Book Title: Dharmamrut Sagar
Author(s): Ashadhar
Publisher: Bharatiya Gyanpith
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पण्डितप्रवर आशाधर विरचित धर्मामृत (सागार) [‘ज्ञानदीषिका' संस्कृत पलिका तथा हिन्दी टीका सहित ] सम्पादन-अनुवाद सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द्र थाली भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला : संस्कृत ग्रन्थांक-४७ पण्डितप्रवर आशाधर विरचित धर्मामत (सागार) [ 'ज्ञानदीपिका' संस्कृत पञ्जिका तथा हिन्दी टीका सहित] सम्पादन-अनुवाद सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री CAHHE भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन M ahana वीर नि० संवत् २५०४ : वि० संवत् २०३४ : सन् १९७० प्रथम संस्करण : मूल्य अठारह रुपये Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्व. गुण्यश्लोका माता मूर्तिदेवीकी पवित्र स्मृतिमें स्व. साहू शान्तिप्रसाद जैन द्वारा संस्थापित एवं उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीया श्रीमती रमा जैन द्वारा संपोषित भारतीय ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला इस ग्रन्थमालाके अन्तर्गत प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, हिन्दी, कन्नड़, तमिल आदि प्राचीन भाषाओंमें उपलब्ध आगमिक, दार्शनिक, पौराणिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक आदि विविध-विषयक जैन-साहित्यका अनुसन्धानपूर्ण सम्पादन तथा उसका मूल और यथासम्भव अनुवाद आदिके साथ प्रकाशन हो रहा है। जैन-मण्डारोंकी सचियाँ. शिलालेख-संग्रह. कला एवं स्थापत्य, विशिष्ट विद्वानोंके अध्ययन-ग्रन्थ और लोकहितकारी जैन साहित्य ग्रन्थ भी इसी ग्रन्थमालामें प्रकाशित हो रहे हैं। ग्रन्थमाला सम्पादक सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री डॉ. ज्योतिप्रसाद जैन प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ प्रधान कार्यालय : बी/४५-४७, कॅनॉट प्लेस, नयी दिल्ली-११०००. मुद्रक : सन्मति मुद्रणालय, दुर्गाकुण्ड मार्ग, वाराणसी-२२१००१ स्थापना : फाल्गुन कृष्ण ९, वीर नि० २४७०, विक्रम सं० २०.., १८ फरवरी १९४४ सर्वाधिकार सुरक्षित Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भारतीय ज्ञानपीठ : संस्थापना 1944 मल प्रेरणा दिवंगता श्रीमती मतिदेवी जी मातुश्री श्री साहू शान्तिप्रसाद जैन अधिष्ठात्री दिवंगता श्रीमती रमा जैन धर्मपत्नी श्री साह शान्तिप्रसाद जैन Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ JNĀNAPĪTHA MŪRTIDEVI GRANTHAMĀLĀ : Sanskrit Grantha No. 47 DHARMAMRTA (SĀGĀRA) of Pandita pravara ASĀDHARA Edited with a Jñanadipika Sanskrit Commentary & Hindi Translation by Pt. KAILASH CHANDRA SHASTRI, Siddhantacharya BHARATIYA JNANPITH PUBLICATION VIRA NIRVANA SAMVAT 2504: V. SAMVAT 2034 : A. D. 1978 First Edition: Price Rs. 18/ Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ BHARATIYA JNANPĪTHA MŪRTIDEVĪ JAINA GRANTHAMĀLĀ FOUNDED BY LATE SAHU SHANTI PRASAD JAIN IN MEMORY OF HIS LATE MOTHER SHRIMATI MURTIDEVI AND PROMOTED BY HIS BENEVOLENT WIFE LATE SHRIMATI RAMA JAIN IN THIS GRANTHAMALA CRITICALLY EDITED JAINA AGAMIC, PHILOSOPHICAL, PURANIC, LITERARY, HISTORICAL AND OTHER ORIGINAL TEXTS AVAILABLE IN PRAKRITS, SANSKRIT, APABHRÀSA, HINDI, KANNADA, TAMIL, ETC., ARE BEING PUBLISHED IN THEIR RESPECTIVE LANGUAGES WITH THEIR TRANSLATIONS IN MODERN LANGUAGES AND ALSO BEING PUBLISHED ARE CATALOGUES OF JAINA-BHANDARAS, INSCRIPTIONS, ART AND ARCHITECTURE, STUDIES BY COMPETENT SCHOLARS AND POPULAR JAINA LITERATURE. General Editors Siddhantacharya Pt. Kailash Chandra Shastri Dr. Jyoti Prasad Jain Published by Bharatiya Jnanpith Head Office : B/45-47, Connaught Place, New Delhi-110001 nea Founded on Phalguna Krishna 9, Vira Sam 2470, Vikrama Sam. 2000,18th Feb.,1944 All Rights Reserved. Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रधान सम्पादकीय जैनधर्म निवृत्ति प्रधान है, और निवृत्तिका मार्ग साधुमार्ग है। किन्तु सबके लिए साधुमार्गपर चलना सम्भव नहीं है, और साधुमार्गको अपनाये बिना मोक्षकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, तथा मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है और प्रत्येक जीवको उसे प्राप्त करना उसका प्रधान कर्तव्य है। अतः प्रत्येक व्यक्तिको निवृत्तिमार्गका पथिक बनानेके लिए ही जैन धर्ममें गृहस्थ धर्म या सागार धर्मका उपदेश दिया गया है। सागार धर्मका उपदेश देते हए पं. आशाधरजीने कहा है-'संसारके विषय-भोगोंको त्यागने योग्य जानते हुए भी जो मोहवश उन्हें छोड़नेमें असमर्थ है वह गृहस्थ धर्मका पालन करनेका अधिकारी होता है।' अतः गृहस्थाश्रम प्रवृत्तिरूप होते हुए भी निवृत्तिका शिक्षणालय है । त्यागको भूमिका अपनाये विना गृहस्थाश्रम चल नहीं सकता। यदि माता-पिता सन्तानके लिए अपने स्वार्थोंका त्याग न करें तो सन्तानका लालन-पालन, शिक्षण आदि नहीं हो सकता। वे स्वयं कष्टमें रहते हैं और सन्तानको सुखी देखने का प्रयत्न करते हैं। अपने परिवारकी तरह ही गृहस्थ देश, समाज और धर्मके लिए भी त्याग करता है। उसके बलिदानपर ही परतन्त्र देश स्वतन्त्र होते हैं और स्वतन्त्र देश समुन्नत होते हैं। उसके त्यागपर ही समाजके लिए शिक्षणालय, भोजनालय, औषधालय आदि निर्मित होते हैं। उसके त्यागपर ही मन्दिर, मूर्तियों, धर्मशालाओं आदिका निर्माण होता है। उसकी त्यागवृत्तिपर ही साधु-सन्तोंका निर्वाह होता है। इस तरह गृहस्थाश्रम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों परुषार्थों का जनक है। किन्तु अर्थ और काम प्रधान होनेसे अधिकांश गहस्थ उसीमें फंसकर रह जाते हैं और धर्मकी ओरसे विमुख होकर परम पुरुषार्थ मोक्षको भी भुला देते हैं और इस तरह अपना मनुष्य जीवन काम-भोगमें बिताकर इस संसारसे विदा होते हैं। उन्हें, 'मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ, कहाँ जाऊँगा, मेरा क्या कर्तव्य है'-इसका विचार ही नहीं आता । पुराने शास्त्रकार कह गये हैं-खाना, सोना, डरना, कामसेवन करना ये सब प्रवृत्तियां मनुष्योंमें और पशुओंमें समान है, किन्तु दोनोंमें यदि अन्तर डालनेवाला है तो वह धर्म ही है। जो धर्मसे विहीन है वह पशुके तुल्य है। वह धर्म है सद्विचार और सदाचार । मानवकी ये ही दो विशेषताएँ हैं। और इन्हीं विशेषताओंके कारण मानव समाज आदरणीय है। जिस तरह मनुष्य अपने प्रियजनों के सम्बन्धमें सोचता-विचारता है उसी तरह अपने सम्बन्धमें भी विचार करना चाहिए कि 'मैं कौन हूँ? क्या यह जो भौतिक शरीर है यही मैं हूँ ? किन्तु मर जानेपर भौतिक शरीर तो पड़ा रह जाता है, उसमें जानना-देखना, हलन-चलन आदि नहीं होता। तब यह सब जो इस शरीरमें नहीं होता वे क्या उसकी विशेषताएँ थीं जो अब इस शरीरसे निकल गया है ? तब मैं क्या हूँ ? इस शरीररूप तो मैं हूँ नहीं, क्योंकि शरीर अपने में अहंबुद्धि करने में असमर्थ है। और मैं अहंबुद्धिवाला हूँ। अतः जो अब इस शरीरमें नहीं है वही मैं हूँ, उसे ही जीव या आत्मा कहते हैं। उसीकी चिन्ता मुझे करना चाहिए।' इस तरहके सद्विचारसे जब मनुष्य शरीरसे भिन्न अपनी एक स्वतन्त्र सत्ताका अनुभव करता है तब इस शरीर और इस शरीरसे सम्बद्ध वस्तुओंके प्रति उसकी आसक्तिमें कमी आती है और वह स्व और परके भेदको जानकर परकी ओरसे विरक्त और स्वकी ओर प्रवृत्त होता जाता है। परके प्रति अपने कर्तव्योंका Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६ धर्मामृत ( सागार ) पालन करता है किन्तु कर्तव्यबुद्धिसे करता है, ममत्वबुद्धिसे नहीं । इस तरहके चिन्तन और अभ्यास से गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी उसकी वही स्थिति होती है जो जलमें रहनेवाले कमलकी है । ऐसा सद्गृहस्थ ही सच्चा धर्मात्मा होता है । उसका धर्म उसकी आत्मासे सम्बद्ध होता है, शरीरसे नहीं । उसका शरीर भी उसके इस आत्मधर्मका एक सहायक होता है । उसका और उससे सम्बद्ध वस्तुओंका वह पालन करता है, संरक्षण करता है; खाता है, पीता है, भोग भोगता है; व्यापार करता है, लोकाचार करता है । सब कुछ करता है किन्तु करते हुए भी नहीं करता; क्योंकि कर्तृत्वभावमें उसकी आसक्ति नहीं । अतः वह अपनी शारीरिक आसक्तिसे प्रेरित होकर किसीको सताता नहीं हैं, अनुचित साधनोंसे धन संचय नहीं करता, व्यापार-व्यवहारमें असत्यका अवलम्बन नहीं लेता, काला बाजार नहीं करता । आय-व्ययका सन्तुलन रखता है । आवश्यकतासे अधिक संचय नहीं करता । परस्त्री मात्रको माता, बहन या बेटीके तुल्य मानता है । उसका यह जीवनव्यवहार न केवल उसे किन्तु समाजको भी सुखी करनेमें सहायक होता । यही सच्चा गृहस्थ धर्म है । इसी गृहस्थ धर्मका पालन करनेकी प्रेरणा सागारधर्मामृतमें हैं । उसीको सम्यक्त्व, अणुव्रत आदि कहा है । धर्मका प्रारम्भ सम्यक्त्व या सम्यग्दर्शनसे होता है । सम्यग्दृष्टि ही सच्चा धर्मात्मा होता है । जिसकी दृष्टि, श्रद्धा, रुचि या प्रतीति ही सम्यक् नहीं है वह साधु भी हो जाये, फिर भी धर्मात्मा कहलानेका पात्र नहीं है । जिसे शरीरादिसे भिन्न शुद्ध आत्मद्रव्यकी श्रद्धा है, रुचि है, प्रतीति है, भले ही वह अभी संसारमें फँसा हो किन्तु वह धर्मात्मा है, उसने धर्मके मूलको पहचान लिया है अतः अब वह जो कुछ करेगा वह उसीकी प्राप्तिके लिए करेगा । अब वह लक्ष्यभ्रष्ट नहीं हो सकेगा । अन्यथा संसार, शरीर और भोगों में आसक्ति रखते हुए उसका सारा व्रताचरण संसारको बढ़ानेवाला ही होगा, संसारको काटनेवाला नहीं । अतः धर्मका मूल सम्यक्त्व और धर्म चारित्र है । वह चारित्र अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहरूप है । इनको गृहस्थ एकदेश पालता है और मुनि सर्वदेश पालता है । असल में तो अहिंसा ही जैन धर्मका आचार और विचार है । जो गृहस्थ सन्तोषपूर्वक जीवन-यापन करता है, सीमित आरम्भ और सीमित परिग्रह रखता है वही अहिंसक है । और ऐसे अहिंसक सद्गृहस्थ ही अहिंसक समाजकी रचना कर सकते हैं । जैन धर्म ऐसे अहिंसक समाजकी रचनाका ही आदर्श रखता है । किन्तु मनुष्यका लोभ और उसकी संग्रह वृत्ति उसे संचयी और लोभी बना देती है । इसीके साथ वह व्रतादिका पालन करके धनात्माके साथ धर्मात्मा भी बनना चाहता है । किन्तु धनात्मा धर्मात्मा नहीं हो सकता और धर्मात्मा धनात्मा नहीं हो सकता । यह गृहस्थ धर्मकी पहली सीख है । आचार्य गुणभद्र लिख गये हैं "शुद्धैर्धनैविवर्धन्ते सतामपि न संपदः । न हि स्वच्छाम्बुभिः पूर्णाः कदाचिदपि सिन्धवः ॥" सज्जनोंकी भी सम्पदा शुद्ध — न्यायोपार्जित द्रव्यसे नहीं बढ़ती । नदियाँ स्वच्छ जलसे कभी भी परिपूर्ण नहीं देखी जातीं । अस्तु, भारतीय ज्ञानपीठकी स्थापना जिन्होंने की थी, वे दानवीर साहू शान्तिप्रसाद भी स्वर्गवासी हो गये । उसकी अध्यक्षा उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रमा रानी उनसे पूर्व ही दिवंगत हो चुकी । यह हम लोगोंके लिए अत्यन्त दुःखद है । प्रसन्नता और सन्तोषको बात यह है कि साहू श्रेयांस प्रसादने अध्यक्षपदका भार वहन किया है | हम लोग दिवंगत उदारमना साहूजीके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं । कैलाशचन्द्र शास्त्री ज्योतिप्रसाद जैन Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना पं. आशाधर और उनके धर्मामृतको सर्वप्रथम प्रकाशमें लानेका श्रेय स्व. श्री नाथूरामजी प्रेमीको है। उन्होंने ही स्व. सेठ माणिकचन्द हीराचन्द बम्बईकी स्मृतिमें स्थापित ग्रन्थमालाके मन्त्रीके रूपमें भव्यकुमुदचन्द्रिका टीका सहित सागारधर्मामृतका संस्करण संवत् १९७२ में प्रकाशित किया था। उसका मूल्य आठ आना था। संवत् १९७२ में ही मैं स्याद्वाद महाविद्यालयमें प्रविष्ट हुआ था और अँगरेजीमें अच्छे नम्बर प्राप्त करनेके उपलक्ष्यमें मुझे सागारधर्मामृतका वह संस्करण पारितोषिक रूपमें प्राप्त हुआ था। तथा इन पंक्तियोंको लिखते समय भी वह मेरे सामने उपस्थित है। उसके पश्चात् सागारधर्मामृतके अनेक संस्करण प्रकाशित हुए, किन्तु इतना सुन्दर, सस्ता, शुद्ध और आकर्षक संस्करण प्रकाशित नहीं हो सका। सागारधर्मामतके उक्त संस्करणके प्रकाशन वर्ष सन १९१५ में ही पं. कल्लपा भरमप्पा निटवेने अपने मराठी अनुवादके साथ कोल्हापुरसे एक संस्करण प्रकाशित किया। यह बहत्काय संस्करण भी सजिल्द और आकर्षक था। इसमें भी भव्यकुमुदचन्द्रिका टीका दी गयी है। उसके प्राक्कथनमें पं. निटवेने लिखा था कि 'मैंने ज्ञानदीपिकासे स्थान-स्थानपर टिप्पण दिये हैं। वह ज्ञानदीपिका स्वतन्त्र रूपसे देनेको थी। किन्तु हमारे दुर्भाग्यसे सागारधर्मामृतकी प्राचीन पुस्तक आगमें भस्म हो गयी। दूसरी आज मिलती नहीं। सौभाग्यसे इस ग्रन्थके पुनः प्रकाशनका प्रसंग आया तो किसी भी तरह पंजिकाका सम्पादन करके प्रकाशित करनेकी बलवती आशा है।' श्री निटवेके इस उल्लेखपर-से ज्ञानदीपिकाके उपलब्ध होनेकी आशा धूमिल हो गयी थी। किन्तु स्व. डॉ. ए. एन. उपाध्येके प्रयत्नसे श्री जीवराजग्रन्थमाला शोलापुरसे सागारधर्मामृतको एक हस्तलिखित प्रति प्राप्त हुई। यह प्रति रूलदार फुलिस्केप आकारके आधुनिक कागजपर सुन्दर नागरी अक्षरोंमें एक-एक लाइन छोड़कर लिखी हुई है। लिपिक बहुत ही कुशल और भाषा तथा विषयका भी पण्डित प्रतीत होता हैं। उसने जिस प्रतिसे यह प्रतिलिपि की है उसके 'पेज टु पेज' प्रतिलिपि की है और मूल प्रतिके पृष्ठ नम्बर भी देता गया है। बीच-बीच में कहीं-कहीं त्रुटित भी है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि जिस प्रतिके आगमें जलनेकी बात कही गयी है उसीपर-से यह प्रतिलिपि की गयी हो। हमें जो प्रति प्राप्त हुई उसमें भव्यकुमुदचन्द्रिका टीकाकी भी प्रति है। दोनों अलग-अलग होनेपर भी हिली-मिली थीं। हमने दोनोंको अलग-अलग किया तो हमें लगा कि जो प्रति जली उसीसे ये दोनों प्रतिलिपियां की गयी हैं। सौभाग्यसे भ. कु. च. को विशेष क्षति पहुँची और ज्ञानदीपिकाको कम । भ. कु. च. की प्रतियाँ तो सुलभ हैं किन्तु ज्ञानदीपिका दुर्लभ है। उसी प्रतिके आधारसे हमने उसकी प्रेसकापी तैयार की। रिक्त पाठोंकी उनके आदि और अन्त अक्षरोंके आधारपर भ. कु. च. से पूर्ति की और उन्हें ब्रैकेटमें दिया है। ज्ञानदीपिका उद्धरणबहुल है । अतः जिन उद्धरणोंका आधार मिला उन्हें मूलके आधारपर शुद्ध किया है किन्तु जिनका आधार नहीं मिला, उन्हें यथासम्भव शुद्ध करनेकी कोशिश करके छोड़ दिया गया है। Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) प्रतिलेखकके सम्बन्धमें कुछ भी ज्ञात नहीं हो सका । इस संस्करणमें उसी प्रतिके आधारसे ज्ञानदीपिकाका प्रथमबार मुद्रण हुआ है और इस तरह एक अलभ्य-जैसे ग्रन्थका उद्धार हुआ है । सागारधर्मामत मूलकी एक शुद्ध हस्तलिखित प्रति श्री स्याद्वाद महाविद्यालय वाराणसीके पुस्तकालयमें है। उसीके आधारपर सागारधर्मामतके मल श्लोकोंका संशोधन किया गया है। इससे कई ऐसे पाठोंका शोधन हुआ जिनकी ओर किसीका ध्यान नहीं था। इस प्रतिमें ४३ पत्र हैं। प्रारम्भके दो पत्र नहीं हैं। लिपि सुन्दर और सुस्पष्ट है। प्रत्येक पत्र में प्रायः दस पंक्तियां हैं और प्रत्येक पंक्तिमें छत्तीस या सैंतीस अक्षर हैं। श्लोकोंके साथ उनकी उत्थानिका भी है । तथा टीकामें 'उक्तं च' करके जो उद्धृत पद्य है वे भी प्रत्येक श्लोकके आगे लिखे हैं। प्रत्येक श्लोकके प्रत्येक पदकी पथक्तताका बोध करानेके लिए उसके अन्तमें ऊपरकी ओर एक छोटी-सी खड़ी पाई लगायी हई है। प्रत्येक पत्रके ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर रिक्त स्थानोंमें टिप्पणके रूपमें टीकासे शब्दार्थ तथा वाक्य आवश्यकतानुसार दिये हैं। इस तरहसे यह प्रति बहुत ही उपयोगी और अत्यन्त शुद्ध है। अन्तमें ग्रन्थकारकृत प्रशस्ति है। उसके अन्तमें लिपि प्रशस्ति है 'संवत् १५३६ वर्षे चैत्रवदि ५ श्री मूलसंघे नन्द्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्प२ भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तच्छिष्य मुनि श्री रत्नकीर्तिस्तदाम्नाये पंडिल्यवालान्वये अजमेरागोत्रे साधु ईश्वरस्तद्भार्या सवीरी तत्पुत्राः साधु पदमा वील्हा-देल्हा-तोल्हा एतेषां मध्ये साधु देल्हाख्येन सभार्येन इदं शास्त्रं लिखाप्य कर्मक्षयनिमित्तं ज्ञानपात्राय मुनि श्रीरत्नकीर्तये दत्तं । ज्ञानवान् ज्ञानदानेन निर्भयोऽभयदानतः । अन्नदानात्सुखी नित्यं भेषजात् व्याधिनुत्पुमान् ।। पं. आशाधर और उनका सागारधर्मामृत धर्मामतके प्रथम भाग अनगारधर्मामृतकी भूमिकामें ग्रन्थकार पं. आशाधर तथा उनकी कृतियों के सम्बन्धमें प्रकाश डाला गया है । अतः यहाँ केवल सागारधर्मामृतके सम्बन्धमें ही प्रकाश डाला जायेगा। पं. आशाधरने अपना जिनयज्ञकल्प वि. सं. १२८५ में रचकर समाप्त किया था। अतः उसकी प्रशस्तिमें जिन ग्रन्थोंका नाम दिया है वे उसके पूर्व रचे गये थे। उन्हीं में 'अर्हद्वाक्यरस' 'निबन्धरुचिर' धर्मामत शास्त्र भी है। पं. आशाधरजीने स्वयं 'अर्हद्वाक्यरस'का अर्थ 'जिनागमनिर्यासभूत' अर्थात् 'जिनागमका निचोड़ किया है । और 'निबन्धरुचिर'का अर्थ 'स्वरचित ज्ञानदीपिका पंजिकासे रमणीय' किया है। अतः धर्मामृतके साथ ही उसकी ज्ञानदीपिका पंजिका भी उन्होंने रची थी। पंजिका उस टीकाको कहते है जिसमें श्लोकमें आगत पदोंकी व्युत्पत्ति आदि मात्र होती है, शब्दशः व्याख्यान नहीं होता। अतः ज्ञानदीपिका पंजिकासे धर्मामृतके श्लोकोंको समझने में पूर्ण साहाय्य न मिलनेसे एक ऐसी टीकाकी आवश्यकता थी जिसमें प्रत्येक श्लोकका अन्वयार्थ पूर्वक व्याख्यान हो और कुछ प्रासंगिक शास्त्रीय चर्चा भी निबद्ध हो । उसीके लिए पोरवाड़वंशके समुद्धर श्रेष्ठीपुत्र महीचन्द्र की प्रार्थनापर सागारधर्मामृतको भव्यकुमुदचन्द्रिका टीका वि. सं. १२९६ में नलकच्छपुरके नेमिजिनालयमें रचकर पूर्ण हुई। महीचन्द्रने ही उसको प्रथम पुस्तक लिखी। उसके पश्चात् वि. सं. १३०० में अनगारधर्मामृतपर भी भव्यकुमुदचन्द्रिका टीका रची गयी। इस प्रकार ज्ञानदीपिकाके पश्चात् भव्यकुमुदचन्द्रिका रचो गयो। यह बात उस टीकाके प्रारम्भिक मंगलश्लोकके पश्चाद्वर्ती श्लोकसे भी पुष्ट होती है । यथा "समर्थनादि यन्नात्र, ब्रुवे व्यासभयात् क्वचित् । तज्ज्ञानदीपिकाख्यैतत्पञ्जिकायां विलोक्यताम् ।।" Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना अर्थात-विस्तारके भयसे इस टीकामें यदि कहीं समर्थन आदि न कहा गया हो तो उसको ज्ञानदीपिका नामक पंजिकामें देखनेका कष्ट करें। इसोसे ज्ञानदीपिका उद्धरणप्रधान है। उसमें आशाधरजीने अपने कथनके समर्थन में पूर्वाचार्यों और ग्रन्थकारोंके ग्रन्थोंसे सैकड़ों पद्य उद्धृत किये हैं। उनके अध्ययनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सागारधर्मामृत अपनेसे पूर्वमें रचे गये न केवल श्रावकाचारोंका किन्तु अन्य भी उपयोगी आगमिक और लौकिक ग्रन्थोंका निर्यासभूत है जैसा कि ग्रन्थकारने स्वयं कहा है । सागार धर्मामृतके आधारभूत ग्रन्थ सागारधर्मामृतसे पूर्वमें रचे गये श्रावकाचार सम्बन्धी प्रसिद्ध ग्रन्थ है-रत्नकरण्डश्रावकाचार, महापुराणके अन्तर्गत कुछ भाग, पुरुषार्थसिद्धयुपाय, यशस्तिलकके अन्तर्गत उपासकाध्ययन, अमित गति श्रावकाचार, चारित्रसार, वसूनन्दिश्रावकाचार, पद्मनन्दिपञ्चविंशतिका आदि । इन सभीका उपयोग आशाधरजीने किया है । और अपनी ज्ञानदीपिकामें उनसे अनेक उद्धरण दिये हैं। सागार धर्मामृतका विशिष्ट विषय परिचय १. प्रथम अध्याय प्रथम अध्यायका आरम्भ सागारके लक्षणसे होता है। जो अनादि अविद्यारूपी दोषसे उत्पन्न चार संज्ञा-आहार, भय, मैथुन, परिग्रहरूपी ज्वरसे पीड़ित हैं, निरन्तर स्वज्ञानसे विमुख हैं और विषयों में फंसे है, विषयासक्त हैं । वे सागार या गृहस्थ हैं। सागारके इस लक्षणमें साधारणतया सभी गृहस्थोंका अन्तर्भाव हो जाता है। मगर गृहस्थोंमें तो सम्यग्दृष्टी और देशसंयमी भी आते हैं। अतः सागारके दूसरे लक्षणमें 'प्रायः' पद दिया है । 'प्रायः' का अर्थ होता है 'बहत करके' । कामिनी आदि विषयों में 'यह मेरे भोग्य हैं' और 'मैं इनका स्वामी हूँ' इस प्रकारका ममकार और अहंकार उनमें पाया जाता है। चारित्रावरण कर्मके उदयसे सम्यग्दृष्टियोंमें भी इस प्रकारका विकल्प होता है । किन्तु जन्मान्तरमें रत्नत्रयका अभ्यास करने के प्रभावसे इस जन्ममें साम्राज्यका उपभोग करते हुए भी तत्त्वज्ञान और देश संयममें उपयोग होनेसे जिन्हें नहीं भोगते हुएकी तरह प्रतीत होते हैं उनके लिए 'प्रायः' शब्दका प्रयोग किया है। सम्यग्दर्शन-आगे सम्यक्त्वका माहात्म्य बतलाते हुए कहा है-अविद्याका मूलकारण मिथ्यात्व है और विद्याका मूलकारण सम्यग्दर्शन है। संज्ञोतियंच पशु होकर भी सम्यक्त्वके माहात्म्यसे हेय और उपादेय तत्त्वको जानते हैं। किन्तु मनुष्य यद्यपि विचारशील होते हैं तथापि मिथ्यात्वके प्रभावसे हिताहितके विवेकसे रहित पशुओंकी तरह आचरण करते हैं। सम्यग्दर्शनको उत्पत्ति पाँच लब्धिपूर्वक ही होती है। उसके बिना नहीं होती । अतः श्लोक छठे में पांच लब्धियोंको बहुत संक्षेपमें कहा है। श्लोक बारहवें में सम्पूर्ण सागार धर्ममें निर्मल सम्यक्त्व, निरतिचार अणुव्रत, गुणवत, शिक्षाव्रत और मरते समय विधिपूर्वक सल्लेखना गिनाये हैं । वस्तुतः इतना ही सागार धर्म है तथा श्रावकाचारों में इनका ही कथन प्रधानरूपसे पाया जाता है। इसकी ज्ञानदीपिकामें आशाधरजीने रत्नकरण्ड और पुरुषार्थ सि.से श्लोक उद्धृत किये हैं। रत्नकरण्डमें सच्चे देव शास्त्र गुरुके तीन मूढ़ता और आठ मद रहित तथा आठ अंग सहित श्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहा है और पु. सि. में जीवाजीवादि तत्त्वार्थोके श्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहा है। इन दोनोंको ही उद्धृत करनेसे आशाधरजीका यही अभिप्राय है कि जीवाजोवादि तत्त्वार्थोंका तथा देव शास्त्र गुरुका यथार्थ श्रद्धान ही सम्यग्दर्शन है । दोनों पर श्रद्धान हुए बिना सम्यक्त्व नहीं होता; क्योंकि जीवाजीवादि तत्त्वोंका कथन तो देव ने ही किया है । उन्हीं के मुखसे निसृत वाणीका संकलन शास्त्र में है और उन्हींके अनुयायी सद्गुरु होते हैं । [२] Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १० धर्मामृत ( सागार ) अतः एकके श्रद्धानमें दूसरेका श्रद्धान गर्भित ही है। फिर भी जो देव शास्त्र गुरुकी श्रद्धा तो रखते हैं किन्तु जीवाजीवादि तत्त्वार्थोंके नामसे भी परिचित नहीं होते, वे अपनेको व्यवहारसे भी सम्यग्दृष्टी कहलाने की पात्रता नहीं रखते । सम्यक्त्वकी प्राप्तिके लिए उनका भी श्रद्धान परमावश्यक है । आशाधरजीने सम्यग्दर्शनके आठ अंगों के लिए पुरुषार्थ के श्लोक उद्धृत किये हैं, रत्नकरण्ड० के नहीं । किन्तु फिर भी वे रत्नकरण्ड० से दो श्लोक उद्धृत करना नहीं भूले । वे श्लोक वास्तव में बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं और वह भी आजके इस युग में । उनका अर्थमात्र यहाँ दिया जाता है जो मनमें मानका अभिप्राय रखकर घमण्डसे चूर हो अन्य धार्मिकों की अवहेलना करता है, उनका तिरस्कार करता है वह अपने धर्मका ही तिरस्कार करता है; क्योंकि धार्मिकों के बिना धर्म नहीं । अर्थात् धर्मके मूर्तिमान रूप तो धार्मिक हो हैं । अतः उनका तिरस्कार धर्मका ही तिरस्कार है । आज यही सब हो रहा है । कुछ लोगोंको धर्मका उन्माद चढ़ा है । धर्मके मिथ्या अभिनिवेशने उन्हें धर्मोन्मत्त बना दिया है, जो धर्म नहीं है, केवल उन्माद है । दूसरे श्लोकका अर्थ है अंगहीन सम्यग्दर्शन जन्मकी परम्पराको छेदने में समर्थ नहीं है । क्योंकि जिसमें अक्षर छूट गये हों, ऐसा मन्त्र विषकी वेदना को दूर नहीं कर सकता । अतः आठ अंगसहित सम्यग्दर्शनको ही दर्शनविशुद्धि शब्दसे कहा गया है। आज व्रताचरणकी चर्चा तो जोरोंसे की जाती है किन्तु सम्यग्दर्शन और उसके अंगों तथा मलोंकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता । आचार्य समन्तभद्र के इस कथनको लोग भूल गये हैं- कि 'तीनों कालों और तीनों लोकोंमें सम्यक्त्व के समान कोई अन्य प्राणियोंका कल्याणकारी नहीं है और मिथ्यात्वके समान अकल्याणकारी नहीं है ।' आज आचार्य अमृतचन्द्रजीके भी इस कथनको भुला दिया गया है - 'उन सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रमेंसे सर्वप्रथम पूर्ण यत्नोंके साथ सम्यग्दर्शनकी उपासना करना चाहिए; क्योंकि उसके होनेपर ही सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र होते हैं ।' सम्यकुचारित्रके बिना मोक्ष नहीं होता । यह तो हम सुनते हैं । किन्तु सम्यग्दर्शनके बिना सम्यक्चारित्र नहीं होता, इसे कहनेवाले विरल ही हैं । रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें चारित्रका प्रकरण प्रारम्भ करते हुए आचार्य समन्तभद्र महाराज कहते हैं"मोहतिमिरापहरणे दर्शनलाभादवाप्त संज्ञानः । रागद्वेषनिवृत्त्यै चरणं प्रतिपद्यते साधुः ॥" ' दर्शन मोहरूपी अन्धकारके दूर होने पर सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति के साथ सम्यग्ज्ञानको प्राप्त हुआ साधु राग द्वेषको दूर करनेके लिए चारित्र धारण करता है ।' अतः दर्शनमोहकी उपेक्षा करके चारित्र धारण करना श्रेयस्कर नहीं है । अस्तु, असंयमी भी सम्यग्दृष्ट कर्मजन्य क्लेश क्षोण होते हैं और संयमी भी मिथ्यादृष्टिका संसार अनन्त ही होता है। आशाधरजीने श्लोक १३ की भ. कु. च. टीकामें असंयत सम्यग्दृष्टी के सम्बन्ध में कहा है । बतलाया ' जैसे कोतवालके द्वारा मारनेके लिए पकड़ा गया चोर जो-जो कोतवाल कहता है वह वह करता है । इसी प्रकार जीव भी चारित्रमोहके उदयसे नहीं करने योग्य भावहिंसा, द्रव्यहिंसा आदि अयोग्य जानते हुए भी करता है; क्योंकि अपने काल में उदयागत कर्मको रोकना शक्य नहीं है । इससे यह भी कि सम्यक्त्व ग्रहण से पहले जिसने आयुका बन्ध नहीं किया है उस सम्यग्दृष्टिके सुदेवपना और सुमानुषपनाके सिवाय समस्त संसारका निरोध हो जानेसे कर्मजन्य क्लेशमें कमी हो जाती है अर्थात् वह मरकर यदि मनुष्य है तो सुदेव होता है और देव है तो मरकर सुमानुष होता । यदि उसने सम्यक्त्व ग्रहणसे पूर्व नरक गतिका बन्ध कर लिया है और पीछे सम्यक्त्व ग्रहण किया है तो प्रथम नरकमें जघन्य स्थिति ही भोगता है । अतः उसके सम्यक्त्वके माहात्म्यसे बहुत-से दुःख दूर हो जाते हैं । इसलिए संयमकी प्राप्ति से पूर्व संसारसे भयभीत भव्य जीवको सम्यदर्शनकी आराधना में नित्य प्रयत्न करना चाहिए ।' Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना इस असंयत सम्यग्दृष्टिको आशाधरजीने निश्चय सम्यग्दृष्टि कहा है और कहा है कि वह यह श्रद्धा रखता है कि विषयजन्य सुख हेय है और आत्मिक सुख उपादेय है। वह अपनी निन्दा-गर्दा करता हुआ भी चारित्रमोहके उदयके परवश होकर इन्द्रिय सुख भोगता है और अन्य जीवोंको पीड़ा पहुँचाता है अर्थात् इन्द्रियसंयम और प्राणीसंयमसे रहित असंयत सम्यग्दृष्टि है। इसी अव्रती किन्तु सम्यग्दर्शन मात्रसे शुद्ध असंयत सम्यग्दृष्टिके सम्बन्धमें आचार्य समन्तभद्रने अपने रत्नकरण्डमें लिखा है कि वह मरकर नारक, स्त्री, नपुंसक, तिर्यंच नहीं होता। नीचकुलमें जन्म नहीं लेता, विकलांग, अल्पायु, दरिद्री नहीं होता । आदि, अधिक क्या, सम्यक्त्वके बिना अनन्त संसार सान्त नहीं होता। इस सम्यक्त्वकी प्राप्ति के लिए कोरा व्रताचरण आवश्यक नहीं है। आवश्यक है देवशास्त्र, गुरु और सप्ततत्त्वविषयक यथार्थ श्रद्धा। नरक और देवगतिमें व्रताचरण नहीं होता, फिर भी सप्त तत्त्वोंकी श्रद्धासे सम्यक्त्वकी प्राप्ति होती है । ___अष्टमूलगुणका धारण भी सम्यक्त्वपूर्वक ही होता है । सम्यक्त्वके बिना अष्टमूलगुण धारण करने व्रती नहीं होता। देशव्रती पंचम गुणस्थानवर्ती होता है और असंयत सम्यग्दृष्टि चतुर्थ गुणस्थानवर्ती होता है। सम्यक्त्वके बिना पाँचवाँ आदि गुणस्थान नहीं होता। अतः सम्यक्त्वपूर्वक ही अष्टमूलगुण यथार्थ होते हैं। केवल मद्य-मांस आदिका त्याग करनेसे बुद्धि शुद्ध नहीं होती, बुद्धि शुद्ध होती है मिथ्यात्वके त्यागपूर्वक सम्यक्त्वके ग्रहणसे । दूसरे अध्यायके १९वें श्लोक में आशाधरजीने कहा है "यावज्जीवमिति त्यक्त्वा महापापानि शुद्धधीः । जिनधर्मश्रुतेर्योग्यः स्यात्कृतोपनयो द्विजः ॥" इसकी टीकामें आशाधरजीने 'शुद्धधीः' का अर्थ किया है-'सम्यक्त्वविशुद्धबुद्धिः सन्'-अर्थात् सम्यक्वसे विशुद्धबुद्धि होकर जीवनपर्यन्तके लिए महापाप मद्यादिको छोड़कर उपनयन संस्कारवाला द्विज-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जिनधर्मके श्रवणका अधिकारी होता है । यही कथन पुरुषार्थसिद्धयुपायमें आया है "अष्टावनिष्टदुस्तरदुरितायतनान्यमूनि परिवर्त्य । जिनधर्मदेशनाया भवन्ति पात्राणि शुद्धधियः ॥" यहाँ भी कर्ता 'शुद्धधियः' है। सम्यक्त्वसे विशुद्ध बुद्धिवाले जन इन आठोंको छोड़कर जिनधर्मकी देशनाके पात्र होते हैं । अतः यह अर्थ करना कि इन महापापोंको छोड़कर विशुद्ध बुद्धि हो गयी है जिनकी, ठीक नहीं है । यदि ऐसा अर्थ होता तो आशाधर अपनी टीकामें 'शुद्धधीः'का अर्थ 'सम्यक्त्वविशुद्धबुद्धिः' न करते । वसुनन्दिश्रावकाचारमें भी पहली प्रतिमाका स्वरूप कहते हुए 'सम्मत्त विसुद्धमई' विशेषण दिया है, जो बतलाता है कि बुद्धिकी विशुद्धिका कारण सम्यक्त्व है, मात्र मद्यादि त्याग नहीं है। बहुत-से अन्य जन मद्य-मांसका सेवन नहीं करते। किन्तु मात्र इतनेसे उन्हें 'शुद्धधीः' नहीं कह सकते। उसके लिए सम्यक्त्व अनिवार्य है, किन्तु सम्यक्त्वकी प्राप्ति के लिए मद्यादिका त्याग अनिवार्य नहीं है। सेवन नहीं क त्याग करना एक बात नहीं है। जैनोंमें ही मद्य-मांसका सेवन नहीं होता। यह उनका कुलक्रमागत धर्म है। किन्तु इसे त्याग शब्दसे नहीं कहा जाता । अभिप्रायपूर्वक नियम लेने का नाम त्याग है। वह चतुर्थगुणस्थानमें नहीं होता, पाँचवेंमें होता है। अतः असंयत सम्यग्दृष्टिका जो स्वरूप गोम्मटसार जीवकाण्डमें कहा है कि वह न इन्द्रियोंसे विरत होता है और न स-स्थावर जीवोंको हिसासे विरत होता है केवल जिनोक्त तत्त्वोंपर श्रद्धा रखता है वह अविरत सम्यग्दृष्टि है, वह यथार्थ है। आशाधरजीने इसीका अभिप्राय लेकर प्रथम अध्यायका १३वा श्लोक रचा है। और ज्ञानदीपिकामें अपने कथनके समर्थनमें उक्त गाथाको प्रमाण रूपसे उद्धृत भी किया है । अस्तु, Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२ धर्मामृत ( सागार) श्रावकके पाक्षिकादि भेद-आचार्य जिनसेनका महापुराण जैनोंके लिए महाभारत-जैसा है। जैसे महाभारतके शान्ति पर्व में भीष्म युधिष्ठिरको राजधर्म आदिका उपदेश देते हैं उसी प्रकार आचार्य जिनसेनने चक्रवर्ती भरतके द्वारा बनाये गये ब्राह्मण वर्णको जो जैन धर्मका पालक त्यागीसमूह ही था, श्रावक धर्मका उपदेश कराया है। यह उपदेश ३८ से ४० तक तीन पर्वोमें हैं। और उसे गर्भान्वय क्रिया, दीक्षान्वय क्रिया और कन्वय क्रिया नाम दिया है। गर्भान्वय क्रिया तिरपन और दीक्षान्वय क्रियाएँ अड़तालीस हैं। तथा कन्वय क्रियाएँ सात हैं। इन्हें उन्होंने सातवें अंग उपासकाध्ययनांगमें वणित बतलाया है। इन क्रियाओंका कथन करनेसे पूर्व भरत महाराजने उन श्रावकोंको षट्कर्मका उपदेश दिया था। वे षट्कर्म हैं-इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम, तप । अर्हन्तोंकी पूजाका नाम इज्या है। उसके चार भेद हैं-सदार्चन या नित्यपूजा, चतुर्मुख पूजा, कल्पद्रुमपूजा, अष्टाह्निकपूजा। प्रतिदिन अपने घरसे गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि ले जाकर जिनालयमें जिनेन्द्रकी पूजा करना सदार्चन या नित्यपूजा है। तथा भक्तिपूर्वक जिनबिम्ब, जिनालय आदिका निर्माण कराना, उनकी पूजा आदिके लिए दानपत्र लिखकर ग्राम आदि देना भी नित्यपूजा है। अपनी शक्तिके अनुसार नित्य दानपूर्वक महामुनियोंकी पूजा भी नित्यपूजा है । महामुकुटबद्ध राजाओंके द्वारा जो महापूजा की जाती है उसे चतुर्मुखपूजा और सर्वतोभद्र कहते हैं। चक्रवर्तियोंके द्वारा जगत्की आशा पूर्ण करके याचक जनोंको मुंहमागा दान देकर जो पूजा की जाती है वह कल्पद्रुमपूजा है । अष्टाह्निकपूजा तो प्रसिद्ध है । इसके सिवाय एक इन्द्रध्वजपूजा है जिसे इन्द्र करता है। यह सब श्रावकका प्रथम कर्म इज्या है। विशुद्ध वृत्तिके साथ कृषि आदि करना वार्ता है। चार प्रकारका दान है-दयादत्ति, पात्रदत्ति, समक्रियादत्ति, अन्वयदत्ति। इन तीनके अतिरिक्त, स्वाध्याय, संयम और तप ये तीन कर्म हैं। जहाँ तक हम जानते हैं महापुराणसे पूर्वके किसी ग्रन्थमें ये सब पूजाके भेद आदि उपलब्ध नहीं हैं। महापुराणके पश्चात् रचे गये पुरुषार्थ सिद्धयुपायमें तो इनकी कोई चर्चा नहीं है। सोमदेवके उपासकाध्ययनमें पूजाविधिका विस्तारसे वर्णन है किन्तु इन भेदादिका नहीं है। उसीमें इज्याके स्थानमें देवसेवा तथा वार्ताके स्थानमं गुरूपास्ति रखकर श्रावकके प्रतिदिनके षट्कर्म कहे हैं। यथा "देवसेवा गुरूपास्ति स्वाध्यायः संयमस्तपः । दानं चेति गृहस्थानां षट् कर्माणि दिने दिने ॥" महापुराणमें कन्वय क्रियाओंका वर्णन करते हए कहा है यह शंका हो सकती है कि जो असि, मषो आदि छह कर्मोसे आजीविका करनेवाले जैन, द्विज या गृहस्थ हैं उनको भी हिंसाका दोष लगता है। परन्तु इस विषयमें हमारा कहना है कि आपका कहना यद्यपि ठीक है आजीविकाके लिए छह कर्म करनेवाले जैन गृहस्थोंको भी थोड़ी-सी हिंसाका दोष अवश्य लगता है । परन्तु शास्त्रोंमें उन दोषोंकी शुद्धि भी बतलायी है। उनकी शुद्धिके तीन अंग हैं-पक्ष, चर्या, साधन । मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ्य भावसे वृद्धिको प्राप्त हुआ समस्त हिंसाका त्याग जैनोंका पक्ष है। किसी देवताके लिए, किसी मन्त्रकी सिद्धिके लिए, अथवा औषधि या भोजन के लिए मैं किसी जीवकी हिंसा नहीं करूँगा ऐसी प्रतिज्ञा करना चर्या है। इस प्रतिज्ञामें यदि कभी प्रमादसे दोष लग जावे तो प्रायश्चित्तसे उसकी शुद्धि की जाती है। तथा अन्त में अपना सब कुटुम्ब भार पुत्रको सौंपकर घरका परित्याग करना चर्या है । और आयुके अन्तमें शरीर, आहार और समस्त प्रकारकी चेष्टाओंका परित्याग कर ध्यानको शुद्धिसे आत्माको शुद्ध करना साधन है। यह सब कथन सद्गहित्व नामकी दूसरी क्रियाके अन्तर्गत आता है। Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना १३ आशाधरजीने अपने सागारधर्मामृत के प्रथम अध्यायमें महापुराण के उक्त सब कथनको इस प्रकार निबद्ध किया है " नित्याष्टाह्निकसच्चतुर्मुख महः कल्पद्रुमैन्द्रध्वजाविज्या: पात्रसमक्रियान्वयदयादत्तीस्तपः संयमान्' । स्वाध्यायं च विधातुमादृत कृषीसेवा वणिज्यादिकः शुद्धयाप्तोदितया गृही मललवं पक्षादिभिश्च क्षिपेत् ॥” इसमें महापुराण में उक्त पूजाके चार भेद, दानके चार भेद, तप, संयम, स्वाध्याय आते हैं । तथा कृषि सेवा, व्यापार आदिमें लगे दोषोंकी शुद्धिके लिये पक्षादिको भी कहा है । इससे आगे श्लोकमें पक्ष चर्या साधनका स्वरूप उक्त प्रकारसे ही कहा है । यह सब कथन सागारधर्मामृत से पूर्व किसी भी श्रावकाचारमें या महापुराणके सिवाय अन्य किसी ग्रन्थमें हमारे देखने में नहीं आया । इन्हीं पक्ष चर्या तथा साधनके आधारपर आशाधरजीने श्रावकके पाक्षिक, कहे हैं । ये तीन भेद भी इससे पूर्व नहीं मिलते। चामुण्डरायकृत चारित्रसार में भी इज्या, वार्ता आदि षट् कर्म कहे हैं किन्तु पक्ष चर्या साधनकी चर्चा उसमें नहीं है । श्रावकके तीन भेद करना तो शायद आशाधरजीकी अपनी ही सूझबूझ है । वैसे तीनों हैं । जिसे जैनधर्मका पक्ष हो, अर्थात् जिसने जैनधर्म स्वीकार किया हो वह पाक्षिक है है अर्थात् निरतिचार श्रावकधर्मका निर्वाह करता है वह नैष्ठिक है । एकादश प्रतिमा नैष्ठिकके ही भेद हैं । और जब नैष्ठिक मरणकाल उपस्थित होनेपर आत्मसाधना -- समाधि पूर्वक मरण करता है तो वह साधक है । इस तरह पाक्षिक, नैष्ठिक और साधक नाम सार्थक हैं । इन्हींका वर्णन आगे के अध्यायों में हैं । भेद बहुत ही उपयुक्त और जो उसमें निष्ठ २. द्वितीय अध्याय - पाक्षिकका वर्णन - दुसरे अध्याय में पाक्षिकका वर्णन कई दृष्टियोंसे महत्त्वपूर्ण है । पाक्षिकका मतलब होता है साधारण श्रावक या आम जैन जनता । उसका क्या कर्तव्य है, यह अन्य किसी भी श्रावकाचार में वर्णित नहीं है और जनसाधारण की दृष्टिसे वही विशेष उपयोगी है । उसके प्रारम्भमें कहा है-जो जिन भगवान्‌की आज्ञासे सांसारिक विषयोंको त्यागने योग्य जानते हुए भी मोहवश छोड़ने में असमर्थ है उसे गृहस्थ धर्म पालन करने की अनुमति है । " त्यागने योग्य जानते हुए भी" को स्पष्ट करते हुए टीकामें कहा है कि अनन्तानुबन्धी राग आदिके वशीभूत होकर जो विषयोंको सेवनीय मानता है वह गृहस्थ धर्मके पालनका अधिकारी नहीं है । ऐसी परिणति तो दूर की बात है, आन्तरिक श्रद्धाका होना भी कठिन है । अनन्तानुबन्धी कषायके उदयमें इस प्रकारकी श्रद्धा होना संभव नहीं है । और उसके बिना सम्यक्त्वकी बात बहुत दूर है । फिर भी उक्त कषायके मन्द उदय में मनुष्यों की प्रवृत्ति त्यागकी ओर होती है । किन्तु वह त्याग संसारका अन्त करनेमें तभी समर्थ होता है जब उसके साथ सम्यक्त्व होता है। अतः पाक्षिकको भी सम्यग्दृष्टि होना चाहिये । उसके पश्चात् वह अष्ट मूलगुण धारण करता है । नैष्ठिक तथा साधक भेद महापुराण में प्रतिपादित और उनके आधार पर अष्टमूल गुण - मद्य, मांस, मधु और पांच उदुम्बर फलोंके त्यागको अष्टमूल गुण कहते हैं । इन अष्टमूल गुणोंके सम्बन्धमें मतभेद है और उसे भी आशाधरजीने लिखा है । वह लिखते हैं 'हमने सोमदेव के उपासकाध्ययन आदिका अनुसरण करते हुए उक्त अष्टमूल गुण कहे हैं । और स्वामी समन्तभद्रने पाँच अणुव्रत और तीन मकार के त्यागको अष्टमूल गुण कहा है। तथा महापुराणमें पाँच अणुव्रत और द्यूत, मद्य, मांसके त्यागको अष्टमूल गुण कहा है'। उसके समर्थनमें उन्होंने चारित्रसारसे एक श्लोक भी दिया है जो चारित्रसार में ' तथा चोक्तं महापुराणे' करके उद्धृत है । किन्तु महापुराणके मुद्रित संस्करणों में यह श्लोक नहीं पाया जाता । उसमें तो पाँच उदुम्बरोंके त्यागवाले ही अष्टमूल गुण मिलते । यथा Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) "मद्य-मांस-परित्यागः पञ्चोदुम्बरवर्जनम् । हिंसादिविरतिश्चास्य व्रतं स्यात् सार्वकालिकम् ॥"-महापु. ३८।१२२ । इसमें मधुत्याग नहीं है । तथा हिंसादिविरतिको गिननेसे आठ हो जाते हैं। किन्तु द्यूतत्याग नहीं है। अतः महापुराणके नामसे उद्धृत उक्त श्लोक विचारणीय है। महापुराण, पुरुषार्थसिद्धयुपाय, सोमदेव उपासकाध्ययन, पद्मनन्दि पंचविंशतिका, सागारधर्मामृत आदिमें पाँच उदुम्बर फलोंके त्यागवाले ही अणुव्रत आते हैं । रत्नकरण्डमें ही पाँच अणुव्रतवाले अष्टमूल गुण पाये जाते हैं। कहाँ पाँच अणुव्रत और कहाँ पाँच उदुम्बर फलोंका त्याग, दोनोंमें मोहर और कौड़ी जैसा अन्तर है। पाँच अणुव्रत तो नैतिकताके भी प्रतीक हैं । किन्तु पाँच उदुम्बर फलोंका त्याग तो मात्र स्थूल हिंसाके त्यागका प्रतीक है। देखा जाता है कि आजका व्रती श्रावक खानपानकी शुद्धिकी ओर तो विशेष ध्यान देता है किन्तु भावहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहकी ओरसे उदासीन जैसा रहता है। मानो ये पांचों व्रत उसके लिए अनावश्यक जैसे हैं । इससे व्रती श्रावकोंकी भी नैतिकतामें ह्रास देखा जाता है और उससे धर्माचरणकी गरिमा हीन होती जाती है । अतः पाँच अणुव्रतोंकी ओर ध्यान देना आवश्यक है। मद्य, मांस, मधु-हिन्दू या वैदिक धर्ममें मद्य, मांस और मधुके सेवनका विधान है। यज्ञोंमें पशुवध होता था और हविशेषके रूपमें मांसका तथा मद्यका सेवन करना धर्म माना जाता था। अतिथि सत्कार तो मधुपर्कके बिना होता ही नहीं था। मांसके सम्बन्धमें परस्पर विरोधी विचार मिलते हैं। धर्मशास्त्रका इतिहास भाग १, पृ. ४२० पर मांस भक्षण पर लिखा है-'शतपथ ब्राह्मण (१११७।१।३ ) ने घोषित किया है कि मांस सर्वश्रेष्ठ भोजन है। साथ ही शतपथ ब्राह्मणने यह भी सिद्धान्त प्रतिपादित किया है कि मांसभक्षी आगेके जन्ममें उन्हीं पशुओं द्वारा खाया जायेगा।' धर्मसूत्रोंमें कतिपय पशुओं, पक्षियों एवं मछलियोंके मांस भक्षणके विषयमें नियम दिये गये हैं । प्राचीन ऋषियोंने देवयज्ञ, मधुपर्क एवं श्राद्धमें मांसबलिकी व्यवस्था दी है। मनु (५।२७-४४) ने केवल मधुपर्क, यज्ञ, देवकृत्य एवं श्राद्धमें पशुहननकी आज्ञा दी है। अन्तमें मनुने अपना यह निष्कर्ष दिया है कि मांसभक्षण, मद्यपान एवं मैथुनमें दोष नहीं है क्योंकि ये स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ हैं। कुछ अवसरों एवं कुछ लोगोंके लिए शास्त्रानुमोदित है किन्तु इनसे दूर रहनेपर महाफलकी प्राप्ति होती है। शायद इन्हीं प्रवृत्तियोंको ध्यानमें रखकर जैनाचार्योंने मद्य, मांस, मधुके त्यागको ही जैनाचारका आधार माना है। रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें कहा है "त्रसहतिपरिहरणार्थं क्षौद्रं पिशितं प्रमादपरिहृतये । मद्य च वर्जनीयं जिनचरणौ शरणमुपयातैः ।।८४॥" अर्थात्-जिन भगवान् के चरणोंकी शरणमें आये हुए मनुष्योंको त्रसहिंसासे बचने के लिए मधु और मांस तथा प्रमादसे बचने के लिए मद्य छोड़ना चाहिए। इसमें मद्यपानमें सघात न बतलाकर प्रमाद दोष बतलाया है। किन्तु उत्तरकालीन सब श्रावकाचारोंमें मद्यपानमें भी हिंसाका विधान मुख्यरूपसे किया है। पु. सि. में कहा है-मद्य मनको मोहित करता है । मोहितचित्त मनुष्य धर्मको भूल जाता है । और धर्मको भूला हुआ जीव अनाचार करता है। मधुमें तो त्रसहिंसा होती ही है। आजकल मधुमक्खियोंको पालकर उनसे मधु प्राप्त किया जाता है और उसे अहिंसक कहा जाता है। किन्तु ऐसा मधु भी सेवन नहीं करना चाहिए; क्योंकि सेवन करने पर अहिंसक और हिंसकका भाव जाता रहता है। आजकल पाश्चात्त्य सभ्यताके प्रचारके कारण कुलाचार रूपमें मद्य मांसका सेवन न करनेवाले जैन घरानोंके युवकोंमें भी मद्य मांसके सेवनकी चर्चा सुनी जाती है। उच्चश्रेणीकी पार्टियों में प्रायः मद्य मांस Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना चलता है और उनमें जो सम्मिलित होते हैं वे उनसे बच नहीं सकते। इसी प्रकार होटलों में खानपानका प्रचार बढ़ रहा है। वह सभ्यतामें आ गया है। और धन सम्पन्न स्त्री-पुरुष उसमें अपनी शान समझते हैं। इस तरह जैनोंमें भी मद्य मांस सेवनकी प्रवृत्तिको बल मिल रहा है। इसे रोकना आवश्यक है। अन्यथा जैनधर्मके आचारका मूल ही नष्ट हो जायेगा। रात्रिभोजन-रात्रि भोजन तो बहुत अधिक प्रचलित हो गया है। विवाह-शादियोंमें रात्रिभोजन चल पड़ा है। अब दिनके खानेवाले बहुत ही कम रह गये हैं। रात्रिभोजन तो स्वास्थ्यको दृष्टिसे भी हानिकर है किन्तु उसकी ओर भी अब कोई ध्यान नहीं देता। यह जैन होनेका एक चिह्न था। जैनका मतलब ही था रातमें भोजन न करनेवाला और पानी छानकर पीनेवाला । आज दोनों ही परम्पराएँ समाप्त है । लोग पानी छानना भी भूल गये हैं। कुओंका स्थान नलोंके ले लेनेसे भी इस प्रवृत्तिको बल मिला है। आजके लोग कहते हैं कि पुराने समयमें बिजलीका प्रकाश न होनेसे रातमें भोजनको बुरा कहा है; क्योंकि अन्धकारमें दिखायी नहीं देता। किन्तु बिजलीका प्रकाश जितना तेज होता है उसमें उतने ही अधिक जीवजन्तु आते हैं। और वे सब भोजनमें गिरकर मनुष्योंका आहार बनते हैं। यह तो सूर्यका प्रकाश ही ऐसा है जिसमें क्षुद्र जीवजन्तु छिपकर बैठ जाते हैं । वह उन्हें आकृष्ट नहीं करता। दिनमें भोजन करनेकी इतनी अच्छी व्यवस्था भी उठ रही है यह बहुत ही खेदकी बात है। रातमें अन्न भक्षण न करनेको भी प्रवृत्ति अब उठ रही है। यद्यपि अन्नके स्थानमें सिंघाड़े आदिके व्यंजन खानेकी प्रवृत्ति भी कुछ प्रदेशोंमें है किन्तु अब उसमें भी कमी आ रही है। आशाधरजी ने पाक्षिक श्रावकके लिए रात्रिमें पान इलायची आदि तथा जल और औषधीको लेनेकी छूट दी है जो उचित हो है। आशाधरजी ने वृद्ध आचार्योंके मतसे आठ मूलगुण अन्य प्रकारसे बतलाये हैं । वे हैं "मद्य, मांस, मध, रात्रिभोजन और पांच उदुम्बर फलोंका त्याग, जीवोंपर दया और छना जल तथा पंचपरमेष्ठीकी भक्ति।" ये आठ मूलगुण ऐसे हैं जिनमें एक साधारण जैन गृहस्थके लिए उपयोगी सब आवश्यक आचार आ जाता है। आजके समयमें इन अष्ट मूलगुणोंके प्रचारको बहुत आवश्यकता है। आचार्यों और मुनिगणोंको इस ओर ध्यान देना चाहिए और जो श्रावक जीवन भरके लिए इन आठ मूलगुणोंका पालन करे उसका ही आहार ग्रहण करना चाहिए। जैनधर्मकी दीक्षा-पाक्षिक धावकका आचार बतलाते हुए आशाधरजी ने महापुराणमें प्रतिपादित दीक्षान्वय क्रियाका अनुसरण करते हुए जैनधर्मकी दीक्षा देनेका भी विधान किया है। ये क्रियाएँ आठ हैअवतार, वृत्तलाभ, स्थानलाभ, गणग्रह, पूजाराध्य, पुण्ययज्ञ, दृढ़चर्या और उपयोगिता। दूसरे अध्यायके २१वें श्लोकमें इन आठों क्रियाओंको संक्षेपमें इस प्रकार कहा है-'अन्य मिथ्यादृष्टि कुलमें जन्मा हुआ व्यक्ति सबसे प्रथम धर्माचार्य या गृहस्थाचार्यके उपदेशसे जीवादि तत्त्वार्थोंका निश्चय करे। फिर श्रावकधर्म अष्टमूलगुण आदिको धारण करते हुए गुरुमुखसे पंचनमस्कार महामन्त्रको धारण करे । और अबतक जिन मिथ्या देवोंको पूजता था, उनको सदाके लिए विसर्जित कर दे। उसके पश्चात् द्वादशांग और चतुर्दशपूर्वसे उद्धार किये गये ग्रन्थोंका अध्ययन करने के पश्चात् अन्य मतके भी शास्त्रोंका अध्ययन करे । और प्रत्येक मासकी दो अष्टमी और दो चतुर्दशीकी रात्रि में रात्रिप्रतिमायोग धारण करके द्रव्य पाप और भाव पापका नाश करे।' यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि यह जिन धर्मकी दीक्षाका विधान केवल द्विजातिब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकुलमें जन्म लेने वालोंके लिए है क्योंकि उन्हें ही जिनमुद्रा धारण करनेका अधिकार है। Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १६ धर्मामृत ( सागार) इस जैन धर्मकी दीक्षामें देशव्रत धारण करनेसे प्रथम तत्वार्थका निश्चय आवश्यक कहा है। च्योंकि तत्त्वार्थके निश्चयपूर्वक ही सम्यक्त्व होता है और सम्यक्त्वपूर्वक ही चारित्र धारणका विधान है। किन्तु आज उल्टो गंगा बह रही है। जिन्हें तत्त्वार्थका बोध भी नहीं, वे त्यागी और मुनि बनते हैं। और माना जाता है कि चारित्र धारण करनेसे सम्यक्त्व स्वतः प्राप्त हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि सात तत्त्वोंसे अपरिचित भी व्यक्ति चारित्र धारण करके केवल बाह्य आचरणको ही यथार्थ धर्म मानकर, आत्मज्ञानसे अछूता ही रहा जाता है। ऐसोंके लिए ही कहा गया है "मुनिव्रतधार अनन्तवार ग्रंवेयक उपजायो। पै निज आतमज्ञान विना सुख लेश न पायो ॥" आत्मज्ञानके बिना समस्त व्रताचरण व्यर्थ है। व्रताचरण वही यथार्थ होता है जो संसारका अन्त करता है। और संसारका अन्त वही कर सकता है जो सम्यक्त्व प्राप्त करके अनन्त संसारको सान्त कर लेता है। जिसका संसार अनन्त है वह मुनिपद धारण करके भी अनन्त संसारका अन्त नहीं कर सकता। अतः व्रतधारण से पूर्व गुरुमुखसे तत्त्वार्थका स्वरूप निश्चित करके उसकी यथार्थ श्रद्धा आवश्यक है। उसके बिना जैनत्वकी दीक्षा अधूरी है। . इसके प्रकाशमें जब हम आज जैनकुलमें उत्पन्न होनेसे अपनेको जैन कहलाने वालोंको देखते हैं तो घोर कष्ट होता है। तत्त्वार्थका ज्ञान तो आजके अनेक त्यागियों और मुनियों तकको नहीं, फिर साधारण गृहस्थोंकी तो बात ही क्या है। अब तो जैन बालक नमस्कार मन्त्र तकसे अपरिचित पाये जाते हैं। उन्हें जैनधर्मकी दीक्षा देनेका कोई प्रयत्न नहीं किया जाता। आज जैनेतर मिथ्यादष्टियोंको जैनधर्मकी दीक्षा देनेसे प्रथम जैनमिथ्यादृष्टियोंको जैनधर्मकी दीक्षा देना आवश्यक है। उसके लिए उन्हें द्रव्यसंग्रह और रत्नकरण्ड श्रावकाचार ये दो ग्रन्थरत्न पढ़ाना ही चाहिए। इससे उन्हें तत्त्व और श्रावकाचार दोनोंका बोध हो सकेगा और तब वे जैन कहलाने के पात्र बन सकेंगे । शद्र का धर्माधिकार-आशाधर जी ने आचार आदि शुद्धिसे विशिष्ट शद्रको भी ब्राह्मण आदि की तरह यथायोग्य धर्मक्रिया करनेका अधिकारी बतलाया है और उसके समर्थनमें सोमदेवसूरिके उपासकाध्ययन तथा नीतिवाक्यामृतसे उद्धरण दिये हैं। उपासक.ध्ययन में कहा है कि दीक्षाके योग्य तो तीन वर्ण हैं किन्तु आहारदान चारों दे सकते हैं। नीतिवाक्यामृतमें कहा है-आचारकी निर्दोषता अर्थात मद्य मांसका सेवन न करना, उपकरण आदि की पवित्रता और शारीरिक बिशुद्धि शुद्र को भी देव, द्विज और तपस्वियोंके परिकर्मके योग्य बनाती है । सागार धर्मामृत २।२२ में भी यही बात कही है। तथा साथ में यह भी कहा है कि कालादिलब्धिके अर्थात धर्माराधनकी योग्यताके होनेपर जीव श्रावकधर्मका आराधक हो सकता है। अर्थात् जिन दीक्षाका शत्र नहीं होनेपर भी शूद्र श्रावकधर्मका पालन कर सकता है। रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें सम्यग्दर्शनसे सम्पन्न चाण्डाल को भी देवतुल्य कहा है। इसी तरह पद्मपुराणमें व्रती चाण्डालको देवतुल्य कहा है। अहिंसाणुव्रतका पालन करनेवालों में भी यमपाल चाण्डाल प्रसिद्ध हुआ है। हिन्दू धर्मशास्त्रके अनुसार भी शूद्रके दो भेद होते है--भोज्यान्न, जिनके द्वारा बनाया गया भोजन ब्राह्मण कर सके और अभोज्यान्न तथा सत्शूद्र और असत्शूद्र । प्रथम प्रकार में वे शूद्र आते हैं जो सद्व्यवसाय करते हैं, द्विजातियोंकी सेवा करते हैं और मद्य मांसको त्याग चुके हैं। शूद्र वैदिक क्रियाएँ नहीं कर सकते हैं। उन्हें वेदाध्ययन करना मना है। किन्तु महाभारत पुराण आदि सुन सकते हैं। उन्हें केवल गृहस्थाश्रमका ही अधिकार है। दि. जैन साहित्यमें वर्णव्यवस्थाका वर्णन जिनसेनके महापुराणमें ही विस्तारसे मिलता है। किन्तु उसमें भी शूद्रके धर्माधिकारका स्पष्ट विवेचन नहीं है । श्रावकाचारोंमें भी आशाधरके श्रावकाचारमें ही स्पष्ट , Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना १७ विवेचन मिलता है। और उसपर सोमदेवका ही प्रभाव परिलक्षित होता है, जो जैनधर्मकी परम्परा और उदारताके सर्वथा अनुकूल है । आशाधरजीने लिखा है-अहिंसा या दयालुता, सत्य भाषण, परद्रव्यसे निवृत्ति, परिग्रह परिमाण और निषिद्ध स्त्रियों में ब्रह्मचर्य यह सर्वसाधारण धर्म है अर्थात् इसे प्रत्येक वर्णवाला पाल सकता है। किन्तु अध्ययन, दान, पूजन तीन ही वर्ण कर सकते हैं और अध्यापन, याजन और दान लेना ब्राह्मणोंका ही धर्म है । इस कथनमें हिन्दू शास्त्रोंका ही विशेष प्रभाव परिलक्षित होता है। उसमें ही ब्राह्मण वर्णको यह अधिकार दिया गया है। दक्षिणमें उपाध्याय ही पूजन कराते और दान लेते हैं। आगे आशाधरजोने जो धर्मपात्रोंको दान देने की प्रेरणा की है उसके साथ भी इसकी संगति नहीं बैठती है। धर्मपात्रोंको दान देनेकी प्रेरणा-धर्मपात्रोंको गुणानुरागवश दान देनेकी प्रेरणा करते हुए लिखा है कि गहस्थको समयिक, साधक, समयद्योतक, नैष्टिक, और गणाधिपोंको दान-सम्मान आदिसे सन्तुष्ट करना चाहिए । जैन धर्मके पालक गृहस्थ या मुनिको समयिक कहते हैं । ज्योतिष मन्त्र आदि लोकोपकारक शास्त्रों के ज्ञाताको साधक कहते हैं । जो शास्त्रार्थ आदिके द्वारा जिनमार्गकी प्रभावना करता है उसे समयद्योतक कहते हैं। जो मूलगुण और उत्तरगुणोंके साथ तपमें लीन होता है उसे नैष्ठिक कहते हैं। और धर्माचार्य या गहस्थाचार्यको गणाधिप कहते हैं। ये सब दान सम्मान आदिके अधिकारी माने गये हैं। किन्तु ये किसी वर्णविशेषसे सम्बद्ध नहीं हैं । अतः आशाधरजीका ब्राह्मणको ही दानका अधिकारी बतलाना उचित प्रतीत नहीं होता। दानके भेद-आचार्य जिनसेनजीने अपने महापुराणमें पात्रदान, दयादान, समक्रियादान और अन्वयदान ये चार भेद करके दानकी दिशाको नयी गति दी है। उसीका अनसरण सोमदेवके उपासकाध्ययनमें किया गया है । पण्डित आशाधरजीने भी उनका अनुसरण किया है । सोमदेवजीने पात्रके पांच भेद किये हैंसमयी, साधक, साध, आचार्य और समयदीपक । ज्योतिष शास्त्र, मन्त्रशास्त्र, निमित्तशास्त्र और प्रतिष्ठाशास्त्रके ज्ञाताओंका सम्मान करनेकी प्रेरणा करते हुए उन्होंने लिखा है यदि ये न हों तो मुनिदीक्षा तीर्थयात्रा और बिम्बप्रतिष्ठा वगैरह धार्मिक क्रियाएँ कैसे हो सकती है क्योंकि मुहूर्त देखनेके लिए ज्योतिविदोंकी, और प्रतिष्ठा करने के लिए मन्त्रशास्त्र के ज्ञाता पण्डितोंकी आवश्यकता होती है। यदि अन्य धर्मावलम्बी ज्योतिषियों और मान्त्रिकोंसे पूछना पड़े तो अपने धर्मकी उन्नति कैसे हो सकती है। अतः जैन मन्त्रशास्त्र, जैन ज्योतिषशास्त्र और जैन क्रियाकाण्डके ज्ञाताओंका सम्मान करना आवश्यक है। इसी तरह जो शास्त्रार्थ तथा वक्त त्व कौशल द्वारा जैन धर्मकी प्रभावना करनेमें तत्पर रहते हैं उनका भी समादर करना गृहस्थोंका कर्तव्य है। ये दान समदत्ति कहलाता है । आशाधरजीने समदत्तीके विधानका उपदेश करते हुए लिखा है जो नामसे और स्थापनासे भी जैन है वह अजैन पात्रोंसे विशिष्ट है । एक जैनका उपकार करना श्रेष्ठ है हजारों अजैनोंसे । यह कथन आशाधरजीके गम्भीर धर्मप्रेमका परिचायक है। समदत्ति---कन्यादान भी समदत्ति में आता है । आशाधरजीने साधर्मीको कन्या देनेका विधान किया है। जिसका धर्म, क्रिया, मन्त्र, व्रत आदि अपने समान हो उसे साधर्मी कहते हैं। साधर्मीको कन्या देनेका कारण बतलाते हुए उन्होंने लिखा है जैन धर्मकी धार्मिक क्रियाएँ उनके मन्त्र व्रत नियम आदि अन्य धर्मोंसे भिन्न हैं । यदि कन्या अजैन कुलमें दी जाती है तो उसके व्रतनियम, देवपूजा, पात्रदान आदि सब छूट जाते हैं इस तरहसे उसका धर्म ही छूट जाता है। इसलिए कन्या साधर्मोको ही देना चाहिए। चारित्रसारमें भी इसी तरहका कथन है और उसीका अनुसरण आशाधरजीने किया है । लोकप्रचलित पद्धतिके अनुसार सजातीयको कन्या देनेका परिचलन रहा है। तदनुसार लोग सजातीय विधर्मीको भी अपनी कन्या देते हैं और तीय साधर्मीको कन्या नहीं देते। वर्तमानमें जैनधर्मके अन्तर्गत उसको माननेवाली अनेक जातियां पायी जाती हैं जिनका पूर्व इतिवृत्त अन्धकारमें है । प्रायः उन सबका धर्मकर्म समान है फिर भी जातिभेदके कारण [३] Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८ धर्मामृत ( सागार ) उनमें रोटी-बेटी व्यवहार नहीं था। किन्तु कुछ समयसे आन्दोलनके कारण इन जातियोंमें परस्परमें विवाह सम्बन्ध होने लगे हैं और धर्मकी दृष्टिसे यह उचित ही है। जीवनमें धर्मका महत्त्व जातिकी अपेक्षा विशिष्ट है। उच्चजातिसे उच्चधर्मकी प्राप्ति होना सम्भव नहीं है। किन्तु उच्चधर्मका पालन करनेसे नियमसे परभवमें सज्जातित्व प्राप्त होता है। अतः जातिके सामने धर्मकी अवहेलना करना उचित नहीं है। आशाधरजीने कन्यादानको पाक्षिक श्रावकके कर्तव्योंमें स्थान देकर बहुत ही उचित किया है। अपनी ज्ञान-दीपिका नामक पंजिकामें उन्होंने विवाहके सम्बन्धमें मनुस्मृति, महापुराण, नीतिवाक्यामृत आदिसे बहुत-सी सामग्री संकलित की है जो पठनीय है। वर्तमान मनि-जैन मुनिकी चर्या अत्यन्त कठिन है और सामयिक स्थितिने उसे अत्यधिक कठिन बना दिया है। प्राचीन कालमें मुनि बनोंमें रहते थे। वही उनके दिगम्बरत्वके अनुकूल भी था। आचार्य न्तभद्रने अपने रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें ग्यारहवीं प्रतिमाके धारी श्रावकका वर्णन करते हुए लिखा है कि वह अपने घरसे मुनियोंके वनमें जाकर गुरुके पासमें व्रत ग्रहण करे और भिक्षा-भोजन करे तथा वस्त्रखण्ड रखे। उत्तरकालमें तो इसमें बहुत-सा परिवर्तन और परिवर्द्धन हो गया है। गुणभद्राचार्यने अपने आत्मानशासनमें कलिकालमें मुनियों के ग्रामके समीप बसनेपर खेद व्यक्त किया है। परिस्थितिवश दिगम्बर जैन मुनि भी मन्दिरोंमें रहने लगे और उनके निमित्त दानादि लेने लगे और इस तरहसे शिथिलाचारी दिगम्बर मनियोंसे ही भट्टारक पन्थ प्रवर्तित हुआ । जिन आगमाभ्यासियोंको यह अरुचिकर प्रतीत हुआ वे ऐसे मुनियोंकी आलोचना करने लगे, जैसे आज भी करते हैं । जो अधिक कठोर हुए उन्होंने शायद शिथिलाचारियोंको आहारदान देना भी बन्द कर दिया, ऐसा प्रतीत होता है। सोमदेव सुरिने अपने उपासकाध्ययनमें वर्तमान कालके मुनियोंका पक्ष लेते हए कहा है-'भोजनमात्र देने में तपस्वियोंकी परीक्षा करना अनुचित है। वे अच्छे हों या बुरे हों, गृहस्थ तो दान देनेसे शुद्ध होता है । जैसे तीर्थंकरोंकी प्रतिमाएं पूज्य हैं उसी प्रकार आजके मुनियोंको पूर्वमनियों की प्रतिकृति मानकर पूजना चाहिए।' आशाधरजीने भी उन्हींका अनुसरण करते हुए कथन किया है । जो धर्म स्नेहवश उचित ही है। किन्तु शिथिलाचारकी ओरसे आँख बन्द कर लेनेसे शिथिलाचार अनाचारका भो रूप ले लेता है और उससे पवित्र मुनिमार्ग ही दूषित हो जाता है। उसके दूषित होनेसे व्यक्ति और परम्परा दोनोंका ही अहित होता है। अतः जिनदीक्षा बहुत ही परीक्षापूर्वक देनी चाहिए। जिस किसीको भी मनिदीक्षा देनेसे पीछियोंकी संख्या अवश्य बढ़ जाती है किन्तु गुणोंमें ह्रास ही देखने में आता है। अतः आशाधरजीने जहाँ मुनियोंको उत्पन्न करनेकी प्रेरणा की है वहाँ उन्हें गुणवान् बनानेकी भी प्रेरणा की है। इस तरह सागारधर्मामतका यह दूसरा अध्याय साधारण श्रावककी दृष्टिसे बहुत ही महत्वपूर्ण है। किन्तु खेद यही है कि आजके जैनकुलमें उत्पन्न होने मात्रसे अपनेको जैन कहनेवाले पाक्षिक श्रावक भी नहीं हैं । वे केवल नामसे जैन है। उनमें जैनत्वका पक्ष तो है किन्तु यह भी नहीं जानते कि जन किसे कहते हैं। जिनमें धर्मके प्रति रुचि है उनमें भी दो पक्ष पड़ गये हैं। एक पक्ष तत्त्वज्ञानका प्रेमी है तो दूसरा पक्ष चारित्रका पक्षपाती है। किन्तु जैनत्वके लिए दोनों ही आवश्यक है। जैसे चारित्रशून्य तत्त्वज्ञान शोभित नहीं होता, वैसे ही तत्त्वज्ञानशून्य चारित्र उपयोगी नहीं होता । आशाधरजीने लिखा है "ज्ञानमयं तपोऽङ्गत्वात्तपोऽयं तत्परत्वतः । द्वयमयं शिवाङगत्वात्तद्वन्तोऽा यथागणम ।" 'तप (चारित्र) का कारण होनेसे ज्ञान पूज्य है और ज्ञानका कारण होनेसे तप भी पूज्य है। दोनों ही मोक्षके कारण हैं अतः दोनों पूज्य हैं। और जो ज्ञानी और तपस्वी हैं उन्हें भी उनके गुणोंके अनुसार पूजना चाहिए।' Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना अतः ज्ञानियोंको चारित्रधारियोंका समादर करना चाहिए और चारित्र के प्रेमियोंको ज्ञानियोंका समादर करना चाहिए। __ अन्तमें श्रावकको अपनी सहधर्मिणीमें ही सन्तान उत्पन्न करनेकी तथा उसे आचारमें दक्ष करने और कुमार्गसे बचानेकी प्रेरणा की गयी है। ज्ञानदीपिका पंजिकामें मनस्मतिसे अनेक श्लोक उदधत करके पत्रोंके भेद बतलाये हैं। आशाधरजी वैद्यक शास्त्रके भी पण्डित थे। उन्होंने अष्टांगहृदयपर टीका रची थी। अतः इस प्रकरणमें उन्होंने उससे अनेक श्लोक देकर पुत्रोत्पादनकी विधि भी विस्तारसे बतलायी है। वह सब विवाहसे पूर्व प्रत्येक वयस्क कन्या और युवकको जानना आवश्यक है। हमारे देशके युवक और युवतियाँ सिनेमाके द्वारा बहुत-सी कुशिक्षा तो प्राप्त करते हैं किन्तु उन्हें कामशास्त्र-विषयक आवश्यक ज्ञान देने में संकोचका अनुभव किया जाता है और इससे वे कुसंगतमें पड़ जाते हैं। आजके भोगप्रधान युगमें इस प्रकारकी सत् शिक्षा देना आवश्यक है जिससे विवाहसे पूर्व उन्हें स्त्री-पुरुष-विषयक आवश्यक बातोंका परिज्ञान हो जाये, और वे अतिप्रसंगसे बचकर संयमपूर्वक सन्ताननिरोधका भी मार्ग अपना सकें। संयमकी शिक्षाके अभाव में कृत्रिम उपायोंके अवलम्बनसे अयत्नाचारके साथ दुराचार भी बढ़ता है और उससे व्यक्तिके साथ समाजका भी नैतिक पतन होता है । नैतिक पतनके साथ धर्मकी संगति नहीं बैठ सकती। जो व्यक्ति नैतिक दृष्टिसे पतित है, छिपकर अनाचार करता है और उसे छिपानेके लिए धर्मपालनका ढोंग रचता है वह उस अनाचारीसे भी हीन है जो अपने दुराचारको छिपानेके लिए धर्मका ढोंग नहीं रचता । ऐसे ढोंगी धर्मात्माओं के कारण ही धर्मका पवित्र मार्ग मलिन होता है और आजके शिक्षित नवयुवक धर्मका परिहास करते हैं । अतः आज पाक्षिक-जनसाधारणके-जीवनको सुधारनेकी विशेष आवश्यकता है । और उसकी दृष्टिसे सागारधर्मामृतका यह अध्याय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। ३. तृतीय अध्याय नैष्ठिक श्रावक (दर्शनिक)- दुसरेके पश्चात तीसरेसे सातवें अध्याय तक नैष्ठिक श्रावकका कथन है । नैष्ठिकके ही भेद ग्यारह प्रतिमाएँ है। तीसरे अध्यायमें केवल दर्शन प्रतिमाका कथन है। रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें पहली प्रतिमावालेको सम्यग्दर्शनसे शद्ध, संसार शरीर और भोगोंसे विरक्त तथा पंचपरमेष्ठीके चरणोंको ही अपना शरण माननेवाला कहा है। उसीका विस्तार इस अध्यायमें है । 