Book Title: Dharm Pariksha
Author(s): Yashovijay Gani
Publisher: Jain Granth Prakashak Sabha
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ POSIANCCasna हितो SadSEDAAR TV श्रीजैनग्रन्थप्रकाशकसभाग्रन्थांकः ४७IVITA 9844929202 सर्वतंत्रस्वतंत्र-शासनसम्राट्-सूरिचक्रचक्रवर्ति-जगद्गुरु-तपागच्छाधिपति-प्रौढप्रभावशालि अनेकतीर्थोद्धारक-भट्टारक आचार्य . . महाराजाधिराज श्रीविजयनेमिसूरीश्वर सद्गुरुभ्यो नमो नमः ।। . न्यायविशारद-न्यायाचार्य-निजप्रतिभाप्राग्भारोबोधितातीतपूर्वश्रुतकेवलिभगवत्-कूर्चालसरस्वती-पूर्वधरनिकटकालवर्ति.... चतुश्चत्वारिंशदुत्तरचतुर्दशशतग्रन्थप्रासादसूत्रधारभगवत्-श्रीहरिभद्रसूरिलघुबान्धवप्रभृतिविशदविरुदावलीविभू पितमहोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिप्रणीता स्वोपज्ञविवरणसमलङ्कता । EXCESSOASTEARAW ॥ श्री धर्मपरीक्षा ॥ विवरणं चास्याः साक्षितयोद्धृतेन ग्रन्थानां सार्धशताधिकेन संवादपाठानां च पश्चशताधिकेन विभूषितम् ॥ । सा चेयं राजनगर (अहम्मदावाद)स्थ श्रीजैनग्रन्थप्रकाशकसभा कार्यवाहक श्रेष्ठि ईश्वरदास मूलचन्द्रेण लघुशत्रुञ्जयेतिख्याति* प्रसाधयितृश्रीजनप्रासादसमलङ्कृतजामनगर(नवानगर) स्थ श्रीजैन भास्करोदय मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशिता. ॥ बीर संवत् २४६८ ॥ ॥ पुंडरीकगणधरसिद्धिपदप्राप्तिवासरः चैत्रशुक्ला पुर्णिमा ॥ ॥ विक्रम संवत् १९९८ ॥ प्राप्तिस्यान-प्रकाशकात् अथवा श्रीजैनधर्मप्रसारकसभा-भावनगर. 7 Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ m ० ० ० ॥श्री जैनग्रन्थप्रकाशकसभा प्रकाशित ग्रन्थाः॥ १ हारिभद्राष्टकवृत्ति ३३१ संवादपाठयुक्त- । जैनन्याय मुक्तावली समु० भेगा ....१-४|१९ पारमर्षस्वाध्यायग्रन्थसंग्रह (पत्राकार) ०-८ वृत्ति ड्राइंगपेपर ....२-८ १० नवतत्व विस्तरार्थ.... .... ....३-०२० सम्मतितर्कप्रकरण सटीक प्र० भा० ५-० , ग्लेझपेपर ....२-० ११ दंडक विस्तरार्थ..... .... -०२१ योगदृष्ट्यादिनवग्रन्थपद्यानुक्रम .....-६ २ संबोध प्रकरण..... ..... -० १२ हैमधातुमाला.... -०२२-२३-२४-२५ भाषारहस्य प्रकरण सटीक ३ हरिभदसूरिग्रन्थसंग्रह.... .... -०१३ जैनतत्त्वपरीक्षा.... .... योगविंशिका व्याख्या-तत्त्वविवेकविवरणसमे४ हारिभद्राष्टक प्रकरण (मूल).... .....-४ १४ स्तोत्र भानु.... .... .....- २ त कूपदृष्टान्तविशदीकरणप्रकरण-निशाभक्ते५ स्याद्वादरहस्य पत्र सटीक.... ..... १२, १५-१६ योगदृष्टि स. योगबिन्दु सटीक २-८ स्वरुपतो दूषितत्वविचारप्रकरण ....२-० ६ न्यायालोक सटीक.... ... .... ५-०१७ १२५-१५०-३५० स्तबनो, योग- २६ ज्ञानार्णवप्रकरण मूलं ० -४ ७ अष्टसहस्री तात्पर्यविवरण.... .... ०-० दृष्टिसज्झाय द्रव्यगुणपर्यायराससंयमश्रे- २७ थी ३७ श्रीयशोविजयवाचकग्रन्थसंग्रह ८ समुद्राततत्त्व.... .... .....-६ णिविचार-सज्ज्ञायादि संग्रह ....०-८/ पातंजलयोगदर्शनविवरणादि ११ ग्रन्थो २-० ९ जैनन्याय मुक्तावली सटीक.... ....१-०१८ पारमर्षस्वाध्याय ग्रन्थसंग्रह (बुक)....०-६/३८ सविवरण धर्मपरीक्षा. ॥मुद्रयमाणा मुद्रयिष्यमाणाश्च शासनप्रभावका ग्रन्थाः॥ १ज्ञानाणेव सटीक २ अनेकान्ततव व्यवस्था ३ उत्पादव्ययधौव्यसिद्धि ४ सम्मतितके प्रकरण सटीक द्वि० भाग ५ प्रतिमाशतक बृहट्टीका विगेरे, प्राप्तिस्थान-शेठ ईश्वरदास मूलचंद, कीका भटपोल-अमदावाद. Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा प्रकाशकीयं ॥ १ ॥ || प्रकाशकीयं निवेदनम् ॥ अर्द्ध नमः । ॐ स्मोपास्यचरण भगवान् महोपाध्यायजी श्रीमान् यशोविजयनीगणि महाराजना ग्रन्थोने अंगे कांड़पण निवेदन कर ते उच्चकोटिजात्य सुवर्णने गिलेट लगाववा जेवुं या सूर्यप्रकाशने आंगलीथी बताववा जेवुं छे. भगवान् उपाध्यायजीना जीवनतान्त माटे जे जे उल्लेखो करवा ते पण प्रायः चर्चित चर्वण या पिष्टपेषण तुल्य छे. तेओश्रीना निकटकालमां बनेल सुजसवेली भास के जे अमोए उपाध्यायजी भगवंते रचेला तत्वपूर्ण मोटा स्तवनादि तथा द्रव्यगुणपर्याय रास विगेरेनो संग्रह बहार पाड्यो छे तेना निवेदनान्तर्गत प्रकाशित कर्यो के तेथी तेओश्रीना जीवनोदन्तनो झांखो अने स्वल्प पण सत्यस्वरूप प्रकाश पडे छे. भगवंत उपाध्यायजीना वचनो एटले " प्रमाण-नय- सप्तभंगी-सकलादेश-विकलादेश-निक्षेप विगेरेना निष्कर्षरूप स्वरूप प्रदर्शन साथै पदार्थोना ऐदम्पर्य विचारप्रदर्शक दीवाओ, श्रीजिनेश्वरदेव प्रत्येनो अविहड भक्तिरस प्रकटावनार पीयूषना झराओ, बोधिबीजना अंकूरो खीलवनार पुष्करावर्त मेघ, सुवर्णमुद्रामुद्रित टंकशाली अबाधित सिद्धान्तवाक्यो, सम्यग्दर्शन निर्मलता अने दृढता कराववा साथै प्रभाव प्रशासन उपरना असीम प्रेमभाव अने बहुमानने उत्तेजित करनार परमसाधनो, पदे पदे न्यायकोटिनी उच्च कक्षानुं निष्कर्ष, प्रावचनिक-तार्किक - कार्मग्रन्थिक-सैद्धान्तिक आदि प्रभावक महापुरुषोना विचारोनो नयभेदे समन्वय करावनार परमपाज, सिद्धान्त अने शास्त्रोना साक्षिरूप संवाद पाठोनुं मोढुं निधान, योगसाधनाना परमस्वरूप यावत् धर्ममेघ समाधि परमममरस भाव अने प्रभु सा समापत्तिरूप एकाग्रता प्राप्त करवानी सरणि, श्रुतकेवलि भगवंतोना अगाध -अमाप - गंभीर श्रुत समुद्रनुं अवगाहन करवाने महानाव आत्माने प्रभुधर्मथी रसवेधित साम्रना सुवर्ण भावनी जेम अगर चोळमजीठ रंगथी रंजित वखनी जेम तद्रूप बनावनार निर्मल रस निवेदनम् ॥ १ ॥ Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा प्रकाशकीयं ॥ २ ॥ कूपिकाना रसनो झरो, मिध्यात्वरूप दुर्गमपर्वतो मेदवा माटे वज्र, पदार्थ तस्वविषयक सन्देह - विपरीतज्ञान-अज्ञानादि महान्धकारने तोडवामां सूर्य, मित्रादि यावत्परा पर्यन्तनी योगदृष्टिओ-अध्यात्मादि योग मेदो - प्रणिधानादि शुभाशयो- खेदोद्वेगादि दोषो - प्रीत्यादि अनुष्ठान मेदो अन्य रीतिए अमृतानुष्ठान पर्यन्तना भेदो - इच्छा-शास्त्र-सामर्थ्य योगादि-योगावंचकादि- इच्छायमा दि अनेकविध गहन तच्चोना उपनिषद् भाव बतावनार प्रकाशवंत दीपिकाओ, पूर्व श्रुतकेवलि भगवंतोनुं स्मरण करावनार अथाग प्रतिभावैभव" इत्यादि | तेमना वचननुं सत्य गौरव माहात्म्य प्रकाशकं ते सूर्यना झळहळता तेजने प्रकाशमां लाववा प्रयत्न करता खद्योतनो उद्यम के, समुद्रना | विशाल प्रमाणने बताववा प्रयास करता बालकनी बाहुप्रसारणा छे. उंचा नालीयेरी वृक्षनी टोचे रहेला श्रीफलने ग्रहण करवा इच्छा राखता जमीन उपर ऊमेला वामनने उंचा बाहु करवा तुल्य के. उपाध्यायजी भगवंतोना अनेक ग्रन्थो पैकी एकसो चार गाथात्मक धर्मपरीक्षा नामना आ लघु प्रकरण ग्रन्थनी गंभीरार्थता अने तेने लइने जिज्ञासु विशिष्ट व्युत्पत्तिशालि मुमुक्षु भव्यात्माओने पण तेना ऐदम्पर्यार्थनी दुर्गमता विगेरे अनेक साक्षात् परम्परा हेतुओने विचारी धर्म-तेनी परीक्षा अने तेनो अधिकारि कोण होड़ शके विगेरे इन्द्रियागम्य - अगोचर पदार्थों तेमज तेना विचारनी अन्तर्गत साक्षात् - पारम्परिक के आनुषङ्गिक आवता अनेक तवोमां भिन्नभिन्न विचारसरणि उपर चढता तर्कवादोथी उद्भवेला तथा उद्भवता केटलाक साम्प्रदायिक मतभेदोनुं निर्णयात्मक निवारण "अतीन्द्रियाणामर्थानां सद्भावप्रतिपत्तये || आगमश्चोपपत्तिश्च, संपूर्ण दृष्टिलक्षणम् ||१||" "आगमेनानुमानेन ध्यानाभ्यासरसेन च ॥ त्रिधा प्रकल्पयन्प्रज्ञां लभते तत्रमुत्तमम् ॥ १ ॥ " इत्यादि अनेक महर्षिओना वचनोथी निर्णीतज के के आगम अने सतर्क (युक्ति) करी शके छे, हृदयमां अबाधित कोतराएल अने आत्मानी साथे तद्रूप बनेल आ निर्मल पवित्र विचारणाथी संवादपणे ग्रहण निवेदनम् ॥ २ ॥ Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा प्रकाशकीयं ॥ ३ ॥ 66 करेला सेंकडो आगम तेमज आगम समकक्ष शास्त्रपाठोना समूहथी तेमज न्याययुक्त सत्तर्कोनी श्रेणिथी भरेलुं लगभग साडाछहजार श्लोकप्रमाण विवरण पोतेज बनावी आ धर्मपरीक्षाप्रकरणने समलंकृत कर्तुं छे. आ ग्रन्थनी सामान्य बालजीवोमां पण उपयोगिता | जाणी आपामर बालजीवोना हितनी खातर पूज्य ग्रन्थकार महोपाध्यायजी भगवंते पोतेज सविवरण आ धर्मपरीक्षा शास्त्ररूप | अमृत समुद्रमाथी सारस्वरूप उद्धार करी भाषावार्तिकरूपे समुद्रमांथी उद्भवेला बिन्दुनी जेम एक विचारबिन्दु ग्रन्थ लख्यो हे. आवात तेज विचारबिन्दु ग्रन्थना नीचे आपेला मंगल तथा प्रशस्ति श्लोकोथी सारी रीते व्यक्त थाय छे. "ऐन्द्रश्रेणिनतं नत्वा, जिनं तत्त्वार्थदेशिनम् ॥ कुर्वे धर्मपरीक्षार्थे, लेशोद्देशेन वार्तिकम् ॥ १ ॥” “एष बिन्दुरिह धर्मपरीक्षा- वाङ्मयामृतसमुद्रसमुत्थः । नन्दताद्विषविकार विनाशी, व्योम यावदधितिष्ठति मानुः || २ ||” अर्थ - "इन्द्रोनी श्रेणीवडे नमस्कार करायला अने तत्रभूत पदार्थ स्वरू|पने देखाडनार श्रीजिनेश्वर भगवंतने नमस्कार करी धर्मपरीक्षाना अर्थमां लेशथी सामान्य स्वरूप कहेवाए करी वार्तिक हुं करुं छं. १ धर्मपरीक्षाशास्त्ररूप अमृतसमुद्रमांथी उत्पन्न थयेल आ विचारबिन्दु ग्रन्थ पदार्थतस्त्रविषयक विपरीत ज्ञानरूप झेरविकारने विनाश करतो तो ज्यांसुधी सूर्य आकाशनुं अधिष्ठान करे छे तेटला कालमुधी आ पवित्र श्रीवीतरागशासनमां समृद्धि पामतो वर्तो" आ धर्मपरीक्षा विवरणमां आवता साक्षीभूत ग्रन्थोना प्राकृतपाठोनो तथा मूल धर्मपरीक्षा ग्रन्थनो संस्कृतानुवाद पण वांच| कोनी सुगमता माटे साधे ने साथै आपवा प्रयास कर्यो छे. साक्षीभूत ग्रन्थोनी नामावलि अलग सूचिरूपे पण आपी छे. तेमज आवेला पाठोनी सूचि पण साक्षिग्रन्थनाम तथा पृष्ठ पंक्ति क्रमांक साथे आपी छे. मूल गाथाओनी पण वर्णक्रमानुसार गाथांक पृष्ठांक समेत अनुक्रमणिका आपवामां आवीं छे. आ धर्मपरीक्षा ग्रन्थमां आवेला विषयनुं सर्वस्व बतावता ग्रन्थकार भगवंतना शब्दो कहे छे के निवेदनम् ॥३॥ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा प्रकाशकीयं निवेदनम् ॥४॥ ॥४ ॥ ROSHAHR "खपरमां रहेल मैत्री-प्रमोदादि शुभाशयना अखंड प्रवाहवाला अन्तःकरणस्वरूप" अध्यात्मभावमां बाधकता न आवे तेवीरीते निर्णय माटे इच्छेला पदार्थोनो निर्णय करवो तेज धर्मवाद उत्तम पुरुषो माटे कर्तव्य अने सिद्धिनुं साधन स्वीकार्यों छे, आ धर्मपरीक्षा ग्रन्थ पण ते धर्मवादना मार्गनी दिशाए गुंथ्यो छे अने बीजाओने पण ते ज मार्गे चालवा उपदेश आपे छे. प्रान्ते श्रीजिनेश्वरदेवनी आज्ञा बतावे छेके 'सर्व दुःखोना बीजभूत संसारबन्धनना मूल रागद्वेषो जेम जेम विलय पामे तेम तेम प्रयत्न करवो एज श्रीजिनेश्वर भगवंतनी आणा छे. भव्यात्माओने तत्त्वबोध माटे रचेलो आ धर्मपरीक्षा ग्रन्थ शोधवा माटे प्रसादतत्पर गीतार्थ भगवंतोनी प्रार्थना करी ग्रन्थ समाप्ति करी छे. आ धर्मपरीक्षा ग्रन्थ विवरणसमेत श्रीहेमचन्द्राचार्य ग्रन्थावली पाटण तरफथी घणा वर्षो अगाउ बुकाकार बहार पडेल छतां हाल ते पुस्तक अलभ्य जेवूछे तेमजाते आवृत्तिमा रही गएल पाठोनी त्रुटि, गाथा तथा प्राकृतपाठोना संस्कृतानुवादनी त्रुटि तेमज प्रताकार होय तो वांचनारवर्गने अनुकूलता रहे विगेरे कारणो ध्यानमा लइ आ प्रयत्न कयों छ. बनता उपयोगे ग्रन्थशुद्धि माटे काळजी रखाइ ले शुद्धिपत्रक दाखल कर्या छतां प्रेसदोष-छयस्थता विगेरे कारणे प-घ, व-ब, म-भ. विगेरे प्रायः समाकृति वर्णोना फेरफार विगेरे अशुद्धि रही मइ होय तो ते सुधारी वाचवा. तथा शुद्धिपत्रक जोइ लेवा विनन्ति साथे रही गएल अशुद्धि माटे श्री श्रमणसंघ प्रत्ये धमाभ्यर्थना छे. शुभं भूयात् श्रीश्रमणसंघस्य, CALCUCUMAUGUSUM Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा साक्षीकृता ग्रन्थाः । 24265453 धर्मरस्नप्रकरण धर्मरत्नप्रकरणवृत्ति भयोगम्यवच्छेदद्वात्रिंशिका महानिशीथसूत्र ज्ञाताधर्मकांगसूत्र ज्ञातासंत्रवृत्ति आवश्यकनियुक्ति भावश्यकभाष्य आवश्यकचूर्णि आवश्यकवृत्ति व्यवहारभाष्य व्यवहारवृत्ति गच्छाचारपयनो त्रिषष्टि नेमिचरित्र उत्सूत्रकंदाहाल चढसरणपयनो , टीका स्थाद्वादरत्नाकर हारिभद्राष्टक भाचारांगसूत्र आचारांगनियुक्ति आचारांगवृत्ति आचारांगचूर्णि पंचसूत्र पंचसूत्रवृत्ति उत्तराध्ययनसूत्र उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययनवृत्ति दशवकालिक सूत्र दशवकालिकनियुकि दशवकालिकचर्णि दशवकालिकवृत्ति तत्वार्थसूत्र ॐ धर्मपरीक्षावृत्तौ साक्षीकृता ग्रन्थाः * तत्वार्थभाष्य योगबिन्दुवृत्ति तत्वार्थवृत्ति অদ্বিান্ত लोकतस्वनिर्णय योगशास्त्रवृत्ति सम्मतितर्क प्रवचनसारोद्धार सम्मतिनवृत्ति प्रवचनसा• वृत्ति भगवतीसूत्र उपदेशपद भगवतीवृत्ति उपदेशपदवृत्ति सम्यक्त्वसित्तरी विशेषणवती गुणस्थानकमारोह लघूपमितभवप्रपंच गुणस्थानक्रमारोहवृत्ति वृद्धोपमितभवप्रपंच कायस्थितिप्रकरण समयसारप्रकरण पसवणासत्र समयसारवृत्ति पनवणावृत्ति . भवभावनावृत्ति संग्रहणिवृत्ति श्राद्ध दिनकृत्यवृत्ति भुवनभानुकेवलिचरित्र पुष्पमाला प्रकरण | योगबिन्दु पुष्पमाला वृहद्वृत्ति पुष्पमाला रघुवृत्ति संस्कृतनवतस्व प्र. ललितविस्तारा कलितविस्तरापंजिका योगदृष्टिसमुख्य योगदृष्टिसमु० वृत्ति पंचाशक पंचाशकवृत्ति तृतीय विशिका चतुर्थविशिका पंचमविशिका अष्टमविशिका विशेषावश्यकभाध्य विशेषावश्यकवृत्ति आउस्पचक्खाण भाउरपयवाणवृत्ति GAUR Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा महाभारत षोडशक सिद्धसेनीयाद्वात्रिंशिका धर्कविदु धर्मविन्दुवृत्ति षड्दर्शनसमुच्चयवृत्ति वृहत्करूप नियुक्ति वृहत्करूपभाध्य वृहत्कल्पवृत्ति धनपाल पंचाशिका गांगसूत्र सूयगडांग नियुक्ति सुगडांगचूर्णि सूपगढांगवृत्ति उपदेशमाला उपदेश मालावृत्ति उपदेशमालाकर्णिका उपदेशमाला दोघट्टी उपदेशमालासिद्धर्षीया उपदेशमालाद्देयोपादेया उपदेश मालाघुवृत्ति पाक्षिकसूत्र पाक्षिक सूचूर्णि पाक्षिकसूत्रवृत्ति अनुयोगद्वारसूत्र अनुयोगद्वार मूळ टीका अनुयोगद्वारवृहद्वृत्ति पंक्ति निवृत्ति निशीथ चूर्णि दशाश्रुतस्कन्धचूर्ण कालिकाचार्य कथा यति जीतकरूपवृत्ति पंचनिन्थी प्रकरण हितोपदेशमाला हितोपदेश मालावृत्ति प्रवचनपरीक्षा प्रवचनपरीक्षावृत्ति प्रसव्याकरण शकस्तव शक्रस्तववृत्ति न्यायावतार · खंडवाद्य श्रावकप्रतिक्रमणवृत्ति वन्दारुवृत्ति पाक्षिक सित्तरी पाक्षिक सित्तरीवृत्ति प्रशमरति प्रमाणनयतश्वालोकालंकार श्राद्धजीत कल्पसूत्र श्राद्धजीतकावृत्ति समवायांग ओ नियुक्ति ओ नियुक्तिवृत्ति ठाणांगलूत्र नंदीसूत्र नंदी सूत्रवृत्ति आराधनापताका श्रावकप्रज्ञप्तिसूत्र श्रावकप्रज्ञप्तिवृत्ति पंचवस्तु पंचयस्तुवृत्ति श्राद्ध विधि श्राद्धविधिवृत्ति उपदेशरत्नाकर श्राद्धप्रतिक्रमण श्राद्धप्रतिक्रमणचूर्णि श्राद्धप्रतिक्रमणवृत्ति त्रिषष्टीयदशममर्व प्राकृतवीरचरित्र साक्षीकृता ग्रन्थाः । Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा COMCOM मूलगाथाकाराधनुः क्रमः॥ ११५ + ॥ धर्मपरीक्षामूलगाथाकाराद्यनुक्रमः गाथाङ्कपृष्ठाङ्कसमन्वितः ॥ गाथांक: पृष्ठांकः | गाथांकः पृष्ठांकः | गाांकः पृष्ठांकः | गाांकः पृष्ठांकः १६ अकरणणियमावेक्खं १७२ ५० एएणं दग्ववहे १७८ १०३ किं बहुणा इह जह जह २९१ | २ जणु जिणजोगाउ तहा २५३ | १०१ अउझप्पाबाहेणं ७. एएण मच्छियाइ २५८ | १५ खीणे मोहे णियमा १७० ९णस्थि ण णिच्चो ण कुणइ ३३ १० अणभिग्गहियाइणवि ७४ एगस्थ जळमचिर्त २५४ १४ गलियासम्गहदोसा १२ .१ ण हु सका काउं जे २५३ ३३ भणुमोयणाइ विसओ ९४ एयारिसो खलु गुरू ९५ गुरुआणाइ ठियस्स २८. ६ णिय उस्सुत्तणिमित्ता १६ ५२.अणुसंगयहिंसाए १९२ ८८ एयाहिं परिक्वाहिं २८४ २१ जइणीये किरियाए ४९ णियणियकारणपभवो १७५ २४ अण्णस्यवि जमभिणं ९ १०० एवं परमं नाणं २८९ ३९ जइ हीणं तेसि गुणं १३८ ५७ णो दब्वा णो भावा २२४ ९९ अण्णे पुग्गल भावा १८ एयमि नाणदंसण દર ५४ जलजीवाणाभोगा २९ तइये भंगे साहू १११ ५१ अववाओवगमे पुण १८० ४६ एवं सम्वजियाण ૨૫૭ ९. जलहिम्मि असंखोमे २८८ ६६ तस्थ णिमित्ते सरिसे २४० ८५ आणा पुण जगगुरुणो २८२ ९३ एवं सुवण्णसरिसो २८६ ६९ जियरक्खा सुहजोगा २४९ ८ तम्मूलं मिच्छत्तं २० ६० आपायगाऽपसिद्धी २३० १०४ एसा धम्मपरिक्खा २९१ ४३ जेणं भणंति केह- १६४ ५६ तम्हा दब्वपरिगगह २२४ ६२ भारंभाइजुयत्त • कम्मं बंधइ पार्व ८. जोगगया सा लद्धी २६१ २८ तह णिण्डबाण देसा ११० १३ इत्तो अ गुणट्ठाणं ६० ८६ कसछेयतावजोगा २८२ ६८ जो पुण इह कत्तार २४७ ७९ तं खलु उवजीवंतो २६० १२ इत्तो अणभिग्गहियं ५६ ९८ का अरती भाणंदे २८८ ८३ जोवि य जायह मोहो २६५ २० तं मिच्छा जे फलओ ८५ ९. इय मोइविसं घायइ २८५ ६. कारगसंबंघेणं ૨૪૫ .८ जंपि मयं णारंभो २६. ९६ तंमि य आयसरुवं २८७ सइय लोइय लोउत्तर १२१।१ किरियाओ अंतकिरिया २३१ । ५५ णु भाभोगाइथं २०७] ४० ता उस्सुत्तं मुर्नु १३९ २८९ MICALCURES Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मूलगाथाकाराधनुक्रमः॥ गाथांकः पृष्ठांक- गाथांकः पृष्ठांकः । गाथांकः . पृष्ठांकः | गाथांकः पृष्ठांक: धर्मपरीक्षामा ३२ तिणि अणुमोमणिजा ११५ | २७ पढमकरणभेएणं १०८ ३७ मग्गाणुसारिकिञ्च १२३ . विहिपडिसेहाउ कसो २८५ ५ तिस्थुळे ओब्ध मभो १९ पढमो बालतवस्सी २३ मग्गणुसारिकिरिया ६५ सक्खं तु कायफासे २४० ६४ तिब्बासग्गहदोसा १ पणमिय पासजिणिदं २ ९२ मग्गणुसारिपयाहिण ८९ सत्थोइयगुणजुत्तो २८४ "तुल्ले वि तेण दोसे ५८ पयडं चिय वयणमिण २२६ १६ मग्गणुसारि भावो ७० सा तस्स सरुवेणं २५२ १४ ते इय पजणुजुज्जा १६५ ३८ परपाखंडिपसंसा १३६ १. मग्मणुसारिभावो ३४ सामण्णविसेसत्ता ११६ ३५ तेणमणुमोअणिज ११८ ४० परिणिट्टियवयणमिणं १७४ ११ मज्मस्थत्तंजायइ ५५ ४१ सुत्तं भासंताणं १६॥ १५ दवाणा खलु तेसिं ६६ ६. पोग्गलपणोल्लयाए "मज्मस्थो य अणिस्सिय . ७५ सोऽइसओ कायकभो २५६ ८१ दब्बारंभ दोसं २६२ ७३ भण्णइ सब्वं एवं २५४ .३ मिच्छादोसवयणओ ५४ सो केवलिणो वि हो २१८ ४८ दब्बासवस्स विगमो १७४ | १०२ भणियं किंचि फुडमिणं २९१ २६ लोइयमिच्छत्ताओ २ सो धम्मो जो जीवं । २८ देसस भंगओवा ११० ११ भावुझियववहारा ११४ | ५३ बजतो य अणिठं ४२ हिययडियो य भयवं १६४ २५ पक्खतरम्मि भणिो १०४ | ३० भावो जेसिमसुद्धो ११२] ९० विसघाइरसायणमं २८५/ ५९ हिंसगभावो हुन २२९ RECORRECORECAUCRACE WEARABA TA 66666 Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अथ धर्मपरीक्षा-तवृत्तिगतं च शुद्धिपत्रकम् । धर्मपरीक्षा ३ अशुद्धम् मंगल हे जनके हितो म्यस्त्र मानका शुद्धम् ध्यव कत्वस्वी ध्यव रित्वे रुप स्पर्ये भिमता सर्व भगवद देना श्रण शुद्धम पृष्ठ पंक्तिः ] अशुद्धम् मार्क हे वध्य अनिके . . कस्वी । हितो ११ व्यव नकरव . १४ रिता मानाव्यवहितोत्तरका ८ रूप श्रयण स्पर्यवे व्याप्यत्वम् भिगता स्वम् सव युक्स्यो (मुक्तो) भगद भवेद् दाना वद्म १८ १३ यथा व्याप्यम् मुख युक्तो भडे . पृष्ठम् पंक्तिः| अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठम् पंक्तिः । शुद्धिपत्रकम् निगोद निगोदा २० . वयहा व्यवहा ४५ रत्वं तू २६ यत यतो २६१३ जोसु एगेसु १८ ते भाइ ते म १०," ", | धा यथा म धा जीवा यथा एक: सूक्ष्म १६ द्वाद द्वादश पृथिव्य-ते ते प्लेजो शाच शते च १५ मिमु भिमु CAREERCASSESSAGS बर यधा भ्रा संस रनम्ता भ्रष्ट कत्वम कम Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा शुद्धिपत्रकम .:... मैं अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठम् पंक्तिः। अशुद्धम् शुद्धम पृष्ठम् पंक्तिः | अशुद्धम् शुद्धम पृष्ठम् बत्तित वर्तित २ सुकृतं यत्सुकृतं १२. नीयाभ्यु नीयामभ्यु वभू सम्याफ सव्यफ १२७ मेव मेव संपझे . सम्पदो घूकि त्या महा स्थाहा २०० गलपरा द्गलपरा . १२८ हैयैव, भवा भाव पुद्ग अपापुद्ग भतथा तथा २५४ पुनर्बन्धक संसझाय समाय नच देवो २१२ शदेना देशना हिट्ठी यः पिण्डो यस्पिण्डो २८० रतिप्य तिरप्य तामिव तामेव ननु वि ननु कुषि तदेवश्रु तदेवं शीलवानश्रु १०४ स्तुत्सूत्र | बखेम खेम रम्यम् द्रष्टव्यम् रन्तम किरीया किरिया २८॥ पतित प्रतित मथ मर्थ १५. नाश्यानुवि विनाश्यानुवि देनं देन इफुटदोषत्वं १२२ | तिखिवि तविम्बि दनेन दने न . | वासिस्त वासितस्त वस्युनानं क्युद्भावनं १२२ | स्वस्यायि स्वस्यापि सीसकाक्षरयोजकदोषादनुपयोगाद्वायरिकचना शुद्धं च-च, प-प, म-भ, ब-य प्रभृतिव्यस्थासादिकं जातं भवेत्तत्सर्वविशोध्य शुद्धिपत्रकावलोकनेन पाउं| शोधयित्वा च वाचनादिकं विधेयं विद्वद्भिरिति प्रार्थयामः ॥ *SHRERAISRO १८५ १९. Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ १ ॥ ॥ ॐ अहँ नमः ॥ शासन सम्राट् - सर्वतंत्रस्वतंत्र - अनेकतीर्थोद्धारक - मूरिचक्रचक्रवर्ति - जगद्गुरु-तपागच्छाधिपति - भट्टारक आचार्य महाराजाधिराजश्रीमद्विजयनेभिसूरिभगवद्भन्यो नमः ॥ ।। न्यायविशारद-न्यायाचार्य-निजज्ञानचरणसंस्मारितातीतश्रुतके वलि भगवन्महामहोपाध्यायश्रीमद्यशोविजयगणिप्रवरविनिर्मिता स्वोपज्ञवृत्तिसमलङ्कृता ॥ श्रीधर्मपरीक्षा. ॥ ऐन्द्रश्रेणिकिरीटकोटिरनिशं यत्पादपद्मद्वये, हंसालिश्रियमादधाति, न च यो दोषः कदापीक्षितः । |यद्गीः कल्पलता शुभाशयभुवः सर्वप्रवादस्थिते-र्ज्ञानं यस्य च निर्मलं स जयति त्रैलोक्यनाथो जिनः ॥ १ ॥ यन्नाथ मात्र स्मरणाज्जनानां प्रत्यूहकोटिः प्रलयं प्रयाति । अचिन्त्यचिन्तामणिकल्पमेनं, शङ्खश्वरस्वामिनमाश्रयामः | २ | अथ टिप्पणम् ॥ ऐन्द्रश्रेणिनवं स्तौमि, श्रीमद्वीरजिनेश्वरम् । अबाधितार्थसिद्धान्तं, विनव्यूहविघातिनम् ॥ १ ॥ नरवा श्री नेमिसूरीशान्, वर्तमानगणाधिपान् । प्रवक्ष्ये टिप्पणं किञ्चित् तेषां सेवानुभावतः ॥ २ ॥ ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ 'तत्र तावत् प्रारिप्सितप्रबन्धपूर्णताविरोधिविघ्नव्यूहविध्वंसन विचक्षणस्येश्वरनिर्देशरूपस्य मंगलस्य शिष्या अप्येवं कुर्युरिति शिष्यशिक्षायै निबध्नातिऐन्द्रेत्यादि ऐन्द्रश्रेणीत्यादिना भगवतः पूजातिशयो दर्शित इति, न चेत्यादिना चापायापगमरूपातिशयो दर्शितो भवति यद्गीरित्यादिना • सटिप्पणा ॥ खोपन वृतिः ॥ 11 2 11 Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4 धर्मपरीक्षा ॥२॥ *॥ खोपज्ञ त्तिः ॥ | गाथा-१ ॥२॥ | नत्वा जिनान् गणधरान, गिरं जैनी गुरूनपि । स्वोपज्ञां विधिवद् धर्म-परीक्षा विवृणोम्यहम् ॥ ३ ॥ ___इह हि सर्वज्ञोपज्ञे प्रवचने प्रविततनयभङ्गप्रमाणगम्भीरे परममाध्यस्थ्यपवित्रितैः श्रीसिद्धसेन-हरिभद्रप्रभृतिमूरिभिर्विशदीकृतेऽपि दुःषमादोषानुभावात्केषांचिद् दुर्विदग्धोपदेशविप्रतारितानां भूयः शङ्कोदयः प्रादुर्भवतीति तन्निरासेन तन्मनोनैर्मल्यमाधातुं | धर्मपरीक्षानामायं ग्रन्थः प्रारभ्यते, तस्य चेयमादिगाथा पणमिय पासजिणिंद, धम्मपरिक्खाविहिं पवक्खामि । गुरुपरिवाडीसुझं, आगमजुत्तीहिं अविरुद्धं ॥ १॥ • [प्रणम्य पार्श्वजिनेन्द्र, धर्मपरीक्षाविधिं प्रवक्ष्ये । गुरुपरिपाटीशुद्धम्, आगमयुक्तिभ्यामविरुद्धम् ॥ १ ॥ | [३०] पणमियति । प्रणम्य-प्रकर्षण भक्तिश्रद्धाऽतिशयलक्षणेन नत्वा, पार्श्वजिनेन्द्रम्, अनेन प्रारिप्सितप्रतिबन्धकदुरितनिरासार्थ शिष्टाचारपरिपालनार्थ च मङ्गलमाचरितम् । धर्मस्य धर्मत्वेनाभ्युपगतस्य, परीक्षाविधिम्-अयमित्थंभूतोऽनित्थंभूतो वेति विशेषनिर्धारणप्रकार, प्रवक्ष्ये । प्रेक्षावत्मवृत्युपयोगिविषयाभिधानप्रतिज्ञेयम् । प्रयोजनादयस्तु सामर्थ्यगम्याः धर्मप्रतिपादकस्यास्य ग्रन्थस्य धर्मशास्त्रप्रयोजनादिभिरेव प्रयोजनादिमत्त्वादिति । किंभूतं धर्मपरीक्षाविधिम्?गुरुपरिपाटीशुद्धम्-अविच्छिन्नपूर्वाचार्यपरम्परावचनानुसरणपवित्रम्, तथा, आगमयुक्तिभ्यां-सिद्धान्ततर्काभ्याम्, अविरुद्धमबाधितार्थम् । एतेनाभिनिवेशमूलकवकपोलकल्पनाशङ्का परिहृता भवति । इयं हि ज्ञानांशदुर्विदग्धानामैहिकार्थमात्रलुब्धानां महतेऽनाव । यावानेव ह्यर्थः सुविनिश्चितस्तावानेवानेन [टि०] तु वचनातिशयो दर्शित इति, ज्ञानमित्यादिना च ज्ञानातिशयो दर्शित इति शास्त्रादौ हि भगवतश्चत्वारोऽतिशया आवर्णनीया इति वाचकवर्या अपि तानाविश्चक्रिरे । अथ तस्यास्वेवं इन्द्राणां-इमा ऐन्द्रयः या श्रेणयः क्रमबद्धपंक्तयः तासां किरीटानां मुकुटानां कोटि:-अग्रभागः शतगुणलक्षप्रमाणः 43*CREASE Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा 4 सटिप्पणां ॥ स्वोपज्ञ दृत्तिः ॥ गाथा-२ % ॥३॥ % निरूपणीयः, न तु कल्पनामात्रेण यत्तदसंबद्धप्रलापो विधेय इति मध्यस्थाः। अत एव चिरप्ररूढमप्यर्थ कल्पनादोषभीरवो नाहत्य दूषयन्ति गीतार्थाः। तदुक्तं धर्मरत्नप्रकरणे जं च ण सुत्ते विहियं णय पडिसिद्धं जणमि चिररूढं। समइविगप्पिअदोसा.तं पि ण दसति गीयत्था॥१॥" [१ यच्च न सूत्रे विहितं न च प्रतिषिद्धं जने चिररुढम् । स्वमतिबिकल्पितदोषास्तदपि न दूषयन्ति गीतार्थाः ॥१॥] ततश्च माध्यस्थ्यमेव धर्मपरीक्षायां प्रकृष्टं (प्रधान) कारणमिति फलितम् ॥ १॥ एतदेव आहसो धम्मो जो जीवं, धारेइ भवण्णवे निवडमाणं । तस्स परिक्खामूलं, मज्झस्थत्तं चिय जिणुतं ॥ २॥ [स धर्मो यो जीवं धारयति भवार्णवे निपतन्तम् । तस्य परीक्षामूलं मध्यस्थत्वमेव जिनोक्तम् ॥२॥] [वृ०] सो धम्मोत्ति । यो भवार्णवे निपतन्तं जीवं क्षमादिगुणोपष्टम्भदानेन धारयति,स धर्मो भगवत्प्रणीतः श्रुतचा. रित्रलक्षणः, तस्य परीक्षामूलं मध्यस्थत्वमेव जिनोक्तम्, अज्ञातविषये माध्यस्थ्यादेव हि गलितकुतर्कग्रहाणां धर्मवादेन तत्वोपलम्भप्रसिद्धेः । ननु सदसद्विषयं माध्यस्थ्यं प्रतिकूलमेव । तदुक्तम्-"सुनिश्चितं मत्सरिणो जनस्य, न नाथ ! मुद्रामतिशेरते ते ।। माध्यख्थ्यमास्थाय परीक्षका ये, मणौ च काचे च समानुबन्धाः ॥ १॥ इति कथं तद्भवद्भिःपरीक्षानुकूलमुच्यते? इति चेत् । सत्यम्, प्रतीयमानस्फुष्टातिशयशालिपरविप्रतिपत्तिविषयपक्षद्वयान्यतरनिर्भीरणानुकूलव्यापाराभावलक्षणस्य माध्यस्थ्यस्य परीक्षाप्रतिकूलत्वेऽपि टि.] संख्याविशेषो वा अनिवा-सदा ख्य जिनेश्वरस्य पादः चरणं तदेव पद्म कमलं तस्य द्वयं तस्मिन्न हसाना तदात्यपक्षिणा आटि: पंक्तिः तस्याः श्रियं शोभा आदधाति प्रामोति, ननु सर्वेषामपि प्राणिनां दोषाश्चितत्वेन दृष्टत्वादस्यापि तथास्वं स्यादिति चेत्, न, इत्याह न चेति, दोपैः प्रसिद्ध रागद्वे % %A6 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥४॥ *% * वायुपगमहानिभयप्रयोजकदृष्टिरागाभावलक्षणस्य माध्यस्थ्यस्य तदनुकूलत्वात् ॥२॥ अथ मध्यस्थः कीदृग्भवति? इति तल्लक्षणमाह-11 मज्झत्थोअअणिस्सिय-वक्हारी तस्स होइ गुणपक्खो॥णो कुलगणाइणिस्सा, इस ववहारंमि सुपसिद्धं ॥३॥ सटिप्पणा मध्यस्थश्चानिश्रितव्यवहारी तस्य भवति गुणपक्षः। नो कुलगणादिनिश्रा इति व्यवहारे सुप्रसिद्धम् ।। ३॥] ★ खोपज्ञ वृ०) मध्यस्थश्चानिश्रितव्यवहारी स्यात्, उपलक्षणत्वादनुपश्रितव्यवहारी च । तत्र निश्रा रागः, उपश्रा च द्वेष इति राग वृत्तिः ॥ ४ द्वेषरहितशास्त्रप्रसिद्धाभाव्यानाभाव्यसाधुत्वासाधुत्वादिपरीक्षारूपव्यवहारकारीत्यर्थः । अत एव, तस्य मध्यस्थस्य, गुणपक्षो 'गुणा गाथा३-४ एवादरणीयाः' इत्यभ्युपगमो, भवति, न तु कुलगणादिनिश्रा-निजकुलगणादिना तुल्यस्य सद्भूतदोषाच्छादनयाऽसदभूतगुणोद्धा-1 ॥ ४ ॥ वनया च पक्षपातरूपा । तथा कुलगुणादिना विसदृशस्यासद्भूतदोषोद्भावनया सद्भुतगुणाच्छादनयाऽपि चोपश्राऽपि न भवति इत्यपि द्रष्टव्यम्, इति एतद, व्यवहारग्रन्थे सुप्रसिद्धम्, निश्रितोपश्रितव्यवहारकारिणः सूत्रे महाप्रायश्चित्तोपदेशात ।। ३ ।। इत्थं च मध्यस्थस्यानिश्रितव्यवहारित्वाद् यत्कस्यचिदभिनिविष्टस्य पक्षपातवचनं तन्मध्यस्थैर्नाङ्गीकरणीयमित्याहतुलेंवि तेण दोसे, पक्खविसेसेण जा विसेसुत्ति ॥ सा णिस्सियत्ति सुत्तु-त्तिण्णं तं बिंति मज्झस्था॥४॥ [तुल्येऽपि तेन दोष, पक्षविशेषेण या विशेषोक्तिः ॥ सा निश्रितेति मत्रोत्तीर्णा तां बुवते मध्यस्थाः ।। ४ ।] (वृ०) तुल्लेवित्ति । तेन-मध्यस्थस्य कुलादिपक्षपाताभावेन, तुल्येपि उत्सूत्रभाषणादिके, दोषे सति, पक्षविशेषेण या [टि.] पादिदोषैः कदापि त्रिकालेऽपि, न च नैव, इक्षित: अवलोकितः, तदाश्रितत्वेन इति यावत्, यस्य जिनेशस्य, गी: वाणी, कल्पलता यथाभीष्ट सा ददाति तथा चेयमपीति रूपकं । यहा कल्पलता इव लुप्तोपमा अस्य भगवतो ज्ञानं निर्मलं केवलं आवरणरहितं अनन्तं अप्रतिष इति यावत्, * 4 %AS Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ICC | विशेषोक्तिः-'रूपक्षपतितस्य यथाछन्दस्याप्यपरमार्गाश्रयणाभावान्न तथाविधदोषः, परपक्षपतितस्य तून्मार्गाश्रयणान्नियमेनान-1 धमेपरीक्षान्तसंसारित्वम्' इति, सा विशेषोक्तिः, निश्रिता पक्षपातगर्मा, इति तां सूत्रोत्तीर्णामागमबाधितां, बुवते मध्यस्थाःआगमे ||सटिप्पणा खोपज्ञ कीदृशस्य शुभः समीचीनो य आशयः अभिप्राय: "सर्वे जना एतादृशा एव भवन्तु" इत्येतद्रूप इति यावत, तस्य भूरूपत्तिस्थानं तस्य, सर्वः समस्तः वृत्तिः ॥ प्रकृष्टो वादः नय: तस्य स्थिति:-स्थीयतेऽस्मिन् बाहुलकादधिकरणे प्रत्यय: अधिकरणं मूलमिति यावत्, तस्य, यत्पदेन पूर्वमुक्तस्यैव तत्पदेन परामर्श गाथा३-४ इति न्यायात्, स पूर्वोक्तगुणविशिष्टः, बैलोक्यनाथः त्रयाणां लोकानां समाहारस्त्रिलोकी तत्र भवा: लोक्यास्तेषां नाथ: स्वामी, जिन: रागद्वेषजेता, जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते ॥१॥ ननु कार्य प्रति प्रतिबन्धकाभावस्थापि कारणत्वात्, सति प्रतिबन्धके कार्य कथं स्वादिति ग्रन्थकार आत्मनः परेषां श्रोतृणां च जिनपतिपदप्रसादेनापायापगमत्वं सूचयाञ्चके द्वितीयश्लोकनेति । यन्नामेति ! यस्य नाममात्रस्य स्मरणात् । जनानां भव्यजनानां प्रत्यूहानां मा कोटिः समुदायः प्रलयं नाशं प्रयाति गच्छति, स कः, शंखेश्वरस्वामी तमाश्रयामः । कीदृशं अचिन्त्यः चिन्तामणिः मणिविशेषः, तत्करूपं सदशं, एनं जगत्प्रसिद्धम् ॥२॥ ननु'यस्य देवे पराभक्तियथा देवे तथा गुरौ॥ तस्यैव कथिता झर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः" ॥१॥ इति लौकिकोश्या "अभिमतफल सिद्धेरभ्युपायः सुबोधः प्रभवति स च शास्त्रात् तस्य चोपतिराप्तात् ॥ इति भवति स पूज्यस्तत्प्रसादप्रबुद्धन हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति ॥१॥ इति लोकोत्तरशास्त्रप्रसिद्धोत्तया परापराप्तप्रवाह निबन्धन एवं परापरशास्त्रप्रवाह इति अस्य शास्त्रस्य परापरशारामूलकत्येनादौ परापराप्तप्रवाहस्यापि स्मरणमवश्यं करणीयतयाऽऽह नत्वा जिनानित्यादिना । परापराप्तप्रवाहं परापरशास्त्रप्रवाहस्य मुख्यकारणं जैनी भारतीच स्मरणं प्रतिजानीते । जिनान् गणधरान् जनीं जिनसम्बन्धी वाच गुरूनपि नरवा जिनान् गणधरान् इत्यत्रोभयत्र जात्येकवचनत्वेन सिद्धावप्यतिशयद्योतनाथ बहुवचनान्तता । अहं स्वोपज्ञां। धर्मपरीक्षा धर्मस्य परीक्षाम, परमतनिराकरणपूर्वकस्वमतव्यवस्थापन, परमतं परकीयमतिः तनिराकरणं तत्राप्रामाण्यज्ञापन ' असिभ्युदावनं वा, तत्पूर्वक तदुत्तरकालीनं यत्स्वमतव्यवस्थापन, स्वमतं स्वकीयमतिः तव्यवस्थापनं तद्विषयकाप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितज्ञानानुकूलब्यापार इति यावत् । विधिवत् विध्य चुसारेण, विवृणोमि विवृत्ति विदधामि ॥३॥ प्रारिप्लिवप्रतिबन्धकनिरासार्थ शिष्टाचारपरिपालनार्थञ्चेति । अत्र चकारोऽनास्थायामिति । ननु मंगलस्य EASEARSHA । Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॐ धर्मपरीक्षा सटिप्पणा * खोपज्ञ वृत्तिः ॥ | गाथा-४ यविशेषेणैवान्यथावादिनामन्यथाकारिणां च महादोषः प्रदर्शितस्तत्कोऽयं विशेषो यत्परपक्षपतितस्यैवोत्सूत्रभाषिणोऽनन्तसंसारित्वनियमो न स्वपक्षपतितस्य यथाछन्दादेरिति ॥ ४॥ नन्वस्त्ययं विशेषो यत्परपक्षगतस्योत्सूत्रभाषिणो वयमेव जैना अन्ये तु जैनाभासाः' 'समाप्तिकामी मंगलमाचरेदिति' वेदेनैव बोधितकर्तव्यताकत्वेन प्रारिप्सितप्रतिबन्धकनिरासार्थ शिष्टाचारपरिपालनार्थश्चेति ग्रंथकारोक्तिरसंगतेतिचेत्, न । अन्वयष्यतिरेकम्यमिचाराभ्यां समाप्तिमात्रे मंगलस्य हेतुत्वाभावेन तादशवेदकल्पने प्रमाणाभावात् प्रत्यक्षत्वाभावाच । न च स्वसमसंख्यविनस्थलीयसमाप्ती मंगलहेतुः नास्तिकग्रन्थे च जन्मान्तरीयमंगलादेव समाप्तिरिति वाच्यम्, स्वन्यनसंख्यवितस्थले समात्यभावप्रसंगात्, न च स्वानधिकसंख्यविनस्थलीयत्वं निवेश्यम्, यत्र दश विघ्नाः पञ्च च प्रायश्चित्तेन नाशिताः पञ्च च मङ्गलात् तत्र समाप्त्यभावप्रसंगात् । न च प्रायश्चित्ताद्यनाश्यत्वमपि विशेषणं देयमिति वाच्यं, बलवतो विघ्नस्य बहुभिरपि मंगलैरनाशात् । बलवता मंगलेन च बहूनामपि विनानां नाशाच । किञ्च विघ्नः समाप्तौ विशेषणं, उपलक्षणं वा, नाद्यः विघ्नस्यापि मङ्गलजन्यत्वापतेः । नाऽन्त्यः नियतोपलक्ष्यतावच्छेदकाऽभावात् । उपलक्षणस्य नियतोपलक्ष्यतावच्छेदकत्वात् इति दिक् । आवश्यकत्वाद् विघ्नध्वंस एव मङ्गलफलं समाप्तिस्तु असति प्रतिबन्धके स्वकारणादेव भवति, कारीरीत इवाऽवग्रहनिवृत्तौ वृष्टिः, निर्विघ्नं परिसमाप्यता, इति कामनाऽपि " सविशेषणे हि वर्तमानौ विधिनिषेधौ सति विशेष्यबाधे विशेषणमुपसंक्रामत" इति न्यायाद् विघ्नध्वंसमात्रावगाहिनी, इत्यपि न रमणीयम् । मंगलं विनापि विघ्नध्वंसस्य प्रायश्चित्तादितो भावेन व्यभिचारात् । न च प्रायश्चित्ताद्यनाश्यविघ्नध्वंसे मंगलहेतुरतो न दोष इति वाच्यं, प्रायश्चित्तादीनामपि मंगलानाश्यबिघ्नध्वंसं प्रति हेतुत्वेऽन्योऽन्याश्रयात् । ननु विघ्नो माभूदितिकामनया प्रवृत्तेर्विघ्नप्रागभाव एवं मङ्गलफलमित्यपि न पेशलं वचनं, प्रागभावस्थानादित्वेन फलवायोगात् । न चागामिसमयविशेषेण प्रागभावसम्बन्धस्यानादित्वाऽभावेन तस्यैव मङ्गलफलस्वमिति वाच्यम्, स्वत आगन्तुकस्य समयविशेषेण तत्सम्बन्धरूपस्य तत्परिपालनस्थापि मङ्गलफलत्वायोगात् । शिष्टाचारपरिपालनं मंगलफलभित्यपि वार्तामात्रम्, तत्परिपालनस्यादृष्टद्वाराऽभीप्सितसिद्धिहेतुत्वे मंगलस्यैवाऽदृष्टार्थत्वौचित्यात्, विघ्नमविनाश्य शिष्टाचारपरिपालनजन्यधर्मविशेषस्य समायहेतुत्वे विघ्ननाशस्यैवावश्यकत्वाच । किञ्च शिष्टाचारेण विधि 6154AR-Ek Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-४ FORGAON | इत्येवं तीर्थोच्छेदाभिप्रायेण प्रवर्तमानस्य सन्मार्गनाशकत्वानियमेनानन्तसंसारित्वम, स्वपक्षगतस्य तु व्यवहारतो मार्गपतितस्य नायमभिप्रायः सम्भवति, तत्कारणस्य जैनप्रवचनप्रतिपक्षभूतापरमार्गस्याङ्गीकारस्याभावाद्, इत्यत आहबोधितकर्तब्यतामनुमाय मंगले प्रवृत्तिरेव तत्परिपालन न सा तत्फलम् । किन्तु तजनकेति । न चाचारप्राप्तातिलाने प्रत्यवायस्मरणात् । प्रत्यवायित्वपर्यवसन्नाशिष्टत्वशंकानिरासद्वारा शिष्टाचारपरिपालनमेव मंगलफलमिति वाच्यम, तादृशशङ्कायाः शिष्यावधानप्रतिबन्धकत्वेऽपि समाप्ति प्रत्यप्रतिबन्धकत्वात् । कामनाविशेषनियतकर्तव्यताकस्य मङ्गलस्य कामनाभावेनाऽकरणेऽपि न प्रत्यवाय इति विशेषदर्शनेन तच्छानिवृत्तेश्च तस्मान्मङ्गलं निष्फलमिति चेत् । अनोच्यते, विघ्नध्वंस एव मंगलस्य हेतुत्वात् नोक्तव्यभिचारः । प्रायश्चित्तादीनामपि मङ्गलवात् । “प्रारिप्सितप्रतिबन्धकरूपदुरितनिवृत्त्यसाधारणकारण मङ्गलम्" इति हितल्लक्षणं परैर्गीयते, तत्र चास्माभिलषिवात् "प्रारिप्सितप्रतिबन्धक" इति विशेषणं परित्यज्य 'दुरितनिवृत्त्यसाधारणकारणमेव' स्वीक्रियते, इति तदिदमुक्त स्थाद्वादरत्नाकरे 'स्वाध्यायादेरपि मङ्गलस्वाविरोधात्,' ननु तथापि न दुरितनिवृत्त्य साधारणकारणत्वेन हेतुता आत्माश्रयात् । किन्तु नतित्वादिना प्रातिस्विकरूपेणैव इति व्यभिचारतावस्थ्यमेवेति चेत्, न, नत्याचभिव्यङ्गयभावविशेषस्यैव निश्चयतो दुरितहेतुत्वात् । निकाचितकर्मणश्चाऽनिवर्तनीयत्वात् न बलवतो विघ्नस्य नाशः इति । वस्तुतः शब्दाद्यात्मकनत्यादीनामपि स्वाव्यवहितोत्तरविघ्नध्वंसहेतुत्वाद् न कोऽपि दोषः । न च कारणस्य कार्यतावच्छेदकत्वानुपगमान्न तथाकार्यकारणभावः । अत एव विश्वनाथपञ्चाने काशीमरणान्मुक्तिरिति शुत्यन्तर्गतपञ्चम्याः प्रयोजकत्वपरत्वोपवर्णनं कृतम्, अन्यथा तत्रापि स्वाव्यवहितोत्तरमुक्ति प्रति तस्यापि हेतुत्वस्य निर्दुष्टतया बथोपवर्णनमसंगतं स्यात्, इति वाच्यम्, “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय" इतिश्रुत्या तत्वज्ञानस्य मुक्तिसामान्य प्रति हेतुस्वं प्रतिपादितं तच्च काशीमरणस्य मुक्तिहेतुस्चे न संभवति तजन्यमुक्तौ तत्त्वज्ञानस्य व्यभिचारात, अत: तस्य न मुक्तिजन्यत्वमपि तु तत्वज्ञानद्वारा मुक्तिप्रयोजकत्वमेवेति विश्वनाथेन तत्रत्यपञ्चम्याः प्रयोजकत्वोपवर्णनं कृतं न तु कारणस्य कार्यतानवच्छेदकत्वादिति कारणस्य कार्यता'वच्छेदकत्वानुपगमे प्रमाणाभावात्, इति प्रारिप्सितप्रतिबन्धकरूपदुरितनिरासार्थमिति ग्रन्थकारोक्ति संगतेति निपुणतरम्हनीयम् ॥ प्रतिज्ञेति AERAH**** %% खा *%* Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥८॥ 4% तिथुच्छेओ व्व मओ, सुत्तुच्छेओवि हंदि उम्मग्गो। संसारो अ अणंतो; भयणिज्जो तत्थ भाववसा ॥५॥18 तीर्थोच्छेद इव मता सूत्रोच्छेदोऽपि हंदि उन्मार्गः। संसारश्वानन्तो भजनीयस्तत्र भाववशात् ॥ ५॥] सटिप्पणा (वृ०) तित्थुच्छेओत्ति । तीर्थोच्छेद इव सूत्रोच्छेदोऽपि 'हंदि इत्युपदर्शने उन्मार्ग एव मतः । तथा चोन्मार्गपतितानामु- खोपज्ञ स्सूत्रभाषणं यदि तीर्थोच्छेदाभिप्रायेणैवेति भवतो मतं तदोत्सूत्राचरणप्ररूपणप्रवणानां व्यवहारतो मार्गपतितानां यथाछन्दादीनामु-सूत्र- मावृत्तिः ॥ | वर्तमानकालीनस्वकर्तव्यताप्रकारकज्ञानानुकूलव्यापारः । धर्मशास्त्र प्रयोजनादिभिरेवेति । आदिना सम्बन्धाधिकारिप्रभृतिपरिग्रहः, य एव प्रयोजनसम्बन्धा- गाथा-५ •धिकारिप्रभृतयो धर्मशास्त्रस्यागमस्य त एवास्य ग्रन्थस्थापि तत्प्रतिपादितविषयाणामेव प्रतिपादकत्वात् । आगमयुक्तिभ्याभिति, नन्वन्त्रागमेनैवेत्येव वक्तु मुचितं आगमेन बुक्स्यैवार्थस्य प्रतिपादित्वादिति चेन,आगमोक्तार्थस्य यस्तकेंणानुसंधानं कुरुते स एव धर्म जानाति न स्वन्य इति ॥ तथा चोक्तं "परीक्ष्य भिक्षवो ग्राह्य मदचो न तु गौरवात् ॥"अन्यैरपि भणित, “यस्तकेंणानुसन्धत्ते स धर्म वेद नेतर' इति तर्कानुसंधानं विना तात्पर्यस्यैव निश्चतुमशक्यत्वात्, इयं हीति-स्वकपोलकल्पना हि। धर्मवादेनेति-तत्त्वबुभुत्सोः कथारूपवादेन न तु जल्पवितण्डाभ्यां ताभ्यां च तत्वोपलम्भस्यासिद्धेः । सुनिश्चितमितिअस्यायमर्थ:-हे नाथ ये परीक्षका: स्वाभ्युपगमपरीक्षणविधौ दुर्विदग्धाः पण्डितं मन्या इति यावत्, माध्यस्थ्यमास्थाय-वयं मध्यस्था इत्यभिमानेन न तु वस्तुगमा सदसद्विषयकविप्रतिपत्तिविषयद्वयान्यतरस्वाभ्युगमहानिभयप्रयोजकदृष्ठिरागाभावरूपं माध्यस्थ्यं किन्तु पूर्वोक्तपक्षद्वयविषयकविप्रतिपत्तिविषययान्यतरनिर्धारणानुकूलच्यापाराभावरूपेऽवास्तविके तमारोप्य तमास्थाय स्वीकृत्य कीदृशाः समानुबन्धाः-समानोऽनुबन्धोभिप्रायो येषां ते, केषु मणौ चन्द्रकान्तादिरूपे काचे-काचाख्यप्रसिद्धद्रव्ये च,ते -तच्छब्दस्य पूर्वपरामर्थत्वेन पूर्वोक्ता जनाः, मत्सरिण:-मत्सरो गुणेषु दोषाविष्करणं असूया इति यावत्, स अस्यासीति-मस्सरी तस्य मत्सरिणो जनस्य, जातावेकवचनं, मुद्रा स्वभावं प्रकृतिमिति यावत्, नातिशेरते नातिकामन्ति इति सुनिश्चितम् ॥ न तु विप्रतिपत्तिविषयम् ॥ जैनाभासा इति जैनवदाभासन्ते दुष्टजना इति व्यवहारत इति-व्यवहारनयेन । यथाछन्दादीनामिति यथा छन्दोऽभिप्राय इच्छा तथैवाऽऽगमनिरपेक्षेण यो पर्तते अथवा यथा कथंचित् नागमपरतम्यतया छन्दोऽमिप्रायो बोधः प्रवचनार्थेषु यस्य स यथाछन्दः । भादिना-पार्श्वस्थादिपरिग्रहः । BC% Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा | सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-५ ॥९॥ | भाषणमपि सूत्रोच्छेदाभिप्रायेणैव स्थाद् विरुद्धमार्गाश्रणस्येव सूत्रविरुद्धाश्रयणस्यापि मार्गोच्छेदकारणस्याविशेषाद, तथा च द्वयोरप्युन्मार्गः समान एव । संसारस्त्वनन्तस्तत्र भावविशेषाद्भजनीयः, अध्यवसायविशेष प्रतीत्य संख्यातासंख्यातानन्तभेदभिन्नस्य तस्याहेदाद्याशातनाकृतामप्यभिधानात् । तथा च महानिशीथसूत्रम्-"जेणं तित्थकरादीणं महतिं आसायणं कुजा, से गं अज्झवसायं पडुच्च जाव णं अणंतसंसारिअत्तणं लभिज्जत्ति " ॥ ( यस्तीर्थकरादीनां महतीमाशातनां कुर्यात्, स अध्यवसायं प्रतीत्य यावदनन्तसंसारिकत्वं लभेत II) इत्थं चोत्सूत्रभाषिणां नियमादनन्तः संसार इति नियमः परास्तः । किं च कालीदेवीप्रमुखाणां| षष्ठाङ्गे "अहाछंदा अहाछंदविहारिणी(उ)ति" ( यथाछन्दा यथाछन्दविहारिणी इति ॥) पाठेन यथाच्छन्दत्वभणनादुत्सूत्रभाषित्वं सिद्धम् । “उस्मुत्तमायरंतो, उस्सुत्तं चेव पण्णवेमाणो। एसो उ अहाछंदो, इच्छा छंदुत्ति एगट्ठा ॥१॥" ( उत्सूत्रमाचरन् उत्सुत्रं चैव प्रज्ञापयन् । एष तु यथाच्छन्द, इच्छा छन्द इत्येकार्थौ ।) इत्यावश्यकनियुक्तिवचनात् । तासां चैकावतारित्वं प्रसि| मिति नायं नियमो युक्तः। यत्तन्मार्गमाश्रितानामाभोगवतामनाभोगवतां नियमेनानन्तः संसारः, प्रतिसमयं तीर्थोच्छेदाभिप्रायेण | विरुद्धमार्गाश्रयणस्येति-जिनप्रवचनप्रतिपक्षभूतकान्तमार्गाश्रयणस्य । मार्गोच्छेदकारणस्याविशेषादिति-मोक्षमार्गध्वंसनियतपूर्ववृत्तित्वभेदाभावात् तथा च भोक्षमार्गनाशकत्वाविशेषादिति भावः । इत्यनेति-अध्यवसायविशेषस्यैवानन्तसंसारहेतुस्वे सिद्धे सति । नायं नियमो युक्त इति-श्रीज्ञाताधर्मकथायांअहाळदेत्यादिना कालीदेवीप्रमुखाणां यथाछन्दत्वमुक्तं तेन च तेषामुत्सूत्रभाषित्वमपि सिद्धम्, यथाछन्दत्वस्योत्सूत्रभाषित्वब्याप्यत्वात् इत्येवं तासामुत्सूत्रभाषित्वे सिद्धेऽपि-तासामेकावतारित्वप्रसिद्धत्वाद् । प्रसिद्धत्वंतु-काली गं भंते! देवी ताओ देवलोगाओ अणंतरं उवट्टित्ता कहिं गच्छिहिति कहिं उववजिहिति ? गोयमा ? महाविदेहे वासे सिजिनहितित्ति ज्ञाताधर्मकथाद्वितीयश्रुतस्कन्धप्रथमवर्गप्रथमाध्ययनसूत्रेति भावः ॥ तस्माद् उत्सूत्रभाषिणां नियमादनन्तसंसार इति नियमो न युक्त इति भावः । अनवट Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4 साम्यात् । यथाछन्दस्तु क्वचिदंशेऽनाभोगादेवोत्सूत्रभाषी स्थात्, तस्यानाभोगोऽपि प्रायः सम्यगागमखरूपापरिणतेः, न चैतस्य तदुत्सूत्रभाषणमनन्तसंसारहेतुः,तीर्थीच्छेदाभिप्रायहेतुकस्यैव तस्यानन्तसंसारहेतुत्वादिति । तदसंबद्धम् एतादृशनियमाभावाद् । न धुन्मा पतिताः सर्वेऽपि तीर्थोच्छेदपरिणामवन्त एव,सरलपरिणामानामपि केषाञ्चिद्दर्शनाद् । न च यथाछन्दादयोऽनाभोगादेवोत्सूत्रभाषिणः, जाननामपि तेषां बहूनां सुविहितसाधुसमाचारप्रद्वेषदर्शनात् । यस्त्वाह-यथाछन्दत्वभवनहेतूनां पार्श्वस्थत्वभवनहेतूनामिव नानात्वेजागमे भणितत्वाद् यथाछन्दमात्रस्योत्सूत्रभाषिखनियमोऽप्रामाणिक इति । तदरमणीयम् , आगम एव यथाछन्दस्योत्सूत्रप्ररूपणाया नियतव्यवस्थाप्रदर्शनात् । तदुक्तं व्यवहारभाष्ये-अहछंदस्स परूवण,उस्मुत्ता दुविह होइ णायव्वा । चरणेसु गईसुं जा,तत्थ चरणे इमा होइ ॥१॥ पडिलेहणि-मुहपोत्तिय. रयहरण-निसिज्ज,पाय-मत्तए पट्टे । पडलाइं चोल, उण्णा-दसिआ,पडिलेहणापोत्तं ॥२॥ दंतच्छि४ नमलितं, हरियद्विय पमज्जणा य णितस्स । अणुवाइ अणणुवाई-परूव चरणे गंतीसुपि।।३॥ अणुवाइत्ति नजइ, जुत्तीपडियं खु भासए | एसो । जं पुण मुत्तावेयं तं होइ अणणुवाइत्ति॥४॥सागारिआइपलियंक-णिसिज्जासेवणाय गिहिपच्छमत्ते । णिग्गंथिचिट्ठणाइ,पडिसेहो । PIमासकप्पस्स ॥५॥ चारे वेरज्जे वा, पढमसमोसरण तह णितिएसु । सुण्णे अकप्पिए अ,अणाउंछे य संभोगे ॥६॥ किंवा अकप्पिएणं, गहियं फासुपि होइ उ अभोज । अनाउंछ को वा, होइ गुणो कप्पिए गहिए ॥७॥ पंचमहब्वयधारी, समणा सम्वेवि किंण सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ।। गाथा-५ ॥१०॥ सुविहितसाधुसमाचारप्रद्वेषदर्शनादिति-यथाछन्दादिषु सुबिहिसाधुसत्कसम्यगाचारविषयकाप्रीत्यवलोकनादितिभावः । यथाछन्दमात्रस्येति-यथाछन्दसामान्यस्य । उत्सूत्रभाषित्वनियम इति-उत्सूत्रभाषित्वम्याप्यम् । यथाछन्दस्येति-यथाछन्दत्वस्येतिभावप्रधाननिर्देशात् । उत्सूत्रप्ररूपणायानियतव्यवस्थादर्शनादिति-उत्सूत्रभाषित्वम्यापकत्वम्यवस्थादर्शनात् । AAKAAS Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ ११ ॥ T भुंजंति । इय चरणवितथवादी, इत्तो वुच्छं गई तु ॥ ८ ॥ खेत्तं गओ अडविं, इक्को संचिक्खए तहिं चैव । तित्थयरो पुण पियरो, खेतं पुण भावओ सिद्धित्ति ॥ ९ ॥ ( यथाछन्दस्य प्ररूपणा उत्सूत्रा द्विविधा भवति ज्ञातव्या । चरणेषु गतिषु या तत्र चरणे इयं | भवति ॥ १ ॥ प्रतिलेखनी - मुखपोतिका रजोहरण- निषेधा, पात्रमात्र के पट्टे । पटलानि चोल (पट्टः) ऊर्णादशिका प्रतिलेखनापोतं ॥२॥ | दन्तच्छिन्नमलित हरितस्थितं प्रमार्जना च छन्नस्य | अनुपात्यननुपातिप्ररूपणं चरणे गतिष्वपि ||३|| अनुपातीति ज्ञायते युक्तिपतितं खलु भाषते एषः । यत्पुनः सूत्रापेतं तद् भवति अननुपातीति | ४ || सागारिकादिपर्यङ्कनिषद्यासेवना च गृहिपात्रे । निर्ग्रन्थीस्थानादि प्रतिषेधो मासकल्पस्य || ५ || चारे वैराज्ये वा प्रथमसमवसरणे तथा नित्येषु । शून्ये अकल्पिके चाज्ञातोञ्छे च संभोगे ॥ ६ ॥ किंवाऽकल्पिकेन गृहीतं प्रासुकमपि भवति त्वभोज्यम् । अज्ञातोञ्छं को वा भवति गुणो कल्पिकेन गृहिते ॥ ७ ॥ पञ्चमहाव्रतधारिणः श्रमणाः सर्वेऽपि किं न भुञ्जते ? । इति चरणवितथवादी इतो वक्ष्ये गतिषु तु || ८ || क्षेत्रं गतोऽटवीमेकः संतिष्ठते तत्रैव । तीर्थंकरः पुनः पिता क्षेत्रं पुनः भावतः सिद्धिरिति ॥ ९ ॥ ) एतासां गाथानामयं संक्षेपार्थ. - अहछंदस्मत्ति । यथाछन्दस्य प्ररूपणा उत्सूत्रा - मूत्रादुत्तीर्णा द्विविधा भवति ज्ञातव्या । तद्यथा चरणेषु चरणविषया, गतिषु गतिविषया ॥ तत्र या चरणे चरणविषया सा इयं वक्ष्यमाणां भवति ॥ १ ॥ तामेवाह - पडिलेहणित्ति | मुखपोतिका मुखवत्रिका सैव प्रतिलेखनी पात्रप्रत्युपेक्षिका पात्र के सरिका, किं द्वयोः परिग्रहेण ? अतिरिक्तोपधिग्रहणदोषादेकयैव मुखपोतिकया कायभाजनोभयप्रत्युपेक्षणकार्यनिर्वाहेणापरवैफल्यात् । तथा रयहरणणिसिजत्ति । किं रजोहरणस्य द्वाभ्यां निषद्याभ्यां कर्तव्यम् ? एकैव निषद्यास्तु । पीयमत्तएति । यदेव पात्रं तदेव मात्रकं क्रियताम् मात्रकं वा पात्रं क्रियताम्, किं द्वयोः परिग्रहेण १ एकेनैवान्यकार्यनिष्पत्तेः । भणितं च - " यो भिक्षुस्तरुणो बलवान् सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा - ५ ॥ ११ ॥ Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ १२॥ स एकं पात्रं गृह्णीयाद्” इति । तथा पट्टएत्ति । य एव चोलपट्टकः स एव रात्रौ संस्तारकस्योत्तरपट्टः क्रियताम्, किं पृथगुत्तरपट्टग्रहेण । तथा पडलाई चोलत्ति । पटलानि किमिति पृथग् धियन्ते ?, चोलपट्टक एक भिक्षार्थ हिण्डमानेन द्विगुणत्रिगुणो वा कृत्वा पटलस्थाने वा निवेश्यताम् । उण्णादसियत्ति । रजोहरणस्य दशाः किमित्यूर्णमय्यः क्रियन्ते, क्षौमिकाः क्रियन्ताम् ता पूर्णमयी यो मुदुतरा भवन्ति । पडिलेहणापोत्तति । प्रतिलेखनावेलायामेकं पोतं प्रस्तार्य तस्योपरि समस्तव प्रत्युपेक्षणां कृत्वा तदनन्तरमुपाश्रयाद् बहिः प्रत्युपेक्षणीयम्, एवं हि महती जीवदया कृता भवतीति ॥२॥ दंतच्छिन्नमिति । हस्तगताः पादगता वा नखाः प्रवृद्धा दन्तैश्छेत्तव्याः न नखरदनेन । नखरदनं हि ध्रियमाणमधिकरणं भवति । तथा अलित्तंति । पात्रमलिप्तं कर्तव्यम्, लेपे बहुदोषसंभवान्न पात्रं लेपनीयमिति भावः । हरियट्ठियत्ति । हरितप्रतिष्ठितं भक्तपानादि डगलादि च ग्राह्यम्, तद्ग्रहणे हि तेषां हरितकायजीवानां भारापहारः कृतो भवति । पमज्जणा य तिस्सति । यदि छन्ने जीवदयानिमित्तं प्रमार्जना क्रियते ततो बहिरच्छन्ने क्रियताम्, दयापरिणामाविशेषात् । ईदृशी यथाछन्दस्य प्ररूपणा चरणेषु, गतिषु चानुपातिन्यननुपातिनीं च भवति ॥ ३ ॥ अनुपातिन्यननुपातिन्योः खरूपमाह -- अणुवाइति । यद् भाषमाणः स यथाछन्दो ज्ञायते, यथा खु निश्चितं युक्तिपतितं युक्तिसङ्गमेव भाषते तदनुपातिप्ररूपणम् । यथा-यैव मुखपोतिका सैव प्रतिलेखनिकेत्यादि । यत्पुनर्भाष्यमाणं सूत्रापेतं प्रतिभासते तद्भवत्यननुपाति । यथा चोलपट्टः पटलानि क्रियन्तामिति, षट्पदिकापतन संभवेन सूत्रयुक्तिबाधात् । अथवा सर्वाण्येव पदान्यगीतार्थप्रतिभासापेक्षयाऽनुपातीनि, गीतार्थप्रतिभासापेक्षया त्वननुपातीनीति ॥ ४ ॥ इदं चान्यत्तत्प्ररूपणम् - सागारियात्त । सागरिकः शय्यातरस्तद्विषये ब्रूते - शय्यातरपिण्डग्रहणे नास्ति दोषः, प्रत्युत शय्यातरस्य महालाभ इति । आदिशब्दात्स्थापनाकुलेष्वपि प्रविशतो सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा - ५ ॥