनानि| अश्वादीनि एतैराकीर्णो- व्याप्तो युक्त:- विस्तीर्णविपुलभवनशयनासनयानवाहनाकीर्णः । १५ तथा बहु धनम् बहु जातरूपं - सुवर्णम् | रजतं च-रूप्यं यस्य स बहुधन बहुजातरूप - रजतः । तथा १६ आयोगप्रयोगसम्प्रयुक्तः - आवाहनविसर्जनकुशलः । तथा १७ विच्छ Jain Education interational ॥२५॥ Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२६॥ Jain Education बहुदासी - दास- गो-महिस-गो-एलगप्पभुए 'पडिपुन्नजंत- कोस- कोट्ठागार - आउहघरे बेलवं दुब्बलपञ्चामित्ते अहयकटयं मलियकंटयं उद्भियकंटयं अप्पडिकटयं ओहयसत्तुं निहयसत्तुं मैलियस दितं तथाविधविशिष्टोपकाराकारितया विसृष्टम् उकुरुटकादिषु प्रचुरं भक्तपानं यस्मिन् राज्यमनुशासति स विच्छर्दितप्रचुर भक्तपान:अनेन पुण्याधिकतया न तस्मिन् राज्यमनुशासति दुर्भिक्षमभूदिति कथितम् । तथा १ बहूनां दासीनां दासानां गवां- बलीवर्दानां महिषाणां गवां - स्त्रीगवानां एडकानां च प्रभुः बहुदासीदास गोमहिपगवेलकप्रभुः- ततः स्वार्थिक 'क' प्रत्ययविधानात् प्रभुकः । तथा २ प्रतिपूर्णानि भृतानि यन्त्रकोशकोष्ठागाराणि - यन्त्रगृहाणि, कोशगृहाणि - भाण्डागाराणि, कोष्ठगृहाणि धान्यानां कोष्ठागाराणि गृहाणि इति भावः, आयुधगृहाणि च यस्य स प्रतिपूर्णयन्त्रकोशकोष्ठागारायुधगृहः । तथा ३ बलं शारीरिकम् मानसिकं च यस्यास्ति स बलवान् ४ दुर्बलप्रत्ययमित्रः - दुर्बलानामकारणवत्सल इति भावः । एवंभूतः सन् राज्यं प्रशासत् विहरति- अवतिष्ठते इति योगः । कथम्भूतं राज्यम् ? इत्याह-५ अपहतकण्टकम्-इह देशोपद्रवकारिणश्वराः कण्टका इव कण्टकाः ते अपहृता अवकाशानासादनेन स्थगिता यस्मिन् तत् अपहतकण्टकम् तथा ६ मलिताः - उपद्रवं कुर्वाणा मानम्लानिमापादिताः कण्टका यत्र तद् मलितकण्टकम् । तथा १० ७ उद्धृताः स्वदेशत्याजनेन जीवितत्याजनेन वा कण्टका यत्र तत् उद्धृतकण्टकम् । तथा ८ न विद्यते प्रतिमल्लः कण्टको यत्र तद् अप्रतिमल्लकण्टकम् तथा ९ प्रत्यनीकाः राजानः शत्रवः ते अपहृताः स्वावकाशमलभमानीकृता यत्र तत् अपहतशत्रु । तथा १० निहता:रणाङ्गणे पातिताः शत्रवो यत्र तद् निहतशत्रु तथा ११ मलिताः - तद्गतसैन्यत्रासापादनतो मानम्लानिमापादिताः शत्रवो यत्र तत् * - विशिष्टोपकारकारितया पा० ५ (लि० स० वि० ० १४८५) भा० । 8 भाषायाम् 'ऊकरडो' इति प्रसिद्धं मलनिक्षेपणस्थानम् । अस्य jainelibrary.org Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण-I इयं। 'धारिणी देवी वर्णनम् ॥२७॥ | उद्धियसत्तुं निजियसत्तुं पैराइयसत्तुं वैवगयदुभिक्खदोसमारि भयविप्पमुकं खेम सिर्व सुभिक्खं पसंतडिंबडमरं रज पसासेमाणे विहरह। [६][तस्स णं सेयरण्णो धारिणी|नामं] देवी होत्था सुकुमालपाणिपादा "अहीणपडिपुण्णपंचिंदियसरीरा मलितशत्रु । तथा १ स्वातन्त्र्यच्यावनेन स्वदेशच्यावनेन जीवितच्यावनेन वा उद्धृताः शत्रवो यत्र तत् उद्धृतशत्रु । एतदेव विशेषणद्वयेन व्याचष्टे-२ निर्जितशत्रु । ३ पराजितशत्रु । तथा ४ व्यपगतं दुर्भिक्षं दोषो मारिश्च यत्र तत् व्यपगतदुर्भिक्षदोषमारि तथा ५ भयेन | स्वदेशोत्थेन परचक्रकृतेन वा विप्रमुक्तम् । अत एव ६ क्षेमं-निरुपद्रवम् । ७ शिवम्-शान्तम् । ८ सुभिक्षम् शोभना-शुभा भिक्षा दर्शनिनां दीनानाथादीनां च यत्र तत् सुभिक्षम् । तथा ९ प्रशान्तानि डिम्बानि-विघ्नाः डमराणि-राजकुमारादिकृतविडवरा* यत्र तत् प्रशान्तडिम्बडमरम्। [६] १ तस्य समस्तान्तःपुरप्रधाना भार्या सकलगुणधारिणी २ धारिणीनामा ३ देवी। 'जाव समोसरणं समत्त' इति यावच्छब्दकरणाद् राजवर्णको देवीवर्णकः समवसरणं च औपपातिकानुसारेण तावद् वक्तव्यं ४ ४यावत् समवसरणं समाप्तम् । देवीवर्णके ४ सुकु. मारौ पाणी पादौ च यस्याः सा सुकुमारपाणिपादा । तथा ५ अहीनानि-अन्यूनानि स्वरूपतः प्रतिपूर्णानि लक्षणतः पञ्चापीन्द्रियाणि मूलप्रकृतिः सं० 'उत्कर' शब्दः समूहवाची । * विड्वरो वैराज्यम्-राज्यविरुद्धता । x यावत्' शब्देन यत् यत् सूचितं तत् समग्र विवरणकारकथनानुसारेण औपपातिकसूत्रपाठमनुसूत्य अत्र तत्तत्स्थाने मूले यथोचितं निक्षिप्तम् । Jain Education Internal For Private & Personel Use Only ww.jainelibrary.org Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं ।। ॥२८॥ | लक्खण-वंजण-गुणोववेया माण-उम्माण-पमाणपडिपुण्णसुजायसव्वंगसुंदरंगी ससिसोमागारकंतपियदसणा सुरूवा करयलपरिभियपसत्थतिवलिबलियमज्झा कुंडलुल्लिहियगंडलेहा कोमुइरयणियरविमलपडिपुण्णसोयस्मिन् तथाविधं शरीरं यस्याः सा अहीनप्रतिपूर्णपञ्चेन्द्रियशरीरा तथा १ लक्षणानि-स्वस्तिक-चक्रादीनि व्यञ्जनानि-मपी-तिलकादीनि गुणाः-सौभाग्यादयस्तैरुपपेता लक्षणव्यञ्जनगुणोपपेता । 'उप अप इत'इति शब्दत्रयस्थाने "पृषोदरादयः"[३-२-१५५ हैमश०] इति अपाऽकारस्य लोपे उपपेता इति द्रष्टव्यम् । तत्र २ मान-जलद्रोणप्रमाणता, कथमिति चेत् , उच्यते, जलस्यातिभृते कुण्डे पुरुषे । | स्त्रियां वा निवेशितायां यजलं निस्सरति तद्यदि द्रोणप्रमाणं भवति तदा स पुरुषः स्त्री वा मानप्राप्त उच्यते, तथा उन्मानं-अर्द्धभारप्रमाणता, साचैवम्-तुलायामारोपितः पुरुषः स्त्री वा यद्यर्द्धभारं तुलति तदा स उन्मानप्राप्तोऽभिधीयते, प्रमाण-स्वाङ्गुलेनाष्टोत्तरशतोच्तिता, ततो मानोन्मानप्रमाणः प्रतिपूर्णानि-अन्यूनानि सुजातानि-जन्मदोषरहितानि सर्वाणि अङ्गानि-शिरःप्रभृतीनि यानि तैः सुन्दराङ्गी मानोन्मानप्रमाणप्रतिपूणसुजातसर्वाङ्गसुन्दराङ्गी । तथा ३ शशिवत् सोमाकारम्-अरौद्राकारम् कान्तं-कमनीयम् प्रियं द्रष्ट्रणामानन्दोत्पादकम् दर्शन-रूपं यस्याः मा शशिसोमाकारकान्तप्रियदर्शना । अत एव ४ सुरूपा, तथा ५ करतलपरिमितो-मुष्टिग्राह्यः प्रशस्त-/२० लक्षणोपेतः त्रिवलीको-वलित्रयोपेतो रेखात्रयोपेतो बलिको-बलवान् मध्यो-मध्यभागो यस्याः सा करतलपरिमितप्रशस्तत्रिवलीकबलिकमध्या । ६ तथा कुण्डलाम्यां उल्लिखिता-घृष्टा गण्डलेखा-कपोलविरचितमृगमदादिरेखा यस्याः सा कुण्डलोल्लिखितगण्डलेखा । ७ कौमुदी-कार्तिकी पौर्णमासी तस्यां रजनिकर:-चन्द्रमाः तद्वद् विमलं-निर्मलम् प्रतिपूर्णम् अन्यूनातिरिक्तमानम् Jain Education anal For Private 8 Personal Use Only jainelibrary.org Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥२९॥ मवयणा 'सिंगारागारचारूषेसा संगयगय-हसिय-भणिय-चिट्ठिय-विलास-ललिय-संलावनिउणजुत्तोवयारकुसला सुंदर-थण-जघण-वयण-कर-चरण-नयणलायण्णविलासकलिया सेएण रण्णा सद्धिं अणुस्त्ता अविरत्ता इहे सह-फरिसे रस-रूव-गंधे पंचविहे माणुस्सए कामभोगे पचणुभवमाणा विहरह। सौम्यम्-अरौद्राकारं वदनं यस्याः सा तथा । १ शृङ्गारस्य-रसविशेषस्य अगारमिव अगारम् अथवा शृङ्गारो-मण्डनभूषणाटोपस्तत्प्रधान आकार:-आकृतिर्यस्याः सा तथा, चारुः वेषो-नेपथ्यं यस्याः सा तथा-ततः कर्मधारयः-शृङ्गाराऽगा(ऽऽका)रचारवेषा। तथा २ सङ्गता ये गत-इसित-भणित-चेष्टित-विलासाः यश्च निपुणो युक्तश्च स्वजन-परजनान् प्रति उपचारः तेषु कुशला संगतगतहसितमणितचेष्टितविलास-ललितसंलापनिपुणयुक्तोपचारकुशला, तत्र सङ्गतं नासङ्गतम् गतं यद् गुप्ततया गृहस्यैवान्तर्गमनं न.तु बहिः स्वेच्छाचारितया, सङ्गतं हसितं यत कपोलविकाशमात्रसूचितं न त्वदृट्टहासादि । "हसियं कपोलकहिय" [ ] इति। वचनात् । सङ्गतं भणितं यत् समागते प्रयोजने नर्मभणितिपरिहारेण विवक्षितार्थमात्रप्रतिपादनम् , सङ्गतं चेष्टितं यद् कुचजघनाद्यवयवाच्छादनपस्तयोपवेशनशयनोत्थानादि, सङ्गतो विलास:-स्वकुलौचित्येन शृङ्गारादिकरणम् । तथा ३ सुन्दरैः स्तन-जघन-चदनकर-चरण-नयनलावण्यविलासैः कलिता, अब विलासः-स्थानासनगमनादिरूपश्चेष्टाविशेषः। उक्तं च-"स्थानासनगमनानां हस्त___* श्वेतेन राज्ञा सार्धम् अनुरका अविरक्ता इष्टान् शब्द-स्पर्शान् रस-रूप-गन्धान् पञ्चविधान् +मानुषकान् कामभोगान् प्रत्यनुभवन्ती विहरति । ललितसंलापः प्रतीतः अत एव विवरणकारेण न व्याख्यातः। * विवरणकारकथनानुसारेण 'श्वेतेन' इति । +मनुष्यभोग्यान् । श्रोत्र-नेत्रगम्यो कामौ-शब्दः रूपं च। प्राण-रसन-स्पर्शनमम्या भोगाः आन्धः, स्वादः स्पर्शश्च । Pol Jain Education demon For Private Personal use only tainelibrary.org Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेग इयं। महावीरः समागतः ॥३०॥ [७] सामी समोसढे [ते णं काले णं ते णं समए णं समणे भगवं महावीरे आइगरे तित्थगरे सहसंबुद्धे पुरिमुत्तमे पुरिससीहे पुरिसवरपुंडरीए पुरिसवरगंधहत्थी अभयदए चक्खुदए मग्गदए सरणदए जीबदए दीवो | ताणं सरणं गई पइट्ठा धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टी अप्पडिहयवरनाणदसणधरे वियदृछउमे जिणे जावए तिण्णे तारए मुत्ते मोयए बुद्ध बोहए सव्वण्णू सव्वदरिसी सिवं अयलं अरुयं अणंतं अक्खयं अव्वाबाहं अपुणरावत्तिअं सिद्धिगइणामधेज्ज ठाणं संपाविउकामे अरहा जिणे केवली। भ्रनेत्रकर्मणां चैव । उत्पद्यते विशेषो यः लिष्टोऽसौ विलासः स्यात्" ॥[ ]। अन्ये त्वाहुः-"विलासो नेत्रजो विकारः" [ ]] तथा चोक्तम्-"हावो मुखविकारः स्यात् भावश्चित्तसमुद्भवः । विलासो नेत्रजो ज्ञेयो विभ्रमो भ्रूसमुद्भवः" ॥[ ] [७] समस्तोऽपि औपपातिकग्रन्थप्रसिद्धो भगवद्वर्णको वाच्यः, स चातिगरीयानिति न लिख्यते, केवलमौपपातिकग्रन्थादवसेयः । स्वामी समवसृतः-तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणः भगवान् महावीरः आदिकरः तीर्थकरः सहसंबुद्धः पुरुषोत्तमः पुरुषसिंहः पुरुषवरपुण्डरोकः पुरुषवरगन्धहस्ती अभयदयः चक्षुर्दयः मार्गदयः शरणदयः जीवदयः द्वीपः त्राणम् शरणम् गतिः प्रतिष्ठा धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्ती अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनधरः व्यावृत्तच्छमा जिनः जापकः तीर्णः तारकः मुक्तः मोचकः बुद्धः बोधकः सर्वज्ञः सर्वदर्शी शिवम् अचलम् अरुजम् अनन्तम् अक्षतम् * विवरणकारसूचनानुसारेण समस्तोऽपि भगवद्वर्णकः औपपातिकप्रन्थाद् अत्र मूले उद्धृतः । Jain Education lemonal For Private Personel Use Only wwrainelibrary.org Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। महावीर शरीर वर्णनम् ॥३१॥ [८] सत्तहत्थुस्सेहे समचउरंससंठाणसंठिए बजरिसहनारायसंघयणे अणुलोमवाउवेगे कंकग्गहणी कवोयपरिणामे सउणिपोसपिटुंतरोरुपरिणए पउमुप्पलगंधसरिसनिस्साससुरभिवयणे छवी निरायंकउत्तमपसत्थअ-| इसेयनिरुवमपले जल्लमल्लकलंकसेयरयदोसवजियसरीरनिरुवलेवे छायाउज्जोइयंगमंगे घणनिचियसुबद्धलक्खणुपणयकूडागारनिभपिडियग्गसिरए सामलिबोंडघणनिचियप्फोडियमिउविसयपसत्थसुहमलक्खणसुगंधसुंदरभुयमोयगभिंगनेलकजलपहभमरगणनिद्धनिकुरंबनिचियकुंचियपयाहिणावत्तमुद्धसिरए दालिमपुप्फप्पगासतवणिज्जसरिसनिम्मलसुणिद्धकेसंतकेसभूमी छत्तागारुत्तिमंगदेसे णिवणसमलहमहचंदद्धसमणिडाले उडुवइपडिपुण्णसोमवयणे अल्लीणपमाणजुत्तसवणे सुस्सवणे पीणमंसलकवोलदेसभाए आणामियचावरुइलकिण्हब्भअव्याबाधम् अपुनरावृत्तिकम् सिद्धिगतिनामधेयं स्थानं संप्राप्तुकामः अर्हन् जिनः केवली । ___8सप्तहस्तोत्सेधः समचतुरस्रसंस्थानसंस्थितः वज्रऋषभनाराचसंहननः अनुलोमवायुवेगः =कग्रहणिः ४कपोतपरिणामः । शकुनिपोस-पृष्ठान्तरोरुपरिणतः पनोत्पलगन्धसदृशनिःश्वाससुरभिवदनः छविमान् निरातङ्कउत्तमप्रशस्तअतिश्वेतनिरुपमपल: * जल्ल-मल्लकलङ्कस्वेदरजोदोषवजितशरीरनिरुपलेपः |१० छायोयोतिताङ्गाङ्गः धननिचितसुबद्धलक्षणोन्नतकूटाकारनिभपिण्डिताप्रशिरस्कः शाल्मलिबोण्ड० घननिचितस्फोटितमृदुविशदप्रशस्तसूक्ष्मलक्षणसुगन्धसुन्दरभुजमोचक-भृङ्ग-नैल-कजल-प्रहृष्टभ्रमरगणस्निग्धनिकुरम्बनिचितकुञ्चितप्रदक्षिणावर्त्तमूर्धशिरोजः दाडिमपुष्पप्रकाशतपनीयसदृशनिर्मलमुस्निग्धकेशान्तकेशभूमिः छत्राकारोत्तमाङ्गदेशः निर्बणसमलष्टमृष्टचन्द्रार्धसमललाटः उडुपतिप्रतिपूर्णसोमवदनः आलीनप्रमाणयुक्तश्रवणः सुश्रवणः पीनमांसलकपोलदेशभागः = कङ्कपक्षिवद् ग्रहणी गुदाशयो यस्य । x कपोतस्य जठराग्निः पाषाणलवानपि जरयति इति श्रुतिः । ॐ पोस' अपानदेशः-यस्य अपानदेशः शकुनेरिव निर्लेपः । - याति च लगति च जल्लः, स्वल्पप्रयत्नापनेयो मल्लो-मलः । ० बोंडं च फलम् । Jain Educationteational wilv.jainelibrary.org Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेन इयं । ॥३२॥ Jain Education l राइतणुक सिणणिद्धभमुद्दे अबदालियपुंडरीयणपणे कोपासियधवलपत्तलच्छे गुरुलायय उज्जुतुंगणासे उवचिसिलवालबिंब फलसण्णिभाहरोहे पंडुरससिसयलविमलणिम्मलसंखगोक्खीरफेणकुंदद गरयमुणालियाधव| लवंतसेढी अखंडते अप्फुडियदंते अविरलदंते सुणिद्धवंते सुजायदंते एगवंतसेवी विव अणेगदंते हुयचहणिदंतधोयतत्ततवणिज्जर ततलतालुजीहे अवद्वियसुविभत्तचित्तमं मंसलसंठियपसत्थसद्दूलविउलहणुए चउरंगुलसुप्पमाणकंबुबरस रिसग्गीवे वरमहिसवराहसीहसद्द लउस भनागवरपडिपुण्णविउलक्खंधे जुगसन्निभपीणर- ५ इयपीवर पउद्वसुसंठियसुसिलिट्ठविसिद्वघणधिरसुबद्धसंधिपुरवरफलिहवहियभुए भुयगीसरविउल भोग आयाणपलिहउच्छूढदीहबाह रत्ततलोवइयमउयमंसलजायलक्खणपसत्थअच्छिद्दजालपाणी पीवरको मलवरंगुली आयंय| संवतलिणसुइरुइलणिद्धनखे चंदपाणिलेहे संखपाणिलेहे चक्कपाणिलेहे दिसासोत्थियपाणिलेहे चंद-सूर-संखआनामितचापरुचिरकृष्णाभ्रराजितनुकृष्णस्निग्धनः अवदारितपुण्डरीकनयनः विकसितधबलपत्रलाक्षः गरुडायतऋजुतुङ्गनासः उपचितशिलाप्रवालविम्बफल - निभाधरोष्ठः पाण्डुरशशि सकलविमलनिर्मलशङ्ख गोक्षीरफेनकुन्ददकरजोमृणालिकाधत्रलदन्तश्रेणिः अखण्डदन्तः अस्फुटितदन्तः अविरलदन्तः सुस्निग्धदन्तः १० सुजातदन्तः एकदन्तश्रेणिः इव अनेकदन्तः हुतवहनिर्मातधौततप्ततपनीयरक्ततरतालुजिह्नः अवस्थितसुविभक्तचित्रमश्रुः मांसलसंस्थितप्रशस्तशार्दूलविपुलहनुकः चतुरङ्गुलसुप्रमाणकम्बुवर सदृशग्रीवः वरमहिषवराईसिहशार्दूलवृषभनागवरप्रतिपूर्णविपुलस्कन्धः युगसन्निभपीनरतिदपीचरप्रकोष्ठ सुसंस्थितसुश्लिष्टविशिष्टघनस्थिर सुद्ध संधिपुरवरपरिघवर्तितभुजः भुजगेश्वरविपुलभोगआदानपरिघउत्क्षिप्तदीर्घबाहुः रक्तत छोपचितमृदुकम सलजातलक्षणप्रशस्त अच्छिद्रजालपाणि: पीवरकोमलवराङ्गुलिः आताम्रताम्र तलिनशुचिरुचिरस्निग्धनखः चन्द्रपाणिलेखः शङ्खपाणिलेखः चक्रपाणिलेखः दिशास्वस्तिक पाणिलेखः चन्द्र-सूर्य-शङ्ख-चक्रx तलिनं सूक्ष्मम् । Jainelibrary.org Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥३३॥ |चक्क-दिसासोत्थियपाणिलेहे कणगसिलायलुज्जलपसत्थसमतलउवचियवित्थिण्णपिहुलवच्छे सिरिवच्छंकियव च्छे अकरंडुयकणगरुययनिम्मलसुजायनिरुवहयदेहधारी संनयपासे संगतपासे सुंदरपासे सुजायपासे मियमाइयपीणरइयपासे उज्जुयसमसहियजच्चतणुकसिणणिआइजलडहरमणिजरोमराई झसविहगसुजायपीणकुच्छी झसोयरे सुइकरणे पउमवियडणाभे गंगावत्तगपयाहिणावत्ततरंगभंगुररविकिरणतरुणयोहियअकोसायंतपउमगंभीरवियडणाभे साहयसोणंदमुसलदप्पणणिगरियवरकणगच्छरुसरिसवरवहरवलियमज्झे पमुइयवरतुरगसीहवरवट्टियकडी वरतुरगसुजायगुज्झदेसे आइण्णहउ व्व णिरुवलेवे वरवारणतुल्लविक्कमविलसियगई गयससणसुजायसन्निभोरू समुग्गनिमग्गगूढजाणू एणीकुरुविंदावत्तवाणुपुव्वजंघे संठियसुसिलिट्ठगूढगुप्फे सुप्पइट्टियदिशास्वस्तिकपाणिलेखः कनकशिलातलोज्ज्वलप्रशस्तसमतलउपचितविस्तीर्णपृथुलवक्षाः श्रीवत्साङ्कितवक्षाः +अकरण्डुककनका रुचकनिर्मलसुजातनिरुपहतदेहधारी संनतपार्श्वः संगतपाश्वः सुन्दरपावः सुजातपार्श्वः =मितमात्रिकपीनरचितपावः ऋजुकसमसहितजात्यतनुकृष्णस्निग्धआदेयलडहरमणीयरोमराजिः झषविहगसुजातपीनकुक्षिः झषोदरः शुचिकरणः पद्मविकटनाभः गङ्गावर्तकप्रदक्षिणावर्ततरङ्गभङ्गुररविकिरणतरुणबोधितविकासमानपद्मगम्भीरविकटनाभः | संहतसोणंदOमुसलदर्पण-निगरियवरकनकत्सरुसदृशवरवद्ध्वलितमध्यः प्रमुदितवरतुरगसिंहवरवर्तितकटिः वरतुरगसुजातगुह्यदेशः आजन्यहय इव निरुपलेपः वरवारणतुल्यविक्रमविलसितगतिः गजश्वसनसुजातसंनिभोरुः समुद्गनिमग्नगूढजानुः एणीकुरुविन्दावर्तवृत्तानुपूर्वजाः संस्थित सुश्लिष्टगूढगुल्फः सुप्रति+ अकरण्डकम्-मांसलतया अनुपलक्ष्यमाणपृष्ठवंशास्थिकम् । * रुचकः रुचिः । = मितमात्रिको उचितपरिमाणयुक्ती । ४ लडहं लावण्ययुक्तम् । ० सोणंद त्रिकाष्टिका इत्याकारो घटाधारः । * निगरियं सारीकृतम्। Jan Educati onal For Private Personal use only Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राय पसेण इयं । ॥३४॥ | कुम्मचारुचलणे अणुपुव्वसुसंहयंगुलीए उण्णयतणुतंवणिणक्खे रतुप्पलपत्तमउयसुकुमालकोमलतले नगन- महावीरगुण | गरमगरसागर चक्कं कवरंगमंगलंकियचलणे विसिहरूवे हुयवहनिद्धमजलियतडितडियतरुणरविकिरणसरिसतेए अट्ठसहस्सवर पुरिस लक्खणधरे । वर्णनम् [९] * अणासवे अममे अकिंचणे छिन्नसोए निरुवलेवे ववगयपेमरागदोसमोहे निग्गंथस्स पवयणस्स देसए सत्थनायगे पइट्टावए समणगणवई समणगविंदपरिअहए चंउत्तीसबुद्धवयणाइसेससंपत्ते पणतीससञ्चवयणाति सेस ५ संपत्ते आगासगएणं चक्केणं आगासगएणं छत्तेण आगासियाहि चामराहिं आगासफालिहमएणं सपायपीढेणं [९] १ चतुस्त्रिंशद् बुद्धानाम् - भगवतामर्हतां वचनप्रमुखाः “सर्वस्वभाषानुगतं वचनं धर्मावबोधकरम् " [ ] इत्यादिना उक्तस्वरूपा ये अतिशेषा - अतिशयाः तान् प्राप्तः - चतुस्त्रिंशद्बुद्धवचनातिशेषसम्प्राप्तः । इह वचनातिशेषस्योपादानमत्यन्तोपकारितया प्राधान्यष्ठितकूर्मचारुचरणः अनुपूर्वसुसंहताङ्गुलिकः उन्नततनुताम्रस्निग्धनखः रक्तोत्पलपत्रमृदुकसुकुमालकोमलतलः नगनगरमकरसागरचक्राङ्कवराङ्गमङ्गलाङ्कितचरणः विशिष्टरूपः हुतत्रहनिर्धूमज्वलित 8 तटितडित् तरुणरविकिरणसदृशतेजाः अष्टसहस्रवरपुरुषलक्षणधरः । *अनाव: अममः अकिञ्चनः छिन्नस्रोताः निरुपलेपः व्यपगतप्रेमरागद्वेषमोहः निर्ग्रन्थस्य प्रवचनस्य देशकः शास्तृनायकः प्रतिष्ठापकः श्रमणगणपतिः श्रमणकवृन्दपरिवर्तकः चतुस्त्रिंशदबुद्धवचनातिशेषसंप्राप्तः पञ्चत्रिंशत्सत्यवचनातिशेषसंप्राप्तः आकाशगतेन चक्रेण आकाशगतेन छत्रेण x अयं च समस्तोऽपि शरीरवर्णकः प्रश्नव्याकरणसूत्रे देवकुरु - उत्तरकुरुनिवासिनां शरीरवर्णके प्रायोऽक्षरशः समुपलभ्यते । 8 पतन्त्या विद्युतः 'तङ् त ' इति जायमानस्य ध्वनेः अनुकरणम् 'तटि' इति । Jain Education intentional Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥३५॥ ख्यापनार्थम्, अन्यथा देहवैमल्यादयस्ते पठयन्ते। तथा च-"*देहं विमलसुगन्धं आमयपस्सेयवज्जियं अरयं । रुहिरं गोक्खीराभं निविस्सं पंडुरं मंस"॥ [ ] इत्यादि । २ पञ्चत्रिंशत् ये सत्यवचनस्यातिशेषा-'अतिशयास्तान् सम्पाप्तः पञ्चत्रिंशद्वचनातिशेषसम्प्राप्तः। ते चामी सत्य+वचनातिशेषाः-' संस्कारवत्त्वम् ' उदात्तत्वम् उपचारोपेतत्वम् गम्भीरशब्दत्वम् ' अनुनादित्वम् 'दक्षिणत्वम् " उपनीतरागत्वम् “ महार्थत्वम् ' अव्याहतपौर्वापर्यत्वम् ' शिष्टत्वम् " असन्दिग्धत्वम् " अपहतान्योत्तरत्वम् " हृदयग्राहित्वम् " देशकालाव्यतीतत्वम् " तत्वानुरूपत्वम् " अप्रकीर्णप्रसृतत्वम् "अन्योऽन्यप्रगृहीतत्वम् “ अभिजातत्वम् "अतिस्निग्धमधुरत्वम् “ अपरमर्मवेधित्वम् " अर्थधर्माभ्यासानपेतत्वम् २ उदारत्वम् २१ परनिन्दात्मोत्कर्षविप्रमुक्तत्वम् । उपगतश्लाघत्वम् २७ अपनीतत्वम् “ उत्पादिताविच्छिन्नकौतूहलत्वम् " अद्भुतत्वम् २८ अनतिविलम्बित्वम् " विभ्रमविक्षेपकिलिकिञ्चितादिवियुक्तत्वम् अनेकजातिसंश्रयाद् विचित्रत्वम् - आहितविशेषत्वम् “ साकारत्वम् सत्वपरिगृहीतत्वम् * अपरिखेदितत्वम् | ॐ अव्युच्छेदितत्वं चेति । तत्र 'संस्कारवत्वं संस्कृतादिलक्षणयुक्तत्वम् उदात्तत्वं उच्चैवृत्तिता उपचारोपेतत्वम्-अग्राम्यता गम्भीरशब्दत्वं मेघस्येव "अनुनादिता प्रतिरवोपेतत्वम् 'दक्षिणत्वं सरलता उपनीतरागत्वं-उत्पादिता श्रोत्जने स्वविषयबहुमानता । एते सप्त शब्दापेक्षा अतिशयाः । अत ऊर्ध्व तु अर्थाश्रयाः-तत्र महार्थत्वं-परिपुष्टार्थाभिधायिता 'अव्याहतपौर्वापर्यत्वं-पूर्वापरवाक्याविरोधः "शिष्टत्वं * देहो विमलसुगन्धः आमय-प्रस्वेदवर्जितः अरजाः । रुधिरं गोक्षीराभम् निर्वित्रं पाण्डुरं मांसम् ॥ + "सत्यवचनातिशया आगमे न दृष्टाः । एते तु ग्रन्थान्तरदृष्टाः संभाविताः "-समवायाङ्गसूत्रटीकायां श्रीअभयदेवसूरयः पृ० ६३ । Jain Educati o nal For Private Personal use only Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥३६॥ वक्तुः शिष्टत्वसूचनात् असन्दिग्धत्वं परिस्फुटार्थप्रतिपादनात् "अपहतान्योत्तरत्वं-परदृषणाविषयता "हृदयग्राहित्वं-दुर्गमस्याप्यर्थस्य परहृदये प्रवेशकरणम् "देशकालाव्यतीतत्वं प्रस्तावोचितता "तत्वानुरूपत्वं-विवक्षितवस्तुस्वरूपानुसारिता "अप्रकीर्णप्रसृतत्वं-संबन्धाधिकारपरिमितता "अन्योऽन्यप्रगृहीतत्वं-पदानां वाक्यानां वा परस्परसापेक्षता "अभिजातत्वं-यथाविवक्षितार्थाभिधानशीलता "अतिस्निग्धमधुरत्वं-बुभुक्षितस्य घृतगुडादिवत् परमसुखकारिता " अपरनर्मवेधित्वं-परमर्मानुट्टिनशीलता " अर्थधर्माभ्यासानपेतत्वं-अर्थधर्मप्रतिबद्धता उदारत्वं-अतिविशिष्टगुम्फगुणयुक्तता अतुच्छाथप्रतिपादकता वा परनिन्दा-५ त्मोत्कर्षविप्रमुक्तत्वं प्रतीतम् ४ उपगतश्लाघत्वं-उक्तगुणयोगतः प्राप्तश्लाघता" अपनीतत्वं-कारककालवचनलिङ्गादिव्यत्ययरूपवचनदोषापेतता उत्पादिताविच्छिन्नकुतूहलत्वं-श्रोतृणां स्वविषये उत्पादितं-जनितमविच्छिन्नं कौतूहलं-कौतुकं येन तत तथा तद्भावस्तत्वम् श्रोतृषु स्वविषयाद्भुतविस्मयकारितेति भावः " अद्भुतत्वम् “ अनतिविलम्बित्वम् च प्रतीतम् विभ्रमविक्षेपकिलिकिञ्चितादिवियुक्तत्वमिति-विभ्रमो-वक्तुन्तिमनस्कता विक्षेपो-वक्तुरेवाभिधेयार्थ प्रत्यनासक्तता किलिकिश्चितं-रोषभयलोभादिभावानां युगपदसकृत्करणं आदिशब्दाद् मनोदोषान्तरपरिग्रहः तैर्वियुक्तं यत् तत् तथा तद्भावस्तत्त्वम् अनेकजातिसंश्रयाद् विचित्रत्वंसर्वभाषानुयायितया चित्ररूपता आहितविशेषत्वं-शेषपुरुषवचनापेक्षया शिष्येषत्पादितमतिविशेषता साकारत्वं-विच्छिन्नपदवाक्यता सवपरिगृहीतत्वम्-ओजस्विता *अपरिखेदित्वम्-अनायाससंभवात् अव्युच्छेदितत्व-विवक्षितार्थसम्यसिद्धिं यावद् अविच्छिन्नवचनप्रमेयता इति । ३ आकाशस्फटिक-यद् आकाशवत अतिस्वच्छं स्फटिकं तन्मयेन। Jain Education lemn For Private & Personel Use Only Aaw.jainelibrary.org Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । | सीहासणेणं पुरतो धम्मज्झएणं पगढिज्ज माणेणं चउद्दसहि समणसाहस्सीहिं छत्तीसाए अज्जियासाहस्सीहिं सद्धि | संपरिवुडे पुत्र्वाणुपुवि चरमाणे गामाणुगामं देइज्ज़माणे सुहंसुहेणं विहरमाणे जेणेव आमलकप्पा नयरी 'जे|णेव वणसंडे ० जेणेव असोगवरपायवे. जेणेव पुढविसिलापहए "तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता अंहापडिरूवं १ धर्मचक्रवर्तित्वसूचकेन केतुना महेन्द्रध्वजेनेत्यर्थः तथा २ पूर्वानुपूर्व्या क्रमेणेत्यर्थः ३ चरन् सञ्चरन्, एतदेवाह ४ ग्रामश्च अनुग्रामश्च - विवक्षितग्रामादनन्तरं ग्रामो ग्रामानुग्रामः तम् ५ द्रवन्- गच्छन् एकस्मादनन्तरं ग्राममनुल्लङ्घयन् इत्यर्थः - अनेनाप्रतिबद्धविहा रिता ख्यापिता । तत्राप्यौत्सुक्याभावमाह-६ सुखसुखेन - शरीरखेदाभावेन संयमाचाध्यविहारेण * च= ७ ग्रामादिषु विहरन् - अवतिष्ठमानः ८ + 'जेणेव ' यस्मिन्नेव देशे आमलकल्पा नगरी ९ यस्मिन्नेव प्रदेशे च वनखण्डः १० यस्मिन्नेत्र देशे सोऽनन्तरोक्तस्वरूपः शिलापट्टकः । ११ तस्मिन्नेव देशे उपागच्छति, १२ उपागत्य च १३ यथाप्रतिरूपं यथोचितं मुनिजनस्य आकाशिकाभिः चामराभिः आकाशस्फाटिकमयेन सपादपीठेन : सिंहासनेन पुरतः धर्मध्वजेन प्रकृष्यमाणेन चतुर्दशभिः श्रमणसहस्रैः षटूत्रिंशद्भिः आर्थिक सहस्रैः सार्धं संपरिवृतः पूर्वानुपूर्व चरन् ग्रामानुग्रामं द्रवन् सुखसुखेन विहरन् येनैव *आमलकल्पा नगरी येनैव वनखण्डः येनैव अशो- १० ० यस्मिन्नेव अशोकवरपादपः । संयमः अबाध्यः यस्मिन् विहारे- विचरणे तेन संयमाबाध्यविहरेण पा०४ । संयमबाधाविरहेण - भा०२ । = वा-पा० ४ । + 'जेणेत्र' इति "प्राकृतत्वात् सप्तम्यर्थे तृतीया" विवरणकारः । यथा वा संस्कृतभाषायां ' पूर्वेण' इति 'एन' प्रत्ययान्तं सविभक्तिकप्रतिरूपकमयं ' पूर्वस्मिन्' अर्थे प्रयुज्यते तथा 'येन- जेण' इति अव्ययं ' यस्मिन्' अर्थे प्राकृते व्यवह्रियमाणं बोध्यम् । तथैव 'तैण' इत्यस्यापि निष्पत्तिर्ज्ञेया । * विवरणकारकथनानुसारेण 'आमलकल्पा' इति । Jain Education Intmational ॥३७॥ ww.jainelibrary.org Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥३८॥ उग्गहं उग्गिण्हइ उग्गिण्हित्ता असोगवरपायवस्स अहे पुंडविसिलापगंसि पुरत्याभिमुहे संपलिअंकनिसन्ने पनिमः 'संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति] [१०] परिसा निग्गया जाव राया पज्जुवासइतिए णं आमलकप्पानयरीए सिंघाडग-तिय-चउक-चचरचउम्मुह-महापहेसु बहुजणो अण्णमण्णं एवं आइक्खइएवं भासेइ एवं पण्णवेइ एवं परूवेइ-एवं खलु देवाणु१ अवग्रहम्-आवासम् अनुज्ञापनापूर्वकम् २ अवगृह्णाति ३ अवग्रहश्च अशोकवरपादपस्य ४ अधः ५ पृथिवीशिलापट्टके ६ पूर्वाभि-14 मुखः-तीर्थकृतो हि भगवन्तः सदा समवसरणे पृथिवीशिलापट्टके वा देशनाय पूर्वाभिमुखा अवतिष्ठन्ते-७ संपर्यङ्कनिषण्णः ८ संयमेन तपसा चात्मानं भावयन् ९ विहरति आस्ते । ततः पर्षनिगमो + वाच्यः । कवरपादपः येनैव पृथिवीशिलापट्टकः तेनैव उपागच्छति उपागम्य यथाप्रतिरूपम् अवग्रहम् अवगृह्य अशोकवरपादपस्य अधः पृथिवीशिलापट्टके पौरस्त्याभिमुखः संपल्यङ्कनिषण्णः संयमेन तपसा आत्मानम् भावयमानः विहरति । (१०) पर्षद् निर्गता यावत् राजा पर्युपास्ते ततः आमलकल्पानगर्याम् १ शृङ्गाटक-त्रिक-चतुष्क-चत्वर-चतुर्मुख-महापथेषु बहुजनः अन्योन्यम् १० * "उत्तरदिक् पूर्वदिक् च लोके पूज्या, ततस्तस्याः पृष्ठप्रदाने लोकमध्येऽवर्गवादो भवति" इत्यादि-सनियुक्ति-भाष्य-वृत्तिकबृहत्कल्पसूत्र पृ० १३२ गा० ४५६-४५। + अयं च निर्गमः औपपातिकसूत्रमाश्रित्य अत्र मूले संयोजितः । १ शृङ्गाटकम्-शङ्गाटकाभिधानफलविशेषाकारं स्थानम्-त्रिकोणम् । त्रिकम्-यत्र स्थाने रथ्याप्रयमोलकः । चतुष्कम्-रथ्याचतुष्कमीलकः । चत्वरम्-यत्र बह्वो मार्गा मिलन्ति । चतुर्मुखम्-तथाविधदेवकुलादि । महापथो राजमार्गः। in Education entona For Private & Personel Lise Only w jainelibrary.org Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥३९॥ प्पिया ! समणे भगवं महावीरे जाव आगासगएणं छत्तेणं जाव [पृ० ३०५०१ पृ० ३८ पं० २] संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति, तं महाफलं खलु देवाणुपियाणं तहारूवाणं अरहंतागं नाम-गोयस्स वि सवणयाए किमंग पुण अभिगमणवंदणनमंसणपडिपुच्छणपज्जुवासणयाए ? तं सेयं खलु एगस्स वि आरियस्स धम्मियस्स सुवयणस्स सवणयाए किमंग पुण विउलस्स अट्ठस्त गहणयाए ? तं गच्छामो णं देवाणुप्पिया! समणं भगवं महावीरं वंदामो णमंसामो सकारेमो सम्माणेमो कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासेमो, एयं तं इह-५ भवे परभवे य हियाए सुहाए खमाए निस्सेयसाए आणुगामियत्ताए भविस्सइ, तए णं आमलकप्पाए नयरीए 'तए णं आमलकप्पाए नयरीए बहवे उग्गा भोगा' इत्यादि औपपातिक * ग्रन्थोक्तं सर्वमवसातव्यं यावत् समग्राऽपि राजप्रभृतिका परिषत् पर्युपासीना अवतिष्ठते । एवम् आख्याति एवं भाषते एवं प्रज्ञापयति एवं प्ररूपयति-एवं खलु देवानुप्रियाः ! श्रमणो भगवान् महावीरः यावत् आकाशगतेन छप्रेण यावत् | संयमेन तपसा आत्मानं भावयमानः विहरति, तत् महाफलं खलु देवानुप्रियाणां तथारूपाणाम् अर्हतां नामगोत्रस्यापि श्रवणतया किमङ्ग पुनः अभिगमन-वन्दन-नमस्यन-प्रतिप्रच्छन-पर्युपासनतया? तत् श्रेयः खलु एकस्यापि आर्यस्य धार्मिकस्य सुवचनस्य श्रवणतया किमङ्ग पुनः विपुलस्य अर्थस्य ग्रहणतया? तद् गच्छामः देवानुप्रियाः! श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दामहे नमस्यामः सत्कारयामः सम्मानयामः कल्याणं मङ्गलं देवता चैत्यं पर्युपास्महे, एतत् तद् इहभवे परभवे च हिताय सुखाय २ क्षमाय निःश्रेयसाय आनुगामिकतया भविष्यति, ततः आमलकल्पायाः नगर्याः | * औपपातिकग्रन्थोक्तमेतत् सर्व तं ग्रन्थमाश्रित्य मूले सन्निवेशितम् । २ क्षमाय संगतत्वाय । Jain Education inter nal For Private & Personel Use Only ww.jainelibrary.org Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। । बहवे उग्गा उग्गपुत्ता भोगा भोगपुत्ता राइण्णा राइण्णपुत्ता खत्तिया खत्तियपुत्ता भडा भडपुत्ता जोहा जोहपुत्ता पसत्थारो मल्लई मल्लइपुत्ता लेच्छई लेच्छइपुत्ता अण्णे य बहवे राईसरतलवरमाडंबियकोडुंबियइन्भसेडिसेणावइसत्थवाहप्पभितयो अप्पेगइया वंदणवत्तियं अप्पेगइया पूयणवत्तियं एवं सकारवत्तियं सम्माणवत्तियं दसणवत्तिय कोऊहलवत्तियं, अप्पेगइया अट्टविणिच्छयहेउं-अस्सुयाइं सुणेस्सामो सुयाई निस्संकियाई करिस्सामो, अप्पेगइया अट्ठाई हेऊई कारणाई वागरणाइं पुच्छिस्सामो, अप्पेगइया सवओ समंता मुंडे भवित्ता ॥४०॥ बहवः ३ उपाः उग्रपुत्राः भोगाः भोगपुत्राः राजन्याः राजन्यपुत्राः क्षत्रियाः क्षत्रियपुत्राः भटाः भटपुत्राः योधाः योधपुत्राः प्रशास्तारः मल्लकिनः मल्लकिपुत्राः लिच्छविनः लिच्छविपुत्राः अन्ये च बहवः ४ राज-ईश्वर-तलवर-माडम्बिक-कौटुम्बिक-इभ्य-श्रेष्ठि-सेनापति-सार्थवाहप्रभृतयः ५ अप्येककाः वन्दनवृत्तिकम् अन्येककाः पूजनवृत्तिकम् एवं सत्कारवृत्तिकम् सम्मानवृत्तिकम् दर्शनवृत्तिकम् कुतूहलवृत्तिकम्, अप्येककाः अर्थविनिश्चयहेतुम्-अश्रुतानि श्रोष्यामः श्रुतानि निःशङ्कितानि करिष्यामः, अप्येककाः अर्थान् हेतून् कारणानि व्याकरणानि प्रक्ष्यामः, अप्येककाः सर्वतः समन्तात् मुण्डा १० ३ उम्र-भोग-राः य-क्षत्रिय-भट-योध-प्रशास्तृ-मल्लकि-लिच्छविशब्दा विशिष्टराजवंशसूचकाः। ४ राजा-माण्डलिकः । ईश्वरः युवराजः। तलवरः परितुटनरपतिप्रदतपट्टबन्धविभूषितो राजस्थानीयः । माण्डविको मण्डपाधिपः। कौटुम्बिकः कतिपयकुटुम्बप्रभुः । इभ्यः यद्व्यनिचयाच्छन्नो महेभी न दृश्यते। श्रेष्ठी श्रीदेवतामुदायुक्तसुवर्णपट्टविभूषितोत्तमाङ्गः। सेनापतिः नृपतिनियुक्तश्चतुरङ्गसेनापतिः। सार्थवाहः सार्थनायकः। ५ अपि एकका:-केचन। Jain Education fem a l For Private & Personel Use Only watjainelibrary.org Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥४॥ अगाराओ अणगारियं पव्वइस्सामो, पंचाणुव्वइयं सत्तसिक्खावइयं दुवालसविहं गिहिधम्म पडिवज्जिस्सामो, अप्पेगइया जिणभत्तिरागेणं अप्पेगइया 'जीयमेयं ति कट्ट पहाया कयवलिकम्मा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता सिरसा कंठे मालकडा आविद्धमणिसुवण्णा कप्पियहार-अद्भहार-तिसर-पालंव-पलबमाणकडिसुत्तयकयसो. हाभरणा पवरवत्थपरिहिया चंदणोलित्तगायसरीरा, अप्पेगइया हयगया एवं गयगया रहगया सिबियागया संदमाणियागया अप्पेगइया पायविहारचारेणं पुरिसवग्गुरापरिक्खित्ता महया उक्किट्ठसीहणायबोलकलकलरवेणं पक्खुभियमहासमुद्दरवभूयं पिव करेमाणा आमलकप्पाए नयरीए मज्झंमज्झेणं णिग्गच्छन्ति णिग्गच्छित्ता जेणेव अंबसालवणे घेइए तेणेव उवागच्छन्ति उवागच्छित्ता समणस्स भूत्वा अगारादू अनगारिक प्रवजिष्यामः, पञ्चानुवतिक सप्तशिक्षाप्रतिकं द्वादशविध गृहिधर्म प्रतिपत्स्यामहे. अप्येककाः जिनभक्तिरागेण, अप्येककाः ६ जीतम् एतत्' इति कृत्वा स्नाताः कृतबलिकर्मागः कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्ताः शिरसा कण्ठे कृतमालाः आविमणिसुवर्णाः कल्पितहार-अर्धहार-त्रिसर-प्रालम्ब-प्रलम्बमानकटिसूप्रककृतशोभाभरणाः परिहितप्रवरवस्त्राः चन्दनावलिप्तगात्रशरीराः, अप्येककाः हयगताः एवम् गजगताः | रथगताः शिविकागताः स्पन्दमानिकागताः, अप्येककाः पादविहारचारेण पुरुषवागुरापरिक्षिप्ताः महता उत्कृष्टसिंहनाद ७ बोलकलकलरवेण प्रक्षुब्धमहासमुद्ररवभूतमिव कुर्वन्तः आमलकल्पायाः नगर्याः ८ मध्यमध्येन निर्गच्छन्ति, निर्गम्य येनैव आम्रशालबनं चैत्यम् तेनैव उपागच्छन्ति उपागम्य श्रमणस्य ६ जीतम् आचार:-प्रथा-परम्परा ७ बोल: अस्पष्टशब्दः । कलकलः स्पष्टशब्दः । ८ "मध्यंमध्येन इत्यर्थः । 'गृहंगृहेण 'मध्यमध्येन' 'पदंपदेन' 'सुखसुखेन' इत्यादयः शब्दाः चिरंतनव्याकरणेषु सुसाधवः प्रतिपादिता इति नायम् अपप्रयोगः"-श्रीमलयगिरिकृतं रायपसेणइयविवरणम् । Jain Educat ional For Private Personal Use Only Www.jainelibrary.org Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥४२॥ भगवओमहावीरस्त अदूरसामन्ते छत्तादीए तित्थयराइसेसे पासन्ति पासित्ता जाण-वाहणाई ठवेंति उवित्ता जाण-वाहणेहिंतो पचोरुहन्ति पञ्चोरहित्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छन्ति उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेंति करित्ता वंदति णमंसंति वंदित्ताणमस्सित्ता णचासणे णाइदूरे सुस्सूसमाणा णमंसमाणा अभिमुहा विणएणं पञ्जलिउडा पज्जुवासंति] [तए णं से सेए राया नयणमालासहस्सेहिं पेच्छिज्जमाणे पेच्छिजमाणे जाव सा णं धारिणी देवी जेणेव ५ समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता जाव समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेंति वन्दंति णमंसंति सेअरायं पुरओ कटु जाव विणएणं पञ्जलिकडाओ पज्जुवासंति] तए णं समणे भगवं महावीरे सेअस्स रपणो धारिणीए देवीए तीसे य महइमहालियाए परिसाए जाव भगवतो महावीरस्य अदूरसामन्ते छत्रादिकान् तीर्थकरातिशेषान् पश्यन्ति दृष्ट्वा यान-वाहनानि स्थापयन्ति स्थापयित्वा यान-वाहनेभ्यः प्रत्यवरोहन्ति प्रत्यवरुह्य येनैव श्रमगो भगवान् महावीरः तेनैव उपागच्छन्ति उपागम्य श्रमणं भगवन्तं महावीरं ९प्रिकृत्वः आदक्षिणप्रदक्षिणं कुर्वन्ति कृत्वा बन्दन्ते १० नमस्यन्ति वन्दित्वा नमस्थित्वा नात्यासन्ने नातिदूरे शुश्रूषमाणाः नमस्यमानाः अभिमुखाः विनयेन प्राञ्जलिपुटाः पर्युपासते। 8 ततः स श्वेतो राजा नयनमालासहौः प्रेक्ष्यमाणः प्रेक्ष्यमाणः यावत् सा धारिणी देवी येनैव श्रमणो भगवान् महावीरः तेनैव उपागच्छन्ति उपागम्य यावत् श्रमणं भगवन्तं महावोरं त्रिकृत्वः आदक्षिणप्रदक्षिणं कुर्वन्ति वन्दन्ते नमस्यन्ति श्वेतराज पुरतः कृत्वा यावत् विनयेन कृतप्राञ्जलयः पर्युपासते। ततः श्रमणो भगवान् महावीरः श्वेतस्य राज्ञः धारिण्या देव्याः तस्याश्च महातिमहत्याः पर्षदः यावत् धर्म परिकथयति । ९प्रिकृत्वः वारप्रयम्। Jain Educat For Private Personal Use Only dow.ainelibrary.org Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं । गमः मा धम्म परिकहेइ] शतए णं सा महइमहालिया मणूसपरिसा समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम्म सोचा पर्षत्पति|णिसम्म हहतुट्ठ जाव हियया जाव समणं भगवं महावीरं वंदित्ता एवं वयासी-सुअक्खाए ते भन्ते ! निग्गन्थे । पावयणे जाव णत्थि णं अण्णे केइ समणे वा माहणे वा जे एरिसं धम्म आइक्खित्तए किमङ्ग पुण एत्तो उत्तरतरं? एवं वदित्ता जामेव दिसं पाउन्भूया तामेव दिसं पडिगया] 1॥४३॥ तिए णं से सेए राया सा धारिणी देवी समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम् सोचा णिसम्म हत जाब हियया उद्याए उट्ठति उद्वित्ता सुअक्खाए णं भन्ते ! निग्गन्थे पावयणे एवं वदिखा जामेव दिसिं पाउन्भूयाओ तामेव दिसिं पडिगयाओ] [११] ततः सा महातिमहती मनुष्यपर्षद् श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य अन्तिके धर्म श्रुत्वा निशम्य हृष्टतुष्टा-यावत् १०-हृदया यावत् श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दित्वा एवम् अवादीत्-सुआख्यातं त्वया भगवन् ! नम्रन्थं प्रवचनम् यावत् नास्ति अन्यः कश्चित् श्रमणो वा ब्राहगो वा य ईदृशं १० धर्मम् आख्यातुम् , किमङ्ग पुनः इतः ११ उत्तरतरम् ? एवम् उदित्वा यामेव दिशं प्रादुर्भुता तामेव दिशं प्रतिगता । ४ ततः स श्वेतो राजा सा धारिणी देवी श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य अन्तिके धर्मं श्रुत्वा निशम्य हृष्टतुष्टा यावत् हृदया उत्थया उत्तिष्ठन्ति | उत्थाय सुआख्यातं भगवन् ! नैग्रन्थं प्रवचनम् एवम् उदित्वा यामेव दिशं प्रादुर्भूताः तामेव दिशं प्रतिगताः। |१० 'यावत्' शब्देन 'आनन्दितचित्ता नन्दिता प्रीतिमनाः परमसौमनस्यिता हर्षवशविसर्पधृदया' इति पूर्तिईया । ११ उत्तमतरम् । Jain Education Inter n al For Private & Personel Use Only jainelibrary.org Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥४४॥ [१२] 'ते णं काले णं ते णं समए णं सूरियामेणाम ० देवे सोहम्मे कप्पे सूरियाभे विमाणे सँभाए सुहम्माए 'सूरियामंसि सिंहासणंसि चउहिं सामाणियसाहस्सीहिं, चउहिं अग्गमहिसीहिं-सपरिवाराहिं. सूर्याभदेवेन भगवानव[१२] १ 'ते' इति प्राकृतशैलीवशात् 'तस्मिन्' इति द्रष्टव्यम् यस्मिन् काले भगवान् वर्धमानस्वामी साक्षाद् विहरति तस्मिन् लोकितः काले २ तस्मिन् समये यस्मिन्नवसरे भगवान् आम्रशालवने चैत्ये देशनां कृत्वोपरतस्तस्मिन्नवसरे इति भावः, ३ सूर्याभः |४ नाम्ना देवः । नामशब्दो ह्यव्ययरूपोऽप्यस्ति ततो विभक्तिलोपः। ५ सौधर्म सौधर्माख्ये कल्पे यत् ६ सूर्याभम्-सूर्याभ- ५ नामकं विमानं तस्मिन् या ७ सभा सुधर्माभिधा तस्याम् ८ यत् सूर्याभाभिधानं सिंहासनम् तत्रोपविष्टः सन्निति गम्यते। ९ समाने द्युतिविभवादी भवाः सामानिकाः-अध्यात्मादित्वाद् -'इकण-विमानाधिपतिसूर्याभदेवसदृशद्युतिविभवादिका देवा इत्यर्थः, ते च मातृ-पितृ-गुरु-उपाध्याय-महत्तरवत् सूर्याभदेवस्य पूजनीयाः केवलं विमानाधिपतित्वहीना इति सूर्याभ देवं स्वामिनं प्रतिपन्नाः, तेषां सहस्राणि सामानिकसहस्राणि तैश्चतुर्भिः, प्राकृतत्वाच सूत्रे * सकारस्य दीर्घत्वम् स्त्रीत्वं च । १० चतसृभिरग्रमहिषीभिः-इह xकृताभिषेका देवी महिषी इत्युच्यते, सा च स्वपरिवारभूतानां सर्वासामपि देवीनामग्रा इत्यग्रा, अग्राश्च ता महिष्यश्च अग्रमहिष्यस्ताभिश्चतसृभिः। कथम्भृताभिः? इत्याह-११ सपरिवाराभिः परिवारः सह यासां ताः सपरिवारास्ताभिः, परिवारश्चैकैकस्या लिखितादशेषु मुद्रितपुस्तकेऽपि चासन् ‘णाम' शब्दः विवरणकारविवरणानुसारेण अस्माभिर्मूले योजितः । = "अध्यात्मादिभ्य इकण्"[६-३-७८ हैमश०] * 'सहस्स' शब्दस्य आद्यसकारो दौधों जातः । ४ "या कृताभिषेका नृपस्त्री सा महिषी, अन्या अकृताभिषेका नृपस्त्रियो भोगिन्य इत्युच्यन्ते" अमरकोश० द्वि० का० मनुष्यव० श्लो० ५। Jain Education anal or Private & Personal Use Only ww.jainelibrary.org Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय। ॥४५॥ 'तिहिं परिसाहिं, सत्तहिं अणिएहिं, सत्तहिं अणियाहिवईहिं, सोलसहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं, देव्याः सहस्रं सहस्रं देवीनाम् । तथा १ तिसृभिः पर्षद्भिः, तिस्रो हि विमानाधिपतेः सर्वस्यापि पर्षदः, तद्यथा-अभ्यन्तरा मध्या बाह्या च, तत्र या वयस्यमण्डलीस्थानीया परममित्रसंहतिसदृशी सा अभ्यन्तरपर्षद , तया सह अपर्यालोचितं स्वल्पमपि प्रयोजन न विदधाति । अभ्यन्तरपर्षदा सह पर्यालोचितं यस्यै निवेद्यते यथा-'इदमस्माकं पर्यालोचितं सम्मतमागतम् युष्माकमपीदं सम्मतं किं वा न? इति-सा मध्यमा। यस्याः पुनरभ्यन्तरपर्षदा सह पर्यालोचितं मध्यमया च सह दृढीकृतं करणायैव निरूप्यते यथा-'इदं क्रि-| यताम् इति-सा बाह्या। तथा २ अनीकानि-सैन्यानि, तानि च सप्त-तद्यथा-हयानीकम् गजानीकम् स्थानीकम् पत्त्यनीकम् वृषभानीकम् गन्धर्वानीकम् नाट्यानीकम्, तत्राद्यानि पश्चानीकानि संग्रामाय कल्पन्ते, गन्धर्व-नाट्यानीके पुनरुपभोगाय-तैः सप्तभिरनीकैः ३ अनीकानि स्वस्वाधिपतिव्यतिरेकेग न सम्यक् प्रयोजने समापतिते सत्युपकल्यन्ते ततः सप्तानीकाधिपतयोऽपि तस्य वेदितव्याः, तथा चाह-सत्तहिं अगियाहिबईहिं । तथा ४ पोडशभिः आत्मरक्षदेवसहस्त्रैः इति-विमानाधिपतेः सूर्याभस्य देवस्यात्मानं रक्षयन्तीत्यात्मरक्षा:-"कर्मणोऽण"[५-१-७२ हैमश०] इति 'अण्'-प्रत्ययः-ते च शिरस्त्राणकल्पा:-यथा हि शिरस्त्राणं शिरस्थाविद्ध प्राणरक्षकं भवति तथा तेऽप्यात्मरक्षका गृहीतधनुर्दण्डादिप्रहरणाः समन्ततः पृष्ठतः पाश्वतोऽग्रतश्वावस्थायिनो विमानाधिपतेः सूर्या-1 भस्य देवस्य प्राणरक्षकाः। देवानामपायाभावात् तेषां तथाग्रहणपुरस्सरमवस्थानं निरर्थकमिति चेत्, न, स्थितिमात्रपरिपालनहेतुत्वात प्रीतिप्रकर्षहेतुत्वाच्च, तथाहि-ते समन्ततः सर्वासु दिक्षु गृहीतप्रहरणा ऊर्ध्वस्थिता अवतिष्ठमानाः स्वनायकशरीररक्षणपरायणाः स्वनायकैकनिषण्णदृष्टयः परेषामसहमानानां क्षोभमापादयन्तो जनयन्ति स्वनायकस्य परां प्रीतिमिति । एते च नियतसंख्याकाः सूर्याभस्य Jain Educat onal For Private Personal Use Only wilejainelibrary.org Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥४६॥ | अन्नहिं बहूहिं सूरियाभविमाणवासीहिं वैमाणिएहिं देवेहि य देवीहि य सद्धिं संपरिवुडे मैहया अहयनेटगीयवाइयततीतलतालतुडियघणमुइंगपडप्पवादियरवेणं "दिव्वाइं भोगभोगाई भुञ्जमाणे विहरति, इम च णं "केवलकप्पं | देवस्य परिवारभूता देवा उक्ताः। १ ये तु तस्मिन् सूर्याभे विमाने पौरजनपदस्थानीयाः, ये त्वाभियोग्याः-दासकल्पाः-तेऽतिभूयांसः आस्थानमण्डल्यामपि चानियतसंख्याका इति तेषां सामान्यत उपादानमाह-'अन्नेहिं बहहिं सूरियाभविमाणवासीहिं देवेहि देवीहि य सद्धिं संपरिखुडे'-एतैः सामानिकप्रभृतिभिः सार्धम् २ संपरिवृतः-सम्यग्नायकैकचित्ताराधनपरतया-परिवृतः। ३ 'महता रवेग'इति योगः ४ 'अहय' इति "आख्यानकप्रतिबद्धानि” इति वृद्धाः। अथवा अहतानि-अव्याहतानि-अक्षतानि इति भावः५ नाट्यगीतवादिनानि च ६ तन्त्री-वीणा तला:-हस्ततालाः तालाः कंसिकाः *तुटितानि-शेषतूर्याणि, तथा ७ धनः-घनसदृशो ध्वनिसाधर्म्यात् यो मृदङ्गः-मर्दलः पटुना-दक्षपुरुषेण प्रवादितः-तत एतेषां पदानां द्वन्द्वः-तेषां यो वस्तेन ८ दिव्यान्-दिवि भवान् अतिप्रधानानित्यर्थः, ९ 'भोगभोगाई' इति भोगार्हा ये भोगाः-शब्दादयस्तान्-सूत्रे नपुंसकता प्राकृत्वात् , प्राकृते हि लिङ्गव्यभिचारः। यदाह पाणिनिः स्वप्राकृतलक्षणे-“लिङ्ग व्यभिचार्यपि"[ ] इति-भुञ्जानो विहरति आस्ते । न केवलमास्ते किंतु १० इम-प्रत्यक्षतया उपलभ्यमानं ११ केवलकल्पम्-ईपदपरिसमाप्तं =केलं-केवलकल्पग-परिपूर्णतया केवलसदृशमिति भावः * सं० तूर्य-प्रा० तुरिय-तुडिय-तुटिय-तुटित-इति शब्दपरिवर्तनम् । ४ 'भोग'शब्दस्य। लिङ्गमतन्त्रम् [८-४-४४५] इति आचार्यहेमचन्द्रः 8 -समाप्तं परिसमाप्त केवल केवलज्ञानकेवल-भा०१। = केवलं केवलज्ञानं केवल-पा० ५। भा० २। Jain Educalanm an For Private Personal Use Only Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय । 'जम्बुद्दीवं दीवं 'विउलेणं ओहिणा आभोएमाणे आभोएमाणे पासति । [१३] तत्थ समर्ण भगवं महावीरं 'जंबूद्दीवे भारहे वासे आमलकप्पाए नयरीए बहिया अंबसालवणे चेइए | अहापडिरूवं उग्गहं उग्गहित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेभाणं पासति, पासित्ता हेतु चित्तमादिए १ जम्ब्वा रत्नमय्या उत्तरकुरुवासिन्या उपलक्षितो द्वीपो जम्बूद्वीपस्तं जम्बूद्वीपम् - जम्बूद्वीपाभिधानं द्वीपम् २ विपुलेन विस्तीर्णेन अवधिना, तस्य हि सूर्याभस्य देवस्यावधिः - अधः प्रथमां पृथिवीं यावत् तिर्यक संख्येयान् (१) द्वीपसमुद्रानिति भवति विस्तीर्णस्तेन ||५ ३ आभोगयन् आभोगयन्- परिभावयन् पश्यति, अनेन 'सत्यप्यवधौ यदि तं ज्ञेयविषयमाभोगं न करोति तदा न किञ्चिदपि तेन जानाति पश्यति च' इत्यावेदितम् । [१३] ४ 'तत्र' तस्मिन् विपुलेनावधिना जम्बुद्वीपविषये दर्शने प्रवर्तमाने सति ५श्रमणम् - श्राम्यति तपस्यति नानाविधमिति श्रमणः ६ भगः - समग्रैश्वर्यादिलक्षणः उक्तं च- "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य रूपस्य यशसः श्रियः । धर्मस्याथ प्रयत्नस्य पण्णां भग इतीङ्गना" [ ] भगोऽस्यास्तीति भगवान् तम् भगवन्तम् ७ “शूर वीर विक्रान्तौ " वीरयति - कपायान् प्रति विक्रामति स्मेति वीरः महांश्चासौ वीरश्च १० महावीरस्तम् जम्बूद्वीपे भारते वर्षे आमलकल्पाया नगर्या बहिर - आम्रशालवने चैत्ये अशोकवरपादस्याधः पृथिवी शिलापट्ट के सम्पर्कङ्कनिषण्णं गणसमृद्धिसंपरिवृतं यथाप्रतिरूपमवग्रहं गृहीत्वा संयमेन तपसा आत्मानं भावयन्तं पश्यति दृष्ट्वा च ९ हृष्टतुष्टोऽतीवतुष्ट + तिर्यक् असंख्येयान् मुद्रिते एव पुस्तके पाठः । “सौधर्म - एशानयोर्देवा अवधिविषयेण अधो रत्नप्रभां पश्यन्ति, तिर्यग् असंख्येयानि योजन - सहस्राणि, ऊर्ध्वम् आ स्वभवनात् " - तत्त्वार्थभाष्ये अ० ४ सू० २१ । ॥४७॥ Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण - इयं । ॥४८॥ पीइमणे परमसोमणस्सिए हैरिसवसविसप्पमाणहियए विकसियवरकमलणयणे पॅयलियवरकडगतुडियकेऊरमउडकुंडल-हारविरायंतरइयवच्छे पॉलंबपलंबमाणघोलंतभूसणधरे इति भावः, अथवा हृष्टो नाम विस्मयमापनो यथा-'अहो भगवानास्ते' इति, तुष्टः-तोपं कृतवान् यथा-भव्यमभृद् यन्मया भगवानवलोकितः तोषवंशादेव चित्तमानन्दित-स्फीतीभूतं-"टु नदु समृद्धौ" इति वचनात्-यस्य स चित्तानन्दितः, सुखादिदर्शनात पाक्षिको निष्टान्तस्य परनिपातः, मकारः प्राकृतत्वादलाक्षणिकस्ततः पदत्रयस्य पदद्वयमीलनेन कर्मधारयः १ प्रीतिर्मनसि यस्यासौ प्रीतिमनाः-भगवति बहुमानपरायण इति भावः ततः क्रमेग बहुमानोत्कर्षवशात् २ शोभनं मनो यस्य स सुमनास्तस्य भावः सौमनस्यम् परमं च तत् सौमनस्यं च परमसौमनस्यम् तत् सञ्जातमस्येति परमसौमनस्यितः एतदेव व्यक्तीकुर्वन्नाह-३ हर्षवशेन विसर्पतविस्तारयायि हृदयं यस्य स हर्षवंशविसर्पद्धृदयः ४ हर्षवंशादेव विकसिते वरकमलवन नयने यस्य सः ५ तथा हर्षवशादेव शरीरोदुषण प्रचलितानि वराणि कटकानि-कलाचिकाभरणानि त्रुटितानि-बाहुरक्षकाः केयूराणि-बाह्वाभरणविशेषरूपाणि मुकुटो-मौलिभूषणम् कुण्डले-कर्णाभरणे यस्य स प्रचलितवरकटकत्रुटितकेयरमुकुट कुण्डलः, तथा ६ हारेण विराजमानेन रचित-शोभितं १० वक्षो यस्य स हारविराजमानरचितवक्षाः ततः पूर्वपदेन कर्मधारयसमासः तथा ७ प्रलम्बते इति प्रलम्बः='पदक'-प्रलम्ब___ * "जाति-काल-सुखादिभ्यः परवचनम्" इति काशिकावृत्ती-२-२-३६ । 8 “तुटिकाव बाहुरक्षकाः"-औ० वृ०। वक्षो यस्य स इह विवक्षित-पा० ५-४। भा० १ ० "प्रालम्बो झुम्बनकम्"-औ० वृ०। 'झूमणुं' इति भाषा । "सुवर्णनिर्मिता-आनाभिलम्बितकण्टिका प्रालम्बिका” इति अमरकोशः द्वि० कां० मनुष्यव० श्लो० १०४ । = "पदक[' इत्ययं शब्दो देशभाषायाः प्रतीयते। Jain Education Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं। ॥४९॥ संभमं तुरियं चवलं सुरवरे xसीहासणाओ अब्भुटेइ अन्भुद्वित्ता पायपीढाओ पच्चोरुहति पच्चोरुहित्ता पाउयाओ ओमुयइ ओमुयइत्ता एगसाडियं उत्तरासंगं करेति करित्ता तित्थयराभिमुहे सत्तट्टपयाई अणुगच्छह अणुगच्छित्ता वामं जाणुं 8अंचेइ दाहिण जाणुं धरणितलंसि निह१ तिक्खुत्तो मुद्धाणं धरणितलंसि निमेइ निमित्ता ईसिं पच्चुन्नमइ पच्चुन्नमित्ताकडय-तुडियर्थभियभुयाओ साहरइ साहरित्ता करयलपरिग्गहियं दसणहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कटु एवं वयासीमानम्-आभरणविशेषम्-घोलन्ति+ च भूषणानि धरन्तीति प्रलम्बमलम्बमानघोलभूषणधरः। सूत्रे च 'प्रलम्बमान'पदस्य विशेष्यात् | परतो निपातः प्राकृतत्वात् । हर्षवशादेव १ ससंभ्रमम् संभ्रमः इह विवक्षितक्रियाया बहुमानपूर्विका प्रवृत्तिः, सह सम्भ्रमो यस्य वन्दनस्य- गमनस्य वा तत् ससम्भ्रमम् क्रियाविशेषणमेतत् , २ त्वरितं-शीघ्रम् ३ चपलं-सम्भ्रमवशादेव व्याकुलं यथा भवत्येवं ४ सुरवरो-देववरः। ४सिंहासनाद् अभ्युत्तिष्ठति अभ्युत्थाय पादपीठात् प्रत्यवरोहति प्रत्यवरुह्य पादुकाः अवमुञ्चति अवमुच्य एकशाटिकम् उत्तरासङ्गं करोति कृत्वा तीर्थकराभिमुखः सप्ताष्टपदानि अनुगच्छति अनुगम्य वाम जानुम्-अञ्चति दक्षिणं जानुं धरणितले निधाय प्रिकृत्वः मूर्धानं धरणितले निम्नयति निम्नयित्वा ईषत् प्रत्युन्नमति प्रत्युन्नम्य ०कटक-तुटिकस्तब्धभुजान् संहरति संहृत्य करतलपरिगृहीतां दशनखां शिरस्यावर्ता मस्तके अञ्जलि कृत्वा एवमवादीत्- 8 "उत्पाटयति"-ऊर्च करोति। * "निम्नयति"-नीचैः करोति । + 'घोलत्' शब्दस्य द्वितीयाबहुवचनम् । घोलन्ति'-चलानिचञ्चलानि इति भावः ।% -स्य नमनस्य-पा०१-४ । o "कटक-तुटिकैः-हस्ताभरण-बाहाभरणविशेषः"-औ० वृ० । JainEduca ional For Private Personal Use Only Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥५०॥ [१४] नमोऽत्यु णं अरिहंताणं भगवंताणं आदिगराणं तित्थगराणं सयंसंबुद्धागं पुरिलुत्त मागं पुरिससीहाणं सूर्याभदेवेन पुरिसवरपुण्डरीयाणं पुरिसवरगन्धहत्थीणं लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआणं लोगपईवाणं लोगपज्जोयग- भगवान् राणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं जीवदयाणं सरणदयाणं बोहिदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाणं स्तुतः धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवरचाउरंतचक्कबहीणं अप्पडिहयबरनाणदसणधराणं वियदृछ उमाणं जिणाणं जावयाणं तिण्णाणं तारयाण बुद्धाणं बोहयाण मुत्ताणं मोयगाणं सव्वन्नूणं सम्बदरिसीणं सिवं अयलं अरुयं ५ अणंत अक्वयं अव्वाबाहं अपुणरावत्तिय सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं । [१५] नमोऽत्यु णं समणस्स भगवओ महावीरस्स आदिगरस्त तित्थयरस्स जाव [कण्डिका १४] संपाविउकामस्स, वन्दामिणं भगवन्तं तत्थगयं इहगते, पांसह मे भगवं तत्थगते इहगतं ति कटु वन्दति णमंसति वंदित्ता णमंसित्ता सीहासणवरगए पुव्वाभिमुहं सण्णिसण्णे । [१५] १ पश्यति मां स भगवान् तत्रगतः इहगतम् २ इति कृत्वा बन्दते-स्तौति नमस्यति-कायेन मनसा च ३ बन्दित्वा नम- १० स्यित्वा च भूयः ४ सिंहासनवरगतः गत्वा च ५ पूर्वाभिमुखं सन्निषण्णः। [१४] 0 एषां शब्दानां व्याख्यानं पृ० ३० ० टिप्पणे द्रष्टव्यम् केवलं विभक्तिभेदः । तत्र अनागतानां तु व्याख्यानमेवं बोध्यम्-नमोऽस्तु अर्हताम् भगवताम् स्वयंसंबुद्धानाम् लोकोत्तमानाम् लोकनाथानाम् लोकहितानाम् लोकप्रदीपानाम् लोकप्रद्योतकराणाम् शरणदयानाम् बोधिदयानाम् धर्मदयानाम् धर्मदेशकानाम् धर्मनायकानाम् धर्मसारथीनाम्....संप्राप्तानाम् Jain Educati onal For Private & Personel Use Only Tww.jainelibrary.org Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। [१६] तए णं तस्स-सरियाभस्स-ईमेएतारूवे *अज्झस्थिते चिंतिते पत्थितेमणोगते संकप्पे समुपजित्था- मर्याभदेव[१०] सेयं खलु "मे समणे भगवं महावीरे जम्बूद्दीवे दीवे भारहे वासे आमलकप्पाए णयरीए बहिया अम्ब-स्य संकल्पः सालवणे चेइए अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिण्हित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति, महाफलं खली ॥५ ॥ तहाख्वाणं भगवन्ताणं णामगोयस्स वि सवणयाए किमङ्ग पुण अभिगमणवन्दणणमंसणपडिपुच्छणपज्जुवास-1 णयाए ? एगस्स वि आरियस्स धम्मियस्स सुवयणस्स सवणयाए किमङ्ग पुण विउलस्स अट्ठस्स गहणयाए १५ तं गच्छामि णं सेमणं भगवं महावीरं वदामि णमंसामि सकारेमि [१६] १ ततः निपदनानन्तरम् २ तस्य-सूर्याभदेवस्य ३अयम् ४एतद्रूपः सङ्कल्पः समुदपद्यत । कथम्भूतः ? इत्याह-५मनोगतः मनसि गतो-व्यवस्थितः नाद्यापि वचसा प्रकाशितस्वरूप इति भावः । पुनः कथम्भूतः ? इत्याह-६आध्यात्मिकः आत्मनि अधि अध्यास्मम् तत्र भव आध्यात्मिकः-आत्मविषय इति भावः । सङ्कल्पश्च द्विधा भवति-कश्चिद् ध्यानात्मकः अपरश्चिन्तात्मकः, तत्रायं चिन्तात्मकः इति प्रतिपादनार्थमाह-७ चिन्तितः चिन्ता सञ्जाता अस्येति चिन्तितः-चिन्तात्मक इति भावः, सोऽपि कश्चिदभिलाषात्मको | भवति कश्चिदन्यथा, तत्रायमभिलाषात्मकः, तथा चाह-८ प्रार्थितः प्रार्थनं प्रार्थ:-णिजन्तत्वात् 'अल् प्रत्ययः-प्रार्थः सञ्जातोऽस्येति मार्थितः-अभिलाषात्मक इति भावः। किंस्वरूपः ? इत्याह [१७] ९ श्रेयः 8१० खलु निश्चितम् ११ मे मम श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दितुं कायेन मनसा च प्रणन्तुम् । सत्कार* अत्र मूले टीकायां च पदानां व्युत्क्रमः। 8 इदं विवरणं प्रस्तुतं मूलपाठं शब्दशो नानुसरति अतो ज्ञायते यत् विवरणकारस्य दृष्टौ कश्चिद् Jain Education Internal For Private Personel Use Only ww.jainelibrary.org Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । सूर्याभदेवस्य आभियोगिका नाम् आदेश: ॥५२॥ सम्मामि कल्लाणं मङ्गलं चेतियं देवयं पज्जुवासामि, एयं मे पेचा हियाए सुहाए खमाए णिस्सेयसाए आणुगामियत्ताए भविस्सतित्ति कटु एवं संपेहेइ, एवं संपेहित्ता आर्भिओगे देवे सहावेइ सदार्वित्ता एवं वयासी [१८] एवं खलु देवाणुप्पिया ! समणे भगवं महावीरे जम्बूद्दीवे दीवे भारहे वासे आमलकप्पाए नयरीए | बहिया अम्बसालवणे चेइए अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिण्हित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरइ। "तं गच्छह णं तुमे देवाणुप्पिया! जम्बूद्दीवं दीवं भौरहं वासं आमलकप्पं णयरिं यितुम्-कुसुमाञ्जलिमोचनेन पूजयितुम् , सम्मानयितुम्-उचितप्रतिपत्तिभिराराधयितुम् , कल्याण कल्याणकारित्वात् मङ्गलं दुरितोपशमकारित्वात् देवतां-देवं त्रैलोक्याधिपतित्वात् चैत्यं सुप्रशस्तमनोहेतुत्वात् पर्युपासितुं-सेवितुम् १ इतिकृत्वा इतिहेतोः २ एवं यथा वक्ष्यमाणं तथा ३ सम्प्रेक्षते बुद्ध्या परिभावयति, संप्रेक्ष्य च ४ आभियोगिकान्-आभिमुख्येन योजनं अभियोगः-प्रेष्यकर्मसु व्यापार्यमाणत्वम्-अभियोगेन जीवन्ति इति आभियोगिकाः “वेतनादेर्जीवति"[६-४-१५ हैमश०]इति 'इकण्प्रत्यया-आभियोगिका:खकर्मकरास्तान् ५ शब्दापयति-आकारयति ६ शब्दापयित्वा च तेषां सम्मुखम् ७ एवमवादी [१८] ८ एवं खलु देवानांप्रियाः ! इत्यादि सुगमम् नवरं ९ देवानांप्रियाः-ऋजवः प्राज्ञाः। १० यस्मादेवं भगवान् विहरन् वर्तते तत्-तस्माद्-देवानांप्रियाः! यूयं गच्छत ११ जम्बूद्वीपं द्वीपम् तत्रापि १२ भारतं वर्षम् तत्रापि १३ आमलकल्पां नगरीम् परिवर्तितो मूलपाठो भवेत् । Jain Education lemonal For Private & Personel Use Only wwjainelibrary.org Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । अभ्यसालवणं वेइयं समैणं भगवं महावीरं तिक्खुत्ती आयाहिणण्याहिणं करेह करेत्ता बंद णसंसह वन्दित्ता णमंसित्ता साई साई नागोयाई साहे साहित्ता समणस्स भगवओ महावीरस्स संव्यओ समन्ता जोयणेपरिमण्डलं जं किंषि ते वा पैत्तं वा कै वा समरं वा सुई अचोक्खं वा पूर्वअं दुभिंगन्धं "तं सव्यं आहुणियें आरुणिय ऐंगन्ते ऍडेह एडेत्ता तत्रापि १ आम्रशालवनं चैत्यम् २ श्रमण भगवन्तं महावीरं ३ त्रिकृत्वः--त्रीन् वारान् ४ आदक्षिणप्रदक्षिणं कुरुत - आदक्षिणाद्- ५ | दक्षिणहस्तादारभ्य प्रदक्षिण:- परितो भ्राम्यतो दक्षिण एवं आदक्षिणप्रदक्षिणस्तं कुरुत । कृत्वा च ५ वन्दध्वम् नमस्यत, चन्दित्वा नमस्त्विा च ६ स्वानि - स्वानि आत्मीयानि आत्मीयानि ७ नामगोत्राणि, गोत्रम् - अन्वर्थस्तेन युक्तानि नामानि नामगोत्राणि । राजदन्तादिदर्शनात् 'नाम' शब्दस्य पूर्वनिपातः । ८ साधयत - कथयत, कथयित्वा च ९ श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य १० सर्वतः सर्वासु दिक्षु ११ समन्ततः- सर्वासु विदिक्षु १२ योजनपरिमण्डलं परिमाण्डल्येन योजनप्रमाणं यत् क्षेत्रं तत्र १३ यत् १४ तृणं किलिञ्चादि १६ काष्ठं वा काष्ठशकलं वा १५ पत्र वा निम्बाऽश्वत्थादिपत्रजातम् कचवरं वा श्लक्ष्णतृणधूल्या १० | दिपुखरूपं कथम्भूतम् ? इत्याह- १७ अशुचि अशुचिसमन्वितम् १८ अचोक्षम् - अपवित्रम् १९ पूतिं कुथितम् अत एव २० दुरभिगन्धं २१ तत् संवर्त्तकवातविकुर्वणेन २२ आहत्याहत्य २३ एकान्ते - योजनपरिमण्डलात् क्षेत्राद् दवीयसि देशे २४ एडयत अपStart ष्टी कश्चित् परिवर्तितः मूलपाठो भवेत् । स च विवरणानुसारेण एवं संभवेत्- 'तणं वा कट्टं वा कसगळं वा पत्तं वा कयवरं वा असुई' "राजदन्तादिपु " [३-१-१४९ हैमश०] Jain Education Interational ॥५३॥ w.jainelibrary.org Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । 114811 चोदगं णाइंमहियं पविरैलपप्फुसियं रयरेणुविणासणं दिवं सुरभिगन्धोदयवासं वासह वासित्ता हियरयं हरेय भट्टरयं उवसंतरेयं पसंतरेय कैरेह करिता कुसुमस्स जाणुंस्सेहपमाणमित्तं ओहिं वासं वासह वासित्ता जलयथलय भासुरम्प भूयस्स नयत एडयित्वा च १ नात्युदकम् २ नाप्यतिमृत्तिकं यथा भवति एवं ६ सुरभिगन्धोदकवर्ष ७ वर्षत, कथम्भूतम् ? इत्याह५ दिव्यं प्रधानं सुरभिगन्धोपेतत्वात् पुनः कथम्भूतम् ? इत्याह - ३ प्रकर्षेण यावद् रेणवः स्थगिता भवन्ति तावन्मात्रेणोत्क- ५ पेणेति भावः, स्पर्शनानि प्रस्पृष्टानि विरलानि धनभावे कर्दमसम्भवात् स्पृष्टानि - प्रकर्षवन्ति स्पर्शनानि - मन्दस्पर्शनसम्भवे रेणुस्थगनासम्भवात् यस्मिन् वर्षे तत् प्रविरलप्रस्पृष्टम् अत एव ४ श्लक्ष्णतरा रेणुपुद्गला - रजः त एव स्थूला रेणवः, रजांसि च रेणवच रजोरेणवस्तेषां विनाशनम् । एवम्भूतम् च सुरभिगन्धोदकं वर्षं वर्षित्वा योजनपरिमण्डलं क्षेत्र ८ निहतरजः कुरुतेति योगः निहतं रजो-भूय उत्थानासम्भवात् यत्र तद् निहतरजः, तत्र निहतत्वं रजसः क्षणमात्रमुत्थानाभावेनापि सम्भ वति तत आह-९ नष्टरजः- नष्टं सर्वथाऽदृश्यीभूतं रजो यत्र तद् नष्टरजः, तथा १० भ्रष्टं वातोद्धृततया योजनमात्रात् क्षेत्राद् दूरतः पलायितं रजो यस्मात् तद् भ्रष्टरजः एतदेव एकार्थिकद्वयेन प्रकटयति-११ उपशान्तरजः १२ प्रशान्तरजः १३ कुरुत, कृत्वा च १४ कुसुमस्य जातावेकवचनं कुसुमजातस्य १५ जानू-सेवप्रमाणमात्रम् १६ ओवेन - सामान्येन सर्वत्र योजनपरिमण्डले क्षेत्रे १७ वर्ष वर्षत, किंविशिष्टस्य कुसुमस्य १ इत्याह- १८ जलजं च स्थलजं च जलजस्थलजम् - जलजं पद्मादि स्थलजं विचकिलादि भाखरं| दीप्यमानम् प्रभूतं - अतिप्रचुरम् ततः कर्मधारयः, भाखरं च तत् प्रभूतं च भाखरप्रभूतं जलजस्थलजं च तत् भाखरप्रभूतं च जलजस्थ Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । sisterस कालागुरुपवरकुन्दुरुक्कतुरुक्क धूवमघमघंतगन्धुद्भूयाभिरामं सुगन्धवैरगन्धियं गन्धर्वहिभूतं दिवं सुरवराभिंग प्रणजोरगं करेह कारवेह करिता य कारवेत्ता य विप्पामेव ऐयमाणत्तियं पचपह | लजभास्वरप्रभूतम् तस्य पुनः कथम्भूतस्य ? इत्याह-१ वृन्तेन - अधोवर्तिना तिष्ठतीत्येवंशीलं वृन्तस्थायि तस्य वृन्तस्थायिनः - वृन्तमधोभागे उपरि पत्राणीत्येवं स्थानशीलस्येत्यर्थः । २ दशानामधं पञ्च दशार्थं वर्णा यस्य तद् दशार्धवर्णं तस्य पञ्चवर्णस्येति ५ भावः । इत्थम्भूतस्य च कुसुमजातस्य वर्ष वर्षित्वा ततः योजन परिमण्डलं क्षेत्रं ६ दिव्यं प्रधानं ७ सुरवराभिगमनयोग्यं ८ कुरुत । इत्यत आह-३ कालागुरुः प्रसिद्धः प्रवरः - प्रधानः कुन्दुरुक्क :- चीडा तुरुकं - सिल्हकम् कालागुरुथ प्रवरकुन्दुरुकतुरुक्कौ च कालागुरुप्रवरकुन्दुरुक तुरुक्काः तेषां धूपस्य यो मघमघायमानो गन्धः उद्भूतः - इतस्ततो विप्रसृतस्तेनाभिरामं रमणीयं कालागुरुपवरकुन्दुरुक्कतुरुक धूपमघमवायमानगन्धोद्धूताभिरामम् तथा ४ शोभनो गन्धो येषां ते सुगन्धास्ते च ते वरगन्धाश्च - वासाः सुगन्धवरगन्धास्तेषां गन्धः सोऽस्यास्तीति सुगन्धवरगन्धिकम् "अतोऽनेकखरात्" [७-२-६ हैमश० ] इति 'इक' प्रत्ययः, अत एव ५ २० गन्धवर्त्तिभूतम् - सौरभ्यातिशयात् गन्धद्रव्यगुटिकाकल्पमिति भावः, न केवलं स्वयं कुरुत किन्त्वन्यैरपि ९ कारयत १० कृत्वा च कारयित्वा च १२ एताम् आज्ञप्तिकां ११ क्षिप्रमेव - शीघ्रमेव १३ प्रत्यर्पयत - यथोक्तकार्यसम्पादनेन सफलां कृत्वा निवेदयत । १ कुन्दरुक्कः - पा० ५। कुन्दरुक्कतुरुक्क चीडाभिधं गन्धद्रव्यविशेषः - भा० १। Jain Educationternational ॥५५॥ Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥५६॥ Jain Education [१९] ए से आभियोगिया देवा सूरिया भेणं देवेणं एवं वृत्ता समाणा हेतुट्ठ - जाब- हियया कयलपरिग्गहियं सनहं सिरसावत्तं मत्थेए अञ्जलिं केहु एवं देवो ! तहत्ति आणाएं' विएणं वैयणं पडिसुन्ति, 'एवं देवो तहत्ति आणाएं' चिणएणं वयणं परिसुणेत्ता उत्तरपुरस्थिमं दिसिभागं अवमन्ति, उत्तरपुरत्थिमं दिसिभागं अवकमित्ता वेडव्विर्थसमुग्धाएवं समोहण्णन्ति समोहणित्ता संखेजाई जोयणाई देंण्डं [१९] १ ततो 'णं' इति पूर्ववत् २ ते आभियोगिका देवाः ३ सूर्यामेण देवेन ४ एवमुक्ताः सन्तः ५ ' हट्टतुट्ठ-जाव हियया' इति, अत्र 'यावत्' शब्दकरणात् [ पृ० ४३ टिप्पण १०] इति द्रष्टव्यम् । १० द्वयोर्हस्तयोरन्योऽन्यान्तरिताङ्गुलिकयोः सम्पुटरूपतया यदेकत्र मीलनं सा अञ्जलिः ताम् ६ करवलाभ्यां परिगृहीता - निष्पादिता करतलपरिगृहीता ताम् ७ दश नखा यस्यां एकैकस्मिन् हस्ते नखपञ्चकसम्भवात् दशनखा ताम् तथा ८ आवर्त्तनमावर्त्तः शिरस्यावर्त्तो यस्याः सा शिरस्यावर्त्ता - 'कण्ठे काल:' 'उरसिलोमा' इत्यादिवत् अलुक्समासः - ताम् अत एवाह-९ मस्तके ११ कृत्वा १३ विनयेन १४ वचनं सूर्याभस्य देवस्य १५ प्रतिशृण्वन्ति- अभ्युपगच्छन्ति । कथम्भूतेन विनयेन ? इत्याह- १२ 'हे देव ! एवं यथैव यूयमादिशत तथैवाज्ञया = भवदादेशेन कुर्मः १० इत्येवंरूपेण | 'देवो' इत्यत्र ओकारः आमन्त्रणे प्राकृतलक्षणवशात् यथा 'अजो !' इत्यत्र । १६ प्रतिश्रुत्य वचनम् १७ उत्तरपूर्वदिग्भागम् ईशानकोणमित्यर्थः, तस्यात्यन्तं प्रशस्तत्वात् १८ अपक्रामन्ति गच्छन्ति अपक्रम्य च १९ वैक्रियसमुद्घातेन वैक्रियकरणाय प्रयत्नविशेषेण २० समवहन्यन्ते समवहता भवन्तीत्यर्थः समवहताश्वात्मप्रदेशान् दूरतो विक्षिपन्ति, तथा चाह - २२ दण्ड इव दण्ड:X एतानि त्रीणि अञ्जलेविशेषणानि गच्छन्ति अपक्रम्य पा० ५-४ । भा० १ = भगवदा - भा० २ । tional आभियोगिकानां श्रीमहावीरं प्रति गमनम् w.jainelibrary.org Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥५७॥ निस्सिरंति, तंजहा-रयणाणं वयराणं वेरुलियाणं लोहियक्खाणं मसारगल्लाणं हंसगम्भाणं पुलंगाणं सोगन्धियाणं जोईरसाणं अञ्जणाणं अञ्जणपुलंगाणं रययाणं जायसवाणं अडाणं फलिहाणं रिहाणं अहाबायरे पुग्गले परिसाडंति परिसाडित्ता अहासुहमे पुग्गले परियायंति परियाइत्ता दोचं पि वेउब्वियसमुग्घाएणं समोहण्णंति समोहणित्ता उत्तरवेवियाई ख्वाइं विउबंति ऊर्ध्वाध आयतः शरीरबाहल्यो जीवप्रदेशसमूहस्तं शरीराद् बहिः २१संख्येयानि योजनानि यावत् १ निसृजन्ति-निष्काशयन्ति, नि-५ सृज्य तथाविधान् पुद्गलानाददते । एतदेव दर्शयति, तद्यथा २-रत्नानाम्-कर्केतनादीनाम् ३ वज्राणाम् ४ वैडूर्याणाम् ५ लोहिताक्षाणाम् ६ मसारगल्लानाम् ७ हंसगर्भाणाम् ८ पुलकानाम् ९ सौगन्धिकानाम् १० xज्योतीरसानाम् ११ अञ्जनानाम् १२ अञ्जनपुलकानां १३ रजतानाम् १४ जातरूपाणाम् १५ अङ्कानाम् १६ स्फटिकानाम् १७ रिष्टानाम् १८ योग्यान् यथाबादरान् १९असारान् पुद्गलान् २० परिशातयन्ति २१ यथासूक्ष्मान् २२-सारान् पुद्गलान् २३ पर्याददते पर्यादाय च चिकीर्षितरूपनिर्माणार्थ २४द्वितीयमपि वारं वैक्रिय समुद्घातेन २५समवहन्यन्ते, समवहत्य च यथोक्तानां रत्नादीनाम् अयोग्यान् यथावादरान् पुद्गलान १० परिशातयन्ति यथासूक्ष्मानाददते आदाय च ईप्सितानि २६ उत्तरवैक्रियाणि २७ विकुर्वन्ति ननु रत्नादीनां प्रायोग्याः पुद्गला औदारिकाः, उत्तरक्रियरूपयोग्याश्च पुद्गला ग्राह्या वैक्रियास्ततः कथमेवमुक्तमिति ? उच्यते, इह रत्नादिग्रहणं सारतामात्रप्रतिपादनार्थम् नतु 'रत्नादीनामेव' परिग्रहार्थम् ततो रत्नादीनामिवेति द्रष्टव्यमिति न कश्चिद् दोषः। अथवा औदारिका अपि ते गृहीताः सन्तो x ज्योतीरत्नानाम्-पा० ५-४ भा० १ । * समुद्घट्टनेन-पा०५-४ मा० २। -नां योग्याना य-पा० ५-४ भा० १। 8 तैः-मु० पु०। For Private Personal use only mainelibrary.org Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥५८॥ विउवित्ता ताए उक्किट्ठाए तुरियाए चवलाए चंडाए जणाए सिग्याए उदध्याए दिखाए देवगैईए"तिरिय असंखेजाणं दीवसमुद्दाणं मैज्झमज्झेणं पीईवयमाणे वीईवयमाणे जेणेव जंबुद्दीवे दीवे जेणेव भारहे वासे जेणेव आमलकप्पा णयरी जेणेव अंबसालवणे चेतिए जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छंति, तेणेव उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिण करेंति वंदति नमसंति वंदित्ता नमंसित्ता एवं वदासिअम्हे णं भंते! सूरियाभस्स देवस्स आभियोगा देवा देवाणुप्पियाणं वंदामो णमंसामो सकारेमो सम्माणेमो वैक्रियतया परिणमन्ते, पुद्गलानां तत्तत्सामग्रीवशात् तथातथापरिणमनस्वभावत्वात् अतोऽपि न कश्चिद्दोषः । १तत एवमुत्तरवैक्रियाणि रूपाणि कृत्वा २ तया देवजनप्रसिद्धया ३ उत्कृष्टया प्रशस्तविहायोगतिनामोदयात् प्रशस्तया ४ शीघ्रसञ्चरणात् त्वरितया त्वरा सञ्जाता अस्या इति त्वरिता ५ तया +प्रदेशान्तराऽऽक्रमणमिति चपला तया ६ xक्रोधादविमृश्येव श्रमासंवेदनात् चण्डेव चण्डा तया ८ निरन्तरं शीघ्रत्वगुणयोगात् शीघ्रा तया शीघ्रया ७ परमोत्कृष्टवेगपरिणामोपेता जवना तया ९ वातोद्धृतस्य दिगन्तव्यापिनो रजस इव या गतिः सा उद्धृता तया १० दिव्यया-दिवि देवलोके भवा दिव्या तया ११ देवगत्या १२ तिर्यग् १३असंख्येयानां १० द्वीपसमुद्राणां १४ मध्यंमध्येन-मध्येनेत्यर्थः । अवपतन्तोऽवपतन्तः-समागच्छन्त इति भावः, पूर्वान् द्वीपसमुद्रान् व्यतिक्रामन्तो व्यतिक्रामन्तः उल्लङ्घयन्त इत्यर्थः। शेषं सुगमं यावत+ प्रदेशान्तराक्रमेणमिति-भा० १। त्वरितगत्या हि प्रदेशान्तराक्रमणं भवति इति त्वरितगतिरेव 'चपला' शब्देन विशेष्यते इति भावो गम्यते। x क्रोधादिव श्रमा-भा०२। क्रोधाविष्टस्येव श्र-मु० पु०।- पृ०४१ टिप्पण ८। Jain Education Intel and www.nelibrary.org Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इयं। आभियोगिकान् प्रति श्रीमहावीरस्य उक्तिः ॥५९॥ कल्लाणं मगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामो।। [२०] *देवाइ समणे भगवं महावीरे ते देवे एवं वदासी-पोरोणमेयं देवा! 'जीयमेयं देवा! किच्चमेयं देवा! १४देवादियोगात् देवादिः श्रमणो भगवान् महावीरः २ तान् देवान् ३ एवमवादी-४पुराणेषु भवं पौराणमेतत् कर्म भो देवाः | चिरन्तनैरपि देवैः कृतमिदं चिरन्तनान् तीर्थङ्करान् प्रतीति तात्पर्यार्थः । देयमेतद् वन्दनादिकं तीर्थकृद्भयो भो देवाः! * देवा य समणे भा० २। + नाय पाठः पा० ३। परंतु केनचिद् वाचकेन तत्प्रतिकणिकायां लिखितः । Xअत्र विवरणकारः 'देवाइ' इत्येवंरूपं मूलपाठं दृष्ट्वा "देवादियोगात् देवादिः" इति तद्वयाख्यानं करोति। अनेन विवरणेन ‘देवादिः इति पदं 'श्रमणो भगवान् ' इत्यस्य विशेषणभूतं जायते परंतु 'देवादियोगात् देवादिः' इति व्याख्याय विवरणकारः भगवतो महावीरस्य कमभिनवं विशेष ज्ञापयति इति न सम्यग अवगम्यते। 'देवेषु आदिरूपः योगो यस्य अर्थात् सर्वेषु देवेषु आदिभूतो भगवान्' इत्यर्थोऽभिप्रेतस्तदा संगतिर्भवेत् । परंतु नायमर्थः प्रासादिकः । मदभिप्रायेण तु 'देवा इ' इति पदद्वयम् । तस्यार्थस्तु 'देवा'-'हे देवाः' 'इ'-'इति' संबोध्य भगवान् तान् देवान् एवमुवाच । 'इ' शब्दः 'इति-इइ-इअ-ई' एतत्क्रमेण 'इति' शब्दस्य रूपान्तरम् । एवंप्रकारा वाक्यरचना अन्यत्रापि समायाता। यथा "गोयमा इ समणे भगवं महावीरे भगवं गोयम एवं वयासी" [व्याख्याप्रज्ञप्ति द्वि० श० उ० १ स्कन्दक] अर्थात् “गोयमा'-'गौतम !' 'इ'-'इति संबोध्य' श्रमणो भगवान् महावीरः भगवन्तं गौतमम् एवम् अवादीत्" । व्याख्याप्रज्ञप्तिटीकाकृता श्रीमता अभयदेवसूरिणाऽपि मदभिप्राय एव समर्थितः । तथाहि- गोयमा इ' त्ति गौतम ! इति एवम् , आमन्त्र्य इति शेषः”। अतः 'देवा इ'इति पदद्वयमेव सुसंगतम् । 8 मूलपाठे 'पोराणमेयं देवा ! इति पाठानन्तरम् ‘जीयमेयं देवा !' इति पाठः सर्वेषु अपि मूलप्रतिपुस्तकेषु लभ्यते परंतु टीकाप्रतिपुस्तकेषु क्यापि तत्पाठविवरण न लब्धम् । टीकाप्रतिपुस्तकेषु सर्वेष्वपि 'पोराण'-इत्यादिपाठविवरणानन्तरम् 'देयमेतद् वन्दनादिकम्' इत्येव पाठो लन्धः इति । Jain Educati onal For Private Personel Use Only Pww.jainelibrary.org Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इय। करणिजमेयं देवा ! आचिन्नमेयं देवा ! अन्भणुण्णायमेयं देवा ! जं णं भवेणवइ-वाणमंतर-जोइसिय-वेमाणिया देवा अरहते भगवंते बंदति नसंसंति वंदित्ता नमंसित्ता तओ साइं साइं णामगोयाई =साधिति तं| पोराणमेयं देवा ! जाव अब्भणुण्णायमेयं देवा ।। ॥६०॥ ३ यतोऽभ्यनुज्ञातमेतत् सर्वैरपि तीर्थकृभिर्भो देवाः। ततः कत्तव्यमेतद् युष्मादृशां भो देवाः ! एतदेव व्याचष्टे-१ करणीयमेतद् भो देवाः! २ आचीर्ण : मेतत् कल्पभूतमेतद् भो देवाः! किं तत् ? इत्याह-४ 'जंग'इत्यादि, यत् 'ण' इति पूर्ववत् ५ भवनपति-व्यन्तरज्योतिष्क-वैमानिका देवाः६ अर्हतो भगवतो ७ वन्दन्ते नमस्यन्ति, वन्दित्वा नमस्यित्वा च पश्चात् ८ स्वानि स्वानि-आत्मीयानि आत्मीयानि नामगोत्राणि ९ कथयन्ति, ततो युष्माकमपि भो देवाः! १० पौराणमेतत् यावत्-आचीर्णमेतदिति । ___ = साविति पा० १-२ । * अत्रापि मूलपाठ-विवरणकारलब्धमूलपाठयोर्भेदः । स च यथा-मूले 'किच्चमेयं देवा ! करणिज्जमेयं देवा! आचिन्नमेयं देवा ! अब्भणुण्णायमेयं देवा !' इति पाठक्रमः । विवरणे तु 'किच्चमेयं' इति पाठो न व्याख्यातः किन्तु 'करणिज्जमेय' इति पाठव्याख्यानात् पूर्वमेव 'अब्भगुण्णायमेयं' इति पाठविवरणम् , तदनन्तरं 'करणिज्जमेय इत्यस्य विवरणम् । तदनन्तरं च 'आचिन्नमेयं' इत्यस्य विवरणम् । १० तात्पर्य तु न भियते। केवलं शब्दानुपूर्वी विभिन्ना। विवरणकारलब्धमूलपाठानुसारी पाठ एवं कल्पनीयः-पोराणमेयं देवा! देयमेयं देवा ! अब्भगुण्णायमेयं देवा ! करणिज्जमेयं देवा! आचिण्णमेयं देवा! | 0 -मेतत् भो देवाः-पा० ५-४ । भा०१। Jain Education manal For Private Personel Use Only wwwjainelibrary.org Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। [२१] तए णं ते आभिओगिया देवा समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्ता समाणा हह जाव हियया आभियोसमणं भगवं महावीरं वन्दन्ति णमंसंति वन्दित्ता णमंसित्ता उत्तरपुरस्थिमं दिसीमागं अवकमंति अवक्षमित्ता। गिका देवा वेउब्वियसमुग्याएणं सनोहण्णन्ति समोहणित्ता संखेजाई जोयणाई दण्डं निस्सिरंति। तं जहा-रयणाणं जाव श्रीमहावीर[कण्डिका १९५०५] रिहाणं अहाबायरे पोग्गले परिसाडंति अहाबायरे परिसाडित्ता दोचं पि वेउब्वियसमुग्धा- |स्य सर्वतः एणं समोहण्णन्ति समोहणित्ता संवद्द्यवाए विउव्वन्ति । से जहानामए भइयेदारए सिया तरुणे समन्तात् स्थलं प्रमा[२१] १ 'तए णं इत्यादि सुगमम् २ स वक्ष्यमाणगुणो ३ यथानामकोऽनिर्दिष्ट नामकः कश्चिद् ४ भृतिकदारकः-भृति करोति जयन्ति भृतिका-कर्मकरः तस्य दारको भृतिकदारकः ५ स्यात् , किंविशिष्टः ? इत्याह-६तरुणः प्रवर्धक मानवयाः आह-दारकः प्रवर्धमानवया एव भवति ततः किमनेन विशेषणेन ? न, आसन्नमृत्योः प्रवर्धमानश्यस्त्वाभावात् , न ह्यासन्नमृत्युः प्रवर्धमानवया भवति, न च तस्य ॥६ ॥ 0 ततः ते आभियोगिका देवाः श्रमणेन भगवता महावीरेण एवम् उक्ताः सन्तः हृष्ट यावत् हृदयाः। [पृ० ४३ टिप्पण १०] श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दन्ते नमस्यन्ति वन्दित्वा नमस्यित्वा उत्तरपौरख्यं दिग्भागं अपनामन्ति अपक्रम्य वैकुर्विकसमुद्घातेन समवहन्यन्ते समवहत्य संख्ये-180 यानि योजनानि दण्डं निसृजन्ति। तद् यथा-रत्नानां यावत् रिष्टानाम् [कण्डिका १९ पं०५] यथाबादरान् पुद्गलान् परिशातयन्ति यथाबादरान् परिशात्य द्वितीयमपि वैकुर्विकसमुद्घातेन समवन्यन्ते, समवहत्य संवर्तकवातान् विकुर्वन्ति । 8 सर्वेषु मूलपाठ-आदर्शेषु कम्मारदारए। परन्तु विवरणकारेण 'भइअदारए' पाठो लब्धः स एव च व्याख्यात: नाम अर्थभेदः । मानवया एव-पा०४ भा०२। मानतया एव-भा०१। lain Educationterona For Private & Personel Use Only Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥६२॥ बेलवं जुगवं जुवाणे : अप्पायंके थिरेग्गर हत्थे दर्दपाणिपायपिट्ठन्तरो+रुपरिणए धैणनिचियवट्टवलियखंधे चम्मेदुघणमुट्ठियस माहयगत्ते उरस्सबलसमन्नागए | विशिष्टसामर्थ्यसम्भवः आसन्नमृत्युत्वादेव, विशिष्टसामर्थ्यप्रतिपादनार्थचैव आरम्भस्ततोऽर्थवद् विशेषणम् । अन्ये तु व्याचक्षते - “इह यद् द्रव्यं विशिष्टवर्णादिगुणोपेतमभिनत्रं च तत् तरुगमिति लोके प्रसिद्धम् यथा - 'तरुणमिदमश्वत्थपत्रम्' इति । ततः स भृतिकदारकस्तरुण इति । किमुक्तं भवति ! - अभिनवो विशिष्टवर्गादिगुणोपेतश्च" इति १वलं- सामर्थ्यं तद् यस्यास्तीति बलवान् । तथा २युगंसुषमदुष्पमादिकालः स स्वेन रूपेण यस्यास्ति न दोषदृष्टः स युगवान्, किमुक्तं भवति ? - कालोपद्रवोऽपि सामर्थ्यविघ्नहेतुः स चाय नास्तीति प्रतिपत्त्यर्थमेतद् विशेषणम् ३ युवा - यौवनस्थः युवावस्थायां हि बलातिशय इत्येतदुपादानम् । ४ अल्पशब्दोऽभाववाची, | अल्पः- सर्वथा अविद्यमान आतङ्की - ज्वरादिर्यस्य सोऽल्पातङ्कः । ५. स्थिरोऽग्रहस्तो यस्य स स्थिराग्रहस्तः । ६ दृढानि - अतिनिबिडचयापन्नानि पाणिपादपृष्ठान्तरोरूणि परिणतानि यस्य स दृढपाणिपादपृष्ठान्तरोरुपरिणतः । तथा ७ घनम् - अतिशयेन निचितौ - निबिड - तरचयमापन वलिताविव वलितौ वृत्तौ स्कन्धौ यस्य स धननिचितवलितवृत्तस्कन्धः । ८ चष्टकेन दुधणेन मुष्टिकया च मुष्टया १० समाहत्य समाहत्य ये निचितीकृतगात्रास्ते चर्मेष्टकवणमुष्टिकसमाहत निचितगात्रः तेषामित्र गात्रं यस्य स चर्मेष्टकदुघणमुष्टिकसमा - हतनिचितगात्रः । ९ उरसि भवं उरस्यं तच्च तद् बलं च उरस्यबलं तत् समन्वागतः - समनुप्राप्तः उरस्यबलसमन्वागतः आन्तरोत्साह Jain Education Inmanal + अप्पायंके विरसंघयणे थिर- वि० बा० X हत्थे पडिपुण्णपाणि वि० बा० + -रुसंघाय परिणए वि० वा० । + "सुखादिदर्शनात् पाक्षिकः क्तान्तस्य परनिपातः” राय०वि० पृ० ४८ * टिप्पण www.ainelibrary.org Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । | तलर्जमलजुयल बाहू लंङ्कणपवणजवणपमद्दणसमत्थे छेए देखे पट्टे कुसले मेधावी णिउणसिप्पोवगए एंगे महं | सलागाहैत्थगं वा दण्डेसं पुच्छणिं वा वेणुसंलागिगं वा गहायें रायङ्गेणं वा रायंतेपुरं वा देवकुलं वा सभं वा पैवं वीर्ययुक्त इति भावः । १ तलौ - तालवृक्षौ तयोर्यमलयुगलं- समश्रेणीकं युगलं तलयमलयुगलं तद्वदतिसरलौ पीवरौ च बाहू यस्य स तलयमल युगलबाहुः । २लङ्घने - अतिक्रमणे, प्लवने- मनाक् पृथुतरविक्रमवति गमने, जवने- अतिशीघ्रगतौ प्रमर्दने - कठिनस्यापि वस्तुनथूर्णकरणे समर्थः लङ्घन - प्लवन - जवन-प्रमर्दनसमर्थः । क्वचित् 'लंघणपवणजवणवायामणसमत्थे' इति पाठः, तत्र व्यायामनेव्यायामकरणे इति व्याख्येयम् । ३ छेको- द्वासप्ततिकलापण्डितः । ४ दक्षः - कार्याणामविलम्बितकारी । ५ प्रष्ठो - वाग्मी । ६ कुशलः सम्यक्क्रियापरिज्ञानवान् । ७ नेधावी परस्पराव्याहतपूर्वापरानुसन्धानदक्षः, अत एव ८ निपुणं यथा भवति एवं शिल्पं-क्रियासु कौशलं उपगतः - प्राप्तो निपुणशिल्पोपगतः । ९एक १० महान्तं ११ शलाकास्तकं - सरित्पर्णादिशलाकासमु दायं सरित्पर्णादिशलाकामयीं | सम्मार्जनीमित्यर्थः । ' वा 'शब्दो विकल्पार्थः । १२दण्डयुक्ता = सम्पुंसनी - सम्मार्जनी दण्डसम्पुंसनी तां वा । १३ वेणुः - वंशस्तस्य शलाका | वेणुशलाकास्ताभिर्निर्वृत्ता वेणुशलाकिकी - वेणुशलाकामयी सम्मार्जनी तां वा १४ गृहीत्वा १५ राजाङ्गणं वा १६ राजान्तःपुरं वा १७ देवकुलं वा १८सभां वा सन्तो भान्त्यस्यामिति सभा - ग्रामप्रधानानां नगरप्रधानानां वा यथासुखमवस्थान हेतुर्मण्डपिका - तां वा १९ प्रपां वा * उफलिहनिभवा- वि० बा० । * स्तकं परित्पर्णादि - पा० ५ । - स्तकं सूरित्पर्णादि - भा० २ । -स्तक सुरित्पर्णादि - भा० १ । 8 अत्र 'सरित्पर्ण' शब्दः कम गमयति इति नावगम्यते । 'सरित्पर्ण' स्थाने 'श्रीपर्णी संभवेत् ? । दायं शरित्यर्णादि- पा० ५। = सम्पुच्छनी मु०पु० । Jain Educatic International ॥६३॥ w.jainelibrary.org Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । वा औरानं वा उज्याणं वा अतुरियं अचवलं असंभन्तं निरंतरं सुनिउण सव्वतो समन्ता संपम जेज्जा, एवामेव | तेवि सूरियाभस्स देवस्स आभिओगिया देवा संवयवाए विउव्वंति, विउव्वित्ता समणस्स भगषओ महावीरस्स सव्यतो समंता जोयणपरिमण्डलं जं किंचि तणं वा पत्तं वा तहेव सव्वं आहुणिय आहुणिय ऐगते एडेंति एडित्ता खिप्पामेव उवसमन्ति । [कण्डिका १८ पं०५] ॥६४॥ पानीयशाला वा १ आगत्यागत्य भोगपुरुषा वरतरुणीभिः सह यत्र रमन्ते-क्रीडन्ति स आरामो नगरान्नातिदूरवर्ती क्रीडाश्रयः तरु-14 खण्डः तम् २ ऊर्व विलम्बितानि प्रयोजनाभावात् यानानि यत्र तद् उद्यानं-नगरात् प्रत्यासन्नवर्ती यानवाहनक्रीडागृहाथाश्रयस्तरुखण्डः तद् वा । ३ अत्वरितम् ४ अचपलम् ५ असम्भ्रान्तम् त्वरायां चापल्ये सम्भ्रमे वा सम्यकचवराधपगमासम्भवात् । ६ निरन्तरं न वपान्तरालमोचनेन, ७ सुनिपुणं श्लक्ष्णस्याप्यचोक्षस्यापसारणेन ८ सर्वतः-सर्वासु दिक्षु ९समन्ततः-सामस्त्येन १०सम्प्रमार्जयेत् । ११ 'एवमेव' इत्यादि सुगमं यावत्-'खिप्पामेव पच्चुवसमंति' इत्यादि । १२ एकान्ते तृणकाष्ठाद्यपनीय १३ क्षिप्रमेवशीघ्रमेव १४ । प्रत्युपशाम्यन्ति प्रत्येकं ते आभियोगिका देवाः उपशाम्यन्ति -संवर्गकवायुविकुर्वजानिवर्तन्ते संवर्तकवातमुपसंहरन्तीति भावः। ० मूले तु उवसमन्ति, टीकायाम् 'प्रति'अधिकः । Jan Education For Private Personel Use Only Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। [२२] दोचं पि वेउव्वियसमुग्याएणं समोहण्णन्ति, समोहणित्ता अभवद्दलए 'विउध्वन्ति । से जहाणामए| आभियो भइगदारगे सिया तरुणे [कण्डिका २१५०५] जाव-सिप्पोक्गए एग महं दगवारगं वा दंगकुम्भगं वा दगथार्लंग गिका देवाः वा देगकलसगं वा गहाय आराम वा जाव [पृ०६३ पं० २] पवं वा अतुरियं जाव सव्यतो समंता आरिसेजा, सुरभिगएवामेव तेवि सूरियाभस्स देवस्स आभियोगिया देवा अब्भबद्दलए विउव्वंति विउवित्ता खिप्पामेव पतणत- न्धोदक णायन्ति पतणतणाइत्ता खिप्पामेव विज्जुयायंति विज्जुयाइत्ता समणस्स भगवओमहावीरस्स सव्वओ समन्ता वर्षन्ति [कं०१८ पं०५] जोयणपरिमण्डलं णचोदगं णातिमट्टियं तं पविरलपप्फुसियं रयरेणुविणासणं दिव्वं सुरभिगन्धो. ___ [२२] १ संवर्तकवातविकर्वगार्थ हि यद् वेलाद्वयमपि वैक्रियसमुद्घातेन समयहननं तत् किलैकम् इदं तु अभ्रवादलकविकुर्वणार्थ ॥६५॥ द्वितीयमत उक्तम्-द्वितीयमपि वारं २ वैक्रियसमुद्घातेन समवहन्यन्ते समवहत्य च ३ अभ्रवादलकानि विकुर्वन्ति वाः पानीयं तस्य दलानि वार्दलान्येव वादलकानि मेघा इत्यर्थः अपो विभ्रतीति अन्भ्राणि-मेघाः-आकाशमित्यर्थः, अन्ध्र वादलकानि अन्भ्रवादलकानि तानि ४विकुर्वन्ति-आकाशे मेघान् विकुर्वन्तीत्यर्थः। ५ से जहानामए भइगदारगे सिया' इत्यादि पूर्ववत् यावत् [कंडिका २१५०५] १० 'निउणसिप्पोवगए एग महं' इत्यादि-स यथानामको भृतिकदारकः ६एकं महान्तम् दकवारकं वा मृत्तिकामयभाजनविशेषम् ७ दकघटम् ८दकस्थालकं वा-कंसादिमयमुदकभृतं भाजनं ९ दककलशं वा-उदकभृतं भृङ्गारम् १० आवर्षे आ-समन्तात् सिञ्चेत् । ११ 'पतणतणायति' अनुकरणवचनमेतत्-प्रकर्षण स्तनितं कुर्वन्तीत्यर्थः, १२ प्रकर्षण विद्युतं विदधति । 8"अब्भ्राणि सन्ति अस्मिन् इति “अनादिभ्यः" [७-२-४६ हैमश०] इति मत्वर्थीयः 'अ' प्रत्ययः"-राय० विवा Jain Educ a tional For Private Personal Use Only Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण आभियो इयं। गिकाः पुष्पवृष्टिं कुर्वन्ति ॥६६॥ दगं वासं वासंति वासेत्ता णिहयरयं णहरयं भट्टरयं उवसंतरयं पसंतरयं करेंति, करित्ता खिप्पामेव उवसामन्ति । [२३] तचं पि वेउब्वियसमुग्घाएणं समोहण्णन्ति पुप्फबद्दलए विउव्वन्ति । से जहाणामए मालागारदारए |सिया तरुणे जाव [कण्डिका २१५०५]-सिप्पोवगए एग महंxपुप्फछजियं वा पुफपडलगं वा -पुप्फचङ्गेरियं वा| गहाय रायङ्गणं वा जाय [कण्डिका २१ पं०९] सव्वतो समंता केयग्गहगहियकरयलपब्भट्ठविप्पमुक्केणं दसद्धवन्नेणं कुसुमेणं मुक्कपुप्फजोवयारकलित करेजा, एवामेव ते सूरियाभस्स देवस्स आभिओगिया देवा पुप्फव. दलए विउव्वन्ति खिप्पामेव पतणतणायन्ति जाव जोयणपरिमण्डलं जलयथलयभासुरप्पभूयस्स [कण्डिका| [२३] १ पुष्पवृष्टियोग्यानि वादलकानि पुष्पवादलकानि-पुष्पवर्षकान् मेघान् विकुर्वन्तीति भावः। २ एका महती ३ छाद्यतेउपरि स्थग्यते इति छाद्या छायैव छाधिका पुष्पै ता छाधिका पुष्पछाधिका तां वा। ४ पटलकानि-प्रतीतानि। ५ इह मैथुनसंरम्भे यद् युवतेः केशेषु ग्रहणं स कचग्रहस्तेन गृहीतं कचग्रहगृहीतम् तथा करत लाद् विप्रमुक्तं सत् प्रभ्रष्टं करतलप्र*भ्रष्टवि० प्रमुक्तम् तेन । x पा० ३ प्रतौ नैष शब्दः । पुष्फछज्जियं पुप्फपत्थियं इत्यविकः पाठः पा० २। पुफपत्थियं-पुष्पप्रस्थिकाम् पुष्पपात्रिकाम् इत्यर्थः संभाव्यते । = पा०१ प्रतौ नैष पाठः । लाद् विमु-पा० ५-४ भा० १। *-भ्रष्टविमु-पा० ५-४ भा० १ ० "प्राकृतत्वात् = पदव्यत्ययः ततो विशेषणसमास:"-राय० विव० । ='भ्रष्ट'-'विप्रमुक्त पदयोर्व्यत्ययः । Jain Educat i onal For Private Personal Use Only w.jainelibrary.org Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । १८ पं०१०] बिंदट्ठाइस्स दसद्धवन्नकुसुमस्स जाणुस्सेहपमाणमेत्ति +ओहिं वासन्ति वासित्ता कालागुरुपवरकुन्दुरुक्कतुरुकधूवमघमघन्तगन्धुद्धयाभिरामं कण्डिका १८ पं० ११] सुगंधवरगन्धियं गन्धवहिभूतं दिव्वं सुरवराभिगमणजोग्गं करेंति य कारवेंति य करेत्ता य कारवेत्ता य खिप्पामेव उवसामन्ति । [२४] जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छन्ति तेणेव उवागच्छित्तासमणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो जाव वन्दित्ता नमंसित्ता सनणस्स भगवओ महावीरस्स अन्तियातो अम्बसालवणातो चेइयातो पडिनिक्ख.५ ॥६७।। मन्ति पडिनिक्खमित्ता ताए उनिहाए [कण्डिका १९ पं०९] जाब वीइवयमाणा वीइवयमाणा जेणेव सोहम्मे कप्पे जेणेव सूरियाने विमाणे जेणेव सभा सुहम्मा जेणेव सूरियामे देवे तेणेव उवागच्छन्ति सूरियाभं देवं करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अञ्जलिं कह जेएणं विजएणं वद्धाति वद्धावेत्ता तमाणत्तियं पंचप्पिणन्ति । [२४] शेषं सुगम यावत् १ 'जएणं विजएणं वद्धाति'-जयेन विजयेन वर्धापयन्ति-जय त्वं देव ! विजयख त्वं देव ! इत्येवं वर्धापयन्ति-इत्यर्थः । तत्र जयः-परैरनभिभूयमानता प्रतापवृद्धिश्च विजयस्तु-परेषामसहमानानामभिभवोत्पादः, २ वर्धापयित्वा १० च ३ तां पूर्वोक्तामाज्ञप्तिका ४ प्रत्यर्पयन्ति-आदिष्टकार्यसम्पादनेन निवेदयन्तीत्यर्थः। + विवरणकारेण 'ओहिं' शब्दस्य विवरणं 'ओघेन' इत्येवं कृतम् [पृ० ५४ पं० १२] तथापि 'ओहिं' इत्यस्य विवरणम् 'अवधिम्' इति समुचितं भाति। Jain Educato Interational For Private & Personel Use Only dow.jainelibrary.org Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥६८॥ । [२५] तए णं से सूरियाभे देवे तेसि आभियोगियाणं देवाणं अंतिए ऐयमढे सोचा निसम्म हट्टतुट्ठ-जाव [कं० सूर्याभस्य १३ पं०२]-हियए पायत्ताणियाहिवइं देवं सद्दावेति सद्दावेत्ता एवं वदासी स्वपदात्यखिप्पामेव भो! देवाणुप्पिया! सूरियाभे विमाणे सभाएं सुहम्माए "मेघोघरसियगंभीरमारसई जोयणप नीकाधिरिमण्डलं -संसरं घंटे तिखुतो उल्लालेमाणे उल्लालेमाणे महया महया सद्देणं उग्घोलेमाणे उग्घोसेमाणे एवं पति प्रति xवयाहि- ओणवेति गंभो! सरियामे देवे गछति णं भो! सरियाभेदेवे जाहीवे दीवे मारहे वासे आमलक-५ आदेशः [२५]१ततो '' इति पूर्ववत् २स सूर्याभो देवः ३तेषाम् आ-समन्तादाभिमुख्येन युज्यन्ते-प्रेष्यकर्मसु व्यापार्यन्ते इत्याभियोग्या:आभियोगिका इत्यर्थः तेपामाभियोग्यानां देवानाम् अन्तिके-समीपे ४ एनम्-अनन्तरोक्तमर्थ ५ श्रुत्वा श्रवणविषयं कृत्वा श्रवणानन्तरं च निशम्य-परिभाव्य ६ पदात्यनीकाधिपति देवं ७ शब्दयति, शब्दयित्वा ८ एवमयादीत -९क्षिप्रमेव १०भो! देवानांप्रिय ! ११सभायां सुधर्मायां-सुधर्माभिधानायाम् १२मेघानामोध:-संघातो मेघौघस्तस्य रसितं-गजित तद्वद् गम्भीरो मधुरश्च शब्दो यस्याः सा मेघौधरसितगम्भीरमधुरशब्दा ताम् १३योजन योजनपमाणं परिमण्डलं पारिमाण्डल्यं यस्याः सा योजनपरिमण्डला ताम् १४सुस्वरां-२ सुस्वराभिधानां घण्टाम् १५उल्लालयन् उल्लालयन ताडयन ताडयन्नित्यर्थः, १६महता महता शब्देन १७उद्घोषयन्-उद्घोषणां कुर्वन् १८एवंञ्चद-१९'आज्ञापयति २०भोः २१सूर्याभो देवः यथा २२गच्छति २३भोः!२४सूर्याभो देवो २५जम्बूद्वीप २६भारतं वर्ष २७आ____ = सुस्सरं पा० ११ Xअयं पाठः भा०१ प्रतावेच लभ्यते तथापि अनेनैव च पाठेन मूलार्थसंगतिः । मुद्रितः 'बयासी' इति पाठस्तु भूतकालसूचका स चात्र न संगति गच्छति। अत्र तु आज्ञार्थसूचकस्यैव पाठस्योचितत्वम् ।+"गुणप्रधानोऽयं निर्देशः" राय० विव० । परिमण्डलम्-सर्वतः समन्तात् मण्डलाकारता-वृत्ताकारता। 8 वदति मु०पु०। Jan Educatio n al For Private Personal Use Only tjainelibrary.org Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । पाए णयरीए अंबसालवणे चेतिते समणं भगवं महावीरं : अभिवंदए, तुग्भेऽवि णं भो ! देवाणुप्पिया ! *सव्विड्डीऍ मलकल्पां नगरीम् ९ आम्रशालवनं चैत्यं २श्रमणं भगवन्तं महावीरं ३वन्दितुम् तत् तस्मात् ४यूयमपि देवानांप्रियाः । ५ सर्वद्वर्था - परि वारादिकया सर्वद्युत्या यथाशक्तिविस्फारितेन समस्तेन शरीरतेजसा सर्ववलेन समस्तेन हस्त्यादिसैन्येन सर्व समुदायेन - स्वस्वाभियोग्यादिसमस्तपरिवारेण, सर्वादरेण समस्तयावच्छक्ति ० मूलेन सर्वविभूत्या - समस्तस्वाभ्यन्तरवैक्रिय करणादिवाह्यरत्नादिसम्पदा सर्वविभूषया यावच्छक्तिस्फारोदारशृङ्गार करणेन 'सव्वसंभ्रमेणं' ति सर्वोत्कृष्टेन संभ्रमेण सर्वोत्कृष्टसम्भ्रमो नाम इह स्वनायकविषयव हुमानख्यापनपरा स्वनाय कोपदिष्टकार्य सम्पादनाय यावच्छक्तित्वरितत्वरिता प्रवृत्तिः 'सव्वपुष्पवत्थगंध मल्लालंकारेणं' अत्र गन्धा वासाः माल्यानि - पुष्पदामानि अलङ्काराः- आभरणविशेषाः 'सव्यदिव्वतुडियसह संनिनाएणं' इति सर्वाणि च तानि दिव्यतुडितानि च दिव्यत्र्याणि : 'अभिनंदए' इत्यस्य विवरणम् 'वन्दितुम्' इति कृतं विवरणकारण, अतः अभिनन्दए- अभिवन्दकः अत्र तुमर्थे 'णकच्' प्रत्ययो बोध्यः "क्रियायां क्रियार्थायां तुम् णकच् भविष्यन्ती” [५-३-१३ हैमश०] इति सूत्रं 'णकच' प्रत्ययविधायकम् । विवरणकारेण 'सव्विदूढीए' पदं व्याख्याय 'सर्वद्युत्या' 'सर्ववलेन' 'सर्व समुदायेन' 'सर्वादरेण' 'सर्वविभूत्या' 'सर्वविभूषया' 'सव्वसंभ्रमेणं' 'सव्वपुप्फत्रत्यगंधमलालंकारेणं' 'सव्वदिव्वतुडियसद्दसंनिनारणं' 'महताए इडीए' 'महताए जुईर' 'महता वरतुडितयमकसमकपटुपुरुषप्रवादितरवेण सङ्घ- पणव- पडह - मेरि झल्लरि - खरमुहि - हुडुक्क - मुरजमुइंग- बुंदुभिनिग्बो सनाइतर वेग' एतान्यपि पदानि कानिचित् सप्रतीकं व्याख्यातानि अतो ज्ञायते यत् विवरणकारप्राप्तमूलपाठे एतानि सर्वाण्यपि पदानि मूले एव अभूवन् । क्तितुलनेन भा० २ । “ततः समाहारो द्वन्द्वः ततः सर्वशब्देन सह विशेषणसमासः " राय०चिव० । Jain Education intentional ॥६९॥ w.jainelibrary.org Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण जाब-नाइतरबेण णियगपरिवालसद्धि संपरिबुडा साति सातिं जाणविमाणाई दुरूढा समाणा अकालपरिहीणं चेव सूरियाभस्स देवस्स अति पाउनबह'। इयं। ॥७ ॥ सर्वदिव्यतुडितानि तेषां शब्दाः सर्वदिव्यतुडितशब्दाः तेषामेकत्र मीलनेन यः सङ्गतेन नितरां नादो-महान् घोपः सर्वतडितदिव्यशब्दसन्निनादस्तेन । इह अल्पेष्वपि 'सर्व' शब्दो दृष्टः यथा-'अनेन सर्व पीतं घृतम्' इति तत आह-'महताए इड्डीए' इत्यादि महत्या यावच्छक्तितुलितया ऋद्ध्या परिवारादिकया, एवं 'महताए जुईए' इत्याद्यपि भावनीयं, तथा महता-स्फूर्तिमता वराणां-प्रधानानां तुडितानाम्-आतोद्यानां यमकसमकम्-एककालं पटुभिः पुरुषैः प्रवादितानां यो वस्तेन, एतदेव विशेपेणाचष्टे-१ संख-पणव-पडहमेरि-झल्लरि-खामुहि-हुडुक-सुरज-सुइंग-दुंदुभि-निग्घोसनाइतरवेण' शङ्ख:-प्रतीतः पणवो भाण्डानाम् पटहः प्रतीतः मेरी-ढक्का, झल्लरी-चौवनद्धा विस्तीर्णा वलयाकारा, खरमुही-काहला, हुडुक्का-प्रतीता, महाप्रमाणो मर्दलो मुरजः, स एव लघुर्मदङ्गः दन्दभिः-भेर्याकारा सङ्कटमुखी तासां निघोषो-महान् ध्वानो नादितं च-घण्टायामिव वादनोत्तरकालभावी सततध्वनिः तल्लक्षणो यो खस्तेन २ निजक:-आत्मीयः आत्मीयो यः परिवारस्तेन सार्द्धम् , ३ तत्र सहभावः परिवाररीतिमन्तरेणापि सम्भवति तत आह'संपरिवुडा' सम्यक्-परिवाररीत्या परिवृताः सम्परिवृताः ४ परिहानिः-परिहीनं कालस्य परिहीन कालविलम्ब इति भावः न विद्यते कालपरिहीनं यत्र प्रादुर्भव तत् *अकालपरिहीना-५ अन्तिके-समीपे ६ प्रादुर्भवत समागच्छतेति भावः । ०-मुरवुमु-पा० ५। -मुरखमु-भा० २। -मुरुवुमु-भा० १ । 8 "एतेषां द्वन्द्वः"-राय० विव० । * “क्रियाविशेषणमेतत्”. राय०विव० । ३-२० Jain Education meal For Private Personal Use Only Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । । ७१॥ [२६]तए णं से पायत्ताणियाहिवती देवे सूरियामेणं देवेणं एवं वुत्ते समाणे हट्टतुट्ठ जाव [सं०१३पं०२-हियए एवं देवो! तहत्ति आणाए विणएणं वयणं पडिसुणेति [कं०१९ पं०२] पडिसुणित्ता जेणेव सूरियामे विमाणे जेणेव सभा सुहम्मा जेणेव मेवोयरसियगम्भीरमहरसहा जोयणपरिमण्डला सुस्सरा घंटा तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता तं मेघोघरसितगम्भीरनारसदं जोयणपरिमंडलं सुसरं घंटं तिक्खुत्तो उल्लालेति। तेए णं तीसे मेघोघरसितगंभीरमहुरसदाए जोयणपरिमंडलाए सुसराए घंटाएँ तिक्खुत्तो उल्लालियाएं समाणीए से सूरियामे विमाणे पासायविमाणणिक्खुडावडियसवंटापडियासयसहस्ससंकुले जाए याविहोत्था। [२६] १ त्रिकृत्व:-त्रीन् बारान् २ उहालयति-ताडयति ३ ततः-8'ण' इति वाक्यालङ्कारे ४ तस्यां ५ मेघौधरसितगम्भीरमधुर-| शब्दायाम् ६ योजनपरिमण्डलायाम् ७ सुखराभिधानायाम् ८ घण्टायाम् ९ विकृत्वः १० ताडितायाम् ११ सत्याम् १२ यत् सूर्याभ विमानं १३ तत्मासादनिष्टेषु च ये आपतिताः शब्दाः-शब्दवर्गणापुद्गलास्तेभ्यः समुच्छलितानि यानि घण्टाप्रतिश्रुतां शतसहस्राणि-घण्टाप्रतिशब्दलक्षागि तैः-संगुलम् १५ अपि १४ जातम् १६ अभूत्-किमुक्तं भवति ?-घण्टायां महता प्रयत्नेन ताडितायां ये विनिर्गताः शब्दपुद्गलास्तत्प्रतियातवशतः रा दिक्षु विदिक्षु च* दिव्यानुभावतः समुच्छलितः प्रतिशब्दैः सकलमपि १० विमानमेकयोजनलक्षमानमपि बधिरितमुपजायत इति । एतेन 'द्वादशभ्यो योजनेभ्यः समागतः शब्दः श्रोत्रग्राह्यो भवति न परतः ततः कथमेकत्र ताडितायां घण्टायां सर्वत्र तच्छब्दश्रुतिरुपजायते ? इति यच्चोद्यते तदपाकृतमबसेयम् , सर्वत्र दिव्यानुभावतः तथारू 8 विवरणकारेण एतत् सूचनं वारंवारं कृतम् , तच्च अस्माभिः सर्वत्र न न्यस्तम् । * च शब्दानु-पा० ५। Jain Educationteational For Private Personal Use Only Pw.iainelibrary.org Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । तर णं तेसि सूरियाभविमाणवासिण यहणं वेमाणियाणं देवाण य देवीण य एगंतरइपसत्तनिचप्पमत्तविसयसुहनुच्छियाणं सुसरैघंटारवविउलयोलतुरियचवलपडिबोहणे कए समाणे घोसणकोउहलदिन्नकन्नएगग्गचित्तउवउत्तमाणसाणं से पायत्ताणीयाहिवई देवे तंर्सि घंटारवंसि णिसंतपसंतसि ॥७२॥ पपतिरूपप्रतिशब्दोच्छलने यथोक्तदोषासंभवात् ।। १ ततः २ तेषां सूर्याभविमानवासिना बहूनां वैमानिकदेवानां देवीनां च एकान्तेन सर्वात्मना रतौ-रमणे प्रसक्ता एकान्तरतिप्रसक्ता अत एव नित्यं-सर्वकालं प्रमत्ता नित्यपमत्ताः, कस्मादिति चेत् ? अत आह-विषयसुखेषु मूञ्छिता-अध्युपपन्ना विषयसुखमूञ्छिताः ततो नित्यप्रमत्ताः, तेषाम् ३ सुखराभिधानाया घण्टाया रवस्य यः सर्वासु दिक्षु विदिक्षु च प्रतिशब्दो. च्छलनेन विपुलः-सकलविमानव्यापितया विस्तीणों बोला-कोलाहलस्तेन त्वरितं-शीघ्र चपलं-आकुलं प्रतिबोधने कृते सति ४ 'कीदृग् नाम घोषणं भविष्यति'इत्येवं घोषणे कुतूहलेन दत्तौ कौँ यैस्ते घोषणकुतूहलदत्तकर्णाः तथा एकाग्रं-घोषणाश्रवणैकविषयं चित्तं येषां ते एकाग्रचित्ताः एकाग्रचित्तत्वेऽपि कदाचिदनुपयोगः स्यात् अत आह-उपयुक्तमानसाः ० तेषाम् ५ पदात्यनीकाधिपतिर्देवः ६ तस्मिन् घण्टारवे नितरां शान्तो निशान्तः-अत्यन्तमन्दीभूतस्ततः प्रकर्षण-सर्वात्मना शान्तः प्रशान्तः तस्मिन् 0 ततः पदत्रयस्य पदद्वयमीलनेन विशेषणसमासः"-राय० विव०। 0 ततः पूर्वपदेन विशेषणसमासः” राय० विव० । x “ततः Jan Education a l For Private Personal Use Only Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ५ ॥७३॥ महया महया सद्देणं उग्योलमाणे उग्रोसेमाणे एवं बदासी-हदै सुर्ण भवतो सरियाभविमाणवासियो बहवे माणिया देवा य देवीओ य सूरिया भविनाणवइणो वर्णणं हियनहत्थं-'आणवेणं भो! सूरिया मे देवे, भेच्छइणं भो! सूरिशमे देवे जंबूदीय दीयं भारहं वासं आमलकप्पं नयरी अंबसालवणं चेइयं समणं भगवं महावीरं अभिवंदर, तंतुम्भेऽपि णं देवाणुप्पिया! सब्बिड्डीए अकालपरिहीणा चेव सरियाभस्स देवस्स अन्तियं पाउभवह। १ महता महता शब्देन २ उद्घोषयन् ३ एवमवादी-४ 'हन्त इति हर्षे हर्षश्च स्वामिनाऽऽदिष्टत्वात् श्रीमन्महावीरपादवन्दनार्थ च प्रस्थानसमारम्भात् , ५ पृण्वन्तु ६ भवन्तो बहवः सूर्याभविमानवासिनो वैमानिकदेवा देव्यश्च ७ सूर्याभविमानपतेः ८ वचनं हितसुखार्थं हिनार्थ सुखार्थ चेत्यर्थः तत्र हितं जन्मान्तरेऽपि कल्याणावहम्-तथाविधकुशलम् सुख तस्मिन् भये निरुपद्रवता ९आज्ञापथति १० भोः! देवानांप्रियाः! ११ सूर्याभो देवो यथा १२ गच्छति भोः! सूर्याभो देवो १३ 'जम्बूद्वी द्वीपम्' इत्यादि | तदेव यावत् 'अन्तिके प्रादुर्भक्त' । [पृ०६८५०५] *'छिन्नप्ररूढः' इत्यादौ इब विशेषणसमासः"-राय० विव० । 8 "उक्तं च "हन्त* हर्षेऽनुकम्पायाम्" इत्यादि "-राय० विव० । = च समारम्भात् पा० ५-४। भा० १। पूर्व छिन्नः पश्चात् प्ररूढः 'छिन्नप्ररूढः तद्वत् अन निशान्त-प्रशान्तपदयोः समासः । * "हन्त हर्षेऽनुकम्पायां वाक्यारम्भविषादयोः"अमरकोशः नानार्थव० तु. कां० श्लो०२४३ । Jain Educatio n al For Private & Personel Use Only witjainelibrary.org Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय। श्रीमहावीर | प्रतिगमनाय देवानां सजीभवनम् 11७४|| | [२७]तरे णं ते सूरिया भविमाणवासिणो यहवे वेमाणिया देवा देवीओ य पायत्ताणियाहिवइस्स देवस्स अंतिए | ऐयमटुं सोचा णिसम्म हट्टतुट्ट जाव [सं० १३ पं०२]-हियया अप्पे-गइया वदणवत्तियाए अप्पेर्गइया पूर्वणवत्तियाए अप्पेगइया सकारवत्तियाए। अप्पेगइया संमाणवत्तियाए अप्पेगइया कोऊहलजिणभत्तिरागेणं [२७]१ ततः २ ते सूर्याभविमानवासिनो बहवो वैमानिका देवा देव्यश्च ३ पदात्यनीकाधिपतेर्देवस्य ४ समीपे ५ एनम्-अ. | नन्तरोक्तमर्थ ६ श्रुत्वा ७ अपिः सम्भावनायाम् एकका:-केचन ८ वन्दनप्रत्ययम्-वन्दनम्-अभिवादनं प्रशस्तकायवाग्मनःप्रवृ. तिरूपं तत्प्रत्ययम्-तत् मया भगवतः श्री मन्महावीरस्य कर्तव्यमित्येवंनिमित्तम् , ९ अप्येककाः १० पूजनप्रत्ययम्-पूजन-गन्धमाल्यादिभिः समभ्यर्चनम् ११ अप्येककाः १२ सत्कारप्रत्ययर-सत्कारः-स्तुत्यादिगुणोन्नतिकरणम् १३ अप्येककाः १४ सम्मानोमानसः प्रीतिविशेषः, १५ अप्येककाः १६कुतूहलजिनभक्तिरागेण-कुतुहलेन-कौतुकेन 'कीदृशो भगवान् सर्वज्ञः सर्वदर्शी श्रीमन्महा = अपिएकका:-अध्येकका:-अ-पेगइआ। + -ए एवं संमाण-वि० बा०।- -मन्महावीरेण इत्येवं रूपेण यो जिने भगवति-भा० २। - लिखितप्रतिगते मूलसूत्रपाठे 'कोऊहलवत्तियाए'......'जिणभत्तिरागेण' इत्येवंरूपेण सुव्यवहितः पृथक् पृथक् निर्देशो लभ्यते । विवरणकारस्तु 'कुतूहलजिनभक्तिरागेण' इत्येवं समस्तमिव एकं पदं व्याख्याति, ततः विवरणकारप्राप्तपाठः प्रतिगतमूलपाठाद् भिन्नः प्रतिभाति । अत्र च विवरणानुसारौ पाठक्रमो न्यस्तः। Jain Educati o n For Private Personel Use Only w.jainelibrary.org Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण सूर्याभः इयं । ॥७॥ अप्पेगईया सरियोभस्स देवस्स बयण मणुयत्तेमाणा अप्पेगईया अस्सुयाई सुणेस्सामो अप्पेगईया सुयाँई निस्संकियाई करिस्सामो [पृ०४० पं.४] अप्पेगतिया अन्नमन्नमणुयत्तमाणा अप्पेगइया जिणभत्तिरागेणं अप्पे आभियोगइया 'धम्मोत्ति अप्पेगईया 'जीयमेयंति कह सव्विड्डीए [पृ० ६९ पं०१] जाव अकालपरिहीणा चेव सूरि गिकं विमान याभस्स देवस्स अन्तियं पाउन्भवन्ति । रचयितुमा[२८]तए० से सूरियाभे देवे ते सूरियाभविमाणवासिणो बहवे वेमाणिया देवाय देवीओ य अकालपरिहीणा | दिशात चेव अन्तियं पाउन्भवमाणे पासति पासित्ता हतुट्ट [कं० १३ पं०२] जाव-हियए आभिओगियं देवं सद्दावेति वीरः' इत्येवंरूपेण न्यो जिने-भगवति वर्द्धमानस्वामिनि भक्तिरागो-भक्तिपूर्वकोऽनुरागस्तेन १ अप्येक २ सूर्याभस्य देवस्य ३ वचनम्-आज्ञामनुवर्तमानाः ४ अप्येककाः ५ 'अश्रुतानि-पूर्वमनाकर्णितानि वर्गमोक्षप्रसाधनकानि वचांसि श्रोष्यामः' इति बुद्ध्या ६ अप्येककाः ७'श्रुतानि-पूर्वमाकर्णितानि यानि शङ्कितानि जातानि तानि इदानीं निःशङ्कितानि करिष्यामः' इति बुद्ध्या ८अप्येककाः ९ जीतमेतत्-कल्प एप इति कृत्वा । १० 'सब्धिड्डीए' इत्यादि प्राग्वद [पृ०६९५०३] ॐ -मणुमन्नेमाणा-भा० १-२। ० ततः स सूर्याभो देवः तान् सूर्याभविमानवासिनः बहून् वैमानिकान् देवांश्च देवीश्च अकालपरिहीनान् चैव अन्तिकं प्रादुर्भवमानान् पश्यति दृष्ट्वा हृष्टतुष्ट-याबद्-हृदयः आभियोगिकं देवं शब्दापयति शब्दापयित्वा एवम् अवादीत्-क्षिप्रमेव भो ! देवानुप्रियाः ! = यो जने-पा० ५। यो भग-भा० १ । यो जने 'भगवान्' रूपेण यो जने 'भगवान्' इति 'वर्धमानस्वामी' इति भक्तिरा-पा० ४। 8 रागेण भक्ति-भा०१। Jan Educati o nal For Private Personel Use Only w.jainelibrary.org Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥७६॥ सहावित्ता एवं क्यासी-खिप्पामेव भो! देवाणुप्पिया! अणेगखम्भसयसंनिविडं लीलहियसालभंजियागं ईहाभियउसमतुरगनरमगरविहगवालगकिनररुरुसरभचमरकुञ्जरवणलयपउमलयभत्तिचित्तं खंभुग्गय बइरवेइयापरिगयाभिरामं "विजाहरजमलजुय लजंतजुत्तं पिव अच्चीसहस्समालणीय रूवगसहस्तकलियं र्भिसमाणं भिन्भिसमा खुल्लोयणलेसं सुहफास सस्सिरीयरूवंधैण्टावलिचलियमहुरमणहरसरं [२८]१अनेकेषु स्तम्भशतेषु सन्निविष्ट, २लीलया स्थिता लीलास्थिताः, अनेन तासां पुत्चलिकानां सौभाग्यमावेदयति, लीलास्थिताः शालभजिकाः-पुत्तलिका यत्र तत् तथा ३ ईहामृगा-वृका व्यालाः-स्खापदभुजङ्गा ईहामृगऋषभतुरगनरमकरविहगव्यालकिन्नररुरुसरभचमसुञ्जवनलतापमलतानां भक्त्या-विच्छिन्त्या चित्रम्-आलेखो यत्र तत् तथा ४ तथा स्तम्भोद्गतया-स्तम्भोपरिवत्तिन्या वजरत्नमथ्या वेदिकमा परिगतं सत् यदभिरामं तत् स्तम्भोद्गतबनवेदिकापरिगताभिरामम् ५ विद्याधरयोर्यद् यमलयुगलं-समश्रेणीकं द्वन्द्वं विद्याधरयमलयुगलं तच्च तद् यत्रंच-सञ्चरिष्णुपुरुषप्रतिमाद्वयरूपं तेन युक्तं तदिव ६ तथा अर्चिपां-किरणानां सहस्रैर्मालनीयं-परिवारणीयं० अर्चिासहसमालनीयम् तथा ७ रूपकसहस्रकलितं ८ दीप्यमानं ९ अतिशयेन देदीप्यमानं, १० चक्षुः-क-लोकने लिस-१० तीव-दर्शनीयत्वातिशयात् श्लिष्यतीव यत्र तत् तथा, ११ शुभः-कोमल स्पर्शो यस्य तत् तथा १२ सश्रीकानि-सशोभकानि रूपाणि-रूपकाणि यत्र तत राश्रीकरूपं १३ घण्टावले:-घण्टापर्वातवशेन चलितायाः-कम्पितायाः मधुरः-श्रोत्रप्रियो मनोहरो-मनो__* -यवरवइ-भा० १। 0 -यलं जंत-भा० २। ० - अचिसहस्रकलितं दी-पा० ५-४ । भा० १ ० "चलितशब्दस्य विशेष्यात् | परनिपातः प्राकृतत्वात्"-राय० विव० । Jhin Education For Private 3 Personal Use Only m inelibrary.org Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । सुहं कन्तं दरिसणिज्जं पिंडणडेचियमिसिर्मिसितमणिरयणघण्टियाजालपरिक्खित्तं जोयैणसय सहस्स वित्थिणं दिव्वंगमणसज्जं सिंग्घगमणं णाम जाणविमाणं वि० उब्वाहि, विउब्वित्ता खिप्पामेव एयमाणत्तियं पच्च- पिणाहि । [२९] तए णं से आभिओगिए देवे सूरियाभेणं देवेणं एवं वृत्ते समाणे हट्ठे जाव-हियए करयलपरिग्गहियं जाव | पडिसुणेइ जाव पडिसुणेत्ता उत्तरपुरत्थिमं दिसीभागं अवकमति [कं० १९ पं० ३] अवकमित्ता वेव्वियस-५ | मुग्धारणं समोहणइ समोहणित्ता संखेजाई जोयणाई जाब अहावायरे पोग्गले परिसाउति परिसाडित्ता अहासुहुमे पोग्गले परियाएइ परियाइत्ता दोघं पिवेउब्वियसमुग्धारणं समोहणित्ता अणेगखम्भसय सन्निविहं |[पृ० ७६ पं० १] जाव दिव्वं जाणविमाणं ० विउब्बिडं पवत्ते याचि होत्था । निर्वृतिकरः खरो यत्र तत् तथा १ शुभं यथोदितवास्तुलक्षणोपेतत्वात् २ कान्तं कमनीयं अत एव ३ दर्शनीयं, तथा ४ निपुणक्रियम् - ५ उचितानि खचितानि ६ देदीप्यमानानि मणिरत्नानि यत्र घण्टिकाजाले तत् तथा तेन घण्टिकाजालेन - क्षुद्रघण्टिकासमूहेन १० परि- सामस्त्येन क्षिप्तं व्याप्तं यत् तत् तथा ७ योजनशतसहस्रविस्तीर्णं - योजनलक्षविस्तारं ८ दिव्यं प्रधानं गमन सज्जं गमनप्रवणं ९ शीघ्रगमननामधेयं १० यानरूपं वाहनरूपं विमानं यानविमानम् । शेषं प्राग्वत् । Jain Education interational ० उच्चह भा० २ = पिणह भा० २ । विकुतुिं प्रवृत्तश्वापि अभूत् । [२९] ॥७७॥ Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥७८॥ [३०] तए णं से आमिओगिए देवे तस्स दिव्वस्स जाणविमाणस्स तिदिसि तिसोवाणपडिरूवए विउव्वति, तंजहा-पुरथिमेणं दाहिणेणं उत्तरेणं, तेसि तिसोवाणपडिख्वगाणं ईमे एयारवे वाणावासे पण्णत्ते, तंजहा विमानरचवईरामया र्णिम्मा रिहार्भया पतिवाणा वेरुलियोमया खंभा सुवण्णरुप्पमया फैलगा लोहितक्खमइयाओ सूई ना वर्णनम् ओ वयरीमया "संधी णाणामणिमया अवलंबणा अवलंबणयाहाओ य पासादीया [ पृ० १८ पं०१] जाव [३०] १तस्य दिव्यस्य यानविमानस्य २तिस्रो दिशः समाहृतास्त्रिदिक् तस्मिन् त्रिदिशि ३त्रीणि एकैकस्यां दिशि एकैकस्व भावात् ५ त्रिसोपानप्रतिरूपकाणि प्रतिविशिष्टं रूपं येषां तानि प्रतिरूपकाणि त्रयाणां सोपानानां समाहारत्रिसोपानं त्रिसोपानानि च तानि प्रतिरूपाणि *च ४ तेषां च त्रिसोपानप्रतिरूपकाणाम् ५ अयमेतद्रूपो-वक्ष्यमाणस्वरूपो ६ वर्णावासो वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तः, ७ तद्यथा-८ वज्रमया वज्ररत्नमया ९ नेमाः-भूमिकातः ऊर्ध्व निर्गच्छन्तः प्रदेशाः, १० रिष्टरत्नमयानि ११ प्रतिष्ठानानि त्रिसोपानमूलप्रदेशाः, १२ वैडूर्यमयाः १३ स्तम्भाः, १४ सुवर्णरूप्यमयानि १५ फलकानि-त्रिसोपानाङ्गभूतानि, १६ लोहिताक्षमय्यः १७ सूचयः-फल. कद्वयसम्बन्धविघटनाभावहेतु पादुकास्थानीयाः, १८ वज्रमया वज्ररत्नपूरिताः १९ सन्धयः फलकद्वयापान्तरालप्रदेशाः, २० नानामणिमयानि २१ अबलम्ब्यन्ते इति अवलम्बनानि-अवतरतामुत्तरतां चालाबनहेतुभूता अबलम्बनबाहातो विनिर्गताः केचिदवयवाः, २२ अवलम्बनवाहाश्च नानामणिमय्यः, अबलम्बनवाहा नाम उभयोः पार्श्वयोवलम्बनाश्रयभूता भित्तयः २३ 'पासाइयाओ'इत्यादि _____8 तिसोमाण-भा० १। * "इति विशेषणसमासः विशेषणस्यात्र परनिपातः प्राकृतत्वात्"-रायः विव० । ० -पादका-मा० १-२। पा०४-५ Jain Education lemona For Private & Personel Use Only witjainelibrary.org Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । पडिरूवा । [३१] तेर्सिनोपविगाणं पुरओ पैत्तेयं पत्तेयं तोरणं पण्णत्तं, तेसिं णं तोरणाणं इमे एघारूबे वर्षणावासे पण्णत्ते, "तंजहा- 'तोरणा गाणामणिमया गौणामणिमएस भेस उपनिधिसंनिविट्ठा "विविहमुत्तन्तराख्योवचिया "विविहतारारूयोवचिया [पृ० ७६ पं० २] जैव पडिरूवा । पदचतुष्टयं प्राग्वत् । [३१] १ तेषां २ त्रिसोपानप्रतिरूपकाणां ३ पुरतः ४ प्रत्येकं प्रत्येकं ५ तोरणं ६ प्रज्ञप्तं, ७ तेषां च तोरणानाम् ८ अयमेतद्रूपो ९ वर्णावासो - वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तः १० तद्यथा - ११ तोरणा १२ नानामणिमया इत्यादि, कचिदेवं पाठ:- 'तेसि णं तिसोवाणपडिरूवगाणं पुरतो तोरणे विउच्च तोरणा नाणामणि -मया' इत्यादि । मणयः - चन्द्रकान्ताद्याः, विविधमणिमयानि तोरणानि १३ नानामणिमयेषु १४ स्तम्भेषु १५ उपनिविष्टानि - सामीप्येन स्थितानि, १६ तानि च कदाचिच्चलानि अथवा अपदपतितानि वाऽऽशङ्कयेरन् तत आह- सम्यक् - निश्चलतया अपदपरिहारेण च निविष्टानि, उपनिविष्टसन्निविष्टानि, १७ विविधा - विविधविच्छित्तिकलिता मुक्ता-सुक्ताफलानि 'अन्तरा' इति अन्तराशब्दोऽगृहीतवीप्सोऽपि सामर्थ्याद् वीप्सां गमयति, अन्तरा अन्तरा रूपोपचितानि यावता यत्र तानि तथा १८ विविधैस्तारारूपैः - तारिकारूपैरुपचितानि, तोरणेषु हि शोभार्थ तारिका निबध्यन्ते इति प्रतीतं लोकेऽपि इति विविधतारारूपोपचितानि १९ 'जान पडिरुवा' इति 'यावत्' करणात् 'ईहामिगउस भतुरगनरमगरविहगवालग किंनररुरुसरभचमरकुञ्जरवणलयपउम= विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । “ततो विशेषणसमासः " - राय० विव० । Jain Education tentional ॥७९॥ Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय । ||८०|| [३२] तेसि णं तोरणाणं उपि अट्टमलगा पण्णत्ता, तंजहा- सोत्थिय-सिरिवच्छ-णन्दियावत्त-बद्धनागग-भद्दास-कलस-मच्छ-दप्पणा जाव [पृ० १९ पं० ४ पृ० २० पं० १] पडिरूवा । तेसिं च णं तोरणाणं उपि हवे किण्हचामरज्या [पृ० २० पं० २] जाब सुकिल्लचामरज्झया अच्छा सहा रुपपट्टा वरदण्डा जलंयामलगन्धिया सुरम्मा पासादीया दरिसणिजा अभिरुवा पडिरूवा विउव्वति । लयभत्तिचित्ता खभुग्गयचइरवेड्यापरिगयाभिरामा विजाहरजमलजुगलजंतजुत्ता वित्र' एवं नाम स्तम्भद्वयसन्निविष्टानि तोरणानि व्यव स्थितानि यथः विद्याधरयमलयुगलयन्त्र युक्तानी प्रतिभासन्ते इति, 'अच्चीसहस्समालणीया रूवगसहस्सकलिया भिसमाणा भिभि समाणा चक्खुल्लोषणलेसा सुहासा सहिसरीयरूवा [पृ० ७६ पं०१-४] पासाइया दरिसणिजा अभिरुवा' इति परिग्रहः, कचिदेतत् साक्षाल्लिखितमपि दृश्यते= | [३२] १ तेषां तोरणानाम् २ उपरि ३ बहवः कृष्णचामरयुक्ता ध्वजाः कृष्णचामरध्वजाः[ पृ० २० पं० ९] एवं बहवो नीलचामरध्वजाः, लोहितचामरध्वजाः, हारिद्रचामरध्वजाः, ४शुक्लचामरध्वजाः, कथम्भूता एते सर्वेऽपि ? इत्यत आह-५अच्छा-आकाशस्फटिकर तिनिर्मलाः ६श्लक्ष्णाः श्लक्ष्णपुद्गलस्कन्ध निर्मापिताः ७ रूप्यो- रूप्यमयो वज्रमयस्य दण्डस्योपरि पट्टो येषां ते रूप्यपट्टाः ८वी - वज्ररत्नमयो दण्डो रूप्यपट्टमध्यवर्त्ती येषां ते वज्रदण्डाः ९ तथा जलजानामिव - जलजकुसुमानां पद्मादीनामिवामलो न तु कुद्रव्यगन्धसम्मिश्र यो गन्धः स जलजामलगन्धः स विद्यते येषां ते जलजामलगन्धिकाः, अत एव १० सुरम्याः प्रासादीयाः - इत्यादि= विवरणकारदर्शितः पाठभेदः । Jain Education ema anal ainelibrary.org Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥८॥ तेर्सि' णं तोरणाणं उप्पि बहवे पृ०२१ पं०१] छत्तातिछत्ते पंडागाइपडागे घंटीजुगले उप्पलहत्थए कुमुद-णलिणसुभग-सोगंधिय-पोंडरीय-महापोंडरीय-सतपत्त सहस्सपत्तहत्थए सबरयणामए अच्छे जावं पडिरूवे विउव्वति। [३३] तए णं से आभिओगिए देवे तस्स दिव्वस्स जाणविमाणस्स अंतो बहसमरमणिज्ज भूमिभाग विउव्वति। सें जहाँ भ ए आलिंगपुक्खरे ति। विशेषणचतुष्टयं प्राग्वत् । [पृ०११ पं०१२-] ११तेषां तोरणानामुपरि १२वहूनि [पृ० २१ पं०१-५] १३छवातिच्छत्राणि-छत्रात्- ५ लोकप्रसिद्धात् एकसंख्याकात अतिशायीनि छत्राणि उपर्यधोभावेन द्विसंख्यानि त्रिसंख्यानि वा छत्रातिच्छवाणि १४पताकाभ्यो लोकप्रसिद्धाभ्योऽतिशायिन्यो दीर्घत्वेन विस्तारेण च पताकाः, १५वहूनि घण्टायुगलानि, बहूनि चामरयुगलानि, १६वहब उत्पलहस्ताःउत्पलाख्यजलजकुसुमसमूहविशेषाः, एवं बहवः१७पद्महस्तकाः नलिनहस्तकाः सुभगहस्तकाः सौगन्धिकहस्तकाः पुण्डरीकहस्तकाः शतपत्रहस्तकाः सहस्रपत्रहस्तकाः, पद्मादिविभागव्याख्यानं प्राग्वत् [पृ०२१ पं०१०] एते च छत्रातिच्छत्रादयः १८सर्वरत्नमया अच्छाआकाशस्फटिकवदतिनिर्मला १९ यावत् करणात् 'सण्हा लण्हा अभिरूवा' [पृ० १९ पं०५-पृ० २० पं०१] इति परिग्रहः । [३३] १तस्य दिव्यस्य यानविमानस्य २अन्तः-मध्ये ३बहुसमः सन् रमणीयो बहुसम ?रमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः, किंविशिष्टः? इत्याह-४तत्-सकललोकप्रसिद्धं ५'यथा' इति दृष्टान्तोपदर्शने ६'नाम' इति शिष्यामन्त्रणे ७'ए' इति वाक्यालङ्कारे ८आलिङ्गो-मुरजनामा वाद्यविशेषः तस्य पुष्करं-चर्मपुलकं तत् किलात्यन्तसममिति तेनोपमा क्रियते ९ 'इति' शब्दाः सर्वऽपि स्वस्वोपमाभूतवस्तु + चर्मपुटम् तत् भा०२। Jain Educatintentional For Private & Personel Use Only aw.jainelibrary.org Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥८२॥ वा मुइंगपुत्रखरे इ वा परिपुणे सरतले इ वा करतले इ वा चंदमंडेले इ वा सूरमण्डले इ वा आयंसमंडले इवा उभचम्मे इ वा वसहचैम्मे इ वा वराहचम्मे इ वा सीहचम्मे इ वा वग्घचम्मे इ वा छगलचम्मे इ वा दीविर्य चम्मे इ वा अणेग संकुकीलग सहस्सवितते णाणाविहपंचवन्नेहिं मणीहिं उवसोभिते आवड- पञ्चवड - "सेटि पैसेढ परिसमाप्तिद्योतकाः १०' वा 'शब्दाः समुचये ११ मृदङ्गो लोकप्रतीतो मर्द लस्तस्य पुष्करं मृदङ्गपुष्करं १२ परिपूर्ण - पानीयेन भृतं तडाकं ५ | सरस्तस्य तलम् - उपरितनो भागः सरस्तलं, १३ करवलं प्रतीतं, १४ चन्द्रमण्डलं सूर्यमण्डलं च यद्यपि तच्चवृच्या उत्तानीकृतार्द्धकपित्थाकारं । पीठप्रासादापेक्षया वृत्तालेखमिति तद्गतो दृश्यमानो भागो न समतलस्तथापि प्रतिभासते समतल इति तदुपादानं १५ आदर्शमण्डलं सुप्रसिद्धं १६ 'उरम्भचम्मे इ वा' इत्यादि, अत्र सर्वत्रापि 'अग संकुकी लगसहस्सवितते' इति विशेषणयोगः, उरभ्रः - ऊरणः १७ वृषभ-वराह-सिंह- व्याघ्र-छगलाः प्रतीताः १८ द्वीपी - चित्रकः एतेषां प्रत्येकं चर्म १९ अनेकैः शङ्कप्रमाणैः कीलकसहस्रैः, महद्भिर्दि कीलकैस्ताडितं प्रायो मध्ये क्षामं भवति तथारूपताडासम्भवात् अतः शङ्कग्रहणं विततं विततीकृतं ताडितमिति भावः, १० यथाऽत्यन्तं बहुसमं भवति तथा तस्यापि यानविमान त्यान्तर्बहुसमो भूमिभागः । पुनः कथम्भूतः ? इत्याह- २० नानाविधाः - जातिभे दान्नानाप्रकारा ये पञ्चवर्णा मणयस्तैरुपशोभितः, कथम्भूतैः ? इत्याह-आवर्त्तादीनि मणीनां लक्षणानि - २१ तत्र आवर्त्तः प्रतीतः २२ एकस्यावर्त्तस्य प्रत्यभिमुख आवर्त्तः प्रत्यावर्त्तः २३ श्रेणिः - तथाविधविन्दुजातादेः पङ्क्तिः २४ तस्याश्च श्रेणेर्या च निर्गता अन्या श्रेणिः x वा भिगचम्मे इ वा छ- वि० बा० । Jain Education emanal ainelibrary.org Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥८३॥ सोधिय-सोत्थिय-पूस-मागव-माणग-मच्छंडग-मगरंडग-जोर-मार-फुल्लाबलि-पउमपत्त-सागरतरंगवसंतलय-पउमलयभत्तिचितेहिं सच्छोएहि सप्पभेहिंसमरीइरहिं सउजोएहिं णाजाविहपंचवण्णेहिं मणीहिं उवसोभिए तंजहाँ-कण्हेहिं णीलेहिं लोहिएहिं हालिइहिं सुकिल्लेहि। [३४] तत्थ णं जे ते किण्हा मगी तेसिं णं मणीगं इमे एतारूवे वर्गणावासे पण्णत्ते. सें जहा नाम ए जीमूतए सा प्रश्रेणिः २५स्वस्तिकः प्रतीतः २६सौवस्तिक-पुष्यमाणवी लक्षणविशेषौ लोकात प्रत्येतव्यौ २७वर्द्धमानक-शरावसम्पुटं २८मत्स्यकाण्डक-मकरकाण्डके प्रतीते २९जार-मार इति लक्षणविशेषौ सम्पग्माणलक्षणवेदिनो लोकाद्वेदितव्यौ ३० पुष्पावलि-३१पद्मपत्र-३२सागरतरङ्ग-३३वासन्तीलता-पन्नलताः सुप्रतीता तासां ३४भक्त्या-विच्छित्या चित्रम्-आलेखो येषु ते आवर्तप्रत्यावर्त श्रेणिप्रश्रेणिस्वस्तिकसौवस्तिकपुष्यमाणववर्द्धमानकमत्स्याण्डकमकराण्डकजारमारपुष्पावलिपमपत्रसागरतरङ्गवासन्तीलतापद्मलताभक्तिचित्रास्तैः, किमुक्तं भवति ?-आवादिलक्षणोपेतैः तथा ३५सच्छायैः सती-शोभना छाया-निर्मलत्वरूपा येषां ते सच्छायाः, तथा ३६सती-शोभना प्रभाकान्तिर्येषां ते सत्प्रभाः तैः ३७समरीचिकैः-बहिर्विनिर्गवकिरणजालसहितैः ३८सोयोतैः-बहिर्व्यवस्थितप्रत्यासन्नवस्तुस्तोमप्रकाशकरोद्योतसहितैः ३९एवम्भृतै नाजातीयैः पञ्चवर्गमणिभिरुपशोभितः, तानेव पश्चवर्णानाह-४०'तंजहा-किण्हेहि' इत्यादि सुगमम् । [३४] १ तत्र तेषां पञ्चवर्णानां मणीनां मध्ये २४ये ते कृष्णा मणयः, ३तेषां ४ अयम्-अनन्तरमुद्दिश्यमान एतद्रूपः-अनन्तरमेव वक्ष्यमाणस्वरूपो ५वर्णावासो-वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-६ स यथा नाम ७ जीमूतो-बलाहकः, सचेह प्रावृप्रारम्भसम जलभृतो x “ “ये कृष्णमणयः' इत्येव सिद्धे 'ते' इति वचनं भाषाक्रमार्थन्”-राय० विव० । Jain Educational For Private Personal Use Only Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥८४॥ ई वा अंजणे इ वा खंजणे इ वा केजले इ वा मसी इ वा मसीगुलिया इ वा गवले इ वा गवलगुलिया इ वा भैमरे इ वा भमरावलिया इ वा भमरपतंगसारे ति वा जंबूले ति वा अद्दारितु इ वा पैरपुढे इ वा गए इ वा गर्यकलभे इ वा किण्हसप्पे इ वा किहकेसरे इ वा आगासथिरंगले इ वा किंहासोए इ वा किण्हकैणवीरे इ वा किंहबंधुजीवे वेदितव्यः तस्यैव प्रायोतिकालिमसम्भवात्, ८ 'इति' शब्दः उपमाभूतवस्तुनामपरिसमाप्तिद्योतकः ९ 'वा'शब्दः उपमानान्तरापेक्षया समुच्चये एवं सर्वत्र १० अञ्जनं-सौवीराञ्जनम् रत्नविशेषो वा ११खञ्जनं-दीपमल्लिकामलः, १२कजलं-दीपशिखापतितं, १३मषी-तदेव कजलं ताम्रभाजनादिषु सामग्रीविशेषेण घोलितम् १४मसीगुलिका-घोलितकज्जलगुटिका, क्वचित् 8'मसी इति वा मसीगुलिया इति वा' न दृश्यते १५गवलं माहिषं शृङ्गं तदपि चोपरितनत्वग्भागापसारेण द्रष्टव्यं तत्रैव विशिष्टस्य कालिम्नः सम्भवात् १६तथा च तस्यैव माहिषशृङ्गनिबिडतरसारनिर्वतिता गुटिका गालगुटिका १७ भ्रमरः-प्रतीतः १८ भ्रमरावली-भ्रमरपतिः १९ भ्रमरपतङ्गसारः-भ्रमरपक्षान्तगतो विशिष्टकालिमोपचितप्रदेशः २० जम्बूफलं प्रतीतं २१आर्द्राऽरिष्टका-कोमलः काकः २२ परपुष्टः-कोकिलः २३गजो २४ गजकलभश्च प्रतीतः २५कृष्णसर्पः कृष्णवर्गसर्पजातिविशेषः २६ कृष्णकेसरः-कृष्णबकुलः २७ आकाशथिग्गलं शरदि मेघविनिर्मुक्तमा-१० काशखण्डं तद्धि कृष्णमतीव प्रतिभातीति तदुपादानं २८कृष्णाशोक-२९ कृष्णकणवीर-३०कृष्णबन्धुजीवाः अशोक-कणवीर-बन्धु जीववृक्षभेदाः अशोकादयो हि पञ्चवर्णा भवन्ति ततः शेषवर्णव्युदासाथ कृष्णग्रहणम् । एतावत्युक्ते त्वरावानिव शिष्यः पृच्छति 8 विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । भाषायाम् 'कूणु-लीलु अरीठे। "अरिष्टो लशुने निम्बे फेनिले कङ्क-काकयोः" हिमअने० तृ० कां० श्लो० १४२] इति वचनात् अत्र 'काकः' इति निर्देशः संभाव्यते । Jain Education international Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । इ वा, भवे एयारूवे सिया ? णो इणट्ठे समट्टे, ओवम्मं समणाउँसो ! ते णं किण्हा मणी इत्तो इतराऐं चैव कंततरौए चेव मणुतराए चेव मणामतरौए चेव वण्णेणं पण्णत्ता । ३१ भवेत् मणीनां कृष्णो वर्णः ३२एतद्रूपो जीमूतादिरूपः १ सूरिराह - ३३ नायमर्थः समर्थः नायमर्थ उपपन्नः यदुत - एवम्भूतः कृष्णो वर्णो मणीनामिति, यद्येवं तर्हि किमर्थं जीमूतादीनां दृष्टान्तत्वेनोपादानम् ? अत आह-३४ औपम्यम् - उपमामात्रमेतत् उदितं हे ३५ श्रमण-आयुष्मन् ! ३६ यावता पुनस्ते कृष्णा मणयः ३७ इतो जीमूतादेः ३८ इष्टतरका एव कृष्णेन वर्णेन अभीप्सिततरका एव, ३९ ५ तत्र किञ्चिदकान्तमपि केषाञ्चिदिष्टतमं भवति ततोऽकान्तताव्यवच्छिन्न्यर्थमाह- कान्ततरका एव अतिस्निग्धमनोहारिका लिमोपचिततया जीमूतादेः कमनीयतरकाः ४ अत एव मनोज्ञतरका एव मनसा ज्ञायते - अनुकूलतथा स्वप्रवृत्तिविषयीक्रियते इति मनोज्ञं मनोऽनुकूल ४१ तत्र मनोज्ञतरमपि किञ्चिद् मध्यमं भवेत् ततः सर्वोत्कर्ष प्रतिपादनार्थमाह + मन आपतरका एव द्रष्टृणां मनांसि आप्नुवन्तिआत्मवशतां नयन्तीति मनआपाः । * " ततः प्रकर्षविवक्षायां 'तरप्' 'मनोम' (मनस् + अम्- 'अम्' धातुः राय०जिना० भा० १ पृ० राय० वि० । प्रत्ययः " राय० वि० + नवाङ्गीवृत्तिकारः श्रीअभयदेवसूरिः व्याख्याप्रज्ञप्तिवृत्तौ 'मणाम' शब्द संस्कृत'गम्' धातोः पर्यायः) शब्देन सह तुलयति, “अमनोऽम्यतया चिन्तयाऽपि अमनोगम्यतया ” - श० १ उ० १ ६२ । : "ततः प्रकर्षविवक्षायां 'तरपू' प्रत्ययः प्राकृतत्वाच्च 'प'कारस्य 'म'कारे 'मणामतरा' इति भवति" - Jain Education emanal ॥८५॥ www.ainelibrary.org Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय। ॥८६॥ [३५] तत्थ णं जे ते नीला मणी तेसिणं मणीण इमे एयारूवे वण्णावासे पण्णते, से जहा नाम ए भिगेइ वा भिंगपत्ते इ वा सुएं इ वा सुर्यपिच्छे इ वा चासे इ वा चासपिच्छे इ वा पीली इ वाणीलीभेदे इ वा णीलीगुलिया इ वा सामाए इ वा उच्चन्तगे इ वा वणरीती इ वा हलधेरवसणे इ वा मोरग्गीवाइ वा पारेवयानीवा इ वा अयसिकुसुमे इ वा बाणकुसुमे इ वा अंजणकेसियाकुसुमे इ वा नीलुप्पले इ वा णीलासोगे इ वा णीलकणवीरे इ वा णीलबंधुजीवे इ वा, भवे एयारूवे सिया ? णो इणढे समढे, ते णं णीला मणी एत्तो इतराए चेव [३५] १ तत्र तेषां मणीनां मध्ये २ ये ते नीला मगयः ३तेषाम् ४ अयमेतद्रूषो ५ वर्गावासो-वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तः, तद्यथा ६स यथा नाम ७ भृङ्गः-कीटविशेषः पक्षमलः ८भृङ्गपत्रं तस्यैव भृङ्गाभिधानस्य कीटविशेषस्य पक्ष्मः ९ शुक:-कीरः १० शुकपिच्छंशुकस्य पत्रं ११चापः-पक्षिविशेषः १२चापपिच्छं चापपक्षः १३नीली प्रतीता १४नीलीभेदो-नीलीच्छेदः १५नीलीगुलिका-गुलिकाद्रव्यगुटिका १६ श्यामाको-धान्यविशेषः १७ उचंतगो दन्तरागः १८ वनराजी प्रतीता १९ हलधरो-बलदेवतस्य वसनं हलधरवसनं तच किल नीलं भवति सदैव तथास्वभावतया, हलघरम्य नीलवस्त्रपरिधानात् २० मपुरग्रीवा-२१ पारापतग्रीवा-२२-अतसीकुसुम-२३ बाणवृक्षकुसुमानि प्रतीतानि, इत ऊर्ध्व क्वचित् ='इंदनीले इ वा महानीले इ वा मरगते इ वा' इति दृश्यते तत्रेन्द्रनीलमहानील-मरकता रत्नविशेषाः प्रतीताः, २४ अञ्जनकेशिका-वनस्पतिविशेषः तस्य कुसुममञ्जन केशिकाकुसुमं २५ नीलोत्पलंकुवलयं, २६ नीलाशोक-२७ नीलकणवीर-२८ नीलबन्धुजीवा अशोकादिवृक्षविशेषाः । २९ ‘भवे एयारूवे इत्यादि प्राग्वद् [पृ. __ = विवरणकारनिर्दिष्टं पाठान्तरम् । Jain Education remonal For Private & Personel Use Only Mainelibrary.org Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥७॥ जाव [पृ० ८५ पं० २] चण्णेणं पण्णत्ता । [३६] तत्थ णं जे ते लोहियगा मणी तेसिणं मणीणं इमेयारूवे वणावासे पण्णत्ते, से जहा णाम ए ससरुहिरे इ वा उरभरुहिरे इवा* वराहरुहिरेइ वा मणुस्तरुहिरे इ वा महिसरुहिरे इ वा बालिदेगोवे इ वा धौलदिवाकरे इ वा संझभैरागे इ वा गुंजद्धरोगे इ वा जासुअणकुसुमे इ वा कियकुसुमे इ वा पालि यायकुसुमे इ वा जोइहिंगुलए ति वा सिलैप्पवाले तिचा पालअंकुरे इ पा ८५ पं० ३] व्याख्येयम् । [३६] तथा १ तत्र तेषां मणीनां मध्ये २ये ते लोहिता मगयः ३तेषाम् ४ अयमेतद्रूपो ५वर्गावासः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-६ तद्यथा नाम ७ शशकरुधिरं ८ उरभ्रः-ऊरणस्तस्य रुधिरं, ९ वराहः-शूकरस्तस्य रुधिरं, १० मनुष्यरुधिरं ११ महिषरुधिरं च प्रतीतं एतानि हि किल शेषरुधिरेभ्यो लोहितवर्णोत्कटानि भवन्ति तत एतेषामुपादानम् । १२ बालेन्द्रगोपका-सद्योजातेन्द्रगोपकः स हि प्रवृद्धः सन्नीपत्पाण्डुरो रक्तो भवति ततो बालग्रहणं इन्द्रगोपका-प्रथमप्रावृट्कालभाषी कीटविशेषः १३ बालदिवाकरः-प्रथमभुद्गच्छन् सूर्यः १४ सन्ध्याभ्ररागो-वर्षासु सन्ध्यासमयभावी अभ्ररागः १५ गुञ्जा-लोकप्रतीता तस्या॰ रागो गुञ्जारागः, गुञ्जाया हि अर्द्धमतिरक्तं भवति अद्धं चातिकृष्णमिति गुजार्द्धग्रहणं १६ जपाकुसुम-१७ किंशुककुसुम-१८-पारिजातकुसुम-१९ जात्यहिङ्गला लोकासिद्धाः, २०शिलाप्रवालं-प्रवालनामा रत्नविशेषः २१ प्रवालाकुरः-तस्यैव रत्नविशेषस्य प्रवालस्य अङ्करः, स हि तत्पथमोद्तत्वेनात्य___* वा नररुहिरे इ वा व-वि० बा० । ४ सं० पारिजात-पा० पारिजाय, पारियाय मागधी-पालिजाय, पालियाय । Jain Educationem lona For Private Personal Use Only jainelibrary.org Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥८८॥ लोहियक्खमणी इ वा लक्खारसँगे ति वा किमिरांगकंबले ति वा चीणपिहरासी ति वा रत्तप्पले इ वा रत्तासोगे ति वा रत्तकणवीरे ति वा रत्तबंधुजीवे ति वा, भवे एयारूवे सिया? णो इणढे समझे, ते णं लोहिया मणी इत्तो इतराए चेव जाव [पृ० ८५ पं० २] वण्णेणं पण्णत्ता। [३७] तत्थ णं जे ते हालिद्दा मणी तेसि णं मणीणं इमेयारूवे वणावासे पण्णत्ते-से जहा णाम ए चंपए ति वा चंपछल्ली ति वा चंपगभेए इ वा हलिहा इ वा हलिद्दाभेदे ति वा हलिंदागुलिया ति वा हरियालिया वा हरियालभेदे ति वा हरियालगुलियो ति वा चिउरे इ वा चिउरंगराते ति न्तरक्तो भवति ततस्तदुपादानं २२ लोहिताक्षमणि म रत्नविशेषः २३ लाक्षारस-२४ कृमिरागरक्तकम्बल-२५ चीनपिष्टराशि२६रक्तोत्पल-२७ रक्ताशोक-२८रक्तकणवीर-२९ रक्तबन्धुजीवाः प्रतीताः । ३० 'भवे एयारूवे' इत्यादि [पृ०८५ ५.३] प्राग्वत् । [३७] १ तत्र तेषां मणीनां मध्ये २ये हरिद्रा मगयः ३तेपाम् ४एतद्रूपो ५वर्गावासः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-६स यथा नाम ७चम्पका सामान्यतः सुवर्णचम्पको वृक्षः, ८ चम्पकच्छल्ली-सुवर्णचम्पकत्वक, ९ चम्पकभेदः-सुवर्णचम्पकच्छेदः १० हरिद्रा प्रतीता ११ हरिद्राभेदो-हरिद्राच्छेदः १२ हरिद्रागुटिका हरिद्रासारनिर्वतिता गुटिका १३ हरितालिका-पृथिवीविकाररूपा प्रतीता १४ हरितालिकाभेदोहरितालिकाच्छेदः १५हरितालिकागुटिका-हरितालिकासारनिर्वतिता गुलिका= १६ चि*कुरो-रागद्रव्यविशेषः १७४चिकुरागरागः = का विकुरो-पा० ५। * -कुरो गन्धद्रव्य-भा० २।४ 'अङ्गराग' स्थाने 'अंगराय' इति अर्वाचीनप्राकृतशब्दविकारापेक्षया जायते, परंतु प्राचीनप्राकृतशब्दविकारापेक्षया 'अंगरात' इति अत्र मूलपाठे उल्लिखितम् । अर्वाचीने हि प्राकृते स्वरात् परेषां असंयुक्तानां क-ग-च-ज-त Jain Educationa l For Private Personal Use Only Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥८९॥ वा8 वरकणगनिघसे इ वा वरपुरिसवसणे ति वा अल्लकीफुसुमे ति वा चंपाकुसुमे इ वा कुहंडियाकुसुमे इ वा || कोरंटकमल्लदामे ति वा तडवैडाकुसुमे इ वा घोलेडियाकुसुमे इ वा सुर्वण्णजूहियाकुसुमे इ वा सुहिरण्णकुसुम ति वा बीययकुसुमे इ वा पीयांसोगे ति वा पीर्थंकणवीरे ति वा पीयबंधुजीवे ति वा, भवे एयास्वेसिया? णो इणटे समढे, ते णं हालिद्दा मणी एत्तो इतराए चेव जाव [पृ० ८५ पं० २] वण्णेणं पण्णत्ता। चिकुरसंयोगनिमित्तो वस्त्रादौ रागः,१८वरकनकस्य-जात्यसुवर्णस्य यः कपपट्टके निघर्षः स वरकनकनिघर्षः १९वरपुरुषो-वासुदेवस्त-५ स्य वसनं वरपुरुषवसनम् तच्च किल पीतमेव भवतीति तदुपादानं, २० अल्लकीकुसुमं लोकतोऽवसेयं, २१ चम्पककुसुमं-सुवर्णचम्पकपुष्पं २२कूष्माण्डीकुसुमं-पुष्पफलीकुसुमम् २३कोरण्टकः-पुष्पजातिविशेषः तस्य दाम कोरण्टकदाम २४ तडवडा-+आउली तस्याः कुसुमं तडवडाकुसुमं २५ घोशातकीकुसुमं २६सुवर्णयथिकाकुसुमं च प्रतीतं २७ सुहिरण्यका-वनस्पतिविशेषस्तस्याः कुसुमं सुहिरण्यकाकुसुमं २८ बीयको वृक्षः प्रतीतः तस्य कुसुमं बीयककुसुमं २९ पीताशोक-३० पीतकणवीर-३१ पीतबन्धुजीवाः प्रतीताः ३२ 'भवे एयारूवे' इत्यादि प्राग्वत् । [पृ० ८५ पं० ३] द-प-य-वानां (८-१-१७७ हेमश०) विरलमुच्चारणं भवति, प्राचीने तु प्राकृते तेषां तादृशां कादीनां स्थाने 'त' कारोच्चारणं जायमानं दृश्यतेअम्र प्राचीनाः प्रयोगा एवं प्रमाणम् । यद्वा तकारबहुले उच्चारणे "चर्मण्यती नदीपारे ये चार्बुदसमाश्रिताः । तकारबहुला नित्यं तेषु भाषा प्रयोजयेत् ॥” (भरतप्रणीत नाट्यशा० अ० १७ श्लो० ६२ नि०) इति वचनं समाधानम् । 8 वा वरकणगे इ वा व-वि० बा० । + भाषायाम्आवळ। ४ "कोशातकी पटोलिका"-हैमअभिधानचिन्ता०४ कां० श्लो० २५४ । भाषायां 'पटोल' शाकं प्रतीतम् । Jain Education emanal For Private Personel Use Only virjainelibrary.org Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण [३८] तत्थ णं जे ते सुकिल्ला मणी तेसिं णं मणीणं इमे यारूचे वेपणाचासे पण्णत्ते। से जहा नाम ए अंके ति | वा संखे ति वा चन्दे ति वा कुमुद-उदैक-देयरय-दहि-घणक्खीर-वीरपूरे ति वा कोंचार्वेली ति वा हारावली ति वा हंसाली इ वा बलागावली तिवा, चंदावली ति वा सारतियलाहए ति वा धंधोयरुप्पपट्टे इ वा सालिपिट्ठरासी ति वा कुंदपुप्फरासी ति वा कुभुदरासी तिचा सुर्वेच्छिवाडी ति वा पिभिजिया ति वा ॥९ ॥ [३८] १तत्र तेषां मणीनां मध्ये २ये शुक्ला मणयः ३तेषाम् ४ अयमेतद्रूपो ५ वर्णावासः प्रज्ञप्तः, तद्यथा ६ स यथा नाम ७ अङ्को ५ रत्नविशेषः ८ शङ्ख-९ चन्द्र-१०कुमुद-११ उदक-१२ उदकरजो-१३ दधि-१४ घ नक्षीर-१५ क्षीरपूर-१६ क्रौञ्चावलि-१७हाराबलि-१८ हंसावलि-१९ बलाकावलयः प्रतीताः २० चन्द्रावली-तडागादिषु जलमध्यप्रतिबिम्बितचन्द्रपतिः २१ शारदिकः-शर-1 त्कालभावी बलाहको-मेघः २२ ध्मातः-अग्निसंपर्कग निर्मलीकृतो धौत:-भृति खरण्टितहस्तसंमार्जनेन अतिनिशितीकृतो यो रूप्यपट्टो-रजतपत्रकं स ध्मातधौतरूप्यपट्टः, अन्ये तु व्याचक्षते-"ध्मातेन-अग्निसंयोगेन यो धौतः-शोधितो रूप्यपट्टः स ध्मातधौतरूप्यपट्ट"[ ] २३शालिपिष्टराशिः-शालिक्षोदपुञ्जः, २४कुन्दपुष्पराशिः २५कुमुदराशिश्च प्रतीतः २६ छेवाडिनाम-वल्लादिफलिका १० सा च क्वचिद् देशविशेषे शुष्का सती अतीव शुक्ला भवति ततस्तदुपादानम् -पेहुणं-२७ मयूरपिच्छं तन्मध्यवर्तिनी पेहुणमिञ्जिका सा * इमे+एयारूवे इमेयारूवे । (हैम० ८-१-४०) -नगोक्षीरपूर-मु० पु०। - --वरटित-पा० ४-५। ० विवरणकारश्रीमलयगिरिसूरेः पुरातना विवरणकाराः। 'छेवाडी' शब्दो देश्यः । = 'पेहुण' शब्दो देश्यः-"पिच्छम्मि पेडणे"-देशीना० व० ६ गा० ५८ । Jain Education lemonal For Private & Personel Use Only worjainelibrary.org Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥९ ॥ "भिसे ति वा मुंणालिया ति वा गैयदंते ति वा लवादलए ति वा पोंडरियदैलए ति वा सेयासोगे ति वा सेयकणवीरे ति वा सेयबन्धुजीवे ति वा, भवे एयारूवे सिया? णो इणढे समढे, ते णं सुकिल्ला मणी एत्तो इतराए चेव जाव [पृ० ८५ पं० २] वन्नेणं पण्णत्ता । [३९] तेसि णं मणीणं ईमेयारूवे गन्धे पण्णत्ते, से* जहा नाम ए कोहपुडाण वा तगरपुडाण वा एलापुडाण वा चोयपुडाण वा चम्पापुडाण वा दाणापुडाण वा कुंकुनैपुडाण वा चंदणपुंडाण वा उसीरपुडाण वा मरुआपुडाण वा जोतिपुडाण वा जूहियापुडाण वा मल्लियापुडाण वा पहाणमल्लियापुडाण वा केतैगिपुडाण वा पाडंलिपुडाण चातिशुक्तति तदपन्यासः २८ विसं पद्मिनीकन्दः २९मृणालं पद्मतन्तुः ३० गजदन्त-३१ लबगदल-३२ पुण्डरीकदल-३३ श्वेताशो. क-३४श्वेतकणवीर-३५श्वेतबन्धुजीवाः प्रतीताः, ३६ भवे एयारूवे सिया' इत्यादि प्राग्वत् । [पृ० ८५५०३] तदेवमुक्तं वर्णखरूपम् । [३९] सम्प्रति गन्धस्वरूपप्रतिपादनार्थमाह-१ तेषां मणीनाम् २अयमेतद्रूपो गन्धः प्रज्ञप्तः ३तद्यथा-ते यथा नाम गन्धा अभिनिर्गच्छन्तीति सम्बन्धः । ४ कोष्ठं-गन्धद्रव्यं तस्य पुटाः कोष्ठपुटास्तेषां ५ 'वा'शब्दः सर्वत्रापि समुच्चये, इह एकस्य पुटस्य प्रायो न तादृशो १० गन्ध आयाति द्रव्यस्याल्पत्वात् ततो बहुवचनम् ६ तगरमपि गन्धद्रव्यं ७ एलाः प्रतीताः ८ चोयं-गन्धद्रव्यं ९ चम्पक-१०दमनक-११कुङ्कुम-१२चन्दन-१३उशीर-१४मरुक-१५ जाती-१६ यूथिका-१७मल्लिका-१८स्नानमल्लिका-१९ केतकी-२०पाटली * “प्राकृतत्वात् 'से' इति बहुवचनार्थः प्रतिपत्तव्यः"-राय० वि० । Jain Educat intentional Hw.jainelibrary.org Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥९२॥ वा णोनालियापुडाण वा अगुरु पुडाण वा लवंगपुडाण वा वासपुडाण वा कप्पूरपुडाण वा अणुायंसिवा ओर्भि जमाणाण वा कुहिजमाणाण वा भंजिजाणाण वा उकिरिजमाणाण वा विकिरिजमाणाण वा परिभुजाणाण | वा परिभाइजमाणाण- वा भण्डाओ वा भण्डं साहरिजमाणाण वा ओरालो भैणुण्णा मैंणहरा घाणभैणनिव्वुतिकरा २१नवमालिका-२२अगुरु-२३लवकुसुम-२४वास-२५ कर्पूराणि प्रतीतानि, नवरम्-१३उशीरं-बीरणीमूलम् १८स्नानमल्लिका-स्नानयोग्यो मल्लिकाविशेषः एतेषां पुटानाम्-२६अनुवाते-आघ्रायकविवक्षितपुरुषाणामनुकूलं वाते वाति सति २७उद्भिद्यमानानामुद्घाट्यमानानाम् २८'वा'शब्दः सर्वत्रापि समुच्चये २९इह पुटैः परिमितानि यानि कोष्ठादीनि गन्धद्रव्याणि तान्यपि-परिमेये परिमाणोपचारात'कोष्ठपुटादीनि इत्युच्यन्ते तेषां कुट्यमानानाम्-उदुखले कुटयमानानाम् ३० श्लक्ष्णखण्डीक्रियमाणानाम् एतच्च विशेषणद्वयं कोष्ठादिद्रव्याणामवसेयं तेषामेव प्रायः कुट्टन-श्लक्ष्णखण्डीकरणसम्भवात् न तु युथिकादीनां ३१ क्षुरिकादिभिः कोष्ठादिपुटानां कोष्ठादि. द्रव्याणां वा उत्कीर्यमाणानाम् ३२ विकीर्यमाणानाम्-इतस्ततो विप्रकीर्यमाणानाम् ३३ परिभोगाय उपयुज्यमानानाम् ३४ क्वचित् | 'परिभाइजमाणाण वा इति पाठस्तत्र परिभाज्यमानानां-पार्श्ववर्तिम्यो मनाग मनाग दीयमानानाम् ३५ भाण्डात्-स्थानादेकस्मादन्यद् भाण्डं-भाजनान्तरं संहियमाणानाम् । ३६ उदाराः-स्फाराः ३७ ते चामनोज्ञा अपि स्युरत आह-मनोज्ञा-मनोऽनुकूलाः ३८ तच्च मनोजत्वं कुतः १ इत्याह-मनोहरा:-मनो हरन्ति-आत्मवशं नयन्तीति मनोहराः ३९ इतस्ततो विप्रकीयमाणानां मनोहरत्वं कुतः? - विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । JainEducationaler For Private Personel Use Only wallainelibrary.org Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥९॥ | सर्वतो समन्ता गंधी अभिनिस्सरंति, भवे एयासवे सिया? णो इणढे समढे, ते णं मणी एत्तो इट्टतराए चेव [पृ० ८५ पं० २] गंधेणं पन्नत्ता। [४०] तेसि णं मणीणं ईमेयारूवे फासे पण्णत्ते, 'से जहा नाम ए आईणे ति वा एति वा धूरे इवाणणीए इ वा हंसगम्भतूलिया इ वा सिरीसकुसुमंनिचये इ वा बालकुमुदपत्तरासी ति वा इत्याह-वाण-मनोनिवृतिकराः एवंभूताः ४० सर्वतः-सर्वासु दिक्षु ४१ समन्ततः-सामस्त्येन ४२ गन्धा ४३ अभिनिस्सरन्ति-जिघ्र-५ तामभिमुखं निस्सरन्ति, क्वचित् 'अभिनिस्सवन्ति इति पाठः तत्रापि स एवार्थः नवरम् 'अभितः सवन्ति' इति शब्दसंस्कारः। एवमुक्ते शिष्यः पृच्छति-४४'भवे एयारूवे सिया ? स्यादेतत् यथा भवेद् एतद्रूपस्तेषां मणीनां गन्धः ? सरिराह-४५ 'नो इणद्वे समढे' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० ८५ पं०१-२]। [४०] १ तेषां मणीनाम् २ अयमेतद्रूपः ३ स्पर्शः प्रज्ञप्तः, ४तद्यथा-५ अजिनक-चर्ममयं वस्त्रम् ६ रूतं-प्रतीतम् ७७रो-वनस्पतिविशेषः ८ नवनीतं-म्रक्षणम् ९ हंसगर्भतूली-१०शिरीषकुसुमनिचयश्च प्रतीतः, ११ बालानि-अचिरकालजातानि यानि कुमुद-१० - व्याकरणशास्त्रसिद्ध 'तेसिं' इति रूपम् , परंतु अत्र मूले क्वचित् 'तेसिं' इति रूपम् क्वचिच 'तेसि' पारनियमेन परिशुद्ध प्रतिभाति । इति रूपं समुपलभ्यते। 'तेसिं ' अत्र परवर्तिनि अनुनासिके णकारे पूर्ववर्ती अनुनासिकः-अनुस्वारो लुप्त इति "तेसि णं' इत्यपि रूप वाग्व्या "रूअं तूले"-देशीनाममाला वर्ग ७ गा० ९। भाषायाम् ' इति प्रसिद्धम् । * विवरणकारदर्शितः पाठभेदः। JainEducationaler For Private Personal Use Only h ainelibrary.org Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥९४॥ भवे एयारूवे सिया? णो इण? समढे, ते णं मणी एत्तो इतराए चेव जाव [पृ० ८५ पं०२] फासेणं पन्नत्ता। विमाने [४१]तए णं से आभियोगिए देवे तस्म दिव्वस्स जाणविमाणस्स बहुमज्झदेसभागे एत्थ णं महं पिच्छाघरम प्रेक्षागृहण्डवं विउवइ-अणेगखम्भसयसंनिविलृ भुग्गयसुकयवरवेइयातोरणवररइयसालभंजियागं सुसिलिट्ठविसि मण्डप: ट्ठलट्ठसंठियपसत्थवेरुलियविमलखम्भं णाणा मणिखचियउज्जलबहुसमसुविभत्तभूमिभागं ईहामिय-उसभपत्राणि तेषां राशिर्वालकुमुदपत्रराशिः, क्वचिद् 'बालकुसुमपत्रराशिः' इति पाठः १२ 'भवे एयारूवे' इत्यादि प्राग्वत् । [पृ० ८५ ५ पं०१-२] [४१] १ततः २स आभियोगिको देवः ३तस्य दिव्यस्य यानविमानस्य ४बहुमध्यदेशभागे अत्र ५महत् प्रेक्षागृहमण्डपं ६विकु. ति, कथम्भृतम् ? इत्याह-७अनेकस्तम्भशतसनिविष्टम् । तथा ८अभ्युद्गता-अत्युत्कटा सुकृता-सुष्ठु निष्पादिता वरवेदिकाः तोरणानि वररचिताः शालभञ्जिकाश्च यत्र तद् अभ्युद्गतसुकृतवरवेदिकातोरणवररचितशालभञ्जिकाकम् तथा ९ सुश्लिष्टा विशिष्टा लष्टसंस्थिताःमनोज्ञसंस्थानाः प्रशस्ताः-प्रशस्तवास्तुलक्षणोपेता वैडूर्यविमलस्तम्भा-वैडूर्यरत्नमया विमलाः स्तम्भा यत्र तत् सुश्लिष्टविशिष्टलष्टसंस्थि- १० तप्रशस्तवैडूर्यविमलस्तम्भम् तथा १० नाना मणयः खचिता यत्र भूमिभागे स नानामणिखचितः० नानामणिखचित उज्ज्वलो बहुसम:-अत्यन्तसमः सुविभक्तो भूमिभागो यत्र तत् नानामणिखचितोज्ज्वलबहुसमसुविभक्तभूमिभागम् तथा ११ ईहामृगा-वृकाः = मूलपाठे क्वचित् 'विउव्वई' इति क्वचिच्च 'विउव्वंति' इति पाठो लभ्यते परन्तु नात्र अर्थभेदः। ० --मणिकणगरयणख-वि० बा०। °विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम्। इति भावः-पा०४-५ भा०१।० 'सुखादिदर्शनात् क्तान्तस्य पाक्षिकः परनिपातः" [पृ०४८ * Jain Education emanal For Private Personel Use Only womainelibrary.org Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । तुरग-नर- मंगर- विहग वालग - किंनर - रुरु- सरभ- चमर- कुञ्जरवणलय - पउमलयभत्तिचित्तं खम्भुग्गयवह रवेइयापरिगयाभिरामं विज्जाहरजमलजुयलजंतजुत्तं पिव अच्चीसहस्समालणीयं स्वगसहस्सकलियं भिस माणं भिभिमाणं चक्खुल्लोयणलेसं सुहफासं सस्सिरीयरूवं [पृ० ७६ पं० २-४ ] कंचमणिरयणथुभियागं णाणाविहपञ्चवण्णघण्टापडागपरिमण्डियग्गसिहरं ऋषभा - वृषभाः तुरंग-नर- मकर - विहगाः प्रतीताः व्यालाः- श्वापदभुजगाः किंनरा - व्यन्तरविशेषाः रुखो - मृगाः सरभा:- आठव्या म हाकायाः पशवः चमरा - आटव्या गावः कुञ्जराः दन्तिनः वनलता - अशोकादिलताः पद्मलताः - पद्मिन्यः एतासां भक्त्या विच्छित्त्या चित्रम् - आलेखो यत्र तद् ईहामृग ऋषभ - तुरंग - नर-मकर - विहग- व्याल - किन्नर - रुरु - सरभ - चमर- कुञ्जर- वनलता - पद्मलता भक्तिचित्रम् तथा १२ स्तम्भोगतया - स्तम्भोपरिवर्त्तिन्या वज्ररत्नमय्या वेदिकया परिगतं सद् यदभिरामं तत् स्तम्भोद्गत वज्र वेदिकापरि ताभिरामम् १३ विद्याधरन्तीति विद्याधरा - विशिष्टविद्याशक्तिमन्तः तेषां यमलयुगलानि - समानशीलानि द्वन्द्वानि तेषां यन्त्राणि - प्रपञ्चविशेषास्तैर्युक्तमित्र १४ अर्चिषां - मणिरत्नप्रभाज्वालानां सहस्त्रैर्मालनीयं - परिवारणीयम् किमुक्तं भवति ?--एवं नाम अत्यद्भुतै १० मणिरत्नप्रभाजालैरा कलितमिव भाति यथा नूनमिदं न स्वाभाविकम् किन्तु विशिष्टविद्याशक्तिमत्पुरुषप्रपञ्चप्रभावितमिति, १५ ' रुवगसहस्सकलियं......सस्सिरीयरूवं प्राग्वत् [ १० ७६ पं०६-१२] १६ काञ्चनं च मणयश्च रत्नानि च काश्चनमणिरत्नानि तेषां - तन्मयी स्तूपिका- शिखरं यस्य तत् तथा १७ नानाविधाभिः - नानाप्रकाराभिः पञ्चवर्णाभिर्घण्टाभिः पताकाभिश्च परि-सामस्त्येन मण्डितमग्रटिप्पण ] - राय० वि० । ० 'खंभुग्गय' इत आरम्य 'सस्सिरीयरूवं' इत्यन्तं "कवचिद् एतन्न दृश्यते " - राय० वि० । Jain Education rem onal ॥९५॥ jainelibrary.org Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१६॥ चैवलं मरीतिकवयं विणिम्मुयन्तं लोइय-उल्लोइयमहियं गोसीससरसरत्तचंदणदहरदिन्नपंचंगुलितलं उचियचन्दणकलसं चन्दैणघडकयतोरणपडिदुवारदेसभागं आसत्तोसत्तविउलवड्वग्धारियमल्लदामकलावं पंचवण्णसरससुरभिमुक्कपुप्फपुंजोवयारकलियं कालागुरुपवरकुंदरुकतुरुक्कधूवमघमघंतगंधुद्धयाभिरामं [पृ०७५०४-] शिखरं यस्य तद् नानाविधपञ्चवर्णघण्टापताकापरिमण्डिताग्रशिखरम् १८ चपलं-चलं चिकचिकायमानत्वात् १९ मरीचिकवचं-किरगजालपरिक्षेपं विनिर्मुश्चत् २० लाइयं नाम-यद् भूमेोमयादिनोपलेपनम् २१ उल्लोइयं-कुडथानां मालस्य च सेटिकादिभिः ५ सम्मृष्टीकरणम् लाइय-उल्लोइयाभ्यामिव महितं-पूजितं लाइय-उल्लोइयमहियं तथा २२ गोशीर्षण-गोशीर्षनामकचन्दनेन सरसरक्तचन्दनेन च दर्दरेण-पहलेन चपेटाकारेण वा दत्ताः पञ्चाङ्गुलितला-हस्तका यत्र तद् गोशीर्षसरसरक्तचन्दनदर्दरदत्तपश्चाङ्गुलितलम् तथा २३ उपचिता-निवेशिताः चन्दनकलशा-मङ्गलकलशा यत्र तद् उपचितचन्दनकलशम् २४ चन्दनघटैः-चन्दनकलशैः सुकतानि-सुष्टु कृतानि शोभितानीति तात्पर्यार्थः यानि तोरणानि तानि चन्दनघटसुकृतानि तानि तोरणानि प्रति द्वारदेशभाग-द्वारदे. शभागे यत्र तत् चन्दनघटसुकृततोरणप्रतिद्वारदेशभागम् तथा २५आ-अवाङ्-अधोभूमौ सक्त आसक्तो-भूमौ लग्न इत्यर्थः ऊध्वं सक्त १० उत्सतः-उल्लोचतले उपरि संबद्ध इत्यर्थः विपुलो-विस्तीर्णः वृत्तो-वर्तुल: २६'वग्धारिय' इति-प्रलम्बितो माल्यदामकलापः-पुष्पमालासमूहो यत्र तद् आसक्तोसक्तविपुलवृत्तप्रलम्बितमाल्यदामकलापम् तथा २७ पञ्चवर्णन सरसेन-सच्छायेन सुरभिणा मुक्तेनक्षिप्तेन पुष्पपुञ्जलक्षणेनोपचारेण-पूजया कलितं पञ्चवर्णसरससुरभिमुक्तपुष्पपुञ्जोपचारकलितम् २८ 'कालागुरु...गंधवट्टिभूत' इति मरीचि' स्थाने आर्षत्वात् 'मरीति' इति-पृ० ८८ x टिप्पण । Jain Education demonal For Private Personal use only Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । | सुगंधवरगन्धियं गन्धवहिभूतं अच्छरगणसंघसंविकिण्णं दिव्यकुंडियसद्दसंपणाइयं अच्छं [पृ० १९ पं० ५ ]जाव | पडिरूवं । तैस्स णं पिच्छा घर मण्डवस्स "अंतो बहुसमरमणिज्जभूमिभागं विउब्वैति [कंडिका० ३३-४०] जाव मणीणं फासो । तस्स णं पेच्छाघर मंडवस्स उल्लोयं विउब्वैति पउमलय भत्तिचित्तं जावें [पृ०१९ पं०५] पडिरूवं । [४२] तस्स णं बहुसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बैहुमज्झदेसभाए एत्थ णं एवं महं वइरामयं अखाडगं विउब्वैति । तस्स णं अक्खाडयस्स [पृ० ७ पं० ४ - ] प्राग्वत्, तथा २९ अप्सरोगणानां सङ्घः समुदायस्तेन सम्यग् - रमणीयतया विकीर्ण-व्याप्तम् - अप्सरोगणसङ्घसंविकीर्णम् तथा ३० दिव्यानां त्रटितानाम् आतोद्यानां - वेणुवीणामृदङ्गादीनां ये शब्दास्तैः सम्प्रणादितं सम्यक् - श्रोत्र - मनोहारितया प्रकर्षेण नादितं - शब्दवद् दिव्यत्रुटितशब्दसम्प्रणादितम् ३१ 'अच्छं जाव पडिरूवं' इति 'यावत्' शब्दकरणात् 'सहं अभिरूवं पडिरूवं' इति द्रष्टव्यम् एतच्च प्राग्वद् [पृ० १९ पं० ८] व्याख्येयम् । ३२ तस्य ३३ प्रेक्षागृह मण्डपस्य ३४ अन्तः- मध्ये ३५ बहुसमरमणीयं भूमिभागं ३६ विकुर्वति तद्यथा - 'आलिङ्गपुष्करमिति वा' [कण्डिका ३३ -४० पृ० ८१ पं० १२ - ] इत्यादि तदेव १० तावद् वक्तव्यं यावद् मणिस्पर्शसूत्रपर्यन्तः, तथा चाह - 'जाव मणीणं फासो' इति । ३७ तस्य प्रेक्षागृहमण्डपस्य ३८ उल्लोकम् - उपरिभागं ३९ विकुर्वति ४० पद्मलताभक्तिचित्रम् ४१ 'जाव पडिरूवं' इति 'यावत्' शब्दकरणात् 'अच्छं स० [ पृ० १९ पं० ८-] इत्यादिविशेषण कदम्बकपरिग्रहः । [४२] १तस्य-बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेश भागे ३ अत्र ४एकं महान्तं वज्रमयम् ५अक्षपार्ट ६ विकुर्वति, तस्य Jain Education emonal प्रेक्षागृह - मण्डपे अक्षपाटकः ॥९७॥ v.jainelibrary.org Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । अक्षपाटके मणिपीठिकासिंहासने ॥९८॥ बहुमज्झदेसभागे एत्थ णं भैहेग मणिपेढियं विउव्वति अ? जोयणाई आयामविक्खम्भेणं चत्तारि जोयणाई बाहल्लेणं सवमणिमयं अच्छे सण्हं जाव [पृ० १९५०५] पडिरूवं ।तीसे णं मणिपेडियाए उवैरि ऍत्थ णं | महेगं सीहासणं विउव्वइ, तस्स णं सीहासणस्स ईमेयारूवे वेण्णावासे पणत्ते-तर्वणिजमया चकला रययामया सीहा सोवणिया पाया णाणामणिमयाई पायसीसगाई जंबूणयमयाई गत्ताई वइरीमया संधी णाणामणिमये वेच्चे, "से णं सीहासणे ईहोमिय-उसभ-तुरग-नर-मगर-विहग-वालग-किन्नर-रुरु-सरभचाक्षपाटकस्य ८ बहुमध्यदेशभागे ९अत्र १०एका महतीं मणिपीठिका ११ विकुर्वति १२ अष्टौ योजनानि आयाम-विष्कम्भाभ्याम् १३चत्वारि योजनानि बाहल्येन-उच्चैस्त्वेनेति भावः, कथम्भूतां तां विकुर्वति? इत्यत आह-१४सर्वमणिमयीम्-सर्वात्मना मणिमयीं 'यावत्' करणात् १५ 'अच्छाम्' इत्यादिविशेषणसमूहपरिग्रहः [पृ० १९५०८] १६ तस्याश्च मणिपीठकाया १७ उपरि १८ अत्र १९महदेकं सिंहासनं २० विकुर्वति २१तस्य च सिंहासनस्य २२अयमेतद्रूपो २३वर्णावासः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-२४तपनीयमयाः =चक्कला २५रजतमयाः सिंहा यरुपशोभिंत तत् सिंहासनमुच्यते २६सौवर्णिकाः-सुवर्णमयाः पादाः२७नानामणिमयानि पादशीर्षकाणि-पादानामुपरितना अवयवविशेषाः, २८ जाम्बूनदमयानि गात्राणि २९ वज्रमया-वज्ररत्नापूरिताः सन्धयो-गात्राणां सन्धिमेलाः ३० नानामणि० मयं वेचं-व्युतम् । ३१ तत् सिंहासनम् ३२ ईहामृग-ऋषभ-तुरग-नर-मकर-व्यालक-किन्नर-रुरु-सरभ-चमर-वनलता = 'चकल' इत्ययं शब्दो देश्यः-"कुण्डल-बटुल-दोलाफलय-विसालेसु चक्कलयं"-चक्कलं कुण्डलम् वर्तुलम् दोलाफलकम् विशालं चेति चतुरर्थः"-देशीनाम० ५०३ गा० २० । भाषायाम् 'चाकळा' इति प्रतिभाति। 0 -मयं वच्च-पा० ५।-मयं वर्द्ध पा०४।- मयं वेच्च Jain Education Therional For Private Personel Use Only iw.jainelibrary.org Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१९॥ चमर-कुञ्जर-वणलय-पउमलयभत्ति [पृ०७६ पं० २] चित्तं ससारसारोवचियमणिरयणपायवीढे अँत्थरगमिउमसूरगणवतयकुसंतलिंबकेसरपञ्चत्थुयाभिरामे आईणग-रूय-बूर-णवणीय-तृलफासमउए कण्डिका ४० सविरडयरयत्ताणे उवचियखोमदुगुल्लपट्टपडिच्छायणे रत्तंसुअसंवुडे सुरम्मे पासाईए दरिसणिज्जे अभिरूवे पडिरूवे। पद्मलताभक्ति [पृ०७६ पं०६] चित्रम् । ३३ सारसारेः-प्रधानेः मणिरत्नैरुपचितेन पादपीठेन सह यत् तत् तथा, ३४ आस्तरकम्-५ आच्छादक मृद यस्य मसूरकस्य तद् आस्तरकमृदु, नवा त्वक् येषां ते नवत्वचः कुशान्ताः-दर्भपर्यन्ता नवत्वचश्व ते कशान्ताश्च नवत्वक्शान्ताः-प्रत्यग्रत्वग्दर्भपयन्तरूपाणि लिम्बानि-कोमलानि नमनशीलानि च केसराणि मध्ये यस्य मयूरकस्प तत् नवत्वक्कुशान्तलिम्बकेसरम् आस्तरकमृदुना मसूरकेण नवत्वक्कुशान्तलिम्बकेसरेण प्रत्यवस्तृतम्-आच्छादितं सत् यदभिरामं तत् तथा, ३५ किण्डिका ४०] पूर्ववत तथा ३६सुविरचितं रजवाणमुपरि यस्य तत् सुविरचितरजस्त्राणम् ३७ उपचिंत-परिकर्मितं यत् क्षौम दुकूलंकार्यासिकं वखं परिच्छादनं रजत्राणस्योपरि द्वितीयमाच्छादनं यस्य तत् तथा, तत उपरि ३८ रक्तांशुकेन-अतिरमणीयेन रक्तेन वस्त्रेण संवृतम्-आच्छादितम् अत एव ३९सुरम्यम् ४० 'पासाइए दरिसणिज्जे अभिरूवे पडिरूवे' इति [पृ०७ पं०१ तथा पृ०९५०६] प्राग्वत । तत्-व्युतम्-भा० १। -मयं वेटुं ? भा० २ । 8 “प्राकृतत्वाच्च * पदोपन्यासव्यत्ययः"-राय० वि० । 0 भाषायाम्-'गालमसूरियु' इति प्रसिद्धम् । + "विशेषणपूर्वापरनिपातः यादृच्छिकः प्राकृतत्वात्”-राय० वि० । = "विशेषणस्य परनिपातः प्राकृतत्यातू"-राय० वि० । * मूले 'उबचियमणिरयण' इति उपचित-मणिरत्न-पदयोर्व्यत्ययः । -'मणिरत्नोपचित'-इति उचितम् । Jain Educati o nal For Private Personal Use Only |w.jainelibrary.org Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१००॥ Jain Education [४३] तस्स णं सीहासणस्स उर्वरि एत्थ णं महेगं विजयसं विउवंति, संख-कुंद - दगरय-अमयमहियफेण| पुंजसंनिगासं सवरयणामयं अच्छे सण्हं पासादीयं दरिसणिज्जं अभिरूत्रं पडिवं । तस्स णं सीहासणस्स उवरिं विजय संस्स य बहुमैज्झदेस भागे एत्थ णं मेहं एवं वैयरामयं अंकुशं विव्वंति, तैसि च णं वयरामयंसि अंकुसंसि 'कुंभिक्कं मुत्तादानं विउच्यंति। से" णं कुंभिक्के सुत्तादामे अन्नेहिं चउहि अद्धकुंभिक्केहिं मुत्तादामेहिं [४३] १तस्य सिंहासनस्य २उपरि उल्लोके ३अत्र अस्मिन् स्थाने ४महदेकं ५विजयदुष्यं वस्त्रविशेषः, आह च जीवाभिगममूल| टीकाकृत् - "विजयदुष्यं वस्त्रविशेषः” [ ] इति । तं ६ विकुर्वन्ति-स्वशक्त्या निष्पादयन्ति कथम्भूतम् ? इत्याह-७ शङ्ख-कुन्द-दक| रजो-मृतमथितफेनपुञ्जसन्निकाशम् - शङ्खः प्रतीतः कुन्द इति - कुन्दकुसुमम् दकरजः - उदकरुणाः अमृतस्य-क्षीरोदधिजलस्य मथितस्य यः फेनपुञ्ज - डिण्डीरोत्करः तत्सन्निकाशं तत्समप्रभम् पुनः कथम्भूतम् इत्याह-८सर्वात्मना रत्नमयम् ९ ' अच्छं सहं पासाइयं' इत्या१ दिविशेषणजालं प्राग्वत् [ पृ०१९ पं०८] | १० तस्य सिंहासनस्य - ११ उपरि १२ तस्य विजयदृष्यस्य १३ बहुमध्यदेशभागेऽत्र १४महा- १० न्तमेकं १५ वज्रमयं वज्ररत्नमयमङ्कुशम् - अङ्कुशाकारं मुक्तादामावलम्बनाश्रयं १६ विकुर्वन्ति १७ तस्मिंश्च वज्ररत्नमयेऽङ्कुशे महदेकं १८- कुम्भा - मगधदेशप्रसिद्धं कुम्भपरिमाणं मुक्तादाम १९ विकुर्वन्ति । २० तत् कुम्भा मुक्तादाम २१ अन्यैश्चतुर्भिः कुम्भायै:- कुम्भ "अ पुरस्तात्, उपरि, परिमाणे" - इति मेदिनी - [ अमर० टी० पृ० ३२९] इति वचनात् अत्र 'अ' शब्दः परिमाणवाची बोध्यःकुम्भाप्रम् - कुम्भपरिमाणम् । ५. सिंहासने विजयदु ष्यम् तत्र च कुम्भपरिमाणानि मौक्तिकानि jainelibrary.org Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय। ॥१०॥ तदेञ्चत्तपमाणेहि सचओ समता संपेरिखित्ते । ते णं दामा तणिजलंबूसगा* गाणामणिरयणविविहहारद्वहारउवसोभियसमुदाया ईसिं' अण्णमण्णमसंपत्ता वारहिं पुवावरदाहिणुत्तरागएहिं मंदायं मंदाय =ऐजमाणाणि एजमाणाणि पलंबाणाणिx पलंबमाणाणि धंदमाणाणि वदमाणाणि उरालेणं मणुन्नेणं मणहरेणं परिमाणैर्मुक्तादामभिः २२तदर्बोच्चत्वप्रमाणमात्रैः २३ सर्वतः सर्वासु दिक्षु २४ समन्ततः-सामस्त्येन २५ सम्परिक्षिप्त-व्याप्तम् । २६ तानि पश्चापि दामानि २७ तपनीयमया लम्बूसगा-आभरणविशेषरूपा अग्रभागे येषां प्रलम्बमानानां तानि तथा २८ नानामणिरत्नैः नानामणिरत्नमयैविविधैः-विचित्रो रैरर्धहारैश्चोपशोभितः-सामस्त्येन शोभितः समुदायो येषां तानि तथा २९ तथा ईषत् मनाक् अन्योऽन्यं-परस्परम् असंप्राप्तानि-असंलग्नानि ३० पूर्वापरदक्षिणोत्तरागतैः ३१ 'मन्दायं मन्दाय' इति मन्दं मन्दं ३२ कम्पमानानि ३३ ईषत्कम्पनवशादेव प्रकर्षत इतस्ततो मनाक् चलनेन लम्बमानानि लम्बमानानि ततः ३४ परस्परं सम्पर्कवंशतः शब्दायमानानि शब्दायमानानि ३५ उदारेण स्फारेण शब्देनेति योगः स च स्फारः शब्दो मनःप्रतिकूलोपि भवति तत आह-३६ मनोज्ञेन मनोऽनुकूलेन ३७ तच्च मनोऽनुकूलत्वं लेशतः स्यात् अत आह-मनोहरेण मनांसि श्रोतृणां हरति-एकान्तेनात्मवशं नयतीति मनोहर:० * -गा सुवण्णपयरगमंडियग्गा णा-वि० बा० । = "भृशाभीक्ष्ण्याऽविच्छेदे द्विः प्राक् तमबादे:"-[७-४-७३ हेमश०] इति अविच्छेदे द्विर्वचनम् यथा-पचन्ति पचन्ति' इत्यत्र, एवमुत्तरत्राऽपि"-राय०वि० । ४ -णि वजमा-पा०१। -णि पझंझमा-भा० १।-णि पझझमा- पा. ३। -णि पडंडमा-पा० ५।-णि पञ्भक्खमा-पा० २ । 8 'वातैः' इति शेषः । ० "लिहादेः आकृतिगणत्वाद् 'अच्' प्रत्ययः"-राय०वि० । | "लिहादिभ्यः"-(५-१-५० हैमश०) अन ह' धातोः 'अच्प्रत्यये हरः-मनोहरः। Jain Educationamenal For Private Personel Use Only wwlainelibrary.org Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१०२॥ कण-मणणिचुतिकरणं सद्देणं ते पएसे सव्वओ सनंता आपरेमाणा आपूरेमाणा सिरी अतीव अतीव उवसोभेमाणा उवसोभेमाणा "चिट्ठति । भद्रासनानि [४४]तए णं से आभिओगिए देवे तस्स सीहासणस्त अवरुत्तरेणं उत्तरेण उत्तरपुरथिमेण एत्थणं सूरिआभस देवस्स चउहं सामाणियसाहस्सीणं चत्तारि भद्दासणसाहस्तीओ विउव्वइ, तस्स णं सीहासणस्त तेन ३८ तदपि मनोहरत्वं कुतः ? इत्याह-कर्ण-मनोनिवृतिकरण ° ततोऽयमर्थः-प्रतिश्रोत कर्णयोर्मनसश्च निवृतिकरः-सुखोत्पादकस्ततो मनोहरस्तेनेत्थम्भूतेन ३९ शब्देन ४० तान् प्रत्यासन्नान् प्रदेशान् ४१ सर्वतो-दिक्षु ४२ समन्ततो-विदिक्षु ४३ आपूरयन्ति| आपूरयन्ति, अत एव ४४ श्रिया-शोभया अतीवोपशोभमानानि ४५ तिष्ठन्ति । [४४] १ ततः स आभियोगिको देवः २तस्य सिंहासनस्य ३अपरोत्तरेण-वायव्ये कोणे इत्यर्थः, ४ उत्तरेण-उत्तरस्याम् ५ ऐशान्याम् अत्र एतासु तिसृषु दिक्षु ६ सूर्याभस्य देवस्य ७ चतुर्णाम् सामानिकसहस्राणां योग्यानि ८ चत्वारि भद्रासनसहस्राणि ९वि "निमित्त-कारण-हेतुषु सर्वासां विभक्तीनां प्रायो दर्शनम् ( सर्वनाम्नस्तृतीया च २-३-७ काशिकावृत्ती ) इति वचनात् हेतौ तृतीया”- १० राय० वि०।- ''शत्रन्तस्य शौ' इदं रूपम्" पा० ४-५ भा० १। "शान्तस्य स्याद् इदं रूपम्"-भा०२। “शप्रन्तस्य स्यादौ इदं रूपम्"-मु० पु०। - वर्तमानकालसूचकः 'शत्' प्रत्ययः तेन आ+पूरय+अत्-'आप्रयत्' इति प्रयोगे साधिते प्रथमात्रहुवचने शौ 'आपूरयन्ति' । Jain Education in mala For Private Personel Use Only hinelibrary.org Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । | पुरित्थमेणं एत्थ णं सूरियाभस्स देवस्स चण्हं अग्गमहिसीणं संपरिवाराणं चैत्तारि भद्दा सणसाहस्सीओ विडव्वइ, तस्स णं सीहासणस्स दौहिणपुरत्थिमेणं एत्थ णं सुरियाभस्त देवस्त अभितैरपरिसाए अहं देवसाह| स्त्रीणं अट्ठ भद्दासणसाहस्सीओ विउब्बइ, एवं दाहिणेण मज्झिमपरिसाएं देंसहं देवसाहस्सीणं देस महासण| साहस्सीओ विव्वति दोहिणपञ्चत्थिमेणं बाहिरैपरिसाए बारसहं देवसाहस्सीणं वारेंस भद्दा सणसाहस्सीओ assar पचत्थिमेणं सत्त अभियाद्द्वितीणं सर्वे भद्दासणे विउच्वति, तेस्स णं सीहासणस्स चउदिसिं एत्थ णं सूरिया भस्स देवस्त सोलसन्हं आयरक्खदेव साहस्तीणं सोलस भद्दा सणसाहस्सीओ बिउब्वति, तंज-पुरस्थिमेण चत्तारि साहसीओ दौहिणेणं चत्तारि साहस्सीओ पचत्थिमेणं चत्तारि साहस्सीओ उत्तरेण चत्तारि । कुर्वति, १० पूर्वस्थां ११ चतसृणा मग्रमहिषीणां १२ सपरिवाराणां १३ चत्वारि भद्रासन सहस्रागि, १४ दक्षिणपूर्वस्याम् १५ अभ्यन्तरपर्वदः १६ अष्टानां देवसहस्राणां योग्यानि १७ अष्टौ भद्रासन सहस्राणि १८ दक्षिण त्यां १९ मध्यमपर्षदो २० दशानां देवमहस्राणां यो. | ग्यानि २१ दश भद्रासनसहस्राणि २२ दक्षिणापरस्यां नैर्ऋतकोणे इत्यर्थः, २३ बाह्यपर्षदो २४ द्वादशानां देवसहस्राणां २५ द्वादश १० | भद्रासन सहस्राणि २६ पश्चिमायां २७ सप्तानामनीकाधिपतीनां २८ सप्त भद्रासनानि विकुर्वति । तदनन्तरं २९ तस्य सिंहासनस्य ३० चतसृषु दिक्षु अत्र सामानिकादिदेवभद्रासनानां पृष्ठतः ३१ सूर्याभस्य देवस्य सम्बन्धिनां ३२ षोडशानामात्मरक्षदेवसहस्राणां योग्यानि ३३ षोडश भद्रासन सहस्राणि विकुर्वति, ३४ तद्यथा - ३५चत्वारि भद्रासन सहस्राणि पूर्वस्याम् ३६चत्वारि दक्षिणतः ३७चत्वारि पश्चिमायाम् ३८चत्वारि उत्तरतः - सर्व संख्यया सप्ताधिकानि चतुःपञ्चाशत्सहस्राणि - ५४००७ - भद्रासनानां विकुर्वति । ॥१०३॥ ww.jainelibrary.org Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइथे। साहस्सीओ। [४५] तस्स दिव्वस्स जाणविमाणस्तईमेयारूवेवणावासे पगते, से जहा नाम ए अईरुग्गयस्त वाहेमंतिय. बालियसूरियस्स वा खयरिंगालाण वा रत्ति पजलियाण वा जवाकुसुमवणस्स वा किसुयवणस्स वा पारियाय- | वणस्स वा सव्वतो समंता संकुसुर्मियस्स, भवे एयारूवे सिया ?'णो इणढे समढे, तस्स णं दिव्वस्स जाणविः | माणस्स एत्तो इतराए चेव जाव वण्णेणं [पृ० ८५ पं० २] पण्णते। गंधो य फासो य जहा मणी] [कण्डिका ५ यानविमानवर्णकनिवेशः ॥१०४॥ [४५]१तस्य दिव्यस्य यानविमानस्य ३अयम्-अनन्तरं वक्ष्यमाणस्वरूपो श्वर्णावासो-वर्णकनिवेशः ५तद्यथा-स यथा नाम ६अचिरोगतस्य क्षणमात्रमुद्गतस्य ७हैमन्तिकस्य शिशिरकालभाविनो बालसूर्यस्य स ह्यत्यन्तमारक्तो भवति दीप्यमानश्चेत्युपादानम्, ८'या'शब्दाः सर्वेऽपि समुच्चये, ९ खादिराङ्गाराणां वा १०रात्रौ प्रज्वलितानाम् ११ जपाकुसुमवनस्य वा १२ किंशुक्रवनस्य वा १३ पारिजातवनस्य वा १४ सर्वतः-सर्वासु दिक्षु समन्ततः-सामस्त्येन १५ संकुसुमितस्य सम्यक् कुसुमितस्य, अत्रान्तरे शिष्यः पृच्छति-यादृग्रूप एतेषां वर्णः १६ 'भवे एयारूवे सिया' इति स्याद-कथश्चिद् भवेद् एतद्रूपस्तस्य दिव्यस्य यानविमानस्य वर्णः? मूरिराह-१७ 'नो इणटे समझे, तस्स णं दिव्यस्स.....मणामतरागे चेव वण्णे पण्णत्ते इति प्राग्वत् [पृ०८५ पं० तथा २-५] व्याख्येयम् , १८गन्धः स्पर्शः यथा प्राग् मणीनामुक्तस्तथा वक्तव्यः, स चैवं-'तस्स णं दिव्बस्स जाणविमाणस्स इमे एयारूवे गंधे पण्णत्ते, तंजहा-से जहा नाम ए कोहपुडाण ४ इमे+एयारूवे-इमेयास्वे-पृ० ९० * टिप्पण । १. रत्ति' इति सप्तम्यर्थे द्वितीया प्राकृतत्वात् । Jain Educationamenal For Private Personel Use Only Tww.illainelibrary.org Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । Jain Education ३९-४०] ते णं से आभिओगिए देवे दिव्वं जाणविमाणं विउव्वह विउच्चित्ता जेणेव सूरियाभे देवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सूरियानं देवं करयल परिग्गहियं [पृ० ६७ पं० ८] जावें पञ्चप्पिर्णति । वा तगरपुडाण वा' [कं० ३९ पृ० ९१ पं० ४] इत्यादि । १९ 'तए णं से आभिओगिए देवे' इत्यादि २०' यावत् 'करगात् 'करयलपरिग्गहियं दसनहं. . बद्भावे वद्धावित्ता एयमाणत्तियं' इति [पृ० ५६ पं० १-२ तथा पृ० ६७ पं० ९] द्रष्टव्यम् । सिरिद्दहे गए सूरे। कतो रत्ति मुद्दे ! पाणियसदा सउणयाणं ॥ [ यथा - " + उय त्रिणय8तत्तिल्ले! ० पूरेमसि ? -राय० विव० । ] इत्यत्र " * ॥१०५॥ + 'उय' इति 'पश्य' पदमात्रसूचको निपातः । “उअ पश्य - ( ८-२-२१८ हैमश० ) 8 'तत्तिल्ल' शब्द : तत्परवाची देयः । " तत्तिल्लो तलिच्छी य तपरे" - देशीनाम० ० ५ गा० ३ । अस्य पदस्य भावः सम्यग् न अवगम्यते परंतु तात्पर्यानुसारी 'पूर्णे' इति अर्थः कल्प्यते । = अयं शब्दः खगपानभाजनवाचिना देश्य 'सिरिदही' [" 'सिरिद्दही' खगपानभाजनम् " - देशीना० १०८ गा० ३२] शब्देन समानः प्रतीयते ततः प्रस्तुत 'सिरिद्दह' पदस्यापि स एव अर्थों गम्यते । 'रति' इति द्वितीयान्तमपि पदं सप्तम्यर्थसूचकं ज्ञेयम् । यथा च प्रस्तुतगाथायां 'रति' १० शब्दः सप्तम्य बोधयति तथा अत्र मूलसूत्रगतं 'रवि'पदमपि सप्तमीभावसूचकं बोध्यम् । एतदर्थस्पष्टनार्थं च विवरणकारेण इयं गाथा उदाहरणरूपेण दर्शिता । उत विनयतत्परे ! पूरिने ! श्रीहे ? गते सूर्ये । कुतः रात्री मुग्धे ! पानियशब्दाः शकुनकानाम् ॥ इति शब्दसंस्कारः । समग्रगाथायाः | भावस्तु इत्थं बोध्यः - हे त्रिनयपरायणे ! मुग्धे ! सूर्यः अस्तंगतः रात्रिर्जाता अतः जलपूर्णे खगपानभाजने पक्षिणां पानीयशब्दाः कुतः कारणात् स्युः? रात्रौ हि पक्षिणः शेरत एव न जलं पिवन्ति नापि किञ्चिद् भक्षयन्ति अतस्तेषां निवासे शान्तिरेव युक्ता तथापि अथ रात्रौ पक्षिजलभाजने www.ainelibrary.org Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूर्याभः रायपसेणइयं। ॥१०६॥ [४६] तए णं से सूरियाभे देवे आभिओगस्स देवस्स अंतिए एयमढें सोचा निसम्म हट्ठ-जाव [पृ०४७ पं० ३-1-हियए दिव्वं जिर्णिदाभिगमणजोग्गं उत्तरवेउवियरूवं विउध्वति विउवित्ता चउँहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवारः सपरिवाराहिं दोहिं अणीएहिं, तंजहा-गंधव्वाणीएण य णबाणीएण य सद्धिं संपरिबुडे तं दिव्वं जाणविमाणं यानविमान अणुपंयाहिणीकरेमाणे पुरथिमिल्लेणं मारूढः [४६] १दिव्यं-प्रधानं २जिनेन्द्रस्य-भगवतो वर्द्धमानस्वामिनोऽभिगमनाय-अभिमुखं गमनाय योग्यम्-उचितं जिनेन्द्राभिगमनयोग्यम् ३ उत्तरवैक्रिय रूपं ४ विकुर्वति, विकुर्वित्वा ५ चतसृभिरग्रमहिषीभिः सपरिवाराभिः६द्वाभ्यामनीकाभ्याम्-तद्यथा-गन्धनिीकेन नाट्यानीकेन च ७ सार्द्धम् ८ तत्र सहभावः स्वस्वामिभावमन्तरेणापि दृष्टः यथा समानगुण-विभवयोद्वयोमिंत्रयोः अत: खस्वामिभावप्रकटनार्थमाह-सम्यग् आराधकभावं बिभ्राणैः परिवृतः-संपरिवृतः ९ तद् दिव्यं यानविमानम् १० अनुप्रदक्षिणीकुर्वन्पूर्वतोरणानुकूल्येन प्रदक्षिणीकुर्वन् पूर्वेण तोरणेनानुप्रविशति-प्रविशन् ११ पूर्वेण त्रिसोपानप्रतिरूपकेण प्रतिविशिष्टरूपेण त्रिसोपा___8'बि' पूर्वात् 'कुर्व' धातोः 'विकुर्य' इति पदं साधु । 'विकुवित्वा' इति तु छान्दसमेतत् । ० "पूर्वेण तोरणेन अनुप्रविशति" अस्य विव-१० रणस्य मूलं पञ्चस्वपि टोकापाठप्रतिषु नोपलब्धम् । * -ति स्वसिंहासनानुकूलं प्रविशति प्र-भा० २। पक्षिणां पानीयशब्दो जायते ततस्तस्यावश्यं किमपि कारणं भवेत् । अत्र “एकान्तनिर्जनस्थानं मत्वा आवां समागतो तथापि नात्र एकान्तनिर्जन प्रतिभाति" इत्येवं स्वीयं भावं कश्चिद् वल्लभः मुग्धायै सूचयति-एष गाथाध्वनिः । Jain Education a l For Private & Personal use only I w ainelibrary.org Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। *तिसोमाणपडिरूवएणं दुरूहति दुरूहित्ता जेणेव 'सीहासणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता 'सीहासणवरगए पुरत्याभिमुहे सण्णिसण्णे । तएँ णं तस्स सूरिआभस्स देवस्स चत्तारि सामाणियसाहस्सीओ तं" दिव्वं जाणविमाणं अणुपयाहिणीकरमाणा उत्तरिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं दुरूहंति दुरूहित्ता पत्तयं पत्तय पुवणत्थेहिं भहासणेहिं णिसीयंति, अवसेसा देवा य देवीओ य तं दिव्वं जाणविमाणं जाय दाहिणिल्लेणं तिसो. वाणपडिरूवएणं दुरूहति दुरूहित्ता पत्तेयं पत्तेयं पुँब्वणत्थेहिं भद्दासणेहिं निसीयंति। ५॥१०७॥ नेन तद् यानविमानम् १२ आरोहति, आरुह्य च १३ यस्मिन्नेव देशे तस्या मणिपीठिकाया उपरि १४ सिंहासनं १५ तत्रोपागच्छति. उपागत्य च १६सिंहासनवरगतः सन् १७पूर्वाभिमुखः सन्निपण्णः सम्यक्-सकलसेवकजनचमत्कारकारिण्या उपवेशनस्थित्योपविष्टः। १८ ततः १९ तस्य सूर्याभस्य देवस्य २० चत्वारि सामानिकदेवसहस्राणि २१ तद् दिव्यं यानविमानम् २२ अनुप्रदक्षिणीकुर्वन्ति, २३ उत्तरेण त्रिसोपानप्रतिरूपकेण २४ आरोहन्ति, २५ पूर्वन्यस्तेषु भद्रासनेषु २६ निपीदन्ति २७ अवशेषाः-अभ्यन्तरपर्षदादयो देवा देव्यश्च २८ दक्षिणेन त्रिसोपानप्रतिरूपकेण २९ आरोहन्ति, आरुह्य च ३० स्वेषु भद्रासनेषु ३१ निषीदन्ति । * 'त्रिसोपान-तिसोवाण-तिसोमाण' इति शब्दपरिवर्तनम् । = अत्र 'दुर्' उपसर्गपूर्वको 'रुह' धातुः प्रतीयते । 8 "अत्र सप्तम्यर्थे तृतीया"राय० वि० । Jain Education For Private Personal use only wittainelibrary.org Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण यानविमान प्रस्थानम् इयं। ॥१०८॥ [४७] तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स तं दिव्यं जाणविमाणं दुरूहरेस सनाणस्त अट्ठ अहमङ्गलगा पुरतो अ. हाणुपुब्बीए संपत्थिती, तंजहा-'सोस्थिय सिरिवञ्छ जाव [पृ० १९ पं०४] दप्पणा । त गंतरं च णं पुण्णकलसभिगार दिव्याय छत्तपडागा सचामेरा दंसणरतिया आलोयदरिसणिज्जााउऽयविजयवेजयंतीपडागा ऊसिया गणतलमणुलिहन्ती पुरतो अहाणुपुवीए संपत्थिय।। तयणतरं च णं वेसलियभिसंतवितल दण्डं लम्बकोरंटमल्लदामोवसोभित [४७] १ ततः २तस्य ३ सूर्याभस्य देवस्य ४ तद् दिव्यं यानविमानम् ५ आरूढस्य ६ पुरतोष्टौ -अष्टमङ्गलकानि ७ यथानुपूर्व्या-वक्ष्यमाणपाठक्रमेणेत्यर्थः, ८ संप्रस्थितानि ९ तद्यथा-पूर्व १० स्वस्तिकः तदनन्तरं ११ =श्रीवत्सः-१२ तदनन्तर १३ पूर्णकलश-भृङ्गार-१४दिव्याऽऽतपत्र-पताकाः १५ सचामराः, कथम्भृताः ? इत्याह-१६दर्शनरतिका दर्शने-अवलोकने रतिर्यासु ता दर्शनरतिकाः, १७ इह दर्शनरतिकमपि किश्चिदालोकदर्शनीयं न भवत्यम गलत्वात् यथा गर्भवती युवतिः अत आह-आलोकेबहिःप्रस्थानसमयभाविनि दर्शनीया-द्रष्टुं योग्या मङ्गल्यत्वात् , अन्ये त्वाहुः-"आलोके दर्शनीया-न पुनरत्युच्चा-आलोकदर्शनीया" [ ] तथा १८ वातोद्धता विजयसूचिका वैजयन्ती इति विजयवैजयन्ती च उत्सृता-ऊर्वीकृता १९ गगनतलम्-अम्बरतलमनुलि| खन्ती-अभिलङ्घयन्ती २० पुरतो यथानुपूर्व्या २१ संप्रस्थिता । २२ तदनन्तरं २३ वैडूयों वैडूर्यरत्नमयो भिसन्तो-दीप्यमानो विमलो-निर्मलो दण्डो यस्य तत् तथा २४ प्रलम्बते इति प्रलम्बः तेन-प्रलम्बमानेन कोरण्टमाल्यदाना-कोरण्टपुष्पमालयोपशोभित - पृ० १९ + टिप्पण। - पृ० १९ + टिप्पण। ४ प्राकृतोऽयं प्रयोगः । Jan Education For Private 3 Personal Use Only नाinelibrary.org Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१०९॥ चंदमंडलैंनिभं समुस्सियं विमलमायवत्तं पवरसीहासणं च मणिरयणभत्तिचित्तं सपायपीढं सपाउयांजीयसमाउत्तं बहुकिंकरामरपरिग्गहियं पुरतो अहाणुपुवीए संपत्थियं । तैयणंतरं च णं वईरामयवद्दलट्ठसंठियसुसिलिट्ठपरिघट्टमहसुपतिहिए "विसिट्टे अणेगवरैपंचवण्णकुडभीसहस्सुस्सिए परिमंडियाभिरामे वाउधुयविजयवेजयंतीपडागच्छत्तातिच्छत्तकलिते तुंगे" प्रलम्भकोरण्टमाल्यदामोपशोभित २५ चन्द्रमण्डलनिभं दीप्त्या शोभया वर्तुलतया च चन्द्रमण्डलाकारं २६ समुत्सृतं सम्यगू/- 14 कृतं २७ विमलमातपत्र तथा २८ प्रवरं सिंहासनं २९ मणिरत्नैः भक्त्या-विच्छित्त्या चित्रं यत् तद् मणिरत्नभक्तिचित्रम् ३० सह पादपीठं यस्य तत् सपादपीठं तथा ३१ पादुकायोगः-पादुकाद्वितयं तस्य समायोजनसमायुक्तम् सह पादुकायोगसमायुक्तं यस्य तत् तथा ३२ बहुभिः किङ्करैः-किङ्करकल्पैरमरैः परिगृहीतं ३३ पुरतो ३४ यथानुपूर्व्या ३५ सम्प्रस्थितम् । ३६ तदनन्तरं३७ वज्रमयो वज्ररत्नमयः तथा वृत्तं-वन्तुलं लष्टं-मनोज्ञं संस्थितं-संस्थानमाकारो यस्य स वृत्तलष्टसंस्थितः तथा सुश्लिष्टः-सुश्लेपापन्नावयवो मसृण इत्यर्थः परिघृष्ट इव परिपृष्टः खरशाणया पाषाणप्रतिमावद् मृष्ट इव मृष्टः सुकुमारशाणया पाषाणप्रतिमेव सुपतिष्ठितो न तु तिर्यपतिततया -बक्र:३८ अत एव शेषध्वजेभ्यो विशिष्टः-अतिशायी, तथा ३९ अनेकानि-अनेकसङ्ख्याकानि बराणि-प्रधानानि पञ्चवर्णानि कुडभीसहस्राणि उत्सृतानि यत्र सोऽनेकवरपञ्चवर्णकुडभीसहस्रोत्सृतः= ४० वातोद्धृतविजयवैजयन्तीपताकाच्छत्रातिच्छत्रकलितः, ४१ तुङ्गः-अत्युच्चो योजनस वि० बा०। + -टः परशा-पा० ५। "ततः एतेषां पदानां पदद्वयमीलनेन कर्मधारयः"-राय०वि०। = "कान्तस्य परनिपातः सुखादिदर्शनात्'-राय०वि०-पृ० ४८ * टिप्पण। Jain Education emanal For Private & Personel Use Only jainelibrary.org Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। सूर्याभः भगवन्तमुपागतः ॥११०॥ गगणतलमणुलिहतसिहरे जोअणसहस्समूसिए महतिमहीलए महिंदज्झए पुरतो अहाणुपुवीए संपत्थिए।। तयणंतरं च णं सुरूवणेवत्थपरिकच्छिया सुसजा सव्वालंकारभूसिया महयों भडचडगरपंहगरेणं पंच अणीयाहिवईगो पुरतो अहाणुपुवीए संपत्थिया। [तयणंतरं च णं बहवे आभिओगिया देवा देवीओ य सरहिं सरहिं स्वेहि, सएहिं सएहिं विसेसेहिं,सएहिं सएहिं विदेहिं, सरहिं सरहिं णेजाएहि,सएहिं सएहिं णेव. त्थेहिं पुरतो अहाणुपुवीए संपत्थिया तयणंतरं च णं सूरियाभविमाणवासिंणो बहवे वेमाणिया देवा य ५ देवीओ य सब्विड्डीएँ जाव [पृ० ६९ पं० २]-रवेणं सूरियाभं देवं पुरेतो पासतो य मग्गतो य समणुगच्छंति। हस्रप्रमाणोच्छ्रायत्वात् , तथा ४२ गगनतलम्-अम्बरतलमनुलिखत् शिखरम्-अग्रभागो यस्य स तथा ४३ योजनसहस्रमृत्सृतः अत एव ४४ अतिशयेन महान् ४५ महेन्द्रध्वजः ४६ पुरतो यथानुपूा सम्प्रस्थितः।४७ तदनन्तरं ४८ सुरूपं नेपथ्यं परिकक्षितंपरिगृहीतं यैस्ते तथा, तथा ४९ सुष्ठु-अतिशयेन सज्जाः-परिपूर्णाः खसामग्रीसमायुक्ततया प्रगुणीभूताः-५०सर्वालङ्कारविभूषिताः ५१ महता-अतिशयेन ५२ भटचटकर पहकरेण-चटकरप्रधानभटसमूहेन *पश्चानीकानि ५३ पश्चानीकाधिपतयः५४ पुरतो यथाsनुपूर्व्या संपस्थिताः । ५५ तदनन्तरं च ५६ सूर्याभविमानवासिनो बहवो वैमानिका देवा देव्यश्च-५७सर्वा यावत्'करणात् 'सब्य जुईए सव्वबलेणं इत्यादि [पृ० ६९ पं० २-३-] परिग्रहः-५८ सूर्याभं देवं ५९ पुरतः पार्श्वतो मार्गतः-पृष्ठतः समनुगच्छन्ति । [ ] इति चिह्नान्तर्गतः पाठः विवरणे नारित । ४ "मग्गा पश्चात्"-देशीना० ब० १ गा० ४। "मग्गो पश्चात्'-देशीना० ब०६ गा० १११ । अधुनातनमहाराष्ट्रीभाषायाम् “पश्चात्' इत्यर्थे 'मग' शब्दः प्रसिद्धः। 8 पृ० १६ पं०५ * टिप्पण । * नैतत् पदं मूलपाठे। Jain Educate anterior For Private Personel Use Only Iw.jainelibrary.org Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥११॥ [४८] तए णं से सूरियाने देवे तेणं पश्चागीयपरिखित्तेणं वइरामयवद्दलट्ठसंठिएण जाव [कं० ४७ पं०७] जोयणसहस्समूसिएणं महतिमहालतेणं महिंदज्झएणं पुरतो कड्डिलमागेणं चउँहिं सामाणियसहस्सेहिं जाव [पृ. ४४ पं०२-] सोलसहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अन्नेहि य बहहिं सूरियाभविमाणवासीहिं वेमाणिएहिं देवेहिं देवीहि य सद्धिं संपरिवुडे सब्बिड्डीए जीव [पृ० ६९५०२]-रवेणं सोधम्मस्स कप्पस्स मज्झमज्झेणं "तं दिव्यं देविड़ि दिव्वं देवजुर्ति"दिव्वं देवाणुभावं उवलालेमाणे उवलालेमाणे उवदंसेमाणे उवदंसेमाणे ०पडिजागरेमाणे पडिजागरेमाणे [४८] १ततः २स सूर्याभो देवः ३तेन पश्चानीकपरिक्षिप्तेन ४यथोक्तविशेषणविशिष्टेन[पृ०१०९५०८-] महेन्द्रध्वजेन पुरतः प्रकृष्यमाणेन ५चतुर्भिः सामानिकसहस्रैः चतसृभिः सपरिवाराभिरग्रमहिपीभिः तिसृभिः पर्षद्भिः सप्तभिरनीकाधिपतिभिः षोडशभिरात्मरक्षदेवसहस्रः ७अन्यैश्च बहुभिः सूर्याभविमानवासिभिर्वैमानिकैर्देवैर्देवीभिश्च ८सार्य संपरिवृतः ९सर्वर्या सर्वद्युत्या १० यावत्' करणात 'सव्ववलेणं सव्वसमुदएणं सव्वादरेण सव्वविभूसाए सबविभूईए सम्बसंभमेणं सबपुष्फवत्थगंधमल्लालङ्कारेणं सवदिचतुडियसद्दसंनिनाएणं महया इड्डीए महया जुईए महया बलेणं महया समुदएणं महया वस्तुडियजमगसमगपडुप्पवाइयरवेणं संख-पणव-पडहमेरि-झल्लरि-खरमुहि-हुडुक्क-मुस्य-मुइंग-दुन्दुभिनिग्घोसनाइयरवेणं' इति [पृ० ६९ पं० ३-] परिगृह्यते । ११ सौधर्मस्य कल्पस्य मध्येन १२ तां दिव्यां देवर्द्धिम् १३ दिव्यां देवद्युतिम् १४ दिव्यां देवानुभूतिम् उपदर्शयन् १५ उपलालयन् उपलालयन्-लीलया ०वि० वा०। Join Educat i onal For Private Personel Use Only jainelibrary.org Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥११२॥ जेणे सोहम्नस्स कप्पस्स उत्तरिल्ले णिजाणमग्गे तेगेव उपागच्छति, 'जोयणलयसाहस्सितेहिं विग्गहेहिं ओवयमाणे वीतीवयमाणे ताए उभिट्टाए [पृ०५८ ६०१ जाव तिरिय असंखिजाणं दीवसमुदाणं भैज्झमज्झेणं वीइवयमाणे वीइवयमाणे जेणे नंदीसरवरे दीवे जेगे दाहिणपुरथिभिल्ले रतिकरपैव्यते तेणेव उवा गच्छति उवागच्छित्ता तं "दिव्वं देविड् िजाव दिव्वं देवाणुभावं पंडिसाहरेमाणे पडिसाहरेमाणे पंडिसंखेवेमाणे पडिसंखेवेमाणे जेणे जम्बूद्दीवे दीये जेणे भारहे वासे जेणे आमलकप्पा नयरी जेणे अम्बसालवणे ५ चेइए जेणेवै समणे भगवं महावीरे उपभुञ्जान इति भावः । १६येनैव सौधर्मस्य कल्पस्य १७उत्तराहो निर्याणमार्गः-निर्गमनमार्गः १८तेनैव पावन उपागच्छति २२'ताए उकिडाए' इत्यादि पूर्ववत् [पृ.५८ पं०७] यावत् दिव्यया देवगत्या १९ योजनलक्षप्रमाणैर्विग्रहै:-क्रमैः २० अवपतन्-अधस्ताद् अवतरन् २१व्यतिव्रजंश्च-गच्छंश्च २३तियंग २४ असंख्येयानां द्वीप-समुद्राणां २५मध्यंमध्येन २६यस्मिन्नेव प्रदेशे २७नन्दीश्वरो द्वीपः २८यस्मिन्नेव च प्रदेशे तस्मिन् नन्दीश्वरे द्वीपे २९दक्षिणपूर्वः आग्नेयकोणवर्ती ३०रतिकरनामा पर्वतः३१तस्मिन् उपागच्छति,उपागत्य | च ३२ तां दिव्यां देवर्द्धिम् यावत् दिव्यं देवानुभावं ३३ शनैः शनैः प्रतिसंहरन् प्रतिसंहरन्-३४ एतदेव पर्यायेण व्याचष्टे-प्रतिसंक्षिपन् प्रतिसंक्षिपन् ३५ यस्मिन् प्रदेशे जम्बूद्वीपो नाम द्वीपः ३६ तत्र च जम्बूद्वीपे यस्मिन् प्रदेशे भारतवर्षम् ३७ तस्मिंश्च भारतवर्षे यस्मिन् प्रदेशे आमलकल्पा नगरी ३८ तस्याश्च आमलकल्पाया नगर्या वहिर यस्मिन् प्रदेशे आम्रशालवनं चैत्यम् ३९ तस्मिंश्च ० Jain Education Elemental For Private & Personal use only ww.lainelibrary.org Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। -तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सैमणं भगवन्तं महावीरं तेणं दिव्वेणं जाणविमाणेणं तिक्खुत्तो आयाहिणंपयाहिणं करेइ करित्ता समणस्स भगवतो महावीरस्स उत्तरपुरथिमे दिसिभागे तं दिव्वं जाणविमाणं ईसिं चउरंगुलमसंपत्तं धरणितलंसि ठवेइ ठवित्ता चेंडहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहिं दोहिं अणीयाहि-तंजहा गंधव्वाणिएण य णट्टाणिएण य-सद्धि संपरिखुडे ताओ दिव्वाओ जाणविमाणाओ पुरथिमिल्लेणं तिसोवा. णपडिरूवएणं पैचोरुहति । तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स चारि सामाणियसाहस्सीओ ताओ दिव्वाओ जाणविमाणाओ उत्तरिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पच्चोरुहति, अवसेसा देवा य देवीओ य ताओ दिव्वाओ जाणविमाणाओ दाहिणिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पचोरुहन्ति । चैत्ये यस्मिन् प्रदेशे श्रमणो भगवान महावीरः ४० तत्र उपागच्छति उपागत्य च ४१श्रमगं भगवन्तं महावीरं ४२तेन प्रागुक्तस्वरूपेण दिव्येन यानविमानेन सह ४३ त्रिकृत्वः-त्रीन् वारान् ४४आदक्षिणप्रदक्षिणीकरोति आदक्षिणप्रदक्षिणीकृत्य च ४५श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य अपेक्षया यः ४६उत्तरपूर्वो दिग्भागः तम् अपक्रामति-गच्छति अपक्रम्य च ४७तद् दिव्यं यानविमानम् ४८ईषद्-एतदेव | १० प्रकटयति-चतुरङ्गलम्-चतुर्भिः अङ्गुलैरित्यर्थः-असंप्राप्तं सत् ४९ धरणीतले स्थापयति स्थापयित्वा ५० चतसृभिरामहिषीभिः सपरिवाराभिः ५१ द्वाभ्यामनीकाभ्याम्-तद्यथा-गन्धर्वानीकेन नाट्यानीकेन च ५२ साध संपरिवृतः ५३ तस्माद् दिव्याद् यानविमानात् ५४ पूर्वेण त्रिसोपानप्रतिरूपकेण ५५ प्रत्यवतरति, ५६ चत्वारि सामानिकदेवसहस्राणि उत्तरेण, ५७ शेषा दक्षिणेन । = “सर्वत्र तृतीया सप्तम्यर्थे द्रष्टव्या प्राकृतत्वात्”-राय० विव०-पृ० ३७+ टिप्पण। Jain Education emanal For Private Personal use only Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। भगवता सूर्याभस्य संभाषणम् ॥११४॥ [४९] तए णं से सूरियामे देवे चउहिं अग्गमहिसीहिं जाव [पृ. ४४ पं० २] सोलसहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अण्णेहि य बहहिं सूरियाभविमाणवासीहिं वेमाणिएहिं देवेहिं देवीहि य सद्धिं संपरिबुडे सव्विड्डीए [[पृ०६९ पं० २-] जाव-णादितरवेणं जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता समणं भगवंतं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेति करित्ता वंदति नमसति वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी'अहं णं भंते ! सूरियामे देवे देवाणुप्पियाणं वन्दाभि नमंसाभि जाव पज्जुवासामि। ५०] मरियोभाइ समणे भगवं महावीरे सूरियाभं देवं एवं वयासी-'पोराणमेयं सूरियाभा!जीयमेयं सरियाभा! किच्चमेयं सूरियाभा! करणिजमेयं सूरियाभा! आइण्णमेयं सूरियाभा! अन्भणुण्णायमेयं सरियामा! जं णं भवणवइ-वाणमंतर-जोइस-वेमाणिया देवा अरहंते भगवते वंदंति नमसंति वंदित्ता नमंसित्ता तओ पच्छा [४९] १ 'वंदामि नमसामि जाव पज्जुवासामि' इत्यत्र 'यावत्' शब्दकरणात् 'सकारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासेमि' इति [पृ० ५८ पं० ५-] परिग्रहः।। [५०] ततः १ *'मरियाभाई' इत्यादि, सूर्याभ आदिः मुख्यः पर्युपासकतया यस्य स सूर्याभादिः २ श्रमणो भगवान महावीरः ३ तं सूर्याभं देवम् ४ एवम् अवादीत्-५ 'पोराणमेयं' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० ५९.-६०] 8सूरियामा य स-भा० २। * अत्रापि 'सूरियामा!' 'इ' इति पदद्वयमेव संगतम्-पृ० ५९xटिप्पण। - सूर्याभात् आदिः पा० ४-५। सूर्याभा आदि मुख्यः भा० १। Jain Education emanal For Private Personal Use Only Trainelibrary.org Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। भगवतो धर्मदेशना ॥११५॥ साई साईनाम-गोत्ताई साहिति तं पोराणमेयं सूरियाभा! जाव अब्भणुण्णायमेयं सूरियाभा!।[पृ० ५९६०-कंडिका २०] तए णं से सूरियाभे देवे समणेणं भगवया महाबीरेणं एवं वुत्ते समाणे हट्ठ-पृ० ४७ पं० ३] जाव समणं भगवंतं महावीरं वंदति नमसति बंदित्ता नमंसित्ता नचासण्णे नातिदूरे सुस्सूसमाणे णमंसमाणे | अभिमुहे विणएणं पंजलिउडे पंज्जुवासति। १] तए ण समणे भगवं महावीरे सूरियाभस्स देवस्स तीसे य महेतिमहालिताए परिसाए जाव परिसा जामेव दिसिं पाउन्भूया तामेव दिसि पडिगया। ६ नात्यासन्नः-नातिनिकटः अवग्रहपरिहारात् नात्यासन्ने वा स्थाने वर्तमान इति गम्यम् ७ न नैव अतिदः अतिविप्रकृष्टः अनौचित्यपरिहारात् नातिदूरे वा ८ भगवद्वचनानि श्रोतुमिच्छन् ९ अभि भगवन्तं लक्ष्यीकृत्य मुखमस्येति अभिमुखः-भगवतः सम्मुख इत्यर्थः १० विनयेन हेतुना ११ प्रकृष्टः प्रधाना-ललाटतटघटितत्वेन-अञ्जलि:-हस्तन्यासविशेषः कृतः येन स प्राञ्जलिकृता:१२ पर्युपास्ते-सेवते । ५१]श्वतः २श्रमणो भगवान् महावीरः३सूर्याभस्य देवस्य श्वेतस्य राज्ञः धारणीप्रमुखानां च देवीनाम् ४तस्याश्च ५'महतिमहालिताए'इति-अतिशयेन महत्याः 'इसिपरिसाए'इति-ऋषयः त्रिकालदर्शनिनः तेषां पर्षत् तस्याः-अबध्यादिजिनपर्षद इत्यर्थः मुनिपर्षदः + "सुखादिदर्शनात् क्तान्तस्य परनिपातः" राय० वि०-पृ० ४८ * टिप्पण। JainEducatiorhterolti For Private Personal Use Only Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥११६॥ यथोक्तानुष्ठानानुष्ठायिसाधुपर्षदः 'जतिपरिसाए' इति यतन्ते उत्तरगुणेषु विशेषतः इति यतयः-विचित्रद्रव्याद्यभिग्रहाद्यपेताः साधवः | तेषां पर्षदो यतिपर्षदः 'विदुपरिसाए' इति विद्वत्परिषदः-अनेकविद्वज्जनपर्षदः देवपर्षदः क्षत्रियपर्षदः इक्ष्वाकुपर्षदः कौरव्यपर्षदः कथंभूतायाः ? इत्याह-'अणेगसयाए' इति अनेकानि पुरुषाणां शतानि संख्यया यस्यां सा अनेकशता तस्याः 'अणेगवंदाए' इति अनेकानि वृन्दानि यस्याः सा तथा तस्याः 'अणेगसयवंदपरिवाराए' इति अनेकशतानि अनेकशतसंख्यानि वृन्दानि परिवारो यस्याः सा तथा तस्याः 'महतिमहालियाए परिसाए' अतिशयेन महत्याः पर्षदः । 'ओहबले' इति ओघेन प्रबाहेण बलं यस्य-न तु कथयतो बल-14 हानिः उपजायते इति भावः । एवं जहा उववाइए तहा भाणियव्वं' इति एवं यथा औपपातिके ग्रन्थे तथा वक्तव्यम् । तच्च एवम्"=अइबले- महाबले अपरिमियबल-वीरिय-तेय-माहप्प-कतिजुत्ते सारदनवथणियमहुरगंभीर-कुंचनिग्धोस-दुदुभिस्सरे उरे वित्थडाए कंठे वट्टियाए सिरे समावत्ताए अगग्गयाए अमम्मणाए फुडविसयमहुरगंभीरगाहिगाए सव्वक्खरसन्निवाइयाए गिराए सव्यमासाणुगामिणीए सव्वसंसयविमोयणीए अपुणरुत्ताए सरस्सईए जोयणनीहारिणा सरेणं अद्धमागहाए भासाए अरिहा धम्म परिकहेइ = अतः आरभ्य यावान् प्राकृतः पाठः सूचितः तावान् भा० १ प्रतौ न प्रतिभाति। ४ अतिबल: महाबलः अपरिमितबल-वीर्य-तेजःमाहात्म्य-कान्तियुक्तः शारदनवस्तनितमधुरगम्भीर-क्रौञ्चनिर्घोष-दुन्दुभिस्वरः उरसि विस्तृतया कण्ठे वृत्तिकया-वर्तुलया शिरसि समावृत्तया अगद्गदया अमन्मनया स्फुटविषयमधुरगम्भीरप्राहिकया सर्वाक्षरसन्निपातिकया गिरा सर्वभाषानुगामिन्या सर्वसंशयविमोचिन्या अपुनरुक्तया सरस्वत्या योजननिर्झरिणा स्वरेण अर्धमागध्या भाषया अर्हन् धर्म परिकथयति । तद् यथा अस्ति लोकः अस्ति अलोकः अस्ति जीवः अस्ति अजीवः' । एष समप्रः पाठः तस्य व्याख्याऽपि च औपपातिकमन्थतः (पृ० ७७) बोध्या । lain Educatio n al For Private Personal use only Twjainelibrary.org Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । Jain Education [ ५२] तए णं से सूरियाभे देवे समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए घम्मं सोचा निसम्म हट्ट - [पृ०४७ पं० ३] जाव-हयहियए उट्ठाए उट्ठेति उट्ठित्ता समणं भगवंतं महावीरं बंदइ नमसइ वंदित्ता नर्मसित्ता एवं बयासीतंजा - अत्थि लोए अस्थि अलोए अस्थि जीवे अत्थि अजीवे" [औपपातिक पृ० ७७ पं० १२- सू० ३४ ] इत्यादि नावत् यावत् "तए ण सा महइमहालिया परिसा समणस्स भगवतो महावीरस्स [कण्डिका ११] अंतिए धम्मं सोचा निसम्म हट्टतुट्ठा समणं भगवंतं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ करिता वंदइ नमसइ वंदित्ता नमसित्ता एवं व्यासी- 'सुयक्खाए णं भंते! निग्गंथे पावयणे, नत्थि णं केइ समणे माहणे वा एरिसं धम्मं आइक्खित्तए' एवं वइत्ता जामेव दिसिं पाउन्भूता तामेव दिसिं पडिगया” [ औपपातिक पृ० ८२ पं० १२ सू० ३५-३७ ] "तए णं से+ राया समणस्स भगवतो महावीरस्स अंतिए धम्मं सोचा निसम्म हतुचित्तमाणदिए जाव [पृ० ४७ पं० ३ तथा १२ -] हरिसवसविसप्पमाणहियए समणं भगवंतं महावीरं वंदइ नमसह वंदित्ता नमसित्ता पसिणाई पुच्छह पुच्छित्ता = अट्ठाई परियाएर परियाइत्ता उट्ठाए उट्ठेइ उट्ठित्ता समणं भगवंतं महावीरं वंदइ नमसइ वंदित्ता नर्मसित्ता एवं वयासी'सुयक्खाए णं भंते! निग्गंथे पावयणे जाव [ १० ४३ पं० ३ ] एरिसं धम्मं आइक्वित्तए' एवं वहत्ता हत्थि दुरूहइ दुरूहित्ता समणस्स १० भगवतो महावीरस्स अंतियाओ अंबसालवणाओ चेइयाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ता जामेव दिसिं पाउन्भूए तामेव दिसिं | पडिगते” इति । इदं च प्रायः सकलमपि सुगमम् । नवरम् - यामेव दिशमवलम्ब्य किमुक्तं भवति ? - यतो दिशः सकाशात् प्रादुर्भूतःसमवसरणे समागतः - तामेव दिशं प्रतिगतः । + से पएसी राया भा० २= अर्थान् पर्याददाति पर्यादाय । ॥११७॥ Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूर्याभः रायपसेणइयं । भगवन्तं पृच्छति ॥११८॥ 3D %3D प्र०-अहं गं भंते ! सूरियाभे देवे किं भवसिद्धिते अभवसिद्धिते ? सम्मदिट्ठी मिच्छादिट्ठी? परित्तसंसारिते अणंतसंसारिते? सुलभबोहिए दुल्लभयोहिए ? आरोहते विराहते ? चरिमे अचरिमे? ५२] सम्प्रति सूर्याभो देवो धर्मदेशनाश्रवणतो जातप्रभूततरसंसारविरागः स्वविषयं भव्यत्वादिकं पिपृच्छिषुः यत् करोति तद् | आह-१ भवैः सिद्धिर्यस्य असौ भवसिद्धिका-भव्य इत्यर्थः २तद्विपरीत:-अभवसिद्धिकः ?-अभव्य इत्यर्थः ३ भव्योऽपि कश्चिद् | मिथ्यादृष्टिर्भवति कश्चित् सम्यग्दृष्टिः ततः आत्मनः सम्यग्दृष्टित्वनिश्चयाय पृच्छति-सम्यग्दृष्टिकः ४ मिथ्यादृष्टिकः१५ सम्यग्दृष्टिरपि कश्चित परिमितसंसारो भवति कश्चिद् अपरिमितसंसारः उपशमश्रेणिशिरःप्राप्तानामपि केषांचिद् अनन्तसंसारभावात अतः पृच्छति-परीत्तसंसारिकः ६ अनन्तसंसारिकः १ ५परीतः परिमितः स चासौ संसारश्च परीत्तसंसारः सः अस्य अस्ति-इति परीत्तसंसारिका एवम् ६ अनन्तश्चासौ संसारश्च अनन्तसंसारः सः अस्य अस्ति-इति अनन्तसंसारिकः ७ परीत्तसंसारिकोऽपि कश्चित सलभबोधिको भवति यथा शालिभद्रादिकः कश्चिद् दुर्लभबोधिको यथा पुरोहितपुत्रजीवः ततः पृच्छति-सुलभा बोधिः भवा-| तरे जिनधर्मप्राप्तियस्य असौ सुलभबोधिकः एवं ८ दुर्लभबोधिकः ? ९ सुलभबोधिकोऽपि कश्चिद् बोधिं लब्ध्वा विराधयति ततः | १० पृच्छति-आराधयति-सम्यक् पालयति बोधिम् इति आराधकः १० तद्विपरीतो विराधकः? ११ आराधकोऽपि कश्चित तद्भवमोक्षगामी न भवति ततः पृच्छति-चरमः अचरमो वा? चरमः अनन्तरभावी भवो यस्य असौ =चरमः १२ तद्विपरीतः अचरमः । अतोऽनेकस्वरात्"७-२-६ हैमश० ] 'इक' प्रत्ययः'-राय० वि० । ० शालिभद्रकथा प्रसिद्धा। 0 पुरोहितपुत्रस्य विशेषसंज्ञा नावगता तथापि तस्य कथाऽपि प्रसिद्धा। सा च श्रीपुण्य० पञ्चकल्पभाष्ये लि० पृ० १८-१९ 'सारणी' प्रवज्योदाहरणे। - "अभ्रादिभ्यः" Jain Educatie Internal For Private Personel Use Only Haw.jainelibrary.org Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । [५३] उ०-xसूरियांभाइ समणे भगवं महावीरे सूरियाभं देवं एवं वदासी भगवतः सूरियोभा ! तुमं णं भवसिद्धिए नो अभवसिद्धिते जाँव [पृ० ११८ पं० १] चरिमे णो अचरिमे। प्रतिवचः [५४] तए णं से सुरिआमे देवे समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्ते समाणे हद्वतुट्ठचित्तमाणदिए [पृ० ४७ पं०३-] परमसोमणस्सिए समण भगवंतं महावीरं वंदति नमंसति वंदित्ता नमंसित्ता एवं वदासी J॥११९॥ तुम्भे णं भंते ! सवं जाणह सव्वं पासह, सवओ जाणह सव्वओ पासह, सव्वं कालं जाणह सव्वं ५ [५३] एवमुक्ते -१सूर्याभादिः श्रमणो भगवान् महावीरः रतं सूर्याभ देवम् ३एवम् अवादीत-४भोः सूर्याभ ! ५त्वं भवसिद्धिकः ६न अभवसिद्धिकः ७ यावत्' करणात् 'सम्मदिठ्ठी नो मिच्छादिही, परित्तसंसारिए नो अणंतसंसारिए, सुलभबोहिए नो दुल्लभबोहिए, आराहए नो विराहए' इति [पृ० ११८ पं०१] परिग्रहः। [५४] १यूयं २भदन्त ! ३सर्व केवलवेदसा जानीथ ४सर्व केवलदर्शनेन पश्यथ-अनेन द्रव्यपरिग्रहः ५तत्र 'सर्व' शब्दो देशकास्न्येऽपि वर्तते यथा-'अस्य सर्वस्यापि ग्रामस्य अयमधिपतिः' इति सचराचरविषयज्ञान-दर्शनप्रतिपादनार्थमाह-सर्वतः-सर्वत्र दिक्षु विदिक्षु ऊर्ध्वम् अघो लोके अलोके च-इति भावः जानीथ पश्यथ च-अनेन क्षेत्रपरिग्रहः । ६तत्र सर्वद्रव्यसर्वक्षेत्रविषयं वार्तमानिक [७-२-४६ हैमश०] इति मत्वर्थीयः 'अ' प्रत्ययः"-राय० वि० । ४ सूरियामा समणे-भा०२। = पृ० ११४ * टिप्पण तथा पृ० ५९ ४ टिप्पण। Jain Educatinational Tww.jainelibrary.org Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१२॥ भस्य कालं पासह, सव्वे भावे जाणह सव्वे भावे पासह । जाणंति णं देवाणुप्पिया ! मम व्वि वा पंच्छा वा मम दिव्यं नाएयरूवं दिव्वं देविड्डि दिव्वं देवजुई दिव्वं देवाणुभावं लद्धं पत्तं अभिसमण्णागयं ति, ते इच्छामि णं देवाणु व्यविधान प्पियाणं भत्तिपुव्वगं गोयमातियाणं समणाणं निग्गंथाणं दिव्वं देविड्डेि दिव्वं देवजुई दिव्वं देवाणुभावं दिव्वं प्रदर्शयामि' | मात्रमपि ज्ञानं दर्शनं वा सम्भाव्येत ततः सकलकालविषयज्ञान-दर्शनप्रतिपादनार्थमाह-सर्वकालम्-अतीतम् अनागतं वर्तमानं च इति सूर्याजानीथ पश्यथ-एतेन कालपरिग्रहः ७ तत्र कश्चित् सर्वद्रव्य-सर्वक्षेत्र-सर्वकालविषयमपि ज्ञानं सर्वपर्यायविषयं न संभावयेत् यथा ५ -मीमांसकादिः अत आह-सर्वान् भावान् पर्यायान् प्रतिद्रव्यमात्मीयान् परकीयांश्च केवलवेदसा जानीथ केवलदर्शनेन पश्यथ ।। अथ भावा दर्शनविषया न भवन्ति ततः कथमुक्तम् 'सव्वे भावे पासह' इति ? नैप दोषः, उत्कलितरूपतया हि ते भावा दर्शनविषया न भवन्ति अनुत्कलितरूपतया तु ते भवन्त्येव । तथा चोक्तम्-"निर्विशेष विशेषाणां ग्रहो दर्शनमुच्यते" [ ] ८ ततः 'जाणन्ति णं' इति पूर्ववत् । देवानांप्रियाः ! ९ पूर्वमपि-अनन्तरम् उपदर्थमाननाट्यविधेः १० पश्चादपि च-उपदर्यमाननाट्यविधेः उत्तरकालम् ११ मम एतद्रूपां दिव्यां देवर्द्धिम् दिव्यां देवद्युतिम् दिव्यं देवानुभावम् १२ लब्धं देशान्तरगतमपि किश्चिद् भवति तत आह-प्राप्तम् १३ प्राप्तमपि किश्चिद् अन्तरायवशाद् अनात्मवशं भवति तत आह-अभिसमन्वागतम् । १४ ततः इच्छामि देवानांप्रियाणां पुरतः १५ भक्तिपूर्वकम्-बहुमानपुरस्सरम् १६ गौतमादीनां श्रमणानां निर्ग्रन्थानां दिव्यां - मीमांसका हि सर्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावविषयं ज्ञानं न मन्यन्ते । ते एवमाहु:-"सर्वज्ञो दृश्यते तावन्नेदानीमरमदादिभिः । दृष्टो न चैकदेशोऽस्ति लिङ्ग वा योऽनुमापयेत्” ॥ [*लो० वा० सू० २ 'लो० ११७ ] इत्यादि । For Private Personal use only Jan Educat internal w.jainelibrary.org Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण बत्तीसतिबद्धं नवविहं उर्वदसित्तए। | सूर्याभस्य [५५] तए णं समेणे भगवं महावीरे सूरियाँभेणं देवेणं एवं वुत्ते समाणे सूरियाभस्स देवस्स एयमढें जो विज्ञप्तिआढाति णो परियाणति-तुसिणीए संचिट्ठति ।। भगवता (५६] तए णं से सूरियाभे देवे समणं भगवन्तं महावीरं दोचं पि तेच पि एवं वयासी अनादृता 'तुम्भे णं भंते ! सव्वं जाणह [पृ० ११९५०५] जाव उवदंसित्तए त्ति कटु समणं भगवन्तं महावीरं ति-14 क्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ करित्ता वंदति नमसति वंदित्ता नमंसित्ता उत्तरपुरस्थिम दिसीभागं अवक- | ॥१२॥ देवर्दिम् दिव्यां देवद्युतिम् दिव्यं देवानुभावम् उपदर्शयितुम् १७ द्वात्रिंशद्विधम्-द्वात्रिंशत्प्रकारं नाव्यविधम्-नाटयविधानम् १८ उपदर्शयितुम् । [५५] १ ततः २ श्रमणो भगवान् महावीरः ३ सूर्याभेण देवेन ४ एवमुक्तः सन् ५ सूर्याभस्य देवस्य ६ एनम्-अनन्तरादितम्-अर्थ ७ न आद्रियते-न तदर्थकरणाय आदरपरो भवति ८ नापि परिजानाति अनुमन्यते स्वतो वीतरागत्वात् गौतमादीनां च १० नाटयविधेः स्वाध्यायादिविघातकारित्वात् ९ केवलं तूष्णीकः १० अवतिष्ठते। ५६] एवं १ द्वितीयमपि वारम् २ तृतीयमपि वारम् उक्तः सन् भगवान् एवमेव तिष्ठति । ततः पारिणामिक्या बुद्ध्या तत्त्वमवगम्य 'मौनमेव भगवतः उचितं न पुनः किमपि वक्तुम् केवलं मया भक्तिरात्मीया उपदर्शनीया' इति प्रमोदातिशयतः जातपुलकः * अत्र विवरणकारलब्धपाठ-प्रतिगतमूलसूत्रपाठयोर्भेदः प्रतीयते। Jain Educati onal For Private Personal use only Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१२२॥ Jain Education मति अवकमित्ता वेडव्वियसमुग्धाएणं समोहणति समोहणित्ता संखिजाई जोयणाई दण्डं निस्सिरति अहाबायरे० [०५६ पं०३ - ] अहासुहुमे० । दोचं पि विउग्वियसमुग्धाएणं जाव बहुसमरमणिजं भूमिभागं विउच्वति । से जहा नाम ए आलिंगपुक्खरे इ वा जाव मणीणं फासो [कं० ३३-४० ] तस्स णं बहुसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेस भागे पिच्छाघरमण्डवं विव्वति अणेगखंभसयसंनिविहं वण्णओ-अन्तो बहुसमरन - णिजं भूमिभागं उल्लोयं अक्खाडगं च मणिपेढियं च विउच्वति । तीसे णं मणिपेडियाए उवरि सीहासणं सपरिवारं जाव दामा चिट्ठन्ति [ कं० ४१-४३ ] । [ ५७ ] तए णं से सूरियांभे देवे समणस्स भगवतो महावीरस्स आलोए पैणामं करेति करिता 'अणुजाण मे भगवं' ति कट्टु सीहासणवरगए तित्थयराभिमुद्दे संणिसण्णे । तेए णं से तूरियां देवे तप्पढमयाए सन् सूर्याभो देवः श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दते - स्तौति नमस्यति कायेन वन्दित्वा नमस्यित्वा च ' उत्तरपुरत्थिमं' ......इत्यादि [पृ० ५६ पं० ११ - ] सुगमम् । नत्ररम् - बहुसमभूमिवर्णनम् प्रेक्षागृहमण्डपवर्णनम् मणिपीठिका - सिंहासन- तदुपरि उल्लोच अङ्कुश - मुक्तादामवर्णनानि प्राग्वत् [१० ९४ पं० ७ पृ० १०२ पं० ७ ] भावनीयानि [ ५७ ] १ ततः सूर्याभो देवः ३ तीर्थङ्करस्य भगवतः ४आलोके ५ प्रणामं करोति कृत्वा च ६ 'अनुजानातु भगवान् माम्' इति अनुज्ञापनां कृत्वा ७ सिंहासनवरगतः सन् ८ तीर्थकराभिमुखः सन्निषण्णः । ९ ततः १० सूर्याभो देवः ११ तत्प्रथमतया - तस्य ना दिव्यनाट्यप्रदर्शनाय सूर्याभस्य भक्तिपूर्वकः प्रयत्नः jainelibrary.org Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । नानामणि- कणग- रयणविमलमहरिहनिउणओवियमिसिमिसिंतविरतियमहा भरणकडग-तुडियवर भूसणुज्जलं पीवरं पलम्बं दौहिणं भुयं पैंसारेति तओ णं सरिसयाणं संरित्तयाणं संरिव्वयाणं संरिसलावण्ण-रूव- जोवणगुणोववेयाणं ऐंगाभरण - वसणगहि अणिज्जोआणं ॥ १२३॥ ट्यविषेः प्रथमतायाम् १३ दक्षिणं भुजं १४ प्रसारयति कथंभूतम् ? इत्याह- १२ नानाविधानि मणि- कनक - रत्नानि येषु तानि नानामणि - कनक - रत्नानि - मणयो नानाविधाश्चन्द्रकान्तादयः कनकानि नानाविधानि नानावर्णतया रत्नानि नानाविधानि कर्केतनादीनि ५ तथा विमलानि-निर्मलानि तथा महान्तमुपभोक्तारमर्हन्ति यदि वा महम् - उत्सवम् - क्षणम् अर्हन्ति इति महार्हाणि तथा निपुणम् निपुणबुद्धिगम्यं यथा भवति एवं परिकर्मितानि दीप्यमानानि विरचितानि महाभरणानि यानि कटकानि - कलाचिकाभरणानि तुटितानि बाहुरक्षिकाः अन्यानि च यानि वरभूषणानि तैः उज्ज्वलं - भाखरम् तथा पीवरं-स्थूलम् प्रलम्बं - दीर्घम् । १५ ततः तस्माद् | दक्षिणभुजात् ३० अष्टशतं अष्टाधिकं शतं ३२ देवकुमाराणं ३३ निर्गच्छति कथंभूतानाम् ? इत्याह- १६ सदृशानाम् - समानाकारा| णाम् इत्यर्थः १७ तत्र आकारेण कस्यचित् सदृशोऽपि वर्णतः सदृशो न भवति ततः सदृग्वर्णत्वप्रतिपादनार्थमाह-सदृशी सहग् १० वर्णत्वक् येषां ते तथा १८ सहकत्वग् अपि कचिद् वयसा विसदृशः संभाव्येत तत आह-सह समानं वयो येषां ते तथा तेषाम् १९ सदृशेन लावण्येन - लवणिम्ना - अतिसुभगया शरीरकान्त्या इति भावः । रूपेण - आकृत्या यौवनेन - यौवनिकया गुणैः दक्षत्वप्रियंवदत्वादिभिः उपपेताः सदृशलावण्य-रूप-यौवन - गुणोपपेताः तेषाम् २० एकः समानः आभरण - वसनलक्षणः गृहीतो -मानः आभरणवसनानि आ-पा० ५ भा० १-२ । Jain Education emtional jainelibrary.org Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय । ॥१२४॥ Jain Education ema दुहतो संवेल्लियग्गणियत्थाणं उप्पीलियचित्तपट्टपरियर सैफेणकावत्तरइयैसंगय पलंबवत्थंतचित्तै चिलग नियंसगाणं एगोवलिकण्ठरइयसोभंतवच्छ परिहृत्थभूसणाणं असयं गैहसज्जाणं देवकुमाराणं णिगच्छति । [५८] तयणंतरं चणं नानामणि० [पृ० १२३ पं० १] जाव पीवरं पलंबं वामं भुयं पैसारेति तओणं संरिसयाणं निर्योगः उपकरणम्-अर्थात् नाटयोपकरणं यैस्ते तथा तेषाम् २१ द्विधातो द्वयोः पार्श्वयोः संवेल्लितानि संवृतानि अग्राणि यस्य तद् द्विधातः संवेल्लिताग्रं न्यस्तम् - सामर्थ्याद् उत्तरीयं यैस्ते तथा तेषाम् तथा २२ उत्पीडितः अत्यन्ताऽऽवद्धः चित्रपट्टो विचित्रवर्णपट्टरूपः परिकरो यैस्ते तथा २३ यस्मिन् आवर्तने फेनविनिर्गमो भवति स सफेनकावर्त उच्यते ततः २४ सफेनकावर्तेन रचिताः-संगताःनाटयविधौ उपपन्नाः प्रलम्बा वस्त्रान्ता यस्य निवसनस्य तत् तथा तत् २५ चित्रम् - चित्रवर्णम् २६ चिल्ललगं देदीप्यमानं २७ निवसनं परिधानं येषां ते तथा तेषाम् २८ एकावलिर्या कण्ठे रचिता तया शोभमानं वक्षो येषां ते तथा २९ परिहत्थ' शब्दो देश्यः परिपूर्णवाची पडिहत्थानि पूर्णानि भूषणानि येषां ते तथा । तेषाम् ३१ नृत्ये सञ्जाः प्रगुणीभूताः नृत्यसज्जाः तेषाम् । [५८] १ तदनन्तरं च २ यथोक्तविशेषणविशिष्टं ३ वामं भुजं ४ प्रसारयति ५ तस्माद् वामभुजात् १० अष्टशतं १९ देवकुमारि - १० | काणां १२ विनिर्गच्छति कथंभूतम् १ इत्याह-६ 'सरिसयाणं सरितयाणं... वसणगहियनिजोईणं... संवेल्लियग्गनियत्थीणं' इति पूर्ववत् + "ततः पूर्वपदेन कर्मधारयः " राय० वि० । “पुण्णम्मि पडिहत्थ - पोणियया" " पडिहत्थो तथा पोणिओ पूर्णः " - देशीनाममाला व० ६ गा० २८ । अत्र डकार -रकारयोः साम्येन 'पडिहत्य'वत् 'परिहत्थ' शब्दोऽपि बोध्यः । “ततः पूर्वपदेन कर्मधारयः " - राय० वि० । jainelibrary.org Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । सरितयाणं सरिव्वयाणं सरिसलावण्ण-रूव-जोग्वणगुणोववेयाणं एगाभरण० दुहतो संवेल्लिग्ग० [पृ० ४१२ पं० १] आविद्धतिलयामेलाणं पिंणद्धगेवेज्जकंचुतीणं नानामणि- रयणभूसणविराइयंगमंगाणं चंदाणणाणं चंदद्धसमनिलाडाणं चंदाहियसोमदंसणाणं उक्का इव उज्जोवेमाणीण सिंगारा० हसिय- भणिय० [पृ० २९ पं० १] गहियाउज्जाणं अंहस नहसज्जाणं देवकुमारियाणं णिच्छइ । [ ५९ ] ए से सूरिया भे देवे 'अट्ठसयं संखाणं विउव्वति अट्ठसयं संखवायाणं विउव्वर, 8 अ० सिंगाणं [पृ० १२३ पं० ९] ७ आविद्धः तिलकः *आमेलथ - शेखरको यकाभिस्ता आविद्धतिलकामेलाः तासाम् ८ पिनद्धं ग्रैवेयकं ग्रीवाभरणं कञ्चुकश्च यकाभिस्तास्तथा तासाम् ९ नानाविधानि मणि- कनक - रत्नानि येषु भूषणेषु तानि नानामणि- कनक- रत्नानि तैर्नानामणिकनक- रत्नैर्भूषणैर्विराजितानि अङ्गमङ्गानि अङ्गप्रत्यङ्गानि यासां तास्तथा तासाम् ०'चंदागणाणं... उक्का इव उजोवेमाणीण' इति सुगमम् । सिंगारा० हसिय- भणिय० [पृ० २९ पं० ४] गहियाउञ्जाणं नसणं' इति पूर्ववत् [ पृ० १२४ पं० ९ ] । [ ५९ ] १ ततः २ सूर्याभो देवः ३ अष्टशतं शङ्खानां विकुर्वति ४ अष्टशतं शङ्खवादकानाम्, ५० अ० शृङ्गाणाम् १० 8 'अ' पदेन 'अट्टस' अवगन्तव्यम् । * 'आमेल' शब्द: प्राकृतभाषायां व्यवहियते, संस्कृते तु तदर्थवाची 'आपीड' शब्द: प्रसिद्धः । आचार्यहेमचन्द्रः प्राकृतम् 'आमेल' शब्द संस्कृत 'आपीड' शब्दस्य विकृतोच्चारणं सूचयति । [ ८-१-२३४ हैमश०] 'आपीड - आबीड - आवेडआमेल' इति च तत्परिवर्तनक्रमः प्रतिभाति । 0 चन्द्राननानाम् चन्दार्थसमललाटानाम् चन्द्राधिकसोमदर्शनानाम् उल्का इव उद्योतमानानाम् । = गृहीतातोथानाम् । 'अ' पदेन 'अष्टशतम्' । Jain Education Intentional ॥१२५॥ Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥१२६॥ | वि० अ०सिंगवायाणं वि०, अ०संखियाणं वि० अ०संखियवायाणं वि०, अ. खरमुहीणं वि० अ० खरमुहि- अनेकविधवायाणं वि०, अ० पेयाणं वि० अ० पेयावायगाणं वि०, * पीरिपीरियाणं वि० अ० पीरिपीरियावायगाणं वाद्यानि ६ अ० शृङ्गवादकानाम् , ७ अ० शशिकानाम् ८अ० शहिकावादकानाम् इखः शङ्को जात्यन्तरात्मकः शङ्खिका तस्या हि खरो मनाक् तीक्ष्णो भवति न तु शङ्खवद् अतिगम्भीरः तथा ९ अ० खरमुखीनाम्-काहलानाम् १० अ० खरमुखीवादकानाम् ११ अ० पेयानाम् | 'पेया' नाम महती काहला १२अ० पेयावादकानाम् , १३ अ० पिरिपिरिकाणाम्-कोलिकपुटावनद्धमुखवाद्यविशेषरूपाणाम् १४ अ० | पिरिपिरिका 0 वा०, अ० पणवानाम् पणवो भाण्डपटहः लघुपटहो वा अ० पणववा०, अ० पटहानाम् अ० पटहवा०, अ० भम्भानाम् भम्भा ढक्का अ० भम्भावा०, अ० होरम्भाणाम् होरम्भा महाढक्का अ० होरम्भावा०, अ० भेरीणाम्-ढक्काकृतिवाद्यविशेषरूपाणाम् अ० भेरीवा०, अ० झल्लरीणाम् 'झल्लरी' नाम चर्मावनद्धा विस्तीर्णवलयाकारा अ० झल्लरीवा०, अ० दुन्दुभीनाम् अ० दुन्दुभिवा० दुन्दुभिः-भेर्याकारा संकटमुखी देवातोयविशेषः, अ० मुरुजानाम् महाप्रमाणो मदलो मुरुजः अ० मुरुजवा०, अ० मृदङ्गानाम् लघुमदलो मृदङ्गः अ० मृदङ्गवा०, अ० नन्दीमृदङ्गानाम्-नन्दीमृदङ्गो नाम एकतः संकीर्णः अन्यत्र विस्तृतो मुरजविशेषः अ० नन्दी-१० मृदङ्गवा०, अ० आलिङ्गानाम् आलिङ्गो मुरजवाद्यविशेष एव अ० आलिङ्गवा०, अ० कुस्तुम्बानाम् कुस्तुम्बः-चावनद्धपुटो वाद्यविशेषः अ० कुस्तुम्बवा०, अ० गोमुखीनाम् गोमुखी लोकतोऽवसेया अ० गोमुखीबा०, अ० मर्दलानाम् मर्दला-उभयतः समः अ० 0 'वि' पदेन 'विउव्वति' संबोध्यम् । 8 प्रस्तुते मूलपाठे 'पिरिपिरिका' पर्यन्तं वाधनामानि दृश्यन्ते, अन्यानि-यानि विवरणकारेण सूचितानि तानि अग्रतने मूलपाठे लभ्यन्ते। 0 'वा' पदेन 'बादकानाम्' ज्ञेयम् । Jain Educatineational For Private & Personel Use Only Www.jainelibrary.org Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । Jain Educatio | मर्दलवा०, अ० विपश्चीनाम् विपञ्ची त्रितन्त्री वीणा अ० विपञ्चीवा०, अ० वल्लकीनाम् वल्लकी सामान्यतो वीणा अ० वल्लकीवा०, अ० भ्रामरीणाम् अ० भ्रामरीवा०, अ० पद्भ्रामरीणाम् अ० पद्भ्रामरीवा० अ० परवादनीनाम् परवादनी सप्ततन्त्री वीणा अ० परवादनींवा० अ० बब्बीसानाम् अ० चव्वीसावा०, अ० सुघोषाणाम् अ० सुघोषावा०, अ० नन्दिघोषाणाम् अ० नन्दिघोषवा०, अ० महतीनाम् महती - शततन्त्रिका वीणा अ० महतीवा०, अ० कच्छभीनाम् अ० कच्छभीवा०, अ० चित्रवीणानाम् अ० चित्रवीणावा०, अ० आमोदानाम् अ० आमोदवा०, अ० झञ्झानाम् अ० झञ्झावा०, अ० नकुलानाम् अ० नकुलवा०, अ० तूणानाम् अ० तूणावा०, अ० तुम्बवीणानाम्-तुम्बयुक्ता वीणा या अद्यकल्पे प्रसिद्धा अ० तुम्बवीणावा० अ० मुकुन्दानाम् मुकुन्दो मुरजवाद्यविशेषो यः अति| लीनं प्रायो वाद्यते अ० मुकुन्दवा० अ० हुडुक्कानाम् अ० हुडुक्कावा०, हुडुक्का प्रतीता, अ० =विचिक्कीनाम् अ० विचिक्कीवा०, अ० करटीनाम् अ० करटीवा० करटी प्रतीता, अ० डिण्डिमानाम् अ० डिण्डिमवा० प्रथमं प्रस्तावनासूचकः पणवविशेषः डिण्डिमः, अ० किणितानाम् अ० किणितवान, अ० + कडवानाम् अ० कडवावा०, कडवा करटिका, अ० दर्दरकाणाम् अ० दर्दरवा० दर्दरक: | प्रतीतः, अ० दर्दरिकाणाम् अ० दर्दरिकावा लघुदर्दरको दर्दरिका, अ० कुस्तुम्बराणाम् अ० कुस्तुम्बरवा०, अ० कलशिकानाम् अ० कलशिकावा० अ० तालानाम् अ० तालवा० अ० कांस्यतालानाम् अ० कांस्यतालबा० अ० रिंगिसिकानाम् अ० रिंगिसिकावा०, * अ० डण्डानाम् अ० डण्डावा०पा० ४-५ अ० दण्डानाम् अ० दण्डावा० भा० १। विविक्कीनाम् अ० वित्रकीवा० भा० १ विचिकीनाम् अ० विचिकीना०पा० ४ + अ० कंडकानाम् अ० कंडकावा० अ० कंडवानाम् अ० कंडकानाम् कंडवा करटिका - भा० २ । ational ॥१२७॥ Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥१२८॥ |वि० एंवमाइयाई एगणपण्णं आउज्जविहाणाई विउव्वइ । [६०] तए णं 'ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारियाओ य सहावेति । तए णं ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारीओ य सूरियाभेणं देवेणं सहाविया समाणा हट्ट जाव-पृ०४७ पं० ३] जेणेव सूरियाभे देवे तेणेव उवागच्छंति तेणेव उवागच्छित्ता सूरियाभं देवं करयलपरिग्गहिय [पृ० ६७ पं०८] जाव वद्धावित्ता अ० मगरिकाणाम् अ० मगरिकावा०, ०अ० शिशुमारिकाणाम् अ० शिशुमारिकावा०, अ० वंशानाम् अ० वंशवा०, अ० वालीनाम् । | अ० वालीवा०, वाली तूणविशेषः, स हि मुखे दचा वाद्यते, अ० वेणूनाम् अ० वेणुवा०, अ० परिलीनाम् अ० परिलीवा०, अ० बद्धकानाम् अ० बद्धकवा० बद्धकः तृणविशेषः । अव्याख्यातास्तु भेदा लोकतः प्रत्येतव्याः १५ एवमादीनि बहुनि आतोद्यानि आतोद्यवादकांश्च विकुर्वति, सर्वसंख्यया तु मूल-भेदापेक्षया आतोद्यभेदा एकोनपञ्चाशत् शेषास्तु भेदा एतेषु एव अन्तर्भवन्ति यथा वंशातोद्यविधाने वाली-वेणु-पिरली-बद्धगा इति । [६०] विकुर्वित्वा च १तान् वयंविकुर्वितान् देवकुमारान् देवकुमारिकाश्च २शब्दयति ते च ३शब्दिता हृष्टतुष्टानन्दितचित्ताः १० सूर्याभसमीपम् आगच्छन्ति आगत्य च ४करतलपरिगृहीतं दशनखं शिरसावतं च मस्तके अञ्जलिं कृत्वा जयेन विजयेन वर्धापयित्वा = एवमादिकानि एकोनपञ्चाशद् आतोद्यविधानानि विकुर्वति । अ० अगरिकाणाम् अ० अगरिकावा०-भा० २ । ० अ० सिसुकुमारिकानाम् अ. शिसुकुमारिकवा०-भा० २ । अ० शुशुमारिकानाम् शुशुमारिकावा०- पा० ५। तूणवि०-मु. पु० । अत्र वाद्यविशेषनाम्ना प्रस्तावे बहूनि वाद्यनामानि अप्रतीतानि अत एव च तेषां नामसु अनेकविधः पाठभेदो दृश्यते । walainelibrary.org Join Education Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । नाट्यविधिप्रदर्शनाय सूर्याभस्य आज्ञा ॥१२९॥ | ऐवं वयासी- "संदिसंतु णं देवाणुप्पिया ! जं अम्हेहिं कायव्वं' । [१] तंए णं से सूरियाभे देवे ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारीओ य एवं वयासी-'गच्छह णं तुम्भे | देवाणुप्पिया ! 'समणं भगवंतं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिण करेह करित्ता वंदह नमसह वंदित्ता| नमंसित्ता गोयमाइयाणं समणाणं निग्गंथाणं तं दिव्वं देविड्डि दिव्वं देवजुतिं दिव्वं देवाणुभावं "दिव्वं वत्तीसइबद्धं णद्दविहिं उवदंसेह उवदंसित्ता खिप्पामेव एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह । [२] 'तए णं ते बहवे देवकुमारा देवकुमारीयो य सूरियाभेणं देवेणं एवं वुत्ता समाणा हट्ट जाव [पृ०४७ ५ एवमवादिषुः-६ संदिशन्तु देवानांप्रियाः ! यद् अस्माभिः कर्तव्यम्' । [६१] १ ततः २ स सूर्याभो देवः ३ तान् देवकुमारान् देवकुमारिकाश्च ४ एवमवादीत-५ गच्छत यूयं देवानांप्रियाः!६ श्रमणं भगवन्तं महावीरम् ७ त्रिकृत्वः आदक्षिणप्रदक्षिणं कुरुत कृत्वा च वन्दध्वम् नमस्थत वन्दित्वा नमस्यित्वा ८ गौतमादीनां श्रमणानां निग्रन्थानां ९ तां देवजनप्रसिद्धां दिव्यां देवद्धिं दिव्यां देवद्युतिं दिव्यं देवानुभावम् १० दिव्यं द्वात्रिंशद्विधं नाटयविधिमुपदर्शयत उपदर्य च ११ एतामाज्ञप्तिकां क्षिप्रमेव १२ प्रत्यर्पयत । [६२] १ ततः २ ते बहवो देवकुमारा देवकुमारिकाश्च ३ सूर्याभेण देवेन एवमुक्ताः सन्तो हृष्टा 'यावत्'-[पृ०४७ पं० १२] in Educat intelona For Private Personal use only dow.jainelibrary.org Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । देवैः वादनम् गानम् नतेन च प्रारब्धम् ॥१३०॥ पं०३] करयल जाव पृ०६७ पं०८] पडिसुणंति पडिसुणित्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता समणं भगवंतं महावीर जाव [पृ० १२९ पं०३] नमंसित्ता जेणेव गोयमादिया समणा निर्माथा तेणेव उवागच्छति । तए णं ते वहवे देवकुमारा देवकुमारीयो य 'समामेव समोसरणं करेंति करित्ताः ‘समामेव अवणमंति अवणमित्ता'समामेव उन्नमंति"एवं सहितामेव ओनमंति एवं सहितामेव उन्नमंति सहियामेव | उण्णमित्ता"संगयामेव ओनमंति संगयामेव उन्नमंति उन्नमित्ता"थिमियामेव ओणमंति थिमियामेव उन्नमंति "समामेव पसरंति पसरित्ता"समामेव आउज्जविहाणाइं गेण्हंति "सनामेव पवाएं सु"पगाइंसु"पणचिंसु।। ४प्रतिशण्वन्ति-अभ्युपगच्छन्ति-इत्यर्थः। प्रतिश्रुत्य च ५यत्र श्रमणो भगवान् महावीरः तत्रोपागच्छन्ति उपागत्य च श्रमणं भगवन्तं महावीरं त्रिकृत्व आदक्षिणप्रदक्षिणीकुर्वन्ति कृत्वा च वन्दन्ते नमस्सन्ति वन्दिन्या नमस्यित्वा च ६ यस्मिन् प्रदेशे गौतमादयः श्रमणाः तत्र ७ समकालमेव-एककालमेव समवसरन्ति-मिलन्ति-इत्यर्थः समवसृत्य च ८ समकमेव-एककालमेव अवनमन्ति-अधो नीचा भवन्ति अवनम्य च ९ समकमेव उन्नमन्ति-ऊर्ध्वमवतिष्ठन्ते-इति भावः तदनन्तरं च १० एवंक्रमेण सहितम् ११ संगतम् १२ स्तिमित च अवनमनम् उन्नमनं च वाच्यम् अमीषां च सहितादीनां भेदः सम्यक्कौशलोपेतनाटयोपाध्यायाद् एव अवगन्तव्यः ततः स्तिमितं समकमुन्नम्य १३ समकमेव प्रसरन्ति प्रसृत्य च १४ समकमेव यथायोगम् आतोद्यविधानानि गृह्णन्ति गृहीत्वा च १५ समकमेव प्रवादितवन्तः १६ समकमेव प्रगीतवन्त: १७ समकमेव पनर्तितवन्तः । + -ता समामेव पंतिओ बंधति बंधित्ता समामेव पतिओ नमसंति नमंसित्ता समामेव-वि० बा। Jain Education erroga For Private Personel Use Only watjainelibrary.org Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥१३१॥ [६३] कि 'ते? 'उरेणधमंदं सिरेण तारं कंठेण वितारं "तिविहं तिसमयरेयगरइयं गुंजाज्वंककुहरोवगूढ रत्तं तिठाणकरणसुद्धं [६३]किश्च १ ते देवकुमारा देवकुमारिकाश्च एवं प्रगीता अप्यभवन् इति योगः कथम् ? इत्याह-२ उरसि मन्दं यथा भवति एवं प्रगीताः ३ शिरसि तारम् ४ कण्ठे च वितारम्-अतिशयेन यथावल्लक्षणोपपेतम् किमुक्तं भवति ? २ उरसि प्रथमतो गीतमुत्क्षिप्यते उत्क्षेपकाले च गीतं मन्दं भवति +"आदिमि आरभन्ता" [ ] इति वचनात् अन्यथा गीतगुणक्षतेः तत उक्तम्-'उरसि 4 मन्दम्' इति ३ ततो गायतां मूर्धानमभिनन् स्वर उच्चस्तरो भवति स्थानकं च द्वितीयम् तृतीयं वा समधिरोहति ततः 'शिरसि तारम्' इत्युक्तम् ४ शिरसश्च प्रतिनिवृत्तः सन् स्वरः कण्ठे घुलति घुलंश्च अतिमधुरः भवति ततः 'कण्ठे वितारम्' इत्युक्तम्-५ x तिविहं तिसमयरेयगाइयं' इति ६ गुञ्जनं गुञ्जा गुञ्जाप्रधानानि यानि अबक्राणि-शब्दमार्गाप्रतिकूलानि कुहराणि तेषु उपगूढम्-गुञ्जाऽवक्रकुहरोपगूढम् किमुक्तं भवति ? तेषां देवकुमाराणां देवकुमारिकाणां च तस्मिन् प्रेक्षागृहमण्डपे गायतां गीतं तेषु प्रेक्षागृहमण्डपसत्केषु अन्येषु च कुहरेषु स्वानुरूपाणि प्रतिशब्दसहस्राणि उत्थापयद् वर्तते इति । ७ रक्तम्-इह यद् गेयरागानुरक्तेन गीतं गीयते तद् १० 'रक्तम्' इति तद्विदा प्रसिद्धम्' ८त्रीणि स्थानानि उरःप्रभृतीनि तेषु० करणेन क्रियया शुद्धम-त्रिस्थानकरणशुद्धम् तद्यथा-उर-शुद्धम् | + इयं कण्डिका प्रायो ऽक्षरशः-जीवा० मू० पृ० १८६ पं० १-३ । * “सर्वत्र सप्तन्यर्थे तृतीया"-रायः विव० । * गुंजतवंसकुहरोपगूढ-जीवा० मू० प्र० पृ० १८६ पं०१४। + “आदिमृदुम् आरभमाणाः" । इदं वचनं कस्प इति न ज्ञायते, मूलपाठे तु नैतत् प्रतिभाति । x 'त्रिविधं त्रिसमबरेचकरचितम्' इति शब्दसंस्कारः । मूलस्थमपि एतत् पदं न विवृतं विवरणकारेण । S इदं समग्रमपि विवरणम्-जीना० वि० प्र० पृ० १९५ पं० ३-1 -0षु करणेषु क्रि-पा० ५-४ भा० १ । Jain Education demona ww.djainelibrary.org Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१३२॥ Jain Education Inmat सर्कुहरगुंजतवंस-तंती-तेल-ताल-लय- गैहसुसंपत्तं महुरं समं सललियं मँणोहरं मिड कण्ठशुद्धम् शिरोविशुद्धं च तत्र यदि उरसि स्वरः स्वभूमिकानुसारेण विशालो भवति तत उरोविशुद्धम् स एव यदि कण्ठे वर्तितो भवति अस्फुटितश्च ततः कण्ठविशुद्धम् यदि पुनः शिरःप्राप्तः सन् सानुनासिको भवति ततः शिरोविशुद्धम् यदि वा यत उरः-कण्ठ| शिरोभिः श्लेष्मणा अव्याकुलितैर्विशुद्वैर्गीयते तत उरः-कण्ठ- शिरोविशुद्धत्वात् त्रिस्थानकरणविशुद्धम् तथा ९ सकुहरो गुञ्जन् यो वंशो ये च तन्त्री - तल-ताल-लयग्रहाः तेषु सुष्ठु अतिशयेन संप्रयुक्तम्- सकुहरगुञ्जद्वंश-तन्त्री - तल-ताल-लय-ग्रहसंप्रयुक्तम् किमुक्तं ५ भवति । सकुहरे वंशे गुञ्जति तन्त्र्यां च वाद्यमानायाम् यद् वंश-तन्त्रीखरेग अविरुद्धं तत् सकुहरगुञ्जद्वंश-तन्त्री सुसंप्रयुक्तम् तथा १० परस्परहतहस्ततलखरानुवर्ति यत् तत् तलसंप्रयुक्तम् ११ यद् मुरज- कंशिकादीनामातोद्यानाम् आहतानां यो ध्वनिः पादोत्क्षेपो (१) | यश्च नृत्यन्त्या नर्तक्याः पादोत्क्षेपः तेन समं तत् तालसुसंप्रयुक्तम् तथा १२ शृङ्गमयो दारुमयो दन्तमयो वा यः - अङ्गुलिकौशिकः | | तेन आहतायास्तन्त्र्याः खरप्रकारो लयः, तम् अनुसरद् गेयलयसुसंप्रयुक्तम् तथा १३ यः प्रथमं वंश-तन्त्र्यादिभिः खरो गृहीतः तन्मा |र्गानुसार ग्रहसुसंप्रयुक्तम् तथा १४ मधुरखरेण गीयमानं मधुरं को किलारुतवत् तथा १५ तल - वंशखरादिसमनुगतं समम् १६ यत् २० | स्वरघोलनाप्रकारेण ललतीव तत् सह ललितेन ललनेन वर्तते इति सललितम् यदि वा यत् श्रोत्रेन्द्रियस्य शब्दस्पर्शनमतीव सूक्ष्ममु | त्पादयति सुकुमारमिव च प्रतिभासते तत् सललितम् - इति १७ अत एव मनोहरम् पुनः कथंभूतम् : इत्याह- १८ तत्र मृदुर्मृदुना खरेण * “ध्वनिः यश्च नृत्यन्त्या नर्तक्याः पादोत्क्षेपः तेन” इत्यादि - जीवा० वि०प्र० पृ० १९५ पं० ९ । पादूक्षेपो-पा० ४ भा० १ । पाहूक्षेपो-पा० ५ । पदूत्क्षेपी- भा० २ । ainelibrary.org Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१३॥ रिमियपयसंचारं सुरइ सुइ वरचारुरूवं दिव्व णदृसज्जं गेयं पेंगीया वि होत्था [६४] किं ते ?xउद्धमंताणं संखाणं सिंगाणं संखियाणं खरमुहीणं पेयाणं पिरिपिरियाणं, आंहम्मंताणं पणवाणं पडहाणं, अफालिज्जमाणाणं भंभाणं होरंभाणं, तालिंजंताणं भेरीणं झल्लरीणं दुंदुहीणं, आलवंताणं मुरयाणं मुइंगाणं नंदीमुइंगाणं, उत्तालिजंताणं आलिंगाणं युक्तो न निष्ठुरेण तथा १९ यत्र खरोऽक्षरेषु घोलनास्वरविशेषेषु च संचरन् रङ्गतीव प्रतिभासते स पदसंचारो रिभित उच्यते मृदुः रिभितः पदेषु गेयनिबद्धेषु संचारो यत्र गेये तद् मृदुरिभितपदसंचारम् तथा २० शोभना रतियस्मिन् श्रोतृणां तत् सुरति तथा २१ शोभना नतिर्-नामः-अवसानो यस्मिन् तत् सुनति तथा २२ वरं-प्रधानम् चारु-विशिष्टचङ्गिमोपेतम् रूपं स्वरूपं यस्य तद् वरचाहरूपम् २३ दिव्यं-प्रधानम् २४ नृत्तसजं गेयं २५ प्रगीताः २६ अप्यभवन् ।। [१४] १किंच ते देवकुमारा देवकुमारिकाश्च प्रगीतवन्तः प्रनर्तितवन्तश्च ? ततोऽयमर्थः-यथायोगम् उद्ध्मायमानादिषु शङ्खादिषु इह २ शङ्ख-शृङ्ग-शङ्खिका-खरमुही-पेया-पिरिपिरिकाणां वादनम्-'उद्ध्मानम्'-इति प्रसिद्धम् । ३पणव-पटहानाम् =आमोटनम् ४ १० भम्भा-होरम्भाणाम् आस्फालनम् ५ भेरी-झल्लरी-दुन्दुभीनाम् ताडनम् ६ मुरज-मृदङ्ग-नन्दीमृदङ्गानाम् आलपनम् ७ आलिङ्ग x “अत्र सर्वत्रापि षष्टी सप्तम्य"-रायः विव०। ७ अप्फालिज्जमाणाणं वीणाणं वीयंधीणं तालि-वि० बा० । =मूले 'आहननम् । Jain Education Thermal Www.jainelibrary.org Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥१३४॥ कुंतुंबाणं गोमुहीणं मद्दलाणं, मुंच्छिजंताणं वीणाणं विपंचीणं वल्लकीणं, कुहिताणं महंतीणं कच्छभीणं चित्तवीणाणं, सारिज्जंताणं बद्धीसाणं सुघोसाणं नंदिघोसाणं, फुट्टिजंतीणं भामरीणं छब्भामरीणं परिवायणीणं, छिप्पंतीणं तृणाणं तुंबवीणाणं, आमोडिज्जंताणं आमोताणं झंझाणं नउलाणं, अच्छिज्जंतीणं मुगुंदाणं हुडुक्कीणं विचिक्कीण, वाइजताणं करडाणं डिडिमाण किणियाणं कडम्याणं, ताडिजंताणं दद्दरिगाणं दद्दरगाणं कुतुंबाण कलसियाणं मडुयाणं, आताडिज्जंताणं तलाणं तालाणं कंसतालाणं, घहिज्जताणं रिंगिरिसियाणं लत्तियाणं , मगरियाणं संसुमारियाणं, मिजंताणं वंसाणं वेलूणं वालीणं परिल्लीणं बद्धगाणं । [कं० ५९] कुस्तुम्ब-गोमुखी-मर्दलानाम् उत्ताडनम् ८ वीणा-विपश्ची-बल्लकीनाम् मूर्च्छनम् , ११ भ्रामरी-पभ्रामरी-परिवादिनीनाम् स्पन्दनम् १००वध्वीसा-सुघोपा-नन्दिघोषाणां सारणम् , ९ महती-कच्छपी-चित्रवीणानाम् कुट्टनम् १३ आमोट-+झञ्झा-नकुलानाम् आमोटनम् १२ तूण-तुम्बवीणानाम् स्पर्शनम् १४ मुकुन्द-हुडुक्का-विचिक्कीनाम् मूर्छनम्x १५ करटा-डिण्डिम-किणिक- कडम्बानाम् वादनम् १६ दर्दर-दर्दरिका-कुस्तुम्बरु-कलसिका-मड्डकानाम् ० उत्ताडनम् १७ तल-ताल-कंसतालानाम् आताडनम् १८ रिङ्गिसिका-लत्तिका-मकरिका-शिशुमारिकाणाम् घट्टनम् १९ वंश-वेणु-वाली--पिरली-बद्धगा? नाम् ० फुङ्कनम् अत उक्तम्'उधुमंताणं संखाणं' इत्यादि । [पृ० १२५ पं० १०] *मूलपाठानुसारेण अत्र 'स्फोटनम्' इति उचितं स्यात् । स्यन्दनम्-पा० ५।०वच्छौसा-भा०२+ -झण्डा-न-पा०४।४ मूले 'आच्छेदनम्'। -नम् मरटा-पा० ४ । कडावानाम्-पा० ५। मूले 'ताडनम्'। ४-णामतीव घ-भा० २। = -पिवली-ब-भा० २1 0 अम्र कण्डि Jain Education For Private Personel Use Only wollainelibrary.org Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण नाव्यस्य नामग्राहं द्वात्रिंशत् प्रकाराः |॥१३५॥ [६५] तंए से दिव्वे गीए दिवे वाइए दिव्वे नद्दे एवं अब्भुए सिंगारे उराले मणुन्ने मणेहरे गीते मण-| हरे न मणहरे वातिए उम्पिजलभूते कहकहभृते दिवे देवरमणे पबत्ते या वि होत्या। [६६] तए णं ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारीओ य समणस्स भगवओमहावीरस्स सोत्थिय-सिरिवच्छ [६५] यत एवं प्रगीतवन्त इत्यादि १ ततः २ तद् दिव्यं गीतम् ३ दिव्यं वादितम् ४ दिव्यं नृत्तमभवत् इति योगः । ४ दिव्यं नाम प्रधानम् ५ अद्भुतम्-आश्चर्यकारि ६ शृङ्गारं शृङ्गाररसोपेतत्वात् अथवा शृङ्गारं नाम अलंकृतमुच्यते तत्र यद् अन्यान्यविशेषक- | रणेन अलंकृतमिव गीतं वादनं नृत्तं वा तत शृङ्गारम्-इति । ७ उदारम्-स्फारं परिपूर्णगुणोपेतत्वात् न तु क्वचिदपि हीनम् ८ मनोज्ञम् | मनोनुकूलं द्रष्ट्रणां श्रोतृणां च मनोनिवृतिकरम्-इति भावः ९ तच्च मनोनिवृतिकरत्वं सामान्यतोऽपि स्यात् अतः प्रकर्षविशेषप्रतिपादनार्थमाह-मनो हरति आत्मवशं नयति तद्विदामपि अतिचमत्कारकारितया इति मनोहरम् १० उत्पिञ्जलम्-आकुलकम् उत्पिञ्जलभूते आकुलके भृते किमुक्तं भवति ? महर्षिकदेवानामपि अतिशायितया परमक्षोभोत्पादकत्वेन सकलदेव-असुर-मनुजसमूहचिताक्षेपकारि-इति ११ 'कहकह' इत्यनुकरणम् 'कहकह' इति भूतं प्राप्तम्-कहकहभूतम् किमुक्तं भवति ? निरन्तरं तत्तद्विशेषदर्शनतः समुच्छलितप्रमोदभरवशसकलदिक्चक्रवालवर्तिप्रेक्षकजनकृतप्रशंसावचनबोलकोलाहलव्याकुलीभृतम्-इति अत एव १२ दिव्यं देवरमणमपि-देवानामपि रमणं क्रीडनम्-१३ प्रवृत्तम् १४ अभृत् । [६६] १ ततः २ ते बहवो देवकुमारा देवकुमारिकाश्च ३ श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य पुरतो गौतमादिश्रमणानां ४ स्वस्तिककायर्या मूले विवरणे च पदानां व्युत्क्रमः प्रतिभाति । Jain Educationtentional ainelibraryong Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१३६॥ - नंदियावत्त- वद्धमाणग-भद्दासण-कलस-मच्छ-दप्पण - मंगलभत्तिचित्तं णामं दिव्यं नेहविधि उर्वदति [१] [ ६७ ] तए णं ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारीओ य सममेव समोसरणं करेंति करिता तं चैव भाणियवं | जाव [कं०६२ पं०४ ०६३-६५ ] दिग्वे देवरमणे पवत्ते या वि होत्था । तए णं ते बहवे देवकुमाराय देवकुमारीओ य समणस्स भगवओ महावीरस्स आवड- पंचावड-सेढि - - श्रीवत्स - नन्द्यावर्त - वर्धमानक-भद्रासन -कलश-मत्स्य-दर्पणरूपाणाम् अष्टानां मङ्गलानां भक्त्या विच्छित्या चित्रम्-आलेखनम् = आकाराभिधानं वा यस्मिन् स स्वस्तिक - श्रीवत्स - नन्द्यावर्त - वर्धमानक-भद्रासन -कलश- मत्स्य-दर्पणमङ्गलभक्तिचित्र:- एवं सर्वत्रापि व्युत्पत्तिमात्रं यथायोगं परिभावनीयम् सम्यग्भावना कर्तुं न शक्यते यतः अमीषां नाटयविधीनां सम्यक् स्वरूपप्रतिपादनं पूर्वान्तर्गते नाट्यविधिप्राभृते तच्च इदानीं व्यवच्छिन्नम् इति तं प्रथमं ५ नाटयविधिम् ६ उपदर्शयन्ति । [१] [ ६७ ] १ ततो द्वितीयं नाट्यविधिमुपदर्शयितुकामा भूयोऽपि प्रागुक्तप्रकारेण [पृ०१३००९ पृ० १३५ पं० १२] २समकं समवसरणादिकं कुर्वन्ति तथा चाह- 'तए णं ते... समोसरणं करेंति' इत्यादि प्रागुक्तं तदेव तावद् वक्तव्यं यावत् - 'दिव्वे देवरमणे... होत्या इति । ३ततः १० ४ते बहवो देवकुमारा देवकुमारिकाश्च ५श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य पुरतो गौतमादीनां श्रमणानां ६ * आवर्त - ७प्रत्यावर्त-८श्रेणि = ते देवा देवकुमार्यश्च स्वस्तिकाकारेण, श्रीवत्साकारेण, नन्द्यावर्ताकारेण, वर्धमानकाकारेण, भद्रासनाकारेण, कलशाकारेण, मत्स्याकारेण, दर्पणाकारेण च भूत्वा नृत्यन्ति स्म अर्थात् अन्योन्यं संयोगेन तादृशान् आकारान् निष्पाद्य नृत्यमकार्षुः - इति प्रतिभाति । * एतेषां शब्दानां व्याख्या पृ० ८२ पं०-१२ पृ० ८३ पं० ६ । Jain Education In matinal ainelibrary.org Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१३७॥ पसेदि-सोत्थिय-सोवत्थिय-पूस-माणव-वद्धमाणग-मच्छण्ड [पृ० ८२ पं०३-1-मगरंड-जार-मार-फुल्लावलि-पंउमपत्त-सागरतरंग-वसंतलता-पंउमलयभत्तिचित्तं णाम दिव्वं णविहिं उर्वदंसेंति [२] [६८] एवं च एकिकियाए णट्टविहीए समोसरणादिया एसा [कं०६२-६०६५] वत्तव्वया जाव दिब्वे देवरमणे पवत्ते या वि होत्था। तए णं ते बहवे देवकुमारा देवकुमारियाओ य समणस्स भगवतो महावीरस्स ईहामिअ-उसम-तुरग-नर-मगर-विहग-[पृ० ७६ पं० २] वालग-किन्नर-रुरु-सरभ-चमर-कुंजर-वणलय-1 पउमलयभत्तिचित्तं णामं दिव्वं णविहिं उबदंसेंति । [३] ९प्रश्रेणि-१०वस्तिक-११सौवस्तिक-१२पुष्य-१३ माणवक-१४वर्धमानक-१५मत्स्याण्डक-[पृ० ८२ पं० १२]-१६ मकराण्डक१७जार-१८मार-१९पुष्पावलि-२०पद्मपत्र-२१सागरतरङ्ग-२२वासन्तीलता-२३पद्मलताभक्तिचित्र २४नाम द्वितीयं नाट्यविधिम् | २५उपदर्शयन्ति [२] [६८] तदनन्तरं तृतीयं नाट्यविधिमुपदर्शयितुं भूयस्तथैव समवसरणादिकं कुर्वन्ति [पृ०१३०५०९-पृ० १३५ पं० १२] १एवं समवसरणादिकरणविधिः २ एकैकस्मिन् नाट्यविधौ प्रत्येकं प्रत्येकं तावद् वक्तव्यः यावत्-'देवरमणे...होत्था' इति । ३ ततः ४ ईहामृग-ऋषभ-तुरग-नर-मकर-विहग-व्याल-किन्नर-रुरु-सरभ-चमर-कुञ्जर-वनलता-पद्मलताभक्तिचित्र [पृ० ७६ पं०६] ५ नाम तृतीयं दिव्यं नाट्यविधिम् उपदर्शयन्ति [३] 8 -भ-भमर-पा० ४-५। Jain EducationThtensional For Private & Personel Use Only wiljainelibrary.org Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१३८॥ [६९] एंगतो- वर्क एंगओ चकवालं दुहओ चक्कवालं चक्कद्धचक्कवालं णामं दिव्वं णदृविहिं उवदंसंति [४] | [७०] चंदावलिपविभत्तिं च सूरावलिपविभत्तिं च वलियाँवलिपविभत्ति च हसाँवलिप००च एगोवलिप०| च तारावलिप० च मुत्ताँवलिप० च कणगावलिप० च रयणावलिप० च णामं दिव्वं णद्दविहं उवदसेंति [५] [७१] चंदुग्गमणप० च सूरुग्गमणप० च उग्गमणुग्गमणप० च म दिव्वं णविहं उवदंसेंति [६] [६९] तदनन्तरं भूयोऽपि समवसरणादिकविधिकरणानन्तरम् १ एकतो वक्रम् २ एकतः चक्रवालम् ३ द्विधातः चक्रवालम् ४५ चक्रार्ध चक्रवालं ५ नाम चतुर्थ दिव्यं नाट्यविधिम् उपदर्शयन्ति [४] [७०] तदनन्तरम् उक्तविधिपुरस्सरं १ चन्द्रावलिप्रविभक्ति-२ सूर्यावलिपविभक्ति-३ वलयावलिप्रविभक्ति-४हंसावलिप्रविभक्ति-५एकावलिपविभक्ति-६तारावलिपविभक्ति-७मुक्तावलिप्रविभक्ति-८कनकावलिप्रविभक्ति-९रत्नावलिप्रविभक्त्यभिनयात्मकम् आवलिप्रविभक्ति १० नाम पञ्चमं नाटयविधिम् ११ उपदर्शयन्ति [५] [७१] तदनन्तरम् उक्तक्रमेण १चन्द्रोद्गमपविभक्ति-सूर्योद्गमप्रविभक्तियुक्तम् ३उद्गमनोद्गमनपविभक्ति ४नाम षष्ठं नाटय- १० विधिम् ५उपदर्शयन्ति [६] - -तो वक दुहओ वंकं एगतो खहं दुहओ खहं एगओ चक्कवालं वि० बा०। 0 प०' अक्षरेण पविभत्ति च' इति सर्वत्र बोध्यम् । Jain Education remona For Private Personel Use Only | w .jainelibrary.org Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । [७२) चंदगमणप० च सूरांगमणप० च आगमणागमणप० च = णमं... जैवदंसेंति [७] [७३] चंदोवरणप० सूरवरणप० च औवरणावरणप० णामं... उवदंसेंति [८] [७४] चंदत्थमणप० च सुरत्थमणप० अत्थमणत्थमणप० नामं... उवदंसेंति [९] [७५] चंदमंडलप० च सूरेमंडलप० च नांगमंडलप० च जक्खमंडलप० च भूतमंडलप० च [० रक्खस-महोरग - गन्धव्वमंडलप० च] मंडल मंडलप० नामं... उवदंसेंति [१०] [७२] तत उक्तप्रकारेण १ चन्द्रागमनप्रविभक्ति - २सूर्यागमनप्रविभक्तियुक्तम् ३आगमनप्रविभक्ति ४ नाम सप्तमं नाटयविधिम् ५ उपदर्शयन्ति [७] [१३] तदनन्तरम् उक्तक्रमेण १ चन्द्रावरण प्रविभक्ति-२ सूर्यावरणप्रविभक्तियुक्तम् ३आवरणावरणप्रविभक्तिनामकम् अष्टमं नाटयविधिम् [८] [७४] तत उक्तक्रमेणैव १ चन्द्रास्तमयनप्रविभक्ति - २सूर्यास्तमयनप्रविभक्तियुक्तम् ३ अस्तमयनप्रविभक्तिनामकं नवमं नाटय. १० विधिम् [९] [७५] तत उक्तप्रकारेण १ चन्द्रमण्डलप्रविभक्ति - २सूर्यमण्डलप्रविभक्ति - ३ नागमण्डलप्रविभक्ति - ४यक्षमण्डलप्रविभक्ति-५भूतमण्डलप्रविभक्तियुक्तं ६ मण्डलप्रविभक्तिनामकं दशमं दिव्यं नाटयविधिम् [१०] = ‘णामं' शब्देन सर्वत्र ‘णामं दिव्वं विहं' एतानि पदानि बोध्यानि । [ ] एतच्चिद्दूनान्तर्गतः पाठः वि० बा० । Jain Education intentional | ॥ १३९ ॥ w.jainelibrary.org Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥१४०॥ Jain Education [७६] उस भमंडलप० च सीहमंडलप० च हयविलंबियं गयेवि०० हयविलसिंयं गयविलसियं मत्तहयविलसियं मत्तगजविलसियं मत्तयवि० मत्तगंयवि० दुयविलम्बियं णामं... णट्टविहं उवदसेंति [११] [७७] सागरपविभत्तिं च नागरेप० च सागरै-नागरप० च णाम.... उवदंसेंति [१२] [७८] गंदीप० च चंपांप० च नन्दा - चंपाप० च णामं... उबदंसेंति [१३] [७९] मच्छंडोप० च मयरंडांप० च जारंप० च मारप० च मच्छंडा-मयरंडा - जारा-माराप० च... णामं ५ [७६] तदनन्तरम् उक्तक्रमेण १ऋषभमण्डलप्रविभक्ति - २ सिंहमण्डलप्रविभक्ति - ३हयविलम्बित - ४गजविलम्बित-५हयविलसित- ६ गजविलसित - ७मत्तहयविलसित - ८मत्तगजविलसित - ९मत्तह्यविलम्बित - १० मत्तगजविलम्बितं विलम्बिताभिनयं ११द्रुतविल म्बितं नाम एकादशं नाटयविधिम् [११] [७७] तदनन्तरम् १सागरप्रविभक्ति - २नागरप्रविभक्तिअभिनयात्मकं ३सागर - नागरप्रविभक्तिनाम द्वादशं नाट्यविधिम् [१२] [ ७८ ] ततो १ नन्दाप्रविभक्ति - २ चम्पाप्रविभक्त्यात्मकं नन्दा -३ चम्पाप्रविभक्तिनाम त्रयोदशं नाटयविधिम् [१३] [७९] ततो १ = मत्स्याण्डकप्रविभक्ति - २ मकराण्डकप्रविभक्ति-३ जारमविभक्ति - ४ मारप्रविभक्तियुक्तं ५ = मत्स्याण्डक- मकरा+ अत्र मूलपाठसर्वप्रतिषु विचरणयुक्तमूलपाठादर्श च 'उसभललियत्रिक्कतं सौहललियविक्कतं हयविलंबियं' एवं पाठो लभ्यते परन्तु अत्र मूले तु विवरणानुसारी पाठकमो रक्षितः । 'वि' पदेन 'विलम्बितम्' अवगन्तव्यम् । पृ० ८३ पं० ५-६ । १० jainelibrary.org Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय। ॥१४॥ उवदंसेंति [१४] [८०] * 'क' त्ति ककारप.च 'ख'त्ति खकारप.च 'गति गकारप.च'घ'त्ति धकारप०च 'त्ति ङकारप० च ककार-खकार-गकार-घकार-हुकारप.चणाम...उवदंसेंति [१५] एवं चकारवग्गो पि[१६] टकारवग्गो वि [१७] तकारवग्गो वि [१८] पकारवग्गो वि [१९] ण्डक-जार-मारप्रविभक्तिनाम चतुर्दशं नाटथविधिम् [१४] [८०] तदनन्तरम् क्रमेण १ 'क' इति ककारपविभक्तिः २ 'ख' इति खकारप्रविभक्तिः ३ 'ग' इति गकारप्रविभक्तिः ४ 'घ'इति घकारप्रविभक्तिः ५ 'ङ' इति उकारप्रविभक्तिः इत्येवं ६क्रमभाविककारादिपविभक्तिअभिनयात्मकं ७ ककार-खकार-गकार-घकारडकारप्रविभक्तिनामकं पञ्चदशं दिव्यं नाटथविधिम् [१५] एवं ८चकार-छकार-जकार-झकार-अकारप्रविभक्तिनामकं पोडशं दिव्यं नाटयविधिम् [१६] ९ टकार-ठकार-डकार-दकार-णकारप्रविभक्तिनामक सप्तदशं दिव्यं नाटयविधिम् [१७] १० तकार-थकारदकार-धकार-नकारपविभक्तिनामकम् अष्टादशं नाटथविधिम् [१८] ११पकार-फकार-चकार-भकार-मकारप्रविभक्तिनामकम् एकोन- १० * ब्राह्मोलिपिगतः ककारः + एवंसंस्थितः, अभ्र च नर्तका देवादयः तेन 'क' सत्काकारेण स्थित्वा नृत्यं कृतवन्त इत्यभिप्रायो गम्यते । एवं सर्वत्र 'ख' आदिष्वपि याच्यम् । अत्र नर्तनप्रकारे 'अ'कार-'इ'कार-इत्यादयः स्वरा नोल्लिखिताः तथा व्यञ्जनाक्षरेष्वपि वर्गीया एव वर्णा दर्शिताः, 'य'कार-रकार-'ल'कार-ब'कार-'स'कार-'ह'कारादयो वर्णा न दर्शिताः तत्र किमपि ऐतिहासिक कारणं वा न इति चिन्तनीयम् । अथवा देवानां लिपी ये वर्णाः ते एव अत्र दर्शिताः इत्यपि चिन्तनीयम् । Jan Educati For Private 3 Personal Use Only Mr.jainelibrary.org Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१४२॥ Jain Education I [१] असोय पल्लवप० च अंबपल्लवप० च जंबूपल्लवप० च कोसंब पल्लवप० च : पल्लवप० च णामं... उबदंसति [२०] [२] उमलाप जाव [१० १८ पं० २-३ ] सोमलयाप० च लयप० च णामं... उवदंति [२१] [८३] दुयणमं... उबर्दसंति [२२] विलेबियं णामं... उव० [२३] दुयविलंबियं णामं... उव० [२४] - चियं [२५] रिर्भियं [२६] अंचियरिर्भियं [२७] विंशतितमं दिव्यं नाटयविधिम् [१९] [१] ततः १ अशोकपल्लवप्रविभक्ति - २ आम्रपल्लवप्रविभक्ति - ३ जम्बूपल्लवप्रविभक्ति - ४ कोशम्वपल्लवप्रविभक्तिअभिनयात्मकं ५ पल्लवप्रविभक्तिनामकं विंशतितमं दिव्यं नाटयविधिम् [२०] [२] तदनन्तरम् १ पद्मलता प्रविभक्ति -+नागलताप्रविभक्ति - अशोकलताप्रविभक्ति - चम्पकलताप्रविभक्ति - चूतलताप्रविभक्तिवनलताप्रविभक्ति - वासन्तीलताप्रविभक्ति-कुन्दलताप्रविभक्ति-अतिमुक्तकलताप्रविभक्ति - २श्यामलताप्रविभक्तिअभिनयात्मकं ३ लता- १० प्रविभक्तिनामकम् एकविंशतितमं दिव्यं नाट्यविधिम् [२१] [३] तदनन्तरम् १द्भुतं नाम द्वाविंशतितमं नाटयविधिम् [२२] ततो रविलम्बितं नाम त्रयोविंशतितमम् [२३] ३ द्रुतविलम्बितं नाम चतुर्विंशतितमम् [२४] ४ अश्चितं नाम पञ्चविंशतितमम् [२५] ५रिभितं नाम पड्विंशतितमम् [२६] ६ अश्चितरिभितं : पल्लवपल्लवप० - वि० बा० । ० ल्याल्याप० वि० बा० पृ० १८ पं० १० । - तमं वाद्यविधिम- पा० ४-५ । ainelibrary.org Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । औरभर्ड [२८] भसोलं [२९] आरभडभसोलं [३०] उप्पयनिवयपर्वत्तं 8 संकुचियं पसारियं ० रयारइयं तं संभतं णामं दिव्वं णहविहिं उवदंसेंति [३१] [८४] तरणं ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारीओ य समामेव समोसरणं करेंति जाव [ पृ० पं०] दिव्वे | देवरमणे पवते यावि होत्था । तए णं ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारीओ य समणस्स भगवओ महावीरस्स पुत्र्वभवचरियणिबद्धं च चर्वेणचरियणिबद्धं च संहरेणचरियनिबद्धं च जम्मणचरियनिबद्धं च अभिसे अचरियनिबद्धं च लभावचरियनिबद्धं च जोव्वणचरियनिबद्धं च कामभोगचरियनिबद्धं च निक्खमणचैरियनिबद्धं च तवचैरणचरियनिबद्धं च नाम सप्तविंशतितमम् [२७] ७ आरभटं नाम अष्टाविंशतितमम् [२८] ८ भसोलं नाम एकोनत्रिंशत्तमम् [२९] ९ आरभटभसोलं नाम त्रिंशत्तमम् [३०] तदनन्तरम् १० उत्पातनिपातप्रसक्तं ११ संकुचितप्रसारित रेवका १ रचितं १२ भ्रान्तसंभ्रान्तं नाम एकत्रिंशत्तमं दिव्यं नाटयविधिम् उपदर्शयन्ति [३१] [४] १ तदनन्तरम् च २ श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य ३ चरमपूर्वमनुष्यभव - ४ चरमच्यवन - ५ चरमगर्भसंहरण-६ चरमभरत क्षेत्रावसर्पिणी तीर्थकरजन्म - ७ अभिषेक-८ चरमबालभाव - ९ चरम यौवन- १० चरमकामभोग- ११चरमनिष्क्रमण - १२ चरमतप8- संकुचिय अपसारियं - पा० ३ = रियं भन्तं णामं भा० २ । - रियं रयारतियंत णामं - पा० १ ० इदं पदं न स्पष्टं प्रतिभाति ततः तदर्थोऽपि नावगम्यते । मम् शोभनं नाम भा० २ । *-रितखेकर भ्रान्तं सं भा०१ । - रितं रेवकरचितं भ्रान्तं भा० २ । अस्यार्थोऽपि Jain Education itemtional १० ॥१४३॥ Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। नाट्यस्य उपसंहारः ॥१४४॥ णाणुप्पायचरियनिबद्धं च तित्यपवतणचरिय-परिनिव्वाणचॅरियनियद्धं च चरिमचरियनिबद्धं च णामं दिव्य णविहिं उवदंसेंति [३२] [८५]तएणं ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारीओयचउविह वाइत्त वाएंति-तं जहा-ततं विततं घणे मुंसिर।। [८६] तए णं ते वहवे देवकुमारा य देवकुमारियाओ य चउविहं गेय गायंति तंजहाँ-उक्खितं पायंत मंदायं रोइयांवसाणं च। श्वरण-१३ चरमज्ञानोत्पाद- १४ चरमतीर्थप्रवर्तन-१५ चरमपरिनिर्वाणनिबद्धं १६ चरमनिवद्धं १७ नाम द्वात्रिंशत्तमं दिव्यं नाटयविधिम् उपदर्शयन्ति । [३२] [८५] १ तदनन्तरम् २ बहवो देवकुमारा देवकुमारिकाश्च नाटयविधिपरिसमाप्तिमङ्गलभृतं ३ चतुर्विधं ४ वादित्रं ५ वादयन्ति६ तद्यथा-७ ततम्-मृदङ्ग-पटहादि ८ विततम्-वीणादि ९ घनम्-कंसिकादि १० शुपिरम्-शङ्ख-काहलादि। [८६] १ तदनन्तरम् २ चतुर्विधं ३ गीतं ४ गायन्ति-५ तद्यथा-६ उत्क्षिप्तं प्रथमतः समारभ्यमाणम् ७ पादान्तम्-पाद-१० वृद्धम्-वृद्धादि-चतुर्भागरूपपादबद्धम्-इति भावः । ८ मध्यभागे मूर्छनादिगुणोपेतत्या मन्दं मन्दं घोलनात्मकम् ९ रोचितावसानम्न संबुद्धः । =मूलपाठयुक्तेषु आदर्शेषु पा० २ आदर्श एव ‘णाणुप्पायचरियनिबद्धं च' पदं दृश्यते , परन्तु विवरणानुसारित्वेन अत्र न्यस्तम् । ___ + 'शुषिर' शब्दे आद्य 'श'कारस्य 'झ' कारोच्चारणेन झुसिरं । अत्र 'श' कार-झकारयोः 'तालुस्थानीयत्वेन 'शकारः 'झ'रूपेण परिणत इति | कल्पना योग्या ! शुषिर-सुसिर-सांसरुं । ४ उत्क्षिप्य प्र-पा० ४-५ भा० १ । Jain Education inhital For Private Personal Use Only Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । [८७] तए णं ते बहवे देवकुमारा य देवकुमारियाओ य चउव्विहं णविहिं उदंसंति-तंजहा-अंचिय रिभियं आरभडं भसोलं च। [८८] तए णं ते यहवे देवकुमारा य देवकुमारियाओ य चउम्विहं अभिणयं अभिणयेति-संजहाँ-दिट्ठतियं =पाडितियं सामन्नोविणिवाइयं अंतोमज्झावसाणियं च।। [८९] तए णं ते यहवे देवकुमारा य देवकुमारियाओ य गोयमादियाणं समणाणं निग्गंथाणं दिव्वं देविति । दिव्व देवजुतिं दिव्वं देवाणुभावं दिव्वं बत्तीसइबद्धं नाडयं उवदंसित्ता समणं भगवंतं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिण करेंति करित्ता वंदंति नमसंति वंदित्तानमंसित्ता जेणेव सूरियाभे देवे तेणेव उवागच्छति उवा- सित्ता सूरियाभं देवं करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं पृ०६७ पं०८] मत्थए अंजलि कटु जएणं विजएणं वद्धावेंति इति-रोचितं यथोचितलक्षणोपेततया भावितम्-सत्यापितम् इति यावत् अवसानं यस्य तद् रोचितावसानम् । [८७] १ ततः २ चतुर्विधं ३ नर्तनविधिम् ४ उपदर्शयन्ति-५ तद्यथा-६ अश्चितम् इत्यादि । [८८] १ ततः२ चतुर्विधम् ३ अभिनयम् ४ अभिनयन्ति-५ तद्यथा-६ दार्शन्तिकम् ७ प्रात्यन्तिकम् ८ सामान्यतो विनिपातम् ९लोकमध्यावसानिकम्-इति । एते नर्तनविधयः अभिनयविधयश्च नाटयकुशलेभ्यो वेदितव्याः। पाडियंतियं-भा० २ पा० १-२। पाडियं-पा० ३।। ॥१४५।। Jain Educat ional For Private Personal use only Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। सूर्याभः खस्थान गतः ॥१४६॥ वद्धावित्ता एवं आणत्तिय पच्चप्पिणंति। तए णं से सूरियाभे देवे तं दिव्वं देविति दिव्वं देवजुई दिव्वं देवाणुभावं पडिसाहरइ पडिसाहरेत्ता खणेणं जाते एगे एगभूए । तए णं से सूरियाभे देवे समणं भगवंतं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ वंदति नमसति वंदित्ता नमंसित्ता नियगपरिवालसद्धिं संपरिबुडे तमेव दिव्वं जाणविमाणं दुरूहति दुरूहित्ता जामेव दिसि पाउन्भूए तामेव दिसिं पडिगए। ९० "भते तिं भय गोयमे समण भगवंतं महावीरं वंदति नमसति वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी [८९] तए णं ते...