Book Title: Suyagadanga Sutram Part-2
Author(s): Buddhisagar Gani
Publisher: Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 6 वीराब्दाः २४८९ Jain Education internal 00 ab श्रेष्ठि- देवचन्द्र लालभाई - जैनपुस्तकोद्धारे ग्रन्थाङ्कः ११० पञ्चगणभृछ्रीमत्सु धर्मस्वामिप्रणीतं खरतरगच्छ गगनाङ्गण भास्कर पाठक प्रवरश्रीमत्साधुरङ्गगणिसङ्कलितया दीपिकया समलङ्कृतं तथा श्रीतच्छीहर्षकुलगणिविरचितदीपिकाया विशिष्टभागेन संयुतम् । सम्पादक:- क्रियोद्धारकश्रीमन्मोहनलालजीमुनिवरविनेय स्व० अनुयोगाचार्य श्रीमत् केशरमुनिजीगणिवर - विनेयो बुद्धिसागरो गणिः । प्रकाशक:- सुरत वास्तव्य श्रेष्ठि देवचन्द्र लालभाई जैनपुस्तकोद्धारकोशस्य कार्यवाहको मोतीचंद मगनभाई चोकसी। *** शाके १८८५ निष्क्रयं रूप्यकत्रयम् । प्रथमं संस्करणम् । PUR टा श्रीसूयगडाङ्गसूत्रम् । ( द्वितीयश्रुतस्कन्धात्मको द्वितीयो विभागः ) विक्रमाब्दाः २०१९ * 2200 001010 clas ख्रिस्ताब्दाः १९६२ प्रतय ५०० Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्रकृताङ्ग सूत्रदीपिका। इदं पुस्तकं श्रेष्ठि-देवचन्द्र-लालभाई-जैन-पुस्तकोद्धारसंस्थायाः कार्यवाहक मोतीचंद मगनमाई चोकसी इत्यनेन भावनगरे हाईकोर्ट रोड, महोदय मुद्रण-मन्दिरे गोविंदलाल बेचरभाई पटेल द्वारा मुद्रापितम् । ___ अस्य पुनर्मुद्रणाद्याः सर्वेऽधिकारा एतद् भाण्डारगारकार्यवाहकैरायत्तीकृताः । rape- Marg p All Rights Reserved by the Trustees of the Fund. Printed by Govindlal Becharbhai Patel at the Mahodaya Printing Press, High Court Road, Bhavnagar (Saurashtra). Published for Sheth Devchand Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund, Sheth Devchand Lalbhai Jain Boarding House, Badekhan Chakla, Gopipura, Surat. by Hon. Trustee Motichand Maganbhai Choksi. Paper Su ॥१ ॥ Jain Educationing ww.jainalibrary.org Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Sheth Devchand Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund Series No. 110 SS S Shree Suyagadang Suttra ( Second Part - Second Shrutaskandh ) S SS - By Shreemad Sudharmaswami Commentary By Shree Sadhurang Gani and Shree Harshakul Gani Vir Samvat 2489 Vikram 2019 Super Star Synergy Price Rs. 3-0-0 Jain Education inte ninaryong Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्रकृताङ्ग ઘુત્ર ૧ | ૨ || The Board of Trustees | Nemchand Gulabchand Zaveri 2 Talakchand Motichand 3 Babubhai Premchand. 4 Amichand Zaverchand 5 Keshrichand Hirachand 6 Motichand Maganbhai Choksi સંસ્થાનું ટ્રસ્ટી મંડળ શ્રી નેમચંદ ગુલાબચંદ દેવચંદ , તલકચંદ મેતીચંદ , બાબુભાઈ પ્રેમચંદ , અમીચંદ ઝવેરચંદ કેશરીચંદ હીરાચંદ , મેતીચંદ મગનભાઈ માનદ મેનેજીંગ ટ્રસ્ટી. = ૮ ૧ ચોકસી Hon. Managing Trustee. I || R Jain Education I Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ પ્રકાશકીય નિવેદન ક આગમવિભાગના અપ્રગટ ગ્રંથની અમારી પ્રકાશન-ચેજનામાં આ પંચમ પ્રકાશન પ્રગટ કરતાં અનહદ આનંદ પ્રાપ્ત થાય છે. આ ગ્રંથને પ્રથમ ભાગ વિ. સં. ૨૦૧૫ માં બહાર પડી ગયો છે. બીજા શ્રુતસ્કંધરૂપ આ બીજો ભાગ પ્રસિદ્ધ કરતાં અને અત્યંત આનંદ અનુભવીએ છીએ. આ ગ્રંથનું નામ પ્રાકૃતમાં સૂયગડાંગ અને સંસ્કૃતમાં સૂવકતાંગ છે. ગ્રંથ અંગેની માહિતી પ્રથમ વિભાગમાં સવિસ્તર આપેલી છે. - વિવરણ –આ સૂત્ર ઉપરની દીપિકાનું નામ સમ્યક્ત્વ દીપિકા પણ છે. તે સિવાય આ સૂત્ર ઉપર આચાર્ય શ્રી હેમવિમલસૂરિના શિષ્ય હર્ષકુલગણિએ સં. ૧૫૮૩ માં ૬૬૦૦-૭૦૦૦ કપ્રમાણુ દીપિકા રચી છે. જે બાબુ ધનપતસિંહજી તરફથી મુદ્રિત થઈ છે, તેમને સારભાગ આ ગ્રંથમાં પાછળ આપવામાં આવેલ છે તેમ જ આ ગ્રંથ ઉપર બાળાવબોધ શ્રી પાર્ધચંદ્રસૂરિએ કરેલ છે. બીજી દીપિકા- શ્રી સાધુરંગ ઉપાધ્યાયે રચી છે. જેને પ્રથમ ભાગ અમારા તરફથી બહાર પડી ચૂક્યો છે. બાકીને બીજો ભાગ આ ગ્રંથમાં પ્રસિદ્ધ થાય છે. આ ગ્રંથની પ્રેસકેપી ગણિ શ્રી બુદ્ધિમુનિજી તરફથી અમને મળી હતી. જે અમે સાભાર પ્રકાશિત કરી ચૂક્યા છીએ. આ સૂત્રને બે (બાળાબેથ ) ગુજરાતી ભાષાંતર આ૦ શ્રી જિનમાણેકસૂરિજી વગેરે તરફથી પ્રકાશિત થયા છે. અંગ્રેજીમાં હર્મન જેકેબી તરફથી ભાષાંતર થયું છે. Jain Education in For Private & Personal use only Wijainerary.org Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ત્રતાની I પ્રકાશકીય નિવેદન શ્રીવિદા | આ ગ્રંથની પ્રેસકેપી તયાર કરી સશેધન કરી આપવા માટે ગણિવર્ય શ્રી બુદ્ધિમુનિજીને અમે ખાસ ઉપકાર માનીએ છીએ મંથના પ્રથમ ભાગનું સંપાદન પણ તેઓશ્રીએ કર્યું હતું. બીજા ભાગના પણ મોટા ભાગનું સંપાદન તેઓ શ્રીએ કરેલ છે. મૂળ દીપિકાના અંત ભાગનું મુદ્રણ કાર્ય ચાલુ હતું, તે અરસામાં તેઓશ્રીની તબીયત અત્યંત અરવસ્થ બની, આથી સંશોધનનું કાર્ય પં. કપૂરચંદ રણછોડદાસ વારૈયાને સેંપવામાં આવ્યું. તબીયત અસ્વસ્થ હોવા છતાં પૂ૮ ગણિ શ્રી છેલી પ્રફે જાતે તપાસતા. આ રીતે તેઓશ્રી દેવગત થવાથી બાકીની મેટર માટે બીજાની મદદ લેવી પડી છે તેઓશ્રીના આત્માની આ તકે શાંતિ ઈચ્છીએ છીએ. આ ગ્રંથની પ્રસ્તાવના લખી આપવા માટે આ૦ શ્રી કૃપાચંદ્રસૂરિજી મ.ના શિષ્ય ઉપા૦ શ્રી સુખસાગરજી મના શિષ્ય પૂ. મુનિરાજ શ્રી મંગલસાગરજી મહારાજશ્રીન તથા મૂલ સૂત્રને તથા સુભાષિત ગદ્ય-પદ્ય-સંગ્રહને અકારાદિ • ક્રમ તયાર કરી આપવા બદલ ગણિવર્ય શ્રી બુદ્ધિમુનિજી મહારાજના શિષ્ય પૂ. મુનિ શ્રી જયાનંદમુનિજી મને, આભાર માનીએ છીએ, દષ્ટિદેષ કે મુદ્રણદેષથી જે કંઈ સ્કૂલનાએ રહી જવા પામી હોય તેની અંતઃકરણથી ક્ષમા યાચીએ છીએ. સં. ૨૦૧૯ લિ. મોતીચંદ મગનલાલ ચોકસી મૌન એકાદશી મેનેજીંગ ટ્રસ્ટી (માગશર સુદિ ૧૧ શેઠ દેવચંદ લાલભાઈ પુસ્તકેદ્દાર ફંડ, સુરત, For Private Jain Education in netary.org Personal Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निवेदन। भगवान् श्री महावीर स्वामिजी के मुख से “ उपन्नेह वा” “विगमेइ वा २" "धुवेइ वा ३" इस प्रकार त्रिपदी सुण करके गणधरों ने द्वादशात्री की रचना करते समय प्रथम आचाराङ्ग सूत्र की रचना की कारण की " सम्वेसि आयारो तित्थस्स पवत्तणे पढमयाए सेसाइ अंगाई एकारस अणुपुब्धिए" (आचा०नि० गा. ८) तीर्थकर भगवान् अपने अपने तीर्थ प्रवर्तन के समय आदि में आचार को हि प्रधानता देते है। आत्मकल्याणार्थ जीवों के लिए तो " चरण करण" ही मोक्षप्राप्ति का प्रधान साधन है। प्रस्तुत सूत्रकृताङ्ग दुसरे नम्बर का सूत्र है. सूत्रकृताङ्ग का आचाराङ्ग सूत्र के साथ सम्बंध बतलाते हुवे नियुक्तिकार श्री भद्रबाहुस्वामि कहते है “ जीवो छकाय परूवणाय तेसिं वहेण बंधोति " ( आ. नि. गा. ३५) उपरोक्त पाठसे स्पष्ट है की आचारात सूत्र में बतलाए हुए पृथ्वीकाय आदि षट् जीवनिकाय प्राणियों के वधसे याने हिंसा से उत्पन्न होनेवाले कर्मों का " बंध" उसको समझों और समझने के बाद ज्ञानपूर्वक क्रिया द्वारा त्याग करो "बुझिजत्ति तिउट्टिजा बंधणं परिजाणिया" इत्यादि उपरोक्त सूत्रकृताङ्ग के आदिम सूत्र में (सू. १) श्री गणधर सुधर्मास्वामि बतलाते है कि कर्म १ भगवान् महावीर ने अपनी दीर्घकालिक साधना के बाद जो अनुभव रत्न प्राप्त किया उसके एक अंश में सूचित किया गया है कि कोई भी पुरुष Jain Educati onal Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निवेदन। पत्रकतामा सूत्र दीपिका। बन्धनों का मूलभूत कारण समज के विशिष्ट संयम अनुष्ठान द्वारा क्रिया करके आत्मा को-कों के बन्धन से मुक्त करो। यहां पर अन्य दर्शन वाले कोइ एक केवल ज्ञान से मोक्ष मानते है । और दुसरे दर्शनावलम्बी केवळ क्रियासे हि मोक्ष मानते हैं। परंतु जैनदर्शन में तो "उमाम्यां ज्ञानक्रियाभ्यामेव मुक्तिः" ज्ञान और क्रिया दोनो मिलने पर ही मोक्ष है, ऐसा ज्ञानपूर्वक क्रिया द्वारा प्रत्यक्ष सिद्ध करते है। अतः प्रस्तुत सूत्र-कृताह में द्रव्यानुयोग प्रधान होने से नय-निझेपादिक के स्वरूपों का वर्णन करते समय तिनसो त्रेसठ ( ३६३ ) पाखण्डियो का मत का खण्डन करके, इस ग्रंथ में अहंत भगवान् के सिद्धान्तो का सुंदरतापूर्वक प्रतिपादन किया है। इस ग्रंथ के पठपाठन से भव्य जन जैनदर्शन के सिद्धांतों (द्रव्यानुयोग) का विस्तृत रूप से ज्ञान प्राप्त कर सकते है। प्रस्तुत ग्रंथ मूल-नियुक्ति-श्रीशीलानाचार्य कृत टीका तथा श्रीहर्षकुलगणिकृत दीपिकासह प्रथम छप चुका है।। शानी हो तो उसका सार यही है कि वह अपने आत्मज्ञान के कारण विश्वविज्ञान का उपभोग करता हुआ किसी की हिंसा नहीं करना । किसी भी प्राणी को न सताता है, न मारता है और न दुःख ही देता है। यहि अहिंसा सिद्धान्त है। इसी में विज्ञान का अन्तर्भाव हो जाता है। एवं खनाणिणो सारं जन हिंसह किंचण । अहिंसा समयं चेव एयावन्तं वियाणिया । सूत्रकृतांग ।।१।४।१०। आधुनिक विज्ञान और अहिंसा । लेखक:-गणेशमुनि शानि, सम्पादक:-मुनि कान्तिसागरजी Jain Education Far Private & Personal use Oh WWEjainelibrary.org Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परन्तु श्रीखरतरगच्छेश्वर श्रीमजिनदेवसूरीश्वर के आदेश से पाठक प्रवर श्रीसाधुरङ्गगणि द्वारा सं १५९९ वर्षे सङ्कलित "दीपिका" नामक ग्रंथका प्रथम वार ही मुद्रण हो रहा है। __ प्रस्तुत सूत्रकृताङ्ग की संक्षेपार्थ बोधिनी "दीपिका" के सम्पादन में गणिवर्य श्री बुद्धिमुनिजी महाराज द्वारा सम्प्राप्त प्रतियों का परिचय इस प्रकार है। - (१) प्रति उंझाज्ञानभंडार की थी, आगमप्रभाकर मुनिवर्य श्री पून्यविजयजी महाराज द्वारा मिली थी जिस का लेखनकार्य इस प्रकार है संवत १९१४ वर्षे ज्येष्ठ शुक्ला चतुर्दश्याम् लिपिकृतार्थ पुस्तिका उपाध्याय महेरचन्द्रेण श्रीइन्दोरमध्ये श्री केसरियानाथजी प्रसादात् ।। (२) प्रति पूना के भान्डारकर-प्राच्य विद्यासंशोधन मन्दिर की थी पत्र संख्या २१३ । इसके अंत में लिखनेवाले का नाम और संवतादि नहीं दिये है, यह प्रति श्रीयुत् अगरचंदजी नाहट्टा द्वारा प्राप्त हुई थी। (३) प्रति फलोदी (राजस्थान ) मोटी धर्मशाला में श्री संघ के ज्ञानमंदिर से प्राप्त की. पत्र संख्या ११४ । इसके अंत में १ श्रीमद्बुद्धिमुनेर नुज्ञया, मुद्रणाऽयं लिपिकर्ता-पण्डित-गौरी शङ्कर-तनय-द्विवेयुपाहमदनकुमार शर्मा । फलोदी (फलवृद्धि) वास्तव्यः । वैकमोरे । २००७ तमीये वर्षे पोत्र शुरु १३ मन्दे च ॥ श्री गुर्विष्टप्रसादाच्छुभं भवतु ॥ Jain Education jainelibrary.org Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निवेदन । पत्रकता सूत्र उल्लेख इस प्रकार है। सम्बत् १९४९ वर्षे कार्तिक सुदि पूर्णिमासी मेदनीपुरवरे ॥ 4 (४) प्रति कच्छ मांडवी नगर में श्री धर्मनाथस्वामि प्रसादस्थ ज्ञानभंडार में सुरक्षित है, पत्र सं. ७६ पञ्च पाठी। प्रान्त में पुष्पिका इस प्रकार है संवत् १६६७ वर्ष मागसिर मासे शुक्ल पक्षे एकादश्यां तिथौ गुरुवासरे श्री जेसलमेर दुर्ग प्रवरे, राउलश्री भीमजी राज्ये, श्री लोका गच्छे आचार्य श्री ६ रत्नसीजी पठनार्थ, संघपति तेजपाल पुत्र संघाति जीवा, ततः पुत्रे संघपति कचरा, स्वहस्तेन लिखिता, ऋषि श्री पृथ्वीमनु ऋषिरत्ना, लिखापिता वाच्यमाना शुभं भवतु । उपरोक्त प्रतियों के आधार से स्वर्गस्थ मुनिजी गणिजी ने संशोधन करने का प्रयास किआ और भव्य जीवो के उपकारार्थ द्वितीय दीपिका श्री हर्ष कुलगणि रचित भी इसमें संमिलित की गई है, इसलिये पढनेवालो को बडी सुविधा रहेगी। संशोधन करते समय वृद्वृत्ति एवं हर्षकुलगणि की दीपिका संमुख रखके संशोधन किआ है किसी किसी जगह पर उपयोगी पाठ समज करके पाठो टिप्पण भी किए गये है। हर्षकुछगणिविरचित दीपिका इस प्रतिमें संपूर्ण नहि छपा है, इसका महत्त्वपूर्ण भाग हि इसमें दिया है। पाठकप्रवर श्री साधुरंगगणि का विशेष परिचय नहीं मिलने से यहां नहीं दे सकता हूं और जो परिचय है सो इस ग्रंथ NJ के अंतिम प्रशस्ति पृष्ठ-सं. १५४ पर दी गई है. इससे उनका परिचय मालुम हो जाता है. Jain Education Far Private & Personal use Oh G w w.jainelibrary.org Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उपरोक्त दोनो टीकाओ के आधार पर स्वर्गस्थ गणि श्री बुद्धिमुनिजी महाराज ने अत्यंत परिश्रम करके संपादन किआ है। विशेष करके तो शरीर अस्वस्थ होने पर भी फारम का खुद ही संशोधन करते थे. एवं पंडित कपुरचंदजी वारैया को भी तबि. यत की ज्यादा अस्वस्थता के कारण संशोधन के लिए दिए गये थे. ज्यादा सावधानी रखने पर भी यदि कोई त्रुटीयां रह गई हों तो सुज्ञ वाचक वर्ग सुधार के पढे एही प्रार्थना है.. ज्ञानवृद्धि के हेतु से उपरोक्त प्रतियो को प्रदान करने में जीन जीन महाशयोने सहायता दी है वह धन्यवाद के पात्र है. | श्री देवचंद लालभाई ट्रस्ट के कार्यवाहक श्रीयुत् केशरीचंदजी हीराचंदजी के द्वारा प्रस्तावना आदि लिखने की सूचना मिलने पर 'निवेदन ' मैंने लिखा है. एवं गणि श्री बुद्धिमुनि जी महाराज के शिष्य जयानंदमुनिने भी मूलसूत्र की अकारादि परिशिष्ट तथा दीपिकागत सुभाषित गद्य पद्य संग्रह लिखने में भी प्रयत्न किया है। अतः संपादक महाशयजी का परिश्रम को ग्रंथ पठनपाठन करके ज्ञानवृद्धि साथ सफल करे. इति शुभेच्छा । ठि. माधवलाल बाबु निवेदक :धर्मशाला-पालीताणा. उपाध्याय श्री सुखसागरजी म. के शिष्य सं. २०१८ कार्तिक शुक्ला ११ मुनि मङ्गलसागर Far Private & Personal use Oh wwEjainelibrary.org Jain Educationindmmital I Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पूरकृताङ्ग. सूत्र. दीपिका।। परिशिष्ट नं. १ मूलसूत्राणामकाराद्यनुक्रमः। सूत्राणामकाराचनुक्रमः पत्रांक etter 20 अह पुरिसे पुरित्थ. अहावरे दोघे पुरि० अहावरे तच्चे पुरि० अहावरे च उत्थे पुरि० अहभिक्भु लुहे. अननाउनो आता दीहती० अहावरे दोके पुरि पंच० अहावरे चउ० पु. नियति अहावरे दोच्चे दंड. अहावरे तच्चे दंड अहावरे चउ० दंड. अहावरे पंच० दंड अहावरे छठे भोस० अहावरे सत्तमे फिरिया. अहा अट्ठमे किरिया० अहा० नत्रमे किरिया० अहा० दसमे किरिया० : rr १६ । Jain Education a l Far Private & Personal use Oh TWwEjainelibrary.org Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internation अहा० एकारसमे किरिया ० अहा० बारसमे किरिया० अहा तेरसमे किरिया० अदुत्तरं चणं पुरस अदुआ आगामिए अदुवं वा अच्छराए अहावरे दोबहस ठाणं अहा० तबस्स ठाण० अहा० पढम [स] ठाण ० अद्दा० दोच्च० ठाण० धम्म० अहा० तच्च० ठाण० भीस० अविरति पहुच बाले अहावरं पुखराय पत्रांक ४४ ४६ ४८ ४९ ५१ ५७ ६० ६० ६१ ६६ ७० ७२ ७८ अहा० पुर० कम्मनिया० अहा० पुर० रुक्खेसु० अहा० पुर० अज्जारु० अहा० पुर० पुढविजोणिया ० अहा० पुर० जांब कम्म० अहा० पुर० कम्मनिया० अहा० पुर० उदएसु० अहा० पुर० चेव पुढवि ० अहा० पुर० नाणविहाणं ० अह० पुर० णाणाविहाणं ० अहा० पुर० चउप्पय ० अहा० पुर० उरपरि० अहा० पुर० भुयपरि० पत्रांक F 9 9 9 9 F F F S S ÷ ÷ ÷ १ nainelibrary.org Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वकता दीपिका। अहिंसयं सव्वपयाणु अहवा वि विद्धण. अजोयरूवं इह. अवतरूवं पुरिसं अब्भाइक्खंति खलु सूत्राणामकाराद्यनुक्रमः। अहा. पुर० खहयर० अहा. पुर० इहेगतिया० अहा. पुर० सत्तानाणा० अहा० पुर० सवाउदग० अहा० पुर० उदएसु० अहा. पुर. नाण विह. अहा० पुर० बाउकाय अहा. पुर० पुढवित्ताऐ० अहा. पुर० सब्वे पाणा. असंतएणं मणेणं अन्न यरेणं मणेणं अहाकम्माणि भुंजंति० असेसं अक्खयं वा० आसदीपंचमा पुरिसा० आयरिया वेगे अणारिया० आया अपञ्चक्खाणी आवि. आचार्य आह-जहा से. आदाय बंभचेरं च० आगंतऽगारे आराम आरंभग चेव परिगाहं ११२ । jainelibrary.org For Private & Personal Use Oth Jain Education Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रांक १३४ आउसंतो गोयमा० आउसो गोयमा० आउसंतो उदगा० इह खलु मम अन्न इह खलु गारत्था सारंभा० इह खलु गा० कामभोगा. इह खलु तस्स भिक्खुस्स० इह खलु नाणपण्णाणं. इन्चेयस्त ठाणस्स० इच्चेएहिं बारसहिं० इति खलु ते असन्निणो. इश्चरहिं ठाणेहिं० इमं वयं तु तुम पाउ० 4.96 m८F इह खलु पाइणं वा० इह खलु पंच मह. इह खलु धम्मा पुरिसा० इमं सञ्चं इमं तहित० इह खलु दुवे पुरिसा० इते चत्तारि पुरिस० इह खलु पुरिसे अन्न इह खडु मम अन्न इह खलु कामभोगा. उग्गा उम्गपुत्ता उर्दू पादतला आहे. Jain Education Jewe.jainelibrary.org Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रकृताङ्ग-IN पत्रांक ११८ एएहिं दोहिं ठाणेहिं० दीपिका। उ8 अहेयं तिरियं० उई अहेयं ति० विनायक सूत्राणामकाराद्यनुक्रमः। एतेहिं दोहिं ठाणेहिं० एगंतमेवं अदुवावि० एवं ण मिजति न संस० एवं हं पञ्चक्खंताणं. एवं एगे पागम्भिता. एवं से भिक्षु विरए० एत्थ वि सिया एत्थ० एवं से भिक्खु धम्मस्थी. एवामेव ते इथिकामेहिं. एवामेव समणुगम्म० [एवं ] ओसहीणं चत्ता० एवं खलु भगवया० एवं से भिक्सु विरते. एएहि दोहि ठाणेहिं० 2003 किट्टिए नाए समणासो० किरियाइ वा अकिरि० किरियाति वा जाव. कल्लाणे पावए वा वि. किंतेसि तहप्पगा० १०२ गंता व तत्था अदुवा ॥ ५ ॥ Jain Education in For Private & Personal Use Oh N REjainelibrary.org Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internat चोगगः-से किं कुब्वं ● ज जंपि य इमं समाजानं ० जे खलु गारत्था सारंभा० जे []] अतीया० जे इमे तसा थावरा० जे इमे कामभोगा ० जंपि य इमं संपरा० जावि य से अभितरिया • जहा से वहए तरस्र वा० जे एए सन्नी वा असनी ० जे केइ खुडगा पाणा० पत्रांक १०१ १८ २८ २९ ३० ३१ ३१ ६४ ९७ १०१ १०४ जमिदं ओरालमाहारं० जेयावि बीओदग भोति० जीवाणुभागं सुविचित जे यावि भुंजंति तहप्प ० जे गरहियं ठाणमिहा० risकाम किया ण य० ण ण कुज्जा विहुणे ० गंतिऽणवंतिय तस्थ खलु भगवया० तस्थ भिक्खु परकडं • तत्थ णं [जे से ] पढमस्स ० पत्रांक १०६ ११७ १२५ १२६ १३० ११९ १२० १२२ २८ ३२ ३५ helibrary.org Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बनाताग-1 पत्रांक पत्रांक मूल ५८ दीपिका। सूत्राणामकाराद्यनुक्रमः। ते इणमेव जीवितं. तं जहा अन्नं भन्नका. तस्स णं एगमवि० तेणं गरगा अंतो. तेणं तत्थ देवा भवंति. ते सव्वे पावाउया. तत्थ णं जीवा हत्यिक ते जीवा माउए सयं० तत्थ खलु भगवया० तस्थ खलु भगवता. तत्थ खलु भगव० दुवे० तत्थ से अपिवि[ चि ]ता तत्थ खलु भगव० छज्जीव० ते अन्नमनसतु० तं भुंजमाणा मिसिंत. तेणं कालेणं तेणं समए. तत्थ नालंदाए. तस्स णं लेवस्स गाहा. तस्सि च ण गिहपदे. तसेहिं पाणेहिं निहाय तसा वि बुच्चंति तसा. तत्थ आरेणं जे तसा. तत्थ जे आरे. जाव आउं. तए णं से उदए पेढाल. wwm SCMWWWW १५१ १५३ थूलं उरम्भं इह मारि० ॥ ६ ॥ Jain Education inten Far Private & Personal use Oh ainettar og Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रांक थावरकायाओ विप्प १४१ moc ००० v देहाचुए कम्मबितिए. दोसेइ वा पेसेइ भय० दीसंति समियाचारा. दक्खिवणाए पडिलंभो० दयावरं घम्म दुगुंछ. दुहवो वि धम्मपि० १०८ नत्थि जीवा अजीवा वा० नत्थि धम्मे अहम्मे वा० नत्थि बंधे व मुक्खे वा० नत्थि पुन्ने व पावे वा० नत्थि आसवे संवरे वा. नत्थि वेयणा निजरा वा० नस्थि किरिया अकिरि० नत्थि कोहेव माणे वा० नस्थि माया व लोभे वा० नत्थि पेज्जे व दोसे वा. नत्थि चाउरते संसारे० नत्थि देवा व देवी वा० नत्थि सिद्धी असिद्धी वा० १२८ . धम्म कहतस्स उ. ११० नो इणमटे समढे. नस्थि लोए अलोए वा० Jain Education Internal www in og Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रांक सूत्रकृताङ्ग सूत्र दीपिका। पत्रांक ११० पुरिसं च विद्धण. पुरिसेति पिन्नंति० c मूलसूत्राणामकाराद्यनुक्रमः। नधि सिद्धी नियं ठाणं. नत्थि साहु असाहु वा० नस्थि कल्लाण पावे वा० न किंचि रूवेणऽभि. निग्गंथधम्ममि इमं० नन्नत्व अभिओगेणं. न बाले पुण एवं विष्पडि. बुद्धस्स आणाइ इसं० . 0 moc भामं उप्पायं सुविणं. भण [ह ] देवाणुप्पिया० भूयाभिसंकाइ दुगुंछ. भगवं च उदाहु. भ० च णं उ० इह खलु गाहा. भ० च णं उ. केइ ख० परि० भ० च णं उ० संतेगतिया० पुवामेव तेसिं गाय पुढवी एगे महब्भुते. पढमे दंड समादाणे. पुरे कडं अद्द ! इमं सुणेह. पन्नं जहा वणीए. पिन्नाग पिंडीमवि० 0 SWWm. 0 ११४ 4 0 ० < १२२ < Jain Education For Private & Personal Use Oh aineitary.org Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रांक भ० च णं उ० सं० नो खलु. ण उ० सं० मणुस्सा० णं उ० सं० भवंति आर० भ० च णं उ० सं० पाणा० भ० च णं उ० सं० पाणा भवंति. भ० च णं उ० सं० समणो० भ० च णं उदा० ण एय भूयं० भ० च णं उदा० आउसंतो. भ० च णं उदा० तते पं० ur 000001 Vror लोयं च खलु मए. लद्धे (हु) अतु अहो. लोयं अजाणितिह० लोयं विजाणंतिह विज्जति तेसिं परकमे० वितेसिणो मेहुप्पसंप० वायाभिओओण जपाव महया हिमवंतमलय. महव्वए पंच अणुव्वऐ० मेहाविणो सिखि ११६ सुयं मे उसंतेणं० से जहानामए केइ. सतो णत्थि विणासो. Ein Education interne Far Private & Personal use Oh linelibrary.org Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्रकृताङ्ग सूत्र दीपिका । ॥ ८ ॥ Jain Education Internat से किणं किणावेमाणे ० से जहानामए गंडे. से जहानामए अरई० से जहानामए वम्मिए० से जहानामए रुक्खे ० सउणीपंजरं जहा० से बेमि पाइणं वा० ४ संते० से मेहावी जाणेज्जा ० से मेहावी जाणिज्जा बाहिर० से बेमि० पाइणं वा ४ जाव० से बेमि पाइणं बा० सेभिक्खु जाणेजा संति विरति उवसमं० पत्रांक १५ १६ १७ १७ १७ १८ २१ २४ २५ २८ २० ३१ ३३ सेभिक्खु धम्मं किट्टे ० समणेति वा माहणेति ० सुयं मे आउ इ० ख० किरिया० से जहानामए केइ० से जहानामए के इ० पुरि० कच्छं ० से जहानामए के ० पु० सालीणि० से जहानामए के० पु० गावधा० से जहानामए के० पु० अंतोसल्ले० से एगइओ आयउं० से एगतिओ आणुगा० से एगइओ उवचर० से एगइओ पाडिपहिय० से एगतिए संपिच्छे ० पत्रांक ३३ ३४ ३५ ३८ ३८ ४० ४० ४४ ५१ ५२ ५२ ५२ ५३ मूल. सूत्राणा मकाराद्य नुक्रमः । ॥ ८ ॥ jainelibrary.org Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ से एगतिए गठिच्छे. से एगतिए उरब्भिय० से एगतिए सोयरिय० से एगइओ वागुरि० से एगइओ साउणि से एगइओ मच्छिय. से एगइओ गोधाय० से एगतिओ गोपाल. से एगतिओ सोवणि. से एगतिओ सोय. पडि. संतेगतिया मणुस्सा० से एगइओ केणवि० से एग० केण० आयाणेणं. से एगतिओ केणइ आदा० से एगतिओ केणइ आया. से एगइओ केणइ आदा० से एगइओ नो विति. से एगइओ णो० वि० गाहाव० से एगतिओ समणं. से जहानामए के इ० से जहानामए (केइ ) रुक्खे० से जहानामए अणगारा० से जहानामए समणो० सुर्य मे आउसं० इ० ख० आहार. सुर्य मे आ उसं० इ० ख० पञ्चखा० से किं तं असिन्निदिट्टते. ५५ ५५ Jain Education jainerary.org Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रांक पत्रकृताङ्ग सूत्र दीपिका १०० सूत्राणामकाराद्यनुक्रमः। ११४ ॥९॥ ११६ सव्वजोणिया वि खलु० समुच्छिहिति सत्थारो० साऽऽजीविया पट्ठविता० समिज लोयं तस पाव. सीओदगं सेवउ चीय. सीओदगं वा तह बीय० सिया य बीओदगइ. समारभंते वणिया० सिणायगाणं तु दुवे० सिणायगाणं तु दुवे० सम्वेसि जीवाण दयह सिणायगाणं तु दुवे० सिणायगाणं तु दुवे० संवच्छरेणावि य एग० संवच्छरेणावि य एम० संवच्छरेणावि य एग० संवच्छरेणावि य एग० सवायं भगवं गोयमे० संसारिया खलु पाणा सवायं उदये पेढाल. सवायं उदये पेढाल. संसारिया खलु पाणा. सवायं भगवं गोयमे ~ ~~~~r 2422 or ११७ १२१ oc ac १२३ १२५ १२६ . १२७ । हण छिदर्भिद विगत्तगा. Jain Education i n al For Privista personal UE O स w .jainelibrary.org Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिशिष्ट नं. २ दीपिकागत-सुभाषित-गद्य-पद्य-संग्रहस्याकाराद्यनुक्रमणिका। पत्रांक पत्रांक १११ अट्ठ गुणाणं मझे, इक्केण गुणेण संघपञ्चक्खं । तित्थुन्नयं कुणंतो, जुगपवरो सो इहं नेओ। अप्पत्तियं जेण सिया, आसु कुप्पेज वा परो। सव्यसो तं न भासिज्जा, भासं अहियगामिणि ।। अमूर्तश्चेतनो भोगी, नित्यः सर्वगतोऽक्रियः । अकर्ता निर्गुणः सूक्ष्म, आत्मा कपिलदर्शने ॥ अभंगेण व सगडं न तरइ विगई विणा उ जो साहू । सो रागदोसरहिओ, मत्ताएँ विहीइ तं सेवे ॥ अज्झत्थविसोहिए, जीवनिकाएहिं संघ (डे) दो लोए । देसियमईिसयतं, जिणेहिं तेलोक्कदंसीहिं ।। अन्नाणनिरंतरतिमिर पूरपूरियंमि भवभवणे। को पडद ? पयत्थे, जइ गुरुदीवा न दिपंति ॥ आया चेव अहिंसा, आया हिंसत्ति निच्छओ । | एसो जो होई अप्पमत्तो, अहिंसओ हिंसओ इयरो। २०५ १११। इसीपम्भाराए, उवरि खलु जोयणमि जो कोसो। Jain Education inte Sinelibrary.org Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रांक स्वकृताङ्ग सूत्र दीपिका। पत्रांक १ | कोसस्स च छम्भाए, सिद्धाणोगाहणा भणिया । ॥१०॥ उच्चालियंमि पाए, इरियासमियस्स संकमट्ठाए । वावजेज कुलिंगी, मरिज तज्जोगमासज्ज ॥ दीपिका गतसुभाषित. गद्य-पद्यसंग्रहस्याकाराद्यनुक्रमणिका। एकस्य जन्ममरणे, गतयश्च शुभाशुभा भवावते । तस्मादाकालिकहित-मे केनैवात्मनः कार्यम् ॥ एरण्डफल बीजादे-बन्धच्छेदाद्यथा गतिः । कर्मबन्धनविच्छेदात् , सिद्धम्यापि तथा भवेत् ॥ | को व न लहिज्ज ? मुक्खं, रागद्दोसा जइ न हुज्जा ॥ कुलालचक्रदोलेषु, मुख्याणां हि यथा गतिः । पूर्वप्रयोगतः सिद्धा, सिद्धस्योर्द्धगतिस्तथा ।। केवलमणोहिचउदस-दसनवपुव्वीहि संपर्य रहिए । सुद्धमसुद्धं चरणं को जाणई ? कज्जभावं व ॥ कालाइदोसवसओ, कहवि दीसंति तारिसा न जह । सम्वत्थ तहवि नस्थित्ति, नेव कुज्जा अणासासं ।। कालोचियजयणाए मच्छररहियाण उज्जमंताणं । जणजत्तारहियाग, होइ जइत्तं जईण सया ।। केवइयं कालं तु देवाणुप्पियाणं तित्थे अणुसज्जिसइ ? गोयमा ! इक्वीसवाससहस्साई मम तित्थे अणुस७७ | जिस्सइ, तित्थं पुण चाउवण्णो समणसंघो समणा |समणीओ सावया सावियाओ। कुसुमपुरोप्ते बीजे, मथुरायां नाङ्करः समुद्भवति । यत्रैव तस्य बीजं, तत्रैवोत्पद्यते प्रसवः ।। को दुःखं पाविजा? कस्स व सुक्खे हि विम्हो हुबा! Ladainelibrary.org Jain Education interne Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चत्तारि पंच जोयण सयाई गंधो उ मणुयलोयस्स। उर्दू बच्चइ जेणे, न हु देवा तेण आविति ॥ Marathi पत्रांका | जो य पओगं जुजइ, हिंसत्थं जो य अन्नभावेण । | अमणोय जो पउंजइ, इत्थ विसेसो महं वुत्तो।। जा जयमाणस्स भवे, विराहगा सुत्तविहिसमग्गस्स । सा होइ निज्जरफला, अज्झत्थविसोहिजुत्तस्स ॥ जं अन्नाणी कम्म, खवेइ बहुयाहिं वासकोडीहिं । तं नाणी तिहि गुत्तो, खवेइ ऊसासमित्तेणं ॥ १०२ जिण पंचसु कल्लाणएसु चैव महरिसितवाणुभावाओ। जम्मंतरने हेण य, आगच्छंति सुरा इयं ॥ FAS जे जत्तिया य हेऊ, भवस्स ते चेव तत्तिया मोक्खे। गणणाईया लोगा, दोहवि पुण्णा भवे तुल्ला ॥ जइया होही पुच्छा, जिणंदपासंमि उत्तरं तइया । इक्कास निगोयस्स, अणंतभागो य सिद्धिगओ जो य पमत्तो पुरिसो, तस्स य जोग पदुच्च जे सत्ता। वाविज्जते नियमा, तेसिं सो हिंसओ होइ॥ जे वि न वाविज्जती, नियमा तेसि पि हिंसओ होई। | सावज्जो य पओगेण, सव्वभावेण सो जम्हा ॥ तस्स असंचयओ सं-चयओ (य) जाई सत्ताई। १०५ जोगं पप्प विणस्संति, नथि हिंसाफलं तस्स ॥ तो बहुगुणनासाणं, सम्मत्तचरित्तगुणविणासाणं । १०५ | न हु वसमागंतब्ब, रागद्दोसाण पावाणं ॥ Jain Education ww.jainelibrary.org For Private&Personal use Only tematica Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -सूत्रकृताङ्ग सूत्र दीपिका । ॥ ११ ॥ Jain Education In aणसंथार निसन्नोऽवि, मुनिवरो भट्टरागमयमोहो । जं पावइ मुतिसुहं, कत्तो ? तं चक्कबट्टीवि ॥ न न य तस्स तन्निमित्तो, बंधो सुहुमो वि देसिओ समए । अणवज्जे य पओगे, ण सव्वभावेण सो जम्दा ॥ नाणी कम्मरस खट्ट - मुट्ठिओ नो ठिओ य हिंसाए । जय असतं अहिंस (त्थ ) - मुट्ठिओ अवहिओ सो उ ॥ न य हिंसामिचेणं, सावज्जेणावि हिंसओ होई । सुद्धस्स य संपत्ती, अफला भणिया जिणवरेहिं ॥ न चाघो गौरवाभावान्न तिर्यक् प्रेरकं विना | न च धर्मास्तिकायस्याभावाल्लोकोपरि व्रजेत् ॥ नृलोकतुल्यविष्कम्भा, सितच्छत्रनिभा शुभा । उद्धं तस्याः क्षिते सिद्धा, लोकान्ते समवस्थिताः ॥ पत्रांक ११२ १०५ १०५ १०५ १११ १११ नो किन्हे नो नीले नो लोहिए नो हालिदे नो सुकिले नो सुरभिगंधे नो दुरभिगंधे नो तित्ते नो कडुए नो कसाए नो अंबिले नो महुरे ( नो लवणे ) नो वट्टे नो तसे नो चउरंसे नो परिमंडले नो दीहे नो हस्से नो गुरु नो लहुए नो सीए नो उन्हे नो कक्खडे नो मउ नो इत्थी नो पुरिसे नो अन्ना ॥ प प्राप्तव्यो नियतिबलाश्रयेण योऽर्थः सोऽवश्यं भवति नृणां शुभोऽशुभो बा । भूतानां महति कृतेऽपि हि यत्नेनाभाव्यं भवति न भाविनोऽस्ति नाशः ॥ पञ्चेन्द्रियाणि त्रिविधं बलं च, उच्छ्वास निश्वासमथान्यदायुः । प्राणा दशैते भगवद्भिरुक्तास्तेषां वियोजी करणं तु हिंसा ॥ पत्रांक १११ १९ १०५ दीपिका गत सुभाषित गद्य-पद्य - संग्रहस्या काराधनुक्रमणिका । ॥ ११ ॥ ww.jainelibrary.org Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रांक १०८ प्रत्यक्ष एव विश्वेऽस्मिन् प्रपञ्चः पुण्यपापयोः द्विभिन्न(हि) जगत्सर्व, सुखदुःखव्यवस्थया । पूर्वप्रयोगतोऽसा-भावाद्बन्धविमोक्षतः । स्वभावपरिणामाच, सिद्धस्योर्ध्वगतिर्भवेत् ॥ पलए महागुणाणं, हवंति सेवारिहा लहुगुणा वि। अथमिए दिणनाहे, अहिलसइ जणो पइवं पि ॥ पूर्वसङ्गविनिर्मोक्षा-त्तथा सिद्धिगतिः स्मृता । मनोज्ञा सुरभिस्तन्वी, पुण्या परममासुरा। प्रागूभारा नाम वसुधा, लोकमूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥ १११ १११ यथाऽधस्तिर्यगूई च, लोष्टवाय्वग्निवीचयः । स्वभावतः प्रवर्तन्ते, तथोर्ध्वगतिरात्मनः ।। ब्रह्मा लूनशिरा हरिईशि सरुक् व्यालुतशिश्नो हरः, सूर्योऽप्युल्लिखितोऽनलोऽप्यखिलभुक् सोमः कलां- रत्तो वा मूढो वा, जो पउंजइ पओगं । हिंसा वि कितः । स्वाथोऽपि विसंस्थुलः खलु वपुः संस्थैरूपस्थैः तत्थ जायइ, तम्हा सो हिंसओ वुत्तो॥ सन्मार्गस्खलनाद्भवन्ति विपदः प्रायः प्रभूणामपि ॥ ११८ | रागद्वेषौ विनिर्जित्य, किमरण्ये करिष्यसि । अत्र नो निर्जितावेतो, किमरण्ये करिष्यसि ?॥ मृल्लेपसङ्गनिर्मोक्षा-द्यथा दृष्टाऽऽश्वलाबुनः । राजानं तृणतुल्यमेव मनुते शकऽपि नैवादरः, वित्तो Ein Educationala For Private & Personal UBE Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्रकृताङ्ग पत्रांक | १०६ दीपिका। ॥१२॥ पत्रांक पार्जनरक्षणव्ययकृताः प्राप्नोति नो वेदनाः । संसारा आउरदिटुंतेणं, तं चेव हियं असंथरणे ॥ न्तरवयंपीह लभते शं मुक्तवनिर्भयः, संतोषात्परुषोऽमृत| त्ववमचिराद्यायात्सुरेन्द्रार्चितः ॥ १२७ हिंसत्यं जुजतो सुमहं दोसो, अ(प्पणत्तरं इयरो। अमणो य अप्पदोसो, जोगनिमित्तं च विन्नेओ॥ सम्वत्थ संजमं सं-जमाओ अप्पाणमेव रक्सिज्जा । मुच्चद अइवायाओ, पुणो वि सोही न (त) या (?) विरई॥ १०६ | क्षयं नीस्वा स लोकान्तं, तत्रैव समये व्रजेत् । संथरणमि असुद्धं, दुन्ह वि गिण्हंतदितयाणऽहियं, लब्धसिद्धत्वपर्यायः परमेष्ठी सनातनः ॥ दीपिका गतसुभाषितगद्य-पद्य| संप्रहस्या| काराद्यनुक्रमणिका। 66666 ॥ १२ ॥ Jain Education Intern M ininelibrary.org Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Hofu तं श्रेष्ठि-देवचन्द्र-लालभाई-जैनपुस्तकोद्धारे ग्रन्थाङ्क १०९ अनुसन्धान ॐ नमः प्रवचनाय । ॐ नमोऽहते श्रीवर्द्धमानस्वामिने । परमसुविहितश्रीमत्खरतरगच्छविभूषणमहोपाध्यायश्रीमत्साधुरङ्गगणिवर्यगुम्फितया दीपिकया स सूयगडाङ्गसूत्रम् । तस्य द्वितीयश्रुतस्कन्धात्मको द्वितीयो विभागस्तत्राद्यं पौण्डरीकाध्ययनं । सुयं मे आउसंतेणं भगवया एवमक्खायं-इह खल्लु पोंडरीए नामऽज्झयणे, तस्स णं अयमद्वे || | पन्नत्ते-से जहा नामए पुक्खरिणी सिया बहुउदगा बहुसेया बहुपुक्खला लट्ठा पुंडरीकिणी | पासादीया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा। तीसे गं पुक्खरिणीए तत्थ तत्थ देसे देसे तहिं तहिं बहवे पउमवरपुंडरीया बुइया । अणुपुविटिया ऊसिया रुइला वण्णमंता गंधमंता रसमंता फासमंता पासादिया दारिसणिञ्जा अभिरूवा पडिरूवा । तीसे णं पुक्खरिणीए बहुमज्झदेसभागे - - Jain Education a l T Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग-IN सत्र दीपिकान्वितम् । एगे महं पउमवरपुंडरीए बुइए, अणुपुचिट्ठिए ऊसिते रुइले वण्णमंते गंधमते रसमंते फासमंते || २ श्रुतपासादीए जाव पडिरूवे । सवावंतिं च णं तीसे य पुक्खरिणीए तत्थ तत्थ देसे तहिं तहिं बहवे INT स्कन्ध आयेऽध्यपउमवरपुंडरिया बुइता, अणुपुविट्ठिता जाव पडिरूवा। [सवावंतिं च णं तीसे णं पुक्खरिणीए NTSta बहुमज्झदेसभाए एगे महं पउमवरपुंडरीए बुइए अणुपुविट्ठिए जाव पडिरूवे ( सू० १)]॥ त्वं व्याख्या-श्रुतं मया आयुष्मता भगवतैवमाख्यातं, किमाख्यातं ? भगवता 'इह खलु पोंडरी(ए)यं नामs- पौण्डरीके. ज्झय(णे)णं' इह-द्वितीयाङ्गे श्रुतस्कन्धे द्वितीये 'खलु' शब्दो वाक्यालङ्कारे, 'पुण्डरीकेण' धवलकमलेना- तिनाम्नः। त्रोपमा भविष्यतीति कृत्वाऽस्याध्ययनस्य पौण्डरीक इति नाम कृतम् । तस्य चायमर्थः, णमिति वाक्यालङ्कारे। 'प्रज्ञप्तः' प्ररूपितः ‘से जह 'त्ति तद्यथा 'नाम' इति सम्भावने, पुष्करिणी ' स्याद्' मवेदेवम्भूता। तद्यथा-'नहुदका' बहुजला तथा 'बहुसेया'+ बहुकदमा 'बहुपुक्खला' बहुसम्पूर्णा प्रचुरोदक[भृता]भूता लब्धार्था' यथार्था, यथा नाम्ना तथा स्वभावेन 'पुण्डरीकिणी' श्वेतकमलसहिता-बहुश्वेतपद्मा 'पासादीया' निर्मलजलपूर्णचात् दर्शनीया' दर्शनयोग्या 'अभिरूपा' [आभिमुख्येन सदाऽवस्थितानि] इंसचक्रवाकसारसादीनि जलान्तर्गतानि वा करिमकरादीनि यस्यां सा अभिरूपेति, तथा 'प्रतिरूपा' स्वच्छत्वात्सर्वत्र प्रतिबिम्बानि समुपलभ्यन्ते। 'तीसे णं पुक्खरिणीए' तस्याब पुष्करिण्या + “सीयम्ते-बध्यन्ते यस्मिन्नसौ सेयः-कर्दमः, स [बहु]र्यस्यां सा बहुसेया " इति हर्ष । ॥१ ॥ Jain Education inten For Privats & Personal Use Oh wEjainelibrary.org Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्तत्र तत्र देशे देशे-एकैकप्रदेशे, नास्ति स प्रदेशः पुष्करिण्या: यत्र तानि पुण्डरीकाणि न सन्ति । तत्र तत्र देशे देशे बहुनि पद्मवरपुण्डरीकाणि 'बुइय 'त्ति उक्तानि-प्रतिपादितानि विद्यन्त इत्यर्थः । आनुपूर्व्या' विशिष्टरचनया स्थितानि । तथोच्छितानि-जलोपरि व्यवस्थितानि तथा 'रुचिराणि' दीप्तिमन्ति तथा शोमनवर्णगन्धरसस्पर्शवन्ति । अमिरूपाणि इत्यादिपूर्ववत् । तस्याश्च पुष्करिण्याः सर्वतः पद्मावृतायाः ( सर्वतः पनवेष्टितायाः) बहुमध्यदेशभागे एक महत्पवरपुण्डरीकमुक्तमानुपूव्र्येण व्यवस्थितमुच्छ्रुितं, रुचिरं वर्णगन्धरसस्पर्शोऽपेतं । अभिरूपं प्रतिरूपं प्रासादीयं दर्शनीयं अतीव IN शोभायमानं पद्मवरपुण्डरीकं विद्यते ॥१॥ अह पुरिसे पुरथिमाओ दिसाओ आगम्म तं पुक्खरिणी, तीसे पुक्खरिणीए तीरे विच्चा पासति । तं महं एगं पउमवरपुंडरीयं, अणुपुविहितं ऊसियं जाव पडिरूवं। तते णं से पुरिसे एवं वयासीअहमंसि पुरिसे खेयन्ने कुसले पंडिते वियत्ते+मेहावी अबाले मग्गत्थे मग्गविऊ मग्गस्स गति- | परकमन्नू , अहमेयं पउमवरपुंडरीयं उन्निक्खिस्सामि त्ति कटु इति वुच्चा से पुरिसे अभिक्कमेति तं | पुक्खरिणी, जावं जावं च णं अभिक्कमेइ तावं तावं च णं महंते उदए महंते सेए, पहीणे तीरं, I + यद्यपि - वियत्ते' इत्येतस्यैवार्थों ' व्यक्त' इति लिखितस्तथापि मूले 'मेयने' इति पाठः सर्वास्वपि दीपिकाप्रतिषु । Jain Education interna For PrivatePersonal Use Only 9 leinabrary.org Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग दीपिकान्वितम् । १/२ श्रुतMI स्कंधे आद्येऽध्ययने आधपुरुषद्वयस्वरूपम् ॥२॥ अपत्ते पउमवरपुंडरीयं, नो हवाए नो पाराए, अंतरा पुक्खरिणीए सेयंसि वि[नि]सन्ने, पढमे पुरिसजाए (सू० २)॥ अथानन्तरमेवम्भूतपुष्करिण्याः पूर्वस्या दिशः कश्चिदेकः पुरुषः समागत्य तां पुष्करिणी, तस्याश्च (पुष्करिण्याः) 'तीरे' तटे स्थित्वा तदेतत् (पश्यति, ततस्तत्) पद्म पूर्वोक्तविशेषणकलापोपेतं स पुरुषः, पूर्वदिग्भागव्यस्थित ' एवं ' | वक्ष्यमाणनीत्या 'वदेत् ' ब्रूयात्-'अहमंसि'त्ति अहमस्मि पुरुषः, किम्भूतः ? ( 'खेदज्ञो' मनोऽभिलषितकार्यकरणकालभाविपरिश्रमनः) 'कुशल'श्चतुरो-निपुणः, तथा 'पण्डितः' धर्मज्ञो देशकालक्षेत्रज्ञः । 'व्यक्तो' बालभावानिष्क्रान्त:परिणतधुद्धिः ' मेधावी' प्लवनोत्प्लवनयोरुपायज्ञ तथा 'अबालो' मध्यमवयाः षोडशवर्षोपरिवर्ती ' मार्गस्थः' सद्धिराचीर्णमार्गव्यवस्थितो मार्गझस्तथा मार्गस्य या 'गतिर्गमनं वर्त्तते, तया यत्पराक्रमणं-विवक्षितदेशगमनं, तज्जानातीति पराक्रमझो, यदिवा 'पराक्रमः' सामर्थ्य तज्ज्ञोऽहमात्मज्ञ इत्यर्थः, तदेवम्भूतोऽहमेतत्पद्मवरपुण्डरीकं पुष्करिणीमध्यदेशव्यवस्थितमुत्क्षेप्यामि-निष्कासयिष्यामीति कृत्वेहागतः, इत्युक्त्वाऽसौ पुरुषस्ता पुष्करिणीमभिमुखं कामे-त्तदभिमुखं गच्छेत् । याव[द्याव]चासौ तदवतरणाभिप्रायेणाभिमुख कामेत्ताव चाव]च 'ण' मिति वाक्यालङ्कारे, तस्याः पुष्करिण्या महत्यगाधे जले कईमे च मग्नः । तत्राऽऽकण्ठं निमग्नत्वादत्याऽकुलीभूतः 'प्रहीण'स्तीरादात्मानं उद्धर्तुमसमर्थो विवक्षितपावरपुण्ड + मजनोन्मजनयोविधिज्ञः । For P Jan Education Tvw.jainelibrary.org & Personal use only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रीकमप्राप्तस्तस्माच्च तीरादपि प्रभ्रष्टः, तीरपद्मयोरन्तराल एवावतिष्ठति । यत एवं अतो 'नो हव्वाए' नार्वाक्तटवर्त्यसौ भवति 'नो पाराए 'त्ति न पारगमनाय समर्थो भवति । एवमसावुभयप्रभ्रष्टोऽजनि, इत्ययं प्रथमः पुरुषजातः ॥ २ ॥ अथ प्रथमपुरुषानन्तरं द्वितीयपुरुषस्वरूपमुच्यते___ अहावरे दोच्चे पुरिसजाए-अह पुरिसे दक्खिणाओ दिसाओ आगम्म तं पुक्खरिणी, तीसे | पुक्खरिणीए तीरे ठिच्चा पासति तं महं एगं पउमवरपुंडरीयं, अणुपुविट्टितं जाव पडिरूवं, तं च | एत्थं एगं पुरिसजातं पासति पहीणतीरं अपत्तपउमवरपुंडरीयं नो हवाए नो पाराए अंतरा पुक्खरिणीए सेयंसि निसन्नं । तए णं से पुरिसे तं पुरिसं एवं वयासी-अहो!! णं इमे पुरिसे अखेयन्ने अकुसले अपंडिए अवियत्ते अमेहावी बाले णो मग्गत्थे णो मग्गविऊ णो मग्गस्स गतिपरक्कमन्नू , जन्नं एस पुरिसे [ मन्ने]-अहं गं खेयन्ने अहं कुसले जाव पउमवरपुंडरीयं उन्निक्खिस्सामि, णो[य] खल एयं पउमवरपंडरीयं एवं उन्निक्खेयत्वं, जहाणं एस पुरिसे मन्ने, अहमंसि पुरिसे खेयन्ने कुसले पंडिए वियत्ते मेहावी अबाले मग्गत्थे मग्गविऊ मग्गस्स गतिपरक्कमन्नू , अहमेयं पउमवरपुंडरीयं उन्निक्खिस्सामि[ त्ति कटु] इति वुच्चा से पुरिसे अभिक्कमे तं पुक्खरिणी, Jain Education Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दीपिका न्वितम् । |२ श्रुत| स्कन्धे | आयेऽश्ययने तृतीय पुरुष निरूपणम् । सूयगडाङ्ग, जावं जावं चणं अभिक्कमेइ तावंतावं च णं महंते उदए महंते सेए पहीणे तीरं अपत्ते पउमवपुंडरीयं णो हवाए णो पाराए [ अंतरा पुक्खरिणीए ] सेयांस वि[नि]सन्ने, दोच्चे पुरिसजाए (सू०३)॥ व्याख्या-अथ (अपरो द्वितीयः) कश्चित्पुरुषो दक्षिणदिग्भागादागत्य तां पुष्करिणी, तस्याश्च पुष्करिण्यास्तीरे स्थित्वा तत्रस्थश्च पश्यति महदेकं पद्मवरपुण्डरीकमानुपूर्येण व्यवस्थितं प्रासादीयं यावत्प्रतिरूपं, ततस्तीरे व्यवस्थितः, तं च पूर्वव्यवस्थितं चैकं पुरुष पश्यति, किम्भूतं ? तीरात्परिभ्रष्टं अप्राप्त[पन] वरपुण्डरीकसुभयभ्रष्टं अन्तराल एवावसीदन्तं दृष्ट्वा द्वितीयः पुरुषस्तं प्राक्तनं पुरुषमेवं वदेत्-अहो ! योऽसौ कर्दमनिमग्नः पुरुषः सोऽखेदज्ञोऽकुशलोऽपण्डितोऽमेधावी बालो न मार्गस्थो नो माग्गज्ञो नो मार्गस्य गतिपराक्रमशः, अकुशलत्वादिके कारणमाह-यद्यस्मादेष पुरुष एतत्कृतवान् , तद्यथा-अहं खेदजः कुशल इत्यादि भणित्वा पनवरपुण्डरीकमुत्क्षेप्स्यामीत्येवं प्रतिज्ञातवान् । न चैतत्पनवरपुण्डरीकमेवमुत्क्षेप्तव्यं, यथाऽनेनोत्क्षेप्तुमारब्धं, ततोऽहमेवास्योत्क्षेपणे कुशल इति दर्शयितुमाह-'अहमंसी 'त्यादि, अहं खेदवः कुशलः पण्डितो मेधावी, अहमेतत्पमवरपुण्डरीकमुद्धरिष्यामि, इत्युक्त्वाऽसावपि द्वितीयः पुरुषः पुष्करिणीममिमुखं व्रजेत् , तावताऽगाधे पानीये कईमे च मग्नः तीराद्भष्टो द्वितीयतीरं च न प्राप्तः, उभयभ्रष्टोऽभूत् , पद्यमपि नोः अन्तराल एव व्यवस्थिता, इत्यादि । एवं द्वितीयोऽपि पुरुषः ॥३॥ अहावरे तच्चे पुरिसजाए-अह पुरिसे पच्चस्थिमाओ दिसाओ आगम्म तं पुक्खरिणी, तीसे पण्डितो मातमारब्धं, ततोऽहमेवास्योपण्डरीकाक्षेपस्यामीत्येवं प्राप्तव्ययस्मादेष पुरुष Al ॥ ॥ 3 Jain Education inten अ w.jainelibrary.org Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुक्खरिणीए तीरे ठिच्चा पासति तं महं एगं पउमवरपुंडरीयं अणुपुचिट्टितं जाव पडिरूवं, ते तत्थ । | दोन्नि पुरिसजाते पासति पहीणे तीरं अपत्ते परमवरपुंडरीयं, णो हवाए णो पाराए जाव सेयंसि | | निसन्ने । तते णं से पुरिसे एवं वदासी-अहो!!णं इमे पुरिसा अखेयन्ना अकुसला अपंडिया अवि|| यत्ता अमेहावी बाला णो मग्गत्था णो मग्गविऊ णो मग्गस्स गतिपरक्कमन्नू । जन्नं एते पुरिसा | || एवं मन्ने-अम्हे एतं पउमवरपुंडरीयं उन्निक्खिस्सामो, नो [य] खलु एयं पउमवरपुंडरीयं एवं N| उन्निक्खेतवं, जहाणं एए पुरिसा मन्ने, अहमसि पुरिसे खेयन्ने कुसले पंडिए वियत्ते मेहावी अबाले | मग्गत्थे मग्गविऊ मग्गस्स गतिपरक्कमन्नू, अहमेयं पउमवरपुंडरीयं उन्निक्खेस्सामि [त्ति कटु] इति वुच्चा से पुरिसे अभिक्कमे तं पुक्खरिणिं, जावं जावं च णं अभिक्कमे तावं तावं च णं महंते उदए | महंते सेए जाव अंतरा पुक्खरिणीए सेयंसि वि[नि]सन्ने, तच्चे पुरिसजाए (सू० ४)॥ व्याख्या-अथ तृतीयः पुरुषः पश्चिमदिग्विभागादागत्य पुष्करिण्यास्तीरे स्थित्वा प्रथमपुरुषद्वितयवत् पूर्वोक्तं वचनप्रपञ्चं कथयित्वा कमलोद्धाराय प्रविष्टः । कमलमद्धर्तुमसमर्थ अन्तराल एव कर्दमे ममा, इति तृतीयः पुरुषः ॥ ४ ॥ V Jain Education Interna inerary org Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अयगडाङ्ग सत्र दीपिकान्वितम् । ॥४॥ अथ चतुर्थः पुरुषः २ श्रुतअहावरे चउत्थे पुरिसजाए-[अह पुरिसे ] उत्तराओ दिसाओ आगम्म तं पुक्खरिणी, INT स्कन्धे तीसे पुक्खरिणीए तीरे ठिच्चा पासति [ तं महं ] एगं पउमवरपुंडरीयं [ अणुपुबिट्टियं ] जाव आयेपडिरूवं, ते तत्थ तिन्नि पुरिसजाते पासति पहीणे तीरं अपत्ते जाव सेयंसि विनि]सन्ने। तते गं ध्ययने पचमसे पुरिसे एवं वदासी-अहो!! णं इमे पुरिसा अखेयन्ना जाव णो मग्गस्स गतिपरकमन्न , जन्नं NI पुरुषएते पुरिसा एवं मन्ने-अम्हे एतं पउमवरपुंडरीयं उन्निक्खिस्सामो, णो[य] खलु एयं पउमवर- | वर्णनम् । पुंडरीयं[एवं] उन्निक्खेयवं, जहा णं एते पुरिसा मन्ने, अहमसि पुरिसे खेयन्ने जाव मग्गस्स गतिपरकमन्नू, अहमेयं पउभवरपुंडरीयं उन्निक्खिस्सामि[त्ति कट्ठ ] इति वुच्चा से पुरिसे तं पुक्खरिणी अभिक्कमेइ, [जावं ] जावं च णं अभिक्कमे तावं तावं च णं महंते उदए महंते सेए | जाव वि[नि]सन्ने, चउत्थे पुरिसजाए ॥ (सू० ५) व्याख्या-अथ चतुर्थः पुरुष उत्तराया दिशः समागत्य तत्पुरुषत्रिकं दृष्ट्वा तथैवोक्त्वा तथैव पद्मोदरणाय प्रविष्टा, पूर्वपुरुषत्रिकवत् पङ्के निमनः, एवं चत्वारोऽपि पुरुषाश्चतुर्पु दिक्षु निमग्नाः ॥ ५॥ ॥४॥ Jain Education ww.jainelibrary.org Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ साम्प्रतं पश्चमं पुरुषं तद्विलक्षणमधिकृत्याह अह भिक्खू लूहे तीरट्ठी खेयन्ने जाव [गति]परक्कमन्नू अन्नतरीओ दिसाओ वा अणुदिसाओ वा आगम्म तं पुक्खरिणी, तीसे पुक्खरिणीए तीरे ठिच्चा पासति तं महं एगं पउमवरपुंडरीयं INT जाव पडिरूवं, ते तत्थ चत्तारि पुरिसजाए पासति पहीणे तीरं अपत्ते [पउमवरपुंडरीयं नो हव्वाए नो पाराए ] अंतरा पुस्खरिणीए जाव (?) सेयंसि वि[नि]सन्ने । तते णं से भिक्खू एवं वदासि-अहो !! णं इमे पुरिसा अखेयन्ना जाव नो मग्गस्स गतिपरक्कमन्नू , जन्नं एते पुरिसा एवं मन्ने-अम्हे [एयं] पउमवरपुंडरीयं उन्निक्खिस्सामो, णो[य]खलु एयं पउमवरपुंडरीयं एवं उन्निक्खेतवं, जहा णं एते पुरिसा [मन्ने] । अहमंसि भिक्खू लूहे तीरट्ठी खेयन्ने जाव मग्गस्स गतिपरक्कमन्नू , अहमेयं पउमवरपुंडरीयं उन्निक्खिस्सामि त्ति कडु इति वुच्चा से भिक्खू णो अभिकमे तं पुक्खरिणी, तीसे पुक्खरिणीए तीरे ठिच्चा सदं कुज्जा 'उप्पयाहि खलु भो पउमवरपुंडरीया ! उप्पयाहि' अह से उप्पतिते पउमवरपुंडरीए (सू०६)॥ ainerary.org Jan Education remato Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रयगडाज घ दीपिकान्वितम् । २ श्रुतस्कन्धे आधेडध्ययने दार्शन्तिकयोजना व्याख्या-अथ चतुर्थपुरुषादनन्तरं पञ्चमः पुरुषस्तस्यानि विशेषणानि-'भिक्षुः' पचनपाचनादिसावद्यानुष्ठानरहितो निर्दोषाहारभोजी रागद्वेषरहितः, अत एव 'लूहे' रूक्षा, संसाराब्धेस्तीरार्थी तथा खेदज्ञः, पूर्वव्याख्यानान्येवामूनि विशेषणानि, स च पश्चमः पुरुषो भिक्षुः, अन्यतरस्या दिशोऽनुदिशो वाऽऽगत्य तां पुष्करिणी, तस्याश्च तीरे स्थित्वा समन्ता. दवलोकयन् बहुमध्यदेशमागे तन्महदेकं पावरपुण्डरीकं पश्यति, ताँश्च चतुरः पुरुषान् पश्यति । किम्भूतान् ? त्यक्ततीरान् अप्राप्तपञ्चवरपुण्डरीकान् पङ्कजलावमग्नान्, पुनस्तीरमप्यागन्तुमशक्कान् दृष्ट्वा ततोऽसौ भिक्षुरेवमिति वक्ष्यमाणनीत्या वदेत् । तद्यथा-अहो !! इमे चत्वारः पुरुषा अखेदना यावत्रो मार्गस्य गतिपराक्रमज्ञाः । यथैते पुरुषाः एवं ज्ञातवन्तो, यथा-वयं पुण्डरीकमुत्क्षेप्स्याम:-उद्धरिष्यामः । न च तत् खलु पुण्डरीकमेवमनेन प्रकारेण उत्क्षेप्तव्यं, यथैते मन्यन्ते-वयं हेलयैवो. क्षेप्यामः, न तथोद्धारोऽस्य भविष्यति । परं अहमस्मि रूक्षो भिक्षुर्यावद्गतिपराक्रमज्ञः। एतद्गुणविशिष्टोऽहमेतत्पुण्डरीक'मुत्क्षेप्यामि' उत्खनिष्यामि-समुद्धरिष्यामि, 'एवमुक्त्वाऽसौ' नाभिकामेत्-तां पुष्करिणीं न प्रविशेत , तत्रस्थ एव | तस्यास्तीरे स्थित्वा तथाविधं शन्दं कुर्यात्तद्यथा-'ऊर्द्ध उत्पत', उत्पत खलु वाक्यालङ्कारे 'हे पावरपुण्डरीक ! तस्याः पुष्करिण्या मध्यदेशात् खमुत्पत (ख)मुत्पत' इत्येवं तच्छन्दश्रवणादनन्तरं तदुत्पतितमिति ॥ ५॥ एतदृष्टान्तमथ दार्शन्तिके योजयति, अथ श्रीमहावीरः स्वशिष्यानाहकिहिए नाए समणाउसो!, अढे पुण से जाणितत्वे भवति । भंते ति समणं भगवं महावीरं ॥५॥ For Private & Personal use only MywEjainelibrary.org Jain Education inte Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निग्गंथा[य] निग्गंथीओ [य] वंदति नमसंति, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-किट्टिते नाए समणाउसो!, अटुं पुण से ण जाणामो। समणाउसो!त्ति समणे भगवं महावीरे ते य बहवे निग्गंथे य निग्गंधीओ य आमंतेत्ता एवं वदासी-हंत समणाउसो ! ते आतिक्खामि विभावेमि किमि पवेदेमि सअटुं सहेउयं सनिमित्तं भुजो भुजो उवदंसौम से बेमि (सू०७)॥ व्याख्या-कीर्तिते' कथिते मयाऽस्मिन् ज्ञाते हे श्रमणा! आयुष्मन्तोऽर्थः पुनरस्य ज्ञातव्यो भवति भवद्भिः। एतदुक्तं भवति-नास्योदाहरणस्य परमार्थ यूयं जानीथ, इत्येवमुक्त भगवता ते बहवो निर्ग्रन्था निर्ग्रन्ध्यश्च तं श्रमण मगवन्तं महावीर ते निर्ग्रन्थादयो वन्दन्ते (कायेन), नमस्यन्ति-स्तुवन्ति । वन्दित्वा [नमस्यित्वा] चैवं वक्ष्यमाणं वदेयु:-'कीर्तितमुदाहरणं भगवता, अर्थ पुनरस्य सम्यग्न जानीम, इत्येवं पृष्टो भगवान् श्रमणो महावीरस्तान्निग्रन्थादीनेवं वदेव-[हते]ति सम्प्रेषणे, हे श्रमणा आयुष्मन्तो ! यद्भवद्भिरहं पृष्टस्तत्सोपपत्तिकमाख्यामि-भवतां ['विमावयामि'] आविर्भावयामि- प्रकटार्थ करोमि 'कीर्तयामि' पर्यायकथनद्वारेण तथा 'पवेदेमि'त्ति प्रवेदयामि-प्रकर्षेण हेतु दृष्टान्तैश्चित्तसन्ततावारोपयामि । कथं प्रतिपादयामीति दर्शयति-सार्थ-पुष्करिणीदृष्टान्तं सहेतुकं प्रतिपादयिष्यामि, यथा ते पुरुषा अप्राप्तप्रार्थितार्थाः पुष्करिणीकर्दमे दुरुत्वारे निमन्ना एवं वक्ष्यमाणास्तीर्थिका अपारगाः संसारसागरस्य, तत्रैव निमज्जन्तीत्येवरूपोऽर्थः सदृष्टान्तः प्रदर्शयिष्यते । सनिमित्तं-सकारणं दृष्टान्तार्थ भूयो भूयोऽपरैरपरैर्हेतु दृष्टान्तरुपदर्शयामि । सोऽहं साम्प्रतमेव ब्रवीमि, शृणुत यूयमिति । Jain Education Internal For PrivatePersonal Use Only W inrar og Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुयगडा 110 H दीपिकान्वितम् ।। लोयं च खलु मए अप्पाहठ समणाउसो ! सा पुक्खारणी बुइया। कम्मं च खलु मए || २ श्रुतअप्पाहटु समणाउसो ! से उदए बुइए । कामभोगे य खलु मए अप्पाहटु समणाउसो! से स्कन्धे आद्येऽ. स्रोए बुइए । जणजाणवयं च खलु मए अप्पाहहु समणाउसो ! ते बहवे पउमवरपुंडरीया बुइता।। ध्ययने रायाणं च खल्लु मए अप्पाहटु समणाउसो ! से एगे महं पउमवरपुंडरीए बुइए । अन्नउत्थिया | पुरुष. य खलु मए अप्पाहटु समणाउसो ! ते चत्तारि पुरिसजाया बुइता । धम्मं च खलु मए अप्पा पश्नकस्यह९ समणाउसो! [ से भिक्खू बुइए । धम्मतित्थं च खलु मए अप्पाहद्दु समणाउसो ! से तीरे | दार्शन्तिबुइए । धम्मकहं च खलु मए अप्पाहटु समणाउसो ! से सद्दे बुइए । निवाणं च खलु मए | केऽव अप्पाहटु समणाउसो ! से उप्पाते बुइए । एवमेयं च खलु मए अप्पाहठ समणाउसो! से एव तारणम्। मेयं बुइयं (सू०८)॥ व्याख्या--लोकमिति मनुष्यक्षेत्र, [च शब्दः, समुच्चये] खलुरिति वाक्यालङ्कारे, मया लोको मनुष्याऽऽधारस्तमात्मन्याहृत्य-व्यवस्थाप्य ' अपाहृत्य [वा' आत्मना वा मयाऽऽहत्य] न परोपदेशतः, सा पुष्करिणी पद्माधारभूतोक्ता । तथा कर्म चाष्टप्रकारं, यद्वलेन पुरुषपुण्डरीकाणि भवन्ति, तदुदकं दृष्टान्तत्वेन उपन्यस्त । कामभोगाश्च मया कईमोऽभिहितः, | ॥६ ॥ For Private & Personal Use Oy w.jainalibrary.org Jan Euro119 I Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यथा महति पके निमग्नो दुःखेनात्मानमुद्धरत्येवं विषयेष्वप्यासक्तो नात्मानमुद्धर्तुमलमित्येतत् कदमविषययोः साम्यमिति । 'जनाः' सामान्यलोकाः 'जानपदा' विशिष्टार्यदेशोत्पन्नाः गृह्यन्ते, ताँश्च समाश्रित्य-मया दार्शन्तिकत्वेनाङ्गीकृत्य तानि बहूनि पावरपुण्डरीकाणि दृष्टान्तत्वेनाभिहितानि । राजानमात्मन्याहृत्य तदेकं पद्मवरपुण्डरीकं दृष्टान्तत्वेनाभिहितम् । तथाऽन्यतीथिकान् समाश्रित्य ते चत्वारः पुरुषजाता अभिहितास्तेषां राजपुण्डरीकोद्धरणसामर्थ्यवैकल्यात् । तथा धर्म च खल्वास्मन्याहृत्य श्रमणायुष्मन् ! स भिक्षुः रूक्षवृत्तिरभिहितः, तस्यैव चक्रवर्त्यादिराजपद्मवरपुण्डरीकस्योद्धरणसामर्थ्य सद्भावात् । धर्मतीर्थं च खल्वाश्रित्य मया तत्तीरमुक्तम् । तथा सद्धर्मदेशनां चाश्रित्य मया स भिक्षोः सम्बन्धी शब्दोऽभिहितः। तथा 'निर्वाणं' मोक्षपदमशेषकर्मक्षयरूपमीपत्प्राग्भाराख्यभूमागोपर्यवस्थितं क्षेत्रखण्डं चात्मन्याहृत्य स पावरपुण्डरीकस्यो. त्पातोऽमिहितः। ' एवं ' पूर्वोक्तप्रकारेण [ए]तल्लोकादिकं च खल्वात्मन्याहृत्य-आश्रित्य मया श्रमणायुष्मन् ! 'से' एतत्पुष्करिण्यादिकं दृष्टान्तस्वेन किश्चित्साधादेवमुक्तमिति ॥ ८॥ एतावता सामान्येन दृष्टान्तदान्तिकयोजना कृता, अथ विशेषेण प्रधानभृतराजदार्शन्तिकं तदुद्धरणार्थत्वात सर्वप्रयासस्येति दर्शयितुमाह इह खलु पाईणं वा पडीणं वा उदीणं वा दाहिणं वा संतेगतिया मणुस्सा भवति । अणुपुवेणं लो[ग]गतं (१) उववन्ना, तं जहा-आरिया वेगे अणारिया वेगे उच्चागोया वेगे णीयागोया | वेगे कायमंता वेगे [र]हस्समंता वेगे सुवण्णा वेगे दुवन्ना वेगे सुरूवा वेगे दुरूवा वेगे, तेसिं च Jain Education For PrivatePersonal Use Only wwwEjainelibrary.org का Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिकान्वितम् ॥ ७ ॥ Jain Education Int णं मणुयाणं एगे राया भवति । व्याख्या -' इह ' मनुष्यलोके, खलुर्वाक्यालङ्कारे, प्राच्यां प्रतीच्यामुदीच्यामपाच्यामन्यतरस्यां वा दिशि ' सन्ति ' विद्यन्ते 'एके' केचन तथाविधा मनुष्या आनुपूर्व्येण इमं लोकमाश्रित्योत्पन्ना भवन्ति । तानेव दर्शयति, तद्यथा-आार्या अनार्यास्तथा एके उच्चैर्गोत्रीया इक्ष्वाकुकुलप्रमुखाः, [एके] नीचैर्गोत्रीया, एके + दीर्घकायाः, एके ह्रस्वकायाः, एके सुवर्णाः, एके दुर्वर्णाः कृष्णरूक्षादिवर्णाः, एके 'सुरूपा:' सुविभक्तचारुदेहाः, एके 'दुरूपाः' बीभत्सदेहाः, एतेषां मध्ये कश्चिदेवैकस्तथाविधकर्मोदयाद्राजा भवति । स कीदृश: ? महया हिमवंतमलयमंदरमहिंदसारे अचंतविसुद्धराय कुलवं सप्पसूए निरंतररायलक्खणविराइयंगमंगे बहुजणबहुमाणपूइते सवगुणसमिद्धे खत्तिए मुदिते मुद्धाभिसित्ते माउपिउ सुजाए दपिए सीमंकरे सीमंधरे खेमंकरे खेमंधरे मणुस्सिदे जणवयपिया जणवयपुरोहिए सेउकरे केउकरे नरपवरे पुरिसपवरे पुरिससीहे पुरिसआसीविसे पुरिसवरपुंडरीए पुरिसवरगंधहत्थी अड्डे दित्ते वित्ते विच्छिन्नविपुलभवणसयणासणजाणवाहणाइन्ने बहुजणबहुधणबहुजावर + " कायो' महाकायः प्रांशुत्वं तद्विद्यते येषां ते कायवन्तः " इति बृहद्वृत्तौ । द्वितीये श्रु० पुण्डरीको पमराज वर्णनम् । ॥७॥ Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आओगप्पओगसंपउत्ते विच्छडितपउरभत्तपाणे बहुदासदासीगोमहिसगवेलगप्पभूए [ पडिपुण्ण| कोसकोट्ठागाराउहागारे बलवं दुब्बल्लपच्चामित्ते ओहयकंटयं निहयकंटयं मलियकंटयं उद्धियकंटयं | अकंटयं ओहयसत्तू नि]हयसत्तू मलियसत्तू उद्धियसत्तू निजियसत्तू पराइयसत्तू ववगयदुन्भिक्खमारिभयविप्पमुकं, रायवण्णओ जहा उववाईए, जाव पसंतडिंबडमरं रजं पसाहेमाणे विहरति । तस्स णं रन्नो परिसा भवति । एतद्व्याख्यान औपपातिकोपाङ्गात् ज्ञातव्यं, यावत्ते राजान उपशान्तडिम्बडमरं* 'रलं "ति राज्यं प्रसाधयन्ति । तस्य चैवंविधगुणसम्पदुपेतस्य राज्ञ एवंविधा पर्षद्भवति । | उग्गा उग्गपुत्ता, भोगा भोगपुत्ता, इक्खागा इक्खागपुत्ता, नाया नायपुत्ता, कोरबा कोरव| पुत्ता, भट्टा भट्टपुत्ता, माहणा माहणपुत्ता, लेच्छई लेच्छइपुत्ता, पसत्थारो पसत्थारपुत्ता, सेणावई सेणावईपुत्ता, तेसिं च णं एगतीए सड्डीभवति कामं, तं समणा वा माहणा वा संपहारिंसु गमणाए । * " तत्र 'डिम्बः' परानीकथगालिको 'डमरं' स्वराष्ट्रक्षोभः, पर्यायौ वैतावत्यादरख्यापनार्थमुपात्तौ।" इनि ६० । Jain Education intern For PrivatePersonal Use Only . w.jainelibrary.org Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्रं दीपिका द्वितीयेश्रु० प्रथम पुरुषकल्पचारवाकमतम् । न्वितम् ।। ॥८॥ लिप्तया श्रमणा ब्रामणसिद्धन प्रज्ञापयितारो बानीत भयात्रातारो वा तत्थ अन्नतरेणं धम्मेणं पन्नत्तारो भवंति, वयं इमेणं धम्मेणं पन्नवइस्सामो, से एवमायाणह भयंतारो जहा मए एस धम्मे सुअक्खाए सुपन्नचे भवति । तं जहा___व्याख्या-उग्रा उग्रपुत्राः, एवं भोगपुत्रादयोऽपि द्रष्टव्याः, शेषं सुगम, यावत्सेनापतिपुत्रा इति + । तेषां मध्ये कश्चिदेवैकः 'श्रद्धावान्' धर्मलिप्सुर्भवति । काममित्यवधृतार्थे । अवधृतमेतद्यथाऽयं धर्मश्रद्धालुः, अवधार्य च तं धर्मलिप्सुतया श्रमणा ब्राह्मणा वा 'सम्प्रधारितवन्तः' समालोचितवन्तो धर्मप्रतिबोधनिमित्तं तदन्तिकगमनाय, तत्र चान्यतरेण धर्मेण स्वसमयप्रसिद्धेन प्रज्ञापयितारो वयमित्येवं सम्प्रधार्य राजान्तिकं गत्वा एवमूचुस्तद्यथा-एतद्यथाऽहं कथयाम्यवमिति वक्ष्यमाणनीत्या 'भवन्तो' यूयं जानीत भयात्रातारो वा 'यथा' येन प्रकारेण मयैष धर्मः स्वाख्यात: सुप्रज्ञप्तो भवतीत्येवं तीर्थिकः स्वदर्शनानुरञ्जितोऽन्यस्यापि स्वाभिप्रायेण राजादेरुपदेशं ददाति । तत्राद्यपुरुषजातस्तजीवतच्छरीरवादी राजानमुद्दिश्यैवं धर्मदेशनां चक्रे, तद्यथा____ उढे पादतला अहे केसग्गमत्थया तिरियं तयपरियंते जीवे, एस आयपजवे कसिणे, एस जीवे जीवति, एस मए णो जीवति, सरीरे धरमाणे धरति विणटुम्मि य णो धरति । एयंत + नवरं-'लेच्छा 'त्ति लिप्सुकः, स च वणिगादिस्तथा 'प्रशास्तारो' बुद्ध्युपजीविनो मन्त्रिपभृतयः । इति वृहद्वृत्तौ। ॥८॥ Tww.janeiorary.org Jan Education Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जीवितं भवति। आदहणाए परेहिं निजति.अगणिज्झामिए सरीरे कवोतवण्णाणि अट्रीणि भवंति। ___व्याख्या-'ऊर्ध्व' उपरि पादतलादधश्च केशाग्रमस्तकातिर्यक्त्वपर्यन्तो जीव, एतावता यदेवतच्छरीरं स एव जीवो, नैतस्माच्छरीरावयतिरिक्तः कश्चिदात्माख्यः पदार्थोऽस्तीति यदेतच्छरीरं स एवात्मा । [अयं काय एव] तस्यात्मनः पर्ययः 'कृत्स्नः' सम्पूर्णः 'पर्यायो'ऽवस्थाविशेषः, यावत्कालमिदं शरीरं जीवति तावत्कालं जीवोऽपि जीवति, शरीरे मृते जीवोऽपि म्रियते । यावदिदं शरीरं पञ्चभूतात्मकं अव्ययं * धरति तावदेव जीवोऽपीति, तस्मिंश्च विनष्टे जीवस्यापि विनाशः। [तदेवं यावदेतच्छरीरं वातपित्तश्लेष्माधारं पूर्वस्वभावादप्रच्युतं तावदेव जीवस्य तज्जीवितं भवति, तस्मिंश्च विनष्टे तदात्माजीवोऽपि विनष्ट इति कृत्वा आदहनाय *मशानादौ नीयते, तस्मिंश्च शरीरे अग्निना ध्यामि[ध्मापि]ते कपोतवर्णान्यस्थीनि केवलमुपलभ्यन्ते, परमस्थिव्यतिरिक्तः कश्चिदात्माख्यः पदार्थो न दृश्यते, येन तदस्तित्वप्रतीतिरुपजायते, तथा आसंदीपंचमा पुरिसा गामं पञ्चागच्छति, एवं असंते असंविजमाणे, जोर्स तं असंते असं विजमाणे तेसिं तं सुअक्खायं भवति-अन्नो भवति जीवो अन्नं सरीरं, तम्हा ते एवं नो विप्पडिवेदेति व्याख्या-तद्वान्धवा जघन्यतोऽपि चत्वार:-'आसन्दी' मञ्चका, स पञ्चमो येषां ते आसन्दीपश्चमाः पुरुषास्तं कायं अग्निना च्यामयित्वा पुनः स्वं ग्राम प्रत्यागच्छन्ति । यदि पुनस्तत्रात्मापि शरीराद्विनः स्यात्ततः शरीरानिर्गच्छन् . * अभङ्ग-मखण्डं। For Private & Personal de Daly Jain Education inte Tww.jainalibrary.org Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिकान्वितम् 1 ॥ ९ ॥ Jain Education It दृश्येत, न च दृश्यते, तस्मात्तजीव तच्छरीरमिति स्थितम् । तदेवं येषां मते असौ जीवोऽसत् - अविद्यमानः, तत्र तिष्ठन् गच्छन् नोपलभ्यते, येषामयं पक्षस्तेषां तत्स्वाख्यातं भवति, येषां पुनरन्यो जीवोऽन्यच्छरीरं तद्दृथा, ते तु अन्धरूढ्या प्रवर्त्तमाना एवमिति वक्ष्यमाणं नैव विप्रतिवेदयन्ति न जानन्ति तदेवाह - यद्ययमात्मा शरीराद्भिन्नस्तर्हि किं स्वरूपः १ कियत्प्रमाणो वा ? तद्यथा अयमाउसो ! आता दीहेति वा इस्सेति वा परिमंडलात वा वट्टेति वा तंसेति वा चउरंसोत वा आयतेति वा छलंसिएति वा अहंसेति वा । किण्हेति वा नीलेति वा लोहिएति वा हालिदेति वासुकिलेति वा । सुब्भिगंधेइ वा दुब्भिगंधेइ वा । तित्ते वा कडुएति वा कसाइएति वा अंबिलेति वा महुरेति वा लवणेति वा । कक्खडेति वा मउएति वा गुरुएति वा लहुएति वा सीति वा उसिति वा निद्धेति वा लुक्खेति वा ? । एवं असए असंविजामाणे जेसिं तं सुअक्खायं भवति - अन्नो जीवो अन्नं सरीरं, तम्हा ते नो एवं उबलब्भंति । व्याख्या - ( आयुष्मन् 1 ) यद्ययमात्मा शरीराद्भिन्नस्तर्हि किं दीर्घो वा इस्वो वाऽस्ति ? तथा अयमात्मा कियत्प्रमाणो दीर्घो ह्रस्वो वाऽष्ठश्यामाकतन्दुलपरिमाणो वा, १ किं परिमण्डलः १ किंवा वृत्तः १ त्र्यस्रः १ चतुरस्रः १ पडशो वा ( अष्टांशो द्वितीये श्र● आत्मभाव निरूपणे नैकेदृष्टा न्साचार वाकाया नाम् । ॥ ९ ॥ Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वा)। तथा वर्णतः किं किण्हेति का नीलेति वा लोहिएति वा हालिद्देति वा सुकिलेति वा । तथा गन्धतः किं सुब्भिगंधेह वा | दुम्मिगंधेह वा। तथा रसतः किं तिनेह वा कडुएति वा कसाइएति वा अंबिलेह वा महुरेइ वा लवणेइ वा । (तथा स्पर्शतः) किं कक्खडेति वा मउएति वा गरुएति वा लहुएति वा सीएति वा उसिणेति वा निद्धेइ वा लुक्खेइ वा । एवं असंविञ्जमाणे जेसिं तं सुअक्खायं भवति-अन्नो जीवो अन्नं शरीरं, तम्हा ते नो एवं उपलब्भंति । इत्यादि-सर्व सुगमम् । अतो येषां मते केनापि प्रकारणासंवेद्यमान:-शरीरादपृथग्भूत आत्मा तेषां तत्स्वाख्यातं भवति, यथाऽन्यो जीव अन्यच्छरीरमित्येवं ये प्रतिपादयन्ति ते नात्मानमुपलभन्ते-ते नात्मस्वरूपवेत्तारः, ये तु शरीरात्पृथग्भूतो जीवाख्यः पदार्थ इति स्वग्रन्थेषु निक्षिप्तवन्तस्तद्वृथा, कथं ? यथा से जहा नामए केइ पुरिसे कोसीओ असिं अभिनिवट्टित्ता णं उवदंसेज्जा-अयमाउसो! असी अयं कोसी, एवामेव णत्थि केइ पुरिसे अभिनिवट्टित्ताणं उवदंसेत्तारो-अयमाउसो ! आया इमं सरीरं। से जहा नामए केइ पुरिसे मुंजाओ इसियं अभिनिवट्टित्ताणं उबदसेति-अयमाउसो! मुंजा इयं इसिया, एवामेव नत्थि केइ पुरिसे उदंसेत्तारो-अयमाउसो ! आया इदं सरीरं । से जहा नाम केइ पुरिसे मंसाओ अर्हि अभिनिव्वहित्ताणं उवदंसेज्जा-अयमाउसो ! मंसे अयं अट्ठी, For Private & Personal use Daly Jain Education Intern winna og Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्रं । LA सूयगडाङ्ग-1 एवामेव नस्थि केइ पुरिसे उवदंसेत्तारो-अयमाउसो ! आया इदं सरीरं । से जहा नामए केइ || द्वितीये पुरिसे करतलाओ आमलकं अभिनिवट्टित्ताणं उवदंसेजा-अयमाउसो! करतले अयं आमलए, दीपिका विविधएवामेव णस्थि केइ पुरिसे उवदंसेत्तारो-अयमाउसो ! आया इदं सरीरं । से जहा नामए केइ न्वितम् । दृष्टान्तैपुरिसे दहीओ नवनीयं अभिनिवट्टित्ताणं उवदंसेज्जा-अयमाउसो! नवनीयं अयं तु दही, एवामेव रात्माभाव नत्थि केइ पुरिसे उवदंसेत्तारो-अयमाउसो ! आया इदं सरीरं । से जहा नामए केइ पुरिसे | प्रसाधनं तिलेहितो तेल्लं अभिनिवहिताणं उवदंसेजा-अयमाउसो ! तिल्ले अयं पिन्नाए, एवामेव नत्थि || केइ पुरिसे उवदंसेत्तारो-अयमाउसो! आया इदं सरीरं । से जहा नामए केइ पुरिसे इक्खूतो | खोतरसं अभिनिवट्टित्ताणं उवदंसेज्जा-अयमाउसो ! खोतरसे अयं छोए, एवामेव नत्थि केइ | पुरिसे उवदंसेत्तारो-अयमाउसो ! आया इदं सरीरं। से जहा नामए केइ पुरिसे अरणीतो | अग्गि अभिनिवद्वित्ताणं उवदंसेजा-अयमाउसो! अरणी अयमग्गी, एवामेव नत्थि के पुरिसे , उवदंसेत्तारो-अयमाउसो ! आया इदं सरीरं । एवं असंते असंविजमाणे जेसिं तं ॥१०॥ चारवा कानाम् । S Jain Education in wwjainelibrary.org Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In सुअक्खायं हवइ, तं जहा - अन्नो जीवो अन्नं सरीरं, तम्हा तं मिच्छा से हंता, तं हणह खणह छह उहह यह पह आलंपह विलुंपह सहसक्कारेह विपरामुसह । एतावता X णत्थि जीवे, पिरलो, ते जो एवं विप्पडिवेदेंति, तं जहा व्याख्या—यथा नाम कश्चित्पुरुषः ' कोशतः ' परिवारा + दसिं खङ्गमभिनिर्वृ-समाकृष्यान्येषामुपदर्शयेत्, यथाSयमायुष्मन् ! ' असिः' खङ्गः अयं च ' कोश: ' परिवारः, एवमेव जीवशरीरयोरपि नास्त्युपदर्शयिता, तद्यथा - अयं जीव इदं च शरीरमिति । न चास्त्येवमुपदर्शयिता कश्चिदतो न शरीराद्भिन्नो जीव इति । अस्मिँश्चार्थे * बहवो दृष्टान्ताः सन्तीत्यतो दर्शयितुमाह, तद्यथा - कश्चित्पुरुषो 'मुञ्जा' तृणविशेषात् 'इसियं ' ति तद्गर्भभूतां शिलिकां पृथक्कत्य दर्शयेत् । तथा मासादस्थि, करतलादामलकं, तथा दघ्नो नवनीतं, तिलेभ्यस्तैलं तथेक्षो रसं, तथाऽरणितोऽग्नि 'अभिनिर्वृ ' पृथक्कृत्य दर्शयेत्, एवमेव शरीरादपि जीवमिति । न चास्त्येवमुपदर्शयिता, तस्मात्तन्मिथ्या यत्कैश्चिदुच्यते यथाऽस्त्यात्मा परलोकानुयायीति । एवं चार्वाकस्तजीवतच्छरीरवादी शरीरादपृथग्भूतमेवात्मानं मन्यमानः आत्माऽभावप्रतिपादको नास्तिकः प्राणातिपातदोषमविन्दन् प्राणिनामेकेन्द्रियादीनां ' हन्ता' व्यापादको भवति । प्राणातिपाते दोषाभावमम्युपगम्यान्येषा , x णत्थि 'त्ति शब्दो नास्त्यत्र बृहद्वृस्यम्वितासु सर्वास्वपि मुद्रित प्रतिषु परमस्त्यखिलास्वपि दीपिकाप्रतिषु मूलेऽतोत्र रक्षितः । + प्रत्याकारात् ' म्यान' इति लोके । * ' अस्मिन् 'जीवनास्तिप्ररूपणार्थे । Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ११ ॥ Jain Education afe प्राण्युपघातकारिणामुपदेशं ददाति, तद्यथा-प्राणिनः खङ्गादिना घातयत पृथिव्यादिकं खनतेत्यादि सुगमम् । यावदेतावानेव - शरीरमात्र एव जीवस्ततः परलोकिनोऽभावान्नास्ति परलोकस्तदभावाच्च यथेष्टमासत खादत पिवत सुखमनुभवत दहत पचत, अत्र दोषो नास्ति, जीवस्याभावान्न परलोको नापि पुण्यं न पापं, इत्येवं लोकायतिकास्त जीवतच्छरीरवादिनो नैवैतद्रक्ष्यमाणं विप्रतिवेदयन्ति - नाभ्युपगच्छन्ति । तद्यथा किरियाई वा अकिरिया वा, सुकडेइ वा दुक्कडेड् वा, कल्लाणएति वा पावएति वा, साहूति वा असाहूति वा, सिद्धीति वा असिद्धीति वा, निरएति वा अनिरएति वा । एवं ते विरूत्ररूहिं कम्मसमारंभेहिं विरूवरूवाई कामभोगाई समारंभंति भोयणाए । व्याख्या -ये एवं मन्यन्ते नास्ति जीवो नास्ति परलोकस्ते नैवं विप्रतिवेदयन्ति-नाभ्युपगच्छन्ति । किं नाभ्युपग च्छन्ति ? 'क्रिया' सदनुष्ठानात्मिकां ' अक्रियां' असदनुष्ठानरूपां एवं नैव ते विप्रतिवेदयन्ति । कुतः १ यद्यात्मा क्रियावां स्तर्हि कर्मबन्धः, क्रियया शुभं कर्म बध्यते अक्रियया त्वशुभं ततश्च कोऽपि भोक्ता स्यात् । स तु परलोकगामी जीव एव, स तु मूलतोऽपि निराकृत एव ततश्च कः कर्म बध्नाति ? कश्च कर्मफलमनुभवति १ जीवाभावात्, अतः सत्क्रियादिचिन्ता दूरोत्सादितैव, अतः क्रियामक्रियां च नः मन्यन्ते । तथा सुकृतं वा दुष्कृतं वा, कल्याणमिति पापमिति वा, साधुकृतमसाधुकृतमित्यादिका चिन्तैव नास्ति । तथाहि - ' सुकृतानां कल्याणविपाकिनां साधुतयाऽवस्थानं ' दुष्कृतानां पापविपाकिनां द्वितीवे श्रु० चारवाकभतोप संहारः । ॥ ११ ॥ Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ असाधुत्वेनावस्थानं, एतदुभयमपि सत्यात्मनि तत्फलभुजि सम्भवति, तदभावाच्च कुतोऽनर्थको हिताहितप्राप्तिपरिहारौ स्यातां । तथा अशेषकर्मक्षयरूपां सिद्धिमपि असिद्धिमपि नाऽभ्युपगच्छन्ति, आत्माभावात् । तथा दुष्कृतेन-पापानुबन्धिना असाध्वनुष्ठानेन नरकोऽनरको वा तिर्यग्नरामरगतिलक्षणः स्यादित्येवमादिका चिन्तैव न भवेत् , तदाधारस्यात्मसद्धावस्यानभ्युपगमादिति भावः । एवं [ते ] नास्तिका आत्मामा प्रतिपाद्य विरूपरूपैः पशुधातमांसभक्षणसुरापाननिलांछनादिभिः कर्मसमारम्भैः सावद्यानुष्ठानैः कृषीवलानुष्ठानादिभिर्विरूपरूपान् कामभोगान् समाददति तदुपभोगार्थमिति । साम्प्रतं तज्जीवतच्छरीरवादिमतमुपसंहरबाह एवं एगे पागभिता णिक्खम्म मामगं धम्मं पन्नविति, तं सद्दहमाणा तं पत्तियमाणा तं | रोएमाणा साहु सुअक्खाए, समणेत्ति वा माहणेत्ति वा कामं खलु आउसो! तुमं पूययामि, I तं जहा-असणेण वा पाणेण वा खाइमेण वा साइमेण वा वत्थेण वा पडिग्गहेण वा कंबलेण वा पायपुंछणेण वा, तत्थेगे पूयणाए समाउटिंसु, तत्थेगे पूयणाए निकाइंसु । व्याख्या-['एवं' उक्त प्रकारेण] एके' केचन नास्तिकाः धृष्टाः सन्त एवं वदन्ति-अयमात्मा शरीरादपृथग्भूतोऽस्ति, | एतावता शरीरे मृते जीवोऽपि म्रियते, न परं शरीरात्पृथग्भावं भजते । स एव जीवस्तदेव शरीरं, न शरीरात्पृथगात्मा, इत्येवं 12 For Private&Personal use Only T Jain Education wwjainalitaray.org Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाग द्वितीये दीपिकान्वितम् । ॥