Book Title: Tattvarthshlokavartikalankar Part 2
Author(s): Vidyanandacharya, Vardhaman Parshwanath Shastri
Publisher: Vardhaman Parshwanath Shastri
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तत्वार्थचिन्तामाणः
महाभारत, भागवत और वाल्मीकिके बनाये हुए रामायण आदि शास्त्रोंके सुननेसे जान लिए गए उस वेदमें ही शूद्रको श्रद्धान होना देखा जाता है । महाभारत आदिमें लम्बे चौडे प्रकरणोंके द्वारा वेदकी स्तुति गायी गयी है और इन प्रमाणोंके सुननेका अधिकार शूद्रको प्राप्त है । अतः सामान्यरूपसे जाने हुए वेदमें ही शूद्रकी भक्ति और श्रद्धान हो सकता है। किसी समय रत्नकी परीक्षा नहीं करनेवाले पुरुषोंके भी मार्गमें पडे हुए अथवा किसी धनिकके घरमें रखे हुए माणिक्य, हीरा, मरकत आदि किसी भी मणि ( रत्न ) को प्रत्यक्ष प्रमाणसे अपने आप ज्ञात कर लेनेपर और प्रभाव, चाकचक्य आदि हेतुओं करके सम्भवते हुए अनुमानसे निर्णय कर चुकनेपर ही उन रत्नोंमें किसीकी भक्ति होना सम्भव है। अन्यथा यानी कुछ कुछ प्रत्यक्षसे या सम्भवते हुए अनुमानसे मणिको न जाना जावेगा तो बालक, चूहा, चिडिया आदिके समान उन पुरुषोंको रत्नोंमें वह भक्ति या रागका योग नहीं हो सकता है। जैसे कि मूर्ख भिल्लिनीको गज-मुक्ताओंमें राग नहीं होता है, वह गज-मोतियोंको छोडकर गोंगचियोंके भूषण बनाकर हर्षसहित पहिनती हैं । भूमिमें गढे हुए रत्नोंके निकट मूसे यों ही डोलते हैं । उन रत्नोंका वास्तविक ज्ञान न होनेके कारण उनको आभिमानिक सुख प्राप्त नहीं होता है। तभी तो वे सुवर्ण या रत्नको यों ही इतस्ततः फेंक देते हैं।
साध्यसाधनविकलत्वाच्च दृष्टान्तस्य न स्वाभाविकत्वसाधनं दर्शनस्य साधीयः। न हि स्वाभाविकं निःश्रेयसं तत्त्वज्ञानांदिकतदुपायानर्थकत्वापत्तेः । नापि स्वकाले स्वयमुत्पत्तिस्तस्य युक्ता तत एव । केचित् संख्यातेन कालेन सेत्स्यन्ति भव्याः, केचिदसंख्यातेन केचिदनन्तेन, केचिदनन्तानन्तेनापि कालेन न सेत्स्यन्तीत्यागमानिःश्रेयसस्य स्वकाले स्वयमुत्पत्तिरिति चेत् न, आगमस्यैवंपरत्वाभावात् । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रसात्मीभावेसति संख्यातादिना कालेन सेत्स्यन्तीत्येवमर्थतया तस्य निश्चितत्वात्, दर्शनमोहापशमोदिजन्यत्वाच्च न दर्शनं स्वकालेनैव जन्यते यतः स्वाभाविकं स्यात् ।
एक बात यह भी है कि सम्यग्दर्शनको स्वाभाविकपना सिद्ध करनेमें दिया गया मोक्षरूपी दृष्टान्त तो स्वाभाविकपना साध्य और अपने कालमें अपने आप उत्पत्ति हो जाना रूप हेतुसे रहित है । अतः सम्यग्दर्शनको स्वाभाविकत्व सिद्ध करनेके लिये दिया गया वह दृष्टान्त बहुत अच्छा नहीं है। सुनिये, प्रथम ही दृष्टान्तका साध्यरहितपना अनुमानसे सिद्ध करते हैं कि मोक्ष (पक्ष ) स्वाभाविक नहीं है ( साध्य ) तत्त्वज्ञान, दीक्षा, ध्यान, आदि उसके उपायोंको व्यर्थपनेका प्रसंग हो जानेसे ( हेतु ) । अर्थात् जो उपायोंसे साध्य है वह कारणोंके विना यों ही स्वभावसे ही उत्पन्न हो जानेवाला नहीं है । तथा मोक्षरूपी दृष्टान्तमें हेतु भी नहीं रहता है। देखिये, उस मोक्षकी ( पक्ष ) अपने आप ही अपने समयमें उत्पत्ति हो जाना भी युक्त नहीं है ( साध्य ) क्योंकि उस ही पूर्वोक्त हेतुसे यानी विशिष्ट समयोंमें ही होनेवाले तत्त्वज्ञान आदिक उपाय व्यर्थ पड जावेंगे ( हेतु )। यहां
कितने ही भव्य जीव संख्यात कालके बीत जाने पर सिद्धिको प्राप्त करेंगे