इत्यादि उपसंहारसूत्रं सुगमम् । नवरम्-१ एकभूतः-अनेकीभूय एकत्वं प्राप्त इत्यर्थः । २निजकपरिवारेण साध संपरिवृतः। ९०] १ 'भदन्त' ! २ इति आमन्त्रणपुरस्सरं ३ भगवान् गौतमः ४ श्रमणं भगवन्तं महावीरं ५ वन्दते नमस्थति बन्दित्वा | नमस्यित्वा ६ एवम्-वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादी[पुस्तकान्तरे तु इदं वाचनान्तरं दृश्यते-+'तेणं कालेणं तेणं समपणं समणस्स भगवओ महावीरस्स जितु अन्तेवासी'-इत्यादि-इंदभूई = नाम अणगारे गोयमसगोत्ते सतुरसेहे समचउरंससंठाणसंठिप बजरिसहनारायसंघयणे कणगपुलगनिघसपम्हगोरे उग्गतवे दित्ततवे ० प्रतिसंहति-प्रतिसंक्षिपति इत्यर्थः । + विवरणकारदर्शिता वाचनाभेदः । = "'नाम' इति प्रकृतत्वात् विभक्तिपरिणामेन 'नाम्ना' इति द्रष्टव्यम् एवमन्यत्रापि यथायोग भावनीयम्"-राय० विव० । Jain Education fem a l Wrjainelibrary.org Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । तत्ततवे महातवे उराले घोरे घोरगुणे घोरतवस्सी घोरबंभचेरवासी उच्छूढसरीरे संखित्तविपुलतेयलेस्से चउदसपुथ्वी चउनाणोवगप सव्वक्खरसन्निवाई समणस्स भगवतो महावीरस्स अदृरसामंते उहुंजाणू अहोसिरे झाणकोट्ठोवगए संजमेण तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहर, तरणं से भगवं गोयमे जायसढे जायसंसप जायकोउछल्ले उप्पन्नसडे उपपन्नसंसय उप्पन्न को उहल्ले संजायसङ्के संजायसंसर संजायको उहल्ले समुप्पण्णसड्डे समुप्पण्णसंसद समुप्पण्णको उहल्ले उट्टाप उट्ठेइ उट्टाप उट्टित्ता जेणेव समणे भगवं महावीरं तेणेव उबागच्छति तेणेव उवागच्छित्ता समणं भगवंत महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेति तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेत्ता वंदति नम॑सति वंदित्ता नर्मसित्ता एवं व्यासी' - अस्य व्याख्या - तस्मिन् काले तस्मिन् समये भ्रमणस्य भगवतो महावीरस्य ज्येष्ठ इति प्रथमः अन्तेवासी - शिष्यः । अनेन पदद्वयेन तस्य सकलसंघाधिपतित्वम्- आवेदयति । 'इन्द्रभूतिः' इति मातापितृकृतं नामधेयम् । अन्तेवासी च किल विवक्षायां श्रावकोऽपि स्यात् अतः तदाशङ्काव्यवच्छेदार्थम् आह-अनगारः- न विद्यते अगारं गृहम् अस्य इति अनगारः अयं च विगीतगोत्रोऽपि संभाव्येत अत आह- ॥ १४७॥ गौतमः गोत्रेण गौतमाह्वयगोत्रसमन्धित इत्यर्थः अयं च तत्कालोचितदेहपरिमाणापेक्षया न्यूनाधिकदेहोऽपि स्यात् अत आह-सप्तोत्सेधः- १० सप्तहस्त प्रमाणशरीरोच्छ्रायः अयं च इत्थंभूतो लक्षणहीनोऽपि शङ्कयेत, अतः तदाशङ्कापनोदार्थमाह-समाः शरीरलक्षणशास्त्रोक्तप्रमाणाविसंवादिन्यः चतस्रः अस्रयः यस्य तत् समचतुरस्रम् अस्त्रयस्त्विह चतुर्दिग्विभागोपलक्षिताः शरीरावयवा द्रष्टव्याः । अन्ये त्वाहुः- “समा अन्यूनाधिकाः चतस्रोऽपि अस्रयो यत्र तत् समचतुरस्रम् तच्च तत् संस्थानं च, संस्थानम् आकारः तच्च वाम-दक्षिणजान्वोः अन्तरम् आसनस्य ललाटोपरिभागस्य चान्तरम् वामस्कन्धस्य दक्षिणजानुनश्च अन्तरम्" इति। अपरे त्वाद्दुः- “विस्तारोत्सेधयोः समत्वात् समचतुरस्रम् तत्र तत् संस्थानं च संस्थानम् आकारः तेन संस्थितो व्यवस्थितो यः स तथा । तत्र नाराचम् उभयतो मर्कटबन्धः १५ ऋषभः तदुपरि वेष्टनपट्टः कीलिका अस्थित्रयस्यापि भेदकम् अस्थि एवंरूपं संहननं यस्य स तथा । तथा कनकस्य सुवर्णस्य यः पुलकः - लवः तस्य यो निकषः - कपपट्टके रेखारूपः तथा 'पद्म' ग्रहणेन 'पद्मकेसराणि उच्यन्ते अवयवे समुदायोपचारात् यथा - देवदत्तस्य हस्ताग्ररूपोऽवयवोऽपि देवदत्तः तथा च देवदत्तस्य हस्ताग्रं स्पृष्ट्वा लोको वदति - स्पृष्टो मया देवदत्तः' इति, कनकपुलकनिकपवत् पद्म Jain Education Interational w.jainelibrary.org Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१४८॥ वच्च यो गौरः स कनकपुलकनिकषपद्मगौरः अथवा कनकस्य यः पुलको द्रवत्वे सति बिन्दुः तस्य निकषो वर्णतः सदृशः कनकपुलकनिकषः तथा पद्मवत्-पद्मकेसरवत् यो गौरः स ० पद्मगौरः। अयं च विशिष्टचरणरहितोऽपि शङ्कयेत तत आह-उग्रम् | अधृष्यं तपः अनशनादि यस्य स तथा यद् अन्येन प्राकृतेन पुंसान शक्यते चिन्तयितुमपि मनसा तद्विधेन तपसा युक्त इत्यर्थः तथा दीप्तं जाज्वल्यमानदहन इव कर्मवनगहनदहनसमर्थतया ज्वलितं तपो धर्मध्यानादि यस्य स तथा, तप्तं तपो येन स तप्ततपाः पर्व हि तेन तपः तप्तं येन सर्वाण्यपि अशुभानि कर्माणि भस्मसात्कृतानि इति. महत् प्रशस्तम्-आशंसादोषरहितत्यात्-तपो यस्य स महातपाः तथा उदारः प्रधानः अथवा + उरालो भीष्मः उग्रादिविशिष्टतपःकरणतः पार्श्वस्थानाम्-अल्पसत्त्वानाम् अतिभयानक इति भावः तथा घोरो निघृणः परीपहेन्द्रियादिरिपुगणविनाशनमधिकृत्य निर्दय इति यावत् तथा घोरा अन्यैर्दुरनुचरा गुणा मूलगुणादयो यस्य स घोरगुणः तथा घोरैस्तपोभिः तपस्वी घोरतपस्वी घोरं दारुणम् अल्पसत्त्वैर्दुरनुचरत्वात् ब्रह्मचर्य यत् तत्र वस्तुं शीलं यस्य स तथा 8 उच्छूढम्-उज्झितमिव उज्झितं संस्कारपरित्यागात्-शरीरं येन स उच्छूढशरीरः संक्षिप्ता शरीरान्तर्गतत्वेन ह्रस्वतां गता विपुला विस्तीर्णा अनेकयोजनप्रमाणक्षेत्राश्रितवस्तुदहनसमर्थत्वात् तेजोलेश्या विशिष्टतपोजन्यलब्धिविशेषप्रभवा तेजोज्वाला यस्य स तथा चतुर्दश पूर्वाणि विद्यन्ते यस्य-तेनैव तेषां रचितत्वातू-असौ चतुर्दशपूर्वी अनेन तस्य श्रुतकेवलित्वमाह स च अवधिज्ञानादिविकलोऽपि स्यात् अत आह-मति-श्रुत-अवधि-मनःपर्यायज्ञानचतुष्टयसमन्वितः उक्तविशेषणद्वययुक्तोऽपि कश्चिद् न समनश्रुतविषयव्यापिशानो भवति चतुर्दशपूर्वविदामपि षट्स्थानपतितत्वेन श्रवणात् अत आह सर्वाक्षरसंनिपाती अक्षराणां संनिपाताः संयोगाः अक्षरसन्निपाताः सर्वे च ते अक्षरसन्निपाताश्च सर्वाक्षरसन्निपाताः ते यस्य ज्ञेयाः स तथा किमुक्तं भवति? या काचिद् जगति पदानुपूर्वी वाक्यानुपूर्वी चा संभवति ताः सर्वा अपि जानातीति पवंगुणविशिष्टो भगवान् विनयराशिरिव साक्षात् इति कृत्वा शिष्याचारत्वाच्च श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य अदरसामन्ते विहरति-इति योगः तत्र दूरं विप्रकृष्टम् तत्प्रतिषेधाद् अदूरसामन्तम्-ततो नातिदूरे नातिनिकटे इत्यर्थः किं ० "ततः पदद्वयस्य कर्मधारयसमासः"-राय० विव० । + 'उरालो' अयं प्राकृतः प्रयोगः। 8 'उच्छदम्' इदमपि प्राकृतं पदम् । ' Jain Education lemona For Private Personel Use Only Miw.jainelibrary.org Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । विशिष्टः सन् तत्र विहरति ? इत्यत आह ऊर्ध्वं जानुनी यस्य असौ ऊर्ध्वजानुः अधः शिराः - नोर्ध्व तिर्यग्वा विक्षिप्तदृष्टिः किन्तु नियतभूभागनियमितदृष्टिः इत्यर्थः ध्यानं धर्मध्यानं शुक्लध्यानं च तदेव कोष्ठः कुशूलो ध्यानकोष्ठः तम् उपगतो ध्यानकोष्ठोपगतः यथा हि कोष्ठके धान्य प्रक्षिसम् अविप्रसृतं भवति एवं भगवानपि ध्यानतोऽविप्रकीर्णेन्द्रियान्तःकरणवृत्तिः इत्यर्थः संयमेन पञ्चाश्रवनिरोधादिलक्षणेन तपसा अनशनादिना 'च' शब्दोऽत्र समुच्चयार्थो लुप्तो द्रष्टव्यः संयम - तपोग्रहणम् अनयोः प्रधानमोक्षाङ्गताख्यापनार्थम् प्राधान्यं च नवकर्मानुपादान हेतुत्वेन तपसश्च पुराणकर्मनिर्जराहेतुत्वेन तथाहि अभिनवकर्मानुपादानात् पुराणकर्मक्षपणाच्च जायते सकलकर्मक्षयलक्षणो मोक्षः ततो भवति संयम - तपसोमक्षं प्रति प्राधान्यम् इति । आत्मानं वासयन् तिष्ठति । ततो ध्यानकोष्ठोपगतविहरणाद् अनन्तरं भगवान् गौतमो जातश्रद्धादिविशेषणविशिष्टः सन् उत्तिष्ठति इति योगः तत्र जाता प्रवृत्ता श्रद्धा इच्छा वक्ष्यमाणार्थतत्त्वावगमं प्रति यस्य असौ जातश्रद्धः तथा जातः संशयो यस्य स जातसंशयः संशयो नाम अनवधारितार्थज्ञानम् स चैवम् इत्थं नाम अस्य दिव्या देवधिविस्तृता अभ वत् इदानीं साक्व गता ?' इति तथा जातं कुतूहलं यस्य स जातकुतूहलः जातौत्सुक्य इत्यर्थः यथा - 'कथममुमर्थे भगवान् प्ररूपयिष्यति' इति तथा उत्पन्ना प्राग् अभूता सती भूता श्रद्धा यस्य असौ उत्पन्नश्रद्धः अथ 'जातश्रद्धः' इत्येतदेव अस्तु किमर्थम् 'उत्प- १० नद्धः' इति प्रवृत्तद्धत्वेनैव उत्पन्नश्रद्धत्वस्य लब्धत्वात् नहि अनुत्पन्ना श्रद्धा प्रवर्तते ? इति अत्रोच्यतेः हेतुत्वप्रदर्शनार्थम् तथाहिकथं प्रवृत्तश्रद्धः उच्यते यतः उत्पन्नश्रद्धः इति हेतुत्वदर्शनं चोपपन्नम् तस्य काव्यालंकारत्वात् यथा "प्रवृत्तदीपामप्रवृत्तभास्कराम् प्रकाशचन्द्रां बुबुधे विभावरीम् " [ ] इत्यत्र, अत्र हि यद्यपि प्रवृत्तदीपादित्वादेव अप्रवृत्तभास्करत्वम् अवगतम् तथापि अप्रवृत्तभास्करत्वं प्रवृत्तदीपादेर्हेतुतया उपन्यस्तमिति सम्यक् । 'उप्पन्नसहे' 'उप्पन्नसंसर' इति प्राग्वत् तथा 'संजायसङ्के' इत्यादि पदपटुक प्राग्वत् नवरम्-इह 'सम्'शब्दः प्रकर्षादिवचनो वेदितव्यः उत्थानम् उत्था - ऊर्ध्ववर्तनम् तथा उत्तिष्ठति । इइ 'उट्ठेइ' इत्युक्ते क्रियारम्भ- १५ मात्रमपि प्रतीयेत यथा 'वक्तु+मुत्तिष्ठति' ततः तद्वयवच्छेदार्थम् 'उट्टाए' इत्युक्तम्-उत्थया उत्थाय यस्मिन् दिग्भागे श्रमणो भगवान् + मुत्तिष्ठते ततः पा० ४। मुपतिष्ठते ततः पा० ५ । Jain Education interational ॥१४९॥ w.jainelibrary.org Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। जातसंशयस्य श्रीगौतमस्य प्रश्न: ॥१५॥ _ [९१] प्र०-सूरियाभस्स णं भंते ! देवस्स एसा दिव्वा देविड्डी दिव्वा देवज्जुती दिब्वे देवाणुभावे कहिँ गते | कहिं अणुप्पविहे ? [९२] उ०-गोयमा ! सरीरं गते सरीरं अणुप्पविटे। १९३] प्र०-'से केण?णं भंते ! एवं बुचई सरीरं" गते सरीरं अणुप्पविदे? [९४] उ०-गोयमा ! से जहा नाम ए कूडागारसाला महावीरो वर्तते तस्मिन्नेव दिग्भागे उपागच्छति उपागत्य च श्रमणं विकृत्वः चीन वारान् आदक्षिणप्रदक्षिणीकरोति आदक्षिणप्रदक्षिणीकृत्य वन्दते नमस्यति बन्दित्वा नमस्यित्वा पयम् अवादीत् ] [९१] प्र०-१ व गतः १२ तत्र गमनम् अन्तरमनुप्रवेशाभावेऽपि दृष्टम् यथा 'भित्तौ गता धृलिः' इति, एपोपि दिव्योऽनुभावः यद्येवं क्वचित् प्रत्यासन्ने प्रदेशे गतः स्यात् ततो दृश्येत न चासौ दृश्यते ततो भूयः पृच्छति-क्व अनुप्रविष्ट:-क्व अन्तर्लीनः ? इति भावः [९२] उ०-भगवान् आह-१ गौतम ! २ शरीरं गतः-३ शरीरम् अनुपविष्टः। [९३] प्र०-पुनः पृच्छति-१ अथ केन अर्थेन-केन हेतुना २ भदन्त !३ एवम् ४ उच्यते ५ 'शरीरं गतः-शरीरम् अनुप्रविष्टः'? [९४] उ०-भगवान् आह-१ गौतम ! २कूटस्येव-पर्वतशिखरस्येव आकारो यस्याः सा कूटाकारा-यस्या उपरि आच्छादनं शिखराकारं सा कुटाकारा इति भावः कुटाकारा चासौ शाला च कूटाकारशाला यदि वा कुटाकारेण शिखराकृत्या उपलक्षिता शाला For Private Personal Use Only JainEducation Emal Mainelibrary.org Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। सिया दुहतो लित्ता गुत्ता गुत्तदुवारा णिवाया णिवायगभीरा, 'तीले णं कूडागारसालाते "अदूरसामंते एत्थ श्रीभगवतः |णं "महेगे जणसमूहे चिट्ठति, तए णं "से जणसमूहे रंगे महं अभवद्दलगं वा वासवद्दलंग वा महावायं वा सोदाहरणं एजमाणं वा पासेति, पासित्ता तं कूडागारसालं अतो अणुप्पविसित्ता णं चिट्ठइ, से तेणटेणं गोयमा! एवं प्रतिवचः बुञ्चति-'सरीरं अणुप्पविढे'। [९५] प्र०-काहिं णं भंते ! सूरियांभस्स देवस्स सूरियाभे नामं विमाणे पन्नते? |॥१५१॥ कूटाकारशाला ३ स्यात् ४बहिर् अन्तश्च ५ गोमयादिना लिप्ता ६ गुप्ता बहिः प्राकारावृता ७ गुप्तद्वारा द्वारस्थगनात् यदि वा गुप्तद्वारा केषांचिद् द्वाराणां स्थगितत्वात् केषांचिद् वा अस्थगितत्वात् इति । ८ निवाता वायोरप्रवेशात् ९ किल महद् गृहं निवातं प्रायो न भवति तत आह-निवातगम्भीरा-निवाता सती विशाला इत्यर्थः ततः १० तस्याः कूटाकारशालायाः ११ अदूरसामन्ते-न अतिदूरे | निकटे वा प्रदेशे १२ महान् एकः-अन्यतरः जनसमूहः तिष्ठति १३ स च १४ एकं महत् १५ अभ्ररूपं वादेलम्-अभ्रवादलम्धारानिपातरहित संभाव्यवर्ष वादलम् इत्यर्थः १६ वर्षप्रधानं वादलकम्-वर्षवादलकम्-वर्ष कुर्वत् वादलकम् १७ महावातं वा १८ आयान्तम्-आगच्छन्तम् १९पश्यति दृष्ट्वा २०तस्याः कूटाकारशालायाः २१अन्तरम् ततः २२अनुपविश्य २३तिष्ठति एवं सूर्याभस्यापि १० देवस्य सा तथा विशाला दिव्या देवद्युतिः दिव्यो देवानुभावः शरीरम् अनुप्रविष्टः । २४अनेन कारणेन २५गौतम! एवम् उच्यते । [९५] प्र०-भूयो गौतमः पृच्छति-१ व २ सूर्याभस्य देवस्य सूर्याभं विमानं ४प्रज्ञप्तम् ? 8“ द्वितीया षष्ठ्यर्थे"-रायः विव० । Jain Education remona For Private Personal use only J ainelibrary.org Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१५२॥ उत्तरम् [९६] उ०-गोयमा ! जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणेणं इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमर्रम 'सूर्याभस्य |णिज्जातो भूमिभागातो उड्डे चंदिम-सूरिय-गहगण-नक्खत्त-तारारूवाणं 'बहई जोअणसयाई एवं-सहस्साई विमानं सयसहस्साई बहुईओ जोअणकोडीओ जोअणसयकोडीओ जोअणसहस्सकोडीओबहुईओजोअणसयसहस्स क्व ?'इति कोडीओ चहुईओ जोअणकोडाकोडीओ उड्ड दूरं वीतीवइत्ता एत्थ णं सोहम्मे नामं कप्पे पन्नत्ते पाईणपंडीणायते श्रीगौतम उदीणदाहिणविधिणे अर्द्धचंदसंठाणसंठिते अच्चिमालिभासरासिवण्णाभे प्रश्नस्य [९६] प्र०-भगवान् आह-१ गौतम ! अस्मिन् २ जम्बूद्वीपे यो ३ मन्दरपर्वतः तस्य ४ दक्षिणतः ५ अस्या रत्नप्रभायाः पृथिव्याः ६ बहुसमरमणीयात् भूमिभागात् ७ ऊध्र्व ८ चन्द्र-सूर्य-ग्रह-नक्षत्र-तारारूपाणामपि पुरतः ९ बहूनि योजनशतानि ततो बुद्धथा बहुबहुतरोल्लङ्घनेन १०बहूनि योजनसहस्राणि एवमेव ११बहूनि योजनशतसहस्राणि एवमेव च १२ बह्वीर्योजनकोटीः एवमेव च १३वह्वीयोजनकोटीकोटीः १४ ऊर्ध्वम् १५ उत्प्लुत्य १६ अत्र सार्धरज्जुप्रमाणे प्रदेशे १७ सौधर्मो नाम कल्पः प्रज्ञप्तः स च १८ प्राचीनाऽपाचीनायतः पूर्वापरायत इत्यर्थः १९ उदग्दक्षिणविस्तीर्णः २० अर्धचन्द्रसंस्थानसंस्थितः द्वौ हि सौधर्म-ईशानौ देवलोको २० समुदितौ परिपूर्णचन्द्रमण्डलसंस्थानसंस्थितौ तयोश्च मेरोदक्षिणवर्ती सौधर्मकल्पः उत्तरवर्ती ईशानकल्पः ततो भवति सौधर्मकल्पः अर्ध चन्द्रसंस्थानसंस्थितः २१ *अर्चीनि किरणानि तेषां माला अचिमाला सा अस्य अस्ति-इति अचिमाली--किरणमालासंकुल इत्यर्थः । ___x बहुगीतो जो-भा०१। प्राचीनोपाचीना-पा० ४-५ । * अर्ची षि-भा०२। “अचिस्-अर्ची सन्तेदन्तौ"-शब्दरत्नाकर० का० ४ ग्लो०११५। Jain Education anal For Private Personal Use Only jainelibrary.org Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । Jain Education असंखेज्जाओ जोअणकोडोकोडीओ आयाम विक्खंभेणं असंखेज्जाओ जोअणकोडाकोडीओ पैंरिक्खेवेणं एत्थ णं सोहम्माणं देवाणं वैत्तीसं विमाणवाससयसहस्साइं भवति' इति : मैंक्खायं । ते" णं विमाणा सव्वरयनामया अच्छा जीव पडिरूवा । तेसिं णं विमाणाणं बहुमैज्झदेसभाए पंच वर्डिसया पन्नत्ता तंजहा- असोगवर्डिसए सत्तवण्णवैडिसए २२ असंख्येयाः २३यो - जनकोटीकोटी : २४ आयामश्च विष्कम्भश्च ० आयामविष्कम्भम् तेन आयामेन च विष्कम्भेन चेत्यर्थः २५ ५ असंख्येया योजनकोटीकोटीः २६ परिक्षेपेण-परिधिना । सर्वात्मना रत्नमयः 'यावत्' करणात् 'अच्छे सण्हे घडे' [पृ०१९ पं०५ तथा ८] इत्यादि विशेषणकदम्बकपरिग्रहः तत्र सौधर्मे कल्पे २७ द्वात्रिंशद्विमानशतसहस्राणि २८भवन्ति २९ इति ३० आख्यातं मया शेषैश्व तीर्थकृद्भिः । ३१ तानि च विमानानि ३२ सर्वरत्नमयानि - सामस्त्येन रत्नमयानि अच्छानि आकाशस्फटिकवत् अतिनिर्मलानि अत्रापि ३३ ' यावत्' करणात् 'सण्हा लण्हा घट्टा नीरया' [पृ० १९ पं० ८] इत्यादि विशेषणजातं द्रष्टव्यम् तच्च प्रागेव अनेकशो व्याख्यातम् । ३४ तेषां विमानानां ३५ बहुमध्यदेश भागे त्रयोदशप्रस्तटे सर्वत्रापि विमानावतंसकानां स्वस्वकल्पचरम प्रस्तटवर्तित्वात् ३६ पञ्च ३७ १० विमानावतंसकाः प्रज्ञप्ताः तद्यथा - ३८ अशोकावतंसकः - अशोकावतंसकनामा स च पूर्वस्यां दिशि ततो दक्षिणस्यां ३९ सप्तपर्णाव - +मे+अक्खायं मक्खायं । " सूत्रे पुंस्त्वं प्राकृतत्वात् " - राय० विव० जनकोटी:- पा० ५-४ भा० १ ० "समाहारो द्वन्द्वः "राय० विव० । • विमानशब्दस्य पुंस्त्वम् । onal ॥१५३॥ jainelibrary.org Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१५४॥ चंगवडिसए* चूतवैडिंसए मज्झे सोधम्मवैडिंसए ते" णं वडिंसगा सव्वरयणामया अच्छा जीव पडिरूया। तस्स णं सोधम्मवडिंसगस्स महाविमाणस्स पुरत्मेिणं तिरिय असंखेज्जाई जोयणसयसहस्साई वीइवइत्ता एत्थै णं सुरियाभस्स देवस्स सूरियाभे विमाणे पण्णत्ते +अद्भुतेरस जोयणसयसहस्सा आयामविक्खंभेणं अउणयालीसं च सयसहस्साई बावन्नं च सहस्साई अँट्ट य अडयालजोयणसते परिक्खेवेणं । तंसकः पश्चिमायां ४० चम्पकावतंसकः उत्तरस्यां ४१ चूतावतंसकः मध्ये ४२ सौधर्मावतंसकः ४३ तेऽपि पश्चापि विमानावतंसकाः | ४४ सर्वरत्नमयाः 'अच्छा जाव पडिरूवा' इति ४५ 'यावत्' करणात् अत्रापि 'सण्हा घट्टा मट्ठा' इत्यादि [पृ० १९५०५-८] विशेपणजातम् अवगन्तव्यम् । ४६तस्यैव सौधर्मावतंसकस्य ४७पूर्वस्यां दिशि ४८तिर्यक् ४९ असंख्येयानि योजनशतसहस्राणि ५०व्यतिव्रज्य-अतिक्रम्य ५१ अत्र ५२सूर्याभस्य देवस्य ५३ सूर्याभं नाम विमानं प्रज्ञप्तम् ५४ अर्ध त्रयोदशं येषां तानि अर्धत्रयोदशानिसार्धानि द्वादश-इत्यर्थः-योजनशतसहस्राणि ५५ आयामविष्कम्भेन च ५६ ४एकोनचत्वारिंशत् योजनशतसहस्राणि ५७ द्विपञ्चाशत सहस्राणि ५८ अष्टौ च योजनशतानि अष्टचत्वारिंशानि-अष्टाचत्वारिंशदधिकानि-३९५२८४८ किश्चिद्विशेषाधिकानि ५९ परिक्षेपेण *-ए भूतब.सए-भा० १।-ए भूयगवडिंसते-भा० २।+ अतो तेरसयसहस्साई आयामविक्खंभेणं बायालीसं च सयसहस्साई अट्ट य अड-पा०१।०अउणयालीसं च सयसहस्साई अट्ठ य अड्यालजोयणसते-भा० २। ४ एकोनचत्वारिंशत् योजनशतसहस्राणि अष्टौ च योजन-पा० ४-५। अयमों मूले न प्रतिभाति । For Private 3 Personal Use Only Jainelibrary.org Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण २ एगेणं पागारेणं सवओ समंता संपरिक्खित्ते से णं पागारे तिणि जोयणसयाई उडू-| विमान उच्चत्तणं, मले एग जोयणसयं विखंभेणं, मज्झे पन्नासं जोयणाई विक्खंभेणं उपि पैणवीसं जोयणाई वि प्राकारखंभण। "मले वित्थिपणे मज्झे संखित्ते उपि तणुए-गोपुच्छेसंठाणसंठिए संवरयणामए अच्छे जाव पडिरूवे वर्णनम् "से णं पागारे परिधिना "विक्खम्भवग्ग दहगुण करणी वट्सस्स परिरओ होइ" [ ] इति करणवशात् स्वयम् आनेतव्यं सुगमत्वात् । १५५॥ [९७] १ तद् विमानम् २ एकेन प्राकारेण ३ सर्वतः सर्वासु दिक्षु ४ समन्ततः सामस्त्येन ५ परिक्षिप्तम् । ६ स प्राकारः ७ त्रीणि योजनशतानि ८ ऊर्ध्वम्-उच्चस्त्वेन, ९ मूले एकं योजनशतं १० विष्कम्भेन, ११ मध्यभागे १२ +पञ्चाशत् , मूलाद् आरभ्य मध्यभागं यावत योजने योजने *योजनविभागस्य विष्कम्भतः त्रुटितत्वात् १३ उपरि मस्तके १४ पश्चविंशतिर्योजनानि १५ विष्कम्भेण मध्यभागाद् आरभ्य उपरितनमस्तकं यावत् योजने योजने योजनपड्भागस्य विष्कम्भतो हीयमानतया लभ्यमानत्वात् अत एव १६ मले विस्तीर्णः १७ मध्ये संक्षिप्तः पञ्चाशतो योजनानां त्रुटितत्वात् १८उपरि तनुकः पञ्चविंशतियोजनमात्रविस्तारात्मकत्वात् अत १० एव १९ गोपुच्छसंस्थानसंस्थितः २० 'सब्बरयणामए' इत्यादि विशेषणजातं प्राग्वत् [पृ० १९ पं० ५-८] स २१ प्राकारः "विक्खभ पायगुणिओ परिरओ तस्स गणियपयं” इति सम्पूर्णगाथा। =विष्कम्भवर्गः दशगुणः करणी वृत्तस्य परिरयो भवति । विष्कम्भः पादगणितः परिरयः तस्य गणितपदम्" इति शब्दसंस्कारः । जग्बूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्ती [पृ० १९ पं० ८ वक्ष० १] "परिध्यानयनोपायस्त्वयं चूर्णिकारोक्तः" इति उल्लिख्य इयं गाथा दशिता। उपयुक्तगाथार्थस्तु-विष्कम्भस्य वर्गों विधेयः स च दशगुणः कार्थः ततः करणीक्रियया गणित विधेयम एवंरीत्या वृत्तस्य परिरयो ज्ञातुं शक्यः । + 'विष्कम्भेन' इति शेषः । *-जनविभागस्य वि-भा०२। Jain Education literona For Private Personel Use Only wwjainelibrary.org Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥१५६॥ णोणाविहपंचवण्णेहि कविसीसएहिं उपसोभिते तं जहा-कण्हेहि य नीलेहि य लोहितेहिं हालिद्देहिं सुकि विमानद्वार ल्लेहिं कविसीसएहिं । ते णं कविसीसगा ऐगं जोयणं आयामेणं अद्वैजोयणं विखंभेणं देसणं जोयणं वर्णनम् उड्डे उच्चत्तण *सव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा। | [९८] सूरियाभस्स णं विमाणस्स एगमेगाए बाहाए दारसहस्सं दारसहस्सं भवतीति -मक्खायं, ते णं दारा पंच जोयणसयाई उड्डे उच्चत्तेणं अड्डाइजाई जोयणसयाई विक्खं भेणं तावइयं चेव पवेसेणं सेयाँ वरंकणगथूभियागा ईहोमियउसमतुरगणरमगरविहगवालगकिन्नररुरुसरभचमरकुंजरवणलयपउमलयभत्तिचित्ता खंभुग्गय२२नानाविधानि च तानि पञ्चवर्णानि च नानाविधपश्चवर्णानि तैः नानाविधत्वं च पञ्चवर्णापेक्षया द्रष्टव्यम् कृष्णादिवर्णतारतम्यापेक्षया वा २३ पञ्चवर्णत्वमेव प्रकटयति-कण्हेहिं' इत्यादि । २४ तानि कपिशीर्षकाणि प्रत्येकं २५ योजनमेकम् २६ आयामतो दैर्येण २७ अध योजनं विष्कम्भेण २८ देशोनयोजनम्-२९ उच्चैस्त्वेन ३० सव्वरयणामया' इत्यादि विशेषणजातं प्राग्वत् [पृ०१९ पं०५-८]। [९८] १ एकैकस्यां बाहायां २ द्वारसहस्रमिति सर्वसङ्ख्यया चत्वारि द्वारसहस्राणि, ३ तानि च द्वाराणि प्रत्येकं ४ पञ्च योज- १० नशतानि ऊर्ध्वम्-उच्चस्त्वेन ५ अर्धत्तीयानि योजनशतानि विष्कम्भतः ६ अर्धत्तीयान्येव योजनशतानि प्रवेशतः तानि च द्वाराणि सर्वाण्यपि ७श्वेतानि-श्वेतवर्णोपेतानि बाहुल्येन अङ्करत्नमयत्वात् । ८ वरकनका-वरकनकमयी स्तूपिका-शिखरं येषां तानि तथा, ९ 'ईहामिग...सस्सिरीयरूवा' इति विशेषणजातं यानविमानवद् भावनीयम् [पृ० ७६ पं० २-४ तथा पं० ६-१२]| * सव्वमणिमया-भा० १-२ वि० बा० ।- पृ० १५३ + टिप्पण । 8 द्वादशस-पा० ५। सर्वाण्युपरि श्वे-भा०२। Jain Education emanal For Private & Personel Use Only WW.jainelibrary.org Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण वरवयरवेइया परिगयाभिरामा विजाहरजमलजुयलजंतजुत्ता विव अच्चीसहस्समालणीया रूवगसहस्सकलिया भिसमाणा भिभिसमाणा चक्खुल्लोयणलेसा सुहफासा ससिरीयरूवा । वन्नो दाराणं तेसिं होइ-तंजहा-वइ रामया जिम्मा रिट्टामया पइट्ठाणा वेसलियमया खंभा जायरूवोवचियपवरपंचवन्नमणिरयणकोट्टिमतला हसभमया एलुया गोमेजमया इंदकीला लोहियक्खमतीतो चेडाओ जोईरसमया उत्तरंगा लोहियक्खमईओ १० तेषां द्वाराणां वर्णः-खरूपव्यावर्णनम्-अयं भवति, तमेव कथयति-तद्यथा-इति ११नेमा नाम द्वाराणां भूमिभागाद् ऊवं निष्का-५ मन्तः प्रदेशाते सर्वे वज्रमया-वज्ररत्नमयाः, १२ रिटमयानि-रिष्टरत्नमयानि प्रतिष्ठानानि-मूलपादाः १३ वैडूर्यरत्नमयाः स्तम्भाः। जातरूपेण-सुवर्णेन उपचितैः-युक्तैः प्रवरैः-प्रधानैः पञ्चवर्णैर्मणिभिः-चन्द्रकान्तादिभिः रत्नैः-कर्केतनादिभिः कुट्टिमतलं-बद्धभूमितलं येषां ते तथा १४ हंसगर्भमया-हंसगर्भाख्यरत्नमया एलुका-- देहल्यः इति १५ गोमेजकरत्नमया इन्द्रकीलाः १६ * लोहिताक्षरनमय्यो +द्वारशाखाः १७ द्वारस्योपरि तिर्यगव्यवस्थितमङ्गम्-उत्तरङ्ग- तानि ज्योतीरसमयानि-ज्योतीरसाख्यरत्नात्मकानि १८लोहि ॥१५७॥ । इति वक्तव्ये 'वामन्ने मूलपाठे ‘देहंबालारो नपातिकः” १० देहली 'वज्र' इत्यस्य 'बजिर'-'बइर' इति प्राकृतम् उच्चारणम् 'वइरमया' इति वक्तव्ये 'वइरामया' इति "वज्र' शब्दस्य दीर्घत्वं प्राकृतत्वात्" एवम् अन्यत्रापि द्रष्टव्यम्” -राय० वि०।- भाषायाम् 'डेलि' इति प्रसिद्धम् । ज्ञाताधर्मकथासूत्रे मूलपाठे 'देहंबलि' शब्दः समागत:-"देहबलियाए"-पृ० १९९ प्र० पं० ११ । एतस्य वृत्तौ "देह बलिम्' इति एतस्य आख्यानं देहबलिका xxx अनुस्वारो नेपातिकः" पृ० २०० प्र०पं०१०। अनयोः देहलि-देहंबलिकाशब्दयोः साम्यं प्रतिभाति । यत्र स्थित्वा 'देह बलिम्' इति कथ्यते तत् स्थानं 'देहबलिका-देहली' इति उचितं व्युत्पादनम् । * लोहिताख्यर-विवरणसर्वप्रतिषु । +भाषायाम् 'वारसाख' इति। = 'ओतरंग' इति भाषाप्रतीतम् । Jain Educationem For Private Personal Use Only wallainelibrary.org Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥ १५८॥ Jain Education Inmat | सूईओ वयरामंया संधी नाणामणिमया समुग्गया वयमिया अग्गला अलपासाया रयामयाओ आवत्तणपेढियाओ अंकुत्तरपासगा निरंतैरियत्रणकवाडा भिंतीसु चैव भित्तिगुलिता छपन्ना तिण्णि होंति गो मासिया तत्तिया ताक्षमय्यो लोहिताक्षरत्नात्मिकाः सूचयः - फलकद्वयसम्बन्धविघटनाऽभावहेतुः पादुकास्थानीयाः १९ वज्रमयाः सन्धयः सन्धिमेलाः फलकानाम् - किमुक्तं भवति ? - वञ्चरत्नपूरिताः फलकानां सन्धयः, २० समुद्रका इव समुद्रकाः- ० सूचिकागृहाणि तानि नानाम| णिमयानि २१ + अर्गलाः- प्रतीताः २२ अर्गलाप्रासादा यत्रार्गला नियम्यन्ते, आह च *जीवाभिगममूलटीकाकारः - "अर्गलाप्रासादा यत्रार्गला नियम्यन्ते" [ ] इति । एतौ द्वौ अपि वज्ररत्नमयौ २३ आवर्तनपीठिका नाम यत्रेन्द्रकीलको भवति, उक्तं च विजयद्वारचिन्तायां जीवाभिगममूलटीकाकारेण - "आवर्त्तनपीठिका यत्रेन्द्रकीलको भवति" [ ] इति । २४ अङ्का - अङ्करत्नमया उत्तरपार्श्वा येषां द्वाराणां जानि अङ्कोत्तरपार्श्वकानि २५ निर्गता अन्तरिका लध्वन्तररूपा येषां ते निरन्तरिका अत एव घना - निरन्तरिका घनाः कपाटा येषां द्वाराणां तानि निरन्तरिकधन - कपाटानि २६ तेषां द्वाराणां प्रत्येकमुभयोः पार्श्वयोः भित्तिषु १० - भित्तिगताः भित्तिगुलिकाः- पीठकस्थानीयाः तिस्रः पट्पञ्चाशत्प्रमाणा भवन्ति २७ गोमनस्यः शय्याः २८ तावन्मात्राः षट्पश्चा२३ रजत मय्यः । ० ' शूतिकागृहाणि' विवरण सर्वप्रतिषु + 'आगळियो' भाषा * प्रस्तुतविवरणकारेणैव श्रीमलयगिरिसूरिणा जीवाजीवाभिगमसूत्रस्य विवरणं कृतम् स तत्रापि एवमेव उल्लिखति- "आह च मूलटीकाकारः अर्गलाप्रासादा यत्रार्गला नियम्यन्ते " -जीवा० वि० पृ० २०४ पं० ६ । X जीवा ० वि० पृ० २०४ पं० ७ ० ति ष पञ्चाशत् त्रिकप्रमाणा-पा० ५। त्रिषट्पञ्चाशत् त्रिकप्रमाणा- भा० १। www.ainelibrary.org Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। गाणामणिरयणवालरूवगलीलटिअसालभंजियागा वयंरामया कूडा रयैयामया उस्सेहा सेव्यतवणिज्जमया उल्लोया जाणामणिरयणजालपंजरमणिवंसगलोहियक्खपडिवंसगरययभोमा अामया पक्खा पक्खयाहाओ जोईरसौमया वंसा वंसकवेल्लुयाओ शत्रिकसंख्याका इत्यर्थः इदं द्वारविशेषणमेव, २९ नानामणिरत्नानि-नानामणिरत्नमयानि व्यालरूपकाणि लीलास्थितशालभञ्जिकाश्च | | ॥१५९॥ लीलास्थितपुत्रिका येषु तानि तथा ३०कूटो-माडभाग उच्छ्यः -शिखरम् । आह च जीवाभिगममूलटीकाकृत-"-कूटो माड-५ भागः उच्छ्यः शिखरम्" [ ] इति, नवरमत्र शिखराणि तेषामेव माडभागानां सम्बन्धीनि वेदितव्यानि, द्वारशिखराणामुक्तत्वात वक्ष्यमाणत्वाच्च, ३२ उल्लोका-उपरिभागाः सर्वतपनीयमयाः-सर्वात्मना तपनीयरूपसुवर्णविशेषमयाः ३३ मणयो-मणिमया वंशा येष तानि मणिमयवंशकानि लोहिताक्षाणि-लोहिताक्षमयाः प्रतिवंशा येषु तानि लोहिताक्षप्रतिवंशकानि रजता-रजतमयी भूमियेषां तानि रजतभूमानि मणिवंशकानि लोहिताक्षपतिवंशकानि रजतभूमानि नानामणिरत्नानि-नानामणिरत्नमयानि जालपञ्जराणिगवाक्षापरपर्यायाणि येषु तानि तथा, ३४अङ्को-रत्नविशेषस्तन्मयाः पक्षास्तदेकदेशभूताः पक्षवाहवोऽपि तदेकदेशभूता एवाङ्कमय्यः, आह च जीवाभिगममूलटीकाकृत्-"अङ्कमयाः पक्षास्तदेकदेशभृता एवं पक्षवाहवोऽपि द्रष्टव्याः"[ ] इति, ३५ 8 “यनमयः...कूडो माडभागः ३१ रजतमयः उत्सेधः-शिखरम्" जीवा० वि० पृ० २०४ पं० १३ । - जीवा० वि० पृ० २०४ पं०१४ । | x“प्राकृतत्वात् समासान्तः "-राय० वि० । *"पदानामनन्ययोपनिपातः प्राकृतत्वात्"-राय० वि० । जीवा० वि० पृ०१८०५०८। Jain Education a l For Private Personal Use Only Jjainelibrary.org Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१६०॥ |रययामईओ पट्टियाओ जयरूवमईओ ओहाडणीओ वह मईओ उबरिपुञ्छणीओ सब्वैसेयरययामये छायणे अंकेंमयकणगकूडतवणिज्जधूभियागा सेया संर्खेतलविमलनिम्मलदधिघणगोखीरफेणरययणिगरपगासा तिलगरयणद्धचंद चित्ता J ज्योतीरसं नाम रत्नं तन्मया वंशाः - महान्तः पृष्ठवंशाः महतां पृष्ठवंशानामुभयतस्तिर्यक् स्थाप्यमाना वंशाः कवेल्लुकानि प्रतीतानि ३६ रजतमय्यः पट्टिकाः - वंशानामुपरि कम्बास्थानीयाः ३७ जातरूपं - सुवर्णविशेषस्तन्मय्यः अवघाटिन्यः आच्छादनहेतुक- ५ | म्बोपरिस्थाप्यमानमहा प्रमाण किलिञ्चस्थानीयाः ३८ वज्रमय्यो- वज्ररत्नात्मिका अवघाटनीनामुपरि पुञ्छन्यो - निविडतराच्छादन हेतुश्लक्ष्णतरतृणविशेषस्थानीयाः, उक्तं च + जीवाभिगममूलटीकाकारेण - “ ओहाडणी हारग्रहणं ? महत् क्षुल्लकं च पुञ्छनी" [ | इति । ३९ सर्वश्वतं रजतमयं पुञ्छनीनामुपरि कवेल्लुकानामध आच्छादनम् ४० अङ्कमयानि बाहुल्येनाङ्करत्नमयानि पक्ष - पक्षचाह्वा दीनामङ्करत्नात्मकत्वात् कनकानि कनकमयानि कूटानि महान्ति शिखराणि येषां तानि कनककूटानि तपनीयाः - तपनीयस्तू पिकानि 8 एतेन यत् प्राक् सामान्येन उत्क्षिप्तम्- 'सेया वरकणगधूभियागा' [पृ० १५६ पं० ५ ] इति तदेव प्रपञ्चतो भावितमिति । सम्प्रति तदेव १० श्वेतत्वमुपसंहारव्याजेन भूय उपदर्शयति-४१ श्वेतानि, ४२ श्वेतत्वमेवोपमया द्रढयति-विमलं विगतमलं यत् शङ्खतलं-शङ्खस्योपरितनो भागो यश्च निर्मलो दधिधनः घनीभूतं दधि गोक्षीरफेनो रजतनिकरश्च तद्वत् प्रकाशः - प्रतिभासो येषां तानि तथा ४३ तिलकरत्नानि Oहिन्दीभाषायाम् 'कवलु' शब्देन प्रतीतानि गुजराती भाषायाम् 'नलियां' शब्दवाच्यानि । +जीवा० वि० पृ० १८० पं० १४ । तत्र 'हार' 'स्थाने' हीरशब्दः । अस्य 'हार' इत्यंशस्य सम्पूर्णो भावो नावगतः । ÷ कवेलुका - भा० २ । ततः पदत्रयस्यापि कर्मधारयः " - राय०वि० । Jain Education Int national inelibrary.org Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । | नाणामणिदामालकिया तो बहिं च सण्हा तवर्णिज्जवालुयापत्थडा सुहासा सस्सिंरीयरूवा पासोईया दरिसणिजा अभिरुवा पडिवा । [ ९९ ] तेर्सिणं दारागं उभओ पासे दुहओ निसीहियाए सोलस सोलस चंदणकलसपरिवाडीओ पन्नताओ, "ते णं चंदणकलसा बरकमलपैइट्ठाणा सुरभिवरवारिंपैडिपुण्णा चंदणकयर्चयामा बिदकंठेगुणा पुण्ड्र विशेषास्तैरर्द्धचन्द्रैश्च चित्राणि - नानारूपाणि तिलकरत्नार्द्धचन्द्र चित्राणि, क्वचित् सङ्खत लविमलनिम्मलदहिघणगोखीरफेणरययनियरध्यगासद्धचंद चित्ताई' इति पाठः, तत्र पूर्ववत् पृथक् पृथक् व्युत्पत्तिं कृत्वा पश्चात् पदद्वयस्य कर्मधारयः, ४४ नानामजयो- नानामणिमयानि दामानि - मालास्तैरलङ्कृतानि नानामणिदामालङ्कृतानि ४५ अन्तर्बहिथ लक्ष्णानि - श्लक्ष्णपुद्गलस्कन्धनिर्मापितानि ४६ | तपनीयाः- तपनीयमय्यो या वालुकाः सिकतास्तासां प्रस्तट: - प्रस्तरो येषु तानि तथा ४७ सुखः - सुखहेतुः स्पशों येषु तानि सुखस्पशनि ४८ सश्रीकरूपाणि ४९ प्रासादीयानि [ १० ११ पं० १२] इत्यादि प्राग्वत् । [९९] १ तेषां द्वाराणां प्रत्येकम् - २उभयोः पार्श्वयोरेकैकनैपेधिकीभावेन द्विधातोद्विकारायां नैषेधिक्वाम्, नैषेधिकी-निपी| दनस्थानम् । आह च जीवाभिगममूलटीका कुत्-"नैषेधिकी निषीदनस्थानम्” [ ] इति प्रत्येकं ४ पोडश पोडश चन्दनकलशपरिपाट्यः प्रज्ञप्ताः ५ ते च चन्दनकलशा ६ बरं- प्रधानं यत् कमलं तत् प्रतिष्ठानम् - आधारो येषां ते बरकमलप्रतिष्ठानाः, तथा ७ सुरभिवरवारिप्रतिपूर्णाः ८- चन्दनकृतच चका:- चन्दनकृतोपरागाः ९ आविद्धः - आरोपितः कण्ठे गुणो-रक्तसूत्ररूपो येषां ते आि > विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । * भाषायाम् 'बालू' वा 'वेळू' इति । 8 जीवा० वि० पृ० २०५ ० ४ । Jain Educationternational १० ||| १६१॥ Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥१६२॥ | पंउमुप्पलपिहाणा सब्बरयणामया अच्छा जाव पडिरूवगा महया महयाइंदकुंभसमाणा पैन्नत्ता समैणाउसो!। ___ [१०] तेसि णं दाराणं उभओ पासे दुहओ णिसीहियाए सोलस सोलस णागेदन्तपरिवाडीओ पन्नत्ताओ, ते णं णागदंता मुत्ताँजालंतरुसियहेमजालगवक्खजालखिखिणीघंटाजालपरिक्खित्ता अन्भुरंगया अभिणिसिहा तिरियसुसंपरिग्गहिया श्कण्ठेगुणाः, १० पद्ममुत्पलं च यथायोगं पिधानं येषां ते पद्मोत्पलपिधानाः ११ 'सव्वरयणामया' यावत् 'पडिरूवगा' इति विशेषणकदम्बकं प्राग्वत् [पृ० १९५०८] १२ अतिशयेन महान्तः १३ महेन्द्रकुम्भसमाना:-कुम्भानामिन्द्र इन्द्रकुम्भः महाँश्चासौ इन्द्रकुम्भश्च तस्य समाना महेन्द्रकुम्भसमाना:-महाकलशप्रमाणाः १४ प्रज्ञप्ताः हे १५ श्रमण! हे आयुष्मन् । [१०] १ तेषां द्वाराणां प्रत्येकम्-२उभयोः पार्श्वयोरेकैकनैपेधिकीभावेन या ३ द्विधा नैषेधिकी तस्यां प्रत्येकं ४ पोडश षोडश ५ नागदन्तपरिपाटयः प्रज्ञप्ताः, नागदन्ता-अंकुटकाः, ६ ते च नागदन्ता ७ मुक्ताजालानामन्तरेषु यानि उत्सृतानि-लम्बमानानि हेमजालानि-सुवर्णमयदामसमूहा यानि च गवाक्षजालानि-गवाक्षाकृतिरत्नविशेषमालासमूहा यानि च किङ्किणीघण्टाजालानि-क्षुद्रघण्टासमूहास्तै परिक्षिप्ताः सर्वतो व्याप्ताः ८अभिमुखमुद्गताः अभ्युद्गताः-अग्रिमभागे मनाक् उन्नता इति भावः ९अभिमुख-बहिर्भागाभिमुखं निसृष्टा-निर्गता अभिनिसृष्टाः १०तिर्यक् भित्तिप्रदेशः सुष्टु अतिशयेन सम्यक्-मनागप्यचलनेन परिगृहीताः सुसंपरिगृहीताः, * " 'कण्ठेकाल'वत् सप्तम्या अलुक्”-राय० वि० । “राजदन्तादिदर्शनाद् ‘इन्द्र' शब्दस्य पूर्वनिपातः"-राय० वि० [पृ०५३ टिप्पण०] - "नागदन्तको नर्कुटको अंकुटको इत्यर्थः"-जीवा० वि० पृ० २०५ पं० ११ । भाषाप्रतीत 'नकूचा' शब्देन 'नर्कुटक' शब्दस्य साम्यं Jain Education Temonal For Private Personel Use Only worjainelibrary.org Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । अहे पन्नगद्धरूवा पन्नगद्धसंठाणसंठिया सव्वैवयरामया अच्छा जाव [ पृ० १९ पं० ५ ] पडिरूवा महया महया यदंतसमाणा पत्ता समाउसो ! | तेसुं णं णागदंतएस हवे किण्हसुत्तबद्धा वग्धारितमल्लदामकलावा | पीले० लोहित० हालिद्द० सुकिलसुत्तबद्धा वग्घारितमल्लदा मकलावा, ते णं दामा तर्वेणिजलंबूसगा सुबन्नेपयरगमंडिया नाणीविहमणिरयणविविहारउवसोभियसमुदया जब सिरीए अई अईव उवसोभेमाणा ११ अधः - अधस्तनं यत् पन्नगस्य सर्पस्यार्धं तस्येव रूपम् - आकारो येषां ते अधः पन्नगार्धरूपाः अधः पन्नगार्द्धवद तिसरला दीर्घाचेति भावः, एतदेव व्याचष्टे - १२पन्नगार्द्ध संस्थानसंस्थिताः अधः पन्नगार्द्ध संस्थानाः १३ सर्वात्मना वज्रमयाः 'अच्छा' इत्यारभ्य 'जाव - पडिरूवा' इति विशेषणजातं प्राग्वत् [पृ० १९ पं० ८] १४ अतिशयेन महान्तो १५ गजदन्तसमानाः - गजदन्ताकाराः १६ प्रज्ञप्ताः हे १७ श्रमण ! हे आयुष्मन् ।। १८ तेषु नागदन्तेषु १९ बहवः कृष्णसूत्रबद्धाः २० ' वग्घारिय' इति अवलम्बिता माल्यदामकलापाः- पुष्पमालासमूहाः २१ बहवो नीलसूत्रावलम्बितमाल्यदामकलापाः एवं लोहित - हारिद्र शुक्ल सूत्रबद्धा अपि वाच्याः । २२ तानि दामानि २३ तपनीयः- तपनीयमयो लम्बूसगो - दानामग्रिमभागे मण्डनविशेषो येषां तानि तपनीयलम्बूसकानि, पार्श्वतः सामस्त्येन २४ सुवर्णः प्रत- १० | रेण- सुवर्णपत्रकेण मण्डितानि सुवर्णप्रतरमण्डितानि २५ नानारूपाणां मणीनां रत्नानां च ये विविधा - विचित्रवर्णा हारा:-अष्टादशसरिका: अर्द्धहारा - नव- सरिकास्तैरुपशोभितः समुदायो येषां तानि तथा । २६ 'जाब सिरीए अई अईव उवसोभेमाणा चिट्ठति' इति अत्र 'यावत्' करणादेवं परिपूर्णः पाठो द्रष्टव्यः - 'ईसिं अण्गमण्णम संपत्ता [पृ० १०१ पं० २] सन्जओ समंता आपूरेमाणा आपू प्रतिभाति । 'अंकोडा' इति भाषायाम् । भाषायाम् 'पतरु' इति भाषायाम् 'नवसरो हार' इति । Jain Education interational ...... ॥१६३॥ Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इयं ।। रायपसेण- चिट्ठति। तेर्सि णं णागदंताणं उवरि अन्नाओ सोलस सोलस नागदंतपरिवाडीओ पन्नत्तातेणं णागतात चेव जाव गयदंतसमाणा पन्नत्ता समणाउसो! तेसु णं णागदंतएसु हवे रययामया सिकंगा पन्नत्ता. ते णं रययामएसु सिक्कएसु हवे बेरुलियामईओ धूवघुडीओ पं० ताओ णं धूवघडीओ कालागुरुपवरकुंदुरुकतु॥१६॥ रुमधूवमघमघंतगंधुधुयाभिरामाओ सुगंधवरगंधियातो गंधवद्विभूयाओ ओरालेणं मणुप्णेणं नणहरेणं घाणम गणिव्वुइकरेणं गंधेणं ते पदेसे सव्यओ समंता आपूरेमाणा आपूरेमाणा [१०१०२ पं०१-२] जाब चिट्ठति। ५ । [१०१]तेसि पं दाराणं उभओ पासे दुहओ णिसीहियाए सोलस सोलस सालभंजियापरिक्षाडिओ पन्नता रेमाणा सिरीए अईव अईव उवसोभेमाणा चिट्ठति' एतच्च प्रागेव [पृ०१०१ पं०६] यानविमानवर्णने व्याख्यातमिति न भूयो व्याख्यायते । २७ तेषां नागदन्तकानामुपरि प्रत्येकम्-२८अन्याः षोडश पोडश नागदन्तपरिपाटयः प्रज्ञप्ताः २९ ते च नागदन्ताः 'यावत्' । करणात् 'मुत्ताजालंतरुसियहेमजाल....इत्यादि [पृ० १६२५०३] प्रागुक्तं सर्व द्रष्टव्यं यावत्-गजदन्तसमानाः प्रज्ञताः हे ३० श्रमण ! हे आयुष्मन् ! । ३१ तेषु नागदन्तेषु ३२ बहूनि रजतमयानि ३३ सिक्ककानि प्रज्ञप्तानि, ३४ तेषु च रजतमयेषु सिक्ककेषु ३५ बह्वयो १० वैडूर्यमय्यो-वैडूर्यरत्नात्मिका ३६ धूपघटिकाः 'कालागुरु'......इत्यादि प्राग्वत् [पृ०८पं०२] नवरम्-३७घ्राणेन्द्रिय-मनोनिवृतिकरण । [१०१] १ तेषां द्वाराणां प्रत्येकम्-२ उभयोः पार्श्वयोरेकैकनैपेधिशीभावेन ३ द्विधातो-द्विप्रकारायां नैपेधिक्या ४ पोडश 8 यस्योपरि दध्यादिभाण्डानि स्थाप्यन्ते तद् भाषायाम् 'शीकुं वा छीकुं' इति प्रसिद्धम् । Jan Education na For Private Personal Use Only Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ताओणं सालभंजियाओ लीलट्ठियाओ सुपइंडियाओ सुअलंकियाओ णांणाविहरागवसणाओ जाणामल्लपिणद्धाओ मुहिगिज्झसुमज्झाओ आमेलगजमलजुयलबट्टियअन्भुन्नयपीणरइयसंठियपीवरपओहराओ रत्तावंगाओ असियकेसीओ मिडेविसयपसत्थलक्खणसंवेल्लियग्गसिरयाओ ईसि असोगवरपायवसमुट्ठियाओ वामहत्थपोडश शालभञ्जिकापरिपाटथः प्रज्ञप्ताः, ५ ताश्च शालभजिका ६ लीलया-ललिताङ्गनिवेशरूपया स्थिताः लीलास्थिताः, ७ सुष्ठुमनोज्ञतया प्रतिष्ठिताः सुप्रतिष्ठिताः ८सुष्टु-अतिशयेन रमणीयतया अलङ्कताः खलङ्कताः ९नानाविधो-नानाप्रकारो रागो येषां तानि ५॥१६॥ नानाविधरागाणि तानि बसनानि-वस्त्राणि यासां तास्तथा १० नानारूपाणि माल्यानि-पुष्पाणि पिनद्धानि-आविद्धानि यासां ता नानामाल्यपिनद्धाः,* ११ मुष्टिग्राह्यं सुष्टु-शोभनं मध्यं मध्यभागो यासां तास्तथा, १२ पीन-पीवरं रचितं संस्थितं-संस्थानं यकाभ्यां तौ पीनरचितसंस्थानौ आमेलक:-आपीड:-शेखरकः इत्यर्थः तस्य यमलयुगलं-समश्रेणिकं यद् युगलं तद्वत् वर्तिती बद्धखभावौउपचितकठिनभावाविति भावः-अभ्युन्नतौ पीनरचितसंस्थानौ च पयोधरौ यासां तास्तथा, १३ रक्तोऽपाङ्गो-नयनोपान्तरूपो यासां तास्तथा, १४ असिताः-कृष्णाः केशा यासां ता असितकेश्यः, एतदेव सविशेषमाचष्टे-१५ मृदवः-कोमलाः विशदा निर्मलाः प्रशस्तानि-शोभनानि अस्फुटिताग्रत्वप्रभृतीनि लक्षणानि येषां ते प्रशस्तलक्षणाः संवेल्लितं-संवृतम् अग्रं येषां ते संवेल्लितायाः शिरोजाःकेशा यासां ता मृदुविशदप्रशस्तलक्षणसंवेल्लिताप्रशिरोजाः, १६ ईषत्-मनाक् अशोकवरपादपे समुपस्थिताः-आश्रिता ईपदशोकवरपाद|पसमुपस्थिताः तथा १७ वामहस्तेन गृहीतमग्रं शालायाः-शाखायाः अर्थादशोकपादपस्य यकाभिस्ता वामहस्तगृहीतायशालाः * "क्तान्तस्य परिनिपातः सुखादिदर्शनात् "-राय० वि० [पृ०४८ टिप्पण में For Private Personal Use Only Tww.jainelibrary.org Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१६६॥ ग्गहियग्गसालाओ ईसि अद्धच्छिकडक्खचिट्ठिएणं लूसमाणीओ विव चवुल्लोयणलेसेहि य अन्नमन्नं खिज्जमाणीओ विव पुढविपरिणामाओ सासयभावमुवगयाओ चन्दाणणाओ चंदविलासिणीओ चंदद्धसमणिडालाओ चंदाहियसोमदंसणाओ उका विव उज्जोवेमाणाओ विज् घणमिरियसूरदिप्पंततेयअहिययरसन्निकासाओ सिंगारागीरचारुवेसाओ पासाइयाओ जाव [पृ० ११ पं० १२] चिट्ठति । [१०२] तेसि णं दाराणं उभओ पांसे दुहओ णिसीहियाए सोलस सोलस १८ईषत्-मनाक् अर्ध-तिर्यग् वलितम् अक्षि येषु कटाक्षरूपेषु चेष्टितेषु तैः १९मुष्णन्त्य इव सुरजनानां मनांसि २०अन्योऽन्यं परस्परम् चक्षुषां लोकनेन-आलोकनेन ये लेशा:-संश्लेपास्तैः खिद्यमाना इव किमुक्तं भवति ? एवं नाम तास्तिर्यग्वलिताक्षिकटाक्षैः परस्परमबलोकमाना अवतिष्ठन्ति यथा नूनं परस्परं सौभाग्यासहनतस्तिर्यग्वलिताक्षिकटाक्षः परस्परं खिद्यन्ति इवेति, २१ पृथिवीपरिणामरूपाः २२ शाश्वतभावमुपगता विमानवत् २३ चन्द्र इवाननं मुख-यासां तास्तथा २४ चन्द्रवत् मनोहरं विलसन्तीत्येवंशीलाश्चन्द्रविलासिन्यः २५ चन्द्रार्द्धसमम्-अष्टमीचन्द्रसमान ललाटं यासा तास्तथा २६ चन्द्रादपि अधिकं सोमं-सुभगकान्तिमत दर्शनम्आकारो यासां तास्तथा २७ उल्का इव उद्द्योतमानाः २८ विद्युतो ये घनाः-बहलतरा मरीचयस्तेभ्यो यच्च सूर्यस्य दीप्यमानं दृसं-तेजस्तस्मादपि अधिकतरः सन्निकाश:-प्रकाशो यासां तास्तथा, '२९ सिंगारागारचारुवेसाओ...अभिरूवाओ चिट्ठति' इति प्राग्वत् [पृ० ११ पं०१२]। [१०२] १ तेषां द्वाराणां प्रत्येकम्-२ उभयोः ३ पार्श्वयोरेकैकनैषेधिकीभावेन या ४ द्विधा नैषेधिकी तस्यां ५ षोडश षोडश Jain Education a For Private Personel Use Only Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । | जालकडगपरिवाडीओ पन्नत्ता, ते णं जॉलकडगा सव्वरयणामया अच्छा जाव [ पृ० १९ पं० ५ ] पडिवा | [१०३] तेर्सि णं दाराणं उभओ पाँसे दुहओ निसीहियाए सोलस सोलस घंटापरिवाडीओ पन्नत्ता, तासिं णं घंटाणं इमेयारूवे वन्नावासे पन्नत्ते, तंजहा जंबूणयामईओ घंटाओ वयरामयाओ लालाओ णाणामणिमया घंटापासा तवणिजामइयाओ संखलाओ रययामयाओ रज्जूतो। ताओ णं घंटाओ ओहस्सराओ मेहस्सराओ हंसराओ कुंचस्सराओ सीस्सराओ दुंदुहिंस्सराओ मंदिस्सराओ मंदिघोसाओ मंजुस्सराओ मंजुघोसाओ ६] जालकटकाः प्रज्ञप्ताः, जालकटको - जालकाकीर्णो रम्यसंस्थानः प्रदेशविशेषः, ७ ते च जालकटकाः 'सव्वरयणामया...जाव पडिरूवा' इति [ पृ० १९ पं० ८] प्राग्वत् । [१०३] १तेषां द्वाराणां प्रत्येकम् - २उभयोः ३ पार्श्वयोः ४द्विधातो नैषेधिक्यां षोडश षोडश ६ घण्टापरिपाटयः प्रज्ञप्ताः, ७वासां च घण्टानामयमेतद्रूपो वर्णावासो-वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-८ जम्बूनदमय्यो घण्टाः ९ वज्रमय्यो लालाः १० नानामणिमया १० घण्टा पार्श्वाः ११ तपनीयमय्यः शृङ्खलाः यासु ता अवलम्बितास्तिष्ठन्ति १२ रजतमय्यो रजत्रः १३ ताथ घण्टाः १४ओवेन प्रवाहेण खरो यासां ता ओघस्वराः १५ मेघस्येव अतिदीर्घः स्वरो यासां जा मेघखराः १६ हंसस्येव मधुरः खरो यासां ता हंसस्वराः, एवं १७ क्रौञ्चवराः १८ सिंहस्येव च प्रभूतदेशव्यापी खरो यासां ताः सिंहखराः एवं १९ दुन्दुभिखराः २० नन्दिखराः द्वादशविधतूर्यसङ्घातो नन्दि: २१ नन्दिवत् घोषो - हादो यासां ता नन्दिघोषाः २२ मज्जुः प्रियः खरो यासां ता मज्जुखराः, एवं २३ मज्जुघोषाः, Jain Educatic International ॥१६७॥ Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१६८॥ Jain Education Inmat पुस्राओ सुस्रघोसाओ उरालेणं मणुन्नेणं मणहरेणं कन्नमणनिबुझकरेणं सदेणं ते पदेसे सव्वओ समंता आपरेमाणाओ आपूरेमाणाओ जाव चिद्वंति । [१०४] सिं णं दाराणं उभओ पासे दुहओ णिसीहियाए सोलस सोलस वणमालापरिवाडीओ पन्नताओ, ताओ णं वणमालाओ णाणामणिमयदुमलय किसलय पल्लवसमाउलाओ छप्पय परिभुला माणसोहंतसस्सिरीयाओ पासाईयाओ... [पृ० ११ पं० १२] । [१०५] तेसिंणं दाराणं उभओ पासे दुहओ णिसीहियाए सोलस सोलस पगंठग पन्नत्ता, ते णं पगंठगा किंबहुना ? २४ सुखराः २५सुखरघोषाः, 'उरालेणं' इत्यादि [पृ० १०१ पं० ३ तथा ९] प्राग्वत् । [१०४] १ तेषां द्वाराणां प्रत्येकमुभयोः पार्श्वयोः २ द्विधातो नैषेधिक्यां ३ पोडश षोडश ४ वनमालापरिपाटयः प्रज्ञप्ताः, ५ ताथ वनमालाः ६ नानाद्रुमाणां नानालतानां च यानि किशलयानि ये च पल्लवास्तैः समाकुलाः- सम्मिश्राः ७ पट्पदैः परिभुज्यमानाः सत्यः शोभमानाः पदपदपरिभुज्यमानशोभमानाः अत एव सश्रीकाः ८'पासाईयाओ' इत्यादि पदचतुष्टयं प्राग्वत् [१० ११ पं० १२] १० [१०५] १ तेषां द्वाराणां प्रत्येकमुभयोः पार्श्वयोरेकैकनैपेधिकीभावेन या २ द्विधा नैषेधिकी तस्यां ३ पोडश पोडश ४ प्रकण्ठकाः मज्ञप्ताः प्रकण्ठको नाम पीठविशेषः, आह च जीवाभिगममूलटीकाकार :- " प्रकण्ठौ पीठविशेषौ [ च ] इति, ५ ० जी०० प्र०० २०९ पं० ४। “चूर्णिकारस्तु एवमाह - "आदर्शवृत्तौ पर्यन्तावनतप्रदेशौ पीठौ प्रकण्ठौ ” इति" - जीवा० वि० प्र० पृ० २०९ पं० ४ । wainelibrary.org Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । अड्डाइजाई जोयणसयाई आयामविक्खंभेणं पणवीसं जोयणसयं बाहल्लणं सव्ववयरामया अच्छा [पृ० १९५० ५] जाव पडिरूवा । तेर्सि णं पगंठगाणं उरि पत्तेयं पत्तेयं पासायंवडेंसगा पन्नत्ता, "तेणं पासायवडेंसगा अड्डाईजाई जोयणसयाई उड्डे उच्चत्तेणं पैणवीसं जोयणसयं विक्खंभेणं अब्भुग्गयमूसिअपहसिया विव"विविहमणिरयणभत्तिचित्ता पाउद्वयविजयवेजयंतपडागच्छत्ताइछत्तकलिया। प्रकण्ठकाः प्रत्येकम्-६ अर्द्धतृतीयानि योजनशतान्यायामविष्कम्भाभ्याम् ७पञ्चविंशं-पञ्चविंशत्यधिकं योजनशतं बाहल्येन पिण्ड-५॥१६९॥ भावेन ८ सर्वात्मना ते प्रकण्ठकाः वज्रमया-वज्ररत्नमयाः 'अच्छा सहा' इत्यादि विशेषगजातं [पृ० १९ पं०८] प्राग्वत् । ९ तेषां प्रकण्ठकानां उपरि प्रत्येकं प्रत्येकं १० प्रासादावतंसकाः प्रज्ञप्ताः, प्रासादावतंसका नाम प्रासादविशेषाः, उक्तं च जीवाभिगममूलटीकायाम्-"-प्रासादावतंसको-प्रासादविशेषो" [ ] इति, ११ ते च प्रासादावतंसकाः: १२ अर्धतृतीयानि योजनशतानि ऊर्ध्वम् उच्चस्त्वेन १३ पञ्चविंशं योजनशतं विष्कम्मेन, १४ अभ्युद्गता-आभिमुख्येन सर्वतो विनिर्गता उत्सृताः-प्रबलतया सर्वासु दिक्षु प्रसृता या प्रभा तया सिता इव-बद्धा इत्र तिष्ठन्तीति गम्यते, अन्यथा कथमिव ते अत्युच्चा निरालम्बाः तिष्ठन्तीति 120 भावः, १५ विविधा:-अनेकप्रकारा ये मणयः-चन्द्रकान्तादयो यानि च रत्नानि-कर्केतनादीनि तेषां भक्तिभिः-विच्छित्तिविशेषैश्चित्रा-नानारूपाः आश्चर्यवन्तो वा नानाविधमणिरत्नभक्तिचित्राः, १६ वातोद्भूता-वायुकम्पिताः विजयः-अभ्युदयस्तत्मचिका वैजय "इह एकं प्रति प्रत्येकम्' इति आभिमुख्ये वर्तमानः 'प्रति' शब्दः समस्यते ततो वौ-साविवक्षायां द्विवचनम्”-राय० वि० । = जीवा० वि० प्र० पृ० २०९ पं० ७। का इति तृती-पा०४-५। Jain Educat ional For Private Personal Use Only Now.jainelibrary.org Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥१७॥ तंगी गगणतलमणुलिहतसिहरा जालंतररयण= पंजरुम्मिलिय व्व मणिकणगथूभियागा वियसियसयवित्तपोंडरीतिलगरयणद्धचंदचित्ता णाणामणिदामालंकिया अतो बहिं च सहा तवणिज्जवालयापत्थडा न्त्यभिधाना याः पताका अथवा विजया इति वैजयन्तीनां पार्श्वकर्णिका उच्यन्ते तत्पधाना वैजयन्त्यो विजयवैजयन्त्यः पताकास्ता एव विजयवर्जिता वैजयन्त्यः, छत्रातिच्छत्राणि-उपयुपरि स्थितान्यातपत्राणि तैः कलिता वातोद्धृतविजयवैजयन्तीपताकाच्छत्रातिच्छत्र कलिताः १७तुङ्गा-उच्चा उच्चस्त्वेन-अर्द्धतृतीययोजनशतप्रमाणत्वात् अत एव १८गगनतलं-अम्बरतलम् +अनुलिखन्ति-अभिलङ्घयन्ति | शिखराणि येषां ते तथा, १९ जालानि-जालकानि तानि च भवनभित्तिषु लोके प्रतीतानि, तदन्तरेषु विशिष्टशोभानिमित्तं रत्नानि येषु ते जालान्तर-रत्नाः, तथा २०४ पञ्जरात् उन्मीलिता इव-बहिष्कृता इव पञ्जरोन्मीलिता इव, यथा हि किल किमपि वस्तु पञ्जरात्वंशादिमयाच्छादनविशेषात् बहिष्कृतम्-अत्यन्तमविनष्टच्छायत्वात् शोभवे एवं तेऽपि प्रासादावतंसका इति भावः, तथा २१ मणिकनकानि-मणि कनकमय्यः स्तूपिका:-शिखराणि येषां ते मणिकनकस्तूपिकाः, तथा २२ विकसितानि यानि शतपत्राणि पुण्डरीकाणि च द्वारादौ 8 प्रतिकृतित्वेन स्थितानि तिलकरत्नानि-भित्यादिषु पुण्ड्रविशेषा अर्द्धचन्द्राश्च द्वारादिषु तैश्चित्रा:-नानारूपा आश्चर्यभूता वा विकसितशतपत्रपुण्डरीकतिलकरत्नार्द्धचन्द्रचित्राः, तथा २३ नाना अनेकरूपाणि यानि मणिदामानि-मणिमयपुष्पमालाः तैः अलं| कृतानि शोभितानि नानामणिदामालंकृतानि तथा २४ अन्तर्वहिश्च श्लक्ष्णा-मसृगाः, तथा २५ तपनीयं-सुवर्णविशेषस्तन्मय्या = "सूत्रे विभक्तिलोपः प्राकृतत्वात् "-राय०वि० । सत्यां विभक्तौ 'जालंतररयणा'इति युक्तम् । + 'शत्' प्रत्ययान्तं कृदन्तं प्रथमाबहुवचनम् । x भाषायाम् 'पांजरूं' इति। 8 प्रकृति-पा० ४ भा०१। प्रकृतत्वे-पा० ५। प्राकृतत्वे-भा०२।। एतच्च विशेषणं मुद्रित एव पुस्तके। Jain Education emelona For Private & Personel Use Only wwllainelibrary.org Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । सुहासा सस्सिरीयरुवा [पृ० १९५०५] पासादीया दरिसणिज्जा जाव दामा [पृ० १०१ पं०१]। [१०६ तेसिणं दाराणं उभओ पासे सोलस सोलस तोरणा पन्नत्ता,णाणामणिमयाणाणामणिमएस खंभेस उपणिविसन्निविठ्ठा जाव पउमहत्थगा। तेसि ण तोरणाणं पत्तयं पुरओ दो दो सालभंजियाओ पन्नत्ताओ, जहा हेवा तहेव । तेसि णं तोरणाणं पुरओ नागदंता पन्नत्ता जहा हेहा जाव दामा। वालुकायाः प्रस्तट:-प्रस्तरो येषु ते तपनीयवालुकामस्तटाः, २६ 'सुहफासा... पासाईया' इत्यादि पाग्वत् [पृ. १९५०८] तेषां ५ ॥१७१॥ च *प्रासादवतंसकानामन्तभूमिवर्णनम् [पृ० ९७ पं०२] उपर्युलोकवर्णनम् [पृ० ९७ पं० ३] सिंहासनवर्णनम् [पृ. ९८५०३]/ उपरि - विजयदृष्यवर्णनम् [पृ० १०० ५० १-] बांकुशवर्णनम् मुक्तादामवर्णनं च यथा प्राक् [पृ० १०० पं० ३-४] यानविमाने भावितं तथा भावनीयम्। १०६] १ तेषा द्वाराणां प्रत्येकम् २उभयोः पार्थयोरेकैकनषेधिकीभावेन या द्विधा नैपेधिकी तस्यां पोडश, षोडश तोरणानि | । प्रजातानि, तानि च तोरणानि ३ 'नानामणिमयानि इत्यादि [पृ० ७९ पं० ३ तथा पं०७] तोरणवर्णनं यानविमानमिव निव शेषं भावनीयम् । ४ तेषां तोरणानां पुरतः प्रत्येकं ५वे द्वे शालभञ्जिके, शालभञ्जिकावर्णनं प्राग्वत् [ पृ० ११५ पं० १] ६ तेषां तोरणानां पुरतो द्वौ द्वौ नागदन्तको प्रज्ञप्ती, तेषां च नागदन्तकानां वर्णनं यथाऽधस्तादनन्तरमुक्तं तथा वक्ततम १६२ १०३] * 'अवतंसक'-वत् 'वसंतक' शब्दोऽपि साधुः-३-२-१५६ हैमश०] = जीवा० वि० पृ० २१०५०६। Jain Educatie inter nal For Private Personel Use Only Jiw.jainelibrary.org Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥१७२॥ तेर्सि पं तोरणाणं पुरओ दो दो हयसंघाडा गयसंघांडा नरसंघाडा किन्नरसंघाडा किंपुरिससंघाडा महोरगसंघाडा गंधव्यसंघाडा उसभसंघाडा सब्बरयणामया- अच्छा पृ० १९ पं०५] जाव पडिरूवा, एवं पंतीओ पीही भिहुणाई। तेर्सि' णं तोरणाणं दो दो पउमलयाओ जाव [पृ० १८ पं० २-३] सामलयाओ णिचं नवरमत्रोपरि नागदन्तका न वक्तव्या अभावात् । ७ तेषां तोरणानां पुरतो ८ द्वौ द्वौ हयसङ्घाटौ, सङ्घाटशब्दो युग्मवाची यथा 'साधुसङ्घाटः' इत्यत्र, ततो द्वे द्वे हययुग्मे इत्यर्थः, एवं ९ गज-नर-किन्नर-किंपुरुष-महोरग-गन्धर्व-वृपभसञ्चाटा अपि वाच्याः ,५ एते च कथम्भूताः ? इत्याह-सव्वरयणामया अच्छा...'इत्यादि [पृ० १९ पं०८] प्राग्वत् । यथा चामीपां हयादीनामष्टानां सङ्घाटा उक्ताः १० तथा पतयोऽपि वीथयोऽपि मिथुनकानि च वाच्यानि, तत्र सङ्घाटा:-समानलिङ्गयुग्म रूपाः पुष्पावकीर्णकाच, एकदि. गव्यवस्थिता श्रेणिः-पतिः, उभयोः पार्श्वयोः एकैकश्रेणिभावेन यत् श्रेणिद्वयं सा वीथिः, स्त्रीपुरुषयुग्मं मिथुनकम् । ११ तेषां | तोरणानां पुरतो १२ द्वे द्वे पद्मलते 'यावत् करणात् 'द्वे द्वे नागलते द्वे द्वे अशोकलते द्वे द्वे चम्पकलते द्वे द्वे चूतलते द्वे द्वे वासन्तीलते द्वे द्वे कुन्दलते द्वे द्वे अतिमुक्तकलते' [पृ० १८५०२-] इति परिगृह्यते, द्वे द्वे श्यामलते, एताच कथम्भूताः ? इत्याह-णिञ्चं कुसु. मियाओ' हत्यादि 'यावत' करणात 'निच्च मउलियाओ [पृ० १८५०४-] मञ्जरिवळिसगधरीओं' इति परिगृह्यते, अस्य व्या हैमअनेकार्थकोशे 'संघाटिका' शब्दो युग्मवाची प्राप्यते-"संघाटिका तु कुट्टन्यां प्राणे युग्मेऽम्बुकण्टके" की० ४ लो० ३८ । "संघाडी जुयले"इति देशीनाममालावचनात् [व० ८ गा०७] 'संघाडी' शब्दाऽपि युग्मपर्यायो बोध्यः । भाषायां तु सिंघाडा' इति । संस्कृते तु 'समूह'वाची 'संघात शब्दः प्रतीतः । 13 १० Jain Education remonal For Private Personel Use Only Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण कुसुमियाओ [पृ० १८५०४] सव्वरयणामया अच्छा जाव [पृ० १९५०५] पडिरूवा। तेसिणं तोरणाणं विमानद्वा| पुरओ'दो दो दिसासोवत्थिया पन्नत्ता सव्व रयणामया अच्छा जाव [पृ० १९ पं०५] पडिरूवा। तेसि णं| रतोरण तोरणाणं पुरओ'दो दो चंदणकलसा पन्नत्ता, ते णं चंदणकलसा वरकमलपइट्टाणा तहेव [पृ० १६१ पं०४-|| वर्णनम्। तेसि णं तोरणाणं पुरतो दो दो भिंगारा पन्नत्ता, ते णं भिगारा वरकमलपइहाणा जाव [पृ० १६१ पं० ४]] महया मत्तगयमुहागितिसमाणा पन्नत्ता समणाउसो। तेसि णं तोरणाणं पुरओ दो दो आयंसा पन्नत्ता, ५॥१७॥ तेसिं णं आयंसाणं इमेयारूवे वन्नावासे पन्नत्ते, तंजहाख्यानं प्राग्वत् [पृ०१८ पं०१०] पुनः कथम्भूताः ? इत्याह-सव्वरयणामया जाव'अत्रापि 'यावत्' करणात् 'अच्छा सण्हा' इत्यादिविशेषणसमूहपरिग्रहः, स च प्राग्वदेव [पृ० १९५०८] भावनीयः, १३ तेषां तोरणानां पुरतः प्रत्येकं १४ द्वौ द्वौ दिक्सौवस्तिकौदिक्झोक्षको ते च सर्वे ० 'जाम्बूनदमया' क्वचित् पाठः । १५'सन्वरयणामया...अच्छा इत्यादि प्राग्वत् [पृ०१९ पं०८] १६द्वौ द्वौ चन्दनकलशौ प्रज्ञप्ती, वर्णकः-चन्दनकलशानां 'वरकमलपइट्ठाणा' इत्यादिरूपः [पृ०१६१ पं०१२] सर्वः प्राक्तनो वक्तव्यः, १७द्वौ द्वौ भृङ्गारो, तेषामपि कलशानामिव वर्णको वक्तव्यः, [पृ० १६१५०१२] नवरं पर्यन्ते १८ 'महया मत्तगयमहामुहागिइसमाणा पन्नत्ता समणाउसो!'इति वक्तव्यम् मत्तो यो गजस्तस्य महत-अतिविशालं यत् मुखं तस्याकृतिः-आकारस्तत्समाना:-तत्सदृशाःप्रज्ञप्ताः। १९ तेषां तोरणानां पुरतो २० द्वौ द्वावादर्शको प्रज्ञप्ती, तेषां २१ चादर्शकानामयमेतद्रूपो वर्णावासो-वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तः तद्यथा ० विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । Jain Educat interational For Private & Personel Use Only How.jainelibrary.org Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं । ॥१७४॥ तर्वणिजमया पगंठगाo-अंकमया मंडला अणुग्यसितनिम्मलाते छायाते समणुबद्धा चंदमंडलपडिणिकासा महया महया अद्धकायसमाणा पन्नत्ता समणाउसो!। तेर्सि णं तोरणाणं पुरओ दो दो" वइरनाभथाला पन्नत्ता अच्छतिच्छडियसालितंदुलणहसंदिट्ठपडिपुन्ना इव चिट्ठति सव्वजंबूणयमया जाव पडिरूवा महया महया रहँचकवालसमाणा पन्नत्ता समणाउसो!। २२ तपनीयमयाः प्रकण्ठका:-पीठविशेषाः, २३ अङ्कमयानि-अङ्करत्नमयानि मण्डलानि यत्र प्रतिबिम्बसम्भूतिः २४ अवघर्षणमवचर्षितम् भूत्यादिना निर्मार्जनमित्यर्थः अवधर्षितस्याऽभावोऽनवघर्षितं तेन निर्मला अनवधर्पितनिर्मला तया छायया समनुबद्धायुक्ताः २५ चन्द्रमण्डलसदृशाः २६ अतिशयेन महान्त:-२७ अर्द्धकायसमाना:-काया प्रमाणाः प्रज्ञप्ता हे श्रमण ! हे आयुष्मन् ! । 1 २८ तेषां तोरणानां पुरतो २९ द्वे द्वे वज्रनामे वज्रमयो नाभिर्ययोस्ते वज्रनामे स्थाले प्रज्ञप्ते-तानि च स्थालानि तिष्ठन्ति, ३० | अच्छा निर्मलाः शुद्धस्फटिकवत् त्रिच्छटिताः त्रीन् वारान् छटिताः अत एव नखसन्दष्टाः नखाः-नखिकाः सन्दष्टा मुशलादिभिः त्रुटिता येषां ते तथा अच्छे स्त्रिच्छटितैः शालितन्दुलैनखसन्दष्टैः परि-पूर्णानीव पृथ्वीपरिणामरूपाणि तानि तथा केवलमेवमाकाराणी-१० त्युपमा, तथा चाह-३१ सर्वात्मना जम्बूनदमयानि 'अच्छा...सहा इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९५०८] ३२ अतिशयेन महान्ति ३३ स्थ 0-गा वेरुलियमया सुरया वइरामया दोवारंगा नानामणिमया मंडला-वि० बा० । 'भावे 'क्त' प्रत्ययः"-राय० वि० ० "सुखादिदर्शनात् क्तान्तस्य परनिपातः"-राय० वि०। पृ० ४८ टिप्पण । भाषायाम्-'छडेला चोखा'। = पूर्णानव पृथिवी-पा० ४-५ । भा० १।। x पृथिवीव पृथिवीप-भा० २। Join Education emanal wwdjainelibrary.org Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१७॥ तेसि णं तोरणाणं परओ दो दो पातीओ, ताओ णं पाईओ सच्छोदगपरिहत्थाओणाणाविहस्स फलहरियगस्स- यह पडिपुन्नाओ विव चिट्ठति सव्वरयणामईओ अच्छा जाव पृ० १९ पं०५] पडिरूवाओ महेया महया गोकलिंजरचकसमाणीओ पन्नत्ताओ समणाउसो!। तेर्सि' ण तोरणाणं पुरओ दो दो सुपइट्ठा पन्नत्ता णाणा चिहभंडविरइया इव चिट्ठति चक्रसमानानि प्रज्ञप्तानि हे श्रमण ! हे आयुष्मन् ! । ३४ तेषां तोरणानां पुरतो ३५ द्वे द्वे पायौ प्रज्ञप्ते, ३६ ताश्च पान्यः ३७ स्व-५ च्छपानीयपरिपूर्णाः ३८ नानाविधैः फलहरितह रितफलैबहु-प्रभृतं प्रतिपूर्णा इव तिष्ठन्ति न खलु तानि फलानि किंतु तथारूपाः शाश्व-| तभावमुपागताः पृथ्वीपरिणामाः ततः उपमानमिति । 'सव्वरयणामईओ' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९५०८] ३९ अतिशयेन महत्यो ४० मोकलिञ्जरचक्रसमानाः प्रज्ञप्ताः हे श्रमण ! हे आयुष्मन् !। ४१ तेषां तोरणानां पुरतो ४२ द्वौ सुप्रतिष्ठको-आधारविशेषौ प्रज्ञप्तौ, ते च सुप्रतिष्ठकाः सुसर्योपधिप्रतिपूर्णाः [प्र. पृ० +टिप्पण] ४३नानाविधैः पञ्चवर्णैः प्रसाधनभाण्डेश्च बहुपरिपूर्णा इव तिष्ठन्ति, उपमाभावना णाणामणिपंचवन्नस्स फल-वि० बा०।- “अत्र षष्ठी तृतीयार्थे -बहुवचने च एकवचनं प्राकृतत्वात्"-रायः विव० । + अन मूलपाठ-। १० विवरणकारलब्धपाठयो.दः । अत्रैव स्थले जीवाजीवाभिगमसूत्रे "णाणाविधपसाहणगभंडविरचिया सब्बोसधिपडिपुण्णा" इति पाठो लभ्यते-पृ० २११ पं०९। पाठचार्य प्रस्तुतसूत्रविवरणानुसारी। 8 अस्य विवरणस्य मूलपाठः सर्वप्रतिषु मुद्रितपुस्तके च 'णाणाविहस्स फलहरियगस्स- बहुपडिपुन्नाओ |विव' इत्येव दृश्यते तथापि मुद्रितपुस्तके विवरणे 'बहुपडिपुन्नेति चैकवचनं प्राकृतत्वात्' इति विलक्षणः पाठश्चिन्तनीयः । 'णाणाविहाणं फलहरियगाणं' इति बहुवचनं समुचितम् तथापि एतद् एकवचन बहुवचनार्थे बोध्यम् । Jain EducatInternational Doww.ininelibrary.org Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं । ॥१७६॥ सव्वरयणामया अच्छा पृ० १९५०५] जाव पडिरूवा। तेर्सिणं तोरणाणं पुरओ'दो दो मणोगुलियाओ पन्नत्ताओ, तासँ णं मणोगुलियासु यहवे सुवन्न-रुप्पमया फलगा पन्नत्ता, तेसु णं सुवन्नरुप्पमएसु फलगेसु बहवे वयरामया नागदंतया पन्नत्ता, तेसुणं वयरामएसु णागदंतएमु बहवे वयरामया सिक्कगा पन्नत्ता, तेसु ण वयरामएस सिक्कगेसु किण्हमुत सिक्कगवच्छिता णीलसुत्तसिकगवच्छिया लोहियसुत्तसिक्कगवच्छिया हालिहसुत्तसिकगवच्छिया सुकिलसुत्तसिक्कगवच्छिया बहवे वायकरगा प्राग्वत , [पृ० १७५ पं०६] ४४ 'सबरयणामया' इत्यादि तथैव [पृ० १९५० ५ तथा ८] ४५ तेषां तोरणानां पुरतो ४६ दे द्वे मनोगुलिके प्रज्ञप्ते मनोगुलिका नाम पीठिका, उक्तं च जीवाभिगममूलटीकायाम्-"मनोगुलिका नाम पीठिका"[ ] इति। ताश्च मनोगुलिकाः सर्वात्मना वैडूर्यमय्यः 'अच्छा' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९५०५]। ४७ तासु मनोगुलिकासु ४८ सुवर्णमयानि रूप्यमयानि च फलकानि प्रज्ञप्तानि, ४९ तेषु सुवर्णरूप्यमयेषु फलकेषु बहवो ५० बज्रमया नागदन्तकाः-अटकाः ५१ तेषु च नागदन्तकेषु ५२वहूनि रजतमयानि सिक्ककानि प्रज्ञप्तानि, ५३तेषु च रजतमयेषु सिककेषु ५६बहवो वातकरका-जलशून्याः करका:-१ इत्यर्थः-प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-५४ गवच्छ:-आच्छादनम् गवच्छाः सञ्जाता एष्विति गवच्छिताः कृष्णसूत्रैः-कृष्णसूत्रमयैर्गवच्छे रिति गम्यते, सिक्ककेषु गवच्छिताः कृष्णमूत्रसिक्ककगवच्छिता एवं ५५ नीलमूत्रसिक्ककगवच्छिताः' इत्याद्यपि भावनीयम् , ते च वातकरकाः - जीवा० वि० पृ० २१३ पं० १२ । 8 प्राप्तप्रतिमूलपाठे अस्य वाक्यस्य मूलपाठो न दृश्यते । अत्र स्थले मुद्रितजीवाजीवाभिगमसूत्रेऽपि एवमेव पृ० २११ पं० १०। = मूलपाठे वयरामय-वज्रमय-इति । 0 जीवाजीवाभिगमविवरणे 'गवस्थ' शब्दो लभ्यते-प्र० पृ० २१४ पं० ३ । Jain Education emanal wwidainelibrary.org Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । Jain Education पन्नता सँव्ववेरुलियामया अच्छा [पृ०१९ पं० ५] जाव पडिरुवा । तेसिं' णं तोरणाणं पुरओ 'दो दो चित्ता रयणकरंडगा पन्नत्ता, से जहा णाम ए रन्नो चाउरंतचक्कवहिस्स चित्ते रयणकरंडए वेरुर्लियमणिफैलिह पडलपञ्चोपडे सीते पहाते "ते पतेसे सव्वतो समंती ओभासँति उज्जोवेति तवैति पभासति एवंमेव ते वि चित्ता रयणकरंडगा साते पभाते ते पएसे सव्वओ समंता ओभासंति उज्जोवेंति तवंति पभासंति । तेसिं णं तोरणाणं पुरओ दो दो हयकंठा गयँकंठा नरकंठा किन्नरकंठा किंपुरिसकंठा महोरगकंठा गंधव्यकंठा उस भकंठा ५ ॥ १७७॥ ५७ सर्वात्मना वैडूर्यमयाः 'अच्छा' इत्यादि प्राग्वत् [ पृ० १९ पं० ८ ] । ५८ तेषां तोरणानां पुरतो ५९ द्वौ द्वौ चित्रौ - आश्चर्यभूतौ ६० रत्नकरण्डकौ प्रज्ञप्ती, ६१ स यथा नाम ६२ राज्ञश्वतुरन्तचक्रवर्तिनः- चतुर्षु पूर्वापरदक्षिणोत्तररूपेषु अन्तेषु - पृथिवीपर्यन्तेषु चक्रेण वर्त्तितुं शीलं यस्य तस्य ६३ चित्रः - आश्चर्यभूतो नानामणिमयत्वेन नानावर्णो वा बाहुल्येन ६४ वैहूर्यमणिमयः ६५ स्फाटिकपटलावच्छादितः ६६ स्वकया प्रभया ६७ तान् प्रत्यासन्नान् प्रदेशान् ६८सर्वतः सर्वासु दिक्षु ६९ समन्ततः- सामस्त्येन ७० अवभासयति एतदेव पर्यायत्रयेण व्याचष्टे - ७१ उद्योतयति - ७२ तापयति - ७३ प्रभासयति ७४ 'एवमेव' इत्यादि सुगमम् । ७५ तेषां तोरणानां १० पुरतो ७६ at at eat कण्ठप्रमाणौ रत्नविशेषौ एवं ७७ गज - नर - किन्नर - किम्पुरुष-महोरग- गन्धर्व - वृषभकण्ठा अपि | वाच्याः, उक्तं च + जीवाभिगममूलटीकाकारेण - "हयकण्ठौ - हयकण्ठप्रमाणौ रत्नविशेष " [ ] एवं सर्वेऽपि कण्ठा वाच्या * स्वया प्रभया । 'साते पहाते पतेसे' अत्र तकारबाहुल्यं पूर्वागत टिप्पणतः संगमनीयम् पृ० ८८ टिप्पण X + जीवा० वि० प्र० पृ० २१४ पं० ११ । w.jainelibrary.org Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥१७८॥ सव्वरयणामया अच्छा जाव [पृ० १९ पं०५] पडिरूवा। तेसिंणं तोरणाणं पुरओ "दो दो पुप्फचंगेरीओ | मल्लचगेरी चुन्नचंगेरीओ गंधचंगेरीओ वत्थचंगेरीओ आभरणचंगेरीओ सिद्धत्थचंगेरीओ लोमहत्थचंगेरीओ पन्नत्ताआ सव्वरयणामयाओ अच्छाओ जाव [पृ० १९५०५] पडिरूवाओ । ०तेसिणं तोरणाणं पुरओ दो दो पुप्फपडलगाइ [प० पृ० पं० २] जाव लोमहत्थपडलगाइं सव्वरयणामयाइं अच्छाई जाव [पृ० १९५० ५]] | पाडरूवाइ । तसि ण तोरणाणं पुरओ दो दो सीहासणा पण्णत्ता। तेर्सि णं सीहासणाणं वण्णओ जाव [पृ०५ ९८ प० ३-पृ० १०२ पं० २] दामा। तेसिं गं तोरणाणं पुरओ 'दो दो रुप्पमया छत्ता पन्नत्ता, ते" णं छत्ता वेरुलियविमलदंडा इति, तथा चाह-७८ सर्व रत्नमया-रत्नविशेषरूपाः 'अच्छा' इत्यादि [पृ० १९५०८] प्राग्वत् । ७९ तेषां तोरणानां पुरतो ८० द्वे -द्वे पुष्पचङ्गेयों प्रज्ञप्ते एवं ८१ माल्य-वर्ण-गन्ध- वस्त्र-आभरण-सिद्धार्थक-लोमहस्तचङ्गेयोऽपि वक्तव्याः, एताश्च सर्वा अपि ८२ सवात्मना रत्नमय्यः । 'अच्छा' इत्यादि [पृ० १९ पं०५] प्राग्वत् , ए ८३ पुष्पादीनामष्टानां पटलकान्यपि द्विद्विसंख्याकानि वाच्यानि । ८४ तेषां तोरणानां पुरतो द्वे द्वे सिंहासने प्रज्ञप्ते, ८५ तेषां च सिंहासनानां वर्णकः प्रागुक्तो [पृ० ९८ पं० ३ तथा ९पृ० १०२ ५० २] निरवशेषो वक्तव्यः, ८६ तेषां तोरणानां पुरतो ८७ द्वे द्वे छत्रे रूप्यमये प्रज्ञप्ते, ८८ तानि च छत्राणि ८९ वैडूर्य ण हयकटासु जाव उसभकंठएसु दो-वि० बा०। 0 तासु णं पुष्पचंगेरिआसु जाव लोमहत्थचंगेरीसु दो-वि० बा०। = द्वे | चङ्गेयो-पा० ४-५॥ Jan Education For Private Personel Use Only Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । जंबूर्णयकन्निया वैइरसंधी मुत्ताजालपरिगया अँट्ठसहस्सवरकंचणसलागा दद्दरमैलयसुगंधिसत्र्वोउयसुरभिसी| यलच्छाया मंगल भत्तिचित्ता चंदागौरोवमा । तेसिं णं तोरणाणं पुरओ 'दो दो चामराओ पन्नत्ताओ, ताओ णं चामरा +ओ चंदपं भवेरुलि यवयरनानामणिरयणखचियचित्तदण्डाओ सुमरययदीहवालातो संखेकै कुंददगरयअमयमहिय फेणपुंजसंन्निगासातो सव्वरयणामयाओ अच्छाओ [पृ० १९ पं ५ ] जाव पडिवाओ। रत्नमयविमलदण्डानि ९० जाम्बूनद कणिकानि ९१ वज्रसन्धीनि - वज्ररत्नापूरितदण्डशलाकासन्धीनि ९२ मुक्ताजालपरिगतानि ९३५ ॥ १७९ ॥ अष्टौ सहस्राणि - अष्टसहस्रसंख्या वरकाञ्चनशलाका-वरकाञ्चनमय्यः शलाका येषु तानि, तथा ९४दर्दर:- चीवरावनद्धं कुण्डिकादिभाजनमुखं तेन गलितास्तत्र पक्वा वा ये मलया इति- मलयोद्भवं श्रीखण्डं तत्सम्बन्धिनः सुगन्धा ये गन्धवासास्तद्वत् सर्वेषु ऋतुषु सुरभिः। शीतला च छाया येषां तानि तथा, ९५ अष्टानां स्वस्तिकादीनां मङ्गलानां भक्त्या - विच्छित्या चित्रम्-आलेखो येषां तानि तथा ९६ चन्द्राकारः - चन्द्राकृतिः सा उपमा येषां तानि तथा-चन्द्रमण्डलवत् वृत्तानीति भावः । ९७तेषां तोरणानां पुरतो ९८द्वे द्वे चामरे प्रज्ञप्ते, ९९ तानि च चामराणि १०० चन्द्रप्रभः चन्द्रकान्तः वज्रं वै च प्रतीतं चन्द्रमभ-वज्र-वैडूर्याणि शेषाणि च नानामणिरत्नानि खचितानि येषु ते तथा एवंरूपाचित्रा - नानाकारा दण्डा येषां चामराणां तानि तथा, १०१ सूक्ष्मा रजतमया दीर्घा वाला येषां तानि तथा, १०२ शङ्खः प्रतीतः अङ्को - रत्नविशेषः कुन्द इति कुन्दपुष्पम् दकरज-उदककणाः अमृतमथितफेनपुञ्ज :- क्षीरोदजलमथनसमुत्थः + - ओ णाणामणिकणगरयणविमलमहरिहत वणिज्जुज्ञ्जलधिचित्तदंडाओ चिल्लियाओ सु-वि० वा० । Jain Educationtemtional १० Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। तेसिं थे तोरणाणं पुरओ "दो दो तेल्लसमुग्गा कोट्ठसमुरंगी पत्तसमुग्गा चोयगसमुग्गा तगरसमुग्गा एलासमुग्गा हरियालसमुग्गा हिंगुलयसमुग्गा मणोसिलासमुग्गा अंजणसमुग्गा सवरयणामया अच्छा जाव | [पृ० १९५० ५] पडिरूवा। _[१०७] सूरियांभे ण विमाणे ऐगमेगे दारे अट्ठसयं चक्कज्झयाणं अट्ठसयं मिंगज्झयाणं गरुडझयाणं छत्तज्झयाणं पिच्छज्झयाणं सउणिज्झयाणं सीहज्झयाणं उसमझयाणं अहसयं सेयाण चउविसाणाणं नागवरकेऊणं विमानद्वा रध्वज वर्णनम्। ॥१८॥ फेनपुञ्जस्तेषामिव सन्निकाशः-प्रभा येषां तानि तथा, 'अच्छा' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९५०८] १०३ तेषां तोरणानां पुरतो १०४ द्वौ द्वौ तैलसमुद्कौ-सुगन्धितैलाधारविशेषौ, उक्तं च जीवाभिगममूलभटीकायाम्-"-तैलसमुद्को सुगन्धितैलाधारौं" [ ]] एवं १०५ कोष्ठादिसमुद्गका अपि वाच्याः, अत्र संग्रहणिगाथा-तेल्ले कोहसमुग्गा पत्ते चोए य तगर एला य। हरियाले हिंगुलए मणोसिला अंजणसमुग्गा ॥ एते सर्वेऽपि १०६ सर्वात्मना रत्नमयाः 'अच्छा' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९५०८]। [१०७] १ तस्मिन् सूर्याभे विमाने २ एकैकस्मिन् द्वारे ३ अष्टाधिकं शतं ४चक्रध्वजानां-चक्रलेखरूपचिह्नोपेतानां धजानाम् एवं १० ५ मृग-६ गरुड-७ रुद्धछत्र-८ पिच्छ-९ शकुनि-१० सिंह-११ वृषभ-१२ चतुर्दन्तहस्तिध्वजानामपि प्रत्येकमष्टशतमष्टशतं वक्त___* -लटीकाकारः-भा०२ । = जीवा० वि० पृ० २१४ पं० १४ । - एषा गाथाऽपि जीवा० वि० प्र० पृ० २१५ पं० १ । Jain Education temanal For Private & Personel Use Only willrjainelibrary.org Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । एवमेव सैंपुव्वावरेणं सूरियाभे विमाणे एर्गमेगे दारे अँसीयं असीयं केउसंहस्तं भवति इति मैक्वायं । तेसिं णं दाराणं एगैमेगे दारे पण्णेंहिं पण्णहिं भोमा पत्ता, तेसिं णं भोमाणं भूमिभाग उल्लोयी य भाणियव्वा, | तेसिं णं भोमाणं च बहुमैज्झदेस भागे पैत्तेयं पत्तेयं सीहासणे, सीहासैंणवन्नतो सपरिवारो, अवसेसेसु भोमेसु पत्तेयं पत्तेयं भद्दासणा पत्ता । तेसि णं दाराणं उत्तमांगारा सोर्लेसविहेहिं रयणेहिं उवसोभिया, तंजहांव्यम् १३ एवमेव - अनेनैव प्रकारेण १४ सपूर्वापरेण सह पूर्वैः अपरैश्च वर्त्तते इति सपूर्वापरं - संख्यानं तेन १५ सूर्याभे विमाने १६ ५ | एकैकस्मिन् द्वारे १७ अशीतमशीतं - अशीत्यधिकं अशीत्यधिक १८ केतुसहस्रं १९ भवति २०इति २१ आख्यातं मया अन्यैश्च तीर्थ| कृद्भिः । २२तेषां द्वाराणां सम्बन्धीनि २३ प्रत्येक २४ पञ्चषष्टिः पञ्चषष्टिः २५ भौमानि - विशिष्टानि स्थानानि २६ प्रज्ञप्तानि, २७ तेषां च भौमानां २८ भूमिभागा २९ उल्लोकाच यानविमानवद् वक्तव्याः, [पृ०८१ तथा ९७ पं० ३] ३० तेषां च भौमानां ३१ बहुमध्य| देश भागे यानि त्रयस्त्रिंशत्तमानि भौमानि तेषां बहुमध्यदेशभागे ३२ प्रत्येकं प्रत्येकं सूर्याभदेवयोग्यं ३३ सिंहासनम् ३४तेषां च सिंहासनानां वर्णकोऽपरोत्तरपूर्वादिषु सामानिकादिदेवयोग्यानि भद्रासनानि च क्रमेण यानविमानवद् वक्तव्यानि [पृ० १०२ पं० ३] १० ३५ शेषेषु च भौमेषु ३६ प्रत्येकमेकैकं सिंहासनं परिवाररहितम् । ३७ तेषां द्वाराणां ३८आकारा- उपरितना आकारा + उत्तरङ्गादिरूपाः क्वचित् 'उवरिमागारा' इत्येव पाठः, ३९ पोडशविधैः रत्नैरुपशोभिताः ४० तद्यथा - रत्नैः - सामान्यतः कर्केतनादिभिः 'यात्रत्' S + अक्खायं खायं [८-१-१० हेम०] । * यं सूरियाभे विमाणे पण्णट्टि - वि० बा० । +भाषायाम् 'ओतरंग' इति प्रसिद्धम् । ० विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । Jain Education international ॥१८२॥ w.jainelibrary.org Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। विमानवनखण्ड | वर्णनम्। ॥१८२॥ रयणेहिं जाव [पृ० ५७ पं०१-२] रिटेहि, तेर्सि' णं दाराणं प्पि अँट्ट मंगलगा सज्झया जाय छत्तातिछत्ता [पृ०८०पं०१-२] एंवमेव सपुव्वावरेणं सूरियाभे विमाणे चत्तारि दारसहस्सा भवंतीति मक्खायं । [१०८] सूरियाभस्स विमाणस्स चउद्दिसिं पंच जोयणसयाई अवाहाएँ चेत्तारि वणसंडा पन्नत्ता, तंजहा-असोगवणे, सत्तिवणे चंपगर्वणे, चूर्यगवणे पुरत्थिमेणं असोगवणे दाहिणेणं सत्तवन्नवणे पचत्थिमेणं चंपगवणे उत्तरेणं | | करणात् वज्रः वैडूर्यैः लोहिताक्षैः मसारगल्लैः हंसगौंः पुलकैः सौगन्धिकैः ज्योतीरसैः अः अञ्जनैः रजतैः अञ्जनपुलकैः जातरूपैः | स्फटिकैरिति परिग्रहः षोडशैः ४१ रिष्टैः। ४२ तेषां द्वाराणां प्रत्येकम् ४३ उपरि ४४ अष्टौ अष्टौ स्वस्तिकादीनि ४५ मङ्गलकानि इत्यादि यानविमानतोरणवत् तावद् वाच्यं यावद् बहवः 'सहस्रपत्रहस्तकाः' [पृ० ७९-८० पं०२-] इति । अत ऊध्वं केषुचित पुस्तकान्तरेष्वेवं पाठः ४६ ० 'एवमेव सपुव्वावरेणं सूरियाभे विमाणे चत्तारिदारसहस्सा भवन्तीति मक्खाय' इति सुगमम् । [१०८] १ सूर्याभस्य विमानस्य २ चतुर्दिशं-चतस्रो दिशः समाहृताश्चतुर्दिक् तस्मिन् चतुर्दिशि चतसृषु दिक्षु३ पञ्च पश्च योजनशतानि ४ बाधनं बाधा आक्रमणमित्यर्थः न बाधा अबाधा-अनाक्रमणं तस्यामबाधायां कृत्वेति गम्यते-अपान्तरालं मुक्त्वेति भावः ५ चत्वारो वनखण्डाः प्रज्ञप्ताः, अनेकजातीयानामुत्तमानां महीरुहाणां समूहो वनखण्डः उक्तं च ०जीवाभिगमचूर्णी"अणेगजाईएहिं उत्तमेहिं रुक्खेहिं वणसंडे' [ ] इति, तानेव वनखण्डान् नामतो दिग्भेदतश्च दर्शयति ६ अशोकवृक्षप्रधानं वनमशोकवनं एवं ७ सप्तपर्णवनम् ८ चम्पकवनम् ९ चूतवनमपि भावनीयम् । 'पुरस्थिमेणं' इत्यादि पाठसिद्धं, अत्र ० विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् ।0 "एगजाईएहिं रुक्खेहि वणं अणेगजाईएहिं उत्तमेहि रुक्खेहि वणसण्डे" [जीवाजीवा० ३०१०१८६ पं०७] Jain Education emanal For Private Personal Use Only w ainelibrary.org Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। चूयगवणे। तेणं वणखंडा साइरेगाई अद्धतेरस जोयणसयसहस्साई आयामेणं पंच जोयणसयाई विक्खंभेणं पत्तेयं पत्तेयं पागारपरिखित्ता किण्हा किण्होभासा नीली नीलोभासा हरिया हरियोभासा सीया सीयोभासी संग्रहणिगाथा-"पुव्वेण असोगवणं दाहिणतो होइ सत्तिवण्णवणं । अवरेणं चम्पकवणं चूयवणं उत्तरे पासे" ॥ १० ते च वनखण्डाः ११ सातिरेकानि अर्द्धत्रयोदशानि-सार्दानि द्वादश योजनशतसहस्राणि आयामतः १२ पञ्च योजनशतानि विष्कम्भतः १३ प्रत्येकं प्रत्येकं प्राकारपरिक्षिप्ताः, पुनः कथंभूतास्ते वनखण्डाः ? इत्याह-'किण्हा किण्होभासा जाव पडिमोयणा५॥१८३॥ सुरम्मा' इति 'यावत् करणादेवं परिपूर्णः पाठः मूचितः। अस्य व्याख्या-१४ इह प्रायो वृक्षाणां मध्यमे वयसि वर्तमानानि पत्राणि कृष्णानि भवन्ति ततस्तद्योगात् वनखण्डा अपि कृष्णाः, १५ न चोपचारमात्रात् ते कृष्णा इति व्यपदिश्यन्ते किन्तु तथाप्रतिभासनात् , तथा चाह-कृष्णावभासा यावति भागे कृष्णावभासपत्राणि सन्ति तावति भागे ते वनखण्डाः कृष्णा अवभासन्ते, ततः कृष्णोऽवभासो येषां ते कृष्णावभासा इति, १६ तथा हरितत्वमतिक्रान्तानि कृष्णत्वमसंप्राप्तानि पत्राणि नीलानि तद्योगाद् वनखण्डा अपि नीलाः, १७ न चैतदुपचारमात्रणोच्यते किन्तु तथावभासात् , तथा चाह- नीलावभासाः, १८ यौवने तान्येव पत्राणि | किसलयत्वं रक्तत्वं चातिक्रान्तानि ईपत्-हरितालाऽऽभानि पाण्डूनि सन्ति 'हरितानिइति व्यपदिश्यन्ते, ततस्तद्योगात् वनखण्डा अपि हरिताः, १९ न चैतदुपचारमात्रादुच्यते, किन्तु तथाप्रतिभासात् , तथा चाह-हरितावभासाः, तथा २० बाल्यादतिक्रान्तानि वृक्षाणां | पत्राणि शीतानि भवन्ति ततस्तद्योगाद् वनखण्डा अपि शीता इत्युक्ताः, २१ न च न ते गुगतस्तथा किन्तु तथैव, तथा चाह-शीता * अस्य सूचितस्य पाठस्य मूले एव स्थलनिर्देशः कृतः। * "समासः प्राग्वत्" राय० वि० । = कृदन्तम्-प्रथमाबहुवचनम् । Join Educatio n al For Private Personal Use Only Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥ १८४ ॥ निंद्धा निद्धभासी तिब्बी तिब्वोभासी किन्ही किण्हच्छाया नीला नीलच्छाया हरिया हरियच्छाया सीयाँ सीयच्छाया निद्वा निद्धच्छाया पैंणकडितडियच्छाया वभासाः - अधोभागवर्त्तिनां वैमानिकदेवानां देवीनां तद्योगशीतवातसंस्पर्शतः ते शीता वनखण्डा अवभासन्ते इति, तथा २२ एते कृष्णनील हरितवर्णा यथा स्वस्मिन् स्वरूपे अत्यक्ते स्निग्धा भण्यन्ते तीव्राश्च ततः तद्योगात् वनखण्डा अपि स्निग्धाः २२ तीव्राथ इत्युक्ताः, २३ न चैतदुपचारमात्रं किन्तु तथाऽवभासोप्यस्ति तत उक्तम् - स्निग्धावभासाः २३ तीव्रावभासाः इति, २४इहावभासो भ्रान्तोऽपि भ- ५ वति यथा मरुमरीचिकासु जलावभासस्ततो नावभासमात्रोपदर्शनेन यथावस्थितं वस्तुस्वरूपं वर्णितं भवति किन्तु तथास्वरूपप्रतिपादनेन, ततः कृष्णत्वादीनां तथास्वरूपप्रतिपादनार्थमनुवादपुरस्सरं विशेषणान्तरमाह - 'किण्हा किण्हच्छाया' इत्यादि, कृष्णा वनखण्डाः, कुत इत्याह- २५ कृष्णच्छायाः -- ततोऽयमर्थः यस्मात् कृष्णा छाया - आकारः सर्वाविसंवादितया तेषां तस्मात् कृष्णाः एतदुक्तं भवतिसर्वाविसंवादितया तत्र कृष्ण आकार उपलभ्यते, न च भ्रान्तावभाससंपादितसत्ताकः सर्वाविसंवादी भवति, ततस्तस्ववृच्या ते कृष्णाः न भ्रान्तावभासमात्रव्यवस्थापिता इति, एवं २६ नीला नीलच्छाया इत्याद्यपि भावनीयम् नवरं २७ शीताः शीतच्छायाः इत्यत्र छाया - १० शब्द आतपप्रतिपक्षवस्तुवाची द्रष्टव्यः २८ 'घन कडितडियच्छाया' इति इह शरीरस्य मध्यभागे कटिस्ततोऽन्यस्यापि मध्यभागः > " निमित्तकारणहेतुषु सर्वासां विभक्तीनां प्रायो दर्शनम्” पृ० १०२ टिप्पण ० X “ धनकडियकडच्छाए'- तत्रायमर्थः- कटः संजातः अस्य इति कटिलः कटान्तरेण उपरि आवृत इत्यर्थः कटितश्चासौ कटश्च कटितकटः घना निविडा कटितकटस्य इव अधोभूमी छाया यस्य स धनकटितकटच्छायः " - [ जीवाजीवा० प्र० पृ० १८७ पं० ११] पृ०९ पं० ४ । ainelibrary.org Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं। । ॥१८५॥ रम्मा भैहामेहनिकुरुंबभूया "ते णं पायवा मूलमंतो वणखंडवन्नओ [पृ० ९५० १-पृ० १७ पं० ३] [१०९] तेसि णं वणसंडाणं अंतो बैहुसमरमणिज्जा भूमिभागा पण्णत्ता से जहा नामए आलिंगपुक्खरे ति वा [कं. ३३-३८] जाव णाणाविहपंचवण्णेहिं मणीहि य तणेहि य उवसोभिया, तेसिंणं गंधो फासोणेयव्यो जहक्कम [कं० ३९-४०] कटिखि कटिरित्युच्यते, कटिस्तटमिव कटितटं घना-अन्योऽन्यशाखाप्रशाखानुप्रवेशतो निविडा कटितटे-मध्यभागे छाया येषां ते ५ तथा-मध्यभागे निविडतरच्छाया इत्यर्थः, अत एव २९ रम्यो-रमणीयः तथा ३० महान् जलभारावनतप्रावृद्कालभावी यो मेघनिकुरुम्बो-मेघसमूहस्तं भूता-गुणैः प्राप्ता महामेघनिकुरुम्बभूताः, महामेघवृन्दोपमा इत्यर्थः । ३१ 'ते णं पायवा' इत्यादि, अशोक- | वरपादपपरिवारभूतप्रागुक्ततिलकादिवृक्षवर्णनवत् [पृ० १२ पं०४] परिभावनीयम् नवरं 'सुयवरहिणमयणसलागा' इत्यादि विशेषणम् [पृ०१५ पं० ४] अत्रोपमया भावनीयम् 'अणेगसगडरहजाण' इत्यादि [पृ०१७ पं० ३] तदाकारभावतः । [१०९] १तेषां वनखण्डानाम् २अन्तः-मध्ये ३ बहुसमरमणीया भूमिभागाः प्रज्ञप्ताः, ४तेषां च भूमिभागानां 'आलिंगपुक्खरे १० इवा' इत्यादि वर्णनं प्रागुक्तं किं. ३३-४०] तावद्वाच्यं यावन्मणीनां स्पर्शः नवरम् अत्र तृणान्यपि वक्तव्यानि, तानि चैवं ५ 'नाणाविहपंचवण्णाहिं मणीहि य तणेहि य उवसोभिया [पृ० ८३ पं०२-३ तथा कं० ३४ प्रभृति] ____ * इयं कण्डिका अक्षरशः जीवाजीवाभिगमसूत्रे [पृ० १८३ पं० १२] वर्तते = "अनेकजातीयानामुत्तमानां महिरहाणां समूहो वनखण्डः"जीवा० वि० पृ० १८६ पं०५। on Join Educati For Private & Personal use only vw.jainelibrary.org Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१८६॥ Jain Educatio [१०] प्र० तेसिंणं भंते! तणाण य मणीण य पुव्वावरदाहिणुत्तरागतेहिं वातेहिं मंदोंयं मंदायं एइँयाणं वेइयणं कंपियाँणं चार्लियाणं फंदियाणं धंडियाणं खोभियाणं उदीरिदक्षणं केरिसए सद्दे भवति १ उ०- गोयँमा ! " से हानामए सीयाँए वा संदमणीए वा रहस्से वा सच्छत्तस्स [११०] प्र० - सम्पति १ तेषां मणीनां तृणानां च वातेरितानां शब्दस्वरूपप्रतिपादनार्थमाह-२ भदन्त ! - परमकल्याणयोगिन् ! तृणानां ३ पूर्वापरदक्षिणोत्तरगतैर्वातः ४ मन्दं मन्दं ५ एजितानां - कम्पितानां -६ व्येजितानां विशेषतः कम्पितानां एतदेव पर्यायशब्देन व्याचष्टे ७ कम्पितानां तथा ८ चालितानां इतस्ततो मनाक् विक्षिप्तानां एतदेव पर्यायेण व्याचष्टे - ९स्पन्दितानां तथा १० घट्टितानां परस्परं संघर्षयुक्तानां तथा कथं घट्टितानाम् इत्याह- ११ क्षोभितानां स्वथानाच्चालनमपि कुत इत्याह- १२उदीरितानाम् उत्-प्राबल्येन प्रेरितानाम्, १३ कीदृशः शब्दः प्रज्ञप्तः १ उ०- भगवानाह - १४ गौतम ! १५ स १६ यथानामकः १७ शिविकाया वा १८स्पन्दमानिकाया वा १९ रथस्य वा, तत्र १७ शिबिका जम्पानविशेषरूपा उ परिच्छादिता कोष्ठाकारा, तथा १८ दीघों जम्पानविशेषः पुरुषस्य स्वप्रमाणावकाशदायी स्पन्दमानिका - अनयोश्च १० शब्दः पुरुषोत्पाटितयोः क्षुद्र हेमघण्टिकादिचलनवशतो वेदितव्यः १९ रथश्रेह संग्रामरथः प्रत्येयः अग्रेतन विशेषणानामन्यथाऽसंभवात्, तस्य च फलवेदिका यस्मिन् काले ये पुरुषास्तदपेक्षया कटिप्रमाणाऽवसेया, तस्य च रथस्य विशेषणान्यभिधत्ते - २० सच्छत्रस्य - इमा अपि प्रश्नोत्तररूपाः सर्वाः कण्डिकाः जीवा० सू० पृ० १८५ पं० १०-५० १८६ पं० ३ । = इदं शब्दवर्णनरूपं समग्र विवरणं जीवा० विवरणमिव अक्षरशः प्रतिभाति-जीवा० वि० प्र० पृ० १९२ पं० २३-० १९५ पं० ३। S या कतिप्र - पा० ४-५ भा० १। -या national विमान वनखण्ड तृणशब्द वर्णनम् । ॥ १८७॥ Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । संज्झयस्स सैघंटस्स सपडागैस्स सतोरणवरस्स सनंदिघोसैस्स सखिखिणिहेमजालपरिखित्तस्स हेमवयचित्त| तिणिसकणगणिज्जुत्तदारुयायस्सx सुसंपिनद्धचक्कमंडलधुरागस्स कोलायससुकयणेमिजंतकम्मस्स +आइण्णवरतुरगसुसंपउत्तस्स० २१सध्वजस्य २२सघण्टाकस्य-उभयपाविलम्बिमहाप्रमाणघण्टोपेतस्य २३सपताकस्य २४सह तोरणवरं-प्रधानतोरणं यस्य स सतो. रणवरस्तस्य, २५ सह नन्दिघोषो-द्वादशतूर्यनिनादो यस्य स सनन्दिघोपस्तस्य, तथा २६ सह किङ्किण्य:-क्षुद्रघण्टा येषामिति सकिङ्किणीकानि, हेमजालानि-हेममयदामसमूहास्तैः सर्वासु दिक्षु पर्यन्तेषु-बहिःप्रदेशेषु परिक्षिप्तो-व्याप्तस्तस्य, तथा २७ हैमवत-हिमवत्पर्वतभावि चित्र-विचित्रमनोहारिचित्रोपेतं तिनिशं-तिनिशतरुसंबन्धि कनकनियुक्तं कनकविच्छरितं दारु-काष्ठं यस्य स हैमवत. चित्रतैनिशकनकनियुक्तदारुकस्तस्य, तथा २८ सुष्टु-अतिशयेन सम्यक् पिनद्धं-बद्धं अरकमण्डलं धूश्च यस्य स सुसंपिनद्धारकमण्डलधृष्कस्तस्य, तथा २९ कालायसेन-लोहेन सुष्टु-अतिशयेन कृतं नेमेः-बाह्यपरिधेर्यत्रस्य च-अरकोपरिफलकचक्रवालस्य कर्म यस्मिन् स कालायससुकृतनेमियत्रकर्मा तस्य, तथा ३० आकीर्णा-गुणैाप्ता ये वराः-प्रधानास्तुरगास्ते सुष्ठु-अतिशयेन सम्यक् १० ततिप्र-मु० पु०। - "सूत्रे च द्वितीयः 'क' कारः+ स्वार्थिकः पूर्वस्य च दीर्घत्वं प्राकृतत्वात्"-राय० वि०। +आजन्य-आजण्ण-आयण्णआइण्ण। 'आजन्य' शब्दः 'सर्वोत्तम पर्यायः। विवरणकारः 'आइण्ण' शब्दं 'आकीर्ण' शब्देन सरकरोति। 0 “प्राकृतत्वात् बहुव्रीहौ अपि । *क्तान्तस्य परनिपातः"-राय० वि०। मूलपाठे-'चकमण्डल' इति। + दारु+क-दारुकक-दारुकाक-दारुयाय । * 'सुसंपउत्त' पदस्य । Join Educatio n al w w.jainelibrary.org Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१८८॥ | कुसलणरच्छेयसारहिसुसंपरिग्गहियस्स सैरसयबत्तीसतोणपरिमंडियस्स सकंकडावयंसगस्स सचावसरपहरण-आवरणभरियजोधर्जुज्झसजस्स रायंगणसि वा रायंतेउरंसि वा र मंसि वा मणिकुहिमतलंसि अभिक्खणं अभिक्खणं अभिघहिजमाणस्स वा नियट्टिज़माणस्स वा ओराला मणोण्णा मणोहरा कण्ण-मणनिब्युइकरा सद्दा सव्वओ समंता अभिणिस्सवंति, भवेयारूवे सिया ? णो इणढे समझे। प्रयुक्ता-योजिता यस्मिन् स आकीर्णवरतुरगसुसंप्रयुक्तः तस्य, तथा ३१ सारथिकर्मणि ये कुशला नरास्तेषां मध्ये अतिशयेन छेको-५ दक्षः सारथिस्तेन सुष्टु सम्यक् परिगृहीतस्य, तथा ३२ शराणां शतं प्रत्येकं येषु तानि शरशतानि तानि च तानि द्वात्रिंशत् तूणानि च बाणाश्रयाः तैर्मण्डितः शरशतद्वात्रिंशत्तूणमण्डितः, किमुक्तं भवति ?-एवं नाम तानि द्वात्रिंशत् शरशतभृतानि तूणानि रथस्य सर्वतः पर्यन्तेष्ववलम्बितानि यथा तानि संग्रामायोपकल्पितस्यातीव मण्डनाय भवन्तीति, तथा ३३ कङ्कट:-कवचं सह कङ्कटो यस्य स सकङ्कटः सकङ्कटोऽवतंसः-शेखरो यस्य स सकङ्कटावतंसस्तस्य, तथा ३४ सह चापं येषां ते सचापाः सचापाः ये शरा यानि च कुन्त-भल्लि-मुसण्डिप्रभृतीनि नानाप्रकाराणि ३५ प्रहरणानि यानि च कवच-खेटकप्रमुखानि ३६ आवरणानि तै तः-परिपूर्णः, |२०| तथा योधानां युद्धं तन्निमित्तं सज्जः-प्रगुणीभूतो यः स ३७ योधयुद्ध सजः तस्य, इत्थंभूतस्य ३८ राजाङ्गणे वा ३९ अन्तःपुरे वा ४० रम्ये वा मणिकुट्टिमतले-मणिबद्धभूमितले ४१ अभीक्ष्णमभीक्ष्णं मणिकोट्टिमतलप्रदेशे राजाङ्गणादिप्रदेशे वा ४२अभिघट्यमानस्य वेगेन गच्छतो ये ४३ उदारा ४४ मनोज्ञाः ४५ कर्णमनोनिवृतिकराः सर्वतः समन्तात् । -भिल्लि-मुखण्ठि-पा० ५। "-ततः पूर्वपदेन सह विशेषणसमासः”-राय० वि० । Jan Education among For Private Personal use only nelibrary.org Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। | उ०-से- जहा णाम ए वेयालियवीणाए उत्तरमंदामुच्छियाए अंके सुपइट्टियाए कुसलनरनारिसुसंपरिग्गहियाते चंदणसारनिम्मियकोणपरिघट्टियाए पुव्वरत्तावरत्तकालसमयंमि मंदायं मंदायं वेइयाए पवेड्याए चालियाए घट्टियाए खोभियाए उदीरियाए ओराला मणुण्णा मणहरा कण्ण-मणनिव्वुइकरा सद्दा सव्वओ समंता अभिनिस्सवंति, भवेयारूवे सिया? णो इणढे समढे। उ.-से जहा नाम ए किन्नराण वा किंपुरिसाण वा महोरगाण वा गंधब्वाण वा भदसालवणगयाणं वा|५| ॥१८९॥ नंदणवणगयाणं वा सोमणसवणगयाणं वा पंडगवणगयाणं वा हिमवंतमलयमंदरगिरिगुहासमन्नागयाण वा एगओ सन्निहियाणं समागयाणं सन्निसन्नाणं समुवविट्ठाणं पमुइयपक्कीलियाणं गीयरइगंधव्वहसियमणाणं गजं पज कत्थं गेयं पयबद्धं पायवद्धं उक्खित्तं पायंत मंदायं [पृ० १४४ पं०४] रोइयावसाणं सत्तसरसमन्नागयं = छद्दोसविप्पमुकं एकारसालंकारं अद्वैगुणोववेयं, 0 जीवाभिगममूलटीकायामपि ४६ " उप्पित्थं श्वासयुक्तम्" [ ] इति, तथा उत्-प्राबल्येन अतितालमस्थान- |१०| तालं वा उत्तालं, श्लक्ष्णखरेण काकखरं, सानुनासिक-सानुनासम्-नासिकाविनिर्गच्छत्खरानुगतमिति भावः, तथा ४७ अष्टाभिर्गुणैरु____x अस्याः समग्रायाः अपि कण्डिकायाः विवरणम्-[ जीवा० सू० वृ० पृ० १९३-१९४ ] = -यं अट्टरससंपउत्त भा०२। 0 जीवा० वि० पृ० १९४ पं०९। अत्र मूलविवरणयोर्भेदः। ० "उप्पित्थं तह-कुविय-विहुरेसु"-"उप्पित्थं प्रस्तम् कुपितम् विधुरं चेति त्र्यर्थम्"-देशीनाम० व०१ गा० १२९। JainEducation femillional For Private Personel Use Only Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण-| इयं । प्रभृतीनि ॥१९॥ गुंजाऽवककुहरोवगूढं रत्तं तिहाणकरणसुद्धं [ कं० ६३ ] पगीयाणं, भवेयारूवे ? उ०-हंता सिया। बनखण्डे [१११ तेर्सि णं वणसंडाणं तत्थ तत्थ तहिं देसे देसे बहईओ खुड़ा खुडियातो वापीकूपपेतमष्टगुणोपेतं ते चाष्टौ अमीगुणा:-पूर्णम् रक्तम् अलंकृतम् व्यक्तम् अविघुष्टम् मधुरम् समम् सललितं च । तथा चोक्तम्-"पुण्णं रचं दिव्यसुखच अलंकियं च वत्तं तहेव अविघुटुं । महुरं समं सललियं अट्ठ गुणा होति गेयस्स" [ ] तत्र यत् स्वरकलाभिः परिपूर्ण गीयते तत् पूर्णम् , गेयरागानुरक्तेन यद् गीयते तद् रक्तम् , अन्योन्यस्वरविशेषकरणेन यद् अलंकृतमिव गीयते तद् अलङ्कतम् , अक्षरस्वर स्फुटकरणतो व्यक्तम् , विस्वरं क्रोशतीव विघुष्टं न तथा अविघुष्टम् , मधुरस्वरेण गीयमानं मधुरं कोकिलारुतवत् , तालवंशस्वरादिसमनुगतं समम् , तथा यत् स्वरघोलनाप्रकारेण ललतीव तत् सह ललितेन-ललनेन वर्तत इति सललितम् यदि वा यत् श्रोत्रेन्द्रियस्य शब्दस्पर्शनमतीव सूक्ष्ममुत्पादयति सुकुमारमिव च प्रतिभासते तत् ० सललितम् । इदानीमेतेषामेवाष्टानां मध्ये कियतो गुणान् अन्यच्च प्रतिपिपादयिषुरिदमाह-४८रत्तं तिहाणकरणसुद्धं'......[पृ० १३१ पं० ११] तत् यथा प्राक् नाट्यविधौ व्याख्यातं तथा भावनी- १० यम् 'जारिसए सद्दे हवई' प्रगीतानां-गातुमारब्धवतां यादृशः शब्दोऽतिमनोहरो भवति-स्यात्-कथंचिद् भवेद् एतद्रूपस्तेषां तृणानां मणीनां च शब्दः ? एवमुक्ते भगवानाह-गौतम ! स्यादेवंभृतः शब्दः । [१११] १ तेषां वनखण्डानां मध्ये २तत्र तत्र देशे 'तत्र तत्र' इति तस्यैव देशस्य तत्र तत्र एकदेशे ३बह्वयः ४क्षुल्लिकाः क्षुल्लिका ० इदं समस्तं संगीतस्वरूपं जीवा० वृ० [पृ० १९४-१९५] सविस्तरं चर्चितम् । * मूलपाठे नेतद् वाक्यं प्रतिभाति । Lonal Join Education wollainelibrary.org Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं।। ॥ ९ ॥ वावीयाओ पुक्खरिणीओ दीहियाओ गुंजालियाओ सरपंतियाओ सरसंरपंतियाओ बिलपंतिओ अच्छाओ सैण्हाओ रयामयकूलाओ सैमतीरातो वयरामयपासाणातो तवणिज्जतलाओ सुवण्णसुज्झरययवालुयाओ वेलियमणिफालियपडलपच्चोयडाओ सुहोयारसुउत्ताराओ गाणामणितित्थसुबद्धाओ लघवो लघवो इत्यर्थः, ५ वाप्यश्चतुरस्राः ६ पुष्करिण्यो वृत्ताकारा अथवा पुष्कराणि विद्यन्ते यासु ताः पुष्करिण्यः ७दीर्घिका ऋज्व्यो। नद्यः ८ वक्रा नद्यो गुजालिकाः, ९ बहूनि केवलकेवलानि पुष्पावकीर्णकानि सरांसि एकपतया व्यवस्थितानि सरपतिः-बह्वयः सरपतयः तथा १० येषु सरःसु पतथा व्यवस्थितेषु कूपोदकं प्रणालिकया संचरति सा सरःसर पङ्क्तिः ताः-बह्वयः सरःसर पङ्क्तयः, तथा ११ विलानीव * बिलानि-कूपास्तेषां पतयः बिलपतयः एताश्च सर्वा अपि कथंभूताः ? इत्याह-१२ अच्छा:-स्फटिकवद् बहिनिर्मलप्रदेशाः १३ श्लक्ष्णा:-श्लक्ष्णपुद्गलनिष्पादितबहिःप्रदेशाः श्लक्ष्णदलनिष्पन्नपटवत् , तथा १४ रजतमयं-रूप्यमयं कूलं यासांता रजतमयकूलाः, तथा १५ सम-न गर्ताभावात् विषमम्-तीरं-तीरवर्तिजलापूरितं स्थानं यासां ताः समतीराः, तथा १६ वज्रमयाः पाषाणा यास ता वज्रमयपाषाणाः, तथा १७ तपनीयं-हेमविशेषः तपनीयमयं तलं यासां तास्तपनीयतलाः, तथा १८ सुवर्ण-पीत-१० कान्ति हेम सुज्झं-रूप्यविशेषः रजतं प्रतीतं तन्मय्यो वालुका यासु ताः सुवर्णसुज्झरजतवालुकाः, १९वैडूर्यमणिमयानि स्फटिकपटलमयानि च प्रत्यवतटानि-तटसमीपवर्तिनः अत्युन्नतप्रदेशा यासां ता वैडूर्यमणिस्फटिकपटलपत्यवतटाः, २० सुखेनावतारो जलमध्ये | प्रवेशनं यासु वाः सुखावताराः तथा सुखेन उत्तारो-जलमध्याद् बहिनिर्गमनं यासु ताः +सुखोत्ताराः २१ नानामणिभिः-नानाप्रका * मारवाडीभाषायाम् 'कूप' पर्यायः 'बेरा' शब्दः श्रूयते। + "ततः पूर्वपदेन विशेषणसमास:"-राय० वि०। Jan Education a l For Private Personal use only M ainelibrary.org Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥१९२॥ चक्कोणाओ आणुपुव्वसुजातवप्पगंभीर सीयलजलाओ संछैन्न पत्तभिसमुणालाओ बहुउप्पलकुमुयनलिणसुभग| सोगंधिय पोंडरीय सयवत्तसहस्सपत्तके सरफुल्लोवचियाओ चैंप्पयपरिभुज्ज माणकमलाओ अंच्छविमलसलिलपुण्णाओ पेंडिहत्थभमंत मच्छकच्छभ | रैर्मणिभिस्तीर्थानि सुबद्धानि यासां ता नानामणितीर्थसुबद्धाः =, २२चत्वारः कोणा यासां ताश्चतुष्कोणाः, एतच्च विशेषणं वापीः कूपांश्च | प्रति द्रष्टव्यम् तेषामेव चतुष्कोणत्वसम्भवात् न शेषाणाम्, तथा २३ आनुपूर्व्येण - क्रमेण नीचैर्नीचैस्तरभावरूपेण सुष्ठु - अतिशयेन यो | जातो वप्रः - केदारो जलस्थानं तत्र गम्भीरं - अलब्धस्तागं शीतलं जलं यासु ता आनुपूर्व्यसुजातवप्र गम्भीर शीतलजला:, २४ संछन्नानि| जलेनान्तरितानि पत्रबिसमृणालानि यासु ताः संछन्नपत्रबिसमृणाला:, इह बिसमृणालसाहचर्यात् पत्राणि पद्मिनीपत्राणि द्रष्टव्यानि, | बिसानि - कन्दाः मृणालानि - पद्मनालाः, तथा २५ बहुभिरुत्पलकुमुदनलिनसुभगसौगन्धिकपुण्डरीकशतपत्रसहस्रपत्रैः केसरै: - केसर| प्रधानैः फुल्लै: - विकसितैरुपचिता बहूत्पल कुमुदनलिनसुभगसौगन्धिकपुण्डरीकशतपत्रसहस्रपत्र केसरफुल्लोपचिताः, [पृ०२१ पं० १०] तथा २६ पट्पदैः - भ्रमरैः परिभुज्यमानानि कमलानि - उपलक्षणमेतत्- कुमुदानि च यासु ताः षट्पदपरिभुज्यमानकमलाः, तथा २७ १० अच्छेन - स्वरूपतः स्फटिकवत् शुद्धेन विमलेन -आगन्तुकमलरहितेन सलिलेन पूर्णा अच्छविमलसलिलपूर्णाः, तथा २८पडिहत्था - अति"अत्र बहुव्रीहावपि 'सुबद्ध' पदस्य क्तान्तस्य परनिपातः सुखादिदर्शनाद् प्राकृत शैलीवशाद्वा" - राय० वि० । * “पडिहत्थं उद्घा = अइरेययं जाणम् - 8आउण्णं" [ ] इति वचनात् उदाहरणं चात्र- "घणपडित्थं गयणं सराई नवसलिलउदूधुमायाई । = अतिरियय व जा-भा० २ । 8 आपूर्णम् । Jain Education Intnatal = एतद् वचनं नोपलभ्यते मुद्रितदेशीशब्दकोशेषु तत्समानं वचनं तु प्राप्यते पाइअलच्छीनाममाला www.j Inelibrary.org Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । Jain Educatio अंगसउणमिहुणगपविचरिताओ पैंत्तेयं पत्तेयं पैउमवरवेदिया परिक्खित्ताओ पैंत्तेयं पत्तेयं वैणसंडपरिखिताओ अप्पेगइयाओ आसवोयगाओ अप्पेगइयाओ वारुणोयगाओ | रेकिता अतिप्रभूता इत्यर्थः भ्रमन्तो मत्स्यकच्छपा यत्र ताः परिहत्थभ्रमन्मत्स्यकच्छपाः, तथा २९ अनेकैः शकुनिमिथुनैः प्रविचरिता | इतस्ततो गमनेन सर्वतो व्याप्ताः अनेकशकुनि मिथुनकप्रविचरिताः एता वाप्यादयः सरस्सरः पङ्किपर्यन्ताः ३० प्रत्येकं प्रत्येकं - ३१ पद्मवरवेदिकया परिक्षिप्ताः ३२ प्रत्येकं प्रत्येकं ३३ वनखण्डपरिक्षिप्ताः, ३४ अपिर्वाहार्थे बाढमेककाः - काश्चन वाप्यादयः ३५ ५ आसवमिव-चन्द्रहासादिपरमासवमिव उदकं यासां ता आसवोदकाः, ३६ अप्येकका ३७ वारुणस्य- वारुणसमुद्रस्येव उदकं यासां ता ॥१९३॥ O अइरेइयं मह उण चिन्ताए मणं तुहं ० विरहे" । 'पहित्य' शब्द: पूर्णार्थवाची देस्यः " - राय० वि० । “ततः पूर्वपदेन विशेषणसमासः " - राय०वि०, "प्रति प्रति एकम् अत्र आभिमुख्ये 'प्रति' शब्दः ततो वीप्साविवक्षायां पश्चात् 'प्रत्येक' - शब्दस्य द्विर्वचनम् - इति" - राय० वि० । याम् - "पडित्यं उद्घमायं अहिरेमइयं च अप्फुण्णं" - अंक - १४२ । देशीनाममालायामपि पूर्णपर्यायः "पडिहत्य” शब्दो निबद्धः व० ६ गा०२८ । पृ० १२४ टिप्पणः । अस्मिन् मुद्रिते वचने 'पडिहत्य - 'उधुमाय' - 'अइरेइय' - 'अप्फुण्ण' - [ "क्तेन अप्फुण्णादयः " ८-४-२५८] शब्दाः 'पूर्ण' पर्या- १० यतया निर्दिष्टाः । परन्तु पूर्वोक्तकोशप्रामाण्याद् हैमव्याकरणप्रामाण्यात् [ "पूरेः अग्घाड - अग्घव - उदूधुमा अंगुम-अहिरेमा ः” ८-४-१६९] श्रीजीवाजीवाभिगमवृत्तिप्रामाण्याच्च [ १०९९८ प्र००९-११] 'अइरेइय' स्थाने 'अइ (हि) रेमइय' शब्दो युक्तः । संस्कृत 'अतिरेकित' शब्दप्रकृतिकत्वेन 'अइरेइय' शब्दस्य नैव देशीत्वम् । अइमयइयं भा० २ । ० गाथाया भावार्थ:- घनप्रतिपूर्ण गगनं सरांसि नवसलिलप्रतिपूर्णानि प्रतिपूर्ण मम पुनश्चिन्तया मनः तव विरहे ॥ पूर्णपर्यायरूपाणां परिहत्थ - उदूधुमाय- अइरेमइय-शब्दानां प्रयोगान् दर्शयितुं इयं गाथा दर्शिता । tional Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१९४॥ अप्पेगइयाओ खीरोयगाओ अप्पेगइयाओ घओयगाओ अप्पेगइयाओ खोदोयगाओ अप्पेगतियातो पंग| तीए ईयगरसेणं पण्णत्ताओ पासादीयाओ दरिसणिज्जाओ अभिरुवाओ पडिरूवाओ। तासि णं वावीणं जाव [कं०१११] बिलपंतीणं पत्तेयं पत्तेयं चैउद्दिसिं चत्तारि तिसोपाणपडिरूवगा पण्णता, तेसिं' णं तिसोपाणपडिरूवगाणं अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्त तंजहा-वैइरामया नेमा... [पृ० ७८ पं० २] तोरणाणं झया छत्ताइछत्ता य णेयव्वा। वारुणोदकाः, ३८ अप्येककाः ३९ क्षीरमिव उदकं यासां ताः क्षीरोदकाः, ४० अप्येकका ४१ घृतमिव उदकं यासां ता घृतोदकाः, ४२ अप्येककाः ४३ क्षोद इव-इक्षुरस इव उदकं यासांता क्षोदोदकाः, ४४ अप्येककाः ४५ स्वाभाविकेन ४६ उदकरसेन ४७ प्रज्ञप्ताः, 'पासादीयाओ' इत्यादि विशेषणचतुष्टयं प्राग्वत् [पृ०९ पं०६] । ४८ तासांक्षुल्लिकानां ४९ वापीनां यावद् [पृ०१९१ पं० ४-] ५० बिलपङ्कीनामिति' 'यावत्' शब्दात् पुष्करिण्यादिपरिग्रहः, ५१ प्रत्येकं ५२ चतुर्दिशि ५३ चत्वारि एकैकस्यां दिशि एकैकस्य भावात् ५४ त्रिसोपानप्रतिरूपकाणि-प्रतिविशिष्टरूपाणि त्रिसोपानानि प्रज्ञप्तानि, ५५ तेषां च त्रिसोपानप्रतिरूपकाणाम् ५६ | अयं-वक्ष्यमाणः एतद्रूप:-अनन्तरं वक्ष्यमाणस्वरूपो वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तस्तद्यथा ५७ वज्ररत्नमया+ नेमा इत्यादि प्राग्वत् [पृ०७८ पं०२]। तेषां त्रिसोपानप्रतिरूपकाणां प्रत्येक तोरणानि प्रज्ञप्तानि, तोरणवर्णकस्तु निरवशेषो यानविमानवद्भावनीयो यावत् बहवः ___x ओ अप्पेगइआओ खारीयगाओ-मु० पु०, वि० बा० । - "प्रयाणां सोपानानां समाहारः त्रिसोपानम्-तानि"-राय० वि० । + या वंगा इ-मु० पु०॥ Jain Education India For Private Personal Use Only Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥१९५॥ [११२] तासिं णं खुड्डाखुड्डियाणं वावीणं [कं० १११] जाव बिलपंतियाणं तत्थ तत्थ देसे तहिं तहिं हवे उप्पायपव्वयगा नियइपव्वयगा जगईपव्वयगा दारुइंजपव्वयगा दगमंडवा दंगमंचगा दगमालगादगपासायगा | उसड्डा खुड्डखुड्डुगी अंदोलँगा पैक्खंदोलगा सहस्रपत्रहस्तकाः [पृ० ७८ पं० १] इति । [११२] १ तासां क्षुल्लिकाक्षुल्लिकानां यावद् [पृ०१९१६०४-] बिलपतीनाम् , अत्रापि 'यावत् शब्दात् पुष्करिण्यादिपरिग्रहः, ५ रतत्र तत्र देशे तस्यैव देशस्य तत्र तत्र एकदेशे ३बहवः ४उत्पातपर्वता यत्रागत्य बहवः सूर्याभविमानवासिनो वैमानिका देवा देव्यश्च विचित्रक्रीडानिमित्तं वैक्रियशरीरमारचयन्ति, ५ नियत्या-नयत्येन व्यवस्थिताः पर्वता नियतिपर्वताः, क्वचित् *'निययपव्यया' इति पाठः, तत्र नियताः-सदा भोग्यत्वेनावस्थिताः पर्वता नियतपर्वता:-यत्र सूर्याभविमानवासिनो वैमानिका देवा देव्यश्च भवधारणीयेनैव वैक्रियशरीरेण सदा रममाणा अवतिष्ठन्ते इति भावः, ६ जगतीपर्वतकाः पर्वतविशेषाः ७ दारुपर्वतका-दारुनिर्मापिता इव पर्वतकाः, ८ दकमण्डपाः-स्फाटिकाः मण्डपाः, उक्तं च जीवाभिगममूलटीकायाम्-"दगमण्डपाः-स्फाटिका मण्डपाः" [ ] इति । एवं ९ दकमञ्चकाः १० दकमालकाः ११ दकप्रासादाः, एते च दकमण्डपादयः केचित् १२ उत्सृता उच्चा इत्यर्थः, केचित् १३ क्षुल्लकाः क्षुल्लका इति, तथा १४ अन्दोलकाः१५ पक्ष्यन्दोलकाश्च, इह १४यत्रागत्य मनुष्या आत्मानमन्दोलयन्ति ते 'अन्दोलकाः' इति | लोके प्रसिद्धाः, १५ यत्र तु पक्षिण आगत्यात्मानमन्दोलयन्ति ते पक्ष्यन्दोलकाः, तत्र अन्दोलकाः पक्ष्यन्दोलकाश्च तेषु वनखण्डेषु तत्र | * विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । - जीवा० वृ० प्र० पृ० २०० पं० ४ । Jain Education whinelibrary.org a For Private Personal Use Only l Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेन इयं । ॥१९६॥ Jain Education Inte संव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा । [११३] तेसु णं उप्पायपव्वएस [ कं ११२ ] पक्खदोलए बेहई हंसासणाई कोचासणाई गैरुलासणाई उण्णयासणाई पॅणयासणाई दीसणाई भद्दांसणाई पक्खासणाई मगरासैणाई उसभासणाई* सीहासंगाई पमाणाई दिसा सोवत्थियाइं सव्वरयणामयाई अच्छाई जाव पडिवाई । तत्र प्रदेशे देवक्रीडायोग्या बहवः सन्ति, एते च उत्पातपर्वतादयः कथंभूताः १ इत्याह- १६ सर्वरत्नमयाः, 'अच्छा सहा' इत्यादि ५ विशेषणकदम्बकं प्राग्वत् [ पृ० १९ पं० ५ ] । [११३] १ तेषु उत्पातपर्वतेषु यावद् पक्ष्यन्दोलकेषु 'यावत्' करणात् नियतिपर्वतकादिपरिग्रहः, [पृ० १९५ पं० ६] २ बहूनि ३हंसा| सनादीनि आसनानि, तत्र येपामासनानामधो भागे हंसा व्यवस्थिताः - यथा सिंहासने सिंहाः - तानि हंसासनानि, एवं ४ क्रौञ्चासनानि ५ गरुडासनानि च भावनीयानि, ६ उन्नतासनानि - उच्चासनानि ७ प्रणतासनानि - निम्नासनानि ८ दीर्घासनानि शय्यारूपाणि ९ भद्रासनानि येषामधोभागे पीठिकाबन्धः १० पक्ष्यासनानि येषामधोभागे नानास्वरूपाः पक्षिणः, एवं १९ मकरासनानि १२ सिंहास - नानि च भावनीयानि, १३ पद्मासनानि - पद्माकाराणि आसनानि, १४ येषामधोभागे दिक्सौवस्तिका आलिखिताः सन्ति, अत्र यथाक्रममासनानां संग्रहणिगाथा - "हंसे कोंचे गरुडे उष्णय पणए य दीह भद्दे य । पक्खे मयरे पउमे सीह दिसासोत्थि बारसमे" ॥ | इति तानि सर्वाण्यपि कथंभूतानि । इत्यत आह- १५ ' सव्वरयणामयाई' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९ पं० ५ ] । * वि० बा० । जीवा० वि० प्र० पृ० २०० पं० १४ । inelibrary.org Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । [११४] तेसु णं वणसंडेसु तेत्थ तत्थ तर्हि तर्हि देसे देसे बहवे आर्लिंयघरगा मौलियघरगा कंपलिघरगा लयाघरगा अच्छणघरगा पिच्छेणघरगा मज्जेणघरगा पसाहणघरगा गर्भधरगा मोहँणघरगा सालघरगा जलघरगा कुसुमघरगा चित्तधरगा गंधव्वधरगा आयंसघरगा सव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा । तेसु णं आलियघरगेसु जाव [प्र० प्र० पं० १] आयंसघरगेसु तर्हि तर्हि घरएसु बैहूई हंसासणाई जाव दिसासोव [११४] १तेषु वनखण्डेषु मध्ये २तत्र तत्र प्रदेशे तस्यैव देशस्य तत्र तत्र एकदेशे ३ बहूनि ४आलिगृहाणि - आलि:-वनस्पति- ५ ॥१९७॥ विशेषः तन्मयानि गृहकाणि आलिगृहकाणि, ५ मालिरपि वनस्पतिविशेषः तन्मयानि गृहकाणि मालिगृहकाणि, ६ कदलीगृहकाणि ७ लतागृहकाणि च प्रतीतानि, ८ अवस्थान गृहकाणि येषु यदा तदा वा आगत्य सुखासिकया अवतिष्ठन्ति, ९ प्रेक्षकगृहकाणि यत्रागत्य प्रेक्षणकानि विदधति निरीक्षन्ते च, १० मज्जनगृहकाणि यत्रागत्य स्वेच्छया मज्जनं कुर्वन्ति, ११ प्रसाधनगृहकाणि यत्रागत्य स्वं परं च मण्डयन्ति, १२ गर्भगृहकाणि गर्भगृहाकाराणि १३ मोहनं मैथुनसेवा “रमियं मोहण - रयाई” [ ] इति नाममालावचनात् तत्प्रधानानि गृहकाणि मोहनगृहकाणि-वास भवनानि - इति भावः १४ शालागृहकाणि पट्टशालामधानानि, १५ जालगृह काणि - गवाक्षयु- १० कानि गृहकाणि, १६कुसुमगृहकाणि - कुसुमप्रकरोपचितानि गृहकाणि, १७ चित्रगृहकाणि- चित्रप्रधानानि गृहकाणि १८ गन्धर्वगृहकाणि - गीतनृत्ययोग्यानि गृहकाणि १९ आदर्शगृहकाणि - आदर्शमयानीव गृहकाणि, एतानि च कथंभूतानि ? इत्यत आह-२० 'सव्वरयणामया' इत्यादि विशेषण कदम्बकं प्राग्वत् [ पृ० १९ पं० ५ ] । २१ तेषु आलिगृहकेषु यावत् आदर्शगृहकेषु, अत्र 'यावत्' शब्दात् [ प्र० पृ० पं० ५ ] मालिगृहकादिपरिग्रहः, २२ बहूनि हंसासनानि इत्यादि प्राग्वत् [ पृ० १९६ पं० ७] । Jain Education Int national Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥१९८॥ | त्थिआसणाई [ कं० ११३ ] सव्वरयणामयाई जाव पडिरूवाइं। २१५] तेसण वणसंडेस तेस्थ तत्व से तहि तहिं बहवे जातिमंडवगा जहियामंडवगामलियामंडवगा णवमालियामंडवगा वासंतिमंडवगा दहिवासुयमंडवगा सूरिल्लियमंडवगा 'तबोलिमंडवगा मुद्दियामंडवगा* णागलयामंडवगा अतिमुत्तयलयामंडवगा अप्फोयामंडगा मालयामंडवगा अच्छा संवरयणामया जाव पडिरूवा। [११५] १ तेषु वनखण्डेषु २ तत्र तत्र देशे तस्यैव देशस्य तत्र तत्र एकदेशे ३ बहवो ४ जातिमण्डपकाः ५ युथिकामण्डपकाः | ६ मल्लिकामण्डपकाः ७ नवमालिकामण्डपकाः ८ वासन्तीमण्डपकाः ९ दधिवासुकामण्डपकाः, दधिवासुका-वनस्पतिविशेषस्तन्मया मण्डपका दधिवासुकामण्डपकाः, १० 'मूरिल्लि' अपि वनस्पतिविशेषः तन्मया मण्डपका सरिल्लिमण्डपकाः। ११ ताम्बूली-नागवल्ली तन्मया मण्डपकास्ताम्बूलीमण्डपकाः, १२ नागो द्रुमविशेषः, स एव लता नागलता, इह यस्य तिर्यक् तथाविधा शाखा प्रशाखा वा न प्रसृता सा 'लता' इत्यभिधीयते नागलतामया मण्डपका नागलतामण्डपकाः, १३ अतिमुक्तमण्डपकाः, १४ 'अप्फोया' इति वनस्पतिविशेषस्तन्मया मण्डपका अप्फोयामण्डपकाः, १५ मालुका-एकास्थिकफला वृक्षविशेषास्ताक्ता मण्डपका मालुकामण्डपकाः, एते च कथंभूताः ? इत्याह-१६'सव्वरयणामया' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९५० ५]। * वि० बा०। ० सूरल्लि-पा० ५। सूरमल्लि-भा० १। Jain Education wwilainelibrary.org Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय । Jain Educa - [११६] 'तेसु णं जातिमण्डवएसु जाव [पृ० १९८ पं० १ - ] मालयामंडवएसु बहवे पुढविसिलापट्टगा हंसासणसंठिया जाव [पृ० १९९६ पं० २ ] दिसांसोबत्थियासणसंठिया अण्णे य बहवे वरसयणासणविसिद्धसंठाणसंठिया पुढविसिलापट्टगा पण्णत्ता समणाउसो ! आईणगरूयबूरणवणीयतूलफासा सब्वरयणामया अच्छा जाव पडिरुवा । तत्थ णं बहवे वैमाणिया देवा य देवीओ य असयंति संयंति ॥ १९९॥ [११६] १ तेषु जातिमण्डपकेषु यावत् मालुकामण्डपकेषु 'यावत्' शब्दात् अप्येकका २ दिक्सौवस्तिकासनसंस्थिताः, 'यावत' ५ करणात् 'अप्पेगइया कोंचा सणसंठिया अप्पेगइया गरुडासणसंठिया अप्पेगइया उष्णयासणसंठिया अप्पेगइया पणयासणसंठिया | अप्पेगइया दीहासणसंठिया अप्पेगइया भद्दासणसंठिया अप्पेगइया पक्खासणसंठिया अप्पेगइया मगरासणसंठिया अप्पेगइया उसभासणसंठिया अप्पेगइया सिंहासनसंठिया अप्पेगइया पउमासणसंठिया' इति [१०१९६ पं०७] परिग्रहः २अन्ये च बहवः शिलापट्टका | यानि ४ विशिष्ट चिह्नानि विशिष्टनामानि च वराणि - प्रधानानि शयनानि आसनानि च तद्वत् संस्थिताः वरशयनासनविशिष्ट संस्थानसंस्थिताः, कचिद् 'मांसल सुघट्टविसिठाणसंठिया' + इति पाठः, तत्रान्ये च बहवः शिलापट्टकाः मांसलाः अकठिना इत्यर्थः सुष्टष्टा १० अतिशयेन मसृणा इति भावः विशिष्टसंस्थान संस्थिताश्चेति ५ 'आईणगरूयबूरनवणीयतुलफासमउया [ पृ० ९९ पं० २ ] 'सव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा' इति प्राग्वत् [ पृ० १९ पं० ५ ] । तत्र ६ तेषु उत्पातपर्वतादिगतहंसासनादिषु यावत् [ १०१९६ पं०७] | नानारूपसंस्थान संस्थितपृथ्वीशिलापट्टकेषु ७ बहवः सूर्याभविमानवासिनो देवा देव्यश्च यथासुखम् ८ आसते ९ शेरते - दीर्घकाय+ विवरणकारदर्शितः पाठभेदः । n Inmational Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। देवानां क्रीडनादीनि ॥२०॥ चिट्ठति निसीयंति तुयेति मंति लेलंति कीलंति किति 'मोहेंति पुराँ पोराणाणं सुचिण्णाण सुंपरिकताण | सुभाण कंडाण कम्माण केल्लाणाण कॅल्लाणं फलविवायगं पर्चेणुम्भवमाणा विहरति । प्रसारणेन वर्तन्ते न तु निद्रां कुर्वन्ति तेषां देवयोनिकत्वेन निद्राया अभावात् , १० तिष्ठन्ति-ऊर्ध्वस्थानेन वर्त्तन्ते ११ निषीदन्तिउपविशन्ति १२ तुयटृति-त्ववर्त्तनं कुर्वन्ति, वामपार्श्वतः परावृत्य दक्षिणपार्श्वनावतिष्ठन्ति दक्षिणपार्श्वतो वा परावृत्य वामपावनैति | भावः, १३ रमन्ते-तिमावघ्नन्ति १४ ललन्ति-मनईप्सितं यथा भवति तथा वर्तन्ते इति भावः, १५ क्रीडन्ति यथासुखमितस्ततो | गमनविनोदेन गीतनृत्यादिविनोदेन वा तिष्ठन्ति १६ मोहन्ति-मैथुनसेवा कुर्वन्ति इत्येवं १७पुरा-पूर्व प्राग्भवे इति भावः २२कृतानां कर्मणामिति योगः, अत एव १८ पौराणानां १९सुचीर्णानां-सुचरितानां, इह सुचरितजनितं कर्मापि कार्ये कारणोपचारात् सुचरितं, ततोऽयं भावार्थ:-विशिष्टतथाविधधर्मानुष्ठानविषयाप्रमादकरणक्षान्त्यादिसुचरितजनितानामिति, तथा २० सुपराक्रान्तानां, अत्रापि कार्य कारणोपचारात् सुपराक्रान्तिजनितानि सुपराक्रान्तानि इत्युक्तम् , किमुक्तं भवति ? सकलसत्त्वमैत्री-सत्यभाषण-परद्रव्यानपहारसुशीलादिरूपसुपराक्रमजनितानामिति, अत एव २१ शुभानां शुभफलानां, इह किश्चिदशुभफलमपि इन्द्रियमतिविपर्यासात् शुभफलं प्रतिभासते ततस्ताविकशुभत्वप्रतिपत्त्यर्थमस्यैव पर्यायशब्दमाह-२३ कल्याणानां, तत्ववृत्या तथाविधविशिष्टफलदायिनां, अथवा | कल्याणानां अनर्थोपशमकारिणां २४ कल्याणरूपं २५ फलविपाकं २६ प्रत्येकमनुभवन्तो २७ विहरन्ति-आसते । - वि० बा०। Jain Educatie inter nal Jiww.jainelibrary.org Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । [११७] तेसिणं वणसंडाणं बहमज्झदेसभाए पत्तेयं पत्तेयं पासायवडेंसगा पण्णत्ता, ते णं पासायवडेंसगा 'पंच जोयणसयाइं उडुं उच्चत्तेणं अड्डाइजाई जोयणसयाई विक्खंभेणं अब्भुग्गयमूसियपहसिया [पृ० १६९ पं० ३]इव तहेव बहुसमरमणिजभूमिभागो उल्लोओ सीहासणं सपरिवार [ पृ०८१,९७ ५० ३ तथा पृ०१०२ पं० ३] तत्थ णं चत्तारि देवा महिड्डिया जाव पंलिओवमहितीया परिवसंति, तंजहा-असोए संत्तपण्णे चंपए छुए। [११७] १ तेषां वनखण्डानां २ बहुमध्यदेशभागे ३ प्रत्येकं प्रत्येकं ४ प्रासादावतंसका इति, अवतंसक इव-शेखरक इवावतं-14 सकः प्रासादानामवतंसक इव प्रासादावतंसकः प्रासादविशेष इति भावः, ५ ते च प्रासादावतंसकाः ६ पश्च योजनशतान्यूर्ध्वमुच्चैस्त्वेन | ७ अर्द्धतृतीयानि योजनशतानि विष्कम्भतः, तेषां च ८ 'अन्भुग्गयमृसियपहसिया विव' इत्यादिविशेषणजातं प्राग्वत् [पृ० १६९ | पं०३-९] । ९ भूमिवर्णनं उल्लोकवर्णनं सिंहासनवर्णनं सपरिवारं च प्राग्वत् [पृ० ८१-९७ पं० ३ तथा पृ० १०२ पं०३]। १० तत्र-तेषु वनखण्डेषु प्रत्येकमेकैक देवभावे ११ चत्वारो देवा महर्द्धिका 'यावत्' करणात् 'महज्जुइया महाबला महासुक्खा महाणुभावा' इति परिग्रहः, १२ पल्योपमस्थितिकाः १३ परिवसन्ति, तद्यथा-१४ अशोकवने अशोकः १५ सप्तपर्णवने सप्तपर्णः १६ चम्पकवने चम्पकः १७ चूतवने चूतः० ते 'इत्यादि, ते अशोकादयो देवाः स्वकीयस्य वनखण्डस्य स्वकीयस्य प्रासादावतंसकस्य, सूत्रे बहुवचनं प्राकृतत्वात् , प्राकृते वचनव्यत्ययोऽपि भवतीति, स्वकीयानां सामानिकदेवानां स्वासां स्वासामग्रमहिषीणां सपरिवाराणां ____ * -कदिग्भावेन च-भा० २ । ० अस्य विवरणस्य मूलपाठः, प्रस्तुतसंपादनोपयुक्तानां सप्तानामपि प्रतीनाम्-एकस्यामपि प्रतौ नोपलब्धः अतः ज्ञायते यत् विवरणकारदृष्टिसमक्ष प्रस्तुतमुदितमूलतः अन्यदेव मूलसूत्रपुस्तकम् आसीत् यदनुसारि एतद्विवरणम् । ॥२०॥ Jain Education lemonal For Private Personel Use Only W ainelibrary.org Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । उवगारिया लयनम् । ॥२०२॥ [११८] 'सूरियाभस्सणं देवविमाणस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पण्णत्ते, तंजहा-वणसंडविहणे जाव बहवे वेमाणिया देवा देवीओ य आसयंति जाव [कं. ११६] विहरंति, तस्स णं वहसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसे एत्थ ण मेहेगे 'उवगारियालयणे पण्णत्ते, खासां खासां परिषदां स्वेषां स्वेषामनीकानां स्वेषां स्वेषामनीकाधिपतीनां स्वेषां स्वेषामात्मरक्षाणां 'आहेवच्चं पोरेवच्चं'इत्यादि प्राग्वत् । [११८] १ सूर्याभस्य विमानस्य २ अन्तः-मध्यभागे बहुसमरमणीयो भूमिभागः प्रज्ञप्तः, तस्य 'से जहा नाम ए आलिंग-14 पुक्खरे इ वा इत्यादि यानविमान इव वर्णनं तावद् वाच्यं यावद् मणीनां स्पर्शः [कं० ३३-४०] ३ तस्य च बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य ४ बहुमध्यदेशभागे अत्र ५ सुमहत् ६ उपकारिकालयनं प्रज्ञप्त, विमानाधिपतिसत्कप्रासादावतंसकादीन् उपकरोति-उपष्टभ्नात्युपकारिका-विमानाधिपतिसत्कप्रासादावतंसकादीनां पीठिका, अन्यत्र त्वियम्-'उपकार्योपकारिका' इति प्रसिद्धा, उक्तं च-"गृह___ * 'आहेबच्चं पोरेवच्चं' इत्यादि प्राग्वत्" अनेन अतिदेशवाक्येन विवरणकारः सूचयति यत् 'आहेवच्चं' इत्यादिपदावलिः पूर्वपाठे समागता परंतु एतावत्पर्यन्तं मुद्रितासु सर्वासु कण्डिकासु विवरणकारेण अतिदिष्टा पदावलिन क्वापि समायाता अतः प्रस्तुतमुदितमूलपाठाद् विवरणकारलब्धमूलपाठे भेदः स्पष्ट एव । अतिदिष्टा पदावलिः [औप० पृ० ७४ पं० १३ गतपाठेन ] इत्थं पूरणीया-"पोरेवच्चं सामित्तं भट्टित्तं महत्तरगत आणाईसरसेणावच्च कारेमाणे पालेमाणे महया" अयनट्ट.....[पृ० ४६ ०१-] विहरति । आहेवच्च-आधिपत्यम् । पोरेवच्च-पुरोवर्तित्वम्अग्रेसरत्वम् । भट्टित्त-भर्तृत्वम् । सामित्तं-स्वामित्वम् । महत्तरगत्तं महत्तरत्वम् । आणाईसरसेणावच्च-आज्ञेश्वरसेनापत्यम् । कारेमाणे-कारयन् । पालेमाणेपालयन्"। Join Education e llona jainelibrary.org Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। पवर वेदिका | ॥२०३॥ 'एग जोयणसयसहस्सं आयामविक्खंभेणं तिणि जोयणसयसहस्साई सोलस सहस्साई दोणि य सत्तावीसं जोयणसए तिन्नि य कोसे अट्ठावीसं च धणुसयं तेरस य अंगुलाई अद्धंगुलं च किंचिविसेसूर्ण परिवखेवेणं, जोयणं बाहल्लेणं, सव्वजंबूणयामए अच्छे जाव पडिरूवे। [११९] 'से णं ऐगाए पउमवरवेइयाए एंगेण य वणसंडेण य सव्वतो समंता संपरिखित्ते, साणं पउमवरवेइया अद्धजोयणं उड्डे उच्चत्तेणं पंच धणुसयाई विक्खंभेणं उवकारियलेणसमा परिक्खेवेणं, स्थानं स्मृतं राज्ञामुपकार्योपकारिका" x [ ] इति, उपकारिका लयनमिव उपकारिकालयन, ७ तद् एकं योजनशतसहस्रमायाम-विष्कम्भाभ्यां ८ त्रीणि योजनशतसहस्राणि + षोडश सहस्राणि द्वे योजनशते सप्तविंशत्यधिके अष्टाविंशं धनुःशतं त्रयोदश अङ्गुलान्य - मुलं परिक्षेपतः, इदं च परिक्षेपप्रमाणं जम्बूद्वीपपरिक्षेपपरिमाणवत क्षेत्रसमासटीकातः परिभावनीयम् । ९ एक योजनं बाहल्येन पिण्डेन १० सर्वात्मना जाम्बूनदमयम् 'अच्छे' इत्यादि विशेपणजातं प्राग्वत् [पृ० १९५०५]। [११९] १ तच्च- २ एकया पद्मवरवेदिकया ३ एकेन वनखण्डेन ४ सर्वतः-सर्वासु दिक्षु ५ समन्ततः-सामस्त्येन सम्यक् परिक्षिप्तम् , ६ सा पद्मवरवेदिका ७ अर्द्ध योजनमूर्ध्वमुच्चैस्त्वेन ८ पञ्च धनुःशतानि विष्कम्भतः परिक्षेपेण-९ उपकारिकालयनसमाना - अयमेव संपूर्णः कण्डिकापाठः अक्षरशो विद्यते जीवा० सू० पृ० १७९ प्र० पं० १-पृ० १८० प्र० पं०८1 x “सौधौऽस्त्री राजसदनम् उपकार्योपकारिका"-[अमर० द्वि० कां० पुरवर्ग लो० १०। हैमअभिधान० कां० ४ 'लो० ५९] +-णि द्वयो योजनशते-भा०१। = अयमेव च संपूर्णः टीकाकण्डिकापाठः अक्षरशो विद्यते जीवा० वृ० पृ० १८० प्र० पं०९-पृ०१८३ पं०७। विशेषस्तु-अत्र यः टीकापाठः Jan Educat internal For Private Personal Use Only Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥२०४॥ 'तीसे ण पउमवरवेइयाए इमेयारवे वण्णावासे पण्णत्ते, तंजहा-वेयरामया [पृ०७८ तथा पृ० १५७ पं० ३-पृ० | १५९ पं० २] सुवपणरुप्पमया फलया नाणामणिमया कलेवरा णाणामणिमया कलेवरसंघाडगा णाणामणिमया रूवा णाणामणिमया रूवसंघाडगा अंकामया [पृ० १५९ पं० २-] उवरिपुञ्छणी सव्वरयणामए अच्छायणे, साँ णं पउमवरवेइया एंगमेगेणं हेमजालेणं ऐ० गवक्खजालेणं ऐ० खिखिणीजालेणं ऐ० घंटाजालेणं उपकारिकालयनपरिक्षेपपरिमाणा प्रज्ञप्ता, १० तस्याः-पद्मवरवेदिकायाः ११ अयमेतद्रूपो वर्णावासो वर्णः-इलाधा यथावस्थितस्वरूप-| कीर्तनम् तस्यावासो-निवासो ग्रन्थपद्धतिरूपो वर्णावासः-वर्णकनिवेश इत्यर्थः, प्रज्ञप्तो मया शेषतीर्थकरैश्च 'तद्यथा' इत्यादिना तमेव दर्शयति, इह सूत्रपुस्तकेष्वन्यथाऽतिदेशबहुल: पाठो दृश्यते ततो मा भूदु मतिसंमोह इति विनेयजनानुग्रहाय पाठ उपदयते-१२ 'वयरामया [पृ० ७८ पं०८ तथा पृ०१५७ पं०५, पृ० १६१ पं०९] सुवन्नरुप्पमया फलया नानामणिमया कडेवरा णाणामणिमया कलेवरसंघाडगा नानामणिमया रूवा नानामणिमया रूवसंघाडगा अंकामया [पृ० १५९५०१०] उवरिपुंछणी सव्वरयणामए अच्छायणे' एतत् सर्व द्वारवत् भावनीयं, नवरम्-१३ कलेवराणि-मनुष्यशरीराणि १४ कलेवरसंघाटा:- १० मनुष्यशरीरयुग्मानि १५ रूपाणि-रूपकाणि १६ रूपसंघाटा: रूपकयुग्मानि, १७ सा एवंस्वरूपा पद्मवरवेदिका तत्र तत्र प्रदेशे १८ एकैकेन हेमजालेन-सर्वात्मना हेममयेन लम्बमानेन दामसमृहेन १९ एकैकेन गवाक्षजालेन गवाक्षाकृतिरत्नविशेषदामसम्रहेन २० एकैकेन किङ्किणीजालेन, किङ्किण्या-क्षुद्रघण्टिकाः, २१ एकैकेन घण्टाजालकेन-किङ्किण्यपेक्षया किंचिन्महत्यो घण्टाः घण्टाः, स्थूलाक्षरैर्मुद्रितः स तत्र न विद्यते । ४ 'ए' अक्षरेण 'एगमेगेणं' पदं बोध्यम् । Jain Education Itemona For Private & Personel Use Only Marjainelibrary.org Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥२०५॥ ऐ० मुत्ताजालेणं ऐ० मणिजालेणं ऐकणगजालेणं ए० रयणजालेणं ए० पउमजालेणं सव्वतो समंता संपरिखित्ता, "ते णं जाला+ तवणिजलंबसगा जाव [पृ० १०१ पं०५-पृ० १०२५० ७] चिट्ठति। तीसे णं पउमपरवेझ्याए तत्थ तत्थ देसे तहिं तहिं बहवे हयसंघाडा [पृ० १७२ पं०१] जाव उसभसंघाडा सव्वरयणामया अच्छा जाव [पृ० १९ पं०५] पडिरूवा पासादीया जाववीहीतो पंतीतो मिहुणाणि लयाओ[पृ० १७२ पं०२-पृ० १७३५०१ से केणटेणं भंते ! एवं बुचति-पंउमवरवेइया 'उमवरवेइया' ? तथा २२ एकैकेन मुक्ताजालेन-मुक्ताफलमयेन दामसमूहेन २३ एकैकेन मणिजालेन-मणिमयेन दामसमृहेन २४ एकैकेन कनकजालेन-कनकः-पीतरूपः सुवर्णविशेषः तन्मयेन दामसमूहेन एवम्-२५ एकैकेन रत्नजालेन २६ एककेन पद्मजालेन सर्वरत्नमयपमात्मकेन दामसमूहेन २७सर्वतः सर्वासु दिक्षु २८समन्ततः-सर्वासु विदिक्षु २९परिक्षिप्ताः-व्याप्ताः। एतानि च दामसमूहरूपाणि हेम. जालादीनि जालानि लम्बमानानि वेदितव्यानि, तथा चाह-३० तानि हेमजालादीनि जालानि, कचित् ='दामा इति पाठः, तत्र तावत हेमजालादिरूपा दामान इति, 'तवणिजलंबूसगा' इत्यादि [पृ० १०१ पं० ५-पृ० १०२ पं० ७ तथा पृ० १६३ पं०३,१०] ३१ हयसंघाटादिसूत्रम् [पृ० १७२ पं०४] ३२ लतासूत्रं च प्राग्वत् [पृ०१८ पं० १० तथा पृ० १४ पं० १३]। सम्प्रति पद्मवरवेदिकाशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं जिज्ञासुः पृच्छति-३३ 'से' शब्दः 'अथ' शब्दाथे, अथ ३४ केनाथेन-केन कारयोन ३५/ भदन्त ! ३६ एवमुच्यते-३७पद्मवरवेदिका ३८ 'पद्मवरवेदिका इति-किमुक्तं भवति ?