१२॥ धृष्टा:-सन्तः प्रवर्तन्ते । स्वकीयदर्शनानुसारेण प्रव्रज्यां प्रतिपद्य + मदीयोऽयमेव धर्मः सत्यो, नाऽपर इति[परेभ्यः]प्रज्ञापयन्ति । ततश्चान्ये श्रोतारः नास्तिकोक्तं धर्म विषयिणामनुकूलं श्रद्दधानाः प्रतीयन्तो मनसि रोचयन्तस्तथा अवितथभावेन गृहन्तस्तत्र रुचिं कुर्वन्तस्तथा 'साधु' शोमनमेतद्यथा स्वाख्यातो यथाऽवस्थितो भवता धर्मोऽन्यथा हिंसादिष्ववर्तमानाः परलोकभयात्सुखसाधनेषु मद्यमांसादिषु प्रवृत्ति अकुर्वाणा मानुषजन्मफलवञ्चिता भवेयुः, ततः शोभनमकारि भवता हे | श्रमण ! ब्राह्मण! यदयं धर्मोऽस्माकमावेदितः, काममिष्टमेतदस्माकं धर्मकथनं । खलुशन्दो वाक्यालङ्कारे । हे आयुष्मंस्त्वया वयमभ्युद्धताः, अन्यथा कापटिकैस्तीर्थिकैर्वश्चिता अभूम, तस्मादुपकारिणं 'वां'भवन्तं पूजयामि, अहमपि कश्चिदायुष्मतो. भवतः प्रत्युपकारं करोमि, 'असणेण वा पाणेण वा' इत्यादि सूत्रं सर्व सुगमम् । तत्रैके केचन पूजया पूजायां वा 'समाउद्दिसु 'त्ति समावृत्ता-प्रवीभूतास्ते राजानः पूजां प्रति प्रवृत्ताः 'पूयाए निकाइंसु' पूजायां निकाचितवन्तः' नियमितवन्तः, भवद्भिस्तञ्जीवतच्छरीरमित्यभ्युपगन्तव्यं, अन्यो जीवोऽन्यच्च शरीरमित्येतच्च परित्याज्यं, अनुष्ठानमप्येतदनुरूपमेव विधेयमित्येवं निकाचितवन्तः, के ते ? दर्शनिनः-स्वदर्शनप्रतिपन्नान् राजादीन् ।। पुवामेव तेसिं णायं भवइ-समणा भविस्सामो अणगारा अकिंचणा अपुत्ता अपसू परदत्तभो +" यद्यपि नास्तिकानां नास्ति प्रव्रज्या तथापि बौद्धा दिमते प्रव्रज्य पश्चान्नास्तिकीभूते सम्भवति प्रव्रज्या, अथवा नीलपट्टाद्यनीकृतः कश्चिदस्त्येव प्रव्रज्याविशेषः " इति हर्षः । लोकद्धय प्रभ्रष्टत्व साधनं चारवा. कानाम् । For P Jan Education Phwww.janeiorary.org & Personal use only Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [इणो]गी भिक्खुणो पावं कम्मं नो करिस्सामो, समुट्ठाए ते अप्पणो अप्पडिविरया भवंति । सयमाइयंति अन्नेवि आदियाविति अन्नपि आययंतं समणुजाणंति, एवामेव ते इत्थिकामभोगे(सु)हिं मुच्छिया गिद्धा गढिया अज्झोववन्ना लुद्धा रागदोसवसट्टा, ते णो अप्पाणं समुच्छेदिति, णो परं समुच्छेदिति, णो अण्णाइं पाणाई भूताई जीवाइं सत्ताइं समुच्छेदिति । पहीणा पुवसंजोगं आरियं मग्गं असंपत्ता इति ते णो हवाए णो पाराए, अंतरा कामभोगेसु विसन्ना, IN इति पढमे पुरिसजाते तज्जीवतस्सरीरएत्ति आहिए (सू० ९)॥ व्याख्या-तथा तैर्दर्शनिभिः प्रव्रज्याग्रहणकाल एवैतत्परिज्ञातं भवति, यथा-वयं परित्यक्तपुत्रकलत्राः ' श्रमणा' यतयो भविष्याम 'अनगारा' गृहरहितास्तथा निष्काश्चनास्तथा [अपुत्रा] ' अपशवो' गोमहिष्यादिरहिताः परदत्तभोजिनः, स्वतः पचनपाचनादिक्रियारहितत्वात् । तथा 'भिक्षवो' भिक्षोपजीविनः, कियद्वक्ष्यते ? अन्यदपि यत्किंचित्पा' सावधं कर्मा-नुष्ठानं तत्सर्व न करिष्या(म इत्येवं )मीत्येवं सम्यगुत्थानेनोत्थाय पूर्व, पश्चात्ते-लोकायतिकभावमुपागताः 'आत्मनः' स्वतः पापकर्मभ्योऽप्रतिविरता भवन्ति, विरत्यभावे च यत्कुर्वन्ति तद्दर्शयति-पूर्व सावद्यारम्भान्निवृत्तिं विधाय नीलपटादिकं वा लिङ्गमास्थाय स्वयं सावद्यमनुष्ठानं 'आददतें' स्वीकुर्वन्त्यन्यानप्यादापयन्ति-ग्राहयन्ति अन्यमप्याद Jain Education JANw w.jainalibrary.org Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग- द्वितीये दीपिकान्वितम् । N सांख्यमतनिरूपणम् । ॥१३॥ दान-परिग्रहं स्वीकुर्वन्तं समनुजानन्ति, एवमेव पूर्वोक्तप्रकारेण स्त्रीसम्बन्धिषु कामभोगेषु मृञ्छिताः 'गृद्धाः' कासावन्तो 'ग्रथिताः' अवबद्धाः 'अध्युपपन्ना' लुब्धाः रागद्वेषवशगाः कामभोगान्धा वा, ते एवं कामभोगेष्ववबद्धाः सन्तो नात्मानं संसारात्कर्मपाशाद्वा समुच्छेदयन्ति, नापि परं सदुपदेशदानतः कर्मपाशावपाशितं समुच्छेदयन्ति-कर्मबन्धात्रोटयन्ति, नाप्यन्यान् प्राणान् भूतान् जीवान् सच्चान् समुच्छेदयन्ति । ते चैवविधास्तज्जीवतच्छरीरवादिनो लोकायतिकाः 'पूर्व| संयोगा'त्पुत्रदारादिकात् 'प्रहीणाः' प्रभ्रष्टाः, आर्यमार्गमसम्प्राप्ताः, ऐहिकाऽऽमुष्मिकलोकद्वयात् प्रभ्रष्टाः, अन्तराल एव भोगेषु विषण्णास्तिष्ठन्ति, न विवक्षितं पुण्डरीकोत्क्षेपणादिकं कार्य प्रसाधयन्ति । इत्ययं च प्रथमपुरुषस्तजीवतच्छरीरवादी परिसमाप्त इति । इति प्रथमः पुरुषः। अथ द्वितीयपुरुषजातमधिकृत्याऽऽह अहावरे दोच्चे पुरिसजाए पंच महब्भूतिएत्ति आहिजति, इह खलु पाईणं वा दाहिणं वा पडीणं वा उत्तरं वा संतेगतिया मणुस्सा भवंति अणुपुत्वेणं लोयं उववन्ना, तंजहा-आरिया वेगे अणारिया वेगे एवं जाव दरूवा वेगे, तेसिं च णं महं एगे राया भवति महया०] एवं चेव निरवसेसं जाव सेणावतिपुत्ता, तेसिं च णं एगतिए सड्ढी भवति । कामं तं समणा य माहणा य पहारिंसु गमणाए। तत्थऽन्नयरेणं धम्मेणं पन्नत्तारो वयमिमेणं धम्मेणं पन्नवइस्तामो, से एवमायाणह भयंतारो! जहा मए एस धम्मे सुअक्खाए सुपन्नत्ते भवति । ॥१३॥ Jain Education wwerjainelibrary.org Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter व्याख्या - इह खलु द्वितीयः पुरुषजातः पञ्चभिः [भूतैः ] पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशैश्चरति पश्चभूतिकः, स च साँख्यमतावलम्बी । स प्रथमपुरुषवद्यावद्राजसभामागत्य स्वीयं धम्भे यथा प्रकाशयति तथा[ दर्शयितुमाह इह खलु पंच महब्भूता, जेहिं नो किज्जति किरियाति वा अकिरियाति वा, सुकडेति वा दुकडेति वा, कल्लापति वा पावति वा, साहूति वा असाहूति वा, सिद्धित्ति वा असिद्धित्ति वा, निरएति वा अनिरएति वा इति [अवि] अंतसो तणमातमवि । तं पिहुद्देसेणं पुढो भूतसमवातं जाणेज्जा, तंजहा ' व्याख्या -' इह द्वितीय पुरुषवक्तव्याधिकारे, खलु शब्दो वाक्यालङ्कारे, पृथिव्यादीनि पञ्च महाभूतानि विद्यन्ते । तेषां च सर्वव्यापितया अभ्युपगमान्महवं, पश्चैव परस्य षष्ठस्य क्रियाकर्तृत्वेनानभ्युपगमात् । पश्च भूतानि कार्यकारीणि, न कोऽपि षष्ठः पदार्थोऽस्ति । साङ्ख्यानां हि मते पंच महाभूतान्येव सर्वक्रियाकारीणि, न कोऽपि षष्ठः आत्माख्यः पदार्थः, स तु किमपि न करोति, यतस्तन्मतं - " अमूर्त्तश्चेतनो भोगी, नित्यः सर्वगतोऽक्रियः । अकर्त्ता निर्गुणः सूक्ष्म, आत्मा कापिलदर्शने ॥ १५ ॥ " साङ्ख्या एवं वदन्ति - पञ्चभूतैरभ्युपगम्यमानैन - Sस्माकं 'क्रिया' परिस्पन्दात्मिका चेष्टरूपा [ अक्रिया वा निर्व्यापारतया स्थितिरूपा ] क्रियते, तथाहि साँख्यानां दर्शनं सभ्वरजस्तमोरूपा प्रकृतिः सर्वा अर्थक्रियाः करोति, पुरुषः केवलमुपभुङ्क्ते, तस्याश्च प्रकृतेर्भूतात्मिकायाः सत्वरजस्तमसां चयापचयाभ्यां क्रियाऽक्रिये स्यातामिति कृत्वा भूतेभ्य एव क्रियादीनि प्रवर्त्तन्ते, भूतव्यतिरेकेणा परस्याभावादिति भावः । तथा सुकृतं सत्वगुणाधिक्येन भवति Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग- संत्रं I दीपिकान्वितम् || ॥१४॥ दुष्कृतं रजस्तमसोरुत्कटतया प्रवर्त्तते, एवं कल्याणमिति वा पापकमिति वा, साध्विति वा असाध्विति वा इत्येतत्सत्त्वा- द्वितीये दीनां गुणानामुत्कर्षानुत्कर्षतया यथासम्भव मायोजनीयं । तथा सिद्धिरसिद्धिर्वा, तथा 'नरक' पापकर्मणां यातनास्थानं, | | श्रुत. अनरकस्तियमनुष्यामराः, एतत्सर्व सवादिगुणाधिष्ठिता भूतात्मिका प्रकृतिविधत्ते, लोकायतिकाभिप्रायेणापीहैव तथाविधसुखदुःखावस्थाने स्वर्गनरकाविति इत्येवमन्तशस्तृणमात्रमपि यत्कार्य तद्भूतैरेव प्रधानरूपापनैः क्रियते । तदेवं साँख्याभिप्रायेणा- स्वरूपम्। स्मनस्तुणकुब्जीकरणेऽप्य सामर्थ्यात् , लोकायतिकाभिप्रायेण त्वात्मन एवाभावात् , भूतान्येव सर्वकार्यकर्वणीत्येवमभ्युपगमः । तानि च समुदायरूपापनानि नानास्त्रभावं कार्य कुर्वन्ति । तं च तेषां भूतानां समवायं पृथग्भूतपदोद्देशेन जानीयात् । तथाहि पुढवी एगे महब्भूते आऊ दुच्चे महब्भूते तेऊ तच्चे महन्भूते वाऊ चउत्थे महब्भूते आगासे पंचमे महन्भूते, इच्चेते पंच महब्भूया अणिम्मिया अणिम्माविया अकडा णो कित्तिमा नो कडगा अणादिया अणिहणा अवंझा अपुरोहिता सतंता सासता आयछट्ठा । पुण एगे एवमाहु___व्याख्या-पृथिव्येका काठिन्यलक्षणा महाभूतं, तथा ' आपो' द्रवलक्षणा महाभृतं, तथा 'तेज' उष्णोद्योत लक्षणं महाभूतं, वायु(ग)तिकम्पनलक्षणस्तथाऽवगाहदानलक्षणं सर्वद्रव्याधारभूतमाकाशमित्येवं पृथग्भूतो यः पदोद्देशस्तेन कायाऽऽकारतया यस्तेषां समवाया, स एकत्वेऽपि लक्ष्यते । न न्यूनानि नाप्यधिकानि विश्वव्यापितया महान्ति, त्रिकालभवनाद्भूतानि, एतान्येव क्रमेण व्यवस्थितानि, अपरेण कालेश्वरादिना केनचिदपि न निर्मितानि-अनिष्पादितानि, INJ॥१४॥ Jain Educationa l INI Far Private & Personal use Oh Lall Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter तथा परेण अनिर्मापयितव्यानि तथाऽकतानि-न केनचित्तानि क्रियन्ते, अभ्रन्द्रधनुर्वद्विश्रसा परिणामेन निष्पन्नत्वात्, तथा न घटवत्कुत्रिमाणि, कर्तुकरणव्यापारसाध्यानि न भवन्तीत्यर्थः, तथा परव्यापाराभावतया 'नो' नैव कृतकानि, न अपेक्षितपरव्यापारस्वभावानि, विश्रसापरिणामेन निष्पन्नत्वात्कृत कव्यपदेशमाञ्जि न भवन्ति । तथा अनाद्यनिधनानि, अवन्ध्यानि-अवश्यकार्यकारीणि, तथा न विद्यते 'पुरोहितः ' कार्यं प्रति प्रवर्त्तयिता येषां तान्यपुरोहितानि तथा 'स्वतन्त्राणि स्वाधीनानि, तथा 'शाश्वतानि ' नित्यानि तदेवम्भूतानि पञ्च महाभूतान्यात्मषष्ठानि ज्ञातव्यानि । एके पुनरेवमाहुः - सतो णत्थि विणासो असतो णत्थि संभवो । एतावताव जीवकाए, एतावताव अस्थिकाए, एतावता सवलोए, एतं मुहं लोगस्स करणयाए । अवि अंतसो तणमायमवि । व्याख्या- तथा साँख्याभिप्रायेण 'सतो' विद्यमानस्य प्रधानादेर्नास्ति विनाशः [तथा ] ' असतः' शशविषाणादेर्नापि ' सम्भवः समुत्पत्तिरस्ति, अतः साँख्या आत्मनः कार्यकारित्वं न मन्यन्ते । यद्यात्मा क्रियायाः कर्ता स्यात्ततोऽसदुत्पादयति, अत आत्मा अकर्त्ता निर्गुण इति । ततः साँख्या एवं वदन्ति एतावानेव जीवकायो, यदुत-पञ्च महाभूतानि तथा एतावानेव भूतास्तित्वमात्र एवास्तिकायो, नापरः कश्चित्तीर्थिकाभिप्रेतः पदार्थोऽस्ति । एतावानेव सर्वलोकः, पञ्च महाभूतानि लोक निष्पत्तौ ' मुख्यानि ' प्रधानकारणान्येतान्येव जानीहि । भूतान्येवान्तशस्रणमात्रमपि कार्यं कुर्वन्ति, पञ्च महाभूतेभ्यः परस्य कस्याप्यभावादिति । अथ स चैववाद्येकत्रात्मनोऽकिंचित्करत्वादन्यत्र चात्मनोऽसच्वादसदनुष्ठानैरपि नात्मा पापकर्म Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग- दीपिकान्वितम् । ॥१५॥ द्वितीये श्रुत. सांख्यानां सावद्या प्रवृत्तिः । भिर्वध्यत इति दर्शयितुमाह से किणं किणावेमाणे, हणं घायमाणे, पयं पयावेमाणे, अवि अंतसो पुरिसमवि किणित्ता घा- [य]इत्ता इत्थंपि जाणाहि-णस्थित्थ दोसो, ते णो एवं विप्पडिवेदिति, तंजहा-किरियाति वा जावऽणि- रयेति वा । एवमेव ते विरूवरूवेहि कम्मसमारंभहिं विरूवरूवाइं कामभोगाइं समारभति भोय-| यणाएगणे(?), एवामेव ते अणारिया विप्पडिवन्नातं सहहमाणा तं पत्तियमाणा जाव इति। ते णो हवाए णोपाराए, अंतराय कामभोगेसु विसन्ना, दोचे पुरिसजाएपंचमहब्भूतिएत्ति आहिते(सू०१०)॥| __व्याख्या-'से'त्ति यः कश्चित्पुरुषः क्रयार्थी 'क्रीणन् ' किञ्चित् [वस्तु] क्रयेण गृहैस्तथा परं क्रापर्यंस्तथा प्राणिनो 'नन् ' हिंसंस्तथाऽपरैर्षातयन्-व्यापादयन् , तथा पचन् पाचयन् , क्रीणतः क्रापयतो, नतो घातयतस्तथा पचतः पाचयतश्चापरांस्तथाऽप्यन्तशः पुरुषमपि पश्चेन्द्रियं विक्रीय घातयित्वा अपि पञ्चेन्द्रियघाते नास्ति दोषोऽत्रैवं 'जानीहि' अवगच्छ । किं पुनरेकेन्द्रियवनस्पतिघात इत्यपि शब्दार्थः, ततश्चैवंवादिनः साँख्या वार्हस्पत्या वा 'नो' नैवैतद्वक्ष्यमाणं 'विप्रतिवेदयन्ति' जानन्ति, तद्यथा-क्रिया सावद्यानुष्ठानुरूपा, एवमक्रिया वा स्थानादिलक्षणा यावदेवमेव विरूपरूपै-रुचावचैर्नानाप्रकारैर्जलस्नानावगाहनादिकैस्तथा प्राण्युपमर्दकारिभिः कर्मसमारम्भर्विरूपरूपान्-नानाप्रकारान् सुरापानमांसभक्षणागम्यगमनादिकान् कामभोगान् समारभन्ते स्वतः पराश्च प्रेरयन्ति-नास्त्यत्र दोष इत्येवं प्रतार्यासत्कार्यकरणाय प्रेरयन्ति, ॥ १५॥. www.janesbrary.org Jain Education in Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं तेऽनार्या अनार्यकर्मकारित्वाद्विरुद्धं मागं विप्रतिपनाः तं सद्दहमाणा' तमात्मीयमेव कुमतं पञ्च महाभूतात्मक श्रधानास्तमेव च सत्यमित्येवं 'प्रतीयन्तः' प्रतिपद्यमानास्तमेव स्वपक्षं रोचयन्तस्तद्धर्मस्याऽऽख्यातारं प्रशंसयन्तः 'स्वाख्यातो धर्मो भवता, अस्माकमयं धर्मोऽत्यन्तमभिप्रेतः, सावद्यानुष्ठानेनाप्यधर्मो न भवतीत्यध्यवसायिनः स्त्रीकामेषु माञ्छिताः, इत्येवं पूर्ववन्नेयं, यावदन्तरे कामभोगेषु विषण्णाः ऐहिकामुष्मिकोभयकार्यभ्रष्टाः नात्म[नः] त्राणाय नापि परेषामिति । एवं द्वितीयः पुरुषजातः पञ्च महाभूताम्युपगमिको व्याख्यात इति, साम्प्रतं तृतीयपुरुषं ईश्वरकारणिकमधिकृत्याऽऽह____ अहावरे तच्चे पुरिसजाए ईसरकारणिएत्ति आहिज्जति, इह खलु पाईणं वा ४ संतेगइया मणुस्सा भवंति अणुपुत्वेणं लोयं उववन्ना, तंजहा-आरिया वेगे, जाव तेसिं च णं महंते एगे राया भवति जाव सेणावतिपुत्ता, एतेसिं च णं एगतीए सड्डी भवति । कामं तं समणा य माहणा य पहारिंसु गमणाए जाव जहा मए एस धम्मे सुअक्खाए सुपन्नत्ते भवति । ___व्याख्या-तदेवमीश्वरकारणिक आत्माद्वैतवादी वा तृतीयः पुरुषजात आख्यायते । इह खलु पुरुषप्रस्तावे, खलु शब्दो पाक्यालकारे, प्राच्यादिषु दिक्ष्वन्यतरस्यां दिशि व्यवस्थितः कश्चिदेवं ब्रूयात् , तद्यथा-राजानमुद्दिश्य तावद्यावत्स्वाख्यातः सुप्रज्ञप्तो धम्मो भवति इत्यादि सर्व पूर्ववदवगन्तव्यं । अथ य ईश्वरप्रणीतं जगदिदं मन्यते स कस्यापि राज्ञः समीपमागत्य आत्माभिप्रेतं धर्म प्ररूपयति Jain Education in G w.jainelibrary.org Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये सूपगडाङ्ग सूत्रं दीपिका-1 न्वितम् । ॥१६॥ श्रुत० ईश्वरकारणिकमतम् । इह खलु धम्मा पुरिसादिया पुरिसोत्तरा पुरिसप्पणीया पुरिससंभूया पुरिसपज्जोतिता पुरिसअभिसमन्नागता पुरिसमेव अभिभूय चिटुंति । ___ व्याख्या-' इह ' संसारे, खल्विति वाक्यालङ्कारे, धर्माः-सचेतनाचेतनरूपाः पदार्थाः पुरुषादिकाः, पुरुष-ईश्वर आत्मा वा कारणमादिर्येषां ते पुरुषादिका ईश्वरकारणिका आत्मकारणिका वा, तथा पुरुषोत्तराः, तथा पुरुषेण प्रणीताः, तथा पुरुषसम्भूताः 'पुरुष(प्र)द्योतिताः' पुरुषप्रकाशिताः, प्रदीपमणिसूर्यादिभिर्यथा घटपटादयः पदार्थाः प्रकाश्यन्ते तथा सर्वेऽपि पदार्थाः पुरुषेण-ईश्वरेण प्रकाशिताः, ते च धर्मा जीवानां जन्मजरामरणव्याधिरोगशोकसुखदुःखजीवनादिकाः अजीवधर्मास्तु मूर्तिमतां द्रव्याणां वर्णगन्धरसस्पर्शाः, अमूर्तिमतां च धर्माधर्माकाशानां गत्यादिका धर्माः, सर्वेऽपीश्वरकृताः। सर्वेऽपि पुरुषमेवाभिव्याप्य तिष्ठन्ति । अस्मिन्नर्थे दृष्टान्तमाह से जहानामए गंडे सिया सरीरे जाते सरीरे संवुड्डे सरीरे अभिसमन्नागते सरीरमेव अभिभूय चिट्ठति, एवामेव धम्मा पुरिसादिया, जाव [पुरिसमेव] अभिभूय चिटुंति । . व्याख्या-'से' ति तच्छाब्दार्थे । 'नाम' इति सम्भावनायां। यथा नाम गण्डं 'स्या'द्भवेत् । गण्डं रोगविशेषः । सम्भाव्यते प्राणिनां गण्डादिसमुद्भवः । तच्च शरीरे जातं, शरीरे वृद्धिमुपगतं, शरीरे अभिसमन्वागत-शरीरं व्याप्य व्यव. स्थितं, न तदवयवोऽपि शरीरात्पृथग्भूत इति । शरीरममि[भूय-] व्याप्य (1) पीडयित्वा तिष्ठति, न शरीराबहिर्मवति, arww.ininelibrary.org Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यथा ललिपटकं शरीरकदेशभृतं न युक्तिशतेनापि शरीरात्पृथग्दर्शयितुं शक्यते, एवमेव ये धर्माश्चेतनाचेतनरूपास्ते सर्वेऽपीश्वरकर्तृकाः, न ते ईश्वरात्पृथक्का पार्यन्ते । पुनदृष्टान्तान्तरमाह से जहानामए अरई सिया सरीरे जाया सरीरे (अभिx)संवुड्डा सरीरे अभिसमन्नागया सरीरमेव आभिभूय चिट्ठइ, एवामेव धम्मावि] पुरिसाइया जाव पुरिसमेवाभिभूय चिटुंति । व्याख्या-तद्यथा नाम 'अरति'श्चित्तोद्वेगलक्षणा स्याद्' भवेत् , सा च बरीरे जातेत्यादि गण्डवन्नेया, दार्शन्तिकेऽप्येवमेव सर्वे धर्माः पुरुषप्रभवा इत्यादि पूर्ववन्नेयम् । पुनर्दष्टान्तमाह___ से जहानामए वम्मिए सिया पुढविजाए पुढविसंवुड्ढे पुढविअभिसमन्नागए पुढविमेव अभिभूय चिट्ठइ, एवामेव धम्मा[वि] पुरिसाइया जाव [पुरिसमेव] अभिभूय चिट्ठति । ____ व्याख्या-यथा 'वल्मीकं' पृथ्वीविकाररूपं स्यात्तच्च पृथिव्यां जातं पृथिवीसम्बद्धम् पृथिव्यभिसमन्वागतं, पृथिवीमेवाऽभिसम्भूय तिष्ठति, एवमेव यदेतच्चतनाचेतनरूपं तत्सर्वमीश्वरकारणिकमात्मविवरूपं वा, नात्मनः पृथग्भवितुमर्हति । पृथिव्या वल्मीकवत् । तथा x वृहहृत्त्यादर्शषु नास्त्ययं शब्दः । Jain Education i n al For Privatpersonal use www.janesbrary.org Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग द्वितीये सूत्रं श्रुत. A दीपिकान्वितम् । ॥१७॥ ईश्वरकारणिकनिरूपका दृष्टान्ता: से जहानामए रुक्खे सिया पुढविजाए जाव पुढविसंवुड्ढे पुढविअभिसमन्नागए पुढविमेव अभिभूय चिट्ठइ, एवामेव धम्मा वि [ पुरिसादिया]जाव[ पुरिसमेव ]अभिभूय चिटुंति । से जहा. नामए पुक्खरिणी सिया* पुढविजाता जाव पुढविमेव अभिभूय चिट्ठति, एवामेव धम्माविं पुरिसा. दिया जाव पुरिसमेव अभिभूय चिटुंति, से जहानामए उदगपुक्खले सिया उदगजाए[ जाव] उदगमेव अभिभूय चिट्ठति, एवामेव धम्मा[वि] पुरिसादिया जाव पुरिसमेव अभिभूय चिट्ठति।' से जहानामए उदगबुब्बुए सिया[ उदगजाए जाव ]उदगमेव(जावx) अभिभूय चिट्ठइ, एवामेव धम्मा वि पुरिसा[दिया] जाव पुरिसमेव अभिभूय चिट्ठति । ___व्याख्या-एतत्सर्व सुगम, पूर्ववन्नेतव्याः सर्वेऽपि दृष्टान्ताः । एतावता यदीश्वरकृतत्वेनाभ्युपगम्यते तत्सर्व तथ्यं, * " यथा नाम पुष्करिणीस्यात्-तडागरूपा भवेत् " इति बृहद्वृत्तौ । - नास्त्ययं शब्दोऽत्र बृहद्वृत्त्यादशेषु । __ + केवलं हालापुरीयप्रतिकृतावस्य सूत्रस्य व्याख्या 'से' (तद् ) यथा नाम 'उदकपुष्कलं' प्रचुरपानीयं-उदकप्राचुर्य, तच्च 'तद्धर्मत्वात' तत्स्वभावत्वादुदकमेवाभिभूय तिष्ठति, एवं दार्शन्ति केऽपि" एवम्भूता स्थानान्तरे लिखिताऽस्ति, परं पाश्चात्येन लेखकेन केनापि लिखिता सम्भाव्यते, समस्तानां दृष्टान्तसूत्राणामेवम्भूताया व्याख्याया अनुपलम्भात् । ॥१७॥ Jain Education Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अपरं सर्व मिथ्येति तदाविर्भावयन्नाह___ जंपि य इमं समणाणं निग्गंथाणं उद्दिटुं पणियं वियंजियं दुवालसंगं गणिपिडगं, तंजहाआयारो सूयगडो जाव दिद्विवाओ, सबमेयं मिच्छा, ण एवं तहियं ण एवं अहातहियं व्याख्या-यदपि चेदं प्रत्यक्षासन्नभृतं श्रमणानां' साधूनां ' उद्दिष्टं ' तदर्थ प्रणीतं, व्यञ्जितं-प्रकटीकृतम् । द्वादशाङ्गं गणिपिटकं, तद्यथा-आचाराङ्गं यावदृष्टिवादः, सर्वमेतन्मिथ्या, अनीश्वरप्रणीतत्वात् , यदीश्वरप्रणीतं तदेव सत्यमन्यत्सर्व मिथ्यैव, एतदपि गणिपिटकं ईश्वरप्रणीतं न भवति, स्वेच्छया कल्पितं, तेन मिथ्या । अनया प्ररूपणया अभृतोद्भावनत्वमावेदितं । गणिपिटकं सर्व दृष्टिवादपर्यन्तमतथ्यमपि तथ्यतया प्रतिपादयन्ति, अचौरे चीरत्ववत् असद्भूतार्थारोपणं कुर्वन्ति जैनाः। एतावता ईश्वरप्रणीतमेव तथ्यं नापरं किमपि । अथ यत्सत्यतया मन्यन्ते तदेवाह इमं सच्चं इमं तहितं इमं अहातहितं, [ते] एवं सन्नं कुवांत ते एवं सन्नं संठावेंति, ते एवं सन्नं सोवढवयंति । तमेव ते तजाइयं दुक्खं णो तिउदंति । व्याख्या-यदीश्वरप्रणीतं तदेव तथ्य, तदेव यथातथ्यं, ते ईश्वरकारणिका एवं संज्ञां कुर्वन्ति, स्वदर्शनानुरागिणः संज्ञां संस्थापयन्ति । एवम्भूतां संज्ञां वक्ष्यमाणनीत्या नियुक्तिकामपि सुष्टु सामीप्येन तथाऽऽग्रहितया तदभिमुखा युक्तीः स्थापयन्ति, तत ईश्वरप्रणीतं सर्व सचेतनाचेतनं जगदित्यादिप्ररूपणया तमेव तदभ्युपगमजातीयं दुःखहेतुत्वादुःख-मष्टप्रकार Jain Education interna A w.jainelibrary.org Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग- श्रुत. दीपिकान्वितम् ।। ॥१८॥ कर्म न त्रोटयन्ति । अस्मिन्नर्थे दृष्टान्तमाह द्वितीये ___ सउणीपंजरं जहा, ते णो विप्पडिवेदेति तं जहा-किरियावाई वा जाव अणिरएति वा, एवामेव ते विरूवरूवेहिं कम्मसमारंभेहिं विरूवरूवाइं कामभोगाई समारभंति भोयणाए, एवामेव । ईश्वर कारणिक ते अणारिया विप्पडिवन्ना एवं सद्दहमाणा जाव इति णो हवाए जो पाराए, अंतरा कामभोगेसु । मतोपविसन्नेत्ति । तच्चे पुरिसजाते ईसरकारणिएत्ति आहिते (सू० ११)॥ संहारः। __व्याख्या-यथा 'शकुनिः' पक्षिविशेषः पञ्जरं नातिवर्त्तते, पौनःपुन्येन भ्रान्त्वा तत्रैव वर्तते, एवं तेऽपि एवम्भूता| म्युपगमवादिनः कर्मबन्धनं 'नातिवर्तन्ते' न वात्रोटयन्ति । ते च स्वाग्रहाभिमानग्रहग्रस्ता नैवद्वक्ष्यमाणं 'विप्रतिवेदयन्ति' न सम्यग् जानन्ति, तद्यथा-क्रियामक्रियां वा शोभनामशोभनां वा, यावदयं [अ]नरक इत्येवं सदसद्विवेकरहितत्वान्नावधारयन्ति । एवमेव यथा कथञ्चित्ते विरूपरूपैः 'कर्मसमारम्मै नाप्रकारैः सावद्यानुष्ठानद्रव्योपार्जनोपायभूतैर्द्रव्यमुपादाय विरूपरूपा-नुच्चावचान् कामभोगान समाचरन्ति[ भोजनाय ], इत्येवं ते अनार्या विरुद्ध मार्ग प्रतिपन्ना न सम्यग्वादिनो भवन्ति । तदेवमीश्वरकर्तृत्वमात्माद्वैतपक्षश्च युक्तिभिर्विचार्यमाणो न कथश्चित् घटां प्राश्चति । अत्रैतन्मतनिरासे बहूक्तमस्ति. (तद् ) बृहट्टीकातोऽवधारणीय, अत्र ग्रन्थविस्तरभयान लिखितमिति । एवं ते प्रतीयन्तः श्रद्दधानाच 'नो हव्वाए नो पाराए अंतरा कामभोगेसु विसन्न 'ति इत्ययं तृतीयः पुरुषजात ईश्वरकारणिक इति । असमञ्जसमाषितया त्यक्त्वा ॥१८॥ Jain Education in GTww.jainalibrary.org Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte पूर्वसंयोगमप्राप्तो विवक्षितस्थानमन्तराल एव कामभोगेषु मूर्छितो विषण्ण इत्यवगन्तव्यमिति तृतीयः पुरुषजातः समाप्तः । अथ चतुर्थ पुरुषजातमधिकृत्याह - अहावरे चत्थे पुरिसजाए नियतिवाइएत्ति आहिज्जति - इह खलु पाईणं [ वा ४ व जाव सेणावइपुत्ता वा, तेसिं च णं एगतीए सड्डी भवइ, कामं तं समणा य महणाय संपहारिंसु गमणाए जाव मए एस धम्मे सुअक्खाए सुपन्नत्ते भवइ ] । व्याख्या - अथ चतुर्थः पुरुषजातो नियतिवादिक आख्यायते स तु नियतिवादी, ( एवमाह - ) नात्र कश्चित्कालेश्वरादिकं कारणं, नापि पुरुषकारः, तेषां नियतिबला देवार्थसिद्धेर्नियतिरेव कारणं, उक्तश्च-" प्राप्तव्यो नियतिबलाश्रयेण योऽर्थः सोऽवश्यं भवति नृणां शुभोऽशुभो वा । भूतानां महति कृतेऽपि हि यत्ने, नाभाव्यं भवति न भाविनोऽस्ति नाशः ॥ १ ॥ " इत्यादि । " इह खलु पाईणं० " इत्यादिको ग्रन्थः प्राग्वन्नेतव्यो यावदेष धम्म नियतिवादरूपः स्वाख्यातः सुप्रज्ञप्तो भवतीति । स च नियतिवादी स्वाभ्युपगमं दर्शयितुमाह इह खलु दुवे पुरसा भवंति - एगे पुरिसे किरियमातिक्खति एगे पुरिसे णोकिरियमातिक्खति, जे य पुरिसे किरियमाइक्खइ जे य पुरिसे नोकिरियमाइक्खइ, दोवि ते पुरिसा तुल्ला, www.jainalibrary.org Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा श्रुनि दीपिका वितम् । ॥१९॥ एगट्ठा, [कारणमावन्ना ]। द्वितीये ___व्याख्या-इहाऽस्मिन् जगति, खलुशब्दो वाक्यालङ्कारे, द्वौ पुरुषो भवतः, तत्रैकः क्रियामाख्याति, क्रिया हि | यतिवादी देशाद्देशान्तरावाप्तिलक्षणा पुरुषस्य भवति, न कालेश्वरादिना प्रेरि(तस्य)ता( १ ) भवति, अपितु नियतिप्रेरितस्य, एवम-IN क्रियाऽपि, यदिवा क्रियावादमक्रियावादं च समाश्रितौ तौ द्वावपि नियत्यधीनत्वात्तुल्यौ। यदि पुनस्तौ स्वतन्त्रौ भवतस्तदा मतम् । क्रियाऽक्रिया मेदान तुल्यौ स्यातां इत्यत एकार्थों, एककारणापन्नत्वादिति, नियतिवशेन तौ नियतिवादमनियतिवादं च समाश्रिताविति भावः। उपलक्षणार्थत्वाच्चास्यान्योऽपि यः कश्चित् कालेश्वरादिकं पक्षान्तरमाश्रयति सोऽपि नियतिप्रेरित एव द्रष्टव्य इति । बाले पुण एवं विप्पडिवेदेति कारणमावन्ने-अहमंसि दुक्खामि वा सोयामि वा जूरामि वा | | तिप्पामि वा पीडामि वा परितप्पामि वा, अहमेयमकासि, परो वा जं दुक्खति वा सोयति वा | जूरति वा तिप्पइ वा पीडइ वा परितप्पइ वा, परो एवमकासि, एवं से बाले सकारणं वा परकारणं वा एवं विप्पडिवेदेति कारणमावन्नो । मेहावी पुण एवं विप्पडिवेदेति कारणमावन्नो-अहमंसि दुक्खामि वा सोयामि वा जरामि वा तिप्पामि वा पीडामि वा परितप्पामि वा, णो अहं एयम ॥१९॥ Twwerjainelibrary.org For Private & Personal use Day Jan Education Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कासि । परो वा जं दुक्खति वा जाव परितप्पइ वा नो परो एवमकासि, एवं से मेहावी सकारणं । वा परकारणं वा एवं विप्पडिवेदेति कारणमावन्ने । व्याख्या--नियतिवाद्येवं प्ररूपयति-यो 'बालो' मूर्खः स एवं जानाति यत्सुखदुःखाद्युत्पद्यते जन्तूनां तत्सर्व कालेश्वरादिकृतं जायते । तद्यथा-योऽहमस्मि दुःख-शारीरमानसमनुभवामि तथा 'सोयामि' इष्टानिष्टविप्रयोग[संप्रयोग] कृतं शोकमनुभवामि तथा 'तिप्पामि' शारीरबलात् क्षरामि तथा 'पीडामि' सबाह्याभ्यन्तरया पीडया पीडामनुभवामि । | तथा 'परितप्पामि' परितापमनुभवामि 'जूरयामि' अनार्यकर्मणि प्रवृत्तमात्मानं गर्हामि, अनर्थावाप्तौ विसूरयामि । तदेवं यदहं सुखदुःखशोकादिकमनुभवामि तत्सर्व मयैव परपीडयाऽर्जितं ममोदयमागतम् । तथा परोऽपि यत्सुखदुःखादिक. मनुभवति मयि वाऽऽपादयति तत्स्वयमेव कृतमिति दर्शयति-'परो चे' त्यादि । तथा परोऽपि यन्मां दुःखयति शोचयति इत्यादि प्राग्वज्ज्ञेयं, तत्सर्वमहमकार्षम् । बालोऽज्ञ एवं [वि]प्रतिवेदयति-जानीते । स्वकारणं वा परकारणं वा सर्व दुःखादि | पुरुषाकारा[दि] कृतमिति जानीते, तदेवं नियतिवादी पुरुषाकारकारणवादिनो बालत्वमापाद्य स्वमतमाह 'मेहावी' त्यादि, 'मेधावी' नियतिवादपक्षाश्रयी एवं विप्रतिवेदयति-जानीते । 'कारणमापन' इति नियतिरेव कारणं सुखदुःखाद्यनुभवस्य । तद्यथा-योऽहमस्मि 'दुःखयामि' शोचयामि तथा 'तिप्पामि 'त्ति परामि पीडामनुमवामि परितापमनुभवामि, नाहमेवमकार्ष दुःखं, अपि तु नियतित एवैतन्मय्यागतं, न पुरुषाकारादिकृतं, यतो-नहि कस्यचिदात्मा अनिष्टो, येनानिष्टा Jain Educati o For P n & Personal use only Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्र दीपिकान्वितम् । ॥ २० ॥ Jain Education दुःखोत्पादिकाः क्रियाः समारभते । नियत्यैवात्मा अनिच्छन्नपि तत्कार्यते येन दुःखी भवेत् । कारणमापन्न इति परेऽप्येवमायोजन (या) यम् । एवं स नियतिवादी दृष्टं पुरुषकारं परित्यज्य [अदृष्ट] नियतिपक्षाश्रयणेन महाऽविवेकी स्वकारणं परकारणं च दुःखशोकादिकमनुभवन्नियतिकृतमित्येवं विप्रतिवेदयति, नात्मना कृतं । कारणं चात्रैकस्या[सदनुष्ठानरतस्या ] पि न दुःखमुत्पद्यते परस्य तु सदनुष्ठायिनोऽपि तद्भवतीत्यतो नियतिरेव कर्त्रीति नियतिवादे स्थिते परमपि यत्किश्चि[च]त्सर्वं नियत्यधीनमिति दर्शयितुमाह से बेमि- पाइणं वा ४ जे तसथावरा पाणा ते एवं संघायमागच्छंति, ते एवं विपरियासभावज्जंति, ते एवं विवेगमागच्छंति, ते एवं विहाणमागच्छंति, ते एवं संगतियंति उवेहाए नो एवं विप्पडिवेति । तं जहा व्याख्या -सोsहं नियतिवादी ' ब्रवीमि ' प्रतिपादयामि, ये केचन प्राच्यादिषु दिक्षु त्रसाः स्थावराश्च प्राणिनस्ते सर्वेऽप्येवं नियतित एवौदारिकादिशरीरसम्बन्धमागच्छन्ति नान्येन केनचित्कर्मादिना शरीरं ग्राह्यन्ते, तथा बालकुमार-यौवन - स्थविर - वृद्धावस्थादिकं विविधं पर्याय नियतित एवानुभवन्ति, तथा नियतित एव ' विवेकं ' शरीरात्पृथग् मनुभवन्ति तथा नियतित एव विविधं विधानं ' अवस्थाविशेषं कुब्जकाण खञ्जत्रा मन कजरामरणं रोगशोकादिकं बीभत्समागच्छन्ति । तदेवं ते प्राणिनखताः स्थावरा ' एवं ' पूर्वोक्तया नीत्या सङ्गतिं यान्ति-नियतिमापन्नाः नानाविध द्वितीये श्रु० मत चतुष्कोपसंहारः । ॥ ॥ २० ॥ Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विधानभाजो भवन्ति । तदुत्प्रेक्षया-नियतिवादोत्प्रेक्षया यत्किञ्चनकारितया परलोकभीखो नैतद्विप्रतिवेदयन्ति-जानन्ति । तदेवाऽह किरियाति वा जाव निरएचि वा अणिरएत्ति वा, एवं ते विरूवरूवेहि कम्मसमारंभेहिं विरू| वरूवाई कामभोगाडं समारंभंति भोयणाए । एवामेव ते अणारिया विप्पडिवन्ना तं सहहमाणा IN जाव इति ते णो हव्वाए णो पाराए अंतरा कामभोगेसु विसन्ना। चउत्थे पुरिसजाते णियइवातिए त्ति आहि[ए] जति । व्याख्या-ते नियतिवादिनो नियतिपक्षमेवाश्रिताः नान्यत्किमपि विदन्ति-क्रियामक्रियां सिद्धिमसिद्धिं चेत्यादि न जानन्ति । नियतिमेवाश्रित्य तमेव नियुक्तिकं नियतिवादं श्रद्दधानास्तमेव प्रतीयन्त इत्यादि तावन्नेयं यावदन्तरा कामभोगेषु विषण्णा आत्मानमन्यांश्चोद्ध मशक्ताः ऐहिकामुष्मिकाद्भष्टा मुक्तिनप्राप्ता अन्तराल एव संसारपङ्के मग्नाः [पद्मवर] पुण्डरीकोद्धरणासमर्थाः सन्त एवमेवावतिष्ठन्ते इति चतुर्थः पुरुषजातः समाप्त इति । एतावता चतुर्थः पुरुषो नियतिपक्षाश्रित उक्तः। उपसञ्जिघृक्षुराह इच्छेते चत्तारि पुरिसजाता णाणापन्ना णाणाछंदा गाणासीला जाणादिट्ठी णाणारुई नाणा Jain Education Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा त्रं दीपिका द्वितीये श्रु० मिक्षुरूपपश्चम पुरुषस्वरूपम्। न्वितम् । ॥ २१॥ रंभा नाणाझवसाणसंजुत्ता पहीणपुत्वसंजोगा आरियं मग्गमसंपत्ता इति ते णो हवाए णो पाराए, अंतरा कामभोगेसु विसन्ना (सू० १२)। व्याख्या-' इत्येते' पूर्वोक्तास्तज्जीवतच्छरीर-पञ्चमहाभूतेश्वरकर्तृत्व-नियतिवाद-पक्षाश्रयिणश्चत्वारः पुरुषाः नानाप्रकारा'प्रज्ञा'मतिर्येषां ते तथा 'नानाछन्दा' नानाऽभिप्रायाः 'नानाशीला' नानाऽऽचारा इत्यर्थः, नानारूपा 'दृष्टि'. दर्शनं येषां ते नानादृष्टयः। तथा नानारुचयः 'नानाऽऽरम्भाः' नानाप्रकारधर्मानुष्ठानाः नानाऽध्यवसायसंयुक्ताःधर्मार्थमुद्यताः परित्यक्तपूर्वसंयोगा:-मातृपितृकलत्रपुत्रसम्बन्धाः आर्यमार्गमसम्प्राप्ताः, इति पूर्वोक्तया नीत्या ते चत्वारोऽपि नास्तिकादयः पुरुषाः 'नो हव्वाए 'त्ति नैहिकसुखमाजो भवन्ति तथा 'नो पाराए 'त्ति असम्प्राप्तत्वादार्यमार्गस्य सर्वोपाधिशुद्धस्य प्रगुणमोक्षपद्धतिरूपस्य न संसारपारगामिनो भवन्ति । न च परलोके शुभ[सुख ]भाजो भवन्तीति, किन्त्वन्तराल एव-गृहवासार्यमागयोर्मध्यवर्तिन एव कामभोगेषु 'विषण्णाः' अध्युपपन्ना, दुष्पारपङ्कममा इव करिणो विषीदन्तीति स्थितम् । उक्ताः परतीर्थिकाः, साम्प्रतं लोकोत्तरं रूक्षवृत्ति भिक्षु पञ्चमं पुरुषजातमधिकृत्याह से बेमि पाईणं वा०४ संतेगतिया मणुस्सा भवांत, तं जहा-आरिया वेगे अणारिया वेगे उच्चागोया वेगे नीयागोया वेगे कायमंता वेगे हस्समंता वेगे सुवन्ना वेगे दुवन्ना वेगे सुरूवा वेगे दुरूवा ॥२१॥ For Private & Personal Use Oly Jain Education wwjainty.org Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education वेगे X तेसिं चणं खेत्तवत्थूणि परिग्गहियाणि भवति, तं जहा- अप्पयरा वा भुज्जयरा वाX, तेसिं चणं जणजाणवयाइं परिग्गहियाइं भवंति, तं जहा- अप्पयरा वा भुज्जयरा वा, तहप्पगारेहिं कुलेहिं आगम्म अभिभूय एगे भिक्खायरियाए समुट्ठिता संतो वि एगे णायओ [ अणायओ] य उवगरणं च विजहाय भिक्खायरियाए समुट्ठिता, असतो वा [वि] णायओ य अणायओ य उवगरणं च विप्पजहाय भिक्खायरियाए समुट्ठिता, [ जे ते सतो वा असतो वा णायओ य अणायओ य उवगरणं च विष्पजहाय भिक्खायरियाए समुट्ठिता ] पुवमेव तेहिं णायं भवति, तं जहा व्याख्या - यादृक्कामभोगेष्व (ना) मक्तः सन्नन्तरा नावसीदति पद्मवरपुण्डरीको दुरणाय च समर्थो भवति तदेतदहं ब्रवीमि - प्राचीनादिकामन्यतरां दिशमुद्दिश्य एके केचन मनुष्याः सन्ति, आर्यानार्याः उच्चैर्गोत्राः नीचैर्गोत्राः * ' कायवन्तः प्रांशवः 'इस्वा:' वामनाः* सुवर्णाः दुर्वर्णाः सुरूपाः कुरूपाः, एके केचन कर्मपरवशा भवन्ति तेषां च क्षेत्राणि वास्तूनि - [ गृहाणि ] x x नास्त्येतञ्चिन्हान्तर्गतो मूलपाठः सवृत्तिकमुद्रित प्रतिषु वृत्तिस्तु विहिता वृत्तिकृत्पूज्यैः । * एतञ्चिन्हान्तर्गतो वृत्तिपाठः " कुरूपाः " इत्यतोऽनन्तरमस्ति सर्वास्वपि दीपिका प्रतिषु परं सूत्रानुसारतो युज्यतेऽत्रैवातोऽत्र नियोजितः । Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग द्वितीये सूत्र INI दीपिकान्वितम् । प्राणिनोप्राणस्वं. कामभोगैः। ॥२२॥ खातोच्छ्रिता[दी]नि परिगृहीतानि भवन्ति, तान्येव विशिनष्टि-अल्पतराणि स्तोक[? प्रभृत ]तराणि वा भवन्ति, तेषामेव जन| [जान ]पदाः परिगृहीता भवन्ति, तेऽप्यल्पतराः प्रभूततरा वा भवेयुस्तथा तेषु चाऽऽर्यादिविशेषणविशिष्टेषु तथाप्रकारेषु कुलेवागम्य एवम्भूतानि गृहाणि गत्वा तथाप्रकारेषु कुलेषु वा आगम्य-जन्म लब्ध्धा अभिभूय च विषयकषायादीन् परीपहोपसर्गान् वा सम्यगुत्थानेनोत्थाय-प्रव्रज्यां गृहीत्वा एके केचन तथाविधसत्ववन्तो भिक्षाचर्यायां समुत्थितास्तथा 'सतो' विद्यमानानपि वा 'एक' केचन महासचोपेताः 'ज्ञातीन् ' स्वज[नान् 'अज्ञातीन् ' परिज ]नांस्तथोपकरणं चकामभोगाङ्गं धनधान्यहिरण्यादिकं विविधं प्रकर्षेण 'हित्वा' त्यक्त्वा भिक्षाचर्यायां समुत्थिताः । असतो वा ज्ञाती(नज्ञाती)नुपकरणं च विप्रहाय भिक्षाचर्यायामेके केचनापगतस्वजनविभवाः समुत्थिताः, ये ते पूर्वोक्तविशेषणविशिष्टा भिक्षाचर्यायामम्पद्यताः ' पूर्वमेव ' प्रव्रज्याग्रहणकाल एव तैरेतत् ज्ञातं भवति, तद्यथा इह खलु पुरिसे अन्नमन्नं ममट्ठाए एवं विप्पडिवेदेति, तं जहा-खेतं मे वत्थू मे हिरणं मे सुवन्नं मे धणं मे धन्नं मे कंसं मे दूस मे, विपुलधणकणगरयणमणिमोत्तियसंखसिलप्पवालरत्तरयणसंतसारसावतेयं मे, सदा मे रूवा मे गंधा मे रसा मे फासा मे, एते खलु मम कामभोगा अहं खलु एतेसिं । से मेहावी पुवामेव अप्पणो एवं समभिजाणेज्जा, तं जहा व्याख्या-इह जगति, खलु-क्यिालङ्कारे, अन्यदन्यद्वस्तूद्दिश्य ममैतद्भोगाय भविष्यतीत्येवमसौ प्रव्रज्या प्रतिपना रेतर जात भवाः समुत्थिता, या सवस्थिताः वा॥२२॥ For Private & Personal use only TATiww.jainelibrary.org Jain Education inte Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रविजिषुर्वा ' प्रवेदयति ' जानाति, यथा-क्षेत्रं 'वास्तु' गृहं हिरण्यं सुवर्ण धनं धान्यं काँस्य दृष्यं [तथा] विपुलधनकनकरत्नमणिमौक्तिकशङ्खशिलाप्रवालरक्तरत्नादिकं सत्सारं 'स्वापतेयं' द्रव्यजातं सर्व मे, तन् 'मे' ममोपभोगाय भविष्यति । तथा शब्दा: रूपाणि गन्धाः रसाः स्पर्शाः, एते सर्वे खलु मे कामभोगाय भविष्यन्ति, अहमप्येषां योगक्षेमार्थ प्रभविष्यामि, इत्येवं सम्प्रधार्य पूर्वमेवात्मानं विजानीया-देवं पर्यालोचयेत्तद्यथा इह खलु मम अन्नयरे [ दुक्खे ] रोगातंके समुप्पजेजा अणि? अकंते अप्पिए असुभे अम| गुन्ने अमणामे दुक्खेणो सुहे से हंता, भयंतारो! कामभोगा! इमं मम अन्नतरं दुक्खं रोगायंकं परियाइयह, अणिटुं अकंतं जाव दुक्खं णो सुहं, ताऽहं दुक्खामि वा सोयामि वा जूरामि वा तिप्पामि वा पीडामि वा परितप्पामि वा इमाओ मं अन्नयराओ दुखाओ रोगातंकाओ परिमोयह, अणिट्ठाओ जाव अमणामाओ दुक्खाओ, णो सुहाओ, एवं नो लद्धपुत्वं भवति । ___ व्याख्या-' इह ' संसारे, खल्वरधारणे । ' इह ' मनुष्यभवे ममान्यतरदुःख-शिरोवेदनादिकं 'आतङ्को' वा आशु. जीवितव्यापहारी शूलादिकः समुत्पद्यते । कीदृशः ? अनिष्टः अकान्तः अप्रियः अशुभः अमनोज्ञः अवनामः दुःखः, दुःख हेतुत्वात् 'णो सुहे' सुखलेशेनाप्यस्पृष्टः, एवंविधः आतङ्क आयाति तदा कामभोगान् प्रत्येवं वक्ति, यथा-'हंत' इति खेदे, भयात्रातारो यूयं क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यादिकाः परिग्रहविशेषाः, तथा शब्दादयो वा विषयाः, हे म[ग]वन्तः ! Jain Education ine ral For Private Personal use Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग - स्त्रं दीपिकान्वितम् । कामभोगा! यूयं मया पालिताः परिगृहीता[१], अतो यूयमपीदं दुःखं रोगातक 'परियाइयह 'त्ति विभागशः परिगृहीत यूयं, अत्यन्तपीडयोद्विग्नः पुनस्तदेव दुःखं रोगातक्षं च विशेषणद्वारेणोच्चारयति-[अनिष्टं] अकान्तमप्रियमशुभं, यावदमनोज्ञं दुःखमेव, ततोऽशुभमित्येवम्भूतं ममोत्पन्न, यूयं विमजत, अहमतीव दुःखामि' दुःखित इत्यादि पूर्ववन्नेयं, इत्यतो [ऽमुष्मान्] मामन्यतराहुःखाद्रोगाद्वा प्रतिमोचयत । अनिष्टादित्यादि विशेषणानि पूर्ववव्याख्येयानि, प्रथमं प्रथमान्तानि, पुनर्द्वितीयान्तानि, साम्प्रतं पश्चम्यन्तानि । एवं तेन दुःखोद्विग्नेन प्रतिपादितं परं नैतल्लब्धपूर्व भवति, न हि ते क्षेत्रादयः परिग्रहविशेषाः नापि शब्दादयः कामभोगास्तं दुःखितं दुःखाद्विमोचयन्तीत्येतदेव लेशतो दर्शयति इह खलु कामभोगा नो ताणाए वा[णो]सरणाएवा, पुरिसे वा एगया पुत्विं कामभोगे विप्प- | जहति, कामभोगा वा एगया तं पुरिसं विप्पजहंति, अन्ने खलु कामभोगा अन्नो अहमसि, से किमंगपुण वयं अन्नमन्नेहि कामभोगेहिं मुच्छामो इति संखाए णं वयं च कामभोगे विप्पजहिस्सामो। व्याख्या-इह खल्विमे काममोगा अत्यन्तमभ्यस्ता न 'तस्य' दुःखितस्य त्राणाय शरणाय[वा ] भवन्ति । सुलालितानामपि कामभोगानां पर्यवसानं दर्शयति–'पुरुषो वा' प्राणी 'एकदा' रोगोत्पत्तिकाले जराजीर्ण काले वा अन्यस्मिन्वा राजाद्युपद्रवे ' तान् ' कामभोगान् परित्यजति स वा प्राणी द्रव्याद्यभावे तैः कामभोगैस्त्यज्यते । स च प्राण्येवमव. धारयति-दमे कामभोगा अन्ये तेभ्यश्चाहमन्यः, तदेवमेतेषु परभूतेषु किमिति वयं मृछौं कुर्मः १ एवं केचन महापुरुषाः द्वितीये श्रु. केनाप्यग्रामत्वं कर्मोदयागतसुखदुःखस्य। ॥ २३॥ ॥ २३ ॥ Jain Education a l Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'परिसंख्याय ' ज्ञात्वा [ये] " कामभोगान् [ वयं] 'विप्रजहिष्याम'स्त्यक्ष्यामः" इत्येवमध्यवसायिनो भवन्ति-ते महापुरुषा ज्ञेयाः। पुनरपरं वैराग्योत्पत्तिकारणमाह से मेहावी जाणेज्जा बाहिरंगमेयं, इणमेव उवणीयतरागं, तं जहा-माता मे पिता मे भाया मे भइणी मे भजा मे पुत्ता मे धूया मे पेसा मे नत्ता मे सुण्हा मे सुही मे [पिया मे सहा मे ] सयणसंगंथसंथुया मे, एते खलु मम नायओ अहमावि एतोस । एवं से मेहावी पुत्वामेव अप्पणा एवं समभिजाणिज्जा। ___व्याख्या-एते खलु क्षेत्रवास्तुप्रभृतयः परिग्रहविशेषाः शब्दादयश्च विषयाः दुःखपरित्राणाय न भवन्तीत्युक्तं, तदेते बाह्या विद्यन्ते, परमेते मातापित्रादयो ज्ञातयः पूर्वापरसँस्तुता एते ममोपकाराय भविष्यन्तीत्यहमपि [ए]तेषां स्नानभोजनादिनोपकरिष्यामीत्येवं स मेधावी पूर्वमेवात्मना एवं समभिजानीयादित्येवं पर्यालोचयेत्-कल्पितवानिति । एतदध्यवसायी चासौ स्यादिति दर्शयितुमाह___इह खलु मम अन्नयरे दुक्खे रोगायके समुप्पजेजा अणिढे जाव दुक्खे, णो सुहे, से हता भयंतारो य णायओ य इमं मम अन्नयरं दुक्खं रोगायकं परियादियह, अणिटुं जाव णो सुहं, Jain Education a l Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं IN दीपिकान्वितम् । केनाप्य. ग्राह्यत्वं ॥२४॥ फलस्य । ताऽहं दुखामि वा सोयामि वा जाव परितप्पामि वा,इमाओ मं अन्नयराओ [दुक्खाओ] रोगायंकाओ द्वितीय परिमोएह अणिट्ठाओ जाव णो सुहाओ, एवामेव नो लद्धपुत्वं भवइ । तेसिं वा वि भयंताराणं मम णाययाणं अन्नयरे दुक्खे रोगातंके समुप्पजेज्जा अणिढे जाव णोसुहे, से हंता अहमेतेसिं भयंताराणं णाययाणं इमं अन्नयरं दुक्खं रोगसतंकं परियाइयामि अणिटुंजाव णो सुहं, मा मे दुक्खंतु वा [जाव स्वकृतकर्ममा मे परितप्पंतु वा ], इमाओ[f] अन्नयराओ दुक्खाओ रोयातंकाओ परिमोएमि अणिट्ठाओ जाव णो सुहाओ । एवामेव नो लद्धपुवं भवति-अन्नस्स दुक्खं अन्नो नो परियादियति अन्नेण क(ड)तं || अन्नो नो पडिसंवेदेति, पत्तेयं जायति पत्तेयं मरति पत्तेयं चयति पत्तेयं उववज्जति पत्तेयं झंझा NI पत्तेयं सन्ना पत्तेयं मन्ना, एवं विन्नू वेदणा, इति खलु नातिसंजोगा णो ताणाए वा सरणाए वा, पुरिसे य एगया पुत्विं नातिसंजोए विप्पजहति नातिसंजोगा वा एगया पुत्विं पुरिसं विप्पजहंति। अन्ने खलु नातिसंजोगा अन्नो अहमंसि, किमंग पुण वयं अन्नमन्नेहिं णातिसंगहि मुच्छामो ? ||॥ २४ ॥ Jain Education inteHE For P ale & Personal Use O Claw.jainelibrary.org Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इति संखाए णं वयं नातिसंजोगं विप्पजहिस्सामो इति । का व्याख्या-'इह' अस्मिन् मवे मम वर्तमानस्य अनिष्टादिविशेषणविशिष्टो दुःखातङ्कः समुत्पद्येत, ततोऽसौ तहुःखA दु:खितो ज्ञातीनेवमभ्यर्थयेत् , तद्यथा-इदं ममान्यतरं दुःखातई समुत्पन्नं परिगृहीत यूयं, अहमनेन दुःखातङ्केन पीडि तोऽस्मि, अतोऽमुष्मान्मां परिमोचयत यूयमिति । न चैतत्तेन दुःखितेन लब्धपूर्व भवति, न हि ते ज्ञातयस्तं दुःखान्मोचयि. तुमलमिति भावः, नाप्यसौ तेषां दुःखमोचनायालमिति । 'तेसिं वा वि भयंताराणं मम नाययाण'मित्यादि सर्व प्राग्वद्योजनीयं, यावदेवं नो लब्धपूर्व भवतीति । किमित्येवं नो लब्धपूर्व भवतीत्याह-'अन्नस्स दुक्खं नो अन्नो NI परियादियह इत्यादि, सर्वस्यैव संसारोदरविवस्वर्जिनोऽसुमतः स्वकृतकम्र्मोदयाद्यदुःखमुत्पद्यते तदन्यस्य दुःखमन्यो माता पित्रादिको न पर्यादत्ते तस्मात्पुत्रादेवुःखेनात्यन्तं पीडिताः स्वजना नापि तदुःखमात्मनि कर्तुमलं । किमित्येवमाशङ्कथाह'अन्नेण कडं अन्नो नो पडिसंवेदेति' अन्येन जन्तुना मोहवशगेन यत्कृतं कर्म तदन्यः प्राणी नो प्रतिसंवेदयति-नानुभवति, तदनुभवने यकृतागमकृतनाशौ स्यातां, न चेमौ युक्तिसंगतौ, अतो यद्येन कृतं तत्स एवानुभवति, यस्मात्स्वकृतकर्मफलेश्वरा जन्तवस्तस्मात् 'पत्तेयं जायति पत्तेयं मरति' इत्यादि, सर्वोऽपि प्राणी प्रत्येकं जायते प्रत्येकं च म्रियते, यतः-"एकस्य जन्ममरणे, गतयश्च शुभाशुभा भवावत। तस्मादाकालिकहित-मेकेनैवात्मनः कार्यम् ॥ १॥" इति । तथा * नास्त्येष शब्दो मुद्रितासु सवृत्तिकप्रतिषु हर्षकुलीयदीपिकायामपि । Jan Education in Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग द्वितीये सूत्रं दीपिका- न्वितम् । प्रत्येक क्षेत्रवास्तु] हिरण्यसुवर्णादिकं परिग्रहं शब्दार्दीश्च विषयान्मातापितृपुत्र कलत्रादिकं [च त्यजति । प्रत्येकमुपपद्यते, प्रत्येक 'झंझा' कलहः कषायाश्च प्रत्येकं मन्द-तीव्रतया समुत्पद्यन्ते । तथा प्रत्येकं 'सज्ञा' अर्थपरिच्छित्तिः, साऽपि मन्दमन्दतरपटुपटुतरभेदात्प्रत्येकमुपजायते । सर्वज्ञादारतस्तरतमयोगेन मतेर्व्यवस्थितत्वात् । तथा प्रत्येकं ' मननं ' पर्यालोचनं तथा + प्रत्येकमेव सुखदुःखानुभवः। उप[सं]जिघृक्षुराह-' इति खलु नातिसंजोगा नो ताणाए वा सरणाए वा' इति पूर्वोक्तप्रकारेण, यतो नान्येन कृतमन्यः प्रतिसंवेदयते प्रत्येकं[च]जातिजरामरणादिकं, ततः खल्वमी ज्ञातिसंयोगाः संसारेऽत्यन्तपीडितस्य तदुद्धरणे न त्राणाय नापि शरणाय । किमिति ? यतः पुरुष एकदा क्रोधोदयेन ज्ञातिसंयोगान् 'विप्रजहाति ' त्यजति स्वजना वा तदनाचारदर्शनतस्तं पुरुषं त्यजन्ति । तदेवं व्यवस्थिते एवं भावयेत्-खल्वमी ज्ञातिसंयोगा मत्तो भिन्ना, एम्यश्चाहमन्यः । ततः किमन्यैरिन्यैातिसंयोगैर्मुच्छां कुर्मः? न तेषु मुर्छा क्रियमाणा न्याय्येत्येवं 'संख्याय 'ज्ञात्वा वयमुत्पन्नवैराग्या ज्ञातिसंयोगाँस्त्यक्ष्याम इत्येवं ये कृताध्यवसायिनस्ते 'विज्ञाः' पंडिता, ते विदितवेद्या भवन्तीति । साम्प्रतमन्येन प्रकारेण वैराग्योत्पत्तिकारणमाह __ से मेहावी जाणिज्जा बाहिरगमेयं, इणमेव उवणीयतरागं, तंजहा-हत्था मे पाया मे बाहा मे ऊरू मे उदरं मे सीसं मे सील मे आऊ मे बलं मे वण्णो मे तया मे छायामे सोयं मे चक्खू मे घाणं मे + " प्रत्येकमेव 'विष्णु 'त्ति विद्वान् , तथा" इति बृहदवृत्तौ । आधेऽध्ययने त्राणशरणाक्षमत्वं ज्ञातिस्व ॥ २५॥ जनादी नाम् । KI॥ २५ For Private Jain Education.indian Personal Use Only Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिब्भा मे फासा मे ममातिजति वयाओ पडिजूरति, तंजहा-आऊओ बलाओ वन्नाओ तयाओ छायाओ सोयाओ जाव फासाओ, सुसंधिता संधी विसंधी हवंति। वलि[य]तरंगे गाए भवति । किण्हा केसा पलिया भवंति । तंजहा-जंपि य इमं सरीरं उरालं आहारोवचियं, एयपि य अणुपुवेणं विप्पजहियवं भविस्सति । एवं संखाए से भिक्खू भिक्खायरियाए समुट्ठिए दुहओ लोग जाणेजा, [तंजहा-] जीवा चेव अजीवा चेव, तसा चेव थावरा चेव (सू. १३)। व्याख्या-स मेधावी एतद्वक्ष्यमाणं जानीयात् , तद्यथा-बाह्यतरमेतज्ज्ञातिसम्बन्धनमिदं, इदमुपनीततर-मासनतरं, शरीरावयवानां आसन्नतरत्वात् । तद्यथा-हस्तौ मे पादौ मे पद्मगर्भसुकुमालौ, नान्यस्य कस्यापीदृशावित्यादि । शीर्ष मे उदरं मे शीलं मे आयुर्मे वर्णवलत्वचाछायाश्रोत्रचक्षुर्नासिकाजिह्वास्पर्शनेन्द्रियमित्याद्यगोपाङ्गाः सर्वेऽपि सुन्दरतराः, इत्येवं 'ममाति' ममी करोति, यादृक् मे न तादृगन्यस्येति भावः। एतच्च हस्तपादादिकं स्पर्शनेन्द्रियपर्यवसानं वयसः परिणामात्कालकृतावस्थाविशेषात् 'परिजरह 'त्ति परिजीर्यते-जीर्णतां याति, प्रतिक्षणं विशरारुतां याति । तस्मिंश्च प्रतिक्षणं विशीर्यति शरीरे प्रतिसमयं प्राण्येतस्माद्भश्यते, तद्यथा-आयुषः पूर्वनिबद्धात्समयादिहान्या अपचीयते, आवीचीमरणेन प्रतिसमयं मरणाभ्युपगमात् । तथा बलादपचीयते, तथाहि-यौवनावस्थायाश्यत्रमाने शरीरके प्रतिक्षणं शिथिली Ein Education inte For PrivatePersonal Use Only HAMww.jainelibrary.org Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्र दीपिकान्वितम् ।। द्वितीये श्रुत. आयेऽध्य यने संसारा ॥२६॥ सारता भवत्सु सन्धिबन्धनेषु बलादवश्यं भ्रश्यते । तथा वर्णाचचश्छायातोऽपचीयते । अत्र सनत्कुमारचक्रिणो दृष्टान्तो वाच्यः। तथा जीर्यति शरीरे श्रोत्रादीन्द्रियाणि हीयन्ते । तथा च वयोहान्या ' सुसन्धितः' सुबद्धः 'सन्धि' र्जानुकूपरादिको विसन्धिर्भवति-विग[लि]तवन्धनो जायते । तथा वलितरङ्गाकुलं सर्वतः शिरा( नाड़ी )जालवेष्टितमिदं वपुरुद्वेगकुद्भवति । तथा कृष्णाः केशाः वयोहान्या धवला जायन्ते । ततो वयःपरिणामे सन्मतिरेवं भावयेत् , तथाहि-यदपीदं शरीरं उदारशोमं विशिष्टाहारोपचितं एतदपि ममावश्यं प्रतिक्षणं विशीर्यमाणमायुषः क्षये विप्रहातव्यं भविष्यतीत्येतदवगम्य-संख्याय परित्यक्तसमस्तगृहप्रपञ्चो निष्किञ्चनतामुपगम्य संयमयात्राऽर्थ भिक्षाचर्यायां समुत्थितः सन् द्विधा लोकं जानीयात् । तदेव लोकद्वैविध्यं दर्शयति-'जीवा चेव अजीवा चेव, तसा चेव थावरा चेव' तत्र जीवा:-प्राणधारणलक्षणास्तद्विपरीता अजीवा धर्मास्तिकायादयः, तत्र भिक्षोरहिंसाप्रसिद्धये जीवान् विभागेन दर्शयति-इह खलु जीवा अपि द्विधा-प्रसाः स्थावराश्च, तेऽपि सूक्ष्मवादरपर्याप्तापर्याप्तकभेदेन बहुधा द्रष्टव्याः। एतेषु चोपरि बहुधा व्यापारः प्रवर्त्तते । अथ तदुपमर्दकव्यापारकर्तृन दर्शयितुमाह इह खलु गारत्था सारंभा सपरिग्गहा, संतेगतिया समणा माहणा वि सारंभा सपरिग्गहा, जे इमे तसा थावरा पाणा, तेसयं समारंभंति, अन्नेण वि समारंभाविति, अन्नं पि समारंभंतं समणुजाणंति। व्याख्या-इह खलु संसारे गृहस्थाः ' सारम्भाः' जीवोपमईकारिणो वर्त्तन्ते सपरिग्रहाश्च वर्तन्ते, न केवलं गृहस्था प्रदर्शनम्। Jain Education in For Privats & Personal Use Oh T ww.jainelibrary.org Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In एव, अन्येऽपि श्रमणाः शाक्यादयः ब्राह्मणाश्च पचनपाचनाद्यनुमतेः सारम्भाः सपरिग्रहाः एवंविधा एव गृहिण एव, ततश्च ये इमे त्रसाः स्थावराश्च प्राणिनस्तान् स्वयं समारम्भन्ते, तदुपमर्दकं व्यापारं स्वत एव कुर्वन्तीत्यर्थः । तथा अन्याँच समारम्भयन्ति, समारम्भं कुर्वतश्चान्यान् समनुजानन्ति । तदेवं प्राणातिपातमुपदर्य परिग्रहं मोगाङ्गभूतं दर्शयितुमाह • इह खलु गारत्था सारंभा सपरिग्गहा, संतेगतिया समणा माहणा[वि]य सारंभा सपरिग्गहा य, जे इमे कामभोगा सचित्ता वा अचित्ता वा, ते सयं परिगिति, अन्नेण वि परिगिण्हाविंति, अन्नं पि परिगतं समणुजाणंति । व्याख्या - इह खलु जगति गृहस्थाः सारम्भाः सपरिग्रहाः, तथा श्रमणा ब्राह्मणा अपि केचन सारम्भाः सपरिग्रहाः, ते च किं कुर्वन्ति ? ये इमे कामभोगाः सचित्ता अचित्ता वा भवेयुस्तदुपादानभूतश्चार्थांस्ते कामभोगार्थिनो गृहस्थादयः स्वत एव परिगृह्णन्ति, अन्येन च परिग्राहयन्ति, अपरं च परिगृह्णन्तं समनुजानते । इह खलु गारत्था सारंभा सपरिग्गहा, संतेगतिया समणा माहणा वि सारंभा सपरिग्गहा, अहं खलु अणारंभे अपरिग्गहे, जे खलु गारत्था सारंभा सपरिग्गहा संतेगतिया समणा माहणा वि सारंभा सपरिग्गदा य, ऐतेसिं चेव निस्साए बंभचेरवासं वसिस्सामो, कस्स णं तं हेउं ? जहा Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सत्र IN दीपिकान्वितम् । ॥ २७॥ पुवं तहा अवरं जहा अवरं तहा पुवं, अंजू एते अणुवरया अणुवट्ठिया पुणरवि तारिसगा चेव । ___व्याख्या-इह जगति विद्यन्ते गृहस्थास्तथाविधाः श्रमणा ब्राह्मणाश्च सारम्माः सपरिग्रहाः, इत्येवं ज्ञात्वा स भिक्षुरेवमवधारयेत्-अहमेवात्र खल्वनारम्भोऽपरिग्रहश्च, ये चामी गृहस्थादयः सारम्भादिगुणयुक्तास्तदेतनिश्रया-तदाश्रयेण 'ब्रह्मचर्य' श्रामण्यमाचरिष्यामः, अनारम्भा अपरिग्रहाः सन्तो धर्माधारदेहप्रतिपालनार्थमाहारादिकृते सारम्भसपरिग्रहगृहस्थनिश्रया प्रव्रज्यां करिष्याम इति । ननु च यदि तन्निश्रया विहर्तव्यं किमर्थं पुनस्ते त्यज्यते ? इति जाताशङ्कः कश्चित्पृच्छति-'कस्य हेतोः' केन कारणेन तदेतद्गृहस्थश्रमणब्राह्मण त्यजनमभिहितमिति, आचार्योऽपि विदिताभिप्राय उत्तरं ददाति-"जहा पुवं तहा अवरं" यथा पूर्व-मादौ सारम्भपरिग्रहत्वं तेषां तथा 'पश्चादपि' सर्वकालमपि कालमाप गृहस्थाः सारम्भादिदोषदुशाः, श्रमणाश्च केचन यथा 'पूर्व' गृहस्थभावे सारम्भाः सपरिग्रहास्तथा “[अ]परस्मिन्' प्रव्रज्याकाले तथाविधा एव सारम्भाः सपरिग्रहाः प्रवर्त्तन्ते, तथा 'जहा अवरं तहा पुव्वं यथा 'अपरं' अपरस्मिन् प्रव्रज्याप्रतिपत्तिकाले तथा पूर्वमपि गृहस्थभावादावपीति, यदि वा कस्य हेतोस्तद्गृहस्थाद्याश्रयणं क्रियते ? यतिनेत्याहयथा 'पूर्व ' प्रव्रज्यारम्भकाले सर्वमेव भिक्षादिकं गृहस्थायत्तं वर्तते तथा पश्चादपि, अतः कथं नु नामानवद्या वृत्तिविप्यतीत्यतः साधुभिरनारम्मैः सारम्भाश्रयणं विधेयम् । यथा चैते गृहस्थादयः सारम्भाः सपरिग्रहाश्च तथा प्रत्यक्षेणैवोपलभ्यन्त इति दर्शयितुमाह-'अंजू एते अणुवरया अणुवट्ठिया पुणरवि तारिसगा चेव' अंजू इति व्यक्तं-स्पष्टमेतदेते गृहस्थादयोऽथवा 'अंजू' इति प्रगुणेन न्यायेन सावद्यानुष्ठानेम्य ' अनुपरता' अनिवृत्ताः परिग्रहारम्भाच्च सत्संयमा द्वितीये I श्रुत आयेऽध्ययनेज्यदर्शनीनां सारम्मसपरिग्रहत्वम्। G ॥२७॥ wwwjainelibrary.org Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नुष्ठानेन वा 'अनुपस्थिताः' सम्यगुत्थानमकृतवन्तो येऽपि कथञ्चिद्धर्मकरणायोत्थितास्तेप्युद्दिष्टभोजित्वात्सावद्यानुष्ठानपरत्वाच्च गृहस्थकल्पा एवेति । [ साम्प्रतमुपसंहरति-] जे खल गारत्था सारंभा सपरिग्गहा, संतेगइया समणा माहणा वि सारंभा सपरिग्गहा, दुहतो पावाइं कुवंति, इति संखाए दोहि वि अंतेहिं आदिस्समाणो इति भिक्ख एज्जा। ___ व्याख्या-ये इमे गृहस्थादयस्ते द्विधाऽपि मारम्भसपरिग्रहत्वाम्यामुभाम्यामपि पापान्युपाददते, यदि वा रागद्वेषाम्यां यदि वा गृहस्थप्रव्रज्यापर्यायाभ्यां उमाभ्यां पापानि कुर्वत इत्येवं 'संख्याय' ज्ञात्वा द्वयोरप्यन्तयो रारम्भपरिग्रहयो] रागद्वेषयोर्वा अदृश्यमानो भिक्षुरनवद्याहारभोजी सत्संयमानुष्ठाने रीयेत' प्रवत । से बेमि-पाईणं वा ४ जाव एवं से परिन्नायकम्मे, एवं से वियय[ववेयकम्मे । एवं से वियंतकरए भवतीति मक्खायं (सू. १४) ___ व्याख्या-'से बेमि' तदहमधिकृतमेवार्थ विशेषिततरं सोपपत्तिकं ब्रवीमि-प्रज्ञापकापेक्षया प्रच्यादिकाश दिशोऽन्यतरस्याः समायातः-स भिक्षुयोरप्यन्तयोरदृश्यमानतया सत्संयमे रीयमाणः सन्नेवमनन्तरोक्तेन प्रकारेण ज्ञपरिक्षया ज्ञात्वा प्रत्याख्यानपरिक्षया च प्रत्याख्याय+ कर्मणामन्तद्भवति । अनेन प्रकारेण संसारस्याप्यन्तकृद्भवतीत्येतत्तीर्थ + "परिक्षातकर्मा भवति, पुनरपि 'एवमिति परिज्ञातकर्मत्वाव्यपेतकर्मा भवति-अपूर्वस्याबन्धको भवतीत्यर्थः, पुनरेवमित्य . Jain Education ind i a Far Private & Personal use Oh wwwEjainelibrary.org Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडागकरगणधरैराख्यातमिति प्राणिवधप्रवृत्तस्य न कर्मापगमो भवति, यतस्तत्प्रवृत्तस्यात्मौपम्येन प्राणीनां पीडोत्पद्यते, तया सूत्रं च कर्मवन्धः, इत्येवं सर्व मनस्याधायाहदीपिका तत्थ खलु भगवया छज्जीवनिकाया हेऊ पन्नत्ता, तंजहा-पुढविका[ए]इया जाव तसका[ए]इया न्वितम् । से जहा नामए ममं अस्सायं दंडेण वा अट्ठीण वा मुट्ठीण वा लेलूण वा कवालेण वा आउडिज॥२८॥ माणस्स वा हम्ममाणस्स वा तजिजमाणस्स वा ताडिज्जमाणस्स वा परियाविजमाणस्स वा किलि [किलामि]ज माणस्स वा ४ उद्दविजमाणस्स वाजाव लोमुक्खणणमातमवि हिंसाकारगं दुःखं भयं पडिसंवेएमि, इच्चेवं जाणं सवे जीवा सत्वे भूया सवे पाणा सवे सत्ता दंडेण वा जाव कवालेण वा आउद्दिजमाणा+ वा हम्ममाणा वा तजिजमाणावा तालिजमाणा वा परिताविजमाणा वाकिलाबन्धकतया योगनिरोधोपायत: xxxविशेषेण" इति बृहद्वृत्तौ ।। x अर्थसङ्गत्या 'ओदविज.' इत्येवं पाठो युज्यत इत्येष ममाभिप्रायः । + यद्यप्येतेषु सप्तस्वपि पदेषु ' माणाण वा' इत्येवमेवोपलभ्यते पाठः सर्वास्वपि दीपिकाप्रतिषु. किन्तु मुद्रितासु सवृत्ति. कप्रतिषु 'माणा वा' इत्येवमस्ति, अर्थसङ्गत्या तु 'माणाण वा' इत्येतदेव युक्तमाभाति । द्वितीये श्रुत आयेऽध्य| यने कर्मबन्धहेतुत्वं षड्जीवनिकाया नाम् । ॥२८॥ Jain Education inanda Far Private & Personal use Oh wwwEjainelibrary.org I Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मिजमाणा वा उद्दविजमाणा वा जाव लोमुक्खणणमायमवि हिंसाकारगं दुक्खं भयं पडिसंवेदेति, IN एवंनच्चा सत्वे पाणा न हंतवान अज्जावेयवान परिघेत्तवान परियावेयवा न उवदवेयवा । से बेमि व्याख्या-'तो'ति कर्मबन्धप्रस्तावे खलु भगवता षड्जीवनिकाया हेतुत्वेनोपन्यस्ताः, पृथिवीकायो यावत्रसकाय इति । तेषां च पीड्यमानानां यथा दुःखमुत्पद्यते तथा स्वसंवित्तिसिद्धेन दृष्टान्तेन दर्शयितुमाह-यथा नाम मम 'असातं' दुःखमुत्पद्यते तथा तेषामपीति । तद्यथा-दण्डेन अस्थना मुष्टिना ' लेलुना' लोष्ठेन कपालेन 'आकोट्यमानस्य ' सको। च्यमानस्य हन्यमानस्य तय॑मानस्य, ताड्द्यमानस्य कुड्यादावभिघातादिना, परिताप्यमानस्य तथाऽपद्राव्यमानस्य' मार्यमाणस्य यावल्लोमोत्खननमात्रमपि हिंसाकरं दुःखं भयं च यन्मयि क्रियते तत्सर्वमहं संवेदयामीत्येवं जानीहि । तथा सर्वे प्राणा जीवा भूतानि सचा, एतेषां दण्डादिनाऽऽकुद्यमानानां यावल्लोमोत्खननमात्रमपि दुःखं हिंसाकरं भयं चोत्पन्नं तेऽपि प्राणिनः सर्वेऽपि 'प्रतिसंवेदयन्ति' साक्षादनुभवन्तीत्येवमात्मोपमया पीड्यमानानां जन्तूनां यतो दुःखमुत्पद्यते, अतः सर्वऽपि प्राणिनो न हन्तव्या न व्यापादयितव्या 'न आज्ञापयितव्या'न बलात्कारेण व्यापारे प्रयोक्तव्यास्तथा न परिग्राह्या न परितापयितव्याः नापद्रावयितव्याः । सोऽहं ब्रवीमि एतन्न स्वमनीषिकया, किन्तु सर्वतीर्थकराज्ञयेति[दर्शयति] जे[य]अतीया जे यापडप्पन्ना जेय आगमिस्सा अरिहंता भगवंतो, ते सवे एवमाइ. क्खंति एवं भासति एवं पन्नविति एवं परावति-सवे पाणा जाव सवे सत्ताण हंतवा जाव ण उवद्द Jan Education ww.ininelibrary.org Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायगडाङ्ग आयेऽध्य दीपिका- न्वितम् । ॥२९॥ वेयवा, एस धम्मे धुवे णितिए सासए समेच्च लोगं खेयन्नहिं पवेदिते । द्वितीये व्याख्या-'जे[य] अतीया' इत्यादि सर्व सुगमं । नवरमयं धर्मः प्राणिरक्षणलक्षणो ध्रुवो 'नित्यः' अवश्यंभावी- 1 श्रुत शाश्वतः । इत्येष चाभिसमेत्य-ज्ञानेनावलोक्य चतुर्दशरज्यात्मकं लोकं 'खेदज्ञै'स्तीर्थकृद्भिः प्रवेदितः । एवं ज्ञात्वा स भिक्षुर्विदितवेद्यो विरतः प्राणातिपाताधावत्परिग्रहादिति, एतदेव दर्शयितुमाह यने आशंएवं से भिक्खू विरए पाणातिवायाओ जाव विरते परिग्गहाओ, नो खलु दंतपक्खालणेणं दंते । उपवा सावर्जनम्। पक्खालेजाणो अंजणेणं अंजेजाणो वमणं णो धवणे णो तं परियाविएजा। सेभिक्ख अकिरिए | अलूसए अकोहे अमाणे अमाए अलोभे उवसंते परिनिव्वुडे, नो आसंसं पुरओ कुज्जा। ___ व्याख्या-तथाऽपरिग्रहः साधुनिष्किञ्चनः सन् नो दन्तप्रक्षालनेन दन्तान् प्रक्षालयेत् , नो अञ्जनं विभूषार्थमक्ष्णोदः । द्यात् , नो वमनविरेचनादिकाः क्रियाः कुर्यात् , न शरीरस्य वस्त्राणां वा धूपनं कुर्यात् , न कासाद्यपनयनार्थ धूमं योगवर्तिनिष्पादितमापिवेदिति । एवं गुणव्यवस्थितो भिक्षुरक्रियः' सावधक्रियारहितः संवृतात्मकतया साम्परायिककर्माबन्धकः, कुत एवम्भूतो ? यतः प्राणिना मलूक्षको' हिंसका, एवमक्रोधोऽमानोऽमायी अलोभः कषायोपशमाचोपशान्तः 'परिनिर्वृतः' समाधिवान् । एवमैहिककामभोगेभ्यो निवृत्तः पारलौकिकेभ्योऽपि विरत इति दर्शयति-'नो आसंसं पुरओ कुजा'नो नैवाशंसा-ममानेन तपसा जन्मान्तरे कामभोगावाप्तिर्मविष्यतीत्येवम्भूतामाशंसां न पुरतः कुर्यात् । इत्येतदेव दर्शयति JanEducation in www.jainalibrary.org Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter इमेण मे दिट्ठेण वा सुण वा मएण वा विन्नाएण वा इमेण वा सुचरियतवनियमबंभचेरवाणं इमेण वा जायामायावत्तिएणं धम्मेणं इओ चुए पिच्चा देवे सिया, कामभोगाण वसवत्ती सिद्धे वा अदुक्खमसुभे । व्याख्या- (+ एतज्जन्मकत्वस्य तपसः फलं आमषैषध्यादिलब्धिसम्प्राप्त्या दृष्टं । ) अनेन तपोनियमत्रह्मचर्यादि धर्मकरणीयेन इतो मृतो भवान्तरे देवो भूयासं एवंविधामाशंसां न करोति, अशेषकर्म्मवियुतो वा सिद्ध ' अदु:ख अशुभ शुभाशुभकर्म्मप्रकृत्यपेक्षया, एतावता मध्यस्थः स्यामहं इत्येवंविधामाशंसां न करोति । तदकरणे कारणमाह एत्थ वि सिया एत्थ वि नो सिया । से भिक्खू सद्देहिं अमुच्छिए रूवेहिं* अमुच्छिए रसेहिं अमु + एतस्मिन्नर्द्धचन्द्राकारचिन्हमध्यवर्त्तिपाठस्थाने निर्देक्ष्यमाणः पाठोऽस्ति बृहद्वृत्तौ -" इमेण मे - इत्यादि, अस्मिन्नेव जन्मन्यना विशिष्टतपश्चरणफलेन दृष्टेनामर्षौषध्यादिना तथा पारलौकिकेन च श्रुतेनार्द्रकधम्मिल्लब्रह्मदत्तादीनां विशिष्टतपश्चरणफलेन, तथा 'मरण व 'त्ति ' मन ज्ञाने ' जातिस्मरणादिना ज्ञानेन तथाऽऽचार्यादेः सकाशाद्विज्ञातेन- अबगतेन ममापि विशिष्टं भविष्यतीमेवं नाशंसां विदध्यात् । " * * यद्यप्येतञ्चिन्हान्तर्गतः सूत्रपाठः सवृत्तिकासु मुद्रित प्रतिषु “गंधेहिं अमुच्छिए रसेहिं अमुच्छिए " इत्येवं व्यत्ययेनास्ति, Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ३० ॥ Jain Education Int च्छिए गंधेहिं अमुच्छिए* फासेहिं अमुच्छिए विरए कोहाओ माणाओ मायाओ लोभाओ जाओ दोसाओ कलहाओ अब्भक्खाणाओ पेसुन्नाओ परपरिवायाओ अरतीओ[ अति ]रतीओ मायामोसाओ मिच्छादंसणसल्लाओ, इति से महतो आयाणाओ उवसंते उबट्ठिए पडिविरए से भिक्खू । व्याख्या - अनेन विशिष्टतपसाऽपि स्यात् कदाचित् सिद्धिः कदाचिन्न स्यादपि । अतः आशंसां न कुर्यात् । तदेवमै हिकार्थमामुष्मिकार्थं च कीर्त्तिवर्णश्लोकाद्यर्थं च तपो न विधेयं न कुर्यादिति । कथम्भूतो भिक्षुः ? शब्दे रूपे रसे गन्धे स्पर्शे अमूर्च्छितः । क्रोधमानमायालोभं यावन्मिथ्यादर्शनशल्यं, एवमष्टादश पापस्थानकेभ्यो विरतः । तथा स भिक्षुर्भवति यो महतः कर्मोपादानादुपञ्चान्तः सन् संयमे चोपस्थितः सर्वपापेभ्यश्च विश्वः प्रतिविरत इति । कर्मोपादानाद्विरमणं साक्षादर्शयति जे इमे तसा थावरा पाणा भवंति ते णो सयं समारंभति । नेवन्नहिं समारंभावेति । अन्ने समारंभंते विन समणुज्जाणति, इति से महतो आयाणाओ उवसंते उबट्ठिए पडिविरए [ से भिक्खू ] | व्याख्या - इत्यादि सुगमम् । एवं महतः कर्मोपादानादुपशान्तः प्रतिविरतो भवति भिक्षुरिति । साम्प्रतं कामभोगपरं दीपिका प्रतिषु सर्वास्वप्येतत्क्रमेणैवास्ति, वृत्तिकारेणापि " एवं रूपरसगन्धस्पर्शेष्वपि वाच्यमित्य "नेन वाक्येनैतदेव क्रमः स्वीकृतोऽस्ति । द्वितीये श्रुत० आद्येऽध्य यने काम भोग निवृत्ति र्मिक्षुत्वम् । ॥ ३० ॥ Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education निवृत्तिमधिकृत्याह - कामभोगा सचित्ता वा अचित्ता वा, ते णो सयं परिगिण्हति णो अन्नेणं परिगिह्वावेति अन्नं परिगिहृतं न समणुजाणइ, इति से महतो आयाणाओ उवसंते उवट्ठिए पडिविरते से भिक्खू । व्याख्या - ये केचन काम ( 1 ) भोगाव ते सचित्ता वा अचित्ता वा भवेयुस्तांश्च न स्वतो गृह्णीयान्नाप्यन्येन ग्राहयेनाप्यपरं समनुजानीयादित्येवं कम्र्मोपादानाद्विरतो भिक्षुर्भवतीति । जंपि य इमं संपराइयं कम्मं कज्जति, नो तं सयं करेति नेवन्नेणं कारवेति अन्नपि करंतं नाणुजाति, इति से महतो आदाणाओ उवसंते उवट्ठिए पडिविरते ( + भवति भिक्खू ) । व्याख्या - येन कर्मणा संसारे पर्यटनमनन्तशो जायते तत्साम्परायिकं कर्म्म, तच्च प्रद्वेषनिन्हव मात्सर्यान्तरायाशातनोपघातैर्बध्यते, तत्कर्म तत्कारणं वा न कृतकारितानुमतिभिः करोति स भिक्षुरभिधीयते । साम्प्रतं भिक्षाविशुद्धिमधिकृत्याहसेभिक्खू जाणेजा असणं ४ वा अस्सि X पडियाए एगं साहम्मियं समुद्दिस्स पाणाई भूताई जवाई सत्ता समारंभं समुद्दिस्स कतिं पामिच्चं अच्छेजं अणिसिद्धं अभिहर्ड आहद्दुद्देसियं तं चे + नास्त्येतच्चिन्दान्तर्गतः शब्दः स्रवृत्तिकासु मुद्रितप्रतिषु । X आहारदानप्रतिज्ञया यदिवाऽस्मिन् पर्याये - साधुपर्याये व्यवस्थितं साधुं साधर्मिकं समुद्दिश्य । इति टि० २ । 6 Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रु० आद्याध्ययने हारित्वं भिक्षुत्वम् । एयगडाग|| तियं सिता, तं० नो सयं भुंजइ नेवन्नेणं भुंजावेति अन्नंपि भुंजतं नो समणुजाणइ इति से महतो पत्रं आयाणाओ उवसंते उवट्ठिए पडिविरते से भिक्खू । दीपिका ___ व्याख्या-सुगमम् । यो भिक्षुरेवम्भूतमाहारं +द्वाचवारिंशदोषदुष्टं स्वयं न गृह्णाति न ग्राहयति गृहन्तं न समनुजानाति न्वितम् । स भवति भिक्षुरिति । स भिक्षुः पुनरेवं जानीयात् विजति तेसिं परक्कमे जस्सट्टाए चेइयं सिया, तं जहा-अप्पणो से पुत्ताणं धूयाणं सुण्हाणं धातीणं नातीणं राईणं दासाणं दासीणं कम्मकराणं कम्मकरीणं आदेसाणं पुढो पहेणाए सामासाए पातरासाए सन्निहिसंनिचए कजति इह मेगेसिं माणवाणं भोयणाए। व्याख्या-विद्यते ' तेषां' गृहस्थानां 'पराक्रमः' सामर्थ्य-आहारनिवर्त्तनं प्रत्यारम्भः, तेन च यदाहारजातं +" जानीयात् 'अस्सिं पडियाए' एतत्प्रतिज्ञया एकं साधुसाधर्मिक समुद्दिश्य कश्चित्प्रकृतिभद्रकः श्रावकः साध्वाहारदानार्थ प्राणिनः समारभ्य-प्राणिघातकमारम्भं कृत्वा सत्त्वान् समुद्दिश्य-तत्पीडां सम्यगुद्दिश्य क्रीतं 'प्रामित्यं' उच्छिन्नकं आच्छेद्य' अन्यस्मादाच्छिय गृहीतं ' अनिसृष्टं' परेणाननुमतं ' अभ्याहृतं' साधुसम्मुखमानीतं 'आहृत्य' उपेत्य ज्ञात्वा साध्वर्थ कृतमुद्देशिकं, एवम्भूतमाहारं साधवे 'चेतितं ' दत्तं स्यात् , साधुना वाऽकामेन गृहीतं स्यात् , तद्दोषदुष्ट ज्ञात्वा स्वयं न भुञ्जीत अन्य न भोजयेत् न च भुञ्जानमन्यं समनुजानीयात् , एवं" इति हर्ष० । ॥३१॥ Jain Eda For & Personale Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निर्वतितं यस्य चार्थाय' यत्कृते 'चेतितं' दत्तं, निष्पादितं स्याद्भवेत् । यत्कृते निष्पादितं तत्स्वनामग्राहमाह, तद्यथा 'आत्मनः ' स्वनिमित्तमाहारादिपाकनिर्वर्तनं कृतमिति । तथा पुत्रा[बx) 'आदेशार्थ' प्राघूर्णकाद्यर्थ, तथा पृथक्प्रहेणार्थ +विशिष्टाहारनिवर्त्तनं क्रियते, तथा 'श्यामा' रात्रिस्तस्यामशनं, तदर्थ यावत्प्रातराश:-प्रत्यूषस्येव भोजनं, तदर्थ सभिधेः सञ्चयः, विशिष्टाहारसनहस्य सञ्चयः क्रियते । अनेन चैतत्प्रतिपादितं भवति-बालग्लानबद्धादिनिमितं प्रत्यषादिसमयेष्वपि भिक्षाटनं क्रियते, अतः सन्निधिसञ्चय इहैकेषां मानवानां भोजनार्थ भवति। तत्र भिक्षुरु-द्यतविहारी परकृतपरनिष्ठितमुद्गमोत्पादनैषणाशुद्धमाहारमाहरेत् , कथम्भूतमाहारं ? तदेवाह तत्थ भिक्खू परकडं परनिट्ठितमुग्गमुप्पायणेसणासुद्धं सत्थाईयं सत्थपरिणामितं आविहिंसितं एसितं वेसितं सामुदाणियं पत्तमसणं कारणट्ठा पमाणजुत्तं, अक्खो वंजणवणलेवणभूयं संजमजायामायावत्तियं बिलमिव पन्नगभूतेणं अप्पाणणं आहारं आहारेजा, अन्नं अन्नकाले, पाणं पाणकाले, IN वत्थं वत्थकाले, लेणं लेणकाले, सयणं सयणकाले, से भिक्खू मायन्ने अन्नयरिं दिसं वा अणुदिसं वा पडिवन्ने धम्म आइक्खे विभए किट्टे उवट्ठिएसु वा अणुवाट्ठिएसु वा सुस्सूसमाणेसु पवेदए । व्याख्या-'सत्थाईयं' शखमग्न्यादिकं, तेनातीतं-प्रासुकीकृतं, शस्त्रपरिणामितमिति-शस्त्रेण स्वकायपरकायादिना | x आदिशब्दः प्रकारार्थत्वाद् दुहितृस्नुषाधाच्याद्यर्थम् । + " पढेणयं-भोजनोपायनमुत्सवश्चे"ति देशीनाममालावृत्तौ । Jain Education interna For Privista personal UE O Aaina bayong Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सत्र .मित्यय तस्मातामा दीपिकान्वितम् । ॥३२॥ निर्जीवीकृतं, वर्णगन्धरसादिभिश्च परिणामितं, हिंसां प्राप्तं हिंसितं, विरूपं हिंसितं विहिंसितं, न सम्यनिर्जीवीकृत- द्वितीये मित्यर्थः, तत्प्रतिषेधादविहिसितं निर्जीवमित्यर्थः । तदप्येषित-मन्वेषितं भिक्षाचर्याविधिना प्राप्तं 'वेसियं' वैषिकमिति श्रुत केवलसाधुवेषावाप्त+, तदपि 'सामुदानिक' मधुकरवृत्त्याऽवाप्तं-सर्वत्र स्तोकं स्तोकं गृहीतं, तदपि गीतार्थेनोपात्तमानीतं आद्यातदपि-वेदनावैयावृत्यादिके कारणे सति, तदपि प्रमाणयुक्तं, नाऽतिमात्रं, तदपि न वर्णवलाद्यर्थ किन्तु यावन्मात्रेणाऽऽहारेण || ध्ययने देहः क्रियासु वर्तते, यथाऽक्षस्योपाञ्जनं अभ्यङ्गो व्रणस्य 'लेपन' प्र[व्रण ]लेपस्तदुपमया आहारमाहरेत् । उक्तं च साधो" अन्भंगेण व सगडं, न तरह विगई विणा उ जो साहू । सो रागदोसरहिओ, मत्ताएँ विहीइ तं सेवे ॥१॥