'पञ्चगुरुचरणशरणः'के स्थानमें 'परमेष्ठीपदैकधीः' पद दिया गया है। अर्थात पंच गुरुके चरणोंमें ही जिसकी अन्तर्दृष्टि है । यहाँ जो 'धी' के पहले 'एक' पद लगाया है उसकी सार्थकता बतलाते हुए आशाधरजीने अपनी पंजिका और टीकामें लिखा है-दर्शनिक श्रावक आपत्तियोंसे व्याकुल होकर भी शासन-देवता आदिको कभी भी नहीं भजता। किन्तु पाक्षिक भजता भी है, यह बतलाने के लिए 'एक' पद रखा है। ___आशाधरजी भट्टारक युगके विद्वान् थे और भट्टारक युगमें पद्मावती आदिकी भक्तिका प्रचार चालू था। उनसे पहले केवल सोमदेवने अपने उपासकाध्ययनमें शासन-देवोंका उलेख करते हुए कहा है कि जो पूजाविधानमें उन्हें जिनदेवके समान स्थान देता है उसकी अधोगति होती है। किन्तु आशाधरजीने उनका स्पष्ट रूपसे निषेध किया है । अनगारधर्मामृतकी अपनी टीकामें भी उन्होंने उन्हें कुदेव कहा है । खेद है कि आज भट्टारकपन्थी कुछ मुनियों और आचार्योंके द्वारा कुदेवपूजाका प्रचार चालू है जो स्पष्ट ही आगमविरुद्ध है। मनुष्य विपत्ति में पड़कर ही कुदेवोंकी ओर आकृष्ट होता है। किन्तु विपत्तिका कारण है मनुष्यका पूर्वबद्ध पापकर्म । कुदेवपूजासे तो वह दृढ़ ही होता है। एकमात्र जिनभक्ति ही उसे काटने में समर्थ है। अतः सच्चा जिनभक्त एकमात्र जिनदेवके सिवाय अन्य किसी भी कुदेवकी सेवा नहीं करता। रत्नकरण्डश्रावकाचारमें कुदेवसेवाको देवमूढ़ता कहा है । अस्तु, Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २० धर्मामृत ( सागार) रत्नकरण्डमें अष्टमूलगुणोंका तो कथन है किन्तु उन्हें किसी प्रतिमासे सम्बद्ध नहीं किया है। आशाधरजीने पाक्षिकको अष्टमूलगुणका धारी बतलाया है। अतः प्रथम प्रतिमाका धारी भी अष्टमूलगुणधारी होता है । अन्तर इतना है कि पाक्षिक सातिचार और दर्शनिक निरतिचार पालता है। ४. चतुर्थादि अध्याय व्रती श्रावक-श्रावकके बारह व्रतोंकी परम्परा अष्टमूलगुणोंसे भी प्राचीन है। आचार्य कुन्दकुन्दने अपने चारित्रप्राभूतमें बारह व्रतोंका ही कथन किया है। वे बारह व्रत हैं-पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत । तत्त्वार्थसूत्रके सातवें अध्यायमें भी इन्हींका विवेचन है । इन्हें ही उत्तरकालमें श्रावकके उत्तरगुण कहा है। जैसे पाक्षिक श्रावक अष्टमल गुणोंका पालन करता है उसी प्रकार पूर्वमें श्रावक इन बारह व्रतोंका पालन करता था और उनका पालन करनेसे वह श्रावक कहलाता है। उस समयमें श्रावकके पाक्षिकादि भेद प्रचलित नहीं थे । केवल ग्यारह प्रतिमारूप ही श्रावकके भेद थे। उसकी नैष्ठिक संज्ञा भी उत्तरकालोन है। बारह व्रतोंका सातिचार पालन करनेसे साधारण श्रावक होता था। और निरतिचार पालन करनेसे व्रतप्रतिमाका धारी व्रतिक श्रावक होता था। रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें व्रतिक प्रतिमाका यही स्वरूप कहा है। तत्त्वार्थसूत्र में व्रतीको निःशल्य कहा है। अर्थात् जो माया, मिथ्यात्व और निदान इन तीन शल्योंसे रहित होकर व्रत धारण करता है वही व्रती है, केवल व्रत धारण करनेसे कोई व्रती नहीं होता। मायाचार, मिथ्यात्व और निदानका त्याग किये बिना अन्तरंग शुद्धि सम्भव नहीं है। किन्तु व्रतोंके बाह्य रूपकी ओर जितना ध्यान दिया जाता है उसका शतांश भी ध्यान अन्तरंगकी ओर नहीं दिया जाता। और व्रत धारण करने मात्रसे ही व्रती मान लिया जाता है । आचार्य अमितगतिने अपने श्रावकाचारमें निदानके दो भेद किये हैं.-प्रशस्त और अप्रशस्त । तथा प्रशस्तके भी दो भेद किये हैं-एक संसारका हेतु और एक मुक्तिका हेतु । जिनधर्मकी सिद्धि के लिए यह याचना करना कि मुझे उत्तमजाति, उत्तमकुल प्राप्त हो, ऐसा निदान भी संसारका हेतु है तथा कर्मोका विनाश, संसारके दुःखसे छुटकारा, बोधि, समाधि आदिकी प्राप्तिकी आकांक्षा करना मुक्तिका हेतु निदान है। यह मुक्तिका हेतु निदान भी नीचेकी भूमिकाम ही अच्छा माना गया है। पद्मनन्दि पंचविशतिकाम। कि मोहवश मोक्षकी भी अभिलाषा मोक्षकी प्राप्तिमें बाधक है तब अन्य अभिलाषाओंका तो कहना ही क्या है । अतः मुमुक्षुको सब अभिलाषाएँ त्यागकर अध्यात्मरत होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारम्भमें अणुव्रत साधारण थे। किन्तु उत्तरकालमें उनमें कठिनता आ गयी। पूज्यपादने अपनी सर्वार्थसिद्धिमें 'अणुव्रतोऽगारी' सूत्रकी व्याख्याने पाँच अणुव्रत इस प्रकार कहे हैं-त्रसहिंसाका त्याग अहिंसाणुव्रत है । स्नेह, मोह आदिके वश होकर ऐसा झूठ न बोलना, जो किसीका घर उजाड़ दे या गांव उजाड़ दे सत्याणुव्रत है । जिसके लेने में राजभय आदि हो ऐसी दूसरोंके द्वारा त्यागी हुई वस्तुके प्रति भी बिना दिये ग्रहणका भाव न होना अचौर्याणुव्रत है। किसीके द्वारा स्वीकृत या अस्वीकृत परस्त्रीके साथ रति न करना ब्रह्मचर्याणुव्रत है। और धनधान्य, खेत आदिका इच्छावश परिमाण करना परिग्रहपरिमाण अणुव्रत है। ये पाँचों ही अणुव्रत ऐसे हैं जिन्हें साधारण गृहस्थ सरलतासे पाल सकता है। किन्तु त्रसहिंसाके त्यागमें मन-वचन-काय और कृत, कारित, अनुमोदना रूप नौ संकल्प जोड़नेसे अहिंसाणुव्रतका पालन भी साधारण गृहस्थके लिए कठिन हो गया। उत्तरकालमें आचार्योंका ध्यान इस ओर गया प्रतीत होता है। आचार्य अमितगतिने अपने श्रावकाचारमें हिंसाके दो भेद किये हैं-आरम्भी और अनारम्भी। जिसने गृहवास त्याग दिया है वह दोनों प्रकारकी हिंसासे विरत रहता है। किन्तु गृहवासी श्रावक आरम्भी हिंसाका त्याग नहीं कर सकता। Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना २१ रात्रिमें पूजन आदि - अहिंसाणुव्रतके अन्तर्गत रात्रिभोजन - निषेध की भी चर्चा की गयी है और कहा है कि जिस रात्रि के समयमें अन्य धर्मावलम्बी भी कोई सत्कर्म करना पसन्द नहीं करते उसमें कौन भोजन करेगा । उन सत्कर्मोंमें सत्पात्रदान, स्नान, देवपूजा, आहुति और श्राद्ध गिनाये हैं तथा उद्धृत श्लोकोंमें एक श्लोक इस प्रकार है "नैवाहुतिर्न च स्नानं न श्राद्धं देवतार्चनम् । दानं चाविहितं रात्रौ भोजनं च विशेषतः ॥" किन्तु आजकल कहीं-कहीं, जहाँ भट्टारकपन्थ प्रवर्तित है, रात्रिमें अभिषेक पूजन होता है । और भट्टारकपन्थी मुनि भी उसमें योगदान करते हैं । ऐसा करना आगमविरुद्ध है । ब्रह्माणुव्रत – रत्नकरण्ड श्रावकाचार में ब्रह्माणुव्रतका स्वरूप इस प्रकार कहा है " न तु परदारान् गच्छति न परान् गमयति च पापभीतेर्यत् । सा परदारनिवृत्तिः स्वदार संतोषनामापि ॥" 'जो पापके भयसे न तो परस्त्रियोंसे रमण करता है और न दूसरोंसे रमण कराता है वह परदारनिवृत्ति है उसीका नाम स्वदारसन्तोष भी है । इस व्रत अतिचारोंमें भी इत्वरिकागमन नामक एक ही अतिचार गिनाया है । किन्तु तत्त्वार्थ सूत्र में इत्वरिकाके दो भेद करके दो अतिचार अलग-अलग गिनाये हैं - एक इत्वरिका परिगृहीतागमन, दूसरा इत्वरिका अपरिगृहीतागमन । इत्वरिकाका अर्थ है परपुरुषगामिनी व्यभिचारिणी स्त्री । उसके दो प्रकार हैं - जिसका स्वामी एक पुरुष है वह परिगृहीता है और जिसका कोई स्वामी नहीं है ऐसी गणिका वगैरह अपरिगृहीता है । इसीसे पूज्यपाद स्वामीने ब्रह्माणुव्रत स्वरूपमें परिगृहीत और अपरिगृहीत परस्त्रीके साथ रतिके त्यागको ब्रह्माणुव्रत कहा है । आशाधरजीने इस व्रतको स्वदारसन्तोष नाम दिया है। 'जो पापके भयसे मन वचन - काय और कृतकारित अनुमोदनासे अन्य स्त्री और प्रकट स्त्रीको न स्वयं भजता है और न दूसरोंसे ऐसा कराता है वह स्वदारसन्तोषी है ।' इसकी व्याख्यामें उन्होंने अन्यस्त्रीके दो भेद किये हैं- परिगृहीता और अपरिगृहीता । जिसका स्वामी है वह परिगृहीता है । और जो अनाथ कुलस्त्री है या जिसका पति विदेश में है या परित्यक्ता है वह अपरिगृहीता है । तथा प्रकटस्त्री वेश्या है । इस तरह उन्होंने वेश्याको अन्यस्त्री - या परिगृहीत और अपरिगृहीत इत्वरिका से अलग कर दिया है । और लिखा है यह ब्रह्माणुव्रत निरतिचार अष्टमूलगुणोंके पालक विशुद्ध सम्यग्दृष्टि श्रावकके कहा है । किन्तु जो स्वस्त्रीके समान साधारण स्त्रियों का भी त्याग करनेमें असमर्थ है और केवल परस्त्रियोंका ही त्याग करता है वह भी ब्रह्माणुव्रती कहा जाता | क्योंकि ब्रह्माणुव्रतके दो भेद हैं- स्वदारसन्तोष और परदारनिवृत्ति । यह बात ऊपर अन्यस्त्री और प्रकटस्त्री इन दोनों के सेवनका निषेध करनेसे प्रकट होती है ।' अपने इस मत के समर्थन में आशाधरजीने श्वेताम्बराचार्य हेमचन्द्रके योगशास्त्रका प्रमाण दिया है । उसके पश्चात् सोमदेव सूरीके उपासकाध्ययनका प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत किया है "वधूवित्तस्त्रियो मुक्त्वा सर्वत्रान्यत्र तज्जने । माता स्वसा तनूजेति मतिर्ब्रह्मगृहाश्रमे ॥” ' अर्थात् वधू (पत्नी) और वित्तस्त्री (वेश्या) को छोड़कर अन्य सब स्त्रियों में माता, बहन, बेटीकी बुद्धि होना गृहस्थों का ब्रह्मचर्य है ।' Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत (सागार) हेमचन्द्र तो सोमदेवके पश्चात् हुए है । अतः सम्भवतया सामयिक परिस्थितिसे प्रेरित होकर सोमदेवने ही ब्रह्माणुव्रतसे वेश्याको अलग कर दिया है। और ब्रह्माणुव्रतके अभ्यासियों के लिए ऐसी छूट देना अनुचित भी नहीं है। उसके बिना त्यागमार्ग चल नहीं सकता। फिर ब्रह्मचर्य तो सब व्रतोंमें कठिन है। जनोंको कामसे विमुख करने के लिए केवल परस्त्रीका त्याग कराना भी उचित ही है। और इसी दृष्टिसे इसे देखना भी चाहिए । व्रतोंके अतिचार-व्रतका ध्यान रखते हुए भी जो उसके एक देशका भंग हो जाता है उसे अतिचार कहते हैं। अतिचारोंकी परम्पराका उद्गम तत्त्वार्थसूत्र ही प्रतीत होता है। प्रायः सभी श्रावकाचारोंमें उसीके अनुसार अतिचार गिनाये हैं। रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें ही क्वचित् अन्तर प्रतीत होता है । दूसरी व्रत प्रतिमाके धारी श्रावकके लिए तो अतिचार त्याज्य हैं। अतः ये अतिचार तो प्रायः अभ्यासीके लिए ही सम्भव हैं। वही इस प्रकारकी मोटी गलतियां कर सकता है। इनके पीछे आचार्योंकी उदात्त भावना तथा मानव मनकी कमजोरियोंके प्रति सहिष्णुताका भाव भी रहा है। अतिचार लगाते हुए भी यदि व्रती अपने व्रतकी मूलभावनाके प्रति जागरूक रहे तो वह अतिचारोंको भी छोड़ने में सक्षम हो सकता है । अतिचारोंके भयसे यदि व्रत ही ग्रहण न करे तो वह कभी व्रती नहीं हो सकता। उदाहरणके लिए जिस व्यक्तिको चोरीकी आदत है यदि वह चोरी न करनेका व्रत लेता है किन्तु अपनी आदतवश चोरी न करके भी किसीको चोरीका उपाय बताता है तो उसका यह अपराध क्षम्य ही कहा जायेगा। यही बात सत्य बोलनेका व्रत लेकर झूठी गवाही देनेके सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। किन्तु परिगृहीत और अपरिगृहीत परस्त्रीका त्याग करके भी उनका सेवन अतिचार माना गया है यह खटक सकता है। परन्तु जिसने नया व्रत लिया है, पुरानी आदतवश यदि कदाचित् उससे भूल हो जाये तो ऐसी स्थितिमें ही उसे अतिचारको संज्ञा दी जा सकती है। अतिचार छूट नहीं है, दोष है । और बार-बार दोष लगानेसे व्रत भंग हो सकता है। इसलिए उनकी ओरसे सावधान करने के लिए ही अतिचार कहे गये हैं। आचार्य अमितगतिने अपने सामायिक पाठमें अतिचारसे पूर्व अतिक्रम और व्यतिक्रम कहे हैं। यथा "क्षतिं मनःशुद्धिविधेरतिक्रमं व्यतिक्रमं शीलवृतेविलवनम् । प्रभोऽतिचारो विषयेषु वर्तनं वदन्त्यनाचारमिहातिसक्तताम् ।। "मनकी शुद्धिकी विधिमें कमी आना अतिक्रम है। शीलकी बाड़को लांघना व्यतिक्रम है, विषयोंमें प्रवृत्ति अतिचार है और उनमें अतिआसक्ति अनाचार है।" इसमें अतिचारका लक्षण विषयोंमें प्रवृत्ति कहा है। किन्तु वह प्रवृत्ति व्रतका ध्यान रखते हुए भो कदाचित् ही होना चाहिए । इसके अनुसार जो अतिचार बतलाये गये हैं वे प्रायः सब सुघटित हो सकते हैं। असलमें तो प्रथम अवस्था अतिक्रम है। मानसिक शुद्धि में क्षति आये बिना त्यागे हुए विषयमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः प्रारम्भसे ही सावधान रहनेसे अतिचारका प्रसंग नहीं आ सकता। किन्तु उसके लिए व्रतीको सतत जागरूक रहना आवश्यक है। जो लोग लौकिक प्रतिष्ठा या भावुकतावश व्रत धारण करते हैं वे प्रायः बाहरसे तो सावधान रहते हैं किन्तु अन्तरंगसे सावधान नहीं रहते । अतः उनके व्रत प्रायः सातिचार ही रहते हैं । संसार शरीर और भोगोंसे अन्तरंगसे उदासीन वही होता है जो सम्यग्दर्शनसे शुद्ध होता है। और सम्यग्दर्शन केवल प्रयत्नसाध्य नहीं है, ब्रतोंकी तरह उसे ऊपरसे नहीं ओढ़ा जा सकता। और उसके बिना सब व्रताचरण निष्फल हैं। अतः व्रतीको सम्यग्दर्शनकी शुद्धिके लिए सदा तत्त्वचिन्तनमें रत रहना चाहिए क्योंकि तत्त्वदृष्टिके बिना सम्यग्दृष्टि प्राप्त नहीं होती। Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना ६. षष्ठ अध्याय श्रावककी दिनचर्या-चतुर्थ और पंचम अध्यायमें बारह व्रतोंका वर्णन करनेके पश्चात् छठे अध्यायमें श्रावककी दिनचर्या बतलायी है। श्रावकाचारोंकी दृष्टिसे यह एक बिलकुल नवीन वस्तु है । किसी भी श्रावकाचारमें यह नहीं मिलती। किन्तु यह आशाधरजीकी अपनी उपज नहीं है। हेमचन्द्राचार्यके योगशास्त्रसे ही उन्हें इसकी प्रेरणा मिली है । और उन्होंने उसे अपनी दृष्टिसे ग्रथित किया है। यथार्थ में मुमुक्ष श्रावककी अपनी एक ऐसी दिनचर्या होना आवश्यक है जिसमें वह अपना समय धर्मध्यानपूर्वक बिता सके तथा अपना गृहस्थाश्रम भी चला सके । _ व्रती श्रावकको ब्राह्म मुहूर्तमें उठते ही नमस्कार मन्त्रका जाप करनेके पश्चात् 'मैं कौन हूँ, मेरा क्या धर्म है, मेरे व्रताचरणकी क्या स्थिति है' इत्यादि विचार करना चाहिए। ऐसा करनेसे शुभोपयोगपूर्वक अपने जीवनका ढाँचा अपनी दृष्टि में रहता है। और अपनी कमियाँ सामने आती हैं तथा उनको सुधारनेका अवसर मिलता है । उसके पश्चात् नित्यकृत्यसे निवृत्त होकर देवदर्शन-पूजन आदि करना चाहिए। आशाधरजीने मन्दिर जाते समयसे लेकर मन्दिरसे निकलकर घर जाने तककी जो विधि-विचार वर्णित किये हैं वे सब बहुत ही उपयोगी हैं । प्रातःकालका समय है । सूर्योदय हो रहा है। उसे देखकर मन्दिरकी ओर जाता हुआ श्रावक सूर्यको देखकर अर्हन्तदेवका स्मरण करता है कि उन्होंने भी जगत्का अज्ञानान्धकार दूर किया था। पैर धोकर वह मन्दिरमें प्रवेश करता है और स्तुति पढ़ते हुए नमस्कारपूर्वक तीन प्रदक्षिणा देता है। वह बिचारता है-यह मन्दिर समवसरण है, यह जिनबिम्ब साक्षात् अर्हन्तदेव हैं। मन्दिरमें उपस्थित स्त्री-पुरुष समवसरणमें स्थित भव्यप्राणी है । ऐसा विचारते हुए वह हृदयसे सबकी अनुमोदना करता है । जो जिनवाणीका पाठ करते हैं, व्याख्यान करते हैं तन मनसे उनकी सराहना करता है। उनका उत्साह बढ़ाता है और अपने घर पहुँचकर व्यवसायमें लग जाता है । पीछे मध्याह्नकी वन्दना करके भोजन करता है। भोजनसे पहले अतिथिकी प्रतीक्षा करता है। अपने परिवारके सब लोगोंको भोजन कराता है, दयाभावसे जो अपने आश्रित नहीं हैं उनको भी भोजन कराता है तब स्वयं भोजन करता है। रात्रिमें जब नींद खुल जाती है तो वैराग्य भावनाका ही चिन्तन करता है। सच्चे मुमुक्षु श्रावककी दिनचर्या ऐसी ही पवित्र होती है। ऐसा पवित्र श्रावक जीवन बिताने के पश्चात् जो मुनि बनते हैं वे मोक्षके पात्र होते हैं । अस्तु । ७. सप्तम अध्याय सातवें अध्यायमें शेष दस प्रतिमाओंका विवेचन है । अन्तिम उद्दिष्ट त्याग प्रतिमाका वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें वणित ग्यारहवीं प्रतिमाके स्वरूपके प्रकाशमें उसे देखनेपर लगता है कि एक हजार वर्षके अन्तरालमें कितना परिवर्तन और परिवर्धन हुआ है। खण्डवस्त्रधारी भिक्षाभोजी उद्दिष्ट श्रावकके कितने भेद-प्रभेद हो गये हैं ? आशाधरजीने उपलब्ध सभी सामग्रीको संकलित कर दिया है। ८. अष्टम अध्याय अन्तिम आठवें अध्यायमें श्रावकके तीसरे भेद साधकका वर्णन विस्तारसे है, जो जीवनका अन्त आनेपर प्रीतिपूर्वक शरीर और आहार आदिका ममत्व छोड़कर सल्लेखनापूर्वक प्राणत्याग करता है वह साधक श्रावक कहलाता है । Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४ धर्मामृत ( सागार) भगवती आराधनामें केवल इसीका वर्णन है। आशाधरजीने उसीका दोहन करके इस अध्यायमें सल्लेखनाके सम्बन्धमें सभी उपयोगी बातें निबद्ध कर दी है। उसे पढ़ने से ज्ञात होता है कि समाधिमरणका कितना महत्त्व था। उसके लिए आचार्य भी अपने संघका भार सुयोग्य शिष्यको देकर दूसरे संघमें समाधिमरणके लिए जाते थे। उसके लिए सबसे प्रथम समाधिमरण कराने में दक्ष निर्यापकाचार्यकी खोज की जाती थी। और निर्यापकाचार्य तथा साधुसंघ उस एक व्यक्तिकी समाधिमें लग जाता है। आशाधर उसे आर्योंका महायज्ञ कहते हैं । सचमुच में महायज्ञ यही है। इसीमें कर्मोकी आहुति देकर श्रावक मोक्षका पात्र बनता है। इस तरह सागारधर्मामृत में प्रारम्भिक श्रावकसे लेकर उत्कृष्ट श्रावक तक की सब क्रियाएँ विस्तारसे वर्णित की गयी हैं। अन्त में समाधिमरणमें स्थित श्रावकको लक्ष्य करके कहा है "शुद्धं श्रुतेन स्वात्मानं गृहीत्वार्य स्वसंविदा। भावयंस्तल्लयापास्तचिन्तो मृत्वैहि निर्वृतिम् ॥" 'हे आर्य ! श्रुतज्ञानके द्वारा शुद्ध-द्रव्यकर्म, नोकर्म भावकर्मसे रहित अपनी आत्माका निश्चय करके और स्वसंवेदनके द्वारा उसका अनुभव करके उसीमें लीन होकर सब विकल्पोंको दूर करके मोक्षको प्राप्त करो।' इस एक ही श्लोकके द्वारा आशाधरजीने मोक्षप्राप्तिका मार्ग संक्षेपमें बतला दिया है। सबसे प्रथम मुमुक्षको आत्माके शुद्ध स्वरूपका निर्णय जिनागमके अभ्याससे करना चाहिए। उसके पश्चात् स्वसंवेदनके द्वारा उसकी अनुभूति करना चाहिए। वही स्वानुभूति है, उसीके द्वारा उसीमें लीन होकर उसे प्राप्त किया जाता है । ऐसी शुद्धात्माकी उपलब्धिका नाम ही मोक्ष है । उसीके लिए सब बाह्याचार हैं। अन्तमें इसके अनुवादके सम्बन्धमें दो शब्द कहना चाहते हैं । इसका अनुवाद प्रारम्भ करते समय भव्यकमद चन्द्रिका टीका तो हमारे सामने थी और उसमें चर्चित विषयोंको हमने यथास्थान लिया है किन्तु ज्ञानदीपिकाकी प्राप्ति विलम्बसे होनेसे उसका पूरा उपयोग अनुवादमें नहीं हो सका। ज्ञानदीपिका पूर्वाचार्योंके उद्धरणोंसे ओत-प्रोत है । श्रावकाचारमें प्रतिपादित सभी विषयोंसे सम्बद्ध उद्धरण उसमें संकलित है और इस दृष्टिसे वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। धर्मामृतका ज्ञानदीपिका टीकाके साथ प्रकाशित यह संस्करण स्व. डॉ. उपाध्येकी योजनाका ही सुपरिणाम है । खेद है कि वे इसे न देख सके । अपनी योजनाको कार्यरूपमें परिणत देखकर अवश्य ही उन्हें स्वर्गमें आनन्दका अनुभव होगा। इन शब्दों के साथ उनका पुण्यस्मरण करते हुए हम उनके प्रति बहुभानपूर्वक अपनी इस कृतिको उनकी स्मतिमें उपहृत करते हैं। -कैलाशचन्द्र शास्त्री दीपावली वी. नि. सं. २५०४ Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रथम अध्याय मंगलपूर्वक प्रतिशा सागारका लक्षण प्रकारान्तरसे सागारका लक्षण सम्यक्त्व और मिथ्यात्वकी महिमा मिथ्यात्यके भेद और उनका प्रभाव सम्यग्दर्शनकी सामग्री सच्चे उपदेष्टाओं की दुर्लभता भद्रका लक्षण गृहस्थधर्मका पालक कौन सम्पूर्ण सागारधर्म असंयमी सम्यग्दृष्टिका महत्त्व गृहस्थको धर्म, यश और सुसका भी उपभोग करना चाहिए सम्यक्त्व के अनन्तर देशसंयम धारण करनेकी प्रेरणा प्रतिमाधारी धावकका अभिनन्दन ग्यारह प्रतिमा जिनपूजा और दानके भेद पक्ष, चर्या, साधनका स्वरूप श्रावकके तीन भेद द्वितीय अध्याय गृहस्थधर्मपालनकी अनुज्ञा आठ मूलगुण स्वमत और परमतसे मूलगुण मय के दोष मांस भक्षणके दोष स्वयं मरे प्राणीके मांसभक्षण में दोष मांसभक्षणका संकल्प भी हानिकर मांस और अनमें अन्तर [४] विषयानुक्रमणिका १- ३९ मधुके दोष १ २ ३ ५ ८ १० २१ २४ २५ २९ २१ ३२ ३४ ३७ ३९ ४०-११९ ४० ४१ ४२ ४४ ४६ ४९ ५१ ५२ मक्खन के दोष पाँच उदुम्बर फलोंके भक्षण में दोष रात्रिभोजननिषेध पाँच पापोंके त्यागका अभ्यास भी आवश्यक जुआ आदि व्यसनोंका निषेव प्रकारान्तरसे आठ मूलगुण द्विज जिनधर्मके श्रवणका अधिकारी कब जैनकुलमें उत्पन्न भव्यों का महत्व जैनेतर कुलमें उत्पन्न भव्योंका कर्तव्य आठ दीक्षान्वय क्रियाओंका वर्णन शूद्र भी यथायोग्य धर्मका अधिकारी नित्यपूजाका स्वरूप अष्टाह्निक, इन्द्रध्वज और महापूजाका स्वरूप कल्पद्रुम पूजाका स्वरूप जलादिपूजाका फल जिनपूजाकी सम्यक् विधि तथा उसका फल जिनपूजामें विघ्नोंको दूर करनेका उपाय स्नान करके ही पूजा करनेका अधिकार चरम आदिके निर्माणका विशेष फल कलिकालकी निन्दा कलिकाल में धर्मस्थितिका मुनियोंके लिए वसतिका मूल जिनालय स्वाध्यायशाला, भोजनशाला, औषधालयकी आवश्यकता जिनपूजकों के सब कष्ट दूर जिनवाणीकी पूजाका विधान जिनवाणी के पूजक जिनपूजक ही हैं गुरु-उपासनाकी विधि दान देनेका विधान तथा फल दानके अधिकारी समदतिका विधान ५३ ५५ ५५ ५६ ५९ ५९ ६३ r ६५ ६७ ६७ ७० ७२ ७३ ७४ ७४ ७६ ७८ ७८ ८० ८१ ८२ ८३ ८३ ૮૪ ८५ ८५ ८६ ८७ ८८ ९० Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६ १२३ १२९ धर्मामृत ( सागार) जैनोंको दान देनेका महत्त्व ९० नैष्ठिकके ग्यारह भेद नामादि निक्षेपसे चार प्रकारके व्रतमें अतिचार लगानेवाला नैष्ठिक पाक्षिक जैनोंमें उत्तरोत्तर पात्रता ० होता है १२३ भाव जैनको दान देनेका विशेष फल दर्शनिकका स्वरूप १२५ गृहस्थाचार्यको कन्यादि दान __ मद्य आदिके व्यापारका भी निषेध १२६ साधर्मीको कन्या देने में हेतु २२ मद्यादिके सेवन करनेवालोंके साहचर्यका कन्यादानकी विधि और फल ९२ निषेध १२६ विवाहके भेद ९४ सब प्रकारके अचार आदिका निषेध १२७ विवाहविधि चमड़ेके पात्र में रखे घी-तेल आदिका निषेध १२७ योग्यकन्याके दाताको महान् पुण्यबन्ध पुष्पोंके खानेका निषेध सत्कन्याका पाणिग्रहण आवश्यक अजानाफल, बैगन, कचरिया आदि खानेका सत्कन्याके विना दहेजदान व्यर्थ निषेध १२९ साधर्मीको धन देनेका विधान १०० दिनके आदि तथा अन्तिम मुहर्तमें भोजन वर्तमान मुनियोंमें पूर्वमुनियोंकी स्थापना करके करनेका निषेध १३० पूजनेका विधान १०० जलगालन व्रतके अतिचार १३१ खान और तप पूजनीय १०२ सात व्यसनोंके उदाहरण १३१ पात्रदानका फल १०३ व्यसन शब्दकी निरुक्ति १३३ उत्तम, मध्यम, जघन्य पात्रका स्वरूप और द्यूतत्यागके अतिचार १३४ उनको दान देनेका फल १०४ वेश्याव्यसन त्यागके अतिचार अपात्रदान व्यर्थ १०८ चौर्यव्यसन त्यागके अतिचार १३५ भोगभूमिमें उत्पन्न जीवोंकी जन्मसे लेकर सात शिकार खेलनेके त्यागके अतिचार १३५ सप्ताह तककी अवस्थाका वर्णन १०९ परस्त्रीव्यसन त्यागके दोष अन्नादि दानका फल ११० अनारम्भवध और उत्कट आरम्भका निषेध मनियोंको उत्पन्न करने और उन्हें गुणी धर्मके विषयमें पत्नीको शिक्षित करनेका बनानेके प्रयत्न करनेकी प्रेरणा १११ विधान १३७ दयादत्तिका विधान ११२ स्त्रीको शिक्षा १३८ दिनमें भोजन करनेका विधान ११३ स्वस्त्रीमें अति आसक्तिका निषेध १३८ व्रतका स्वरूप ११४ कुलस्त्रीमें ही पुत्र उत्पन्न करनेका विधान १३९ विचारपूर्वक व्रत लेना आवश्यक ११४ बारह प्रकारके पुत्र १३९ संकल्पी हिंसाके त्यागका उपदेश ११५ कुलस्त्रीकी रक्षाका विधान १४० हिंस्र आदि प्राणियोंके वधका निषेध वैद्यक शास्त्रके अनुसार पुत्रोत्पादनकी विधि १४१ तीर्थयात्रादि करनेका उपदेश ११७ सत्पुत्रकी आवश्यकता १४३ यश कमानेपर जोर ११८ ११८ चतुर्थ अध्याय यश कमानेका उपाय १४५-२०३ वतिक प्रतिमाका स्वरूप १४५ तृतीय अध्याय १२०-१४४ निदानके भेद और उनका स्वरूप १४५ नैष्ठिक श्रावकका स्वरूप १२० तीन शल्य १४६ छह लेश्याओंका स्वरूप १२१ शल्य सहचारी व्रतोंकी निन्दा १४७ १३४ १३५ Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विषयानुक्रमणिका २७ १८४ १८६ १८७ १८९ १९० १९१ १९१ १५६ १९२ १९६ १९७ १९८ १९९ २०४.२५५ २०४ २०५ २०६ श्रावकके उत्तर गुण १४७ अचौर्याणवतके अतिचार सामान्यसे पांच अणुव्रत १४८ स्वदार सन्तोषाणुवत स्वीकारकी विधि हिंसा आदिको स्थूल कहनेका कारण १५२ स्वदार सन्तोषीका स्वरूप अहिंसाणुव्रतका स्वरूप १५३ स्त्रीसम्भोग दुःखरूप नव संकल्प १५४ परस्त्रीरमणमें सुखका अभाव घरमें रहनेवाले गहस्थके अहिंसाणुव्रतका स्वस्त्रीगमनमें भी हिंसा स्वरूप १५५ ब्रह्मचर्यकी महिमा स्थावर जीवोंकी भी हिंसा न करनेका विधान १५५ ब्रह्माणुव्रतके अतिचार संकल्पी हिंसाके त्यागका उपदेश परिग्रहपरिमाण अणुव्रतका स्वरूप हिंसा क्यों छोड़ना चाहिए ? १५६ अन्तरंग परिग्रह अहिंसाणुव्रतका पालक कौन ? १५७ बहिरंग परिग्रहके त्यागकी विधि अहिंसाणुव्रतके अतिचार १५७ परिग्रहके दोष गाय-बैल आदिसे जीविका करनेका निषेध १५९ परिग्रहपरिमाण अणुव्रतके अतिचार अतिचारका लक्षण १६१ हिस्य-हिंसक आदिका लक्षण १६२ पंचम अध्याय अहिंसावतको निर्मल रखनेकी विधि १६२ तीन गुणवत अहिंसाका पालन कठिन नहीं है १६४ दिग्विरतिव्रतका स्वरूप रात्रिमें चारों प्रकारके आहारका निषेध १६५ दिग्व्रतसे अणुव्रती भी महाव्रतीके समान रात्रिभोजनमें दोष १६६ दिग्विरतिके अतीचार दृष्टान्त द्वारा रात्रिभोजन दोषकी महत्ता १६७ अनर्थदण्डवतका लक्षण अन्यमतोंमें भी रात्रिमें पात्रदान आदिका निषेध १६८ पापोपदेशका स्वरूप रात-दिन खानेवाले पशुके तुल्य १६९ हिंसोपकरणदानका स्वरूप रात्रि भोजन न करनेवालोंका आधा दुश्रुति-अपध्यानका स्वरूप जीवन उपवासपूर्वक १६९ प्रमादचर्याका स्वरूप भोजनके अन्तराय १७० अनर्थदण्ड विरतिके अतिचार मौनव्रतकी प्रशंसा १७१ भोगोपभोग परिमाणवत मौनव्रतका उद्यापन १७३ भोग और उपभोगका लक्षण मौन कब रखना आवश्यक है ? १७४ भोगोपभोगपरिसंख्यानके पाँच भेद सत्याणुव्रतका स्वरूप १७४ भोगोपभोगपरिमाणमें त्याज्य वस्तु सत्य-सत्य वचनका स्वरूप १७७ अनन्तकाय और द्विदल त्याज्य असत्य-सत्य और सत्यासत्यका स्वरूप १७८ भोगोपभोगपरिमाणके अतीचार असत्य-असत्यका स्वरूप १७८ भोगोपभोगपरिमाणमें त्याज्य खरकर्म सत्याणुव्रतके अतिचार १८० शिक्षाव्रत अचौर्याणुव्रतका लक्षण देशावकाशिकव्रत बिना दिये हुए तणको भी ग्रहण करनेसे देशावकाशिकव्रतके अतीचार बचौर्य-व्रतभंग १८२ सामायिकका स्वरूप गड़े धनका स्वामी राजा १८३ सामायिकका समय सन्देहमें अपना धन लेनेसे भी व्रतभंग १८३ सामायिकमें ध्येय २०७ २०८ २०९ २०९ २१० २११ २१२ २१४ २१४ २१५ २१७ २१८ २२० २२२ २२६ २२७ २२९ २३० २३२ २३३ Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८ सामायिककी सिद्धिके लिए पूजादि आवश्यक सामायिकके अतिचार प्रोषधव्रतका लक्षण मध्यम और जघन्य प्रोषध प्रोषधकी विधि प्रोषधमें कर्तव्य प्रोषधोपवासके अतिचार अतिथिसंविभागयतका लक्षण अतिथि शब्दकी व्युत्पत्ति पात्रका स्वरूप और भेद पात्रदानकी विधि देय द्रव्यका निर्णय दाताका लक्षण दानका फल दानके फलके दृष्टान्त अतिथिको खोजने की विधि भूमि आदिके दानका निषेध अतिथिसंविभाग व्रतके अतिचार धर्मामृत ( सागार) २३४ २३५ २३६ सप्तम अध्याय सामायिक प्रतिमाका स्वरूप प्रोषधोपवास प्रतिमाका स्वरूप २३७ २३९ षष्ठ अध्याय [ श्रावककी दिनचर्या ] २५६-२७८ प्रातःकालका कृत्य कृतिकर्मका विधान जिनालयको गमन जिनालय में प्रवेशविधि पुण्यवर्धक स्तुतियाँ जिनालय में कर्तव्य जिनालय में वर्जित कार्य व्यापार तथा उससे निवृत्ति उद्यान भोजन आदिका निषेध मध्याह्न में देवपूजाकी विधि तदनन्तर पात्रदान सायंकालीन कृत्य करके शयन रात में नींद खुलने पर चिन्तन मुनि बनने की भावना २४० २४१ २४२ २४२ २४३ २४४ २४५ २४५ २४७ २४९ २४९ २५० २५२ २५६ २५७ २५८ २५९ २६० २६१ २६३ २६३ २६५ २६५ २६७ २६९ २७० २७६ २७९-३०८ २७९ २८१ सचित्तविरत प्रतिमाका स्वरूप षष्ठ प्रतिमाका स्वरूप रात्रिभक्तव्रत प्रतिमाके स्वरूप में भेद ब्रह्मचर्य प्रतिमाका स्वरूप ब्रह्मचारीके भेद वर्णाश्रम व्यवस्था आरम्भविरतका स्वरूप परिग्रहविरतका स्वरूप परिग्रह त्याग या सकलदत्तिकी विधि अनुमतिविरतका स्वरूप उसकी विधि गृहत्याग की विधि विनय और आचारमें भेद उद्दिष्टविरतका स्वरूप उद्दिष्टविरतके भेद और विधि प्रथमको भिक्षाको विधि दूसरेका स्वरूप धावक के लिए निषिद्ध कार्य अष्टम अध्याय साधक श्रावकका स्वरूप शरीर के लिए धर्मका घात निषिद्ध सल्लेखना आत्मघात नहीं मृत्यु सुनिश्चित होनेपर सल्लेखनाका विमान उपसर्गसे मरण होनेपर तत्काल सल्लेखना धारण करे यथाकालमृत्यु में सल्लेखनाकी विधि आहारत्यागका समय संघमें जानेका विधान मरते समय धर्माराधनाका फल मुक्ति दूर होनेपर भी व्रतधारण आवश्यक समाधि मरणके लिए शरीरको कृश करना २८२ २८५ २८६ २८६ २८७ २८८ २९० २९१ २९२ २९५ २९६ २९६ २९८ २९९ ३०० ३०० ३०९-३५४ ३०३ ३०४ ३०९ ३११ ३१२ ३१३ ३१३ ३१४ ३१५ ३१५ ३१६ २१८ आवश्यक ३१९ कषाय कृश किये बिना शरीर कृश करना व्यर्थ ३१९ समाधिमरण की प्रशंसा समाधिमरण के योग्य स्थान ३२१ ३२२. सबसे क्षमा कराकर आचार्यसे अपने दोष निवेदन करे ३२३ Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९ ३२८ विषयानुक्रमणिका पूरब या उत्तरको सिर करके लेटे ३२३ समस्त संघ ध्यानमें लीन रहे ३३६ समाधिमरणके योग्य संस्तर ३२४ निर्यापकाचार्यका सम्बोधन ३३७ लिंगमें दोष होनेपर भी वस्त्रत्याग आवश्यक ३२४ सम्यक्त्वका माहात्म्य ३३८ आर्यिका भी अन्त समय वस्त्रत्याग करे ३२६ अर्हद्भक्तिका माहात्म्य ३३९ पाँच प्रकारकी शुद्धि भावनमस्कारका माहात्म्य ३३९ पाँच प्रकारका विवेक ३२८ ज्ञानोपयोगका माहात्म्य ३४० समाधिमरणके अतिचार ३२९ पांच महाव्रतोंका महत्त्व ३४१ संस्तरपर आरूढ़ होनेके पश्चात् निर्यापकाचार्य व्यवहाराराधनाके पश्चात् निश्चय आराधनाका का कर्तव्य विधान ३४५ आहारत्यागकी विधि निश्चय संन्यासका स्वरूप ३४६ आहारत्यागके पश्चात् स्निग्धपान परीषह या उपसर्ग आनेपर बोध ३४६ अन्तमें गर्मजल ३३३ उसके पश्चात् समस्त आहारका त्याग ३३५ निश्चय रत्नत्रयका स्वरूप और उसके धारणकी रोगादिकी अवस्थामें जलमात्र अन्तमें उसका प्रेरणा ३५० भी त्याग ३३६ विधिपूर्वक समाधिमरणसे आठवें भवमें मोक्ष ३५२ m mmm m mrror Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय ) [अथ चतुर्थाध्याये सुदृग्बोधो गलवृत्तमोहो विषयनिस्पृहः । हिंसादेविरतः कात्या॑द्यतिः स्याच्छावकोंऽशतः ] इत्युक्तमतो मध्यमङ्गलविधानपूर्वकं विनेयान् प्रति सागारधर्म प्रतिपाद्यतया प्रतिजानीते अथ नत्वाहतोऽक्षूणचरणान् श्रमणानपि । तद्धर्मरागिणां धर्मः सागाराणां प्रणेष्यते ॥१॥ अथ मङ्गलार्थे अधिकारे वा । इतः सागारधर्मोऽधिक्रियत इत्यर्थः। नत्वा-शिरःप्रह्वीकरणादिना ६ विशुद्धमनोनियोगेन च पूजयित्वा । अक्षूणचरणान्-अरुणं संपूर्ण निर्दोषं वा चरणं चारित्रं येषां तान् । तद्धर्मरागिणां-तेषां श्रमणानां धमें सर्वविरतिरूपे चारित्रे रागिणां संहननादिदोषादकुर्वतामपि प्रीतिमताम् । यतिधर्मानुरागरहितानामगारिणां देशविरतेरसम्यग्रूपत्वात् । सर्वविरतिलालसः खलु देशविरतिपरिणामः। ९ धर्मः-एकदेशविरतिलक्षणं चारित्रम् । प्रणेष्यते-प्रतिपादयिष्यतेऽस्माभिः ॥१॥ अनगार धर्मामृतके चतुर्थ अध्यायमें कहा है कि जिस जीवका ज्ञान जीवादि तत्त्वोंके विषयमें हेय, उपादेय और उपेक्षणीय रूपसे जाग्रत् है, तथा यथायोग्य क्षयोपशमरूपसे चारित्र मोहनीय कर्म हीयमान है और जो देखे हुए, सुने हुए और भोगे हुए भोग-उपभोगोंमें निरभिलाषी है वह यदि हिंसा आदि पाँच पापकर्मोंसे पूरी तरहसे विरत है तो उसे मुनि या यति या श्रमण कहते हैं और यदि वह एकदेशसे विरत है तो उसे श्रावक कहते हैं । अतः धर्मामृत ग्रन्थके मध्य में मंगलाचरणपूर्वक सागार धर्मामृतका कथन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं ___ सम्पूर्ण यथाख्यातचारित्रके धारक अर्हन्तोंको और निरतिचारचारित्रके धारक श्रमणोंको भी नमस्कार करके उन श्रमणोंके धर्म में प्रीति रखनेवाले श्रावकों या गृहस्थोंके धर्मको कहूँगा ॥१॥ विशेषार्थ-इलोकके प्रारम्भमें 'अर्थ' शब्द मंगलवाचक या अधिकारवाचक है । जो सूचित करता है कि यहाँसे सागारधर्मका अधिकार है। 'अक्षुण' शब्दका अर्थ सम्पूर्ण भी है और निरतिचार या निर्दोष भी है । अर्हन्त भी अक्षूणचरण है और श्रमण भी अक्षण चरण है। समस्त मोहनीय कर्मका क्षय होनेसे प्रकट हुआ चरण अर्थात् यथाख्यातचारित्र पूर्ण नित्य और निर्मल होता है। अतः अहन्त तीर्थकर परमदेव अक्षण चरण है। तथा जो श्रम करते हैं अर्थात् बाह्य और आभ्यन्तर तप करते हैं उन्हें श्रमण कहते हैं अतः श्रमणसे आचार्य, उपाध्याय और साधु लिये जाते हैं। श्रमण भी अक्षण चरण होते हैं-भावनाविशेष १. 'स्फुरद्बोधो गलवृत्तमोहो विषयनिस्पृहः । हिंसादेविरतः कात्ाद्यतिः स्याच्छावकोंऽशतः॥ -अनगार. ४।२१। Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अथ किलक्षणा: सागारा इत्याह___अनाद्यविद्यादोषोत्थचतुःसंज्ञाज्वरातुराः । शश्वत्स्वज्ञान विमुखाः सागारा विषयोन्मुखाः ॥२॥ अविद्या-अनित्याशुचिदुःखानात्मसु विपरीतख्यातिः । ज्वराः चत्वारः प्राकृतो वैकृतश्चेति द्वौ, प्रत्येक साध्योऽसाध्यश्चेति । स्वेत्यादि । यदाह 'माद्यन्मित्रकलत्रपुत्रकुतपश्रेणीरणच्छङ्कला-, बन्धध्वस्तगतेनिरुद्धवपुषः क्रोधादिविद्वेषिभिः । आस्तां ज्ञानसुधारसः किमपरं गेहोरुकारागृह क्रूरक्रोडनिवासिनो न सुलभा वार्ता वणक्ष प्रति।' [ ] ॥२॥ के बलसे उनका क्षायोपशमिक संयम परिणामरूप चारित्र अक्षुण अर्थात् निर्दोष होता है । इन अर्हन्त, आचार्य, उपाध्याय और साधुओंको विशुद्ध मनोयोगपूर्वक सिर नवाकर उन गृहस्थोंके धर्मको कहूँगा जो यद्यपि संहनन आदिकी कमजोरीके कारण श्रमणोंके सर्वविरतिरूप चारित्रको पालने में असमर्थ हैं तथापि उससे अनुराग करते हैं, प्रीति रखते हैं। जिन गृहस्थोंको मुनियोंके धर्मसे अनुराग नहीं है उनका एकदेशत्याग भी सच्चा नहीं है। सर्वविरतिकी लालसाका ही नाम देशविरतिरूप परिणाम है। जिसमें मनिध धर्म अंगीकार करनेकी आन्तरिक इच्छा होती है, भले ही वह अपनी निर्बलताके कारण इस जीवनमें मुनि न बन सके किन्तु वही निष्ठापूर्वक श्रावक धर्मका पालन कर सकता है ।।१।। आगे सागार या गृहस्थका लक्षण कहते हैं अनादि अविद्यारूपी दोषसे उत्पन्न हुई चार संज्ञारूपी ज्वरसे पीड़ित, सदा आत्मज्ञानसे विमुख और विषयों में उन्मुख गृहस्थ होते हैं ॥२॥ विशेषार्थ-अगार कहते हैं घरको। 'घर' कहनेसे सभी परिग्रह आ जाती हैं। जो अगारमें रहते हैं वे सागार कहे जाते हैं। और जिन्होंने घरको त्याग दिया वे अनगार या श्रमण कहे जाते हैं। तत्त्वार्थसूत्रके 'अगार्यनगारश्च' (७।१९ ) सूत्रकी सर्वार्थसिद्धि टीकामें यह शंका उठायी गयी है कि यदि घरमें रहनेवालेको गृहस्थ और घर में न रहनेवालेको अनगार या मुनि कहते हैं तो उलटा भी हो सकता है-मुनि किसी शून्य घरमें या मन्दिरमें ठहरे हों तो वे सागार कहे जायेंगे। और किसी कारणसे कोई गृहस्थ घर छोड़कर जंगलमें जा बसा तो वह अनगार कहा जायेगा। इसके समाधानमें कहा गया है कि यहाँ घरसे भावघर लिया गया है। चारित्रमोहनीयके उदयमें घरसे सम्बन्ध रखनेके परिणामको भावघर कहते हैं। जिसके भावोंमें घर है वह गृहस्थ है भले ही वह वनमें चला जाये। और जिसके भावसे घर निकल गया वह यदि किसी शन्यघर या देवालयमें ठहर गया है फिर भी वह अनगार ही है। यहाँ सागारसे भावागारी ही लिया गया है। यह उसके तीन विशेषणोंसे स्पष्ट होता है । अनित्य पदार्थों को स्त्री-पुत्रादि सम्बन्धको नित्य मानना, अशुचि शरीर आदिको शुचि मानना, दुःखदायी परिवार आदिको सुखदायी मानना और जो परवस्तु कभी अपनी नहीं हो सकती शरीर आदि, उन्हें अपना मानना, इसका नाम अविद्या या अज्ञान है। इस अज्ञानका आदि नहीं, अतः अनादि है। अनादिकालसे जीवके साथ यह अज्ञानरूपी दोष लगा है। शरीरमें जब वात, पित्त और कफ विषम हो जाते हैं तो उसे दोष कहते हैं । इस दोषके कारण Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) अथ भङ्गयन्तरेण भूयस्तानेवाह अनाद्यविद्यानुस्यूतां ग्रन्थसंज्ञामपासितुम् । अपारयन्तः सागाराः प्रायो विषयमूच्छिताः ॥३॥ अनुस्यूतां-बीजाङ्करन्यायेन संतत्या प्रवर्तमानाम् । विषयमूच्छिता:-कामिन्यादिविषयेष्वात्मतयाऽध्यवसिताः। ही मनुष्य ज्वरसे पीड़ित होता है। उसी तरह अज्ञानरूपी दोषके कारण यह चारसंज्ञारूपी ज्वरसे पीड़ित रहता है। ये चार संज्ञाएँ हैं-आहार, भय, मैथुन और परिग्रह। इन्हींकी अभिलाषाकी पूर्तिमें गृहस्थ सदा लगा रहता है। इसलिए उसे कभी अपने आत्माकी ओर दृष्टि डालनेका समय ही नहीं मिलता। परमागर्म में कहा है कि 'ज्ञानदर्शन लक्ष मणवाला एक मेरा आत्मा ही शाश्वत है-सदा रहनेवाला है। शेष सब पदार्थ बाह्य हैं उनका मेरे साथ नदी-नाव-योग जैसा है। यह आत्मज्ञान उसे होता नहीं, इसीसे वह स्त्री आदि इष्ट विषयोंमें राग करता है और अप्रिय विषयोंसे द्वेष करता है। इस राग-द्वेषके करने में ही वह सदा लगा रहता है। इसीमें उसका जीवन तक समाप्त हो जाता है ।।२।। पुनः दूसरे प्रकारसे सागारका स्वरूप कहते हैं अनादि अविद्याके साथ बीज और अंकुरकी तरह परम्परासे चली आयी परिग्रह संज्ञाको छोड़ने में असमर्थ और प्रायः विषयों में मूच्छित सागार होते हैं ॥३॥ विशेषार्थ-जैसे बीजसे अंकुर और अंकुरसे बीज पैदा होता है अतः बीज अंकुरकी सन्तान अनादि है उसी तरह अज्ञान और परिग्रह संज्ञाकी भी अनादि सन्तान है। अनादि कालसे अज्ञानके कारण परिग्रह संज्ञा होती है और परिग्रह संज्ञासे अज्ञान होता है । इस तरह अज्ञानमें पड़ा गृहस्थ परिग्रहकी अभिलाषाको छोड़ नहीं पाता। इसीसे गृहस्थ प्रायः स्त्री आदि विषयोंमें 'यह मेरी भोग्य है' मैं इनका स्वामी हूँ इस प्रकार ममकार और अहंकाररूप विकल्पोंमें फंसे रहते हैं। वास्तवमें शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु ये सब सर्वथा भिन्न स्वभाववाले हैं । किन्तु यह मूढ़ इन सबको अपना मानता है । सम्यग्दृष्टि भी चारित्रमोहनीय कर्मके उदयके वशीभूत होकर ऐसा मान बैठता है। किन्तु सभी सम्यग्दृष्टि ऐसे नहीं होते । जो पूर्वजन्ममें अभ्यास किये हुए रत्नत्रयके माहात्म्यसे साम्राज्य आदि लक्ष्मीका उपभोग करते हुए भी तत्त्वज्ञान और देशसंयमकी ओर उपयोग रखनेके कारण भोगते हुए भी नहीं भोगते हुए की तरह प्रतीत होते हैं, उनको दृष्टि में रखकर ग्रन्थकार ने 'प्रायः' शब्दका प्रयोग किया है जो बतलाता है कि सभी गृहस्थ विषयोंमें मग्न नहीं होते, किन्तु कुछ सम्यग्दृष्टी तत्त्वज्ञानी जो देशसंयमके भी अभ्यासी होते हैं वे विषयोंको रुचिसे नहीं भोगते। किन्तु जैसे धाय पराये पुत्रका पालन करते हए भी उसे अपना नहीं मानतीं, या जैसे दुराचारिणी स्त्रीका स्वामी उसे अनासक्त भावसे भोगता है उसी तरह वे कमलिनीके पत्रपर पड़े जलकी तरह निर्लिप्त रहते हैं। यहाँ एक बात विशेष रूपसे उल्लेखनीय है कि १. 'एगो मे सस्सदो अप्पा णाणदंसणलक्खणो। सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा ॥' -भावपाहुड ५९। मूलाचार ४८ । णियमसार १०२। २. 'धात्रीबालासतीनाथ-पद्मिनीचलवारिवत् । दग्धरज्जुवदाभाति भुञ्जानोऽपि न पापभाक् ॥' -इष्टोप. श्लो.८। Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) तदुक्तम् 'वपुगृहं धनं दाराः पुत्रा मित्राणि शत्रवः । सर्वथाऽन्यस्वभावानि मूढः स्वानि प्रपद्यते ॥ [ इष्टोप. ८ श्लो.] ॥३॥ प्रन्थकारने अपनी संस्कृत टीकामें जिसका हमने विशेषार्थमें विवरण दिया है, सम्यगदृष्टीको भी चारित्र मोहनीय कर्मके उदयवश विषयासक्त कहा है। किन्तु जिन्होंने पूर्वजन्ममें रत्नत्रयका अभ्यास किया है और उसीके प्रभावसे जो इस जन्ममें भी तत्त्वज्ञान और देश संयममें तत्पर रहते हैं उन सम्यग्दृष्टी श्रावकोंको निरासक्त भोगी कहा है। उधर अमृतचन्द्रजी-ने कहा है कि सम्यग्दष्टिके ज्ञानवैराग्यशक्ति नियमसे होती है। क्योंकि वह अपने यथार्थ स्वरूपको जाननेके लिए 'स्व' का ग्रहण और परके त्यागकी विधिके द्वारा दोनोंके भेदको परमार्थसे जानकर अपने स्वरूपमें ठहरता है और परसे सब तरहका राग छोड़ता है। इस पर अपने भावार्थ में पं. जयचन्दजी सा० ने कहा है कि 'मिथ्यात्वके बिना चारित्र मोह सम्बन्धी उदयके परिणामको यहाँ राग नहीं कहा, इसलिये सम्यग्दृष्टिके ज्ञान वैराग्य शक्तिका अवश्य होना कहा है। मिथ्यात्व सहित रागको ही राग कहा गया है वह सम्यग्दृष्टि के नहीं है। जिसके मिथ्यात्व सहित राग है वह सम्यगदृष्टि नहीं है।' आगे समयसार गा० २०१-२०२ के भावार्थ में कहा है-अविरत सम्यग्दृष्टि आदिके चारित्रमोहके उदय सम्बन्धी राग है वह ज्ञानसहित है। उसको रोगके समान मानता है। उस रागके साथ राग नहीं है। कर्मोदयसे जो राग हुआ है उसका मेटना चाहता है। इन्हीं दोनों गाथाओंकी टीकामें जयसेनाचार्यने भी रागी सम्यग्दृष्टि नहीं होता इस चर्चाको लेकर शंका-समाधान किया है। शंकाकार कहता है-आपने कहा कि रागी सम्यग्दृष्टि नहीं होता। तो चतुर्थ-पंचम गुणस्थानवर्ती तीर्थकर, भरत, सगर, राम, पाण्डव आदि क्या सम्यग्दृष्टि नहीं थे। इसके समाधानमें आचार्य कहते हैं उनके मिथ्यादृष्टिकी अपेक्षा तेतालीस कर्म प्रकृतियोंका बन्ध न होनेसे चतर्थ पंचम गणस्थानवी जीवोंके अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ और मिथ्यात्वके उदयसे उत्पन्न होनेवाला पत्थरकी रेखा आदिके समान राग आदिका अभाव होता है। पंचम गुणस्थानवी जीवोंके अप्रत्याख्यान क्रोध मान माया लोभके उदयसे उत्पन्न होनेवाले पृथ्वीकी रेखा आदिके समान रागादिका अभाव होता है। इस ग्रन्थमें पंचम गुणस्थानसे ऊपरके गुणस्थानोंमें रहनेवाले वीतराग सम्यग्दृष्टियोंका मुख्य रूपसे ग्रहण है और सराग सम्यग्दृष्टियोंका गौण रूपसे ग्रहण है। यह व्याख्यान सम्यग्दृष्टिके कथनमें सर्वत्र जानना।' इस तरह अविरत सम्यग्दृष्टिको भी जो ऊपर ग्रन्थकारने विषयों में मग्न कहा है वह अपेक्षा भेदसे ही समझना चाहिए । उसके अप्रत्याख्यानावरण कषायका उदय होनेसे विषयोंसे निवृत्तिका भाव नहीं होता। यद्यपि यह जानता है कि विषय हेय हैं। तथापि कर्मोदयसे प्रेरित होकर भोगता है ॥३॥ १. सम्यग्दृष्टेर्भवति नियतं ज्ञानवैराग्यशक्तिः, स्वं वस्तुत्वं कलयितुमयं स्वान्यरूपाप्तिमुक्त्या । यस्माद् ज्ञात्वा व्यतिकरमिदं तत्त्वतः स्वं परं च स्वस्मिन्नास्ते विरमति परात सर्वतो रागयोगात ॥-सम, क्लेश, १३६ श्लो.। Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय ( प्रथम अध्याय ) अथ विद्याविद्ययोर्बीजोपदेशार्थमाह नरत्वेऽपि पशूयन्ते मिथ्यात्वग्ग्रस्तचेतसः । पशुत्वेऽपि नरायन्ते सम्यक्त्वव्यक्त चेतनाः ॥४॥ पशूयन्ते --- हिताहितविवेकविकलतया पशव इवाचरन्ति । यदाहु:'आहारनिद्रा-भय-मैथुनानि सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । ज्ञानं नराणामधिको विशेषो ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥' [ ] ॥४॥ इस प्रकार सागारोंका लक्षण कहकर अब उनकी विषयोंमें प्रवृत्ति होने और नहीं होनेके मूल कारण जो अज्ञान और ज्ञान है, उस अज्ञान और ज्ञानके बीज मिध्यात्व और सम्यक्त्वके प्रभावको कहते हैं जिनका चित्त मिथ्यात्व से ग्रस्त है, वे मनुष्य होते हुए भी पशुके समान आचरण करते हैं । और जिनकी चेतना सम्यग्दर्शनके द्वारा प्रतीतिके योग्य हो गयी है अर्थात् सम्यगूदृष्टी जीव पशु होते हुए भी मनुष्य के समान आचरण करते हैं || ४ | विशेषार्थ -- पशुओं को हित-अहितका विवेक नहीं होता । और मनुष्य प्रायः विचारशील होते हैं । मिथ्यात्व कहते हैं विपरीत भावको अर्थात् जिस वस्तुका जैसा स्वरूप है उसको वैसा न मानकर उससे उल्टा मानना विपरीत अभिनिवेश है । इसे ही मिथ्यात्व कहते हैं । अतः मिथ्यादृष्टि मनुष्य मनुष्य होते हुए भी हित-अहित के विचारसे शून्य होने के कारण पशु के समान आचरण करते हैं। लोक व्यवहारमें दक्ष होते हुए भी आत्माके हितअहितका विचार उन्हें नहीं होता । इसके विपरीत सम्यक्त्व से जिनकी चेतना व्यक्त होती है। वे जाति पशु होते हुए भी मनुष्योंके समान हित-अहित के विचार में चतुर होते हैं । अर्थात् सम्यक्त्वके माहात्म्यसे पशु भी हेय और उपादेय तत्त्वके ज्ञाता हो जाते हैं फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है। यहाँ पशुसे संज्ञी ही लेना चाहिए क्योंकि सम्यग्दर्शन संज्ञी पंचेद्रिय जीवोंको ही होता है । आगममें कहा है कि भव्य पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव कालादि लब्धिके होनेपर, जब उसके संसार परिभ्रमणका काल अर्धपुद्गल परावर्त प्रमाण शेष रहता है तब एक अन्तर्मुहूर्त में मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध मान माया लोभके अन्तरकरण रूप उपशमसे सम्यक्त्वको प्राप्त करता है । यह सम्यग्दर्शन आत्माका तत्त्वार्थ श्रद्धान रूप परिणाम है । इसके प्रकट होते ही आत्मा में प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य गुण आते हैं। रागादि दोषोंसे चित्तवृत्तिके हटनेको प्रेशम कहते हैं। शारीरिक, मानसिक और आगन्तुक कष्टोंसे भरे संसार से भयभीत होनेको संवेगे कहते हैं । सब प्राणियों के प्रति चित्तके दयालु होनेको अनुकम्पा कहते हैं । मुक्ति के लिए प्रयत्नशील पुरुषका चित्त आप्त वीतराग देव, उनके द्वारा उपदिष्ट श्रुत, व्रत और तत्त्व के विषय में 'ये ऐसे ही हैं' इस प्रकारके भावसे युक्त हो तो उसे आस्तिक्य कहते हैं । इन गुणोंसे जीवको आत्माकी प्रतीति होती है और उसीसे उसके भावोंमें यथार्थता आती है ||४|| १. ' यद्रागादिषु दोषेषु चित्तवृत्तिनिवर्हणम् । तं प्राहुः प्रशमं प्राज्ञाः समन्ताद्व्रतभूषणम् ॥ २. शारीरमानसागन्तुवेदनाप्रभवाद्भवात् । स्वप्नेन्द्रजालसंकल्पाद्भीतिः संवेग उच्यते ॥ ३. सत्त्वे सर्वत्र चित्तस्य दयार्द्रत्वं दयालवः । धर्मस्य परमं मूलमनुकम्पां प्रचक्षते ॥ ४. आप्ते श्रुते व्रते तत्त्वे चित्तमस्तित्वसंयुतम् | आस्तिक्यमास्ति कैरुक्तं युक्तं युक्तिधरेण वा ॥ ५ — सोम. उपा., २२८-२३१ श्लो. ! ३ Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अथ मिथ्यात्वस्य त्रिविधस्याप्यनुभावमुपमानैरनुभावयति केषांचिदन्धतमसायतेऽगृहीतं ग्रहायतेऽन्येषाम् । मिथ्यात्वमिह गृहीतं शल्यति सांशयिकमपरेषाम् ॥५॥ केषांचित्-एकेन्द्रियादिसंज्ञिपञ्चेन्द्रियपर्यन्तानाम् । अन्धतमसायते-निविडान्धकारवदाचरति, घोराज्ञानविवर्तहेतुत्वात् । ग्रहायते-विविधविकारकारित्वात् । अन्येषां-संज्ञिपञ्चेन्द्रियाणाम् । गृही [-तं ६ परोपदेशादुपात्तमतत्त्वाभिनिवेशलक्षणं चिद्वैकृतम् । तथा शल्यति-बहुदुःख-] हेतुत्वाच्चरतान्तः ( च्छरीरान्तः) प्रविष्टकाण्डादिवदाचरति । अपरेषां-इन्द्राचार्यादीनाम् ॥५॥ इस प्रकार सामान्यसे मिथ्यात्वका प्रभाव बताकर अब उसके तीनों ही भेदोंका प्रभाव उपमानके द्वारा बतला इस संसार में किन्हीं एकेन्द्रियोंसे लेकर संज्ञिपंचेन्द्रियपर्यन्त जीवोंका अगृहीत मिथ्यात्व धने अन्धकारके समान काम करता है। किन्हीं संज्ञिपंचेन्द्रिय जीवोंका गृहीत मिथ्यात्व भूत के आवेशकी तरह कार्य करता है। और किन्हीं इन्द्राचार्य आदिका संशय मिथ्यात्व शरीरमें घुसे काँटे आदिकी तरह कार्य करता है ॥५॥ विशेषार्थ-मिथ्यात्व या मिथ्यादर्शनके भेद आगममें दो भी कहे हैं, तीन भी कहे हैं और पाँच भी कहे हैं। सर्वार्थसिद्धि ( ८1१) में दो और पाँच भेद कहे हैं। दो भेद हैं-नैसर्गिक और परोपदेशपूर्वक । और पाँच भेद हैं -एकान्त, विपरीत, संशय, वैनयिक और अज्ञान । किन्तु भगवती आराधना ( गा. ५६) में मिथ्यात्वके तीन भेद कहे हैंसंशय, अभिगृहीत और अनभिगृहीत । नैसर्गिक मिथ्यात्वको ही अनभिगृहीत या अगृहीत कहते हैं। जो मिथ्यात्व पर-के उपदेशके विना अनादिकालसे मिथ्यात्वकमका उदय होनेसे चला आता है वह नैसर्गिक या अगृहीत है । मिथ्यात्वका अर्थ है तत्त्वोंमें अरुचिरूप जीवका परिणाम । यह अगृहीत मिथ्यात्व एकेन्द्रियसे लेकर संज्ञिपंचेन्द्रिय जीवों तक पाया जाता है। इसकी उपमा गहन अन्धकारसे दी है। जैसे घने अन्धकारमें कुछ भी दिखाई नहीं देता, वैसे ही जन्म-जन्मान्तरसे मिथ्यात्वमें पड़े हुए जीवोंको घोर अज्ञान छाया रहता है। बेचारे एकेन्द्रिय आदिमें तो समझने की शक्ति ही नहीं होती। जिन पंचेन्द्रिय संज्ञी मनुष्योंमें समझ होती है वे भी नहीं समझते। बल्कि दूसरोंको भी उलटी पट्टी पढ़ाते हैं। इस तरह परोपदेश से ग्रहण किये गये मिथ्यात्वको गृहीत कहते हैं ; क्योंकि परके उपदेशको ग्रहण करनेकी शक्ति संज्ञीपंचेन्द्रियों में ही होती है इसलिए गृहीत मिथ्यात्व संज्ञीपंचेन्द्रियोंके ही होता है। इसकी उपमा भूतावेशसे दी है। जैसे किसीके सिर भूत आता है तो वह आदमी खूब उछलता, कूदता और अनेक प्रकारकी विडम्बनाएँ करता है, इसी तरह मनुष्य भी दूसरेके मिथ्या उपदेशसे प्रभावित होकर उसे फैलानेको अनेक चेष्टाएँ करता है और उसपर समझानेका कोई प्रभाव नहीं होता। तीसरा संशय मिथ्यात्व तो नामसे ही स्पष्ट है । अन्धेरे में पड़ी वस्तुको देखकर यह साँप है या रस्सी इस तरह के भ्रमको संशय कहते हैं। इसी तरह यह तत्त्व है या अतत्त्व है, सच्चा धर्म है या मिथ्या, इस प्रकारके अनिर्णयकी स्थितिको संशय मिथ्यात्व कहते हैं। इसकी उपमा शरीरमें घुसे कील-काँटेसे दी है। जैसे शरीरमें घुसा काँटा सदा तकलीफ देता है इसी तरह सन्देहमें पड़ा मिथ्यादृष्टि कुछ भी निर्णय न कर पानेके कारण मन ही मनमें दुविधामें पड़ा कष्ट उठाता है। इस तरह मिथ्यात्वके तीन प्रकार हैं ।।५।। Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) अन्तरङ्गबहिरङ्गनिमित्तद्वैतसंपन्नतामनुवर्णयति आसन्नभव्यताकर्महानि-संज्ञित्व-शुद्धिभाक् । देशनाद्यस्तमिथ्यात्वो जीवः सम्यक्त्वमश्नुते ॥६॥ कमहानिः-मिथ्यात्वादिसप्तप्रकृतीनामुपशमः क्षयः क्षयोपशमो वा । शुद्धि:-विशुद्धिपरिणामः । देशनादि-आदिशब्देन जिनमहिम-जिनप्रतिबिम्बदर्शनादि ॥६॥ आगे अविद्या या अज्ञानके मूल कारण मिथ्यात्वको जड़से नष्ट करने में समर्थ सम्यग्दर्शनरूप परिणामको उत्पन्न करनेवाली सामग्री बतलाते हैं निकट भव्यता, कर्महानि, संज्ञीपना तथा विशुद्धि परिणामवाला वह जीव जिसका मिथ्यात्व सच्चे गुरुके उपदेश आदिके द्वारा अस्त हो गया है, सम्यक्त्वको प्राप्त होता है ॥६॥ विशेषार्थ-आगममें पाँच लब्धियोंके द्वारा सम्यक्त्वकी प्राप्ति का विधान हैक्षयोपशमलब्धि, विशुद्धि लब्धि, देशनालब्धि, प्रायोग्यलब्धि, और करणलब्धि। इनमें से प्रथम चार लब्धियाँ सामान्य हैं, भव्य और अभव्य मिथ्यादृष्टि जीवोंके भी होती हैं। किन्तु अन्तिम करणलब्धि सम्यक्त्व होते समय ही होती है । जीवस्थानचूलिका आठके तीसरे सूत्रकी धवलामें कहा है कि प्रथमोपशम सम्यक्त्वके प्राप्त करने योग्य जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करता है यह कथन तो औपचारिक है। यथार्थमें तो अधःकरण, अपूर्वकरण, अनिवत्तिकरणके अन्तिम समयमें सम्यक्त्वको प्राप्त करता है। इसीका नाम करणलब्धि है। उक्त सूत्र में केवल काललब्धिका ही निर्देश है । और उसीका अनुकरण सर्वार्थसिद्धि (२।३)में किया है । उसमें भी केवल काललब्धि आदिके निमित्तसे सम्यक्त्वकी उत्पत्ति बतलायी है। लिखा है कि कर्मसे वेष्टित भव्य जीव अर्धपुद्गल परावर्तकाल शेष रहनेपर प्रथम सम्यक्त्व ग्रहणके योग्य होता है। यदि उसका काल अधिक हो तो नहीं। इसीको ऊपर 'आसन्न भव्यता' शब्दसे कहा है। उसीको निकट भव्य कहते हैं । सम्यक्त्वके प्रतिबन्धक मिथ्यात्व आदि कोंके यथायोग्य उपशम, क्षयोपशम और क्षयको कर्महानि शब्दसे कहा है। यदि सम्यक्त्वके प्रतिबन्धक मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभका उपशम हो तो औपशमिक सम्यक्त्व, क्षयोपशम हो तो क्षायोपशमिक सम्यक्त्व और क्षय हो तो क्षायिक सम्यक्त्व होता है । औपशमिक सम्यत्क्वके दो भेद हैं-प्रथमोपशम और द्वितीयोपशम । उपशम श्रेणीपर चढ़नेवाले वेदक सम्यग्दृष्टि जीव जो उपशम सम्यक्त्व प्राप्त करते हैं उसका नाम द्वितीयोपशम सम्यक्त्व है। वह सम्यक्त्वपूर्वक ही होता है। प्रथमोपशम सम्यक्त्व मिथ्यादृष्टि को ही होता है और वह भी पर्याप्तक अवस्था में ही होता है। अपर्याप्त जीवके प्रथमोपशम सम्यक्त्व होनेका विरोध है। वह जीव देव या नारकी या तिर्यंच या मनुष्य हो सकता है। चारों गतियोंमें उसके होने में कोई विरोध नहीं है। किन्तु वह संज्ञी होना चाहिए। संज्ञा कहते हैं शिक्षा क्रिया, १. 'उक्तं च--आसन्नभव्यता-कर्महानि-संज्ञित्व-शुद्धपरिणामाः । सम्यक्त्वहेतुरन्तर्बाह्योऽप्युपदेशकादिश्च ॥'-सोम. उपा., २२४ श्लो. । २. 'खय उ वसमिय विसोही देसण पाओग्ग करगलद्धीए चत्तारि य सामण्णा करणं पुण होइ सम्मत्ते ॥'-धवला, पु. ६, प. २०५। जी. गो. ६५० गा.। ३. मनोऽवष्टम्भतः शिक्षाकियालापोपदेशवित् । येषां ते संज्ञिनो मा वृषकोरगजादयः ॥[ Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अथ इह दुष्षमायां सदुपदेष्टणां प्रविरलत्वमनुशोचवि कलिप्रावृषि मिथ्यादिङ्मेघच्छन्नासु विक्ष्विह। खद्योतवत्सुदेष्टारो हा द्योतन्ते शचित् कचित् ॥७॥ ___ मिथ्यादिशः-दुरुपदेशाः । दिक्षु-सदुपदेशेसु ककुप्सु च । इह-भरतक्षेत्रे । क्वचित् क्वचित् । उक्तंच 'विद्वन्मन्यतया सदस्यतितरामुद्दण्डवाग्डम्बराः, शृङ्गारादिरसैः प्रमोदजनकं व्याख्यानमातन्वते । ये ते च प्रतिसद्म सन्ति बहवो व्यामोहविस्तारिणो येभ्यस्तत्परमात्मतत्त्वविषयं ज्ञानं तु ते दुर्लभाः ।। [ पद्म. पञ्च. १११११ ॥७॥ आलाप और उपदेशको ग्रहण कर सकनेकी योग्यताको। जिसमें वह योग्यता हो उसे संज्ञी कहते हैं। शुद्धि कहते हैं विशुद्ध परिणामको। जीवका जो परिणाम साता आदि कर्मोके बन्धमें निमित्त होता है और असाता आदि अशुभ कर्मों के बन्धका विरोधी है उसे विशुद्धि कहते हैं । ये सब सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके अन्तरंगका कारण हैं। बाह्य कारण है देशना आदि । छह द्रव्य और नौ पदार्थोके उपदेशको देशना कहते हैं। देशना देते हुए आचार्य आदिकी प्राप्ति और उपदिष्ट अर्थको प्रहण, धारण और विचारनेकी शक्तिकी प्राप्तिको देशनालब्धि कहते हैं। 'आदि' शब्दसे पूर्वजन्मका स्मरण, जिनप्रतिमाका दर्शन आदि बाह्य कारण लेना चाहिए। इन सब अन्तरंग और बाह्य कारणोंके समूहके द्वारा जिसका दर्शन मोहनीय कर्म उपशम आदि अवस्थाको प्राप्त हुआ है वह जीव सम्यक्त्वको प्राप्त करता है ।।६।। ऊपर सम्यक्त्वकी सामग्रीमें सच्चे गुरुके उपदेशको आवश्यक कहा है। किन्तु इस समय यहाँ सच्चे उपदेष्टाओंके कमी पर खेद प्रकट करते हुए ग्रन्थकार उनकी दुर्लभता दिखलाते हैं बड़े खेदकी बात है कि इस भरत क्षेत्रमें पंचमकाल रूपी वर्षा ऋतुमें सदुपदेशरूपी दिशाओंके मिथ्या उपदेशरूपी मेघोंसे ढक जानेपर जुगनुओंकी तरह सच्चे गुरु कहीं-कहींपर ही दिखाई देते हैं। अर्थात् जैसे वर्षाकालमें दिशाओंके मेघोंसे आच्छादित होनेपर सूर्य वगैरहके प्रकाशके अभावमें किसी-किसी स्थानपर जुगनू चमकते हुए देखे जाते हैं। वैसे ही यहाँ पंचम कालमें किसी-किसी आर्यदेशमें सच्चे उपदेशक गुरु दिखाई देते हैं। चतुर्थ कालकी तरह केवली और श्रुतकेवली कहीं भी नहीं हैं ॥७॥ विशेषार्थ-पद्मनन्दि पंचविंशतिकामें वर्तमान काल की स्थितिका चित्रण करते हुए कहा है-'विद्वत्ताके अभिमानसे सभामें अत्यन्त उद्दण्ड वचनोंका आडम्बर रचनेवाले जो व्याख्याता श्रृंगार आदि रसोंके द्वारा आनन्दको उत्पन्न करनेवाला व्याख्यान विस्तारते हैं वे तो घर-घरमें पाये जाते हैं। किन्तु जिनसे परमात्म तत्त्व विषयक ज्ञान प्राप्त हो सकता है वे अतिदुर्लभ हैं।' अतः इस कालमें जो परमात्म तत्त्व विषयक व्याख्यान करते हैं वे आदरास्पद हैं और उनसे लाभ उठाना चाहिए ॥७॥ Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) अथात्रेदानी भद्रकाणामपि पुरुषाणां दुर्लभत्वमालोचयति नाथामहेऽद्य भद्राणामप्यत्र किमु सदृशाम् । हेम्न्यलभ्ये हि हेमाश्मलाभाय स्पृहयेन्न कः ॥८॥ नाथामहे-भद्रका अपि जीवा भूयासुरित्याशास्महे । 'आशिषि नाथ' इत्यात्मनेपदम् । अलभ्येलब्धमशक्ये ॥८॥ अथ भद्रकं लक्षयित्वा तस्यैव द्रव्यतया देशनार्हत्वमाह कुधर्मस्थोऽपि सद्धर्म लघुकर्मतयाऽद्विषन् । भद्रः स देश्यो द्रव्यत्वान्नाभद्रस्तद्विपर्ययात् ॥९॥ अपि-न केवलमुभयोर्मध्यस्थ इत्यर्थः। अद्विषन्-द्वेषविषयमकुर्वन् । द्रव्यत्वात्-आगामिसम्यक्त्वगुणयोग्यत्वात् । अभद्रः-कुधर्मस्थः । सद्धर्म गुरुकर्मतया द्विषन्नित्यर्थः । तद्विपर्यासात्-आगामिसम्यक्त्वगुणयोग्यत्वाभावात् ॥९॥ इस भरत क्षेत्र में पंचमकालके प्रभावसे उपदेष्टा गुरुओंकी तरह उपदेश सुननेवालोंके चित्त भी दर्शनमोहके उदयसे आक्रान्त होनेसे वे भी उपदेशके पात्र नहीं हैं। ऐसी स्थिति में भद्र पुरुषोंसे यह आशा करते हैं कि वे उपदेशके पात्र होवें इस समय इस क्षेत्रमें हम भद्र पुरुषोंसे भी आशा करते हैं कि वे उपदेशके योग्य हों। तब सम्यग्दृष्टियोंकी तो बात ही क्या है ; क्योंकि सुवर्णके अप्राप्य होनेपर सुवर्णपाषाण कौन प्राप्त करना नहीं चाहता ॥८ विशेषार्थ-आजके समयमें जैसे सच्चे उपदेष्टा दुर्लभ हैं वैसे ही सच्चे श्रोता भी दुर्लभ हैं। श्रोताओंका मन भी मिथ्यात्वसे ग्रस्त है। ऐसी स्थितिमें यदि भद्र भी श्रोता मिले तो उत्तम है । और यदि सम्यग्दृष्टि श्रोता मिले तब तो अतिउत्तम है। किन्तु उनके अभावमें शास्त्रचर्चा ही बन्द कर देना उचित नहीं है । सम्यग्दृष्टि सुवर्णके तुल्य है तो भद्र सुवर्णपाषाणके तुल्य है। सुवर्णपाषाण उसे कहते हैं जिसमें से पाषाणको अलग करके सोना निकाला जाता है। तो जो भद्र है वह कल सम्यग्दृष्टी बन सकता है। अतः उसे धर्मोपदेश करना चाहिए ॥८॥ आगे भद्रका लक्षण कहकर उसे ही द्रव्यरूपसे उपदेशके योग्य बतलाते हैं मिथ्याधर्ममें आसक्त होते हुए भी समीचीन धर्मसे द्वेष रखनेका कारण जो मथ्यात्व कर्म है, उसके उदयकी मन्दतासे जो समीचीन धर्मसे द्वेष नहीं करता, उसे भद्र कहते हैं। वह उपदेशका पात्र है, क्योंकि उसमें भविष्य में सम्यक्त्व गुणके प्रकट होनेकी योग्यता है। इससे विपरीत होनेसे अर्थात् आगामीमें सम्यक्त्व गुण प्रकट होनेकी योग्यता न होनेसे अभद्र पुरुष उपदेशका पात्र नहीं है ॥९॥ विशेषार्थ-मिथ्या धर्मसे प्रेम रखनेवाले भी दो प्रकारके होते हैं-एक वे जो समीचीन धर्मसे द्वेष नहीं रखते। उन्हें ही भद्र कहते हैं। और जो समीचीन धर्मसे द्वेष रखते हैं उन्हें अभद्र कहते हैं। भद्र उपदेशका पात्र है क्योंकि उसके मिथ्यात्वके उदयकी मन्दता है तभी वह समीचीन धर्म सुनानेपर सुनता है। किन्तु अभद्र तो सुनना ही नहीं चाहता। उसके अभी तीव्र मिथ्यात्वका उदय है। अतः जिन्होंने जैनकुलमें जन्म लिया है वे ही केवल उपदेशके पात्र नहीं हैं। विधर्मी, मन्दकषायी जीवों को भी धर्म सुनाना चाहिए। ऊपर जो 'कुधर्मस्थोऽपि' में अपि शब्द दिया है उसका यह अभिप्राय है कि जो पुरुष समीचीन धर्म Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) ___ अथ आप्तोपदेशसंपादितशुश्रूषादिगुणः सम्यक्त्वहीनोऽपि तद्वानिव सद्भूतव्यवहारभाजामाभासत इति निदर्शनेन प्रव्यक्तीकरोति शलाकयेवाप्तगिराऽऽप्तसूत्रप्रवेशमार्गो मणिवच्च यः स्यात् । होनोऽपि रुच्या रुचिमत्सु तद्वद् भूयादसौ सांव्यवहारिकाणाम् ॥१०॥ सूत्रं-परमागमस्तन्तुश्च । प्रवेशमार्ग:-शुश्रूषादिगुणः छिद्रं च । हीनोऽपि-रिक्तोऽल्पो वा । ६ रुच्या-शुद्धया दीप्त्या च । रुचिमत्सु-सुदृष्टिषु दीप्तिमन्मणिषु च मध्ये । तद्वत्-रुचिमानिव । भायात्आभासेत् । सांव्यवहारिकाणां-सुनयप्रयोक्तृणाम् ।।१०॥ अथ सागारधर्मचरणाधिकारिणमगारिणं लक्षयितुमाह न्यायोपात्तधनो यजन् गुणगुरुन् सद्गीस्त्रिवर्ग भजनन्योन्यानुगुणं तदर्हगृहिणीस्थानालयो ह्रीमयः। युक्ताहारविहारआर्यसमितिः प्राज्ञः कृतज्ञो वशी शृण्वन् धर्मविधि दयालुरघभीः सागारधर्म चरेत् ।।११।। और मिथ्याधर्ममें मध्यस्थ है वह भी उपदेशका पात्र है। उसे भी धर्ममें व्युत्पन्न बनाना चाहिए ॥९॥ आगे कहते हैं कि जिनेन्द्र के उपदेशसे सेवा आदि सद्गुणोंको प्राप्त करनेवाला भद्र पुरुष सम्यक्त्वसे हीन होनेपर सद्व्यवहारी पुरुषोंको सम्यग्दृष्टीकी तरह मालूम होता है जैसे मणि वज्रकी सुईके द्वारा बींधी जानेपर धागेके मार्गका प्रवेश पाकर जब अन्य मणियोंमें प्रविष्ट हो जाती है तो उसमें चमक कम होनेपर भी चमकदार मणियोंमें मिलकर वह भी चमकदार दीखने लगती है। उसी तरह जो भद्र पुरुष जिन भगवान्की वाणीके द्वारा ऐसा हो जाता है कि उसके चित्तमें परमागमके वचन प्रवेश करने लगते हैं, वह भले ही श्रद्धासे रहित हो, किन्तु सुनयके प्रयोगमें कुशल व्यवहारी पुरुषोंको सम्यग्दृष्टियोंके मध्यमें उन्हींकी तरह लगता है ॥१०॥ विशेषार्थ-भद्र पुरुषको आगामीमें सम्यक्त्व गणके योग्य कहा है। जब वह परमागमका उपदेश श्रवण करने लगता है तो उसके हृदयमें वह उपदेश अपनी जगह बनाना प्रारम्भ कर देता है। उसके मनमें उसके प्रति जिज्ञासा होती है। भले ही उसकी इसपर आज श्रद्धा न हो किन्तु नय दृष्टि से वह मनुष्य भविष्यमें सम्यग्दृष्टि होनेकी सम्भावनासे सम्यग्दृष्टि ही माना जाता है ॥१०॥ इस प्रकार उपदेश देने और सुननेवालोंकी व्यवस्था करनेके बाद सागार धर्मका आचरण करनेवाले गृहस्थका लक्षण कहते हैं न्यायपूर्वक धन कमानेवाला, गुणों, गुरुजनों और गुणोंसे महान् गुरुओंको पूजनेवाला, आदर, सत्कार करनेवाला, परनिन्दा, कठोरता आदिसे रहित प्रशस्त वाणी बोलनेवाला, परस्परमें एक दूसरेको हानि न पहुँचाते हुए धर्म, अर्थ और कामका सेवन करनेवाला, धर्म, १. न्यायसंपन्नविभवः शिष्टाचारप्रशंसकः । कुलशीलसमैः सार्धं कृतोद्वाहोऽन्यगोत्रजैः ।। पापभीरुः प्रसिद्धं च देशाचार समाचरन् । अवर्णवादी न क्वापि राजादिषु विशेषतः ॥ Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय ( प्रथम अध्याय ) ११ न्यायोपात्तधनः -- स्वामिद्रोह - मित्रद्रोह - विश्वसितवञ्चन- चौर्यादिग ह्यर्थोपार्जन परिहारेणार्थोपार्जनोपाय - भूतः स्वस्त्रवर्णानुरूपः सदाचारो न्यायस्तेनोपात्तमुपार्जितमात्मसात्कृतं धनं विभवो येन स तयोक्तः । न्यायोपार्जितं हि वित्तमिह लोकहिताय स्यादशङ्कनीयतया स्वयं तत्फलोपभोगान्मित्रस्वजनादौ संविभागकरणाच्च । यदाह— 'सर्वत्र शुचयो धीराः सुकम्बलगर्विताः । स्वैकर्मनिहतात्मानः पापाः सर्वत्र शङ्किताः ॥' [ ] ६ परलोकहिताय च तत्स्यात् सत्पात्रेषु विनियोगाद्दीनादौ करुणया वितरणाच्च । अन्यायोपात्तं तु धनं लोकद्वयेऽप्यहितार्थमेव भवेत् । इह लोके हि दुराचारचारिणो वधबन्धादयो दोषाः, परलोके च नरकादि - गमनादयः सुप्रसिद्धाः । अन्यायोपार्जितं च वित्तं न चिरं तिष्ठेत् । किं तहि ? प्राच्येन द्रविणैश्च सह प्रणश्येत । यदाहुः - अर्थ और कामसेवनके योग्य पत्नी, गाँव, नगर और मकानवाला, लज्जाशील, शास्त्रानुसार खानपान और गमनागमन करनेवाला, सदाचारी पुरुषोंकी संगति करनेवाला, विचारशील, परके द्वारा किये गये उपकारको माननेवाला, जितेन्द्रिय, धर्मकी विधिको प्रतिदिन सुननेवाला, दयालु और पापभीरु पुरुष गृहस्थ धर्मको पालन करनेमें समर्थ होता है ॥११॥ विशेषार्थ - प्रथम श्लोककी टीकामें ही ग्रन्थकारने कहा है कि जो मुनिव्रत धारण करने की इच्छा रखते हुए भी अपनी कमजोरी और परिस्थितिके कारण उसे धारण करनेमें असमर्थ हैं वे सागारधर्मका पालन करते हैं । और जिन्हें मुनिधर्मकी इच्छा ही नहीं है उनका सागारधर्म भी पूर्ण नहीं है । इससे स्पष्ट है कि सागारधर्मका पालन करना भी कितना कठिन है | उसके पालन के लिए जिन बातोंकी आवश्यकता है उन्हें यहाँ बतलाते हैं । सबसे प्रथम न्यायपूर्वक धन कमाना आवश्यक है । यदि नौकरी करते हैं तो मालिकको धोखा देकर धन कमाना अन्याय है | यदि किसी मित्रके साथ कार-बार करते हैं तो मित्रके साथ धोखा करना अन्याय है । इसी तरह जो अपना विश्वास करता है उसके साथ विश्वासघात करना अन्याय है । और चोरीसे धन कमाना तो अन्याय है ही । इन सब अन्यायोंसे बचकर जो सदाचार है वही न्याय है । इस न्यायसे जो धन कमाता है वही श्रावकधर्मके पालनका यथार्थ में अधिकारी है । क्योंकि न्याय से अर्जित धन इस लोक में हितकर होता है । उसके देन-लेन में किसी प्रकारका भय नहीं होता । आनन्दपूर्वक उसका उपभोग किया जा सकता और अपने बन्धुबान्धवों तथा इष्ट मित्रों को दिया जा सकता है । तथा परलोकके लिए अनतिव्यक्तगुप्ते च स्थाने सुप्रातिवेश्मिके । अनेक निर्गमद्वारविवर्जितनिकेतनः ॥ कृतसंगः सदाचारैर्मातापित्रोश्च पूजकः । त्यजन्नुपप्लुतं स्थानमप्रवृत्तश्च गर्हिते ॥ व्ययमायोचितं कुर्वन् वेषं वित्तानुसारतः । अष्टभिर्धीगुणैर्युक्तः शृण्वानो धर्ममन्वहम् || अजीर्णे भोजनत्यागी काले भोक्ता च सात्म्यतः । अन्योन्याप्रतिबन्धेन त्रिवर्गमपि साधयन् ॥ यथावदतिथो साधो दीने च प्रतिपत्तिकृत् । सदानभिनिविष्टश्च पक्षपाती गुणेषु च ॥ अदेशाकालयोश्चर्यां त्यजन् जानन् बलाबलम् । वृत्तस्थज्ञानवृद्धानां पूजकः पोष्यपोषकः ।। दीर्घदर्शी विशेषज्ञः कृतज्ञो लोकवल्लभः । सलज्जः सदयः सौम्यः परोपकृतिकर्मठः ॥ अन्तरङ्गारिषड्वर्गपरिहारपरायणः । वशीकृतेन्द्रियग्रामो गृहिधर्माय कल्पते । — योगशास्त्र १।४७-५६ । १. स्वकमं । २. कुकर्म, –योगशा. टी. ११४७ । ३ Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) 'अन्यायोपार्जितं वित्तं दश बर्षाणि तिष्ठति। प्राप्ते त्वेकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति ॥' 'पापेनैवार्थरागान्धः फलमाप्नोति यत्क्वचित । बडिशामिषवत्तत्तमविनाश्य न जीर्यति ॥' [ न्यायनिष्ठं च तिर्यञ्चोपतिष्ठन्ते । अन्यायपरस्तु सोदरैरपि दूरे क्रियेत । यदाह 'यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥' [ ] यद्यपि च कस्यचित्पापानुबन्धिपुण्यकर्मवशादिह लोके विपन्नोपलभ्यते तथापि परलोके साऽवश्यं भाविन्येव । तथा चाह 'नालोकयन्ति पुरुतः परलोकमार्ग लीलातपत्रपटलावृतदृष्टयो ये। तेषामगाधनरकात्तविमोहितानां घोरान्धकूपकुहरे निकटो निपातः ॥' [ ] न्याय एव च परमार्थतोऽर्थोपार्जनोपायोपनिषत् । यदाह 'निपानमिव मण्डूकाः सरः पूर्णमिवाण्डजाः। शुभकर्माणमायान्ति विवशाः सर्वसंपदः ॥' [ न्यायोपार्जितमेव च वित्तं पुरुषार्थसिद्धये प्रभवेत् । यदाह 'पैशून्य-दैन्य-दम्भस्तेयानृतपातकादिपरिहारात् । लोकद्वयधर्मार्थ ... ................. ........ ॥' [ ] सत्पात्रोंको तथा दीन-दुखियोंको दान किया जाता है। अन्यायका धन तो दोनों ही लोकोंमें अहितकारी होता है। इस लोकमें लोकविरुद्ध कार्य करनेसे सरकारसे दण्ड मिलता है और परलोकमें दुर्गति मिलती है। इसके सिवाय अन्यायसे कमाया हुआ धन अधिक समय तक नहीं ठहरता, बल्कि पूर्वसंचित द्रव्यको भी साथ में ले जाता है। कहा है-'अन्यायसे उपार्जित धन दस वर्ष तक ठहरता है। ग्यारहवाँ वर्ष लगते ही मूलके साथ नष्ट हो जाता है । जैसे मछलीको फाँसनेके काँटेमें लगा मांस अपने साथ मछलीको भी ले मरता है उसी तरह धनके रागसे अन्धा हुआ मनुष्य अपने पापसे ही उस फलको पाता है।' न्यायी मनुष्यका पशु-पक्षी भी विश्वास करते हैं। अन्यायीसे तो सहोदर भाई भी दूर हो जाता है। कहा है-'न्यायीकी सहायता पशु-पक्षी भी करते हैं और कुमार्गगामीको सहोदर भाई भी छोड़ देता है।' यद्यपि किसी-किसी अन्यायीके पापानुबन्धी पुण्यकर्मके उदयसे इस लोकमें विपत्ति नहीं देखी जाती तथापि परलोकमें विपत्ति अवश्य आती है। कहा है-'अपनी दृष्टि विलासलीला पटलसे आच्छादित होनेके कारण जो सामने स्थित परलोकके मार्गको नहीं देख पाते उन मुग्धबुद्धियोंका घोर अन्धकूपरूपी नरकमें पतन समीप ही है।' परमार्थसे धन कमानेका उपाय न्याय ही है। कहा है-जैसे मेढक जलाशयमें और मछलियाँ भरे तालाबमें आकर बसती हैं वैसे ही समस्त सम्पदा विवश होकर शुभकर्मका अनुसरण करती हैं । न्यायसे उपार्जित धन ही पुरुषार्थकी सिद्धिमें सहायक होता है। वैभव गृहस्थाश्रममें प्रधान कारण है, इसलिए सर्वप्रथम उसीका निर्देश किया है ॥१॥ २. अपना और पराया उपकार करनेवाले सौजन्य, उदारता, दानशीलता, स्थिरता, प्रेमपूर्वक वार्तालाप करना आदि आत्मधर्मोंको गुण कहते हैं। तथा लोकापवादसे Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३ ३ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) विभववत्वं च गार्हस्थ्ये प्रधानकारणमिति प्रागस्योपादानम् । यजन् गुणगुरून्-[ गुणा:-] सौजन्योदार्यदाक्षिण्य-स्थैयप्रियपूर्वकप्रथमाभिभाषणादयः स्वपरोपकारिण आत्मधर्माः । तथा 'लोकापवादभीरुत्वं दीनाभ्युद्धरणादरः । कृतज्ञता सुदाक्षिण्यं सदाचारः प्रकीर्तितः ।।' [ ] इत्यादि शिष्टाचरणं च । तान् यजन्-पूजयन् । तत्र सौजन्यादीनां पूजा बहुमानप्रशंसा साहाय्यकरणादिना अनुकूला प्रवृत्तिः ।........तिनो हि जीवा अवंद्य (-ध्य) पुण्यबीजनिषेकेणेहामुत्र....संपदमारोहन्ता । शिष्टाचारस्य च प्रशंसैव पूजा । यथा 'विपद्युच्चैः स्थैर्य पदमनुविधेयं च महतां प्रिया न्याय्या वृत्तिर्मलिनमसुभङ्गेऽप्यसुकरम् । असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यस्तनुधनः, सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम् ॥' [ तथा गुरवो मातापित्राचार्याश्च । तान् यजन् । तत्र मातापित्रोः पूजा त्रिसन्ध्यं प्रणामकरणेन लोकद्वय. १२ हितानुष्ठाननियोजनेन सकलव्यापारेषु तदाज्ञया प्रवृत्त्या वर्णगन्धादिप्रधानस्य पुष्पफलादिवस्तुबटपटौकनेन तद्भोगोपयोगे च नवान्नादीनामन्यत्र तदनुचितादिति । आचार्यपूजा तु विनयवर्णने व्याख्याता। व्याख्यास्यते च 'सेवेत गुरून्' इत्यत्र । मनुरप्याह 'यन्मातापितरौ क्लेशं सहेते संभवे नृणाम् । न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ।। उपाध्यायाद्दशाचार्य आचार्येभ्यः शतं पिता । सहस्रं तु पितुर्माता गौरवेणातिरिच्यते ।। आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः । नात्तेनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः ।।' [ मनुस्मृ० ] डरना, दीनोंके उद्धारमें आदरभाव, कृतज्ञता, उदारता आदिको सदाचार कहते हैं। इनका बहुमान करना, प्रशंसा करना, इन गुणवालोंकी सहायता करने आदिके रूपमें अनुकूल प्रवृत्तिको पूजा कहते हैं। शिष्टाचारकी प्रशंसा ही उसकी पूजा है। यथा-'घोर विपत्तिमें स्थिरता, महान् पुरुषोंके पदोंका अनुसरण, न्यायपूर्वक आजीविका, प्राण जानेपर भी मलिनताका न आना, दुर्जनोंकी अभ्यर्थना न करना, गरीब मित्रसे भी याचना न करना, यह सज्जन पुरुषोंका विषम असिधाराव्रत किसने कहा है। ___तथा माता, पिता, आचार्य आदि गुरु कहे जाते हैं । गृहस्थको उनका भी पूजक होना चाहिए। उनमें-से माता पिताकी पूजा तीनों सन्ध्याओंमें उन्हें प्रणाम करना, इस लोक और परलोकमें हितकारी अनुष्ठानोंमें लगना, उनकी आज्ञासे ही सब काम करना, घरके लिए आवश्यक वर्ण-गन्ध-पुष्प-फल आदि तथा नया अन्न आदि लाना, यह सब उनकी पूजा है। आचार्यपूजाका कथन तो पूर्व में विनयके वर्णनमें किया जा चुका है। आगे भी कहेंगे। मनुने भी कहा है-'सन्तानको जन्म देने में माता-पिता जो कष्ट सहते हैं उसका मूल्य सैकड़ों वर्षों में भी नहीं चुकाया जा सकता । उपाध्यायसे दस गुणा आचार्यका, आचार्यसे सौ गुना पिताका और पितासे हजार गुना माताका गौरव है। आचार्य, पिता, १. वस्तुन उपढौ-यो. टी. ११४७ । २. तद्भोगे भोगेन चान्ना-यो. टी.। Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) तथा गुणैः - ज्ञानसंयमादिभिर्गुरवो महान्तो गुणगुरवस्तान् । यजन् —– सेवाञ्जल्यास नाभ्युत्थानादिकरणेन मानयन् । ज्ञानसंयम संपन्ना हि पूज्यमाना नियमात् कल्पद्रुमा इव सदुपदेशादिफलैः फलन्ति । गुणाच ३ गुरवश्च गुणगुरवश्चेति विगृह्यकशेषेण गुरवस्तान् । सद्गीः — सती प्रशस्ता परावर्णवादपारुष्यादिदोषरहिता गीर्वाण्यस्यासी । परापवादो हि बहुदोषः । यदाह ६ १४ 'परपरिभवपरिवादादात्मोत्कर्षाच्च वध्यते कर्म । नीचैर्गोत्रं प्रतिभवमनेकभवकोटिदुर्मोचम् ॥' [ तत्त्यागश्च बहुगुणो । यदाह १५ 'यदिच्छसि वशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा । परापवादसस्येभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥' [ 1 श्रीत्यादि । त्रिवर्गो धर्मार्थकामाः । तत्र 'यतोऽभ्युदयनिश्रेयससिद्धिः स धर्मः । यतः सर्वप्रयोजनसिद्धिः सोऽर्थः । यत आभिमानिकरसानुविद्धा सर्वेन्द्रियप्रीतिः सः कामः । तं त्रिवर्गमन्योन्यानुगुणं गुणमुपकारमनुगतं १२ परस्परानुपघातकं भजन् सेवमानः । यदाह 'यस्य त्रिवर्गशून्यानि दिनान्यायान्ति यान्ति च । स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥' [ J अत्रेदं चिन्त्यते—धर्मार्थयोरुपघातेन तादात्विकविषयसुखलुब्धो वनगज इव को नाम न भवत्यास्पदमापदाम् । न च तस्य धनं धर्मः शरीरं वा यस्य कामेऽत्यन्तासक्तिः । धर्मकामातिक्रमाद्धनमुपार्जितं परे अनुभवन्ति स्वयं तु परं पापस्य भाजनं सिंह इव सिन्धुरवधात् । अर्थकामातिक्रमेण च धर्मसेवा यतिनामेव धर्मो न गृहस्थानाम् । न च धर्मबाधया अर्थकामी सेवेत । बीजभोजिनः कुटुम्बिन इव नास्त्यधार्मिकस्याऽऽयत्यां किमपि कल्याणम् । स खलु सुखी योऽमुत्र सुखाविरोधेनेह लोकसुखमनुभवति । एवमर्थबाधया धर्मकामी सेवमानस्य १८ 1 माता, बड़ा भाई इनकी अवमानना नहीं करना चाहिए।' तथा जो ज्ञान, संयम आदिसे महान हैं उनकी सेवा, हाथ जोड़ना, उन्हें आसन देना, उनके सामने उठकर खड़े होना आदिसे सम्मान करना चाहिए। क्योंकि जो ज्ञान और संयमसे सम्पन्न हैं उनकी पूजा करनेपर नियमसे वे कल्पवृक्षके समान सदुपदेशरूप फल प्रदान करते हैं । ३. गृहस्थकी वाणी परनिन्दा, कठोरता आदि दोषोंसे रहित होना चाहिए, परके अपवाद में बहुत दोष है । कहा है- 'दूसरेकी निन्दा और अपनी प्रशंसा से नीच गोत्र कर्मका ऐसा बन्ध होता है जो करोड़ों भवोंमें भी नहीं छूटता ।' तथा उसके त्यागमें अनेक गुण हैं । कहा है- 'यदि तू जगत्को एक ही कार्यके द्वारा वशमें करना चाहता है तो अपनी वाणीरूपी गौको परनिन्दारूपी धान्यको चरनेसे बचा' । ४. धर्म, अर्थ और कामको त्रिवर्ग कहते हैं। जिससे सांसारिक अभ्युदयपूर्वक मोक्षकी प्राप्ति होती है उसे धर्म कहते हैं । जिससे समस्त प्रयोजन सिद्ध होते हैं उसे अर्थ कहते हैं । और जिससे सब इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है उसे काम कहते हैं । गृहस्थको इन तीनोंका ही सेवन इस प्रकार करना चाहिए कि एकसे दूसरेमें बाधा न आवे अर्थात् एक-एकका सेवन न करके तीनोंका ही अपने-अपने समयपर सेवन करना चाहिए । जो धर्म और अर्थ की परवाह न करके बनैले हाथीकी तरह विषयसुखमें आसक्त रहता है वह किन आपत्तियोंका शिकार नहीं होता । जिसकी कामसेवनमें अति आसक्ति होती है उसका धन, धर्म और शरीर नष्ट हो जाते हैं । जो धर्म और कामकी परवाह न करके केवल धन कमाने में ही लगा रहता है उसके धनको दूसरे भोगते हैं और वह स्वयं पापका भाजन बनता है । इसी तरह धन और कामभोगकी Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय ( प्रथम अध्याय ) १५ पदत्वं ) । कामबाधया धर्मार्थों सेवमानस्य । गार्हस्थ्याभावः स्यात् । एवं च तादात्विकमूल हरकदर्येषु धर्मार्थकामानामन्योन्याबाधा सुलभैव । तथाहि यः किमप्यसंचिन्त्योत्पन्नमर्थमपर्व ( -व्ये ) ति स तादात्विकः । यः पितृपितामहमर्थमन्यायेन भक्षयति स मूलहरः । यो भृत्यात्मपीडाभ्यामर्थं संचिनोति न तु क्वचिदपि व्ययते स कदर्यः । तत्र तादात्विकमूलहरयोरर्थभ्रंशेन धर्मकामयोविनाशान्नास्ति कल्याणम् । कदर्यस्य त्वर्थसंग्रहो राजदायादतस्कराणां निधिर्न तु धर्मकामयोर्हेतुरिति । एतेन च त्रिवर्गबाधा गृहस्थस्य कर्तुमनुचितेति प्रतिपादितम् । यदा तु दैववशाद् बाधा संभवति तदोत्तर (-रोत्तर - ) बाधायां पूर्वस्य पूर्वस्य बाधा रक्षणीया । तथाहि — कामबाधायां धर्मार्थयोर्बाधा रक्षणीया, तयोः सतोः कामस्य सुकरोत्पादत्वात् । कामार्थयोस्तु बाधायां धर्मो रक्षणीयः, धर्ममूलत्वादर्थकामयोः । उक्तं च 'धर्मश्चेन्नावसीदेत केपोतेनापि जीवता । आद्यो ऽस्मीत्यवगन्तव्यं धर्मचिन्तों हि साधवः ॥' [ एतेन इदमपि सूक्तं संग्रहीतमेव 'पादमायान्निधिं कुर्यात्पादं वित्ताय खट्वैयेत् । धर्मोपभोगयोः पादं पादं भर्तव्यपोषणे ॥' [ केचित्वाहु: -- 'आयाद्धं च नियुञ्जीत धर्मे समधिकं ततः । शेषेण शेषं कुर्वीत यत्नतस्तुच्छमैहिकम् ॥ आयव्ययमनालोच्य यस्तु वैश्रवणायते । अचिरेणैव कालेन सोऽत्र वै श्रव (-म-) णायते ॥' [ १. ऋणाधिकत्वं - यो. टी. । २. 'कपालेनापि जीवतः ' - योग. टी. ३. आढ्यो - यो. टी. ४. धर्मवित्ता हि-यो. टी. । ५. न्निविं । ६. कल्पयेत् — सो. उपा. ३७३ ॥ परवाह न करके केवल धर्मसेवन करना तो मुनियोंका ही धर्म है गृहस्थोंका नहीं | किन्तु धर्ममें बाधा डालकर अर्थ और कामका सेवन नहीं करना चाहिए; क्योंकि बीजके गेहूँको भी खा डालनेवाले किसानकी तरह अधार्मिक पुरुषका भविष्य में अकल्याण ही होता है । सुखी वही होता है जो पारलौकिक सुखका विरोध न करते हुए इस लोक में सुख भोगता है । इसी तरह धन कमानेकी चिन्ता न करके जो धर्म और कामका सेवन करता है वह कर्जदार हो जाता है। जो कामसेवनसे विमुख होकर केवल धर्म और अर्थका उपार्जन करता है उसका गार्हस्थ्य समाप्त हो जाता है । अतः गृहस्थको त्रिवर्ग में बाधा डालना उचित नहीं है । यदि दैववश बाधा पड़े तो उत्तरोत्तर की बाधामें पूर्व-पूर्व की बाधा रक्षणीय है । अर्थात् काम सामने धर्म और अर्थ में बाधा उपस्थित हो उसे पहले दूर करना चाहिए क्योंकि धर्म और धनके रहनेपर कामसुख सरलता से प्राप्त किया जा सकता है। काम और अर्थके सामने धर्मकी बाधा होनेपर उसे पहले दूर करना चाहिए क्योंकि अर्थ और कामका मूल धर्म है । ] ] ३ ६ ९ १२ १५ १८ Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार ) तदित्यादि । तं त्रिवर्गमर्हन्ति तत्साधनयोग्या भवन्तीति तदर्हा गृहिणीस्थानालया यस्य स तथोक्तः । तत्र समकुलशीला स्वजनकजनन्यग्निदेवादिसाक्षिकं कृतपाणिग्रहणा शुचिपोराचाररता चरित्रशरणार्जवक्षमोपेता ३ च त्रिवर्हाि गृहिणी। तत्पौराचारोपदेशो जनकस्य सीतां प्रति यथा 'अभ्युत्थानमुपागते गृहपती तद्भाषणे नम्रता, तत्पादार्पितदृष्टिरासनविधौ तस्योपचर्या स्वयम् । सुप्ते तत्र शयीत तत्प्रथमतो जह्याच्च शय्यामिति, प्राज्ञैः पुत्रि निवेदिताः कुलवधूसिद्धान्तधर्मा अमी ।।' [ 'निर्व्याबाधयिते ननांदृषु नता श्वश्रूषु भक्ता भव, स्निग्धा बन्धुषु वत्सला परिजने स्मीरा (?) सपत्नीष्वपि । पत्युमित्रजने सनर्मवचना भिन्ना च तद्वैरिणि, स्त्रीणां संवननं नतभ्रु तदिदं वित्तौषदं भर्तृषु ॥' [ अपि च 'पढम चेय विबुज्झइ सुवइपसुंतंमि परियणे सयत्ने । जेमेइ भुत्तसेसं घरं स लन्दिण सा धरिणि ।। (?) घरवावारे धरिणि सुरए वेसा बहुं व गुरुमज्झे। परियणमज्झम्मि सहि विहुरे भिच्च व मंतिव्व ॥' [ ५. पत्नी, नगर या ग्राम और घर गृहस्थधर्मके अनुकूल होने चाहिए। पिता, पितामह आदि पूर्वपुरुषोंके वंशको कुल कहते हैं और मद्य, मांस आदिके त्यागको शील कहते हैं । जिनका कुल और शील अपने समान हो उनके वंशकी कन्याका अग्नि और देव आदिकी साक्षीपूर्वक पाणिग्रहणको विवाह कहते हैं। विवाहका फल शुद्ध पत्नीकी प्राप्ति है। यदि पत्नी ठीक न हो तो जीवन नरक हो जाता है। योग्य पत्नीके मिलनेसे अच्छी सन्तान प्राप्त होती है, चित्त प्रसन्न रहता है, घरके कार्य सुन्दर रीतिसे सम्पन्न होते हैं, कुलीनता और आचारविशुद्धिका संरक्षण होता है, देव-अतिथि और बन्धुबान्धओंके सत्कार में बाधा नहीं आती। जनकने सीताको उपदेश देते हुए कहा था-'स्वामीके घर आनेपर स्त्रीको खड़ा होना चाहिए। उसके भाषणमें नम्रता होनी चाहिए। दृष्टि उसके चरणोंपर होनी चाहिए। उसके बैठनेपर स्वयं उसकी सेवा करनी चाहिए। उसके सो जानेपर सोना चाहिए और उसके जागनेसे पहले शय्या त्याग देना चाहिए। हे पुत्रि ! विद्वानोंने ये कुलवधूके धर्म कहे हैं। तथा सासकी सेवा, बन्धुजनोंमें स्नेहशीलता, परिचारकोंमें वात्सल्य, सपत्नियोंमें सौहार्द, पतिके मित्रोंसे विनयपूर्ण वचनालाप और पतिके शत्रुओंसे अप्रीति ये सब पतिको अपना बनानेकी औषध है।' और भी कहा है-'जो सबसे पहले जागती है, और समस्त परिवारके सो जानेपर सोती है, सबके भोजन करनेपर स्वयं भोजन करती है वह गृहिणी है।' घरके व्यापारमें गृहिणी, सुरतमें वेश्या, गुरुजनोंके बीच में वधू , परिजनोंके मध्यमें सखी और परिजनोंके अभावमें मन्त्री और सेवकके तुल्य जो हो वह गृहिणी है। योग्य पत्नीके साथ स्थान और घर भी योग्य होना चाहिए। स्थान न तो एकदम खुला ही होना चाहिए और न एकदम गुप्त ही होना चाहिए । अत्यन्त खुले स्थानमें पासमें किसीका वास न होनेसे चोरों आदिका भय रहता है। अत्यन्त गुप्त होनेपर एक तो मकानकी अपनी शोभा नहीं रहती, चारों ओरसे मकानोंके जमघट में वह छुप जाता है। दूसरे . Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय ( प्रथम अध्याय ) स्वचक्र-परचक्र - दुर्भिक्ष-मारीति-जनविरोधाद्युपष्ट (द्र - ) वाभावात् पूर्वोपार्जितानां धर्मादीनामविनाशादपूर्वाणां च लाभात् त्रिवर्गाहं स्थानं पुरग्रामादि । तथा शल्यादिदोषरहितं बहलदूर्वाप्रवालकुशस्तम्ब-प्रशस्तवणगन्ध र समृत्तिका - सुस्वादुजलोद्गमनिपानादिमन्निमित्तविशेषख्यापितोदयं सरि (-परि-) पार्श्वतस्त्र्यैवगिकात्मसमान शिष्टगृहस्थ गृहैरसंबाधतयाऽलंकृतं च त्रिवर्गस्थानं वास्तु । तथा प्रतिनियतद्वारः सर्वर्तुरम्यः प्रविभक्तदेवार्चनाद्युचितप्रदेश: सुरक्षितश्चा अ य [ श्चालय ] स्त्रिवर्गार्हः । ह्रीमयः --- लज्जया वैयात्याभावेन निवृत्त इव । लज्जावान् हि प्राणप्रहाणेऽपि न प्रतिज्ञातमपजहाति, नापि विभव वयोऽवस्था- देश - कालजात्याद्यनुचितवेषो भवति, नापि देशकुलजातिगर्हितं कर्म करोति, नापि प्रसिद्धदेशाचारमतिक्रामति । यदाह'लज्जां गुणौघजननीं जननीमिवार्यामत्यन्तशुद्धहृदयामनुवर्तमानाः । तेजस्विनः सुखमसूनपि सन्त्यजन्ति, सत्यस्थितिव्यसनिनो न पुनः प्रतिज्ञाम् ॥' [ युक्ताहारविहारः - युक्तो 1 शास्त्रविहितावाहारविहारी भोजनविचरणे यस्य । विधिर्यथा 'प्रसृष्टे विण्मूत्रे हृदि सुविमले दोषे स्वपथगे, विशुद्धे चोद्गारे क्षुदुपगमने वातेऽनुसरति । तथानावुद्रिके विशद करणे देहे च सुलघी, प्रयुञ्जीताहारं विधिनियमितं कालः स हि मतः ॥ [ अष्टाङ्गहृ. ८५५ ] 'विशुद्धे चोद्गारे' इत्यनेनाविशुद्धोद्गारवर्जनादजीर्णे न भुञ्जीत 'अजीर्णप्रभवा रोगा' इति । तल्लक्षणं यथा— 'मलवातयोर्विगन्धो विभेद्यो गात्रगौरवमरुच्यम् । अविशुद्धश्चोद्गारः षड् जीर्णव्यक्तलिङ्गानि ॥ [ १७ ] आग वगैरह की दुर्घटना होनेपर आने-जाने में कठिनाई होती है। तथा पड़ोसी शीलसम्पन्नहोने चाहिए । यदि पड़ोसी कुशील हों तो उनकी बातोंके सुनने और उनकी चेष्टाओंके देखनेसे अपने भी गुणों को हानि होती है । अतः अच्छे पड़ोस में मकान होना आवश्यक है । ६. तथा गृहस्थको निर्लज्ज नहीं होना चाहिए, लज्जाशील होना चाहिए । लज्जा गुणोंकी जननी है । लज्जाशील व्यक्ति प्राण भले ही छोड़ दे किन्तु अपनी मर्यादाको नहीं छोड़ता । ७. आहार-विहार युक्त होना चाहिए । यदि अजीर्ण हो, पहले किया भोजन पचा न हो तो नया भोजन नहीं करना चाहिए। अजीर्ण में भोजन करनेपर अजीर्ण में वृद्धि होगी और अजीर्ण सब रोगोंकी जड़ है । अत: भूख लगनेपर मित भोजन करना चाहिए। कहा है'जो मित भोजन करता है वह बहुत भोजन करता है। बिना भूखके अमृत भी खानेपर विष होता है' । आहारप्रयोग- १२ आहार करनेके समयका प्रविधान करते हुए कहा है- 'जब मल मूत्रका त्याग कर दिया हो, हृदय निर्मल हो, वात पित्त कफ अपने योग्य हो, भूख लगी हो, वायुका निःसरण ठीक हो, अग्नि प्रज्वलित हो, शरीर हलका हो तब भोजन करना चाहिए। वही भोजनका काल माना गया है।' अजीर्ण में भोजन नहीं करना चाहिए । अजीर्ण रोगोंकी जड़ है । मलवायु में दुर्गन्ध, मलका कड़ा होना, शरीरमें भारीपन, अरुचि और डकार में खटास ये सब अजीर्ण के लक्षण हैं।' अत: भूख लगनेपर हित, मित और सात्म्य भोजन करना चाहिए । सा. - ३ ३ ६ इत्युक्तं स्यात् । यत्पठन्ति - १८ १५ २१ Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) "विधिनियमितम्' इत्यनेन च काले हितं मितं सात्म्यं चाद्यादित्युक्तं स्यात् । मितं-मात्रापरिच्छिन्नम् । यदाह 'मात्राशि सर्वकालं स्यान्मात्रा ह्यग्नेः प्रवर्तिका । मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते गुरूण्यपि लघून्यपि । गुरूणामधंसौहित्यं लघूनां नातितृप्तता। मात्राप्रमाणं निर्दिष्टं सुखं तावद्धि जीयंति ॥' [ अष्टाङ्गह. ८।२ ] सात्म्यलक्षणं यथा 'पानाहारादयो यस्य विरुद्धा प्रकृतेरपि । सुखित्वायैव कल्पन्ते तत्सात्म्यमिति गीयते ॥' अविधिभोजनः [-ने] घनव्याधिरसमाधिमरणं च सुघटमेव । यदाह 'अयुक्तियुक्तमन्नं हि व्याधये मरणाय वा।' विहारविधिर्यथा-सातपत्रपद (?) अविधिविहारिणो ह्यनर्थपरम्पराऽवश्यं भाविन्येव । आर्यसमितिः-आर्येषु सदाचरणकप्राणेषु न तु कितव-धूर्त-विट-भट्ट-भण्डनटादिषु समितिः सङ्गति१५ यस्य । अनार्यसङ्गतौ हि सदपि शीलं विशियेत ( विशोर्यंत ) । यदाह 'यदि सत्सङ्गनिरतो भविष्यसि भविष्यसि । अर्थ सज्ज्ञानगोष्ठीषु पतिष्यसि पतिष्यसि ।।' अपि च'मिथ्यादृशां च पथश्ख्यातानां (?) मायाविनां व्यसनिनां च खलात्मनां च । सङ्ग विमुञ्चत बुधाः कुरुतोत्तमानां, गन्तुं मतिर्यदि समुन्नतमार्ग एव ॥' [ कहा है-सर्वदा उचित मात्रामें भोजन करना चाहिए। भोजनकी उचित मात्रा अग्निको उद्दीप्त करती है। भोज्य हलका हो या भारी हो, मात्राका ध्यान रखना आवश्यक है। जितना सुख पूर्वक पच सके वही मात्रा है। प्रकृति विरुद्ध भी खान-पान यदि सुखकारक हो तो उसे सात्म्य कहते हैं। अविधि पूर्वक भोजन आधि व्याधि और मरण कारक होता है। कहा है-अयुक्त भोजन व्याधि और मरणके लिए होता है। इसी तरह जो अविधि पूर्वक विहार करता है उसका अनिष्ट अवश्यंभावी होता है। गृहस्थको सदाचारी पुरुषोंकी संगति करनी चाहिए, धूर्त और बदमाशोंकी नहीं। उनकी संगतिसे शील नष्ट होता है। कहा है-यदि उन्नतिके मार्गमें जाना चाहते हो तो मिथ्यादृष्टियों, कुपथगामियों, मायावियों, व्यसनियों और दुर्जनोंकी संगति छोड़कर उत्तम पुरुषोंकी संगति करो। गृहस्थको प्राज्ञ होना चाहिए अर्थात् उसे अपने और दूसरोंके द्रव्य, क्षेत्र काल भावकृत सामर्थ्य और असामर्थ्यका ज्ञान होना चाहिए। उसके ज्ञानपर ही सब कार्य सफल होते हैं, अन्यथा तो विफल होते हैं। कहा है-यदि शक्तिके अनुसार व्यायाम किया जाये तो प्राणियोंके अंगोंकी वृद्धि होती है और बलको विचारे बिना कार्य करनेसे विनाश होता है।' १. अथासज्जन-यो. टी. ११४७ । Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) 'प्राज्ञः' एतेन बलाबलज्ञत्वं दीर्घदर्शित्वं विशेषज्ञता चोक्ता स्यात् । तथाहि-बलं स्वपरयोर्द्रव्यक्षेत्रकालभावकृतं सामर्थ्यमबलमपि तथैव । तत् ज्ञाने हि सर्वोऽप्यारम्भः फलवानन्यथा तु विफलम् । यदाह 'स्थाने श्रमवतां शक्त्या व्याया अयथाबलमारम्भो निदानं क्षयसंपदः॥ [ ] तच्च प्रज्ञव। तथा दीर्घकालभावित्वाद्दीर्घमर्थमनर्थ च पश्यति पर्यालोचयतीत्येवंशीलो दीर्घदर्शी तद्यावोऽपि (?) प्रज्ञैव । 'प्रज्ञा कालत्रयार्थगा' इति वचनात । तथा वस्त्ववस्तुनोः कृत्याकृत्ययोः स्वपरयोश्च ह विशेषमन्तरं जानातीति विशेषज्ञः । अविशेषज्ञो हि पुरुष: पशो तिरिच्यते । अथवा विशेषं आत्मन एव गुणदोषाधिरोहणलक्षणं जानातीति विशेषज्ञः । यदाह 'प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत नरश्चरितमात्मनः। किन्नु मे पशुभिस्तुल्यं किन्तु सत्पुरुषैरिति ।' [ ] स च प्रज्ञेषः । ततः सूक्तं प्राज्ञ इति । तथा चोक्तम् 'इदं फलमियं क्रिया करणमेतदेषः क्रमो, व्ययोऽयमनुषङ्गजं फलमिदं दशैषा मम । अयं सुहृदयं द्विषत्प्रयतदेशकालाविमा विति प्रतिवितर्कयन्प्रयतते बुधो नेतरः ॥ [ ] कृतज्ञः-कृतं परोपकृतं जानाति न निद्भुते । एवं हि तस्य कुशललाभाय उपकारकारिणो बहुमन्यते । ' कृतघ्नस्य निष्कृतिरेव नास्ति । यदाह 'ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा । निष्कृतिविहिता राजन् कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः॥[ ] कृतज्ञाश्चात्रेदानीमतिदुर्लभाः । यदाह इस प्रकारके ज्ञानको ही प्रज्ञा कहते हैं। तथा दीर्घदर्शी होना चाहिए जो दीर्घकालमें होनेवाले अर्थ अनर्थका विचार करता है उसे दीर्घदर्शी कहते हैं। यह भी प्रज्ञा ही है क्योंकि प्रज्ञाको त्रिकालवर्ती अर्थगत कहा है। तथा जो वस्तु अवस्तुके, कृत्य अकृत्यके अपने परायेके विशेष अन्तरको जानता है उसे विशेषज्ञ कहते हैं। जो पुरुष विशेषज्ञ नहीं है वह पशुसे भिन्न नहीं है। अथवा जो आत्माके ही गुण दोषोंपर आरोहण करने रूप विशेषको जानता है वह विशेषज्ञ है। कहा है-'मनुष्यको प्रतिदिन अपने चरितका निरीक्षण करना चाहिए कि वह पशुओंके तुल्य है या सत्पुरुषोंके तुल्य है।' यह भी प्रज्ञा ही है अतः प्रज्ञा कहना उचित है । कहा है-यह फल है, यह क्रिया है, यह करण है, यह क्रम है, यह आनुषंगिक हानि लाभ है, मेरी यह दशा है, अमुक मेरा मित्र और अमुक मेरा शत्रु है, ये उचित देश काल है, ऐसा विचार बुद्धिमान ही करता है दूसरा नहीं करता।' तथा गृहस्थको कृतज्ञ होना चाहिए-दूसरेके द्वारा किये गये उपकारको भूलना या छिपाना नहीं चाहिए । इससे यह लाभ है कि उपकार करने वाले उसका बहुमान करते हैं । कृतघ्नका तो उद्धार ही सम्भव नहीं है। कहा है-ब्रह्महत्या करनेवाले, मद्यपायी, चोर और व्रतभंग करनेवालेका तो उद्धार सम्भव है किन्तु कृतघ्नका उद्धार सम्भव नहीं है। आजके समयमें कृतज्ञ पुरुष दुर्लभ १. लाभो यदुपकारिणो-योग, टी.। Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ ६ १५ २० २१ धर्मामृत ( सागार ) 'पञ्चषाः सन्ति ते केचिदुपकर्तुं स्फुरन्ति ये । ये स्मरन्त्युपकारस्य तैस्तु वन्ध्या वसुंधरा ॥' [ यश्च कृतज्ञः स लोकवल्लभो भवत्येव । यदाह वशी - इष्टेऽर्थेऽनासक्त्या विरुद्धे वा प्रवृत्त्या स्पर्शनादीन्द्रियविकारनिरोधकोऽन्तरङ्गारिषड्वर्गनिग्रहपरश्च । तत्रायुक्तितः प्रयुक्ताः कामक्रोध लोभ मान-मद-हर्षाः शिष्टगृहस्थानामन्तरङ्गोऽरिषड्वर्गः । तत्र परपरिगृहीतास्वनूढासु वा स्त्रीषु दुरभिसन्धिः कामः । परस्यात्मनो वा अपायमविचार्य कोपकरणं क्रोधः । ९ दानार्हेषु स्वधनाप्रदानं निष्कारणं परधनग्रहणं च लोभः । दुरभिनिवेशारोहो युक्तोक्तो' ग्रहणं वा मानः । कुलबलैश्वर्य-रूप-विद्यादिभिरहंकारकरणं परपद - [ प्रघर्ष ] निबन्धनं वा मदः । निर्निमित्तं परदुःखोत्पादनेन स्वस्य द्यूत- पापद्धर्याद्यनर्थसंश्रयेण वा मनःप्रमोदो हर्षः । एतेषां च परिहार्यत्वमपायहेतुत्वात् । धर्मविधि१२ धर्मस्याभ्युदयनिःश्रेयसहेतोविधिः — युक्त्यागमाभ्यां प्रतिष्ठितिस्तम् । शृण्वन् – प्रत्यहमाकर्णयन् । यदाह'भव्यः किं कुशलं ममेति विमृशन्दुःखाद् भृशं भीतिवान्, सौख्यैषी श्रवणादिबुद्धिविभवः श्रुत्वा विचार्यं स्फुटम् । धर्मं शर्मंकरं दयागुणमयं युक्त्यागमाभ्यां स्थिति, 'विधित्सुरेनं तदिहात्मवश्यं कृतज्ञतायाः समुपेहि पारम् । गुणैरुपेतोऽप्यखिलैः कृतघ्नः समस्तमुद्वेजयते हि लोकम् ॥' [ गृह्णन् धर्मकथां श्रुतावधिकृतः शास्यो निरस्ताग्रहः ॥' [ आत्मानु., ७ श्लो. ] दयालुः — दुःखितदुःखप्रहाणेच्छालक्षणां दयां शीलयन् । 'धर्मस्य मूलं दया' इति श्रुतेस्तां ह्मवश्यं १८ कुर्वीत । यदाह 'प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा । आत्मौपम्येन भूतानां दयां कुर्वीत मानवः ॥' [ ] अपि च 'श्रूयतां धर्मं सर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् । आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥' [ ] 1 ] ।' हैं । कहा है- 'जो उपकार करनेका उत्साह रखते हैं वे तो कुछ हैं भी । किन्तु जो उपकारको स्मरण रखते हैं उनसे यह पृथ्वी बांझ है जो कृतज्ञ होता है वह लोगोंको प्रिय होता ही है । कहा है- 'यदि तुम पृथ्वीको अपने वशमें करना चाहते हो तो कृतज्ञ बनो । जो सब गुणोंसे युक्त होते हुए भी कृतघ्न होता है सब लोग उससे घृणा करते हैं' । तथा गृहस्थको 'वशी' होना चाहिए । अर्थात् इष्ट वस्तुमें अनासक्ति के साथ तथा विरुद्ध वस्तुमें भी प्रवृत्ति न करके स्पर्शन आदि इन्द्रियोंके विकारको रोकनेवाला और अन्तरंग छह शत्रुओंके निग्रह में तत्पर होना चाहिए । अयुक्तिसे प्रयुक्त काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष ये शिष्ट गृहस्थोंके छह अन्तरंग शत्रु हैं। दूसरेकी विवाहित या अविवाहित स्त्रीमें दुर्भावको काम कहते हैं । अपने या दूसरे के अपायका विचार न करके कोप करना क्रोध है । दानके योग्यको भी अपना धन न देना या अकारण पराया धन ग्रहण करना लोभ है । दुष्ट अभिप्रायको अथवा युक्त बात को भी ग्रहण न करना मान है । कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप, विद्या आदिका अहंकार करना मद है । विना कारणके दूसरोंको दुःखी करनेसे अथवा स्वयं जुआ, शिकार आदि अनर्थका १. युक्तोक्ताग्रहणं । Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) एतेन 'अवृत्तिव्याधिशोकानिनुवर्तेत शक्तितः । आत्मवत्सततं पश्येदपि कीटपिपीलिकाः॥ आर्द्रसंतानतात्यागः कायवाक्चेतसां दमः । स्वार्थबद्धिः पदार्थष पर्याप्तमिति सदव्रतम् ॥ उपकारप्रधानः स्यादपकारपरेऽप्यरौ।' [ इत्यादिरप्याचारो निरुद्धो बोद्धव्यः, सकलगुणभिनित्वाद्दयायाः (?) अघभी:-अघात् पापात् दृष्टादृष्टापायफलात कर्मणश्चौर्यादेमद्यपानादेश्च बिभ्यस् पापभीरित्यर्थः। सागारधर्म-विकलचारित्रम् । यत्स्वामि 'सकलं विकलं चरणं तत्सकलं सर्वसङ्गविरतानाम् । अनगाराणां विकलं सागाराणां ससङ्गानाम् ॥ [ रत्न. श्रा., ५०] चरेत्-'त्रिज्वाश्चाह' इत्यनेनार्हे सप्तमी । चरितुमर्हतीत्यर्थः । विधौ वा । यथोक्तगुणेन गृहिणा सागारधर्मश्चरितव्य इत्यर्थः । अत्र पूर्वो भद्रक उत्तरो द्रव्यपाक्षिक इति विभागः ॥११॥ अथ सकलसागारधर्मसंग्रहार्थमाह सम्यक्त्वममलममलान्यणु-गुण-शिक्षाव्रतानि मरणान्ते। सल्लेखना च विधिना पूर्णः सागारधर्मोऽयम् ॥१२॥ आश्रय लेनेमें मनका प्रमुदित होना हर्ष है। ये सब अपायका कारण होनेसे त्याज्य हैं। तथा अभ्युदय और मोक्षके हेतु धर्मकी विधिको-युक्ति और आगमसे उसके स्थापनाको सुननेवाला होना चाहिए। कहा है-जो भव्य जीव मेरा कल्याण किसमें है ऐसा विचारता हुआ दुःखसे अत्यन्त डरता है सुखको चाहता है, दयागुणमय सुखकारी धर्मको सुनकर युक्ति और आगमसे उसकी स्थितिका विचार करता है। धर्मकथा सुनता है उसे ग्रहण करता है और आग्रह नहीं रखता, वह प्रशंसनीय है। तथा दयालु होना चाहिए, दुःखीका दुख दूर करनेकी इच्छा रूप दयाका पालक होना चाहिए; क्योंकि धर्मका मूल दया है। कहा है-'जैसे हमें अपने प्राण प्रिय हैं उसी तरह अन्य प्राणियोंको भी हैं यह मानकर मनुष्यको सब प्राणियों पर दया करना चाहिए।' तथा धर्मका सार सुनना चाहिए और सुनकर उसे अवधारण करना चाहिए । जो बात स्वयं अपनेको अच्छी नहीं लगती वह दूसरोंके प्रति भी नहीं करना चाहिए। जो आजीविकाके अभावसे, व्याधि और शोकसे पीड़ित हैं शक्ति के अनुसार उनकी सहायता करना चाहिए और कीट चींटी आदिको भी अपने समान देखना चाहिए ।' अपकारी शत्रुका भी उपकार करना चाहिए । इत्यादि आचार भी दयामें ही जानना। तथा गृहस्थको चोरी मद्यपान आदि पापोंसे डरते रहना चाहिए। ऐसे गृहस्थको श्रावक धर्म अथोत विकल चारित्र पालना चाहिए। कहा है-चारित्र दो प्रकारका ह-सकल चारित्र और विकल चारित्र । समस्त परिग्रहसे रहित अनगार मुनियोंके सकल चारित्र होता है और परिग्रही गृहस्थोंके विकल चारित्र होता है ॥११॥ ___ अब मन्दबुद्धि शिष्य सुख पूर्वक सरलतासे स्मरण रख सकें इसलिए समस्त सागारधर्मका संग्रह एक श्लोकसे कहते हैं शंका आदि दोषोंसे रहित सम्यग्दर्शन, निरतिचार अणुव्रत, गुणव्रत और शिक्षाबत और मरण समय विधिपूर्वक सल्लेखना यह पूर्ण सागार धर्म है ॥१२॥ Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) सम्यक्त्वं प्राक् प्रबन्धेन व्यावणितम् । तस्य च मोक्षाङ्गेषु प्रधानत्वात् मुग्धधियां च दुर्लक्षणत्वात् इदानीं गृहिणां तत्प्रतिपत्तये प्राचां सूक्तिप्रपञ्चः प्रस्तीर्यते । तथाहि 'जीवाजीवादीनां तत्त्वार्थानां सदैव कर्तव्यम् । श्रद्धानं विपरीताभिनिवेशविविक्तमात्मरूपं तत् ॥' [ पुरुषार्थसि. २२ ] जीवाजीवादितत्त्वोपदेशस्तु संक्षेपेण यथा 'उपादेयतया जीवोऽजीवो हेयतयोदितः । हेयस्यास्मिन्नुपादानहेतुत्वेनास्रवः स्मृतः॥ हेयोपादानरूपेण बन्धः संपरिकीर्तितः । संवरो निर्जरा हेयहानिहेतुतयोदिते ॥ [ 'श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टाङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ।। आप्तेनोत्सिन्नदोषेण सर्वज्ञेनागमेशिना। भवितव्यं नियोगेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत् ।। आप्तोपज्ञमनुल्लङध्यमदृष्टेष्टविरोधकम् । तत्त्वोपदेशकृत्सा शास्त्रं कापथघट्टनम् ।। विषयाशावशातीतो निरारम्भोऽपरिग्रहः । ज्ञानध्यानतपोरक्तस्तपस्वी स प्रशस्यते ॥ [ रत्न. श्रा. ४, ५, ९, १० श्लो. ] तद्विशुद्धिविधिस्त्वयम् विशेषार्थ-कुन्दकुन्दाचार्यने 'चरित्तपाहुडमें और उमास्वामीने तत्त्वार्थ सूत्रके सातवें अध्यायमें इतना ही पूर्ण सागार धर्म कहा है। इसीका विस्तार श्रावकाचारोंमें मिलता है। अन्तर गणव्रतों और शिक्षाव्रतोंके भेदोंमें है संख्यामें अन्तर नहीं है। व्रतोंकी संख्या तो बारह ही है । जैसे कुन्दकुन्दने दिग्वत और देशवतको 'दिसिविदिसिमाण' नामका एक ही गुणव्रत माना है। तत्त्वार्थसूत्रमें इसे दो व्रत माने हैं। कुन्दकुन्दने इस एक संख्याकी कमीको सल्लेखनाको शिक्षाबतोंमें सम्मिलित करके पूर्ण किया है। इसका विशेष विवेचन आगे इन व्रतोंके प्रसंगमें किया जायगा । जहाँ मरणके साथ ही जीवनका अन्त हो उसे मरणान्त या तद्भवमरण कहते हैं । यों तो प्रति समय आयु कर्मके निषेकोंकी उदयपूर्वक निर्जरा होती है। उसे आवीचि मरण कहते हैं। यह मरण तो सभी प्राणियों में प्रतिक्षण हुआ करता है। उस मरणसे प्रयोजन यहाँ नहीं है । सम्यक् अर्थात् लाभ आदिकी अपेक्षा न करके, लेखना अर्थात् बाह्य और आभ्यन्तर तपके द्वारा शरीर और कषायोंको कृश करना सल्लेखना है। इसकी विधि सत्तरहवें अध्यायमें कहेंगे। यद्यपि अनगार धर्मामृतके प्रारम्भमें सम्यग्दर्शनका वर्णन किया है तथापि मोक्षके कारणोंमें उसके प्रधान होनेसे तथा मूढ़ बुद्धियोंके द्वारा उसका लक्षण ठीक न जाननेसे, गृहस्थोंको उसका बोध करानेके लिए पूर्वाचार्योकी सूक्तियोंको विस्तारसे कहते हैं १८ wwwmaram १. पंचेवणुव्वयाई गुणव्वयाइं हवंति.तह तिण्णि । सिक्खावय चत्तारि य संजमचरणं च सायारं -चरि. पा., २२ गा.। - Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) 'सकलमनेकान्तात्मकमिदमुक्तं वस्तुजातमखिलज्ञैः । कि सत्यमसत्यं वा न जातु शङ्केति कर्तव्या । इह जन्मनि विभवादीनमुत्र चक्रित्वकेशवत्वादीन् । एकान्तवाददूषितपरसमयानपि च नाकाक्षेत् ॥ क्षुत्तृष्णाशीतोष्णप्रभृतिषु नानाविधेषु भावेषु । द्रव्येषु पुरीषादिषु विचिकित्सा नैव करणीया ॥ लोके शास्त्राभासे समयाभासे च देवताभासे। नित्यमपि तत्त्वरुचिना कर्तव्यममूढदृष्टित्वम् ॥ धर्मोऽभिवर्द्धनीयः सदात्मनो मार्दवादिभावनया । परदोषनिगृहनमपि विधेयमुपबृहणगुणार्थम् ।। कामक्रोधमदादिषु चलयितुमुदितेषु वमनो न्यायात् । श्रुतमात्मनः परस्य च युक्त्या स्थितिकरणमपि कार्यम् ।। अनवरतमहिंसायां शिवसुखलक्ष्मीनिबन्धने धर्मे । सर्वेष्वपि च सर्मिषु परमं वात्सल्यमवलम्ब्यम् ।। आत्मा प्रभावनीयो रत्नत्रयतेजसा सततमेव। दानतपोजिनपूजाविद्यातिशयश्च जिनधर्मः॥ [पुरुषार्थ., २३-३० श्लो.] आचार्य अमृतचन्द्रने कहा है 'जीव अजीव आदि तत्त्वार्थोंका सदा ही विपरीत अभिप्राय रहित श्रद्धान करना चाहिए । वह श्रद्धान आत्माका स्वरूप है।' जीव अजीव आदि तत्त्वोंका उपदेश संक्षेपमें इस प्रकार है-जीव उपादेय है अजीव हेय है। जीवमें हेय अजीवको लानेमें कारण होनेसे आस्रव तत्त्व कहा है। हेय अजीवके उपादान रूपसे बन्ध कहा है और हेयकी हानिमें हेतु होनेसे संवर और निर्जरा कहा है। तथा समस्त हेयके छूट जानेसे मोक्ष कहा है। आचार्य समन्तभद्रने सच्चे देव, शास्त्र, गुरुके तीन मूढ़ता और आठ मद रहित तथा आठ अंग सहित श्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहा है। जो दोषोंसे रहित सर्वज्ञ और आगमका उपदेष्टा होता है वही आप्त है, अन्य आप्त नहीं है। तथा जो आप्तके द्वारा कहा गया है, जिसका कथन प्रत्यक्ष और अनुमानके अविरुद्ध है, तत्त्वोंका उपदेशक है, सबका हितकारी है और कुमार्गका नाशक है वही सच्चा शास्त्र है। जो विषयोंकी चाहसे रहित है, आरम्भ और परिग्रहसे रहित है तथा ज्ञान ध्यानमें लीन रहता है वही तपस्वी प्रशंसनीय (सच्चा गुरु) है। सम्यग्दर्शनकी विशुद्धिकी विधि इस प्रकार है-सर्वज्ञ देवने समस्त वस्तुमात्रको अनेकान्तात्मक कहा है । यह सत्य है या असत्य है, ऐसी शंका कभी भी नहीं करनी चाहिए। यह सम्यग्दर्शनका प्रथम निःशंकित अंग है। ___ इस जन्म में वैभव आदिकी और परजन्ममें चक्री केशव आदि पदोंकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिए। तथा एकान्तवादसे दूषित अन्य धर्मोंकी भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। यह दूसरा निःकांक्षित अंग है। भूख प्यास, शीत उष्ण आदि नाना प्रकारके भावोंमें और मल आदि द्रव्योंमें ग्लानि भाव नहीं करना चाहिए। यह तीसरा निर्विचिकित्सा अंग है। तत्त्वरुचि सम्यग्दृष्टिको लोकमें, शास्त्राभासमें, मिथ्यादर्शनोंमें, मिथ्या देवताओंमें सदा अमूढ़ बुद्धि होना चाहिए। यह चतुर्थ अमूढ़ दृष्टि अंग है। Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार ) 'स्मयेन योऽन्यानत्येति धर्मस्थान् गर्विताशयः । सोऽत्येति धर्ममात्मीयं न धर्मो धार्मिकैविना ॥ नाङ्गहीनमलं छेत्तुं दर्शनं जन्मसंततिम् । न हि मन्त्रोऽक्षरन्यूनो निहन्ति विषवेदनाम् ॥' [ रत्न. श्रा. २१, २६ श्लो. ] अपि च 'आप्तागमपदार्थानां श्रद्धानं कारणद्वयात् । मूढाद्यपोढमष्टाङ्गं सम्यक्त्वं प्रशमादिभाक् ॥' [ सो. उपा., ४८ श्लो.] अणु-गुण-शिक्षावतानि-अणुगुणशिक्षापूर्वाणि व्रतानीति विग्रहः । मरणान्ते-मृत्यावासन्ने . सति । सल्लेखना-कायकषायकृशीकरणलक्षणा श्रावकधर्मप्रासादकलशारोहणभूता। पूर्णः ब्रह्म पदाचाराणां सल्लेखनापरिकर्मतया तत्रैवान्तर्भावात् ॥१२॥ अथासंयमिनोऽपि सम्यग्दशः कर्मक्लेशापकर्षमाचष्टे भूरेखादिसक्कषायवशगो यो विश्वदृश्वाज्ञया ___ हेयं वैषयिकं सुखं निजमुपादेयं त्विति श्रद्दधत् । चौरो मारयितुं धृतस्तलवरेणेवाऽऽत्मनिन्दादिमान् शर्माक्षं भजते रुजत्यपि परं नोत्तप्यते सोऽप्यधैः ॥१३॥ भूरेखादिसदृशः-दृषदवनीत्यादिसूत्रोक्तलक्षणा अप्रत्याख्यानावरणादयो द्वादश क्रोधादिविकल्पाः । विश्वदृश्वाज्ञया-'नान्यथावादिनो जिनाः' इति कृत्वा इत्यर्थः । निज-आत्मोत्थं नित्यं वा । 'नित्यं स्वं ___ उपबृंहण गुणके लिए मार्दव आदि भावनाओंके द्वारा सदा आत्मामें धर्मकी वृद्धि करना चाहिए तथा परदोषोंको ढाँकना चाहिए। यह पाँचवाँ उपगूहन या उपबृंहण अंग है। न्याय मार्गसे विचलित करनेके लिए काम क्रोध मान आदि उत्पन्न होनेपर युक्तिसे अपना और दूसरोंका स्थितिकरण करना चाहिए। यह छठा अंग है। निरन्तर अहिंसामें, मोक्ष सुखके कारण धर्ममें तथा सब साधर्मियोंमें उत्कृष्ट वात्सल्य रखना चाहिए। यह सातवाँ अंग है। सदा रत्नत्रयको ज्योतिसे आत्माको प्रभावित करना चाहिए। तथा दान, तप, जिनपूजा और ज्ञानातिशयके द्वारा जिनधर्मकी प्रभावना करनी चाहिए। अंगहीन सम्यग्दर्शन जन्मपरम्पराका छेदन करने में समर्थ नहीं होता; क्योंकि अक्षरोंसे हीन मन्त्र विषकी वेदनाको दूर नहीं कर सकता। ___ आचार्य सोमदेवने कहा है-अन्तरंग बहिरंग कारणोंसे आप्त आगम और पदार्थोंका मूढ़ता आदिसे रहित और आठ अंग सहित श्रद्धान सम्यग्दर्शन है। प्रशम आदि उसके गुण हैं ॥१२॥ इस प्रकार यह सम्यक्त्वका स्वरूप कहा है। आगे कहते हैं कि असंयमी सम्यग्दृष्टिके भी कर्मजन्य क्लेशों में कमी होती है जो सर्वज्ञकी आज्ञासे वैषयिक सुख छोड़ने योग्य है और आत्मिक सुख उपादेय है, इस प्रकारका श्रद्धान रखते हुए भी पृथ्वी आदि की रेखाके समान अप्रत्याख्यानावरण आदि बारह कषायोंके अधीन होकर इन्द्रियोंसे होनेवाले सुखको भोगता है और स्थावर तथा जंगम प्राणियोंको पीड़ा भी पहुँचाता है, किन्तु कोतवालके द्वारा मारनेके लिए पकड़े गये चोरके समान अपनी निन्दा गर्दा करता है, वह अविरत सम्यग्दृष्टि भी पापसे उत्कृष्ट क्लेशको राप्त नहीं होता ॥१३॥ Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ दशम अध्याय ( प्रथम अध्याय) च निजं प्रोक्तम्' इत्यभिधानात् । त्विति-तुरवधारणे भिन्न क्रम इत्येवेत्यर्थः (?) आत्मनिन्दादिमान्-धिग् मामेवं प्रदीपहस्तमप्यन्धकूपे पतन्तमित्यात्मानं निन्दयन् । भगवन् ! कथमस्मै दुर्गतिदुःखाय घटिष्यत एवमुत्पथचारी जनोऽयमिति गुरुसाक्षिकं गहमाणश्च । आक्षं-इन्द्रियेभ्य आगतम् । रुजति–पीडयति । परं-स्थावरं जङ्गमं वा भूतग्रामम् । एतेनासंयतसम्यग्दृष्टिः स भवतीत्युक्तं स्यात् । यथाहु: 'णो इंदिएस विरदो णो जीवे थावरे तसे वापि । जो सद्दहदि जिणुत्तं सम्माइट्ठी अविरदो सो ॥' [ गो. जी. २९ गा.] उत्तप्यते-उत्कृष्टं क्लिश्यते । सोऽपि, कि पुनस्त्यक्तविषयसुखः सर्वात्मनैकदेशेन वा हिंसादिभ्यो विरतश्चेत्यपिशब्दार्थः । विशेषार्थ-धर्मका प्रारम्भ सम्यग्दर्शनसे होता है । इसीसे सभी आचार्योंने सम्यग्दर्शनको धर्मका मूल कहा है । आचार्य कुन्दकुन्दने अपने दसणपाहुडमें सम्यग्दर्शनकी प्रशंसा करते हुए सम्यग्दर्शनको धर्मका मूल कहा है और सम्यग्दर्शनसे भ्रष्टको ही भ्रष्ट कहा है और उसको मोक्षका अपात्र कहा है। इसी तरह आचार्य समन्तभद्रने भी आचार्य कुन्दकुन्दका ही अनुसरण करते हुए कहा है कि तीनों कालों और तीनों लोकोंमें सम्यक्त्वके समान कल्याणकारी और मिथ्यात्वके समान अकल्याणकारी कोई भी नहीं है । और यह भी कहा है कि यतः ज्ञान और चारित्रसे सम्यग्दर्शन श्रेष्ठ या उत्कृष्ट है इसलिए उसे मोक्षमार्गमें कर्णधार कहा है । आचार्य अमृतचन्द्रजीने कहा है कि सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रमें से सबसे पहले पूर्ण प्रयत्नके साथ सम्यग्दर्शनको स्वीकार करना चाहिए; क्योंकि उसके होनेपर ही ज्ञान और चारित्र सम्यक होते हैं। इसीसे सूत्रजीमें भी 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' इस प्रथम सूत्रमें सम्यग्दर्शनको प्रथम स्थान दिया है। सारांश यह है कि सम्यग्दर्शनके विना न शास्त्रज्ञानका कोई मूल्य है न आचारका कोई मूल्य है। इसका कारण क्या है ? जिनशासनका सर्वप्रथम उद्घोष है कि इन्द्रियों के द्वारा हमें जो सुख मिलता है वह सुख सुख नहीं है दुःख है । सुख तो आत्माका धर्म है। जब तक इसपर श्रद्धा न जमे तब तक समस्त त्याग और ज्ञानका कोई मूल्य नहीं है । और यह श्रद्धा सात तत्त्वोंपर श्रद्धान होनेसे ही होती है इसीसे तत्त्वार्थ श्रद्धानको सम्यक्त्व कहा है। इसीमें देव शास्त्र गुरु भी आ जाते हैं । यह श्रद्धा ऊपरी नहीं होती। इसीसे सम्यग्दर्शनको आत्मपरिणाम कहा है। समस्त परभावोंसे भिन्न अपने चैतन्य स्वरूपकी श्रद्धा ही वस्तुतः सम्यग्दर्शन है। चैतन्य स्वरूपकी सामान्य श्रद्धा तो नारकी तिथंच आदिको भी होती है । जिन्हें विशेष ज्ञान नहीं होता वे 'भगवान् जिनेन्द्र अन्यथा नहीं कहते' मात्र इसी दृढ़तम श्रद्धा वश यह श्रद्धा करते हैं कि वैषयिक सुख हेय है और आत्मिक सुख उपादेय है। इस श्रद्धाको ग्रन्थकारने निश्चयसम्यग्दर्शनरूप कहा है। वह अपनी टीकामें लिखते हैं-'एतेन निश्चयसम्यग्दर्शनभाग्भवन् १. 'एव तु अत्रावधारणार्थो भिन्नक्रमः ।'–भ. कु. च.। २. 'दंसणमूलो धम्मो उवइट्ठो जिणवरेहि सिस्साणं ।'-दसणपा. २ गा. ३. 'न सम्यक्त्वसमं किञ्चित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि।। श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनुभृताम् ॥--रत्न. श्रा., ३४ श्लो. । ४. दर्शनं ज्ञानचारित्रात साधिमानमुपाश्नुते । दर्शनं कर्णधारं तन्मोक्षमार्गे प्रचक्ष्यते ।-रत्न. श्रा., ३१ श्लो.। ५. 'तत्रादौ सम्यक्त्वं समुपाश्रयणीयमखिलयत्नेन । तस्मिन सत्येव यतो भवति ज्ञानं चरित्रं च ॥'-पुरुषार्थ. २१ । सा.-४ Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६ धर्मामृत ( सागार) अधैः-पापैः दुखैर्वा बहुभिः । उक्तं च 'सम्मत्त सलिलपवहो णिच्चं हिययम्मि पवट्टए जस्स । कम्मं बालुयवरणं व तस्स बंधोच्चिय ण एइ ॥' -[धम्मरसायण १४० ] इत्युक्तं वेदितव्यम् ।' अर्थात् इच्छित स्त्री आदिको भोगनेसे होनेवाला सुख छोड़ने योग्य है कभी भी सेवनीय नहीं है ; क्योंकि उसका सेवन दुःखदायक कर्मबन्धका कारण है । तथा रत्नत्रयमें उपयोग लगानेसे आत्मामें प्रकट हुआ सुख उपादेय है, ऐसा उसे अन्तरंगसे रुचता है। वह स्वप्नमें भी अन्यथा नहीं सोचता। इसका कारण है उसकी जिनेन्द्र के शासनपर दृढ़तम श्रद्धा कि जिनेन्द्र अन्यथावादी नहीं हैं। इससे जानना चाहिए कि वह निश्चय सम्यग्दृष्टि है । चतुर्थ अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान निश्चयसम्यग्दर्शनको लेकर ही समझना चाहिए । परमात्मप्रकाशकी टीकामें ब्रह्मदेवजीने लिखा है-'प्रभाकर भट्ट पूछेता है-अपनी शुद्ध आत्मा ही उपादेय है इस प्रकारकी रुचिरूप निश्चयसम्यग्दर्शन होता है ऐसा आपने अनेक बार कहा है। यहाँ आप वीतराग चारित्रके साथ निश्चय सम्यक्त्व होता है ऐसा कहते हैं। यह तो पूर्वापरविरुद्ध है; क्योंकि अपनी शुद्ध आत्मा ही उपादेय है' इस प्रकारकी रुचिरूप निश्चयसम्यक्त्व गृहस्थ अवस्था में तीर्थंकर परमदेव, भरत, सगर, राम, पाण्डव आदिके था। किन्तु उनके वीतराग चारित्र नहीं था। यह परस्पर विरोध है। यदि था तो वे असंयत कैसे हुए। यह पूर्वपक्ष है । इसका उत्तर यह है-उनके 'शुद्धात्मा उपादेय है' इस प्रकारकी भावनारूप निश्चय सम्यक्त्व वर्तमान है। किन्तु चारित्र मोहके उदयसे स्थिरता नहीं है। व्रतप्रतिज्ञाका भंग होता है. इस कारण असंयत कहे जाते हैं, शुद्धात्म भावनासे च्युत होनेपर भरत आदि निर्दोष परमात्माका, अहंत सिद्धोंका गुणस्तवन या वस्तुरूप स्तवन आदि करते है, उनके चरित पुराण आदि सुनते हैं। उनके आराधक आचार्य उपाध्याय साधुओंको दान पूजा आदि करते हैं जिससे खोटे ध्यानसे बचें और संसारकी स्थितिका छेद हो। इसलिए शुभराग होनेसे सरागसम्यग्दृष्टि कहलाते हैं। उनके सम्यक्त्वको निश्चय सम्यक्त्व इसलिए कहा जाता है कि वह वीतराग चारित्रके अविनाभावी निश्चय सम्यक्त्वका परम्परासे का इस तरह ब्रह्मदेवजीने रागके सहभावी सम्यक्त्वको व्यवहार सम्यक्त्व और रागके अभाव सहित सम्यक्त्वको निश्चय सम्यक्त्व कहा है क्योंकि राग नाम व्यवहारका है । १. 'अत्राह प्रभाकरभट्टः-निजशुद्धात्मैवोपादेय इति रुचिरूपं निश्चयसम्यक्त्वं भवतीति बहधा व्याख्यातं पूर्व भवद्धिः । इदानीं पुनः वीतरागचारित्राविनाभूतं निश्चयसम्यक्त्वं व्याख्यातमिति पूर्वापरविरोधः । कस्मादिति चेत् निजशुद्धात्मैवोपादेय इति रुचिरूपं निश्चयसम्यक्त्वं गृहस्थावस्थायां तीर्थकरपरमदेव-भरतसगर-राम-पाण्डवादीनां विद्यते । न च तेषां वीतरागचारित्रमस्तीति परस्परविरोधः । अस्ति चेत्तहि तेषामसंयतत्वं कथमिति पूर्वपक्षः। तत्र परिहारमाह-तेषां शुद्धात्मोपादेयभावनारूपं निश्चयसम्यक्त्वं विद्यते परं किंतु चारित्रमोहोदयेन स्थिरता नास्ति व्रतप्रतिज्ञाभको भवतीति तेन कारणेनासंयता वा भण्यन्ते । शुद्धात्मभावनाच्युताः सन्तो भरतादयो निर्दोषिपरमात्मनामहत्सिद्धानां गुणस्तववस्तुस्तवरूपस्तवनादिकं कुर्वन्ति तच्चरितपुराणादिकं च समाकर्णयन्ति, तदाराधकपुरुषाणामाचार्योपाध्यायसाधूनां विषयकषायानवञ्चनार्थ संसारस्थितिच्छेदनार्थं च दानपूजादिकं कुर्वन्ति तेन कारणेन सरागसम्यग्दृष्टयो भवन्ति । या पुनस्तेषां सम्यक्त्वस्य निश्चयसम्यक्त्वसंज्ञा वीतरागचारित्राविनाभूतस्य निश्चयसम्यक्त्वस्य परम्परया साधकत्वात् ।'-पर. प्रका. टी. दोहा २॥१७॥ Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) २७ तथा 'सम्यग्दर्शनशुद्धा नारकतिर्यग्नपुंसकस्त्रीत्वानि । दुःकुलविकृताल्पायुर्दरिद्रतां च व्रजन्ति नाप्यवतिकाः॥ [ रत्न. श्रा. ३५ ] किन्तु वह सरागसम्यक्त्व वीतरागचारित्रके अविनाभावी निश्चय सम्यक्त्वका कारण है इसलिए भी निश्चय सम्यक्त्व कहा है। इस विषयमें-पं. टोडरमलजीके मोक्षमार्ग प्रकाशकका भी कथन उद्धृत किया जाता है ___विपरीताभिनिवेश रहित श्रद्धानरूप 'आत्माका परिणाम वह तो निश्चय सम्यक्त्व है क्योंकि वह सत्यार्थ सम्यक्त्वका स्वरूप है। सत्यार्थका ही नाम निश्चय है। तथा विपरीताभिनिवेश रहित श्रद्धानको कारणभूत श्रद्धान सो व्यवहार सम्यक्त्व है। क्योंकि कारणमें कायंका उपचार किया है। सो उपचारका ही नाम व्यवहार है। वहाँ सम्यग्दृष्टि जीवके देवगुरु धर्मादिकका सच्चा श्रद्धान है। उसी निमित्तसे उसके श्रद्धानमें विपरीताभिनिवेशका अभाव है । यहाँ विपरीताभिनिवेश रहित श्रद्धान सो तो निश्चय सम्यक्त्व है। और देवगुरु धर्मादिकका श्रद्धान है सो व्यवहारसम्यक्त्व है। इस प्रकार एक ही कालमें दो सम्यक्त्व पाये जाते हैं । तथा मिथ्यादृष्टि जीवके देवगुरु धर्मादिकका श्रद्धान आभास मात्र है । और उसके श्रद्धानमें विपरीताभिनिवेशका अभाव नहीं होता, इसलिए वहाँ निश्चय सम्यक्त्व तो है नहीं और व्यवहारसम्यक्त्वका भी आभास मात्र है क्योंकि उसके देवगुरु धर्मादिकका श्रद्धान है सो विपरीताभिनिवेशके अभावका साक्षात् कारण नहीं हुआ। कारण हुए बिना उपचार सम्भव नहीं।' ऊपर जिस दृष्टिसे पं. आशाधरजीने अविरत सम्यकदृष्टिके सम्यक्त्वको निश्चय सम्यक्त्व कहा है उसी दृष्टिसे पं. टोडरमलजीने निश्चय सम्यक्त्वका स्वरूप कहा है। ऐसा निश्चय सम्यग्दृष्टि ही अविरत सम्यग्दृष्टि होता है क्योंकि उसके संयमका लेश भी नहीं होता। उसका कारण यह है कि उसके सोलह कषायोंमें-से अप्रत्याख्यानावरण आदि बारह कषायोंका उदय वर्तमान है। जिसके उदयमें जीव थोड़ा-सा भी व्रत संयम धारण करने में असमर्थ होता है उसे अप्रत्याख्यानावरण कषाय कहते हैं । इसीके उदयसे प्रेरित होकर वह इन्द्रिय सम्बन्धी सुखको भी भोगता है और स्थावर तथा त्रसजीवोंका घात भी करता है। ऐसा वह सम्यक्त्व दशामें ही करता है तभी तो उसे अविरत सम्यग्दृष्टि कहते हैं। गोम्मटसार जीवेकाण्डमें भी सिद्धान्त चक्रवर्ती नेमिचन्द्राचार्यने ऐसा ही कहा है कि जो न तो इन्द्रियोंके विषयोंसे विरत है और न त्रस और स्थावर जीवोंकी हिंसासे विरत है केवल जिनवचनोंपर उसकी श्रद्धा है वह अविरत सम्यग्दृष्टि है। यहाँ उसका उदाहरण कोतवालके द्वारा मारनेके लिए पकड़े गये चोरसे दिया है। यही उदाहरण ब्रह्मदेव सूरिने बृहद्रव्य संग्रहकी टीकामें दिया है। १. 'यदुदयाद्देशविरति संयमासंयमाख्यामल्पामपि कर्तुं न शक्नोति ते देशप्रत्याख्यानमावृण्वन्तोऽप्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोभाः।'-सर्वार्थ. ८९। २. 'णो इंदिएसु विरदो णो जीवे थावरे तसे वा पि । जो सहदि जिणुत्तं सम्माइट्ठी अविरदो सो ॥'-गो. जी. २९ गा.। ३. 'भूमिरेखादिसशक्रोधादिद्वितीयकषायोदयेन मारणनिमित्तं तलवरगृहीततस्करवदात्मनिन्दासहितः सन्नि न्द्रियसुखमनुभवतीत्यविरतसम्यग्दृष्टेलक्षणम् ।'-बृहद्. टी., १३ गा. । Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ २८ धर्मामृत ( सागार ) अपि च 'न दुःखबीजं शुभदर्शनक्षितो कदाचन क्षिप्तमपि प्ररोहति । सदाऽप्यनुप्तं सुखबीजमुत्तमं कुदर्शने तद्विपरीतमिष्यते ॥' [ अथ धर्मशर्मवद्यशोऽपि मनःप्रसत्तिनिमित्तत्वाच्छिष्टैरवश्यं सेव्यमित्युपदेष्टुमाह किन्तु दोनों में अन्तर है । ब्रह्मदेवजी कहते हैं कि जैसे मारनेके लिए कोतवालके द्वारा पकड़ा गया चोर अपनी निन्दा वगैरह करता है वैसे ही अविरत सम्यग्दृष्टि इन्द्रियसुख भोगकर अपनी निन्दादि करता है। पं. आशाधरजी भी अपनी टीका में कहते हैं कि अविरत सम्यग्दृष्टि भी अपनी निन्दा करता है - 'मुझे धिक्कार है मैं हाथ में दीपक लिये हुए होने पर भी अन्धकूपमें गिरनेवाले के समान हूँ ।' तथा गुरुके समक्ष अपनी गर्दा भी करता है कि 'भगवन् ! मुझ कुमार्गगामीका दुर्गतिके दुःखोंसे कैसे बचाव होगा।' इसपर से यह प्रश्न होता है कि ऐसा होते हुए भी वह कैसे इन्द्रियसुखका सेवन करता है और कैसे उसके लिए प्राणियों का घात करता है ? तो उसका उत्तर है कि वह चारित्रमोहनीयके उदयके अधीन होकर ऐसा करता है । जैसे कोतवालके द्वारा मारनेके लिए पकड़ा गया चोर कोतवालके अधीन होकर जो-जो कोतवाल कराता है, गधेपर चढ़ाना आदि, वह उस चोरको करना पड़ता है । इसी तरह अविरत सम्यग्दृष्टि जीव भी चारित्रमोहके उदयसे जो-जो द्रव्यहिंसा, भावहिंसा आदि करायी जाती है उसे अयोग्य जानते हुए भी करता है क्योंकि अपने समय पर फलोन्मुख हुए कर्मके उदयको टालना बहुत ही कठिन है। इस तरह पं. आशाधरजीने उक्त दृष्टान्तका प्रयोग दूसरे प्रकारसे किया है । उक्त कथनसे यह स्पष्ट है कि अविरत सम्यग्दृष्टि के किसी प्रकारका कोई त्याग नहीं होता । किन्तु त्यागके मार्गपर चलने की आन्तरिक भूमिका मात्र तैयार हो जाती है । जिस इन्द्रियसुखको ही सार मानकर जीव दुनिया भर के पाप कार्य करता है उसे वह अन्तःकरणसे हेय मानने लगता है और जिस आत्मिक सुखको वह भूला था उसे उपादेय मानता है । उसकी यह आन्तरिक श्रद्धा ही उसे अविरत सम्यग्दृष्टि से देशविरत और सर्वविरत बनाती है । किन्तु लेशमात्र देशसंयम के नहीं होनेपर भी सम्यक्त्व मात्रसे ही उसके सांसारिक कष्टोंमें कमी हो जाती है । सम्यक्त्व ग्रहण करने से पहले आगामी भवकी आयुका बन्ध न करनेवाले असंयमी भी सम्यग्दृष्टि के सुदेव और उत्तम मनुष्य पर्यायको छोड़कर शेष समस्त जन्मोंका अभाव हो जाता है, क्योंकि अबद्धायुष्क सम्यग्दृष्टि मरकर या तो उत्तम देव होता है या उत्तम मनुष्य होता है । किन्तु जो आगामी भवकी आयुका बन्ध कर लेनेके बाद सम्यक्त्व ग्रहण करता है उसने यदि नरकाका बन्ध किया है तो वह मरकर प्रथम नरक में जघन्य स्थिति ही भोगता है । अतः केवल सम्यक्त्वके प्रभावसे उसका बहुत-सा दुःख घट जाता है । अतः संयम धारण करने का समय आने से पहले संसारसे भयभीत भव्य जीवको सदा सम्यग्दर्शनकी आराधना में ही प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार उक्त श्लोकका उपसंहार विधिपरक ही लेना चाहिए ॥१३॥ ] ॥१३॥ आगे कहते हैं कि धर्म और सुखकी तरह यश भी मनकी प्रसन्नता में निमित्त है अतः शिष्ट पुरुषोंको यशके कार्य भी करना चाहिए १. दुर्गतावायुषो बन्धात् सम्यक्त्वं यस्य जायते । गतिच्छेदो न तस्यास्ति तथाप्यल्पतरा स्थितिः ॥ [ ] Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) धर्म यशः शर्म च सेवमानाः केऽप्येकशो जन्म विदुः कृतार्थम् । अन्ये द्विशो विध वयं त्वमोघान्यहानि यान्ति त्रयसेवयव ॥१४॥ केऽपि-लौकिकाः । एकशः-एकैकं । द्विश:-द्वे द्वे ॥१४॥ अथ सम्यक्त्वदृढत्वानन्तरं शिष्टगृहस्थानामवश्यारोहणीयं 'जो तसवहादु विरदो अविरदओ तह य थावरवहादो। एक्कसमयम्हि जीवो विरदाविरदो जिणेक्कमई ॥ [ गो. जी. ३१ गा. ] इति सूत्रनिर्दिष्टं संयतासंयतत्वपदं निर्देष्टुमाह मूलोत्तरगुणनिष्ठामधितिष्ठन् पञ्चगुरुपदशरण्यः । दानयजनप्रधानो ज्ञानसुधां श्रावकः पिपासुः स्यात् ॥१५॥ मूलोत्तरगुणनिष्ठां-मलानि उत्तरगुणप्ररोहणनिमित्तत्वात् । तस्य च यजनात् प्रागुपन्यासः पाक्षिकापेक्षया । पाक्षिको हि प्रायो(5) संवृताचारत्वाद्यथावदर्हदादिपूजायामसमर्थो दानेनैव विशुद्धिमाप्नोति । यदाह धर्म, यश और सुखमें-से एक-एककी साधना करनेवाले कोई-कोई लौकिक जन अपने जन्मको कृतार्थ मानते हैं । लोकव्यवहारका अनुसरण करनेवाले और अपनेको शास्त्रज्ञ माननेवाले कुछ दूसरे जन इन तीनोंमें से किन्हीं दोकी साधना करनेसे जन्मको कृतार्थ मानते हैं। किन्तु लौकिक और शास्त्रज्ञ दोनोंको ही सन्तुष्ट करनेवाले हम तो तीनोंकी ही साधना करनेसे मनुष्यजन्मके दिनोंको सफल मानते हैं ॥