१२॥ Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 15 नास्ति दोषः,प्रत्युत भिक्षाशुद्धिरित्यादि ग्राह्यम् । पलिअंकत्ति । पर्यङ्कादिषु मत्कुणादिरहितेषु परिभुज्यमानेषु न कोऽपि दोषः, प्रत्युत धर्मपरीक्षा | भूमावुपविशतो लाघवादयो दोषाः । निसेज्जासेवणत्ति । गृहिनिषद्यायां न दोषः, प्रत्युत धर्मकथाश्रवणेन लाभ इति । गिहि- | सटिप्पणा. ।।१३।। मत्तेत्ति। गृहिमात्रके भोजनं कस्मान्न क्रियते ? न ह्यत्र दोषः, प्रत्युत सुन्दरपात्रोपभोगात्प्रवचनानुपघातलक्षणोऽन्यपात्रभारावहन ॥ खोपज्ञ लक्षणश्च गुण इति । निग्गंथिचेट्टणाइत्ति । निर्ग्रन्थीनामुपाश्रयेऽवस्थानादौ को दोषः? यत्र तत्र स्थितेन शुभं मनः प्रवर्तव्यम्, तच्च वृत्तिः ॥ गाथा-५ वायत्तमिति । तथा मामकल्पस्य प्रतिषेधस्तेन[स न] क्रियते, यदि दोषो न विद्यते तदा परतोऽपि तत्र स्थेयमिति।।५।। चारेत्ति । चारश्च चरणं गमनमित्यर्थस्तद्विषये ब्रूते-वृष्टयभावे चतुर्मासकमध्येऽपि गच्छतां को दोष इति । तथा वेरजे वत्ति । वैराज्येऽपि ते ॥१३॥ साधवो विहारं कुर्वन्तु, परित्यक्तं हि तैः शरीरम्, सोढव्याः खलु साधुभिरुपसर्गा इति । पढमसमोसरणं ति । प्रथमसमवसरणं ४ वर्षाकालस्तत्र ब्रूते-किमिति प्रथमसमवसरणे शुद्धं वस्त्रादि न ग्राह्यम् ? द्वितीयसमवसरणेऽपि ह्युद्गमादिदोषशुद्धमिति गृह्यते, तत्को ऽयं विशेषः ? इति । तह णिइएसुत्ति । तथा नित्येषु नित्यवासिषु प्ररूपयति-नित्यवासे न दोषः, प्रत्युत प्रभूतसूत्रार्थग्रहणादि-18 लक्षणो गुण इति । तथा सुन्नत्ति । यद्यपकरणं न केनापि हियते ततः शून्यायां वसतौ को दोपः ? । अकप्पिये अत्ति । अक४ल्पिको गीतार्थस्तद्विषये व्रते-अकल्पिकेनानीतमझातोञ्छं किं न भुज्यते ?,तस्थाज्ञातोञ्छतया विशेषतः परिभोगार्हत्वात् । संभोएत्ति। लसंभोगे ब्रते--सर्वेऽपि पञ्चमहाव्रतधारित्वेन साधवः सांभोगिका इति । ॥६॥अकप्पिए अत्ति विशिष्य विवृणोति । किं वत्ति । किंवत्-केन प्रकारेणाकल्पिकेनागीतार्थन गृहीतं प्रासुकमज्ञातोञ्छमपि अभोज्यमपरिभोक्तव्यं भवति। को वा कल्पिकेन अत्र गाथायां सप्तमी तृतीयार्थे, गृहीते गुणो भवति ? नैव कश्चिद् उभयत्रापि शुद्ध्यविशेषात् ॥ ७॥ संभोएत्ति व्याचष्टे % Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१४॥ सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-५ ॥१४॥ 12-ARIGOROC4% पंचमहब्वयधारित्ति। पञ्चमहाव्रतधारिणः सर्वे श्रमणाः किं नैकत्र भुञ्जते? यदेके सांभोगिका अपरे चासांभोगिकाः क्रियन्ते ६ इति । इत्येवमुपदर्शितप्रकारेणानालोचितगुणदोषो यथाछन्दः,चरणे चरणविषये वितथवादी। अत उर्ध्व तु गतिषु वितथवा| दिनं वक्ष्यामि-खेत्तं गओ यत्ति । स यथाछन्दो गतिष्वेवं प्ररूपणां करोति-'एगो गाहावई तस्स तिण्णि पुत्ता । ते सव्वे वि खिक्कम्मोवजीविणो पियरेण खित्तकम्मे णिओइया। तत्थेगो खित्तकम्मं जहाणत्तं करेइ । एगो अडवि गओ देसं देसेण हिंडइ इत्यर्थः, एगो जिमिउं देवकुलादिसु अच्छति । कालंतरेण तेसि पिया मओ । तेहिं सव्वंपि पितिसंतियं ति काउं समं विभत्तं । तेसिं जं एक्केणं उवजिअं तं सव्वेसिं सामन्नं जायं । एवं अम्हं पिया तित्थयरो तस्संतिओवदेसेणं सब्वे समणा कायकिलेसं कुव्वंति । अम्हे ण करेमो जं तुम्भेहिं कयं तं अम्हं सामन्नं । जहा तुम्भे देवलोगं मुकुलपञ्चायाति वा सिद्धिं वा गच्छह तहा अम्हे वि गच्छिस्सामात्ति।" भएको गाथापतिः। तस्य त्रयः पुत्राः।ते सर्वेऽपि क्षेत्रकर्मोपजीविनः पित्रा क्षेत्रकर्मणि नियोजिताः। तत्रैकः क्षेत्रकर्म यथाऽऽज्ञप्तं करोति । | एकोऽटवीं गतो देशदेशान्तरेषु भ्रमति । एको जिमित्वा देवकुलादिषु तिष्ठति । कालान्तरेण तेषां पिता मृतः । तैः सर्वमपि पितृसत्कमिति कृत्वा समं विभक्तम् । तेषां यदेकेनोपार्जितं तत्सर्वेषां सामान्य जातम् । एवमस्माकं पिता तीर्थकरः,तत्सत्कोपदेशेन सर्वे श्रमणाः कायक्लेशं कुर्वन्ति । वयं न कुर्मः। यद युष्माभिः कृतं तदस्माकं सामान्यम् । यथा यूयं देवलोकं सुकुलप्रत्यायाति सिद्धिं वा गच्छथ,तथा वयमपि गमिष्याम इति ] एष गाथाभावार्थः। अक्षरयोजनिका त्वियम्-एकः पुत्रःक्षेत्रं गतः। एकोऽटवी देशान्तरेषु परिभ्रमतीत्यर्थः। अपर एकस्तत्रैव संतिष्ठते । पितरि च मृते धनं सर्वेषामपि समानम् । एवमत्रापि मातापितृस्थानीयस्तीर्थकरः,क्षेत्र क्षेत्रफलं धनं पुनर्भावतः परमार्थतः सिद्धिस्तां ययमिव युष्मदुपाजनेन वयमपि गमिष्याम इति । तदेवं यथाछन्दस्याप्युत्सूत्रप्ररूपणा -मर548 Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 84 धर्मपरीक्षा % ॥१५॥ सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-५ ॥१५॥ व्यवस्थादर्शनात्कथमेवमर्वाग्दृशा निर्णीयते यदुत मार्गपतितस्य यथाछन्दस्य कस्यचिदनाभोगादेवोत्सूत्रभाषणम्, तच्च नानन्तसंसारकारणम्, उन्मार्गपतितानां तु सर्वेषामाभोगवतामनाभोगवतां वा तदनन्तसंसारकारणमेव, तीर्थोच्छेदाभिप्रायमूलत्वादिति, साध्वाचारोच्छेदाभिप्रायस्य यथाछन्देऽप्यविशेषात् । अथ-"उम्मग्गमग्गसंप-द्विआण साहण गोअमा नृणं (१) । संसारो अ अणंतो, होइ य सम्मग्गणासीणं ।" [उन्मार्गमार्गसंपस्थितानां साधूनां गौतम? नूनम् (१) । संसारश्चानन्तो भवति सन्मार्गनाशिनाम् ॥] इति गच्छाचारप्रकीर्णकवचनबलादुन्मार्गपतितानां निहवानामनन्त एव संसारो ज्ञायते न तु यथाछन्दानामपि, अपरमार्गाश्रयणाभावादिति चेद । उन्मार्गपतितो निह्नव एवेति कथमुद्देश्यनिर्णयः ? साधुपदेन शाक्यादिव्यवच्छेदेऽपि यथाछन्दादिव्यवच्छेदस्य कतुमशक्यत्वात्, PIगुणभेदादिनेव क्रियादिविपर्यासमूलकदालम्बनप्ररूपणयाऽप्युन्मार्गभवनाविशेमाद । न हि 'मार्गपतित' इत्येतावता शिष्टाचारनाशको यथाछन्दादिरपि नोन्मार्गगामी । अथ यथाछन्दादीनामप्युन्मार्गगामित्वमिष्यते एव,न त्वनन्तसंसारनियमः, तन्नियमाभिधायकवचने ४ उन्मार्गमार्गसंप्रस्थितपदेन तीर्थोच्छेदाभिप्रायवत एव ग्रहणादिति चेद् । अहो किंचिदपूर्व युक्तिकौशलम् ! यदुक्तवचनबलात्तीर्थोच्छेदा-1 भिप्रायवतां निहवानामनन्तसंसारनियमसिद्धौ पदविशेषतात्पर्यग्रहः, तस्मिंश्च सति तत्सिद्धिरित्यन्योन्याश्रयदोषमापतन्तं न वीक्षसे ।। ४ संप्रदायादीडशोऽर्थो गृहीत इति न दोष, इति चेद् । न, संप्रदायादध्यवसायं प्रतीत्य निवानामपि संख्यातादिभेदभिन्नस्यैव संसारस्य सिद्धत्वाद्, उन्मार्गमार्गप्रस्थितानां तीवाध्यवसायानामेव ग्रहणे बाहुल्याभिप्रायेण वा व्याख्याने दोषाभावाद् । न चेदेवं तदा 'वयमेव सृष्टिस्थित्यादिकारिणः' इत्याधुसूत्रभाषिणोऽनवच्छिन्नमिथ्यात्वसन्तानपरमहेतोस्तीर्थोच्छेदाभिप्रायवतो बलभद्रजीवस्याप्यनन्तसंसारोत्पत्तिः प्रसज्येत । न चैतदशास्त्रीयं वचनम्,त्रिषष्टीयनेमिचरित्रेप्येवमुक्तत्वात् । तथाहि॥ प्रतिपद्य तथा रामो, जगाम भरतावनौ । Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ का तथैव कृत्वा ते रूपे, दर्शयामास सर्वतः ॥१॥ एवमूचे च भो लोकाः, कृत्वा नौ प्रतिमाः शुभाः। प्रकृष्टदेवताबुद्धया, धर्मपरीक्षा ली यूयं पूजयतादरात् ।। २॥ वयमेव मतः सृष्टि-स्थितिसंहारकारिणः । वयं दिव इहायामो, यामश्च स्वेच्छया दिवम् ।। ३ ॥ निर्मिता दामविपणा ॥१६॥ द्वारकाऽस्माभिः, संहृता च यियामुभिः । कर्ता हर्ता च नान्योऽस्ति, स्वर्गदा वयमेव च ॥ ४॥ एवं तस्य गिरा लोकः, सर्वो ग्रामपु- RI॥ स्वोपज्ञ | रादिषु । प्रतिमाः कृष्णहलिनोः, कारं कारमपूजयन् ॥ ५ ॥ प्रतिमार्चनकर्तृणां, महान्तमुदयं ददौ । स सुरस्तेन सर्वत्र, तद्भक्तोऽ-BI Bावृत्तिः॥ भूजनोऽखिलः" ॥ ६ ॥ इति ॥ ननु बलभद्रस्योत्सूत्रवचनमिदं न स्वारसिकमतो न नियतम्, नियतोत्सूत्रं च निवत्वकारणम्, अत | गाथा-६ एवापरापरोत्सूत्रभाषिणां यथाछन्दत्वमेव, नियतोत्सूत्रभाषिणां च निह्नवत्वमेव । तदुक्तमुत्सूत्रकन्दकुद्दालकृता--"तस्मादनिय- ॥१६॥ | तोत्सूत्रं, यथाछन्दत्वमेषु न । तदवस्थितकोत्सूत्रं, [अनवस्थितकोत्सूत्रं] निह्नवमुत्वपस्थितम् ॥१॥" इति । एतदेव च नियमतोऽन न्तसंसारकारणम् । अत एव यः कश्चिद् मार्गपतितोऽप्युत्सूत्रं भणित्वाऽभिमानादिवशेन वोक्तवचनं स्थिरीकर्तुं कुयुक्तिमुद्भावयति, न | पुनरुत्सूत्रभयेन त्यजति, स ान्मार्गपतित इवावसातव्यः, नियतोत्सूत्रभाषित्वात्, तस्यापरमार्गाश्रयणाभावेऽपि निवस्येवासदाग्रह वादित्यम्मन्मतमित्याशङ्कायामाहणियउस्सुत्तणिमित्ता, संसाराणंतया ण सुत्तत्ता। अज्झवसायाणुगओ, भिन्नो च्चिय कारणं तीसे ॥६॥ द्वितीयसमवसरणेऽपीति-ऋतुबद्धकालेऽपि । यथाछन्दस्येति-यथाछन्दसामान्यस्य । मार्गपतितस्येति-मार्गस्थितस्येत्यर्थः । तदिति-उत्सूत्रभाषणम् । तीर्थोच्छेदामिप्रायमूलत्वादिति-तीर्थध्वंसविषयकेच्छामूलकत्वादिति भावः । यथाछन्दादिव्यवच्छेदस्य कर्तुमशक्यत्वादिति-यथाछन्देष्वपि साधुलिङ्गस्य सत्त्वात् पदविशेषतात्पर्यग्रह इति-उन्मार्गसंप्रस्थितरूपपदविशेषस्य तीर्थोच्छेदकाभिप्रायवत्स्वेव तात्पर्य इति ग्रहो ज्ञानं इति भावः । ८ तस्मिश्च सतीति-तादृशतात्पर्यग्रहे च सति । तरिसद्धिरिति-तनियमसिद्धिः । ACC436AAAAA ABf Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * * धर्मपरीक्षा ॥१७॥ सटिप्पणा ॥ स्वोपन वृत्तिः ॥ गाथा-६ ॥१७॥ * [नियतोत्सूत्रनिमित्ता संसारानन्तता न मत्रोक्ता अध्यवसायोऽनुगतो भिन्न एव कारणं तस्याः ॥६॥] णियउस्सुत्तत्ति। नियतोत्सूत्रं निमित्तं यस्यां सा तथा, संसारानन्तता न सूत्रोक्ता, नियतोत्सूत्रं विनापि मैथुनप्रति| सेवाद्युन्मार्गसमाचरण-तद्वन्दनादिनाऽप्यनन्तसंसाराजनेन व्यभिचारात्। न चोत्सूत्रभाषणजन्येऽनन्तसंसारार्जने नियतोत्सूत्रभाषणस्यैव । हेतुत्वान्न दोषः, तादृशकार्यकारणभावबोधकनियतमूत्रानुपलम्भाद्। 'उस्सुत्तभासगाणं,बोहीणासोअणंतसंसारो (उत्सूत्रभाषकाणां बोधिनाशोऽनन्तसंसारः!!) इत्यादिवचनानां सामान्यत एव कार्यकारणभावग्राहकत्वाद। उत्तरकालं तत्र नियतत्वाख्यो विशेषः कल्प्यते इति चेद्, नैतदेवम् , तथा सति यथाछन्दस्य कस्याप्यनन्तसंसारानुपपत्तिप्रसक्तेः, तस्य स्वदभिप्रायेणापरापरभावेन गृहीतयुक्तोत्सूत्रस्य नियतोसूत्रभाषित्वाभावात् । तथा च-"सवप्पवयणमारं, मूलं संसारदुक्खमुक्खम्स । समत्तं मइलिता, ते दुग्गइवड्या हुंति ॥१॥" (सर्वप्रवचनसारं मूलं संसारदुःखमोक्षस्य । सम्यक्त्वं मलिनयित्वा ते दुर्गतिवर्द्धका भवन्ति ॥१॥) इत्यादिभाष्यवचनविरोधः । अथ a यथाछन्दस्यापि यस्यानन्तसंसारार्जनं तस्य क्लिष्टाध्यवसायविशेषादेव, उन्मार्गपतितस्य निवस्य तु नियतोसूत्रभाषणादेवेति न दोष इति चेद् । न,एवं सत्यनियतहेतुकत्वप्रसङ्गान् । “अनियतहेतुकत्वं अहेतुकत्वं नाम" इति व्यक्तमाकरे । तथा च विप्रतिपन्न उन्मार्गस्थोऽनन्तसंसारी, नियतोत्सूत्रभाषित्वाद्, इत्यत्राप्रयोजकत्वम् । किं तर्हि अनन्तसमारतायामनुगतं नियामकमित्यत्राह-तस्याः संसारानन्ततायाः, कारणं भिन्न एवानुगतोऽध्यवसायस्तीव्रत्वसंज्ञितः, केवलिना निश्चीयमानोऽस्तीति गम्यम् । यस्य संग्रहादेशात्स्वातंत्र्येणैव तस्यामनुगतं हेतुत्वम्, व्यवहारादेशाच क्रियाविशेष सहकारित्वं घटकल्वं वा । शन्दमात्रानुगततीत्राध्यवसायसहकतायास्तत्पूर्विकाया वा पापक्रियाया अनन्तसंसारहेतुत्वव्यवहारात् । स च तीवाव्यवसाय आभोगवतामनाभोगवतां वा शासनमालिन्य * - - *** - Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - धर्मपरीक्षा ॥१८॥ सटिप्पणा || खोपज्ञ वृत्ति. ॥ | गाथा-६ ॥१८॥ - - निमित्त प्रवृत्तिमतां रौद्रानुबन्धानां स्याद्, अनाभोगेनापि शासनमालिन्यप्रवृत्तौ महामिथ्यात्वार्जनोपदेशात् । तदुक्तमष्टकप्रकरणे"यः शासनभ्य मालिन्ये-ऽनामीगेनापि वर्तते। स तन्मिथ्यात्वहेतुत्वा-दन्येषां प्राणिनां ध्रुवम् ॥१॥ बध्नात्यपि तदेवालं, परं संसारकारणम् । विपाकदारुणं घोरं, सर्वानर्थनिवन्धनम्।।२।।"(२३अ०)शासनमालिन्यनिमित्तप्रवत्तिश्च निवानामिव यथाछन्दादीनामप्य. विशिष्टेति कोऽयं पक्षपातः? यदुत निहवानामनन्तसंसारनियम एव, यथाछन्दादीनां त्वनियम इति। अनाभोगेनापि विषयविशेषद्रोहस्य विषमविपाकहेतुत्वाद् . अनियतोत्सूत्रभाषणस्य निःशङ्कताऽभि यञ्जकतया सुतरां तथाभावात् । यथा ह्याभोगेनोत्सूत्रभाषिणां रागद्वेषो. कांदतिसंक्लेशस्तथाऽनाभोगेनोत्सूत्रभाषिणामप्यप्रज्ञापनीयानां मोहोत्कर्षादयं भवन्ननिवारित एव । अत एव तेषां भावशुद्धिरप्यप्रमाणम्, मार्गाननुसारित्वात् ।तदुक्तमष्टकप्रकरणे-"भावशुद्धिरपि ज्ञेया, यैषा मार्गानुसारिणी । प्रज्ञापनाप्रियाऽत्यर्थ, न पुन: स्वाग्रहात्मिका ॥ १ ॥ रागो द्वेषश्च मोहश्च, भावमालिन्यहेतवः । एतदुत्कर्षतो ज्ञेयो, हन्तोत्कर्षोऽस्य तत्त्वतः ॥२॥ तथोत्कृष्टे च सत्यसिन्, शुद्धिर्व शब्दमात्रकम् । स्वबुद्धिकल्पनाशिल्प-निर्मितं नार्थवद् भवेदं।।३॥(२२ अ०)इति" किं च-पार्थस्थादीनां नियतोत्सूत्रमप्यूद्युक्तविहारिणामपवादलक्षणं द्वितीयबालतानियामकमस्त्येव । यदाचारसूत्रम्-"सीलमंता उवसंता संखाए रीयमाणा असीला अणुवयमाणस्स बितिया मन्दस्स बालया । णिअट्टमाणा वेगे आयारगोयरमाइक्खंति नागभट्ठा दंसणलूसिणोत्ति " एतद वत्तिर्यथा- शीलमष्टादशशीलाङ्गसहस्रसंख्यम्, यदि वा महाव्रतसमाधानं पञ्चेन्द्रियजयः कषायनिग्रहस्त्रिगुप्तिगुप्तता चेत्येतच्छीलं विद्यते येषां ते शीलवन्तः । तथोपशान्ताः , कषायोपशमाद् । अत्र शीलवद्वहणेनैव गतार्थत्वात | 'उपशान्ताः' इत्येद्विशेषणं कषायनिग्रहप्राधान्यख्यापनार्थम् । सम्यक् ख्याप्यते प्रकाश्यतेऽनयेति संख्या-प्रज्ञा तया रीयमाणाः - - Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ १९ ॥ संयमानुष्ठानेन पराक्रममाणाः कस्यचिद्विश्रान्तभागधेयतया 'अशीला एते' इत्येवमनुवदतो अनु पश्चाद् वदतः पृष्ठतोऽपवदत्तः, अन्येन वा मिथ्यादृष्ट्यादिना कुशीलाः इत्येवमुक्तेऽनुवदतः पार्श्वस्थादेर्द्वितीयैषा मन्दस्याज्ञस्य बालता - मूर्खता । एकं तावस्वतश्चारित्रापगमः पुनरपरानुकविहारिणोऽपवदतीत्येषा द्वितीया बालता । यदि वा शीलवन्त एते, उपशान्ता वा ' इत्येवमन्येनाभिहिते 'क्वैषां प्रचुरोपकरणानां शीलवतोपशान्तता वा' इत्येवमनुवदतो हीनाचारस्य द्वितीया बालता भवतीति । अपरे तु वीर्यान्तरामोदयात्वतोऽवसीदन्तोऽप्यपरसाधुप्रशंसान्विता यधावस्थितमाचारगोचरमावेदयेयुरिति, एतद्दर्शयितुमाह- णिअट्टमाणा इत्यादि । एके कर्मोदयात्संयमान्निवर्तमाना लिङ्गाद्वा वाशब्दादनिवर्तमाना वा यथावस्थितमाचारगोचरमाचक्षते । 'वयं तु कर्तुमसहिष्णवः, आचारस्त्वेवम्भूतः इत्येवं वदतां तेषां द्वितीयबालता न भवत्येव । न पुनर्धदन्ति एवंभूत एव आचारो योऽस्माभिरनुष्ठीयते, साम्प्रतं दुःषमानुभावेन बलाद्यपगमान्मध्यमभूतैव वर्तिनी श्रेयसी नोत्सर्गावसर इति । उक्तं हि - " नात्यायतं न शिथिलं, यथा युञ्जीत सारथिः । तथा भद्रं वहन्त्यश्वा योगः सर्वत्र पूजितः ॥ १ ॥" अपि च - " जो जत्थ होइ भग्गो, ओगासं सो परं अविन्दतो । गंतु तत्थ वयंतो, इमं पहाणंति घोसे ||२||" इत्यादि (यो यत्र भवति भग्नोऽवकाशं स परमविन्दमानः । गन्तुं तत्र ब्रजन् इदं प्रधानमिति घोपयति ।। ) किंभूताः पुनः ? एतदेव समर्थयेयुरित्याह- नाणभट्टा । सदसद्विवेको ज्ञानं तस्साष्टद्धा ज्ञानभ्रष्टाः । तथा दंसणलूसिणोत्ति । सम्यग्दर्शन विध्वंसिनोऽसदनुष्ठानेन खतो विनष्टाः, अपरानपि शङ्कोत्पादनेन सन्मार्गाच्च्यावयन्तीति । तथा च संविनपाक्षिकातिरिक्तस्य पार्श्वस्थादेरपि द्वितीय बालता नियामकनियतोत्सूत्रसद्भावात् तस्यानन्तसंसारानियमान्निन्हवस्यापि तदनियम एव भवभेदस्य भावभेदनियतत्वादिति प्रतिपत्तव्यम् || ६ | सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-६ ॥१९॥ Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ +ACCR सटिप्पा धर्मपरीक्षा ॥२०॥ 1-73% टिक सामान्यत पवेति-अनन्तसंसारस्वोत्सूत्रभाषणस्वसामान्ययोरेवेति, अत्र चैवकारेण विशेषकार्यकारणभावस्य व्यवच्छेदादिति भावः । तत्रेति-उत्सूत्रभाषणे । अनियतहेतुकत्वप्रसङ्गादिति-उपलक्षणं तेनानन्तसंसारत्वस्य कार्यमात्रवृत्तिजातितया तस्य कार्यतावच्छेदकत्वनियमेन "यद्विशेषयोः कार्यकारणभावः तस्सामान्ययोरपि” इति न्यायात् तदवच्छिन्नं प्रति कस्यचिदेकस्य कारणस्वरूपनस्यावश्यकस्वादित्यर्थः । अप्रयोजकत्वमिति-नियतोत्सूत्रभाषित्वमस्तु अनन्तसंसाहित्वं तु मास्तु इति विपझे बाधकरूपप्रयोजकाभावात् ॥ न च निरुपाधिस्वमेवप्रयोजकत्वमस्त्विति वाच्यम्, अध्यवसायविशेषस्यै वो- ॥ खोपन्न पावित्वात् । नियामकं-कारणम् । ननु तीवाध्यवसायसहकृतायास्तापाबकाया वा पापक्रियाया अनन्तसंसारहेतुस्वमुक्तं, तच्चासत, उभयपक्षेपि तादृशाध्य | वृत्तिः ॥ बसायसहकृतपापक्रियायाः पापक्रियासहकृततादृशाववसायस्य वा तादृशाध्यवसायपूर्विकायाः पापक्रियायाः पापक्रियापूर्वकतारशाध्यवसायस्य वा इत्यत्रात गाथा-६ विनिगमनाविरहेण गुरुभूतद्वयहेतुत्वस्वीकारेण गौरवात् । इति चेन्न, वाकारस्यानुक्तसमुच्चयार्थकस्वीकारेण तादृशाध्यवसायस्य पापक्रियायाश्च स्वातन्त्र्येणैव ॥२०॥ हेतुत्वस्वीकारात् । ननु स तीब्राल्यवसायः केषां भवतीत्याह स चेति-शासनेत्यादीति-शासनस्य-जिनप्रवचनस्य मालिन्यं लोकविरुद्धाचरणेनोपघातः तस्य निमित्तभूता या प्रवृत्तिः सा च येषामस्ति तेषां । अनाभोगेनापि किंपुनराभोगेनेत्यर्थः । शासनमालिन्यप्रवृत्तौ-शासनमालिन्यप्रवृत्तिनिमित्तेति महामिथ्यात्वार्जनेति-महामिथ्यात्वप्राप्तिरिति । तथा च शासनमालिन्यप्रवृत्तेर्महामिथ्यात्वहेतुत्वादिति भावः। उक्तार्थे पूर्वाचार्यसंमतिमाह-तदुक्तमित्यादिना-य इति-अयंभावः-यः कोपि श्रमणादिः शासनस्य जिनप्रवचनस्य मालिन्ये लोकबिरुद्धाचरणेनोपघातेऽनाभोगेनापि-अज्ञानेनापि किं पुनराभोगेन वर्त्तते व्याप्रियते स पूर्वोक्तः प्राणी तेन जिनशासनमालिन्येन करणभूतेन मिथ्यात्वहेतुः-विपरितबोधजनक इति तन्मिथ्यात्वहेतुः तस्य तत्त्वम् । अथवा तस्मिन् जिनशासनविषयकमिथ्यात्वहेतुत्वं मिथ्यात्वभावजनकत्वं, तस्मात् तन्मिथ्यात्वहेतुत्वात्, केषां अन्येषां स्वात्मन्यतिरिक्तानां-ये हि तस्यासदाचारेण परमपवित्रं जिनशासनं हीलयन्ति तेषाम्, प्राणिनां जीवानां, ध्रुवं अवश्यतया, बध्नात्यपि स्वात्मप्रदेशेषु सम्बन्धयस्यपि, न केवलं तेषां तजनयति तदेव मिथ्यात्वमोहनीय कमैंव यदन्यप्राणिनां जनितं न त्वन्यच्छुभं कर्मान्तरम् । अलं अत्यर्थ निकाचनादिरूपेण, परं संसारकारणं भवहेतुं, विपाकदारुणं विपाके विपाकविषये दारुणं तीवरस, घोरं भयानकं नाममात्रेणापि दुःखदायक, सर्वानर्थनिबन्धनं निखिलप्रत्यूहजनकं, सर्वानविवर्धनमिति पाठे तु सर्व प्रत्यूह विशेषेण वर्धयति निखिलप्रत्यूहानां परम्पराजनकमिति यावत् । ननु मिथ्यात्वप्रकृतेरेव मिथ्यात्वहेतुकरवाद् सम्यग्दृष्टिः A 4%95 C Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ २१ ॥ कथं मिथ्यात्वं बध्नाति ?, अन्रोच्यते, शासनमालिन्योत्पादनावसरे मिथ्यात्वोदयान्मिथ्यादृष्टिरेवासावतो मिध्यात्वबन्ध इति । अभिव्यञ्जकतया उत्पाद कतया । तथाभावात् विषमविपाक हेतुत्वात् । अयमिति अतिसंक्लेशः, अनिवारित एव निवारयितुमशक्य एव । अत एव मोहोत्कर्षादेव । उक्तार्थ पूर्वाचार्यसम्मतिमाह भावशुद्धीत्यादिना - अर्थवेवं, भावशुद्धिः मनसोऽसंक्लिश्यमानता या परौर्विरुद्रदानादौ धर्मव्याघातपरिहारनिबन्धनतया कल्पिता साऽपि न केवलं धर्मव्याघात एव शेय इति अपि शब्दार्थ, ज्ञेया ज्ञातव्या या एषा वक्ष्यमाणस्वरूपा नाम्या, तामेवाह, मार्गे जिनोक्तं ज्ञानादिकं मोक्षपथमनुसरत्यनुगच्छत्येवं शीला मार्गानुसारिणी, अथ परो ब्रूयात्, सैषा ममेत्याह, प्रज्ञापना आगमार्थोपवेशनं सा प्रिया वल्लभा यस्यां भावशुद्धी सा प्रज्ञापनाप्रिया, अत्यर्थ अतिशयेन, उक्तस्यैवार्थस्य व्यतिरेकमाह, न नैव, पुनःशब्दः पूर्वोक्तार्थापेक्षया प्रकृतार्थस्य विलक्षणताप्रतिपादनार्थः स्वः, स्वकीयो न तु शास्त्रीयः, स चासावाग्रहश्वार्थाभिनिवेशः स्वाग्रहः स एवात्मा स्वभावो यस्याः सा स्वाग्रहारिमकेति ॥ १॥ अथ कस्मात् स्वाग्रहात्मिकापि भावशुद्धिर्न भवतीति ?, अश्रोच्यते, भावशुद्धि विपर्यय भूतभावमालिन्यरूपत्वात् स्वाग्रहस्येत्येतदेव दर्शयन्नाह, रागेत्यादिना रागोऽभिव्यङ्गलक्षणः, द्वेषोऽप्रीतिरूपः, मोहश्च अज्ञानलक्षणश्च चशब्दौ समुच्चयार्थी, एते त्रयोऽपि भावमालिन्य हेतवः आत्मपरिणाम शुद्धिनिबन्धनानि स्वाग्रहादिभाव कारणानीति गर्भः, एतेषां रागादीनां उत्कर्ष उपचय इति एतदुस्कर्ष:, तस्माद् एतदुत्कर्षतः, ज्ञेयो ज्ञातव्यः हन्त इति प्रत्यवधारणार्थः कोमलामन्त्रणार्थीवा, उत्कर्ष उपचयः, कस्येत्याह, भावमालिन्यस्य स्वाग्रहादिरूपस्य तत्त्वतः परमार्थवृस्येति ॥ २ ॥ ततः किमित्याह । तथा तेन प्रकारेण रागाद्युत्कर्षलक्षणेन, उत्कृष्टे उस्कटे, चशब्दः पुनरर्थः, सति भवति, अस्मिन् रागादिहेतुके स्वाग्रहादिरूपे भावमालिन्ये, शुद्धिः शुद्धत्वम्, भावस्येति गम्यते, वैशब्दो वाक्यालङ्का रार्थः शब्द एवाभिधानमेव शब्दमात्रं तदेव कुत्सितमेव शब्दमात्रकं निरभिधेयमित्यर्थः, मालिन्योत्कर्षे सति नास्ति भावशुद्धिर्नालिन्यस्य तद्विरुद्वस्वरूपत्वादद्मिसद्भावे शीतवदिति भावना । अथ मालिन्ये सत्यपि शुद्धिरिष्यते ततः कथं शब्दमात्रत्वमस्या इत्यत्राह स्वबुद्धया प्रमाणापरतन्त्रया मत्या, कल्पना क्लृप्तिः, सेव शिल्पं चित्रादिकौशलं, तेन निर्मितं विरचितं स्वबुद्धिकल्पनाशिल्पनिर्मित ग्रच्छदरूपं तदिति गम्यम्, न नैव, अर्थवत् साभिधेयम्, भवेत् जायेतेति । अपवादलक्षणमिति - अपवदतीत्येवंस्वरूपम् । संविग्नपाक्षिकातिरिक्तस्येति विशेषणस्य स्वरूपोपधायकत्वम् । नियामकेति द्वितीयबालता नियतोत्सूत्रसद्भावात् तस्य तादृशपार्श्वस्यादेः, तदनियम एव अनन्तसंसारस्य नियमाभाव एव अविशेषादिति शेषः । भवभेदस्य संख्यासंख्यानन्तभवविशेषस्य । भावभेदनियतत्वात् - अध्यवसाय विशेषव्याप्यत्वात् ॥ ६ ॥ सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा- ६ ॥२१॥ Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२२॥ 45-5-155 - 5 सटिप्पणा P॥ खोपज्ञ | वृत्तिः ॥ गाथा-७ ॥२२॥ A-TECIA-A-ARAIGA%% ननु कर्म तावदुत्कर्षतोऽप्यसख्येयकालस्थितिकमेव बद्ध्यते, तत्कथं तीव्राध्यवसायवतामप्युत्सूत्रभाषिणामनन्तसंसारित्वं स्वाद् ? इत्याशङ्कायामाह-- . कम्म बन्धइ पावं, जो खलु अणुवरयतिव्वपरिणामो । असुहाणुबन्धजोगा, अणंतसंसारिआ तस्स ॥७॥ [कर्म बध्नाति पापं यो खल्वनुपरततीव्रपरिणामः। अशुभानुबन्धयोगादनन्तसंसारिता तस्य ॥७॥] कम्मति । कर्म बन्धाति पापं यः खल्वनुपरततीव्रपरिणामः-अविच्छिन्नतथाविधसक्लिष्टाध्यवसायः स्वेच्छानुरोधात्रिय| तास्रवप्रवृत्तो वाऽनियतास्रवप्रवृत्तीवा नियतोत्सूत्रभापी वाऽनियतोत्सूत्रभाषी वाऽप्राप्तानुशयः,तस्याशुभानां ज्ञानावरणीयादिपापप्रकतीनां,अनुबन्धस्य उत्तरोत्तरवृद्धिरूपस्य बध्यमानप्रकृतिषु तज्जननशक्तिरूपस्य वा योगात्सम्बन्धादनन्तसंसारिता भवति । ग्रन्थिमे दात्प्रागप्यनन्तसंसाराजनेऽशुभानुबन्धस्यैव हेतुत्वात्प्राप्तसम्यग्दर्शनानामपि अतिपातेन तत एवानन्तसंसारसंभवात् । तदुक्तमुपदेशपदे ला "गंठीइ(ओ)आरओ वि हु, असई बंधोण अन्नहा होइ। ता एसो वि हु एवं,णेओ असुहाणुबन्धोति॥१॥"(ग्रन्थेरारतोऽपि खलु असकृद् बन्धो नान्यथा भवति। तत एपोऽपि खल्वेवं ज्ञेयोऽशुभानुबन्ध इति ।) ततश्च बन्धमात्रानानन्तसंसारिता, किन्त्वनुबन्धादिति स्थितम् । | अत एवाभोगादनाभोगाद्वोत्सूत्रभाषिणामपीह जन्मनि जन्मान्तरे वाऽऽलोचितप्रतिक्रान्ततत्पातकानामनुबन्धविच्छेदानानन्तसंसारिता, केवलमनन्तभववेद्यनिरुपक्रमकर्मबन्धे तन्निःशेषतां यावत्प्रायश्चित्तप्रतिपत्तिरेव न स्याद् , अध्यवसायविशेषाद् । नियतोपक्रमणीयस्वभावकर्मवन्धे चेह जन्मनि जन्मान्तरे वा प्रायश्चित्तप्रतिपत्तिः स्यात् । अत एव जमालिशिष्यादीनां भगवत्समीपमुपगतानां तद्भव एवोत्सूत्रभाषणप्रायश्चित्तप्रतिपत्तिः । कालीप्रभृतीनां च " तस्स ठाणस्स अणालोइअअपडिकंता कालमासे कालं किच्चा०" [तस्य 5 Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा । खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-७ ॥