Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Author(s): Amolakrushi Maharaj
Publisher: Raja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
View full book text
________________
अह भंते ! मासपण्णी मुग्गपण्णी जीव जीवग सरिसव कपयणुकाउलिखीर कोवालि भगिणहि किमिरासि भद्दमुच्छाणं गलइ पेयुय किण्णा पउयल वाडेहरेणुय लोहीणं, एएसिणं जे जीवा एवं एत्थवि उद्देसगा णिरवसेसं आलुबग्ग सरिसा ॥ पंचमो वग्गो सम्मत्ती ॥ २३ ॥ ५॥ एवं एएसु पंचसु बग्गेसु पण्णासं उद्देसगा भाणियव्वा सव्वत्थ देवा ण उववनंति, तिणि लेस्साओ सेवं भंते ! भंतेत्ति ॥ तेवींसइम सयं संम्मत्तं ॥ २३ ॥
भावार्थ
११ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
जैसे यहां पर कहना. शेष सब वैसे ही जानना. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह तेवीसचा
शतक का चौथा वर्ग समाप्त हुवा ॥ २३ ॥ ४ ॥ र, अहो भगवन् ! उडीद की फली, मुंग की फली, जीवजीवग, मरिसघ, कपयणु, काउली, क्षीर को
दाली, भंगणी, कृमिसशि, भद्रमूर्छा, गलिक, पियुष, कृष्णा, पउय, लबाड, हरेणुक, लोही, इन सब में जो जीव मूलपने उत्पन्न होवे बगैरह दश उद्देशे आलु जैसे कहना. यह तेवीसबा शतक का पांचवा वर्ग समाप्त ॥ २३ ॥ ५ ॥ है एक २ वर्ग में दश २ उद्देशे हैं यों पांच वर्ग के मीलाकर ५० उद्देशे हुये. इन में किसी भी स्थान देवता नही उत्पन्न होते हैं इस से तीन लेश्या के छत्तीस मांगे पाते हैं. अहो भगवन् ! आप के बचन सत्य हैं। यह बीसदा शतक संपूर्ण दुवा ॥ २३ ॥
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादमी