Book Title: Gommatasara Karma kanda
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Shivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ५३४
नामकर्मके सर्वप्रकार बन्धस्थानोंके भंगोंकी सन्दृष्टि
भुजकारबन्ध
४,४६,०९,४३५
३६,९९२
गुणस्थान
मिथ्यात्व
असंयत
अप्रमत्त
उपशांतमोह
योग
४५
心
४,४६,४६,४७२
अल्पतरबन्ध
४,४६,०९, ४३५
७२
३६
o
४,४६, ०९,५४३
अवस्थितवन्ध
८,१२,१८,८७०
३७, ०६४
८१
१७
८,९२,५६,०३२
" इति नामकर्मबन्धस्थान प्रकरण "
"अथानन्तर नामकर्मके उदयस्थानोंका कथन २२ गाथाओंसे करते हैं
विग्गहकम्मसरीरे सरीरमिस्से सरीरपज्जते ।
आणावचिपज्जते कमेण पंचोदये काला ॥। ५८३ ॥
अवक्तव्यवन्ध
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०
एक्कं व दो व तिण्णि व समया अंतोमुहुत्तयं तिसुवि । हेमिकालूणाओ चरिमस्स य उदयकालो
दु ||५८४ ॥
०
१७
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अर्थ नामकर्मके उदयस्थान विग्रहगति अथवा कार्मणशरीर, मिश्रशरीर, शरीरपर्याप्ति, श्वासोच्छ्वासपर्याप्त और भाषापर्याप्तिमें नियतकाल है अर्थात् जिस कालमें उदययोग्य हैं उसी कालमें उदय होते हैं। इसप्रकार इनके पाँच काल नियत हैं ।
विशेषार्थ - जहाँ कार्मणशरीर पाया जावे वह कार्मणकाल और जबतक शरीरपर्याप्त पूर्ण नहीं होती तबतक शरीरमिश्रकाल है। तथा शरीरपर्याप्ति पूर्ण हो जाने पर जबतक श्वासोच्छ्वासपर्याप्त पूर्ण नहीं होती तबतक शरीरपर्याप्तिका काल है। श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति पूर्ण होनेपर जबतक भाषापर्याप्ति पूर्ण नहीं होती तबतक श्वासोच्छ्वासपर्याप्तिकाल है और भाषापर्याप्ति पूर्ण हो जानेपर सम्पूर्ण आयु प्रमाणतक भाषापर्याप्तिकाल है। इसप्रकार नामकर्मके ये पाँच उदयस्थान नियतकाल हैं। यहाँ गाथामें विग्रहगति और कार्मण इसप्रकार इन दोका जो उल्लेख किया है वह “समुद्घातकेवलीके कार्मणशरीरको भी ग्रहण करना चाहिए" इस विशेष अर्थको सूचित करनेके लिए है।
अब इन कालोंका प्रमाण कहते हैं