१४|| विशेषार्थ-कहावत है कि लोगोंकी रुचियाँ भिन्न होती हैं । अतः धर्म, सुख, यशमें-से मनुष्यको किसकी साधना अपने जीवन में करना चाहिए जिससे जन्मको सफल माना जाये, इसके विषयमें विभिन्न लोगोंके विभिन्न मत हैं । जो केवल लोकानुसारी हैं उनमें से कुछ तो ऐसा मानते हैं कि धर्मकी साधना करनेसे ही मनुष्यजन्मकी सफलता है। कुछ मानते हैं कि केवल सुखोपभोगमें ही मनुष्यजन्मकी कृतकृत्यता है। कुछ कहते है कि कमाने में ही सार्थकता है। इस तरह वे तीनोंमें-से एक-एककी साधनामें हो समझते हैं कि मनुष्यने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। उसे कुछ करना शेष नहीं रहा। इन लौकिक जनोंसे दूसरे नम्बरपर वे हैं, जो अपनेको शास्त्रज्ञ भी मानते हैं। उनका मन्तव्य है कि तीनोंमें-से दोकी साधना करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। अर्थात् कुछ धर्म और यशको, कुछ धर्म और सुखको और कुछ यश और सुखको साधन करनेसे जन्मको सफल मानते हैं। किन्तु लौकिक जन और शास्त्रज्ञ दोनोंके ही अभिप्रायोंको समझनेवाले ग्रन्थकारका मत है तीनोंमें-से एक-एक या दो-दोके सेवन करने से जन्म सफल नहीं होता किन्तु तीनोंकी ही साधना करनेसे मनुष्यजन्म सफल होता है। अतः गृहस्थको अपने जीवन में धर्म भी करना चाहिए, धर्मानुकूल सुख भी भोगना चाहिए और संसारमें जिनसे यश हो, ऐसे परोपकारके कार्य भी करना चाहिए ॥१४॥ इस तरह सम्यक्त्वकी प्राप्ति होनेपर यदि पूर्ण संयम धारण करनेकी शक्ति आदिका अभाव है तो एकदेश संयम अवश्य धारण करना चाहिए, ऐसा कथन करते हैं __ जो मूल गुण और उत्तरगणमें निष्ठा रखता है, अर्हन्त आदि पाँच गुरुओंके चरणोंको ही अपना शरण मानता है, दान और पूजा जिसके प्रधान कार्य हैं तथा ज्ञानरूपी अमृतको पीनेका इच्छुक है वह श्रावक है ॥१५॥ Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 3 ६ ९ १२ ३० अपि च यदाह धर्मामृत ( सागार ) 'ध्यानेन शोभते योगी संयमेन तपोधनः । सत्येन वचसा राजा गेही दानेन चारुणा ॥' [] 'जइ घरु करिदाणेण सहुं अहतउ करिणी गंथु | विहे चुं कर सुम्पउ भण इअजिय एंथण उंथ ॥' [ 1 दानं च यजनं च दानयजने प्रधाने मुख्ये यस्य । वार्ता तु श्रावकस्य गौणीति प्रधानग्रहणाल्लक्षयति । 'आयुः श्रीवपुरादिकं यदि भवेत् पुण्यं पुरोपार्जितं, स्यात्सर्वं न भवेन्न तच्च नितरामायासितेऽप्यात्मनि । इत्यार्याः सुविचार्यं कार्यकुशलाः कार्येऽत्र मन्दोद्यमा, द्रागागामि भवार्थमेव सततं प्रीत्या यतन्तेतराम् ॥' [ आत्मानु. ३७ ] ज्ञानसुधां - स्वपरान्तरज्ञानामृतम् ॥१५॥ अथ भावद्रव्यात्मनामेकादशानामुपासकपदानां मध्येऽन्यतमं विशुद्धदृष्टिमहाव्रतपरिपालनलालसो यथात्मशक्ति यः प्रतिपद्यते तमभिनन्दति - विशेषार्थ - जो गुरु आदिसे धर्म सुनता है वह श्रावक है । अर्थात् एकदेश संय धारीको श्रावक कहते हैं । श्रावकके आठ मूलगुण और बारह उत्तरगुण होते हैं । उत्तरगुणों के प्रकट होने में निमित्त होने से तथा संयम के अभिलाषियोंके द्वारा पहले पाले जानेके कारण मूल गुण कहे जाते हैं । और मूल गुणोंके बाद सेवनीय होनेसे तथा उत्कृष्ट होने से उत्तर गुण कहलाते हैं । गुण कहते हैं संयमके भेदोंको । जो संयमके भेद प्रथम पाले जाते हैं मूल गुण हैं। मूल गुणमें परिपक्व होनेपर ही उत्तर गुण धारण किये जाते हैं । किसी लौकिक फलकी अपेक्षा न करके निराकुलतापूर्वक धारण करनेका नाम निष्ठा रखना है । तथा अर्हन्त आदि पंच परमेष्ठी के चरण ही उसके शरण्य होते हैं अर्थात् उसकी यह अटल श्रद्धा होती है कि मेरी सब प्रकारकी पीड़ा पंचपरमेष्ठीके चरणोंके प्रसादसे दूर हो सकती है. अतः वे ही मेरे आत्मसमर्पण के योग्य हैं । इस प्रकार सम्यग्दर्शन पूर्वक देश संयमको धारण करनेवाले श्रावकका कर्तव्य आचार है चार प्रकारका दान और पाँच प्रकारकी जिनपूजा, जो आगे बतलायेंगे। यद्यपि श्रावकका कर्तव्य आजीविका भी है। किन्तु वह तो गौण है । श्रावक धर्म की दृष्टि से प्रधान आचार, दान और पूजा है । यह बतलाने के लिए 'प्रधान' पद रखा है। तथा ज्ञानामृतका पान करने के लिए वह सदा अभिलाषी रहता है । यह ज्ञानामृत है स्व और परका भेद ज्ञानरूपी अमृत। उसीसे उसकी ज्ञान-पिपासा शान्त होती है ॥ १५ ॥ इस प्रकार देशविरतिरूप पंचम गुणस्थानका कथन करके, उसके भेद जो द्रव्यभावरूप ग्यारह श्रावक प्रतिमाएँ हैं, उनमें से महात्रतोंके पालन करनेकी लालसा रखनेवाला जो सम्यग्दृष्टि अपनी शक्ति के अनुसार एक भी प्रतिमाका पालन करता है उसका अभिनन्दन करते हैं— Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय ) ३१ रागादिक्षयतारतम्यविकसच्छुद्धात्मसंवित्सुख स्वादात्मस्वबहिर्बहिस्त्रसबधाचंहोव्यपोहात्मसु । सददग दर्शनकादिदेशविरतिस्थानेष चैकादश स्वेकं यः श्रयते यतिव्रतरतस्तं श्रद्दधे श्रावकम् ॥१६॥ रागादीत्यादि-क्षयः-सर्वघातिस्पर्द्धकानामुदयाभावः। तारतम्यं यथोत्तरमुत्कर्षः। रागद्वेषमोहानां क्षयतारतम्येन । विकसन्ती-आविर्भवन्ती चासो। शुद्धात्मसंविच्च-निर्मलचिद्रूपानुभूतिः । सैव तदुत्थं ६ वा सुखमानन्दस्तस्य स्वाद:-स्वसंवित्यनुभवः, स एव आत्मस्वरूपं येषां तानि तदात्मानि तेषु । त्रसेत्यादिवसबंध आदिर्येषां स्थूलानतादीनां तानि त्रसवधादीनि । तान्येव अंहांसि-पापानि तत्फलत्वात्। तेभ्यो व्यपोहो-विधिपूर्वकं देवगरुसधर्म साक्षिकमपोहो विरतिः स एव आत्मा येषां तानि तेषु । चशब्दस्य भिन्न क्रमस्यात्र योजनात् । यतिव्रतरत:-सर्वविरतिकलशारोपणो हि श्रावकधर्मप्रासादः ॥१६॥ अय दर्शनिकादीन्निदिशति देशविरतिके दर्शनिक आदि ग्यारह स्थान अन्तरंगमें राग आदिके क्षयसे प्रकट हुई शुद्ध आत्मानुभूति रूप सुख या उससे उत्पन्न हुए सुखके स्वादको लिये हुए हैं । और बाह्यमें त्रस हिंसा आदि पापोंसे विधिपूर्वक विरतिको लिये हुए हैं । मुनियोंके व्रतोंमें आसक्त जो सम्यग्दृष्टि उनमें से एक भी प्रतिमाका पालन करता है, वह श्रावक अच्छा करता है ऐसा मैं मानता हूँ ॥१६॥ विशेषार्थ-प्रत्येक प्रतिमाके दो रूप होते हैं-एक भावरूप या अध्यात्मरूप और दूसरा द्रव्यरूप या बाह्यरूप । बाह्यरूप देखा जा सकता है किन्तु अन्तरंगरूपको दूसरे लोग नहीं देख सकते। वह तो स्वसंवेद्य होता है। जब चारित्रमोहनीय कमेके सर्वघाती स्पर्धकोंका क्षय होता है अर्थात् उनके उदयका अभाव होता है और देशघाति स्पर्द्धकोंका उदय रहता है तब राग-द्रेषके घटनेसे निर्मल चिदपकी अनुभति होती है। वह अनुभति सखरूप है या उस अनुभूतिसे उत्पन्न हुए सुखका स्वाद उन प्रतिमाओंका अन्तरंग रूप है । ज्यों-ज्यों उत्तरोत्तर रागादि घटते जाते हैं त्यों-त्यों आगेकी प्रतिमाओंमें निर्मल चिद्रपकी अनुभूतिमें वृद्धि होती जाती है और उत्तरोत्तर आत्मिक सुख भी बढ़ता जाता है। इसके साथ ही श्रावककी बाह्य प्रवृत्तिमें भी परिवर्तन आये विना नहीं रहता। वह प्रतिमाके अनुसार स्थूल हिंसा आदि पापोंसे निवृत्त होता जाता है। ऐसा सम्यग्दृष्टि श्रावक सतत यह भावना रखता है कि कब मैं गृहस्थाश्रम छोड़कर मुनिपद धारण करूँ। तभी उसका प्रतिमा धारण सफल माना जाता है। ऐसा श्रावक किसकी श्रद्धाका भाजन नहीं होगा ? श्वेताम्बर साहित्यमें तो पहली प्रतिमा एक मास, दूसरी प्रतिमा दो मास, तीसरी तीन मास, चौथी चारमास इस तरह ग्यारहवीं ग्यारह मास तक ही पालनेका विधान है। अर्थात् पहली प्रतिमा एक मास पालकर दूसरी प्रतिमा लेनी होती है, दूसरी प्रतिमा दो मास पालकर तीसरी लेनी होती है। इस तरह एक से ग्यारह मास तक क्रमशः ग्यारह प्रतिमाएँ पालनेपर १+२+३+४+५+६+७+८+९+ १० + ११ = ६६ मासके बाद मुनिव्रत लेना होता है ।।१६॥ ___ आगे दर्शनिक आदि श्रावकोंका लक्षण कहते हैं Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ २ मा धर्मामृत ( सागार) दृष्टया मूलगुणाष्टकं व्रतभरं सामायिकं प्रोषधं सचित्तान्न-दिनव्यवाय-वनितारम्भोपधिभ्यो मतात। उद्दिष्टादपि भोजनाच्च विरति प्राप्ताः क्रमात्प्राग्गुण प्रौढ्या दर्शनिकादयः सह भवन्त्येकादशोपासकाः ॥१७॥ दष्टया-सम्यक्त्वेन विशिष्टं मूलगुणाष्टकं प्राप्तो दर्शनिकः । स एव च व्रतभरं निरतिचाराण्यणु६ व्रतादीनि प्राप्तो प्रतिकः । एवमुत्तरेष्वपि संबन्धः कर्तव्यः। व्यवायो-मैथुनम् । मतात् मदर्थ साधुकृतम नेनेदमित्यनुमोदितात् । अपि भोजनात् । मतादुद्दिष्टाच्च भोजनादपि विरतिं प्राप्तोऽनुमतिविरत उद्दिष्टविरतश्च । योऽनुमतमुद्दिष्टं च भोजनमपि न कुर्यात् स किमन्यत्रारम्भादौ पापकर्मण्यनुमति दद्यादुद्दिष्टं वा वसत्याच्छादनादिकमुपयुञ्जीतेत्यपिशब्दाल्लभ्यते । प्राग्गुण ढिया-दृष्टिमूलगुणाष्टकप्रकर्षेण सह व्रतभरं, तत्त्रयप्रकर्षण सामायिकमित्यादि युक्त्या भवन्तीत्यर्थः । उक्तं च 'श्रावकपदानि देवैरेकादश देशितानि येषु खलु । स्वगुणाः पूर्वगुणैः सह सन्तिष्ठन्ते क्रमाद् वृद्धाः ॥' [ रत्न. श्रा. १३६ ] दर्शनिकादयः । उक्तं च भगवज्जिनसेनपादैरादिनाथस्य सुविधिमहाराजभवान्तरब्यावर्णनप्रस्तावे 'सद्दर्शनं व्रतोद्योतं समतां प्रोषधव्रतम् । सचित्तसेवाविरतिमह्नि स्त्रीसङ्गवर्जनम् ।। ब्रह्मचर्यमथारम्भपरिग्रहपरिच्युतिम् । तत्रानुमननत्यागं स्वोद्दिष्टपरिवर्जनम् ।। स्थानानि गृहिणां प्राहुरेकादश गणाधिपाः । स तेषु पश्चिमं स्थानमाससाद क्रमान्नृपः ॥ [ महापु., १०।१५९-१६१ ] क्रमसे पूर्व-पूर्व गुणोंमें प्रौढ़ताके साथ, सम्यग्दर्शन सहित आठ मूल गुण, निरतिचार अणुव्रतादि, सामायिक, प्रोषधोपवास तथा सचित्तसे, दिवामैथुनसे, स्त्रीसे, आरम्भसे, परिग्रहसे, अनुमत और उद्दिष्ट भोजनसे विरतिको प्राप्त ग्यारह श्रावक होते हैं ॥१७॥ विशेषार्थ-ये श्रावकके ग्यारह भेद हैं। उनके नाम दर्शनिक आदि हैं। जो सम्यगदर्शनके साथ आठ मूल गुणोंका धारक है वह पहला दर्शनिक श्रावक है। जो निरतिचार अणुव्रत, गुणव्रत और शिक्षाव्रतका पालक है वह दूसरा व्रतिक श्रावक है। जो त्रिकाल सामायिक करता है वह तीसरा सामायिक प्रतिमावाला श्रावक है। जो पर्वके दिनोंमें प्रोषधोपवास करता है वह चतुर्थ प्रोषधोपवासी श्रावक है। जो सचित्त भक्षण आदिका त्यागी है वह पाँचवा सचित्तविरत श्रावक है। जो दिन में मन-वचन-कायसे मैथुन सेवन नहीं करता वह छठा दिवामैथुन विरत श्रावक है। जो सदाके लिए स्त्रीसेवनका त्यागी है वह सातवाँ स्त्रीविरत या ब्रह्मचर्य प्रतिमाका धारी श्रावक है। जो सम्पूर्ण आरम्भोंका त्यागी है वह आठवाँ आरम्भ विरत श्रावक है। जो परिग्रहका त्यागी है वह नौवाँ परिग्रह विरत श्रावक है। जो आरम्भके कार्यों में अनुमति भी नहीं देता वह दसवाँ अनुमति विरत श्रावक है। और उद्दिष्ट भोजनका त्यागी ग्यारहवाँ उद्दिष्ट विरत श्रावक है। श्लोकमें उद्दिष्ट के साथ जो 'अपि' शब्द रखा है उसका अभिप्राय यह है कि जो अनुमत और उद्दिष्ट भोजन भी नहीं करता वह कैसे अन्यत्र आरम्भ आदि पाप कार्यों में अनुमति देगा, या कैसे उद्दिष्ट वसतिका या वस्त्र आदिका उपयोग करेगा। आगे-आगेकी ये प्रतिमाएँ तभी मान्य होती हैं जब पूर्व-पूर्वकी प्रतिमाओंमें परिपक्वता हो। अर्थात् 'पीछेको छोड़ आगेको दौड़की नीति Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सोमदेवपण्डितास्त्वेवमाहुः - दशम अध्याय ( प्रथम अध्याय ) 'मूलव्रतं व्रतान्यर्चा पर्वकर्माकृषिक्रियाः । दिवा नवधिर [ नवविधं ] ब्रह्म सचित्तस्य विवर्जनम् ॥ परिग्रहपरित्यागो भुक्तिमात्रानुमान्यता । तद्धानौ च वदन्त्येतानेकादश यथाक्रमम् ॥' [ सो. उपा. ८५३-८५४ इलो. ] ॥१७॥ अथ दुरितापचयनिमित्तेज्यादिधर्मकर्मसिद्धयर्थं कृष्यादिषट्कर्मलक्षण वार्तामाचरतो गृहस्थस्यावश्यंभावी सावद्यलेशः प्रायश्चित्तेन पक्षादिभिश्च निराकार्य इत्युपदेशार्थमाह यहाँ नहीं चलती । आगेकी प्रतिमावाले श्रावकको पूर्वकी सभी प्रतिमाओंका आचरण पूर्ण रीति से करना ही चाहिए। इन प्रतिमाओंके छठे भेदको लेकर आचार्यों में मतभेद है । आचार्य समन्तभद्रने छठी प्रतिमाको रात्रिभुक्ति विरत नाम दिया है वह रात्रिमें चारों प्रकारके आहारका त्याग करता है । चरित्त पाहुडे (गा. २१), प्राकृत पंचसंग्रह, (१।१३६), वारस अणुवेक्खा (गा. ६९ ), गो. जीवकाण्ड (गा. ४७६ ) और वसुनन्दि श्रावकाचार में छठी प्रतिमाका नाम 'राइभत्ती' ही है । महापुराण ( पर्व १० ) में दिवास्त्री संगत्याग नाम दिया है । सोमदेव के उपासकाचार में ( ८५३-५४ श्लो. ) तीसरी प्रतिमा अर्चा, पाँचवीं प्रतिमा अकृषिक्रिया - कृषिकर्म न करना और आठवीं प्रतिमा सचित्त त्याग है । श्वेताम्बर आम्नाय में (योगशास्त्र टीका ३।१४८ ) पाँचवीं प्रतिमा पर्वकी रात्रि में कायोत्सर्ग करना । छठी प्रतिमा ब्रह्मचर्य, सातवीं प्रतिमा सचित्त त्याग, आठवीं प्रतिमा स्वयं आरम्भ न करना, नवमी दूसरे से आरम्भ न कराना, दसवीं उद्दिष्ट त्याग और ग्यारहवीं साधुकी तरह निस्संग रहना, केशलोंच करना आदि है । यह अन्तर है । पं. आशाधरजीके उत्तरकालीन पं. मेधावीने तो अपने श्रावकाचारको आशाघरका ही शब्दशः अनुकरण करते हुए रचा है। पं. राजमल्लने अपनी लाटी * संहितामें दिवा मैथुन विरत और रात्रि भोजन विरत दोनोंका ही संग्रह किया है ||१७|| अब कृषि आदि छह कर्मोंके द्वारा आजीविका करनेवाले गृहस्थको पाप अवश्य होता है । तो पापको दूर करने में निमित्त पूजा आदि धर्म-कर्म की सिद्धिके लिए उस पापको प्रायश्चित्त और पक्ष आदिके द्वारा दूर करनेका उपदेश करते हैं १. 'अन्नं पानं खाद्यं लेह्यं नाश्नाति यो विभावर्याम् । स च रात्रिभुक्तिविरतः सत्त्वेष्वनु कम्प्यमानमनाः ॥ '-रत्न श्रा. १४२ श्लो. । २. 'दंसण वय सामाइय पोसह सचित्त राइभत्ती य । ३३ बम्भारम्भपरिग्गह अणुमण उद्दिट्ठ देसविरदे दे ॥' [ चरि. पा. २१ गा. ] ३. 'निक्कंपो काउसगं तु पुव्वुत्तगुण संजुओ । करेइ पव्वराई सु पंचम पडिवन्नभ ॥ छट्ठीय बंभयारी सो फासुआहार सत्तमी । वज्जे सावज्जमारंभ अट्ठमि पडिवन्नओ || अवरेणावि आरंभ नवमी नो करावए । दसमीए पुणोद्दिट्टं फासुअंपि न भुंज ॥ एक्कासीइ निस्सँगो घरे लिंगं पडिग्गहं । कयलोओ सुसाहुष्व पुव्वुत्त गुणसायरो ॥' ४. 'किं च रात्रो यथा भुक्तं वर्जनीयं हि सर्वदा । दिवा योषिद्वतं चापि षष्ठस्थानं परित्यजेत् ॥' सा.-५ — लाटीसं. ७।२१ ६ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार ) नित्याष्टाह्निकसच्चतुमुखमहान्कल्पद्रुमैन्द्रध्वजा विज्याः पात्रसमक्रियान्वयवयावत्तीस्तपः संयमौ । स्वाध्यायं च विधातुमादृतकृषीसेवावणिज्यादिकः, शुद्धयाऽऽप्तोदितया गृही मललवं पक्षादिभिश्च क्षिपेत् ॥१८॥ नित्येत्यादि-नित्यमहः आष्टाह्निकमहश्चतुर्मुखमहः कल्पवृक्षः ऐन्द्रध्वजश्चेति पञ्चाहत्पूजाविशेषा ६ इज्याः । चतुर्मुखस्य सदिति विशेषणादत्रेदानीमयमेव परमोत्कृष्टः कल्पवृक्षस्यासम्भवादिति प्रकाशयति । अत एवेन्द्रध्वजेन सह समस्यैष निर्दिष्टः । पात्रेत्यादि-समा आत्मना समानाः क्रिया आधानादिका उपलक्षणान्मन्त्रादयश्च यस्यासौ समक्रियः। पात्रं च समक्रियश्च अन्वयश्च दया च पात्रसमक्रियान्वयदया९ स्तदाब या दत्तयो दानादि तहत्तयस्ताः। उक्तं चार्षे 'प्रोक्ता पूजाहंतामिज्या सा चतुर्धा सदार्चनम् । चतुर्मुखमहः कल्पद्रुमश्चाष्टाह्निकोऽपि च ॥ तत्र नित्यमहो नाम शश्वज्जिनगृहं प्रति । स्वगृहान्नीयमानार्चा गन्धपुष्पाक्षतादिका ॥ चैत्यचैत्यालयादीनां भक्त्या निर्मापणं च यत् । शासनीकृत्य दानं च ग्रामादीनां सदार्चनम् ॥ कृषि, सेवा, व्यापार आदि छह आजीवन कौंको यथायोग्य स्वीकार करनेवाले गृहस्थको नित्य पूजा, आष्टाह्निक पूजा, सच्चतमख पजा, कल्पद्रम पजा और इ इन्द्रध्वज पूजाको तथा पात्रदन्ति, समक्रियादत्ति, अन्वयदत्ति और दयादत्तिको तथा तप, संयम और स्वाध्यायको करनेके लिए परापर गुरुओं के द्वारा कहे हुए प्रायश्चित्तके द्वारा तथा पक्ष चर्या साधनके द्वारा पापके लेशको दूर करना चाहिए ॥१८॥ विशेषार्थ-भगवज्जिनसेनाचार्यने अपने महापुराणके ३९वें पर्वमें कन्वय क्रियाओंका वर्णन करते हुए दूसरी सद्गृहित्व क्रियाका कथन किया है। उसमें यह सिद्ध किया है कि विशुद्ध वृत्तिको धारण करनेवाले जैन ही सब वर्गों में उत्तम हैं। वे ही द्विज हैं। वे ब्राह्मण आदि वर्णों के अन्तर्गत न होकर वर्णोत्तम हैं। आगे आचार्य कहते हैं-'यहाँ शंका हो सकती है कि जो असि-मषी आदि छह कर्मोंसे आजीविका करनेवाले जैन द्विज अथवा गृहस्थ हैं, उनके भी हिंसाका दोष लग सकता है। इस विषयमें हमारा कहना है कि आजीविकाके लिए छह कर्म करनेवाले जैन गृहस्थोंको थोड़ी-सी हिंसा अवश्य लगती है परन्तु शास्त्रोंमें उन दोषोंकी शुद्धि भी बतलायी गयी है। उनकी विशद्धिके तीन अंग हैंपक्ष, चर्या और साधन ।' इसीका कथन पं. आशाधरजीने किया है। इन्हीं तीनोंके आधारपर उन्होंने श्रावकके पाक्षिक, नैष्ठिक और साधक भेद किये हैं। इनसे पूर्व किसी श्रावकाचार आदिमें ये भेद नहीं मिलते। १. महः क-मु. प्र.। २. संयमान्-मु. प्र. । ३. 'स्यादारेका च षट्कर्मजीविनां गृहमेधिनाम् । हिंसादोषोऽनुसंगी स्याज्जैनानांच द्विजन्मनाम् ॥ इत्यत्र ब्रमहे सत्यं अल्पसावद्यसंगतिः । तत्रास्त्येव तथाऽप्येषा स्याच्छुद्धिः शास्त्रदर्शिता ॥ अपि चैषां विशुद्धय पक्षश्चर्या च साधनम् । इति त्रितयमस्त्येव तदिदानी विवण्महे ॥' -महापु. ३९।१४३-१४५ । . Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) या च पूजा जिनेन्द्राणां नित्यदानानुषङ्गिणी। स च नित्यमहो ज्ञेयो यथाशक्त्युपकल्पितः॥ महामुकुटबद्वैस्तु क्रियमाणो महामहः । चतुर्मुखः स विज्ञेयः सर्वतोभद्र इत्यपि ॥ दत्वा किमिच्छकं दानं सम्राइभिर्यः प्रवर्त्यते । कल्पवृक्षमहः सोऽयं जगदाशाप्रपूरणः ।। आष्टाह्निको महः सार्वजनिको रूढ एव सः। महानन्द्रध्वजोऽन्यस्तु सुरराजैः कृतो महः ॥ बलिस्नपनमित्यन्यस्त्रिसन्ध्या सेवया समम् । उक्तेष्वेव विकल्पेषु ज्ञेयमन्यच्च तादृशम् ॥ एवं विधिविधानेन या महेज्या जिनेशिनाम् । विधिज्ञास्तामुशन्तीज्यां वृत्ति प्रथमकल्पिकीम् ॥ वार्ता विशुद्धवृत्त्या स्यात्कृष्यादीनामनुष्ठितिः । चतुर्धा वर्णिता दत्तिर्दयादानसमान्वयैः। सानुकम्पमनुग्राह्ये प्राणिवृन्देऽभयप्रदा। त्रिशुद्धयनुगता सेयं दयादत्तिर्मता बुधैः ।। महातपोधनायाा प्रतिग्रहपुरस्सरम् । प्रदानमशनादीनां पात्रदानं तदिष्यते ।। समानायात्मनाऽन्यस्मै क्रियामन्त्रव्रतादिभिः । निस्तारकोत्तमायेह भूहेमाद्यतिसर्जनम् ।। __ आचार्य जिनेसेनने गृहस्थके षट्कर्म इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम, तप बतलाये हैं। पं. आशाधरजीने वार्ताको छोड़कर शेष पाँच ही गिनाये हैं क्योंकि धर्म कर्म पाँच ही हैं। वार्ता तो कृषि आदि षट्कर्म रूप है जो आजीविकासे सम्बद्ध है। इन्हीं पाँच कर्मों में गुरूपासनाको सम्मिलित करके आचार्य सोमदेवने श्रावकके छह दैनिक कर्म बतलाये हैं और उन्हींका अनुसरण आचार्य पद्मनन्दिने अपनी पंचविंशतिकामें किया है। पं. आशाधरजीने इज्या और दत्तिके भेद भी महापुराणके अनुसार ही किये है। महापुराणसे पहलेके उपलब्ध किसी साहित्यमें ये भेद भी नहीं हैं। आचार्य जिनसेनने इन सबका कथन इस प्रकार किया है-अपने घरसे ले जाये गये गन्ध, पुष्प, अक्षत आदिसे जिनालय में प्रतिदिन अर्हन्त देवकी पूजा करना नित्यमह है। भक्ति पूर्वक चैत्य-चैत्यालय आदिका निर्माण कराकर उन्हें ग्राम आदि राजकीय नियमानसार देना भी नित्यमह है। जिनेन्द्रोंको लक्ष्य करके शक्तिके अनुसार दान आदि देना भी नित्यमह है। मुकुटबद्ध राजाओंके द्वारा जो पूजा की जाती है उसे महामह, चतुर्मुख और १. दयापात्रसमा-मु.।। २. 'इज्यां वार्ता च दत्ति च स्वाध्यायं संयम तपः।'-महापु. ३८।२४ । ३. 'देवसेवा गुरूपास्तिः स्वाध्यायः संयमं तपः । दानं चेति गृहस्थानां षट्कर्माणि दिने दिने ॥'-सो. उपा. ९११ श्लो. । ४. देवपूजा......।६७। Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) समानदत्तिरेषा स्यात्पात्रे मध्यमतामिते। समानप्रतिपत्त्यैव प्रवृत्ता श्रद्धयान्विता ॥ आत्मान्वयप्रतिष्ठा, सूनवे यदशेषतः। समं समयवित्ताभ्यां स्ववर्गस्यातिसर्जनम् ॥ सैषा सकलदत्तिः स्यात् स्वाध्यायः श्रुतभावना । तपोऽनशनवृत्त्यादि संयमो व्रतधारणम् ॥ [ महापु., ३८।२६-४१ ] वणिज्यादि । आदिशब्देन मषीविद्याशिल्पानि गह्यन्ते । उक्तं च 'असिमषिः कृषिविद्या वाणिज्यं शिल्पमेव च। कर्माणीमानि षोढाः स्युः प्रजाजीवनहेतवः ।।' [ महापु. १६३१७९ ] शुद्धया-प्रायश्चित्तेन । आप्तोदितया-परापरगुरुनिरूपितया । उक्तं चार्षे 'स्यादारेका च षट्कर्मजीविनां गृहमेधिनाम् । हिंसादोषोऽनुषङ्गी स्याज्जैनानां च द्विजन्मनाम् ।। इत्यत्र ब्रूमहे सत्यमल्पसावद्यसङ्गतिः । तत्रास्त्येव तथाऽप्येषां स्याच्छुद्धिः शानदर्शिता ॥ अपि चैषां विशुद्धयङ्गं पक्षश्चर्या च साधनम् । इति त्रितयमस्त्येव तदिदानी विवृण्महे ।। तत्र पक्षो हि जेनानां कृत्स्नहिंसाविसर्जनम् । मैत्री प्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यैरुपबृहितम् ।। चर्यार्थं देवतार्थं वा मन्त्रसिद्धयर्थमेव वा । औषधाहारक्लृप्त्यै वा न हिंस्यामीति चेष्टितम् ।। सर्वतोभद्र कहते हैं। चक्रवर्ती सम्राद्वारा प्रजाको उसकी इच्छानुसार दान देकर जो पूजा कीजाती है वह कल्पवृक्ष पूजा है। अष्टाह्निक पूजा तो सार्वजनिक है सब उसे जानते हैं। इन्द्र के द्वारा की गयी पूजाको इन्द्रध्वज पूजा कहते हैं। तीनों सन्ध्याओंमें देवताराधनाके साथ जो अभिषेक उपहार आदि किये जाते हैं वह सब भी उक्त भेदोंमें ही जानना। इस प्रकार विधि-विधानके साथ जो जिनेन्द्र देवोंकी पूजा की जाती है विधि-विधानको जाननेवाले उसे इज्या कहते हैं। विशुद्ध वृत्तिसे कृषि आदि करनेको वार्ता कहते हैं। दानके चार भेद हैं। प्रतिग्रह पूर्वक महातपस्वियोंकी पूजाके साथ जो उन्हें भोजन आदि देना है वह पात्रदान है। क्रिया, मन्त्र, व्रत आदिमें जो अपने समान श्रेष्ठ श्रावक हैं उन्हें भूमि, स्वर्ण आदि देना समदत्ति है। अपने वंशकी प्रतिष्ठाके लिए अपने पुत्रको जो धनादिकके साथ अपने परिवारका भार दिया जाता है वह सकलदत्ति है। दयाके योग्य प्राणियोंको अभयदान देना दयादत्ति है। श्रुतकी भावनाको स्वाध्याय कहते हैं । उपवास आदिको तप कहते हैं और व्रतधारणको संयम कहते हैं । असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य, शिल्प ये छह कर्म प्रजाके जीवन-यापनमें कारण है। षट्कर्मसे आजीविका करनेवाले गृहस्थोंको यद्यपि अल्प पाप होता ही है तथापि उसकी शुद्धिके लिए पक्ष, चर्या साधन कहे हैं। मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ्य भावनाके साथ समस्त हिंसाके त्यागको चर्या कहते हैं कि मैं देवताके लिए, मन्त्रसिद्धि के लिए, औषध और आहारके लिए हिंसा नहीं करूँगा। अनिच्छापूर्वक होनेवाली - Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३७ ३७ १२ दशम अध्याय (प्रथम अध्याय) तत्राकामकृते शुद्धिः प्रायश्चित्तैविधीयते । पश्चाच्चात्मान्वयं सूनी व्यवस्थाप्य गृहोज्झनम् ।। चर्यैषा गृहिणां प्रोक्ता जीवितान्ते तु साधनम् । देहाहारेहितत्यागाद् ध्यानशुद्धयात्मशोधनम् ॥' [ महापु., ३९।१४३-१४९ ] ॥१८॥ एतदेव संगृहन्नाहस्यान्मैश्याधुपबृंहितोऽखिलवधत्यागो न हिस्याम्यहं धर्माद्यर्थमितीह पेक्ष उदितं दोषं विशोध्योज्झतः । सूनौ न्यस्य निजान्वयं गृहमथो चर्या भवेत्साधनं त्वन्तेऽन्नेहतनूज्झनाद्विशदया ध्यात्यात्मनः शोधनम् ॥१९॥ अखिलवधः। अखिलोऽनृतादिसहितो वधः प्राणातिपातः। स चेह सागारधर्मप्रक्रमात् त्रसविषय एव । धर्माद्यर्थ-धर्मार्थं देवार्थ मन्त्रसिद्धयर्थमौषधार्थमाहाराथं वा । यदाह 'देवातिथि-मन्त्रौषध-पित्रादिनिमित्ततोऽपि संपन्ना। हिंसा धत्ते नरके किं पुनरिह नान्यथा विहिता ॥' [ अमित. श्रा., ६।२९] इह-एषु पक्षादिषु मध्ये। उक्तं च चारित्रसारे-'अहिंसा परिणामत्वं पक्षः' इति । उदितंकृष्याद्यारम्भद्वारेणोत्पन्नम् । दोषं-हिंसादिकम् । विशोध्य-विधिपूर्वकं प्रायश्चित्तशास्त्रोक्तविधानेन १५ निराकृत्य । सूनी-पुत्रे। तदसंभवे तत्तुल्ये वंश्येऽपि । अथो-पक्ष संस्कारानन्तरं वैराग्यपरिणामे प्रत्यहहिंसाकी विशुद्धि प्रायश्चित्त द्वारा की जाती है । पश्चात् अपने घरका सब भार पुत्रको सौंपकर गृह त्याग देना चर्या है और जीवनके अन्तमें भोजनादिका त्याग करके ध्यानशुद्धि के द्वारा आत्माका शोधन करना साधन है। महापुराणके ३८वें पर्व में गर्भान्वय क्रियाके वर्णनमें भी ऐसा कहा है ॥१८॥ आगे पक्ष चर्या साधनका स्वरूप कहते हैं मैं धर्मके लिए, देवताके लिए, मन्त्रसिद्धिके लिए, औषधके लिए और आहारके लिए प्राणिघात नहीं करूँगा, ऐसी प्रतिज्ञा करके मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ भावनासे वृद्धिको प्राप्त असत्य आदिसे सहित हिंसाको त्यागना पक्ष है। पक्ष संस्कारके बाद प्रतिदिन वैराग्य परिणाम बढ़नेपर कृषि आदिमें लगे हुए हिंसा आदि दोषोंका शास्त्रोक्त विधानके द्वारा शोधन करके और पुत्र पर अपने धन, परिवार और धर्मायतनोंका भार सौंपकर घर छोड़ना चर्या है । पुनः लगे हुए दोषोंको प्रायश्चित्तके द्वारा शुद्ध करके अन्त में आहार, शरीरचेष्टा और शरीरका परित्याग करके निर्मल ध्यानके द्वारा आत्माकी शुद्धि करना साधन है ।।१९॥ विशेषार्थ-यहाँ पक्षचर्या-साधनका स्वरूप कहा है। पक्ष में झूठ. चोरी आदि पापोंके साथ हिंसाका त्याग किया जाता है । यतः सागारधर्मका प्रकरण है अतः त्रसहिंसाका ही त्याग लेना चाहिए। तथा मन्दकषायो भी गृहस्थ चूंकि घरमें रहता है गृहस्थीके सब काम १. तत्र पक्षो हि जनानां कृत्स्नहिंसाविवर्जनम् । मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यैरुपबृहितम् ॥ चर्या तु देवतार्थ वा मन्त्रसिद्धयर्थमेव वा । औषधाहारक्लप्त्यै वा न हिस्यामोति चेष्टितम् ।। तत्राकामकृते शुद्धिः प्रायश्चितविधीयते । पश्चाच्चात्मालयं सूनी व्यवस्थाप्य गृहोज्झनम् ॥ चर्यषा गृहिणां प्रोक्ता जीवितान्ते च साधनम् । देहाहारेहितत्यागात् ध्यानशुद्धयात्मशोधनम् ॥ -महापु. ३९।१४६-१४९ । Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३८ धर्मामृत ( सागार) मारोहति सतीत्यर्थः। उक्तं च चारित्रसारे-हिसासंभवे प्रायश्चित्तविधिना विशुद्धः सन् परिग्रहपरित्याग करणे सति स्वगृहं धर्म च वंश्याय समर्प्य यावद् गृहं परित्यजति तावदस्य चर्या भवतीति । आर्षेऽप्युक्तमष्टा३ विंशतितमे [-ष्टत्रिंशत्तमे पर्वणि गर्भान्वयक्रियावर्णने 'कुलचर्यामनुप्राप्तो धर्मे दाढयमथोद्वहन् । गृहस्थाचार्यभावेन संश्रयेत् स गृहीशिताम् । सोऽनुरूपं ततो लब्ध्वा सूनुमात्मभरक्षमम् । तत्रारोपितगार्हस्थ्यः सत्प्रशान्तिमतः श्रयेत् ।। विषयेष्वनभिष्वङ्गो नित्यं स्वाध्यायशीलता। नानाविधोपवासैश्च वृत्तिरिष्टा प्रशान्तता ।।' इत्यादि । [महापु०, ३८।१४४, १४८-१४९ ] चर्या-दर्शनिकादारभ्यानुमतिविरतं यावदुपासकाचारः । तथा च वक्ष्यति-'इति चर्या गृहत्यागपर्यन्तामित्यादि । अत्र सुविधिमहाराजो दृष्टान्तः । अन्ते-गृहत्यागावसाने मरणे चासन्ने । तु शब्दात् 'उदितं दोषं विशोध्य' इत्यनुवृत्याऽत्रापि योज्यम् । अन्नेत्यादि । ईहा-शरीरचेष्टा । नियतकालं यावज्जीवं चेत्युपस्कारः । १५ ध्यात्या-ध्यानेन । प्रपञ्चयिष्यते चैतदुतरत्र । १९॥ करता है, आरम्भ करता है अतः आरम्भी हिंसाको तो नहीं छोड़ सकता, केवल संकल्पी हिंसा को ही छोड़ सकता है क्योंकि आरम्भी हिंसा तो गृहस्थको अवश्य होती है। उसी संकल्पी हिंसाके चार रूप हैं, धर्म मानकर लोग पशुओंकी बलि देते हैं। जैसे यज्ञोंके समयमें पशु होम होता था। मनुस्मृतिमें इसका विधान है। काली आदि देवताओंके लिए तो आज भी बलि प्रचलित है । मन्त्र सिद्धि के लिए भी तान्त्रिक-मान्त्रिक मनुष्य तककी बलि दिया करते थे। औषधि और आहारके लिए तो आज भी प्रतिदिन करोड़ों पशु मारे जाते हैं। इस तरह संकल्पी हिंसाके ये पाँच प्रचलित द्वार हैं । अतः जिसे जैनत्वका पक्षहोता है वह सबसे प्रथम इन पाँच कामोंके लिए जीव वध न करने का नियम लेता है। इसके बिना वह जैन कहलानेका भी पात्र नहीं है । इसके साथ ही उसमें चार भावनाएँ भी होनी चाहिए। पहली है मैत्री भावना, संसारके प्राणिमात्रको अपना मित्र मानना और अपनेको उनका मित्र मानकर एक मित्रकी तरह उनके दुःख और कष्टोंको दूर करनेका प्रयत्न मैत्री है। जो गुणी जन हैं, ज्ञानी हैं, तपस्वी हैं, परोपकारी हैं उनके प्रति प्रमोद भाव होना, उन्हें देखते ही आनन्दसे गद्गद हो उनका सम्मान आदि करना प्रमोद है। जो कष्टमें हों, दीन दुःखी हों, करुणा बुद्धिसे उनका साहाय्य करना कारुण्य भावना है। और ऐसे भी लोग होते हैं जो अच्छी शिक्षा देनेपर भी रुष्ट होते हैं उनके प्रति माध्यस्थ भाव अर्थात् उनसे राग-द्वेष न करके उपेक्षा करना यह चौथी भावना है । इन भावनाओंसे उक्त अहिंसाव्रतमें वृद्धि होती है । इस तरह जब वह परिपक्क हो जाता है तो अपने दोषोंका प्रायश्चित्त करके दर्शनिक आदि प्रतिमाके व्रत पालता है । अर्थात् ज्यों-ज्यों उसमें रागादिको हीनता होनेसे निर्मल चिद्रूपकी अनुभूति बढ़ती जाती हैं त्यों-त्यों वह बाह्य त्यागकी ओर भी विशेष बढ़ता जाता है। इस तरह दर्शनिकसे लेकर अनुमति विरत तक जितना श्रावकाचार है वह सब चर्या में गर्भित है। अनुमति विरतके बाद वह अपने पुत्र या योग्य दत्तकपर सब भार छोड़कर घर छोड़ देता है । यहाँ अन्तसे दो अभिप्राय हैं-घर छोड़ देनेपर और मरण समयमें । घर छोड़नेपर कुछ नियत समयके Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशम अध्याय ( प्रथम अध्याय ) अथ पक्षादिकल्पनाद्वारेण कृतावतारान् श्रावकस्य त्रीन् प्रकारानुद्दिश्य संक्षेपेण लक्षयन्नाहपाक्षिकादिभिदा त्रेधा श्रावकस्तत्र पाक्षिकः । तद्धर्मगृह्यस्त निष्ठो नैष्ठिकः साधकः स्वयुक् ॥२०॥ पाक्षिकः - पक्षेण चरति दीव्यति जयति वा । तद्धमंगृह्यः तस्य श्रावकस्य धर्मः एकदेशहिंसाविरतिरूपं व्रतं गृह्यः पक्षः प्रतिज्ञाविषयो यस्यासौ प्रारब्धदेशसंयमः । श्रावकधर्मस्वीकारपर इत्यर्थः । तन्निष्ठः -- तत्र तद्धर्मे निष्ठा निर्वहणं यस्यासौ घटमान देशसंयमो निरतिचारश्रावकधर्मनिर्वाहपर इत्यर्थः । स्वयुक् - स्वस्मिन्नात्मनि युक् समाधिर्यस्यासौ निष्पन्नदेश संयम आत्मध्यानतत्पर इत्यर्थः । वक्ष्यति च ६ 'प्रारब्धो घटमानो निष्पन्नश्चाहंतस्य देशयमः । योग इव भवति यस्य त्रिधा स योगीव देशयमी ॥' इति । भद्रम् । इत्याशाधरदृब्धायां धर्मामृतपञ्जिकायां ज्ञानदीपिकापरसंज्ञायां दशमोऽध्यायः समाप्तः । अत्राध्याये पञ्चदशोत्तराणि त्रिशतानि अङ्कतः । ३१५ । लिए भोजन, शारीरिक चेष्टा और शरीरका ममत्व त्यागकर निर्मल ध्यानके द्वारा आत्मासे रागादि दोपोंको दूर करना भी साधन है यह ग्यारहवीं प्रतिमाके पालन रूप हैं । और मरते समय जीवन पर्यन्त के लिए ऐसा करना भी साधन है । आत्माकी शुद्धि तो रागादि दोषों के छोड़नेसे ही होती है और उसके लिए ऐसे ही शुद्ध ध्यानकी आवश्यकता है जो रागादि दोष से दूषित न हो । धर्मका एकमात्र उद्देश यही है ||१९| ३९ अब पक्ष आदि भेदोंके द्वारा श्रावकके तीन भेदोंका अवतार करके संक्षेपसे उनका लक्षण कहते हैं पाक्षिक, नैष्ठिक और साधकके भेदसे श्रावक के तीन भेद हैं । उनमें से जो एकदेश हिंसा विरतिरूप श्रावक धर्मका पक्ष लेता है अर्थात् उसका पालन करना स्वीकार करता है. वह पाक्षिक है । और जो उसमें निष्ठा रखता है अर्थात् निरतिचार श्रावक धर्मका निष्ठापूर्वक निर्वाह करता है वह नैष्ठिक है । जो अपनेमें समाधि लगाता है अर्थात् समाधिपूर्वक मरण साधता है वह साधक है ||२०|| विशेषार्थ - पहला भेद देससंयमकी प्रारम्भिक अवस्थाको बतलाता है, दूसरा भेद उसकी मध्यम अवस्थाको बतलाता है और तीसरा भेद उसकी पूर्णदशाको बतलाता है ||२०|| इस प्रकार पं. आशाधर रचित धर्मामृतके अन्तर्गत सागारधर्मामृत की स्वोपज्ञसंस्कृत टकानुसारिणी हिन्दी टीकामें प्रारम्भसे दसवाँ और सागार धर्मकी अपेक्षा प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ९ १२ Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) अथ पाक्षिकाचारं प्रपञ्चयितुकामः प्रथमं तावद्यादृशस्य भव्यस्य सागारधर्माभ्युपगमो धर्माचार्यैरभ्यनु३ ज्ञायते तादृशं तद्दर्शयन्नाह त्याज्यानजस्रं विषयान् पश्यतोऽपि जिनाज्ञया। मोहात्त्यक्तुमशक्तस्य गृहिधर्मोऽनुमन्यते ॥१॥ पश्यत:-प्रतिपद्यमानस्य । एतेन सम्यग्दर्शनशुद्धस्येत्युक्तं स्यात् । मोहात्-प्रत्याख्यानावरणलक्षणचारित्रमोहोद्रेकात् । यदाह "विषयविषमाशनोत्थितमोहज्वरजनिततीव्रतृष्णस्य । निःशक्तिकस्य भवतः प्रायः पेयाद्युपक्रमः श्रेयान् ॥ [ इस प्रकार पहले अध्यायमें सागार धर्मकी सूचना मात्र करके विस्तारसे पाक्षिक श्रावकका आचार कथन करनेकी इच्छासे ग्रन्थकार सबसे प्रथम जिस प्रकारके भव्य जीवको धर्माचार्योंने सागारधर्म पालनेकी अनुज्ञा दी है, उसको बतलाते हैं __ जिनेन्द्रदेवकी आज्ञासे इष्ट स्त्री आदि विषयोंको न सेवने योग्य जानते हुए भी जो प्रत्याख्यानावरण नामक चारित्र मोहके तीव्र उदयके कारण त्यागनेमें असमर्थ हैं उन्हें धर्माचार्य गृहस्थ धर्म पालनेकी अनुज्ञा देते हैं ॥१॥ विशेषार्थ-पुरुषार्थसिद्धयुपायके प्रारम्भमें आचार्य अमृतचन्दजीने कहा है कि मुनीइवरोंको वृत्ति अलौकिक होती है वह पाप क्रियासे युक्त आचारसे विमुख और सर्वथा विरतिरूप होती है । यतः श्रावकका आचार पापक्रियासे मिला होता है अतः मुनि उससे विमुख होकर केवल निजस्वरूपका अनुभव करते हैं। इसीलिये वे गृहस्थाचारका उपदेश न देकर समस्तविरतिरूप मुनिधर्मका ही उपदेश देते हैं। किन्तु बार-बार समस्तविरति रूप मुनिधर्मका उपदेश देनेपर भी जो ग्रहण नहीं करता उसे श्रावक धर्मका उपदेश करते हैं। किन्तु जो अल्प बुद्धि मुनि मुनि धर्मका उपदेश न देकर गृहस्थ धर्मका ही उपदेश करता है उसे जिनागममें दण्डके योग्य कहा है क्योंकि इस तरह मुनिधर्मका कथन न करके गृहस्थ धर्मका कथन करनेसे श्रोता यदि मुनिधर्म धारण करनेके लिए उत्साहित हो तो उस दुर्बुद्धिके १. 'अनुसरता पदमेतत् करम्बिताचारनित्यनिरभिमुखा। एकान्तविरतिरूपा भवति मुनीनामलौकिको वृत्तिः ।। बहुशः समस्तविरतिं प्रदर्शितां यो न जातु गृह्णाति । तस्यैकदेशविरतिः कथनीयानेन बीजेन ॥ यो यतिधर्ममकथयन्नुपदिशति गृहस्थधर्ममल्पमतिः । तस्य भगवत्प्रवचने प्रदर्शितं निग्रहस्थानम् ॥ . अक्रमकथनेन यतः प्रोत्सहमानोऽतिदूरमपि शिष्यः । अपदेऽपि सम्प्रतृप्तः प्रतारितो भवति तेन दुर्मतिना' ।-पुरुषार्थ. १६-१९ । . Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ M . एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) अनुमन्यते-एकदेशविरतिमहं करिष्यामीति प्रतिपद्यमानो गृही सूरिभिरोमित्यनुज्ञायत इत्यर्थः । एतेन स्थावरबधानुमतिदोषानुषङ्गोऽचार्याणां परिहृतो भवति । तथा चोक्तम् 'सर्वविनाशी जीवनसहननं त्याज्यते यतो जैनैः । स्थावरहननानुमतिस्ततः कृता तैः कथं भवति ॥' [ अमित. श्रा., ६।१८ ] ॥१॥ अथ पाक्षिकस्य निर्मलसम्यक्त्वपूर्वानष्टौ मूलगुणाननुष्ठेयतया प्रतिष्ठापयितुमाह तत्रादौ श्रद्दधज्जैनोमाज्ञां हिंसामपासितुम् । मद्यमांसमधून्युज्झेत्पञ्चक्षीरिफलानि च ॥२॥ जैनीमाज्ञाम् 'विकल्पसुखसंतुष्टो विमुखः स्वात्मजे सुखे । गुञ्जान्नितापसन्तुष्टशाखामृगसमो जनः ।।' [ 'मांसाशिषु दया नास्ति न सत्यं मद्यपायिषु । आनृशंस्यं न मर्येषु मधूदुम्बरसेविषु ॥' [ सोम. उपा., २९३ श्लो. ] द्वारा गृहस्थ धर्म में ही सन्तुष्ट होकर रह जानेसे ठगा जाता है। अतः ऊपर कहा है कि धर्माचार्य उसे ही गृहस्थ धर्म पालन करनेकी अनुज्ञा देते हैं जो सम्यग्दर्शनसे शुद्ध होनेसे यह जानता है कि वीतराग सर्वज्ञदेवका शासन अनल्लंघ्य है और उसमें संसारके विषयोंको त्याज्य कहा है। किन्तु ऐसा जानते हुए भी उसने अपने अविचारित कार्योंके द्वारा जो चारित्र मोहनीय कर्मका बन्ध किया हुआ है उसके तीव्र विपाकसे वह उन्हें छोड़ने में असमर्थ होता है। अनन्तानुबन्धी कषायसे जो परतन्त्र होते हैं वे तो विषयोंको सेवनीय ही मानते हैं। वे मिथ्यादृष्टि होते हैं, उनकी यहाँ बात नहीं है। जो उससे छूटकर यह तो दृढ़ आस्था रखते हैं कि ये सेवनीय नहीं हैं किन्तु छोड़ने में असमर्थ होते हैं, वे नियम करते हैं कि मैं एकदेशविरतिको अर्थात् श्रावकके आचारको पालूंगा। और आचार्य उन्हें अनुज्ञा देते हैं। इससे आचार्यपर यह दोषारोपण भी नहीं हो सकता कि उन्होंने श्रावकको स्थावर जीवोंका घात करनेकी अनुमति दी है । अतः ठीक ही कहा है कि जो व्यक्ति सब प्रकारकी हिंसामें आसक्त है उससे यदि जैनाचार्य त्रसहिंसाका त्याग कराते हैं तो यह कैसे कहा जा सकता है कि उन्होंने स्थावर जीवोंको मारनेकी स्वीकृति दी है। वे तो उससे सभी प्रकारकी हिंसा छुड़ाना चाहते हैं ॥१॥ ___अब सम्यग्दर्शनसे विशुद्ध पाक्षिक श्रावकको अहिंसाकी सिद्धिके लिए मद्य आदिके त्यागमें लगाते हैं गृहस्थ धर्ममें सबसे पहले जिनागमकी आज्ञाका श्रद्धान करते हुए हिंसाको छोड़नेके लिए देश संयमकी ओर उन्मुख पाक्षिक श्रावकको मद्य, मांस, मधु, पाँच क्षीरिफलोंको और 'च' शब्दसे लिये गये मक्खन, रात्रिभोजन और बिना छने जल आदिको छोड़ना हए॥२॥ विशेषार्थ-यहाँ यह बात ध्यानमें रखनेकी है कि जब गृहस्थ सम्यग्दर्शनसे विशुद्ध होता है तब अहिंसाकी सिद्धिके लिए मद्य-मांस आदिका त्याग करता है । मद्य-मांस आदिके त्यागका सम्यग्दर्शनसे कोई सम्बन्ध नहीं है। हाँ, सम्यक्त्व होनेपर उसकी उनसे अरुचि हो जाती है । जैन घरानोंमें मद्य-मांसका सेवन न करना कुलधर्म है। इसी तरह जेनेतर भी बहुत-से ऐसे धार्मिक घराने हैं जैसे, वैष्णव आदि, उनमें भी मद्य-मांसका सेवन नहीं है। किन्तु इससे उन्हें पाक्षिक श्रावक नहीं माना जा सकता। पाक्षिक श्रावककी श्रेणी में तो वही आता सा.-६ Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ m धर्मामृत ( सागार) इत्यादिकाम् । एतेनेदमुक्तं भवति तत्तादृग्जिनाज्ञाश्रद्धानेनैव मद्यादिविरतिं कुर्वन् देशव्रती स्यात् न कुलधर्मादिबुद्धया । 'च' अनेन नवनीत-रात्रिभुक्यगालितपानीयादिकमनुक्तं समुच्चीयते ॥२॥ अथ स्वमतपरमताभ्यां मूलगुणान् विभजते अष्टैतान् गृहिणां मूलगुणान् स्थूलवधादि वा। फलस्थाने स्मरेत् द्यूतं मधुस्थान इहैव वा ॥३॥ एतान्-उपासकाध्ययनादि शास्त्रानुसारिभिरस्माभिः पूर्वमनुष्ठेयतयोपदिष्टान् । उक्तं च यशस्तिलके 'मद्यमांसमधुत्यागाः सहोदुम्बरपञ्चकैः । अष्टावेते गृहस्थानामुक्ता मूलगुणाः श्रुते ॥' [ सो. उपा. २७० श्लो. ) फलस्थाने-पञ्चोदुम्बरफलप्रसङ्गे तन्निवृत्ती वा। मद्यमांसमधु विरति त्रयं पञ्चाणुव्रतानि चाष्टी मूलगुणानीत्यर्थ" भगवन्तः स्वामिसमन्तभद्रपादाःहै जो जिन वचनोंपर श्रद्धान करके मद्य-मांस आदिका त्याग करता है। मात्र कुल परम्परासे उनका सेवन करने मात्रसे पाक्षिक श्रावक नहीं हो सकता। अतः जैन घरानों में जन्म लेनेवालोंको भी जिनागमके कथनको जानकर और उसपर श्रद्धा रखकर नियमानुसार मद्यादिका त्याग करना चाहिए। केवल न सेवन करनेसे वे व्रती नहीं माने जा सकते। जो मद्यादिका नियमानुसार व्रत लेता है वह फिर कुसंगति में पड़कर भी मद्यादिका सेवन नहीं करता। किन्तु जो अपने घरके कारण मद्यादि का सेवन नहीं करते वे संगति दोषसे उसका सेवन करने लगते हैं। आज यही हो रहा है। होटलोंके खान-पानसे, कुल धर्म बुद्धिसे मद्यमांसका सेवन न करनेवाले भी सेवन करने लगते हैं। हिंसाके दो प्रकार हैं-भाव हिंसा और द्रव्यहिंसा। मद्यादिके सेवनमें अनुराग होना भावहिंसा है और मद्यपानसे उसमें रहनेवाले जीवोंका घात होना या मांसके लिए जी वध होना द्रव्यहिंसा है। इन दोनों ही प्रकारकी हिंसाको छोड़नेसे ही अहिंसाकी सिद्धि हो सकती है और उसीके लिए सबसे प्रथम यह स्थूल त्याग कराया गया है। क्षीरिफल कहते हैं-बड़, पीपल, पाकर, गूलर और कठूमरके फलोंको। इनमें साक्षात् त्रसजीव पाये जाते हैं । इसीसे गूलरका एक नाम जन्तु फल भी है । अंजीर भी इन्हींकी जातिका है। त्रसहिंसासे बचने के लिए इनका त्याग कराया जाता है ।।२।। अब ग्रन्थकार अपने तथा अन्य आचार्यों के मतसे मूलगुणोंको कहते हैं आचार्य मद्य, मांस, मधु और पाँच उदुम्बर फलोंके त्यागको गृहस्थोंके आठ मूलगुण मानते हैं । अथवा पाँच फलोंके त्यागके स्थानमें पाँच स्थूल हिंसा आदिके त्यागको गृहस्थोंके मूलगुण कहते हैं । अथवा मद्य, मांस, मधु तथा पाँच स्थूल हिंसा आदिके त्यागरूप आठ मूल गुणोंमें ही मधुके स्थानमें जुएके त्यागको आठ मूलगुण मानते हैं ॥३॥ विशेषार्थ-आचार्य कुन्दकुन्द और उमास्वामीने अपने श्रावकाचारके वर्णनमें मूल गुणका कोई निर्देश नहीं किया। श्वेताम्बर साहित्यमें भी श्रावकके मूलगुणोंकी कोई चर्चा नहीं है। सबसे प्रथम आचार्य समन्तभद्रके रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें श्रावकके आठ मूलगुण कहे हैं। वे हैं-मद्य, मांस, मधुके त्यागके साथ पाँच अणुव्रत । इन्हींको ग्रन्थकारने 'वा' शब्दसे सूचित किया है। इन्हीं अष्ट मूल गुणोंमें मधुके स्थानमें जुआका १. 'उदुम्बरो जन्तुफलो'-अमरकोष २।४।२२ Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय) ४३ 'मद्यमांसमधुत्यागैः सहाणुव्रतपञ्चकम् । अष्टौ मूलगुणानाहुऍहिणां श्रमणोत्तमाः॥ [ रत्न. श्रा., ६६ श्लो. ] 'स्मरेत्' एतेन सर्वत्र यमनियमादौ मुक्त्यङ्गे स्मरणपरेण भवितव्यमिति लक्षयति । द्यूतमित्यादि। इहैव-अस्मिन्नेव स्वाम्युक्ताष्टमूलगुणपक्षे मधुस्थाने द्यूतं स्मरेत् । तथा चोक्तं महापुराणे 'हिंसासत्यस्तेयादब्रह्मपरिग्रहाच्च बादरभेदात् । द्यूतान्मांसान्मद्याद्विरति गृहिणोऽष्ट सन्त्यमी मूलगुणाः ॥' [ चारित्रसार., पृ. ६१ ] ॥३॥ त्यागकर मद्य, मांस और द्यूत तथा स्थूल हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल चोरी, स्थूल अब्रह्म और स्थूल परिग्रहका त्याग ये आठ मूल गुण ग्रन्थकारने महापुराणके मतसे कहे हैं। और प्रमाण रूपसे श्लोक भी उद्धृत किया है। किन्तु महापुराणके मुद्रित संस्करणोंमें वह श्लोक नहीं मिलता। चारित्रसारमें यह श्लोक उद्धृत है और वह भी महापुराणके नामसे । ज्ञात होता है, आशाधरजीने भी उसे वहींसे उद्धृत किया है । महापुराण में तो व्रतावतरण क्रिया में मधु-मांसके त्याग तथा पंच उदुम्बरोंके त्याग और हिंसादि विरतिको सार्वकालिक व्रत कहा है। मूलगुणका भी नाम नहीं है। न मधुके स्थानमें जुएका ही त्याग कराया है। आगे जो पाँच अणुव्रतोंके स्थानमें पाँच उदुम्बर फलोंके त्यागको अष्ट मूल गुणोंमें लिया गया उसका प्रारम्भ महापुराणसे ही हुआ प्रतीत होता है। पुरुषार्थ सिद्धयुपायमें भी सर्वप्रथम हिंसाके त्यागीको मद्य, मांस, मधु और पाँच उदुम्बर फलोंको छोड़नेका विधान है किन्तु उन्हें मूलगुण शब्दसे नहीं कहा है। सबसे प्रथम पुरुषार्थ सिद्धयपायमें ही इन आठोंमें होनेवाली हिंसाका स्पष्ट कथन मिलता है और इन्हें अनिष्ट, दुस्तर और पापके घर कहा है तथा यह भी कहा है कि इन आठोंका त्याग करनेपर ही सम्यग्दृष्टि जीव जिनधर्मकी देशनाका पात्र होते हैं। इसके बाद आचार्य सोमदेवने अपने उपासकाचारमें और आचार्य पद्मनन्दिने पंचविंशतिकामें स्पष्ट रूपसे इन आठोंके त्यागको मूलगुण कहा है और उन्हींका अनुसरण आशाधरजीने किया है । आचार्य अमितगतिने जो आचार्य सोमदेव और पद्मनन्दिके मध्य में हुए हैं, अपने श्रावकाचारमें इन आठोंके साथ रात्रि-भोजनका भी त्याग आवश्यक माना है किन्तु उन्हें मूलगुण शब्दसे नहीं कहा । देवसेनके भावसंग्रह में भी (गा.३५६) अष्ट मूल गणका निदेश है। शिवकोटिकी रत्नेमालामें एक विशेषता है उसमें मद्य, मांस और मधुके त्यागके साथ पाँच अणुव्रतोंको अष्ट मूल गुण कहा है। और पाँच उदुम्बरोंके त्यागवाले अष्ट मूल गुणको बालकोंके कहा है। पं. आशाधरके उत्तरकालीन मेधावीने अपने श्रावकाचारमें मद्यादि तीन १. 'मधुमांसपरित्यागः पञ्चोदुम्बरवर्जनम् । हिंसादिविरतिश्चास्य व्रतं स्यात् सार्वकालिकम्' ।-३८.१२२ । २. 'मद्यं मांसं क्षौद्रं पञ्चोदुम्बरफलानि यत्नेन । हिंसाव्युपरतिकामर्मोक्तव्यानि प्रथममेव ॥ अष्टावनिष्टदुस्तरदुरितायतनान्यमूनि परिवर्त्य । जिनधर्मदेशनाया भवन्ति पात्राणि शुद्धधियः॥ -पुरुषार्थ., ६१ तथा ७४ श्लो. ३. 'त्याज्यं मांसं च मद्यं च मधूदुम्बरपञ्चकम् । अष्टौ मूलगुणाः प्रोक्ता गृहिणो दृष्टिपूर्वकाः' । -पद्म. पञ्च. ६१२३ ४. 'मद्यमांसमधुरात्रिभोजनं क्षीरवृक्षफलवर्जनं त्रिधा। कुर्वते व्रतजिघृक्षया बुधास्तत्र पुष्यति निषेविते व्रतम् ॥-अमि. श्रा. ५०१ ५. 'मद्यमांसमधुत्यागसंयुक्ताणुव्रतानि नुः । अष्टौ मूलगुणाः पञ्चोदुम्बरश्चार्भकेष्वपि ॥'-शि. रत्न. Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामत ( सागार) __ अथ मद्यस्य जन्तुभूयिष्ठतानुवादपुरस्सरमुपयोक्तृणामुभयलोकबाधकत्वमुपदर्शयन्नवश्यत्याज्यतामभिधत्तेयदीत्यादि यदेकबिन्दोः प्रचरन्ति जीवा श्चेत्तत् त्रिलोकीपि पूरयन्ति । यद्विक्लवाश्चेमममुं च लोकं यस्यन्ति तत्कश्यमवश्यमस्येत् ॥४॥ उक्तं च 'मद्यैकबिन्दुसंपन्नाः प्राणिनः प्रचरन्ति चेत् । पूरयेयुर्न संदेहः समस्तमपि विष्टपम् ॥' [ सो. उपा., २७५ श्लो.] यद्विक्लवा:-येन मोहितमतयः । इमम्-इह लोकम् । यस्यन्ति-भ्रंशयन्ति, श्रेयोरहितं कुर्वन्तीत्यर्थः । कश्यं-मद्यम् । अस्येत्-त्यजेत् । उक्तं च 'मनोमोहस्य हेतुत्वान्निदानत्वाच्च दुर्गतेः । मद्यं सद्भिः सदा त्याज्यमिहामुत्र च दोषकृत् ॥' [ सो. उपा., २७६ श्लो. ] अपि च 'मद्ये मोहो भयं शोकः क्रोधो मृत्युश्च संश्रितः । सोन्मादमदमूीयाः सापस्मारापतानकाः ।। विवेकः संयमो ज्ञानं सत्यं शौचं दया क्षमा । मद्यात्प्रवीयते सर्वं तृण्या वह्निकणादिव ।' [ ]॥४॥ तथा पाँच उदुम्बर फलोंके सातिचार त्यागको अष्ट मूल गुण कहा है। और पं. राजमल्लने अपनी पंचाध्यायीके उत्तरार्धमें आठ मूल गुणोंका कथन करते हुए उनके बारे में जो विशेष कथन किया है वह इस प्रकार है कि 'व्रतधारी गृहस्थोंके आठ मूल गुण होते हैं। कहीं-कहीं अव्रतियोंके भी होते हैं क्योंकि ये सर्वसाधारण हैं। ये आठ मूल गुण स्वभावसे या कुलपरम्परासे चले आते हैं। इनके बिना न सम्यक्त्व होता है और न व्रत । इनके बिना जब जीव नामसे भी श्रावक नहीं हो सकता तब पाक्षिक, नैष्ठिक और साधककी तो बात ही क्या है। जिसने मद्य, मांस और मधुका और पाँच उदुम्बर फलोंका त्याग कर दिया है वह नामसे श्रावक है। त्याग न करनेपर नामसे भी श्रावक नहीं है।' इस तरह विविध श्रावकाचारोंमें अष्ट मूल गुणोंके सम्बन्धमें विवेचन मिलता है ।।३।। अब मद्य में जीवोंकी बहुलता होनेसे उसके सेवन करनेवाले इस लोक और परलोकको नष्ट करते हैं, यह बतलाकर उसको अवश्य छोड़नेका आग्रह करते हैं जिस मद्यकी एक बदसे यदि उसमें पैदा होनेवाले जन्तु बाहर फैल तो समस्त संसार उनसे भर जाये । तथा जिस मद्यको पीकर उन्मत्त हुए प्राणी अपने इस जन्म और दूसरे जन्मको भी दुःखमय बना लेते हैं, उस मद्यको अवश्य छोड़ना चाहिए ॥४॥ १. 'तत्र मूलगुणाश्चाष्टौ गृहिणां व्रतधारिणाम् । क्वचिदवतिनां यस्मात् सर्वसाधारणा इमे ॥ निसर्गाद्वा कुलाम्नायादायातास्ते गुणाः स्फुटम् । तद्विना न व्रतं यावत् सम्यक्त्वं च तथाङ्गिनाम् ॥ एतावता विनाप्येषः श्रावको नास्ति नामतः । किं पुनः पाक्षिको गूढो नैष्ठिकः साधकोऽथवा ।। मद्यमांसमधुत्यागी त्यक्तोदुम्बरपञ्चकः । नामतः श्रावकः ख्यातो नान्यथाऽपि तथा गृही॥ -पञ्चाध्यायी, उत्त. ७२३-७२६ श्लो.। Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) अथ मद्यपानस्य द्रव्यभावहिंसानिदानत्वमनूद्य तन्निवृत्तिप्रवृत्तिशीलानां गुणदोषो दृष्टान्तद्वारेण स्पष्टयन्नाह पोते यंत्र रसाङ्गजीवनिवहाः क्षिप्रं म्रियन्तेऽखिलाः __कामक्रोधभयभ्रमप्रभृतयः सावध मुद्यन्ति च । तन्मयं व्रतयन्न धूर्तिलपरास्कन्दीव यात्यापदं चारं चरन्मज्जति ॥५॥ उक्तं च 'समुत्पद्य विपद्येह देहिनोऽनेकशः किल । मद्यीभवन्ति कालेन मनोमोहाय देहिनाम् ॥ [ सो. उपा., २७४ श्लो.] भ्रमः-मिथ्याज्ञानं शरीरभ्रमणं च । सावधं-पापेन निन्दया वा सह । उक्तं च 'अभिमानभयजुगुप्सा-हास्यारतिकाम-शोक-कोपाद्याः । हिंसायाः पर्यायाः सर्वेऽपि च नरकसन्निहिताः ॥ [ पुरुषार्थ., ६४ श्लो. ] व्रतयन् -व्रतं कुर्वन् । अमद्यपकुलजातोऽपि देवादिसाक्षिकं निवर्तयन्नित्यर्थः । तिलपरास्कन्दीव- १२ धूर्तिलनामा चोरो यथा । उक्तं च 'हेतुशुद्धेः श्रुतेर्वाक्यात्पीतमद्यः किलेकपात् । मांस-मातङ्गिकासङ्गमकरोन्मूढमानसः ॥' [सो. उपा., २७७ श्लो. ] ॥५॥ " अब मद्यपानको द्रव्यहिंसा और भावहिंसाका कारण बतलाकर उसको पीनेवालेके दोष और नहीं पीनेवालेके गण दष्टान्त द्वारा स्पष्ट करते हैं जिस मद्यके पीते ही मद्यके रससे पैदा होनेवाले तथा मद्यमें रस पैदा करनेवाले जीवोंके समूह मद्यपान करते ही तत्काल मर जाते हैं तथा पाप और निन्दाके साथ काम, क्रोध, भय, भ्रम प्रमुख दोष उत्पन्न होते हैं, उस मद्यका व्रत लेनेवाला धूर्तिल नामक चोरकी तरह विपत्तिमें नहीं पड़ता। और उस मद्यको पीनेवाला मनुष्य एकप नामके संन्यासीकी तरह दुराचार करता हुआ दुर्गतिके दुःखमें डूबता है ॥५॥ _ विशेषार्थ-मद्यपानसे मनुष्यका मन आपेमें नहीं रहता। वह मदहोश होकर धर्मको भूल जाता है । और धर्मको भूल जानेपर उसे पाप करते हुए संकोच नहीं होता । इसके साथ ही मद्यमें जीवोंकी उत्पत्ति अवश्य होती है, उनके बिना मद्य तैयार नहीं होता । और मद्यपानसे वे सब मर जाते हैं। इस तरह मद्यपानमें द्रव्यहिंसा तो होती ही है। साथ ही मद्य पीनेसे काम सताता है, स्त्रीके साथ रमण करनेकी इच्छा पैदा होती है । सिर चकराता है। मूच्छित होकर गिर पड़ता है। कुत्ते उसके मुखमें मूत्र कर जाते हैं। चोर वस्त्रादि हर लेते हैं। दुनिया उसपर हँसती है। जिनके कुलमें शराब नहीं पी जाती, उन्हें भी देव-गुरुकी साक्षीपूर्वक मद्यपान न करनेका नियम लेना चाहिए। नियम लेनेवाला धूर्तिल नामक चोरकी तरह १. 'रसजामां च बहूनां जीवानां योनिरिष्यते मद्यम् । मद्यं भजतां तेषां हिंसा संजायतेऽवश्यम्॥-पुरुषार्थ. ६३ श्लो. । २. सरक-मु.। ३. पुरुषार्थसि. ६२-६४ श्लोक । ४. अमित. श्रा. ५।२-१२ । Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ धर्मामृत ( सागार ) अथाचार विशुद्धिगवितानां पिशिताशनं गईमाणः प्राह 'स्थानेश्नन्तु पलं हेतोः स्वतश्चाशुचि कश्मलाः। श्वादिलालावदप्यधुः शुचिम्मन्याः कथन्नु तत् ॥६॥ स्थाने-युक्तम् । हेतोः-शुक्रशोणितलक्षणात् कारणात् । स्वतः-स्वभावेन । अशुचिअमेध्यबीजममध्यस्वभावं चेत्यर्थः ।। उक्तं च 'शुक्रशोणितसंभूतं विष्ठारसविवर्धितम् । लोहितं स्त्यानतामाप्तं (?) कौश्लियादक्रिमिः पलम् ।।' [ ] __ अपि च 'भक्षयन्ति पलमस्तचेतनाः सप्तधातुमयदेहसंभवम् । यद्वदन्ति च शुचित्वमात्मनः किं विडम्बनमतः परं बुधाः ।।' [ अमित. श्रा., ५।२२] 'अत्ति यः कृमिकुलाकुलं पलं पूयशोणितवसादिमिश्रितम् । तस्य किंचन न सारमेयतः शुद्धबुद्धिभिरवेक्षतेऽन्तरम् ॥' [ अमि, श्रा. ५।१८] कश्मला:-जातिकुलाचारमलिनाः। श्वादिलालावत्-कुक्कुरचित्रक-श्येनादिमुखस्रावयुक्तं तत्तुल्यं वा । अद्युः-खादेयुः । गर्थेऽत्र सप्तमी । गर्हामहे । अन्यायमेतदित्यर्थः । शुचिमन्याः-आचारविशुद्धमात्मानं मन्यमानाः । उक्तं च 'अहो द्विजातयो धर्म शोच्यमूलं वहन्ति च । सप्तघातकदेहितं (?) मांसमश्नन्ति चाधमाः॥' [ प्राणोंसे हाथ नहीं धोता। और मद्यपायी एकप नामक संन्यासीको तरह अगम्यागमन और अभक्ष्य भक्षण करके दुर्गतिमें भ्रमण करता है। इन दोनोंकी कथाएँ सोमदेवके उपासकाचारमें (पृ. १३०-१३२) वर्णित हैं ।।५॥ आगे आचारविशुद्धिका गर्व करनेवालोंके मांसभक्षणकी निन्दा करते हैं मांस स्वभावसे भी अपवित्र है और कारणसे भी अपवित्र है। ऐसे अपवित्र मांसको जाति और कुलके आचारसे हीन नीच लोग खायें तो उचित हो सकता है। किन्तु अपनेको विशुद्ध आचारवान् माननेवाले कुत्तेकी लारके तुल्य भी उस मांसको कैसे खाते हैं । यही आश्चर्य है ॥६| . विशेषार्थ-स्थूल प्राणीका घात हुए बिना मांस पैदा नहीं होता। और स्थूल प्राणीकी उत्पत्ति माता-पिताके रज और वीर्यसे होती है। अतः मांसका कारण भी अपवित्र है और मांस स्वयं अपवित्र है । उसपर मक्खियाँ भिनभिनाती हैं, चील-कौए उसे देखकर मँडराते हैं । कसाईखानेको देखना भी कठिन होता है। ऐसे घृणित मांसको आजके सभ्य लोग तो होटलोंमें बैठकर खाते ही है। किन्तु गंगा स्नान करके किसीसे छु जानेके भयसे गीली धोती पहने और हाथमें मांसका झोला लिये आचारवान लोगोंको देखा जा सकता है जो मांस१. 'स्वभावाशुचि दुर्गन्धमन्यापायं दुरास्पदम् । सन्तोऽदन्ति कथं मांसं विपाके दुर्गतिप्रदम् ॥ -सोम. उपा., २७९ श्लो. 1 Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) किं च, प्राणिघाताज्जातमामिषमश्नतां हिंसाया अवश्यं भावात् कौतस्कुती पवित्रता स्यात् ? यदाह 'न विना प्राणिविधातान्मांसस्योत्पत्तिरिष्यते यस्मात् । मांसं भजतस्तस्मात्प्रसरत्यनिवारिता हिंसा ॥' [पुरुषार्थ. ६२ श्लो. ] तथा 'ये भक्षयन्त्यन्यपलं स्वकीयपलपुष्टये । त एव घातका यन्न वद को भक्षकं विना ॥' [ अपि च 'हन्ता पलस्य विक्रेता संस्कर्ता भक्षकस्तथा । क्रेताऽनुमन्ता दाता च घातका एव यन्मनुः ॥ अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः।' [ मनुस्मृ. ५।५१ ] विशसिता-हतस्याङ्गविभाक्षकं [-विभाजकः] विना । आ गकरः (?) उपहर्ता--परिवेष्टा । ततो १२ दुरन्तनरकनिवासायाणुशोऽपि पिशितस्याशनमामनन्ति । तदाह 'तिलसर्षपमात्रं यो मांसमश्नाति मानवः। स श्वभ्रान्न निवर्तेत यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥' [ तदिदमुन्मत्तभाषितमिव मनोर्वचः 'न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने। प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥' [ मनुस्मृ. ५।५६ ] इति । येषां निवृत्तिर्महाफला तेषां प्रवृत्तिर्न दोषवतीति स्ववचनविरोधाविष्करणात् । 'मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाम्यहम् । एतन्मांसस्य मांसत्वे निरुक्तं मनुरब्रवीत् ॥' [ मनु. ५.५५] इति च पूर्वापरविरोधोक्तिः । तद्वदिदमपि च स्मृतिकाराणां वाक्यं महाविलसितमेव 'क्रीत्वा स्वयं वाऽप्युत्पाद्य परोपहेतमेव वा। देवान् पितृन् समभ्यर्च्य खादन्मांसं न दुष्यति ॥ [ मनु. ५।३२ ] इति । भक्षणमें भी धर्म मानते हैं। वेदके अध्येता वैदिक विद्वानोंने लिखा है कि ऋग्वेदमें देवताओंके लिए बैलका मांस पकानेकी ओर कई संकेत दिये गये हैं। प्राचीन धर्मसूत्रोंमें भोजन एवं यज्ञके लिए जीवहत्याकी व्यवस्था है। बृहदारण्यकोपनिषदें जो बुद्धिमान पुत्र उत्पन्न करना चाहता है उसके लिए बैल या साँड या किसी अन्य पशुके मांसको चावल और घीमें पकानेका निर्देश है (६।४।१८)। धर्मसूत्रोंमें कुछ पशुओं-पक्षियों एवं मछलियोंके मांस के भक्षणके सम्बन्धमें नियम दिये गये हैं। इन्हींको लक्ष्य करके ग्रन्थकारने उक्त कथन किया प्रतीत होता है । आचार्य सोमदेवने भी लिखा है कि 'मांस स्वभावसे ही अपवित्र है, दुर्गन्धसे भरा है, दूसरोंकी हत्यासे उत्पन्न होता है तथा कसाईके घर जैसे खोटे स्थानसे प्राप्त होता है। ऐसे मांसको भले आदमी कैसे खाते हैं। यदि जिस पशुको हम मांसके लिए मारते हैं १. मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः।-मनु. ५।५५ । २. परोपकृतमेव वा । देवान् पितूंश्चार्चयित्वा-मनु. । ३. धर्मशास्त्रका इतिहास, १ भाग, पृ. ४२० आदि । Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार ) देवानाममृताहारत्वात् पितॄणां च पुत्रादिवितीर्णेन संबन्धासंभवात् । मांसखादनस्य द्रव्यभावहिंसामयत्वेन दुर्गतिदुःखैकफलकल्मषसम्भारकारणत्वात् । न चैतद् वेदविहितत्वादनवद्यं तद्वाक्यानामप्रामाणिकत्वेन ३ प्रत्ययस्य कर्तुमशक्यत्वात् । यदाह ९ १२ १५ १८ ४८ 'स्पर्शो मेध्यभुजांगवामघहरो वन्द्या विसंज्ञा द्रुमाः, स्वर्ग - श्वगवदानेति च पितृन् विप्रोपभुक्ताशनम् । आप्ता छद्मपराः सुराः शिखिहुते प्रीणाति देवान् हविः, _ स्फीतं फल्गु च वल्गु च श्रुतिगिरां को वेति लीलायितम् ॥' [ एतेनैषामपि स्मृतिवाक्यानामप्रामाणिकत्वमेव समर्थितं स्यात्'तिलैर्बीहियवैर्मारद्भिर्मूलफलेन वा । दत्तेन मासं प्रीयन्ते विधिवत् पितरो नृणाम् ॥ द्वी मासी मत्स्यमांसेत त्रीन् मासान् हारिणेन तु । औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनेह पञ्च तु ॥' [ मनु. ३।२६७-६८ ] औरभेण मेषसम्बन्धिना, शाकुनेन इति आरण्यकुक्कुटादिसंबन्धिन इत्यर्थः । ' षण्मासांरछागमासेन पार्वतेनेह सप्त वै । अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवेव तु ॥' [ मनु. ३।२६९ ] पृषतेन - रुरणमृगजाति........ वचनाः । 'दश मांसास्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः । शशकूर्मयोस्तु मांसेन मासेनेकादशैव तु ॥ संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन तु । वार्षीणसस्यमांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥ [ ] दूसरे जन्म में वह हमे न मारे या मांसके बिना जीवन ही न रह सके तो प्राणी न करने योग्य जीवहत्या भले ही करे । किन्तु ऐसी बात नहीं है, मांस के बिना भी मनुष्योंका जीवन चलता है ।' मनुस्मृतिमें मांस भक्षणका विधान भी मिलता है और विरोध भी । विरोध में लिखा है - जो व्यक्ति पशुको मारनेकी सम्मति देता है, जो पशुवध करता है, जो उसके अंगअंग पृथक करता है, जो मांस बेचता या खरीदता है, जो पकाता है, जो परोसता है, और जो खाता है. ये सभी मारनेके अपराधी हैं- (५/५१) । किन्तु आगे ही लिखा है- 'न मांसभक्षण में दोष है, न मद्यपान में और न मैथुन- सेवनमें । ये तो प्राणियोंकी प्रवृत्तियाँ हैं । किन्तु इनकी निवृत्तिका महाफल है ।' जिनके त्यागका महाफल है उनका सेवन निर्दोष कैसे हो सकता है । यह स्ववचन विरोधा है । ] आगे कहा है- 'खरीदकर या स्वयं उत्पन्न करके या दूसरेसे उत्पन्न कराकर देवता और पितरोंकी पूजापूर्वक जो मांस खाता है वह दोषका भागी नहीं होता ।' देवता तो अमृतपान करते हैं और पुत्रके दानसे मरे हुए पितरोंका कोई सम्बन्ध नहीं रहता। मांसभक्षण में तो द्रव्यहिंसा, भावहिंसा दोनों होती हैं अतः वह दुर्गतिमें ले जानेवाले पापका ही कारण है । कहा जाता है कि वेदविहित हिंसामें पाप नहीं है । किन्तु इस प्रकारके वचन प्रामाणिक न होनेसे उनपर विश्वास नहीं किया जा सकता । कहा है- 'ज्ञानहीन वृक्ष पूज्य १. तृप्यन्ति - मनु. | Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४९ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) गव्येनेति मांसेन केचित् सम्बध्नन्ति । वार्षीणसो जरच्छागः, यस्य पिवतो जलं त्रीणि स्पृशन्ति जिह्वा कर्णौ च । यदाह 'त्रि पिवन्त्विन्द्रियक्षिणं (?) श्वेतं वृद्धमजापतिम् । वार्षीणसं तु तं प्राहुर्याज्ञिकाः पितृकर्मसु ॥' इति । [ एतेनेदमपि शाक्यवाक्यं प्रत्युक्तम् 'मांसस्य मरणं नास्ति नास्ति मांसस्य वेदना । वेदनामरणाभावात् को दोषो मांसभक्षणे ॥' इति । [ मृगलावकमूषिकादीन् प्रतिवधबुद्धेनिवारत्वात् । तदुक्तम् 'मांसास्वादनलुब्धस्य देहिनो देहिनं प्रति । हन्तुं प्रवर्तते बुद्धिः शाकिन्य इव दुर्धियः ।।' [ ] ॥६॥ अथ स्वयमेव पञ्चत्वं प्राप्तस्य पञ्चेन्द्रियस्य मत्स्यादेर्भक्षणमदूषणमुत्प्रेक्षमाणान् प्रत्याह हिंस्रः स्वयं मृतस्यापि स्यादश्नन्वा स्पृशन् पलम् । पक्कापक्वाहि तत्पेश्यो निगोतौघसुतः सदा ॥७॥ हैं, यज्ञमें बकरेका बलिदान करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे पितरोंकी तृप्ति होती है, छली देव आप्त है । आगमें हवि डालनेसे देव प्रसन्न होते हैं, वेदके इन व्यर्थ वचनोंकी लीला कौन जानता है।' __इससे स्मृतिका निम्न कथन भी अप्रामाणिक ही सिद्ध होता है। तिल, जौ, धान्य, उड़द, मूल, फल देनेसे पितर एक मास तक तृप्त रहते हैं। मछलीके मांससे दो मास तक, हरिणके मांससे तीन मास तक, मेढेके मांससे चार मास तक, जंगली मुर्गे आदिके मांससे पाँच मास तक, बकरे के मांससे छह मास तक, रुरु मृगके मांससे सात मास तक, ऐण मृगके मांससे आठ मास तक और रौरव मृगके मांससे नौ मास तक, सुअर और भैसेके मांससे दस मास तक और खरगोश तथा कछुवेके मांससे ग्यारह मास तक और श्वेत वृद्ध बकरेके मांससे बारह वर्ष तक पितर तृप्त होते हैं। ___ बौद्धोंका कहना है--सांस तो जड़ है, न वह मरता है, न उसे कष्ट होता है। जब वेदना और मरण दोनों ही नहीं होते तो मांस-भक्षणमें क्या दोष है ? ऐसा माननेसे तो जीवोंको घात करनेकी भावना ही बढ़ती है, उसके बिना जड़ मांस पैदा नहीं होता। कहा हैमांसके स्वादका लोभी प्राणी दूसरे प्राणियोंको मारने में प्रवृत्त होता है। अतः मांस-भक्षण निन्द्य है ।।६।। किन्हींका कहना है कि स्वयं ही मरे हुए पंचेन्द्रिय प्राणीका मांस खाने में कोई दोष नहीं है। उनको लक्ष करके कहते हैं स्वयं मरे हुए भी मच्छ, भैंसा आदिके मांसको खानेवाला और छूनेवाला भी हिंसक है ; क्योंकि उस मांसकी पकी हुई और बिना पकी डलियोंमें सदा निगोदिया जीवोंके समूह उत्पन्न होते रहते हैं ॥७॥ १. गोदौ-मु. सा.-७ Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AM धर्मामृत ( सागार) हिंस्रः-द्रव्यहिंसाशीलत्वात् । भावहिंसायास्तु मांसभक्षणे दर्पकरत्वेन वक्ष्यमाणत्वात् । यदाह 'यतो मांसाशिनः पुंसो दमो दानं दयार्द्रता। सत्यशौचव्रताचारा न स्युर्विद्यादयोऽपि च ॥ [ ] पक्वापक्वाः-पक्वाश्च अपक्वाश्च पक्वापक्वाश्चेति विगृह्मैकशेषेण पक्वापक्वा इत्यस्य लोपः । तेन पच्यमाना इत्येव संगृहीतम् । तत्पेश्य:--मांसग्रन्थयः । निगोतीघसुतः-अनन्तकायिकसङ्घातान् सुवन्ति ६ जनयन्तीत्यर्थः। उक्तं च 'आमास्वपि पक्वास्वपि विपच्यमानासु मांसपेशीसु। सातत्येनोत्पादस्तज्जातीनां निगीतानाम् ।। आमां वा पक्वां वा खादति वा स्पृशति वा पिशितपेशीम् । स निहन्ति सततनिचितं पिण्डं बहुजीवकोटीनाम् ॥ [ पुरुषार्थ. ६७-६८ ] ॥७॥ अथ मांसस्य प्राणिहिंसाप्रभवत्वेनेन्द्रियदर्पकरत्वेन च द्रव्यभावहिंसा-हेतुत्वानुवादपुरस्सरं तद्भक्षणं १२ नरकादिगतिविवर्तननिमित्तत्वेनोपदिशन्नाह विशेषार्थ-पुरुषार्थ सिद्धथुपायमें कहा है-स्वयं मरे हुए भैंसा, बैल आदिका जो मांस होता है उसमें भी हिंसा होती है, क्योंकि उस मांसके आश्रयसे जो निगोदिया जीव उत्पन्न होते हैं उनका तो घात होता ही है । कच्ची, पकी हुई तथा पकती हुई मांसकी डलियोंमें उसी जातिके निगोदिया जीव सतत उत्पन्न होते रहते हैं। अतः जो कच्ची या पकी हुई मांसकी डलीको खाता है अथवा छूता है वह निरन्तर एकत्र होनेवाले बहुत-से जीवोंके समूहको मारता है। आचार्य अमृत चन्द्रने जो बात तीन श्लोकोंमें कही है, आशाधरजीने उसे एक ही इलोकके द्वारा कह दिया है। आचार्य अमृतचन्द्रसे भी पहले आचार्य हरिभद्रने अपने सम्बोधे प्रकरणमें प्राकृत गाथामें भी यही बात कही है कि मांसकी कच्ची या पकी हुई डलियोंमें निगोदिया जीव सतत उत्पन्न होते रहते हैं और उनका घात अवश्य होता है ॥७॥ इसपर-से यह कहा जा सकता है कि निगोदिया जीवोंका घात तो सप्रतिष्ठित वनस्पतिके खानेसे भी होता है तब उसमें और मांस-भक्षणमें कोई भेद नहीं रहा। इस आपत्तिको दूर करनेके लिए ग्रन्थकार कहते हैं कि मांस पंचेन्द्रिय प्राणीकी हिंसासे प्राप्त होता है तथा उसके भक्षणसे इन्द्रियमद विशेष होता है अतः वह भावहिंसाका कारण होनेसे नरकादि गतिका कारण होता है १. 'यदपि किल भवति मांसं स्वयमेव मृतस्य महिषवृषभादेः । तत्रापि भवति हिंसा तदाश्रितनिगोतनिर्मथनात् ॥ आमास्वपि पक्वास्वपि विपच्यमानासु मांसपेशीषु । सातव्येनोत्पादस्तज्जातीनां निगोतानाम् ।। आमा वा पक्वां वा खादति यः स्पृशति वा पिशित पेशीम् । स निहन्ति सततनिचित पिण्डं बहुजीवकोटीनाम् ॥'-पुरुषार्थ., ६६-६८ श्लो. । २. 'आमासु अ पक्कासु विपच्चमाणासु मांसपेसेसु । सययं चिय उववाओ भणिओ निगोय जीवाणं' ॥-संबोध प्रकरण, ६७५ । Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) प्राणिहिंसापितं वर्षमर्पयत्तरसं तराम् । रसयित्वा नुशंसः स्वं विवर्तयति संसृतौ ॥८॥ तरसं-मांसम् । तराम्-अतिशायनेऽव्ययमिदम् । मृष्टान्नादिभ्योऽतिशयेन प्राणिघातादु [-त्पन्नं तद्वद्दपकरं चे-] त्यर्थः । रसयित्वा-आस्वाद्य ॥८॥ अथ सांकल्पिकस्यापि पलभक्षणस्य दोषं तद्विरतिनिष्ठायाश्च गुणमुदाहरणद्वारेण दर्शयति भ्रमति पिशिताशनाभिध्यानादपि सौरसेनवत् कुगतिः। तद्विरतिरतः सुर्गात श्रयति नरश्चण्डवत् खदिरवद्वा ॥९॥ चण्डवत्-चण्डो नामोज्जयिन्यां मातङ्गो यथा। खदिरवत्-खदिरसारो नाम भिल्लराजो यथा ॥९॥ मांस पंचेन्द्रिय प्राणीको मारनेसे ही प्राप्त होता है और उसके खानेसे अत्यन्त मद होता है। उसे खाकर क्रूर प्राणी अपनेको संसार में भ्रमण कराता है ॥८॥ विशेषार्थ-आचार्य अमितगतिने भी कहा है कि तीनों लोकोंमें मांसकी उत्पत्ति जीवघातसे ही होती है। उसके बिना मांस नहीं मिलता। अतः पंचेन्द्रिय प्राणीका घात होनेसे हिंसा होती है। एकेन्द्रियसे पंचेन्द्रियकी हिंसामें अत्यधिक पाप है क्योंकि उसकी अनुभवन शक्ति विशेष है। वह जीना चाहता है मरना नहीं चाहता। अतः जो जीवको मारता है, खाता है, मांस बेचता है, उसे अच्छा मानता है, मांस-भक्षणका प्रचार करता है और मांस पकाता है ये छहों ही पापी हैं। जो मांसके स्वादके लोभी है वे मांस-मदिराका सेवन करके विषयासक्त रहते हैं। अतः मांस द्रव्यहिंसाके साथ भावहिंसाका भी कारण है। अतः मांसभक्षक संसारमें पंचपरावर्तन करते हुए भ्रमण करता है ।।८।। ___ आगे मांसभक्षणके विचारको भी दोष और उसके त्यागका गुण दृष्टान्त द्वारा बतलाते हैं मांसभक्षणके संकल्प मात्रसे जीव सौरसेन राजाकी तरह कुगतियोंमें नमण करता है। और जो मांससेवनके त्यागमें आसक्त होता है वह चण्ड नामक चाण्डाल या खदिरसार नामक भील राजाकी तरह सुगतिमें जाता है ।।९।। विशेषार्थ-मांसभक्षणकी तो बात ही क्या, मांस खानेका इरादा करने मात्रसे मनुष्यको दुर्गतियोंमें भ्रमण करना पड़ता है। इसका उदाहरण राजा सौरसेन है जो मांस खानेका विचार करता है किन्तु अपवाद, भय और राजकार्यवश खा नहीं पाता। वह मरकर मत्स्य होता है और फिर नरकमें जाता है। और मांसका कुछ समयके लिए त्याग करनेवाला चण्डनामका मातंग सद्गति पाता है। इन दोनोंकी कथा सोमदेवके उपासकाध्ययनमें (पृ. १४०-१४३ ) वर्णित है। खदिरसार एक भील था। शिकार उसका व्यवसाय था। वह मांस कैसे छोड़ सकता। किन्तु दूरदर्शी मुनिराजने उसकी विवशता जानकर उसे केवल कौएका मांस छुड़ाया। एक बार वह बीमार हुआ और वैद्यने उसे कौएका मांस खाना बतलाया। किन्तु उसने नहीं खाया। इस त्यागसे ही उसे सद्गति प्राप्त हुई ॥९॥ १. अमित. श्राव. ५।१३-२६ । Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अथ मांसं सतां भक्षणीयं प्राण्यङ्गत्वान्मुद्गादिवदित्यनुमानाभिधानग्रहावेशान्मांसभक्षणदक्षिणान् प्रत्याह प्राण्यङ्गत्वे समेऽप्यन्नं भोज्यं मांसं न धार्मिकैः। भोग्या स्त्रीत्वाविशेषेऽपि जनैर्जायैव नाम्बिका ॥१०॥ अन्नं भोज्यं रसरक्तविकारजवाभावात् । न हि मांसं यथा रसरक्तविकाराज्जायते तथा मुद्गादि धान्यमपि । न च प्राणिकायत्वाद् धान्यस्यापि मांसत्वमुपकल्प्यम्, यो यः प्राणिकायः स स मांसमिति व्याप्तेरभावात् । अन्यथा वृक्षत्वादशोकादीनामपि निम्बत्वकल्पनाप्रसङ्गात् । तदाह 'मांसं जीवशरीरं जीवशरीरं भवेन्न वा मांसम् । यद्वन्निम्बो वृक्षो वृक्षस्तु भवेन्न वा निम्बः ।।' [ ] कि च, प्राण्यङ्गत्वाविशेषेऽपि यथा लोके शङ्खादिकं पवित्रत्वेन प्रसिद्धं न तथाऽस्थ्यादिकम् । एवमोदनादिकमेव भक्ष्यमभक्ष्यं तु मांसचम-रुधिर-मेदो-मज्जादिकं द्रव्यभावहिंसाभूयस्त्वात् । यदाह 'द्विजाण्डजनिहन्तृणां यथा पापं विशिष्यते । जीवयोगाविशेषेऽपि तथा फलपलाशिनाम् ।। स्त्रीत्वपेयत्वसामान्याद्दारवारिवदीहताम् । एष वादी वदन्नेवं मातृमद्यसमागमे ।।' [ सोम. उपा., ३०२-३०३ श्लो. ] कि च 'शुद्धं दुग्धं न गोमांसं वस्तुवैचित्र्यमीदृशम् । विषघ्नं रत्नमाहेयं विषं च विपदे यतः ॥' [ सो. उपा. ३०४ ] कुछ मांसभक्षणके प्रेमी यह कहते सुने जाते हैं कि जैसे अन्न जीवका शरीर है वैसे ही मांस भी जीवका शरीर है अतः अन्नकी तरह मांस भी खाद्य है। उन्हें लक्ष करके ग्रन्थकार कहते हैं यद्यपि अन्न भी प्राणीका अंग है और मांस भी प्राणीका अंग है इस तरह दोनों में ही समानता होनेपर भी धार्मिकों को अन्न ही खाने योग्य है, मांस नहीं। जैसे माता भी स्त्री है और पत्नी भी स्त्री है, इस तरह स्त्रीपनेसे दोनों ही समान हैं फिर भी मनुष्य पत्नीको ही भोगते हैं, माताको नहीं ॥१०॥ विशेषार्थ-आचार्य सोमदेवने अपने उपासकाचारमें इस कथनका प्रतिवाद करते हुए एक श्लोक उद्धृत किया है जिससे प्रकट होता है कि यह चर्चा उनसे भी पुरानी है । उसमें कहा है-मांस जीवका शरीर है यह ठीक है किन्तु जो जीवका शरीर है वह मांस है ऐसी व्याप्ति नहीं है। जैसे नीम वृक्ष है यह ठीक है। किन्तु जो-जो वृक्ष है वह नीम है यह कहना ठीक नहीं है । तथा जैसे ब्राह्मण और पक्षी दोनों जीव हैं। फिर भी पक्षीको मारनेकी अपेक्षा ब्राह्मणको मारने में ज्यादा पाप है। वैसे ही फल भी जीवका शरीर है और मांस भी जीवका शरीर है। किन्तु फल खानेकी अपेक्षा मांस खाने में ज्यादा पाप है। जो यह कहता है कि फल और मांस दोनों ही जीवका शरीर होनेसे समान हैं। उसके लिए पत्नी और माता दोनों ही स्त्री होनेसे समान हैं तथा शराब और पानी दोनों ही पेय होनेसे समान है। अतः जैसे वह पानी और पत्नीका उपभोग करता है वैसे ही शराब और माताका भी उपभोग वह क्यों नहीं करता। गौका दूध शुद्ध है किन्तु गोमांस शुद्ध नहीं है । वस्तुका Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) अथवा, 'हेयं पलं पयः पेयं समे सत्यपि कारणे । विषद्रोरायुषे पत्रं मूलं तु मृतये मतम् ॥' [ सो. उपा., ३०५] अपि च, 'पञ्चेन्द्रियस्य कस्यापि वधे तन्मांसभक्षणे। यथा हि नरकप्राप्तिर्न तथा धान्यभोजनात् ।। धान्यपाके प्राणिवधः परमेकोऽवशिष्यते । गृहिणां देशयमिनां स तु नात्यन्तबाधकः ।। मांसखादकति विमृशन्तः सस्यभोजनरता इह सन्तः । प्राप्नुवन्ति सुखसंपदमुच्चै नशासनजुषो गृहिणोऽपि ॥' [ ] ॥१०॥ अथ क्रमप्राप्तान् मधुदोषानाहमधुकृवातघातोत्थं मध्वशुच्यपि विन्दुशः। १२ खादन् बध्नात्यघं सप्तनामदाहाहंसोऽधिकम् ॥११॥ मधुकृवातः-मक्षिकाभ्रमरादीनां मधुकरप्राणिनां व्रातः सङ्घातः । अशुचिप्राणिनिर्यासजत्वात् ।। अपवित्रं म्लेच्छलालादिसम्पृक्त्वात् कुत्स्यं च । अपि च, 'मक्षिकागर्भसंभूत-बालाण्डकनिपीडनात् । जातं मधु कथं सन्तः सेवन्ते कललाकृति ॥ [ सो. उपा., २९४ श्लो.] वैचित्र्य इसी प्रकार है। इसी तरह मांस और दूधका एक कारण होनेपर भी मांस छोड़ने योग्य है और दूध पीने योग्य है। जैसे एक विषवृक्षका पत्ता आयुवर्धक होता है और जड़ मृत्युका कारण होती है। मांस भी शरीरका हिस्सा है और घी भी शरीरका हिस्सा है। फिर भी मांसमें दोष है धीमें नहीं। जैसे ब्राह्मणोंमें जीभसे शराबका स्पर्श करने में दोष है, पैरमें लगानेमें नहीं। इसलिए जो अपना कल्याण चाहते हैं उन्हें बौद्ध, सांख्य, चार्वाक, वैदिक और शैवोंके मतोंकी परवाह न करके मांसका त्याग करना चाहिए। जैसे जो परस्त्रीगामी पुरुष अपनी माताके साथ सम्भोग करता है वह दो पाप करता है। एक तो परस्त्र परस्त्रीगमनका पाप करता है दूसरे माताके साथ सम्भोग करनेका पाप करता है। उसी तरह जो मनुष्य धर्मबुद्धिसे लालसापूर्वक मांसभक्षण करता है वह भी डबल पाप करता है । एक तो वह मांस खाता है, दूसरे धर्म बुद्धिसे खाता है। इस तरह शास्त्रकारोंने मांसको हिंसापरक मानकर उसका निषेध किया है । आजके वैज्ञानिक युगमें मांसको मनुष्यका प्राकृतिक आहार नहीं माना जाता। मोसभोजी पशुओंके शरीरकी रचना भिन्न ही प्रकारकी होती है। उनके दाँतोंकी रचना भी मांसभक्षणके अनुकूल होती है । मनुष्यके शरीरकी रचना उससे विपरीत है । स्वास्थ्यकी दृष्टिसे भी मांस भोजन बुरा है । प्राकृतिक चिकित्सामें वह त्याज्य माना गया है। तामसिक है। अतः मांसभक्षण नहीं करना चाहिए ॥१०॥ अब क्रमानुसार मधुके दोषोंको कहते हैं मधुमक्खियोंके समूह के घातसे उत्पन्न अपवित्र मधुकी एक बँदको भी खानेवाला सात गांवोंको जलानेसे जितना पाप होता है, उससे भी अधिक पापका बन्ध करता है॥११॥ Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ ६ ९ १२ ५४ धर्मामृत ( सागार ) मक्षिकादिवान्तत्वाच्चास्याशुचित्वम् । तदप्याह— 'एकैककुसुमक्रोडाद्रसमापीय मक्षिकाः । यद्वमन्ति मधूच्छिष्टं तदश्नन्ति न धार्मिकाः ॥' [ अपि बिन्दुश: बिन्दुमात्रमपि नाधिकम् । तदाह 'ग्रामसप्तकविदाहरेफसा तुल्यता न मधुभक्षिरेफसः । तुल्यमञ्जलिजलेन कुत्रचिन्निम्नगापतिजलं न जायते ॥' [ अमि श्रा. ५।२८ ] स्मृतिस्त्वित्थमाह 'सप्तग्रामे त यत्पापमग्निना भस्मना कृते । तस्य चेतद् भवेत्पापं मधुबिन्दुनिषेवणात् ॥' [ 1 मांसवन्मध्वपि चिखादिषोः प्राणिवधबुद्धचा कृपातिरस्कारात् पापीयस्त्वं स्यात् । तदुक्तम् - 'यश्चिखादिषति सारघं कुधीर्मंक्षिकागणविनाशनस्पृहः । पापकर्दम निषेधनिम्नगा तस्य हन्त करुणा कुतस्तनी ॥ [ अमित श्री. ५। ३०] ॥ ११ ॥ अथ क्षोद्रवन्नवनीतस्यापि दोषभूयिष्ठतया त्याज्यतामुपदिशति- विशेषार्थ - यद्यपि मद्य -मांसकी तरह मधु दैनिक भोजनका साधारण अंग नहीं है तथापि वैदिक संस्कृति में मधु अतिथिसत्कारका विशिष्ट अंग रहा है । मनुस्मृति में कहा हूं कि मघा नक्षत्र और त्रयोदशी तिथि होनेपर मधुसे मिली हुई कोई भी वस्तु दे तो वह पितरोंकी तृप्ति लिए होती है । पितर यह अभिलाषा करते हैं कि हमारे कुलमें कोई ऐसा उत्पन्न हो त्रयोदशी तिथिको मधु तथा घीसे मिली हुई खीरसे हमारा श्राद्ध करे ( ३।२७३-२७४) । किन्तु मधु तो मधुमक्खियोंके द्वारा संचित होता है । उनकी हिंसा करके ही वह प्राप्त किया जाता है । अमृतचन्द्रजीने कहा है कि यदि कोई छलसे अथवा मधुमक्खियोंके छत्तेसे स्वयं पके हुए मधुको प्राप्त कर भी ले तो भी उसमें रहनेवाले जन्तुओंके घातसे हिंसा अवश्य होती है । सोमदेवजीने लिखा है - मधुमक्खियोंके अण्डोंके निचोनेसे पैदा हुए मधुका, जो रज और वीर्यके मिश्रण के समान है, कैसे सज्जन पुरुष सेवन करते हैं । मधुका छत्ता व्याकुल शिशुओं के गर्भ - जैसा है। और अण्डोंसे उत्पन्न होनेवाले जन्तुओंके छोटे-छोटे अण्डों के टुकड़ोंजैसा है । भील, व्याध वगैरह हिंसक मनुष्य उसे खाते हैं । उसमें माधुर्य कहाँ ? अमितगति आचार्य ने कहा है, जो औषधि के रूप में भी मधुका सेवन करता है वह भी तीव्र दुःखको प्राप्त होता है । यदि कोई जीवनकी इच्छासे विष खावे तो क्या विष उसका जीवन नष्ट नहीं कर देता । अतः सुखके इच्छुक पण्डितजन घोर दुःखदायी मधुका सेवन नहीं करते || ११|| आगे मधुकी तरह बहुत दोष होने से मक्खन को भी छोड़ने योग्य कहते हैं १. ' मधु शकलमपि प्रायो मधुकर हिंसात्मकं भवति लोके । भजति मधुमूढधी को यः स भवति हिंसकोऽत्यन्तम् ॥ - पुरुषार्थ, ६९ श्लो. । २. 'उद्भ्रान्तार्भकगर्भेऽस्मिन्नण्डजाण्डकखण्डवत् । कुतो मधु मधुच्छत्रे व्याधलुब्धकजीवितम् ' ॥ ३. ' योऽत्ति नाम मधु भेषजेच्छया सोऽपि याति लघु दुःखमुल्वणम् । किन्न नाशयति जीवितेच्छया भक्षितं झटिति जीवितं विषम् ॥-अमि श्रा ५।२७-३३ । --सो. उपा. २९४-९५ । Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) मधुवन्नवनीतं च मुञ्चेत्तत्रापि भूरिशः। द्विमुहूर्तात्परं शश्वत् संसजन्त्यङ्गिराशयः ॥१२॥ तत्रापि-न केवलं मधुनि, किं तर्हि, नवनीतेऽपीत्यर्थः । संसजन्ति-सम्मूर्च्छन्ति । यदाह 'यन्मुहूर्तयुगतः परं सदा मूर्छति प्रचुरजीवराशिभिः । तद्गिलन्ति नवनीतमत्र ये ते व्रजन्ति खलु कां गतिं मृताः ॥ [ अमि. श्रा. ५।३६ ] ६ अन्ये त्वन्तर्मुहूर्तादूध्वं नवनीते जन्तुसंमूर्छनमिच्छन्ति । यदाह 'अन्तर्मुहूर्तात्परतः सुसूक्ष्मा जन्तुराशयः । यत्र मूर्च्छन्ति नाद्यं तन्नवनीतं विवेकिभिः ॥' मधुनि त्वयं विशेषो यन्नित्यं जीवमयत्वम् । तदाह 'स्वयमेव विगलितं यद्गृहीतमथवा वेलेन निजगोलात्। तत्रापि भवति हिंसा तदाश्रयप्राणिनां घातात् ।।' [ पुरुषार्थ. ७० ] ॥१२॥ अथ पञ्चोदुम्बरफलभक्षणे द्रव्यभावहिंसादोषमुपपादयति पिप्पलोदुम्बर-प्लक्ष-वट-फल्गु-फलान्यदन् । हन्त्यार्द्राणि प्रसान् शुष्काण्यपि स्वं रागयोगतः ॥१३॥ धार्मिक पुरुषको मधुकी तरह मक्खनको भी छोड़ना चाहिए; क्योंकि मक्खनमें भी दो मुहूर्त के बाद निरन्तर बहुत-से जीवसमूह उत्पन्न होते रहते हैं ॥१२॥ विशेषार्थ-आचार्य हरिभद्रने कहा है कि मद्य-मांस-मधुमें और मक्खनमें उसी रंगके असंख्यात जीव उत्पन्न होते हैं । यही बात अमृतचन्द्रजीने भी कही है कि मधु, मद्य, नवनीत और मांस ये चार महाविकृतियाँ हैं । व्रती इन्हें नहीं खाते हैं क्योंकि उनमें उसी वर्णके जीव पाये जाते हैं। आचार्य अमितगतिने भी मक्खनमें निरन्तर जीवोंकी उत्पत्ति बतलाते हुए कहा है कि जो ऐसे मक्खनको खाते हैं उनमें संयमका अंश भी नहीं है फिर धर्ममें तत्परता कैसे हो सकती है । उन्होंने भी चारोंको ही ज्याज्य बतलाया है ॥१२॥ आगे पाँच उदुम्बर फलोंके खाने में द्रव्यहिंसा और भावहिंसाका दोष बतलाते हैं पीपल, उदुम्बर, पिलखन, बड़ और कठूमरके गीले फलोंको खानेवाला त्रसजीवोंको मारता है। और सूखे फलोंको भी खानेवाला रागके सम्बन्धसे अपने आत्माका घात करता है ॥१३॥ १. 'छलेन मधुगोलात् ।'-पुरु.। २. 'मज्जे महम्मि मंसंमी नवणीयंमि चउत्थए । उप्पज्जति असंखा तव्वण्णा तत्थ जंतूणो' । -सम्बोध प्र. ६१७६ ३. मधु मद्यं नवनीतं पिशितं च महाविकृतयस्ताः । वल्भ्यन्ते न वतिना तद्वर्णा जन्तवस्तत्र ॥-पुरुषार्थ., ७१ श्लो. । ४. 'चित्रजीवगणसूदनास्पदं विलोक्य नवनीतमद्यते । तेष संयमलवो न विद्यते धर्मसाधनपरायणा कुतः।-अमित श्रा. ५।३४-३८ । Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) फल्गु-- काकोदुम्बरिका । त्रसान्-स्थूलसूक्ष्मप्राणिकुलाकुलत्वात्तेषाम् । तदाह 'अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षन्यग्रोधादिफलेष्वपि। प्रत्यक्षाः प्राणिनः स्थूलाः सूक्ष्माश्चागमगोचराः ॥' [ सो. उपा., २९६ श्लो.] तत्र लौकिका अपि पठन्ति 'कोऽपि क्वापि कुतोऽपि कस्यचिदहो चेतस्य कस्माज्जनः, केनापि प्रविशत्युदुम्बरफलप्रा ......... ......... .... । येनास्मिन्नपि पाटिते विघटिते विस्फोटिते त्रोटिते, निष्पिष्टि परिगालिते विदलिते निर्यात्यासा वा न वा ॥ रागयोगतः। अन्तर्दीपकत्वादिदं मध्वादिष्वपि योज्यम, तत्रापि रागावतारद्वारेणात्मघातस्योक्तत्वात । उक्तंच 'यानि च पुनर्भवेयुः कालोत्सन्नत्रसानि शुष्काणि । भजतस्तान्यपि हिंसा विशिष्टरागादिरूपा स्यात् ।।' [ पुरुषार्थ., ७३ श्लो. ] अपि च 'असंख्यजीवव्यपघातवृत्तिभिर्न धीवरैरस्ति समं समानता। अनन्तजीवव्यपरोपकारिणामुदुम्बराहारविलोलचेतसाम् ।।' [ अमि. श्रा. ५।७० ] ॥१३॥ अथ निशाभोजनागालितजलोपयोगयोर्मद्याद्युपयोगवद्दोषमयत्वात्परिहारमाह रागजीवबधापायभूयस्त्वात्तद्वदुत्सृजेत् ।। रात्रिभक्तं तथा युञ्ज्यान पानीयमगालितम् ॥१४॥ _ विशेषार्थ-आचार्य अमृतचन्द्रने ऊमर, कठूमर, पीपल, बड़, पाकड़के फलोंको त्रसजीवोंकी योनि कहा है। और यह भी कहा है कि काल पाकर जिन फलोंमें वर्तमान त्रस जीव मर जाते हैं उन फलों को खाने में भी विशिष्ट रागादिरूप हिंसा अवश्य होती है। आशय यह है कि गीले फलोंको भी आदमी तभी खाता है जब उसमें उनके प्रति राग होता है। किन्तु जो सूखे फल खाता है उसमें तो उन फलोंके प्रति विशेष राग होता है तभी तो व सूखे फल इकट्ठे करता है। अतः सूखे फल खानेवालेमें रागकी अधिकता होनेसे हिंसा अवश्य होती है ।।१३।। मद्य आदिके सेवनकी तरह रात्रिभोजन और बिना छने जलका उपयोग भी दोषमय है अतः उनके भी त्यागके लिए कहते हैं राग, जीवहिंसा तथा जलोदर आदि रोगोंकी प्रचुरता होनेसे मद्यपान आदिकी तरह रात्रिभोजनको भी छोड़ना चाहिए। तथा वस्त्रसे छाने बिना जलका उपयोग नहीं करना चाहिए ॥१४॥ 'योनिरुदुम्बरयुग्मं प्लक्षन्यग्रोधपिप्पलफलानि । त्रसजीवानां तस्मात्तेषां तद्भक्षणे हिंसा ॥'-पुरुषार्थ., ७२-श्लो. । 'अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षन्यग्रोधादिफलेष्वपि । प्रत्यक्षाः प्राणिनः स्थूलाः सूक्ष्माश्चागमगोचराः ॥' -सोम. उपा., २९६ श्लो. । Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) रागभूयस्त्वम्-दिवाभोजनाद् रात्रिभोजने प्रीतिबहुतरत्वम् । तदुक्तम् 'रागाद्युदयपरत्वादनिवृत्ति तिवर्तते हिंसाम् । रात्रि दिवमाहरतः कथं हि हिंसा न संभवति ।। यद्येवं तहि दिवा कर्तव्यो भोजनस्य परिहारः। भोक्तव्यं च निशायां नेत्थं नित्यं भवति हिंसा ।। नैवं वासरभुक्तर्भवति हि रागाधिको रजनिभुक्तो। अन्न कवलस्य भुक्तेभुंक्ताविव मांसकवलस्य ॥ [ पुरुषार्थ. १३०-१३२] जीववधभूयस्त्वम् । तदुक्तम् 'चम्मट्ठि-कोड-उन्दुर-भुयंग-केसादि असणमज्झम्मि। पडिदं ण कि पि पस्सदि भुंजदि सव्वं पि णिसिसमए ॥' [ वसु. श्रा. ३१५ गा.] विशेषार्थ-रत्नकरण्डश्रावकाचारमें छठी प्रतिमाका धारी श्रावक रात्रिमें चारों प्रकारका आहार नहीं करता। इससे पहले वहाँ रात्रिभोजन त्यागकी कोई चर्चा नहीं है । तत्त्वार्थ सूत्रके सातवें अध्यायमें अहिंसा व्रतकी पाँच भावनाओंमें एक भावनाका नाम 'आलोकित पान भोजन' है। सर्वार्थसिद्धिमें सातवें अध्यायके प्रथम सूत्रकी व्याख्या में यह प्रश्न किया गया है कि रात्रिभोजन विरमण नामका एक छठा अणुव्रत भी है उसे भी यहाँ गिनाना चाहिए। तो उत्तर दिया है कि अहिंसाव्रतकी भावना आगे कहेंगे। उनमें-से आलोकित पान भोजन भावनामें उसका अन्तर्भाव होता है । यहाँ यह स्मरणीय है कि यह छठा अणुव्रत विषयक शंका मुनियोंको लेकर है गृहस्थोंको लेकर नहीं है। अनगार धर्मामृतमें इसकी चचो की गयी है। तथा तत्त्वाथ राज वार्तिकमें भी सातव अध्यायके प्रथम सूत्रकी व्याख्या में सर्वार्थसिद्धिके समाधानको आधार बनाकर जो शंका-समाधान किया गया है वह भी मुनियों को ही लेकर किया गया है, कि मुनि रात्रिमें चलते-फिरते नहीं हैं। रात्रिभोजनकी अत्यधिक निन्दा रविषेणके पद्मपुराणके चौदहवें पर्वमें बहुत विस्तारसे की गयी है। लिखा है जो सूर्यके डूबनेपर अन्नका त्याग करता है उसका भी अभ्युदय होता है। यदि वह सम्यग्दृष्टि हो तो और भी विशेष अभ्युदय होता है । दिनमें भूखकी पीड़ा उठाना और रातमें भोजन करना, यह कार्य लोकमें सर्वथा त्याज्य है। रात्रिभोजन अधर्म है उसे जिन्होंने धर्म माना है उनके हृदय कठोर हैं। सूर्यके अदृश्य हो जानेपर जो लम्पटी, पापी मनुष्य भोजन करता है वह दुर्गतिको नहीं समझता। जिनके नेत्र अन्धकारके पटलसे आच्छादित है और बुद्धि पापसे लिप्त है वे पापी प्राणी रातमें मक्खी, कीड़े तथा बाल आदि हानिकारक पदार्थ खा जाते हैं । जो रात्रिमें भोजन करता है वह डाकिनी, भूत-प्रेत आदिके साथ भोजन करता है । जो रात्रिमें भोजन करता है वह कुत्ते-बिल्ली आदि मांसाहारी जीवोंके साथ भोजन करता है । अधिक कहनेसे क्या, जो रात्रिमें भोजन करता है वह सब अपवित्र पदार्थ खाता है । जो सूर्यके अस्त होनेपर भोजन करते हैं उन्हें विद्वानोंने मनुष्यतासे बद्ध पशु क जो जिनशासनसे विमुख होकर रात-दिन भोजन करता है वह परलोकमें सुखी कैसे हो १. आदित्येऽस्तमनुप्राप्ते कुरुते योऽन्नवर्जनम् । . भवेदभ्युदयोऽस्यापि सम्यग्दृष्टेविशेषतः ॥-पद्म पु. १४॥२५८ सा.-८ Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अपि च 'अर्कालोकेन विना भुञ्जानः परिहरेत् कथं हिंसाम् ।। अपि बोधितः प्रदीपो भोज्यजुषां सूक्ष्मजीवानाम् ॥' [ पुरुषार्थ. १३३ ] अपायभूयस्त्वं-'जलोदरादि' इत्यादिना हिंसाविरतिव्रते वक्ष्यमाणम् । रात्रिभक्तं-रात्रावन्नप्राशनम् । पानीयं-जलं पेयत्वात् । जलघृतादि वा सर्वं द्रवद्रव्यम् । तदाह 'द्रवद्रव्याणि सर्वाणि पटपूतानि योजयेत् ।' [ सो. उपा. ३२१ श्लो. ] ॥१४॥ अथानस्तमितभोजिनः सत्फलं किंचिदृष्टान्तेन मुग्धजनप्ररोचनार्थं प्रकटयति चित्रकूटेऽत्र मातङ्गी यामानस्तमितव्रतात् । स्वभा मारिता जाता नागश्रीः सागराङ्गजा ॥१५॥ अत्र- एतस्मिन्नेव मालवदेशस्योत्तरस्यां दिशि प्रसिद्ध । याम-प्रहरमात्र पालितम् । स्वभ;जागरिकनाम्ना । सागराङ्गजा-सागरदत्तधेष्ठिपुत्री ॥१५॥ सकता है इत्यादि । इस प्रकार रात्रि भोजनकी बुराई और दिवाभोजनकी प्रशंसा इतने विस्तारसे अन्यत्र देखनेको नहीं मिलती। एक विशेषता इसमें यह भी है कि स्त्रियोंको भी लक्ष करके रात्रिभोजनकी बुराई बतलायी है और अन्तमें कहा है कि नर हो या नारी दोनोंको अपना चित्त नियममें स्थिर करके अनेक दुःखवाले रात्रिभोजनका त्याग करना चाहिए । आचार्य अमृतचन्द्रने अपने पुरुषार्थ सिद्ध्युपायमें पाँच अणुव्रतोंके कथनके बाद रात्रिभोजन त्यागका कथन करते हुए कहा है-रात्रिमें भोजन करनेवालोंको हिंसा अनिवार्य है इसलिए हिंसाके त्यागियोंको रात्रिभोजनका भी त्याग करना चाहिए। अत्यागभाव रागादि भावोंके उदयकी उत्कटतासे होता है अतः हिंसारूप है। जो रात-दिन खाते हैं उन्हें हिंसा क्यों नहीं लगेगी ? यदि कोई कहे तब तो दिनमें न खाकर रात्रि में ही खाना चाहिए। इससे हिंसा नहीं लगेगी। किन्तु ऐसा कहना गलत है क्योंकि दिवा भोजनकी अपेक्षा रात्रिभोजनमें अधिक राग होता है। जैसे अन्नभोजनकी अपेक्षा मांसभोजनमें अधिक राग रहता है। सूर्य के प्रकाशके बिना दीपक जलाकर रात्रिमें भोजन करनेवाला हिंसासे कैसे बच सकता है क्योंकि भोजनमें सूक्ष्म जीव गिरते ही हैं। अधिक कहनेसे क्या, जो मन वचन कायसे रात्रि भोजनका त्याग करता है वह निरन्तर अहिंसाका पालन करता है। इसी तरह जलको भी मोटे वस्त्रसे छानकर ही काममें लेना चाहिए । आज तो खुर्दवीनसे जलमें जीवोंको देखा जा सकता है। नलके पानीमें तो कभी-कभी साँपके बच्चे तक आ जाते हैं । आचार्य सोमदेवने इसीसे कहा है कि सब पतली वस्तुओंको वस्त्रसे छानकर ही काममें लाना चाहिए । मनुस्मृति तकमें पानी छानकर पीना लिखा है ॥१४॥ अब मूढजनोंको आकृष्ट करने के लिए दृष्टान्त द्वारा रात्रिभोजनत्यागका फल बतलाते हैं मालव देशकी उत्तर दिशामें प्रसिद्ध चित्रकूट नामक नगरमें एक पहर मात्रके रात्रिभोजनत्याग व्रतसे अपने पतिके द्वारा मारी गयी चाण्डाली मरकर सागरदत्त श्रेष्ठीके नागश्री नामक कन्या हुई ॥१५॥ १. पुरुषा. १२९-१३४ श्लो. । २. 'दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत् ।'-मनुस्मृति ६।४६ । Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय अथैव कृतपरिकर्मणा पाक्षिकश्रावकेण स्थूलहिंसादिविरतिरपि यथात्मशक्ति भावनीयेत्युपदेशार्थमाहस्थूलहिसानृतस्तेयमैथुन ग्रन्थवर्जनम् । पापभीरुतयाऽभ्यसेद् बलवीर्यानिगूहकः ॥१६॥ पापभीरुतया न तु राजादिभयेन ॥१६॥ द्यूते हिंसानृतस्ते लोभमायामये सजन् । क्व स्वं क्षिपति नानर्थे वेश्याखेटान्यदारवत् ॥१७॥ स्वं - आत्मानं ज्ञाति च । अनर्थे - अधर्मादिनामभावे व्याप वा (?) । उक्तं च तथा- 'सर्वानर्थं प्रथनं मथनं शौचस्य सद्म मायायाः । दूरात्परिहर्तव्यं चौर्यासत्यास्पदं द्यूतम् ॥' [ पुरुषार्थ. १४६ ] 'कौपीनं वसनं कदन्नमशनं शय्या धरा पांसुला, जल्पाश्लीलगिरः कुटुम्बकजनद्रोहः सहाया विटाः । व्यापाराः परवञ्चनानि सुहृदश्चौरा महान्तो द्विषः, प्रायः सैष दुरोदरव्यसनिनः संसारवासक्रमः ॥' [ ] आगे कहते हैं कि इस प्रकार मद्यादि त्यागके अभ्यासी पाक्षिक श्रावकको अपनी शक्तिके अनुसार स्थूल हिंसा आदि पाँच पापोंसे विरतिका भी अभ्यास करना चाहिएअपने बल और वीर्यको न छिपाकर अर्थात् अपनी अन्तरंग और शारीरिक शक्तिके अनुसार पाक्षिक श्रावकको पापके भय से स्थूल हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल चोरी, स्थूल मैथुन और स्थूल परिग्रह त्यागका अभ्यास करना चाहिए ||१६|| ५९ विशेषार्थ - आहार आदिसे उत्पन्न शक्तिको बल कहते हैं और नैसर्गिक शक्तिको वीर्य कहते हैं | अपनी शक्ति के अनुसार पाक्षिक श्रावकको पाँच अणुव्रतोंके पालनका भी अभ्यास करना चाहिए | वह भी यह मानकर करना चाहिए कि हिंसा आदि पाप हैं । इनके करनेसे पापकर्मका बन्ध होता है । यदि कोई राजभय या सामाजिक भयसे इन पापकार्योंको नहीं करता तो उसे व्रत नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ऐसे व्यक्ति प्रायः छिपकर पाप करते हुए नहीं सकुचाते । किन्तु व्रती तो पाप करनेका अवसर मिलनेपर भी पापके भय से पापकार्य नहीं करता । और तभी उसके पूर्व अर्जित कर्मोंकी निर्जरा होती है ॥ १६ ॥ आगे कहते हैं कि इस प्रकार स्थूल हिंसा आदिकी विरतिका अभ्यास करनेवाले पाक्षिक श्रावकको वेश्या आदिकी तरह जुआ खेलने आदि में भी असक्ति नहीं करना चाहिए वेश्यागमन, शिकार खेलना और परस्त्रीगमनमें आसक्त मनुष्यकी तरह हिंसा, झूठ, चोरी, लोभ और मायाचारसे भरे जुए में आसक्त मनुष्य अपनेको, अपने सम्बन्धियोंको किस अनर्थ में नहीं डालता । अर्थात् सभी बुराइयों में डालता है ||१७|| विशेषार्थ - पाक्षिक श्रावकको पाँच पापोंके त्यागका अभ्यास करनेकी तरह सात व्यसनोंके भी त्यागका अभ्यास करना चाहिए । सात व्यसनों में जुआ सिरमौर है । इसलिए उसपर जोर दिया है। वेश्यागमन, परस्त्रीगमन, जुआ खेलना आदिके व्यसनी मनुष्य स्वयं तो विपत्तियों में पड़ते हैं अपने परिवार वगैरह को भी विपत्ति में डालते हैं । यहाँ इतना विशेष ३ ६ ९ १२ १५ Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अपि च 'भवनमिदमकीर्तेश्चौर्यवेश्यादि सर्वव्यसनपतिरशेषापन्निधिः पापबीजम् । विषमनरकमार्गेष्वग्रयायोति मत्वा. क इह विशदबुद्धि तमङ्गीकरोति ॥' [ पद्म. पञ्च. १२१७ ] वेश्येत्यादि । एतेन वेश्यादिव्यसनान्यप्यपायावद्यभूयिष्ठत्वादसेव्यानीति लक्षयति । तथा चोक्तं 'याः खादन्ति पलं पिवन्ति मदिरां, जल्पन्ति मिथ्या वचः, स्निह्यन्ति द्रविणार्थमेव विदधत्यर्थप्रतिष्ठाक्षतिम् । नीचानामपि दूरवक्रमनसः पापात्मिकाः कुर्वते, लालापानमहर्निशं न नरकं वेश्यां विहायापरम् ॥' 'रजकशिलासदृशीभिः कुक्कुरकर्पर समानचरिताभिः । गणिकाभिर्यदि सङ्गः कृतमिह परलोकवार्ताभिः ॥' [ पद्म. पञ्च. ११२३-२४ ] अपि च 'जात्यन्धाय च दुर्मुखाय च जराजीर्णाभिलाङ्गाय (?) च, ग्रामीणाय च दुःकुलाय च गलत्कुष्टाभिभूताय च । यच्छन्तीषु मनोहरं निजवपुलं (क्षे ) लवश्रद्धया, पण्यस्त्रीषु विवेककल्पलतिकाशस्त्रीषु रज्येत कः ॥' [ 'या दुर्दैहैकवित्ता वनमधिवसति भ्रातृसम्बन्धहीना, भीतिर्यस्यां स्वभावाद्दशनधृततॄणा नापराधं करोति । वध्यालं सापि यस्मिन्ननु मृगवनितामांसपिण्डप्रलोभादाखेटेऽस्मिन् रतानामिह किमु न किमन्यत्र नो यद्विरूपम् ॥ [पद्म. पञ्च. १।२५ ] जानना कि पाक्षिक श्रावक मन-बहलावके लिए ताश आदि खेल सकता है। प्रारम्भिक श्रावक होनेसे वह अभी उसका त्याग नहीं कर सकता । शायद इसीसे आचार्य अमृतचन्द्रने अनर्थदण्ड त्याग नामक गुणव्रतमें धुतको दूरसे ही छोड़नेकी प्रेरणा की है क्योंकि वह सब अनर्थोकी जड़ है, मायाका घर है और चोरी तथा झूठका स्थान है। इनके बिना जुआरीका काम नहीं चलता। किसीने जुआरीकी संसारमें जीवन बितानेकी दशाका चित्रण करते हुए कहा है कि उसके पास लंगोटीके सिवाय दूसरा वस्त्र नहीं होता, निकृष्ट अन्नका भोजन करता है, जमीनपर सोता है, गन्दी बातें करता है, कुटुम्बी जनोंसे लड़ाई-झगड़ा चलता है, दुराचारी उसके सहायक होते हैं, दूसरोंको ठगना उसका व्यापार है, चौर मित्र होते हैं, सज्जनोंको अपना वैरी मानता है । प्रायः जुएके व्यसनीकी यही दशा होती है। ___आचार्य पद्मनन्दिने जुएकी निन्दा करते हुए कहा है-'यह जुआ अपयशका घर है, चोरी, वेश्या आदि सब व्यसनोंका स्वामी है, सब विपत्तियोंका स्थान है, पापका बीज है, दुःखदायी नरकके मार्गों में अग्रगामी है, ऐसा जानकर कौन बुद्धिमान् जुआ खेलना स्वीकार कर सकता है।' इसीसे वेश्या आदि व्यसनोंको भी विनाश निन्दाकी बहुलतासे असेवनीय कहा है। आचार्य पद्मनन्दिने वेश्याकी निन्दा करते हुए कहा है-'उन वेश्याओंके सिवाय दूसरा नरक Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किञ्च, अपि च एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) ' तनुरपि यदि लग्ना कीटिका स्याच्छरीरे भवति तरलचक्षुर्व्याकुलो यः स लोकः । कथमिह मृगयाप्तानन्दमुत्खातशस्त्रो मृगमकृतविकारं ज्ञातदुःखोऽपि हन्ति ॥ [ पद्म पञ्च. १।२६ ] 'चिन्ता-व्याकुलता - भयारतिमतिभ्रंशातिदाहभ्रमक्षुत्तृष्णाहति-रोग-दुःख मरणान्येतान्यहो आसताम् । यान्यत्रैव पराङ्गनाहितमतेस्तद् भूरिदुःखं चिरंश्वभ्रे भावि यदग्निदीपितवपुर्लोहाङ्गनालिङ्गनात् ॥ [ पद्म पञ्च. १२९ ] 'दत्तस्तेन जगत्य कीर्तिपटहो गोत्रे मषिकूर्चकश्चारित्रस्य जलाञ्जलिर्गुणगणारामस्य दावानलः । सङ्केतः सकलापदां शिवपुरद्वारे कपाटो दृढः कामार्तस्त्यजति प्रभोदयभिदाशस्त्रों परस्त्रीं नयन् ॥' [ 'सकल - पुरुषधर्मं - भ्रंशकार्यंत्र जन्मन्यधिकमधिकमग्रे यत्परं दुःखहेतुः । तदपि यदि न मद्यं त्यज्यते बुद्धिमद्भिः स्वहितमिह किमन्यत्कर्म धर्माय कार्यम् ॥ ] नहीं हैं जो मांस खाती हैं, मदिरा पीती हैं, झूठ बोलती हैं, धनके लिए ही प्रेम करती हैं, धन और प्रतिष्ठाकी हानि करती हैं, रात-दिन नीच पुरुषोंकी भी लार पीती हैं।' 'जो धोबीकी कपड़े पछाड़ने की शिलाके समान हैं, जिनका आचरण कुत्तेके खप्पर समान हैं उन वेश्याओंका यदि संसर्ग किया तो परलोककी तो बात ही व्यर्थ है ।' 'जो धनकी आशासे अपना मनोहर शरीर जन्मान्धको दुर्मुखको, जरासे जीर्ण अंगवालेको, ग्रामीणको, अकुलीनको तथा गलित कुष्टसे प्रसित जनों को भी देती हैं, विवेकरूपी कल्पलताको काटनेके लिए शस्त्रके समान उन वेश्याओं से कौन अनुराग करेगा ?” ६१ इस प्रकार वेश्याव्यसनकी बुराइयाँ बताकर आचार्य पद्मनन्दि शिकार खेलनेवालों की निन्दा करते हैं - ' एकमात्र दुःखदायक शरीर ही जिसका धन है, जिसका कोई भाई आदि सम्बन्धी भी नहीं है, वनमें रहती है, जो स्वभाव से ही डरपोक है, दाँतों में तिनका लिये हैं, किसीका अपराध भी नहीं करती, मांस भोजनके लोभसे जिस शिकार में ऐसी हरिणी भी मारी जाती है उस शिकारके प्रेमी मनुष्य इस लोक और परलोकमें जो पाप करते हैं उसे कौन कहने में समर्थ है ।' जो लोग शरीर में जरा-सी चींटीके भी काटनेपर व्याकुल होकर आँख में पानी ले आते हैं वे ही दुःखको जानते हुए भी शिकार के आनन्द में चूर होकर निरपराध मृगका कैसे शस्त्र उठाकर घात करते हैं ? शिकार के पश्चात् परस्त्री व्यसनकी निन्दा करते हुए कहते हैं- 'परस्त्री गामीको इसी भव में जो चिन्ता, व्याकुलता, भय, अरति, बुद्धिनाश, अतिसन्ताप, भ्रम, भूख-प्यास, आघात, रोग, दुःख, मरण आदि प्राप्त होते हैं वे तो रहे किन्तु उससे महान् दुःख चिर काल तक ३ ६ १२ १५ १८ Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) आस्तामेतद्यदिह जननी वल्लभां मन्यमाना निन्द्याश्चेष्टा विदधति जना निस्त्रपाः पीतमद्याः । तत्राधिक्यं पथि नियतिता यत्किरत्सारमेयाद्वक्त्रे मूत्रं मधुरमधुरं भाषमाणाः पिवन्ति ॥' [ पद्म. पञ्च. ११२१-२२ ] 'बीभत्स्यं प्राणिघातोद्भवमशुचि कृमिस्थानमश्लाघ्यमूलं, हस्तेनाक्ष्णापि शक्यं यदिह न महतां स्प्रष्टुमालोकितुं च । तन्मासं भक्ष्यमेतद्वचनमपि सतां गर्हितं यस्य साक्षात्पापं तस्यात्र पुंसो भुवि भवति कियत्का गतिर्वा न विद्मः ।।' 'गतो ज्ञातिः कश्चिद्बहिरपि न यद्येति सहसा, शिरो हत्वा हत्वा कलुषितमना रोदिति जनः । परेषामुत्कृत्य प्रकटितमुखं खादति पलं, कले रे निविण्णा वयमिह भवच्चित्रचरितैः ।।' [ पद्म. पञ्च. १११९-२० ] 'यो येनैव हतः स तं हि बहुशो हन्त्येव यैर्वश्चितो, नूनं वञ्चयते स तानपि भृशं जन्मान्तरेऽप्यत्र च । स्त्रीबालादिजनादपि स्फुटमिदं शास्त्रादपि श्रूयते, नित्यं वञ्चनहिंसनोज्झनविधी लोकः कुतो मुह्यति ॥' नरकमें जो आगमें तपी लोहमयी नारियोंके शरीरके आलिंगनसे होनेवाला है, आश्चर्य है कि यह उसे भी नहीं देखता।' _ 'जो पुरुष कामसे पीड़ित होकर परस्त्रीके पास जाता है उसने जगत्में अपयशकी डुग्गी पीट दी है, अपने कुलके नामपर कालिमा पोत दी है, चारित्रको जलांजलि भेंट कर दी है, गुणोंके समूहरूप उद्यानमें आग लगा दी है, समस्त आपत्तियोंको निमन्त्रण दे दिया है और मोक्ष नगरके द्वारपर मजबूत कपाट लगा दिये हैं।' ____ इस तरह परस्त्रीव्यसनकी बुराइयाँ बताकर आचार्य मद्यपान व्यसनकी बुराइयाँ कहते हैं-'जो मद्य इस जन्ममें समस्त पुरुषार्थोंका नष्ट करनेवाला है तथा आगे उत्तरोत्तर अधिक दुःखका कारण है यदि बुद्धिमान् उस मद्यपानको भी नहीं छोड़ सकते तो फिर इस लोकमें धर्मके लिए अपना हितकारक अन्य कौन काम कर सकते हैं। .मद्यपायी निर्लज्ज मनुष्य माताको प्रिया मानकर जो निन्द्य चेष्टाएँ करते हैं वे तो दूर रहे। उससे भी अधिक खेदकी बात यह है कि मार्गमें मदहोश होकर कुत्तेके पेशाबको 'बड़ा मधुर है' कहते हुए पी जाते हैं।' मद्यपानके पश्चात् मांसव्यसनकी निन्दा करते हैं-'मांस घिनावना होता है, प्राणियोंके घातसे उत्पन्न होता है, अतएव अपवित्र, कृमियोंका उत्पत्तिस्थान और निन्दनीय होता है । बड़े पुरुष तो उसे हाथसे स्पर्श नहीं कर सकते और आँखोंसे देख नहीं सकते। 'वह मांस खाने योग्य है' ऐसा कहना भी सज्जनोंके लिए गर्हित है। उस मांसको जो साक्षात् पाप है, खानेवाले पुरुषकी लोकमें क्या गति होगी, हम नहीं जानते । 'यदि कोई अपना सम्बन्धी बाहर जाकर जल्दी नहीं लौटता तो मनुष्य सिर पीट-पीटकर रोता है। वही मनुष्य दूसरे प्राणियोंको मारकर उनका मांस मुँह फैलाकर खाता है । हे कलिकाल ! तुम्हारे इन विचित्र चरितोंको देखकर हमे तुमसे विरक्ति होती है।' जो जिसके द्वारा मारा जाता है वह उसे Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६३ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) 'अर्थादी प्रचुरप्रपञ्चवचनैर्ये वञ्चयन्तेऽपरान्नूनं ते नरकं व्रजन्ति पुरतः पापव्रजादन्यतः। प्राणाः प्राणिषु तन्निबन्धनतया तिष्ठन्ति नष्टे धने, यावान् दुःखभरो नरेन मरणे तावानिह प्रायशः ॥' [पद्म. पञ्च. ११२७-२८] ॥१७॥ अथ प्रतिपाद्यानरोधाद्धर्माचार्याणां सूत्राविरोधेन देशनानानात्वोपलम्भाद् भनयन्तरेणाष्टमूलगुणानुद्देष्टुमाह मद्य-पल-मधु-निशासन-पञ्चफलोविरति-पञ्चकाप्तनुती। जीवदया जलगालनमिति च कचिदष्ट मूलगुणाः ॥१८॥ पञ्चफली–पञ्चानां फलानां समाहारः पिप्पलादिफलपञ्चकमित्यर्थः । तद्विरतिरेक एवात्र मूलगुणः ।। आप्तनूति:-त्रिकालदेववन्दना । क्वचित्-क्वापि शास्त्रे । यद् वृद्धाः पठन्ति 'मद्योदुम्बरपञ्चकामिषमधुत्यागाः कृपा प्राणिनां, नक्तं भुक्तिविमुक्तिराप्तविनुतिस्तोयं सुवस्त्रनुतम् । एतेऽष्टौ प्रगुणा गुणा गणधरैरागारिणां कीर्तिताः, एकेनाप्यमुना विना यदि भवेद् भूतो न गेहाश्रमी ।' ॥१८॥ अथ प्रकृतमुपसंहरन् सार्वकालिक-सम्यक्त्व-शुद्धिपूर्वकमद्यादिविरतिकृतां कृतोपनीतीनां ब्राह्मणक्षत्रिय- १५ विशां जिनधर्मश्रुत्यधिकारितामाविष्कर्तुमाहइसी लोक और परलोकमें भी अनेक बार मारता है। जो जिसके द्वारा ठगा जाता है वह उसे इस लोक और परलोकमें भी अनेक बार ठगता है। यह बात स्त्री और बालकोंसे भी तथा शास्त्रमें भी सुनी जाती है। फिर भी लोग धोखा देही और हिंसाको छोड़ते हुए क्यों संकोच करते हैं ? जो मनुष्य अनेक प्रपंचपूर्ण वचनोंसे दूसरोंके धनको ठगते हैं वे निश्चय ही उस पापसमूहसे नरकमें जाते हैं। इसका कारण है कि धन मनुष्योंका प्राण है क्योंकि धनसे ही प्राण रहते हैं । अतः धन नष्ट होनेपर मनुष्यको जितना दुःख होता है उतना प्रायः मरते समय भी नहीं होता ।।१७॥ ____ शिष्यों के अनुरोधसे धर्माचार्य आगमसे अविरुद्ध अनेक प्रकारसे उपदेश देते हुए पाये जाते हैं । अतः अन्य प्रकारसे आठ मूल गुण कहते हैं मद्य का त्याग, मांसका त्याग, मधुका त्याग, रात्रि भोजनका त्याग, पाँच उदुम्बर फलोंका त्याग, त्रिकाल देववन्दना, जीव दया और छना पानीका उपयोग, ये आठ मूलगुण किसी शास्त्र में कहे हैं ॥१८॥ विशेषार्थ-इन अष्ट मूल गुणों में एक पाक्षिक श्रावकके योग्य सभी आवश्यक आचार आ जाता है । मद्य, मांस, मधु, रात्रिभोजन और पाँच प्रकारके उदुम्बर फलोंके त्यागके साथ प्रतिदिन जिनदर्शन, पानी छानकर उपयोगमें लाना तथा जीवोंपर दया, ये आठ बातें ऐसी हैं जिन्हें श्रावक सरलतासे पाल सकता है। इसीलिए जिन धर्माचार्यने आजके श्रावकको लक्ष्य करके ये अष्टमूल गुण कहे हैं, उन्होंने यह भी कहा है कि इनमें से एकके भी बिना गृहस्थ कहलानेका पात्र नहीं है ॥१८॥ अब प्रकृत अष्टमूलगुणोंकी चर्चाका उपसंहार करते हुए ग्रन्थकार सार्वकालिक सम्यक्त्वकी शुद्धिपूर्वक आठ मूलगुणोंका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको, जिनका उपनयन संस्कार हो गया है, जिनधर्मके सुननेका अधिकारी बतलाते हैं Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) यावज्जीवमिति त्यक्त्वा महापापानि शुद्धधीः। जिनधर्मश्रुतेर्योग्यः स्यात् कृतोपनयो द्विजः ॥१९॥ महापापानि-महत् विपुलमनन्तसंसारकारणं पापं येभ्यस्तानि मद्यपानादीनि प्राक् प्रबन्धेनोक्तानि । उक्तं चार्षे 'मधुमांसपरित्यागाः पञ्चोदुम्बरवर्जनम् । हिंसादिविरतिश्चास्य व्रतं स्यात्सार्वकालिकम् ।।' [ महापु. ३८।१२२ ] जिनधर्मश्रुतेः-वीतरागसर्वज्ञोपदिष्टस्य धर्मस्य श्रुतिः श्रवणं शास्त्रं वा उपासकाध्ययनादि तस्याः । यदाह 'अष्टावनिष्टदुस्तरदुरितायतनान्यमूनि परिवर्त्य । जिनधर्मदेशनाया भवन्ति पात्राणि शुद्धधियः ।' [ पुरुषार्थ. ७४ ] इस प्रकार जीवनपर्यन्तके लिए अनन्त संसारके कारण महापापको जन्म देनेवाले मद्य आदि जो पहले विस्तारसे कहे गये हैं उनको छोड़कर सम्यक्त्वसे विशुद्ध बुद्धिवाला द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उपनयन संस्कार हो जानेपर वीतराग सर्वज्ञके द्वारा उपदिष्ट धर्मको अथवा उपासकाध्ययन आदि शास्त्रको सुननेका अधिकारी होता है ।।१९।। विशेषार्थ-ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यको द्विज कहते हैं। महापुराणमें (३८।४८) कहा है कि जो दो बार उत्पन्न हुआ हो एक बार गर्भसे और दूसरी बार क्रियासे उसे द्विज कहते हैं । परन्तु जो क्रिया और मन्त्रसे रहित है वह केवल नामसे द्विज है। यहाँ द्विजको ही जैन धर्मके सुननेका अधिकारी कहा है वह भी जब वह सम्यक्त्व पूर्वक जीवन पर्यन्तके लिए स्कारसे सम्पन्न हो। जैनधर्मके सुननेके अधिकारी की चर्चा पुरुषार्थ सिद्धयुपायमें मिलती है । किन्तु उसमें न तो द्विज और न उपनयन संस्कारका विधान है। जो शुद्धधी आठ अनिष्ट मद्यपानादिका त्याग कर देता है वह जिनधर्म देशनाका पात्र होता है । आचार्य अमृतचन्द्र और पं. आशाधरके समयमें तीन सौ वर्षों का अन्तर है इन वर्षों में धर्मको लेकर वर्ण आदिकी बात आ गयी। अन्यथा भगवान्के समवसरणमें तो पशु तक जाते थे और धर्म सुनते थे । आचार्य सोमदेवने जिनदीक्षाके योग्य तीन ही वर्णों को बतलाया है । अपने नीतिवाक्यामृतमें भी उन्होंने कहा है कि जैसे सूर्य सबके लिए वैसे ही धर्म भी सबके लिए है केवल विशेष अनुष्ठान में नियम है। यह विशेष अनुष्ठान जिनदीक्षा आदि है । अतः विशेष अनुष्ठानमें नियम हो सकता है। धर्मश्रवणका भी अधिकार यदि सबको न हो तो बिना धर्म सुने कोई कैसे सम्यग्दृष्टि बनकर आठ मूल गुणोंको धारण करेगा। पं. आशाधरजीने अवश्य ही यह कथन पुरुषार्थसिद्धयुपायके आधारपर किया है। 'शुद्धधी' शब्द दोनोंमें है । इस शब्दके अर्थको लेकर भी विवाद खड़ा कर दिया है। किन्हीं विद्वानोंका कहना है कि शुद्धधीका अर्थ निर्मल बुद्धि है और आठ महापापोंको छोड़नेसे १. 'त्रयो वर्णाः द्विजातयः।-नीतिवा., ७।६। २. 'द्विजातो हि द्विजन्मेष्ट: क्रियातो गर्भतश्च यः । क्रियामन्त्रविहीनस्तु केवलं नामधारकः ॥' । -महापु. ३ ।४८ ३. 'दीक्षायोग्यास्त्रयो वर्णाः'।-सो. उपा. ४. 'आदित्यावलोकनवत् धर्मः खलु सर्वसाधारणो विशेषानुष्ठाने तु नियमः।' -नीतिवा. ७।१४। Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) ६५ कृतोपनय:-कृतो यथाविध्युपकल्पित उपनयो मौञ्जीबन्धादिलक्षणोपनीतिक्रिया यस्य स तथोक्तः । द्विजः-द्विजाँतो मातगर्भे जिनसमयज्ञानगर्भे चोत्पादाद् द्विजो ब्राह्मण-क्षत्रिय-विशामन्यतमः। 'त्रयो वर्णा द्विजातयः' इति वचनात् ॥१९॥ अथ सहजामाहायर्या चालोकिकी गुणसम्पदमुद्वहतो भव्यान् यथासंभवमवगमयन्नाह जाता जैनकुले पुरा जिनवृषाभ्यासानुभावाद्गुण___ येऽयत्नोपनतैः स्फुरन्ति सुकृतामग्रेसराः केऽपि ते । येऽप्युत्पद्य कुदृक्कुले विधिवशाद्दीक्षोचिते स्वं गुण विद्याशिल्पविमुक्तवृत्तिनि पुनन्त्यन्वीरते तेऽपि तान् ॥२०॥ निर्मल बुद्धि होती है । इसी इलोकका अर्थ एक विदुषी साध्वीने इसी प्रकार किया है-'इस प्रकार जीवन पर्यन्तके लिए मद्यपानादि महापापोंको छोड़कर विशुद्धि बुद्धि हो गयी है जिसकी। __ और इस श्लोककी उत्थानिकामें उन्होंने पं. आशाधरजीकी संस्कृत टीकाका अनुसरण करते हुए लिखा है-'जो पूर्वोक्त रीतिसे सम्यग्दर्शनपूर्वक अष्ट मूलगुणोंका पालन करते हैं।' एक तरफ़ सम्यग्दर्शनपूर्वक अष्ट मूलगुणों के पालनकी बात और दूसरी ओर अष्ट मूलगुण पूर्वक सम्यग्दर्शन होनेकी बात परस्पर विरुद्ध है । पं. आशाधरजीने अपनी टीकामें 'शुद्धधी: का अर्थ 'सम्यक्त्व विशुद्ध बुद्धिः' किया है। अमृतचन्द्रजीके 'शुद्धधियः' का भी यही अर्थ है। जिनशासनके अनुसार सम्यग्दर्शनके बिना बुद्धि विशुद्ध होती ही नहीं। हेयको हेय रूपसे और उपादेयको उपादेय रूपसे जानकर श्रद्धा होना ही बुद्धिको विशुद्धता है । यह सम्यक्त्वके होनेपर ही होती है। सम्यक्त्वके बिना तो अष्ट मूलगुण धारण भी व्रतकी कोटिमें नहीं आता । अस्तु, अतः जिनधर्म श्रवणकी यह योग्यता विशेष धर्म-जैसे आगम ग्रन्थ आदि हैं उन्हींके श्रवणसे सम्बद्ध होना चाहिए। सामान्य जिनधर्मके श्रवणका अधिकार तो सभीको है। शायद इसीसे आशाधरजीके बाद रचे गये श्रावकाचारोंमें यह कथन किसीने नहीं किया कि अमुक व्यक्ति ही जिनधर्मको सुननेका अधिकारी है। आशाधरजीने महापुराणसे एक श्लोक उद्धृत किया है जिसमें कहा है कि मद्य, मांस और पाँच उदम्बर फल तथा हिंसादिका त्याग सार्वकालिक व्रत है। किन्तु इसमें जिनधर्मके श्रवणकी अधिकारितावाली बात नहीं है । यह तो महापुराणके भी उत्तरकालीन दसवीं शताब्दीकी चर्चा है जब लोगोंका ध्यान सम्भवतया उस ओर कम हो गया होगा ॥१९॥ आगे जैनकुलमें जन्म लेकर जन्मसे अष्ट मूलगुणोंका पालन करनेवाले और दीक्षाके योग्य मिथ्यादृष्टि कुलमें जन्म लेकर अवतार आदि क्रियाओंके द्वारा अपनेको पवित्र करनेवाले भव्योंके माहात्म्यका वर्णन करते हैं पूर्वजन्ममें सर्वज्ञदेवके द्वारा कहे गये धर्म के अभ्यासके माहात्म्यसे जो जैन कुलमें उत्पन्न होकर अपनेको बिना प्रयत्नके प्राप्त हुए सम्यक्त्व आदि गुणोंसे लोगोंके चित्तमें चमत्कार करते हैं वे पुण्यशालियोंके मुखिया बहुत थोड़े हैं। और जो मिथ्यात्व सहचारी पुण्य कर्मके उदयसे विद्या और शिल्पसे आजीविका न करनेवाले, अतएव दीक्षाके योग्य मिथ्यादृष्टि कुलमें भी जन्म लेकर अपनेको सम्यक्त्व आदि गुणोंसे पवित्र करते हैं वे भी उन जैनकुलमें जन्म लेनेवालोंका ही अनुसरण करते हैं अर्थात् उन्हींके समान होते हैं ॥२०॥ १. सागारधर्मामृत-प्रकाशिका सौ. भवरी देवी पांड्या धर्मपत्नी सेठ चांदमलनी सुजानगढ़ । १९७२ । सा.-९ Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६६ धर्मामृत ( सागार) जिनो देवता येषां ते जैनास्तेषां कुलं पूर्वपुरुषपरम्पराप्रभवो वंशस्तत्र जिनोक्तगर्भाधानादिनिर्वाणपर्यन्तक्रियामन्त्रसंस्कारयोग्यो महान्वय इत्यर्थः । आधानादिक्रिया आर्षोक्ता यथा 'आधानं प्रीतिसुप्रीति तिर्मोदः प्रियोद्भवः। नामकर्म वहिर्यानं निषद्या प्राशनं तथा ॥ व्यष्टिश्च केशवापश्च लिपिसंख्यानसंग्रहः । उपनीतिव्रतं चर्या व्रतावतरणं तथा ।। विवाहो वर्णलाभश्च कुलचर्या गृहीशिता । प्रशान्तिश्च गृहत्यागे दीक्षाद्यं जिनरूपता ।। मौनाध्ययनवृत्तत्वं तीर्थकृत्वस्य भावना। गुरुस्थानाभ्युपगमो गणोपग्रहणं तथा ।। स्वगुरुस्थानसंक्रान्तिनिःसङ्गात्मभावना। योगनिर्वाणसंप्राप्तिोगनिर्वाणसाधनम् ॥ इन्द्रोपपादाभिषेको विधिदानं सुखोदयः । इन्द्रत्यागावतारौ च हिरण्योत्कृष्टजन्मता ।। मन्दरेन्द्राभिषेकश्च गुरुपूजोपलम्भनम् । यौवराज्यं स्वराज्यं च चक्रलाभो दिशाञ्जयः ।। चक्राभिषेकसाम्राज्ये निष्क्रान्तिर्योगसंमहः। आर्हन्त्यं तद्विहारश्च योगत्यागोऽग्रनिर्वृतिः ।। त्रयः पञ्चाशदेता हि मता गर्मान्वयक्रियाः । गर्भाधानादि-निर्वाणपर्यन्ताः परमागमे।।' [ महापु. ३८।५२-६३ ] अजैन कुले जातं प्रतित्विमाः 'अवतारो वत्तलाभः स्थानलाभो गणग्रहः । पूजाराध्य-पुण्ययज्ञो दृढ़चर्योपयोगिता ॥ इत्युद्दिष्टाभिरष्टाभिरुपनीत्यादयः क्रियाः । चत्वारिंशत्प्रमायुक्तास्ताः स्युर्दीक्षान्वयक्रियाः || तास्तु कन्वया ज्ञेया या प्राप्याः पुण्यकर्तृभिः । फलरूपतया वृत्ताः सन्मार्गाराधनस्य वै ॥ सज्जातिः सद्गहित्वं च पारिवाज्यं सुरेन्द्रता। साम्राज्यं परमाहंन्त्यं परं निर्वाणमित्यपि ।।' [ महापु. ३८।६४-६७ ] गुणैः-सम्यक्त्वादिभिः । अयत्नोपनतैः-प्रयत्नमन्तरेण प्राप्तः सहजैरित्यर्थः । स्फुरन्ति-लोकचित्ते चमत्कारं कुर्वन्ति । यत्पठन्ति_ 'भवे भवे यदभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः । तेनैवाभ्यासयोगेन तदेवाभ्यस्यते पुनः ॥' [ विशेषार्थ-दो तरहके भव्य पुरुष होते हैं-एक जो जैन कुलमें जन्मे हैं और दूसरे जो अन्य धर्मावलम्बी ऐसे कुलमें जन्मे हैं जिसमें विद्या और शिल्पसे आजीविका नहीं होती। विद्यासे यहाँ आजीविकाके लिए गीत आदि विषयक शास्त्र और शिल्पसे बढ़ई-लुहार आदि . Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय) सुकृतां-कृतपुण्यानाम् । अग्रेसरा:-सम्यक्त्वसहचारिपुण्योदययोगात् मुख्याः। केऽपि-प्रविरलाः सन्तीत्यर्थः । विधिवशात्-मिथ्यात्वसहचारिपुण्योदययोगात् । दीक्षोचिते-दीक्षा व्रताविष्करणं व्रतोन्मुखस्य वृत्तिरिति यावत् । सा चात्रोपासकदीक्षा जिनमुद्रा बा उपनीत्यादिसंस्कारो वा । :-वक्ष्यमाणतत्त्वार्थ- ३ प्रतिपत्त्यादिभिः । विद्येत्यादि । विद्यात्राजीवनाथं गीतादिशास्त्रम् । शिल्पं-कारुकर्म । ताभ्यां विमुक्ता ततोऽन्या, वृत्तिर्वार्ताकृष्यादिलक्षणो जीवनोपायो यत्र तस्मिन् । अन्वीरते-अनुगच्छन्ति ॥२०॥ अथ द्विजातिषु कुलक्रमायातमिथ्याधर्मपरिहारेण विधिवज्जिनोक्त-मार्गमाश्रित्य स्वाध्यायध्यानबलाद- ६ शुभकर्माणि निघ्नन्तं भव्यमभिष्टौति तत्त्वार्थ प्रतिपद्य तीर्थकथनादादाय देशवतं ___तद्दीक्षानधृतापराजितमहामन्त्रोऽस्तदुर्दैवतः। आङ्गं पौर्वमथार्थसंग्रहमधोत्याधीतशास्त्रान्तरः पन्ति प्रतिमासमाधिमुपयन् धन्यो निहन्त्यंहसी ॥२१॥ तीर्थ-धर्माचार्यो गृहस्थाचार्यों वा । सैषावतारक्रिया । उक्तं चार्षे 'गुरुजनयिता तत्त्वज्ञानं गर्भः सुसंस्कृतः।। तथा तत्रावतीर्णोऽसौ भव्यात्मा धर्मजन्मना ।। अवतारक्रिया सैषा गर्धाधानवदिष्यते । यतो जन्मपरिप्राप्तिः उभयत्र न विद्यते ॥ [ महापु. ३९।३४-३५ ] देशव्रतं-सोऽयं वृत्तलाभः । उक्तं च 'ततोऽस्य वत्तलाभः स्यात्तदैव गरुपादयोः । प्रणतस्य व्रतवातं विधानेनोपसेदुषः ।।' [ महापु. ३९।३६ ] कारुकर्म लिया गया है। इनसे आजीविका करनेवालोंको जिनदीक्षाका अधिकारी नहीं कहा। जो जन्मसे जैन होते हैं वे तो बिना प्रयत्नके ही सम्यक्त्व व्रत आदि धारण करके धर्मात्माओंमें अग्रणी बन जाते हैं और जो मिथ्यादृष्टि कुलमें जन्म लेते हैं वे आगे बतलाये क्रमके द्वारा व्रतादि धारण करके उन्हींके समान हो जाते हैं ॥२०॥ अब, जो ब्राह्मण-क्षत्रिय या वैश्य कुल-परम्परासे आये मिथ्या धर्मको छोड़कर और विधिपूर्वक जैनमार्गको स्वीकार करके स्वाध्याय और ध्यानके बलसे अशुभ कर्मोंका घात करते हैं उन भव्य जीवोंका अभिनन्दन करते हैं धर्माचार्य अथवा गृहस्थाचार्यके उपदेशसे जीवादिक तत्त्वार्थका निश्चय करके अष्ट मूलगुण आदि एकदेश ब्रतको स्वीकार करे तथा देशव्रतकी दीक्षा लेनेसे पहले गुरुमुखसे पंच नमस्कार नामक महामन्त्रको ग्रहण करे, अब तक जिन मिथ्यादेवोंको मानता था उनका त्याग कर दे, तथा ग्यारह अंग और चौदह पूर्व सम्बन्धी उद्धार ग्रन्थोंका अध्ययन करनेके बाद अन्य मतोंके शास्त्रोंको पढ़े । तथा प्रतिमास दो अष्टमी और दो चतुर्दशीकी रात्रिमें रात्रि प्रतिमा योगका अभ्यास करता हुआ वह पुण्यशाली व्यक्ति द्रव्यपाप और भावपापको नष्ट करता है ।२१॥ विशेषार्थ-अवतार, वृत्तलाभ, स्थानलाभ, गणग्रह, पूजाराध्य, पुण्ययज्ञ, दृढ़चर्या और उपयोगिता ये आठ क्रियाएँ जैन धर्म में दीक्षित होनेवाले अजैनके लिए हैं । इनकी गणना दीक्षान्वय क्रियाओंमें की जाती है । व्रतोंका धारण करना दीक्षा है। उन व्रतोंको ग्रहण करनेके सम्मुख पुरुषकी जो प्रवृत्ति है उसे दीक्षा कहते हैं और उस दीक्षासे सम्बन्ध रखनेवाली जो Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ ६ १२ १५ १८ २१ २४ २७ ६८ धर्मामृत ( सागार ) तद्दीक्षाग्रं — उपासक दीक्षापुरस्सरम् । सोऽयं स्थानलाभ: । तद्विधिरार्षोक्तो यथा - 'ततः कृतोपवासस्य पूजाविधिपुरस्सरः । स्थानलाभो भवेदस्य तत्रायमुचिता विधिः ॥ जिनालये शुचौ रंगे पद्ममष्टदलं लिखेत् । विलिखेद्वा जिनास्थानमण्डलं समवृत्तकम् || श्लक्ष्णेन पिष्टचूर्णेन सलिलालोडितेन वा । वर्तनं मण्डलस्येष्टं चन्दनादिद्रवेण वा ॥ तस्मिन्नष्टदले पद्मे जैने वाऽऽस्थानमण्डले । विधिना लिखिते तज्ज्ञैर्विष्वविरचितार्चने ॥ जिनार्चाभिमुखं सूरिविधिनैनं निवेशयेत् । तवोपासकदीक्षेयमिति मूर्ध्नि मुहुः स्पृशन् ॥ पञ्चमुष्टिविधानेन स्पृष्ट्वेनमधिमस्तकम् । तोऽसि दीक्षयेत्युक्त्वा सिद्धशेषां च लम्भयेत् ॥ ततः पञ्चनमस्कारपदान्यस्मायुपादिशेत् । मन्त्रोऽयमखिलात्पापात्त्वां पुनीतादितीरयन् ॥ कृत्वा विधिमिमं पश्चात्पारणाय विसर्जयेत् । गुरोरनुग्रहात्सोऽपि सम्प्रीतः स्वं गृहं व्रजेत् ॥' अस्तदुर्दैवतः—त्यक्तमिथ्यादेवतागणः । सोऽयं गणग्रहः । तद्विधिरार्षे यथा - महापु., ३९।३७-४४ ] 'इयन्तं कालमज्ञानात्पूजिताःस्थ कृतादरम् । पूज्यास्त्विदानीमस्माभिरस्मत्समयदेवताः ॥ ततोऽपमूषितेनालमन्यत्र स्वैरमास्यताम् । इति प्रकाशमेवैतान् नीत्वान्यत्र क्वचित्त्यजेत् ॥ गणग्रहः स एषः स्यात्प्राक्तनं देवतागणम् । विसृज्याचंयतः शान्ता देवताः समयोचिताः ॥' [ महापु. ३९।४६-४८ ] अर्थं संग्रह - उद्धारग्रन्थमुपश्रुत्य । सूत्रमपि । उक्तं चार्षे 'पूजाराध्याख्यया ख्याता क्रियास्य स्यादतः परा । पूजोपवाससम्पत्या गृह्णतोऽङ्गार्थं संग्रहम् ॥' क्रियाएँ हैं वे दीक्षान्वय क्रिया कहलाती हैं । उनमें पहली अवतार क्रिया है । जब मिथ्यात्व से दूषित कोई पुरुष समीचीन मार्गको ग्रहण करना चाहता है तब यह क्रिया की जाती है । प्रथम ही वह भव्य किन्हीं मुनिराज या गृहस्थाचार्य के पास जाकर धर्मकी जिज्ञासा करता है । और उपदेश सुनकर मिथ्या मार्गसे प्रेम छोड़कर समीचीन मार्ग में बुद्धि लगाता है । उस समय गुरु ही उसका पिता है और तत्त्वज्ञान ही संस्कार किया हुआ गर्भ है । वह भव्य पुरुष धर्मरूप जन्म के द्वारा तत्त्वज्ञानरूपी गर्भ में अवतीर्ण होता है । इसलिए इस क्रियाको पहली अवतार क्रिया कहते हैं । उसी समय गुरुके चरणकमलोंको नमस्कार करते हुए और विधिपूर्वक व्रतोंको धारण करते हुए उस पुरुषके वृत्तलाभ नामकी दूसरी क्रिया होती है । Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) तथा 'ततोऽन्या पुण्ययज्ञाख्या क्रिया पुण्यानुबन्धिनी । शृण्वताः पूर्वविद्यानामर्थं सब्रह्मचारिणः ॥' [ महापु. ३९।४९-५० ] शास्त्रान्तराणि- सौगतादिग्रन्थान् । उक्तं च तदास्य दृढचर्याख्या क्रिया स्वसमयश्रुतम् । निष्ठाप्य शृण्वतो ग्रन्थान् बाह्यानन्यांश्च कांश्चन ॥' [ महापु. ३९।५१ ] अपि च 'सूत्रमौपासकं चास्य स्यादध्येयं गुरोर्मुखात् । विनयेन ततोऽन्यच्च शास्त्रमध्यात्मगोचरम् ॥ शब्दविद्यार्थशास्त्रादि चाध्येयं नास्य दुष्यति । स्वसंस्कारप्रबोधायाध्येयानि ख्यातयेऽपि च ॥ ज्योतिर्ज्ञानमथ च्छन्दोज्ञानं ज्ञानं च शाकुनम् । संख्याज्ञानमपीदं च तेनाध्येयं विशेषतः ।।' [ महापु. ३८।११८-१२० ] प्रतिमासमाधि-रात्रिप्रतिमायोगम। उक्तं च 'दृढव्रतस्य तस्यान्या क्रिया स्यादुपयोगिता। पर्वोपवासपर्यन्ते प्रतिमायोगधारणम् ॥' [ महापु. ३९।५२ ] ॥२१॥ अथ शूद्रस्याप्याचारादिशुद्धिमतो ब्राह्मणादिवद्धर्म्यक्रियाकारित्वं यथोचितं समनुमन्यमानः प्राहउसके बाद उपवास और पूजापूर्वक स्थान लाभ नामकी तीसरी क्रिया होती है। इसकी विधि इस प्रकार है-जिनालयमें किसी पवित्र स्थानपर आठ पांखुरीका कमल बनावे अथवा गोलाकार समवसरण मण्डलकी रचना करे। जब उसकी पूजा सम्पूर्ण हो चुके तब आचार्य उस पुरुषको जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाके सम्मुख बैठावे और बार-बार उसके मस्तकका स्पर्श करते हुए कहे-'यह तेरी श्रावककी दीक्षा है।' पंचमुष्ठिकी रीतिसे उसके मस्तकका स्पर्श करे तथा 'तू इस दीक्षासे पवित्र हुआ' इस प्रकार कहकर पूजाके बचे हुए शेषाक्षत उससे ग्रहण कराये। पश्चात 'यह मन्त्र तुझे समस्त पापोंसे पवित्र करे' इस प्रकार कहते हुए उसे पंच नमस्कार मन्त्रका उपदेश करे। यह तीसरी क्रिया है। उसके बाद वह पुरुष अपने घरसे मिथ्या देवताओंको निकालता है । यह चौथी गणग्रह क्रिया है । फिर पूजा और उपवासपूर्वक द्वादशांग श्रुतकी सुनना पाँचवीं पूजाराध्य क्रिया है। फिर साधर्मी पुरुषोंके साथ चौदह पूर्वोके अर्थको सुननेवाले उस भव्य के पुण्यको बढ़ानेवाली पुण्ययज्ञा नामक छठी क्रिया होती है। इस प्रकार अपने मतके शास्त्रोंको पूर्ण पढ़ लेने के बाद अन्य मतके शास्त्रोंको अथवा किसी अन्य विषयको पढ़ने या सुननेवाले उस भव्यके दृढ़चर्या नामकी सातवीं क्रिया होती है । इसके बाद उपयोगिता नामकी आठवीं क्रिया होती है। इसमें पर्वके दिन रात्रिके समयमें प्रतिमा योग धारण किया जाता है । महापुराणमें प्रतिपादित इन आठ क्रियाओंका ही कथन ग्रन्थकारने इस श्लोकमें क्रिया है । इन आठके बाद उपनीति क्रिया होती है। जिसमें जनेऊ धारण किया जाता है । उसका कथन आशाधरजीने नहीं किया है ॥२१॥ आगे कहते हैं कि आचार आदिकी शुद्धि पालनेवाला शूद्र भी ब्राह्मण आदिकी तरह यथायोग्य धर्म-कर्म कर सकता है Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७० धर्मामृत ( सागार) शूद्रोऽप्युपस्कराचारवपुःशुद्धयाऽस्तु तादृशः। जात्या होनोऽपि कालादिलब्धौ ह्यात्माऽस्ति धर्मभाक् ॥२२॥ उपस्करः-आचमनाद्युपकरणम्। आचारः-मद्यादिविरतिः । तादृशः-जिनधर्मश्रुतेर्योग्यः देवद्विजतपस्वीपरिकर्मयोग्यो वा। यन्नीति:--'आचारानवद्यत्वं शुचिरुपस्करः शारीरी च शुद्धिः करोति शूद्रमपि देवद्विजतपस्वीपरिकर्मसु योग्यमिति ।'-[नीति वा०] हीनः-अल्पो रिक्तो वा । धर्मभाक्६ श्रावकधर्माराधकः । यदाह 'दीक्षायोग्यास्त्रयो वर्णाश्चत्वारश्च विधोचिताः । मनोवाक्कायधर्माय मताः सर्वेऽपि जन्तवः ॥'सो. उपा., ७९१ श्लो.] वर्णलक्षणमार्षे यथा 'ब्राह्मणा व्रतसंस्कारात् क्षत्रियाः शस्त्रधारणात् । वणिजोऽर्थार्जनान्न्याय्याच्छूद्रा न्यग्वृत्तिसंश्रयात् ॥' [ महापु. ३८।४६ ] स्वयमप्यन्वाख्यच्च सिद्धयः 'कर्म धयं क्षतत्राणं वार्ता प्रेषं च मानुषाः । कुर्वाणा जात्यभेदेऽपि भेद्या विप्रादिभेदतः ।।' ॥२२॥ अथानृशंस्यममूषाभाषित्वं परस्वनिवृत्तिरिच्छानियमो निषिद्धासु च स्त्रीष ब्रह्मचर्यमिति सर्वसाधारणं धर्ममभिधायेदानीमध्ययनं यजनं दानं च ब्राह्मण-क्षत्रिय-विशां समानो धर्मोऽध्यापनयाजनप्रतिग्रहाश्च ब्राह्मणानामेवेति विशेषतस्तद्वयाख्यानार्थमुत्तरप्रबन्धमुपक्रममाणो यजनादिविधानाय पाक्षिकं तावदेवं नियुङ्क्ते __ आसन आदि उपकरण, मद्य आदिकी विरतिरूप आचार और शरीरकी शुद्धिसे विशिष्ट शूद्र भी जिनधर्मके सुननेके योग्य होता है। क्योंकि वर्णसे हीन भी आत्मा योग्य काल-देश आदिकी प्राप्ति होने पर श्रावक धर्मका आराधक होता है ।।२२।। विशेषार्थ-यद्यपि दीक्षाके योग्य तीन ही वर्ण होते हैं तथापि शूद्रको भी अपनी मर्यादाके अनुसार धर्म सेवनका अधिकार है। किन्तु इसके लिए उसका निवासस्थान, उसका खानपान तथा शरीर शुद्ध होना आवश्यक है। आचार्य सोमदेवने कहा है कि आचारशुद्धि, घर-बरतन वगैरहको सफाई और शरीर शुद्धि शूद्रको भी देव, द्विज और तपस्वियोंकी सेवाके योग्य बनाती है । उन्होंने जिनमें पुनर्विवाह प्रचलित नहीं है उन्हें सत्शूद्र कहा है। सत्शूद्र तो मुनिको आहार भी दे सकता है किन्तु मुनिपद धारण नहीं कर सकता। किन्तु श्रावक धर्मके पालनका उसे अधिकार प्राप्त है। महापुराणमें कहा है कि जो दीक्षाके अयोग्य कुल में उत्पन्न हुए हैं और नाचना-गाना आदि विद्या और शिल्पसे आजीविका करते हैं ऐसे पुरुषोंको यज्ञोपवीत आदि संस्कारोंकी आज्ञा नहीं है। किन्तु ऐसे लोग अपनी योग्यतानुसार व्रत धारण करें तो जीवन पर्यन्त एक शाटक धारण करके व्रती रह सकते हैं। क्रूरता न करना, सत्य बोलना, पराया धन न लेना, परिग्रहका परिमाण और निषिद्ध स्त्रीमें ब्रह्मचर्यका पालन ये सर्वसाधारणका धर्म है इसे सभी वर्णवालोंको पालना चाहिए ॥२२॥ आगे कहते हैं कि अध्ययन, पूजन और दान ये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका समान १. 'सकृत्परिणयनव्यवहाराः सच्छुद्राः । आवारानवद्यत्वं शुचिरुपस्करः शारीरी च विशुद्धिः करोति शूद्रमपि देवद्विजतपस्विपरिकर्मसु योग्यम् ॥'-नीतिवा. ७।११-१२ २. महापु. ४०।१७१-१७३ । Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७१ ३ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) यजेत देवं सेवेत गुरून् पात्राणि तर्पयेत् । कर्म धर्म्य यशस्यं च यथालोकं सदा चरेत् ॥२३॥ यजेदित्यादि । दानयजनप्रधान इति दानस्य प्राचुर्येणानुष्ठानाथं प्रागुपादानम् । इह तु देवार्चनस्य पूर्ववचनं प्रथमं देवमर्चयेत्ततोऽन्यत्कृत्यं कुर्यादिति क्रमविधानदर्शनार्थम् । तथा श्लोकः 'दानं पूजा जिनेः शीलमपवासश्चतविधः। श्रावकाणां मतो धर्मः संसारारण्यपावकः ॥' [ अमि. श्रा. ९।