- 'पद्मवरवेदिका' इत्येवरूपस्य शब्दस्य तत्र प्रवृत्ती + 'जालाणि' इति वक्तव्ये 'जाला' इति "सूत्रे पुंस्त्वनिर्देशः प्राकृतत्वात् प्राकृते हि लिङ्गमनियतम्"-राय० वि० । Jain Education For Private Personal use only Hainelibrary.org Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२०६॥ गोर्यमा ! पैउमवरवेइयाए णं तत्थ तत्थ देसे तहिं तहिं वेइयाँसु वेइयाबाहासु य वेइयफलतेसु य वेइयपु 'पद्मवरवेडतरेसु य खंभेसैं खंभया हासु खंभसीसेसैं खंभपुडंतरेसु सूईसु सूईमुखेसु सूईफलेएसु सूईपुडतरेसु पक्खेसु । दिका पैक्खबाहासु ० पक्खपेरंतेसु पक्खपुडंतरेसु बहुयाइं उप्पलाई पउमाई कुमुयोइं गलिणाति सुभगाई सोगं- शब्दस्यार्थः धियाई पुंडरीयाई महापुंडरीयाणि संयवत्ताई संहस्सवत्ताई किं निमित्तम् ? इति, एवमुक्ते भगवानाह-३९ गौतम! ४०पद्मवरवेदिकायां ४१तत्र तत्र एकदेशे तस्यैव देशस्य ४२तत्र तत्र एकदेशे ५ ४३ वेदिकासु--उपवेशनयोग्यमत्तवारणरूपासु ४४वेदिकाबाहासु-वेदिकापावेषु ४५वे वेदिके वेदिकापुटं तेषामन्तराणि-अपान्तरालानि तानि वेदिकापुटान्तराणि तेषु, तथा ४६ स्तम्भेषु सामान्यतः ४७स्तम्भबाहासु-स्तम्भपात्रेषु ४८स्तम्भशीर्षेषु ४९ द्वौ स्तम्भौ स्तम्भपुटं तेषामन्तराणि स्तम्भपुटान्तराणि तेषु ५० सूचीपु-फलकसम्बन्धविघटनाभावहेतुपादुकास्थानीयासु तासामुपरि इति तात्पर्यार्थः, ५१यत्र प्रदेशे सूची फलक भिच्या मध्ये प्रविशति तत्प्रत्यासन्नो देशः सूचीमुखं तेषु, तथा ५२ सूचीफलकेषु सूचीभिः सम्बन्धिनो ये फलकपदेशास्तेप्युपचारात् सूचिफलकानि तेषु सूचीनामधउपरिवर्तमानेषु, ५३ द्वे सूच्यौ सूचीपुटं तदन्तरेषु, ५४ पक्षाः ५५पक्षवाहाः १० वेदिकैकदेशविशेषास्तेषु, ५६ बहूनि ५७ उत्पलानि गर्दभकानि [पृ०२१५०१०] ५८ पद्मानि-सूर्यविकासीनि ५९ कुमुदानि-चन्द्रविकासीनि ६० नलिनानि-ईषद्रक्तानि पद्मानि ६१ सुभगानि-पद्मविशेषरूपाणि ६२ सौगन्धिकानि-कल्हाराणि ६३ पुण्डरीकाणि| सिताम्बुजानि ६४ तान्येव महान्ति महापुण्डरीकाणि ६५ शतपत्राणि-पत्रशतकलितानि ६६ सहस्रपत्राणि-पत्रसहस्रोपेतानि, शतपत्र x वि० बा०। ० वि० बा० । For Private Personal Use Only jainelibrary.org Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। | सव्वरयणामयाइं अच्छाइं पडिरूवाई मँहया वीसिक्कछत्तसमाणाई पणत्ताई समणाउसो! से एएँणं अटेणं || पववरचेदिगोयमा !एवं वुच्चइ-पउभंवरवेइया 'पउमवरवेइया'। काया पउमैवरवेइया णं भंते! किं सासया अंसासया ? गोयमा! सिय सासया सिंय असासया।से केणटेणं नित्यानिभंते! एवं वुच्चइ-सिय सासया सिय असासया ? गोयमा! दवट्टयाए सासया, वनपज्जवेहिं गंधपज्जवेहिं रस- 'त्यत्वम् । सहस्रपत्रे च पद्मविशेषौ पत्रसंख्याविशेषाञ्च पृथगुपाते, एतानि ६७ सर्वस्त्नमयानि 'अच्छाई' इत्यादि विशेषणजातं प्राग्वत पृ० १९५ |पं०५]६८ महान्ति-महाप्रमाणानि ६९वार्षिकाणि-वर्षाकाले पानीयरक्षार्थ यानि कृतानि वार्षिकाणि तानि च तानि छत्राणि च तत्स | ॥२०७॥ मानानि ७० प्रज्ञप्तानि हे ७१ श्रमण ! हे आयुष्मन् ! ७२ तद् ७३ एतेन अर्थन-अन्वर्थन ७४ गौतम ! ७५एवमुच्यते-७६ 'पद्मव खेदिका' इति, तेषु तेषु यथोक्तरूपेषु प्रदेशेषु यथोक्तरूपाणि पद्मानि पद्मवरवेदिकाशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तमिति भावः, व्युत्पत्तिश्चवंपद्मवरा-पद्मप्रधाना वेदिका पद्मवरवेदिका-इति । ७७पअवरवेदिका ७८किं ७९ शाश्वती उत ८० अशाश्वती-किं नित्या उत अनित्या? इति भावः, भगवानाह-८१गौतम ! ८२ =स्यात् शाश्वती ८३ स्यात्-अशाश्वती-कथंचिन्नित्या कथश्चिदनित्या इत्यर्थः, ८४ प्रश्नसूत्रं सुगमम् । भगवानाह-८५ गौतम ! ८६ द्रव्यार्थतया-द्रव्यास्तिकनयमतेन शाश्वती, द्रव्यास्तिकनयो हि द्रव्यमेव तात्त्विकमभिमन्यते न पर्यायान् , द्रव्यं चान्वयि परिणामित्वात् अन्वयित्वाच्च सकलकालभावि इति भवति द्रव्यार्थतया शाश्वती, ८७वर्णपर्यायैः* " सासया' इति +आदन्ततया सूत्रे निर्देशः प्राकृत्वात्"-राय० वि० । = " स्यात्' शब्दो निपातः कथंचित्'इति एतदर्थवाची"-राय०वि० । + आबन्त-भा०। Jain Educat internal For Private Personal Use Only Aw.jainelibrary.org Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२०८|| पज्जवेहिं फासपज्जवेहिं सासया, "से एएणद्वेणं गोयमा ! एवं बुच्चति सिय सासया लिय असासया । पेंडमवरवेइया णं भंते! कॉलओ केवँचिरं होई ? गोयमाणं कयावि णासि णें कयावि णत्थि में कयाचि न भवि - स्सइ, भुंविं च वइ य भविस्संह य | तत्तदन्यसमुत्पद्यमान वर्णविशेषरूपैः, एवं गन्धपर्यायैः रसपर्यायैः स्पर्शपर्यायैः उपलक्षणमेतत् तत्तदन्यपुद्गलविचटनोच्चटनैश्च ८८ अशाश्वती किमुक्तं भवति १ - पर्यायास्तिकनयमतेन पर्यायप्राधान्यविवक्षायाम् - अशाश्वती, पर्यायाणां प्रतिक्षणभावितया कियत्काल भावितया विनाशित्वात् ८९ 'से एएणट्टेणं' इत्याद्युपसंहारवाक्यं सुगमम् । इह द्रव्यास्तिकवादी स्वमतप्रतिष्ठापनार्थमेवमाह - नात्यन्तासत उत्पादः नापि सतो नाशः "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः " [ भग० गी० अ० २ श्लो०१६ ] इति वचनात्, यौ तु दृश्येते प्रतिवस्तु उत्पाद - विनाशौ तद् आविर्भावतिरोभावमात्रम् यथा सर्पस्य उत्फणत्व-विफणत्वे, तस्मात् सर्वं वस्तु नित्यमिति, एवं च तन्मतचिन्तायां संशयः - किं घटादिवत् द्रव्यार्थतया शाश्वती उत सकलकालमेकरूपा -इति ? ततः संशयापनोदार्थं भगवन्तं भूयः पृच्छति - ९० पद्मवश्वेदिका प्राग्वत् [पृ० २०६ पं० ५] ९१ भदन्त ! १० ९२ कालतः ९३ कियचिरं - कियन्तं कालं यावद् ९४ भवति एवंरूपा हि कियन्तं कालमवतिष्ठति इति ? भगवानाह - ९५ गौतम 1 ९६ न कदाचिन्नासीत् सर्वदैवासीदिति भावः अनादित्वात्, तथा ९७ न कदाचिन्न भवति, सर्वदैव वर्तमानकालचिन्तायां भवतीति भावः सदैव भावात्, तथा ९८न कदाचिन्न भविष्यति, किन्तु भवि यचिन्तायां सर्वदैव भविष्यतीति प्रतिपत्तव्यं, अपर्यवसितत्वात्, तदेवं कालत्रयचिन्तायां नास्तित्वप्रतिषेधं विधाय सम्प्रत्यस्तित्वं प्रतिपादयति - ९९ अभूच्च १०० भवति च १०१ भविष्यति चेति, Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । धुवाँ नियँया सांसया अक्खया अश्या अवट्टियाँ णिचा पउमवर वेइया । [१२०] साणं परमवरवेइया एंगेणं वणसंडेणं सञ्चओ समता संपरिक्खित्ता । से णं वणसंडे देसूणाई दो जोयणाई चक्कवालविक्खंभेणं उवयारियालेणसमे परिक्खेवेणं वणसंडवण्णतो + भाणितव्वो जाव [पृ० १८३ पं० २-० ११६] विहरति । एवं त्रिकालावस्थायित्वात् १०२ ध्रुवा मेर्वादिवत् १०३ ध्रुवत्वादेव सदैव स्वस्वरूपनियता १०४ नियतत्वादेव च शाश्वती - शश्वद्भवनस्वभावा १०५ शाश्वतत्वादेव च सततं गङ्गासिन्धुप्रवाह प्रवृत्तावपि पौण्डरीकहद इवानेकपुद्गलविचटनेऽपि तावन्मात्रान्यपुद्गलोच्चटनसंभवादक्षया, न विद्यते क्षयो- यथोक्तस्वरूपाकारपरिभ्रंशो यस्याः सा अक्षया, १०६ अक्षयत्वादेव अव्यया- अव्ययशब्दवाच्या मनागपि | स्वरूपचलनस्य जातुचिदप्यभावात् १०७ अव्ययत्वादेव सदैव स्वप्रमाणेऽवस्थिता मानुषोत्तराद् बहिः समुद्रवत्, १०८ एवं च खप्र माणे सदावस्थानेन चिन्त्यमाना नित्या धर्मास्तिकायादिवत् । १० [१२०] १ सा पद्मवश्वेदिका २ एकेन वनखण्डेन ३ सर्वतः समन्तात् परिक्षिप्ता, ४ स च वनखण्डो ५ देशोने द्वे योजने ६ चक्रवालविष्कम्भतः - ७परिक्षेपतः उपकारिकालयन परिक्षेपपरिमाणो, ८वनखण्डवर्णकः 'किण्हे किण्होभासे'...इत्यादिरूपः समस्तोऽपि प्राग्वत् [पृ० ९ पं० २ तथा पृ० १८३ पं० २] यावद् विहरन्ति । + वनखण्डवर्णकविषयः सविस्तरः पाठः जीवा० सू० पृ० १८३-१९७ । ॥ २०९॥ w.jainelibrary.org Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२१ ॥ [१२१] तस्सxणं उवयारियालेणस्स चउद्दिसिं चत्तारितिसोवाणपडिरूवगा पण्णत्ता. वण्णओ. तोरणा झया छत्ताइच्छत्ता [पृ० ७८ पं० २] । तस्स णं उवयारियालयणस्स उवरि बहुसमरमणिजे भूमिभागे पण्णत्ते जाव मणीणं फासो [कं० ३३-४०]। [१२२] तस्स णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महेगे मूर्लंपासायवडेंसए प. ण्णत्ते, से णं मूलपासायडिंसते पंर्च जोयणसयाई उड्डे उच्चत्तेणं अड्डाइज्जाइं जोयणसयाई विक्खंभेणं अन्भुग्गयमूसिय-वपणतो [पृ० १६९ पं० ३] भूमिभागो [पृ० ८१ पं० ३] उल्लोओ [पृ० ९७ पं० ३] सीहासणं सपरिवारं [१२१] १ तस्य-उपकारिकालयनस्य २ चतुर्दिशि-चतसृषु दिक्षु एकैकस्यां दिशि एकैकभावेन चत्वारि ३ त्रिसोपानप्रतिरूपकाणि-प्रतिविशिष्टरूपकाणि त्रिसोपानानि प्रज्ञप्तानि, त्रिसोपानवर्णको यानविमानवत् वक्तव्यः [पृ० ७८ ५७-] तेषां च त्रिसोपानप्रतिरूपकाणां पुरतः प्रत्येकमेकैकं तोरणं, तोरणवर्णकोऽवि तथैव [पृ० ७९ पं० ३,६] ४ तस्य उपकारिकालयनस्य 'बहुसमरमणिजे भूमिभागे' इत्यादिना भूमिभागवर्णनकं यानविमानवर्णनवत् तावद् वाच्य यावद् मणीनां स्पर्शः [पृ० ८१ पं० ११-पृ० ९४ पं०५] । १० [१२२] १ तस्य च बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य २ बहुमध्यदेशभागे अत्र ३ महानेको ४ मूलप्रासादावतंसकः प्रज्ञप्तः, ५स |च ६ पञ्च योजनशतान्य॒र्ध्वमुच्चैस्त्वेन ७ अर्द्धतृतीयानि योजनशतानि विष्कम्भतः ८ तस्य वर्णनम् मध्येभूमिभागवर्णनम् उल्लोकव x इदमपि सविस्तरं मूलं जीवा० सू० पृ० २२१ प्र० पं० ५। Jain Education intern al For Private & Personel Use Only Haw.jainelibrary.org Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। भाणियव्वं [पृ० १०२ पं०४-] अट्ठ मंगलगा झया छत्ताइच्छत्ता। से णं मूलपासायवडेंसगे अण्णेहिं चउहिं पासायव.सएहिं तयद्धच्चत्तप्पमाणमेत्तेहिं सव्वतो सनंता संपरिखित्ता, ते णं पासायवडेंसगा अंडाइजाई जोय. णसयाई उड्डू उच्चत्तेणं पंणधीसं जोयणसयं विक्खंभेणं जाव वण्णओ [पृ०१६९ पं०३-] 'ते णं पासायवडिंसया र्णन द्वारबहिःस्थितप्रासादवद् भावनीयम् [पृ० १६९५०९] तस्य* च मूलप्रासादावतंसकस्य बहुमध्यदेशभागेन महती एका मणिपीठिका प्रज्ञप्ता, अष्टौ योजनान्यायामविष्कम्भाभ्यां चत्वारि योजनानि बाहल्यतः सर्वात्मना मणिमयी 'अच्छा' इत्यादि विशेष-५॥२११॥ णकदम्बकं प्राग्वत् [पृ० १९५० ५]18'तीसे गं' इत्यादि, तस्याश्च मणिपीठिकाया उपरि महदेकं सिंहासनं प्रज्ञप्तं, तस्य सिंहासनस्य वर्णनं, परिवारभूतानि शेषाणि भद्रासनानि प्राग्वद् वक्तव्यानि [पृ० १०२ पं०९] ९ स मूलपासादावतंसकः १० अन्यैश्चतुर्भिः प्रासादावतंसकैस्तदर्दोच्चत्वप्रमाणैः सर्वतः समन्ततः परिक्षिप्तः, तदोच्चत्वप्रमाणमेव दर्शयति-११ अर्द्धतृतीयानि योजनशतान्यूर्ध्वचैस्त्वेन, १२ पञ्चविंशं योजनशतं विष्कम्भेन, तेषामपि स्वरूपवर्णनं मध्यभूमिभागवर्णनमुल्लोकवर्णनं च प्राग्वत् [पृ० १६९ पं० ३ पृ० ८१ पं०३-पृ० ९७ पं० ३-] तेषां च प्रासादावतंसकानां बहुमध्यदेशभागे प्रत्येकं प्रत्येक सिंहासनं प्रज्ञतं, तेषां च सिंहासनानां वर्णनं प्राग्वत् [पृ० १०२ पं० ९ पृ० ९८ पं० ३] नवरमत्र शेषाणि परिवारभूतानि वक्तव्यानि, १३ ते प्रासादावतंसका *तस्य' इत्यादिकस्य मणिपीठिकासंबन्धिनः विवरणस्य मूलं न प्रतिभाति । 8" 'तीसे गं' इत्यादि " प्रतीकदर्शनाद् अत्र प्रस्तुतमूलपाठविवरणकारलब्धमूलपाठयोर्भेदः प्रतीयते। -नि भद्रासनानि व०-भा० २। Jain Educat intellational For Private & Personel Use Only ww.jainelibrary.org Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२१२।। | अण्णेहिं चउहिं पासायवडिसएहिं तयधुचत्तप्पमाणमेत्तेहिं सव्वओ समंता संपरिखित्ता,"ते णं पासायवडेंसया पंणवीसं जोयणसयं उड्डे उच्चत्तेणं बाँसहि जोयणाई अद्धजोयणं च विक्खंभेणं अब्भुग्गयमूसिय-[पृ० १६९ पं० ३] वण्णओ भूमिभागो [पृ० ८१ ५३]। उल्लोओ [पृ० ९७ पं०३] सीहासणं सपरिवारं भाणियव्वं [पृ० १०२ पं०४-] अदृह मंगलगा झया छत्तातिच्छत्ता."ते णं पासायवडेंसगा अण्णेहिं चउहिं पासायवडेंसरहिं तदधुच्चत्तपमाणमेत्तेहिं सव्वतो समंता संपरिक्खित्ता, "ते णं पासायवडेंसगा बासहिं जोयणाई अद्धजोयणं च उडूं उच्चत्तेणं एकतीसं जोयणाई कोसं च विक्खंभेणं वण्णओ उल्लोओ सीहासणं० सपरिवारं १४ अन्यैश्चतुभिः प्रासादावतंसकैः तेषां मूलप्रासादावतंसकानां यद तदुच्चत्वप्रमाणमात्रैः-मूलप्रासादावतंसकापेक्षया चतुर्भागमात्रप्रमाणः सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्ताः, तदोच्चत्वप्रमाणमेव दर्शयति-१५ ते प्रासादावतंसकाः १६ पञ्चविंशं योजनशतमूर्ध्वमुच्चैस्त्वेन १७द्वापष्टियोजनानि अयोजनं च विष्कम्भतः, तेषामपि स्वरूपवर्णनम् मध्यभागभूमिवर्णनम्-उल्लोकवर्णनम् सिंहासनवर्णनं च सर्व प्राग्वत् [पृ० १६९ ५०३ पृ०८१५० ३-पृ० ९७ पं०३ पृ. ९८५०३] केवलमत्रापि सिंहासनं १८ सपरिवारं वक्तव्यम् । १९ ते च १० प्रासादावतंसका २० अन्यैश्चतुर्भिः प्रासादावतंसकैस्तदोच्चत्वप्रमाणैः अनन्तरोक्तप्रासादावतंसकार्दोच्चत्वप्रमाणेलप्रासादावतंसकापेक्षया अष्टभागप्रमाणः सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्ताः, तदोच्चत्वप्रमाणमेव दर्शयति-२१ ते च प्रासादावतंसका २२ द्वाषष्टियोजनानि अर्धयोजनं च ऊर्ध्वमुस्त्वेन २३ एकत्रिंशतं योजनानि क्रोशं च विष्कम्भतः, एषामपि स्वरूपवर्णनम् मध्यभागभूमिवर्णनम् उल्लोक ०-णं अपरि-भा० १।-नम् परिवाररहितं प्राग्वत् ते च-भा० १। Jain Education emanal For Private & Personel Use Only wajainelibrary.org Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसे ग इयं । पासाय उवरिं अदृह मंगलगा झया छत्तातिछत्ता। वर्णनम सिंहासनवर्णनं च परिवाररहितं प्राग्वत् [पृ० १६९ पं०३ पृ०८१५०३-पृ० ९७ पं० ३ पृ०९८५०३ पृ० १०२ पं९] ते+ऽपि प्रासादावतंसका अन्यैश्चतुर्भिः प्रासादावतंसकैस्तदर्बोच्चत्वप्रमाणैः-अनन्तरोक्तप्रासादावतंसकार्बोच्चत्वप्रमाणमूलप्रासादावतंसकापेक्षया षोडशभागप्रमाणेः सर्वतः समंतात् संपरिक्षिप्ताः, तदोच्चत्वप्रमाणमेव दर्शयति-एकत्रिंशतं योजनानि क्रोशं च ऊर्ध्वमुच्चस्त्वेन पञ्चदश योजनानि अर्द्धतृतीयांश्चैव क्रोशान् विष्कम्भतः । एतेषामपि स्वरूपादिवर्णनमनन्तरोक्तम् [प्र. पृ० पं० २]| तेऽपि च प्रासादावतंसका अन्यैश्चतुर्भिः प्रासादावतंसकैस्तदोच्चत्वप्रमाणैः-अनन्तरोक्तप्रासादावतंसकार्बोच्चत्वप्रमाणैः सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्ताः, तदोच्चत्वप्रमाणमेव दर्शयति-पञ्चदश योजनानि अर्द्धतृतीयांश्च क्रोशान् ऊर्ध्वमुच्चैस्त्वेन देशोनान्यष्टौ योजनानि विष्कम्भेन, एषामेव स्वरूपव्यावर्णनं भूमिभागवर्णनम् उल्लोकवर्णनं सिंहासनवर्णनं च परिवारवर्जितं प्राग्वत् [प्र. पृ० पं० २] + प्रस्तुतसंपादनोपयुक्तेषु एकस्मिन्नपि लिखितादर्श अतः आरभ्य कण्डिकासमाप्तिपर्यन्तस्य विवरणस्य मूलपाठी न लभ्यते एवमेव च मु० पुस्तकेऽपि, अत एवान विवरणकारलब्धमूलपाठ-प्राप्तादर्शमूलपाठयोर्भदः। स च अलभ्यमानो मूलपाठः श्रीजीवाजीवाभिगमसूत्रे प्रस्तुतान्यप्रसङ्गेऽपि १५ एवमुपलभ्यते-"ते णं पासायडिसगा एकतीस जोयणाई कोसं च उढं उच्चत्तेणं, अद्वसोलसजोयणाई अद्धकोस च आयामविक्खभेष...ते णं पासायडिसगा अद्धसोलस जोयणाई अद्धकोसं च उड्ढे उच्चत्तेणं देसूणाई अट्ट जोयणाई आयामविक्खंभेणं...पृ० २२१ पं०२-८। तद्विवरणं चैवम्-"तदर्बोच्चत्वप्रमाणमेव दर्शयति-एकत्रिशतं योजनानि कोशं चैकमूर्ध्वमुच्चस्त्वेन, पञ्चदश योजनानि अर्धतृतीयांश्च क्रोशान् आयाम-विष्कम्भाभ्याम् ......तर्बोच्चत्वप्रमाणमेव दर्शयति-पञ्चदश योजनानि अर्धतृतीयांश्च क्रोशान् ऊर्ध्वमुच्चस्त्वन देशोनानि अष्टौ योजनानि आयामविष्कम्भाभ्याम्"-जीवा० वृ० पृ० २२३ प्र० पं०११-पृ०२२३ पं०४। ॥११३॥ Jain Education intern al For Private & Personel Use Only wow.jainelibrary.org Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । सुधर्मासभावणेकः ॥११४॥ [१२३]-तस्स णं मूलपासायवडेंसयस्स उत्तरपुरत्थिमेणं एत्थ णं सभा सुहम्मा पण्णत्ता, ऍगं जोयणसयं आयामेणं पणेणासं जोयणाई विक्खम्भेणं बावतरि जोयणाई उड्ढे उच्चत्तेणं अणेगखम्भ...जाव अच्छरगण... पासादीया [पृ० ९४ पं० ३-पृ० ९७ पं० १] सभाए णं सुहम्माए तिदिसिं तओ दारा पण्णत्ता, तंजहा-पुरत्यिमेणं दाहिणेणं उत्तरेणं. ते णं दारा सोलस जोयणाई उड्डे उच्चत्तेणं अट्ठ जोयणाई विक्खम्भेणं तावतिय चेव पवेसेणं सेयो वरकणगथूभियागा जाव वणमालाओ, [तेसि णं दाराणं उवरिं अट्ठ मङ्गलगा झया छत्ताइ-* छत्ता] "तेसि णं दाराणं पुरओ [१२३] १ तस्य मूलप्रासादावतंसकस्य २ उत्तरपूर्वस्यामीशानकोणे इत्यर्थः, अत्र ३ सभा सुधर्मा प्रज्ञप्ता, सुधर्मा नाम विशिष्टच्छन्दकोपेता, सा ४ एकं योजनशतमायामतः ५ पञ्चाशत् योजनानि विष्कम्भतः ६ द्वासप्ततियोजनानि ऊर्ध्वमुच्चैस्त्वेन, कथंभृता सा ? इत्याह-७अनेक....कञ्चणमणिरयणधूभियागा नानाविहपश्चवण्णघण्टापडागपरिमण्डियग्गसिहरा [पृ० ९४ पं०८-पृ०९७ पं०९] अच्छा जाव पडिरूवा' इति प्राग्वत् । ८ सभायाश्च सुधर्मायाः ९ त्रिदिशि तिसृषु दिक्षु एकैकस्यां दिशि एकैकद्वारभावेन १० त्रीणि | द्वाराणि प्रज्ञप्तानि, ११तद्यथा-एकं १२ पूर्वस्याम् एकं १३ दक्षिणस्याम् एकम् १४उत्तरस्याम् १५तानि च द्वाराणि प्रत्येक १६षोडश षोडश योजनान्युर्ध्वमुच्चस्त्वेन १७ अष्टौ योजनानि विष्कम्भतः १८ तावन्त्येवाष्टौ योजनानीति भावः प्रवेशेन, १९ 'सेया वरकणगथूभियागा' इत्यादि प्रागुक्तद्वारवर्णनं तदेव तावद् वक्तव्यं यावत् वनमालाः [पृ० १५६ पं०५-पृ० १६८ पं० ३] इति, २० तेषां * अस्यां कण्डिकायाम्-[ ] एतच्चिबान्तर्गतः पाठः वि० बा० । Jain Education | Mainelibrary.org Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । |॥११५॥ पत्तेयं पत्तेयं मुहण्डवे पण्णत्ते, ते णं मुहमण्डवा ऍग जोयणसयं आयामेणं पण्णासं जोयणाई विक्खंभेणं साइरेगाई सोलस जोयणाई उर्दू उच्चत्तेणं वणओ सभाए सरिसो, तेसि*णं मुहमण्डवाणं तिदिसिं ततो दारा पण्णत्ता, तंजहा-पुरत्थिमेणं दाहिणेणं उत्तरेणं, ते णं दारा सोलस जोयणाई उड्डे उच्चत्तेणं अट्ठ जोयणाई विक्खभेणं तावइयं चेव पवेसेणं सेया वरकणगथूभियागा जाव वणमालाओ ।तेसि णं मुहमंडवाणं भूमिभागा| उल्लोया, तेसि णं मुहमंडवाणं उरिं अट्ठ मङ्गलगा झया छत्ताइच्छत्ता।] तेसिं णं मुहमंडवाणं पुरतो पत्तेयं पत्तेयं पेच्छाघरमंडवे पण्णत्ते, मुहमंडववत्तव्वया जाव दारा भूमिभागा उल्लोया ।। [१२४] तेसिं गं बहुसमरमणिज्जाणं भूमिभागाणं बहुभेज्झदेसभाए पत्तेयं पत्तेयं वइराभए अक्खाडए च द्वाराणां पुरतः २१ प्रत्येकं प्रत्येकं २२ मुखमण्डपः प्रज्ञप्तः, २३ ते च मुखमण्डपा २४ एक योजनशतमायामतः २५ पञ्चाशत योजनानि विष्कम्भतः २६ सातिरेकाणि पोडश योजनानि ऊर्ध्वमुच्चैस्त्वेन, एतेषामपि 'अणेगखम्भसयसन्निविट्ठा' इत्यादि २७ वर्णन सुधर्मसभाया इव निरवशेषं द्रष्टव्यम् [कं० १२३] २८ तेषां च मुखमण्डपानां पुरतः २९ प्रत्येकं प्रत्येकं ३० प्रेक्षागृहमण्डपः प्रज्ञप्तः, ते च प्रेक्षागृहमण्डपा आयाम-विष्कम्भ-उच्चैस्त्वैः प्राग्वत् [पृ० पं० ] प्रेक्षागृहमण्डपानां च भूमिभागवर्णनं प्राग्वत् तावद् वाच्यं यावद् मणीनां स्पर्शः [कं० ३३-४० तथा पृ० ९४ पं० ७-] [१२४] १ तेषां च बहुसमरमणीयानां भूमिभागानां २बहुमध्यदेशभागे ३प्रत्येकं प्रत्येकं ४वज्रमयोऽक्षपाटका प्रज्ञप्तः [पृ०९७/ Jain Education Wemalona For Private & Personel Use Only wivjainelibrary.org Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं ।। ॥११६॥ पण्णत्ते, तेसिं णं वयरामयाणं अक्खाडगाणं बहभज्झदेसभागे पत्तेयं पत्तेयं मणिपेढिया पण्णत्ता, ताओ णं | मणिपेढियातो अट्ट जोयणाई आयामविक्खंभेणं चत्तारि जोयणाई बाहल्लेणं सव्वमणिमईओ अच्छाओ जाव पडिरूवाओ, तासि णं मणिपेढियाण उवरि पत्तेयं पत्तेयं सीहासणे पण्णत्ते, सीहासवण्णओ सपरिवारो, तेसि णं पेच्छाघरमंडवाणं उवरिं अट्ट मंगलगा झया छत्तातिछत्ता, तेसिं णं पेच्छाघरमंडवाणं पुरओ पत्तयं पत्तेयं मणिपेडियाओ पण्णत्ताओ, ताओ णं मणिपेढियातो सोलंस सोलस जोयणाई आयामविक्खंभेणं अट्ट जोयणाई बाहल्लेणं सवमणिमईओ अच्छाओ पडिरूवाओ, तासिणं उवरि पं० १४-] ५ तेषां च वज्रमयानामक्षपाटकानां ६ बहुमध्यदेशभागे ७ प्रत्येकं प्रत्येकं ८ मणिपीठिका प्रज्ञप्ता ९ ताश्च मणिपीठिकाः १० अष्ट योजनान्यायाम-विष्कम्भाभ्यां ११ चत्वारि योजनानि बाहल्येन-पिण्डभावेन १२ सर्वात्मना मणिमय्यः १३ 'अच्छाओं' इत्यादि विशेषणजातं मागिव [पृ० ९८५०६]। १४ तासां च मणिपीठिकानामुपरि १५ प्रत्येकं प्रत्येकं १६ सिंहासन प्रज्ञप्तं, १७ तेषां च सिंहासनानां वर्णनं परिवारश्च प्राग्वद् वक्तव्यः [पृ० ९८ पं०८] १८तेषां च प्रेक्षागृहमण्डपानामुपरि १९अष्टा- १० वष्टौ मङ्गलकानि बहवः कृष्णचामरध्वजा इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९ पं०६-पृ० २० पं० ९] २० तेषां प्रेक्षागृहमण्डपानां पुरतः २१ प्रत्येकं प्रत्येकं २२ मणिपीठिकाः प्रज्ञप्ताः, २३ ताश्च मणिपीठिकाः प्रत्येकं प्रत्येकं २४ षोडश योजनान्यायाम-विष्कम्भाभ्याम् |२५ अष्टौ योजनानि बाहल्येन २६ सर्वात्मना मणिमय्यः 'अच्छा' इत्यादि विशेषणकदम्बकं प्राग्वत् [पृ० ९८ पं०६] २७तासां Jain Education timallal ॥ ॥ For Private 8 Personal Use Only Ilainelibrary.org Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेग इयं। | ॥११७॥ पैत्तयं पत्तयं धुंभे पण्णत्ते, "ते णं *थूभा सोलस सोलस जोयणाई आयामविखंभेणं साइरेगाई सोलस स्तूपवणका सोलस जोयणाई उड्डे उच्चत्तणं, सेया संखंक...[पृ०१७९५०३] सव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा, तेसि णं थूभाणं उरिं अट्ठ मंगलगा झया छत्तातिछत्ता जाव सहस्सपत्तहत्थया । तेसिँ णं थूभाणं पत्तेयं पत्तेयं चउद्दिसि ऑणिपेढियातो पण्णत्ताओ, ताओ णं मणिपेढियातो अहूँ जोयणाई आयामविक्खंभेणं चत्तारि जोयणाई बाहल्लेणं सव्वमणिमईओ अच्छाओ जाव पडिरूवातो, तासि णं मणिपेढियाणं उरि च मणिपीठिकानामुपरि २८ प्रत्येकं प्रत्येकं २९ चैत्यस्तूपः प्रज्ञप्तः, ३० ते च चैत्यस्तूपाः ३१ षोडश योजनान्यायाम-विष्कम्भाभ्यां ३२ सातिरेकाणि षोडश योजनान्य॒र्ध्वमुच्चैस्त्वेन 'संखक'-इत्यादि तद्वर्णनं सुगमम् , [पृ० १७९ पं०१२] ३३ तेषां च चैत्यस्तूपानामुपरि ३४ अष्टावष्टौ स्वस्तिकादीनि मङ्गलकानि 'जाव सहस्सपत्तहत्थया' इति 'यावत्' करणात् तेसिं चेइयथूभाणं उप्पि बहवे किण्हचामरज्झया [पृ० २५५०२ तथा पं०९] तेसिं चेइयथूभाणं उप्पि बहवे छत्ताइच्छत्ता ...[पृ० २१ पं० १ तथा ५] इति, एतच्च समस्तं प्राग्वत् । ३५ तेषां चैत्यस्तूपानां ३६ प्रत्येकं प्रत्येकं ३७ चतुर्दिशि-चतसृषु दिक्षु एकैकस्यां दिशि एकैकमणि-20 पीठिकाभावेन चतस्रो ३८ मणिपीठिकाः प्रज्ञप्ताः ३९ अष्टौ योजनान्यायामविष्कम्भाभ्यां ४० चत्वारि योजनानि बाहल्येन ४१ | सर्वात्मना मणिमय्यः 'अच्छा' इत्यादि प्राग्वत [पृ० ९८ पं० ६] ४२ तासां च ० मणिपीठिकानामुपरि एकैकप्रतिमाभावेन * "चेइयथूभा"-जीवा० पृ० २२४ पं० १४। 0 मणिपीठिकानामुपरि एकैकस्या अपि मणिपीठिकाया उपरि एकैक-पा० ४-५ । Jain Education emanal For Private Personel Use Only wilainelibrary.org Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥१८॥ |चत्तारि जिणपॅडिमातो जिणुस्सेहपमाणमेत्ताओ संलियकनिसन्नाओ थूभाभिमुहीओ सन्निखित्ताओ चिट्ठति, | तंजही-उसभा वद्धमाणा चंदाणेणा वारिसेणा। जिनप्रति मानां नाम[१२५] तेसिणं थूभाणं पुरतो पत्तेयं पत्तेयं मणिपेढियातो पण्णत्ताओ,ताओणं मणिपेढियातो सोलस जोयणाई ग्राईवर्णकः आयामविखंभेणं अहूँ जोयणाई बाहल्लेणं सबमणिमईओ जाव पडिरूवातो, तासि णं मणिपेढियाणं उवरिं पत्तेयं पत्तेयं चेइयरुक्खे पण्णत्ते, ते णं चेइयरुक्खा अट्ट जोयणाई उड्डे उच्चत्तेणं अद्ध जोयणं उब्वेहेणं, 'दो जोय. णाई खंधा अद्धजोयणं विक्खंभेणं छै जोयणाई विडिमा बहुमज्झदेसभाए ४३ चतस्रो ४४ जिनप्रतिमाः ४५ जिनोत्सेधप्रमाणमात्राः जिनोत्सेध उत्कर्षतः पञ्च धनुःशतानि जघन्यतः सप्त हस्ताः, इह तु पञ्च धनुःशतानि सम्भाव्यन्ते, ४६ पर्यङ्कासनसन्निषण्णाः, ४७ स्तूपाभिमुख्यः ४८ सन्निक्षिप्ताः, तथा जगत्स्थितिखाभाव्येन सम्यग्निवेशितास्तिष्ठन्ति, ४९ तद्यथा-५० ऋषभाः ५१ वर्द्धमानाः ५२ चन्द्राननाः ५३ वारिषेणा:-इति । [१२५] १ तेषां चैत्यस्तूपानां पुरतः २ प्रत्येकं प्रत्येकं ३ मणिपीठिकाः प्रज्ञप्ताः, ४ ताश्च मणिपीठिकाः ५ षोडश योजना-१० न्यायामविष्कम्भाभ्याम् ६ अष्टौ योजनानि बाहल्यतः ७ 'सव्वमणिमईओ'इत्यादि प्राग्वत , [पृ० ९८५०६] ८ तासां च मणिपीठिकानामुपरि ९ प्रत्येक प्रत्येकं १० चैत्यवृक्षा ११ अष्टौ योजनान्य॒र्ध्वमुच्चैस्त्वेन १२ अर्द्धयोजनमुद्वेधेन-उण्डत्वेन, १३ द्वे योजने उच्चैस्त्वेन १४ स्कन्धः स एव १५ अर्ध योजनं विष्कम्भतया १८ बहुमध्यदेशभागे १७ विडिमा-ऊवं विनिर्गता शाखा सा __ + ओपलियंक-भा० १। x अट्ठ जोयणाई-मु० पु० पाठः स च विवरणविरोधो । lainEducationten For Private Personal use only jainelibrary.org Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । चैत्यवृक्षाणां वर्णक अ? जोयणाई आयामविखंभेणं साइरेगाइं अट्ट जोयणाई सव्वग्गेणं पण्णता, तेर्सि' णं चेइयरुक्खाणं इमेयारवे वण्णावासे पपणत्ते, तंजैहा-वयंरामयमूलरययसुपइट्टियविडिमा रिट्ठामयविउलकंदवेरुलियरइलखंधा सुजॉयवरजायरूवपढमगविसालसाला नाणामणिमयरयणविविहसाहप्पसाहवेरुलियपत्ततवणिजपत्तबिंटा जधणयरत्तमउयसुकुमालपवालपल्लववरंकुरधरा विचित्तमणिरयणसुरभिकुसुमफलभरनमियसाला ऊर्ध्वमञ्चस्त्वेन १६ षड् योजनानि १९ अष्टौ योजनानि २० विष्कम्भेन २२ सर्वाग्रेण २१ सातिरेकेणाष्टौ योजनानि प्रज्ञप्ताः २३तेषां च चैत्यवृक्षाणाम् २४अयमेतद्रूपो वर्णावासः प्रज्ञप्तः २५तद्यथा-२६वज्राणि-वज्रमयानि मूलानि येषां ते वज्रमयमूला रजते सुप्रतिष्ठिता विडिमा-बहुमध्यदेशभागे ऊवं विनिर्गता शाखा येषां ते रजतसुप्रतिष्ठितविडिमा:* २७ रिष्टमयो-रिष्टरत्नमयः कन्दो येषां ते रि- टमयकन्दाः, तथा वैडूर्यरत्नमयो रुचिरः स्कन्धो येषां ते *तथा, २८ सुजातं-मूलद्रव्यशुद्धं वरं-प्रधानं यत् जातरूपं तदात्मकाः प्रथमका-मूलभूता विशालाः शालाः शाखा येषां ते सुजातवरजातरूपप्रथमकविशालशालाः २९ नानामणिरत्नात्मिका विविधाः शाखाः प्रशाखा येषां ते तथा वैडूर्याणि-वैडूर्यमयाणि पत्राणि येषां ते तथा तपनीयमयानि पत्रवृन्तानि येषां ते तथा, ३० जाम्बूनदाजाम्बूनदसुवर्णविशेषमया रक्ता-रक्तवर्णा मृदवः-मनोज्ञाः सुकुमाराः-सुकुमारस्पर्शाःप्रवाला:-ईपदुन्मीलितपत्रभावाः पल्लवाः-संजातपरिपूर्णप्रथमपत्रभावरूपा वराङ्कराः-प्रथममुद्भिद्यमाना अङ्करास्तान् धरन्तीति जाम्बूनदरक्तमृदुसुकुमारप्रवालपल्लवाङ्करधराः ३१ विचि + नैतत् पदं विवरणे । * " ततः पूर्वपदेन कर्मधारयः समास: "-राय० वि० । 0 “ ततः पूर्ववत् पदद्वयमीलनेन कर्मधारयः" -राय० वि०। ॥११९॥ Jain Education lema al For Private & Personel Use Only wijainelibrary.org Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥१२०॥ सच्छाया सप्पभा सँस्सिरीया संउज्जोया अहियं नयण-मणणिव्वुइकरा अमयरससमरसफला पासाईया... तेर्सि गं चेइयरुक्खाणं उरि अहह मंगलगा झया छत्ताइछत्ता । तेर्सि' णं चेइयरुक्खाणं पुरतो पत्तेयं पत्तयं मणिपेढियाओ पण्णत्ताओ, ताओ णं मणिपेढियाओ अट्ट जोयणाई आयामविक्खंभेणं चत्तारि जोयणाई बाहल्लेणं त्रमणिरत्नमयानि यानि सुरभीनि कुसुमानि फलानि च तेषां भरेण नमिताः शाला:-शाखा येषां ते तथा, तथा ३२ सती-शोभना छाया येषां ते सच्छाया, ३३ सती-शोभना-प्रभा-कान्तियेषां ते सत्प्रभाः, अत एव ३४ सश्रीकाः, तथा ३५ सह उद्द्योतेन वर्तन्ते मणिरत्नानामुयोतभावात् सोयोताः, ३६ अधिकं नयन-मनोनिवृतिकराः ३७अमृतरससमरसानि फलानि येषां ते तथा, ३८'पासाईया'इत्यादिविशेषणचतुष्टयं प्राग्वत् [पृ०७ पं०१] एते च चैत्यवृक्षा अन्यैबहुभिस्तिलक-लवक-च्छत्रौपग-शिरीष-सप्तपर्ण-दधिपर्णलुब्धक-धवल-चन्दन-नीप-कुटज-पनस-ताल-तमाल-प्रियाल-प्रियङ्गु-पारापत-राजवृक्ष-नन्दिवृक्षः सर्वतः समन्तात् सम्परिक्षिसाः, ते च तिलका यावनन्दिवृक्षा मूलमन्तः कन्दमन्त इत्यादि सर्वमशोकपादपवर्णनावामिव [पृ० १२ पं० २] तावद् वक्तव्यं यावत् परिपूर्ण लतावर्णनम् [पृ० १२५० ४] ३९तेषां चैत्यवृक्षाणामुपरि ४०अष्टावष्टौ मङ्गलकानि बहवः कृष्णचामरध्वजा इत्यादि चैत्यस्तूप १० इव तावद् वक्तव्यं यावद् बहवः सहस्रपत्रहस्तकाः, सर्वरत्नमया यावत् प्रतिरूपका इति [पृ०८७ पं०७]४१ तेषां च चैत्यवृक्षाणां पुरतः ४२ प्रत्येकं ४३ मणिपीठिकाः प्रज्ञप्ताः, ४४ ताश्च मणिपीठिका ४५ अष्टौ योजनान्यायामविष्कम्भाभ्यां ४६ चत्वारि योजनानि बाह x अत आरभ्य 'यावत् प्रतिरूपकाः' [पं० ११] इत्यन्तस्य विवरणस्य मूलपाठो मूले न दृश्यते । Jain Education Interior For Private Personel Use Only Jiw.telibrary.org Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण-I इयं ।। सव्वमणिमईओ अच्छाओ जाव पडिरूवाओ, तासि णं मणिपेढियाणं उरि पत्तेयं पत्तेयं महिंदज्झए पण्णत्ते, | "ते णं महिंदज्झया सहि जोयणाई उई उच्चत्तणं ० अद्धकोसं उब्वेहेणं अद्धकोसं विखंभेण वइरामय-..[पृ०१०९ पं०२]-सिहरा पासादीया । तेसिं णं महिंदज्झयाणं उवरि अट्ट मंगलगा झंया छत्तातिछत्ता [पृ० ८० पं०३] तेसिं णं महिंदज्झयाण पुरतो पत्तयं पत्तेयं नंदा पुक्खरिणीओ पण्णत्ताओ, ताओणं पुक्खरिणीओ =एगं जोयणसयं आयामेणं पंण्णासं जोयणाई विखभेणं दस जोयणाई उन्हेणं ल्यतः ४७ 'सव्व रयणामईओ' इत्यादि प्राग्वत पृ०९८५६] ४८ तासां च मणिपीठिकानामुपरि ४९ प्रत्येकं ५० महेन्द्रध्वजः प्रज्ञप्तः, ५१ते च महेन्द्रध्वजाः ५२षष्टियोजनान्यूर्ध्वमुच्चैस्त्वेन ५३अर्द्धक्रोशम्-अर्चगव्यूतमुद्वेधेन-उण्डत्वेन ५४अर्द्धक्रोशं विष्कम्भतः ५५ 'वइरा'...[पृ० १०९५०२-८] ५६तेषां महेन्द्रध्वजानामुपरि ५७ अष्टावष्टौ मङ्गलकानि ५८ बहवः कृष्णचामरध्वजा इत्यादि | ॥१२॥ | तोरणवत् सर्व वक्तव्यम् [पृ०८०पं०९] ५९ तेषां च महेन्द्रध्वजानां पुरतः ६० प्रत्येकं ६१ नन्दा नन्दाभिधाना पुष्करिणी प्रज्ञप्ता, ६२एकं योजनशतमायामतः ६३पञ्चाशत योजनानि विष्कम्भतः ६४ ० दश योजनान्युद्वेधेन-उण्डत्वेन, तासां च नन्दापुष्करिणीनां १० ० अत्र सर्वप्रतिषु मु० पुस्तके च 'जोयण उव्वेहणे जोयण विखंभेणं' इति-एव पाठ उपलभ्यते, केवलम् भा०२ प्रती 'सद्धि जोयणाई उड्ढे उच्चत्तेणं अद्धकोसं उव्वेणं, अद्धकोसं विक्खंभेण' इति लभ्यते परंतु भा० २ प्रतावपि मूलतस्तु 'जोयण' इत्यादिक एव पाठो दृश्यत, अनन्तरं केनचित् शोधकेन मूल-विवरणयोर्वेषम्यं परिहर्तुकामेन 'जोयण' स्थाने 'अद्धकोस' इति परिवर्तितं प्रतिभाति, अस्माभिस्तु मूल-विव. रणयोः संवादाय विवरणानुसारी स शोधित एव पाठोऽत्र मूले न्यस्तः। = एग जोयणाई विक्खंभेग दस जोयणाई उन्हेणं पा०१। - मूलविवरणयोः पाठभेदः । ० मु० पु० विवरणे तथा पा० ४-५, भा०१ प्रतौ च विवरणे 'दासप्ततियोजनानि' इत्येव पाठो लभ्यते किन्तु केवलं १०/ Jain Education in alla For Private & Personel Use Only Jainelibrary.org Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥१२२॥ Jain Education अच्छाओ-जाव वण्णओ - एगइयाओ उदगर सेणं पण्णत्ताओ, पत्तेयं पत्तेयं पउमँवरवेइयापरिखित्ताओ पत्तेयं | पत्तेयं वणसंड परिक्खित्ताओ [पृ० १९१ पं० २] तसि णं णंदाणं पुक्खरिणीणं तिदिसि' तिसोवाणपडिरूवगा पण्णत्ता, तिसोवाणपडिरूवगाणं वण्णओ, तोरणा झया छत्तातिछत्ता । सभाएँ णं सुहम्माए अंडयालीसं मणोगुलियामा हस्तीओ पण्णत्ताओ, तंजहा- पुरन्थिंमेण सोलससाहस्सीओ पचत्थिमेणं सोलसमाहस्सीओ दौहिणेणं | अट्ठसाहस्सीओ उत्तरेण 'अट्टसाहस्सीओ, तासु णं मणोगुलियासु बहवे सुवण्णरुपमया फलगा पण्णत्ता, | तेसु णं सुवन्नरुपमएसु फलगेसु बहवे बइरामया णागदंता पण्णत्ता, तेसु णं वइरामएसु णागदंत एस किण्हसुत्तवहवग्घारियमल्लदामकलावा चिट्ठेति, ६५ 'अच्छाओ सण्हाओ रययामय'... इत्यादि वर्णनं प्राग्वत् [ पृ० १९१६०२ - ७] ताश्च नन्दापुष्करिण्यः प्रत्येकं प्रत्येकं ६६ पद्मवरवेदिकया प्रत्येकं प्रत्येकं ६७ वनखण्डेन परिक्षिप्ताः, ६८ तासां च नन्दापुष्करिणीनां प्रत्येकं ६९ त्रिदिशि ७० त्रिसोपानप्रतिरूपकतोरणवर्णनं प्रागिव [पृ० ७८ पं० ६ - पृ० ८१ पं० १०] ७१ सभायां सुधर्म्मायाम् ७२ अष्टचत्वारिंशन्मनोगुलिका सहस्राणि - पीठिकासहस्राणि प्रज्ञप्तानि, ७३ तद्यथा-७४पूर्वस्यां दिशि पोडश मनोगुलिकासहस्राणि, ७५ पोडश सहस्राणि पश्चिमायाम् ७६ अष्टौ सहस्राणि दक्षिणतः ७७ अष्टौ सहस्राणि उत्तरतः, ७९ एतासु च फलक-नागदन्तक-- माल्यदामवर्णनं प्राग्वत् [ पृ० १७६ पं० २ ] सिक्कगवर्णनं भा० २ प्रतावेव 'दश योजनानि' पाठः प्राप्तः स एव च पाठः मूलपाठानुसारी अत एव अत्र स्त्रीकृतः । विवरणे निर्दिष्टः 'द्वासप्ततियोजनानि ' पाठोऽपि विशेषेण विचारणीयोऽस्ति नहि अविमृश्यैव विवरणकारेण एवं निर्देशः कृतो भवेत् । jainelibrary.org Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । | ॥२२३॥ सभाए णं सुहम्माए अडयालीसं गोमाणसियासाहस्सीओ पन्नत्ताओ, जैह मणोगुलिया जाव णागदंतगा, तेसु णं णागदंतएसु बहवे रययामया सिकगा पण्णत्ता, तेसुणं रययामएस सिकगेसु बहवे वेरुलियामइओ धूवघडियाओ पण्णत्ताओ, ताओ णं धूवघडियाओ कालागुरुपवर-जाव [पृ० १६४ पं ३] चिट्ठति। [१२६] सभाए णं सुहम्माए अंतो बहुसमरमणिजे भूमिभागे पण्णत्त जाव मणीहिं उवसोभिए मणिफासो य उल्लोयो य, तस्स णं बहुसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महेगा मणिपेढिया पण्णत्ता सोलस जोयणाई आयामविक्खंभेणं अई जोयणाई बाहल्लेणं सब्वमणिमयी जाव पडिरूवा। तीसे णं मणिपेढियाए उवरिं एत्थ णं माणवेए चेइयखंभे पण्णत्ते, धूपघटिकावर्णनं द्वारवत् [पृ०१६४ पं०२-३] ८०सभायां सुधर्मायां ८१ अष्टाचत्वारिंशत् ८२गोमानसिकाः-शय्यारूपाः स्थानविशेपास्तेषां सहस्राणि प्रज्ञप्तानि, ८३तद्यथा-पोडश सहस्राणि पूर्वतः पोडश सहस्राणि पश्चिमायाम अष्टौ सहस्राणि दक्षिणतः अष्टौ सहस्राणि उत्तरतः, तास्वपि फलकवर्णनम् नागदन्तवर्णनम् सिक्कगवर्णनम् धूपघटिकावर्णनं च द्वारवत [पृ० १७६ पं०२, पृ०१६४ पं० २-३] |२० [१२६] १ 'सभाए णं सुहम्माए' इत्यादिना भूमिभाग वर्णनं उल्लोकवर्णनं च प्राग्वत् [पृ०८१, ९७ पं०३] २ तस्य बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य ३ बहुमध्यदेशभागेत्र ४ महती एका मणिपीठिका प्रज्ञप्ता, ५ षोडश योजनान्यायाम-विष्कम्भाभ्याम् ६ अष्टौ | योजनानि बाहल्यतः ७ सर्वरत्नमयी इत्यादि प्राग्वत् [पृ० पं०] ८ तस्याश्च मणिपीठिकाया उपरि महानेको ९ माणवकनामा चैत्य____x-वर्णन 'सभाए णं सुहम्माए इत्यादिना उल्लोकवर्णनं च प्रा-पा० ४-५ भा० । Jain Education lemonal For Private Personel Use Only watjainelibrary.org Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥२४॥ सटिंजोयणाई उड्डूं उच्चत्तेणं, जोयणं उव्वेहेणं, जोयणं विक्खंभेणं अडयालीसंअंसिए अडयालीसइ०कोडीए अडयालीसइविग्गहिए सेसं जहा महिंदज्झयस्स [पृ० पं०] माणवगस्स णं चेइयखंभस्स उवरिं बारस जोयणाई सिक्ककोपओगाहेत्ता हेट्टीवि बारस जोयणाई वज्जेत्ता *मैज्झे छत्तीसाएँ जोयणेसु एत्थ णं बहवे सुवण्णरुप्पमया फलगा रिस्थित समुद्के षु पण्णत्ता, तेसु णं सुवण्णरुप्पामएसु फलएमु बहवे वइरामया णागदंता पण्णत्ता, तेसु णं वइरामएसु नागदंतेसु देवपूज्यानि बहवे रययामया सिकगा पण्णत्ता, तेसुणं रययामएसु सिक्कएसु बहवे वइरामया गोलबहसमुंग्गया पण्णत्ता, जिनसतेसु णं वयरामएसु गोलवहसमुग्गएसु बहवे जिणसहातो संनिखित्ताओ चिट्ठति। तातो णं सूरियाभस्स क्थीनि स्तम्भः प्रज्ञप्तः, १० षष्टियोजनान्य॒र्ध्वमुच्चैस्त्वेन ११ योजनमुद्वेधेन १२ योजनं विष्कम्भेण १३ अष्टाचत्वारिंशदनिकः १४ 'अडयालीसइकोडीए १५ अडयालीसइविग्गहिए' इत्यादि सम्प्रदायगम्यम् । 'वइरामयवट्ट' इत्यादि १६ महेन्द्रध्वजवत् वर्णनं निरवशेषं तावद् वक्तव्यं यावत् 'सहस्सपत्तहत्थगा सव्वरयणामया जाव पडिरूवा इति [पृ०१०९५०२] तस्य च १७ माणवकस्य चैत्यस्तम्भस्य उपरि १८द्वादश योजनानि ० अवगाह्य-उपरितनभागात् द्वादश योजनानि वर्जयित्वेति भावः, १९अधस्तादपि द्वादश योजनानि वर्जयित्वा १० २० मध्ये २१ षट्त्रिंशति योजनेषु २२ 'चहवे सुवण्णरुप्पामया फलगा' इत्यादि फलकवर्णनम् नागदन्तवर्णनम् सिक्ककवर्णनं च प्राग्वत् [पृ० १७६ पं०२-९] २३ तेषु च रजतमयेषु सिक्ककेषु बहवो २४ वज्रमया २५ गोलवृत्ताः-गोलवद् वृत्ताः समुद्गकाः प्रज्ञप्ताः, २६ तेषु च वज्रमयेषु समुद्केषु २७ बहूनि २८ जिनसक्थीनि सन्निक्षितानि तिष्ठन्ति, यानि २९ सूर्याभस्य देवस्य ०-कोडाकोडीए-भा० १। * मझे बत्तीसाए-मु० पु० पाठः, स च विवरणं नानुसरति। 0 अवगम्य उ-मा० १। Jain Education allemaal For Private Personel Use Only Jainelibrary.org Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। | देवस्स अन्नेसिं च बहूण देवाण य देवीण य अचणिज्जाओ जाव 4ज्जुवासणिज्जातो। माणबैंगस्स चेइयखंभस्स उवरिं अह मंगलगा झया छत्ताइच्छत्ता।। [१२७] तस्स माणवगस्स चेइयखंभस्स पुरत्यिमेणं एत्य णं महेगा मणिपेढिया पण्णत्ता, अहूं जोयणाई आयामविक्खंभेणं चत्तारि जोअणाई बाहल्लेणं सव्वमणिमई अच्छा जाव पडिरूवा, तीसे णं मणिपेढियाए उरि एत्थ णं महेगे सीहासणे पण्णत्ते सीहासणवण्णतो सपरिवारो [पृ० ९८ पं०३-] तस्स णं माणवगस्स 4॥२२५॥ चेइयखभस्स पञ्चेत्थिमेणं एत्थ णं महेगा मणिपेढिया पण्णत्ता अट्ट जोयणाई आयामविक्वंभेणं ३० अन्येषां च बहूनां वैमानिकानां देवानां देवीनां च ३१ अर्चनीयानि चन्दनैः, वन्दनीयानि स्तुत्यादिना, पूजनीयानि पुष्पा दिना, माननीयानि बहुमानतः, सत्करणीयानि वस्त्रादिना, कल्याणं मङ्गलं दैवतं चैत्यमितिबुद्ध्या ३२ पर्युपासनीयानि । ३३ 'तस्स णं चेइयखंभस्स उवरि बहवे अट्ठट्ठ मंगलगा' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९ पं०४-] [१२७] १ तस्य माणवकस्य २ चैत्यस्तम्भस्य ३ पूर्वस्यां दिशि अत्र ४ महत्येका ५ मणिपीठिका प्रज्ञप्ता, सा च ६ अष्टौ २० योजनान्यायाम-विष्कम्भाभ्यां ७ चत्वारि योजनानि बाहल्येन ८ 'सव्वमणिमई' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९ पं०५] [९-सिंहासनं प्रज्ञप्तम् सिंहासनवर्णनम् [पृ० ९८ पं० ३] शेषाणि च भद्रासनानि तत्परिवारभूतानि प्राग्वत् [कं० ४४]। १० तस्य माणवकनाम्नः ११ चैत्यस्तम्भस्य १२ पश्चिमायां दिशि अत्र १३ महती एका १४ मणिपीठिका प्रज्ञप्ता साऽपि १५ अष्टौ योजनानि आयाम-विष्क [ ] एतचिहान्तर्गतः पाठः केवलं भा० १-२ प्रतावेव तथापि मूलानुसारित्वेन अत्र न्यस्तः । Jain Educati o nal For Private & Personal use only | Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥२२६॥ चत्तारि जोयणाई बाहल्लेणं सव्वमणिमया अच्छा जाव पडिरूवा, 'तीसे णं मणिपेढियाए उवरिं एत्थ णं हेगे देवस्यणिज्जे पण्णत्ते, तस्सें णं देवसयणिजस्स इमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते, तंजहा-गाणामणिमया पडिपाया सोर्वेन्निया पायौ णाणामणिमयाइं पायसीसँगाई जंबूणयामैयाई गैत्तगाई बइरामैया " संधी णाणामणिमए ० विच्चे रययामैई तूली लोहियक्खमया विब्बोयणौ तवणिज्जमैंया गंडोवहाणैया "से णं सयणिज्जे सीलिंगणवट्टिए म्भाभ्यां १६ चत्वारि योजनानि बाहल्येन । 'सव्वमणिमया' इत्यादि प्राग्वत् |] [पृ० ९८ पं० २ तथा पृ०१०२ पं० १] १७ तस्याश्च | मणिपीठिकाया उपरि अत्र १८ महदेकं १९ देवशयनीयं प्रज्ञप्तम्, २० तस्य च देवशयनीयस्य २१ अयमेतद्रूपो वर्णावासो - वर्णनि| वेश: प्रज्ञप्तः, तद्यथा - २२ नानामणिमयाः २३ + प्रतिपादा- मूलपादानां प्रतिविशिष्टोपष्टम्भकरणाय पादाः प्रतिपादाः, २४ सौवर्णिका:| सुवर्णमयाः २५ पादाः - मूलपादाः, २६ नानामणिमयानि २७ पादशीर्षकाणि २८ जाम्बूनदमयानि २९ गात्राणि - ईषा - आदीनि ३० वज्रमया - वज्ररत्नापूरिताः ३१ सन्धयः ३२ नानामणिमयं ३३ व्यूतं विशिष्टवानम् ३४ रजतमयी ३५ तूली ३६ लोहिताक्षमयाणि ३७ 'बिब्बोयणा' इति उपधानकानि, आह च जीवाभिगममूलटीकाकार:- “विब्बोयणा - उपधानकान्युच्यन्ते" ] इति, ३८ तपनीयमय्यो ३९ गण्डोपधानिकाः, ४० तद् देवशयनीयं ४१ सालिङ्गनवर्तिकम् - सह आलिङ्गनवर्या-शरीर० पृ०९८ पं०५ तथा १२ । "वेच्चं व्यूतं वानम् इत्यर्थः " - जीवा० वृ० प्र०१० २१० पं०६ । 'वान' शब्दस्य पर्यायः भाषायाम् 'वाण' - 'खाटलानं वाण' इति । + भाषायाम् - पडवाया । * भाषायाम् ईषा - 'ईस - खाटलानी ईस' इति प्रसिद्धम् । 0 जीवा० वृ०पृ० २३१ पं०१४ | Jain Education interational | देवशयनीयस्यवर्णकः ww.jainelibrary.org Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण-| इयं। ॥२२७॥ | उभओविब्बोयणं दुहतोउण्णते मज्झे णयगंभीरे गंगापुलिणवालुयाउद्दालसालिसए सुविरइयरयत्ताणे उँवधियखोमदुगुल्लपट्टपडिच्छायणे आईणग-रूय-बूर-णवणीय-तुलफासमउते [पृ० ९९५०२] रत्तंसुयसंवुए सुरम्मे पासादीये...पडिरूवे। [१२८] तस्स णं देवसयणिजस्स उत्तरपुरथिमेणं महेगा मणिपेढिया पण्णत्ता, अढे जोयणाई आयामविक्खंभेणं चत्तारि जोअणाई बाहल्लेणं सव्वमणिमयी जाव पडिरूवा, तीसे णं मणिपेढियाए प्रमाणेनोपधानेन यत् तत् तथा, ४२ उभयतः-उभौ-शिरोऽन्त-पादान्तावाश्रित्य बिब्बोयणम्-उपधानं यत्र तत् उभयतोबिब्बोयणं ४३ उभयतउन्नतं ४४ मध्ये नतं च तत् निम्नत्वात् गम्भीरं च महत्त्वान्नतगम्भीरं ४५ गङ्गापुलिनवालुकाया अवदालो-विदलनं पादादिन्यासे अधोगमनमिति भावः तेन 'सालिसए' इति सदृशकम् गङ्गापुलिनवालुकावदालसदृशकं, दृश्यते चायं प्रकारो हंसतूल्यादिष्विति, तथा ४६ 'उपचित इति विशिष्टं परिकर्मितं क्षौम-कासिकं दुकूलं-वस्त्रं तदेव पट्टः उपचितक्षौमदुकूलपट्टः स प्रतिच्छदनंआच्छादनं यस्य तत् तथा प्राग्वत् [पृ. ९९६०९] ४७ रक्तांशुकेन संवृतं रक्तांशुकसंवृतम्-अत एव ४८ सुरम्यम् 'पासादीये इत्यादिपदचतुष्टयं प्राग्वत् [पृ० ७ पं० ५]। [१२८] १ तस्य देवशयनीयस्य २ उत्तरपूर्वस्यां दिशि अत्र ३ महत्येका ४ मणिपीठिका प्रज्ञप्ता, सा च ५ अष्टौ योजनान्यायाम-विष्कम्भाभ्यां ६ चत्वारि योजनानि बाहल्यतः ७ 'सव्वमणिमयी' इत्यादि माग्वत् [पृ० १९५०८] ८ तस्याश्च मणिपीठिकाया Jain Education idlmalinal For Private Personel Use Only wwtjainelibrary.org Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । | सूर्याभस्य प्रहरण कोशः ॥२२८॥ उर्वरि एत्थ णं महेगे खुडुएं महिंदज्झए पण्णत्ते सहि जोयणाई उड्डे उच्चत्तेणं जोयणं विक्खंभेणं वइरामया वट्टलट्ठसंठियसुसिलिट्ठ-जाव-पडिरूवा, [पृ० १०९ पं० २] उवरि अहह मंगलगा झया छत्तातिच्छत्ता, तस्स णं | खुड्डागमहिंदज्झयस्स पचैथिमेणं एत्थ णं सूरियाभस्स देवस्स चोप्पाले नाम पहरणकोसे पन्नत्ते सव्ववइरामए अच्छे जाव पडिरूवे, तत्थं णं सूरियाभस्स देवस्स फैलिहरयण-खग्ग-गया-धणुप्पमुही बहवे पहरणरयणा संनिखित्ता चिट्ठति, उजला निर्सिया सुतिक्खधारा पासादीया...। सभाएं णं सुहम्माए उवरिं अट्ठ मंगलगा झया छत्तातिच्छत्ता। १२९] सभाए णं सुहम्माए उत्तरपुरस्थिमेणं एत्थणं मैहेगेसिंद्धायतणे पण्णत्ते ऐगं जोयणसयं आयामेणं पन्नासं ९ उपरि १० क्षुल्लको महेन्द्रध्वजः प्रज्ञप्तः, तस्य प्रमाणं वर्णकश्च महेन्द्रध्वजवद् वक्तव्यम् [पृ० २२१ पं० २] ११ तस्य क्षुल्लकमहेन्द्रध्वजस्य १२ पश्चिमायामत्र १३ सूर्याभस्य देवस्य महानेकः १४ चोप्पालो नाम १५ प्रहरणकोश:-प्रहरणस्थानं प्रज्ञप्तम् , किंविशिष्टः ? इत्याह-जाव पडिरूवे' इति प्राग्वत् [पृ० १९५०८] १६ तत्र चोप्पालकाभिधाने प्रहरणकोशे बहूनि १७ परिघरत्न१८ खड्ग-१९ गदा-२० धनुःप्रमुखादीनि २१ प्रहरणरत्नानि २२ सन्निक्षिप्तानि तिष्ठन्ति, कथंभूतानि ? इत्यत आह-२३ उज्ज्वलानि-निर्मलानि २४निशितानि-अतितेजितानि अत एव २५ तीक्ष्णधाराणि प्रासादीयानि इत्यादि प्राग्वत् [पृ० ७५०५] तस्याश्च २६ सभायाः सुधर्माया उपरि बहूनि २७ अष्टावष्टौ मङ्गलकानि-इत्यादि सर्व प्राग्वत् [पृ०१९५०४] वक्तव्यम् । [१२९] १ सभायाः सुधर्मायाः २ उत्तरपूर्वस्यां दिशि ३ महदेकं ४ सिद्धायतनं प्रज्ञप्तम् , ५ एकं योजनशतमायामतः ६ पञ्चा Jain Education email For Private Personel Use Only wwainelibrary.org Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं । ॥२२९॥ जोयणाई विखंभेणं यावत्तरि जोयणाई उड्डे उच्चत्तेणं सभांगमएणं जाव गोमाणसियाओ भूमिभागा उल्लोया | | तहेव। तस्स णं सिद्धायतणस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महेगा मणिपेढिया पण्णत्ता, सोलस जोयणाई आयामविक्खंभेणं अट्ट जोयणाई बाहल्लेणं, 'तीसे णं मणिपेढियाए उवरिं एत्थ णं महेगे देवच्छंदए पण्णत्ते, सोलस जोयणाई आयामविक्खंभणं साइरेगाइं सोलस जोयणाई उड्डे उच्चत्तणं शत् विष्कम्भतः ७ द्वासप्ततियोजनान्यूर्ध्वमुच्चैस्त्वेन-इत्यादि ८सर्व सुधर्मावत् वक्तव्यं यावत् गोमानसीवक्तव्यता [पृ० २१४ पं० १- पृ० २२३५०१] तथा चाह-'सभागमएणं जाव गोमाणसियाओ'इति, किमुक्तं भवति ?-यथा सुधर्मायाः सभायाः पूर्वदक्षिणोत्तरवर्तीनि त्रीणि द्वाराणि तेषां च द्वाराणां पुरतो मुखमण्डपाः तेषां च मुखमण्डपानां पुरतः प्रेक्षागृहमण्डपाः तेषां च प्रेक्षागृहमण्डपानां पुरतश्चै. त्यस्तूपाः सप्रतिमाः तेषां च चैत्यस्तूपानां पुरतः चैत्यवृक्षाः तेषां च चैत्यवृक्षाणां पुरतो महेन्द्रध्वजाः तेषामपि पुरतो नन्दापुष्करिण्यस्तदनन्तरं गुलिका गोमानस्यश्चोक्ताः तथाऽत्रापि सर्वमनेनैव क्रमेण निरवशेष वक्तव्यम् , ९ उल्लोकवर्णनं भूमिभागवर्णनं च प्राग्वत् | [पृ०८१, ९७ पं० ३] १० तस्य सिद्धायतनस्यान्तबहुमध्यदेशभागेऽत्र ११ महत्येका मणिपीठिका प्रज्ञप्ता, सा १२ षोडश योजनान्यायामविष्कम्भाभ्याम् १३ अष्टौ योजनानि बाहल्यतः 'सन्दमणिमयी इत्यादि प्राग्वत् [पृ० २१८ पं० ३] १४ तस्याश्च मणिपीठिकाया उपरि अत्र १५ महानेको १६ देवच्छन्दकः प्रज्ञप्तः स च १७ षोडश योजनान्यायामविष्कम्भाभ्यां १८ सातिरेकाणि षोडश 0 नैतत् पदं मूलपाठे। Jan Educati For Private Personal use only How.jainelibrary.org Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२३०॥ Jain Educatio सव्वरयणाए जाव पडिरूवे एत्थे णं असयं जिणपेंडिमाणं जिणुस्सेहपैमाणमित्ताणं संनिखित्तं संचिद्वैति, तौसि णं जिणपेंडिमाणं इमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते, तंजहा - तंवणिज्जमया हत्थतल-पायतला, अंकामैयाई | नखाई अंतोलोहियक्खपडिसेगाई, कणगामईओ जंघाओ, कणगामया जाणू, कणगीमया रू, कणगामईओ गायेंलट्ठीओ, तर्वैणिमयाओ नाभीओ, रिहामइओ रोमैंराईओ, तवणिज मैंया चुर्चुया, तवणिज भैया सिरिबच्छी, सिलप्पैवालमया ओट्ठा, फालियामैया दंत, तवणिज्जमईओ जीहाओ, तवणिज्जमैया तालुया, कणगा- ५ मैंईओ नार्सिंगाओ अंतोलोहियैक्खपडिसेगाओ, अंकामयाणि योजनान्यूर्ध्वमुच्चैस्त्वेन १९ 'सव्वरयणामए' इत्यादि प्राग्वत् [ पृ० १९ पं० ५] २० तत्र च देवच्छन्द के २१ अष्टशतं अष्टाधिकं शतं २२ जिनप्रतिमानां २३ जिनोत्सेधप्रमाणमात्राणाम् पश्चधनुः शतप्रमाणानामिति भावः, २४ सन्निक्षिप्तं २५ तिष्ठति । २६ तासां २७ जिनप्रतिमानाम् २८अयमेतद्रूपो २९ वर्णावासो वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तः ३० तपनीयमयानि ३१ हस्ततल - पादतलानि ३२ अङ्करत्नमया ३४ अन्त:- मध्ये लोहिताक्षरत्नप्रतिसेका ३३ नखाः ३५ कनकमय्यो ३६ जङ्घाः ३७ कनकमयानि ३८ जानूनि ३९ कनकमया ४० ऊरवः ४१ कनकमय्यो ४२ गात्रयष्टयः ४३ तपनीयमय्यो ४४ नाभयः ४५ रिष्टमय्यो ४६ रोमराजयः ४७ तपनीयमयाः ४८ चुचुकाःस्तनाग्रभागाः ४९ तपनीयमयाः ५० श्रीवृक्षाः ५१ शिलाप्रवालमया - विद्रुममया ५२ ओष्ठाः ५३ स्फटिकमया ५४ दन्ताः ५५ तपनीयमय्यो ५६ जिह्वाः ५७ तपनीयमयानि ५८ तालुकानि ५९ कनकमय्यो ६० नासिकाः ६१ अन्तर्लोहिताक्षप्रतिसेकाः, ६२ अङ्क8 अत आरभ्य संपूर्णा कण्डिका जीवा० मू० पृ० २२२०९ । tional जिनप्रतिमाः तासां वर्णकथ Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण-1 इय। ॥२३॥ अच्छीणि अंतोलोहियक्खपडिसेगाणि [रिहामईओ ताराओ] रिट्ठामयाणि अच्छिपाणि, रिहामईओ भमुहीओ कणगीमया कवोला, कणगामया सर्वणा, कणगामईओ णिडालँपट्टियातो, वइरामईओसीसँघडीओ तवैणिजमईओ केसंतकेसभूमीओ रिहामैया उर्वरि मुद्धया। १३०1०तासि णं जिणपडिमाणं पिंट्टतो पत्तयं पत्तेयं छत्तधारंगपडिमाओ पण्णत्ताओ, ताओण छत्त धारगपडिमाओ हिमरेययकुंदेंदुप्पगासाई सकोरंटमल्लदामधवलाई आँयवत्ताइं सलीलं धारेमाणीओ धारेमा-५ णीओ"चिट्ठति, तासि णं जिणपंडिमाणं उभओ पासे पत्तेयं पत्तेयं मयानि ६३ अक्षीणि ६४अन्तलोहिताक्षप्रतिसेकानि, ६५रिष्टरत्नमयानि ६६अक्षिपत्राणि ६७रिष्टरत्नमय्यो ६८ भ्रवः ६९ कनकमयाः ७० कपोलाः ७१ कनकमयाः ७२ श्रवणाः ७३ कनकमय्यो ७४ ललाटपट्टिकाः ७५ वज्रमय्यः ७६ शीर्षघटिकाः ७७ तपनीयमय्यः ७८ केशान्तकेशभूमयः, केशान्तभूमयः केशभूमयश्चेति भावः, ७९ रिष्टमया ८० उपरि मूर्द्धजाः-केशाः। [१३०] १ तासां २ जिनप्रतिमानां ३ पृष्ठत एकैका ४ * छत्रधराणां प्रतिमा ५ हिमरजतकुन्देन्दुप्रकाशं ६ सकोरण्टमाल्यदामध- १० वलम् ७ आतपत्रं गृहीत्वा ८ सलीलं ९धरन्ती १० तिष्ठति, तथा ११ तासां १२ जिनप्रतिमानां १४ प्रत्येकम् १३ उभयोः पार्श्वयोः ___x[ ] एतचिहान्तर्गतः पाठः वि० बा० । जीवा० मू०प्र० पृ० २३३ पं०१।० इयं संपूर्णाऽपि कण्डिका जीवा० मू० प्र० पृ०२३३ पं० ५। * छत्रधरा प्र-पा०४-५ भा०१। Jain Education melal For Private & Personel Use Only watjainelibrary.org Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२३२॥ चामरधारपडिमाओ पण्णत्ताओ, ताओ णं चामरधारपडिमातो चंदप्पंहवयरवेरुलियनानामणिरयणखचियचि-1 त्तदंडाओ सुहुमैरयतदीहवालाओ संखंककुंददगैरयअमतमहियफेणपुंजसन्निकासाओ धवलाओ चामराओ [पृ० १७९ पं०२-] सलीलं धारेमाणीओ धारेमाणीओ चिट्ठति, तासि णं जिणपंडिमाणं पुरंतो दो दो नागपडिमांतो जक्खडिमाओ भूयडिमातो कुंडधारपैडिमाओ सव्वरयणामईओ अच्छाओ जाव चिट्ठति, तासि णं जिणपंडिमाणं पुरंतो अट्ठसयं घंटीणं अट्ठसयं चंदणकलसाणं अट्ठसयं भिंगारॊणं एवं आयंसाणं द्वे द्वे १५ चामरधरे प्रतिमे प्रज्ञप्ते, १६ =ते च १७ चन्द्रप्रभा-चन्द्रकान्तो वज्रं वैडूर्य च प्रतीतं चन्द्रप्रभवज्रवैड्रोणि शेषाणि च नानामणिरत्नानि खचितानि येषु दण्डेषु ते तथा, एवंरूपाः १८ चित्रा-नानाप्रकारा दण्डा येषां तानि तथा १९ सूक्ष्मा रजतमया दीर्घा वाला येषां तानि तथा [पृ० १७९ अंक-१०२] १९ प्रतीतम् चामराणि गृहीत्वा सलील वीजयन्त्यस्तिष्ठन्ति, ताश्च 'सव्वरयणामईओ अच्छाओ'इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १७९ ५०८-] २० तासां २१ जिनप्रतिमानां २२ पुरतो २३ द्वे द्वे २४ नागप्रतिमे द्वे द्वे २५ यक्षप्रतिमे द्वे द्वे २६ भूतप्रतिमे द्वे द्वे २७ कुण्डधरे प्रतिमे सन्निक्षिप्ते तिष्ठतः, तस्मिंश्च देवच्छन्दके २८ तासां २९ जिनप्रतिमानां ३० पुरतः ३१ अष्टशतं ३२ घण्टानाम् ३३ अष्टशतं ३४ चन्दनकल-शानाम् ३५ अष्टशतं ३६ भृङ्गाराणाम् अष्टशतम्-३७ आदर्शा जिनप्रतिमानां पुरतः नागयक्षभूतादिप्रतिमाः तथा घण्टादिपदार्थाश्च - "सूत्रे स्त्रीत्वं+ प्राकृतत्वात्"-राय० विव०। -शानाम् अष्टशतं मङ्गलकलशानाम् अ-भा०२। + 'चामर' शब्दस्य | Jain Education remonal For Private Personal Use Only Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥२३३।। || थालँाणं पाईणं सुइट्ठाण मणोगुलियाणं वायरगाणं चित्तगैराणं रयणरंडगाणं हयकंठीणं जाव [पृ० १७७ |पं०५] उसभकंठाणं पुप्पचंगेरीणं जाव [पृ० १७८ पं०१] लोमहत्थंचंगेरीणं पुप्फडलगाणं तेल्लंसमुग्गाणं जाव [पृ० १८० पं०१] अंजणसमुग्गाणं अट्ठसयं झयाणं अट्ठसयं नाम् अष्टशतं ३८ स्थालानाम् अष्टशतं ३९ पात्रीणाम् अष्टशतं ४० सुप्रतिष्ठानानाम् अष्टशतं ४१ मनोगुलिकाना-पीठिकाविशेषाणाम् अष्टशतं ४२ वातकरकाणाम् अष्टशतं ४३ चित्राणां ४४ रत्नकरण्डकानाम् अष्टशतं ४५ हयकण्ठानाम् अष्टशतं गजकण्ठानाम् अष्टशतं नरकण्ठानाम् अष्टशतं किन्नरकण्ठानाम् अष्टशतं किंपुरुषकण्ठानाम् अष्टशतं महोगकण्ठानाम् अष्टशतं ४६ वृषभकण्ठानाम् अष्टशतं ४७ पुष्पचङ्गेरीणाम् अष्टशतं माल्यचङ्गेरीणाम् , मुकुलानि पुष्पाणि, ग्रथितानि माल्यानि, अष्टशतं चूर्णचङ्गेरीणाम् अष्टशतं गन्धचङ्गेरीणाम् अष्टशतं वस्त्रचङ्गेरीणाम् अष्टशतमाभरणचङ्गेरीणाम् अष्टशतं सिद्धार्थकचङ्गेरीणाम् अष्टशतं ४८ लोमहस्तकचङ्गेरीणाम् , लोमहस्तकं च मयूरपुच्छपुञ्जनिका, अष्टशतं ४९ पुष्पपटलकानाम् एवं माल्य-चूर्ण-गन्ध-वस्त्राभरण-सिद्धार्थक-लोमहस्तक-पटलकानामपि प्रत्येक प्रत्येकं अष्टशतं वक्तव्यम् अष्टशतं सिंहासनानाम अष्टशतं छत्राणाम् अष्टशतं चामराणाम् अष्टशतं ५० तैलसमुद्गकानाम् अष्टशतं कोष्ठसमुद्कानाम् अष्टश्शतं पत्रसमुद्गकानाम् अष्टशतं चोयकसमुद्कानाम् अष्टशतं तगरसमुद्गकानाम् अष्टशतम्-एलासमुद्गकानाम् अष्टशतं हरितालसमुद्गगकानाम् अष्टशतं हिंगुलकसमुद्गकानाम् अष्टशतं मनःशिलासमुद्गकानाम् अष्टशतम्-५१ अञ्जनसमुद्कानाम् सर्वाण्यपि अनि तैलादीनि परमसुरभिगन्धोपेतानि, अष्टशतं ५२ ध्वजानाम् । अत्र सग्रहणिगाथा___ "चंदणकलसा भिंगारगा य आयंसया य थाला य । पातीउ सुपइट्ठा मणगुलिका वायकरगा य ॥१॥ in Education Hem llegal For Private Personel Use Only witjainelibrary.org Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥२३४॥ Jain Education In धूर्वेकडच्छुयाणं संनिखित्तं "चिट्ठति, सिद्धायतर्णैस्स णं उबेरिं अँट्ठट्ठ मंगलेगा झंया छत्तातिच्छता । [ १३१] तस्स णं सिद्धांतणस्स उत्तरपुरत्थिमे णं एत्थ णं महेगा उवैवायसभा पण्णत्ता, जहां सभाए सुहम्माए तहेब जाव मणिपेढिया अट्ठ जोयणाई देवसयणिज्जं तहेव स्यणिजवण्णओ अट्ठट्ठ मंगलगा झया छत्तातिछत्ता । | तीसे णं उर्ववायसभाए उत्तरपुरत्थिमेणं एत्थ णं हेगे हैरए पण्णत्ते चित्ता रयणकरंडा इय-गय-नरकंठगा य चंगेरी । पडलग-सीहासण - छत्त - चामरा समुग्गय-झया य ॥२॥ अष्टशतं ५३ धूपकच्छुकानां ५४ सनिक्षिप्तं ५५ तिष्ठति, तस्य च ५६ सिद्धायतनस्य ५७ उपरि ५८ अष्टावष्टौ ५९ मङ्गलकानि ६० ध्वज - ६१ छत्रातिच्छत्रादीनि तु प्राग्वत् [ पृ० १९ पं० ४ ] । [१३१] १तस्य च २ सिद्धायतनस्य ३ उत्तरपूर्वस्यामत्र ४ महत्येका ५ उपपातसभा प्रज्ञप्ता, ६ तस्याश्च सुधर्मागमेन स्वरूपवर्णन - पूर्वादिद्वारत्रय वर्णन - मुखमण्डप - प्रेक्षागृह मण्डपादिवर्णनादिप्रकाररूपेण तावद् वक्तव्यं यावत् उल्लोकवर्णनम् [पृ० २१४ पं०३ - ] तस्याश्र | बहुसमरमणीय भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागेऽत्र महत्येका ७ मणिपीठिका प्रज्ञप्ता, सा च ८ अष्टौ योजनान्यायाम - विष्कम्भाभ्यां १० चत्वारि योजनानि बाहल्येन 'सव्वमणिमयी' इत्यादि प्राग्वत् [ १०२१७ पं० ४] तस्याश्च मणिपीठिकाया उपरि अत्र महदेकं देवशयनीयं प्रज्ञप्तम्, तस्य स्वरूपं यथा सुधर्मायां सभायां देवशयनीयस्य [ पृ० २२६ पं० २] तस्या अप्युपपातसभाया उपरि अष्टाष्ट मङ्गल| कादीनि प्राग्वत् [ पृ० १९ पं० ४] ९ तस्या १० उपपातसभाया ११ उत्तरपूर्वस्यां दिशि १२ महानेको १३ इदः प्रज्ञप्तः, स च * कडुछका – पा० ४। - कडुछा - भा० १। भाषायाम् 'कडछो' 'कडछी' । उपपातसभा jainelibrary.org Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ऍग जोयणसयं आयामेणं पण्णासं जोयणाई विक्खंभेणं दसैँ जोयणाई उव्वेहेणं तहेब " से णं हरए गाए | पउमवरवेइयाए एगेणं वणसंडेण सव्वओ समता संपरिक्खित्ते । तस्स णं हरयस्स तिदिसं तिसोवाणपडिरूवगा पन्नत्ता । तस्मै णं हरयस्स उत्तैरपुरत्थिमे णं त्थ णं मैंहेगा अभिसेगसभा पण्णत्ता, सुहम्मैागमएणं जाव गोमाणसियाओ मॅणिपेढिया सीहासणं सपरिवारं जाव दामा चिहंति, तत्थे णं सूरियाभस्सै देवस्स १४एकं योजनशतमायामतः १५ पञ्चाशत् योजनानि विष्कम्भतः १६ दश योजनान्युद्वेधेन 'अच्छे स्ययामयकूले' इत्यादि नन्दापुष्करिण्या इव वर्णनं निरवशेषं वक्तव्यम् [पृ० १९१ पं० २] १७ स हद १८ एकया पद्मवश्वेदिकया १९ एकेन च वनखण्डेन २० सर्वतः समन्तात् संपरिक्षिप्तः पद्मवरवेदिकावर्णनं [पृ० २०४ पं० १] वनखण्डवर्णनं च प्राग्वत् [पृ० १८३ पं० १] २१तस्य च इदस्य २२ उत्तरपूर्वस्यां दिशि २३ अत्र २४ महत्येका २५ अभिषेकसभा प्रज्ञप्ता, सा च २६ सुधर्मासभावत् प्रमाण-स्वरूप - द्वारत्रय - मुखमण्ड| पादिप्रकारेण तावद् वक्तव्या यावद् २७ गोमानसीवक्तव्यता [पृ० २१४ पं० १-१०२२३ पं० १] तदनन्तरं तथैव उल्लोकवर्णनम् भूमिभागवर्णनं च तावत् यावन्मणीनां स्पर्शः [पृ० ९७, ८१ पं० ३ कं० ४०] तस्या अभिषेकसभाया बहुसमरमणीयस्य भूमिभा - १० गस्य बहुमध्यदेशभागे महत्येका २८ मणिपीठिका प्रज्ञप्ता, साऽप्यष्टौ योजनान्यायाम - विष्कम्भाभ्यां चत्वारि योजनानि बाहल्यतः 'सव्वरयणामयी' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० २१७ पं० ४] तस्या मणिपीठिकाया उपरि अत्र महदेकं २९ सिंहासनम् सिंहासनवर्णकः प्राग्वत् [पृ० ९८ पं० ३] नवरमत्र ३० परिवारभूतानि भद्रासनानि च वक्तव्यानि [कं० ४४] ३१ तस्मिँथ सिंहासने ३२ सूर्याभस्य -स्य पूर्वस्यां दि-पा० ५। Jain Education tercional अभिषेक सभा ||२३५॥ Www.jainelibrary.org Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥२३६॥ Jain Education बहु अभिसेयभंडे संनिखित्ते चिट्ठा, अट्ठट्ठ मंगलगा तहेव । तीसे णं अभिसेगसभाए उत्तरपुरत्थिमेणं एत्थ णं अलंकारियसभा पण्णत्ता जहा सभा सुधम्मा, मणिपेढिया अट्ठ जोयणाईं सीहासणं सपरिवारं तत्थैणं सूरियाभस्स देवस्स सुबहु अलंकारियभंडे संनिखित्ते चिट्ठति, सेसं तहेव, सीसे णं अलंकारियसभाए उत्तरपुरत्थिमे णं तत्थ णं मँहेगा ववसासभा पण्णत्ता, जैहा उववायसभा जाव सीहा+सणं सपरिवारं मणिपेढिया अट्ठट्ठ मंगलगा०, तत्थै णं सूरियाभस्स देवस्स एत्थ मँहेगे पोत्थर्यरयणे सन्निखित्ते चिट्ठइ, तस्मै णं पोत्थयरय- ५ णस्स इमेयारूवे | देवस्य ३३ सुबहु ३४ अभिषेकभाण्डम् - अभिषेकयोग्य उपस्करः सन्निक्षिप्तः तिष्ठति, 'तीसे णं अभिसेयसभाए अट्ठट्ठ मंगलका ' इत्यादि प्राग्वत् [ पृ० १९ पं० ४] ३५ तस्याश्च अभिषेकसभाया ३६ उत्तरपूर्वस्यां दिशि अत्र महत्येका ३७ अलंकारसभा प्रज्ञप्ता, सा ३८ चाभिषेक+सभावत् प्रमाण-स्वरूप द्वारत्रय- मुखमण्डप - प्रेक्षागृहमण्डपादिवर्णकप्रकारेण तावद् वक्तव्या यावत् परिवारसिंहासनम् [पृ० २१४ पं० १] ३९ तत्र सूर्याभस्य देवस्य ४० आलङ्कारिकम् - अलङ्कारयोग्यं भाण्डं संनिक्षिप्तमस्ति, शेषं प्राग्वत् [ प्र० १० पृ० पं० १] ४१ तस्याश्च अलङ्कारसभाया ४२ उत्तरपूर्वस्यां दिशि अत्र ४३ महत्येका ४४ व्यवसायसभा प्रज्ञप्ता, सा च ४५ -अभिषेकसभावत् प्रमाण-स्वरूप- द्वारत्रय - मुखमण्डपादिवर्णनप्रकारेण तावद् वक्तव्या यावत् सिंहासनं सपरिवारम् [पृ० २१४ पं० १ पृ० २१६ पं० ३ ] ४६ तत्र ४७ महदेकं ४८ पुस्तकरत्नं सन्निक्षिप्तमस्ति, ४९ तस्य च पुस्तकरत्नस्य ५० अयमेतद्रूपो = -सणं अपरि-भा० १ । + मूल- विवरणपाठयोर्भेदः । = मूले तु 'जहा उबवायसभा' इत्युक्तम् । जीवा० पृ० २३५ पं० ८ - "ववसात सभा | अलंकार सभा व्यव सायसभा च inelibrary.org Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण वण्णावासे पण्णत्ते, +तंजहा रिट्ठी मईयो कविआओ *[तवणिज्जमए] "दोरे नाणामणिमए गंठी रयणा. व्यवसायमयाई पतंगाई वेरुलियमए लिप्पासणे रिट्ठामए छंदणे तवणिज्जमई संकली रिट्ठामई मंसी वइरामई लेहँणी सभायां रिट्टामयाई अक्खंराई धम्मिए लेक्खे । ववसायसभाए णं उरिं अट्ठ मंगलगा, तीसे णं ववसायसभाए स्थितस्य ५१ वर्णावासो वर्णकनिवेशः प्रज्ञप्तः, ५२ रिष्टमय्यौ-रिष्टरत्नमय्यौ ५३ ० कम्बिके ० पृष्ठके इति भावः, रत्नमयो ५४ *दवरको पुस्तकस्य वर्णकः यत्र पत्राणि प्रोतानि सन्ति, ५५ नानामणिमयो ५६ ग्रन्थिः दवरकस्यादौ येन पत्राणि न निगच्छन्ति, ५७ अङ्कमयानि-अङ्करत्न-- मयानि ५८ पत्राणि, ५९ नानामणिमयं ६० लिप्यासनम्-मषीभाजनमित्यर्थः, ६३ तपनीयमयी ६४ शृङ्खला मषीभाजनसत्का, ६१ रिष्टरत्नमयं उपरितनं तस्य ६२ छादनं ६५ रिष्टमयी-रिष्टरत्नमयी ६६ मषी, ६७ वज्रमयी ६८ लेखनी, ६९ रिष्टमयानि || ॥२३७॥ ७० अक्षराणि, ७१ धार्मिकं लेख्यं, क्वचित्-'धम्मिए सत्थे इति पाठः तत्र धार्मिकं शास्त्रम्' इति व्याख्येयम् ७२ तस्याश्च उप पण्णत्ता अभिसेयसभावत्तव्वया जाव सीहासणं अपरिवारं" इत्यादि । + इदं समस्तं पुस्तकवर्णन जीवा० मू० पृ० २३५ पं० ९। ० -मयाई उक्कंठियाई त-भा०१। * वि० बा० । अत्र पुस्तकवर्णने मूल-विवरणयोमेंदः मूलपाठव्युत्क्रमश्च भासते। “देशीनाममालायां 'दारदोर' शब्दौ कटीसूत्रापरपर्यायकाञ्चीवाचको लभ्येते-"कंचीई दार-दोरा य"-व० ५ गा० ३८ । अत्र तु 'दोर' शब्दः पत्रबन्धनसाधनं सूत्रापरपर्यायं केवलं गुणरूपमथै सूचयति-इति । 'दोर' शब्दश्च भाषायाम् 'दोरो' नाम्ना प्रतीतः । 'दवरक' इति तु अस्यैव संस्कृतमुच्चारणम् । 0 कण्ठिके-पा० ५, भा० १। -के प्रष्टके भा० २-के पुष्टके-जीवा० वि० पृ० २३७। * दवको-पा० ५-४ । * क्वचित् 'धमि' इति पाठः-भा०२। 8 विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । - मूले तु 'ववसायसभाए' इति भेदः । JanFannine For Private Personal use only Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२३८॥ उत्तरपुरस्थिमेणं एत्थ णं नंदा पुक्खरिणी पण्णत्ता हरयसरिसा, तीसे णं णंदाए पुक्खरिणीए उत्तरपुरस्थिमेणं | उत्पन्नमात्रमहेगे बलिपीढे पण्णत्ते सव्वरयणामए अच्छे जाव पडिरूवे। स्य सूर्याभ[१३२] तेण कालेण तेणं समएणं सूरियाभे देवे अहुणोववण्णमित्तए चेव समाणे पंचविहाए पज्जत्तीए स्य कर्तव्य पज्जत्तीभावं गच्छद, तंजहा-आहारपजत्तीए सरीरपज्जत्तीए इंदियपज्जत्तीए आणपाणपजत्तीए भासा-मणप- | विचारणा ज्जत्तीए, तएँ णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स पंचविहाए पजत्तीए पातसभाया ७३ उत्तरपूर्वस्यां दिशि ७४ महदेकं ७५ बलिपीठं प्रज्ञप्तम् , तच्चाष्टौ योजनानि आयामविष्कम्भतः चत्वारि योजनानि बाहल्यतः ७६ सर्वरत्नमयम् ७७ 'अच्छे' इत्यादि प्राग्वत् [पृ० १९५० ५]। तस्य च बलिपीठस्य उत्तरपूर्वस्यां दिशि अत्र महत्येका नन्दा पुष्करिणी प्रज्ञप्ता, सा च हुदप्रमाणा, हृदस्येव च तस्या अपि त्रिसोपानवर्णनं नोरणवर्णनं च प्राग्वत् [पृ० ७८ ५० १, पृ०७९५० १]। तदेवं यत्र यादृम्रूपं च सूर्याभस्य देवस्य विमानं तत्र ताग्रूपं चोपवर्णितम् । [१३२] सम्मति सूर्याभो देवः उत्पन्नः सन् यदकरोत् यथा च तस्याऽभिषेकोऽभवत् तद् उपदर्शयति-१ तस्मिन् काले २ त-१० स्मिन् समये ३ सूर्याभो देवः सूर्यामे विमाने उपपात सभायां देवशयनीये देवदृष्यान्तरिते प्रथमतोऽङ्गुलासंख्येयभागमात्रयाऽवगाहनया समुत्पन्नः ४ 'तए णं' इत्यादि सुगमम् नवरम् इह भाषा-मनःपर्याप्त्योः समाप्तिकालान्तरस्य प्रायः शेषपर्याप्तिसमाप्तिकालान्तरापेक्षया स्तोकत्वादेकत्वेन विवक्षणमिति 'पंचविहाए पजत्तीए पज्जतीभावं गच्छइ' इत्युक्तम् , ततः ५ तस्य सूर्याभस्य देवस्य ६ पञ्च ० मूले पूर्व पुष्करिणीनिर्देशः पश्चात् बलिपीठनिर्देशः, विवरणे तु व्युत्क्रमः । ० -तशय्यायां-भा०२। --गद्वया अव-भा०२। l Jain Education a For Private Personal Use Only Hainelibrary.org Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥२३९॥ | पजत्तीभावं गयस्स समाणस्स इमेयारूवे अन्झथिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुपज्जित्था-कि मे पुटिव करणिज्ज ? कि मे पच्छा करणिजं? किं में पुटिव सेयं किं मे पच्छा सेयं कि मे पुब्बि पि पच्छा विहियाए सुहाए खमाए णिस्सेयसाए आणुगामियत्ताए भविस्सह? । [१३३]तए णं तस्स सूरियाभस्म देवस्स सामाणियपरिसोववनगा देवा सूरियाभस्स देवस्स इमेयारूवमज्झत्थियं जाव पृ०५१पं०१] समुप्पन्नं समभिजाणित्ता जेणेव सूरियाभे देवे तेणेव उवागच्छंति, सूरियाभं देवं करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कटु जएणं विजएणं वद्धाविन्ति बद्धावित्ता एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पियाण सरियाभे विमाणे सिद्धायतणसि जिणपडिमाणं जिणुस्सेहपमाणमित्ताणं अट्ठसयं संनिखित्तं चिविधया पर्याप्तथा ७ पर्याप्तभावमुपगतस्य सतः ८ अयमेतद्रूपः ९ संकल्पः १० समुदपद्यत-'अज्झस्थिए' इत्यादि पदव्याख्यानं पूर्ववत् [पृ०५१ पं०१ तथा ७] ११कि मे मम पूर्व करणीयम् ? १२किं मे पश्चात्करणीयम् ? १३ किं मे पूर्व कर्तुं श्रेयः? १४ किं मे पश्चात् कर्नु श्रेयः? तथा १५ कि मे पूर्वमपि च पश्चादपि च १६ हिताय-भावप्रधानोऽयं निर्देशो-हितत्वाय-परिणामसुन्दरतायै १७ सुखाव शर्मणे १८ क्षमाय-अयमपि भावप्रधानो निर्देश:-संगतत्वाय १९ निःश्रेयसाय-निश्चितकल्याणाय २० अनुगामिकताकै-परम्परशुभानुबन्धसुखाय २१ भविष्यति-इति । इह प्राक्तनो ग्रन्थः प्रायोऽपूर्वः भूयानपि च पुस्तकेषु वाचनाभेदस्ततो माऽभूत शिष्याणां सम्मोह इति क्यापि सुगमोऽपि यथावस्थितवाचनाक्रमप्रदर्शनार्थ लिखितः, इत ऊवं तु प्रायः सुगमः प्राग्व्याख्यातस्वरूपश्च न च वाचनामेदोऽप्यतिवादर इति स्वयं परिभावनीयः, विषमपदव्याख्या तु विधास्यते इति । Jain Education Interland! For Private Personel Use Only winelibrary.org Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२४०॥ इति, सभाए णं सुहम्माए माणवए चेहए खंभे वहरामएस गोलवहसमुग्गएसु बहुओ जिणसकहाओ संनिखिताओ चिति, ताओ णं देवाणुप्पियाणं अण्णेसिं च बहूणं वैमाणियाणं देवाण य देवीण य अच्चणिजाओ जाव पज्जुवासणिज्जाओ, तं एयं णं देवाणुप्पियाणं पुठिंव करणिज्जं तं एयं णं देवाणुप्पियाणं पच्छा करणिजं, तं एवं णं देवाणुप्पियाणं पुव्वि सेयं तं एयं णं देवाणुप्पियाणं पच्छा सेयं तं एयं णं देवाणुप्पियाणं पुवि पि पच्छा वि हियाए सुहाए खमाए निस्सेयसाए आणुगामियत्ताए भविस्सति । [१३४ ] तए णं से सूरियाभे देवे तेमिं सामाणियपरिसोववन्नगाणं देवाणं अंतिए एयमहं सोचा निसम्म हट्ठतुट्ठ- जाव [पृ० ४७ पं० ३-] - हयहियए सयणिजाओ अब्भुट्टेति सयणिज्जाओ अब्भुट्टेत्ता उववायसभाओ पुरत्थिमिल्लेणं दारेणं निग्गच्छइ, जेणेव हरए तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता हरयं अणुपयाहिणीकरेमाणे अणुपयाहिणीकरेमाणे पुरत्थिमिल्लेणं तोरणेणं अणुपविसद्द अणुपविसित्ता पुरथिमिल्लेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पचोरुह पचोरुहित्ता जलावगाहं जलमज्जणं करेइ करित्ता जलकिहुं करेइ करिता जलाभिसेयं करेइ करिता अयंते चोक्खे पर मैसुईभूए हरयाओ पश्चोत्तरह पञ्चोत्तरित्ता जेणेव अभिसेयसभा तेणेव उवागच्छति तेव [१३४] १ नवानामपि श्रोतसां शुद्धोदकप्रक्षालनेन आचान्तो- गृहीताचमनः - २ चोक्षः स्वल्पस्यापि शङ्कितमलस्यापनयनात् अत एव ३ परमशुचिभूतः । * भाषायाम् 'चोक्खु' | Jain Education emanal १० सामानिकैः कर्तव्य - निर्देश: तदनुसारेण सूर्याभस्य स्नानादि प्रवृत्तिः w.jainelibrary.org Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । Jain Educati उवागच्छित्ता अभिसेयसभं अणुपयाहिणीकरेमाणे अणुपयाहिणीकरेमाणे पुरत्थिमिल्लेणं दारेणं अणुपविसह अणुपविसित्ता जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छद्द उवागच्छित्ता सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे सन्निसन्ने । [ १३५ ] तए णं सूरियाभस्स देवस्स सामाणियपरिसोववन्नगा देवा अभिओगिए देवे सहावेंति सद्दावित्ता एवं वयासी - खिप्पामेव भो ! देवाणुप्पिया ! सूरियाभस्स देवस्त महत्थं महग्धं महरिहं विउलं इंदाभिसेयं उवैद्ववेह । तए णं ते आभिओगिआ देवा सामाणियपरिसोवयन्नेहिं देवेहिं एवं बुत्ता समाणा हट्ठा जाव-हियया [पृ०४७ पं०३ - ] करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि कट्टु एवं देवो ! तह' त्ति आणाए विणणं वयणं पडिसृणंति, पडिणित्ता उत्तरपुरत्थिमं दिसीभागं अवकमंति, उत्तरपुरत्थिमं दिसीभागं अवकमित्ता वेउ - व्वियसमुग्धाएणं समोहणंति, समोहणित्ता संखेज्जाई जोयणाई जाव दोचं पि वेउत्र्वियसमुग्धाएणं समोहणित्ता [ कण्डिका १९] अट्टसहस्सं सोवन्नियाणं कलसणं अट्ठेसहस्सं रुप्पमयाणं कलसाणं असहस्सं मणिमयाणं कलसाणं असहस्सं सुवण्णरुपमयाणं कलसाणं [१३५] १ महान् अर्थो मणिकनकरत्नादिक उपयुज्यमानो यस्मिन् स महार्थः तं तथा २ महान् अर्ध: - पूजा यत्र स महार्घः तं, ३ महम् - उत्सवमर्हतीति महार्हस्तं, ४ विपुलं - विस्तीर्ण शक्राभिषेकवत् ५ इन्द्राभिषेकम् - उपस्थापयत । 'अट्टसहस्सं सोवण - | याण कलसाणं विउव्वंति' इत्यादि, अत्र भूयान् वाचनाभेदः इति यथावस्थितवाचनाप्रदर्शनाय लिख्यते, ६ अष्टसहस्रं| अष्टाधिकं सहस्रं ७ सौवर्णिकानां ८ कलशानाम् ९ अष्टसहस्रं रूप्यमयानाम् १० अष्टसहस्रं मणिमयानाम् ११ अष्टसहस्रं सुवर्णरूप्यम national सूर्याभस्य अभिषेको पस्थापना तदर्थ च जल- मृत्तिकादिग्रह णाय देवानां मनुष्यक्षेत्रे आगमनम् १० ॥२४१॥ Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥२४२॥ असहस्सं सुवन्नमणिमयाणं कलसाणं अट्ठसहस्सं रुप्पमणिमयाणं कलसाणं अ१सहस्सं सुवण्णरुप्पमणिमयाणं कलसाणं अट्ठसहस्सं भोमिज्जाणं कलसाणं एवं भिंगारीणं आयंसाणं थालाणं पाईणं सुपतिढाणं वायक| रगाणं रयणकरंडगाणं पुप्फेचंगेरीणं जाव लोमहत्थचंगेरीणं पुप्फपडलगाणं जाव लोमहत्थपडलगाणं सीहा. सैणाणं छत्ताणं चामराणं तेल्लसँमुग्गाणं जाव अंजणसमुग्गाणं झयाणं अट्ठसहस्सं धूवर्कंडुच्छुयाणं विउव्वंति, विउवित्ता ते साभाविए य वेउव्विए य कलसे य जाव कडुच्छुए य गिण्हंति गिण्हित्ता सूरियाभाओ विमाणाओ पडिनिक्खमंति पडिनिक्खमित्ता ताए उकिटाए चवलाए जाव [पृ०५८५१] तिरियमसंखेजाणं जाव [पृ० ५८ पं० १] वीतिवयमाणे वीतिवयमाणे जेणेव खीरोदयसमुद्दे तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता खीरोयगं गिण्हंति जाई तत्थुप्पलाई ताई गेण्हंति जाव [पृ० २१ पं० १०] सयसहस्सपत्ताई गिण्हंति गिणिहत्ता यानाम् १२ अष्टसहस्रं सुवर्णमणिमयानाम् १३अष्टसहस्रं रूप्यमणिमयानाम् १४अष्टसहस्रं सुवर्णरूप्यमणिमयानाम् १५अष्टसहस्रं भौमेयानां कलशानाम् अष्टसहस्रं १६ भृङ्गाराणाम् एवम् १७ आदर्श-१८ स्थाल-१९ पात्री-२० सुप्रतिष्ठ-२१ वातकरक-२२ चित्ररत्न करण्डक-२३ पुष्पचङ्गेरी-यावत् २४ लोमहस्तकपटलक-२५ सिंहासन-२६ च्छत्र-२७ चामर-२८ समुद्गक-२९ ध्वज-३० धूपकडुच्छुकानां प्रत्येकं प्रत्येकम् अष्टसहस्रम् अष्टसहस्रं ३१ विकुर्वन्ति =विकुचित्वा ३२ 'ताए उक्किट्ठाए' इत्यादि व्याख्यातार्थम् [पृ० ५८ पं०७] ४६ सर्वान् तूवरान-कषायान् ४७ सर्वाणि पुष्पाणि ४८ सर्वान् गन्धान-गन्धवासादीन् ४९ सर्वाणि माल्यानि अथितादिभेदभिन्नानि ५० सर्वोषधीन् ५१ सिद्धार्थकान्-सर्षपकान् ५२ गृह्णन्ति । इहैवं क्रमः-३३ पूर्व क्षीरसमुद्रे उपागच्छन्ति ='विकुळ' इति शुद्धम् । Jain Education in mala For Private & Personel Use Only jainelibrary.org Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । जेणेव पुक्खरोदए समुद्दे तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता पुक्खरोदयं गेव्हंति गिण्हित्ता जाहं तत्थुप्पलाई सयसहस्सपत्ताई ताई जाव गिण्हंति गिण्हित्ता जेणेव समयखेत्ते जेणेव भरहेरवयाई बासाइं जेणेव माँगहव| रामपभासाई तित्थाई तेणेव उवागच्छति तेणेव उवागच्छित्ता तित्थोदगं गेण्हंति गेहेत्ता तित्थमैट्टियं गण्हंति गेण्हित्ता जेणेव गंगा-सिंधु-रत्ता-रत्तैबईओ महानईओ तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता सलिलोदगं | गेण्हंति सलिलोदगं गेण्हित्ता उभओकूलमट्टियं गेण्हंति महियं गेण्हित्ता जेणेव चुल्लहिमवंतसिहरीवासीहर |पब्वया तेणेव उवागच्छति तेणेव उवागच्छित्ता दगं गेण्हंति सव्वत्यरे सव्यपुष्फे सव्वगंधे सेव्यमले सव्वासहिसिद्वैत्थए गिοहंति गिन्हित्ता जेणेव पडमैपुंडरीयदहे तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता दहोदगं गेण्हंति गेण्हित्ता जाई तत्थ उप्पलाई जाब [पृ० २१ पं० १०] सयसहस्सपत्ताई ताई गेव्हंति गेण्हित्ता जेणेव हेमवऍरेवयाई वासाई जेणेव रोहिय तत्रोदकमुत्पलादीनि च गृह्णन्ति, ततः ३४ पुष्करोदे समुद्रे तत्रापि तथैव ततो ३५ मनुष्यक्षेत्रे ३६ भरतैरावतवर्षेषु ३७ मागधादिषु १० तीर्थेषु ३८ तीर्थोदकं ३९ तीर्थमृत्तिकां च गृह्णन्ति, ततो ४० गङ्गा-४१ सिन्धु-४२ रक्ता ४३ रक्तवतीषु नदीषु ४४ सलिलोदकं - नद्युदकमुभयतदमृत्तिकां च गृह्णन्ति ततः ४५ चुल्लहिमवत् शिखरेषु ४६ सर्वतूवर - ४७ सर्वपुष्प - ४९ सर्वमाल्य - ५० सर्वौषधि - ५१ सिद्धार्थकान् ततस्तत्रैव ५३ पद्मइदपौण्डरीकहूदेषु ५४ ह्रदोदकमुत्पलादीनि च ततो ५५ हैमवतैरण्यवतवर्षेषु ५६ रोहिता x तः क्षुल पा० ४ । Jain Educatio International ॥२४३॥ www.jainelibraty.org Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥२४४॥ रोहियंसा-सुवणकूल-रुप्पकूलाओ महाणईओ तेणेव उवागच्छंति, सलिलोदगं गेण्हंति गेण्हित्ता उभओक| लमट्टियं गिण्हंति गिण्हित्ता जेणेव सद्दावतिविर्यंडाव०तिपरियागा वट्टवेयड्डपव्वया तेणेव उवागच्छन्ति उवागच्छित्ता संवतूयरे तहेव [पृ०२४३ पं०६-] जेणेव महाहिमवंतरुप्पिवासहरपव्वया तेणेव उवागच्छन्ति तहेव जेणेव महापउममहापुंडरीयद्दहा तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता दहोदगं गिण्हन्ति तहेव जेणेव हरिबासरम्मगवासाई जेणेव हरिकंत-नारिकताओ महाणईओ तेणेव उवागच्छंति तहेव जेणेव गंधावइमालवंतपरि-14 याया वटवेयड्डपब्वया तेणेव तहेव जेणेव णिसढणीलँवंतवासधरपव्वया तहेव जेणेव तिगिच्छिकेसरिद्दहाओ तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता तहेव जेणेव महाविदेहे वासे जेणेव सीतासीतोदाओ महाणदीओ तेणेव तहेव जेणेव ५७रोहितांशा-५८ सुवर्णकूला-५९ रूप्यकूलासु महानदीषु ६०सलिलोदकमुभयतटमृत्तिका, तदनन्तरं ६१ शब्दापाति६२विकटापाति६३वृत्तवैतादथेषु ६४ सर्वत्वरादीन , ततो ६५ महाहिमवद्रप्पिवर्षधरपर्वतेषु सर्वतवरादीन , ततो ६६ महापद्मपुण्डरीकहदेषु हुदो-१० दकादीनि, तदनन्तरं ६७ हरिवर्षरम्यकवर्षेषु ६८ +हरिकान्ता-६९नरनारीकान्तासु महानदीषु सलिलोदकमुभयतटमृत्तिकां च ततो| ७० गन्धापाति७१माल्यवत्पर्याय७२वृत्तवैताढयेषु तूवरादीन्, ततो ७३ निषध७४नीलवद्वर्षधरपर्यतेषु सर्वतूबरादीन्, तदनन्तरं तद्गतेषु ७५ तिगिच्छि७६केसरिमहादेषु इदोदकादीनि, ततः ७७ पूर्व विदेहापरविदेहेषु ७८ ० सीता-७९सीतोदानदीषु सलिलोदक ०-वतिवट्टवेय-भा० १ । * -बन्तरूप्यव-भा० २। + हरिहरिकान्तासु म-भा० २। ० सीतोदान-भा० २। in Education Hemoga For Private & Personal use only मw.jainelibrary.org Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । सब्वचईवहिविजया जेणेव सब्बभागहवरदामपभासाई तित्थाई तेणेव उवागच्छंति तेणेव उवागच्छित्ता तित्थोदंगं गेण्हंति गेण्हित्ता सव्वंतरणईओ जेणेव सव्ववक्खारपव्वया तेणेव उवागच्छंति सव्वतूयरे तहेव जेणेव मंदरे पव्यते जेणेव भद्दसालवणे तेणेव उवागच्छंति सव्वतूयरे सव्वपुप्फे सव्वमल्ले सव्वोसहिसिद्धत्थए य गेण्हति गेण्हित्ता जेणेव णंदणवणे तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता सव्वतयरे जाव सव्वोसहिसिद्धत्थए य सरसगोसीसचंदणं गिण्हंति गिण्हित्ता जेणेव सोमणसवणे तेणेव उवागच्छंति संवत्यरे जाव सब्बोसहिसिद्वत्थए य सरसगोसीसचंदणं च दिव्वं च सुमणदामं गिण्हंति गिण्हित्ता जेणेव पंडर्गवणे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता सव्वतूयरे जाव सव्वोसहिसिद्धत्थए च सरसं च गोसीसचंदणं च दिव्वं च सुमणदामं दरमलयसुगंधियगन्धे मुभयतटमृत्तिकां च, 0 ततः सर्वेषु ८० चक्रवत्तिविजेतव्येषु ८१ मागधादिषु तीर्थेषु ८२ तीर्थोदकं तीर्थमृत्तिकां च, ततः ८३सर्वासु अन्तरनदीषु सलिलोदकमुभयतटमृत्तिका च, तदनन्तरं ८४ सर्वेषु वक्षस्कारपर्वतेषु ८५ सर्वतूवरादीन् , तदनन्तरं ८६ मन्दर- १० पर्वते ८७ भद्रशालवने ८८ तूवरादीन् ततो ८९ नन्दनवने ९० तूवरादीन् ९१ सरसं च गोशीर्षचन्दनम्, तदनन्तरं ९२ सौमनसवने ९३ सर्वतूबरादीन् ९४ सरसं च गोशीर्षचन्दनं ९५ दिव्यं च सुमनोदाम गृह्णन्ति, ततः ९६ पण्डकवने ९७ तूबर-पुष्प-गन्ध-माल्य-सरसगोशीर्षचन्दन-दिव्यसुमनोदामानि, ९८ दईर:-चीवरावनद्धं कुण्डिकादिभाजनमुखं तेन गालितं तत्र पक्वं वा यत् 0 ततः सर्वेषु वक्षस्का-भा० २। ॥२४५॥ Jain Education Herlinal For Private Personal Use Only Mw.jainelibrary.org Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण सूर्याभस्य अभिषेकः इयं। ॥२४६॥ गिण्हेंन्ति गिण्हित्ता एगतो मिलायंति मिलाइत्ता ताए उक्किट्ठाए जाव [पृ० ५८ पं० १] जेणेव सोहम्मे कप्पे जेणेव सूरियाभे विमाणे जेणेव अभिसेयसभा जेणेव सूरियाभे देवे तेणेव उवागच्छंति उवागच्छित्ता सूरियाभं| देवं करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कटु जएणं विजएणं वद्धाविति वद्धावित्ता तं महत्थं महग्छ | महरिहं विउलं इंदाभिसेयं उवट्ठति ।। तए णं तं सूरियाभं देवं चत्तारि सामाणियसाहस्सीओ चत्तारि अग्गमहिसीओ सपरिवारातो तिन्नि परिसाओ सत्त अणियाहिवइणो जाव अन्नेवि बहवे सूरियाभविमाणवासिणो देवा य देवीओ य तेहिं साभाविएहि य वेउविएहि य वरकमलपइट्टाणेहि य सुरभिवरवारिपडिपुन्नेहिं चंदणकयचच्चिएहिं आविद्धकंठेगुणेहि पउमुप्पलपिहाणेहिं सुकुमालकोमलपरिग्गहिएहिं अट्ठसहस्सेणं सोवन्नियाणं कलसाणं जाव [पृ० २४१ पं०९] अट्टसहस्सेणं भोमिजाणं कलसाणं सव्वोदएहिं सव्वमट्टियाहिं सव्वतूयरेहिं जाव सब्योसहिसिद्वत्थएहि य सव्विड्डीए जाव-वाइएणं महया महया इंदाभिसेएणं अभिसिंचति। [१३६] तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स महया महया इंदाभिसेए वदृमाणे अप्पेगतिया देवा सूरियाभ विमाणं नच्चोययं नातिमट्टियं पविरलफुसियरेणुविणासणं दिव्वं सुरभिगन्धोदगं वासं वासंति, अप्पेगतिया देवा मलयोद्भवतया प्रसिद्धत्वात् मलयज-श्रीखण्डं येषु तान् सुगन्धिकान्-परमगन्धोपेतान् गन्धान् ९९ गृह्णन्ति । Jain Education remonal For Private Personal Use Only w.jainelibrary.org Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपण- इयं । अभिषेके देवानां परमोल्लासेन स्वच्छन्द विहरणम् ॥२४७॥ हयरयं नहरयं भट्टरयं उवसंतरयं पसंतरयं करेंति, अप्पेगतिया देवा सूरियाभविमाणं आसियसंमजिओलित्तं | सुइसंमट्ठरत्यंतरावणवीहियं करेंति, अप्पेगतिया देवा सूरियाभं विमाणं मंचाइमंचकलियं करेंति, अप्पेगइया देवा सूरियाभं विमाणं णाणाविहरागोसियं झयपडागाइपडागमंडियं करेंति, अप्पेगतिया देवा सूरियाभं विमाणं | लाउल्लोइयमहियं [पृ० ७+टिप्पण] गोसीससरसरत्तचंदणदद्दरदिण्णपंचंगुलितलं करेंति, अप्पेगतिया देवा सूरियाभं विमाणं उवचियचंदणकलसं चंदणघडसुकयतोरणपडिदुवारदेसभागं करेंति, अप्पेगतिया देवा सूरियाभं | विमाणं आसत्तोसत्तविउलवद्वग्धारियमल्लदामकलावं करेंति, अप्पेगतिया देवा सूरियाभं विमाणं पंचवण्णसु. रभिमुक्कपुप्फपुंजोवयारकलियं करेंति, अप्पेगतिया देवा सूरियाभं विमाणं कालागुरुपवरकुंदुरुतुरुकधूवमघमघंतगंधुद्धयाभिरामं करेंति, अप्पेगइया देवा सूरियाभं विमाणं सुगंधगंधियं गंधवहिभूतं करेंति, अप्पेगतिया देवा हिरणवासं वासंति, सुवण्णवासं वासंति, रययवासं वासंति, वइरवासं० पुप्फवासं० फलवासं० मल्लवासं० गंधवासं०चुण्णवासं०आभरणवासं वासंति, अप्पेगेतिया देवा हिरणविहिं भाएति, एवं [१३६] १आसिक्तम्-उदकच्छटकेन २सम्मार्जित-संभाव्यमानकचवरशोधनेन ३उपलिप्तमिव गोमयादिना उपलिप्त तथा सिक्तानि | जलेन अत एव ४ शुचीनि-पवित्राणि ५ संमृष्टानि-कचरापनयनेन ६ रथ्यान्तराणि ७ आपणवीथय इव-हट्टमार्गा इवापणवीथयोरथ्याविशेषा यस्मिन् तत् तथा ८ कुर्वन्ति, ९ अप्येकका:-केचन देवा १० हिरण्यविधि-हिरण्यरूपं मङ्गलभूतं प्रकारं ११ भाजयन्ति Jain Education For Private Personal Use Only Hw.jainelibrary.org I ॥ Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥२४८॥ सुवन्नविहिं भाएंति, रयणविहिं पुप्फैविहिं फलेंविहिं मल्लविहिं चुण्ण विहिं बथविहिं गंधविहिं०, तत्थ अप्पेगतिया देवा आभरणविहिं भाएंति, अप्पेगतिया चउब्विहं वाइत्तं वाइंति-ततं विततं घणं [पृ० १४४ पं० ३] झुसिरं, अप्पेगइया देवा चउब्विहं गेयं गायंति, तं०-उक्खित्तायं पायत्तायं मंदायं [पृ० १४४ पं० ४] रोइतावसाणं, अप्पेगतिया देवा दुयं नविहिं उवदंसिंति अप्पेगतिया विलंबियणदृविहिं उवदंसेंति अप्पेगतिया देवा दुतविलंथियं णविहिं उवदंसेंति, एवं अप्पेगतिया अंचियं नविहिं उवदंसेंति, अप्पेगतिया देवा आरभडं भसोलं आरभेड भसोलं उप्पायनिवायपवत्तं संकुचियपंसारियं रियारियं भंतसंभंतणामं [कं०८३-८७] दिव्वं णविहिं उवसेंति, अप्पेगतिया देवा चउव्विहं अभिणयं अभिणयंति, तंजहा-दिटुंतियं पादंतियं सामंतोवणिवाइयं [कं०८८] लोगअंतोमज्झावसाणियं, अप्पेगतिया देवा बुक्कारेंति, अप्पेगतिया देवा पीणेति, अप्पेगतिया लासंति अप्पेगतिया हकारेंति, अप्पेगतिया विणंति, "तंडवेंति, अप्पेगइया वग्गंति अप्फोडेंति, अप्पेगतिया अप्फोडेंति वग्गंति, अप्पे तिवई छिदंति, अप्पेगतिया हयहेसियं करेंति, अप्पेगतिया हत्थिगुलगुलाइयं करेंति, १० विश्राणयन्ति-शेषदेवेभ्यो ददतीति भावः, एवं १२ सुवर्ण-१३ रत्न-१४ पुष्प-१५ फल-१६ मालथ-गन्ध-१७ चूर्ण-१८ आभरणविधिभाजनमपि भावनीयम् । २० उत्पातपूर्वो निपातो यस्मिन् स उत्पातनिपातस्तं, एवं निपातोत्पात २१ संकुचितप्रसारित २२ | भ्रान्तसंभ्रान्तं नाम १९ आरभटभसोलं दिव्यं नाटयविधिमुपदर्शयन्ति, अप्येकका देवा २३ बुक्काशब्दं कुर्वन्ति, २४ पीनयन्ति-पीन|मात्मानं कुर्वन्ति-स्थूला भवन्तीत्यर्थः, २५ लासयन्ति लास्यरूपं नृत्यं कुर्वन्ति, २६ ताण्डवयन्ति-ताण्डवरूपं नृत्यं कुर्वन्ति २७ आ an Educational For Private Personel Use Only Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२४९॥ अप्पेगतिया रहघणघणाइयं करेंति, अप्पेगतिया हयहेसिय-हत्थिगुलगुलाइय-रघणघणाइयं करेंति, अप्पेगतिया उच्छेलेंति, अप्पेगतिया पोच्छेलेंति, अप्पेगतिया उक्किट्टियं करेंति, अ० उच्छलेंति पोच्छलेंति, अप्पेगतिया तिन्नि वि, अप्पेगतिया उवैयंति, अप्पेगतिया उप्पयंति, अप्पेगतिया परिवयंति, अप्पेगइया तिन्निवि, अप्पेग इया सीहनायंति, अप्पेगतिया दद्दरयं करेंति, अप्पेगतिया भूमिचवेडं दलयंति, अप्पे० तिन्नि वि, अप्पेगतिया गजंति, अप्पेगतिया विज्जुयायंति, अप्पेगइया वासं वासंति, अप्पेगतिया तिन्निवि करेंति, अप्पेगतिया ५ जलंत, अप्पेगतिया वंति, अप्पेगतिया पैतवेंति, अप्पेगतिया तिन्नि वि, अप्पेगतिया हकारेंति, अप्पेगतिया थुक्कारेंति, अप्पेगतिया धक्कारेंति, अप्पेगतिया साइं साइं नामाइं साति, अप्पेगतिया चत्तारि वि, अप्पेगइया देवा देवसन्निवायं करेंति, अप्पेगतिया देवुज्जोयं करेंति, अप्पेगइया देवुकलियं करेंति, अप्पेगइया देवा कहकहगं करेंति, अप्पेगतिया देवा दुहंदुहगं करेंति, अप्पेगतिया चेलुक्खेवं करेंति, अप्पेगइया देवसन्निवायं देवुजोयं देवुक्कलियं देवकहकहगं देवदुहदुहर्ग चेलुक्खेवं करेंति, अप्पेगतिया उप्पलहत्थगया जाव सयसहस्सपत्तहत्थस्फोटयन्ति भूम्यादिकमिति गम्यते, २८ उच्छलयन्ति २९ प्रोच्छलयन्ति ३० अवपतन्ति ३१ उत्पतन्ति ३२ परिपतन्ति-तिर्यक् निपतन्तीत्यर्थः ३३ ज्वालामालाकुला भवन्ति ३४तप्ता भवन्ति ३५ प्रतप्ता भवन्ति ३६महता शब्देन थूत्कुर्वन्ति ३७ देवानां वातस्येवोत्कलिका देवोत्कलिका तां कुर्वन्ति, ३८ प्राकृतानां देवानां प्रमोदभरवशतः स्वेच्छावचनोलकोलाहलो देवकहकहस्तं कुर्वन्ति । ३९ 'दुहदुहगम्' इत्यनुकरणमेतत् । Jain Education Intellano For Private & Personel Use Only Diww.limelibrary.org Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गयपसेण इयं । देवानामाशीर्वचनम् ॥२५०॥ |गया, अप्पेगतिया कलसहत्थगया जाव धूवकडुच्छयहत्थगया हहतुह जाव-हियया [पृ०४७ पं० ३] सव्वतो समंता आहावंति परिधावति । तए णं तं सूरियाभं देवं चत्तारि सामाणियसाहस्सीओ जाव [पृ०४४ पं०२]] सोलस आयरक्खदेवसाहस्सीओ अण्णे य बहवे सूरियाभरायहाणिवत्थव्वा देवा य देवीओ य महया महया इंदाभिसेगेणं अभिसिंचंति अभिसिंचित्ता पत्तेयं पत्तेयं करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कटु एवं वयासी-जय जय नंदा ! जय जय भद्दा ! जय जय नंदा ! भदं ते, अजियं जिणाहि, जियं च पालेहि, जियमज्झे ५ वसाहि इंदो इव देवाणं चंदो इव ताराणं चमरो इव असुराणं धरणो इव नागाणं भरहो इव मणुयाणं वह पलिओवमाई बहूई सागरोवमाई बहइं पलिओवमसागरोवमाई चउण्हं सामाणियसाहस्सीणं जाव [पृ० ४४ | पं० २] आयरक्खदेवसाहस्सीणं सूरियाभस्स विमाणस्स अन्नेसिं च बहणं सूरियाभविमाणवासीणं देवाण य देवीण य आहेवचं जाव [पृ० २०२ * टिप्पण] महया महया कारेमाणे पालेमाणे विहराहि त्ति कटु जय जय सई पउंजंति। १३७] तए णं से सूरियाभे देवे महया महया इंदाभिसेगेणं अभिसित्ते समाणे अभिसेयसभाओ पुरत्थिमिल्लेणं दारेणं निग्गच्छति निग्गच्छित्ता जेणेव अलंकारियसभा तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता अलंकारियसभं अशुप्पयाहिणीकरेमाणे २ अलंकारियसभं पुरथिमिल्लेणं दारेणं अणुपविसति अणुपविसित्ता जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छति सीहासणवरगते पुरत्थाभिमुहे सन्निसन्ने । Jnin Education i n For Private Personal use only w lanelibrary.org Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण-/ इवं । सूर्याभस्य अलंकारपरिधानम् २५१॥ तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स सामाणियपरिसोववन्नंगा अलंकारियभंडं उवट्ठति, तए णं से सूरियाभे देवे तप्पढमयाए पम्हलसूमालाए सुरभीए गंधर्कोसाईए गायाइं लूहेर्ति लूहित्ता सरसेणं गोसीसचंदणेणं गायाई अणुलिपति अणुलिंपित्ता नासानीस्वासवायवोन्झं चक्खुहरं वन्नफरिमजुत्तं हयलालापेलवातिरेगं धवलं कर्णगखचियन्तकम्मं आगासफालियसमप्पभं दिवं देवदूसजुयलं नियंसेति नियंसेत्ता हारं पिणद्वेति पिणद्वित्ता अदहारं पिणद्धेड एगोवलि पिणद्धेति पिणद्धित्ता मुत्तावलिं पिणद्धति पिणद्धित्ता रयणावलि पिणद्धेइ पिणद्धि- [१३७] १ तत्प्रथमतया-तस्यामलङ्कारसभायां प्रथमतया २ पक्ष्मला च सा सुकुमारा च पक्ष्मलसुकुमारा तया ३ सुरभ्या ४ गन्धकाषायिक्या-सुरभिगन्धकषायद्रव्यपरिकर्मितया लघुशाटिकया ५ गात्राणि ६रूक्षयति ७ 'नासिकानिःश्वासवाह्यम्' अनेन तच्छलक्ष्णतामाह, ८चक्षुहरति-आत्मवशं नयति विशिष्टरूपातिशयकलितत्वात इति चक्षुहरं ९वर्णेन स्पर्शन च-अतिशायिनेति गम्यतेयुक्तं वर्णस्पर्शयुक्तं, १० हयलाला-अश्वलाला तस्या अपि पेलवमतिरेकेण हयलालापेलवातिरेकम्-अतिविशिष्टमृदुत्वलघुत्वगुणोपेतमिति भावः, ११ धवलं श्वेत, तथा १२ कनकेन खचितानि-विच्छुरितानि अन्तकर्माणि-अञ्चलयोनिलक्षणानि यस्य तत् कनकरखचितान्तकर्म १३ आकाशस्फटिकं नामातिखच्छः स्फटिकविशेषस्तत्समप्रभं १४ दिव्यं १५ देवदूष्ययुगलं १६ परिधत्ते परिधाय हारादीन्याभरणानि पिनह्यति, तत्र १७ हारः--अष्टादशसरिकः १८ अर्द्धहारो-नवसरिकः १९ एकावली-विचित्रमणिका २० मुक्तावलीमुक्ताफलमयी २१ रत्नावली-रत्नमय मणिकात्मिका * "नाम नाम्ना ऐकायें समासो बहुलम्-[३ । १ । १८ हैमश०] इति समासः"-रायः विव० - अयं 'मणिक' शब्दः भाषाप्रसिद्ध Jain Educatorren lana For Private Personel Use Only w.jainelibrary.org Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२५२॥ त्ताएवं अंगयाई केयूराइं केडगाइं तुडियाई कडिसुत्तगं दसमुदाणंतगंवच्छसुत्तगं मुरवि कंठमुरवि पालंचं कुंडलाई चूडामणिं मउड पिणद्धेइ गंथिम-वेढिम-पूरिम-संघाइमेणं चउव्विहेणं मल्लेणं कप्परुक्खगं पिव अप्पाणं अलंकियविभूसियं करेइ करित्ता दद्दरमलयसुगंधगंधिएहिं गाxयाई भुखंडेइ दिव्वं च सुमणदामं पिणद्धेइ।। [१३८] तए णं से सूरियाभे देवे केसालंकारेणं मल्लालंकारेणं आभरणालंकारेणं वत्थालंकारेण चउबिहेण| २६ प्रालम्बः-तपनीयमयो विचित्रमणिरत्नभक्तिचित्र आत्मनः प्रमाणेन सुप्रमाण आभरणविशेषः, २३ कटकानि-कलाचिकाभर-५ णानि २४ त्रुटितानि-बाहुरक्षिकाः २२अङ्गदानि बाह्याभरणविशेषाः २५ दशमुद्रिकानन्तकं हस्ताङ्गुलिसम्बन्धि मुद्रिकादशकं २७ कुण्डले-कर्णाभरणे २८ चूडामणि म सकलपार्थिवरत्नसर्वसारो देवेन्द्रमनुष्येन्द्रमूर्द्धकृतनिवासो निःशेषामङ्गलाशान्तिरोगप्रमुखदोषापहारकारी प्रवरलक्षणोपेतः परममङ्गलभूत आभरणविशेषः चित्राणि-नानाप्रकाराणि यानि रत्नानि तैः संकटश्चित्ररत्नसङ्कटः-प्रभूतरत्न निचयोपेत इति भावः-तम्-२९ पुष्पमालाम् ३० ग्रन्थिमं-ग्रन्थनं ग्रन्थस्तेन निवृत्तं ग्रन्थिमम्-यत्सूत्रादिना ग्रथ्यते तद् ग्रन्थिमम्इति भावः, ३१ पूरिमं यत् ग्रथित तत् वेष्टय ते यथा पुष्पलम्बू'सगो गेन्दुक इत्यर्थः, ३२ पूरिमं येन वंशशलाकामयं पञ्जरादि पूर्यते, ३३ संघातिमं यत् परस्परतो नालसंघातेन संघात्यते । 'मणका' शब्दं सूचयति । 8-गं विकच्छसु-भा० १।४-याई भक्खंडेइ-भा० १। "भावादिमः" [६-४-२१] प्रत्ययः"-रा०वि० । = सर्वप्रतिषु अयमेव पाठः परंतु अन 'पूरिम' शब्दस्थाने 'वेष्टिम' शब्दः उचितो भाति ? ४ -ते तथा पुष्पलंपूसको गन्दुक-पा०४-५ ।। +-सको गडक-भा०१। Jain Education Internet For Private & Personel Use Only wolinelibrary.org Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । सूर्याभस्य पुस्तकवाचनम् . ॥२५३॥ | अलंकारेण अलंकियविभूसिए समाणे पडिपुण्णलंकारे सीहासणाओ अन्भुढेति अम्भुद्वित्ता अलंकारियसभाओ| पुरथिमिल्लेणं दारेणं पडिणिक्खमइ पडिणिक्वमित्ता जेणेव ववसायसभा तेणेव उवागच्छति ववसायसभं अणुपयाहिणीकरेमाणे अणुपयाहिणीकरेमाणे पुरथिमिल्लेणं दारेणं अणुपविसति, जेणेव सीहासणवरगए जाव सन्निसन्ने । तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स सामाणियपरिसोववन्नगा देवा पोत्थयरयणं उ०वणेति, तते णं से सूरियाभे देवे पोत्थयरयणं गिण्हति गिणिहत्ता पोत्थयरयणं मुयई मुइत्ता पोत्थयरयणं विहाडेई विहाडित्ता पोत्थयरयणं वाएति पोत्थयरयणं वाएत्ता धम्मियं ववसायं ववसइ ववसइत्ता पोत्थयरयणं पडिनिक्खिवइ सीहासणातो अब्भुटेति अम्भुढेत्ता ववसायसभातो पुरथिमिल्लेणं दारेणं पडिनिक्खमित्ता जेणेव नंदा पुक्खरिणी तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ताणंदापुक्खरिणि पुरथिमिल्लेणं तोरणेणं तिसोवाणपडिरूवएणं पच्चोरहइ [१३८] १ व्यवसायसभा नाम व्यवसायनिबन्धनभृता सभा, क्षेत्रादेरपि कर्मोदयादिनिमित्तत्वात , उक्तं च0"उदय-क्खय-क्खओवसम-उवसमा जं च कम्मुणो भणिया । दव्वं खेत्तं कालं भावं च भवं च संपप्प ॥ [ ] इति, २उत्सङ्गे स्थानविशेषे वा उत्तमे इति द्रष्टव्यम् , ३उद्घाटयति, ४धार्मिकम्-धर्मानुगतं व्यवसाय व्यवस्थति-कर्तुमभिलपतीति भावः। 0-वर्णमंति-भा०१। सायं गिण्हति गिण्हित्ता-भा०१। 0 उदय-क्षय-क्षयोपशम-उपशमा यच्च कर्मणो भणिताः । द्रव्यं क्षेत्रं कालं भावं च भवं च संप्राप्य ॥ Jain Educat inter nal For Private & Personel Use Only iww.jainelibrary.org Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२५४॥ Jain Educatio | पञ्चोरुहित्ता हत्थपादं पक्खालेति पक्खालित्ता आयंते चोक्खे परमसूइभूए एगं महं सेयं रययामयं विमलं सलिलपुण्णं मत्तगयमुहागितिकुंभसमाणं भिंगारं पगेण्हति पगेण्हित्ता जाई तत्थ उप्पलाई जाव [पृ० २१ पं० १०] सतसहस्सपत्ताई ताई गेण्हति गेण्हित्ता णंदातो पुक्खरिणीतो पच्चुत्तरति पच्चुत्तरित्ता जेणेव सिद्धायतणे तेणेव पहारेत्थ गमणाए । सूर्याभः सिद्धायतनं गत्वा जिनप्रतिमानां | प्रमाजनादिकं करोति [१३९] तए णं तं सूरियाभं देवं चत्तारि य सामाणियसाहसीओ जाव [ पृ० ४४ पं० २] सोलस आयरक्ख ५ | देवसाहस्सीओ अन्ने य बहवे सूरियाभविमाणवासिणो जाव देवीओ य अप्पेगतिया देवा उप्पलत्थगा जाव सयस हस्तपत्त हत्थगा सूरियाभं देवं पितो पिट्ठतो समणुगच्छति । तए णं तं सूरियाभं देवे बहवे आभिओगिया देवाय देवीओ य अप्पेगतिआ कलसहत्थगा जाव अप्पेगतिया धूवकडुच्छुयहत्थगता हट्ठतुट्ठ जाव [पृ० ४७ पं० ३] सूरियाभं देवं पिट्ठतो समणुगच्छति । तए णं से सूरियाभे देवे चउहि सामाणिगसाहस्सीहिं | जाव अन्नेहि य बहूहि य जाव देवेहि य देवीहि य सद्धिं संपरिवुडे सबिट्टीए जाव [पृ० ६९ पं० २]- णातियरवेणं १० जेणेव सिद्धायतणे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता सिद्धायतणं पुरथिमिल्लेणं दारेणं अणुपविसति अणुपविसित्ता जेणेव देवच्छंदए जेणेव जिणपडिमाओ तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता जिणपडिमाणं आलोए पणामं करेति करिता लोमहत्थगं गिण्हति गिव्हित्ता जिणपरिमाणं लोमहत्थएणं पमज्जइ पमजित्ता जिणपडिमाओ सुरभिणा गंधोद पहाणेइ ण्हाणित्ता सरसेणं गोसीसचंदणेणं गायाइं अणुलिंपइ अणुलिंपइत्ता सुरभिगंधका ational Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२५५॥ साइएणं गायाइं लूहेति लूहित्ता जिणपडिमाणं अहयाई देवदूसजुयलाई नियंसेइ नियंसित्ता पुप्फारुहणं मल्लारहणं गंधारुहणं चुण्णारुहणं वन्नारुहणं वत्थारुहणं आभरणारुहणं करेइ करित्ता आसत्तोसत्तविउलवहवग्धारियमल्लदामकलावं करेइ मल्लदामकलावं करेत्ता कयग्गहगहियकरयलपन्भट्टविप्पमुक्केणं दसवद्धवन्नेणं कुसुमेणं मुक्कपुप्फपुंजोवयारकलियं करेति करित्ता जिणपडिमाणं पुरतो अच्छेहिं सण्हेहिं रययामएहिं अच्छरसातंदुलेहिं अट्ठ मंगले आलिहइ, संजहा-सोत्थिय जाव [पृ० १९६०४] दप्पणं । तयाणंतरं च णं चंदप्पभवइरवेरुलियविमः | लदंड कंचणमणिरयणभत्तिचित्तं कालागुरुपवरकुंदुरुक्कतुरकधूवमघमघंतगंधुत्तमाणुविद्धं च धूववैदि विर्णिम्मुयंतं वेरुलियमयं कईच्छुयं पगहिय पयत्तण धवं दाऊण जिणवैराणं अट्ठसयविसुद्धगन्थजुत्तेहिं अत्थजुत्तेहिं अपुण [१३९] १ अच्छो रसो येषु ते अच्छरसाः, प्रत्यासन्नवस्तुप्रतिबिम्बाधारभूता इवातिनिर्मला इत्यर्थः, अच्छरसाश्च ते तन्दुलाश्च | तैः-दिव्यतन्दुलैरिति भावः, २ चन्द्रप्रभवज्रवैडूर्य मयो विमलो दण्डो यस्य स तथा तम् , ३ काञ्चनमणिरत्नभक्तिचित्रम् ४कालागुरुप्रवरकुन्दरुक्कतुरुक्कसत्केन धूपेन उत्तमगन्धिनाऽनुविद्धाम्-कालागुरुप्रवरकुन्दरुकतुरुकधूपगन्धोत्तमानुविद्धां ५धूपवर्ति ६ विनिमु- १० चन्तं ७ चैडूर्यमयं ८ धूपकडुन्छुयं ९ प्रगृह्य १० प्रयत्नतो ११ धूपं दत्वा १२ जिनवरेभ्यः , १६ सप्ताष्टानि पदानि १७ पश्चादपसृत्य १९ दशाङ्गलिमञ्जलिं मस्तके रचयित्वा प्रयत्नतः १३ विशुद्धो-निर्मलो लक्षणदोपरहित इति भावः यो ग्रन्थः-शब्दसंदर्भस्तेन युक्तानि, अष्टशतं च तानि विशुद्धग्रन्थयुक्तानि च तैः १४ अर्थयुक्तैः-अर्थसारैरपुनरुक्तैर्महावृत्तैः, तथाविधदेवलब्धिप्रभाव एषः, 0 "प्राकृतत्वात् पदव्यत्ययः"-राय० वि० । - "सूत्रे षष्ठी प्राकृतत्वात्"-राय० वि० । Jain Education Temational For Private & Personel Use Only Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेन इयं । ॥२५६॥ | रुत्तेहिं महावित्तहिं संधुणे संधुणित्ता सत्तट्ट पयाई पच्चसक्क पञ्चो कित्ता वामं जाणं अंचेइ अंचित्ता दाहिणं | जाणुं धरणितलंसि निहद्दु तिक्खुत्तो मुद्धाणं धरणितलंसि निवाडेह निवाडित्ता ईसिं पफचुण्णमइ पच्चुण्णमित्ता | कैरयल परिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि कट्टु एवं वैयासी- नमोऽत्थे णं अरिहंताणं भगवंताणं आदिगराण तित्थगराणं सैंयंसंबुद्धाणं पुरिमुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिसर्वरपुण्डरी आणं पुरिसवरगंधहत्थीणं १५संस्तौति संस्तुत्य १८ वामं जानुं अश्चति इत्यादिना विधिना प्रणामं कुर्वन् २० प्रणिपातदण्डकं पठति, तद्यथा - २१ नमोऽस्तु २२ ५ | देवादिभ्योऽतिशयपूजामर्हन्तीत्यर्हन्तस्तेभ्यः = २३ ते चार्हन्तो नामादिरूपा अपि सन्ति ततो भावार्हस्पतिपभ्यर्थमाह- 'भगवद्भयः' भगःसमग्रैश्वर्यादिलक्षणः स एषामस्तीति भगवन्तस्तेभ्यः, २४ आदि : - धर्मस्य प्रथमा प्रवृत्तिस्तत्करणशीलाः आदिकरास्तेभ्यः २५ तीर्यते संसारसमुद्रोऽनेनेति तीर्थ- प्रवचनं तत्करणशीलास्तीर्थकराः तेभ्यः, २६ स्वयम् - अपरोपदेशेन सम्यग् वरबोधिप्राप्त्या बुद्धा-मिथ्या| त्वनिद्रापगमसंबोधेन स्वयंसंबुद्धास्तेभ्यः, तथा २७पुरुषाणामुत्तमाः पुरुषोत्तमाः, भगवन्तो हि संसारमप्यावसन्तः सदा परार्थव्यसनिन | उपसर्जनीकृतस्वार्था उचितक्रियावन्तोऽदीनभावाः कृतज्ञतापतयोऽनुपहतचित्ता देवगुरुब हुमानिन इति भवन्ति पुरुषोत्तमास्तेभ्यः, तथा १० २८ पुरुषाः सिंहा इव कर्मगजान् प्रति पुरुषसिंहास्तेभ्यः, तथा २९ पुरुषवरपुण्डरीकाणीव संसारजलासङ्गादिना च कर्ममलव्यपेताः | पुरुषवरपुण्डरीकाः तेभ्यः तथा ३० पुरुषवरगन्धहस्तिन इव परचक्रदुर्भिक्षमा प्रभृतिक्षुद्र गजनिराकरणेनेति पुरुषवरगन्धहस्तिनस्तेभ्यः = "सूत्रे षष्टी 'छट्टीविभत्तीए भन्नइ चउत्थी' [ ] इति प्राकृतलक्षणवशात् - राय० वि० । Jain Education Inmatnal ainelibrary.org Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगैहिआणं लोगपईवाणं लोगपजोगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाण मग्गदाणं सेरणदयाणं बोहिदयाणं धम्मदयाणं धम्मैदेसयाणं तथा ३१लोको-भव्यसवलोकः तस्य सकलकल्याणैकनिबन्धनतया भव्यत्वभावेनोत्तमा लोकोत्तमास्तेभ्यः, तथा ३२ लोकस्य नाथायोगक्षेमकृतो लोकनाथास्तेभ्यः, तत्र योगो बीजाधानोद्भेदपोषणकरणम्-क्षेमम् च तत्तदुपद्रवाद्यभावापादनं, तथा ३३ लोकस्यप्राणिलोकस्य पश्चास्तिकायात्मकस्य वा हिताहितोपदेशेन सम्यमरूपणया वा लोकहितास्तेभ्यः, तथा ३४लोकस्य-देशनायोग्यस्य |५| ॥२५७॥ प्रदीपा देशनांशुभियथावस्थितवस्तुप्रकाशका लोकपदीपास्तेभ्यः, तथा ३५ लोकस्य-उत्कृष्टमतेर्भव्यसतलोकस्य प्रद्योतनं प्रद्योतकत्वविशिष्टा ज्ञानशक्तिस्तत्करणशीला लोकप्रद्योतकराः-तथा च भवन्ति भगवत्प्रसादात् तत्क्षणमेव भगवन्तो गणभृतो विशिष्टज्ञानसंपत्समन्विता यदशाद् द्वादशाङ्गमारचयन्तीति-तेभ्यः, तथा ३६ अभयं-विशिष्टमात्मनः स्वास्थ्य, निःश्रेयसधर्मभूमिकानिवन्धनभूता परमा धृतिरिति भावः, ततः अभयं ददतीत्यभयदा+स्तेभ्यः, तथा ३७ चक्षुरिव चक्षुः-विशिष्ट आत्मधर्मः तत्वावबोधनिबन्धनः श्रद्धास्वभावः, श्रद्धाविहीनस्य अचक्षुष्मत इव रूपतत्त्वदर्शनायोगात् तद् ददतीति चक्षुर्दास्तेभ्यः, तथा ३८ मार्गो-विशिष्टगुणस्थानावाप्तिप्रगुणः स्वरसवाही क्षयोपशमविशेषस्तं ददतीति मार्गदाः, तथा ३९शरणं-संसारकान्तारगतानामतिप्रबलरागादिपीडितानां समाश्वासनस्थानकल्प तत्वचिन्तारूपमध्यवसानं तद् ददतीति शरणदास्तेभ्यः, तथा ४०बोधिः-जिनप्रणीतधर्मप्राप्तिस्तत्वार्थश्रद्धानलक्षणसम्यग्दशनरूपा तां ददतीति बोधिदास्तेभ्यः, तथा ४१ धर्म-चारित्ररूपं ददतीति धर्मदास्तेभ्यः, कथं धर्मदाः ? इत्याह-४२ धर्म दिशन्तीति | + 'अभयद' स्थाने 'अभयदय' इत्यत्र "सूत्रे च 'क' प्रत्ययः स्वार्थिकः प्राकृतलक्षणवशात्-एवमन्यत्रापि"-राय०वि० । Jain Education Meme Lonal For Private & Personel Use Only watjainelibrary.org Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥२५८॥ धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं अप्पडिहयवरनाणदंसणधराणं विअच्छेउमाणं जि णणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाण बुद्धाणं बोयाण मुत्ताणं मोअगाणं सव्वन्नूणं सव्वदरिसीणं सिवं अॅयलं अरु अणंत अक्खयं-अव्वाबाहं अंपुणरावित्ति सिद्धिंगइनामधेयं ठाणं | धर्मदेशकास्तेभ्यः, तथा ४३ धर्मस्य नायकाः-स्वामिनस्तद्वशीकरणभावात् तत्फलपरिभोगाच्च धर्मनायकाः तेभ्यः, ४४ धर्मस्य सारथय इव सम्यक् प्रवर्तनयोगेन धर्मसारथयस्तेभ्यः, तथा ४५धर्म एव वरं-प्रधान चतुरन्तहेतुत्वात् चतुरन्तं चक्रमिव चतुरन्तचक्रं तेन वत्तितुं ५ शीलं येषां ते तथा तेभ्यः, तथा १६अप्रतिहते अप्रतिस्खलिते क्षायिकत्वात् वरे-प्रघाने ज्ञानदर्शने धरन्तीति अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनधरास्तेभ्यः, तथा ४७ छादयन्तीमि छद्म-घातिकर्मचतुष्टयं व्यावृत्तम्-अपगतं छद्म येभ्यस्ते व्यावृत्तच्छमानस्तेभ्यः, तथा ४८ रागद्वेषकषायेन्द्रियपरीषहोपसर्गघातिकर्मशत्रून् स्वयं जितवन्तोऽन्यांश्च जापयन्तीति जिनाः ४९ जापकास्तेभ्यो जिनेम्यो जापकेभ्यः, तथा ५० भवार्णवं स्वयं तीर्णवन्तोऽन्याँश्च तारयन्तीति ५१ तीस्तारकास्तेभ्यः, तथा केवलवेदसा अवगततत्त्वा ५२ बुद्धा अन्याँश्च बोधयन्तीति ५३ बोधकास्तेभ्यः, ५४ मुक्ताः कृतकृत्याः-निष्ठितार्थी इति भावः-तेभ्योऽन्याँश्च मोचयन्तीति ५५ मोचकास्तेभ्यः, १० ५६ सर्वज्ञेभ्यः ५७ सर्वदर्शिम्या, ५८ शिव सर्वोपद्रवरहितत्वात् ५९ अचलं स्वामाविकमायोगिकचलनक्रियाऽपोहात् ६० अरुजं शरीरमनसोरभावन आधिव्याध्यसम्भवात् ६१ अनन्तं केवलात्मनाऽनन्तत्वात् ६२ अक्षयं विनाशकारणाभावात् ६३ अव्यावा, केनापि बाधयितुमशक्यममूतत्वात् ६४ न पुनरावृत्तिर्यस्मात् तदपुनरावृत्ति ६५ सिध्यन्ति-निष्ठितार्था भवन्त्यस्यामिति सिद्धिः-लोकान्तक्षेत्रलक्षणा सैव गम्यमानत्वात् गतिः सिद्धिगतिरेव नामधेयं यस्य तत् सिद्धिगतिनामधेयम् ६६तिष्ठन्ति अस्मिन् इति स्थान-व्यवहारतः Jain Education Inter For Private 8 Personal use only Tww.linelibrary.org Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । २५९॥ संपत्ताणं वदह नमसई वंदित्ता नमंसित्ता जेणेव० देवच्छंदए जेणेव सिद्धायतणस्स बहुमज्झदेसभाए तेणेव उवागच्छइ लोमहत्थगं परामुसइ सिद्धायतणस्स बहुमज्झदेसभागं लोमहत्थेणं पमैजति, दिव्वाए दगधाराए अन्भुक्खेड, सरसेणं गोसीसँचंदणेणं पंचंगुलितलं *मंडलगं आलिहइ कर्यग्गहगहिय-जाव [पृ०६६ पं०४] पुंजोवयारकलियं करेइ करेत्ता धृवं दलयइ, जेणेव सिद्धायतणस्स दाहिणिल्ले दारे तेणेव उवागच्छति लोमहत्थगं परामसह दारचेडीओ य सालभंजियाओ य वालरूवए प लोमहत्थएणं पजइ दिवाए दगधाराए अभुक्खेइ सिद्धिक्षेत्रं निश्चयतो यथावस्थितं स्वखरूपं स्थानस्थानिनोरभेदोपचारात् तत् सिद्धिगतिनामधेयं स्थानं ६७तत् संप्राप्तेम्यः, एवं प्रणिपातदण्डकं पठित्वा ततो "वन्दते ताः प्रतिमाश्चैत्यवन्दनविधिना प्रसिद्धन, नमस्करोति पश्चात्पणिधानादियोगेन" इत्येके,अन्ये त्वभिदधति-"विरतिमतामेव प्रसिद्धश्चैत्यवन्दनविधिः अन्येषां तथाऽभ्युपगमपुरस्सरकायव्युत्सर्गासिद्धेः-इति वन्दते सामान्येन नमैस्करोति आशयवृद्धरभ्युत्थाननमस्कारेण इति, तत्त्वमत्र भगवन्तः परमर्षयः केवलिनो विदन्ति, अत ऊर्ध्वं सूत्रं सुगम केवलं भूयान् विधिविषयो वाचनाभेद इति यथावस्थितवाचनाप्रदर्शनार्थ विधिमात्रमुपदश्यते तदनन्तरं७०लोमहस्तकेन देवच्छन्दकं ७१प्रमार्जयति ७२पानीयधारया ७३अभ्युक्षति,अभिमुखं सिञ्चतीत्यर्थः, तदनन्तरं ७४गोशीर्षचन्दनेन ७५पञ्चाङ्गुलितलं ददाति, ततः ७६पुष्पा रोहणादि धूपदहनं च करोति, तदनन्तरं सिद्धायतनबहुमध्यदेशभागे उदकधाराभ्युक्षणचन्दनपश्चाङ्गुलितलप्रदानपुष्पपुञ्जोपचारधूपदानादि करोति, ततः ७७ सिद्धायतनदक्षिणद्वारे समागत्य ०-व सिद्धाय-भा० १-२ । * मूल-विवरणयोर्भेदः । ४ -पाचारो-भा० १। For Private & Personal use only Jain Education amenal Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२६०॥ सरसेणं गोसीसचंदणेणं चच्चए दलयइ दलइत्ता पुारहणं मल्ला० जाव [पृ०२५५ पं०१-२] आभरणारुहणं करेइ | सूर्याभः करेत्ता आसत्तोसत्त० जाव [पृ० २५५ पं० २] धूवं दलयइ जेणेव दाहिणिल्ले दारे मुहमंडवे जेणेव दाहिणिल्लस्स स्वविमानमुहमंडवस्स बहुमज्झदेसभाए तेणेव उवागच्छइ लोमहत्थगं परामुसइ बहुमज्झदेसभागं लोभैहत्थेणं पमजइ स्थानां शादिव्वाए दगधाराए अन्भुक्खेइ सरसेणं गोसीसेंचंदणेणं पंचंगुलितलं मंडलगं आलिहइ कयग्गाहगहिय-जाव | लभञ्जिकाVवं दलयइ जेणेव दाहिणिल्लस्स मुहमंडवस्स पचत्थिमिल्ले दारे तेणेव उवागच्छह लोमहत्थगं परामुसइ दारचे- दीनामपि डीओ य सालभंजियाओ य वालरूवए य लोमहत्थेणं पमजइ दिव्वाए दगधाराए० सरसेणं गोसीसचंदणेणं | प्रमाजेनाचच्चए दलयइ पुप्फारुहणं जाव आभरणारुहणं करेइ आसत्तोसत्त० कयगाहग्गहिय० धूवं दलयइ जेणेव दाहि दिकं करोति णिल्लमुहमंडवस्स उत्तरिल्ला खंभपंती तेणेव उवागच्छइ लोमहत्थं परामुसइ थंभे य सालभंजियाओ य वाल७८ लोमहस्तकं गृहीत्वा तेन ७९ द्वारशाखे ८० शालिभञ्जिकाः ८१ च्यालरूपाणि च ८३ प्रमार्जयति, तत ८४ उदकधारयाऽभ्युक्षणं ८५ गोशीर्षचन्दनचर्चा-८६पुष्पाचारोहणं ८७ धूपदानं करोति । ततो दक्षिणद्वारेण निर्गत्य ८८ दाक्षिणात्यस्य मुखमण्डपस्य ८९ १० बहुमध्यदेशभागे ९० लोमहस्तकेन प्रमाय ९१उदकधाराभ्युक्षणं ९२ चन्दनपञ्चाङ्गुलितलप्रदान९३पुष्पपुञ्जोपचार ९४धूपदानादि करोति, कृत्वा ९५ पश्चिमद्वारे समागत्य पूर्ववत् द्वारार्च निकां करोति कृत्वा च तस्यैव दाक्षिणात्यस्य मुखमण्डपस्य ९६उत्तरस्या स्तम्भपको समागत्य पूर्ववत् तदर्चनिकां विधत्ते, इह यस्यां दिशि सिद्धायतनादिद्वारं तत्रेतरस्य मुखमण्डपस्य स्तम्भपतिः, ततस्तस्यैव * -कधारासिञ्चनपुष्पपुजो-भा० २। ०-वत् पूजां च विधाय-पा० ४-५ । Jain Educatio n al w.jainelibrary.org Page #305 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२६॥ रूवए य लोहमत्थएणं पमजइ जहा चेव पञ्चथिमिल्लस्स दारस्स जाव धूवं दलयइ जेणेव दाहिणिल्लस्स मुहमंडवस्स पुरथिमिल्ले दारे तेणेव उवागच्छह लोमहत्थगं परामुसति दारचेडीओ तं चेव सव्वं जेणेव दाहिणिल्लस्स मुहमंडवस्स दाहिणिल्ले दारे तेणेव उवागच्छइ दारचेडीओ य तं चेव सव्वं जेणेव दाहिणिल्ले पेच्छाघरमंडवे जेणेव दाहिणिल्लस्स पेच्छाघरमंडवस्स बहुमज्झदेसभागे जेणेव वइरामए अक्वाडए जेणेव मणिपेढिया जेणेव सीहासणे तेणेव उबागच्छइ लोमहत्थग परामुसइ अरवाडगं च "मणिपेढियं च सीहाँसणं च लोमहर्थएणं ५ पमन्जइ दिव्वाए दगधौराए सरसेणं गोसीसचंदणेणं चच्चए दलयइ, पुप्फारुहणं आसत्तोसत्त-जाव धूवं दलेइ जेणेव दाहिणिल्लस्स पेच्छाघरमंडवस्स पञ्चथिमिल्ले दारे उत्तरिल्ले दारे तं चेव जं चेव पुरथिमिल्ले दारेतं चेव, दाहिणे दारे तं चेव, जेणेव दाहिणिल्ले चेईयथूभे तेणेव उवागच्छद धूभं 'मणिपेढियं च दिव्वाए दगधाराए सरसेण गोसीसचंदणेण चच्चए दलेइ दाक्षिणात्यस्य मुखमण्डपस्य ९७ पूर्वद्वारे समागत्य तत्पूजां करोति कृत्वा तस्य दाक्षिणात्यस्य मुखमण्डपस्य ९८ दक्षिणद्वारे १० समागत्य पूर्ववत् पूजां विधाय तेन द्वारेण विनिर्गत्य ९९ प्रेक्षागृहमण्डपस्य १०० बहुमध्यदेशभागे समागत्य १०१ अक्षपाटकं १०२ मणिपीठिका १०३ सिंहासनं च १०४ लोमहस्तकेन प्रमाय१०५उदकधारयाऽभ्युक्ष्य १०६चन्दनचर्चा १०७पुष्पपूजा१०८धूपदानानि कृत्वा तस्यैव १०९ प्रेक्षागृहमण्डपस्य क्रमेण पश्चिमोत्तरपूर्वदक्षिणद्वाराणामर्चनिकां कृत्वा दक्षिणद्वारेण विनिर्गत्य ११० चैत्यस्तूपं १११मणिपीठिकां च लोमहस्तकेन प्रमाय ११२उदकधारयाऽभ्युक्ष्य सरसेन ११३गोशीर्षचन्दनकेन ११४पञ्चाङ्गु. Jain Educat internal For Private Personel Use Only Vipww.jainelibrary.org Page #306 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥२६२॥ पुस्फोरु० आसत्तो जाव धूवं दलेइ, जेणेव पञ्चस्थिमिल्ला मणिपेढिया जेणेव पञ्चस्थिमिल्ला जिणपडिमा तं चेव, जेणेव उत्तरिल्ला जिणपडिमा तं चेव सव्वं, जेणेव पुरथिमिल्ला मणिपेढिया जेणेव पुरथिमिल्ला जिणपडिमा तेणेव उवागच्छइ तं चेव, दाहिणिल्ला मणिपेढिया दाहिणिल्ला जिणपडिमा तं चेव, जेणेव दाहिणिल्ले चेइयरुक्खे तेणेव उवागच्छइ तं चेव, जेणेव महिंदझए जेणेव दाहिणिल्ला नंदापुक्वरिणी तेणेव उवागच्छति लोमहत्थग परामुसति तोरणे य तिसोवाणपडिरूवए सालभंजियाओ य वालरूवए य लोमहत्थएणं पमज्जइ दिवाए दगधाराए सरसेणं गोसीसचंदणेणं० पुकारहणं आसत्तोसत्त० धूवं दलयति, लितलं दचा ११५ पुप्पाचारोहणं च विधाय ११६ धूपं ददाति, ततो यत्र ११७ पाश्चात्या ११८ मणिपीठिका तत्रागच्छति, तत्रागत्य आलोके प्रणाम करोति, कृत्वा लोमहस्तकेन प्रमार्जनं सुरभिगन्धोदकेन स्नानं सरसेन गोशीपचन्दनेन गात्रानुलेपनं | देवदूष्ययुगलपरिधानं पुष्पाचारोहणं पुरतः पुष्प-पुञ्जोपचारं धूपदानं पुरतो दिव्यतन्दुलैरष्टमङ्गलकालेखनमष्टोत्तरशतवृत्तः स्तुति प्रणिपात्तदण्डकपाठं च कृत्वा वन्दते नमस्यति, तत एवमेव क्रमेण ११९ उत्तरपूर्वदक्षिणप्रतिमानामप्यर्च निकां कृत्वा दक्षिणद्वारेण विनिर्गत्य १२० दक्षिणस्यां दिशि यत्र १२१ चैत्यवृक्षः तत्र समागत्य चैत्यवृक्षस्य द्वारवदनिका कनेति, ततो १२२महेन्द्रध्वजस्य स्तो यत्र १२३ दाक्षिणात्या १२४ नन्दा पुष्करिणी तत्र १२५ समागच्छति, समागत्य १२६ तोरणत्रिसोपानप्रतिरूपकगतशालभञ्जिका-व्यालकरूपाणां १२७ लोमहस्तकेन प्रमाजनं १२८ जलधारयाऽभ्युक्षणं १२९ चन्दनचर्चा १३० पुष्पाद्यारोहणं १३१ धूपदानं - --प्पपूजोप-भा०१। Jain Educate inteliational Iww.jainelibrary.org Page #307 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। सिद्धाययणं अणुपाहिणीकरेमाणे जेणेव उत्तरिल्ला गंदापुक्खरिणी तेणेव उवागच्छति तं चैवे, जेणेव उत्तरिल्ले चेइयरुक्खे तेणेव उवागच्छति, जेणेव उत्तरिल्ले चेइयथूभे तहेव, जेणेव पञ्चत्थिर्मिल्ला पेढिया जेणेव पञ्चत्थिमिल्ला जिणपडिमा तं चेय, उत्तरिल्ले पेच्छाघरमंडवे तेणेव उवागच्छति जा चेव दाहिणिल्लंवत्तव्वया सा चेव सक्या पुरथिमिल्ले दारे, दाहिणिल्ला खंभपंती तं चेव सव्वं, जेणेव उत्तरिल्ले मुहमंडवे जेणेव उत्तरिल्लस्स मुहमंडवस्स बहुमज्झदेसभाए तं चेव सव्वं, पञ्चथिमिल्ले दारे तेणेव० उत्तरिल्ले दारे दाहिणिल्ला खंभपंती | ५|॥२६३॥ सेसं तं चेव सव्वं, जेणेव सिद्वायतणस्स उत्तरिल्ले दारे तं चैव, जेणेव सिद्धायतणस्स पुरथिमिल्ले दारे तेणेव उवागच्छइ तं चर्व, जेणेव पुरथिमिल्ले मुहमंडवे जेणेव पुरथिमिल्लस्स मुहमंडवस्स बहुमज्झदेसभाए तेणेव उवागच्छइ तं चेव, पुरथिमिल्लस्स मुहमंडवस्स दाहिणिल्ले दारे पचत्थिमिल्ला खंभपंती उत्तरिल्ले दारे तं चैव च कृत्वा १३२ सिद्धायतनम्१३३ अनुप्रदक्षिणीकृत्य१३४उत्तरस्यां नन्दापुष्करिण्यां समागत्य १३५ पूर्ववत् तस्या अर्चनिकां करोति, तत उत्तराहे महेन्द्रध्वजे तदनन्तरमुत्तराहे १३६ चैत्यवृक्षे तत उत्तराहे १३७ चैत्यस्तूपे ततः १३८ पश्चिमोत्तरपूर्वदक्षिणजिनप्रतिमानां पूर्ववत् पूजां विधाय १३९उत्तराहे प्रेक्षागृहमण्डपे समागच्छति, तत्र १४० दाक्षिणात्यप्रेक्षागृहमण्डपवत् सर्वा वक्तव्यता वक्तव्या, ततो १४१दक्षिणस्तम्भपङ्कत्या विनिर्गत्योत्तराहे १४२मुखमण्डपे समागच्छति, तत्रापि दक्षिणात्यमुखमण्डपवत् सर्व १४३पश्चिमोत्तरपूर्वद्वारक्रमेण कृत्वा १४४ दक्षिणस्तम्भपङ्कत्था विनिर्गत्य १४५ सिद्धायतनस्योत्तरद्वारे समागत्य १४६ पूर्ववदर्चनिकां कृत्वा १४७ पूर्वद्वारेण समागच्छति,नत्रार्च निकां १४८ पूर्ववत् कृत्वा पूर्वस्य १४९मुखमण्डपस्य १५० दक्षिणद्वारे १५१पश्चिमस्तम्भपङ्कत्या१५२उत्तरपूर्वद्वारेषु Jain Education jamglona For Private Personel Use Only wwdjainelibrary.org Page #308 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥२६४॥ पुरथिमिल्ले दारे तं चेवे, जेणेव पुरथिमिल्ले पेच्छाघरमंडवे, एवं "थूभे जिणपडिमाओ चेइयरुक्खा महिंद| झया गंदा पुखरिणी तं चेव जाव धूवं दलइ जेणेव सभा सुहम्मा तेणेव उवागच्छति संभं सुहम्म पुरत्थिमिल्लेणं दारेणं अणुपविसइ जेणेव माणवए चेइयखंभे जेणेव वईरामए गोलवसमुग्गे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता लोमहत्वगं परामुसइ वइरामए गोलवदृसमुग्गए लोमहत्थेणं पमजइ वइरामए गोलवसमुग्गए विहाँडेइ जिणसगहाओ लोमहत्थेणं पमज्जइ सुरभिणा गंधोदएणं पक्खालेइ पक्वालित्ता अग्गेहिं वरेहिं गंधेहि य ५ मल्लेहि य अञ्चेइ धूवं दलयइ जिणसकहाओ वइरामएसु गोलवदृसमुग्गएसु पडिनिखिंवइ माणवगं चेइयखंभं १५३ क्रमेणोक्तरूपां पूजां विधाय पूर्वद्वारेण विनिर्गत्या १५४ पूर्वप्रेक्षागृहमण्डपे समागत्य पूर्ववत् द्वारमध्यभागदक्षिणद्वारपश्चिमस्तम्भपङ्कत्या उत्तरपूर्वद्वारेषु पूर्ववदर्च निकां करोति, ततः पूर्वप्रकारेणैव क्रमेण १५५ चैत्यस्तूप१५६जिनप्रतिमा१५७चैत्यवृक्ष१५८महेन्द्रध्वज१५९नन्दापुष्करिणीनाम्, ततः १६०सभायां सुधर्मायां १६१पूर्वद्वारेण १६२प्रविशति, प्रविश्य यत्रैव मणिपीठिका तत्राऽऽगच्छति, आलोके च जिनप्रतिमानां प्रणामं करोति, कृत्वा यत्र १६३ माणवकचैत्यस्तम्भो यत्र १६४ वज्रमयाः १६५गोलवृत्ताः समुद्गकाः तत्रागत्य समुद्रकान् गृह्णाति, गृहीत्वा १६७ विघाटयति विघाट्य च १६६ लोमहस्तकं परामृश्य तेन प्रमायं १६८ उदकधारया अभ्युक्ष्य गोशीर्षचन्दनेनानुलिम्पति, ततः १६९ प्रधानगन्धमाल्यैरर्चयति १७०धूपं दहति, तदनन्तरं भूयोऽपि १७१ वज्रमयेषु गोलवृत्तसमुद्गेषु १७२ प्रतिनिक्षिपति, प्रतिनिक्षि० प्य तेषु पुष्पगन्धमाल्यवस्त्राभरणानि चारोपयति, ततो लोमहस्तकेन १७३ माणवक * विवरणे नैतत् पदं विवृतं प्रतिभाति । -त्य पूर्ववत् मध्यभागद-पा० ४-५। ०-प्य तान् वनमयान् गोलवृत्तसमुद्गकान् स्वस्थाने Jain Education Hemenal For Private Personel Use Only whjainelibrary.org Page #309 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । लोमहत्थएणं पमज्जइ दिव्वाए दगधाराए सरसेणं गोसीसचंदणेणं चचए दलयइ, पुप्फारुहणं जाव 'धूवं दलयइ, | जेणेव सीहासणे तं वेव, जेणेव देवसंयणिजे तं चेवें, जेणेव खुड्डागमहिंदज्झए तं चेवें, जेणेव पहरणकोसे चोप्पालए तेणेव उवागच्छइ लोमहत्थगं परानुसइ पहरेणकोसं चोप्पालं लोमहत्थेएणं पमज्जैइ दिव्याए दग | धाराए नरसेणं गोसीसचंदणेणं दलेइ पुप्फारुहणं आसत्तोसत्त० [पृ० २५५ पं० २] ध्रुवं दलयइ, जेणेव सभीए | सुहम्माए बहुमज्झँदेस भाए जेणेव मणिपेढिया जेणेव देवसयणिज्जे तेणेव उवागच्छर लोमहत्थगं परामुसह | देवसयणिज्जं च मणिपेढियं च लोमहत्थएणं पमज्जइ जाव धूर्व दलई जेणेव चैत्यस्तम्भं प्रमार्ण्य उदकधारयाऽभ्युक्षणचन्दनचर्चापुष्पाद्यारोपणं १७४ धूपदानं च करोति, कृत्वा च १७५ सिंहासनप्रदेशमागत्य | मणिपीठिकायाः सिंहासनस्य च १७६ लोमहस्तकेन प्रमार्जनादिरूपां पूर्ववदर्चनिकां करोति, कृत्वा यत्र मणिपीठिका यत्र च १७७ देवशयनीयं तत्रोपागत्य मणिपीठिकाया देवशयनीयस्य च १७८ द्वारवदर्चनिकां करोति, तत उक्तप्रकारेणैव १७९ ० क्षुल्लकेन्द्रध्वजे १८० पूजां करोति, ततो यत्र १८१ चोप्पालको नाम प्रहरणकोशस्तत्र समागत्य १८३ लोमहस्तकेन १८२ परिघरत्नप्रमुखाणि प्रहरणरत्नानि १८४ प्रमार्जयति प्रमार्ण्य १८५ उदकधारयाऽभ्युक्षणं १८६ चन्दनचर्चाम् १८७ पुष्पाद्यारोपणं १८८ धूपदानं च करोति, ततः १८९ सभायाः सुधर्माया १९० बहुमध्यदेशभागेऽचैनिकां १९१ पूर्ववत् करोति, कृत्वा सुधर्मायाः सभाया दक्षिणद्वारे समागत्य तस्य अर्थनिकां पूर्ववत् कुरुते, ततो दक्षिणद्वारेण विनिर्गच्छति, इत ऊर्ध्वं यथैव सिद्धायतनान्निष्क्रामतो दक्षिणद्वारादिका प्रतिनिक्षिप्य भा० २ । ० मूल सूत्रे 'खुड्डागमहिंदज्झए ' इति पाठः । १० Jain Educationemtional ॥