x" राहादि. एतदेव दर्शयति-संयमयात्रायां मात्रा संयमयात्रा[मात्रा], यावत्याऽऽहारमात्रया संयमयात्रा प्रवर्तते । तथा विलप्रवेश ग्रहणपन्नगभूतेनात्मना आहारमाहरेत् , यथा पन्नगो बिले प्रविशस्तूर्णमेव प्रविशति एवं साधुनाप्याहारस्तत्स्वादमनास्वादयता प्रकारः। शीघ्र प्रवेशयितव्य इति । तदपि ' अन्नं अन्नकाले' सूत्राथपौरुष्युत्तरका[लं]ले (2) भिक्षाकाले प्राप्ते, तथा पानकं पानककाले* तथा वस्त्रं वस्त्रकाले गृह्णीया-दुपभोग वा कुर्यात् । तथा 'लयनं' गुहादिकमाश्रयस्तस्य वर्षास्ववश्यमुपादानमन्यदा त्वनियमः। तथा शय्यासंस्तारका, स च शयनकाले । तत्राप्यगीतार्थानां प्रहरद्वयं निद्राविमोक्षो गीतार्थानान्तु + "न पुनर्जात्याद्याजीवनतो निमित्तादिना बोत्पादित "मिति बृहत्तौ । x अभ्यनेनेव शकटं न शक्नोति विकृति विनैव यः साधुः । स रागद्वेषरहितो मात्रया विधिना तां सेवेत ॥ १ ॥ *"न तृषितो भुञ्जीत न बुभुक्षितः पानकं पिबेत् ।" इति हर्ष। ॥३२॥ JainEducation ind i a For Prve & Personal Use Only [w.jainelibrary.org Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रहरमेकमिति । तथा स मिक्षुराहारोपधिशयनस्वाध्यायाध्ययनादीनां मात्रां जानातीति तद्विधिज्ञः, अन्यतरां दिशमनुदिशं वा 'प्रतिपन्नः' समाश्रितो धर्ममाख्यापयेत्-प्रतिपादयेत्, यद्येन [ साधुना गृहस्थेन वा] विधेयं तद्यथायोग विभजेत् धर्मफलानि च कीर्तयेत् । परहितार्थ प्रवृत्तेन साधुना सम्यगुपस्थितेषु वा [अनुपस्थितेषु] कौतुकादिप्रवृत्तेषु 'शुश्रूषमाणेषु' श्रोतुं प्रवृत्तेषु स्वपरहिताय 'प्रवेदयेत् ' कथयेत् । यत्कथयेत्तदर्शयितुमाह संतिविरति उवसमं निवाणं सोयवियं अजवियं मद्दवियं लावियं अणतिवातियं, सन्वेसिं | पाणाणं, सत्वेसि भूताणं जाव सव्वेसिं सत्ताणं अणुवीइ किट्टए धम्मं । व्याख्या-शान्ति-रुपशमः क्रोधजयः 'विरतिः' प्राणातिपातादिभ्यः शान्तिविरतिस्ता कथयेत । तथोपशम इन्द्रि. यनोन्द्रियोपशमरूपं रागद्वेषामावजनितं, तथा निर्वृतिं निर्वाणं, तथा ' शौचं ' तदपि भावशौचं सर्वोपाधिविशुद्धं व्रतामालिन्यं 'अजवियं' आर्जवं मायारहितत्वं, तथा 'मार्दवं' मृदुभावः अकठोरत्वं सर्वत्र प्रश्रयत्वं विनयनम्रता, तथा 'लाघवियं' कर्मणां लाघवापादनं । साम्प्रतं सर्वशुमानुष्ठानानां मूलकारणमाह 'अतिपातः' प्राण्युपमईनं, तत्प्रतिषेधादनतिपातिकस्तं सर्वेषां प्राणिनां भूतानां यावत् सच्चानां धर्ममनुविचिन्त्य कथयेत् , सर्वप्राणिनां रक्षानिमित्तभूतं धर्म कथयेत् । से भिक्खू धम्म किट्टेमाणे णो अन्नस्स हेउंधम्ममाइक्खेज्जा, नो पाणस्स हेउं धम्ममाइक्खेज्जा, Jan Education For Private & Personal use only wwwjainelibrary.org Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूर्यगढाङ्ग दीपिकान्वितम् । ॥ ३३ ॥ Jain Education Inter नो वत्थस्स हे धम्ममाइक्खेजा, नो लेणस्स हेउं [ धम्ममाइक्खेजा, ] नो सयणस्स हे उं [ धम्ममा इक्जा, ]नो अन्नेसिं विरूवरूवाणं कामभोगाणं हेउं धम्ममाइक्खेज्जा, अगिलाए धम्ममाइक्खेज्जा, नन्नत्थ कम्मनिज्जरट्टयाए धम्माइक्वेज्जा । व्याख्या - स भिक्षुर्नान्नस्य हेतोर्ममायमीश्वरो धर्मकथाश्रवणेन विशिष्टाहारजातं दास्यतीत्येतन्निमित्तं न धर्ममाच क्षीत । तथा पानस्य वस्त्रलयनशयननिमित्तं न धर्ममाचक्षीत । अन्येषां वा 'विरूपरूपाणां ' उच्चावचानां कार्याणां कामभोगानां वा निमित्तं न धर्म्ममाचक्षीत । तथा ग्लानिमनुपगच्छन् धर्म्ममाचक्षीत । कर्मनिर्जरायाचान्यत्र न धर्मं कथयेत्, अपरप्रयोजननिरपेक्ष एव धर्म्म कथयेदिति । अथ धर्मकथनफलमुपदर्शयति इह खलु तस्स भिक्खुस्स अंतिए धम्मं सोच्चा निसम्म सम्मं उट्ठाणेणं उट्ठाय वीरा अस्सि धम्मे समुट्टिया ते एवं सवोवगता, ते एवं सबोवरता, ते एवं सवोवसंता, ते एवं सबत्ताई, परिनिogsत्ति बेमि । व्याख्या - इह खलु जगति तस्य भिक्षोर्गुणवतोऽन्तिके - समीपे धर्मं श्रुत्वा [निशम्य च ] सम्यगुत्थानेनोत्थाय ' वीराः ' कर्म्मविदारणसहिष्णवो ज्ञानदर्शनचारित्रारूये मोक्षमार्गे प्राप्ताः सर्वपापस्थानेभ्यो निवृत्ताः सर्वत उपचान्ताः जितकषायतया द्वितीवे श्रुत० आद्या ध्ययने निरपेक्ष तया धर्मोपदेशनम् । ॥ ३३ ॥ w.jainelibrary.org Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internat शीतलीभूताः, तथा त एवं ' सर्वात्मतया ' सर्वसामर्थ्येन सदनुष्ठाने उद्यमं कृतवन्तो, ये चैवम्भूतास्ते अशेषकर्मक्षयं कृत्वा परिनिर्वृचाः, अशेषकर्म्मक्षयं कृतवन्त इति । ब्रवीमीति पूर्ववत् । अथाध्ययनोपसंहारार्थमाह एवं से भिक्खू धम्मट्ठी धम्मविऊ नियागपडिवन्ने, से जहेयं बुइयं अदुवा पत्ते पउमवरपुंडरीयं अदुवा अपत्ते पउमवरपुंडरीयं । एवं से भिक्खू परिन्नायकम्मे परिन्नायसंगे परिन्नाय - गिहवासे उवसंते समिए सहिये सया जए, से एवं वयणिज्जे, तं जहा व्याख्या - एवं स भिक्षुर्धम्र्म्मार्थी यथावस्थितं परमा[र्थतो ] ( 2 ) धर्मं सर्वोपाधिविशुद्धं जानातीति धर्मवित् तथा' नियागः संयमो विमोक्षो वा, तं प्रतिपन्नः - नियागप्रतिपन्नः स चैवम्भूतः पञ्चमपुरुषजातः, तं चाऽऽभित्य तद्यथेदं प्राक् प्रदर्शितं, तत्सर्वमुक्तं, स च प्राप्तो वा स्यात् पद्मवरपौण्डरीकमनुग्राह्यं पुरुषविशेषं चक्रवर्ण्यादिकं, तत्प्राप्तिश्च परमार्थतः केवलज्ञानावाप्तौ सत्यां भवति, साक्षाद्यथावस्थित वस्तुस्वरूप परिछित्तेः, अप्राप्तो वा स्यान्मतिश्रुतावधिमनःपर्यायज्ञानैर्ग्यस्तैः समस्तैर्वा समन्वितः । स चैवम्भूतो भिक्षुः परिज्ञातकर्मा (दिविशेषणविशिष्टो भवतीत्येतद्दर्शयितुमाह - ) सम्भूतो भिक्षुः 'परिज्ञातकर्मा' परिज्ञातकर्म्मस्वरूपः परिज्ञातसङ्गः परिज्ञातगृहबासः, तथोपशान्तः, [ इन्द्रियनो ]इन्द्रियोपशमात्तथा समितिभिः समितः, तथा सहितो ज्ञानादिभिः सदा यतः संयतः एवंविधगुणकलापोपेत एतद्वचनीयः - स ईदृशः कथ्यते, (तद्यथा - ) ainelibrary.org Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग दीपिकान्वितम् । समणेति वा माहणेति वा खंतेति वा दंतेति वा गुत्तेति वा मुत्तेति वा इसीति वा मुणीति वा कतीति वा विदूति वा भिक्खूति वा लूहेति वा तीरटेति वा चरणकरणपारविउत्ति बेमि [सूत्र १५] । बितियस्स [सुयक्खंधस्स पोंडरीयं नाम पढमं अज्झयणं समत्तं । व्याख्या-स पूर्वोक्तगुणकलापोपेतः किनामा कथ्यते ? श्रमणः तथा 'माहण 'ति ब्राह्मणः, मा प्राणिनो व्यापादयेति माहनः ब्रह्मचारी वा ब्राह्मणा, क्षान्तः क्षमोपेतत्वात् , दान्तः इन्द्रिय[नोहन्द्रिय]दमनात्, तिसृभिर्गुप्तिभिर्गुप्तः, मुक्त इव मुक्ता, विशिष्टतपश्चरणो महर्षिः, मनुते जगतत्रिकालावस्थामिति मुनिः, कृतमस्यास्तीति 'ती' पुण्यवान् परमार्थपण्डितो वा, तथा 'विद्वान् ' सवि[सद्विद्योपेतः, तथा 'भिक्षु 'निरवद्याहारतया भिक्षणशीलः, तथा अन्तप्रान्ताहारत्वेन रूक्षः, संसारतीरभृतो मोक्षस्तदर्थी, तथा चर्यत इति चरणं-मूलगुणाः, क्रियत इति करण-उत्तरगुणास्तेषां पारं 'तीरं पर्यन्तगमनं, तद्वेत्तीति करणचरणपारवित् । इतिशब्दःपरिसमाप्त्यर्थे, बबीमीति तीर्थकरवचनात् सुधर्मस्वामी जम्बूस्वामिनमुद्दिश्यैवं भणतीति। द्वितीये श्रुत आद्या ध्ययन समाप्तिः। ॥३४॥ ener इति श्रीपरमसुविहितखरतरगच्छविभूषणपाठकप्रवरश्रीमत्साधुरङ्गगणिवरसन्न्धायां श्रीमत्सूत्रकृताङ्गदीपिकायां समाप्तं द्वितीयश्रुतस्कन्धाध्ययनं प्रथमम् ।। ॥३४॥ Jain Education a l Far Private & Personal use Oh ne bog Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ अथ क्रियास्थानाख्यं द्वितीयमध्ययनम् ॥ - +- - ___साम्प्रतं द्वितीयश्रुतस्कन्धे द्वितीयं क्रियाध्ययन प्रारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययने पुष्करिणी-पुण्डरीकदृष्टान्तेन तीथिकाः सम्यङमोक्षोपायाभावात्कर्मणां बन्धकाः प्रतिपादिताः सत्साधवश्च सम्यग्दर्शनादिमोक्षमार्गप्रवृत्तत्वात् कर्मणां मोचकाः सदुपदेशदानतो परेषामपीति, तदिहापि यथा कर्म द्वादशभिः क्रियास्थानबध्यते यथा च त्रयोदशेन मुच्यते तदेतत्पूर्वोक्तमेव बन्धमोक्षयोः प्रतिपादनं क्रियते, तथाहि सुयं मे आउसंतेणं भगवया एवमक्खायं-इह खलु किरियाठाणे नामं अज्झयणे पन्नत्ते, तस्स णं अयमढे (पन्नत्ते-) इह खलु संजूहेणं दुवे ठाणा एवमाहिजंति-धम्मे चेव अधम्मे चेव, उवसंते चेव अणुवसंते चेव । ____ व्याख्या-सुधर्मस्वामी जम्बूस्वामिनमुद्दिश्येदमाह-श्रुतं मया आयुष्मता भगवतैवमाख्यातं-इह खलु क्रियास्थानं नामाध्ययनं भवति, तस्य चायमर्थः इह खलु 'संजूहेणं 'ति सामान्येन संक्षेपेण च द्वे स्थाने भवतः । य एते क्रियावन्तस्ते सर्वेऽप्यनयोः स्थानयोरेवमाख्यायन्ते-धर्मे चैव अधर्मे चैव, इदमुक्तं भवति-धर्मस्थानमधर्मस्थानं च । कारणशुद्ध्या च कार्यशुद्धिर्भवतीत्याह-उपशान्वं यत्तद्धर्मस्थानं अनुपशान्तमधर्मस्थानं । लोकस्तु प्रायेणाधर्मप्रवृत्तो भवति, पश्चात्स Jain Education jainebrary.org Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूबगडाला दुपदेशयोग्याचार्यसंसर्गाद्धर्मस्थाने प्रवर्तते, अतः पूर्वमधर्मस्थानमधिकृत्याह द्वितीये तत्थ णं [जे से ] पढमस्स ठाणस्स अधम्मपक्खस्स विभंगे, तस्स णं अयमढे [पण्णत्ते]- M श्रुत० दीपिका| इह खलु पाईणं वा ४ संतेगतिया मणुस्सा भवंति, [तं जहा ] द्वितीयं न्वितम् । व्याख्या-तत्र प्रथमस्य अधर्मपक्षस्य विभंगो' विचारस्तस्यायमर्थ इति । इह जलु' इह अस्मिञ्जगति क्रिया॥३५॥ 'खलु' निश्चितं प्राच्यादिदिक्षु मध्ये अन्यतरस्यां दिशि 'सन्ति' विद्यन्ते एके केचन मनुष्यास्ते चैवम्भूता भवन्तीत्याह स्थाना ध्ययनम् । ___ +आयरिया वेगे अणारिया वेगे, उच्चागोया वेगे णीयागोया वेगे, कायमंता वेगे हस्समंता वेगे, सुवन्ना वेगे दुव्वन्ना वेगे, सुरूवा वेगे दुरूवा वेगे, तेसिं च णं इमं एयारूवं दंडसमादाणं संपेहाए। तं जहा-नेरईएसुवा]x तिरिक्खजोणीएसु माणुसेसु देवेसु जेयावन्ने तहप्पगारा पाणा चिन्न[विन्नू । | वेयणं वेयंति, तेसि पि य णं इमाइं तेरस किरियाठाणाई भवंतीतिमक्खायं, तं जहा-अट्ठादंडे १, + सर्वास्वपि दीपिकाप्रतिषु 'आयरिया' इति पाठो लेखकप्रमादजः सम्भाव्यते, मुद्रितासु सवृत्तिकप्रतिषु आरिया' इत्येवोपलभ्यते, योऽर्थदृष्ट्या युक्त आभाति |मुद्रितासु सवृत्तिकप्रतिष्वेते चत्वारोऽपि पदा 'वा' शब्दान्ताः सन्ति, परं दीपिका.IN प्रतिषु यन्नैवं एषोऽपि लेखकदोष एव सम्भाव्यते । ॥३५॥ in Education inten (intent Far Private & Personal use Oh sinaryong Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अणहादंडे २, हिंसादंडे ३, अकम्हादंडे ४, दिट्ठीविपरियासियादंडे ५, मोसवत्तिए ६, अदिन्नादाणवत्तिए ७, * अज्झत्थिए ८, माणवत्तिए ९, मित्तदोसवत्तिए १०, मायावनिए ११, लोभवत्तिए | १२, इरियावहिए १३ । [ सू० १] व्याख्या-एके आर्या एके अनार्याः भवन्ति, याववरूपाः सुरूपाश्चेति । तेषामार्यादीनामिदं-वक्ष्यमाणमेतद्रूपं 'दण्डः ' पापोपादानसङ्कल्पस्तस्य 'समादानं ' ग्रहणं संपेहाए 'त्ति सम्प्रेक्ष्य, तच्चतुर्गतिकानामन्यतमस्य भवति, तद्यथा-नारकादिषु, ये चान्ये तथाप्रकारास्तभेदवर्तिनः सुवर्णदुर्वर्णादयः प्राणिनो विद्वाँसो 'वेदना' ज्ञानं, तद्वेदयन्त्यनुभवन्ति, यदिवा सातासातरूपां वेदनामनुभवन्तीति, अत्र चत्वारो भङ्गास्तद्यथा-संझिनो वेदनामनुभवन्ति विदन्ति च १, सिद्धास्तु विदन्ति नानुभवन्ति २, असंझिनोऽनुभवन्ति न विदन्ति ३, अजीवास्तु न विदन्ति नानुभवन्ति ४। इह पुनः प्रथमतृतीयाभ्यामधिकारो, द्वितीयचतुर्थाववस्तुभूताविति । 'तेषां च' नारकतिर्यमनुष्यदेवानां तथाविधज्ञानवतां 'इमानि' वक्ष्यमाणलक्षणानि त्रयोदश क्रियास्थानानि भवन्ति, एवमाख्यातं तीर्थकरगणधरादिभिरिति । कानि? पुन * यद्यपि सटीकमुद्रितप्रतिष्वत्र परत्र च सर्वत्रापि 'अज्झत्थवत्तिए' इत्येकरूप एव पाठोऽस्ति, परं दीपिकाप्रतिषु समप्रास्वप्यत्र 'अज्झथिए' इत्येवमुपलभ्यते, वृत्तिकृताऽपि 'आत्मन्यध्यध्यात्म-तत्र मव आध्यात्मिकः' इत्येवमों विहित अतो दीपिकापाठः युक्त इत्याभाति ।। Jain Education Internatil Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ३६ ॥ Jain Education Int स्तानीति दर्शयति- ' तं जहे 'त्यादि, तद्यथा-' आत्मार्थाय' स्वप्रयोजनकृते दण्डो -ऽर्थदण्डः - पापोपादानं १, तथाऽनर्थदण्ड इति निष्प्रयोजनमेव सावद्यक्रियाऽनुष्ठानमनर्थदण्डः २ तथा हिंसा-प्राण्युपमईरूपा तया-दण्डो हिंसादण्डः ३, तथाSकस्माद्दण्डः (१) अनुपयुक्तस्य [ दण्डः ] अकस्माद्दण्डः, अन्यस्य क्रिययाऽन्यस्य व्यापादनम् ४ । तथा दृष्टेर्विपर्यासो रज्ज्वामिव सर्पबुद्धिः, तथा दण्डो दृष्टिविपर्यासदण्डस्तद्यथा-लेष्टुकाष्ठादिबुद्धया शराद्यभिघातेन चटकादिव्यापादनम् ५, तथा मृषावादप्रत्ययिकः, स च सद्भूतनिवासद्भूतारोपणरूपः ६, तथा अदत्तस्य परकीयस्य ग्रहणं स्तैन्यं तत्प्रत्ययिको दण्डः ७, तथाऽध्यात्मदण्डो - निर्निमित्तमेव दुर्मना उपहतमनः संकल्पो हृदयेन दूयमानश्चिन्तासागरावगाढः संतिष्ठते ८, तथा जात्याद्यष्टमदस्थानोपहतमनाः परावहेलारूपस्तस्य मानप्रत्ययिको दण्डो भवति ९, तथा मित्राणामुपतापेन दोषो मित्रदोषस्तत्प्रत्ययिको [दण्डो] भवति १०, तथा माया' परवञ्चनबुद्धिस्तया दण्डो माया [प्रत्ययिको] दण्डः ११, तथा लोमप्रत्य यिको- लोभनिमित्तो दण्ड इति १२, तथा पश्चसमितित्रिगुप्तिभिरुपयुक्तस्येय प्रत्ययिकः सामान्येन कर्मबन्धो भवति १३, एतच्च त्रयोदशं क्रियास्थानमिति । अथानुक्रमेण क्रियास्थानानि व्याख्यानयति पढमे दंडसमादाणे अट्ठादंडवत्तिपत्ति आहिअइ, ( + तं जहा-) से जहा नामए केइ पुरिसे आहे वा णाइहे वा अगारहेडं वा परिवारहेडं वा मित्तहेउं वा णागहेउं वा भूयहेडं वा + नास्ति बहुष्वादर्शेष्वयं पाठस्त्रयोदशस्वपि क्रियास्थानसूत्रेषु । द्वितीये श्रुत० द्वितीये क्रिया स्थाना ध्ययने प्रथम क्रियास्थानवर्णनम् । ॥ ३६ ॥ Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - जक्खहेउं वा तं दंडं तसथावरेहिं पाणेहिं सयमेव निसिरति अण्णेण[वि ]निसिरावेति अन्नं पि निसिरंतं समणुजाणति, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावजंति आहिजति, पढमे दंडसमादाणे अट्ठादंडत्तिए आहिए ॥ [ सू० २] व्याख्या-यत्प्रथममुपात्तं दण्डसमादानमर्थाय दण्ड इत्येवमाख्यायते । तद्यथा नाम कश्चित्पुरुषः, पुरुषग्रहणेन सर्वोऽपि चातुर्गतिकः प्राणी, आत्मनिमित्तं ज्ञातिनिमित्तं तथा गृहनिमित्तं परिवारो-दासीकर्मकरादिकस्तानिमित्तं, तथा मित्रनागभूतयक्षनिमित्तं तथाभूतं स्वपरोपघातरूपं दण्डं त्रसस्थावरेषु प्राणेषु स्वयमेव 'निसृजति ' निक्षिपति-उपतापयति प्राण्युपमईकारिणी क्रिया करोति, तथाऽन्येन कारयति, तथा परं दण्डं निसृजन्तं समनुजानीते। एवं कृतकारितानुमतिभिः कर्म सम्बन्धो भवति, तदर्थदण्डप्रत्ययिकं प्रथम क्रियास्थानमाख्यातमिति । __अहावरे दोच्चे दंडसमादाणे अणट्ठादंडवत्तिएत्ति आहिज्जति । तं जहा-से जहा नामए केइ पुरिसे जे इमे तसा पाणा भवति, ते णो अच्चाए णो अजिणाए णो मंसाए णो सोणियाए, एवं हिययाए पित्ताए वसाए पिच्छाए पुच्छाए वालाए सिंगाए विसाणाए दंताए दाढाए णहाए पहारुणीए अट्ठीए अट्ठिमंजाए णो हिंसिसु मेत्ति णो हिंसंति मेत्ति णो हिंसिस्संति मोत, णो - - Jain Education in For Privista personal UE O Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत स्यगडाङ्ग- पुत्तपोसणयाए णो पसुपोसणयाए णो अगारपरिवूहणताए नो समणमाहणवत्तणाहेउं नो तस्स तं || सरीरस्स किंचि विपरियादित्ता भवंति । से हंता छेत्ता भेत्ता लुपइत्ता विलंपइत्ता उद्दवइत्ता दीपिका उज्झिउं बाले वेरस्स आभागी भवति अणट्ठादंडे । न्वितम् । ___ व्याख्या-अथापरं द्वितीय[ दण्डसमादानं ]अनर्थदण्डप्रत्ययिकं अभिधीयते । स यथा नाम कश्चित्पुरुषः+ये केचन ॥३७॥ 'अमी' संसारान्तर्तिनः प्रत्यक्षाश्छागादयःप्राणिनस्तांचासौ हनन् 'नो' नैव अर्चायै हिनस्ति, तथा नो 'अजिनाय' चर्मणे, नापि मांसशोणितहृदयपित्तवसापिच्छपुच्छवालशृङ्गविषाणनखस्नाय्व[स्थ्य स्थिमिजा इत्येवमादिकं कारणमुद्दिश्य, नैवाहिसिपुर्नापि हिंसन्ति नापि हिंसयिष्यन्ति मां मदीयं चेति । तथा नो पुत्रपोषणाय-पुत्र पोषयिष्यामीत्येतदपि कारणमुद्दिश्य न व्यापादयति, तथा नापि पशूनां पोषणाय, तथा 'अगारं' गृहं, न तदर्थ हिनस्ति, तथा न श्रमणब्राह्मणवर्तनाहेतु, तथा यत्तेन पालयितुमारब्धं नो तस्य शरीरस्य किमपि परित्राणाय तत्प्राणिव्यपरोपणं भवति, इत्येवमादिकं कारणमनादृत्यैवासौ क्रीडया व्यसनेन वा प्राणिनां हन्ता भवति दण्डादिभिः, छेत्ता भवति कर्णनासिकादिविकतनता, तथा भेचा-शूलादिना तथा लुम्पयिताऽन्यतराङ्गावयवविकर्त्तनतस्तथा विलुम्पयिता चक्षुत्पाटनचर्मविकर्तनकरपादादिच्छेदनतः परमाधाम्मिकवत्प्राणिनां + " निर्निमित्तमेव निर्विवेकतया प्राणिनो हिनस्ति, तदेव दर्शयितुमाह-" इति बृ० वृ० । x “ तस्य 'परिवहणा' वृद्धिः" इति हर्ष। द्वितीये क्रियास्थानाध्ययने द्वितीय| क्रियास्थानवर्णनम् । M ॥३७॥ jainty.org For Pre & Personal use Jain Education Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Int निर्निमित्तमेव नानाविधोपायैः पीडोत्पादको भवति, तथा जीवितादप्यपद्रावयिता मवति । स च + बालोऽसमीक्षितकारितया जन्मान्तरानुबन्धिवैरस्याभागी भवति । तदेवं निर्निमित्तमेव पञ्चेन्द्रियप्राणिपीडन तो यथाऽनर्थदण्डो भवति तथा प्रतिपादितं, अधुना स्थावरानधिकृत्योच्यते— से जहा नामए केइ पुरिसे जे इमे थावरा पाणा भवति, तं जहा - इक्कडाइ वा कडि ( कढि ) नाइ वा जंतुगाइ वा परगाइ वा मोक्खाइ वा तणाइ वा कुसाइ वा कुच्छगाइ वा पप्प[प] गाइ वा पलाएइ वा, ते णो पुत्तपोसणयाए नो पसुपोसणयाए नो अगारपरिवहणयाए नो समणमाहणपोसणयाए नो तस्स सरीरगस्स किंचि वि परियाइत्ता भवति । से हंता छेत्ता भेत्ता लंपइत्ता विलंपइत्ता उद्दवइत्ता उज्झिउं वाले वेरस्स आभागी भवति अट्ठादंडे । व्याख्या - स यथा नाम कश्चित्पुरुषो निर्विवेकः प[थि]रि ( ? ) गच्छन् [निर्निमित्तमेव] वृक्षादेः पल्लवादिकं दण्डादिना प्रध्वंसयन् फलनिरपेक्षस्तच्छीलतया व्रजति, एतदेव दर्शयति — ये केचनामी - प्रत्यक्षाः स्थावरा वनस्पतिकायिकाः प्राणिनो भवन्ति तद्यथा - ' इकडा' दयो वनस्पतिविशेषाः सुगमार्थाः । तदिहेयमिकडा, ममानया प्रयोजनमित्येवमभि[सं]धाय न + " सद्विवेकमुज्झित्वाऽऽत्मानं वा परित्यज्य बालवद्वाल" इति वृ० वृत्तौ । Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग दीपिकान्वितम् । द्वितीये श्रुत द्वितीयेऽध्ययने ॥३८॥ प्रथम छिनत्ति, केवलं तत्पत्रपुष्पफलादिनिरपेक्षस्तच्छीलतयेत्येतत्सर्वत्रानुयोजनीयमिति । तथा न पुत्रपोषणाय, न पशुपोषणाय, नागारकार्याय, न श्रमणब्राह्मणप्रवृत्तये, नापि शरीरस्य किश्चित्परित्राणं भविष्यतीति, केवलमेवमेवासौ वनस्पति हन्ता छेत्तेत्यादि यावजन्मान्तरानुवन्धिनो वैरस्याभागी भवति । अयं वनस्पत्याश्रयोऽनर्थदण्डोऽभिहितः, साम्प्रतमग्न्याश्रितमाह__से जहा नामए केइ पुरिसे कच्छसि वा दहंसि वा उदगंसि वा दवियंसि वा वलयंसि वा नूमसि वा गहणांस वा गहणविदुग्गंसि वा वणसि वा वणविदुग्गंसि वा पवयंसि वा पत्वयविदुग्गसि वा तणाई ऊसविय २ सयमेव अगणिकायं निसिरति अण्णेहिं अगणिकायं निसिरावेति अन्नं पि जाव समणुजाणति अणट्ठादंडे, एवं खलु तस्स पुरिसस्स तप्पचियं सावजंति आहिजति । दोच्चे दंडसमादाणे अणट्ठादंडवत्तिएत्ति आहिए [ सू०३] ___ व्याख्या-स यथा नाम कश्चित पुरुषो, निर्विवेकतया* कच्छादिषु दशसु स्थानेषु वनदुर्गपर्यन्तेषु 'तृणानि' कुशई. * “कच्छे-नदीजलवेष्टिते वृक्षादिमति प्रदेशे, हृदे-प्रतीते, उदके-जलाशयमात्रे, द्रविके-तृणादिद्रव्यसमुदाये, वलये-वृत्ताकार नद्यादिजलकुटिलगतियुक्तप्रदेशे, नूमे-अवतमसे गहने वृक्षवल्लीसमुदाये, गहनेऽपि दुर्गे-पर्वतैकदेशावस्थितवृक्षवल्लीसमुदाये, वनविदुर्गेनानाविधवृक्षसमूहे, एतेषु" इति हर्ष । क्रियास्थानवर्णनम। ॥३८॥ Jan Education in For Prve & Personal Use Only Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter षिकादीनि पौनःपुन्येोर्ध्वाधःस्थानि कृत्वाऽग्निकायं ' निसृजति ' प्रक्षिपत्यन्येन वा निसर्जयति प्रक्षिपयत्यन्यं च निसृजन्तं समनुजानीते । तदेवं योगत्रिकेण तस्य यत्किञ्चनकारिणस्तत्प्रत्ययिकं - दवदाननिमित्तं ' सावधं कर्म ' तम् । एतच्च द्वितीयमनर्थदण्डसमादानमाख्यातमिति तृतीयमधुना व्याख्याति - महापातकमाख्या अहावरे तच्चे दंडसमादाणे हिंसादंडवत्तिएत्ति आहिज्जति । से जहा नामए केइ पुरिसे ममं वा ममिं वा, अन्नं वा अन्नं वा, हिंसिंसु वा हिंसति वा हिंसिस्सति वा, तं दंडं तसथावरेहिं पाणेहिं सयमेव निसिरति जाव अन्नंपि समणुजाणति हिंसादंडे, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावज्जंति आहिज्जति । तच्चे दंडसमादाणे हिंसादंडवत्तिएत्ति आहिते [सू० ४ ] ॥ व्याख्या- ' अहावरे ' इति, अथापरं तृतीयं दण्डसमादानं हिंसादण्डप्रत्ययिकमाख्यायते - स यथा नाम कश्चित् 'पुरुष: ' पुरुषाकारं वहन, स्वतो मरणभीरुतया वा मामयं घातयिष्यतीत्येवं मत्वा कंमवद्देवकीसुतान् मावतो जघान, मदीयं वा पितरमन्यं वा 'मामकं' ममीकारोपेतं परशुरामवत् कार्त्तवीर्यं जघान, अन्यं वा कञ्चनायं सर्पसिंहादिव्यापादयिष्यतीति मत्वा सर्पादिकं व्यापादयति, अन्यदीयस्य वा कस्यचिद्धिरण्यपश्वादेश्यमुपद्रवकारीति कृत्वा तत्र दण्डं निसृजतीति । तदेवमयं मां मदीयमन्यमन्यदीयं वा हिंसितवान् हिनस्ति हिंसिष्यतीत्येवं सम्भाविते त्र से स्थावरे वा ' तद्दण्डं ' प्राणव्यपरोपणलक्षणं स्वयमेव निसृजति अन्येन निसर्जयति निसृजन्तं वाऽन्यं समनुजानीते, इत्येतत्तृतीयं दण्डसमादानं हिंसा Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग दण्ड प्रत्ययिकमाख्यातमिति । द्वितीये ____ अहावरे चउत्थे दंडसमादाणे अकम्हा[अकस्मात्* दंडवत्तिए[त्ति ] आहिजति । से जहा। श्रुत. दीपिका- | नामए केइ पुरिसे कच्छंसि वा जाव वणविदुग्गंसि वा मियवित्तिए मियसंकप्पे मियपणिहाणे द्वितीयेन्वितम् ।। ध्ययने मियवहाए गंता, एए मिएत्ति काउं अन्नयरस्स मियस्स वहाए उसु आयामेत्ता गं णिसिरेजा, चतुर्थ॥३९॥ से मियं वहिस्सामीति कट्टु तित्तिरं वा वट्टगंवा[ चडगं वा ]लावगं वा कवोतगं वा कविं वा कविंजलं क्रियाKI वा विधेत्ता भवति । इह खल्लु से अन्नस्स अट्ठाए अन्नं फुसति अकम्हादंडे । स्थानव्याख्या-अथाऽपरं चतुर्थ दण्डसमादानमकस्माद्दण्डप्रत्ययिकमाख्यायते-तद्यथा नाम कश्चित् पुरुषो लुब्धकादिकः वर्णनम् । कच्छे वा यावद्वनदुग्ने वा गत्वा 'मृगै 'राटव्यपशुभिर्वा वृत्तिर्यस्य स मृगवृत्तिकः, स चैवम्भूतस्तथा मृगसङ्कल्पः, मृगप्रणिधान:-क मृगान् द्रक्ष्यामीत्येतदध्यवसायी सन् मृगवधार्थ कच्छादिषु गन्ता भवति, तत्र च गतः सन् दृष्ट्वा [मृगानेते] | मृगा इत्येवं कृत्वा तेषां मध्ये अन्यतरस्य मृगस्य वधार्थ 'इषु' शरं आयामेन समाकृष्य मृगमुद्दिश्य निसृजति । स चैवं *" इह चाकस्मादित्ययं शब्दो मगधदेशे सर्वेणाप्याबालगोपालाननादिना संस्कृत एवोच्चार्यत इति तदिहापि तथाभूत एवोचरित इति" वृ० वृत्तौ। ॥३९॥ www.jaineliterary.org Jain Education Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सङ्कल्पो भवति-यथाऽहं मृग हनिष्यामि, इतीघु निक्षिप्तवान् , स च तेन इषुणा तित्तिरादिपक्षिविशेष व्यापादयिता भवति, तदेवं स्वत्वसावन्यस्यार्थाय निक्षिप्तो दण्डो यदन्यं 'स्पृशति ' पातयति सोऽकस्माद्दण्ड इत्युच्यते । अधुना वनस्पतिमुद्दिश्याकस्माद्दण्डमाह से जहा नामए केइ पुरिसे सालीणि वा वीहीणि वा कोद्दवाणि वा कंगूणि वा परगाणि वा । रालाणि वा णिति[णिलि]जमाणे अन्नयरस्स तणस्स वहाए सत्थं निसिरेजा, से सामगं तणगं | मुकुंद[कुमुदुमं वीहीऊसियं कलेसुयं तणं छिंदिस्सामित्ति कट्ठ सालिं वा वीहिं वा कोद्दवं वा कंगुं वा परगं वा रालगं वा छिदित्ता भवति, इति खलु से अन्नस्स अट्ठाए अन्नं फुसति अकम्हादण्डे, एवं खल तस्स तप्पत्तियं सावज्जति आहिज्जति । चउत्थे दंडसमादाणे अकम्हादंडवत्तिएत्ति आहिते ॥ [सू०५] ___व्याख्या-स यथा नाम कश्चित्पुरुषः कृषीवलादिः शाल्यादेर्धान्यजातस्य श्यामादिकं तृणजातमपनयन् धान्यशुद्धि कुर्वाणः समन्यतरस्य तृणजातस्यापनयनाथ शस्त्रं दात्रादिकं निसृजेत् , स च श्यामादिकं तृणं छत्स्यामीति कृत्वा अकस्माच्छालिं वा यावद्रालकं वा छिन्द्यात् , रक्षणीयस्यैव धान्यस्य अकस्माच्छेत्ता भवतीत्येवमन्यस्यार्थाय अन्यकृतेऽन्यं वा 'स्पृशति' Jain Education inte Far Private & Personal use Oh wwwEjainelibrary.org Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायगडाङ्ग सूत्रं | दीपिका न्वितम् । छिनत्ति, तदेवं खलु तत्कर्तुस्तत्प्रत्ययिक-मकस्माद्दण्डनिमित्तं 'सावा' पापमाधीयते-सम्बध्यते, तच्चतुर्थ दण्डसमादानमकस्माद्दण्डप्रत्ययिकमाख्यातमिति । ___ अहावरे पंचमे दंडसमादाणे दिट्ठीविपरियासिया दंडवत्तिए आहिजति । से जहा नामए केइ पुरिसे माईहिंवा पीईहिं वा भाईहिं वा भइणीहिं वा भजाहिं वा पुत्तेहिं वा धूयाहि वा सुण्हाहि | वा सद्धिं संवसमाणे मित्तं अमित्तमिति]व मन्नमाणे मित्ते हयपुवे भवति दिट्ठीविपरियासियादंडे। | व्यांख्या-अथाऽनन्तरं पञ्चमं दण्डसमादानं दृष्टिविपर्यासदण्डप्रत्ययिकमाख्यायते-तद्यथा नाम कश्चित् पुरुषश्चारभटा. दिको मातृपितृभ्रातृमगिनीमार्यापुत्रपुत्रिकास्नुषादिभिः साद्धं [सं]वसंस्तिष्ठन् ज्ञातिपालनकृते मित्रमेव दृष्टिविपर्यासादमित्रो. ऽयमित्येवं मन्यमानो 'हन्यात् ' व्यापादयेत् , तेन च दृष्टिविपर्यासवता मित्रमेव हतपूर्व भवतीत्यतो दृष्टिविपर्यासदण्डोऽयम् । पुनरन्यथा तमेवाह से जहा नामए के पुरिसे गामघायंसि वा नगरघायंसि वा खेड० कब्बड० मडंबघायसि वा| दोणमुहघायंसि वा पट्टणघायांस वा x आसम० सन्निवेस० निगम रायहाणीघायंसि वा अतेणं x“संबाहघायंसि वा” इति हर्ष० । प्रामादिलक्षणं चेदं-'ग्रामो वृत्या वृतः स्यानगरमुरुचतुर्गोपुरोद्भासिशोभ, खेटं द्वितीये श्रुत द्वितीयेध्ययने पञ्चमक्रिया. स्थानवर्णनम् । ॥४॥ Jain Education For Privista pronal Use Oh T Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Int तेणमिति मन्नमाणे अतेणे हयपुत्रे भवति दिट्ठीविप्परियासियादंडे, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावज्जंति आहिज्जति । पंचमे दंडसमादाणे दिट्ठीविप्परियासियादंडवत्तिएत्ति आहिए । [ सू० ६ ] ॥ व्याख्वा स यथा नाम कश्चित्पुरुषः पुरुषाकारमुद्वहन् ग्रामघातादिके विभ्रमे भ्रान्तचेता दृष्टिविपर्यासादचौरमेव चौरोऽयमित्येवं मन्यमानो व्यापादयेत् तदेवं तेन भ्रान्तमनसा विभ्रमाकुलेनाचौर एवं हतपूर्वो भवति, सोऽयं दृष्टिविपर्यासदण्डस्तदेवं खलु ' तस्य दृष्टिविपर्यासवतस्तत्प्रत्ययिकं सावद्यं कर्माधीयते । तदेवं पञ्चमं दण्डसमादानं दृष्टिविपर्यास प्रत्ययिकमाख्यायते । अहावरे छुट्टे मोसवत्तिए किरियाठाणे + आहिजाति-से जहा नामए केइ पुरिसे आयहेउं वा नाइदेउ वा अगारहेडं वा परिवारहेडं वा सयमेव मुसं वयति अन्नेणं मुलं वयावेति मुसं वयंतं नद्यद्रिवेष्टं परिवृतमभितः कर्बेटं पर्वतेन । ग्रामो युक्तं मडम्बद [ १ के ]लितदशशतैः पचनं रत्नयोनि, द्रोणाख्यं सिंधुवेला- वलयितमथ सम्बाधनं चाद्रिशृङ्गः ॥ १ ॥ इति । आश्रमस्तापसस्थानं, सन्निवेशः - सार्थकटकादिवासः, निगमो - बहुवणिग्वासः, राजधानी - राजकुलस्थानम् । " इति हर्ष० ' ख्यात इति ' प्र० । ' ख्यातमिति ' बृ. वृ. । + मुद्रितासु सवृत्तिकप्रतिषु ' छट्ठे किरियट्ठाणे मोसाबसिएत्ति' इत्येवमस्ति, तत्समीचीनं प्रतिभाति, दीपिकाकारेणाप्यर्थ एतत्क्रमेणैव कृतत्वात् । किच- ' किरियट्ठाणे मोसावत्तिए ' इत्यत्र ' किरियाठाणे मोसवत्तिए ' इति सम्यगाभाति । । Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीवे श्रुत सूयगडा सूत्रं दीपिकान्वितम् । वा अन्नं समणुजाणाति, एवं खलु तस्स तप्पतियं सावजांत आहिजति, छ? किरियाठाणे मोसव- त्तिए ति] आहिते [ सू०७] ॥ व्याख्या-अथाऽपरं षष्ठं क्रियास्थानं मृषावादप्रत्ययिकमाख्यायते, तत्र पूर्वोक्तानां पश्चानां क्रियास्थानानां सत्यपि क्रियास्थानत्वे प्रायशः परोपघातो भवतीति कृत्वा दण्डसमादानसंज्ञा कृता, षष्ठादिषु च बाहुल्येन परव्यापादनं न भवतीति कृत्वा क्रियास्थानमित्येषा संज्ञोच्यते । स यथा नाम कश्चित् पुरुषः स्वपक्षावेशादागृही आत्मनिमित्तं यावत्परिवारनिमित्तं वा सद्भूतार्थनिन्हवरूपमसद्भूतोद्भावनरूपं वा स्वयमेव मृषावादं वदति, तद्यथा-नाहं मदीयो वा कश्चिच्चौरः, स च चौरमपि सद्भूतमप्यर्थमपलपति, तथा परमचौरं चौरमिति वदति, तथाऽन्येन मृषावाद भाणयति, तथाऽन्यांश्च मृपावाद वदतः समनुजानीते । तदेवं खलु तस्य योगत्रिककरणत्रिकेण मृषावादं वदतस्तत्प्रत्ययिकं सावधं कर्माधीयते-सम्बध्यते, तदेतत्वष्ठं क्रियास्थानं मृषावादप्रत्ययिकमाख्यातमिति । __अहावरे सत्तमे किरियाठाणे अदिन्नादाणवत्तिए[ ति] आहिजति-से जहा नामए केइ पुरिसे आयहेउं वा जाव परिवारहेउं वा सयमव अदिन्नं आदियति अन्नेण वि अदिन्नं आदियावेति अदिन्नं आदियंतं अन्नं समणुजाणति, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावजंति आहिजति । सत्तमे किरियाठाणे आदिन्नादाणवत्तिएत्ति अहिते [ सू०८]॥ द्वितीयेध्ययने षष्ठक्रियास्थानवर्णनम् । ॥४१॥ 1 For PrivatePersonal Use Only wwwjainelibrary.org in dat A Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ का व्याख्या-अथापरं सप्तमं क्रियास्थानमदत्चादानप्रत्ययिकमाख्यायते, एतदपि प्राग्वज्ज्ञेयम् । स यथा नाम कश्चित्पुरुष आत्मनिमित्तं यावत्परिवारनिमित्तं [ स्वयमेय] परद्रव्यमदत्तमेव गृह्णीयात् अपरं च ग्राहयेत् गृह्णन्तमप्यपरं समनुजानीया. दित्येवं तस्यादत्तादानप्रत्ययिकं कर्म बध्यते । सप्तमं क्रियास्थानमाख्यातमिति । ___ अहावरे अट्टमे किरियाठाणे अज्झत्थवत्तिएत्ति आहिजति । से जहा नामए केइ पुरिसे णत्थि णं केति किंचि विसंवादेति, सयमेव हीणे दीणे दुढे दुम्मणे ओहयमणसंकप्पे चिंतासोगसागरसंपविढे करतलपल्हत्थमुहे अदृज्झाणोवगए भूमिगयदिट्ठीए झियाइ, तस्स णं अज्झत्थिया असंसइया चत्तारि ठाणा एवमाहिति, तंजहा-कोहे माणे माया लोहे, अज्झत्थमेव कोहमाणमायालोहे, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावजंति आहिजति, अट्ठमे किरियाठाणे अज्झथिएत्ति आहिए [ सू०९]॥ व्याख्या-अथापरमष्टमं क्रियास्थानमाध्यात्मिकमित्यन्तःकरणोद्भवमाख्यायते, मानसिकमित्यर्थः। तद्यथा नाम कश्चित् पुरुषश्चित्तोत्प्रेक्षाप्रधानस्तस्य च नास्ति कश्चिद्विसंवादयिता-न तस्य कश्चिविसंवादेन परिभवेन वाऽसद्भूतोद्भावनेन वा चित्तदुःखमुत्पादयति, तथाऽप्यसौ स्वयमेव वर्णापशदवद्धीनो दुर्गतवद्दीनो दुश्चित्ततया दुष्टो दुर्मनास्तथोपहतोऽस्वस्थतया Jain Education For PrivatePersonal Use Only Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रु० द्वितीयेsध्ययने नवम क्रिया स्थान एयगडाङ्ग VI मनःसङ्कल्पो यस्य स तथा चिन्ताशोकसागर(सं)प्रविष्टः। तथा करतलपर्यस्तमुखः, तथाऽऽर्तध्यानोपगतो-निर्विवेकतया सूत्रं | धर्मध्यानाद्दरवर्ती [भूमिगतदृष्टिः] निनिमित्तमेव द्वन्द्वोपहतवद्ध्यायति, तस्यैवं चिन्ताशोकसागरावगाढस्य सत ' आध्या- दीपिका त्मिकानि' अन्तःकरणोद्भवानि मनःसंश्रितान्यशंसयितानि वा-निःशंसयानि चत्वारि वक्ष्यमाणानि स्थानानि भवन्ति, न्वितम् । तानि चैवमाख्यायन्ते, तद्यथा-क्रोधस्थानं मानस्थानं मायास्थानं लोभस्थानमिति । ते च चत्वारोऽपि कषाया आध्यात्मि॥४२॥ काः, एभिरेव सद्भिर्दुष्टं मनो भवति, तदेवं तस्य दुर्मनसः क्रोधमानमायालोभवत एवमेवोपहतमनःसङ्कल्पस्य 'तत्प्रत्ययिक' अध्यात्मनिमित्तं सावधं कर्म आधीयते-सम्बद्ध्यते, तदेवमष्टममेतत् क्रियास्थानमाध्यात्मिकायमाख्यातमिति । __अहावरे नवमे किरियाठाणे माणवत्तिए[त्ति] आहिजति। से जहा नामए केइ पुरिसे जातिमएण वा कुलमरण वा बलमएण वा रूवमएण वा तवमएण वा सुयमएण वा लाभमएण वा ईसरियमएण वा पन्नामएण वा अन्नतरेण वा मददाणेणं मत्ते समाणे परं हीति निंदति खिंसति गरहति परिभवति अवमन्नति, इत्तरिए अयं, अहंमंसि पुण विसिट्ठजाइकुलबलाइगुणोववेए, एवमप्पाणं समुक्कसे। व्याख्या-अथापरं नवमं क्रियास्थानं मानप्रत्ययिकमाख्यायते । स यथा नाम कश्चित्पुरुषो जात्यादिगुणोपेतः सन् जातिकुलबलरूपतपःश्रुतलाभैश्वर्यप्रज्ञामदाख्यैरष्टभिर्मदस्थानैरन्यतरेण वा मत्तः परमवमबुद्धथा हीलयति तथा निन्दति वर्णनम् । ॥४२॥ Jain Education a l Far Private & Personal use Oh wwwEjainelibrary.org Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जुगुप्सते गर्हति परिभवति, एतानि चैकार्थिकानि । यथा परिभवति तथा दर्शयति-'इतरोऽयं' जघन्यो हीनजातिकस्तथा | मत्ता कुलबलरूपादिभिरमपभ्रष्टः सर्वजनावगीतोxऽयमिति, अहं पुनर्विशिष्टजातिकुलबलादिगुणोपेतः, एवमात्मानं समत्कर्षयेदिति+ । साम्प्रतं मानोत्कर्षविपाकमाह देहा चुए कम्मबितिए अवसे पयाइ, तं जहा-गब्माओ गन्भं जम्माओ जम्मं माराओ मारं नरगाओ नरगं, चंडे थद्धे चवले माणी आवि भवति, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावजंति आहिजति। नवमे किरियाठाणे माणवत्तिए[त्ति] आहिते [सू० १०॥ ___व्याख्या-'देहा चुए'त्ति, तदेवं जात्यादिमदोन्मत्तः सनिहैव लोके गर्हितो भवति, *जातिमदः कस्यचिन कुलमदोऽपरस्य कुलमदोन जातिमदः, अपरस्योमयं, अपरस्यानुभयमिति, एवं [पदद्वयेन चत्वारो भङ्गाः] पदत्रयेणाष्टौ, चतुर्भिः षोडशेत्यादि यावदष्टभिः पदैः षट्पश्चाशदधिकं शतद्वयमिति, सर्वत्र मदामावरूपश्चरमभङ्गः शुद्ध इति । परलोकेऽपि च मानी दुःखभाग्भवतीत्यनेन प्रदर्श्यते । स्वायुषः क्षये देहाच्युतो भवान्तरं गच्छन् शुभाशुभकर्मद्वितीयः कर्मपरायत्तत्वादवशः x निन्दनीयः । + वक्ष्यमाणः । तदेव ' मित्यादितः । शुद्ध ' इति पर्यन्तः पाठोऽत्रत्य आभाति । · परलोकेऽपी 'ति वाक्यं च 'भवती 'त्यस्थाले । इति टिप्पणं आगमोदयसमितिमुद्रितासु सवृत्तिकप्रतिषु । * " अत्र च जात्यादिपदद्वयादिसंयोगा द्रष्टव्याः, ते चैवं भवन्ति" इति वृत्तौ। Jain Education For Privats & Personal Use Oh Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ४३ ॥ Jain Education Int परतन्त्रः प्रयाति । त[]]थाहि (१) गर्भाद्गर्भ पञ्चेन्द्रियापेक्षं, तथा गर्भादगर्भ विकलेन्द्रियापेक्ष-विकले[न्द्रिये ] धूत्पद्यमानः पुनरगर्मागर्म, एवमगर्भादगर्भ, एतच्च नरककल्पगर्भदुःखापेचया अभिहितम् । उत्पद्यमानदुःखापेक्षया त्विदमभिधीयतेजन्मन एकस्मादपरजन्मान्तरं व्रजति, मरणान्मरणान्तरं व्रजति । नरकदेश्यात् श्वपाकादिवासाद्रत्नप्रभादिकं नरकान्तरं व्रजति, यदिवा नरकात्सीमन्तादिकादुद्वर्त्य सिंहमत्स्यादावुत्पद्य पुनरपि तीव्रतरं नरकान्तरं व्रजति । तदेवं नटवद्रङ्गभूमौ संसारचक्रवाले खीपुंनपुंसकादीनि बहुन्यवस्थान्तराण्यनुभवति । तदेवं मानी परपरिभवे सति ' चण्डो' रौद्रो भवति परस्यापकरोति, तदभावे ह्यात्मानं व्यापादयति । तथा स्तब्धश्चपलो यत्किञ्चनकारी, मानी सन् सर्वोऽप्येतदवस्थो भवति । तदेवं मानप्रत्ययिकं सावधं कर्म्म बद्ध्यते । नवमं [ ए ]तक्रियास्थानमाख्यातमिति । अहावरे दसमे किरियाठाणे मित्तदोसवत्तिएत्ति आहिज्जति । से जहा नामए केइ पुरिसे माईहिं वा पिईहिं वा भाईहिं वा भइणीहिं वा भज्जाहिं वा धूयाहिं वा पुत्तेहिं वा सुहाहिं वा सद्धिं संवसमाणे तेर्सि अन्नयरेसिं वा [ अन्नयरंसि ] अहालहुगांस अवराहंसि सयमेव गरुयं दंड निवन्तेति । तं जहा - सीओदगवियडंसि वा कार्य उच्छोलित्ता भवति, उसिणोद्गवियडेण वा कार्य उसिचित्ता भवति, अगणिकाएणं वा कार्य उवडहित्ता भवइ, जोत्तेण वा वेत्तेण वा णेत्तेण वा द्वितीये श्रुत० द्वितीया ने दशमक्रियास्थान वर्णनम् । ॥ ४३ ॥ Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तयाइ वा कसेण वा छियाए वा लयाए वा पासाई उद्दालेत्ता भवइ, डंडेण वा अट्ठीण वा मुट्ठीण वा । लेलूण वा कवालेण वा कार्य आउहित्ता भवति, तहप्पगारे पुरिसजाते संवसमाणे दुम्मणा भवंति, पवसमाणे सुमणा भवंति, तहप्पगारे पुरिसजाए दंडपासी दंडगुरुए दंडपुरक्खडे अहिए इमर्सि लोगंसि अहिए परंसि लोगसि संजलणे कोहणे पिट्रिमसियावि भवति, एवं खल तस्स तप्पत्तियं सावजंति आहिजति, दसमे किरियाठाणे मित्तदोसवत्तिएत्ति आहिते ॥ सू० । ११ ॥ व्याख्या-अथापरं दशमं क्रियास्थानं मित्रदोषप्रत्ययिकमाख्यायते-तद्यथा नाम कश्चित् पुरुषः प्रभुकल्पो मातापितृसुहृत्स्वजनादिभिः सा परिवसँस्तेषां च मातापित्रादीनामन्यतमेनाऽनाभोगतया यथाकथचिल्लघुतरेऽप्यपराधे वाचिके दुर्वचनादिके तथा कायिके हस्तपादादिसङ्घनरूपे कृते सति ' स्वयमेव ' आत्मना क्रोधाध्मातो गुरुतरं दण्डं दुःखोत्पादकं 'निर्वतयति' करोति । तद्यथा-शीतोदके 'तस्य' अपराधकर्तुः कायमधो बोलयिता भवति, तथोष्णोदकविकटेन कार्य सिञ्चयिता भवति, तत्र विकटग्रहणादुष्णतेलेन कॉजिकादिना वा कायमुपतापयिता भवति, तथाऽनिकायेनोल्मुकेन तप्तायसा वा कार्य उप[ दाहयिता तापयिता वा (१) भवति, तथा जो[ यो ]त्रेण वा, वेत्रेण वा, [ नेत्रेण वा] 'स्वचा वा' सनादिकया लतया वाऽन्यतमेन वा दवरकेण ताडनातः 'तस्य' अल्पापराधकर्तुः शरीरपाणि ' उद्दालयितुं' चर्माणि लुम्पयितुं (प्रस्तुतो) भवति, तथा दण्डादिना कायमुपताडयिता मवति, तदेवमल्पापराधिन्यपि महाक्रोधदण्डवति तथा Jain Education in Ni Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूर्यगढाज पुत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ४४ ॥ Jain Education Inte प्रकारे पुरुषजाते एकत्र वसति सति तत्सहवासिनो मातापित्रादयो दुर्मनसस्तदनिष्टाशङ्कया भवन्ति तस्मिँश्च देशान्तरं गच्छति तत्सहवासिनः सुमनसो मवन्ति । तथाप्रकारच पुरुषजातोऽल्पेऽप्यपराधे महान्तं दण्डं कल्पयतीति, तदेव दर्शयतिदण्डपार्थी स्वल्पेऽप्यपराधे कुप्यति दण्डं च पातयति, दण्डेन गुरुको भवति, तथा दण्डपुरस्कृतः - सदा पुरस्कृतदण्ड इत्यर्थः । स चैवम्भूतः ‘अस्मिँल्लोके' अस्मिञ्जन्मनि अहितः प्राणिनामहितदण्डापादनात्, तथा परस्मिन्नपि जन्मन्यसावहितः, येनकेनचिन्निमित्तेन क्षणे क्षणे सज्ज्वलतीति सज्वलनः स चात्यन्तक्रोधनो बधबन्धविच्छेदनादिषु शीघ्रमेव क्रियासु प्रवर्त्तते, तदभावेऽप्युत्कटद्वेषतया मर्मोद्धदृनतः पृष्ठिमासमपि खादेत्तदसौ ब्रूयाद्येनासौ परः सज्ज्वलति, तदेवं तस्य महादण्डप्रवर्त्तयितुस्तद्दण्डप्रत्ययिकं सावधं कर्म्म बध्यते, तदेतदशमं क्रियास्थानं मित्रद्रोहप्रत्ययिकमाख्यातमिति । अहावरे एक्कारसमे किरियाठाणे मायावत्तिएत्ति आहिज्जति, जे इमे भवंति गूढायारा तमोकासिया उलूगपत्तलहुया पवयगुरुआ ते आरिया वि संता अणारियाओ भासाओ वि प्परंजंति, अन्ना संता अप्पाणं अन्नहा मन्नति, अन्नं पुट्ठा + अन्नं वागारंति, अन्नं आइक्खियवं अन्नं X “ अन्ये पुनरष्टमं क्रियास्थानमात्मदोष प्रत्ययिकमाचक्षते, नवमं तु परदोषप्रत्ययिकं, दशमं पुनः प्राणवृत्तिकमिति " हर्षकुलः । + यद्यपि दीपिकाप्रतिषु सर्वास्वपि 'अन्नं पुण कुर्णति अन्नं० ' इत्येवंरूपः पाठोऽस्ति मूले, परं सवृत्तिकमुद्रित प्रतिषु ' अन्नं पुट्ठा अन्नं० ' इत्येवम्भूतोऽस्ति, अर्थो दीपिकायामप्येवंविध एव विहित इत्ययमेव मूले निवेशितः । द्वितीये श्रुत० द्वितीयेऽ ध्ययने एकादशमक्रिया स्थान वर्णनम् । ॥ ४४ ॥ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आइक्खति । व्याख्या - अथापरं एकादशं [ मायाप्रत्ययिकं ] क्रियास्थानमाख्यायते ये केचनामी भवन्ति पुरुषाः गूढाचाराः गलकर्त्तकग्रन्थिछेदादयस्ते च नानाविधैरुपायैर्विश्रम्भमुत्पाद्य पश्चादपकुर्वन्ति, प्रद्योतादेरमयकुमारादिवत्, ते च मायाशीलत्वेनाप्रकाशचारिणः । तमःकाषिणः- पराविज्ञाताः क्रियाः कुर्वन्ति, ते च स्वचेष्टयैव 'उलूकपत्रवल्लघवः कौशिकप[च]सो पर्वतद्गुरुमात्मानं मन्यन्ते यदिवाऽकार्यप्रवृत्तेः पर्वतवनो स्तम्भयितुं शक्यन्ते, ते चार्यदेशोत्पन्नाः सन्तः धूर्तप्राया आत्मप्रच्छादनार्थम परमयोत्पादनार्थं वा अनार्यमाषाः प्रयुजन्ते, परव्यामोहार्थं स्वमतिपरिकल्पितभाषाभिरपराविदिताभिर्माषन्ते तथाऽन्यथा वा व्यवस्थितमात्मानमन्यथा-साध्याकारेण मन्यन्ते व्यवस्थापयन्ति च तथाऽन्यत्पृष्टा मातृस्थानतोऽन्यदाचक्षते, यथाऽऽम्रान् पृष्टाः कोविदारकान् + आचक्षते, वादकाले वा कश्चिन्यायवादितया व्याकरणे [ पृष्टे ] प्रवीण [ प्रवणं ] स्त ( १ )र्कमार्गमवतारयति तथाऽन्यस्मिश्चार्थे कथयितव्येऽन्यमेवार्थमाचक्षते । तेषां च सर्वार्थविसंवादिनां कपटप्रपश्चचतुराणां विपाकोद्भावनाय दृष्टान्तं दर्शयितुमाह सेज नाम के रिसे अंतोसले, तं सलं नो सयं णीहरति नो अन्नेणं बीहरावेइ नो पडिविद्धंसेति, एवमेव निण्हवेइ, अविउद्यमाणे अंतो अंतो झि[रि ]याति, एवमेव माई मायं कणो + ' कोविदारो - युगपत्र: ' इति है मवचनाद्वनस्पति: ' कचनार 'इति लोके । Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्थगडा दीपिका: न्वितम् । द्वितीये श्रु. द्वितीयेs. ध्ययने एकादशमक्रिया स्थान| वर्णनम् । ॥४५॥ आलोएतिनो पडिक्कमति नो निदइ नो गरिहइ नो विउदृति नो विसोहेइ नो अकरणयाए अब्भुढेइ नो अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवजति, माई अस्सिं लोए पञ्चायाति माई परंसि लोए [पुणो पुणो] पञ्चायाति । निंदइ गरिहइ पसंसइ णिच्चरति, णो नियति णिसिरियं दंडं छाएति | मायी असमाहडसुहलेस्से आवि भवति, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावजंति आहिजति । एक्कार समे किरियाठाणे मायावत्तिपत्ति आहिए ॥ सूत्र १२॥ _____ व्याख्या से जहे 'त्यादि, तद्यथा नाम कश्चित्पुरुषः समामादपक्रान्तोऽन्तःसशल्यः, शल्यपटुनवेदनाभीरुतया तच्छल्यं न स्वतो निर्हरति-अपनयति नोद्धरति, नाप्यन्येनोद्धारयति नापि तच्छल्यं वैद्योपदेशेनौषधोपचारयोगादिभिरुपायैः प्रध्वंसयति, अन्येन केनचित्पृष्टोऽपृष्टो वा तच्छल्यं ' एवमेव ' नेष्प्रयोजनमेव निह्नते-अपलपति, तेन च शल्येना| सावन्तर्वतिना 'अविउमाणे 'त्ति पीडथमानः 'अन्तो अन्तो' मध्ये मध्ये पीब्यमानोऽपि ' रीयते' व्रजति, तत्कृतां वेदनामधिसहमाना क्रियासु प्रवर्तते । साम्प्रतं दार्शन्तिकमाह-' एवमेवे 'त्यादि, यथाऽसौ सशल्यो दुःख माग भवत्येव मेवासौ 'मायी' मायाशल्यवान् यत्कृतमकार्य तन्मायया निगूहयन्मायां कृत्वा न तां मायामन्यस्मै 'आलोचयति' कथयति नापि तस्मात् स्थानात् प्रतिक्रामति-न ततो निवर्चते, नाप्यात्मसाक्षिकं तन्मायाशल्य निन्दति, तद्यथा|धिमा ।। यदहमेवम्भूतमकार्य कर्मोदयात्कृतवान् । नापि परसाक्षिकं 'गईति' आलोचयति नापि च जुगुप्सते तथा -STS |॥१५॥ For Private & Personal Use Oy wwjanesbrary.org Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'नो विउद्दह' इति नापि तन्मायाशल्यं वित्रोटयति, अपुनःकरणतया न निवर्तयतीत्यर्थः। [नापि तन्मायाऽऽदिकमकार्य | सेवित्वाऽऽलोचनाऽर्हायाऽऽत्मानं निवेद्य तदकार्याकरणतयाऽम्युत्तिष्ठते, प्रायश्चित्तं प्रतिपद्यापि नोयुक्तविहारी भवतीत्यर्थः । तथा नापि गर्वादिभिरभिधीयमानोऽपि यथाऽईमकार्य निर्वहणयोग्यं प्रायचित्तं-शोधयतीति प्रायश्चित्तं तपाकर्म विशिष्टं चान्द्रायणाद्यात्मकं 'प्रतिपद्यते' अभ्युपगच्छति । ] नो यथायोग्यं प्रायश्चित्तं प्रतिपद्यते, तदेवं मायया सत्कार्यप्रच्छादकोऽस्मिन्नेव लोके मायावीत्येवं सर्वकार्येम्वेवाविश्रम्भणत्वेन 'प्रत्यायाति' प्रख्याति याति, तथाभूतश्च सर्वस्याविश्वास्यो]. सो (1) भवति । तथाऽतिमायाविवादसौ परलोके सर्वाधमेषु यातनास्थानेषु नरकतिर्यगादिषु पौनःपुन्येन प्रत्यायातिसा भयोभ्यस्तेम्वेवारघट्टघटीन्यायेन प्रत्यागच्छति । तथा नानाविधैः प्रपञ्चैर्वञ्चयित्वा परं 'निन्दति ' जुगुप्सते, तद्यथा अयमझो मूर्खः पशुकल्पो, नानेन किमपि प्रयोजनमित्येवं परं निन्दति आत्मानं प्रशंसयति, तथाऽऽत्मप्रशंसया तुष्यति, एवं चासौ लब्धप्रसरोऽधिकं तथाविधानुष्ठायी भवति । निश्चरति-तस्मान्मातृस्थानान्न निवर्तते । तथाऽसौ मायया 'दण्ड' प्राण्युपमर्दकारिणं 'निसृज्य' पातयित्वा पश्चाच्छादयति-अपलपति अन्यस्य[ वा ]उपरि प्रक्षिपति । स च मायावो सर्वदा वञ्चनपरायणः संस्तन्मनाः सर्वानुष्ठानेऽप्येवम्भूतो भवति- असमाहृता' अनङ्गीकता शोभना लेश्या येन स तथा, आर्तध्यानोपहततया अशोभनलेश्य इत्यर्थः । तदेवमपगतधर्मध्यानोऽममाहितोऽशुद्धलेश्यश्चापि भवति । तदेवं तस्य मायाशल्यप्रत्ययिकं सावधं कर्माधीयते, तदेतदेकादशं क्रियास्थानं मायाप्रत्ययिक व्याख्यातम् । +[ ] नास्त्येतविद्वान्तर्गतपाठः प्रत्यन्तरेषु । For Private & Personal Use Oy Jain Education in | Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडात दीपिकान्वितम् । अहावरे बारसमे किरियाठाणे लोभवत्तिएत्ति आहिज्जति-जे इमे भवंति, [तं जहा-]आरन्निया आवसहिया गामंतिया कण्हुई राहस्सिया नो बहुसंजया नो बहुपडिविरया सबपाणभूयजीवसत्तेहिं, ते अप्पणा सच्चामोसाई एवं वि[प]उंति-अहं न हंतवो अन्ने हंतवा, अहं न अज्जावेयवो अन्ने अज्जावेयवा, अहं न परिघेत्तत्वो अन्ने परिघेत्तवा, अहं न परितावेयवो अन्ने परितावेयवा, अहं न उद्दवेयवो अन्ने उद्दवेयबा, एवामेव ते इत्थिकामेहिं मुच्छिया गिद्धा गढिया गरहिया अज्झोववन्ना जाव वासाइं चउपंचमाइं छद्दसमाइं अप्पयरो वा भुजयरो वा भुंजित्तु [ भोग]भोगाई कालमासे कालं किच्चा अन्नयरेसु आसुरिएसु किब्बिसिएसु ठाणेसु उववत्तारो भवंति । ततो विप्पमुच्चमाणा भुजो भुजो एलमूयत्ताए तमूयत्ताए जातिमूयत्ताए पञ्चायंति, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावजंति आहिज्जति, दुवालसमे किरियाठाणे लोभवत्तिएत्ति आहिए । इच्चेयाइं दुवालसकिरियाठाणाई | दविएणं समणेणं वा माहणेणं वा सम्मं सुपरिजाणियवाणि भवंति ॥ [ सू. १३ ] ॥ भ्याख्या-अथ द्वादशं क्रियास्थानं लोमप्रत्ययिकमाख्यायते, [तद्यथा]-य इमे वक्ष्यमाणा अरण्ये वसन्त्यारण्यकास्ते द्वितीवे श्रुत. द्वितीयेध्ययने द्वादशमक्रियास्थानवर्णनम् । ॥४६॥ ॥४६॥ Jan Education For F ate & Personal use Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - - च कन्दमूलफलाहाराः सन्तः केचन वृक्षमुले वसन्ति, केचन ' आवसथेषु' शूद्र(पूड )वा[उटजा]कारेषु गृहेषु, तथाऽपरे ग्रामादिकमुपजीवन्तो ग्रामसमीपे वसन्तीति ग्रामान्तिकाः, कचि( कदाचि)त्कार्य मण्डलप्रवेशादिके रहस्य येषां ते राहसिकास्ते च ' न बहुसंयताः' न. सर्वसावद्यानुष्ठानेभ्यो विरता, एतदुक्तं भवति-न बाहुल्येन प्रसेषु दण्डसमाऽरम्मं विदधति, एकेन्द्रियोपजीविनस्त्वविगानेन तापसादयो भवन्ति, तथा 'न बहुविरता'न सर्वेष्वपि प्राणातिपातविरमणादिव्रतेषु वर्तन्ते, किन्तु द्रव्यतः कतिपयव्रतवर्तिनो, न भावतो, तत्कारणस्य सम्यग्दर्शनस्याभावादित्यभिप्रायः । इत्येतदेवाऽऽविर्भावयितुमाह-सव्वपाणे 'त्यादि, ते ह्यारण्य कादयः सर्वप्राणभूतजीवसत्वेभ्य 'आत्मना' स्वतोऽविरता:- तदुपमर्दकादारम्भादविरता इत्यर्थः । ते पाषण्डिका आत्मना बहूनि स(त्य)त्यामृषाभूतानि वाक्यानि ' एवं ' वक्ष्यमाणनीत्या विशेषण प्रयुजन्ति, यदिवा सत्यान्यपि तानि प्राण्युपमर्दकत्वेन मृपाभूतानि स(त्य)त्यामृषाणि, एवं ते प्रयुञ्जन्तीति दर्शयति, तद्यथाअहं ब्राह्मणवान हन्तव्योऽन्ये तु शूद्रत्वाद्धन्तव्याः, तथाहि तद्वाक्यं-'शुद्रं व्यापाद्य प्राणायाम +जपेत् किश्चिद्वा दद्यात् , तथा 'क्षुद्रसच्चानामनस्थिकानां शकटभरमपि व्यापाद्य ब्राह्मणं भोजये'दित्यादि, अपरश्चाहं वर्णोत्तमचान आज्ञापयितव्योऽन्ये तु मत्तोऽवमाः[ ऽधमाः समाज्ञापयितव्याः, तथा नाइं परितापयितव्यः [ अन्ये तु परितापयितव्याः], तथाऽहं वेतनादिना कर्मकरणाय न ग्राह्यः अन्ये तु शुद्रा ग्राह्या x इति । किम्बहुनोक्तेन ? नाहमुपदावयितव्यो-न जीवितादपरोपयितव्योऽन्येत्व()पद्रावयितव्या इति । तदेवं परपीडोपदेशनतोऽतिमूढतयाऽसम्बद्धप्रलापिनामज्ञानावताना + श्वासप्रश्वासरोधनम् । ४ मूले ग्रहणसूत्रानन्तरं परितापसूत्रमस्ति । N Jan Education ewww.jainalibrary.org Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अयगडाङ्गसूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ४७ ॥ Jain Educatic मात्मम्मरीणां विषमदृष्टीनां न प्राणातिपातविरतिरूपं व्रतमस्ति तथा मृषावादादत्तादानविरमणाभावोऽप्यायोज्यः, अधुना त्वनादिमवाभ्यासाद्दुस्त्यजत्वेन प्राधान्यात्सूत्रेणैवाब्रह्माधिकृत्याऽऽह - ' एवामेवे 'त्यादि, 'एवमेव' पूर्वोक्तेनैव कारणेनातिमूढतया परमार्थम जानानास्ते तीर्थिकाः स्त्रीषु कामेषु च शब्दादिषु मूर्च्छिता गृद्धा प्रथिता अभ्युपपन्नाः यावद्वर्षाणि चतुष्पश्च षदशकानि, अयं च मध्यमः कालो गृहीतः, प्रायस्तीर्थिका अतिक्रान्तवयस एव प्रत्रजन्ति, तत्र च ते त्यक्त्वाऽपि गृहवासं शुक्त्वा भोग भोगानिति ते च किल वयं प्रव्रजिता इति वदन्तोऽपि न भोगेभ्यो निवृत्ताः, यतो मिध्यादृष्टितयाऽज्ञानान्धत्वात्सम्यग्विरतिपरिणामरहिताः, ते चैवम्भूतपरिणामाः स्वायुषः क्षये कालमासे कालं कृत्वा विकृष्टतपसोऽपि सन्तोऽन्यतरे सुरिकेषु किल्विषकस्थानेषूत्पादयितारो भवन्ति, ते ज्ञानतपसा मृता अपि किल्बिपिके [ षु स्थाने] षूत्पत्स्यन्ते, तस्मादपि स्थानादायुषः क्षयाद्विप्रमुच्यमानाः किल्बिष बहुलास्तत्कर्मशेषेण एलमूक भावेनोत्पद्यन्ते, यथा एडमूकोऽव्यक्तवाग्भवति एवमसावप्यव्यक्तवाक्समुत्पद्यते, तथा 'तमूयत्ताए 'ति तमस्त्वेन - अत्यन्तान्धतमसत्वेन जात्यान्धतयाऽत्यन्ताज्ञानावृत्तया [वा ] तथा जातिमूकतया ऽपगतवाच इह प्रत्यागच्छन्तीति । तदेवम्भूतं खलु तीर्थिकानां सावद्यानुष्ठानादनिवृत्तानां तत्प्रत्ययिकं सावधं कर्माधीयते, तदेतल्लोमप्रत्ययिकं द्वादशं क्रियास्थानमाख्यातमिति । इत्येवमर्थदण्डादीनि लोभप्रत्ययिकक्रियास्थानपर्यवसानानि द्वादश क्रियास्थानानि + ' द्रविकेण ' मुक्तिगमनयोग्येन श्रमणेन माहनेन एतानि सम्यग् ' यथावस्थितस्वरूपनिरूपणतो मिथ्यादर्शनाऽऽभितानि संसारकारणानीति कृत्वा ज्ञपरिज्ञया ज्ञात्वा प्रत्याख्यानपरिज्ञया परिहर्त्तव्यानि । + " कर्मप्रन्थि द्रावणाद्रवः- संयमः, स विद्यते यस्यासौ द्रविकस्तेन " इति हर्ष० । ational द्वितीये श्रुत० द्वितीयेऽ ध्ययने द्वादशम क्रियास्थान वर्णनम् । ॥ ४७ ॥ Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education आहावरे तेरसमे किरियाठाणे इरियावहिपत्ति आहिज्जति-इह खलु अतत्ताए संवुडस्स अणगारस्स इरियासमियस्स भासासमियस्स एसणासमियस्स आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासामयस्स उच्चारपासवणखेलसिंघाणजलपारिट्ठावणियासमियस्स, मणसमियरस वयसामियस्स कायसमियरस, मणगुत्तस्स वयगुत्तस्स कायगुत्तस्स, गुत्तिदियस्स गुत्तबंभचारिस्त, आउत्तं गच्छमाणस्स आउत्तं चिट्ठमाणस्स आउत्तं निसियमाणस्स आउत्तं तुयट्टमाणस्स आउत्तं भुंजमाणस्स आउत्तं भासमाणस्स आउत्तं वत्थं पडिग्गहं कंबलं पायपुंछणं गिह्रमाणस्स वा निक्खिवमाणस्स वा जाव चक्खुपम्दनिवायमवि अस्थि वेमाता सुहुमा किरिया इरियावहिया नाम कज्जइ, सा पढमसमए बद्धा पुट्ठा, बितिय समए वेइया, तइयसमए निजिण्णा, सा बद्धा पुट्ठा उदीरिया वेइया निजिण्णा, सेकाले अकम्मए यावि भवइ, एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावज्जांत आहिज्जति, तेरसमे किरियाठाणे इरियावहिएति आहिज्ज [ ए ]ति । *तेरसमे किरियाठाणे इरियावहिति * * एतच्चिन्हान्तर्गतो मूलपाठो नास्ति मुद्रितासु सवृत्तिकप्रतिषु हर्षकुली यदीपिकास्वपि, परमेतद्दीपिकाप्रतिषु सर्वास्वप्यस्ति Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडात स्त्रं दीपिकान्वितम्। | आहि[ते]ता* । से बेमि जे अतीया जे य पडुप्पन्ना जे य आगमिस्सा अरहंता भगवंता सवे ते एयाई चेव तेरस किरियाठाणाई भासिंसु वाभासिंति वा भासिस्संति वा, पन्नविंसु वा पन्नावति वा पन्नविस्सांत वा, एवं चेव तेरसमं किरियाठाणं सेविंसु वा सेविंति वा सेविस्संति वा॥ [सू०१४॥] ___ व्याख्या-अथापरं त्रयोदशं क्रियास्थानमीर्यापथिकं ४ नामाख्यायते-इह खलु प्रवचने संयमे वा [आत्मनो भाव] आत्मत्वं, तदर्थमात्मत्वार्थ संवृतस्य अनगारस्य ईर्यादिसमितस्य तथा त्रिगुप्तिगुप्तस्य गुप्तेन्द्रियस्य नवब्रह्मचर्यगुप्त्युपेतब्रह्म चारिणश्च सतः, तथोपयुक्तं गच्छतस्तिष्ठतो निषीदतस्त्वग्वर्तनां कुर्वाणस्य, तथोपयुक्तमेव वस्त्रं पतदहं कम्बलं पादप्रोन्छन वा गृहतो निक्षिपतो वा, यावच्चक्षुःपक्ष्मनिपातमप्युपयुक्तं कुर्वत: सतोऽत्यन्तमुपयुक्तस्याप्यस्ति-विद्यते विविधा मात्रा [विमात्रा], तदेवंविधा सूक्ष्माक्षिपक्षमसञ्चलनरूपादिकर्यापथिका नाम क्रिया केवलिनाऽपि क्रियते, तथाहि-सयोगी जीवो न शक्नोति क्षणमप्येक निश्चलः स्थातुं, अग्निताप्यमानोदकवकार्मणशरीरानुगतः सदा परिवर्तयन्नेवास्ते, केवलिनोऽपि किन्तु सर्वेषामपि क्रियास्थानानामुपसंहारसूत्रवदत्रापि ' आहिज्जती 'त्यस्य स्थाने आहिते ' वा · आहिए ' इति भवितुमर्हतीत्युद्बोधनार्थ लेखकादिभिः पुनरुक्ततया लिखितो भविष्यतीति सम्भावनाय न किमप्ययुक्तत्वं प्रतिभासते। "ईरणं-ईर्या, तस्यास्तया वा पन्था ईर्यापथः स विद्यते यस्य तदर्यापथिकं, एतच्च शब्दव्युत्पत्तिनिमित्तं, प्रवृत्तिनिमित्तं तु इदं-सर्वत्रोपयुक्तस्य निष्कषायस्य समीक्षितमनोवाकायक्रियस्य या[क्रिया ]तया यत्कर्म तदीर्यापथिकं सैव वा क्रिया ईर्यापथिकम्" इति हर्ष कुलः । द्वितीये श्रुत द्वितीयाध्ययने प्रयोदशमक्रियास्थानवर्णनम् । ॥४८॥ ॥४८॥ Jain Education Intel diww.jainalibrary.org Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूक्ष्मगात्रसञ्चारा भवन्ति, तया क्रियया यद् बध्यते कर्म तस्य च कर्मणो या अवस्थास्ताः क्रियाः, ता एव दर्शयितुमाह'सा पढमसमयेत्यादि, याऽसावकषायिणः क्रिया तया यद्वध्यते कर्म, तत्प्रथमसमय एव बद्धं स्पृष्टं चेति कृत्वा तक्रियैव बद्धस्पृष्टेत्युक्ता, तथा द्वितीयसमये वेदिता तृतीयसमये निर्जीर्णा, एतदुक्तं भवति-कर्म योगनिमित्तं बध्यते, तत् स्थितिश्च कषायायत्ता तदभावाच न तस्य सांपरायिकस्येव स्थितिः, किन्तु योगसद्भावाद्वध्यमानमेव 'स्पृष्टतां' संश्लेषं याति, द्वितीयसमये त्वनुभूयते, तच्च प्रकृतितः सातावेदनीय स्थितितो द्विसमयस्थितिकं अनुभावतः शुभानुभावमनुत्तरोपपातिकदेवसुखातिशायि प्रदेशतो बहुप्रदेशमस्थिरबन्धं बहुव्ययं च । तदेवं सा ईर्यापथिका क्रिया प्रथमसमये बद्धस्पृष्टा द्वितीये समये उदिता वेदिता निर्जीर्णा भवति । 'सेयकाले 'ति आगामिनि तृतीयसमये तत्कर्मापेक्षया अकर्मतापि च भवति । एवं तावद्वी. तरागस्येर्याप्रत्ययिक कर्म 'आधीयते' सम्बध्यते । तदेतत्रयोदशमं क्रियास्थानं व्याख्यातं, ये पुनस्तेभ्योऽन्ये प्राणिनस्तेषां सांपरायिको बन्धः । तेषां वीर्यापथवर्जाणि द्वादशक्रियास्थानानि, तेषु(१) वर्तन्ते, तेषां च तद्वर्तिनामसुमतां मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकषाययोगनिमित्तः साम्परायिको बन्धो भवति, स त्वनेकप्रकारस्थितिका, तद्रहितस्तु केवलयोगप्रत्ययिको द्विसमयस्थितिरेवेर्याप्रत्ययिक इति स्थितम् । एतानि त्रयोदशक्रियास्थानानि न वर्द्धमानस्वामिनैवोक्तानि, किन्त्वन्यैरपीत्येतदर्शयितुमाह-' से बेमी 'त्यादि, सोऽहं ब्रवीमि-यत्प्रागुक्तं तद्ब्रवीमि इति, तद्यथा--येऽ(हन्तोऽ)तिक्रान्ताः, ये च वर्तः | मानाः, ये चागामिनि काले भविष्यन्ति, ते सर्वेऽप्येवं +प्ररूपितवन्तः प्ररूपयन्ति प्ररूपयिष्यन्ति, तथैतदेव त्रयोदशं क्रिया-IN +'अभाषिषुः भाषन्ते भाषिष्यन्ते च । तथा तत्स्वरूपतस्तद्विपाकतश्चेति वृत्तौ । Jain Education inte har For Private & Personal Use Oh WwEjainelibrary.org Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ INI द्वितीये एयगडाङ्ग पत्रं दीपिकान्वितम् । श्रुत. ॥४९॥ म्यान मवितवन ३ बावष्यन्ते च, यथा हि-जम्बूद्वीपे सूर्यद्वयं तुल्यप्रकाशं भव[तः]ति यथा वा सदृशोपकरणाः प्रदापास्तुल्यप्रकाशा मान्य तीर्थकृतोऽपि निरावरणत्वात्कालत्रयवर्तिनोऽपि तुल्या पदेशा भवन्ति । साम्प्रतं त्रयोदामु क्रियास्थानेषु यन्नाभिहितं पापस्थानं तद्विभणिषुराह अदुत्तरं च णं पुरिसविजयविभंगमाइक्खिस्सामि । व्याख्या-अस्मात्रयोदशक्रियास्थानप्रतिपादनादुत्तरं यदत्र न प्रतिपादितं तदनेन सूत्रसन्दर्भण प्रतिपाद्यते-पुरुषविजयविभङ्गो स च विभङ्गवदवधिविपर्ययवद्विभङ्गो ज्ञानविशेषस्तमेवम्भूतं ज्ञानक्रियाविशेषमाख्यास्यामि-प्रतिपादयिष्यामि । | यादृशानां चासौ भवति ताल्लेशतः प्रतिपादयितुमाह इह खल नाणापण्णाणं नाणाछंदाणं नाणासीलाणं नाणादिठीणं नाणारुईणं नाणारंभाणं नाणाज्झवसाणसंजुत्ताणं नाणाविहपावसुयज्झयणं एवं भवइ, तं जहाव्याख्या-इह खलु जगति नानाप्रकारा विचित्रक्षयोपशमात्प्रज्ञा येषां ते नानाप्रज्ञास्तेषां, तथा छन्दो-ऽभिप्राय:, *" पुरुषा · विचीयन्ते ' मृग्यन्ते-विज्ञानद्वारेणान्वेष्यन्ते येन स पुरुषविचयः पुरुषविजयो वा-केषाश्चिदल्पसवानां तेन ज्ञानलवेनाविधिप्रयुक्तेनानर्थानुबन्धिना विजयादिति ” बृहद्वृत्तौ । “विजयो ना[म]मार्गणा, विविधो विशिष्टो वा विभागो-विभङ्गः, तं पुरिसजातविभंग आइक्खिस्सामि" इति चूर्णौ । द्वितीयेध्ययने शेषपापस्थानवर्णनम् । ॥ ९ ॥ Jan Educatio n al For P & Personal use only l Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वाहिर वति, तेषां तथा स नाना येषां ते तथा, तेषां, नानाशीलाना, तथा नानारूपा दृष्टि-रन्तःकरणप्रवृत्तिर्येषां ते तथा, तेषामिति, तथा नाना- IN रुचियेषां ते नानारुचयस्तेषां, तथाहि-आहारशयनासनाच्छादनाभरणयानवाहनगीतवादिवादिषु मध्येऽन्यस्यान्याऽन्यस्यान्या रुचिर्भवति, तेषां नानारुचीनामिति, तथा नानारम्भाणामिति कृषिपाशुपाल्पविपणिशिल्पकर्मसेवाद्यन्यतमारम्भेण, तथा नानाऽध्यवसायसंयुतानां शुभाशुभाध्यवसायमाजामिति, इहलोकप्रतिवद्धानां परलोकनिष्पिपासानां विषयवृषिNI तानामिदं नानाविधं पापश्रुताध्ययनं भवति । तद्यथा भोमं उप्पायं सुविणं अंतलिक्खं अंगं सरलक्खणं (लक्खणं) वंजणं इथिलक्खणं पुरिसलक्खणं हयलक्खणं गयलक्खणं गोणलक्खणं मिंढलक्खणं कुक्कडलक्खणं तित्तिरलक्खणं वगलक्खणं लावगलक्खणं चक्कलक्खणं छत्तलक्खणं चम्मलक्खणं दंडलक्खणं असिलक्खणं मणिलक्खणं कागिणिलक्खणं सुभगाकरं दुब्भगाकरं गब्भाकरं मोहणकरं आहव्वणिं पागसासणिं दवहोमं खत्त[ खत्तिय विजं चंदचरियं सूरचरियं सुक्कचरियं वहस्सतिचरियं उक्कापायं दिसादाहं मियचकं वायसपरिमंडलं पंसुबुद्धिं केसवुटुिं मंसवुद्धिं रुहिरवुटुिं वेतालिं अद्धवेतालिं ओसोवर्णि तालुग्घाडणिं सोवा[ गिं ]गिणिं सावरिं दामलिं कालिंगि गोरि गंधारिं उवत्तार्ण उप्पयणि जंभिणिं Jain Educationin For Private & Personal Use Oy Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1 पत्र I दीपिकान्वितस् । द्वितीये श्रु. द्वितीये ध्ययने पापश्रुतवर्णनम् । ॥५०॥ थंभणिं लेसणिं आमयकरणिं विसल्लकरणिं पक्कमणिं अंतद्धाणिं आयमणिं, एवमाइयाओ विजाओ अन्नस्स हेउं पउंजंति पाणस्स हेउं पउंजंति वत्थस्सा लेणस्स०सयणस्स० अन्नेसि वा विरूवरूवाणं कामभोगाणं हेउं पउंजंति, तेरिच्छं ते विजं सेवंति, अणारिया विप्पडिवन्ना कालमासे कालं किच्चा, अन्नयराइं आसुरियाई, किब्बिसियाई ठाणाई उववत्तारो भवंति, +ते ततो विप्पमुच्चमाणा भुजो एलमूयत्ताए तमअंधयाए पञ्चायति । ( सू० १५) व्याख्या-भूमौ भवं भौम-निर्घातभूकम्पादिकं, उत्पात-कपिहसितादिकं, स्वप्नं-गजसिंहवृषभादिकं अंग-अक्षि बाहुस्फुरणादिकं, स्वरलक्षणं-काकस्वरगम्भीरस्वरादिकं, लक्षणं-यवपद्मादिकं, व्यञ्जनं-मषतिलकादि, तथा स्त्रीलक्षणं [रक्तकरचरणादिकं, एवं ]पुरुषलक्षणादीनां काकिणीरत्नपर्यन्तानां लक्षणप्रतिपादकशास्त्रपरिज्ञानं, तथा मन्त्रविशेषरूपा विद्या, तथाहि-सौभाग्यकरां, दुर्भाग्यकरां, तथा 'गर्भकरां' गर्भाधानविधायिनी, मोहकरां-व्यामोहोत्पादिकां, आथर्वणी-सद्योऽनर्थकारिणी, तथा 'पाकशासनी' इन्द्रजालसंक्षिका, तथा नानाविधद्रव्यैः कणवीरपुष्पादिभिःघृतमध्वादिमिर्हवनं, तथा क्षत्रियाणां विद्या धनुर्वेदादिका( तां), तथा ज्योतिषमधीत्य व्यापारयन्ति, 'चंदचरिय 'मित्यादि, चन्द्रचरित्रं वर्णसंस्थान + नास्ति एतौ शब्दो सवृत्तिकमुद्रितप्रतिषु । ४ ' तथाऽऽन्तरीक्षं-अमोघादि' इति बृहवृत्तौ । Jain Education internal Far Private & Personal use Oh T HEjainelibrary.org Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रमाणप्रभानक्षत्रयोगराहुग्रहणादिकं, सूर्यचरित-सूर्यस्य मण्डलपरिमाणराशिपरिभोगोयोतावकाशराहूपरागादिकं, तथा शुक्रचारो वीथीत्रयप्रचारादिकः, तथा बृहस्पतिचारः [ उदयास्तवर्षफलादि ] शुभाशुभफलप्रदः संवत्सरराशिपरिभोगादिकः, तथोल्कापातदिग्दाहाश्च वायव्यादिषु मण्डलेषु मवन्तः शस्त्राग्निक्षुत्पीडाविधायिनो भवन्ति, तथा मृगभृगालादीनां आरण्यकजीवानां रुतदर्शनग्रामनगरप्रवेशादौ (या) शुभाशुभचिन्ता तन्मृगचक्रं, तथा वायमादीनां पक्षीणां यत्र स्थानदिक्स्वराश्रयणात् शुभाशुभफलं चिन्त्यते तद्वायसपरिमण्डलं, तथा पांशु केशमाँसरुधिरादिवृष्टयोऽनिष्टफलदा यत्र शास्त्रे चिन्त्यते, तथा विद्या नानाप्रकाराः क्षुद्रकर्मकारिण्यस्ताश्चेमा:-वैताली नाम विद्या नियताक्षरप्रतिबद्धा, सा च किल कतिभिर्जापैर्दण्डमुत्थापयति, तथाऽर्द्धवैताली तमेवोपशमयति, तथाऽवस्वापिनी+प्रमुखाः सर्वा अपि विद्या ज्ञातव्याः । तदेवमादिकाः प्रज्ञप्त्यादिकाश्च गृह्यन्ते, एताश्च पाषण्डिका अविदितपरमार्था गृहस्था वा स्वयूथ्या वा द्रव्यलिङ्गधारिणोऽन्नपानाद्यर्थ प्रयुञ्जन्ति, अन्येषां वा विरूपरूपाणां कामभोगानां कृते प्रयुञ्जन्ति । सामान्येन विद्यासेवनमनर्थकारीति दर्शयितुमाह'तैरिश्च 'मित्यादि, तिरश्चीनां सदनुष्ठानविघातिनी ते अनार्या विप्रतिपन्ना विद्या सेवन्ते, यद्यपि ते भाषाः क्षेत्रास्तिथाप्यनार्यकर्मकारित्वादनार्या एव द्रष्टव्याः। ते च स्वायुषःक्षये कालमासे कालं कृत्वा यदि कथश्चिदेवलोकगामिनो भवन्ति, ततोऽन्यतरेवासुरीयेषु किल्बिषिकादिस्थानेषूत्पत्स्यन्ते, ततोऽपि विप्रमुक्ता यदि मनुष्येषत्पद्यन्ते, तत्र च तत्कर्मशेषतया + " तालोद्घाटीनी श्वापाकी शावरी द्राविडी कालिङ्गी गौरी गान्धारी अवपतनी उत्पतनी जम्मिनी स्तम्भिनी श्लेषिणी आमयकारिणी विशल्यकारिणी अन्तर्धानकारिणी" इति हर्ष० । Jain Educational For Pale & Personal Use Oy ForwEEnelorey.org Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्र दीपिका न्वितम् । ॥ ५१ ॥ Jain Education एडमूकत्वेनाव्यक्तभाषिणस्तमस्त्वेनान्धतया मृकतया वा प्रत्यागच्छन्ति । ततोऽपि नानाप्रकारेषु यातनास्थानेषु नारकतिर्यगादिषूत्पद्यन्ते । साम्प्रतं गृहस्थानुद्दिश्याधर्मपक्षासेवनमुच्यते से एगइओ आहेउं वा णायहेउं वा, सयणहेउं वा अगारहेउं वा परिवारहेडं वा नाय[ गं वा ] वा ( ? ) सहवासियं वा णिस्साए । व्याख्या - स एकः कदाचित् कोऽपि गृहस्थः निस्त्रिंशः साम्प्रतापेक्षी अपगतपरलोकभयः कर्मपरतन्त्रः सुखभोगमिच्छन् आत्मनिमित्तं यानि कर्कशानि कर्माणि कुरुते तान्याह - ' आयहेउं वा, ' आत्मनिमित्तं तथा ज्ञातयः स्वजनास्तन्निमित्तं, तथा ' अगारनिमित्तं ' गृहसंस्करणार्थ, सामान्येन वा कुटुम्बाऽर्थं [वा ] परिवारनिमित्तं दासीदास - कर्मकरादिकते, तथा ज्ञात एव ' ज्ञातकः परिचितस्तमुद्दिश्य 'सहवासिकं ' प्रातिवेश्मिकमुद्दिश्य, एतानि वक्ष्यमाणानि कुर्यादिति सम्बन्धः । तानि च दर्शयितुमाह अदुवा अणुगामिए १, अदुवा उवचरए २, अदुवा पाडिपहिए ३, अदुवा संधिच्छेद ४, अदुवा गठिच्छेदए ५, अदुवा उरब्भिए ६, अदुवा सोयरिए ७, अदुवा वागुरिए ८, अदुवा साउणिए ९, अदुवा मच्छिए १०, अदुवा गोवालए ११, अदुवा गोघायए १२, अदुवा सोवणिए १३, अदुवा द्वितीये श्रुत० द्वितीयेऽ ध्ययने गृहस्थनि श्रिताधर्म स्थान वर्णनम् । ॥ ५१ ॥ Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सोतणियंतिए १४ । ____ व्याख्या-अथवा 'आनुगामिकः' कश्चिदकार्यकरणाय गच्छति, तमनुगच्छति, अथवा अकार्यकरणाय, अथवाऽपकारकर्यपकारकृते विश्वसनाय उपचारको भवति, अथवा तस्य प्रातिपथिको भवति, 'प्रतिपथं ' सन्मुखमागच्छति, अथवा स्वजनाद्यर्थ सन्धिच्छेदको ( ग्रन्थिच्छेदकश्चापि ) भवति-चौर्य प्रतिपद्यते, तथोरनै मषैश्चरति, औरभ्रिको भवति, [ अथवा सौकरिकः] अथवा शकुनिभिश्चरति शाकुनिको भवति, अथवा बागुरया' मृगाऽदिवन्धनरवा चरति रक्षक: x[ वागुरि ], अथवा मत्स्यैश्चरति मात्स्यिकः]च्छिकः, अथवा गोपालभावं प्रतिपद्यते, अथवा गोघातकः स्यात् , अथवा श्वभिश्चरति शौचनिक:-शुनां परिपालको भवति, अथवा मृगयां कुर्वन् श्वभिमंगघातं करोति । अथैतानि चतुर्दशस्थानानि आदितो विवृणोति____ से एगतिओ आणुगामियं भावं पडिसंधाय तमेव अणुगामियाणुगामियं हंता छेत्ता भेत्ता लंपइत्ता विलंपइत्ता उद्दवइत्ता आहारं आहारेति इति से महया पावहिं कम्मेहिं अचाणं उवक्खाइत्ता भवइ॥१॥ व्याख्या-तत्रैकः कश्चिदात्माद्यर्थ अपरस्य ग्रामान्तरं गच्छतः किश्चिद्रव्य जातमवगम्य केटके गत्वा अवसरं लब्ध्वा x मूले शाकुनिकबागुरिकयोः स्थाने वागुरिकशाकुनिकयोरिति व्यत्ययेन निर्देशः । Jain Education For Pwee & Personal use only Girl Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं । दीपिका द्वितीये श्रुत द्वितीयेध्ययने उपचरक न्वितम् । ॥५२॥ माव तद्रव्यं गृहीतुमनाः पथिकं [ दण्डादिभिः] हन्ता भवति, तथा छेत्ता भवति खड्गादिभिः, तथा मेत्ता [वज्रमुष्ट्यादिमिः] लुम्पयिता-केशाकर्षणादिकदर्थनतः, तथा विलुम्पयिताऽत्यन्तं दुःखमुत्पादयति, तथाऽपद्रावयति जीविताव्यपरोपयति । तदेवमादिकं कृत्वाऽऽहारमाहारयति, एतदुक्तं भवति-गलकर्चकः कश्चिदन्यस्य धनवतोऽनुगामुकभावं प्रतिपद्य तं बहुविधैरुपायैर्विश्रम्भे पातयित्वा, भोगार्थी-मोहान्ध इहलोकार्थी तस्य धनवतो गलकर्तनादिकं कृत्वा तस्य द्रव्यजातमादायाss. हारादिकां भोगक्रियां विधत्ते, इत्येवमसौ 'महद्भिः क्रूरैः 'कर्मभिरनुष्ठानमहापातकभृतैस्तीवानुभावैरात्मानमुपख्यापयिता भवति । तथाहि-असौ महापापकारीत्येवमात्मानं ख्यापयति । तथा लोके तद्विपाकाऽऽपादितेनावस्थाविशेषेण नारकतिर्यगादिगतावात्मानमाख्यापयिता भवति ॥ १ ॥ से एगइओ उवचरगभावं पडिसंधाय तमेव उवचरितं हंता छेत्ता भत्ता जाव आहारं । आहारेति, इति से महया पावहिं कम्महि अत्ताणं उवक्खाइत्ता भवति ॥२॥ व्याख्या-एकः कश्चिदकर्त्तव्यकारी कस्यापि धनवतो धनं जिघृक्षुः उपचारकमा प्रतिसन्धाय पश्चात्तं नानाविधैरुपायैरुपचरति, उपचर्य च विश्रम्मे पातयित्वा तद्रव्यार्थी तस्य हन्ता छेत्ता मेत्ता यावदपद्रावयिता भवतीत्येवमसौ [आत्मानं ] महद्भिः पापैः कर्मभिरुपाख्यापयिता भवतीति ॥ २ ॥ से एगइओ पाडिपहियभावं पडिसंधाय तमेव पाडिपहे ठिच्चा हंता छेत्ता जाव उद्दवइत्ता वर्णनम् । w.ininelibrary.org Jain Education Internet Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Int आहारं आहारेति इति से महया पावेहिं कम्मेहिं अत्ताणं उवक्खाइत्ता भवति ॥ ३ ॥ व्याख्या - अथैकः कश्चिदागन्तुकस्य पथिकादेर्धनवतः प्रातिपथिकमावं प्रतिपद्यते - सम्मुखं गत्वा प्रच्छन्नो मार्ग बद्धवा तिष्ठति, ततः प्रतिपथे स्थित्वा तस्यार्थवतो विश्रम्भतो हन्ता छेत्ता यावदपद्रावयिता भवतीत्येवमसावात्मानं पापैः कर्मभिः ख्यापयतीति ॥ ३ ॥ से एगतिए संधिच्छेदगभावं पडिसंधाय तमेव संधिं छेत्ता भेत्ता जाव इति से महया पावेहिं कम्मेहिं अत्ताणं वक्खाइत्ता भवति ॥ ४ ॥ व्याख्या - एकः कश्चित्पुरुषो विरूपकर्म्मणा जीवितार्थी ' सन्धिच्छेदकभावं ' खत्रखननत्वं प्रतिपद्यते, ततोऽसौ ' सन्धि छिन्दन् ' खात्रं खनन् प्राणिनां हन्ता छेता मेत्ता भवतीत्येतच्च कृत्वाऽऽहारमाहारयतीत्येवमसौ महद्भिः पापकर्मभिः संसारे भ्रमति ॥ ४ ॥ से एगतिए गंठिच्छेद [ग]भावं पडिसंधाय तमेव गंठिं छेत्ता भेत्ता जाव इति से महया पावेहिं कम्मेहिं अप्पाणं उवक्खाइत्ता भवति ॥ ५ ॥ व्याख्या—अथ कश्चित्पापकर्मकारी घुघुरादिना ग्रन्थिच्छेदकभावं प्रतिपद्य तमेव हन्ता छेत्ता यावत् परद्रव्यमादाय कर्मबन्धं करोति, ततः संसारे पर्यटतीति पूर्ववत् ॥ ५ ॥ Foy Private & Personal Use Only Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाल-IN सूत्रं दीपिकान्वितम् । di ॥५३॥ S से एगतिए उरब्भियभावं पडिसंधाय उरब्भं वा अन्नतरं वा तसं पाणं हंता जाव उवक्खा- द्वितीये इत्ता भवइ, एसो अभिलावो सवत्थ ६। श्रुत व्याख्या-कश्चिदधर्मवृत्तिः 'औरभ्रिकभावं' औरणिकभावं प्रतिपद्यते, स च औरभ्रिकस्तर्णया तन्मांसादिना | द्वितीयावाऽऽत्मानं वर्त्तयति, तदेवमसौ तद्भावं प्रतिपद्य उरभ्र वा अन्यं वा त्रसं वा (१) प्राणिनं स्वमाँसपुथ्यर्थ व्यापादयति, ध्ययने तस्य वा हन्ता छेत्ता भवतीति, शेषं पूर्ववत् ॥ ६॥ वागुरिकसे एगतिए सोयरियभावं पडिसंधाय महिसं वा अन्नयरं वा तसं पाणं हंता जाव उवक्खा भाव | वर्णनम् । इत्ता भवति ॥७॥ व्याख्या-कश्चित् शौ(क)निक+भावं (शौवनिका )श्चाण्डालाः खाटिकास्तभावं प्रतिपद्यते, शेषं पूर्ववत् ॥७॥ से एगडओ वागरियभावं पडिसंधाय मियं वा अन्नयरं वा तसं वा पाणं हंता जाव उवक्खाइत्ता भवति ॥८॥ व्याख्या-कश्चित्पापात्मा ' वागुरिकभावं ' लुब्धकत्वं प्रतिपद्य वागुस्या मृगं अन्यं वा प्रसं प्राणिनं शशकादिकमात्म+ " अत्रान्तरे सौकरिकपदं, तच्च स्वबुद्ध्या व्याख्येय, सौकरिका:-श्वपचाश्चाण्डालाः खट्टिका इत्यर्थः” इति वृत्तौ । Jain Ede For Pate Personal SEO Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुष्पथं स्वजनाद्यर्थ वा व्यापादयति, शेषं पूर्ववत ॥८॥ से एगइओ साउणियभावं पडिसंधाय सउणियं वा अन्नयरं वा तसं पाणं हंता जाव उवक्खाइत्ता भवइ ॥९॥ ___ व्याख्या-कश्चिदघमोपायजीवी ' शकुना' लावकादयस्तैश्चरति, ततश्च तन्मासाद्यर्थी 'शकुनि' पक्षिणं [अन्य वा] तित्तिरादिकं व्यापादयति, शेषं पूर्ववत् ॥९॥ से एगइओ मच्छियभावं पडिसंधाय मच्छं वा अन्नयरं वा तसं पाणं हंता जाव उवक्खाइत्ता भवति ॥१०॥ व्याख्या-कश्चिन्मात्स्यिकमावं प्रतिपद्यते, तद्भाव प्रतिपद्य जलचरजीवान् व्यापादयति, शेषं पूर्ववत् ॥१०॥ से एगइओ गोघायगभावं पडिसंधाय गोणं वा अन्नयरं वा तसं पाणं हंता जाव उवक्खाइत्ता भवइ ॥११॥ व्याख्या-यथा कश्चित्क्रूरकर्मकारी गोघातकमावं प्रतिपद्यते, शेषं पूर्ववत् ॥ ११ ॥ से एगतिओ गोपालगभावं पडिसंधाय तमेव गोणं [अन्नयरं वा तसं पाणं] परिजविय Jain Education Indgi For Private Personal use | Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ५४ ॥ Jain Education Int परिजविय हंता जाव उवक्खाइत्ता भवति ॥ १२ ॥ व्याख्या - कश्चित् गोपालकभावमादृत्य ' गोणं ' वृषभं गोकुलाट्टालयित्वा 'परिजविय परिजविय' तस्य हन्ता छेत्ता इत्यादि पूर्ववत् ॥ १२ ॥ पृथक्कृत्य से एगतिओ सोवणियभावं पडिसंधाय मणुस्सं [ सुणयं ] वा अन्नयरं वा तसं पाणं हंता जाव आहारं आहारेति, इति से महया पावेहिं कम्मेहिं अत्ताणं उवक्खाइत्ता भवति ॥ १३ ॥ व्याख्या – कश्चिञ्जघन्यकर्मकारी, सौ[ शौ ]वनिकमावं ( - पापर्द्धिभावं प्रतिपद्यते ), सारमेयं गृहीत्वा आखेटकक्रियां करोति, तेन मृगशूकरादिकं व्यापादयति, शेषं पूर्ववत् ॥ १३ ॥ से एगतिओ सोवणि[यंति ] यभावं पडसंधाय मणुस्तं वा अन्नयरं वा तसं पाणं हंता छेत्ता जाव आहारं आहारेति, इति से महया पावेहिं कम्मेहिं अत्ताणं उवक्खाइत्ता भवति १४ । [सू० १६] व्याख्या - अथैकः कश्चिन्महाक्रूरकर्मकारी प्रत्यन्तनिवासी क्रूरसारमेयपालको दुष्ट सारमेयपरिग्रहं प्रतिपद्य मनुष्यं वा कश्चन पथिकं - अभ्यागतमन्यं वा मृगशुकरादिकं त्रसं प्राणिनं हन्ता भवति, तदेवमसौ महाक्रूरकर्मभिरात्मानमुपख्यापयिता भवतीति ॥ १४ ॥ आजीविकार्थे पापकर्म उक्तं, अथ केनापि हेतुना यत्पापं क्रियते तदाह द्वितीये श्रुत० द्वितीया ध्ययने सौवनि कान्तिक भाव वर्णनम् । ॥ ५४ ॥ Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In संगतिया मणुस्ता परिसामज्झाओ उट्ठेता अहमेयं हणामिति कट्टु तित्तिरं वावगं वा लावगं वाकवतगं वा कविजलं वा अन्नयरं वा तसं पाणं हंता जाव उत्रकखाइत्ता भवति ॥ व्याख्या - अथैकः कश्चिन्मांसादनेच्छया व्यमनेन क्रीडया कुपितो वा परिषदो मध्यादुत्थायैवम्भूतां प्रतिज्ञां विदध्यात्, यथाहमेनं वक्ष्यमाणं प्राणिनं हनिष्यामीति प्रतिज्ञां कृत्वा पश्चातिचिरादिकं हन्ता छेता यावदात्मानं पापेन कर्मणा ख्यापयिता भवतीति । अत्र पूर्वमनपराधक्रुद्धा अभिहिताः, साम्प्रतमपराधक्रुद्धान्दर्शयति से एईओ केवि आयाणेणं विरुद्धे समाणे, अदुवा खलदाणेणं अदुवा सुरथालएणं गाहावतीण वा गाहावतिपुत्ताण वा सयमेव अगणिकाएगं सस्साई झामेइ अन्त्रेण वि अगणिकाएणं सस्साई झामावेइ अगणिकाएणं सस्साई झामंतं पि अन्नं समणुजाणति, इति से महया पावेहिं कम्मेहिं अत्ताणं उक्खाइत्ता भवति । व्याख्या - अथैकः कश्चित् प्रकृत्या क्रोधनः केनापि हेतुना कुपितः सन् परस्वापकुर्यात्, तत्र शब्दादानेन केनचिदाक्रुष्टो निन्दितो वा विरुद्ध्येत रूपादानेन तु बीभत्सं कञ्चन दृष्ट्वाऽपशकुनाध्यवसायेन कृष्यत, गन्धरसादिकं त्वादान दर्शयति - [ अथवा ] 'खलस्य कुथितादिविशिष्टस्य दानं खलके [ खलस्य ]वल्यधान्यादेर्दानं तेन कुपितोऽथवा , १० Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत द्वितीया एवमहाशसुरायाः 'स्थाल' कोशकादि तेन विवक्षितलाभाभावात् कुपितो गृहपत्यादेरेतत्कुर्शदित्याह-स्वयमेवाग्निकायेनाग्निना खलकवर्नानि ' शस्थानि' धान्यानि 'मारयेद्'दहदन्येन वा दाहयेदहतो वाऽन्यासमाजागीयादिल्येषमसौ महापापदीपिका- कर्मभिरात्मानमुपख्यापयिता भवति । साम्प्रतमन्येन प्रकारेण पापोपादानमाह- . न्वितम् ।। ___से एगइओ केणइ आयाणेणं विरुद्ध समाणे अदुवा खलदाणेणं अदुवा सुराथालएणं गाहा॥५५॥ वतीण वा गाहावतिपुत्ताण वा उहाण वा गोणाण वा घोडगाण वा गद्दभाण वा सयमेव घूराओ कप्पेति अन्नेण वा कप्पावेति कप्पंतं [ पि ] अन्नं ससणुजाणति, इति से महया जाव भवति । व्याख्या- अथै कः कश्चित्केनचित् खलदानादिनाऽऽदानेन गृहपत्यारेः कुपितस्तत्सम्बन्धिन उष्ट्रादेः स्वपमेवात्मनापादिना 'घूरिया[घूरा ]ओ'त्ति जला:* खलका वा 'कल्पयति' छिनत्ति अन्धन वा छेदयति अन्यं वा छिन्दन्तं समनुजानीते, इत्येवमसावात्मानं पापेन कर्मणा उपख्यापयिता भवतीति । किश्च___से एगतिओ केणइ आदाणेणं विरुद्धे समाणे अदुवा खलदाणेणं अदुवा सुराथालएगं गाहावतीण वा गाहावतिपुत्ताण वा उसालाओ वा गोणसालाओ वा घोडगसालाओ या गदभ. * * ट(ङ्गा)का(?)' इति प्रत्यन्तरे। " जङ्घाद्यवयवान् ” इति हर्ष० । ध्ययने प्रकारान्तरेण पापो पादानवर्णनम् । For Private & Personal use Day T Jan Education ww.jainelibrary.org Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Int सालाओ वा, कंटगवोंदियाहिं पडिपिहित्ता सयमेव अगणिकाएणं झामेइ अत्रेण त्रि झामावेति झामंतं पि अन्नं समणुजाणति, इति से महया पावकम्महिं उवक्खाइत्ता भवति । व्याख्या—अथैकः कचित्केनचिन्निमित्तेन गृहपत्यादेः कुपितस्तत्सम्बन्धी नामुष्ट्रादीनां 'शाला' गृहाणि कण्टकशाखाभिः ' पिधाय ' स्थगयित्वा स्वयमेवाग्नि कायेन दहेत् शेषं पूर्ववत् । से एगतिओ केणइ आयाणेणं विरुद्धे समाणे अदुवा खलदाणेणं अदुवा सुराधालपणं गाहावतीण वा गाहावतिपुत्ताण वा कुंडलं वा मणिं वा मोत्तियं वा सयमेव अत्रहरति अत्रेण वि अवहरावेति अवहतं[ पि ] अन्नं समणुजाणति, इति से महया जाव भवति । व्याख्या—अथैकः कश्चित्केनचिदादानेन कुपितो गृहपत्यादेः सम्बन्धिकुण्डलादिकं द्रव्यजातं स्वयमेवापहरे दवशिष्टं पूर्ववत् । साम्प्रतं पापण्डिकोपरि कुपितः सन् यत्कुर्यात्तद्दर्शयति इओ के आदाणेणं विरुद्धे समाणे अदुवा खलदाणेणं अदुवा सुराधालएणं समणाणं वा माहाणं वा छत्तगं वा दंडगं वा भंडगं वा मत्तगं वा लट्ठिगं वा भिसिगं वा चेलगं वा चिलिमिलिगं वा चम्मगं वा चम्मच्छेयणगं वा चम्मकोसियं वा सयमेव अवहरति जाव समणु Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रुत सूयगडासा जाणति, इति से महया जाव उवक्खाइत्ता भवति।। द्वितीये सूत्रं N व्याख्या-अथैकः कश्चित्स्वदर्शनानुगगेण वा वादपराजितो वा[ऽन्येन ] केनचिनिमित्तेन वा कुपितः सन्नेतत्कुर्यात्-V दीपिका- श्रमणानां शाक्यादीनां माहनानां वा केनचिदादानेन कुपितः सन् दण्डच्छत्रादिक + मुपकरण जातमपहरेत् , अन्येन वा द्वितीयेन्वितम्।। हारयेत् अन्यं वा हरन्त समनुजानीयादित्यादि पूर्ववत् । एवं तावद्विरोधिनोऽभिहिताः साम्प्रतं इतरेऽभिधीयन्ते ध्ययने से एगइओनो वितिगिंछह [तं जहा-] गाहावतीण वा गाहावतिपुत्ताण वा सयमेव अगाणि- पापो. कारणं ओसहीओ झामेति जाव अन्नपि झामंतं समणुजाणति, इति[ से ]महया जाव भवति । पादानव्याख्या-कश्चित्पुरुषोऽत्यन्तमूर्खतया नो 'वितिगिंछइन स्वचेतसि विमृशते, यथाऽनेन कार्येण कृतेन परलोको प्रकारमहते दुःखाय भविष्यतीति न मीमांसतेऽतिमूर्खत्वात , मदीयमिदमनुष्ठानं पापानुबन्धीत्येवं न पर्यालोचयति, ततश्च परलोक वर्णनम् । विरोधिनीक्रियाः कुर्यात् । एतदेवोद्देशतो दर्शयति, [४ तद्यथा-गृहपत्यादेनिनिमित्तमेव-तत्कोपकरणमन्तरेणैव 'स्वयमेव' आत्मना 'अग्निकायेन' अग्निना 'औषधीः' शालिबीह्यादिका: 'मापयेद् दहेत्तथाऽन्येन दाहयेद्दहन्तं च समनु___ + " भाण्डं किश्चिद्वस्तु ' मात्रक' पात्रं 'लद्विगं' यष्टिं 'भिपिगं' वृषी आसनमिति यावत् 'चेलक' वस्त्रं 'चिलिमिलिगं' | प्रच्छादनपटी ' चर्मक ' पाटुकादि · चमच्छेदनकं ' शस्त्रादि चर्मकोश' शस्त्रक्षेपकोत्थल के स्वयमपहरेत् ," इति हर्ष । ___x[ ] एतचिन्हान्तर्गतः पाठो नास्ति सर्वास्वपि दीपिकाप्रतिष्वतो बृहद्वृत्तितोऽत्रोद्धृतः। ॥५६॥ Jain Education intena For Pale & Personal use only jainelibrary.org Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जानीयादित्यादि ] | [ से एगइओ णो वितिगिंछइ, ] तं जहा - गाहावईण वा गाहावतिपुत्ताण वा उहाण वा गणा वा घोडगाव गद्दभाण वा सयमेव घूराओ कप्पेति अन्त्रेण वा कप्पावेति अन्नं पिकतं समेणुजाणति ॥ १ ॥ से एगतिओ णो वितिगिंछति, तं जहा - गाहावतीण वा गाहावतिपुत्ताण वा उसालाओ वा जाव गद्दभसालाओ वा कंटगबोंदिया [ हिं ]ए पडिपिहित्ता सयमेव अगणिकाएणं झामेइ जाव समणुजाणति ॥ २ ॥ से एगतिओ णो वितिगिंछति, तं जहा-गाहावतीण वा गाहावतिपुत्ताण वा कुंडलं वा जाव मोत्तियं वा सयमेव अवहरति जात्र समणुजाणति ॥ ३ ॥ से एगतिओ वितिछति, [तं जहा-] समणाणं वा माहणाणं वा [छत्तगंवा ] दंडगं वा जाव चम्मच्छेद [C] वा सयमेव अवहरति जाव समणुजाणति ॥ ४॥ इति से महया जाव उवक्खाइत्ता भवति । व्याख्या - एते आलापकाः पूर्ववद् व्याख्येयाः, विशेषस्त्वयं - प्राक्तनेष्वालापकेषु केनापि कारणेन कुपितः सन् पापक्रियाः कुरुते, अत्रालापकेषु निरर्थकं पापं गृह्णाति, अयं विशेषः । साम्प्रतं विपर्यस्तदृष्टय आगाढ मिथ्यादृष्टयोऽभिधीयन्तेसे एगतिओ समणं वा माहणं वा दिस्सा नाणाविदेहिं पावकम्मेहिं अत्ताणं उवक्खाइत्ता भवति । • Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायगडा द्वितीये दीपिका न्वितम् । द्वितीयेध्ययने मिथ्यादृष्टीनां ॥५७॥ व्याख्या-अथैकः कश्चिन्मिथ्यादृष्टिरभद्रका साधु दृष्ट्वा प्रत्यनीकतया श्रमणादीनां निर्गच्छतां प्रविशतां स्वतश्च निर्गच्छन् प्रविशन् वा नानाविधैः पापोपादानभूतैः कर्मभिरात्मानापख्यापयिता भवतीत्येतदेव दर्शयति___अदुवा णं अच्छराए आफालित्ता भवति अदुवाणं फरुसं वदित्ता भवति कालेण वि से अणुप्पविट्रस्स असणं वा ४ जाव नो दवावित्ता भवति, जे इमे भवंति वोन्नमंता भारुकंता अलसगा वसलया किवणगा समणगा पव्वयति । I व्याख्या-अथवेति पक्षान्तरोपग्रहार्थः, क्वचित्साधुदर्शने सति मिथ्यात्वोपहत दृष्टितया अपशकुनोऽयमित्येवं मन्यमानः सन् दृष्टिपथादपपारयन् साधुमुद्दिश्यावयाऽमराया-चपुटिकाया आस्फाल पिता भवति, अथवा तिरस्कारमापादयन् परुषं वचो ब्रूयात , तद्यथा-ओदनमुण्ड ! निरर्थक कायक्लेशपरायण ! दुर्बुद्वे ! अपनराग्रतः, ततोऽसौ भृकुटिं विदध्यादसभ्यं वा ब्रूयात् , तथा भिक्षाकालेनापि तस्य भिक्षोरन्येभ्यो भिक्षाचरेभ्योऽनु-पथात्प्रविष्टस्य सतोऽतिदुष्टतया अन्नादेनों दापयिता भवति अपरश्च दानोद्यतं निषेधयति, तत्प्रत्यनीकतया एवं ब्रूते-ये इमे पापण्डिका भवन्ति ते एवम्भूता भवन्तीत्याह-वोन्नमंत'त्ति तृणकाष्ठाहारादिकमध[म]म्म(?)कर्म तद्वन्तस्तथा भारेण-कुटुम्ब[भारेण पोट्टलि कादि]भारेण वा'ऽऽक्रान्ताः' पराभग्नाः सुखलिप्सवोऽलसा:-क्रमागतं कुटुम्बं पालयितुमसमर्थाः, ते पाषण्डमाश्रयन्ति, तथा ' वसलग 'त्ति 'वृपला' अधमाः शुद्रजातयः, तथा 'कृपणाः' क्लीचा अकिश्चित्कराः श्रमणा भान्ति, प्रव्रज्यां गृहन्तीति । पापो पादान| वर्णनम् । ॥५७॥ Jain Education indranal Far Private & Personal use Oh La wwEjainelibrary.org Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ते इणमेव जीवितं धिज्जीवितं संपडिब्रूहिति, नाइ ते परलोगस्स अट्ठाए किंचि वि सिलीसंति, ते दुखंति ते सोयंति ते जूरंति ते तिप्पंति ते पिटुंति ते परितप्पति ते दुक्खण-सोयण-जूरणतिप्पण-पिट्टण-परितप्पण-वह-बंधण-परिकिलेसाओ अपडिविरता भवंति। ते महया आरंभेणं ते महया समारंभेणं ते महया [आ]रंभसमारंभेणं विरूवरूवहिं पावकम्मकिच्चेहि ओरालाई माणुस्सगाई भोगभोगाइं भुंजित्तारो भवति । व्याख्या-ते इणमेवे 'त्यादि, ते हि साधुवर्गापवादिनः सद्धर्मप्रत्य नीका ' इदमेव जीवितं ' परापवादोद्घट्टनजीवितं 'धिग्जीवितं ' साधुनिन्दापरायणं कुत्सितजीवितं [सम्प्रतिबृंहन्ति]-एतदेवासद्वत्तजीवितं प्रशंसन्तीति, ते चेहलोके प्रतिबद्धाः साधुनिन्दाजीविनो मोहान्धाः साधूनपवदन्ति, न च ते साधूनामनुष्ठानं स्वल्पमपि 'श्लिष्यन्ति' समाश्रयन्ति, केवलं ते वचोभिः साधून 'दुःखयन्ति' पीडामुत्पादयन्ति, तथा तेऽज्ञानान्धास्तत्कुर्वन्ति येनाधिकं शोचन्ते परानपि शोचयन्ति दुर्भाषितादिभिः शोकश्चोत्पादयन्ति, तथा ते परान् 'जूरयन्ति ' गर्हन्ति तथा 'तिप्यन्ति ' सुखात् च्यावयन्ति आत्मानं पराश्च, तथा अपुष्टधर्माणः असदनुष्ठानः स्वतः पीड्यन्ते पराँश्च पीडयन्ति, तथा ते पापेन कर्मणा 'परितप्यन्ते ' अन्तर्दह्यन्ते पराँश्च परितापयन्ति, तदेवं ते सद्वृत्तेष्वसन्तो दुःखनशोचनादिक्लेशादप्रतिविरताः सदा भवन्ति, एवम्भूताश्च सन्तस्ते महताऽऽरम्भेण महता समारम्भेण प्राणिपरितापनरूपेण तथोमाभ्यामप्यारम्भसमारम्माभ्यां ' विरूपरूपैश्च' नानाप्रकारैः Jain Education in Far Private & Personal use Oh fw.ininelibrary.org Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥५८॥ सावद्यानुष्ठानैः पापकर्मकृत्यैरुदारान्मानुष्यकान् भोगभोगान् [ते] सावद्याऽनुष्ठायिनो भोक्तारो भवन्ति । एतदेव दर्शयति । तं जहा-अन्नं अन्नकाले पाणं पाणकाले वत्थं वत्थकाले लेणं लेणकाले सयणं सयणकाले, [स]पुत्वावरं च णं हाए कयबलिकम्मे कयकोउयमंगलपायच्छित्ते सिरसा पहाए कंठे मालकडे आविद्धमणिसुवण्णे कप्पियमालामउली पडिबद्धसरीरे वग्घारियसोणसुत्तगमल्लदामकलावे अहत. वत्थपरिहिते चंदणो[क्खित्त किन्नगायसरीरे महतिमहालियाए कूडागारसालाए महति महालयंसि सीहासणंसि इत्थीगुम्मसंपरिबुडे सत्वराइएणं, जोइणा य झियायमाणेणं महया हयनदृगीयवाइयतंतीतलतालतुडितघणमुइंगपडुप्पवाइयरवेणं ओरालाई माणुस्सगाइं भोगभोगाई भुंजमाणे विहरइ । व्याख्या-तद्यथा-अनमन्त्रकाले यथेप्सितं तस्य पापानुष्ठानात्सम्पद्यते, एवं पानवस्त्रशयनासनादिकमपि यथाकाले सर्वमपि सम्पद्यते, यद्यदा प्रार्थ्यते तत्तदा सम्पद्यते, इत्यभिलषितार्थप्राप्तिमेव लेशतो दर्शयति, तद्यथा-विभूत्या स्नातः तथा कृतं देवतादिनिमित्तं बलिकर्म येन स तथा, तथा कृतानि कौतुकान्यवतारणकादीनि तथा मङ्गलानि-दध्यक्षतचन्दनादीनि तथा दुःस्वप्नप्रतिघातकानि प्रायश्चित्तानि [ येन स ] कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्तः, + तथा कल्पितमालामुक[टी]ट (१) प्रति. ' + तथा " शिरसि स्नात: नानाविधविलेपनावलिप्तश्चे "ति बृहद्वृत्तौ। अत्र वृत्तिकृदभिप्रायेण मूले कतिचित्पदानां प्राक्पश्चाद्भावित्वमस्ति । द्वितीये . द्वितीये ध्ययने इहलोकप्रतिबद्धानामारम्भादिवेव रतित्वम् । ॥५८॥ JanEducation For P Hom & Personal use only Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - - - बद्धशरीरः [ दृढावयवः ], तथा 'बग्घारियं 'ति प्रलम्बितं ' श्रोणीसूत्रं' कटिसूत्रं मल्लदामकलापः, ४ तदेवं स यथोक्तभूषणभूषितः महतिमहालियाए 'त्ति विस्तीर्णायां कुटाकारशालायां ' महतिमहालये ' विस्तीर्णे सिंहासने समुपविष्टः 'स्त्रीगुल्मेन' युवतिजनेन सार्द्धमपरपरिवारेण 'ममारितो' वेष्टितः, महता गीतबादिवतन्यादिरवेणोदारान् मानुष्यकान् भोगभोगान् भुजानो विहरति । तस्स णं एगमवि आणवेमाणस्त जाव चतार पंच जणा अवुत्ता चेव अब्भुटुंति । ___ व्याख्या-तस्य व प्रयोजने समुत्पन्ने सति एकमपि पुरुषमाज्ञापयतो यावच्चत्वारः पञ्च वा पुरुषाः अनुक्ता एव समुपतिष्ठन्ते, ते च किं कुर्वाणाः ? एतद्वक्ष्यमाणमूचुस्तद्यथा भण[ह] देवाणुप्पिया! किं करेमो? किं आहरेमो? किं उवणेमो? किं उवद्वे[आचिट्ठामो? किं भे हियं इच्छियं ? किं भे आसगस्स सदति ? । तमेव पासित्ता अणारिया एवं वदंति-देवे खल्लु अयं पुरिसे देवसिणाए खलु अयं पुरिसे देवजीवणिजे खल[ अयं ]पुरिसे, अन्नवि[य]णं | उवजीवंति, तमेव पासित्ता आरिया वदंति-अभिकंतकूरकम्मे खल अयं पुरिसे, अतिधूते x" अहतं अखण्डितं वस्त्रं परिहितं येन स तथा, चन्दनेन । उत्क्षिप्तं ' सिक्तं ' गात्रं शरीरं शरीरावयवा यस्य स तथा, नानाविधविलेपनावलिप्त इत्यर्थः । " इति हर्ष। Jain Education w Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग दीपिका-IN न्वितम् । अइयायरक्खे दाहिणगामिए नेरइए कण्हपक्खिए आगमिस्साणं दुल्लहबोहियाए यावि भविस्सइ। - व्याख्या-भण स्वामिनाज्ञापय, धन्या वयं, येन भवताऽप्येवमादिश्यन्ते, किं कुर्म ? इत्यादि सुगम, यावत् हृदयेप्सित. मिति, तथा कि 'भे' युष्माकं 'आस्यकस्य ' मुखस्य ' स्वदते ' स्वादु प्रतिभाति ? [अथवा ] यदेव त्वदीयआस्यात् 'श्रवति' निर्गच्छति तदेव वयं कुर्मः। तथा तमेव राजानं तथाक्रीडमानं दृष्ट्वाऽन्येऽनार्याः एवं वदन्ति, तद्यथा-देवः खल्वयं पुरुषस्तथा 'देवस्नातको' देवश्रेष्ठो बहूनामुपजीव्यः । तथा तमेवासदनुष्ठायिनं दृष्ट्वा 'आर्याः' विवेकिन:-सदाचारा एवं ब्रुवते-अभिक्रान्तक्रूरकर्मा खल्वयं पुरुषो, हिंसादिप्रवृत्त इत्यर्थः। तथाऽसौ 'धूयते' रेणुवद्वायुना संसारचक्रवाले भ्राम्यते येन तद्भुतं-कर्म अष्टप्रकारं यस्य सोऽतिधूतः, तथा अतीवात्मनः पापैः कर्मभिः रक्षा यस्य स आत्मरक्षः, संसारे बहुभिः पापकर्मभिः बहुकालं स्थास्यतीति भावः, तथा दक्षिणदिग्मामी, यो हि क्रूरकर्मा साधुनिन्दापरायणः साधुदाननिषेधकः स दक्षिणदिग्गामुको भवति, दाक्षिणात्येषु नरकतिर्यमनुष्याऽमरेत्पद्यते, 'नेरइए 'त्यादि, नरकेषु भवो नारकः, तथा कृष्णपाक्षिकःx, इदमुक्तं भवति-प्रायेण दिक्षु मध्ये दक्षिणा दिगप्रशस्ता, गतिषु नरकगतिः, पक्षयोः कृष्णपक्षः, तदस्य साधप्रद्वेषमतेर्दानान्तरायविधायिनो दिगादिकं सर्वमप्रशस्तं दर्शितं, अन्यदपि यदप्रशस्तं गत्यादिकमबोधिलाभादिक तद्योजनीयमस्येति । एतद्विपरीतस्य साधुप्रशंसावतः सदनुष्ठानपरस्य अदक्षिणगामुकत्वं सुदेव शुक्लपाक्षिकत्वं समानुपाया. तस्य सुलभबोधित्वमित्येवमादिकं सद्धर्मानुष्ठायिनो भवतीति । साम्प्रतमुपसंजिधृक्षुराह x" तथा आगामिनि काले नरकादुवृत्तो दुर्लभबोधिकश्चाय बाहुल्येन भविष्यति " इति बृहद्वृत्तौ । द्वितीये श्रुत द्वितीयेडध्ययने दुर्लभबोधित्वमारम्भप्रतिबद्धा. नाम्। ॥ ५९॥ Jain Education l Far Private & Personal use Oh | a वा Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte इच्चेस ठाणस्स उट्ठिया वेगे अभिगि[ज्झं] हृति, अणुट्टिया वेगे अभिगि[ज्झं ] हृति, अभिझंझाउरा अभिगि (ज्झं ) इंति, एस ठाणे अणारिए अकेवले अपडिपुन्ने अणेयाउए असंसुद्धे असलगत्तणे असिद्धिमग्गे अमुत्तिमग्गे अनिवाणमग्गे अनिज्जाणमग्गे असवदुक्ख पहीणमग्गे । एगंतमिच्छे असाहू, एस खलु पढम (स्स) ठाणस्स अधम्मपक्खस्स विभंगे एवमाहि [ ए ] जति ( सू० १७ ) व्याख्या — इत्येतस्य पूर्वोक्तस्य स्थानस्यैश्वर्यलक्षणस्य शृङ्गारमूलस्य साँसारिकस्य परित्यागबुद्ध्या 'एके' केचन विपर्यस्तमतयः पाषण्डिकोत्थानेनोत्थिताः परमार्थमजानाना 'अभिगिज्झंति 'ति आभिमुख्येन लुभ्यन्ते - लोभवशगा भवन्तीत्यर्थः । तथा 'एके' केचन साम्प्रते क्षिणस्तस्मात्स्थानादनुपस्थिता गृहस्था एवं सन्तः ' अभिझंझ 'चि, झञ्झा - तृष्णा, तदातुराः सन्तोऽर्थेषु अत्यन्तं लुभ्यन्ते, अतो ह्येतत्स्थानमनार्थं महापुरुषैरनाचीर्णं, तथा ' अकेवलियं ' अशुद्धमिति, अस्मिन् स्थाने न केवलज्ञानावाप्तिरिति भावः । तथाऽपरिपूर्णमितरपुरुषाचीर्णत्वात्तथा सद्गुणविरहा तुच्छं, तथानैयायिकं - न्याय मार्गाद्वहि:, [ अशुद्धं समलं ] तथा ' असलगत्तणं ' ( असलगत्वं ) इन्द्रियासंवरणरूपं अथवा न शल्यकर्त्तनं, न सिद्धिमार्गः, तथाऽशेषकर्मक्षयलक्षणायाः मुक्तेर्न मार्गस्तथा अनिर्वाणमार्गः, तथा अनिर्माणमार्गस्तथा न सर्वदुःखानां प्रक्षीणमार्गः । कुत एवम्भूतं तत्स्थानं ? इत्याशङ्कयाह - एतत्स्थानमनार्य मे कान्तेन मिथ्यात्वरूपं, अत एव असाधुः, असदाचारवान ह्ययं सत्पुरुषसेवितः पन्या, येनास्मिन्मार्गे विषयान्वाः प्रवर्तन्ते, एवात्रवाऽयं प्रथम[स्य ] स्थान ww.jainelibrary.org Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये एयगडाङ्ग पत्रं दीपिकान्वितम् । ॥६ ॥ द्वितीया ध्ययने स्याधर्मपक्षस्य पापोपादानभूतस्य 'विभङ्गो' विशेष: स्वरूपमिति । साम्प्रतं द्वितीयं धर्मोपादानभृतं पक्षमाश्रित्याह अहावरे दोच्चस्स ठाणस्त धम्मपक्खस्स विभंगे एवमाहि जति-इह खल्ल पाईणं वा पडीणं वा उदीणं वा दाहिणं वा संतेगइया मणुस्सा भवंति, तं जहा-आरिया वेगे अणारिया वेगे उच्चागोया | वेगे नीयागोया वेगे कायमंता वेगे हस्समंता वेगे सुवन्ना वेगे दुबन्ना वेगे सुरूवा वेगे दुरूवा वेगे, तेर्सि | च णं खेत्तवत्थूणि परिगहियाई भवंति, एसो आलावगो जहा पंडरीए तहा नेयवो, जाव सबओ (वसंता)सब(ताए)याओ (2) परिनिवुडे त्ति बेमि, एस ठाणे आरिए केवले जाव सवदुक्खप्पहीणमग्गे एगंतसम्म साह दोच्चस्स ठाणगस्स धम्मपक्खस्स विभंगे एवमाहिते ॥ (सू०१८)॥ ___ व्याख्या-अयमालापकः सुगम एव, यथा पुण्डरीकाध्ययने तथेदापि सर्व निरवय भणितव्यं, यावत्ते ' एवं ' पूर्वोक्तेन प्रकारेण सर्वेभ्यः पापस्थानम्य उपशान्ताः, तथा अत एव सर्वात्मतया परिनिता इत्यहमेवं ब्रवीमि । तदेवमेतत्स्थानं केवलिकं प्रतिपूर्ण नैयायिकमित्यादि प्राग्वद्विपर्ययण नेयं, यावद्वितीयस्य स्थानस्य धाम्मिकस्यैष 'विभङ्गः'। स्वरूपव्याख्यानमिति । साम्प्रतं धर्माधर्मयुक्तं तृतीयस्थानमाश्रित्याह अहावरे तच्चस्स ठाणस्स मीसगस्स विभंगे एवमाहिजति-जे इमे भवंति आरन्निया आव धर्मपक्ष विकल्पवर्णनम् । Jan Education LSTww.jainalibrary.org Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सहिया गामणियंतिया कोई राहस्सिया, जाव ते तओ विप्पमुच्चमाणा भुजो २ एलमूयत्ताए [तमूत्ताए ] पञ्चायति । एस ठाणे अणारिए अकेवलिए जाव असवदुक्खप्पहीणमग्गे एगंतमिच्छे असाहू, एस खलु तच्चस्स ठाणस्स मीसगस्स विभङ्गे एवमाहिते ॥ [ सू० १९] व्याख्या-अथापरस्य तृतीयस्य स्थान कस्य मिश्राख्यस्य विभङ्गा-स्वरूपमाख्यायते, अत्राधर्मपक्षेण युक्तो धर्मपक्षो मिश्र इत्युच्यते, तत्राधर्मस्य प्राचुर्यादधर्मपक्ष एव द्रष्टव्यः, एतदुक्तं भवति-यद्यपि मिथ्यादृष्टयः काश्चित्तथाप्रकारां प्राणातिपातादिनिवृत्ति कुर्वन्ति तथाप्याशयाविशुद्धत्वात् अभिनवे पित्तोदये सति शर्करामिश्रक्षीरपानवतरप्रदेशवृष्टिवद्विवक्षितकार्यासाधकत्वान्निरर्थकतामापद्यते, तथा मिथ्यात्वानुभवान्मिश्रपक्षोऽप्यधर्मपक्ष एवावगन्तव्यः। []तदेव दर्शयितुमाहये इमे आरण्यिका:-कन्दमूलफलाशिनस्तापसाः वनवासिनो, ये च आवसथिका:-गृहिणस्ते च कुतश्चित्पापस्थानानिवृत्ता अपि प्रबलमिथ्यात्वोपहतबुद्धयः, ते च यापवासादिना महता कायक्लेशेन देवगतयः केचन भवन्ति, तथापि ते आसुरीयेषु स्थानेषु किल्बिषिकेषु उत्पद्यन्ते, इत्यादि सर्व पूर्वोक्तं भणनीय, यावत्तत युता मनुष्यमवं प्रत्यायाता एलकमूकत्वेन तमोऽन्धतया जायन्ते, तदेवमेतत्स्थानमनार्य अकेवलं-असम्पूर्ण अनैयायिकमित्यादि यावदेकान्तमिथ्याभूतं सर्वथैवैतदमाध्विति तृतीयस्थानस्य मिश्रस्यायं विभङ्गः-स्वरूपमाख्यातमिति । उक्तान्यधर्मधर्ममिश्रस्थानानि, साम्प्रतं तदेव विशेषेण कथयति अहावरे पढम स्स] ठाणस्स अहम्मपक्खस्स विभंगे एवमाहिज्जति, इह खल पाइणं वा ४ Jan E IN www.ininelibrary.org Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यगडाङ्गसूत्रं दीपिका न्वितम् । H६१ ॥ Jain Education Inter संगतिया मणुस्सा भवंति - [गिहत्था ] महेच्छा महारंभा महापरिग्गहा अधम्मिया अधम्माणु[u] अम्मिट्ठा अहम्मक्खाई अहम्म[पायजीविणो ] जीवी अहम्मपलोई अहम्मपलज्जणा अहम्मसीलसमुदायारा अहम्मेणं चैव वित्तिं कप्पेमाणा विहरंति । व्याख्या - अथापरोऽन्यः प्रथमस्य स्थानस्य अधर्म्मपक्षस्य 'विभङ्गो' विभाग एवमाख्यायते, इह खलु मनुष्या एवं - स्वभावा भवन्तीति एते च प्रायो गृहस्था एव भवन्तीत्याह 'गिहत्था ' ( इत्यादि०) । 'महेच्छा' महती - राज्यविभवपरिवारादिका सर्वातिशायिनी 'इच्छा' मनःप्रवृत्तिर्येषां ते महेच्छाः, तथा महारम्भाः - कृषिकरणादिभ्योऽविरताः, तथा महापरिग्रहाः - द्विपदचतुष्पदधनधान्यादिपरिग्रहोपेताः, अत एवाधार्मिकाः, तथाऽधम्मिष्ठा-नित्रिंशकर्मकारित्वादधर्मबहुलाः, तथा कर्त्तव्ये ' अनुज्ञा ' अनुमोदनं येषां ते अधर्मानुज्ञाः, एवमधर्म्ममाख्यातुं शीलं येषां ते तथा, [ एवमधर्मप्रायजीविनः]। एवमधर्ममेव प्रलोकितुं शीलं येषां ते अधर्म्मप्रलोकिनः, तथाऽधर्म्मप्रायेषु कर्मसु प्रकर्षेण रज्यन्त इत्यधर्म्म[प्र]रक्ताः, तथाऽधर्म्मशीला अधर्म्मस्वभावा, तथाsधम्र्मात्मकः समुदाचारो - यत्किञ्चनानुष्ठानं येषां ते अधर्मशीलसमुदाचाराः, तथा 'अधर्मेण ' पापेन ' वृत्ति' र्निर्वाहो येषां ते तथा, एवंविधाः विहरन्तः कालमतिवाहयन्ति । पापानुष्ठानमेव लेशतो दर्शयितुमाह हण छिंद भिंद विगत्तगा लोहितपाणी चंडा रुद्दा खुद्दा साहस्सिया उक्कुंचणवंचणमायानिय - द्वितीये श्रुत द्वितीया ses धर्मस्य विशेषस्व रूपम् । ॥ ६१ ॥ Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internat डिकूडकवडसातिसंपओगबहुला दुस्सीला दुबता दुप्पडियाणंदा असाहू सल्बाओ पाणाइवायाओ अप्पडवरया जावज्जीवाए जाव सबाओ परिग्गहाओ अप्पडिविरया जावजीवाए, सवाओ कोहाओ जावमिच्छादंसणसल्लाओ अप्पडिविरया, सव्वाओ पहाणुमद्दणवण्ण[ग] गंधविलेवणसद्दफरिसररूवगंधमल्लालंकाराओ अप्पडिविरता जावज्जीवाए, सबाओ सगडरहजाणजुग्गगिल्लिथिल्लिसीयासंदमाणियासयणासणजाणवाहणभोगभोयणपवित्थरविहीओ अप्पडिविरया जावजीवाए, सवाओ कयविक्कयमासद्धमासरूवगसंववहाराओ अप्पाडविरया [ जावज्जीवाए ], सवाओ हिरण्णसुवण्णधणधन्नमणिमोत्तिय संखसिलप्पवालाओ अप्पडिविरया [जावजीवाए ], सबाओ कूडतुलकूडमाओ अपडरिया [ जावज्जीवाए ], सबाओ आरंभसमारंभाओ अप्पडिविरया [ जावuttare ], सवाओ करणकारावणाओ अप्पडिविरया जावज्जीवाए, सवाओ पयणपयावणाओ अप्पडिविरया [ जावज्जीवाए ], सबाओ कुट्टणपिट्टणतजणताडणबहबंध[ण ] परिकि लेसाओ अप्पडिविरता जावज्जीवाए, जेआवणे तहत्यगारा सावज्जा अबोहिता कम्मंता परपाण परितावणकरा जे jainelibrary.org Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्र दीपिकान्वितम्। | अणारिएहिं कजंति, ततो वि अप्पडिविरया जावजीवाए व्याख्या-ते अनार्याः स्वत एव हननादिकाः क्रियाः कुर्वाणा अपरेपामपि एवमेवोपदेशं ददति । तत्र हननं दण्डा. दिभिस्तत्कारयन्ति । तथा छिन्धि कर्णादिकं, भिन्दि शूलादिना 'विकतकाः' प्राणिनां चर्मापनेतार; अत एव लोहितपाणया, तथा [चण्डाः] । 'रौद्रा'निस्त्रिंशाः, क्षुद्राः क्षुद्रकर्मकारित्वात् , तथा साहसिकाः असमीक्षितकारित्वात् , तथोकुश्चनवचनमायानिकृतिकूटकपटादिभिः सहातिसम्प्रयोगो-गाय, तेन बहुलास्तत्प्रचुराः, एते चोत्कुचनादयो मायापर्यायाः, इन्द्रशक्रादिवत् कथश्चिक्रियाभेदेऽपि द्रष्टव्याः+। तथा दुःशीलाश्चिरमुपचरिता अपि क्षिप्रं विसंवदन्ति, दुःखानुनेयदारुणस्वभावा इत्यर्थः । तथा दुष्टव्रताः माँसाभक्षणव्रतकालसमाप्तौ प्रभूततरसचोपधातेन माँसप्रदान, अन्यदपि नक्तभोजनादिकं दुष्टव्रतमिति, तथा दुःखेन प्रत्यानन्द्यन्ते [हर्ष प्राप्यन्ते ] दुष्प्रत्यानन्दा, दुराराध्या इत्यर्थः, उपकारेऽपि दोषमेव गृहन्ति, यत एवमतोऽसाधवस्ते, पापकर्मकारित्वात् , तथा यावजीवतया सर्वस्मादपि प्राणातिपातादविरताः, लोकनिन्दनीयात् स्त्रीहत्याबालब्राह्मणऋषिघातादेरप्यविरताः, एवं मृषावादादत्तादानमैथुनपरिग्रहक्रोधमानमायालोभप्रेमद्वेषकलहाभ्याख्यानपैशून्यपरपरिवादरत्य + “ तत्र शूलाधारोपणार्थमूर्ध्व कुञ्चनमुत्कुञ्चनं। वञ्चनं-प्रतारणं, यथाऽभयकुमारः प्रद्योतगणिकाभिर्धर्मवञ्चनया वञ्चितः । माया-वञ्चनबुद्धिः, प्रायो वणिजामिव । निकृतिस्तु बकवृत्त्या देशभाषा दिविपर्ययकरणं । कूटं तुलामानादेन्यूनाधिककरणं । कपटयथाऽऽषाढभूतिना वेषपरावृत्याऽऽचार्योपाध्यायसङ्घाटकात्मार्थ वारंवारं मोदका लब्धाः ।" इति हर्ष। द्वितीये श्रुत द्वितीयाध्ययने. धर्मस्य विशेषवर्णनम् । ॥६२॥ H For Privatespersonal use Only ijainelibrary.org Jan Education inte Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रतिमायामृषामिथ्यादर्शनशल्यादिभ्योऽसदनुष्ठानेभ्यो यावज्जीवयाप्रतिविरता भवन्तीति, तथा सर्वस्मात् स्नानोद्वर्त्तनवर्णकविलेपनशब्दस्पर्शरूपरसगन्धमाल्याऽलङ्कारान-कामाङ्गान् मोहजनितादप्रतिविरताः यावजीवया, तथा सर्वतः शुकटस्थादेर्यानविशेषादिकात् प्रविस्तरविधेः परिकररूपात् परिग्रहादप्रतिविरताः, तदेवमन्यस्मादपि वस्त्रादेः परिग्रहादुपकरणभूतादविरतास्तथा ' सर्वतः' सर्वस्मात् क्रयविक्रयाभ्यां करणभृताम्यां यो माषकामापकरूपककार्षापणादिभिः पण्यविनिमयात्मकः संव्यवहारस्तस्मादविरताः, यावजीवयेति, तथा ' सर्वतः' सर्वस्मात् हिरण्यसुवर्णादेः प्रधानपरिग्रहादविरतास्तथा कूटतुलकूटमानादेरविरताः, तथा सर्वतः कृषिपाशुपाल्यादेयत् स्वतः करणं अन्येन यत्किश्चित्कारयन्ति तस्मादविरतास्तथा पचनपाचनतस्तथा खण्डनकुट्टनपिहनतर्जनताडनबधबन्धनादिना यः परिक्लेशः पाणिनां तस्मादविरताः। साम्प्रतमुपसंहरति-ये चान्ये तथाप्रकाराः परपीडाकारिणः सावद्याः कर्म समारम्भाः 'अबोधिकाः ' बोधिलाभविघातिनः, तथा [परप्राण]परितापनकराः गोग्राहबन्दीग्रहग्रामघातात्मका:, ये अनाय्यः क्रियन्ते, ततोऽप्रतिविरताः यावजीवयेति । पुनस्न्यथा बहुप्रकारमधामिकपदं प्रतिपिपादयिषुराह___ से जहा नामए के पुरिसे कलममसरतिलमग्गमासणिप्फावकुलत्थआलिसंदगपलिमंथ. गमादिएहिं अयते करे मिच्छादंडं पउंजंति, एवामेव तहप्पगारे पुरिसजाए तित्तिरवदृगलावगकपोतकर्विजलमियमहिसवराहगाहगोहकुम्मसिरीसिवमादिएहिं अयते कूरे मिच्छादंडं पउंजति, Jain Education B ww.ininelibrary.org Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वनडाज पत्रं दीपिकान्वितम् ।। द्वितीये श्रुत. द्वितीयाध्ययनेधार्मिकस्य बाह्यपर्ष जावि य से बाहिरिया परिसा भवति, तं जहा___ व्याख्या-यथा नाम अस्मिन् विचित्रे संसारे के चनैवम्भूताः पुरुषाः, ये कलममसूरतिलमुद्गादिषु पचनपाचनादिकया क्रियया स्वपरार्थमयताः क्रूरा: मिथ्यादण्डं प्रयुञ्जन्ति, निरपराधेष्वपि मिथ्यादण्डं विदधति, तथैवमेव निष्प्रयोजन तथाप्रकाराः पुरुषा निर्दया: जीवोपघातनिरतास्तित्तिरवर्तकलावकादिषु जीवनप्रियेषु प्राणिषु अयता:-क्रूरकर्माणो नरा, मिथ्यादण्डं प्रयुञ्जन्ति, तेषां ऋरधियां “ यथा राजा तथा प्रजा" इति वचनात् परिवारोऽपि तथाभूत एव क्रूरो भवतीति, तथा दर्शयितुमाह-'जावि य से' इत्यादि, यापि च तेषां बाह्या पर्षद्भवति, तद्यथा दासेइ वा पेसेइ वा भयएति वा भाइल्लेति वा कम्मकरएति वा भोगपुरिसेति वा, तेसिं पि य णं अन्नयरंसि वा अहालहुगंसि अवराहसि सयमेव गरुयं दंडं निव्वत्तेति । तं जहा-इमं दंडेह इमं मुंडेह इमं तजेह इमं तालेह इमं अंडुयबंधणं करेह इमं नियडबंधणं करेह इमं हडिबंधणं करेह इमं चारगबंधणं करेह, इमं नियलजुयलसंकोडियमोडियं करेह, इमं हत्थछिन्नयं करेह इमं पायछिन्नयं करेह इमं कन्नछिन्नयं करेह इमं नक्कउहसीसमुखछिन्नयं करेह, वेयगच्छहियं अंगच्छहियं पप्फोडियप[पक्खाफोडि] यं करेह इमं नयणुप्पाडियं करेह दसणवसण द्वर्णनम् । Jain Education intern Far Private & Personal use Oh ww.jainelibrary.org Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिब्भुप्पाडियं करेह, उल्लंबियं ऊ[घ]सियं करेह घोलियं करेह सूलाइयं करेह [सूला]भिन्नयं | खारवत्तियं दब्भवत्तियं करेह सीहपुच्छियगं करेह वसहपुच्छियगं करेह दवग्गिदड्ड(यं)गं कागिणिमंसखावियंगं भत्तपाणनिरुद्धगं इमं जावज्जीवं वहबंधणं करेह इमं अन्नयरेणं असुभेणं कुमारेणं मारेह व्याख्या-दासः 'प्रेष्यः ' प्रेषणयोग्यो 'भृतको' वेतनेनोदकाद्यानयनविधायी, तथा मागिको यः षष्ठांशादिलाभेन | कुष्यादौ व्याप्रियते, तथा कर्मकरः प्रतीतः [ तथा नायकाश्रितः कश्चिद्भोगपरः], तदेवं ते दासादयोऽन्य( तरस्मिन् ? )स्य लघावप्यराधे शब्दाश्रवणादिके गुरुतरं दण्डं प्रयुञ्जन्ति प्रयोजयन्ति च । स च नायकस्तेषां दासादीनां बाह्यपर्षद्भूतानामन्य[तर]स्मिल्लघावप्यपराधे शब्दाश्रवणादिके गुरुतरं दण्डं-प्रयुक्ते, तद्यथा-इमं दासं सर्वस्वापहारेण दण्डयत यूयमित्यादिसूत्रसिद्धं यावदिममन्यतरेणाशुभेन कुत्सितमारेण व्यापादयत यूयं । जावि य से अभितरिया परिसा भवति, तं जहा-मायाति वा पिताति वा भायाति वा । भइणीति वा भजाइ वा पुत्ताइ वा सुण्हाइ वा धूयाइ वा, तेसिं पि य णं अन्नयरंसि अहालहुगंसि अवराहसि सयमेव गरुयं दंडं निवत्तेइ, सीओदगवियडांस उच्छोलित्ता भवइ जहा मित्तदोसवत्तिए Jan Education Emel For Private & Personal use only Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गஎன் दीपिकान्वितम् । ।। ६४ । Jain Education Intern [जा] अहिए परंसि लोगंसि, ते दुखंति सोयंति जूरंति तिष्यंति पिद्वंति परितप्यंति, ते दुक्खणसोयणजूरणतिपण पिट्टणपरितावणवह बंधण परिकिलेसाओ अप्पडिविरया भवंति । व्याख्या - याsपि च क्रूरकर्मवतामभ्यन्तरा पर्षद्भवति तद्यथा-मातापित्रादिका, मित्रदोषप्रत्ययिक क्रियास्थानवन्नेयं दहितोs[म] मल्लोके इति, तथाहि आत्मनोऽपथ्यकारी परस्मिलोके, तदेवं ते मातापित्रादीनां स्वल्पापराधिनामपि गुरुतरदण्डापादनतो दुःखमुत्पादयन्ति तथा नानाविधैरुपायैस्तेषां शोकमुत्पादयन्तीत्येवं प्राणिनां बहुप्रकार पीडोत्पादका यावद्वधबन्ध (न) परिक्लेशादप्रतिविरता भवन्ति । ते च विषयासक्ततयैतत्कुर्वन्तीत्येतद्दर्शयितुमाह वामेव ते इत्थिकामेहिं मुच्छिया गिद्धा गढिया अज्झोववन्ना जाव वासाइं चउपंचमाई छद्दसमाई वा अप्पतरो वा भुज्जतरो वा कालं भुंजित्तु (भोग) भोगाई परामु[पविसु ]इत्ता वेरायतणाई संचिणित्ता बहूइं कूराई कम्माई ओसन्नाई संभा (रकडेण) रेण कम्मेण, से जहा नामए अयगोलेति वा सेलगोलेति वा उदगंसि पखित्ते समाणे उदगतलमतिवइत्ता अहे धरणिपा भवइ, एवमेव तपगारे पुरिसजाए वज्जबहुले धूतबहुले पंकबहुले वेरबहुले अयसबहुले अप्प - तिय० भ० नियडि० सादिबहुले ओसन्नतसपाणघाती कालमासे कालं किच्चा धरणितलमतिवइत्ता द्वितीये श्रुत० द्वितीया ध्ययनेऽ धार्मिक स्याशुभ गतिप्रति पादनम् । ॥ ६४ ॥ w.jainelibrary.org Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अहे णरगतलपइट्ठाणे भवति (सू० २०)॥ व्याख्या-एवमेव पूर्वोक्तस्वभावा, एवं ते निष्कृपा निरनुक्रोशा बाह्याभ्यन्तरपर्षदोरपि कर्णनाशाविकर्तनादिना दण्डपातनस्वभावाः स्त्रीप्रधानाः कामास्तेषु मूञ्छिता गृद्धा ग्रथिता अध्युपपन्नाः, ते च ते भोगासक्ता व्यपगतपरलोकभयाः यावद्वपीणि चतुःपश्च षट्सप्त वा दश वाऽल्पतरं वा प्रभूततरं वा कालं भुक्त्वा भोगभोगान् तथा परपीडोत्पादनतो वेराऽनुबन्धान प्रवियो-पाद्य तथा सश्चयित्वा 'बहुनि' प्रभृततरकालस्थितिकानि 'कृराणि' दारुणानि नरकादिषु यातनास्थानेषु ककचपाटनतप्तत्रपुपानात्मकानि कर्माण्यष्टप्रकाराणि बद्धस्पृष्टनिधत्तनिकाचनावस्थानि विधाय तेन च सम्भारकृतेन कर्मणा प्रेर्यमाणास्तकर्मगुरवो वा नरकतलप्रतिष्ठाना भवन्ति । अस्मिन्नर्थे सर्वलोकप्रतीतं दृष्टान्तमाह-' से जहा नामए अयगोले' इत्यादि, तद्यथा नाम 'अयोगोलको ' लोहगोलक [ शिलागोलको-वृत्ताश्मशकलं वा ] उदके प्रक्षिप्तः सन् सलिलतलमतिवा-तिलध्याऽधोधरणितलप्रतिष्ठानो भवति । अथ दार्शन्तिकमाह-'एवमेवे 'त्यादि, यथाऽसावयोगोलकः शीघ्रमेवाधो यात्येवमेव तथाप्रकारः पुरुषजातः, तमेव लेशतो दर्शयति-'वज्रबहुलो' वज्रवद्गुरुत्वाकर्म, तबहुला, बङ्ख्यमानकर्मगुरुः, तथा धूयत इति [धूतं-] प्रारबद्धं कर्म, तत्प्रचुरः, तथा 'पत' पापं तद्वहुलः, तथा वैरबहुला, तथा 'अप्पत्तिय'ति अप्रत्ययवहुला, तथा 'मायाबहुल:' कपटबहुल:, तथा निकृति- या वेषभाषापरावृत्तिच्छमना परद्रोहबुद्धिस्तन्मयः, तथा सातिबहुल:, हीनद्रव्यस्य सातिशयेन द्रव्येण संयोजन सातिस्तद्वहुल:-तत्करणप्रचुरः, तथा अयशो बहुलः, स एवम्भूतः पुरुषः कालमासे कालं कृत्वा नरकतलप्रतिष्ठानो भवति । Jain Education inte For Private & Personal use only jainelibrary.org Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग दीपिकान्वितम् ।। द्वितीये श्रुत. द्वितीयाध्ययनेनरकावास | स्वरूपम् । अथ नरकस्वरूपं निरूपयति ते णं णरगा अंतो वट्टा बाहिं चउरंसा अहे खुरप्पसंठाणसंठिता निच्चंधकारतमसा ववगयगहचंदसूरनक्खत्तजोइसप्पहा मेदवसामसरुहिरपूयपडलचिखिल्ललित्ताणुलेवणतला असुई विस्सा परमदुब्भिगंधा कण्हा अगणिवण्णाभा कक्खडफासा दुरुहियासा असुभा गरगा असुभा नरएसु वेदणाओ। नो चेव णं नरएसु नेरइया निदायंति वा पयलायति वा सुई वा रतिं वा धितिं वा मति वा उवलभंति, ते णं तत्थ उज्जलं विउलं पगाढं कडुयं ककसं चंडं दुक्खं दुग्गं तिवं दुरहियासं निरयवयणं पच्चणुभवमाणा विहरंति ॥ (सू० २१) ___व्याख्या-'ते णं नरगा' इत्यादि, ते नरकाः सीमन्तकादयः, बाहुल्यमङ्गीकृत्यान्तर्मध्ये वृत्ता बहिरपि चतुरस्राः [अधश्च क्षुरप्रसंस्थानसंस्थिताःx] नित्यान्धकारतमसा:-मेघच्छन्नाम्बरतलकृष्णपक्षरजनीवत्तमोबहुलाः, तथा व्यपगतश्चन्द्रसूर्यग्रहनक्षत्रज्योतिष्पथो येषां ते तथा, तथा मेदवसामाँसरुधिरपूयपटला: + तथा अशुचयो विष्ठामुक्क्लेदप्रधानाः, अत एवं ___x “ एतच संस्थानं पुष्पावकीर्णानाश्रित्योक्तं, तेषामेव प्रचुरत्वात् , आवलिकाप्रविष्टास्तु वृत्तव्यस्रचतुरस्रसंस्थाना एवं भवन्ति " इति बृहद्वृत्तौ। +“ तैर्लिप्तानि-पिच्छिलीकृतानि 'अनुलेपनतलानि' अनुलेपनप्रघानानि तलानि येषां ते तथा" इति बृहद्वृत्तौ । Jain Education inte jaineibrary.org Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | 'विश्राः ' कृथितमाँसादिकल्पकर्दमविलिप्ताः, एवं परमदुर्गन्धाः-[ कृथितगोमायु] कलेवरादप्यसह्यगन्धाः, तथा कृष्णाऽग्नि. वर्णाभाः रूपतः, स्पर्शतस्तु 'कर्कशः' कठिनो वज्रकण्टकादप्यधिकतरः स्प[ों येषां ते तथा]ः, तथा ' दुस्सहाः' अतीव दुःखेन अधिसह्यन्ते, किमिति ? यतस्ते नरका:-पश्चानामपीन्द्रियार्थांनामशोभनत्वादशुभाः, तत्र च सचानामशुभकर्म कारिणामुग्रदण्डपातिनां तीव्रा-अतिदुःसहा वेदनाः प्रादुर्भवन्ति । ते च नारकास्तया वेदन या अक्षिनिमेषमात्रमपि कालं न निद्रायन्ते न प्रचलायन्ते; * वेदनाऽभिभूतत्वात्कृतस्तेषां निद्रालाभो भवतीति दर्शयति, तीवा-मुज्वलामित्यादिविशेषणविशिष्टां यावद् वेदनां वेदयन्त्यनुभवन्ति । पुनरपरं दृष्टान्तमाह से जहा नामए (केइ) रुक्खे सिया पवयग्गे जाते मूले छिन्ने अग्गे गरुए जओ णिन्नं । जओ विसमं जओ दुग्गं तओ पवडति, एवामेव तहप्पगारे पुरिसजाते गन्भातो गन्भं जम्मातो | जम्मं माराओ मारं नरगाओ नरगं दुक्खाओ दुक्खं दाहिणगामिए नेरईए कण्हपक्खिए आग मिस्साणं दुल्लहबोहिए यावि भवति, एस ठाणे अणारिए अकेवले जाव [अ]सबदुक्खप्पहीणसामग्गे एगंतमिच्छे असाहू, पढमस्स ठाणस्स अधम्मपक्खस्स विहंगे एवमाहिए ॥[ सू० २२ *" श्रुतिं वा रतिं वा धृति वा मतिं वा नोपलभन्ते " इति हर्ष । Jan Education interna Far Private & Personal use Oh Sajainelibrary.org Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग-IN सूत्रं दीपिकान्वितम् । द्वितीये श्रुत द्वितीयाध्ययने धर्मपक्षस्वरूपम् । व्याख्या-सुगमैव स्वयमेवाम्यूह्या+ _ अहावरे दोच्चस्स ठाणस्स धम्मपक्खस्स विभंगे एवमाहिज्जति-इह खलु पाईणं वा ४ संते- गतिया मणुस्सा भवंति, तं जहा-अणारंभा अपरिग्गहा धम्मिया धम्माणुया धम्मिट्ठा जाव धम्मेणं चेव वित्तिं कप्पेमाणा विहरंति, सुसीला सुब्बया सुप्पडियाणंदा सुसाह सबाओ पाणा(ति)यवायाओ पडिविरया जावज्जीवाए, जाव जेयावन्ने तहप्पगारा सावजा अबोहिया कम्मंता परपाणपरितावणकरा कजंति, तओ वि पडिविरया जावजीवाए । व्याख्या-अथाऽपरस्य द्वितीयस्य स्थानस्य विमङ्गो' विभागः स्वरूपमेवं-वक्ष्यमाणनीत्याऽऽख्यायते, तद्यथाइह खलु प्राच्यादिदिक्षु मध्ये अन्यतरस्यां दिशि 'सन्ति' विद्यन्ते, ते चैवम्भूता भवन्तीति, त[य]था-न विद्यते सावध ___+ "तद्यथा नाम कश्चिदृक्षः पर्वताये जातो मूलछिन्नः शीघ्रं यथा निम्नं पतति, एवमसावप्यसाधुकर्मकारी तत्कर्मवातेरितो वातप्रेरितः सन् शीघ्रमेव नरके पतति, ततोऽप्युद्वत्तो गर्भाद्गर्भमवश्यं याति, न तस्य किश्चित्राणं भवति, यावदागामिन्यपि कालेऽसौ दुर्लभधर्मप्रतिपत्तिर्भवतीति । साम्प्रतमुपसंहरति-'एस ठाणे इत्यादि, तदेतत्स्थानमनार्य पापानुष्ठानपरत्वाद्यावदेकान्तमिध्यारूपमसाधु । तदेवं प्रथमस्याधर्मपाक्षिकस्य स्थानस्य 'विमङ्गो' विभागः स्वरूपमेष व्याख्यातः।” इति प्रत्यन्तरेऽस्य सूत्रस्य व्याख्योपलभ्यते । ॥६६॥ अ Jain Education inter w.jainelibrary.org । Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आरम्भो येषां ते अनारम्भाः, तथा ' अपरिग्रहाः ' निष्किश्चना, धर्मेण चरन्तीति धामिकाः, यावद्धम् णैवात्मनो वृत्ति परिकल्पयन्ति, तथा सुशीलाः सुव्रताः सुप्रत्यानन्दाः सुसाधवः सर्वस्मात् प्राणातिपाताद्विरताः, एवं यावत्परिग्रहाद्विरता इति, ये चान्ये तथाप्रकाराः सावद्यारम्भा यातदबोधिकारिणस्तेभ्यः सर्वेभ्योऽपि विरता इति । पुनरन्येन प्रकारेण साधुगुणान् दर्शयितुमाह___ से जहा नामए अणगारा भगवंतो इरियासमिया भासासमिया एसणासमिया आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिया उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघाणपारिट्ठावणियासमिया, मणसमिया वयसमिया कायसमिया, मणगुत्ता वयगुत्ता कायगुत्ता, गुत्ता गुतिदिया गुत्तबंभयारी, अकोहा अमाणा अमाया अलोभा, संतो पसंता उवसंता परिनिव्वुडा, अणासवा अग्गंथा छिन्नसोया निरु-N वलेवा, कंसपाईव मुक्कतोया संखो इव निरंजणा जीवो इव अप्पडिहयगई गगणतलं पिव निरालंबणा | वाउरिव अप्पडिबद्धा सारदसलिलं व सुद्धहियया, पुक्खरपत्तं पिव निरुवलेवा कुम्मो इव गुतिंदिया विहग इव विप्पमुक्का खग्गिविसाणं व एगजाया भारंडपक्खीव अप्पमत्ता कुंजरो इव सोंडीरा वसहो इव जातथामा सीहो इव दुद्धरिसा मंदरो इव निप्पकंपा सागरो इव गंभीरा चंदो इव १२ JanEducatioJNT Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र दीपिकातिम सोमलेसा सूरो इव दित्ततेया जच्चकंचणगं व जातरूवा वसुंधरा इव सवफासविसहा सुहुताया- 11 द्वितीये सणो विव तेयसा जलंता। नस्थि णं तेसिं भगवंताणं कत्थ वि पडिबंधे, से य पडिबंधे चउविहे || श्रुत द्वितीया] पन्नत्ते, तं जहा-अंडएति वा पोयएति वा उग्गहेइ वा पग्गहेइ वा, जन्नं जन्नं दिसं इच्छंति तन्नं । ध्ययनेतन्नं दिसं अप्पडिबद्धा सुइभूया लहभूया अ[ण]प्पगंथा संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणा नगारगुण विहरति । तेसि णं भगवंताणं इमा एतारूवा जायामायावित्ती होत्था, तं जहा-चउत्थभत्ते वर्णनम् । x" नास्ति तेषां कुत्रचित्प्रतिबन्धः, स च प्रतिबन्धश्चतुर्विधस्तद्यथा-अण्ड जो हंसादि. अण्डकं वा मयूराण्ड क्रीडामयूरादिहेतुः, स्यात्तेन तत्र प्रतिबन्धः । पोतजे हस्त्यादौ पोतके वा शिशुत्वात्प्रतिबन्धः स्यात् । अथवा 'अंडजोइ वा वोडजोइ वा' इति पाठान्तरं । अण्डज-सणिका दिवस्त्रं, बोण्ड-कासं वस्त्रं, तत्र प्रतिबन्धः स्यात् । 'उग्गहेइ वा' अवगृहीतं-परिवेषणार्थ मुत्पाटितं भक्तपानं, प्रगृहीतं-भोजनार्थ गुत्पाटितं तदेव, अथवा अनवग्रहिकं वसतिपीठफलकादि औपग्रहिकं वा दण्डकायुपधिजातं, प्रमही तु रजोहरणाद्यौधिकोपधिरूपं, तत्र प्रतिबन्धः स्यात् । 'जण्णं 'ति यां यां] दिशमिच्छन्ति विहन्तुं तांतां दिशं विहरन्ति । किम्भूताः ? अप्रतिबद्धाः शुचिभूता-भावशुद्धिमन्तः श्रुतिभूता वा-प्राप्तसिद्धान्ताः । लघुभूता-अल्पोपधयोऽगौरवाश्च, अनल्पग्रन्था-बह्वागमा, न विद्यते आत्मनः सम्बन्धी प्रन्यो-हिरण्या दिर्येषां तेऽनात्मग्रन्था इति वा" इति हर्ष। ॥६ ॥ Jain Education ! jainelibrary.org Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Interna छट्टभत्ते अट्टमभत्ते दसमभत्ते दुवालसमभत्ते चोदसमभत्ते, अद्धमासिए ( भत्ते ) मासिए (भत्ते ) दोमासिए तिमासिए चउम्मासिए पंचमासिए छम्मासिए, अदुत्तरं चणं उखिचचरगा (निक्खित्तचरगा उक्खित्त) निखित्तचरगा अंतचरगा पंतचरगा लूहचरगा समुयाणचरगा संसट्टचरगा असंसचरगा तज्जातसंसचरगा, दिट्ठलाभिया अदिट्ठलाभिया, पुट्ठलाभिया अपुलाभिया, भिक्खलाभिया अभिक्खलाभिया, अन्नातचरगा *अन्नगिलायचरगा उवनिहिया, + संखादत्तिया परिमिय * नास्त्येतचिह्नमध्यगतः पाठः सवृत्तिकमुद्रितप्रतिषु । + " सङ्ख्याप्रधाना दत्तयो येषां ते तथा । परिमित - अर्द्धपोषादि (?) ( पिण्डपात- आहार ) लाभो येषामस्ति ते तथा । 'सुद्धेणिया 'शुद्धपणाः, शुद्धस्य वा निर्व्यञ्जतस्य भक्तादेरेपणा येषामस्ति ते [तथा ] । अन्तप्रान्तं वल्लवनकादिः, स आहारो येषां ते तथा । विरसं नीरसं शीतलीभूतं । रूक्षाहाराः । ' अंबलिया' आचाम्लं ओदनकुल्माषादि, तेन चरन्तीति । निर्विकृतिकाःघृतादिविकृतित्यागिनः । अमद्यमांसाशिनः - मद्यमांसं नानन्तीति । 'नो नियाग 'त्रि न नित्यं रस भोजिनः । 'नेस जिया ' निषद्यायुतायां भूमौ उपविशनं, तथा चरन्तीति नैषयिकाः । सिंहासन निविष्टस्य भून्यस्तपादस्य सिंहासनापनोदे सति यादृशमत्रस्थानं, तच्चस्यास्ति स वीरासनिकः । दण्डस्येवायतं - आयामो येषां ते दण्डायतिका: । लगण्डं वक्रकाएं, तद्वत् शेरते ये ते लगण्डशायिनः, jainelibrary.org Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्यगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥६८॥ पिंडवाइया, सुद्धेसणिया अंताहारा पंताहारा अरसाहारा विरसाहारा लूहाहारा तुच्छाहारा, अंतजीवी !! द्वितीये पंतजीवी, आयंबिलिया पुरमड्डिया निविगइया, अमजमंसासिणो नो निकाम[नो नियाग] रसोई || श्रुत० द्वितीयाठाणाइया पडिमाठाणाइया उक्कडुआसणिया नेसज्जिया वीरासणिया दंडायतिया लगंडसाइणो ध्यपने[आयावगा] अवाउडा अगत्तया अकंडुया अनिढुहा* धुतकेसमंसुरोमनहा, सव्वगायपडिकम्म नगारगुण विप्पमुक्का चिटुंति । [ते णं] एतेणं विहारेणं विहरमाणा बहूइं वासाइं सामनपरियागं पाउणंति वर्णनम् । पाउणित्ता आबाहसि उप्पन्नंसि वा अणुप्पन्नसि वा बहूई भत्ताइ[पञ्चक्खंति],पञ्चक्खित्ता बहूइं भत्ताई अणसणाए छेदिति, छेदित्ता जस्सट्टाए कीरइ नग्गभावे मुंडभावे अण्हाण[भारे] गे(?) IN अदंतवणगे अच्छत्तए अणोवाहणए, भूमिसेजा फलगसेज्जा कटुसेजा केसलोए बंभचेरवासे परघरपवेसे लद्धावलद्धे माणावमाणाओ हीलणाओ निंदणाओ खिसणाओ गरहणाओ तजणाओ पाणिका शिरश्च वा (?) भूमौ लगति तथा शयनं कुर्वतः । आतापका-आतापनाप्राहिणः । 'अबाउडा' अप्रावृताः-प्रावरणवर्जकाः । हा' अनिष्ठीवनाः।" इति हर्ष कुलीयदीपिकायाम् । ॥६ ॥ आणता mar For Private & Personal use Oh wwwEjainelibrary.org Jain Educationalainal I Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तालणाओ उच्चावया गामकंटगा बावीसं परीसहावसग्गा अहियासिज्जति तमटुं आराहेति, आराहित्ता चरमेहि ऊसासनीसासेहिं अणंतं अणुत्तरं निवाघायं निरावरणं कसिणं पडिपुन्नं केवलवरनाणदंसणं समुप्पाडिंति, समुप्पाडित्ता कालमासे कालं किच्चा ततो पच्छा सिझंति बुझति | मुच्चंति परिनिव्वायांत सव्वदुक्खाणमंतं करंति । एगच्चाए पुण एगे भयंतारो भवंति, अवरे पुण पुवकम्मावसेसेणं [कालमासे]कालं किच्चा अन्नयरेसु देवलोगेसु देवत्ताए उववत्तारो भवति, तं जहा-महिडिएसु महज्जुतिएसु महापरक्कमेसु महाजसेसु महाबलेसु महाणुभावेसु महासुक्खेसु । व्याख्या-+ इत्यादिसाधुवर्णकः प्राक्तनः सर्वोऽपि पाठसिद्ध एव, सुगमत्वात् , बृहट्टीकाकारेण न व्याख्यातोत्रा. + इतः प्राक् प्रत्यन्तरे निम्नप्रकारेणोपलभ्यते वृत्तिपाठः-" सुगम एव, नवरं विशेष:-' उक्खित्तथरए ' उत्क्षिप्त-स्वपयोजनाय पाकभाजनादुद्धतं, तदर्थमभिग्रहतश्वरति-तद्गवेषणाय गच्छतीत्युस्क्षिप्तचरकःनिक्खित्तचरए 'त्ति निक्षिप्त-पाकभाजनादनुद्धृतं । 'उक्खित-निक्वित्तचरए 'त्ति पाकभाजनादुरिक्षप्तं तत्र वाऽन्यत्र च स्थाने (निक्षिप्तं ) यत्तदुरिक्षप्तनिक्षिप्तं । 'संसट्ठचरए 'त्ति संसृष्टेन-खरण्टितेन हस्तादिना दीयमानं संसृष्टमुच्यते, तच्चरति यः स तथा । 'असंसहचरए 'त्ति [ उक्तविपरीतमसंसृष्ट, तेन चरति । 'तजाय 'ति] तज्जातेन देयद्रव्याविरोधिना यत्संसृष्टं हस्तादि, तेन दीयमानं यश्चरति स तथा । 'अन्नायचरए 'त्ति in wwwjanesbrary.org Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिका न्वितम् । ॥ ६९ ॥ Jain Education Interna प्यत एव न लिखितः । अन्यच्च - विशेषार्थिना औपपातिकमाचाराङ्गसम्बन्धिप्रथममुपाङ्ग, तत्र च साधुगुणाः प्रबन्धेन व्यावर्ण्यन्ते, तदिहापि तेनैव क्रमेण द्रष्टव्यमिति । तथा एवंविधाः साधवः * सर्वगात्र परिकर्म्मविप्रमुक्ता- निष्प्रतिकर्म शरीरास्तिष्ठन्तीति । तथोग्रविहारिणः प्रव्रज्यापर्यायमनुपालय आबाधारूपे रोगातङ्के समुत्पन्ने अनुत्पन्ने वा भक्तप्रत्याख्यानं विदधति । किं बहुनोक्तेन ? यत्कृतेऽयमयोगोलकवन्निरास्वादः करवालधारामार्गवदुरध्यवसायः श्रमणभावोऽनुपालयते तमर्थं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राख्यमाराव्याव्याहत मे कमनन्तं केवलज्ञानमवाप्नुवन्ति, केवलज्ञानावाप्तेरू सर्वदुःखविमोक्षणलक्षणं मोक्षमवाप्नुवन्ति । एके पुनरेकया अर्चया एकेन शरीरेण एकस्माद्वा भवात्सिद्विगतिं गन्तारो भान्ति, अपरे अज्ञातोऽनुपदर्शितस्वाजन्यादिभावः संश्चरति यः स तथा । 'दिलाभिए 'ति दृष्टस्यैव भक्तादेर्दृष्टाद्वा-पूर्वोपलब्धादाय का लाभो यस्यास्ति स दृष्ट्रलाभिकः । ' अदिट्ठलाभिए ' तत्रादृष्टस्यापि अपवरकादिमध्यान्निर्गतस्य श्रोत्रादिभिः कृतोपयोगस्य भक्तादेरदृष्टाद्वापूर्वगन्धादायकालाभो याति स तथा । 'पुलाभिए 'चि पृष्टस्यैव ' हे साधो ! किं ते दीयते ? ' इत्यादिप्रश्नितस्य यो लाभो यस्यास्ति स तथा । ' अपुलाभिए 'ति [ पृष्टलाभिकविपर्ययात् । 'भिक्खलाभिए 'त्ति ] भिक्षेत्र भिक्षा तुच्छमवज्ञातं वा, तल्लामो ग्राह्यतया यस्यास्ति स भिक्षालाभिकः । 'अभिक्खलाभिए 'ति उक्तविपर्ययात् । [ अज्ञातचरका - अज्ञातगृहेषु चरन्तीत्यभि ग्रहवन्तः ] । ' अन्नगिलायए 'त्ति अन्नं भोजनं विना ग्लायति ( यः स ) अन्नग्लायकः, स चाभिप्रहविशेषात्प्रातरेव दोषाऽन्नभुगिति । 'उवनिद्दिय 'ति उपनिहितं [ यथा कथविदासन्नीभूतं तेन चरति यः स औपदिकः ]" इत्यादि । * ' धूतं ' अपनीतं केशश्मश्रुलोमनखादिकं यैस्ते तथा इति बृहद्वृत्तौ । द्वितीये श्रुत● द्वितीया ध्ययनेऽ• नगारगुण वर्णनम् - 1 ॥ ६९ ॥ Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुनस्तथाविधपूर्वकर्मावशेषे सति तत्कर्मवशगाः कालं कृत्वाऽन्यतमेषु वैमानिकेषु देवेपत्पद्यन्ते, तत्रेन्द्र सामानिकत्रायविंशलोकपालपार्षद्यात्मि]रक्षप्रकीर्णेषु नानाविधसमृद्धिषु भवन्तीति, नत्वाभियोगिककिल्बिषिकादिष्विति । 'तं जहे'. त्यादि, तद्यथा-महादिषु देवलोकेपूत्पद्यन्ते । ते देवास्त्वेवम्भूता भवन्तीति दर्शयति ते णं तत्थ देवा भवंति-[ महिड्डिया महज्जुत्तिया जाव महासुक्खा] हारविराइयवच्छा कडगतडियर्थभियभया अंगयकुंडलमट्रगंडतलकपणापीढधारी विचित्तवत्थाहरणा विचित्तमाला- 18 मउलिमउडा कल्लाणगपवरवत्थपरिहिया कल्लाणगपवरमल्लाणुलेवणधरा भासुरबोंदी पलंबवणमालधरा । दिवेणं रूवेणं दिवेणं वपणेणं दिवेणं गंधेणं दिवेणं फासेणं दिवेणं संघाएणं दिवेणं संठाणेणं दिवाए इड्डीए दिवाए जुत्तीए दिवाए पभाए दिवाए छायाए दिवाए अच्चाए दिवेणं तेएणं दिवाए लेसाए दसदिसाओ उज्जोवेमाणा पभासेमाणा गतिकल्लाणा ठिइकल्लाणा आगमेसिभहया यावि | भवंति । एस ठाणे आयरिए, जाव सबदुक्खपहीणमग्गे एगंतसम्मे सुसाइ दोच्चस्स ठाणस्स । धम्मपक्खस्स विभंगे एवमाहिए ॥ सू० २३] ॥ व्याख्या-तेणं तत्थ देवा' इत्यादि, ते देवा नानाविधतपश्चरणोपात्तशुभकर्माणो महक्ष्यादिगुणोपेता भवन्ती Jain Education intern jainelibrary.org Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रयगडाङ्ग- श्रुत दीपिकान्वितम् । ॥ ७०॥ त्यादिकः सामान्यवर्णकस्तथा हारविराजितवक्षस इत्यादिक आभरणवस्त्रपुष्पवर्णकः । पुनरतिशयापादनार्थ दिव्यरूपादि- द्वितीये प्रतिपादनं चिकीर्षुराह-'दिवेणं रूवेणं' दिव्यरूपेण दिव्यया द्रव्यलेश्ययोपेताः दशापि दिशः समुद्योतयन्तो गत्या शीघ्ररूपया कल्याणाः, तथा स्थित्योत्कृष्टमध्यमया कल्याणास्ते भवन्ति । तथाऽऽगामिनि काले भद्र काः शोभनमनुष्यभव. द्वितीयासम्पदुपेताः, तथा सद्धर्मप्रतिपत्तारश्च भवन्तीति । तदेतत्स्थानमार्य मे कान्तेनैव सम्यग्भूतं सुसाध्विति । एतद्वितीय[स्य] || ध्ययनेस्थानस्य धर्मपाक्षिकस्य विभङ्ग एवमाख्यातः । श्रावकअहावरे तच्चस्स ठाणस्स मीसगस्स विभंगे एवमाहिजति-इह खल पाईणं वा ४ संतेगतिया गुणमणुस्सा भवंति, तंजहा-अप्पिच्छा [अप्पारंभा अप्पपरिग्गहा धम्मिया धम्माणुया जाव धम्मेणं वर्णनम् । चेव वित्तिं कप्पेमाणा विहरंति। सुसीला सुवया सुप्पडियाणंदा साहू एगच्चाओ पाणाइवाराओ पडिविरया जावज्जीवाए एगच्चाओ अप्पडिविरया जाव जे यावन्ना तहप्पगारा सावज्जा अबोहिया कम्मंता परपाणपरितावणकरा कजंति, ततोवि एगच्चाओ अप्पडिविरया। व्याख्या-अथापरस्य तृतीयस्य स्थानस्य मिश्रकाख्यस्य विभङ्गः समाख्यायते-एतच्च यद्यपि मिश्रत्वाद्धाऽधर्माभ्यामुपपेतं भवति [तथापि] धर्मभूयिष्ठत्वाद्धार्मिकपक्षेऽवतरति, तद्यथा-बहुषु गुणेषु मध्यपतितो दोषो नात्मानं लभने, कलङ्क इव चन्द्रिकायाः, तथा बहूदकमध्यपतितो मृच्छकलावयवो नोदकं कलुषयितुमलं, एवमधर्मोऽपि धर्ममिति स्थितं । ॥७ ॥ Janwwe.jainalibrary.org Jain Education Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ असौ मिश्रपक्षोऽपि धार्मिकपक्षेऽवतरति । इह खलु जगति प्राच्यादिदिक्षु 'एके' केचन शुभकर्माणो मनुष्या भवन्तीति, अल्पेच्छा अल्पपरिग्रहारम्मा, एवंविधा धाम्मिवृत्तयः प्रायः सुशीला: सुबताः सुपत्यानन्दाः साधवो भवन्तीति । ते च एकस्मात् स्थूलात्सङ्कल्पकृतात् प्रतिनिवृत्ता, एकस्माच सूक्ष्मादारम्भजादपतिविरता, एवं शेषाग्यपि प्रतानि संयोज्यानीति ।। 'जे यावन्ने' ये चान्ये सावद्या नरकातिहेतवः कर्मसमारम्भास्तेभ्य एकस्माद्यन्त्रपीडानिलाञ्छनादिभ्यो निवृत्ता एकस्माच | क्रयविक्रयादेरनिवृत्ता इति । तांश्च विशेषतो दर्शयति___ से जहा नामए समणोवासगा भवंति-अभिगयजीवाजीवा उवलद्धपुन्नपावा आसवसंवरवेयणाणिज्जराकिरियाहिगरणबंधमोक्खकसला असहिजा देवासुरनागसुवण्णजक्खरक्खसकिनारकिंपुरिसगरुलगंधवमहोरगमाइएहिं देवगणेहिं निग्गंथाओ पावयणाओ अणइक्कमणिज्जा, निग्गंथे पावयणे निस्संकिया निकांखिया णिवितिगिच्छा, लट्टा गहियट्ठा पुच्छियट्ठा विणिच्छियट्ठा अभिगयट्ठा अद्विमिंजपेमाणुरागरत्ता, अयमाउसो ! निग्गंथे पायवणे अ? अयं परमटे सेसे अणद्वे, ऊलियफलिहा अवंगुयदुवारा अचियत्तंतेउरपरघरप्पवेसा, चाउद्दसट्ठमुदिट्ठपुण्णमासिणीसु पडिपुण्णं पोसहं सम्म अणुपालेमाणा, समणे निग्गंथे फासुयएसणिजेणं असणपाणखाइमसाइमेणं वत्थ Jain Education janesbrary.org Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्रं । न्वितम् । सूयगडाङ्ग-IN | पडिग्गहकंबलपायपुंछणेणं [ओसहभेसज्जेणं ] पीढफलगसिजासंथारएणं पडिलाभमाणा बहहिं द्वितीये सीलवयगुणवेरमणपञ्चक्खाणपोसहोववासेहिं अहापरिग्गहिएहिं तवोकम्मेहि अप्पाणं भावेमाणा दीपिका-1 विहरंति, ते णं एयारूवेणं विहारेणं विहरमाणा बहुइं वासाई समणोवासगपरियाय पाउणंति, द्वितीया ध्ययनेपाउणित्ता आवाहसि उप्पन्नंसि वा अणुप्पन्नंसि वा बहूई भत्ताई अणसणाए (पञ्चक्खायंति), ॥७१॥ विरत्यापञ्चक्खाइत्ता बहूई भत्ताई अणसणाए(छेदेति), च्छेदित्ता आलोइयपडिकंत्ता समाहिपत्ता कालमासे द्यश्रितकालं किच्चा अन्नवरेतु देवलोएसु देवत्ताए उववत्तारो भवंति, तं जहा-महिडिएसु महजुइएसु। बालादिजाव महासुक्खेसु, सेसं तहेव जाव एस ठाणे आरिए जाव एगंतसम्म साहू, तच्चस्स ठाणस्स स्वरूपम् । मीसगस्स विभंगे एवं आहिए। व्याख्या-अयं श्रगणोपासकवर्णकः सुगम एष, विशेषार्थिना वृहड्डीका विलोकनीया, या ग्रन्थगौरवमयान्याख्या न लिखिता । नवरं-'असियफलिहा' उच्छुितानि स्फटिकानीव स्फटिकाम्यन्तकरणानि येते तथा, एतदुक्तं भवति मौनीन्द्रदर्शनावाप्तौ सत्यां परितुष्टमानसा इति । तथा अप्रावृतानि द्वाराणि यैस्ते तथा, उद्घाटितगृहद्वारास्तिष्ठन्ति, सद्दर्शनNJलामेन न क(स्माच्चि)स्यचि(१)द्विमेति, शोभनमार्गपरिग्रहेणोद्घाटितशिरसो विश्रब्धं-तिष्ठन्तीति । अपरं सर्व सुगमम् । ॥७१॥ jainerary.org For Private & Personal Use Oy Jain Education Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | तदेतत् स्थानं कल्याण-परम्परया सुखविपाकमिति कृत्वाऽऽर्यमित्येवं विभङ्गस्तृतीयस्य स्थानस्य मिश्रकाख्यस्याऽऽख्यात इति । उक्ताः धाम्मिका अधामिकाच, तदुभयरूपाश्चाभिहिताः। साम्प्रतमेतदेव स्थानत्रिकं संक्षेपतो विभणिषुराह अविरतिं पडुच्च बाले आहिजति, विरतिं पडुच पंडिए आहिज्जति, विरयाविरइं पडुच्च बालपंडिए आहिज्जति, तत्थ णं जा सा सबओ अविरती एस ठाणे आरंभट्टाणे अणारिए जाव असवदुक्खप्पहीणमग्गे एगंतमिच्छे असाहू । तत्थ णं जा सा सबतो विरती एस ठाणे अणारंभटाणे (एस ठाणे) आरिए जाव सवदुक्खप्पहीणमग्गे एगंतसम्म साहू। तत्थ णं जा सा सवओ विरयाविरई एस ठाणे अणा आरंभणोआरंभट्टाणे, एस ठाणे आरिए जान सव्वदुक्खप्पहीणमग्गे एगंतसम्म साह ॥ [सू. २४] ॥ ___ व्याख्या-येयमविरतिरसंयमरूपा, सम्यक्त्वाभावानिमथ्यादृष्टे व्यतो विरतिरप्यविरतिरेव, तां 'प्रतीत्य' आश्रित्य बालोऽज्ञः, सदसद्विवेकविकलत्वादित्येवमाधीयते-व्यवस्थाप्यते आख्यायते चा, विरतिं प्रतीत्य पण्डितः, तथा विरताविरति प्रतीत्य चालपण्डित इत्येतत्प्राग्वदायोज्यमिति । 'तत्थ ण' मित्यादि, तत्र पूर्वोक्तेषु स्थानेषु येयं सर्वस्मादविरतिविरतिपरिणामाभावः, तदेतत्स्थानं सावद्यारम्भस्थानं, एतदाश्रित्य सर्वाणि [अ] कार्याणि क्रियन्ते, अत एतदनार्यस्थानं, निश्शङ्कतया यत्किञ्चनकारित्वात् , यावदसर्वदुःखमहीणमाम्र्गोऽयं एकान्तमिथ्यारूपोऽमाधुरिति, तत्र च येयं 'विरतिः' धमाधीयते तत्थ सर्वाणि [ Jोमाधुरिति P Jan Education oininelibrary.org Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये एयगडाङ्ग सत्रं दीपिकान्वितम् । ॥७२॥ | सम्यक्त्वपूर्विका सावद्यारम्भानिवृत्तिः, सा स्थगिताबद्वारत्वात्पापा[ नुपादानरूपेति निवृत्तत्वात् (!) । एतत्स्थानमना- रम्भस्थानं सावद्यानुष्ठानरहितत्वात्संयमस्थानं, तदेतत्स्थानमार्यस्थानं अशेषकर्मक्षयमार्गः, तथैकान्तसम्यग्भूतः, एतदेवाऽहसाधुरिति साधुभूताऽनुष्ठानात् । तत्र चेयं या विरताविरतिरभिधीयते सा मिश्रस्थानभूता, तदेतदारम्मानारम्भस्थानं, एतदपि कथञ्चिदार्यमेव, पारम्पर्येण सर्वदुःखप्रक्षीणमार्गस्तथैकान्तसम्यग्भूतः साधुश्चेति । तदेवमने कविधोऽयमधर्मपक्षो धर्मपक्षो मिश्रपक्षश्चेति संक्षेपेणाभिहितः । मिश्रपक्षोऽप्यनयोरेवान्तर्वर्ती भवतीति दर्शयतिI एवामेव समणुगम्ममाणा+इमेहिं चेव दोहि ठाणेहि समोअरंति, तं जहा-धम्मे चेव अधम्मे | चेव उवसंते चेव अणुवसंते चेव, तत्थ णं जे से पढमास्साठाणस्स अधम्मपक्खस्स विभंगे एवमाहिए, तत्थ गं इमाइं तिन्नि तेवढाइं पावाउयसयाई भवंतीति मक्खा[याइं]यं । तं जहाकिरियावाईणं अकिरियावाईणं अन्नाणियवाईणं वेणईयवाईणं, तेवि [परि]निवाणमाहंसु, तेवि पलिमोक्खमाहंस. ते विलवंति सावगा ते वि लवंति सावइत्तारो ॥ [सू. २५] व्याख्या-'एवमेवे'त्यादि, एवमेव संक्षेपेण 'समनुगम्यमाना' व्याख्यायभाना 'अनयोरेव' धर्माधर्मस्थानयोरनु+ 'समणुगिज्झमाणा' इति पाठान्तरं सम्यगनुगृह्यमाणः' इत्यर्थश्व हर्ष। द्वितीया ध्ययने त्रिषष्टयुतरत्रिशत| प्रावादुकानां मिथ्यावादिता। ।। ७२॥ Jain Education inte Far Private & Personal use Oh W ww.jainelibrary.org Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | पतन्ति, कथं ! यदुपशान्तस्थानं तद्धर्मपक्षस्थान[मनुपशान्तस्थानमधर्मपक्षस्थान]मिति, तत्र च यदधर्मपाक्षिकं प्रथम | स्थानं तत्रामूनि त्रीणि विषष्ठवधिकानि प्रावादुकशतान्यन्तर्भवन्ति, एवमाख्यातं पूर्वाचार्यैरिति । एतानि च सामान्येन दर्शयितुमाह-'तं जहा' इत्यादि, तत्र क्रियावादिनः ज्ञानरहितां क्रियां स्वर्गापवर्गसाधिका वदन्ति, ते क्रियावादिनः | क्रियात एव मोक्षं वदन्तीति भावः। तत्र क्रियावादिनामशीत्युत्तरं शतं, अक्रियावादिनां चतुरशीतिः,अज्ञानिकानां सप्तषष्टिः, वैनायिकानां द्वात्रिंशदिति । एते सर्वेऽपि प्रावादुकाः मोक्षमार्ग कथयन्ति, तेऽपि प्रावादुकाः संसारबन्धनान्मोचनात्मक मोक्षमाहुः । तेऽपि ' तीर्थकाः 'लपन्ति' वदन्ति-मोक्षं प्रति धर्मदेशनां विदधतीति । शृण्वन्तीती श्रावकाः, अहो श्राव का। एवं गृह्णीत यूयं यथाऽहं देशयामीति । तथा तेऽपि धर्मश्रावयितास सन्तः एवं 'लपन्ति' भाषन्ते यथाऽनेनोपायेन स्वर्ग मोक्षावाप्तिरिति, तद्वचनं मिथ्यात्वोपहतबुद्धयोऽवितथमेव गृह्णन्ति, कूटपण्यदायिनां विपर्यस्तमतय इवेति, तथा कथमेते प्रावादुकाः* अहिंसां प्रतिपादयन्ति न च तां प्रधानमोक्षाङ्गभूतां सम्यगनुतिष्ठन्ति । तथा सर्वे प्रावादुकाः मोक्षाङ्गभूतामहिमां अप्राधाम्येन प्रतिपद्यन्ते इति दर्शयितुमाह ते सवे पावाउया आइकरा धम्माणं नाणापन्ना नाणाछंदा नाणासीला नाणादिही नाणारुई नाणारंभा नाणाऽज्झवसाणसंजुत्ता एगं महं मंडलिबंधं किंचा सवे एगओ चिट्रंति । पुरिसे य *"मिध्यावादिनो भवन्तीति १ अत्रोच्यते-यतस्तेऽपि" इति वृदृत्ती। Jain Educationallanal १३ wwwEjainelibrary.org Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत द्वितीयेsध्ययने योशदम एयगडागा सागाणियाणं इंगालाणं पार्ति पुन्नं अओमएणं संडासएणंगहाय ते सवे पावाउए (:प्रावादुकान ) आदिगरे धम्माणं नाणापन्ने ( प्रज्ञान् ) जाव नाणाऽज्झवसाणसंजुत्ते एवं वयासि-हं भो पावाउया ! दीपिका आइगरा धम्माणं नाणापन्ना जाव नाणाऽज्झवसाणसंजुत्ता! इमं ताव तुब्भे सागणियाणं इंगलाणं न्वितम् । पाई बहपडिपुन्नं गहाय महत्तयं महत्तयं पाणिणा धरेह नो बहसंडासगसंसारियं कुजा नो बहु ॥७३॥ अग्गिथंभणियं कुज्जा नो बहुसाहम्मियश्वेयावडियं ( वैयावृत्यं ) कुजा नो बहुपरधम्मियवेयावडियं कुज्जा उज्जुया नियागपडिवन्ना अमायं कुबमाणा पाणिं पसारेह, इति वुच्चा से पुरिसे तेसिं पावा- दुयाणं तं सागणियाणं इंगालाणं पातिं बहुपडिपुन्नं अओमएणं संडासएणं गहाय पाणिंसु निसिरति, तएणं ते पावादुया आदिगरा धम्माणं नाणापन्ना जाव नाणाज्झवसाणसंजुत्ता पाणिं पडिसाहरंति (सङ्कोचयेयुः ), तए णं से पुरिसे ते सत्वे पावा[उए]इयाणं आदिगरे धम्माणं जाव नाणाउझवसाणसंजुत्ते एवं वदासी-हं भो पावादया! आदिगरा धम्माणं (णाणापन्ना) जाव नाणा * साधम्मिकानामग्निदाहोपशमनाऽदिनोपकार कुरुतेति । क्रियास्थान वर्णनम् । 1॥ ७३॥ For P & Personal use only dww.ininelibrary.org Jan Education Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ज्झवसाणसंजुत्ता! कम्हाणं तुम्भे पाणिं पडिसाहरह? पाणी नो डहेज( दह्यति )दडे किं भविस्सइ ? दिक्खं दक्खंति मन्नमाणा पाणिं पडिसाहरह, एस तला एस पमाणे एस समोसरणे. पत्तेयं ।। तुला पत्तेयं पमाणे पत्तेयं समोसरणे, तत्थ णं जे तेसमणा माहणा एवमाइक्खंति जाव परविंतिसवे पाणा जाव सवे सत्ता हंतवा अजावेयवा परिघेत्तवा परितावेयवा किलामेतवा उद्दवेयवा, ते - आगंतु छेयाए ते आगंतु भेयाए जाव ते आगंतु जाइजरामरणजोणिजम्मणसंसारपुणब्भवगम्भवासभवपवंचकलंकलीभागिणो भविस्संति, ते बहूणं दंडणाणं बहणं मुंडणाणं तजणाणं तालणाणं अंदुबंधणाणं जाव घोलणाणं माइमरणाणं पिइमरणाणं भाइमरणाणं भइणीमरणाणं भजामरणाणं पुत्तमरणाणं धूयामरणाणं सुण्हामरणाणं दारिदाणं दोहग्गाणं अप्पियसंवासाणं पियविप्पओगाणं बहणं दुक्खदोम्मणस्साणं आभागिणो भविस्संति, अणादियं च णं अणवदग्गं दीहमद्धं चाउरंत- | संसारकंतारं भुजो भुजो अणुपारियाहस्संति, ते णो सिज्झिस्संति नो बुज्झिस्संति जाव नो सबदुक्खाणमंतं करिस्संति, एस तुला एस पमाणे एस समोसरणे, पत्तेयं तुला पत्तेयं पमाणे पत्तेयं JainEducation internati For Paw Patrol LED hiainelibrary.org Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्र दीपिकान्वितम् । ॥ ७४ ॥ild समोसरणे। तत्थ णं जे ते समणा माहणाएवमाइक्खंति जाव परूविंति-सत्वे पाणा जाव सवे सत्ता द्वितीये न हंतवा जाव न उद्दवेयवा, ते णो आगंतुं छेयाए णो आगंतुं भेयाए जाव जाइजरामरणजोणि- श्रृत० जम्मणसंसारपुणब्भवगब्भवासभवपवंचकलंकलीभागिणो णो भविस्संति। ते णो बहणं दंडणाणं |द्वितीया ध्ययने जाव बहूणं दुक्खदोम्मणस्साणं नो आभागिणो भविस्संति, अणादियं च णं अणवदग्गं दीहमद्धं त्रयोदशमचाउरंतसंसारकंतारं भुजो भुजो नो अणुपरियहिस्सति [ते सिज्झिस्संति] जाव सवदुक्खाणमंतं क्रियास्थान करिस्संति ॥ [ सू. २६ ] वर्णनम् । ___ व्याख्या-ते सव्वे ' इत्यादि, ते सर्वे प्रावादुकास्त्रिषष्टयुत्तरशतत्रयपरिमाणा अप्यादिकराः यथा स्वं धर्माणां, तथा 'नाना' भिन्ना 'प्रज्ञा' ज्ञानं येषां ते नानाप्रज्ञाः, तथा नानाछन्दा-भिन्नाभिप्रायाः, तथा ते नानाऽध्यवसायाः, | ते सर्वेऽपि प्रावादुका यथा स्वं पक्षमाश्रिताः एकत्र प्रदेशे मण्डलिबन्धमाधाय तिष्ठन्ति, तेषां चैवं व्यवस्थितानामेकः कश्चिन्पुरुषस्तेषां प्रतिबोधनार्य ज्वलतामङ्गाराणां प्रतिपूर्णा 'पात्रीं' अयोमयं भाजनं लोहमयेन सन्दंशकेन गृहीत्वा तेषां ढौकितवान् , उवाच च-भोः प्रावादुकाः! इदमङ्गारभृतं भाजनं एकैकं मुहूर्त प्रत्येक विभृत यूयं, न चेदं सन्दंशकं सांसारिक नापि चाग्निस्तम्भनं विधत्त नापि साधम्मिकान्यधार्मिकाणामग्निदाहोपशमादिनोपकारं कुरुतेति 'ऋजवो' मायामकुर्वाणाः J७४॥ Jain Educational For Private & Personal use only S EEnelorey.org Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पाणिं प्रसारयत, तेऽपि च तथैव कुर्युः, ततोऽसौ पुरुषस्तद्भाजनं तत्पाणौ समर्पयति, तेऽपि च दाहशङ्कया हस्तं सङ्कोचयेयुरिति । ततोऽसौ तानुवाच-किमिति पाणिं प्रतिसंहरत ? यूयं, एवममिहितास्ते ऊचुः-दाहभयादिति । एतदुक्तं भवति-अवश्यमग्निदाहभयान कश्चिदग्न्यभिमुखं पाणिं ददातीत्येतत्परोऽयं दृष्टान्तः। [ स नः प्राह-] पाणिना दग्धेनापि किं भवतां भविष्यति ? दुःखमिति चेद्यद्येवं दाहभीरवो यूयं सुखाभिलाषिणश्च, तदेवंसति सर्वेऽपि जन्तवः संसारोदरविवरवर्त्तिन एवम्भूता एवेत्येवमात्मतुलया-ऽऽत्मौपम्येन यथा मम नाभिमतं दुःखमेवं सर्वजन्तूनामित्यवगम्याहिंसैव प्राधान्येनाऽऽश्रयणीया । 'तदेतत्प्रमाणं' सैषा युक्तिः "आत्मवत् सर्व भूतानि, यः पश्यति स पश्यति" तदेतत् समवसरणं-स एव धर्मविचारो यत्राहिंसा सम्पूर्णा, तत्रैव परमार्थतो धर्म इत्येवं व्यवस्थिते तत्र ये केचनाविदितपरमार्थाः श्रमणब्राह्मणादयः 'एवं' वक्ष्य माणमाचक्षते-परेषामेवं भाषन्ते, तथैवं धर्म 'प्रज्ञापयन्ति ' व्यवस्थापयन्ति, तथाऽनेन प्राण्युपतापकारिणा प्रकारेण धर्म प्ररूपयन्ति, तथाहि-सर्वे प्राणा इत्यादि, यावद्धन्तव्या दण्डादिभिः, परितापयितव्याः धर्मार्थमरघडवहनादिभिः, परिग्राह्याः श्राद्धादौ रौहितमत्स्यादय इत्र, तथाऽपद्रावयितव्या देवतायागादिनिमित्तं छागादयः, इत्येवं ये श्रमणादयः प्राणिनामुपतापकारिणी भाषा भाषन्ते ते आगामिनि काले 'अनेकशो' बहुशः स्वशरीरच्छेदाय मेदाय च भाषन्ते, तथा ते सावद्यभाषिणो भविष्यति काले जातिजरामरणानि बहूनि प्राप्नुवन्ति । [ योन्यां जन्म ] योनिजन्म, तदनेकशो गर्भव्युत्क्रान्तजा. वस्थायां प्राप्नुवन्ति, तथा संसारप्रपश्चान्तर्गताः कलङ्कलीभावभाजो भवन्ति बहुमो भविष्यन्ति च, तथा ते बहूनां दण्डादीनां [ शारीराणां ] दुःखानामात्मानं भाजनं कुर्वन्ति, तथा ते मातृमरणादीनां मानसानां दुःखाना तथाऽन्येषामप्रिय. Jain Education a l For Private & Personal Use Ooh wwwEjainelibrary.org Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा सूत्रं दीपिकान्वितम् । द्वितीये श्रुत द्वितीयाध्ययनसमाप्तिः। ॥ ७५॥ सम्प्रयोगार्थनाशादिभिर्दुःखदौर्मनस्यानामामागिनो भविष्यन्ति । तथाऽनाद्यनवदग्रं-अनाद्यनन्तं संसारकान्तारं भूयो. भूयः अनुपरिवर्तिष्यन्ते, अरघट्टघटीन्यायेन तत्रैव भ्रमन्तः स्थास्यन्ति । तथा ते कुप्रावचनिकाः नैव सेत्स्यन्ति, नैव ते सर्वपदार्थान् भोत्स्यन्ते नैव ते संसारान्मोक्ष्यन्ते, तथा परिनिर्वृति:-परिनिर्वाणमानन्दं नैव लप्स्यन्ते । न च ते सर्वः दुःखानामन्तं करिष्यन्ति, एवं स्वयूथ्या अपि सावद्योपदेशतया न सेत्स्यन्ति । एषा तुला एतत्समवसरण-मागमविचार रूपं द्रष्टव्यमिति । तथा ये पुनर्विदिततचा एवं प्ररूपयन्ति-सर्वेऽपि जीवा दुःखद्विषः सुखलिप्सवोऽतो न हन्तव्या इति | भाषन्ते ते पूर्वोक्तं दण्डनादिकं न प्रास्यन्ति, संसारकान्तारमचिरेणैव व्यतिक्रमिष्यन्तीत्यादि सर्व पूर्वोक्तं भणनीयमिति । मणितानि क्रियास्थानानि, अथ पूर्वोक्तमेव संक्षेपेण कथयति इच्चेएहिं बारसहिं किरियाठाणेहिं वहमाणा जीवा नो सिंझिसु जाव नो सबदुक्खाणं अंतं करिंसु वा [ णो ] करिति वा [णो] करिस्संति वा, एयंसि चेव तेरसमे किरियाठाणे वट्टमाणां जीवा सिझिसु बुझिसु मुच्चिंसु परिनिवाइंसु जाव सव्वदुक्खाणं अंतं करिंसु वा करिति वा करिस्संति वा । एवं से भिक्खू आतट्टी (आत्मार्थी) आयहिते आयगुत्ते आयजोगे आयपरकमे आयरक्खिए आयाणुकंपए आयनिप्फेडए आयाणमेव पडिसाहरिज्जासि त्तिबोम [ सू० २७] । बीयसुयक्खंधस्स किरियाठाणं नाम बीयमज्झयणं समत्तं ॥ ॥ ७५॥ Jain Education Ja Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern व्याख्या - इत्येतेषु द्वादशक्रिया स्थानेष्वधर्मपक्षः समवतार्यते, तत् एतेषु वर्त्तमाना जीवा नातीते काले सिद्धा न सिद्ध्यन्ति न सेत्स्यन्ति, तथा न बुबुधुर्न बुद्ध्यन्ते न भोत्स्यन्ते, तथा न मुमुचुर्न मुञ्चन्ति न च मोक्ष्यन्ते, न निर्वृता न निर्वान्ति न च निर्वास्यन्ति, तथा न सर्वदुःखानामन्तं ययुर्न च यान्ति न च यास्यन्ति । साम्प्रतं त्रयोदशं क्रियास्थानं धर्मपक्षाश्रितं दर्शयितुमाह- 'एयंसि ' इत्यादि, एतस्मित्रयोदशे क्रियास्थाने वर्त्तमानाः जीवाः सिद्धाः सिद्धयन्ति सेत्स्यन्ति यावत्सर्वदुःखानामन्तं करिष्यन्तीति स्थितम् । तदेवं स भिक्षुर्यः पुण्डरीकाध्ययनेऽभिहितो द्वादश क्रियास्थानवर्जकः अधर्म्मपक्षानुपशमपरित्यागी धर्मपक्षे स्थित उपशान्तः आत्मा-त्मार्थसाधकः आत्महितः आत्मगुप्तः आत्मयोगी-सदा धर्म ध्याना वस्थितः, तथा पापेभ्यो- दुर्गतिगमनादिभ्यः आत्मा रक्षितो येन स आत्मरक्षी, सावद्यानुष्ठानान्निवृत्त इति भावः । तथाssस्मानमनुकम्पते - शुभानुष्ठानेन सद्गतिगामिनं विधत्ते, तथाऽऽत्मानं [संयमेन] संसारचारकान्निस्सारयति, तथाऽऽत्मानमनर्थभूतेभ्यो द्वादशक्रियास्थानेभ्यः प्रतिसंहरेत् तथाऽऽत्मानं सर्वानर्थेभ्यो निवर्त्तयेदिति । एतच्च महापुरुषे सम्भाव्यते । इतिः परिसमाप्यर्थे, ब्रवीमीति पूर्ववत्, श्रीसुधर्मस्वामी जम्बूस्वामिनमुद्दिश्य भाषते - श्रीवर्द्धमानस्वामीसमीपे मयैतच्छ्रुतं तद्भवतो निवेदितं, न स्वमनीषिकयेति समाप्तं क्रियास्थानाख्यं द्वितीयमध्ययनमिति । यदवापि मया पुण्यं, क्रियास्थानं विवृण्वता । तेन पुण्येन लोकोऽयं, भूयादानन्दमेदुरः ॥ १ ॥ इति श्रीपरमसुविहितखरतरगच्छ विभूषण पाठक प्रवर श्री मत्साधुरङ्गगणिवर कृतायां श्रीमत्सूत्रकृताङ्गदी पिकायां द्वितीयश्रुतस्कन्धे द्वितीयमध्ययनं समाप्तम् ॥ w.jainelibrary.org Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ।। ७६ ।। Jain Education Int आहारपरिज्ञाभिधं तृतीय मध्ययनम् । अथ आहारपरिज्ञाख्यं तृतीयमध्ययनं प्रारभ्यते । तथाहि सुयं मे आउसंते भगवया एवमक्खायं-इह खलु आहारपरिन्नानाम अज्झयणं, तस्स णं अमट्ठे पन्नत्ते, इह खलु पाईणं वा ४ सवतो सवावंति च णं लोगंसि चत्तारि बीयकाया एवमाहिजंति, तं जहा-अग्गबीया मूलबीया पोरबीया खंधबीया, तेसिं चणं अहाबीएणं अहावगासेणं इह एगतिया सत्ता पुढविजोणीया पुढविसंभवा पुढविवुक्कमा य, तज्जोणीया तस्संभवा तदुवक्कमा कम्मोवगा कम्मनियाणेणं तत्थ वुक्कमा णाणाविहजोणियासु पुढवीसु रुक्खत्ताए विउर्हति । ते जीवा तेसिं नाणाविहजोणियाणं पुढवीणं सिणेहमाहारिंति, ते जीवा आहारैति पुढविसरीरं आउसरीरं तेउसरीरं वाउसरीरं वणस्सइसरीरं, नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सरीरं अचित्तं कुव्वंति, परिविद्धत्थं तं सरीरं पुवाहारियं तयाहारियं विपरिणामियं सारूवि [य] कडं संतं, अवरे वियणं तेसिं पुढविजोणियाणं रुक्खाणं सरीरा नाणावण्णा नाणागंधा नाणारसा नाणाफासा नाणासंठाण द्वितीये श्रुत● तृतीया - ध्ययने चतुर्विज काय वर्णनम् । ।।। ७६ ।। Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संठिया नाणाविहसरीरपुग्गलविउविता ते जीवा कम्मोववन्नगा भवंतीति मक्खायं ॥ [सू०१]॥ ___व्याख्या-'सुयं मे' सुधर्मस्वामी जम्बूस्वामिनमुद्दिश्यैतदाह, तद्यथा-श्रुतं मया आयुष्मता भगवतेदमाख्यातं, आहारपरिक्षेदमध्ययनं, तस्य चायमर्थः-प्राच्यादिदिक्षु 'सर्वत' इत्यू धो विदिक्षु च सर्वस्मिल्लोके चत्वारो 'बीजकाया' बीजप्रकाराः-समुत्पत्तिभेदा भवन्ति, तद्यथा-अग्रे चीज-येषां तेऽबीजाः तलतालीसहकारादयः शाल्यादयो वा, यदि वा अग्राण्येवोत्पत्तौ कारणतां प्रतिपद्यन्ते येषां ते कोरण्टादयः। तथा मूलबीजा आर्द्रकादयः, पर्वबीजा इक्ष्वादयः, स्कन्धबीजाः सल्लक्यादयः, तेषां च चतुर्विधानामपि वनस्पतिकायानां यद्यस्य 'बीज'मुत्पत्ति कारणं तद्यथाबीजं, यथा शाश्यङ्करस्य शालिबीज-मुत्पत्तिकारणं, एवमन्यदपि द्रष्टव्यं, 'यथाऽवकाशेने ति यो यस्यावकाश:-यद्यस्योत्पत्तिस्थानं, अथवा भूम्यम्बुकालाकाशबीजसंयोगा यथावकाशे गृह्यन्ते, तदेवं यथाबीजं यथाऽवकाशेन चेहाऽस्मिञ्जगति 'एके' केचन सच्चा ये तथाविधकर्मोदयाद्वनस्पतिपित्सवस्ते हि वनस्पतावुत्पद्यमाना अपि पृथिवीयोनिका भवन्ति, यथा तेषां वनस्पतिविजेकारणं, परमाधार विनोत्पत्तिर्न स्यात् तेन पृथिवीयोनिका इत्युच्यन्ते, यथा सेवालकर्दमानामुत्पत्ती आधारभूतमम्मा, तथा 'पुढविसंभवा' पृथिव्यां वनस्पतिकायसम्भवः, तथा 'पुढविवुकमा' पृथिव्यां व्युत्क्रमो' वृद्धिर्भवति, [एवं च ते ] तद्योनिकास्तत्सम्भवास्तव्युत्क्रमाः, अर्थः पूर्ववत । तथा 'कम्मोवगा'ते हि तथाविधेन वनस्पतिकायसम्भवेन कर्मणा प्रेर्यमाणास्तेष्वेव वनस्पतिधूप-सामीप्येन तस्यामेव पृथिव्यां गच्छन्तीति कर्मोपगा मण्यन्ते, ते हि कर्म Jain Education a l For Privista personal UE O wwwEjainelibrary.org Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा सूत्रं | दीपिकान्वितम् । ॥ ७७॥ द्वितीये श्रुत तृतीयाध्ययने पृथ्वी वशगा वनस्पतिकायादागत्य तेष्वेव पुनरपि वनस्पतित्पद्यन्ते, न चाऽन्यत्रोप्ता अन्यत्र भविष्यन्ति, यतः "कुसुमपुरोते बीजे, मथुरायां नाङ्करः समुद्भवति । यत्रैव तस्य बीजं, तत्रवोत्पद्यते प्रसवः ॥१॥" तथा ते जीवाः कर्मनिदानेन-कारणेन समाकृष्यमाणास्तत्र-पृथिव्यां वनस्पतिकाय वा व्युत्क्रमाः-समागताः सन्तो नानाविधयोनिकासुपृथिवीष्वित्यन्येषामपि षण्णां कायानामुत्पत्तिस्थानभृतासु सचित्ताचित्तमिश्रासु वा श्वेतकृष्णादिवर्ण-तिक्तादिरस-सुरम्यादिगन्ध-मृदुकर्कशादिस्पर्शादिकैर्विकल्पैर्बहुप्रकारासु भूमिषु वृक्षतया विविधं वर्तन्ते, ते च तत्रोत्पन्नास्तासां च पृथिवीनां 'स्नेहं ' स्निग्धभावमाददते, स एव तेषां वनस्पतिजीवानामाहार इति, न च ते पृथिवीशरीरमाहारयन्तः पृथिव्याः पीडामुत्पादयन्ति । एवमकायतेजोवायुवनस्पतीनामप्यायोज्यम् । अत्र च पीडाऽनुत्पादनेऽयं दृष्टान्तः, तद्यथाअण्डोद्भवाद्या जीवा मातुरुप्मणा विवर्द्धमाना गर्भस्था वा उदरगतमाहारमाहारयन्तो नातीव पीडामुत्पादयन्त्येवमसावपि वनस्पतिकायिकः पृथिवीस्नेहमाहारयन्नातीव तस्याः पीडामुत्पादयति उत्पद्यमानः, समुत्पन्नश्च वृद्धिमुपागतोऽसहशवर्णरसाद्युपेतत्वात् बाधां विदध्यादपीति । एवमकायस्य भौमस्यान्तरिक्षस्य वा शरीरमाहारयन्ति । तथा तेजसो भस्मादिकं शरीरं गृहन्ति, एवं वाय्वादेरपि द्रष्टव्यम् । किं बहुक्तेन ? नानाविधानां त्रसस्थावराणां यच्छरीरं तत्ते समुत्पद्यमाना अचित्तमिति-स्वकायेनावष्टभ्य प्रासुकी कुर्वन्ति, यदि वा परिविध्वस्तं पृथिवीकायादिशरीरं किञ्चित्परितापितं कुर्वन्ति, ते च वनस्पतिजीवा एतेषां पृथिवीकायादीनां तच्छरीरं 'पूर्वमाहारित मिति तैरेव पृथिवीकायादिभिरुत्पत्तिसमये आहारितमासीत्-स्वकायत्वेन परिणामितमासीत् , तदधुनापि वनस्पति जीवस्तत्रोत्पद्यमान उत्पन्नो वा 'त्वचा' स्पर्शेन आहारयति, योनिकवृक्षाणामाहारवर्णनम् । I || ७७॥ Jain Education Far Private & Personal use Oh Wilwwwjainelibrary.org Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आहार्य च स्वकायत्वेन विपरिणामयति, विपरिणामितं च तच्छरीरं स्वकायेन [ सह ] स्वरूपतां नीतं सत्तन्मयतां प्रतिपद्यते । अपराग्यपि शरीराणि मूलशाखाप्रतिशाखापत्रपुष्पफलादीनि तेषां पृथिवीयोनिकानां वृक्षाणां नानावर्णानि, तथाहि स्कन्धस्यान्यथाभूतो वर्णो मूलस्य चान्यादृश इति, एवं यावन्नानाविधशरीरपुद्गल विकुर्वितास्ते भवन्तीति, तथाहि-नानारसवीर्यविपाका नानाविधपुद्गलोपचयात्सुरूपकुरूपसस्थानास्तथा दृढाल्पसंहननाः शस्थूलस्कन्धाश्च भवन्त्येवमादिनानाविधस्वरूपाणि शरीराणि विकुर्वन्तीति स्थितम् । ' ते जीवा कम्मोववन्नगा' ते च जीवास्तत्र-वनस्पतिषु तथाविधकर्मणा उपपन्नगास्ते चेदं एकेन्द्रियजातिस्थावरनामवनस्पतियोग्यायुष्कादिकमिति, तत्कर्मोदयेन तत्रोत्पन्ना:-कम्मोत्पन्ना इत्युच्यन्ते, न पुनः कालेश्वरादिना तत्रोत्पाद्यन्ते इत्येवमाख्यातं तीर्थकरादिभिरिति । एवं पृथिवीयोनिका[वृक्षा] उक्ताः, साम्प्रतं तद्योनिकेष्वेव वनस्पतिषु परे समुत्पद्यन्ते इत्येतदर्शयितुमाह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता रुक्खजोणिया रुक्खसंभवा रुक्खवुकमा तजोणिया तस्संभवा तदुवकमा कम्मोवगा कम्मनिदाणेणं तत्थ वुकमा पुढविजोणिएहिं रुक्खेहि रुक्खत्ताए विउदृति, ते जीवा तेसिं पुढविजोणियाणं रुक्खाणं सिणेहमाहाति । ते जीवा आहारेंति पुढविसरीरं आउतेउवाउवणस्सइसरीरं नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सरीरं अचित्तं कुवंति परिविद्धत्थं तं सरीरगं पुवाहारितं तयाहारियं विप्परिणयं सारूविकडं संतं अवरे विय णं तेर्सि For Pas Personale G Jan Education eejainelibrary.org Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् ।। ॥ ७८॥ रुक्खजोणियाणं रुक्खाणं सरीरा नाणावण्णा नाणागंधा नाणारसा नाणाफासा नाणासंठाणसठिया द्वितीये नाणाविहसरीरपोग्गलविउविया ते जीवा कम्मोववन्नगा भवंतीति मक्खायं ॥ [सू०२] श्रुत. ___ व्याख्या-सुधर्मस्वामी शिष्योद्देशेनेदमाह-अथापरं एतदाख्यातं पुरा तीर्थकरेण, तद्यथा-इहास्मिन् जगत्येके केचन तृतीयातथाविधकम्मोदयवर्तिनः 'सचाः' प्राणिनः वृक्षा एव योनिरुत्पत्तिस्थानमाश्रयो येषां ते वृक्षयोनिकाः । इह यत् पृथिवी ध्ययने योनिकेषु वृक्षेष्वभिहितं तदेतेष्वपि वृक्षयोनिकेषु वनस्पतिषु तदुपचयकर्तृ सर्वमायोज्यं, यावदाख्यातमिति । साम्प्रतं वृक्षोपरिवनस्पत्यवयवानधिकृत्याह जातअहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता रुक्खजोणिया रुक्खसंभवा रुक्खवुकमा य तज्जोणिया वृक्षाणातस्संभवा तदुवकमा कम्मोवगा कम्मनियाणेणं तत्थ बुकमा रुक्खा रुक्खजोणिएसु रुक्खत्ताए माहारादिविउद्घति, ते जीवा तेसिं रुक्खजोणियाणं रुक्खाणं सिणेहमाहरोत, ते जीवा आहारिंति पुढविसरीरं वर्णनम् । आउतेउवाउवणस्सइसरीरं [नाणाविहाणं ] तसथावराणं पाणाणं सरीरं अचित्तं कुवंति, परिविद्धत्थं तं सरीरगं पुवाहारियं तयाहारियं विपरिणयं सारूविकडं संतं अवरे वि य णं तेसिं रुक्खजोणियाणं रुक्खाणं सरीरा णाणावण्णा जाव ते जीवा कम्मोववन्नगा भवंतीति मक्खायं ॥[सूत्रं ३] IN॥ ७८॥ For Privatespersonal use Only Jan Education in Paw.jainelibrary.org Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्याख्या-अथापरमेतदाख्यातं, तदर्शयति-इहास्मिञ्जगत्येके, न सर्वे, तथाविधकम्मोदयवर्तिनो वृक्षयोनिकाः सत्वा भवन्ति तदवयवाश्रिताश्चापरे बनस्पतिरूपा एव प्राणिनो भवन्ति, तथाहि-यो टेको वनस्पतिजीव: सर्वपक्षावयव. व्यापी भवति, तस्य चापरे तदवयवेषु मूलकन्दस्कन्धत्वशाखाप्रवालपुष्पपत्रफलबीजभूतेषु दशसु स्थानेषु जीवाः समु. त्पद्यन्ते । ते च तत्रोत्पद्यमाना वृक्षयोनिकाः वृक्षोद्भवाः वृक्षव्युत्क्रमाचो च्यन्ते त्पद्यन्ते (१) इति, शेषं पूर्ववत् । इह च प्राक्चतुर्विधार्थप्रतिपादकानि सूत्राण्यभिहितानि, तद्यथा-वनस्पतयः पृथिव्याश्रिताः भवन्तीत्येकं १, तच्छरीरमकायादि. शरीरं वाऽऽहारयन्तीति द्वितीयं २, तथा विवृद्धास्तदादारितं शरीरमचित्तं विद्धस्तं च कृत्वाऽऽत्मसात्कुर्वन्तीति तृतीयं ३, अन्यान्यपि तेषां पृथिवीकाययोनिकानां वनस्पतीनां शरीराणि मूलकन्दस्कन्धादीनि नानावर्णानि भवन्तीति चतुर्थ ४, एवमत्रापि वनस्पतियोनिकानां वनस्पतीनामेवंविधार्थप्रतिपादकानि चतुष्प्रकाराणि सूत्राणि द्रष्टव्यानि यावत्ते जीवा वनस्पत्यवयवमूलकन्दादिरूपाः कर्मोपपनमा भवन्तीत्येवमाख्यातम् ॥ अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता रुक्खजोणिया रुक्खसंभवा रुक्खवुकमा तज्जोणिया तस्संभवा तदुवकमा कम्मोवगा कम्मनिदाणेणं तत्थ बुक्कमा रुक्खजोणिएसु रुक्खेसु मूलत्ताए कंदत्ताए खंधत्ताए तयत्ताए सालत्ताए पवालत्ताए पत्तत्ताए पुप्फत्ताए फलत्ताए बीयत्ताए विउदृति, ते जीवा तेसिं रुक्खजोणियाणं रुक्खाणं सिणेहमाहारिति, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं आउ Jan Education a l Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायगडाङ्ग द्वितीये पत्रं तृतीया दीपिकान्वितस् । ॥७९॥ तेउवाउवणस्सइसरीरं नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सरीरं अचित्तं कुवंति परिविद्धत्थं तं सरीरं जाव सारूविकडं संतं, अवरे वि य णं तेसिं रुक्खजोणियाणं मूलाणं कंदाणं खंधाणं तयाणं सालाणंपवालाणं जाव बीयाणं सरीरा णाणावण्णा नाणागंधा जाव नाणाविहसरीरपोग्गलविउविता ते जीवा कम्मोववन्नगा भवंतीति मक्खायं ॥ [ सूत्रं ४ ] ____ व्याख्या-अयमालापकोऽव्याख्यात एव प्राग्वर्तते, अत्र तु लिखितोऽस्ति मया, (पर) सम्यग्नाऽवगतोऽस्ति, तेन विद्वद्भिः सम्यग् विचार्य वाचनीया+ । साम्प्रतं वृक्षोपर्युपपन्नान वृक्षानाश्रित्याह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता रुक्खजोणिया रुक्खसंभवा रुक्खवुकमा तज्जोणिया तस्संभवा तदुवकमा कम्मोव[वन्नगा कम्मनिदाणेणं तत्थ वुकमा रुक्खजोणिएहिं रुक्खहिं अज्झारुहत्ताए विउति, ते जीवा तेसिं रुक्खजोणियाणं अज्झारुहा[ रुक्खा ]णं सिणेहमाहारिंति, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव सारूविकडं संतं, अवरे विय णं तेसिं रुक्खजोणियाणं + " अथापरमेतदाख्यातं-इहैके सत्त्वा वृक्षयोनिकाः स्युः, तस्यैकस्य वनस्पत्ते लारम्भकस्य उपचयकारिणस्ते वृक्षयोनिका उच्यन्ते, यदि वा मूलस्कन्धाविकाः पूर्वोकदशस्थानवर्जिनस्ते एवमुच्यन्ते । अत्रापि सूत्रचतुष्टयं प्राग्वत् ।" इति हर्ष । ध्यरने पृक्षोपरिजातवृक्षाणामाहारवर्णनम्। ॥७९ Jain Education in Far Private & Personal use Oh wिw.jainelibrary.org Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internati अज्झारुहाणं सरीरा नाणावण्णा जावसक्खायं ॥ [ सूत्रं ५] व्याख्या - अथापरमेतत्पुराऽऽख्यातं यद्वक्ष्यमाणमिहैके सत्रा वृक्षयोनिका भवन्ति, तत्र ये ते पृथिवीयोनिका वृक्षास्तेष्वेव प्रतिप्रदेशतया ये अपरे समुत्पद्यन्ते, तस्यैकस्य वनस्पतेर्मूलारम्भकस्योपचयकारिणस्ते वृक्षयोनिका इत्यभिधीयन्ते, तेषु च वृक्षयोनिकेषु वृक्षेषु कम्र्मोपादाननिष्पादितेषु उपर्युपरि अध्यारोहन्तीत्यध्यारुहा-वृक्षोपरि जाता वृक्षा इत्यभिधीयन्ते । ते च वल्ली वृक्षाभिधानाः कामवृक्षाभिधाना वा द्रष्टव्यास्तद्भावे चापरे वनस्पतिकायाः समुत्पद्यन्ते वृक्षयोनिकेषु वनस्पतिष्विति, इदं प्रथमं सूत्रं । इहापि प्राग्वचत्वारि सूत्राणि द्रष्टव्यानि तद्यथा-वृक्षयोनिकेषु वृक्षेष्वपरेऽध्यारुहाः समुत्पद्यन्ते, ते च तत्रोत्पन्नाः स्वयोनिभूतं वनस्पतिशरीरमाहारयन्ति तथा पृथिव्यप्तेजोवाय्वादीनां शरीरकमाहारयन्ति, तच्छरीरमाहारितं सदचित्तं विद्धस्तं विपरिणामितमात्मसात्कृतं स्वकायावयवतया व्यवस्थापयन्ति, अपराणि च तेषामध्यारुहाणां नानाविधरूपरसगन्धस्पर्शोपेतानि नानासँस्थानानि शरीराणि भवन्ति, ते जीवास्तत्र स्वकृतकम्मोपपन्ना भवन्त्येतदाख्यातमिति प्रथमं सूत्रम् १ ॥ अहावरं पुरखायं इद्देगतिया सत्ता अज्झारुहजोणिया अज्झारुहसंभवा जाव कम्मनिदाणेणं तत्थ वुक्कमा रुक्खजोणिएसु अज्झारुहेसु अज्झारुहत्ताए विउद्वंति, ते जीवा तेसिं अज्झारुह[ रुक्ख ] जोणियाणं अज्झारुहाणं सिणेहमाद्दारिंति, ते जीवा [ आहारित ]पुढविसरीरं जाव jainelibrary.org Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाज दीपिकान्वितम् । ॥८ ॥ सारूविकडं संतं, अवरे वि य णं तेसिं अज्झारुहजोणियाणं अज्झारुहाणं सरीरा नाणावपणा जाव- द्वितीये मक्खायं ॥ [ सूत्रं ६] श्रुत. तृतीयाव्याख्या-अथापरं पुराऽऽख्यातं ये ते प्राग वृक्षयोनिकेषु वृक्षेषु अध्यारुहाः प्रतिपादितास्तेष्वेवापरे प्रतिप्रदेशोप ध्ययने चयकारोऽध्यारुहवनस्पतित्वेनोपपद्यन्ते, ते च जीवा अध्यारुहप्रदेशेषूत्पन्ना अध्यारुहजीवास्तेषां स्वयोनिभूतानि शरीरा वृक्षोपरि ण्याहारयन्ति, तत्रापराण्यपि पृथिव्यादीनि शरीराण्याहारयन्ति, अपराणि चाध्यारुहसम्भवानामध्यारुहजीवानां नाना | जातवेवर्णकादीनि शरीराणि भवन्त्येवमाख्यातमिति द्वितीयं सूत्रम् २ ॥ वप्युत्पन__अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता अज्झारुहजोणिया अज्झारुहसंभवा जाव कम्म वृक्षाणानिदाणेणं तत्थ वुक्कमा अज्झारुह( रुक्ख )जोणिएसु ( अज्झारुहेसु) अज्झारुहत्ताए विउदृति, माहारते जीवा तेसिं अज्झारुहजोणियाणं अज्झारुहाणं सिणेहमाहारित, ते जीवा आहारिंति पुढविसरीरं । | वर्णनम् । आउ[ सरीरं ] जाव सारूविकडं संतं, अवरे वि य णं तेर्सि अज्झारुहजोणियाणं अज्झारुहाणं सरीरा नाणावन्ना जावमक्खायं ॥ [ सू०७] व्याख्या-अथापरं पुराऽऽख्यातमिह के सच्चा अध्यारुहसम्मवेष्वध्यारुहेष्वध्यारुहत्वेनोत्पद्यन्ते, ये चैवमुत्पद्यन्ते तेऽध्या Incom For Private & Personal Use Oy w Jan Education inerary.org Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ VI सहयोनिकानामध्यारुहाणां यानि शरीराणि तान्याहारयन्ति । द्वितीयसूत्रे वृक्षयोनिकानामध्यारुहाणां यानि शरीराणि तानि | अपरेऽध्यारुहजीवा आहारयन्ति, तृतीये त्वध्यारुहयोनिकानामध्यारुहजीवानां शरीराणि द्रष्टव्यानीति विशेषः । इदं तु चतुर्थकं, तद्यथा___अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता अज्झारुहजोणिया अज्झारुहसंभवा जाव कम्मनिदाणेणं तत्थ वुकमा अज्झारुहजोणिएसु अज्झारुहेसु(अज्झारुहत्ताए )मूलत्ताए जाव बीयत्ताए विउदृति, ते जीवा तेसिं अज्झारुहजोणियाणं अज्झारहाणं सिणेहमाहारिति(ते जीवा आहारित पुढवीसरीरं आउ०) जाव( सारूविकडं संतं, अवरे वि य णं तेसिं अज्झारुहजोणियाणं (अज्झारुहाणं) मुलाणं जाव बीयाणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं ॥ [ सू०८] ___ व्याख्या-अथापरमिदमाख्यातं, तद्यथा-दहै के सत्वा अध्यारुहयोनि केवध्यारुहेषु मूलकन्दस्कन्धत्वशाखाप्रवालपत्रपुष्पफलबीजभावेनोत्पद्यन्ते, ते तथाविधकम्मोपगा भवन्तीत्येतदाख्यातमिति । शेषं पूर्ववदिति । साम्प्रत पक्षव्यतिरिक्त शेषवनस्पतिकायमाश्रित्याह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता पुढविजोणिया पुढविसंभवा जाव नाणाविहासु जोणिया Jain Education india Far Private & Personal use Oh T Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग पत्र दीपिकान्वितम् । ॥८॥ सु पुढवीसु तणत्ताए विउदृति, ते जीवा तेसिं नाणाविहजोणियाणं पुढवीणं सिणेहमाहारिति जाव ते जीवा कम्मोववन्ना भवंतीति मक्खायं १ [ सू० ९ ] एवं पुढविजोणिएसु तणेसु तणत्ताए विउद्वंति, जाव मक्खातं २ [ सू० १० ] एवं तणजोणिएसु तणेसु तणत्ताए विउहृति, तणजोणियं तणसरीरं च आहारिति जावमक्खायं ३ । एवं तणजोणिएसु तणेसु मूलत्ताए जाव बीयत्ताए विउहृति ते जीवा जाव[एव]मक्खायं ४।। व्याख्या-अथापरमिदमाख्यातं यदुत्तरत्र वक्ष्यते, तद्यथा-इहैके सत्वाः [पृथिवीयोनिकाः] पृथिवीसम्भवाः [पृथिवी-] व्युत्क्रमा इत्यादयो यथा वृक्षेषु चत्वार्या[चत्वार आ]लापका एवं तृणान्यायाश्रित्य द्रष्टव्यास्ते चामी-नानाविधासु पृथिवी. योनिषु तृणत्वेनोत्पद्यन्ते पृथिवी शरीरं चाहारयन्ति १ । द्वितीयं तु पृथिवीयोनिकेषु तृणेपूत्पद्यन्ते तृणशरीरं चाहारयन्ति २। तृतीयं तु दृणयोनिकेषु तृणेषत्पद्यन्ते तृण [योनिकं] तृणशरीरं चाहारयन्ति ३ । चतुर्थ तृणयोनिकेषु तणावयवेषु मूलादिषु | दशप्रकारेपूत्पद्यन्ते तृणशरीरं चाहारयन्तीत्येवं पावदाख्यातमिति ४ । [ एवं ] ओसहीणं चत्तारि आलावगा, एवं हरियाण वि चत्तारि आलावगा [ सू० ११] व्याख्या-एवमौषध्यायाचत्वार आलापका भणनीया, नवरं-औषधीग्रहणं कर्चव्यं, एवं हरिताश्रयाश्चत्वार: द्वितीये श्रुत | तृतीया। योनिकादि| णानामाहारादिवर्णनम् । ध्यपनेपृथ्वी ॥८१॥ Jain Education in Livw.jainelibrary.org Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आलापका वाच्याः । कहणेषु त्क्षेक एव आलापको द्रष्टव्यः, स चायं अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता पुढविजोणिया पुढविसंभवा जाव कम्मनिदाणेणं तत्थ बुकमा णाणाबिहजोणियासु पुढवीसु आयत्ताए वायत्ताए कायत्ताए हणत्ताए, कंदु[क]त्ताए उबेहलि[णि]यत्ताए निबेहलि[णि]यत्ताए सच्छत्ताए छत्तगत्ताए वासाणियत्ताए कूरत्ताए विउहृति, ते जीवा तेसिं नाणाविहजोणियाणं पुढवीणं सिणेहमाहारेंति, ते जीवा आहारिति पुढवी सरीरं जाव संतं. अवरे विय णं तेसिं पुढविजोणियाणं आयत्ताणं जाव कराणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं । इक्को चेव आलावगो, सेसा तिन्नि नस्थि । व्याख्या--कुहणेष्वेक एवालापको ज्ञेयः, शेषानयो न सन्ति, तद्योनिकानामपरेषामभावादिति । इह चामी वनस्पतिविशेषा लोकव्यवहारतोऽवगन्तव्याः प्रज्ञापनातो वा अवखेया इति । सम्प्रतमकाययोनिकस्य वनस्पते: स्वरूपं दर्शयितुमाह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता उद्गजोणिया उद्गसंभवा जाव कम्मनियाणेणं तत्थ बुझमा णाणाविहजोणिएसु उदगेसु रुखचाए विउद्वंति, ते जीवा तेसिं नाणाविहजोणियाणं उदगाणं सिणेहमाहारिति, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरंजावसंतं, अवरे विय गं तेसिं उदग Jan Eda For Private Personal use analbrary.org Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत. सूयगडाङ्ग सूत्रं । दीपिकान्वितम् ।। तृतीयाध्ययने ॥८२॥ N जोणियाणं रुक्खाणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं। जहा पुढविजोणियाणं रुक्खाणं चत्तारि गमा अज्झारुहाण वि तहेव तणाणं ओसहीणं [ हरियाणं ]चत्तारि आलावगा भाणियवा इक्केके । व्याख्या-अथानन्तरमेतद्वक्ष्यमाणमाख्यातं, तद्यथा-इहैके सचास्तथाविधकम्मोदयादुदकयोनिका उदकसम्भवा यावत्कर्मनिदानेन सन्दानितास्तदुपक्रमा भवन्ति, ते च तत्कर्मवंशगानानाविधयोनिकेदकेषु वृक्षत्वेन [पनकवलादित्वेन) 'व्युत्क्रामन्ति' उत्पद्यन्ते । ये च जीवा उदकयोनिका वृक्षत्वेनोत्पन्नास्ते तच्छरीर-मुदकशरीरमाहारयन्ति, न केवलं तदेव, अन्यदपि पृथिवीकायादिकं शरीरमाहारयन्तीति । शेषं पूर्ववनेयम् । यथा पृथिवीयोनिकानां वृक्षाणां चत्वार आलापका एवमुदकयोनिकानामपि वृक्षाणां भवन्तीत्येवं द्रष्टव्यं, तदुत्पन्नानामपर*स्य प्रागुक्तस्यकविकल्पाभावादिति । किं तर्हि १ एक एवालापको भवति,[ए] तेषां हि उदकाकृतीनां वनस्पति कायानां तथा अवकपनकशैवलादीनामपरस्य प्रागुक्तस्य विकल्पस्थामावादिति, एते चोदकाश्रया वनस्पनिविशेषाः कलम्बुकाइडाइयो लोकव्यवहारतोऽवसेया इति । अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता उदगजोणिया उदगसंभवा जाव कम्मनियाणेणं तत्थ वुकमा नाणाविहजोणिएसु उदएसु उदगत्ताए अवगत्ताए पणगचाए सेवालत्ताए कलंबुगत्ताए हडताए कसेरुगत्ताए कच्छभाणियत्ताए उप्पलत्ताए पउमत्ताए कुमुयत्ताए नलिणत्ताए सुभगताए * एतचिन्हान्तर्गतः पाठो लेखकदोषजः सम्भाव्यते, वृत्तिष्वनुपलम्भात् । योनिकादिवृक्षाणामाहारादिस्वरूपम् । ॥८ ॥ Tww.ininelibrary.org Jain Education in Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सोगंधियत्ताए पॉडरीयमहापोंडयित्ताए सयपत्तत्ताए सहसपत्तत्ताए, एवं कल्हारकोंकणत्ताए अरविंदत्ताए तामरसत्ताए भिसभिसमुणालपुक्खलत्ताए पुक्खलच्छिभगत्ताए विउहृति, ते जीवा तेसिं नाणाविहजोणियाणं उदगाणं सिणेहमाहारिति, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं उदगजोणियाणं उदगाणं जाव पुक्खलच्छिभगाणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं। एको चेव आलावगो ३। [ सू० १२] ___ व्याख्या-अथापरमन्यत् स्थानकं तीर्थकरैराख्यातं, तद्यथा-' इह' जगति एके जीवा उदकयोनिका नानायोनि(का)के (१) अवकपनकसेवालाः यावन्मृणालपुक्खलान्ता उत्पद्यन्ते, ते जीवा नानाविधयोनिकोदकस्नेहमाहारयन्ति इत्यादि पूर्ववत् । अस्यायमेक एव आलापको ज्ञेयः। ___ अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता तेसिं चेव पुढविजोणिएहिं रुक्खेहिं रुक्खजोणिएहिं xतणेहि, तणजोणिएहिंx मुलेहिं जाव बीएहिं+ (रुक्खजोणिएहिं अज्झारुहेहिं, अज्झारुहजोणिएहिं x एतचिन्हान्तर्वर्तिपाठस्थाने 'रुक्खेहिं रुक्ख जोणिएहिं ' इत्येवंविधः पाठोऽस्ति सवृत्तिकमुद्रितप्रतिषु । + ( ) नास्त्येतचिन्हान्तर्गतः पाठः पुण्यपत्तनीयदीपिकापतिषु । Jan Education a l Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये एवं दीपिकावितम् । तृतीया उववने ॥८ ॥ जाव बीएहिं, पुढविजोणिपहिं तणेहि सणजोणिएहिं मूलेहिं जाव वीएहिं, एवं [ओसहीहिं ] सपत्य वितिन्नि आलावगा, एवं हरिएहिं) वितिन्नि आलावगा, पुढविजोणिएहिं विआएहिं काएहि जाद छुरूए[ कूरे]हिं उदगजोणिएहिं रुक्षेहिं * रुश्खजोणिएहिं मूलेहिं जाव बीएहि, एवं अज्झारुहेहि वितिलि तणेहिं वि तिन्नि आलावगा, ओसहीहिं वि तिनि हरिएहिं वितिन्नि उदगजोणिएहि उदगएहिं अभएहिं जाव पुक्खलच्छिभएहिं तसपाणत्ताए दिउद्घति । ते जीवा तेसिं पुढविजोणियाणं उदगजोणियाणं रुखजोणियाणं अज्झारुहजोणियाणं तणजोणियाणं ओसहिजोणियाणं हरियजोणियाणं रुक्खाणं अज्झारहाणं तणाणं ओसहीणं हरियाणं मूलाणं जाव धीयाणं आयाणं कायाणं जाव कुरवा कूरा]णं उदगाणं अवगाणं जाव पुक्खलच्छिभगाणं लिणेडमाहारिति । ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं रुकजोणियाणं अज्झारुहजोणियाणं सणजोणियाणं ओसहिजोणियाणं हरियजोणियाणं मूलजोणियाणं कंद अत्रैतचिन्हस्थानेषु " अब्बारूहेहिं अज्झारुहजोणिएहि मूलेहिं" क्या "तणजोणिएहि तणेहि " तथा " उक्त जोणिएहि रक्खेहिं" इतिरूपेण पाठाधिक्यमस्ति सवृत्तिकमुद्रितप्रतिषु । वनस्पतिकाविकजीवानामाहारवर्णनम् । Jan Educational For Pre & Personal Use Only www.jaineltray.org Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internati जोणियाणं जाव घीयजोणियाणं आयजोणियाणं कायजोणियाणं [ जाव कूरजोणियाणं ] उदगजोणियाणं अवगजोणियाणं जाव पुक्खलच्छिभगजोणियाणं तसपाणाणं सरीरा नाणावण्णा जामवखायं १ ॥ [ सू० १३ ] व्याख्या - ते वनस्पतावुत्पन्ना जीवाः पृथिवीयोनिकानां तथोदकानां वृक्षाध्यारुहतृणौषधिहरित योनिकानां वृक्षाणां यावत्स्नेहमाहारयन्तीत्येतदाख्यातमिति, तथा त्रसानां प्राणिनां शरीरमाहारयन्तीत्येतदवसाने द्रष्टव्यमिति । तदेवं वनस्पतिकायिकानां सुप्रतिपाद्यचैतन्यानां स्वरूपमभिहितं शेषाः पृथिवीकायादयश्चत्वार एकेन्द्रिया उत्तरत्र प्रतिपादयिष्यन्ते, साम्प्रतं त्रसकायिकस्यावसरः, स च नाश्कतिर्यङ्मनुष्य देव मेदभिन्नः, तत्र नारका अप्रत्यक्षत्वेनानुमानग्राह्याः, [तथाहि - ] दुष्कृतकर्मफलजः केचन सन्तीत्येवं ते ग्राह्माः, तदाहारोऽप्येकान्तेनाशुमपुद्गल निर्वर्तित ओजसा, न प्रक्षपेणेति, देवा अध्यधुना बाहुल्येन अनुमानगम्या ए [व] तेषामप्याहारः शुभ एकान्तेनौ जो निर्वर्त्तिदो, न प्रक्षेपकृत इति । स चाभोगनिवर्तितोऽना[भोगत, तत्राना ] भोगकृतः प्रतिसमयभात्री आभोगकृतश्च जघन्येन चतुर्थभक्तकृत उत्कृष्टवस्तु त्रयस्त्रिंशद्वर्षसहस्र निष्पादित इति शेषास्तु विर्य मनुष्यास्तेषां च मध्ये मनुष्याणामभ्यर्हितत्वाचानेव प्राक् प्रदर्शयितुमाह अहावरं पुरखायं नाणाविहाणं मणुस्साणं, तं जहा - कम्मभूमिगाणं अकम्मभूमिगाणं अंतरदीवगाणं आरियाणं मिलक्खुगाणं, तेसिं चणं अहाबीएणं अहावगासेणं इत्थी पुरिसस्सय कम्म jainelibrary.org Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धूयगडा द्वितीये श्रुत दीपिका- न्वितम्। नरवक्ष्यमाणनीसुद्धमतदभव मनाया यस्यावकाशन विवस्त बनिवास्ता कडाए जोणिए एत्थणं मेहुणवत्तिए नाम संजोगे समुपजति, ते दुहओ विसिणेहं संचिति । _व्याख्या-अथानन्तरमेत'त्पुरा पूर्वमाख्यातं, तद्यथा-आर्याणामनार्याणां च कर्मभूमिजाकर्मभूमिजादीनां मनुष्याणां नानाविधयोनिकानां स्वरूपं वक्ष्यमाणनीत्या समाख्यातं, तेषां च स्त्रीनपुंपकमेदभिनानां 'यथाबीजेनेति यद्यस्य बीजं, तत्र स्त्रियाः सवन्धि शोणितं पुरुषस्य शुक्रमेतदुभयमप्यविद्धस्तं, शुक्राधिकं सन्मनुष्यस्य शोणिताधिकं स्त्रियास्तत्समता नपुंसकस्य कारणता प्रतिपद्यते, तथा 'यथावकाशेनेति यो यस्यावकाशो मातुरुदरकुक्ष्यादिकः, तत्रापि किल वामा स्त्रियो दक्षिणा कुक्षिः पुरुषस्योभयाऽऽश्रितः षण्ढ इति । तत्र चाविद्धस्ता योनिरविद्धस्तं+ बीजमिति चत्वारो भङ्गकाः, तत्राप्याद्य एव भङ्गक उत्पत्तेरवकाशो, न शेषेषु त्रिध्विति । अत्र च स्त्रीपुंसयोवेंदोदये सति पूर्वकर्मनिवर्तितायां योनौ 'मैथुनप्रत्ययिको' रताभिलाषोदयजनितोऽग्निकारणयोररणिकाष्ठयोरिव संयोगः समुत्पद्यते, तत्संयोगे च तच्छुक्रशोणिते समुपादाय तत्रोत्पित्सवो जन्तवस्तैजसकार्मणाभ्यां शरीराभ्यां कम्मरज्जुसन्दानितास्तत्रोत्पद्यन्ते । ते च प्रथममुभयोरपि स्नेहमाचिन्वन्त्यविवस्तायां योनौ सत्यामिति, विद्धस्यते तु योनिः “पञ्चपञ्चशिका नारी, सप्तसप्ततिकः पुमानि"ति, तथा द्वादश मुहूर्तानि यावच्छुक्रशोणिते अविग्रस्तयोनिके भवतस्तत ऊर्दू ध्वंसमुपगच्छत इति । तत्थ णं जीवा इत्थित्ताए पुरिसत्ताए नपुंसगत्ताए विउद्देति । + “बीजं १, अविध्वस्ता योनिर्विध्वस्त बीजं २, विश्वस्ता योनिरविध्वस्त बीजं ३, विध्वस्ता योनिर्विध्वस्त ।" इति हर्ष। तृतीयाध्ययनेमनुष्यो त्पत्तिवर्णनम् । ॥८४॥ N ८४॥ Jain Education intent all Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education _व्याख्या - तत्र च जीवा उभयोरपि स्नेहमा [हार्य आ]दाय स्वकर्मविपाकेन यथास्त्रं स्त्रीपुंनपुंसकभावेन 'विउति 'त्ति विवर्त्तन्ते समुत्पद्यन्ते । ते जीवा माउए उयं पिउयं सुक्कं तं तदुभयसंसटुं कलसं किविसं तप्पढमयाए आहारमाहरिंति । ततो पच्छा जं से माता नाणाविहाओ रसवईओ आहारमाहरेति ततो एगदेसेणं ओयमाहारित, आणुपुत्रेणं वुड्डा पलिवागमणुप्पवन्ना ततो कायातो अभिनिवट्टमाणा इस्थि वेगया जयंति पुरिसं वेगया जणयंति णपुंसगं वेगया जणयंति । ते जीवा डहरा समाणा माउए खीरं सपि च आहािित आणुपुवेणं वुड्डा ओयणं कुम्मासं तसथावरे य पाणे, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव सारूविकडं संतं, अवरे वि य णं तेसिं णाणाविहाणं मणुस्साणं कम्म भूमिगाणं अकस्मभूमिगाणं अंतरदीवगाणं आरियाणं मिलक्खूणं सरीरा नाणावण्णा भवतीति मक्खायं ॥ [सू०१४] व्याख्या - ततस्ते जीवास्तत्रोत्पन्नाः सन्तो मातुराहारमोजसा मिश्रेण वा लोमभिर्वाऽऽनुपूर्व्येणाहारयन्ति 'यथाक्रमं ' आनुपूर्येण वृद्धिमुपगताः सन्तो 'गर्भपरिपार्क' गर्मनिष्पत्तिमनुप्रपन्नास्ततो मातुः कायादभिनिवर्त्तमानाः- पृथग्भवन्तस्तधोर्निर्गच्छन्ति, ते च तथाविधकर्मोदयादात्मनः स्त्रीभावमध्येकदा जनयन्ति अपरे केचन पुम्भावं नपुंसकमावं च इदमुक्तं १५ Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाज सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ८५ ॥ Jain Education Int भवति - स्त्रीपुंनपुंसकभावः प्राणिनां स्वकृतकर्मनिर्वर्त्तितो भवति, न पुनर्यो यादृगिद्दभवे सोऽमुष्मन्नपि तादृगेवेति ते च तदद्दर्जात बालकाः सन्तः पूर्वभवाभ्यासादाहाराभिलाषिणो मातुः स्वनस्वन्यमाहारयन्ति [ तद्] आहारेण च वृद्धिमुपगतास्तदुत्तरकालं नवनीतदध्योदनादिकं यावत्कुल्माषान् भुञ्जते, तथाऽऽहारत्वेनोपगताँत्रसास्थावथि प्राणिनस्ते जीवा आहारयन्ति, तथा नानाविधपृथिवीशरीरं लवणादिकं सचेतनमचेतनं वा आहारयन्ति, तच्चान्दारितमात्मसात्कृतं सद् " रसामांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातव " इति सप्तधा व्यवस्थापयन्ति, अपराण्यपि तेषां नानाविधमनुष्याणां [ नानावर्णा ] शरीराण्याविर्भवन्ति, ते च तद्योनिकत्वात्तदाधारभूतानि नानावर्णानि शरीराण्याहारयन्तीत्येवमाख्यातमिति । एवं तावद्गर्भव्युकान्तज मनुष्याः प्रतिपादितास्तदनन्तरं सम्मूर्छनजानामवसरः, ताँश्चोत्तस्त्र प्रतिपादयिष्यामि । साम्प्रतं तिर्यग्यो निकास्तत्रापि जलचरानुद्दिश्याऽऽह अहावरं पुरखायं णाणाविहाणं जलचराणं पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं, तं जहा-मच्छाणं जाव सुंसुमाराणं तेसिं च णं अहावीएणं अहावगासेणं इत्थीए पुरिसस्स य कम्मकडाए जोणीए तव, जाव ततो एगदेसेणं ओयमाहारिंति आणुपुत्रेणं वुड्डा पलिपागमणुपपन्ना ततो कायातो अभिनव माणा, अंडं वेगया जणयंति पोयं ए[वे ]गया जणयंति, से अंडे उब्भमाणे इथि वेगया जणयंति पुरिसं वेगया जणयंति नपुंसगं वेगया जणयंति । ते जीवा डहरा समाणा 1 द्वितीये श्रुत• तृतीया ध्ययने जलचर पञ्चेन्द्रि याणा माहारादि |वर्णनम् । ॥ ८५ ॥ Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | आउसिणेहमाहारिति आणुपुवेणं वुड्डा वणस्सइकायं तसथावरे य पाणे, ते जीवा आहारैति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वियणं तेर्सि नाणाविहाणं जलचरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं मच्छाणं सुसुमाराणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं । व्याख्या-अथाऽनन्तरमेतद्वक्ष्यमाणं पूर्वमाख्यातं, तद्यथा-नानाविधजलचरपश्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकानां सम्बन्धिनः कौश्चित् स्वनामग्राहमाह-" मच्छाणं जाव सुंसुमाराणं " तेषां मत्स्यि]च्छकच्छपादीनां यस्य यथा यद्वीजं तेन तथा 'यथावकाशेन' यो यस्योदरादाववकाशस्तेन, स्त्रिया: पुरुषस्य च स्त्रकर्मनिवर्चितायां योनावुत्पद्यन्ते, ते च तत्राभिव्यक्ता मातुराहारेण वृद्धिमुपगताः स्त्रीपुंनपुंसकानामन्यतमत्वेनोत्पद्यन्ते, ते च जीवा जलचरा गर्भाव्युत्क्रान्ताः सन्तस्तदनन्तरं यावद् डहर 'त्ति लघवस्तावदपाँस्नेहमप्कायमेवाऽहारयन्ति, आनुपूर्येण च वृद्धाः सन्तो वनस्पतिकायं त्रसान् स्थावराथाहारयन्ति । तथा ते जीवाः पृथिवीशरीरं-कईमस्वरूपं क्रमेण वृद्धिमुपगताः सन्त आहारयन्ति, तच्चाहारितं सत्समानरूपीकृतमात्मसात्परिणामयन्ति, शेषं सुगम, यावत्कोपगा भवन्तीत्येवमाख्यातम् । साम्प्रतं स्थलचरानुद्दिश्याह___अहावरं पुरक्खायं नाणाविहाणं चउप्पयथलचरपंचिंदियतिरिक्ख जोणियाणं[तं जहा-] एगखुराणं, दुखुराणं, गंडीपदाणं, सणप्फयाणं, तेसिं च णं अहाबीएणं अहावगासेणं इत्थीए Jain Education internet For Privats & Personal Use Only inbraryong Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा पत्र दीपिकान्वितम् । पुरिसस्स य कम्म० जाव मेहुणवत्तिए नाम संजोगे समुप्पजति, ते दुहओ सिणेहं संचिणंति, 9 द्वितीये तत्थ णं जीवा इत्थित्ताए पुरिस[त्ताए ]जाव विउदति । ते जीवा माऊए उयं पिउसुक्कं, एवं जहा श्रुत. मणुस्साणं जाव इत्थि वेगया जणयंति पुरिसंपि नपुंसगंपि, ते जीवा डहरा समाणा माउणो खीरं तृतीयासप्पि आहारिति । आणुपुत्वेणं वुढा वणस्सतिकायं तसथावरे य पाणे, ते जीवा आहारिति पुढवि ध्ययने स्थलचर सरीरं जाव संतं, अवरे वि यणं तेसिं नाणाविहाणं चउप्पयथलचरपचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पञ्चेन्द्रियाएगखुराणं जाव सणफयाणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं । | णामाहर___ व्याख्या-अथापरमेतत्तीर्थकरैरारूपातं नानाविधानां चतुष्पदानां, तद्यथा-एकखुराणामश्वानां, द्विखुराणां गोम- | वर्णनम् । हिष्यादीनां, गण्डीपदानां हस्त्यादीनां, सनखपदानां सिंहव्याघ्रादीनां, तेषां यथाबीजं यथाऽनकाशं जीवानामुत्पत्तिस्ते च पृद्धिमुपगताः सन्तोऽपरेषामपि शरीरमाहारयन्तीति, शेषं सुगमं, यावत्कर्मोपगा भवन्तीति । साम्प्रतं उर:. परिसर्पानुद्दिश्याह अहावरं पुरक्खायं नाणाविहाणं उरपरिसप्पाणं थलचरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं,तं जहाअहीणं अजगराणं असालिआणं महोरगाणं, तेसिं च णं [अहावीएणं] अहावगासेणं इत्थीए जाव |NJaan Jain Education inte For Privista personal UE O Tww.jainelibrary.org Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इत्थ णं मेहुणे, एवं तं चेव, नाणत्तं-अंडं वेगया जणयंति पोयं वेगया जणयांत, से अंडे उब्भिजमाणे इत्थिं वेगया जणयंति पुरिसंपि नपुंसगंपि, ते जीवा डहरा समाणा वाउकायमाहारैति, आणुपुत्वेणं वुढ्ढा वणस्सतिकायं तसथावरे पाणे, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं नाणाविहाणं उरपरिसप्पथलचरपंचिंदियतिरिक्ख० अहीणं जाव महोरगाणं सरीरा नाणावण्णा [ नाणागंधा] जावमक्खायं ।। ___x[ व्याख्या-नानाविधानां' बहुप्रकाराणां उरसा ये प्रमर्षन्ति तेषां, तद्यथा-अहीनामजगराणामशालिकानां महोरगाणां यथाचीजेन यथाऽवकाशेन चोत्पत्याउण्ड[ज] त्वेन पोनजत्वेन वा गर्भानिमच्छन्ति, ते च निर्गता मातुरूष्माणं (बाष्पमयं ) वायु चाहाग्यन्ति, तेषां च जातिप्रत्ययेन तेनैवाऽहारेण क्षीरादिनेत्र वृद्विरुपजायते, शेषा] व्याख्या सुगमैच पूर्ववत् । साम्प्रतं भुजपरिसर्पानुद्दिश्याह अहावरं पुरक्खायं नाणाविहाणं भुयपरिसप्पाणं थलचरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं, तं जहागोहाणं नउलाणं सीहाणं सरडाणं सल्लाणं सरवाणं खराणं घरकोइलाणं विस्संभराणं मूसगाणं x नास्त्येतचिन्हान्तर्गतः पाठः प्रत्यन्तरेषु । Jain Education Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ८७॥ मंगुसाणं पयलातियाणं विरालियाणं जोहाणं चउप्पाइयाणं, तेसिं च णं अहाबीएणं अहावगासेणं इत्थीए पुरिसस्स य, जहा उरपरिसप्पाणं तहा भाणियवं, जाव सारूविकडं संतं, अवरे वि य णं तसिं नाणाविहाणं भुयपरिसप्पपंचिंदियथलचरतिरिक्खाणं गोहाणं जावमक्खायं । ____ व्याख्या-x [ नानाविधानां भुजाम्यां ये प्र(परि)सर्पन्ति तेषां, तद्यथा-गोधानकुलादीनां स्वकम्मोपात्तेन यथावीजेन यथाऽवकाशेन चोत्पत्तिर्भवति, ते चाण्डजत्वेन पोतजत्वेन चोत्पन्नास्तदनन्तरं मातुरूष्मणा वायुना चाहारितेन वृद्धिमुपयान्ति । शेष ] सुगुममेव पूर्ववत् । साम्प्रतं खेचरानुद्दिश्याह अहावरं पुरक्खायं नाणाविहाणं खहचरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं, तं जहा-चम्मपक्खीणं लोमपक्खीणं समुग्गपक्खीणं विततपक्खीणं,तेसिं च णं अहाबीएणं अहावगासेणं इत्थीए जाव जहा उरपरिसप्पाणं, नाणत्तं-ते जीवा डहरा समाणा माउए गायसिणेहं आहारिति । आणुपुत्वेणं वुड्डा वणस्सइकायं, तस-थावरे य पाणे, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे विय णं तेसिं नाणाविहाणं खहचरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं० चम्मपक्खीणं जावमक्खायं । [सू०१६] x नास्त्येतचिन्हान्तर्वर्तिपाठः प्रत्यन्तरेषु । द्वितीये श्रुत्त० तृतीयेध्ययने खेचरपञ्चेन्द्रियाणामाहारवर्णनम् । ॥८७॥ For Private W Jain Education in Personal Use Only ww.jaineltorary.org Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्याख्या-नानाविधानां खेचराणामुत्पत्तिरेवं द्रष्टव्या, [य]था-चर्मपक्षिणां चर्मकीटवल्गुलीप्रभृतीनां, तथा लोमा पक्षिणां सारस-राजहंस-काक-बकादीनां, तथा समुद्गपक्षि-विततपक्षिणां बहिर्वीपवर्तिनां, एतेषां यथाबीजेन यथाऽवकाशेन चोत्पन्नानामाहारक्रिया एवमुपजायते, तद्यथा-सा पक्षिणी तदण्डकं स्वपक्षाम्यामावृत्य तावत्तिष्ठति यावत्तदण्डकं तद्मणाऽऽहारितेन वृद्धिमुपगतं सत् कललावस्था परित्यज्य चच्चादिकानक्यवान् परिसमापय्य भेदमुपयाति, तदुत्तरकालमपि मात्रोपनीतेनाहारेण वृद्धिमुपयाति, शेषं प्राग्वत् । व्याख्याताः पञ्चेन्द्रिया मनुष्यास्तिर्यश्चश्व, तेषां चाहारो द्वेधा-आभोग निर्वतितोऽनाभोगनिर्चितश्च, तत्रानाभोगनिवर्तितः प्रतिक्षणभावी आभोगनिवर्तितस्तु यथास्वं क्षुद्वेदनीयोदयभावीति । साम्प्रतं विकलेन्द्रियानुद्दिश्याह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता नाणाविहजोणिया नाणाविहसंभवा नाणाविहवकमा तज्जोणिया तस्संभवा तदुवकमा कम्मोवगा कम्मनिदाणेणं तत्थ वुकमा नाणाविहाणं तसथावराणं पोग्गलाणं सरीरेसु वा सञ्चित्तेसु वा अचित्तेसु वा अणुसूयत्ताए विउद्देति । ते जीवा तेसिं नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सिणेहमाहारिति । ते जीवा आहारित पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं तसथावरजोणियाणं अणुसूयगाणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं । एवं दुरूवसंभवत्ताए, एवं खुरदुगत्ताए। [ सू० १७ ] Jain Education Jvw.jainelibrary.org Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग सूत्रं दीपिका न्वितम् । व्याख्या अथानन्तरमेतदाख्यातं ' इह 'अस्मिन् संसारे 'एके 'केचन तथाविधकर्मोदयवशवर्तिनः ‘सत्त्वाः' प्राणिनो नानाविधयोनिकाः कर्मनिदानेन-स्वकृतकर्मणा तत्रोत्पत्तिस्थाने ' उपक्रम्य' आगत्य नानाविधनसस्थावराणां शरीरेषु सचित्तेषु वाऽचित्तेषु वा 'अणुसूयत्ताए 'त्ति अपरशरीराश्रिततया परनिश्रया 'विवर्तन्ते ' समुत्पद्यन्ते, यावत्ते च जीवा विकलेन्द्रियाः सचित्तेषु-मनुष्यादिशरीरेषु युकालिक्षादिकन्वेनोन्पद्यन्ते, तथा तत्परिभुज्यमानेषु मश्वकादिवच्चित्तेषु मस्कुणत्वेनाविर्भवन्ति-उत्पद्यन्ते, तथऽचित्तीभूतेषु मनुष्यादिशरीरेषु विकलेन्द्रियशरीरकेषु वा ते जीवा 'अनुभू [१स्यू] तत्वेन' परनिश्रया कुम्यादित्वेनोत्पद्यन्ते, परे तु सचित्ते तेजस्कायादौ मूषकादिकत्वेनोत्पद्यन्ते, यत्र चाग्निस्तत्र वायुरित्यत. स्तदुद्भवा अपि द्रष्टव्याः, तथा पृथिवीमनुश्रित्य कुन्थुपिपीलिकादयो वर्षादाश्मणा संस्वेदजा जायन्ते, तथोदके पूतरका डोल्लणकभ्रमरिकाछेदनकादयः समुत्पद्यन्ते, तथा वनस्पतिकाये पनकभ्रमरादयो जायन्ते । तदेवं ते जीवास्तानि स्वयोनिशरीराण्याहारयन्ति इत्येवमाख्यातमिति । साम्प्रतं पञ्चेन्द्रियमूत्रपुरीपोद्भवान् प्राणिनः प्रतिपादियितुमाह 'एव' मित्यादि, यथा सचित्ताचित्तनिश्रया विकलेन्द्रियाः समुत्पद्यन्ते तथा तत्सम्भवेषु मूत्रपुरीषवान्तादिषु परे जन्तवो 'दुरूवत्ताए' दुरूपास्तत्सम्भवत्वेन कुम्यादिमावत्वेनोत्पद्यन्ते । ते च तत्र विष्ठादौ देहानिर्गते अनिर्गते वा समुत्पद्यमाना उत्पन्नाश्च तदेव विष्ठादिकं स्वयोनिभूत[माहार]माहारयन्ति, शेषं प्राग्वत् । सांप्रतं सचित्तशरीराऽऽश्रयाञ्जन्तून् प्रतिपादयितुमाह-एवं खुरदुगत्ताए' एवमिति यथा मूत्रपुरीषादावुत्पादस्तथा तिर्यक्रशरीरेषु 'खुरदुगत्ताए 'त्ति चर्म कीटतया समुत्पद्यन्ते, | इदमुक्तं भवति-जीवतामेव गोमहिष्यादिनां चर्मणोऽन्तः प्राणिनः संमृच्छय॑न्ते, ते च तन्मासचर्मणी भक्षयन्ति, भक्षयन्त द्वितीये श्रुत. तृतीया ध्ययने|विकलेन्द्रि याणामाहारवर्णनम् । ॥८८॥ || ८ Jain Education ind i al For Privats & Personal Use Oh Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्तचर्मणो विवराणि विदधति, गलच्छोणितेषु विवरेषु तिष्ठन्तस्तदेव शोणितमाहायन्ति, तथा अचित्तगवादिशरीरेऽपि, तथा सचित्ताऽचित्तवनस्पतिशरीरेऽपि घुणकीटकाः सम्मृर्छन्ते, ते च तत्र सम्मूर्च्छन्तस्तच्छरीरमाहारयन्तीति । साम्प्रत मकायं प्रतिपिपादयिषुस्तत्कारणभूतवातप्रतिपादनपूर्वकं प्रतिपादय माह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता नाणाविहजोणिया, +[जाव कम्म० खुरदुगत्ताए एवमक्खंति, इहेगइया सत्ता णाणाविहजोणिया] जाव + कम्मनिदाणेणं तत्थ वुकमा नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सरीरेसु सचित्तेसु वा अचित्तेसु वा । तं सरीरगं वायसंसिद्धं वा वातसंग. हितं वा वातपरिगतं वा उड्ढवातेसु उड्डभागी भवति अहेवाएसु अहेभागी भवति तिरियवातेसु तिरियभागी भवति, तं जहा-उस्सा हिमए महिया करए हरतणूए सुद्धोदए, ते जीवा तेसिं नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सिणेहमाहारिति, [ते जीवा आहारिति ] पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं तसथावरजोणियाणं उस्साणं जाव सुद्धोदगाणं सरीरा णाणा वण्णा जावमक्खायं । + + नास्त्येतचिन्हमध्यगतो मूलपाठः सवृत्तिकमुद्रितप्रतिषु, परं दीपिकाप्रतिषु सर्वास्वप्यस्ति । Jain Education Intel Far Private & Personal use Oh Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा सत्र दीपिकान्वितम् । ॥८९॥ व्याख्या-अथानन्तरमेतद्वक्ष्यमाणं 'पुरा' पूर्वमाख्यातं, 'इह' अस्मिञ्जगत्येके सवास्तथाविधकर्मोदयानानाविधकर्मोदया-नानाविधयोनिकाः सन्तो यावत्कर्मनिदानेन 'तत्र' वातयोनिकाकाये व्युत्क्रम्प-आगत्य नानाविधानां द१रप्रभृतीनां प्राणिनां 'स्थावराणां च' हरितलवणादीनां सचित्ताचित्तभेदभिन्नेषु शरीरेषु तदप्कायशरीरं वायुना निष्पादित वातेनैव सम्यग्गृहीतमभ्रकपटलान्तनिर्वृत्तं वायुनवान्योऽन्यानुगतं, तथोर्द्धगतेषु वातेपूद्ध मागी भवति, अप्कायो हि गगनगतवातवशादिवि सम्मूछते जलं, तथाऽधस्ताद्गतेषु तद्वशाद्भवऽत्यधोभागी अकाया, एवं तिर्यग्गतेषु बातेषु तिर्यग्भागी भवत्यप्कायः, इदमुक्तं भवति-बातयोनिकत्वादकायस्य यत्र यत्रासौ तथाविधारिणामपरिणतो भवति तत्र तत्र तत्कार्यभृतं जलमपि सम्मूर्छते, तस्य चाभिधानपूर्वकं दर्शयितुमाह-'ओस 'त्ति अवश्यायः हिमं महिका करका हरतणूए 'त्ति तृणाग्रव्यवस्थिता जलबिन्दवः, शुद्धोदकं प्रतीतमिति, इहोदकप्रस्तावे एके सच्चास्तत्रोत्पद्यन्ते स्त्रकर्मवशगास्तत्रोपन्नास्ते जीवास्तेषां नानाविधानां त्रसस्थावराणां स्त्रोत्पत्याधारभूतानां स्नेहमाहारयन्ति, ते जीवास्तच्छरीरमाहारयन्ति, अनाहारका न भवन्तीत्यर्थी, शेषं सुगमम् । तदेवं वातयोनि कमकायं प्रदर्याधुनाऽकायसम्भवमेवाकार्य दर्शयितुमाह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता उदगजोणिया उदगसंभवा जाव कम्मनिदाणेणं तत्थ वुकमा तसथावरजोणिएसु उदएसु उदगत्ताए विउदंति, ते जीवा तेसिं तसथावरजोणियाणं उदगाणं सिणेहमाहारिंति, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव संतं अवरे वि य णं तेसिं द्वितीये श्रुत तृतीयाध्ययनेsकाययोनिकवृक्षाणामाहारवर्णनम् । ॥८९॥ Jain Eda For Pawat & Personal use Javw.jainelibrary.org Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तसथावरजोणियाणं उदगाणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं । व्याख्या-अथापरमाख्यातं इह जगति उदकाधिकारे [वा] एके सचास्तथाविधकम्र्मोदयाद्वातवशोत्पन्नत्रसस्थावरशरीराधारमुदकं योनि-रुत्पत्तिस्थानं येषां ते तथा, तथोदकसम्भवा यावत्कर्मनिदानेन तत्रोपित्सवस्त्रसस्थावरयोनिके[पदके]. वपरोदकतया ' विवर्त्तन्ते ' समुत्पद्यन्ते, ते च उदकजीवास्तेषां त्रसस्थावरयोनिकानामुदकानां + नानाविधानि शरीराणि विवर्त्तन्ते । एतदाख्यातं । तदेवं त्रसस्थावरशरीरसम्भवमुदकं योनित्वेन प्रदर्य अधुना निर्विशेषणमष्कायसम्भवमेवाकार्य दर्शयितुमाह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता उदगजोणियाणं जाव कम्मनियाणणं तत्थ वुकमा, उदगजोणिएसु उदगेसु उदगत्ताए विउहति, ते जीवा तेसिं उदगजोणियाणं +जीवाणं उदगाणं सिणेहमाहारिंति, ते जीवा आहारित पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं उदग___ + ' स्नेहनाहारयन्ति, अन्यान्यपि पृथिव्यादिशरीराण्याहारयन्नि, तच्च पृथिव्यादिशरीरमाहारितं सत्सारूप्यमानीयात्मसाप्रकुर्वन्त्यपराण्यपि तत्र त्रसस्थावरशरीराणि विवर्त्तन्ते, तेषां चोद कयोनिकानामुदकानां' इति वृत्तौ। + नास्त्येतच्छब्दः सवृत्तिकमुद्रितप्रतिषु । Jain Education Interna Far Private & Personal use Oh Liainelibrary.org Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग द्वितीये श्रृत० दीपिकान्वितम् । जोणियाणं उदगाणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं । व्याख्या-प्रथाऽपरमेतदाख्यातं, इहैके मचा सकतकर्मोदयादुदकयोनि[कचूद के] वृनयने, ते च तेषामुदकसम्भवानामुदकजीवानामात्माधारभूतानां शरीरमाहास्यन्ति, शे सुगम, याबदाख्यानमिति । साम्पादकधारानारान्तरकादिकां. स्त्रसान् दर्शयितुमाह __ अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता उदगजोणियाणं जाव कम्मनिदाणेणं तत्थ वुकमा उदगजोणिएसु उदएसु तसपाणताए विउदृति, ते जीवा तेर्सि उदगजोणियाणं उदगाणं सिणेहमाहारिति, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं उदगजोणियाणं तसथावराणं पाणाणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं । [ सू०१८] व्याख्या-सुगमैव । अथाऽग्निकायमधिकृत्याह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता नाणाविहजोणिया जाव कम्मनियाणणं तत्थ वुकमा x"अथापरमेतदाख्यातं, इहै के सत्ता उदकेषु उदकयोनिषु चोदकेषु त्रसप्राणितया पूतरकादित्वेन विवर्तन्ते' समुत्पञ्चन्ते, ते चोत्पद्यमानाः समुत्पन्नाश्च तेषा-मुहकयो ने कानामुद कानां स्नेहमाहारयन्ति, शेवं सुगम, यावदारुपातमिति" इति वृत्तौ । तृतीयाध्ययने जलचर प्रसानामाहारवर्णनम् । ॥९ ॥ Jain Education in 2011 For Privista personal UE O MWwEjainelibrary.org Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सरीरेसु सचित्तेसु वा अचित्तेसु वा अगणिकायत्ताए विउति, ते जीवा तेसिं नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सिणेहमाहारिंति, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं तसथावरजोणियाणं पुढवी( अगणी )णं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं, सेसा तिन्नि आलावगा जहा उदगाणं । ___ व्याख्या-अथैतदपरमाख्यातं, 'इह' संसारे 'एके' केचन 'सच्चाः' प्राणिनस्तथाविधकर्मोदयवर्तिनो नानाविधयोनयः प्राक्सन्तः-पूर्वजन्मनि तथाविधं कम्र्मोपादाय तत्कर्मनिदानेन नानाविधानां त्रसस्थावराणां प्राणिनां शरीरेषु [ सचित्तेषु] अचित्तेषु वाऽग्नित्वेन 'विवर्तन्ते' प्रादुर्भवन्ति, तथाहि-पञ्चेन्द्रियतिरश्वा दन्तिमहिषादीनां परस्परं युद्धावसरे x विषाणसंहर्षे + सत्यग्निरुत्तिष्ठते, एवमचित्तेष्वपि तदस्थिसंहर्षादग्नेरुत्थानं, तथा द्वीन्द्रियादिशरीरेष्वपि यथासम्भवमायोजनीयं, तथा स्थावरेष्वपि वनस्पत्युपलादिषु सचित्ताचित्तेष्वग्निजीवाः समुत्पद्यन्ते, ते चाग्निजीवास्तत्रोत्पन्नास्तेषां नानाविधानां त्रसस्थावराणां स्नेहमाहारयन्ति, शेषं सुगम, यावद्भवन्तीत्येवभाख्यातम् । अपरे त्रयोऽप्यालापकाः x दन्तशृनयोः परिप्रहापेक्षया सचित्तांशयुक्तत्वापेक्षया वा अचित्तभेदभिन्नता इति टिप्पणं सवृत्तिकमुद्रितप्रतौ । + "स्पर्धायां तु समः परौ । हर्ष-घर्षों च सङ्काम-सङ्कमौ दुर्गसञ्चरे ॥ ८७॥" इति शब्दरत्नाकरः कां० ६ । Jain Education |ww.jainelibrary.org Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिका न्वितम् । ॥ ९१ ॥ Jain Education Inter प्राग्वद्रष्टव्या इति । साम्प्रतं वायुकायमुद्दिश्याह अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता नाणाविह जोणिया जाव कम्मनिदाणेणं तत्थ वुक्कमा नाणाविहाणं तस्थावराणं पाणाणं सरीरेषु सचित्तेसु [वा] अचित्तेसु वा वाउकायत्ताए विउति, जहा अगणीणं तहा भणियवा चत्तारि गमा [सू० १९] व्याख्या - अयमालापकोऽग्निकायगमेन व्याख्येयः । साम्प्रतमशेषजीवाधारं पृथिवी कायमधिकृत्याह - अहावरं पुरखायं, इहेगतिया सत्ता नाणाविहजोणिया जाव कम्मनिदाणेणं तत्थ वुक्कमा नाणाविहाणं तस्थावराणं पाणाणं सरीरेसु सचित्तेसु वा अचित्तेसु वा पुढवित्ताए सक्करत्ताए वालुयत्ताए, इमाओ गाहाओ अणुगंतवाओ - पुढवी सक्करा वालु-या य उवले सिलाय लोणूसे । अय-तउय- तंब - सीसग - रुप्पसुवण्णेय वयरे य ॥ १ ॥ हरियाले हिंगुलुए, मणोसिलासासगंऽजणपवाले, अब्भपडलष्भवालय - बायरकाए मणिविहाणे ॥ २ ॥ गोमेज्जए य रुपए, अंके फलिहे य लोहियक्खे य । मरगय-मसाले, भुयमोयग-इंदनीले य ॥ ३ ॥ चंदण- गेरुय-हंसगब्भ - पुलए द्वितीये श्रुत● तृतीया - ध्ययने वायुपृथ्वी कायिका नामाहर वर्णनम् । ॥ ९१ ॥ Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internat सोगंधिए य बोधव्वे । चन्दप्पभ-वेरुलिए, जलकंते सूरकंते य ॥ ४ ॥ एयाओ गाहाओ एएसु भणियवाओ, जाव सूरंकतत्ताए विउति, ते जीवा तेसिं नाणाविहाणं तसथावराणं पाणाणं सिणेहमाहारिंति, ते जीवा आहारिति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरे वि य णं तेसिं तस्थावरजोणियाणं पुढवीणं जाव सूरकंताणं सरीरा नाणावण्णा जावमक्खायं, सेसा तिन्नि आलावा जहा उदगाणं । [ सू० २० ] व्याख्या - अथापरमेतत्पूर्वमाख्यातं, इहैके सच्चाः पूर्वं नानाविधयोनिकाः स्वकृतकर्मवशगा नानाविधत्र सस्थावराणां शरीरेषु सचित्तेषु अचित्तेषु वा पृथिवीत्वेनोत्पद्यन्ते, तद्यथा - सर्पशिरस्सु मणयः करिदन्तेषु मौक्तिकानि विकलेन्द्रियेष्वपि शुयादिषु मौक्तिकानि, स्थावरेष्वपि वेण्वादिषु तान्येवेति एवमचित्तेषूषरादिषु लवणभावेनोत्पद्यन्ते, एवं पृथिवीकायिका नानाविधासु पृथिवीषु शर्करा - वालुका- उपल-शिला लवणादिभावेन तथा गोमेदकादिरत्नभावेन च बादरमणिविधानतया समुत्पद्यन्ते, शेषं सुगमं यावच्चत्वारोऽप्यालापका उदकगमेन नेतव्या इति । साम्प्रतं सर्वोपसंहारद्वारेण सर्वजीवान् सामान्यतो विभणिपुराह - अहावरं पुरखायं सवे पाणा सबै भूया सवे जीवा सबै सत्ता नाणाविहजोणिया नाणाविह jainelibrary.org Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ९२ ॥ Jain Education Intert संभवा नाणाविहकमा, सरीरजोणिया सरीरसंभवा सरीखुकमा सरीराहारा कम्मोवगा कम्मनिदाणा कम्मईया कम्मट्ठिइया कम्मणा चैव विपरियासमुर्वेति । से एवमायाणह, से एवमायाणित्ता आहारगुत्ते सहिए समिए सया जए तिबेमि । [सू० २१] बीसुखंधस्स आहारपरिन्नानाम तईयमज्झयणं समत्तं ॥ ३ ॥ _व्याख्या - अथापरमेतदाख्यातं - सर्वे प्राणाः सर्वे भूताः सर्वे सचाः सर्वे जीवाः x नानाविधयोनिका नारक - तिर्यङ्नरा मरादिगतित्पद्यन्ते यत्र यत्रोत्पद्यन्ते तत्र तत्र तच्छरीराहारिणो भवन्ति, तदाहारवन्तश्च तत्रागुप्तास्तद्वारा यात तत्कर्मदशगा नारकतिर्यन रामरगतिषु जघन्य मध्यमोत्कृष्टस्थितयो भवन्ति, अनेनेदमुक्तं भवति - यो यादृहि भवेद - स ताहग मुत्रापि भवतीत्येतनिरस्तं भवति, अपि तु कम्र्म्मोपगाः कर्म्मनिदानाः कर्मायत्तगतयो भवन्ति, तथा तेनैव कर्मणा सुखलिप्सवोऽपि तद्विपर्यासं दुःखमुपगच्छन्तीति । साम्प्रतमध्ययनार्थमुपसंजिहीर्षुराह - ' से एवमायाण हे 'त्यादि, यदेतन्मयाऽऽदितः प्रभृत्युक्तं, तद्यथा-यो यत्रोत्पद्यते स तच्छरीराहारको भवति, आहारागुप्तश्च कर्म्मादत्ते, कर्म्मणा च नानाविधासु योनिवरघघटीन्यायेन पौनःपुन्येन पर्यटतीत्येवं जानीत यूयं एतद्विपर्यासं दुःखुमुपगच्छन्तीति । एतत्परिज्ञाय सदस X जीवस स्वयोर्व्यत्ययेन निर्देशोऽत्र । द्वितीये श्रुत० तृतीया - ध्ययने सर्वोप संहारवर्णनम् । ॥ ९२ ॥ jainelibrary.org Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्विवेकी आहारगुप्तः पञ्चभिः समितिभिः समितः सहितो ज्ञानादिमिः सदा सर्वकालं-यावदुच्छासं तावद्यतेत-संयमानुष्ठाने प्रयत्नवान् भवेदिति । इतिः परिसमाप्त्यर्थे, ब्रवीमीति पूर्ववत् । इति श्रीपरमसुविहितखरतरगच्छविभूषणपाठकप्रवरश्रीमत्साधुरङ्गगणिवरगुम्फितायां श्रीसूत्रकृताङ्गदीपिकायां द्वितीये श्रुतस्कन्धे समाप्तमाहारपरिज्ञाख्यं तृतीयमध्ययनमिति ॥३॥ अथ प्रत्याख्यानक्रियाख्यं चतुर्थमध्ययनम् । अथ तृतीयाध्ययनानन्तरं चतुर्थमारभ्यते, आहारपरिबानन्तरं प्रत्याख्यानक्रियाध्यनमारभ्यते, तच्चेदम् सुयं मे आउसंतेणं भगवया एवमक्खायं-इह खल पच्चक्खाणकिरियानाम अज्झयणं, तस्स णं अयमढे पन्नत्ते व्याख्या-श्रीजम्बूस्वामिनं प्रति श्रीसुधर्मस्वामी कथयति-श्रुतं मया [आयुष्मता] भगवतेदमाख्यातं-इह खलु प्रत्याख्यानक्रियानामाध्ययनं, तस्यायमर्थो वक्ष्यमाणलक्षणस्तथाहि आया अपञ्चक्खाणी आवि भवति, आया अकिरियाकुसले आवि भवति, आया मिच्छासंठिए Jain Education Far Private & Personal use Oh T ww.jainelibrary.org भा Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रायगडा दीपिकान्वितम् । चतुर्था ध्ययने ॥९३॥ आवि भवति, आया एगंतदंडे आवि भवति, आया एगंतबाले आवि भवति, आया एगंतसुत्ते || द्वितीये आवि भवति, आया अवियारमणवयणकायवक्के आवि भवति, आया अप्पडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे श्रुत आवि भवति, एस खल भगवता अक्खाए असंजए अविरए अप्पडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे सकिरिए असंवुडे एगंतदंडे एगंतबाले एगंतसुत्ते से बाले अवियारमणवयणकायवक्के सुविण अप्रत्यामवि ण पस्सति, पावे य से कम्मे कजइ [सू० १] तत्थ चोयए पन्नवगं एवं वदासि ख्यानिनः ___ व्याख्या-अयमात्मा-जीवः अनादिमिथ्यात्वाविरतिप्रमादकषाययोगानुगततया स्वभावत एवाप्रत्याख्यान्यपि भवति, पापा[अपि शब्दात् ] स एव कुतश्चिन्निमित्वात्प्रत्याख्यान्यपि भवति, तथा+अक्रियाकुशलोऽपि भवति, तथाऽऽत्मा मिथ्यात्वोदय. करणेऽपि संस्थितोऽपि भवति, तथैकान्तेनापरान्प्राणिनो [दण्डयतीति ] दण्डस्तदेवम्भूतो भवति, तथाऽऽत्मा एकान्तबालश्च भवति, कर्मबन्धतथाऽऽत्मा एकान्तसुप्तश्च भवति, यथा द्रव्यसुप्तः शब्दादीन् विषयान जानाति हिताहितप्राप्तिपरिहारविकलश्च भवति वर्णनम् । तथाऽऽत्माऽपि भावसुप्तो हिताहितं न वेत्ति, तथाऽऽत्माऽप्रत्याख्यानक्रियः सन् अविचारितमनोवाकायवाक्यश्चापि भवति, +" सदनुष्ठानं क्रिया, तस्यां कुशलः क्रियाकुशलस्तत्प्रतिषेधात्" इति बृहः । x" वाग्ग्रहणेनैव वाक्यस्य गतार्थत्वात्पुनर्वाक्यग्रहणं वाग्व्यापारस्य प्राचुर्यज्ञापनार्थम् ।" इति हर्ष । ॥१३॥ ६१. - Jain Education inter For Privista personal UE O AINE.jainelibrary.org Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तथाऽप्रतिहताप्रत्याख्यातपापकर्मा भवति, एवंविधो जीवो भगवता असंयत अविरत अप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा सक्रिय असंवत एकान्तबाल एकान्तसुप्तश्च कथिता, तदेवम्भूतश्च बालसुप्ततया 'अविचाराणि' अविचारितरमणीयानि परमार्थविचारणया युक्त्या वा विघटमानानि मनोवाकायवाक्यानि यस्य स तथा, अविचारितमनोवाकायः निर्विवेकतया पडविज्ञानरहितः स्वप्नमपि न पश्यति, तस्य चाव्यक्तविज्ञानस्य स्वप्नमयपश्यतः पापं कर्म बध्यते, एतावता यद्वस्तु स्वमेऽपि नायाति कदाचिदृष्टमपि न तस्यापि कर्मबन्धो लगति, अव्यक्तविज्ञानेनापि प्राणिना पापं कर्म क्रियत इति भावः । तत्र चैवं व्यवस्थिते परः प्रज्ञापकमेवमवादीत्-अत्र चाचार्याभिप्राय परः प्रतिषेधयति असंतएणं मणेणं पावएणं असंतिआए वतीए पावियाए असंतएणं काएणं पावएणं अहणंतस्स अमण[क्खस्स अवियारमणवयणकायवकस्स सुमिणमवि अप्पस्सओ पावे कम्मे नो कजइ, कस्स णं तं हेउं ? चोयगे एवं बवीति व्याख्या-अविद्यमानेन असता मनसा तथा अप्रवृत्तेनाशोभनेन, तथा वाचा कायेन च पापेन असता, तथा सस्वान् अनिघ्नतः, तथाऽमनस्कस्याविचारमनोवाक्कायवाक्यस्य स्वप्नमयपश्यतः, एवमव्यक्तविज्ञानस्य पापं कर्म न बङ्ख्यते, एवम्भूतविज्ञानेन पापं कर्म न क्रियत इति, तर्हि कथयन्तु पूज्याः ? कथं पाप कर्म बध्यते ? केन हेतुना-केन कारणेन कर्मबन्धः स्यात् ? नात्र कश्चिदव्यक्तविज्ञानत्वात् पापकर्म हेतुरिति । अथ पर एव स्वाभिप्रायेण पापकर्मबन्धहेतमाह Jain Education internal Far Private & Personal use Oh Trainelibrary.org Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडा पुत्रं | दीपिकान्वितम् । द्वितीये श्रुत चतुर्था ॥९४॥ अन्नयरेणं मणेणं पावएणं मणवत्तिए पावे कम्मे कज्जइ, अन्नयरीए वतीए पावियाए वतिवत्तिए पावे कम्मे कजइ, अन्नयरेणं कारणं पावएणं कायवत्तिए पावे कम्मे कजति, [ हणंतस्स समणक्खस्स सवियारमणवयणकायवक्कस्स सुमिणमवि पासओ एवंगुणजातीयस्स पावे कम्मे कजइ।] पुणरवि चोयगे एवं बवीति-तत्थणं जेते एवमाहंसु-असंतएणं मणेणं पावएणं असंतीयाए वतीए पावियाए असंतएणं कारणं पावएणं अहणंतस्स अमणक्खस्स अवियारमणवयणकायवकस्स सुविणमवि अपस्सओ पावे कम्मे कज्जति,[तत्थ णं] जे [ते ]एवमाइंसु तं मिच्छा। तत्थ पन्नवए चोयगं एवं वयासी-[ तं सम्मं जं मए पुवं वुत्तं असंतएणं मणेणं पावएणं असंतियाए वईए पावियाए असंतएणं कारणं पावएणं अहणंतस्स अमणक्खस्स अवियारमणवयणकायवक्कस्स सुविणमवि अपस्सओ पावे कम्मे कज्जइ तं सम्मं । [कस्स णं तं हेउं ?।] व्याख्या-कर्माश्रवद्वारभूतैमनोवाकायकर्ममिः कर्म बयत इति दर्शयति-अन्यतरेण क्लिष्टेन प्राणातिपातादिप्रवृत्या | मनसा वाचा कायेन च तत्प्रत्ययिकं कर्म बख्यते । तथा नतस्सचान्समनस्कस्य सविचारमनोवाकायवाक्यस्य स्वममपि पश्यतः प्रस्पष्टविज्ञानस्यैतदुणजातीयस्य पापं कर्म बयते, न पुनरेकेन्द्रियविकलेन्द्रियादेः पापकर्मसम्मव इति, तेषां घात. ध्ययनेपराभिप्रायेणाविचारमनो. बाकाय. वाक्यस्य कर्मवन्धाभावः। For P Jan Education www.ininelibrary.org & Personal use only Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कस्य मनोवाकायव्यापारस्याभावात , अथैतव्यापारमन्तरेणापि कर्मवन्ध इष्यते ? एवं च सति मुक्तानामपि कर्मवन्धः स्यात् , न चैतदिष्यते, तस्मान्नैवं बन्धः, तत्र यदेवम्भूतैरेव मनोवाक्कायव्यापारैः कर्मबन्धोऽभ्युपगम्यते । तदेवं व्यवस्थिते सति ये ते एवमुक्तवन्तस्तद्यथा-अविद्यमानैरेवाशुभैर्योगैः पापं कर्म क्रियते, मिथ्या ते एवमुक्तवन्त इति स्थितम् । तदेवं शिष्येणाचार्यपक्षं दूषयित्वा स्वपक्षे व्यवस्थापिते सत्याचार्य आह-तं सम्म'मित्यादि, यदेतन्मयोक्तं प्राग यथाऽस्पष्टाव्यक्तयोगानामपि कर्म बध्यते तत् 'सम्यक' शोमनं युक्तिसङ्गतं इति । एवमुक्ते पर आह-'कस्य हेतोः१' केन कारणेन ? तत्सम्यगिति चेदाह तत्थ खलु भगवया छज्जीवनिकाया हेऊ पन्नत्ता, तं जहा-पुढविकाइया जाव तसकाइया, | इच्चेतेहिं छहिं जीवनिकाएहिं आया अप्पडिहयपच्चक्खायपावकम्मे निच्चं पसढविउवातचित्तदंडे, तं जहा-पाणाइवाए जाव परिग्गहे कोहे जाव मिच्छादसणसल्ले । ___व्याख्या-आचार्य आह-तत्र खलु भगवता षड्जीवनिकाया: कर्मबन्धहेतुत्वेनोपन्यस्तास्तद्यथा-पृथिवीकायिका यावत्रसकायिका इति । कथमेते षट्कायाः कर्मवन्धस्य कारणमित्याह-'इच्चेएहिं' इत्यादि, इत्येतेषु पृथिव्यादिषु षड्जीवनिकायेषु अप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा य आत्मा जन्तुः 'नित्यं सर्वकालं प्रकर्षण शठः तथा 'व्यतिपाते' प्राणिव्यपरोपणे चित्तं यस्य स व्यतिपातचित्तः, [स्वपरदण्डहेतुत्वादण्डः] प्रशठचासौ व्यतिपातचित्चदण्डश्चेति आत्मा, तद्यथा Jain Education Far Private & Personal use Oh wwwEjainelibrary.org Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ९५ ॥ Jain Education Intern प्राणातिपाते विधेये प्रशठ [ व्यतिपात ]चित्तदण्डः, एवं मृषावादादत्तादानमैथुनपरिग्रहेष्वपि वाच्यं यावन्मिथ्यादर्शनशल्यमिति । तेषामिदै केन्द्रियविकलेन्द्रियादीनामनिवृत्तत्वान्मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकषाययोगानुगतता इति द्रष्टव्यं तद्भावाच्च ते कथं प्राणातिपातादि दोषवन्तो न भवन्ति । एतावता एकेन्द्रियविकलेन्द्रियाः प्राणातिपातादिदोषवत्तया अव्यक्तविज्ञाना अपि सन्तोsस्वप्नाद्यवस्थायामपि ते कर्म्मबन्धका एव, तदेवं व्यवस्थिते यत्प्रागुक्तं परेण, यथा-अव्यक्तविज्ञानानामनन्नतां अमनस्कानां न कर्म्मबन्ध इत्येतन्मृषा । साम्प्रतमाचार्य: स्वपक्षसिद्धये दृष्टान्तमाह तत्थ खलु भगवता वहए दिट्ठते पन्नत्ते, से जहा नामए वहए सिया गाहावइस्स वा गाहावइ पुत्तस्स वा रन्नो वा रायपुरिसस्स वा खणं निदाय पविसिस्सामि खणं लडूणं वहिस्सामि [त्ति ] पहारेमाणे से किं नु हु नाम से वहए तस्स गाहावइस्स वा [ तस्स ] गाहावइपुत्तस्स वा तस्ल वा रण्णो तस्स वा रायपुरिसस्स खणं निदाय पविसिस्सामि खणं लडूणं वहिस्सामि [त्ति ] पहारेमाणे दिया वा राओ वा सुत्ने वा जागरमाणे वा अमित्तभूते मिच्छासंठिते निच्चं पसढविडवायचित्तदंडे भवति ? एवं वियागरेमाणे समियाए वियागरे चोयए-हंता भवति । व्याख्या - तत्र खलु भगवता वधकदृष्टान्तः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-वधकः कश्चित्स्यादिति, कुतश्चिन्निमित्तात्कुपितः सन् द्वितीये श्रुत चतुर्था ध्ययने ऽव्यक्त विज्ञानाम स्वप्नाद्य वस्थाया मपि कर्मबन्धवर्णनम् । | 11 20 11 wjainelibrary.org Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कस्यचिद्वधपरिणतः कश्चित्पुरुषो भवति, कीदृशो वधकः ? 'गाहावइस्से 'त्यादि, गृहपतिर्गृहपतिपुत्रो वा तस्योपरि कश्चिद्वधक संवृत्तः, स च वधपरिणामपरिणतोऽपि कस्मिंश्चित्क्षणे पापकारिणमेनं घातयिष्यामीति । तथा राज्ञः राजपुरुषस्य वोपरि कुपित एतत्कुर्यादित्याह-'खणं निदाय' इत्यादि, क्षण-मवसरं 'निदाय'त्ति प्राप्य लब्ध्वा [वध्यस्य पुरे गृहे वा प्रवेक्ष्यामीति तदध्यवसायी भवति, तथा क्षणमवसरं छिद्रादिकं वध[वध्यस्य लब्ध्वा तं वध्यं हनिष्यामीत्येवं सम्प्र. धारयति, तथा गृहपते राज्ञो वा कश्चित्कारणकोपाद्वधपरिणतोऽप्यात्मनोऽवसरं लब्ध्वा हनिष्यामीत्यवसरं-छिद्रमपेक्ष माणस्तदवसरापेक्षी, कश्चित् कालमुदास्ते, स च तत्रौदासीन्यं कुर्वाणः अपरेण कार्यादिना व्यग्रचेतास्तस्मिन्नवसरे व[ध]ध्यं प्रत्यस्पष्टविज्ञानो भवति, स चैवम्भूतोऽपि यथा तं वध्यं प्रति नित्यमेव प्रशठव्यतिपातचित्तदण्डो भवति, एवमविद्यमानैरपि प्रव्यक्तैरशुमैर्योगरेकेन्द्रियविकलेन्द्रियादयोऽस्पष्टविज्ञाना अपि मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकपाययोगानुगतत्वात्प्राणातिपातादिदोषवन्तो भवन्तीति, न च तेऽवसरं अपेक्षमाणा उदासीना अपि अवैरिण इति, एवमस्पष्टविज्ञाना अपि वैरिणो भवन्तीति । साम्प्रतमाचार्य एव स्वाभिप्रेतमर्थ परप्रश्नपूर्वकमाविर्भावयन्नाह-से किं नु हु' इत्यादि, आचार्यः स्वतो निर्णीतार्थोऽस्यया परं पृच्छति-किमसौ वधक पुरुषो[हनना]ऽवसरापेक्षी छिद्रं 'सम्प्रधारयन्' चिन्तयन् अहर्निशं सुप्तो जाग्रदवस्थो वा 'तस्य' गृहपते राज्ञो वा वध्यस्यामित्रभूतो वा मिथ्यासँस्थितो नित्यं प्रशठव्यतिपातचित्तदण्डो भवति ? आहोस्विनेत्येवं | पृष्टः पर समतया माध्यस्थ्यमवलम्बमानो यथाऽवस्थितमेव व्यागृणीयात् , यथा-हन्त आचार्य ! भवत्यसावमित्रभूत इत्यादि । तदेवं दृष्टान्तं प्रदर्य दान्तिकमाह Jain Education internatioN Far Private & Personal Use Oh leadinelibrary.org Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ ९६ ॥ Jain Education Interf आचार्य आह-जहा से वहए तस्स गाहावइस्स [ वा ]तस्स गाहावइपुत्तस्स [ वा ]तस्स वा रन्नो तस्स वा रायपुरिसस्स खणं निदाय पविसिस्सामि खणं लडूणं वहिस्सामित्ति पहारेमाणे दिया वा राओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा आमित्तभूते मिच्छासंठिए निःश्चं पढविवायचित्तदंडे [ भवइ ] एवामेव बाले वि सवेसिं पाणाणं जाव सवेसिं सत्ताणं दिया वा राओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा अमित्तभूते मिच्छासंठिए निचं पसढविउवायचित्तदंडे [ भवइ ], तं जहा - पाणातिवाए जाव मिच्छादंसणसले, एवं खलु भगवता अक्खाए-असंजए अविरए अप्पाडेहयपञ्चकखाय पावकम्मे सकिरिए असंवुडे एगंतदंडे एगंतबाले एगंतसुत्ते आवि भवति, से बाले अवियारमणवयणकायवक्के सुविणमवि ण परसति पावे य से कम्मे कज्जति । व्याख्या- 'जहा से वहए' इत्यादि, यथाऽसौ वधक इत्यादिना दृष्टान्तमनूद्य दार्शन्तिकमर्थं दर्शयितुमाह'एवामेवे' इत्यादि, यथाऽसौ वधकोऽवसरापेक्षितया वध्यस्य व्यापत्तिमकुर्व्वाणोऽप्यमित्र भूतो भवत्येवमसावपि बालोऽस्पष्टविज्ञानो निवृत्तेरभावात्सर्वेषां प्राणिनां व्यापादको भवति यावन्मिथ्यादर्शनशल्योपेतो भवति, यद्यच्युत्थानादिकं विनयं कुतश्चिन्निमित्तादसौ विधत्ते तथाप्युदायिनृपमारकवदन्तर्दुष्ट एवेति नित्यं प्रशठव्यतिपातचिचदण्डश्च यथा परशुरामः द्वितीये श्रुत० चतुर्था ध्ययने व्यक्त विज्ञानाम स्वप्नाद्यवस्थायामपि कर्मबन्ध वर्णनम् । ॥ ९६ ॥ Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कृतवीर्य व्यापाद्यापि तदुत्तरकालं सप्तवारानिक्षत्रां पृथिवीं चकार, एवमसावमित्रभूतो मिथ्याविनीतश्च भवति । 'एवं खलु भगवया' इत्यादि, यथाऽसौ वधकोऽवसरापेक्षी न तावद्घातयति [अथ च] अनिवृत्तत्वाद्दोषदुष्ट एव, एवमसावयेकेन्द्रियादिकोऽस्पष्टविज्ञानोऽप्यविरतत्वात्तथाभूत एव-अविरताप्रतिहताप्रत्याख्याताऽसक्रियादिदोषदुष्ट एवेति, शेष सुगम, यावत्पापं कर्म क्रियत इति । जहा से वहए तस्स वा गाहावइस्स वा[ जाव ]तस्स वा रायपुरिसस्स पत्तेयं पत्तेयं ]चित्तसमादाए दिया वा राओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा अमितभूते मिच्छासंठिए[ निचं पसढविउवातचित्तदंडे भवति, एवामेव बाले सवेसिं पाणाणं जाव सवेसिं सत्ताणं पत्तेयं[ पत्तेयं चित्तसमादाए दिया वा राओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा अमित्तभूते मिच्छासंठिते निच्चं पसढविउवातचित्तदंडे भवति ॥ [ सू०२] ___ व्याख्या-यथाऽसौ वधको वध्यस्य विनाशं चिन्तयन् अनिनन्नपि अमित्रभृतः कथ्यते, तदनु तस्य वधमकुर्वतोऽपि पापकर्म जायते, एवं बाल एकेन्द्रियादिरपि सर्वेषां प्राणिनाममित्रभूतः कथ्यते, अविरतत्वात् , एकेन्द्रियादेरप्यकुर्वतोऽपि बन्धो भवति पापकर्मण इति । एवमाचार्येण प्रतिपादिते सति शिष्यः कथयति Jain Education in For Private & Personal use only Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रुत. न्वितम् । सूयगडाङ्ग | नो इणमटे समटे [चोदका] । इह खलु बहवे पाणा० जे इमेणं सरीरसमुस्सएणं नो दिट्ठा द्वितीये सूत्र | वा सुया वा नाभिमता वा, विन्नाया वा जेसिं णो पत्तेयं पत्तेयं चित्तसमायाए दिया वा राओ वा || दीपिका चतुर्थे| सुत्ते वा जागरमाणे वा अमित्तभूते मिच्छासंठिते निच्चं पसढविउवातचित्तदंडे, तं जहा- ध्ययन IN पाणाइवाए जाव मिच्छादसणसल्ले ॥ [ सू०३] वादिमतेना ____ व्याख्या-'नो इणमढे समढे' नायमर्थः समर्थः यदकुर्वतोऽनतः अमनस्कस्यापि पापकर्म लगति, नायमर्थः नभिमते | समर्थः-प्रतिपत्तुं न योग्य इति । तत्र शिष्यः कारणमाइ-इह खलु' चतुर्दशरज्ज्वात्मके लोके 'बहवो 'ऽनन्ताः प्राणिनः कर्मबन्धा सन्ति देशकालविप्रकृष्टास्तथाभृता बहवः सन्ति ये अनेन शरीरसमुच्छयेण न कदाचिदृष्टाश्चक्षुषा न श्रुताः श्रवणाभ्यां भावविशेषतो नाभिमता-इष्टा, न च विज्ञाताः स्वयमेवेत्यतः कथं तद्विषयस्तस्यामित्रभावः स्यात् १, अतस्तेषां कदाचिदप्यविज्ञातानां कथं प्रत्येकं वधं प्रति चित्तसमादानं भवति ? न चासौ तान् प्रति नित्यं प्रशठव्यतिपातचित्तदण्डो भवतीति । एवं च व्यवस्थिते न सर्व विषयं प्रत्याख्यानं युज्यते, इत्येवं प्रतिपादिते सति परेण आचार्य आह तत्थ खलु भगवया दुवे दिटुंता पन्नत्ता, तं जहा-सन्निदिटुंते य असन्निदिटुंते य, से किं तं | सन्निदिटुंते ?, २ जे इमे सन्निपंचिंदिया पजत्तगा, एतसिणं छज्जीवनिकाए पडुच्च, तं०-पुढविकायं ॥ ९७॥ वर्णनम् । For Private & Personal use only www.jainalibrary.org Jain Education Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education जाव तसकायं, से एगतिओ [ पइन्नं कुज्जा ] पुढविकाएणं किच्चं करेइ [वि] कारवेइ[वि], तस्स णं एवं भवइ - एवं खलु अहं पुढविकाएणं किच्चं करोमि वि कारवेमि वि, णो चेवणं से एवं भवइइमे वा[ इमेण वा ], से य तेणं पुढविकाएणं किच्चं करोति वि कारवेति वि, से णं ताओ पुढविकायाओ अस्संजयाविरयअप्पडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे यावि भवति, एवं जाव तसकाएत्ति भाणियां । से एगतिओ छहिं जीवनिकाएहिं किच्चं करेति विकारवेति वि, तस्स णं एवं भवतिएवं खलु अहं छज्जीवनिकाएहिं किच्चं करेमि विकारखेमि वि, णो चेव णं से एवं भवति - इमेहिं [ इमेहिं वा, से य तेहिं छहिं जीवनिकाएहिं जाव कारवेइ वि ], से य तेहिं छहिं जीवनिकाएहिं असंजयअविरयअप्पाडहयपच्चक्खायपापकम्मे, तं जहा - पाणातिवाए जाव मिच्छादंसणस, एस खलु भगवता अक्खाए - असंजए अविरए अप्पडिहयपच्चक्खायपावकम्मे सुविणमवि अपस्सतो पाय से कम्मे कज्जति, से तं सन्निदिट्ठते । व्याख्या - यद्यपि सर्वेषु जीवेषु देशकालस्वभावविप्रकृष्टेषु वधकचितं नोत्पद्यते तथाप्यसावविरतिप्रत्ययत्वा तेष्वमुक्तवैर Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दीपिका 4 एयगडाग- II एव कथ्यते, अस्य चार्थस्य सुखप्रतिपत्तये भगवता द्वौ दृष्टान्तौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा-संझिदृष्टान्तोऽसंझिदृष्टान्तश्च । अथ कोऽयं II द्वितीये सूत्रं संज्ञिदृष्टान्तः ? ये केचन इमे संज्ञिन: पंचेन्द्रियाः पर्याप्तकाः, एषां च मध्ये कश्चिदेकः षड्जीवनिकायान् प्रतीत्यैवम्भूतां श्रुत 'प्रतिज्ञा' नियमं कुर्यात् , यथाऽहं षड्जीवनिकायमध्ये पृथिवीकायेनैवैकेन वालुकाशिलोपललवणादिस्वरूपेण 'कृत्यं' चतुर्थान्वितम् । कार्य कुर्या, स चैवं कृतप्रतिक्षस्तेन तस्मिस्तस्माच्च तं करोति कारयति च, शेषकायेभ्योऽहं विनिवृत्तः, तस्य च कृतनियमस्यै- ध्ययने वम्भूतो भवत्यध्यवसाय:-खल्वहं पृथिवीकायेन कृत्यं करोमि कारयामि [च], तस्य च सामान्यकृतप्रतिज्ञस्य विशेषा- आचार्येणा॥ ९८॥ भिसन्धि व भवति, यथाऽहं कृष्णेन वा श्वेतेन वा पृथिवीकायेन कार्य करोमि [ कारयामि च], सामान्येन वचसाऽहं विचारपृथिवीकायारम्भ करिष्यामि एवं स सर्वस्मात्पृथ्वीकायादनिवृत्तोऽप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा भवति, तत्र सर्वत्र पृथिवीकाये मनो. खननस्थाननिषीदनत्वग्वर्तनोच्चारप्रश्रवणादि[करण ]क्रियासद्भावात्सर्वस्मात्पृथिवीकायादनिवृत्तत्वात् , एवमप्तेजोवायुवन- वाकाय. स्पतिष्वपि वाच्यं, तत्राप्कायेन स्नानपानावगाहनभाण्डोपकरणधावनादिपूपयोगः, तेजस्कायेनापि [पचनपाचनवितापन- वाक्यस्य प्रकाशनादिषु, वायुनाऽपि ] व्यजनतालवृन्तोत्पादितव्यापारादिषु प्रयोजनं, वनस्पतिनाऽपि-कन्दमूलफलपत्रत्वशाखायुप- कर्मवन्धे योग, एवं विकलेन्द्रिय-पश्चेन्द्रियेष्वप्यायोज्यम् । तथैकः कश्चित् षट्स्वपि जीवनिकायेष्वविरतोऽसंयतत्वाच्च तैरसौ 'कार्य' सावद्यानुष्ठानं स्वयं करोति कारयति च परैस्तस्य च क्वचिदपि निवृत्तेरभावादेवम्भूतोऽध्यवसायो भवति, तद्यथा-एवं खत्वह द्वयोपषड्भिरपि जीवनिकायैः सामान्येन कृत्यं करोमि, न पुनस्तद्विशेष प्रतिज्ञेति, स च तेषु षट्स्वपि जीवनिकायेष्वसंयतोऽप्रति न्यासः। हतप्रत्याऽख्यातपापकर्मा भवति । एवमष्टादशपापस्थानकेष्वप्यायोज्यम् । तदेवमसौ हिंसादीन्यकुर्वन्नपि अविरतत्वाच दृष्टान्त Jain Education in For Private & Personal use Ooh viwwEjainelibrary.org Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रत्ययिक कर्म बद्ध्नाति । एवं देशकालस्वभावविप्रकृष्टेष्वपि जन्तुषु अविरतत्वादमित्रभूतो भवति तत्प्रत्ययिकं च कर्माऽचि. नोति, सोऽयं संझिदृष्टान्तोऽभिहितः, स च कदाचिदेकमेव पृथ्वीकार्य व्यापादयति शेषेषु निवृत्तः, कदाचिद् द्वावेवं त्रिका| दिकाः संयोगा मणनीयाः, पावत्सर्वानपि व्यापादयतीति । स सर्वेषां व्यापादकत्वेन व्यवस्थाप्यते, सर्वविषयारम्भप्रवृत्तेः, यथा कश्चिद्वामघाताय प्रवृत्तः, यद्यपि च तेन विवक्षितकाले केचन पुरुषा न दृष्टास्तथाप्यसौ ततोऽनिवृत्तत्वात्तद्घातक इत्युच्यते, एवं जीवोऽप्यविरतत्वात् प्राणातिपातमृषावादादत्तमैथुनपरिग्रहक्रोधमानमायालोमादिकमकुर्वन्नपि तत्कर्माऽचिनोति, अष्टादशपापस्थानान्यकुर्वतोऽपि कर्मबन्धः स्यादविरतत्वादिति भावः । इति संज्ञिदृष्टान्तः, अधुना असंज्ञिदृष्टान्तः कथ्यते से किं तं असन्निदिटुंते ? जे इमे असन्निणो पाणा, तं जहा-पुढविकाइया जाव वणस्सइकाइया छट्ठा वेगतिया तसा पाणा, जेसिं णो तक्काइ वा सन्नाति वा पन्नाति वा मणेति वा वईति वा सयं वा करणाए अन्नहिं वा कारावित्तए करतं वा समणुजाणित्तए, तेवि णं बाला सव्वर्सि पाणाणं जाव सोसि सत्ताणं दिया वा राओ वा सुत्ता वा जागरमाणा वा अमित्तभूता मिच्छासंठिया निच्चं पसढविउवातचित्तदंडा, तं० पाणाइवाए जाव मिच्छादसणसल्ले । इच्छेवं [ जइवि] जाव (?) नो चेवणं मणे नो चेव गंवई [ तहवि ] पाणाणं जाव सत्ताणं दुक्खणयाए सोयणयाए Jain Education a l For Privats & Personal use on ASTwwwEjainelibrary.org Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत. चतुर्था न्वितम् । ध्ययने ऽव्यक्तविज्ञाना सूबगडाङ्ग 9 जूरणयाए तिप्पणयाए पिट्टणयाए परितप्पणयाए ते दुक्खण-सोयण जाव परितप्पणवहबंधण परिकिलेसाओ अप्पडिविरता भवति । दीपिका व्याख्या-'से किं तं असनिदिटुंते' इत्यादि, 'असंज्ञिनो' मनोविकला: सुप्तमत्तमूञ्छितादिवत् , ये इमे अ. संझिनः पृथिवीकायिका: यावद्वनस्पतिकायिकास्तथा षष्ठा अप्येके त्रसाःप्राणिनो विकलेन्द्रियाः यावत्सम्मृच्छिमपञ्चेन्द्रियास्ते ॥ ९९॥ सर्वेऽप्यसंझिनो, येषां नो 'तक्कों' विचारो मीमांसाविशिष्टविमर्शो विद्यते, यथा-कस्यचित्संज्ञिनो मन्दमन्दप्रकाशे स्थाणु पुरुषोचिते देशे किमयं ? स्थाणुरुत पुरुष इत्येवमात्मक ऊह-स्तर्कः सम्भवति, नैवं तेषामसंज्ञिनां तर्कः सम्भवतीति । तथा 'संज्ञा' पूर्वोपलब्धेऽथें तदुत्तरकालपर्यालोचनं, सा संज्ञा येषां नास्ति, तथा 'प्रज्ञा' बुद्धिः-साऽपि नास्ति, तथा मनस्तथा वाकवचनं, साऽपि न विद्यते, तथा स्वयं करोमि अन्यैर्वा कारयामीत्येवम्भूतोऽध्यवसायो नास्ति, तेऽप्यसंज्ञिनो बालबद्वाला दिवा रात्रौ [वा] सुप्ता जाग्रदवस्था वा सर्वजीवानाममित्रभूता उच्यन्ते, विरतेरभावात् । एवमष्टादशपापस्थानकेष्वप्यायोज्यन्ते । असंझिनो हि विरतेरमावादविरताः, अविरतत्वाच्च कर्मणां बन्धका एवेति । यद्यप्यसंज्ञिनो [ विशिष्ट ] मनो | व्यापाररहितास्तथाऽपि सर्वप्राणिनां दुःखोत्पादनतया तथा शोचनतया-शोकोत्पादनतया तथा जूरणतया-बयोहानिरूपया तथा 'तिप्पणयाए' त्रिभ्यो मनोवाक्कायरूपेम्यः पातनं त्रिपातनं, तद्भावस्तया, यदि वा 'तिप्पणयाए'त्ति परिदेवनतया तथा 'पिट्टणयाए 'मुष्टिलोष्टादिप्रहारेण तथा [ तथाविध] परितापनतया-बहिरन्तश्च पीडया, ते चासंज्ञिनो मपि NTANोपलब्धेऽनरुत पुरुष इत्येवमाशष्टविमर्शो विद्यते कर्मवन्धे संज्ञिदृष्टान्तवर्णनम् । ॥९९ Jain Education a For Privista l की personal UE O wwwEjainelibrary.org Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यद्यपि देशकालस्वभावविप्रकृष्टानां, न सर्वेषां दुःखमुत्पादयन्ति तथापि विरतेरभावात्तत्प्रत्ययिकेन कर्मणा वध्यन्ते. तदेवं विप्रकृष्टविषयेऽपि बन्धकाः स्युरविरतत्वात् । अथोपसंजिहीर्षुराह इति___ इति खलु ते असन्निणो वि सत्ता अहोनिसं पाणातिवाए उवक्खाइजंति, जाव अहोनिसं परिग्गहे उक्खाइजति जाव मिच्छादसणसल्ले उवक्खाइजति । | व्याख्या-'इति खलु' इह खलु ये इमे पृथिवीकायादयोऽसंज्ञिनः प्राणिनस्तेषां न तों न संज्ञान प्रज्ञा न मनो न वाक [1] स्वयं कत नान्येन कारयितुं न कुर्वन्तमनुमन्तुं वा प्रवृत्तिरस्ति, ते चाहर्निशममित्रभूता मिथ्यासंस्थिता नित्यं प्रशठव्यतिपातचित्तदण्डा दुःखोत्पादनं यावत् परितापनपरिक्लेशादप्रतिविरता, असंझिनोऽपि सन्तोऽहर्निशं प्राणातिपाते कर्तव्ये तद्योग्यतया तदसम्प्राप्तावपि ग्रामघातकबदुपाख्यायन्ते-कथ्यन्ते, यावन्मिथ्यादर्शनशल्ये उपाख्यायन्ते, एतावता असंजिनामपि प्राणिनां किमप्यकुर्वतामपि अविरतत्वात्पापकर्मवन्धो जायत इति भावः । तदेवं दृष्टान्तद्वयं प्रदर्य तत्प्रतिबद्धमेवाऽर्थशेष प्रतिपादयितुं शिष्यः प्रश्नं करोति-किमेते सच्चाः संज्ञिनोऽसंजिनश्च भव्याभव्यत्ववन्नियतरूपा एवाहोस्थित संज्ञिनो भूत्वा असंज्ञित्वं प्रतिपद्यन्ते असंज्ञिनोऽपि संज्ञित्वमित्येवं शिष्येण प्रतिपादिते सत्याहाचार्य:___सव्वजोणिया वि खलु सत्ता सन्निणो हुच्चा असन्निणो हुंति असन्निणो हुचा सन्निणो हुंति । होच्चा सन्नी अदुवा असन्नी। Jain Education in T Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत सूयगडाङ्ग सूत्रं | दीपिकान्वितम् । चतुर्था ॥१० ॥ व्याख्या-ये वेदान्तवादिनो वादिनस्ते एवं प्रतिपादयन्ति 'पुरुषः पुरुषत्वमेवाश्नुते पशुरपि पशुत्वमेवेति, तदत्रापि संज्ञिनः संजिन एव भविष्यन्ति असंज्ञिनोऽपि असंजिन इति, तन्मतव्यवच्छेदार्थमाह- सव्वजोणिया वी 'त्यादि, यदि वा किं संझिनोऽसंज्ञिकर्मसम्बन्धं प्राक्तने कर्मणि सत्येव कुर्वन्ति ? किंवा नेत्येवमसंज्ञिनोऽपि संज्ञिकर्मबन्धन प्राक्तने सत्येव कुर्वन्त्याहोस्विन्नेत्येतदाशङ्कथाह-'सब्बजोणिया वी 'त्यादि, सर्वा योनयो येषां ते सर्वयोनयः, संवृत्तविवृत्तोभय-शीतोप्पोमय-सचित्ताचित्तोमयरूपयोनय इत्यर्थः। सर्व योनयोऽपि खलु सत्त्वाः पर्यायपेक्षया यावन्मनःपर्याप्तिन निष्पद्यते तावदसंझिनः करणतः सन्तः पश्चात्संज्ञिनो भवन्ति एकस्मिन्नेव जन्मनि, अन्यजन्मापेक्षया त्वेकेन्द्रियादयोपि सन्तः पश्चान्मनुष्यादयो भवन्तीति, तथाभूतकर्मपरिणामात् , न पुनर्भव्यामव्यत्ववद्व्यवस्थानियमो, भन्याभव्यत्वे हि न कर्मायत्ते, अतो नानयोर्व्यभिचारः । ये पुनः कर्मवशगास्ते संज्ञिनो भूत्वाऽन्यत्रासंझिनो भवन्ति, असंज्ञिनश्च भूत्वा संज्ञिन इति । वेदान्तवादिमतस्य तु प्रत्यक्षेणैव व्यभिचारः समुपलभ्यते, तथाहि-संश्यपि कश्चिन्मूर्छाद्यवस्थायामसंज्ञित्वं प्रतिपद्यते | मूपगमे पुनः संज्ञित्वमिति, जन्मान्तरे तु सुतरां व्यभिचारः, तथा प्रबुद्धो निद्रोदयात्स्वपिति सुप्तश्च प्रतिबुध्यते, एवं | स्वापप्रबोधावस्था एकस्मिन्नेव भवे जीवस्य जायते, एवं संज्ञित्वमसंज्ञित्वमप्येकस्मिन्नेव भवे जन्तोरविरुद्धमिति । एवं परभवेऽपि संश्यसंझी स्यादसंज्ञी च संज्ञी स्यात् । तथा पुरुषो देवत्वं देवश्च पुरुषत्वमित्येवं सर्वत्र योज्यम् । तत्थ से अविवि[चित्ता अविधूणिचा असंमुच्छित्ता अणणुतावित्ता असनिकायाओ [वा] ध्ययनेऽसज्ञीनां संक्षिसज्ञीनां चासंक्षिभवन Jain Education in Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - (संज्ञिकायात् ) सन्निकार्य संकर्मिति ( संक्रामन्ति ) १, सन्निकायाओ [वा ] असन्निकायं संकर्मिति २, सन्निकायाओ [ वा ] सन्निकायं संकर्मिति ३, असन्निकायाओ [वा ] असन्निकायं संकर्मिति ४ । व्याख्या-तत्र प्राक्तनं कर्म यदुदणं यच्च बद्धमास्ते, तस्मिन् सत्येव तत्कर्म 'अविविच्य' अपृथक्कृत्य तथाऽविधूयाऽसमुच्छिद्याननुताप्य तदेवमपरित्यक्तकर्माणोऽसंचिकायात्संज्ञिकाय सङ्कामन्ति तथा संज्ञिकायादसंशिकायमिति [संज़िकायासंज्ञिकार्य असंज्ञिकायादसंशिकायं ] | त[य]था नारकाः-सावशेषकर्माण एवं नरकादुनृत्य प्रतनुवेदनेषु तिर्यसूत्पद्यन्ते, एवं देवा अपि प्रायस्तत्कर्मशेषतया शुभस्थाने त्पद्यन्त इत्यवगन्तव्यम् । अत्र चतुर्भङ्गिका सूत्रेणैव दर्शिता । जे एए सन्नी वा असन्नी वा सवे ते मिच्छायारा[ निच्चं ]पसढविउवातचित्तदंडा, तं जहापाणातिवाते वा जाव मिच्छादसणसल्ले । ___ व्याख्या-सर्वेऽप्येते संझिनोऽसंज्ञिनो वा मिथ्याचारा, अप्रत्याख्यानित्वादित्यभिप्रायः, सर्वजीवेष्वपि नित्यं प्रशठ व्यतिपातचित्तदण्डा भवन्तीत्येवम्भूताश्च प्राणातिपातायेषु सर्वेष्वप्याश्रवद्वारेषु वर्तन्त इति । तदेवं व्यवस्थिते यदुक्तं परेण तद्यथा-' इहाविद्यमानाऽशुभयोगसम्मवे कथं पापकर्म बध्यते ?' इत्येतन्निरस्तं, विरतेरभावादकुर्वतामपि पापं लगत्येवेति भावः। For P Jan Education & Personal use only Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रुत सूयगडा सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥१०१ पम्येन एवं खलु भगवया अक्खाए-असंजए अविरए अप्पडिहयपच्चक्खायपावकम्मे सकिरिए । द्वितीये असंवुडे एगंतदंडे एगंतवाले एगंतसुत्ते, से बाले अवियारमणवयणकायवक्के सुविणमवि ण पासइ पावे य से कम्मे कजति । [ सू० ४] चतुर्थाव्याख्या-एवं ' भगवता' तीर्थकताऽऽख्यातमित्यादि यत्प्राइप्रतिज्ञातं तदेवास्मिन् सूत्रालापके दर्शितं, व्याख्यानं ध्ययने प्राग्वत ज्ञेयमिति, पापं च कर्म लगत्येव । तदेवमप्रत्याख्यानिनः कर्मसम्भवात्तत्सम्भवे च नारकतिर्यङ्नरामरगति आत्मौ . लक्षणं संसारमवगम्य संजातवैराग्यः शिष्यः आचार्य प्रति प्रवणचेताः प्रश्नयितुमाह सर्वजीवान् चोयगः-से किं कुत्वं किं कारवं कहं संजयविरयपडिहयपच्चक्खायपावकम्मे भवति ? । पश्यतः व्याख्या-शिष्यः प्राह-भगवन् ! किमनुष्ठानं स्वतः कुर्वन् ? किं वा परं कारयन् ? केन प्रकारेण संयतविरतप्रति कर्मबन्धाहतप्रत्याख्यातपापकर्मा जन्तुर्भवति ? इत्येवं पृष्टे सत्याचार्य आह मावतत्थ खल भगवया छज्जीवनिकाया हेऊ पन्नत्ता, [तं जहा-] पुढविकाइया जाव त- वर्णनम् । सकाइया, से जहा नामए ममं अस्सातं दंडेण वा अट्ठीण वा मुट्ठीण वा लेलूएण वा कवालेण IP वा आतालिज्जमाणस्स वा जाव उद्दविजमाणस्स वा लोमुक्खणणमायमावि हिंसाकारगं दुक्खं भयं ॥११॥ Jain Education T Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पडिसंवेदेमि, इच्चेवं जाण सत्वे पाणा जाव सवे सत्ता दंडेण वा जाव कवालेण वा आताडिज्जमाणा वा उवहम्ममाणा वा तजिज्जमाणा वा ताडिजमाणा जाव उवहविजमाणा वा जाव लोमुक्खणणमायमवि हिंसाकारकं दुक्खं भयं पडिसंवेदिति । एवं नच्चा सवे पाणा [जाव सवे सत्ता] न हंतवा जाव न उद्दवेयत्वा, एस धम्मे सुद्धे धुवे नितिए सासए समिञ्च लोगं खेदन्नहि पवेइए। IN ___व्याख्या-तत्र खलु भगवता षड्जीवनिकायाः संयमसद्भावे हेतुत्वेनोपन्यस्ताः, यथा प्रत्याख्यानरहितस्य षड्जीवनिकायाः संसारगतिनिबन्धनत्वेन कथिताः एवं त एवं प्रत्याख्यानिनो मोक्षाय भवन्तीति, तथा चोक्तम्-"xजे जत्तिया य हेऊ, भवस्स ते चेव तत्तिया मोक्खे | गणाणाईया लोगा, दोण्हवि पुण्णा भवे तुल्ला ॥१॥" इदमुक्तं भवति-यथाऽऽत्मनो दण्डाद्युपघाते दुःखमुत्पद्यते एवं सर्वेषामपि प्राणिनामित्यात्मोपमया तदुपघातानिवर्त्तते, एष धर्मः सर्वापायताणलक्षणो ध्रुवो नित्यः शाश्वतः परैः कचिदप्यस्खलितो युक्तिसङ्गतत्वात् । अयं च धर्मः सम्यक्शुद्ध इत्यवगम्य लोकं चतुर्दशरज्ज्वात्मकं खेदःप्रवेदितः। एवं से भिक्खू विरते पाणाइवायाओ जाव मिच्छादंसणसल्लाओ, से भिक्खू णो दंतपक्खाx ये यावन्तश्च हेतवो भवस्य ते तावन्तश्चैव मोक्षस्य । गणनातिगा लोका द्वयोरपि पूर्णा भवेयुस्तुल्याः॥१॥ Jain Education a l For PrivatesPersonal use Only IN Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये सूयगडाज सूत्रं । श्रुत. चतुर्था दीपिकान्वितम् । लणेणं दंते पक्खालेज्जा, नो अंजणं नो वमणं नो धू[ वणित्तं ]मणत्तं पि आ[इते]दत्ते, से भिक्खू अकिरिए अलूसए अकोहे जाव अलोभे उवसंते परिनिव्वुडे, एस खलु भगवया अक्खाए संजयविरयपडिहयपञ्चक्वायपावकम्मे, अकिरिए संवुडे एगंतपंडिए यावि भवति तिमि । [सू० ५] । बीयसुयक्खंधस्स चउत्थं पञ्चक्खाणकिरियानाम अज्झयणं, समत्तं । व्याख्या-एवं स मिक्षु-निवृत्तः सर्वाश्रवद्वारेभ्यो दन्तप्रक्षालनादिकाः क्रिया अकुर्वन् सावधक्रियाया अभावादक्रियोऽक्रियत्वाच्च प्राणिनामलूषकोऽव्यापादको यावदेकान्तेनैवासौ पण्डितो भवति । इतिः परिसमाप्त्यर्थे, ब्रवीमीति पूर्ववत् । ध्ययनेऽक्रियादि| साधुगुण ॥१०२॥ वर्णनम् ।। इति श्रीपरमसुविहितखरतरगच्छविभूषणपाठकप्रवरश्रीमत्साधुरङ्गगणिवरगुम्फितायां श्रीसूत्रकृताङ्ग दीपिकायां द्वितीय श्रुतस्कन्धे समाप्तं प्रत्याख्यानक्रियारूयं चतुर्थमध्ययनमिति ॥ ४॥ Leeeeee 99900 ॥ १०२।। PEPO Jan Education Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education अथ पञ्चममाचारश्रुताध्ययनम् ܬ साम्प्रतं पञ्चममारभ्यते, तत्रेयमादिगाथा - आदाय बंभचेरं च, आसुपने इमं वयं । अस्तिँ धम्मे अणायारं, नायरेज कयाइ वि ॥ १ ॥ व्याख्या -' आदाय ' गृहीत्वा किं तद् ब्रह्मचर्यं सत्य भूतदया-तप इन्द्रियनिरोधलक्षणं एतन्मौनीन्द्र प्रवचने ब्रह्मचर्यमित्युच्यते, तदादाय 'आशुप्रज्ञः सदसद्विवेकज्ञः 'इमां' समस्ताध्ययनेनाभिधीयमानां वाचं[ इदं जगत् ] शाश्वतमेव शाश्वतमेव वा इत्यादिकां कदाचिदपि 'नाचरेत् ' न कथयेत् तथाऽस्मिन्धम्र्मे सर्वज्ञप्रणीते व्यवस्थितः सन् अनाचार - सावद्यानुष्ठानरूपं 'न समाचरेत् ' न विदध्यात् यदि वा केवलिप्रणीते धर्मे व्यवस्थितः 'इमां ' वक्ष्यमाणां वाचमनाचारं च कदाचिदपि नाचरेदिति श्लोकार्थः ॥ १ ॥ अथाचार्योऽनाचारं दर्शयितुं यथावस्थित लोकस्वरूपप्रकटनपूर्वकमाह अणादीयं परिन्नाय, अणवदग्गेति वा पुणो । सासयमसासए वा इति दिट्ठि न धारए ॥ २ ॥ व्याख्या - चतुर्दशरज्वात्मकं लोकमनादिकमनवद[ - अनन्तं] च परिज्ञाय - अपर्यवसानं च ज्ञात्वा शाश्वतमशाश्वतं वा इत्येकान्तेन न वदेत् इत्येवम्भूतां दृष्टिं न धारयेत्, पण्डितस्त्वेकान्तेन शाश्वतमेवाश्शाश्वतमेव लोकं न वदेदिति गाथाऽर्थः ||३|| १८ • Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग द्वितीये N श्रुत दीपिकान्वितम् । ॥१.३॥ पञ्चमाध्ययनेनारचारोपदर्शनम् । किमित्येकान्तेन न वदेदित्याह एएहिं दोहिं ठाणेहिं, ववहारो ण विजई। एएहिं दोहिं ठाणहिँ, अणायारंतु जाणए ॥३॥ व्याख्या-अयं लोको नित्य एवानित्य एव वा, अथवा सर्व वस्तु नित्यमेवानित्यमेव वा, एताभ्यां स्थानाभ्यामभ्युपगम्यमानाभ्यां अनयोर्वा पक्षयोर्व्यवहारो लोकस्यैहिकामुष्मिकयोः कार्ययोः प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणो न विद्यते, एतावता | एकान्तपक्ष नाश्रयेत् , एकान्तपक्षाश्रयणं त्वनाचारः, स्याद्वादपक्षाश्रयणं वाचार इति । अत्र हेतुयुक्तयो बृहट्टीकातोऽत्रसेया, अत्र तु संक्षेपेण सूत्रार्थस्यैव प्रकाशनमिति गाथार्थः ॥ ३॥ तथाऽन्यमप्यनाचारं निषेद्धकाम आहसमुच्छिहिंति सत्थारो, सव्वे पाणा अणेलिसा। गंठिगावा भविस्संति, सासयंतिवणो वए ॥४॥ व्याख्या-सम्यनिरवशेषतया उच्छेत्स्यन्ति' उच्छेदं यास्यन्ति-क्षयं यास्यन्ति यदिवोच्छेत्स्यन्ति-सिद्धिं यास्यन्ति, के ते? शास्तार-स्तीर्थकरास्तच्छासनप्रतिपमा वा 'सर्वे' निरवशेषाः सिद्भिगमनयोग्या भव्याः, ततश्चोत्सन्नमव्यं जगत्स्यादिति, अत्र शुष्कतर्काभिमानग्रहगृहीता युक्ति प्रकाशयन्ति-जीवसद्भावे सत्यप्यपूर्वोत्पादाभावात् अभव्यस्य च सिद्धिगमनासम्भवात् कालस्य चानन्त्यात् निरन्तरं सिद्धिगमनसम्मवेन तद्वययोपपत्तेरपूर्वभव्यजीवोत्पत्तेरभावाद्भन्योच्छेद इत्येवं नो वदेव , तथा सर्वेऽपि प्राणिनः 'अनीदृशाः' न सदृशाकाराः सन्तीत्येवमपि नो वदेत् । तथा प्रन्थिकाः सञ्चा:-सर्वेऽपि १.३॥ Jain Education |www.ininelibrary.org a l Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गोपेता एव भविष्यन्तीत्येवमापा 'ग्रन्थिका' इति नान्यत्येवमपि नो वदेत् ॥ ४ ॥ प्राणिनः कर्मग्रन्थोपेता एव भविष्यन्तीत्येवमपि नो वदेत् । इदमुक्तं भवति-सर्वेऽपि प्राणिनः सेत्स्यन्त्येव कर्मावृता वा सर्वे भविष्यन्तीत्येवमेकमपि पक्षमेकान्तिकं नो वदेत् । यदि पा ' ग्रन्थिका' इति ग्रन्थिभेदं कर्तुमसमर्था भविष्यन्तीत्येवं ।। च नो वदेव , तथा शाश्वताः]स्तारः सर्वकालस्थायिनस्तीर्थकरा भविष्यन्ति, नोच्छेदं यास्वन्ति इत्येवमपि नो वदेत् ॥ ४॥ ___ तदेवं दर्शनाचारवादनिषेधं वाङ्मात्रेण प्रदर्याधुना युक्तिं दर्शयितुमाहएएहिं दोहि ठाणेहि, पवहारो ण विजती। एएहिं दोहिं ठाणेहि, अणायारं तु जाणए ॥५॥ ___व्याख्या-सर्वे शास्तारः क्षयं यास्यन्ति शाश्वता वा भविष्यन्तीति, यदि वा सर्वे शास्तारस्तदर्शनप्रपन्ना[वा] सेत्स्यन्ति, शाश्वता वा भविष्यन्ति, यदि वा सर्वे प्राणिनो विसदृशाः सदृशा वा, तथा ग्रन्थिकसचास्तद्रहिता वा भविष्यन्तीत्येवमनयोर्द्वयोः स्थानयोर्व्यवहारो न विद्यते, तथाहि-'सर्वे शास्तारः क्षयं यास्वन्ती 'त्येतदयुक्तं, क्षयनिवन्धनस्य कर्म: णोऽभावात् सिद्धानां क्षयाभावः, [अथ]भवस्थ केवल्यपेक्षया चेदभिधीयते तदप्ययुक्तं, यतोऽनाद्यनन्तानां केवलिनां सद्भावात् , भरतेषु केवलिनां विरहे महाविदेहेषु सर्वदा केवलिसद्भावः । तथा सर्वेऽपि भव्याः सेत्स्यन्तीत्येतदपि न स्यात् , यतः श्रीभगवत्या जयन्तीप्रश्नाधिकारे "सव्वे विणं भंते! भवसिद्धिया जीवा सिज्झिस्संति ?" भगवानाह -"हंता जयंती! भवसिद्धिया जीवा सिन्झिस्संति xxx भवसिद्धियविरहिए लोए भविस्सह? नो इणमढे समढे" इत्यादि. भगवदुक्तवचनप्रामाण्याव्यजीवविरहितं जगन भविष्यति, युक्तिश्चात्र भगवतीवृत्तितोऽनसेया, तथा च "जया होही Jan Education inte For Privats & Personal Use Oh BYNEjainelibrary.org Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग- छत्रं दीपिकान्वितम् । ॥१०४॥ पुच्छा, जिणंदपासंमि उत्तरं तइया । इक्कस्स निगोयस्स, अणंत भागो य सिद्धिगओ ॥ १॥" इति वचनात् सर्वेऽपि न सेत्स्यन्ति, न भव्यजीवविरहितं जगद्भविष्यति । न सिद्धिक्षेत्रं पूर्ण भविष्यति । सिद्धिं च निरन्तरमेव प्रयास्यन्ति, अतो " तमेव सचं नीसंकं, जिणेहिं पवेड्यं" इति वचनादेकान्तपक्ष नाश्रयेत् । अथ शाश्वतत्वमपि शास्तृणां न प्ररूपयेत् , यतस्तेषामपि सिद्धिगमनसद्भावादशाश्वतत्वमिति, अत एकान्तेनाशाश्वतत्वपक्षमपि न श्रयेत् । तथा सर्वेऽपि प्राणिनः चित्रकर्मसद्भावान्नानागतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गादिभिभिन्नत्वात् विशदृशास्तथोपयोगासङ्ख्येयप्रदेशत्वामूर्तत्वादिधमैः कथश्चित् सदृशा इति । तथोल्लसितसवीर्यतया केचिद्भिन्नग्रन्थयोऽपरे च तथाविधपरिणामाभावाद्वन्धिकसत्वा एवं भवन्तीत्येवं व्यवस्थिते नैकान्तपक्षो भवतीति निषिद्धः, तदेवमेतयोरेव द्वयोः स्थानयोरुक्तनीत्याऽनाचारं विजानीयादिति स्थितम् । अपि चागमेऽनन्तानन्तास्वप्युत्सर्पिण्यवसर्पिणीषु भव्यानामनन्तभाग एवं सिद्ध्यतीत्ययमर्थः प्रतिपाद्यते, यदा चैवम्भूतं तदानन्त्यं, तत्कथं तेषां क्षयः । युक्तिरप्यत्र-सम्बन्धिशब्दावेतौ, मुक्तिः संसारं विना न भवति संसारोऽपि न मुक्ति| मन्तरेण, ततश्च भव्योच्छेदे संसारस्याप्यभावः स्यादतोऽभिधीयते-नानयोर्व्यवहारो युज्यत इति ॥ ५॥ अधुना चारित्राचारमङ्गीकृत्याहजे केइ खुड्डुगा पाणा, अदुवा संति महालया । सरिसं तेहिं वेरंति, असरिसंती य नो वदे ॥ ६ ॥ व्याख्या-ये केचन क्षुद्राः प्राणिनः एकेन्द्रियद्वीन्द्रियादयोऽल्पकाया वा पश्चेन्द्रिया, अथवा 'महालया' महाकाया द्वितीये श्रुत पश्चमाध्ययने दर्शनचारित्राचारविषयकमनाचारम-1 S १०४॥ For P Jan Education www.ininelibrary.org & Personal use only Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education I हस्त्यश्वादयः अल्पकायाः- कुन्ध्वादयः, तेषां व्यापादने सदृशं (विसदृशं वा ) वैरमिति एवं (एकान्तेन ) नो वदेत्, यतः बन्धोऽपि अध्यवसायवशाद्भवति, तीव्राध्यवसायिनोऽल्पकाय सच्वव्यापादनेऽपि महान् बन्धः, अकामस्य अनाभोगादिना महाकाय व्यापादनेऽपि स्वल्पमिति गाथार्थः ॥ ६ ॥ एएहिं दोहिं ठाणेहिं, ववहारो न विजई। एएहिं दोहिं ठाणेहिं, अणायारं तु जाणए ॥ ७ ॥ व्याख्या - आभ्यामेव स्थानाभ्यां अनयोर्वा स्थानयोर्महाकायालय कायव्यापादने कर्मबन्धः सदृशः असदृशो वा एतयोः स्थानयोर्व्यवहारो न विद्यते, निर्मुक्तिकत्वान्न युज्यते । एतयोरेव स्थानयोः प्रवृत्तस्थानाचारं विजानीयात् यतो - नहि जीवव्यापत्या हिंसोच्यते, जीवस्य शाश्वतत्वेन व्यापादयितुमशक्यत्वात्, अपि विन्द्रियादिव्यापच्या हिंसा स्यात्, तथा चोक्तं" पञ्चेन्द्रियाणि त्रिविधं बलं च, उच्छासनिश्वासमधान्यदायुः । प्राणा दशैते भगवद्भिरुक्तास्तेषां वियोजीकरणं तु हिंसा ॥ १ ॥ " अपि च हिंसा चतुर्धा, एका द्रव्यतोऽपि भावतोऽपि १, एका द्रव्यतो न भावतः २, एका भावतो हिंसा न द्रव्यतः ३, एका न द्रव्यतो न भावतः ४, अयमेको भङ्गः शुद्धः, अबन्धकत्वाद्, द्वितीयो भङ्गः जातेऽपि द्रव्यतः प्राणिवधे स्वल्पः कर्मबन्धः, भावतः परिणामस्य शुद्धत्वात् । भावसहितस्यैव कर्म्मबन्धोऽभिहितः, तथाहिवैद्यस्यागमानुसारेण सम्यक्रियां कुर्व्वतोऽपि पद्यातुरविपत्ति मंत्रति तथापि न वैरानुषङ्गो भवेद्दोषाभावात् । अपरस्य तु सर्पबुद्ध्या रज्जुमपि तो भावदोषात् कर्मबन्धः, यतः - " उच्चा लियंमि पाए, इरियासमियरस संकमट्ठाए । वावज्जेज्ज कुलिंगी, Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रुत. सूपनडा पत्रं दीपिकान्वितम् । पश्वमाध्ययने ऽहिंसकत्वं यतनायुतस्य। ॥१०५॥ मरिज तज्जोगमासज्ज ॥१॥ न य तस्स तन्निमित्तो, बंधो सुहुमो वि देसिओ समए । अणवजे य पओगे, ण सव्वभावेण सो जम्हा ॥२॥ अज्झत्थविसोहिए, जीवनिकाएहिं संघ(डे)डो लोए । देसियमहिंसयत्तं, जिणेहिं तेलोकदसीहिं ॥ ३ ॥ नाणी कम्मस्स खयट्ठ-मुट्टिओ नोठिओ य हिंसाए । जयइ असद अहिंस(स्थ)-मुडिओ अवहओ सो उ॥ ४ ॥ तस्स असंचयओ सं-चयओ(य) जाई सत्ताई। जोगं पप्प विणस्संति, नत्थि हिंसाफलं तस्स ॥५॥ जो य पमत्तो पुरिसो, तस्स य जोगं पडुच्च जे सत्ता । वाविजंते नियमा, तेसिं सो हिंसओ होइ ॥ ६ ॥ जे विन वाविजंती, नियमा तेसि पि हिंसओ होई । सावज्जो य पओगेण, सव्वभावेण सो जम्हा ।। ७ ।। आया चेव अहिंसा, आया हिंसत्ति निच्छओ एसो । जो होइ अप्पमत्तो, अहिंसओ हिंसओ इयरो॥८॥ जो य पओगं जुजइ, हिंसत्थं जो य अन्नभावेण । अमणो य जोपउंजह, इत्थ विसेसो महं वुत्तो॥९॥ हिंसत्थं झुंजतो, सुमहं दोसो अप्प]णत्तरं इयरो। अमणो य अप्पदोसो, जोगनिमित्तं च विन्नेओ॥ १०॥ रत्तो वा मूढो वा, जो पउंजइ पओगं । हिंसा वि तत्थ जायइ, तम्हा सो हिंसओ बुत्तो॥ ११॥ न य हिंसामित्तेणं, सावजेणावि हिंसओ होई । सुद्धस्स य संपत्ती, अफला भणिया जिणवरेहिं॥ १२ ॥ जा जयमाणस्स भवे, विराहणा सुत्तविहिसमग्गस्स । सा होइ निजरफला, अज्झत्यविसोहिजुत्तस्स ॥१३॥” अत्र पूर्वोक्तचतुर्भङ्गिकामध्ये प्रथमतृतीयभङ्गावशुद्धौ, शेषौ शुद्धौ, इत्यलं विस्तरेण । एतावता महत्प्राणीवघे अल्पकायसवव्यापादने च सदृशं वैरं सदृशः कर्मवन्धः इत्येवं नो वदेत् इति गाथार्थः ॥७॥ ।१०५॥ Jan Education ! For Private & Personal Use Oly Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अथ पुनरपि चारित्रमधिकृत्याहारमधिकृत्याचारानाचारौ प्रतिपादयितुकाम आहअहाकम्माणि भुंजंति, अन्नमन्ने सकम्मुणा। उवलित्तेति जाणिज्जा, अणुवलित्तेति वा पुणो ॥८॥ व्याख्या-साधुमाश्रित्य कर्माणि-आधाकर्माणि, तानि च वस्त्रभोजनवसत्यादीनि, एतान्याधाकर्माणि ये भुञ्जन्तेएतरुपभोगं ये कुर्वन्ति 'अन्योऽन्यं' परस्परं तान्स्वकीयेन कर्मणोपलिप्तान विजानीयादित्येवं नो वदेत , [ तथाऽनुपलिप्तानिति वा नो वदेत् ]। एतदुक्तं भवति-अधाकाऽपि श्रुतोपदेशेन शुद्धमिति कृत्वा भुञ्जानः कर्मणा नोपलिप्यते तथा श्रुतोपदेशमन्तरेणाऽऽहारगृङ्ख्या आधाकर्म भुञ्जानस्य तनिमित्तकर्मबन्धसद्भावाद् , अतोऽनुपलिप्तानपि नो वदेत , यथाऽव. स्थितमौनीन्द्रागमज्ञस्य त्वेवं युज्यते वक्तुं-आधाकोपभोगेन स्यारकर्मबन्धः स्यान्नेति, उक्तं च-"किश्चिच्छुद्धं कल्प्य-मकल्प्यं वा स्यादकल्प्यमपि कल्प्यम् । पिण्डः शय्या वस्त्रं, पात्रं वा भेषजाद्यं वा ॥१॥" अतः आधाकर्मणोपलिप्तान् वा अनुपलिप्तान् वा इत्येकान्तेन नो वदेत् ।। ८॥ किमित्येवं स्थाद्वादः प्रतिपाद्यते ? इत्याहएतेहिं दोहिं ठाणेहिं, ववहारो न विजई । एतेहिं दोहिं ठाणेहि, अणायारं तु जाणए ॥९॥ ___ व्याख्या-आभ्यां स्थानाम्यामनयोर्वा स्थानयोराधाकर्मोपभोगेन कर्मबन्ध[भावा]भावभूतयोर्व्यवहारो न विद्यते, तथाहि-श्रुते हि कदाऽपि कस्यामप्यवस्थायामाधाकर्मग्रहणमप्यनुज्ञातमस्ति "सव्वस्थ संजमं सं-जमाओ अप्पाणमेव रक्खिजा । मुच्चइ अइवायाओ, पुणो वि सोही न(त)या (१) विरई ॥१॥" तथा-"संथरणमि असुद्धं, Jain Education Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग- द्वितीये सूत्रं | दीपिका न्वितम् । दुन्ह वि गिण्हंतदितयाणहियं, आउरदिटुंतेणं, तं चेव हियं असंथरणे ॥२॥" तथा च श्रीभगवत्यां"तहारूवं भंते ! समणं वा माहणं वा फासुयएसणिजेणं असण पाणखाइमसाइमेणं पडिलामेमाणस्स किं कजति ? गोयमा! एगंतसो निजरा कजति । तहारूवं समणं वा माहणं वा अफासुएणं अणेसणिज्जेणं असणपाणखाइमसाइमेणं पडिलामेमाणस्स किं कजइ ? गोयमा! बहुतरिया निजरा कजइ अप्पतरे पावे कम्मे कजइ ।" इत्यादिप्रकारेणाधाकाप्यनुज्ञातमस्ति, अतः आधाकम्र्मोपभोगेन कर्मणा लिप्यते इत्येकान्तेन नो वदेत् , नाऽपि तदुपभोगे कर्मबन्धाभाव इत्यपि वदेत , यत:-आधाकर्मणि निष्पाद्यमाने षड्जीवनिकायवधस्तद्वधे च प्रतीतः कर्मबन्ध इत्य[तोऽ]नयोः स्थानयोरेकान्तेनाश्रीयमाणयोर्व्यवहारो न युज्यते, तथाऽऽभ्यामेव स्थानाभ्यामाश्रिताभ्यां सर्वमनाचारं विजानीयादिति स्थितं ॥९॥ पुनरन्यथा दर्शनं प्रति वागनाचारं दर्शयितुमाहजमिदं ओरालमाहारं, कम्मगं च तमेव तं] हेव य। सवत्थ वीरियं अस्थि, नत्थि सव्वत्थ वीरियं ॥१०॥ ___ व्याख्या-औदारिकं शरीरं १, तथाऽऽहारकं २, वैक्रियं ३, कार्मणं ४, तैजसं ५, एवं पञ्च शरीराणि, तत्र कश्चिदेवंजानाति-यदेवौदारिकं तदेव कार्मणं तैजसं च, यदेव तैजसं कार्मणं तदेवौदारिकं तदेवाहारकं तदेव वैक्रियं च, एवं विधां संज्ञां न धारयेत् , एतेषां शरीराणां ऐक्यं न गणयेत् , तथा मिथः पार्थक्यमपि न गणयेत् , कथश्चिदेकत्रोपलन्धेरभेदः कथश्चिच्च संज्ञामेदाढ़ेद इति स्थितं, तदेवमौदारिकादीनां शरीराणां मेदामेदौ प्रदर्य सर्वस्यैव द्रव्यस्य भेदामेदौ प्रदर्शयितु. पश्चमे. ऽध्ययने आधाकर्मों पभोगेकर्मणो. | पलिप्तत्वमलिप्तत्वं Jain Education inthita JAL Far Private & Personal use Oh T w w.jainelibrary.org Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कामः पूर्वपक्षं श्लोकपश्चार्द्धन दर्शयितुमाह-सव्वत्थ वीरिय' मित्यादि, 'सर्वद्रव्यवीर्य सर्वद्रव्येषु विद्यते' अयं साँख्याभिप्रायः, साँख्यानां हि सत्वरजस्तमोरूपस्य प्रधानस्यैकत्वात्तस्य च सर्वस्यैव कारणत्वात् , अतः 'सर्व सर्वात्मक'. मित्येवं व्यवस्थिते सर्वत्र घटपटादावपरस्य व्यक्तस्य [ कार्यस्य ] 'वीर्य' शक्तिर्विद्यते, सर्वस्यैव हि व्यक्तस्य प्रधानकार्यत्वा. स्कार्यकारणयोश्चैकत्वात् , अतः 'सर्व सर्वात्मक 'मित्येवं संज्ञांनो निवेशयेत , तथा "सर्वे भावाः स्वभावेन, स्वस्वभावे व्यवस्थिताः", अतः प्रतिनियतशक्तित्वान्न सर्वत्र सर्वस्य 'वीर्य' शक्तिरित्येवमपि संज्ञा नो निवेशयेत , अत्रैकान्तनिषेधेन स्याद्वादभाषया वदेदिति गाथार्थः ॥ १०॥ एतेहिं दोहि ठाणेहि, ववहारो न विजई । एएहिं दोहि ठाणेहि, अणायारं तु जाणए ॥ ११ ॥ ___ सुगमार, व्याख्या पूर्ववत् । तथानस्थि लोए अलोए वा, नेवं सन्नं निवेसए । अत्थि लोए अलोए वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ १२॥ व्याख्या-पश्चास्तिकायात्मकचतुर्दशरवात्मको वा लोको नास्ति, एवं संज्ञां नो निवेशयेत्-न धारयेत् , तथा केवलाकाशात्मकोऽलोकोऽपि नास्तीत्येवमपि संज्ञां न निवेशयेत-न निवेदयेत्, किन्तु 'अस्थि लोए' इत्यादि, किन्तु अस्ति लोकः x"द्वाभ्यामेताभ्यां शक्तिरस्ति नास्ति वेति, अथवा शरीराणां सर्वेषां भेदोऽभेदो वेति द्वाभ्यां स्थानाभ्यां व्यवहारो न विद्यते, युक्तयो न सङ्गगच्छन्ति इत्यर्थः । एतयोः स्थानयोः प्रवृत्तस्यानाचारं जानीयात्" इति हर्षकुलीयदीपिकायां । Jan Education a l For Prve & Personal Use Only El Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ । श्रुत. सूयनडाना ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्रूपो वैशाखस्थानस्थितकटिन्यस्तकरयुग्मपुरुषसदृशः पश्चास्तिकायात्मको वा, युक्तिश्चाऽत्र-यदि सर्व नास्ति ततः द्वितीये सर्वान्तःपातित्वाल्लोकप्रतिषेधक पुरुषोऽपि नास्ति, एतावता लोकाभावे प्रतिषेधकपुरुषाभावा, पुरुषाभावात्प्रतिषेधस्यादीपिका- प्यभावः, तदेवं व्यवस्थिते लोकोऽप्यस्ति तत्प्रतिपक्षभूतः अलोकोऽप्यस्ति इत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ।। १२ ।। पश्चमान्वितम् । नत्थि जीवा अजीवा वा, नेवं सन्नं निवेसए। अस्थि जीवा अजीवावा, एवं सन्नं निवेसए ॥१३॥ ध्ययने ऽनाचारव्याख्या-उपयोगलक्षणाः संसारिणो सुक्ता वा जीवा न विद्यन्ते, तथा अजीवाश्च धर्माधर्माकाशकालपुद्गलात्मकाः स्वमेकान्तेगतिस्थित्यवगाहदानछायातपोद्योतादिवर्तनालक्षणा न विद्यन्ते। प्रत्यक्षेणानुपलभ्यमानत्वाजीवा न विद्यन्ते, कायाकार न जीवापरिणतानि भूतान्येव धावनवल्गनादिकां क्रियां कुर्वन्तीति । अजीवा अपि न विद्यन्ते, एवंविधां संज्ञा नो निवेशयेत् , नास्तिवादी तु सर्व नास्तीति प्ररूपयति । 'अस्थि जीवे 'त्यादि, अस्ति जीवः अस्त्यजीवः एवंविधां संज्ञां निवेशयेत् । तस्मान्नै जीवयोरकान्तेन जीवाजीवयोरभावः, अपितु सर्वपदार्थानां स्याद्वादाऽश्रयणाजीवाजीवयोरस्तित्वं नास्तित्वं च (स्यात् ) केनापि स्तित्वनाप्रकारेणेति । अत्र जीवाजीवयोरस्तित्वे नास्तित्वे च युक्तयोः ग्रन्थान्तरादवया इति गाथार्थः ।। १३ ।। स्तित्वनत्थि धम्मे अहम्मे वा, नेवं सन्नं निवेसए। अत्थि धम्मे अहम्मे वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ १४ ॥ निवेदने । ___ व्याख्या-धर्मः श्रुतचारित्राऽत्मको जीवस्यात्मपरिणामोऽस्ति धर्मः कर्मक्षयकारणं, अधर्मोऽपि मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकपाययोगरूपः कर्मबन्धकारणं, धम्मोऽपि नास्ति अधोऽपि नास्ति नैव संज्ञा निवेशयेत-नैवं प्ररूपयेदित्यर्थः । IV१०७॥ jane ty.org Jain Education in Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कथं प्ररूपयेत् ? 'अस्थि धम्मे 'त्यादि, अस्ति धर्म:-अधम्मोऽप्यस्ति, यतो धर्माऽधर्ममन्तरेण संसास्वैचित्र्यं न स्यात् , यत:-"प्रत्यक्ष एव विश्वेऽस्मिन् , प्रपञ्चः पुण्यपापयोः। द्विभिन्नं (हि) जगत्सर्व, सुखदुःखव्यवस्थया ॥१॥ एके दधति साम्राज्य, परे दधति दासताम् ।” इत्यादिवचनात् , अतो धर्मः सम्यग्दर्शनादिकोऽस्ति अधोऽपि मिथ्यात्वादिकोऽस्ति इत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥ १४ ॥ नस्थि बंधे व मुक्खे वा, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि बंधे व मुक्खे वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ १५ ॥ ___ व्याख्या-बन्धः कर्मणां 'नास्ति' न विद्यते, अमूर्तत्वादात्मनो गगनस्येव न कर्मणां बन्धः, इत्येवं संज्ञां नो निवेशयेत, तथा बन्धाभावाच्च मोक्षस्याप्यभाव इत्येवमपि संज्ञां नो निवेशयेत् , किन्तु-'अस्थि बंधे व मुक्खे वा' अस्त्यात्मनो बन्धः कर्मणां, अमूर्तस्याप्याऽत्मनो मूः कर्मपुद्गलैः सह सम्बन्धो-बन्धः, स तु विद्यत एव, आत्मनः सक्रियत्वात् , सक्रियस्य स्यादेव बन्धः, यदा ह्यात्माऽक्रियस्तदा न कर्मवन्धः, बन्धाभावाच मोक्ष एव, अतो बन्धोऽप्यस्ति मोक्षोऽप्यस्तीत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥ १५॥ अथ बन्धसद्भावे पुण्यपापयोरपि सद्भावः । तर्हिनत्थि पुन्ने व पावे वा, नेवं सन्नं निवेसए । अत्थि पुन्ने व पावे वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ १६ ॥ व्याख्या-'नास्ति' न विद्यते 'पुण्यं शुमकर्मप्रकृति लक्षणं तथा पाप-मशुभकर्मप्रकृतिलक्षणं 'नास्ति' न विद्यते, Jan Edua Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिका न्वितम् । ॥ १०८ ॥ Jain Education Int इत्येवं नो संज्ञां निवेशयेत्, यतः - पुण्यपापयोर्विना जगद्वैचित्र्यं न स्यात् । केषांचिन्मते जगद्वैचित्र्यं नियतिकृतं नियत्या जगद्वैचित्र्यं स्यात् तदप्ययुक्तम्, यदि नियत्या स्वभावेन वा जगद्वैचित्र्यं स्यात् तदा सकलक्रियावैयर्थ्यं स्यात् । सकल क्रियात एव सकलकार्योत्पत्तिः । यतः- शुभक्रियातः पुण्यं पुण्याच्च सुखं अशुभक्रियातः पापं पापाञ्च दुःखमित्यतः ' अस्थि पुन्नं व पावं वे 'त्यादि, अस्ति पुण्यं पापं चास्ति एवंविधां संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ।। १६ ।। नत्थ आसवे संवरे वा, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि आसवे संवरे वा, एवं सन्नं निवेस ॥ १७ ॥ व्याख्या – अभवः प्राणातिपातादिरूपः कम्र्मोपादानकारणं, तन्निषेधः संवरः एतौ द्वावपि न स्तः इत्येवं संज्ञां न निवेशयेत् किन्त्वस्त्याश्रवः संवस्थ, इत्येवंविधां संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ।। १७ ।। वेणा निजरा वा, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि वेयणा निज्जरा वा, एवं सन्नं निवेस ॥ १८ ॥ व्याख्या- 'वेदना' कर्मानुभवलक्षणा तथा 'निर्जरा' कर्मपुङ्गलशाटनलक्षणा, एते द्वे अपि न विद्येते इत्येवं संज्ञां नो निवेशयेत्, यतः - पल्योपमसागरोपमशताऽनुभवनीयं कर्म अन्तर्मुहुर्त्तनैव क्षयमुपयातीत्यभ्युपगमात्तदुक्तं *" जं अन्नाणी कम्मं, खवेइ बहुयाहिं वासकोडीहिं । तं नाणी तिहि गुत्तो, खवेइ ऊसासमित्तेणं ॥ १ ॥ " इत्यादि । क्षपकश्रेण्यां तु झटित्येव कर्मणो भस्मीकरणाद्यथाक्रमबद्धस्य चानुभवनाभावेन वेदनाया अभाव:, तदभावान्निर्जराया अप्य * यदज्ञानी कर्म क्षपयति बहुकाभिवर्ष कोटी भिः । तज्ज्ञानी त्रिभिर्गुप्तः क्षपयत्युच्छ्रवासमात्रेण ॥ १ ॥ द्वितीये श्रुत० पश्चमा ध्ययने अश्रव संरयो रेकान्तेना स्तित्वना स्तित्व निवेदने धनाचार त्वम् । ॥ १०८ ॥ Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भावः, इत्येवं संज्ञां नो निवेशयेत् । किमिति ? यत:-कस्यचिदेव कर्मण एवमनन्तरोक्तया नीत्या क्षपणात्तपसा प्रदेशानुभवेन चापरस्य तूदयोदीरणाभ्यामनुभवनमित्यतोऽस्ति वेदना, आगमोऽप्येवम्भूत एव, तद्यथा-"x पुब्बि दुच्चिन्नाणं. दुप्पडिकंताणं वेइत्ता मोक्खो, नत्थि अवेइत्ता" इत्यादि । वेदनासिद्धौ च निर्जराऽपि सिद्धैवेत्यतोऽस्तिवेदना निर्जरा चेत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥१८॥ वेदना निर्जरा च क्रियाऽक्रियायत्ते, ततस्तद्भाव प्रतिषेधपूर्वकं दर्शयितुमाहनत्थि किरिया अकिरियावा, नेवं सन्नं निवेसए। अस्थि किरिया अकिरिया वा, एवं सन्नं निवेसए ॥१९॥ ___व्याख्या-'क्रिया' परिस्पन्दलक्षणा तद्विपर्यस्ता त्वक्रिया, ते द्वे अपि न स्तो-न विद्येते, इत्येवंविधा संज्ञां नो निवेशयेत् , यतः-शरीराऽत्मनोदेशाद्देशान्तरावाप्तिनिमित्ता परिस्पन्दात्मिका क्रिया प्रत्यक्षेणैवोपलभ्यते, सर्वथा निष्क्रियत्वे चात्मनोऽ. भ्युपगम्यमाने गगनस्येव बन्धमोक्षाद्यभावः, स च दृष्टेष्टबाधितः, अपि चैकान्तेन क्रियाऽमावे संसारमोक्षाभावः स्यादित्यतोऽस्ति क्रिया तद्विपक्षभृता चाक्रियाऽप्यस्ति इत्येवंविधां संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥ १९ ॥ ___ अथ सक्रिये आत्मनि सति क्रोधादिसद्भाव इत्येतदर्शयितुमाहVI नत्थि कोहे व माणे वा, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि कोहे व माणे वा, एवं सन्नं निवेसए ॥२०॥ ४ पूर्व दुश्वीर्णानां दुष्प्रतिक्रान्तानां (कर्मणां ) वेदयित्वा मोक्षो, नास्त्यवेदयित्वा । Jain Education in ब www.jaineltrary.org Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्गा व्याख्या-स्वपरात्मनोरप्रीतिलक्षणः क्रोधः, स चानन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणसचलनभेदेन चतु. (ऽऽगमे पठ्यते, तथैतावद्भेद एव 'मानो' गर्वः, तौ द्वावपि ' न स्तो' न विद्यते, इत्येवं संज्ञां नो निवेशयेत् , यतःदीपिका कषायकम्मोदयवर्ती दष्टौष्ठः कृतभृकुटीभङ्गो रक्तवदनो गलत्स्वेदबिन्दुसमाकुलः क्रोधाध्मातः समुपलभ्यते, केषाश्चिन्मतेन न्वितम् । क्रोधो मानांश एवेत्येतदप्ययुक्तं, क्षकश्रेण्यां तु भेदेन क्षपणात कोवक्षये न मानस्य क्षयः, पृथक पृथक क्षयो दूयोरपि, तदुभयस्य च नरसिंहव[व] स्वन्तरवादित्यतोऽस्ति क्रोधः, मानोऽप्यस्ति चेत्येवं संत्रां निवेशयेदिति गाथार्थः ।। २०॥ ॥१०९॥ नत्थि माया व लोभे वा, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि माया व लोभे वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ २१॥ व्याख्या-अत्रापि प्राग्वन्मायालोभयोरभाववादिनं निराकृत्यास्तित्वं प्रतिपादनीयमिति ॥ २१॥ साम्प्रतमेषामेव क्रोधादीनां समासेनास्तित्वं प्रतिपादयन्नाह-- नस्थि पेजे व दोसे वा, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि पेजे व दोसे वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ २२॥ व्याख्या-प्रीतिलक्षणं प्रेम, पुत्र कलत्रधनधान्याद्यात्मीयेषु रागस्तद्विपरीतस्त्वात्मीयोपघातकारिणि द्वेषस्तावेतौ द्वावपि न विद्यते इत्येवं संज्ञां नो निवेशयेत् । प्रेमाप्यस्ति द्वेषोऽप्यस्ति, यतः-" को दुःखं पाविज्जा ?, कस्स व सुक्खे हि विम्हओ हुज्जा ? । को व न लहिज ? मुक्खं, रागद्दोसा जइ न हुज्जा ॥१॥ तो बहुगुणनासाणं, समत्तचरित्तगुणविणासाणं । न हु वसमागंतव्वं, रागहोसाण पावाणं ॥२॥" इत्यादिवचनप्रामाण्यान्न तदभावः, द्वितीये श्रुत पश्चमाध्ययने मायालोभादीनामपलपनमनाचारः। ॥१०९॥ H Jain Education ww.jainelibrary.org Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ NI अतः प्रेमाप्यस्ति द्वेषोऽप्यस्ति इत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ।। २२ ॥x नत्थि चाउरंते संसारे, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि चाउरंते संसारे, एवं सन्नं निवेसए ॥ २३ ॥ व्याख्या-चत्वारोऽन्ता गतिभेदा नारकतिर्यङ्नरामरलक्षणा यस्य संसारस्यासौ चातुरन्तः, संसार एव कान्तारो भयकहेतुत्वात्स चतुर्विधो न विद्यते, अपि तु सर्वेषां संसृतिरूपत्वात् कर्मबन्धात्मकतया च दुःखैकहेतुत्वादेकविध एव, अथवा नारकदेवयोरनुपलभ्यमानत्वात्तिर्यङ्मनुष्ययोरेव सुखदुःखोत्कर्षतया तद्व्यवस्थानाद् द्विविधः संसारः, पर्यायनयाश्रयणावेकविधः, अतश्चातुर्विध्यं न कथश्चिद्घटत इत्येवं नो संज्ञां निवेशयेत् , अपि त्वस्ति चातुरन्तः संसार इत्येवं संज्ञां निवेशयेत् । यदुक्तमेकविधः संसारस्तन्न घटते, यतोऽध्यक्षेण तिर्यमनुष्ययोमेंदः समुपलभ्यते, तथा [सम्मवानुमानेन] नारकदेवानामप्यस्तित्वाभ्युपगमात् [द्वैविध्यमपि न विद्यते ], एवं चातुर्गतिक एव संसार इत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥२३॥ नत्थि देवो व देवी वा, नेवं सन्नं निवेसए। अस्थि देवो व देवी वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ २४ ॥ व्याख्या-भवनपतिब्यन्तरज्योतिष्कवैमानिका देवा न सन्ति तथा देवाभावाद्देव्योऽपि न सन्ति इत्येवं संज्ञां नो x इतोऽनन्तरं निम्नोद्धृतः श्लोकः सवृत्तिकः समुपलभ्यते हर्षकुलीयायां-" नस्थि रागे व दोसे वा, नेवं सन्नं निवेसए । NI अस्थि रागे व दोसे वा, एवं सनं निवेसए ॥ २३ ।। दी.-रागद्वेषौ न स्तः इति न स्वीकार्य, तौ विद्यते इति मतिः कार्या, युक्तिः पूर्वोक्ता । (पुनरुक्त एवायम् ) Jain Education Ation For Private & Personal use Day Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रुत न्वितम् । एयगडाङ्ग-|| निवेशयेत् , किन्तु देवा देव्यश्च सन्ति, अर्हता पञ्चसु कल्याणकेषु समागमनदर्शनात् “ जिणपंचसु कल्लाणएसु चेव || द्वितीये | महरिसितवाणुभावाओ। जम्मतरनेहेण य, आगच्छंती सुरा इहयं ॥१॥" अन्यथा नायान्ति, (यत:-) दीपिका- " चत्तारि पंच जोयण-सयाइं गंधो उमणुयलोयस्स। उट्ठे वच्चइ जेणं, न हु देवा तेण आविति ॥१॥" तथा च | पश्चमाग्रहगृहीतवरप्रदानादिना च तदस्तित्वमनुमानेन साध्यते, अतो देवा देव्यश्च सन्तीत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥ २४॥ ध्ययने॥११॥ नत्थि सिद्धी असिद्धी वा, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि सिद्धी असिद्धी वा, एवं सन्नं निवेसए ॥२५॥ देवादीनां व्याख्या-अशेषकर्मक्षयलक्षणा सिद्धिस्तद्विपर्ययभूता चासिद्धिर्नास्तीत्येवं नो संज्ञां निवेशयेत् , अस्ति सिद्धिरित्येवं सिद्ध्यादीसंज्ञां निवेशयेत् । सम्यग्ज्ञानदर्शनचारित्रात्मकस्य मोक्षमार्गस्य सद्भावात् कर्मक्षयस्य च पीडोपशमनादिना प्रत्यक्षेण- नां चापदर्शनात , अतः कस्यचिदात्यन्तिककर्महानिसिद्धरस्ति सिद्धिरिति गाथार्थः ।। २५ ॥ लपनमनत्थि सिद्धी नियं ठाणं, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि सिद्धी नियं ठाणं, एवं सन्नं निवेसए ॥२६॥ | नाचारः। व्याख्या-सिद्धेरशेषकर्मक्षयलक्षणाया निजं स्थानमीपत्तागमाराख्यं व्यवहारतो, निश्चयतस्तु तदुपरि योजन[चतुर्थीक्रोशषड्भागः, तत्प्रतिपादकप्रमाणाभावात्स नास्तीत्येवं संज्ञां नो निवेशयेत् , किन्तु सिद्धानामवस्थानस्थानं सिद्धाश्च सन्तीत्येवं संज्ञां निवेशयेत् , यतः-अयोगिचरमसमये त्रयोदश प्रकृतीः "क्षयं नीत्वा स लोकान्तं, तत्रैव समये व्रजेत् । लब्धसिद्धत्वपर्यायः, परमेष्ठी सनातनः ॥१॥ पूर्वप्रयोगतोऽसङ्ग-भावाद्वन्धविमोक्षतः । स्वभाव- ११ Jain Education For Private & Personal Use Oh wwwEjainelibrary.org a l II Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिणामाच, सिद्धस्योद्धर्वगतिर्भवेत् ॥२॥ कुलालचक्रदोलेषु, मुख्याणां हि यथा गतिः। पूर्वप्रयोगतः सिद्धा, सिद्धस्योर्द्धगतिस्तथा ॥ ३ ॥ मृल्लेपसङ्गनिर्मोक्षा-द्यथा दृष्टाऽऽश्वलावुनः । पूर्वसङ्गविनिर्मोक्षा-त्तथा सिद्धिगतिः स्मृता ॥ ४॥ एरण्डफलबीजादे-बन्धच्छेदाद्यथा गतिः। कर्मबन्धनविच्छेदात्, सिद्धस्यापि तथा भवेत् ॥ ५॥ यथाऽधस्तियंगूई च, लोष्टवाय्वग्निवीचयः । स्वभावतः प्रवर्त्तन्ते, तथोर्द्धगतिरात्मनः | ॥ ६॥ न चाधो गौरवाभावा-नतिर्यक् प्रेरकं विना। न च धर्मास्तिकायस्या-भावाल्लोकोपरि व्रजेत् ॥७॥ मनोज्ञा सुरभिस्तन्वी, पुण्या परमभासुरा। प्रागभारा नाम वसुधा, लोकमूनि व्यवस्थिता ।। ८॥ नृलोकतुल्यविष्कम्भा, सितच्छत्रनिभा शुभा । ऊर्द्ध तस्याः क्षितेः सिद्धा, लोकान्ते समवस्थिताः ॥९॥ इसीपन्भाराए, उवरिं खलु जोयणमि जो कोसो। कोसस्स य छन्भाए, सिद्धाणोगाहणा भणिया ॥१०॥" इति सिद्धानां स्थानम् । अथ सिद्धास्तु-" नो किण्हे नो नीले नो लोहिए नो हालिदे नो सुकिल्ले नो सुरभिगंधे नो दुरभिगंधे नो तित्ते नो कडुए नी कसाए नो अंबिले नो महुरे (नो लवणे )नो बट्टे नो तंसे नो चउरंसे नो परिमंडले नो दीहे नो हस्से नो गुरुए नो लहए नो सीए नो उण्हे नो कक्खडे नो मउए नो इत्थी नो पुरिस नो अन्नहा" एवं सिद्धाः लोकाग्रपदसंस्थिताः सदाऽव्ययाः अनन्ता अजरामराः सदाऽऽनन्दमया अवतिष्ठन्ते । एवं सिद्धास्तथा सिद्धानां च स्थानं विद्यते, एवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥ २६ ॥ नत्थि साहू असाहू वा, नेवं सन्नं निवेसए । अत्थि साहू असाहू वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ २७॥ Jain Education Inter ! For PrivatePersonal Use Only jainelibrary.org Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्र दीपिकान्वितम् । ॥ १११ ॥ Jain Education In व्याख्या - 'नास्ति' न विद्यते यथोक्तगुणोपेतः साधुस्तदभावाच्च तत्प्रतिपक्षभूतस्यासाधोरप्यभावः, यतः " केवलमणोहिचउदस-दसनवपुत्रवीहि संपयं रहिए । सुद्धमसुद्धं चरणं, को जाणइ ! कज्जभावं च ॥ १ ॥ " इत्येवम्भूतां संज्ञां नो निवेशयेत् "कालाइ दोसवसओ, कवि दीसंति तारिसा न जइ । सव्वत्थ तहवि नत्थित्ति, नेव कुजा अणासासं ॥ १ ॥ कालोचियजयणाए, मच्छररहियाण उज्जमंताणं । जणजत्तारहियाणं, होइ जइत्तं जईण सया ॥ २ ॥ अन्नाणनिरंतर तिमिर - पूरपूरियंमि भवभवणे को पयडइ १ पयत्थे, जइ गुरुदीवा न दिप्पंति || ३ || पलए महागुणाणं, हवंति सेवारिहा लहुगुणा वि । अत्थमिए दिणनाहे, अहिलसह जणो पई पि ॥ ४ ॥ अट्ठ गुणाणं मज्झे, इक्केण गुणेण संघपञ्चकखं । तित्थुन्नयं कुणतो, जुगपवरो सो इहं नेओ ॥ ५ ॥ दुष्प सहतं चरणं, जं भणियं भगवया इह खित्ते । आणाजुत्ताणं पुण, न होइ अहुणत्ति वामोहो ।। ६ ।। " श्रीभगवत्यां - " केवइयं कालं तु देवाणुप्पियाणं तित्थे अणुसज्जिस्सर ?, गोयमा ! इक्कवीसवाससहस्साई ममं तित्थे अणुसज्जिस्सर, तित्थं पुण चाउवण्णो समणसंघो समणा समणीओ सावया सावियाओ " इत्यादिभगवद्वचनप्रामाण्यात्तीर्थं यावत् साधवः सन्ति तद्विपरीताश्वासाधवोऽपि सन्तीत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥ २७ ॥ नत्थ कल्ला पावे वा, नेवं सन्नं निवेसए । अस्थि कल्लाण पावे वा, एवं सन्नं निवेसए ॥ २८ ॥ द्वितीये श्रुत० पञ्चमा ध्ययनेदुष्प्रसहा तं यावचारित्रम् । ॥ १११ ॥ Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्याख्या-यथेष्टार्थफलसम्प्राप्तिः कल्याणं तन्त्र विद्यते तथा पापं पापवान्वा न कश्चिद्विद्यते, तदेवमुभयोरप्यभावः, इत्येवं रूपां संज्ञां नो निवेशयेत् , यत:-कल्याणपापयोविना सुखी दुःखी सरोगी निरोगी सुरूपः कुरूपो दुर्भगः सुभगो धनी दरिद्रो मूर्खः पण्डितो वेत्यादिको जगद्वैचित्र्यभावोऽध्यक्षसिद्धोऽपि न स्यात्तस्मादस्ति कल्याणं पापं चेत्येवं संज्ञां निवेशयेदिति गाथार्थः ॥ २८ ॥ न चैकान्तेन[ कल्याणं ]कल्याण मेव, यतः-केवलिनां प्रक्षीणघनवातिकर्मचतुष्टयानां सातासातोदयसद्भावात्तथा । नारकाणामपि पश्चेन्द्रियत्वविशिष्टज्ञानादिसद्भावान्कान्तेन ते पापवन्त इति, तस्मात्कथञ्चित्कल्याणं कथञ्चित्पापमिति स्थितं । तदेवं कल्याणपापयोरनेकान्तरूपत्वं प्रसाध्य एकान्तं दृषयितुकाम आहकल्लाणे पावए वा वि, ववहारो न विजई। जं वेरंतं न जाणंति, समणा बालपंडिया ॥ २९ ॥ व्याख्या-सर्वथा कल्याणवानेवायं तथा पापवानेवायमित्येवम्भृतो व्यवहारो न विद्यते, एकान्तस्यार्थस्याभावात , अनेकान्तवादस्यैवाश्रयणात्सर्ववस्तूनामने कान्ताश्रयणेन[प्राक प्रसाधितत्वात् , एकान्तिको व्यवहारो न विद्यते कुत्रापि वस्तु. विषये इति भावः । यः पुरुष एकान्तेन पुण्यवान् दृश्यते सोऽप्यन्त्यावस्थायां परिणामपरावर्तादुर्गतौ प्रयाति यः पापी सोऽपि परिणामवशात्मुगतिगामी स्यात् , अत एकान्तवचनं न ब्रूयात् । तथा वैरं कर्मविरोधो वा वैरं, तद्येन च परोप x" तदभावे कल्याणवांश्च न कश्चिद्विद्यते" इति बृहद्वृत्तिः । For Private & Personal use Day wwerjainelibrary.org Jain Education Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग पत्रं दीपिकान्वितम् । ॥११२॥ १ घातादिना एकान्तपक्षसमाश्रयणेन वा भवति, तते 'श्रमणा'स्तीथिकाः 'बाला' रागद्वेषकलिताः 'पण्डिता' अभि- द्वितीये मानिन: शुष्कतर्कदोध्माता न जानन्ति, परमार्थभूतस्याहिंसालक्षणस्य धर्मस्थानेकान्तपक्षस्य वाऽनाश्रयणात् । यदि वा श्रुत यद्वैरं तत्ते श्रमणा वालाः पण्डिता न जानन्तीत्येवं वाचं न निसृजेत् , तत्वेषां कोपोत्पत्ता, यच्चैवम्भूतं वचस्तन वाच्यं, यतः- पश्चमा"+अप्पत्तियं जेण सिया, आसु कुप्पेज वा परो । सव्वसो तं न भासिज्जा, भासं अहियगामिणिं ॥१॥" ध्ययने इति गाथार्थः ॥ २९ ॥ अपरमपि वासंयममधिकृत्याह पराप्रीतिअसेसं अक्खयं वा वि, सबदुक्खेति वा पुणो। वज्झा पाणा न वज्झत्ति, इति वायं न नीसिरे ॥३०॥ IN कवच- व्याख्या-इह जगति सर्वेऽपि घटपटादयः पदार्था एकान्तेन नित्याः-शाश्वताः, सर्व जगदकृतं नित्यं एवं न ब्रूयात् , | | सोऽजल्पसर्वेषां पदार्थानां प्रतिसमयं चान्यथा भावदर्शनात् , सर्वथा क्षणिकमेवमपि न ब्रूयात् । तथा सर्व जगदुःखात्मकमेवमपि न वदेत् , सुखात्मकस्यापि सम्यग्दर्शनादिभावेन दर्शनात , यतः-"xतणसंथारनिसन्नोऽवि, मुणिवरो भट्टरागमय. मोहो । जं पावइ मुत्तिसुहं, कत्तो? तं चक्कवद्दीवि ॥१॥" इत्यादि, तथा वयाचौरपारदारिकादयोऽवध्या वा, तत्कर्मानुमतिप्रसङ्गात् ॐ, इत्येवम्भूतां वाचं स्वानुष्ठानपरायणः साधुः परव्यापारनिरपेक्षो न निसृजेत् । तथाहि-सिंहव्याघ्र + अप्रीतिकं यया स्यादाशु कुप्येद्वा परः । सर्वथा तां न भाषेत भाषामहितगामिनीम् ॥ १॥ x तृणसंस्तारकनिषण्णोऽपि मुनिवरो भ्रष्टरागमदमोहः । यत्प्राप्नोति मुक्तिसुखं कुतस्तचक्रवर्त्यपि ॥१॥ * वध्यकथने हिंसाविकर्मणामवध्यकथने च चौर्यादिकर्मणाम् । ११२॥ नम् । Jain Education Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Interna मार्जारादीन् परमश्वव्यापादनपरायणान् दृष्ट्वा माध्यस्थ्यमवलम्बयेत् । तथाऽमी गवादयो वाह्या न वाह्या वा तथाऽमी वृक्षाछेद्या अद्यावा इत्यादिकं वचो न वाच्यं साधुनेति गाथार्थः ॥ ३० ॥ अथायमपरो वाक्संयमप्रकारोऽन्तः करण शुद्धिमाश्रितः प्रदर्श्यते दीसंति समियाचारा, भिक्खुणो साहुजीविणो । एए मिच्छोवजीवित्ति, इति दिट्ठि न धारए ॥ ३१ ॥ व्याख्या—जगत्येके दृश्यन्ते 'समियाचार '[त्ति समिताचाराः ]सिद्धान्तोक्ताचारे प्रवर्त्तमाना भिक्षवो दोषरहिताहारवेषिणस्तथा साधुजीविनः, न कस्यचिदपराधविधायिनः क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रिया जितक्रोधा ईर्याशोधका युगमात्रान्तरदृष्टयः सत्यसन्धा दृढव्रताः परिपूतोदकपायिनो मौनिनः सदा तायिनो विविक्तैकान्तध्यानाध्यासिनोऽकौत्कुच्यास्तानेवम्भूनवधार्याप' सरागा अपि वीतरागा इव चेष्टन्ते' इति मत्वा एते मिथ्योपजीविन इत्येवं दृष्टिं न धारयेत् - नैवम्भूतमध्यवसायं कुर्यान्नाप्येवम्भूतां वाचं निसृजेत् यथैते मिथ्योपाचारप्रवृत्ता मायाविन इति, छद्मस्थेन सर्वाग्दर्शिना एवम्भूतस्य निश्चयस्य कर्त्तुमशक्यत्वादित्यभिप्रायः, ते च स्वयूथ्या वा भवेयुस्तीर्थान्तरीया वा, तावुभावपि न वक्तव्यौ साधुनेति ॥ ३१ ॥ किश्च दक्खिणाए पडिलंभो, अस्थि वा नत्थि वा पुणो । न वियागरेज मेहावी, संतिमग्गं च वूहए ॥ ३२ ॥ व्याख्या—-दानं दक्षिणा, तस्याः प्रतिलम्भः ' प्राप्तिः, स दानलाभोऽस्माद्गृहस्थादेः सकाशादस्ति नास्ति वेत्येवं नव्यागृणीयात् 'मेधावी' मर्यादावान् स्वयूथ्यस्य तीर्थान्तरीयस्य वा एकान्तेन दानं दाननिषेधं वा न कुर्यात्, तथाहि Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत सूयगडाङ्ग त्रं दीपिकान्वितम् । तहाननिषेधेऽन्तरायसम्मवः, तदानानुमतावप्यधिकरणोद्भवः, इत्यतोऽस्ति दानं न वेत्येकान्तेन न वयात । कथं तर्हि IP ब्रयात ? इति दर्शयति-'शान्ति'मोक्ष[ स्तस्य ]मार्गस्तं ' उपद्व्हयेत् ' बर्द्धयेत् , यथा मोक्षमार्गाभिवृद्धिर्भवति तथा वदे दित्यर्थः । एतावता यथा सावद्यं स्यात्तथा न वदेदिति गाथार्थः ।। ३२ ॥ इच्चेएहिं ठाणेहिं, जिणदितुहिं संजए। धारयंते उ अप्पाणं, आमोक्खाए परिवएजासि तिबेमि ॥३३॥ बीयसुयखंधस्स अणायारनामं पंचमज्झयणं समत्तं ॥ ५॥ व्याख्या इत्येतैरेकान्तनिषेधद्वारेणानेकान्तविधायिभिः स्थानासंयमप्रधानः समस्ताध्ययनोक्तः रागद्वेपरहितैर्जिन दृष्टरुपलब्धन स्वमतिविकल्पोत्थापितैः 'संयतः' संयमवानात्मानं धारयन् , एभिः स्थानरात्मानं वर्तयन् आमोक्षाय[अ] शेष कर्मक्षयार्थ 'परि' समन्तात्संयमानुष्ठाने 'बजेः' गच्छेस्त्वमिति विने यस्योपदेशः । इतिः परिसमाप्त्यर्थे, त्रीमीति पूर्ववत ।। ............................................................................................... इति श्रीपरमसुविहितखरतरगच्छविभूषणपाठकप्रवरश्रीमत्साधुरङ्गगणिवरसन्डन्धायां श्रीसूत्रकृताङ्ग दीपिकायां समाप्तमनाचारश्रुताख्यं पश्चममध्ययनमिति ॥ ५॥ पश्चमाध्ययनेऽध्ययन समाप्तिः। .................................................................. 8000 99900 neec000 For Pra Jain Education Cwecanelibrary.org Personal use only Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा द्वितीय सूत्र श्रुत दीपिका-1 न्वितम् । षष्ठाध्ययने ॥११४॥ गोशाल. केनसह विवाद साऽऽजीविया पट्टविताऽथिरेणं, सभागओ गणओ भिक्खुमज्झे। आइक्खमाणो बहुजन्नमत्थं, न संधयाती अवरेण पुत्वं ॥२॥ व्याख्या-येयं बहुजनमध्यगतेन युष्मद्गुरुणा धर्मदेशना प्रारब्धा सा आजीविका प्रस्थापिता, एकाकी विहरन् पामरैः परिभ्यत इति मत्वा महान् परिकरः कृतः, तदनेन दम्भप्रधानेन आजीविकार्थमिदमारब्धं अस्थिरेण, पूर्वमयं मया सार्द्धमेकाक्यन्तप्रान्ताशनेन शून्यारामदेवकुलादौ वृत्तिं कल्पितवान् , न च तथाभूतमनुष्ठानं सिकताकालवनिरास्वादं यावजीवं कर्तुमलं, अतो मां विहाय बहून् शिष्यान् प्रतार्य एवम्भूतेन स्फटाटोपेन विहरतीत्यतो अनवस्थितचित्तः, पूर्वचर्यापरित्यागेनापराचारसमाश्रयणात् । 'सभागतः' पर्षदि व्यवस्थितः 'गणओ'त्ति 'गणशो' बहुशो भिक्षूणां मध्यगतो (बहुजन्य- | मर्थ-) बहुजनहितमर्थ कथयन् विहरति, एतच्चास्यानुष्ठानं [ पूर्वापरं न सन्दधाति-] पूर्वापरविरुद्धं, यदि साम्प्रतीयं वृत्तं प्राकारत्रयसिंहासनाशोकवृक्षभामण्डलछत्रचामरादिकं मोक्षाङ्गममविष्यत्ततो या प्राक्तना चर्या क्लेशबहुलाऽनेन कृता सा क्लेशाय केवलं, अथ निर्जराहेतुका परमार्थभूता ततः साम्प्रतावस्था परप्रतारकत्वाद्दम्भकल्पा, ततः पूर्वोत्तरयोरनुष्ठानयोमौनव्रतधर्मदेशनयोः परस्परतो विरोध इति गाथार्थः ॥ २ ॥ अपि च एगंतमेवं अदुवावि इण्हि, दोवण्णमन्नं न समेति जम्हा। पुविं च इहि च अणागयं च, एगंतमेवं पडिसंधयाति ॥३॥ आर्द्रकमुने। ॥ ११४॥ Jain Education,intent IMww.jainelibrary.org Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अथ षष्ठमाईकीयमध्ययनम् । उक्त पश्चममध्ययनं, साम्प्रतं षष्ठमारम्यते इदमाईककुमाराध्ययनम् । अत्र आर्द्रककुमारोत्पत्तिः प्राग्भवस्वरूपप्रतिमादर्शनोत्पन्नजातिस्मरणादिकं सर्व बृहट्टीकातोऽवसेयं, अत्र तु सूत्रार्थ एव | प्रतन्यते, तथाहि पुरे कडं अद्द ! इमं सुणेह, एगंतचारी समणे पुरासी। से भिक्खुणो उवणेत्ता अणेगे, आइक्खतिम्हि पुढो वित्थरेणं ॥१॥ ___ व्याख्या-यथा गोशालकेन समं वादोऽभूदाईककुमारस्य तथाऽनेनाध्ययनेनोपदिश्यते, तं च राजपुत्रमार्द्रककुमार प्रत्येकबुद्धं भगवत्समीपमागच्छन्तं गोशालकोऽब्रवीद् , यथा-भो आर्द्रक ! यदहं ब्रवीमि तच्छृणु, 'पुरा' पूर्व यदनेन भवतीर्थकृता कृतं तच्चेदमिति दर्शयति-पुरा एकान्तप्रदेशचारी-श्रमणः पुराऽऽसीत्तपश्चरणोधुक्तः, साम्प्रतं तूफ़ैस्तपश्चरणभग्नो मां विहाय देवादिमध्यगतोऽसौ धर्म कथयति । बहून् मिथुनुपनीय-प्रभृतशिष्यपरिवारं कृत्वा भवद्विधानां मुग्ध जनानामिदानीं धर्ममाचष्टे पृथक पृथक् विस्तरेणेति गाथार्थः ॥१॥ T Jain Education a l Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्याख्या-यद्येकान्तचारित्वमेव शोभनं, पूर्वमाश्रितत्वात्ततः सर्वदाऽन्यनिरपेक्षैस्तदेव कर्त्तव्यं, अथ चेदं महापरिवारवृतं साधुतया मन्यसे ततस्तदेवादावयाचरणीयमासीत , अपि च द्वे अप्येते छायाऽऽतपबदत्यन्तविरोधिनी वृत्ते नैकत्र समवायं गच्छतः। तथा यदि मौनेन धर्मस्ततः किमियं महता प्रवन्धेन धर्मदेशना ? अथानयैव धर्मस्ततः किमिति पूर्व मौनव्रतमनेनाऽललम्बे ? । तदेवं गोशालकेनोक्ते सत्याकः श्लोकपश्चानोत्तरदानायाह-'पुचि चे 'त्यादि, 'पूर्व ' पूर्व स्मिन् काले यन्मौनव्रतिकत्वं या चैकचर्या तच्छमस्थत्वाद घातिकर्मचतुष्टयक्षयार्थ, साम्प्रतं यद्धर्मदेशनादीनां दानं तत्तीर्थ| करनाम्नो वेदनार्थं "+तं च कहं वेइज्जइ ? अगिलाए धम्मदेसणाईहिं" इति वचनात् , अपरामा चोचैर्गोत्रशुभायु मादीनां शुभप्रकृतीनां वेदनार्थमिति, यदिवा पूर्व साम्प्रतं चानागते काले[च ]रागद्वेषरहितत्वादेकत्वभावनाऽनतिक्रमणाचेंकत्वमेवाशेषजनहितं धर्म कथयन् सन्दधाति, न तस्य पूर्वोत्तस्योरवस्थयोराशंमारहितत्वाद्भेदोऽस्ति । यदुच्यते| पूर्वोत्तरयोरवस्थयोर्भेदस्तन्न किश्चित् ।। ३ ॥ अथ धर्मदेशनया श्रोतृणां कश्चिदुपकारोऽपि स्यादत आह समिच्च लोयं तसथावराणं, खेमंकरे समणे माहणे वा। आइक्खमाणो वि सहस्समज्झे, एगंतयं सारयई तहच्चे ॥ ४ ॥ व्याख्या-' समेत्य ' ज्ञात्वा लोकं त्रसस्थावराणां जन्तूनां 'क्षेम' शान्ति:-रक्षा, तत्करणशीलः क्षेमङ्करः श्रमणो + तब कथं वेद्यते ! अग्लान्या धर्मदेशनादिभिः । Jain Education Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एषगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । माहनो वा, स एवम्भृतो निर्ममो रागद्वेषरहितः प्राणिहितार्थ, न लाभपूजाख्यात्यर्थ, धर्ममाचक्षाणोऽपि प्राग्वच्छग्रस्थाव- द्वितीये खायां मौनव्रतिक इवोत्पन्नदिव्यज्ञानोऽपि देवासुरनरतिर्यसहस्रमध्येऽपि व्यवस्थितः पङ्काघारपङ्कजवत्तदोषव्यासङ्गा- श्रुत (संयोगा )भावान्ममत्वविरहादाशंसादोषविकलवादेकान्तमेव [ मारयति-] माधयति । अस्य भगवतः पूर्वावस्थासाम्प्रत. । पष्ठाकालीनावस्थयो स्त्यन्तरं. रागद्वेषाभावात् । तथा प्राग्वदर्चा-लेश्या शुक्लध्यानाख्या यस्य, अष्टमहाप्रातिहार्यः पूज्य- Rध्ययनेमानोऽपि नोच्छे[ नोत्से ]-गवं विदधाति, जितरागद्वेषत्वात् । तथा चोक्तं-" रागद्वेषौ विनिर्जित्य, किमरण्ये आईकोक्तं करिष्यसि ? । अथ नो निर्जितावेतो, किमरण्ये करिष्यसि ? ॥१॥” तथा बाह्यमनङ्गमान्तरं कपायजयादिकं गोशालको प्रधानं कारणमिति गाथार्थः ॥ ४ ॥ चरम् । अथ भगावानने कैलोंकैः परिपृतोऽपि रागद्वेषाभावादेकान्तचार्येवासो मन्तव्यः, निरीहः सन् धर्म कथयन्नपि न दोषभागिति दर्शयति धम्म कहतस्स उ नत्थि दोसो, खंतस्स दंतस्स जिइंदियस्स। भासाइ दोसे य विवजगस्स, गुणे य भासाइ निसेवगस्स ॥ ५ ॥ व्याख्या-तस्य भगवतोऽपगतधनधातिकलङ्कस्योत्पन्नसकलपदार्थावि विज्ञानस्य जगदम्युद्धरणप्रवृत्तस्यैकान्तपरहितकारिणः स्वकार्यनिरपेक्षस्य क्षान्तस्य दान्तस्य जितेन्द्रियस्य भाषादोषविवर्जकस्य कर्कशासभ्यवचोवर्जकस्य तथा ॥११५ ॥ For Private Beyond Personal Use Only Jain Education inte Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भाषाया ये गुणा हितमितदेशकालासन्दिग्धभाषणादयस्तन्निषेत्रकस्य सतो धर्म कथयतोऽपि नास्ति दोषः, छद्मस्थस्य हिर [बाहुल्येन] मौनमेव श्रेयः समुत्पन्न केवलस्य हि भाषणमपि गुणायेति गाथार्थः ॥ ५ ॥ किम्भूतं धर्ममसौ कथयतीत्याह महत्वए पंच अणुव्वए य, तहेव पंचासव संवरे य। विरई इहस्सामणियंमि पन्ने, लवावसक्की समणे तिबेमि ॥६॥ व्याख्या-पञ्चमहाव्रतानि तथा पश्चैवाणुव्रतानि श्रावकानुद्दिश्य प्रज्ञापितवान् , तथा पश्चाश्रवसंवरं च तथा सप्तदशप्रकारं संयमं च प्रतिपादितवान् , संयमवतो हि विरतिर्भवत्यतो विरतिं च प्रतिपादितवान् , च शब्दात्तत्फलभृतौ निर्जरा. मोक्षौ च कथितवान् । कथम्भूतः ? श्रामण्ये प्राप्तः प्राज्ञो वा एतत्प्रतिपादितवान् , कथम्भूतो ? 'लवावसक्की' लवंकर्म, तस्मादवसर्पति, एवंविधः श्रमणस्तपस्वी, स्वयमेव हि भगवान् पञ्चमहाव्रतोपपन्न इन्द्रियनोइन्द्रियगुप्तो विरतो लवाव[वष्की]सी सन्, ततोऽन्येषामपि तथाभूतमुपदेशं दत्तवान् । तत आईककुमारवचनमाकर्ण्य गोशालकस्तत्प्रतिपक्षभूतमर्थ वक्तुकाम इदमाह-इत्येतद्वक्ष्यमाणं यदहं ब्रवीमि तच्छृणु त्वमिति गाथार्थः ॥ ६ ॥ अथाह गोशालकः सीओदगं सेवउ बीयकायं, अहायकम्मं तह इत्थियाओ। एगंतचारिस्सिह अम्ह धम्मे, तवस्सिणो णाभिसमेति पावं ॥ ७॥ www.janeibrary.org Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एयगडाङ्ग व्याख्या---भो आर्द्रकुमार! त्वया प्रतिपादित-परार्थ प्रवृत्तस्याष्टमहापातिहार्यादिपरिग्रहस्तथा शिष्यादिपरिग्रहो धर्मः । द्वितीये देशना च न दोषाय यथा तथाऽस्माकमपि सिद्धान्ते यदेतद्वक्ष्यमाणं तन्न दोषाय, तथाहि-'शीतोदक 'मप्रासुकोदकं, तत्परि श्रुत दीपिका-16 भोगे न दोपस्तथा बीजकायपरिभोगमाधाकश्रियणं स्त्रीप्रसङ्गं च विदधातु, अस्मदीये धर्मे प्रवृत्तस्य 'एकान्त चारिणः' षष्ठान्वितम् । आरामोद्यानादिष्वेकाकिविहारोद्यतस्य तपस्विनः पापं नाभिसमेति-न लगतीत्यर्थः । इदमुक्तं भवति-शीतोदकस्त्रीप्रसङ्गादिक ध्ययने च यद्यपीपत्कर्मबन्धाय तथापि धर्माधारं शरीरं प्रतिपालयत एकान्तचारिणस्तपस्विनो नबन्धाय भवतीति गाथार्थः ।। ७ ।। शीतोदकाअथ आईक उवाच दिमोजि नामश्रमसीओदगं वा तह बीयकायं, अहायकम्मं तह इस्थियाओ। णत्वम् । एयाइं जाणं पडिसेवमाणा, अगारिणो अस्समणा भवंति ॥ ८॥ व्याख्या-भो गोशालक ! शीतोदकादीन्येतानि प्रागुपन्यस्तान्यप्रासुकोदकपरिभोगादीनि प्रतिसेवन्तः ' अगारिणो', | गृहस्थास्ते भवन्ति, अश्रमणाश्च-अप्रबजिताश्चैवं त्वं जानीहि, यत:-" अहिंसासत्यमस्तेयं, ब्रह्मचर्यमलुब्धता"। इत्येतच्छुमणलक्षणं, तच्चैषां शीतोदकबीजाधाकर्मस्त्रीपरिभोगकारिगां नास्ति, अतस्ते नामाकाराभ्यां श्रमणाः, न परमार्थत इति गाथार्थः ॥ ८ ॥ पुनरप्याक एवैतद्दषणायाह IN॥ ११६ ॥ For P Jan Education Twwjaineiorary.org & Personal use only Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सिया य बीओदगइत्थियाओ, पडिसेवमाणा समणा भवंति । अगारिणो वि समणा भवंतु, सेवंति उ तेवि तहप्पगारं ॥९॥ व्याख्या-अहो गोशालक ! स्यादेतद्भवदीयं मतं, यथा-ते एकान्त चारिणः क्षुत्पिपासादिप्रधानतपश्चरणपीडिताच, तत्कथं ते न तपस्विन इति एतदाशङ्कथाद्रक आह-यदि बीजाद्युपभोगिनोऽपि श्रमणा इत्येवं भवताऽभ्युपगम्यते एवं ती. गारिणोऽपि-गृहस्थाः श्रमणा भवन्तु, तेपामपि देशिपिथि कावस्थायामाशंमावतामपि निष्काश्चनतया एकाकीविहारित्वं क्षुत्पिपासादिपीडनं च सम्भाव्यते (अत) अगारिणोऽपि श्रमणा भवन्तु, यतस्तेऽपि तथाप्रकारं स्त्रीपरिभोगादिकं सेवन्त्येवेति गाथार्थः ॥९॥ पुनरप्याईको बीजोदकादिभोजिना दोषाऽभिधिस्मयाऽऽह-- जेयावि बीओदगभोति भिक्ख, भिक्खं विहिं जायति जीवियट्री।। ते णातिसंजोगमविप्पहाय, कायोवगा गंऽतकरा भवंति ॥ १० ॥ व्याख्या-ये चापि भिक्षवः प्रव्रजिता चीजोदकमोजिनः सन्तो द्रव्यतो ब्रह्मचारिणोऽपि आजीविकार्थ भिक्षामटन्ति, ते ज्ञातिसंयोग ' विप्रहाय ' त्यक्त्वा 'कायोपगाः' पदकायारम्भिणः संमारसागरस्य नान्तकरा भवन्ति ते, गृहस्थकल्पा एव ते, यनु भिक्षाटनं तु कषाश्चिद्गृहस्थानामपि सम्भाव्यते, नैतावता श्रमणभाव इति गाथार्थः ॥ १०॥ अर्थतदाकर्ण्य गोशालकोऽपरमुत्तरं दातुमसमर्थोऽभ्यतीथिकान महायान् विधाय सोल्लुण्ठमसारं वक्तुकाम आह Jain Education internati For Private & Personal use only brary.org Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । इमं वयं तु तुमं पाउकुवं, पावाइणो गरिहसि सब एव । पावाइणो पुढो किट्टयंता, सयं सयं दिट्ठि करिति पाउ ॥ ११ ॥ व्याख्या-अहो आईकुमार ! — इमां' पूर्वोक्तां वाचं 'प्रादुष्कुर्वन् ' प्रकाशयन् सर्वान् प्रावादुकान् गर्हसि, यस्मात्सर्वेऽपि तीर्थका बीजोदकादिभोजिनोऽपि संसारोच्छेदनाय प्रवर्तन्ते, ते तु भवता नाभ्युपगम्यन्ते, ते तु प्रावादकाः पृथक् पृथक स्त्रीयां स्त्रीयां दृष्टिं प्रत्येकं स्वदर्शनं कीर्तयन्तः 'प्रादुष्कुर्वन्ति' प्रकाशयन्ति, यदिवा श्लोकपश्चार्द्धमाककुमार आह-सर्वेऽपि प्रावादुका यथावस्थितं स्वदर्शनं प्रादुष्कुर्वन्ति, तत्प्रामाण्याच वयमपि स्वदर्शनाविर्भावनं कुर्मः, तथाहिअप्रासुकेन बीजोदकादिपरिभोगेन कर्मबन्ध एव केवलं, न संमारोच्छेदः, इतीदमस्मदीयं दर्शनं, एवं च व्यवस्थिते कात्रपरनिन्दा ? को वाऽऽत्मोत्कर्ष ? इति गाथार्थः॥११॥ किश्च ते अन्नमन्नस्स तु गरहमाणा, अक्खंति भो समणा माहणा य। - सतो य अत्थी असतो य णत्थी, गरहामो दिट्ठीं ण गरहामो किंचि ॥ १२ ॥ व्याख्या-'ते' प्रावादुकाः 'अन्योऽन्यस्य' परस्सरेण तु स्वदर्शनस्थापनेन परदर्शनं गईमाणाः स्वदर्शनगुणान् कथयन्ति, ते श्रमणा ब्राह्मणाः स्वपक्षमेव समर्थयन्ति परकीयं च दूषयन्ति । तदेव पश्चार्द्धन दर्शयति-स्वकीये पक्षे स्थाप्यमानेऽस्ति पुण्यं तत्कार्य च स्वर्गापवर्गादिकमस्ति, ' अस्वत 'पराभ्युपगमाच नास्ति पुण्यादिकभित्येवं सर्वेऽपि तीर्थकाः द्वितीये श्रुत षष्ठाध्ययनेगर्हामावत्वं तथ्य कथने। V॥११७॥ Jain Education a l T Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education I परस्परव्याघातेन प्रवृत्ताः, अतो वयमपि यथावस्थिततच्च प्ररूपणतो युक्तिविकलत्वादेकान्तदृष्टिं गर्हामो, नापरं किमपि गमः, सत्ये उक्ते न कापि ग X, एकान्तवादं निराकुर्मः, न परवादिनो, रागद्वेषविरहान्न कमपि गर्हाम इति गाथार्थः ॥ १२ ॥ एतदेव स्पष्टतरमाह न किंचि रूवेणऽभिघारयामो, सदिट्ठिमग्गं तु करेमो पाउं । इमे किट्टिए आरिएहि, अणुत्तरे सप्पुरिसेहिं अंजू ॥ १३ ॥ व्याख्या - भो गोशालक ! वयं न कञ्चन भ्रमणं ब्राह्मणं वा 'रूपेण ' जुगुष्पिताङ्गोपाङ्गोद्घट्टनेन जात्यादिमर्मप्रकाशनेन[वा] गर्हामः, केवलं स्वदृष्टिमार्ग प्रादुष्कर्मः स्वदर्शनं प्रकाशयामः, अथवाऽन्यदर्शनप्ररूपितं मागं दर्शयामः, यथा - “ ब्रह्मा लूशिरा हरिर्दृशि सरुकू पालुप्तशिनो हरः, सूर्योऽप्युल्लिखितोऽनलोऽप्यखिलभुक् सोमः कलङ्काङ्कितः । स्वर्नाथोऽपि विसंस्थलः खलु वपुः संस्थैरुपस्थैः कृतः, सन्मार्गस्वलनाद्भवन्ति विपदः प्रायः प्रभूणामपि ॥ १ ॥ " इत्यादि, एतच्च तैरेज स्वागमे पठ्यते, वयं तु श्रोतारः परं न कस्याप्यपवादं कुर्मः । अयमस्मदीयो मार्गः 'अनुत्तरः ' प्रधानः ' आय्यैः ' सर्वज्ञेः [ कीर्त्तितः ] प्ररूपितः अत एव ' अंजू ' इति व्यक्तो, निर्दोषत्वात्प्रकटः x" नेत्रैर्निरीक्ष्य बिलकण्टक कीटसर्पान् सम्यग्यथा व्रजत तान्परिहृत्य सर्वान् । श्रुति मार्गदृष्टिदोषान्, सम्यग् वि (चा) रयत कोऽत्र परापवादः १ ॥ १ ॥ " इति हर्ष ० Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग द्वितीये दीपिकान्वितम् । ध्ययने ॥ ११८ [ऋजुर्वा- अकुटिलः इति गाथार्थः॥ १३ ॥ पुनरपि स्वधर्मप्ररूपणायाह उ8 अहेयं तिरियं दिसासु, तसा य जे थावर जे य पाणा। भूयाहिसंकाइ दुगुंछमाणा, णो गरहती बुसिमं किंचि लोए ॥१४॥ व्याख्या-ऊधिस्तिर्यगदिक्षु ये त्रमाः स्थावराश्च ये प्राणिनस्तेषां पालकः 'भृताभिशङ्कगा' प्राण्युपमर्दशङ्कया सर्व सावद्यमनुष्ठानं जुगुप्ममानो नैवापरं लोकं कश्चन 'गर्हते' निन्दति, कः? 'बुसिमं 'ति संयमवानिति, तदेवं रागद्वेषरहितस्य वस्तुस्वरूपाविर्भावने न काऽपि गर्दा भवति, तत्रापि चेद्गर्दा स्यात्तर्हि उष्णोऽग्निः शीतमुदकं विषं मारणात्मकमित्येवमादि न किश्चिद्वस्तुस्वरूपमाविर्भावनीयमिति गाथार्थः ॥ १४ ॥ स एवं गोशालकमतानुसारी त्रैराशिको निराकृतोऽपि पुनरन्येन प्रकारेणाह आगंतऽगारे आरामऽगारे, समणे उभीते ण उवेति वासं । दक्खा हु संती बहवे मणूसा, ऊणातिरित्ता य लवालवा य ॥ १५ ॥ व्याख्या-भो आर्द्रकुमार ! भवत्सम्बन्धी योऽसौ तीर्थङ्कर स रागद्वेषमययुक्तः, तथाहि-असौ भवत्तीर्थकरः आगन्तागारं-कार्पटिकादीनां स्थानं धर्मशालाऽऽदिकं, आरामागारं उद्यानादिकं, तत्रासौ न वसति-न तत्र तिष्ठति भयेन । किं तत्र भयकारणं तत्र हागन्तुकाः बहवो 'दक्षाः' प्रभूतशास्त्रविशारदाः मनुष्यास्तिष्ठन्ति, तीतो न तत्र वासं कुरुते भगवद्विषये गोशालकोक्तिः। ।११८॥ Jain Education intele Far Private & Personal use Oh MWWEjainelibrary.org Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यतस्ते स्वतोऽवमाः-हीना जात्या[दि]भिस्तैः पराजितस्य महाश्छायाभ्रंश इति भयेन न धर्मशालाऽऽदिषु वासं विधत्ते ।। कथम्भृतास्ते पण्डिताः ? लपन्तीति · लपाः' वाचालाः घोषितानेकतर्कविचित्रदण्डकाः, तथा-न[अ] लपा-मौनव्रतिका | निष्ठितयोगाः गुटिकादियुक्ता वा, यद्वशात्परवादिनामभिधेयविषया वागेव न प्रवर्ते, ततस्तद्भयेन युष्मत्तीर्थकर आगन्तागारादौ न बजतीति गाथार्थः ॥ १५॥ पुनरपि गोशालक एवाह मेहाविणो सिखियबुद्धिमंता, सुत्तेहि अत्थेहि य निच्छयन्ना । पुच्छिसु मा + अणगार अन्ने, इति संकमाणो न उवेति तत्थ ॥ १६ ॥ व्याख्या-भो आर्द्रकुमार ! भवत्सम्बन्धी तीर्थकत एवं जानाति-यद्यहं धर्मशालादिषु स्थास्यामि तदा तत्र बहवो विशारदा मेधाविनो-ग्रहणधारणासमर्थाः, आचार्यादेः समीपे गृहीतशिक्षाः, तथोत्पत्यादिचतुर्विधवुद्ध्युपेताः, तथा सूत्रार्थविषये विनिश्चयज्ञाः-यथावस्थितसूत्रार्थवेदिनस्ते चैवम्भूताः सूत्रार्थविषयं मा प्रश्नं कापुरित्येवं शङ्कमान-स्तेभ्यो बिभ्यन् धर्मशालादिषु न तिष्ठति । अहं तैः पृष्टः सन्नुत्तरं दातुमममर्थस्ततो मम छायानंशो भविष्यती भिया न तेषु मध्ये आयाति, तेभ्यो दूरत एव तिष्ठति, अत एवासौ न जुमार्गः, भययुक्तत्वात्तस्य, तथा म्लेच्छविषयं गत्वा न कदाचिद्धर्मदेशनां चकार, आर्यदेशेऽपि न सर्वत्रापि[ ? अपितु ]कुत्रचित् , अतो विषमदृष्टित्वाद्रागद्वेषवर्यसौ इति ॥ १६ ॥ + णे' इति पादपूविव्ययम् । For Private & Personal use only Jain Education in dww.jainelibrary.org Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्रं दीपिका न्वितम् । ॥ ११९ ॥ Jain Education [ एतद् ] गोशालक मतं परिहर्तुकाम आईक आह Pulsarahara बालकिञ्चा, रायाभिओगेण कुओ भएणं । वियागरेज्जा पसिणं नवावि, स कामकिच्चेणिह आरियाणं ।। १७ । व्याख्या– भो गोशालक सहि भगवान् प्रेक्षापूर्व कारितया नाकामकृत्यो भवति, एतावता अनिच्छाकारी न भवति । यो विमृश्यकारितया भवति सोऽनिष्टमपि स्वपरात्मनो निरर्थकमपि कृत्यं कुर्वीत, भगवाँस्तु सर्वज्ञः सर्वदर्शी परहितैकरतः [ कथं ] स्वपरयोर्निरुपकारकमेवं कुर्यात् । तथा न चासौ बालकृत्यः - बालवदनालोचितकारी न परानुरोधान्नाऽपि गौरवाद्धर्म्मदेशनादिकं विधत्ते, अपितु यदि कस्यचिद्भव्य सत्वस्योपकाराय तद्भाषितं भवति तेन प्रवृत्तिर्भवति, नान्यथा, तथा न राजाभियोगेनासौ धर्मदेशनादौ कथञ्चित्प्रवर्त्तते, ततः कुतस्तस्य भयेन प्रवृत्तिः १ स्यादित्येवं व्यवस्थिते केनचित् कचित्संशयकृतं प्रश्नं व्यागृणीयाद् यदि तस्योपकारो भवति, उपकारमन्तरेण न व्यागृणीयाद्, यदिवा अनुत्तरसुराणां मनः पर्यवज्ञानिनां च द्रव्यमनसैव तन्निर्णयसम्भवादतो न व्यागृणीयादित्युच्यते, यद्भवता कथ्यते - वीतरागोऽसौ किमिति aari करोतीति ? चेदित्याशङ्कयाह - ' स्वकामकृत्येन ' स्वेच्छा [ चारि] कारितयाऽसावपि तीर्थक्र नामकर्म्मणः क्षपणाय, न यथाकथञ्चिद्, अतोऽसावग्लान ' इह ' अस्मिन् संसारे आय्र्यक्षेत्रे चोपकारयोग्ये आय्र्याणामुपकाराय धर्मदेशनां व्यागृह्णीयादसाविति गाथार्थः ।। १७ ।। किञ्चान्यत् द्वितीये श्रुत० षष्ठा ध्ययने यथोपकारं तीर्थ कृद्धर्मदेशना । ॥ ११९ ॥ Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गंता व तत्था अदुवा अगंता, वियागरेज्जा समियासुपन्ने । अणारिया दंसणओ परित्ता, इति संकमाणो ण उवेति तत्थ ॥१८॥ व्याख्या-स हि भगवान् परहित करतो गत्वाऽपि विनेयासन, अथवाऽप्यगत्वा यथा यथा भव्यसच्चोपकारो भवति तथा तथाऽर्हन्तो धर्मदेशनां विदधति । उपकारे सति गत्वाऽपि कथयन्ति, असति तु स्थिता अपि न कथयन्त्यतो न तेषां रागद्वेषसम्भव इति । केवलमाशुप्रज्ञः समतया चक्रवर्तिद्रमकादिषु [पृष्टोऽ]पृष्टो वा धर्म व्यागृणीयात् । “जहा पुण्णस्स कत्थई, तहा तुच्छस्स कथइ” इति वचनान्न रागद्वेषवान् , यत्पुनरनार्यदेशमसौ न व्रजति तत्रेदमाह-अनार्याः दर्शनतोऽपि 'परि' समन्तादिता' गताः-प्रभ्रष्टा इति यावत् , तदेवमसौ भगवान् [तेषु] सम्यग्दर्शनमात्रमपि न भवतीत्या. शङ्कमानस्तत्र न व्रजतीति । यदिवा विपरीतदर्शना:-साम्प्रतक्षिणो ह्यनास्तेि हि वर्तमानसुखमेवैकमङ्गीकृत्य प्रवर्तन्ते, न पारलोकिकमङ्गीकुर्वन्त्यतः सद्धर्मपराङ्मुखेषु तेषु भगवान याति, न पुनस्तद्वेषादिबुद्ध्येति । यदुच्यते त्वया-यथाऽनेकशास्त्रविशारदगुटिकादिसिद्धविद्यासिद्धादितीर्थिकपराभवभयेन न तत्समाजे गच्छतीत्येतदपि बालप्रलपितप्रायं, यतः-सर्वत्रस्य भगवतः समस्तैः प्रावादुर्मुखमप्यवलोकयितुं न शक्यते, वादस्तु दरोत्सादित एवेत्यतः कुतस्तत्परामवः ? भगवास्तु केवलालोकेन यत्रैव स्वपरोपकारं पश्यति तत्रैव गत्वापि धर्मदेशनां विधत्ते इति गाथार्थः ॥ १८ ॥ पुनरन्येन प्रकारेण गोशालक आह Jain Education in Arjwwjainelibrary.org Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्र दीपिकान्वितम्। ॥ १२० पन्नं जहा वणिए उदयट्ठी, आयस्स हेउं पगरेति संगं । तओवमे समणे नायपुत्ते. इच्चेव मे होति मती वियका ॥ १९ ॥ व्याख्या-भो आद्रकुमार ! यथा कश्चिद्वणिक ' उदयार्थी' लाभार्थी 'पण्यं ' व्यवहारयोग्यं भाण्डं कर्पूरागुरु. कस्तूरिकाऽम्बरादिकं गत्वा देशान्तरं विक्रीणाति, तथा 'आयस्य' लाभस्य 'हेतोः' कारणान्महाजनसङ्गं विधत्ते, तदु-N पमोऽयमपि भवतीर्थकरः 'श्रमणो' ज्ञातपुत्रः इत्येवं मे मतिर्भवति वितर्को-मीमांसा वेति गाथार्थः ॥ १९॥ ___ एवमुक्ते गोशालकेन आईक आह ण कुज्जा विहुणे पुराणं, चिच्चाऽमई ता[इ]य इ(?)साह एवं । प(त्ता)न्ना [एत्तो]वया बंभवतित्ति वुत्ता, तस्सोदयट्ठी समणे तिबेमि ॥२०॥ ___व्याख्या-मो गोशालक! योऽयं वणिग्दृष्टान्तो दर्शितः, स किं सर्वतो देशतो वा सदृक्षः ? यदि देशतस्ततो न न: ( अस्माकं ) क्षतिमावहति, यतो वणिग्यत्रैव लामं पश्यति तत्रैव क्रियां व्यापारयति, न यथाकथश्चिदिति, एतावता साधर्म्यमस्त्येव । अथ सर्वसाधम्र्येण, तन्न युज्यते, यतो भगवान् विदितवेद्यतया सावद्यानुष्ठानरहितो नवं कर्म न कुर्यात् , तथा विधुनय-त्यपनयति पुरातनं यद्भवोपग्राहिकर्म बद्धं, तथा त्यक्त्वा 'अमति' विमति 'त्रायी' भगवान् ‘तायी वा' | मोक्षं प्रति ममनशीलो भवतीति, एतावता च सन्दर्भण 'ब्रह्मणो' मोक्षस्य व्रतं ब्रह्मव्रतमित्येतदुक्तं, तस्मिथोक्ते तदर्थे व द्वितीये श्रुत. षष्ठाध्ययनेयथोपकारं तीर्थकृद्धर्मदेशना । ॥ १२० ॥ Jain Educationtin a l INAL Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुष्ठाने क्रियमाणे तस्योदयस्यार्थी-लाभार्थी श्रमण इति ब्रवीम्यहमिति ॥२०॥ न चैवम्भृता वणिज इति पुनरार्द्रकुमारो दर्शयितमाह समारभंते वणिया भूयगामं, परिग्गहं चेव ममायमाणा । ते णातिसंजोगमविप्पहाय, आयस्स हेउं पकरोति संगं ॥ २१ ॥ व्याख्या-ते हि वणिजश्चतुर्दशप्रकारमपि भूतग्राम समारमन्ते, तदुपमईकाः क्रियाः प्रवर्सयन्ति क्रयविक्रया शकट. वाहनोष्ट्रमण्डलिका( श्वाना )दिभिरनुष्ठानैरिति, तथा परिग्रहं द्विपदचतुष्पदादिकं ममीकुर्वन्ति, ते हि वणिजो जातिभिः सह संयोग ' अविप्रहाय ' अपरित्यज्य 'आयस्य' लाभस्य हेतोरपरेण सार्द्ध सङ्ग' सम्बन्धं कुर्वन्ति । भगवास्तु-षड्जीवरक्षापरोऽपरिग्रहस्त्यक्तस्वजनपक्षः सर्वत्राप्रतिबद्धो धर्माऽऽयमन्वेषयन् गत्वाऽपि धर्मदेशनां विधत्ते, अतो मगवतो वणिग्भिः सार्धं न सर्वसाधर्म्यमस्तीति गाथार्थः ॥ २१ ॥ पुनरपि वणिजां दोषमुद्भावयन्नाह वित्तेसिणो मेहुणसंपगाढा, ते भोयणट्टा वणिया वयंति । वयं तु कामेहि अज्झोववन्ना, अणारिया पेमरसेसु गिद्धा ॥ २२ ॥ व्याख्या-वणिजो वितैषिणस्तथा ' मैथुने ' स्त्रीसम्प 'सम्प्रगाढा' अध्युपपन्नास्तथा ते भोजनार्थ-माहारार्थ वणिज इतश्चेतश्च व्रजन्ति वदन्ति वा, ताँस्तु वणिजो वयमेवं अमो-यथेते कामेष्वध्युपपन्नाः-गृद्धाः, अनार्या रसेषु च साता Jain Education intemer inelibrary.org Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिका न्वितम् । ।। १२१ ।। Jain Education Internat गौरवादिषु 'गृद्धा' मूर्च्छिताः, न त्वेवम्भूता भगवन्तोऽईन्तः, कथं तेषां तैः सह साधर्म्यमिति दूरत एव निरस्तेषा कथेति गाथार्थः ।। २२ ।। किञ्च तेसिं च आरंभगं चैव परिग्गहं च, अविउस्सिया णिस्तिय आयंदडा । उदए जं वयासी, चउरंतणताय दुहाय णेह ॥ २३ ॥ व्याख्या - आरम्भं परिग्रहं च ' अभ्युत्सृज्य ' अपरित्यज्य तस्मिन्नेवारम्भे परिग्रहे च निश्चयेन ' सृता ' बद्धानिसृता वणिजो भवन्ति । तथा आत्मदण्डा असदाचारप्रवृत्तेरिति भावोऽपि च तेषां वणिजां परिग्रहारम्भवत स 'उदयो' लाभो यदर्थे ते प्रवृत्ताः यं च त्वं लाभं वदसि स तेषां 'चतुरन्तः' चतुर्गतिको यः संसारोऽनन्तस्तस्मै - तदर्थं भवतीति, [तथा] दुःखाय च भवति । अतस्त्वमर्हतां वणिजां साम्यं मा कुर्विति गाथार्थः ।। २३ ।। एतदेव दर्शयितुमाहगतिएऽणञ्चंतिय उदए से, वयंति ते दो वि गुणोदयंमि । से उदय सातिमणंतपत्ते, तमुदयं साहयइ ताइ णाई ॥ २४ ॥ व्याख्या – अहो गोशालक ! स वणिजां लाभो नैकान्तिकः, लाभार्थं धावतामलाभोऽपि स्यात् स तु लाभ आत्यन्तिकोऽपि न - अवश्यं सर्वकालभाव्यपि न, कदाचित्स्यात् कदाचिन्नेति व्यापारविदो वदन्ति । तौ च द्वावपि भावौ विगतगुणोदयौ, किमुक्तं भवति १ किं तेनोदयेन-लाभेन । यो नैकान्तिको नात्यन्तिकथ अनर्थाय च प्रत्युत स्यात् । तथा द्वितीये श्रुत● षष्ठाध्ययने वणिजैस्स हासाधर्म्य भगवतः ॥ ॥ १२१ ॥ linelibrary.org Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवतः सर्वक्षस्य यो लामः स केवलज्ञानप्राप्तिलक्षणो निर्जरारूप एव, स तु साधनन्तो लाम इति, एवंविघलामसहितो भगवान् अन्येषामपि तादृग्विधमेव लाभं ददाति । कथम्भूतो भगवान् ? पायी, आसनसिद्धिगमनानां वाणकरणात् सथा ' ज्ञाती' बातशत्रियवंशोद्भवः अथवा 'ज्ञाती' विदितसमस्तवेद्य इत्यर्थः । तदेवम्भूतेन भगाता तेषां वणिजां निर्विवेकिनां कथं सर्वसाधर्म्य ? कथं वा तैः सह भगवतः उपमानं दीयत ? इति गाथार्थः ॥ २४ ॥ साम्प्रतं देवकृतसमवसरणपद्मावलीदेवच्छन्दकसिंहासनादिकोपभोगं कुर्वनप्याधाकर्मकृतवसतिनिषेवकसाधुवकथं तदनुमतिकृतेन कर्मणाऽसौ न लिप्यत इत्येतद्गोशालकमतमाशङ्कयाह आईकुमार: अहिंसयं सवपयाणुकंपी, धम्मे ठितं कम्मविवेगहे। तमायदंडेहिं समायरंता, अबोहीए ते पडिरूवमेयं ॥२५॥ __ व्याख्या-मो गोशालक ! असौ भगवान् समवसरणाद्युपभोगं कुर्वन्नप्यहिंसन्नुपभोगं करोति, एतदुक्तं भवति-न हि तत्र भगतो मनागप्याशंसा प्रतिबन्धो वा विद्यते, समतृणमणिलोष्टु काश्चनतया तदुपभोगप्रवृत्ते देवाः प्रवचनप्रभावनाहेतोः सम्यक्त्वनिर्मलीकरणार्थमहद्भक्तिभाविताः सन्तःप्रवचन्ते, अतोऽसौ भगवान हिंसका, तथा सर्वप्रजाऽनुकम्पकः । एवम्भूतं भगवन्तं धमें व्यवस्थितं कर्मविवेकहेतुभूतं भवद्विधा आत्मदण्डैः समाचरन्त आत्मकल्पं कुर्वन्ति वणिगादिभिरुदाहरणरेतच्चाबोधे-रविज्ञानस्य प्रतिरूपं वर्तते । एकं तावदिदमज्ञानं-यत्स्वतः कुमार्गप्रवर्तनं द्वितीयं च यद्भगवतामपि जग वा विद्यते तअत: ममाचा Jain Education Internatio halibrary.org Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यगडाङ्ग-IN द्वन्द्यानां सर्वातिशयनिधानभूतानामितरैः समत्वापादनमिति गाथार्थः ॥ २५॥ सूत्रं । ___ साम्प्रतमार्द्रकुमारमपहस्तितगोशालकं ततो भगवदभिमुखं गच्छन्तं दृष्ट्वाऽपान्तराले शाक्यपुत्रीया भिक्षव इदमुचुर्यदेत दीपिका- णिग्दृष्टान्तं गोशालोक्तं त्वया दुषितं तच्छोभनं कृतं भवता, यतो बाह्यमनुष्ठानं शून्यप्राय अन्तरङ्गमनुष्ठानमेव प्रधानं न्वितम् । मोक्षाचं ज्ञातव्यम् । अस्मत्सिद्धान्ते ऽप्येवमेव व्यावयेते, भो आर्द्रककुमार! त्वं सावधानतया मदुक्तमवधारयेति भणित्वा ते भिक्षवः आन्तरानुष्ठानसमर्थकमात्मीयसिद्धान्ताविर्भावनायेदमाहुः। ॥ १२२॥ पिन्नागपिंडीमवि विद्धु सूले, केइ पएज्जा पुरिसे इमेत्ति । अलाउयं वावि कुमारएत्ति, स लिप्पती पाणिवहेण अम्हं ॥ २६ ॥ व्याख्या-'पिण्याकः' खलस्तस्य 'पिण्डि'मिन खल शकलमचेतनमपि क्वापि स्थाने पतितं दृष्ट्वा तदुपरि केनचिन्नइयता प्रावरणं ( वस्त्रं ) खलोपरि प्रक्षिप्त, तच्च म्लेच्छेन केनाप्यन्वेष्टुं प्रवृत्तेन पुरुषोऽयमिति मत्वा खलपिण्ड्या सह गृहीतं, तोऽसौ ग्लेच्छो करूवेष्टितां तां खलपिण्डि पुरुषबुद्ध्या शूले प्रोतां पावके पचेत , तथा 'अलाबुकं' तुम्बकं कुमारकोऽयमिति मत्वा अग्नावेव पपाच, स चैवं चित्तस्य दुष्टत्वात्प्राणिवधजनितेन पातकेन लिप्यते, अस्मसिद्धान्ते चित्तमूलत्वाच्छुभाशुभबन्धस्य, अशुभपरिणामेन बन्धः, अचित्तप्रामाण्यादकुर्वन्नपि प्राणातिपातं प्राणिघातफलेन युज्यत इति गाथार्थः ।। २६ ॥ अमुमेव दृष्टान्तं वेपरीत्ये वाह द्वितीये श्रुत पष्ठाध्ययने गोशालकोक्तवणिग्दृष्टान्तः स्यासिद्धत्वम् । Son । ।१२२ ॥ Jain Education in For Private & Personal use Daly jainelibrary.org Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern अहवा विविद्धूण मिलक्खु सूले, पिन्नागबुद्दीइ नरं पजा । कुमारगं वावि अलाउयंति, न लिप्पइ पाणिवण अहं ॥ २७ ॥ व्याख्या - अथवाऽपि सत्यपुरुषं खलबुद्ध्या कश्चिन्म्लेच्छः शूले प्रोतमग्नौ पचेत्, तथा कुमारकमलाबुबुद्ध्याऽग्नावेवपचेत्, न चासौ प्राणिबधजनितेन पातकेन लिप्यतेऽस्माकमिति गाथार्थः ॥ २७ ॥ किञ्चान्यत् पुरिसं च विद्धूण कुमारगं वा, सूलंमि केइ पयए जायतेए । पिन्नायपिंडं सतिमारुहेत्ता, बुद्धाण तं कप्पति पारणाए ॥ २८ ॥ व्याख्या - पुरुषं वा कुमारकं वा शूले विद्धा कश्चित्पचेत् वह्नौ खलपिण्डीयमिति मत्वा ' सतीं' शोमनां वदेतत् बुद्धानामपि पारणाय कल्पते-योग्यं भवति, किमुतापरेषाम् १ एवं मनमा असङ्कल्पितं कर्म न लगतीति गाथार्थः ॥ २८ ॥ पुनः शाक्य एव दानफलमधिकृत्याह- सिणायगाणं तु दुवे सहस्से, जे भोयए निति [णिय ] ए भिक्खुयाणं । ते पुन्नखंधे सुमहज्जिणित्ता, भवंति आरोप महंतसत्ता ॥ २९ ॥ व्याख्या - स्नातका बौद्धमते प्रधाना दर्शनिनस्तेषां भिक्षुकाणां सहस्रद्वयं निजे ' शाक्यपुत्रीये धर्मे व्यवस्थितः jainelibrary.org Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यगडाङ्ग Ni द्वितीये श्रुत. दीपिकान्वितम् ।। आद्रकुमारेण कृतंबौद्धाना प्रत्युत्तरम् । कश्चिदुपासकः पचनपाचनाद्यपि कृत्वा भोजयेत् समांसगुडदाडिमेन इष्टेन भोजनेन, ते महासचाः पुरुषाः श्रद्धालयः पुण्यस्कन्ध [सु]महान्तं समावयं-अर्जयित्वा तेन च पुण्यस्कन्धेनाऽऽरोप्याख्या देवा भवन्ति, सर्वोचमा देवगति गच्छन्तीत्यर्थः ॥ २९॥ तदेवं बुद्धेन दानमूलः शीलमूलश्च धर्मः प्रवेदितः, तदेह्या-गच्छ बौद्धसिद्धान्तं प्रपद्यस्वेत्येवं भिक्षुकरभिहितः सन्नाईकोऽनाकुलया दृष्ट्या तान् वीक्ष्योवाचेदं वक्ष्यमाणमित्याह अजोगरूवं इह संजयाणं, पावं तु पाणाण पसज्झ काउं। अबोहिए दोण्ह वितं असाहू, वयंति जेआवि पडिस्सुणंति ॥ ३०॥ व्याख्या-अहो शाक्यपुत्रीयाः ! 'इह' अस्मिन् भवदीये शाक्पमते 'संयतानां ' भिक्षुगां यदुक्तं भोजनं तदयो. [ग्यरूप-मयोग्य, तथाहि-अहिंसार्थमुत्थितस्य त्रिगुप्तिगुप्तस्य पञ्चसमितिसमितस्य सतः प्रत्रजितस्य सम्यग्ज्ञानपूर्विका क्रियां कुर्वतो मावशुद्धिः फलवती भवति, तद्विपर्यस्तमतेस्त्वज्ञानावृतस्य महामोहाकुलीकृतान्तरात्मतया खलपुरुषयोरपि विवेकमजानतः कृतस्त्या भाव शुद्धिः ? अतोऽत्यन्तमयुक्तमेतदुद्धमतानुसारिणां यत्खलबुद्ध्या पुरुषस्य शलपोतनपचनादिकं, तथा बुद्धस्य चाऽन्म[पिण्याक]बुद्ध्या पिशित(मांस)मक्षणानुमत्यादिकमित्येतदाह 'प्रागाना'मिन्द्रियादीनामपगमनेन तु पापमेव कृत्वा रससातगौरवादिगृद्धास्तदभावं व्यावयेयन्ति, एतच्च तेषां पापाभावव्यावर्णनमबौध्यै-अबोधिलाभार्थ तयो Jain Education into Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ योरपि सम्पद्यते अतोऽमाध्वेतत् , कयोयोरित्याह-ये वदन्ति पिण्याकबुझ्या पुरुषपाकेऽपि पातकामावं ये च तेभ्य: शृण्वन्ति तयोर्द्वयोरपि वर्गयोरसाध्वेतदिति । अपिच-नाज्ञानावृतमहजने मावशुस्या शुद्धिर्भवति, यदि स्यात्संसारमोचकादी. नामपि तहि कमविमोक्षः स्यात्, तथा मावशुद्धिमेव केवलामभ्युपगच्छतां भवतां शिरस्तुण्डमुण्डनपिण्डपातादिकं चैत्यकर्मादिकं चानुष्ठानमनर्थकमापद्यते, तस्मान्नैवंविधया भावशुद्ध्या शुद्धिरुपजायत इति स्थितमिति गाथार्थः ॥ ३० ॥ अथाकः स्वपक्षाविर्भावनायाह उहुं अहेयं तिरियं दिसासु, विन्नाय लिंगं तसथावराणं । भूयाभिसंकाइ दुगुंछमाणे, वदे करेजा वि कओ विहऽस्थि ॥ ३१॥ व्याख्या-ऊर्द्धमधस्तिर्यक सर्वासु दिक्षु प्रसानां स्थावराणां च लिङ्ग-चलनस्पन्दनारोद्भवच्छेदम्लानादिकं विज्ञाय भूताभिशङ्कया-जीवोपमर्दोऽत्र भविष्यतीत्येवं बुद्ध्या सर्वमनुष्ठान जुगुप्समानस्तदुपमई परिहरन् ' वदेत् ' धर्म कथयेत्कुर्या-IN दप्यतः कुतोऽस्तीहास्मिन्नेवम्भतेऽनुष्ठाने क्रियमाणे प्रोच्यमाने वाऽस्मत्पक्षे युष्मदापादितो दोष इति गाथार्थः ॥ ३१ ॥ अथ खले पुरुषबुद्धया असम्भवमेव दर्शयितुमाह पुरिसेत्ति पिन्नंति [विन्नत्ति] न एय अस्थि, अणारिए से पुरिसे तहा हु। को संभवो ? पिन्नगपिंडियाए, वाया वि एसा बुइया असच्चा ॥ ३२ ॥ Jain Education Ww.jainelibrary.org Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग श्रुत दीपिकान्वितम्। ॥१२४॥ व्याख्या-तस्यां पिण्याकपिण्डयां पुरुषोऽयमित्येवं महामूर्खस्यापि [विज्ञप्तिरेव नास्ति ] मतिरीदृशी न जायते, तथा N| द्वितीये खलेऽपि यः पुरुषमति मन्यते स अनार्य एवासौ यः पुरुषमेव खलोऽयमिति मत्वा हतेऽपि नास्ति दोषः इत्येवं वदेव , तथाहि-कः सम्भवः ? पिण्याकपिण्डयां पुरुषबुद्धरित्यतो वागपीयमसत्या, ईग्माषाया भाषकोऽपि निर्विवेक अशुभं कर्म | वाचाऽपि बध्नाति अनन्तं च संसारं रुलतीति गाथार्थः ।। ३२ ।। किश्च अवाच्यत्वं वायाभिओएण जमावहेज्जा, णो तारिसं वायमुदाहरिजा। मांसभक्षणअट्ठाणमेयं वयणं गुणाणं, णो दिक्खिए बूय सुरालमेयं ॥ ३३ ॥ व्याख्या-वाचाऽमियोगो-वागभियोगस्तेनापि यस्मात्पापमावत , अतो विवेकी-भाषागुणदोषज्ञो न तादृशीं 'वाचं' भाषामुदाहरेत-न वदेत् । यत एवं ततोऽस्थानमेतद्वचनं गुणानां, अतो यः प्रबजितः [ उदारं-सुष्टु परिस्थरं] IN ईदृशमसारं वचनं न ब्रूयात् । तद्यथा-पिण्याकोऽपि पुरुषः पुरुषोऽपि पिण्याकः तथाऽलावुकमेव बालको बालक एवं अलाबुकमिति गाथार्थः ।। ३३ ॥ साम्प्रतमार्द्रक एव तं भिक्षुकं युक्तिपराजितं सन्तं सोल्लुण्ठं विभणिषुराह लद्धे (हु) अट्टे अहो !! एव तुब्भे, जीवाणुभागे सुविचिंतिए य । पुत्वं समुदं अवरं च पुटुं, ओलोइए पाणितलट्ठिए वा ॥ ३४ ॥ १२४॥ For Private & Personal Use Oy jane brary.org Jan Education Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern व्याख्या - अहो भिचवः । एवंविधाम्युपगमे युष्माभिरेव लब्धः ' अर्थो' विज्ञानं यथावस्थितं तत्त्वमिति तथाऽवगतः सुचिन्तितो भवद्भिर्जीवानामनुभागः कर्मविपाकस्तत्पीडा इति, तथा एवम्भूतेन विज्ञानेन भवतां यशः पूर्व समुद्रमपरं समुद्रं च स्पृष्टं - गतमित्यर्थः तथा भवद्भिरेवं [विघ] विज्ञानावलो केनावलोकितः पाणितलस्थित इवायं लोक इति अहो ! Hai विज्ञानातिशयो !! यदुत-पिण्याकपुरुषयोरला बुकचालकयोर्वा बाते [ पापस्य ] कर्म्मणो मात्राभावं प्राक्रू कल्पितवन्तो भवन्त इति गाथार्थः || ३४ || अथार्द्रकः परपक्षं दूषयित्वा स्वपक्षस्थापनायाह जीवाणुभागं सुविचिंतयंता, आहारिया अन्नविहीइ सोहिं । न वियागरे छन्नपओपजीवी, एसोऽणुधम्मो इह संजयाणं ॥ ३५ ॥ व्याख्या - जिनशासनप्रतिपन्नाः [ सर्वज्ञोक्तमार्गानुसारिणो ] जीवानामनुभाग - मवस्थाविशेषं तदुपमर्देन पीडां वा सुष्ठु ' विचिन्तयन्तः ' पर्यालोचयन्तः अन्नविधौ शुद्धि ' आहृतवन्तः ' स्वीकृतवन्तो द्विचत्वारिंशदोषहितेन शुद्धेनाहारेणाहारं कृतवन्तो, नतु यथा भवतां पिशिताद्यपि पात्रपतितं न दोषायेति, एवंविधं वचोऽपि जैना महर्षयो न भाषन्ते । भवन्तः कीदृशाः ? छन्नपदोपजीविनः, हिंसास्थानोपजीविन इत्यर्थः, न तादृशा जैना मुनयः तेषां हि मुनीनां निर्दोषाहारग्रहणेन षट् कायप्रतिपालनेन तीर्थङ्करानुयायी धम्मों ज्ञेय इति गाथार्थः || ३५ || पुनरार्द्रकुमारः कथयति - jainelibrary.org Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिका न्वितम् । ।। १२५ ।। Jain Education Int सिणायगाणं तु दुवे सहस्से, जे भोयए निइ[निय ] ए भिक्खुयाणं । असंजए लोहियपाणि से ऊ, नियच्छती गरिहमिव लोए || ३६ || व्याख्या- ' स्नातकानां ' बौद्धभिक्षूणां नित्यं यः सहस्रद्वयं भोजयेदित्युक्तं प्राक् तस्य यो लाभं वक्ति सोऽयतो 'लोहितपाणिः ' रुधिरार्द्रपाणिरनार्य इव 'निन्दां' जुगुप्सापदवीं इहलोक एव निश्वयेन गच्छति परलोके चानार्यगम्यां गतिं गच्छति, एवं तावत्याद्यानुष्ठानानुमन्तृणामात्रभूतानां यद्दानं तत्कर्म्मबन्धाय केवलं, न लाभायेति गाथार्थः ||३६|| किश्च - थूलं उभं इह मारियाणं, उद्दिट्ठभत्तं च पगप्पइत्ता । तं लोण तेल्लेण उवक्खडित्ता, सपिप्पलीयं पगति मंसं ॥ ३७ ॥ व्याख्या - 'स्थूल' महाकाय मुपचितमासशोणितं 'उरभ्रं' ऊरणकं 'इह' शाक्यशासने भिक्षुकमङ्घोदेशेन व्यापाद्यघातयित्वा तथोद्दिष्टमक्तं च प्रकल्पयित्वा [ विकर्थ्य वा तं ] उरभ्रं तन्मांसं वा लवणतैलाभ्यामुपस्कृत्य - पाचयित्वा सपिप्पली कं समरिचं अपरसँस्कारकद्रव्यसमन्वितं प्रकर्षेण मक्षणयोग्यं मॉसं कुर्वन्तीति गायार्थः ॥ ३७ ॥ सँस्कृत्य च यत्कुर्वन्ति तद्दर्शयितुमाह द्वितीये श्रुत० मांसशीनां बौद्धाना मानार्यगम्यगतिगामित्वम् । ॥ १२५ ॥ jainelibrary.org Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तं भुंजमाणा पिसित पभूतं, नो उवलिप्पामो वयं रएणं । इच्चेवमाहंसु अणजधम्मा, अणारिया बाल रसेसु गिद्धा ॥ ३८ ॥ व्याख्या-'तत् ' पिशितं शुक्रशोणितसम्भूतमनार्या इत्र भुञ्जाना अपि प्रभूतं तद्रजसा-पापेन कर्मणा न वय. मुपलिप्यामहे इत्येवं धाष्टयोपेताः प्रोचुरनार्या 'बाला' विवेकरहिताः 'रसेषु'मांसादिषु 'गृद्धाः' मूञ्छिताः, इत्येतच तेषां महते अनर्थायेति गाथार्थः ।। ३८ ॥ एतदेा दर्शयति जे यावि भुंजंति तहप्पगारं, सेवंति ते पावमजाणमाणा । मणं न एयं कुसला करिती, वाया वि एसा बुइया उ मिच्छा ॥ ३९ ॥ व्याख्या-ये चापि रसगारवगृद्धाः शाक्योपदेशवर्तिनस्तथाप्रकार स्थूलोरभ्रसम्भूतं घृतलवणमरिचादिसंस्कृतं पित्रितं भुञ्जन्ते पापमजानानाः निर्विवेकिनः सेवन्तेक तदेवं महादोषं मांसमक्षगमिति मत्वा यद्विधेयं तद्दर्शयति-तदेवम्भूतं मांसाद * " यदुक्तं-हिंसामूलममेध्यमास्पदमलं ध्यानस्य रौद्रस्य य-द्वीमत्सं रुधिरा विलं कृमिगृहं दुर्गन्धिपूयाविलम् । शुक्रामृक्प्रभवं नितान्तमलिनं मद्भिः सदा निन्दितं, को भुते नरकाय राक्षमसमो मांसं तदात्मद्रहः॥१॥ तथा-मांस भक्षयिताऽमुत्र, यस्य मांसमिहाद्यहम् । एतन्मांसस्य मांसत्वं, प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २॥ (तथा)-योनि यस्य च मांसमुभयोः पश्यतान्तरम् । एकस्य क्षणिका तृप्ति-रन्यः प्रागैर्वियुज्यते ॥ ३॥" इति हर्ष. JainEducation a l For Private & Personal use only W ww.jaineliterary.org. Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ १२६ ॥ Jain Education Inte नाभिलाषरूपं मनो-न्तःकरणं ' कुशला ' निपुणा न कुर्वन्ति, महापापहेतुत्वा [तदभिलाषा]न्मनो निवर्त्तयन्ती त्यर्थः । आस्तां भक्षणं वागध्येषा " न मांस भक्षणे दो + ष० " इत्यादिका वामप्युक्ता महते पातकायेति मत्वा वचोऽपि न वाच्यमिति गाथार्थः ॥ ३९ ॥ न केवलं मांसादनमेव त्याज्यमन्यदपि मुमुक्षूणां परिहर्त्तव्यमिति दर्शयितुमाहसवेसि जीवाण दयट्टयाए, सावज्जदोसं परिवज्जयंता | तस्संकिणो इसिणो नायपुत्ता, उद्दिट्ठभत्तं परिवज्जयंति ॥ ४० ॥ व्याख्या - सर्वेषां जीवानां सुखाभिलाषिणां दुःखद्विषां न केवलं पञ्चेन्द्रियाणामेवेति सर्व ग्रहणं, ' दयाऽथं ' दयानिमित्तं सावद्यारम्भं महासदोषं मत्वा तं परिवर्जयन्तः [तच्छङ्किनो-दोषशङ्किनः ] साधवो ज्ञातपुत्रीया महर्षयः ' उद्दिष्टं ' साधुदानाय कल्पितं यद्भक्तपानादिकं, तत् परिवर्जयन्तीति गाथार्थः ॥ ४० ॥ किश्वभूयाभिसंकाइ दुर्गुछमाणा, सबेसि पाणाण निहाय दंडं । तम्हा ण भुंजंति तह पगारं, एसोऽणु धम्मो इह संजयाणं ॥ ४१ ॥ × “ निवृत्तिस्तु महागुणाय, यदुक्तं श्रुत्वा दुःखपरम्परामतिघृणां मांसाशिनां दुर्गति, ये कुर्वन्ति शुभोदयेन विरतिं मांसादनस्यादरात् । सद्दीर्घायुरदूषितं गदरुजा सम्भाव्य यास्यन्ति ते, मर्त्येषूद्भटभोगधर्ममतिषु स्वर्गापवर्गेषु च ॥ १ ॥ " इति हर्ष० । +" षो, न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ।। १ ।। "9 द्वितीये श्रुत० उद्दिष्ट भक्तस्यापि वर्जनी यत्वं जैन श्रमणा नाम् । ॥ १२६ ॥ w.jainelibrary.org Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्याख्या-'भूताभिशङ्कथा' भृतोपमईशङ्कया सावद्यमनुष्ठानं 'जुगुप्समानाः' परिहरन्तस्तथा सर्वेषां प्राणिनां 'दण्डः' समुपतापस्तं 'नि[ धाय हाय ' त्यक्त्वा सम्यगुत्थानेनोत्थाय सत्साधवो यतयस्ततो न भुञ्जन्ते तथाप्रकारमशुद्ध-IN जातीयमाहारमिति, एषोऽनुधर्मः इह प्रवचने संयतानां-यतीनां तीर्थकराचरणादनु-पश्चादाचर्यते[ इत्यनुना विशेष्यते ], यथा तीर्थकरौनिर्दोषाहारग्रहणं कृतं तथा तदनुसारिभिः साधुभिरपि तथैव विधेयं, यद्वाऽणुरिति स्तोकेनाप्यतिचारेण बाध्यते शिरीषपुष्पमिव सुकुमारोऽयं धर्म इति गाथार्थः ।। ४१ । किश्चान्यत् निग्गंथधम्ममि इमं समाहि, अस्सिं सुठिच्चा अणिहे चरेजा । बुद्धे मुणी सीलगुणोववेए, अच्चत्थ[ओ]तं पाउणती सिलोगं ॥ ४२ ॥ व्याख्या-निर्ग्रन्थधर्मे-श्रुतचारित्ररूपे क्षान्त्यादिके वा सर्वज्ञोक्ते व्यवस्थितः 'इम' पूर्वोक्तं समाधिमनुप्राप्तोऽस्मिंश्चाशुद्धाहारपरिहाररूपे समाधौ सुस्थि[त्वा]न: ' अनिहो' मायारहितोऽस्नेहो वा साधुः संयमानुष्ठानं चरेत , तथा बुद्धोऽवगततच्यो 'मुनिः' कालत्रयवेदी, तथा शीलेन क्रोधाद्युपशमरूपेण गुणेश्व-मूलोत्तरगुणभूतैरुपेतो-युक्तः इत्येवं गुण. कलितोऽत्यर्थं संतोषात्मिका श्लाघा' प्रशंसां लोके लोकोत्तरे चावाप्नोति, तथा चोक्तम्-" राजानं तृणतुल्यमेव मनुते शक्रेऽपि नैवादरः, वित्तोपाजेनरक्षणव्ययकृताः प्राप्नोति नो वेदनाः। संसारान्तरवलुपीह लभते शं. मुक्तवनिर्भयः, सन्तोषात्पुरुषोऽमृतत्वमचिराद्यायात्सुरेन्द्रार्चितः ॥१॥" इत्यादि ॥ ४२ ॥ JainEducation inayak १२ For Privats&Personal use Only w.jainelibrary.org Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग NI सूत्रं दीपिका- 4॥ १२७॥ ___ तदेवमाककुमारं निराकतगोशालकाजीवकचौद्धमतमभिसमीक्ष्य साम्प्रतं द्विजातयः प्रोचुस्तद्यथा-मो आर्द्रककुमार! द्वितीये शोभनमकारि भवता यदेते वेदबाह्ये द्वे अपि मते निरस्ते, तत्माम्प्रतमेतदप्याहतं वेदवाखमेवातस्तदपि नाश्रयणाई श्रुत भवद्विधानां, तथाहि-भवान् क्षत्रियः, क्षत्रियाणां च सर्ववर्णोत्तमा ब्राह्मणा एवोपास्याः, न शूद्राः, अतो यामादिविधिना षष्ठाभ्यने | ब्राह्मण सेवैव युक्तिमतीत्येतत्प्रतिपादयन्नाह ब्राह्मणैः सिणायगाणं तु दुवे सहस्से, जे भोयए णि[यए]तिए माहणाणं । स्वमत ते पुन्नखंधं सुमहऽजणित्ता, भवंति देवा इति वेयवाओ ॥४३॥ प्रकाशन व्याख्या-षट्कर्माभिरताः वेदाध्यापकाः शौचाचारपरतया नित्यस्नायिनो ब्रह्मचारिणो द्विजाः स्नातका उच्यन्ते, माकुमातेषां नित्यं सहस्रद्वयं ये भोजयेयुः कामिकाहारेण, ते समुपार्जितपुण्यस्कन्धाः सन्तो देवाः स्वर्गनिवासिनो भवन्तीत्येवम्भूतो राने। वेदवाद इति गाथार्थः ॥ ४३ ॥ अथाईक एतद्पयितुमाह सिणायगाणं तु दुवे सहस्से, जे भोयए णि[यए]तिए कुलालयाणं । से गच्छति लोलुयसंपगाढे, तिवाहितावी णरगाभिसेवी ॥४४॥ व्याख्या-स्नातकानां सहस्रद्वयमपि नित्यं ये भोजयन्ति, किम्भूतानां ? 'कुलालयाः' मार्जारास्तत्सदृशाः द्विजा:ज्ञातव्याः, यतः-सावद्याहारवाञ्छया सर्वदा सर्वगृहेषु मार्जारा इव भ्रमन्ति, एवंविधानां निन्द्यजीविकाजीवनानां सहस्त्र ॥ १२७॥ For Private & Personal use only W ww.jaineltray.org Jan Education Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वयं यो भोजयेत्सोऽसत्पात्रनिक्षिप्तदानस्तैः स्नातकै शणैः सह नरके बहुवेदने [गच्छति] एतावता त्रयस्त्रिंशत्सागरायुनारको जायते इति गाथार्थः ।। ४४ ॥ अपि च दयावरं धम्म दुगुंछमाणे, वहावहं धम्म पसंसमाणे । एगंपि जे भोजयति असीलं, निवो णिसं जाति कोऽसुरेहिं ? ॥४५॥ व्याख्या-[दयया वरं]दयावरं धर्म 'जुगुप्समानो' निन्दन तथा 'वधात्मकं' प्राण्युपमात्मकं धर्म प्रशंसन् एकमपि 'अशील' विरतिरहितं षट्कायोपमन यो भोजयेत् , एकमपि, किम्पुनः प्रभूतान् ?'नृपो' राजाऽन्यो वा यः कश्चिन्मूढमति. र्धार्मिकमात्मानं मन्यमानः, स वराको निशेव नित्यान्धकारवानिशा-नरकभूमिस्तां याति, कुतस्तस्यासुरेष्वप्यधमदेवेषु प्राप्तिरिति गाथार्थः॥४५॥ तदेवमार्द्रकुमारं निराकृतब्राह्मणवाद भगवदन्तिकं गच्छन्तं दृष्ट्वा एकदण्डिनोऽन्तराल एवोचुस्तद्यथा-भो आईककुमार! शोभनं कृतं भवता, यदेते सर्वारम्भप्रवृत्ता गृहस्थाः शब्दादिविषयपरायणा मांसाशिनो राक्षसकल्पा द्विजातयो निराकृताः, साम्प्रतमस्मसिद्धान्तं शृणु, श्रुत्वा चावधारय, अस्मसिद्धान्तभवसिद्धान्तयोर्न कोऽपि भेदोऽस्ति, इत्येतदर्शयितुमाह दुहओ वि धम्ममि समुट्ठियामो, अस्सि सुठिच्चा तह एसकालं । आयारसीले बुइएऽह णाणे, ण संपरायम्मि विसेसमस्थि ॥ ४६ ॥ rininelibrary.org Jain Education in Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत. षष्ठाध्ययने एकदण्डिमतप्रकाशनम् । अवमडा व्याख्या-योऽयमस्मद्धम्मो भवदीयश्चाहतः स उभ यरूपोऽपि कथश्चित्सदृशः, यतः युष्माकं मते जीवास्तित्वे पुण्यसत्रं पापबन्धमोक्षानामपि सद्भावः, अस्माकमपीत्य मेवाऽस्ति । अस्माकमपि पश्च यमाः अहिंमाद्याः, भवतां च त एव पञ्च महा. दीपिका ब्रतरूपाः, तथेन्द्रियनोइन्द्रियनियमोऽप्यावयोस्तुल्य एव, तदेवमुभयस्मिन्नपि धर्मे बहुसमाने सम्यगुत्थानोत्थिता युयं वितम् । वयं च तस्माद्धम्में सुष्टु स्थिताः, पूर्वस्मिन्काले वर्तमाने एध्ये च यथागृहीतप्रतिज्ञानिवोढारो, न पुनरन्ये, यथावतेश्वरयाग. विधानेन प्रव्रज्यां मुक्तवन्तो मुश्चन्ति मोक्ष्यन्ति चेति, तथाऽऽचारप्रधानं शीलमुक्तं यमनियमलक्षणं, न फल्गुकलक११२८ कुहकाजीवनरूपं, अथानन्तरं ज्ञानं च मोक्षाङ्गतयाऽभिहितं, तच्च श्रुतज्ञानं केवलाख्यं च, यथास्वमावयोर्दर्शने प्रसिद्धं, तथाप्राणिनो यत्र स्वकर्मभिर्धाम्यन्ते स 'सम्परायः' संसारस्तस्मिश्चावयोर्न विशेषोऽस्तीति गाथार्थः ॥ ४६॥ पुनरप्येकदण्डिनः प्रोचुः अवत्तरूवं पुरिसं महंतं, सणातणं अक्खयमवयं च । सवेसु भूतेसु वि सवतो सो, चंदो व ताराहि समत्तरूवे ॥ ४७ ॥ व्याख्या-'पुरुष' जीवं यथा मवन्तोऽभ्युपगतवन्तस्तथा वयमपि, कथम्भूतं जीवं ? अमूर्त्तत्वादव्यक्तरूपं करचरणशिरोग्रीवाद्यवयवतया न लक्ष्यते, तथा 'महान्तं ' लोकव्यापिनं तथा 'सनातन' शाश्वतं-द्रव्यार्थतया नित्यं, नानाPJ विधगतिसम्भवेऽपि चैतन्यलक्षणात्मस्वरूपस्याप्रच्युतेस्तथा'ऽक्षतं' केनचित्प्रदेशानां खण्डशः कर्तुमशक्यत्वात्तथा'ऽव्ययं ॥ १२८ ॥ Jain Education Far Private & Personal use Oh SMBEjainelibrary.org a l हा Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter अनन्तेनापि कालेनैकस्यापि प्रदेशस्य व्ययाभावात् तथा सर्वेष्वपि भूतेषु कायाकारपरिणतेषु प्रतिशरीरं 'सर्वतः ' सामस्त्याभिरंशत्वादसावात्मा सम्भवति, किमि [१ क इ]त्र ? ' चन्द्र इव शशीव, ताराभिरश्विन्यादिभिर्नक्षत्रैर्यथा ' समस्तरूप: ' सम्पूर्णः सम्बन्धमुपयात्येवममावण्यात्मा प्रत्येकं शरीरैः सह सम्पूर्णः सम्बन्धमुपयाति । तदेवमेकदण्डि भिर्दर्शनसाम्यापादनेन सामवादपूर्वकं स्वदर्शनारोपणार्थमाद्रे ककुमारोऽभिहितो, यत्रैतानि सम्पूर्णानि निरूपचरितानि पूर्वोक्तानि विशेषणानि धर्मसंसारयोर्विद्यन्ते स एव पक्षः सश्रुतिकेन समाश्रयितव्यो भवति एतानि चास्मदीय एव दर्शने यथोक्तानि सन्ति, नाऽऽर्हते, अतो भवताप्यस्मदीयमेव दर्शन मभ्युपगन्तव्यमिति गाथार्थः ॥ ४७ ॥ अथार्द्रककुमारस्तदुत्तरदानायाह एवं ण मिजंति न संसरति, न माहणा खत्तिय वेस पेसा । कीडा य पक्खी य सरीसिवा य, नरा य सबै तह देवलोगा ॥ ४८ ॥ व्याख्या - यदिवा प्राक्तनः श्लोकः 'अन्यत्तरुव'मित्यादिको वेदान्तवाद्यात्माऽद्वैतमतेन व्याख्यातव्यस्तथाहि -ते एकमेवाव्यक्तं पुरुषमात्मानं महान्तमाकाशमित्र सर्वव्यापिनं सनातन [मनन्त ] मक्षयमव्ययं सर्वेष्वपि भूतेषु ' सर्वतः ' सर्वात्मarsat स्थित इत्येवमभ्युपगतवन्तो यथा सर्वास्वपि तारास्वेक एव चन्द्रः सम्बन्धमुपयात्येवमपावपीति, अस्य चोरदानायाह - ' एवं 'मित्यादि यथा भवतां दर्शने एकान्तेनैव नित्योऽविकारी चात्माऽभ्युपगम्यते इत्येवं पदार्थाः wjainelibrary.org Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्गसूत्र ० दीपिकान्वितम् । १२९ ।। Jain Education In सर्वेऽपि नित्यास्तथा च सति कुतो बन्धमवद्भावः १ बन्धाभावाच न नारकतिर्यङ्न रामरलचणचतुर्गतिकः संसारो, मोक्षाभावाच्च निरर्थकं व्रतग्रहणं भवतां पञ्चरात्रोपदिष्टयमनियमप्रतिपत्तिश्व, एवं च यदुच्यते भत्रता - यथा 'आवयोस्तुल्यो धर्म' इति तदयुक्तमुक्तं यतो न कथञ्चिदावयोः साम्यं, किञ्च सर्वव्यापित्वे सत्यात्मनो विकारित्वे चात्माद्वैते चाभ्यु पगम्यमाने नरकतिर्यङ्गनरामरभेदेन बालकुमारसुभगादुर्भगाढ्य दरिद्रादिभेदेन वा न मीयेरन्-न परिच्छिद्येरन्, नापि स्वकर्म्मप्रेरिता नानागतिषु संसरन्ति, सर्वव्यापित्वादेकत्वाद्वा, तथा न ब्राह्मगा न क्षत्रिया न वैश्या न प्रेष्या न शूद्रा नापि की पक्षिसरीसृपाश्च भवेयुः तथा नराच सर्वेऽपि देवलोकाचेत्येवं नानागतिभेदेन न भियेरन् अतो न सर्वव्याप्यात्मा तथा नाप्यात्माऽद्वैतवादो ज्यायान् यतः प्रत्येकं सुखदुःखानुभवः समुपलभ्यते, तथा शरीरत्वक्पर्यन्तमात्र एवात्मा, तत्रैव गुणविज्ञानोपलब्धेरिति स्थितं, तदेवं व्यवस्थिते युष्मदागमो यथार्थाभिधायी न भवति, असर्वज्ञ प्रणीतत्वाद्, असर्वज्ञप्रणीतत्वं चैकान्तपचसमाश्रयणादिति ॥ ४८ ॥ एवमसर्वज्ञस्य मार्गोद्भावने दोषमाविर्भावयन्नाद लोयं अजाणिति केवलेणं, कहति जे धम्मम जाणमाणा । संति अप्पा परं च नट्ठा, संसारघोरम्मि अणोरपारे ॥ ४९ ॥ व्याख्या - लोकं चतुर्दशरज्ज्वात्मकं चराचरं वा लोकमज्ञात्वा ' केवलेन' दिव्यज्ञानावभासेन ' इह ' अस्मिन् जगति ये तीर्थिका ‘ अजानाना ' अविद्वांसो धर्म्म दुर्गतिगमनमार्गार्गलाभूतं 'कथयन्ति ' प्रतिपादयन्ति ते स्वतो नष्टा naj द्वितीये श्रुत● षष्ठाध्ययने एकदण्डि मत निर सनमाईकुमारेण । ॥ १२९ ॥ Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अपरानपि नाशयन्ति, क? 'घोरे' भयानके संसारसागरे 'अणोरपारे' अर्थागमागपरभागविवर्जिते अनाद्यनन्ते, इत्येवम्भते संसारार्णवे आत्मानं प्रक्षिपन्तीति गाथार्थः ॥ ४९ ॥ साम्प्रतं सम्यग्ज्ञानवतामुपदेष्टणां गुणानाविर्भावयन्नाह लोयं विजाणंतिह केवलेणं, पुन्नेण नाणेण समाहिजुत्ता । धम्म समत्तं च कहंति जे उ, तारंति अप्पाण परं च तिण्णा ॥५०॥ व्याख्या-लोकं चतुर्दशरज्जात्मकं केवलालोकेन केवलिनो विविध-मनेकप्रकार जानन्ति, इह जगति प्रकर्षण जानाति प्रज्ञः पुण्यहेतुत्वाद्वा पुण्यं, तेन तथाभूतेन ज्ञानेन समाधिना च युक्ताः समस्तं वर्म श्रुतचारित्ररूपं ये तु परहितैषिणः 'कथयन्ति' प्रतिपादयन्ति ते महापुरुषाः स्वतः संसारसागरं तीर्णाः परं च तारयन्ति सदुपदेशदानत इति, यथादेशकः -सम्यगुमार्गज्ञ आत्मानं परं च तदुपदेशवतिनं महाकान्ताराद्विवक्षितदेशप्रापणेन निस्तारयति, एवं केलिनोऽप्यात्मानं परं च संसारकान्तारान्निस्तारयन्तीति गाथार्थः ॥५०॥ पुनरघ्यार्द्र कुमार एवमाह जे गरहियं ठाणमिहावसंति, जे यावि लोए चरणोववेया । उदाहडं तं तु समं मतीए, अहाउसो विपरियासमेव ॥ ५१ ॥ व्याख्या-असर्वज्ञप्ररूपणमेवम्भूतं भवति, तद्यथा-ये केचित्संसारान्तर्वतिनोऽशुभकर्मणोपपेताः-समन्विताः 'गहितं' Jain Education in For Private & Personal use only ANNEjainelibrary.org Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एचगडाङ्ग दीपिकान्वितम् । ॥ १३०॥ निन्दितं जुगुप्सितं निर्विवेकिजनाचरितं स्थानं कर्मानुष्ठानरूपं 'इह' जगति आ[वसन्ति]सेवन्ति आजीविकाहेतुमाश्रयन्ति, ये || द्वितीये च सदुपदेशवानोऽस्मिल्लो के 'चरणेन' विरतिपरिणामरूपेणोपेता:-समन्वितास्तेषामुभयेषामपि यदनुष्ठानं शोभना] शोभन श्रुत. रूपमपि तदसर्वोः 'सम' तुल्यं 'उदाहृतं' उपन्यस्तं 'स्वमत्या' स्वाभिप्रायेण भो एकदण्डिन् ! तं विपरीतमति [एवं] [ षाध्ययने जानीहि, सम्यग्धसिम्यग्धर्मयोः कथं साम्यं स्यादिति गाथार्थः ॥ ५१॥ तदेवमेकदण्डिनो निराकृत्याककुमारो हस्तियावद्भगवदन्तिकं व्रजति ताबद्धस्तितापसाः परिवृत्य तस्थुरिदं च प्रोचुरित्याह वापसमतसंवच्छरेणावि य एगमेगं, बाणेण मारेउ महागयं तु ।। दूषणम् । सेसाण जीवाण दयट्रयाए, वासं वयं वित्ति पकप्पयामो ॥ ५२॥ व्याख्या-हस्तिनं व्यापायात्मनो पूर्ति कल्पयन्तीति हस्तितापसास्तेषां मध्ये कश्चिद्वृद्धतम एतदुवाच, तद्यथाभो आर्द्रकुमार ! सश्रुतिकेनाल्पबहुत्वमालोचनीय, तत्र येऽमी तापसाः कन्दमूलफलाशिनस्ते बहूनां सच्चानां स्थावराणां तदाश्रितानां चोदुम्बरादिषु जङ्गमानामुपधाते वर्तन्ते, येऽपि च भैक्ष्येणात्मानं वर्तयन्ति तेऽप्यासादोषदक्षिता इतश्चेतश्चाटाटयमानाः पिपीलिकादिजन्तूनामुपधाते वर्तन्ते, वयं च संवत्सरेण अपिशब्दात् षण्मासेन चैकैकं हस्तिनं महाकायं बाणप्रहारेण व्यापाद्य शेषसच्चानां दयार्थमात्मनो वृत्ति [ वर्षमेकं यावत् ] कल्पयामः । तदेवं वयमल्पसचोपघातेन प्रभूततरसच्चानां रक्षा कुर्म इति गाथार्थः ॥ ५२ ॥ साम्प्रतमेतदाकमारो हस्तितापसमतं पयितुमाह ॥१३०॥ . For Pwee & Personal use only पEEnelorey.org Jan Education inte । Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भारत संवच्छरेणावि य एगमेगं, पाणं हणंता अणिअत्तदोसा। सेसाण जीवाण वहेण लग्गा, सिया य थोवं गिहिणो वि तम्हा ॥ ५३ ॥ व्याख्या-संवत्सरेणैकैकं प्राणिनं सन्तोऽपि प्राणातिपातादनिवृत्तदोषास्ते भवन्ति, एतावता धर्मबुद्ध्या शेषजीवरक्षार्थमेकैकं प्राणिनं प्रतामपि प्राणिवधो लगत्येव, आशंसादोषश्च भवतां पश्चेन्द्रियमहाकायसचवधपरायणानामतिदुष्टो भवति, साधूनां सूर्यरश्मिप्रकाशितबीथिषु युगमात्रदृष्ट्या गच्छतामीर्या[ समिति ] पमितानां द्विचत्वारिंशदोष[रहित ] माहारमन्वेषयतां लाभालाभसमवृतीनां कुत आशंसादोषः ? पिपीलिकादिसचोपघातो वा ? तथा ( यदि ) स्तोकसचोपघातेन दोषाभावोऽभ्युपगम्यते तदा गृहस्था अपि आजीविकार्थमारम्भं कुर्वन्तः स्वक्षेत्रे आरम्भं कुर्वन्ति, न परत्र क्वापि, तेऽपि स्तोकजीववधकारिणोऽपरसर्वजन्तूनां क्षेत्रकालव्यवहितानां रक्षणाद् गृहिणोऽपि निदोषा एव, स्तोकजीववधकारिणः प्रभूतसत्वरक्षकाः, ततस्तेऽपि भवदभिप्रायेण गृहस्था अपि दोषरहिता एवेति गाथार्थः ॥ ५३ ॥ साम्प्रतमार्द्रकुमारो हस्तितापसान दूपयित्वा तदुपदेष्टारं दूपयितुमाह संवच्छरेणावि य एगमेगं, पाणं वहता समणवतेसु । आयाहिते से पुरिसे अणजे, नो तारिसे केवलिणो भवंति ॥ ५४॥ व्याख्या-भो हस्तितापसाः! भवन्मते श्रमणव्रते व्यवस्थिताः सन्तः एकैकं संवत्सरेणापि ये नन्ति ये चोपदिशन्ति - For Private & Personal Use Oy jainelibrary.org Jan Education in Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग श्रुत. दीपिकान्वितम् । पठाध्ययने य भगवदन्तिकं माविश्वविवेकोऽचिन्तयत्। तस्यां तत एनं महापुमावदसा हस्ती कृतसर ॥ १३१॥ हस्तितापसमठ-- निरसनम्।। RSS ते अनार्या, असत्कर्मानुष्ठायित्वात् , तथा आत्मनः परेषां चाहितास्ते पुरुषाः केवलिनो न भवन्ति, तथा एकस्य प्राणिनः संवत्सरेणापि घाते येऽन्ये पिशिताश्रितास्तत्संस्कारे च क्रियमाणे स्थावरजङ्गमा विनश्यन्ति ते तैः प्राणिषातोपदेशकैर्न दृष्टा, न च तैनिरवद्योपायो माधुकर्या वृत्त्या यो भवति स दृष्टः, अतस्ते न केवलमकेवलिनो विशिष्टविवे करहिताश्चेति। तदेवं हस्तितापसानिराकृत्य भगवदन्तिकं गच्छन्तमाकुमारं महता कलकलेन लोकेनाभिष्ट्रयमानं तं समुपलम्पाभिनवगृहीतः सर्वलक्षणसम्पूर्णो वनहस्ती समुत्पन्नतथाविधविवेकोऽचिन्तयत् , यथा-अयमाद्रकुमारोमाताशेषतीर्थको निष्प्रत्यूहं सर्वज्ञपादपद्मान्तिकं वन्दनाय व्रजति, ततोऽहमपि यद्यपगताशेषबन्धनः स्यां तत एनं महापुरुषमार्द्रकुमारं प्रबुद्धतस्करपश्चशतोपेतं तथा प्रबोधितानेकवादिगणसमन्वितं परमया भक्त्यैतदन्तिकं गत्वा वन्दामीत्येवं यावदसौ हस्ती कृतसङ्कल्पस्तावत्रटन (टदितित्रु)टितसमस्तबन्धनः सनार्द्र कुमार प्रति प्रदत्त कर्णतालस्तथोद्धप्रसारितदीर्वकरः प्रधावितः, तदनन्तरं लोकेन कृतहाहारवगर्भकलकलेन पूत्कृत, यथा-धिकष्ट ! हतोऽयमार्द्रकुमारो महर्पिमहापुरुषस्तदेवं प्रलपन्तो लोका इतश्चेतश्च प्रपलानाः, असावपि बनहस्ती समागत्याककुमारसमीपं भक्तिसम्भ्रमावनतायता(प्रभा)गोचमाङ्गो निभृतकर्णतालस्त्रिप्रदक्षिणीकृत्य निहितधरणीतलदन्ताग्रभागः स्पृष्ट कराग्रतचरणयुमलः सुप्रणिहितमनाः प्रणिपत्य महर्षि वना. भिमुखं ययाविति । तदेवमाईकुमारतपोऽनुभावाद्वन्धनान्मुक्तं महागजमुपलभ सपौरजनपदः श्रेणिकराजस्तमाईकुमार महर्षि तत्तपःप्रमावं चाभिनन्ध अभिवन्द्य च प्रोवाच-भगवन् ! आश्चर्यमिदं यदसौ वनहस्ती तामिधाच्छनो. च्छेयाच्यालापन्धनायुष्मत्तपःप्रभावान्मुक्त हत्येतदतिदुष्करमित्येवमभिहिते आर्द्र कुमारः प्रत्पाह-भो श्रेणिकमहाराज ! ॥१३१।। __Jain Education ii vwrjainelibrary.org Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नैतदुष्करं यदसौ वनहस्ती बन्धनान्मुक्त, अपि त्वेतदुष्करं यत्स्नेहपाशमोचनं । एतच्च प्राग्नियुक्तिगाथया दर्शितम्, सा चेयं" + न दुक्करं वा परपासमोयणं, गयस्स मत्तस्स वर्णमि रायं । जहा उ वत्तावलिएण तंतुणा, सुदुकर मे पडिहाइ मोयणं ॥१॥" एवमाईकमारो राजानं प्रतिबोध्य भगवदन्तिकं गत्वाऽभिवन्ध च भगवन्तं भक्तिपरनिर्भर आसाञ्चके । भगवानपि तानि पश्चापि शतानि प्रव्राज्य तच्छिध्यत्वेनोपनिन्ये इति गाथार्थः॥५४॥ साम्प्रतं समस्ताध्ययनोपसंहारार्थमाह बुद्धस्स आणाइ इमं समाहिं, असि सुठिच्चा तिविहेण ताई। तरिउं समुदं च महाभवोघं, आयाण बंधं समुदाहरिजा त्ति बेमि ॥ ५५॥ अद्दइजं छठं अज्झयणं समत्तं । व्याख्या-'बुद्ध' अवगततत्वः सर्वज्ञो वर्द्धमानसामी, तस्याजधा-तदागमेने में समाधि सद्धर्मावाप्तिलक्षममवाप्यास्मिश्च समाधौ सुष्टु स्थित्वा मनोवाकायैश्च प्रणिहितेन्द्रियः स एवम्भूतः आत्मनः परेषां च 'त्रायी' त्रामशीलस्तायी वा ___ +" न दुष्करमेतद्यन्नरपाशैद्धमत्तवारणस्य विमोचनं वने राजन् !। एतत्तु मे प्रतिभाति दुष्करं यज्ञ तत्रावलितेन तन्तुना मम प्रतिमोचन मिति" बृहबृत्ति । Jain Education inte For PrivatePersorial Use Only Pjainelibrary.org Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत गमनशीलो मोक्षं प्रति, स एवम्भृतस्तरीतुमतिलङ्घय समुद्रमिव दुस्तरं महाभवौध मोक्षार्थमादीयत इत्यादानं-सम्यग्दर्शन- ज्ञानचारित्ररूपं, तद्विद्यते यस्यासावादानवान् साधुः, स च सम्यग्दर्शनेन सता परतीर्थिकतपस्समृद्धिदर्शनेन मौनीन्द्रदर्शनान प्रच्यवते, सम्यग्ज्ञानेन तु यथावस्थितवस्तुप्ररूपणतः समस्तप्रावादुकवाद निराकरणेनापरेषां यथावस्थितमोक्षमार्गमाविर्भा. वयतीति, सम्यक् चारित्रेण तु समस्तभूतग्रामहितैषितया निरुद्धाश्रवद्वारः संस्तपोविशेषाच्चाने कभवोपार्जितं कर्म निर्जरयति स्वतोऽन्येषां चैवं प्रकारमेव धर्ममुदाहरव्यागृणीयादाविर्भावयेदित्यर्थः ।। ५५ ।। इतिः परिसमाप्त्यर्थे, ब्रवीमीति पूर्ववत् । सूत्रं । दीपिकान्वितम् । १३२॥ षष्ठा ध्ययने उपसंहार। MPMLNESICALEMEMEMAKAMAKALKANEMALERNMENLINENEVENENERA इति श्रीपरमसुविहितखरतरगच्छविभूषणपाठकप्रवरश्रीमत्साधुरङ्गगणिसन्हब्धायो श्रीसूत्रकृताङ्गदीपिकायां समाप्तश्चेदमार्द्रकुमाराध्ययनं पष्ठमिति । KAKIRATESTIMIRACETICKR ११३२॥ For Private Jain Education Ww.jainelibrary.org Personal Use Only Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अथ सप्तमं नालन्दीयाख्यमध्ययनम् । व्याख्यातं षष्ठमध्ययनं, साम्प्रतं सप्तमं नालन्दीयाख्यं समारम्यते अस्य चायमभिसम्बन्धः इह द्वितीयाऽङ्गे प्राक्तनेषु सर्वेष्वप्यध्ययनेषु स्वसमयपरसमयप्ररूपणाद्वारेण प्रायः साधूनामाचारोऽभिहितोऽनेन तु श्रावकगतो विधिरुच्यते, यदिवाऽनन्तराध्ययने परवादिनिराकरणं कृत्वा साध्वाचारस्य य उपदेष्टा स उदाहरणद्वारेण प्रदर्शितः, इह तु श्रावधर्मस्य य उपदेष्टा स उदाहरणद्वारेण प्रदर्श्यते, यदिवाऽनन्तराध्ययने परतीर्थिकः सह वाद इह तु स्वयुध्यरित्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनं प्रारम्यते, तथाहि ते णं काले णं ते णं समए णं रायगिहे नामं नगरे होत्था, रिद्धिस्थिमियसमिद्धे वण्णओ जाव पडिरूवे । तस्स णं रायगिहस्स नगरस्स बहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए, एत्थ णं नालंदा. नाम बाहिरिया होत्था, अणेगभवणसयसंनिविट्ठा जाव पडिरूवा [ सू०१] व्याख्या-सुगम, नवरं नालन्दा इति नाम्ना पाटकविशेषः समभूत् । तस्थ णं नालंदाए बाहिरियाए लेवे नाम गाहावई होत्था । अढे दित्ते वित्ते जाव | Jain Education inter For PrivatePersonal Use Only IN w.jainelibrary.org Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सू दीपिकान्वितम् । ।। १३३ ॥ Jain Education + अपरिभूष । से णं लेवे नामं गाहावई समणोवासए आवि होत्था | अभिगयजीवाजी जाव विहरइ | X [ नग्गंथे पावयणे निस्संकिए निक्कखिए निवितिगिच्छे लखट्टे गहियट्ठे पुच्छियट्ठे विणिच्छियट्ठे अभिगहियंट्ठे अट्ठिमिंजापेमाणुरागरते, अयमाउसो ! निग्गंथे पावयणे अयं अट्ठे अयं परमट्ठे सेसे अणट्टे, उस्सियफलिहे अप्पात्र (अवंगु ) यदुवारे चियत्तंतेउरप्पवेसे चाउद्दसमुदिट्ठपुण्णमासीणीसु पडिपुराणं पोसहं सम्मं अणुपालेमाणे समणे निग्गंथे तहाविहेणं एसणिजेणं असणपाणखाइमसाइमेणं पडिलामेमाणे बहूहिं सीलवयगुणविरमणपच्चक्खाणपोसहोववासेहिं अप्पाणं भावेमाणे एवं च णं विहरइ ॥ सू० २] तस्स णं लेवस्स गाहावइस्स तीए नालंदाए बाहिरियाए उत्तरपुरच्छिमे दिलीभाए एत्थ पं + ' जाव ' इत्यत्र “ विच्छिन्नविपुल मत्रणसयणासण जाणवाहणाहणे बहुघणत्र हुजातरूवरजते आओगपओगसंप उचे विच्छड्डियप उरभत्तपाणे बहुदासीदास गोमहिसागवेलगप्पभूते बहुजणस्स " इति पाठ: प्रत्यंतरे । ] एतचिह्नान्तर्गत: पाठो नास्ति सर्वेष्वपि दीपिकादर्शेषु । x [ द्वितीये श्रुत● सप्तमाध्ययने लेप श्राद्ध वर्णनम् ॥ १३३ ॥ Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सेसदवियानामं उदगसाला होत्या। अणेगखंभसयसंनिविट्ठा पासादीया जाव पडिरूवा, तीसे णं । सेसदवियाए उदगसालाए उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए एत्थ णं हथिजामे नाम वणसंडे होत्था, IN किण्हे वण्णओ वणसंडस्स [सू०३] __व्याख्या-शेषद्रव्याभिधाना-गृहोपयुक्तशेषद्रव्येण कृता, एवंविधा 'उदकशाला' पानीयशाला 'तस्य' लेपस्य गाथापतेरासीत् । तस्सि च णं गिहपदेसंसि भयवं गोयमे विहरति, भगवं च णं अहे आरामंसि । अहे णं उदए पेढालपुत्ते[भगवं]पासावच्चिजे नियंठे मेतजे गोत्तेणं, जेणेव भगवं गोयमे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता भयवं गोयमं एवं वयासी___ व्याख्या-सुगमैवेति । भगवान् श्रीगौतमः साधुभिः परिवृतस्तस्मिन् वनपण्डे स्थित आसीत् । स उदको मौतम| स्वामिसमीपं समागत्य भगवन्तमेवमवादी__आउसंतो गोयमा ! अत्थि खलु मे केइ पएसे पुच्छियवे, तं च मे आउसो! अहासुयं अहादरिसियं मे वियागरेज्जाहि सवायं । भयवं गोयमे उदयं पेढालपुत्तं एवं वयासी-अवियाई Jain Education For Prve & Personal Use Only dharsanelibrary.org Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्वमहात सूत्र दीपिकान्वितम् । ॥१३४॥ आउसो! सोच्चा निसम्म जाणिस्सामो। सवायं उदए पेढालपुत्ते भगवं गोयमं एवं बयासी द्वितीये व्याख्या-आयुष्मन् गौतम ! 'अस्ति ' विद्यते मम कश्चित्प्रदेश:-प्रश्नः पृष्टव्यः, तत्र सन्देहात, तं च प्रदेश मम श्रुत यथाश्रुतं भवता यथा च भगवता सन्दर्शितं तथैव मम-'व्यागृणीहि' प्रतिपादय एवं पृष्टः, स चायं भगवान् संवाद सप्तमावा शोभनमारतीकं वा प्रश्नं पृष्टस्तमुदकं पेढालपुत्रमेवमवादीत्तद्यथा-अपि चायुष्मन्नुदक ! 'श्रुत्वा' भवदीयं प्रश्नं | ध्ययने निशम्य-चावधार्य च गुणदोषविचारणतः सम्यगई ज्ञास्ये । तदुच्यतां विश्रब्धं भवता स्वाभिप्रायः। सबादमुद(का)य: गौतमायो पेढालपुत्रो भगवन्तं गौतममेवमवादीत्तद्यथा दकेन कृतः ____ आउसो गोयमा ! अस्थि खल कुमारपुत्तिया नाम समणा निग्गंथा तुम्हाणं पवयणं पव प्रश्नः। यमाणा गाहावति समणोवासगं उवसंपन्नं एवं पञ्चक्खार्विति-णण्णत्थ अभिओएणं, गाहावतीं चोरग्गहणविमोक्खणताए तसेहिं पाणेहिं निहाय दंडं । एवं हूं पच्चक्खंताणं दुप्पञ्चक्खायं भवइ । एवं हूं पञ्चक्खावेमाणाणं दुप्पचक्खावियं भवड। एवं ते परं पच्चक्खावेमाणा अतियरंति सयं पतिण्णं, कस्स णं तं हेउं ?। व्याख्या-मो गौतम ! अस्तीति-विद्यन्ते सन्ति कुमारपुत्रा नाम निर्ग्रन्था युष्मदीयं प्रवचनं प्रवदन्तस्तद्यथा-गृहपति IN॥ १३४ ॥ Jain Education in A w .jainelibrary.org Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमणोपासकमुपसम्पन्न-नियमायोत्थितमेवं प्रत्याख्यापयन्ति' प्रत्याख्यानं कारयन्ति-स्थूलेषु प्राणिषु 'दण्डं ' विनाश परित्यज्य प्राणातिपातनिवृत्ति कुर्वन्ति, एतावता स्थूलप्राणातिपातनिवृत्ति कुर्वन्ति, अन्यत्र राजाद्यभियोगेन यः प्राण्युपघातो न तत्र निवृत्तिरिति, राजाद्यभियोग विना स्थूलप्राणिवधनिवृत्तिः परमन्येषां स्थूलव्यतिरिक्तानां प्राणिनां वधानुमतिप्रत्ययो दोषः स्यात् । एतावता त्रसप्राणिवधनिवृत्तौ कृतायामन्येषां प्राणिनामनुमतिदोषो लगतीति भावः, इत्या कावानाह]कां वात्वा प्राह ['गाहावई' इत्यादि,] अस्य चार्थवत्तरताविर्भावयिष्यामः-अग्रे कथयिष्यामः । 'एवं ह 'मित्यादि, एवमेव त्रमप्राणिविशेष[ग] त्वेनापरत्र सभूतविशेषणरहितत्वेन प्रत्याख्यानं गृहनां श्रावकाणां दुष्प्रत्याख्यातं भवति, प्रत्याख्यानभङ्गसद्भावात् , प्रत्याख्यापयितामपि साधूनां दुष्टं प्रत्याख्यानदानं भवति, किमिति ? अत आह-एवं ते साधवः प्रत्याख्यानं कारयन्तः श्रावकाच प्रत्याख्यानं गृहन्तः स्वां प्रतिज्ञामति चरन्ति-अतिलयन्ति, एवं कुर्वतामेवं च कारयतां प्रत्याख्यानं भज्यते । 'कस्स गं तं हेउं' केन कारणेन प्रतिज्ञामति चरन्ति-प्रतिज्ञाभतो भवति ? उद(क)य उवाच संसारिया खलु पाणा, थावरा वि पाणा तसत्ताए पञ्चायंति, तसा वि पाणा थावरत्ताए पञ्चायति, थावरकायाओ विप्पमुच्चमाणा तसकायांस उववजति तसकायाओ विप्पमुच्चमाणा थावरकायंसि उववज्जति । तेसिं च णं थावरकायंसि उववन्नाणं ठाणमेयं धत्तं । [सू०४] STEP Jan Education intel l Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीय भूयगडाग सूत्रं दीपिकान्वितम् । व्याख्या-सांसारिकाः खलु 'प्राणा' जन्तवः स्थावराश्च पञ्चापि प्राणिनः सन्तोऽपि तथाविधकर्मोदयात्रसतया' I सत्वेन 'प्रत्यायान्ति ' उत्पद्यन्ते, तथा वसा अपि स्थावरतयोत्पद्यन्ते, एवं च परस्परममने व्यवस्थिते सत्यवश्यम्भावी प्रतिज्ञाविलोपस्तथाहि-नागरिको मया न हन्तव्य एवम्भूता प्रतिज्ञा येन गृहीता स यदा बहिरारामादौ व्यवस्थित नागरिक व्यापादयेत् किमेतावता तस्य न भवेत्प्रतिज्ञालोपः एवमत्रापि येन त्रसधनिवृत्तिः कुता स यदा तमेव वसं प्राणिनं स्थावरकायस्थितं व्यापादयेत् किं तस्य न भवेत्प्रतिज्ञाभङ्गः १ अपि तु भवत्येवेत्यर्थः । एवमपि स्थावरकाये समुत्पन्नानां त्रसानां यदि तथाभूतं किश्चिदसाधारणं लिङ्गं स्यात्ततस्ते त्रसाः स्थावरत्वेऽप्युत्पन्नाः शक्यन्ते परिहतं, न च तदस्तीत्येतद्दर्शयितुमाह-'थावरकायाओ' इत्यादि, स्थावरकायापविमुच्यमाना:-स्थावरकायायुषा विप्रमुक्तास्त(योग्यैश्च) अपरैः कर्मभिः सर्वात्मना त्रसकाये समुत्पद्यन्ते, तथा त्रसकायादपि सर्वात्मना विप्रमुच्यमानाः (तत्कर्मभिः) स्थावरकाये समुत्प. द्यन्ते, तत्र चोत्पन्नानां तथाभूतत्रसलिङ्गामावात्प्रतिज्ञालोप इत्येतत्सूत्रेण दर्शयति 'तेसिं च ण' मित्यादि, तेषां-त्रसानां स्थावरकाये समुत्पन्नानां गृहीतत्रमप्राणातिपातविरते. श्रावस्याप्यारम्भप्रवृतत्वेनैतत्वसा[स्थावरा ख्यं स्थानं घात्यं भवति, यतः स्थावरवधादनिवृत्तस्वसं स्थावरोत्पन्नं घातयति, एवं कृतत्रमप्रत्याख्यानस्य श्रावकस्य प्रतिज्ञापत्रः स्यात् । | एवं एहं पच्चक्खंताणं सुप्पञ्चक्खायं भवइ, एवं पहं पच्चक्खावेमाणाणं सुप्पच्चक्खावियं भवइ, एवं ते परं पच्चक्खावेमाणा नाइयरंति सयं पइन्नं ॥ श्रुत० सप्तमाज्यपने उदकोकप्रत्याख्यान Prary १३५ Jain Education lbnel For Pwee & Personal use only Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्याख्या-नागरिकदृष्टान्तेन त्रसमेव स्थावरत्वेनायात व्यापादयतोऽवश्यं प्रतिज्ञामङ्गः, यतस्तत एव मदुक्तया [वक्ष्यमाण]नीत्या प्रत्याख्यानं कुर्वतां सुप्रत्यारूपातं भवति । एवमेव च प्रत्याख्याश्यतां सुप्रत्याख्यातं भवति, एवं च प्रत्याख्यानं कुर्वन्तः कारयन्तश्च नातिचरन्ति स्वीयां प्रतिज्ञामित्येतद्दर्शयितुमाह___नन्नत्थ अभिओगेणं गाहावईचोरग्गहणविमोक्खणयाए तसभूतेहिं पाणेहिं निहाय दंडं, एवमेव सइ भासाए परकमे विजमाणे जे ते कोहा वा लोहा वा परं पञ्चक्खाविंति अयंपि नो उवएसे भे किं णेयाउए भवति? अवियाई आउसो गोयमा ! तुभपि एवं रोयति ?। [सू० ५] ___व्याख्या-तत्र गृहपतिः प्रत्याख्यानमेवं गृहाति, तद्यथा-त्रमभूतेषु वर्तमानकाले त्रमत्वेनोत्पन्नेषु 'दण्डः' प्राण्यु. पमईस्तन्निहाय-परित्यज्य प्रत्याख्यानं करोति, तदिह भूतत्वविशेषणात्स्यावरपर्यायापनवधेऽपि न प्रत्याख्यानमङ्गः, गृहपतिचौरविमोक्षणन्यायेन, एतदपि युक्तमेव सम्यगुक्तं, तदेतदपि त्रसकाये भूतत्वविशेषणमभ्युपगम्यता, एतदम्युपगमे हि यथा क्षीरविकृतिप्रत्याख्यायिनो दधिमक्षणेऽपि न प्रतिज्ञाविलोपस्तथा मभूताः सच्चा न हन्तव्या इत्येवं प्रतिज्ञावतः स्थावरहिंसायामपि न प्रत्याख्यानातिचारः, तदेवं विद्यमाने सति 'भाषायाः' प्रत्याख्यानवाचः 'पराक्रमे 'भूतविशेषणादोषपरिहारसामध्यें एवं पूर्वोक्तया नीत्या मति दोषपरिहरणोपाये ये केचन क्रोधाद्वा लोमावा 'परं' श्रावकादिक भूतशम्दनिर्विशेषणमेव प्रत्याख्यापयन्ति तेषामेवं प्रत्याख्यानं ददतां मृपावादो भवति गृहनां चावश्यं भावी व्रतलोप इति, Jain Education intmedial For Privats & Personal use on E w .jainelibrary.org Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुबगडाङ्ग द्वितीये श्रुत दीपिका-1 न्वितम् । ॥