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________________ धर्मामृत ( सागार) अपि च 'अर्कालोकेन विना भुञ्जानः परिहरेत् कथं हिंसाम् ।। अपि बोधितः प्रदीपो भोज्यजुषां सूक्ष्मजीवानाम् ॥' [ पुरुषार्थ. १३३ ] अपायभूयस्त्वं-'जलोदरादि' इत्यादिना हिंसाविरतिव्रते वक्ष्यमाणम् । रात्रिभक्तं-रात्रावन्नप्राशनम् । पानीयं-जलं पेयत्वात् । जलघृतादि वा सर्वं द्रवद्रव्यम् । तदाह 'द्रवद्रव्याणि सर्वाणि पटपूतानि योजयेत् ।' [ सो. उपा. ३२१ श्लो. ] ॥१४॥ अथानस्तमितभोजिनः सत्फलं किंचिदृष्टान्तेन मुग्धजनप्ररोचनार्थं प्रकटयति चित्रकूटेऽत्र मातङ्गी यामानस्तमितव्रतात् । स्वभा मारिता जाता नागश्रीः सागराङ्गजा ॥१५॥ अत्र- एतस्मिन्नेव मालवदेशस्योत्तरस्यां दिशि प्रसिद्ध । याम-प्रहरमात्र पालितम् । स्वभ;जागरिकनाम्ना । सागराङ्गजा-सागरदत्तधेष्ठिपुत्री ॥१५॥ सकता है इत्यादि । इस प्रकार रात्रि भोजनकी बुराई और दिवाभोजनकी प्रशंसा इतने विस्तारसे अन्यत्र देखनेको नहीं मिलती। एक विशेषता इसमें यह भी है कि स्त्रियोंको भी लक्ष करके रात्रिभोजनकी बुराई बतलायी है और अन्तमें कहा है कि नर हो या नारी दोनोंको अपना चित्त नियममें स्थिर करके अनेक दुःखवाले रात्रिभोजनका त्याग करना चाहिए । आचार्य अमृतचन्द्रने अपने पुरुषार्थ सिद्ध्युपायमें पाँच अणुव्रतोंके कथनके बाद रात्रिभोजन त्यागका कथन करते हुए कहा है-रात्रिमें भोजन करनेवालोंको हिंसा अनिवार्य है इसलिए हिंसाके त्यागियोंको रात्रिभोजनका भी त्याग करना चाहिए। अत्यागभाव रागादि भावोंके उदयकी उत्कटतासे होता है अतः हिंसारूप है। जो रात-दिन खाते हैं उन्हें हिंसा क्यों नहीं लगेगी ? यदि कोई कहे तब तो दिनमें न खाकर रात्रि में ही खाना चाहिए। इससे हिंसा नहीं लगेगी। किन्तु ऐसा कहना गलत है क्योंकि दिवा भोजनकी अपेक्षा रात्रिभोजनमें अधिक राग होता है। जैसे अन्नभोजनकी अपेक्षा मांसभोजनमें अधिक राग रहता है। सूर्य के प्रकाशके बिना दीपक जलाकर रात्रिमें भोजन करनेवाला हिंसासे कैसे बच सकता है क्योंकि भोजनमें सूक्ष्म जीव गिरते ही हैं। अधिक कहनेसे क्या, जो मन वचन कायसे रात्रि भोजनका त्याग करता है वह निरन्तर अहिंसाका पालन करता है। इसी तरह जलको भी मोटे वस्त्रसे छानकर ही काममें लेना चाहिए । आज तो खुर्दवीनसे जलमें जीवोंको देखा जा सकता है। नलके पानीमें तो कभी-कभी साँपके बच्चे तक आ जाते हैं । आचार्य सोमदेवने इसीसे कहा है कि सब पतली वस्तुओंको वस्त्रसे छानकर ही काममें लाना चाहिए । मनुस्मृति तकमें पानी छानकर पीना लिखा है ॥१४॥ अब मूढजनोंको आकृष्ट करने के लिए दृष्टान्त द्वारा रात्रिभोजनत्यागका फल बतलाते हैं मालव देशकी उत्तर दिशामें प्रसिद्ध चित्रकूट नामक नगरमें एक पहर मात्रके रात्रिभोजनत्याग व्रतसे अपने पतिके द्वारा मारी गयी चाण्डाली मरकर सागरदत्त श्रेष्ठीके नागश्री नामक कन्या हुई ॥१५॥ १. पुरुषा. १२९-१३४ श्लो. । २. 'दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत् ।'-मनुस्मृति ६।४६ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001017
Book TitleDharmamrut Sagar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1944
Total Pages410
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size10 MB
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