Book Title: Gommatasara Karma kanda
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Shivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
View full book text
________________
गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३३० वैक्रियिकमिश्र काययोग में तिर्यञ्च व मनुष्यायु के बिना सत्त्वप्रकृति १४६, गुणस्थान (१-२४) ३ हैं। यहाँ मिथ्यात्व और असंयतगुणस्थान में सत्त्व १४६ प्रकृति का तथा असत्त्व नहीं है। सासादनगुणस्थान में आहारकद्विक, तीर्थङ्कर और नरकायुबिना सत्त्व १४२ प्रकृति का है, क्योंकि इन चार प्रकृतियों का यहाँ असत्त्व पाया जाता है। औदारिकमिश्रकाययोग में तथा कार्मणकाययोग में सत्त्वादि का कथन करते हैं
ओरालमिस्सजोगे, ओघं सुरणिरयआउगं णत्थि।
ताम्मस्सवामगे हि, तित्थ कम्मति संगुणोघं ।।३५३॥ अर्थ- औदारिकमिश्नकाययोग में देवायु और नरकायु के बिना गुणस्थानोक्त सामान्यवत् सत्त्वप्रकृति १४६ हैं, गुणस्थान १-२-४-१३ ये चार हैं। यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में सम्मिस्से वाममे ण हि तित्थं इस वचन से असत्त्व एक तीर्थङ्करप्रकृति का एवं सत्त्व १४५ प्रकृति का है। सासादनगुणस्थान में तीर्थङ्कर
और आहारकद्विक इन तीनप्रकृति का असत्त्व और १४३ प्रकृति का सत्त्व। असंयतगुणस्थान में असत्त्व नहीं होने से सत्त्वप्रकृति १४६ हैं। सयोगीगुणस्थान में असत्त्व ६१ प्रकृति का और सत्त्व ८५ प्रकृति का है। यहाँ चारों ही गुणस्थानों में सत्त्वव्युच्छित्ति नहीं है।
कार्मणकाययोग में चारों भुज्यमानआयु सम्भव हैं अत: सत्त्वयोग्य प्रकृति ५४८ हैं, गुणस्थान १-२-४-१३ ये चार हैं। यहाँ मिथ्यात्व और असंयतगुणस्थान में असत्त्व नहीं है अतः सत्त्व १४८ प्रकृति का है, किन्तु सासादनगुणस्थान में आहारकद्रिक और तीर्थकर एवं नरकायु का असत्त्व, सत्व १४४ प्रकृति का । सयोगकेवलीगुणस्थान में असत्त्व ६३ प्रकृति का और सत्त्व ८५ प्रकृति का है। यहां भी चारों गुणस्थानों में सत्त्वव्युच्छित्ति का अभाव है। अथानन्तर वेदमार्गणा से आहारमार्गणापर्यन्त सत्त्यादि का कथन करते हैं
वेदादाहारोत्ति य, सगुणोघं णवरि संढथीखवगे।
किण्हदुगसुह तिलेस्सियवामेवि ण तित्थयरसत्तं ।।३५४॥ अर्थ- वेदमार्गणा से आहारमार्गणापर्यन्त अपने-अपने गुणस्थानवत् सामान्य से सत्त्व जानना, किन्तु विशेषता यह है कि क्षपकश्रेणी वाले नपुंसकवेदी और स्त्रीवेदी के तीर्थङ्करप्रकृति की सत्ता नहीं है। इसी प्रकार कृष्ण व नीललेश्यावाले मिथ्यादृष्टि के और पीत-पद्म-शुक्लरूप तीन शुभलेश्यावाले मिथ्यादृष्टिजीव के भी तीर्थङ्करप्रकृति का सत्त्व नहीं है।
विशेषार्थ- वेदमार्गणा में पुरुषवेदी के सत्त्वप्रकृति १४८ और मिथ्यात्व से