२३॥ स्थानस्यानालोचिताप्रतिक्रान्ता कालमासे कालं कृत्वा०] इत्यादिवचनात् तद्भावानालोचितपार्श्वस्थत्वादिनिमित्तपापानां भवान्तर एवं धर्मपरीक्षा प्रायश्चित्तप्रतिपत्तिः। “कालीणं भंते! देवी ताओ देवलोगाओ अणंतरं उच्चहित्ता कहिं गच्छिहिति? कहिं उववजिहिति? । गोयमा! Pमहाविदेहवासे सिज्झिहिति ॥" [काली भगवन् देवी तस्माद्देवलोकादनन्तरमुत्वृत्य कस्यां (गतौ) गमिष्यति, कस्यामुत्पत्स्यते ? । गौतम महाविदेहवर्षे सेत्स्यतीति ॥] इत्यादिवचनात्तासां भवान्तर एवं पूर्वभवाचीर्णपार्श्वस्थत्वादिजातपापकर्मप्रायश्चित्तभणनात् ।"सव्वा दाबि हु पन्वज्जा पायच्छित्तं भवंतरकडाणं पाषाणं कम्माणं " [सर्वाऽपि खलु प्रव्रज्या प्रायश्चित्तं भवान्तरकृतानां पापानां कर्मणाम् । ] | इत्यादिपूर्वाचार्यवचनात्प्रव्रज्याया एव भवान्तरकृतकर्मप्रायश्चित्तरूपत्वाद् । एतेन 'कृतस्य पापस्य प्रायश्चित्तप्रतिपत्तिस्तस्मिन्नेव भरे भवति न पुनः जन्मान्तरेऽपि' इति वदन् तत्र “जावाउ सावझेसं” इत्यादिसम्मतिमुद्भावयन् व्यक्तामसंलग्नकतामनवगच्छन्निरस्तो बोध्यः । अथ पूर्वभवकृतपापपरिज्ञानाभावात्कुतस्तदालोचनम् ? कुतस्तरां च तत्प्रायश्चित्तम् ? इति चेत , न, एतद्भवकतानामपि विस्मृतानामिव पूर्वभवकृतानामपि पापानां सामान्यज्ञानेनालोचनप्रायश्चित्तसम्भवात् , अत एव मिथ्यात्वहिंसादेः पारभवि कस्यापि निन्दागर्दादिकम् ।" इहमवियमनभवियं, मिच्छत्तपवत्तणं जमहिगरणं । जिणपवयणपडिकुटुं, दुटुं गरिहामि तं पावं ॥१॥" द ईहभविकमन्यभविकं मिथ्यात्वप्रवर्तनं यदधिकरणम् । जिनप्रवचनप्रतिक्रुष्टं दुष्टं गहें तत्पापम् ॥ ] " इहं भवे अन्नेसु वा भवग्गह णेसु पाणांइवाओ कओ वा काराविओ वा कीरंतो वा परेहिं समणुण्णाओ तं निंदामि गरिहामि" [ इह भवे अन्येषु वा भवग्रहणेषु प्राणातिपातः कृतो वा कारितोषा क्रियमाणो वा परैः समनुज्ञातस्तं निन्दामि गहें ।] इत्यादि चतुःशरणप्रकीर्णकपाक्षिकसूत्रादावुक्तम् । पापप्रतिघातगुणबीजाधानसूत्रे हरिभद्रसूरिभिरप्येतद्भवसम्बन्धि भवान्तरसम्बन्धि वा पापं यत्तत्पदाभ्यां परामृश्य Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा खोपज्ञ वृत्तिः ।। गाथा-७ ॥२४॥ 5 मिथ्यादुष्कृतप्रायश्चित्तेन विशोधनीयमित्युक्तम् । तथाहि-"सरणमुवगओ अ एएसि गरिहामि दुक्कडं । जण्णं अरहंतसु वा सिद्धेसु वा धर्मपरीक्षा आयरिएमु वा उवज्झाएमु वा साहसु वा साहुणीसु वा अन्नेसु वा धम्मट्ठाणेमु माणणिज्जेसु पूअणिज्जेसु तहा माईसु वा पिईसु वा बन्धूसु वा मित्तेसुवा उवयारिसु वा ओहेण वाजीवेसु मग्गद्विएमु वा अमग्गट्ठिएसु वा मग्गसाहणेसु वा अमग्गसाहणेसु वा जं किंचि वितहमायरि ॥२४॥ ४ अशायरिअव्वं अणिच्छिअव्वं पावं पावाणुबंधि सुहुमं वा बायरं वा मणेणं वा वायाए वा कारणं वा कयं वा काराविरं वा अणुमोइअं | वा रागेण वा दोसेण वा मोहेण वा इत्थं वा जम्मे जम्मन्तरेसु वा गरहियमेयं दुक्कडमेयं उज्झियव्वमेअं वियाणि मए कल्लाणमित्तMगुरुभगवंतवयणाओ एवमेअंति रोइअं सद्धाए अरहंतसिद्धसमक्खं गरहामि अहमिणं दुकडमेअं उझियममेअं इत्थ मिच्छामि दुकडं ३॥"एतद्वयाख्या-यथा चतुःशरणगमनान्तरं दुष्कृतगर्दोक्ता,तामाह-शरणनुपगतश्च सन्नेतेषामहदादीनांगहें दुष्कृतम्। किंविशिष्टम् ? इत्याह-जण्णं अरहंतेसु वा इत्यादि । अहंदादिविषयमोघेन वा जीवेषु मार्गस्थितेषु-सम्यग्दर्शनादियुक्तेषु, अमार्गस्थितेषु-एतद्विपरीतेषु, मार्गसाधनेषु-पुस्तकादिषु, अमार्गसाधनेषु-खङ्गादिषु, यत्किचिद्वितथमाचरितम्-अविधिपरिभौगादि, अनाचरितव्यं क्रियया, अनेष्टव्यं मनसा, पापम् पापकारणत्वेन, पापानुबन्धि तथाविपाकभावेन, गर्हितमेतद कुत्साऽऽस्पदम्, दुष्कृतमेतद् धर्मबाह्यत्वेन, उज्झितव्यमेतद् हेयतया, विज्ञातं मया कल्याणमित्रगुरुभगवद्वचनाद, एवमेतद् इति रोचितं श्रद्धया-तथाविधक्षयोपशमजया, अर्हत्सिद्धसमक्षं गहें, कथम् ? इत्याह-दुष्कृतमेतद. उज्झितव्यमेतद् । अत्र व्यतिकरे 'मिच्छामिदुक्कडं' वारत्रयं पाठः । अथ हिंसादिकस्य पापस्य पारभविकस्यापि प्रायश्चित्तप्रतिपत्तिः स्यात, न तूलमूत्रभाषणजनितस्य उत्सूत्रभाषिणो निवस्य क्रियाबलाद्देवकिल्बिषिकत्वप्राप्तावपि तत्र निजकृतपापपरिज्ञानाभावेन - 4 -CAR Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -64 दुर्लभबोधित्वभणनाद् । यदागमः-लघृण वि देवत्तं, उनबन्नो देवकिब्धिसे । तत्थवि से न याणाइ, किं मे किच्चा इमं फलं ॥१॥ धर्मपरीक्षा दतत्तो वि से चइत्ता णं, लब्भिही एलमूअगं । गरगं तिरिक्खजोणि वा, बोही जत्थ मुदल्लहा ॥२॥ एतदत्तिर्यथा-लद्धृण वित्ति। 'सटिप्पणा ||२५|| लब्ध्वापि देवत्वं तथाविधक्रियापालनवशेनोपपन्नो देवकिल्बिषनिकाये, तत्राप्यसौ न जानाति विशुद्धावध्यभावात्, किं वृत्तिः ॥ | मम कृत्वेदं फलं किल्बिषिकदेवत्वमिति । अस्य दोषान्तरमाह-तत्तो वित्ति। ततोऽपि देवलोकादसौ च्युत्वा, लप्स्यते एडमू गाथा-७ कताम्-अजभवानुकारिमनुष्यत्वम्, तथा नरकं तिर्यग्योनि वा पारम्पर्येण लप्स्यते । योधिर्यत्र सुदुर्लभा-सकलसम्पत्तिनिव-टू 5 ॥२॥ न्धना यत्र जिनधर्मप्राप्तिर्दुरापा। इह 'प्रामोत्येडमकताम्' इति वाच्ये असकृद्भवप्राप्तिख्यापनार्थ 'लप्स्यते' इति भविष्यत्कालनिर्देश इति | चेत्, मैवम्, न हि तत्र निदव एवाधिकृतः किन्तु तपःस्तेनादिः "तव नेणे वय नेणे" इत्यादिपूर्वगाथैकवाक्यत्वात् तस्याप्युत्कृष्टफलप्र| दर्शनमेतत्, न तु सर्वत्र सादृश्यनियमः, अध्यवसायवैचित्र्यात् । किं चैवम्-"इय से परस्स अट्ठाए कूराई कम्माई वाले पकुव्वमाणे तेण दुक्खण संमृढे विपरियासमुवेह" [इति स परस्यार्थाय क्रूराणि कर्माणि बालः प्रकुर्वाणः तेन दुःखेन सम्मूढः विपर्यासमुपैति ] इत्याचाराङ्गवचनात्राणि कर्माणि परस्यार्थाय कुर्वतो हिताहितबुद्धयादिविपर्यासवतो हिंसादिदोषस्यापि भवान्तरे प्रायश्चित्तानुपपतिरेव स्यात् । अथ सर्वस्यैव पापस्य प्रमादेन कृतस्य विपर्यासाधायकत्वाद्विपर्यासजलसिच्यमानानां क्लेशपादपानां चानुबन्धफलत्वाद् भवान्तरेऽपि तथाभव्यताविशेषात्कस्यचिद्विपर्यासनिवृत्त्यैवानुबन्धनिवृत्तेहिंसादिप्रायश्चित्तोपपत्तिरिति चेत्, तदिदमुत्सूत्रप्रायश्चित्तेऽपि तुल्यम् । न चैवमुत्सूत्रभाषिणामनन्तसंसारानियमनात्ततो भयानुपपत्तिरिति शङ्कनीयम्, एकान्ताभावेऽपि बाहुल्योक्तफलापेक्षया हिंसादेखिोत्सूत्रादास्तिकस्य भयोपपत्तेः । आस्तिक्यं यसत्प्रवृत्तिभयनिमित्त मितिदिग ॥ ७॥ 49444444 -4-IX - Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1- धर्मपरीक्षा ल ॥२६॥ 94 सटिप्पणा । खोपज्ञ दृत्तिः ॥ गाथा-७ | ॥२६॥ टि० तत्कथमिति-तस्मात्कथम् । तीव्राध्यवसायवतामपीति-अजीवाध्यवसायबतां तु न स्यादेवेत्यपिशब्दार्थः । स्वेच्छानुरोधादिति-उपरजकं तादृशसंक्लिष्टाध्यवसायवतां तस्य नियमेन सत्वात् । बध्यमानप्रकृतिषु-बध्यमानकर्मपुद्गल विशेषेषु । तज्जननशक्तिरूपस्य-अनन्तसंसारजननशक्तिलक्षणस्य, ग्रन्थिमेदादिति कर्मविशेषजनितो महानिबिडरागद्वेषपरिणामः कर्कश निविडचिरप्ररूढगुपिलवक्रग्रन्थिवदुर्भेद्योऽमिनपूर्वो प्रन्थिः, तस्य भेदो नाम समुल्लसितप्रचुरदुर्निवारवीर्यप्रसरेण निशितकुठारधारयेव परमविशुद्धया समतिक्रमणम् स च केनचिद् महानुभागेनासनपरमनिर्वृतिसुखेनैव कतुं शक्य इति तस्मात् । प्रागति पूर्वकालेऽपि । प्रतिपातेन-नाशेन सम्यग्दर्शनस्येतिशेषः । तत एवेति-क्लुप्तहेतुताकाशुभानुबन्धादेव । अनन्तसंसारसम्भवात्-अनन्तसंसारमाप्तिसम्भवात्, तथा च क्लुप्तकार्यकारणभावेन निर्वाहेऽन्यकार्यकारणभावकरुपनायां प्रमाणाभावाद्, गौरवाञ्चेति भावः । उक्तार्थे पूर्वाचार्यसम्नतिमाहगठीइत्ति-अस्थायमर्थः-ग्रन्थेरुक्तस्वरूपात्, आरतोऽपि-तस्मिन्नमिन्ने सति किं पुनर्भिन्नग्रन्थौ, अशुभानुबन्धतोऽनन्तसंसार इत्यपिशब्दार्थः, हु खलु निश्चये, असकृद् अनन्तवारान्, बन्धो ज्ञानावरणादीनां कर्मणां स्वीकारः, न नैव, अन्यथाऽशुभानुबन्धं विना भवति, अनुरूपकारणप्रभवत्वात् सर्वकार्याणाम् । तत्-तस्मात्. पषोऽप्यसकृद्बन्धः, न केवलं यतोऽसौ प्रवृत्त इत्यपि शब्दार्थः, हु स्फुटम्, एवमशुभानुबन्धमूलत्वेन ज्ञेयोऽशुभानबन्ध इति, कार्यकारणयोर्मद्घटयोरिव कथञ्चिदभेदात् । तस्मात् कारणकृतस्य कार्यभूतस्य चाशुभानुबन्धस्य त्रोटने प्रयत्नो विधेय इति । अनुपदोक्कमेवार्थ स्पष्टयति ततश्चेति-तसाद्, बन्धमात्रात्-अशुभबन्धसामान्यात् । अनुबन्धादिति-अशुभानुबन्धात् । अत एव-अशुभानुबन्धादेवानन्तसंसारितासिद्ध सत्यव, यावदिति-मर्यादायामिति, तथा च केवलमनन्तभववेद्यनिरूपक्रमकर्मबन्धे सति न तूपक्रमणीयस्वभावकर्मबन्धे सतीति केवल शब्दार्थः, तनिःशेषतापर्यन्तं प्रायश्चित्तप्रतिपत्तिविषयकाध्यवसाय एव न भवति । एतेन पूर्वाचार्यवचनेन । जावाउ इति, "जावाउ सावसेसं, जाव य थेवो वि भस्थि ववसाओ। ताव करिजप्पहियं, मा ससिराया व सोचिहिसि" ॥१॥ इति भगवद्धस्तदीक्षितधर्मदासगणिकृतोपदेशमालीयगाथायाः "प्रमादो न कार्य" इत्येवार्थे तात्पर्यमिति । न तुइह भव एवं प्रायश्चित्तप्रतिपत्तिन तु भवान्तरे' इत्यर्थे तात्पर्यमिति भावः ॥ व्यक्कामसंलग्नकतामिति-स्पष्टामसङ्गतिम् निरस्तो बोध्य इति, भयमाशयः, अथ प्रमादो मा विधेय इत्यर्थे एव तात्पर्यम् न तु इहभवेत्याद्यर्थे इति कथं ज्ञातमिति चेद, न, सब्वावि ह पवजा इत्यादि पूर्वाचार्यवचनस्य इह भवेत्याचर्थे तात्पर्यत्वे बाधकत्वेन प्रमादो मा विधेय इत्यर्थे तात्पर्यस्वे बाधकामावरूपावि निगम (वन निरस्त Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२७॥ सटिप्पणा. | ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-८ ॥२७॥ इति । यदागमे-दशवकालिकपञ्चमाध्ययन द्वितीयोदेशके, तवतेणेत्ति-"तवतेणे वयतेणे, रूवतेणे अ जे नरे । आयारभावतेणे अ, कुब्बई देवकिविसं ॥१॥"इति पूर्वगाधया सहकवाक्यत्वात् न केवलं निव एव अधिकृतः, किन्तु तपस्तेनादीनामुत्कृष्टफलप्राप्तिप्रदर्शनपरमेव तदिति भावः। तपस्तेनादीनां स्वरूपं त्वेवं, तपस्तेनो नाम क्षपकरूपकल्पः कश्चित् केनचित् पृष्टस्त्वमसौ क्षपक इति, स पूजाद्यर्थमाह-अहम्, अथवा वक्ति-साधव एव क्षपकाः, तूण्णी वाऽऽस्ते, एवं वास्तेनो धर्मकथकादितुल्यरूपः कश्चित् केनचित् पृष्ट इति, एवं रूपस्तेनो-राजपुत्रादितुल्यरूपः, एवमाचारस्तेनो विशिष्टाचारवत्तुल्यरूप इति, भावस्तेमस्तु परोत्प्रेक्षितं कथञ्चित किञ्चित् श्रुत्वा स्वयमनुत्प्रेक्षितमपि मर्यतत्प्रपञ्चेन चर्चितमित्याहेति । इति से परस्सेत्यादि आचारामथमश्रुतस्कन्धद्वितीयाध्ययनतृतीयोद्देशके. तत्र समूढेत्ति-रागद्वेषामिभूतत्वात्कार्याकार्यपराङ्मुखः ॥ एष मृढ इति शेयो विपरीतविधायकः ॥१॥ अनन्तसंसारिताऽशुभानुबन्धयोगादित्युक्तम्,अथाशुभानुबन्धस्य किं मूलम् ? के च तद्भेदाः ? इत्याहतम्मूलं मिच्छत्तं, आभिग्गहिआइ तं च पंचविहं। भव्वाणमभव्वाणं, आभिग्गहिअं वणाभोगो ॥८॥ [तन्मूलं मिथ्यात्वमाभिग्रहिकादि तच्च पञ्चविधम् । भत्र्यानाम्, अभव्यानामाभिग्रहिकं वाऽनाभोगः ॥ ८ ॥] तम्मूलंति । तस्यानन्तसंसारहेत्वशुभानुबन्धस्य मूलं मिथ्यात्वम्, उत्कटहिंसादिदोषानामपि मिथ्यात्वसहकतानामेव तद्धेतुत्वात, अन्यथा दोषण्यामूढताऽनुपपत्तेः। तचाभिग्रहिकादिकं पञ्चविधम् आभिग्रहिकमनाभिग्रहिकमाभिनिवेशिकं सांशयिककमनाभोगं चेति पञ्चप्रकारम् । यद्यपि जीवादिपदार्थेषु तत्वमिति निश्चयात्मकम्य सम्यक्त्वस्य प्रतिपक्षभूतं मिथ्यात्वं द्विविधमेव पर्यवस्पति-जीवादयो न तत्वमिति विपर्यासात्मकं १।। जीवादयस्तत्वमिति निश्चयाभावरूपानधिगमात्मकं च २।। तदाह वाचकमुख्यः "अनधिगमविपर्ययौ च मिथ्यात्वम्" इति, तथापि 'धर्मेऽधर्मसंज्ञा' इत्येवमादयो दश मेदा इवोपाधिभेदात्पश्चैते भेदाः शास्त्र| प्रसिद्धाः। तत्राभिग्रहिकम्-अनाकलिततत्त्वस्याप्रज्ञापनीयताप्रयोजकस्वस्वाभ्युपगतार्थश्रद्धानम्। यथा बौद्धसा Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२८॥ - इख्यादीनां स्वस्वदर्शनप्रक्रियावादिनाम् । यद्यपि वैतण्डको न किमपि दर्शनमभ्युपगच्छति, तथाऽपि तस्य स्वाभ्युपगतवितण्डावादार्थ एव निग्रहवत्वादाभिग्रहिकत्वमिति नाव्याप्तिः । अनाकलिततत्त्वस्य इति विशेषणाद् यो. जैन एव धर्मवादेन परीक्षापूर्व तत्त्वमा कलय्य स्वाभ्युपगतार्थं श्रद्धत्ते तत्र नातिव्याप्तिः । यस्तु नाम्ना जैनोऽपि स्वकुलाचारेणैवागमपरीक्षां बाधते तस्याभिग्रहिकत्वमेव, सम्यग्दृशोऽपरीक्षित पक्षपातित्वायोगात् । तदुक्तं हरिभद्रसूरिभिः । " पक्षपातो न मे वीरे, न द्वेषः कपिलादिषु । युक्तिमद्वचनं यस्य, तस्य कार्यः परिग्रहः ॥ १ ॥ " इति । यथागीतार्थी गीतार्थनिश्रितो माषतुषादिकल्पः प्रज्ञापाटवाभावादनाकलिततत्त्व एव स्वाभिगतार्थ जैनक्रियाकदम्बकरूपं श्रद्धत्ते तस्य स्वाभ्युपगतार्थश्रद्धानं नाप्रज्ञापनीयताप्रयोजकम् असद्ग्रहशक्त्यभावात्, किन्तु गुणवदाज्ञाप्रामाण्यमूलत्वेन गुणवत्पारतन्त्र्यप्रयोजकमित्यप्रज्ञापनीयताप्रयोजकत्व विशेषणान्न तत्रातिव्याप्तिः १ ॥ स्वपराभ्युपगतार्थयोरविशेषेण श्रद्धानमनाभिग्रहिकम्। " यथा सर्वाणि दर्शनानि शोभनानि इति प्रतिज्ञावतां मुग्धलोकानाम् । यद्यपि परमोपेक्षावतां निश्चयपरिकर्मितमतीनां सम्यग्दृष्टीनां स्वस्वस्थाने सर्वनयश्रद्धानमस्ति, शिष्यमतिविस्फारणरूपकारणं विनैकतरनयार्थनिर्द्धारणस्याशास्त्रार्थत्वात् । तदाह सम्मतौ सिद्धसेनः - "णिययवय णज्ज सच्चा, सव्वणया परवियालणे मोहा । ते पुण न दिट्ठसमयो विभयह सच्चे लिए वा ॥ १ ॥ " [ निजकवचनीयसत्याः सर्वनयाः परविचालने मोहाः । तान् पुन र्न दृष्टसमयः विभजति सत्यान्वाऽलीकान्वा ] तथाऽपि स्वस्वस्थान विनियोगलक्षणेन विशेषेण तेषां सवनयश्रद्धानमस्तीति नातिव्याप्तिः २ ।। " विदुषोऽपि स्वरसवाहि भगवत्प्रणीतशास्त्रबाधितार्थश्रद्धानमाभिनिवेशकम् । स्वस्वशास्त्रबाधितार्थश्रद्धानं विपर्यस्तशाक्यादेरपीति तत्रातिव्या प्तिवारणाय भगवत्प्रणीतत्वं शास्त्रविशेषणम् । भगवत्प्रणीतशास्त्र बाधितार्थ श्रद्धानमिति सप्तमीगर्भसमासान्नातिव्यासितादत्रस्थ्यम्, तथा सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृति ॥ गावा ८ ॥२८॥ Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२५॥ प्यनाभोगात्प्रज्ञापकदोषाद्वा वितथश्रद्धानवति सम्यग्दृष्टावतिव्याप्तिः, अनाभोगाद् गुरुनियोगाद्वा सम्यग्दृष्टेरपि वितथश्रद्धानभणनात् । तथा चोक्तमुत्तराध्ययननिर्युक्तौ - "सम्मद्दिड्डी जीवो, उवइटुं पवयणं तु सद्दहह । सद्ददइ असम्भावं, अणाभोगा गुरूणिओगा वा ॥ | १ ||" [सम्यग्दृष्टिर्जीव उपदिष्टं प्रवचनं तु श्रद्धत्ते । श्रद्धते असद्भावमनाभोगाद् गुरुनियोगाद्वा ॥] इति तद्वारणाय स्वरसवाहीति सम्यग्वक्तुवचनानिवर्त्तनीयत्वं तदर्थः । अनाभोगादिजनितं मुग्धश्राद्धादीनां वितथश्रद्धानं तु सम्यग्वक्तृवचन निवर्त्तनीयमिति न दोषस्तथाऽपि जिनभद्रसिद्धसेनादिप्रावचनिकप्रधानविप्रतिपत्तिविषयपक्षद्वयान्यतरस्य वस्तुतः शास्त्रबाधितत्वात्तदन्यतरश्रद्धानवतोऽभिनिवेशित्वप्रसङ्ग इति तद्वारणार्थं विदुषोऽपीति-शास्त्रतात्पर्यबाधप्रतिसन्धानवत इत्यर्थः । सिद्धसेनादयश्च स्वस्वाभ्युपगतमर्थ शास्त्रतात्पर्यबाधं प्रति सन्धायापि पक्षपातेन न प्रतिपन्नवन्तः किन्त्व विच्छिन्नप्रावचनिकपरम्परया शास्त्रतात्पर्यमेव स्वाभ्युपगतार्थानुकूलत्वेन प्रतिसन्धायेति न तेऽभिनिवेशिनः । गोष्ठा माहिलादयस्तु शास्त्रतात्पर्यवाधं प्रतिसन्धायैवान्यथा श्रद्धत्ते इति न दोषः ३ || भगवद्वचनप्रामाण्यसंशयप्रयुक्तः शास्त्रार्थसंशयः सांशयिकम् ॥ यथा सर्वाणि दर्शनानि प्रमाणं कानिचिद्वा, इदं भगवद्वचनं प्रमाणं नवेत्यादि संशयानां मिध्यात्वप्रदेशोदयनिष्पन्नानां साधूनामपि सूक्ष्मार्थसंशयानां मिथ्यात्वभावो मा प्रासाङ्गीदिति भगवद्वचनप्रामाण्यसंशय: प्रयुक्तत्वं विशेषणम् । ते च नैवंभूताः, किन्तु भगद्वचनप्रामाण्यज्ञान निवर्तनीयाः, सूक्ष्मार्थादिसंशये सति " तमेव सच्च णीसंकं जं जिणेहिं पवेइयं" [तदेव सत्यं निःशङ्कं यज्जिनैः प्रवेदितम् । ] इत्याद्यागमोदित भगवद्वचनप्रामाण्यपुरस्कारेण तदुद्धारस्यैव खाध्वाचारस्वात् । या तु शङ्का साधूनामपि स्वरसवाहितया न निवर्तते सा सांशयिकमिध्यात्वरूपा सत्यनाचारापादिकैत्र । अत एव कङ्ग्रामोहोदयादाकर्षप्रसिद्धिः ४ ॥ साक्षात्परम्परया च तच्चाप्रतिपत्तिरनाभोगम् ॥ यथै केन्द्रियादीनां तच्चातच्चानध्यवसाय व तां सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-८ ॥२९॥ Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥३०॥ सटिप्पणा ॥ खोपन | तिः ॥ गाथा-८ ॥३०॥ मुग्धलोकानां च । यद्यपि मापतुषादिकल्पानां साधूनामपि साक्षात्त्वाप्रतिपत्तिरस्ति, तथापि तेषां गीतार्थनिश्रितत्वात्तद्गततत्वप्रतिपत्तिः परम्परया तेष्वपि सत्त्वान्न तत्रातिव्याप्तिः। तत्त्वाप्रतिपत्तिश्चात्र संशयनिश्चयसाधारणतत्त्वज्ञानसामान्याभाव इति न सांशयिके तिव्याप्तिरिति दिक् । एतच्च पञ्चप्रकारमपि मिथ्यात्वं भव्यानां भवति । अभव्यानां त्वाभिग्रहिकमनाभोगो वेति द्वे एव मिथ्याले स्याताम्, न त्वनाभिग्रहिकादीनि त्रीणि अनाभिग्रहिकस्य विच्छिन्नपक्षपाततया मलाल्पतानिमित्तकत्वाद्, आभिनिवेशिकस्य च व्यापनदर्शननियतत्वाद्, सांशयिकस्य च सकम्पप्रवृत्तिनिबन्धनत्वाद्, अभव्यानां च बाधितार्थे निष्कम्पमेव प्रवृत्तेः, अत एव भव्याभव्यत्वशङ्कापि तेषां निषिद्धा । तदुक्तमाचारटीकायाम्-"अभव्यस्य भव्याभव्यत्वशङ्काया अभावाद्” इति ॥८॥ (टि०) कि मूलमिति किं शब्दो जिज्ञासायां मूलं कारणम्, तथाचाशुभानुबन्धजनकतावच्छेदकावच्छिन्नं ज्ञानं जायतामित्याकारिका जिज्ञासा । के च तद्देदा इति-अत्रापि किमः पूर्ववत्, तद्भेदाः-अशुभानुबन्धजनकविशेषाः । तद्धेतृत्वात्-तादृशानुबन्धजनकत्वात्, अन्यथा-मिथ्यात्वस्य तादृशानुबन्धाजनकत्वे । दोषव्यामूढतानुपपत्तरिति-दोषे दोषविषयका व्यामूढता-वि-विशेषेण आ समन्तात् मूढता पूर्ववर्णितलक्षणमूढस्वभावः तस्या अनुपपत्तिः अघटमानता तस्याः । तथा च बलवदनिष्टाननुबन्धित्वज्ञानस्य प्रवृत्ति प्रति प्रयोजकत्वेन उत्कटहिंसादिदोषे बलवदनिष्टानुबन्धित्वस्यैव सत्वात् विषयाभावात् म तादशज्ञानं शक्यं मिथ्यात्वं विना, तादशज्ञानं विना च तदशहिंसादिदोषे प्रवृत्तिरेव न स्यादिति प्रवृत्तेरन्यथानुपपत्या मिथ्यात्वस्य तादृशानुबन्ध प्रति हेतुत्वस्यावश्यस्वीकार्यत्वादिति भावः । तादृशानुबन्धहेतुत्वस्य विभागमाह-तच्चेति मिथ्यात्वज । पञ्चेति-पञ्चप्रकारा यस्य तद् । ननु विशेषधर्मप्रकारकज्ञानानुकूलण्यापाररूपस्य विभागस्य विशेषधर्मजिज्ञासायां सत्यामेव सार्थकत्वम्, विशेषधर्मजिज्ञासा तु सामान्यधर्मज्ञाने सत्येव भवतीति मिथ्यात्वसामान्यधर्मज्ञाने सत्येव मिथ्यावविशेष जिज्ञासा, इह च तत् सामान्यलक्षणस्यानुक्तत्वात् 'तच्च पञ्चप्रकारम्' इति विभागोऽनुपपन्न इत्याहयद्यपि अनाकलिततत्त्वस्येति-अनाकलिततत्वसम्बन्धी षष्ठीविभक्तेः सम्बन्धसामान्ये शक्तत्वात, सम्बन्धिनि लक्षणया बोधः तस्य श्रद्धानान्तपदार्थेन सहामेदेनान्वयो निपातातिरिक्तनामार्थयो/दानान्वयबोधस्याव्युत्पनत्वात् । अत्र दृष्टान्तमाह पथा बौद्धसांख्यादीनामिति-आदिना वैशेषिकप्रभृतिपरिग्रहः । Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-८ ॥३२॥ ननु वेतण्डिकस्य स्वाभ्युपगतार्थश्रद्धानाभावेन तत्राग्याप्तिरित्याह-यद्यपि, स्वपक्षस्थापनाहीनकथा-वितण्डा सा अस्यास्तीति-वैतण्डिकः । स्वाभ्युपगतवितण्डावादार्थ इति-स्वाङ्गीकृतायां स्वपक्षस्थापनाहीनकथायां परपक्षदूषणमात्रपर्यावसानायामित्यर्थः । नाव्याप्तिरिति-न बैतण्डिकरूपे लक्ष्येऽवृत्तित्वमित्यर्थः । तत्र धर्मवादेन परीक्षापूर्व तत्त्वमाकलब्य स्वाभ्युपगतार्थश्रद्धावति जैने । नातिव्याप्तिरिति-नालक्ष्यरूपे तादृशजैने वृत्तित्वम् , तस्य श्रद्धानस्यानाकलिततत्त्वसम्बन्धित्वाभावादिति भावः । स्वकुलाचारेणैवेति-न तु गीतार्थसमाचारेणेति-एक्कारार्थः, तेन न 'जं च ण सुत्तेहिं बिहियं' इत्यादिना विरोध इति भावः । यद्यप्यत्र धर्मवादेन परीक्षापूर्वकाकलिततत्वस्वाभ्युपगतार्थश्रद्धानवति जनेऽतिव्याप्तिवारणं "अप्रज्ञापनीयताप्रयोजकम्,” इत्येतद्विशेषणेनैव संभवतीति 'अनाकलिततत्वस्येति' विशेषणमनर्थकं प्रतिभात्यापातदृशाम् , तथापि धर्मवादपूर्विकायाः परीक्षाया एव तत्र प्रयोजकत्वमिति तत्राप्रज्ञापनीयतायाः प्रयोजकत्वाभावेन न तद्विशेषणमनर्थकमिति सम्यगालोचनीयम् । असग्रहशक्त्यभावादिति-असद्मशक्तिनियतत्वादप्रज्ञापनीयताया इति भावः । णिययेत्यादिसम्मतिगाथाया अर्थस्वेवम् ॥ निजकवचनीये स्वविषये परिच्छेद्ये, सत्याः सम्यग्ज्ञानरूपाः, सर्व एव नयाः संग्रहादयः, तद्वति तदवगाहित्वात् । परविचालने परविषयोत्खनने, मोहा मुह्यन्तीति मोहा असमर्थाः, परविषयस्यापि सत्यत्वेनोन्मूलयितुमशक्यत्वात्, मिथो नान्तरीयकत्वात् । अत: परविषयस्याभावे स्वविषयस्याप्यसत्वात् तत्प्रत्ययस्य मिथ्यात्वमेवेत्यवधारयन् दृष्टसमयो ज्ञातानेकान्तः पुनस्तान् नयान् न विभजते सत्यानलीकान् वा, किन्वितरनयविषयसव्यपेक्षया 'अस्त्येव न्यार्थतः' इत्येवं भजनया स्वनयामिप्रेतमर्थ सत्यमेवावधारयति, यद् यत्र यदपेक्षयास्ति तस तत्र तदपेक्षया ग्राहकत्वेनैव नयप्रामाण्यात् । अत एव द्रव्यास्तिकादेः प्रत्येकमित्यरूपतया सत्त्वम्, अनित्थरूपतया चासत्त्वं । ननु यदि च संग्रहादेः प्रत्येकं मिथ्यात्वं तदा सिकतासमुदाये तैलबत् तत्समुदाये स्वस्वस्थान विनियोगलक्षणविशेषे सत्यपि सम्यक्त्वं कथं स्यात् ? प्रत्येकमसतः समुदाये सवायोगात्, इति चेत्, न, न झन दलप्रचयलक्षणः समुदाय उच्यते संग्रहादेईलस्वाभावात्, इतरेतरविषयापरित्यागवृत्तीनां ज्ञानानां समुदायसंभवात्, क्वचित् ऋमिकतत्समुदायस्याव्यापकत्वाच्च, किन्वितरनयविषयीकृतरूपाव्यवच्छेदकत्वम्, तदेव चान्योन्यनिश्रितत्वं गीयते । इदमेव च प्रवृत्तिनिमित्तीकृत्य तत्र सम्यक्त्वपदं प्रवर्तते, तदिदमुक्तम्-तम्हा सव्वेवि णया मिच्छादिट्ठी सपक्खपडिबद्धा । अण्णोण्णणिस्लिा उण हवंति सम्मतसम्भावा ॥१॥ अस्यार्थः, यस्माद् एकान्तनित्यानित्यत्वाभ्युपगमे बन्धमोक्षादिव्यवस्थानुपपत्तिः, तस्माद् मिथ्यादृष्टयः सर्वेऽपि नयाः स्वपक्षण Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥३२॥ सटिप्पणा । खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-८ ॥३२॥ तिबद्धाः स्व आत्मीयः पक्षोऽभ्युपगमः तेन प्रतिबद्धाः प्रतिहता यतस्तत इति । नयज्ञानानां मिथ्यात्वे तद्विषयस्य तदभिधानस्य च मिथ्यात्वमेव । अयं प्रमाणार्थः, सर्वनयवादाः, मिथ्याः, स्वपक्षेणैव प्रतिहतत्वात्, चौरवाक्यवत् । अथैवं तेषां प्रत्येकं मिथ्यात्वे. सर्वत्रापि सम्यक्त्वानुपपत्तिरित्याह-अन्योन्यनिश्रिताः-परस्परविषयापरित्यागेन व्यबस्थिताः, पुनः ते एव सम्यक्त्वस्य यथावस्थितवस्तुप्रत्ययस्य सद्भावा भवन्तीति । किन प्रत्येकमसतः समुदाये सत्त्वायोगादिस्युक्त, तदपि नैकान्तम्, तथाहि-यथा बहुमूल्यान्यपि रस्नान्यसमुदितानि 'रत्नावली' इति व्यपदेशं न लभन्ते, समुदितानि तु तान्येव 'रत्नावली' इति व्यपदेशं लभन्ते इति, तथा ते नयाः स्वविषयपरिच्छेदकत्वेन सुनिश्चिता अपि, इतरनयनिरपेक्षाः सम्यक्त्वं न प्राप्नुवन्ति स्वस्वस्थानविनियोगलक्षणविशेषे सति अन्योन्यसापेक्षतया त एवं सम्यक्त्वं लभन्त इति न कोऽपि दोषः । किन तवमतेऽपि द्वित्वादीनां प्रत्येक पर्याप्तिसम्वन्धेनासत्त्वेऽपि समुदाये तेन सम्बन्धेन सत्त्वाङ्गीकारात् । न च जातेः समवायेन एकव्यक्तिपर्याप्तत्वमुभयपर्याप्तत्वं तथा द्वित्वादीनामपीति तेषां समवायातिरिक्ततत्सम्बन्धस्वीकारे प्रमाणाभाव इति वाच्यं, एको द्वित्ववान् इति प्रत्ययवत् एको द्वौ इति प्रत्ययापत्तेः, एको न द्वित्ववान् इति प्रत्ययायाभाववत् एको न द्वौ इति प्रत्ययस्याप्यभावप्रसङ्गाच्च । न चैकत्वादेः न्यूनवृत्तितया द्वित्वव दानवच्छेदकत्वात् 'एको न द्वौ' इति प्रतीतिर्न स्यादेवेति वाच्यं, 'एको द्वित्ववान्' इति प्रतीतेः सर्वानुभवसिद्धतया तबलाद् न्यूनबृत्येकत्वस्यापि, आधारतावच्छेदकत्वसंभवात् । न हि कारणतावच्छेदकत्वादाविवाधिकरणतावच्छेदकत्वेऽपि अन्यूनानतिरिक्तवृत्तित्वं नियामकं, अन्यथा 'पृथिवी द्रव्यत्ववती पृथिवी नीलरूपवती' इत्यादिप्रमाणप्रतीतीनामपलापप्रसङ्गात्, पृथिवीत्वस्य द्रव्यत्वाधिकरणतान्यूनवृत्तित्वात, नीलरूपाधिकरणतातिरिक्तवृत्तित्वाच । तस्माद्विषयतावच्छेदकत्व इवाधिकरणतावच्छेदकत्वे. ऽप्यन्यूनातिरिक्तवृत्तित्व न नियामकम् । तस्मात् पर्याप्तिस्वीकार आवश्यकः । तेनैकत्वविशिष्टे पर्याप्तिसम्बन्धेन द्वित्वाभावात्तेन सम्बन्धेन द्वित्वबद्भेदसस्वाञ्चको द्वौ' इति प्रत्ययाभावः, एको न द्वाविति प्रत्ययश्चोपपद्यते इति भावः, आभिनिवेशिकस्य लक्षणमाह-विदुषोऽपीति-जानतोऽपीति तदर्थः, वि. पर्यस्तशाक्यादेरिति, विपर्यस्तः-भियादृष्टिः, एतद्विशेषणं स्वरूपोपबोधकं न तु व्यवच्छेदकम् । न च व्यभिचारे एव विशेषणस्य सार्थकतेति वाच्यम्, अविदितस्वभावस्य भावस्य स्वभावाविर्भावनायापि विशेषणस्याभिमतत्वात् । ननु पूर्वोक्तमिथ्यादृष्टीनां भगवच्छास्त्रेण बाधितार्थे श्रद्धानमस्तीत्यतिव्याप्तितादवस्थ्यमित्याह-सप्तमीत्यादि, मलाल्पतानिमित्तकत्वादिति लघुकर्मकारणकत्वात् । न्यापन्नदर्शननियतत्वाद् प्राप्तविगतसम्यग्दर्शनव्याप्यत्वात् । सकम्पप्रवृत्तिनिबन्धनत्वादिति सभयप्रवृत्तिहेतुत्वादिति-बाधितार्थ इतिशेषः । अत एव बाधितार्थे भयरहितप्रवृत्तित एव ॥ ८ ॥ Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥३३॥ नवभध्यानामन्तस्तत्त्वशून्यानामनाभोगः सार्वदिको भवतु, आमिग्रहिकं तु कथं स्याद् ?, इति भ्रान्तस्याशङ्कामपाकर्तुमाभिग्र हिकभेदानुपदर्शयति— थिचिणकुंइ, कयं ण वे ऍड णत्थि णिव्वाणं॥ णत्थि य मोक्खोवाओ, आभिग्गहिअस्स छ विअप्पा | ९ | [ नास्ति १ न नित्यो२ न करोति३ कृतं न वेदयति४ नास्ति निर्वाणं५ । नास्ति च मोक्षोपाय६ आभिग्रहिकस्य षड विकल्पाः ॥ ९ ॥] थिति । १ नास्त्येवात्मा, २ न नित्य आत्मा, ३ न कर्ता, ४ कृतं न वेदयति ५ नास्ति निर्वाणम्, ६ नास्ति मोक्षपाय इत्याभिग्रहिकस्य चार्वाकादिदर्शनप्रवर्तकस्य परपक्षनिराकरणप्रवृत्तद्रव्यानुयोगसारसम्मत्यादिग्रन्थप्रसिद्धाः षड् विकल्पाः ते च सदा नास्तिक्यमयानामभव्यानां व्यक्ता एवेति कस्तेषामाभिग्रहिकसम्वे संशय इति भावः । इत्थं च - " लोइअमिच्छतं पुण, सरुव भेएण हुज्ज चउभेअं । अभिगहिअमणभिगहिअं, अंसइअं तह अणाभोग || १|| तत्थ वि जमणाभोगं, अव्वत्तं सेसगाणि वत्ताणि । चत्तारि वि जं नियमा, सन्नीणं हुंति भव्वाणं ॥ २ ॥ [ लौकिक मिथ्यात्वं पुनः स्वरूपभेदेन भवेच्चतुर्भेदम्। आभिग्रहिकमनाभिग्रहिकं सांशयिकं तथाऽनाभोगं ॥ तत्रापि यदनाभोगमव्यक्तं शेषकाणि व्यक्तानि । चत्वार्यपि यन्नियमात् संज्ञिनां भवन्ति भव्यानाम् ॥] इति नवीन कल्पनां कुर्वन् अभव्यानां व्यक्तं मिथ्यात्वं न भवत्येवेति वदन् पर्यनुयोज्यः । ननु भोः कथमभव्यानां व्यक्तमिथ्यात्वं न भवतिः, नास्त्यात्मेत्यादिमिध्यात्वविकल्पा हि व्यक्ता एव तेषां श्रूयन्ते । तथा - "अभव्याश्रितमिध्यात्वे ऽनाद्यानन्ता स्थितिर्भवेत् । सा भव्याश्रितमिध्यात्वे-नादिसान्ता पुनर्मता ॥ १ ॥ एतद्वृत्तिर्यथा, अभव्यानाश्रित्य मिथ्यात्वे - सामान्येन व्यक्ताव्यक्तमिध्यात्वविषयेऽनाद्यनन्ता स्थितिर्भवति । तथा सैव स्थितिर्भव्यजीवान्पुनराश्रित्यानादिसान्ता मता । यदाह । “मिच्छत्तमभन्त्राणं, सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा - ९ ॥३३॥ Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1564 धर्मपरीक्षा ॥३४॥ सटिप्पणा । खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-९ ॥३४॥ तमणाइमणतयं मुणेयव्वं । भव्यागं तु अणाइ-सपज्जवसियं तु सम्मत्ते॥"[मिथ्यात्वमभव्यानां तदनाद्यनन्तकं ज्ञातव्यम् । भव्यानां त्वनादिसपर्यवसितं तु सम्यक्त्वे ॥] इति गुणस्थानकक्रमारोहसूत्रवृत्त्यनुसारेणाभव्यानां व्यक्तमपि मिथ्यात्वं भवतीत्यापातह| शाऽपि व्यक्तमेव प्रतीयते । अपि च पालकसङ्गमकादीनां प्रवचनाहत्प्रत्यनीकानामुदीर्णव्यक्ततरमिथ्यात्वमोहनीयोदयानामेव समुद्भूता नानाविधाः कुविकल्पाः श्रूयन्ते । किं च-मोक्षकारणे धर्म एकान्तभवकारणत्वेनाधर्मश्रद्धामरूपं मिथ्यात्वमपि तेषां लब्ध्याद्यर्थ गृहीतप्रव्रज्यानां व्यक्तमेव । यत्पुनरुच्यते-तेषां कदाचित्कुलाचारवशेन व्यवहारतो व्यक्तमिथ्यात्वे सम्यक्त्वे वा सत्यपि निश्चयतः सर्वकालमनाभोगमिथ्यात्वमेव भवतीति । तदभिनिवेशविजृम्भितम्, शुद्धय(द्धि)प्रतिपत्त्यभावापेक्षया निश्चयेनानाभोगाभ्युपगमे आभि|ग्रहिकादिस्थलेऽपि तत्प्रसङ्गाद्, बहिरन्तव्यक्ताव्यक्तोपयोगद्वयाभ्युपगमस्य वापसिद्धान्तकलङ्कषितत्वाद् । अथ यदेकबुद्गलावशेषसंसारस्य क्रियावादित्वाभिव्यञ्जकं धर्मधिया क्रियारुचिनिमित्तं तन्मिथ्यात्वं व्यक्तम् । यदुक्तम्-"तेसुवि एगो पुग्गल-परिअहो जेसिं हुन्न संसारो। सहभव्वत्ता तेसिं, केसिंचि होइ किरियरुई॥१॥ तीए किरियाकरणं, लिगं पुण होइ धम्मबुद्धीए । किरियाईणिमित्तं, जं वुत्तं वन मिच्छंति॥२॥"[तेष्वपि एकः पुद्गलपरावर्तों येषां भवेत्संसारः । तथाभव्यत्वात्तेषां केषांचिद् भवेत्क्रियारुचिः। तया क्रियाकरण लिङ्ग पुनर्भवति धर्मबुद्धया । क्रियारुचिनिमित्तं यदुक्तं व्यक्तमिथ्यात्वमिति॥] ततोऽज्यच्चाव्यक्तं मिथ्यात्वम् । न चाभव्यस्य केंदाप्येकपुद्गलपरावर्तावशेषः संसार इति सदैव तस्याव्यक्तं मिथ्यात्वमवस्थितमिति चेद्, मैवम्, एवं सति चरमपुद्गलपरावर्तातिरि|क्तपुद्गलपरावर्तवतिनां भव्यानामप्यव्यक्तानाभोगमिथ्यात्वव्यवस्थितावाभिग्रहिकमिथ्यात्वोच्छेदप्रसङ्गात् । किंच-एवमनाभोगमिथ्या-18 त्वे वर्तमाना जीवा न मार्गगामिनो न वोन्मार्गगामिनो भवन्ति, अनाभोगमिथ्यात्वस्यानादिमत्त्वेन सर्वेषामपि जीवानां निजगृहकल्प 5 Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा साटिप्पणा खोपज्ञ वृत्तिः ।। गाथा-१ त्वाद् । लोकोऽपि निजगृहे भूयःकालं वसन्नपि न मार्गगामी न वोन्मार्गगामीति व्यपदिश्यते, किन्तु गृहानिर्गतः समीहितनगराभिमुखं गच्छन् मार्गगामी, अन्यथा तून्मार्गगामीति व्यपदिश्यते । एवं तथाभव्यत्वयोगेनानादिमिथ्यात्वान्निर्गतो यदि जैनमार्गमाश्रयते तदा मार्गगामी, जैनमार्गस्यैव मोक्षमार्गवाद । यदि च शाक्यादिदर्शनं जमाल्यादिदर्शनं वाऽऽश्रयते तदोन्मार्गगामीति व्यपदिश्यते, तदीयदर्शनस्य संसारमार्गत्वेन मोक्षं प्रत्युन्मार्गभूतत्वादिति स्वकल्पितप्रक्रियापेक्षयाऽचरमपुद्गलपरावर्तवर्तिनः शाक्यादयोऽपि नोन्मा- गंगामिनः स्युरिति, “कुप्पवयणपासंडी, सव्वे उम्मन्गपट्ठिया" [ कुप्रवचनपाखण्डिनः सर्वे उन्मार्गप्रस्थिताः ॥ ] इत्यादि प्रवचनविरोधः । किंच-एवं धर्मधिया विरुद्धक्रियाकरणादुन्मार्गगामित्वं यथा व्यक्तमिथ्यात्वोपष्टम्भाच्चरमपुद्गलपरावर्त एव तथा धर्मधिया | हिंसाकरणाद्धिंसकत्वमपि तदैवेत्यचरमपुद्गलपरावर्तेषु हिंसकत्वादिकमपि न स्यादिति सर्वत्र त्रैराशिकमतानुसरणे जैनप्रक्रियाया मूलत एव विलोपापत्तेर्महदसमञ्जसम् । तस्मादभन्यानामपि दूरभव्यानामिव योग्यतानुसारेणाभिग्रहिकव्यक्तमिथ्यात्वोपगमे न दोष इति मन्तव्यम् । अथाभव्या अव्यक्तमिथ्यात्ववन्तः, अव्यवहारित्वात, सम्प्रतिपन्ननिगोदजीववद्-इत्यनुमानात्तेषामव्यक्तमिथ्यात्वसिद्धिः । अव्यवहारित्वं च तेषामनन्तपुद्गलपरावर्तकालस्थायित्वाद् सिध्यति । व्यावहारिकाणामुत्कृष्टसंसारस्यावलिकासख्येयभाग-1 पुद्गलपरावर्तमानत्वात् । तदुक्तं कायस्थितिस्तोत्रे-"अव्वहारियमझे, भमिऊण अणंतपुग्गलपरहे। कहवि ववहाररासिं, संपत्तो नाह तत्थवि य ॥१॥ उक्कोसं तिरियगई-असण्णि-एगिदि-वण-णपुंसेसु । भमिओ आवलिअअसंख-भागसमपुग्गलपरट्टे ॥२॥" [[अव्यवहारिकमध्ये भ्रान्त्वाऽनन्तपुद्गलपरावर्तान् । कथमपि व्यवहारराशिं सम्प्राप्तो नाथ! तत्रापि च ॥उत्कृष्टं तिर्यग्गत्यसंझ्ये केन्द्रियवन-नपुंसकेषु । भ्रान्त आवलिंकाऽसंख्यभागसमपुद्गलपरावर्तान् । अत एवोत्कृष्टो वमस्पतिकालोऽपि प्रवचने व्यावहारिकापेक्षयै Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वोक्तः । तथाहि- "वणस्सइकाइआणं पुच्छा, जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं अणंतं कालं-अणंता उस्सप्पिणिओसप्पिणीओ कालओ, IM धर्मपरीक्षा खित्तओ अणंता लोगा, असंखेजा पुग्गलपरिअट्टा" इति ॥ [ वनस्पतिकायिकानां प्रश्नः, जघन्येन अन्तर्मुहूर्तमुत्कृष्टेनानन्तं कालम् सटिप्पणा ॥३६॥ ॥ खोपज्ञ अनन्ता उत्सर्पिण्यवसार्पण्यः कालतः, क्षेत्रत अनन्ता लोका असंख्येयाः पुद्गलपरिवाः । इति । इदमेव चाभिप्रेत्यास्माभिरुक्तम् वृत्तिः ॥ "ववहारीणं णियमा, संसारो जेसि हुन्ज उक्कोसो। तेसिं आवलिअअसंख-भागसमपोग्गलपरट्टा॥१॥" [व्यावहारिकाणां नियमात्संसारो गाथा-९ 'येषां भवेदुत्कृष्टः । तेषामावलिकासंख्यभागसमपुद्गलपरावर्ताः॥] इत्यस्मन्मतमदुष्टमिति चेत् । नायमप्येकान्तः, अनन्तपुद्गलपरा ॥३६॥ वर्तकालस्थायित्वनाव्यवहारित्वासिद्धेः, । व्यावहारिकाणामप्यावलिकाऽसंख्येयभागपुद्गलपरावर्तान्तरितभूयोभवभ्रमणेनानन्तपुद्गलपरावर्तावस्थानस्यापि संभवात् । तदुक्तं संग्रहणीवृत्तौ-"एते च निगोदे वर्तमाना जीवा द्विधा-सांव्यवहारिका असांव्यहारिकाश्च । | तत्र ये सांव्यवहारिकास्ते निगोदेभ्य उद्धृत्य शेषजीवराशिमध्ये समुत्पद्यन्ते, तेभ्य उद्धृत्य केचिद् भूयोऽपि निगोदमध्ये समाग४च्छन्ति, तत्राप्युत्कर्षत आवलिकाऽसंख्येयभागगतसमयप्रमाणान् पुद्गलपरावर्तान् स्थित्वा भूयोऽपि शेषजीवेषु मध्ये समागच्छन्ति, & एवं भूयो भूयः सांव्यवहारिकजीवा गत्यागतीः कुर्वन्तीति" । यत्पुनरत्र भूयो भूयः परिभ्रमणेऽप्युक्तासंख्येयपुद्गलपरावर्तानतिक्रम | एव, आवलिकाऽसंख्ययभागपुद्गलपरावर्तानामसंख्यातगुणानामप्यसंख्यातत्वमेवेति प्रतीतौ कुतो भूयो भूयः शब्दाभ्यामानन्त्यकल्प|नाया गन्धोऽपि, तेन भूयो भूयः परिभ्रमणेऽप्यसंख्यातत्वं तदवस्थमेव । अत एव तावता कालेन व्यावहारिकाणां सर्वेषामपि सिद्धिभणितेति परेण खमतं समाहितम् , तदपि नैकान्तरमणीयम् । एवं "विकलेन्द्रियैकेन्द्रियेषु गतागतैरन्तान् पुद्गलपरावर्तान् निरुद्धोऽतिदःखितः" इत्यादिना"अन्यदाच कथमपि नीतोऽसावार्यदेशोद्भवमातङ्गेषु, तेभ्योऽप्यभक्ष्यभक्षणादिभिर्नरकपातादिक्रमेण रसगृदयकार्य Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा 37 प्रवर्तनाभ्यामेव लीलयैव व्यावृत्य विधृतोऽनन्तपुलपरावर्तान्" इत्यादिना च महता ग्रन्थेन भुवनभानुकेवलिचरित्रादौ व्यावहारिकत्वमुपेयुषोऽपि संसारिजीवस्य विचित्रभवान्तरिततयाऽनन्त पुद्गलपरावर्तभ्रमणस्य निगदसिद्धत्वात् । तथा योगबिन्दुसूवृत्तावपि नरनारकादिभावेनानादौ संसारेऽनन्तपुद्गलपरावर्त भ्रमण स्वाभाव्यमुक्तम् । तथा हि- "अनादिरेष संसारो, नानागतिसमाश्रयः । पुद्गलानां परावर्ता अत्रानन्तास्तथागताः ॥ १ ॥” [ एतद्वृत्तिः] अनादिरविद्यमानमूलारम्भः, एष प्रत्यक्षतो दृश्यमानः, संसारो मत्रः कीदृशः ? इत्याह - नानागतिसमाश्रयः - नरनारकादिविचित्र पर्यायपात्रं वर्तते । ततश्च पुद्गलानामौदारिकादिवर्गणारूपाणां सर्वेषां परावर्ता ग्रहणमोक्षात्मकाः, अत्र संसारे, अनन्ता अनन्तवारस्वभावाः, तथा तेन समयप्रसिद्धप्रकारेण, अतीताः । केषाम् ? इत्याह - " सर्वेषामेव सत्त्वानां तत्स्वाभाव्य नियोगतः । नान्यथा संविदेतेषां सूक्ष्मबुद्धया विभाव्यताम् ।। || १ || ” [ एतद्वृत्तिः ] सर्वेषामेव सत्त्वानां प्राणिनां तत्स्वा भाव्यम् - अनन्तपुद्गल परावर्तपरिभ्रमणस्वभावता तस्य नियोगो व्यापारस्तस्माद् । अत्रैव व्यतिरेकमाह, न नैव, अन्यथा - तत्स्वाभाव्यनियोगमन्तरेण, संविद् अवबोधो घटते । एतेषामनन्तपुद्गलपरावर्तानां सूक्ष्मबुद्धया निपुणाभोगेन, विभाव्यताम् - अनुविचिन्त्यतामेतद् । इति व्यावहारिकत्वेऽप्यनन्तपुद्गलपरावर्त - भ्रमणसम्भवात् तेनाभव्यानामव्यावहारिकत्वसाधनमसङ्गतमिति द्रष्टव्यम् || [[fo] नास्ति आत्मा देहातिरिक्त इति बृहस्पतिमतानुसारी, तथा च तदुक्तं यथा ते "न स्वर्गे नापवर्गे वा नैवारमा पारलौकिकः । नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः " ॥ १ ॥ इत्यादि । अस्ति आत्मा किन्तु प्रतिक्षणविशरारुरूपतया चित्तसन्ततेर्न नित्य इति सौगताः । तदुक्तं यथा ॥ | “यत्सत्तत्क्षणिकं यथा जलधरः सम्तश्च भावा अमी ॥" अस्ति आत्मा नित्यो भोक्ता, किन्तु न करोति- इति सांख्याः । त एवमाहुः ॥ " यद्यसौ कर्ता न भोक्ता प्रकृतिवत् कर्तुर्भोक्तृत्वानुपपत्तेः। " या "न कर्ता न भोक्ता" इति सांख्यमते तथा च ते वदन्ति । 'पुरुषस्तु पुष्करपलाशवन्निलिंप्सः " कृतं न वेदयति सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ धृतिः ॥ गाथा - ९ 1 (60 Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा 111 W 30 इति शाक्यसिंहानुसारी, क्षणिकस्याञ्चित्तसन्ततेः । यद्वोपचरित भोक्तृत्वस्यानभ्युपगमात्र भोकेतिवेदान्तिमतम् । नास्ति निर्वाणम् इति नास्तिकप्रायाणां सर्वज्ञानभ्युपगन्तॄणां यवनां मते । तथव च ते प्रलपन्ति "न मुच्यतेऽसौ चेतनखात् अभव्यवत्" । किञ्च रामादीनामात्मस्वरूपाव्यतिरेकात् सर्वदुःखविमोक्षत्वलक्षणस्य तस्यासम्भव आत्मनः क्षयाभावेन तेषामप्यक्षयात् । अस्ति मुक्तिः परं नास्ति मोक्षोपायः सर्वभावानां नियतत्वेनाकस्मादेव भावादिति नियतिवादिनः १ चार्वाकादीत्यादि । चारू रमणीयो वाकः "पिब खा च चारुलोचने" इत्यादिरूपा “एतावानेव लोकोऽयं इत्यादिका" वा उक्तिर्यस्य स चार्वाकः । अयं बृहस्पतिशिष्यः । एतदुक्तेः परिणामेऽत्यन्तदुःखप्रदत्वेऽपि श्रवणसमये तस्वातस्वविवेकविकलानां श्रोतॄणां मनोरञ्जनाद्रमणीयत्वमिति भावः ॥ आदिना सांख्यप्रभृतिपरिग्रहः । तेषां दर्शनानि मतानि पक्षा अभ्युपगमा इति यावत् तेषां प्रवर्तकः, समूहे एकवचनं तस्य । परपक्षेत्यादि-परे भाईव्यतिरिक्ताः तेषां पक्ष अभ्युपगमः तस्य निराकरणं अप्रामाण्यज्ञापनं तत्र प्रवृत्ताः सततप्रवृत्तिमन्तः, द्रव्यानुयोग एवं सारो मुख्यविषयो येषु ते द्रव्यानुयोगसाराः ते च सम्मतितरवार्थाने कान्तजय पताकादयो ग्रन्थाः तेषु प्रसिद्धाः । ते च अनुपदोक्ता विकल्पाश्च । सदानास्तिक्यमयानामिति - अनाथनन्तनास्तिक्यभाववतामित्यर्थः । व्यक्ता एव-न त्वव्यक्ता इत्येवकारेणान्यक्कत्वव्यवच्छेदः । इति इतिहेतोः । कस्तेषामाभिग्रहिकत्वसत्त्वे संशय इतिकिमोत्राक्षेपे तस्य संशय इत्यनेनान्वयः तथा च तेषां मोक्षगमनायोग्यानामेते पड़ विकल्पाः सन्त्येव तेषां विकल्पानां चाभिग्राहिकत्वव्याप्यत्वादिति व्यायसरत्वे व्यापकसत्तायां कस्संशयः, नैवेत्यर्थः । इत्थञ्चति तेषामभव्यानामाभिग्रहिकमिध्यात्वे सिद्धे च । नवीनकल्पनां- आगमानुमानादिप्रमाणशून्य कल्पनामिति भावः । कथमिति कस्मादित्यर्थः तस्य न भवतीत्यनेनान्वयः । हि हेतौ व्यक्तमपि-भव्यक्तन्त्वस्त्येवेत्यपिशब्दार्थः । आपातदृशाऽपि किं पुनरागमार्थपर्यालोचनेनेत्यर्थः । व्यक्तमेव स्पष्टतयैव न स्वस्पष्टम् । अम्यदपि प्रमाणमाह-अपि चेति । श्रूयन्ते । आगमे इति शेषः, तेषां पालकसङ्गमकादीनामागमे ह्यभव्यत्वेन प्रसिद्धत्वात्। मोक्षकारण इति स्वरूपोपधायकम्। न तु व्यवच्छेदकं, धर्मपदस्य तत्रैव शक्तत्वात् ननु धर्मस्य कल्पवृक्षाद्युपमेयत्वेन तस्यैहभविकपारभविक फलदायित्वमपि संभवतीत्याह एकान्त इति । तेषाम् अभव्यानाम् । लब्ध्याद्यर्थमिति - लब्ध्याद्युद्देशेन, आदिना पूजाख्यातिप्रभृतिपरिग्रहः । तत्प्रसङ्गात् - अनाभोगप्रसङ्गात् शुद्धिप्रतिपत्यभावस्य तत्रापि सत्वात् । कदापि कस्मिन्नपि कालेऽपि न च नैवैकपुद्गलपरावर्ताविशेषः संसार इत्यन्वयः । इति इति हेतोः । सदैव सर्वकाल एव अध्यर्थक एवकारः । एवं सति - एकपुद्गलपरावर्तावशेषसंसारिणां मिथ्यात्वं व्यक्तम्, तदव्यतिरिक्तानां सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा - ९ Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा SANSAR सटिप्पणा ॥ वोपन वृत्तिः ॥ गाथा-९ ॥३॥ *% % तदव्यक्तमिस्यभ्युपगमे सति । ननु चरमपुद्गलपरावर्तातिरिक्तपरावर्तवर्तिनां भव्यानामनाभोगेनैव मिथ्यात्वव्यवहारसम्भवात्, तेषामाभिमहिकाभ्युपगमे ममाणाभावात्तदुच्छेदप्रसङ्गे न किञ्चिदप्यनिष्टमित्याह-किश्चेति, अन्यथा-समीहितनगरबिमुख गच्छन् । नोन्मार्गगामिन इति-तेषामनाभोगमिथ्यात्वेन शाक्यादिदर्शनाश्रयणासम्भवप्रसाः तव मते, शाक्यदर्शनाश्रयणं तु सर्वजनप्रसिद्धमिति तस्यापलपितुमशक्यत्वादिति भावः । ननु तेषामुन्मार्गगामित्वाभावे को दोष इत्याह-कुप्पवयणेत्यादि । ननु " कुप्पवयणेत्यादिकस्य उत्तराध्ययनीयत्रयोविंशाध्ययनरूपप्रवचनस्य चरमपुद्गलपरावर्तवर्तिनामेव तेषामुन्मा गामित्वव्य वस्थापकत्वास दोष इत्याह किचेति । सर्वत्र त्रैराशिकमतानुसरण इति-जीव-अजीव-नोजीववद्, हिंसकत्वमहिंसकत्वं नोहिंसकत्वमित्यादि सर्वत्र त्रैराशिकमतानुसरणे सति । हिंसकत्वाहिंसकत्वभिन्नस्य तृतीयभेदस्य जैनप्रक्रियायामप्रसिद्धत्वेन तदङ्गीकारे तस्या मूलत: सर्वथा विलोपरूपो महादोष इति भावः । इति। तेषाभव्यानामनन्तपुद्गलपरावर्तवर्तित्वेनाऽव्यवहारित्वसिद्धथा तेषामन्यक्तमिथ्यावे याधकाभावात् । अस्मन्मतमिति-अभव्यानामनाभोगमेव मिथ्यात्वमिति । नायमप्येकान्त इति-अत्र अपिशब्दः समुच्चायकः तेन चरमपुद्गलपरावर्तातिरिक्तपुद्गलपरावर्तवर्तित्वस्य समुच्चयः, तथा च तयो योरपि हेत्वोः व्यक्तमिथ्यात्ववत्सु व्यावहारिकेच्वपि सत्वावधभिचारित्वमिति भावः । नन्वावलिकाऽसंख्येयभागः पुद्गलपरावर्तानामसंख्यातगुणानामप्यसंख्यातत्वमेवेत्येवाह-यत्पुनरिति, तथा च व्यावहारिकाणामनन्तपुद्गलपरावर्तवर्तित्वस्यौसिद्धत्वेनाव्यवहितोक्तहेतोर्न व्यभिचारित्वमिति भावः । तदपि नैकान्तरमणीयमिति-आवलिकाऽसंख्येयभागः पुद्गलपरावर्तानामसंख्यातगुणानामप्यसंख्यातत्वमेवेत्यपि न सर्वथा शोभनम् । पूर्वाचार्यवचनेन बिरोधादिति शेषः । अनुपदोक्तस्यार्थस्य निष्कर्षमाह-दतीत्यादिना ॥ ' ननु प्रज्ञापनावृत्तौ व्यावहारिकाणामुत्कर्षतोऽप्यावलिकासंख्येयभागपुद्गलपरावर्तस्थितिः, तत ऊर्ध्व चावश्य सिद्धिरिति स्फुटं प्रतीयते । तथा च तद्ग्रन्थः-"ननु यदि वनस्पतिकालप्रमाणमसंख्येयाः पुद्गलपरावर्तास्ततो यद् गीयते सिद्धान्ते "म रुदेवाजीवो यावज्जीवभावं वनस्पतिरासीद"इति तत्कथं स्यात् ? कथं वा वनस्पतीनामनादित्वम् ?, प्रतिनियतकालप्रमाणतया ला वनस्पतिभावस्यानादित्वविरोधात । तथाहि-असंख्येयाः पुद्गलपरावर्तास्तेषामवस्थानमानमः, तत एतावति कालेऽतिक्रान्ते नियमा % % Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा सटिप्पणा खोपज्ञ वृत्तिः ॥ | गाथा-९ सर्वेऽपि कायपरावर्त कुर्वते, यथा स्वस्थितिकाले सुरादयः । उक्तं च-"जइ पुग्गलपरिअट्टा, संखाईआ वणस्सईकालो। तो अश्चंत| वणस्सइ-जीवो कह नाम मरुदेवी? [तो अच्चंतवणस्सईण-मणाइयत्तमहेऊओ]॥१॥हुज व वणस्सईणं. अणाइअत्तम(मत एव)डेऊओ। न य मरुदेवाजीवो. जावज्जीव वणस्सई आसीजमसंखेनापोग्गल-परिअद्दा तत्थवत्थाणा शाकालेणेवइपणं, त(जम्हा कुव्वंति कायपलढें । सव्वेवि वणस्सइणो, ठिइकालंते जह सुराई ।।३॥ यदि पुद्गलपरावर्ताः संख्यातीता वनस्पतिकालः । ततोऽत्यन्तवनस्पतिजीवः कथं नाम मरुदेवी ? ॥१॥ भवेद्वा वनस्पतीनामनादिकत्वम(मतएव)हेतोः। यदसंख्येयाः पुद्गलपरावर्तास्तत्रावस्थानम् ॥२॥ कालेनै तावता तस्मात्कुर्वन्ति कायपरिवर्तम् । सर्वेऽपि वनस्पतयः स्थितिकालान्ते यथा सुरादयः ॥३॥] किंच- एवं यद्वनस्पतीनां निर्लेपनमागमे प्रतिषिद्धम्, तदपीदानी प्रसक्तम्, कथम्? इति चेद् । उच्यते-इह प्रतिसमयमसंख्येया बनस्पतिभ्यो जीवा उद्वर्तन्ते, वनस्पतीनां च कायस्थितिपरिमाणमसंख्येयाः पुद्गलपरावर्ताः, ततो यावन्तोऽसंख्येयेषु पुद्गलपरावर्तेषु समयास्तरभ्यस्ता एकसमयोवृत्ता जीवा यावन्तो भवन्ति तावत्परिमाणमागतं वनस्पतीनाम्। ततः प्रतिनियतपरिमाणतया सिद्धं निर्लेपनम् , प्रतिनियतपरिमाणत्वात्.एवं च गच्छता कालेन सिद्धिरपि सर्वेषां भव्यानां प्रसक्ता, तत्प्रसक्तौ च मोक्षपथव्यवच्छेदोऽपि प्रसक्तः, सर्वभव्यसिद्धिगमनानन्तरमन्य स सिद्धिगमनायोगात् । आह च-"कायठिइकालेणं, तेसिमसंखिजयावहारेणं । णिल्लेत्रणमावण्णं, सिद्धीवि य सव्वभव्वाणं ॥१॥ | पइसमयमसंखिज्जा, जेणुव्बदंति तो तदभत्था । कायठिईए समया, वणस्सईणं च परिमाणं । २॥" [कायस्थितिकालेन तेषामसं ख्येयताकाऽपहारेण । निर्लेपनमापन्नं सिद्धिरपि च सर्वभव्यानाम् ॥ प्रतिसमयमसंख्येया येनोद्वर्तन्ते ततस्तदभ्यस्ताः । कायस्थित्याः समया वनस्पतीनां परिमाणम् ॥ ] न चैतदस्ति, वनस्पतीनामनादित्वस्व-निर्लेपनप्रतिषेधख-सर्वभव्यासिद्धे-र्मोक्षपथाव्यवच्छेदस्य Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्मपरीक्षा mer सटिप्पणा | ॥खोपा इति। गाथा॥४१॥ | च तत्र तत्र प्रदेशे सिद्धान्तेऽभिधानात् ? उच्यते--इह द्विविधा जीवाः-सांव्यवहारिका अमांव्यवहारिकाश्च । तत्र ये निगोदावस्थात उद्धृत्त्य पृथिवीकायिकादिभवेषु (भेदेषु) वर्तन्ते ते लोकेषु दृष्टिपथमागताः सन्तः पृथिवीकायिकादिव्यवहारमनुपतन्तीति सांव्यवहारिका उच्यन्ते । ते च यद्यपि भूयोऽपि निगोदावस्थामुपयान्ति तथाऽपि ते सांव्यवहारिका एव, संव्यवहार(रे) पतितत्वात् । ये पुनरनादिकालादारभ्य निगोदावस्थामुपगता एवावतिष्ठन्ते ते व्यवहारपथातीतत्वादसांव्यवहारिकाः । कथमेतदवसीयते द्विविधा जीवाः सांव्यवहारिका असांव्यवहारिकाश्चेति!, उच्यते, युक्तिवशात् । इह प्रत्युत्पन्नवनस्पतीनामपि निर्लेपनमागमे प्रतिषिद्धम् , किं पुनः सकलवनस्पतीनां तथा भव्यानामपि । तच्च यद्यसांव्यवहारिकराशिनिपतिता अत्यन्तवनस्पतयो न स्युस्ततः कथमुपपद्येत ? तस्मादवसीयते-अस्त्वसांव्यवहारिकराशिरिति, यद्गतानां वनस्पतीनामनादिता। किंच-इयमपि गाथा गुरूपदेशादागता समये प्रसिद्धा |" अत्थि अणंता जीवा, जेहिं ण पत्तो तसाइपरिणामो। तेवि अणताणंता, णिगोअवासं अणुहवंति (वसंति) ॥१॥” [मन्त्यनन्ता जीवा यैन प्राप्तः त्रसादिपरिणामः । तेऽप्यनन्तानन्ता निगोदवासमनुभवन्ति ॥] तत इतोऽप्यसांव्यवहारिकराशि सिद्धिः । उक्तं च-"ण य पच्चुप्पन्नवण-स्सईणं णिल्लेवणं न भव्वाणं । जुत्तं होइण तं जइ, अचंतवणस्सई नत्थि ॥१॥ एवं चा(म)णाइवण-स्सईणमत्थित्तमत्थओ सिद्धं । भण्णइ इमावि गाहा, गुरुवपसागया समए ॥२॥[न च प्रत्युत्पन्नवनस्पतीनां न भव्यानाम् । युक्तं भवति न तद् यदि अत्यन्तवनस्पतिर्नास्ति ॥ एवं चानादिवनस्पतीनामस्तित्वमर्थतः सिद्धम् । भण्यते इयमपि गाथा गुरूपदेशागता समये ॥] "अत्थि अणंता जीवा इत्यादि १८ पदे " ततोऽभव्या अव्यावहारिका एव, अन्यथाऽसंख्येयपुद्गलपरावर्तकालातिकमे तेषां सिद्धिगमनसाव्यवहारित्वभवनस्य वा प्रसङ्गाद् । अत एव चादरनिगोदजीवा अप्यव्यावहारिकराशावभ्युपगन्तव्याः, अन्यथा बादरनिगोदजीवेभ्यः सिद्धा Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥४२॥ CORRECRUGSAARC नामनन्तगुणत्वप्रसङ्गात् । थावन्तो हि सांध्यवहारिकराशितः सिध्यन्ति, तावन्त एव जीवा असांव्यवहारिकराशेविनिर्गत्य सांव्यवहारिकराशावागच्छन्ति । यत उक्तम्-"सिझंति जत्तिया किर, इह संववहारजीवरासीओ इंति अणाइवणस्सई-मज्झाओ तत्तिया चेव॥१॥"15 सटिप्पणा इति । [सिध्यन्ति यावन्तः किल इह संव्यवहारजीवराशितः । यन्ति अनादिवनस्पतिमध्यात्तावन्त एव ॥१॥] एवं च व्यवहारराशितः |॥ खोपन | सिद्धा अनन्तगुणा एवोक्ताः तत्र यदि बादरनिगोदजीवानां व्यावहारिकत्वं भवति, तहिं बादरनिगोदजीवेभ्यः सिद्धा अनन्तगुणाः संप-IN वृतिः ॥ माथा-९ घेरन्, सन्ति च सिद्धेभ्यो बादरनिगोदजीवा अनन्तगुणाः, तेभ्यः सूक्ष्मजीवा असंख्येयगुणाः। यदागमः-"एएसि णं भंते! जीवाणं मुहुमाणं बायराणं णोसुहुमाणं णोबायराणं कयरे कयरेहितो अप्पा वा, बहुआ वा, तुल्ला वा, विसेसाहिआ वा? । गोयमा! ॥४२॥ सव्वथोवा जीवा णोसहुमा णोबायरा, बायरा अणंतगुणा, सुहुमा असंखेजगुणा" इति । एत्तवृत्तिर्यथा-"एएसि णं भंते! जीवाणं सुहुमाणमित्यादि । सर्वस्तोका जीवा जोसुहमा णोबायरा, सिद्धा इत्यर्थः. तेषां सूक्ष्मजीवराशेर्बादरजीवराशेश्चानन्ततमभायकल्पत्वात् । तेभ्यो बादरा अनन्तगुणाः, बादरनिगोदजीवानां सिद्धेभ्योऽनन्तगुणत्वात् । तेभ्यश्च सूक्ष्मा असंख्येयगुणाः, बादरनिगोदजीवेभ्यः सूक्ष्मनिगोदजीवानामसंख्येयगुणत्वाद" इति।