१ ] 'आराध्यन्ते जिनेन्द्रा गुरुषु च विनतिर्धार्मिके प्रीतिरुच्चैः, पानभ्यो दानमापन्निहतजनकृते तच्च कारुण्यबद्धथा। तत्त्वाभ्यासः स्वकीयवतरतिरमलं दर्शनं यत्र पूज्यं, तद् गार्हस्थ्यं बुधानामितरदिह पुनदुःखदो मोहपाशः ॥' [ पद्म. पञ्च. १।१३ ] कर्म-भृत्वाश्रितानित्यादि वक्ष्यमाणक्रमेण । यशस्यं च धयं तावदवश्यमाचरणीयम् । तच्चेत कीर्त्यर्थं स्यात्तदा सुतरां भद्रकमित्ययमर्थश्चशब्देनान्वाचीयते । अनुक्तासमुच्चये वात्र च । तेनायुष्यं च कर्म ब्राह्म महोत्थान-शरीर चिन्ता-दन्तधावनादिकमायुर्वेदप्रसिद्धमाचरेदिति लभ्यते । यन्मनु: 'स्वायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत् ।' [ मनुस्मृ. ४।१३ ] इति । यथालोकम् । यदाह 'द्रम (?) स्वामि स्वकार्येषु यथालोकं प्रवर्तताम् । गुणदोषविभागेऽत्र लोक एव यतो गुरुः ।।' [ ] ॥२३॥ धर्म है किन्तु पढ़ाना, पूजन कराना और दान लेना ये ब्राह्मणोंका ही मुख्य धर्म है इसलिए विशेष रूपसे उसका व्याख्यान करने के लिए आगेका कथन करते हुए पाक्षिक श्रावकको पूजन आदि करनेकी प्रेरणा करते हैं श्रावकको नित्य जिनेन्द्रकी पूजा करनी चाहिए, गुरुओंकी सेवा, उपासना करनी चाहिए, पात्रोंको दान देना चाहिए, तथा धर्म और यश बढ़ानेवाले कार्य लोकरीतिके अनुसार करने चाहिए ॥२३॥ विशेषार्थ-मनुस्मृति (१।८८) में पढ़ाना, पढ़ना, यज्ञ करना, कराना, दान देना और लेना ये छह कर्म ब्राह्मणके ही बताये हैं और इनमें से तीन कर्म पढ़ना, यज्ञ करना और दान देना क्षत्रिय और वैश्यके बताये हैं । तदनुसार महापुराणमें भी भरत महाराजने जो व्रती वर्गके लिए ब्राझेण नामके चतुर्थ वर्णकी स्थापना की उनके लिए पूजा, वार्ता, दान, स्वाध्याय संयम, तप ये षट्कर्म बताये। अतः जो व्रती श्रावक है वह ब्राह्मण है और स्वाध्याय संयम और तपके साथ पूजा करने-कराने, तथा दान देने और लेनेका अधिकारी है। जो व्रती नहीं है वह पूजा करता है, दान देता है । दान लेनेका पात्र तो वही है जिसमें मोक्षके कारण गुण सम्यग्दर्शन आदि यथायोग्य विद्यमान है। उसे ही दान देना चाहिए। तथा दयाभावसे अपने तोंका पालन करना चाहिए यह आगे कहेंगे। तथा जिससे संसारमें यश भी हो ऐसे भी कार्य करना चाहिए । 'च' शब्दसे अन्य कार्य भी लेना चाहिए। जैसे प्रातःकाल उठकर शारीरिक शुद्धि करना। यह सब काम श्रावकको लोकानुसार करना चाहिए। आचार्य पद्मनन्दिने गृहस्थाश्रमकी पूज्यता बतलाते हुए कहा है-जिस गृहस्थाश्रममें जिनेन्द्रोंकी पूजा १. 'ब्राह्मणाव्रतसंस्कारात्'-महापु. ३८।४६ Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७२ धर्मामृत ( सागार ) अष्टादशभिः पद्यौजिनपूजां प्रपञ्चयन्नाह यथाशक्ति यजेतार्हदेवं नित्यमहादिभिः। सङ्कल्पतोऽपि तं यष्टा भेकवत् स्वमहीयते ॥२४॥ यष्टा-ताच्छील्येन साधुत्वेन वा यजमानः । भेकवत्-राजगृहे नगरे श्रेष्ठिचरो दुर्दरो यथा । उक्तं च 'अहंच्चरणसपर्यामहानुभावं महात्मनामवदत् । भेकः प्रमोदमत्तः कुसुमेनैकेन राजगृहे ॥' [ रत्न. श्रा. १२० ] महीयते-पूज्यो भवति ॥२४॥ अथ नित्यमहमाहप्रोक्तो नित्यमहोऽन्वहं निजगृहान्नीतेन गन्धाविना पूजा चैत्यगृहेऽहंतः स्वविभवाच्चैत्यादिनिर्वापणम् । भक्त्या ग्रामगृहादिशासनविधादानं त्रिसन्ध्याश्रया ___सेवा स्वेऽपि गृहेऽर्चनं च यमिनां नित्यप्रदानानुगम् ॥२५॥ विदाकरणां ( ? )। स्वे-निजे । अपिशब्दाच्चैत्यगृहे ॥२५॥ की जाती है, निग्रन्थ गुरुओंकी विनय की जाती है, धार्मिक पुरुषों के प्रति अत्यन्त प्रीति रहती है, पात्रोंको दान दिया जाता है, जो विपत्तिसे ग्रस्त जन होते हैं उनकी करुणाभावसे मदद की जाती है, तत्त्वोंका अभ्यास किया जाता है, अपने व्रतोंसे अनुराग होता है, निर्मल सम्यग्दर्शन होता है, वह गृहस्थाश्रम विद्वानोंके द्वारा भी पूज्य होता है। इससे विपरीत गृहस्थाश्रम तो दुःखदायक मोहपाश ही है ॥२३॥ आगे अठारह पद्योंसे जिनपूजाका विस्तारसे कथन करते हैं श्रावकको अपनी शक्तिके अनुसार नित्यमह आदिके द्वारा अहन्त देवकी पूजा करनी चाहिए । क्योंकि 'मैं अर्हन्त देवकी पूजा करूँ' इस प्रकारके विचार मात्रसे भी जिनेन्द्रदेवका पूजक मेढककी तरह स्वर्गमें महर्द्धिक देवोंके द्वारा पूजा जाता है ।।२४।। विशेषार्थ-रत्नकरण्डश्रावकाचारमें चतुर्थ शिक्षाव्रतका नाम वैयावृत्य है । आचार्य समन्तभद्रने उसीमें देवपूजाको भी रखा है और श्रावकको प्रतिदिन आदर पूर्वक देवाधिदेव जिनेन्द्रदेवके चरणोंकी पूजा करनेका उपदेश देते हुए कहा है कि अहन्त भगवान के चरणोंकी पूजाका माहात्म्य तो राजगृही नगरीमें आनन्दसे मत्त मेढकने एक फूलके द्वारा बतलाया था। अर्थात् पूर्व जन्मका श्रेष्ठी, जो मायाबहुल होनेसे मरकर अपनी ही बावड़ीमें मेढक हुआ था, भगवान महावीरके समवसरणमें जाते हुए राजा श्रोणिकके हाथीके पैरसे कुचलकर मर गया । उस समय वह भी भगवान के दर्शनाथ मुखमें एक कमलका फूल लेकर जाता था। मरकर वह स्वर्गमें देव हुआ और अवधिज्ञानसे सब पूर्ववृत्तान्त जानकर महावीर भगवान्के समवसरणमें उपस्थित हुआ । जब देवपूजाके विचार मात्रका इतना फल है तब शरीरसे जल चन्दन आदिके द्वारा और वचनोंसे स्तवनके द्वारा पूजन करनेका तो फल कहना ही क्या है ॥२४॥ नित्यमहका स्वरूप कहते हैं प्रतिदिन अपने घरसे लाये गये जल, चन्दन, अक्षत आदिके द्वारा जिनालयमें जिन भगवान्की पूजा करना, अथवा अपने धनसे जिनबिम्ब-जिनालय आदिका बनवाना, अथवा Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अथाष्टाकिंन्द्रध्वजो लक्षयति एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) जिनाच क्रियते भव्यैर्या नन्दीश्वर पर्वणि । graisal सेन्द्राद्यः साध्या त्वेन्द्रध्वजो महः ॥ २६ ॥ भव्यैः- संभूयकरणज्ञापनार्थं बहुवचनम् । साध्या – क्रियमाणा ॥ २६ ॥ अथ महामहं निर्दिशति - भक्त्या मुकुटबद्धेर्या जिनपूजा विधीयते । तदाख्याः सर्वतोभद्र - चतुर्मुख - महामहाः ॥२७॥ भक्त्या न चक्रवर्त्यादिभयादिना । एषापि कल्पवृक्षवत् । केवलमत्र प्रतिनियतजनपदविषयं दानादिकम् ॥२७॥ भक्तिपूर्वक गाँव, मकान, जमीन आदि शासनके विधान के अनुसार रजिस्ट्री आदि कराकर मन्दिरके निमित्त देना, अथवा अपने भी घर में तीनों सन्ध्याओंको अर्हन्त देवकी आराधना करना और मुनियोंका प्रतिदिन पूजापूर्वक आहारदान देना नित्यमह कहा है ||२५|| विशेषार्थ-महका अर्थ पूजा है । नित्यपूजा करना नित्यमह है । उसके ही ये प्रकार हैं । इनका कथन महापुराण में किया है । प्रतिदिन अपने घरसे पूजनकी सामग्री लेजाकर मन्दिर में पूजन करना नित्यपूजा है। इसमें इतनी विशेषता है कि पूजनकी सामग्री अपने घरकी होनी चाहिए। मन्दिरकी सामग्रीसे पूजा करना तभी उचित हो सकता है जब उसका मूल्य मन्दिरको चुका दिया हो । प्रतिदिन पूजा करनेवालोंको यह याद रखनेकी बात है । इसमें लोभ नहीं करना चाहिए। लोभ त्यागकर पूजा करनेसे सच्चा फल मिलता है । आगे जो बतलाये हैं वे सब इसी पूजा में निमित्त होनेसे नित्यमह कहे गये हैं । जैसे अपने द्रव्यसे जिनबिम्ब और जिनालयका निर्माण कराना । जहाँ मन्दिर न होनेसे पूजा नहीं होती वहाँ मन्दिर निर्माणपूर्वक जिनबिम्ब प्रतिष्ठा कराना उचित है । किन्तु जहाँ जिनमन्दिर है और नित्यपूजाकी व्यवस्था नहीं है वहाँ जिनमन्दिर बनवाना या नयी मूर्तियाँ प्रतिष्ठित कराना धर्म आसादना है । पूजनके निमित्त मन्दिरके नाम जायदाद वगैरहकी लिखा-पढ़ी करके देना भी नित्यमह है क्योंकि उसकी आमदनी नित्यपूजामें व्यय होनेवाली है । मन्दिरके सिवाय अपने घरपर भी प्रातः, मध्याह्न और सायंकालको सामायिक आदि करना भी नित्यमह है । और प्रतिदिन मुनियोंको अपने घरपर पड़गाहकर जो पूजा की जाती है जिसके बाद उन्हें आहारदान दिया जाता है वह भी नित्यमह है । ये सब नित्यमहके ही प्रकार हैं ||२५|| ७३ ra अष्टक और ऐन्द्रध्वजका लक्षण कहते हैं भव्य जीवोंके द्वारा नन्दीश्वर पर्व में अर्थात् प्रति वर्ष आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुनके श्वेत पक्ष अष्टमी आदि आठ दिनोंमें जो जिनपूजा की जाती है वह अष्टाह्निकमह है । तथा इन्द्रप्रतीन्द्र सामानिक आदिके द्वारा जो जिनपूजा की जाती है उसे ऐन्द्रध्वजमह कहते हैं ||२६|| १. विन्द्र - मु. सा.-१० महामहका स्वरूप कहते हैं मण्डलेश्वर राजाओंके द्वारा भक्तिपूर्वक जो जिनपूजा की जाती है उसके नाम सर्वतोभद्र, चतुर्मुख और महामह हैं ||२७|| ३ ९ Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७४ धर्मामृत ( सागार) अथ कल्पद्रुममाह किमिच्छकेन दानेन जगदाशाः प्रपूर्यं यः । चक्रिभिः क्रियते सोऽहंद्यज्ञः कल्पद्रुमो मतः॥२८॥ किमिच्छकेन-किमिच्छसीति प्रश्नपूर्वकं याचकेच्छानुरूपं क्रियमाणेन ॥२८॥ अथ बलिस्नपनादिजिनपूजाविशेषाणां नित्यमहादिष्ववान्तर्भावमोह बलिस्नपन-नाट्यादि नित्यं नैमित्तिकं च यत् । भक्ताः कुर्वन्ति तेष्वेव तद्यथास्वं विकल्पयेत् ॥२९॥ ॥२९॥ अथ जलादिपजानां प्रत्येक दिङ्मात्रेण फलमालपति वार्धारा रजसः शमाय पदयोः सम्यक्प्रयुक्ताऽहंतः, सद्गन्धस्तनुसौरभाय विभवाच्छेदाय सन्त्यक्षताः। यष्टुः स्रग्दिविजस्रजे चरुरुमास्वाम्याय दीपस्त्विषे, धूपो विश्वदृगुत्सवाय फलमिष्टार्थाय चार्घाय सः॥३०॥ विशेषार्थ-जिनको सामन्त आदिके द्वारा मुकुट बाँधे गये हैं उन्हें मुकुटबद्ध या मण्डलेश्वर कहते हैं। वे जब भक्तिवश जिनदेवकी पूजन करते हैं तो उस पूजाको सर्वतोभद्र आदि कहते हैं। वह पूजा सभी प्राणियोंको कल्याण करनेवाली होती है इसलिए उसे सर्वतोभद्र कहते हैं। चतुर्मुख मण्डपमें की जाती है इसलिए चतुर्मुख कहते हैं। और अष्टाहिककी अपेक्षा महान् होनेसे महामह कहते हैं। यदि मण्डलेश्वर चक्रवर्ती आदि के भयसे यह पूजा करता है तब उसकी यह गरिमा समाप्त हो जाती है। इसीलिए भक्तिवश कहा है। यह पूजा भी आगे कही जानेवाली कल्पवृक्ष पजाके तल्य ही होती है। अन्तर इतना है कि कि कल्पवृक्ष पूजामें चक्रवर्ती अपने साम्राज्य-भरमें दान करता है और इस पूजामें मण्डलेश्वर केवल अपने जनपद में दान करता है ॥२७|| __ आगे कल्पवृक्ष पूजाका स्वरूप कहते हैं 'क्या चाहते हो' इस प्रकारके प्रश्नपूर्वक याचककी इच्छाके अनुरूप दानके द्वारा लोगोंके मनोरथोंको पूरा करके चक्रवर्तीके द्वारा जो जिनपूजा की जाती है उसे कल्पद्रुम कहते हैं ॥२८॥ आगे कहते हैं कि उपहार, अभिषेक आदि जो जिनपूजाके भेद हैं उन सबका अन्तर्भाव इन्हीं नित्यगह आदि में होता है ___ जिनेन्द्र भगवान के भक्त, श्रावक प्रतिदिन या पर्व के अवसरोंपर जो उपहार, अभिषेक, गीत-नृत्य आदि करते हैं वे सब यथायोग्य उन्हीं नित्यमह आदिमें अन्तर्भूत होते हैं । अर्थात् जिनेन्द्र भगवानको लक्ष करके जो भी भक्ति प्रदर्शित की जाती है चाहे वह भेंटरूपमें हो या गीत-नृत्य आदिके रूपमें हो; विद्वान् उन सबको नित्यपूजा आदिके ही भेद मानते हैं ॥२९॥ आगे प्रत्येक जलादि पूजाका फल कहते हैं अर्हन्त भगवानके दोनों चरणों में विधिपूर्वक अर्पित की गयी जलकी धारा पूजा करनेवालेके पापोंकी शान्ति के लिए होती है। उत्तम चन्दन पूजकके शरीरकी सुगन्धके लिए होता है । अखण्ड तन्दुल पूजकके अणिमा आदि विभूति अथवा धन सम्पतिके नष्ट नहीं होनेके Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) ७५ विभवाच्छेदाय-विभवस्याणिमादिविभूतेविणस्य वा अच्छेदो निरन्तरप्रवृत्तिस्तदर्थः । यष्टुःआत्मनः पूजयितुः । यदाह 'भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वरीः स्त्रियः । विभवो दानशक्तिश्च स्वयं धर्मकृतेः फलम् ।। आत्मचित्तपरित्यागात्परैर्धर्मविधापने। निःसन्देहमवाप्नोति परभोगाय तत्फलम् ।।' [ सो. उपा. ७८९-७८८ ] एतच्च समर्थः सन् यः स्वयं न करोति तदपेक्षयोच्यते । स्वयं कर्तुमसमर्थस्य तु श्रद्धधानस्य परधर्मविधापने विधीयमानस्य वानुमोदनेऽपि महती पुण्यप्रसूतिरिष्यते, परिणामैककारणात्वात्पुण्यपापयोः । दिविजस्रजे-स्वर्गजन्ममन्दारमालार्थम् । उमा-लक्ष्मी । यदाह 'उमा श्री रती कान्तिः कीर्तिर्दुर्गा पुलोमजा। उमाशब्देन कथ्यन्ते कायस्तुङ्गोपमाचिषः ॥ [ त्विषे-दीप्त्यर्थम् । विश्वदृगुत्सवाय-पपमसौभाग्यार्थम् । अर्धाय-पूजाविशेषार्थम् । सः १२ लिए या सदा बने रहने के लिए होते हैं। पुष्पोंकी माला स्वर्गमें होनेवाली मन्दारवृक्षकी मालाकी प्राप्तिके लिए होती है। नैवेद्य लक्ष्मीका स्वामित्व प्राप्त करने के लिए होता है। दीप कान्ति के लिए होता है । धूप पूजकके परम सौभाग्यके लिए होती है । फल इष्ट अर्थकी प्राप्तिके लिए होता है । और अर्घ पूजा विशेषके लिए होता है ॥३०॥ विशेषार्थ-सोमदेवने अपने उपासकाचारमें अष्टद्रव्यसे पूजाका विधान तो किया है। किन्तु प्रत्येक पूजाका अलग-अलग फल न बतलाकर पूजामात्रका सामान्य जो पूजककी शुभ भावना रूप है। जैसे-'हे भगवन् , जबतक इस चित्तमें आपका निवास है तबतक सदा जिन भगवान्के चरणोंमें मेरी भक्ति रहे, मेरी ऐश्वर्यरत मति सदा सबका आतिथ्य सत्कार करने में संलग्न हो, मेरी बुद्धि अध्यात्मतत्त्वमें लीन रहे। ज्ञानीजनोंसे मेरा स्नेह भाव रहे और मेरी चित्तवृत्ति सदा परोपकारमें रहे ।' आदि । अमितगतिके श्रावकाचारमें भी प्रत्येक पूजाके फलका कथन नहीं है। देवसेनके भावसंग्रह में प्रत्येक पूजाका फल बतलाया है। यथा-'जिनके चरण कमलों में दी गयी जलधारा समस्त रजको शान्त करती है, जो भव्य जीव जिनवरके चरणों में सुगन्धित चन्दनका लेप करता है वह स्वभावसे सुगन्धित वैक्रियिक शरीर प्राप्त करता है। जो देवके चरणोंके आगे अक्षतके पुंज चढ़ाता है • वह नवनिधि सहित चक्रवर्तित्व प्राप्त करता है। जो सुगन्धित पुष्पोंसे जिनदेवके चरणकमलोंको पूजता है वह उत्तम देव होकर स्वर्गके वनोंमें आनन्द करता है। जो दही, दूध, घीसे बनाये गये उत्तम नैवेद्यसे जिनदेवके चरण कमलोंको पूजता है वह उत्तम भोगोंको प्राप्त करता है। जो कपूर और तेलसे प्रज्वलित और मन्द-मन्द वायुके झकोरोंसे नाचते हुए दीपोंसे जिनके चरण कमलोंको पूजता है वह चन्द्र-सूर्यके समान शरीर पाता है। जो शिलारस १. वरस्त्रियः । -मु.। २. वित्त-।-मु.। ३. 'अम्भश्चन्दनतन्दुलोद्गमहविदीपः सधूपैः फलैरचित्वा त्रिजगद्गुरुं जिनपति स्नानोत्सवानन्तरम् ।' सो. उपा. ५५९ श्लो. । ४. भावसंग्रह-४७०-४७७ गा. । Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२ धर्मामृत ( सागार ) श्रुतत्वादर्धः पुष्पाञ्जलिरित्यर्थः। अथवा स इत्यनेन पूर्वोक्त इष्टार्थ एव परामश्यते तेनायमर्थः कथ्यतेयद्यद्यष्टुरात्मनोऽभिमतं वस्तु गीतादिकं तेन जिने सम्यक्प्रयुक्तं तत्तद्विशिष्टगीतादिवस्तुनः अर्घाय मूल्याय ३ स्यात्तत् सम्पादयतीत्यर्थः ॥३०॥ अथ जिनेज्यायाः सम्यक् प्रयोगविध्युपदेशपुरस्सरं लोकोत्तरं फलविशेषमाविष्करोति चैत्यादौ न्यस्य शुद्ध निरुपरमनिरौपम्यतत्तद्गुणौघश्रद्धानात्सोऽयमर्हन्निति जिनमनघेस्तद्विधोपाधिसिद्धैः । नीराद्यैश्चारुकाव्यस्फुरदनणुगुणग्रामरज्यन्मनोभि भव्योऽचंन् दृग्विद्धि प्रबलयतु यया कल्पते तत्पदाय ॥३१।। __ चैत्यादौ-चैत्ये प्रतिमायामादिशब्देन तदलाभे जिनाकाररहिते अक्षतादौ। शुद्धे-रुद्राद्याकाररहिते इत्यर्थः। यदाह 'शुद्ध वस्तुनि संकल्पः कन्याजन इवोचितः । नाकारान्तरसंक्रान्ते यथा परपरिग्रहे ॥ [सो. उपा. ४८१ ] और अगुरुसे मिश्रित धूपसे जिनचरणोंको पूजता है वह तीनों लोकों में शुभवर्तन (?) पाता है। जो पके हुए तथा रससे भरे हुए नाना फलोंसे जिन चरणको पूजता है वह इष्ट फलको पाता है।' इस प्रकार प्रत्येक पूजाका फल कहा है वैसा ही इस ग्रन्थमें भी कहा है। इस फलमें केवल लौकिक फलकी ही कामना है। आज जो पूजाफल द्रव्य चढ़ाते हुए बोला जाता है कि संसार तापकी शान्तिके लिए चन्दन चढ़ाता हूँ, अक्षय पदकी प्राप्तिके लिए अक्षत चढ़ाता हूँ, आदि वह फल आध्यात्मिक है । अतः ऐसा प्रतीत होता है कि मध्यकालमें पूजामें लौकिक फलकी भावना थी। उत्तरकालमें उसे आध्यात्मिक रूप देकर पूजाका महत्त्व बढ़ाया है। तथा आठ द्रव्योंसे पृथक्-पृथक् पूजन करनेके बाद आठों द्रव्योंके मेलसे जो पूजन होती है उसे अर्घ कहते हैं। इस अर्घका कथन आशाधरजीने तो किया है किन्तु उनसे पहलेके उक्त ग्रन्थों में इसका कथन नहीं है । आशाधरजीने 'चार्घाय सः' की व्याख्या करते हुए लिखा है-'स अर्थात् अर्घ अर्थात् पुष्पांजलि पूजाविशेषके लिए होती है। आगे अथवा करके लिखा है 'स' पदसे पूर्वोक्त इष्टार्थका ग्रहण किया जाता है। उससे यह अर्थ किया जाता है कि पूजक जो-जो अभिमत वस्तु गीत आदि जिन भगवान्के प्रति सम्यक् रूपसे प्रयुक्त करता है वह-वह विशिष्ट गीत आदि वस्तुके अर्घ अर्थात् मूल्य के लिए होती है अर्थात् उसे स्वयं उन वस्तुओंकी प्राप्ति होती है। इससे प्रतीत होता है कि उस समय तक अर्घसे पूजनका प्रयोजन स्पष्ट नहीं था। तथा पूजा पद्धतिमें अर्घका प्रवेश अष्ट द्रव्य जितना प्राचीन नहीं है ॥३०॥। आगे जिन पूजाकी सम्यक् विधि बतलाते हुए उसका लोकोत्तर फल कहते हैं अविनाशी और असाधारण उन उन गुणों के समूह में अत्यन्त अनुरागसे, उत्सर्पिणीके तीसरे और अवसर्पिणीके चतुर्थकालमें होनेवाले चौंतीस अतिशय सहित और समवसरणमें आठ प्रातिहार्य सहित विराजमान तथा तत्त्वोपदेशसे भव्यजीवोंको पवित्र करनेवाले यह ही वे अर्हन्त हैं, इस प्रकार निर्दोष प्रतिमामें और उसके अभाव में अक्षत आदिमें जिनदेवकी स्थापना करके, पापके हेतु दोषोंसे रहित तथा निष्पाप साधनोंसे तैयार किये गये जल-चन्दन आदिसे सुन्दर गद्य-पद्यात्मक काव्योंमें वर्णित महान गुणों के समूह में मनको अनुरक्त करते हुए पूजन करनेवाला भव्य सम्यग्दर्शनकी विशुद्धिको बलवती बनाता है, जिस दर्शन विशुद्धिके द्वारा वह तीर्थकर पदको प्राप्त करने में समर्थ होता है ॥३१॥ Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) ७७ निरुपरमा-अविनश्वराः। तत्तद्गुणाः-व्यवहारेण दर्शनविशुद्धयादिभावनाप्रमुखकल्याणपञ्चकलक्षणाः । निश्चयेन च चिदचिदज्ज्ञेयद्रव्याकारविशेषस्वरूपाः । अनघेः-हठहतत्वाहृद्यत्वस्वान्यभुक्त शेषत्वादि पापहेतुदोषमुक्तः । तद्विधोपाधिसिद्धः-निष्पापसाधननिष्पन्नः । चारूणि-दोषनिरासाद्गुणालंकार ३ स्वीकाराच्च सहृदयहृदयावर्जकानि । तत्पदाय--तीर्थकरत्वाय । एकस्या अपि दर्शनविशुद्धरुत्कर्षस्य तीर्थकरत्वाख्यपुण्यविशेषबन्धहेतुत्वसिद्धेः, तत्पूर्वकत्वाद्विनयसंपन्नतादीनां तत्कारणान्तराणाम् । उक्तं च 'आराध्य दर्शनविशुद्धिपुरस्सराणि विश्वेश्वरत्वपद चारणकारणानि । वघ्नाति तीर्थंकर कर्म समग्रकर्म निर्मूलनाय विभुरद्भुतवीयंसारः ॥' [ ]॥३१॥ अथ व्रतविभूषितस्य जिनयष्टुरिष्टफलविशेषसिद्धिमभिधत्ते विशेषार्थ-यह जिनपूजाकी विधि है । पूजा स्थापनापूर्वक की जाती है और स्थापना तदाकार भी होती है और अतदाकार भी होती है। सोमदेवने अपने उपासकाचारमें पूजकके दो भेद किये हैं-एक पुष्प आदिमें पूज्यकी स्थापना करके पूजन करनेवाला और दूसरा प्रतिमाका अवलम्बन लेकर पूजन करनेवाला। उन्होंने फल, पत्र, पाषाण आदिमें तथा अन्य धर्मकी मूर्ति स्थापना करनेको निषेध किया है। दोनोंकी विधि भी अलग-अलग कही है, जो प्रतिमामें स्थापना नहीं करते उनके लिए अर्हन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रकी स्थापना करके पूजन करना बतलाया है । और जो प्रतिमामें स्थापना करके पूजा करते हैं उनके लिए अभिषेक, पूजन, स्तवन, जप, ध्यान और श्रुतदेवताकी आराधना इन छह विधियोंको बतलाया है। वसुनन्दिने अपने श्रावकाचारमें इस कालमें अतदाकार स्थापनाका निषेध किया है। आशाधरजी ने उसका निषेध नहीं किया। सम्भवतया पहले सामने प्रतिमाके न होनेपर तन्दुल आदिमें स्थापना करके भी पूजन की जाती थी। अस्तु, पूजन करनेसे पहले निर्दोष मूर्ति में जिनदेवके गुणोंकी श्रद्धापूर्वक स्थापनाकी जाती है। व्यवहारसे दर्शनविशद्धि आदि भावना प्रमुख पाँच कल्याणक और निश्चयसे अनन्त ज्ञानादि उनके असाधारण गुण हैं। उन गुणोंमें अनुरागवश ही जिनेन्द्र पूजा की जाती है । गुणोंमें अनुरागका ही नाम भक्ति है। भक्तिपूर्वक स्थापनाके बाद शुद्ध द्रव्यसे जिनेन्द्रकी पूजा की जाती है। द्रव्यकी शुद्धता दो बातोंपर निर्भर है। वह द्रव्य जबरदस्ती किसीसे छीना गया न हो, उसमें हार्दिकता हो, अपने या दूसरोंके खानेसे बचा हुआ न हो इत्यादि । दूसरे, निष्पाप साधनोंसे तैयार किया गया हो, बाजारू, गला-सड़ा या बासी आदि न हो, प्रासुक जलसे सावधानीपूर्वक बनाया गया हो, आरम्भबहुल न हो। इस तरह शरीरसे द्रव्यका अर्पण करने के साथ, वचनसे पूजन पढ़ते हुए और मनको संगीतपर्वक पढी जानेवाली पजनमें वर्णित भगवानके गणोंमें लगाते हए पजन करनेसे मनवचन-कायकी एकाग्रताके साथ सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि होती है । और एक दर्शन विशुद्धिका भी उत्कर्ष तीर्थकर नामक पुण्य विशेषके बन्धका कारण होता है यह सब जानते हैं। कहा है-विश्वेश्वर पदके कारण दर्शनविशुद्धि आदिकी आराधना करके अद्भुत शक्तिशाली आत्मा समग्र कर्मोंका निर्मूलन करनेके लिए तीर्थकर कमेका बन्ध करता है ॥३॥ अब, व्रतसे भषित जिनपूजकको इष्ट फल विशेषकी सिद्धि होती है, यह कहते हैं Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ ६ ९ १२ १५ १८ ७८ धर्मामृत ( सागार) दृक्तमपि यष्टारमहंतोऽभ्युदयश्रियः । श्रयन्त्यहम् पूर्विकया कि पुनव्रतभूषितम् ||३२|| स्पष्टम् ॥३२॥ अथ जिनपूजान्तराय परिहारोपायविधिमाह - यथास्वं दानमानाद्यैः सुखीकृत्य विधर्मणः । स्वधर्मणः स्वसात्कृत्य सिद्धयर्थी यजतां जिनम् ||३३|| [ सर्वधर्म- ] बाह्यान्वा । सुखीकृत्य - अनुकूलान्कृत्वा । विधर्मण: - [ शिवादिधर्मरतान् ] सधर्मणः - जिनधर्मभावितान् । सिद्धयर्थी – जिनपूजा संपूर्णतां स्वात्मोपलब्धि वाऽभीप्सन् ॥३३॥ अथ स्नानापास्तदोषस्यैव गृहस्थस्य स्वयं जिनयजनेऽधिकारित्वमन्यस्य पुनस्तथाविधेनैवान्येन तद्यजनमित्युपदेशार्थमाह स्त्र्यारम्भसेवासंक्लिष्टः स्नात्वाऽऽकण्ठमथाशिरः । स्वयं यजेतार्हत्पादानस्नातोऽन्येन याजयेत् ||३४|| स्त्रीत्वादि । स्त्रीसेवया कृष्यादिकर्मसेवया च । संक्लिष्टः - समन्तात्काये मनसि चोपतप्तः । प्रस्वेदतन्द्रालस्य- दौर्मनस्यादि दोषदूषितकायमनस्क इत्यर्थः । स्नात्वेत्यादि । एतेन यथादोषं स्नानोपदेशादागुल्फमाजान्वाकटि च स्नानमनुजानाति । यदाह 'नित्यस्नानं गृहस्थस्य देवार्चनपरिग्रहे । यतेस्तु दुर्जनस्पर्शात्स्नानमन्यद्विगर्हितम् ॥ वातातपादिसंस्पृष्ठे भूरितोये जलाशये । अवगाह्याचरेत्स्नानमतोऽन्यद्गालितं भजेत् ॥ जब सम्यग्दर्शनसे पवित्र भी जिन भगवान् के पूजकको पूजा, धन, आज्ञा और ऐश्वर्ययुक्त परिवार काम भोग आदि सम्पदा 'मैं पहले' 'मैं पहले' करके प्राप्त होती है तब यदि वह एक देश से हिंसा आदिके त्यागरूप व्रतोंसे भूषित हो तो कहना ही क्या है ? अर्थात् व्रती पूजकको भोगसम्पदा और भी विशेष रूप से प्राप्त होती है ||३२|| आगे जिनपूजा में आनेवाले विघ्नोंको दूर करनेका उपाय बताते हैं जिन पूजाकी सम्पूर्णता के इच्छुक पूजक को अन्य धर्मावलम्बियोंको यथायोग्य दानसम्मान आदिके द्वारा अनुकूल बनाकर और साधर्मियोंको अपने साथ में लेकर जिन भगवान्की पूजा करनी चाहिए ||३३|| आगे कहते हैं कि स्नानके द्वारा शुद्ध गृहस्थको ही स्वयं जिनपूजन करनेका अधिकार है गृहस्थका शरीर और मन स्त्रीसेवन तथा कृषि आदि आरम्भ में फँसे रहने से दूषित रहता है | अतः उसे दोषके अनुसार मस्तकसे या कण्ठसे स्नान करके ही स्वयं अर्हन्तदेव के चरणोंकी पूजा करनी चाहिए। यदि स्नान न करे तो दूसरे स्नान किये हुएके द्वारा पूजन करावे ||३४|| विशेषार्थ - देवपूजनके लिए अन्तरंग शुद्धि और बहिरंग शुद्धि आवश्यक है । चित्तसे बुरे विचारोंको दूर करनेसे अन्तरंग शुद्धि होती है और विधिपूर्वक स्नान करने से वहिरंग १. सधर्म - मु. । . Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) पाद - जानु - कटि-ग्रीवा - शिरः पर्यन्तसंश्रयम् । स्नानं पञ्चविधं ज्ञेयं यथादोषं शरीरिणाम् || ब्रह्मचर्योपपन्नस्य निवृत्तारम्भकर्मणः । यद्वा तद्वा भवेत्स्नानमन्त्यमन्यस्य तु द्वयम् ॥ सर्वारम्भविजृम्भस्य ब्रह्मजिह्मस्य देहिनः । अविधाय बहिः शुद्धि नाप्तोपास्त्यधिकारिता ॥ अद्भिः शुद्धि निराकुर्वन् मन्त्रमात्रपरायणः । स मन्त्रः शुद्धिमन्नं भुक्त्वा हत्वा विहृत्य च ॥ आप्लुतः संप्लुतश्चान्तः शुचिवासो विभूषितः । मौनसंयम संपन्नः कुर्याद्देवार्चनाविधम् || दन्तधावनशुद्धास्यो मुखवासोवृताननः । असंजातान्यसंसर्गः सुधीर्देवानुपाचरेत् ॥' [ सो. उपा. ४६४-४६९, ४७२-४७३ ] स्नानगुणा यथा 'दोपनं वृष्यमायुष्यं स्नानमूर्जो बलप्रदम् । कण्डू-मल-श्रम-स्वेद-तन्द्रा तृट् - दाह- पापजित् ॥' [ अष्टांगहृ. २।१६ ] ॥३४॥ शुद्धि होती है। देवपूजा करनेके लिए गृहस्थको सदा स्नान करना चाहिए । किन्तु मुनिको दुर्जनसे छू जानेपर ही स्नान करना चाहिए । अन्य स्नान मुनिके लिए वर्जित है । जिस जलाशय में खूब पानी हो, और वायु तथा धूप उसे खूब लगती हो, उसमें घुस करके स्नान करना उचित है । किन्तु अन्य जलाशयोंका जल छानकर ही काम में लाना चाहिए । रत्नमाला में कहा है कि पत्थर से टकरानेवाला जल दोपहर तक प्रासुक माना गया है । वापिकाका तपा हुआ जल तत्काल प्रासुक है। यह जल मुनियोंके शौच और गृहस्थोंके स्नानके लिए होता है शेष सब जल अप्रासुक हैं। धर्म संग्रह श्रावकाचार में कहा है-नदियों और तालाबोंका गहरा जल जो वायु और धूपसे तपा हो वह भी स्नानके योग्य है । वर्षाका जल, पत्थर और घटीयन्त्रसे ताड़ित जल तथा वापिकाका सूर्यसे तप्त जल प्रासुक माना गया है । स्नान के पाँच प्रकार हैं— पैर तक घुटनों तक, कमर तक, गरदन तक और सिर तक । दोष के अनुसार स्नान करना उचित है । जो ब्रह्मचारी हैं, सब प्रकारके आरम्भोंसे निवृत हैं वह इनमें से कोई भी स्नान कर सकते हैं । किन्तु अन्य गृहस्थोंको तो सिर या गरदन से ही स्नान करना चाहिए। जो सब प्रकारके आरम्भों में लगा रहता है और ब्रह्मचारी भी नहीं है उसे बाह्य शुद्धि किये बिना देवपूजाका अधिकार नहीं है। स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहने, फिर शरीरको आभूषणोंसे भूषित करे, और चित्तको वशमें करके मौन तथा संयमपूर्वक जिनेन्द्रकी पूजा करे ||३४|| १. तद्द्वयम् ।-मु. २. शुद्धभा नूनं । - मु. ३. संप्लुतस्वान्तः । मु. 1 ४. सोचिताननः, मु. ५. रत्नमाला ६३, ६४ श्लो. । ६. धर्म. श्री. पू. २१८ । ७९ ३ ६ ९ १२ १५ Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अथ चैत्यादिनिर्मापणस्य फलविशेषसमर्थनया विधेयतामभिधत्ते निर्माप्यं जिनचैत्यतद्गृह-मठ-स्वाध्याय-शालादिकं ___ श्रद्धाशक्त्यनुरूपमस्ति महते धर्मानुबन्धाय यत् । हिंसारम्भविवर्तिनां हि गृहिणां तत्तादृगालम्बन प्रागल्भीलसदाभिमानिकरसं स्यात्पुण्यचिन्मानसम् ॥३५।। शालादि । आदिशब्देन सत्रपुण्यारामादि । अस्तीत्यादि । चैत्यालयादिनिर्मापणे सावद्यदोषशङ्कानिरासार्थमेतत् । यदाह-'तत्पापमपि न पापं यत्र महान् धर्मानुबन्ध' इति । तत्-जिनचैत्यचैत्यालयादि । तादकतीर्थयात्रादि । आलम्बनं-दग्विशुद्धघङ्गम् । प्रागल्भी-प्रौढिः । पुण्यं सुकृतं चिनोति वर्धयति अथवा पुण्या पवित्रा निर्मला चित् संवित्तिर्यस्य तत्पुण्यचित् । तथा चोक्तम् 'यद्यप्यारम्भतो हिंसा हिंसायाः पापसंभवः । तथाऽप्यत्र कृतारम्भो महत्पुण्यं समश्नुते ॥ निरालम्बा न धर्मस्य स्थितियस्मात्ततः सताम् । मुक्तिप्रदानसोपानमाप्तैरुक्तो जिनालयः ॥' [ चैत्य आदिके निर्माणका विशेष फल बतलाते हुए उसके करनेकी प्रेरणा करते हैं पाक्षिक श्रावकको अपनी श्रद्धा और शक्तिके अनुसार जिनबिम्ब, जिनालय, मठ, स्वाध्यायशाला आदि बनवाना चाहिए, क्योंकि ये सब बड़े भारी धर्मके अनुबन्धके लिए होते हैं अर्थात इनसे जो प्राप्त नहीं है उसकी प्राप्ति होती है, जो प्राप्त है उसकी रक्षा होती है और जो रक्षित है उसकी वृद्धि होती है, क्योंकि हिंसाप्रधान कृषि आदि आरम्भमें निरन्तर लगे रहनेवाले पाक्षिक श्रावकोंका मन इन जिनबिम्ब आदि तथा इनके समान तीर्थयात्रा आदि जो सम्यग्दर्शनकी विशुद्धिके अंग हैं, उन आलम्बनोंकी प्रौढ़तासे अनुभवमें आनेवाले अहंकारसे अनुरक्त हर्षसे पुण्यका संचय करता है अथवा निर्मल अनुभूतिको करता है ।।३५।। विशेषार्थ-पाक्षिक श्रावक विशेष रूपसे तो अपने कृषि व्यापार आदिमें ही फंसा रहता है और इन गार्ह स्थिक कार्यों में हिंसा अवश्य होती है । अतः जो अशुभोपयोगमें फंसे रहते हैं उनका धर्म तो शुभोपयोग ही है। जिनबिम्ब, जिनमन्दिर, स्वाध्यायशाला वगैरह धर्म के साधन हैं। साधारण श्रावक इन्हींके द्वारा धर्मका प्रारम्भिक पाठ पढ़ता है, इसीसे आगे बढ़कर वह उत्तम श्रावक और मुनि बनता है। अतः भोगोपभोगमें धनको व्यय करनेवाला श्रावक यदि धर्मकी परम्पराको कायम रखनेवाले व उसे चलाने वाले धार्मिक कार्यों में धन खर्च करता है तो उसे इससे एक प्रकारका मानसिक आनन्द मिलता है, उसे यह अनुभव करके परम हर्ष होता है कि उसने अपने द्रव्यका उपयोग धर्मके कार्यों में, ऐसे कार्यों में जो दर्शनविशुद्धिमें निमित्त होते हैं किया। इससे उसे पुण्यबन्ध तो होता ही है, यदि वह ज्ञानी हुआ तो इसी आनन्दमें उसे आत्मानुभूति भी हो सकती है। यद्यपि आरम्भमें हिंसा होती है और हिंसासे पाप होता है । तथापि इस आरम्भको करनेवाला महान् पुण्यबन्ध करता है। तथा धर्मकी स्थिति किसी आलम्बनके बिना सम्भव नहीं है अतः महापुरुषोंने जिनालयको मुक्तिका सोपान कहा है। पण्डित आशाधरजीके पहले आचार्य अमितगति, Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) अपि च 'बिम्बाफेलोन्नतियवोन्नतिमेव भक्त्या ये कारयन्ति जिनसद्म जिनाकृति च । पुण्यं तदीयमिह वागपि नैव शक्ता स्तोतुं परस्य किमु कारयितुव॑यस्य ।।' [ पद्म. पञ्च. ७।२२] ॥३५॥ अथ शास्त्रविदामपि प्रायः प्रतिमादर्शनेनैव देवाधिदेवसेवापरां मतिं कुर्वाणं कलिकालमपवदन्ते धिग्दुषमाकालरात्रि यत्र शास्त्रदृशामपि। चैत्यालोकादृते न स्यात् प्रायो देवविशा मतिः ॥३६॥ आचार्य पद्मनन्दि, आचार्य वसुनन्दि आदिने मन्दिर और मूर्ति निर्माणपर बहुत जोर दिया है। आचार्य अमितगतिने कहा है जो जिनेन्द्रकी अंगष्ठ प्रमाण भी मर्ति बनवाता है उससे अविनाशी लक्ष्मी दूर नहीं है। वसुनैन्दी और पद्मनन्दिने उनसे भी आगे बढ़कर कहा है कि जो कुन्दुरुके पत्ते के बराबर जिनालय और उसमें जौ के बराबर प्रतिमाका निर्माण कराते हैं उनके पुण्यका वर्णन वाणीसे नहीं हो सकता । यह तत्कालीन परिस्थितिकी पुकार है। आचार्य पद्मनन्दिने अपने समयका चित्रण करते हुए लिखा है-'इस दुषमा नामके पंचम कालमें जिनेन्द्र भगवान के द्वारा प्ररूपित धर्म क्षीण हो गया है। साधर्मी जन बहुत थोड़े हैं, मिथ्यात्वरूपी अन्धकार बहुत फैला है। ऐसे में जो जिनबिम्ब और जिनालयमें भक्ति रखता हो वह भी दिखाई नहीं देता । फिर भी जो विधिपर्वक जिनबिम्ब और जिनालयका निर्माण कराता है वह वन्दनीय है। आशाधरजीके समयमें तो मारवाड़में सहाबुद्दीन गोरीका आक्रमण हो गया था। फिर भी उन्होंने पत्ते बराबर मन्दिर और जौ बराबर मूर्ति बनवानेकी बात नहीं कही, तथा जिनबिम्ब और जिनमन्दिरके साथ साधुओंके निवासस्थान और स्वाध्यायशाला ( ग्रन्थागार ) भी बनवानेपर जोर दिया यह उनकी दूरदर्शिताका परिचायक है ॥३५॥ आगे कलिकालकी निन्दा करते हैं इस पंचम कालरूपी मरणरात्रिको धिक्कार हो, जिसमें शास्त्र ही जिनकी आँखें हैं प्रायः उन विद्वानोंकी भी अन्तःकरण प्रवृत्ति देवदर्शनके बिना अन्यकी शरण न लेकर एकमात्र जिनदेवको ही भजनेवाली नहीं होती ॥३६॥ १. दलो- मु. । २. 'येनांगुष्ठप्रमाणाएं जैनेन्द्री क्रियतेऽङ्गिना। तस्याप्यनश्वरी लक्ष्मीन दुरे जातु जायते ॥ --सुभाषित., ८७६ श्लो.। ३. 'कुत्थंभरिदलमेते जिणभवणे जो ठवेई जिणपडिमं । सरिसवमेतं पि लहेइ सो णरो तित्थयरपुण्णं ॥-वसु. श्रा. ४८१ गा.. ४. 'काले दुःखमसंज्ञके जिनपतेधर्म गते क्षीणतां तुच्छे सामयिके जने बहुतरे मिथ्यान्धकारे सति । चैत्ये चैत्यगृहे च भक्तिसहितो यः सोऽपि नो दृश्यते यस्तत्कारयते यथाविधि पुनर्भव्यः स वन्द्यः सताम्' ।।-पद्म. पञ्च. ७॥२१॥ सा.-११ Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) दुःषमाकालरात्रि-दुःषमा पञ्चमकालः, कालरात्रिमरणनिशेव दुनिवारमोहावहत्वात् । देवविशादेवं परमात्मानं विशति अनन्यशरणीभय संश्रयतीति क्विबन्तादजाद्यतष्टाप् ॥३६॥ अथ कलौ धर्मस्थितिः सम्यक् चैत्यालयमूलैवेत्यनुशास्तिप्रतिष्ठायात्रादिव्यतिकर-शुभ-स्वरचरण स्फुरद्धर्मोद्धर्षप्रसररसपूरास्तरजसः । कथं स्युः सागाराः श्रमणगणधर्माश्रमपदं न यत्राहंद्रोहं दलितकलिलोलाविलसितम् ॥३७॥ यात्रादि । आदिशब्देन पूजाभिषेकजागरणादि । यदाह 'यात्रादिस्नपनैमहोत्सवशतैः पूजाभिरुल्लोचकैः, नैवेद्यैर्बलिभिवंजैश्च कलशैस्तूर्यत्रिकैर्जागरैः । घण्टाचामरदर्पणादिभिरपि प्रस्तार्य शोभां परां भव्याः पुण्यमुपार्जयन्ति सततं सत्यत्र चैत्यालये ।' [ पद्म. पञ्च. ७।२३ ] स्वैरं-स्वच्छन्दम् । उद्धर्षः-उत्सवः । रसः-हर्षो जलं च । रजः-पापं रेणुश्च । कलिलोलाविलसितं-मठपत्यादिदुर्नयो निरङ्कुशविजृम्भमाणसंक्लेशपरिणामो वा ॥३७॥ विशेषार्थ-सच्चा जिनभक्त वही है जो एकमात्र जिनेन्द्रदेवको ही अपना शरण मानता है। जो उनके सिवाय किसी अन्य देवको शरण मानता है वह सच्चा जिनभक्त नहीं है । जैन परम्परामें ऐसे भी विद्वान् भट्टारक आदि हुए हैं और आज भी हैं जो शासन देवताओंकी उपासनाके पक्षपाती रहे, यह भी कलिकालका प्रभाव है। किन्तु सभी ऐसे नहीं होते । जैन परम्परामें सदा ऐसे मुनिराज होते आये हैं जो ज्ञान और वैराग्यमें तत्पर रहते हुए जिन दर्शनके बिना भी परमात्माको ही अपना शरण मानते हैं। निश्चय नयसे तो कोई भी किसीका शरण नहीं है; रत्नत्रयमय आत्मा ही आत्माका शरण है। इस तरहकी श्रद्धाके लिए गृहस्थ विद्वान्को भी प्रतिदिन देवदर्शन करना आवश्यक है ॥३६॥ आगे कहते हैं कि कलिकालमें धर्मस्थितिका मूल जिनालय ही हैं जिस नगर आदिमें कलिकालकी लीलाके विलासको नष्ट करनेवाला और मुनिसंघोंके धर्म साधनके लिए निवासस्थान जिन मन्दिर नहीं है, उन स्थानोंमें प्रतिष्ठा, यात्रा आदि महोत्सवोंमें होनेवाला जो मन-वचन-कायका शुभ व्यापार और उससे होनेवाला जो धर्मोत्साह, वही हुआ जल प्रवाह, उस प्रवाहसे जिनकी पापरूपी धूलि दूर हो गयी है ऐसे गृहस्थ कैसे हो सकते हैं। आशय यह है कि जिन मन्दिर होनेसे प्रतिष्ठा, पूजा, अभिषेक आदिके आयोजन होते हैं। उन धार्मिक आयोजनोंमें सभी स्त्री-पुरुष भाग लेते हैं। इससे उनका धर्मोत्साह बढ़ता है, उससे उनके पापकर्मोंकी शान्ति होती है। किन्तु जहाँ जिन-मन्दिर नहीं होता वहाँ कोई भी धार्मिक आयोजन नहीं होता। फलतः गृहस्थोंकी धार्मिक भावनामें ज्वार-भाटा आनेका कभी प्रसंग नहीं होता। आचार्य पद्मनन्दिने कहा है-चैत्यालयके होनेपर भव्यलोक यात्राओं, अभिषेकों, सैकड़ों महान् उत्सवों, पूजाविधानों, चन्दोवों, नैवेद्यों, उपहारों, ध्वजाओं, कलशों, गीतों, वादित्रों, नृत्यों, जागरणों, घण्टा, चामर, दर्पण आदिके द्वारा उत्कृष्ट शोभाका विस्तार करके निरन्तर पुण्यका संचय करते हैं !॥३७॥ Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) अथ कलो वसतिविशेषं विना सतामप्यनवस्थितचित्तत्वं दर्शयति मनो मठकठेराणां वात्ययेवानवस्थया। चेक्षिप्यमाणं नाद्यत्वे क्रमते धर्मकर्मसु ॥३८॥ मठकठेराणां-वसतिदरिद्राणाम् । अद्यत्वे-इदानींतनकाले । क्रमते-उत्सहते ॥३८॥ अथ विमर्शस्थानं विना महोपाध्यायानामपि शास्त्रान्तस्तत्त्वज्ञानदो:स्थित्यं प्रथयति विनेयवद् विनेतृणामपि स्वाध्यायशालया। विना विमर्श शून्या धीदृष्टऽप्यन्धायतेऽध्वनि ॥३९॥ विनेयवत् -शिष्याणां यथा । अध्वनि-मार्गे अर्थाच्छास्त्रे निःश्रेयसे वा ॥३९॥ अथ सत्रातुरोपचारस्थानयोरनुकम्प्यप्राण्यनुग्रहबुद्धया विधापनं बह्वारम्भरतानां गृहस्थानां जिनपूजार्थ पुष्पवाटिकादिनिर्मापणे दोषाभावं च प्रकाशयन्नाह सत्रमप्यनुकम्प्यानां सृजेदनुजिघृक्षया। चिकित्साशालवदुष्येन्नेज्यायै वाटिकाद्यपि ॥४०॥ आगे कहते हैं कि कलिकालमें मुनियोंका भी मन वसतिकाके बिना स्थिर नहीं रहता इस पंचम कालमें वायुमण्डलके द्वारा उड़ती हुई रुईकी तरह चंचल हुआ जंगलवासी मुनियोंका भी मन वसतिकाके बिना धार्मिक क्रियाओंमें उत्साहित नहीं होता ॥३८॥ विशेषार्थ-प्राचीन समयमें मुनि वनोंमें रहते थे । रत्नकरण्डे श्रावकाचारमें ग्यारहवीं प्रतिमाधारीको घर छोड़कर मुनिवनमें जानेका निर्देश है । धीरे-धीरे मुनियोंका निवास प्रामनगरोंमें होने लगा। आचार्य गुणभद्रने अपने आत्मानुशासनमें इसपर खेद प्रकट करते हुए कहा है कि जैसे रात के समय भीत मृग वनसे नगरोंके निकट आ जाते हैं उसी तरह कलिकालमें तपस्वी भी नगरोंमें रहने लगे हैं। तब उनके निवासके लिए श्रावकलोग गफा वगैरह बनाने लगे। उसके बिना साधओंका चित्त भी धर्म में नहीं लगता। अतः मन्दिरोंकी तरह साधुओंके ठहरनेका स्थान भी बनाना चाहिए ॥३८॥ ___ आगे कहते हैं कि स्वाध्यायशालाके बिना गुरुओंके भी शास्त्रज्ञानमें कमी आ जाती है.-- स्वाध्यायशालाके बिना शिष्योंकी तरह गुरुओंकी भी विचारशून्य बुद्धि देखे हुए भी शास्त्र या मोक्षमार्गके सम्बन्धमें अन्धेके समान आचरण करती हैं। अर्थात् शिष्यकी तो बात ही क्या, पढ़ानेवाले गुरु भी यदि शास्त्रचिन्तन निरन्तर न करें तो वे भी तत्त्वको भूल जाते हैं-उलटा-सीधा बतलाने लगते हैं। इसलिए स्वाध्यायशाला अत्यन्त आवश्यक है ॥३९॥ आगे कहते हैं कि दयाके योग्य प्राणियों के लिए भोजनशाला, औषधालय आदि भी बनवाना चाहिए भूख, प्यास और रोगसे पीड़ित गरीब प्राणियोंका उपकार करनेकी इच्छासे औषधालयकी तरह भोजनशाला भी बनवाना चाहिए। तथा पूजाके लिए बगीचा बनवाने में भी दोष नहीं है ॥४॥ १. 'गृहतो मुनिवनमित्वो...'-रत्न. श्रा. १४७ श्लो.। २. 'इतस्ततश्च त्रस्यन्तो विभावर्या यथा मृगाः । वनाद्विशन्त्युपग्रामं कलो कष्टं तपस्विनः ॥-आत्मानु., १९७ श्लो. । Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) सत्रमपि-अपिशब्दात प्रपामपि । अनुकम्प्यानां-क्षत्तुष्णार्तानां व्याधितानां च । वाटिकादिआदिशब्दाद् वापीपुष्करिण्यादि । अपिशब्देनानादरार्थेन विषयसुखार्थ कृष्यादिकं कुर्वतां यद्यपि धर्मबुद्ध्या वाटिकादि विधापने लोकव्यवहारानुरोधादोषो न भवति । तथापि तदकुर्वतामेव क्रयक्रीतेन पुष्पादिना तेषामपि जिनं पूजयतां महान् गुणो भवतीति ज्ञाप्यते । यत्पठन्ति 'एषा तटाकमिषतो ननु दानशाला मत्स्यादयो रसवति प्रगुणा सदैव। पात्राणि ढंकबकसारसचक्रवाकाः कीदृग्भवेदिह हि पुण्यमिदं न विद्मः ॥ [ ]॥४०॥ अथ नियाजभक्त्या येन केनापि प्रकारेण जिनं सेवमानानां सर्वदुःखोच्छेदमितस्ततः समस्तसमीहितार्थसम्पत्ति चोपदिशति यथाकथंचिद् भजतां जिनं नियाजचेतसाम् । नश्यन्ति सर्वदुःखानि दिशः कामान् दुहन्ति च ॥४॥ यथाकथंचित-ग्रामगृहादिदानप्रकारेणापि ॥४१॥ अथैवं जिनपजां विधेयतयोपदिश्य तद्वत्सिद्धादिपूजामपि विधेयतयोपदेष्टुमाह जिनानिव यजन् सिद्धान् साधून धर्म च नन्दात। तेऽपि लोकोत्तमास्तद्वच्छरणं मङ्गलं च यत् ॥४२॥ साधून-सिद्धि साधयन्तीति अन्वर्थतामात्रानुसरणादाचार्योपाध्याययतीन् ॥४२॥ विशेषार्थ—यह सब पाक्षिक श्रावकके लिए कथन है। पाक्षिक श्रावक जब विषयसुखके लिए कृषि आदि कर्म करता है तो उसे परोपकारकी भावनासे भूखसे पीड़ित जनोंके लिए निःशुल्क भोजन प्राप्तिका स्थान तथा रोगियोंके लिए चिकित्सालय वगैरह भी बनवाना चाहिए । ग्रन्थकारने पूजाके निमित्त पुष्प प्राप्त करने के लिए बगीचा लगाने में भी दोष नहीं बताया है । तथापि वह बगीचा न लगाकर और बाजारसे पुष्प खरोदकर उनसे पूजा करना उत्तम मानते हैं। पुष्पोंमें होनेवाली अशुद्धि तथा हिंसाके कारण उत्तर कालमें अक्षतोंको पीला रँगकर उनमें पुष्पकी स्थापना की गयी ॥४०॥ आगे कहते हैं कि निष्कपट भक्तिसे जिस-किसी भी प्रकारसे जिन भगवान्की पूजा करनेवालोंके सब दुःख दूर होते हैं और समस्त इच्छित पदार्थों की प्राप्ति होती है अभिषेक, पूजा, स्तवन आदि जिस किसी भी प्रकारसे जो निष्कपट चित्तसे जिन भगवानको भजते हैं उनके सब दुःख नष्ट हो जाते हैं और दिशाएँ उनके मनोरथोंको पूरा करती हैं । अर्थात् जिनदेवके पूजक जो-जो चाहते हैं वह उन्हें सर्वत्र प्राप्त होता है ।।४१॥ __ इस प्रकार जिनपूजाको कर्तव्य बतलाकर उसीकी तरह सिद्ध आदि पूजाको भी करनेका उपदेश देते हैं जिनदेवकी तरह मुक्तात्माओं, साधुओं और रत्नत्रय रूप धर्मको पूजनेवाला अन्तरंग और बहिरंग विभूतिसे सम्पन्न होकर आनन्द करता है, क्योंकि वे भी जिनदेवकी तरह लोकमें उत्कृष्ट हैं, शरण हैं और मंगलरूप हैं ॥४२॥ विशेषार्थ-'चत्तारि मंगलं' आदिमें अर्हन्त, सिद्ध, साधु और धर्मको मंगलस्वरूप, उत्कृष्ट तथा शरणभूत कहा है। साधुसे आचार्य, उपाध्याय और साधु तीनों लिये जाते हैं। Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) अथ सकलपूज्यपूजाविधिप्रकाशनेनानुग्राहिकायाः सम्यक् श्रुतदेवतायाः पूजायां सज्जयन्नाह - यत्प्रसादान्न जातु स्यात् पूज्यपूजाव्यतिक्रमः । तां पूजयेज्जगत्पूज्यां स्यात्कारोडुमरां गिरम् ॥४३॥ स्यात्कारोड्डुमरां—स्यात्पदप्रयोगेण सर्वथैकान्तवादिभिरजय्यामित्यर्थः । यथाह— 'दुर्निवारनयानीकविरोधध्वंसनौषधिः । स्यात्कारजीविता जीयाज्जेनीसिद्धान्तपद्धतिः ॥' अपि च - मिथ्याज्ञानतमोवृत लोकैकज्योतिरित्यादि ॥ ४३ ॥ अथ श्रुतपूजकाः परमार्थतो जिनपूजका एवेत्युपदिशति - ये यजन्ते श्रुतं भक्त्या ते यजन्तेऽञ्जसा जिनम् । चिदन्तरं प्राहुराप्ता हि श्रुतदेवयोः ॥४४॥ नेत्यादि । तथा पठन्ति - 'श्रुतस्य देवस्य न किंचिदन्तरम्' इत्यादि ॥४४॥ शरणका मतलब है, कष्टको दूर करना और अनिष्टसे रक्षाका उपाय करना । तथा मंगलका अर्थ है पापकी हानि और पुण्यका संचय । इन चारोंके पजनसे ये सब कार्य होते हैं । इनके लिए किसी अन्य देवी- देवताकी शरण लेना उचित नहीं है, इष्टका वियोग और अनिष्टका संयोग अपने ही पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम है अतः उसे हम स्वयं ही अपने शुभ कर्मोंके द्वारा दूर कर सकते हैं ||४२ ॥ ] सम्यक् श्रुत भी एक देवता है । वह सब पूज्योंकी पूजाकी विधि बतलाकर हमारा उपकार करती है | अतः उसकी पूजाका उपदेश करते हैं देवने ८५ जिसके प्रसादसे कभी भी पूज्य अर्हन्त सिद्ध साधु और धर्मकी पूजा में यथोक्त विधि का लंघन नहीं होता, उस जगत् में पूज्य और स्यात् पदके प्रयोगके द्वारा एकान्तवादियोंसे न जीती जा सकनेवाली श्रुतदेवताको पूजना चाहिए ॥ ४३ ॥ विशेषार्थ -- श्रुतदेवता या जिनवाणी के प्रमादसे ही हमें यह ज्ञात होता है कि पूजने योग्य कौन हैं और क्यों हैं ? तथा उनकी पूजा हमें किस प्रकार करनी चाहिए । इसलिए जिनवाणी भी पूज्य है । अगर शास्त्र न होते तो हम देवके स्वरूपको भी नहीं जान सकते थे । फिर जिनवाणी स्याद्वादनय गर्भित है । स्याद्वाद कथनकी वह शैली है जिससे अनेकान्तात्मक वस्तुका कथन करते हुए किसी प्रकार विसंवाद पैदा नहीं होता । वस्तु नित्य भी और अ भी है । द्रव्य रूपसे नित्य है और पर्याय रूपसे अनित्य है । इसके विपरीत एकान्तवादी दर्शन किसीको नित्य और किसीको अनित्य मानते हैं । जैसे उनके मतसे आकाश नित्य ही है और दीप अनित्य ही है । किन्तु जेन दृष्टिसे आकाश और दीप दोनों ही नित्य भी हैं और अनित्य भी हैं । अतः स्याद्वादी जैन दर्शन एकान्तवादी दर्शनोंके द्वारा अजेय है । वह वस्तुके यथार्थ स्वरूपको कहता है । उसकी उपलब्धि भी हमें जिनवाणी या श्रुतदेवता के प्रसादसे ही हुई है अतः उसको भी पूजना हमारा कर्तव्य है || ४३ ॥ आगे कहते हैं कि जो श्रुतदेवता की पूजा करते हैं वे परमार्थसे जिनदेवकी ही पूजा करते हैं जो भक्तिपूर्वक श्रुतको पूजते हैं वे परमार्थसे जिनदेवको ही पूजते हैं। क्योंकि सर्वज्ञ 'और देव में थोड़ा-सा भी भेद नहीं कहा है ॥ ४४ ॥ श्रुत ३ ६ ९ Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अथ साक्षादुपकारकत्वेन गुरूणामुपासने नित्यं नियुक्त उपास्या गुरवो नित्यमप्रमत्तः शिवाथिभिः । तत्पक्षताक्ष्य पक्षान्तश्चरा विघ्नोरगोत्तराः॥४५॥ तदित्यादि। तेषां गुरूणां पक्षस्तदायत्ततया वृत्तिः स एव तायपक्षो गरुडपतत्र तत्रान्तर्मध्ये चरन्ति तदन्तश्चराः विघ्नोरगोत्तरा भवन्ति । विघ्नाः प्रक्रमाद्धर्मानुष्ठानविषयेऽन्तरायास्त एवोरगाः सस्तेिभ्य उत्तराः है परे तद्रचारिणः । धर्मानुष्ठानप्रत्यूहस भिभूयन्ते इति भावः । उक्तं च 'देवपूजा गुरूपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः । दानं चेति गृहस्थानां षट्कर्माणि दिने दिने ॥' [ पद्म. पञ्च. ६७ ] ॥४५॥ अथ गुरूपास्तिविधिमाह निजिया मनोवृत्या सानुवृत्या गुरोर्मनः । प्रविश्य राजवच्छश्वद्विनयेनानुरञ्जयेत् ॥४६॥ सानुवृत्या-छन्दानुवृत्त........पं........सहितया । यन्नीतिः पूर्व चित्तं प्रभो यं ततस्तदनुवर्तनम् । इति संक्षेपतः प्रोक्ता सेवाचर्यानुजीविनाम् ॥' [ ] ॥४६॥ अथ विनयेनानुरञ्जयेदित्यस्यार्थव्यक्त्यर्थमाह विशेषार्थ-जिनदेवके मुखसे निकली और गणधरके द्वारा स्मृतिमें रखकर बारह अंगोंमें रची गयी जिनवाणीको ही श्रुत कहते हैं। श्रुतका शब्दार्थ होता है सुना हुआ। गणधरने भगवान्के मुखसे जो सुना वही श्रत है। अतः जिनदेव और उनकी वाणीमें, जो परम्परासे आचार्यों द्वारा शास्त्रों में निबद्ध है, कोई अन्तर कैसे हो सकता है । व्यक्ति अपने वचनोंके कारण ही पूज्य बनता है । व्यक्तिके वचन व्यक्तिसे भिन्न नहीं होते ॥४४॥ ___इस प्रकार संक्षेपसे देवपूजाकी विधिको कहकर आगे साक्षात् उपकारी होनेसे गुरु ओंकी भी नित्य उपासना करनेका उपदेश देते हैं परमकल्याणके इच्छुक पाक्षिक श्रावकोंको प्रमाद छोड़कर गुरुओंकी-धर्मकी आराधनामें लगानेवालोंकी नित्य उपासना करनी चाहिए। क्योंकि, जैसे गरुड़के पंख पास रहनेसे सर्प दूर रहते हैं वैसे ही गुरुओंके अधीन होकर चलनेवालोंके धार्मिक कार्यसे विघ्न दूर रहते हैं अर्थात् उनके कार्यों में विघ्न नहीं आते हैं ॥४५।। गुरुकी उपासनाकी विधि कहते हैं अपना कल्याण चाहनेवालेको छलरहित और अनुकूलता सहित मनोवृत्तिके द्वारा गुरुके मन में प्रवेश करके राजाकी तरह विनयसे गुरुको सदा अपने में अनुरक्त करना चाहिए । अर्थात् जैसे सेवक वर्ग अपने निश्छल व्यवहार और विनयपूर्वक आज्ञा पालनसे राजाके मनमें प्रवेश करके उसे अपना अनुरागी बना लेता है उसी तरह गुरुके आनेपर खड़े होना आदि कायिक विनयसे, हित-मित भाषण आदि वाचनिक विनयसे और गुरुके प्रति शुभ चिन्तन आदि मानसिक विनयसे गुरुकी आज्ञाका पालन करते हुए गुरुके मनमें अपना स्थान बनाना चाहिए॥४६॥ 'गुरुको विनयसे अनुरक्त करे' इसको स्पष्ट करते हैं Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ A७ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) पार्वे गुरूणां नृपवत्प्रकृत्यभ्यधिकाः क्रियाः। अनिष्टाश्च त्यजेत्सर्वा मनो जातु न दूषयेत् ॥४७॥ प्रकृत्यभ्यधिकाः-स्वभावादतिरिक्ता वैकारिकीः कोप-हास्य-विवादादिकाः । अनिष्टाः-पर्यस्तिकोपा- ३ श्रयादिकाः । उक्तं च 'निष्ठीवनमवष्टम्भं जम्भणं गात्रभञ्जनम् । असत्यभाषणं नमहास्यं पादप्रसारणम् ॥ अभ्याख्यानं करस्फोट करेण करताडनम् । विकारमङ्गसंस्कारं वर्जयेद्यतिसंनिधौ ॥ ] ॥४७॥ अथ पात्राणि तर्पयेदित्यादि पर्वोदृिष्टदानादि विधिप्रपञ्चार्थमाह पात्रागमविधिद्रव्य-देश-कालानतिक्रमात् । दानं देयं गृहस्थेन तपश्चयं च शक्तितः॥४८॥ स्पष्टम् । उक्तं च 'यथाविधि यथादेशं यथाद्रव्यं यथागमम् । यथापात्रं यथाकालं दानं देयं गृहाश्रमैः ॥ [ सो. उपा., ७६५ श्लो. ] ॥४८॥ अथ सम्यग्दृशो नित्यमवश्यतया विधीयमानयोनितपसोरवश्यं-भाविनं फलविशेषमाह नियमेनान्वहं किचिद्यच्छतो वा तपस्यतः । सन्त्यवश्यं महीयांसः परे लोका जिनश्रितः॥४९॥ महीयांसः-इन्द्रादिपदलक्षणाः । जिनश्रितः-जिनं सेवमानस्य ॥४९॥ राजाकी तरह गुरुओंके समीपमें अस्वाभाविक तथा शास्त्रनिषिद्ध समस्त चेष्टाओंको नहीं करना चाहिए । तथा गुरुके मनको कभी भी दूषित नहीं करना चाहिए ॥४७॥ विशेषार्थ-गुरुओंके सामने थूकना, सोना, जंभाई लेना, शरीर ऐंठना, झूठ बोलना, ठठोली करना, हँसना, पैर फैलाना, दोष लगाना, ताल ठोकना, ताली बजाना, विकार करना तथा अंग संस्कार नहीं करना चाहिए। ये क्रियाएँ अस्वाभाविक कहलाती हैं ॥४७॥ पहले कहा था कि 'पात्रोंको सन्तुष्ट करना चाहिए', अतः दान आदिकी विधिको विस्तारसे कहते हैं गृहस्थको पात्र, आगम, विधि, द्रव्य, देश और कालके अनुसार शक्तिपूर्वक दान देना चाहिए और शक्ति अनुसार तप करना चाहिए। अर्थात् दान देते समय पात्र आदिका ध्यान रखकर तदनुसार ही दान देना चाहिए। यदि उत्तम पात्र है तो उसको आगमके अनुसार नवधा भक्ति पूर्वक ऐसा सात्त्विक आहार देना चाहिए जो ऋतुके अनु नुकूल होनेके साथ इन्द्रिय बलवर्धक और कामोद्दीपक न हो । इसी प्रकार समझ लेना चाहिए ॥४८॥ सम्यग्दृष्टिके द्वारा नित्य अवश्य दान देने और तप करनेका अवश्य होनेवाला फल कहते हैं परमात्माकी सेवा करनेवाला जो भव्य प्रतिदिन नियमपूर्वक शास्त्रविहित कुछ भी दान देता है और तपस्या करता है उसके परलोक अर्थात् आगेके जन्म अवश्य ही महान् होते हैं । अर्थात दूसरे जन्ममें वह इन्द्र आदिके महान पद पाता है ।।४।। Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ ९ १२ १५ १८ ८८ अथ यदर्थ यद्दानं कर्तव्यं तत्तदर्थमाह धर्मामृत ( सागार) धर्मपात्राण्यनुग्राह्याण्यमुत्र स्वार्थसिद्धये । कार्यपात्राणि चात्रै कोत्यै त्वौचित्यमाचरेत् ॥५०॥ अनुग्राह्याणि - उपकार्याणि । अमुत्र स्वार्थ: - स्वर्गादिसुखम् । अत्रैव - इहैव जन्मनि स्वार्थसिद्धये । उक्तं च- 'परलोकधिया कश्चित्कश्चिदैहिकचेतसा । औचित्य मनसा कश्चित्सतां वित्तव्ययस्त्रिधा || परलोकैहिकौचित्येष्वस्ति येषां न धीः समा । धर्मः कार्यं यशश्चेति तेषामेतत्त्रयं कुतः ॥ [ सो. उपा. ७६९-७७० ] ॥५०॥ अथ धर्मपात्राणां यथागुणं सन्तर्पणीयत्वमाह - समयिक - साधक - समयद्योतक नैष्ठिक गणाधिपान् धिनुयात् । दानादिना यथोत्तरगुणरागात्सद्गृही नित्यम् ॥५१॥ समायिकः - गृही यतिर्वा जिनसमयश्रितः । उक्तं च'गृहस्थो वा यतिर्वापि जैनं समयमास्थितः । यथाकालमनुप्राप्तः पूजनीयः सुदृष्टिभिः ॥' [ सो. उपा. ८०९ ] साधक: ज्योतिषादिवित् । उक्तं च 'ज्योतिमन्त्रनिमित्तज्ञः सुप्रज्ञः काय कर्मसु । मान्यः समयिभिः सम्यक् परोक्षार्थं समर्थंधीः ॥ [ आगे जिस हेतु से जो दान करना चाहिए, उसे बतलाते हैं कल्याणके इच्छुक पाक्षिक श्रावकको परलोकमें स्वर्गादि सुख-सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए रत्नत्रय की साधनामें तत्पर गुरुओं की सेवा आदि करनी चाहिए। और इसी जन्म में पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए अर्थ में सहायक कर्मचारियों का काम में, सहायक पत्नीका उपकार करना चाहिए, उनकी हर तरहसे संरक्षा-सम्पोषण करना चाहिए। तथा कीर्ति के लिए उचित कार्य करना चाहिए अर्थात् दान और प्रिय वचनोंसे दूसरोंको सन्तुष्ट करना चाहिए ॥ ५० ॥ आगे धर्मपात्रोंको उनके गुणोंके अनुसार सन्तुष्ट करनेकी प्रेरणा करते हैं 1 जैनधर्मके पालक गृहस्थ या मुनिको समयिक कहते हैं । ज्योतिष मन्त्र आदि लोकोपकारक शास्त्रोंके ज्ञाताको साधक कहते हैं । जो शास्त्रार्थ आदिके द्वारा जिनमार्गकी प्रभावना करता है उसे समयद्योतक कहते हैं । जो मूल गुण और उत्तर गुणोंसे प्रशंसनीय तपमें लीन होता है उसे नैष्ठिक कहते हैं और धर्माचार्य या उसीके समान गृहस्थाचार्यको गणाधिप कहते हैं। इनमें जो-जो उत्कृष्ट हों उनके गुणों में अनुरागसे या जिसके जो उत्कृष्ट गुण हों उनमें अनुरागसे पाक्षिक श्रावकको सदा दान-सम्मान, आसनदान आदिके द्वारा पाँचोंको सन्तुष्ट करना चाहिए ॥ ५१ ॥ विशेषार्थ - उत्तम, मध्यम और जघन्य पात्रोंको दान देनेका कथन तो अनेक शास्त्रों में मिलता है | यह पात्रदान कहलाता है । आचार्य जिनसेनजी ने अपने महापुराण में पात्रदान, दयादान, समक्रियादान और अन्वयदान ये चार भेद करके दानकी दिशाको नयी गति दी है। उसीका प्रतिफल हम सोमदेव के उपासकाध्ययनमें पाते हैं । उन्हींका अनुसरण Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय) 'दीक्षायात्राप्रतिष्ठाद्याः क्रियास्तद्विरहे कुतः। तदर्थं परपृच्छायां कथं च समयोन्नतिः ।।' [ सो. उपा. ८१०-८११] [ समयद्योतक:-वादित्वादि-1 ना मार्गप्रभावकः । नैष्ठिक:-मूलोत्तरगुणश्लाध्यस्तपोऽनुष्ठाननिष्ठः । उक्तं च 'मूलोत्तरगुणश्लाघ्यैः तपोभिनिष्ठितस्थितिः । साधुः साधु भवेत्पूज्यः पुण्योपार्जनपण्डितैः ॥ [ सो. उपा. ८१२ ] गणाधिपः-धर्माचार्यस्तादृग्गृहस्थाचार्यो वा । उक्तं च 'ज्ञानकाण्डे क्रियाकाण्डे चातुर्वण्यपुरःसरः।। सुरिव इवाराध्यः संसाराब्धितरण्डकः ॥' [ सोम. उपा. ८१३ ] धिनुयात्-प्रीणयेत् । धर्मानुष्ठाने बलाधानेनोपकुर्यादित्यर्थः । यदाह 'वयं-मध्य-जघन्यानां पात्राणामुपकारकम् । दानं यथायथं देयं वैयावृत्त्यविधायिना ॥' [ अमि. श्रा. ९।१०७ ] दानादिना-दान-मानासनसंभाषणादिना । यथोत्तरगुणरागात्-यो य उत्तरः समयिकादीनां मध्ये तस्य तस्य गुणेषु प्रीतितः । अथवा यो यो यस्योत्कृष्टो गुणस्तत्र तत्र प्रीत्या तं धिनुयादिति योज्यम् । अत्र श्रमणोपासकेषु मुमुक्षुषु रत्नत्रयानुग्रहबुद्धया संतर्पणं पात्रदत्तिर्बुभुक्षुषु च गृहस्थेषु वात्सल्येन यथार्हमनुग्रहः समानदत्तिरिति विभागः ॥५१॥ पं. आशाधरजी-ने किया है। सोमदेवजीने पात्रके पाँच भेद किये हैं-समयी, साधक, साधु, आचार्य और समयदीपक । गृहस्थ हो या साधु, जो जैनधर्मका अनुयायी है उसे समयी या समयिक कहते हैं । ये साधर्मी पात्र यथाकाल प्राप्त होनेपर सम्यग्दृष्टियोंको उनका आदर करना चाहिए। जिनकी बुद्धि परोक्ष अर्थको जाननेमें समर्थ है उन ज्योतिषशास्त्र, मन्त्रशास्त्र, निमित्तशास्त्रके ज्ञाताओंका तथा प्रतिष्ठाशास्त्रके ज्ञाता प्रतिष्ठाचार्योंका भी सम्मान करना चाहिए। यदि ये न हों तो मुनिदीक्षा, तीर्थयात्रा और बिम्बप्रतिष्ठा वगैरह धार्मिक क्रियाएँ कैसे हो सकती हैं; क्योंकि मुहूर्त देखनेके लिए ज्योतिर्विदोंकी, प्रतिष्ठा करनेके लिए मन्त्र शास्त्रके पण्डितोंकी आवश्यकता होती है। यदि अन्य धर्मावलम्बी ज्योतिषियों और मान्त्रिकोंसे पूछना पड़े तो अपने धर्म की उन्नति कैसे हो सकती है ? तथा अपने मुहूर्तविचारमें भी दूसरोंसे अन्तर है। वैवाहिक विधि दूसरे करावे तो उनमें तो श्रद्धा ही नहीं होती। अतः जैन मन्त्रशास्त्र, जैन ज्योतिषशास्त्र और जैन क्रियाकाण्डके ज्ञाताओंका सम्मान ना आवश्यक है। मल गण और उत्तर गणोंसे युक्त तपस्वीको साध कहते हैं। उन्हें ही आशाधरजीने नैष्ठिक कहा है। उन्हें भी भक्तिभावसे पूजना चाहिए । जो ज्ञानकाण्ड और आचारमें चतुर्विध संघके मुखिया होते हैं तथा संसार-समुद्रसे पार उतारनेमें समर्थ हैं उन्हें आचार्य या गणाधिप कहते हैं। उनकी देवके समान आराधना करनी चाहिए। जो लोकज्ञता, कवित्व आदिके द्वारा और शास्त्रार्थ तथा वक्तृत्व कौशल-द्वारा जैनधर्मकी प्रभावना करने में १. 'समयी साधकः साधुः सूरिः समयदीपकः । तत्पुनः पञ्चधा पात्रमामनन्ति मनीषिणः।' -सो. उपा. ८०८ श्लो.। २. 'लोकवित्वकवित्वाद्यैर्वादवाग्मित्वकौशलैः । मार्गप्रभावनोद्युक्ताः सन्तः पूज्या विशेषतः ॥' -सो. उपा. ८१४ श्लो.। सा.-१२ Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत ( सागार) अथ समदत्तिविधानोपदेशार्थमादौ समयिकं स्तुवन्नाह स्फुरत्येकोऽपि जैनत्वगुणो यत्र सतां मतः । तत्राप्यजनैः सत्पात्रोत्यं खद्योतवद्रवौ ॥५२॥ एकः ज्ञानतपोरहितः, जैनत्वगुणः-जिन एव देवो मे भवार्णवोत्तारकत्वादित्यभिनिवेशधर्मः ॥५२॥ अथ श्रेयोथिनां जनानुग्रहानुभावमाह वरमेकोऽप्युपकृतो जैनो नान्ये सहस्रशः। दलादिसिद्धान् कोऽन्वेति रससिद्धे प्रसेदुषि ॥५३॥ दलादि-आदिशब्देन वर्णोत्कर्षादि । प्रसेदुषि-प्रसन्ने सति ॥५३॥ अथ नामादिनिक्षेपविभक्तानां चतुर्णा जनानां पात्रत्वं यथोत्तरं विशिनष्टि नामतः स्थापनातोऽपि जैन : पात्रायतेतराम् । स लभ्यो द्रव्यतो धन्यैर्भावतस्तु महात्मभिः ।।५४।। पात्रायते तरां-अजैनपात्रेभ्योऽतिशयेन संयुज्यमाननिर्वाणकारणगुणलक्षणपात्रवदाचरति, सम्यक्त्वसहकारिपुण्यास्रवणकारणत्वात् ॥५४॥ तत्पर रहते हैं उन्हें समयदीपक या समयद्योतक कहते हैं। उनका भी समादर करना कर्तव्य है। इन पाँच दानोंमें-से श्रमण और श्रावक मुमुक्षुओंको रत्नत्रयकी भावनासे जो दान दिया जाता है वह तो पात्रदत्ति है। तथा क्षुधापीड़ित गृहस्थोंको वात्सल्य भावसे जो यथायोग्य दिया जाता है वह समदत्ति है। यह विभाग कर लेना चाहिए ।।५।। आगे समदत्तिका उपदेश करते हैं जिसमें साधु जनोंको इष्ट एक भी जैनत्व गुण चमकता है उसके सामने सत्पात्र भी अजैन सूर्य के सामने जुगनूकी तरह प्रतीत होते हैं ।।२।। विशेषार्थ-जिन ही मेरे आराध्यदेव हैं क्योंकि संसार-समुद्रसे पार लगाते हैं, इस प्रकारके अभिप्रायको यहाँ जैनत्व गुण कहा है। उसके साथमें ज्ञान और तप न होनेसे उसे एक कहा है । जैसे सूर्य के सामने जुगनू निष्प्रभ हो जाते हैं उसी तरह जिसमें एक भी जैनत्व गुण भासमान है उस व्यक्तिके सामने मिथ्याज्ञान और मिथ्यातपसे युक्त मिथ्यादृष्टि धार्मिक प्रभाहीन हो जाते हैं ॥५२॥ आगे जैनपर अनुग्रह करनेका महत्त्व बतलाते हैं एक भी जैनका उपकार करना श्रेष्ठ है, हजारों भी अजैनोंको उपकृत करना श्रेष्ठ नहीं है। क्योंकि पारेसे गरीबी, रोग, बुढ़ापा आदिको दूर कर सकने की शक्तिसे युक्त पुरुषके प्रसन्न होनेपर बनावटी सुत्रणे आदिको बनाने में प्रसिद्ध पुरुषको कौन पसन्द करता है ? ॥५३॥ विशेषार्थ-यह कथन धार्मिकताको दृष्टि में रखकर किया गया है । जैनधर्म प्रकारान्तरसे आत्मधर्म ही है। जैन वही है जो आत्मा के निकट है। उसका उपकार करनेसे आत्मधर्मको बल मिलता है और अनात्मधर्मका परिहार होता है। आत्मासे भिन्न पदार्थों में आसक्ति ही अनात्मधर्म है । उसको बल नहीं देना धार्मिकका कर्तव्य है ॥५३॥ आगे नाम आदिके निक्षेपसे चारप्रकारके जैनों में उत्तरोत्तर विशेष पात्रता बतलाते हैं नामसे तथा स्थापनासे भी जैन अजैन पात्रोंसे विशिष्ट पात्र होता है। द्रव्यसे जैन पुण्यवानोंको प्राप्त होता है और भावसे जैन तो महाभागोंको ही मिलता है ॥५४।। Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय) अथ भावजनं प्रति निरुपाधिप्रीतिमतोऽभ्युदयनिःश्रेयससंपदं फलमाह प्रतीतजैनत्वगुणेऽनुरज्यन्निाजमांसंसृति तेद्गुणानाम् । धुरि स्फुरन्नभ्युदयैरदृप्तस्तृप्तस्त्रिलोकोतिलकत्वमेति ॥५५॥ अनुरज्यन्-स्वयमेवानुरागं कुर्वन् । आसंसृति तद्गुणानां धुरिस्फुरन्-भवे भवे जैनानामग्रणीभवन्नित्यर्थः । अदृप्तः-अकृतमदः । सम्यक्त्वसहचारिपुण्योदययोगात् ।।५५॥ अथ गृहस्थाचार्याय तदभावे मध्यमपात्राय वा कन्यादिदानं पाक्षिकश्रावकस्य कर्तव्यतयोपदिशति निस्तारकोत्तमायाथ मध्यमाय सधर्मणे। कन्याभहेमहस्त्यश्वरथरत्नादि निर्वपेत् ॥५६॥ अथ पक्षान्तरसूचने अधिकारे वा। तत्र जघन्यविषयां समदत्ति व्याख्याय मध्यमविषया साऽवधिक्रियत ९ इत्यर्थः । सधर्मणे-समान आत्मसमो धर्मः क्रियामन्त्रव्रतादिलक्षणो गुणो यस्य तस्मै । रत्नादि । आदिशब्देन वस्त्रगृहगवादि । निर्वपेत्---दद्यात् । उक्तं च चारित्रसारे (प. २१ )-'समदत्तिः स्वसमक्रियामन्त्राय निस्तारकोत्तमाय कन्या भूमि-सुवर्ण-हस्त्यश्व-रथ-रत्नादिदानं, स्वसमानाभावे मध्यमपात्रस्यापि दानमिति ॥५६॥ १२ विशेषार्थ-नाम, स्थापना, द्रव्य और भावके भेदसे निक्षेपके चार भेद हैं। जो मात्र नामसे जैन है उसे नामजैन कहते हैं। जिसमें 'यह जैन है' ऐसी कल्पना कर ली गयी है वह स्थापनाजैन है। जो आगे जैनत्व गुणकी योग्यतासे विशिष्ट होनेवाला है वह द्रव्य. जैन है। और जो वर्तमानमें जैनत्व गुणसे विशिष्ट है वह भावजैन है। इनमें से सबसे निकृष्ट नामजैन और स्थापनाजैन हैं। किन्तु पात्रकी दृष्टि से जैनेतर पात्रोंसे वे भी श्रेष्ठ हैं । क्योंकि उनमें जैनत्वका नाम तो है। रहे द्रव्य जैन और भावजैन, वे तो सच्चे पात्र हैं ही। इसीसे कहा है कि आजके समयमें यदि किसीको उपकार करनेके लिए ऐसा व्यक्ति मिल जाये जो आगे महान जैनवती या ज्ञानी होनेवाला हो तो वह व्यक्ति धन्य है। और यदि पात्र मुनि आदि हो तब तो ऐसे पात्रको दान देनेवाला महाभाग्यशाली है ॥५४॥ _ आगे कहते हैं कि जो भावजैनके प्रति निश्छल प्रीति रखता है उसे स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति होती है- जिसका जैनत्व गुण प्रसिद्ध है ऐसे पुरुषमें निश्छल अनुराग करनेवाला व्यक्ति संसार पर्यन्त अर्थात् भव-भवमें प्रसिद्ध जैनत्व गुणवाले पुरुषोंमें अग्रणी होता हुआ, सम्यक्त्व सहचारी पुण्योदयके योगसे सांसारिक भोगोंसे विरक्त होकर तीनों लोकोंके तिलकपनेको अर्थात् परमपदको प्राप्त करता है ।।५५।। आगे कहते हैं कि पाक्षिक श्रावकको सबसे प्रथम गृहस्थाचार्यको उसके अभावमें मध्यम पात्रको कन्या आदि देना चाहिए संसाररूपी समुद्रसे पार उतारनेवाले गृहस्थों में जो प्रमुख हो, उसके अभावमें मध्यम साधर्मी के लिए कन्या, भूमि, स्वर्ण, हाथी, घोड़ा, रथ, रत्न आदि देना चाहिए ॥५६।। विशेषार्थ-कन्यादान भी समदत्तिमें आता है। पहले जो कहा था कि नाम और स्थापनासे जो जैन है वह भी पात्र है और उसे भी दान देना चाहिए । वह जघन्य समदत्तिका कथन है और यह मध्यम समदत्तिका कथन है। क्योंकि यदि गृहस्थ साधुकी अपेक्षा गुणोंमें अधिक भी हो तब भी मध्यम पात्र ही होता है उसे ही कन्या देना चाहिए। कन्या१. 'सद्गुणानाम्' इति टीकायाम् । Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ ६ ९ ९२ धर्मामृत ( सागार अथ धर्मभ्यः कन्यादिदाने हेतुमाह - आधानादिक्रियामन्त्रव्रताद्यच्छेदवाञ्छया । प्रदेयानि सधर्मेभ्यः कन्यादीनि यथोचितम् ॥५७॥ मन्त्राः—प्रत्यासत्तेराधानादि क्रियासम्बन्धिन एवार्षोक्ताः अपराजितमन्त्रो वा ॥५७॥ अथ सम्यक् कन्यादानविधि तत्फलं चाह - निर्दोषां सुनिमित्तसूचितशिवां कन्यां वराहैर्गुणैः स्फूर्जन्तं परिणाय्य धर्म्यविधिना यः सत्करोत्यञ्जसा । दम्पत्योः स तयोस्त्रिवर्गघटनात्त्रवगकेष्वग्रणी भूत्वा सत्समयास्त मोहमहिमा कार्ये परेऽप्यूर्जति ॥५८॥ दानके योग्य वही पात्र होता है जो अपना सधर्मा हो, अर्थात् जिसका धर्म - क्रिया, मन्त्र, व्रत वगैरह अपने समान हो ॥५६॥ आगे सधर्माको ही कन्या क्यों देनी चाहिए, उसका कारण कहते हैं— गर्भाधान आदि क्रियाएँ, उन क्रियाओं सम्बन्धी मन्त्र अथवा पंचनमस्कार मन्त्र और मद्य आदिके त्यागरूप व्रतोंको सदा बनाये रखनेकी इच्छासे यथायोग्य कन्या आदि साधर्मीको देना चाहिए ॥५७॥ विशेषार्थ - जैन धर्म की धार्मिक क्रियाएँ, जिनका वर्णन महापुराणके ३८-३९ आदि पर्वोंमें भगवज्जिनसेनाचार्यने किया है, तथा उनके मन्त्र और पंच नमस्कार मन्त्र, व्रत नियम आदि अन्य धर्मोसे भिन्न है । यदि लड़की अजैन कुलमें जाती हो तो उसके व्रत, नियम, देवपूजा, पात्रदान सब छूट जाते हैं। इस तरहसे उसका धर्म ही छूट जाता है । इसलिए कन्या साधर्मीको ही देनी चाहिए। धर्मके सामने संसारका ऐश्वर्य तुच्छ है । धर्मके रहने से वह भी मिल जाता है और धर्मके अभाव में प्राप्त भोग भी नष्ट हो जाते हैं । इसीसे चारित्रसार में भी समदत्तिका स्वरूप बतलाते हुए अपने समान धर्म कर्मवाले मित्रको जो उत्तम गृहस्थ हो, कन्या, भूमि, स्वर्ण, हाथी, रथ, रत्न आदि देनेका विधान किया है। यदि अपने समान न मिले तो मध्यम पात्रको भी देनेका विधान किया है । किन्तु विधर्मी या अधर्मीको देनेका विधान नहीं किया ||५७॥ आगे कन्यादान की विधि और उसका फल कहते हैं जो गृहस्थ सामुद्रिक शास्त्र में कहे गये दोषोंसे रहित तथा भावी शुभाशुभको जानने के उपायोंके द्वारा ज्योतिर्विदोंने जिसका सौभाग्य सूचित कर दिया है, उस कन्या को वरके योग्य कुल, शील, परिवार, विद्या, सम्पत्ति, सौरुप्य, योग्यवय आदि गुणोंसे विचारशील मनुष्योंके चित्तमें जँचनेवाले वरके साथ धार्मिक विधिसे विवाह करके श्रद्धापूर्वक साधर्मीका सत्कार करता है, वह गृहस्थ अपनी कन्या और उसके वरके धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ के सम्पादन करनेसे धर्म, अर्थ और कामका पालन करनेवाले गृहस्थों में मुखिया होकर जिनागम अथवा आर्य पुरुषों की संगतिसे चारित्रमोहनीय कर्मकी गुरुता दूर होनेपर पारलौकिक कार्यमें भी समर्थ होता है ॥५८॥ १. 'समदत्तिः स्वसमक्रियाय मित्राय निस्तारकोत्तमाय कन्याभूमिसुवर्णहस्त्यश्वरथ रत्नादि दानं स्वसमानाभावे मध्यमपात्रस्यापि दानम् । चारित्रसार, पृ. २१ । Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय) निर्दोषां-उत्तरत्वं [ उन्नतत्वं ] कनीमिकयोर्लोमशत्वं जङ्घयोरमांसलत्वमूर्वोरचारुत्वं कटि-नाभिजठर-कुचयुगलेषु, शिरालत्वाशुभसंस्थानत्वे बाह्वोः, कृष्णत्वं तालु-जिह्वाधर-हरीतिकीषु, विरलविषमभावी दशनेषु, सकूपत्वं कपोलयोः, पिङ्गलत्वमक्ष्णोर्लग्नत्वं चिल्लिकयोः, स्थपुटत्वं निडाले, दुःसन्निवेशत्वं ३ श्रवणयोः, स्थूलपरुषकपिलभावः केशेषु, अतिदीर्घातिलघुन्यूनाधिकता-समविकट-कुब्जवामन-किरातांगत्वं जन्मदेहाभ्यां समानत्वाधिकत्वे च' (नीतिवा. ३१११४)। इत्यादि कन्यादोषरहिताम् । यदाह-'वरं वेश्यापरिग्रहो नाविशुद्धकन्यापरिग्रहः' इति । सुनिमित्तसूचितशिवां-सुनिमित्तः सामुद्रिकदूतज्योतिषादि- ६ भविष्यच्छुभाशुभज्ञानोपायैः सूचितं प्रकाशितं शिवं स्वस्य वरस्य कल्याणं यस्यास्ताम् । किं च वरितरि दूते वा सहसा कन्यागृहं गते सति कन्या अभ्यक्ता व्याधिमती रुदती पतिघ्नी सुसा स्तोकायुरप्रसन्ना दुःखिता बहिर्गता, कुलटा कलहोद्युक्ता परिजनोद्वासिनी अप्रियदर्शना च दुर्भगा स्यादिति न तां वृणीत कन्याम् । वराहैर्गुणैः- ९ कुलीन-सुशीलत्वादिभिः । उक्तं च 'कुलं च शीलं च सनाथता च विद्या च वित्तं च वपुर्वयश्च । एतान् गुणान् सप्त परीक्ष्य देया कन्या बुधैः शेषमचिन्तनीयम् ॥' [ ] १२ कुलस्य प्रागुपादानमकुलीने कन्याविनियोगस्यात्यन्तनिषेधार्थम् । यदाह'वरं जन्मनाशः कन्याया ना............. परिणाय्य-[युक्तितो वर-] णविधानमरिनदेवद्विजसाक्षिकं च पाणिग्रहणं विवाहस्तं कारयित्वा । १५ यदाह-"विवाहपूर्वो व्यवहारश्चातुर्वण्यं कुलीनयतीति, [-नीतिवा. ३११२] धम्यविधिना-घा:-धर्मादनपेताः ब्राह्मणप्राजापत्यार्षदैवाश्चत्वारो विवाहाः । ततोऽन्ये गान्धर्वासुरराक्षसपैशाचाश्चत्वारोऽधाः । तल्लक्षणनि यथा विशेषार्थ-भारतीय धर्ममें गृहस्थाश्रमका बहुत महत्त्व है। आचार्य पद्मनन्दिने कहा है कि इस कलिकालमें जिनालय, मुनि, धर्म और दान इन सबका मूल कारण श्रावक हैं। श्रावक न हों तो इनमें से कोई भी रक्षित नहीं रह सकता । अतः इन सबकी स्थिति तभी तक है जब तक श्रावक और श्राविकाओंमें धार्मिक प्रेम है । इसीसे विवाह सम्बन्ध साधर्मियोंमें ही करनेपर जोर दिया है । भारतमें विवाहिताको केवल पत्नी नहीं कहते, धर्मपत्नी कहते हैं । क्योंकि वह पतिके धर्मकी भी सहचारिणी होती है । पत्नीके योग्य होनेपर ही पतिका भी योगक्षेम चलता है और धर्मसाधन होता है। अतः वैवाहिक सम्बन्ध बहुत सोच-समझकर किया जात ता है। सबसे प्रथम कन्याका कुल शील सौभाग्य आदि देखा जाता है, इसी तरह कन्यापक्षकी ओरसे वरके गुण देखे जाते हैं तब विवाह होता है । कन्या निर्दोष होना चाहिए-आँखकी पुतलियोंका उठा होना, जंघाओंपर रोम होना, उरुओंका मांसविहीन होना, कटि-नाभि-उदर और कुच युगलका सुन्दर न होना, बाहुओं पर नसोंका उभार तथा उनका आकार सुन्दर न होना, तालु, जीभ और ओठोंपर कालापन होना, दाँतोंका विरल और टेढ़े-मेढ़े होना, कपोलोंकी हड्डीका उठा होना, आँखोंमें पीलापना, भौंहोंका जुड़ा होना, मस्तकका उठा होना, कानोंकी रचना खराब होना, केशोंका स्थूल, कठोर और पीला होना, अतिलम्बी या अतिलघु होना, अंगोंका कुबड़ा बौना आदि होना दोष है । इत्यादि दोषोंसे रहित कन्या होना चाहिए । कहा है-वेश्याको स्वीकार करना उत्तम है किन्तु .१. 'संप्रत्यत्र कलो काले जिनगेहो मुनिस्थितिः । धर्मश्च दानामित्येषां श्रावका मूलकारणम् ॥ -पद्म. पञ्च.६६ Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत (सागार ) ' स ब्राह्म विवाहो यत्र वरायालङ्कृत्य कन्या प्रदीयते ' त्वं भवास्य महाभागस्य सधर्मचारिणीति ।' विनियोगेन कन्याप्रदानात् प्राजापत्यः । गो-भूमि सुवर्णपुरस्सरं कन्याप्रदानादार्ष: । स दैवो विवाहो यत्र यज्ञार्थ३ मृत्विजः कन्याप्रदानमेव दक्षिणा । मातुः पितुर्बन्धूनां चाप्रामाण्यात्परस्परानुरागेण मिथः समवायाद् गान्धर्वः । पणबन्धेन ( ? ) कन्याप्रदानादासुरः । सुप्तप्रमत्तकन्यादानात्पैशाचः । कन्यायाः प्रसह्यादानाद्राक्षसः । एते चत्वारोऽधर्म्या अपि नाधर्म्या यद्यस्ति वधूवरयोरनपवादं परस्परस्य भाव्यत्वम् । - नीति वा ३१।४-१३ | ६ अत्राह मनुः ९ १२ १५ १८ ९४ 'ब्राह्मो देवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः । गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ आच्छाद्य चाचयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् । आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्म्यः प्रकीर्तितः ॥ यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते । अलङ्कृत्य सुतादानं देवं धर्म्यं प्रचक्षते ॥ एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः । कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्म्यः स उच्यते ॥ सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचानुभाव्य तु । कन्याप्रदानमभ्यच्यं प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥ ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्वा कन्याये चैव शक्तितः । कन्याप्रदानं स्वाछन्द्यादासुरोऽधम्र्म्यं उच्यते ॥ इच्छयाऽन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च । गान्धवः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसंभवः || अविशुद्ध कन्याका ग्रहण उत्तम नहीं है । जो कन्या रोगी हो, अल्पायु हो, अप्रसन्न रहती हो, कुलटा हो, लड़ाकू हो, अभागिनी हो, देखने में अप्रिय हो उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए । वर कुलीन और सुशील होना चाहिए। कहा है- कुल, शील, सनाथता, विद्या, धन, शरीर और आयु इन सात गुणोंकी परीक्षा करके ही कन्या देना चाहिए। सबसे प्रथम कुलको स्थान दिया है कि अकुलीनको कन्या कभी भी नहीं देना चाहिए। कहा है- 'कन्याका मरना उत्तम है किन्तु अकुलीनको कन्या देना उत्तम नहीं है ।' विवाह के चार प्रकार कहे हैं - ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और दैव । इनके अतिरिक्त गान्धर्व, आसुर, राक्षस और पैशाच विवाह अधर्म्य हैं । इनका लक्षण इस प्रकार है - कन्याको अलंकृत करके वरको देना कि तू इस भाग्यशालीकी धर्मपत्नी होओ, ब्राह्म विवाह है। बदलेमें कन्या देना प्राजापत्य विवाह है। गौ, भूमि, सुवर्णदान पूर्वक कन्या देना आ विवाह है । जिसमें यज्ञ के पुरोहितको यज्ञ कराने की दक्षिणाके रूपमें कन्या दी जाती है वह दैवविवाह है। माता-पिता, बन्धु बान्धवोंकी अनुमतिके बिना परस्परके अनुरागसे जो विवाह किया जाता है वह गान्धर्व है |... कन्या देना आसुर विवाह है । सोती हुई या बेहोश कन्याको उठा ले जाना पैशाच विवाह है। जबरदस्ती कन्याको ले जाना राक्षस विवाह है । ये चारों विवाह अधर्म्य होनेपर भी यदि वधू और वरमें परस्पर में अपवादरहित भव्यता है तो अधर्म्य नहीं है । मनुने कहा है- 'ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच आठ भेद है । श्रुति और शीलसे सम्पन्न वरको स्वयं आमन्त्रित करके पूजापूर्वक Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) हृत्वा छित्वा च भित्वा च क्रोशन्तीं रुदती गृहात् । प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसोऽधर्म उच्यते ॥ सुप्तां प्रमत्तां मत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति । स पापिष्टो विवाहानां पैशाचः प्रथितोऽष्टमः ।। ब्राह्मादिषु विवाहेषु चतुर्वेवानुपूर्वकः । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्राः जायन्ते शिष्टसंमताः ।। रूपसत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः । पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः ।। इतरेषु त्वशिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः । जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः॥ अनिन्दितैः स्त्रीविवाहैरनिन्द्या भवति प्रजा। निन्दितैनिन्दिता नृणां तस्मान्निन्द्यानि वर्जयेत् ।।' [मनुस्मृ. ३।२१,२७-३४,३९-४२] १२ धर्म्यविवाहविधिरा!क्तो यथा 'ततोऽस्य गुर्वनुज्ञानादिष्टा वैवाहिकी क्रिया। वैवाहिके कुले कन्यामुचितां परिणेष्यतः ॥ सिद्धार्चनविधिं सम्यग् निर्वयं द्विजसत्तमाः। कृताग्नित्रयसंपूज्याः कुर्युस्तत्साक्षिकां क्रियाम् ।। पुण्याश्रमे क्वचित् सिद्धप्रतिमाभिमुखं तयोः । दम्पत्योः परया भूत्या कार्यः पाणिग्रहोत्सवः ।। वेद्यो प्रणीतमग्नीनां त्रयं द्वयमथैककम् । ततः प्रदक्षिणीकृत्य प्रशय्य विनिवेशनम् ॥ कन्यादान ब्राह्म विवाह है। यज्ञमें पधारे ऋत्विजको जो यज्ञकर्म करता है, अलंकृत करके कन्या देना दैवविवाह है। वरसे एक या दो गोमिथुन लेकर विधिवत् कन्या देना आर्ष विवाह है। दोनों मिलकर धर्मका पालन करना ऐसा कहकर कन्या देना प्राजापत्य विवाह है । ये चारों विवाह धर्म्य हैं। कुटुम्बियोंको कन्याके लिए धन देकर बलपूर्वक कन्यादान आसुर है। कन्या और वरका परस्परकी इच्छासे सम्बन्ध करना गान्धर्व विवाह है। यह विवाह कामज है। रोती-चिल्लाती हुई कन्याको बलपूर्वक हरण करना राक्षस विवाह है। सोती हुई या पागल या बेहोश कन्याके पास एकान्तमें जाना सब विवाहोंमें निकृष्ट पैशाच विवाह है । इनमें से ब्राह्म आदि चार विवाहोंमें ही ब्रह्मविद् तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होते हैं और वे रूप, सत्त्व आदि गुणोंसे युक्त धनवान , यशस्वी और धार्मिक होते हैं तथा सौ वर्ष तक जीते हैं। अन्य दुर्विवाहोंमें ब्रह्म और धर्मके द्वेषी, असत्यवादी क्रूर पुत्र उत्पन्न होते हैं। अनिन्दित स्त्रीविवाहोंसे अनिन्द्य सन्तान उत्पन्न होती है और निन्दितसे निन्दित । इसलिए मनुष्योंको निन्दित विवाह नहीं करना चाहिए । महापुराणमें विवाह क्रियाका वर्णन करते हुए लिखा है-विवाहके योग्य कुलमें उत्पन्न हुई कन्याके साथ जो विवाह करना चाहता है गुरुकी आज्ञासे उसकी वैवाहिक क्रिया की जाती है। सबसे पहले अच्छी तरह सिद्ध भगवानका पूजन करना चाहिए। फिर १. प्रसज्य । Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९६ धर्मामृत ( सागार) पाणिग्रहणदीक्षायां नियुक्तं तद्वधूवरम् । आसप्ताहं चरेद् ब्रह्मवतं देवाग्निसाक्षिकम् ।। कृत्वा स्वस्योचितां भूमि तीर्थभूमी विहृत्य च । स्वगृह प्रविशेद् भूत्या परया तद्वधूवरम् ॥ विमुक्तकंकणं पश्चात् स्वगृहे शयनीयकम् । अधिशय्य यथाकालं भोगाङ्गेरुपलालितम् ।। सन्तानार्थमृतावेव कामसेवां मिथो भजेत् । शक्तिकालव्यपेक्षोऽयं क्रमोऽशक्तेष्वतोऽन्यथा ॥ [ महापु. ३८।१२७-१३४ ] 'शिथिले पाणिग्रहे वरः कन्यया परिभूयते। मुखं पश्यतो वरस्यानिमीलितलोचना कन्या भवति प्रचण्डा। सह शयानस्तूष्णींभवन् पशुवन्मन्येत । बलादाक्रामन्नाजन्मविद्वेष्यो भवति । धैर्य-चातुर्यायत्तं हि कन्याविषेभणम्। समविभवाभिजनयोरसमगोत्रयोश्च विवाहसंबन्धः । महतः कन्यापितुरैश्वर्यादल्पमव१२ गणयति । अल्पस्य कन्यापितुर्दीविद्यान्महताऽवज्ञायेत । अल्पस्य महता संव्यवहारे महान् व्ययो अल्पश्चायः । सम्यग्धृताऽपि कन्या तावत्सन्देहास्पदं यावन्न पाणिग्रहः। आनुलोम्येन चतुस्त्रिशद्विवर्ण कन्याभाजनानि ब्राह्मणक्षत्रियविशः । देशकुलापेक्षो मातुलसंबन्ध इति ।' [नीति वा. ३१११५-२९] सत्समय:-जिनप्रवचनमायसंगतिर्वा । तेनास्तो-निराकृतो। मोहस्य-चारित्रमोहकर्मणो । - महिमा-गुरुत्वं येन स तथोक्तः । तथा च 'जन्मसन्तानसंपादि-विवाहादि-विधायिनः। स्वाः परे स्युः सकृत्प्राणहारिणो न परे परे ॥ [ 'सर्व धर्ममयं क्वचित्क्वचिदपि प्रायेण पापात्मकं क्वाप्येतद् द्वयवत्करोति चरितं प्रज्ञाधनानामपि । तस्मादेष तदन्धरज्जुवलनं स्नानं गजस्थाथवा, मत्तोन्मत्तविचेष्टितं न हि हितो गेहाश्रमः सर्वथा ॥' [ तीनों अग्नियोंकी पूजापूर्वक वैवाहिक क्रिया की जाती है। किसी पवित्र स्थानमें बड़ी विभूतिके साथ सिद्ध भगवान्की प्रतिमाके सामने वर-वधूका विवाहोत्सव करना चाहिए । तीन अग्नियोंकी प्रदक्षिणा देकर वर-वधूको समीप ही बैठना चाहिए । तथा देव और अग्निकी साक्षीपूर्वक सात दिन तक ब्रह्मचर्य धारण करना चाहिए। फिर किसी योग्य देशमें भ्रमण कर तथा तीर्थभूमिमें विहार करके वर-वधूका गृहप्रवेश करना चाहिए । फिर शय्यापर शयन कर केवल सन्तान उत्पन्न करनेकी इच्छासे ऋतुकालमें ही काम-सेवन करना चाहिए। काम-सेवनका यह क्रम काल तथा शक्तिकी अपेक्षा रखता है। अतः जो अशक्त हैं उनके लिए अन्य क्रम है । यह विवाहकी धार्मिक विधि है। नीतिवाक्यामृतमें कहा है--'प्रथम रात्रिको पत्नीके साथ सोते हुए यदि वर एकदम चुप रहता है तो उसे पशुके समान माना जाता है। यदि वह बलात्कार करता है तो उससे पत्नी जन्म-भर द्वेष रखती है। इसलिए धैर्य चतुराई में पत्नीका विश्वास प्राप्त करना चाहिए। विवाह-सम्बन्ध समान सम्पत्तिशाली १. क्रान्त्वा -मु.। २. पितुर्दीस्थ्यं महता कष्टेन विज्ञायते ।-नी. वा. । ३. वर्णाः कन्याभाजना:-नी. वा. । १८ . Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) इत्यादि सूक्तिसुधा........भितः। परेऽपि-पारलौकिके। ऊर्जति-समर्थो भवति । एतेनेदमपि संगृहीतम् 'द्वो हि धर्मों गृहस्थानां लौकिकः पारमार्थिकः । लोकाश्रयो भवेदाद्यः परः स्यादागमाश्रयः ।। जातयोऽनादयः सर्वास्तत्क्रियापि तथाविधा । श्रुतिः शास्त्रान्तरं वास्तु प्रमाणं कात्र नः क्षतिः ।। स्वजात्यैव विशुद्धानां वर्णानामिह रत्नवत् । तक्रियाविनियोगाय जैनागमविधिः परम् ।। यद्भव भ्रान्तिनिर्मुक्तिहेतुधीस्तत्र दुर्लभा । संसारव्यवहारे तु स्वतः सिद्धे वृथागमः ।। तथा च सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधिः । यत्र सम्यक्त्वहानिनं यत्र न व्रतदूषणम् ॥ [ सो. उपा. ४७६-४८०] इति स्थितम् ॥५८॥ अथ सत्कन्याप्रदातुः सार्धामकोपकारकरणद्वारेण महान्तं सुकृतलाभमवभासयन्नाह सत्कन्यां ददता दत्तः सत्रिवर्गो गृहाश्रमः । गृहं हि गृहिणीमाहुन कुड्यकटसंहतिम् ॥५९॥ किन्तु विभिन्न गोत्रवालोंमें होता है । यदि कन्याका पिता समृद्धिशाली हुआ तो कन्या अपनेसे हीन ऐश्वर्यवाले पतिका तिरस्कार करती है। छोटा आदमी यदि बड़ेके साथ सम्बन्ध करता है तो व्यय तो बहुत होता है और आय कम होती है। विवाहकी बात पक्की हो जानेपर भी जबतक विवाह न हो जाये तबतक सन्देह रहता है। अनुलोम विवाहमें ब्राह्मण चारों वर्णकी, क्षत्रिय तीन वर्णोंकी और वैश्य दो वर्षों की कन्यासे विवाह कर सकता है। देश विशेष में मामाकी कन्यासे भी विवाह होता है।' - आचार्य कहते हैं-'यह गृहस्थाश्रम क्वचित्-क्वचित् धर्ममय है किन्तु प्रायः पापमय है। इसलिए यह अन्धेके रस्सी बटनेके समान या हाथीके स्नानके समान है। यह सर्वथा हितकर नहीं है।' गृहस्थके दो धर्म हैं-लौकिक और पारलौकिक । लौकिक धर्म लोकरीतिके अनुसार चलता है। किन्तु पारलौकिक धर्म आगमके अनुसार होता है । सभी जैनोंको ऐसी लौकिक विधि मान्य होती है जिसके पालन करनेसे सम्यक्त्वकी हानि न हो और व्रतोंमें दूषण न लगे। सांसारिक व्यवहार तो स्वतःसिद्ध है उसके लिए आगमकी आवश्यकता नहीं है। आगमकी आवश्यकता तो संसार छोड़ने के लिए है। विवाहका भी यही लक्ष्य है, संसारमें रमना नहीं। जो विवाह द्वारा जीवनको सुखी बनाते हैं वे अन्तमें गृह त्यागकर अपने परलोकको भी सुधारने में समर्थ होते हैं ॥५८॥ आगे कहते हैं कि योग्य कन्याके दाता पिताको अपने साधर्मीका उपकार करनेसे महान् पुण्यबन्ध होता है सत्कन्या देनेवालेने धर्म-अर्थ-काम सहित गृहाश्रम दे दिया ; क्योंकि पत्नीको ही गृह कहते हैं, दीवार और बाँस आदिके समूहको गृह नहीं कहते ॥५९।। १. 'गृहिणी गृहमुच्यते न पुन: कुड्यकटसंघातः ।'-नीतिवा०, ३१॥३१ । सा.-१३ Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मामृत (सागार) सत्रिवर्गः - धर्मार्थकामानां सद्गृहिणीमूलत्वात् । तथाहि धर्मः स्वदारसन्तोषाद्यात्मक संयमासंयमलक्षणो देवादिपरिचरणस्वरूपः सत्पात्रदानादिस्वभावश्च । अर्थो वेश्यादिव्यसनव्यावर्तनेन निष्प्रत्यूहमर्थस्यो३ पार्जनादुपार्जितस्य च रक्षणाद् रक्षितस्य च वर्धनाद्यथाभाग्यं ग्रामसुवर्णादिसंपत्तिः । कामश्च यथेष्टमाभिमानिकरसानुविद्धसर्वेन्द्रियप्रीतिहेतुः कुलाङ्गनासंगिनां सुप्रतीतः । तथा च स्वयं प्रायुङ्क्त सिद्ध्यङ्के'जगद्वधूद्याननगप्लवङ्गं या स्वोपभोगेन नियत्यचेतः । भर्तुः स भागन् जनयत्युरस्थान् प्रादान्न कि कन्यतमां ददत्ताम् ॥' श्रीः सर्वभोगीणवपुःप्रयोगैरक्षिप्तचित्ते ध्रुवमिद्धरागा । विपत् समवै कामा तदेकभोग्यां सुकलत्रमूर्तिम् ॥ सर्वाणि लोके सुखसाधनानि स्वार्थक्रियावन्ति यतो भवन्ति । तामेव युक्त्वा खितमां स्वनेत्रा मनस्विनः स्वेत्तरयेत्सुधर्मः ॥' [ अथ कुलस्त्रीपरिग्रहं लोकद्वयाभिमतफलसम्पादकत्वात् त्रैवर्गिकस्य विधेयतयोपदिशति - धर्मसन्ततिमक्लिष्टां रति वृत्तकुलोन्नतिम् । देवादिसत्कृति चेच्छन्सत्कन्यां यत्नतो वहेत् ॥६०॥ धर्मंसन्तति-धर्मार्थान्यपत्यानि धर्माविच्छेदे वा । अक्लिष्टां - अनुपहताम् । कुलं – वंशो गृहं च । १५ वहेत् - परिणयेत । उक्तं च ६ ९ १२ १८ ९८ 1 114811 'धर्मसन्ततिरनुपहता रतिः गृहवार्ता सुविहितत्त्वमाभिजात्याचारविशुद्धत्वं । देवद्विजातिथिबान्धवसत्कारानवद्यत्वं च दारकर्मणः फलम् ॥' [ नीतिवा. ३१।३० ] ॥ ६० ॥ विशेषार्थ - कुलीनता आदि गुणोंसे युक्त और सामुद्रिक शास्त्रमें कहे गये दोषोंसे रहित कन्याको सत्कन्या कहते हैं । जहाँ धर्मका अनुष्ठान होता है उसे आश्रम कहते हैं । घर भी एक आश्रम है जिसमें रहकर गृहस्थ धर्मपूर्वक अर्थ और कामका साधन करता है । धर्म अर्थ और कामकी मूल सती पत्नी ही होती है । पत्नीके सहयोग से गृहस्थ स्वदार सन्तोष आदि रूप संयमका पालन करता है, देव आदिकी पूजन आदि करता है, सत्पात्रों को दान देता है । ये सब धर्म के अंग हैं । पत्नी के होने से वेश्या सेवन आदि व्यसनोंसे बचनेके कारण बिना बाधा के धनका उपार्जन करता है, उपार्जितकी रक्षा करता है और रक्षित धनको बढ़ाता है । इस तरह उसके पास ग्राम, सुवर्ण आदि सम्पत्ति संचित होती रहती है । सम्भोगकी अभिलाषाको काम कहते हैं । कुलांगना के साथ इच्छानुसार कामभोगसे समस्त इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है । इस तरह सत्कन्याकी प्राप्तिसे धर्म-अर्थ-काम सहित गृहाश्रम ही प्राप्त होता है । इसी से लोकमें भी घर नाम घरवालीका ही है । योग्य घरवालीके अभाव में ईंट-पत्थर से बनी दीवारोंके छाजनका नाम घर नहीं है । नीतिवाक्यामृतमें भी ऐसा ही कहा है। आशाधरजी ने अपने सिद्धयंक महाकाव्य में कहा है- 'जो पत्नी पतिके मनको अपनेमें बाँधकर रखती है वैसी पत्नी जिसने दी उसने क्या नहीं दिया ? || ५९ || सत्कन्याका पाणिग्रहण इस लोक और परलोक में इष्ट फलका दायक होता है अतः गृहस्थको उसे करनेका उपदेश देते हैं धार्मिक सन्तानको जन्म देने या धर्मकी परम्परा चालू रखने, बिना किसी प्रकार की बाधाके सम्भोग करने व चारित्र और कुलकी उन्नति तथा देव, द्विज और अतिथिका सत्कार करनेके इच्छुक श्रावकको सज्जनकी सत्कन्याको तत्परताके साथ विवाहना चाहिए ॥६०॥ Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) अथ दुष्कलत्रस्याकलत्रस्य वा पात्रस्य भूम्पादिदानान्न कश्चिदुपकारः स्यादित्यममर्थमवश्यं कन्याविनियोगेन सधर्माणमनुगृह्णीयादिति विधिव्यवस्थापनार्थमर्थान्तरन्यासेन समर्थयते सुकलत्रं विना पात्रे भूहेमादिव्ययो वृथा। कोटेर्दन्दश्यमानेऽन्तः कोऽम्बुसेकाद् द्रुमे गुणः ॥६१॥ पात्रे-संयुज्यमानमोक्षकारणगुणे गृहिणि । गुणः--उपकारः । यल्लोकः 'तणयं णासइ वंसो णासइ दियहो कुभोयणे भुत्ते ।। कुकलत्तेण य जम्मो णासई धम्मो विणु दयाए ।'[ ] ॥६१॥ अथ विषयसुखोपभोगेनैव चारित्रमोहोदयोद्रेकस्य शक्यप्रतीकारत्वात्तद्द्ववारेणैव तमपवात्मानमिव ९ साघमिकमपि विषयेभ्यो व्युपरमेदित्युपदेशार्थमाह विशेषार्थ-सोमदेवजीने भी अपने नीतिवाक्यामृतमें विवाह के ये ही फल बतलाये हैं। सबसे पहला फल है धर्मसन्तति । इसके दो अर्थ होते हैं-धार्मिक सन्तान और धर्मकी परम्परा । धार्मिक सन्तानसे ही धर्मकी परम्परा चलती है। और धार्मिक सन्तान तभी होती है जब माता-पिता दोनों धर्मात्मा हों। उनमें भी मातापर बहुत कुछ निर्भर है क्योंकि बालकके लालन-पालनमें माताका विशेष हाथ होनेसे उसीके संस्कार बालकमें आते हैं और ऐसे संस्कारित बालकोंसे धर्मकी परम्परा चलती है। विवाहका दूसरा फल है निर्बाध सम्भोग। अपनी पत्नीसे प्रेम करने में मनुष्य स्वतन्त्र होता है उसमें किसी प्रकारका भय नहीं रहता। इससे निर्विघ्न कामशान्ति होनेसे मनुष्य आवारागर्दीसे बच जाता है और उसका चारित्र उन्नत होता है। यह विवाहका तीसरा फल है। स्वदार सन्तोष मनष्यके चारित्रकी उन्नतिका ही सूचक है । चारित्रकी उन्नतिके साथ वंशकी उन्नति विवाहका चतुर्थ फल है । धर्मात्मा सन्तानसे जैसे धर्मकी परम्परा चलती है वैसे ही वंशकी भी परम्परा चलती है। पाँचवा फल है अतिथि सत्कार । अतिथिमें मुनि-व्रती आदि तो आते ही हैं बन्धु-बान्धव भी आते हैं। अपने घरमें इन सब आगन्तुकोंका सत्कार पत्नीके द्वारा ही सम्भव होता है । अतः विवाह करना आवश्यक है ॥६०॥ ___ 'सत्कन्या देकर साधर्मीका उपकार अवश्य करना चाहिए' इस विधिकी व्यवस्थाके लिए जिसके घरमें पत्नी नहीं है या दुष्टा पत्नी है उसे भूमि आदि देनेसे कोई लाभ नहीं है इस बातका समर्थन करते हैं सत्पत्नीके बिना गृहस्थको भूमि-सुवर्ण आदिका दान देना व्यर्थ है। जिस वृक्षके मध्य भागको कीटोंने बुरी तरह खा डाला हो, उसे पानीसे सीचनेसे क्या लाभ है ? किसीने कहा है-कुपुत्र वंशका नाशक है, कुभोजन करनेसे वह दिन ही नष्ट होता है। किन्तु कुपत्नीसे जन्म ही नष्ट हो जाता है ॥६१॥ विषय-सुखके उपभोगसे ही चारित्रमोहके तीव्र उदयका प्रतीकार हो सकता है, इस लिए उसके द्वारा ही स्वयं विषय-सेवनसे निवृत्त होकर अपनी ही तरह अन्य साधर्मियोंको भी विषय सेवनसे निवृत्त करना चाहिए, यह उपदेश देते हैं Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०० धर्मामृत ( सागार) विषयेषु सुखभ्रान्ति कर्माभिमुखपाकजाम् । छित्वा तदुपभोगेन त्याजयेत्तान् स्ववत्परम् ॥६२॥ स्पष्टम् ।।६२॥ अथ दुःषमकालवशात्प्रायेण पुरुषाणामाचारविप्लवदर्शनाद् विचिकित्साकुलितचित्तदातुः सौचित्यविधानार्थं चतुरः श्लोकानाह दैवाल्लब्धं धनं प्राणैः सहावश्यं विनाशि च । बहुधा विनियुञ्जानः सुधीः समयिकान् क्षिपेत् ॥६३॥ विनियुञ्जानः-व्ययमानः । समयिकान्-समयाश्रितान् गृहस्थान् यतीन्वा । क्षिपेत्-धिगिमान् ९ संभावणमात्रस्याप्ययोग्यानित्याद्यवर्णवादेन तिरस्कुर्यात काक्वा न क्षिपेदिति प्रतिषेधे पर्यवस्यति ॥६३॥ किं तहि कुर्यादित्याह विन्यस्यैदयुगीनेषु प्रतिमासु जिनानिव । भक्त्या पूर्वमुनीनर्चेत् कुतः श्रेयोऽतिचिनाम् ॥६४॥ विन्यस्य-नामादि विधिना निक्षिप्य । ऐदंयुगीनेषु-अस्मिन् युगे साधुषु ॥६४॥ अपना फल देने के लिए तैयार हुए चारित्रमोहनीय कर्मके उदयसे मनुष्यको विषयोंमें सुखकी भ्रान्ति होती है वह ये सुखरूप हैं या सुखके हेतु हैं ऐसा मानता है। उस भ्रान्तिको विषयोंका सेवन करनेसे दूर करना चाहिए। और फिर अपनी ही तरह दूसरोंको भी कन्या आदि देकर यह विषय छुड़ाना चाहिए । ६२॥ विशेषार्थ-चारित्रमोहके उदयसे पीड़ित मनुष्यको विषय-सेवन अच्छा लगता है। वह मानता है कि विषयमें सुख है । उसका यह भ्रम दूर करनेका उपाय है कि उसका विवाह करा दिया जाये । इससे वह विषयोंकी यथार्थता समझकर स्वयं ही विषयोंसे विमुख होकर दूसरोंको भी भ्रान्ति दूर करनेका प्रयत्न करेगा ॥२॥ पंचम कालके प्रभावसे प्रायः मनुष्योंके आचारमें शिथिलता देखनेसे दाताका मन ग्लानिसे भर जाता है । अतः उनके चित्तके समाधानके लिए चार श्लोक कहते हैं पुण्य कर्मके उदयसे प्राप्त हुआ धन प्राणोंके साथ अवश्य नष्ट होनेवाला है। उस धनको अनेक प्रकारसे खर्च करनेवाला गृहस्थ क्या साधर्मियोंका तिरस्कार करेगा ? अर्थात् नहीं करेगा ॥६३॥ विशेषार्थ-संसारमें दैवकी ही बलवत्ता मानी जाती है और पौरुषको गौणता दी जाती है । दैवके अनुकूल होनेपर ही पौरुष भी सफल होता है। अतः धनकी प्राप्तिमें पुण्य कमका उदय प्रधान है। इसके साथ ही यह तो स्पष्ट ही है कि मनुष्यके मरते ही उसके लिए तो सब धन नष्ट ही हो जाता है। ऐसी स्थितिमें जब गृहस्थ शादी-विवाह, भोग-उपभोगमें खूब धन खर्च करता है तो यदि वह विचारशील है और लोक-परलोकको समझता है तो क्या वह धार्मिकोंका विशेषतया मुनियोंका यह कहकर तिरस्कार करेगा कि ये तो बात करने लायक भी नहीं है ? ॥६३।।। ऐसी स्थितिमें क्या करना चाहिए, यह बतलाते हैं जैसे प्रतिमामें जिनदेवकी स्थापना करके उनकी पूजा करते हैं उसी तरह इस युगके साधुओंमें पूर्व मुनियों की स्थापना करके भक्तिपूर्वक पूजा करे। क्योंकि अत्यन्त नुक्ताचीनी करनेवालोंका कल्याण कैसे हो सकता है ॥६४॥ Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०१ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय) पुनस्तद समर्थनार्थमाह भावो हि पुण्याय मतः शुभः पापाय चाशुभः। तदुष्यन्तमतो रक्षेद्धीरः समयभक्तितः ॥६५॥ विशेषार्थ-दिगम्बर जैन धर्मका मुनिमार्ग अत्यन्त कठिन है। और इस कालमें तो उसका पालन करना और भी कठिन है। फिर भी मुनिमार्ग चालू है। किन्तु उसमें शिथिला चारिता बढ़ी है इसीसे मुनियोंकी आलोचना कुन्दकुन्द-जैसे महर्षियोंने अपने षट् प्राभृतोंमें की है। जब मुनिपदने भट्टारकोंका रूप लिया तब तो शास्त्रज्ञ श्रावकोंके द्वारा उनकी और भी अधिक आलोचना हुई। पं. आशाधरजीने अपने अनगारधर्मामृत (२।९६) में उन्हें म्लेच्छवत् आचरण करनेवाला कहा है और एक पुराना इलोक उद्धृत किया है जिसमें कहा है कि चारित्रभ्रष्ट पण्डितों और बठर तपस्वियोंने निर्मल जिनशासनको मलिन कर दिया। लगता है दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दीमें शिथिलाचारी मुनियोंका विरोध इतना बढ़ा कि श्रावकोंने उन्हें आहार तक देना बन्द कर दिया। तब उदारमना सोमदेवाचार्यको इस ओर ध्यान देना पड़ा। उन्होंने अपने उपासकाचारमें लिखा है-भोजनमात्र देनेके लिए साधुओंकी परीक्षा नहीं करना चाहिए। वे सज्जन हों या दुर्जन, गृहस्थ तो दान देनेसे शुद्ध होता है। गृहस्थ अनेक आरम्भोंमें फंसे रहते हैं और उनका धन भी अनेक प्रकारसे खर्च होता है। अतः तपस्वियोंके आहारदानमें ज्यादा सोच-विचार नहीं करना चाहिए । मुनिजन जैसे-जैसे तप-ज्ञान आदिमें विशिष्ट हों वैसे-वैसे गृहस्थोंको उनका अधिकअधिक समादर करना चाहिए। धन भाग्यसे मिलता है अतः भाग्यशाली परुषोंको कोई मुनि आगमानुकूल मिले या न मिले, उन्हें अपना धन धार्मिकोंमें अवश्य खर्च करना चाहिए। जिन भगवान्का यह धर्म अनेक प्रकारके मनुष्योंसे भरा है। जैसे मकान एक स्तम्भपर नहीं ठहर सकता, वैसे ही धर्म भी एक पुरुषके आश्रयसे नहीं ठहरता। नाम, स्थापना, द्रव्य और भावकी अपेक्षा मुनि चार प्रकारके होते हैं और वे सभी दान-सम्मानके योग्य हैं । किन्तु गृहस्थोंके पुण्य उपार्जनकी दृष्टि से जिनविम्बोंकी तरह उन चार प्रकारके मनियोंमें उत्तरोत्तर विशिष्ट विधि होती जाती है। यह बड़ा आश्चर्य है कि इस कलिकालमें योंका मन चंचल रहता है और शरीर अन्नका कोडा बना रहता है. आज भी जिन रूपके धारक पाये जाते हैं। जैसे पाषाण वगैरहमें अंकित जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिकृति पूजने योग्य है, वैसे ही आजकल मुनियोंको भी पूर्वकालके मुनियोंकी प्रतिकृति मानकर पूजना चाहिए। इस तरह सोमदेव सूरिने वर्तमान मुनियोंको पूर्व मुनियोंकी प्रतिकृति मानकर पूजनेका निर्देश किया है। पं. आशाधरजीने भी उन्हींका अनुसरण करते हुए वतमान मुनियों में पूर्व मुनियोंकी स्थापना करके उनको पूजनेकी प्रेरणा की है । आचार्य पद्मनन्दिने भी कहा है 'आज इस पंचमकालमें भरत क्षेत्रमें तीनों लोकों में श्रेष्ठ केवली नहीं हैं किन्तु जगत्के स्वरूपको प्रकाशित करनेवाली उनकी वाणी विद्यमान है तथा उस वाणीके आलम्बन रत्नत्रयके धारी मुनिवर विद्यमान हैं। उनकी पूजा जिनवाणीकी ही पूजा है और जिनवाणीकी पूजा साक्षात् जिनेन्द्रदेवकी पूजा है' ॥६४।। उसीके समर्थनमें पुनः कहते हैं शुभ भाव पुण्यके लिए और अशुभ भाव पापके लिए होता है। इसलिए भावोंमें विकार होनेपर धीर पुरुषको जिनशासनके अनुरागसे रक्षा करना चाहिए ॥६५॥ Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०२ धर्मामृत ( सागार ) धीर:-अविकारप्रकृतिः । समयभक्तितः । तथाहि'सम्प्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्यचूडामणि ___स्तद्वाचः परमासतेऽत्र भरतक्षेत्रे जगद् द्योतिकाः। सद्ररत्नत्रयधारिणो यतिवरास्तासां समालम्बनं, तत्पूजा जिनवाचि पूजनमतः साक्षाज्जिनः पूजितः ।।' [पद्म. पञ्च. १२६८] ॥६५॥ अथ ज्ञानतपसोः पृथक् समुदितयोश्च तद्वतां च पूज्यत्वे युक्तिमाह___ ज्ञानमच्यं तपोऽङ्गत्वात्तपोऽयं तत्परत्वतः। द्वयमच्यं शिवाङ्गत्वात्तद्वन्तोऽा यथागुणम् ॥६६॥ ज्ञानं साधकस्थं, तपः नैष्ठिकस्थम् । तत्परत्वतः-ज्ञानातिशयहेतुत्वात् , तत् ज्ञानं परममुत्कृष्टं यस्मादिति व्युत्पत्याश्रयणात् । द्वयं गणाधिपस्थम् । अत्राहुः श्रीसोमदेवपण्डिताः 'भुक्तिमात्रप्रदाने तु का परीक्षा तपस्विनाम् । ते सन्तः सन्त्वसन्तो वा गृही दानेन शुद्धयति ।। सर्वारम्भप्रवृत्तानां गृहस्थानां धनव्ययः। बहुधास्ति ततोऽत्यर्थं न कर्तव्या विचारणा ।। यथा यथा विशिष्यन्ते तपोज्ञानादिभिर्गुणैः । तथा तथाधिकं पूज्या मुनयो गृहमेधिभिः ।। दैवाल्लब्धं धनं धन्यैर्वप्तव्यं समयाश्रिते। एको मुनि वेल्लभ्यो न लभ्यो वा यथागमम् ।। उच्चावचजनः प्रायः समयोऽयं जिनेशिनाम् । नैकस्मिन् पुरुष तिष्ठेदेकस्तम्भ इवालयः ।। ते नाम स्थापनाद्रव्यभावन्यासैश्चतुर्विधाः । भवन्ति मुमयः सर्वे दानमानादिकर्मसु ।। उत्तरोत्तरभावेन विधिस्तेषु विशिष्यते । पुण्यार्जने गृहस्थानां जिनप्रतिकृतिष्विव ॥ [ सो. उपा., ८१८-८२४ ] विशेषार्थ-शुभ भावसे पुण्यबन्ध और अशुभ भावसे पापबन्ध होता है यह सब जानते हैं । अतः मुनियोंके प्रति यदि भाव खराब होते हों तो कलिकालमें जिनशासनको धारण करनेवाले ये मुनि जिनकी तरह मान्य हैं इस अनुराग भावसे अपने भावोंको उनके प्रति बिगड़नेसे रोकना चाहिए ।।६।। ज्ञान और तपके पृथक् -पृथक् तथा सम्मिलित रूपसे पूज्य होनेमें तथा ज्ञानी, तपस्वीके पूज्य होनेमें युक्ति देते हैं तपका कारण होनेसे ज्ञान पूज्य है और ज्ञानकी अतिशयका कारण होनेसे तप पूज्य है और मोक्षका कारण होनेसे ज्ञान और तप दोनों पज्य हैं तथा ज्ञानी, तपस्वी और ज्ञान तथा तप दोनोंसे युक्त महात्माओंको जो-जो गुण जिसमें अधिक हो उस-उस गुणके कारण विशेष रूपसे पूजना चाहिए ।।६।। विशेषार्थ-ज्ञान और तप दोनों परस्परमें एक दूसरेके साधक हैं। यदि ज्ञानी न हों तो पूजा-प्रतिष्ठा, शास्त्रचर्चा वगैरह बन्द हो जाये । ज्ञानके होनेसे ही सम्यक् तप होता है, Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय) १०३ अपि च 'काले कलौ चले चित्ते देहे चान्नादिकीटके । एतच्चित्रं तदद्यापि जिनरूपधरा नराः ।। यथा पूज्यं जिनेन्द्राणां रूपं लेपादिनिर्मितम् । तथा पूर्वमुनिच्छायाः पूज्याः संप्रति संयताः ॥' [ सो. उपा., ७९६-७९७ ] ॥६६॥ अथ मिथ्यादृष्टेजघन्यादिपात्रत्रये कुपात्रे चान्नदानात् सदृष्टेश्च सुपात्रेष्वेवान्नदानादुत्पन्नपुण्यस्य ६ फलविशेषमपात्रे चार्थविनियोगस्य वैयर्थ्य प्रतिपादयितुमाह न्यग्मध्योत्तमकुत्स्यभोगजगतो भुक्तावशेषावृषा तादृपात्रवितीर्णभुक्तिरसुदृग्देवो यथास्वं भवेत् । सदृष्टिस्तु सुपात्रदानसुकृतोद्रेकात्सुभुक्तोत्तम स्वर्भूमर्त्यपदोऽश्रुते शिवपदं व्यर्थस्त्वपात्रे व्ययः ॥६॥ न्यगित्यादि-न्यङ् जघन्यः एकपल्योपमभोग्यत्वात् । मध्यः द्विपल्योपमभोग्यत्वादुत्तमस्त्रिपल्योपन- १२ भोग्यत्वात् । कुत्स्यः सुस्वादुमृत्पुष्पफलाशनवृत्तित्वादेकोरुकादिदेहयोगाच्च । न्यङ् च मध्यमश्चोत्तमश्च कुत्स्यश्च न्यङ्मध्योत्तमकुत्स्यास्ते च ते भोगाश्च न्यङ्मध्योत्तमकुत्स्यभोगास्तैरुपलक्षिता ज जघन्यभोगभूमिमध्यमभोगभूमिरुत्तमभोगभूमिः कुभोगभूमिश्चेति चतस्रस्तासु भुक्ताः कल्पवृक्षादिसंपादितेष्ट- १५ विषयोपभोगसुखेन निर्जीर्णश्चासाववशेषश्चोद्धृतो यो वृषः पुण्यविशेषस्तस्मात् । तादृक्पात्रवितीर्णभुक्तिःतादृग्भ्यो न्यङ्मध्योत्तमकुत्स्येभ्यः पात्रेभ्यो वितीर्णा दत्ता भुक्तिराहारो येन स तथोक्तः। पात्रापात्रलक्षणं शास्त्रे यथा 'उत्कृष्टपात्रमनगारमणुव्रताढयं मध्यं व्रतेन रहितं सुदृशं जघन्यम् । ज्ञानके अभावमें तो केवल कायक्लेश होता है। इसी तरह ज्ञानाराधन स्वयं एक तप है। अन्तरंग तपके भेदोंमें स्वाध्यायको तप कहा है। तथा तपस्याके द्वारा ही केवल ज्ञानकी प्राप्ति होती है । तथा तप और ज्ञान दोनोंसे मुक्ति मिलती है इसलिए ज्ञान, तप, ज्ञानी तपस्वी ये सभी पूज्य हैं । सोमदेव सूरिने भी कहा है कि तपके बिना अकेला ज्ञान भी आदरके योग्य है, और ज्ञानके बिना अकेला तप भी पूज्य है। जिसमें ज्ञान तप दोनों होते हैं वह देवता है और जिसमें न ज्ञान है और न तप है वह तो केवल स्थान भरनेवाला है ॥६६॥ आगे मिथ्यादृष्टिके सुपात्रको ही आहारदान देनेसे उत्पन्न हुए पुण्यके फलकी विशेषता और अपात्र दानकी व्यर्थता बतलाते हैं जघन्य पात्र, मध्यम पात्र, उत्तम पात्र तथा कुपात्रको दान देनेवाला मिथ्यादृष्टि जघन्य भोगभूमि, मध्यम भोगभूमि उत्तम भोगभूमि, और कुभोगभूमिमें भोगनेसे बाकी बचे पुण्यसे यथायोग्य देव होता है। किन्तु सम्यग्दृष्टि सुपात्र दानसे होनेवाले पुण्यके उदयसे उत्तम भोगभूमि, महर्द्धिक कल्पवासी देव और चक्रवर्ती आदि पदोंको यथेष्ट भोगकर मोक्षपदको पाता है । परन्तु अपात्रको दान देना व्यर्थ है ॥६७॥ १. 'मान्य ज्ञानं तपोहीनं ज्ञानहीनं तपोऽहितम् । द्वयं यत्र स देवः स्याद् द्विहीनो गणपुरणः ।' -सो. उपा., ८१५ श्लो. Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०४ धर्मामृत ( सागार) निर्दशनं व्रतनिकाययुतं कुपात्रं युग्मोज्झितं नरमपात्रमिदं हि विद्धि ॥' [पय. पञ्च. २।४८ ] 'उत्तमपत्तं साह मज्झिमपत्तं च सावया भणिया। अविरदसम्माइट्टी जहण्णपत्तं मुणेयव्वं ॥ [ 'जं रयणत्तयरहियं मिच्छामय कहियधम्म अणुलग्गं । जइ विहु तवइ सुघोरं तहवि हु तं कुच्छियं पत्तं ।। जस्स ण तवो ण चरणं न चावि जस्सत्थि वरगुणो को वि। तं जाणेह अपत्तं अफलं दाणं कयं तस्स ॥ [ भावसं. ५३०१५३१ ] आर्षे पुनः धेयो युवराजः पात्रापात्रलक्षणं भरतराजर्षिमन्वशीषत् 'जघन्यं शीलवान्मिथ्यादृष्टिश्च पुरुषो भवेत् । सदृष्टिमध्यमं पात्रं निःशीलवतभावनः ।। सदृष्टिः शीलसंपन्नः पात्रमुत्तममिष्यते । कूदष्टिर्यो विशीलश्च नैव पात्रमसो मतः ।। कुमानुषत्वमाप्नोति जन्तुर्दददपात्रके । अशोधितमिवालाम्बु तद्धि दानं विदूषयेत् ॥'[ महापु. २०११४०-१४२] - यथास्वं-यद्यत्स्वमात्मीयं दानं तत्तदनतिक्रमणेत्यर्थः। तत्र मिथ्यादष्टिजंघन्यपात्रायाहारदानं दत्वा जघन्यभोगभूमौ निरातंकभोगान् भुक्त्वा स्वायुःक्षये यथाभाग्यं स्वगं गच्छेत् । तत्तत्पात्रसन्निधानात्तथाविधशुभपरिणामविशेषोपपत्त्या तादृक् पुण्यप्रचयानुभावात् । स एव च कुपात्राहारं दत्वा कुभोगभूमौ निभूषणविवस्त्र-गुहा-वृक्षमूलनिवास्यैकोरुकादिशरीरो भूत्वा स्वसमानपल्या सह यथास्वं निराबाधतया भोगं भुक्त्वा पल्योपमात्रस्वायुःक्षये मृत्वा स्वर्गे वाहनदेवो वा ज्योतिष्को वा व्यन्तरो वा भवनवाती वा भूत्वा दीर्घ २१ दुर्गतिदुःखानि भुञ्जानः संसरति । किञ्च, ये भोगभूमिषु ये च मानुषोत्तरपर्वताद् बहिः प्राक् च स्वयंप्रभपर्वता त्तिर्यञ्चो, ये च म्लेच्छराजगजतुरगादयो वेश्यादयो वा नीचात्मानो भोगभाजो दृश्यन्ते ते सर्वे कुपात्रदानतो यथापरिणाममुत्पन्नेन मिथ्यात्वसहचारिणा पुण्येन तथा स्युरिति निर्णयः । उक्तं च विशेषार्थ-मुनिको उत्तम पात्र, अणुव्रती श्रावकको मध्यम पात्र, सम्यग्दृष्टिको जघन्य पात्र, सम्यग्दर्शनसे रहित व्रतीको कुपात्र तथा सम्यग्दर्शन और व्रतसे रहितको अपात्र कहते हैं। अमितगति आचार्यने अपने श्रावकाचार (११।५-१८) में उत्तम पात्रका स्वरूप विस्तारसे बतलाते हुए लिखा है-वह जीवस्थान, गुणस्थान और मार्गणास्थानके भेदोंको जानकर जीवोंकी रक्षा करता है। सूर्य की तरह परोपकारमें तत्पर रहता है, हितमित वचन बोलता है। परधनको निर्माल्यकी तरह मानता है। दाँत साफ करनेके लिए तिनका तक नहीं उठाता । पशु, मनुष्य, देव और अचेतनके भेदसे चार प्रकारकी नारियोंसे ऐसे दूर रहता है मानो वे महामारी हैं । प्रासुक मार्गसे चार हाथ भूमि देखकर जीवोंकी रक्षा करते हुए गमन करता है। छियालीस दोषोंको टालकर नवकोटिसे विशुद्ध आहार करता है और सरस तथा विरस आहार में समान बुद्धि रखता है। प्रत्येक वस्तुको सावधानीके साथ रखता तथा उठाता है। किसीको बाधा न पहुँचाते हुए प्रासुक तथा गुप्त स्थानमें मल-मूत्र करता है। चंचल चित्तको वशमें रखता है। कर्मों के क्षयके लिए कायोत्सर्ग करता है। कृत्य और अकृत्यको जानता है। इस प्रकार जो सम्यक् रूपसे व्रत, समिति और गुप्तिको पालता है वह उत्तम Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) 'कुच्छियपत्ते किंचिवि फलइ कुदेवेसु कुणरतिरियेसु । कुच्छिभोयधरासु य लवणंबुहि कालउयहीसु ॥ एए जरा पसिद्धा तिरिया य हवंति भोगभूमीसु । सुत्तरवहिरे असंखदीवेसु ते हुंति । सव्वे मर्दकसाया सव्वे निस्सेसवाहिं परिहीणा । मरिण वितरावि जोइसभवणेसु जायंति ॥ तत्थ चुया पुण संता तिरियणरा पुण हवंति ते सव्वे | काऊ तत्थ पाव पुणो विणिरयावहा हुंति ॥ चंडाल भिल्ल छिप्पय लोलय कल्लाल एवमाईणि । दीसंति रिद्धिपत्ता कुच्छियपत्तस्स दाणेण ॥ केई पुण गयतुरया गेहे रायाण उण्णई पत्ता | दीसंति पव्व लोए कुच्छियपत्तस्स दाणेण || केई दिवो ववण्णा वाहणत्तणे मणुया । सोयंति जाय दुःखापिच्छिय रिद्धि सुदेवाणं ॥ स्वर्भुवः - कल्पोपपन्नदेवाः । उक्तं च 'पात्राय विधिना दत्वा दानं मृत्वा समाधिना । अच्युतान्तेषु कल्पेषु जायन्ते शुद्धदृष्टयः ॥ ज्ञात्वा धर्मप्रसादेन तत्र प्रभवमात्मनः । पूजयन्ति जिनास्ते भक्त्या धर्मस्य वृद्धये ॥ सुखवारिधिमग्नास्ते सेव्यमानाः सुधाशिभिः । सर्वदा व्यवतिष्ठन्ते प्रतिबिम्बैरिवात्मनः ॥ नवयौवनसम्पन्ना दिव्यभूषणभूषिताः । ते वरेण्याद्यसंस्थाना जायन्तेऽन्तर्मुहूर्ततः ।। [ भावसं. ५३३, ५४०-५४५ ] पात्र है । जो एकसे लेकर ग्यारह तक प्रतिमा पालता है वह मध्यम पात्र है । निर्मल सम्यग्दृष्टि, जिसे जन्म-जरा-मरण आदिका भय नहीं सताता, संसार, शरीर और भोगोंसे विरक्त रहता है, निरन्तर अपनी निन्दा-गर्दा करता है, आत्मतत्त्व और परतत्त्वके विचारसे पण्डित है, किन्तु व्रताचरणकी ओर उत्सुक नहीं है वह जघन्य पात्र है । जो कठोर आचरण करता है, परोपकारी है, असत्य और कठोर वचन नहीं बोलता, धन- स्त्री परिग्रहसे निस्पृह है, कषाय और इन्द्रियों का जी है परन्तु घोर मिथ्यात्व से युक्त है वह कुपात्र है । जो घोर मिध्यात्वी होनेके साथ व्रतशील संयमसे भी रहित है वह अपात्र है । जैसे पात्रके चार भेद हैं वैसे ही भोगभूमि भी उत्कृष्ट मध्यम आदि चार प्रकार हैं । दान देनेवाला यदि मिथ्यादृष्टि है, वह यदि जघन्य पात्र सम्यग्दृष्टिको दान देता है तो मरकर जघन्य भोगभूमि में जन्म लेता है, यदि सम्यक्त्व और अणुव्रत सहित मध्यम पात्रको दान देता है तो मध्यम भोगभूमि में जन्म लेता है । यदि सम्यग्दर्शन और महाव्रतसे भूषित उत्तम पात्रको दान देता है तो उत्तम भूमि में जन्म लेता है और वहाँ निर्बाध भोगोंको भोगकर अपनी आयु क्षय होनेपर यथायोग्य देव होता है । इसका कारण यह है कि जैसे पात्रको वह दान देता है उसी प्रकार के शुभ परिणाम होने से उसी जातिके पुण्यका बन्ध करता है । वही यदि सम्यक्त्वसे रहित सा. - १४ १०५ .३ ६ ९ १२ १५ १८ २१ Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०६ धर्मामृत (सागार) तेषां खेदमलस्वेदजरारोगादिवर्जिताः। जायन्ते भासुराकाराः स्फाटिका इव विग्रहाः ॥ निधुवनकुशलाभिः पूर्णचन्द्राननाभिः स्तनभरनमिताभिमन्मथाध्यासिताभिः । पृथुतरजघनाभिबन्धुराभिर्वधूभिः समममलवचोभिः सर्वदा ते रमन्ते ॥' [ अमि. श्रा. ११।१०२, ११२, ११३, ११६, ११७, १२० ] बद्धायुष्का मानुषास्तथा तिर्यञ्चोऽपि पात्रदानानुमोदनया अवश्यमुत्तमभोगभूमिपूत्पद्यन्ते । यदाह 'बद्धाउया सुदिट्ठी मणुया अणुमोयणेण तिरिया वि।। णियमेणुववज्जंते ते उत्तमभोगभूमीसु॥' [ वसु. श्रा. २४९ गा. ] 'दिवोऽवतीर्योजितचित्तवृत्तयो महानुभावा भुवि पुण्यशेषतः । भवन्ति वंशेषु बुधाचितेषु ते विशुद्धसम्यक्त्वधरा नरोत्तमाः ।। अवाप्यते चक्रधरादिसम्पदं मनोरमामत्र विपुण्यदुर्लभाम् । नयन्ति कालं निखिलं निराकला न लभ्यते कि खल पात्रदानतः ।। निषेव्य लक्ष्मीमिति शर्मकारिणी प्रथीयसी द्वित्रिभवेषु कल्मषम् । प्रदह्यते ध्यानकृशानुनाखिलं श्रयन्ति सिद्धि विदु.... .. पदं सदा ।। विधाय सप्ताष्टभवेषु वा स्फुटं जघन्यतः कल्मषकक्षकर्तनम् । व्रजन्ति सिद्धि मुनिदानवासिता व्रतं चरन्तो जिननाथभाषितम् ॥' [ किन्तु व्रत और तपसे युक्त कुपात्रको दान देता है तो कुभोगभूमिमें भूषण-वस्त्र रहित, गुफा या वृक्षके मूलमें निवास करनेवाला कुमनुष्य होकर अपने ही समान पत्नीके साथ यथायोग्य बाधा रहित भोगोंको भोगकर एक पल्य प्रमाण आयुके क्षय होनेपर मरकर वाहन जातिका देव, या ज्योतिष्क, या व्यन्तर, या भवनवासी देव होकर दीर्घ काल तक दुर्गतिके दुःखोंको भोगता हुआ संसारमें भ्रमण करता है । तथा कुभोगभूमियोंमें और मानुषोत्तर पर्वतसे बाहर तथा स्वयंप्रभ पर्वतसे पहले जो तियेच पाये जाते है, तथा जो म्लेच्छ राजाओंके हाथी, घोड़े, वेश्या वगैरह नीच प्राणी भोग भोगते हुए पाये जाते हैं वे सब कुपात्र दानसे परिणामोंके अनुसार उत्पन्न हुए मिथ्यात्व सहचारी पुण्यके उदयसे होते हैं। सोमदेव सूरिने कहा हैजिनका चित्त मिथ्यात्वमें फंसा है और जो मिथ्या चारित्रको पालते हैं, उनको दान देना बुराईका ही कारण होता है। जैसे साँपको दूध पिलानेसे वह जहर ही उगलता है । ऐसे लोगोंको दयाभावसे या औचित्यवश कुछ दिया भी जाये तो जो अवशिष्ट भोजन हो वही दिया जाये, किन्तु घरपर न जिमाना चाहिए। जैसे विषैले भाजनके सम्बन्धसे जल भी विषैला हो जाता है वैसे ही इन मिथ्यादृष्टि साधुओंका सत्कार करनेसे श्रद्धान भी दूषित होता है। अतः कुपात्रको सम्यग्दृष्टि दान नहीं देता। वह तो सुपात्रको ही दान देता है। और महातपस्वियोंको या तीन प्रकारके पात्रोंको दिये गये दानसे होनेवाले पुण्यके उदयसे उत्तम भोगभूमिके सुख भोगकर महद्धिक कल्पवासी देवोंके सुख भोगता है फिर चक्रवर्ती आदि होकर मोक्ष प्राप्त करता है। आचार्य अमितगतिने अपने उपासकाचारमें विस्तारसे पात्रदानका वर्णन करते हुए लिखा है कि सम्यग्दृष्टि जीव विधिपूर्वक पात्रदान करके और समाधिपूर्वक मरण करके अच्युत पर्यन्त स्वर्गों में जन्म लेते हैं और वहाँ धर्मके प्रसादसे अपना जन्म हुआ Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) १०७ एतेन सदृष्टिना कुपात्राय न देयं देयं वा.......दिवशात् किञ्चिदुद्धृतमेवेत्युपदिष्टं स्यात् । तथा चोक्तम् 'मिथ्यात्वग्रस्तचित्तेषु चारित्राभासभागिषु । दोषायैव भवेद्दानं पयःपानमिवाहिषु ॥ कारुण्यादथवौचित्यात्तेषां किञ्चिद्दिशन्नपि । दिशेदुद्धृतमेवान्नं गृहे भुक्तिं न कारयेत् ॥ सत्कारादिविधावेषां दर्शनं दूषितं भवेत् । यथा विशुद्धमप्यम्बु विषभाजनसंगमात् ।।' कि च 'शाक्य-नास्तिक-यागज्ञ-जटिलाजीविकादिभिः । सहावासं सहालापं तत्सेवां च विवर्जयेत् ।। अज्ञानतत्त्वचेतोभिर्दुराग्रहमलीमसैः। युद्धमेव भवेद् गोष्ठयां दण्डादण्डि कचाकचि ।। भयलोभोपरोधाद्यैः कुलिङ्गेषु निषेवणे । अवश्यं दर्शनं म्लायेन्नीचैराचरणे सति ।। बुद्धिपौरुषयुक्तेषु देवायत्तविभूतिषु नृषु कुत्सितसैवायां देन्यमेवातिरिच्यते ॥ [ सो. उपा. ८०१-८०७ ] जानकर भक्तिपूर्वक जिनदेवका पूजन करते हैं। किन्तु सम्यक्त्व और व्रतसे रहित अपात्रमें दान देना व्यर्थ है। अमितगतिने कहा है कि अपात्रदानसे पापके सिवाय दूसरा फल नहीं होता । बालूको पेरनेसे खेद ही हाथ आता है । जो उत्तम पात्रको छोड़कर अपात्रको धन देता है वह साधुको छोड़कर चोरको धन देता है। अतः अपात्रको पात्रबुद्धिसे दान नहीं देना चाहिए, दयाभावसे देने में कोई हानि नहीं है । भावसंग्रहमें देवसेनाचार्यने लिखा है-जो रत्नत्रयसे रहित है, मिथ्याधर्ममें आसक्त है वह कितना भी घोर तप करे फिर भी वह कुपात्र है। जिसमें न तप है, न चारित्र है, न कोई उत्कृष्ट गुण है उसे अपात्र जानो। उसको दान देना व्यर्थ है। कुपात्रको दान देनेसे कुदेवोंमें, कुमनुष्योंमें, तिथंचोंमें, लवणसमुद्र, कालोदधि समुद्रवर्ती कुभोग भूमियोंमें जन्म होता है । या मानुषोत्तर पर्वतसे बाहर असंख्यात द्वीप समुद्रोंमें जन्म होता है। ये सब मन्द कषाय और समस्त आधिव्याधिसे रहित होते हैं। तथा वहाँसे मरकर व्यन्तर या ज्योतिषी देवोंमें उत्पन्न होते हैं। वहाँसे च्युत होकर वे सब तिर्यंच या मनुष्य होते हैं। और वहाँ पाप करके नरक जाते हैं । लोकमें जो चाण्डाल, भील, कलार, छीपी आदि धन सम्पन्न देखनेमें आते हैं यह सब कुपात्रदानका फल है। कुपात्रदानके फलसे कोई राजाओंके हाथी-घोड़े आदि होते हैं। कोई मनुष्य मरकर देवलोकमें वाहन जातिके देव होते हैं। वहाँ वे अन्य देवोंकी ऋद्धि देखकर दुःखी होते हैं। यहाँ प्रसंगवश पल्यका स्वरूप कहते हैं-पल्यके तीन भेद हैं-व्यवहार पल्य, उद्धार पल्य, अद्धापल्य । ये सब नाम सार्थक हैं । प्रथमका नाम व्यवहारपल्य है क्योंकि वह आगेके दो पल्योंके व्यवहारका बीज है। इससे कुछ अन्य नहीं मापा जाता । दूसरेका नाम उद्धार पल्य है क्योंकि उससे उद्धृत (निकाले गये) रोमच्छेदोंसे द्वीप समुद्रोंकी गणना की जाती है। Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ ६ १०८ १२ धर्मामृत (सागर) व्यर्थः -- विपरीतफलो निष्फलो वा । यदाह - अथ किं पल्योपममिति चेद् भ्रमः ( ? ) - पत्यं त्रिविधं व्यवहारपत्यमुद्धारपल्यमद्धापल्यमिति । अन्वर्थ९ संज्ञा एताः । आद्यं व्यवहारपत्यमित्युच्यते उत्तरपल्यव्यवहारबीजत्वात् । नानेन किचित् परिच्छेद्यमस्ति । द्वितीयमुद्धारपल्यं, तत उद्धृत्तं लोमच्छेदैः द्वीपसमुद्राः संख्यायन्त इति । तृतीयमद्धापल्यं, अद्धा कालस्थितिरित्यर्थः । तत्राद्यस्य प्रमाणं कथ्यते तत्परिच्छेदार्थत्वात्तद्यथा 'अपात्रदानतः किंचिन्न फलं पापतः परम् । लभ्यते हि फलं खेदो बालुकापुञ्जपेषणे ॥ विश्राणितमपात्राय विधत्तेऽनर्थमूजितम् । अपथ्य भोजनं दत्ते व्याधि किं न दुरुत्तरम् ॥ अपात्राय धनं दत्ते यो हित्वा पात्रमुत्तमम् । साधुं विहाय चौराय तदर्पयति स स्फुटम् ॥' [ अभि. श्री . ११९०, ९१, ९७ ] प्रमाणाङ्गुलपरिमितयोजनविष्कम्भायामावगाहानि त्रीणि पल्यानि कुसूला इत्यर्थः । एकादिसप्तान्ताहोरात्रजाताविबालाग्राणि तावच्छिन्नानि यावद् द्वितीयं कर्तरीच्छेदं नाप्नुवन्ति । तादृशैर्लोमच्छेदैः परिपूर्णं घनीकृतं व्यवहारपत्यमित्युच्यते । ततो वर्षशते वर्षशते एकैकलोमापकर्षणविधिना यावता कालेन तद्रिक्तं १५ भवेत्तावत्कालो व्यवहारपल्योपमाख्यः । तैरेव रोमच्छेदैः प्रत्येकम संख्येय वर्ष कोटिसमयमात्र च्छिन्नैस्तत्पूर्णमुद्धारपत्यम् । ततः समये समये एकैकस्मिन् रोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्तं भवति तावत्काल उद्धार पत्गोपमाख्यः । एषामुद्धारपल्यानां दशकोटी कोट्य एकमुद्धारसागरोपमम् । अर्धतृतीयोद्धारसागरोप१८ मानां यावन्तो रोमच्छेदास्तावन्तो द्वीपसमुद्राः । पुनरुद्धारपत्य रोमच्छेदै र्वर्षशतसमयमात्रच्छिनैः पूर्णमद्धापत्यम् । ततः समये समये एकैकस्मिन् रोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्तं भवति तावत्कालोऽद्धापल्योपमाख्यः । एषामद्धापल्यानां दशकोटी कोट्य एकमद्धासागरोपमम् । दशाद्धासागरोपमकोटी कोट्य २१ एकावसर्पिणी । तावत्येवोत्सर्पिणी । अनेनाद्धापल्येन नारकर्तर्यग्योनानां देवमनुष्याणां च कर्मस्थितिर्भवस्थितिरायुःस्थिति: काय स्थितिश्च परिच्छेतव्या ।' - [ सर्वार्थसि ३३३८ ] ॥६७॥ तीसरा अद्धापल्य है । अद्धाका अर्थ कालस्थिति है । पहले पल्यका प्रमाण कहते हैं - प्रमाणांगुलसे नापे गये योजन प्रमाण लम्बे-चौड़े गहरे तीन पल्य अर्थात् गड्ढे करो । एक दिनसे सात दिन तक जन्मे मेढ़के बालोंके अग्रभागको इतना काटो कि पुनः उन्हें कैंची से न काटा जा सके। पहले गढेको उनसे खूब ठोस रूपसे भर दो। उसे व्यवहारपल्य कहते हैं । सौ-सौ वर्ष में एक-एक बाल निकालनेपर जितने समय में वह खाली हो उतने कालको व्यवहार पल्पोपम कहते हैं । व्यवहार पल्यके प्रत्येक रोमके उतने खण्ड कल्पनासे करो जितने असंख्यात कोटिवर्षके समय होते हैं । और उन्हें दूसरे गड्ढे में भर दो। उसे उद्धारपल्य कहते हैं । प्रति समय एक-एक रोम निकालनेपर जितने कालमें वह रिक्त हो उतने कालको उद्धार पल्योपम कहते हैं । दस कोड़ा - कोड़ी उद्धार पल्योंका एक उद्धार सागर होता है । अढ़ाई उद्धार सागर में जितने रोम हों उतनी ही द्वीप समुद्रोंकी संख्या जानना । पुनः उद्धारपल्य के प्रत्येक रोमके उतने खण्ड करो जितने सौ वर्षके समय होते हैं और उन्हें तीसरे गढ़में भर दो उसे अद्धापल्य कहते हैं । प्रतिसमय एक-एक रोमखण्ड निकालनेपर जितने समय में वह रिक्त हो उतने कालको अद्धा पल्योपम कहते हैं । दस कोड़ा कोड़ी अद्धा पल्योंका एक अद्धा सागर होता है। दस कोड़ा - कोड़ी अद्धा सागरोपम कालकी एक अवसर्पिणी होती है और उतनी ही Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय) १०९ अथ पात्रदानपुण्योदयफलभाजां भोगभूमिजानां जन्मप्रभृति सप्ताहसप्तकभाविनीरवस्था निर्देष्टुमाह सप्तोत्तानशया लिहन्ति दिवसान्स्वाङ्गष्टमार्यास्ततः को रिङ्गन्ति ततः पदैः कलगिरो यान्ति स्खलस्तितः । स्थेयोभिश्च ततः कलागुणभृतस्तारुण्यभोगोद्गताः । सप्ताहेन ततो भवन्ति सुदृगादानेऽपि योग्यास्ततः ॥६॥ आर्याः--भोगभूमिजाः । को-भूमौ । रिङ्गन्ति-पद्भयां विना सर्पन्ति । कला:-गीताद्याः । । गुणाः-लावण्याद्याः । सुदृगादाने-सम्यक्त्वग्रहणे । उक्तं च 'तदा स्त्रीपुंसयुग्मानां गर्भविटुंठितात्मनाम् । दिनानि सप्त गच्छन्ति निजाङ्गष्ठावलेहनैः ।। रिङ्गतामपि सप्तैव सप्तास्थिरपरिक्रमैः। स्थिरैश्च सप्त तैः सप्त कलासु च गुणेषु च ॥ सप्तभिश्च दिनस्ते स्युः सम्पूर्णनवयौवनाः । सम्यक्त्वग्रहणेऽपि स्युर्योग्यास्ते सप्तभिर्दिनैः ॥' [ ] ॥६८॥ अथ मुनिदेयनिर्णयार्थमाहउत्सर्पिणी होती है। इस अद्धापल्यसे नारकी, तिर्यंच, मनुष्य और देवोंकी कर्मस्थिति, भवस्थिति, आयुस्थिति और कायस्थिति ज्ञात होती है ॥६७॥ अब पात्रदानके पुण्यसे भोगभूमिमें जन्म लेनेवाले जीवोंकी जन्मसे लेकर सात सप्ताह तक होनेवाली अवस्थाको बतलाते हैं भोगभूमिमें जन्म लेनेवाले मनुष्य जन्मके अनन्तर सात दिन तक ऊपरको मुख करके सोते हुए अपने अंगूठेको चूसते हैं। प्रथम सप्ताहके अनन्तर सात दिन तक पृथ्वीपर रंगते हैं। द्वितीय सप्ताहके अनन्तर सात दिन तक मनोहर वाणी बोलते हुए गिरते-पड़ते चलते हैं । तीसरे सप्ताह के अनन्तर सात दिन तक स्थिर पैरोंसे चलते हैं। चतुर्थ सप्ताह के अनन्तर सात दिनोंमें कला, गीत आदि गुणों और लावण्य आदिको धारण कर लेते हैं। पंचम सप्ताहके अनन्तर सात दिनोंमें युवा होकर भोगोंको भोगनेमें समर्थ हो जाते हैं। और छठे सप्ताहके अनन्तर सात दिनोंमें सम्यक्त्व ग्रहण करनेके योग्य हो जाते हैं ॥६८॥ विशेषार्थ-भोगभूमिमें दस प्रकार कल्पवृक्षोंसे मनुष्योंको भोग-उपभोगके सब पदार्थ प्राप्त होते हैं इसीसे उसे भोगभूमि कहते हैं। भोगभूमिमें नगर, ग्राम, राजा, कुल, शिल्प, कृषि आदि षट्कर्म, वर्ण आश्रम आदि नहीं होते। रात-दिनका भेद, सर्दी, परस्त्री रमण, परधन हरण आदि नहीं होते । परिवार में स्त्री और पुरुष दो ही होते हैं। नौमास आयु शेष रहनेपर स्त्रीके गर्भ रहता है और मृत्युका समय आनेपर युगल बालकबालिका जन्म देकर पुरुष छींकसे और स्त्री जंभाईके आनेसे मर जाते हैं। उत्कृष्ट भोगभूमिमें अंगूठा चूसने आदिमें तीन-तीन दिन लगते हैं। मध्यम भोगभूमिमें पाँच-पाँच दिन और जघन्य भोगभूमिमें सात-सात दिन लगते हैं। इस तरह उत्कृष्ट भोगभूमिमें २१ दिनमें, मध्यम भोगभूमिमें ३५ दिनमें और जघन्य भोगभूमिमें ४९ दिनमें वे युगल बालक-बालिका युवा होकर सम्यक्त्व ग्रहणके योग्य हो जाते हैं । और परस्परमें रमण करते है ॥६८॥ __ आगे मुनियोंको क्या देना चाहिए, इसका निर्णय करते हैं Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११० धर्मामृत ( सागार) तपः श्रुतोपयोगीनि निरवद्यानि भक्तितः। मुनिभ्योऽन्नौषधावासपुस्तकादीनि कल्पयेत् ॥६९।। निरवद्यानि-उद्गमादिदोषरहितानि । पुस्तकादीनि आदिशब्देन पिच्छिकाकमण्डल्वादीनि । ' कल्पयेत्-उपकारयेत् ॥६९॥ अथान्नादिदानफलानां क्रमेण निदर्शनान्याह भोगित्वाद्यन्तशान्तिप्रभुपदमुदयं संयतेऽन्नप्रदाना च्छीषेणो रुग्निषेधाद्धनपतितनया प्राप सर्वोषर्धाद्धम् । प्राक्तज्जन्मर्षिवासावनशुभकरणाशकरः स्वर्गमयं कौण्डेशः पुस्तका वितरणविधिनाऽप्यागमाम्भोधिपारम् ॥७०॥ भोगित्वाद्यन्तशान्तिप्रभुपदं-भोगित्वमुत्तमभोगभूमिजत्वमादावन्ते च शान्तिप्रभोः शान्तिनाथतीर्थकरस्य पदं यस्य। अन्नप्रदानात्-बीजत्वमात्रविवक्षात्र । तथाविधाभ्युदयस्योत्तरोत्तरपुण्यविशेषोदयसंपाद्यत्वात् । श्रीषेण:-स एव राजा। रुग्निषेधात्-ब्याधिप्रतीकारादौषधादेः। धनपतितनयावृषभसेनाभिधाना, पूर्वभवे राज्ञो देवकुलस्य संमाजिका । प्राक्तज्जन्मनोः-पूर्वभवे च शुभकरणात् मुनिरक्षाभिप्रायेण शुभाभिसन्धिपरिणामात् । अयं-सौधर्मे महद्धिकदेवत्वमित्यर्थः। कौण्डेशः-गोविन्दाख्यगोपालचरो ग्रामकूटपुत्रः सन् कौण्डेशो नाम मुनिः ॥७०॥ १३ मुनियोंको भक्तिपूर्वक तप और श्रुतज्ञानमें उपयोगी तथा अनगार धर्मामृतके पिण्डशुद्धि नामक अध्यायमें कहे गये उद्गम उत्पादन आदि दोषोंसे रहित, आहार, औषध, वसतिका और पुस्तक आदि देना चाहिए। आदि शब्दसे पीछी-कमण्डलु आदि आते हैं ॥६९।। आगे क्रमसे आहार आदि दानका फल कहते हैं मुनियोंको विधिपूर्वक आहार देनेसे राजा श्रीषेण मरकर प्रारम्भमें उत्तम भोगभूमिमें उत्पन्न हुआ और अन्तमें शान्तिनाथ नामक सोलहवें तीर्थकरके पदको प्राप्त हुआ। धनपति सेठकी पुत्री रोग दूर करनेके लिए औषधदान देनेसे समस्त औषधोंकी ऋद्धिको प्राप्त हुई । पूर्व जन्ममें मुनियोंको आवास देनेके शुभ परिणामसे और उस जन्ममें मुनियोंकी रक्षा करनेके शुभ परिणामसे शूकर सौधर्म स्वगमें महद्धिक देव हुआ । और कौण्डेश मुनि शास्त्रोंकी पूजा और दान करनेसे द्वादशांग श्रुतके पारको प्राप्त हुए ॥७०॥ विशेषार्थ-रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें दानके चार भेदोंके उक्त चार उदाहरण दिये हैं। तदनुसार पं. आशाधरजीने भी दिये हैं। राजा श्रीषेणने अर्ककीर्ति और अमितगति नामक दो चारण मुनियोंको आहार दिया था। उस दानसे होनेवाले पुण्यवन्धके फलस्वरूप राजा श्रीषेणने मरकर भोगभूमिमें जन्म लिया। फिर वे अन्तमें शान्तिनाथ तीर्थकर हुए । यद्यपि वे उसी पुण्यसे तीर्थंकर नहीं हुए । किन्तु उत्तरोत्तर पुण्य विशेषसे तीर्थकर हुए। तथापि उसका बीज आहारदान था । औषधदानमें वृषभसेनाका उदाहरण उल्लेखनीय है । वृषभसेना धनपति सेठकी पुत्री थी। उसके स्नानके जलसे प्राणियोंकी शारीरिक व्याधि दूर हो जाती थी। एक मुनिराजसे इसका कारण पूछनेपर उन्होंने बतलाया कि पूर्वजन्ममें इसने औषध १. 'श्रीषेणवृषभसेने कोण्डेशः सूकरच दृष्टान्ताः । वयावृत्यस्यते चतुविकल्पस्य मन्तव्याः॥-रत्न. श्रा., ११८ श्लो. । Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १११ एकादश अध्याय ( द्वितीय अध्याय ) अथ जिनधर्मानुबन्धार्थमसतां मुनीनामुत्पादने सतां च गुणातिशयसम्पादने प्रयत्नविधापनार्थमाह जिनधर्म जगद्वन्धुमनुबद्धमपत्यवत् । यतीञ्जनयितुं यस्येत्तथोत्कर्षयितुं गुणैः ॥७॥ यस्येत्-प्रयतेत गृही । गुणैः-श्रुतज्ञानादिभिः ॥७१॥ अथ संप्रति पुरुषाणां दुष्कर्मगुरुत्वाद् गुणातिशयसिद्धयदर्शनात्तदुत्पादने निष्फलः प्रयत्न इति गृहिणां मनोभङ्गनिषेधार्थमाह श्रेयो यत्नवतोऽस्त्येव कलिदोषाद गुणातौ । ___असिद्धावपि तत्सिद्धौ स्वपरानुग्रहो महान् ।।७२॥ कलि:-पञ्चमकाल: पापकर्म वा । गुणधुतां-गुणातिशयशालिनां विषये । यत्नवतः-श्रावकस्य । तेषामसिद्धावपि इत्यावृत्या योज्यम् ॥७२॥ अथ महाव्रतमणुव्रतं वा विभ्रत्यः स्त्रियोऽपि धर्मपात्रतयानुग्राह्या इति समर्थयितुमाहदान किया था। उसीके फलस्वरूप इसे यह ऋद्धि प्राप्त हुई है। तीसरे आवासदानमें एक शूकरका नाम उल्लेखनीय है। मालवदेशमें एक कुम्भकार और एक नाईने एक वसतिका बनवायी। कुम्भकारने उसमें एक मुनिको ठहराया और नाई एक संन्यासीको ले आया । दोनोंने मिलकर मुनिको बाहर निकाल दिया। इसपर कुम्भकार और नाईकी लड़ाई हुई। कुम्भकार मरकर शूकर हुआ और नाई व्याघ्र। एक बार जिस गुफामें शूकर रहता उसी गुफामें दो मुनि आकर ठहरे । व्याघ्र मनुष्यकी गन्ध पाकर आया तो शूकर गुफाके द्वारपर उससे भिड़ गया और मरकर स्वर्गमें देव हुआ। शास्त्रदानके फलसे कौण्डेश मुनि शास्त्र पारगामी हुए । पूर्वजन्ममें उसे वनमें वृक्षके एक कोटरमें एक शास्त्र मिला । वह शास्त्र उसने एक मुनिको भेंट किया और उसकी पूजा करता रहा। मरकर वह उसी ग्रामके स्वामीका पुत्र हुआ। बड़ा होनेपर उसे पूर्वजन्मका स्मरण हुआ। मुनिदीक्षा लेकर वह कौण्डेश नामसे प्रसिद्ध जैनाचार्य हुआ । अतः चारों प्रकारका दान करना उचित है ।।७०॥ आगे कहते हैं कि जिनधर्मकी परम्परा चालू रखनेके लिए नवीन मुनियोंको उत्पन्न करनेका और विद्यमान मुनियोंके गुणोंमें विशेषता लानेका प्रयत्न करना चाहिए जैसे गृहस्थ अपने वंशकी परम्परा चलानेके लिए सन्तान उत्पन्न करता है और उसे गुणी बनानेका प्रयत्न करता है उसी तरह उसे लोकोपकारी जैनधर्मकी परम्पराको चालू रखनेके लिए नवीन मुनियोंको उत्पन्न करनेका और वर्तमान मुनियोंको श्रुतज्ञान आदिसे उत्कृष्ट बनानेका प्रयत्न करना चाहिए ।।७१॥ 'आजकल पुरुषोंके दुष्कर्म बढ़ते जाते हैं, उनके गुणोंमें कोई उन्नति नहीं देखी जाती, अतः उसके उत्पन्न करनेका प्रयत्न निष्फल है' गृहस्थोंके इस प्रकारके निरुत्साहका निषेध करते हैं पंचमकालके अथवा पापकर्मके दोषसे मुनियोंके गुणोंमें विशेषता लानेके प्रयत्नके सार्थक नहीं होनेपर भी जो प्रयत्न करता है, उसका कल्याण अवश्य होता है। और यदि उसमें सफलता मिलती है तो उस प्रयत्नके करनेवाले मनुष्यका तथा साधर्मिजनों और जनसाधारणका महान् लाभ है ॥७२॥ महाव्रत अथवा अणुव्रतका पालन करनेवाली स्त्रियाँ भी धर्मपात्र होनेसे पात्रदानके योग्य हैं, इसका समर्थन करते हैं Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११२ धर्मामृत ( सागार) आर्यिकाः श्राविकाश्चापि सत्कुर्याद गुणभूषणाः । चतुविधेऽपि सङ्घ यत्फलत्युप्तमनल्पशः ॥७३॥ स्पष्टं ॥७३॥ एवं धर्मपात्रानुग्रहं गृहस्थस्यावश्यकार्यतयोपदिश्य सम्प्रति कार्यपात्रानुग्रहविध्युपदेशार्थमाह धर्मार्थकामसध्रीचो यथौचित्यमुपाचरन् । सुधीस्त्रिवर्गसंपत्या प्रेत्य चेह च मोदते ॥७॥ सध्रीचः-सहायान् ॥७४॥ एवं समदत्ति पात्रदत्त च प्रबन्धेनाभिधायेदानी दयादत्ति विधेयतमत्वेनोपदिशन्नाह सर्वेषां देहिनां दुःखाद् बिभ्यतामभयप्रदः। दयाद्रो दातधौरेयो निीः सौरूप्यमश्नुते ॥७॥ दातृधौरेयः-अन्नादिदातृणामग्रणीः । यदाह 'तेनाधीतं श्रुतं सर्वं तेन तप्तं परं तपः। तेन कृत्स्नं कृतं दानं यः स्यादभयदानवान् ।।' [ सो. उपा. ७७५ ] अपि च 'धमार्थकाममोक्षाणां जीवितं मूलमिष्यते । तद्रक्षता न कि दत्तं हरता तन्न किं हृतम् ॥' [ अमि. श्रा. १११२ ] श्रुत-तप-शील आदि गुणोंसे सुशोभित उपचरित महाव्रतकी धारी आर्यिकाओं और यथाशक्ति मूलगुण और उत्तर गुणोंकी धारी श्राविकाओंको तथा 'अपि' शब्दसे गुणभूषित किन्तु व्रतरहित नारियोंका भी गृहस्थको विनय आदि पूर्वक सत्कार करना चाहिए। क्योंकि मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविकाके भेदसे चतुर्विध संघमें दिया गया ज्ञान बहुत फल देता है ।।७।। विशेषार्थ-आशय यह है कि जिनबिम्ब, जिनालय और जिनवाणीमें व्यय किया गया धन ही बहुफल दायक नहीं होता, किन्तु चतुर्विध संघमें दिया गया दान भी बहु फलदायक होता है। इस तरह गृहस्थ के धन खर्च करनेके लिए ये सात स्थान जानने चाहिए ॥७३॥ __इस प्रकार धर्मपात्रोंपर अनुग्रह करना गृहस्थका आवश्यक कर्तव्य बतलाकर अब कार्यपात्रोंपर अनुग्रह करनेका उपदेश देते हैं __ धर्म, अर्थ और काममें सहायकोंका यथायोग्य उपकार करनेवाला बुद्धिशाली गृहस्थ इस लोकमें और परलोकमें धर्म, अर्थ और कामरूप सम्पदासे सम्पन्न होकर आनन्दित होता है ॥७४॥ विशेषार्थ-जो धर्ममें सहायक ज्ञानी तपस्वीजन हैं, अर्थमें सहायक मुनीम गुमाश्ते हैं और काममें सहायक पत्नी है, इन सभीका यथायोग्य सत्कार करनेसे गृहस्थाश्रम सानन्द रहता है ।।७४॥ __ इस प्रकार समदत्ति और पात्रदत्तिको विस्तारसे कहने के बाद अब दयादत्तिको अवश्य करणीय कहते हैं शारीरिक और मानसिक दुःखसे डरनेवाले सब प्राणियोंको अभयदान देनेवाला दयालु अन्न आदिका दान देनेवालोंमें अग्रणी होता है तथा वह सब ओरसे भयरहित होकर सौरूप्यको प्राप्त होता है ।।७५।। Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) 'दानमन्यद्भवेन्ना वा नरश्चेदभयप्रदः । सर्वेषामेव दानानां यतस्तद्दानमुत्तमम् ॥' [ सो. उपा. ७७४ ] 'यो भूतेष्वभयं दद्यात् भूतेभ्यस्तस्य नो भयम् । यादृग्वितीयं दानं तादृगध्यास्यते फलम् ॥' [ सौरूप्यं । उक्तं च ] 'मनोभूरिव कान्ताङ्गः सुवर्णाद्रिरिव स्थिरः । सरस्वानिव गम्भीरो विवस्वानिव भास्वरः ॥ आदेयः सुभगः सौम्यस्त्यागी भोगी यशोनिधिः । भवत्यभयदानेन चिरजीवी निरामयः ॥ तीर्थंकुच्चक्रिदेवानां सम्पदो बुधवन्दिताः । क्षणेनाभयदानेन दीयन्ते दलितापदः ॥' [ अभि. श्री . ११९-११ ] ॥ ७५ ॥ भृत्वाऽऽश्रितानवृत्याऽऽर्तान्कृपयानाश्रितानपि । भुञ्जीतन्ाम्बुभैषज्य ताम्बूलैलादि निश्यपि ॥७६॥ आदिशब्देन जातिफलकर्पूरादिमुखवासन प्रायद्रव्यपरिग्रहः ॥ ७६ ॥ विशेषार्थ - सोमदेव सूरिने अभयदानकी प्रशंसा करते हुए कहा है - जिसने अभय दान दिया उसने समस्त शास्त्रोंका अध्ययन कर लिया, उत्कृष्ट तप तथा और सब दान दिया । यदि मनुष्यने अभयदान दिया तो वह अन्य दान देवे या न देवे । क्योंकि अभयदान सब दानों में श्रेष्ठ है । जो प्राणियोंको अभयदान देता है उसे प्राणियोंसे कोई भय नहीं रहता । ठीक ही है जैसा दान दिया जाता है वैसा ही फल प्राप्त होता है । आचार्य अमितगतिने कहा हैधर्म, अर्थ, काम और मोक्षका मूल जीवन है जिसने उसकी रक्षा की उसने क्या नहीं दिया और जिसने उसे हर लिया उसने क्या नहीं हर लिया । अभयदानसे कामदेवकी तरह सुन्दर शरीर, सुमेरु पर्वत की तरह स्थिर, समुद्रकी तरह गम्भीर, सूर्यकी तरह प्रकाशमान तथा सौभाग्यशाली, सौम्य, त्यागी, भोगी, यशस्वी, नीरोग और चिरंजीवि होता है । अभयदानसे तीर्थंकर, चक्रवर्ती और देवोंकी विभूति क्षणमात्रमें प्राप्त होती है तथा आपत्तियाँ दूर होती हैं ॥ ७५ ॥ पहले कहा था कि श्रावकको धर्म और यशके कार्य करना चाहिए | उसीका विस्तार करते हुए अपने आश्रितोंके भरण-पोषण और दया बुद्धिसे जो अपने आश्रित नहीं हैं उनका भी भरण-पोषण करनेकी प्रेरणा करते हुए दिन में भोजनका उपदेश देते हैं tara न होनेसे दुःखी अपने आश्रित मनुष्यों और तियंचोंको तथा दयाभाव से जो अपने आश्रित नहीं हैं उनका भरण-पोषण करके गृहस्थको दिनमें भोजन करना चाहिए । तथा रात्रिमें भी जल, औषधी, पान, इलायची आदि ले सकता है ॥७६॥ विशेषार्थ - यह कथन पाक्षिक श्रावकके लिए है । पाक्षिक श्रावकको चारों प्रकारका आहार तो दिन में ही करना चाहिए, रात्रि में केवल औषधि, जल और मुखको शुद्ध तथा सुवासित करनेवाले द्रव्य ही खाना चाहिए । केवल अन्न मात्र रात्रिमें न लेनेकी और उसके सिवाय अन्य सब कुछ खानेकी परम्परा आगमिक नहीं है, लौकिक है । किन्तु आज तो १. 'ताम्बूलमोषधं तोयं मुक्त्वाऽऽहारादिकां क्रियाम् । प्रत्याख्यानं प्रदीयेत यावत्प्रातदिनं भवेत् ' ॥ [ सा. - १५ ] ११३ ३ ६ १२ Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११४ धर्मामृत ( सागार ) सेव्यानामप्यर्थानां सेवायामसम्भवत्यां कालपरिच्छित्या प्रत्याख्येयतामुपदिश्य तत्प्रत्याख्यानं फलवत्तया समर्थयते यावन्न सेव्या विषयास्तावत्तानाप्रवृत्तितः । व्रतयेत्सव्रतो दैवान्मृतोऽमुत्र सुखायते ॥७७॥ स्पष्टम् ॥७७॥ अथ 'तपश्चयं च शक्तितः' इत्यक्तं तद्विशेषविधिमभिधत्ते पञ्चम्यादिविधि कृत्वा शिवान्ताभ्युदयप्रदम् । उद्योतयेद्यथासंपन्निमित्त प्रोत्सहेन्मनः ॥७८॥ पं.........॥७८॥ समीक्ष्य व्रतमादेयमात्तं पाल्यं प्रयत्नतः। छिन्नं दात्प्रमादाद्वा प्रत्यवस्थाप्यमञ्जसा ॥७९॥ संकल्पपूर्वकः सेव्ये नियमोऽशुभकर्मणः। निवत्तिर्वा'वतं स्याद्वा प्रवत्तिःशभकर्मणि ॥८॥ उसका भी निर्वाह नहीं किया जाता। इस समय रात्रिभोजन जैनों में भी अजैनोंकी तरह ही प्रवर्तित है। यह बड़े खेदकी बात है। धार्मिकोंको इस ओर ध्यान देना चाहि __ सेवनीय पदार्थ भी जबतक सेवनमें न आवें तबतक कालकी मर्यादा करके उनको त्यागनेका उपदेश देते हुए उसका फल बतलाते हैं जितने काल तक स्त्री, ताम्बूल आदि विषयोंके सेवन करनेकी सम्भावना न हो तबतक उन विषयोंका त्याग कर देना चाहिए। दैववश यदि व्रतके साथ मरण हुआ तो परलोकमें सुखको भोगता है ॥७॥ ___ पहले कहा था कि शक्तिके अनुसार तप भी करना चाहिए, उसीका विशेष कथन करते हैं इन्द्र चक्रवर्ती आदिके पदोंके साथ अन्तमें मोक्ष प्रदान करनेवाले पुष्पांजलि मुक्तावली रत्नत्रय आदि विधानको करके सम्पत्तिके अनसार उद्यापन करना चाहिए। तथा नित्य कृत्यकी अपेक्षा नैमित्तिक अनुष्ठानमें मनको अधिक उत्साहित करना चाहिए ॥७८॥ अब व्रतोंको लेना, उनका रक्षण करना, यदि व्रत भंग हो जाये तो प्रायश्चित्त लेकर पुनः व्रत लेनेका उपदेश करते हैं ___ अपने कल्याणके इच्छुक गृहस्थको अपनी तथा देश, काल, स्थान और सहायकोंकी अच्छी तरह समीक्षा करके व्रत ग्रहण करना चाहिए। और ग्रहण किये हुए व्रतको प्रयत्नपूर्वक पालना चाहिए । प्रमादसे या मदमें आकर यदि व्रतमें दोष लग जाये तो तत्काल प्रायश्चित्त लेकर पुनः व्रत ग्रहण करना चाहिए ॥७९॥ आगे व्रतका स्वरूप कहते हैं सेवनीय अपनी स्त्री और ताम्बूल आदिके विषयमें संकल्पपूर्वक नियम लेना, अथवा संकल्पपूर्वक अशुभ कर्म हिंसा आदिसे विरक्त होना, या संकल्पपूर्वक पात्रदान आदि शुभ कर्ममें प्रवृत्ति करना व्रत है ।।८०॥ १. 'व्रतमभिसन्धिकृतो नियमः।-सर्वार्थ. ७।१। Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) न हिस्यात्सर्वभूतानीत्या धर्मी प्रमाणयन् । सागसोऽपि सदा रक्षेच्छक्त्या किं नु निरागसः॥८१॥ ..जन्तूनां हिंसां संकल्पतस्त्यजेत् ॥८॥ आरम्भेऽपि सदा हिंसां सुधीः साङ्कल्पिकों त्यजेत् । घ्नतोऽपि कर्षकादुच्चैः पापोऽघ्नन्नपि धीवरः ॥८॥ कि अमुञ्चतः स मांसाद्यथित्वेन हन्मीति संकल्पपूर्विकाम्............। '[ अघ्नन्नपि भवेत्पापी निघ्नन्नपि-] न पापभाक् । अभिध्यानविशेषेण यथा धीवरकर्षकौ ॥' [ सो. उपा. ३४१ ] ८२॥ विशेषार्थ-यह इतनी वस्तु मैं इतने काल तक सेवन नहीं करूँगा, अथवा यह इतनी वस्तु इतने काल तक मैं सेवन करूँगा, इस प्रकारसे मनमें निर्णय करके नियम लेनेको व्रत कहते हैं। जबतक संकल्पपूर्वक नियम नहीं लिया जाता तबतक व्रत नहीं कहाता । नियम करनेसे मन उस वस्तुकी ओरसे निवृत्त हो जाता है। अन्यथा सेवनकी भावना बनी रहती है ।।८।। आगम विशेषपर विश्वासका आलम्बन लेकर प्राणिरक्षाका उपदेश देते हैं समस्त त्रस और स्थावर जीवोंको नहीं मारना चाहिए इस प्रकारके ऋषियोंके वचनको 'यही सत्य है' इस प्रकार प्रमाण माननेवाले धार्मिकको अपराध करनेवाले जीवोंकी भी सदा रक्षा करनी चाहिए। तब जो निरपराधी हैं उनका तो कहना ही क्या है ? उनकी रक्षा तो अवश्य ही करनी चाहिए ।।८।।। विशेषार्थ-'मा हिंस्यात्सर्वभूतानि'-सब प्राणियोंकी हिंसा नहीं करनी चाहिए यह श्रुतिवचन है । जो वेदपर श्रद्धा रखते हैं उन्हें इस श्रुतिवाक्यको प्रमाण मानकर अपराधी जीवोंका भी प्राण नहीं लेना चाहिए। मनुस्मृति में कहा है-'जो अपने सुखके लिए अहिंसक जीवोंका वध करता है वह जीता हुआ और मरकर भी सुखी नहीं होता' ।।८१॥ . संकल्पी हिंसाके त्यागका उपदेश देकर दृष्टान्तके द्वारा उसका समर्थन करते हैं हिंसाके फलको निश्चित रूपसे जाननेवाला बुद्धिमान पुरुष कृषि आदि आरम्भ करते हुए भी संकल्पी हिंसाको छोड़े। क्योंकि मारते हुए भी किसानसे नहीं मारता हुआ भी मछलीमार अधिक पापी है ॥८२॥ विशेषार्थ-हिंसाका पालन इसलिए अशक्य-जैसा प्रतीत होता है क्योंकि ऐसी कोई क्रिया नहीं है जिसमें हिंसा न होती हो। किन्तु इसीलिए जैन धर्म में हिंसाके अनेक भेद करनेके साथ ही गौण और मुख्य भावोंपर विशेष बल दिया है । हिंसाके मुख्य दो भेद हैंअनारम्भी या संकल्पी हिंसा और आरम्भी हिंसा। 'मैं मांस आदि के लिए अमुक प्राणीको मारूँ' यह संकल्पी हिंसा है। किन्तु आरम्भमें होनेवाली हिंसाको टालना तो अशक्य है क्योंकि गृहस्थाश्रम आरम्भके बिना चल नहीं सकता और आरम्भमें हिंसा अवश्य होती है। अतः आरम्भमें भी संकल्पी हिंसा नहीं करनी चाहिए। आरम्भी हिंसा करनेवालेसे संकल्पी हिंसा १. धर्मे मु.। २. 'योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया । स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते ॥'-मनुस्म. ५।४५ । Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११६ धर्मामृत ( सागार) ____ अथ परै [ विधेयतया व्यवस्थाप्यमानं हिंस्रादिप्राणिनां वधं प्रतिविधातुमाह-] हिस्र-दुखि-सुखि-प्राणिघातं कुर्यान्न जातुचित् । _अतिप्रसङ्ग-श्वभ्राति-सुखोच्छेदसमीक्षणात् ॥८३॥ [ अत्र केचिदाहुः हिंस्रजीवा हन्तव्याः ] हिंस्र ोकस्मिन् हते भूयसां रक्षा कृता भवति । ततश्च धर्मा [-धिगमः पापोपरमश्च स्यात् ] इति तदयुक्तमतिप्रसङ्गात् । सर्वेषां प्राणिनां हिंस्रतया [हन्तव्यतानुषङ्गात् । ६ तथा च लाभमिच्छतां तथावादिनां मूलोच्छेदः स्यात् । न च बहरक्षणाभिप्रायेणापि हिंस्रं हिंसतो धर्मः पा-] पोच्छेदो वा युज्यते दयामूलत्वात्तयोः । उक्तं च _ 'केचिद् वदन्ति...हन्तव्यता स्यात् । लाभमिच्छार्मूलक्षतिः स्फुटा। अहिंसा..... हेतुः कालकूटं चेवितायन जायते ॥' । यच्च संसारमोचकाः [प्रचक्षते दुःखिनो जीवा हन्तव्यास्तेषां विनाशे दुःखविनाशसंभवादिति । तदप्ययुक्तं तेषां स्वल्पदुःखानां निहतानां नरकेऽनन्त ] दुःखसंयोजनाया दुनिवारत्वात् । उक्तं च 'दुःखवतां भवति वधे धर्मो नेदमपि युज्यते वक्तुम् । मरणे नरके दुःखं घोरतरं वार्यते केन ॥' [ अमि. श्रा. ६।३९ ] करनेवाला अधिक पापी होता है। उदाहरणके लिए एक किसान खेत जोत रहा है और खेत जोतनेसे बहुत-से जीवोंका घात हो रहा है। तथा एक मछलीमार पानीमें जाल डाले बैठा है उस समय वह किसी की जान नहीं लेता। फिर भी किसानसे मछलीमार अधिक पापी है । क्योंकि किसानका भाव जीव मारनेका नहीं है अन्न पैदा करनेका है और मछलीमारका भाव मछली मारनेका है । अतः दोनों के भावोंमें बहुत भेद है ।।८२॥ कुछ लोग हिंसक आदि प्राणियोंको मारनेका विधान करते हैं। उनका निषेध करते हैं हिंसक, दुःखी और सुखी प्राणीका घात कभी भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करनेसे अतिप्रसंग, नरककी पीड़ा और सुखका विनाश देखा जाता है ॥८३।। विशेषार्थ-कुछ लोग कहते हैं कि हिंसक जीवोंको मार देना चाहिए, क्योंकि एक शेर वगैरहको मार देनेपर बहुत-से जीवोंकी रक्षा हो जाती है। और ऐसा होनेसे धर्मकी प्राप्ति और पापसे छुटकारा होता है। किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं है, इसमें तो अतिप्रसंग आता है । क्योंकि यदि यह नियम बनाया जाता है कि हिंसकको मार देना चाहिए तो जो हिंसकको मारेगा वह भी हिंसक होगा। तब उसे भी मार देना चाहिए। उसे जो मारेगा वह भी हिंसक होगा। अतः उसे भी मार देना होगा। इस तरह सभीके हिंसक होनेसे सभीको मार डालनेका प्रसंग आयेगा। तब लाभके बदलेमें मूलका ही उच्छेद हो ज तथा बहुत जीवोंकी रक्षाके अभिप्रायसे हिंसकको मारनेवालेको न तो धर्म ही होना सम्भव है और न पापका ही उच्छेद होना सम्भव है। क्योंकि उनका मूल तो दया है। पहले एक मतवालोंका कहना था कि दुःखी जीवोंको मार देना चाहिए इससे वे दुःखसे छूट जाते हैं। किन्तु यह भी ठीक नहीं है क्योंकि यहाँ तो उन्हें कम दुःख है । यदि मरनेपर वे नरकमें गये तो उनको अनन्त दुःख उठाना होगा। कहा है-दुखी जीवोंको मरनेमें धर्म होता है ऐसा कहना भी उचित नहीं है। क्योंकि मरनेपर नरकके घोर दुःखसे कौन बचा सकता है। किन्हींका मत है कि संसारमें सख दर्लभ है अतः सखी जीवोंको मार देना चाहिए क्योंकि सखी जीव मरकर अगले भवमें सुखी ही होंगे। यह कथन भी ठीक नहीं है क्योंकि सुखीको Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) ११७ अन्ये त्वाहुः - सुखिनो हन्तव्याः यतः संसारे सुखं दुर्लभं सुखिनश्च हताः सुखिन एव भवन्तीति । तदप्यसङ्गतं, सुखिनां हन्यमानानां दुःखावेशेन सुखोच्छेदस्यावश्यं भावात् दुःखमृत्युना च दुर्ध्यानानुसन्धानादुरन्तदुर्गतिदुःखावर्तनिर्वर्तनात् । तदलमतिप्रसङ्गेन । स्वगता परगता वा यथाकथंचित् क्रियामाणा हिंसा न धर्माय स्यात् । किं तर्हि ? पातकसंभवायैवेति प्रतिपद्यमानैर्यथाशक्तितत्परित्यागे धर्मार्थभिः सततं यतितव्यमित्याप्तसूत्रोपनिषत् । यदाह ३ 'को नाम विशतिमोहं नयभङ्गविशारदानुपास्य गुरून् । विदित जनमत रहस्यः श्रयन्नहिंसां विशुद्धमतिः ॥ [ पुरुषार्थ ९० ] ॥८३॥ अथ पाक्षिकस्य दुर्गविशुद्धयर्था लोकानुवृत्त्यर्थाश्च क्रियाः कृत्यतयोपदिशति स्थूललक्ष: क्रियास्तीर्थयात्राद्यादृग्विशुद्धये । कुर्यात्तथेष्ट भोज्याद्याः प्रीत्या लोकानुवृत्तये ॥८४॥ स्थूललक्ष:-- स्थूलव्यवहारं लक्षयत्यालोचयतीति स्थूललक्षो व्यवहारप्रधानो बहुप्रदश्च । तीर्थयात्रा -- तीर्थान्यूर्जयन्तादीनि पुण्यपुरुषाध्युषितस्थानानि । तेषु यात्रा – गमनम् । आद्यशब्देन रथयात्रा- १२ क्षप यात्रा निषिद्धकागमनादयः । इष्टभोज्याद्याः - सधर्म - स्वजन - मित्रादयो भोज्यन्ते स्वगृहे भोजनं कार्यन्ते यस्यां सा इष्टभोज्या क्रिया । आद्यशब्देनातिथिपूजन- भूतबल्यादयः । अत्राह श्रीसोमदेवपण्डितः– 'आवेशिका तिथिज्ञातिदीनात्मसु यथाक्रमम् । यथौचित्यं यथाकालं यज्ञपंचकमाचरेत् ॥' [ सो. उपा. ७९५ ] मारनेपर उसे दुःख होगा । और इससे उसके सुखका विनाश अवश्य होगा । तथा दुःखपूर्वकमरण करने से खोटे ध्यानके प्रभाव से दुर्गतिमें जन्म लेना होगा और तब वहाँ दुःखोंका अन्त नहीं रहेगा । इस प्रकार पुरुषार्थ सिद्धयुपायमें हिंसा के सम्बन्ध में बहुत-से प्रचलित विकल्पोंका निराकरण किया है । अतः किसी भी प्रकार से की गयी हिंसा धर्मके लिए नहीं होती । किन्तु पापके ही लिए होती है । इसलिए धर्मार्थीको यथाशक्ति हिंसाको छोड़ने में प्रयत्नशील रहना चाहिए ||८३ || पाक्षिक श्रावकको सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि और लोगोंको अपने अनुकूल करने के लिए करने योग्य क्रिया बतलाते हैं व्यवहारको प्रधानता देनेवाले पाक्षिक श्रावकको सम्यग्दर्शनको निर्मल करने के लिए यात्रा आदि क्रिया करनी चाहिए। तथा लोगोंके चित्तको अनुकूल करनेके लिए प्रेमपूर्वक जीमनवार आदि करना चाहिए ||८४|| विशेषार्थ - पाक्षिक श्रावकका आचार व्यवहार प्रधान होता है अतः उसे तीर्थयात्रा, १. 'रक्षा भवति बहूनामेकस्यैवास्य जीवहरणेन । इति मत्वा कर्तव्यं न हिंसनं हिंस्रसत्त्वानाम् ॥ बहुसत्त्व घातिनोऽमी जीवन्त उपार्जयन्ति गुरुपापम् । इत्यनुकम्पां कृत्वा न हिंसनीया शरीरिणो हिंस्राः ॥ बहुदुःखाः संज्ञापिताः प्रयान्ति त्वचिरेण दुःखविच्छित्तिम् । इति वासनाकृपाणीमादाय न दुःखिनोऽपि हन्तव्याः || कृच्छ्र ेण सुखावाप्तिर्भवन्ति सुखिनो हताः । सुखिन एव इति तर्कमण्डलाग्रः सुखिनां घाताय नादेयः ॥ - पुरुषार्थ. ८३-८६ श्लो. । १५ Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२ धर्मामृत ( सागार) 'होमभूतबली पूर्वैरुक्ती भक्तविशुद्धये । भुक्त्यादौ सलिलं सर्पिरूधस्यं च रसायनम् ।। एतद्विधिनं धर्माय नाधर्माय तदक्रिया । दर्भपुष्पाक्षतश्रोतृवन्दनादि विधानवत् ॥' तथा 'बहिविहृत्य संप्राप्तो नानाचम्य गृहं विशेत् । स्थानान्तरात्समायातं सर्वं प्रोक्षितमाचरेत् ।।' [सो. उपा. ४७४, ४७५, ४७१ ] इत्यादि ।।८४॥ अथ श्रेयोथिनः कीर्तेरप्यर्जनीयत्वमाह_अकीर्त्या तप्यते चेतश्चेतस्तापोऽशभास्रवः। तत्तत्प्रसादाय सदा श्रेयसे कीर्तिमर्जयेत् ॥८५।। अशुभास्रवः-पापहेतुः ॥८५॥ अथ कीयुपाजनोपायमाह परासाधारणान् गुण्यप्रगण्यानघमर्षणान् । गुणान् विस्तारयेन्नित्यं कोतिविस्तारणोद्यतः ॥८६॥ गुण्यप्रगण्यान्-गुणवद्भिः प्रकर्षण माननीयान् । अघमर्षणान्-पापध्वसिनः । गुणान्-दानसत्यशौचशीलादीन् ।॥८६॥ रथयात्रा आदि करना चाहिए इससे उसकी श्रद्धामें प्रगाढ़ता और निर्मलता आती है। पहले लोग तीर्थयात्रासे लौटनेपर अपने इष्टमित्रों और साधर्मियोंको अपने घरपर भोजन कराया करते थे। इससे साधर्मी वात्सल्यमें वृद्धि होती है ॥८४॥ आगे यश कमानेपर भी जोर देते हैं यश न होनेसे मनुष्यके मनमें संक्लेश रहता है और चित्तमें संक्लेशके रहनेसे अशुभ कर्मोंका आस्रव होता है। इसलिए चित्तकी प्रसन्नताके लिए, जो कि पुण्य संचयका कारण है, सदा यश उपार्जन करना चाहिए ॥८५॥ विशेषार्थ-मनुष्य चाहता है कि लोगोंमें-समाजमें मेरा यश हो, लोग मेरे कार्योंकी बड़ाई करें। यदि ऐसा नहीं होता तो उसके मनमें दुःख रहता है । दुःखरूप परिणामोंसे पापकर्मका बन्ध होता है। अतः कल्याणके लिए पुण्यकर्मका उपार्जन आवश्यक है। और उसके लिए मनमें प्रसन्नता रहना जरूरी है। इसलिए गृहस्थको ऐसे भी काम करना चाहिए जिससे लोकमें ख्याति हो ॥८५॥ यश कमानेके उपाय कहते हैं अपना यश फैलाने में तत्पर गृहस्थको दूसरोंमें न पाये जानेवाले, और गुणवानों के द्वारा अति माननीय तथा पापोंका विनाश करनेवाले दान, सत्य, शौच, शील आदि गुणोंको नित्य बढ़ाना चाहिए ।।८६।। विशेषार्थ-इन्होंने कीर्ति फैलानेका उपाय सद्गुणोंको फैलाना बतलाया है। यह कठिन है। किन्तु यथार्थमें यश तो सद्गुणोंके फैलावसे ही मिलता है। अन्यायसे धन उपार्जन करके उससे यश कमाना लौकिक दृष्टि में भले ही उत्तम माना जाये। किन्तु सद्गुणोंके प्रकारमें योगदानसे अपना और सबका कल्याण होता है ।।८।। Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकादश अध्याय (द्वितीय अध्याय ) ११९ अथैवंविधाचारपास्य श्रावकस्योत्तरोत्तरभूमिकाश्रयणेन सकलविरतिपदाधिरोहणविधिमुपदिशति सैषः प्राथमकल्पिको जिनवचोऽभ्यासामृतेनासकृ निर्वेदद्रुममावपन् शमरसोद्गारोधुरं बिभ्रति । पाकं कालिकमुत्तरोत्तरमहान्त्येतस्य चर्याफला __ न्यास्वाद्योधतशक्तिरुद्धचरितप्रासादमारोहतु ॥८॥ सैषः स एष इत्यर्थः । पादपणेऽत्र सेर्लोपः। प्राथमकल्पिक:-प्रारब्धदेशसंयमः । आवपन्सिञ्चन् । उद्गार-अभिव्यक्तिः । कालिकं-कालकृतम । चर्या:-दर्शनिकादिप्रतिमाः। उधचरितंसल्लेखनान्तो यतिधर्म इति । भद्रम् ॥८७॥ इत्याशाधरदब्धायां धर्मामृतपञ्जिकायां ज्ञानदीपिकापर संज्ञायामेकादशोऽध्यायः । इस प्रकार पाक्षिकके आचारमें तत्पर श्रावकके उत्तरोत्तर प्रतिमाओंपर आरोहण करते हुए मुनिपद धारण करनेकी कामना करते हैं वही पाक्षिक श्रावक बार-बार जिनागमकी भावनारूप अमृतके द्वारा संसार शरीर भोगोंसे वैराग्यरूप वृक्षको सींचता हुआ, शान्तिरूपी रसकी अभिव्यक्तिसे लबालब भरे हुए काल पाकर पकनेवाले और उत्तरोत्तर महान उस वृक्षके चारित्ररूपी फलोंको खाकर शक्तिके बढ़ जानेपर मुनिधर्मरूपी महलपर आरोहण करे ॥८॥ विशेषार्थ-यहाँ वैराग्यको एक वृक्ष माना है। जैसे वृक्षको जलसे सींचते हैं वैसे ही यह वैराग्यरूपी वृक्ष बार-बार जिनेन्दके वचनोंके अभ्यासरूपी जलसे सींचा जाता है। फिर उसपर पहली, दूसरी, तीसरी आदि प्रतिमाके आचाररूप फल लगते हैं, जो समय पाकर पकते हैं और उत्तरोत्तर महान् होते हैं अर्थात् उत्तरोत्तर प्रतिमाओंमें चारित्र बढ़ता जाता है। तथा उन चारित्ररूपी फलोंमें शान्तिरूपी रस भरा होता है। उसके सेवनसे श्रावककी शक्ति बढ़ती जाती है और तब वह मुनिपद धारण करके सल्लेखनापूर्वक मरण करता है ।।८७॥ इस प्रकार पं. आशाधर रचित धर्मामृतके अन्तर्गत सागारधर्मकी भव्यकुमुद चन्द्रिका टोका सोपज्ञ तथा ज्ञानदीपिका पञ्जिकाकी अनुसारिणी हिन्दी टीकामें प्रारम्भसे ग्यारहवाँ और इस सागारधर्मकी अपेक्षा दूसरा अध्याय समाप्त हुआ। Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वादश अध्याय ( तृतीय अध्याय ) अथ नैष्ठिकं दर्शयन्नाह देशयमनकषायक्षयोपशमतारतम्यवशतः स्यात् । दर्शनिकायेकादशदशावशो नैष्ठिकः सुलेश्यतरः ॥१॥ देशयमघ्नाः-अप्रत्याख्यानावरणाख्याः । वशः-सामर्थ्यम् । दर्शनं निर्मलं मद्यादिविरत्याहिताशयं ६ सम्यक्त्वमस्यास्तीत्यतिशायने ठावत इति ठः। एवं वतिकादयस्त्रयो व्युत्पाद्याः । उक्तं च 'दंसण-क्द-सामायिय-पोसह-सच्चित्त-राइभत्तेय । ब्रह्मारंभपरिग्गह अणुमणमुद्दिटुदेशविरदेदे ॥' [गो. जी. ४७६ ] सुलेश्यतरः । लिम्पति स्वीकरोति पुण्यपापे स्वयं जीवो यया सा लेश्या । उक्तं च 'लिम्पत्यात्मीकरोत्यात्मा पुण्यापुण्यैर्यथा स्वयम् । सा लेश्येत्युच्यते सद्भिद्विविधा द्रव्यभावतः ॥' [ अथवा लिशत्यल्पीकरोत्यात्मानमिति लेश्या। कषायानुरंजिता योगप्रवृत्तिः। सैषा भावतः द्रव्यतस्तु शरीरच्छवितेश्या । सा च द्वितय्यपि कृष्णादिभेदात् षोढा । उक्तं च 'प्रवृत्तिर्योगिकी लेश्या कषायोदयरञ्जिता । भावतो द्रव्यतो देहच्छविः षाढोभयी मता ॥ कृष्णा नीलाथ कापोती पीता पद्मा सिता स्मता। लेश्या षड्भिः सदा ताभिः गृह्यते कर्म जन्मिभिः ।।' [अमित. पञ्चसं. १०२५३-२५४] नैष्ठिकका लक्षण कहते हैं देशचारित्रको घातनेवाली कषायके क्षयोपशमके उत्तरोत्तर उत्कर्ष के कारण दर्शनिक आदि ग्यारह अवस्थाओंके अधीन तथा पाक्षिक की अपेक्षा उत्तम लेश्यावाला नैष्ठिक श्रावक होता है ॥१॥ विशेषाथ--अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ नामक कषाय देशचारित्रको घातती हैं। उसके क्षय अर्थात उदयके अभावके साथ प्रत्याख्यानावरण कषायके उदयसे विशिष्ट सदवस्थारूप उपशमको क्षयोपशम कहते हैं। यह क्षयोपशम पहलेसे दूसरी, दूसरीसे तीसरी, इस तरह ऊपरकी प्रतिमाओंमें बढ़ता जाता है । इसीके कारण दर्शनिक, व्रतिक आदि ग्यारह अवस्थाएँ होती हैं। उन सब अबस्थावाले श्रावक नैष्ठिक कहलाते हैं। उनके उत्तरोत्तर उत्तम लेश्या होती है। यहाँ लेश्याका वर्णन किया जाता है। जिसके द्वारा जीव अपनेको पुण्यपापसे लिम्पित करता है उसे लेश्या कहते हैं । लेश्याके दो भेद हैं-भावलेश्या और द्रव्यलेश्या । कषायके उदयसे रंगी मन-वचन-कायकी प्रवृत्तिको भावलेश्या कहते हैं। और शरीरके रंगको द्रव्यलेश्या कहते हैं । प्रत्येकके छह भेद हैं-कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पड़ा और शुक्ल । प्रारम्भकी तीन लेश्या कषायकी तीव्रतामें होती हैं, शेष तीन कषायकी मन्दतामें होती हैं। Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२१ द्वादश अध्याय ( तृतीय अध्याय ) अपि च 'योगाविरतिमिथ्यात्व-कषायजनितोऽङ्गिनाम् । संस्कारो भावलेश्यास्ति कल्मषास्रवकारणम् ।। कापोती कथिता तीवो नीला तीव्रतरो जिनैः । कृष्णा तीव्रतमो लेश्या परिणामः शरीरिणाम् ।। पीता निवेदिता मन्दः पद्मा मन्दतरो बुधैः । शुक्ला मन्दतमस्तासां वृद्धिः षट्स्थानयायिनी ।। निर्मूलस्कन्धयोश्छेत्तुं भावाः शाखोपशाखयोः । उच्चये पतितादाने भावलेश्या फलाथिनाम् ।। षट् षट् चतुर्दा विज्ञेयास्तिस्रस्तिस्रः शुभास्त्रिषु । शुक्ला गुणेषु षट्स्वेका लेश्या निर्लेश्यमन्तिमम् ।।' [अमित. पं. सं. १।२६१-२६५] तत्कर्माणः क्रमेण यथा 'रागद्वेषग्रहाविष्टो दुर्ग्रहो दुष्टमानसः। क्रोधमानादिभिस्तीत्रैर्ग्रस्तोऽनन्तानुबन्धिभिः ।। निर्दयो निरनुक्रोशो मद्यमांसादिलम्पटः । सर्वदा कदनासक्तः कृष्णलेश्यान्वितो नरः ।। कोपी मानी मायी लोभी रागी द्वेषी मोही शोकी। हिंस्रः क्रूरश्चण्डश्चोरो मूर्खः स्तब्धः स्पर्धाकारी ।। निद्रालुः कामुको मन्दः कृत्यांकृत्यविचारकः। महामूर्ची महारम्भो नीललेश्यो निगद्यते ॥ शोकभीमत्सरासूया-परनिन्दा-परायणः । प्रशंसति सदात्मानं स्तूयमानः प्रहृष्यति ॥ जैसे कापोती तीव्र, नील तीव्रतर और कृष्णलेश्या तीव्रतम है। इसी तरह पीत मन्द, पद्म मन्दतर और शुक्ल मन्दतम है । इन लेश्याओंमें षट्स्थान पतित हानि-वृद्धि हुआ करती है। एक दृष्टान्त द्वारा आगममें लेश्याओंका भाव स्पष्ट किया है कि छह पथिक जंगलमें मार्ग भल गये। वे भखे थे। उन्हें एक फलोंसे लदा वृक्ष मिला । एकने सोचा इस वृक्षको जड़से काटकर फल खायेंगे। उसके कृष्णलेश्या है। दूसरेने विचारा इसका तना काटकर फल खायेंगे। उसके नीललेश्या है। तीसरेके मनमें आया इसकी एक शाखा काटकर फल खायेंगे । उसके कापोतलेश्या है । चौथेके मनमें आया उपशाखा काटकर फल खायेंगे उसके पीतलेश्या है। पाँचवेने विचारा पेड़पर चढ़कर फल तोड़कर खायेंगे उसके पद्मलेश्या है । छठेने विचारा-पेड़के नीचे गिरे फल चुनकर खायेंगे उसके शुक्ललेश्या है । प्रथम चार गुणस्थानोंमें छहों लेश्या होती हैं । पाँचवें, छठे, सातवें गुणस्थानों में तीन शुभलेश्या होती हैं। आठवेसे तेरहवें तक छह गुणस्थानों में एक शुक्ललेश्या ही होती है । अन्तिम गुणस्थानमें लेश्या नहीं होती। इन लेश्यावाले जीवोंका लक्षण इस प्रकार है। जो राग द्वेष मदसे आविष्ट है, दुराग्रही है, दुष्ट अभिप्राय वाला है, अनन्तानुबन्धी क्रोध मान माया लोभसे ग्रस्त है, निर्दयी है, मद्य मांसमें आसक्त है, अभक्ष्यभोजो है वह कृष्ण लेश्यावाला होता है । क्रोधी, मानी, मायाचारी, लोभी, रागी, द्वेषी, मोही, सा.-१६ - - Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२२ धर्मामृत ( सागार) वृद्धिहानी न जानाति न मूढः स्वपरान्तरम् । अहंकारग्रहग्रस्तः समस्तां कुरुते क्रियाम् ।। श्लाघितो नितरां दत्ते रणे मर्तुमपीहते । परकीययशोध्वंसी युक्त: कापोतलेश्यया ॥ समदृष्टिरविद्विष्टो हिताहितविवेचकः । वदान्यो सदयो दक्षः पीतलेश्यो महामनाः ॥ शुचिर्दानरतो भद्रो विनीतात्मा प्रियंवदः । साधुपूजोद्यतः साधुः पद्मलेश्योऽनघक्रियः ।। निनिदानोऽनहंकारः पक्षपातोज्झितोऽशठः। रागद्वेषप्राचीनः शुक्ललेश्यः स्थिराशयः ।।' [ अमित. पं. सं. ११२७२-२८१ ] शोभना तेजःपद्मशुक्लानामन्यतमा लेश्या यस्यासौ सुलेश्यः। सदृष्टिपाक्षिकाभ्यामतिशयेन सुलेश्यः १२ सुलेश्यतरः, उत्तमसंवेगप्राप्तत्वात् । यदाह 'तेजः पद्मा तथा शुक्ला लेश्यास्तिस्रः प्रशस्तिकाः । संवेगमुत्तमं प्राप्तः क्रमेण प्रतिपद्यते ॥ [ ] लेश्याविशुद्धयादिनैव च महाव्रतिनोऽपि सद्गतिः । यदाह 'यो यया लेश्यया युक्तः कालं कुर्यान्महाव्रती। तल्लेश्ययैव स स्वर्गे तल्लेश्यायुजि जायते ।' [ ] ॥१॥ अथ दर्शनिकादीनुद्दिशंस्तेषां गृहित्व-ब्रह्मचारित्व-भिक्षुकत्वानि जघन्य-मध्यमोत्तमत्वानि च विभक्तुमार्याद्वयमाहशोक करनेवाला, हिंसक, क्रूर, चोर, मूर्ख, ईर्ष्या करनेवाला बहुत सोनेवाला, कामुक, कृत्यअकृत्यका विचार न करनेवाला, महा धन-धान्यमें अति आसक्त प्राणी नील लेश्यावाला होता है। बहुत शोक, बहुत भय करनेवाला, निन्दक, दूसरोंकी चुगली करनेवाला, दूसरोंका तिरस्कार करनेवाला, अपनी प्रशंसा करनेवाला, अपनी प्रशंसासे प्रसन्न होनेवाला, किसीका विश्वास न करनेवाला और अपनी ही तरह दूसरोंको भी माननेवाला, हानि-लाभकी परवाह न करनेवाला, युद्ध में मरने-मारनेको तैयार व्यक्ति कापोतलेश्यावाला है। सर्वत्र समदृष्टि, कृत्य-अकृत्य और हित-अहितको जाननेवाला, दया-दानमें लीन, विद्वान, पीतलेझ्यावाला होता है । त्यागी, क्षमाशील, भद्र, सरल परिणामी, साधुओंकी पूजामें तत्पर जीव पद्मलेश्यावाला होता है । सर्वत्र समभावी, पक्षपातसे रहित, निदान न करनेवाला, और राग-द्वेषसे रहित आत्मा शुक्ललेश्यावाला होता है। जो उत्तम संवेग भाव रखता है उसके पीत-पद्मशक्ललेश्या होती है। पाक्षिकसे नैष्ठिककी लेश्या प्रशस्त होती है। तथा नैष्ठिकके भी ग्यारह भेदोंमें उत्तरोत्तर प्रशस्त लेश्या होती है । कहा है- 'जो उत्तम संवेगभावको प्राप्त होते हैं उनके क्रमसे पीत-पद्म-शुक्ल तीन प्रशस्त लेश्या होती हैं।' लेश्याविशुद्धि आदिसे ही महाव्रतीकी भी सद्गति होती है । कहा है- 'जो महाव्रती जिस लेश्यासे मरण करता है वह उस लेश्यासे ही उसी लेश्यावाले स्वर्गमें जन्म लेता है' ॥१॥ दर्शनिक आदिका नामोल्लेख करते हुए उनके गृहस्थ, ब्रह्मचारी और भिक्षुक तथा जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट भेद दो पद्योंसे कहते हैं Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२३ द्वादश अध्याय (तृतीय अध्याय) देशनिकोऽथ वतिकः सामयिकी प्रोषधोपवासी च। सचित्तदिवामैथुनविरतौ गृहिणोऽणुयमिषु हीनाः षट् ॥२॥ अब्रह्मारम्भपरिग्रहविरता वणिनस्त्रयो मध्याः । अनुमतिविरतोद्दिष्टविरतावुभौ भिक्षुको प्रकृष्टौ च ॥३।। अथ मानन्तर्यार्थः प्रत्येक योज्यः । अणुयमिषु-श्रावकेषु मध्ये ॥२॥ भिक्षुको अल्पेकः प्रकृष्टौ च । चकाराद्-वणिनी च । उक्तं च 'षडत्र गृहिणो ज्ञेयास्त्रयः स्युर्ब्रह्मचारिणः। भिक्षुको द्वौ तु निर्दिष्टौ ततः स्यात्सर्वतो यतिः ॥' [ सो. उपा. ८५६ ] 'आद्यास्तु षट् जघन्याः स्युर्मध्यमास्तदनु त्रयः । शेषो द्वावुत्तमावुक्तौ जेनेषु जिनशासने ॥ [ चारित्रसार, पृ. २० ] ॥३॥ अथ नैष्ठिकोऽपि यादृशः सन् पाक्षिकव्यपदेशं लभते तादृशं दर्शयति दुर्लेश्याभिभवाज्जातु विषये क्वचिदुत्सुकः। स्खलन्नपि क्वापि गुणे पाक्षिकः स्यान्न नैष्ठिकः॥४॥ दुर्लेश्याभिभवात्-दूर्लेश्यया कृष्णनीलकापोतीनामन्यतमया। अभिभव:-कृतश्चिन्निमित्ताच्चेतनशक्तेस्तादृक् संस्कारोबोधस्तस्माद्धेतोस्तं वाश्रित्य । क्वचित्-कामिन्यादीनामन्यतमे। उत्सुकः- १५ सोत्कण्ठाभिलाषः । स्खलन्–अतीचारं गच्छन् , अनभ्यस्तपूर्वत्वात्संयमस्य दुर्धरत्वाद्वा मनसः । यद्बद्धाः'जोइय विसमिय जोयगइ' इत्यादि । क्वापि-मद्यविरत्यादीनामन्यतमे ॥४॥ दर्शनिक, व्रतिक, सामयिकी, प्रोषधोपवासी, सचित्तविरत, दिवामैथुनविरत ये छह गृहस्थ कहलाते हैं तथा श्रावकोंमें जघन्य होते हैं। अब्रह्मविरत, आरम्भविरत और परिग्रहविरत, ये तीन वर्णी या ब्रह्मचारी कहलाते हैं और श्रावकोंमें मध्यम होते हैं। अनुमतिविरत और उद्दिष्टविरत ये दो भिक्षुक कहे जाते हैं और श्रावकोंमें उत्तम होते हैं ॥२-३॥ विशेषार्थ-सभी ग्रन्थोंमें ग्यारह प्रतिमाओंका यही क्रम पाया जाता है। अपवाद है सोमदेवका उपासकाचार। उसमें तीसरी प्रतिमाका नाम अर्चा है। अर्चा पजाक उन्होंने तीसरी प्रतिमामें पूजापर विशेष जोर दिया है। तथा पाँचवीं प्रतिमा है आरम्भ त्याग और आठवीं प्रतिमा है सचित्त त्याग । इस तरह व्यतिक्रम है। सोमदेवने भी आदिकी छह प्रतिमावालोंको गृहस्थ, आगेकी तीन प्रतिमावालोंको ब्रह्मचारी और दो अन्तिमको भिक्षुक कहा है। चारित्रसारमें प्रथम छहको जघन्य, उनसे आगेके तीनको मध्यम और दो अन्तिमको उत्कृष्ट कहा है ॥२-३॥ नैष्ठिक भी जिस अवस्था में पाक्षिक कहलाता है उस अवस्थाको कहते हैं कृष्ण, नील या कापोत लेश्यामें-से किसी एक लेश्याके प्रभावसे चेतनशक्तिके पुराने संस्कारके उद्बुद्ध होनेसे किसी एक व्रतमें अतिचार लगानेवाला नैष्ठिक श्रावक नैष्ठिक नहीं रहता, पाक्षिक ही होता है ॥४॥ १. 'दंसण वय सामाइय पोसह सच्चित्तराइभत्तीय । वंभारंभ परिग्गह अणुमण उद्दिट्ट देसविरदेदे ॥' चारित्तपाहुण २१, प्रा. पंचसंग्रह १।१३६ । वारस अणुवेक्खा ६९, गो. जी. ४७६ । वसु. श्रा. ४ । महापु.१०।१९-१६० । 'मूलव्रतं व्रतान्यर्चा पर्वकर्माकृषिक्रियाः। दिवा नवविधं ब्रह्म सचित्तस्य विवर्जनम् ॥ परिग्रहपरित्यागे मुक्तिमात्रानुमान्यता। तद्धानौ च वदन्त्येतान्येकादश यथाक्रमम् ॥'-सो. उ., ८५३-८५४। Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ ६ ९ १२ धर्मामृत ( सागार ) अथ दर्शनिकादिनामास्वस्वानुष्ठानदाढर्थ्याद् द्रव्यत एव दर्शनिकादिव्यपदेशः स्याद्भावतस्तु पूर्वः पूर्वोसाविति बोधयन्नाह १२४ तद्वद्दर्शनिकादिश्च स्थैर्यं स्वे स्वे व्रतेऽव्रजन् । लभते पूर्वमेवार्थाद्वयपदेशं न तूत्तरम् ॥५॥ तद्वत् - नैष्ठिकमात्रवत् । स्वे स्वे व्रते - निरतिचाराष्टमूलगुणादिलक्षणे ॥५॥ एतदेव समर्थयितुमाह - प्रारब्धो घटमानो निष्पन्नश्चार्हतस्य देशयमः । योग इव भवति यस्य त्रिधा स योगीव देशयमी ॥६॥ योगः - रत्नत्रयम् । योगीव - यथा प्रारब्धयोगो घटमानयोगो निष्पन्नयोगश्चेति नैगमादिनयापेक्षया त्रिविधो योगी तथा प्रारब्धदेशसंयमो घटमानदेशसंयमो निष्पन्नदेशसंयमश्चेति त्रिविधः श्रावकोऽपि स्यादित्यर्थः ॥ ६ ॥ एवं स्थलशुद्धि विधाय दर्शनिकादिस्वरूपनिरूपणार्थं श्लोकद्वयमाह- विशेषार्थ - जिस पाक्षिकने प्रतिमा धारण की है यदि वह कदाचित् पुराने संस्कारके जाग्रत हो जाने से किसी एक इन्द्रिय विषयकी तीव्र इच्छा करता है या संयमका अभ्यास न होनेसे और मनको वशमें करना कठिन होनेसे किसी व्रतमें दोष लगा लेता है तो वह पाक्षिक ही कहलाता है, नैष्ठिक नहीं ॥४॥ इस प्रकार दर्शनिक आदि ग्यारह प्रतिमाओंके धारी भी यदि अपनी-अपनी प्रतिमा में दृढ़ नहीं हैं तो वे द्रव्यसे ही उस प्रतिमावाले कहलायेंगे, भावसे तो उससे पूर्व प्रतिमाके धारी ही कहे जायेंगे, यह बतलाते हैं उसी तरह दर्शनिक आदि श्रावक भी अपने-अपने व्रतमें यदि स्थिर न हों, कभी कहीं किंचित् भी डिंग जाते हों तो परमार्थसे पहलेकी प्रतिमावाले ही कहलाते हैं, उस पर्व की प्रतिमासे आगेकी प्रतिमावाले नहीं कहलाते ||५|| विशेषार्थ - जैसे पहली प्रतिमावाला यदि निरतिचार अष्टमूल गुणके पालनमें कभी किंचित् दोष लगा लेता है तो वह भावसे पाक्षिक ही कहलायेगा । द्रव्यसे उसे भले ही पहली प्रतिमाका धारी कहा जाये ||५|| इसीका समर्थन करते हैं जैसे योगी तीन प्रकार के होते हैं - एक योगकी प्रारम्भिक दशावाले, एक मध्यम दशावाले और पूर्ण दशावाले । इस तरह नैगम आदि नयकी अपेक्षा तीन प्रकारके योगी होते हैं । उसी तरह श्रावक भी तीन प्रकार के होते हैं - जिन भगवान्को ही एकमात्र शरण माननेवाले जिस श्रावकके देशसंयमकी प्रारम्भिक दशा होती है, दूसरे जिसके मध्यम दशा होती है और तीसरा जो पूर्ण देशसंयमको पालता है । ये तीनों ही देशसंयमी श्रावक होते हैं ॥६॥ इस प्रकार प्रारम्भिक कथन करके दो इलोकोंसे दर्शनिक श्रावकका स्वरूप कहते हैं- Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२५ द्वादश अध्याय ( तृतीय अध्याय ) पाक्षिकाचारसंस्कारदृढीकृतविशुद्ध दृक् । भवाङ्ग भोगनिविण्णः परमेष्ठिपदैकधीः ।।७।। निर्मलयन्मलान्मूलगुणेष्वग्रगुणोत्सुकः । न्याय्यां वृत्ति तनुस्थित्यै तन्वन्दर्शनिको मतः ॥८॥ भवाङ्गभोगा:-संसारशरीरेष्टविषयाः । अथवा भवाङ्ग-संसारकारणं यो भोगो बुद्धिपूर्व कामिन्यादिविषयसेवनं, ततो निविण्णो-विरक्तः। प्रत्याख्यानावरणाख्य-चारित्रमोहकर्मविपाकवशात्कामिन्यादि-विषयान् भजन्नपि तत्राकृतसेवानिर्बन्ध इत्यर्थः। परमेष्ठीपदैकधी:-अर्हदादिपञ्चगुरुचरणेष्वेव धीरन्तर्दृष्टिर्यस्य । आपदाकुलितोऽपि दर्शनिकस्तन्निवृत्त्यर्थ शासनदेवतादीन् कदाचिदपि न भजते । पाक्षिकस्तु भजत्यपीत्येवमर्थमेकग्रहणम् ॥७॥ निर्मूलयन्-मूलादपि निरस्यन् । उक्तं च 'आदावेतत्स्फुटमिह गुणा निर्मला धारणीयाः, पापध्वंसिनतमपमलं कुर्वता श्रावकीयम् । कर्तुं शक्यं स्थिरमुरुभरं मन्दिरं गर्तपूरं न स्थेयोभिर्दृढतममृते निर्मितं ग्रावजालैः ।।' [ अमि. श्रा. ५।७३ ] अग्रगुणः-व्रतिकपदम् । न्याय्यां-स्ववर्णकुलव्रतानुरूपाम् । वृत्ति-कृष्यादिवार्ताम् । तनुस्थित्यै- १५ शरीरवर्तनाथं न विषयोपसेवनार्थम् । जिसने पूर्व अध्यायमें विस्तारसे कहे गये पाक्षिक श्रावकके आचारके आधिक्यसे अपने निर्मल सम्यग्दर्शनको निश्चल बना लिया है, जो संसार, शरीर और भोगोंसे विरक्त है, अथवा प्रत्याख्यानावरण नामक चारित्रमोहकर्मके उदयसे प्रेरित होकर स्त्री आदि विषयों को भोगते हुए भी उनके भोगनेका आग्रह नहीं रखता, जिसकी एकमात्र अन्तर्दृष्टि अर्हन्त आदि पाँच गुरुओंके चरणों में ही रहती है, जो मूलगुणोंमें अतिचारोंको जड़-मूलसे ही दूर कर देता है और व्रतिक प्रतिमा धारण करनेके लिए उत्कण्ठित रहता है तथा शरीरकी स्थितिके लिए, (विषयसेवनके लिए नहीं) अपने वर्ण, कुल और व्रतोंके अनुरूप कृषि आदि आजीविका करता है वह दशनिक श्रावक माना गया है ।।७-८|| विशेषार्थ--श्रावकाचारोंमें प्राचीनतम रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें सर्वप्रथम प्रत्येक प्रतिमाका स्वरूप वर्णित है। उसमें कहा है कि जिनेन्द्रदेवने श्रावकके ग्यारह पद कहे हैं जिनमें अपनी प्रतिमाके गण पहलेकी प्रतिमाके गुणों के साथ क्रमसे बढते हए स्थित रहते हैं । अतः जब श्रावकके ग्यारह पद होते हैं तो पाक्षिक श्रावकका पद ग्यारहमें सम्मिलित न होनेसे उसकी श्रावक संज्ञापर आपत्ति आती है। इससे पूर्वके किसी श्रावकाचारमें यह पद है भी नहीं। इस आशंकाके निवारणके लिए पं. आशाधरजीने अपनी टीकामें पाक्षिकको नैगमादि नयकी अपेक्षा दर्शनिक कहा है क्योंकि पाक्षिक भी सम्यग्दर्शनके साथ अष्ट मूल१. श्रावकपदानि देवैरेकादशदेशितानि येषु खलु । स्वगुणाः पूर्वगुणैः सह सन्तिष्ठन्ते क्रमविवृद्धाः ।। सम्यग्दर्शनशुद्धः संसारशरीरभोगनिविण्णः । पञ्चगरुचरणशरणो दर्शनिकस्तत्त्वपथगृह्यः॥-रत्न. श्रा.१३६-१३७। Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२६ धर्मामृत ( सागार) उक्तं च 'कृषि वाणिज्यं गोरक्ष्यमुपायैर्गुणिनं नृपम् । ___लोकद्वयाविरुद्धां च धनार्थी संश्रयेत्क्रियाम् ॥' [ ] मतः-एवंभूतनयादिष्टः । एतेन नैगमनयादेशात्पाक्षिकस्यापि दर्शनिकत्वमनुज्ञातं स्यात् । ततो न 'श्रावकपदानि देवैरेकादशदेशितानि' इत्यनेन विरोधः स्यात् पाक्षिकस्य द्रव्यतो दर्शनिकत्वात् ॥८॥ अथ मद्यादिवतद्योतनाथं तद्विक्रयादिप्रतिषेधमाह मद्यादिविक्रयादीनि नार्यः कुर्यान्न कारयेत् । न चानुमन्येत मनोवाक्कायैस्तव्रतधुते ॥९॥ विक्रयादीनि-आदिशब्देन संधानसंस्कारोपदेशाधुपादानम् । तद्वतद्युते-मद्यविरत्याद्यष्टमूलगुणनिमलोकरणार्थम् ॥९॥ अथ यच्छीलनान्मद्यादिव्रतक्षतिः स्यात्तदुपदेशार्थमाह भजन मद्यादिभाजस्स्त्रोस्तादृशैः सह संसृजन् । भुक्त्यादौ चैति साकीति मद्यादिविरतिक्षतिम् ॥१०॥ गुणका पालन करता है किन्तु अतीचारोंकी ओर उसकी दृष्टि नहीं रहती। दर्शनिक श्रावक निरतिचार पालन करता है। उसका सम्यग्दर्शन भी निर्दोष और दृढ़ होता है। रत्नकरण्ड श्रावकाचारमें दर्शनिकको सम्यग्दर्शनसे शुद्ध, संसार और शरीर एवं भोगोंसे विरक्त, पंचपरमेष्ठीको ही अपना एकमात्र शरण माननेवाला और तत्त्वपथका पक्षवाला कहा है । उसीका शब्दशः अनुसरण करते हुए पं. आशाधरजीने कथन किया है। रत्नकरण्डमें दर्शनिकके अष्ट मूलगण पालनकी कोई चर्चा नहीं है और न न्याय्य आजीविककी ही चर्चा है । ये दोनों बातें सम्भवतया 'तत्त्वपथगृह्य में समाविष्ट हैं। परमेष्ठीके चरणों में एकमात्र दृष्टिको स्पष्ट करते हुए पं. आशाधरजीने अपनी टीकामें लिखा है कि आपत्तियोंसे व्याकुल होनेपर भी दर्शनिक उसको दूर करनेके लिए कभी शासन देवता आदिकी आराधना नहीं करता । पाक्षिक कर भी लेता है यह बतलानेके लिए 'एक' पद रखा है ॥७-८|| मद्यत्याग आदि व्रतोंको निर्मल करनेके लिए मद्य आदिके व्यापारका भी निषेध करते हैं दर्शनिक श्रावक मद्यत्याग आदि आठ मूल गुणोंको निर्मल करनेके लिए मन, वचन और कायसे मद्य, मांस, मधु, मक्खन आदिका व्यापार न करे, न करावे और न उसकी अनुमोदना करे ।।९।। विशेषार्थ-पाक्षिक श्रावक मद्यादिके सेवनका नियम लेता है कि मैं इनका सेवन नहीं करूँगा । किन्तु उनके व्यापार आदि न करनेका नियम नहीं करता । दर्शनिक उसका भी नियम लेता है ॥९॥ आगे जिनके साथ सम्बन्ध रखनेसे मद्यत्याग आदि व्रतको हानि पहुँचती है उसको बतलाते हैं ___ मद्य-मांस आदिका सेवन करनेवाली स्त्रियोंको सेवन करनेवाला और खान-पान आदिमें मद्य-मांसका सेवन करनेवाले पुरुषोंका साथ करनेवाला अर्थात् उनके साथ खानपान करनेवाला दर्शनिक श्रावक निन्दाके साथ अष्ट मूल गुणोंकी हानि करता है ॥१०॥ Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वादश अध्याय ( तृतीय अध्याय) १२७ तादृशैः-मद्यादिभाभिः पुम्भिः। संसृजन्–संसर्ग कुर्वन् । भुक्त्यादौ-भोजनभाजनासनादौ । साकीति-वाच्यतासहिताम् । उक्तं च 'मद्यादि-स्वादिगेहेषु पानमन्नं च नाचरेत् । तदमत्रादिसंपर्क न कुर्वीत कदाचन ॥ कुर्वन्नतिभिः साधं संसर्ग भोजनादिषु । प्राप्नोति वाच्यतामत्र परत्र च न सत्फलम् ॥ [ सो. उपा. २९७-२९८] ॥१०॥ अथैवं सामान्यं मूलव्रतातिचारनिवृत्तिमभिधाय मद्यव्रतातिचारनिवृत्त्यर्थमाह सन्धानकं त्यजेत्सवं दधि तक्रं यहोषितम् । काञ्जिकं पुष्पितमपि मद्यव्रतमलोऽन्यथा ॥११॥ सर्व-एतेन काञ्जिकवटकादेरपि हेयत्वं दर्शयति । उक्तं च 'जायन्तेऽनन्तशो यत्र प्राणिनो रसकायिकाः । संधानानि न वल्भ्यन्ते तानि सर्वाणि भाक्तिकाः॥ [ द्वयहोषितं-अहोरात्रद्वयमतिक्रान्तम् । पुष्पितमपि-अपिशब्दाद् द्वयहोषितं च ॥११॥ अथ मांसविरत्यतीचारानाह चर्मस्थमम्भः स्नेहश्च हिंग्वसंहृतचर्म च । सर्व च भोज्यं व्यापन्नं दोषः स्यादामिषव्रते ॥१२॥ चर्मस्थं-दृत्यादिस्थं जलं कुतुपादिस्थं च घृतादिकमुपयुज्यमानम् । एतेन खट्टिकादिस्थ-बडिकादिस्थचूतफलादीनां चर्मोपनद्धचालनी-शूर्पटिकाद्युपस्कृतकणिका दीनां च त्याज्यतामुपलक्षयति । उक्तं च 'दृतिप्रायेषु पानीयं स्नेहं च कुतुपादिषु । व्रतस्थो वर्जयेन्नित्यं योषितश्चानतोचिताः ॥' [ सो. उपा. २९९ ] विशेषार्थ-मद्य-मांस आदि स्वयं न खाकर भी यदि मद्य-मांससेवी स्त्री-पुरुषोंके साथ खान-पान आदिका सम्बन्ध रखता है तो मद्य-मांसके सेवनका ही दोष लगता है। आचार्य सोमदेवने भी कहा है कि मद्य-मांसका सेवन करनेवाले लोगोंके घरों में खान-पान नहीं करना चाहिए । तथा उनके बरतनोंको भी काममें नहीं लाना चाहिए। जो मनुष्य मद्य आदिका सेवन करनेवाले पुरुषोंके साथ खान-पान करता है उसकी यहाँ निन्दा होती है और परलोकमें भी उसे अच्छे फल की प्राप्ति नहीं होती ॥१०॥ इस प्रकार सामान्यसे अष्टमूल गुणोंमें अतिचारकी निवृत्तिका कथन करके अब मद्य आदिके व्रतोंमें अतिचार दूर करनेका कथन करते हैं दर्शनिक श्रावक सभी प्रकारके अचार, मुरब्बोंको, दो दिन दो रातके वासी दही और मठेको तथा फफून्दी हुई और दो दिन दो रातकी बासी कांजीको भी त्याग दे। नहीं तो उसके सेवनसे मद्यव्रतमें अतिचार लगता है ॥११॥ मांस विरतिके अतिचारको दूर करनेके लिए कहते हैं चमड़ेकी मशकका जल और चमड़ेके कुप्पेमें रखा घी-तेल तथा चमड़ेसे ढका हुआ, या बँधा हुआ या फैलाया हुआ हींग और जिसका स्वाद बिगड़ गया है ऐसा समस्त भोजन खानेसे मांसत्याग व्रत में अतिचार लगता है ॥१२॥ विशेषार्थ-चमड़ेसे सम्बद्ध किसी भी वस्तुके खानेसे मांस-भक्षणका दोष लगता है। सोमदेव सूरिने भी मशकके पानी और चमड़ेकी कुप्पोंमें रखे घी-तेलका निषेध किया है। Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२८ धर्मामृत ( सागार) असंहृतचर्म-असंहृतं स्वस्वभावेनापरिणामितं चर्म येन तत् । उपलक्षणमेतत् । तेन तथाभूतं लवणाद्यपि । व्यापन्नं-कुथितं स्वादचलितमिति यावत् । उक्तं च _ 'आहारो निःशेषो निजस्वभावान्यभावमुपयातः । योऽनन्तकायिकोऽसौ परिहर्तव्यो दयालीद्वैः ॥ [ ]॥१२॥ मुस्लिम युगमें रची गयी लाटी संहितामें प्रकृत चर्चाका विस्तारसे वर्णन करते हुए कहा है'श्रावकको मद्य-मांस और मधका सेवन नहीं करना चाहिए।' इसपर यह शंका की गयी कि जैन लोग तो इनको खाते ही नहीं तब इसके कहने की क्या आवश्यकता है ? इसके समाधानमें कहा है कि साक्षात् तो नहीं खाते, किन्तु उसके कुछ अतीचार अनाचारके समान हैं, उन्हें छोड़ना चाहिए उनको गिनाना शक्य नहीं है। फिर भी व्यवहारके लिए कुछ कहते हैंचमड़ेके बरतनमें रखे घी-तेल-जल वगैरह नहीं खाने चाहिए क्योंकि चमड़ेके आश्रयसे त्रसकायके जीव हो जाते हैं। शायद कोई कहे कि हम कैसे जानें कि उसमें वे होते हैं या नहीं ? तो इसके उत्तरमें हमारा कहना है कि सर्वज्ञ देवने केवलज्ञानरूप चक्षसे देखकर ही ऐसा कहा है। अतः उसे मानना चाहिए। शायद इसपर भी कोई तर्क करें कि उनके खानेसे पाप होता है, इसमें क्या प्रमाण है ? किन्तु ऐसा तर्क करना उचित नहीं है क्योंकि जैनागममें मांस खानेवालेको अवश्य ही पापका भागी कहा है । अतः उसमें सन्देह नहीं करना चाहिए। मूंग आदि अन्न, सोंठ आदि औषधी, शक्कर आदि खाद्य और ताम्बूल आदि स्वाद्य, दूध आदि पेय, तैलमर्दन आदि लेप ये चार प्रकारके आहार कहे हैं। आहारके लिए शुद्ध द्रव्य देख-भालकर ही काम में लेना चाहिए । ऐसा न करनेसे मांसभक्षणका दोष लगता है, क्योंकि उनमें त्रस जीव हो सकते हैं । घुना हुआ अन्न इसीसे अभक्ष्य कहा है। उसका आप कितना भी शोधन करें फिर भी उसमें त्रसजीवोंकी सम्भावना रहती ही है। जिस अन्नादिमें यह सन्देह हो कि इसमें त्रसजीव हैं या नहीं, उसे भी मनकी निर्मलताके लिए नहीं खाना चाहिए । जो निर्दोष और बिना घुना हो उसे भी अच्छी तरहसे शोध कर ही खाना चाहिए। शायद कोई कहें कि जो शुद्ध अन्न है उसे शोधनेकी क्या जरूरत है ? किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं है । इसमें प्रमादका दोष लगता है। जितनी तरल वस्तुएँ हैं जैसे घी, तेल, दूध, पानी वगैरह, उन्हें मजबूत वस्त्रसे छानकर ही काममें लेना चाहिए। ऐसा न करनेसे मांसत्याग व्रतमें अतीचार लगता है क्योंकि उनमें मरे हुए त्रसजीवोंके कलेवर हो सकते हैं । यदि शोधन भी किया किन्तु प्रमादवश असावधानीसे किया तो वह बेकार होता है। इसलिए व्रतकी रक्षा और मांसभक्षणके दोषसे बचने के लिए अपने हाथों और अपनी आँखोंसे ही अन्न आदिका शोधन करना चाहिए। जैसे अपने लिए सुवर्ण खरीदनेवाला देख-भालकर खरीदता है वैसे हो व्रतीको सुनिरीक्षित आहार करना चाहिए। अज्ञानी साधर्मी और ज्ञानी विधर्मीके द्वारा शोधे हुए और पकाये हुए भोजनको भी व्रतीको नहीं खाना चाहिए। शायद कोई कहें कि अपने किसी परिचित साधर्मी या विधर्मी के द्वारा शोधित और पकाये गये भोजनमें क्या हानि है ? किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि किसीका अत्यधिक विश्वास व्रतकी हानि करनेवाला है। जिसका आचरण ठीक नहीं है और जो निर्दय है उसका संयममें अधिकार नहीं है। एक बार शोधनेपर भी यदि बहुत समय हो जाये तो उसे पुनः शोधन करके ही ग्रहण करना चाहिए। केवल अग्निसे पकाया गया अथवा घीसे मिश्रित बासी भोजन भी Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वादश अध्याय ( तृतीय अध्याय ) १२२ अथ मधुव्रतातिचारनिवृत्त्यर्थमाह प्रायः पुष्पाणि नाश्नीयान्मधुवतविशुद्धये । वस्त्यादिष्वपि मध्वादिप्रयोगं नार्हति व्रती ॥१३॥ 'प्रायः', एतेन मधूक-भल्लातकपुष्पाणां शक्यशोधनत्वान्नात्यन्तं निषेधः । शुष्कत्वाच्च नागकेसरादीनामपि । वस्त्यादिषु-वस्तिकर्म-पिण्डप्रदान-नेत्राञ्जनसेचन-लूतानासादिषु । व्रती-मधु-मांस-मद्येभ्योऽतिशयेन विरतः ॥१३॥ अथ पञ्चौदुम्बरविरत्यतिचारपरिहारार्थमाह सर्व फलमविज्ञातं वार्ताकादि त्वदारितम् । तल्लादिसिम्बीश्च खादेन्नोदम्बरवती ॥१४॥ वार्ताकादि। आदिशब्देन कर्चर-बदर-पूगफलादि । भल्लादिशिम्बीः-भल्लराजमाषप्रमुखफलिकाः ॥१४॥ नहीं करना चाहिए क्योंकि अधिक काल बीतनेपर उसमें सूक्ष्म त्रस जीव उत्पन्न हो जाते हैं। कहा है-'जो भोजन अपना स्वभाव छोड़कर अन्य भावरूप हो गया है वह सब अनन्तकायिक होनेसे छोड़ देना चाहिए' ।।१२।। आगे मधुव्रतके अतीचारोंको दूर करनेके लिए कहते हैं मधुत्याग व्रतमें अतीचारसे बचनेके लिए प्रायः पुष्प नहीं खाना चाहिए। मधु, मांस और मद्यके सर्वथा त्यागीको बस्ति आदि कर्ममें भी मधु, मांस तथा मद्यका प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥१३॥ विशेषार्थ-मधु या शहद फूलोंसे ही संचित होता है अतः फूलोंके भक्षणसे मधुत्यागनतमें दूषण लगता है । किन्तु 'प्रायः' शब्द देनेसे सभी पुष्प अभक्ष्य नहीं होते। पण्डित आशाधरजीने अपनी टीकामें लिखा है कि मधूक (महुआ) और भल्लातक (भिलावा) के फूलोंका शोधन करना शक्य है इसलिए अत्यन्त निषेध नहीं है। इसी तरह नागकेसर आदिके फूल सूख जाते हैं। उन्हें काममें लिया जाता है। सम्भवतः फूलोंके अभक्ष्य होनेसे ही पूजनमें फूलोंके स्थानमें केसरिया चावलका प्रयोग किया गया है। जो वस्तु अभक्ष्य है वह भगवान्को कैसे चढ़ायी जा सकती है । तथा मधु आदिके व्रतीको मधु आदिका प्रयोग औषधीके रूप में भी नहीं करना चाहिए। बस्तिकमके लिए, नेत्रोंमें अंजनके रूपमें, मकड़ीके काटे आदिपर भी शहद वगैरहका प्रयोग त्याज्य है। ऐसी स्थितिमें स्वास्थ्य, इन्द्रियपुष्टि आदिके लिए उनका प्रयोग कैसे किया जा सकता है। यह 'अपि' शब्दसे आशय है ॥१३॥ आगे पाँच उदुम्बरोंसे विरतिके अतीचारोंको दर करनेके लिए कहते हैं पीपल आदिके फलोंके त्यागीको समस्त अनजान फल, बैंगन, कचरी, बेर आदि भीतर से देखे बिना, तथा उसी तरह अर्थात् अन्दरसे शोधे बिना उड़द, सेम आदि की फलियोंको नहीं खाना चाहिए ॥१४॥ विशेषार्थ-आचार्य हेमचन्द्रने भी अनजान फलको खानेका निषेध किया है और उसका कारण यह बतलाया है कि निषिद्ध या विषफलको खानेमें उसकी प्रवृत्ति न हो। क्योंकि अज्ञानवश निषिद्ध फल खानेसे व्रतभंग होता है । और विषफल खानेसे तो जीवन ही खतरेमें पड़ जाता है ॥१४॥ १. 'स्वयं परेण वा ज्ञातं फलमद्याद्विशारदः । निषिद्धे विषफले वा मा भूदस्य प्रवर्तनम् ॥'-योगशास्त्र ३।४७। सा.-१७ Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३० धर्मामृत ( सागार) अथानस्तमितभोजनव्रतातिचारार्थमाह-- मुहर्तेऽन्त्ये तथाऽद्येऽह्नो वल्भानस्तमिताशिनः। गदच्छिदेऽप्याम्रघृताधुपयोगश्च दुष्यति ॥१५॥ अनस्तमिताशिनः अनस्तमिते सूर्ये अश्नाति तद्वतः। आम्रधृताधुपयोगः-चूत-चार-चोचमोचादिफलानां घृतक्षीरेक्षुरसादीनां च सेवनम् ॥१५॥ रात्रिभोजनत्याग व्रतके अतीचार कहते हैं सूर्योदयके रहते हुए ही भोजन करनेका नियमवाले मनुष्यको दिनके प्रथम तथा अन्तिम मुहूर्त में भोजन करना और रोग दूर करने के लिए आम्र, घृत आदिका सेवन करना दोष है ॥१५॥ विशेषार्थ-रात्रिभोजन त्यागका अर्थ है सूर्यके उदय रहते हुए ही भोजन करना। उसा भी सर्योदय हए जब एक महत हो जाये तब कुछ खान-पान करना चाहिए तथा सूर्यास्त होने में जब एक मुहूर्त शेष रहे तब बन्द कर देना चाहिए, क्योंकि आदि और अन्तिम मुहूर्तमें सूर्यका प्रकाश मन्द होनेसे जीव-जन्तु भ्रमणशील रहते हैं। आदि और अन्तिम मुहूर्तमें भोजनकी बात तो दूर, रोग निवृत्तिके लिए भी आम्र, केला आदि फलोंका तथा घी, इक्षुरस, दूध आदिका सेवन करनेसे भी दोष लगता है। किन्तु उत्तरकालीन लाटी संहितामें छठी प्रतिमा रात्रिभोजनत्याग है। अतः दर्शनिकके लिए उसमें ऐसा प्रतिबन्ध नहीं है। लिखा है-व्रतधारी नैष्ठिक श्रावकोंको मांसभक्षणके दोषसे बचनेके लिए रात्रिभोजनका त्याग करना चाहिए । शायद आप कहें कि यहाँ रात्रिभोजनत्यागका कथन नहीं करना चाहिए क्योंकि छठी प्रतिमामें इसका त्याग कराया गया है। आपका कथन सत्य है। छठी प्रतिमामें सर्वात्मना रात्रिभोजनका त्याग होता है। यहाँ सातिचार त्याग होता है। अर्थात् यहाँ अन्न मात्र आदि स्थूल भोज्यका त्याग होता है किन्तु रात्रिमें जलादि या ताम्बूल आदिका त्याग नहीं होता। छठी प्रतिमामें ताम्बूल, जल आदि भी निषिद्ध हैं। प्राणान्त होनेपर भी रात्रिमें औषधि-सेवन नहीं किया जाता। शायद आप कहें कि दर्शनिक श्रावक रात्रिमें किसीको अन्नका भोजन करायेगा, किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं है। एक कुलाचार भी होता है उसके बिना दर्शनिक नहीं होता। मांस मात्रका त्याग करके रात्रिमें भोजन न करना तो सबसे जघन्य व्रत है। इससे नीचे तो कुछ है ही नहीं। शायद कहें कि पाक्षिकके तो व्रत नहीं होते, केवल पक्ष मात्र होता है किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि जो सर्वज्ञ भगवानकी आज्ञाको नहीं मानता वह पाक्षिक कैसे हो सकता है। सर्वज्ञकी आज्ञा है कि क्रियावान ही श्रावक होता है। जो निकृष्ट श्रावक है वह भी कुलाचार नहीं छोड़ता । यह सब लोकमें प्रसिद्ध है कि रात्रिमें दीपकके पास में पतंग आदि त्रस जीव गिरते ही हैं। और वे वायुके आघातसे मरते हैं। उनके कलेवरोंसे मिश्रित भोजन निरामिष कैसे हो सकता है। रात्रिभोजनमें उचित-अनुचितका भी विचार नहीं रहता। रात्रिमें मक्खी तक नहीं दिखाई देती तब मच्छरकी तो बात ही क्या है। इसलिए संयमकी वृद्धिके लिए रात्रि भोजन छोडना चाहिए । यदि शक्ति हो तो चारों प्रकारके आहारका त्याग करना चाहिए, नहीं तो उनमें से १. 'निषिद्ध मन्नमात्रादि स्थूलभोज्यं व्रते दृशः । न निषिद्धं जलाद्यत्र ताम्बूलाद्यपि वा निशि ॥' -लाटी सं., पृ. १९ । Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२ द्वादश अध्याय ( तृतीय अध्याय ) १३१ अथ जलगालनव्रतातिचारनिवृत्त्यर्थमाह मुहूर्तयुग्मोध्वंमगालनं वा दुर्वाससा गालनमम्बुनो वा। अन्यत्र वा गालितशेषितस्य न्यासो निपानेऽस्य न तव्रतेऽय॑ः ॥१६॥ मुहूर्तयुग्मोवं-घटिकाचतुष्टयादुपरि । दुर्वाससा-अल्पसछिद्रजर्जरादिवस्त्रेण । अन्यत्र-स्वाधारजलाशयात् । तद्वते-गालितजलपाननिष्ठायां अच्यों न, निन्द्य इत्यर्थः । अथ 'पंचुंबर सहियाई सत्तवि वसणाई जो विवज्जेइ। सम्मत्तविसुद्धमई सो सणसावओ भणिओ ॥' [वसु. श्रा. ५७] ॥१६॥ इति वसुनन्दिसैद्धान्तमतेन दर्शनिकस्य द्यतादिव्यसननिवृत्तिमुपदेष्टुं तेषामिहामुत्र चापायावद्यप्रायत्वमुदाहरणद्वारेण व्याहरन्नाह 'द्यूताद्धर्मतुजो बकस्य पिशितान्मद्याद्यदूनां विपच्चारोः कामुकया शिवस्य चुरया यद्ब्रह्मदत्तस्य च । aaa...... किसी एक अन्न आदिका त्याग करना चाहिए । जब मांसके दोषसे बासी भोजन ही अभक्ष्य कहा है तब आसव, अरिष्ट, अचार वगैरहकी तो बात ही क्या है। जिसका रूप, गन्ध, रस और स्पर्श बिगड़ गया है उसे नहीं खाना चाहिए क्योंकि उसमें अवश्य त्रसजीव उत्पन्न हो गये हैं। इसी तरह दही, मठा, रस, वगैरह मर्यादामें ही भक्ष्य है। उसके बाद अभक्ष्य है । यह सब कथन लाटी संहितामें किया है ॥१५॥ आगे जलगालन व्रतके अतिचारोंको दूर करने के लिए कहते हैं___एक बार छाने हुए जलको दो मुहूर्त के बादमें न छानना, अथवा छोटे और छिद्र सहित जीर्ण वस्त्रसे पानीका छानना, अथवा छानने के बाद बचे हुए जलको जिस जलाशयका वह जल है उसीमें न डालकर अन्य जलाशयमें डालना, जलगालन व्रतमें निन्दनीय माना गया है ।।१६। विशेषार्थ-जलको मोटे स्वच्छ वस्त्रसे छानकर ही काममें लेना चाहिए। छने हुए जलकी मर्यादा भी दो मुहूर्त है। दो मुहूर्त के बाद छने जलको पुनः छानना चाहिए । और बिलछानीको उसी जलाशयमें डालना चाहिए जिससे जल लिया हो; क्योंकि एक जलाशयके जीव दूसरे जलाशयमें जाकर मर जाते हैं। पानीमें जीव तो आज खुर्दबीनसे देखे जाते हैं ॥१६॥ आचार्य वसुनन्दि सैद्धान्तीके मतसे जो विशुद्ध सम्यग्दृष्टि पाँच उदुम्बर फलोंके साथ सात व्यसनोंको छोड़ता है वह दर्शनिक श्रावक कहा जाता है। अतः दर्शनिकको जुआ आदि सात व्यसनोंके त्यागका उपदेश करने के लिए व्यसनोंको इस लोक और परलोकमें उदाहरणके द्वारा विनाशकारी और निन्दनीय ठहराते हैं यतः जुआ खेलनेसे युधिष्ठिरको, मांसभक्षणसे बक राजाको, मद्यपानसे यादवोंको, १. 'द्यूताद्धर्मसुतः पलादिह वको मद्याद्यदोर्नन्दनाः, चारुः कामुकया मुगान्तकतया स ब्रह्मदत्तो नृपः । चौर्यत्वाच्छिवभूतिरन्यवनितादोषाशास्यो हठात् एकैकव्यसनाहता इति जनाः सर्वन को नश्यति ॥-पद्म. पंच. १३१॥ Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३२ धर्मामृत ( सागार ) पापद्धर्या परदारतो दशमुखस्योच्चैरनुश्रूयते द्यूतादिव्यसनानि घोरदुरितान्युज्झेत्तदार्यस्त्रिधा ॥ १७॥ वेश्यासेवन से चारुदत्त सेठको, चोरी करनेसे शिवभूति ब्राह्मणको, शिकार खेलनेसे ब्रह्मदत्त चक्रवर्तीको, परस्त्रीगमनकी अभिलाषासे रावणको बड़ी भारी विपत्ति भोगनी पड़ी, यह वृद्धपरम्परासे सुना जाता है । अतः दर्शनिक श्रावकको घोर पापके कारण द्यूत, मांस, मद्य, वेश्या, चोरी, शिकार, और परस्त्रीसेवनको मन, वचन, काय कृत कारित अनुमोदनासे छोड़ना चाहिए ॥१७॥ विशेषार्थ - पद्मनन्दि पंचविंशतिकामें ग्यारह प्रतिमाओंसे प्रथम सप्त व्यसन त्यागपर जोर दिया है। क्योंकि समस्त व्रतोंकी प्रतिष्ठा सप्त व्यसन त्यागपर ही निर्भर है। जुआ, मांस, मद्य, वेश्या, शिकार, चोरी, परस्त्री ये सात व्यसन हैं । ये महापाप हैं। जुआ निन्दनीय है, सब व्यसनों में मुख्य है, समस्त आपत्तियोंका घर है, पापका कारण है, नरकके मार्गोंका मुखिया है । जो दुबुद्धि मनुष्य हैं वे ही इसे अपनाते हैं, विवेकी मनुष्य इसके पास भी नहीं जाते । यदि मनुष्य का मन जुए में न रमे तो उसका अपयश और निन्दा न हो, क्रोध और लोभकषाय उत्पन्न ही न हों,