२६५॥ Page #310 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥२६६॥ उववायसीए दाहिणिल्ले दारे तहेव अभिसेयसभासरिसं जाव पुरथिमिल्ला गंदा पुक्खरिणी जेणेव हरए तेणेव उवागच्छइ तोरणे य तिसोवाणे य सालभंजियाओ य वालरूवए य तहेव, जेणेव अभिसेयसभा तेणेव उवागच्छइ तहेव सीहासेणं च मणिपेढियं च सेसं तहेव आययणसरिसं जाव पुरथिमिल्ला गंदा पुक्खरिणी जेणेव अलंकारियसभा तेणेव उवागच्छइ जहा अभिसेयसभा तहेव सव्वं, जेणेव ववसीयसभा तेणेव उवादक्षिणनन्दापुष्करिणीपर्यवसाना पुनरपि प्रविशतः उत्तरनन्दापुष्करिण्यादिका उत्तरद्वारान्ता ततो द्वितीयद्वारान्निष्कामतः पूर्वद्वारादिका पूर्वनन्दापुष्करिणीपर्यवसाना अर्चनिकावक्तव्यता सैव सुधर्मायां सभायामप्यन्यूनातिरिक्ता वक्तव्या, ततः पूर्वनन्दापुष्करिण्या अर्चनिकां कृत्वा १९२ उपपातसभां पूर्वद्वारेण प्रविशति, प्रविश्य च मणिपीठिकाया देवशयनीयस्य तदनन्तरं बहुमध्यदेशभागे प्राग्वदर्चनिकां विदधाति, ततो १९३ दक्षिणद्वारे समागत्य तस्यानिकां कुरुते, अत ऊर्ध्वमत्रापि सिद्धायतनवत् दक्षिणद्वारादिका १९४ पूर्वनन्दापुष्करिणीपर्यवसानार्चनिका वक्तव्या, ततः पूर्वनन्दापुष्करिणीतोऽपक्रम्य १९५ इदे समागत्य पूर्ववत् १९६ तोरणार्च निकां करोति, कृत्वा १९७ पूर्वद्वारेणाभिषेकसभां प्रविशति, प्रविश्य मणिपीठिकायाः १९८ सिंहासनस्याभिषेकभाण्डस्य बहुमध्यदेशभागस्य च क्रमेण पूर्ववदर्च निकां करोति,ततोऽत्रापि १९९ सिद्धायतनवत् दक्षिणद्वारादिका २०० पूर्वनन्दापुष्करिणीपर्यवसाना अनिका वक्तव्या ततः पूर्वनन्दापुष्करिणीतः २०१ पूर्वद्वारेणालङ्कारिकसभां प्रविशति, प्रविश्य मणिपीठिकायाः सिंहासनस्य अलंकारभाण्डस्य बहुमध्यदेशभागस्य च क्रमेण पूर्ववदनिकां करोति, तत्रापि क्रमेण सिद्धायतनवत् दक्षिणद्वारादिका पूर्वनन्दापुष्करिणीपर्यवसाना अर्चनिका गीतः पूर्वद्वारेण अलंकारिकसभा प्र-पा० ४-५ । Jain Education meal For Private & Personel Use Only wijainelibrary.org Page #311 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । | गच्छइ तहेव लोमहत्थयं परामुसति पोत्थयैरयणं लोमहत्एणं पमज्जइ पमज्जित्ता दिखाए दगधाराए अग्गेहिं रेहि य गंधेहिं मल्लेहि य अच्चेति 'मॅणिपेढियं सीहासणं च सेसं तं चैवें पुरत्थिमिल्ला नंदा पुक्खरिणी जेणेव हरए तेणेव उवागच्छइ तोरणे य तिसोवाणे य सालभंजियाओ य वालरूवए य तहेव । जेणेव बैलिपीढं तेणेव | उवागच्छइ बलिविसजणं करेह, आभिओगिए देवे सहावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया सूरियाभे विमाणे सिंघाडएस तिए चउक्के चरेसु चमुसु महापहेतु पागरेसु हालएसु वक्तव्या, ततः पूर्वनन्दापुष्करिणीतः पूर्वद्वारेण २०२ व्यवसायसभां प्रविशति प्रविश्य २०३ पुस्तकरत्नं २०४ लोमहस्तकेन प्रमृज्य | २०५ उदकधारया अभ्युक्ष्य चन्दनेन चर्चयित्वा २०६ वरगन्धमाल्यैरर्चयित्वा पुष्पाद्यारोपणं धूपदानं च करोति, तदनन्तरं २०७ | मणिपीठिकायाः २०८ सिंहासनस्य बहुमध्यदेशभागस्य च क्रमेण २०९ पूर्ववदर्चनिकां करोति, तदनन्तरमत्रापि सिद्धायतनवत् | दक्षिणद्वारादिका २१० पूर्वनन्दापुष्करिणीपर्यवसाना अर्चनिका वक्तव्या, ततः पूर्वनन्दापुष्करिणीतो २११ बलिपीठे समागत्य तस्य बहुमध्यदेशभागवत् अर्चनिकां करोति, कृत्वा च २१३ आभियोगिकदेवान् शब्दापयति, शब्दापयित्वा २१४ एवमवादीत् - २१५ १० 'खिप्पामेव' इत्यादि सुगमं यावत् २३५ 'तमाणत्तियं पच्चप्पिणंति' । तत्र २१६ शृङ्गाटक:- शृङ्गाटकाऽऽकृतिपथयुक्तं त्रिकोणं स्थानम् | २१७ त्रिकं यत्र रथ्यात्रयं मिलति, २१८ चतुष्कं - चतुष्पथयुक्तं, २१९ चत्वरं - बहुरथ्यापातस्थानं, २२० चतुर्मुखं यस्माच्चतसृष्वपि दिक्षु पन्थानो निस्सरन्ति, २२१ महापथः - राजपथः शेषः सामान्यः पन्थाः २२२ प्राकारः प्रतीतः, २२३ अट्टालकाः - प्राकारस्योपरि सूर्याभः स्वविमानस्था नां शालभञ्जिका दीनामर्च निकां कारयति ॥२६७॥ Page #312 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चरियासु दारेसु, गोपुरेसु तोरणेसु आरामेसु उर्जीणेगु वणेसु वणराईसु कोणणेसु वैणसंडेसु अचणियं करेह रायपसेण अञ्चणियं करेत्ता एवमाणत्तियं खिप्पामेव पञ्चप्पिणह, तए णं ते आभिओगिया देवा सूरियाभेणं देवेणं एवं इयं। वुत्ता समाणा जाव पडिसुणित्ता सूरियाभे विमाणे सिंघाडएसु तिएसु चउक्कएसु चचरेसु चउम्मुहेसु महाप हेसु पागारेसु अद्यालएसु चरियासु दारेसु गोपुरेसु तोरणेसु आरामेसु उजाणेसु वणेसु वणरातीसु काणणेसु ॥२६८॥ वणसंडेसु अच्चणियं करेन्ति जेणेव सूरियाभे देवे जाव पच्चप्पिणंति, तते णं से सूरियाभे देवे जेणेव नंदा - पुक्खरिणी तेणेव उवागच्छइ नंदापुक्खरिणि पुरथिमिल्लणं तिसोमाणपडिरूवएणं पच्चोरुहति हत्]पाए पक्खालेइ णंदाओ पुक्खरिणीओ पच्चुत्तरेह जेणेव सभा सुधम्मा तेणेव पहारित्थ गमणाए। तए णं से सूरियाभे देवे | चउहिं सामाणियसाहस्सीहिं जाव [पृ० ४४ पं० २] सोलसहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अन्नेहि य बहहिं भृत्याश्रयविशेषाः, २२४ चरिका-अष्टहस्तप्रमाणो नगरप्राकारान्तरालमार्गः २२५ द्वाराणि-प्रासादादीनां २२६ गोपुराणि-प्राकारद्वार णि २२७ तोरणानि-द्वारादिसम्बन्धीनि २२८ आरमन्ते यत्र माधवीलतागृहादिषु दम्पत्यादीनि-इत्यसाबारामः, २२९ पुष्पादिमयवृक्षसंकुलमुत्सवादी बहुजनोपभोग्यमुद्यान, २३२ सामान्यवृक्षवृन्दनगरासन्नं काननं, २३० नगरविप्रकृष्टं वनम् , २३३ एकाऽनेकजाती. योत्तमवृक्षसमूहो वनखण्डः, २३१ एकजातीयोचमवृक्षसमूहो वनराजी, २३६ ततः सूर्याभदेवो बलिपीठे २१२ बलिविसर्जनं करोति, कृत्वा चोत्तरपूर्वा २३७ नन्दापुष्करिणीमनुप्रदक्षिणीकुर्वन् २३८ पूर्वतोरणेनानुप्रविशति, अनुपविश्य च २३९ हस्तौ पादौ प्रक्षालयति | प्रक्षाल्य नन्दापुष्करिण्याः२४० प्रत्यवतीर्य सामानिकादिपरिवारसहितः सर्वक्ष्या यावद् दुन्दुभिनिर्धोपनादितरवेण सूर्याभविमाने मध्यJain Education temjonal ainelibrary.org Page #313 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण सूरियाभविमाणवासीहिं वेमाणिएहिं देवेहिं देवीहि य सद्धिं संपरिबुडे सव्विड्डीए जाव-नाइयरवेणं [पृ० ६९ सूर्याभस्य पं० २] जेणेव सभा सुहम्मा तेणेव उवागच्छद सभं सुधम्म पुरथिमिल्लेणं दारेणं अणुपविसति अणुपवि. परिवार सित्ता जेणेव सीहासणे तेणेव उवागच्छइ सीहासणवरगए पुरत्याभिमुहे सणसण्णे। [१४०] तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स अवरुत्तरेणं उत्तरपुरथिमेणं दिसिभाएणं चत्तारि य सामाणिय |॥२६९॥ साहस्सीओ चउसु भद्दासणसाहस्सीसु निसीयंति, तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स पुरथिमिल्लेणं चत्तारि अ-4 ग्गमहिसीओ चउसु भद्दासणेसु निसीयंति, तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स दाहिणपुरत्थिमेणं अभितरियपरिसाए अट्ठ देवसाहस्सीओ अट्ठसु भद्दासणसाहस्सीसु निसीयंति, तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स दाहिणेणं मज्झिमाए परिसाए दस देवसाहस्सीओ दससु भद्दासणसाहस्सीसु निसीयंति, तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स दाहिणपचत्थिमेणं बाहिरियाए परिसाए बारस देवसाहस्सीतो बारससुभद्दासणसाहस्सीसु निसीयंति, तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स पचत्थिमेणं सत्त अणियाहिवइणो सत्तहिं भद्दासणेहिं णिसीयंति, तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स चउदिसिं सोलस आयरक्खदेवसाहस्सीओसोलसहिं भद्दासणसाहस्सीहिं णिसीयंति, तंजहामध्येन समागच्छन् २४१ यत्र सुधर्मा सभा तत्रागत्य ता २४२ पूर्वद्वारेण प्रविशति, प्रविश्य मणिपीठिकाया उपरि २४३ सिंहासने २४४ पूर्वाभिमुखो २४५ निषीदति [१४०] ततः [पृ० १०२ पं० ३] प्रागुपदर्शितसिंहासनक्रमेण १ सामानिकादय उपविशन्ति, Jain Education tern al For Private Personel Use Only Mb.jainelibrary.org Page #314 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२७॥ पुरथिमिल्लेणं चत्तारि साहस्सीओ, तेणं आयरक्खा सन्नद्धबद्धवम्मियकवया उप्पीलियसरासणपट्टिया पिणद्धगेविजा आर्विद्धविमलवरचिंधपट्टा गहियाउहपहरणा तिणयाणि तिसंधियाई वयंरामयकोडीणि धणूई पैगिज्झ पडियाइयकंडकलावा जीलपाणिणो पीतपाणिणो रतपाणिणो चावपाणिणो चारूपाणिणो चम्मपाणिणो दंडपाणिणो खग्गपाणिणो पासपाणिणो नीलपीयरत्तचावचारुचम्मदंडखग्गपासधरा आयरक्खा रक्खोवगा गुत्ता गुत्तपालिया जुत्ता जुत्तेपालिया पत्तेयं पत्तेयं समयओ विणयओ किंकरभूया चिट्ठन्ति । २ते आत्मरक्षाः ३सनद्धबद्धवर्मितकवचा ४उत्पीडितशरासनपट्टिकाः ५पिनद्धग्रैवेयाः-पिनगवेयकाभरणाः ६आविद्धविमलवरचिह्नपट्टा ७ गृहीताऽऽयुधप्रहरणाः ८त्रिनतानि आदिमध्यावसानेषु नमनभावात् ९ त्रिसन्धीनि आदिमध्यावसानेषु संधिभावात् १० वज्रमयकोटीनि ११ धषि १२ अभिगृह्य १३ पत्तिकाण्डकलापा विचित्रकाण्डकलापयोगात , केऽपि १४ नीलः 'काण्डकलापः' इति गम्यते पाणी येषां ते नीलपाणयः, एवं १५ पीतपाणयः १६ रक्तपाणयः १७ चापं पाणी येषां ते चापपाणयः १८ चारु:-प्रहरणविशेषः पाणी येषां ते चारुपाणयः १९ चर्म अङ्गुष्ठाङ्गुल्योराच्छादनरूपं येषां ते चर्मपाणयः, एवं २० दण्डपाणयः २१ खड्गपाणयः २२ पाशपाणयः, एतदेव व्याचष्टे-यथायोगं २३ नील-पीत-रक्त-चाप-चारु-चर्म-दण्ड-खड्ग-पाश-धरा २४ आत्मरक्षाः २५ रक्षामुपगच्छन्ति तदेकचित्ततया तत्परायणा वर्तन्ते इति रक्षोपगाः २६ गुप्ता न स्वामिभेदकारिणः, तथा २७गुप्ता-परामवेश्या पालिः-सेतुर्येषां ते गुप्तपालिकाः, तथा २८ युक्ताः-सेवकगुणोपेततया उचितास्तथा २९ युक्ताः-परस्परसंबद्धा नतु बृहदन्तरा पालियेषां ते युक्तपालिकाः, ३० समयतः-आचारतः-आचारेणेत्यर्थः ३१ विनयतश्च ३२ किंकरभूता इव ३३ तिष्ठन्ति, न खलु ते किंकराः, किन्तु तेऽपि Jan Education in setorary.org Page #315 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण प्र०-सूरियाभस्स णं भंते ! देवस्स केवइयं कालं ठिती पण्णत्ता! उ०-गोयमा! चत्तारि पलिओवमाई ठिती पण्णत्ता। प्र०-सुरियाभस्स णं भंते ! देवस्स सामाणियपरिसोववण्णगाणं देवाणं केवइयं कालं ठिती पण्णत्ता? उ०-गोयमा! चत्तारि पलिओवमाइं ठिती पण्णत्ता, महिड्डीए महजुत्तीए महब्वले महायसे महासोक्खे महाणुभागे सूरियामे देवे, अहोणं भंते ! सूरियाभे देवे महिड्डीए जाव महाणुभागे। १४१] प्र०-सूरियाभेणं भंते ! देवेणं सा दिव्या देविड्डी सा दिव्वा देवज्जुई से दिव्वे देवाणुभागे किण्णा लद्धे | किण्णा पत्ते किण्णा अभिसमन्नागए ? पुठवभवे के आसी? किंनामए वा ? को वा गुत्तणं? कयरंसि वा गोमंसि वा नगरंसि वा निगमंसि वा रायहाणीए वा खेडंसि वा कबडंसि वा मडंबंसि वा पट्टणंसि वा मान्याः, तेषामपि पृथगासननिपातनात् , केवलं ते तदानीं निजाचारपरिपालनतो विनीतत्वेन च तथाभूता इव तिष्ठन्ति, तत उक्तं किंकरभूता इवेति, तेहिं * चउहिं सामाणियसाहस्सीहिं, इत्यादि सुगम, यावत् 'दिव्वाई भोगभोगाई भुंजमाणे विहरति' इति [१४१] १ग्रसते बुद्ध्यादीन गुणान् यदि वा गम्यः शास्त्रप्रसिद्धानामष्टादशानां कराणामिति ग्रामस्तस्मिन्, २न विद्यते करो यस्मिन् तन्नगरं तस्मिन् , ३ निगमः-प्रभूततरवणिग्ववासः ४ राजाधिष्ठानं नगरं राजधानी ५ प्रांशुप्राकारनिबद्धं खेटम् ६ क्षुल्लकग्राकारवेष्टितं कर्बटम् ७ अर्धगव्यूततृतीयान्तामान्तररहितं मडम्बम् ८ पट्टनं-जलस्थलनिर्गमप्रवेशः, उक्तं चः-"पट्टनं शकटैगम्यं, घोटकै * अस्य विवरणस्य मूलपाठो न दृश्यते। सूर्याभः पुरा क आसीत? स्वर्ग चत. ख कियती स्थितिः? इत्यादि प्रश्नोत्तराणि ॥२७१॥ Jain Education femlosa For Private & Personel Use Only Page #316 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२७२॥ Jain Education Inter दोणमुहंसि वा आरंसि वा आसमंसि वा संबासि वा संन्निवेसंसि वा? किं वा दवों किं वा 'भोचा किं वा किची किं वा समीयरित्ता कस्स वा तहारूवस्स समणस्स वा माहणस्स वा अंतिए एगमवि आरियं धम्मयं सुवयणं सुच्चा निसम्म जं णं सूरियाभेणं देवेणं सा दिव्वा देविड्डी जाव देवाणुभागे लद्धे पत्ते अभिसमन्नागए ? उ०- 'गोयमा ! 'ति- समणे भगवं महावीरे भगवं गोयमं आमंतेत्ता एवं वयासी सूरियाभोसमतो नौभिरेव च । नौभिरेव तु यद् गम्यं, पत्तनं तत् प्रचक्षते" । [ ] ९ द्रोणमुखं - जलनिर्गमप्रवेशम् - पत्तनमित्यर्थः १० आकरोहिरण्याकरादिः ११ आश्रमः - तापसावसथोपलक्षित आश्रयविशेषः १२ संबाधो-यात्रासमागतप्रभूतजननिवेशः १३ सन्निवेशः तथाविधप्राकृतलोकनिवासः, १४ दत्त्वा अशनादि, १५भुक्त्वा अन्तप्रान्तादि, १६कृत्वा तपः - शुभध्यानादि, १७ समाचर्य प्रत्युप्रेक्षाप्रमार्जनादि । ★ पृ० ५९ टिप्पण x । www.helibrary.org Page #317 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। 'केयइअद्धे जनपद: पएसिकहा ॥२७३॥ [१४२] एवं खलु गोयमा तेणं कालेणं तेणं समएणं इहेव जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे केयइअद्धे नामे जणवए होत्था,रिद्धत्थिमियसमिद्धे सव्वोउयफलसमिद्धे रम्मे नंदणवणप्पगासे पासाईए [पृ०९ पं०४] जाव पडिरूवे। __ [१४२] १ ०केकया नाम अर्द्धम्-अर्धमात्रमार्यत्वेनेति गम्यते, स हि परिपूर्णो जनपदः, केवलमर्द्धमार्यम् अर्द्ध चानार्यम् आर्येण चेह प्रयोजनमिति 'अर्धम्' इत्युक्तम् जनपद आसीत् , सर्वर्त्तकैः-२ सर्वत्तुभाविभिः पुष्पैः फलैश्च समृद्धिमत् , एवं ३ स्म्यम्रमणीयं ४ नन्दनवनप्रकाशम्-नन्दनवनप्रतिम शुभसुरभिशीतलया छायया सर्वतः समनुबद्धं 'पासाईए' इत्यादि पदचतुष्टयं पूर्ववत् ० किकया नाम-भा० १। Jain Educat i onal Tww.jainelibrary.org Page #318 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२७४|| तत्थ णं केइयअद्धे जणवए सेयविया णाम नगरी होत्था, रिद्धस्थिमियसमिद्धा जाव [पृ० ३ पं०१-] पडिरूवा। | सेयविया तीसे ण सेयवियाए नगरीए बहिया उत्तरपुरस्थिमे दिसीभागे एस्थ णं भिगवणे णाम उजाणे होत्था-रम्मे नंदणवणप्पगासे सव्वोउयफलसमिद्धे सुभसुरभिसीयलाए छायाए सव्वओ चेव समणुबद्धे पासादीए जाव [पृ०९ पएसी राया पं० ४] पडिरूवे । तत्थ णं सेयवियाए णगरीए पएसी णामं राया होत्था, महंयाहिमवंत [पृ० २३ पं० ३-] जाव विहरइ । अधम्मिए अधम्मिटे अधम्मक्खाई अधम्माणुए अधम्मपलोई अधम्मपजणणे अधम्मसीलसमुयायारे-अधम्मेण चेव वित्तिं कप्पेमाणे 'हण'-'छि'-'भिद'-पवत्तए लोहियपाणी पावे चंडे रुद्दे खुद्दे [पृ० ११ पं० १२] ५'महया हिमवंत'-इत्यादि राजवर्णनं प्राग्वत् [पृ० २३ पं०३-] ६ धर्मेण चरति धार्मिको न धार्मिकः अधार्मिकः, ७ सामान्यतोऽप्यधार्मिकः स्यात् अत आह-अधर्मिष्ठः-अतिशयेन-अधर्मवान् अत एव ८ अधर्मेण ख्यातिर्यस्यासावधमख्यातिः ९ अधर्ममनुगच्छति अधर्मानुगः तथा १० अधर्ममेव प्रलोकते-परिभावयतीत्येवंशीलोऽधर्मप्रलोकी ११ अधर्म प्रकर्पण जनयति-उत्पादयति लोकानामपीत्यधर्मप्रजननः १२ अधर्मशीलसमुदाचारो-न धर्मात् किमपि भवति तस्यैवाभावादित्येवम्-१३ अधर्मणैव वृत्तिम्-सर्वजन्तूनाम्-यापना कल्पयन् १४ 'जहि' १५'छिन्द्धि' १६ 'भिन्द्धि' इत्येवं १७ प्रवर्तकः अत एव १८ लोहितः पाणिः-मारयित्वा हस्तयोरप्यप्रक्षालनात् अत एव १९पापः पापकर्मकारित्वात् २०चण्डः तीवकोपावेशात् २१रौद्रो+निस्तूंशकर्मकारि+ "ऋरे नृशंस-निखिंश-पापाः"-हिम अभि० कां०३ श्लो० ४०] इति वचनात् 'निस्त्रिंश' इति उचितम् । For Private Personal Use Only Jin Educati onal w.ainelibrary.org Page #319 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । | साहस्सीए उक्कण-वण-माया- निर्यडि-कूड- केंवड - सोयिसंप ओग बहुले निस्सीले निव्वैए निग्र्गुणे निम्मेरे निप्पञ्चक्खाणपोसहोववासे बैंहूणं दुप्पयचरप्पयमियपसुपक्खी सिरिसवाण घायए वहाँए उच्छायणयाए अधम्मक समुट्ठिए, गुरूणं णो ॥ २७५॥ त्वात् २२ साहसिकः परलोकभयाभावात् २३ ऊर्ध्वं कश्चनमुत्कश्चनं-हीनगुणस्य गुणोत्कर्षप्रतिपादनम् २४ वञ्चनं प्रतारणं २५ माया परवश्चन बुद्धिः २६ निकृतिः - बकवृच्या गलकर्त्तकानामिवावस्थानम् २७ कूटम् अनेकेषां मृगादीनां ग्रहणाय नानाविधप्रयोगकरणम् २८ ५ कपट - नेपथ्य-भाषाविपर्ययकरणम् एभिः उत्कञ्चनादिभिः २९ सहातिशयेन यः संप्रयोगो योगस्तेन बहुलः, अथवा २९ सातिसंप्रयोगो | नाम यः सातिशयेन द्रव्येण कस्तूरिकादिना अपरस्य संप्रयोगः-उक्तं च सूत्रकृताङ्गचूर्णिकृता- “सो होइ साइजोगो दध्वं जं छुहिय अन्नदव्वेसुं । दोसगुणा वयणेसु य अत्थविसंवायणं कुणइ" । [सूत्रकृ० द्वितीयश्रु० द्वितीयाध्य० सू० ३५ टीका ] इति तत्संप्रयोगे ३० बहुलः, अपरे व्याख्यानयन्ति - २३" उत्कञ्चनं नाम उत्कोचा, २६ निकृतिः - - वचनप्रच्छादनकर्म २९ सातिः - विश्रम्भः, एतत्संप्रयोग बहुल : " । शेषं तथैव, ३१ निःशीलो - ब्रह्मचर्य परिणामाभावात् ३२ निर्वतो - हिंसादिविरत्यभावात् ३३ निर्गुणः- क्षान्त्यादिगुणा- १० भावात् ३४ निर्मर्यादः - परस्त्री परिहारादिमर्यादाविलोपित्वात् ३५ निष्प्रत्याख्यानपौषधोपवासः - प्रत्याख्यानपरिणाम- पर्वदिवसोपवासपरिणामाभावात्, ३६ बहूनां ३७ द्विपदचतुष्पद मृगपशुपक्षिसरिसृपाणां ३८ घाताय - विनाशनाय ३९ वधाय - ताडना ४० | उच्छादनाय - निर्मूलाभावीकरणाय ४१ अधर्म्मरूपः केतुरिव - ग्रहविशेष इव ४२ समुत्थितः न च ४३ गुरूणां पित्रादीनामागच्छ - वञ्चन भा० १ पा० ५। Page #320 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय। राज्ञी ॥२७६॥ भुट्टेति जो विणयं पउंजइ, सँयस्स वि य णं जणवयस्स णो सम्मं कर रवित्ति पर्वत्तेइ । | सूरियकता । [१४३] तस्स णं पएसिस्स रन्नो सूरियकंता नाम देवी होत्था, सुकुमालपाणिपाया धारिणीवण्णओ पृ० | २७ पं० ३] पएर्सिणा रन्ना सद्धि अणुरत्ता अविरत्ता इहे सद्दे रुवे जाव विहरइ।। सरियकंतो | [१४४] तस्स णं पएसिस्स रणो णेढे पुत्ते सूरियकताए देवीए अत्तए सरियकते नामं कुमारे होत्था, सुकुमालपाणिपाए जाव [पृ० २७ पं० ३-] पडिरूवे। सेणं सरियकंते कुमारे जुवैराया वि होत्था, पएसिस्स रन्नो | रंजं च टुं च बलं च वाहणं च कोसं च कोडागारं च पुरं च अंतेउरं च संयमेव पच्चुवेक्खमाणे पच्चुवेक्खमाणे ताम् ४४ अभ्युत्तिष्ठति-अभिमुखमूर्ध्व तिष्ठति, ४५ न च विनयं प्रयुते, नापि श्रमणब्राह्मणभिक्षुकाणामभ्युत्तिष्ठति, न च विनयं प्रयुड़े, ४६ नापि खकस्यापि-आत्मीयस्यापि जनपदस्यापि ४७ सम्यक् ४८ करभरवृत्ति ४९ प्रवर्तयति। [१४३] १ 'सुकुमालपाणिपाया' इत्यादि देवीवर्णनं प्राग्वत् [पृ० २७ पं० ३]। २ प्रदेशिना राज्ञा ३ सार्द्धमनुरक्ता अवि. रक्ता-कश्चिद्विप्रियकरणेऽपि विरागाभावात् । [१४४] कुमारवर्णनं १ 'सुकुमालपाणिपाए' इत्यादि जाव 'सुन्दरें इति, अत्र 'यावत्'करणात् 'अहीणपञ्चेदियसरीरे पियदरिसणे सुरूवे' इति द्रष्टव्यम् , एतच्च देवीवर्णकवत् [पृ० २७ पं०११] स्वयं परिभावनीयम् । २ स च सूर्यकान्तो नाम कुमारो ३ युवराजा अभृत् , ४ प्रदेशिनो राज्ञो ५ राज्य-राष्ट्रादिसमुदायात्मकं ६ राष्ट्र च-जनपदं च ७ बलं च-हस्त्यादिसन्यं ८ वाहनं च-वेगसरादिकं ९ कोशं च-भाण्डागारं १० कोष्ठागारं च-धान्यगृहं ११ पुरं च १२ अवरोधं च १३ आत्मनैव-खयमेव १४ समुत्प्रेक्षमाणो JainEducation For Private Personal use only jainelibrary.org Page #321 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । |विहरह। चित्तो [१४५] तस्स णं पएसिस्स रन्नो जेट्टे भाउयवयंसए चित्ते णामं सारही होत्था अड्डे जाव [पृ० २५ पं० २]] सारथिः बहुजणस्स अपरिभूए साम-दंड-भेय-उवप्पयाण-अत्थसत्थईहामइविसारए उत्पत्तियाए वेणतियाँए कम्मयाए| पारिणामियाए चउविहाए बुद्धीए उववेए, पएसिस रण्णो बहुसु कन्जेसु य कारणेसु य कुटुंबेसु य मंतेसु य | ||२७७॥ गुंज्झेसु य रहँस्सेसु य निच्छेएमु च ववहारेसु य आपुच्छणिज्जे -निरूपयन् समुत्प्रेक्षमाणो वा व्यापारयन् । [१४५] १ आढयः-समृद्धो दीप्तः-कान्तिमान वित्तः प्रतीतो यावत्'करणात् 'विउलभवण...विच्छड्डियउरभत्तपाणे' इति परिग्रहः, अस्य व्याख्या राजवर्णकवत् [पृ० २५ पं० ११] परिभावनीया, २ राज्यमान्यत्वात् स्वयं च जात्यक्षत्रियत्वात् , ३ साम-भेददण्ड-उपप्रदानलक्षणानां नीतीनाम् ४ अर्थशास्त्रस्य-अर्थोपायव्युत्पादनग्रन्थस्य ५ ईहा-विमर्शस्तत्प्रधाना मतिरीहामतिस्तया विशा रदो-विचक्षणः सामभेददण्डोपप्रदानार्थशास्त्रेहामतिविशारदः ६औत्पत्तिक्या-अदृष्टाश्रुताननुभूतविषयाकस्माद्भवनशीलया ७ वैनयि- १० क्या-विनयलभ्यशास्त्रार्थसंस्कारजन्यया ८कर्मजया-कृषिवाणिज्यादिकर्मभ्यः सप्रभावया ९पारिणामिक्या-प्रायोक्योविपाकजन्यया१० एवंरूपया चतुर्विधया बुद्ध्या ११ उपपेतः १२ प्रदेशिनो राज्ञो १३ बहुषु कार्येषु-कर्त्तव्येषु १४ कारणेषु-कर्त्तव्योपायेषु १५ कुटुम्बेषु स्वकीयपरकीयेषु विषयभूतेषु १६ मन्त्रेषु-राज्यादिचिन्तारूपेषु १७ गुह्येषु-बहिर्जनाप्रकाशनीयेषु १८ रहस्येषु-तेष्वेव अषडक्षीणेषु १९ निश्चयेषु निश्चीयन्ते इति निश्चया:-अवश्यकरणीयाः कर्त्तव्यविशेषास्तेषु २० व्यवहारेषु-आवाहनविसर्जनादिरूपेषु २१ आमच्छ Jain Education melal For Private Personel Use Only Jwwjainelibrary.org Page #322 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । कुणाला जनपद: -सावत्थी नगरी ॥२७८॥ | पडिपुच्छेणिज्जे मेढी पाणं आहारे आलंबणं चक्खू मेढिभूएँ पमाणभूए आहारभूए आलंवणभूए चक्खुभूए सव्वट्ठाणसव्वभूमियासु लद्धपच्चए विदिण्णविचारे रज्जधुराचिंतए आवि होत्या। [१४६] तेणं कालेणं तेणं समयेणं कुणाला नाम जणवए होत्था, रिद्धस्थिमियसमिद्धे [पृ० २७२ पं० ६] तत्थ | णं कुणालाए जणवए सावत्थी नाम नयरी होत्था रिद्धस्थिमियसमिद्धा [पृ० ३ पं० १] जाव पडिरूवा। तीसे णं सावत्थीए णगरीए बहिया उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए कोहए नाम चेइए होत्था, पोराणे [पृ०७ पं०३-]जाव ५ नीयः-सकृत प्रच्छनीयः २२ प्रतिप्रच्छनीयः-असकृत् प्रच्छनीयः, किमिति ?, यतोऽसौ २३ मेढी-खलकमध्यवर्तिनी स्थूणा यस्यां नियमिता गोपतिर्धान्यं ग्राहयति तद्वद् यमालम्ब्य सकलं मत्रिमण्डलं मन्त्रणीयान् अर्थान् धान्यमिव विवेचयति स मेढिः, तथा २४ प्रमाण-प्रत्यक्षादि तद्वत् यः-तदृष्टानामर्थानामव्यभिचारित्वेन तत्रैव मन्त्रिणां प्रवृत्तिनिवृत्तिभावात-स प्रमाणम् , २५ आधारः आधेयस्येव सर्वकार्येषु लोकानामुपकारित्वात् , तथा २६ आलम्बनं रज्ज्वादि तद्वत् आपद्गर्त्तादिनिस्तारकत्वात् आलम्बनं, तथा २७ चक्षुः-लोचनं तद्वल्लोकस्य यो विविधकार्येषु प्रवृत्तिनिवृत्तिविषयदर्शकः स चक्षुः, एतदेव प्रपञ्चयति-२८ 'मेढिभए' इत्यादि, अत्र १० भृतशब्द औपम्यार्थः, मेढिसदृश इत्यर्थः, २९ सर्वेषु स्थानेषु-कार्येषु संधिविग्रहादिषु ३० सर्वासु भूमिकासु-मन्त्र्यमात्यादिस्थानरू. पासु लब्धः-उपलब्धः प्रत्ययः-प्रतीतिः अविसंवादवचनतया यस्य स तथा, ३१ वितीर्णो-राज्ञाऽनुज्ञातो विचारः-अवकाशो यस्य विश्वसनीयत्वा स वितीर्णविचारः सर्वकार्यादिष्वति प्रकृतं, किंबहुना ?-३२ राज्यधुराचिन्तकश्चापि-राज्यनिर्वाहकश्चापि ३३अभूत् । Jain Education in malal For Private Personel Use Only wwlainelibrary.org Page #323 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥२७९॥ पासादीए। तत्थ णं सावत्थीए नयरीए पएसिस्स रन्नो अंतेवासी जियसत्तू नाम राया होत्था, महयाहिमवंत जाव [पृ० २३ पं०३-] विहरइ । तए णं से पएसी राया अन्नया कयाइ महत्थं महग्धं महरिहं विउलं रायारिहं पाहुडं सजावेइ, सज्जावित्ता चित्तं सारहिं सद्दावेइ, सद्दावित्ता एवं वयासी-गच्छ णं चित्ता! तुमं सावत्थि नगरिं जियसत्तुस्स रणो इमं महत्थं जाव पाहुडं उवणेहि, जाई तत्थ रायकजाणि य रायकिचाणि य रायनीतीओ य रायववहारा य ताई जियसत्तुणा सद्धिं सयमेव पच्चुवेक्खमाणे विहराहि त्ति कटु विसजिए। तए णं से चित्ते ५ सारही पएसिणा रण्णा एवं वुत्ते समाणे हट्ठ-जाव [पृ० ४७ पं०३-] पडिसुणेत्ता तं महत्थं जाव पाहुडं गेण्हइ, पएसिस्स रणो जाव पडिणिक्खमइ सेयवियं नगरिं मज्झमज्झेणं जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता तं महत्थं जाव [प्र० पृ० पं० २] पाहुडं ठवेइ, कोडुंबियपुरिसे सद्दावेइ सहावेत्ता एवं वयासीविप्पामेव भो! देवाणुप्पिया! सच्छत्तं जाव [पृ० १८७ पं०१-] चाउरघंटं आसरहं जुत्तामेव उवट्टवेह जाव पञ्चप्पिणह । तए णं ते कोडंबियपुरिसा तहेव पडिसुणित्ता खिप्पामेव सच्छत्तं जाव जुद्धसज्ज चाउग्घंटं आस १० रहं जुत्तामेव उवट्ठवेन्ति, तमाणत्तियं पञ्चप्पिणंति, तए णं से चित्ते सारही कोडुंबियपुरिसाण अंतिए एयमढे [१४६] १ अन्ते-समीपे वसतीत्येवंशीलोऽन्तेवासी-शिष्यः, अन्तेवासीव सम्यगाज्ञाविधायी इति भावः । २ कवचं-तनुत्राणं वर्म-लोहमय कमलकादिरूपं संजातमस्येति वर्मितम् , सन्नद्धं शरीरारोपणात् बद्धं गाढतरबन्धनेन बन्धनात् वर्मितं कवचं येन स x-कत्तलियादि-भा० १। in Educati onal Www.jainelibrary.org Page #324 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । चित्तो सावत्थीं गच्छति ॥२८०॥ जाव-हियए हाए कयबलिकम्मे कयकोउयमंगलपायच्छित्ते सन्नद्धवद्धवम्मियकवए उप्पीलियसरासणपट्टिएपिणद्धगेविजविमलवरचिंधपट्टे गहियाउँहपहरणे तं महत्थं जाव पाहुडं गेण्हइ, जेणेव चाउग्धंटे आसरहे तेणेव उवागच्छद चाउरघंटं आसरहं दुरूहेति, बहुहिं पुरिसेहिं सन्नद्ध-जाव [प्र० पृ०५०१] गहियाउहपहरणेहिं सद्धिं संपरिबुडे सकोरिंटमल्लदामेणं छत्तेणं धरेजमाणेणं महया भडचडगररहपहकरविंदपरिक्खित्ते साओ गिहाओ णिग्गच्छइ सेयवियं नगरि मझमझेणं णिग्गच्छइ सुहेहिं वासेहिं पायरासेहिं नाइविकिट्टेहिं अंतरा वासेहिं वसमाणे वसमाणे केइयअद्धस्स जणवयस्स मज्झंमज्झेणं जेणेव कुणालाजणवए जेणेव सावत्थी नयरी तेणेव उवागच्छद सावत्थीए नयरीए मज्झमझेणं अणुपविसइ, जेणेव जियसन्तुस्स रणो गिहे जेणेव बाहिरिया उबट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ तुरए निगिण्हइ, रहं ठवेति, रहाओ पचोरुहद, तं महत्थं जाव पाहुडं गिण्हइ जेणेव अभितरिया उवट्ठाणसाला जेणेव जियसत्तू राया तेणेव उवागच्छइ, जियसत्तुं रायं करयलपरिग्गहियं [पृ०५६पं० २-] जाव कटु जएणं विजएणं वद्धावेइ, तं महत्थं जाव पाहुडं उवणेइ । तए णं से जियसत्तू राया चित्तस्स सारहिस्स तं महत्थं जाव पाहुडं पडिच्छइ चित्तं सारहिं सकारेइ सम्माणेति सन्नद्धबद्धवर्मितकवचः, ३ उत्पीडिता-गाढीकृता शरा अस्यन्ते-क्षिप्यन्ते अस्मिन्निति शरासनं-इषुधिस्तस्य-पट्टिका येन स उत्पीडितशरासनपट्टिकः ४ पिनद्धं गैवेयक-ग्रीवाऽऽभरणं विमलवरचिह्नपट्टश्च येन स पिनगवेयकविमलवरचितपट्टः ५आयुध्यतेऽनेनेत्यायुधंखेटकादि प्रहरणम्-असिकुन्तादि गृहीतान्यायुधानि प्रहरणानि च येन स गृहीतायुधप्रहरणः । Jain Education a l For Private & Personel Use Only wwwjainelibrary.org Page #325 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥२८॥ पडिविसज्जेइ रायमग्गमोगाढंच से आवासं दलयइ । तए णं से चित्ते सारही विसजिते समाणे जियसत्तुस्स रनो अंतियाओ पडिनिक्खमइ, जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ, चाउरघंटं आसरहं दुरूहइ, सावत्थि नगरि मझमज्झेणं जेणेव रायमग्गमोगाढे आवासे तेणेव उवागच्छइ, तुरए निगिण्हइ, रहं ठवेइ, रहाओ पञ्चोकहइ, पहाए कयवलिकम्मे कयकोउयमंगलपायच्छित्ते सुद्धप्पावेसाई मंगल्लाई वत्थाई पवरपरिहिते अप्पमहग्घाभरणालंकियसरीरे जिमियभुत्तुत्तरागए वि य णं समाणे पुवावरपहकालसमयंसि गंधब्वेहि य णाडगेहि य उवनचिजमाणे उवनचिजमाणे उवगाइजमाणे उवगाइजमाणे उवलालिजमाणे इट्टे सद्द-फरिस-रस-रूव-गंधे पंचविहे माणुस्सए कामभोए पचणुभवमाणे विहरइ। [१४७] तेणं कालेणं तेणं समएणं पासावञ्चिज्जे केसी नाम कुमारसमणे जोतिसंपण्णे कुलसंपण्णे बैलसंपपणे स्वसंपण्णे विणयसंपण्णे नाणसंपण्णे दसणसंपन्ने चरित्तसंपण्णे लज्जासंपण्णे लांघवसंपण्णे लज्जालाघवसंपन्ने +ओयसी तेयंसी वच्चंसी [१४७] १ जातिसंपन्नः-उत्तममातृपक्षयुक्त इति प्रतिपत्तव्यम् , अन्यथा मातृपितृपक्षसंपन्नत्वं पुरुषमात्रस्यापीति नास्योत्कर्षः कश्चिदुक्तो भवति, उत्कर्षाभिधानार्थ चास्य विशेषणकलापोपादानं चिकीर्पितमिति, एवं २ कुलसंपन्नोऽपि नवरं कुलं-पितृपक्षः३ बलं -संहननविशेपसमुत्थः प्राणः ४ रूपम्-अनुपमं शरीरसौन्दयं ५ विनयादीनि प्रतीतानि, नवरं ६ लाघवं-द्रव्यतोऽल्पोपधित्वम् भावतो गौरवत्रयत्यागः मनोबाकायसंयमः ७ ओजो-मानसोऽवष्टम्भस्तद्वान् ओजस्वी ८ तेजः-शरीरप्रभा तद्वान तेजस्वी ९ वचो वचनं सौ + 'ओयंसो' इत्यादि-इह च विशेषणचतुष्टयेऽपि अनुस्वारः प्राकृतत्वात्'-राय० विव० । For Private Personal Use Only Harjainelibrary.org JainEducation litern Page #326 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२८२।। जसंसी जियकोहे जियमाणे जियमाए जियलोहे जियणिद्दे जितिदिए जियपरीसहे जीवियासमरणभयविप्पमुक्के कमीकमार तवप्पहाणे गुणप्पहाणे करणप्पहाणे चरणप्पहाणे निगहप्पहाणे निच्छयप्पहाणे अंजवप्पहाणे मद्दवप्पहाणे | समणे | लाघवप्पहाणे खंतिप्पहाणे गुत्तिप्पहाणे मुत्तिप्पहाणे विजप्पैहाणे मंतप्पहाणे भाग्याद्यपेतं यस्यास्ति स वचस्वी अथवा वर्च:-तेजः प्रधाव इत्यर्थस्तद्वान् वर्चस्वी १० यशस्वी-ख्यातिमान् , ११ 'जितक्रोधः' इत्यादि तु विशेषणसप्तकं प्रतीतम् , नवरं क्रोधादिजय उदयप्राप्तक्रोधादिविफलीकरणतोऽवसेयः, तथा १२ जीवितस्य-प्राणधारणस्य | आशा-वाञ्छा मरणाद् भयं ताभ्यां विप्रमुक्तो जीविताशामरणभयविप्रमुक्तः, तदुभयोपेक्षक इत्यर्थः, तथा १३ तपसा प्रधानः-उत्तमः शेषमुनिजनापेक्षया तपो वा प्रधानं यस्य स तपःप्रधानः, एवं १४गुणप्रधानः नवरं गुणाः-संयमगुणाः, एतेन च विशेषणद्वयेन तपःसंयमौ पूर्वबद्धाऽभिनवयोः कर्मणोनिर्जराऽनुपादानहेतू मोक्षसाधने मुमुक्षूणामुपादेयौ प्रदर्शितौ, गुणप्राधान्यप्रपञ्चनार्थमेवाह-१५करणं -पिण्डविशुद्ध्यादि, उक्तं च-"पिंडावसोही समिई भावण पडिमा य इन्दियनिरोहो । पडिलेहण नुत्तीओ अभिग्गहा चेव करणं तु"॥ [ ]१६ चरणं-महाव्रतादि, उक्तं च-"वय समणधम्म संजम वेयावच्चं च बम्भगुत्तीओ। णाणाइतियं तवं कोहनिग्गहाई चरण- १० मेयं" ॥[ ] १७ निग्रहः-अनाचारप्रवृत्तेनिषेधनम् । १८ निश्चयः-तत्त्वानां निर्णयः विहितानुष्ठानेष्ववश्यमभ्युपगमो वा १९ आजवं-मायानिग्रहः २० लाघवं-क्रियासु दक्षत्वं २१ क्षान्तिः-क्रोधनिग्रहः २२ गुप्तिः-मनोगुप्त्यादिका २३ मुक्तिः-निर्लोभता २४ २४ विद्याः-प्रज्ञप्त्यादिदेवताऽधिष्ठिता वर्णानुपूर्व्यः २५ मन्त्रा-हरिणेगमेष्यादिदेवताऽधिष्ठिताः अथवा ससाधना विद्या साधनरहिता Jain Education Temonal gjainelibrary.org Page #327 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२८३॥ बंर्भप्पहाणे वेयप्पहाणे नर्यप्पहाणे नियमप्पहाणे सच्चप्पहाणे सोयप्पहाणे नाणप्पहाणे दंसंणप्पहाणे चरित्तप्पहाणे ओराले...[पृ० १४७ पं०१-] चउदसपुवी चउणाणोवगए पंचहिं अणगारसएहिं सद्धिं संपरिबुडे पुवाणुपुचि चरमाणे गामाणुगामं दूइज्जमाणे सुहंसुहेणं विहरमाणे जेणेव सावत्थी नयरी जेणेव कोहए चेइए तेणेव उवागच्छइ, सावत्थी-नयरीए बहिया कोट्ठए चेइए अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिण्हइ उग्गिण्हित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरइ । 1. मन्त्राः, २६ब्रह्मचर्य-बस्तिनिरोधः सर्वमेव वा कुशलानुष्ठानम् २७वेदः-आगमो लौकिक-लोकोत्तरिक-कुप्रावचनिकभेदभिन्नः २८ नया नैगमादयः सप्त प्रत्येकं शतविधाः, २९नियमा-विचित्रा अभिग्रहविशेषाः ३० सत्यं-भूतहितं वचः ३१ शौच-द्रव्यतो निर्लेपता भावतोऽनवद्यसमाचारता ३२ ज्ञानं-मत्यादि ३३ दर्शन-सम्यक्त्वं २४ चारित्रं-बाह्यं सदनुष्ठानं, यच्चेह चरणकरणग्रहणेऽपि आजवादिग्रहणं तत् आर्जवादीनां प्राधान्यख्यापनार्थम् , ननु जितक्रोधत्वादीनामाजवादीनां च का प्रतिविशेषः? उच्यते, जितक्रोधादिविशेषणेषु तदुदयविफलकरणम् मार्दवप्रधानादिपु उदयनिरोधः, अथवा यत एव जितक्रोधादिः अत एव क्षमादिप्रधान इत्येवं हेतुहेतुमद्भावाद् विशेषः, तथा 'ज्ञानसम्पन्नः' इत्यादौ ज्ञानादिमत्वमात्रमुक्तम् 'ज्ञानप्रधानः' इत्यादौ तद्वतां मध्ये तस्य प्राधान्यमित्येवमन्यत्राप्यपौनरुक्त्यं भावनीयम् , तथा ३५ उदार:-स्फाराकारः 'घोरे...३६ चउनाणोवगए' इति पूर्ववत् [पृ० १४७ पं०१ तथा पृ० | १४८ पं०७-१२] 'पंचहि अणगारसएहि' इत्यादिकं वाच्यम् । 8-चर्य सर्वमेव -पा० ४-५ भा० १। JainEducatiointedindia w.iainelibrary.org Page #328 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥२८४॥ [१४८] तए णं सावत्थीए नयरीए सिंघाडग-तिय-चउक्क-चच्चर-चउमुह-महापहेसु महया जणसद्दे इ=वा० जण बूहे इ वा जणबोले इ वा जणकलकले इ वा जणउम्मीइ वा जणउक्कलिया इ वा जणसन्निवाए इ वा जाव परिसा पज्जुवासइ । तए णं तस्स सारहिस्स तं महाजणसदं च जणकलकलं च सुणेत्ता य पासेत्ता य इमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पजित्था, किं णं अज जाव सावत्थीए णयरीए इंदमहे इ वा खंदमहे इ वा रुद्दमहे इ वा मउंदमहे इ वा सिवमहे इ वा वेसमणमहे इ वा नागभहे इ वा जैक्खमहे इ वा भूयमहे इ वा थूभ हे इ वा चेइयमहे इ वा रुखमहे इ वा गिरिमैहे इ वा दरिमहे इ वा अगेंडमहे इ वा नईमहे इ वा सरमहे इ वा सागरमहे [१४८] महान् जनशब्दः परस्परालापादिरूपः, २ जनव्यहो-जनसमुदायः, ३ बोल:-अव्यक्तवर्णो ध्वनिः, ४ कलकलः स एवोपलभ्यमानवचनविभागः ५ ऊर्मि:-संबाधः ६ लघुतरसमुदायः सन्निपातः-अपरापरस्थानेभ्यो जनानामेकत्र मीलनम् , 'जाव परिसा पज्जुवासई' इति, 'यावत्' करणात् 'बहुजणो...[पृ० ३८ पं० ४] पन्नवेइ पासावच्चिज्जे केसी नाम कुमारसमणे जाइसम्पण्णे जाव [पृ० ११८ पं० ९] गामणुगामं दुइजमाणे इहमागए इह संपत्ते इह समोसढे इहेव सावत्थीए नयरीए [पृ० ११८ [पं० ३], तं महप्फलं खलु [पृ० ३९५० २] इत्यादि प्रागुक्तसमस्तपरिग्रहः, ७ इन्द्रमहः-इन्द्रोत्सवः इन्द्रः-शक्रः, ८ स्कन्दः-कार्तिकेयः ९ रुद्रः प्रतीतः १० मुकुन्दो-बलदेवः ११ शिवो-देवताविशेषः १२ वैश्रमणो-यक्षराट् १३ नागो-भवनपतिविशेषः १४ यक्षोभूतश्च व्यन्तरविशेषौ १५स्तूप:-चैत्यस्तूपः १६ चैत्यं-प्रतिमा १७ वृक्षः १८ दरि-गिरी १९अवट-नदी-सरः-सागराःप्रतीताः, = 'इ' कारो वाक्यालंकारार्थः "-राय० वि०। ० " 'वा' शब्दः पदान्तरापेक्षया समुच्चयार्थः "-राय० वि० । Jain Education Inthandi For Private Personel Use Only willinelibrary.org Page #329 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। इ वा जंणं इमे बहवे उग्गा उग्गैपुत्ता भोगा राइना इक्खागाणाया कोरव्वा जाव इन्भा इन्भपुत्ता अण्णे य बहवे राया-ईसर-तलवर-मांडविय-कोटुंबियं-इभ-सेहि-सेणावइ-सत्यवाहप्पभितयो ण्हाया २० उग्राः आदिदेवावस्थापिता इक्षुवंशजाताः २१उग्रपुत्राः त एव कुमाराद्यवस्थाः, एवं २२ भोगा:-आदिदेवेनैवावस्थापितगुरुवंशजाता २३ राजन्या:-भगवद्वयस्यवंशजाः 'यावत'करणात् 'खसिया माहणा भडा [पृ० ४० पं०१-] जोहा मल्लई मल्लइपुत्ता लेच्छई लेच्छइपुत्ता' इति परिग्रहः, तत्र क्षत्रियाः-सामान्यराज्यकुलीना भटाः-शौर्यवन्तः योधाः-तेभ्यो विशिष्टतराः, मल्लकिनो लेच्छकिनश्च राजविशेषाः, यथा चेटकराजस्य श्रूयन्ते अष्टादश गणराजा नव मल्लकिनो नव लेच्छकिनः, २४ राजानो-माण्डलिका २५ ईश्वरा-युवराजानः २६तलवराः-परितुष्टनरपतिप्रदत्तपट्टबन्धविभूपिता राजस्थानीयाः २७ माडम्बिकाः २९ इभ्या:-महानिनः३०श्रेष्ठिनः-श्रीदेवताध्या- | सितसौवर्णपट्टविभूषितोत्तमाङ्गाः ३१ सेनापतयो-नृपतिनिरूपिताश्चतुरङ्गसैन्यनायकाः ३२ सार्थवाहाः-सार्थनायकाः २३ प्रभृतिग्रहणात् मत्रि-महामत्रि-गणक-दौवारिक-पीठमर्दादिपरिग्रहः, तत्र मत्रिणः प्रतीताः महामत्रिणो मत्रिमण्डलमधानाः "हस्तिसाधनोपरिकाः" इति वृद्धाः मणका-गणितज्ञाः "भाण्डागारिकाः" इति वृद्धाः "ज्योतिषिकाः" इत्यपरे दौवारिका:-प्रतीहारा राजद्वारिका वा पीठमर्दाः - आस्थाने आसन्नप्रत्यासन्नसेवका वयस्या इति भावः 'जाव अंबरतलमिव फोडे माणा' इति यावत करणात 'अप्पेगतिया' बंदणवत्तियं ...सत्त सिक्खावयाई...पृ० ४० पं०३-पृ. ४१ पं०६] समुद्दरवभूयं पिव करेमाणा अंबरतलं पिव फोडेमाणा'इति परिग्रहः, एतच्च प्रायः सुगमम् , नवरम् गुणवतानामपि निरन्तरमभ्यस्यमानतया शिक्षाक्तत्वेन विवक्षणात 'सत्त सिक्खावयाई' इत्युक्तम् ३४ स्माताः ___x पृ० ४० पं० १, टिप्पण ३ वि० बा। ॥२८५॥ Jain Education Cremona For Private & Personel Use Only wwjainelibrary.org Page #330 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥२८६॥ कैयवलिकम्मा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता सिरसाकंठेमालकडा ऑविद्धमणिसुवण्णा कप्पियहार-अद्धहारतिसर-पालंबपलंबमाण-कडिसुत्तयकयसोहाहरणा चंदणोलित्तगायसरीरा...पुरिसवरगुरापरिखित्ता महया उकिट्ठसीहणायबोलकलकलरवेणं....एगदिसाए जहा उववाइए जाव [उववाइअ सू० पृ० ५७ पं० ११-] अप्पेकृतस्नानाः अनन्तरं ३५ कृतं बलिकर्म-स्वगृहदेवताभ्यो यैस्ते कृतबलिकर्माणः, तथा ३६ कृतानि कौतुकमङ्गलान्येव प्रायश्चित्तानि दुःखमादिविघातार्थ यैस्ते कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्ताः, तत्र कौतुकानि-मपीतिलकादीनि मङ्गलानि-सिद्धार्थकदध्यक्षतर्वादीनि, तथा ३७ शिरसा कण्ठे च कृता माला यैस्ते, शिरसाकण्ठेमालाकृताः, तथा ३८ आविद्धानि-परिहितानि मणिसुवर्णानि यैस्ते तथा, ३९ कल्पितो-विन्यस्तो हारः-अष्टादशसरिकः अर्द्धहारो-नवसरिकः त्रिसरिकम्-प्रतीतमेव-यैस्ते तथा, तथा ४० प्रलम्बो-झुंबनकं लम्बमानो येषां ते तथा, ४१ कटिसूत्रेण अन्यान्यपि सुकृतशोभान्याभरणानि येषां ते कटिसूत्रसुकृतशोभा भरणाः, ४२ चन्दनावलितानि गात्राणि यत्र तत तथाविधं शरीरं येषां ते चन्दनावलिप्तगात्रशरीराः, ४३ पुरुषाणां वागुरेव वागुरा-परिकरस्तया परिक्षिप्ताःव्याप्ताः, ४४ महता उत्कृष्टिश्च-आनन्दमहाध्वनिः सिंहनादश्च-सिंहस्येव नादः बोलश्च-वर्णव्यक्तिवर्जितो ध्वनिः, कलकलश्च-व्यक्तव- १० चनः स एव एतल्लक्षणो यो बस्तेन समुद्रस्वभृतमिव-समुद्रमहाघोपप्राप्तमिव श्रावस्ती नगरीमिति गम्यते कुर्वाणाः अम्बरतलमिवआकाशतलमिव स्फोटयन्तः, ४५ एकया दिशा पूर्वोत्तरलक्षणया एकाभिमुखा-एकं भगवन्तं प्रति अभिमुखाः । - "प्राकृतत्वात् पदव्यत्ययः विभक्तिव्यत्ययश्च इति"-राय० वि० । 0 भाषायाम्-'भूमणु' इति । ४ “ततः पदत्रयस्यापि पदद्वयमीलनेन कर्मधारयः"-राय० वि० । Jan Education For Private Personel Use Only wittainelibrary.org Page #331 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। गतिया हयगया जाव अप्पेगतिया गयगया पायचारविहारेण [पृ० ४१ पं०४] महया महया वंदावंदएहिं चिचो सारनिग्गच्छति, एवं संपेहेइ संपेहित्ता कंचुइज्जपुरिसं सहावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी-किं णं देवाणुप्पिया। अज ही केसिसावत्थीए नगरीए इंदमहे इ वा जाव सागरमहे इ वा जेणं इमे यहवे उग्गा भोगा. णिग्गच्छंति? कुमारतए णं से कंचुईपुरिसे केसिस्स कुमारसमणस्स आगमणगहियविणिच्छए चित्तंसारहिं करयलपरिग्गहियं | श्रमणमुपजाव वद्धावेत्ता एवं वयासी-णो खलु देवाणुप्पिया! अज्ज सावत्थीए णयरीए इंदमहे इ वा जाव सागरमहे इ ५ गतः वा जेणं इमे बहवे जाव विंदाविंदएहिं निग्गच्छति, एवं खलु भो! देवाणुप्पिया! पासावचिजे केसी नाम कुमार ॥२८७॥ समणे जाइसम्पन्ने [पृ० २८१ पं०८] जाव दुइजमाणे इहमागए जाव विहरइ, तेणं अज सावत्थीए नयरीए | बहवे उग्गा जाव इन्भा इन्भपुत्ता अप्पेगतिया बंदणवत्तियाए जाव महया वंदावंदएहि णिग्गच्छन्ति । [१४९] तए णं से चित्त सारही कंचुइपुरिसस्स अंतिए एयमढे सोचा निसम्म हहतुट्ठ-जाव-हियए कोडुबि| यपुरिसे सद्दावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो ! देवाणुप्पिया ! चाउग्घेट आसरहं जुत्तामेव उवट्ठवेह जाव सच्छत्तं उबट्ठवेंति, तए ण से चित्ते सारही बहाए कयवलिकम्मे कयकोउयमंगलपायच्छित्ते सुद्धप्पावेसाई मंगल्लाई वत्थाई पवरपरिहिते अप्पमहग्याभरणालंकियसरीरे जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता चाउरघंट आसरहं दुरूह सकोरिंटमल्लदामेणं छत्तणं धरिजमाणेणं महया भडचडगरेण विंदप [१४९] १ चतस्रो घण्टा अवलम्बमाना यस्मिन् स तथा, २ अश्वप्रधानो रथोऽश्वरथः तं, ३ युक्तमेव अश्वादिभिरिति गम्यते, Jain Education emanal wadjainelibrary.org Page #332 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥२८८॥ रिखित्ते सावत्थीनगरीए मझमझेणं निग्गच्छइ निग्गच्छित्ता जेणेव कोट्टए चेइए जेणेव केसिकुमारसमणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता केसिकुमारसमणस्स अदूरसामंते तुरए णिगिण्हइ रहं ठवेइ य, ठवित्ता पचोरुहति पच्चोरहित्ता जेणेव केसिकुमारसमणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता केसिकुमारसमणं तिक्खुत्तो आयाहिणंपयाहिणं करेइ करित्ता वंदइ नमसइ नमंसित्ता णच्चासण्णे णातिदूरे सुस्सूसमाणे णमंसमाणे अभिमुहे पंजलिउडे विणएणं पज्जुवासइ । तए णं से केसिकुमारसमणे चित्तस्स सारहिस्स तीसे महतिमहालियाए महच्चपरि-14 साए चाउजामं धम्म परिकहेइ, तं०-सव्वाओ पाणाइवायाओ वेरमणं, सवाओ मुसावायाओ वेरमणं, सव्वाओ अदिण्णादाणाओ वेरमणं, सव्वाओ बहिद्धादाणाओ वेरमणं । तए णं सा महतिमहालिया महच्चपरिसा केसिस्स कुमारसमणस्स अंतिए धम्म सोचा निसम्म जामेव दिसिं पाउन्भूया तामेव दिसिं पडिगया । [१५०] तए णं से चित्ते सारही केसिस्स कुमारसमणस्स अंतिए धम्मं सोचा निसम्म हट्ठ-जाव-हियए उहाए उट्टेइ उहेत्ता केसि कुमारसमणं तिक्खुत्तो आयाहिणंपयाहिणं करेइ वंदइ नमसइ नमंसित्ता एवं १० शेष प्राग् व्याख्यातार्थम् ४ 'जहा जीवा *वज्झन्ति' इत्यादिरूपा धर्मकथा औपपातिकग्रन्थादवसेया [औप० सू० पृ० ७८६० ७-] लेशतस्तु प्रागेव दर्शिता। * मूल-विवरणयोः पाठभेदः । Jain Education Interi For Private Personel Use Only ivw.delibrary.org Page #333 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥२८९॥ रायपसेण-क्यासी-सहामि णं भंते ! निंग्गंथं पावयणं, पत्तियामि णं भंते ! निग्गंथं पाययणं, रोएमिणं भंते ! निग्गंथं इयं। पावयणं, अभुमि णं भंते । निग्गंथं पावयणं, एवमेयं निग्गंथं पावयणं, हमेयं भते ! ०, अक्तिहमेयं भंते:०, असंदिद्धमेयं०, इच्छियपडिच्छियमेयं भंते ! जपं तुम्भे वदह त्ति कट्ट वंदइ नमसइ नमंसित्ता एवं वयासी-जहा णं देवाणुप्पियाणं अंतिए बहवे उग्गा भोगा जाव इन्भा इन्भपुत्ता चिच्चा हिरेपणं चिच्चा सुवर्ण एवं धणं धन्नं बलं चाहणं कोसं कोहागारं पुरं अंतेउरं चिच्चा विउलं धर्णकणगरयणमणिमोत्तियसंखसिलप्पवाल.. संतसारसावएज्ज विच्छेडित्ता विगोवंइत्ता दाणं दाइयाणं परिभाइत्ता मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्व [१५०] १ श्रद्दधे-अस्तीत्येवं प्रतिपद्ये २ नैन्थं प्रवचन-जैनशासनम् , ३ एवम्-इति प्रत्ययं करोम्यत्रेति भावः, ४रोचयामिकरणरुचिविषयीकरोमि-चिकीर्षामि-इति तात्पर्यार्थः, किमुक्तं भवति ?-५ अभ्युत्तिष्ठामि-अभ्युपगच्छामीत्यर्थः, ६ एवमेतत् यद् भवद्भिः प्रतिपादितं ७ तत् तथैव भदन्त! तथैवैतद् भदन्त ! याथात्म्यवृत्या ८ वस्तु अवितथमेतत् भदन्त ! सत्यमित्यर्थः, ९ असंदिग्धमेतत् भदन्त ! सम्यक् तथ्यमेतदिति भावः, १० इष्टम्-अभिलषितम् प्रतीष्टम्-आभिमुख्येन सम्यक् प्रतिपन्नमेतत् ११ यथा यूयं | वदथ, १२ हिरण्यम्-अघटितं सुवर्णम् १३ धन-रूप्यादि १४ धान्य-बल-वाहन-कोश-कोष्ठागार-पुर-अन्तःपुराणि व्याख्यातानि प्रतीतानि च, १५ धनम्-रूप्यादि १६ कनकरत्नमणिमौक्तिकशङ्खाः प्रतीताः १७ शिलाप्रवालं-विद्रुमम् १८ सत्-विद्यमानं सारंप्रधानं यत् स्वापतेयं-द्रव्यं १९ 'विच्छर्दयित्वा' भावतः परित्यज्य २० प्रकटीकृत्य, तदनन्तरं २१ दानं-दीनानाथादिभ्यः २२-अत्र पुत्रादिषु विभज्य । Jain Education Internal For Private & Personel Use Only ww.tinelibrary.org Page #334 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण जातः ॥२९॥ यंति, णो खलु अहं ता संचाएमि चिच्चा हिरणं तं चेव जाव पव्वइत्तए, अहं णं देवाणुप्पियाणं अंतिए पंचाणु चिसो श्रमव्वइयं सत्तसिक्खावइयं दुवालसविहं गिहिधम्म पडिवज्जित्तए, अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंध करेहि, णोपासको तए णं से चित्ते सारही केसिकुमारसमणस्स अंतिए पंचाणुव्वतियं जाव गिहिधम्म उवसंपज्जित्ताणं विहरति, सए णं से चित्ते सारही केसिकुमारसमणं वंदह नमसइ नमंसित्ता जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव पहारेत्थ गमणाए चाउग्घंटं आसरहं दुरूहह जामेव दिसिं पाउन्भूए तामेव दिसिं पडिगए। [१५१] तए णं से चित्ते सारही समणोवासए जाए अहिगयजीवाजीवे उवलद्धपुण्णपावे आँसवसंवरनिजर--- किरियाहिगरणपंधमोक्खकुसले असहिज्जे देवासुरणागसुवण्णजक्खरक्खसकिन्नरकिंपुरिसगरुलगंधव्वमहोरगाईहिं देवगणेहिं निग्गंथाओ पावयणाओ अणइकमणिज्जे, निग्गंथे पावयणे णिस्संकिए णिकखिए [१५१] १ अभिगतौ-सम्यग् विज्ञातौ जीवाजीवौ येन स तथा, २ उपलब्धे यथावस्थितस्वस्वरूपेण विज्ञाते पुण्यपापे येन स उपलब्धपुण्यपापः, ३ आश्रवाणां-प्राणातिपातादीनाम् ४ संवरस्य-प्राणातिपातादिप्रत्याख्यानरूपस्य ५ निर्जरायाः-कर्मणां देशतो १० निर्जरणस्य ६ क्रियाणां-कायिक्यादीनाम् ७ अधिकरणानाम्-खड्गादीनां ८ बन्धस्य-कर्मपुद्गलजीवप्रदेशान्योऽन्यानुगमरूपस्य ९ मोक्षस्य सर्वात्मना कर्मापगमरूपस्य १० कुशलः-सम्यक् परिज्ञाता आश्रव-संवर-निर्जरा-क्रिया-ऽधिकरण-बन्ध-मोक्षकुशलः ११ अविद्यमानसाहाय्यः, कुतीर्थिकप्रेरितः सम्यक्त्वाविचलनं प्रति न परसाहाय्यमपेक्षते इति भावः, तथा चाह-१२ 'देवासुरनाग...अणइक्कमणिज्जे' सुगमम्, नवरं गरुडाः-सुवर्णकुमाराः, एवं चैतत् यतो १३ नैग्रन्थे प्रावचने निःसंशयः दर्शनान्तराकानरहितः १४ फलं Jain Education anal wr.jainelibrary.org Page #335 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण | णिविंतिगिच्छे लईटे गहियढे पुच्छियढे अहिगयढे विणिच्छियढे अद्विमिंजपेम्माणुरागरत्ते-'अयमाउसो! | निग्गंथे पावयणे अटे अयं परमटे सेसे" अणट्टे' ऊसियफैलिहे अवगुयदुवारे चियत्तंतेउरघरप्पवेसे प्रति निःशङ्कः अर्थश्रवणतः १५अर्थावधारणतः संशये सति सम्यगुत्तरश्रवणतो विमलबोधात् , १६ पदार्थोपलम्भात् १७ अस्थीनि प्रसिद्धानि तानि च मिञ्जा च-तन्मध्यवर्ती मजा अस्थिमिञ्जानः ते प्रेमानुरागेण-सर्वज्ञप्रवचनप्रीतिलक्षणकुसुम्भादिरागेण रक्ता इव रक्ता यस्य स तथा, केनोल्लेखेनेत्यत आह-१८ 'अयमाउसो ! निग्गंथे पावयणे अढे परमटे सेसे अणडे' इति 'आउसो आयुष्मन्, एतच्च सामर्थ्यात् पुत्रादेरामत्रणं, १९ शेषमिति-धनधान्यपुत्रदारराज्यकुपवचनादि, २० "उच्छ्रितं स्फटिकमिव स्फाटिकम-अन्तःकरणं यस्य स तथा-मौनीन्द्रप्रवचनावाप्या परितुष्टमना इत्यर्थः" एषा वृद्धव्याख्या । अपरे त्वाहुः-"उच्छ्रितः-अगलास्थानादपनीय ऊर्वीकृतो न तिरश्चीनः, कपाटपश्चाद्भागादपनीत इत्यर्थः, उत्सृतो वा-अपगतः परिघा-अर्गला गृहद्वारे यस्यासौ उच्छ्रितपरिधः उत्सृतपरिघो वा-औदार्यातिरेकतोऽतिशयदानदायित्वेन भिक्षुकमवेशार्थमनर्गलितगृहद्वार इत्यर्थः", २१ अप्रावृतद्वारः भिक्षुकप्रवेशार्थ कपाटानामपि पश्चात्-करणात् , वृद्धानां तु भावनावाक्यमेवम्-२१ "सम्यग्दर्शनलाभे सति न कस्माञ्चित् पाखण्डिकाद् बिभेति-शोभनमार्गपरिग्रहेण उद्घाटितशिरास्तिष्ठतीति भावः", २२ 'चियत्त' इति नाप्रीतिकरः अन्तःपुरगृहे प्रवेशः-शिष्टजनप्रवेशनं यस्य स तथा, अनेनानीर्ष्यालुत्वमस्योक्तम् , अथवा २२ चियत्तः-प्रीतिकरो लोकानामन्तःपुरे गृहे वा प्रवेशो यस्यातिधा ० भाषायाम् 'मीज' शब्दः 'मिजा' समानः । Jain Education Internal For Private & Personel Use Only Mainelibrary.org Page #336 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं। ॥२९२॥ चाउद्दसहमुहिपुण्णमासिणीसु पडिपुण्णं पोसह सम्म अणुपालेमाणे समणे णिग्गंथे फासुएसणिज्जेणं अस-1 णपाणखाइम साइमेण पीढेफलैंगसेज्जासंधारेण धत्थपडिगहकंबलपायपुंछणेणं ओसहभेसैज्जेणं पडिलामेमाणे अहापरिग्गहेहिं तबोकम्मेहिं अप्पाणं भावेमाणे जाई तत्थ रायकजाणि य जाव [पृ० २७९ पं० ४] रायववहाराणि य ताई जियसत्तुणा रण्णा सद्धिं सयमेव पच्चुवेवमाणे पच्चुवेवमाणे विहरइ । [१५२] तए णं से जियसत्तुराया अण्णया कयाइ महत्थं जाव पाहुडं सज्जेइ, चित्तं सारहिं सदावेइ सदा-५ वित्ता एवं वयासी-गच्छाहि 'णं तुमं चित्ता! सेयवियं नगरिं, पएसिस्स रन्नो इमं महत्थं जाव पाहुडं उवणेहि, मम पाउग्गं च णं जहाभणियं अवितहमसंदिद्धं वयणं विन्नवेहि त्ति कटु विसजिए। तर णं से चित्ते सारही जियमिकतया सर्वानाशङ्कनीयत्वात स तथा, २३ चतुर्दश्याम् अष्टम्याम् 'उद्दिष्टे' इति अमावस्यायां पौर्णमास्यां च २४ प्रतिपूर्णम्अहोरात्रं यावत् २५ पौषधम्-आहारादिपौप, २६ सम्यक् अनुपालयन् , २७ पीठम्-आसनं २८ फलकम्-अवष्टम्भार्थम् २९ वसतिः शयनं वा यत्र प्रसारितपादेः सुप्यते ३० संस्तारको लघुतरः ३१ वस्त्रं प्रतीतम् ३२ पतत् भक्तं पानं वा गृह्णातीति -पतद्ग्रहः-पात्रम् | १० ३३ पादप्रोञ्छनक-रजोहरणम् ३४ ओपधं प्रतीतम् ३५ भेषजं-पथ्यम् ३६ 'अहापरिग्गहेहिं तवोकम्मेहि...' सुगमम् , क्वचित् । पाठ:--'बहूहिं सीलव्ययगुणवेरमणपोसहोववासेहिं अप्पाणं भावेमाणे विहरई' इति, तत्र शीलवतानि-स्थूलप्राणातिपातविरमणादीनि गुणवतानि-दिग्वतादीनि पौषधोपवासाः-चतुर्दश्यादिपर्वतिथ्युपवासादिः तैरात्मानं भावयन् विहरति-आस्ते । • "लिहादित्वाद् 'अच्' प्रत्ययः”-राय० वि० । विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । Jain Education Internance For Private Personel Use Only elibrary.org Page #337 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं ।। कुमार सत्तुणा रन्ना विसजिए समाणे तं महत्थं जाव गिण्डह जाब जियसत्तुस्स रण्णो अंतियाओपडिनिक्खमह साव | सेयवियं त्थीनयरीए मज्झमज्झेणं निग्गच्छइ जेणेव रायमग्गमोगाढे आवासे तेणेव उवागच्छइ तं महत्थं जाव ठवइ, | समागन्तुं पहाए जाव-सरीरे सकोरंट० महया० पायचारविहारेण महया पुरिसवग्गुरापरिक्खित्ते रायमग्गमोगाढाओ आ. चित्तो विज्ञवासाओ निग्गच्छइ सावत्थीनगरीए मज्झमज्झेणं निग्गच्छति जेणेव कोट्ठए चेइए 'जेणेव केसी कुमारसमणे | पयति केसि तेणेव उवागच्छति केसिकुमारसमणस्स अन्तिए धम्मं सोचा जाव हह उहाए जाव एवं वयासी-एवं खलु अहं |५|श्रमणम् । भंते ! जियसत्तुणा रन्ना पएसिस्स रन्नो इमं महत्थं जाव उवणेहि त्ति कट्ट विसज्जिए, तं गच्छामि णं अहं भंते ! सेयवियं नगरि, पासादीया णं भंते ! सेयविया णगरी, एवं दरिसणिज्जा णं भंते ! सेयवियाणगरी, अभिरूवा | ॥२९३॥ [१५२] १५ जेणेव केसी कुमारसमणे तेणेव उवागच्छित्ता केसीकुमारसमणं पंचविहेणं अभिगमेणं अभिगच्छा, तंजहा-सचित्तानां द्रव्याणां पुष्पताम्बूलादीनां 'विउसरणयाए' इति व्यवसरणेन-व्युत्सर्जनेन, अचित्तानां द्रव्याणाम्-अलङ्कार-वस्त्रादीनामव्यवसरणेनअव्युत्सर्गेण, क्वचित् 'विउसरणयाए'इति पाठः, तत्र अचित्तानां द्रव्याणां-छत्रादीनां व्युत्सर्जनेन-परिहारेण, उक्तं च-"अवणेइ पंच कहाणि रायवरचिंधभूयाणि । छत्तं खग्गो वाणह मउडं तओ चामराओ य" ॥[ ] इति, एका शाटिका यस्मिन् तत् तथा बत् उत्तरासङ्गकरणं च-उत्तरीयस्य न्यासविशेषरूपं तेन, चक्षुस्स्पर्श दर्शने 'अंजलिपग्गहेण' हस्तजोटनेन, मनस एकत्वीकरणेन-एकत्वविधानेन । ____x मूल-विवरणयोः पाठभेदः । Jain Educatieinteletional For Private & Personel Use Only ww.jainelibrary.org Page #338 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥२९॥ | णं भंते ! सेयविया नगरी, पडिरूवाणं भंते ! सेतविया नगरी, समोसरह णं भंते ! तुम्भे सेयवियं नगरिं। पएसि नृप[१५३] तए णं से केसी कुमारसमणे चित्तण सारहिणा एवं वुत्ते समाणे चित्तस्स सारहिस्स एयमझु णो स्य अर्धार्मिआढाइ णो परिजाणाइ तुसिणीए संचिट्ठइ, तए णं से चित्ते सारही केसीकुमारसमणं दोचं पि तचं पि एवं वया- | कत्वेन सी-एवं खलु अहं भंते ! जियसत्तुणा रन्ना पएसिस्स रण्णो इमं महत्थं जाव विसज्जिए तं चेव जाव समोसरह | केसिकुमारणं भंते ! तुब्भे सेयक्यि नगरिं । तए णं केसीकुमारसमणे चित्तेण सारहिणा दोचं पितचं पि एवं वुत्ते समाणे || श्रमणः तां चित्तं सारहिं एवं वयासी-चित्ता ! से जहानामए वणसंडे सिया किण्हे किण्होभासे जाव पडिरूवे, से पूर्ण |विज्ञप्ति न स्वीकरोति चित्ता ! से वणसंडे बहणं दुपयचउप्पयमियपसुपक्षीसिरीसिवाणं अभिगमणिज्जे?, हंता अभिगमणिज्जे, तंसि च णं चित्ता ! वणसंडसि बहवे भिलंगा नाम पावसउणा परिवसंति, जे णं तेसिं बहणं दुपयचउप्पयमियपसुपक्खीसिरीसिवाण ठियाणं चेव मंससोणियं आहारति, से गुणं चित्ता! से वणसंडे तेसि णं बहणं दुपय-जाव-सिरीसिवाणं अभिगमणिजे? णो ति०, कम्हा णं ? भंते ! सोवसग्गे, एवामेव चित्ता! तुम्भं पि १० सेवियाए णयरीए पएसी नाम राया परिवसइ अहम्मिए जाव [पृ० २७४ पं०]णो सम्मं करभरवित्ति पवत्तइ, तं कहं णं अहं चित्ता! सेयवियाए नगरीए समोसरिस्सामि ? [१५४] तए णं से चित्त सारही केसि कुमारसमणं एवं वयासी-किंणं भंते! तुम्भं पएसिणा रन्ना कायव्वं? | अस्थि णं भंते ! सेयवियाए नगरीए अन्ने बहवे ईसरतलवर-जाव-सत्थवाहपभिइयो जे णं देवाणुप्पियं वंदिस्संति Jain Education emanal For Private Personel Use Only wadjainelibrary.org Page #339 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय। नमंसिस्संति जाव पज्जुवासिस्संति विउलं असणं पाणं खाइमं साइमं पडिलाभिस्संति, पौडिहारिएण पीढफ- किसिकुमारलगसेज्जासंथारेणं उवनिमंतिस्संति, तए णं से केसी कुमारसमणे चित्तं सारहिं एवं बयासी-अवि या इंचित्ता! श्रमणस्य आदराय जाणिस्सामो। चित्तेन [१५५] तए णं से चित्ते सारही केसिकुमारसमणं वंदइ नमसइ केसिस्स कुमारसमणस्स अंतियाओ कोट्ट उद्यानपालयाओ चेइयाओ पडिणिक्खमइ जेणेव सावत्थी णगरी जेणेव रायमग्गमोगाढे आवासे तेणेव उवागच्छइ कोडं-५ काःप्रेरिताः बियपुरिसे सद्दावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! चाउग्घंटं आसरहं जुत्तामेव उवट्ठवेह जहा सेयवियाए नगरीए निग्गच्छइ तहेव जाव [पृ० २८० पं०५] वसमाणे कुणालाजणवयस्स मज्झंमज्झेणं जेणेव | ॥२९५॥ केइयअद्धे जेणेव सेयविया नगरी जेणेव मियवणे उजाणे तेणेव उवागच्छइ उजाणपालए सद्दावेइ एवं वयासीजया णं देवाणुप्पिया! पासावचिज्जे केसी नाम कुमारसमणे पुव्वाणुपुब्बि चरमाणे गामाणुगाम दूइज्जमाणे इहमागच्छिज्जा तया णं तुम्भे देवाणुप्पिया! केसिकुमारसमणं वंदिज्जाह नमंसिज्जाह वंदित्ता नमंसित्ता अहाप [१५४] १ 'पाडिहारिएण पीढफलगसेज्जासंथारगेणं निमंतेहिति' मातिहारिकेण-पुनः समर्पणीयेन । २ 'अवि या ई चित्ता! जाणिस्सामो' इति 'अवि या ई' इति अपि च चित्र ! परिभा वयामो 'लग्नाः' इति भावः, क्वचित् पाठः *'अवि या इं चित्ता ! समोसरिस्सामो इति, तत्र अपि च-एतदपि च परिभाव्य समवसरिष्यामौ वर्तमानयोगेन । 0-बयामो नो लग्ना इ-भा० २। * विवरणकारदर्शितं पाठान्तरम् । Jan Educatinten For Private Personal Use Only Delibrary.org Page #340 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥२९६॥ डिरूवं उग्गहं अणुजाणेज्जाह पडिहारिएणं पीढफलग-जाव उवनिमंतिज्जाह, एयमाणत्तियं खिप्पामेव पञ्चप्पि जाह, तए णं ते उज्जाणपालगा चित्तेणं सारहिणा एवं वृत्ता समाणा हट्ठतुङ - जाव- हियया करयल परिग्गहियं जाव एवं वयासी-तहत्ति आणाए विणएणं वयणं पडिसुणंति । [१५६] तए णं चित्ते सारही जेणेव सेयविया णगरी तेणेव उपागच्छइ सेयवियं नगरिं मज्झमज्झेणं अ पविसह जेणेव पएसिस्स रण्णो गिहे जेणेव बाहिरिया उवद्वाणसाला तेणेव उवागच्छइ तुरए णिगिण्हह रह ठवेइ रहाओ पञ्चोरूहइ तं महत्थं जाव गेव्हइ जेणेव पएसी राया तेणेव उवागच्छह पएसिं रायं करयल - जाव वृद्धावेत्ता तं महत्थं जाव उवणेइ । तए णं से पएसी राया चित्तस्स सारहिस्स तं महत्थं जाव पडिच्छर चित्तं सारहिं सकारेइ सम्माणेइ पडिविसज्जेइ । तए णं से चित्ते सारही परसिणा रण्णा विसज्जिए समाणे हट्ठजाव- हियए पएसिस्स रन्नो अंतियाओ पडिनिक्खमइ जेणेव चाउरघंटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ चाउरघंट आसरहं दुरूहइ सेयवियं नगरिं मज्झंमज्झेणं जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ तुरए णिगिण्हह रहं ठवेइ १० रहाओ पचोरुहइ पहाए जाव उपि पासायवरगए हमाणेहिं मुइंगमत्थएहिं बत्तीसइबद्धएहिं नॉडएहिं वतरु [१५६] १ स्फुटद्भिरतिरभसास्फालनात् २ मर्दलमुखपुटैः ३ द्वात्रिंशद्विधैः द्वात्रिंशत्पात्र ४ नाटकैर्वर तरुणी५ संप्रयुक्तै रुपनृत्य ० तरुणयु-पा० ५ । Jain Education Inemanal Page #341 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। सेयवियं णीसंपउत्तेहिं उवणचिजमाणे उवगाँइजमाणे उवलालिजमाणे इहे सहफरिस-जाव [पृ० २८१ पं०७] विहरह।। केमिकमार. [१५७] तए ण केसी कुमारसमणे अण्णया कयाइ पाडिहारियं पीढफलगसेज्जासंथारगं पचप्पिणइ सावत्थी- श्रमण: | ओ नगरीओ कोट्टगाओ चेइयाओ पडिनिक्खमइ पंचहिं अणगारसएहिं जाव विहरमाणे जेणेव केयइअद्धे जणवए जेणेव सेयविया नगरी जेणेव मियवणे उजाणे तेणेव उवागच्छइ अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिण्हिः समागतः त्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेनाणे विहरति । तए णं सेयवियाए नगरीए सिंघाडग-महया जणसद्दे वा० [पृ० २८४ पं०१] परिसा णिग्गच्छइ तए णं ते उज्ज्ञाणपालगा इमीसे कहाए लट्ठा समाणा हट्टतुट्ठ-जाव -हियया जेणेव केसी कुमारसमणे तेणेव उवागच्छन्ति केसि कुमारसमणं वंदति ननंसंति अहापडिरूवं |॥२९७॥ उग्गहं अणुजाणंति पाडिहारिएणं जाव संथारएणं उवनिमंतंति णामं गोयं पुच्छंति ओधारेंति एगंतं अवकमंति अन्नमन्नं एवं वयासी-जस्सणं देवाणुप्पिया! चित्ते सारही दसणं कंखई देसणं पत्थेइ दंसणं पीहेई दसणं अभिलसइ जस्स णं णामगोयस्स वि सवणयाए हट्टतुट्ठ-जाव-हियए भवति से णं एस केसी कुमारसमणे पुव्वाणुपुटिव चरमाणे गामाणुगामं दृइजमाणे इहमागए इह संपत्ते इह समोसढे इहेव सेयवियाए णगरीए बहिया मियवणे उज्जाणे अहापडिरूवं जाव विहरइ, तं गच्छामो णं देवाणुप्पिया !चित्तस्स सारहिस्स एयमटुंपियं निवे. मानः ६ तदभिनयपुरस्सरं नर्तनात् ७ उपगीयमानः तद्गुणानां गानात् । [१५७] १ काति २ प्रार्थयते ३ स्पृहयते ४ अभिलपति चत्वारोऽप्येकार्थाः । Jain Educat intrational For Private & Personel Use Only Paww.jainelibrary.org Page #342 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥२९८॥ Jain Education I | एमो पियं से भवउ, अण्णमण्णस्स अंतिए एयमहं पडिसुर्णेति जेणेव सेयविया णगरी जेणेव चित्तस्स सारहिस्स गिहे जेणेव चित्तसारही तेणेव उवागच्छंति चित्तं सारहिं करयल - जाव वद्वावेति एवं वयासी - जस्स णं देवाणुप्पिया! दंसणं कंवंति जाव अभिलसंति जस्स णं णामगोयस्स वि सवणयाए हट्ठ-जाव भवह, से णं अयं केसी कुमारसमणे पुत्र्वाणुपुवि चरमाणे समोसढे जाव विहरइ । [१५८] तए णं से चित्ते सारही तेसिं उज्जाणपालगाणं अंतिए एयमहं सोचा णिसम्म हट्ठतुट्ठ-जाब आसणाओ ५ अन्भुट्ठेति पायपीढाओ पचोरुहइ पाउयाओ ओमुयइ एगसाडियं उत्तरासंगं करेइ, अंजलिम उलियग्गहत्थे के सिकुमारसमणाभिमुहे मत्तट्ठ पयाई अणुगच्छद्द करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु एवं बयासी - नमोऽत्थु णं अरहंताणं जाव [पृ० २५६ पं० ३] संपत्ताणं, नमोऽत्थु णं केसियस्स कुमारसमणस्स मम धम्मायरियस धम्मोवदेसगस्स, वंदामि णं भगवंतं तत्थगयं इहगए पासउ मे त्ति कहु वंदइ नमसर, ते उज्जाणपालए विउलेणं वत्थगंधमल्लालंकारेणं सकारेइ सम्माणेह विउलं जीवियारिहं पीइदाणं दलयइ पडिविसज्जेइ १० कोडुंबियपुरिसे सहावेह एवं वयासी- खिप्पामेव भो ! देवाणुप्पिया चाउरघंटं आसरहं जुत्तामेव उबवेह नाव पञ्चपिणह । तए णं ते कोडुंबियपुरिसा जाव खिप्पामेव सच्छत्तं सज्झयं जाव उवट्ठवित्ता तमाणत्तियं पञ्चप्पिपति, तए णं से चित्ते सारही कोडुंबियपुरिसाणं अंतिए एयमहं सोचा निसम्म हट्ठतुट्ट-जाव-हियए हाए कय| बलिकम्मे जाव- सरीरे जेणेव चाउरघंटे जाव दुरूहित्ता सकोरंट० महया भडचडगरेणं तं चैव जाव पज्जुवासइ धम्मकहाए [ कंडिका १५० पं० १] जाव । केसि कुमारश्रमणं चितो वन्दते w.jainelibrary.org Page #343 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण- इयं । यितं [१५९] तए णं से चित्ते सारही केसिस्स कुमारसमणस्स अंतिए धम्मं सोचा निसम्म हहतुढे तहेव एवं पएसिनृपं वयासी-एवं खल भंते ! अम्हं पएसी राया अधम्मिए जाव सयस्स वि ण जणवयस्स नो सम्मं करभरवित्ति प्रतिबोधपवत्तेइ, तं जइ णं देवाणुप्पिया! पएसिस्स रणो धम्ममाइक्खेज्जा बहुगुणतरं खलु होजा पएसिस्स रपणो तेसिं |च बहूणं दुपयचउप्पयमियपसुपक्खीसिरीसवाणं, तेसिं च बहणं समणमाहणभिक्खुयाणं तं जइ णं देवाणुः। चित्तस्य प्पिया!पएसिस्स बहुगुणतरं होजा सयस्स वि य णं जणवयस्स। विज्ञप्तिः तए णं केसी कुमारसमणे चित्तं सारहिं एवं वयासी-एवं खलु चउहिं ठाणेहिं चित्ता! जीवा केवलिप-| नत्तं धम्मं नो लभेजा सवणयाए, तं०-[१] आरामगयं वा उज्जाणगयं वा समणं वा माहणं वा णो अभिगच्छइ ॥२९९॥ णो वंदइ णो णमंसइ णो सकारेइ णो सम्माणेइ णो कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासेइ नो अट्ठाई हेऊई पसिणाइं कारणाई वागरणाइं पुच्छइ, एएणं ठाणेणं चित्ता! जीवा केवलिपन्नत्तं धम्म नो लभंति सवणयाए [२] उवस्सयगयं समणं वा तं चेव जाव एतेण वि ठाणेणं चित्ता! जीवा केवलिपन्नत्तं धम्म नो लभति सवणयाए| | गोयररंगगयं समणं वा माहणं वा जाव नो पज्जुवासइ, णो विउलेणं असणपाणखाइमसाइमेणं पडिलाभइ० [१५९] १ आरामादिगतं श्रमणादिकं नाभिगच्छतीत्यादिकं प्रथमं कारणम् , २ उपाश्रयगतं नाभिगच्छतीत्यादि द्वितीयम् , प्रातिहारेण पीठफलकादिना नामन्त्रयतीत्यादि तृतीयम् , ३ गोचरगतं ४ न ५अशनादिना ६ प्रतिलाभयति-इत्यादि चतुर्थम् । ॐ विवरणकारदर्शितं चतुर्थं कारणं मूलपाठे तृतीयकारणे एव अन्तर्भावितम् चतुर्थ तु कारणं पृथग निर्दिष्टमिति मूल-विवरणयोरर्थभेदः । Jain Education remona For Private Personel Use Only waljainelibrary.org Page #344 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । चतुर्भिः कारण: नरो धर्म श्रोतुं न लभते लभते च ॥३०॥ णो अट्ठाई जाव पुच्छइ, एएणं ठाणेणं चित्ता! केवलिपन्नत्तं० नो लभइ सवणयाए [४] जत्थ वि णं समणेण वा माहणेण वा सद्धिं अभिसमागच्छद तत्थविणं हत्थेण वा बत्थेण वा छत्तण वा अप्पाणं आवरित्ता चिट्ठइ, नो। अट्टाई जाव पुच्छइ, एएण वि ठाणेणं चित्ता! जीवे केवलिपन्नत्तं धम्म णोलभइ सवणयाए-एएहिं च णं चित्ता! चउहि ठाणेहिं जीवे णो लभइ केवलिपन्नत्तं धम्म सवणयाए। चउँहिं ठाणेहिं चित्ता ! जीवे केवलिपन्नत्तं धम्म लभइ सवणयाए, तं०-[१] आरामगयं वा उजाणगयं वा समणं वा माहणं वा बंदइ नमसइ जाव पज्जुवासह अट्ठाई जाव पुच्छइ, एएण वि जाव लभइ सवणयाए, एवं [२] उवस्सयगयं [३]गोयरग्गगयं समणं वा जाव पज्जुवासइ विउलेणं जाव पडिलाभेइ अट्टाई जाव पुच्छइ, एएण वि० [४] जत्थ वि यण समणेण वा अभिसमागच्छइ तत्थवि य णं णो हत्थेण वा जाव आवरेत्ताणं चिट्ठइ, एएण वि ठाणेणं चित्ता ! जीवे केवलिपन्नत्तं धम्म लभइ सवणयाए तुझं च णं चित्ता! पएसी राया आरामगयं वा तं चेव सव्वं भाणियव्वं आइल्लएणं गमएणं ७ए तैरेव चतुर्भिः स्थानः केवलिप्रज्ञप्तं धर्म लभते श्रवणतया-श्रवणेनेति भावः, ८यत्रापि श्रमणः-साधुः माहनः-परमगीतार्थः श्रावकोऽभ्यागच्छति तत्रापि हस्तेन वस्त्राञ्चलेन छत्रेण वाऽऽत्मानमावृत्य न तिष्ठति इदं प्रथमं कारणम् , एवं शेषाण्यपि कारणानि प्रत्येक मेवं भावनीयानि, ९ 'तुझं च णं चित्ता ! पएसी राया आरामगतं वा तं चेव सव्वं भाणियवं' 'आइल्लगमएणं ति प्रथमगमकेन, तद्यथा-युष्माकं प्रदेशी राजा हे चित्र! आरामादिगतं न वन्दते, यत्रापि च श्रमणोऽभ्यागच्छति तत्रापि हस्तादिनाऽऽत्मानमावृत्य - मूलपाठे एतत् चतुर्थं कारणम् । Jain Education emanal For Private & Personel Use Only wwwillainelibrary.org Page #345 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । जाव अप्पाणं आवरेत्ता चिट्टइ, तं कहं णं चित्ता ! पयसिस्स रन्नो धम्ममाइक्खिस्सामो? कम्बोजदे[१६०] तए णं से चित्ते सारही केसिकुमारसमणं एवं वयासी-एवं खलु भंते ! अण्णया कयाई कंबोएहिं शीयअश्वचत्तारि आसा उवणयं उवणीया ते मए पएसिस्स रपणो अन्नया चेव उवणीया, तं एएणं खलु भंते ! कारणेणं चेष्टापरीक्षअहं पएसिं रायं देवाणुप्पियाणं अंतिए हव्वमाणेस्सामो, तं मा णं देवाणुप्पिया! तुम्भे पएसिस्स रन्नो धम्म णमिषात् चित्तोरामाइक्खमाणा गिलाएज्जाह, अगिलाए णं भंते ! तुम्भे पएसिस्स रण्णो धम्ममाइक्खेजाह, छदेणं भंते ! तुम्भे जान पएसिं पएसिस्स रण्णो धम्ममाइक्खेज्जाह, तए णं से केसी कुमारसमणे चित्तं सारहिं एवं वयासी-अवि या इं चित्ता! केसिकुमारजाणिस्सामो। तए णं से चित्ते सारही केसि कुमारसमणं वंदइ नमसइ जेणेव चाउग्घंटे आसरहे तेणेव उवाग- निकटसमाच्छइ चाउग्घंट आसरहं दुरूहइ जामेव दिसिं पाउन्भूए तामेव दिसिं पडिगए। _ [१६१] तए ण से चित्ते सारही कल्लं पाउप्पभायाए रयणीए फुल्लुप्पलकमलकोमलुम्मिलियंमि अहापंडुरे ॥३०॥ पभाए कयनियमावस्सए सहस्सरस्सिम्मि दिणयरे तेयसा जलंते साओ गिहाओ णिग्गच्छइ जेणेव पएसिस्स || रन्नो गिहे जेणेव पएसी राया तेणेव उवागच्छइ पएसिं रायं करयल-जाव ति कट्ट जएणं विजएणं बद्धावेइ, एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पियाणं कंबोएहिं चत्तारि आसा उवणयं उवणीया, ते य मए देवाणुप्पियाणं तिष्ठति, 'तं कहं णं चित्ता!' इत्यादि सुगमम् । नीतवान् Jain Education em fonal For Private & Personel Use Only Miw.jainelibrary.org Page #346 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय । ॥३०२॥ Jain Education I अण्णया चैव विणइया । तं एह णं सामी ! ते आसे चिट्ठं पासह, तए णं से पएसी राया चित्तं सारहिं एवं वयासी- गच्छाहि णं तुमं चित्ता ! तेहिं चैव चउहिं आसेहिं आसरहं जुत्तामेव उवट्ठवेहि जाव पञ्चप्पिणाहि, | तए णं से चित्ते सारही पएसिणा रन्ना एवं वृत्ते समाणे हहतुट्ठ-जाव-हियए उबट्टवेइ एयमाणत्तियं पञ्चप्पि इ। तए णं से पएसी राया चित्तस्स सारहिस्स अंतिए एयमहं सोचा णिसम्म हहतुट्ठ-जाव अप्पमहग्घा| भरणालंकियसरीरे साओ गिहाओ निरगच्छड़ जेणामेव चाउरघंटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ चाउग्घंटं आसरहं दुरूह, सेयवियाए नगरीए मज्झमज्झेणं णिग्गच्छइ, तए णं से चित्ते सारही तं रहं णेगाई जोयणाई उभा| मेइ, तए णं से पएसी राया उण्हेण य तण्हाए य रहवाएणं परिकिलंते समाणे चित्तं सारहिं एवं वयासी चित्ता ! परिकिलते मे सरीरे परावतेहि रहं, तए णं से चित्ते सारही रहं परावत्तेह, जेणेव मियवणे उज्जाणे तेणेव उवागच्छह, पएसिं रायं एवं वयासी एस णं सामी ! मियवणे उज्जाणे एत्थ णं आसाणं समं किंलामं सम्म अवणेमो, तए णं से पएसी राया चित्तं सारहिं एवं बदासी एवं होउ चित्ता ! | [१६२] तरणं से चित्ते सारही जेणेव मियवणे उज्जाणे जेणेव केसिस्स कुमारसमणस्स अदूरसामंते तेणेव उवागच्छइ तुरए णिगिण्हेइ रहं ठवेह रहाओ पचोरूहइ तुरए मोति पएसिं रायं एवं वयासी- एह णं सामी ! [१६१] १ अश्वानां समं श्रमम् - खेदं २ क्लमं - ग्लानिं सम्यक् ३ अपनयामः- स्फेटयामः । १० www.ainelibrary.org Page #347 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । आसाणं समं किलामं सम्मं अवणेमो, तए णं से पएसी राया रहाओ पचोरूहइ, चित्तेण सारहिणा सद्धि आसाणं समं किलामं सम्मं अवणेमाणे पासइ जत्थ केसीकुमारसमणं महइमहालियाए महच्चपरिसाए मज्झगए महया संदेणं धम्ममाइक्खमाणं, पासइत्ता इमेयारूवे अज्झत्थिए जाव समुप्पज्जित्था - जड्डां खलु भो ! जड्डुं पज्जुवासंति, मुंडा खलु भो ! मुंडं पज्जुवासंति, मूढा खलु भो ! मूढं पज्जुवासंति, अपंडिया खलु भो ! अपंडियं पज्जुवासंति निव्विण्णाणा खलु भो! निव्विण्णाणं पज्जुवासंति, से केस णं एस पुरिसे जडे मुंडे मूढे अपंडिए निव्विण्णाणे सिरीए हिंरीए उवगएँ उत्तप्पसरीरे, एस णंपुरिसे किमाहारमाहारेह ? किं परिणामेह ? किं खाइ किं पियइ किं दलेइ किं पर्यैच्छइ 'जंणं एस एमहालियाए मणुस्स परिसाए मज्झगए महया सद्देणं बूयाए ? एवं [१६२] १ जड- २ मूढ- ३ अपण्डित - ४ निर्विज्ञानशब्दा एकार्थिका मौर्यप्रकर्ष प्रतिपादनार्थं चोक्ताः ५ श्रिया - शोभया ६ हिया - लञ्जया ७ उपगतो- युक्तः, परमपरिषदादिशोभया गुप्तशरीरचेष्टाकतया चोपलम्भात्, ८ उत्तप्तशरीरो- देदीप्यमानशरीरः, अत्रैव कारणं विमृशति - ९ एष किमाहारयति - किमाहारं गृह्णाति ? न खलु कदन्नभक्षणे एवंरूपायाः शरीरकान्तेरुपपत्तिः, कण्डूत्यादि - १० | सद्भावतो विच्छायत्वप्रसक्तेः, तथा किं १० परिणामयति - कीदृशोऽस्य गृहीताहारपरिणामः ? न खलु शोभनाहाराभ्यवहारेऽपि मन्दाग्नित्वेन यथारूपा कान्तिर्भवति, एतदेव सविशेषमाचष्टे - १९ किं खाइ किं पियइ ? तथा किं १२ दलयति - ददाति, एतदेव व्याचष्टे - किं १३ प्रयच्छति ? १४ येन एतावान् लोकः पर्युपास्ते - एतदेवाह - 'जं णं एस १५ एमहालियाए माणुसपरिसाए महया महया सण Jain Educats International केसि कुमारं दृष्ट्वा पएसी चिन्तयति एषः कः मूढः ॥३०३॥ nww.jainelibrary.org Page #348 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥३०४॥ संपेहेई चित्तं सारहिं एवं वयासी-चित्ता ! जड्डा खलु भो! जड पज्जुवासंति जाव बूयाइ, साए विणं उजाणभूमीए नो संचाऍमि सम्म पकामं पैवियरित्तए। चित्तसार थिः परसि [१६३] तए णं से चित्ते सारही पएसीरायं एवं वयासी-एसणं सामी! पासावचिज्जे केसी नाम कुमारसमणे नृपं केसि | जाइसंपण्णे जाव चउनाणोवगए अधोऽवहिए अण्णजीविए । तए णं से पएसी राया चित्तं सारहिं एवं वयासी-1 कुमारं आहोहियं णं वदासि चित्ता! अण्णजीवियत्तं गं वदासि चित्ता!? हंता, सामी!आहोहिणं वयामि०, अभि-५ प्रत्यभिज्ञा पयति गमणिजे णं चित्ता! एस पुरिसे ? हंता! सामी! अभिगमणिजे, अभिगच्छामो णं चित्ता! अम्हे एवं पुरिसं? हंता सामी! अभिगच्छामो।। [१६४] तए णं से पएसी राया चित्तेण सारहिणा सद्धिं जेणेव केसीकुमारसमणे तेणेव उवागच्छद केसिस्स कुमारसमणस्स अदूरसामंत ठिच्चा एवं वयासी-तुब्भेणं भंते ! आहोहिया अण्णजीविया?, तएणं केसी बयाए' इति व्रते, यस्मिंश्चन्थं चेष्टमाने १८ स्वकीयायामपि १९ उद्यानभूमौ न २० संचाएमो-न शक्नुमः २१ सम्यक्-प्रकामं स्वेच्छया |१०| २२ प्रविचरितुम् , एवं १६ संप्रेक्षते-खचेतसि परिभावयति, संप्रेक्ष्य चित्रं सारथिमेवमवादीत-१७ 'चित्ता' इत्यादि। [१६३] १ अधोऽवधिका-परमावधेरधोवय॑वधियुक्तः, २ अनेन जीवितं-प्राणधारणं यस्यासावन्नजीवितः। - अत्र मूले विवरणे च वाक्यस्य क्रमभेदः । Jain Education lemona For Private & Personel Use Only Page #349 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । कुमारसमणे पएसिं रायं एवं वदासी-पएसी! से जहा णामए अंकवाणिया इ= वा संखवाणिया इ वा ज्ञानप्ररूपदंतवाणिया इ वा सुंक भंसिँउकामा जोसम्म पंथ पुच्छइ, एवामेव पएसी तुब्भे विविणयं भंसेउकामो नो सम्म णायां पुच्छसि, से गूणं तव पएसी ममं पासित्ता अयमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पज्जित्था-जड्डा खलु भो! जड़ें | नन्दिसूत्रपज्जुवासंति, जाव पवियरित्तए, से गृणं पएसी अढे समत्थे ? हंता! अत्थि। स्य निर्देशः [१६५] तए णं से पएसी राया केसि कुमारसमणं एवं वदासी-से केणटेणं भंते! तुझं नाणे वा दंसणे वा ५ जेणं तुझे मम एयारूवं अज्झत्थियं जाव संकप्पं समुप्पण्णं जाणह पासह ? तए णं से केसीकुमारसमणे पएसिं ॥३०५॥ रायं एवं वयासी-एवं खलु पएसी अम्हं समणाणं निग्गंथाणं पंचविहे नाणे पण्णत्ते, तंजहा-आभिणियोहियणाणे सुयनाणे ओहिणाणे मणपजवणाणे केवलणाणे । से किं तं आभिणिबोहियनाणे? आभिणियोहियनाणे चउविहे पण्णत्ते, तंजहा-उगहो ईहां अवाए धारणा । से कि तं उग्गहे ? उग्गहे दुविहे पण्णत्ते, जहाँ नंदीए [१६४] ते यथा नाम १ अङ्करत्नवणिजः २ शङ्खवणिजो मणिवणिजो वा ३ शुल्कं-राजदेयं भाग ४ भ्रंशयितुकामाः शङ्कातो १० ५न सम्यग् ६ पन्थानं पृच्छति, ७ 'एवमेव तुम' इत्यादिदार्टान्तिकयोजना सुगमा । [१६५] १ 'उग्गहों' इत्यादि,तत्र १ अविवक्षिताशेषविशेषस्य सामान्यरूपस्यानिर्देश्यस्य रूपादेरवग्रहणमवग्रहः २ तदर्थगतासद्भुतविशेषालोचनम् ईहा ३ प्रक्रान्तार्थविशेषनिश्चयोऽपायः ४ अवगतार्थविशेषधारणं धारणा, ५ 'से किं तं उग्गहे' इत्यादि, ६ यथा = " इति' वाक्यालंकारे "-राय० वि० । Jain Education literional For Private & Personal use only ww.jainelibrary.org Page #350 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥३०६॥ || जाव से तं धारणा, से तं आभिणियोहियणाणे । से किं तं सुयनाणे ? सुयनाणे दुविहे पण्णत्ते, तंजहा-अंगप। विद्वं च अंगवाहिरं च, सव्वं भाणियव्वं जाव दिद्विवाओ। ओहिणाणं भवपच्चइयं खओवसमियं जहा गंदीए [नन्दिसू० पृ० १६८ पं०४-] मणपजवनाणे दुविहे पण्णत्ते, तंजहा-उज्जुमई य विउलमई य, तहेव केवलनाणं सब्वं भाणियव्वं । तत्थ णं जे से आभिणियोहियनाणे से णं ममं अस्थि, तत्थ णं जे से सुयणाणे से वि य मम अस्थि, तत्थ णं जे से ओहिणाणे से वि य ममं अत्थि, तत्थ णं जे से मणपजवनाणे से विय ममं अत्थि, तत्थ | णं जे से केवलनाणे से णं मम नत्थि, सेणं अरिहंताणं भगवंताणं, इच्चेएणं पएसी अहं तव चउबिहेणं छउमत्थेणं णाणेणं इमेयारूवं अज्झत्थियं जाव समुप्पण्णं जाणामि पासामि। [१६६] तए णं से पएसी राया केसि कुमारसमणं एवं वयासी-अह णं भंते ! इहं उवविसामि? पएसी ! एसाए उज्जाणभूमीए तुमंसि चेव जाणए, तए णं से पएसी राया चित्तणं सारहिणा सद्धि केसिस्स कुमारसमणस्स अदूरसाभंते उवविसइ, केसिकुमारसमणं एवं वदासी-तुम्भे णं भंते ! समणाणं णिग्गंथाणं एसा सण्णा ऐसा पइण्णा एसा दिट्ठी नन्दी [नन्दिसूत्र पृ० १६८ पं० ४-] ज्ञानप्ररूपणा कृता तथाऽत्रापि परिपूर्णा कर्तव्या, ग्रन्थगौरवभयाच्च न लिख्यते, केवलं तट्टीकैवावलोकनीया, तस्यां सप्रपञ्चमस्माभिरभिधानात् । [१६६] १ संज्ञानं- संज्ञा सम्यग्ज्ञानमित्यर्थः २ एपैव प्रतिज्ञा निश्चयरूपोऽभ्युपगमः ३ एपा-दृष्टिः दर्शनम् स्वतत्त्वमिति JainEducation Inthandi For Private Personal Use Only Page #351 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । 'अन्यो न्यत् शरीरम' इति केशिमतम् ॥३०७॥ ऐसा कई ऐस हेऊ एस उवएसे एस संकप्पे ऐसा तुला एस माणे ऐस पमाणे एस समोसरणे जहा अण्णो जीवो | अण्णं सरीरं, णोतं जीवो तं सरीरं? तएणं केसी कुमारसमणे पएसिं रायं एवं वयासी-पएसी! अम्हं समणाणं णिग्गंथाणं एसा सपणा जाव एस समोसरणे जहा अण्णो जीवो अण्णं सरीरं, णोतं जीवो जो तं सरीरं। । [१६७] तए णं से पएसी राया केसि कुमारसमणं एवं वयासी-जति भंते ! तुम्भं समणाणं णिग्गंथाणं एसा सण्णा जाव समोसरणे जहा अण्णो जीवो अण्णं सरीरं णो तं जीवो तं सरीरं, एवं खलु ममं अजए होत्था, ५ इहेव जंबूदीवे दीवे सेयवियाए णगरीए अधम्मिए जाव सगस्स वि य णं जणवयस्स नो सम्मं करभरवित्ति पवत्तेति, से णं तुभं वत्तव्ययाए सुबहुं पावं कम्मं कलिकलुसं समन्जिणित्ता कालमासे कालं किच्चा अण्णयरेसु भावः, ४ एषा रुचिः-परमश्रद्धानुगतोऽभिप्रायः, ५ एष हेतुः समस्ताया अपि दर्शनवक्तव्यतायाः-एतन्मूलं युष्मदर्शनमिति भावः, ६ एष संकल्प:--एप सदैव भवतां तात्त्विकोऽध्यवसायः, ७ एषा तुला यथा तुलायां तोलित सम्यगित्यवधार्यते तथा अनेनाप्यभ्युपगमेनाङ्गीकृतेन च यद्विचार्यमाणं संगतिमुपैति तत् सम्यगित्यवधार्यते न शेषमिति तुलेव तुला तया, ८ एवमेतन्मानमित्यपि भावनीयं, नवरं मान-प्रस्थादि, ९ एतत् प्रमाणं, यथा प्रमाणे प्रत्यक्षाद्यविसंवादि एवमेषोऽप्यभ्युपगमोविसंवादीति भावः, १० एतत् समवसरण-बहूनामेकत्र मीलनं, सर्वेषामपि तत्वानामस्मिन्नभ्युपगमे संतुलनमिति भावः इत्यादि । + 'यदि' शब्दस्य 'जई' वा 'जदि' इति प्राकृतम्-उच्चारणम् , 'जति' इति तु पैशाचीभाषोचारणम् अथवा पृष्ठ ८८ गतं x टिप्पणं द्रष्टव्यम् । ० संलुल-भा० १-२। Jain Educatorlhteriosa For Private & Personel Use Only Page #352 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥३०८॥ नरएसु णेरइयत्ताए उववण्णे । तस्स णं अजगस्स णं अहं णत्तुए होत्था इंटे कते पिए मणुण्णे मणामे थेजे वेसा. |पएसिनृपसिए संमएँ बहुमए अणुमए रयणकरंडगसमाणे जीविउस्सविए हिययणंदिजणणे उंबरपुप्फ पिव दुल्लभे सवण स्य पितामयाए, किमंग पुण पासणयाए ? तं जति णं से अजए ममं आगंतुं वएजा-एवं खलु नतुया! अहं तव अजए | हापापित्वेन होत्था, इहेव सेयवियाए नयरीए अधम्मिए जाव नो सम्मं करभरवित्ति पंवत्तेमि, तए णं अहं सुबहुं पावं कम्भश्रमणमतेन कलिकलुसं समजिणित्ता नरएसु उववण्णे तं मा णं नत्तुया ! तुमं पि भवाहि अधम्मिए जाव नो सम्मं करभर- नरकं गतोवित्तिं पवत्तेहि, मा णं तुम पि एवं चेव सुबहुं पावकम्मं जाव उववज्जिहिसि, तं जइ णं से अजए ममं आगंतुं पि स्वकी यं प्रियं वएज्जा तो णं अहं सद्दहेजा पत्तिएजा रोएजा जहा अन्नो जीवो अन्नं सरीरं णो तं जीवो तं सरीरं, जम्हा णं से | नप्तकं पापअज्जए ममं आगंतुं नो एवं वयासी तम्हा सुपइट्टिया मम पइन्ना समणाउसो! जहा तज्जीवो तं सरीरं। स्याकरणाय [१६७] १ इष्टः इच्छाविषयत्वात् २ कान्तः कमनीयतमत्वात् ३ प्रियः प्रेमनिबन्धनत्वात् ४ मनोज्ञो मनसा सम्यगुपादेयतया नरकादागज्ञातत्वात् ५ मनसा अम्यते-गम्यते इति - मनोऽमः ६ स्थैर्यगुणयोगात् स्थैर्यो अविश्वासको विश्वासस्थानं ८ संमतः कार्यकरणेन १० त्यसबा धयति अतः ९ बहुमतो बहुत्वेन-अनल्पतया मतो बहुमतः १० कार्यविघातस्य पश्चादपि मतो - बहुमतः११ रत्नकरण्डसमानो रत्नकरण्डवदेका 'स जीवः न्तेनोपादेय इति भावः, १२ जीवितस्योत्सवः इव जीवितोत्सवः स एव जीवितोत्सविकः, १३ हृदयनन्दिजननः, १४ उदुम्बरपुष्पं तदेव शरी___x पृ० ८५ पं० ८ तथा टिप्पण। - सर्वेष्वपि आदर्शेषु 'बहुमत' पदम् तथापि इदं विवरणं यदि 'अनुमत' शब्दस्य तदा अत्र 'अनुमत' | रम्' इति इति समुचितम् । 'बहुमत' शब्दस्य विवरण पुरैव आगतम् अत एतद् विवरणम् 'अनुमत' शब्दस्य प्रतिभाति । पएसिमतम् Jain Education remona For Private Personel Use Only willjainelibrary.org Page #353 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं ।। [१६८] तए णं केसी कुमारसमणे पएसिं रायं एवं वदासी-अस्थि णं पएसी! तव सूरियकता णामं देवी? यथा न कोहंता अस्थि, जइ णं तुमं पएसी तं सूरियकंतं देवि पहायं कयबलिकम्मं कयकोउयमंगलपायच्छित्तं सव्वालंका- ऽपि स्वापरविभूसियं केणइ पुरिसेणं ण्हाएणं जाव सव्वालंकारभूसिएणं सद्धिं इट्टे सद्दफरिसरसरूवगंधे पंचविहे माणु- | राधिनम् स्सते कामभोगे पच्चणुभवमाणिं पासिजसि तस्स णं तुम पएली! पुरिसस्स के डंडं निव्वत्तेजासि ? अहं णं अदण्डयिभंते ! तं पुरिसं हत्थच्छिण्णगं वा सूलाइगं वा सूलभिन्नगं चा पायछिन्नगं वा एगाहचं कूडाहचं जीवियाओ वव-I त्वैव विसृ जति तथा रोवएजा। अह णं पएसी से पुरिसे तुम एवं वदेज्जा-मा ताव मे सामी ! मुहत्तगं हत्थच्छिण्णगं वा जाव जीवि नरकपाला याओ ववरोवेहि जाव ताव अहं मित्तणाइणियगसयणसंबंधिपरिजणं एवं वयामि-एवं खलु देवाणुप्पिया! | नारकं न पावाई कम्माई समायरेत्ता इमेयारूवं आवई पाविजामि, तं मा णं देवाणुप्पिया! तुम्भे वि केइ पावाई कम्माई विसृजन्ति समायरह, मा णं से वि एवं चेव आवई पाविज्जिहिह जहा णं अहं, तस्स णं तुमं पएसी! पुरिसस्स खणमवि |अतो नारएयमझु पडिसुणेज्जासि ? णो तिणढे समढे, कम्हाणं? जम्हा णं भंते ! अवराही णं से पुरिसे, एवामेव पएसी! १० कानागम नात् न श्रेह्यलभ्यं भवति ततस्तेनोपमानम् । यान् अना[१६८] १ शूलायामतिशयेन गतं शूलातिगं, एतदेव व्याचष्टे-२-शूलायां भिन्नः शूलाभिन्नः स एव शूलाभिन्नकस्तं, तथा एकं त्मवादः घातम् एकेन घातेनेति भावः, ४ कूटाघातम्-कूटपतितस्य मृगस्येव घातेनेति भावः। - शूलयाभि-पा०४-५। ३०९॥ Jain Education emanal For Private & Personel Use Only Jainelibrary.org Page #354 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥३१॥ तव वि अज्ज होत्था इहेव सेयवियाए णयरीए अधम्मिए जाव णो सम्मं करभरवित्तिं पवत्तेइ से णं अम्हं वत्तव्वयाए सुबहुं जाव उववन्नो, तस्स णं अज्जगस्स तुमं णत्तुए होत्था इट्ठे कंते जाव पासणयाए, से णं इच्छइ | माणुसं लोगं हव्वमागच्छित्तए णो चेव णं संचाएति हव्वमागच्छित्तए, चऊहिं ठाणेहिं पएसी अहुणोववण्णए | नरएसु नेरइए इच्छेइ माणुसं लोगं हव्वमागच्छित्तए नो चेवणं संचाएइ-१ अहुणोववन्नए नरएस नेरइए से णं तत्थ महभूयं वेयणं वेदेमाणे इच्छेजा माणुस्सं लोगं हव्वंणो चेव णं संचाएइ । २ अहुणोववन्नए नरएसु नेरइए नरय| पालेहिं भुज्जो भुज्जो समहिट्टिजमाणे इच्छइ माणुसं लोगं हव्वमागच्छित्तए नो चेत्र णं संचाए । ३ अहुणोववनए नरएमु नेरइए निरयवेयणिज्जंसि कम्मंसि अक्खीणंसि अवेइयंसि अनिज्जिन्नंसि इच्छइ माणुसं लोगं० नो | चेव णं संचाएइ । ४ एवं णेरइए निरयाउयंसि कम्मंसि अक्खीणंसि अवेइयंसि अणिजिन्नंसि इच्छइ माणुसं लोगं० नो चेव णं संचाएइ हव्वमागच्छित्तए । इचेएहिं चऊहिं ठाणेहिं पएसी अहुणोववन्ने नरएस नेरइए इच्छ माणुसं लोगं० णो चेवणं संचाएइ । तं सद्दहाहि णं पएसी ! जहा अन्नो जीवो अन्नं सरीरं, नो तं जीवो तं सरीरं १ । १० [१६९] एणं से एसी राया केसिं कुमारसमणं एवं वदासी-अत्थि णं भंते ! एसा पण्णा उवमा, इमेण पुण कारणेण नो उवागच्छइ, एवं खलु भंते! मम अज्जिया होत्था इहेव सेयवियाए नगरीए धम्मिया जाव वित्ति कप्पे तत्र ५ सुमहद्भूत नरकवेदनावेदनमेकं कारणम् । द्वितीयम् - ६ परमा धार्मिकैः कदर्थनम् । तृतीयम् - ७नरकवेदनीयकर्माक्षयत उद्विजनम् । चतुर्थम् - ८नरकायुष्काक्षयत उद्विजनम् । Jain Education Inmatinal www.lainelibrary.org Page #355 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। माणी समणोवासिया अभिगयजीवा० [पृ०२९०५०६]सन्चो वण्णओ जाव अप्पाणं भावेमाणी विहरइ, सा गं स्वर्गगतातुझं वत्तव्वयाए सुबहुं पुन्नोवचयं समन्जिणित्ता कालमासे कालं किच्चा अण्णयरेसु देवलोएसु देवत्ताए उववण्णा, ऽपि मातातीसे गं अजियाए अहं नत्तुए होत्था इहे कंते [पृ० ३०८ पं० १] जाव पासणयाए, तं जइ णं सा अजिया मम मही कथआगंतुं एवं वएजा-एवं खलु नत्तुया! अहं तव अज्जिया होत्था, इहेव सेयवियाए नयरीए धम्मिया जाब वित्ति |यितुं नाग. कप्पेमाणी समणोवासिया जाव विहरामि । तए णं अहं सुबहुं पुण्णोवचयं समजिणित्ता जाव देवलोएम उव ता अतोन | आत्मा शवण्णा, तं तुमंपि णत्तया! भवाहि धम्मिए जाव विहराहि, तए णं तुमं पि एयं चेव सुबहुं पुण्णोवचयं सम० रीव्यतिजाव उववन्जिहिसि, तं जइ णं अजिया मम आगंतुं एवं वएज्जा तो णं अहं सद्दहेजा पत्तिएजा रोइजा जहा- रिक्तः अण्णो जीवो अण्णं सरीरं, णो तं जीवो तं सरीरं। जम्हा सा अज्जिया ममं आगंतुं णो एवं वदासी, तम्हा सुपइडिया मे पइपणा जहा-तं जीवो तं सरीरं, नो अन्नो जीवो अन्नं सरीरं।। ३११॥ [१७०] तए णं केसी कुमारसमणे पएसीरायं एवं वयासी-जति णं तुम पएसी! पहायं कयवलिकम्मं कयको २० उयमंगलपायच्छित्तं उल्लपडसाडगं भिंगारकडच्छयहत्थगयं देवकुलमणुपविसमाणं केइ य पुरिसे बच्चघरंसि ठिच्चा एवं वदेजा-एह ताव सामी ! इह मुहुत्तगं आसयह वा चिट्ठह वा निसीयह वा तुयह वा, तस्स णं तुम पएसी! पुरिसस्स खणमवि एयम पडिसुणिज्जासि? णो ति० कम्हा णं? भंते! असुइ असुइ सामंतो, एवामेव x एहि-भा० १। Jain Educatie inter nal For Private & Personel Use Only ravw.jainelibrary.org Page #356 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥३१२॥ पएसी ! तब वि अजिया होत्था इहेव सेयवियाए णयरीए धम्मिया जाव विहरति, सा णं अम्हं वत्तव्वयाए सुबहु | जाव उववन्ना, तीसे णं अज्जियाए तुमं णन्तुए होत्था इट्ठे० [पृ० ३०८ पं० १] किमंग पुण पासणयाए । सा णं इच्छइ माणुसं लोगं हव्वमागच्छित्तए, णो चेवणं संचाएइ हव्वमागच्छित्तए । चंऊहिं ठाणेहिं पएसी! अहुणोववण्णए देवे देवलोएस इच्छेला माणुसं लोगं० णो चेव णं संचाएइ-१ अहुणोववण्णे देवे देवलोएस दिव्वेहिं का| मभोगेहिं मुच्छिए गिद्धे गढिए अज्झोववण्णे से णं माणुसे भोगे नो आढाति नो परिजानाति, से णं इच्छिल ५ माणुसं नो चेव णं संचाएति । २ अहुणोववण्णए देवे देवलोएस दिव्वेहिं कामभोगेहिं मुच्छिए जाव अज्झोववण्णे, तस्स णं माणुस्से पेम्मे वोच्छिन्नए भवति दिव्वे पिम्मे संकते भवति, से णं इच्छेला माणुस० णो चेव णं संचाइ । २ अहुणोववण्णे देवे दिव्वेहिं कामभोगेहिं मुच्छिए जाव अज्झोववण्णे, तस्स णं एवं भवइ-इयाणि गच्छं मुहुत्तं जाव इह गच्छं अप्पाउया णरा कालधम्मुणा संजुत्ता भवंति से णं इच्छेला माणुस्सं० णो चेव णं | संचाएइ । ३ अहुणोववण्णे देवे दिव्वेहिं जाव अज्झोववण्णे, तस्स माणुस्सए उराले दुग्गंधे पडिकूले पडिलोमे १० भवइ, उड्डुं पि य णं चेत्तारि पंच जोअणसए असुभे माणुस्सए गंधे अभिसमागच्छति, से णं इच्छेला माणुसं० [१७०] १ 'चऊहिं ठाणेहिं अहुणोववण्णए देवे' इत्यादि सुगमम् । नवरम् - २' चत्तारि पंच वा जोअणसए असुभे गंधे हवइ' इति । इह यद्यपि नवभ्यो योजनेभ्यः परतो गन्धपुद्गला न घ्राणेन्द्रियग्रहणयोग्या भवन्ति, पुद्गलानां मन्दपरिणामभावात् घ्राणेन्द्रियस्य : अत्र मूले 'अभिसमागच्छति' इति क्रिया । Jain Educationtentional स्वर्गीयो |देवः स्वभोगास क्त्वादिका रणेन नात्र आगन्तुं शक्नोति अतस्तस्यानागमनाद पि न श्रे यान् अना त्मवादः Page #357 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं ।। ॥३१३॥ णो चेव णं संचाइजाइचेएहिं ठाणेहिं पएसी! अहुणोववण्णे देवे देवलोएसु इच्छेन माणुसं लोग हव्वमागच्छित्तए णो चेव णं संचाएइ हब्वमागच्छित्तए तं सद्दहाहि णं तुमं पएसी ! जहा-अन्नो जीवो अन्नं सरीरं, नो तं जीवोतं सरीरं२। १७१] तए णं से पएसी राया केसि कुमारसमणं एवं वयासी-अस्थि णं भंते ! एस पण्णा उवमा, इमेणं पुण मे कारणेणं णो उवागच्छति, एवं खलु भंते ! अहं अन्नया कयाई वाहिरियाए उवट्ठाणसालाए अणेगगण*-५ णायक-दंडणायेंग-राय-ईसर-तलवर-माडंबिय-कोडुबिय-इन्भ-सेटि-सेणावइ-सत्थवाह-मंति-महामंतिच तथाविधशक्त्यभावात् , तथापि ते अत्युत्कटगन्धपरिणामा इति नवसु योजनेषु मध्ये अन्यान् पुद्गलान् उत्कटगन्धपरिणामेन परिणमयन्ति, तेऽपि ऊर्ध्व गच्छन्तः परतोऽन्यान् तेऽप्यन्यानिति चत्वारि पश्च वा योजनशतानि यावद् गन्धः, केवलमूर्ध्वमूवं मन्दपरिणामो वेदितव्यः, तत्र यदा मनुष्यलोके बहूनि गोमृतककलेवरादीनि तदा पञ्चयोजनशतानि यावद् गन्धः, शेपकालं चत्वारि तत उक्तम्-'चत्वारि पञ्च' इति । [१७१] १ अस्ति २ भदन्त ! ३ प्रज्ञातो-बुद्धिविशेषादुपमा । ४ गणनायकाः-प्रकृतिमहत्तराः ५ दण्डनायकाः-तन्त्रपाला ६ राज| ईश्वर-तलवर-माडम्बिक-कौटुम्बिक-इभ्य-श्रेष्ठि-सेनापति-सार्थवाह-मत्रि-महामन्त्रि-गणक-दौवारिकाः प्रागुक्तस्वरूपाः [पृ०२८५ * एषां सर्वेषां शब्दानां व्याख्या (पृ० २८५ पं० ३) द्रष्टव्या । Jain Educatonemelosa For Private & Personel Use Only Jww.dainelibrary.org Page #358 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । ॥३१४॥ गणग-दोबारिय-अमच्च-चेड-पीढमई-नगर-निगम-दय-संधिवालेहिं सद्धिं संपरिखुडे विहरामि । तए णं मम णग अयकु:म्भीरगुत्तिया सँसक्खं सेलोई सगेवेजं अचउडबंधणबद्धं चोरं उवणेति तए णं अहं तं पुरिसं जीवंतं चेव अउकुंभीए निक्षिप्तचौपक्खिवावेमि, अउमएणं पिहाणएणं पिहावेमि, अएण य तउएण य आयावेमि, आयपच्चइयएहिं पुरिसेहिं रक्खा- | रदृष्टान्तेन वेमि तए अहं अण्णया कयाई जेणामेव सा अउकुंभी तेणामेव उवागच्छामि, उवागच्छित्ता तं अउकुंभी उग्ग- अनात्मलच्छावेमि, उग्गलच्छावित्ता तं पुरिसं सयमेव पासामिणो चेव णं तीसे अयकुंभीए केइ छिड्डे इ वा विवरे इ वा ५ बादः अंतरे इ वा राई वा जओ णं से जीवे अंतोहिंतो बहिया णिग्गए। जइ णं भंते ! तीसे अउकुंभीए होजा केइ छिड्डे वा जाव राई वा जओणं से जीवे अंतोहिंतो बहिया णिग्गए, तो णं अहं सद्दहेज्जा पत्तिएज्जा रोएन्जा जहा अन्नो जीवो अन्नं सरीरं नो तं जीवो तं सरीरं, जम्हा णं भंते! तीसे अउकुंभीए णत्थि केइ छिड्डे वा जाव निग्गए, तम्हा सुपतिटिया मे पइन्ना जहा-तं जीवो तं सरीरं, नो अन्नो जीवो अन्नं सरीरं । [१७२] तए णं केसी कुमारसमणे पएसिं रायं एवं वयासी-पएसी ! से जहा नाम ए कूडागारसाला सिया दुहओ १० पं० १] ७अमा त्या-राज्याधिष्ठायकाः ८ चेटाः-पादमूलिकाः ९पीठमः-प्रागुक्ताः [पृ० २८५ पं०१०] १० नगर-नगरवासिप्रकृतयः ११ निगमाः-कारणिकाः १२ दूताः-अन्येषां गत्वा राजादेशनिवेदकाः १३संधिपाला-राज्यसन्धिरक्षकाः नगररक्षाकारिणः १४ ससाक्षि +सहोढं-१५सलोद्रम् ग्रीवानिबद्धकिंचिल्लोध्रमित्यर्थः, १६ अग्रावृतबन्धनबद्धं चौरमिति । + सहोष्टं स-पा० ५। JainEducation For Private Personel Use Only Hainelibrary.org Page #359 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। | लित्ता गुत्ता गुत्तदुवारा णिवायगंभीरा, अह णं केइ पुरिसे भेरिंच दंडं च गहाय कूडागारसालाए अंतो अंतो अणुप्पविसति तीसे कूडागारसालाए सव्वतो समंता घणनिचियनिरंतरणिच्छिडाई दुवारवयणाई पिहेइ, तीसे कूडागारसालाए बहुमज्झदेसभाए ठिचा तं भेरि दंडएणं महया महया सद्देणं तालेज्जा, से णूणं पएसी! से सद्दे | णं अंतोहिंतो बहिया निग्गच्छइ ? हंता णिग्गच्छइ, अत्थि णं पएसी! तीसे कूडागारसालाए केइ छिडे वा जाव | राई वा जओ णं से सद्दे अंतोहिंतो बहिया णिग्गए ? नो तिणटे समढे, एवामेव पएसी! जीवे वि अप्पडिहयगई पुढविं भिचा सिलं भिच्चा पव्वयं भिच्चा अंतोहिंतो बहिया णिगच्छइ, तं सद्दहाहि णं तुमं पएसी! अण्णो जीवो तं चेव ३। [१७३] तए णं पएसी राया केसिकुमारसमणं एवं वदासी-अस्थि णं भंते ! एस पण्णा उवमा इमेण पुण कारणेणं णो उवागच्छइ, एवं खलु भंते ! अहं अन्नया कयाइ बाहिरियाए उवट्ठाणसालाए जाव [कं० १७१ पं० २]| विहराभि, तए णं ममं णगरगुत्तिया ससक्ख जाव उवणेंति, तए णं अहं(सं) पुरिसं जीवियाओ ववरोवेमि जीवि- याओ ववरोवेत्ता अयोकुंभीए पक्खिवावेमि अउमएणं पिहावेमि जाव [कं० १७१ पं० ६] पच्चइएहिं पुरिसेहिं रक्खावेमि, तए णं अहं अन्नया कयाई जेणेव सा कुंभी तेणेव उवागच्छामि तं अउकुंभि उग्गलच्छामि तं अउकुंभी किमिकुंभि पिव पासामि जो चेव णं तीसे अउकुभीए केइ छिडे इ वा जाव राई वा जताणं ते जीवा [१७२] १ भेरी-ढक्का ! २ दण्डो वादनदण्डः। याः कुटाका कारशालाय अपि शब्द निर्गमदृष्टान्तेन जीवनिगमःअ. यःकुम्भीनिक्षिप्तमारितचौरस्ट कृमिरूपता दृष्टान्तेन अ नात्मवादः ॥३१५॥ Jan Education hentona Mir.jainelibrary.org Page #360 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥३१६॥ बहियाहिंतो अणुपविट्ठा, जति णं तीसे अउकुंभीए होज केइ छिड्डे इ वा जाव अणुपविद्या तेणं अहं सद्दहेज्जा तप्तलोहप्रजहा-अन्नो जीवो तं चेव, जम्हा णं तीसे अउकुंभीए नत्थि कोइ छिड्ड इ वा जाव अणुपविट्ठा तम्हा सुपति विष्टाग्नि | हिआ मे पइण्णा जहा तं जीवोतं सरीरंतं चेव। शान्तेन [१७४] तए णं केसी कुमारसमणे पएसी रायं एवं वयासी-अस्थि णं तुमे पएसी! कयाइ अए धंतपुव्वे वा| | जीववादः धमावियपुव्वे वा ? हंता अस्थि, से गृणं पएसी ! अए धंते समाणे सव्वे अगणिपरिणए भवति? हंता भवति, ५ बाल-युव. अस्थि णं पएसी! तस्स अयस्स केइ छिड्डे इ वा जेणं से जोई बहियाहिंतो अंतो अणुपचिट्टे ? नो इणमढे समढे, कदृष्टान्तेन अजीववाद: एवामेव पएसी! जीवो वि अप्पडिहयगई पुढधि भिचा सिलं भिच्चा बहियाहिंतो अणुपविसइ, तं सद्दहाहि णं तुमं पएसी ! तहेव ४। १७५] तए णं पएसी राया केसीकुमारसमणं एवं वयासी-अत्थि णं भंते ! एस पण्णा उवमा इमेण पुण मे कारणेणं नो उवागच्छइ, अत्थि णं भंते ! से जहानामए के पुरिसे तरुणे जाव सिप्पोवगए पभू पंचकंडगं निसिरित्तए ? हंता, पभू । जति णं भंते ! सो च्चेव पुरिसे बाले जाव मंदविन्नाणे पभू होजा पंचकंडगं निसिरित्तए, तो णं अहं सद्दहेजा जहा-अन्नो जीवोतं चेव, जम्हा णं भंते !स चेव से पुरिसे जाव मंदविन्नाणे णो पभू पंचकंडयं निसिरित्तए तम्हा सुपइडिया मे पइण्णा जहा-तं जीवोतं चेव। १७६] तए णं केसीकुमारसमणे परसिं रायं एवं वयासी-से जहानामए केइ पुरिसे तरुणे जाव सिप्पोव Jain Education emanal For Private & Personel Use Only Wjainelibrary.org Page #361 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । अन्यप्रकारेण तरुणदृष्टान्तेन जीववादः ॥३१७॥ गए णवएणं धणुणा नवियाए जीवाए नवएणं इसुणा पभू पंचकंडगं निसिरित्तए? हंता, पभृ। सो चेव गं पुरिसे तरुणे जाव निउणसिप्पोवगते कोरिल्लिएणं धणुणा कोरिल्लियाए जीवाए कोरिल्लिएणं इसुणा पभू पंचकंडगं निसिरित्तए ? णो तिणमढे समझे। कम्हा णं । भंते! तस्स पुरिसस्स अपजत्ताई उवगरणाई हवंति, एवामेव पएसी! सो चेव पुरिसे बाले जाव मंदविन्नाणे अपजत्तोवगरणे, णो पभू पंचकंडयं निसिरित्तए, तं सहहाहि णं तुमं पएसी ! जहा-अन्नो जीवो तं चेव ५। [१७७] तए णं पएसी राया केसीकुमारसमणं एवं वयासी-अस्थि णं भंते ! एस पण्णा उवमा इमेण पुण कारणेणं नो उवागच्छइ, भंते ! से जहानामए केइ पुरिसे तरुणे जाव सिप्पोवगते पभू एगं महं अयभारगं वा तउयभारगं वा सीसगभारगं वा परिवहित्तए ? हंता पभू । सो चेव णं भंते ! पुरिसे जुन्ने जराजजरियदेहे सिढिलवलितयाविणट्टगत्ते दंडपरिग्गहियग्गहत्थे पविरलपरिसडियदंतसेढी आउरे किसिए पिवासिए दुब्बले किलंते नो पभू एगं महं अयभारगं वा जाव परिवहित्तए, जति णं भंते ! सच्चेव पुरिसे जुन्ने जराजरियदेहे जाव परिकिलंते पभू एगं महं अयभारं वा जाव परिवहित्तए तो णं सद्दहेजा तहेव, जम्हा णं भंते ! से चेव पुरिसे जुन्ने जाव किलंते नो पभू एग महं अयभारं वा जाव परिवहित्तए तम्हा सुपतिहिता मे पइण्णा तहेव । [१७८] तए णं केसी कुमारसमणे पएसिं रायं एवं वयासी-से जहाणामए केइ पुरिसे तरुणे जाव सिप्पोवगए णवियाए विहंगियाए णवएहि सिक्कएहिं णवएहिं पच्छियपिंडएहिं पट्ट एगं महं अयभारं जाव परिवहि Join Educat intel For Private Personel Use Only Jww.jainelibrary.org Page #362 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । जीवतः मृतस्य च तोलने भारभेदा| भावाद् अजीववादः। ॥३१८॥ त्तए ? हंता पभू । पएसी ! से चेव णं पुरिसे तरुणेजाव सिप्पोवगए जुन्नियाए दुब्बलियाए घुणक्वइयाए विहं|गियाए जुण्णएहिं दुव्बलएहिं घुणक्खइएहिं सिढिलतयापिणद्धएहिं सिक्कएहिं जुण्णएहिं दुब्बलिएहिं घुणखइएहिं पच्छिपिंडएहिं पभू एगं महं अयभारं वा जाव परिवहित्तए ? णो तिण, कम्हा णं ?। भंते ! तस्स पुरिसस्स जुन्नाइं उवगरणाई भवंति, पएसी! से चेव से पुरिसे जुन्ने जाव किलंते जुत्तोवगरणे तो पभू एगं महं अयभारं वा जाव परिवहित्तए, तं सद्दहाहि णं तुमं पएसी ! जहा-अन्नो जीवो अन्नं सरीरं ६। [१७९] तए णं से पएसी केसिकुमारसमणं एवं वयासी-अत्थि णं भते ! [कं० १७७ पं०१] जाव नो उवागच्छइ, एवं खलु भंते ![पृ० ३१३ पं०५] जाव विहराभि, तए णं मम णगरगुत्तिया चोरं उवणेति, तए णं अहं तं पुरिसंजीवंतगं चेव तुलेमि तुलेत्ता छविच्छेयं अकुव्वमाणे जीवियाओ ववरोवेभि मयं तुलेमिणो चेव णं तस्स पुरिसस्स जीवंतस्स वा तुलियस्स वा मुयस्स वा तुलियस्स केइ आणत्ते वा नाणत्ते वा ओमत्ते वा तुच्छत्ते वा गुरुयत्ते वा लहुयत्ते वा) जति णं भंते ! तस्स पुरिसस्स जीवंतस्स वा तुलियस्स मुयस्स वा तुलियस्स केइ अन्नत्ते वा जाव लहुयत्ते वा तो णं अहं सद्दहेज्जा तं चेव, जम्हा णं भंते ! तस्स पुरिसस्स जीवंतस्स वा तुलियस्स मुयस्स वा तुलियस्स नत्थि केइ अन्नत्ते वा लहुयत्ते वा० तम्हा सुपतिट्ठिया मे पइन्ना जहा-तं जीवो तं चेव । [१८०] तए णं केसी कुमारसमणे पएसिं रायं एवं वयासी-अस्थि णं पएसी! तुमे कयाइ वत्थी धंतपुब्वे वा धमावियपुब्वे वा ? हंता अस्थि । अत्थि णं पएसी! तस्स वत्थिस्स पुण्णस्स वा तुलियस्स अपुण्णस्स वा Jan Education that For Private Personal use only Page #363 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । तलियस्स केइ अणत्ते वा जाव लहुयत्ते वा ? णो तिणढे समझे। एवामेव पएसी! जीवस्स अगुरुलघुयत्तं वायुपूर्णभपडुच जीवंतस्स वा तुलियस्स मुयस्स वा तुलियस्स नत्थि केइ आणत्ते वा जाव लहुयत्ते वा, तं सहाहि णं तुम | स्त्रायाः रिपएसी! चेव । क्तभवाया |श्च तोलने [१८१तए णं पएसी राया केसि कुमारसमणं एवं वयासी-अस्थि णभंते ! एसा जाव नो उवागच्छड. भारभेदाएवं खल भंते ! अहं अन्नया जाव [पृ०३१३५०५] चोरं उवणेति, तए णं अहं तं पुरिसं सव्वतो समंता समभि-५ | भावाद् न लोभि नो चेव गंतस्थ जीव पासामि तए णं अहं तं पुरिसं दुहा फालियं करेमि करित्ता सव्वतोसमंता सम- हि वायोर भिलोएमि. नो चेव ण तत्थ जीवं पासामि एवं तिहा चउहा संखेजफालियं करेमि णो चेव णं तत्थ जीवं | भावः तद्वपामामि जहणं भंते ! अहं तं पुरिसं दुहा था तिहा वा चउहा वा संखेजहा वा फालियंमि वा जीवं देिव न जी वाभावः पासंतो तो णं अहं सद्दहेजा नो तं चेव, जम्हा णं भंते ! अहं तंसि दुहा वा तिहा वा चउहा वा संखिजहा| द्विधाकृते. वा फालियंमि वा जीवं न पासामि तम्हा सुपतिट्ठिया मे पइण्णा जहा-तं जीवो तं सरीरं तं चेव । चवnant) १० अपि शरीरे १८२] तए णं केसिकुमारसमणे पएसिं रायं एवं वयासि-मूढतराए णं तुमं पएसी ! ताओं तुच्छतराओ, जीवं न के भंते ! तुच्छतराए ? पएसी! से जहाणामए केई पुरिसे वणत्थी वणोवजीवी वणगवेसणयाए जोडं च पश्यामि जोडभायणं च गहाय कट्ठाणं अडविं अणुपविट्ठा) तए णं ते पुरिसातीसे अगामियाए जाव किंचिदेसं अणप्पत्ता इति अजी. ववाद: ससाणा एवं परिसं एवं वयासी-अम्हे णं देवाणुप्पिया! कट्ठाणं अडविं पविसामो, एत्तो णं तुमं जोहभायणाओ ॥३१९॥ Jain Education intern al For Private Personel Use Only Iw.jainelibrary.org Page #364 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण ॥३२०॥ द्रष्टुकाम जोइं गहाय अम्हं असणं साहेजासि, अह तं जोइभायणे जोई विज्झवेजा एत्तो णं तुम कट्ठाओ जोइ गहाय अरणिकाष्ठं अम्हं असणं साहेजासि त्ति कटु कट्ठाणं अडविं अणुपविट्ठा/तए णं से पुरिसे तओ मुहुत्तन्तरस्स तेसिं पुरिसाणं द्विधाविअसणं साहेमि त्ति कटु जेणेव जोतिभायणे तेणेव उवागच्छइ जोइभायणे जोई विज्झायमेव पासति तए णं से | भिद्य अनि पुरिसे जेणेव से कहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता तं क8 सव्वओ समंता समभिलोएति नो चेव णं तत्थ जोई पासति, तए णं से पुरिसे परियरं बंधइ फरसुं गिण्हइ तं कहें दुहा फालियं करेइ सव्वतो समंता समभि-4 स्येव पएसि लोएइ णो चेव णं तत्थ जोइं पासइ, एवं जाव संखेजफालियं करेइ सव्वतो समंता समभिलोएइ नो चेव णं तत्थ | नृपस्य मूढत्वम् जोइं पासइ, तए णं से पुरिसे तंसि कटुंसि दुहाफालिए वा जाव संखेज्जफालिए वा जोइं अपासमाणे संते तंते परिसंते निविण्णे समाणे परसुं एगते एडेइ परियरं मुयइ एवं वयासी-अहो !मए तेसिं पुरिसाणं असणे नोसाहिए त्ति कट्ट ओहयमणसंकप्पेचिंतासोगसागरसंपविढे करयलपल्लत्थमुहे अदृज्झाणोवगए भूमिगयदिट्टिए झियाइ, तए णं ते पुरिसा कट्ठाइं छिदंति जेणेव से पुरिसे तेणेव उवागच्छंति तं पुरिसं ओहयमणसंकप्पं जाव झियायमाणं पासंति एवं वयासी-किं णं तुम देवाणुप्पिया! ओहयमणसंकप्पे जाव झियायसि ? तए णं से पुरिसे एवं वयासी-तुज्झे णं देवाणुप्पिया! कट्ठाणं अडविं अणुपविसमाणा ममं एवं वयासी-अम्हे णं देवाणुप्पिया! कहाणं अडविं जाव-पविट्ठा, तए णं अहं तत्तो मुहुत्तंतरस्स तुझं असणं साहेमि त्ति कटु जेणेव जोइभा० जाव किं. १८२ पं०७-] झियामि, तए णं तेसिं पुरिसाणं एगे पुरिसे छेदे दक्खे पत्तढे जाव उवएसलद्धे ते पुरिसे एवं Jain Education emanal For Private Personel Use Only | w rjainelibrary.org Page #365 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । वयासी-गच्छह णं तुज्झे देवाणुप्पिया ! पहाया कयवलिकम्मा जाच हव्वमागच्छेह जा णं अहं असणं साहेमि त्ति कद्दु परियरं बंधइ परसुं गिण्हइ सरं करेइ सरेण अरणिं महेइ जोइं पाडेइ जोई संधुक्खेइ तेसिं पुरिसाणं असणं साहेइ, तए णं ते पुरिसा ण्हाया कयबलिकम्मा जाव-पायच्छित्ता जेणेव से पुरिसे तेणेव उवागच्छंति, तए णं से पुरिसे तेसिं पुरिसाणं सुहासणवरगयाणं तं विउलं असणं पाणं खाइमं साइमं उवणेइ, तए णं ते पुरिसा तं विउलं असणं ४ आसाएमाणा वीसाएमाणा जाव विहरंति, जिमियभुनुतरागया वि य णं समाणा आयंता चोक्खा परमसुइभूया तं पुरिसं एवं वयासी-अहो! णं तुमं देवाणुप्पिया! जड्डे मूढे अपंडिए णिब्विण्णाणे अणुवएसलद्धे जे णं तुम इच्छसि कलुसि दुहाफालियंसि वा जोतिं पासित्तए, से एएणडेणं पएसी! एवं वुच्चइ मूढतराए णं तुमं पएसी! ताओ तुच्छतराओ ८। [१८३] तए णं पएसी राया केसिकुमारसमणं एवं क्यासी-जुत्तए णं भंते ! तुम्भ इय छेयाणं दक्खाणं वुद्धाणं कुसलाणं महामईणं विणीयाणं विण्णाणपत्ताण उवएसलद्धाणं अहं इमीमाए महालियाए महचपरिसाए मज्झे उच्चावएहिं आउसेहिं आउसित्तए उच्चावयाहि उद्धंसणाहिं उद्धंसित्तए एवं निभंछणाहिं० निच्छो डणाहिं। [१८४] तए णं केसी कुमारसमणे पएसिं रायं एवं वयासी-जाणासि णं तुम पएसी! कति परिसाओ पण्णताओ? जाणामि चत्तारि परिसाओ पण्णत्ता, तंजहा-खत्तियपरिसा गाहावइपरिसा माहणपरिसा इसिप पएसीः भवद्भिः दक्षैपि श्रमणैः महत्यां पर्पदि कथमहमेवमनादृतः? ||३२१॥ JainEducatioriter For Private Personel Use Only wide.jainelibrary.org Page #366 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥३२२॥ Jain Education Internatio रिसा । जाणासि णं तुमं पएसी राया ! एयासि चउन्ह परिसाणं कस्स का दंडणीई पण्णत्ता ? हंता ! जाणाभि । जेणं खत्तियपरिसाए अवरज्झइ से णं हत्थच्छिण्णए वा पायच्छिण्णए वा सीसच्छिण्णए वा सूलाइए वा एगाहचे कूडाहचे जीवियाओ ववरोविजइ । जे णं गाहावइपरिसाए अवरज्झइ से णं तएण वा वेढेण वा पलालेण वा वेदित्ता अगणिकाएणं झामिज्जइ । जेणं माहणपरिसाए अवरज्झइ से णं अणिट्ठाहिं अकंताहिं जाव अमणामाहिं वग्गूहि उवालंभित्ता कुंडियालंछणए वा सूणगलंछणए वा कीरइ, निच्चिसए वा आणविज्जइ । जे णं इसि परिसाए अवरज्झइ से णं णाइअणिट्ठाहिं जाव णाइअमणामाहिं वग्गूहिं उबाल भइ एवं च ताव पएसी ! तुमं जाणासि तहावि ण तुमं ममं वामं वामेणं दंड दंडेणं पडिकूलं पडिकूलेणं पडिलोमं पडिलोमेणं विवद्यासं विवचासेणं वहसि । तणं एसी राया केसिं कुमारसमणं एवं वयासी एवं खलु अहं देवाणुप्पिएहिं पढमिल्लुएणं चैव बागरणेण संलत्ते तए णं ममं इमेयारूवे अज्झत्थिए जाव संकप्पे समुपज्जित्था जहा जहा णं एयस्स पुरिसस्स वामं १० वामेण जाव विवचासं विवचासेणं वहिस्सामि तहा तहा णं अहं नाणं च नाणोवलंभं च करणं च करणोवलंभं च दंसणं च दंसणोवलंभं च जीवं च जीवोवलंभं च उबलभिस्सामि, तं एएणं अहं कारणेणं देवाणुप्पियाणं वामं वामेण जाव विवचासं विवचासेणं वट्टिए । [१८४] १ वामं वामेन एवम् - २ 'दंडं दंडेणं' इत्याद्यपि भावनीयम् । केशी श्र०: पर्षदां प्रकाराः तासांच दण्डनीतयः पएसी:ज्ञानं लब्धु कामोऽहं विव्यत्यासे न स्थितः inelibrary.org Page #367 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं ।। [१८५] तए णं केसी कुमारसमणे पएसीरायं एवं वयासी-जाणासि णं तुम पएसी! कइ ववहारगा पण्णत्ता केशी श्र हंता जाणामि । चत्तारि ववहारगा पण्णत्ता-१ देई नामेगे णो सण्णवेइ । १सन्नवेइ नामेगे नो देइ । ३ एगे देइ वि | पएसिनृपसन्नवेइ वि । ४ एगे णो देइ णो सण्णवेइ । जाणासि णं तुमं पएसी! एएसिं चउण्हं पुरिसाणं के ववहारी के अ. |स्य व्यवव्ववहारी? हंता जाणामि । तत्थ णं जे से पुरिसे देइ णो सण्णवेइ से णं पुरिसे ववहारी । तत्थ णं जे से पुरिसे | हारित्वम् । णो देइ सण्णवेइ से णं पुरिसे ववहारी। तत्थ णं जे से पुरीसे देइ वि सन्नवेइ वि से पुरिसे ववहारी। तत्थ णं जे ५ हस्तामल से पुरिसे णो देह णो सन्नवेइ से णं अयवहारी। एवामेव तुमं पि ववहारी, णो चेव णं तुमं पएसी अववहारी। कवद् आत्मा कथं १८६] तए णं पएसी राया केसिकुमारसमणं एवं वयासी-तुज्झे णं भंते! इय छेया दक्खा जाव उवएसलद्धा नदश्यते? समत्था णं भंते ! ममं करयलंसि वा आमलयं जीवं सरीराओ अभिनिवद्वित्ताणं उवदंसित्तए ? तेणं कालेणं तेणं समएणं पएसिस्स रण्णो अदूरसामंते वाउयाए संबुत्ते, तणवणस्सइकाए एयइ वेयइ चलइ | ॥३२३॥ फंदइ घट्टइ उदीरइ तं तं भावं परिणमइ, तए णं केसी कुमारसमणे पएसिरायं एवं बयासी-पाससि णं तुम पए-120 [१८५] १ ददाति-दानं प्रयच्छति न संज्ञापयति-न सम्यगालापेन संतोषयति, चतुर्भङ्गी पाठसिद्धा, यद्यपि त्वं न सम्यगालापेन मां संतोषयसि तथापि मम विषये भक्तिं बहुमानं च कुर्वन् आद्यपुरुष इव २व्यवहार्येव नाव्यवहारी, १ एतावता च 'मृढतराए तुमं पएसी! तओ कट्ठहारयाओं' इत्यनेन वचसा [कं० १८२ अंतिम पंक्ति यत् कालुष्यमापादितं तदपनीतम् परमं च संतोष प्रापित इति। For Private Personal Use Only Jiw.jainelibrary.org Page #368 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥३२४॥ Jain Education सी राया ! एयं तणवणस्सई एयंतं जाव तं तं भावं परिणमंतं ? हंता पासामि । जानासि णं तुमं पएसी ! एवं तणवणस्सइकार्य किं देवो चालेह असुरो वा चालेइ णागो वा किन्नरो वा चालेइ किंपुरिंसो वा चालेर महोरगो वा चालेइ गंधवो वा चालेइ ? हंता जाणामि-णो देवो चालेइ जाव णो गंधच्यो चालेह वाउयाए चालेइ । पाससि णं तुमं पएसी ! एतस्स वाउकायस्स सरूविस्स सकामस्स सरागस्स समोहस्स सवेयस्स ससस्स ससरीरस्स खवं ? णो तिणट्टे० । जइ णं तुमं पएसी राया। एयस्स वाउकायस्स सरूविस्स जाव ससरीरस्स रूवं न पाससि ५ तं कहं णं पएसी । तब करयलंसि वा आमलगं जीवं उवदंसिस्सामि । एवं खलु पएसी ! दसट्टाणाई छउमत्थे मस्से सव्वभावेणं न जाणइ न पासइ, तंजहा - धम्मत्थिकार्य १ अधम्मत्थिमायं २ आगासत्धिकार्य ३ जीवं असरीरबद्धं ४ परमाणुपोग्गलं ५ स ६ गंधं ७ वायं ८ अयं जिणे भविस्सइ वा णो भविस्सइ ९ अयं सच्चदुक्वाणं अंतं करेस्सइ वा नो वा १० । एताणि चेव उत्पन्ननाणदंसणधरे अरहा जिणे केवली सव्वभावेणं जाणइ पासई, तं०-धम्मत्थिकार्य जाव नो वा करिस्सइ, तं सद्दहाहि णं तुमं पएसी ! जहा अन्नो जीवो तं चैव ९ । [१८७ ] तए णं से पएसी राया केसिं कुमारसमणं एवं वयासी से नृणं भंते ! हत्थिस्स कुंथुस्स य समे चेव जीवे ? हंतो पएसी ! हत्थिस्स य कुंथुस्स य समे चैव जीवे । से णूणं भंते! हत्थीउ कुंथू [१८७] १ 'हंता एसी हथिस्स ! कुंथुस्स य समे चैव जीवे' इति प्रदेशानां तुल्यत्वात् केवलं संकोचविकोचधर्मत्वात् | कुन्थुशरीरे संकुचितो भवति, हस्तिशरीरे विस्तृतः उक्तं च - " आसञ्ज कुंथुदेहं तत्त्रियमित्तो गयम्मि गयमित्तो । न य संजुञ्जह १० रूपी अपि वायुः हस्ता मलकवद् न दर्श्यते तर्हि अरूपी आत्मा तु कथं दश्येत Page #369 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । अप्पकम्मतराए चैव अप्पाकरियतराए चेव अप्पासवतराए चेव एवं आहारनीहारउस्सासनीसासइड्डीए महज्जुइअप्पतराए चेव, एवं च कुंधुओ हत्थी महाकम्मतराए चेव महाकिरिय० जाव ? हंता पएसी ! हत्थीओ कुंथू अप्पकम्मतराए चेध कुंथुओ वा हत्थी महाकम्मतराए चैव तं चैव । कम्हा णं भंते! हत्थिस्स य कुंथुस्स य समे चैव जीवे ? पएसी ! जहा णाम ए कूडागारसाला सिया जाव गंभीरा अह णं केइ पुरिसे जोई व दीवं व गहाय तं कूडागारसालं अंतो २ अणुपविसइ, तीसे कूडागारसालाए सव्वतो समंता घणनिचियनिरंतराणि निच्छिड्डाई दुवारवयणाई पिहेति, तीसे कूडागारसालाए बहुमज्झदेसभाए तं पईवं पलीवेज्जा । तए णं से पईवे | | तं कूडागारसालं अंतो २ ओभासइ उज्जोवेइ तवति पभासेइ, णो चेव णं बाहिं, अह णं पुरिसे तं पई इईरएणं पिज्जा, तए णं से पईवे तं इदुरयं अंतो ओभासेइ, णो चेव णं इड्डरगस्स बाहिं णो चेव णं कूडागारसालाए बाहिं एवं गोकिलिंजेणं पच्छिपिंडएणं गंडमाणियाएं आढतेणं अद्धाढतेणं पत्थैएणं १० जीवो संकोयविकोयदोसेहि" ॥ [ ] अत्र न संयुज्यते जीवः संकोचविकोचदोषाभ्यामिति तयोस्तस्य स्वभावतया - भ्युपगमात्, तथा चात्र प्रदीपदृष्टान्तो वक्ष्यते, अथवा २ 'कर्म' आयुष्कलक्षणं ३ क्रिया- कायिकयादि ४ आश्रवः प्राणातिपातादिः ५ आहारनीहारोच्छ्वास निश्वासादिद्युतयः प्रतीताः ६ इड्डरकं - महत् पिटकं, येन समस्तापि रसवती स्थग्यते, ७ गोकिलिञ्ज नाम यत्र गोभक्तं प्रक्षिप्यते, ८ पच्छिकापिटकं च प्रतीतं, ९ गण्डयुक्ता माणिका देशविशेषप्रसिद्धा, १० आढक - ११ अर्घाटक - १२प्रस्थक Jain Education interational महतो गज स्य क्षुद्रतम स्थ च कुन्थोः जीवस्य समानतादिविषये चर्चा ॥३२ Page #370 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । पएसीः परंपरायातं मतं कथं त्यजेयम् ? ॥३२६॥ अद्धपत्थैएणं कुलवेणं अद्धकुल वेणं चाउम्भाइयाँए अट्ठभाइयाए सोलसियाए बत्तीसियाएं चउसट्ठियाए दीवचंपऍणं तए णं से पदीवे दीवचंपगस्स अंतो ओभासति ४, नो चेव णं दीवचंपगस्स बाहिं नो चेव णं चउसट्ठियाए बाहिं, णो चेव णं कूडागारसालं णो चेव णं कूडागारसालाए बाहिं, एवामेव पएसी! जीवे वि जं जारिसयं पुवकम्मनिबद्धं बोंदि णिव्वत्तेइ तं असंखेज्जेहिं जीवपदेसेहि सचित्तं करेइ खुड्डियं वा महालियं वा, तं सद्दहाहि णं तुमं पएसी ! जहा-अण्णो जीवो तं चेव णं १०। [१८८] तए णं पएसी राजा केसि कुमारसमणं एवं वयासी-एवं खलु भंते ! मम अजगस्स एस सन्ना जाव समोसरणे जहा-तज्जीवोतं सरीरं, नोअन्नो जीवो अन्नं सरीरं तयाणंतरं च णं मम पिउणोवि एस सण्णा,तयाणंतरं मम वि एसा सण्णा जाव समोसरणं, तं नो खलु अहं बहुपुरिसपरंपरागयं कुलनिस्सियं दिहि छंडेस्सामि । [१८९] तएणं केसी कुमारसमणे पएसिरायं एवं वयासी-माणं तुमं पएसी! पच्छाणुताबिए भवेजासि जहा व से पुरिसे अयहारए। के णं भंते ! से अयहारए ? पएसी! से जहाणामए केई पुरिसा अस्थत्थी अत्थगवेसी अत्थ- १ लुद्धगा अत्थकंखिया अत्थपिवासिया अत्थगवेसणयाए विउलं पणियभंडमायाए सुबहुं भत्तपाणपत्थयणं गहाय, १३ अर्द्धप्रस्थक-१४ कुलव-१५अर्द्धकुलवा मगधदेशप्रसिद्धा धान्यमानविशेषाः, १६ चतुर्भागिका-१७अष्टभागिका-१८षोडशिका१९द्वात्रिंशत्का मगधदेशप्रसिद्धा एव रसमानविशेषाः, २० दीपचम्पको-दीपस्थगनकम्, २१ 'एवामेव' इत्यादि निगमनं कण्ठ्यम् , उक्तं चैतदन्यत्रापि-"जह दीवो महह घरे पलीविओ तं घरं पगासेइ । अप्पपयारे तं तं एवं जीवो सदेहाई"।[ For Private & Personal use only Jain Education international | w.jainelibrary.org Page #371 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण एगं महं अकामियं छिन्नावायं दीहमद्धं अडविं अणुपविठ्ठा, तए ण ते पुरिसा तीसे अकामियाए अडवीए कंचि परंपरायातदेसं अणुप्पत्ता समाणा एगमहं अयागरं पासंति, अएणं सव्वतो समंता आइपणं विच्छिण्णं सच्छडं उवच्छडं स्यापि अफुडं गाढ़ पासंति हतुट्ठ-जाव-हियया अन्नमन्नं सद्दावेंति एवं वयासी-एस णं देवाणुप्पिया! अयभंडे इहे कंते निष्टस्य जाव मणामे, तं सेयं खलु देवाणुप्पिया! अम्हं अयभारए बंधित्तए त्ति कटु अन्नमन्नस्स एयमढे पडिसुणेति अय मतस्य त्याग एवं भारं बंधति अहाणुपुवीए संपत्थिया । तए णं ते पुरिसा अकामियाए जाव अडवीए किंचि देसं अणुपत्ता श्रयान्-इति समाणा एगं महं तउआगरं पासंति, तउएणं आइण्णं तं चेव [कं० १८९ पं०५] जाव सहावेत्ता एवं वयासी-एस उदाहरणेन णं देवाणुप्पिया! तउयभंडे जाव मणामे, अप्पेणं चेव तउएणं सुबहुं अए लब्भति, तं सेयं खलु देवाणुप्पिया! द्रढयति अयभारए छडुत्ता तउयभारए बंधित्तए त्ति कटु अन्नमन्नस्स अंतिए एयमझु पडिसुणेति अयभारं छड्डेति तउयभारं बंधंति । तत्थ णं एगे पुरिसे जो संचाएइ अयभारं छड्डेत्तए तउयभारं बंधित्तए, तए णं ते पुरिसा तं पुरिसं ॥३२७॥ एवं वयासी-एस णं देवाणुप्पिया! तउयभंडे जाव [कं० १८९५०६ तथा १०] सुबहुं अए लगभति, तं छड्डेहि ण १० देवाणुप्पिया! अयभारगं, तउयभारगं बंधाहि । तए से पुरिसे एवं वदासी-दृराहडे मे देवाणुप्पिया! अए, चिराहडे मे देवाणुप्पिया ! अए, अइगाढवंधणबद्ध मे देवाणुप्पिया! अए, असिढिलबंधणबद्ध देवाणुप्पिया! अए, धणियबंधणबद्ध देवाणुप्पिया! अए, णो संचाएमि अयभारगं छड्डेत्ता तउयभारगं बंधित्तए। तए णं ते पुरिसा तं पुरिसं जाहे णो संचायंति बहहिं आघवणाहि य पवनवणाहि य आघवित्तए वा पण्णवित्तए वा तया अहाणु Jain Education leme al For Private Personel Use Only wwjainelibrary.org Page #372 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । पएसी श्रमणोपासको जाता ॥३२८॥ पुचीए संपत्थिया, एवं तंबागरं रुप्पागरं सुवण्णागरं रयणागरं वइरागरं, तए णं ते पुरिसा जेणेव सया जणवया जेणेव साई साई नगराइं तेणेव उवागच्छन्ति वयरविकणयं करेंति सुबहुदासीदासगोमहिसगवेलगं गिण्हति अट्टतलमूसियवडंसगे कारावेंति पहाया कयबलिकम्मा उप्पि पासायवरगया फुडमाणेहिं मुइंगमत्थएहिं बत्ती. सइबद्धएहिं नाडएहिं वरतरुणीसंपउत्तेहिं उवणचिजमाणा उवलालिजमाणा इट्टे सह-फरिस-जाव विहरंति । तए णं से पुरिसे अयभारेण जेणेव सए नगरे तेणेव उवागच्छइ अयभारेणं गहाय अयविकिणणं करेति तंसि अप्पमोल्लंसि निहियंसि झीणपरिव्वए ते पुरिसे उप्पि पासायवरगए जाव विहरमाणे पासति पासित्ता एवं वयासी-अहो ! णं अहं अधन्नो अपुन्नो अकयत्थो अकयलक्खणो हिरिसिरिवज्जिए हीणपुग्णचाउद्दसे दुरंत पंतलक्खणे । जति णं अहं मित्ताण वा णाईण वा नियगाण वा सुणेतओ तो णं अहं पि एवं चेव उप्पि पासायवरगए जाव विहरंतो, से तेणद्वेणं पएसी एवं वुच्चइ-मा तुमं पएसी पच्छाणुताविए भविज्जासि, जहा व से पुरिसे अयभारिए। [१९०] एत्थ णं से पएसी राया संबुद्धे केसिकुमारसमणं वंदइ जाव एवं वयासी-णं खलु भंते ! अहो। पच्छाणुताविए भविस्सामि जहा व से पुरिसे अयभारिए, तं इच्छामि णं देवाणुप्पियाणं अंतिए केवलिपन्नत्तं धम्म निसामित्तए, अहासुहं देवाणुप्पिया! मा पडिबंध ०, धम्मकहा जहा चित्तस्स [पृ० २८८ पं०६] तहेव गिहिधम्म पडिवजह जेणेच सेयचिया नगरी तेणेव पहारेत्थ गमणाए। Jan Education remonal For Private Personel Use Only Page #373 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं । [१९१] तरणं केसी कुमारसमणे पएसिं रायं एवं वयासी- जाणासि तुमं पएसी ! कइ आयरिया पन्नत्ता ? हंता जाणामि, तओ आयरिआ पण्णत्ता, तंजहा कलायरिए, सिप्पायरिए, धम्मायरिए । जाणासि णं तुमं पएसी ! तेसिं तिन्हं आयरियाणं कस्स का विनयपडिवत्ती पउंजियव्वा! हंता जाणामि, कलायरियस्स सिप्पायरियस्स उवलेवणं संमजणं वा करेजा पुरओ पुप्फाणि वा आणवेज्जा मज्जावेजा मंडावेजा भोयाविजा वा | विउलं जीवितारिहं पीइदाणं दलएज्जा पुत्ताणुपुत्तियं वित्तिं कप्पेज्जा । जत्थेव धम्मायरियं पासिज्जा तत्थेव वंदेज्जा ५ णमंसेज्जा सक्कारेजा सम्माणेज्जा कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासेज्जा फासुएसणिज्जेणं असणपाणखाइमसा| इमेणं पडिला भेजा पाडिहारिएणं पीढफलगसिज्जासंथारएणं उवनिमंतेज्जा, एवं चताव तुमं पएसी ! एवं जाणासि तहावि णं तुमं ममं वामं वामेणं जाव वहित्ता ममं एयमहं अक्खामित्ता जेणेव सेयविया नगरी तेणेव पहारेत्थ गमणाए, [१९२] तए णं से पएसी राया केसि कुमारसमणं एवं वदासी एवं खलु भंते! मम एयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पज्जित्था एवं खलु अहं देवाणुप्पियाणं वामं वामेणं जाब बहिए तं सेयं खलु मे कलं पोउप्पभायाए रयणीए फुल्लुप्पलकमलको लुम्मिलियम्मि [१९२] अस्थायमर्थः - १कल्यमिति श्वः २ प्रादुः- प्राकाश्ये, ततः प्रकाशप्रभातायां ३ रजन्यां ४ फुल्लोत्पलकमल कोमलोन्मीलिते | फुलं विकसितं तच्च तत् उत्पलं तच्च कमलथ - हरिणविशेषः फुल्लोत्पलकमलौ तयोः कोमलम् - अकठोरमुन्मीलितं यथासंख्यं दलानां च Jain Educatio interational १० आचार्याणां तद्विनयानां च प्रकाराः पएसी ख म्-अविनयं सेवन क्षमयति ॥३२९॥ Page #374 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय। अधुना ॥३३०॥ अहोपंडरे पंभाए रत्तासोग-किसुय-सुर्यमुह-गुंजद्धंरागसरिसे कमलागरनलिणिसंडयोहए उहियम्मि सरे पूर्व रमणीसहस्सरस्सिम्सि दिणेयरे तेयसा जलंते अंतेउरपरियालसद्धिं संपरिवुडस्स देवाणुप्पिए वंदित्तए नमंसित्तए यः सन् एतमट्ठे भुज्जो भुज्जो सम्म विणएणं खामित्तए त्ति कटु जामेव दिसिं पाउन्भूते तामेव दिसि पडिगए। तए णं से पएसी राया कलं पाउप्पभायाए रयणीए जाव तेयसा जलंते हहतुट्ट-जाव-हियए जहेव कूणिए [औप- जिनो भूत्वा पातिक सूत्र पृ० ६४ पं०१] तहेव निग्गच्छइ अंतेउरपरियालसद्धि संपरिखुडे पंचविहेणं अभिगमेणं वंदह अमरणीयो नमंसइ एयम8 भुजो भुज्जो सम्मं विणएणं खामेइ।। मा भव इति सोदाहरणं [१९३] तए णं केसी कुमारसमणे पएसिस्स रण्णो सूरियकंतप्पमुहाणं देवीणं तीसे य महतिमहालियाए मह संज्ञापित: चपरिसाए जाव धम्म परिकहेइ। तए णं से पएसी राया धम्मं सोचा निसम्म उहाए उठेति केसिकुमारसमणं पएसी वंदइ नमसइ जेणेव सेयविया नगरी तेणेव पहारेत्थ गमणाए। [१९४] तए ण केसी कुमारसमणे पएसिरायं एवं वदासी-मा णं तुम पएसी ! पुब्बि रमणिज्जे भवित्ता 1 पच्छा अरमणिजे भविजासि, जहा से वणसंडे इ वा णसाला इ वा इक्खुवाडए इ वा खलवाडए इ वा। नयनयोश्च यस्मिन् तत् तथा तस्मिन् , अथ रजनीविभानानन्तरं ५ पाण्डुरे-शुक्ले ६ प्रभाते, ७ रक्ताशोकस्य प्रकाश:-प्रभा स च ८ किंशुकं च-पलाशपुष्पं ९ शुकमुख च १० गुज्जा-फलविशेपो रक्तकृष्णस्तदर्ध च तानि तेषां सदृशे-आरक्ततया समाने ११ कमलाकराः-हदास्तेषु नलिनीखण्डास्तेषां बोधके १२ उदयप्राप्ते १३ आदित्ये १४ सहस्ररश्मौ १५ दिवसकरणशीले १६तेजसा ज्वलिते। in Edat anterrosal For Private Personel Use Only Hjainelibrary.org Page #375 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। [१९५] कहं णं भंते !? [१९६] वणसंडे पत्तिए पुप्फिए फलिए हरियगरेरिजमाणे सिरीए अतीव उबसोभेमाणे चिट्ठइ, तया वणसंडे रमणिज्जे भवति, जया णं वणसंडे नो पत्तिए नो पुप्फिए नो फलिए नो हरियगरेरिजमाणे णो सिरीए अईव उवसोभेमाणे चिट्ठइ तया णं जुन्ने झडे परिसडियपंडुपत्ते सुक्करुक्खे इव मिलायमाणे चिट्ठा तया णं वणे णो रमणिजे भवति । [१९७] जया णं णसाला वि गिजइ बाइज्जइ नचिजह हसिज्जइ रमिजइ तया णं णसाला रमणिज्जा। भवह, जया णं नसाला णो गिजइ जाव णो रमिज्जइ तया णं णसाला अरमणिज्जा भवति । १९८] जया णं इक्खुवाडे छिज्जइ भिजइ सिन्जइ पिज्जइ दिजइ तया णं इक्खुवाडे रमणिज्जे भवइ, जया णं इक्खुवाडे णो छिजइ जाव तया इक्खुवाडे अरमणिज्जे भवइ । [१९९] जया णं खलवाडे उच्छुब्भइ उडुइज्जइ मलइजइ मुणिज्जइ खजइ पिज्जइ दिजइ तया णं खलवाडे रम-1.. णिजे भवति जया णं खलवाडे नो उच्छुभइ जाव अरमणिजे भवति। से तेणटेणं पएसी! एवं वुचइ माणं तुमे [१९६] १ हरिततया २ देदीप्यमाने । [१९९] १'मा णं तुमे पएसी! पुब्धि रमणिज्जे भवित्ता पच्छा अमरणिज्जे भविजासि' इत्यादेग्रन्थस्यायं भावार्थ:-पूर्वमन्येषां । | दात्रा भूत्वा सम्पति जैनधर्मप्रतिपच्या तेषामदात्रा न भवितव्यम् अस्माकमन्तरायस्य जिनधर्मापभ्राजनस्य च प्रसक्तेः। Ian Education For Private Personal use only Page #376 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय। ॥३३२॥ वैराग्यम् पएसी! पुब्धि रमणिजे भवित्ता पच्छा अरमणिजे भविजासि जहा वणसंडे इ वा। पएसिनृपेण [२००] तए णं पएसी केसि कुमारसमणं एवं वयासी-णो खलु भंते ! अहं पुचि रमणिज्जे भवित्ता पच्छा कृता अरमणिज्जे भविस्सामि, जहा वणसंडे इ वा जाव खलवाडे इ वा, अहं णं सेयवियानगरीपमुक्खाई सत्त गामस स्वधन हस्साइं चत्तारि भागे करिस्सामि, एगं भागं बलवाहणस्स दलइस्सामि, एगं भागं कुहागारे छुभिस्सामि, एग व्यवस्था भागं अंतेउरस्स दलइस्सामि, एगेणं भागेणं महतिमहलयं कूडागारसालं करिस्सामि, तत्थ णं बहहिं पुरिसेहिं पएसीदिनभइभत्तवेयणेहिं विउलं असणं० उवक्खडावेत्ता बट्टणं समणमाहणभिक्खुयाणं पंथियपहियाणं परिभाए नृपस्य माणे बहहिं सीलव्वयगुणव्वयवेरमणपञ्चक्खाणपोसहोववासस्स जाव विहरिस्सामि त्ति कट्ठ जामेव दिसिं पाउभूए तामेव दिसिं पडिगए।। [२०१] तए णं से पएसी राया कल्लं जाव तेयसा जलंते सेयवियापामोक्खाई सत्त गामसहस्साई चत्तारि भाए कीरइ, एगं भागं बलवाहणस्स दलइ जाव कूडागारसालं करेइ, तत्थ णं बहहिं पुरिसेहिं जाव उवक्खडा-१० वेत्ता बहणं समण-जाव परिभाएमाणे विहरह। २०२] तए णं से पएसी राया समणोवासए अभिगयजीवाजीवे० [पृ० १९० पं०६] विहरइ, जप्पभिई च णं पएसी राया समणोवासए जाए तप्पभिई च णं रज्जं च रहें च वलं च वाहणं च कोहागारं च पुरं च अंतेउरं |च जणवयं च अणाढायमाणे यावि विहरति । Jain Education femella For Private & Personel Use Only Mainelibrary.org Page #377 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । तए णं तीसे सूरियकताए देवीए इमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पज्जित्था-जप्पभिई चणं पएसी राया सम पएसिनृप णोवासए जाए तप्पभिई च णं रज्जं च रह जाव अंतेउरं च मम जणवयं च अणाढायमाणे विहरइ, तंसेयं खल विरक्तं मे पएसिं रायं केणवि सत्थपओएण वा अग्गिपओएण वा मंतप्पओगेण वा विसप्पओगेण वा उद्दवेत्ता सूरिय- ज्ञात्वा कंतं कुमारं रज्जे ठवित्ता सयमेव रजसिरिं कारेमाणीए पालेमाणीए विहरित्तए त्ति कट्ठ एवं संपेहेइ संपेहित्ता तत्पत्न्या: सूरियकंत कुमारं सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी-जप्पभिई च णं पएसी राया समणोवासए जाए तप्पभिई ५ सूर्यकान्ता याः तन्माचणं रज्जं च जाव अंतेउरं च णं जणवयं च माणुस्सए य कामभोगे अणाढायमाणे विहरइ, तं सेयं खल तव रणसंकल्प: पुत्ता! पएसिं रायं केणइ सत्थप्पयोगेण वा जाव उद्दवित्ता सयमेव रजसिरिं कारेमाणे पालेमाणे विहरित्तए । तए णं सूरियकंते कुमारे सूरियकताए देवीए एवं वुत्ते समाणे सूरियकंताए देवीए एयमढे णो आढाइ नो परिया ॥३३३॥ णाइ तुसिणीए संचिट्ठइ, तए णं तीसे सूरियकताए देवीए इमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पज्जित्था-मा णं सूरियकंते कुमारे पएसिस्स रन्नो इमं रहस्सभेयं करिस्सइत्ति कट्ठ पएसिस्स रण्णो छिद्दाणि य मम्माणि य रह-१० स्साणि य विवराणि य अंतराणि य पडिजागरमाणी पडिजागरमाणी विहरह। [२०३] तए णं सूरियकंता देवी अन्नया कयाइ पएसिस्स रणो अंतरं जाणइ असणं जाव खाइमं सव्ववत्थगंधमल्लालंकारं विसप्पजोगं पउंजइ, पएसिस्स रण्णो ण्हायरस जाव-पायच्छित्तस्स सुहासणवरगयस्स तं विससंजुत्तं असणं वत्थं जाय-अलंकारं निसिरेइ घातइ । तए णं तस्स पएसिस्स रणोतं विससंजुत्तं असणं Jain Educationtentional vw.jainelibrary.org Page #378 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । ॥३३४॥ | आहारेमाणस्स सरीरगंमि वेयणा पाउन्भूया उज्जला विपुला पगाढा कक्कां कडेंया फरुसा निठुरा चंडौँ तिव्वा मारिनोऽपि दुक्खा दुग्गा दुरहियासा पित्तरपरिग्यसरीरे दाहवकंतिया वि विहरह। पएसि न [२०४] तए णं से पएसी राया सूरियकताए देवीए अत्ताणं संपलद्धं जाणित्ता सूरियकंताए देवीए मणसावि क्षुभ्यति | अप्पदुस्समाणे जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ पोसहसालं पमन्जइ उच्चारपासवणभूमि पडिलेहेइ दम्भ- किन्तु धर्म संथारगं संथरेइ दम्भसंथारगं दुरूहइ पुरत्थाभिमुहे संपलियंकनिसन्ने करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं अं-५ धम्माचाय अलिं मत्थए त्ति कटु एवं वयासी-नमोऽत्थु णं अरहंताणं जाव [पृ० २५६ पं० ३] संपत्ताणं । नमोऽत्थु णं के च स्मरति | सिस्स कुमारसमणस्स मम धम्मोवदेसगस्स धम्मायरियस्स, वदामि भगवतं तत्थ गयं इह गए, पास [२०३] १ उज्ज्वला दुःखरूपतया निर्मला सुखलेशेनाप्यकलङ्कितेति भावः २विपुला-विस्तीर्णा सकलशरीरव्यापनात् ३प्रगाढा प्रकर्षण मर्मप्रदेशिव्यापितया समवगाढा, ४कर्कश इव कर्कशा, किमुक्तं भवति ?-यथा कर्कशपाषाणसंघर्षः शरीरस्य खण्डानि त्रोटयति एवमात्मप्रदेशान् त्रोटयन्ती या वेदनोपजायते सा कर्कशा, तथा ५ कटुका पित्तप्रकोपपरिकलितस्य रोहण्यादिकद्रव्यमियोपभुज्य- १० मानमतिशयेनाप्रीतिजनिकेति भावः, ६ परुषा मनसोऽतीव रूक्षत्वजनिका, ७ निष्ठुरा-अशक्यप्रतीकारतया दुर्भेदाऽत एव ८ चण्डारुद्रा ९ तीवा-अतिशायिनी १० दुःखा-दुःखस्वरूपा ११ दुर्लध्या १२ पित्तज्वरपरिगतशरीरे १३ व्युत्क्रान्त्या चापि-दाहोत्पत्त्या चापि १४ विहरति-तिष्ठति । [२०४] १ पद्मासनसन्निविष्टः Jain Education a l For Private Personel Use Only prary.org Page #379 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पएसि रायपसेण इयं । मे भगवं तत्थ गए इह गयं ति कटु वंदइ नमसइ, पुबि पिणं मए केसिस्स कुमारसमणस्स अंतिए थूलपाणाइवाए पञ्चक्खाए जाव परिग्गहे, तं इयाणिंपिणं तस्सेव भगवतो अंतिए सव्वं पाणाइवायं पञ्चक्वामि मृत्वा सूर्याजाव परिग्गहं सव्वं कोहं जाव मिच्छादसणसल्लं, अकरणिजं जोयं पञ्चक्वाभि, सव्वं असणं चउव्विहं पि आहारं भो जातः जावजीवाए पच्चक्खामि, जं पि य मे सरीरं इ8 जाव फुसंतु त्ति एवं पि य णं चरिमेहिं ऊसासनिस्सासेहिं वोसिरामि त्ति कट्ट आलोइयपडिकते समाहिपत्ते कालमासे कालं किच्चा सोहम्मे कप्पे सूरियाभे विमाणे उववा-५ ॥३३५॥ यसभाए जाव वण्णओ। [२०५] तए णं से सूरियाभे देवे अहुणोववन्नए चेव समाणे पंचविहाए पजत्तीए पजत्तिभावं गच्छति, तं०आहारपजत्तीए सरीरपज्जत्तीए इंदियपज्जत्तीए आणपाणपजत्तीए भासमणपजत्तीए, तं एवं खलु भो! सूरियाभेणं देवेणं दिव्वा देविड्डी दिव्वा देवजुत्ती दिव्वे देवाणुभावे लद्धे पत्ते अभिसमन्नागए। [२०६] सूरियाभस्स णं भंते! देवस्स केवतियं कालं ठिती पण्णत्ता? [२०७] गोयमा! चत्तारि पलिओवमाई ठिती पण्णत्ता, से णं सूरियाभे देवे ताओ लोगाओ आउखएणं २ क्रोधमानमायालोभाः प्रतीताः प्रेम-अभिष्वङ्गमात्रम् द्वेषः-अप्रीतिमात्रः अभ्याख्यानम्-असदोषारोपणं पैशुन्यं-पिशुनकर्म परिवाद-विप्रकीर्णापरदोषकथा अरतिरती धर्माधर्माङ्गेषु मायामृषा-वेषान्तरकरणतो लोकविप्रदारणं ३ मिथ्यादर्शनम्-मिथ्यात्वं तत् शल्यमिव मिथ्यादर्शनशल्यम् । Jain Education tema For Private & Personel Use Only witw.jainelibrary.org Page #380 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥३३६॥ भिवक्खएणं ठिइक्खएणं अणंतरं चइत्ता कहिं गमिहिति कहिं उववजिहिति? गोयमा! महाविदेहे वासे जाणि सूर्याभः इमाणि कुलाणि भवंति, तं०-अड्डाइं दित्ताइं विउलाइं विच्छिणविपुलभवणसयणासणजाणवाहणाई बहुधणबहु. च्युत्वा जातरूवरययाइं आओगपओगसंपउत्ताई विच्छड्डियपउरभत्तपाणाई बहुदासीदासगोमहिसगवेलगप्पभूयाई नाम्ना दृढबहुजणस्स अपरिभूताई, तत्थ अन्नयरेसु कुलेसु पुत्तत्ताए पचाइस्सइ । प्रतिज्ञो भूत्वा महा [२०८] तए णं तंसि दारगंसि गभगयंसि चेव समाणंसि अम्मापिऊणं धम्मे दढा पइण्णा भविस्सइ। तए | विदेहे वर्षे णं तस्स दारयस्स नवण्हं मासाणं बहुपडिपुन्नाणं अट्ठमाणं राइंदियाणं वितिकताणं सुकुमालपाणिपायं अही. निर्वाणणपडिपुण्णपंचिंदियसरीरं लक्खणवंजणगुणोववेयं माणुम्माणपमाणपडिपुन्नसुजायसव्वंगसुदरंग ससिसोमाकारं | मेष्यति कंतं पियदसणं सुरूवं दारयं पयाहिसि। [२०९] तए णं तस्स दारगस्स अम्मापियरो पढमे दिवसे ठितिवडियं करेहिंति तेतियदिवसे २०७] १ आयोगस्य अर्थलाभस्य प्रयोगा:-उपायाः संप्रयुक्ता-व्यापारिता यस्तानि आयोगप्रयोगसंप्रयुक्तानि २ विच्छर्दिते-१० त्यक्ते बहुजनबहुभोजनदानेनाविशिष्टोच्छिष्टसंभवात् संजातविच्छर्दै वा-नानाविधभक्तिके भक्तपाने येषां तानि तथा, ३ बहुदासीदासगोमहिषगवेलकाः प्रभूता येषां तानि तथा। [२०९] १ स्थितौ-कुलमर्यादायां पतिता-अन्तर्भूता या प्रक्रिया पुत्रजन्मोत्सवसम्बन्धिनी सा स्थितिपतिता तां, २ तृतीये Jain Education remenal For Private Personel Use Only wallhijainelibrary.org Page #381 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण प्रतिजस्य जन्मादि | संस्काराः ॥३३७॥ चंदैसूरदसणिगं करिस्संति छठे दिवसे जाँगरियं जागरिस्संति एकारसमे दिवसे वीइकते संपत्ते बारसाहे दिवसे णिवित्त असुईजायकम्मकरणे चोक्खे संमजिओवलित्ते विउलं असणपाणखाइमसाइमं उवक्खडावेस्संति मित्तणाइणियगसयणसंबंधिपरिजणं आमंतेत्ता तओ पच्छा पहाया कयवलिकम्मा जाव अलंकिया भोयणमंडवंसि सुहासणवरगया ते मित्तणाइ-जाव परिजणेण सद्धि विउलं असणं आसाएमागा विसाएमाणा परिभुजेमाणा परिभाएँमाणा एवं चेवणं विहरिस्संति, जिमियभुतत्तरागया वि य णं समाणा आयंती चोक्खा परमसुइभूया तं मित्तणाइ-जाव परिजणं विउलेणं वत्थगंधमल्लालंकारेणं सकारेस्संति सम्माणिस्संति तस्सेव मित्त-जाव-परिजणस्स पुरतो एवं वइस्संति-जम्हा णं देवाणुप्पिया! इमंसि दारगंसि गभगयंसि चेव समाणंसि घम्मे दढा पइण्णा जाया, तं होउ णं अम्हं एयस्स दारयस्स दढपइण्णे णामेणं । तए णं तस्स दढपइण्णस्स दारगस्स अम्मापियरो नामधेज्ज करिस्संति-दढपइण्णो य दढपइण्णो य । तए णं तस्स अम्मापियरो अणुपुत्वेणं ठितिवडियं च चंदसूरियदरिसणं च धम्मजागरियं च नामधिजकरणं च दिवसे ३ चन्द्रसूर्यदर्शनोत्सवं, ४ षष्ठे दिवसे ५जागरिकां-रात्रिजागरणरूपां ६ निवृत्ते-अतिक्रान्ते ७ अशुचीनां-जातिकर्मणां करणे ८ आस्वादयन्तौ ९ विविधखाद्यादि स्वादयन्तौ १०परिभाजयन्ती-अन्योऽन्यमपि यच्छन्तौ मातापितराविति प्रक्रमः, ११ भुक्तवन्तौ भुक्तोत्तरकालं आगतौ उपवेशनस्थाने इति गम्यते, १२ आचान्तौ शुद्धोदकयोगेन १३ चौक्षौ लेपसिक्थाद्यपनयनेन अत एव १४ परमशुचिभूतौ । १५ ' तए णं तस्स दढपइण्णस्स अम्मापियरो अणुपुव्वेणं ठिइपडियं' इत्याद्युक्तमनुक्तं च संक्षेपत उपदर्शयति, सुगम Jain Educatinterational For Private 8 Personal Use Only ivw.jainelibrary.org Page #382 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइयं । ॥३३८|| Jain Education पजेमगं च पडिवद्धावणगं च पचकमैणगं च कन्नवेणं च संबैच्छर पडिलेहणगं च चूलोवर्णेयं च अन्नाणि य बहणि भाहाणजम्मणाइयाई महया इड्डीसकारसमुदएणं करिस्संति । [२१०] तए णं दढपतिष्णे दारगे पंचधाईपरिक्खित्ते खीरधाईए मंडणधाईए मज्जणधाईए अंकधईए किला - araiईए, अन्नाहि बहूहिं खुजाहिं चिंलाइयाहिं वामणिर्याहिं वडभियांहिं बैंचराहिं बैंउसियाहिं जोहियाहिं पण्णवियाहि ईसिणियाहिं वारुणिंयाहिं लासियाहि लाउसियाहिं दर्मिलीहिं सिंहेलीहिं पुलिंदीहिं और- ५ बीहिं पणीहि बैहलीहिं मुंरंडीहिं सर्वैरीहिं पासीहिं णाण देसी चैतत्, नवरं १६ प्रजेमनं- भक्तग्रहणं १७ प्रचङ्क्रमणं - पदाभ्यां गमनम् जल्पनम् १८ कर्णवेधनं १९ संवत्सर प्रतिलेखनं 'प्रथमः संवत्सरोऽभूत्' इत्येवं संवत्सरलेखनपूर्वं महोत्सवकरणम् २० चूडोपनयनं मुण्डनं २१ अन्यानि च बहूनि २२ गर्भाधान - जन्मादीनि कौतुकानि उत्सवविशेषरूपाणि २३ महत्या ऋद्ध्या महता सत्कारेण पूजया महता समुदयेन जनानामिति । [२१०] १ क्षीरधात्र्या - स्तनदायिन्या २ मण्डनधात्र्या - मण्डयित्र्या ३ मञ्जनधात्र्या स्नापिकया ५ क्रीडनधात्र्या - मण्डयित्वा १५ क्रीडाकारिण्या ४ अङ्कधात्र्या - उत्सङ्गधारिण्या ६ कुब्जिकाभिः - वक्रजङ्घाभिः ७ चिलातीभिः अनार्यदेशोत्पन्नाभिः ८ वामनाभिः हखशरीराभिः ९ वडभाभिः मडहकोष्ठाभिः १० बर्बरीभिः बर्बर देशसंभवाभिः ११ बकुशिकाभिः १२ यौनिकाभिः १३ पह्नविकाभिः १४ ईसिनिकाभिः १५ वारुणिकाभिः १६ लासिकाभिः १७ लकुसिकाभिः १८ द्रमिलाभिः १९ सिंहलीभिः २० पुलिन्द्रीभिः २१ आरिबीभिः २२ पक्कणीभिः २३ बहलीभिः २४ मुरण्डीभिः २५ शबरीभिः २६ पारसीभिः एवंभूताभिः - २७नानादेशीभिर्नानाविधानार्य आर्यअनार्य कुल जा दास्यः jainelibrary.org Page #383 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय। ॥३३९॥ विदेमपरिमंडियाहिं इंगियचिंतियपत्थियवियाणाहिं सदेसणेवत्थगहियसाहिं निउणकैसलाहिं विणीयाहिं चेडियाचक्नवालतरुणिवंदपरियालपरिवुडे बॅरिसधरकंचुइमहर्यरवंदपरिक्खित्ते हत्थाओ हत्थं साहरिज्जमाणे उवनचिजमाणे अंकाओ अंकं परिभुजमाणे उवगिज्जेमाणे उवलालिजमाणे उर्वंगूहिजमाणे अवतासिन्जमाणे परियंदिजमाणे परिचुंबिजमाणे रम्मसु मणिकोहिमतलेसु परंगमाणे गिरिकंदरमल्लीणे विव चंपगवरपॉयवे णिव्वाघायंसि सुहसुहेणं परिवड्डिसँइ। [२११] तए णं तं दढपतिण्णं दारगं अम्मापियरो सातिरेगअट्टवासजायगं जाणित्ता सोभणसि तिहिकरणप्रदेशोत्पन्नाभिः २८ विदेश:-तदीयदेशापेक्षया दृढप्रतिज्ञजन्मदेशस्तस्य २९ परिमण्डिकाभिः ३० इङ्गित-नयनादिचेष्टाविशेषः ३१ चिन्तितं-परेण स्वहृदि स्थापितम् ३२ प्रार्थितं च-अभिलषितं च ३३ विजानते यास्तास्तथा ताभिः, ३४ स्वदेशे यद् नेपथ्यं-परिधानादिरचना तद् गृहीतो वेषो यकाभिस्तास्तथा ताभिः ३५ निपुणानां मध्ये या अतिशयेन कुशलास्ता निपुणकुशलास्ताभिः, अत एव ३६ विनीताभिः, ३७ चेटिकाचक्रवालेन अनार्य-स्वदेश-संभवेन ३८ वर्षधराणां-वर्द्धितकप्रयोगेण नंपुसकीकृतानामन्तःपुरमहल्लकानां ३९ कञ्चुकिनाम्-अन्तःपुरपयोजननिवेदकानां प्रतिहाराणां वा ४० महत्तरकाणां च-अन्तःपुरकार्यचिन्तकानां ४१ वृन्देन परिक्षिप्तः, तथा ४२ हस्ताद् हस्तं-हस्तान्तरं ४३ संहियमाणः ४४ अङ्कादई ४५ परिभोज्यमानः ४६ परिगीयमानस्तथाविधवालोचितविशेषैः ४७ उपलाल्यमानः क्रीडादिलालनया ४८ आलिङ्गथमानः आलिङ्गनविशेषेण ४९ स्तूयमानः ५० परिचुम्ब्यमानः ५१ गिरिकन्दरायां लीन इव ५२ चम्पकपादपः ५३ सुर्खसुखेन ५४ परिवर्धिष्यते । Jain Education ilmeional For Private Personel Use Only voitrainelibrary.org Page #384 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। ॥३४०॥ णक्खत्तमुहुत्तंसि पहायं कयबलिकम्मं कयकोउअमंगलपायच्छित्तं सव्यालंकारविभूसियं करेत्ता महया इड्डीस दृढप्रतिकारसमुदएणं कलायरियस्स उवणेहिंति । तए णं से कलायरिए तं दढपतिण्णं दारगं लेहाइयाओ गणियप्पहा ज्ञस्य अ. णाओ सउणरुयपजवसाणाओ बावत्तरि कलाओ सुत्तओ अत्थओ य गंथओ य करणओ य सेहावेहि य पसि ध्ययनम् क्खावेहि य, तं०-लेहं गणियं रूवं न गीयं वाइयं सरगयं पुक्खरगयं समतालं जूयं जणवयं पासगं अट्ठावयं पारेकव्वं दगमट्टियं अन्नविहिं पाणविहिं वत्थविहिं विलेवणविहिं सयणविहिं अज्जं पहेलियं मागहियं णिहा-५ इयं गाहं गीइयं सिलोग हिरण्णजुत्ति सुवण्णजुत्तिं आभरणविहिं तरुणीपडिकम्भ इथिलक्खणं पुरिसलक्षणं हयलक्खणं गयलक्खणं कुक्कुडलक्खणं छत्तलक्खणं चक्कलक्खणं दंडलक्खणं असिलक्खणं मणिलक्खणं कागणिलक्खणं वत्थुविजं गरमाणं खंधवारं माणवारं पडिचारं वृहं चकबूहं गरुलवूहं सगडवूह जुद्धं नियुद्ध जुद्धजुद्धं अटिजुद्धं मुट्ठिजुद्धं बाहुजुद्धं लयाजुद्धं ईसत्यं छरुप्पवायं धणुवेयं हिरण्णपागं सुवण्णपागं मणिपागं धाउपा सुत्तखेड्डु वट्टखेड्डे णालियाखेडे पत्तच्छेज्न कडगच्छेज्ज सज्जीवनिज्जीवं सउणरुयं-इति । १० [२१२] तए णं से कलायरिए तं दढपइण्णं दारगं लेहाइयाओ गणियप्पहाणाओ सउणरुयपज्जवसाणाओ [२११] १ 'अर्थतः' इति व्याख्यानतः २ करणतः-प्रयोगतः ३ सेधयिष्यति-निष्पादयिष्यति ४ शिक्षापयिष्यति-अभ्यास *कारयिष्यति । * सर्वत्र 'करिष्यति' पदम् केवलं मुद्रिते पुस्तके 'कारयिष्यति' । Jain Education Intel For Private & Personel Use Only nelibrary.org Page #385 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय । बावन्तरिं कलाओ सुत्तओ य अत्थओ य गंथओ य करणओ य सिक्खावेत्ता सेहावेत्ता अम्मापिऊणं उवणेहिंति । तए णं तस्म दढपइण्णस्स दारगस्स अम्मापियरो तं कलायरियं विउलेणं असणपाणखाइमसाइमेणं वत्थगंध मल्लालंकारेणं सकारिस्संति सम्माणिस्संति विउलं जीवियारिहं पीतिदाणं दलइस्संति विउलं जीविया रिह० दलहत्ता पडिविसज्जेर्हिति । [२१३] तरणं से दढपतिष्णे दारए उम्मुक्कबालभावे विण्णायपरिणयमित्ते जोव्वणगमणुपत्ते बाबत्तरिक- ५ लापंडिए णवंगसुत्तगडिबोहए अट्ठारसविहदेसिप्पगार भासाविसारए गीयरई गंधवणककुसले सिंगारागार| चारुवेसे संगयगयहसियभणियचिट्टियविलावनिउणजुत्तोवयारकुसले हयजोही गयजोही रहजोही बाहुजीही बाहुप्पमद्दी अलंभोगस मत्थे साहस्सीए वियालचारी यावि भविस्सर । [२१४] नए णं तं दढष्णं दारगं अम्मापियरो उम्मुक्कवालमावं जाव वियालचारिं च वियाणित्ता विउलेहिं [२१३] १ द्वे श्रोत्रे द्वे नयने द्वे नासिके एका जिह्वा एका त्वक् एकं मन इति सुप्तानीव बाल्यादव्यक्तचेतनानि प्रतिबोधितानि १० यौवनेन व्यक्तचेतनावन्ति कृतानि यस्य स तथा व्यवहारभाष्ये 'सोत्ताइं नव सुत्ताई' [ ] इत्यादि, २ अष्टादशविधायाः अष्टादशभेदाया देशीप्रकाराया - देशीस्वरूपाया भाषाया विशारदो- विचक्षणः, तथा ३ गीतरतिः तथा ४ गन्धर्वे गीते नाटये च कुशलः ५ हयेन युध्यते इति हययोधी एवं ६ गजयोधी ७ रथयोधी ८ बाहुयोधी तथा ९ बाहुभ्यां प्रमृनातीति बाहुप्रमर्दी साहसिकत्वात् १० विकाले चरतीति विकालचारी | Jain Education international गुरुदक्षिणा दृढप्रति ज्ञस्य भोग समर्थता ॥३४१॥ Page #386 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। दृढपतिज्ञस्य अनासक्तिः ॥३४२॥ | अन्नभोगेहि य पाणभोगेहि य लेणभोगेहि य वत्थभोगेहि य सयणभोगेहि य उवनिमंतिहिंति । [२१५] तए णं दढपइण्णे दारए तेहिं विउलेहिं अन्नभोएहिं जाव सयणभोगेहिं णो सज्जिहिति सो गिज्झिहिति णो मुच्छिहिति णो अज्झोववज्जिहिति, से जहा णामए पउमुप्पले ति वा पउमे इ वा जाव सयसहस्सप- तेति वा पंके जाते जले संवुड्ढे णोवलिप्पइ पंकरएण नोवलिप्पइ जलरएणं, एवामेव दढपइण्णे वि दारए कामेहिं जाते भोगेहिं संवड्डिए णोवलिप्पिहिति. मित्तणाइणियगसयणसंबंधिपरिजणेणं, से णं तथारूवाणं थेराणं अं. तिए केवलं योहिं बुज्झिहिति केवलं मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइस्सति, से ण अणगारे भविस्सइ ईरियासमिए जाव सुहुयहुयासणो इव तेयसा जलंते । तस्स णं भगवतो अणुत्तरेणं णाणेणं एवं दसणेणं चरितेणं आलएणं विहारेणं अजवेणं महवेणं लाघवेणं खन्तीए गुत्तीए मुत्तीए अणुत्तरेणं सवसंजमसुचरियतवफलणिव्वाणमग्गेण अप्पाणं भावेमाणस्स अणंते अणुत्तरे कसिणे पडिपुण्णे णिरावरणे णिव्वाघाए केवलवरनाणदसणे समुप्पज्जिहिति । तए णं से भगवं अरहा जिणे केवली भविस्सइ सदेवमणुयासुरस्स लोगस्स परियायं जाणहिति तं०-आगतिं गति ठिति चवणं उववायं तकं कडं मणोमाणसियं खइयं भुत्तं [२१५] १ सर्वसंयमः सर्वात्मना मनोवाक्कायानां संयमनं तस्य सुचरितस्य च आशंसादिदोषरहितस्य तपसो यत्फलं-निर्वाणं तन्मार्गेण, किमुक्तं भवति ?-सर्वसंयमेन सुचरितेन च तपसा, निर्वाणग्रहणमनयोनिर्वाणफलत्वख्यापनार्थम् , २ मनसि भवं मानसिकं तच्च कदाचिद्वचसापि प्रकटितं भवति तत उच्यते-मनसि व्यवस्थित मानसिक मनोमानसिकम् ३ क्षयित क्षयं नीतमिति भावः, १० en Education For Private Personel Use Only Page #387 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं । पडिसेवियं आवीकम्मं रहोकॅम्मं अरहा अरहस्सभागी तं तं मणवयकायजोगे वट्टमाणाणं सव्वलोए सव्वजीवाणं सव्वभावे जाणमाणे पासमाणे विहरिस्सह। तए णं दढपइन्ने केवली एयारूवेणं विहारेणं विहरमाणे बहई वासाई केवलिपरियागं पाउणित्ता अप्पणो आउसेसं आभोएत्ता बहई भत्ताई पच्चक्खाइस्सइ बहुई भत्ताई अणसणाए छेइस्सइ जस्सट्टाए कीरइ णग्गभावे केसलोचबंभचेरवासे अण्हाणगं अदंतवणं अणुवहाणगं भूमिसेजाओ फलहसेन्जाओ परघरपवेसो लद्धावलद्धाइं माणावमाणाई परेसिं हीलणाओ निंदणाओ खिंस-५॥३४३॥ णाओ तज्जणाओ ताडणाओ गरहणाओ ४प्रतिसेवितं स्यात् स्यादिअधः-कर्म-भूमौ निखातं परहाकर्म गुप्तस्थानकृतम् ६हीलनानि सद्भुतहीनजात्यायुद्घट्टनानि ७निन्दनानि-परोक्षे जुगुप्साभाषणानि ८ खिसकानि 'धिग् मुण्ड ते' इत्यादि वाक्यानि ९ तर्जनानि अङ्गुल्या निक्षेपपुरस्सरं निभर्सनानि १० ताडनानि कशादिघाताः। अधरीकृतचिन्तामणि-कल्पलता-कामधेनुमाहात्म्याः । विजयन्तां गुरुपादाः विमलीकृतशिष्यमतिविभवाः ॥ राजप्रश्नीयमिदं गम्भीरार्थ विवृण्वता कुशलं । यदवापि मलयगिरिणा साधुजनस्तेन भवतु कृती०॥ इति श्रीमलयगिरिविरचिता राजप्रश्नीयोपागवृत्तिका समर्थिता ॥ प्रत्यक्षरगणनातो ग्रन्थमानं विनिश्चितम् । सप्तत्रिंशच्छतान्यत्र श्लोकानां सर्वसंख्यया ।। ग्रन्थानम्-३७००॥ * विवरणानुसारेण मूल 'अहोकम्म' इत्यपि स्यात् । ० एतच्छ्लोकद्वयं भा० प्रतावेव । Jain Education emanal For Private Personel Use Only watjainelibrary.org Page #388 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इयं। विहारः ॥३४४॥ उच्चावया विरूरूवा बावीसं परीसहोवसग्गा गामकंटगा अहियासिजति तम8 आराहेइ चरिमेहिं उस्सासनिस्सासेहिं सिज्झिहिति मुचिहिति परिसिव्वाहिति सव्वदुक्खाणमंतं करेहिति। [२१६] सेवं भंते ! सेवं भंते! त्ति भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ वंदित्ता नमंसित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । [२१७] णमो जिणाणं जियभयाणं । णमो सुयदेवयाए भगवतीए । णमो पण्णत्तीए भगवईए। णमो भगवओ अरहओ पासस्स । पस्से सुपस्से पस्सवणा णमो। ग्रन्थाग्रम्-२१२० । * वाक्यमेतद् अशुद्ध प्रतिभाति । अर्थदृष्टया 'पएसिस्स पण्हे पण्णवणीए नमो' इति संभवेत् । PSSSSSSSSBOS ॥रायपसेणइयं समत्तं॥ Jain Education bemalla For Private & Personel Use Only Jainelibrary.org Page #389 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १'आमल रायपसेणइय सुत्तनो सार श्रीरायपसेणइय सुत्तनो सार कप्पा' नगरीन वर्णन ॥१॥ [१] ते काले ते समये आमलकप्पा' नामे नगरी हती. १ भगवान महावीरे जे नगरीओमा चोमासां कर्या छे तेमां आ नगरीनुं नाम नथी, तेम सूत्रोमा जणावेली-आर्यदेशनी-राजधानीओर्मा आ नगरौनी गणना नथी. भगवाने पोतानी साधनाना काळमां ज्या ज्या विहार कर्यो छे तेमां पण 'आमलकप्पा' नो उल्लेख नथी, तेथी ५ 'आमलकप्पा' नगरी विशे कोइ विशेष जाणवा जेबी नोंधो नथी मळती. स्थितप्रज्ञ थया पछी भगवाने जे विहार कयों छे तेमा आ नगरीनी गणना थइ शके एम छे ए, आ 'रायपसेणइय' ना उल्लेखथी सूचित थाय छे. आ नगरी हालमा क्या छे ! तेनुं वर्तमान नाम शुं छे! ए, मगधदेशमा छे के बीजा कोइ देशमा छे ! ए बधी बाबतो अद्यावधि अंधारामा ज छे. टीकाकार मलयगिरि 'आमलकप्पा'नो संस्कृत पर्याय 'आमलकल्पा' जणावे छे. आ सूत्रमा जे जे विशेष नामो आवे छे ते जेमनां तेमप्राकृत-राखीने अनुवादमा प्रयोज्यां छे. कोइ पण प्रामाणिक आधार विना मूळ प्राकृत नामोनुं संस्कृत स्पांतर करवा जता अर्थातर थवानो १० भय रहे छे. JainEducation For Private Personel Use Only Hw.jainelibrary.org Page #390 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥२॥ Jain Education ए आमलकप्पा नगरीमां धन अने धान्य वगेरेनी विभूति परिपूर्ण हती, मूळथी वसवाट करीने रहेनारा अने बहारथी आवीने वसेला पवा बन्ने जातना लोको त्यां प्रमोदथी रहेता हता, नगरीनी चारे बाजु दूर दूर सुधीनी सीमाडानी भॉय' प्राज्ञ लोकोप संस्कारेली-केळवेली हती, ए भोंय उपर सेंकडो अने हजारो हळो फरतां रहेतां हतां, शेरडी, जब अने शाळनुं वावेतर थतुं हतुं तथा ए भयने पाणीनी नीको द्वारा पाणी पावामां आवतुं हतुं. ज्यांना कूड़ा ने सांढो एक गामथी बीजे गाम जइ शके पवां पासेपासेनां घणां गामो प नगरीनी आसपास हतां, अनेक ५ ‘रायपसेणइय' नुं संस्कृत रूप श्रीमलयगिरि 'राजप्रश्नीय' जणावे छे त्यारे तेमनाथी प्राचीन आचार्य सिद्धसेने (तत्त्वार्थ- टीकाकार) आसूत्रनुं संस्कृत नाम 'राजप्रसेनकीय' नोवेलुं छे अने वादिदेवसूरिना गुरु श्रीमुनिचन्द्रसूरिए देवेंद्रनर केन्द्रप्रकरणमा 'राजप्रसेनजित्' जणावेलुं छे. आ बधामा कोण कई रीते खरुं छे ए एक शोधनो विषय छे, परन्तु आवो व्यर्थ विवाद न ऊठे माटे ज मूळ नामोनी प्रथा साचवी राखी जरुरी छे. २ आपणो देश खेतीप्रधान छे, खेती अने पशुओ ज आपणी अहिंसक संस्कृतिनुं प्रधान धन छे. प्राचीन समयमा जेम बीजा बीजा १० विषयोनां शास्त्रो हतां ते कृषिविद्याने लगतां पण हतां एमां खेतीनी साधे सीधो सम्बन्ध धरावनारा- भूमिपरीक्षा, भूमिने केळववानी पद्धति, पाणीकळानी विद्या, बोजरक्षणविधि, वृक्षोना रोगो अने तेनां औषधो वगेरे - अनेकविषयोनी स्फुट चर्चा रहेती. माटे ज मूळ सूत्रकार जगावे छे के 'प्राज्ञलोको भूमिने संस्कारता - केळवता' आजनो खेडूत मूढ गणाय छे तेम ते समयनो खेडूत मूढ नहि पण 'प्राज्ञ' लेखातो, ए ज, मूळ सूत्रनो उक्त उल्लेख सूचवे छे. ७३ व्याकरणमहाभाष्यमा गामडाओनी परस्परनी निकटताने सूचववा प्रामोना विशेषणरूपे 'कुक्कुट संपात्याः प्रामाः ' उदाहरण मूकेलुं छे. उपर्युक्त १५ वर्णन उपरथी चोक्कस जणाय छे के ते बखतनां गामो खरेखर कुक्कुटसंपात्य ज हतो. 'कुक्कुटसंपात्य' एटले 'कूकडो पहची शके तेवुं गाम;' helibrary.org Page #391 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुतनो सार बळदो, पाडाओ, गायो अने घेटांओ, ए नगरीनुं पशुधन हतुं, ज्यांनां कळामय आकारवाळां अनेक चैत्यो भने पवा ज सुंदर पण्यतरुणीना - अनेक संनिवेशो प्रेक्षकोनां मनने आकर्षतां तां. आखीय नगरीमा कोइ नहि लांचियो,' कोइ नहि खूनी, कोइ नहि गांठियो, कोइ नहि चोर अने कोइ नहि दंडपाशिक- सोनेरी टोळीवाळो पथी प नगरी सर्व प्रकारना उपद्रवोथी रहित हती, नगरीमा रहेनारा भिक्षुओ भिक्षाने सारी रोते मेळवी शकता हता, त्यां रहेनारा प्रत्येक मनुष्यना जानमालने लेश पण हाण थवानो संभव न हतो तेथी ते विश्वासपूर्वक सुखथी त्यां रद्दी शकतो, अनेक कोटिना कौटुम्बिक -कणवी लोको त्यां सुखे सुखे रहेता हता. अर्थात् एक गामनो कूकडो चालतो चालतो बीजे गाम पहेांची शके तेटलं नजीकनुं गाम भीलोना प्रदेशमा अने मगधमां कुक्कुटसंपात्याम नजरे जोएला छे. ४ सूत्रनो 'धण्यतरुणी' शब्द वांचीने कोई भडकी न जाय. पण्यतरुणीनी ए समयनी संस्था समाजमा आदरपात्र हती. श्रीवात्स्यायन पोताना कामसूत्रमा जणावे छे के - "शील अने रूपना गुणोथी युक्त एवी वेश्या जनसमाजमा आसन मेळवे छे, राजा तेने पूजे छे अने गुणवंत जनो १० प्रशंसे छे, कलाना विद्यार्थिओ कळा मेळवावा तेने प्रार्थे छे अने तेनो आदर करे छे." आजकाल आ संस्था विशेष विकृत धरली देखाय छे पण ते वखते प्रायः तेनुं नहि होय एम आ वर्णनथी मानी शकाय. ५ आ तो मात्र वर्णना छे, कोइ सजीव के निर्जीवनुं वर्णन करतां मात्र तेनी ऊजळी बाजुनं ज वर्णन करवानो प्रघात, कविओमां आदिकवि वाल्मीकिथी चाल्यो आवे छे अने तेने लीधे तेओ केटलेक स्थळे केवळ ऊनळु ऊजळु ज बधुं वर्णवे छे. मानवस्वभाव जोता पण आ बनवुं असंभवित जेवुं जणाय छे. छतां नगरीना आ वर्णन उपरथी 'एमा रहेनारा एकंदर सारा हता' एम तो कल्वी शकाय ६ मूलमा आ माटे 'अणेगकोडि' शब्द छे. टीकाकार मलयगिरि, तेनो अर्थ करतां लखे छे के "अनेककोटिभिः अनेककोटिसंख्या कैः” Jain Educationtemtional १५ ॥३॥ w.jainelibrary.org Page #392 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥४॥ अनेक नटो, नाचनाराओ, राजानां गुणगान गानाराओ, मल्लो, मुट्ठिजुद्ध करनाराओ, हसावनारा विदूषको, कथा करनाराओ, कूद नाराओ के तरनाराओ, रास लेनाराओ के भांड लोको, शुभ अशुभ कही बतावनारा ज्योतिषिको, "लंखो-वांसडानी टोच उपर खेल करनाराओ, चित्रनां पाटियां हाथमा राखी जनमनरंजन करनाराओ, तूण वगाडनाराओ अने तुंबनी वीणा वगाडनाराओ, प बधा लोको नगरीमा सारो आश्रय मेळवता हता. दंपतीओने क्रीडा करवाना रमणीय आरामो, मोटा मोटा उत्सवो अने मोटी मोटी उजाणीओ ऊजवी शकाय पवां सुंदर उद्यानो, 4 सरस कूवाओ, आंखने ठारे पवां तळावो, दीर्घिकाओ-लांबी लांबी मनोहर वावडीओ अने क्याराओ नगरीनी शोभामां वधारो करता हता. ___ नगरीनी रक्षा करतुं नगरीनी फरतुं उडु, उपर पहोळु नीचे सांकडं एवं खात हतुं तथा नगरी फरती उंडी अने उपर नीचे सरखी खोदेली विशाळ खाइ हती, नगरीमां कोई उपद्रवकारी न पेसी शके माटे मोटा मोटा तीक्ष्ण चक्रो, गदाओ, मुसंढीओ, सो जणाने कचरी नाखे पवी मोटी मोटी शिलाओ वगेरे शस्त्रो' दरवाजे दरवाजे टांगेला हतां, नगरीनी फरतो धनुष जेवो वांकडो कोट अर्थात् अनेककोटि एटले अनेक क्रोड संख्या. पण आ अर्थ करता 'अनेक कोटि' नो 'अनेक प्रकार' एवो अर्थ अहीं विशेष उचित लागे छे'कोटि' शब्दनो 'प्रकार' अर्थ, जैन आगमोमां सुप्रतीत छे.. ७ आ अर्थ माटे मूळमां 'लंख' शब्द छे. जे लोको चोघडियां वगाडे छे तेने 'लंघा' कहेवामां आवे छे. मूळनो 'लंख' अन आ 'लका' बन्ने समान शब्दो छे एठले 'लङ्घ नो मूळ अर्थ 'चोघडियां वगाडनारो' कदाच होइ शके. ८ शहेरनी फरती खाइ होय छे तेम खाइनी फरतुं बहारना भागमा एक 'खात' पण होय छे, एमां अंगारा के चीणो भरवामां आवतो. चीणो एटले बधो लीसो होय छे के तेना उपर पग मूकतां ज माणस तळिये उतरी जाय छे. एरीते 'खात' शहेरनी रक्षानुं एक साधन हतुं. १५ ९ केटलांक प्राचीन शस्त्रोनां नाम, आचार्य हेमचन्द्र आ प्रमाणे जणावे छे: "चन्द्रहास छुरी पत्रपाल दंड ईली भिदिपाल कुन्त दुघण Jain Education telmaal For Private & Personel Use Only fwwwhinelibrary.org Page #393 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण-| इय सुत्तनो सार गोळ गोळ कांगराओथी शोभतो हतो, चोकीदारोने बेसवानी अटारीओ कोटमां खूब उंची उंची करवामां आयी हती, कोट तथा नगरीनी वच्चेनो मार्ग आठ हाथ पहोळो राखेलो हतो, कोटनी पोळोना दरवाजाओमां नाना नाना गढो रचेला हता अने ए दरवाजाओ मजबूत रीते जडेला हता. नगरीना राजमागों सारा सारा विभागवाळा हता, त्यां व्यवहारीआओनी मोटी वसती हती अने वेव्हाररोजगारनुं तो ए नगरी मोटुं मथक हतुं, कुंभार, सुतार, लुहार वगेरे शिल्पकारी लोकोनो त्यां सुखे निर्वाह थतो हतो. नगरीना केटलाक मार्गों सिंगोडा" जेवा त्रिकोण हता, ज्यां त्रण के चार शेरीओ मेगी थाय पवा केटलाफ त्रिक मार्गों अमे चतुष्क-चोक मागों हता अने ज्यां अनेक शेरीओ भेगी थाय पवाय केटलाय चाचर-चत्वर मागों हता, राजमार्ग उपर राजानी अवरजवर खूब रहेती, नगरीना मार्गोमां उत्तम घोडाओ, झूलता हाथोओ, शणगारेला रथो, शिखरवाळो घुम्मटदार पालखीओ, झूलती पालखीओ अने बीजां अनेक वाहनोनी हरफर ठीक रहेती. __ त्यांना जलाशयो खोलेलां कमळोथी चमकर्ता हतां अने धोळां धोळां मोटा महालयो जाणे आभना टेकारूप होय एवां अडग जणातां कुठार परिध तोमर शंकु त्रिशीर्षक शक्ति पट्टिस दुःस्फोट चक्र शतघ्नी महाशिला मुबूंढी चिरिका वराहकर्णक आराफल कणय वगेरे" आ बधांनी वधारे बीगत माटे जुओ-अभिधानचिंतामणि कांड ३ श्लो० ४४६-४५१ १. आ मार्गनुं खास नाम मूळमा 'चरिआ छे. भाषामा एने ज मळतो 'चर' शब्द जाणीतो छे. टीकाकार कहे छे के "चरिका अष्टहस्तप्रमाणो मार्गः" ११ नगरीना विविध मार्गोने सूचववा मूळमां "सिंघाडग' 'तिय' 'चउक्क' अने 'चच्चर' शब्दो आवेला छे. ते ते मार्गोना आकारो उपरथी १५ तेमनां एवां जुदा जुदां नामो थएलां छे. जे मार्गनो आकार शिंगोडा जेवो ते 'सिंघाडग'. बाकीना शब्दो प्रतीत छे. 'चोक' अने 'चाचर' शब्दो तो भाषामा पण प्रचलित छे. Jain Education Temehaal For Private & Personel Use Only witainelibrary.org Page #394 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो 'अंबसालवण' चैत्यर्नु वर्णन सार ॥६॥ हता एवी ए आमलकप्पा नगरी दर्शनीय, मनोहर, प्रासादिक अने असाधारण सौंदर्यवाळी हती. [२] एवी ए आमलकप्पा नगरीथी बहार ईशान खूणामां अंबसालवण नामर्नु पक चैत्य हतुं. ___चैत्य घणा लांबा काळर्नु पुराणुं, पूर्व पुरुषोए गाएलु-वखाणेलुं हतुं, छत्र, धजा, घंट, पताका, लोमहस्त' -मोरपींछी अने वेदिका बगेरेथी शोभित हतुं, चैत्यनु भोंतळ छाण वगेरेथो लीपीने चोक्खं करेलुं अने भींतो वगेरे खडीथी धोळीने चकचकती करेली, उत्तम रक्त चंदनना थापावाळु, चंदनना सुंदर कळशोथी मंडित हतुं, एना दरेक दरवाजा उपर चंदनना घडावाळां तोरणो बांधेला हतां, ____एमां उपर नीचे सुगंधी पाणीनो छंटकाव करीने मोटी मोटी माळाओ लटकावेली हती, पांच वर्णनां सुगंधी फुलो, काळो अगर, उत्तम कुंदुरू, तुरुष्कनो" उंचा प्रकारनो धूप वगेरे अनेक सुगंधी धूपोथी ए महेंकी रहेलुं हतु-जाणे के सुगंधोनो भरेलो ओरडो १२ औपपातिक-उववाइय-सूत्रमा 'चम्पा' नगरीनुं वर्णन छे. मूळ सूत्रोमा सावत्थी, काकन्दी, राजगृह वगेरे जे जे नगरोना वर्णननी हकीकत कहेवानी होय छे त्यां सूत्रकार कहे छे के औपपातिकमा वर्णवेली 'चंपा' प्रमाणे ते ते नगरनुं वर्णन समजी लेवु. अहीं पण मूळकारे | एवी ज भलामण करेली छे. टीकाकारे ते भलामण प्रमाणे टीकामां नगरीनो वर्णक काव्यमय भाषामा नेधेिलो छे. १३ 'हती' माटे मूळमा होत्था' क्रिया बतावेली छे. 'हती' अने होत्था' बच्चे घणु ज मळतापणुं छे. अने 'होत्था, पद, 'अभविष्ट' क्रियापदनुं सगा भाई जेवं छे. १४ अहीं जणावेलो 'चैत्यनो वर्णक, औपपातिक सूत्रथी लौधेलो छे. तेमा 'लोमहस्त' नो अर्थ 'लोममय प्रमार्जन'-रुवाटानी पुञ्जणी'-आपेलो छ: ए अर्थमा 'मोरपीछी नो पण भाव समजाइ जाय छे. १५ सूत्रोमा ज्यां त्यां धूपनां नाम तरीके 'काळो अगर' 'ऊंचो किनरु' (केंछ) अने 'तुरुक्क'-'तुरुष्क'नां नाम आपेला छे. 'तुरुक' Jain Education in angel For Private & Personel Use Only vww.lainelibrary.org Page #395 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥७॥ जन होय ! ५ चैत्यमां नटो, नाचनाराओ जल्लो, मल्लो, मौष्टिको, विदूषको, कूदनाराओ, तरनाराओ, ज्योतिषिको, रास लेनाराओ, भांडो, कथा करनाराओ, चित्रपटने बतावनाराओ, तूण अने तुंबवीणाने वगाडनाराओ, भुजगो-भोगी-शोखी-जनो अने मगधो-भाटो वगेरे रहेता हता. ५ चैत्य घणा लोकोमा अने अनेक देशोमां प्रख्यात हतुं, घणा आहोता लोको त्यां आहुति देवा, पूजा करवा," वंदन करवा अने नमन करवा आवता, घणा लोकोर्नु ए सत्कारर्नु, सन्माननु अने उपासनानुं स्थान हतुं, कल्याण अने मंगलरूप पवा देवता संबंधी शब्द 'तुर्कस्तान' सूचक छे एटले ज तुर्कस्तानमा नीपजता धूप माटे पण एज शब्दनो उपयोग मूरकार करे छे. आ रीते आपणो तुर्कस्तान साथेनो सम्बन्ध केटलो प्राचीन छे ते समजी शकाय एम छे. तुरुष्क तुरुक्क-तरक. "तुरुको यवनदेशजः"-३ कांड, श्लोक ३१२. "तुरुष्कास्तु साखयः स्युः" ४ कांड, लोक २५-अभिधानचितामणि-हेमचंद्र मुसलमान बादशाहो 'शाहि'-'शाह' तरीके बहु प्रसिद्ध छे. आचार्य हेमचंद्रे ए 'शाह' शब्दनु संस्कृत 'साखि' बनाव्युं छे अने तेनी संस्कृत | व्युत्पत्ति पण आपेली छे. फारसी शब्दोने बिना संकोचे संस्कृतमा उतारवानी प्रथा शिष्ट लोकोमा आजथी केटलाय वर्षों पूर्वे पण प्रचलित हती एम आ उपरथी समजी शकाय एवं छे. १६ चैत्यर्नु आ वर्णन जोता, ते भारे गम्मतनुं स्थान पण होय एम लागे छे. केटलोक कथाओमा चैत्यने 'जुगारीओनो अखाडो' 'युवान युवतीओनां मीलननु स्थान' 'अभिसारिकाओनुं संकेतस्थान ए रीते वर्णवेलं छे, ते उपर्युक्त वर्णन जोतां बंध बेसे एवं छे. १७ चैत्य, उक्त रीते मोजशोखनु स्थान हतुं छतां त्यां पूजाआहुति वगेरे माटे घणा लोको आवता ऐम आ वर्णन सूचवे छे. चैत्यमा १५ | भुजग लोको रहे अने धर्मविधिओ पण चाले ए परिस्थितिथी, ते समयना आपणा लोकोनी मनोदशा ठीक ठीक व्यक्त थइ शके एम छे. For Private Personel Use Only Mainelibrary.org Page #396 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥८॥ चैत्यनी पेठे ए, विनयपूर्वक पर्युपासवाने योग्य हतुं. ३ 'अशोक' __देवताई शक्तिवाळ, साचवाळ, साचा उपायोवाळ अने हजारो यागोना भागो ज्यां नैवेद्यरूपे धरवामां आवे छे पया ए चैत्यने घणा वृक्षनुं वर्णन लोको आवी आवीने पूजता-अर्चता. वळी, ए चैत्य, चारे वाजु एक मोटा वनखंडथी घेरापलु हतुं, ए वनखंड लीलोछम, ठण्डो हिम, क्याय हरी कांतिवाळो, क्यांय नीली कांतिवाळो, सघन छायावाळो अत्यन्त रमणीय हतो-प वनखण्ड जोतां जाणे के मेघनो समूह ज न होय एवो भास जोनारने थतो हतो. (३) चैत्यनी चारेबाजु पथरापला ए पहोळा वनखण्डमां वच्चोवच्च एक मोटुं उचं अशोकनुं वृक्ष हतुं, ए पण आंखने ठारे पर्बु, | प्रसन्नता पमाडनारु घणु सुशोभित हतुं. ___प अशोकवृक्षनी आसपास केटलांय बीजां तिलकनां, लकुचना-लवकना, छत्रगोपना, शिरीषनां, सादडनां, दधिपर्णनां, लोदरना, धवनां, चन्दननां, अर्जुननां, नीपनां, कुडजनां, कदम्बना, फनसनां, दाडिमनां, शालनां, ताडनां, प्रियकनां, प्रियंगुना, पुरोबक-कुरवकनां, राजवृक्षनां अने नन्दिवृक्षना उत्तम वृक्षो" आवेलां छे. ए बधांय वृक्षो मूळ, कन्द, स्कन्ध-थड, छाल, शाखा, प्रवाल, पत्र, पुष्प, फळ अने बीजोथी युक्त छे; ए वृक्षोनां मूळो भोंयमां बहु उंडे पहोंचेलां, सीधा अने एकसरखी रीते गोळ ए बधां उगेला, पहेलं मूळ, पछी कन्द, पछी थड, पछी शाखा प्रशाखा ए जातनी एकसरखी उगणी ए वृक्षावळीमां सचवापली, पमनी शाखा प्रशाखाओ चारे कोर फेलापली, एमनां मोटा मोटा गोळ थडो घाम वाम जेटलां घेराववाळां, ए वृक्षोनां पत्रो वायुना दोषथी वा अन्य प्रकारनी ईति-उपद्रव-थी नहि खरेला अर्थात् पमनां पांदडां १८ अहीं जे वृक्षो गणावेला छे तेमांना केटलाकनो अर्थ ज अवगत थतो नथी. टीकाकार अने टबाकार बन्ने ए बाबत मौन राखे छे. १५/ कोशकारो 'वृक्षविशेष' सिवाय बीजो अर्थ आपी शकता नथी, माटे ज जेमना तेम मुळ नामो कायम राखेला छे. Jain Education Semedonal For Private Personel Use Only Mainelibrary.org Page #397 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार पवां घाटां हतां के तेमां क्याय छिद्र ज न जणाय, ए वृक्षोना पाकां घरडां पांदडां तो खरी पडेलां अने ताजां नवां कूणां पांद ने लीधे ए लीला लीला काच जेवा ओपता, वृक्षोनी टोचे आवेला नवा कोमळ किसलयो शिखरनी जेम हल्या करता, छप तुमोमां | ए बधां कोळेलां-कळीओवाळां, फुलेला-फुलोवाळां, फळेलां-फळोवाळां, पल्लववाळां, गुच्छावाळा अने फळोना भारथी नमेलां रहेतां. उंचा उंचां तरुओ उपर दम्पतीरूप सूडा, मोर, मेना, कोयल, कोरक, कोभव, भिंगार, कोंडलक, जीवजीवक, नन्दीमुख, कपिल, कपिलाक्ष, कारंड, चकवा, कलहंस अने सारस वगेरे पक्षीओ आमतेम उडतां, कूजतां-मधुर कलकल कर्या करतां, भमरा-भमरीओनुं | झुण्ड (पमनी उपर) गुंजारवा मस्त रहेतुं. | ॥९॥ रोग विनाना, कांटा बगरना अने मधुर रसभर ए तरुओनी" आसपास रिंगणी वगेरेना नाना छोडो तथा नवमालिका वगेरेना। मण्डपो शोभता; प वर्धा विशेष उन्नत तरुवरो पर ध्वजो फरक्या करता. अशोक वृक्षनी चारे बाजु शोभायमान प वृक्षकुंजमा क्यांय जाळियांपाळी चोरस वावडीओ, क्याय गोळ वावो, क्यांय कमळोवाळां| नानां नानां पोखरो अने क्याय पाणीथी भरेली लांबी लांबी सीधी नीको वगेरे अनेक जळाशयो ए वृक्षघटानी शोभामा वळी विशेष | १० वधारो करतां, जेटली जातनी सुगन्धो होय छे तेटली बधी ५ घटामांथी महेकती तेथी तेने लोको 'गन्धधाणि" कहेता. पनवेल, नागवेल, अशोकवेल, चम्पकवेल; आंबावेल," वनवेल, वासंतीवेल, माधवीवेल, कुंदवेल अने श्यामवेल वगेरे बीजी अनेक वेलडीओथी ए वृक्षराजि वींटळापली रहेती, वनराइना प्रत्येक वृक्षना मूळमा के आसपास उगेलां डाभ वगेरे घातकतृणो नींदी नाखेलां १९ वृक्षोने लगतुं आ बधु वर्णन वाचता ते समयना वृक्ष-प्रेमीओनो वृक्षो प्रति पोताना संतान जेवो प्रेम सहेजे जाणीशकाय एम छे. जे लोकोमा वृक्षनी साचवणी, वृक्षोने उगाडवानी पद्धतिर्नु ज्ञान अने वृक्षो प्रति काळजी न होय तेओ आवां वृक्षो न उगाडी शके. आज-184/ काल आवा वृक्षप्रेमीओना अभावने लीधे ज देश सूको थवा लाग्यो छे ए खोटी बात नथी. २० गंधप्राणि' शब्द गंधनी तृप्तिनो सूचक छे. अशोकवृक्षनी आसपासनो वृक्षकुंज एटली बधो महेकतो एटले के जे जे जातना सुगंधो Jan Education et For Private Personal Use Only wir.jainelibrary.org Page #398 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥१०॥ Jain Education Int हृतां अने उक्त बधी वेलडीओ फळफुलोथी नित्य लचकती रहेती. ए वनराइमां केटलाय क्रीडारथो, संग्रामरथो, गाडांओ, गोळ घुम्मटवाळी पालखीओ, झूलती पालखीओ वगेरे अनेक प्रकारना वाहनो छूटेलां रहेतां, अने सुखे सुखे जवा आववा माटे ठेकठेकाणे विचित्र प्रकारना सेतुओ-पूलो-गरनाळाओ बांघेलां छतां तथा फरवाहरवा माटे अनेक पाका सुंदर मार्गे करेला हता. उक्त वनराजिथी विराजित ए उत्तमोत्तम अशोकवृक्ष उपर रत्नोथी बनेल, निर्मळ, देदीप्यमान, देखावडां स्वस्तिक, श्रीवत्स, नन्दावर्त, वर्धमानक, भद्रासन, कलश, मत्स्य अने दर्पण-प आठ मङ्गलो" लटकावेलां हां. संभवी शके छे ते बधाय तेमाथी फोरता अने ते वडे लोकोनी नासा तृप्त तृप्त अने तर थइ जती माटे ए वृक्षकुंज 'गंधभ्राणि' कहेवातो. संस्कृतमां '' धातु तृप्ति अर्थने बतावे छे. गंधप्राणि'नो 'भ्राणि' शब्द, ए 'मैं' धातुथी बनेलो छे अने भाषामा बोला 'धरा' क्रियापद ए ' मांथी नीकल्युं छे. एथी मुद्रित विवरणमांना 'गंधत्राणि' शब्द करतां 'गंधभ्राणि' शब्द युक्तियुक्त छे. २१ आ माटे मूळमा 'चूयलया' शब्द छे. न्यायना ग्रंथोमा केटलेक स्थळे उदाहरण माटे 'चूतलता' के 'आम्रलता' शब्दनो उपयोग थयेलो छे तेनो अर्थ 'आंबावेल' छे. उगेलां घटादार वृक्षो जेवा मोटा मोटा आंबा तो सौनी जाणमा छे पण 'आंबावेल' ने केटलाक नहि जाणता होयः खेतीवाडीना प्रदर्शनमां घणा प्रकारना आंबा आवेला, तेमां एक 'वेलियो आंबो' पण नजरे जोएलो. ए आंबो पातळो सोटी जेवो होय यने जेम बीजी वेलो चडे छे तेम तेनी वेल चडे अने केरीओ पण धाय. २२ वनराइना उक्त वर्णनथी एम समजी शकाय छे के आपणे त्यांनी नगररचनानी विद्या घणा उंचा प्रकारनी हती. घणा प्राचीन समयमा पण पूलो अने पाका मार्गो वगेरे सुखसाधनो लोकोना ध्यान बहार न इतो. २३ स्वस्तिक श्रीवत्स नथावर्त वर्धमानक भद्रासन कलश मत्स्ययुगल अने दर्पण ए आठ मंगलरूप छे. आ सूत्रमा घणे स्थळे आ आठ inelibrary.org Page #399 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार वळी, वज्रना डांडावाळां रूपेरी पट्टावाळां कमळ जेवां सुगन्धी, काळां, नीलां, लाल, पीळां अने धोळां चामरो टांगेलां इतां प उपरान्त ए अशोक तरु उपर बीजां घणां उपराउपर लटकतां छत्रो, उपराउपर लटकती धजाओ, घंट अने चामरनी जोडी, सर्वरत्नमय पद्म, कुमुद, नलिन, सुभग, सौगन्धिक, पुंडरीक, महापुंडरीक शतपत्र अने सहस्रपत्रना हाथो खोडेला" इता. [४] पवा पूजापात्र प अशोकवृक्षनी नीचे एक मोटी काळी शिलापाट हती. अशोक वृक्षना थडनी लगोलग आवेली ए शिलापाट उंचाई, लम्बाई अने पहोळाईमां प्रमाणसर हती. जांबुडां, नीलां कमळनो ढगलो, मरकतमणि, बीयानुं वृक्ष, आंखनी कीकी अने तरवारना वर्ण जेवी ते काळी शिलापाट, आंजणनां वृक्षो, मेघनो समूह, नीलां कमळ अने बलदेवना वखनी माफक चमकती हती तथा भमराओनुं झुंड, आंखनो सुरमो, गळीनी गोळीओ, मंगळाने मंगळ तरीके सूचवेला छे. स्वर्गमां देवोनी सवारीमा पण आज आठ मंगळ सर्व प्रथम चाले छे जे निगठ लोको द्रव्य मंगळ उपर ओछो भार आपे छे तेओ ज आ आठ पदार्थोने मंगळ तरीके जणावे छे तेनुं कारण समजातुं नथी. मंदिरमां ज्यां जिनमूर्ति होय छे त्यां पण आ आठ मंगलनी पाटली पूजाय छे ते महदाश्चर्यनो विषय छे. बीजुं तो ठीक पण 'मत्स्यना युगल' ने मंगल कहेवानुं शुं कारण हशे ? १० अथवा ए आठ मंगळोनी पाछळ कोइ प्रकारनो विशेष इतिहास छुपाएको हो ? २४ जूना समयमा लोको 'अशोकवृक्ष' ने पूजता हरो, ए, अशोकना आ जातना वर्णन उपरथी जणाय छे. हालमा पण खीजडा वगेरेना वृक्षो उपर लोको कपडा लटकावे छे, नानां नानी घोडियां के ढींगला बांधे छे अने धजा के त्रिशूल वगेरे खोडे छे. वैदिक लोको पीपळाने अने तुलसीने पूजे छे. बौद्ध लोको गयाना बोधिवृक्षने अने जैन लोकोनो एक भाग रायणना झाडने पूजे छे. क्षत्रियोनुं शमीपूजन तो सुप्रसिद्ध छे ज. वृक्षपूजानी आ परंपरा बहु बखतथी चालतो जणाय छे एनी पाछळ वृक्षोनी उपयोगिता, काइ पुण्य पुरुषनी स्मृति के बहे - १८ मनां पटळ छे ए खास शोधनो विषय छे. Jain Educatio International ४ शिला पाटूनुं वर्णन ॥११॥ Page #400 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार राजानुं वर्णन ॥१२॥ पाडा शिंगडु-ए बधां करताय वधारे काळी ते शिलापाट, जोनारने केम जाणे पथराइने बेठेला भमराओगें झुंड न होय एवो भास करावती हती. ___पनो काळो रंग घन-घेरो हतो, ५ क्याय कोठलानी जेम पोली न हती, रूपमात्रनां प्रतिबिंबो तेमा आरिसानी पेठे पडतां, घाटे सिंहासन जेवी आठखूणी प पाटनी बधी बाजुनी कोरोमां मोतीओ जडेलां हतां, चामडानुं वस्त्र, रू, माखण अने माकडानुरूप बधानी | जेम पनी सुवाळप हती; पवी रत्नमय" रम्य शिलापाट ५ अशोकवृक्षनी नीचे आवेली हती. [५] आ तरफप नगरीमा राजा सेयः अने राणी धारिणीनु राज्य हतुं. २५ रत्नमय शिलापाट अने वळी एनी कोरोमा मोतीओनुं जडतर; आ अने आवा बीजा रत्नमय, वज्रमय, मणिमय, वैडूर्यमय के सुवर्णमय पदार्थना वर्णन उपरथी ते समयनी संपत्तिनी बहुलता ज कल्पी शकाय पण ए नयु अतिहासिक सत्य छे एम तो केम कहेवाय ? 'लंकामा सोनुं पाके छे', 'जे जाय जावे ते, परियाना परिया चावे एटलं धन लावे' इत्यादि वाक्योनो जे आशय छे ते ज आशय आ 'रत्नमय शिलापाट' नो छे. आ प्रकारना वर्णको एक प्रकारनी अतिशयवाळी भाषा छ, लोकमानसने लक्ष्यमा राखीने आवा वर्णको करवा पडे छे. कथाग्रंथोमा आवा वर्णको होय तोज कथाकार सफळ थयो गणाय. २६ राजा 'सेय'नो विशेष वृत्तांत जाणवामां नथी. स्थानांग सूत्रना आठमा ठाणामां श्रमण भगवान महावीरे प्रवजित करेला आठ राजाओनां नामो गणावतां सूत्रकारे तेमां ऐक नाम 'सेय' पण मूकेछं छे. ए 'सेय' आ के बीजो कोइ ते विशे नक्की कही शकातुं नथी. टीकाकार अभयदेव तो ते 'सेय' आ ज सेय' छे एम जणावे छे. तेओ लखे छे के "तथा सेये आमलकल्पानगर्याः स्वामी, यस्यां हि सूर्यकाभो देवः |१५|| सौधर्माद् भगवतो महावीरस्य वन्दनार्थमवततार नाट्यविधि चोपदर्शयामास, यत्र च प्रदेशिराजचरितं भगवता प्रत्यपादि इति" अर्थात् जे आमलकप्पा For Private Personal Use Only JainEducation flemional jainelibrary.org Page #401 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥१३॥ राजा सेय महान् हिमालय, महान् मलयगिरि, मन्दराचल अने महेन्द्र जेवो अडग-अणनम हतो. अत्यन्त विशुद्ध-खानदान-राजकुल- रावल-वंशनो ए राजा बधां राजलक्षणोथी विभूषित हतो, पने बहुजनो बहुमान आपता-पूजता. सर्वगुणसंपन्न क्षत्रिय लोहीनो ए राजा योनिशुद्ध हतो, पनो मूर्धाभिषेक थपलो हतो, पनां मातापिता विशुद्ध वंशनां हता. __ए, मनुष्योनो इन्द्र सेय राजा सीमंकर सीमंधर क्षेमंकर क्षेमंधर हतो ए माटे ज जनपदनो पिता जेवो हतो; जनपदनो पालक अने पुरोहित, जनपदमा सेतुओ" अने केतुओ करनार ए राजा, नरवर, पुरुषप्रवर, पुरुषसिंह, पुरुषव्याघ्र, पुरुषाशीविष, पुरुषवरपु. ण्डरीक अने पुरुषवरगंधहस्ती हतो. नगरीमा सूर्याभदेव भगवानने वांदवा आन्यो अने तेणे तेमनी पासे नृत्य करी बताव्यु तथा जे नगरीमां भगवाने प्रदेशीराजानी कथा कहेली ते आमलकप्पा नगरीनो स्वामी आ 'सेय छे. टीकाकार मलयगिरि 'सेय'र्नु संस्कृत रूपांतर श्वेत' कहे छे पण वेत' छे के 'श्रेय' छे ए कोण कही शके ? २७ मूळमां 'अच्चंतविसुद्धायकुलवंसप्पसूए' एवं राजानुं विशेषण छे एमां 'कुल' अने 'वंश' ए बे एक साथे मूकेला पर्यायवाचक शब्दोनो १० खास उपयोग जणातो नथी. 'अत्यंत विशुद्ध एवा जे राजकुल-रावळ-वंश तेमां जन्मेलो' एवो अर्थ लइए तो 'रायकुल' अने 'वंश' बन्ने शब्दोनी चरितार्थता छे. जणावेलो अर्थ बराबर होय तो ए विशेषणनो रायकुल' शब्द बाप्पा रावळना 'रावळे' वंशनो सूचक कहेवाय. राजकुल-राजउल-राउल-रावळ बाप्पानी ए वंश सुप्रसिद्ध छे पण ते वंशनो उत्पादक मूळ पुरुष कोण अने क्यारे थयो ! ए निश्चित रीते शोधी शकाय तो आगमोना इतिहास अने समय विशे विशेष अजवाळु पडे. २८ सेतुओ एटले मार्गों अर्थात् ए राजा मार्गोनो देशक छे, केतुओ एटले आश्चर्य ऊपजावे तेवा बनावो-ए राजा आश्चर्यकारक बनावोनो उत्पादक छे. राजानो आ बधो वर्णक कविसमयनी भाषामा लखेलो छे. एथी तेने ते रीते समजबो जोइए. Jain Education infernal For Private & Personel Use Only jainelibrary.org Page #402 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥१४॥ .. समृद्धिवाळो कातिए दीपतो ए सेय नृप प्रसिद्ध हतो. भवनो, शयनो, आसनो, यानो अने वाहनो पनी पासे विपुल-विस्तीर्ण हतां, पना भंडारमा घणुं धन, सुवर्ण अने रजत-रूपं भरेलुं हतुं, अर्थलाभना" उपायोने करी जाणनार पना राज्यमा पठवाडमां पण घण भातपाणी फेंकी देवामां आवतां अर्थात् लोको खाधेपीधे सुखी हता. २९ 'आजना राजानी पेठे प्राचीन समयना राजाओ, अर्थलाभना उपायोने करी जाणता' ए हकीकत खास विशेषण द्वारा सूचबवामां आवी छे. एथी 'राजा तरीके जमीननी आवकरूपे तेमने जे योग्य मळवु जोइए ते तो मळतुं ज हशे अने ते उपरांत अर्थलाभना उपायोने तेओ योजता हशे' एवो आ विशेषणनो ध्वनि नीकळी शके. पण आजना राजाओ, अर्थलाभना उपायो करतां प्रजाने भारे रंजाडे छे तेम ए प्राचीन राजाओ करता हशे के केम ! ए एक प्रश्न छे. उत्तराध्ययन सूत्रना खलुकिज नामना सत्यावीशमा अध्ययननी गाथा तेरमीमां पायवेट्टि' शब्द राजानी वेठ' अर्थमां वपरायो छे तेथी जूना बखतमा 'वेठ' हती एम तो कही शकाय अने अर्थलाभ साथे 'वेठ' नो गाढ संबंध छे ए तो जाणीतुं छे. . एठवाडमा घणु खावार्नु चाल्यु जाय एने संपत्तिनी निशानी रूपे वर्णवेलुं छे, पण ए संपत्तिनी निशानी करतां बेदरकारीनुं वधु निशान छे एम १० लाग्या विना रहेतुं नथी. चारसें वर्ष पूर्वे लखेली एक प्राचीन प्रतिमा "तथा विच्छदितम्-तथाविधविशिष्टोपकारकारितया विसृष्टम् उकुरिटकादिषु प्रचुरं भक्तपानम्" इत्यादि पाठ छे. तेनो अर्थ एम थाय छे के-'जे राजाना राज्यमा विशिष्ट उपकार करवाने कारणे प्रचुर खानपान उकरडा वगेरेमा फेंकाय छे." आ उपरथी 'जेना एठवाडमा अधिक खावान फेंकाय ते विशेष उपकारी छे' एवं टीकाकारर्नु कथन नीकळे छे. परंतु अहिंसानी दृष्टिए विचारीए तो आ पद्धति प्रशंसनीय न ज गणाय. कदाच खरेखर एबुं बनतुं ज होय तोपण राजानी वर्णनामां तेनुं आ जातनुं वर्णन अहिंसानी दृष्टिए न शोभे. एठवाडद्वारा उपकार करवा करतां चोक्खा भोजनद्वारा उपकार करवानी पद्धतिने ज जैन दृष्टि स्वीकारे २५ छे अने विवेकीने तो ऐम ज शोभे. एठवाडथी तो उपकारने बदले अपकार ज थाय अने मानवबंधुओ तथा अन्य प्राणीओ प्रतिनो आपणो For Private Personal Use Only Jain Education inte Howinelibrary.org Page #403 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुतनो सार घणा दासो, दासीओ, बळदो, पाडाओ, गायो अने घेटओनो प प्रभु हतो, पनो यंत्रकोश, अन्नकोश, धनकोश अने आयुधकोश भरेलो रहेतो, बहु दूबळाओनो प मित्र हतो एवो ए सेय राजा आमलकप्पा नगरीमां अकंटक राज्य चलावतो हतो-पना राज्यमां क्या दुकाळ, मरकी वगेरे उपद्रवो न हता, सदा सुभिक्ष रहेतो पथी पनुं राज्यशासन शिवरूप अने क्षेमरूप लेखातुं. [६] राणी धारिणी हाथेपगे सुकुमाळ हती, तेनी पांचे इंद्रियोमां के अंगमां कोइ प्रकारनी खोड न हती, तेनां अंगप्रत्यङ्गो सामुद्रिक लक्षणो,” व्यंजनो अने गुणोथी युक्त हतां, वजनमां अने उंचाइमां ते बराबर मापसरने हती, देखावमां चंद्र जेवी प्रियकर ५ जणाती ते राणीनी कड मुठीमां आवी जाय पवी पातळी, मजबूत अने त्रिवलीवाळी हती. प्रेम-समभाव पण न जळवाय अने गंदवाड थइ रोगचाळो बधे ए तो जुदं ज. ३० राजानी पासे अनेक बळदो घेटाओ वगेरे होवानुं जणावीने तेनी संपत्ति वर्णची छे. देशनी दृष्टिए जोतां राजानी खरी संपत्ति पण ते ज छे. ज्यारथी राजाओए ए संपत्ति तरफ दुर्लक्ष्य कर्तुं त्यारथी तेमनी पोतानी अने देशनी अधोगति शरू थइ, ३१ हाथ-पगमा साथियो चक्र वगेरेना जेवी रेखाओ होवी ते सुलक्षणो कहेवाय. शरीर उपर शुभसूचक मसा के तल वगेरे होव ते १० व्यंजनो अने सौभाग्य लावण्य वगेरेने गुणो समजवा. ३२ पाणीथी छलकाता भरेला कुंडमां पुरुष के खोना पडवाथी जे पाणी छलकाइने बहार नोकळे तेनुं वजन द्रोण जेटलं होय तो ते पडनार स्त्री के पुरुष मापसर कहेवाय. पोताना आगळ्थी एकसो ने आठ आंगळ ऊंचाइ होय तो ते योग्य ऊंचाई कहेवाय. ३३. स्त्रीओनी केड मूठीमा आवी जाय एवी पातळी होय तो ते अधिक प्रशस्त गणाय छे. जन्मतां तो पुरुषनी जेम स्त्रीनी केडमां पात- १५ ळापणुं ओडुं होय छे पण पछीथी युरोपनी स्त्रीओ पोतानी कडने पातळी करवाना उपचारो करे छे तेम जूना बखतमा केडने पातळी करवाना Jain Education emanal ६ 'धारिणी' राणीनं वर्णन ॥१५॥ ainelibrary.org Page #404 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ७ भगवान | महावीर पधार्या ॥१६॥ पूर्णचंद्रमुखी ए राणी कानोमां कुंडळ पहेरती, कपोलो उपर कस्तूरी लगाडती, पनी आकृति, शृङ्गार अने वेश बधुं चारु-सारं हतुं, बोलवे, चालवे अने हसवे प कुशळ हती, विविध चेष्टाओ, विविध विलासो, ललित संलापो अने युक्त उपचारो करवामां ते विशेष निष्णात हती. पवी ए अंगे अंगे अनुपम लावण्य धरती धारिणी राणी सेय राजा साथे अनुरक्त इती अने तेनी साथे मनुष्यना शब्द, स्पर्श, | रस, रूप, गंध ए पांच प्रकारना कामभोगोने" अनुभवती रहेती हती. [७] आ तरफ ए राजा-राणीना राज्यकाळमां गामेगाम फरता अने सुखे सुखे विहरता श्रमण भगवान महावीर" आमलकप्पा नगरी तरफपधार्या, ऐवा उपचारो चालता हशे खरा. ३४ जैन परिभाषा प्रमाणे शब्द अने रूप ए ये काममा गणाय छे; गंध, रस, अने स्पर्श भोगा गणाय छे. भोगो स्थूल जणाय छे, त्यारे कामो भोगो करतां विशेष सूक्ष्म लागे छे. ए दृष्टिए आ विभाग थयो जणाय छे. ३५ जैन धर्मना चोवीश तीर्थकरोमांना छेल्ला तीर्थंकर. तेमना पितार्नु नाम 8सिद्धार्थ, मातानुं नाम =त्रिशला, ज्येष्ठ भाइर्नु नाम नंदिवर्धन, पत्नीनु नाम ग्यशोदा, पुत्रीन नाम अणोज्जार ("ज्येष्ठा-सुदर्शना-अनवद्याङ्गी"-विशेषावश्यक टीका गा० २३०७ ) अने जमाइनुं नाम जमाली हतुं. जमाली महावीरनी बेन सुदर्शनानो पुत्र हतो. +महावीरनी पुत्रीनी पुत्रीनुं नाम जसवती हतुं. महावीरना मातापिता पार्श्वनाथना श्रमणो. पासक हता, तेमना पिता ज्ञात कुळना क्षत्रिय हता. (आवश्यकचूर्णीमां ऋषभदेवना ज पोताना लोकोने 'ज्ञातो' तरीके जणावेला छे. 8"सिद्धत्य, सेज्जंस, जसंस (पितानां त्रण नाम) गोत्र काश्यप, = तिसला, विदेहदिग्णा, पियकारिणी (मातानां श्रण नाम) गोत्र वासिष्ठ. * गोत्र कौडिन्य Jx अणोज्जा, पियदसणा (पुत्रीनां में नाम) + महावीरना पित्तियए (काका) सुपास. सेसवई, जसबई (पौत्रीनां बे नाम) गोत्र कौशिक"-आचारांग अध्ययन २४ a l For Private Personel Use Only Jain Education w w.jainelibrary.org Page #405 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुनो सार अने नगरीथी बहार ईशानखूणा तरफना अंबसालवण चैत्यमां पूर्ववणित वनखंडथी विराजित अशोक वृक्षनी नीचे आवीने ऊतर्या, त्यां तेओ यथोचित अवग्रह धारण करी पूर्वाभिमुख थई प काळी शिलापाट उपर पर्यकालने रही संयम अने तपथी आत्माने तेओनुं कुळ ते ज्ञात कुळ अने तेओनो वंश ते ज्ञात वंश ) महावीरनो जन्म वैशालीमा ( पटणाथी २७ माइल उत्तरे अत्यारनुं बसार ) क्षत्रियकुंडमां थयो हतो. तेमना मातापिताए तेमनुं नाम वर्धमान राख्युं हतुं ते श्रीश वर्षना थतां तेमनां मातापिता मृत्यु पाम्यां. त्यारबाद मोटा भाइनी रजा लई तेमणे प्रत्रज्या ठीधी, अने बार वर्ष तपश्चर्या अने ध्यानमा गाळ्या बाद स्थितप्रज्ञपशुं प्राप्त करें. त्यारपछी तेओ श्रीश वर्ष सुधी उपदेश आपता जीव्या, अने बहोंतेर वर्षनी उमरे इ. स. पूर्वे चारसो सोनी आसपासमा तेओ वर्तमान बिहार पासे पावापुरीमा निर्वाण पाया. श्वेतांबरी तेमज दिगम्बरो बन्नेने महावीर स्वामी तीर्थकर तरीके सरखा ज मान्य होवा छतां तेमना जन्मनी अने विवाहनी हकीकत तथा समयादि विषे बन्नेमा मतभेद छे. तेमनां बीजां नाम आ प्रमाणे छे:-वर, चरमतीर्थकृत, देवार्य, ज्ञातनदन, वैशालिक, सन्मति, महतीवीर, अंत्यकाश्यप, नाथान्वय (ज्ञातान्वय); बौद्ध ग्रन्थोमां तेओ दीर्घतपस्वी निग्गंठ नातपुत तरीके प्रसिद्ध छे. ३६ आ शब्द निवासस्थानना ग्रहणनी मर्यादा सूचवे छे. जैन परिभाषामा आनो बीजो अर्थ 'सामान्य ज्ञान' एवो पण प्रसिद्ध छे, परंतु अहीं तो आनो अर्थ 'ग्रहणनी मर्यादा' घटे एम छे. घरघणीनी संमति मेळवीने रहेवा माटे घरने ग्रहण करवुं, संमति मल्ये घरमा ऊतरवु ('घर' शब्द उद्यान वाडी बगीचो खेतर पहाड झाड वगेरेनो सूचक समजवानो छे) ए भावने अवग्रह शब्द सूचवे छे. शास्त्रकार अवग्रहना पांच प्रकार बतावे छे: इंद्रावग्रह, राजावग्रह, गृहपति अवग्रह, गृहस्वामिअवग्रह अने साधर्मिकावग्रह. अर्थात् कोइ निवासस्थानमा रहेवुं होय त्यारे इन्द्र, राजा, गृहपति- मांडलिक, गृहस्वामी अने पोतानो साधर्मिक एमनी संमति मेळवीने एमना निवासमा रहेवुं उचित छे. एओनी संमति मळ्या विना एमना निवासमा रहेनुं दोषजनक छे. ३७ ज्या ज्यां तीर्थंकरोनी रहेवानी वात आवे छे त्यां बधे तेओ पूर्वाभिमुख थइने बेसे छे एवं लखेलुं होय छे. पूर्व दिशामां सूर्य होय Jain Education Intentional ॥१७॥ Page #406 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥१८॥ भावित करता रहेवा लाग्या. ए श्रमण भगवान महावीर आदिकर, तीर्थकर, स्वयंसंबुद्ध, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुरुषवरपुण्डरीक, पुरुषवरगंधहस्ती, अभयदाता, नेत्रदाता, मार्गदर्शक, शरणदाता, जीवितदाता, द्वीपसमान, त्राणरूप, शरणरूप, गति-आश्रय-रूप, आधाररुप,धर्मचक्रने प्रवर्तावनार, विशुद्ध ज्ञान अने दर्शनथी युक्त, छद्मरहित, जिन-जय मेळवनार, जितावनार, तरनार, तारनार, मुक्त, मुकावनार, बुद्ध, बोध आप छ एथी ए दिशा घणा जूना समयथी लौकिक दृष्टिए पवित्र मनाती आवौ छे. धणा जूना काळमा केटलाक लोको सूर्यना पूजक हता. पूर्वाभिमुख बेसवामा सूर्य तरफना जूना सद्भावनी निशानी रहेली मालूम पडे छे. आ परंपराने अनुसरीने बीजा बधा सामान्य लोको पण पूर्व दिशाने महत्त्व आपे छे. जैन दृष्टिए तो कोई दिशाने खास कशु महत्त्व होय एवं जणातुं नथी. भगवान महावीरना समयमां एक एवो संप्रदाय हतो के जे दिशाओनी पूजाओमां मानतो. जैन सूत्रोमा ए संप्रदायर्नु नाम 'दिसापोक्खी' जणावेलु छे. भगवाने दिशाओनी आ जडपूजाना प्रचारने रोकवा माटे अने दिशाना माहात्म्यनी निष्प्रयोजनता बताववा माटे भगवती सूत्रमा दिशाओने जीवाजीवात्मक कहीने वर्णवेली छे. दिशाओ मात्र आकाशरूप होई जीवाजीवरूप समस्त पदार्थना आधाररूप छे ए बात खरी छे, पण एटला मात्रथी तेनीजडपूजा करवी जराय उपयोगी नथी. ____३८ भगवाननो परिचय आपता स्तुतिरूप वर्णकमां भगवानने द्वीपसमान, प्राणरूप, शरणरूप, आश्रयरूप अने आधाररूप, जणावेला छे. तेने लगतो मूळ पाठ "दीवो, ताणं, सरणं, गई, पइट्ठा" आ प्रकारनो छे. मूर्तिपूजक संप्रदायना लोकोमां आ पाठनो प्रचार नथी पण स्थानकवासी संप्रदायना लोकोमा आनो प्रचार छे. · दीवो' वगेरे शब्दो प्रथमाविभक्तिवाळा छे पण तेमने बधाने छट्ठी विभक्तिवाळा करीने प्रस्तुत स्तुतिमा योजवाना छे. ३९ शक्रस्तवमा वा भगवाननो परिचय आपता वर्णकमा घणा पाठभेदो मालूम पडे छे. केटलेक स्थळे 'जिण' पछी 'जावय' शब्द आवे Jain Education a l For Private Personal Use Only ||ww-lainelibrary.org Page #407 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेग सार नार, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी अने अपुनरावर्तननी शिवरूप, अचल, अरोग, अक्षय अव्यावाध सिद्धिने मेळववाना अभिलाषी पवा हता. ८ भगवान [८] एमना शरीरनी उंचाई सात हाथ, संस्थान समचोरस अने संहनन-शरीरनो बांधो-बन जेवो मजबूत हतो. शरीरनी अंद. | महावीरनुं रना वायुओ अनुकूळ रहेता, मलाशय कंक पक्षीना मलाशय जेवो नीरोग, जठर पारेवाना जठर जेवू तीव्र, मलविसर्जननां स्थान शारीरिक पक्षीनां मलविसर्जननां स्थान जेवां निर्लेप अने पीठ, बन्ने तरफनां पांसळां तथा उरु सुजात हतां. वर्णन ___ एमनो श्वास सुगंधी," नीरोगी उत्तम मांस, छबी उदात्त अने प्रशस्त, शरीर निर्मळ अने अंगअंगमांथी झरतुं लावण्य असाधा-५ रण हतुं. | ॥१९॥ छे त्यारे क्याय क्यांय 'जावय' ने बदले 'जाणय' पद देखाय छे. विशेष विचार करता 'जाणय' ने बदले 'जावय' पाठ वधारे सुसंगत छे. 'तिन्नाणं तारयाण' वगेरे विशेषणो जोता 'जावयाणं' पाठ ज बराबर छे. आ उपरांत ए शक्रस्तवमा बीजा अनेक पाठभेदो छे. ४० भगवानना शरीरनुं वर्णन जोता एम मालूम पडे छे के तेओ गृहस्थाश्रममा विशेषे करोने ब्यायामप्रिय हशे. शरीरनी मजबूताइ अने सुडोळपणुं लाववामां व्यायाम ए मुख्य कारण छे. जैन सूत्रोमा ठेकठेकाणे व्यायामनी पद्धतिना वर्णनो तो आवे ज छे. कल्पसूत्रमा भगवान |१० महावीरना पिता राजा सिद्धार्थनो अखाडो प्रसिद्ध छे. भगवानना मलाशय अने जठर- जे वर्णन करेलुं छे, ते तेमनी मिताहारिता अने पथ्यचारिताने सूचवे छे. खानपानना आचारो वर्णवता जैन सूत्रोमां खानपानना प्रमाण विषे खूब भार मूकवामां आव्यो छे. ४१ योगी ज्यारे योगनी साधना पूरी करे छे, शरीर, मन अने वचन उपर पूरेपूरो काबू मेळवे छे त्यारे तेनां शरीरमा लावण्य, स्कृति, अने तेज वधु ने वधु प्रमाणमा प्रकटे छे. उपरांत केटलीक बीजी शक्तिओनो पण तेमा आविर्भाव थाय छे. पातंजलयोगसूत्रना विभूतिपादमा जे विभूतिओ वर्णवेली छे, ते बधी खरा योगीने सुलभ होय छे. भगवान महावीरना शरीरनुं वर्णन तेमनी योगलब्धिने अनुरूप छे. Jain Educatie internal For Private & Personel Use Only dow.jainelibrary.org Page #408 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार. ॥२०॥ ही जेवा निर्मळ" एक शाईलनी हडपची डीक, उत्तम पाडो पराजय, स्थिरता अने । लोढाना घणनी जेवी सुबद्ध स्नायुवाळी अने शिखर जेवी उन्नत खोपरी उपर शिरोभाग, माथाना वाळ घननिचित-लगोलग उगेलाचांकडिया जमणा वांकवाळा सुंवाळा अने भमरा जेवा काळा, वाळ उगवानी चामडी-केशांतभूमि-सोना जेवी चमकती अने दाडिमना फुल जेवी निग्ध, छत्र जेवू उंचुं उत्तम उत्तमांग-मस्तक, वणविनानो एकसरखो अर्धचन्द्र जेवो ललाटपट्ट अने पूर्णचंद्र समान सोमाकार मुख, सांभळवामां सरवा प्रमाणयुक्त बन्ने कान, मांसथी भरेला पुष्ट बन्ने कपोल, धनुष जेवी वांकडी काळी माछी भमरो, खीलेला ५ कमळ जेवां एकाद घोळा वाळवाळी पापणवाळां बन्ने नयनो, गरुडनी नासिका जेवी उत्तुंग लांबी सरळ नासिका, परवाळा जेवा बन्ने होठ, चंपानी कळी जेवा निर्मळ एक श्रेणीबद्ध बधा दांत, अग्निथी धमेला सोनाना जेवु रातुं ताळवं अने जीभ, अवस्थित-अवस्थासुचक अने सुविभक्त श्मश्रु-दाढी मूंछ, शार्दुलनी हडपची जेवी मांसल प्रशस्त हडपची, प्रमाणसर चार आंगळ उंची उत्तम शंख जेवी रूपाळी डोक, उत्तम पाडो वराह सिंह शार्दूल बळद अने हाथीना खभा जेवा | १० ४२ पापणमा एकाद धोळो वाळ वर्णववानुं कारण समजातुं नथी. कदाज ए विशेष गांभीर्य, स्थिरता अने वृद्धत्वसूचक होय. ४३ भगवानना दांतनुं वर्णन वाचता आपणे तेमना दांतोनी शुद्धिनो ख्याल मेळवी शकौए छीए. केवळी थया पछी भगवान नियत आहारी रह्या छे. आहारने जे नियत लेतो होय तेना दांतो आवा शुद्ध अने निर्मळ त्यारे ज रही शके ज्यारे ते दांतो तरफ बेदरकार न रहे. कोइ छूमंतर के अतिशय मात्र कहेवाथी दांतोनी शुद्धि थई जती नथी. ए तो, संयमसाधन, शरीरनी विशेषसंयमपूर्वक काळजी, आहारनु प्रमाण, स्वादेन्द्रियनो जय, अजीर्णनो अभाव अने शरीरगत रक्तकणोनी विधुच्छक्ति उपर निर्भर छे. भगवानना अनुयायी आपणे, वधारे तो नहि पण तेमनी दंतशुद्धि जेटलंय तेमनुं अनुकरण करीए तोय बस छे. अनुयायी आपणीनो अभाव अने शरीरगत र पाई जाती नथी. ए तो, संयमान रही शके ज्यारे ते दाता Jain Education in maila For Private Personel Use Only wwehinelibrary.org Page #409 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण:/ इय सुचनो सार ॥२१॥ | भरावदार मजबूत खभा, सुबद्ध सांधावाळी सुग्लिष्ट स्थिर पुष्ट पोंचामां सुसंस्थित नगरना दरवाजा पाछळ रहेला भोगळ जेवी गोळ अने धोंसरा जेवी लांबी भुजाओ, शेषनागे विस्तारेली फणा जेवा विपुल अने उंचा करेला भोगळ जेवा दृढ बाहुओ, राती कोमळ मांसल अने शुभ चिह्नोवाळी हथेळी, पांचे आंगळीओ सिधी करतां जेमां जेमा पक पण काणुं न देखाय तेवो निश्छिद्र प्रशस्त पंजो, लोहीथी भरेली कोमळ पांच पांच आंगळीओ, तांबा जेवा राता स्निग्ध चमकता नखो, हथेळीमां चन्द्र, शंख, चक्र, स्वस्तिक अने सूर्यनी जेवी रेखाओ, पहोळी विशाळ सोनानी पाट जेवी उज्ज्वल समतल-पक सरखी अने श्रीवत्सना" चिह्नथी शोभती छाती, हाडकां न देखाय तेवो मांसल बरडो, कनकनी कान्ति जेवी कान्तिवाद्धं रोगरहित | निर्मळ सुजात शरीर, संगत संनत सुंदर अने सुजात पडखाओ, काखनी नीचेना बन्ने बाजुना भागो बराबर प्रमाणसर अने पुष्ट, माछी ऋजु स्निग्ध अने रमणीय रुंवाटी-रोमराई, माछली अने पक्षीनी कुक्षि जेवी सुजात पुष्ट कुक्षि, माउलीना उदर जेवू चमकतुं उदर, इंद्रियो बधी निर्मळ, | १० ४४ श्रीवत्सनो अर्थ आपता आचार्य हेमचंद्र कहे छे के "श्रिया युक्तो वत्सो वक्षोऽनेन श्रीवत्सः रोमावर्तविशेषः” कांड २, लोक १३६ अभिधानचिंतामणि. रुंवाटानो एक खास प्रकारनो वळांको ते श्रीवत्स. जेनी छातीमां ए विशिष्ट प्रकारनो संवाटानो वळांको होय ते सुलक्षणो कहेवाय एवो लोकवाद छे. श्रीवत्सवाळी छाती होवाने लीधे कृष्णर्नु एक नाम श्रीवत्स पण छे. 'वत्स'नो अर्थ 'वक्ष-छाती' थाय छे. जेने लीधे छाती शोभावाळी थाय ते श्रीवत्स, जे जे जिनबिंबो वर्तमानमा देखाय छे ते बधांनी छातीना बराबर मध्य भागमा लंबचोरस जे, एक उपसेलं निशान देखाय छे अने एने 'श्रीवत्स' कहेवामां आवे छे. ए निशान कोइ उपसेला हाडकानी स्मृति करावे छे, त्यारे 'श्रीवत्स' तो १५ रुवाटानो खास प्रकारनो वळाको छे ए ध्यान देवा जेवी बात छे.. Jan Educatione lla For Private Personel Use Only Page #410 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥२२॥ पन जेवी विशाळ नाभि, मुसल दपण अने वज्रना मध्य जेवो मध्यभाग, "उत्तम घोडो अने सिंहनी कटी जेवो कटीभाग, श्रेष्ठ घोडाना गुप्त गुह्य भाग जेवो गुप्त सुजात अने निरुपलेप गुह्य भाग, उत्तम हाथी जेवी मलपती ललित अने विक्रमवाळी गति, हाथीनी सुंढ जेवा शोभन उरुओ, ढांकणोमां बराबर बेठेला मांसल बन्ने | धुंटणो, हरणी जेवी रुडी वृत्त जंघाओ, सुश्लिष्ट सुसंस्थित अने बहार न कळाय तेवी घुटीओ, काचबाना चरण जेवा सुप्रतिष्ठित उन्नत चारु चरणो, नानी मोटी छतां पगनी आंगळीओ सुसंहत अने कोमळ, पगना नखो ५ राता अने चमकता, तळियां रातां कमळना पत्र जेवां सुकोमळ अने मृदु, पगमा पर्वत नगर मगर सागर चक वगेरेनी जेवी उत्तम रेखाओ, विशिष्ट रूप जाज्वल्यमान अग्नि, चमकती वीजळी, अने तरुण सूर्यनी जेवू उग्र तेज तथा अंगमा, उत्तम पुरुषनां अंगमां होय एवां एक हजार आठ सुलक्षणोः श्रमण भगवान महावीर शरीरे पवा प्रकारना हता. ४५ भगवानना शरीरना मध्य भागने मुसल जेवो वर्णवेलो छे. मुसल-सांबेलु-नो मध्य भाग-जेने पकडीने खंडाय छे ते भाग पातळो |१० होय छे. मध्य भाग पछी तरतज कटीभागर्नु वर्णन छे, तेथी मध्य भाग अने कटी बन्ने जुदा छे एन बीसराय. ४६ उत्तम पुरुषना शरीरमा एक हजार ने आठ शुभतम लक्षणो होय छे ए हकीकत जैन ग्रंथोमा वारंवार आवे छे. पण ते लक्षणो क्यां क्यों छे ए संबंधी बीगतवार हकीकत क्याय नजरे चडती नथी. हाथमां चंद्र, सूर्य, शंख, चक्र, स्वतिक वगेरेनी जेवी रेखाओ होय अने पगमा पर्वत नगर मगर सागर चक्र वगेरेनी जेवी रेखाओ होय-ए बधां शारीरिक सुलक्षणो छे. १००८ अने १०८ नी संख्या घणा || संप्रदायवाळाने तेम जैन लोकोने विशेष प्रिय छे एन कारण शोधवा जेवू छे. Jain Education Internet For Private & Personel Use Only rwwrainelibrary.org Page #411 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार [९] स्वभावे श्रमण भगवान महावीर अनानव-आस्रव बिनाना-सामाजिक वा आध्यात्मिक दूषण जेथी उत्पन्न थाय तेवी प्रवृत्ति विनाना, ममतारहित, अकिंचन -अच्छिक गरीबीने वरेला-अपरिग्रही, संसारना स्रोते-प्रवाहे-नहि वहेनारा, आसक्ति विषयानुराग ९ भगवान द्वेष अने अज्ञानथी पर रहेला, निग्रंथ प्रवचनना उपदेशक, श्रमण शास्ताओना नायक-तेमना व्यवस्थापक, श्रमणोना अधिपति,श्रमण महावीरना स्वभावर्नु | वर्णन ४७ जेमनी पासे किंचन-काइ-नथी ते अकिंचन. आवा अकिंचनो बे प्रकारना होय छे. एक तो औच्छिक अकिंचन अने बीजा ओघ अकिंचन. ओघ अकिंचनो पोतानी वृत्तिने शोध्या विना मात्र आवेग के देखादेखीथी अकिंचनपणुं माणे छे, एथी तेओ अकिंचनो देखावा ५ छतां पोतानी अने परनी समाधिमां विघ्नरूप बने छे, तेमनामां तृष्णा काम लोभ ईर्ष्या अहंकार वगेरे वृत्तिओ पडेली होय छे, तेमांनी एक शा वृत्तिने पण ते ओघ अकिंचनो विवेक न होवाने कारणे दाबी शकता नथी, उलटुं ते वृत्तिओना तेओ दास बनेला होय छे. एथी ओघ अकिंचनोनो मोटो भाग समाज, राष्ट्र, विश्व के व्यक्तिनी शांतिने हानि पहोंचाडनारो थाय छे. जेओ पोतानी वृत्तिने तपासी तावीने अने पोतानां बळ सामर्थ्य अने मर्यादा वगेरेन बराबर समजीने इच्छापूर्वक अकिंचनपणुं स्वीकारे छे, तेओ अच्छिक अकिंचनो छे. आवा ज अकिचनो पोताने विकास साधी शके छे अने व्यक्ति समाज राष्ट्र के विश्वनी शांतिमा पोतानो फाळो नोधावी शके छे. भगवान महावीर आ | १०॥ जातना अकिंचन हता, पण ओघ अकिंचन न हता. संसारनो प्रत्येक प्राणी पोतानी अज्ञानताने लीधे दुःखना पंकमा फसाएलो छे. संसारमा अज्ञान अने दुःखनी मात्रा एटली बधी वधारे छे के तेनो एटले समस्त संसारना समग्र अज्ञान अने समग्र दुःखनो समूळ नाश कोइथी कोइ प्रकारे थइ शक्यो नथी, थइ शकतो नयी अने हवे पछी थइ शकशे के केम ए प्रश्न छ आम छाय जे महान आत्माओगें हृदय ए दुःख परंपराने जोतांज ककळी ऊठे छे, तेओ ते दुःखना साधनरूपे कदी पण बनता नथी अने एवा साधनभूत न थवा माटेज तेओ अच्छिक गरीबीने स्वीकारे छे. अच्छिक गरीबीने वरेला ज महानुभावो खरा अकिंचन छे. Jain Educat international Jiww.jainelibrary.org Page #412 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥२४॥ Jain Educat वृंदमां परिवर्तन करनार - क्रान्ति करनार, बुद्धोने छाजे पवा चोत्रीश अतिशयोथी' संपन्न हता. ४८ आ अर्थ माटे मूळ सूत्रमा 'समणगविंदपरिअट्टए' शब्द आवेलो छे. टीकाकार [श्रमणा एव श्रमणकाः तेषां वृन्दस्य परिवर्तकः - औ० वृ० पृ० २१ पं० २] 'परिअट्टए 'नु संस्कृत रूपांतर 'परिवर्तक' आपे छे. श्रमण संस्कृतिमा भगवाने जे क्रांति करेली छे तेने आ विशेषण बराबर बंधबेसतुं छे. पार्श्वनाथ भगवाननी परंपरामा जे शैथिल्य पेठेलं, तेने दूर करवा अने श्रमणसंस्कृतिनुं तेज वधारवा भगवंते चार यमना पांच यम करेला, पोतानी जीवनचर्यामा अचेलकत्व उपर वधारे भार मूकेलो अने केटलीक सामाजिक हिंसाओने दूर करवा तेमने जातिवादने ५ दूर करी गुणवादने अग्रस्थाने स्थापेलो, तेमज स्त्रीओ अने पछात गणाता लोकोने ऊंचे चडाववा तेमने पोताना तीर्थमा सारं स्थान आपेलं. भगवतनुं 'परिवर्तक' विशेषण आ बधा भावने बराबर सूचित करे छे, टीकाकार तो 'परिवर्तक' नो अर्थ 'वृद्धिकारी' बतावे छे पण ए अथ व्युत्पत्तिनी दृष्टिए संगत छे के केम ए विचारवा जेवुं छे. ४९ समवायांग सूत्रमां चोत्रीश बुद्धातिशेषो आ प्रमाणे जणावेला छे: १ केश दाढीमूंछ रुंवाडां अने नख ए बधां न बधे २ काया निरोगी अने पवित्र रहे . ३ मांस अने लोही गोक्षीर जेवुं धोळु होय. ४ श्वासोच्छ्वास पद्मगंधी. ५ फक्त चर्मचक्षुवाळा न जोइ शके ते १० रीते आहार अने निहार प्रच्छन्न रहे. ६ प्रकाशबाळु चक्र. ७ प्रकाशवाळु छत्र. ८ प्रकाशवाळां धोळां चामरो ९ आकाशजेवुं स्वच्छ स्फटि कमय अने पादपीठ सहित सिंहासन. १० घणो उंचो इंद्रध्वज (आ चक्र वगेरे बधुं भगवाननी व्यागळ आगळ चाले). ११ ज्यां ज्यां अरिहंत भगवंतो ऊभा रहे के बेसे त्यां यक्षदेवो अशोकवृक्षने तत्काळ नीपजावे. १२ मस्तकना पाछळना भागमां तेजोमंडळ-भामंडळ. १३ भगवान ज्यां चाले ते भूभाग सरखो सपाट बनी जाय. १४ रस्तामां आवता कांटा ऊंधा वळी जाय. १५ ऋतुओ बधी नियमित अविपरीत - रहे. १६ सुगंधी शीतळ अने ठंडा वायु वडे योजनपरिमित भूभाग साफ थई जाय. १७ ते भूभागनी धूळ बेसी जाय ते प्रकारे तेना उपर मेघनो १५ छंटकाव थाय १८ पांचे रंगना सुगंधी फूलोनी ढींचण ढींचण जेटली भरचक वृष्टि थाय. १९ नहि गमता शब्दो स्पर्शो अने रसो रूपो अने national Page #413 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण. इय सुदनो सार गंधो दूर थइ जाय. २० मनगमता शब्दो स्पर्शो रसो रूपो अने गंधोनो प्रादुर्भाव थाय. २१ योजन सुधी संभळाय ते रीते भगवाननो स्वर नोकळे. २२ भगवाननी देशना अर्धमागधी भाषामां थाय. २३ भगवान देशना तो अर्धमागधी भाषामा करे छतां तेमने सांभळवा आवेला बधा आयों अनार्यों वगेरे तेमने समजी शके. २४ परस्पर वैरवाळा देवो असुरो राक्षसो बगेरे भगवाननी पासे उपशांत थाय. २५ अन्यतीथिको पण भगवानने नमस्कार करे. २७ तेओ भगवाननी पासे आवतां निरुत्तर थई जाय. २७ जे बाजु भगवान विहार करे ते तरफमा आजुबाजु पच्चीश पच्चीश योजन सुधी ईति न थाय. २८ मरकी न थाय. २९ स्वचक्रनो भय न रहे. ३० परचक्रनो भय न रहे. ३१५ अतिवृष्टि न थाय. ३२ अनावृष्टि न थाय. ३३ दुकाळ न पडे अने ३४ जे रोगो चालता होय ते पण जलदी ज शमी जाय. ॥२५॥ ___ वैदिक परंपराए अने बौद्ध परंपराए पण पोतपोताना ते ते प्रवर्तको माटे आवा आवा वा आथीय वधारे अद्भुततावाळा अतिशयो नोंधेला छे, ए भूलवू न जोइए. ___ आ अतिशयोनी गणनामा शास्त्रीय एक वाक्यता जणाती नथी, तेथी प्रवचनसारोद्धारमा अने अभिधानचिंतामणि-प्रथमकांड-मां वळी आ अतिशयो बधघट करीने बीजी रीते बतावेला छे. तेमा जे भेद छे ते आ प्रमाणे छः योजनप्रमाण भूभागमा प्रण जगतनो जनसमुदाय माई शके. भगवान एकमुखवाळा छतां चतुर्मुख ब्रह्मा जेवा भासे. मणिकंचनमय नव कमळोनी रचना थाय. शुभ शकुनो थाय. वृक्षो प्रणाम करे अने दुंदुभीओ वागे (प्रवचनसा०). भगवाननी आजुबाजु चारे प्रकारना देवो कोडनी संख्यामा रह्या करे. प्रण गढनी रचना थाय (अभिधानचिंता०) आमांना केटलाक अतिशयो जन्मथी होय छे, केटलाक कर्मक्षयथी उपजेला होय छे अने केटलाक देवोए बनावेला होय छे, एवो विभाग टीकाकारोए बतावेलो छे. भगवाननो पुण्यप्रकर्ष अपरिमित हतो ए निःशंक वात छे पण तेनुं आ रीते माप केम नौकळी शके ? खरं कहीए तो एमना पुण्यप्रकर्षनुं माप काढवानी भाषा ज आपणी पासे नथी. उपर जे माप काढी बताव्युं छे ते तो सामान्य मानवनी भाषा छे. पण १५/ Jain Education malal For Private & Personel Use Only wwpainelibrary.org Page #414 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥२६॥ वचनना पांत्रीश गुणोथी संयुक्त पवा श्रमण भगवान महावीर जे वखते आमलकप्पा नगरीमा आव्या ते वखते तेमनी साथे आकाएवी भाषाथी कोई विवेकी जन भगवानना स्वरूप संबंधी भुलावामां न पडे, माटे ज आचार्य समंतभद्र जणावे छे के "देवागम-नभोयानचामरादिविभूतयः । मायाविष्वपि दृश्यन्ते नातस्त्वमसि नो महान्" ॥ अर्थात्-इंद्रजाळ करी बतावनारा, पोतानी पासे देवो आवे छे एq बतावी शके छे अने चामर वगैरेने अद्धर राखी बतावे छे. हे || भगवन् ! अमारे मन तु, तारी पासे देवो आवे छे तेथी मोटो नथी पण तारुं वीतरागपणु ज तारौ महत्तानुं खरं कारण छे एम हुँ मानुं छु। ५० "सत्यवचनना पत्रिीश अतिशयो जणावेला छे" एम समवायांगसूत्रमा मूळमां लखेलं छे. ए माटे मूळमां "पणतीस सच्चवयणाइसेसा पण्णत्ता" एवं वचन छे पण ए पात्रीश अतिशयो कया कया छे? ए बाबत मूळमां कशुय जणावेलु नथी. मूळना ए वचननी टीका करतां आचार्य श्रीअभयदेव जणावे छे के-"सत्यवचनना अतिशयो आगममा दीठामा आव्या नथी पण ग्रंथांतरमा नेधेिला छे." ["सत्यवचनातिशया आगमे न दृष्टाः एते तु प्रन्थान्तरदृष्टाः संभाविताः"-समवायांग टीका पृ. ६३] टीकाकारना आ उल्लेख उपरथी 'आ अतिशयो आगमिक छे के नहि । एवो प्रश्न जरूर उठी शके छे. एना समाधाननु आ स्थान नथी पण ए वस्तु विचारणीय तो खरी ज. टीकाकारे १० ए पांत्रीश अतिशयो आ प्रमाणे बतावेला छेः १ संस्कारिता, २ उदात्तता, ३ उपचारोपेतता, ४ गांभीर्य, ५ पडछंदो पडवो, ६ सरळता, ७ संगीतयुक्तता, ८ महार्थता, ९ पूर्वापर अविरोध, १० शिष्टता, ११ असंदिग्धता, १२ अखंडनीयता, १३ हृदयंगमता, १४ देश अने काळजें अनुसरण, १५ तत्त्वानुरूपता, १६ अतिविस्तर अने असंबद्ध अधिकार रहितता, १७ पदोनी परस्पर सापेक्षता, १८ अभिजातता, १९ अतिस्निग्ध मधुरता, २० परमर्मनो अप्रकाश, २१ अर्थ अने धर्म साथेनो संबंध, २२ औदार्य, २३ परनिंदा अने स्वप्रशंसानी अभाव, २४ प्रशस्यता, २५ व्याकरणनो अविरोध, २६ सतत कुतूहल जनकता, २७ अद्भुतता, २८ अतिविलंबरहितता, २९ विक्षेप वहेम वगैरे दूषणर्नु न होवू, ३० हकीकतोनी नवीनता, ३१ खास प्रकारनी विशेषता, ३२ वर्ण पद अने वाक्योनो घटना, ३३ साहसयुक्तता, ३४ अखेद अने For Private & Personal use only Jain Education in hand Jww.limelibrary.org Page #415 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुचनो सार ॥२७॥ शगत "धर्मचक्र आकाशगत छत्र आकाशगत श्वेत चामरो, पादपीठ सहित आकाशस्फटिकमय स्वच्छ-सिंहासन अने आगळ खेंचातो धर्मध्वज ए बधुं हतु तथा चौद हजार श्रमणो-साधुओ अने छत्रीश हजार श्रमणीओ साथे संपरिवरेला श्रमण भगवान महावीर फरता फरता त्यां आव्या हता. [१०] जे वखते श्रमण भगवान महावीर त्यां आव्या ते वखते आमलकप्पा नगरीमा ठेरठेर-तरमेटामा त्रिकमां चोकमां चाचरमां ३५ विवक्षित जर्थनी सिद्धि. ५१ समवायांगना मूळमां 'आकाशगत' अर्थनो सूचक 'आगासग' शब्द आपेलो छे. तेनो अर्थ करतां टीकाकार लखे छे के-'तथा 'आगासग'त्ति आकाशगतं व्योमवति आकाशकं वा प्रकाशकम् इत्यर्थःxxx एवम् आकाशगं छत्रं छत्रत्रयम् xxx आकाशके प्रकाशके श्वेतवरचामरे 'आगासफलिहमय'ति आकाशमिव यद् अत्यन्तम् अच्छम् स्फटिकम् तन्मयं सिंहासनम् ४ 'आगासगओ'त्ति आकाशगतोऽत्यर्थं तुङ्ग इत्यर्थः"-(पृ० ६१) टीकाकारना कहेवा प्रमाणे 'आगासग' शब्दना प्रण अर्थो थयाः एक तो व्योममा रहेतु-अद्वर रहेतुं, बीजो प्रकाशक-प्रकाश आपतुं-चमकतुं, अने श्रीजो घणु उंचु. ५२ भगवानना विहारनो आ बधो वर्णक विवरणकारनी भलामण प्रमाणे उववाइय सूत्रमाथी लीधेलो छे. उववाइय सूत्रना मूळमां "चउदसहि समणसाहस्सीहि छत्तीसाए अजिआसाहस्सीहिं" ए पाठ तो छे, परंतु टीकाकारे त्यां ए संबंधे कशी हकीकत लखी नथी ए जरूर विचारवा जेवू तो खरं ज. अने एम छे माटे उववाइय सूत्रना संपादके मूळना ए पाठने ( ) आवा निशाना मूकेलो छे अने ते उपर "ए वचन व्याख्यानुगामी नी" [औ० वृ० पृ० २१ सू० १० १० ११ तथा १४ ] एवं टिप्पण करेलुं छे. टीकाकार अने टिप्पणकारनुं वलण ए मूळ पाठ संबंधे संदेह उपजावे एवं जणाय छे अर्थात् भगवान विहार करता हशे त्यारे दरेक ठेकाणे तेमनी साथे चौद हजार साधुओ अने छत्रीश २५ हजार साध्वीओ हमेशां रहेतां ज हशे ए नको न कही शकाय पण ए वचन उपरथी तेमना श्रमणश्रमणीना परिवारनुं माप तो जाणी शकाय. Jain Education Intention! For Private Personel Use Only Iww.lnelibrary.org Page #416 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥२८॥ चतुर्मुखोमां-चोकठामां-राजमार्गमा अने शेरीओमां-ज्यां सांभळो त्यां घणा लोकों परस्पर पम कहेता हता के हे देवानुप्रियो! आकाशगत छत्र वगेरे साथे संयम अने तपथी आत्माने भावित करता श्रमण भगवान महावीर अहीं आव्या छे तो तेवा प्रकारना अरहंत भगवंतोना मात्र नामगोत्र पण काने पडे तोय मोटो लाभ छे, तो पछी तेमनी सामे जवानो तेमने वांदवानो नमवानो तेमनी पासे जइ केटलाक खुलासा पूछवानो अने तेमनी पयुपासना-सेवा करवानो प्रसंग मळे तो जे लाभ थाय ते माटे कहेवू ज शु? __आर्य पुरुषर्नु एक पण धार्मिक सुवचन काने पडे तोपण ते श्रेयरूप छे तो पछी तेमनी पासे जइ विपुल अर्थ-घणी हकीकतो. जाणवानो प्रसंग सांपडे तो तेथी जे श्रेय थाय ते माटे कहेवू ज शु? तो हे देवानुप्रियो ! आपणे जईए अने श्रमण भगवान महावीरने वांदीए नमीए सत्कारीप सन्मानीए अने कल्याणरूप मंगळमय दिव्य चैत्यनी पेठे तेमनी पर्युपासना करीए तो ए, आपणे माटे आ भव परभव अने जन्म जन्मांतरमां हितरूप थशे, सुखरूप अने निःश्रेयसरूप नीवडशे. ___ आम विचारीने घणा उग्रो उग्रपुत्रो भोगो भोगपुत्रो राजन्यो क्षत्रियो ब्राह्मणो भटो योधो प्रशास्ताओ मल्लकिओ लिच्छविओ १० लिच्छविपुत्रो अने बीजा घणा मांडलिक राजाओ युवराजो राजमान्य पुरुषो मडंबाधिपो कौटुंबिको-कणबीओ इभ्यो श्रेष्ठिओ सेनापतिओ सार्थवाहो वगेरे अनेक लोको ज्यां भगवान ऊतर्या हता त्यां जवा नीकळ्या. ५३ कोइ परिवर्तनकारी के संशोधक वक्ता आवे त्यारे संप्रदायना भेदभाव विना दरेक प्रजा तेने सांभळ्या इच्छे छे एवं लोकमानस आजे पण छे, तो पहेलो पण एवं ज हशे एम आ उपरथी जणाय छे. ५४ उग्र भोग राजन्य क्षत्रिय भट योध मल्लकि लिच्छवि वगेरे, ते समयना प्रसिद्ध प्रसिद्ध राजवंशोनां खास विशेष नामो छ ए ध्यानमा ||१५/ राखवार्नु छ, अर्थात् भटो एटले सुभटो, योधो एटले युद्ध करनाराओ, एवो ते नामोनो अर्थ बराबर नथी. Jain Education lerroa For Private & Personel Use Only 1 jainelibrary.org Page #417 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार एमांना केटलाक" श्रमण भगवान महावीरने वांदवानी-नमवानी वृत्तिवाळा हता, केटलाक मात्र भगवानने जोवाना इच्छुक हता, केटलाक तो 'भगवान केवा होय' ए जातना कुतूहलथी जवा प्रेराया हता, केटलाकने अर्थविनिश्चय-खुलासा मेळववा हता, केटलाकने पम हतुं के त्यां जइशें तो अथुतपूर्व सांभळशुं अने सांभळ्युं छे ते संबंधी शंकाओ दूर करशु, केटलाके पम धारेलु के आपणे तो भगवाननी पासे सर्व प्रकारे मुंडभाव धारण करी अगार-घर छोडी अनगार थशु, केटलाके एवो संकल्प करेलो के आपणे पांच अणुव्रतवाळो अने सात शिक्षाव्रतवाळो पम बार प्रकारनो गृहिधर्म स्वीकारशुं, केटलाक तो मात्र जिनभक्तिना रागथी प्रेराया हता अने|५ केटलाक गतानुगतिक हता अर्थात् तेओ पम समजेला के आ बधा जाय छे त्यारे आपणे पण जवु प शिष्टता छे-योग्य छः पम जुदी ॥२९॥ जुदी वृत्तिवाळा तेओ बधा भगवाननी पासे जवा नीकळ्या. श्रमण भगवान महावीरनी पासे जनारा ए बधा न्हापला, तेमणे बलिकर्म करेलु, तिलक वगेरे लगाडेलां, माथे डोके माळाओ नाखेली, हार अर्धद्वार प्रणसरो हार लटकतां झूमणां कटिसूत्र-कणदोरो वगेरे आभरणो पहेरेलां अने सुंदर वस्त्रो सजेला तथा शरीरे चंदन लगाडेलु, एओ केटलाक घोडे चडेला, केटलाक हाथी उपर बेठेला, रथ उपर चडेला, घुम्मटवाळी पालखीमां बेठेला, अने झूलती पाल५५ सभा-समितिओमा जनाराना मानसर्नु आबेहूब चित्रण आ कंडिकामा छे. ५६ कोई गृहस्थ ज्ञानी पासे धर्म सांभळवा जाय के राजदरबारमा जाय त्यारे 'बलिकर्म' करीने जाय-एवा अनेक उल्लेखो जैन आगमोमा विद्यमान छे. पण ए 'बलिकर्म' शुं छे ? ते संबंधी स्पष्ट माहिती मळती नथी. 'पोतपोताना गृहदेवो पासे बलि चडाववी-निवेद धरवूभेट धरवी' ऐवो बलिकर्मनो अर्थ टीकाकारे आपेलो छे. ("कृतं बलिकर्म स्वगृहदेवतानां यैः ते तथा"-उवयाइय पृ. ५९) आमा 'गृहदेवता' |१५| कोण अने तेनु शु स्वरूप-ए प्रश्न ऊभो रहे छे. Jan Education For Private Personel Use Only vodiainelibrary.org Page #418 -------------------------------------------------------------------------- ________________ खीमां आवेला हता; वळी मोटा जनसमुदायथी विटाएला केटलाक मात्र पगे चालीने जता हता. ए बधा जनाराओनो अवाज पटलो रायपसेण ११०भगवान | बधो थतो हतो के जाणे कोइ खळभळेलो महासमुद्र गाजतो न होय. इय सुत्तनो | महावीरनी आमलकप्पा नगरीथी बहार ईशान खूणामां आवेला अंबसालवण चैत्यमां पओ बधा जइ पहोंच्या. त्यां छत्र वगेरे तीर्थकरना अतिशेषो जोतां तेओ पोतपोतानां यान वाहन ऊभां राखी ऊतरी पड्या-यानो छोडी नाख्यां, वाहनो चरवा छूटां मूकी दोधां अने धर्मसंशोएओ भगवाननी पासे आवी पहोंच्या, तेमने त्रण प्रदक्षिणा दीधी, वंदना करी नमस्कार कयों अने भगवाननी शुश्रूषा करता तेओ बहु ५ | परवाणा ॥३०॥ दूर नहि तेम बहु नजीक नहि ए रीते हाथ जोडीने तेमनी सामे विनयपूर्वक बेठा. आमलकप्पानो राजा सेय, राणी धारिणी पण बधांनी साथे श्रमण भगवान महावीरनी सेवामा जोडायां हता. आमलकप्पाना राजा सेय, राणी धारिणी अने त्यांना जनसमुदायने उद्देशीने श्रमणगणमा परिवर्तन करनार श्रमण भगवान महावीरे पोतानी धर्मसंशोधक वाणी संभळावी. तेमणे "कमु के: (१) "जे मनुष्यो दुर्बुद्धिथी प्रेराइने पोपको करी ते द्वारा धन पेदा करे छे तेओ आ विराट विश्वने दुःखना ऊंडा खाडामां धक्केले छे अने पोते पण सतत तरफडियां मारतां मारतां झुरी झुरीने उपडी जाय छे-छेवटे लेश पण शांति पामता नथी. आ संसारमां शांति पण छे अने अशांति पण छे. शांति के अशांति मेळववी मानवीना पोताना हाथनीज वात छे. मनुष्यमां तृष्णावृत्ति विशेष बळवान छे तेने लीधे ए सुखदुःखनु खरं स्वरूप समजी शकतो नथी, उलटुं दुःखने सुख समजे छे अने सुखने दुःख समजे छे. ए तृष्णावृत्तिनी प्रबळ बळवत्ताने ज लीधे क्रोध वधे छे, मूढता व्यापे छे अने मनुष्य पोतानु-पोताना स्वरूपy-पोताना कर्तव्यर्नु ५७ भगवाननी धर्मसंशोधक देशना जे अहीं जणावली छे तेनुं मूळ उत्तराध्ययन सूत्रनां नीचेनां पयोमा छः (१) जे पावकम्मेहि धणं मणुस्सा समाययंति अमति गहाय । पहाय ते पास पयट्ठिए नरे वेराणुबद्धा नरयं उति ॥२॥ Jain Education in all womainelibrary.org Page #419 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥३१॥ भान भूली जाय छे पटले आखर ते मानव मटी दानवी वृत्ति उपर आवी जाय छे. आम थवाथी मनुष्योनी परस्पर हितकारिणी बंधुतानी वृत्ति शिथिल थाय छे, तेथी अन्योअन्य वरवृत्ति पेदा थइ सर्वत्र अशांति ऊपजे छे. शुं मनुष्य, पशु के पक्षीओ वा आ स्थावर जगत ए बधु प धखधखती अशांतिमा होमाय छे, माटे ज धन पेदा करनार लोकोए परस्पर बंधुतानी वृत्तिनो नाश न थाय ते तरफ विशेष लक्ष्य राखी पोतपोतानो व्यवहार करवो घटे. अन्यथा कोईनुं श्रेय थवानुं नथी. मात्र धन पेदा करनारो आ विचार भाग्ये ज करे छे के तेनी धनतृष्णानी आगमा आजसुधीमां केटलां मानधी होमायां, केटलां पशुओ अने पक्षी बळीने खाख ५ थइ गयां, केटलां कोटि वृक्षो कपायां, केटलां बधां स्वच्छ पाणीनो होम थई गयो, केटली बधी स्वच्छ हवाने बगाडी नाखी तेनो विनाश कयों अने विमाश पामती केटली आगे केटकेटलाने बाळी नाख्या. धन पेदा करवानी आ रीतर्नु ज नाम दुर्बुद्धि छे-घोर हिंसा-परस्पर बंधतानी वृत्ति शिथिल थवी प दानवी वृत्तिनुं मुख्य लक्षण छे. ए धर्मनी, पुण्यनी, सुखनी अने प्राणीमात्रनी नाशक छे प भूल न जोइए. क्रियाकांडर्नु हाडपिंजर ए विशुद्ध धर्म नथी पण ते हाडपिंजरमा परस्पर बंधुतारूप अहिंसावृत्तिनो प्राण संचारवो ए ज शुद्ध धर्मनो पायो छे, माटे ज आर्य पुरुषोए एक अहिंसाने परम धर्म कहेलो छे. (२) "विलासी मनुष्य पम मानतो होय के मारूं शरण तो धन छे, मारे परस्पर बंधुतानी वृत्ति केळववानी शी जरुर छे? तो पम मानतो ए मूढ खांड खाय छे. मात्र धन होवाने लीधे आजसुधीमां कोईनुं त्राण थयु नथी अने हवे पछी थशे पण नहि. आ लोक के परलोकमां तेज सुखी थशे के जेनामां व्यापक भ्रातृभावनी ज्योति प्रकटी होय अने जेनो बधो व्यवहार ए व्यापक भ्रातृभाव उपरज चालतो होय. (३) "तृष्णानुं चक्र पटलु बधु प्रबळ छे के मनुष्य तेनाथी शीघ्र छूटो थइ शकतो नथो-इच्छा छतां पोताना व्यवहारोमा विवेक(२) वित्तेण ताणं न लभे पमत्ते इमम्मि लोए अदुवा परस्थ ॥५॥ (३) खिप्पं न सक्केइ विवेगमेउं तम्हा समुट्ठाय पहाय कामे ॥१०॥ Jain Education Internance For Private & Personel Use Only wdinelibrary.org Page #420 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण-I इय सुत्तनो सार ॥३२॥ पूर्वक रही शकवामां शिथिलता आव्या करे छे; आम छतां मुमुक्षु जनोए गभरावानुं नथी ज, तेओए तो वारंवार प्रबळ प्रयत्न कर्या करवानो छे अने तृष्णानी प्रवृत्तिओना पाशमां न फसातां आत्मसंशोधनोना प्रयत्नोमा मच्या रहेवार्नु ज छे. (४) "जुओ-जे आ श्रमणो अहीं बेठेला छे तेओ तृष्णाना चक्रथी छूटवा माटे ज श्रम करी रह्या छे. तमे पम न समजता के श्रमणनो मात्र वेश पहेरवाथी श्रमण थइ जवाय छे. आ तो एक प्रकारनी शाळा छे. जेम तमे निशाळमां जइने अंकज्ञान शिखो छो तेम आ मारी शाळाना श्रमण विद्यार्थिओ तृष्णाना चकने छेदवानी विद्याओ शिखी रह्या छे, तेओ ए माटे सबळ प्रयत्न करे छे. छतांय | ५ तृष्णानां नवां नवां रूपो तेमने वारंवार सतावे छे जेथी तेओमां पण भारे असमंजसता फेलाइ रहे छे; आमछतांय तेमने कहुं छु के तेओए मुमुक्षावृत्तिनो पक छांटो बाकी होय त्यांसुधी जराय गभरावानु नथी, पण आरंमेला प्रयत्नमा ज दिनप्रतिदिन शिथिलता छोडी सविशेष उग्र बनवानुं छे. कोई तमे कहेशो के श्रमण थया पछी वळी तृष्णा शानी? तो मारे जणावQ जोइप के तृष्णा कांइ धननी, स्त्रीनी के पुत्रनी ज होय छे एम नथी, ए तो अनेक स्वांगो करीने प्राणीमात्रने सताव्या करे छे. श्रमणोए धन मूक्यु, स्त्री अने वहालां मातापिता छोडयां छतां तेओमां वेशनी, उपकरणनी, खावापीवानी, चेलाचाटीनी, गुरुनी, उपासकनी, वाचनानी, वेशमां पण अमुक ज प्रकारना वेशनी अने सौथी मोटार्मा मोटी हानिकारक तृष्णा मोटा थवानी-मोटा कहेवराववानी छे. तृष्णानां आ राक्षसी स्वरूपोआ श्रमणोने पण घडीए पळे नड्या ज करे छे-वेश अने उपकरणोनी तृष्णामाथी बचवा नग्नभाव धारण करवा जतां तेनी ज एक तृष्णा बंधाई गई, खावापीवानी जाळमाथी बचवा अनशनवतो आदरतां तेमां ज फसाई जवा जेवू थयु, मनने ठेकाणे लाववा भयंकर उग्र तपो, घोर देहदंडनो अने केशलुंचन वगेरे घोगतिघोर बाह्य कष्टो करवा जतां तेमां ज टेवाइ रसलीन थवा जेवू थयुः आम अनेक उग्र उपचारो चालु छताय हजु आ श्रमणो ठेकाणे आवता नथी; तेम छतांय मारी श्रद्धा छे-मारो अचळ विश्वास छे के प्रबळ प्रय-१५ लनी सामे तृष्णा एक क्षण पण टकी शकवानी नथी. मारा पोताना जाति अनुभवथी कहुं छु के तमे पण तृष्णानी सामे मोरचा मांडशो (४) मुहूं मुहूं मोहगुणे जयंतं अणेगरूवा समणं चरंतं। फासा फुसंति असमंजसं च ण तेसु भिक्खू मणसा पउस्से ॥११॥-अध्ययन ४ । Jan Education in that For Private Personal use only antinelibrary.org Page #421 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपण इय सुचनो सार ॥३३॥ तो जरूर तेने छेदीने विजय वरवाना ज. (५) "घेर सोना रूपाना कैलास पर्वत जेवडा असंख्य पहाडो होय तोपण ए दुःखद तृष्णा शमती नथी-ए तो आकाश जेवी अमाप छे. पर्नु शमन तो विवेकपूर्वक रहेवामा छे अने ते प्रमाणे पोतपोताना सर्व व्यवहारो चलाववामां छे." सर्व सुखकर भ्रातृभावने फरीषार याद देवरावी भगवाने पोतानी देशना पूरी करी. [११] आमलकप्पानो ए जनसमुदाय भगवाननी उक्त देशना सांभळीने विशेष प्रमुदित थयो अने 'भगवाने निग्रंथ प्रवचन ठीक ५ कही बताव्यु छे' 'पवो कोई श्रमण के ब्राह्मण नथी जे आ प्रकारनी धर्मदेशना करी शके' पम कहेतो कहेतो प समुदाय पोतपोताना स्थानके जइ पहोंच्यो. राजा सेय अने राणी धारिणी पण भगवाननी अपूर्व देशना सांभळीने प्रसन्न प्रसन्न थइ गयां, तेमणे भगवानने वंदन-नमन करी केटलाक प्रश्नोना खुलासा पूछी लीधा अने पछी तेओ निग्रंथ प्रवचननी तेमज भगवाननी यशोगाथा गातां गातां पोताने महालये आवी पहोंच्यां. [१२] जे समये श्रमण भगवान महावीर आमलकप्पा नगरीनी बहार आवेला अंबसालवण चैत्यनासमवसरणमां विराजता हता ते (५) सुवण्णरुप्पस्स य पव्वया भवे सिया हु केलाससमा असंखया। नरस्स लुद्धस्स न तेहि किंचि इच्छा हु आगाससमा अणतया ॥४८॥ -अध्ययन ९ ५८ 'सम्' अने 'अव' उपसर्गपूर्वक 'सृ-सरकवू-जवू' धातुमाथी 'समवसरण' शब्द नीपजेलो छे. भगवानना के तेमना शिष्योना आगमनने सूचबवा सूत्रोमा अनेक ठेकाणे 'समोसरई' क्रियापद वपराएलु छे. आजनी भाषामा 'पधारवं' क्रियापद जे भावने सूचवे छे ते भाव ए| १५ 'समोसरई' क्रियापदनो जणाय छे. आ उपरथी 'समवसरण'नो प्रथम अर्थ 'पधारवू' थाय. बीजो अर्थ 'जुदा जुदा मतवाळाओनो मेळो' थाय. Jain Education a l For Private Personal Use Only ॥ ॥ Page #422 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥३४॥ काले ते समये "सौधर्मकल्पमा सूर्याभ विमानमा सुधर्मा नामनी सभामा सूर्याभ सिंहासन उपर बेठेलो सूर्याभदेव पोताना विपुल अवः ।। धिवढे समग्र जंबूद्वीप तरफ नजर नांखी तेने बराबर निरखी रह्यो हतो. ए सूर्याभदेवना परिवारमा चार हजार सामानिक देवो, पोतपोताना परिवारथी विटळापली तेनी चार पट्टराणीओ, त्रण सभाओ, सात सेनाओ, सात सेनाधिपतिओ, सोळ हजार आत्मरक्षक देवो अने सूर्याभविमानमा रहेनारा बोजा पण घणा देवो अने देवीओ हता. सूर्याभ सिंहासन उपर बेठेलो ते सपरिवार सूर्याभदेव-नाट्य, गीत, वाद्य, तंत्री, तल, ताल, बीजां विविध वाजांओ अने वादनकळामां दक्ष पुरुष जेने वगाडे छे पवो मेघनी पेठे गाजतो मृदंग-ए बधांमांथी नीकळता मधुर स्वरो सांभळतो सांभळतो दिव्य भोगोने भोगवतो रहेतो हतो.. सूर्याभ देवे समग्र जंबूद्वीपने निरखतां निरखतां भारतवर्षमां आमलकप्पा नगरीनी बहार अंबसालवण चैत्यमा आवी रहेला अने योग्य अवग्रहपूर्वक संयम अने तपथी आत्माने भावित करता श्रमण भगवान महावीरने जोया. जेमकेः-'वादिओनुं समोसरण' ["चत्तारि वाइसमोसरणा"-"वादिनः तीथिकाः समवसरन्ति अवतरन्ति एषु इति समवसरणानि-विविधमतमौलकाः"(स्थानांग पृ. २६४-२६८] 'समवसरण'नो श्रीजो अर्थ रहेठाण-रहेबानुं स्थान-थाय छे. ('समोसरणाईति-समवसरणानि वसतयः ४ क्व भगवान् अवस्थितः इति जानीत-भगवान क्या-क्या मकानमां-ऊतर्या छे ते जाणो-उववाइय पृ. ६१) अने चोथो अर्थ त्रिगडु-समवसरणनी रचना-थाय छे. उक्त प्रणे अर्थों तद्दन सादा स्वाभाविक छे त्यारे आ चौथो अर्थ विशेष अलंकारवाळो छे. अहीं तो पीजो रहेठाण' अर्थ बंध बेसे एम छे...। ५९ सौधर्म स्वर्ग अने सुधर्मा सभाना नामनो निर्देश बौद्धग्रंथोमां पण आवे छे. जुओ भगवतीसूत्रनो मारो अनुवाद भाग २, पृ०१५ १२९-१३० टिप्पण. Jain Educationalimanal wwinelibrary.org Page #423 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार १३भगवान महावीर प्रत्ये सूर्याभदेवनी भक्ति [१३] भगवाननुं दर्शन करीने ते सूर्याभदेव हर्षवाळो, तोषवाळो अने आनंदित चित्तवाळो थयो तथा भगवान तरफ एना । मनमां प्रीति थई-परम सौमनस्य थयु. हर्षना आवेगथी तेनुं हृदय धबकवा लाग्युं, एनां कमळ जेवां उत्तम नेत्रो खीली उठ्यां, आनंदना वेगथी एनां उत्तम कडां बेरखां केयूर मुगट बन्ने कुंडलो अने सुंदर हारथी सुशोभित छाती-ए बधु चलायमान हलुंहलुं-थई गयुं. नीचे सुधी लटकता प्रलंबने अने कंपायमान थएलां बीजां आभूषणोने धारण करतो ते सूर्याभ देव भगवान महावीरने जोतां ज संभ्रम साथे त्वरा अने चपळतापूर्वक सिंहासनथी ऊभो थई गयो, पछी तेणे पादपीठ उपर चडी पादुकाओ-मोजडीओ-काढी नाखी अने तीर्थकरनी सामे सात आठ पगला जई डाबो धुंटण उंचो करी जमणो धुंटण धरणी उपर ढाळी मस्तकने प्रण वार धरणी उपर नमाव्यु. पछी जराक माथाने उंचु करी कडां अने बेरखांथी स्तब्ध थपली भुजाओने मेगी करी, दशे नख एक बीजाने अडे ए रीते बन्ने हथेळीओ साथे राखी शिरसावर्तपूर्वक मस्तके अंजलि जोडी ते आ प्रमाणे बोल्योः [१४] आदिकर, तीर्थकर [कं०७ पृ० १८ पं०२-] यावत् अजर अमर स्थानने प्राप्त थपला अरिहंत भगवंतोने नमस्कार थाओ, [१५] अजरअमर स्थानने मेळववानी वृत्तिवाळा श्रमण भगवान महावीरने नमस्कार थाओ, अहीं रहेलो हुं त्यां रहेला श्रमण भग-|| वान महावीरने वांदु छु, त्यां रहेला श्रमण भगवान महावीर अहीं रहेला मने जुप छः एम करीने ते सूर्याभ देव भगवानने वांदी नमी पाछो पूर्वाभिमुख थई सिंहासन उपर बेसी गयो. [२६] त्यार पछी ते सूर्याभ देवना आत्मामा २ चिंतनरूप, अभिलाषरूप आ-आ प्रकारनो मनोगत संकल्प-विचार-उत्पन्न थयाः | ६० चित्तमा खरेखरो हर्षनो उद्रेक था शरीर उपर ते उद्रेकनी जे असर थाय छे ते, आ कंडिकामा प्रत्यक्षवत् वर्णवेली छे. ६१ आ स्थळे सूर्याभ देवना मुखमां शकस्तवनो आखोय पाठ मूकवामां आव्यो छे पण ते सुप्रसिद्ध होवाने लीधे अहीं आपेलो नथी. ६२ एकज भावने बताववा पर्यायरूप अनेक शब्दो मूकत्रानी पद्धति सूत्रोमां प्रचलित छ, प्राचीन वैदिक वा बौद्धग्रंथोमांय तेवी वाक्यपद्धति Jain Educatintetional For Private Personel Use Only How.jainelibrary.org Page #424 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्नो सार ॥३६॥ [१७] "योग्य भवग्रहपूर्वक संयम अने तपथी आत्माने भावित करता श्रमण भगवान महावीर जंबूद्वीपना भारतवर्षमा आमलकप्पा १८भगवान नगरीनी बहार अंबसालवण चैत्यमा आवीने विहरे छे ते मारे माटे श्रेयरूप छे. महावीरना ___ "तेवा प्रकारना अरहंत भगवंतनां मात्र नाम गोत्र काने पडे तोपण ते महाफळरूप छे, तो पछी तेमनी सामे जवानो, तेमने वांद उतारावाळी वानो, नमस्कार करवानो, तेमनी पासेथी केटलाक खुलासा पूछवानो अने तेमनी उपासना करवानो प्रसंग मळे तो तो कहेवू ज शु? |जग्याने ___"आर्य पुरुषर्नु मात्र एक धार्मिक सुवचन काने पडे तोपण ते महाफलरूप छे, तो पछी नेमनी पासेथी विपुल अर्थ-उपदेश- स्वच्छ अने मेळववानो प्रसंग सांपडे तो तो कहेवु ज शु? सुगंधित "तो हुं श्रमण भगवान महावीरने वांदवा, नमवा, तेमनो सत्कार करवा, सन्मान करवा तथा कल्याणरूप मंगळरूप, चैत्यरूप अने करवा देवरूप श्रमण भगवान महावीरनी पर्युपासना करवा जाउं. सूर्याभदेवे "श्रमण भगवान महावीरनी ए पर्युपासना मारे माटे-जन्म-जन्मांतरमां हितकर, सुखकर, क्षमकर, कल्याणकर नीवडवानी छे आभियोअने नीवडशे": पम ते सूर्याभ देव विचार करे छे. प प्रमाणे गंभीरपणे विचारीने तेणे पोताना आभियोगिक देवोने बोलावी तेमने | १०गिक देवोने आ प्रमाणे कहां करेली [१८] "हे देवानुप्रियो ! पम छे के, योग्य अवग्रहने ग्रहण करी संयम अने तपथी आत्माने भावित करता श्रमण भगवान महा- आज्ञा वीर जंबूद्वीपना भारतवर्षमां आमलकप्पा नगरीनी बहार अंबसालवण चैत्यमां आवीने विहरे छे. तो हे देवानुप्रियो! तमे त्यां जाओ योजाएली छे. विवक्षित भाव उपर विशेष भार बताववा एक ज वाच्य माटे पण अनेक शब्दो मुकाता हशे, परंतु भाषामां एवं ठीक न जणायाथी आ अनुवादमा ए पद्धति स्वीकारी नथी. ६३ टीकाकार 'क्षम'नो अर्थ 'संगति' बतावे छे: (क्षमायxसंगतत्वाय-रायपसेणइय पृ.१०२ समिति) Jan Educati onal For Private Personal Use Only w.jainelibrary.org Page #425 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुनो सार अने अंबसालवण चैत्यमां विराजता श्रमण भगवान महावीरने त्रण प्रदक्षिणा करी तेमने वांदो, नमो अने पछी तमारां नाम अने गोत्रो तेमने कही संभळावो, तथा श्रमण भगवान महावीरना ऊतारानी आसपास चारे बाजु योजन- प्रमाण जमीनमां अपवित्र, सडेलां, दुर्गंधी तणखां, लाकडां, पांदडां के कचरो वगेरे जे कांद पड्यं होय तेने त्यांथी उठावी दूर करो अने ए जमीनने तद्दन चोक्खी करो. वळी, तेटली जमीन उपर सुगंधो पाणीनो छंटकाव एवी रीते करो जेथी त्यांनी ऊडती बधी धूळ बेसी जाय, बहु पाणीपाणी न थाय अने वधारे किच्चड पण न थाय. पछी, जेनी रज जरा पण ऊडती नथी एवी जमीन उपर जलज अने स्थलज पवां पांच प्रकारां सुगंधी पुष्पोनो वरसाद पवी रीते वरसावो के त्यां वधां पुप्पो चत्तां ज पडे, तेमनां डिंटियां नीचे रहे अने ए पुष्पो बधे जमीनथी उंचे एक एक जानु-हाथ सुधी उपराउपर खीचोखीच रहे. आ उपरांत ते जमीनने काळो अगर, उत्तम किनरु भने तुरु E ६४ भक्तोनुं अतिशय भक्तिथी आवेगवाळु हृदय एकवार तो कई कंइ कल्पनाओ करी बेसे छे अने पछी स्वस्थ थतां ते करेली कल्पनाओमां पोतानी ज बुद्धि ज्यारे विसंवाद ऊभो करे छे त्यारे तेनुं निराकरण करवा वळी बीजी केवी विचित्र कल्पनाओ करवी पडे छे, तेनो आ एक साररूप नमूनो नीचे प्रवचनसारोद्वार पृ. १०७ माथी अहीं ऊतारेलो छेः १० "भगवाननी समवसरणभूमिमां देवो पुष्पोनी वृष्टि करे छे. ए तो खरं, पण त्यारे ए पुष्पवाळी भूमिमां जीवदयाप्रधान जीवन गाळनारा साधुओ बेसे शी रीते ? पुष्पो उपर साधुओ बेसे तो ते विचारां मूगां पुष्पो कचराय - दुःख पामे अने कोई पण प्राणीने दुःख न देवाना बाळा साधुओ ए गरीब पुष्पोने दूभवे खरा ? आना जवाबमां केटलाक कहे छे के समवसरण भूमिमां वरसेलां पुष्पो सजीव ज होय छे एम नथी, निर्जीव पण होय छे एटले तेमना उपर बेसवाथी तेमने दुःख थवानो संभव नथी. केटलाकोए आपेलो आ उत्तर खरो छे एम प्रवचनसारोद्धारना टीकाकार नथीं मानता. तेओ तो कहे छे के त्यां वरसेला बधांय पुष्पो निर्जीव नथी होतां, सजीव पण होय छे, त्यारे १५ हवे त्यां साधुओने बेसवानुं केम थाय ? आ माटे वळी कोइ बीजा बीजो ज जवाब शोधी काढे छे के ज्यां ज्यां साधुओ बेसवाना होय छे Jain Education Inmanal ॥३७॥ www.ainelibrary.org Page #426 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुतनो सार ॥३८॥ कना सुगंधी धूपथी मधमधित करो अने प रीते ए भूमिने सर्व प्रकारे दिव्य करो-ज्यां उत्तम देव आवी शके एवी सुंदरमां सुंदर सुगंधीमां सुगंधी अने पवित्रमां पवित्र बनावो आम करी कारवीने पछी मने शीघ्र समाचार पण आपो. " [१९] आभियोगिक देवोए 'श्रीमान देव जे कहे छे ते बराबर छे' पम कही सूर्याभदेवनी ए आशाने सहर्ष विनयपूर्वक हाथ जोडीने स्वीकारी अने पछी सेओ ईशानकोण तरफ जवा नीकळ्या. ईशानकोण तरफ जई वैक्रियसमुद्घात" वडे तेमणे संख्येय योत्यां सजीव पुष्पोनी दृष्टि नथी थती पण निर्जीवनी थाय छे. प्रस्तुत टीकाकारनी नजरमां तेमनो आ उत्तर पण बराबर नथी. टीकाकार कहे छे के समवसरणभूमिमा बेसवा आवता साधुओ कांइ लाकडानी पेठे हाल्या चाल्या विना बेसी ज रहे छे एम नथी, तेओ तो त्यां जावआव पण करे छे, एटले रस्तामां आवत सजीव पुष्पो कचरावानां अने दुःखी थवानां तेनुं शुं ? आ बधी हकीकत ध्यानमा लई प्रवचनसारोद्वारना टीकाकार एक तद्दन विलक्षण जवाब घडी काढे छे अने ते आ छेः समवसरण भूमिमां वरसेलां पुष्पो सजीव होय छे, ए वात खरी किंतु परमकारुणिक तीर्थंकर भगवाननो एवो प्रभाव छे के जेने लीधे ते पुष्पो कचरातां छताय लेश मात्र त्रास अनुभवता नथी, दलढुं जाणे ते पुष्पो अमृतरसथी सींचात होय एवो आनंद अनुभवे छे अंतमां टीकाकार कहे छे के अमारो आ उत्तर बधाय गीतार्थ पुरुषोने संमत छे." १० आ विशे अनुवादकनो विशेष कहेवानो अधिकार नथी. ६५ आ क्रियानुं वास्तविक स्वरूप समजातुं नथी. जैन सूत्रोमा आ विशे माहिती तो घणी मळे छे पण आ क्रिया अनुभव बहारनी थइ जवाथी ए माहिती शब्दस्पर्श उपरांत बीजं कशुं बतावी शकती नथी. योगीओ पोतानां शरीरमां धारे एवो फेरफार करी शके हो एम संभळाय छे, तेम देवा पण तेमने भ्यां ज्यां जवुं होय ते ते स्थानने योग्य पोतानां शरीरो बनाववामां आ क्रियानो उपयोग करे छे एम आगमबचन कहे छे. पातंजल योगशास्त्र प्रसिद्ध 'निर्माणकाय'नी क्रिया जेवी आ समुद्घातनी क्रिया लागे छे अने ते एक प्रकारनी शक्तिरूप १५ छे. आगम तो कहे छे के ते क्रिया मानवोमां पण संभवी शके छे पण तेने केम मेळवावी - सिद्ध करवी ए बाबत विशेष जणावेलुं नथी. Jain Education interational १९ अभियोगिक देवो भक्तिपूर्वक भगवान पासे आव्या jainelibrary.org Page #427 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ६ जन लांबो दंड काढ्यो अर्थात् ५ द्वारा ते देवोए रत्न, वज्र, धैडूर्य, लोहिताक्ष, मसारगल्ल, हंसगर्भ, पुद्गल, सौगंधिक, ज्योतिरस, अंजनपुलक, अंजन, रजत, जातरूप, अंक, स्फटिक अने रिष्टनां मोटा-जाडां पुद्गलो दूर करी सूक्ष्म पुद्गलो लीधां. पछी फरी पण २०भगवान वैक्रियसमुद्घात करी तेमणे पोतानां उत्तर वैक्रियरूपो बनान्यां. आ रीते तेओ-आभियोगिक देवो-पोतानां रूपोने बनावी घणीज | अने अभित्वरावाळी, विशेष वेगवाळी अतिशय शीघ्रतावाळी, वधुमां वधु चपलतावाळी, प्रचंड दिव्य गतिथी तीरछी दिशामा जवा उपड्या. योगिक असंख्य द्वीप अने समुद्रोनी बच्चोवच्च थता तेओ जंबूद्वीपना भारतवर्षमां आयी पहोंच्या. पछी त्यां आमलकप्पा नगरीनी यहार जे | देवोनो तरफ अंबसालवण चैत्यमां श्रमण भगवान महावीर बिराज्या हता ते तरफ जई ते आभियोगिक देवोप भगवान महावीरनी फरती | वार्तालाप प्रण प्रदक्षिणा करी, तेमने वांद्या, नमस्कार कर्यों अने पछी तेओ आ प्रमाणे बोल्याः ___ "हे भगवान ! अमे सूर्याभदेवना भाभियोगिक देवो छीए, आप देवानुप्रियने बांदीए छीप, नमीए छीप, सत्कारीप छोए, सन्मा- I n नीए छीए अने कल्याणरूप, मंगळरूप, देवरूप अने चैत्यरूप पवा आप देवानुप्रियनी पर्युपासना करीप छीए." [२०] 'हे देवो' एम कद्दीने श्रमण भगवान महावीरे ते देवोने आ प्रमाणे काः "हे देवो! ए पुरातन छे, हे देवो! ए कृत्यरूप छे, हे देवो! ए करणीयरूप छे, हे देवो! आचीर्ण छे, अने हे देवो! ए संमत मनापलुं छे के भवनपति, चानव्यंतर, ज्योतिषिक अने वैमानिक देवो अरहंत भगवंतोने बदि छे, नमे छे अने तेम करी पोतपोतानां नामगोत्रो कही संभळावे छे. हे देवो! ए पुरातन पद्धति छे अने ते सम्मत थपली छे." गरम प्रदेशनो मानव ठंडा प्रदेशमां जाय त्यारे ते पोताना शरीर उपर गरम कपडा पहरे छे, ओढे छे, तेम देवसृष्टिमा रहेनारा लोको ज्यारे मानवसृष्टिमां आवे छे त्यारे तेमने पोतानां शरीरनी रचना बदलवी पडती हशे एम आगमवचन उपरथी लागे छे. आ विशे विशेष १५ तर्क जइ शकतो नथी, तेमज तेम करवाना अर्थात् शरोरपरिवर्तनना कारण संबंधे पण कशु कही शकातुं नथी. Jain Educati o nal For Private Personal Use Only How.jainelibrary.org Page #428 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥४०॥ [२१] त्यारपछी, श्रमण भगवान महावीरे जेमने उक्त रीते कहेलु छे पवा ते आभियोगिक देवो हर्षित थया अने यावत् प्रफुल्ल हुदयवाळा थया. तेमणे श्रमण भगवानने वांदी नमी उत्तरपूर्वना खूणा तरफ जई वैक्रियसमुद्घात कयों, ते द्वारा संख्येय योजन लांबो २१भूमंडल दंड काढयो अर्थात् ए समुद्घातद्वारा ते देवोए मोटां-जाडां-पुद्गलोने दूर करी सूक्ष्म पुद्गलो लोधां. पछी फरी पण वैक्रियसमुद्घात स्वच्छ कयु करी ते देवोप संवर्तक वायनी रचना करी अने ते वायद्वारा श्रमण भगवान महावीरनो जे स्थळे ऊतारो हतो ते स्थळनी आसपास चारे बाजु एक योजन सुधीमा जे काइ अपवित्र-सडेलां, दुर्गधी तणखलां, लाकडां, पांदडां के कचरो वगेरे पडयुं हतुं ते वधुं| त्यांथी उठावी दूर करी योजनप्रमाण भूमंडलने स्वच्छ कयुः [२२] वळी, फरीवार वैक्रियसमुद्घात करी ते द्वारा ते देवोए पाणीभरेलां वादळनी रचना करी. जेम कोइ कुशळ छंटारो पाणी६६ मूळमां आ स्थळे वाळीझूडीने साफ करवा बाबत नीचेनुं उदाहरण मूकेलं छे. जेम एक कोइ झाडुवाळानो छोकरो होय-ते जुबान बळवान निरोगी स्थिर बांधानो साफसूफीनी कळामा सिद्धहस्त लांबा अने सीधा | हाथवाळो होय, कूदq टपो जवु वगेरे क्रियामां कुशळ होय, अने वळी मेघावी दक्ष तथा वाग्मी होय, एवो ते छोकरो पोताना हाथमां एक मोटी दंडसंपुच्छनी शलाकाहस्तका के वेणुशलाकामयी अर्थात् एक मोटी सावरणी लइ कोइ राजाना आंगणाने के अंतःपुरने धीरे धीरे साफ करे वा देवळने सभाने परबने आरामने के उद्यानने वाळवा मंडे तेम ए आभियोगिक देवोए ते संवर्तक वायुद्वारा ए भूमिभागने वाळी झूडीने साफ कयों. (मोटा दांडावाळी सावरणी ते दंडसंपुच्छनी. जेना हाथामां सळीओ जडेली छे ते शलाकाहस्तका अने वांसडानी सळीओथी बनेली सावरणी ते वेणुशलाकामयी-आ बधां जुदी जुदी सावरणीनां नामो छे). ६७ आ उपरथी एम लागे छे के पाणी वरसाववा माटे कृत्रिम वादळांनी रचना प्राचीन समयमां थती हशे. आ युगना वैज्ञानिको पण १५ । एवी कोइ चोकस फळवती शोध पाछळ मंड्या छे खरा. अने तेमां तेओ थोडे घणे अंशे फाव्या पण छे. a l For Private Personal Use Only Jain Education wwdainelibrary.org Page #429 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार Jain Educatio भरेला मोटा घडाद्वारा कोई बगीचाने छांटे अने तेने शांतरज- शीतळ करे तेम ते देवोप प पाणीभरेलां वादळद्वारा प स्वच्छ करेल भूमंडळ उपर सुगंधी पाणी वरसावी-छांटी त्यां उडती धूळने बेसारो दीधी-तेने शांतरज-शीतळ बनावी दीधुं. पाणीने वरसावतो मेघ जेम गाजे छे अने वीजळीथी झबके छे तेम ते देवोए रचेलुं प पाणीभरेलुं वादळ पण पाणीने वरसावतुं गाजतुं हतुं अने वीजळीथी चमकतुं हतुं. [२३] वळी, श्रीजीवार वैक्रियसमुद्धात करी ते द्वारा ते देवोप फूलभरेलां वादळनी रचना करो. जेम कोइ माळीनो कुशल युवान पुत्र फूलभरेली चंगेरीओद्वारा राजसभाने पुष्पोथी मघमधित करी दे तेम ते देवोप मेघनी पेठे गाजता अने वीजळीथी झवकता ए फूलभरेलां वादळद्वारा पाणीथी सुगंधित करेली ए भूमि उपर पांच प्रकारनां पुष्पोने वरसावी तेने चारे वाजुथी महेक महेक करी मूकी अने जमीनथी उंचे एकपक जानु-हाथ सुधी उपराउपर पुष्पोथी खीचोखीच भरी दीधी. ते पुष्पो पण तेमणे एवी रीते वरसाव्यां के दरेक पुष्पनुं डिटियुं नीधुं रहे अने कळीभोवाळो भाग उपर रहे. २२ भूमंडल उपर पाणी छांट२३ फूलो वरसाव्यां ॥४१॥ त्यारपछी, पुष्पोथी मघमघता प भूमंडळने केम जाणे सुगंधनो महासागर न बनाववो होय तेम ए देवोप त्यां चारे बाजु उत्तम १० काळो अगर, उत्तम किनरु अने तुरुक्कनो सुगंधी धूप मूकी तेने घणुं ज सुगंधित करी मूक्युं अने एवी रीते करी ते स्थळे देवो पण आवी शके एवं तेने आकर्षक बनावी दीधुं. [२४] हवे आ बधुं भूमिशुद्धिने लगतुं काम फ्तावी ते देवो श्रमण भगवान महावीर तरफ आव्या, त्यां आवी तेमने वांदी नमी त्यांथी पोताना स्थान भणी जवा नीकळ्या. जे जातनी वेगवती प्रचंड गतिथी तेओ आव्या हता ते ज गतिद्वारा जता तेभ सौधर्मकल्पने सत्वर पहोंची गया. त्यां जे तरफ सूर्याभनामनुं विमान हतुं अने सुधर्मा सभामां से तरफ सूर्याभदेव विराजेलो हतो त्यां जई तेमणे सूर्याभदेव तरफ विनयपूर्वक हाथ जोडी माथु नमावी 'सूर्याभदेवनो जय थाओ विजय थाओ' पयो प्रघोष कर्यो अने तेमणे सेने जणावयुं के "हे महाराज ! आपे अमने भगवान महावीरना ऊतारानी आसपासना भूमंडळने शुद्ध अने सुगंधित करवानी w.jainelibrary.org Page #430 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुचना सार ॥४२॥ जे आशा आपी हती ते प्रमाणे अमे बधु करी आव्या छीए अर्थात् आपे आपेली आज्ञा अमे हवे आपने पाछी सोंपीप छोए." I [२५] त्यारपछी ते सूर्याभदेव, ए आभियोगिक देवो पासेथी तेमणे कहेली उक्त हकीकतने सांभळीने-अवधारीने हर्षित थयो, तुष्ट || थयो यावत् प्रफुल्ल हृदयवाळो थयो. त्यारबाद तेणे पोताना सेनापति देवने बोलावीने आ प्रमाणे कद्यः "हे देवानुप्रिय! सूर्याभविमानमां आवेली सुधर्मा सभामां एक मोटी सारा रणकारावाळी घंटा टांगेली छे, जेनो घेरावो योजनप्रमाण छे अने जे मेघनी पेठे गंभीर अने मधुर रणको करे छे ते घंटाने तुं शीघ्र उलाळतो उलाळतो-उंचा उंचा घोषथी उद्घोषण करतो करतो आ हकीकतने जाहेर करः हे देवो! सूर्याभविमानमा रहेनारा प्रत्येक देवदेवीओने सूर्याभदेव आज्ञा करे छे के हे देवो! जंबूद्वीपना भारतवर्षमा आवेली आमलकप्पा नगरीना अंबसालवण चैत्यमां श्रमण भगवान महावीर समोसर्या छे, तेने वांदवा माटे सूर्याभदेव जनार छे तो हे देवानुप्रियो! तमे पण तमारी सर्व शोभा-ऋद्धि-समृद्धि साथे अने पोतपोताना परिवार साथे संपरिवृत थई पोतपोतानां यानविमान उपर चडी तेनी साथे जवा तैयार थाओः आ माटे विलंब न करतां वखतसर तमे वर्धा सूर्याभदेवनी समक्ष हाजर थई जाओ." [२६] ए प्रकारनी आशा करवानी सूर्याभदेवनी सूचना सांभळीने ते सेनापतिदेव हर्षित थयो अने ते-आशा करवानी सूचनाने तेणे विनयपूर्वक स्वीकारो. पछी ते सेनापतिदेव सूर्याभविमानमा आवेली सुधर्मा सभामां आव्यो अने ज्यां ते मोटी सारा रणकारावाळी अने घगाडतांज मेघनी पेठे गाजती एवी योजनप्रमाण घेरावावाळी घंटा टांगेली छे त्यां जई तेणे तेने त्रण वार उलाळी. प घंटाने त्रण वार उलाळतां ज सूर्याभविमानमा एक मोटो जबरदस्त अवाज थयो, ते अवाज थतां ज ते विमानमा रहेला बधा महेलो अवाजना पडछंदाथी गाजी उठ्या." ६८ वधारेमा वधारे दुर बार योजनथी आवनारो शब्द आपोआप श्रोत्रग्राह्य थइ शके छे पण तेथी वधारे दूरथी आवतो शब्द कोइ बीजा साधन विना एनी मेळे-आपोआप-श्रोत्रग्राह्य थइ शकतो नथी. एवो श्रोत्रंद्रियना विषयने लगतो साधारण नियम जैनशास्त्रमा छे. अहीं सूर्याभदेव तरफथी पोताना | ताबाना देवोने पो. तानी साथे | भगवंतने वांदवा आववानी आज्ञा १० Jain Education manal For Private & Personel Use Only www.lainelibrary.org Page #431 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्नो सार ॥४३॥ ए महेलोमां रहेनारा देवो अने देवीओ परस्पर क्रीडामां मशगुल हर्ता, रतिमां आसक्त हतां अने अनेक प्रकारना विलासोमां तल्लीन हतां; ते बधां ए घंटानो अवाज सांभळी एककान थइ गयां, घंटानो अवाज सांभळी ते बाने कुतूहल थयुं. घंटानो अवाज शांत थया पछी ते देवो अने देवीओए 'सौए भगवान महावीरने वांदवा माटे जनारा सूर्याभदेव साथे जवा तैयार थर्बु अने बराबर वखतसर पोतपोतानां वाहन-यानो साथे सूर्याभदेवनी समक्ष हाजर थर्बु' एवी ए सेनापतिदेवे सूचवेली सूर्याभदेवनी आज्ञाने ध्यानपूर्वक सांभळी. [२७] सेनापतिदेवे संभळावेली सूर्याभदेवनी आज्ञाने सांभळीने ए बधां देवो अने देवीओ हर्षित थयां. एमांना केटलांकने तो भगवान महावीरने वांदवानी वृत्ति थइ आवी, केटलांक तो भगवान महावीरने पूजवा माटे उत्सुक थई गयां, केटलांकने भगवान तरफ सत्कारनो भाव उपज्यो, केटलांक भगवंत तरफ सन्मानवृत्तिवाळां थयां, केटलांक मात्र कुतूहळवृत्तिथी ज भगवाननी पासे जवाने तैयार थवा लाग्यो, केटलांकने पम थयं के भगवान पासे जशु तो जे आजसुधी नथी सांभळ्यं तेवं नवं सांभळशः केटलांक एवं विचारवा लाग्यो के भगवान पासे जशुं तो अर्थाने, हेतुओने, प्रश्नोने, कारणोने अने व्याकरणोने पूछवानो प्रसंग मळशे. बीजां केटलांक मात्र सूर्याभदेवनी आज्ञानी खातर ज तैयार थवा मांड्यां. केटलांक वळी परस्परना अनुरागथी भगवान पासे जवानी तैयारी सूर्याभदेवन विमान लाख योजननुं बतावेलं छे, तेमांनी सुघोषा घंटा योजनना घेरावावाळी छे, ते घंटा वगाड्या पछी तेना शब्दनो रणको लाख योजनना ए आखाय विमानमा पहेांची गयानु जणावेलु छे; पण एबुं बने शी रीते ? उपर्युक्त साधारण नियम प्रमाणे तो बार योजन करतां वधारे छेटेथी आवतो शब्द कोइ पण बीजा साधनना उपयोग विना एनीमेळे श्रोप्रग्राह्य थइ शकतो नथी, तो पछी ए घंटानो रणको लाख योजन प्रमाणवाळा विमानमा बधे शी रौते पहोंची शक्यो हशे ? टीकाकार पोते आवी शंका उठावे छे अने तेनुं समाधान आपता ते पोते ज कहे छे के ए तो बधुं देवना प्रभावथी बनी शके छे, माटे ए विशे कोइ तर्क के शंकाने अवकाश नथी. [विवरण पृ० ७१५०१०] Jain Education Interling For Private Personel Use Only Law.olnelibrary.org Page #432 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुचनो सार ॥४४॥ करवा लाग्यो, केटलांक जिनभक्तिना रागने लीधे अने केटलांक भगवान पासे जवानो पोतानो धर्म छे, आचार छे, पम समजीने सज थवा लाग्यां. आ प्रमाणे अनेक प्रकारनी वृत्तिथी उत्साहित थपला ते देवो अने देवीओ पोतपोतानी ऋद्धि समृद्धि अने परिवार २८ एक साथे तैयार थइ पोतपोताना यान विमान सज्ज करी घरावर वखतसर सूर्याभदेवनी समक्ष हाजर थयां. मोटा यान4 [२८] पोते करेली सूचना प्रमाणे बरावर बखतसर हाजर थएला ते देवो अने देवीओने जोइने सूर्याभदेव खुशखुश थइ गयो. विमानने पछी तेणे पोताना आभियोगिक देवोने बोलावीने आ प्रमाणे काः 'हे देवानुप्रियो! लाख योजनमा विस्तारवालु एक भोटुं यान ५ रचवानी विमान तमे जलदी तैयार करी, ए मोटा विस्तारवाळा यानमां सेंकडो स्तंभो गोठववाना छे, एमां जात जातना हावभाववाळी अनेक आज्ञा फूतळीओ जडवानी छे; ज्यां त्यां शोभे ए रीते वरु, वृषभ-बळद, घोडा, मनुष्य, मगर, पक्षी सर्प के वाघ, किन्नर, शरभ चमरी गाय, हाथी, वनवेलो अने कमळवेलो, ए बधुं चीतरवार्नु छ, थांभलाओ उपर वज्रनी वेदिकाओ बनाववानी छे, विद्याधर अने विद्याधरीनुं जोडलं जेमा फरतुं देखाय एवां अनेक यंत्रो ते विमानमां गोठववानां छे, हजारो किरणोथी सूर्यनी पेठे झगारा मारे एबुं हजारो रूपकोथी युक्त पर्बु ते विमान रचवानुं छे, अने जोनारनी आंखने शीतळ करे एवं, अडकनारना हाथने सुख उपजावनालं, १० देदीप्यमान, सुंदर, देखावडु, टांगेली अनेक घंटडीओना मधुर रणकारावाळु, दिव्य प्रभाववाढु अने वेगवाळी गतिवाळु ए, ए यान विमान शीघ्र तैयार करवानुं छे. हे देवो! तेवा ते यान विमानने तैयार करीने तमे मने जलदी समाचार आपो." [२९] आभियोगिक देवोने सूर्याभदेवे पूर्वोक्त प्रकारच् यान विमान बनाववानी आज्ञा करी तेथी तेओ खुश थया अने ए आज्ञाने नेमणे विनयपूर्वक माथे चडावी. पछी तेओ उत्तरपूर्वना खूणा तरफ गया, त्यां जईने तेमणे वैक्रियसमुद्घात कर्यो अने ते द्वारा संख्येय योजन लांबो दंड काढ्यो, जाडा पुद्गलोने मूकी सूक्ष्म पुद्गलोने लीधां, वळी फरीवार पण वैक्रियसमुद्घात कों अने पछी ते आभिः योगिक देवो दिव्य एवा ते विमान बनाववानी प्रवृत्तिमा लागी पडया. ६९ जुओ टिप्पण ५५ मुं. पृथ्वीपरना लोको अने पृथ्वीथी विशेष ऊंचे रहेता देवो ए बन्नेना मानसमां झाझो फेर जणातो नथी.. For Private Personel Use Only Jain Education internal witljainelibrary.org Page #433 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो ...सार [३०] ते देवोए ए दिव्य यान-विमाननी त्रण बाजुए प्रण मोटा सुंदर सोपान गोठव्यां, एक सोपान पूर्वमां, बीजु दक्षिणमां अने चीजें उत्तरमां. ते सोपानोनी भोंय वज्रमय बनावी तेनां प्रतिष्ठानो रिष्टरत्नोनां बनाव्यां, टेका माटे मूकेला स्तंभो वैडूर्यरत्नमांथी घडया, | ३०-यानसोपानोनां पाटियां सोनारूपामय रच्या, कठेडामां आवेली सूईओ (सळियाओ) लोहिताक्षरत्नोमांथी नीपजावी सांधाना भागो वज्रथी विमाननी जड्या, अवलंबनोने अनेक प्रकारनां मणिओमाथी बनाव्यां, अवलंबन बाहुओने-सोपानोनी बन्ने बाजुनी कठेडावाळी भींतोने पण मणि- रचनानं ओमाथी ज रच्या. आ प्रकारे ते देवोए यान-विमाननी त्रण बाजुए मूकेला सोपानो अति आकर्षक, जोनारना चित्तने प्रसाद उपजावे ५ वर्णन पां अने घणां मनोहर बनाव्या. ___ [३१] ते त्रणे सुंदर सोपानोनी आगळ सुंदर तोरणो बांध्यां. ते तोरणो पण चंद्रकांत अने सूर्यकांत वगेरे अनेक मणिओथी भरेला हता, मणिमय स्तंभो उपर गोठवेला होवाथी निश्चल हता, तेमां विविध प्रकारनां मोतीओ मूकीने अनेक प्रकारनी भातो पाडेली ॥४५॥ हती, हाथी, घोडा, मगर, पक्षी, वनवेलो अने कमळवेलो वगेरे अनेक प्रकारनां चित्रो प तोरणोमा कोरेला हतां, फरती पूतळी जेवां यंत्रो पण पमा भरेला हतां अथवा गोठवेलां हता, ए बधां तोरणो खूब प्रकाशमान हतां, जोनारनी आंखने, अडकनारना हाथने सुख उपजावे पवां प्रासादिक हतां. [३२] वळी, ते तोरणोनी उपर ते आभियोगिक देवोए साथीओ, श्रीवत्स, नंदावर्त, वर्धमानक, भद्रासन, कलश, मत्स्य-माछली अने दर्पण ५ आठ आठ मंगलो गोठव्यां, उपरांत वज्रमांथी बनावेली डांडीवाळां काळां चामर, घोळां चामर वगेरे अनेक रंगनां चामरोनी धजाओ पण ते तोरणो उपर लटकावेली हती. वळी, ते तोरणो उपर, छत्र उपर छत्र होय ते घाटे अनेक छत्रो, ए प्रमाणे अनेक घंटडीओ, पताकाओ, सर्व रत्नमय उत्पलना, कुमुदना, नलिनना, सो पांखडीवाळा कमळना अने हजार पांखडीवाटा कमळना अनेक 24/ गुच्छाओ गोठवेला हता... [३३] हवे ते आभियोगिक देवो, प सोपानो अने तेने लगती बीजी बधी सुंदर रचना पूरी करी ते दिव्य यान-विमाननी अंदरना Jain Educationalcional For Private 8 Personal Use Only iw.jainelibrary.org Page #434 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राय पसेणइय सुचन सार ॥४६॥ भूमिभागने सुंदरमां सुंदर रीते सजाववानी प्रवृत्तिमां लागी गया. ते दिव्य यान- विमानन अंदरनो भूमिभाग, ते देवोप सर्व प्रकारे सम बनाव्यो हतो. जेम मुरजनो उपरनो भाग, मृदंगनो उपरनो भाग, सरोवरनो उपरतळनो भाग, हाथनी हथेळीनो भाग, चंद्रना मंडळनो भाग, सूर्यना मंडळनो भाग, आरीसानो उपरनो भाग जेवो सर्व प्रकारे सरखो होय छे-क्यांय ऊंचो नीचो नथी होतो, ए प्रकारे ते विमाननी अंदरनो भूभाग सर्व प्रकारे सम करेलो हतो. वळी, जेम घेटानुं, बळदनुं, वराहनुं, सिंहनुं, वाघनुं, हरणनुं, बकरानुं, अने दीपडानुं चामडुं सर्व बाजुओथी शंकु शंकु जेवडा खीलाओ ५ भरावी खेचतां जेवुं एकसरखं थई जाय छे तेवो ते विमाननो अंदरनो भूभाग सम बनावेलो हतो. ते भूभागमां, काळा, नीला, राता, पीळा अने धोळा एवा अनेक मणिओ जडेला हता. तेमांना केटलाक आवर्तवाळा, प्रत्यावर्तवाळा, श्रेणि अने प्रश्रेणिवाळा हता, केटलाक वळी स्वस्तिक जेवा, पुष्यमाणव जेवा, शरावसंपुट जेवा हता. ते मणिओमां बीजा केटलाक माछलानां इंडां जेवा अने मगरनां इंडां जेवा जणाता हता. केटलाक मणिओमां फूलवेल, कमळपत्र, समुद्रतरंग, वासंतीलता, कमळवेल वगेरे जेवां घणां बीजां सुंदर चित्रो कोरेलां होय एम देखातुं हतुं ते भूभागमां जडेला बधा मणिओ भारे चकचकाटवाळा, अनेक किरणोवाळा, उत्कट १० प्रभावाळा अने तेजना अंबारथी भरेला हता. [३४] प मणिओमां जे काळा मणि हता ते मेघ जेवा, आंजण जेवा, दीवानी मेश जेवा, काजळ जेवा, पाडाना शिंगडा जेवा, पाडाना शिंगडामांथी बनावेली गोळी जेवा, भमरा जेवा, भमरानी हार जेवा, भमरानी पांखना सारभाग जेवा, जांबूडा जेवा, काग| डाना नाना बच्चा जेवा, कोयल जेवा, हाथीना बच्चा जेवा, काळा साप जेवा, काळा बकुल जेवा, शरद ऋतुना वादळा जेवा, काळा अशोक जेवा, काळी कणेर जेवा अने काळा बपोरीया जेवा काळा हता. Jain Education intentional प्र० - शुं ते काळा मणिओ, ए आपेली उपमाओ जेवा ज खरेखर काळा हता ? उ०- अर्थ समर्थ नथी अर्थात् हे आयुष्मन् श्रमण ! ए तो मात्र उपमाओ छे; पण ते काळा मणिओ तो ते बधी उपमाओ १५ w.jainelibrary.org Page #435 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥४७॥ करता क्यांय वधारे इष्टतर, सरस, मनोहर, अने मनोज्ञ काळा वर्णवाळा हता. [३५] ए मणिओमां जे नीला मणि हता ते भृङ्ग जेवा, भृङ्गनी पांख जेवा, पोपट जेवा, पोपटनी पांख जेवां, चाप पक्षी जेवा, | चाषना पीछा जेवा, गळी जेवा, गळीना अंदरना भाग जेवा, गळीनी गोळी जेवा, सावा जेवा, *उच्चंतक दंतराग जेवा, वनराइ जेवा, बळ देवे पहेरेला लीला कपडा जेवा, मोरनी डोक जेवा, अळसीना फूल जेवा, बाणना फूल जेवा, अंजनकेशीना फूल जेवा, लीला कमळ जेवा, लीला अशोक जेवा, लीला वपोरीया जेवा, अने लीली कणेर जेवा लीला हता. प्र०-शु ते मणिओ, ए आपेली उपमाओ जेवा ज खरेखर लीला हता? उ०-५ अर्थ समर्थ नथी अर्थात् हे आयुष्मन् श्रमण ! ए तो मात्र उपमाओ छे; पण ते लीला मणिओ तो ते बधी उपमाओ | करतां फ्याय बधारे हएतर, सरस, मनोहर अने मनोज्ञ लीला वर्णवाळा हता. [३६] ए मणिओमा जे राता मणि हता ते घेटाना लोही जेवा, ससलाना लोही जेवा, माणसना लोही जेवा, वराहना लोही जेवा, पाडाना लोही जेवा, नाना इंद्रगोप जेवा, उगता सूर्य जेवा, संध्याना लाल रंग जेवा, चणोठीना अडधा-लाल भाग जेवा, जासूदना फूल जेवा, केसुडाना फूल जेवा, पारिजातकना फूल जेवा, उंचा हिंगळोक जेवा, परवाळा जेवा, परवाळाना अंकुर जेवा, लोहिताक्षमणि जेवा, लाखना रस जेवा, कृमिना रंगथी रंगेला कामळा जेवा, चीणाना लोटना ढगळा जेवा, राता कमळ जेवा, राता अशोक जेवा, राती कणेर जेवा अने राता धपोरीया जेवा राता हता. प्र०-शु ते राता मणिओ, ए आपेली उपमाओ जेवा ज खरेखर राता हता? उ०-ए अर्थ समर्थ नथी अर्थात् हे आयुष्मन् श्रमण! ए तो मात्र उपमाओ छे; पण ने राता मणिओ तो ते वधी उपमाओ | ७० आनो अर्थ समजातो नथी, पण गळो जेवा रंगनो ते कोइ पदार्थ होवो जोइए एम एना प्रसंग उपरथी जणाय छे. आजकाल पण घणा लोको दांतने काळा रंगे छे, संभव छे के, ए काळा रंग माटे आ 'उच्चंतक' शब्द वपरायो होय ? १० Jain Educalanmal rebrang Page #436 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥४८॥ करतां क्यांय वधारे इष्टतर, सरस, मनोहर अने मनोश राता वर्णवाळा हता. [३७] ए मणिओमां जे पीळा मणि हता ते सोनाचंपा जेवा, सोनाचंपानी छाल जेवा, सोनार्चपाना अंदरना भाग जेवा, हळदर जेवा, हळदरनी अंदरना भाग जेवा, हळदरनी गोळी जेवा, हरताळ जेवा, हरताळनी अंदरना भाग जेवा, हरताळनी गोळी जेवा, चिकुर जेवा, चिकुरना रंग जेवा, उत्तम सोना जेवा, उत्तम सोनानी रेखा जेवा, वासुदेवे पहेरेला पीळा कपडा जेवा, अल्लकीना फूल जेवा, चंपाना फल जेवा, कोळाना फल जेवा, आवळना फल जेवा, घींसोडीना फूल जेवा, सोनेरी जुईना फल जेवा, सुहिरण्यना फूल जेवा, कोरंटक फूलनी उत्तम माळा जेवा, बीयाना फूल जेवा, पीळा अशोक जेवा, पीळी कणेर जेवा, अने पीळा बपोरीया जेवा | पीळा हता. प्र०-शुंते पीळा मणिओ, ए आपेली उपमाओ जेवा ज खरेखर पीळा हता? उ०-अर्थ समर्थ नथी अर्थात् हे आयुष्मन् श्रमण ! ए तो मात्र उपमाओ छे पण ते पीळा मणिओ तो ते बधी उपमाओ करता क्याय वधारे इष्टतर, सरस, मनोहर अने मनोश पीळा वर्णवाळा हता. [३८] ए मणिओमा जे धोळा मणि हता ते अंक रत्न जेवा, शंख जेवा, चंद्र जेवा, कुंदना फूल जेवा, शुद्ध दांत जेवा, कमळ उपरना पाणीना मोतीया जेवा, शुद्ध पाणीना बिंदु जेवा, दही जेवा, कपूर जेवा, गायना दूध जेवा, हंसोनी श्रेणि जेवा, क्रौंचोनी श्रेणि जेवा, हारोनी श्रेणि जेवा, चंद्रोनी श्रेणि जेवा, शरद्क्रतुना मेघ जेवा, धमेला अने चोक्खा करेला रूपाना पतरा जेवा, चोखाना लोटना ढगला जेवा, कुंदना फलना ढगला जेवा, कुमुदना ढगला जेवा, वालनी सूकी शिंगो जेवा, मोरपींछनी वच्चे आवेला चंद्रक जेवा, बिसतंतु जेवा, मृणालिका जेवा, हाथीदांत जेवा, लवंगना फल जेवा, पुंडरीक कमळ जेवा, धोळा अशोक जेवा, धोळी कणेर १५ जेवा अने धोळा बपोरीया जेवा ऊजळा हता. प्र०-शुं ते धोळा मणिओ, प आपेली उपमानो जेबा ज खरेखर ऊजळा इता? Jain Education meal Page #437 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार Jain Education Interation उ०- ए अर्थ समर्थ नथी अर्थात् हे श्रमणायुष्मन् ! प तो मात्र उपमाओ हे; पण ते घोळा मणिओ तो ते बधी उपमाओ करतां क्यांय वधारे इष्टतर, सरस, मनोहर अने मनोश धोळा वर्णवाळा हता. [३९] दिव्य यान- विमाननी अंदरना भूभागमां अनेक रंगवाळा चकचकित जे मणिओ जडेला हता ते मात्र देखावमां सुंदर हता पटलं ज नहि पण सुगंधी " पण हता. प मणिओमांथी पधी सरस सुगंध फेलाती के जाणे प भूभागम कोष्ठोनां, तगरनां, पलानां, सुगंधी चूआनां, चंपानां, दमणानां कुंकुमनां, चंदननां, सुगंधी वाळानां, मरवानां, जाइनां, जूइनां, मल्लिकानां, स्नानमल्लिकानां, केतकीनां, पाटलनां, नवमालिकानां, अगरमां, लवंगनां, कपूरनां वासकपूरनां पुटो-पडिआओ-अनुकूळ हवामां चारे बाजु गंध फेलाय प रीते खुल्लां पडेलां न होय, अथवा त्यां प सुगंधी द्रव्योमांनां खांडवा जेवां द्रव्यो खंडातां न होय, वेरातां न होय, एक वासणमांथी काढी बीजा वाणमां भरातां न होय, ए जातनी उदार, मनोश, मनहर अने घ्राणने तथा मनने शांति आपनारी सुगंध प भूभागमांथी चारे बाजु महेक्या करे छे-मघमध्या करे छे. प्र० - शुं से सुगंधी मणिओ, प आपेली उपमाओ जेवा ज खरेखर सुगंधी हता ? उ०- प अर्थ समर्थ नथी अर्थात् हे आयुष्मन् श्रमण ! प तो मात्र उपमाओ छे; पण ते सुगंधी मणिओ तो ते बधी उपमाओ करतां क्यांय वधारे इष्टतर, सरस, मनोहर अने मनोश सुगंधवाळा हता. ७१ हौरा पन्ना मोती के मणि वगेरे झवेरातना ऊंचामा ऊंचा पदार्थों सौ कोइने प्रत्यक्ष छे, तेम प्रकाश तेज चळकाट के अमुक खास प्रकारनो रंग वगेरे तो देखाय छे, परंतु तेमांना कोईमां कोई प्रकारनो उत्कट गंध होवानुं जाण्यं नथी. त्यारे देवसृष्टिना ए मणिओ धुमधु सुगंधी होय छे ए एक नवुं जाणवा जेवुं खरं. पृथ्वी गंधवती छे ए खरी बात, पण मणिओनो जेवो गंध अहीं वर्णवेलो छे तेवो उत्कटतम गंध, मानवीसृष्टिना कोइ पण स्थळमां नीपजेला के नीपजता मणिओमां जणातो नथी, ए ध्यानमा राखवा जेवुं छे. १० ॥४९॥ www.nelibrary.org Page #438 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण [४०] ते मणिओनो रंग अने गंध जेवो उत्तम हतो तेवो ज तेमनो स्पर्श पण उत्तमोत्तम हतो. केम जाणे त्यां जमीन उपर कोमळ चामडुंज न पायु होय, रू ज न भरेलु होय, माखण ज न लगाडेलु होय, हंसगर्भना रूथी भरेली एबी तळाइओ ज न पाथरेली ४१ विमाः इय सुत्तनो होय, सरसडांनां फूलोना जाणे ढगला ज न कर्या होय अने कोमळ कमळोनां पांदडां न वेरेला होय, पयो ते मणिओनो कोमळ को-|नमा रचला सार मळतर स्पर्श हतो. | प्रेक्षागृहप्र०-शुं कोमळ स्पर्शवाळा ते मणिओ ए आपेली उपमाओ जेवा ज खरेखर कोमळ हता? | मंडपर्नु ॥५०॥ ___ उ०-ए अर्थ समर्थ नथी अर्थात् हे आयुष्मन् श्रमण ! ए तो मात्र उपमाओ छे; पण ते कोमळ मणिओ तो ते वधी उपमाओ वर्णन करता क्यांय वधारे इष्टतर, सरस, मनोहर अने मनोश कोमळ स्पर्शवाळा हता. [१] त्यारपछी ते आभियोगिक देवोए पूर्ववणित दिव्य यान-विमाननी अंदर बराबर बच्चेना भागमा पक मोटा प्रेक्षागृहमंडपनी रचना करी. ए देवोए ए मंडपने अनेक स्तंभो उपर ऊभो कर्यो, उंची वेदिकाओ, तोरणो अने सुंदर पूतळीओथी सुशोभित बनाव्यो, पमा रमणीय घाटवाळां विमळ अने प्रशस्त वैडूर्यरत्नो जड्यां, ते मंडपना जुदा जुदा भागोमां बीजा पण अनेक प्रकारना मणिओ जडी तेने विशेष चळकतो बनान्यो, तेमां पूर्वोक्त बळद, घोडो. हाथी, मगर, नर, वनवेल वगेरेनां चित्रो कोर्या वा चीतां, सुवर्णमय अने रत्नमय अनेक स्तूपो ऊभा कर्या, अनेक प्रकारनी पंचरंगी घंटडीओ तथा पताकाओथी तेना शिखरने शणगायु, ए मंडप पटलो बधो चकचकतो हतो के जोनारने ते जाणे हलतो होय तेवो चपल जणातो, पाथी किरणोनी धारा छूटतो होय एम लागतुं, तेना-मंडपना-बधा भागो लीपीगुंपीने चकचकता अने संवाळा करेला हता, मंडपमां बहार अने अंदर रक्तचंदन वगेरे अनेक सुगंधी द्रव्योना थापा मारेला हता, ज्यां त्यां चंदनना कलशो गोठवेला हता, बारणाना टोडलाओ चंदनना कलशोथी शोभायमान एवां तोर ७२ मणिओ जेवो पाषाणमय पदार्थ सुंवाळामां सुंवाळो-अतिशय लीसो होइ शके खरो, पण ते, रू माखण के शिरीष जेवो नरम होवान कहेवामा ए दिव्य मणिओनी अतिशय सुंबाळप बताववा मूळकारे उपरनी कंडिकामा ए वर्णन आपेलुं हशे. Jain Education lmalal For Private Personal Use Only eiorary.org Page #439 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेन इय सुतनो सार पोथी सुशोभित करेला हता, ज्यां त्यां लांबी लांबी सुगंधी माळाओ लटकावेली हती, पंचरंगी पुप्पोना तो ढगे ढग भरेला हता, अगर वगेरेना पूर्वोक्त सुगन्धी धूपोथी र मण्डप मघमधी रह्यो हतो. जाणे के सुगन्धनो कोइ खास ओरडो न होय ? मण्डपमां चारे तरफ वाजांओ वागी रह्यां हतां अने अप्सराओनां टोळे टोळां आमथी तेम फरतां जणातां हतां. ५ ए अभियोगिक देवोप ए प्रेक्षागृह मण्डपने हमणां कह्यो पवो सुन्दर, प्रसन्नतावर्धक, दर्शनीय- देखावडो अने अनुपम बनाव्यो हतो. ते मण्डपनी अन्दरनी भों यान- विमाननी भों जेवी तद्दन लीसी-सरखी बनावी हती अने तेमां सुगन्धी, सरस स्पर्शवाळा अने रंगबेरंगी मणिओ पण तेवा ज जडेला हता, जेमां पद्मलताओ भरेली के पवो एक मोटो सारामां सारो चन्दरवो ते मण्डपमां बांधेलो हतो. [४२] ते मण्डपना ए लीसा भूभागनी बच्चोवच्च ते देवोप एक मोटो वज्रमय अखाडो बनाव्यो प अखाडानी बच्चोवच्च, आठ योजन लांबी पहोळी अने चार योजन जाडी पक्षी एक मोटी स्वच्छ, सुंवाळी, मणिमय मणिपीठिका बनावी से मणिपीटिका उपर एक मोटुं सिंहासन स्थापन करें. सिंहासन उपरना चाकळा (?) सुवर्णमय तार झीक अने सताराथी झगझगता हताः सिंहो रत्नना, पाया सोनाना, पायाना कांगरा अनेक प्रकारना मणिओना, गात्रो जांबूनदनां, सांधाओ वज्रना अने सिंहासननुं वाण अनेक मणिओथी भरेलुं हतुं. बळी ते सिंहासनमां घोडो, हाथी, मगर वगेरे पूर्वोक्त अनेक चित्र कोरेलां हतां सिंहासन आगळनुं पादपीठ मणिमय अने रत्नमय हतुं, ते पादपीठ उपरनुं पग राखवानुं मसूरियुं सुंवाळा अस्तरथी ढांकेलं हतुं अने ते मसूरियानी लटकती झालर कोमळ केसरतंतु जेवी जणाती हती. सिंहासन उपर रज न पडे माटे तेने सारा शीवेला रजखाणथी ढांकेलं हतुं, चोक्खा कपासमांथी बनेलुं चोक्खुं सूतराउ कपडुं ते रजस्त्राण उपर गोठवेलुं हतुं अने ते आखा सिंहासन उपर एक रातुं वस्त्र ढांकेलं हतुं, ए रीते प सिंहासनने रम्य, वाळु अने सर्व प्रकारे प्रासादिक बनाववामां आवयं हतुं. [४३] प सुन्दर सिंहासनना उपरना भागमां शङ्ख, कुन्द, जलबिन्दु अने समुद्रना फोण जेवुं धोळु, तेमां भरेलां रत्नोथी झगमगतुं, झीं अने सुन्दर एक मोटुं विजयदृष्य बांधेलुं हतुं. ए विजयदृष्यनी बरोबर बच्चोवच्च एक मोटो वज्रमय अंकुश वांको सळीयो Jain Education emonal १० १५ ४२ प्रेक्षागृ हमंडपम वेला अखाडानुं अने अखा डा उपर आवेलां म णिपीठिका तथा सिंहा सननुं वर्णन ॥५१॥ w.jainelibrary.org Page #440 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥५२॥ टांगेलो हतो. ए सळीयामां घडा जेवढं एक मोटुं मुक्तादाम-मोतीनुं झुम-लटकावेलु हतुं अने ते मोतीना झुमखानी चारे बाजु अर्ध ४३सिंहासघडा जेवडां बीजां चार मोतीदाम परोवेलां हतां. आरोते प सिंहासनना उपरना भागमां बांधेला विजयदृष्यमां एक मोटुं मोतीनुं झुम्मर शोभतु हतुं. ए झुम्मरनां मोतीओ सोनानी पादडीवाळां बीजा अनेक लम्बूसगोथी शोभतां हतां तेमज अनेकविध मणिओ, जातजातना नना उपरना हारो, अर्धहारो अने रत्नोथी चमकतां हता. हवे ज्यारे पूर्वनो, पश्चिमनो, दक्षिणनो के उत्तरनो वायु चालतो त्यारे ए मोतीओ धीरे भागमा धीरे हलता हता. हलतां हलतां तेओ ज्यारे एक वीजा साथे अफळातां त्यारे तेमांथी कानने मधुर लागे तेवु अने मनने परम शांति ५ लटकता पमाडे तेवू उदार-मनोहर गुंजन नीकळतुं हतुं. ए सुन्दर दिव्य गुञ्जनथी सिंहासननी चारे बाजु गुंजायमान थइ रहेती हती. घडा जेवडा [४४] ते सिंहासननी आसपास वायव्य खूणामां, उत्तरमा अने ईशान खूणामां सूर्याभदेवना चार हजार सामानिक देवोने बेसवा | मोतीना माटे एक एक हजार-कुल चार हजार बीजां सुन्दर भद्रासनो ए आभियोगिक देवोए मांडो दीधां. सूर्याभदेवनी चार पट्टराणीओ अने झुमखामांतेना परिवारने बेसवा माटे पूर्वना भागमा चार हजार भद्रासनो गोठवाई गया. सूर्याभदेवनी अन्तरंग सभाना आठ हजार सभ्योने थीनीकळबेसवा माटे अग्निखूणामां आठ हजार भद्रासनो नंखाई गया. पज प्रमाणे वचली सभाना दस हजार सभ्योने बेसवा सारु दस हजार | तागुंजनभद्रासनो दक्षिणना भागमां, बाह्य सभाना बार हजार सभ्योने माटे बार हजार भद्रासनो नैर्ऋत्य खूणामां अने सात सेनापतिओने वर्णन सारु सात भद्रासनो पश्चिमना भागमा हारबन्ध नाखवामां आव्यां. ४४भद्राआ उपरान्त सूर्याभदेवनी चोकी करनारा अङ्गरक्षक देवो माटे ए सिंहासननी चारे बाजु अर्थात् पूर्वमा चार हजार, दक्षिणमा चार हजार, पश्चिममा चार हजार अने उत्तरमा चार हजार एम कुल बीजां सोळ हजार भद्रासनो गोठववामां आव्यां. रचना [४५] हवे आ रीते ते यान-विमान पूर्णपणे तैयार थई गयु. जेम ताजो उगेलो हेमन्त ऋतुनो बाळसूर्य, अन्धारी राते सळगावेला १५ खेरना अङ्गाराः जपाकुसुमनुं वन, केसुडांनुं वन वा पारिजातकनुं वन, रातुं चोळ जेवू लागे तेम ते दिव्य यान-विमान रातुं चोळ चकचकतुं हतु. anal सनोनी Jain Education For Private & Personel Use Only Page #441 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार प्र०-गु ते यान-विमान, पने बाळसूर्य वगेरेनी आपेली उपमाओ जेवू ज खरेखर लालचोळ हतुं ? उ.-ए अर्थ समर्थ नथी अर्थात् हे आयुष्मन् श्रमण ! ए तो मात्र उपमाओ छे, पण ते यान-विमान तो ए बधी उपमाओ करता क्यांय वधारे इष्टतर, सरस, मनोहर अने मनोश लाल वर्णवालु हतुं. तेनो गन्ध अने स्पर्श पण पूर्वोक्त मणिओनी पेठे घणो । ४६-४८ सुगन्धी अने अतिशय सुंवाळो हतो. यानविमान ए आभियोगिक देवोए पोताना स्वामी सूर्याभदेवनी आशा प्रमाणे पूर्वे वर्णवेलं एवं सुन्दर दिव्य यान-विमान सजधज कर्य अने उपर चडला एनी पूर्णाहुतिना समाचार तेमणे विनयपूर्वक सूर्याभदेवने जणावी तेनी आज्ञा तेने पाछी सोंपी. सपरिवार [६] पोतानी धारणा प्रमाणे ए दिव्य यान विमाननी तैयारीना समाचार जाणी सूर्याभदेवने आनन्द थयो, हवे तेणे पोताना सूर्याभदेवरूपने जिनेन्द्र पासे जवा जेवु योग्य कर्यु. मोटा परिवारवाळी पोतानी चार पट्टराणी अने गान्धर्वोर्नु तथा नाटककारो-नाटकीयाओनुं नी भगवान मोटुं लश्कर ए बधा साथे ए सूर्याभदेवे ते दिव्य यान-विमाननी प्रदक्षिणा करी अने पछी पूर्व दिशाना सोपानद्वारा ते, ए यान पासे जती विमान उपर चडी तेमां गोठवेला मुख्य सिंहासन उपर पूर्वाभिमुख थइने बेठो. पछी तेना चार हजार सामानिक देवो, ए यानविमाननी १० स्वारीनु प्रदक्षिणा करी उत्तर दिशाना सोपानद्वारा एना उपर चड्या अने पूर्वे गोठवेलां पोतपोतानां आसनो उपर बेठा. तथा बीजा देवो अने सविस्तर देवीओ पण यान-विमाननी प्रदक्षिणापूर्वक दक्षिण दिशाना सोपानद्वारा विमान उपर चडी पोतपोतानां जुदां जुदा आसनो उपर वर्णन गोठवाई गया. [१७] ए यानविमाननी सवारीमा सौथी प्रथम आगळ अष्टमंगल-आठ मंगळ-अनुक्रमे गोठवापलां हर्ता. सेमा पहेलो स्वस्तिक, ॥५३॥ बीजो श्रीवत्स, त्रीजो नन्दावर्त, चोथु वर्धमानक, पांच, भद्रासन, छट्ठो कळश, सात, मत्स्ययुगल अने आठ, दर्पण-पवी गोठवणी १५ हती. त्यार पछी पूर्ण कलश, भृङ्गार, दिव्य छत्र अने चामरो चालतां हतां. आ साथे गगनतलनो स्पर्श करती, अतिशय सुन्दर अने वायुथी फरफरती एक मोटी ऊंची विजयवैजयंती नामनी पताका चालती हती. त्यारपछी वैडूर्यना चकचकता दांडावाळु, माळाओथी Jan Education a l For Private Personal use only Nainelibrary.org Page #442 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो ॥४॥ सुशोभित, चंद्र मे, उज्ज्वळ-धोळु ऊंचुं छत्र चालतुं हतुं. पछी जेना उपर पावडीओनी सुंदर जोडी अने पादपीठ मूकेला छे, एबुं| मणि अने रत्ननी कारीगरीथी आश्चर्य पमाडनारं उत्तम सिंहासन अनेक दास देवोना सभा उपर चालतुं हतुं. त्यारवाद वज्रमांथी बनावेलो, चकचकतो, घसीने सुधाळो करेलो, गोळ आकारवाळो, पचरंगी नानी नानी हजारो धजाओथी शोभतो, छत्राकारे गोठवारली विजयदैजयंती पताकाथी युक्त, अतिशय ऊंचो-हजार योजन ऊंचो माटे ज आकाशने अडकतो मोटामां मोटो इन्द्रध्वज चालतो हतो. एनी पछवाडे सुंदर वेषभूषावाळा, सजधज थपला, सर्व प्रकारना अलंकारोथी विशेष देखावडा लागता पांच सेनाधिपतिओ तेमना मोटा सुभटसमुदाय साथे बेठेला हता, पमनी पाछळ पोतपोतानां टोळा साथे, पोतपोताना नेजा (१) साथे, पोतपोतानी विशिष्ट वेषभूषा साथे ए आभियोगिक देवो अने तेमनी देवीओ गोठवापली हती. त्यारबाद-छेक छेल्ले-ते सूर्याभविमानमां रहेनारां बीजा देवो अने देवीओ पोतपोतानी सर्व प्रकारनी ऋद्धि सिद्धि, द्युति, बळ, वेषभूषा अने परिवार साथे ए यान-विमाननी सवारीमा जोडायला हताः आ रीते विमानना स्वामी सूर्याभदेवनी आगळ पाछळ अने बन्चे बाजुए अनेक देव देवीओ गोठवापलां हतां अने ए यानविमान ए वधांने उपाडी वेगवंध गाजतुं गति करतुं हतुं. [४] ए रीते सजधज थपलो सूर्याभदेव, पोताना ए दिव्य ठाठमाठने बतावतो वतावतो सौधर्मकल्पनी वच्चे थइने नोकळ्यो, अने सौधर्मकल्पथी उत्तरमा आवेला नीचे आववाना-निर्याणमार्ग तरफ तेणे पोताना ए यान-विमानने हंकायु. ते, प निर्याणमार्गने पहोंचतां लाख योजननी वेगवाळी गतिथी झपाटाबंध भारतवर्ष तरफ आववा लाग्यो, आ तरफ आवतां आवतां तेने असंख्य द्वीपो अने समुद्रो उल्लंघवा पड्या. ए रीते वेगबंध गति करतो ए सूर्याभदेव नंदीश्वर द्वीप सुधी आवी पहोंच्यो अने त्यां अग्निकोणमां आवेला रतिकर पर्वत पासे आवी लाग्यो. आ रतिकर पर्वत पासे आवीने ए सूर्याभदेवे पूर्वे वर्णवेली पोतानी देवमाया संकेली लीधी अने जंबूद्वीपना भारतवर्षमां पहोंचवा जेवी साधारण व्यवस्था करी लीघो. हवे ते, रतिकर पर्वतथी जंबूद्वीप भणी आववाना मार्गे पोताना यान-विमानने हंकारवा लाग्यो अने तुरतमांज भारतवर्षमा पहोंच्यो. त्यां पहोंची तेणे आमलकप्पानो रस्तो लीधो अने झपा Jain Education intimathsal For Private & Personal use only wlinelibrary.org Page #443 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो खार Jain Education Int natio | टाम ज आमलकप्पाना अवसालवणचैत्यमां ज्यां श्रमण भगवान महावीर ऊतर्या छे त्यां आयी लाग्यो. त्यां आवतां ज तेणे ए दिव्य यान- विमान साथै श्रमण भगवान महावीरनी त्रण प्रदक्षिणा करी अने भगवानथी उत्तर पूर्वना भागमां ईशान खूणामां तेणे एयानविमानमे धरतीथी चार आंगळ अद्धर राखी ऊभुं राख्युं. [४९] मोटा परिवारवाळी पोतानी चार पट्टराणीओ, गांधर्वोनुं अने नाटकीयाओनुं टोलुं प बधा साधे प सूर्याभदेव पयानविमान उपरथी ऊतरी नीचे आव्यो. त्यारवाद सूर्याभदेवना चार हजार सामानिक देवो अने प यान विमानमां आवेला बीजा या देवो अने देवीओ क्रमशः नीचे आव्यां. एवा मोटा परिवारथी वींटापलो सूर्याभदेव, पोतानी सर्व प्रकारनी दिव्य ऋद्धि साथे, देववाद्योना मधुर घोष साथे चालतो चालतो श्रमण भगवान महावीर तरफ आव्यो, त्रण प्रदक्षिणा करी, वांदी, नमी तेमने विनयनम्र रीते कहेवा लाग्योः “हे भगवन्! हुं सूर्याभदेव मारा सकल परिवार समेत, आप देवानुप्रियने चंदन करुं हुं नमन करुं हुं अने आपनी पर्युपासमा करूं लुं." [५०] "हे सूर्याभ !” एम कही श्रमण भगवान महावीरे सूर्याभदेवने आ प्रमाणे कः " हे सूर्याभ ! ए पुरातन छे, हे सूर्याभ ! ए जीत छे, हे सूर्याभ ! ए कृत्य छे, हे सूर्याभ ! प करणीय छे, हे सूर्याभ ! ए आचरापलं छे अने हे सूर्याभ ! ए संमत थपलुं छे के 'भवनपतिना, वानव्यंतरना, ज्योतिषिकना अने वैमानिक वर्गना देवो अरहंत भगवन्तोने वांदे छे, नमे छे, अने पछी पोतपोतानां नाम गोत्रो कहे छे,' तो हे सूर्याभदेव ! तुं जे करे छे ते पुरातन छे अने संमत थपलुं छे." भगवाननी साथै सूर्याभ देवनुं संभा पण ॥५५॥ श्रमण भगवान महावीरनुं कथन सांभळी सूर्याभदेव बहु हर्षित थयो, प्रफुल्ल थयो अने घणो ज संतुष्ट थयोः पछी तेमने वांदी १५ नमी तेमनाथी बहु नजीक नहि, तेम बहु दूर नहि, एवी रीते बेसी ते सूर्याभदेव तेमनी शुश्रूषा करतो सामो रही विनयपूर्वक हाथ जोडी श्रमण भगवान महावीरनी पर्युपासना करवा लाग्यो. winelibrary.org Page #444 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥५६॥ [२१] ते वखते थमण भगवान महावीरे पोताना दर्शनार्थ आवेला सूर्याभदेवने, आमलकप्पाना राजा-राणीने तथा आमलकप्पामाथी आवेली मोटी जनसभाने धर्मदेशना संभळावी. देशना सांभळी जनता तो पोतपोताने ठेकाणे चाली गई. ५२ सूर्यामे [१२] देशना सांभळीने प्रसाद पामेला अने आल्हादित हृदयवाळा सूर्याभदेवे ऊभा थईने प्रणामपूर्वक श्रमण भगवान महावीरने भगवंतने आ प्रमाणे पूछयुः पूज्य ५३ भगवंत प्र०-हे भगवन् ! शु सूर्याभदेव भवसिद्धिक-भव्य छे के अभवसिद्धिक-अभव्य छे? सम्यग्दृष्टिवाळो छे के मिथ्याष्टिवाळो छे?|५| नो उत्तर संसारमा परिमितपणे भमनारो छे के अनंतकाळ सुधी भमनारो छे ? बोधिनी प्राप्ति थवी तेने सारु सुलभ छे के दुर्लभ छे? शुं ते ५४ भगवंत आराधक छ के विराधक छे? ते चरम शरीरी छे के अचरम शरीरी छे ? पासे नाच [५३] 'हे सूर्याभ !' पम कहीने श्रमण भगवान महावीरे तेने नीचे प्रमाणे उत्तर आप्योः |करी बताउ०-हे सूर्याभ ! तुं भव्य छो, सम्यग्दृष्टिवाळो छो, संसारमा परिमितपणे भमनारो छो, तने बोधिनी प्राप्ति थवी सुलभ छे, तुं | ववानी आराधक छो अने तुं चरमशरीरी छो. सूर्याभनी [१४] भगवाने आपेलो उत्तर सांभळीने सूर्याभदेवर्नु चित्त आनंदित थयुं अने परम सौमनस्य युक्त थयु भगवाननो उत्तर सांभळ्या वीनंती पछी ए सूर्याभदेवे भगवानने वांदी नमी आ प्रमाणे विनंती करी: "हे भगवन् ! तमे बधुं जाणो छो अने जुओ छो, ज्यां ज्यां जे छे ते बधु तमे जाणो छो अने जुओ छो, सर्व काळना बनावोने जाणो छो अने जुओ छो, सर्व भावोने तमे जाणो छो अने जुओ छोः मारी दिव्य ऋद्धिसिद्धिने, में प्राप्त करेली दिव्य देवद्युतिने अने दिव्य देवानुभावने पण पहेलां अने पछी तमे जाणो छो अने जुओ छोः तो हे भगवन् ! आप देवानुप्रिय तरफनी मारी भक्तिने लीधे हुं एवी इच्छा करूं छु के मारी दिव्य ऋद्धिसिद्धि, ||१५ दिव्य देवद्युति अने दिव्य देवप्रभाव तथा बत्रीश प्रकारनी दिव्य नाट्यकळा आ गौतम वगेरे श्रमणनिग्रंथोने देखाहूं." For Private Personal use only Miainelibrary.org Page #445 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार [२५] श्रमण भगवान महावीरे सूर्याभदेवनी उपर्युक्त विनंतीने आदर न आप्यो, अनुमति न आपी अने ते तरफ मौन राख्यु. [१६] त्यारपछी बोजीवार, त्रीजीवार पण सूर्याभदेवे एवीज विनंती करी अमे तेना उत्तरमां भगवान महावीरे तेनो आदर न करता मात्र मौन ज धरी राख्यु. छेवटे ते सूर्याभदेव, श्रमण भगवान महावीरने त्रण प्रदक्षिणा दई, चांदी नमी उत्तर-पूर्वनी दिशा तरफ गयो. ईशान खूणामां जई तेणे वैक्रियसमुद्घात कर्यो, ते द्वारा तेणे संख्येय योजन सुधीना लांबा दंडने बहार काढ्यो, जाडां मोटा पुद्गलो तजी दीधां अने जोइए. तेवां यथासूक्ष्म पुद्गलोनो संचय कर्यो, वळी, बीजीवार वैक्रियसमुद्घात करी तेणे नरघाना उपरना ५ ७३ आत्मज्ञानी भगवाननी स्थितप्रज्ञ दशा जोतां तेओ सूर्याभदेवना संकल्पने आदर न आपे ते ज स्वाभाविक छे पण आ तरफ सूर्याभदेवनी मनोभूमिका जोतां ते, तेमनी पासे नाटक करी देखाडवा सिवाय बीजं करी पण शुं शके ? भक्तोनी बे कोटि छे. एक तो मनसा वचसा कायेन पोताना भजनीयने अनुसरनारा वा अनुसरवा माटे अतुल प्रयत्नशील रहेनारा अने बीजा तेमना मात्र प्रशंसको. प्रथम कोटिना भक्तो आवा बाह्य उपचारमा पडता नथी, एओ तो भजनीयना शुद्ध अनुसरणने ज पोतानी भक्ति समजे छे; त्यारे जेओ भजनीयने अनुसरवा जेटला प्रबळ पुरुषार्थशाळी नथी होता तेओ तेमना प्रशंसको रहोने तोष माने छे अने आवा प्रशंसको ज बाह्य उपचार सिवाय बीजी भक्ति सुधी पहेांची शक्ता नथी. ए प्रशंसको, पोताना भजनीयनो बाह्य उपचार सामे सख्त अणगमो जाणवा छताय तेमनी पोतानी जातनी प्रसन्नता माटे तेओ बाह्य उपचार सिवाय बीजं कशु करी शके तेवा नथी होता. आ परिस्थितिमाथी औपचारिक भक्तिनो आविर्भाव थयो लागे छे. आमांथी विवेकनुं तत्त्व नीकळी जाय तो ते औपचारिक भक्ति राष्ट्रीय, सामाजिक अने वैयक्तिक हानिने नीपजावे छे. वळी बीजु"यद्' यदाचरति शिष्टः तत् तदेवेतरो जनः" ए उक्तिनु तत्त्व पण भगवानना अणगमामा रहेलुं छे ए ध्यानमा राखवार्नु छे. टीकाकार, सूर्याभदेवना ए नाट्यविधिने स्वाध्याय वगेरे कर्तव्यनो विघातक बतावे छे ("गौतमादीनां च नाट्यविधेः स्वाध्यायादिविघातकारित्वात्"-विवरण पृ० १२१ पं०-१०). सूर्याभनी वीनंतीनो भगवाने करेलो अनादर ॥५७॥ Jivanitainelibrary.org For Private Personal Use Only Jan Education Page #446 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥५८|| भाग जेवो सर्व प्रकारे सर्व बाजुथी एकसरखो एवो एक भूभाग सज्यों, तेमां रूप, रस, गंध अने स्पर्शथी सुशोभित पूर्वे वर्णवेला एवा अनेक मणिओ जडी दीधा, सर्व बाजुथी एकसरखा भूमंडळमां वच्चोवञ्च तेणे एक प्रेक्षागृह रच्यं-नाटकशाळा खडी करी. ए || नाटकशाळा, तेमां बांधेलो उल्लोच-चंदरवो, अखाडो अने मणिनी पेढली ए बधार्नु वर्णन आगळ कहेवाइ गयुं छे, तथा मणिनी ए भक्तिपूर्वक पेढली उपर सिंहासन, छत्र वगेरे जे आगळ वर्णवाइ गयुं छे ते बधु बराबर गोठवी दीg. नाच करी [५७] त्यारपछी ए सूर्याभदेव श्रमण भगवान महावीरना देखतां तेमने प्रणाम करे छे अने 'भगवान मने अनुज्ञा आपो' एम कही ५ वाली पोते यांधेली नाटकशाळामां तेमनी-तीर्थकरनी-सामे उत्तम सिंहासनमां बेसे छे. | सूर्याभनी त्यारबाद बेसतां वेत तेणे अनेक प्रकारनां मणिमय कनकमय रत्नमय विमल अने चकचकतां कडां पोंची बेरखां वगेरे आभू. तैयारी षणोथी दीपतो ऊजळो पुष्ट अने लांबो एवो पोतानो जमणो हाथ पसार्यों. एना ए जमणा हाथमांथी सरखां वय लावण्य रूप अने यौवनवंता, सरखां नाटकीय उपकरणो अने वस्त्राभूषणोथी सजेला, खभानी वन्ने बाजुमां उत्तरीय वस्त्रथी युक्त, डोकमां कोटियु अने शरीरे कंचुक पहेरेला, टीलां अने छोगां लगावेला, चित्र विचित्र पट्टावाळां अने फुदडी फरतां जेना छेडा फेण जेवा उंचा थाय पवी छेडे-कोरे-मूकेली झालरवाळा रंगबेरंगी नाटकीय परिधान पहेरेला, छाती अने कंठमां पडेला एकावळ हारोथी शोभायमान अने नाच करवानी पूरी तैयारीवाळा एकसो ने आठ देवकुमारो नीकळ्या. [५८] एज प्रमाणे सूर्याभदेवे पसारेला डावा हाथमाथी चंद्रमुखी, चंद्रार्धसमान ललाटपट्टवाळी, खरता तारानी नेम चमकती भाकृति वेश अने चारु शृंगारथी शोभती, हसवे बोलवे चालवे विविधविलासे ललित संलापे अने योग्य उपचारे कुशळ, हाथमां वाचाळी, नाचकरवानी पूरी तैयारीवाळी अने बराबर ए देवकुमारोनी जोडीरूप पवी पकसो ने आठ देवकुमारीओ नीकळी. [५९] पछी ए सूर्याभदेवे शंखो१, रणशिंगांर, शंखलीओ३, खरमुखीओ४, पेयाओ५, पीरपीरिकाओ६, पणवो-नानी पडघमो७, __७४ वाघोना जे जे नामो अहीं आपेलां छे तेमांना केटलांक स्पष्ट समजातां नथी. लोकगम्य कहीने टीकाकारे तेमनी व्याख्या जती For Private & Personel Use Only Jain Education Temelleal wwlainelibrary.org Page #447 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार Jain Education Interation पटो-मोटी पडघमोट, ढक्काओ-डाकलीओ९, मोटी ढक्काओ - डाको१०, भेरीओ११ झालरो१२, दुंदुभीओ१३, सांकडमुखीओ१४, मोटा मादळो१५, मृदंगो१६, नंदीमृदंगो१७, आलिंगो१८, कुस्तुंबो १९, गोमुखीओ२०, नाना मादळो२१, त्रण तारनी वीणाओ२२, वीणाओ२३, भमरीवाळी वीणाओ२४ छ भमरीवाळी वीणाओ२५, सात तारनी वीणाओ २६, बब्बीसो२७, सुघोषा घंटाओ२८, नंदीघोषा घंटाओ२९, सो तारनी मोटी वीणाओ३०, काचयी वीणाओ ३१, चित्रवीणाओ३२, आमोदो३३, झांझो ३४, नकुलो३५, तूणो ३६, तुंबडावाळी वीण (ओ३७, मुकुंदो३८, हुडको३९, विचिक्कीओ४०, करटीओ४१, डिंडिमो४२, किणितो४३, कडवांओ४४, दर्दरो ४५, दर्दरिकाओ४६, कुस्तुंबुरुओ४७, ५ कलशीओ४८, कलशो४९, तालो५०, कांसाना तालो५१, रिंगिरिसिको५२, अंगरिकाओ५३, शिशुमारिकाओ५४, वांसना पावाओ५५, बालीओ५६, वेणुओ-वांसळीओ ७, परिल्लीओ५८, अने बद्धको५९, एम ओगणपचासे जातनां पकसो ने आठ आठ वाजांओ बनाव्यां अने पकसो ने आठ आठ ते दरेक वाजांने बगाडनारा बनाव्या. [६०] पछी सूर्याभदेवे पोताना हाथमांथी सरजेला ते देवकुमाये अने देवकुमारीओने बोलाव्या, तेओए 'आवीने शी आशा छे?” एम विनयपूर्वक जणान्युं. १० [६१] तेमने सूर्याभि देवे कहां के "हे देवानुप्रियो ! तमे श्रमण भगवान महावीर पासे जाओ अने तेमने त्रण प्रदक्षिणा दई करी छे. जिज्ञासुओए ते ते वाद्योनी माहिती उस्ताद बगाडनाराओ पासेथी जाणी लेवी घटे. ७५ मूळ पाठमा वाजांओना भेदनी संख्या ओगणपचास जणावेली छे पण मूळ पाठ प्रमाणे वाजांओनी संख्या ओगणसाठ थाय छे. आ विवाद समाधान करवा टीकाकार कहे छे के ए ओगणपचास तो मूळभेदो समजवाना छे अने वधाराना तेना पेटा भेदो छे. ("एवमाइयाई एगूणपणं आउज्जविहाणाई बिउव्वर [कं० ५९] मूलभेदापेक्षया आतोषभेदा एकोनपञ्चाशत् शेषास्तु एतेषु एवं अन्तर्भवन्ति यथा १५ वंशातोयविधाने वाली - वेणु - परिली - बव्व (द्ध ? ) - गाः " - इति विवरण पृ० १२८ पं० ८) ५९ अनेक प्रकारनां वाजांओ 114811 www.janelibrary.org Page #448 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥६०॥ Jain Education In चंदन- नमन करी ए गौतम वगेरे श्रमणनिर्गथोने ते दिव्य देवऋद्धि दिव्य देवद्युति दिव्य देवानुभावाळु वत्रीस प्रकारनं नाटक भजवी बतावो." [६२] सूर्याभदेवनी आशा थतां ज तेने माथे चढावी हृष्टतुष्ट थपलां ए देवकुमारो अने देवकुमारीओ श्रमण भगवान महावीर तरफ जई तेमने वांदी नमी जे तरफ गौतमादिक भ्रमणनिर्ग्रथो हता ते तरफ वळ्यां अने एक साथे ज एक हारमां एक कतार ऊभा रह्य, साथे ज नीचे नम्यां, बळी पार्छु साथै ज तेओ पोतानां माथां उंचां करी टट्टार ऊभां रह्यां एज प्रमाणे सहितपणे अने संगत- ५ पणे नीचे नम्यां अने पाछां टट्टार ऊभा रह्यां, पछी साथे ज टट्टार ऊभा रही फेलाइ गयां अने पोतपोतानां नाचगाननां उपकरणो हाथपगमां बराबर गोठवी राखी एक साथे ज वगाडवा लाग्यां, नाचवा लाग्यां अने गावा लाग्यां. [६३] तेमनुं संगीत उरथी शरू थतां उठावमां धीरुं मंद मंद मूर्धामां आवतां तारस्वरवाळु अने पछी कंठमां आवतां विशेष तारस्वरवाळु, एम त्रिविध हतुं, ज्यारे ए बधां गातां हतां त्यारे तेनो मधुर पडछंदो नाटकशाळामां आखाय प्रेक्षागृहवाळा मंडपमां पड़तो हतो. जे जातना रागनुं गाणं हतुं तेने ज अनुकूल एमनुं संगीत हतुं गानाराओनां उर मूर्धा अने कंठ प त्रणे स्थानो अने १० ए स्थानानां करणो विशुद्ध हतां. वळी, गुंजतो वांसनो पावो अने वीणाना स्वर साथै भळतुं, एक बीजानी बागती हथेळीना अवाजने अनुसरतुं, मुरज अनेकांसीओना झणझणाटना तथा नाचनाराओना पगना ठमकाना तालने बराबर मळतुं, वीणाना लयने बराबर घबेस अने शरूआतथी जे तानमां पावो वगेरे वागतां छतां तेने अनुरूप एवं पमनुं संगीत कोयलना टहुकाजेवुं मधुरं हतुं वळी, सर्व प्रकारे सम, सललित-कानने कोमळ, मनोहर, मृदुपदसंचारी श्रोताओने रतिकर, छेवटमां पण सुरस पहुं ते नाचनाराओनुं नाचसज्ज विशिष्ट प्रकारनं उत्तमोत्तम संगीत हतुं. [६४] ज्यारे ए मधुरुं संगीत चालतं हतुं त्यारे तेमने धमता, पणव पटह उपर आघात करता, शंख रणशिंगुं शंखली खरमुखी पेया अने पीरीपीरिकाने, बगाडनारा ते देवो भंभा मोटी डाकोने अफळावता, मेरो झालर दुंदुभीओ उपर ताडन करता, मुरज १५ ६२-६३ नाच-गान वादननी शरूआत ६४ वाजांओवगाडवानी प द्धतिओ ainelibrary.org Page #449 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार मृदंग नंदीमृदंगोनो आलाप लेता, आलिंग कुस्तुंब गोमुखी मादळ उपर उत्ताडन करता, वीणा विपंची बल्लकीआने मूविता, सो तारनी मोटी वीणा काचबी वीणा चित्र वीणाने कूटता, बद्धीस सुघोषा नंदिघोषानुं सारण करता, भ्रामरी षड्भ्रामरी परिवादनीनुं स्फोटन करता, तूण तुंबवीणाने छबछवता, आमोद झांझ कुंभ नकुलोर्नु आमोटन करता-परस्पर अफळावता, मृदङ्ग हुडुक्की विचि नाटकना क्कीओने छेडता, करटी डिडिम किणित कडवांने बजावता, दर्दरक दर्दरिकाओ कुस्तुंबुरु कलशीओ मडुओ उपर अतिशय ताडन बत्रीश प्रकरता, तल ताल कांसाना तालो उपर थोडं थोडं ताडन करता-परस्पर घसता, रिंगिरिसिका लत्तिका मकरिका शिशुमारिकानुं घट्टन | कारनां जे करता अने बंसी वेणु बाली परिल्ली तथा बद्धकोने फूंकता हता. जे अभि[६५] ए रीते ए गीत नृत्य अने वाद्य दिव्य मनोश मनहर अने शृंगाररसथी तरबोळ बन्यां हतां, अद्भुत थयां हतां, बधानां नयो करी चित्तना आक्षेपक नीवडयां हतां. ए संगीतने सांभळनारा अने नृत्यने जोनाराना मुखमांथी उछळता वाहवाहना कोलाहलथी ए नाटक बताव्या शाळा गाजी रही हती. एम ए देवोनी दिव्य रमत प्रवृत्त थपली हती. तेमनां नाम [६६] प रमतमा मस्त बनेला ते देवकुमारो अने देवकुमारीओए श्रमण भगवान महावीरनी सामे स्वस्तिक श्रीक्स नंदावर्त १० वर्धमानक भद्रासन कलश मत्स्य अने दर्पणना दिव्य अभिनयो करी ए मंगळरूप प्रथम नाटक भजवी देखाडयुं हतुं. | ॥११॥ ७६ भरतर्नु नाट्यशास्त्र, नाट्य संगीत वगेरेने लगती अनेकविध माहितीओथी भर्यु पड्यु छे. अहीं नाटयना जे बस्रोश प्रकार करी देखाड्या छे तेमांना केटलाक तो ए नाट्यशास्त्रमा बतावेला छे. जेवा के-संकुचित. प्रसारित, दुत, विलम्बित, अंचित वगैरे. ५७मी कण्डिकाथी ८९मी कण्डिका सुधीमा संगीत अने वाद्योना वर्णन साथे ए बधा अभिनयोनो चितार आपेलो छे. घणाखरा अभिनयोनी भाव समजाय एवो छे. एमांना केटलांक पशुपक्षीने लगता, वनस्पतिने लगता, जगतना अन्य पदार्थोने लगता, प्राकृतिक प्रसंगोने लगता अने उत्पातोने लगता छे. वळी केटलाक लिपिने लगता छे-जे अभिनयो 'क' वगेरे अक्षरोनी आकृतिने लगता छे ते बधा लिपिसम्बन्धी अभिनयो छे. ब्राह्मी लिपिमा + आवी आकृति Jain Education al For Private & Personel Use Only मw.jainelibrary.org Page #450 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुचनो सार ॥६२॥ [६७] वळी, ए देवकुमारो अने देवकुमारीओ बीजुं नाटक भजवी बताववा पूर्व जणावेली रीते एकसाथे एक हारमा भेगां थई गावा नाचवा अने वाजां वगाडवा लाग्यां तथा ए अद्भुत देवरमतमां मशगुल बनी गयां. ____ आ बीजा नाटकमां तेमणे श्रमण भगवान महावीरनी सामे आवर्त प्रत्यावर्त श्रेणि प्रश्रेणि स्वस्तिक पूस माणवग वर्धमानक मत्स्याडक मकरंडक जार मार पुप्पावली पद्मपत्र सागरतरंग यासंतीलता अने पद्मलताना अभिनयो करी देखाडी बीजुं नाटक पूरे कयु. [६८] पछी श्रीजु नाटक भजवी बतावचा मेगां थयेला ते देवकुमारो अने देवकुमारीओप श्रमण भगवान महावीरनी सामे ईहामृग बळद घोडो मानव मगर विहग-पक्षी व्याल किन्नर रुरु शरभ चमर कुंजर वनलता अने पालताना अभिनयो करी देखाड्या. [६९] चोथु नाटक देखाडतां ते देवकुमारो अने देवकुमारीओए श्रमण भगवान महावीरनी सामे एकतश्चक्र द्विधाचक्र एकतश्चक्र वाल द्विधाचक्रवाल पम चक्रार्ध अने चक्रवालनो अभिनय भजवी बतान्यो. [७०] पांच, नाटक भजवतां तेमणे आवलिकाओनो अभिनय कर्यो. पमा पमणे चंद्रावलिका वलयावलिका हंसावलिका सूर्यावलिका एकावलिका तारावलिका मुक्तावलिका कनकावलिका अने रत्नावलिकाओना देखावो करी बताव्या. [७२] छट्टुं नाटक शरू करतां तेमणे उद्गमनोना पटले चंद्र ऊगवानां अने सूर्य ऊगवानां दृश्यो खडां कीं.. [७२] सातमा नाटकमां आगमनना अर्थात् चंद्रना आगमनना अने सूर्यना आगमनना देखावो करी बताववामां आव्या. 'क नौ छे एटले ए आकृति प्रमाणे गोठवाईने जे अभिनय करी बताववो ते 'क' नी आकृतिनो अभिनय गणाय. ए ज प्रमाणे लिपिसम्बन्धी बीजा बधा अभिनयो विशे समजी लेवू. छेल्लो बत्रीशमो अभिनय भगवान महावीरनी जीवन घटनाना मुख्य मुख्य प्रसंगोने लगतो छे. आ बधुं| जोतां ते समयनी अभिनयकळाना परमप्रकर्षनो ख्याल आवे छे अने ते प्रत्येक अभिनयनी उपयोगिता पण समजाय एबुं छे. भगवतीसूत्रमा पण सूर्याभदेवे करी बतावेला अहीं जणावेला अभिनयोनो उल्लेख छे. ते माटे जुझो भगवतीसूत्रनो मारो अनुवाद-खंड २, पृ० ४३ नुं टिप्पण. Jain Education intern al wijainelibrary.org Page #451 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेग-1 इय सुत्तनो सार [७३] आठमा नाटकमां तेओप आवरणना-चंद्रना अने सूर्यना आवरणना देखावो करी देखाड्या अर्थात् ज्यारे चंद्रग्रहण अने सूर्यग्रहण थाय त्यारे जगतमां अने गगनमा जे जातनुं वातावरण प्रसरे छे ते ए नाटकमा प्रत्यक्ष करी बताववामां आव्यु. ८०लिपिना [७४] नवमा नाटकमां अस्तमनना देखावो आब्या पटले ज्यारे चंद्र अने सूर्य आथमी जाय छे त्यारे जगतमां अने आकाशमां जे आ अभिनयो जे घटनाओ बने छे ते बधी नजरोनजर खडी करवामां आवी. [७५] दसमुं नाटक चंद्रमंडल सूर्यमंडल नागमंडल यक्षमंडल भूतमंडल राक्षसमंडल अने गांधर्वमंडलना अभिनयोमा पूरं थयु ५ ॥६३॥ एमां चंद्र सूर्य नाग यक्ष भूत राक्षस अने गांधर्व संबंधी मंडलोना भावो भजवी बताव्या. [७६] अग्यार, नाटक द्रुतविलंबित अभिनयने लगतुं हतुं, तेमां बृषभनी अने सिंहनी ललित गति, घोडानी अने गजनी विलंबित गति, मत्त घोडो अने मत्त हाथीनी विलसित गति करी बताववामां आवी. [७७] बारमा नाटकमा सागर अने नागरना आकारोने अभिनयमा करी बताव्या. [७८] तेर, दिव्य नाटक नंदा अने चंपाना अभिनयने लगतुं हतुं. [७९] चौदमा नाटकमां मत्यांड मकरांड जार मारनी आकृतिओना अभिनयो हता. [८०] पन्नरमा नाटकमां क ख ग घ अने उना घाटना अभिनयो करी बताव्या. ७७ अहीं लिपिना अभिनयोना उल्लेखमां पांच वर्गना पच्चीश अक्षरोना ज अभिनयोनी नांध छे, तेमा स्वरना अने य र ल व श ष स ह ळ क्ष के ज्ञ ना अभिनयोनी उल्लेख नथी ए ध्यानमा राखवा जेवु छे. ब्राह्मी लिपिमा 'क' वगैरेनी जे मूळ आकृतिओ बतावी छे ते आकृतिना घाटना अभिनयो अहीं समजवा जोइए. अशोकना शिलालेखो ब्राझीलिपिमा लखाएला छे ए लिपिना अक्षरोनी आकृति माटे सुप्रसिद्ध १५ लिपिशास्त्री हीराचन्द गौरीशंकर ओझानी प्राचीन लिपिमाळा जोई जवी घटे, Jain Education emanal For Private & Personel Use Only willjainelibrary.org Page #452 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥६४॥ पछीनां चार नाटको अनुक्रमे १६ च छ ज झ ञ ना, १७ ट ठ ड ढ ण ना, १८ त थ द ध न ना, अने १९ प फ ब भ म ना घाटना अभिनयोने लगता हता. ८४भगवान [८१] वीसमुं नाटक अशोक आंबो जांबुडो अने कोसंबना पल्लव संबंधी अभिनयोने लगतुं हतुं. | महावीरना | जीवननी [८२] २१ मुं नाटक लताना देखावो करवाने माटे हतु तेमां पद्म नाग अशोक चंपो आम्र वन वासंती कुंद अतिमुक्तक अने इयामनी वेलडीओना अभिनयो हता. घटनाओना [८३] पछी अनुक्रमे २२ द्रुत २३ विलंबित २४ द्रुतविलंबित २५ अंचित २६ रिभित २७ अंचितरिभित २८ आरभट २९ भसोल | अभिनयो अने ३० आरभट भसोलना अभिनयोने लगतां नव नाटको करी बताया. ८५नाटक३१ मा नाटकमा उत्पात निपात संकुचित प्रसारित रयारइय (?) भ्रांत अने संभ्रांतनी क्रियाओने लगता अभिनयो देखाउचामां आव्या. नो उपसंहार [८४] ३२ मा नाटकमां ते एक साथे पक हारमा मेगां थपलां देवरमणमा तल्लीन बनेलां देवकुमारो अने देवकुमारीओए श्रमण भगवान महावीरना पूर्वभव संबंधी चरित्रने लगता बनावोना अभिनयो भजवी बताव्या अने पछी तेमना ज वर्तमान जीवनसंबंधी पण जे जे मोटा मोटा बनावो बन्या हता ते दरेकने अभिनयोमा करी देखाडया-तेमां तेमनुं च्यवन, गर्भसंहरण, जन्मसमयना बनायो, अभिषेकनो प्रसंग, बालक्रीडा, यौवनदशा, कामभोगनी लीला, निष्क्रमणनो प्रसंग, तपश्चरणनी अवस्था, ज्ञानी थयानी परिस्थिति, तीर्थप्रवर्तननी घटनाने लगता अभिनयो हता अने पछी छेल्ला अभिनयमां भगवान महावीरना निर्वाणर्नु चित्र पण ऊतारवामां आव्यु हतुं. आम ए चरम-छेल्लु-बत्रीशमुं नाटक पूरुं थयु. [८५] ए नाटकोमा ते देवकुमारो अने देवकुमारीओप ढोल वगेरे तत-पहोळां, वोणा वगेरे वितत-तांतवाळां, झांझ वगेरे घन-१५ नक्कर अने शंख वगेरे शुषिर-पोलां पम चार जातनां वाजा वगाडेलां. ७८ जुओ भगवतीसूत्रनो मारो अनुवाद-खंड २, पृ० ४४ नुं टिप्पण. nell For Private Personel Use Only Page #453 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥६५॥ [८६] उत्क्षिप्त पादवृद्ध मंद अने रोचित्र एम चार प्रकारचें संगीत गाएल. [८७] अंचित, रिभित, आरभट अने भसोल पम चार प्रकारे नृत्य करेलुं. [८८] दार्शतिक प्रात्यंतिक सामान्यतोपनिपातनिक अने लोकमध्यावसानिक पम चार जातना अभिनयो भजवी बतावेला. [८९] हवे ते देयकुमार अने देवकुमारीओ गौतमादिक श्रमण निर्गथोने ए वत्रीशे प्रकारचें दिव्य नाटक देखाडी तथा श्रमण भगवान महावीरने त्रण प्रदक्षिणा दई तेमने वांदी नमी जे तरफ पोतानो अधिपति सूर्याभदेव हतो ते तरफ गयां अने हाथ जोडी ५ पोताना प अधिपतिने जय विजयथी यधावी तेओए जणाव्यु के आपे करेली आशा प्रमाणे अमे श्रमण भगवान महावीर पासे जई बत्रीशे प्रकारचें ए दिव्य नाटक देखाडी आव्यां. त्यारवाद ए सूर्याभदेव पोतानी ते दिव्य देवमायाने संकेली लई एक क्षणमां पकलो-हतो तेवो एकाकी बनी गयो. पछी ते श्रमण भगवान महावीरने प्रण प्रदक्षिणा दई वांदी नमी पोताना पूर्वोक्त परिवार साथे ए दिव्य यान विमान उपर चडी ज्यांची आव्यो हतो ७९ प्रस्तुत 'उत्क्षिप्त' वगेरे शब्द उपरथी संगोतना आ चार भेदो समजाय एवा छे पण तेनी विशेष माहिती तो कोई संगीतविशारद | १० पासेथी ज जाणी लेवी जोइए. ८० मूळकारे अभिनयना आ चार प्रकार बतावेला छे, दार्टान्तिक अभिनय ते कोई प्रकारना दृष्टांतनो अभिनय. २ 'प्रत्यंत' नो अर्थ 'म्लेच्छदेश' छे ("प्रत्यन्तो म्लेच्छमण्डल:" अभिधान चि० कां० ४ ग्लो० १८). भोट वगेरे देशोने म्लेच्छदेश गणेला छे. ए देशना लोकोनो हेमना आचारनो के ए देशना कोई प्रसंग वगेरेनो अभिनय ते प्रात्यंतिक अभिनय. ३ सामान्य प्रकारनो अभिनय ते सामान्योपनिपातिक अने लोकना मध्य के अंत संबंधी अभिनय ते लोकमध्यावसानिक अभिनय. अभिनयना प्रकारसूचक ते ते शब्दनो आ तो शब्दार्थमात्र छे. परंतु ते विशे विशेष समजवा माटे अभिनयविशारदो अने नाट्यशास्त्रद्वारा जाणी लेवु जोइए. Jain Education indThatilal For Private Personel Use Only Newonelibrary.org Page #454 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायप सेणइय सुत्तनो सार ॥६६॥ त्यां ज पाछो चाल्यो गयो. [९०] पना गया पछी 'भगवन्' एम कहीने चौद पूर्वने जाणनारा, चार ज्ञानथी युक्त, सर्वाक्षरसंनिपाती, महातपस्वी सूर्याभनी ए देवमायाने जोहने शंकाशील थयेला अने कुतूहलवाळा बनेला भगवान गौतम भ्रमण, भगवान महावीरने चांदी नमीने नम्रपणे आ प्रमाणे वोल्या. [९१] प्र०—हे भगवन् ! ते सूर्याभिदेवनी ए दिव्य देवमाया, ए दिव्य देवद्युति, ए दिव्य देवानुभाव क्यां जतो रह्यो समाई गयो ? [२२] उ० - हे गौतम! सूर्याभदेवे सर्जेली ए देवमाया तेना शरीरमां अती रही, तेना शरीरमां समाई गई. [१३] प्र० - हे भगवन् ! से क्या कारणथी एम बन्युं ? Jain Education Inmatinal क्या ५ १० [ ९४] उ०- हे गौतम! बहार अने अन्दर छाण वगेरेथी लींपेली गुपेली फरती वंडीवाळी बन्ध वारणांवाळी उंडी अने पवन न भराय पवी जेम कोई एक मोटी शिखरबंधी शाळा होय, प शाळानी पासे माणसोनुं एक मोटुं टोलुं ऊभुं होय अने प वखते ए टोळु आकाशमां एक मोटुं पाणीभर्यु वादळु जूप तथा ए वादळं हमणांज वरसशे एम जो टोळाने लागे तो जेम ए टोकुं पासेनी प शाळामां पेसी जाय, तेम प देवमाया सूर्याभना शरीरमां समाई गई अथवा प शाळा बहार उभेलु टोळं पोतानी सामे चडी आवता वंटोळियाने जुए तो पण जेम ए पासेनी शाळामां पेसी जाय, तेम ए देवमाया सूर्याभना शरीरमां समा गई एम में कहधुं छे. [ ९९ ] वळी, गौतमे पूछ के - प्र० - हे भगवन् ! सूर्याभदेवनुं सूर्याभविमान क्यां जणावेलुं छे ? [९६] उ०- हे गौतम! जम्बूद्वीप नामना द्वीपमां मन्दर पर्वतथी दक्षिणे आ रत्नप्रभा नामनी पृथ्वी छे, तेना रमणीय समतल भूभागथी ऊंचे चन्द्र सूर्य ग्रहगण नक्षत्र अने तारकाओ आवेलां छे, त्यांथी आगळ घणां योजनो सेंकडो योजनो हजारो योजनो ९० शंकाशील श्रीगौतमनो प्रश्न अने भगवाननुं प्रतिवचन ९५-९६ सूर्याभदेवनुं विमान क्यां छे ? एवा श्रीगौतमना प्रश्ननो आपेलो उत्तर www.ainelibrary.org Page #455 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार लाखो योजनो करोडो योजनो अने लाखोकरोडो योजनो ऊंचे ऊंचे दुर जईप त्यारे त्यां सौधर्मकल्प नामनो कल्प जणावेलो छ, प कल्प पूर्व पश्चिम लांबो, उत्तर दक्षिण पहोळो, आकारे अर्धचन्द्रसमान संस्थित छे, किरणोना प्रकाशथी झगझगतो छे, तेनी लम्बाई १९७विमापहोळाई असंख्य कोटानुकोटि योजन छे अने तेनो घेरावो पण तेटलो ज छे, नना प्राकासौधर्मकल्पमां सौधर्मदेवोना बत्रीश लाख विमानावासो होय छे एम का है. ए बधा विमानावासो सर्वरत्नमय दर्शनीय अने रनुं वर्णन असाधारण सुन्दरतावाळा छे. ते विमानोनी वच्चोवञ्च पांच अवतंसको जणावेला छे. अशोक अवतंसक, सप्तपर्ण अवतंसक, चम्पक अवतंसक, चूतक अवतंसक अने बच्चे सौधर्मावतंसक. ए पांचे अवतंसको पण सर्वरत्नमय सुन्दरतम छे. एमांना ते सौधर्मावतंसक महाविमानथी पूर्वे तीरछु असंख्य लाख योजन आगळ वधीप त्यारे त्यां सूर्याभदेवतुं सूर्याभ नामर्नु विमान जणावेलु छे. ए विमाननी लम्बाई पहोळाई साडाबार लाख योजन छे अने घेरावो ओगणचाळीश लाख बावन हजार आठसो अड़तालीश योजन छे. [९७] सूर्याभदेवना प विमाननी फरतो चारे बाजु एक मोटो प्राकार-गढ़ छे. ए गढ त्रणसे योजननी उंचाइए छे. मूळमां तेनी ॥६७॥ पहोळाई सो योजन, वच्चे पचास योजन अने छेक उपर पचीस योजन छे अर्थात् ए गढ मूळमां पगतो-पहोळो वच्चे सांकडो अने टेक उपर वधारे पातळो छे. गढनो आकार गायना पूंछडा जेवो छे अने ते आखोय गढ सर्वकनकमय अच्छो मनोहर छे. ए गढनां कांगरां अनेक प्रकारना काळा जीला लाल पीळा अने धोळा पम पांचे रंगोथी शोभितां छे. ते एक एक कांगरूँ, लम्बाइमां एक योजन, पहोळाईमा अरधुं योजन, अने थोडं माठेरुं योजन उंचाईमां छे. ते बघां कांगरां सर्व प्रकारनां रत्नोमांथी बनावेला १५ हे-बट्ठ रमणीय छे. [२८] सूर्याभदेवना ते विमाननी एक एक बाजुप हजार हजार बारणां होय छे पम कहेलु छ अर्थात् ते विमानने पूर्व पश्चिम For Private Personal use only Jw.ainelibrary.org Jain Educate Page #456 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥६८॥ उत्तर दक्षिण पम चारे बाजुनां मळीने चार हजार थारणां होय छे. १९८विमानते एक एक बारणु उचाइए पांचसो योजन छे, पहोळाईए अने प्रवेशे अढीसो योजन छे. । ते वर्धा वारणां धोळां छे, तेमनी उपरनां शिखरो सोनानां छे, ए शिखरोमां वृषभ मगर विहग मानव कुंजर किन्नर पद्मलता ना बारणांवगेरेनां चित्रो कोरेला, पमना स्तम्भ-थांभला उपरनी वेदिकाओ वनमय-प वधां हजारो किरणोथी झळहळे छे, एवां ए आंखने ठारे नुं वर्णन एवां सुखस्पर्शवाळां छे. ते दरेक वारणानी नेमो वज्रमय, मूळ पाया रिष्टरत्नना, थाभलीओ वैडूर्यनी अने तेनुं तल पंचरङ्गो उत्तम मणिओमांथी बनेलं छे. डेलीओ हंसगर्भरत्ननी, इन्द्रकीलो गोमेदना, वारसाखो लोहिताक्षरत्ननी, ओतरंगो ज्योतिरसरत्नना, सूईओ-खीलीओ-लोहिताक्षरत्ननी, सांधाओ बज्रना, खीलीओनी टोपीओ विविध मणिमय, आगळियो अने तेनुं अटकण वज्रनु, आवर्तनपीठ-उलाळानुं टेकण रजतनु, वारणानां उत्तर पडखां अंकरत्ननां, एवी ए वारणांथोनी शोभावाळी रचना छे. तेनां कमाड लगार पण आंतरा विनानां चपोचप भीडाय तेवां मजबूत छे. वारणांनी भींतोमा बन्ने पडखे एकसो अडसठ अडसठ भीतगोळीओ छे अने तेटलीज गोमाणसीओ पटले बेठको छे. विविध मणिरत्नोथी रमती पूतळीओ वारणांओमां खोडेली छे. तेनो माढ-माडभाग-वज्रनो अने माडभागर्नु शिखर रूपानुं छे. - यारणाना उपला भागो सुवर्णमय, तेमा मणिमय जाळीवाळा गोखलाओ, पडखां अने पडखांनो बाजुओ अंकरत्नमय अने वांसडाओ खपाटो तथा नळियां ज्योतिरसरत्नमय छेतेनी पाटीओ रूपानी, नळियांनां ढांकण सुवर्णमय अने टाटीओ वज्रमय छे. ए जातनां ते बारणां शंखना उपला भाग जेवां अने रूपाना ढगला जेवां धोळां लागे छे. ते बारणांओ उपर अनेक प्रकार तिलको-टीला अने|१५ अर्धचंद्रो कोरेलां छे, मणिनी माळोओ टांगेली छे, वारणां बहार अने अंदर सुंवाळां छे, तेना उपरनी रंगनी भूकी सोनानी वेलमय छ: एयां ए बारणां सुंदर, सारा स्पर्शबाळां, रूडी शोभावाळां, प्रसन्नता पमाडे तेवां दर्शनीय अने असाधारण रमणीय छे. Jain Education emanal www.lainelibrary.org Page #457 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ६९॥ [९९] ए वारणांनी बन्ने बाजुनी बेठकोमा कमळ उपर कोरेला पवा चंदनना सोळ सोळ कळशोनी हारो, तेओमां सुगंधी पाणी भरेला, तेमना कांठाओमां रातां सूतर नाखेलां अने तेनां ढांकणां पद्मोत्पलना-एवा ए सर्वरत्नमय घडाओ, हे दीर्घजीवी श्रमण ! मोटामा मोटा इन्द्रकुंभनी जेवा विशेष रमणीय जणावेला छे. __ [१०] वळी, ते बारणांओनी बन्ने वाजुनी बेठकोमा सोळ सोळ नागदन्तोनी-कडियाओनी हारो आवेली छे.ते दरेक नागदन्तो उपर नानी नानी झणझणती घण्टडीओ लटकेली, एओ भीतमां वरावर बेटेला, एमनो आगलो भाग भीतथी सारी रीते वहार पडतो -एवा ए सापना अड्धा भाग जैवा देखाता वनमय सीधा लांबा नागदन्तो, हे आयुष्मन् श्रमण ! मोटा मोटा गजदन्तना आकार जेवा सुंवाळा अने शोभाजनक छे. वळी, ए नागदंतोमा काळा, नीला, राता, पोळा अने धोळा सूतरथी परोवेली लांबी लायी माळाओ लटकावेली, प माळाओना लंबूसको-उपरनां फुमका-सोनानां, ए फुमकांनी अडखेपडखे डेली सोनाना पतरानी पांदडीओ छे. ज्यारे दक्षिणनो उत्तरनो पूर्वनो । अने पश्चिमनो मंद मंद पवन वाय त्यारे ते धीरे धीरे हलती हलती पांदडीओमांथी कान अने मनने शांति आपे पq मधुरं १० संगीत नोकळे छे. बळी, हे आयुप्मन् श्रमण ! ए नागदंतोनी उपर बौजा सोळ सोळ नागदंतोनी हारो आवेली छे, ते पण गजदंतना आकार जेवा सुंवाळो अतिरमणीय छे. उपरना आ नागदंतोमा रजतमय शिंकां टांगेला छे, ए दरेक शिकामां वैडूर्यनी धूपघडीओ मूकेली छे, ए धूपघडीओमा उत्तम काळो अगर किनरु अने तुरुष्कनो सुगंधी धूप मधमधी रह्यो छे, एवी ए सुगंधी-चाट जेवी मघमवती धूपघडीओमाथी नीकळती मनोहारी सुगंध घाण अने मनने शांति आपती ते प्रदेशमा चारे कोर फेलाती रहे छे. [११] वळी, ए बारणांओनी बन्ने पडखेनी बेठकोमा सोळ सोळ पूतळीओनी हारो जणावेली छे. ते पूतळीओ विविध प्रकारनी लीलाओवाळी, सुप्रतिष्ठित, सारी रीते शणगारेली, रंगबेरंगी वस्त्रो पहेरेली अने अनेक जातनी माळाओवडे शोभायमान छे. पमनो Jhin Education le For Private 3 Personal Use Only w jainelibrary.org Page #458 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥७॥ कटिभाग भूठीमां आवी जाय एवो पातळो, अंबोडो उंचो अने कठण पीवर-भरावदार-छाती, आंखना खूणा राता, वाळ काळा; कोमळ अने शोभनिक छे. अशोक वृक्ष उपर तेनी डाळने डावे हाथे पकडीने ए पूतटीओ उमेली छे. आंखमींचामणी करती ए, जाणे देवोनां मनने हरी न लेती होय, एक बीजा सामु जोती ए, जाणे परस्पर खीजती न होय, एवी जणाय छे. ए बधी बनेली छ तो पृथ्वीमांथी-माटीमांथी-पण नित्य रहेनारी छे. पमनु मुख चंद्र जेवू, ललाट चंद्रार्ध जेवू अने देखाव चंद्र जेवो सौम्य छे. खरता | तारानी जेम ए बधी झगमग्या करे छे, मेघनी वीजळीनो झबकारो अने प्रखर सूर्यनो चमकाट ए करताय तेओ वधु झबके छे-चमके|५ छे. एवी ए पूतळीओ शंगारे आकारे अने वेशे प्रसाद उपजावे एवी देखावडी अने मनोहर छे. [१०२] वळी, ए बारणांओनी बन्ने बाजुनी बेठकोमा सर्वरत्नमय सुंदर जाळीवाळां सोळ सोळ रमणीय स्थानो छे, [१०३] बन्ने पडखेनी ए बेठकोमा सोळ सोळ घंटानी हारो टांगेली जणावेली छे. ए घंटाओ सुवर्णमय, तेमना लोलको वज्रमय, घंटानां बन्ने पडखां विविध मणिमय, घंटानी सांकळो सोनानी अने दोरीओ रूपानी छे. तेमनो रणको मेघना गडगडाट जेवो, सिंहनी | त्राड जेवो, दुंदुभिना नाद जेवो, हंसना स्वर जेवो मंजु छे. पवा-ए कान अने मनने ठारे-सुख आपे-तेवा रणकावडे ते घंटाओनी २० आसपासनो प्रदेश पण गाजतो रहे छे. _ [१०४] वळी, ए वारणांओनी बन्ने बाजुनी बेठकोमा सोळ सोळ वनराइओ जणावेली छे. ए वनराइओमां वृक्षो वेलो फणगा अने| पांदडां मणिमय छे, एमना उपर भमराओ गुंजता रहे छेः एवी ए वनराइओ टाढी हिम जेवी शीतळ अने प्रासादिक छे. [१०५] वळी, ते बन्ने पडखेनी बेठकोमा वज्रमय सोळ सोळ प्रकंठको-ओटलाओ जणावेला छे. ते दरेकनी लंबाई पहोळाई अढीसो योजन अने जाडाई सवासो योजन छे. ते ते एक एक प्रकंठक उपर एक एक मोटो उंचो महेल आवेलो जणावेलो छे, ते दरेक महेल अढीसो योजन ऊंचो अने सवासो योजन पहोळो छे. जाणे प्रभाना पुंज न होय पवा ए महेलो विविध मणिओ अने रत्नोथी खीचोखीच जडेला छे. उपराउपर छत्रोथी शोभायमान विजय वैजयंती पताकाओ ए महेलो उपर पवनथी फरफरती रहे छ। For Private & Personel Use Only ५ Jain Education Intan wwginelibrary.org Page #459 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार Jain Education Inmat एनां मणिकनकमय शिखरो उचां आभने अडतां छे. महेलोनी भींतोमां बच्चे बच्चे रत्नोवाळां जाळियांओ मूकेलां के. वारणांमां पेससांज विकासमान पुण्डरीक कमळो अने भींतोमां विधविध तिलको तथा अर्धचंद्रको कोरेला छे. महेलो अंदर अने बहार लीसा सोनेरी वेळुथी लींपेला सुंदरतम छे. जे प्रकंठको उपर ते महेलो छे ते प्रकंटको पण छत्रोथी शोभती धजाओथी रमणीय छे. [१०६] ए महेलोनां बारणांनी बन्ने बाजु सोळ सोळ तोरणो जणावेलां छे. ए मणिमय तोरणो मणिमय थांभलाओ उपर बेसाडेलां छे, तेमना उपर पद्म वगेरेना गुच्छाओ टांगेला छे. ते एक एक तोरणनी आगळ पूर्वे वर्णवेला पवा नागदंतो तथा पवी ज बच्चे पूतळीओ उमेली छे. ते ज रीते दरेक तोरणनी आगळ एक एक बाजु सर्वरत्नमय घोडा हाथी मानव किंनर किंपुरुष महोरग गांधर्व ने वृषभनां बब्बे जोडकां तथा तेमनी श्रेणीओ वगेरे आवेलां छे, ते ज प्रकारे नित्य पुष्पवाळी सर्वरत्नमय पद्मलता वगेरेनी श्रेणिओ आवेली छे. ए रीते, हे आयुष्मन् श्रमण ! दिशास्वस्तिक चंदनकलश अने मत्तगजना मुखनी जेवा भृङ्गारनी वे हारो गोठवेली छे. वळी, ते तोरणनी आगळ बच्चे बच्चे आरिसा होवानुं जणावेलुं छे. प आरिसानां चोकठां सुवर्णमय, मंडळो अंकरत्नमय - १० अने मां पडतां प्रतिबिम्बो निर्मलातिनिर्मल छे. हे दीर्घजीवी श्रमण ! चन्द्रमंडळ जेवा प निर्मळ आरिसा अर्धकायप्रमाण जणावेला छे. वळी, ए तोरणोनी आगळ वज्रमा बच्चे थाळो जणावेला छे. प रथना पैडा जेवा मोटा मोटा थाळो जाणे के त्रणवार छडेला आखा चोखाथी भरेला ज होय एवा भासे छे. वळी, ए तोरणोनी आगळ स्वच्छ पाणी अने ताजां लीलां फळोथी भरेली वे बे पात्रीओ मूकेली जणावेली छे. हे चिरंजीव श्रमण ! ए वे बे पात्रीओ गायने खाण आपवाना मोटा गोळ सुंडला जेवडी मोटी सर्वरत्नमय अने शोभनातिशोभन छे. ॥७१॥ jainelibrary.org Page #460 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय मुत्तनो सार ॥७२॥ वळी, ए तोरणोनी आगळ नानाविध भांडोथी भरेला सर्वरत्नमय बेचे सुप्रतिष्ठको छे-शरायो छे. बेबे मनोगुलिकाओ-पेढलीओ छे. ए पेढलीओमां सोनानां अने रूपानां अनेक पाटियांओ जणावेलां छे. ते सोनारूपानां पाटियांओमां बज्रमय नागदतो जडेला छे, प नागदंतो उपर वज्रमय शिकां छे, ए शिकां उपर काळा नीला राता पीळा अने धोळा सूतरना पडदावाळा पवनथी भरेला घडाओ छे; ए बधा पवनपूर्ण घटो चैडूर्यमय सुंदर छे. __ वळी, ए तोरणोनी आगळ रतनथी भरेला बब्बे करंडियाओ छ; चक्रवर्तीना रत्नपूर्ण करंडियानी जेम ए करंडियाओ पोताना ५ प्रकाशथी ए जग्याने चारे वाजुथी चकचकती करी मूके छे. वळी, ए तोरणोनी आगळ वज्रमय बब्बे हयकंठा गजकंठा नरकंठा किन्नरकंठा किंपुरुषकंठा महोरगकंठा गांधर्वकंठा अने वृपभकंठा छे. तेओमां सर्वरत्नमय बब्बे चंगेरीओ छे. तेमां सर्वरत्नमय पुष्प माळा चूर्ण चख आभरण सरसव अने पीछीओ मूकेली छे. वळी, ए तोरणोनी आगळ बब्बे सिंहासनो अने वबे छत्रो होचार्नु जणावेलुं छे. ए छत्रोना दांडा चैडूर्यना, कानी-झूल-सोनानी, सांधा वज्रना, मोतीथी परोवेली सोनानी आठ हजार सळीओ अने चंदन जेवी शीतळ सुगंधी छाया छे. मंगलरूप चित्रोथी आले. १ खेलां चंदना घाट जेवां ए सर्व छत्रो अतिशोभनिक छे. बळी, ए तोरणोनी आगळ बेचे चामरोनी हयाती जणावेली छे. ए चामरोना हाथा चेहर्यना अने पमा विविध मणिरतननी। कोरणी कोरेली छे. क्षीरसागरना फीण जेवां पातळा वाळवाळां सर्वरत्नमय पचामरो बहु सुशोभित देखाय छे. ___ एज प्रमाणे ते तोरणोनी आगळ तेल, कुठ-उपलेट, पत्र-तमालपत्र, चूआ, तगर, पलची, हरताळ, हिंगळोक, मणसिल अने| अंजनना धब्बे कुडलाओनी अस्ति जणावेली छे. ए कुडलाओ सर्वरत्नमय अने अनुपम शोभावाळा छे. [१०७] चळी, प सूर्याभविमानना पक पक वारणा उपर चकनी नीशानीवाळा एकसो ने आठ ध्वजो छे; प ज प्रमाणे मृग, गरुड, छत्र, पीछु, पक्षी, सिंह, वृषभ, चारदंतो हाथी अने उत्तम नागनी नीशानीवाळा एकसो ने आठ आठ ध्वजो छ, अर्थात् ए। Jain Education Inte For Private & Personel Use Only ww.jinelibrary.org Page #461 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वनखंडो | तृणोनो ॥७३॥ रायपसेण- प्रत्येक वारणा उपर एक हजार अने अशी ध्वजो लहेरी रह्या छे एम जणावेलं छे. इय सुत्तनो ग ए सूर्याभविमानमां चंदरवाथी सुशोभित पांसठ पांसठ भौमो-भूमिनां स्थानो जणावेलां छे. ए भौमोनी वरावर वच्चे एक पक/सार सिंहासन मांडेलु छ, वाकीना भौमो उपर एक एक भद्रासन मांडेलु छे. विमानमा वारणांओनां ओतरको सोळ प्रकारनां रत्नोथी घडेला छे. वारणांओ उपर धजा अने छत्रोथी शोभतां आठ आठ मंगलो| आवेलां छे: ए रीते विमाननी चारे बाजुनां ते वां बाराओ एवी उत्तमोत्तम शोभावाळां छे. [१०८] ए सूर्याभविमाननी आसपास पांचसे पांचसे योजन मूकीने चार दिशामां चार वनखंडो आवेला छे. पूर्वमा अशोकवन, दक्षिणमा सादडवन, पश्चिममा चंपकवन अने उत्तरमा चूतकवन. ए वनखंडोनी लंबाई साडाबार लाख योजनथी कांदक वधारे अने पहोळाई पांचसो योजन छे. ते दरेकनी फरतो एक एक कोट छे. एम ए चारे वनखंडो लीलाछम जेवा, टाढा हिम जेवा, जोनारनी आंखने ठारे पवा शीतळ छे.. [१०९] ते वनखंडोर्नु मातळ तद्दन सम-सपाट छे, ते उपर अनेक प्रकारना मणिओ अने तृणो शोभी रया छे, तेमनो स्पर्श अने गंध मनगमतो आकर्षक छे. [११०] हे भगवन् ! पूर्व पश्चिम दक्षिण अने उत्तरना वायरा बाय छे त्यारे मंद मंद हलता परस्पर अथडाता पया ते तृणोनो। || अमे माणओनो केवो अवाज थाय छे ? हे गौतम ! एमनो अवाज श्रमहर श्रुतिमधुर अने श्रुतिने अत्यंत तृप्ति आपनारो थाय छे. छत्र, धजा, घंट, पताका अने उत्तम तोरणोथी सुशोभित एक सुंदर रथ होय, जेनी चारे वाजु नानी नानी टोकरीओ जडेली होय, हिमालयमां उगेला तिनिशना लाकडानांथी बनावेलो होय, आरा अने घोसरं बराबर बेसाडेलां होय, पैडां उपरनो लोढानो पाटो। Jain Educatio n al For Private Personel Use Only Whujainelibrary.org . . 1 Page #462 -------------------------------------------------------------------------- ________________ होय, एवो पर तेना जेबो वनखंडोमां रायपसेणइय सुत्तनो सार अनेक शेष मधुर है जलाशयो ॥७४॥ मजबूत होय, कुलीन घोडानी जोड जोडेली होय, हांकनारो सारथि अतिकुशळ होय अने अनेक प्रकारनां हथोआरो कवचो भाथांओ वगेरे युद्धोपकरणोथी जे भरेलो होय, एवो प रथ, मणिओथी बांधेला राजाना भव्य आंगणामां वारंवार चालतो होय, वारंवार आवतो जतो होय, त्यारे तेनो जे मधुरध्वनि संभळाय छे, तेना जेवो ते तृणोनो अने मणिोनो ध्वनि छे? गौतम ! ना, एना जेवो पमनो ध्वनि नथी पण ते करताय विशेष मधुर छे. वादनकुशळ नर वा नारीद्वारा रात्रीना छेल्ले पहोरे वागती चडती उतरती मूर्छनावाळी पवी वैकालिक वीणानो जे मधुर अवाज ५ संभळाय छे तेवो अवाज, ते तृणोनो अने मणिओनो छ ? गौतम ! ना, पवो पण नथी-प करतां सविशेष मधुर छे. भद्रशाळ नंदन सोमनस के पांडकवनमा अथवा हिमालय मलय के मंदर गिरिनी गुफाओमा रहेता, गानताननी सहेल करवा साथे मळेला किन्नरो किंपुरुषो महोरगो अने गांधोंनो जेचो विशुद्ध मधुर गीतध्वनि गुंजे छे, तेयो ध्वनि परस्पर अथडाता ए मणि ओनो अने तृणोनो छ ? गौतम ! हा, ते मणिओनो अने तृणोनो पवो मधुरातिमधुर ध्वनि नीकळे छे. [१११] वळी, ए वनखंडोमा ठेकठेकाणे नानी मोटी नानामां नानी अने मोटामां मोटी पवी अनेक चोरस चावो, गोळ पुष्करिणीओ, सीधी वहेती नदीओ, वांकी चुंकी वहेती नदीओ अने फूलोथी ढांकेला पवां हारवंध आयेला अनेक सरोवरो तथा हारवंध शोभता अनेक कवाओ आवेला छे. ए बधांना कांठा रजतमय, कांठाना भागो खाडाखडिया विनाना पकसरखा छे. एमनी अंदरना पाणाओ बज्रमय अने वेळु सुवर्ण-रजतमय छे. वावो वगेरे ए वधां जलाशयो सुवाळा सोनाना तळियावाळां छे, एमां ऊतरवानां अने नीकळवानां साधनो सारी रीते गोठवा-|| पलां छे, एमना घाटो अनेक प्रकारना मणिओथी जडेला छे. चार खूणावाळा ए जलाशयोमां पाणी अगाध अने अतिशीतळ छे. JainEducation For Private Personal Use Only Page #463 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पण- इय सुत्तनो सार पाणी जेमनी उपर भमरा-भमरीओ गुंजी रह्यां छे पयां उत्पल, कुमुद, नलिन, सुभग, सौगंधिक, पाँडरीक, सो अने हजार पांखडीवाळां । खोलेला कमळोथी अने विसपत्र तथा मृणालना दंडोथी ए वां जलाशयो ढंकापलां छे. जेमनी अंदर भमता मत्स्यो अने काचवाओ आसव जेवां अने बीजा कलोल करी रह्या छे अने जेमने कांठे अनेक प्रकारनां पक्षीओ विचरी रह्यां छे पवां ए स्वच्छातिस्वच्छ जळथी छलकतां जलाशयो| प्रकारनां ते वनखंडोमां शोभी रह्यां है. ए जलाशयोमा केटलांकमां आसव जेवां पाणी छे, केटलांकमां शेरडीना रस जेवां, केटलांकमां घी जेवां, केटलांकमां दृध जेवां, ५ वटोमां केटलांकमां खारा ऊस जेयां अने केटलांकमा सामान्य पाणी जेवां पाणी भरेलां छे. क्रीडानां ते वावो अने कृवा वगेरे प्रत्येक जलाशयोनी फरतां चारे दिशामा त्रण प्रण सोपानो छे, ते सोपानो उपर तोरणो धजाओ अने । अनेक छत्रो वगेरे शोभी रह्यां छे. साधनो अने [११२] तेमां नानी नानी वावो वगेरेनी अने कूवानी हारोमा बच्चे वच्चे घणा उत्पातपर्वतो नियतिपर्वतो जगतीपर्वतो दारुपर्वतोदेवोनी आवेला छे तथा कोइ ऊंचा के नीचा पवा दकमंडपो दकमालको अने दकभचो उभा करेला छे. क्रीडा वळी त्यां मनुष्योने हिंचवालायक हिचका जेवा केटलाक हिंचकाओ गोठवापला छे, तेम पक्षीओने झलवालायक झला जेवा केटलाये झलाओ गली रह्या छे. ए वधा हिंचकाओ अने मलाओ सर्वरत्नमय होवाथी अधिकाधिक प्रकाशमान अने मनोहर के. | ॥७॥ ११३] वच्चे बच्चे आवेला ते उत्पातपर्वतो वगेरे पर्वतो उपर अने हिंचकाओ उपर सर्वरत्नमय पां अनेक हंसासनो, जाँचासनो, गरुडासनो, उन्नत ढळतां अने लांयां आसनो, पक्ष्यासनो, भद्रासनो, वृपभासनो, सिंहासनो, पद्मासनो अने स्वस्तिकासनो सजापला छे. [११४] वळी, ते वनखंडोमां सर्वरत्नमय झळहळायमान एवां आलिगृहो, मालिगृहो, कदलीगृहो, लतागृहो, आसनगृहो, प्रेक्षणगृहो, Jain Education For Private Personal use only Ra j ainelibrary.org Page #464 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥६॥ मज्जनगृहो, मंडनगृहो, प्रसाधनगृहो, गर्भगृहो, मोहनगृहो, शालागृहो, जाळीवाळ गृहो, चित्रगृहो, कुसुमगृहो, गंधगृहो, आरिसाभ चार प्रासाबिनो शोभी रह्यां छे अने ते प्रत्येक गृहमा पूर्व कह्या प्रमाणे हंसासनो घगेरे आराम पनारां आसनो मांडेलां हे. । [११५] बळी, ते वनखंडोमां ज्यां त्यां सर्वरत्नमय पवा झळा झळां थता जाइनी वेलोना मंडपो, जूइनी वेलोना मंडपो, मल्लिका, दो अने नवमालिका, वासंती, दधिवासुका, सूरिल्लि-सूरजमुखी, नागरवेल, नाग, अतिमुक्तक, अप्फोया अने मालुकानी लताओना मंडपो उपकारिका फेलापला छे. लयन [११६] ते प्रत्येक मंडपमा हस अने गरुड वगेरेना घाटना, ऊंचा ढळता अने लांबा पवा केटलाय सर्वरत्नमय शिलापट्टको ढाळेला छे. ते बधाय शिलापट्टको माखण जेवा सुंबाळा कोमळ अने देदीप्यमान छे. हे चिरंजीव श्रमण ! से स्थळे अनेक देयो अने देवीओ से छे, सूए छे, विहरे छे, हसे छे, रमे छे, रतिक्रीडा करे छे अने ए रीते पोते पूर्व उपार्जेला शुभ कल्याणमय भगलरूप पुण्यकर्मोना फलविपाकोने भोमवता आनंदपूर्वक विचरे छे. । [११७] वळी, ते धनखंडोनी बच्चोवच्च पांचसे योजन ऊंचा अने अढीसो योजन पहोळा पवा चार मोटा प्रासादो शोभी रह्या २० छे. प्रासादोनां भोयतळियां तद्दन सपाट छे अने तेमां चंदरवा सिंहासनो यगेरे उपकरणो यथास्थाने गोठवाएला छे. । तेमांना एक प्रासादा अशोकदेव, धोजामां सप्तपर्णदेव, श्रीजामां चंपकदेव अने चोथामां चूतकदेव एम चार देवोनो निवास (छ. ए चारे देवो मोटी दिव्य समृद्धिवाळा अने पल्योपमप्रमाण आयुष्यचाळा . ११८] अतिशय सुंदर एवा ते सूर्याभनामना देवधिमाननो अंदरनो भूभाग तहन सपाट अने अत्यंत रमणीय छे. त्यां पण घणा देवो अने देवीओ फरे छे, बेसे छे, हसे छे, रतिक्रीडा करे छे अने आनंद माणता विचरे छे. ते विमानना ए भूभागनी बच्चोपच्च लाख योजन लावू पहोठं पधु एक मोटुं उपकारिकालयन छेः तेनो घेरावो त्रण लाख सोळ हजार बसें सत्तावीस योजन, त्रण कोश, अट्ठावीससें धनुष, सेर आंगळ अने उपर ओछु वधतुं अउधुं आंगळ छे. प पषु । माननो अंदरनो भूभागमा विचरे छे. तेनो घेरायोपवं Jan Education Page #465 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण पनवर वेदिकानुं वर्णन इय सुत्तनो सार ७७॥ मोटु लयन आय सुवर्णमय छे अने अत्यन्त मनोहरमा मनोहर छे. [११९] ए लयननी चारे बाजु अडधुं योजन ऊंची अने पांचसें धनुष पहोळी पवी एक मोटी पद्मवरवेदिका छे अने पटलाज मापनो एक मोटो वनखंड ते लयनने घेरी रहेलो छे. ते वेदिकाना थांभला, पाटियां, खीलीओ, खीलीओनी टोपीओ, बांसडा, वांसडा उपरनां नळियां, पाटीओ, मोभीयां, ढाकणां अने|| तेनां जालियां, गोखला वगेरे ए बधं विविध रत्नमय मणिमय वज्रमय अने सुवर्णरजतमय छ, पना केटलांक जाळियां नानी नानी टोकरीओवाळां, मोतीना पडदावाळां अने मोटी मोटो लटकती माळावाळा है. __ वेदिकामां ज्यां त्यां सर्वरत्नमय घोडानी वृषभनी अने सिंह वगेरेनी जोडो शोभी रही छे. हे भंते ! ए बेदिकाने पद्मवरवेदिका कहेवार्नु शुं कारण ? गौतम! ए वेदिकाना थांभला, पाटीयां, खीलीओ, खीलीओनी टोपीओ, मोभ अने जाळियां वगेरे दरेक भागमां,चोमासाना पड़ता। पाणीने रोकी शके एवा छत्राकार अनेक प्रकारनां सर्वरत्नमय सुंदर उत्पलो, कुमुदो, नलिनो, पुंडरीको बगेरे नाना प्रकारनां स्वीलेला पद्मो शोभी रह्यां छे, माटे हे चिरंजीव श्रमण ! ए वेदिकाने पद्मवरवेरिका कहेली छे. हे भगवन् ! उपर वर्णवेली ए पद्मवरवेदिका शुं शाश्वत छे के अशाश्वत छ? गौतम ! द्रव्यार्थिक नयनी दृष्टिप तो ए वेदिका शाश्वत छे, पण हे गौतम! ते वेदिकाना वर्णों गंधो, रसो अने स्पशोंनी दृष्टिए जोता अर्थात वर्णादि पर्यायोनी अपेक्षाए तो ते वेदिका अशाश्वत छे, माटे तेने शाश्वत पण कही छे अने अशाश्वत पण कही छे. हे भगवन् ! उपर वर्णवेली वेदिका, शुं त्या कायम रहेवानी छे? हे गौतम ! ए वेदिका, त्यां कोई दिवस न हती, नथी के नहि हशे एम तो न कहेवाय; पण ए, त्यां हमेशांने माटे हती, छे भने । हशे एम कहेवाय; माटे ते त्यां ध्रुव, शाश्वत, अव्यय, नित्य अने सदा अवस्थित छे एम मानवु जोइए. Jain Education errona For Private Personel Use Only w.jainelibrary.org Page #466 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥७८॥ Jain Education [१२०] उपकारिकालयननी फरतो जे वनखंड वर्णवेलो छे तेनो चक्रवालविष्कंभ बे योजनथी कांइक ओछो छे अने तेनो घेरावो तो ते लयनना जेटलो ज छे. प वनखंडमां पण अनेक देवो अने देवीओ फरे छे, हसे छे, बेसे छे, सूप छे अने रतिक्रीडा करतां विहरे छे. [१२१] प लथनमी फरतां चारे दिशामां बार चार सोपानो गोवेलां छे. प सोपानो उपर तोरणो ध्वजो अने छत्रो वगेरे घणा मनहर पदार्थों झूली रह्या छे. लयननं भयतळ, मणिरत्न अने वज्र वगेरे बहुमूल्य धातुओथी बधिलुं छे अने वळी ते तहर सपाट अने चारे बाजु झगारा मारतुं शोभी रह्युं छे. _[१२२] लयनना ते समतल भूभागनी बच्चोवच पांच आवेलो छे. योजन उंचो अने अढीसो योजन पहोलो एवो एक मोटो मुख्य प्रासाद ते मुख्य प्रासादनी फरता भने लेना करतां ऊंचाई अने पहोळाईमां अडधा एवा बीजा चार प्रासादो आवी रहेला छे. वळी, ए आजुबाजु आवेला चार प्रासादोनी आसपास तेमने वींटळाईने तेमना करतां ऊंचाइप अने पहोळाइप अडधा एवा बीजा १० चार महालयो सोहामणा आवेला छे. वळी, सोहामणा ए चार महालयोने घेरीने ऊमेला पण मापमां तेना करतां अडधा पवा बीजा चार महालयो त्यां दीपी रहेला छे. आ हेला चार महालयोनी ऊंचाइ ६२ ॥ योजन अने पहोळाइ ३१ योजन उपर एक कोश छे. ए बधाय प्रासादोनी अंदर चंदरवा सिंहासन वगेरे शोभनिक उपकरणो गोठवापलां छे अने उपर धजाओ तोरणो अने आठआठ मंगळो झूली रह्यां छे. १५ [१२३] एम अनेक प्रासादोथी वींटापला ते मूळ प्रासादधी उत्तरपूर्वमां अर्थात् ईशानखूणामां एक मोटी सुधर्मा सभा आवेली छेएनी लंबाई सो योजन, पहोळाइ पचास योजन अने उंचाइ बहोंतेर योजन छे. जेमनी उपर अनेक प्रकारनां तोरणो पूतळीओ अने सुधर्मा सभा अने मंडपो Jainelibrary.org Page #467 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार अप्सरानां झुंडो कोरेलां छे पवा अनेक मनहर स्तंभो उपर ए सभा रचापली छे. प सभाने पूर्वमा दक्षिणमां अने उत्तरमा पम त्रण स्तूपो अने द्वारो भूकेला छे. ते एक एक द्वार सोळ सोळ योजन उंचं अने आठ योजन पहोळं छे, तेम ते दरेकनो प्रवेशमार्ग पण तेटला ज मापनो तेमनी छे पत्रणेद्वारो घोळां दृध जेवां, सुवर्णमय स्तूपवाळां अने उपर आठ आठ मंगळोथी विराजित छे. सामेनी ते प्रत्येक द्वारनी सामे एक एक मुख्य मंडप छे. प मंडपनी लंबाइ सो योजन, पहोळाइ पचास योजन अने ऊंचाई सोळ योजन | मणिपीठिकरतां वधारे छे. | का उपर ए मंडपने पण पूर्वमा दक्षिणमा अने उत्तरमा एम प्रण वारसाख पाडेलां छे. ते प्रत्येक बारलाख ऊंचाईमा सोळ योजन अनेचार जिन पहोळाईमां आठ योजन छे अने ते दरेकनो प्रवेशमार्ग पण सेटला ज मापनो छे ते वां वारणांओ चंदवा वगेरेथी सुशोभित छे अने प्रतिमा तेमनी उपर धजाओ अने आठ आठ मंगलो फरफरी रह्यां छे. बळी, ते प्रत्येक मुखमंडपनी सामे तेमनी जेवा ज सुंदर प्रेक्षागृहमंडपो आवेला छे. [१२४] ते पक पक प्रेक्षागृहभंडपना समतळ भूभागनी वच्चे एक मोटो धज्रमय अखाडो शोभी रह्यो छे. ॥७९॥ ते एक एक अखाडानी वश्चोवञ्च आठ योजन लांबी पहोळी, चार योजन जाडी अने नाना प्रकारनां मणिरत्नोथी बांधेली पची एक मोटी मणिपीठिका शोभी रही छे, ए मणिपीठिका उपर सिंहासन वगेरे आरामनी सामग्री गोठवी राखेली छे. ___वळी, ज्या प्रेक्षागृहमंडपो वर्णवेला छे त्यां ते प्रत्येक मंडपनी सामे पण सोळ योजन लांबी पहोळी अने आठ योजन जाडी एवी | सुंदर मणिपीठिकाओ ढाळेली छे. ते दरेक पीठिकानी उपर सोळ योजन लांबा पहोळा अने ते करतां ऊंचाइमां कांइक वधारे ऊंचा तथा सर्व प्रकारनां रत्नोथी | चणेला धोळा शंख जेवा ऊजळा पवा अनेक स्तूपो बांधेला छे. पदरेक स्तूपो उपर धजाओ तोरणो अने आठ आठ मंगळो छाजी रह्यां छे. Jan Educat ional For Private Personal Use Only Page #468 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥८ ॥ तथा, ए एक पक स्तूपनी फरती चारे दिशामां वळी बीजी मणिपीठिकाओ आवेली छे. ते पीठिकाओनी लंबाई पहोळाई आठ चैत्यवृक्षोनुं योजन अने जाडाई चार योजन छे.प पीठिकाओ अनेक प्रकारना मणिओथी निर्मली अतिशय रमणीय छे, एमनी उपर अने ए स्तूपोनी | वर्णन बराबर सामे चार जिनप्रतिमाओ विराजेली छे, ए प्रतिमाओ जिननी ऊंचाइए ऊंची अने पर्यकासने बेठेली छे. तेमांनी एक ऋसभनी, बीजी वर्धमाननी, त्रीजी चंद्रानननी अने चोथी वारिषेणनी प्रतिमा छे. [१२५] वळी, ते स्तूपोनी सामे सोळ योजन लांबी पहोळी अने आठ योजन जाडी एवी सर्वमणिमय बीजी मणिपीठिकाओ निर्मेली | छे. ते दरेक पीठिका उपर एक पक चैत्यवृक्ष आवेलुं छे. ए बधां चैत्यवृक्षो आठ योजन ऊंचां अने "अडधु योजन ऊंडां छे.घे योजनन थड अडधुं योजन पहोछे छे. थडथी नीकळो ऊंची गपली वचली शाखा छ योजन ऊंची छे. एम ए चैत्यवृक्षोनो सर्वांग लंबाई पहोळाई एकंदर आठ योजन झाझेरी छे. ए वृक्षोनां मूळ वज्रमय, शाखा रूपेरी, कंदो रिष्टरत्नमय, स्कंधो वैडूर्यना, नानी नानी शाखाओ मणिमय रत्नमय पांदडां वैडू ८१ आगमोदयसमितिवाळा पुस्तकमा (पृ० ८७) "ते णं चेइयरुक्खा अट्ट जोयणाई उड्ढे उच्चत्तेणं, अट्ठ जोयणाई उब्वेहेणं" आवो पाठ छे. ते पाठ प्रमाणे "ते चैत्यवृक्षो ऊंचाईमां आठ योजन छे अने ऊंडाईमा आठ योजन छे" आवी अर्थ थाय. त्यारे आ मूळ पाठनी टीकामां तद्दन जुदोज अर्थ छे. ("प्रत्येकं चैत्यवृक्षा अष्टौ योजनानि ऊर्ध्वम्-उच्चैत्वेन, अर्धयोजनम् उद्वेधेन-उण्डत्वेन" समिति आवृत्ति पृ०९०) आ विवरणमां "ऊंडाई अडधुं योजन" बताबी छे. मने लागे छे के प्रस्तुत विवरण- प्रामाण्य जोता समितिवाळी आवृत्तिमा 'अद्वजोयण पाठ होवो जोइए पण संशोधकनी असावधानीथी 'अट्ट जोयणाई थई गयुं छे, आ पाठमां 'अट्ठ' ने बदले 'अद्ध' वांचवाथी काम सरी जशे एम कोइ न धारे, कारण के 'जोयणाई ए बहु-१५ वचननी संगति थइ शके एम नथी. 'अडधा योजन' माटे 'जोयणं' एम एकवचन ज घटमान थई शके. For Private Personel Use Only Join Education mella Page #469 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इस सुत्नो सार | यनां, डींटियां सुवर्णमय, अंकुराओ जांबूनदमय अने फूलफलभर विचित्र मणिरत्नमय सुरभि छे. ए फळोनो रस अमृतसम मधुरो | छे. ए रीते सरस छाया, प्रभा, शोभा अने प्रकाशवाळां ए चैत्यवृक्षो विशेषमा विशेष प्रासादिक छे. वृक्षो उपर आठ आठ मंगळो वजो आने छत्रो वगेरे शोभी रहेला छे अने पमनी-ए वृक्षोनी-फरता शिरीष वगेरे बीजां पण | अनेक वृक्षो आवेलां छे. ए चैत्यवृक्षोनी आगळ आठ योजन लांबी पहोळी अने चार योजन जाडी पवी सर्वमणिमय बीजी अनेक मणिपीठिकाओ | ५ आवेली छे. ___प दरेक पीठिकाओ उपर साठ योजन ऊंचा अर्ध क्रोश उंडा अने अर्ध क्रोश पद्दोळा एवा विशिष्ट प्रकारना वज्रमय अनेक महेन्द्रध्वजो खोडेला छे, तेमनी उपर पथनथी हालती नानी नानी अनेक पताकाओ, आठ आठ मंगळो, ध्वजो अने छत्रो वगेरे बधुं लहेरी रहेलुं छे. ८२ अहीं पण समितिवाळो आवृत्तिमा मूळ पाठ अने टीकानो पाठ बन्ने परस्पर असंगत छपाएला छे व्यारे मूळमां 'जोयण' छे त्यारे | टीकामां 'अर्धक्रोशम्" छे. मारी पासेनी भावनगरवाळी प्रति सिवाय बाकीनी बधीय प्रतिओमां पण समितिनी आवृत्ति जेवो ज पाठ छे. मात्र एक भावनगत्वाळी प्रतिमा ज 'जोयण'ने बदले 'अद्धकोस' पाठ छे अने ए 'अद्धकोस' पाठ पण भावनगरवाळी प्रतिमा पहेलेथी न हतो परंतु कोईए सुधारीने बनावेलो छ अर्थात् भावनगरवाळी प्रतिमा पहेला 'जोयणं' पाठ ज हतो पण पछी तेने बदले कोईए विवरणर्नु प्रामाण्य ध्यानमा राखी 'अद्धकोसं' करेलो छे अने अहीं में तो ए सुधारेला पाठने ज मान्य राख्यो छे. ॥८॥ Jain Education at hinelibrary.org Page #470 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुचनो सार 11८२॥ ते दरेक महेन्द्रध्वजोनी आगळ सो योजन लांबी पचास योजन पहोळी अने दस योजन उंडीएवी नन्दा नामनी पुष्करिणीओ आवेली छे. पनां पाणी सामान्य पाणी जेवां मीठा रसवाळां छे. ___ए प्रत्येक पुष्करिणीओनी चारे कोर पूर्व वर्णवेलां पद्मवरवेदिकाओ अने वनखंडो आवेलां छे अने पुष्करिणीओमां त्रण बाजु सरस सोपानो गोठवेला छे तथा उपर बेसाडेला तोरणो, ध्वजो, आठ आठ मंगळो अने छत्रो बगेरे त्यां ठेकठेकाणे दीपी रहेला छे. ए सुधर्मासभामा पूर्व अने पश्चिममा सोळ सोळ हजार तथा दक्षिण अने उत्तरमा आठ आठ हजार पेढलीओ बांधेली छे. प ५ पेढलीओ उपरनां पाटीयां सुवर्ण रजतमय अने ते उपर जडेला नागदन्तो बज्रमय छे. ते नागदन्तोमा काळा सूतरनी माळाओ लटके छे. वळी, ५ सुधर्मासभामां प पेढलीओनी जेवीज अने जे उपर सुखे सई शकाय पची सुकोमळ सुंदर शय्याओ धीछापली छे, पवी अडताळीश हजार गोमानसीओ आवेली छे. ते गोमानसीओनी पासे ज जडेला नागदन्तोमा टांगेलां रजतमय शिंकां उपर वैडूर्यमय धूपघडीओ मूकेली छे अने ५ धूपघडीओमाथी नीकळतो सुगन्धमय काळा अगरनो धूप चारे कोर महेकी रह्यो छे. [१२६] सभानी अन्दरना भागर्नु भौतळ तद्दन सपाट अने विविध मणिओथी बांधेलु छे अने ते उपर सिंहासन चन्दरवा वगेरे सामग्री सरस रीते सजेली छे. वळी, ए भोंतळनी बच्चोवच्च सोळ योजन लांबी पहोळी अने आठ योजन जाडी पची सर्वमणिमय एक मोटी मणिपीठिका ८३ अहीं पण मूळ पाठ अने विवरणमा मोटो भेद छे. मूळ पाठ 'दस जोयणाई छे त्यारे विवरणनो पाठ 'द्वासप्ततियोजनानि छे अर्थात् मूळमां 'दस योजन' लखेला छे त्यारे विवरणमां 'बहोंतेर योजन' लखेलां छे. आ स्थाने पण मात्र एक भावनगरनी प्रतिमा विवरणमा 'दश योजनानि' पाठ आवे छे अने तेने ज अहीं राख्यो छे, आम करवायी ज मूळ अने विवरणनो विसंवाद मटे छे. समितिवाळी आवृत्तिमां तो ए |१५/ विसंवाद कायम रहेलो छे. बळी विवरणमा जे 'बहेतिर योजन' लखेटु छे ते पण विचारणीय तो खरुंज ने ! For Private Personel Use Only in Education ellorary.org Page #471 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुतनो सार बांधेली छे. तेनी उपर साठ योजन ऊंचो योजन उंडो अने योजन पहोळो तथा अडताळीश खूणावाळो, अडताळीश धारवाळोranळी पासवाळो पवो महेन्द्रध्वजनी जेवो एक मोटो माणवक चैत्यस्तम्भ आवेलो छे. पनी उपर आठ आठ मंगळो धजाओ भने छत्रो घगेरे खोडी राखेलां छे. प चैत्यस्तम्भनी बच्चेना छत्रीश योजन" जेटला भागमां सोना रूपानां पाटियां जडेलां छे. ते पाटियां उपर बेसाडेला वज्रमय नागदन्तो मां रूपेरी शिकां टांगी राख्यां छे. ते शिकां उपर वज्रमय गोळ गोळ दावडीओ गोठवी राखेली है अने ते दाबडीओमां ५ जिनना सक्थिओ - साथळनां हाडकांओ मूकी राखेलां छे. सूर्याभदेवने अने बीजां पण अनेक देव देवीओने जिनना ते सक्थिओ अर्चनीय के वन्दनीय के अने पर्युपासनीय छे. [१२७] आठ मंगळ अने चामर वगेरेथी सुशोभित ते माणवक चैत्यस्तम्भनी पूर्वे आठ योजन लांबी पहोळी अने चार योजन जाडी व सर्वमणिमय एक मोटी मणिपीठिका आवेली छे अने तेना उपर एक मोटुं सिंहासन ढाळेलुं छे. ॥८३॥ बळी, ते चैत्यस्तम्भनी पश्चिमे, पूर्वे आवेली पत्री अने पवडी ज बीजी एक मणिपीठिका आवेली छे, तेना उपर एक मोटुं अतिशय १० रमणीय देवशयनीय गोठवेलुं छे. देवशयनीयमा पढवाया सोनाना, पाया मणिना अने पायाना कांगरां सोनानां छे. पनी इंसो अने उंपळां वज्रनां वाण विविधमणिमय, तळाई रूपेरो अने ओशोका सुवर्णमय छे. ते देवशयनीय बन्ने बाजुथी ऊंचुं अने बच्चेथी ढळतुं एवं गम्भीर छे, ए मेलुं न थाय पटला माटे पना उपर रातुं वस्त्र ढांकेलं ८४ अहीं आगमोदय समितिवाळी आवृत्तिमां मूळमां 'बत्तीसाए जोयणेसु' - छपाएलं छे पण ते पाठ, विवरण जोत खोटो जणाय छे. विव- १५ रणमां 'षत्रिशति योजनेषु' (पृ० ९२) पाठ छे माटे मूळमां 'छत्तीसार जोयणेसु' ज पाठ होवो उचित छे. Jain Education Intentional चैत्य स्तंभ नी वच्चेना शिकामां श्री जिनना साथळनां हाडकां Page #472 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥८४॥ Jain Educat छे अने प माखण जेवुं सुंवाळु, कोमळ, अतिसुवासित, मनोहर छे. [१२८] पनी उत्तरपूर्व पटले ईशान खूणामां आठ योजन लांबी पहोळी अने चार योजन जाडी पवी सर्वमणिमय एक मोटी मणिपीठिका छे. तेनी उपर साठ योजन ऊंचो एक योजन पहोलो पवो एक क्षुल्लक नानो महेन्द्रध्वज रोपेलो छे, पना उपर आठ आठ मंगळो अने ध्वजो वगेरे शोभी रह्यां छे. ए नाना महेन्द्रध्वजथी पश्चिमे चोपाळ नामनो एक मोटो हथियारोनो वज्रमय भण्डार छे, एमां उत्तम प्रहरणो- परिघो तरवारो गदाओ अने धनुष वगेरे अस्त्रशस्त्र संघरी राख्यां छे. ए भण्डारमां साचची राखेलां सूर्याभदेवनां ए बधां अस्त्रशस्त्रो ऊजळां पाणीवाळां अणीदार अने विशेषमां विशेष तेजवाळां छे. सूर्याभनो शस्त्र भंडार सिद्धायतनमां ५ एकसो- आठ [१२९] सुधर्मा सभानी उपर आठ आठ मंगळो छत्रो अने धजाओ वगेरे शोभाजनक पदार्थों दीपी रह्यां छे. ए समानी उत्तरपूर्वे पटले ईशान खूणामां सो योजन लांधुं पचास योजन पोलुं अने बहोंतेर योजन ऊंचं एवं एक मोटुं सिद्धायतन आवेलुं छे. ए सिद्धायतननी बधी शोभा सुधर्मासभानी जेवी समजवानी छे. १० ए सिद्धायतननी बच्चोवच्च सोळ योजन लांबी पहोळी आठ योजन जाडी पवी एक मोटी मणिपीठिका आवेली छे. ए पीठिकानो उपर सोळ योजन लांबो पहोलो अने ते करतां थोडो वधारे ऊंचो पवो सर्वरत्नमय एक मोटो देवच्छंदक गोठवेलो छे. तेना उपर जिननी ऊंचाईए ऊंची एवी एकसो ने आठ जिनप्रतिमाओ बिराजेली छे. प्रतिमाओना हाथपगनां तळियां तपनीयमय, नखो वच्चे लोहिताक्षरत्न जडेल अंकरत्नना, जांघो, जानुओ, ऊरुओ अने देहलता कनकमय, नाभी तपनीयमय, रोमराई रिष्टरत्नमय, चुचुको अने श्रीवृक्ष तपनीयमय, वन्ने ओष्ठो प्रवालमय, दांतो स्फटिकमय, जीभ १५ अने ताळबुं तपनीयमय, नासिका बच्चे लोहिताक्षरत्ने जडेल कनकमय, आंखो वच्चे लोहिताक्षरत्ने जडेल अंकरत्नमय, कीकीओ आंखनी पांपणो अने भवांओ रिप्ररत्नमय, बन्ने कपोलो कान भने भालपट्ट कनकमय, माथानी घडीओ वज्रमय, माथाना वाळ उगवानी | जिनमति माओ Page #473 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार चामडी तपनीयमय अने माथा उपरना वाळ रिष्टरत्नमय छे. [१३०] ते दरेक जिनप्रतिमाओनी पाछळ, माळावाळां घोळां छत्रो घरी राखनारी छत्रधारक प्रतिमाओ छे, बजे वाजुर मणिकनकमय चामरने वझती चामरधारक प्रतिमाओ छे. बळी ते दरेक जिनप्रतिमाओनी आगळ सर्वरत्नमय पवी वे बे "नागप्रतिमाओ, भूतप्रतिमाओ, यक्षप्रतिमाओ अने कुंडधारक प्रतिमाओ आवेली छे. प उपरान्त एक सो आठ पकसो आठ घंटो, कळशो, भृङ्गारो, आरिसाओ, थाळो, पात्रीओ, सुप्रतिष्ठो, मनोगुलिकाओ, रत्नकरंयाओ, इकाओ गजकंठाओ अने वृषभकंठाओ वगेरे अनेक पदार्थों त्यां प प्रत्येक जिनप्रतिमानी आगळ गोठवेला छे. चळी फूल, माळा, चूर्ण, गन्ध, वस्त्र, आभरण, सरसव अने मोरपींछ वगेरे उपकरणोनी एकसो आठ एक सो आठ चंगेरीओ, त्यां प्रतिमाओ आगळ मूकी राखेली है. ८५ सूर्याभदेवना विमानमां तो बधा वैमानिक देवो रहे छे, त्यां नागो अने भूतोनो निवास नथी तेम संबंध पण नथी, छतां एविमानमो नागो अने भूतोनी प्रतिमाओ शा माटे स्थापेली हशे ? स्थापेली तो ठीक पण एमने जिनप्रतिमाओनी आगळ शा माटे मुकवामां आव हो ? नागोनी अने भूतोनी प्राचीन पूजापद्धतिनी आमा असर तो नहि होय ? लोको नागोथी अने भूतोथी भय पामता अने तेमांथी पोतानुं रक्षण मेळवबा तेओए नागो अने भूतोनी पूजा प्रवर्तावेली ए बात प्रसिद्ध छे; त्यारे शुं सूर्याभदेव पण नागोनी अने भूतोनी पूजा करतो ह खरो ? एने पण एमनाथी भय हशे के केम ? नाग अने भूत ए बन्ने नामो एक बळवान अने सुप्रसिद्ध वंशने पण सूचवे छे, तो शुं अहीं पराएला ते बन्ने शब्दो ए वंशना सूचक छे के नागदेवता वा भूत प्रेत व्यंतरना सूचक छे, ए बाबत पण विचारवा जेवी तो खरीज. १५ Jain Education emaional १० नागनी अने भूतनी प्रतिमाओ ॥८५॥ Page #474 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥८६॥ Jain Education वळी, फूल, माळा, गन्ध अने मोरपछ वगेरेनां तेटलां ज पटलको त्यां स्थापी राखेलां छे. ए उपरान्त एकसी आठ एकसो आठ सिंहासनो, छत्रो, चामरो, तेलना डबाओ, कुठना डबाओ, सुगन्धी पत्र, सुगन्धी चूवा, तगर, पलची, हरताळ, हिंगळोक, मणसिल अने आंजना डबाओ, प वधुं त्यां यथाक्रमे गोठवी राखेलुं छे. ए डबाओमां तेल वगेरे जे पदार्थों भरेला छे ते अत्यन्त निर्मळ सुगन्धी अने उत्तम जातना छे. वळी, प सिद्धायतनमां सुगंधी धूपथी मघमघतां एकसो ने आठ धूपधाणां राखेलां छे अने प आयतनोनी उपर जडेला आठ आठ मंगळो धजाओ अने छत्र वगेरे पमनी शोभामां बधारो करी रह्यां छे. [१३१] ते सिद्धायतनमी उत्तरपूर्वे पटले ईशान खूणामां सुधर्मासभा जेवी एक मोटी उपपातसभा आवेली छे. ए सभानी उत्तरपूर्वे सो योजन लांबो पचास योजन पहोलो अने दस योजन ऊंडो एवो एक मोटो स्वच्छ पाणीनो धरो भरेलो छे. ते धरानी उत्तरपूर्वे सूर्याभदेवनी एक मोटी अभिषेकसभा आवेली छे. ए सभामां अभिषेक करवानी बधी सामग्री भरेली छे. ते अभिषेकसभानी उत्तरपूर्वी सूर्याभवना अलंकारोथी भरेली एधी एक मोटी अलंकारसभा आवेली छे. प सभानी उत्तरपूर्वे एक मोटी व्यवसायसभानुं १० स्थान आवेलुं छे, तेमां सिंहासन वगेरे बधां उपकरणो व्यवस्थित रीते गोटवेलां छे. व्यवसायसभामा सूर्याभदेवनुं एक मोटुं पुस्तकरत्न मूकेलुं छे. ते पुस्तकनां "पानां रत्ननां पानां उपर राखवानी कांबीओ रिष्ट८६ स्वर्गीय बधा पदार्थों रत्न अने मणि वगेरेना वर्णवेला छे तेम त्यांनुं पुस्तक पण रत्नमय छे एम मूळकार कहे छे. पुस्तकनी रत्नमयता पाषाण उपर लखवाना युगनी यादी आपे छे. लखवा माटे पांदडां के कागळो ज्यां सुधी नहि शोधायां हतां ते पहेलां पुस्तको पत्थर के माटीनी इंटो उपर लखातां ए हकीकत इतिहासप्रसिद्ध छे. आ स्वर्गीय पुस्तक पण पाषाणमय ( रत्नमय रत्न पण एक जातनो पाषाण छे) १५ होईने पत्थर उपर लखाएलुं होय ते स्वाभाविक छे. मूळकार, पुस्तक तेनी शाही लेखण खडियो अक्षरो अने खडियानां ढांकण सुद्धांनुं अद्भुत सूर्याभदेवना धर्म पुस्तकनुं वर्णन jainelibrary.org Page #475 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार रत्ननी, पानामां परोवेलो दोरो तपनीयनो, दोरानी गांठो विविधमणिमय, खडियो वैडूर्यनो, खडिया- ढांक' रिष्टरत्ननु, तेनी सांकळ तपनीयनी, मपी-शाही रिटरत्ननी, लेखण बजनी अने अक्षरो रिष्टरत्नमय छे. एवा रत्नमय पुस्तकमांनुं बधुं लखाण धर्मसंबंधी छे अश्वा बीजी रीते कहीए तो ए पुस्तक एक धार्मिक शास्त्र छे. ते व्यवसायसभानी उत्तरपूर्वे आगळ वर्णवेला धरा जेवडी लांबी पहोळी अने ऊंडी एवी एक मोटी नंदा पुष्करिणी आवेली छे.. तेनी उत्तरपूर्वे आठ योजन लांबु पहोळ अने चार योजन जाडं एवं सर्व रत्नमय अतिशय मनोहर एक मोटुं बलिपीठ आवेलुं छे. ५ प रीते वर्णवेलु सूर्याभदेवर्नु वसतिस्थान वधारेमां वधारे मनोहर अने सर्व प्रकारे अतिशय आकर्षक छे. [१३२] ते काले ते समये ताजा अवतरेला सूर्याभदेवे आहार शरीर इंद्रिय श्वासोच्छ्वास अने भाषा मननी पर्याप्तिद्वारा शरीरनी वर्णन करे छे, पण तेओ पुस्तकना नाम बाबत कशो उल्लेख करता नथी, तेम तेना मूळकर्ता, टीकाकार, तेमां आवेला विषयोनी चर्चा वगेरे पुस्तक संबंधी महत्त्वनी बाबत माटे एक आंकडो पण पाडता नथी. जे अंगो उपांगो के पूर्वो वगेरे जैनशास्त्रो प्रसिद्ध छे तेना करतां ए पुस्तक शुं कोई जुदा प्रकारचें हशे? मूळमा फक्त एटलं लखेलं छे के ए पुस्तकमा धर्म संबंधी लखाण छे, पण ते लखाण कया धर्मने लगतुं १० छे, कोणे लखेलु छे अने शा उद्देशथी लखेल छे एवी कोई माहिती मूलकारे आपी नथी. बीजी वाचनामां आ पुस्तकने धम्मिए सत्थे' अर्थात् 'धार्मिक शाख' तरीके जणावेलु छे. आ स्थळे समितिवाळा पुस्तकमा मूळ अने टीकामा पाठभेद छे. जे पाठ टीकामां बीजी वाचनानो कहेलो छ तेने संपादके अहीं मूळमां छापेलो छे अने जे पाठने टीकाकारे प्रस्तुत मूलनो मूळपाठ जणावेलो छे ते पाठ मूळमा देखातो नथी. आवा प्रकारना मूळगत अने टीकागत पाठभेदो आ सूत्रमा तेम ज अन्य सूत्रोमां अनेक स्थळे रहेला छे तेथी विचारक अभ्यासी शुद्ध अने प्राचीन पाठने तारवी काढी अर्थ मेळववा प्रयत्न करे तो ज मूळना भावने पामी शके, नहि तो भुलावामां पडे तेवं छे. ॥८७॥ Jan Education in For Private sPersonal use Only wwwinelibrary.org Page #476 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार था१३३] सूर्याभदेव गया भाविष्यमा सदाने माटे यारमा पड्यो के-अहीं आ सूर्याभदेवने एकसी ने आठ जिनप्रतिमा ॥८॥ सर्वांगपूर्णता मेळवी लीधी. पछी ए देव एवा विचारमा पड्यो के-अहीं आचीने मारुं प्रथम कर्तव्य शुं छे ? हवे पछी निरंतर शुं गामाजिक करवार्नु छ ? तत्काळ अने भविष्यमां सदाने माटे श्रेयरूप पवु शु काम करवानु छ ? सभाना [१३३] सूर्याभदेव एवो विचार करे छे त्या तरत ज तेनी सामानिक सभाना देवो हाथ जोडीने सेवामां हाजर थया अने 'जय | देवोनी थाओ विजय थाओ' एम बोली स्वामीने वधावता तेनी पासे आवीने कहेवा लाग्याः हे देवानुप्रिय ! आपना आ विमानमा एक मोठे सिद्धायतन छे. तेमां जिननी ऊंचाइए ऊंची पवी एकसो ने आठ जिनप्रतिमाओ |' भलामण बिराजेली छे. आपनी सुधर्मासभामां एक मोटो माणवक चैत्यस्तंभ ऊभो करेलो छे तेमा गोठवी राखेला वज़मय गोळ डबामां जिनना सक्थिओ स्थापी राखेला छे. ए, आपने अने अमने बधाने अर्चनीय बंदनीय उपासनीय छे. तो हे देवानुप्रिय ! प प्रतिमाओनी अने ए सक्थिओनी अर्चा वंदना अने पर्युपासना ए आपनुं प्रथम कर्तव्य छे अने वळी वर्तमान अने भविष्यमां सदाने माटे श्रेयरूप एवं पण एज काम छे. [१३४] सूर्याभदेव उक्त सूचन सांभळी देवशय्यामांथी तरत ज बेठो थयो, त्यांथी उपपातसभाना पूर्वद्वारे नीकळी पेला स्वच्छ २० पाणीथी भरेला मोटा धरा तरफ गयो. धराने अनुप्रदक्षिणा करतो ते तेमां पूर्व द्वारे पेठो अने त्यां गोठवेल सोपानद्वारा तेमां ऊतयों, ___८७ टीकाकार लखे छे के "आ स्थळे पुस्तकोमा घणोय वाचनाभेद-पाठभेद छे अने तेमांनो केटलोक तो प्रायः अपूर्व छे, तेथी शिष्योने संमोह तो थवानो पण ए न थाय ते माटे अहीं एक सुगम पाठ अमे आपेलो छे.” (“इह प्राक्तनो ग्रन्थः प्रायः अपूर्वः भूयान् अपि च पुस्तकेषु वाचनाभेदः ततो मा भूत् शिष्याणां सम्मोह इति क्वापि सुगमोऽपि यथावस्थितवाचनाक्रमप्रदर्शनार्थ लिखितः-पृ० १०२) मारी समजमा फेर न होय तो जे हकीकतने आश्रीने जैन समाजमा मोटो मतभेद प्रवर्ते छे ते हकीकतने लगतो आ पाठभेद लागे छे. आ पाठभेद बाबत खूब विचारीने तत्त्वशोध थाय तो ज जैन समाजमां शांति प्रवर्ते ए ध्यानमा राखबार्नु छे. in Education malla |ww.lainelibrary.org Page #477 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार त्यां तेणे जलक्रीडा अने जलनिमज्जन सारी रीते कीं, पछी ते चोक्खो अने परमशुचिभूत थई धरामाथी बहार आव्यो अने ज्यां | सूर्याभदेवनं अभिषेकसभा हती त्यां गयो. स्नान अभिषेकसभाने प्रदक्षिणा करतो ते पूर्वद्वारे तेमां पेठो अने त्यां गोठवेला मुख्य सिंहासन उपर जई चडी बेठो. सूर्याभदेव[१३५] पछी तेनी सामानिक सभाना देवसभ्योए त्यांना कर्मकररूप आभियोगिक देवोने बोलाव्या अने हुकम आप्यो के नो इंद्रा भिषेक हे देवानुप्रियो ! आपणा स्वामी आ सूर्याभदेवना महाविपुल इंद्राभिषेकनी तैयारी करो. उक्त आशा सांभळतां ज ते आभियोगिक देवोप त्यांथी ईशान खूणामां जई एक बे वार वैक्रियसमुद्धात करी लीधो अने ते द्वारा अभिषेकनी सामग्री माटे एक हजार आठ एक हजार आठ पवा घणा पदार्थों बनावी लीधा; जेवा के ||८९॥ सोनाना, रूपाना, मणिना, सोनामणिना, रूपामणिना अने सोनारूपामणिना कळशो बनान्या, भौमेय कलशो घडी काल्या; तेज प्रकारे अने तेटली ज संख्यामां भृङ्गारो, आरिसा, थाळो, पात्रीओ, छत्रो, चामरो, फूलनी अने मोरपींछ बगेरेनी चंगेरीओ, तेलना, हिंगळोकना अने आंजण वगेरेना डयाओ अने धूपधाणांओ ए बधु एक हजार आठ एक हजार आठनी संख्यामां रची नाख्यु. ए बधी स्वाभाविक अने बनावटी सामग्री लई ते आभियोगिक देवो तिरछा लोक तरफ जवा वेगवाळी गतिथी झपाटाबंध उपड्या. ए बाजु असंख्य योजन जतां जतां तेओ क्षीरसमुद्र पासे आवी पहोंच्या, तेमांथी क्षीरोदक अने त्यांना प्रशस्त उत्पल वगेरे कमळो लई त्यांथी तेओ पुष्करोदक समुद्रे जई पहोंच्या. त्यांनां पवित्र पाणी अने पुष्पादिक लई ते आभियोगिक देवो भरत परवतमा आवेलां मागध, वरदाम अने प्रभास तीर्थों तरफ उडया. त्यां पहोंची तीर्थजळ अने तीर्थधळ लई तेओ गंगा सिंधु रक्ता अने रक्तवती नदी ओने ओवारे ऊतर्या. त्यांनां शुचि पाणी अने माटी लेताक तेओ चुल्लहिमवंत वगेरे पर्वतो तरफ जइ चड्या. त्यांथी पाणी पुष्प अने सर्व प्रकारनी औषधि सरसव वगेरे लीधुं. त्यांथी तेओ पद्मपुंडरीकना धरा तरफ गया. त्यांनु चोक्खं पाणी वगेरे भरी त्यांथी हिम Jain Education remona For Private & Personel Use Only whiainelibrary.org Page #478 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥९०॥ Jain Education वंत, औरवत, रोहिता, रोहितांशा, सुवर्णकूला अने रूप्यकूला नदीओ भणी तेओ उपडया, पछी सहावति वियडावति अने वृत्तवैताढ्य तरफ गया. पछी त्यांथी महाहिमवंत रुक्मि वगेरे पर्वतो भणी उड्या अने त्यांथी महापद्मद्रह महापुंडरीकद्रह तरफ जई पछी ओ हरिवर्ष अने रम्यकक्षेणनी हरिकांता भने नारीकांता नदीओ भणी वळ्या. त्यांथी गंधावती मालवंत भने वृत्तवैताढ्य तथा निषेध नीलवंत तिमिच्छ केसरिद्रह अने महाविदेहनी सीता सीतोदा नदीओ भणी तेओ गया. पछी त्यांथी चक्रवर्तीना बधा विजयोए जई अने प रोते ते ते बधां स्थळोनां पाणी माटी पुष्पादिक लई छेक छेहले तेओ मंदर पर्वते जई पहोंच्या. मंदर पर्वतना भद्रशाल नंदन अने सोमनस वनमांथी सुंदर गोशीर्षचंदन वगेरे सामग्री लई तेओ झपाटबंध पाछा फर्या अने त्वरावाळी चालथी पाछा सूर्याभविमानमांज्यां सिंहासन उपर पोतानो स्वामी सूर्याभदेव बेठेलो हे त्यां-जई पहोंच्या ऊने पेला सामानिक सभाना सभ्यो समक्ष इंद्राभिषेकनी सर्व सामग्री जे तेमणे विविध स्थळेथी आणी हती ते हाजर करी दीधी. ५ अभिषेकनी सर्व सामग्री आवी पहोंच्या पछी सूर्याभदेवनी सामानिक सभाना चार हजार देवसभ्यो, तेनी चार पट्टराणीओ, बीजी ऋण सभाभना पोतपोताना परिवारवाळा देवो, सात सेनाधिपतिओ, सोळ हजार आत्मरक्षक देवो अने वीजा पण घणा १० देवदेवीओ-एवधांप त्यां अभिषेकसभामां आवी ते ते सामग्रीद्वारा मोटी धामधूमथी सूर्याभदेवनो इंद्राभिषेक कर्यो. [१३६] ए महाविपुल इंद्राभिषेक चालतो हतो त्यारे केटलाक देवोप सूर्याभविमानमां सुगंधी पाणीनो छँटकाव कर्यो, केटलाकोप ने विमाननी बधी धूळ झाडी काढी, बीजा केटलाकोप प विमान अने तेनां शेरी बजार वगेरे भागोने लिंपीगुंपीने साफ कर्या, मांचा उपर मांचा ढाळीने विमानने शणगार्यु, ठेकठेकाणे हारबंध धजापताकाओ रोपी, चंदरवा बांध्या, सुगंधी छांटणां छांटर्धा, चंदनना थापा मार्या, वारणेबारणे चंदनना पूर्ण कळशो अने तोरणी टांग्यां, लांबी लांबी सुगंधी माळाओ लटकावी, सुवासित पुष्पो वेयं, १५ सुगंधमय धूपो उवेख्या, सोनुं रूपुं वज्र रत्न मणि फूल फळ माळा चूर्ण गंध आभरण अने वस्त्र वगेरेनो वरसाद वरसाव्यो, मंगळ वाज वाग्यां, ढोल धडक्या, वीणाओ रणझणी, धवळ मंगळ गवायां, विविध प्रकारनां अभिनयोवाळां नृत्यो थयां, नाटको भजवायां, अभिषेकने लीधे देवोनो आनंद jainelibrary.org Page #479 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूर्याभदेवे रायपसेणइय सुत्तनो सार सोना रूप रत्नो वगेरे वेचायां, पम ते ते देवोए पोताना स्वामीना अभिषेकनी खुशालीमां ते विमानने अनेक प्रकारे सुशोभित कर्यु. वळी, ते प्रसंगे हर्षमा आवी जई कोइ देवो बुचकारा करवा लाग्या, कोई फूल्या समाता नथी, केटलाको नाचवा मांड्या, तांडव पहेरेला करवा लाग्या, होकारा करवा लाग्या, बाहुओ अफळाववा लाग्या, हणहणवा मांड्या, हाथीनी पेठे चीसो पाडवा लाग्या; केटलाको वस्त्र अने ऊछळे छे, सिंहनाद करे छे, ऊंचे ऊडे छे, नीचे पडे छे, पग पछाडे छे, गाजे छे, झबके छे, वरसे छे, पोतपोतानां नामो कही| आभूषणो संभळावे छे, तेजथी तपे छे; केटलाको मोटेथी थूथू करे छे अने केटलाको पोताना हाथमां धूपधाणां, फळशो अने कमळो वगेरे |५|| राखी आमतेम दोडादोडी करे छः ए रीते ते दरेक देवो पोताना स्वामीना अभिषेकनी खुशाली माणे छे. ॥९ ॥ अभिषेक थई रह्या बाद ते दरेक देवो हाथ जोडीने बोल्या के हे नंद ! तारो जय थाओ, हे भद्र ! तारो जय थाओ, जे अजित छे तेने तु जित अने जे जित छे तेनी तुं रक्षा कर. देवोमा जेम इंद्र. ताराओमां चंद्र, असुरोमां अमर, नागोमां धरण अने मनुष्योमां भरतनी पेठे तुं अमारी बच्चे रहे. वळी, घणां पल्योपमो, घणां सागरोपमो, घणां पल्योपमो अने सागरोपमो सुधी अमारा उपर अने आ आखा सूर्याभविमान उपर |१०| आधिपत्य भोगव अने अमने बर्धाने सुरक्षित राखतो तुं अहीं आनंदथी विहर. आम बोलीने ते बधां देवदेवीओए जय जय नाद कयों अने ए रीते सूर्याभदेवनो इंद्राभिषेक पूरो थयो. [१३७] अभिषेक पूरो थतां ते सूर्याभदेव, त्यांची पूर्वने बारणे नीकळी अलंकार सभाने प्रदक्षिणा करतो तेमा तेज वारणे पेठो अने त्यांना मुख्य सिंहासने बेठो. पछी तेना सामानिक सभ्यदेवोए तेनी समक्ष त्यां बधी अलंकारसामग्री उपस्थित करी. पहेला तो म्हापलो होवाथी तेणे सुको-|१५| मळ अंगलूछणा द्वारा पोतानां अंगो लूछयां, तेना उपर सरस गोशीर्षचंदननो लेप कर्यों अने त्यारबाद पकज फूंके ऊडी शके तेवू Jain Educationem tonal For Private Personel Use Only waljainelibrary.org Page #480 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥९२॥ Jain Education घोडानी लाळ जेवुं नरम, सुंदर वर्ण अने स्पर्शवाळु अने जेने छेडे सोनुं जडेलुं छे तेवुं स्फटिक जेवुं ऊजळु धोळु देवदूष्य "युगल तेणे पहेर्नु पछी हार, अधहार, एकावळ, मोतीनी माळा, रत्नावळ, अंगद, केयूर, कडां, बेरखां, कणदोरो, दसे आंगळीप वेढ वींटीओ, छाती उपर दोरो; मादळियुं, कंठी, झूमणु, काने कुंडळ अने माथे चूडामणि मुगट वगेरे आभरणो पहेरी पोताना देहने प सूर्याभदेवे ठीक ठीक सजाव्यो. मिंक व्यव वळ, गुंथेली वटेली भरेली अने एक बीजाना नाळथी जोडेली एवी चारे प्रकारनी माळाओथी पोतानी जातने कल्पवृक्षनी पेठे ५ साय जाण्यो सुशोभित करतां तेणे दिव्य पुष्पमाळ पण पहेरी. [१३८] प रीते अलंकृत थपलो ते सूर्यभिदेव व्यवसायसमाने प्रदक्षिणा करतो तेमां आव्यो अने त्यां सिंहासनारूढ थयो. पछी तो तेना सामानिक सभ्योप तेनी समक्ष त्यांना पुस्तकरत्नने मूक्युं तेणे तेने उघाडी वांची तेमांथी धार्मिक व्यवसायने लगती समजुती मेळवी लोधी. पक्रम पूरो थया बाद ते, त्यांथी पूर्वद्वारे नीकळी नंदा पुष्करिणीए गयो. त्यां गोठवेला सोपानद्वारा पुष्करिणीमां ऊतरी तेणे पोताना हाथपग पखाळ्या, पछी चोक्खा परमशुचिभूत थई हाथीनी मुखाकृतिनी जेवी पाणीथी भरेली एक मोटी धोळी रजतमय झारी अने पुष्करिणीनां कमळो वगेरे लई त्यांथी ते सिद्धायतन तरफ जवा नीकळ्यो. सूर्याभदेवे पुस्तक वांची घा ८८ भगवान महावीरना समसमयी लोको बे वस्त्रो पहेरता ए हकीकत, ते समयनी वस्त्रपरिधानपद्धतिनो उल्लेख अने बीजां केटलॉक प्राचीन चित्रो उपरथी समजी शकाय एम छे. ए रीते स्वर्गीय देवो पण भारतवर्षनी ए वस्त्रपरिधानपद्धतिने अनुसरता होय एम आ वर्णन सूचित करे छे. वस्त्रनी बनावटनुं वर्णन जोतां ते समयनी वस्त्ररचनानी कळा परमप्रकर्षने पामेली छे ए तो चोक्खु जणाय छे. सूत्रकारे वर्णवेलुं वस्त्र आजनां वस्त्रयंत्रो पण नथी बनावी शकतां, त्यारे ए वस्त्र ते समयना हाथवणाटनी बनावट छे ए, वस्त्ररचनानी कळानो परमप्रकर्ष नहि तो बौद्धुं शुं ? Page #481 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार सिद्धायतनमा ज्यां देवच्छंद छे अने जे बाजुए जिनप्रतिमाओ छे ते तरफ जई ए सूर्याभदेवे अने तेना सकळ परिवारे तेमने | सूर्याभदेवे प्रणाम कर्या, पछी तेमने मोरपीछथी जी, सुगंधी पाणीथी एखाळी, सरस गोशीर्षचंदननो लेप कयों, सुवासित अंगलूछणाथी लेमने श्रीजिनप्रलूंछी अने पछी ते प्रतिमाओने अक्षत पवां देवदृप्य युगल पहेराव्या. त्यारवाद ते सवस्त्र प्रतिमाओ उपर फूल, माळा, गंध, चूर्ण, | तिमानी वर्ण, वस्त्र, आभरण वगेरे चडावी तेमने लांबीलांबी माळाओ पहेरावी अने पांचे प्रकारनां पुष्पोना पगर भर्या. पछी ते जिनप्रतिमा-| पूजा करी ओनी सन्मुख रूपेरी अखंड चोखाना स्वस्तिक दर्पण बगेरे आउआठ मंगळो आलेख्यां, चैडूर्यमय धूपधाणामां सुगंधो धूप सळगावी ते प्रत्येक प्रतिमाओ आगळ धूप को अने पछी गंभीर अर्थवाळा मोटा पकसो ने आठ छंदो बोली तेमनी स्तुति करी. ॥९॥ ८९ टीकाकारे लखेलु छे के-"सूर्याभदेव बांदे छे एटले ते जिनप्रतिमाओने चैत्यदनविधिपूर्वक बदि छे अने पछी नमे छे एटले प्रणिधानादिकना योगपूर्वक नमे छे' एवो केटलाकनो मत छे. त्यारे बळी बीजा केटलाक तो कहे के "चैत्यवंदननो जे प्रसिद्ध विधि छे ते तो विरतिवाळाओने ज बंधवेसे एवी छे. तेमा ईर्यापयिकीपूर्वकनो काउस्सग्ग आवतो होवाथी विरतिवाळा सिवायना बीजाओने ए विधि करबो उचित नथी, माटे 'बाद ' एटले चैत्यवंदनपूर्वक वांदे छे एम नहि पण सामान्यपणे वांदे छे अने 'नमे छे' एटले आशय-भाव-वृद्धिने कारणे आदर- ||१० पूर्वक नमे छे" एवो अर्थ समजवो. सूर्याभदेवे करेली चैत्यवंदनरूप स्तुतिना प्रसंगमां आ प्रकारे मोटो मतभेद छे.” अहीं जे तध्यरूप होय ते तो परम ऋषि केवळी भगवंतो जाणे" आम कहीने ऐ मतभेदोथी गुंच्वाईने टीकाकार छूटी जता जणाय छे, पण ए बाबत कोई प्रकारनी स्पष्टता करता नथी. वळी "आ पछी जे हकीकत आवे छे ते संबंधे पण मोटो पाठभेद छे” एम टीकाकार जणावे छे. आ बधो वाचनाभेद अने उक्त मतमतांतरी ध्यानमा राखौने आ प्रकरणने समजवु जोईए. “ मोटा छंदवाळा १०८ श्लोक द्वारा सूर्याभदेवे स्तुति करेली” एम मूळमां कहेलुं छे पण ए छंदो क्या प्रकारना हता ए विशे कशु जणावेलुं नथी. स्तुति करतां सूर्याभदेवे शक्रस्तव पण कहेलं छे परंतु ते अतिप्र-१२ सिद्ध होवाथी अहीं पूरू आपेलु नथी. ("वन्दते ताः प्रतिमाः चैत्यवन्दनविधिना प्रसिद्धेन, नमस्करोति पश्चात् प्रणिधानादियोगेन इति एके. अन्ये Jain Education emanal wir.jainelibrary.org Page #482 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥९४॥ Jain Education Internatio त्यारबाद ते सूर्याभदेव सातआठ पगलां पाछो फर्यो, पछो बेसी, डाबो पग ऊंचो राखी, जमणो पग जमीन उपर मूकी, माथु ऋण वार नीचुं नमावी, हाथ जोडीने आ प्रमाणे बोल्योः अरिहंत भगवंताने नमस्कार, यावत् अचळ सिद्धिने वरेलाओ प्रति नमस्कार. [पृ० १८ पं० २ ] पछी तो ए सिद्धायतननो बचलो भाग, तेनी चारे वाजुनो द्वारप्रदेश, मुखमंडपो, प्रेक्षागृहमंडपो, वज्रमय अखाडो, बधा चैत्यस्तंभो, मणिपीठिकाओं उपरनी जिनप्रतिमाओ बधां चैत्यवृक्षो, महेन्द्रध्वजो, नंदापुष्करिणीओ, माणवक चैत्यस्तंभोमां सचवाई रहेलां जिननां सक्थिओ, देवशय्याओ, नाना महेन्द्रध्वज, सुधर्मासभा, उपपातसभा, अभिषेकसभा, अलंकारसभा अने ए बधी सभाओनो चारे बाजुनो प्रदेश, ए बधांने तथा ए वधे स्थळे आवेली पूतळीओ शालभंजिकाओ, द्वारचेटीओ अने वीजां वधां भव्य उपकरणो वगेरेने ते सूर्याभदेवे मोरपींछीथी पंज्यां दिव्य पाणीनी धाराओथी पोंख्यां, तेमना उपर गोशीर्ष चंदनो लेप्यां ते बती थापा मार्या अने तेमनी सन्मुख फूलना पगर भर्या, धूप दीधो अने ते शोभावर्धक बधी सामग्री उपर फूल चडाव्यां, तेमज माळाओ, घरेणां अने वस्त्र वगेरे पहेराव्यां अने पोतानी ऋद्धिने सूचवता ते प्रत्येक पदार्थ तरफ ए रीते ते सूर्याभदेवे पोतानो सद्भाव बताव्यो. एम करतो करतो ते, छेक छेल्ले व्यवसायसभामां आवी पहोंच्या. त्यां तेणे त्यांना पुस्तकरत्नने मोरपींछथी पूंज्यु, दिव्य जळनी धाराथी पोंख्युं भने उत्तम गंध तेमज माळा वगेरे वडे पूर्ववत् तेनी अर्चा करी तथा त्यांनी पूतळीओ वगेरे तरफ पण तेणे ते ज रीते पोतानो सद्भाव सूचित कर्यो. आ वधुं करीने ज्यारे ते बलिपीठ पासे आवी बलिनु विसर्जन करें छे त्यारे तेणे पोताना आभियोगिक देवोने बोलावी नीचेनो तु अभिदधति - विरतिमतामेव प्रसिद्धः चैत्यवन्दनविधिः अन्येषां तथाऽभ्युपगमपुरस्सरकायव्युत्सर्गासिद्धेः इति वन्दते सामान्येन, नमस्करोति आशय- १५ वृद्धेः अभ्युत्थाननमस्कारेणेति । तत्त्वमत्र भगवन्तः परमर्षयः केवलिनो विदन्ति । अत ऊर्ध्वं सूत्रं सुगमम्, केवलं भूयान् विधिविषयो वाचनाभेद इति" - पृ० ११० ) १० सूर्याभदेवे विमाननी पूतळीओ वगेरे अर्चना करी अने देवो द्वारा करावी www.ainelibrary.org Page #483 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार हुकम कही संभळाव्योः सूर्याभनो हे देवानुप्रियो ! तमे शीघ्र जाओ अने आ सूर्याभविमानमा आवेला सिंगोडाना घाटना मागोमां त्रिकोमा चतुष्कोमां चत्वरोमां परिवार चतुर्मुखोमां अने महापथोमां तथा प्राकार अटारीओ द्वारो गोपुरो तोरणो आरामो उद्यानो बनो वनराजिओ काननो अने वनखंडोमां अर्थात् मारा आ विमानमां वसतां देवो अने देवीओ उक्त रीते नाने मोटे बधे स्थळे अर्चनिका करे पर्बु तेपने जाहेर करो. आभियोगिक देवोद्वारा पोताना स्वामी सूर्याभदेवनी उपर प्रमाणेनी घोषणा सांभळी त्या वसतां प्रत्येक देवो अने देवीओए उक्त । घोषणामां जणाव्या प्रमाणेनां ते ते प्रत्येक स्थळनी अर्चनिका करी. आ बधु पती गया पछी ते सूर्याभदेव नंदा पुष्करिणीप गयो, त्यां तेणे हाथ पग पखाळ्या अने त्यांथी ते, चार हजार सामानिक देवसभ्यो, चार पट्टराणीओ अने सोळ हजार आत्मरक्षक देवो वगेरे अनेक देव देवीओ साथे, मोटा ठाठमाठथी वाजते गाजते ॥९५॥ चरघोडो फरे तेम फरतो फरतो सीधो पोतानी सुधर्मासभा तरफ आव्यो, त्यां पूर्वद्वारे पेसी त्यांना मुख्य सिंहासन उपर पूर्वाभिमुख थईने बेठो. [१४०] ए सभामां ते सूर्याभदेवनी पश्चिमोत्तरे अने उत्तरपूर्वे ढाळेला चार हजार भद्रासनोमां सूर्याभदेवनो सामानिक सभाना सभ्यदेवो बेठा, पूर्वमां तेनी चार पट्टराणोओ, दक्षिणपूर्वमां आंतरसभाना आठ हजार देवो, दक्षिणमां मध्यसभाना दस हजार देवो, दक्षिणपश्चिममा बाह्य सभाना बार हजार देवो अने पश्चिमे सात सात सेनाधिपतिओ बेठा. वळी, ते सूर्याभदेवनी फरता चारे दिशामां चार चार हजार आत्मरक्षक देवो बेठा. ए आत्मरक्षक देवोप वरावर सजेलां कवचो पहेरेला, खेचेली कामठीबाळां धनुषो हाथमां धरी राखेलां, पोतपोताना पहेरवेशो उपर उत्तम चितपट्टो भरावेला, तेमांना केटलाकना हाथमा नीला पीळां अने रातां फळां इतां, केटलाकना हाथमां चाप, चारु, चर्म, दंड, खड्ग अने पाश वगेरे अनशस्त्रो झबकी |१५| रहेलां हतां, पोताना स्वामी सूर्याभदेव तरफ खूब भक्तिभावभरी दृष्टिए जोता तथा विनीत भावे किंकरभूत थईने रहेला अने समये Jain Education tema For Private Personel Use Only Page #484 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥१६॥ समये ए सूर्याभदेवनी रक्षा माटे सावधान रहेता से आत्मरक्षक देवो त्यां तेनी फरता चारे दिशामां चोकी पहेरो भरता ऊभा छे. ते सूर्याभदेवनी ए बधी दिव्य ऋद्धि छे, दिव्य शोभा छे अने दिव्य देवशक्ति छे. | सूर्याभदेव नी आवरदा प्र०-हे भगवन् ! ए सूर्याभदेवनी स्थिति-आवरदा केटली लांबी जणावेली छे ? अने तेना उ०-हे गौतम! पनी आवरदा चार पल्योपमनी जणावेली छे. प्र०-हे भगवन् ! सूर्याभदेवनी सामानिक सभामां बेसनारा देवोनी स्थिति केटली लांबी जणावेली छे ? पूर्व भवने लगता उ०-हे गौतम ! तेओनी आवरदा पण चार पल्योपमनी जणावेली छे. हे गौतम! ते सूर्याभदेव ए प्रकारनी महाऋद्धि, महाद्युति, महावळ, विशाळ यश, अतुल सुख अने महाप्रभाववाळो छे. प्रश्नोत्तरी [१४१] प्र०-हे भगवन् ! ते प्रकारनी दिव्य देवऋद्धि देवद्युति अने देवप्रभाव ए बधुंए सूर्याभदेवने केवी रीते मळ्यु ? तेणे ए | बधु केवी रीते प्राप्त कर्यु ? अने केवी रीते ए बधानो ते स्वामी थयो ? ए सूर्याभदेव पना पूर्वजन्ममां कोण हतो? पर्नु नाम गोत्र शुं हतुं ? ए कया गाम नगर के संनिवेशनो निवासी हतो? पणे पq ते शुं दीधुं शु खाधुं शुं कर्यु ने शुं आचर्यु के जेथी ते पवो २० महाप्रभावशाळी देव थयो ? अथवा तथाप्रकारना आर्य श्रमण के ब्राह्मणनी पासेथी तेणे पर्बु ते धार्मिक आर्य सुवचन शुं सांभळ्यु के जेथी ते एवो अतुल वैभववाळो उत्तम देव थयो ? उ०-'हे गौतम वगेरे श्रमणो! पम कहीने श्रमण भगवान महावीरे भगवान गौतमने आमंत्रीने आ प्रमाणे कहां: सूरियाभनुं वर्णन समाप्त । Jain Education ennal For Private Personal use only wi.jainelibrary.org Page #485 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार राजा पएसीनी कथा 'केकयि' नामनो अधो [१४२] हे गौतम ! एम छे के आ जंबूद्वीप नामना द्वीपमा भारतवर्षमा केकयिअर्ध" नामे जनपद, धन अने धान्य वगेरेनी आयदेश विभूतिथी परिपूर्ण हतो. ते देशमां सर्व प्रकारनां सुखनुं धाम एवी सेयविया" नामनी नगरी हती. ते नगरीथी यहार उत्तरपूर्वना अने सेय ९० जैन शोस्रोमा २५|| आर्य देशोनां तथा ते दरेक देशनी एक एक राजधानीनां नाम प्रसिद्ध छे. २५ देशो तो आखेआखा आर्य विया नगरी हता अने 'केकयि' देश अडधो आर्य हतो एम ए शास्त्र सूचवे छे. बौद्धग्रंथोमा य 'केकय देशनो उल्लेख छे. ते देशवें वर्तमान स्थान उत्तरमा पेशावर तरफ वही शकाय. पण तेनी चोक्कस सीमा कळी शकाती नथी. मूळ पाठमा 'केइयअद्धे' एबुं छपाएलु छे अने टीका |॥१७॥ कारे ("केकयी नाम अर्धम्"-पृ० ११४ ) लखीने ते मूळ शब्दनी व्याख्या आपी छे. टीकानो उल्लेख जोतां मूळ पाठ 'कइय'ने बदले 'केअई' के 'केयई' होय तो शुद्ध पाठ कहेवाय. राजा दशरथनी एक राणीनु 'वैकयी' नाम ते, आ केकय देशनी हती माटे 'कैकयी' पडधुं जगाय छे. ९१ आ नगरीने 'केकय' देशनी राजधानी तरीके सूत्रोमा वर्णवेली छे. 'सेयविया' नो संस्कृत पर्याय टीकाकारे 'श्वेतम्बी' सूचवेलो छे. आ-१० वश्यक सूत्र (पृ० १९७ विभाग १) मा जणावेलु छे के "छद्मस्थ भगवान महावीर विहार करता करता उत्तरचावाल के उत्तरवाचाल प्रदेशमा गया, त्यांची 'सेयबिया' गया, त्यां ते नगरीना श्रमणोपासक राजा परदेशीए भगवाननो महिमा को अने पछी त्यांथी भगवान सुरभिपुर पहांच्या | आ नगरी वर्तमानमा कयां छे तेनी हकीकत मळी नथी. दीघनिकाय नामना बौद्ध ग्रंथमा आवेला पायासिसुत्तमां आ नगरोने 'सेतव्या' नामथी in Educatanem wijainelibrary.org Page #486 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्सनो सार ॥९८॥ दिग्भागमां-ईशान खूणामां वधी ऋतुओमां फळोथी लच्युं रहेतुं सुन्दर सुगन्धी शीतळ छायायालु अने सर्व प्रकारे रम्य नन्दनवन जेवू मियवण नामे उद्यान हतुं. ते नगरीनो राजा महाहिमवन्त जेवो प्रभावशाळी पयेसी" राजा हतो. ए राजा अधार्मिक, अधर्मिष्ठ, पएसी राजा धर्मने नहि अनुसरनारो, अधर्मने ज जोनारो, अधर्मने फेलावनारो हतो. पना शील तथा आचारमा क्याय धर्मने नामर्नु पण स्थान सूचवेली छे अने कोशल देशमा (जनदृष्टिए अयोध्या अने तेनी आसपासनो प्रदेश)विहार करता करता कुमार काश्यप आ नगरीमा आब्या एम सूची एने कोशलोना नगर तरीके जणावेली छे. ("येन सेतव्या नाम कोसलानं नगरं तद् अबसरि"-दीघनिकाय भाग २ पृ. ३१६) ९२ मूळमां आ माटे 'पएसी' शब्द वपराएलो छे , टीकाकार आ माटे 'प्रदेशी' शब्द वापरे छे अने आवश्यकमां 'पदेसी, शब्द सूचवे लो छे आ राजा संबंधी जे हकीकत हवे पछी आ, रायपसेणइय सूत्रमा आवनारी छे तेने लगभग मळती हकीकत 'दीघनिकाय' ना पायासिसु'तंत' नामना लांबा प्रकरणमा आवेली छे. ('पायासि शब्दमां 'यानी पहेलां जे काना जेवू निशान छे ते, खरेखर कानो नयी पण पडिमात्रानी लिपिमा | ए काना जेवू निशान 'य' उपरनी मात्रा छे एटले एनुं खरु वाचन 'पयेसि' थाय पण मात्रा वांचवानी भूलना परिणाम अने 'य' पछी एक कानो वधी जवाने कारणे 'पयेसि' ने बदले 'पायासि' थयुं होय एम न बने ) ए सुत्ततमा मुख्य प्रश्नकार राजा 'पायासि छे, तेमां तेने १० राजन्य वंशनो जणावेलो छे अने तेनो संबंध कोशल वंशना राजा 'पसेनदि साथे बतावेलो छे. रायपसेणइयमा जेम राजा पयेसि ने अत्यंत पापिष्ट तरीके वर्णदेलो छे तेम दीघनिकायमा नथी. परंतु एम एम तो कहेलं छे के- ए राजाने पापमय विचारो थयेला; परलोक नथी, औपपातिक सत्ता नथी अने सुकृत तथा दुष्कृतनो कोइ प्रकारनो फलविपाक -परिणाम-नथी. आ राजा विशे बीजी कोई अतिहासिक माहिती मळी नथी. (तेन खो पन समयेन पायासि राजञ्जो सेतव्यं अध्झावसति x x x पसेनदिकोसलेन दिन्न राजदेय्यं x x x पायासिराजञस्स एवरूपं पापकं दिद्विगतं उत्पन्नं होति इति पि नत्थि परलोको, नत्थि सत्ता ओपपातिका, नत्थि सुक्तदुक्कतानं कम्मानं फलविपाको ति-दीघनि काय भाग २ पृ० ३१६-३१७) a l For Private Personel Use Only |२५| nin Education rary.org Page #487 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार यकंत न हतुं. वळी, ए राजा पोतानी आजीविका अधर्मथी ज चलावते. पना मोढामांथी 'हणो' 'छेदो भेदो' पवीज भाषा नीकळतो. प प्रकृतिए प्रचण्ड क्रोधी भयागक अने अधम हतो. पमा हाथ हमेशं लोहीभर्या-लोहीथी खरडापला ज रहेता. प चिनाविचार्ये प्रवृत्ति सूरियकता करनासे, हलकाओने उत्तेजन आपनारो, लांचियो, ठगारो, कपटी, बगभगत अने अनेक प्रकारमा फांसलाओ रची सवै कोईने दुःख राणी, सूरिदेनारो हतो. पनामां कोई प्रकारनां व्रत शील गुण के मर्यादा न हतां, कदी पण ए प्रत्याख्यान उपोसथ के उपवास न करतो, अनेक | मनुष्यो मृग पशु पक्षी अने सर्प वगेरेनो घातक इतो. टुंकामां ए राजा अधर्मनो केतु हतो. कदी ते गुरुजनोनो आदर न करतो, ५ युवराज विनय न करतो, तेम कोई श्रमण वा ब्राह्मणमा तेमे लेश पण विश्वास न हतो. आवो ते कर राजा पोताना आखा देशनी करभर कल्याणवृत्ति वरावर चलावी न शकतो. | मित्र चित्त [१४३] ए राजाने बोलवे चालवें हसवे कुशळ अने हाथेपगे सुयाळी सूरियकन्ता नामे राणी हती. पयेसी राजामा अनुरक्त प | सारथि राणी तेनी साथे अनेक प्रकारनां मानवी भोगोने भोगवती रहेती हती. [१४] पपसी राजानो मोटो दीकरो सूरियकन्ता राणीने पेटे अयतरेलो सूरियकन्त नामे युवराज कुमार हतो. ए युवराज, राजा | 100 पयेसीनां राज्य राष्ट्र बळ वाहन कोश कोठार अन्तःपुर अने समग्र देशनी पोतानी मेळे संभाळ करतो रहेतो हतो. ॥९९॥ [१४२] ते पयेसी राजाने तेनाथी मोटो, भाई अने कल्याणमित्र जेवो, चित्त नामे एक सारथि हतो. संपत्तिवाळो ए कोईथी न __९३ आ माटे टीकाकार 'चित्र' शब्द वापरे छे. दीघनिकायमा आ माटे 'खत्ते' शब्द छे. आ सूत्रमा जेम राजा पएसो अने चित्त बच्चे गाढ संबंध बतायेलो छे तथा ते थेनो बच्चे विशेष बातचीत थयानी हकीकत लखेली छे, तेम दीघनिकायना पायासिसुत्तंत प्रकरणमां राजा पायासि अने खत्ते बच्चेनो संबंध जणावेलो छे अने ते बेनी बच्चे विशेष वातचीत थयानी नेधि करेली छे. 'सत्ते' नो संस्कृत |२०| पर्याय क्षत्तृ-क्षत्ता छे अने तेनो अर्थ सारथि-रथ हांकनार-छे. ["सूतः क्षत्ता च सारथिः"-अमरकोश कां० २ क्षप्रियवर्ग लो० ५९.] हुं न Jan Educati o nal For Private Personel Use Only wjainelibrary.org Page #488 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥१०॥ दवाय एवो हतो. बळी, ए चित्त सारथि अर्थशास्त्रमा सूचवेला साम दाम भेद दण्ड वगेरे राजकारणी उपायोमां कुशल हतो, हाजर जवावी, अनुभवी हतो. औत्पत्तिकी वैनयिकी कर्मज अने पारिणामिक पवी चारे प्रकारनी बुद्धि पनामा हती. राजा पपसी, तेना पोतानां कुणालदेशअनेक कार्योनां कारगोनां कुटुम्बोनां मन्त्रणाओनां छपां कामोनां रहस्यभूत बनायोनां अनेक जातनां निर्णयोनां अने पवा वीजा मेद | सावत्थी भरेला अनेक प्रकारना राजकारणोना व्यवहारोनां विधानोमां तेनी सलाह लेतो.राजाने मन ए सारथि खळाना वचला स्तम्भ जेवो हतो। नगरीजितअने राजा पने प्रमाणभूत, पोतानो आधार, आलम्बन अने पोतानी आंख जेवो ज समजतो हतो. ए सारथिमा राजा पयेसीनो खूप || शत्रु राजा विश्वास हतो, माटे ज ५ अनेक प्रकारनी राजखटपटोमा अने बीजां पण विविध प्रकारनां राजकार्योमा पोतानी सलाह आपी शकतो. बीजी रीते कहीए तो ए सारथि, राजा पयेसीना समग्र राज्यनी धुराने चहेतो हतो. [१४६] जे वस्त्र ते राजा पयेसी सेयविया नगरीमा राज्य करतो हतो ते वखते राजा जितशत्रु कुणालदेशनी सावत्थी" नगरीनो भूलतो होउं तो रायपसेणइयमा जे 'चित्ते' शब्द वपरायो छे ते, ए खत्ते' ने बदले छे अने तेम थवामा लिपिभ्रम कारण जणाय छे 'खत्ते' शब्द कोई काळे 'चित्ते' पंचायो होय अथवा चकारबहुल भाषावाळा लोको ते 'खत्ते' ने 'चित्ते' समया होय. कवर्गने बदले चवर्ग बोलवानो रिवाज गूजरातना केटलाक भागमा कांई नवो सवो नथी, एथी 'खत्ते ने बदले 'चित्ते' या पछी ते-'चित्ते'-विशेष नाम कल्पायुं होय अने त्यारबाद ते माटे 'सारहि'- सारथि एबुं विशेषण योजायु होय एम केम न बने ? दौघनिकायमा ‘खत्ते' पद निर्विशेषण होवाथी 'चित्ते' उपरथी 'खत्ते' नी कल्पनाने अवकाश रहेतो नथी. ९४ सूत्रोमां आ नगरीने कुणालनी राजधानी कहेली छे. टीकाकारो तेने 'श्रावस्ती कहे छे. दीघनिकायना महासुदस्सन सुत्तेतमा सावत्थीने ते समयनुं 'महानगर कहे लुं छे, 'सहेतमहेत' ना नामथी जे गाम आजे जाणितुं छे ते आ 'सावत्थी' छे एम प्राचीन भूगोळना शोधको कहे छ. आ माटे वधारे जाणवा सारु जुओ मारी 'भगवान महावीरनी धर्मकथाओ' मानु 'श्रावस्ती' उपरर्नु टिप्पण. in Education a l For Private & Personal use only wir.jainelibrary.org Page #489 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार जाते पोते। राजाले शिष्य मा जणावे राजा हतो. कुणालदेश समृद्धिवाळो हतो अने सावत्थी नगरी पण ऋद्धिसिद्धिथी भरेली हती. ते सावत्थी नगरोनी वहार ईशान । | चित्त सारखूणामां कोट्टय नामे चैत्य हतुं, राजा जितशत्रु पयेसी राजानो आज्ञाधारी खंडियो राजा हतो. थिर्नु सावएक वखते राजा पयेसीए विशाळ महामूल्य एवं राजाने देवा जेवू एक मोटुं मेटणुं तैयार कराव्यु. पछी चित्त सारथिने त्थी तरफ बोलावीने का के, चित्त! तुं सावत्थी नगरीए जा अने त्यां जितशत्रु राजाने आ आपणी भेट आपी आव" तथा त्यांना राजकार्यो, प्रयाण राजनीतिओ अने राजव्यवहारो तुं जाते पोते ज जितशत्र राजानी साथे रहीने जोतो-संभाळतो थोडो वखत त्यां रही पण आव. | ९५ मूळ सूत्रमा जणावेलुं छे के “सावत्थीनी राजा जितशत्रु, सेयवियाना राजा पएसीनो अंतेवासी हतो." अतेवासी शब्द शिष्यना भावने | सूचवे छे. शिष्य जेम गुरुनी आज्ञानो धारक होय छे तेम राजा जितशत्रु, राजा पएसीनी आज्ञानो धारक हतो अर्थात् तेना ताबानो खडियो |॥१०१॥ राजा जितशत्रु हतो. परिस्थिति आम छतां राजा पएसी पोताना सारथि चित्तने पोताना ताबाना राजा जितने भेटणुं आपी आववानी जे भलामण करे छे तेनु शु कारण होवू जोईए ? खरी रीते तो ताबाना खडिया जितशत्रु राजाए पोताना उपरीभूत राजा पएसीने प्रथम भेटणुं मोकटवू जोईए. आ संबंधे मूळमां के टीकामां कशो खुलासो मतो नथी, पण कल्पनाथी जे खुलासो सूझे छे ते आ छेः केटलीएक वार |१०| ताबाना खंडिया राजाओ, पोताना उपरीभूत राजा करतां बट, सेना, कोश-धनभंडार अने बीजी बाबतोमा आगळ बंधवानो गुप्त प्रयास करे छे अने तेम करी पोताना उपरीभूत राजाने हठावी तेने स्थाने आश्वानो अने पोतानुं खंडियापणु भुसवानो प्रयत्न प्र छन्नपणे सेवता होय छे, आ परिस्थितिनी जाण व्यारे उपरीभूत राजाने थाय छे त्यारे ते मुख्य राजा, राजनीतिशास्त्रने अवलंबीने ते माटे तपास करवा प्रयत्न करे छे अने ते प्रयत्न करवानां जेम बीजां पण अनेक निमित्तो होय छे तेम 'भेट मोकलवी' ते पण एक निमित्त छे. आ ज वस्तुने राजा पएसी पोताना सारथि चित्तने नीचेना शब्दोमा जणावी रह्यो छे: "चित्त ! तुं आ भेट आपी आव तथा त्यांना राजकार्यो, राजनीतिओ २५ अने राजव्यवहारो तुं जाते पोते ज जोतो संभाळतो थोडो बखत त्यां राजा जितशनी पासे रही पण आव." Jain Educat Interational For Private & Personal use only Page #490 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुचनो सार पाछळ थीभावानी सायरथी नाव करतो करतो घोडा उभा ॥१०२।। चित्त सारथि प भेटणु लई पोताने घेर आन्यो अने तेणे पोताना कौटुम्बिक पुरुषोने बोलावीने कहां के-हे देवानुप्रियो ! मारे माटे छत्रीयाळो चार घण्टाबाळो पयो घोडा जडेलो रथ जलदी तैयार करी हाजर करो. कौटुम्विक पुरुषो ए रथनी तैयारीमा लाग्या पटला समयमा चित्त सारथि नाह्यो, बलिकर्म कयु, बस्तर दहेर्यु, भाथु बांध्यु, गळामां हार साथे राजचिवाळो पट्टो पहेयों अने जोइतां हथीआर-पडीआरो पण बांधी लीधां. पछी पेलुं राजाए आपेलं भेटणु लई, तैयार थईने आवेला रथ उपर चित्त सारथि बेठो, तेने माथे पक जणे कोरंटकना फूलनी | माळावा छत्र धर्यु अने रथनी पाछळ हथीआरबन्ध वीजा अनेक माणसोने पण तेणे साथे लीधा. प रीते ते सेविया नगरीथी नीकळी केकयिअर्ध देशनी बच्चे थतो कुणाल देशनी सावत्थी नगरी तरफ जवा लाग्यो. बच्चे बच्चे बहु लावा नहि पचा सुखरूप शिरामणीवाळा पडाव करतो करतो ते सावत्थी नगरीए जई पहोंच्यो. त्यां जितशत्र राजाना घरनी जे बाजु बहारनी उपस्थानशाळा हती त्यां जई तेणे घोडा उभा राख्या, रथने स्थिर कयों, पछी रथथी उतरी पोताना राजाए आपेलु मेटणु लई जितशत्र राजाना घरमां अंदरनी उपस्थानशाळामां गयो, त्यां पहोंची राजा जितशत्रुने १० प्रणाम कर्या, तेने 'जय हो विजय हो' एम कहोने वधान्यो अने पछी राजा पयेसीप मोकलेलं भेटणु नजर कयु. __ ए मेट स्वीकारी जितशत्रु राजाप चित्त सारथिनो सत्कार कर्यो, सन्मान कयु अने ऊतरवा माटे राजमार्ग उपरनो एक मोटो आवास काढी आप्यो. चित्त सारथि सायस्थी नगरीनी बच्चोवच्च थतो ते आपेले उतारे जा पहोंच्यो, नाह्यो, पलिकर्म कयु, मांगलिक शुद्ध वस्त्रो पहेयी, नाना पण महामूल्य घरेणांथो शरीरने शणगायु. __पछी जमी करीने चोक्खो थई सुन्दर रीते गोठवेला सिंहासन उपर आवीने बेठो एटले बपोरने वखते नमते छांये एनी सामे | २५ गान्धर्वो मधुर गीतो गावा लाग्या अने कुशळ नाचनाराओ सुंदर नृत्य करवा लाग्या. आ रीते मानवभोग्य योग्य उत्तम सुखोने भोगवतो ते त्यां सावत्थी नगरोमा रहेषा लाग्यो. Jan Education inte For Private Personel Use Only orary.org Page #491 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार पार्थापत्य | केशिकुमार श्रमण ॥१०३।। [१४७] ते चखने त्यां-सावत्थी नगरीमां-पापित्य केशी नामे कुमारश्रमण पण आवेला हता. ए केशी कुमारश्रमण जातवान कुलीन बलिष्ठ विनयी ज्ञानी सम्यग्दर्शनी चारित्रशील लाजवान निरभिमानी ओजस्वी तेजस्वी वर्चस्वी अने यशस्वी हता. एमणे क्रोध मान माया अने लोभ उपर जीत मेळवेली हती, निद्रा इंद्रियो अने परीषहो उपर काबू करेलो हतो. पमने जीवननी तृष्णा के मरणनो भय नहोता. पमना जीवनमा तप, चरण, करण, निग्रह, सरळता, कोमळता, क्षमा, निर्लोभता ए बधा गुणो मण्यरूपे हता. वळी, ते । श्रमण, विद्यावान मांत्रिक ब्रह्मचारी अने वेद तथा नयना ज्ञाता हता. तेमने सत्य शौच वगेरे सदाचारोना नियमो प्रिय हता, तथा तेओ चौदपूर्वी अने चार शानवाळा हताः पवा ते केशी" कुमारश्रमण पोताना पांचवें भिक्षुशिप्यो साथे क्रमे क्रमे गामे गाम फरता फरतो सुखे सुखे विहरता श्रावस्ती नगरीनी यहार ईशान खूणामां आवेला कोट्टय चैत्यमां आवीने ऊतर्या अने त्यां योग्य अभिग्रह धारण करीने संयम तथा तपथी आत्माने भावित करता रहेवा लाग्या. जे वखते केशी कुमारथमण सावत्थी नगरीए आव्या ते वखते ते नगरीमां ठेर ठेर-तरभेटामा त्रिकमा चोकमां चाचरमा चोकठामा राजमार्गमा अने शेरीप शेरीप ज्यां सांभळो त्यां घणा लोको परस्पर पम कहेता हता के आजे तो पापित्य केशी कुमारश्रमण अहीं आव्या छे, तो हे देवानुप्रियो! आपणे तेमनी पासे जईए, तेमने बांदीप, नमीप, सत्कारीए अने सन्मानीए. ९६ दीघनिकायमा आमने स्थाने कुमार काश्यप (पालो-कुमार कस्सपर्नु नाम छे. काश्यपनो भिक्षु समुदाय पांचर्सेनी संख्यामा बतावेलो छे. कुमार काश्यपने श्रमण गौतमना (गौतम बुद्धना) श्रावक तरीके वर्णवेला छे. (बौद्धशासनमा त्यागी होय ते श्रावक अने गृहस्थ होय ते उपासक) आ कुमारकाश्यप सीधा ज सेयविया नगरीमा आवे छे त्यारे केशीकुमार-श्रमण सावत्थीए आव्या पछी सेयरिया भणी जाय छे. आजन्म ब्रह्मचारी होय ते कुमारश्रमण कहेवाय. मूळ तो कुमारश्रमण शब्द यौगिक छे पण पछी ते ब्राह्मण मुनि वगेरे शब्दनी पेठे रूढ थयो लागे छे. पाणिनीयना मूळ अष्टाध्याय [२-१-७०]मां पण ए शब्दनो उल्लेख छे एटलो ए शब्द प्राचीन छे. Jain Education Trainelibrary.org a l Page #492 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार ॥ १०४॥ Jain Education आम विचारीने प नगरीनो जनसमुदाय महाजन कोय चैत्यमां ज्यां केशी कुमारभ्रमण ऊतर्या हता त्यां तेमना दर्शनार्थे पहोंच्युं. केशी कुमारभ्रमणे पोतानो पासे आवेला लोकोने तेमने योग्य हितशिक्षाओं कही संभळावी. [१४८] ते वखते त्यां जता के त्यांथी पाछा फरता लोकोनो घोंघाट सांभळीने चित्त सारथिना मनमां एम थयुं के 'शुं आजे आ नगरी इंद्र स्कंद रुद्र मुकुंद नाग भूत यक्ष स्तूप चैत्य वृक्ष गिरि गुफा कृवो नदी सरोवर के समुद्र संबंधी कोइ उत्सव छे के जेने लईने आ घणा उग्रो भोगो राजन्यो क्षत्रियो इक्ष्वाकुओ ज्ञातो कौरव्यो ब्राह्मणो भटो योधो लिच्छविओ मलकिओ प्रशास्ताओ इभ्यो इभ्यपुत्रो अने सेनापतिओ बगेरे नाही धोईने आवजा करी रह्या छे, केटलाक घोडे चडेला छे, केटलाक हाथीप बेटेला छे अने केटलाक टोळे वळीने पगे चालता आवजा करे छे' ? लोकोनी ए दोडधामवाळी आवजानुं कारण जाणवा चित्त सारथिए पोताना कंचुकी पुरुषने तपास करवा मोकल्यो, तेणे यरावर तपास करी खरा समाचार मळतां ज आवीने चित्त सारथिने विनयपूर्वक जणान्युं के हे देवानुप्रिय ! आजे आ नगरीमां कोइ इंद्र के सागर वगेरेनो उत्सव नथी पण पार्श्वापत्य केशी कुमारभ्रमण आ नगरीना कोहय नामना चैत्यमां आवीने उतरेला छे अने तेमना दर्शनार्थे जया माटे आ वधी दोडधाम घोंघाट थई रह्यां छे. ११० [१४९] पोताना संदेशवाहके कहेली ए हकीकत सांभळीने चित्त सारथि खुश थयो अने तेने पण केशी भ्रमण पासे जवानुं मन थयुं, पथी तेणे कौटुंबिक पुरुषोने बोलावीने अश्वरथ जलदी तैयार करी लाववानो आदेश कर्यो. " रथ आवी पोचतां तो ते सारथि नाह्यो, बलिकर्म करें, मंगलमय शुद्ध वस्त्रो पहेर्यो, एक जणे पना उपर छत्र धर्यु अने प ते, रथमां बेसी मोटा समुदाय साथै केशी कुमारभ्रमणना उतारा भणी जवा नीकळ्यो. तेमनी पासे पहोंचतांज घोडाओ ऊभा राख्या, १५ रथने भावी दीधो अने पोते रथथी ऊतरी केशी कुमारश्रमणनी प्रण प्रदक्षिणा करी, तेमने चांदी नमी हाथ जोडी विनयपूर्वक सेवा करतो तेमनी सामे बेठो. चित्त सार थिनुं के शि कुमार पासे wwlainelibrary.org Page #493 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार केशी कुमारभ्रमणे चित्त सारथिने अने तेनी साथेनी मोटी जनताने चतुर्याम धर्मनो उपदेश कर्यों पटले के सर्व प्रकारनी हिंसाथी विराम करवो, सर्व प्रकारना असत्यथी विराम करवो, सर्व प्रकारनी चोरीथी विराम करवो अने सर्व प्रकारना वहिद्धादानथी ̈ विराम करवो. [१५०] केशी कुमारभ्रमणे कहेली आ हितशिक्षाओ सांभळीने चित्त सारथि प्रमुदित थयो अने श्रमणने त्रण प्रदक्षिणा दई हाथ जोडी आ प्रमाणे बोल्योः हे भगवन् ! तमे कहेला निर्ग्रथ प्रवचनमां श्रद्धा करूं छु, विश्वास धरूं लुं, हे भगवन् ! तमोप जणावेलुं निर्ग्रथ प्रवचन मनेरुचे छे, ते प्रमाणेना पालन माटे ऊजमाळ थउं छु अने हे भगवन् ! जेवुं तमे कहेलुं छे तेवुं ते, मने साधुं लागे छे. तमारी पासे आ घृणा उग्रो भोगो अने इभ्यो वगेरेप पोतानुं पुष्कळ सोनुं रूपं धन धान्य बळ वाहन भंडार कोठार अने विशाळ अंतःपुर ए बधांनो परित्याग करीने अने प बधुं धन जनतामां बहेंची दईने मुंड थई गृहवास छोडी अणगारपणुं स्वीकार्य छे पण हुं तेम करवा समर्थ नथी. हुं तो आप देवानुप्रियनी पासे पांच अणुव्रतवाळो अने सात शिक्षावतवाळो एम बार प्रकारनो गृहिधर्म १० स्वीकारवा शक्तिमान हुँ. केशी कुमारभ्रमण बोल्याः हे देवानुप्रिय ! तने सुख थाय तेम कर, तेमां विघ्न न आववा दे. पछी केशी कुमारभ्रमण पासे चित्त सारथिप पूर्वे जणावेलो गृहिधर्म स्वीकार्यों अने तेमने वांदी नमीने पाछो प सारथि पोताने ऊतारे आवी पहोंच्यो. ९७ स्थानांगसूत्री टीकामां ( पृ० २०२) बहिद्धा एटले मैथुन अने आदान एटले परिग्रह एम जणावेलुं छे अथवा स्त्रीपरिग्रह वा बीजो कोई पण प्रकारनो परिग्रह 'बहिद्वादान' मां समाई जाय छे. केशी कुमारश्रमण भगवान पार्श्वनाथना अनुयायी हता माटे तेमणे चार महाव्रतोने उपदेशेला छे. Jain Education Inmational १५ ॥१०५॥ www.ainelibrary.org Page #494 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥१०६॥ Jain Educati [१५१] हवे ते चित्त सारथि श्रमणोपासक थयो. जीव अजीव पुण्य पाप आस्रव संवर निर्जरा क्रिया अधिकरण बंध अने मोक्षना स्वरूपने ते बराबर समजवा लाग्यो. निर्ग्रथ प्रवचनमां तेने हवे पवी दृढ श्रद्धा थई के ते प्रवचनथी कोई देव असुर नाग सुवर्ण यक्ष राक्षस किन्नर किंपुरुष गरुड गांधर्व के महोरग वगेरे देवगणो तेने चळावी शके नहि. निग्रंथ प्रवचन तरफनी तेनी बधी शंकाओ दळी गई, बधी कांक्षाओ शमी गई अने बधी विचिकित्साओ ओसरी गइ. ते ए प्रवचनना मर्मने बराबर समज्यो अने जेम अस्थिमज्जा परस्पर ओतप्रोत थई रहेलां छे तेवी ज ओतप्रोतता र प्रवचनमां तेने जामी गई. हवे ते एम मानवा लाग्यो के आ निथ ५ प्रवचन परमार्थरूप छे अने बाकी बधुं अनर्थरूप छे. प्रवचननी आवी आस्थाने लीधे हवे ते" अतिशय दानशाली थयो पटले हवे तेणे पोताना घरना आगळिया उंचा करी लीधा अर्थात् सर्व कोइने माटे दरवाजाओ खुल्ला करी नाख्या. तेनुं शील पटलु बधुं पवित्र वन्युं के हवे ते कोइना घरमां के अंतःपुरमा प्रवेशतो तोपण लेशमात्र अप्रीतिकर नहोतो लागतो. चौदश आठम अमावास्या १९ अने पूर्णिमाना दिवसोमां ते पूरेपूरो उपोसथ पाळतो, निर्बंध श्रमणोने निर्दोष खानपान खादिम स्वादिम पीठ पाटीयां शय्या संथारो वस्त्र पात्र कामळ पगपूंछणु अने ओसडवेसड आपतो हतो तथा शीलवत गुण विरमण प्रत्याख्यान अने उपोसथोपवास १० द्वारा पोताना आत्माने भावित करतो अने सावत्थी नगरीमां जे जे राजकार्यों अने राजव्यवहारो हता ते बधांने जितशत्रु राजाने साथै राखीने ते पोते ज संभाळतो रहेवा लाग्यो. ९८ जेणे धर्मवचनने सांभळीने समजम लीघेलुं होय अने जीवनशुद्धि, समाजशुद्धि, राष्ट्रशांति अने विश्वशांतिना कारणे ए धर्मवचनने जीवनमा उतारखा प्रयत्न क्यों होय तेवा एक मानवनुं खरेखरुं शब्द चित्र आ कंडिकामां दोरेलुं छे. ९९ वैदिक संप्रदाय अने बौद्ध संप्रदायमा पण आ तिथिओने धर्मकरणी माटे बतावेली छे. आ माटे जुओ 'भगवान महावोरनी धर्मकथाओ' मांनुं ते विशेनुं टिप्पण. चित्त, श्रमणोपासक थयो w.jainelibrary.org Page #495 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार [१५२] आम केटलाक दिवसो चीत्या पछी कोइ एक दिवसे राजा जितशत्रुए एक महामूल्य भेटणुं तैयार कराव्यु. पछी चित्त सेयविया सारथिने बोलावोने राजाप का के-हे चित्त !] सेयविया नगरीए जा अने हुं आ जे नजराणु आपुंछंने राजा पयेसीने नजर | | तरफ आकर तथा मारी वती पमने विनंती करजे के तेमणे जे मारा योग्य संदेशो कहो मोकलाब्यो छे ते मारे मन साचो अने असंदिग्ध ववा माटे छे. आम सूचना आपीने राजाए विशेष आदरपूर्वक चित्त सारथिने विदाय आपी. चित्ते केशि____ [१५३] चित्त सारथि पण ए भेटणु लई पोताने ऊतारे आवी, जवानी तैयारी करवा लाग्यो. जतां पहेला ते नाही धोई शुद्ध वस्त्रो ५ श्रमणने पहेरी केशी कुमारश्रमण पासे गयो. करेली श्रमणे सारथिने धमोपदेश कयों. धर्मोपदेश सांभळी सारथि प्रसन्न थयो. ऊठतां तेणे श्रमणने विनंती करी के-हे भगवन् ! विनंती राजा जितशनी विदाय लई आजे हुँ सेयविया नगरी भणी रवाना था छु, तो हे भगवन् ! तमे कोई वार सेयविया नगरी जरूर |पएसिनृप पधारजो. सेयविया नगरी प्रासादिक छे, दर्शनीय छे अने बधी रीते रमणीय छ, माटे जरूर तमे त्यां पधारवा कृपा करशो. । अधार्मिक चित्त सारथिना आ कथननो केशी श्रमणे आदर न कयों, ते तरफ कोई ध्यान न आप्यु, पण मात्र मौन ज धरी राख्यु. छतां १० चित्त सारथिए तो बीजीवार अने त्रीजीवार पण सेयविया नगरी आववानो आग्रह कर्या को. विनंतीनो ज्यारे बे-त्रणवार सारथिए आग्रहभरी विनंती करी त्यारे केशी कुमारश्रमण सारथि प्रति बोल्या-के हे चित्त ! जेम कोई पक | अस्वीकार लीलोछम ठंडी छायावाळो मोटो वनखंड होय, तो हे चित्त ! ते वनखंड, मनुष्य पशु पक्षी अने सपों वगेरेने रहेवालायक खरो? चित्त बोल्यो-हा जरूर-प रहेवालायक खरो. ___ श्रमण बोल्या-पण हे चित्त ! ए वनखंडमां अनेक प्राणीओनुं लोही पीनारा भीलुगा नामना पापशकुनो रहेता होय तो ए वन- १५/॥१०७॥ खंड शु रहेवालायक खरो ? चित्त बोल्यो-पम होय तो ए सारो वनखंड पण उपसर्ग देनारो होवाथी रहेवालायक न गणाय. श्रमण वोल्या-पज प्रमाणे, हे चित्त ! तारी सेयविया नगरी पण भले घणी सारी होय, छतां तेनो अधार्मिक राजा पयेसी Jain Educat inteletional For Private Personel Use Only Www.jainelibrary.org Page #496 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥१०८॥ प्रजानो कारभार सारी रीते न चलावनारो होवाथी हुँ त्यां केवी रीते आवी शकुं ? केशिश्रम[१५४] पछी चित्त सारथिए केशी कुमारश्रमणने एम का के-हे भगवन् ! तमारे राजा पयेसी साथे शु करवू छे ? सेयविया नगरीमा सार्थवाह वगेरे बीजा घणा लोको छे, जेओ आप देवानुप्रियने वांदशे नमशे अने आपनी सेवामा रहेशे तेम ज ए लोको णना आदर माटे चित्ते आपने खानपान खादिम स्वादिम प्रतिलाभशे तथा पीठ फलक शय्या संस्तारक वगेरे द्वारा पण आपने उपनिमन्त्रित करशे. सारथिर्नु आ कथन सांभळी केशी कुमार बोल्या-चित्त ! त्यारे वळी कोइ वखते तारी सेयविया नगरीप पण आवीशु. पोताना उद्यानपाल [१५५] पछी सारथि केशी श्रमणने वांदी नमी त्यांथी पोताना ऊतारा तरफ जवा माटे पाछो फर्यो. ऊतारे आवी घोडे जोडेला कोने करेली चार घंटावाळा रथमां बेसी सेयविया नगरीथी जे रीते आव्यो हतो ते रीते कुणालदेशनी वचमां थतोक पाछो त्यां जवा नीकळ्यो. केकयिअर्ध देशनी सेयविया नगरीमा आवतां ज चित्त सारथिए त्यांना मियवण उद्यानना रखेवाळोने बोलावी सूचना करी के-हे । भलामण देवानुप्रियो ! पावापत्य केशी कुमारश्रमण क्रमे क्रमे गामेगाम फरता फरता अहीं आववाना छे, तो तेओ अहीं आवे त्यारे, देवानुः प्रियो ! तमे तेमने वांदजो, नमजो, तेमने रहेवा योग्य स्थळमां रहेवानी अनुज्ञा आपजो अने पीठ फलक शय्या संस्तारक लई जवा १० निमंत्रण करजो. ते रखेवाळोए चित्त सारथिर्नु उक्त कथन माथे चढाव्यु अने तेओ केशी कुमारना आगमननी राह जोवा लाग्या. [१५६] मियवणना रखेवाळोने पूर्वोक्त भलामण करी चित्त सारथि सेयविया नगरीए आवी पहोंच्यो. नगरीनी वच्चोवच्च थतोक ते, पयेसी राजाना घरमां बहारनी उपस्थानशाळा तरफ गयो. त्यां पहोंची तेणे घोडाओने थंभावी रथ ऊभो राख्यो, रथथी ऊतरी राजा जितशत्रुप आपेलु महामूल्य मेट' लई ते सारथि, राजा पयेसी पासे गयो, हाथ जोडी राजा पयेसीने वधावी ते भेटणुं तेने नजर कयु. राजा पयेसीए जितशत्रुनी मेट स्वीकारतां चित्त सारथिनुं सन्मान कर्यु, सत्कार कर्यो अने तेने पोताने घेर जवानी अनुज्ञा आपी. राजा पासेथी नीकळी रथमां बेसो सारथि पोताने घेर आव्यो, नाहो, बलिकर्म कयु, खाइ पीने शुद्ध थयो अने पछी पोताना Jain Education remona For Private Personel Use Only jainelibrary.org Page #497 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुतनो सार उत्तम प्रासादम सुशोभित सिंहासने बेठो. त्यां तेनी सामे मृदंगो वागवा लाग्या, वत्रीश प्रकारनां नाटको थवा लाग्यां अने उत्तम तरुणीओ नाचवा लागीः ए रीते ते, गानतानमां पोतानो समय वितावतो उत्तम सुखोने भोगवतो रहेवा लाग्यो. [१५७] हवे अन्य कोई दिवसे केशी कुमारभ्रमणे मागी आणेलां पीठ पाटीयां शय्या अने संथारो .. पाछां आपी दीघां अने पोते पोताना पांच अनगारो साथे बहार विहार अर्थ नीकळी पडया. साथी नगरीथी विहार करी फरतां फरतां तेओ केकयिअर्ध देशनी सेयविया नगरीना मियवण उद्यानमां आवी पहोंच्या अने ५. त्यां यथोचित अवग्रह स्वीकारी संयम अने तपथी आत्माने भावित करता रहेवा लाग्या. ॥१०९॥ केशी कुमारभ्रमण ते उद्यानमां आबी पहोंच्या त्यारे तेमनुं आगमन थयुं जाणी ते उद्यानपालको बहु खुश थया. तेमनी पासे आवीने तेओए केशी श्रमणने वांद्या, तेमने योग्य रहेवाना स्थळोमां रहेवानी अनुमति आपी, अने तेमने उपयोगमां लेवा माटे पीठ पाटीयां संथारो वगेरे लई जवाने निमंत्रण आयुं. १० ते रवाळ केशी कुमारश्रमणनां नाम अने गोत्र पूछीने याद पण करी लोधां पछी तेओ एकांतमां भेगा थई परस्पर बातचीत करवा लाग्या के, हे देवानुप्रियो ! आपणो चित्तसारथि जेमनी वाट जोतो रहे छे, जेमनुं दर्शन इच्छे छे अने जेमनां नाम गोत्र सांभळतां पण ए खूब प्रसन्न थाय छे, ते ज आ केशी कुमारभ्रमण गामेगाम फरतां फरतां अहीं सेयविया नगरीमां आवी चडया छे; १०० आजकाल जेम उपाश्रयमां पीठ पाट पाटला वगेरे तैयार रहे छे अने साइओ संथाराने साथै ज फेरवे छे तेम पहेला न हतुं. पहेला तो चोमासुं करनारा श्रमणो पोते जाते पीठ वगेरे उपयुक्त पदार्थने गृहस्थने त्यांथी निर्दोष रीते मागी लावता अने संथारो पण सा न फेरवता. ज्यारे अने ज्यांसुधी जरूर पडे त्यां सुधीनी मुदत माटे संथारो पण गृहस्थने त्यांथी मागी लाववामां आवतो. संथारामां घास- १५ पराळ पाथरवामां आवतुं. Jain Education international केशिश्रमण सेयविया आव्या v.jainelibrary.org Page #498 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार पएसीने उपदेश आपवानी चित्तनी भलामण ॥११०॥ तो हे देवानुप्रियो ! आपणे जईए अने चित्तसारथिने तेने अतिप्रिय लागे तेवी केशी कुमारना आगमननी हकीकत जणावीए. एवो विचार करी ते उद्यानपालको चित्तसारथिने घेर गया, तेने प्रणामपूर्वक जयविजयथी वधावी कहेवा लाग्या के, हे देवानुप्रिय ! तमे जेमनी वाट जोइ रह्या छो ते केशी कुमारश्रमण ओपणी सेयविया नगरीना मियवण उद्यानमा आवी संयम अने तपथी | आत्माने भावित करता रहेवा लाग्या छे. __ [१५८] उक्त हकीकत सांभळी चित्तसारथि बहु खुश थयो. पछी ते, आसनथी उठी-ऊभो थई पादपीठथी नीचे ऊतरी पगमांथी ५ | मोजडीओ काढी नांखी खमे खेस राखी हाथ जोडी जे दिशामा केशी कुमारश्रमण ऊतर्या हता ते दिशा तरफ सात आठ पगलां गयो |:अने प्रणामपूर्वक तेमनी स्तुति करवा लाग्योः नमोऽत्थु णं अरिहंताणं भगवंताणं वगेरे [पृ० १८ पं० २] आम शकस्तव पूरुं करतां छेवटे ते बोल्यो के-अहींना मियवण उद्यानां पधारेला ए मारा धर्माचार्य अने धर्मोपदेशक केशी कुमारश्रमण भगवानने हुं वांदुं छु. ए रीते पोताना धर्माचार्यने नमस्कार करी तेमनो आगमन संदेशो कहेवा आवनार ते उद्यानपालकोनो सारथिप सत्कार कर्यो अने जीवतांसुधी पहोंचे तेटलुं विशाळ प्रीतिदान आपी तेमने विदाय कर्या. __ पछी तेणे कौटुंबिक पुरुषोने बोलावीने अश्वरथ जलदी तैयार करी लाववानो आदेश को. रथ आवतां भावतां तो ते नाही, बलिकर्म करी, शुद्ध वस्त्रो पहेरी अने शरीरने शोभावी तैयार थई गयो. पछी ते, रथमा बेसी मोटा जनसमुदाय साथे केशी कुमारथमणना दर्शनार्थे गयो। [१५९] केशी श्रमणनी धर्मदेशना सांभळी हरखाएलो अने तोष पामेलो सारथि बोल्यो के-हे भगवन् ! अमारो राजा पएसी अधार्मिक छे अने पोताना देशनो य कारभार बराबर चलावतो नथी, तेम कोई श्रमण ब्राह्मण के भिक्षुओनो आदर करतो नथी Jain Education remona For Private Personel Use Only waldjainelibrary.org Page #499 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार पएसीनी धर्म सांभलवानी अयोग्यता ॥११॥ | अने सर्व कोईने हेरान हेरान करे छे. माटे हे देवानुप्रिय ! तमे ए राजाने धर्मोपदेश आपो, तो तेनुं घणु भलु थाय, साथे श्रमण ब्राह्मण भिक्षुओ, मनुष्यो, पशुओ अने पक्षीओनुं पण घणु भलु थाय अने तेम थतां तेना आखाय देशनुं पण घणु सारं थाय. चित्तसारथिनं आ कथन सांभळी केशी कुमारभ्रमण बोल्या के-हे चित्त! जे मनुष्यो आराम के उद्यानमा आवेला धमण ब्राह्मणनी सामे जता नथी, तेमने वांदता नमता के सत्कारता नथी, तेमज तेमनी पर्युपासना करता नथी अने तेमनी पासे जई पोताना प्रश्नोना खुलासा पूछता नथी, तेओ केवळीए कहेला धर्मने सांभळवानो लाभ मेळवी शकता नथी. जे मनुष्यो उपाश्रयमां आवेला श्रमण ब्राह्मणनो आदर करता नथी, तेमनी पासे जई कशो खुलासो पूछता नथी, तेओ धर्म सांभळवानो ल्हायो लई शकता नथी. जे मनुष्यो गोचरीए नीकळेला श्रमण ब्राह्मणनी भक्ति करता नथी, तेमज तेमने विपुल अशन पान खादिम अने स्वादिम वडे प्रतिलाभता नथी तथा तेमने कोई प्रकारनो खुलासो पूछता नथी, तेओ धर्मने सांभळवा समजवाना अधिकारी थई शकता नथी. तेमज जे मनुष्यो श्रमण ब्राह्मणनी पासे जवा छतां पोतानी जातने हाथ कपड़े के छत्री वडे ढांकी राखे छे-छुपावी राखे छे अर्थात् एक खूणामां जई चुपचाप बेसी रहे छे पण कशो खुलासो पूछवा आगळ आवता नथी, तेओ य धर्मने सांभळवानो लाभ खोई बेसे छे. पण हे चित्त ! जे मनुष्यो आराम उद्यान के उपाश्रयमा आवेला श्रमण ब्राह्मणनो आदर करे छे, गोचरीए आवेला तेमने विपुल दान आपे छे अने तेमनी पासे जतां पोतानी जातने न छुपावतां ज्या ज्या प्रसंग मळे त्या त्या सर्व खुलासा पूछी ले छे, तेओ ज धर्मने सांभळयानो समजवानो के मेळववानो लाभ मेळयो शके छे. तो हे चित्त ! तारा राजा पपसीने अमे धर्म केवी रीते कही शकीप, केमके ते अमारी पासे आवतो नथी तेमज अमारी सामु | पण जोतो नथी. Jan Educati onal For Private Personal Use Only w.anelorary.org Page #500 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥११२॥ Jain Educat [१६०] पछी सारथि बोल्योः हे भगवन् ! कोई एक वखते मारी पासे कंबोज देशमांथी चार घोडाओनी भेट आवेली, प में न राखतां परवारी राजाने त्यां मोकली आपी, तो हे भगवन् ! ए घोडाओना व्हानाथी राजा पप्सीने हुं आप देवानुप्रियानी पासे लावी शकीशः माटे हे देवानुप्रिय ! ते समये तमे राजा पएसीने धर्मकथा कहेतां लेश पण ग्लान थशो नहि तमे तमारे राजा पपसीने खूब छूटथी धर्म कहेजोलेश पण अचकाशो नहि. पछी केशी कुमारभ्रमण बोल्याः हे चित्त! ते प्रसंगे वात. त्यारवाद चित्तसारथि पोताना धर्माचार्य केशी कुमारश्रमणने चांदी नमी रथमां बेसी पोताने आवासे जई पहोंच्यो. ational [१६१] हवे एक दिवसे प्रभातना पहोरे नियम धारी अने आवश्यक करी सूर्य उगतां ज चित्तसारथि पोताने घेरथी राजा परसीने घेर गयो. राजाने नमस्कार करी जयविजयथी वधावी ते बोल्योः हे देवानुप्रिय ! आपने में केळवेला चार घोडानी भेट मोकलेली छे, तो हे स्वामी ! चालो अने आज ए घोडाओनी चेष्टा जुओ, १० अर्थात् पमनां चाल स्वभाव वगेरेनी परख करो. राजा सारथिने कः चित्त ! तुं जा अने पारखवाना ते चारे घोडाओ जोडेलो अश्वरथ जलदी तैयार करी अहीं हंकारी लाव. अश्वरथ आवी पहोंचतां शरीरने सजधज करीने राजा रथमां बेसी सेयविया नगरीनी बच्चोवच्च थतोक घोडाने खेलवतो खेलयतो बहार नीकळ्यो. एम जतां जतां चित्तसारथि ते रथने अनेक योजनो" सुधी खंची गयो. राजा परसी, गरमी, तरस, रथनो वायरो ऊनी लू के १५ उडती धूळथी कंटाळी थाकी गयो भने बोल्योः १०१ अहींनो आ 'अनेक योजन' शब्द, फरवानी मर्यादाना अतिरेकने सूचवे छे तेथी तेनो 'सो पचास योजन' एवो अर्थ कोइ न समजे. ५ घोडानी परखने बाने चित्त, पसीने श्रमण पासे लई गयो v.jainelibrary.org Page #501 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुनो सार चित्त ! मारुं शरीर थाकी गयुं छे माटे हवे रथने तुं पाछो वाळ. सारथिरथने पाछो वाळी मियवण उद्यान तरफ हंकारी गयो उद्यान पासे पहोंचतां तेणे राजाने क स्वामी ! आणि उद्यान छे. अहीं घोडाओने सारी रीते थाक खवडावीप अने तेमनो बधो श्रम आपणे दूर करो नाखीप. [१६२] राजाप 'हा' पाडतां ते उद्यानमां केशी कुमारश्रमणना ऊतारानी पासे जई चित्ते घोडाओने रोकी राख्या रथने स्थिर कय अने घोडाओने छोडी नाखी तेमनो भ्रम दूर थाय तेवी प्रवृत्ति शरू करी. राजा पण रथथी नीचे ऊतरी सारथिनी ए प्रवृत्तिमां जोडायो अने घोडाओने धीमे धीमे फेरववा लाग्यो. एम करता करतां मियवणमां मळेली मोटी सभामां बच्चे बेसी मोटा अवाजे कहेता केशी कुमारश्रमणने राजाए जोया. जोतां जतेने विचार आयो के 'जड लोको ज जडनी उपासना करे छे, मुंड लोको ज मुंडनी पूजा करे छे, मूढ लोकोज मूढनो आश्रय खोळे छे, अपंडित लोको ज अपंडितनो आदर करे छे अने अज्ञानी लोको ज अज्ञानीनुं बहु मान करे छे' तो आ वळी कोण जड मूढ मुंड अपंडित अने अज्ञानी पुरुष छे जे शरमाळ अने शरीरे हृष्टपुष्ट देखावडो लागे छे ? ए शुं खाय छे ? शुं पीये छे ? एवं १० शुं खाधा पीधाथी पनुं शरीर आवुं तगमगी रहुं छे ? अने वळी पशुं दे छे जेने लीधे आवडी मोटी मानवमेदनीनी बच्चे बेठो बेठो ते मोटा वराडा पाडे छे ? आम विचार आवतां ज राजाए सारथिने कद्दुः चित्त ! जोतो खरो आ लोको केवा जड छे जे पेला मोटा जडनी सेवा करे छे अरे ए मोटो जाडो जड तेओनी सामे केवा मोटा बराडा पाडीने कोण जाणे शुंय समजावे छे ! गम्मत तो ए छे के आवा नफकरा अने जामी गएला जड लोकोने लीधे आपणे आपणी पोतानी पण उद्यानभूमिमां सारी रीते हरी फरी शकता नथी. मात्र विसामो १५ अने शांति मेळवावा माटे तो अहीं आव्या अने अहीं तो माथाना वाळ ऊंचा थई जाय पवा बराडा करने अथडाया करे छे. [१६३] चित्ते राजाने कः Jain Education Interational श्रमण तरफ पएसीनी अरुचि ॥११३॥ Page #502 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइयं सुतनो सार ॥११४॥ Jain Education ma हे स्वामी ! ए केशी नामे कुमारभ्रमण पाश्र्वपित्य छे, जातिवंत छे, घार ज्ञानना धारक है, पमने आधोऽवधिज्ञान थपलं हे अने ओ अन्नजीवी छे. राजा बोल्योः चित्त ! तुं शुं कहे छे ? शुं प पुरुषने आधोऽवधिज्ञान छे ? शुं प अन्नजीवी छे ? सारथि बोल्योः हा, स्वामी ! एम ज छे. राजाः चित्त ! त्यारे शुं प पुरुष अभिगमनीय छे ? चित्तः हा, स्वामी ! प श्रमण अभिगमनीय छे. राजाः त्यारे तो चित्त ! आपणे तेनी सामे जईए. [१६४ ] आम वातचीत करी ए बन्ने जणा साथे, केशी कुमारनी सामे जईने तेमनी पासे बेठा. राजः हे भ॑ते॒ ! शुं तमे आंघोऽवधिज्ञान धरावो छो ? शुं तमे अन्नजीवी छो ? श्रमणे राजाने कः हे पपसी ! गामे गाम फरता कोई अंकवाणिया शंखवाणिया के दंतवाणिया दाणमांथी छटकी जवा माटे कोईने खरो रस्तो पूछता १५ १०२ केशी कुमारश्रमणनुं हृष्टपुष्ट अने कांतिबाळु मोटुं ताजुं शरीर जोईने राजाने मन आ प्रश्न उद्भवेलो छे. जेओ तपस्वी होय अ भिक्षामां आवेल अंतप्रांत अन्न खाता होय तेओनुं शरीर आयुं मोढुं ताजु अने कांतिवाळु होई शके खरुं ? ए जातनी राजाने मन शंका छे. टीकाकार पण आज खुलासो आपे छे. ( "एष किम् आहारयति ? x न खलु कदन्नभक्षणे एवंरूपायाः शरीरकान्तेः उपपत्तिः इत्यादि - पृ० १३० ). चित्ते करावेलो श्रम नो परि चय Page #503 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार नथी पण आडे वळे मार्गे चाले छे, तेम विनयना मार्गथी छटकी जवाने लीधे तने पण सारी रीते पूछतां आवडतुं नथी. पपसी ! मने जोईने तने एवो विचार थयेलो खरो के आ जड लोको पेला मोटा जडनी उपासना करे छे अने आ मारा उद्यानमां पण वराडा पाडी मने य सुखे रहेवा देता नथी ? राजाः हा, ए यात खरी. [१६५ ] पण हे भंते! प तमे जाप्यं शाथी ? तमने पहुं ते केबुक ज्ञान के दर्शन थपलं छे जेथी मारा मननो संकल्प पण तमे जाणो लोधो ? केशी श्रमण बोल्याः अमारा भ्रमण निर्यथोना शास्त्रोमां कहेलुं छे के ज्ञानना पांच प्रकार छेः १ आभिनिबोधिकज्ञान २ श्रुतज्ञान ३ अवधिज्ञान ४ मनः पर्यवज्ञान अने ५ केवळशान. तेमां अवग्रह ईहा अवाय अने धारणा पम चार प्रकारनुं पहेलुं ज्ञान छे. अंगप्रविष्ट अने अंगवाह्य ara प्रकार बीजा ज्ञाना छे. त्रीजुं ज्ञान, भवप्रत्यय अने क्षायोपशमिक एम बे भेदवाळु छे अने चोथा ज्ञानना ऋजुमति तथा विपु. लमति एवा वे भेद छे. १० हे पपसी ! जणावेल पांच ज्ञानोमां पहेलांनां चारे ज्ञान तो मने थरलां जे फक्त एक पांचमुं केवळशान छे ते मने थपलुं नथी. प पांचमुं ज्ञान तो अरिहंत भगवंतोने होय छे. Jain Education nterational हे परसी ! हुं छद्मस्थ हुं अने ए चार ज्ञानोद्वारा तारा मनना संकल्पने पण जाणी शकुं हुं-जोई शकुं कुं. [१६६ ] पछी राजा केशी श्रमणने कहांः हे भंते! अहीं हूं आपनी पासे बेसुं ? केशी कुमारभ्रमण बोल्याः १०३ ज्ञानना नाना मोटा अनेक प्रकारो अने तेनी विशेष समजुती माटे जुओ नन्दीसूत्र अथवा भगवतीसूत्र. पसीना अविनय बाबत श्रमणनी टकोर श्रमणना ज्ञान धावत पसीनी पृच्छा ॥११५॥ Page #504 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनों सार ५ । ॥११६॥ आ उद्यानभूमि तारी पोतानी छे तेथी अहीं बेस के न बेसचं प तारी वृत्तिनी वात छे. पछी तो चित्तसारथि अने राजा पपसी प बन्ने जणा साथे केशी कुमारश्रमणनी पासे बेठा. राजाप श्रमणने पृछ्यु: जीव अने शरीर भिन्न हे भंते ! तमारा श्रमण निग्रंथोमा पवी समज छे, एवी प्रतिज्ञा छे, एवी दृष्टि छे, एवी रुचि छे, एवो हेतु छ, पवो उपदेश छे, | भिन्न छे एवो संकल्प छे, एवी तुला छे, एवं मान छे, एबुं प्रमाण छे अने एवं समोसरण छे के-जीव जुदो छे अने शरीर जुदुं छे, पण | एवी श्रमजे जीव छे ते ज शरीर छे पवी समज नथी. कुमारश्रमण बोल्याः णनी समज हा, पपसी ! अमारी समजमां जीव जुदो हे अने शरीर जुर्नु छ एम छे पण जे जीव छे ते ज शरीर छे एवी अमारी समज नथी. [१६७] राजा वोल्योः जीव अने शरीर बन्ने जुदां जुदां ज होय अने जे जीव छे तेज शरीर छे एम न होय तो, हे भंते! तमे सांभळो केएक मारो दादो हतो, जे आ ज नगरीमा मोटो अधार्मिक राजा हतो, ते पोताना देशनी पण ठीक सार संभाळ न करतो अने १० १०४ समोसरण एटले एक मतमा “घणाओगें मीलन"-["एतत् समवसरणम्-बहूनामेकत्र मीलनम्”-पृ० १३३ टीकाकार] १०५ दीघनिकायमां आ बाबत नीचेनी हकीकत छे. राजा पायासि अने कुमार काश्यप ए वे वच्चे मुलाकात थतां पायासि पोतानी शंकाओ काश्यप पासे रजु करे छे. पछी काश्यप, राजाने समजाववा कहे छे के-हे राजन्य ! आ चन्द्र शुं छे ? सूरज शुं छे? तेओ आ लोकमां छे के परलोकमां छे ? देवो छे के मानवो छ ? अर्थात्-आ उदाहरण आपीने काश्यप, राजा पासे परलोकनी साबीती आपे छे पण राजाने गळे आ वात उतरती नथी. पछी राजा कहे छे के, मारा केटलाक जातभाइओ अने मित्रो प्राणातिपातादिकमां मस्त रहेता, तेओने |१५ में कहाँ राखेखें के प्राणातिपातादिकथी तमे नरके जाओ तो मने ए बाबतनी सूचना करवा अहीं आवजो. पण तेओ अहीं आव्या नहीं वेम Jain Education malla For Private Personal Use Only orary.org Page #505 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार घणांय पापकर्मोमाज राच्यो रहेनो तमारा कहेया प्रमाणे तो ए पापी मारो दादो काळ आवतां मरण पामी कोई एक नरकमां नैरयिक जीव अने थयो होवो जोईए. हे भंते ! केम खलं ने ? शरीर भिन्न वळी, ए मारा दादानो हुं बहालो पौत्र छु, तेने मारा पर घणुं हेत हतुं, हुं तेनो विशेष लाडीलो-मानीतो हतो, तेनुं हृदय मने || | भिन्न होय जोईने विशेष आनंद पामतुं. वधारे शुं, पण माझं नाम सांभळीने पण तेओ पोतार्नु अहोभाग्य मानता. तो मारो हवे, हे भंते! तमारा कहेवा प्रमाणे जीव अने शरीर जुदां जुदां होय तो मारा दादा नरकमां गया होवा जोइए. वळी, मारा ५ दादोपापी दादाने मारा उपर घणं हेत हतं तेथी तेमणे अहीं मारी पासे आवीने एम जणायवु जोईए के "हे पौत्र! हूं तारो दादो हतो पण होईने नरके अधार्मिक होवाने कारणे में घणां पापो आचरेला, तेथो हुँ नरकमां पड्यो छु. माटे, हे पौत्र! तुं लेश पण पाप न आचरजे अने गएलो, ते प्रामाणिकपणे देशनो कारभार करजे. पापकर्ममां पड़ीश तो मारी पेठे नरकमां जईश-नरकनी यातनाओ बहु भयंकर छे, माटे भूल्ये मने हजु चूक्ये जरा पण पापाचरण न सेवीश." सुधी केम भंते ! मारो दादो मारी पासे आवीने उक्त रीते कहे, तो जीव अने शरीर जुदां जुदां छे एवी मारी श्रद्धा थाय, पण अत्यार-10 सुधीमां मारे दादे अहीं मारी पासे आचीने पवु कशुंय कहेलु नथी, तेथी हुँ एम समर्नु छ के तेमनो जीव अने शरीर प बन्ने साथे ज काई खबर नाश पामी गयां छे अर्थात् मारा दादाना देहने देन देतांनी साथे तेमनो जीव पण अहीं बळी गयो छे तो परलोकमां जाय ज कोण ? आपवान आव्यो ? अने पम छे माटे ते अहीं आवी पण क्याथी के ? अने आम छे मारे जीव अने शरीर बन्ने एक ज छे-जे जीव छे तेज शरीर छे-ए मारी प्रतिज्ञा सुप्रतिष्ठित छे. आम कही जीव अने कोई दुतने पण तेमणे मोका यो नहीं, माटे परलोक नथी एवी मारी श्रद्धा छे. अयपसेणइय सूत्रमा राजा पएसीए पोताना दादानुं दृष्टान्त २०ी आपीने जे हकीकत कहेली छे तेज हकीकत दीघनिकायमा राजा पायासिए पोताना मित्रोन उदाहरण आपीने कहेली छे. वळी, नरकमाथी न अभिन्नता आवी शकवानु जे कारण रायपसेणइयसूत्रमा बतावेलुं छे ते ज कारण दीघनिकायमा पण कहेलुं छे. जुओ दीघनिकाय भाग२ पायासिसुत्तंत पृ० ३२०.. कहे छे. ॥११७॥ For Private Personal Use Only Jain Educa t ional ww.jainelibrary.org Page #506 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥११८॥ [१६८] केशी कुमारश्रमण वोल्याः श्रमणः हे पपसी ! तारे सूर्यकांता नामे राणी छे. हवे तुं पम समज के प रूडी रूपाळी तारी गणी कोई रूडा रूपाळा परपुरुष साथे जेलमा मानवीय कामसुखोने अनुभवती होय एम तुं जो, तो ए कामुक पुरुषनो तुं शु दंड करे? हे भंते ! हुं ए पुरुषनो हाथ कापी नाखु, पग छेदी नाखु, एने शूळीए चडावी द अथवा एक ज घाए तेनो प्राण लउं. पडेलो अपहे पएसी ! ते कामुक पुरुष कदाच तने एम कहे के-हे स्वामी! तमे एक घडीक थोभी जाओ, मारा मित्रो ज्ञातिजनो संबंधो. 14राधी, पोताजनो अने परिवारना लोकोने हुँ पम कही आयु के-हे देवानुप्रियो! कामवृत्तिने वश थई हु सूर्यकांताना संगमां पडयो तेथी मरणनी | नां सगांने आ सख्त सजा पाम्यो छु, माटे हे देवानुप्रियो ! तमे भूल्येचूक्ये पण पवा पापाचरणमां न पडशो, पडशो तो मारी पेठे फांसीनी | समजाववा सजा पामशो. आवी शक____ हे पएसी ! ५ पुरुषतुं काकलुदीथी भरेलुं आ गळगळ वचन सांभळीने तु ते कामुकने सजा करतां घडीक पण थोभी | तो नथी ते जईश खरो? १० न आवे माटे हे भंते ! पम तो न ज बने. प कामुक मारो अपराधी छे माटे लेश पण ढील कर्या विना हुं तेने पाधरोज फांसीए चडावी दंडं. जीव अने एज प्रमाणे, हे पपसी ! नरकमां पडेलो तारो दादो परतंत्रपणे जे दुःखो भोगवी रह्यो छे ते तने-वहाला पौत्रने कहेवा न शरीर आवी शके. अभिन्न छे १०६ केशी कुमार श्रमण राणीनु उदाहरण आपीने अहीं जे हकीकत जणावे छे तेज हकीकत चोरनुं उदाहरण आपीमे कुमार काश्यप दीघनिकायमा जणावे छे. तेओ कहे छे के-हे राजन्य ! कोई पकडायेलो चोर तने एम कहे के, 'हु मारा कुटुंबने कही आq के तमे चोरी |१५| बने ? न करशो अने करशो तो मारी जेम विपत्तिमां पडशो एवँ मने मारा कुटुंबमा जई कही आववानी रजा आपो, हुं पाछो आवतां सुधी तमो खमो अने त्यारबाद मने शिक्षा करजो, तो तुं चोरनी ए वात माने खरो ? राजा न पाडे छे इत्यादि. जुओ दीघनिकाय पृ० ३२१. | एम केम Jain Educatintestinal ना ॥ For Private Personal Use Only Jww.jainelibrary.org Page #507 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार मनुष्यलोकमां जईने पापकर्मनां माठां फळोनी सूचना करी आघवानी पनी तो घणीय इच्छा होय, पण ते पेला अपराधी पुरुषनी पेठे त्यांथी छूटोज थई शकतो नथी. नरकमा ताजो ज आवेलो अपराधी-नारकी, मनुष्यलोकमां आववाने तो इच्छे छे, पण नीचेनां चार कारणोने लीधे ते अहीं आवी शकतो नथीः ___ त्यांनी-नरकनी भयंकर वेदनानो अनुभव तेने अत्यंत विह्वल करी नाखे छे अने तेथी ते किंकर्तव्यमूढ वनी जाय छे, ए प्रथम ५॥११९॥ कारण छे. नरकना कठोर संत्रीओ ए नारकीमे घडीभर पण छूटो राखता नथी अने तेने वारंवार सताव्या करे छे, ए बीजुं कारण छे. ताजा नारकीन नारक वेदनीय कर्म पूरु भोगवाई रहेलु नथी होतुं, ए त्रीजुं कारण छे, अने चो) कारण तेनुं नरकर्नु आव पूरु थपलुं नथी होतुं, ए छ, अर्थात् मनुष्यलोकमा आववाने इच्छतो पण नारकी ए बधा प्रतिबंधोने लीधे अहीं आवी शकतो नथी. माटे, हे पपसी ! 'शरीर साथे ज जीव अहीं बळी जाय छे अने तेथी मरेलो माणस फरी अहीं क्याथी आवी शके ? एम जे तुं कहे छे ए बराबर नथी. मरीने नरकमां पडेलो प्राणी अहीं नथी आची शकतो तेनुं कारण तेनी परतंत्रता ज छे, नहीं के ते नथी. माटे, हे पपसी! तुं पम समज के-जीव जुदो छे अने शरीर जुदुं छे-कोइ काळे ते वन्ने एक छे एवं नथी. [१६९] पएसी बोल्योः हे भंते ! मारी मान्यताने दृढीभूत करनारो आ एक बीजो दाखलो समिळोअहीं-आज नगरीमा मारी एक दादी रहेती हती, जे मोटी धार्मिक श्रमणोपासिका हती, वळी ए जीव अजीव पुण्य पाप १०७ आ सूत्रमा राजा पएसीए पोतानी धर्मिष्ठ दादीनुं उदाहरण आपीने जे हकीकत जणावी छे से ज हकीकत दीघनिकायमा राजा १० Jain Education Thermal For Private sPersonal use Only Mjainelibrary.org Page #508 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार धर्मिष्ठ ॥१२०॥ आस्रव संवर वगेरे तत्त्वोनी जाणकार हती अने तप तथा संयमवडे पोताना आत्माने वासित करती बहु पुण्य उपार्जन करती हती. तमारा कहेवा प्रमाणे तो, काळ आवतां मरण पामी, ए कोई एक स्वर्गमा देव थपली होवी जोइप. हे भंते ! केम खरुंने ? पएसी वळी, ए मारी दादीनो हुँ वहालो पौत्र छु. हवे ए मारी दादी, तमारा कहेवा प्रमाणे देव थई होय तो तेणीए अहीं मारी पासे आवीने एवं कहेवू जोइए के-९ तारी दादी हती अने धार्मिक होवाने लीधे बहु पुण्योपार्जन करी स्वर्गमां देव थई छु, माटे होईने स्वर्ग हे पौत्र ! तुं पण धार्मिक थजे अने देशनो कारभार प्रामाणिकपणे करजे, दानादिक बडे पुण्य उपार्जन करीश तो मारी पेठे स्वर्गना गएलीमारी सुखो अनुभवीश. दादी मने हे भंते ! मारी दादी मारी पासे आवीने ए प्रमाणे कहे तो जीव अने शरीर जुदां जुदां छे पचो मारी खात्री थाय. पण मर्याने स्वर्ग विशे लायो वखत थयो छतां अत्यारसुधीमा मारी दादीप अहीं मारी पासे आवीने एवं कशुं य सूचवेलुं नथी, तेथी जीव अने शरीर समाचार ए बन्ने पक जछे पण जुदां जुदां नथी ए मारी खात्री पाकी थाय छे. आपवा न [१७०] केशी कुमारश्रमण बोल्याः । आवी माटे हे पपसी ! तुं एम समज के,०८ देवमंदिरमा जवा माटे तु नाहेलो छे, भीनां कपडां पहेरेलां छे, तारा थमां कळश अने धूपनी जीव अने | शरीर अपायासिए पोताना धर्मपरायण मित्रोन उदाहरण आपीने सूचवेली छे. तेमां कयु छ के-"राजा पायासिए पोताना धार्मिक मित्रोने कयु के तमो। | भिन्न छे. तमारी धर्मवृत्तिने लीधे स्वर्ग जवाना अने एम बने तो मने तमो ए समाचार आपवा जरूर आवजो" इत्यादि-जुओ दीघनिकाय पृ० ३२७. १०८ दीघनिकायमां आने बदले कुमार काश्यपे कोजु उदाहरण आपेलुं छे अने ते आ छे. “जेम कोई मनुष्य गूथकूपमां-गंथाती गटरमां-पडेलो होय अने तेनु आखु शरीर मळथी खरडायेल होय ते माणसने त्यांथी बहार काढी नवराबी-धोबरावी-चोक्खो करी, सुगंधी तेलथी १५ तेना उपर विलेपन करी, माळा वगेरे पहरावी तेने सुशोभित करो पछी तेने पाछा फरीवार ए गन्धाती गटरमा जवान कहेवामां आवे तो जाय १० Jain Education intelllenosa For Private Personel Use Only How.jainelibrary.org Page #509 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार कडछी रही गई छे अने देवमंदिग्मा पेसवाने तुं पगला ज उपाडे छे, पयामां पायखानामां बेठेलो कोई पुरुष तने पम कहे के स्वर्गमा हे स्वामी ! तमे अहीं पायखानामां आवो, बेसो, ऊभा रहो अने थोडीवार लांबु डील करो; तो हे पएसी ! तुं ए वातने काने गएलो | घर खरो? प्राणी स्वपपसी बोल्योः हे भंते ! हु एवं कशं काने न धरूं अर्थात् एक क्षण माटे पण पायखानामा न जउं. हे भंते ! पायखार्नु तो भारे गंदु छे, पवी/ 4 गीय भो TA गंदी जग्यामां हुं शी रीते जई शकुं? केशी कुमारश्रमण बोल्याः | सक्तिने ए ज प्रमाणे, हे पपसी ! स्वर्गमां देव थपली तारी दादी अहीं आवी तने पोतानां सुखो कहेवाने इच्छे, तोपण आवी शके नहि. लीधे अर्हि स्वर्गमां ताजो उत्पन्न थपलो देव, मनुष्यलोकमां आववाने तो इच्छे छे, पण नीचेनां चार कारणोने लीधे ते अहीं आची न आवी शकतो नथीः शके माटे ए देव, स्वर्गना दिव्य कामभोगोमां खूब मशगुल बनी जाय छे अने मानवीसुखोमां तेनी रुचि रहेती नथी, ए पहेलुं कारण छे. जीव नथी ए देवनो मनुष्य साथेनो प्रेमसंबंध टूटी गपलो होय छे अने स्वर्गनां देवदेवीओ साथेनो नयो प्रेमसंबंध तेमा संक्रमेलो होय छे, एम न ए बीजुं कारण छे. कहेवाय दिव्य कामसुखो भोगववानी लालचमां पडेलो ए देव, अब घडीए जउ अब घडीए जउं, एम विचारे तो छे, पण तेना आवतां खरो? राजा कहे छे-न जाय तेम आ गन्धाता मानवलोकमाथी स्वर्गे पहोंचेला देवो फरोबार गन्धाता मानवलोकमां आवे खरा ?" इत्यादि.....॥१२१।। दीघनिकाय पृ० ३२४. १०९ दीघनिकायमा कहेलुं छे के-"मानवलोकना पूरां सो बरस एटले त्रायस्त्रिंश देवोनो एक दिवस-रात; एवा आपणां सो वरस जेटला Jain Educatioint For Private Personal use only Jw.jainelibrary.org Page #510 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण| इय सुत्तनो सार ॥१२२॥ आवतां तो मनुष्यलोकनां तेनां अल्पायुषी संबंधीओ मरी गयेलां होय छे, कारण के देवनी घडी पटले आपणां हजारो वर्ष अर्थात् | पनी एक घडीमां तो आपणी केटलीप पेढीओ बदलाई जाय छे, एटले घडी पछीय देवर्नु आवQ कल्पी लईए तोपण ए पना खरा संबंधीओने मळी शकतो नथी, प त्रीजु कारण छे. चोथु कारण मनुष्य लोकनी माधु फाडी नाखे पवी भयंकर गंदकी छे. १ ए गंदकी उंचे पण "" चारसो पांचसो योजन सुधी फेलाय छे अने प पवी तीव होय छे के देव पने सही शकतो नथी. लांबां प्रीश रातदिवस थाय त्यारे देवोनो एक मास अने एवा बार मास बीते त्यारे देवोर्नु एक वरस थाय. ए प्रायस्त्रिंश देवोर्नु एवां दिव्य हजार वर्ष जेटलुं दीर्घ आयुष्य होय छे. ए देवो एम धारे छे के आपणे बे के प्रण रात आ दिव्य कामगुणोने भोगवी पछी आपणा मानवी सम्बन्धीओने समाचार आपवा जईशु" इत्यादि पृ० ३२७. ११० दीघनिकायमा जणावेलुं छे के-"देवोनी दृष्टिमां मनुष्यो अशुचि छे, दुर्गन्धी छे, जुगुप्सित छे. मनुष्यलोकनी दुर्गन्ध सो योजन ऊंचो जईने देवोने बाधा उपजावे छे." "योजनसतं खो राजन! मनुस्संगधो देवे उब्बाहति"-पृ० ३२५. १११ नव योजन करतां बधारे दूरथी आवतां सगंध पुद्गलो आपोआप घ्राणेन्द्रियनो विषय थई शकता नथी एवो घ्राणेन्द्रियना विषयने लगतो जैनशास्त्रनो नियम छे. नव योजन करतां वधारे दूरथी जे पुद्गलो आवे छे तेमनो गन्ध अत्यन्त मन्द थई जाय छे अर्थात् प्राणेन्द्रिय तेने लई शकती नथी. आवो नियम छतां अहीं जे चारसे पांचसें योजन सुधी दुर्गन्ध जवानी वात कही छे तेनी संगति केम थाय ? आवो प्रश्न टीकाकारने पोताने थाय छे. अने तेनुं समाधान पण तेओ पोते ज पोतानो रीते शोधी काढे छ: “जो के नियम तो एवो ज छे तोपण जे पुद्गलो अतिउत्कट गन्धवाळा होय छे ते नव योजन सुधी पहोंचतां त्यां तेमने जे बीजां पुद्गलो मळे छे तेमां तेओ पोताना दुर्गन्धनो, पास बेसाडे छे अने प पास वेठेलां पुद्गलो बळी आगळ जई बीजां पुद्गलोमा पास बेसाडे छे, ए रौते उपर उपर पास बेसाडेलां पुद्गलो For Private Personal Use Only Jan Education a sanelibrary.org Page #511 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार देव एनी पोतानी इच्छा होवा छतां उपरनां चार कारणोने लीधे अहीं आवी शकतो नथी. माटे, हे परसी ! 'शरीर साथै ज जीव अहीं बळी जाय छे, पथी मरेलो माणस फरी अहीं क्यांथी आवी शके ?" एवी तारी समज बराबर नथी. चारसे पांचसे योजन सुधी पहोची बळे छे. पण आ बात लक्ष्यमा राखवानी छे के उपर उपर जतां गन्ध मन्द थई जाय छे. मनुष्यलोकमा जे | दुर्गन्ध छे ते साधारण रीते चारसे योजन सुधी जाय छे पण मनुष्यलोकमा ज्यारे दुर्गन्ध खूब बधे छे त्यारे ते पांच योजन सुधी पण पहोंचे छे, माटे मूळकारे 'चारसो' अने 'पांचसो' एम बे संख्या बतावी छे." ("इह यद्यपि नवभ्यो योजनेभ्यः परतो गन्धपुद्गला न घ्राणेन्द्रिय|ग्रहणयोग्या भवन्ति, पुद्गलानां मन्दपरिणामभावात् घ्राणेन्द्रियस्य च तथाविधशक्त्यभावात् तथापि ते अत्युत्कटगन्धपरिणामा इति नवसु योजनेषु मध्ये अन्यान् पुद्गलान् उत्कटगन्धपरिणामेन परिणमयन्ति तेऽपि ऊर्ध्वं गच्छन्तः परतोऽन्यान् तेऽपि अन्यान् इति चत्वारि पञ्च वा योजनशतानि यावत् गन्धः केवलम् ऊर्ध्वम् ऊर्ध्वम् मन्दपरिणामो वेदितव्यः । तत्र यदा मनुष्यलोके बहूनि गोमृतककलेवरादीनि तदा पञ्च योजनशतानि यावद् गन्धः शेषकालं चत्वारि तत उक्तम्- चत्वारि पञ्च इति पृ० १३४) आ समाधान तद्दन साधारण छे टीकाकार पोते ज कहे छे के उपर उपर गन्ध मन्द थतो जाय छे तो पछी चारसे के पांचसे योजन सुधीमां मन्दतम भयेली दुर्गन्ध, देवोने केम बाधा पहाचाडी शके ? आ तो एक संगति मात्र कहेवाय. आ बावतमां स्थानांगना टीकाकार अभयदेवसूरि वळी नवो प्रकाश पाडे छे. तेओ कहे छे के "मनुष्यक्षेत्र के गन्तुं स्वरूप छे एम आ उपरथी सूचित थाय छे. वस्तुतः तो देव वा बीजो कोई नव योजन करता वधारे दूरथी आवेलां पुद्गलोनो गन्ध जाणतो नथी- जाणी शकतो नथी अथवा शास्त्रमां इन्द्रियोना विषयनुं जे प्रमाण बतावेलुं छे ते सम्भव छे के औदारिक शरीर सम्बन्धी इन्द्रियोनी अपेक्षाए होय.” ( " इदं च मनुष्यक्षेत्रस्य अशुभस्वरूपत्वमेवोक्तम् । न च देवः अन्यो वा नवभ्यो योजनेभ्यः परतः आगतं गन्धं जानाति इति अथवा अत एव वचनाद् यद् इन्द्रियविषयप्रमाणमुक्तं तद् औदारिकशरीरेन्द्रियापेक्षयैव सम्भाव्यते " - पृ० २४४ स्थानांगटीका.) भरतादिक क्षेत्रमा या एकांत सुखमा काळ होय त्यारे तेनी दुर्गन्ध चारसो योजन जाय छे अने ज्यारे तेवो काळ न होय त्यारे १० १५ Jain Educationema onal ॥ १२३॥ jainelibrary.org Page #512 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥१२४॥ मरीने स्वर्गमां गपलो प्राणी अहीं नथी आवी शकतो, तेनुं कारण स्वर्गना मोजशोखो तरफ तेनी विशेषतम अभिरुचि छे, नहि लोढानी के ते नथो ज, तेथी हे पपसी! तुं एम समज के जीव जुदो छे अने शरीर जुदु छे, पण ते बन्ने एक नथी. कुंभीमा [१७१] वळी फरीने पएसी बोल्योः नाखेला हे भंते ! जीव अने शरीर जुदां जुर्दा नथी ते माटे आ एक वीजो पुरावो ध्यानपूर्वक सांभळोः चोरना उहे भंते ! तमे एम समजो के कोई एक दिवसे मारी बहारनी उपस्थानशाळामां मारा मंत्री वगेरे परिवारथी घेरापलो हुँ राजर्मि- दाहरणथी हासनमा बेठो होउं, ते वग्नते मारा कोटवाळो कोई एक चोरने पकडी लावे, हुं ते चोरने जीवतो ने जीवतो लोढानी कुंभीमां पूरी अजीववाद दउं, तेना उपर लोढानु ढांकणुं सज्जड ढांकी दडं, तेने लोढा तथा सीसाना रसथी रेवरावी दउं अने तेना उपर मारा विश्वासु सैनिकोनी चोकी मूकी ते लोहकुंभीनी साचवण करावं. पछी वखत जतां हुँ पोते जाते ते कुंभीने खोलावू तो तेमां पेला पूरेला पुरुषने मरेलो जोउं दु. जीव अने शरीर जुदां जुदा होय तो प पुरुषनो जीव कुंभीमांथी बहार शी रीते जाय? कुंभीने क्याय राई जेटलुं पण काणुं नथी, जेथी जीवने बहार जवानो मार्ग १० मळी शके. कुंभी क्याय जरा पण काणी होत तो एम मानी पण शकात के जीव बहार नीकळी गयो छे अने तेथी एम पण ठरत के शरीर अने जीव जुदां जुदां छे, पण आ कुंभी तो क्यांय काणी ज नथी पटले जीव जुदो होय तो पांथी नीकळी शी रोते शके? | माटे जीव अने शरीर बन्ने पक छे अने शरीर अक्रिय थतां जीव पण अक्रिय थाय छे, ए मारुं धारदुं बराबर छे. [१७२] केशी कुमारश्रमण बोल्याःपांचसो योजन जाय छे माटे बे संख्या बतावी छे एम श्रीअभयदेवसूरि कहे छे. ("कदाचित् भरतादिषु एकान्तसुषमादौ चत्वारि, अन्यदा तु २५| पञ्चापि"-पृ० २४४ स्था० टी०) Jhin Education ItemBonal For Private Personal Use Only wouldjainelibrary.oro Page #513 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार हे पएसी! तुं एम समज के शिखरना घाटनी घुम्मटवाळी एक मोटी ओरडी होय, जे चारे कोर लींपेली होय, जेनां बारणां सञ्जड बंध सज्जड वासेला होय अने जेमां जराय हवा पण न पेसी शके पवी ते उंडी होय, तेमां कोई पुरुष भेरी अने एने वगाडवानो दंडो करेला घरलइने पेसे, पेसीने एनां वारणां सज्जड रीते बंध करे, पछी ते, ओरडीनी वच्चोवञ्च बेसीने मोटा मोटा अवाजथी ए मेरीने बगाडे, तो हे पएसी! मेरीनो ए अवाज बहार नीकळे खरो? मांथी जेम हा, भंते ! नीकळे. शब्द बहार हे पएसी! ए ओरडीमा क्यांय एक पण काणुं छे खरूं? आवे छे ना, भंते, ए ओरडीमां क्यांय पण काणुं नथी. तेम सञ्जड हे पपसी! एज प्रमाणे, वगर काणानी ओरडीमांथी पण अवाज बहार नीकळी शके छे, तेम वगर काणानी कुंभीमाथी जीव पण बंध करेली बहार नीकळी शके छे, अर्थात् पृथ्वीने शिलाने के पर्वतने मेदीने सोसलं जवानु सामर्थ्य जीवमां छे, माटे तेने गमे त्यां पूरवामां कुंभीमांथी आवे तोपण ते बहार नीकळी ज जवानो. एथी तुं एम समज के जीव अने शरीर जुदां जुदां छे पण ए बन्ने एक नथी. जीव नीक[१७३] वळी, पएसी बोल्यो: ळी शके छ हे भंते ! जीव अने शरीर जुदा जुदा नथी पण एक ज छे पवी मारी धारणाने टेको आपतो आ बळी एक दाखलो सांभळोः मरेलो चोर मारा कोटवाळोप पकडी आणेला चोरने हुँ जीवथी मारी नाखू, पछी ते मारी नाखेला चोरने लोढानी कुंभीमां पूरी दर्ड, तेना उपर मजबूत ढांकणुं बेसारी, तेने रेवरावी अने पाकी चोकी बेसाडी दउं; पछी वखत जतां ते लोढानी कुंभी उघाडी जोऊ ९ तो । | कृमिरूप तेने कीडाओथी खबदती कुंभी जेवी भालु छ. प कुंभीमां क्यांय राई जेटलुंय काणु नथी, छतां एमां एटला बधा कीडा क्याथी पेसो गया? अजीववाद हुई तो पम समजु टु के शरीर अने जीव एकज छे, माटे शरीरमांथी ज ए बधा नीपज्या होचा जोइए. शरीर अने जीव जुदा जुदांसार२५॥ 1१५थयोछे माटे Jain Educatie Inmational For Private & Personel Use Only Tww.jainelibrary.org Page #514 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥१२६॥ होय तो ए कुंभीमां में जोएला ए जीवो बहारथी शी रीते आवी शके ? [१७४] केशी कुमार बोल्या:हे पएसी! ते पहेलां कोईवार धमेलु लोढुं जोएलुं छे खरं ? वा ते जाते कोईवार लोढुं धमावेलुं खरं ? भंते ! हा, धमेलु लोढं में जोपलुं छे अने तेने धमावेल पण छे. पएसी! पवु ए लोढुं अग्निमय लालचोळ थई गएलुं होय छे, ए वात खरीने ? हा, भंते ! ए वात खरी छे. तो हे पएसी! ए नक्कर लोढामां ते अग्नि शी रीते पेठो ? राइ जेटलुंय काणु लोढाने नथी, छतां तेमां अग्नि पेसी शके छे, तेम जीव पण सर्वत्र अनिरुद्ध गति शक्तिवाळो छे. ते पृथ्वीने अने शिला वगेरेने भेदीने पण गमे त्यां पेसी शके छे. हे पपसी ! बराबर सज्जड बंध करेली ए कुंभीमां पण ते जे जीवो जोया छे ते बधाय तेमां ""बहारथी पेठेला छे, माटे तुं पम | मान के शरीर अने जीव जुदां जुदां छे पण एक नथी. [१७५] राजा पएसी बोल्योः हे भंते ! कोई एक बाणावली तरुण पुरुष तरुण होय त्यारे एक साथे पांच वाणोने फेंकी शकवा जेटलो कुशळ होय, पण ते |ज पुरुष ज्यारे मंद ज्ञानवाळो बाळक हतो त्यारे एवी कुशळता धरावी शकतो होत तो हुँ पम मानत के जीव जुदो छे अने शरीर जुदुं छे. परंतु मंद शानवाळो ए बाळक" एवी कुशळता बताची शकतो नथी, माटे जीव अने शरीर एक छे ए मारो कल्पना सुसंगत छे. ११२ मुडदामा जे कीडा देखाय छे तेमना जीयो, कोई बीजो गतिथी च्यवीने मुडदाना शरीरमा पेठेला छे-उपजेला छे एवो आ | वाक्यनो आशय छे. ११३ राजा पएसोना आ तर्कनो अभिप्राय नीचे प्रमाणे जणाय छः आत्मवादी परम्पराओ आत्माने नित्य माने छे, एटले जेवो आत्मा | n For Private Personal Use Only तपेला लोढामां जेम अग्नि पेसे छे तेम काणा वगरनी कुंभीमा जीवो पेसे छे. बाल अने युवकना उदाह रणथी | अजीववाद २all Jain Educatio ibrary.org Page #515 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार युवकना बाजा प्रकारना उदाहरण द्वारा जीववाद |॥१२७॥ [१७६] केशी कुमार बोल्या: हे पपसी! कोइ एक बाणावली तरुण पुरुष, नवं धनुष नवी दोरी अने नवं वाण ए बडे एक साथे पांच बाणोने फेंकी शकवा जेटली कुशळता धरावी शके छे, पण ते ज पुरुष पासे जून खवाई गपलुं धनुष तेवी ज दोरो अने तेधुंज बूलु फलं होय, तो ते एक साथे पांच फळांने फेंकी शके खरो? भंते ! न फेंकी शके. हे पएसी! तरुण पुरुष शक्तिशाळी तो छे, परंतु उपकरणोनी न्यूनता-खामी-ने लीधे ने पोतानी शक्ति बताची शकतो नथी, तेम मंद ज्ञानवाळा बाळकमां आवडतरूप उपकरणनी खामी छे, माटे ते प अवस्थामा एक साथे पांच बाणने फेंकी शकतो नथी. हा, ते ज मंद ज्ञानवाळो बाळक ज्यारे तरुण थइ आवडतरूप उपकरण मेळवे छे, त्यारे तेमा एवी शक्ति खीली उठे छे, पण तेथी तुं एम न मान के शरीर अने जीव बन्ने एक छे. पपसी! ए बन्ने तो जुदां जुदां छे. [१७७] पएसी बोल्योःबाळकमा छे तेवो ज आत्मा, ते बाळकनी युवावस्थामां पण छे. जो आम छे तो पछी जे काम बाळकनो आत्मा नथी करी शकतो ते काम तेज बाळकनी युवावस्थानो आत्मा केम करी शके ? व्यवहारमा तो एबुं जोवामां आवे छे के जे काम बाळकनो आत्मा नथी करी शकतो ते काम तेनी युवावस्थानो आत्मा करी शके छे. बन्ने अवस्थामां-बाळ अने युवान अवस्थामा एक ज व्यक्तिनो आत्मा एक ज होय अने ते नित्य होय-एक सरखो ज अवस्थामा रहेतो होय, तो ए घटना न बनी शके, माटे राजा पएसी कहे छे के आत्मा अने शरीर जुदा जुदा नथी. राजा पएसीने मते तो बाळकनुं शरीर अशक्त छे. माटे जे काम ते न करी शके ते ज काम ते बाळकनुं युवान शरीर जरूर करी शके, शरीर तो बदलाया करे छे माटे तेने मते आत्मा अने शरीर एक ज छे, ए कल्पना, उदाहरणथी ते समजावे छे. Jain Education remona For Private Personel Use Only wellainelibrary.org Page #516 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसमा इय सुत्तना सार ॥१२८॥ हे भंते ! जैम कोइ तरुण पुरुष, लोढाना सीसाना के जसतना मोटा भाराने उपाडवा समर्थ छे, तेम ते ज तरुण पुरुष ज्यारे जीवता अने डोसो थाय अर्थात चामडी बधी लबडी गपली, गात्र तमाम ढीलां, दांतो बधा खरी गएला अने चालतां लाकडीनो टेको लीघेलो पयो मुएलाना घरडो थाय, त्यारे एवा मोटा भारने उपाडी शकतो देखातो नथी. वजनमा हे भंते ! तरुण मटी एवो पडोसो थएलो पुरुष, एवा मोटा भारने पण उपाडी शकतो देखाय, तो हुँ एम मार्नु के जीव जुदो । फरक नथी छे अने शरीर जुदुं छे, अन्यथा मारी मान्यता ज बराबर छे. माटे जीव [१७८] केशी कुमार बोल्या: नथी हे पएसी! एवंडो मोटो भार तो कोई हट्टोकट्टो पुरुष ज उपाडी शके. वळी, पवा हट्टाकट्टा तरुण पुरुषनी पासे भार उपाडवानां साधनो बराबर न होय तो ए पण पवा भारने न उपाडी शके. धार के, कोई हट्टोकट्टो तरुण पुरुष तो छे, पण तेनी पासे भार उंचकवानी जे कावड छे, ते पातळी अने घुणे खाधेली छे, कावडनां शिकां दोरडां अने वांसनी सळीओ ए वधूय एवं सडेलुं छे, आम होवाथी एवो बळवान पुरुष पण ए भारने न उठावी शके अर्थात् भार उपाडवामां सुदृढ शरीर उपरान्त बीजी पण कळवकळ होवी जोइए अने उपकरणो पण पूरतां होवां जोइए. तरुण मटी पेला डोसा थयेला पुरुष पासे ए बधुं होत, तो ए पण एवो भार जरूर उपाडी शकत; माटे तारे एम मानवु जोइए के शरीर अने जीव जुदा जुदा छे पण ते बन्ने एक नथी. [१७९] पपसी बोल्यो: हे भंते ! में पक जीवतो चोर तोळ्यो, पछी तेने जीवथी मारी नाखी फरीवार तोळ्यो, जीवतां तेनु जे वजन हतुं तेज वजन तेना मडानुं हतुं-ए बन्ने वजनमा लेश पण फरक न हतो. जीव अने शरीर जुदां जुदां होय अने जीव शरीरमांथी नीकळी जतो होय, तो १५ मडान वजन घटवू जोइप. हे भंते ! ए बन्ने स्थितिमां वजननो जराय फरक जणातो नथी, माटे हुं एम मार्नु छु के जीव अने शरीर एक ज छे पण जुदां जुदा नथी. Jan Education For Private Personel Use Only Twittainelibrary.org Page #517 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायसेनइय सुत्तनो सार [१८०] केशी कुमार बील्या: हे पपसी ! पहेलां कोईवार तें चामडानी मसकमा १४ पवन भरेलो छे खरो ? वा भरावेलो छे खरो ? चामडानी खाली मसक अने पवनभरेली मसक ए बन्नेना वजनमां कांइ फेर पडे छे खरो ? ना, भंते ! फेर नथी पडतो. पसी ! खाली अने पवनभरेली मसकना वजनमां फेर न पडतो होय तो जीवतानुं अने मुडदानुं वजन फरक विनानुं ज होय ने ? जीव भारे नथी तेम हळवो य नथी, तेथी जीव नीकळी जतां मुडदानुं वजन घटे पम न बने, पटले एक सरखा वजनने लीघे तुं एम मानतो हो के जीव अने शरीर बन्ने एक ज छे, ते जरा य संगत नथी. ५ [१८१] पपसी बोल्यो: हे भंते ! कोई वार एक चोरने मारी पासे लाववामां आव्यो, 'तेमां जीव छे के नहि' प जाणवा में तेने चारे बाजु तपास्यो, पण जीव तो क्यांय दीठामां न आव्यो. पछी में तेना बे ऊभा चीरा करी तेने फरीवार जोयो, छतांय जीव तो न ज देखायो पछी तो थई शके तेटला तेना नाना नाना कटका करी तेने वारंवार तपासी जोयो, छतय तेमां क्यांय जीवनुं निशान पण न जणायुं. माटे हुं कहुं हुं के जीव अने शरीर एक छे पण जुदां जुदां नथी. ११४ आ मसकनुं उदाहरण बराबर छे खरं ? पत्रनथी भरेली मसकनुं वजन अवश्य वधे ज अने खाली मसकनुं वजन पवनथी भरेली मसक करता जरूर ओछे थाय ए तो आजे पण प्रत्यक्ष छे. जे पवन पोताना जबरदस्त आंचिकाथी मोटा मोटा तोतिंग वृक्षोने समूळ उखेडी नाखे छे, जे पवनथी भरेला डबा वा तुंबडा द्वारा आपणे तरी शकीए छोए ते पवननुं वजन न होय ए बने ज केम ? छतां 'पवननुं वजन नथी' एम जे अहीं कहलं छे ते कई दृष्टिए समजवु ए कळातुं नथी अथवा स्थूलदृष्टिए आम कहे होय. पवनथी भरेली कोथलीमां १० अने खाली कोथलीमां वजननो फरक नथी माटे पवन नथी ? श रीरने चीरी चीरीने जोयां छतां जीव न १५ | जीव नथी भळायो माटे ॥१२९॥ Page #518 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥१३०॥ [१८२] केशी कुमार मुनि बोल्याः अरणीना हे पपसी ! पेला कठीयारा करताय तुं विशेष मूढ जणाय छे. हे भंते ! ए कठीयारो वळी कोण हतो? लाकडाने | चीरीने पएसी ! अग्नि अने अग्नि राखवार्नु ठाम साथे लई केटलाक वनजीवी लोको वननी शोध माटे नीकळी पडन्या. चालता चालतां | अग्नि जोनातेओ जेमा घणां लाकडां छे एवी एक मोटी अटवी पासे आवी पहोंच्या. पवामां तेमांना कोइए पोताना साथना माणसने कहां के, ५ रनी पेठे हे देवानुप्रिय ! अमे लाकडाओनी भरेली आ अटवीमां जईए छीए. तुं आ अग्नि अने अग्निनुं ठाम लइ जा भने अमारा माटे खावानुं रांधी राखजे. कदाच कोई कारणथी अग्नि ओलवाई जाय तो तु लाकडामाथी अग्नि लईने अमार खावानं रांधी राखजे. | पएसी तेमना गया बाद थोडी वारे रांधवानी शरुआत करवा जतां पेला साथीए अग्निने ओलवाई गयेलो दीठो. एथी तेणे पोताना राजानी साथीनी भलामण प्रमाणे लाकडामांथी अग्नि मेळववा लाकडं हाथमा लइ चारे बाजु तपासी जोयं पण तेमां तेने ते क्यांय न कळायो. पछी तो तेणे हाथमा कुहाडो लइ लाकडं चीरी नाण्यु छतां तेमांय अग्नि न दीठो. छेवटे तेणे थई शके तेटला तेना नाना नाना | १० कटका करी ते हरेकने तपासी जोया, छतांय तेमा एकमां अग्निर्नु निशान पण न भाळ्यु. आखरे थाकी कंटाळी ते विचारो चिंतातर थइ लमणे हाथ दईने बेठो अने 'हजु सुधी हुँ रांधी न शक्यो' ए बाबत अफसोस करवा लाग्यो. पटलामा जे साथीओ लाकडाना भारा लेवा गपला हता ते बधा पाछा फर्या अने आ बिचाराने चिंतातुर थपलो दीठो. तेओए पूछयुः हे देवानुप्रिय ! तुं उदास केम बेठो छे ? हजु सुधी ते अमारा सारु खावानुं नथी रांध्यु ? तेणे जणाब्यु के, हे भाइओ ! तमारा गया बाद थोडीवारमा ज तमोए आपेलो ए अग्नि तो ओलवाई गयो. पछी हुँ तमारा ११५ दीघनिकायमा आकुंज एक मोटुं उदाहरण आपेलं छे. तेमा मात्र एक नानो छोकरो अने एक जटिल ए बेने आश्रीने हकीकत कहेली छे. जुओ पृ० ३४१. मूढता Jain Educat intetional For Private Personal use only ww.jainelibrary.org Page #519 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार कहेवा प्रमाणे लाकडामांथी अग्नि मेळववा लाकडाने तपासवा लाग्यो. लाकडाने चीरी, तेना नाना नाना कटका करी तपासी जोयु. तो तेमां अग्नि तो क्यांय न जोवामां आव्यो. तेथी अग्नि विना हुं रांधु शी रीते ? ए माटे ज आम अफसोसमां पडयो छु. पछी तेओमाना ज कोइ दक्ष पुरुषे साथेना बीजा बधा भाइओने कहा के, तमे बधा नाही धोइने बलिकर्म करी तेयार थइने आवो, हुं हमणां ज रसोइ बनावी नाखु छुः पछी ए दक्ष पुरुषे कुहाडो लई लाकडामांथी घसणियुं शर बनाव्यु अने प शरने अरणी साथे घसी अग्नि उपजावी अग्निने | संधुकीने ते बधाओनी रसोई करी नांखी. पटलामां नहावा धोवा गपला बधा साथीओ आवी पहोंच्या. सौ साथे जमी करीने चोक्ता थइ मेळा मळीने वातो करवा बेठा. रसोईनी वात नीकळतां पेला दक्ष पुरुषे पेला उदास थयेला साथीने को के, हे देवानुप्रिय ! अग्निने शोधवा माटे ते लाकडां फाडी फाडीने जोवानो प्रयास कर्यो तेथी एम जणाय छे के, तुं जड छे, मूढ छे अने तद्दन अज्ञान छे. हे पपसी ! ए अग्निशोधक कठीयारानी पेठे ते पण जीवने शोधवा-जोवा-माटे शरीरने चीरी चीरीने जोवानुं पाणी वलोव्यु, तेथी तुं पण एना करतां कांइ ओछो मूढ नथी. [१८३] पएसी बोल्यो हे भंते ! तमारा जेवा शानी बुद्ध महामति विज्ञानी अने विनीत पुरुष आवो मोटी सभा वच्चे मारा पर आक्रोश करे, खीजाई | जाय अने मारी निर्भर्त्सना करे ए शुं ठीक कहेवाय ? [१८४] केशी श्रमण बोल्या: पएसी ! तने खबर छ के क्षत्रियपर्षदा गृहपतिपर्षदा ब्राह्मणपर्षदा अने ऋषिपर्षदा पम चार प्रकारनो पर्षदाओ छे. ए चारे पर्षदाओनी दंडनीतिने पण तुं क्या नथी जाणतो? क्षत्रियपर्षदानो अपराध करनार कांतो पोताता हाथ पग गुमावे, माथु गुमावे अने कांतो जीवथी जाय. पएसीतमे दक्ष थइने भर सभा बच्चे मारु आम अपमान करो छो? । केशी सभाओ अने तेना नियमोने जाणे छे? ॥१३१॥ Jain Educat intet tona For Private Personel Use Only Hww.jainelibrary.org Page #520 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण| इय सुचनो सार पएसीज्ञान मेळववानी वृत्तिथी में तमने उश्कयो ॥१३२॥ गृहपतिपर्षदाना अपराधीने बंधाइने आगमां सळगी जवू पडे. ब्राह्मणपर्षदानो अपराधी अनिष्ट उपालंभपूर्वक कुंडीना वा शुनकना निशानथी अंकित थाय के निर्वासित थाय-हदपार जाय. ऋषिपर्षदानो अपराध करनार, अतिअनिष्ट नहिरवी वाणीवडे उपालंभ पामे. हे पपसी ! उक्त दंडनीतिथी तुं परिचित छे, छताय तुं मारी प्रतिकूळ वा करे छे, विपरीत रह्या करे छे, माटे ज तारे 'तुं मूढतर छे' पवी हळवी पण मारी आक्रोशवाणी वाणी सांभळवी पडे छे. पएसी बोल्योः हे भंते ! मने एम थपलु के हुं जेम जेम आपनी प्रतिकूळ वर्तीश-विपरीत वर्तीश, तेम तेम तत्त्वने विशेष जाणीश, ज्ञानने पामीश, करण अने दर्शनने अधिक समजी शकीश, तेथीज हुं अत्यारसुधी आपनी प्रतिकूळ वो छु अने विपरीत बोल्यो छु. [१८]-केशी मुनि बोल्याःहे पपसी ! तुं जाणेज छे के व्यवहारकोना चार प्रकार कहेला छे. केटलाको दे तो छ पण मीठी वाणी नथी बोली शकता. केटलाको वाणीने तो मीठी राखे छे पण कशुय देता नथी. केटलाको । कशंय देता नथी तेम वाणी पण मीठी नथी राखता. अने केटलाको दे छे अने साथे पाणी पण मधुरी बोले छे. हे परसी! आ चार व्यवहारकोमा जे देतो नथी अने वाणी ये मीठी नथी बोलतो, ते तद्दन अव्यवहारी छे अने बाकीना त्रणे व्यवहारना जाणकार छे. हे पपसी ! प रीते तुं पण व्यवहारी छे, कांइ अव्यवहारी नथी. ११६ आ पदनी व्याख्या करतां टीकाकार लखे छे के-"केशी कुमारश्रमणे राजा पएसीने 'तुं मुढ नर छे' एम पहेलां कहेलं अने तेथी राजाना मनमा कलुषता पण नीपजेली, हवे ते कलुषता दूर करवा अने तेने संतुष्ट-प्रसन्न करवा केशी कुमारजीए तेने अहीं' व्यवहारी' व्यवहारी छे Jain Educatio n al For Private & Personel Use Only How.jainelibrary.org Page #521 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार शको? [१८६]-पएसी बोल्योः | पएसीहे भंते ! तमे दक्ष छो, बुद्ध छो, विज्ञानी छो, तो जेम कोइ आमळाने हथेळीमां बतावे, तेम तमे मने जीवने न बतावी शको? | तमे आवा राजा पएसीप ए प्रश्न कर्यो तेटलामां तेनी पासेज जोरथी वायु वावा लाग्यो, तेथी तृण अने वनस्पतिओ वधु हालवा लाग्युं, ज्ञानी थइने कंपवा लाग्युं, परस्पर अथडावा लाग्यु अने नवा नवा आकारे ऊडवा लाग्यु. | हथेलीमा ते वखते लाग जोइने केशी मुनिए राजा पएसीने कहा के-हे पएसी! जे आ तृणो अने बनस्पतिओ कंपे छे ते तो तुं जुए छेद आत्मा न ने? तो शु पने कोइ देव हलावे छे? दानव, नाग, किचर, किंपुरुष, महोरग के गांधर्व हलावे छे? बतावी पएसी बोल्योःहे भंते ! ए तृण वगेरेने तो वायु ज हलावे छे, पण कोइ देव दानव के किन्नर हलावतो नथी. केशी-रूपी केशी-हे पएसी ! काम, राग, मोह, वेद, लेश्या अने शरीरने धारण करनारा ए वायुने तुं जोई शके छ ? पएसी-ना, भन्ते। हुं तेने जोई शकतो नथी. | वायु न केशी-रूपधारी, देहधारी, मोही अने रागी पवा वायुने पण तुं जोई शकतो नथी, तो इन्द्रियातीत पया जीवने हुं तने शी रीते | १० जोइ शकाय तो अमृत कहीने वखाण्यो छे." आ पदनो आशय खोलतां टीकाकार केशी कुमारश्रमण- हार्द आ प्रमाणे जणावे छे-" हे राजा पएसी ! जो के तुं आत्मा केम सारी रोते बोलीने मने संतोष नथी आपतो तोपण मारा तरफ तारां भक्ति अने बहु मान छे माटे तुं' व्यवहारी' छे.” (एवामेव पएसि! जोइ तुम पि वबहारी इति-यद्यपि त्वं न सम्यगालापेन मां संतोषयसि तथापि मम विषये भक्तिबहुमानं च कुर्वन् आद्यपुरुष इव व्यवहारी एव न शकाय? अव्यवहारी. एतावता च ' मूढतराए तुम पएसी! तओ कट्टहारयाओ' इत्यनेन वचसा यत् कालुष्यमापादितं तद् अपनीतम् , परमं च संतोषं | १५ ॥१३३।। प्रापित इति। पृ० १४०) Jain Education national For Private & Personel Use Only T Page #522 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार जीवनी ॥१३४॥ बतावी शकुं? मोटा हाथी पपसी! खरी वात तो एम छे के, जे मनुष्य रागद्वेषथी पर छे, ते धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय आकाशास्तिकाय अशरीरोजीव परमाणुपुद्गल शब्द गन्ध वायु प आठ पदार्थाने सारी रीते जाणी शके छे-समजी शके छे अने 'आ जिन थशे के नहि' 'आ बधां अने नानादुःखोनो नाश करशे के नहि ? ए बे हकीकतोने पण तेज जाणी शके छे. अर्थात् वीतराग मनुष्य प दस बाबतोने सारी रीते जाणी मां नाना शके छे; माटे हे पपसी ! तुं पम समज के जीव अने शरीर जुदां जुदां छे पण एक नथी. कंथवाना [१८७] परसी बोल्योः समानता हे भन्ते ! हाथीनो अने कंथवानो जीव एक सरखो छ ? वगेरे विशे हे पपसी! हा, ते बनना जोव एक सरखा छे. चर्चा हे भंते ! हाथी करतां तो कंथयो अल्प कर्मवाळो अल्प क्रियावाळो अने अल्प आम्रववाळो छे तथा कथवाना आहार, निहार, श्वासोच्छ्वास, बळ, वीर्य अने द्युति वगेरे पण अल्प छे, अने पथी उलटुं, ए वधु कंथवा करतां हाथीमां वधारे छे; आम हाथीमा १० अने कंथवामां आसमान जमीन जेटलो चोक्खो मेद जणाय छे, छतांय हे भंते! तमे पम कहो छो के हाथीनो अने कंथवानो जीव एक सरखो छ? केशी कुमार बोल्या: हे पपसी! तुं पम धार के घुम्मटदार अने शिखराकार एक मोटी ओरडी होय, तेमां कोई पुरुष दीयो लइने पेसे अने पछी ए ते ओरडीनां बयां बारी बारणां बराबर बन्ध करी दे अने एनां बधां छिद्रो छांदी दे, तो ए दीपकनो प्रकाश, ए आखोए ओरडीने |१२| अजवाळशे पण बहारना भागने नहि अजवाळे; केम खरुंने ? ए रीते, ए दीपक उपर कोई मोटो थाळ ढांके अथवा मोटुं डालुं ढांके, तो ते दीपकनो प्रकाश ते ते ढांकणना अन्दरना भागने प्रकाशशे पण बहार नहि प्रकाशे, अर्थात् वधे दीपक तो एकज छे पण ते For Private Personal Use Only wjainelibrary.org Jain Educator Page #523 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार मोटा ढांकण नीचे होय तो वधारे भागमा प्रकाशे छे अने नाना ढांकण नीचे होय तो ओछा भागने प्रकाशे छे. तेज न्याये. हे पएसी! आ जीव पण जेवडा-मोटा के नाना-शरीरने मेळवे छे, तेवडा शरीरना बधा भागोने पोताना असंख्य आत्मप्रदेशो द्वारा सचित्त करी पएसीशके छे, पछी भलेने शरीर मोटामा मोटुं होय के नानामां नानु होय; माटे हे पएसी! तुं एम समज के हाथीनो अने कंथवानो जीव | मारी परंएक सरखो छे अने तुं पम पण मान के जीव अने शरीर जुदा जुदा छे पण एक नथी. पराने केम [१८८] राजा बोल्योः छोडं ? हे भंते ! 'जीव अने शरीर एक छे' पर्यु हुं कांइ एकलोज मानतो नथी, पण मारा दादा अने मारा पिता एमज समजता आल्या खोटी परंछे, पटले मारी ए समज कुलपरम्परानी समज छे, बहुपुरुष परम्पराथी चाली आवेली छे, तो हे भंते ! मारा कुलनी ए दृष्टिने हुँ परा तो शी रीते छोडी शकुं? छोडवीज [१८९] केशी श्रमण बोल्याः जोइए एवं हे पपसी ! तारी ए समजने तुं नहि बदलावीश, तो पेला लोढानो भारो नहि छोडनारा कदाग्रही पुरुषनी पेठे तारे पस्तावू पडशे. |१०| उदाहरण राजा बोल्योः साथे भंते ! लोढानो भारो नहि छोडनारो कदाग्रही पुरुष वळी कोण हतो अने तेने पस्ता, केम पड्यु ? समर्थन केशी कुमार बोल्याः पएसी! केटलाक धनार्थी लोकी विपुल करीयाणां भरीने अने साथे घणु वधु भातुं लाने, ज्यां कोई आवेलुं नहि पवी एक मोटो ॥१३५॥ लांबी अटवीमां जइ चड्या. त्या कोई एक स्थळे पहोंचता तेमणे जेमां घणुं लोढुं दटायेलु छे एवी एक मोटी लोढानी खाण जोई. १५ खाणने जोतांज खुशीमां आवी जई तेओ परस्पर कहेवा लाग्या के आ लोढुं आपणने विशेष उपयोगी छे, माटे तेने भारा बांधी लइ जवू सारुं छे. Jain Educati o nal For Private Personal use only w.jainelibrary.org Page #524 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुचनो सार ॥१३६।। पम विचारी तेओ लोढाना भारा बांधी तेमने उंचकी एज अटवीमा आगळ चाल्या. चालता चालतां, जेमां घणु सीसुं भरेलु छे एवी एक मोटी सीसानी खाण तेमना जोवामां आवी. थोडाक पण सीसाना बदलामां लोढुं घणु मळे छे, माटे लोढा करतां सीसाने बहुमूल्य समजी तेओप लोढाना भाराने पडता मूकी सीसाना भारा बांधवानो विचार कयों अने पना भारा बांध्या पण खरा. परन्तु तेओमाना एक साथीए सीसाने बहुमूल्य समजवा छतां लोढाना भाराने पडतो मूकी सीसानो भारो न ज बांध्यो. प बाबत तेने बीजा साथीओए घणं घणं समजाव्यं तोय ते पकनो बेन थयो. उलटुं तेणे पम का के, हे देवानुप्रियो! लोढानो आ भारो हुँ घणा दूरथी उपाडी लाग्यो छु अने तेने घणो मजबूत बांधेलो छे, माटे एने मूकीने सीसानो भारो बांधवानुं मारु मन नथी. पछी तो तेओ बधा सीसाना भाराने उंचकी ए अटवीमा वळी आगळ वध्या. आगळ चालता चालतां तेओए तांबानी, रूपानी, सोनानी, रत्ननी अने वज्रनी मोटी मोटी खाणो जोई. पओए तो जेम जेम बहुमूल्य वस्तुओ मळती गई, तेम तेम ओछी कीमतवाळो वस्तओ छोडी दीधी अने आखरे तेओए बज्रना भारा बांधी तेमने उंचकी पोताना देशमा पोतपोताना नगर भणी जवाने प्रयाण कर्य. नगरमां पहोंची, भारे भारे आणेलां वज्रोने वेची, तेओ बधा न्याल न्याल थई गया. तेओए आठ तळवाळा मोटा मोटा महालयो बंधाव्या, घणां दास दासीओ गायो अने घेटां वगेरेने आंगणे वसाव्यां अने ए महालयोमा बिराजी तेओ तरुणीओथी भजवातां बत्रीश प्रकारनां नाटको, तेमनां गान नाच जोतां जोतां आनन्दपूर्वक रहेवा लाग्या. त्यारे पेलो लोढाना भाराने उंचकी लावनार साथी लोढुं वेची घणुं ओझे कमायो अने तेमना ए साथीओनो वैभव जोइ पोतानी जातने निंदवा लाग्योः हुँ केवो हीनपुण्य छु, केवां माठां लक्षणवाळो छ, में साथीओर्नु कहेषु छेवटसुधी काने न ज धर्य अने एक मारा दुराग्रहमांज तणायो. तेमन कहेवं मान्य होत तो आजे हुँ पण एमना जेवोज वैभव माणत. हे पपसी! तुं पण तारो दुराग्रह न छोडीश, तो प लोढाना भारावाळा दुराग्रहीनो पेठे तारेय पस्ता, पडशे अने तेनी पेटे दीनहीन थर्बु पडशे. For Private Personel Use Only jainelibrary.org Page #525 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार [१९०] केशीकुमारनुं कथन सांभळी आखरे राजा परसोने भान आभ्युं अने तेणे केशीकुमारने वन्दन करीने कहां के, हे भंते! मारे जराय पस्तावुं पडे एवं तो हुं नहि करूँ. मारो पूर्व ग्रह छोडीने आपनी पासे हुं केवळीभाषित धर्मने सांभळवानी - समजवानी इच्छा राखुं हुं, माटे हवे मारे पेला लोढावाळानी पेठे पस्तावानुं क्यां र ? केशी भ्रमण बोल्याः हे देवानुप्रिय ! सुख थाय तेम कर, पण सारा काममां प्रतिबंध न आववा दे. राजानी जिज्ञासावृत्ति जोइ केशी श्रमणे जेम चित्त सारथिने धर्मकथा कही संभळावी गृहिधर्म समजाभ्यो हतो, तेम राजा पसीने पण तेमणे धर्मकथा कही गृहिधर्मनी समजण आपी अने राजाप गृहिधर्म स्वीकारी पोतानी सेयविया नगरी भणी जवानो मनसूबो कर्यो. [१९१] राजा उठतो हतो त्यां केशी श्रमण बोल्याः पसी ! कलाचार्य, शिल्पाचार्य अने त्रीजा धर्माचार्य ए त्रण आचार्यांना विभागने तुं जाणे छे अने प त्रणेनी विनयप्रतिपत्ति केवी केवी करवानी होय छे, तेनी पण तने खबर छे. पपसी बोल्यो: भंते! हा, ए बधुं हुं बराबर जाणुं हुं. कलाचार्य अने शिल्पाचार्यनुं तैलादिकथी मर्दन करवुं, तेमने म्हवराववा, तेमनी पासे पुष्पादिकनी सुवास फेलाववी, वस्त्रो अने घरेणां गांठां आपी सारी रीते शणगारवा, आदरपूर्वक जमाडवा, मोटुं प्रीतिदान आप अने तेमने एवी वृति बांधी आपवी के जे तेमना पुत्रोना पुत्रो सुधी पहोंच्या करे. १५ अने धर्माचार्यने जोतां तेमने वंदन कर, सत्कार करवो, देवताना चैत्यनी पेठे ते मंगळमय आचार्यनी उपासना करवी तथा तेमने खान पान खादिम स्वादिम वगेरे निर्दोष पदार्थोद्वारा प्रतिलाभवा अने पीठ पाटियां शय्या संथारो वगेरे लइ जवा निमंत्रित करवा. Jain Education Intelational १० श्रमणोपा सक पएसी आचार्योना अने तेमनी प्रतिपत्ति ओना प्रकारो ॥१३७॥ Page #526 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण इय सुत्तनो सार ॥१३८॥ हे पएसी ! तुं एम समजे छे त्यारे अत्यारसुधी मारी सामे ते जे प्रतिकूळ वर्तन चलाव्युं छे तेनी माफी माग्या विना नगरी भणी | पएसी जवाने आटलो बधो उतावळो केम थयो छे ? पोताना [१९२] राजा बोल्योः अविनयने हे भंते ! अत्यारसुधी हुं आपनी प्रतिकूळ वयों छु ए खरं पण ए विषे में एवो विचार कर्यो छे के आवती काले प्रभातनो पहोर सविनय थतांज मारा बधा परिवार साथे अहीं आवी आपने चंदन नमन करी में करेला आ अविनयनी विनयपूर्वक वारंवार माफी मागु. ५ आम कही राजा पपसी पोताने स्थाने पहोंची गयो अने सवार थतां ज ए राजा राजा कोणिकनी पेठे मोटा आडंबर साथे पांच | पहेलो सारो ११ अभिगमपूर्वक केशी श्रमण पासे आव्यो अने तेमने वांदी नमी पोताना अविनय संबंधी विशेष नम्रतापूर्वक क्षमा मागी. हतो हवे [१९३] केशी श्रमणे ए राजा परसीने तेनी राणी सूर्यकांताने तथा तेनी साथेनी मोटी सभाने धर्मदेशना कही संभळावी. जैन थइने [१९४] धर्मदेशना सांभळी पोताने स्थाने जवानी त्वरावाळा राजाने केशी कुमारे कधः अरमणीय हे पपसी! वनखंड, नृत्यशाळा, शेरडीनो वाढ अने खोळनो वाडो पहेलां पहेला तो रमणीय लागे छे पण पछी अरमणीय थइ |१०| न थतो जाय छे, तेम, तुं पहेलां रमणीय थइ पछी अरमणीय न थतो. ११७ कोई संतपुरुष पासे जतां जे अदब-मर्यादा साचववानी होय छे तेनुं नाम अभिगम छे. ११८ आ वाक्यनो आशय स्पष्ट करवा टीकाकार आ प्रमाणे जणावे छे: “ केशीकुमारजी राजा पएसीने कहे छे के हे राजन् ! तुं जैनधर्मानुगामी न हतो त्यारे बीजा लोकोने दान आपतो हतो. दाननी तारी आ प्रथा हवे पण तारे चालु राखवी उचित छे. अर्थात् जैन धर्मानुगामी थया पछी पण तुं पहेलां जेवो दानी हतो तेवोज हवे पण दानी रहे ए उचित छे. तात्पर्य ए के तुं पहेला जेवो रमणीय हतो | १२| तेवोग रमणीय हवे पछी पण रहेजे, पण अरमणीय न थतो. अरमणीय थईश-टुको दृष्टिवाळो थईश-तो जैनधर्मनी अपकीर्ति थशे अने अमोने Jain Education Semeal For Private & Personal use only wwjainelibrary.org Page #527 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ॥१३९॥ [१९५] पपसी बोल्योः हे भंते ! वनखंड, नृत्यशाळा, शेरडीनो वाढ अने खोळनो वाडो ए पहेलां पहेला तो रमणीय लागे छे अने पछी अरमणीय थइ जाय हे, ते वळी केम? [१९६] केशी बोल्या: पएसी! सांभळ. वनखंड ज्यांसुधी पत्रवाळो फूलवाळो फळवाळो अने घटादार छायावाळो लीलोछम होय छे त्यां सुधी रमणीय लागे छे अने ज्यारे तेनां पांदडो खरी पडे छे, फूलो करमाइ जाय छे, फळो नथी होता, तेम ते सूको खंख थइ जाय छे, त्यारे बीहामणो लागे छे. १९७] नृत्यशाळामां ज्यारे नाच चालतो होय, गाणां गवाता होय, वाजां वागतां होय अने लोको हसता रमता होय त्यारे ते रमणीय लागे छे अने ज्यारे नाच बंध होय, गाणां न चालतां होय, वाजां न वागतां होय अने तेमा एक पण माणस न फरकतुं होय, त्यारे ते सूनकार स्थान जेवी बीहामणी जणाय छे. १९८] शेरडीना वाढमां चिंचोडा चालता होय, शेरडी पीलाती होय, लोको तेनो रस पीता होय. कोड तेने लेता होय वा देता। होय, त्यारे ते वाढ भयों भों-रमणीय लागे छे, पण ज्यारे तेमां चिंचोडा बंध होय, शेरडी न पीलाती होय, एक चकलु य न फरकतुं होय, त्यारे ते खावा धाय छे-अळखामणो दीसे छे. अंतरायकर्म लागशे.” (मा णं तुमे पुव्वं रमणिज्जे भवित्ता पच्छा अरमणिज्जे भविजासि ॥ इत्यादेर्ग्रन्थस्य अयं भावार्थः-पूर्वमन्येषां दात्रा भूत्वा सम्प्रति जैनधर्मप्रतिपत्त्या तेषामदात्रा न भवितव्यम् अस्माकमन्तरायस्य जिनधर्मापभ्राजनस्य च प्रसक्तेः” पृ० १४५) राजा पएसोने आ सूचना करी केशीकुमारजीए विशाळ भावनी जे समज आपी छे ते अतिमहत्त्वनी छे अने आजे आपणे एने अनुसरोए तो जैनधर्मनी प्रभावना थवा उपरांत समाजमां पण शांति पेदा करी शकीए. a l For Private Personal use only १५ Jain Education Page #528 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुनो सार ॥१४०॥ [१९९] खोळना वाडामां ज्यारे घाणीओ चालती होय, तल पीलाता होय, लोको भेगा थइने सानी खाता होय, एक बीजा परस्पर सानीने लेता देता होय, त्यारे ते रमणीय जणाय छे, पण ज्यारे घाणीओ ज बंध होय कोइनी अवरजवर न होय, त्यारे ते अरमणीय भासे छे. तेम हे परसी ! तु पहेलां रमणीय थइने पछी पाछळथी अरमणीय न थतो. [२००] राजा परसी बोल्यो: हे भंते ! तमे जणावेलां उदाहरणोनी पेठे हुं पहेलां रमणीय थइ पछी अरमणीय नहि थउं में तो पवो विचार कर्यो छे के हाल ५ मारा तावामां सेविया प्रमुख जे सात हजार गामो छे तेना चार भाग पाडु: एक भाग राज्यनी व्यवस्था अने रक्षण माटे वलवाहनने सोंपुं, एक भाग कोठार माटे राखुं, एक भाग अंतःपुरनी रक्षा तथा निर्वाह माटे दउं अने एक भागनी पेदाशमांथी एक मोटी कूटागारशाळा बनावु, तेमां अनेक पुरुषोने पगारदार, पेटवडिये के भाडे रोकी खानपान खादिम स्वादिम तैयार करावं कने ए बधुं अनेक श्रमण, ब्राह्मण, भिक्षु तथा प्रवासी वटेमार्गुओ वगेरेमां वर्हेचावु, तथा हुं शीलव्रत, गुणव्रत, विरमण, प्रत्याख्यान अने पोषधोपवासद्वारा जीवनयापन करतो रहुं. हे भंते! मारी आ धारणा छे. एम कही ते राजा पोताना परिवार साथै केशी मुनीने वांदी नमी पोताने स्थानके चाल्यो गयो. [२०१] नगरीमां आवी राजाए जे धारणा केशी मुनीने निवेदी हती, ते प्रमाणे वधी व्यवस्था करी दीधी अने पोते पण ते रीते आचरवा लाग्यो. [२०२] हवे तो राजा पएसी श्रमणोपासक थयो, जीव अजीव वगेरे तत्त्वोनुं तेने भान थयुं, ए प्रवृत्ति सर्वनी जेम ओछो वने अने संरमां जेम अधिक रहेवाय तेम ते वर्तवा लाग्यो एटले राज्य, राष्ट्र, वळ, वाहन, भंडार, कोठार, गाम नगर अने अंतःपुर १५ तरफ तेनुं ध्यान आपो आप ओलुं रहेवा लाग्. Jain Educationtentional १० पएसीए करेली पोताना धननी सुव्यवस्था w.jainelibrary.org Page #529 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार ज्यारथी राजा पएसीखें ध्यान राज्यकारभार अने विषयोपभोगो तरफ ओछु रहेवा लाग्यु-ओसरवा लाग्युं, त्यारथी तेनी रसीली । पएसीनो राणो सूर्यकांताने एवो विचार थयो के हवे कोइ शस्त्रप्रयोग, अग्निप्रयोग, मंत्रप्रयोग के विषप्रयोगद्वारा राजा पएसीने ठेकाणे करवो वैराग्य अने जोइए, राजकुमार सूर्यकांतनो राज्याभिषेक करवो जोइए अने मारे विविध विषयोपभोगोमां रस लेतां लेतां राज्यश्रीने संभाळता | | तेथी तेनी रहेवु जोइए. स्त्रीए तेने तेणीए आ पोतानो संकल्प राजकुमार सूर्यकांतने सूचव्यो अने राजाने मारी नाखी तेने राज्य सिंहासन आपवान जणाव्यु. ५ |मारवानी राज्यकमार सूर्यकांत पोतानी माताना तेवा क्रूर विचारमा संमत न थयो ते बाबत को उत्तर न आपतां मौन ज रह्यो. करेलो पोताना ए विचारमा राजकुमारनी असंमति जाणी तेणीने एम थयुं के रखेने राजकुमार तेना आ रहस्यनो मेद फोडी नाखे अने संकल्प राजाने बधु कही दे. आम विचारी तेणी राजा पपसीने मारवानो लाग शोधवा लागी, तेनां छिद्रो जोवा लागो अने हवे तेने शीघ्र मारी नाखवानी बाबतमां सावधान रहेवा लागी.. १०।१४। [२०३] एकवार लाग मळतां ज तेणीए राजा पएसीना खानपानमा, तेने पहेरवानां वस्त्रोमां, सुंघवानो माळाओमां अने तेना शणगारनां घरेणांओमां ""विष मेळव्यं. नाही धोई बलिकर्म करी जेवो राजा रसवती शाळामां जमवा आव्यो, तेवू ज तेने तेणीए ५ विषमय भोजन पीरस्यु, विषमय वस्त्रो पहेराव्यां, विषमय माळाओ आपी अने विषमय शणगार सजाव्यो. ११९ भोजनमां के पीणामां विष भेळवबानी कळा तो प्रख्यात छे, पण बस्त्रोमां सुंघवानी माळाओमा अने शणगारना सामानमां, न कळी शकाय ते रीते विष भेळववानी कळा ते काळे पण लोकोमा जाणीती हती ए जाणवा जेबी हकीकत छे. आजे पण एवा विषमय पोषाक | बने छे के जेने पहेरतां ज मरण नीपजे. Jain Education emelnal For Private & Personel Use Only wwlainelibrary.org Page #530 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेण| इय सुत्तनो सार ॥१४२॥ एम थतां राजा पएसीना शरीरमां तीव्र वसमी वेदना ऊपजी अने विषम पित्तज्वरन जोर व्यापतां, नहि सही शकाय तेवी भारे मार्यों गए. | बळतरा थवा लागी. लो पएसी [२०४] राजा तो समजी गयो के पोते राणीना कावत्राथी ठगायो छे, छतां तेणे राणी उपर लेश पण रोष न आणतां पाथरो पोष क्षोभ पामधशाळा तरफ जवानो मनसुबो कर्यो. त्यां जइ तेने पंजी प्रमार्जी तथा शौचनी अने लघुशंकानी जग्याने तपासी पछी ते पूर्वाभिमुख | तो नथी थइ डाभना संथारामां पल्यंकासने स्थिर बेठो अने हाथ जोडी माथु नमावी या प्रमाणे बोल्योः पण पोताना अरहंत भगवंतोने नमस्कार. धर्मने अने मारा धर्माचार्य अने धर्मोपदेशक केशी कुमारश्रमणने नमस्कार. अहीं रही तेमने वंदन करता मने भगवंत केशी कुमारजी जुओ, धर्माचार्यने हुं तेमने वारंवार चांदुं छु-नमुं हूं. | संभारे छ में पहेलां ए मारा धर्माचार्य पासेथी स्थूल प्राणातिपात वगेरेना त्यागथी प्रतिज्ञाओ लीधी हती अने हमणां पण तेमनी ज साक्षीमां पएसी मरीसर्व प्रकारना प्राणातिपात वगेरेना त्यागनो नियम लउं छु, क्रोध मान माया अने लोभ वगेरे कषायो छोडी दउंछु, नहि करवा | १० जेवु वधुं कार्य तजी दउ छु अने जीवतांसुधी चारे प्रकारना आहारनो पण परित्याग करुं छ. देव थयो वळी, आ शरीर जे मने अत्यंत वहालुं छे तेने पण छेल्ला श्वासोच्छ्वास चालतां सुधी वोसरावी दउं छु. एम करीने ते राजाए पोताना सारां नरसां बधां कार्योनी आलोचना करी, प्रतिक्रमणा करी अने तेणे कालमासे मरण आवतां समाधिपूर्वक काळ करी सौधर्मकल्पना सूर्याभविमानमा सूर्याभदेवरूपे अवतार मेळव्यो... [२०५] ते त्यां हमणां ताजो उत्पन्न थपलो सूर्याभदेव पांच प्रकारनी पर्याप्तिओद्वारा शरीरादिकनी पूर्णता मेळवे छे, तो हे गौतम! आ सूर्याभदेवे ए दिव्य देवऋद्धि, दिव्य देवशक्ति अने दिव्य देवप्रभाव ए रीते मेळवेलां छे. [२०६] हे भगवन् ! सूर्याभदेवनी जीवनस्थिति आयुष्यमर्यादा केटला काळ सुधीनी जणावेली छे ? पाषाशा ५००गाकामयाभ Jain Education temallina For Private & Personel Use Only wwilgainelibrary.org Page #531 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार [२०७] हे गौतम ! तेनी आयुष्यमर्यादा चार पल्योपमनी कहेली छे, हे भगवन् ! ते सूर्याभदेव आयुष्य पूरं थतां त्यांथी क्या जवानो-क्यां जन्म लेवानो ? सूर्याभदेव च्यवीने हे गौतम ! सूर्याभदेव, तेनो देवत्वकाळ पूरो थतां महाविदेहवर्षमां जन्म लेवानो. महाविदेहवर्षमा जे कुळो आल्य छे, दीप्त छ, महाविदेहलेवडदेवडना व्यापारमा कुशळ छे, जेमनी पासे भवन, शयन, आसन, यान, वाहन, धन, सोनुं अने रूपु विशेष छे, खानपाननी सग मां दृढवड अधिकाधिक छे, दासदासीओ गाय अने घेटां घणां छे, पवा प्रसिद्ध अने कोईथी पराभव न पामनारां कुळोमां ते सूर्याभदेव पुत्र ५ पणे अवतरशे. थइ निर्वाण [२०८] ए पुत्रपणे गर्भमां भावतां ज तेनां मातापितानी धर्ममा रढता थशे. पामशे पूरा नव मास अने साडा सात दिवस जतां ते बाळकनो त्यां जन्म थशे. दृढप्रतिज्ञना २०९] जन्म थया पछी पहेले दिवसे तेनां मातापिता बाळकना जन्मनो उत्सव करशे, पीजे दिवसे १२"सूर्यचंद्रनां दर्शन करावशे, जन्मादि कटे दिवसे धर्मजागरण ऊजवशे, पम अग्यार दिवस बीती जतां अने बारमो दिवस आयतां बाळकना जन्मनुं सूतक काढी नाखशे |Rol संस्कारो अर्थात तेनां मातापिता चोक्खां थशे, पछी बधे लीपणगुंपण करी भोजननी विपुल सामग्री तैयार करावशे अने पोतानां सगां संबंधी मित्र शातिजन स्वजन परिजन वगेरेने आमंत्री न्हाइ धोई बलिकर्म करी वां साथे बेसीने भोजनमंडपमा भोजन करशे. पदी ने पत्रनां मातापिता, वस्त्र गंध माला अने अलंकारवडे आमंत्रित जनोनो सत्कार करो, सन्मान करशे अने तेओनी समक्ष | ॥१४३॥ स कडे के आ बाळक तेनी मातानी कुक्षिमां आव्यो त्यारथी अमे धर्ममा दृढ प्रतिशाबाळां थयां छीए, माटे अमे तेनं 'दप्रतिज' एबुं यथार्थ नाम पाडीशु. १२० आ संस्कारोने लगती सविस्तर माहिती माटे जुओ संस्कारो उपरनुं भगवान महावीरनी धर्मकथाओ' मानु टिप्पण. Jan Educati onal For Private Personal use only w.jainelibrary.org Page #532 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आर्य अने रायपसेण इय सुत्तनो सार अनार्यकु उनी अनेक दास ॥१४४॥ | दासीओ ए प्रकारे नामसंस्कार थया बाद समय आवतां बाळकनां मातापिता तेना प्रजेमनक प्रतिवर्धापनक प्रचंक्रमण कर्णवेध संवत्सरमः। तिलेख अने चूलोपनयन वगेरे बधा संस्कारो करशे. [२१०] तेओ पोताना पुत्रना लालनपालन माटे पांच धात्रीओनी योजना करशेः एक वाळकने धवरावनारी, बीजी शणगारनारी, त्रीजी न्हवरावनारी, चोथी खोळामां लई फरनारी अने पांचमी रमाडनारी. ए उपरांत त्यां घरकाम माटे रोकवामां आवेली, पोतपोताना देशनो पोषाक पहेरनारी, इंगित चिंतित अने प्रार्थितने समजनारी, ५ |पवी देशविदेशनी बीजी पण अनेक कुशळ दासीओ" द्वारा अने अंतःपुरना रक्षण माटे योजाएला वर्षधरो२२ कंचुकीओ तथा महत्तरो द्वारा ए बाळकनुं घणी सारी रीते लालनपालन थशे; कोई ते वाळकने हाथोहाथ फेरवशे, कोइ तेनी पासे नाचशे, कोइ तेनां गीत गाशे, कोइ तेने बची लेशे, ए प्रकारे अनेक रीते लालित पालित थतो ते बाळक चंपाना छोडनी जेम सुखे सुखे दिनदिन वृद्धि पामशे. १२१ सूत्रोमा ज्या ज्या दासीओk वर्णन आवे छे त्यां बधे लगभग एक सरखो उल्लेख होय छे. अनार्य देशनां जे नामो सूत्रमा सूचवेलां छे तेज नामो दासीओनां वर्णनमां नोंधेला छे. जेमके-चिलाईया (किरात देशनौ) बयरिया (बाबर देशनी) सिंहली (सिंहल देशनी) आरबी (अरबस्ताननी) पारसी (पारस-पशिया-देशनी) इत्यादि. आ उपरथी एम समजी शकाय छे के आर्योए अनार्यों उपर जय मेळवी तेमने दास तरीके राखबानी प्रथा पाडेली ते आजसुधी पण भुसाई नथी. १२२ राजाना अंतःपुरनी रक्षा माटे उक्त दासीओ उपरांत केटलाक वर्षधरो अने कंचुकीओ पण राखवामां आवता; जेओ मूळथी नपुंसक हता वा जेओने अंतःपुरनी रक्षा माटे खसी करवामां आवता तेओ वर्षधर कहेवाता अने जेओ खीनी पेठे कांचळी-कापडु-पहेरीने रहेता तेओ कंचुकी कहेवाता. आचार्य हेमचन्द्र कहे छे के-"घण्ढे वर्षवरः” अभिधान०कांड-३ श्लो० ३९२. अर्थात् “पंढ एटले वर्षवर.” | १५ कोशमां वर्षवर शब्द छे अने सूत्रोमां वर्षधर शब्द छे, छतां ए बन्ने शब्दोनो भाव तो एक सरखो छे. Join Educat i onal For Private & Personal use only jainelibrary.org Page #533 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायपसेणइय सुत्तनो सार [२१] पुत्रने नवमुं वरस बेसतां तेनां मातापिता, न्हवरावी वलिकर्म करावो सारी रीते शणगारी शुभ मुहूर्त्तमां मोटा उत्सव साथे कलाचार्य पासे कलाओ शीखया मोकलशे. दृढप्रतिज्ञर्नु [२१२] कलाचार्य लिपि अने गणितथी मांडीने पक्षीओनी भाषा समजवा सुधीनी बहोंतेरे कळाओने प्रयोग साथे शीखवाडी | भणतर मातापिता पासे ते पुत्रनु उपनयन करशे.. गुरुदक्षिणा दृढप्रतिज्ञनो कलाओ संबंधी अभ्यास जोइ मातापिता कलाचार्य उपर खुश थशे अने विशिष्ट खानपान वस्त्र गंध माला अलंका-५ दृढपतिज्ञनी रोवडे कलाचार्यनो सत्कार करशे तथा जीवनपर्यंत चाले तेवू विपुल प्रीतिदान दइ तेमने विसर्जित करशे. भोगसम[२१३-२१४] बहोतेर कलानिपुण, अढार"देशीभाषाविशारद, गीतनृत्यरसिक नाट्यकलाकोविद, पवो दृढप्रतिज्ञ यौवनमा आवतां र्थता दृढ तेनां मातापिता तेने भोगसमर्थ जाणी एम कहेशे के, हे चिरंजीव ! तुं युवान थयो छे माटे हवे तुं कामभोगोनी आ विपुल सामग्रोने प्रतिज्ञनि. भोगव. २१५] दृढप्रतिज्ञ पोतानां मातापिताने (विनयपूर्वक) जणावशे के, हे मातापिता ! भोगोनी ए सामग्रीमा मने जराय रस नथी, |१०| अनासक्ति अर्थात् ते ए भोगसामग्रीथी ललचाशे नहि, खेंचाशे नहि, तेम तेमा लेश पण आसक्ति राखशे नहि. जेम कमळ पंकमां पेदा थाय छे अने पाणीथी वधे छे, छतां पंक के पाणीथी लेपातुं नथी, तेम कामोमां पेदा थपलो अने भोगोमां | ॥१४५|| वधेलो ए दृढप्रतिज्ञ ते कामभोगथी जरा पण लेपाशे नहि. पण तथारूप उत्तम स्थविरो पासेथी बोधिज्ञानने मेळ्वशे अने अगारने त्यजी मुंड थइ अनगार धर्मनो स्वीकार करशे. पछी तो ते पूर्ण अहिंसा सत्य त्याग तप अने सद्वर्तनना तेजथी चमकशे अने जेवटे उत्तमोत्तम ज्ञान दर्शन चारित्र आर्जव मार्दव लघुता क्षमा निर्लोभता वगेरे गुणोथी अधिकाधिक दीपतो ते, अनुत्तर अनंत निरावरण निर्व्याघात एवा केवळज्ञान अने केवळद १२३ बहोतेर कळानी सविस्तर समज माटे जुओ भगवान महावीरनी धर्मकथाओं' मानुं कळाभो उपरर्नु टिप्पण. १२४ आ विशेषणनी स्पष्ट समज माटे जुओ भगवान महावोरनी धर्मकथाओमान देशी भाषा उपरर्नु टिप्पण. in Educati on For Private Personal Use Only Page #534 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीगतिमना रायपसेणइस सुचना सार विहार ॥१४६॥ शनने पामशे. ___हवे तो ते दृढप्रतिज्ञ अर्हन् जिन भगवान केवळी कहेवाशे अने जेमां देवो मनुष्यो तथा असुरो रहे छे पवा समस्त लोकना | पर्यायने जाणशे, अर्थात् ते, प्राणीमात्रनां आगति, गति, स्थिति, च्यवन, उपपात, तर्क, क्रिया, मनोभाव वगेरेने जाणशे, तेमर्नु प्रकट कर्म के गुप्त कर्म ए बधु कळी शकशे, तेमर्नु खाघेल पीधेल अने भोगवेलुं समजी शकशे. पवो ते दृढप्रतिश अर्हन् सर्व लोकना सर्व जीवोना सर्व भावोने जाणतो जोतो पृथ्वी तळ उपर विहरशे. ए प्रकारे बहु वर्षे विहरतो ते पोताना आयुष्यनो अन्त निकटवर्ती जाणी घणा दिवसोनुं अनशन लेशे अने जे साध्यनी सिद्धि माटे नग्नभाव, मुंडभाव, केशलोच, ब्रह्मचर्यधारण, अस्नान, अदन्तधावन, अणुवहाणग, भूमिशय्या, काष्टासननो आश्रय, भिक्षा माटे परगृहप्रवेश, मानापमानसहन, लोकनिन्दा वगेरे घणु आकरूं कष्ट सह पडे छे तथा न खमी शकाय तेवा जात जातना वावीश परीषहो खमया पडे छे, ते साध्यनी सिद्धि मेळवशे, अर्थात् ते सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे अने सर्व दुःखोना अन्तने करशेपरिनिर्वाण पामशे. [२१६] हे भगवन् ! ते ए प्रमाणे छे, हे भगवन् ! ते ए प्रमाणे छे, एम कही भगवान गौतम, श्रमण भगवान महावीरने वांदी, नमी, संयम, अने तपबड़े आत्माने वासित करता विहरे छे. [२१७] भयोने जितेला जिनोने नमस्कार. श्रुतदेवता भगवतीने नमस्कार. प्रशप्ति भगवतीने नमस्कार.अरिहंत भगवान पार्श्वनाथने नमस्कार. राजा पपसीना प्रश्नोने जणायनारा प्रस्तुत ग्रन्थने नमस्कार. मूळर्नु ग्रन्थमान-२१२० PuNCISCONOMIS रायपसेणइयनो सार समाप्त ॥ ISICISSUS Jain Education t o rjainelibrary.org Page #535 -------------------------------------------------------------------------- ________________ For Private & Personel Use Only Page #536 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1 ॥रायपसेणइयं समत्तं // For Private & Personel Use Only