Book Title: Gommatasara Karma kanda
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Shivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५३५ अर्थ – इन पाँच उदयस्थानरूप कालोंका प्रमाण क्रमसे विग्रहगतिके कार्मणशरीरमै एक-दो अथवा तीनसमय है। अपर्याप्तरूप मिश्रशरीर में, शरीरपर्याप्तिमें श्वासोच्छ्वासपर्याप्तिमें अन्तर्मुहूर्तअन्तर्मुहूर्त प्रमाणकाल है। भाषापर्याप्तिमें पूर्वोक्त चारकालों का प्रमाण घटानेपर अवशेष सर्व भुज्यमानआयु प्रमाणकाल जानना। आगे उन पाँच उदयकालोंको जीवसमासोंमें घटित करते हैं
सव्वापजत्ताणं दोण्णिवि काला चउक्कमेयखे।
पंचवि होंति तसाणं आहारस्सुवरिमचउक्वं ।।५८५ ।। अर्थ – आदिके दोकाल सर्व लब्ध्यपर्याप्तकोंमें, एकेन्द्रियोंमें आदिके चारकाल, त्रसोंमें पाँचों ही काल तथा आहारकशरीर में प्रथमकालबिना शेष चारकाल हैं।
कम्मोरालियमिस्सं ओरालुस्सासभास इदि कमसो।।
काला हु समुग्घादे उवसंहरमाणगे पंच ॥५८६ ।। अर्थ - समुद्घातकेवलीके कार्मण-औदारिकमिश्र-औदारिकशरीरपर्याप्ति-श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति और भाषापर्याप्तिकाल इसप्रकार पाँचकाल क्रमसे अपने आत्मप्रदेशोंके संकोचके समय ही होते हैं, किन्तु विस्तारके समय तीनकाल ही होते हैं। अब उन्हीं तीनकालोंका स्पष्टीकरण करते हैं
ओरालं दंडदुगे कवाडजुगले य तस्स मिस्सं तु।
पदरे य लोगपूरे कम्मे व य होदि णायव्वो ॥५८७ ।। अर्थ- दण्डसमुद्धात करने और समेटनेरूप युगलसम्बन्धी दो समयोंमें औदारिकशरीरपर्याप्तिकाल है, कपाटसमुद्घात करने और समेटनेरूप दो समयोंमें औदारिकमिश्रशरीरकाल है, प्रतर और लोकपूरणसमुद्घातमें कार्मणकाल है। इसप्रकार प्रदेशोंके विस्तार करनेमें तीन ही काल हैं, किन्तु श्वासोच्छ्वास और भाषापर्याप्तिकाल प्रदेशोंका संकोच करते समय ही होते हैं, क्योंकि भूलशरीरमें प्रवेश करते समयसे ही सञ्जी-पञ्चेन्द्रियके समान क्रमसे पर्याप्ति पूर्ण करता है अतएव वहाँ पाँचोंकाल सम्भव
अथानन्तर नामकर्मके उदयस्थानोंकी उत्पत्तिक्रमका कथन चारगाथाओंमें करते हैं