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________________ रायपसेणइयं । ॥२९८॥ Jain Education I | एमो पियं से भवउ, अण्णमण्णस्स अंतिए एयमहं पडिसुर्णेति जेणेव सेयविया णगरी जेणेव चित्तस्स सारहिस्स गिहे जेणेव चित्तसारही तेणेव उवागच्छंति चित्तं सारहिं करयल - जाव वद्वावेति एवं वयासी - जस्स णं देवाणुप्पिया! दंसणं कंवंति जाव अभिलसंति जस्स णं णामगोयस्स वि सवणयाए हट्ठ-जाव भवह, से णं अयं केसी कुमारसमणे पुत्र्वाणुपुवि चरमाणे समोसढे जाव विहरइ । [१५८] तए णं से चित्ते सारही तेसिं उज्जाणपालगाणं अंतिए एयमहं सोचा णिसम्म हट्ठतुट्ठ-जाब आसणाओ ५ अन्भुट्ठेति पायपीढाओ पचोरुहइ पाउयाओ ओमुयइ एगसाडियं उत्तरासंगं करेइ, अंजलिम उलियग्गहत्थे के सिकुमारसमणाभिमुहे मत्तट्ठ पयाई अणुगच्छद्द करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु एवं बयासी - नमोऽत्थु णं अरहंताणं जाव [पृ० २५६ पं० ३] संपत्ताणं, नमोऽत्थु णं केसियस्स कुमारसमणस्स मम धम्मायरियस धम्मोवदेसगस्स, वंदामि णं भगवंतं तत्थगयं इहगए पासउ मे त्ति कहु वंदइ नमसर, ते उज्जाणपालए विउलेणं वत्थगंधमल्लालंकारेणं सकारेइ सम्माणेह विउलं जीवियारिहं पीइदाणं दलयइ पडिविसज्जेइ १० कोडुंबियपुरिसे सहावेह एवं वयासी- खिप्पामेव भो ! देवाणुप्पिया चाउरघंटं आसरहं जुत्तामेव उबवेह नाव पञ्चपिणह । तए णं ते कोडुंबियपुरिसा जाव खिप्पामेव सच्छत्तं सज्झयं जाव उवट्ठवित्ता तमाणत्तियं पञ्चप्पिपति, तए णं से चित्ते सारही कोडुंबियपुरिसाणं अंतिए एयमहं सोचा निसम्म हट्ठतुट्ट-जाव-हियए हाए कय| बलिकम्मे जाव- सरीरे जेणेव चाउरघंटे जाव दुरूहित्ता सकोरंट० महया भडचडगरेणं तं चैव जाव पज्जुवासइ धम्मकहाए [ कंडिका १५० पं० १] जाव । For Private & Personal Use Only केसि कुमारश्रमणं चितो वन्दते w.jainelibrary.org
SR No.600148
Book TitleRaipaseniya Suttam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBechardas Doshi
PublisherGurjar Granthratna Karyalay
Publication Year1938
Total Pages536
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_rajprashniya
File Size11 MB
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