तत एवमागमबाधापरिहारार्थ बादरनिगोदजीवा अव्यावहारिकाः स्वीकर्तव्याः । प्रयोगश्चात्र-बादरनिगोदजीवा न व्यवहारिणः, तेषां सिद्धेभ्योऽनन्तगुणत्वात् । यथा सूक्ष्मनिगोदजीवास्तथा अनादिमन्तः सूक्ष्मा बादराश्च निगोदजीवा अव्यवहारिण एव, अन्यथा व्यवहारित्वभवनसिद्धिगमनयोरपर्यवसितत्वानुपपत्तेः । अपर्यवसितत्वं च “सिझंति जचिया किर." इत्यादिना सिद्धम्, तथा सांव्यवहारिका जीवाः सिध्यन्त्येव, आवलिकाऽसंख्येयभागपुद्गलपरावर्तसमयपरिमाणत्वेन परिमितत्वाद् । व्यतिरेके सिद्धा निगोदजीवाश्च दृष्टान्ततया वाच्या इति । 4545ARCREASINEK Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्मपरीक्षा ४३॥ [टी०] अत्थीत्यादि "एवमन्यत्रापि" "सामग्गीअभावाओ ववहारियरासिअप्पवेसाओ ॥ भव्वा वि ते अर्णता सिद्धिसुहं जे न पावंति।।१॥” प्रज्ञापनावृत्युक्तार्थस्याशयमजानानः शकते-नन्वित्यादिना। आगमविरोधमाह-किञ्चति। एवं व्यावहारिकाणामुत्कर्षतोऽप्यावलिकाऽसङ्ख्येयभागपुद्गलपरावर्तस्थि सटिप्पणा तिसिद्धौ। तदपीति वनस्पतीनां निर्लेपनमपि । प्रसक्तम् आपतितम् । 'अनिष्टापादनं प्रसङ्गः' अन्यस्य-अभब्यस्य । ननु निलेपनमोक्षपथव्यवच्छेदस्य प्रसक्तः ॥ स्वोपक्ष को दोष इत्याह न चैतदस्तीति, समाधिमाह-उच्यते । अव्यावहारिकाः, एव न तु व्यावहारिकाः, एवकारेणाऽभव्येष्वव्यवहारित्वस्यात्यन्तायोगव्यवच्छेदो वृत्तिः ॥ बोध्यत इति भावः । अन्यथा-अव्यावहारित्वस्य त्यन्तायोगव्यवच्छेदानभ्युपगमे । वा-विकल्पे तथा चाऽन्यतरप्रसङ्गाद् । अत एव-पूर्वोक्तान्यतरप्रसङ्गादेव । गाथा-९ ननु "सर्वे जीवा व्यवहार्यव्यवहारितया द्विधा, सूक्ष्मा निगोद एवान्त्याः, तेभ्योऽन्ये व्यवहारिणः।" इति योगशास्त्रवृत्ति- ॥४३॥ वचनाद् बाँदरनिगोदजीवानां व्यवहारित्वसिद्धेः कथमन्यवहारित्वमिति चेत् । न, तत्र 'सूक्ष्मनिगोदा एवान्त्याः ' इति पाठस्यापि दर्शनात् तत्र सूक्ष्माश्च निगोदाश्चेतीतरेतरद्वन्द्वकरणेऽसंगतिगन्धस्याप्यभावाद् । सूक्ष्मपृथिव्यादिजीवानां चाव्यवहारित्वं प्रज्ञापनावृत्त्यभिप्रायेण स्फुटमेव प्रतीयते, लोकदृष्टिपथमागतानामेव पृथिव्यादिजीवानां व्यवहारित्वभणनाद्, अन्यथा 'प्रत्येकशरीरिणो व्यावहारिकाः' इत्येव वृत्तिकदवक्ष्यत् । यच्च केवलं निगोदेभ्य उद्वृत्त्य पृथिवीकाथिकादिभवेषु वर्तन्ते इत्यादि भणितम् , तत्सूक्ष्मपृथिव्यादिजी-12 वानामसंख्येयत्वेनाल्पत्वाद् अवश्यभाविव्यवहारित्वाद्वाविवक्षणादिति सम्भाव्यते, सम्यग्निश्चयस्तु बहुश्रुतगम्य इति । एवं चासांव्य-1४ वहारिका जीवाः सूक्ष्मपृथिव्यादिषु निगोदेषु च सर्वकालं गत्यागतीः कुर्वन्तीति सम्पन्नम् । इत्थं च तत्र येऽनादिसूक्ष्मनिगोदेभ्य उद्वृत्त्य | शेषजीवेषूत्पद्यन्ते पृथिव्यादिविविधव्यवहारयोगात्सांच्चयहारिकाः। ये पुनरनादिकालादारभ्य सूक्ष्मनिगोदेष्वेवावतिष्ठन्ते तथाविधव्यवहारातीतत्वादसांव्यवहारिका इति । प्रवचनसारोद्धारवृत्तावपि “ अनादिसूक्ष्मनिगोदजीवा.अव्यवहारिणः" इत्यत्र सूक्ष्माः पृथिव्यादयश्चत्वारो, निगोदाश्च बादरसाधारणवनस्पतयः, न विद्यते आदियेषां तेऽनादयः-अप्राप्तव्यवहारराशय इत्यर्थः। तथा च Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ A कोपरीक्षा ॥४४॥ सटिप्पणा ॥ खोपन वृचिः ॥ गाथा-९ ॥४४॥ RRRRRRORS सूक्ष्माश्च निगोदजीवाश्चेति द्वन्द्वः, अनादयश्च ते सूक्ष्मनिगोदजीवाश्चेति कर्मधारयः, इति समासविधिद्रष्टव्यः । सर्वत्रापि कर्मधारयकरणे बादरनिगोदजीवानां व्यवहारित्वसम्पत्तावुक्तागमबाधप्रसङ्गादिति चेत् । उच्यते-यदेवं प्रज्ञापनावृत्त्यभिप्रायमनुसृत्याभव्यानामव्यावहारिकत्वं व्यवस्थाप्यते, तत्कि व्यावहारिकलक्षणायोगादुत परिभाषान्तराश्रयणात् !, नाद्यो लोकव्यवहारविषयः प्रत्येकशरीरवत्त्वादिस्तल्लक्षणस्याभव्येष्वपि सत्त्वादनन्तद्रव्यक्रियाग्रहणपरित्यागवतां तेषामव्यावहारिकराशिविनिर्गतत्वेन व्यावहारिकत्वस्योपदेशपदप्रसिद्ध त्वाच्च । तथा च तद्ग्रन्थः-"जं दव्वलिंगकिरिया-णतातीया भवंमि सगलावि। सव्वेसिं पाएणं, ण य तत्थवि जायमेअंति ॥१॥" एतद्वृत्तिः जमित्यादि। यद्-यस्माद्, द्रव्यलिङ्गक्रियाः-पूजाघभिलाषेण व्यावृत्तमिथ्यात्वादिमोहमलतया द्रव्यलिङ्गप्रधानाः शुद्धश्रमणभावयोग्याः प्रत्युपेक्षणाप्रमार्जनादिकाश्चेष्टाः,किम्? इत्याह-अनन्ता-अनन्तनामकसंख्याविशेषानुगता,अतीता व्यतिक्रान्ताः,भवे-संसारे, सकला अपि-तथाविधसामग्रीवशात्परिपूर्णा अपि, सर्वेषां-भवभाजां, प्रायेण-अव्यावहारिकराशिगतानल्पकालतनिर्गतांश्च मुक्त्वेत्यर्थः। | ततोऽपि किम् ? इत्याह-नच-नैव, तत्रापि तावपि सकलासु द्रव्यलिङ्गक्रियासु, जातमेतद्-धर्मबीजमित्यादि।।" अथ पृथिव्यादिव्य| वहारयोगेन तेषां व्यवहारिकत्वेऽप्यावलिकाऽसंख्येयभागपुद्गलपरावर्ताधिकसंसारवत्त्वेन न व्यावहारिकत्वमिति परिभाषान्तरमाश्री| यते इति द्वितीयः पक्षः परिगृह्यते इति चेत, परिगृह्यतां यदि बहुश्रुताः प्रमाणयन्ति, नैवमस्माकं कापि क्षतिः, मुख्यव्यावहारिकलक्षणपरित्यागेन तेषामव्यक्तमिथ्यात्वनियमाभ्युपगमादिविरुद्धप्रक्रियाया असिद्धः । न हि परिभाषा वस्तुस्वरूपं त्याजयतीति । एतेन बादरनिगोदजीवानां व्यावहारिकत्वनिषेधोऽपि प्रत्युक्तः, परिभाषामात्रेण लक्षणसिद्धस्य व्यावहारिकत्वस्य निषेधुमशक्यत्वात् । पृथिव्यादिविविधव्यवहारयोगिन्वलक्षणस्य तस्य प्राप्तसूक्ष्मनिगोदेतरत्वपर्यवसितस्यानुगतस्यानादिसूक्ष्मनिगोदेतरसर्वजीववृत्तित्वात् । चक्षु Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥४५॥ सटिप्पणा ॥स्वोपक्ष वृत्तिः ॥ गाथा-९ ॥४५॥ AMSUTRASTRUCACC ग्राह्यशरीरत्वरूपलक्षणं न तु लक्षणमित्यावयोः समानम्, अन्यथाऽस्माकं मूक्ष्मपृथिवीकायिकादिष्वव्याप्तेरिव तव मते बादरनिगोदेऽतिव्याप्तेरपि प्रसङ्गात् । किं च-प्रज्ञापनावृत्त्यभिप्रायेणापि बादरनिगोदजीवानां व्यवहारित्वमेव प्रतीयते । ये पुनरनादिकालादारभ्य निगोदावस्थामुपगता एवावतिष्ठन्ते ते व्यवहारपथातीतत्वादसांव्यवहारिका इति वचनादनादिवनस्पतीनामेवाव्यावहारिकत्वाभिधानात् । | तत्रेदं सूत्रं सांव्यवहारिकानधिकृत्यावसेयम्, न चासांव्यवहारिकान् , विशेषविषयत्वात्सूत्रस्य । न चैतत्स्वमनीषिकाविजृम्भितम् । यत आहुर्जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणपूज्यपादाः-"तह कायठिईकाला-दओ वि सेसे पडुच्च किर जीवे । नाणाइवणस्सइणो, जे संववहारबाहिरिया ॥१॥ण तथा कायस्थितिकालादयोऽपि शेषान् प्रतीत्य किल जीवान् । नानादिवनस्पतीन् ये संव्यवहारबाह्याः॥] अत्रादिशब्दात्सर्वैरपि जीवः श्रुतमनन्तशः स्पृष्टमित्यादि । यदस्यामेव प्रज्ञापनायामेव वक्ष्यते प्रागुक्तं च तत्परिग्रहस्ततो न कश्चिद्दोष इति, | अग्रे व्यक्तमेव अनादिवनस्पत्यतिरिक्तानां व्यावहारिकत्वाभिधानाच्च । अनादिवनस्पतय इति च सूक्ष्मनिगोदानामेवाभिधानम् , न तु बादरनिगोदानामिति ग्रन्थान्तरेऽप्ययमेवाभिप्रायो ज्ञायते । उक्तं च लघूपमितभवप्रपञ्चग्रन्थे श्रीचन्द्रसूरिशिष्यश्रीदेवेन्द्रसूरिभिः-"अस्त्यत्र लोके विख्यात-मनन्तजनसकुलम् । यथार्थनामकमसं-व्यवहाराभिधं पुरम् ॥३७॥ तत्रानादिवनस्पति| नामानः कुलपुत्रकाः । वसन्ति(च) तत्र कर्म-परिणाममहीभुजा ॥६८॥ नियुक्तौ तीव्रमोहोद-यात्यन्तबोधनामको । महत्तमवलाध्यक्षौ, तिष्ठतः स्थायिनौ सदा ॥ ६९ ॥ युग्मम् ॥ताभ्यां कर्मपरिणाम-महाराजस्य शासनात् । निगोदाख्यापवरकेष्व-संख्येयेषु दिवाऽनिशम् ॥७॥क्षिप्त्वा संपिण्ड्य धार्यन्ते, सर्वेऽपि कुलपुत्रकाः। प्रसुप्तवन्मूर्छितव-न्मत्तवन्मृतवच्च ते॥७१॥ युग्मम्।। ते स्पष्टचेष्टाचैतन्य-माहै|पादिगुणवर्जिताः । छेदभेदप्रतीघात-दाहादीन्नाप्नुवन्ति च ॥७२॥ अपरस्थानगमन-प्रमुखोनापि कश्चन । क्रियतेऽन्योऽपि तैलौक Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥४६॥ |व्यवहारः कदाचन। ७।संसारिजीवसंज्ञेन, वास्तव्येन कुटुंबिना । कालो निर्गमितः पूर्व, तत्रानन्तो मयाऽपि हि ॥७४॥तथा अत्रैव सटिप्पणा कियदन्तरे.॥ तत्रैकाक्षनिवासाख्ये, नगरे प्रथमं खलु । अमीभिरस्ति गन्तव्य-मर्थनं युवयोश्च तत् ॥२६॥ ताभ्यामपि तथेत्युक्ते, ते ॥ खोप | सर्वे तत्पुरं ययुः । तसिंश्च नगरे सन्ति, महान्तः पञ्च पाटकाः ॥ २७॥ एकं पाटकमड्गुल्या. दर्शयन्नग्रतः स्थितम् । मामेवमथ त वृचिः ॥ न्वनि तीव्रमोहोदयोऽब्रवीत् । २८ ॥ खमत्र पाटके तिष्ठ, भद्र ! विश्वस्तमानसः । पाश्चात्यपुरतुल्यत्वाद्, भाव्येष धृतिदस्तव ॥२९॥ | गाथा-१ यथा हि तत्र प्रासाद-गर्भागारस्थिता जनाः। सन्त्वनन्ता पिण्डिताङ्गा-स्तथैवात्रापि पाटके ॥३०॥वर्तन्ते किन्तु ते लोक-व्यवहारपरा- ॥४६॥ सुखाः । मनीषिभिः समानाता-स्तेनासांव्यवहारिकाः॥३१॥ गमागमादिकं लोक-व्यवहारममी पुनः । कुर्वन्ति सर्वदा तेन, प्रोक्ताः सांव्यवहारिकाः ॥३२।। अनादिवनस्पतय, इति तेषां समाभिधा । एषां तु वनस्पतय, इति भेद (दो) यथापरः ॥३३॥ वृद्धोपमित-14 भवप्रपश्चग्रन्थेऽप्येवमेवोक्तमस्ति । तथाहि-"अस्तीह लोके आकालप्रतिष्ठमनन्तजनसंकुलमसंव्यवहारं नाम नगरम् । तत्र सर्वसिन्नगरेऽनादिवनस्पतिनामानः कुलपुत्रकाः प्रतिवसन्ति" इत्यादि । “उक्तौ च भवितव्यतया महत्तराबलाधिकृतौ--यदुत मया युवाभ्यां | चामीभिः मह यातव्यम् । यतो भदेवता नारीति न मोक्तव्यो मया संसारी जीवः । यच्चास्ति युवयोरपि प्रतिजागरणीयमेकाक्षनिवासं नाम नगरम् । तत्रामीभिर्लोकः प्रथमं गन्तव्यम् । ततो युज्यते युवाभ्यां सह चामीषां तत्रासितुं नान्यथा । ततो यद्भवती जानाती-12 त्यभिधाय प्रतिपन्नं तद्वचनं महत्तमबलाधिकृताभ्याम् । प्रवृत्ताः सर्वेऽपि, समागतास्तदेकाक्षनिवासं नगरम् । तत्र नगरे महान्तः पञ्च पाटका विद्यन्ते । ततोऽहमेकं पाटकं कराग्रेण दर्शयता तीव्रमोहोदयेनाभिहितः--भद्र संसारिजीव! तिष्ठ त्वमत्र पाटके । यतोऽयं पाटकोऽसंव्यवहारनगरेण बहुतरं तुल्यो वर्तते । भविष्यत्यत्र तिष्ठतो धृतिरित्यादि । ततोऽहं यदा तत्रासंव्यवहारनगरेऽभूवम् , तदा मम Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा 45 ४७॥ सटिप्पणा ॥खोपक्ष वृत्तिः ॥ गाथा-१ ॥४७॥ जीर्णायां जीर्णायामपरां गुटिकां दत्तवती, केवलं सूक्ष्ममेव मे रूपमेकाकारं सर्वदा तत्प्रयोगेण विहितवती । तत्र पुनरेकाक्षनिवासनगरे समागता तीव्रमोहात्यन्तबोधयोः कुतूहलमिव दर्शयन्ती तेन गुटिकाप्रयोगेण ममानेकाकारं स्वरूपं प्रकटयति स्मेत्यादि ।" (टी०) ननु बादरनिगोदजीवानां योगशास्त्रवृत्तौ व्यवहारित्वस्यैव भणनान्न तेषामव्यवहारित्वमित्येवाह-नन्विति, कथमिति आझेपे नैवेत्यर्थः । तत्र-यो | गशास्त्रवृत्तौ । ननु सूक्ष्मनिगोदा इत्यत्रेतरेतरद्वन्द्वसमासाश्रयणे सूक्ष्मपृथिव्यादिजीवानामप्यव्यवहारिवापत्तिप्रसङ्ग इत्यत आह-वृक्ष्मपृथिव्यादिजीवानामिति तथा चेष्टापत्तिरिति भावः । स्फुटमेव प्रतीयते-ऐदंपर्येण न तु शब्देन । ननु तद्बोधकशब्दाभावेऽस्मिन्नेवार्थे तात्पर्य मिति कथं ज्ञातम् ? इत्याह-लोकदृष्टिपथमित्यादि । अन्यथा-सूक्ष्मपृथिव्यादिजीवानामव्यवहारिवानङ्गीकारे । अवक्ष्यत् लाघवसत्त्वादिति शेषः, बाधकाभावे गौरवस्य दुष्टत्वादिति भावः । ननु यदि सूक्ष्मपृथिव्यादिजीवानामव्यवहारिव एवं प्रज्ञापनावृत्त्यभिप्राय: स्यात्तदा " ये निगोदावस्थात उद्धृत्य " इत्यादि सूक्ष्मपृथिव्यादीनामपि कथं नोक्तम् ? इत्याह यच्चेति इत्थञ्चेति । सूक्ष्मपृथिव्यादिजीवानां बादरनिगोदजीवानाञ्चाब्यवहारित्वसिद्धौ च । उक्तार्थे पूर्वाचार्यसंवादमाह-प्रवचनसारोद्धारवृत्तावपीति । नन्वत्र सर्वत्र कर्मधारयसमासाश्रयणे अस्मदुक्तमपि न दुष्टमित्याह-सर्वत्रापीति "ततोऽभव्या अव्यवहारिका एव" इत्यादिनाऽभव्यानामग्यवहारित्वमुक्तं, तदसत्, विकल्पासहत्वादित्येवाह उच्यते । तत्-अव्यवहारिकत्वम्, किं शब्द:-प्रश्ने । नन्वभव्यव्यावृत्तमन्यदेव लक्षणमित्याहअनन्तद्रव्येत्यादि तथाचोपदेशपदवचनेन विरोधः स्यादिति भावः । द्वितीयपक्षमाह-अथेति । तेषाम्-अभव्यानाम् । असिद्धेरिति-बहुश्रुतप्रमाणस्वेन इति शेषः। ननुक्तपरिभाषयैवाव्यक्तमिथ्यात्वनियमाभ्युपगमादिप्रक्रियायाः सिद्धिः स्यादित्याह-न हीति, पतेन-वक्ष्यमाणयुक्त्या । बादरनिगोदजीवानां प्रज्ञापनावृत्त्यनुसारेणाव्यवहारित्वमुक्तं तदप्यसमञ्जसमेवेत्येवाह किश्चेति । नन्विदं सूत्रं सांव्यवहारिकविशेषविषयकमेवेति कथं ज्ञातम् ! इति चेदाहविशेषविषयत्वादिति। नन्विदं स्वोत्प्रेक्षामूलकत्वेनाप्रमाणं स्थादित्यत आह-न चेति, यत इति यस्मात्कारणात् । तह कायेत्यादिगाथाया अयमर्थः-तथा कायस्थितिकालादयो ये उक्तास्ते शेषान् अनादिवनस्पतिव्यतिरिक्तान् जीवान् प्रतीत्य-आश्रित्य, किल निश्चयेन ज्ञेया इति शेषः, किन्तु नानादिवनस्पतीनाश्रित्य यत ये अनादिवनस्पतयः संव्यवहारबाझाः असांव्यवहारिका इत्यर्थः । नन्वनादिवनस्पतिशब्देन कथं न निगोदमात्रस्याभिधानमित्यत आहअनादिवनस्पतय इति, इतिः-हेतौ-तथा च यस्मात्कारणाद्, ग्रन्थान्तरेऽप्ययमेवाभिप्रायः । ननु कस्मिन् ग्रन्थान्तरे इत्याह उक्तश्चेति, Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥४८॥ सटिप्पणा ॥स्वोपन वृत्तिः ॥ गाथा-९ ॥४८॥ समयसारसूत्रवृत्त्योरप्युक्तम्-"अहवा संववहारिया य असंववहारिया य।" तवृत्तिः, अथवेति द्वैविध्यस्यैव प्रकारान्तरोद्योतने । एतदेव स्पष्टयन्नाह-"तत्थ जे अणाइकालाओ आरब्भ सुहुमणिगोएमु चिठ्ठति न कयाइ तसाईभावं पत्ता ते असंववहारिया । जे पुण सुहुमणिंगोएहितो निग्गया सेसजीवेसु उप्पन्ना ते संववहारिआ ते अपुणोवि मुहुमणिगोअत्तं पत्तावि संववहारिअच्चिय भण्णंति ॥" | [अथवा सांव्यवहारिकाश्चासांव्यवहारिकाश्च ।। तत्र ये अनादिकालादारभ्य सूक्ष्मनिगोदेषु तिष्ठन्ति,न कदाचित् त्रसादिभावं प्राप्तास्ते असांव्यवहारिकाः । ये पुनः सूक्ष्मनिगोदेभ्यो निर्गताः शेषजीवेषूत्पन्नास्ते सांव्यवहारिकाः । ते च पुनरपि सूक्ष्मनिगोदत्वं प्राप्ता अपि | सांव्यवहारिका एव भण्यन्ते ] इदमत्र हृदयम्-सर्वसंसारिणां प्रथममनादिकालादारभ्य सूक्ष्मनिगोदेष्वेवावस्थानम् , तेभ्यश्च निर्गताः शेषजीवेषत्पन्नाः पृथिव्यादिव्यवहारयोगात्सांव्यवहारिकाः। ते च यद्यपि कदाचिद् भूयोऽपि तेष्वेव निगोदेषु गच्छन्ति, परं तत्रापि | सांव्यवहारिका एव, व्यवहारपतितत्वात् । ये न कदाचित्तेभ्यो निर्गताः "अत्थि अणंता जीवा, जेहिं ण पत्तो तसाइपरिणामो । तेवि | अणंताणंना, णिगोअवासं अणुहवंति"॥१॥ [सन्त्यनन्ता जीवा यैर्न प्राप्तस्त्रसादिपरिणामः: तेऽप्यनन्तानन्ता निगोदवासमनुभवन्ति ॥] इति वचनात्तत्रैवोत्पत्तिव्ययभाजस्ते तथाविधव्यवहारातीतत्वादसांव्यवहारिका इति। तत्रैवाग्रेऽप्युक्तम्-"तेरसविहा जीवा जहा णोसुहुमणिगोअरूवे असंववहारभेए । बारस संववहारिआ, ते आइमे-पुढवी-आऊ-तेउ-बाउ-णिगोआ, मुहूमबायरत्तेण दु दु भेआ,१० पत्तेअवणस्सई १० तसा ११ य ॥"[त्रयोदशविधा यथाक्ष्मनिगोदरूपोऽसंव्यवहारभेदः, द्वाद सांव्यवहारिकाः,-पृथिव्य-ते चेमे-पृथिव्यप्ते जोवायुनिगोदाः सूक्ष्मवादरत्वेन द्वौ द्वौ भेदो, प्रत्येकवनस्पतयः त्रसाश्च । सांव्यवहारिकासांव्यवहारिकत्वेन जीवानां द्वैविध्यं प्रार दर्शितम्।तत्रासांव्यवहारिको राशिरेक एव मूक्ष्मनिगोदानामेवासांव्यवहारिकत्वात्. सांव्यवहारिकभेदास्तु द्वादशा च इमे पृथिव्यादयः MARCH Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥४९॥ 34+% पञ्च, सूक्ष्मबादरतया द्विभेदाः, प्रत्येकवनस्पतयः त्रसाश्चेति ॥ तथा भवभावनावृत्तावप्युक्तम्-अणाइमं एस भवे, अणाइमं च जीवे, अणाई असामन्त्रण तस्स नाणावरणाइकम्मसंजोगो, अपज्जवसिओ अभब्वाणं, सपञ्जवसिओ उण भव्वाणं। विसेसओ उण मिच्छ-* |सटिप्पणा त्ताविरइपमायकसायजोगेहि कम्मसंजोगो जायइत्ति । सव्वेसिपि जीवाणं साईओचेव एसो जाओ अकामणिज्जरा-बालतवोकम्मसम्मत्त स्वोपड़ वृत्तिः ॥ नाणविरइगुणेहिं अवस्समेव विहडइत्ति सम्बेसि सपज्जवसिओ चेव। तेण य कम्मपोग्गलसंजोअणाणुभावेणं वसंति । सम्वेवि पाणिणो गाथा-९ पुब्धि ताव अणताणतपोग्गलपरिअट्टे अणाइवणस्सइणिगोएसु पीडिजंति । तत्थेगणिगोअसरीरे अणंता परिणमंति असंखणिगोअसमुद ॥४९॥ यणिफण्णगोलयभावेणं, समगमणता जीवा ऊससंति, समगं णीससंति, समगं आहारेंति, समगं परिणामयंति, समग उप्पजंति, समगं विजंति, थीणद्धीमहाणिद्दागाढनाणावरणाइकम्मपोग्गलोदएणं न वेअंति अप्पाणं, न मुणंति परं, न सुणंति सइं, न पेच्छंति सरूवं, न अग्घायंति गंधं, न बुझंति रसं, न विदंति फासं, न सरंति कयाकयं, महपुब्वं न चलंति, न फंदंति, ण सीयमणुसरंति, नायवमुवगच्छति । केवलं तिव्वविसयवेयणाभिभूअमजपाणमत्तमुदियपुरिसन्न जहुत्तरकालं तेसु वसिऊण कहमवि तहाभव्वत्तभविअव्वयाणि ओगेणं किंपि तहाविहडिअकम्मपोग्गलसंजोगा तेहितो णिग्गंतुमुववजंति केइ साहारणवणस्सइसु अल्लय-सूरण-गजर-वजकंदाइरू| वेण" इत्यादि । [ अनादिमानेष भवः, अनादिमांश्च जीवः, अनादिश्च सामान्येन तस्य ज्ञानावरणादिकर्मसंयोगः, अपर्यवसितोऽभव्या नाम , सपर्यवसितश्च पुनर्भव्यानाम् । विशेषतः पुनर्मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकषाययोगैः कर्मसंयोगो जायते इति । सर्वेषामपि जीवानां | सादिक एव एष जात अकामनिर्जराबालतपःकर्मसम्यक्त्वज्ञानविरतिगुणैरवश्यमेव विघटते इति सर्वेषां सपर्यवसित एव । तेन च कर्मपुदलसंयोजनानुभावेन वसन्ति सर्वेऽपि प्राणिनः पूर्व तावदनन्तानन्तपुद्गलपरावर्ताननादिवनस्पतिनिगोदेषु पीब्यन्ते । तत्रैकनिगोद NAGAGGACADA) A4S4 Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा 119011 शरीरे अनन्ताः परिणमन्ति, असंख्यनिगोद समुदयनिष्पन्नगोलकभावेन । समकमनन्ता जीवा उच्छ्वसन्ति, समकं निःश्वसन्ति, सम कमाहारयन्ति, समकं परिणामयन्ति समकमुत्पद्यन्ते, समकं विद्यन्ते, स्त्यानर्द्धिमहानिद्रा गाढज्ञानावरणादिकर्म पुद्गलोदयेन न वेदयन्ति आत्मानं, न जानन्ति परं न शृण्वन्ति शब्दम्, न पश्यन्ति स्वरूपम्, नाजिघ्रन्ति गन्धम्, न बुद्धयन्ते रसम्, न वेदयन्ति स्र्पशम्, न स्मरन्ति कृताकृतम्, मतिपूर्वं न चलन्ति, न स्पन्दन्ते, न शीतमनुस्मरन्ति, नातपमुपगच्छन्ति । केवलं - तीत्रविषय वेदनाभिभूतम"द्यपानमत्त - मुदित पुरुषवद्यथोत्तरकालं तेषु उषित्वा कथमपि तथाभव्यत्व भवितव्यतानियोगेन किमपि तथाविघटित कर्म पुद्गलसंयोगास्तेभ्यो निर्गत्योत्पद्यन्ते केचित्साधारणवनस्पतिषु आर्द्रक - सूरण-गर्जर - वज्रकन्दादिरूपेण || तथा तत्रैव प्रदेशान्तरे प्रोक्तम् — “ ततो बलिनरेन्द्रेणोक्तम्- स्वामिंस्तर्हीदमेव श्रोतुमिच्छामि, प्रसादं विधाय निवेदयन्तु भगवन्तः । ततः केवलिना प्रोक्तम्महाराज ! सर्वायुषाऽप्येतत्कथयितुं न शक्यते । केवलं यदि भवतां कुतूहलं तर्हि समाकर्णयत, संक्षिप्य किंचित्कथ्यते - इतोऽनन्तकालास्परतो भवान्किल चारित्र सैन्य सहायो भूत्वा मोहारिबलक्षयं करिष्यतीति कर्मपरिणामेनासंव्यवहारपुरान्निष्काश्य समानीतो व्यवहारनिगोदेषु । ततो विज्ञातैतद्व्यतिकरैर्मोहारिभिः प्रकुपितैर्विधृतस्तेष्वेव त्वमनन्तं कालम् । ततः पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिद्वित्रिचतुष्पञ्चेन्द्रियतिर्यक्षु नरकेष्वनार्यमनुष्येषु चानीतस्त्वं कर्मपरिणामेन, पुनः पुनरनन्तवाराः कुपितैर्मोहादिभिर्व्यावर्त्य नीतोऽसि पश्चान्मुखो निगोदादिषु, एवं तावद् यावद्भावितोऽस्यतिदुःखितस्तैरनन्तानन्तपुद्गलपरावर्तान् । ततश्चार्यक्षेत्रेऽपि लब्धं मनुष्यत्वमनन्तवाराः, किन्तु हारितं क्वचित् कुजातिभावेन, क्वापि कुलदोषेण, क्वचिजात्यन्धवधिरखञ्जत्वादिवैरूप्येण, क्वापि कुष्ठादिरोगैः क्वचिद| ल्पायुष्कत्वेन एवमनन्तवारा: (रम्), किन्तु धर्मस्य नामाप्यज्ञात्वा भ्रान्तस्तथैव (स्तेष्वेव ) पराङ्मुखो व्यावृत्यानन्तपुद्गलपरावर्ताने के सटिप्पणा ॥ खोपड वृतिः ॥ गाथा - ९ ॥५०॥ Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥५१॥ का सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-९ ॥५१॥ RASACASSA न्द्रियादिषु ततोऽन्यदा श्रीनिलयनगरे धनतिलकवेष्ठिनो जातस्त्वं वैश्रमणनामा पुत्रः। तत्र च 'स्वजनधनभवनयौवनवनितातत्त्वाद्यनि | त्यमिदमखिलं ज्ञात्वाऽऽपत्राणसहं धर्म शरणं भजत लोकाः?' इति वचनश्रवणाजाता धर्मकरणबुद्धिः केवलम् । साऽपि कुदृष्टिसम्भवा महापापबुद्धिरेव परमार्थतः सञ्जाता । तद्वशीकृतेन च स्वयम्भूनाम्नस्त्रिदण्डिनः शिष्यत्वं प्रतिपन्नम् । ततस्तदपि मानुषत्वं हारयित्वा व्यावर्तितो भ्रामितः संसारेऽनन्तपुद्गलपरावर्तानिति । ततोऽनन्तकालात्पुनरप्यन्तराऽन्तरा लब्धं मानुषत्वम्, परं न निवृत्ताऽसौ कुधर्मबुद्धिः। शुद्धधर्मश्रवणाभावोऽपि क्वापि सद्गुरुयोगाभावात्क्वचिदालस्यमोहादिहेतुकलापात् । क्वचिच्छुद्धधर्मश्रवणेऽपि तन्निवृत्तोऽसौ शून्यतया तदर्थानवधारणात् क्वचिच्च श्रद्धानेन ततः कुधर्मबुद्धथुपदेशाद्धमच्छलेन पशुवधादिमहापापानि कृत्वा भ्रान्तस्तथैवा(स्तेष्वेवा) नन्तपुद्गलपरावर्तीनिति ॥” तथा श्रावकदिनकृत्यवृत्तावप्युक्तम्-"इह हि सदैव लोकाकाशप्रतिष्ठितानाद्यपर्यवसितभवचक्राख्य| पुरोदरविपरिवर्ती जन्तुरनादिवनस्पतिषु सूक्ष्मनिगोदापरपर्यायेष्वनन्तानन्तयुद्गलपरावर्तान्समकाहारोच्छ्वासनिःश्वासोऽन्तर्मुहूर्तान्तर्ज |न्ममरणादिवेदनात्रातमनुभवति" इत्यादि । तथा "एवं च तथाविधभव्यजन्तुरप्यनन्तकालमव्यवहारराशौ स्थित्वा कर्मपरिणामनपादेशातथाविधभवितव्यतानियोगेन व्यवहारराशिप्रवेशत उत्कर्षेण बादरनिगोदपृथिव्यप्तेजोवायुषु प्रत्येकं सप्तकोटिसागरोपमाणि तिष्ठन्ति। एषा च क्रिया सर्वत्र योज्या। एतेष्वेवं सूक्ष्मेष्वसंख्यलोकाकाशप्रदेशसमा उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः" इत्यादि ॥ पुष्पमालाबृहदवृत्तावप्युक्तम् "ननु कथमित्थं मनुष्यजन्मदुर्लभं प्रतिपाद्यते? उच्यते-समाकर्णय कारणम् । “अबवहारणिगोएसु, ताव चिट्ठति जंतुणो | सके ।। पढमं अणंतपोग्गल-परिअट्टे थावरत्तेणं ॥१॥ [अव्यवहारनिगोदेषु तावत्तिष्ठन्ति जन्तवः सर्वे ।। प्रथममनन्तपुद्गलपरावर्तान् स्थावरत्वेन॥१॥] तत्तो विणिग्गया वि हु, ववहारवणस्सइंमि णिवसंति । कालमणंतपमाणं, अणंतकायाइभावेणं ॥२॥ ततो विनिर्गता Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥५२॥ सटिप्पणा ॥स्वोपड़ वृत्तिः ॥ गाथा-९ ॥५२॥ BARASHICIRECECABARSANGA अपि च व्यवहारवनस्पती निवसन्ति । कालमनन्तप्रमाणमनन्तकायादिभावेन ॥३॥ तत्तोवि समुबट्टा, पुढविजलानलसमीरमज्झमि ॥ अस्संखोसप्पिणिसप्पिणीओ णिवसंति पत्तेयं ॥३॥ ततोऽपि समुद्वृत्ताः पृथिवी-जला-नल-समीरमध्ये । असंख्योत्सर्पिण्यवसर्पिणीनिवसन्ति प्रत्येकम् ॥३॥] संखेज पुण कालं, वसंति विगलिदिएसु पत्तेयं ॥ एवं पुणोपुणो वि य, भमंति ववहाररासिंमि ॥४॥" [संख्येयं पुनः कालं वसन्ति विकलेन्द्रियेषु प्रत्येकम् । एवं पुनः पुनरपि च भ्रमन्ति व्यवहारराशौ ॥ ४॥] तल्लघुवृत्तावप्युक्तम्"आदौ सूक्ष्मनिगोदे, जीवस्यानन्तपुद्गलविवर्तान् । तस्मात्कालमनन्तं, व्यवहारवनस्पतौ वासः॥१॥ उत्सर्पिणीरसंख्याः, प्रत्येक भूजलाग्निपवनेषु । विकलेषु च संख्येयं, कालं भूयो भ्रमणमेव ॥ २॥ तिर्यपञ्चेन्द्रियतां, कथमपि मानुष्यकं ततोऽपीह । क्षेत्रकु. लारोग्यायुर्बुद्धयादि यथोत्तरं तु दुरवापम् ॥ ३॥" धर्मरत्नप्रकरणवृत्तावप्युक्तम्-"इभ्यस्तन्नमनार्थ, प्रययौ नत्वा गुरून समयविधिना । निषसाद यथास्थानक-मथ सरिर्देशनां चक्रे ॥१॥ अव्यवहारिकराशी, भ्रमयित्वाऽनन्तपुद्गलविवर्तान् । व्यवहृ. तिराशौ कथमपि, जीवोऽयं विशति तत्रापि ॥२॥ बादरनिगोद-पृथिवी-जल-दहन-समीरणेषु जलधीनाम् । सप्ततिकोटाकोव्यः, कायस्थितिकाल उत्कृष्टः ॥ ३॥ सूक्ष्मेष्वमीषु पञ्च-स्ववसर्पिण्यो ह्यसंख्यलोकसमाः । सामान्यबादरेऽङ्गुल-गणनातीतांशमानास्ताः | ॥४॥" इत्यादि । संस्कृतनवतत्त्वसूत्रेऽप्युक्तम्-निगोदा एव गदिता, जिनैरव्यवहारिण । सूक्ष्मास्तदितरे जीवा-स्तेऽन्येऽपि व्यवहारिणः ॥