१३६॥ तदेवमयमपि 'नः' अस्मदीयोपदेशाम्युपगमो भूतत्वविशेषणविशिष्टः पक्षः किं भवतां नैव नैयायिको' न्यायोपपन्नो भवति ? इदमुक्तं भवति भूतत्वविशेषणेन हि स्थावरोत्पत्रान् हिंसतोऽपि न प्रतिज्ञाऽतिचार इति । अपि च आयुष्मन् गौतम ! तुभ्यमपि रोचते एवमेतद्यथा यया व्याख्यातं । एवमभिहितो गौतमः सदाचं सवाई वा तमुदकं पेढालपुत्रमेवं वक्ष्यमाणमवादीत्तद्यथा सवायं भगवं गोयमे उदयं पेढालपुत्तं एवं वयासी-आउसंतो ! उदगा! नो खलु अम्हं एयं एवं रोयति, जे ते समणा वा माहणा वा एवमाइक्खंति जाव परूविति, नो खलु ते समणा वा निग्गंथा वा भासं भासंति, अणुतावियं खलु ते भासं भासंति। ___ व्याख्या-आयुष्मन् उदक ! नो खलु अस्मभ्यमेतदेवं, यद्यथा त्वयोच्यते, तद्रोचते, इदमुक्तं भवति-यदिदं त्रस| कायविरतौ भूतत्व विशेषणं क्रियते तन्निरर्थकतयाऽस्मभ्यं न रोचत इति । तदेवं व्यवस्थिते भो उदक ! ये ते श्रमणा वा ब्राह्मणा वा एवं भृतशब्दविशेषणत्वेन प्रत्याख्यानमाचक्षते, परैः पृष्टास्तथैव भाषन्ते प्रत्याख्यानं स्वतः कुर्वन्तस्तकारयन्तश्चैवमिति सविशेषणं प्रत्याख्यानं भाषन्ते, एवमेव सामान्येन प्ररूपयन्तो न खलु ते श्रमणा वा निर्ग्रन्था वा यथार्थां भाषां भाषन्ते, अपि तु अनुतापिका भाषां भाषन्ते, अन्यथाप्ररूपणे श्रोतुरनुनापो भवति, तेनानुतापित्युच्यते । तथा पुनरपि तेषां सविशेषणप्रत्याख्यानवतामुल्वण(प्रकट )दोषमाह सप्तमाध्ययने गौतमस्वामिदतोत्तरम् । ॥१३६ ॥ Jain Education Internet Far Private & Personal Use Only S anelibrary.org Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ । अम्भाइक्खंति खलु ते समणे समणोवासए वा, जेहिं वि अन्नेहिं पाणेहिं भूतहिं जीवहिं सत्तेहिं संजमयंति, ताण वि ते अब्भाइक्खंति, कस्स णं तं हेउं ?। ___ व्याख्या-तेहि सविशेषणप्रत्याख्यानवादिनो यथावस्थितप्रत्याख्यानं ददतः साधून गृह्णतश्च श्रावकान् ' अभ्या- | ख्यान्ति' अभृतदोषोद्भावनतोऽभ्याख्यानं ददति । किश्चान्यत्-येषप्यन्येषु प्राणिषु भूतेषु जीवेषु सत्वेषु ये 'संयमयन्ति' संयम कुर्वन्ति, तद्यथा-ब्राह्मणो न मया हन्तव्य इत्युक्ते स यदा वर्णान्तरे तिर्यक्षु वा व्यवस्थितस्तदा तद्वधे ब्राह्मणवध आपद्यते, भृत शब्दाविशेषणात् , एवं ते भृतशब्दविशेषणवादिनोऽन्यान् ' अभ्याख्यान्ति' पयन्ति । 'कस्स णं तं हेउं' कस्माद्धेतोस्तदसद्भुतं दूषणं भवति ? यस्मात संसारिया खलु पाणा, तसा वि पाणा थावरत्ताए पञ्चायति थावरा वि पाणा तसत्ताए पच्चायंति, तसकायाओ विष्पमुच्चमाणा थावरकायंसि उववज्जति, थावरकायाओ विप्पमुच्चमाणा तसकायंसि उववजंति, तेसिं च णं तसकायंसि उववन्नाणं ठाणमेयं अघतं । [सू०६] व्याख्या-सांसारिकाः खलु प्राणाः परस्परं जातिसङ्क्रमणभाजो भवन्ति, यतस्त्रमाः प्राणाः स्थावरत्वेन प्रत्यायान्ति स्थावराश्च प्रसत्वेनेति, त्रसकायाश्च सर्वात्मना वसायुष्कं परित्यज्य स्थावरकाये तद्योग्यकर्मोपादानादुत्पद्यन्ते तथास्थावरकायाच्च तदायुष्कादिना कर्मणा विमुच्यमानास्त्रसकाये समुत्पद्यन्ते, तेषां च स्थावर[स] काये समुत्पन्नानां स्थान पमानास्त्रसकाये समस्यावरकाये तद्योग्यको पावरत्वेन प्रत्यायान्ति For Private &Personal use only Jan Education in ininelibrary.org Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | द्वितीय यगडाङ्ग- मेतस्त्रसकायाख्यमघात्य-न पाताई भवति, यस्मातेन श्रावकेण सानुद्दिश्य प्रत्याख्यानं कृतमस्ति, तस्य तीब्राध्यवसायो सूत्र० त्पादकत्वाल्लोकगर्हितत्वाचेति, तत्रासौ स्थूलपाणातिपातानिवृत्तस्तनिवृत्या च त्रसस्थानमघात्यं प्रवते, स्थावरेवविरत -दीपिका- इति, तद्योग्यतया तत्स्थानं घात्यमिति । स्थावरकाये समुत्पत्रस्य त्रसप्राणस्य पर्यायान्तरमापत्रस्य स्थावरकायवधेऽपि न्वितम् । कर्म न लगति, न प्रत्याख्यानभङ्ग इति । तदेवं स भवदभिप्रायेण विशिष्टसच्चोद्देशेनापि प्राणातिपातनिवृत्तौ कृतायामपर पर्यायापन्नं प्राणिनं व्यापादयतो व्रतमङ्गो भवति, ततश्च न कस्यचित्सम्यग् व्रतपालनं स्यात् इति । एवमम्याख्यानमभूत. दोषोद्भावनं भवन्तो वदन्ति । यद्यपि भवद्भिर्वर्तमान कालविशेषणत्वेन किलायं भूतशब्द उपादीयतेऽसावपि व्यामोहायकेवलं भ्रान्तिरेवेयं, तथाहि-भूतशब्दोऽयमुपमानेऽपि वर्तते, तद्यथा देवलोकभूतं नगरमिदं, न देवलोक एक, तथाऽत्रापि त्रसभूतानां-त्रससदृशानामेव प्राणिनां प्राणातिपातनिवृत्तिः कृता स्यात् , न तु बसानामिति । अथवा तादर्थे भूतशब्दोऽयं, यथा शीतीभूतमुदकं शीतमित्यर्थः, एवं त्रसभृतास्त्रसत्वं प्राप्ताः, तथा च सति सशब्देनैव गतार्थत्वात्पौनरुक्यं स्यात् ।। अथैवमपि स्थिते भूतशब्दोपादानं क्रियते तनिरर्थकमतिप्रसङ्गः स्यात् । तदेवं निरस्ते भूतशब्दे सति उदक आह सवायं उदए पेढालपुत्ते भयवं गोयम एवं वदासी-कयरे खलु ते आउसंतो गोयमा ! तुब्भे वयह तसा पाणा तसा अह अन्नहा ? सवायं भगवं गोयमे उदयं पेढालपुत्तं एवं वयासी-आउ. VJ संतो उदगा ! जे तुम्भे वयह तसभूता पाणा तसा ते वयं वदामो तसा पाणा, जे वयं वदामो सप्तमाध्ययने सन्दाले भूत शब्दोपादानस्थ निरर्थक ॥ १३७ ॥ in Ed o na Page #305 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तसा पाणा ते तुब्भे वयह तसभूया पाणा, एते संति दुवे ठाणा तुल्ला एगट्ठा, किमाउसो! इमे भे ( भवतां ) सुप्पणीततराए भवति-तसभूता पाणा [तप्ता], इमे भे दुप्पणीततराए भवति-तसा पाणा [तसा], ततो एगमाउसो! पडिकोसह एवं अभिणंदह, अयंपि भेदे से णो णेयाउए भवति । व्याख्या-'सवाय 'मित्यादि, सद्वाचं सवादं वा उदक:-पेढालपुत्रो भगवन्तं गौतममेवमवादीत , तद्यथा-हे आयु. ज्मन् गौतम ! कतरान् प्राणिनो यूयं वदथ ? सा एव प्राणा:-प्राणिनस्त एव वसाः प्रागा:-उतान्यथेत्येवं पृष्टो भगवान् गौतमस्तमुदकं पेढालपुत्र एवमवादीत् आयुष्मन्नुदक! यान् प्राणिनो यूयं वदथ त्रसभूतात्र पत्वेनाविभूताः प्राणिनो, नातीताः नाप्येष्याः, किन्तु वर्तमानकाल एव त्रसाः प्राणा इति, तानेर वयं वदामस्त्रसा:-त्रसत्वं प्राप्तास्तत्कालवनि एवं त्रसाः प्राणाः 'जे वय' मित्यादि, यान् वयं वदामनमा एव प्राणास्त्रसाः प्राणास्तान् यूयमेवं वदथ-त्रसभूता एव प्राणाः, एवं च व्यवस्थिते किमायुष्मन् ? युष्माकमयं पक्षः सुष्ठु 'प्रणीततरो' युक्तियुक्तः प्रतिभासते ? तथा सा एवं प्राणास्त्रसाः इत्ययं तु पक्षो दुष्प्रणीततरो 'भवति' प्रतिभासते भवतां तद्यथा-त्रसभूताः प्राणास्त्रमाः, त्रसाः प्राणास्त्रसाः, कोऽयं भेदः ? एकार्थिका एते, एकार्थिकत्वेन भवतां कोऽयं व्यामोहो? येन शब्दभेदमात्रमाश्रित्य एकं पक्षमाक्रोशथ द्वितीयं त्वभिनन्दथ इति, तदयमपि तुल्येऽप्यर्थ सत्येकस्य पक्षस्याकोशनमपरस्याभिनन्दनमित्युपदेशाम्धुपगमो भवतां नो नैयायिको-नन्यायोपपन्नो भवति, उभयोरपि पक्षयोः समानत्वात् , केवलं सविशेषगपो भूतशब्दोपादानं मोहमावह नीति । पुनर्यदुक्तं माता Jain Education For PrivatePersonal Use Only |AMwEjainelibrary.org Page #306 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रुत न्वितम्। सूयगडाङ्गा सानां वनिवृत्तौ कारितायां साधोरनुमतिदोषः स्थावरप्राणिविषयो लगति, भूतशब्दाकथनेऽनन्तरमेव त्रसं स्थावरपर्यायापन व्यापादयतो व्रतभङ्ग इत्येतदपि न किश्चित् , तत्परिहर्नुकाम आहदीपिका- भगवं च णं उदाहु-संतेगतिया मणूसा भवंति, तेसिं च णं एवं वुत्तपुत्वं भवात-नो खलु वयं संचाएमो मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पवइत्तए, वयं ण्हं अणुपुवेणं गोत्तस्स लिसि॥१३८॥ स्सामो, ते एवं संखं सावेंति ते एवं संखं ठवयंति, नन्नत्थ अभिओएणं। व्याख्या-भगवान् गौतमस्वामी पुनराह-सन्त्येके केचन लघुकर्माणो मनुष्याः प्रव्रज्या कर्तुमसमर्थाः प्रवज्यां विना धर्म चिकीर्षवः साधोधर्मोपदेशदानोद्यतस्याग्रत इदमुक्तपूर्व भवति, तथाहि-भोः साधो ! न खलु वयं शक्नुमो मुण्डा भवितुं-प्रव्रज्यां गृहीतुं अगारादनगारता-साधुभावं प्रतिपत्तुं, वयं त्वाऽनुपूर्ये ग-क्रमशो ' गोत्रं ' साधुत्वं, तस्य साधुभावस्य 'पर्यायेण ' परिपाटयात्मानमनुश्लेषयिष्यामः । इदमुक्तं भवति-पूर्व देशविरतिरूपं श्रावकधर्म अनुपालयामस्ततोऽनुक्रमेण पश्चाच्छ्रमणधर्ममिति । तत एवं ते 'संख्यां' व्यवस्था श्रावयन्ति । एवं व्यवस्था प्रत्याख्यानं कुर्वन्तः ' स्थापयन्ति' प्रकाशयन्ति नान्यत्र अभियोगेन, स च “रायाभिओगो गणाभिओगो देवयाभिओगो बलाभिः ओगो गुरुनिग्गहो" इत्येवमादिनाऽभियोगेन व्यापादयतोऽपि त्रसं न व्रतमङ्गः । एवं साधूपदेशेन प्रत्याख्यानं कुर्वन्ति । .. गाहावइचोरग्गहणविमोक्खणताए । सप्तमाध्ययने त्रसवध प्रत्याख्यान कारापणे साधूनां स्थावरवधानुमति दोष निवारणम् । ॥ १३८॥ Jain Education inte For Privats & Personal Use Only jainelibrary.org Page #307 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education in अस्यायमर्थः- रत्नपुरे नगरे रत्नशेखरो नाम राजा, तेन च परितुष्टेन रत्नमालाऽग्रमहिषी प्रमुखान्तःपुरस्य कौमुदी - | महोत्सवे नगरस्यान्तः स्वेच्छाप्रचारोऽनुज्ञातः । तदवगम्य नागरलोकेनापि राजाऽनुमत्या स्वकीपस्य स्त्रीजनस्य तथैव क्रीडनमनुमतं राज्ञा च नगरे सडिंडिमशन्द्रमा घोषितं तद्यथा - अस्तमनोपरि कौमुदीमहोत्सवे प्रवृते यः कश्चित्पुरुषो नगरमध्ये स्थितः प्रच्छन्नमुपलब्धश्च तदा तस्य शरीरनिग्रहं करिष्यामि न केनाप्यस्मिन्नर्थे विज्ञप्तिः कार्या नादं तं मोक्ष्यामि, इत्येवं व्यवस्थिते सत्येकस्य वणिजः षट्पुत्राः, ते च कौमुदीदिने क्रयविक्रयव्यग्रतया तावस्थिताः यावत्सूर्योऽस्तंगतः, तदनन्तरमेव स्थगितानि च नगरद्वाराणि तेषां च व्यग्रतया न निर्गमनमभूत् । ततस्ते भयसम्भ्रान्ताः नगरमध्य एवा. sseमानं गोपयित्वा स्थिताः । ततोऽतिक्रान्ते कौमुदी प्रचारे राज्ञाऽऽरक्षकाः समाहूयादिष्टाः, यथा सम्यग्निरूपयत यूयमंत्र कौमुदीप्रचारे नगरान्तः कश्चित्पुरुषो व्यवस्थित इति । तैरप्यारक्षकैः सम्यङ् निरूपयद्भिरुपलभ्य पणिक्पुत्रवृत्तान्तो राज्ञे निवेदितः । राज्ञाप्याज्ञामङ्गकुपितेन तेषां षण्णामपि वधः समादिष्टः । ततस्तत्पिता पुत्रवधसमाकर्णनगुरुशोकविह्वलोडकालापतित कुलक्षयोद्धान्तलोचनः किंकर्त्तव्यतामूढतया गणितविधेयाधेयविशेषो राजानमुपस्थितोऽवादीच्च गद्गदया गिरा, यथा मा कृथा देव ! कुलक्षयमस्माकं गृह्यतामिदमस्मदीयं कुलक्रमायातं स्वभुजोपार्जितं च प्रभूतं द्रविणजातं, मुच्यताममी षट्पुत्राः क्रियतामयमस्माकमनुग्रहः इत्येवमभिहितो राजा तद्वचनमाकर्ण्य विशेषं पुनरपि वधमादिदेश । असावपि वणि सर्वाङ्की समस्तमोचनानभिप्रायं राजानमवेत्य पञ्चानां मोचनं याचितवान्, तानप्यसौ राजा न मोक्तुमना इत्येवमवगम्य चतुर्मोचनकृते सादरं विज्ञप्तवान् तथाऽपि राजा तमनादृत्य कुपितवदन एव स्थितः । ततस्त्रयाणां विमोचने २४ Page #308 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा सूत्रं दीपिकान्वितम् । मा १३९ ॥ कृतादरस्तत्पिताऽभूत्तानप्यमुञ्चन्तं राजानं ज्ञात्वा गणितस्वापराधो द्वयोर्विमोचनं प्रार्थितवान् , तथाप्यवज्ञाप्रधान नृपति द्वितीये मवगम्य ततः पौरमहत्तरसमेतो राजानमेवं विज्ञप्तवान् देव ! अस्माकमयं कुलक्षयः समुपस्थितः, तस्माच भवन्त एव श्रुत. त्राणायालं, अतः क्रियतामेकपुत्रविमोचनेन महाप्रसाद इति मणिवा पादयोः सपौरमहत्तमः पतितः, तो राजापि सजा- सप्तमातानुकम्पेन मुक्तस्तदेको ज्येष्ठपुत्र इति । तदेवमस्य दृष्टान्तस्य दार्शन्तिकयोजनेयं, तद्यथा-साधुनाऽभ्युपगतसम्यग्दर्शन- ध्ययने मरगम्य श्रावकमखिलप्राणातिपातविरतिग्रहणायाम्यर्थितः, परं श्रावकः षट्कायरक्षणेऽसमर्थतया यदा न सर्वप्राणाति- श्रावकपातविरतिं प्रतिपद्यते, यथाऽसौ राजा वणिजोऽत्यर्थ विलपतोऽपि न पडपि पुत्रान् मुमुक्षति नाऽपि पश्चचतुनिद्विसंख्यानिति, स्थाणु तत एकविमोक्षणेनात्मानं कृतार्थमिव मन्यमानः स्थितोऽसौ, एवं साधोरपि श्रावकस्य यथाशक्ति व्रतं गृहनस्तदनुरूप. बतादान मेवाणुव्रतदानमविरुद्धं, यथा च तस्य वणिजो न शेषपुत्रवधानुमतिलेशोऽप्यस्ति एवं साधोरपि न शेष प्राणिवधानुमति साधोव प्रत्ययजनितः कर्मबन्धो भवति, किं तर्हि ? यदेव व्रतं गृहीत्वा यानेव सचान बादरान सङ्कल्पजप्राणातिपातनिवृत्त्या रक्षति तत्प्रदानम् तनिमित्तः कुशलानुबन्ध एव इत्येतस्सूत्रेणेव दर्शयितुमाह विरुद्धम्। तसेहिं पाणेहिं निहाय दंडं, तंपि तेसिं कुसलमेव भवति । [ सू० ७ ] व्याख्या-त्रसेषु द्वीन्द्रियादि 'निहाय ' परित्यज्य बसेषु प्राणातिपातविरतिं गृहीत्वेत्यर्थः, तदपि त्रसप्राणातिपातविरमणव्रतं तेषां' देशविरतिधारिणां कुशलमेव भवति । यच्च प्रागभिहितं, तद्यथा-तमेव सं स्थावरपर्यायापर्व INU१३९॥ Jain Education in Far Private & Personal use Oh O w .jainelibrary.org IAN Page #309 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नागरिकमिव बहिःस्थं व्यापादयतोऽवश्यं भावी व्रतमा इत्येतत्परिह काम आह तसा वि वुञ्चति तसा तससंभारकडेणं कम्मुणा नामं च णं अब्भुवगतं भवति, तसाउयं च णं पलिखीणं भवति, तसकायद्वितीया ते ततो आउयं विप्पजहंति, ते तओ आउयं विप्पजहित्ता थावरत्ताए पच्चायति । थावरा वि वुच्चति थावरा थावरसंभारकडेण कम्मुणा णामं च णं अब्भुवगतं भवति, थावरआउं च णं पलिखीणं भवति, थावरकायद्वितीया तो आउगं विप्पजहंति, ततोआउगं विप्पजहित्ता भुजो पारलोइयत्ताए पञ्चायंति, ते पाणा वि वुच्चंति ते तसा वि वुच्चंति, ते महाकाया चिरद्वितीया [ सू०८] __ व्याख्या-'सा' द्वीन्द्रियादयोऽपि त्रसा उच्यन्ते, ते च त्रसास्त्रमसम्भारकतेन कर्मणा भवति, सम्भारो नाम अवश्यतया कर्मणो विपाकानुभवेन वेदनं, एवं त्रसनामकर्मणा सा अभिधीयन्ते, सत्वेन यत्प्रतिबद्धमायुष्कं तद्यदोदयप्राप्तं भवति, तदा त्रससम्भारकृतेन कर्मणा वसा इति ध्यपदिशन्ते । यदा [च] वसायुः परिक्षीणं भवति, त्रसकाय. स्थितिकं च कर्म यदा परिक्षीणं भवति, तच्च जघन्यतोऽन्तर्मुहर्च मुत्कृष्टतः सातिरेकसागरोपमसहस्रद्वयपरिमाणं, तदा, ततस्त्रसकायस्थितेरभावात्तदायुष्कं ते परित्यजन्ति, अपराण्यपि तत्सहचरितानि कर्माणि परित्यज्य स्थावरत्वेन प्रत्या Jain Education Interior ainary.org Page #310 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीये श्रत. अयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥१४ ॥ यान्ति, स्थावरादि नाम च तत्राभ्युपगतं भवति, अपराण्यपि तत्सहचरितानि सर्वात्मना सत्वं परित्यज्य स्थावरत्वेनोदयं I यान्ति इति, एवं व्यवस्थिते कथं स्थावरकायं व्यापादयतो गृहीतत्रसकायप्राणातिपातनिवृत्तेः श्रावकस्य व्रतभङ्ग इति । किश्चान्यत् 'थावराउयं च ण 'मित्यादि, यदा तदपि स्थावगयुष्कं परिक्षीणं भवति [ तथा ] स्थावरकायस्थितिश्च, सा जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्त्तमुत्कृष्टतोऽनन्तकालमसङ्ख्येयपुद्गलपरावर्ता इति, ततस्तत्कायस्थितेरभावात्तदायुष्क परित्यज्य भूयः पारलौकिकत्वेन स्थावरकायस्थितेरभावात्रसत्वेन प्रत्यायान्ति । ' ते पाणा वि वुचंति' ते त्रससम्भारकृतेन कर्मणा समुत्पन्नाः सन्तः सामान्यसंज्ञया प्राणा अप्युच्यन्ते, असा अप्युच्यन्ते, ते महाकाया योजनलक्षप्रमाणवपुर्विकुर्वणात , तथा चिरस्थितिका अप्युच्यन्ते, भवस्थित्यपेक्षया त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमायुष्कसद्भावात् । ततस्त्रसपर्यायव्यवस्थितानामेव प्रत्याख्यानं तेन गृहीतं, न तु स्थावस्कायव्यवस्थितानामपीति, यस्तु नागरिकदृष्टान्तो भवतोपन्यस्तोऽसावपि दृष्टान्तदाान्तिकयोरसाम्यात्केवलं भवतोऽनुपासितगुरुकुलवासित्वमाविष्करोति, तथाहि-नगरधर्युक्तो नागरिका, स च मया न हन्तव्यः, इति प्रतिवां गृहीत्वा यदा तमेव व्यापादयति बहिःस्थितं पर्यायापन्नं तदा तस्य किल व्रतमङ्ग इति भवतः पक्षा, स च न घटते, यतो-यो हि नगरधम्मैरुपेतः स बहिःस्थितोऽपि नागरिक एव, अतः पर्यायापन इत्येतद्विशेषणं नोपपद्यते । अथ सामस्त्येन परित्यज्य नगरधानसौ वर्तते । ततस्तमेवेत्येतद्विशेषणं नोपपद्यते, तदेवमत्र त्रसः सर्वात्मना त्रसत्वं परित्यज्य यदा स्थावरः समुत्पद्यते तदा पूर्वपर्यायपरित्यागादपरपर्यायापनत्वात्रस एवासौ न भवति, त[य]था-नागरिक | पल्यां प्रविष्टस्तद्धम्मोपेतत्वात्पूर्वधर्मपरित्यागानागरिक एवासौ न भवति । पुनरप्यन्यथोदकः पूर्वपक्षमारचयितुमाह- सप्तमाध्ययने पर्यायापन्नविशे. पणस्यानुपपन्नत्वम्। ॥१४॥ Jain Education interilia Far Private & Personal use Oh ANGREJainelibrary.org Page #311 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte सवायं उदए पेढालपुत्ते भयवं गोयमं एवं वयासी-आउसंतो गोयमा ! नत्थि णं से परियाए जन्नं समणोवासगस्स एगपाणातिवायविरए वि दंडे निखित्ते, कस्स णं तं हेउं ? | व्याख्या - सद्वा [चं सवा]मुदकः पेढालपुत्रो भगवन्तं गौतम मेवमवादीत् तद्यथा - आयुष्मन् गौतम ! नास्त्यसौ कचित्पर्याय येन एकप्राणातिपातत्रिरतिविषये दण्डस्त्यक्तो भवति श्रमणोपासकस्य, एतावता श्रावक एकां प्राणातिपात"विषयांविरति ग्रहीतुं न शक्नोतीति भावः । कस्माद्धेतोः केन कारणेन १ । अथोदकः कारणं दर्शयति ' संसारिया खलु पाणा, थावरा चि पाणा तसत्ताए पच्चायति, तसा वि पाणा थावरत्ताए पच्चायंति। व्याख्या - संमरणशीलाः परस्परं प्राणिनः, ततः स्थावराः सामान्येन त्रसतया प्रत्यायान्ति त्रमा अपि स्थावरतया प्रत्यायान्ति, तदेवं संसारिणां परस्परगमनं प्रदर्श्याधुना यत्परेण विवक्षितं तदा[विष्कुर्वन्ना]ह थावर कायाओ विष्पमुच्चमाणा सवे तसकायंसि उनवजंति, तसकायाओ विष्पमुच्चमाणा सर्व्व थावरकायंसि उववजंति, तेसिं च णं थावरकायंसि उववन्नाणं ठाणमेयं घत्तं । व्याख्या—स्थावरकायाद्विप्रमुच्यमानाः स्थावरेभ्यो निर्गत्य सर्वेऽपि प्राणिनत्र सेषु समुत्पद्यन्ते, स्थावरशून्यं जगजातं तथा त्रसेभ्यो विप्रमुच्यमानाः सर्वेऽपि प्राणिनः स्थावरेषु समुत्पद्यन्ते, न कोऽपि त्रसो जगति लभ्यते, तेषां च त्रसानां सर्वेषां स्थावरकाये समुत्पन्नानां स्थानमेतद् घात्यं भवति, यतः श्रावकेण स्थावस्ववनिर्वृत्तिः कृता नास्ति, एतावता w.jainelibrary.org Page #312 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । -॥ १४१ ॥ Jain Education In स्थावरविनाशे स्थावरमध्ये उत्पन्नानां श्रसानामपि विनाशो जायते, एवं कृतत्र सवध प्रत्याख्यानस्य श्रावकस्य व्रतभङ्गः स्यात् । एवमुक्त्वा स्थिते उदके गौतमस्वाम्याह सवायं भगवं गोयमे उदयं पेढालपुत्तं एवं वयासी - तो खलु आउसो ! अस्माकं + वत्तव (ए)यातुचे अपवादेणं अस्थि णं से परियाए जेणं समणोवासगस्स सङ्घपाणेहिं सवभूपहिं सबजीवेहिं सबसतेहिं दंडे निखित्ते [भवइ], कस्स णं तं हेउं ? संसारिया खलु पाणा, तसा त्रिपाणा थावरत्ताए पच्चायंति, थावरा वि पाणा तसत्ताए पच्चायंति, ते तसकायाओ विष्पमुच्चमाणा सवे थावरकायंसि उववजंति, थावरकायाओ विप्पमुच्चमाणा सवे तसकायंसि उववज्जंति, तेसिं चणं तसकायंसि उन्नाणं ठाणमेयं अघत्तं, ते पाणावि वुच्चंति, ते तसा वि बुच्चंति, ते महाकाया [ते] चिरद्वितीया, ते 'बहुतरगा पाणा जेहिं समगोवासगस्त सुपञ्चकखायं भवति, ते अप्पतरगा पाणा जेहिं समणोवागस्स अपञ्चकखायं भवति, से महया तसकायाओ उवसंतस्स उचट्ठियस्स पडिविरयस्स, जन्नं तुभे वा अन्नो वा एवं वदह-नत्थि णं से[ केइ ] परियाए जंसि समणोत्रा सगस्स एगपाणा+ " अस्माकमित्येतन्मगधदेशे आगोपाळ ङ्गनाप्रसिद्धं संस्कृतमेवोच्चार्यते, तदिद्दापि तथैवोच्चारितमिति " वृचिकार मिश्राः । द्वितीये श्रुत० सप्तमा ऽध्ययने गौतम स्वामिकुढ मुदकं प्रत्युतरम् १४१ # ww.jainelibrary.org Page #313 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (इवा)ए वि दंडे निक्खित्ते, अयंपि भेदे से नो णेआउए भवति । [ सू० ९] - व्याख्या-गौतम उदकं पेढालपुत्र प्रत्यवादी-नो खलु आयुष्मन् उदक! अस्माकं सम्बन्धिना वक्तव्येन एतदस्ति, यत्सर्वेऽपि त्रसाः स्थावरत्वेन प्रत्यायान्ति स्थावराः सर्वेऽपि त्रसत्वेन प्रत्यायान्ति नैतदस्मद्वक्तव्यतायामस्ति, तथाहि-नैतद्भूतं न च भवति न कदाचिद्भविष्यति, यदुत सर्वेऽपि स्थावग निलेपतया त्रमत्वं प्रतिपद्यन्ते, स्थावराणामानन्त्यात्रसानां चासंख्येयत्वेन तदाधारत्वानुपपत्तिः४ तथा वसा अपि सर्वेऽपि न स्थावरत्वं प्रतिपन्ना न प्रतिपद्यन्ते नापि प्रतिपत्स्यन्ते, इदमुक्तं भवति-यद्यपि विवक्षितकालवर्तिनस्त्रसाः कालपर्यायेण स्थावरकायत्वेन यास्यन्ति तथाप्यपरापरत्रसोत्पच्या सजा. त्यनुच्छेदान्न कदाचिदपि त्रसकाय शून्यः संसारो भवतीति सर्वथा नियुक्तिकं भवद्वचः। भवदीयं पक्ष भवदभिप्रायेणैव निराक्रियते-तदेव पराभिप्रायेण परिहरति-अस्त्पसौ पर्यायः, स चायं-भवदभिप्रायेण यदा सर्वेऽपि स्थावरास्त्रसत्वं प्रतिपद्यन्ते यस्मिन् पर्याये-ऽवस्थाविशेपे श्रमणोपासकस्य कुनत्रसप्राणातिपातनिवृत्तेः सतस्त्रसत्वेन [च] मवदम्युपगमेन सर्वप्राणिनामुत्पत्तेस्तैश्च सर्वप्राणिभित्रसत्वेन भने-रुत्पन्न करणभूतस्तेषु [वा] विषयभूतेषु दण्डो - निक्षिप्तः' परित्यक्तः । इदमुक्तं भवति-यदा सर्वेऽपि स्थावरा भवदभिप्रायेण त्रसत्वेनोत्पद्यन्ते तदा सर्वप्राणविषयं प्रत्याख्यानं श्रमणोपासकस्य भवतीति । एतदेव प्रश्नपूर्वकं दर्शयितुमाह-'कस्स णं तं हेउं ?' इत्यादि सुगम, यावत्तमकाये समुत्पन्नानां स्थावराणां स्थानमेत x अनन्ताः स्थावरा असंख्यातानां त्रसानां मध्ये क समान्ति !। Jan Education For Pwee & Personal use only ना Page #314 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्र | प जयगडागदपात्य-मपाताई, तत्र विरतिसद्भावात् । ते च सा नारकसियनरामरगतिभाजा सामान्यसंज्ञया प्राणिनोऽप्यभिधीयन्ते विशेषसंज्ञया प्रसा[अपि] अभिधीयन्ते[,तथा] महाकायाः, वैक्रियशरीरस्य योजनलक्षप्रमाणत्वादिति । तथा चिरस्थितिकात्रयदीपिका- त्रिंशत्सागरोपमपरिमाणत्वाद्भनस्थितेः, तथा[च]ते प्राणिनो बहुतमाः यैःश्रमणोपासकस्य सुप्रत्याख्यानं भवति, सानुद्दिश्य न्वितम् । तेन प्रत्याख्यानग्रहणात् । भवन्मते सर्वस्थावराणां त्रसत्वेनोत्पत्तेरतस्तेऽल्पतरकाः प्राणिनो, यैः श्रावकस्य अप्रत्याख्यानं भवति । इदमुक्तं भवति-अपशब्दस्याभाववाचित्वान्न सन्त्येव ते येवप्रत्याख्यानमिति । इत्येवं पूर्वोक्तया नीत्या 'से' ।१४२॥ तस्य श्रमणोपासकस्य महतस्त्रसकायादुपशान्तस्योपरतस्य प्रतिविरतस्य सतः सुप्रत्याख्यातं भवतीति । तदेवं व्यवस्थिते 'ण' मिति वाक्यालङ्कारे, यद्यूयं वदथ अन्यो वा कश्चित् , यथा-नास्ति कोऽपि पर्यायो यत्र श्रावस्य प्राणातिपात. प्रत्याख्यानं भवति, अयमपि भवत्पक्षो नो नैयायिको-न युक्त इत्यर्थः। अथ श्रीगौतमनसानां स्थावरपर्यायापनानां | व्यापादनेऽपि न व्रतभङ्गो भवतीत्यस्यार्थस्य प्रसिद्धये दृष्टान्तत्रयमाह भगवं च णं उदाहु नियंठा खलु युच्छियवा-आउसंतो नियंठा! इह खलु संतेगतिया मणुस्सा भवंति, तसिं च णं एवं वृत्तपत्वं भवड-जे इमे मंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पवइया, एएसि च णं आमरणंताए दंडे निखित्ते, जे इमे अगारमावसंति एतेसि णं आमरणंताए दंडे नो निखित्ते, केई च णं ( केचित् ) समणा जाव वासाइं चउपंचमाइं छद्दसमाणि अप्पयरो वा भुजयरो वा देसं द्वितीये श्रुत. सप्तमाध्ययने गौतम स्वाम्युक्तं दृष्टान्तत्रयम् । ॥ १४२ ।। Jain Education indical For Privista personal UE O HTMVE.jainelibrary.org Page #315 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वा दूइजिता अगारमावसेज्जा ? हंता वसेज्जा, तस्स णं तं गारत्थं वहमाणस्स से पच्चक्खाणे | भग्गे भवति ? नो इणमटे समटे, एवामेव समणोवासगस्स वि तसेहिं पाणेहिं दंडे निखित्ते थाव| रेहिं पाणेहिं दंडे नो निखित्ते, तस्स णं तं थावरकायं वहमाणस्स से पच्चक्खाणे नो भग्गे भवति । | से एवमायाणह ? नियंठा !, एवमायाणियो । __एको दृष्टान्तः, भगवान् गौतमस्वामी अपरानपि [तत् ] स्थविरान् साक्षिणः कर्तुमिदमाह भो उदक ! निग्रन्थाः [युष्मत्स्थविराः ] खलु प्रष्टव्यास्तद्यथा-भो निग्रन्था! युष्माकमप्येतद्वक्ष्यमाणमभिमतं माहोस्विन ? युष्माकमप्येतदभिप्रेतं यदहं वच्मि, तथाहि-सन्त्येके मनुष्याः ये मुण्डा भृत्वाऽगारात्-गृहानिर्गत्यानगारतां प्रतिपन्नाः, प्रव्रजिता इत्यर्थः, तेषामुपरि यावज्जीवमामरणान्तं मया दण्डो ‘निक्षिप्तः' परित्यक्तो भवति, कोऽर्थः ? कश्चित्तथाविधो मनुष्यो यतीनुद्दिश्य व्रतं गृह्णाति, तद्यथा-न मया यावजी यतयो हन्तव्याः, एतावता यावजीवं यतीन हनिष्यामि, गृहस्थानुद्दिश्य नियमो नास्ति, एवं च सति केचन मनुष्याः प्रवज्यां गृहीत्वा श्रमणा जाताः कियन्तमपि कालं प्रव्रज्यापर्यायं प्रतिपाल्य यावद्वर्षाणि चत्वारि पञ्च वा षड् दश वा अल्पतरं वा प्रभूततरं वा कालं तथा देशं च 'दुइजित्तत्ति विहृत्य कुतश्चित् कर्मोदयात्तथाविधपरिणतेरगारं-गृहमावसे यु:-गृहस्था भवेयुरित्येवम्भूतः पर्यायः किं सम्भाव्यते ? उत नेति, इत्येवं पृष्टा निम्रन्थाः प्रत्युचुः-हन्त गृहवास बजेयुः, 'तस्य च' श्रावकस्य यतिवधगृहीतव्रतस्य Ein Education inten For PrivatePersonal Use Only N inaryong Page #316 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ १४३ ॥ | 'तं' गृहस्थं व्यापादयतः किं व्रतमङ्गो भवेदूत नेति । ततस्ते निर्ग्रन्था आहुन व्रतमङ्ग इति । एवमेव श्रमणोपासकस्यापि त्रसेषु दण्डो निक्षिप्तो न स्थावरेविति, अतस्वसं स्थावरपर्यायापनं व्यापादयतस्तत्प्रत्याख्यानमो न भवतीति । साम्प्रतं द्वितीयं दृष्टान्तं दर्शयितुकाम आह भगवं च णं उदाहु-नियंठा खलु पुच्छियवा-आउसंतो नियंठा! [इह ] खलु गाहावई वा गाहावइपुत्तो वा तहप्पगारेहिं कुलेहिं आगम्म धम्मसवणवत्तियं उवसंकमेजा ? हंता उत्रसंकोजा, तेसिं च णं तहप्पगाराणं धम्मे आइक्खियो? हंता आइक्खियत्वे, किं ते तहप्पगारं धम्मं सोचा निसम्म एवं वदेजा-इणमेव निग्गंथं पावयणं सच्चं अणुत्तरं केवलियं पडिपुगं संसुद्धं नेयाउयं सल्लकत्तणं सिद्धिमग्गं मुत्तिमग्गं निजाणमग्गं निवाणमग्गं अवितहमसंदिद्धं सबदुक्खप्पहीणमग्गं, इत्थं ठिया जीवा सिझंति बुझंति मुचंति परिनिवायंति सवदुक्खाणमंतं करेंति, तमाणाए तहा गच्छामो तहा चिट्ठामो तहा निसियामो तहा तुयट्टामो तहा भुंजामो तहा भासामो तहा अब्भु. ट्रेमो तहा उट्टाए उट्टेमो त्ति पाणाणं भूयाणं जीवाणं सत्ताणं संजमेणं संजमामो ति वदेजा ? हंता वएज्जा, किं ते तहप्पगारा कप्पंति पवावित्तए ? हंता कप्पंति, किं ते तहप्पगारा कप्पति मुंडावित्तए? द्वितीरे श्रुत. सप्तमाध्ययने श्राद्धव्रतामहे द्वितीय दृष्टान्तम् १४३॥ Jain Educator intern Far Private & Personal use Oh inbraryong भा Page #317 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हंता कप्पंति, किं ते तहप्पगारा कप्पंति सिक्खावित्तए ? हंता कप्पंति, किं ते तहप्पगारा कम्पति उबट्टावित्तए ? हंता कप्पंति, तेसिं च णं तहप्पगाराणं सबपाणेहिं जाव सबसत्तेहिं दंडे निखिते ? हंता निखित्ते, से णं एयारूवेणं विहारेणं विहरमाणा जाव वासाइं चउपंचमाई छ।समाणि वा अप्पतरो वा भुजतरो वा देसं दूइजित्ता अगारं वइजा ? हंता वएजा, तस्त णं सबपाणेहिं जाव | सबसत्तेहिं दंडे निखित्ते ? णो तिणटे समटे, से जे से जीवे जस्स परणं सबपाणेहिं जाव सबसत्तेहिं दंडे नो निखित्ते, से जे से जीवे जस्स आरेणं सवपाणेहिं जाव रुवसत्तेहिं दंडे निखित्ते, से जे से जीवे जस्स इदाणिं सबपाणेहिं जाव सबसत्तेहिं दंडे नो निखित्ते भवइ, परेणं असंजए| आरेणं संजए, इदाणिं असंजए, असंजयस्त णं सबपाणेहिं जाव सबसत्तेहिं दंडे नो निखित्ते भवति, से एवमायाणह ?, नियंठा!, से एवमायाणियत्वं । व्याख्या-भगवानेव गौतमस्वाम्याह-गृहस्था यतीनामन्ति के [समागत्य] धर्म श्रुत्वा सम्यक् प्रतिपद्य तदुत्तरकालं सञ्जातवैराग्याः प्रव्रज्यां गृहीत्वा पुनस्तथाविधकर्मोदयात्प्रवन्यां त्यजन्ति, ते च पूर्व गृहस्थाः सर्वाऽरम्मप्रवृत्तास्तदारतः प्रव्रजिताः सन्तो जीवोपमईपरित्यक्तदण्डाः पुनः प्रवज्यापरित्यागे सति नो परित्यक्तदण्डाः, तदेवं प्रत्याख्यातॄणां यथाव । Jain Educati o nal For Privats & Personal use on Page #318 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तीये अयगडाङ्ग स्थात्रयेऽप्यन्यथात्वं भवत्येवं त्रसस्थावस्योरपि द्रष्टव्यम् । एतच्च 'भगवं च णं उदाहु' इत्यादिग्रन्थस्य ' से एक सूत्रं | मायाणियव्वं' इत्येतत्पर्यवसानस्य तात्पर्यम् , अक्षरघटना तु सुगमेति स्वबुद्धथा कार्या । तदेवं द्वितीयं दृष्टान्तं दीपिका- प्रदर्याधुना तृतीयं दृष्टान्तं परतीर्थिकोद्देशेन दर्शयितुमाहन्वितम् । ____ भगवं च णं उदाहु नियंठा खलु पुच्छियवा-आउसंतो नियंठा ! केइ खलु परिवायगा [वा] ॥१४४ परिवाइयाओ वा अन्नयरेहितो तित्थाययणहितो आगम्म धम्मसवणवत्तियं उवसंकमज्जा ? हंता उवसंकमेजा। व्याख्या--भगवान् गौतमस्वामी कथयति निर्ग्रन्थाः पृष्टव्याः निर्ग्रन्थानुद्दिश्य पृच्छति-भो आयुष्मन्तो निर्ग्रन्था ! इह जगति कश्चित् परिव्राजकः परित्राजिका वा अन्यतीर्थायतनादागत्य साधुसमीपे धर्म श्रोतुमुपसङ्कमते ? निर्ग्रन्था वदन्ति उपसमते, तादृशस्य परिव्राजकस्य कथ्यते धर्म: ? हन्त कथ्यते, तमुपस्थापयितुं कल्पते ? हन्त कल्पते । । किं तेर्सि तहप्पगाराणं धम्मे आइक्खियत्वे ? हंता आइक्खियो, तं चेव जाव उवट्ठावित्तए, NI [कप्पंति ? हंता कप्पंति किं ते तहप्पगारा कप्पति संभुंजित्तए ? हंता कप्पति, तेणं एयारूवेणं NI विहारेणं विहरमाणा तं चेव जाव अगारंवएज्जा ? हंता वएज्जा, ते णं तहप्पगारा कप्पति संभुंजित्तए? श्रुत. सप्तमाध्ययने श्राद्धव्रता भङ्गे तृतीयं दृष्टान्तम् । ॥ १४४ ॥ Jan Education interior For Private & Personal Use Oh FIw.jainelibrary.org Page #319 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter त ? णो तिणमट्ठे समट्ठे, से जे से जीवे जे परेणं नो कप्पइ संभुंजित्तए, से जे से जीवे आरेणं कप्पइ संभुंजित्तए, से जे से जीवे जे इदाणिं णो कप्पति संभुंजित्तए, परेणं अस्समणे आरेणं समणे, इदाणिं अस्समणे, अस्समणेणं सार्द्धं नो कप्पति समणाणं निग्गंथाणं संभुंजित्तए, से एवमायाण नियंठा ! से एवमायाणियां [सू० १० ] व्याख्या - ते परिव्राजकाः साधुत्वं प्राप्ताः सन्तः उपविशन्ति ? हन्त उपविशन्ति, को दोषः ? पुनस्तथाविधकर्मो दयात्साधुमार्गं त्यक्त्वा गृहवासमङ्गीकुर्वन्ति ? हन्त कुर्वन्ति, ततः मण्डल्यामुपवेशयितुं कल्पते ? निर्मन्था ऊचुः - 'नो तिट्ठे समट्ठे' इत्यादि सर्वे सुगमम् । तात्पर्यार्थस्त्वयं पूर्वं परिव्राजकादयः सन्तोऽसम्भोग्याः साधूनां गृहीतश्रामण्याच साधूनां सम्भोग्याः संवृत्ताः पुनः प्रव्रज्यात्यागादसम्भोग्या इत्येवं पर्यायान्यथात्वं त्रसस्थावराणामप्यायोज नीयमिति । यदा सः स्थावरेषूत्पन्नस्तदा स्थावर एव, न त्रसः, यदा पूर्वं सोऽभूत्तदा तस्य वधः प्रत्याख्यातोऽभूत् श्रावण, यदा स एव सः स्थावरतयोत्पन्नस्तदा न प्रत्याख्यानं स्थावरघाते, यदा पुनः स्थावर कायान्निर्गत्य सोऽजनि तदा पुनः प्रत्याख्यानमिति, तदेवं निर्दोषां देशविरतिं प्रसाध्य पुनरपि तद्गतमेव विचारं कर्तुकाम आह भगत्रं च णं उदाहु संतेगतिया समणावासगा भवति, तेसिं च णं एवं वृत्तपुत्रं भवइ नो खलु वयं २५ Page #320 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा नं I दीपिकान्वितम् । 4॥१४५॥ संचाएमो मुंडा भवित्ता अगाराओ अणगारियं पवइत्तए, वयं णं चाउद्दसट्टमुट्ठिपुण्णमासिणीसु द्वितीय पडिपुण्णं पोसहं सम्म अणुपालेमाणा विहरिस्सामो, थूलगं पाणाइवायं पञ्चक्खाइस्सामो, एवं श्रुत थूलगं मुसावायं थूलगं अदिन्नादाणं थूलगं मेहुणं थूलगं परिग्गहं पञ्चक्खाइस्सामो, इच्छापरि सप्तमा ध्ययने माणं करिस्सामो, दुविहं तिविहेणं, मा खलु मम अट्ठाए किंचिंवि करेह वा करावेह वा, तत्थ वि गौतमपञ्चक्खाइस्सामो, ते णं-अभोच्चा अपिच्चा असिणाइत्ता आसंदीपेढियाओ पच्चोरुहिता, ते तहा स्वामी कालगता किं वत्तवं सिया? सम्मं कालगतत्ति वत्तवं सिया, ते पाणा वि वुच्चंति ते तसा वि उदकं प्रति वुच्चंति ते महाकाया ते चिरद्वितीया ते बहुतरगा पाणा जेहिं समणोवासगस्स सुप्पच्चक्खायं । संसारे त्रसजीवाभवति, ते अप्पतरगा पाणा जेहिं समणोवासगस्स अप्पच्चक्खायं भवति, इति से महयाओ || नामजपणं तुब्भे वदह तं चेव, जाव अयंपि भेदे से णो णेयाउए भवति । शून्यता व्याख्या-पुनरपि गौतमस्वाम्युदकं प्रतीदमाह, तथाहि-बहुभिः प्रकारेनससद्भावः सम्भाव्यते, ततश्चाशून्यस्तैः दर्शयति । संसारः, तदशून्यत्वे च [न]निर्विषयं श्रावकस्य प्रसवधनिवृत्तिरूपं प्रत्याख्यानं, तदधुना बहुप्रकारत्रससम्भूत्याऽशून्यवां संसारस्य दर्शयति, भगवानाह-सन्ति एके केचन श्रमणोपासका भवन्ति, तेषां चेदमुक्तपूर्व भवति-सम्भाव्यते श्रावकाणा- IA १४५॥ ww.ininelibrary.org Jain Education Page #321 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मेवम्भृतस्य वचसः सम्भव इति, तद्यथा-न खलु वयं शक्नुमः प्रव्रज्यां गृहीतुं, किन्तु वयं चतुर्दश्यष्ट मीपूर्णमासीषु सम्पूर्ण | पौषधं + सम्यगनुपालयन्तो विहरिष्यामस्तथा स्थूलप्राणातिपातमृषावादादत्तमैथुनपरिग्रहं प्रत्याख्यास्यामो 'द्विविध'मिति कृतकारितप्रकारद्वयन, अनुमतेः श्रावकस्याप्रतिषिद्धत्वात्तथा 'त्रिविधेन' मनसा वाचा कायेन च तथा 'मा' इति निषेधे, खलु निश्चितं पौषधस्थस्य पचनपाचनादिकं मम मा काष्टा, तथा परेण मा कारयत तत्राऽनुमतावपि सर्वथा यदसम्मवि तत्प्रत्याख्यास्यामः, ते एवं कृतप्रतिज्ञाः सन्तः श्रावकाः अभुक्त्वा अपीत्वा अस्नात्वा च पौषधोपेतत्वादासन्दी. पीठिकातः प्रत्याऽरुह्याऽवतीय सम्यक् पौषधं गृहीत्वा कालं कृतवन्तस्ते तथा प्रकारेण कृतकालाः सन्तः सम्यकृतकाला उच्यन्ते ? किंवा असम्यक् ? कथं च वक्तव्यं स्यात् ? इत्येवं पृटेनिग्रन्थैरवश्यमेवं वक्तव्यं स्यात्-सम्यकालगता इति एवं च कालगतानामवश्यं भावी देवलोके पुत्पादस्तदुत्पन्नाश्च ते त्रसा एव, ततश्च कथं निर्विषयता प्रत्याख्यानस्योपासकस्येति । एवं च बहवो जीवाः येषां श्रावकस्य प्रत्याख्यानं स्यात् , ते स्तोका येषु विषये न प्रत्याख्यानं, एवं श्रावकस्य महतस्त्रमा कायाद्विरतिरस्ति, त्रसरक्षणे महान् यत्नः श्रावकस्य विराधनायाश्च विरतिः। एवंविधस्य श्रावकस्य भवद्भिरुच्यते-नास्ति स कोऽपि पर्यायो यत्र श्रावकस्य प्राणातिपातप्रत्याख्यानं स्यात् , एतद्भवदचो न न्यायोपपत्रमिति । पुनरन्यथा श्रावकोद्देशेन प्रत्याख्यानस्य विषयं प्रदर्शयितुमाह +" आहारशरीरसत्कारत्रमचर्याव्यापाररूपम् " इति वृत्तिकाराः । Jain Education interne Mainelibrary.org Page #322 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाज सूत्र दीपिकान्वितम्। __ भगवं च णं उदाहु संतेगतिया समणोवासगा भवंति, तेसिं च णं एवं वुत्तपुवं भवइ नो खलु वयं संचाएमो मुंडा भवित्ता अगाराओ जाव पवइत्तए, नो खलु वयं संचाएमो चाउद्दसट्ठमुद्दिपुण्णमासिणीसु जाव अणुपालेमाणा विहरित्तए, वयं णं अपच्छिममारणंतियसलेहणाझुसणाझुसिया भत्तपाणपडियाइक्खिया जाव कालं अणवकंखमाणा विहरिस्तामो, सवं पाणाइ. वायं पच्चक्खाइस्सामो जाव सवं परिग्गहं पञ्चक्खाइस्सामो तिविहं तिविहेणं मा खलु मम अट्ठाए किंचि वि जाव आसंदीए पेढियाओ पच्चोरुहित्ता ते तहा कालगता किं वत्तवं सिया ? सम्मं काल- गता इति वत्तवं सिया, ते पाणा वि वुच्चंति जाव अयंपि भेदे से णो नेयाउए भवइ । व्याख्या-गौतमस्वाम्याह, तद्यथा 'सन्ति' विद्यन्ते 'एके' केचन श्रमणोपासकाः, तेषां चैतदुक्तपूर्व भवति, तथाहिखलु न शक्नुमो वयं प्रव्रज्यां गृहीतुं नापि चतुर्दश्यादिषु सम्यक् पौषधं पालयितुं, वर्ष चापश्चिमया संलेखनाक्षपणया क्षपितकायाः सन्तो भक्तपानं प्रत्यारव्याय 'कालं' दीर्घकालमनवकाङ्क्षमाणा विहरिष्यामः । इदमुक्तपूर्व भवति, तद्यथान खलु वयं दीर्घकालं पौपधादिकं व्रतं पालयितुं समर्थाः, किन्तु वयं सर्वमपि प्राणातिपातादिकं प्रत्याख्याय संलेखनासंलिखितकायाश्चतुर्विधाहारपरित्यागेन जीवितं परित्यक्तुमलमिति, एतत्सूत्रेणैव दर्शयति- सव्वं पाणाइवाय 'मित्यादि द्वितीये श्रुत सप्तमाध्ययने श्रावकस्य त्रसवध निवृत्तस्य विषयता | प्रतिपाद यति। ॥१४६ ॥ For Private & Personal use only iainelibrary.org. Page #323 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुगमम् । यावचे तथाकालगताः किं वक्तव्यमेतत्स्यात्-सम्यक ते कालगताः ? इति, एवं पृष्टा निर्गन्था एतचुर्यथा ते सन्मनसः-शोभनमनसस्ते कालगता इति, ते च सम्यक् संलेखनया यदा कालं कुर्वन्ति तदाऽवश्यमन्यतमेषु देवलो केधूत्पद्यन्ते, तत्र चोत्पन्ना यद्यपि व्यापादयितुं न शक्यन्ते तथापि त्रसत्वात्ते श्रावकस्य[त्रसवधनिवृत्तस्य विषयतां प्रतिपद्यन्ते । पुनरप्यन्यथा प्रत्यारव्यानस्य विषयमुपदर्शयितुमाह भगवं च णं उदाहु संगतिया मणुस्ता भवंति तं जहा-महेच्छा महारंभा महापरिग्गहा अहम्मिया जाव दुप्पडियाणंदा जाव सबाओ परिग्गहाओ अपडिविरता, जावजीवाए, जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए दंडे निखित्ते, ते ततो आउगं विप्पजहति, ते तओ भुजोसगमादाए दोग्गतिगामिणो भवंति, ते पाणा वि वुच्चंति ते तसा वि वुच्चंति । ते महाकाया [ते] RI चिरद्वितीया, ते बहुतरगा पाणा, जाव जणं तुन्भे वदह तं चेव, अयंपि भेदे से णो नेयाउए भवति। व्याख्या-भगवानाह-'एके' केचन मनुष्या एवम्भृता भवन्ति, तद्यथा-महेच्छा महारम्भा महापरिग्रहा इत्यादि सुगम, येथेषु वा श्रमणोपासकस्य 'आदानं 'प्रथमव्रतग्रहणं, तत आरभ्याऽऽमरणान्तं दण्डो' निक्षिप्तः परित्यक्तो भवति, ते च तादृग्विधास्तस्माद्भवाकालात्यये स्वायूपं त्यजन्ति, त्यक्त्वा त्रसजीवितं ते भूय: 'स्वकर्म'स्वकृतं किविष Jan Education internationa Far Private & Personal use Oh WWEjainelibrary.org Page #324 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न्यूयगडाज द्वितीये सूत्रं दीपिका श्रुत सप्तमा न्वितम् ।। ध्ययने १४७॥ प्रत्याख्यानस्य मादाय-गृहीत्वा दुर्गतिगामिनो भवन्ति । एतदुक्तं भवति-महारम्भपरिग्रहत्त्वाचे मृताः पुनरन्वतरपृथिव्यां नारकत्रसत्वे नोत्पद्यन्ते, ते च सामान्यसंज्ञया प्राणिनो विशेषसंज्ञया त्रसा: महाकायाचिरस्थितिका इत्यादि पूर्ववत् , यावत् 'नो आउएत्ति' । पुनरप्यन्येन प्रकारेण प्रत्याख्यानस्य विषयं दर्शयितुमाह भगवं च णं उदाहु संतेगतिया मणुस्सा भवंति [तं जहा] अणारंभा अपरिग्गहा धम्मिया | धम्माणुया जाव सवाओ परिग्गहाओ पडिविरया जावजीवाए, जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए दंडे निखित्ते, ते तओ आउयं विप्पजहंति, ते तओ भुजोसगमादाए सोग्गतिगामिणो भवंति, ते पाणा वि वुच्चंति जाव णो णेयाउए भवति । व्याख्या-भगवानाह-सन्त्येके मनुष्याः महारम्भपरिग्रहादिभ्यो विपर्यस्ताः सुशीलाः सुव्रताः सुप्रत्यानन्दाः साधव इत्यादि सुगमं, यावत् 'नो णेयाउए भवति' एते च सामान्यश्राव कास्तेऽपि त्रसेष्वेवान्यतरेषु देवेषूत्पबन्ते अतोऽपि न निर्विषयं प्रत्याख्यानमिति । किश्चान्यत्___ भगवं च णं उदाहु संतेगतिया मणुस्सा भवंति, तंजहा-अप्पिच्छा अप्पारंभा अप्पपरिग्गहा धम्मिया धम्माणुया जाव एगच्चाओ परिग्गहाओ अप्पडिविरया, जेहिं समणोवासगस्त आया- | विषय दर्शनम् । १४७॥ N Jain Education w.jainalibrary.org 1 Page #325 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern सो आमरणंताए दंडे निखित्ते । ते तओ आउ[i] विप्पजहंति, आउयं विष्पजहित्ता भुज्जोसगमादा सुग्गइगामिणो भवंति, ते पाणा वि वुच्चति जाव नो णेयाउए भवति । व्याख्या - एतेऽपि अल्पलोमा अल्पपरिग्रहा अत्यारम्भा धार्मिकाः प्राणातिपातादेकस्मिन् पक्षे विरता एकतो अविरता अतो विरताविरता उच्यन्ते, श्रमणोपासकस्य येषामामरणान्ताद्दण्डो निषिद्धोऽस्ति, ते विरताविरताः स्वमायुस्त्य क्त्वा सद्गतिगामिनो जायन्ते देवेषूत्वद्यन्ते । ते तत्रस्थाः प्राणास्तथा त्रमा महाकायाश्चिरस्थितिकाश्रोच्यन्ते ते तानपि न्ति । अतो यद्भवतोच्यते नास्ति स कोऽपि पर्यायो यत्र श्रावकस्य प्राणातिपातविरतिः स्यात्चन्मृषा । ' अयं भेदे से नो णेयाउए' इत्यादि सर्वत्र योज्यम् । भगवं चणं उदाहु संगतिया मणुस्सा भवंति, आरपिणया आवसहिया गामणियंतिया कई हस्तिया, जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए दंडे निखित्ते, ते नो बहुसंजया नो बहुपडिविरता पाणभूयजीवसत्तेहिं अविरया, ते अप्पणा सच्चामोसाई एवं विपडिवेदेति - अहं न हंतो अन्ने हंतवा, जाव कालमासे कालं किच्चा अन्नयराई आसुरियाई किविसियाई जाव उववत्तारो हवंति, तओ विष्पमुच्चमाणा भुजो एलमूयत्ताए तमोरूत्रत्ताए पच्चा Sanelibrary.org Page #326 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग सूत्र ० दीपिका न्वितम् । ॥ १४८ ॥ Jain Education Int यंति, ते पाणा विदुच्चति जाव नो णेयाउए भवति । व्याख्या - गौतमस्वाम्येव प्रत्याख्यानस्य विषयं दर्शयितुमाह - ' एके 'केचन मनुष्याः एवम्भूता भवन्ति, तद्यथाआरण्यकास्तीर्थिक विशेषास्तथा आवसथिकास्तीर्थिकविशेषा एव तथा ग्रामनिमन्त्रिकास्तथा 'कहूनुई रहस्सिय ' त्ति क्वचित्कार्ये रहस्यकाः एते सर्वेऽपि तीर्थिकविशेषास्ते च नो बहुसंयताः हस्तपादादिक्रियासु तथा ज्ञानावरणीया तत्वान्न बहुविरताः सर्वप्राणभूत जीव सच्वेभ्यस्तत्स्वरूपापरिज्ञानात्तद्वधादविरता इत्यर्थः । ते तीर्थिकविशेषा बहुसंयताः स्वतोऽविरताः आत्मना सत्यामृषाणि वाक्यान्येवमिति वक्ष्यमाणनीत्या 'त्रियुञ्जन्ति' प्रयुञ्जन्ति ' एवं विप्पडिवेदेति' + एवं विविधप्रकारेण परेषां प्र[ति] वेदयन्ति-ज्ञापयन्ति, तानि पुनरेवम्भूतानि वाक्यानि दर्शयति, तद्यथा-अहं न हन्तव्योऽन्ये पुनर्हन्तव्यास्तथाऽहं नाज्ञापयितव्योऽन्ये पुनराज्ञापयितव्या इत्यादीन्युपदेशवाक्यानि ददति, ते चैवमेवोपदेशदायिनः स्त्रीकामेषु मूर्च्छिताः गृद्धा यावद्वर्षाणि चतुःपञ्चमानि पड्दशमानि वाऽतोऽप्यल्पतरं वा प्रभूततरं वा कालं भुक्त्वा उत्कट [ [ भोगा ]भोगभोग [स्ताँ]स्ते तथाभूताः किञ्चिदज्ञानतपःकारिणः कालमासे कालं कृत्वाऽन्यतरेषु आसुरीयेषु स्थानेषु किल्विषकेष्वसुरदेवाधमेषूपपत्तारो भवन्ति, यदिवा प्राण्युपधातोपदेशदायिनो भोगाभिलाषुकाः 'असूय्र्येषु' नित्यान्धकारेषु किल्बिषप्रधानेषु नरकस्थानेषु ते समुत्पद्यन्ते, ते च देवा नारका वा त्रसत्वं न व्यभिचरन्ति तेषु च यद्यपि द्रव्यप्राणातिपातो न + " क्वचित्पाठोऽस्यायमर्थः " इतिवृत्तौ । द्वितीये श्रुत० सप्तमा ध्ययने प्रत्या ख्यानस्य विषय दर्शनम् । ॥ १४८ ॥ w.jainelibrary.org Page #327 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्भवति तथापि ते भावतो यः प्राणातिपातस्तद्विरतेविषयता प्रतिपद्यन्ते, ततोऽपि च देवलोकाता नरकाद्वा निर्गताः क्लिष्टपश्चेन्द्रियतिर्यक्षु तथाविधमनुष्येषु वा एडमकतया समुत्पद्यन्ते, तथा 'तमोरूवत्ताए'त्ति अन्धबधिरतया प्रत्या. यान्ति, ते चोभयोरप्यवस्थयोत्रसत्वं न व्यभिचरन्ति, अतो न निर्विषयं प्रत्याख्यानं एतेषु च द्रव्यतोऽपि प्राणातिपातः सम्भवतीति । साम्प्रतं प्रत्यक्षसिद्धमेव विरतेविषयं दर्शयितुमाह भगवं च णं उदाहु संतेगतिया पाणा दीहाउया जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो | | [आमरणताए ] जाव [दंडे] निरिखते [ भवइ ] ते पुवामेव कालं करित, करित्ता पारलोइय- || त्ताए पच्चायंति, ते पाणा वि वुच्चंति ते तसा वि [ वुच्चंति ] ते महाकाया ते चिरट्ठितिया ते दीहाउया ते बहुतरगा जेहिं समणोवासगस्स [ सुपच्चक्खायं भवइ ] जाव णो णेयाउए भवति । व्याख्या-यो हि प्रत्याख्यानं गृह्णाति तस्माद्दीर्घायुष्काः 'प्राणाः' प्राणिनस्ते च नारकमनुष्यदेवा द्वित्रिचतु. पञ्चेन्द्रियतिर्यश्चश्च सम्भवन्ति, ततः कथं निर्विषयं प्रत्याख्यानमिति ? शेषं सुगम यावत् ' णो णेयाउए भवइति । भगवं च णं उदाहु संतेगतिया पाणा भवंति समाउया जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो [आमरणंताए] जाव दंडे निक्खित्ते भवइ, ते (पाणा) सममेव कालं कारीत करित्ता पारलोइयत्ताए Jain Education inted jainerary.org Page #328 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -खूयगडाङ्ग सू दीपिकान्वितम् । ॥ १४९ ॥ Jain Education In पञ्चायत, ते पाणावि [बुच्चति] ते तसा [वि वुच्चति] ते महाकाया ते समाउया [ते बहुतरगा, जेहिं समणोवासगस्त सुपच्चक्खायं भवति, ] जाव नो णेआउए भवति । व्याख्या—यः श्रावकस्त्रसंवधप्रत्याख्यानं गृह्णन्नस्ति ते न समायुष्का एके प्राणिनः सन्ति ते सममेव कालं कुर्वन्ति सममेव परलोकगतयो भवन्ति, ते समायुष्का अपि सा एव तेषां श्रावकस्य प्रत्याख्यानं सुप्रत्याख्यानं भवति, यदुच्यते त्वया - नास्ति स कोऽपि पर्यायो यत्र श्रावकस्य प्रत्याख्यातं स्यादपि मुधेति अपि भेदे से नो आउए । भगवं च णं उदाहु संतेगतिया पाणा अप्पाउगा, जेहिं समणावासगस्स आयाणसो आमरणंए दंडे [निक्खित्ते भवइ ], ते पुव्वामेव कालं करिति, करित्ता पारलोइयत्ताए पञ्चायंति, ते पाणा० ते तसा० ते महाकाया ते अप्पाउया ते बहुतरगा पाणा, जेहिं समगोवा सगस्त सुपच्चखायं हव अप्परगा जेहिं समणोवासगस्स दुपच्चक्रवायं हवइ इति से महया जाव नो णेयाउए भवइ । व्याख्या - एके प्राणिनः अल्पायुषः सन्ति तेऽपि त्रसा उच्यन्ते, कृतप्रत्याख्यानाच्छुमणोपासकात्पूर्वं त्रियन्ते तद्विषयं प्रत्याख्यानं स्यात्, एतावता बहुतरप्राणविषयं प्रत्याख्यानं अल्पतरप्राणिविषये अप्रत्याख्यानं, अथवा यस्मात् श्रावकादल्पायुषः प्राणिनः सन्ति ते यावन्न म्रियन्ते तावत्रसविषयं प्रत्याख्यानं स्यात्, ते तु मृत्वा पुनस्त्रसेवेवोत्पद्यन्ते तदाऽग्रतोऽपि द्वितीये श्रुत० सप्तमा ध्ययने प्रत्यक्ष सिद्धं विरतेर्विपर्य दर्शयति । ॥ १४९ ॥ Page #329 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In प्रत्याख्यानं स्यात्, अतः श्रावकस्य निर्विषयं प्रत्याख्यानं कथं कथ्यते ? विमृश भवद्वचोऽयुक्तमेवेति तच्चम् | भगवं च णं उदाहु संगतिया समणोवासगा भवति, तेसिं च णं एवं वृत्तपुत्रं भवइ-नो खलु वयं संचाएमो मुंडे भवित्ता जाव पवइत्तए, नो खलु वयं संचाएमो चाउद्दसमुद्दिट्ठपुण्णमासिणी परिपुर्ण पोसहं अणुपालित्तए, नो खलु वयं संचाएमो अपच्छिमं जाव विहरित्तए, वयं णं सामाइयं देसावगासियं पुरत्थापाईणं वा पडीणं वा दाहिणं वा उदीणं वा एतावता जाव सव्वपाणेहिं जात्र सङ्घसत्तेहिं दंडे निखित्ते, सव्वपाणभूयजीवसत्तेहिं खेमंकरे अहमंसि । व्याख्या -भगवानाह इत्यादि सुगमम् । यावत् 'वयं णं सामाइयं देसावगासियं ति देशावका शिकं पूर्वगृहीतस्य दिग्व्रतस्य योजनशतादिकस्य [य]त्प्रतिदिनं संक्षिप्ततरं योजनगन्यूतपचनगृहमर्यादादिकं परिमाणं विधत्ते तदेशाव काशिकमित्युच्यते, तदेव दर्शयति 'पुरस्थापाईण' मित्यादि, प्रातरेव प्रत्याख्यानावसरे दिगाश्रितमेवम्भूतं प्रत्याख्यानं करोति, तथाहि - ' प्राचीनं ' पूर्वाभिमुखं प्राच्यां दिश्येतावन्मयाऽद्य गन्तव्यं, तथा 'प्रतीचीनं ' प्रतीच्यां - अपरस्यां दिशि तथा दक्षिणाभिमुखं दक्षिणस्यां तथोदीच्यामुत्तरस्यां वा दिश्यैतावन्मयाऽद्य गन्तव्यमित्येवम्भूतं स प्रतिदिनं प्रत्याख्यानं विधचे, तेन च गृहीतदेशावकाशिकेन श्रावकेण सर्वप्राणिभ्यो गृहीतपरिमाणात्परेण दण्डो ' निक्षिप्तः ' परित्यक्तो भवति, ततश्वासौ श्रावकः सर्वप्राणभूत जीवसच्चेषु क्षेमङ्करोऽहमस्मीत्येवमध्यवसायी भवति । Page #330 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पगढाङ्ग सूत्रं दीपिकान्वितम् । ॥ १५० ॥ Jain Education Inter तत्थ आरेणं जे तसा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणताएं दंडे निखित्ते, ते ततो आउं विप्पति विष्पजहित्ता तत्थ आरेणं चैव जे तसा पाणा जेहिं समणावासगस्स, आयाणसो (दंडे निखित्ते) जाव तेसु पच्चायंति, तेहिं समणोवासगस्स सुपच्चक्खायं भवति । पाण वुच्चति ते तसा० महाकाया ते चिराट्ठतीया जाव अयंपि भेदे से नो णेयाउए ॥ १ ॥ [सू० ११] व्याख्या—' तत्र ' गृहीतपरिमाणे देशे ये आरेण त्रसाः प्राणा येषु श्रमणोपासकस्य आदान इत्यादेरारभ्याऽऽमरणान्तो दण्डो ' निक्षिप्तः परित्यक्तो भवति, ते च त्रसाः प्राणाः स्वायुष्कं परित्यज्य तत्रैव-गृहीत परिमाणदेश एव योजनादिदेशाभ्यन्तर एव त्रसाः प्राणास्तेषु प्रत्यायान्ति, इदमुक्तं भवति- गृहीतपरिमाणे देशे त्रसायुष्कं परित्यज्य त्रसेष्वेवोत्पद्यन्ते, ततश्च तेषु श्रमणोपासकस्य सुप्रत्याख्यानं भवति, उभयथापि त्रसत्व सद्भावात् शेषं सुगमं, यात्रत् 'नो णेआऊएं भवति'त्ति एवमन्यान्यप्यष्टौ सूत्राणि दृष्टव्यानि तत्र प्रथमे सूत्रे तदेव यद् व्याख्यातं तचैवम्भूतं, तद्यथा - गृहीतपरिमाणे देशे ये सास्ते गृहीतपरिमाणदेशा[देशस्था ] स्तेष्वेव त्रसेषूत्पद्यन्ते । अथाग्रेतनानि तत्थ आरेणं जे तसा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयासो आमरणंताए दंडे निखित्ते, ते ततो आउं विष्वजर्हति ते ततो आउं वि०ता तत्थ आरेणं चेव जे थावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स अड्डाए दंडे अणिक्खिते अट्ठाए दंडे निखिचे तेसु पच्चायंति, तेहिं समणोवासगस्स अट्ठाए दंडे अणिक्खिते अट्टाए दंडे णिखित्ते, ते पाणा त्रि वुञ्चति ते तसा वि० ते चिरट्ठिया जाव अपि भेदे से० || २ || अयं द्वितीयो मङ्गकः । द्वितीये श्रुत० सप्तमा ध्ययने प्रत्यक्ष सिद्धं विश्तेर्विषयं दर्शयति । ।। १५० ।। w.jainelibrary.org Page #331 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्थ जे आरेणं तसा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए जाव आउं विप्पजहंति [विप्पजहित्ता] तत्थ परेणं जे तसा-थावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए दंडे निखित्ते, तेसु पञ्चायंति, तेहिं समणोवासगस्त सुपच्चक्खायं भवइ । ते पाणा वि जाव, अयं पि भेदे से णो नेयाउए ॥ ३॥ तत्थ जे आरेणं थावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो अट्टाए दंडे अणिक्खित्ते अणटाए निक्खिते, ते तओ आउं विप्पजहति विप्पजहित्ता तत्थ आरेणं चेव जे तसा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए। तेसु पञ्चायति, जेहिं [तेसु] समणोवासगस्स सुपच्चक्खायं भवति, ते पाणा वि वुचंति जाव अयंपि भेदे नो णेयाउए ।। ४ ॥ तत्थ जे ते आरेणं थावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स अट्ठाए दंडे अणिक्खित्ते अणट्टाए णिक्खित्ते ते तओ आउं विष्पजहति विप्पजहित्ता तत्थ आरेणं चेव जे थावरा पाणा, जेहिं समणोवासगस्स अट्टाए दंडे निखित्ते तेसु पञ्चायंति, तेहिं समणोवासगस्सxसुपच्चक्खायं भवति ते पाणा वि.जाव अयंपि भेदे से नो०॥ ५॥ तत्थ णं जे ते x एतचिन्हान्तर्गतपाठस्थाने " अाए अणट्ठाए" इत्येवं रूपः प्रत्यन्तरे । २६ Jain Education Mela For Private & Personal UBE ww.jainelibrary.org Page #332 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडाङ्ग- दीपिकान्वितम् । ॥१५॥ परेणं थावरा पाणा, जेहिं समणोवासगस्स अट्टाए दंडे अणिक्खित्ते, अणट्टाए णिक्खिचे, ते तओ आउ विप्पजहंति विप्पजाहित्ता ते तत्थ आरेणं चेव जे तसथावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए० तेसु पञ्चायंति, तेहिं समणोवासगस्त सुपञ्चक्खायं हवइ, ते पाणा वि० जाव अयंपि भेदे से णो णेयाउए भवति ॥६॥ तत्थ जे ते परेणं तसथावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए अटाए अणट्टाए दंडे निक्खित्ते हवइ, ते तओ आउं विप्पज. हति विप्पजहित्ता तत्थ आरेणं जे तला पाणा जेहिं समणोवासगस्त आयाणसो आमरणंताए दंडे निखित्ते तेसु पच्चायंति, तेहि समणोवासगस्स सुपच्चक्खायं हवइ, ते पाणा वि० जाव अयंपि भेदे से णो णेयाउए भवति ॥ ७॥ तत्थ जे ते परेणं तसथावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए अट्ठाए अणढाए दंडे निक्खित्ते, ते ततो आउं विप्पजति विप्प. जहित्ता तत्थ आरेणं जे थावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स अट्ठाए दंडे अणिखित्ते अगट्ठाए दंडे निखित्ते तेसु पञ्चायति तेहिं समणोवासगस्स सुपच्चक्खायं भवइ, ते पाणावि० जाव अयंपि द्वितीये श्रुत सप्तमाध्ययने श्रमणोपासकस्य त्रसस्थावरजीवानाम् सुप्रत्या ख्या दर्शयति। Jain Education A O w.jainelibrary.org Page #333 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - भेदे से णो णेयाउए भवति । ॥ ८॥ तत्थ जे ते परेणं तसथावरा पाणा, जेहिं समणोवासगस्त आयाणसो आमरणंताए अट्ठाए अणट्ठाए दंडे निक्खत्ते, ते ततो आउं विप्पजहंति विप्पजहित्ता ते तत्थ परेणं चेव जे तसथावरा पाणा जेहिं समणोवासगस्स आयाणसो आमरणंताए दंडे निक्खित्ते तेसु पच्चायति जे(ते)हिं समणोवासगस्त सुपच्चक्खायं भवइ, ते पाणा वि. जाव अयंपि भेदे से नो णेयाउए भवति ॥ ९॥ व्याख्या-गृहीतपरिमाणे देशे ये त्रसास्ते [गृहीतपरिमाणदेशस्थाशास्तेष्वे त्रसेत्स्यन्ते इति प्रथमो भङ्गाः॥१॥ द्वितीयं सूत्रं वारादेशवर्तिनस्त्रमा आराद्देशवत्तिषु स्थावरेपूत्पद्यन्ते (इति) द्वितीयः ॥२॥ तृतीये त्वाराद्देशवर्तिनखसा गृहीतपरिमाणाद्देशादहिये त्रसाः स्थावराश्च तेषूत्पद्यन्ते अयं तृतीयः ।। ३ ।। चतुर्थे त्वारादेशवर्तिनो ये स्थावरास्ते तद्देशवर्तिष्वेव त्रसेप्त्पद्यन्ते अयं (चतुर्थः) तुर्यः ॥ ४॥ पश्चममूत्रे तु आराद्देशवर्तिनो ये स्थावरास्ते गृहीतपरिमाणस्थेषु तद्देशवर्तिषु स्थावेरघूत्पद्यन्ते अयं पञ्चमः ॥ ५॥ षष्ठसूत्रं तु परदेशवर्तिनो ये स्थावरास्ते गृहीतपरिमाणस्थेषु त्रसस्थावरेवृत्पद्यन्ते अयं षष्ठः ॥ ६॥ सप्तममूत्रं त्विद- परदेशवत्तिनो ये प्रसाः स्थावरास्ते आराद्देश वर्तिषु त्रसेषूत्पद्यन्ते अयं सप्तमः ॥७॥ अष्टमसूत्रं तु परदेशतिनो ये त्रसाः स्थावरास्ते आराद्देशवर्तिषु स्थावरेपूत्पद्यन्ते अष्टमः ॥ ८॥ नवमसूत्रे परदेशवचिनो ये त्रसाः स्थावरास्ते परदेशवर्तिम्वेव सस्थावरेत्पद्यन्ते नवमोऽयम् ॥ ९॥ (एवमनया प्रक्रियया नवापि सूत्राणि भणनीयानि) Jain Education Page #334 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बयगडाग- II तत्र यत्र [यत्र] सास्तत्रादानशः आदेरारभ्य श्रमणोपासकेनामरणान्तो दण्डस्त्यक्त इत्येवं योजनीयं, यत्र तु स्थावरा द्वितीये स्तत्रार्थाय दण्डो न निक्षिप्तो-न परित्यक्तः, अनर्थाय च दण्डः परित्यक्त इति । शेषाक्षरघटना तु स्वबुद्ध्या विधेयेति । . श्रुत दीपिकाभगवं च णं उदाह ण एयभूयं ण एयं भवं ण एवं भविस्संति जण्णं तसा पाणा वोच्छि सप्तमान्वितम् । ध्ययनेजिहिंति थावरा पाणा भविस्संति, थावरा पाणा [वि.] वोच्छिजिहिंति तसा पाणा भविस्संति, गौतम॥१५२॥ अबोछिन्नेहिं तस-थावरेहिं पाणोहिं जणं तुब्भे वा अन्नो वा एवं वदह-णत्थि णं से केइ परियाए स्वाम्युदकं जाव नो णेआउए भवति । [ सू० १२] त्रसा: प्राणा: __ व्याख्या-भगवान् गौतमस्वाम्युदकं प्रत्येतदाह तद्यथा-भो उदक ! नतद्भूतमनादिके काले प्रागतिक्रान्ते नायगामिनि स्थावराश्व काले चैतद्भविष्यति नाप्येतद्वर्तमाने काले भवति यत्रपाः सर्वथा निलेपतया स्वजात्युच्छेदे नो छेत्स्यन्ति-विच्छेदं यास्यन्ति, प्राणा: सर्वे स्थावरा एव भविष्यन्ति, स्थावराश्च प्राणिनः कालत्रयेऽपि न भविष्यन्ति-विच्छेदं यास्यन्ति, सर्वेऽपि वसा भविष्यन्ति । कदाप यद्यपि तेषां परस्परसङ्कमेण गमनमस्ति तथापि न सर्वप्रकारेण निलेपतया त्रसाः सर्वे स्थावरा भवन्ति स्थावराश्च सर्वेऽपि DIविच्छेदं नयास्यनिर्लेपतया वसा जायन्ते, नैतद्भवति कदाचिदपि, यदुत-प्रत्याख्यानिनमेकं विहाय परेषां नारकाणां द्वीन्द्रियादीनां तिरश्चां मनुष्यदेवानां च सर्वथाऽप्यभावः, एवं च त्रसविषयं प्रत्याख्यानं निर्विषयं भवति यदि तस्य प्रत्यारव्यानिनो जीवत एवं सर्वे नारकादयस्त्रसाः समुच्छिद्यन्ते, नायं भावः सम्भवति, स्थावरास्त्वनन्ता न त्रसेषु सम्मान्ति त्रसास्त्वसंख्यातास्ते ॥ १५२ ।। व्यानिनो जीवत एव Aन्तीति दर्शयति । Jain Education For Privats & Personal Use Oh Jww.jainelibrary.org Page #335 -------------------------------------------------------------------------- ________________ VI वनन्ताः अनन्ताः कथमसङ्ख्यातेषु सम्मान्ति ? सुप्रतीतमिदं, तदेवमव्यवच्छिन्नैस्त्रसैः स्थावरैश्च प्राणिभिर्यद्वदत यूयमन्यो वा कश्चिद्वदति यन्नास्त्यसौ कश्चित्पर्यायो यच्छारकस्यैकत्रसविषयोऽपि दण्डः परित्यक्तो भवति, तदेतत्सर्वमप्ययुक्तमिव प्रतिभासते। साम्प्रतं उपसं जिघृक्षुराह भगवं च णं उदाहु आउसंतो उदगा! जे खलु समणं वा माहणं वा परिभासे इमित्तिं मन्नंति + आगमित्ता नाणं आगमित्ता दसणं आगमित्ता चरित्तं पावाणं कम्माणं अकरणयाए | से खल परलोय-पलिमंथत्ताए चिट्ठति, जे खलु समणं वा माहणं वा नो परिभासइ मित्त मन्नमाणे आगमेत्ता नाणं आगमेत्ता दंसणं आगमेत्ता चारित्तं पावाणं कम्माणं अकरणत्ताए VI से खलु परलोयविसुद्धीए चिट्ठति । व्याख्या-श्री गौतमस्वाम्युदकं प्रत्युवाच । आयुष्मन्नुदक! खलु श्रमण वा माहनं वा सब्रह्मचर्योपेतं ' परिभाषते' निन्दति मैत्री मन्यमानोऽपि तथा सम्यग्ज्ञानमागम्य तथा दर्शनं चारित्रं च पापानां कर्मणामकरणाय समुत्थितः [म] खलु लघुप्रकृतिः पण्डितंमन्यः परलोकस्य सुगतिलक्षणस्य सतत्कारणस्य वा सत्संयमस्य वा 'पलिमन्थाय' विधाताय तिष्ठति, यस्तु पुनमहासच्चो रत्नाकरवद्गम्भीरोन श्रमणादीन परिभाषते तेषु च परमां मैत्री मन्यते सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राण्यनुगम्यते + " मन्नमाणे" इत्यर्थ सङ्गत्या युक्तमाभाति । X" मन्नति" इति बहुष्वादशेषु। Jain Education For PrivatePersonal Use Only aina bayong Page #336 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुयगडाङ्गसूत्रं दीपिकान्वितम् । बा १५३ ॥ Jain Education Inte तथा पापानां कर्मणां अकरणाय समुत्थितः स खलु परलोकविशुद्धयै अवतिष्ठते, स परलोकसाधनाय तिष्ठतीति भावः । एतावता यो बहुश्रुतान् गीतार्थान् पूर्वाचार्य्यान्निन्दति स परलोकस्य संयमस्य विराधकः यस्तु तादृशान्महागीतार्थान् पूर्वाचार्यान्न निन्दति स परलोकस्य संयमस्य चाराधक इति तत्सम् । भो उदक! इति ज्ञात्वा त्वयाऽपि संयमसाधनाय यत्नो विधेयः । भगवं च णं उदाहु-तते णं से उदए पेढालपुत्ते भगवं गोतमं अणाढायमाणे जामेव दिसं पाउन्भूते तामेव दिसं संपहारेत्थ गमणाए । 1 व्याख्या —तदेवं यथावस्थितमर्थं गौतमस्वामिनाऽवगमितोऽप्युदकः पेढालपुत्रो यदा भगवन्तं - गौतममनाद्रियमाणो यस्या एव दिशः प्रादुर्भूतस्तामेव दिशं गमनाय सम्प्रवारितवान् । तं च गच्छन्तं दृष्ट्वा भगवान् गौतमस्वाम्याहआउस्तो उद्गा ! जे खलु तहा [ भूतस्स ] रूवस्त समणस्स वा माहणस्स वा अंतिए एगआरियं धम्मियं सुवयणं सोच्चा निसम्म अप्पणो चेत्र सुहुमाते पडिलेहाए अणुत्तरं जोगखेमपयं लभिए समाणे सोवि ताव तं आढाति परिजाणति वदति नम॑सति सक्कारेति सम्माणेति (जाव ) कलाणं मङ्गलं देवयं चेइयं पज्जुवासति । व्याख्या - आयुष्मन्नुदक । यः खलु तथाभूतस्य भ्रमणस्य ब्राह्मणस्य वाऽन्ति के समीपे एकमपि योगमाय आर्य द्वितीये श्रुत● सप्तमा ध्ययने गौतम स्वाम्बु दकमुप दिशति । ॥ १५३ ॥ jainelibrary.org Page #337 -------------------------------------------------------------------------- ________________ yer - धार्मिक तथा शोभनवचनं श्रुत्वा निशम्याऽऽत्मन एव तदनुतरं योगक्षेमपदमित्येवमत्रगम्य 'सूक्ष्मया'-कुशाग्रीय या वुया 'प्रत्युपेक्ष्य'-पर्यालोच्य तद्यथा-अहमनेनैवम्भूतमर्थपदं 'लम्मितः' प्रापितः सनसावपि तावल्लौकिकस्तमुपदेशदातारमाद्रियते पूज्योऽयमित्येवं जानाति तथा कल्याण मङ्गलं देवतामिव स्तौति पर्युपास्ते च यद्यप्यसौ पूजनीयः किमपि नेच्छति तथापि तेन [तस्य] परमार्थोपकारिणो यथाशक्ति विधेयमिति । तदेवं गौतमस्वामिनाऽभिहित उदक इदमाह तए णं से उदए पेढालपुत्ते भयवं गोयमं एवं वयासी-एतेसि णं भंते ! पदाणं पुट्विं अन्नाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अदिदाणं अस्सुयाणं अमुणयाणं अविनायाणं अनिगूढाणं अबोगडाणं अवोच्छिन्नाणं अणिसिट्ठाणं अणिवूढाणं अणुवहारियाणं एयमटुं नो सद्दहियं । नो पत्तियं नो रोइयं एतेसिणं भंते ! पदाणं इहिं जाणयाए सवणयाए बोहिए जाव उवहारणयाए IN एयमटुं सद्दहामि पत्तियामि रोएमि एवमेव जहेयं तुब्भे वदह । तएणं भगवं गोतमे उदयं पेढालपुत्तं एवं वयासि-सदहाहि णं अज्जे ! पत्तियाहि णं अजे! रोएहि णं अजे! एवमेयं जहा णं अम्हे वदामो । तए णं से उदए पेढालपुत्ते भयत्र गोयमं एवं वयासी-इच्छामि णं भंते ! तुम्भ अंतिए चाऊज्जामाओ धम्माओ पंचमहत्वाइयं सपडिक्कमणं घम्म उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए। तए णं 4 Page #338 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बयगडाङ्ग सूत्रं । दीपिका न्वितम् । ॥१५४॥ से भगवं गोयमे उदयं पेढालपुत्तं गहाय जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ उवा- द्वितीये गच्छित्ता तते णं से उदए पेढालपुत्ते समणं भगवं महावीरं तिखुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ । श्रुत करेइत्ता वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं भंते ! तु[भं]भा[तुम्हा]णं - सप्तमाअंतिए चाउजामाओ धम्माओ पंचमहत्वइयं सपडिक्कमणं धम्म उवसंपजित्ता णं विहरित्तए । ध्ययने उपसंहारः। [तएणं समणे भगवं महावीरे उदयं (पेढालपुत्तं) एवं वयासी-1 अहासुहं देवाणुप्पिया मा पार्डबंधं करेहि। तते णं से उदए पेढालपुत्ते समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए चाउज्जामाओ धम्माओ पंचमहत्वइयं सपडिकमणं धम्म उपसंपज्जित्ता णं विहरति त्ति बेमि। नालिन्दिज्जऽज्झयणं समत्तम्। व्याख्या-इह व्याख्यानं सर्व सुगम, विशेषतस्तु बृहद्वृत्तितोऽवसेगमिति । समाप्ता चेयं द्वितीयाङ्गस्य दीपिका । जयति जिनशासनमिदं, परतीर्थिकतिमिरजालवरतरणिम् । भवजलधियानपात्रं, पात्रं सज्झानरत्नानाम् ॥१॥ यस्य जिनेन्दोः शासन-पानीयपथाश्वरत्नमारुह्य । कुशलेन के न चापु-र्भवजलमुल्लंघ्य शिवनगरम् ॥२॥ स जयति वीरजिनेन्द्र-त्रिभुवनचूडामणिः कृतोद्योतः । कुमुदोल्लासं कुर्वन् मदनखसूर्यांशुभिर्विततः ॥३॥ ७।।१५४॥ Jain Education intar jainerary org Page #339 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - - बापायालयायायालय वर्द्धमानजिनो जीया-जगदानन्ददायकः । द्वादशाङ्गीविधातारो, जयन्तु च गणाधिपाः ॥४ ॥ जयन्तु गुरवः पूज्या ये सदा मयि वत्सलाः । परोपकारप्रवणा:, जयन्तु स्वजना अपि ॥५॥ श्री जिनदेवसूरीणा-मादेशेन चिरायुषाम् । उपजीव्य बृहद्वृत्ति, कृत्वा नामान्तरं पुनः श्री साधुरङ्गोपाध्याय-द्वितीयाङ्गस्य दीपिका । संक्षेपरुचिजीवानां, हिताय सुखबोधिनी ॥ ७॥ लिलिखे वरलूग्रामे, निधिनन्दशरैकके (१५९९) वत्सरे कार्तिके मासि चतुर्मासिकपर्वणि [त्रिभिः सम्बन्धः] ॥ ८॥ ज्ञानदर्शनचारित्र-रत्नत्रितयदीपिका । मिथ्यात्वध्धान्तविधंसदीपिकेयं समर्थिता । ॥९ ॥ मनोमत्सरमुत्सृज्या-ऽऽदृत्यसौजन्यमुत्तमम् । व्यापार्या वाचनीया च, विधायानुग्रहं मयि ॥१०॥ लिखता लिखितं किञ्चिद्यदि-न्यूनाधिकं भवेत् । विधाय सम्यक् तत्सर्व, वाचनीयं विवेकिभिः स्तोकाः कर्पूरतरवः, स्तोकाश्च मणिभूमयः । परोपकारप्रवणाः, स्तोकाः प्रायेण सजनाः ॥१२॥ न मे कोऽप्यभिमानोऽस्ति, न मे पण्डितमानिता । न कला न च चातुर्य, मन्दमेधाऽस्मि सर्वथा दीपिकायाः स्वभावेन, प्रशस्तिनिर्मिता मया । खूणं तदत्र नो चिन्त्यं, नावमान्यो ह्ययं जनः ॥१४॥ न चात्मीया मतिः कापि, प्रयुक्ताऽस्त्यत्र केवलम् । संक्षेप्य वृत्तेरेवाऽयं सूत्रार्थो लिखितोऽस्त्यहो अन्यथाऽहं जडप्रायो, वृत्ति कत्तुं कुतः क्षमः । किनाम पङ्गुरारोढुं, शक्तः स्यान्मेरुमूर्द्धनि व्याख्यानं वृत्तिमध्यस्थं, निर्युक्तेरपसार्य च । मूलसूत्रेण संयुक्ता, पुस्तके च निवेशिता Jain Education inter For Private&Personal Use Only IN Ejainelibrary.org IRA Page #340 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडा-IA सूत्र दीपिकान्वितम् । मया सदाचारपरायणेन, जिनाज्ञया संयमपालनेन । यदर्जि पुण्यं सुकृतानुबन्धि, तेनास्तु लो को जिनधर्मरक्तः धर्मोपदेशदानेन, दीपिकालेखनेन च । सुखी भवतु लोकोऽयं, तेन पुण्येन भूयसा यदर्जितं मया पुण्यं, विमलाचलयात्रया । उज्जयन्ते च श्रीने मेः, पदपङ्कजसेवया ॥ २० ॥ तेन पुण्येन मे भूया-द्वोधिलाभो भवे भवे । यतः सम्यक्त्वसम्प्राप्ति-विना पुण्यन लम्यते ॥ २१ ॥ श्रीमत्खरतरगच्छे, श्रीमजिनदेवमूरिसाम्राज्ये । श्रीभुवनसोमसद्गुरु-शिष्यैः श्रीमाधुरङ्गाख्यैः ॥२२॥ लन्धोपाध्यायपदैः, कुशलेनारोपिता प्रमाणपदम् । आचन्द्राऽक नन्दतु, गीतार्थैर्वाच्यमानेयम् ॥२३॥ (युग्मम्) | विनीत विनयेनेयं, धर्मसुन्दरसाधुना । लिखिता प्रथमादर्श, वाचनाय स्त्रपुस्तके ॥२४॥ इति प्रशस्तिः। श्रेयोऽस्तु सपरिवारस्य । यादृशं पुस्तकं दृष्टं, तादृशं लिखितं मया। यदि शुद्मशुदं वा, मम दोषो न दीयते ॥१॥ द्वितीये श्रुत सप्तमाऽध्ययने दीपिका. कारकता प्रशस्तिः । -or Jan Education Far Private & Personal use Oh ne og I Page #341 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इतिश्री परमसुविहित-खरतरगच्छविभूषण-पाठकप्रवर-श्रीमत्माधुरङ्गगणिवर-गुम्झितायां श्री सूत्रकृताङ्गदीपिकायां समाप्तमिदं नालिन्दीयाख्यं सप्तममध्ययनं तत्समाप्तौ च समाप्तमिदं सूत्रकृताख्यं द्वितीयमङ्गसूत्रं दीपिकान्वितम् ।। ॥श्रीकल्याणं भूयात् ॥ Jan Education For we & Personal Use On १ w .ininelibrary.org Page #342 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Far Private & Personal use Oh WWjBinebryong