Book Title: Gommatasara Karma kanda
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Shivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan

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Page 787
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ७४८ १०२४-२०४८-४०९६-८१९२-१६३८४-३२७६८, एकपण्णट्टी, २ पण्णट्टी, ४ पण्णट्टी और ८ प्रमाण हैं। ये मिलकर १६ गुणी पण्णीमें से एककम सर्वपदसंबंधी भंग होते हैं। सयोगकेवलीगुणस्थानमें केवलज्ञानके १, केवलदर्शनके २, क्षायिक सम्यक्त्वके ४, यथाख्यातचारित्र ८, क्षायिकदानलब्धिके १६, लाभलब्धिके ३२, भोगलब्धिके ६४, उपभोगलब्धिके १२८, वीर्यलब्धि के २५६, असिद्धत्वके ५१२, जीवत्वके १०२४ भव्यत्वके २०४८, मनुष्यगतिके ४०९६, शुक्ललेश्याके ८१९२ भंग हैं। इसप्रकार सर्वमिलकर २५६ से गुणित ६४ प्रमाणमें एककम करनेसे जो लब्ध आवे उतने प्रमाण सर्वपदके भंग जानना । अयोगकेवलीगुणस्थानमें केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिकसम्यक्त्व, यथाख्यातचारित्रके ८, दानलब्धिके १६, लाभलब्धिके ३२, भोगके ६४, उपभोगके १२८, वीर्यके २५६, असिद्धत्वके ५१२, जीवत्वके १०२४, भव्यत्वके २०४८, मनुष्यगतिके ४०९६ भंग हैं सो ये सर्व मिलकर २५६ से गुणित ३२में से एककम (२५६०३२ - १ ) प्रमाण भन यहाँ सर्वपदसम्बन्धी होते हैं। सिद्धों में केवलज्ञानके १, केवलदर्शन २, क्षायिकसम्यक्त्वके ४, अनन्तवीर्यके ८ और जीवत्वके ९६ ये सर्व मिलकर ३१ भंग होते हैं। प इसप्रकार प्रत्येकपद व पिंडपदोंके द्वारा भंगोंका वर्णन किया। यहाँ प्रत्येकपदका नाम असदृशपद भी है, क्योंकि इनमें प्रतिपक्षीसे समानता नहीं है तथा पिंडपदका नाम सदृशपद भी है, क्योंकि इनमें प्रतिपक्षीसे समानता पाई जाती है।

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