१॥" इति तदेवंविधवचनैरनादिसूक्ष्मनिगोदस्यैवासांव्यवहारिकत्वम्, अन्येषां च व्यावहारिकत्वमिति स्थितौ परोक्ता युक्तिरेकाऽवतिष्ठते । तत्र “सिझंति जत्तिया किर०" इत्यादिना व्यवहारराशितः सिद्धानामनन्तगुणत्वं व्यवस्थाप्य तदनन्तगुणत्वेन बादरनिगोदजीवानामव्यावहारिकत्वं च व्यवस्थापितम् । तदसत,(ततः)सिद्धथवच्छिन्नव्यवहारराश्यपेक्षया सिद्धानामनन्तगुणत्वसिद्धावपि NEWSTMASSACSCACIES Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RECRUAE%E0 | सटिप्पणा स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-१० सामान्यापेक्षया तदसिद्धेः, व्यवहारित्वभवनसिद्धिगमनयोरपर्यवसितत्वं चानादिसूक्ष्मनिगोदानियतव्यवहारित्वाभिमुखजीवानां निर्गधर्मपरीक्षा मान्नानुपपन्नम् । आवलिकासंख्येयभागपुद्गलपरावर्तमानत्वेन व्यावहारिकाणां सर्वेषां सिद्ध्यापत्तिस्तु स्यात् । तत्रामव्यस्य व्यावहारि ॥५३॥ कत्वानुरोधेन निगोदत्वेन तिर्यक्त्वनपुंसकत्वादिना च कायस्थितिप्रतिपादकानां सूत्राणां व्यावहारिकविशेषविषयत्वं वा कल्पनीयम्, अन्यो वा कश्चित्मूत्राभिप्राय इत्यत्र बहुश्रुता एव प्रमाणम् । अवश्यं च सूत्राभिप्रायः कोऽपि मृग्यः, अन्यथा बहवो भव्यास्तावदेतालवतः कालासिध्यन्ति, अन्ये तु स्वल्पात,अपरे तु स्वल्पतरात्, यावत्केचिन्मरुदेवीस्वामिनीवत्स्वल्पेनैव कालेन सिध्यन्ति । अभव्यास्तु | कदाचिदपि न सिध्यन्ति, भवभावनावृत्त्यादिवचनादभव्यानां भव्यानां च यदुक्ताधिकसंसारभेदभणनं तन्नोपपद्येत । यत्तु परे णोक्तम्-यत्तु क्वचिदाधुनिकप्रकरणादो प्रज्ञापनाद्यागमविरुद्धानि वचनानि भवन्ति, तत्र तीर्थान्तरवर्तिनामसद्ग्रहाभावादनाभोग | एव कारणम् । तथा अभव्या न व्यवहारिणो नाप्यव्यवहारिणः, किन्तु व्यवहारित्वादिव्यपदेशवाह्या इति ते व्यावहारिकमध्ये न विवक्षितास्तेषां सम्यक्त्वप्रतिपतितानामनन्तभागवर्तित्वेनाल्पत्वादिति ॥ तदतिसाहसविजृम्भितम्, अभिप्रायमज्ञात्वा प्राचीनप्रकरणविलोपे महाशातनाप्रसङ्गात् । अभव्यानामपि व्यावहारिकबहिर्भावे नियतकायस्थितिरूपसंसारपरिभ्रमणानुपपत्तेर्यादृच्छिककल्पना याऽसमञ्जसत्वप्रसङ्गात, नोव्यवहारित्व-नो अव्यवहारित्वपरिभाषामात्रस्य चाभव्येष्विवोक्ताधिकसंसारिजीवेष्वपि कल्पयितुं वा शक्यत्वाच न किंचिदेतदिति दिग् ॥ ९॥ तदेवमभव्यस्याप्याभिग्रहिकं मिथ्यात्वं भवतीति प्रदर्शयितुमाभिग्रहिक स्य षड् भेदा उक्ताः । अथानाभिग्रहिकादीनामपि सामान्येन बहुप्रकारत्वं निर्दिशन्नतेषु गुरुलधुभावं विवेचयतिअणभिग्गहिआईणवि, आसयभेएण हुंति बहुभेआ। लहुआई तिणि फलंओ, एएसुंदुन्नि गरुआई॥१०॥ %A4.. Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -CG सटिप्पणा ॥ खोपन चिः ॥ * गाथा-१. | ॥५४॥ [अनामिग्रहिकादीनामपि आशयभेदेन भवन्ति बहुमेदाः । लघुनि त्रीणि फळतो एतेषु द्वे गुरुणी ॥१०॥] धर्मपरीक्षा | अणभिग्गहिआईणवित्ति। अनामिग्रहिकादीनामपि मिथ्यात्वानाम्, आशयभेदेन परिणामविशेषेण, बहवो भेदा भवन्ति । ॥५४॥ | तथाहि-अनामिग्रहिकं किंचित्सर्वदर्शनविषयम्-यथा 'सर्वाणि दर्शनानि शोभनानि' इति । किंचिद्देशविषयम्-यथा 'सर्व एव श्वेता |म्बरदिगम्बरादिपक्षाः शोभनाः' इत्यादि । आभिनिवेशिकमपि मतिभेदाभिनिवेशादिमूलभेदादनेकविधम्-जमालिगोष्ठामाहिलादीनाम्। उक्तं च व्यवहारभाष्य-"मइभेएण जमाली, पुचि बुग्गाहिएण गोविंदो । संसग्गीए भिक्खू , गोट्ठामाहिल अहिणिवेसत्ति ॥१॥" इति[मतिभेदेन जमालिः पूर्व व्युग्राहितेन गोविन्दः। संसर्गाद् भिक्षुर्गोष्ठामाहिल अभिनिवेशादिति॥] सांशयिकमपि सर्वदर्शन-जैनदर्शनतदेकदेशपदवाक्यादिसंशयभेदेन बहुविधम् । अनाभोगोऽपि सर्वांशविषयाध्यक्तबोधस्वरूपो विवक्षितकिंचिदंशाव्यक्तबोधस्वरूपश्चेत्यनेकविधः । न खलु महामोहशैलूपस्यैको नर्तनप्रकारोऽस्तीति । एतेष्वाभिग्रहिकादिषु मिथ्यात्वेषु मध्ये, त्रीण्यनाभिग्रहिकसां. शयिकानाभोगरूपाणि, फलतः प्रज्ञापनीयतारूपं गुरुपारतन्त्र्यरूपं च फलमपेक्ष्य, लघूनि, विपरीतावधारणरूपविपर्यासव्यावृत्तत्वेनैतेषां क्रूरानुबन्धफलकत्वाभावात् ।द्वे आभिग्रहिकाभिनिवेशलक्षणे मिथ्यात्वे, गुरू (रुणी) विपर्यासरूपत्वेन सानुबन्धक्लेशमूलत्वात् । | उक्तं चोपदेशपदे-"एसो अ एत्थ गुरुओ, णाणज्झवसायसंसया एवं । जम्हा असप्पवित्ती, एत्तो सव्वत्थणत्थफला ॥१॥" [[ एष चात्र गुरु नध्यवसायसंशयावेवम् । यस्मादसत्प्रवृत्तिरितः सर्वत्रानर्थफला || ] दुष्प्रतीकारोऽसत्प्रवृत्तिहेतुत्वेनैव विपर्यासोऽत्र गरीयान् दोषः, न त्वनध्यवसाय-संशयावेवंभृतौ, अतत्त्वाभिनिवेशाभावेन तयोः सुप्रतीकारत्वेनात्यन्तानर्थसंपादकत्वाभावादित्येतत्तात्पर्यार्थः॥ नन्वत्र मापतुपादीनां चारित्रिणामेव संशयानध्यवसाययोरसत्प्रवृत्त्यननुबन्धित्वमुक्तम्, तच युक्तम्, तेषां मिथ्या +ACACASSAKC SCIES Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा ||खोपत्र वृत्तिः ॥ गाथा-११ ॥५५॥ त्वमोहनीयानन्तानुबन्धिनां प्रबलबोधविपर्यास कारिणां प्रबलक्रियाविपर्यासकारिणां च तृतीयकषायादीनामभावात् । मिथ्यादृशां संशधर्मपरीक्षा यानध्यवसाययोश्च न तथात्वं युक्तम्, विपर्यासशक्तियुक्तत्वात्तेषाम् । अतः शुभपरिणामोऽपि तेषां फलतोऽशुभ एवोक्तः श्रीहरिभ५५॥ द्रसूरिभिः । तथाहि-"गलमच्छ-भवविमोअग-विसन्नभोईण जारिसो एसो। मोहा सुहोवि असुहो, तप्फलओ एवमेसोत्ति ॥१॥" | गलेत्यादि । गलो नाम प्रान्तन्यस्तामिषो लोहमयः कण्टको मत्स्यग्रहार्थं जलमध्ये संचारितः, तद्ग्रसनप्रवृत्तो मत्स्यस्तु प्रतीत एव । | ततो गलेनोपलक्षितो मत्स्यो गलमत्स्यःभिवाद-दुःखबहुलकुयोनिलक्षणाद दुःखितजीवान् काकशृगालपिपीलिकादीन् तथाविधकुत्सितवचनसंस्कारात्प्राणव्यपरोपणेन मोचयत्युत्तारयतीति भवविमोचकः-पाखण्डविशेषः । विषेण मिश्रमन्नं तद् भुङ्क्ते तच्छीलश्च यः स तथाविधः । ततो गलमत्स्यश्च भवविमोचकश्च विषान्नभोजी चेति द्वन्द्वः, तेषां यादृश एष परिणामः प्रत्यपायफल एव । कुतः ? मोहादज्ञानात्पर्यन्तदारुणतया शुभोपि-स्वकल्पनया खरुचिमन्तरेण तेषां तथाप्रवृत्तरयोगात्सुन्दरोपि सन्, अशुभः संक्लिष्ट एव । कुतः ? इत्याह-तत्फलतः-भावप्रधानत्वाद् निर्देशस्य तत्फलत्वाद् अशुभपरिणामफलत्वाद् । अथ प्रकृते योजयन्नाह एवं गलमत्स्थादिपरिणामवत्, एषोऽपि जिनाज्ञोल्लङ्घनेन धर्मचारिपरिणामः तत्फलत्वादशुभ एव, आज्ञापरिणामशून्यतयोभयत्रापि Pसमानत्वेन तुल्यमेव किल फलम्" इति ।। १० ।। एतदाशङ्कायामाह मज्झत्थत्तं जायइ, जेसि मिच्छत्तमंदयोएवि । ण तहा असप्पवित्ती, सदंधणाएण तेसिपि ॥ ११ ॥ [मध्यस्थत्वं जायते येषां मिथ्यात्वमन्दतयाऽपि । न तथाऽसत्प्रवृत्तिः सदन्धज्ञातेन तेषामपि ॥ ११ ॥] मज्झत्थतंति । मध्यस्थत्वं रागद्वेषरहितत्वं, जायते येषां मिथ्यात्वमन्दतयापि, किंपुनस्तत्क्षयोपशमाद् इत्यपिशन्दार्थः। -CAGARGAHRECALS) Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तेषामपि मन्दमिथ्यात्ववतामपि, किं पुनः सम्यग्दृष्ट्यादीनाम् । न तथा दृढविपर्यासनियतप्रकारेण, असत्प्रवृत्तिः स्यात् । केन? धर्मपरीक्षा हूँ सदन्धज्ञातेन-समीचीनान्धदृष्टान्तेन । यथाहि-सदन्धः सातवेद्योदयादनाभोगेनाऽपि मार्ग एवं गच्छति. तथा निर्बीजत्वेन निर्वी- | सटिप्पणा ॥५६॥ जभावाभिमुखत्वेन वा मोहापकर्षजनितमन्दरागद्वेषभावोऽनाभोगवान्मिथ्यादृष्टिरपि जिज्ञासादिगुणयोगान्मार्गमेवानुसरतीत्युक्तम् । ॥स्वोपन उक्तं च ललितविस्तरायाम्-"अनाभोगतोऽपि मार्गगमनमेव सदन्धन्यायेन-इत्यध्यात्मचिन्तकाः" इदमत्र हृदयम्-यः खलु MIN" वृत्तिः ॥ | मिथ्यादृशामपि केषांचित्वपक्षनिबद्धोद्धरानुबन्धानामपि प्रबलमोहत्वे सत्यपि कारणान्तरादुपजायमानो रागद्वेषमन्दतालक्षण उपशमो ॥५६॥ भूयानपि दृश्यते, स पापानुबन्धिपुण्यबन्धहेतुत्वात्पर्यन्तदारुण एव । तत्फलसुखव्यामृढानां तेषां पुण्याभासकर्मोपरमे नरकादिपातावश्यं भावादित्यसत्प्रवृत्तिहेतुरेवायम् । यश्च गुणवत्पुरुषप्रज्ञापनार्हत्वेन जिज्ञासादिगुणयोगान्मोहापकर्षप्रयुक्तरागद्वेषशक्तिप्रतिघातलक्षण उपशमः, स तु सत्प्रवृत्तिहेतुरेवाग्रहविनिवृत्तेः सदर्थपक्षपातसारत्वादिति ॥ ११ ॥ यत एव मिथ्यात्वमन्दताकृतं माध्यस्थ्यं नासत्प्रवृत्याधायकम्, अत एव तदुपष्टम्भकमनाभिग्रहिकमिथ्यात्वमपि शोभनमित्याहइत्तो अणभिग्गहियं, भणि हियकारि पुव्वसेवाए ॥ अण्णायविसेसाणं, पढमिल्लयधम्ममहिगिच्च ॥१२॥ [इतोऽनाभिग्रहिकं भणितं हितकारि पूर्वसेवायाम् । अज्ञातविशेषाणां प्रथमधर्ममधिकृत्य ॥ १२॥] इत्तोत्ति । इतः पूर्वोक्तकारणात, अज्ञातविशेषाणां देवगुर्वादिविशेषपरिज्ञानाभाववतां, प्राथमिकं धर्ममधिकृत्य-प्रथमा. रब्धस्थूलधर्ममाश्रित्य, पूर्वसेवायां योगप्रासादप्रथमभूमिकोचिताचाररूपायां, अनाभिग्रहिकं-सर्वदेवगुर्वादिश्रद्धानलक्षणं मिथ्यात्वं, हितकारि भणितम्, अनुषङ्गतः सद्विषयभक्तिहेतुत्वाद्, अविशेषश्रद्धानस्यापि दशाभेदेन गुणत्वात् । तदुक्तं योगविन्दौ ।। अथ SECAMALSSIENCECANSAR ॐCCACAॐॐॐॐॐ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥५७॥ सटिप्पणा स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-१२ ॥५७॥ "देवपूजाविधिमाह-पुष्पैश्च बलिना चैव, वस्त्रैः स्तोत्रैश्च शोभनैः ॥ देवानां पूजनं ज्ञेयं, शौचश्रद्धासमन्वितम् ॥१॥ (श्लो ११६) | पुष्पैर्जातिशतपत्रकादिसम्भवः, बलिना पक्वान्नफलाद्युपहाररूपेण, वस्त्रैः वसनैः, स्तोत्रैश्च शोभनैः स्तवनैः, चशब्दौ चैवशब्दच समुच्चयार्थाः शोभनैरादरोपहितत्वेन सुन्दरैः, देवानामाराध्यतमानां, पूजनं ज्ञेयम् । कीदृशम् ? इत्याह-शौचश्रद्धासमन्वितम् । शौचेन शरीरवस्त्रद्रव्यव्यवहारशुद्धिरूपेण, श्रद्धया च बहुमानेन, समन्वितं युक्तमिति ॥ " अविशेषेण सर्वेषा-मधिमुक्तिवशेन वा ।। गृहिणां माननीया य-त्सर्वे देवा महात्मनाम् ॥२॥" (११७) अविशेषेण-साधारणवृत्त्या सर्वेषां-पारगत-सुगत-हर-हरिहिरण्यगर्भादीनाम् । पक्षान्तरमाह-अधिमुक्तिवशेन वा । अथवा यस्य यत्र देवतायामतिशयेन श्रद्धा तद्वशेन । कुतः इत्याह, गृहिणाम्-अद्यापि कुतोऽपि मतिमोहादनिर्णीतदेवताविशेषाणां, माननीया-गौरवाः , यद् यस्मात,सर्वे देवा उक्तरूपाः, महात्मनां परलोकप्रधानतया प्रशस्तात्मनामिति ॥ एतदपि कथम् ? इत्याह ।। सर्वान्देवान्नमस्यन्ति, नैकं देवं समाश्रिताः ॥ जितेन्द्रिया जितक्रोधा, दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥३॥ (११८) सर्वान् देवान्नमस्यन्ति-नमस्कुर्वते । व्यतिरेकमाह-नैकं कंचन, देवं समाश्रिताः प्रतिपन्ना वर्तन्ते । येन ते जितेन्द्रिया निगृहीतहृषीकाः, जितक्रोधा अभिभूतकोपाः, दुर्गाणि-नरकपातादीनि व्यसनानि, अति. तरन्ति-व्यतिक्रामन्ति, ते सर्वदेवनमस्कारः। ननु नैव ते लोके व्यवह्रियमाणाः सर्वेऽपि देवा मुक्तिपथपस्थितानामनुकूलाचरणा भव. न्तीति कथमविशेषेण नमस्करणीयाः(यता)? इत्याशङ्कयाह-चारिसञ्जीवनीचार-न्याय एष सतां मतः॥ नान्यथाऽवेष्टसिद्धिःस्थाद्, विशे| षेणादिकर्मणाम् ॥४॥(११९) चारेः प्रतीतरूपाया मध्ये सञ्जीवनी-औषधिविशेषश्चारिसञ्जीवनी, तस्याश्चारश्चरणं स एव न्यायो दृष्टान्तश्चारिसञ्जीवनीचारन्यायः। एषोऽविशेषेण देवतानमस्करणीयतोपदेशः, सतां शिष्टानां मतोऽभिप्रेतः । "भावार्थस्त C Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥५८॥ कथागम्यः, सा चेयमभिधीयते ।। अस्ति स्वस्तिमती नाम, नगरी नागराकुला ॥१॥ तस्यामांसीसुता काचिद्, ब्राह्मणस्य तथा सखी॥ तस्या एव परं पात्रं, सदा प्रेम्णो गतावधेः॥२॥ तयोविवाहवशतो, मित्रस्थाननिवासिता ॥ जज्ञेऽन्यदा द्विजसुता, जाता (स्थिता) सटिप्पणा चिन्तापरायणा ॥३॥ कथमास्ते सखीत्येवं, ततः प्राघूर्णिका गता || दृष्टा विषादजलधौ, निममा सा तया ततः॥४॥ प्रपच्छ किं ॥ खोषज्ञ त्वमत्यन्त-विच्छायवदना सखि ! ॥ तयोचे पापसद्माऽहं, पत्युर्दुभंगतां गता ॥५॥ मा विषीद विषादोऽयं, निर्विशेषो विषात् सखि ! | वृश्चिः ॥ करोम्यनवाहमहं, पति ते मूलिकाबलात् ॥ ६ ॥ तस्याः सा मूलिकां दत्ता, संनिवेशं निजं ययौ ॥ अप्रीतमानसा तस्य, प्रायच्छ गाथा-१२ ॥५८॥ तामसौ ततः ॥७॥ अभूद् गौरुद्धरस्कन्धो, झगित्येव च सा हृदि ॥ विद्राणाऽथ (गैष) कथं सर्व-कार्याणामक्षमोऽभवत् ॥८॥ गोयू-18 थान्तर्गतो नित्यं, बहिश्चारयितुं सकः। तयाऽऽरब्धो वटस्याधः, सोऽन्यदा विश्रमं गतः ॥२॥ तच्छाखायां नमश्चारि-मिथुनस्य कथंचन ॥ विश्रान्तस्य मिथो जल्प-प्रक्रमे रमणोऽब्रवीत् ॥१०॥ नात्रैष गौः स्वभावेन, किन्तु वैगुण्यतोऽजनि ॥ पत्नी प्रतिवभाषे सा, पुनर्नासौ कथं भवेत् ॥ ११ ॥ मूल्यन्तरोपयोगेन, वास्ते ? साऽस्य तरोरधः ॥ श्रुत्वैतत्सा पशोः पत्नी, पश्चात्तापितमानसा ॥ १२ ॥ अभेदज्ञा ततश्चारिं, सर्वां चारयितुं तकम् ।। प्रवृत्ता मृलिकाऽऽभोगा-त्सद्योऽसौ पुरुषोऽभवत् ॥१३॥ अजानाना यथा मेदं, मृलिकायास्तया पशुः । चारित: सर्वतश्चारिं, पुनर्तृत्वोपलब्धये ॥१४॥ तथा धर्मगुरुः शिष्यं, पशुप्राय विशेषतः॥ प्रवृत्तावक्षम ज्ञात्वा, देवपूजादिके विधौ ॥ १५॥ सामान्यदेवपूजादौ, प्रवृत्ति कारयन्नपि ॥ विशिष्टसाध्यसिद्ध्यर्थ, न स्यादोषी मनागपि ॥१६॥” इति। विपक्षे बाधामाह, न नैव, अन्यथा चारिसञ्जीवनीचारन्यायमन्तरेण, अत्र देवपूजनादौ प्रस्तुते, इष्टसिद्धिः विशिष्टमार्गावताररूपा, स्याद् भवेत् । अयं चोपदेशो यथा येषां दातव्यस्तदाह विशेषेण सम्यग्दृष्टयाधुचितदेशनापरिहाररूपेण, आदिकर्मणाम् प्रथममे % % Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - - धर्मपरीक्षा ॥९॥ PिAAAAA वारब्धम्धूलधर्माचाराणाम् । ते ह्यत्यन्तमुग्धतया कंचन देवताविशेषमजानाना न विशेषप्रवृत्तेरद्यापि योग्याः, किन्तु सामान्यरूपाया एवेति ॥ तर्हि कदा विशेषे प्रवृत्तिरनुमन्यते ? इत्याशङ्कय आह ।। गुणाधिक्यपरिज्ञाना-द्विशेषेऽप्येतदिष्यते ॥ अद्वेषेण तदन्येषां, वृत्ता सटिप्पणा धिक्ये तदाऽऽत्मनः ॥ १२० ॥ गुणाधिक्यपरिज्ञानात् देवतान्तरेभ्यो गुणवृद्धेरवगमात, विशेषेऽप्यहृदादौ किं पुनः सामान्येन ॥खोपज्ञ वृत्तिः ॥ एतत्पूजनमिष्यते। कथम् ? इत्याह, अद्वेषेण अमत्सरेण, तदन्येषाम् पूज्यमानदेवताव्यतिरिक्तानां देवतान्तराणां, वृत्ताधिक्ये कागाथा-१२ आचाराधिक्ये सति । तथा इति विशेषणसमुच्चये। आत्मनः स्वस्य देवतान्तराणि प्रतीत्येति ॥" अत्र ह्यादिधार्मिकस्य विशेषाज्ञानद- ॥५९॥ शायां साधारणी देवभक्तिरेवोक्ता, दानाधिकारे पात्रभक्तिरप्यस्य विशेषाज्ञाने साधारण्येव, तज्ज्ञाने च विशेषत उक्ता । तथाहि ॥ "व्रतस्था लिङ्गिनः पात्र-मपचास्तु विशेषतः॥ खसिद्धान्ताविरोधेन, वर्तन्ते ये सदैव हि ।।१२२॥ व्रतस्था हिंसाऽनृतादिपापस्थानविरतिमन्तः, लिङ्गिनो व्रतसूचकतथाविधनेपथ्यवन्तः, पात्रमविशेषेण वर्तते । अत्रापि विशेषमाह-अपचास्तु स्वयमेवापाचकाः, पुनरु-ते पलक्षणात्परैरपाचयितारः पच्यमानानननुमन्तारो लिङ्गिन एव विशेषेण पात्रम् । तथा स्वसिद्धान्ताविरोधेन स्वशास्त्रोक्तक्रिया ऽनुल्लङ्गनेन, वर्तन्ते चेष्टन्ते, सदैव हि सर्वकालमेवेति । इत्थं चास्यानाभिग्रहिकमपि गुणकारि सम्पन्नम् । तथा चानाभिग्रहिकमप्याभिग्रहिककल्पत्वाचीवमेवेति सुनिश्चितमित्यादि संमतिप्रदर्शनपूर्व यः प्राह तन्निरस्तम्, मुग्धानां स्वप्रतिपत्तौ तस्य गुणत्वात् । सुनिश्चितमित्यादिना विशेषज्ञस्यापि मायादिना माध्यस्थ्यप्रदर्शनस्यैव दोषत्वप्रतिपादनाद् । न चास्याविशेषप्रतिपत्तिः सम्यग्दृष्टरिव दुष्टेति शङ्कनीयम्, अवस्थाभेदेन दोषव्यवस्थानाद् । अन्यथा साधोरिव सम्यग्दृशः साक्षाद्देवपूजादिकमपि दुष्टं स्यादिति विभावनीयम् । एतेन पृथिव्याद्यारम्भप्रवृत्तापेक्षया निजनिजदेवाराधनप्रवृत्तानामध्यवसायः शोभना, देवादिशुभगतिहेतुत्वात्, इत्यसत्, तथाभूताध्य ARCARE Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ % धर्मपरीक्षा ॥६॥ RISAR वसायस्य शोभनत्वे सम्यक्त्वोच्चारिणो "कप्पइ अणउत्थिए वा.” इत्यादिरूपेण मिथ्यात्वप्रत्याख्यानानुपपत्तिप्रसक्तेः । न हि शुभाध्यवसायस्य तद्धेतोर्वा प्रत्याख्यानं सम्भवति, ततः शुभाध्यवसायोऽपि तेषां पापानुबन्धिपुण्यप्रकृतिहेतुत्वेन नरकादिनिवन्धनत्वा सटिप्पणा न्महानर्थहेतुरेव । न ह्यत्रापेक्षिकमपि शुभत्वं घटते,स्वस्त्रीसङ्गपरित्यागेन परस्त्रीसङ्गप्रवृत्तस्येव बहुपापपरित्यागमन्तरेणाल्पपापपरित्याग ॥स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ स्याशुभत्वाद् । अत एव पृथिव्याद्यारम्भप्रवृत्तस्यापि सम्यग्दृशोऽन्यतीर्थिकदेवाद्याराधनपरित्यागोपपत्तिरिति परस्यैकान्ताभिनिवेशो गाथा-१२ निरस्तः । उत्कटमिथ्यात्ववन्तं पुरुषं प्रतीत्य निजनिजदेवाद्याराधनप्रवृत्तेर्महानर्थहेतुत्वेऽप्यनाग्रहिकमादिधार्मिकं प्रति तथात्वस्याभावात्,18 ॥६०॥ तस्याविशेषप्रवृत्तर्दुगतरणहेतुत्वस्य हरिभद्रसूरिभिरेवोक्तत्वात् । प्रत्याख्यानं च पूर्वभूमिकायां शुभाध्यवसायहेतोरप्युत्तरभूमिकायां स्वप्रतिपन्न विशेषधर्मप्रतिबन्धकरूपेण भवति, नैतावता पूर्वभूमिकायामपि तस्य विलोपो युक्तः। यथाहि-प्रतिपन्नकृत्स्नसंयमस्य जिनपूजायाः साक्षात्करणनिषेधात, तस्य स्वप्रतिपन्नचारित्रविरोधिपुष्पादिग्रहणरूपेण तत्प्रत्याख्यानेऽप्यकृत्स्नसंयमवतां श्राद्धानां न तदनौचित्यम, तथा प्रतिपन्नसम्यग्दर्शनानां स्वप्रतिपन्नसम्यक्त्वप्रतिबन्धकविपर्यासहेतुत्वेनाविशेषप्रवृत्तेः प्रत्याख्यानेऽपि नादिधार्मिकाणां तदनौचित्यमिति विभावनीयम् । नन्वेवमादिधार्मिकस्य देवादिसाधारणभत्ते: पूर्वसेवायामुचितत्वे जिनपूजावत्साधूनां साक्षात्तदकरणव्यवस्थायामपि तद्वदेवानुमोद्यत्वापत्तिरिति चेद् । न, सामान्य प्रवृत्तिकारणतदुपदेशादिना तदनुमोद्यताया इष्टत्वात्, केवलं सम्यक्त्वाद्यनुगतं कृत्यं स्वरूपेणाप्यनुमोद्यमितरच्च मार्गबीजवादिनेत्यस्ति विशेष इत्येतच्चाग्रे सम्यग् विवेचयिष्यामः ॥१२॥ अनामिग्रहिकस्य शोभनत्वमेव गुणान्तराधायकत्वेन समर्थयतिइत्तो अ गुणहाणं, पढमं खलु लद्धजोगदिट्ठीणं ॥ मिच्छत्तेवि पसिद्धं, परमत्थगवेसणपराणं ॥ १३॥ AN Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥६ ॥ PRECAUSA [ इतश्च गुणस्थानं, प्रथमं खलु लब्धयोगदृष्टीनाम् । मिथ्यात्वेऽपि प्रसिद्ध परमार्थगवेषणपराणाम् ।। १३ ॥] इतश्चानाभिग्रहिकस्य हितकारित्वादेव च, मिथ्यात्वेऽपि, खल्विति निश्चये, लब्धयोगदृष्टीनां मित्रादिप्रथमदृष्टिचतुष्टयप्रा तसटिप्पणा प्तिमतां, परमार्थगवेषणपराणां मोक्षकप्रयोजनानां योगिनां, प्रथमं गुणस्थानमन्वर्थ, प्रसिद्धम् । अयं भावः-मिथ्यादृष्टयोऽपि स्वोपज्ञ परमार्थगवेषणपराः सन्तः पक्षपातं परित्यज्याद्वेषादिगुणस्थाः खेदादिदोषपरिहाराद् यदा संवेगतारतम्यमाप्नुवन्ति तदा मार्गामिमु- वृत्तिः ॥ ख्यात्तेषामिक्षु-रस-कक्कब-गुडकल्पा मित्रा तारा बला दीपा चेति चतस्रो योगदृष्टय उल्लसन्ति, भगवत्पतञ्जलिभदन्तभास्करादीनां *गाथा-१३ तदम्युपगमात् । तत्र मित्रायां दृष्टौ स्वल्पो बोधो, यमो योगाङ्गं देवकार्यादावखेदो, योगबीजोपादानं भवोद्वेगसिद्धान्तलेखनादिकं बीजश्रुतौ परमश्रद्धा, सत्संगमश्च भवति, चरमयथाप्रवृत्तकरणसामर्थ्यन कर्ममलस्याल्पीकृतत्वात् । अत एवेदं चरमयथाप्रवृत्तकरणं पर| मार्थतोऽपूर्वकरणमेवेति योगविदो विदन्ति। उक्तं च-"अपूर्वासनभावेन, व्यभिचारवियोगतः ॥ तत्त्वतोऽपूर्वमेवेद-मिति योगविदो विदुः ॥३९॥" अस्यां चावस्थायां, मिथ्यादृष्टावपि गुणस्थानपदस्य योगार्थघटनोपपद्यते । उक्तं च- "प्रथमं यद्गुणस्थानं, सामान्येनोपवर्णितम् ॥ अस्यां तु तदवस्थायां, मुख्यमन्वर्थयोगतः ॥४०॥" तारायां तु मनाक् स्पष्टं दर्शनम्, शुभा नियमाः, तत्वजिज्ञासा, योगकथास्वविच्छिन्ना प्रीतिः, भावयोगिषु यथाशक्त्युपचारः, उचितक्रियाऽहानिः, खाचारहीनतायां महात्रासः, अधिककृत्यजिज्ञासा च भवति, तथाऽस्यां स्थितः स्वप्रज्ञाकल्पिते विसंवाददर्शनानानाविधमुमुक्षुप्रवृत्तेः कात्स्न्येन ज्ञातुमशक्यत्वाच शिष्टाचरितमेव पुरस्कृत्य प्रवर्तते । उक्तं च-"नास्माकं महती प्रज्ञा, सुमहान् शास्त्रविस्तरः । शिष्टाःप्रमाणमिह त-दित्यस्यां मन्यते सदा ॥४८॥" बलायां दृष्टौ दृढं दर्शनम् , स्थिरसुखमासनम्, परमा तत्त्वशुश्रूषा, योगगोचरोऽक्षेपः, स्थिरचित्ततया योगसाधनोपायकौशलं च Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 162 धर्मपरीक्षा ॥६२॥ सटिप्पणा |॥ खोपक्ष | वृतिः ॥ गाथा-१३ ॥६ ॥ 4NCRECORCHCG भवति । दीपायां दृष्टौ प्राणायामः, प्रशान्तवाहितालाभाद् योगोत्थानविरहः, तत्त्वश्रवणम, प्राणेभ्योऽपि धर्मस्थाधिकत्वेन परिज्ञानम, | तत्त्वश्रवणतो गुरुभक्तेरुद्रेकात्समापत्त्यादिभेदेन तीर्थकद्दर्शनं च भवति। तथा मित्रादृष्टिस्तृणाग्निकणोपमा न तत्त्वतोऽभीष्टकार्यक्षमा, सम्यक् प्रयोगकालं यावदनवस्थानात्, अल्पवीर्यतया ततः पटुस्मृतिबीजसंस्काराधानानुपपत्तेः, विकलप्रयोगभावाद् भावतो वन्दनादि. कार्यायोगादिति । तारादृष्टिोमयाग्निकणसदृशी, इयमप्युक्तकल्पैव, तत्त्वतो विशिष्टस्थितिवीर्यविकलत्वाद् । अतोऽपि प्रयोगकाले स्मृतिपाटवासिद्धेः, तदभावे प्रयोगवैकल्यात्, ततस्तथातत्कार्याभावादिति । बलादृष्टिः काष्ठाग्निकणतुल्या, ईषद्विशिष्टोक्तबोधद्वयात्, | तद्भावेनाऽत्र (तद्भवतोत्र) मनास्थितिवीर्ये, अतः पटुप्राया स्मृतिरिह, प्रयोगसमये तद्भावे चार्थप्रयोगमात्रप्रीत्या यत्नलेशभावादिति । दीपादृष्टिीपप्रभासदृशी, विशिष्टतरोक्तवीर्यबोधत्रयाद्, अतोऽत्रोदने स्थितिवीर्ये, तत्पद्व्यपि प्रयोगसमये स्मृतिः । एवं भावतोऽप्यत्र द्रव्यप्रयोगो वन्दनादौ, तथा भक्तितो यत्नभेदप्रवृत्तेरिति प्रथमगुणस्थानप्रकर्ष एतावानिति समयविदः। इत्थं चोक्तस योगदृष्टिसमुच्चयग्रन्थार्थस्यानुसारेण मिथ्यादृष्टीनामपि मित्रादिदृष्टियोगेन तथा(थ्य)गुणस्थानकत्वसिद्धेः, तथाप्रवृत्तेरनाभिग्रहिकत्वमेव तेषां शोभनमित्यापन्नम् ॥१३।। ननु योगदृष्ट्यापि मिथ्यादशां कथं गुणभाजनत्वम् ? जैनत्वप्राप्तिं विना गुणलाभासम्भवाद् दृष्टिविपर्यासस्य दोषस्य सत्त्वाद् । अत एवोक्तम्-"मिथ्यात्वं परमो रोगो, मिथ्यात्वं परमं तमः॥ मिथ्यात्वं परमः शत्रु-मिथ्यात्वं पदमापदाम् ॥१॥" इत्याशङ्कथाहगलिआसग्गहदोसा, अविजसंविजपयगया तेवि ॥ सव्वण्णुभिच्चभावा, जइणत्तणं जति भावेणं ॥ १४ ॥ [ गलितासद्ग्रहदोषा अवेद्यसंवेद्यपदगतास्तेऽपि । सर्वज्ञभृत्यभावाद् जैनत्वं यान्ति भावेन ॥ १४ ॥] HARAAN ॐ Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥६ ॥ * * गलिआसग्गहदोसत्ति । ते लब्धयोगदृष्टयो मिथ्यात्ववन्तोऽवेद्यसंवेद्यपदगता अपि तत्त्वश्रवणपर्यन्तगुणलाभेऽपि कर्म सटिप्पणा वनविभेदलभ्यानन्तधर्मात्मकवस्तुपरिच्छेदरूपसूक्ष्मबोधाभावेन वेद्यसंवेद्यपदाधस्तनपदस्थिता अपि भावेन जैनत्वं यान्ति वेद्यसंवेद्या खोपज्ञ वेद्यसंवेद्यपदयोर्लक्षणमिदम्-"वेद्यं संवेद्यते यसि-बपायादिनिवन्धनम् । पदं तद्वद्यसंवेद्य-मन्यदेतद्विपर्ययात् ॥” इति ॥७३॥ अस्यार्थः वृत्तिः ॥ | वेद्यं वेदनीयं वस्तुस्थित्या तथाभावयोगिसामान्येनाविकल्पज्ञानग्राह्यमित्यर्थः। संवेद्यते क्षयोपशमानुरूपं विज्ञायते, यस्मिन्नाशय- गाथा-१४ स्थाने, अपायादिनिवन्धनं नरकवर्गादिकारणं स्त्र्यादि, तद् वेद्यसंवेद्यपदं निश्चितागमतात्पर्यार्थयोगिनां भवति । अन्यदवेद्यसं- ॥६३॥ वेद्यपदम् । एतद्विपर्ययात्-उक्तलक्षणव्यत्ययात् स्थूलबुद्धीनां भवति ॥ कथं ते भावजैनत्वं यान्ति ? इत्यत्र हेतुमाह-सर्वज्ञभृत्य भावात् सर्वत्र धर्मशास्त्रपुरस्कारेण तद्वक्ससर्वज्ञसेवकत्वाभ्युपगमात् । नन्वेवमनुच्छिन्ना जैनाः, जैनव्यवस्थाबाबैरपि सर्वैर्नाममात्रेण 3 | सर्वज्ञाभ्युपगमात् तेषामपि जैनत्वप्रसङ्गादित्यतस्तेषां विशेषमाह-गलितीसग्रहदोषा इति । येषां ह्यसद्ग्रहदोषात्स्वस्वाभ्युपगतार्थपुरस्कारस्तेषां रागद्वेषादिविशिल्प(ष्ट)कल्पितसर्वज्ञाभ्युपगन्तृत्वेऽपि न भावजैनत्वम् । येषां तु माध्यस्थ्यावदातबुद्धीनां विप्रतिपत्तिविषयप्रकारांशे नाग्रहस्तेषां मुख्यसर्वज्ञाभ्युपगन्तृत्वाद् भावजैनत्वं स्थादेव इति भावः । मुख्यो हि सर्वज्ञस्तावदेक एव, निरतिशयगुणवत्त्वेन तुत्प्रतिपत्ति(त्त)त्वं यावतां तावतां तद्भक्तत्वमविशिष्टमेव, सर्वविशेषाणां छमस्थेनाग्रहाद्दूरासन्नादिभेदस्य च भृत्यत्वजात्यभेदकत्वादिति। तदुक्तं योगदृष्टिसमुच्चये-“न तत्त्वतो भिन्नमताः, सर्वज्ञा बहवो यतः॥ मोहस्तदधिमुक्तीनां, तद्भेदाश्रयणं ततः ॥ १०२॥ सर्वज्ञो नाम यः कश्चित, पारमार्थिक एव हि ॥ स एक एव सर्वत्र, व्यक्तिमेदेऽपि तत्त्वतः ॥१०३॥ प्रतिपत्तिस्ततस्तस्य, सामान्येनैव यावताम् ।। ते सर्वेऽपि तमापना, इति न्यायगतिः परा ॥ १०४ ॥ विशेषस्तु पुनस्तस्य, कात्स्न्]नासर्वदर्शिमिः ॥ सर्वैर्न ज्ञायते तेन, * Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥६॥ तमापनो न कश्चन ॥१०५॥ बस्सात्सामान्यतोऽप्येन-मभ्युपैति य एव हि ॥ निर्व्याज तुल्य एवासौ, तेनांशेनैव धीमताम् ॥१०६॥ |सटिप्पणा | यथेबैकस्य नृपते-बहवोऽपि, समाश्रिताः॥ दुरासन्नादिभेदेन(ऽपि), तभृत्याः सर्व एव ते॥१०७॥सर्वज्ञतत्वाभेदेन, तथा सर्वज्ञवादिनः।। ॥स्वोपड़ सुर्वे तत्तत्त्वगा ज्ञेया, भिन्नाचारस्थिता अपि ॥१०८॥ न भेद एव तत्त्वेन, सर्वज्ञानां महात्मनाम् ॥ तथा नामादिभेदेऽपि, भाव्यमेत-18 वृत्तिः ॥ न्महात्मभिः ॥१०९॥" इति। न च परेषां सर्वज्ञभक्तेरेवानुपपत्तिः, तेषामप्यध्यात्मशास्त्रेषु चित्राचित्रविभागेन भक्तिवर्णनात् , संसा-टोगाथा-१५ रिणां विचित्रफलार्थिनां नानादेवेषु चित्रभक्तेः, एकमोक्षार्थिनां चैकस्मिन् सर्वज्ञे चित्रभक्त्युपपादनात् । तथा च हारिभद्रं वचः- ॥६४॥ "चित्राचित्रविभागेन, यच्च देवेषु वर्णिता। भक्तिः सद्योगशास्त्रेषु. ततोऽप्येवमिदं स्थितम् ॥ ११ ॥ संसारिषु हि देवेषु, भक्तिस्तकायगामिनाम् ॥ तदतीते पुनस्तत्वे, तदतीतार्थयायिनाम् ॥ १११॥ चित्रा चायेषु तदराग-तदन्यद्वेषसङ्गता । अचित्रा चरमे त्वेषा, शमसाराऽखिलैव हि ॥ ११२ ॥” इति । प्राप्यस्य मोक्षस्य चैकत्वात् तदथिनां गुणस्थानपरिणतितारतम्येऽपि न मागभेद इति, तदनुकूलसर्वज्ञभक्तावप्यविवाद एव तेषाम् । उक्तं च-प्राकृतेष्विह भावेषु, येषां चेतो निरुत्सुकम् ॥ भवभोगविरक्तास्ते, भवातीता र्थयायिनः॥१२७॥ एक एव तु मार्गोऽपि, तेषां शमपरायणः ॥ अवस्थाभेदभेदेऽपि, जलधौ तीरमार्गवत् ॥१२८॥ संसारातीततत्वं तु, | परं निर्वाणसंज्ञितम् । तथै(द्धथे)कमेव नियमा-च्छब्दभेदेऽपि तत्त्वतः ॥१२९।।सदाशिवः परं ब्रह्म, सिद्धात्मा तथातेति च । शब्दैस्तदुच्यतेऽन्वर्था-देकमेवैवमादिभिः ॥१३०॥ तल्लक्षणाविसंवादा-निराबाधमनामयम् । निष्क्रियं च परं तत्त्वं, यतो जन्माद्ययोगतः ॥१३॥ ज्ञाते निर्वाणतत्वेऽस्मिन्, न संमोहेन तत्वतः ॥ प्रेक्षावतां न तद्भक्तो, विवाद उपपद्यते ॥ १३२ ॥ PLICACA4% AHABAR Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-१५ सर्वज्ञपूर्वकं चैत-नियमादेव यस्थितौ ॥ आसन्नोऽयमृजुर्मार्ग-स्तद्भेदस्तत्कथं भवेत् ॥ १३३ ॥” इति । ननु देशनाभेदान्नैकः सर्वज्ञ इति सर्वेषां योगिनां नैकसर्वज्ञभक्तत्वमिति चेद् । न, विनेयानुगुण्येन सर्वेषां देशनामेदोपपत्तेः, एकस्यैव वा तस्या वक्तुरचिन्त्यपुण्यप्रभावेन श्रोतृभेदेन भिन्नतया परिणतेः कपिलादीनामृषीणामेव वा कालादियोगेन नयभेदात्तद्वैचित्र्योपपत्तेः, तन्मूलसर्वज्ञप्रतिक्षेपस्य महापापत्वात् । उक्तं च-"चित्रा तु देशनैतेषां स्याद्विनेयाऽऽनुगुण्यतः॥ यस्मादेते महात्मानो, सर्व व्याधिभिषग्वराः ॥ १३४॥ यस्य येन प्रकारेण, बीजाधानादिसम्भवः । साधु (नु) बन्धो भवत्येते, तथा तस्य जगुस्ततः ॥ १३५ ॥ एकापि देशनैतेषां, यद्वा श्रोतृधिभेदतः । अचिन्त्यपुण्यसामर्थ्या-त्तथा चित्राऽवभासते ॥ १३६॥ यथाभव्यं च सर्वेषा-मुपकारोऽपि तत्कृतः । जायते वन्ध्यताऽप्येव-मस्याः सर्वत्र सुस्थिता ॥ १३७ ॥ यद्वा तत्तन्नयापेक्षा, तत्तत्कालादियोगतः । ऋषिभ्यो देशना चित्रा, तन्मूलैषाऽपि तत्त्वतः ॥१८॥ सदभिप्रायमज्ञात्वा, न ततोऽर्वागूदृशां सताम् । युज्यते तत्प्रतिक्षेपो, महानर्थकरः परः ॥ १३९ ॥ निशानाथप्रतिक्षेपो, यथाऽन्धानामसङ्गतः । तद्भेदपरिकल्पश्च, तथैवाग्दृिशामयम् ॥ १४० ॥ न युज्यते प्रतिक्षेपः, सामान्यस्यापि तत्स ताम् । आर्यापवादस्तु पुन-जिह्वाच्छेदाधिको मतः॥१४॥कुदृष्टा( ष्टया) दि च नो(वनो) सन्तो, भाषन्ते प्रायशः क्वचित । निश्चितं सारखच्चैव,किन्तु सत्वार्थकृत्सना(दा)॥१४२॥” इति । ननु यद्येवंविधं माध्यस्थ्यं परेषां स्यात् तदा मार्गाभाव(वे)जैनत्वं भवेत, तदेव तु व्यवहारतो जैनमार्गानाश्रयणे दुर्घटमिति न तेषां माध्यस्थ्यमिति चेद् । न, मोहमान्ये परेषामपि योगिनामेतादृशमाध्यस्थ्यस्येष्टत्वाद्, यदयं कालातीतवचनानुवादो योगबिन्दौ ।। "माध्यस्थ्यमवलम्ब्यैव-मैदम्पर्यव्यपेक्षया ॥ तत्त्वं निरूपणीयं स्यात् । कालातीतोऽप्यदोऽब्रवीत् ॥१॥(श्लो० ॥३०॥) अन्येषामप्ययं मार्गो,मुक्ताविद्यादिवादिनाम् ॥अमिधानादिभेदेन,तत्त्वनीत्या व्यव Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ ६६ ॥ स्थितः || ३०१ || मुक्तो बुद्धोऽईन वापि य- दैश्वर्येण समन्वितः । तदीश्वरः स एव स्यात्, संज्ञाभेदोऽत्र केवलम् ॥ ३०२ ॥ अनादिशुद्ध इत्यादि-य मेदो यस्य कल्प्यते । तत्तत्तन्त्रानुसारेण, मन्ये सोऽपि निरर्थकः ॥ ३०३ ॥ विशेषस्यापरिज्ञानाद्, युक्तीनां जातिवादतः । प्रायो विरोधतश्चैव, फलामेदाच्च भावतः ३०४ ॥ अविद्याक्लेशकर्मादि यतश्च भवकारणम् । ततः प्रधानमेवैत-त्संज्ञामेदमुपागतम् || ३०५ ।। अत्रा (स्या ) पि यो परो भेद - श्वित्रोपाधिस्तथा तथा । गीयतेऽतीत हेतुभ्यो, धीमतां सोऽप्यपार्थकः ॥ ३०६ ॥ ततोऽस्थानप्रयासोऽयं यत्तद्भेदनिरूपणम् । सामान्यमनुमानम्य, यतश्च विषयो मतः ॥ ३०७ ॥ साधु चैतद् यतो नीत्या, शाखमत्र | प्रवर्तकम् । तथाऽभिधानभेदात्तु, भेदः कुचितिकाग्रहः ॥ ३०८ ॥ " इत्यादि । अथैतेषां भावजैनत्वे आज्ञासम्भवमाह - दव्वाणा खलु तेसिं, भावाणाकारणत्तओ नेया ॥ जं अपुणबंधगाणं, चित्तमणुट्टामुव ॥ १५ ॥ [द्रव्याज्ञा खलु तेषां भावाज्ञाकारणत्वतो ज्ञेया । यदपुनर्बन्धकानां चित्रमनुष्ठानमुपदिष्टम् ।। १५ ।।] दवाणत्ति । तेषामवेद्यसंवेद्यपदस्थानां भावजैनानां, खलु इति निश्वये, भावाज्ञायाः सम्यग्दर्शनादिरूपायाः, कारणत्वतो, द्रव्याज्ञा ज्ञेयाsपुनर्बन्धकोचिताचारस्य पारम्पर्येण सम्यग्दर्शनादिसाधकत्वात् । तदुक्तं चोपदेशपदे - " गंठिगसत्ताsपुणबंधगा आपि दव्वओ आणा । णवरमिह दव्वमद्दो, भइअच्वो समयणीईए ॥ २५३ ॥ एगो अप्पाहने, केवलए चैव बट्टई एत्थ । अंगारमद्दगो जह, दव्वाय रिओ सयाभव्व ॥ २५४ ॥ अन्नो पुण जोग्गत्ते, चित्ते णय भेअओ मुणेअव्वो । वेमाणिओववाओ-त्ति दव्वदेवो जहा साहू ॥ २५५ ॥ तत्था भव्वादीणं, गंठिगसत्ताणमप्पहाणत्ति । इय रेसिं जोग्गयाए, भावाणाकारण तेणं ॥ २५६ ॥ । [ ग्रन्थिमसत्त्वा पुनर्वन्धकादीना मपि द्रव्यत आज्ञा । केवलमिह द्रव्यशब्दो भक्तव्यः समयनीत्या || एकोऽगाधान्ये केवले एव वर्ततेऽत्र । अङ्गारमर्दको यथा द्रव्याचार्यः सटिप्पणा || स्वोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा - १५ ॥ ६६ ॥ Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ ६७ ॥ सदाऽभव्यः ॥ अन्यः पुनर्योग्यत्वे चित्रे नयभेदतो ज्ञातव्यः । वैमानिकोपपात इति द्रव्यदेवो यथा साधुः । तत्राभव्यादीनां ग्रन्थि - गसत्त्वानामप्रधान इति । इतरेषां योग्यतया भावाज्ञाकारणत्वेन ||] अत्र हि द्रव्यशब्दस्य द्वावर्थी — प्रधानभावकारणं भावांशविकलं केवलमप्राधान्यम् । संग्रहव्यवहारनय विशेषाद् विचित्रमेकभविकबद्धायुष्का भिमुखनामगोत्र लक्षणं तत्तत्तत्पर्यायसमुचितभावरूपं योग्यत्वं च । तत्र प्रथमार्थेनाभव्य सकृद्बन्धकादीनां द्रव्य क्रियाभ्यासपराणां द्रव्याज्ञा । द्वितीयार्थेन चापुनर्बन्धकादीनामिति वृत्तितात्पर्यार्थः । नन्वेवृमपुनर्बन्धकानां द्रव्याज्ञा व्यवस्थिता तथाऽपि भिन्नमार्गस्थानां मध्यस्थानामपि मिथ्यादृशां कथमेषा संभवति ?, जैनमार्गक्रिययैवान्युत्पन्नदशायामपुनर्बन्धकत्वसिद्धे वीजाधानस्यैव तल्लिङ्गत्वात् तस्य च सर्वज्ञवचनानुसारिजिन मुनिप्रभृतिपदार्थकुशलचित्ता| दिलक्ष्यत्वाद् । तदुक्तमुपदेश पदवृत्तिकृता - "आणापरतंतेहि ता बीआहाणमेत्थ कायव्वं । धम्मंमि जहासत्ती, परमसुहं इच्छमाणेहिं ।। २२५ ।। ” [आज्ञापरतन्त्रैस्तसाद्वीजाधानमत्र कर्तव्यम् । धर्मे यथाशक्ति परमसुखमिच्छद्भिः ।। ] इति गाथां विवृण्वता धर्मबीजानि चैवं शास्त्रान्तरे परिपठितानि दृश्यन्ते ( योगदृष्टिसमुच्चये) "जिनेषु कुशलं चित्तं तन्नमस्कार एव च । प्रणामादि च संशुद्धं, योगबीजमनुत्तमम् ॥ २३ ॥ उपादेयधियाऽत्यन्तं, संज्ञा विष्कम्भणान्वितम् । फलाभिसन्धिरहितं संशुद्धं ह्येतदीदृशम् ॥ २५॥ आचार्यादिपि ह्येत - द्विशुद्धं भावयोगिषु । वैयावृत्त्यं च विधिव-च्छुद्धाशय विशेषतः ॥ २६ ॥ भवोद्वेगश्व सहजो, द्रव्याभिग्रहपालनम् । तथा सिद्धान्तमाश्रित्य विधिवद् (ना) लेखनानि (दि) च ||२७|| लेखना पूजना दानं, श्रवणं वाचनोद्ग्रहः । प्रकाशनाऽथ खाध्याय - चिन्तना भावनेति च ॥ २८॥ दुःखितेषु दयाऽत्यन्त-मद्वेषो गुणवत्सु च । औचित्यासे ( त्से) वनं चैव सर्वत्रैवाविशेषतः ॥ ३२ ॥” इति ॥ ललितविस्तरायामप्युक्तम् - " एतत्सिद्ध्यर्थं तु यतितव्यमादिकर्मणि, परिहर्तव्यो ऽकल्याणमित्रयोगः, सेवितव्यानि कल्याणमित्राणि, न लङ्घ सटिप्पना || स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा - १५ ॥ ६७ ॥ Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ A धर्मपरीक्षा ॥६॥ | सटिप्पणा ॥स्वोपन. वृत्तिः ॥ गाथा-१५ ॥ ६८॥ CASTHAHASABSE नयोचितस्थितिः,अपेक्षितव्यो लोकमार्गः,माननीया गुरुसन्न(सह)तिः, भवितव्यमेतत्तन्त्रेण.प्रवर्तितव्यं दानादौ, कर्तव्योदारपूजा भग| वताम्, निरूपणीयः साधुविशेषः,श्रोतव्यं विधिना धर्मशास्त्रम्,भावनीयं महायत्नेन,प्रवत्तितव्यं विधानतो अवलम्बनीयं धैर्य, पर्यालोचनीयाऽऽयतिः, अवलोकनीयो मृत्युः, परिहर्तव्यो विक्षेपमार्गः, यतितव्यं योगसिद्धौ, कारयितव्या भगवत्प्रतिमा, लेखनीयं भुवनेश्वरवचनम्. कर्तव्यो मङ्गलजापः, प्रतिपत्तव्यं चतुःशरणम्, गार्हतव्यानि दुष्कृतानि, अनुमोदनीयं कुशलम्, पूजनीया मन्त्रदेवता, | श्रोतव्यानि सच्चष्टितानि, भावनीयमौदार्यम्. वर्तितव्यमुत्तमज्ञातेन, एवम्भृतस्य येह प्रवृत्तिः सा सर्वैव साध्वी मार्गानुमारीत्ययं निय| मादपुनर्बन्धकादिस्तदन्यस्यैवभूतगुणसंपक्षेऽभावात्"इत्यत आह-यद् यस्माद्,अपुनर्बन्धकानां चित्रमने कविधम् . अनुष्ठानमुपदिष्टम्, अतो भिन्नाचारस्थितानामपि तेषां द्रव्याज्ञाया नानुपपत्तिरिति । इदमत्र हृदयम् । न ह्यादिधार्मिकस्य विधिः सर्व एव सर्वत्रोपयुज्यते, किन्तु क्वचित्कश्चिदेवेति । भिन्नाचारस्थितानामप्यन्तःशुद्धिमतामपुनर्बन्धकत्वमविरुद्धम्, अपुनर्बन्धकस्य हि नानास्वरूपखात् तत्तत्तन्त्रोक्ताऽपि मोक्षार्था क्रिया घटते,सम्यग्दृष्टेश्च स्वतन्त्रक्रियैवेति व्यवस्थितखात् । तदुक्तं योगबिन्दुसूत्रवृत्त्योः॥"अपुनर्बन्धकस्यैवं, सम्यग्नीत्योपपद्यते । तत्तत्तन्त्रोक्तमखिल-मवस्थाभेदसंश्रयात ॥२५१॥" अपुनर्बन्धकस्योक्तरूपस्य,एवमुक्तरूपेण, सम्यग्नीत्या-शुद्धयुक्तिरूपया, उपपद्यते घटते । किम् ? इत्याह ।। तत्तत्तन्त्रोक्तं कापिल-सौगतादिशास्त्रप्रणीतं मुमुक्षुजनयो. ग्यमनुष्ठानम्,अखिलं समस्तम्, कुतः ? इत्याह-अवस्थाभेदमंश्रयात्-अपुनर्बन्धकस्यानेकखरूपाङ्गीकरणत्वात्, अनेकस्वरूपाभ्युपगमे हि अपुनर्बन्धकस्य किमप्यनुष्ठानं कस्यामप्यवस्थायामवतरतीति। अथापुनर्बन्धकानन्तरं कोत्त)यद्भवति तद्दर्शयति-"स्वतन्त्रनीतितस्त्वेव, ग्रन्थिभेदे तथा सति । सम्यग्दृष्टिर्भवत्युच्चैः, प्रशमादिगुणान्वितः ॥ २५२ ॥" स्वतन्त्रनीतितस्त्वेव जैनशास्त्रनीते रेव, न पुनस्त Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ ६९ ॥ न्त्रान्तराभिप्रायेणापि, ग्रन्थिभेदे रागद्वेषमोहपरिणामस्यातीवदृढस्य विदारणे, तथा यथाप्रवृत्त्यादिकरणप्रकारेण, सति विद्यमाने, किम् ? इत्याह- सम्यग्दृष्टिः शुद्धसम्यक्त्वधरो, भवति सम्पद्यते । कीदृश: ? इत्याह-उच्चैः अत्यर्थ प्रागवस्थातः सकाशात्, प्रशमादिगुणान्वितः उपशम-संवेग - निर्वेदा - ऽनुकम्पा -ऽऽस्तिक्याभिव्यक्तियुक्त इति । एवं परेषामपि माध्यस्थ्ये द्रव्याज्ञासद्भावः सिद्धः || १५ || ननु द्रव्याज्ञाऽपि सिद्धान्तोदितक्रियाकरणं विना कथं परेषां स्यात् । इत्यत आह मग्गानुसारिभावो, आणाए लक्खणं मुणेयव्वं । किरिया तस्स ण नियया, पडिबंधे वावि उपगारे ॥ १६॥ [मार्गानुसारिभाव आज्ञाया लक्षणं ज्ञातव्यम् । क्रिया तस्य न नियता प्रतिबन्धे वाऽप्युपकारे ।। १६ ।।] मंग्गाणुसारिभावोति | मार्गानुसारिभावो "निसर्गतस्तत्त्वानुकूलप्रवृत्तिहेतुः परिणामः" आज्ञाया लक्षणं मुणेयव्वं ति ज्ञातव्यम् । क्रिया स्वसमय परसमयोदिताचाररूपा, तस्य मार्गानुसारिभावस्य, उपकारे प्रतिबन्धे वा न नियता, स्वसमयोदितक्रिया| कृतमुपकारं विनाऽपि मेघकुमारजीव हस्त्यादीनां तथाभव्यत्वपरिपाका हिताऽनुकम्पादिमहिम्ना मार्गानुसारित्वसिद्धेः, परसमयक्रियायां च सत्यामपि समुल्लसित योगदृष्टिमहिम्नां पतञ्जल्यादीनां मार्गानुसारित्वाप्रतिघातात् । अत्र कश्चिदाह - ननु पतञ्जल्यादीनां मार्गानुसारित्वमशास्त्रसिद्धम्, उच्यते - नैतदेवं योगदृष्टिसमुच्चयग्रन्थ एव योगदृष्टयभिधानात् तेषां मार्गानुसारित्वसिद्धेः । “उक्तं च निरूपितं पुनः, योगमार्गज्ञैरध्यात्मविद्भिः पतञ्जलिप्रभृतिभिः, तपोनिर्द्धतकल्मषैः प्रशमप्रधानेन तपसा क्षीणप्रायमार्गानुसारिबोधबाधक मोहमूलैरिति" "उक्तं च योगमार्गज्ञैस्तपोनिर्द्धत कल्मषैः । (श्लो०६६ ) " - इति प्रतीकं विवृण्वता योगविन्दुवृत्तिकृताऽपि तेषां तदभिधानाचेति ।। अयमिह परमार्थ:-अच्युत्पन्नानां विपरीतव्युत्पन्नानां वा परसमयस्थानां जैन भिमतक्रिया यथाऽसद्ग्रहपरित्याजनद्वारा सटिप्पणा || स्वोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा - १६ ॥ ६९ ॥ Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क धर्मपरीक्षा १७०॥ - IACHECCAE% द्रव्यसम्यक्त्वाद्यध्यारोपणेन मागानुसारिताहेतुः, तथा सद्ग्रहप्रवृत्तानां तेषामभयामिमतयमनियमादिशुद्धखरूपक्रियाऽपि पारमार्थिक सटिप्पणा वस्तुविषयपक्षपाताधानद्वारा तथा हेयोपादेयविषयमात्रपरीक्षाप्रवणत्वादध्यात्मविदां तथा च नियतक्रियाया मार्गानुसारिभावजननेऽनै ॥ खोपच कान्तिकत्वमात्यन्तिकत्वं वा, तथा च जैनक्रियां विनाऽपि भावजनानां परेषां मार्गानुसारित्वादाज्ञासम्भवोऽविरुद्ध इति । युक्तं चैतद्, चिः ॥ न चेदेवं तदा जैनक्रियां विना भावलिङ्गबीजाभावाद् भावलिङ्गस्यापि परेषामनुपपत्तावन्यलिङ्गसिद्धादिभेदानुपपत्तेः। यः पुनराह- * गाथा-१६ परसमयानभिमतस्वसमयाभिमतक्रियैव असदग्रहविनाशद्वारा मार्गानुसारिताहेतुरिति, तदसत, उभयाभिमताकरणनियमादिनैव पत ॥७०॥ जल्यादीनां मार्गानुसारिताऽभिधानात, व्युत्पन्नस्य मार्गानुसारितायां तत्त्वजिज्ञासामूलविचारस्यैव हेतुत्वाव, अव्युत्पन्नस्य तस्यां गुरुपारतन्त्र्याधानद्वारा स्खसमयामिमतक्रियाहेतुत्वे परसमयानभिमतत्वप्रवेशे प्रमाणाभावाच । भवाभिनन्दिदोषप्रतिपक्षा गुणा एव हि | नियता मार्गानुसारिताहेतवः, क्रिया तु क्वचिदुभयाभिमता, कचिच्च स्वसमयाभिमते त्यनियता हेतुः, परकीयसंमतेनिजमार्गदाढर्थहेतुत्वं | 2 वा व्युत्पन्नमभिनिविष्टं वा प्रति, न तु व्युत्पन्नमनभिनिविष्टं वा प्रतीति । यत्तु निश्चयतः परसमयबाह्यानामेव सङ्गम-नयसारा| ऽम्बडप्रमुखानां मार्गानुसारित्वं स्यात्, नान्येषामिति केषाश्चिन्मतम्, तत्वेषामेव प्रतिकूलम् , सद्ग्र(द)हप्रवृत्तिजनितनैश्चयिकपरसमयबाह्यतया पतञ्जल्यादीनामप्यम्बडादीनामिव मार्गानुसारित्वाप्रतिघातात् । इयानेव हि विशेषो यदेकेषामपुनर्बन्धकत्वेन तथात्वम्, अपरेषां तु श्राद्धत्वादिनेति ॥ १६ ॥ अयं मार्गानुसारिभावः कदा स्यात् ? इत्येतत्कालमानमाहमग्गाणुसारिभावो, जायइ चरमंमि चेव परिअट्टे ॥ गुणवुढीए विगमे, भवाभिनंदिदोसाणं ॥ १७ ॥ [ मार्गानुसारिभावो जायते चरम एव परिवर्ते । गुणवृद्ध्या विगमे भवाभिनन्दिदोषाणाम् ॥ १७॥] सCHA5% Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षां ॥७१॥ माणुसारिभावोति । भवाभिनन्दिदोषाणाम् - "क्षुद्रो लो (ला) भरतिदींनो, मत्सरी भयवान् शठः ॥ अज्ञो भवाभिनन्दी स्यान्निष्फलारम्भसङ्गतः ।।७६ ( योगबिन्दु ८७ ) इति योगदृष्टि० इलोकोक्तानां विगमे सति, गुणवृद्धया चरमे पुद्गल परावर्त एव मार्गानुसारिभावो भवति । अपुनर्बन्धकादेर्मागांनुसारिप्रौढप्रज्ञानुगतत्ववचनात् तस्य चैतावत्कालमानत्वात् । अत एव वचनौषध प्रयोगकालश्वरमपुद्गलपरावर्त एवोक्तो व्यवहारतः, निश्चयतस्तु ग्रन्थिभेदकालस्तत्रापि ग्रन्थिभेदकाल एव न्यूनत्वेन पुरस्कृतः । तथा चोपदेशपदसूत्रवृत्ती - "घणमिच्छत्तो कालो, एत्थ अकालो उ होइ गायव्वो । कालो उ अपुणबंधग-पभिई धीरेहिं णिद्दिट्ठो |||४३२३॥ [घनमिथ्यात्वः कालोऽत्राकालस्तु भवति ज्ञातव्यः । कालवा पुनर्बन्धकप्रभृतिर्धी रैर्निर्दिष्ट: ।।] णिच्छयओ पुण एसो, विन्नेओ | गंठिभे अकालंभि (लोड)। एयंमि विहिसयपालणाउ आरोग्गमेयाओ ।। ४३३ ॥ " घनं महामेघावलुप्तस कलनक्षत्रादिप्रमाप्रसरभाद्रपदाद्यमावास्यामध्यभागसमुद्भूतान्धकारनिविडं, मिथ्यात्वं तत्त्वविपयासलक्षणं यत्र स्व तथा, कालश्वरम पुद्गल परावर्तव्यतिरिक्तशेषपुद्गलपरावर्तलक्षणः, अत्र - वचनौषधप्रयोगे, अकालस्तु अकाल एव भवति ज्ञातव्यः । चरमपुद्गलपरावर्तलक्षणस्तु तथा भव्यत्व परिपाकतो बीजाधानोद्भेदपोषणादिषु स्यादपि काल इति । अत एवाह-कालस्त्ववसरः पुनः, अपुनबैन्धकप्रभृतिः । तत्रापुनर्बन्धकः "पावं गतिवभावा कुणइ (पञ्चाशके)" इत्यादिलक्षणः, आदिशन्दान्मार्गाभिमुख मार्गपतितौ गृह्येते । तत्र मार्गो ललितविस्तरायामनेनैव शास्त्र कृत्थंलक्षणो निरूपितः 'मग्गदयाणं' इत्याद्यालापकव्याख्यायां, "मार्गश्चेतसोऽवक्रगमनम् भुजङ्गमनलिकायामतुल्यो विशिष्टगुणस्थानावाप्तिप्रवणः, स्वरसवाही क्षयोपशमविशेषो हेतु-स्वरूप-फलशुद्धामुखेत्यर्थः " तत्र पतितो भव्य विशेषो मार्गपतित इत्युच्यते, तदादिभावाप नव मार्गाभिमुख इति । एतौ च चरमयथाप्रवृत्त करणभागभाजावेव विज्ञेयौ । अपुनर्बन्धको पुनर्बन्धककालः, प्रभृतिर्यस्य स तथा, सटिप्पणा ॥खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा - १७ ॥७१॥ Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ACCASI गागपादनमापातपात..हाथी-७ कर्मपरीक्षा धीरैस्तीर्थकरादिभिः,निर्दिष्टोव्यवहारत इति ॥१॥ निश्चयतो निश्चयनयमतेन, पुनरेष वचनौषधप्रयोगकाले विज्ञेयः । कः? इत्याहग्रन्थिभेदकालस्तु ग्रन्थिभेदकाल एव,यसिन कालेऽपूर्वकरणानिवृत्ति करणाभ्यां ग्रन्थिन्निा भवति तस्मिन्नेवेत्यर्थः।कुतःयत एतस्मिन् सटिप्पणा ॥७२॥ ॥स्वोपज्ञ अन्थिभेदे सति, विधिना-अवस्थोचितकृत्यकरणलक्षणेन, सदा सर्वकालं, या पालना च वचनौषधस्य, तया कृत्वाऽऽरोग्य-संसार वृत्तिः ॥ व्याधिरोधलक्षणम्, एतस्माद्वचनौषधप्रयोगाद् भवति । अपुनर्बन्धकप्रभृतिषु वचनप्रयोगः क्रियमाणोऽपि न तथा सूक्ष्मबोधविधायकः, 12 'अनाभोगबहुलत्वात्तत्कालस्य । भिन्नग्रन्थ्यादयस्तु व्यावृत्तमोहत्वेन निपुणबुद्धितया तेषु कृत्येषु वर्तमानास्तत्कर्मव्याधिसमुच्छेदका जायन्त | ॥७२॥ इति॥२॥ ग्रान्थभेदमेव पुरस्कुर्वन्नाह-"इहरावि हंदि एअंमि,एस आरोग्गसाहगो चेव पोग्गलपरिअदृद्ध, जमूणमेअंमि संसारो॥४३॥" इतरथाऽपि विधेः सदापालनामन्तरेणापि, हन्दीति पूर्ववत्, एतस्मिन् ग्रन्थिभेदे कृते सति, एष वचनप्रयोगः, आरोग्यसा. धकश्चैव भावारोग्यनिष्पादक एव सम्पद्यते । तथा च पट्यते-" लब्ध्वा मुहूर्तमपि ये परिवर्जयन्ति, सम्यक्त्वरत्नमनवद्यपदप्रदायि ।यास्यन्ति तेऽपि न चिरं भववारिराशी, तद्विभ्रतां चिरतरं किमिहास्ति वाच्यम्॥१॥" अत्र हेतुमाह पुद्गलानामौदारिक-वैक्रियतैजस-भाषा-ऽऽनप्राण-मन:-कर्मग्रहणपरिणतानां विवक्षितकालमादौ कृत्वा यावतां सामस्त्येनकजीवस्य ग्रहनिसर्गौ सम्पद्यते स काल: पुदलपरावर्त इत्युच्यते, पुद्गलग्रहणनिसर्गाभ्यां परिवर्तन्ते परापरपरिणतिं लभन्ते तस्मिन्निति व्युत्पत्तेः,तस्याई यावद्, यद यस्माद् ऊनं किंचिद्धीनम, एतस्मिन् ग्रन्थिभेदे सति,संसारो जीवानां तीर्थकराद्याशातनाबहुलानामपि।अत्र दृष्टान्ताः कूलवालकगोशालकादयो दीवाच्या इति ! एवं चोत्कर्षतोऽप्यपापुद्गलपरावर्तावशेषसंमारस्यैव मार्गानुसारित्वमिति यत्केनचिदुक्तम्, तत्केनाभिप्रायेणेति विचार णीय मध्यस्थैः । न ह्येवमपुनर्बन्धकापेक्षया कालभेदेन ग्रन्थिभेदस्य पुरस्करणमुपपद्यते, पराभिप्रायेणापा पुद्गलावर्तकालमानस्योभय ANS- CA Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्म परीक्षा ॥७३॥ त्राविशेषाद् एवं वदतो भ्रान्तिमूलं तावच्चरमयथाप्रवृत्तकरणवि भागभाजामे वा पुनर्बन्धकादीनामधिकारित्वभणनम्, तादृशानां तेषां सम्यस्वसंनिहितत्वाद् । अत एव - "भवहेऊ नाणमेयस्स, पायसोऽसप्पवित्तिभावेणं । तह तयणुबंधओ च्चिय, तत्तेयरनिंदणाइओ ||४४६ ॥” ( भवहेतुर्ज्ञानमेतस्य प्रायशोऽसत्प्रवृत्तिभावेन । तथा तदनुबन्धत एव तच्वेतरनिन्दनादितः । ) भवहेतुः संसारनिबन्धनं ज्ञानं| शास्त्राभ्यासजन्यो बोधः, एतस्य मिथ्यादृष्टेः, कथम् । इत्याह-प्रायशो बाहुल्येन, असत्प्रवृत्ति भावेन विपर्यस्तचेष्टाकरणात् तस्य, यदि प्रायोग्रहणं तद् यथाप्रवृत्त करणचरमविभागभाजां संनिहितग्रन्थिभेदानामत्यन्तजीर्ण मिध्यात्वज्वराणां केषाञ्चिद्दुःखितदया - गुणवदद्वेष - समुचिताचारप्रवृत्तिसाराणां सुन्दरप्रवृत्तिभावेन व्यभिचारवारणार्थम् । तथेति हेत्वन्तरसमुच्चये । तदनुबन्धत एवासत्प्रवृत्यनुबन्धादेव । एतदपि कुतः ? इत्याह-तत्त्वेतरनिन्दनादितः । स हि मिथ्यात्वोपघातात्समुपात्तविपरीतरुचिः, तत्त्वं च सद्भूतदेवतादिकमर्हस्वादिलक्षणम्, 'निंद'त्ति इतरच्चातच्वं तत्कुयुक्तिसमुपन्यासेन पुरस्करोति ततस्तत्त्वेतरनिन्दनादितो दोपाद् भवान्तरेऽप्यसत्प्रवृत्तिरनुबन्धयुक्तस्यैव स्यादित्युपदेशपदवचनान्तरमनुसृत्यात्रानादिप्रवाहपतितस्य यथाप्रवृत्तकरणस्य चरमविभागः सम्यक्त्वप्राप्तिहेतुकर्मक्षयोपशमलक्षितावस्थाविशेषस्तद्वतां संनिहितग्रन्थिभेदानां स्वल्पकालप्राप्तव्य सम्यक्त्वानामत्यन्तजीर्णमिध्यात्वज्वराणां सुन्दरप्रवृत्तिरिति भणनेन तद्व्यतिरिक्तानां तु सर्वेषामपि मिथ्यादृशामसुन्दरप्रवृत्तिरेवोक्तेति सूक्ष्मदृशा पर्यालोच्यमिति तेनोक्तम् । तत्रेदं विचारणीयम् - चरमत्वं यथाप्रवृत्त करणस्यानन्त पुद्गल परावर्त भाविनश्वरमै कावर्तमात्रेणापि निर्वाह्यम्, संनिहितग्रन्थिभेदत्वस्य तु खल्पकाप्राप्तन्य सम्यक्त्वाक्षेपकता || “आसन्ना चेयमस्योच्चै - वरमावर्तिनो यतः । भूयांसोऽमी व्यतिक्रान्ता - स्तदेकोऽत्र न किंचन ॥ १७६ ॥ आसन्ना चाभ्यर्णवर्तिन्येव, इयमुक्तिः, अस्योच्चैरतीव, चरमावर्ति नश्वरमपुद्गल परावर्तभाजो जीवस्य यतः कारणाद् भूयांसो अती सटिप्पणा | स्वोपज्ञ |वृत्तिः ॥ गाथा - १७ ॥ ७३ ॥ Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥७ ॥ A RATECORRECTION वबहवः, अमी आवर्ता, व्यतिक्रान्ता अनादौ संसारे व्यतीताः, तत्ततः, एकोऽपश्चिमः, अत्रन किंचन न किंचिद्भयस्थानमेष इत्यर्थः" इति योगबिन्दुसूत्रवृत्तिवचनाचरमावर्तिन आसनसिद्धिकत्वस्यापि स्वल्पकालप्राप्तव्यसिद्ध्याक्षेपकत्वापत्तेः, आपेक्षिकास सटिप्पणा ॥ खोपक्ष बतया समाधानं चोभयत्र सुघटमिति । अथैकमविकाधुचितयोग्यतानियतत्वाद् द्रव्याज्ञायाः सम्यक्त्वप्राप्त्यपेक्षया तदपिकव्यवधाने ब्रूचिः ॥ मिथ्यादृशो न मार्गानुसारितेति निश्चीयते इति चेद् । न, असति प्रतिबन्धे परिपाके वाऽपुनर्बन्धकादेर्मार्गानुसारिणोभा है गाथा-१७ वाज्ञाऽव्यवधानेऽपि सति प्रतिबन्धादौ तद्वयवधानस्यापि सम्भवात् तत्कालेऽपि भावाज्ञाबहुमानाप्रतिघातात, उचितप्रवृत्तिसारतया ॥७४|| द्रव्याज्ञाया अविरोधाद् , अन्यथा चारित्रलक्षणाद् भावस्तवादेकभविकाद्यधिकव्यवधाने द्रव्यस्तवस्याप्यसम्भवप्रसङ्गाद् , भाव|स्तव हेतुत्वेनैव द्रव्यस्तवत्वप्रतिपादनात् । तदुक्तं पञ्चाशके-ता भावत्थयहेऊ, जो सो दबत्थओ इहं इट्ठो॥ जो उण णेवंभूओ, I स अप्पहाणो परं होई ॥१॥” (तस्माद्भावस्तवहेतुर्यः, स द्रव्यस्तव इहेष्टः । यः पुनरनेवम्भूतः स अप्रधानः परं भवति ॥) इति । यदि च भावलेशयोगाद्वयवहितस्यापि द्रव्यस्तवत्वमविरुद्धं तदा तत एव तादृशस्य मार्गानुसारिणो द्रव्याज्ञाप्यविरुद्धैव । यथाहिनिर्निदानं सूत्रविधिलक्षणेन भावस्तवानुरागलक्षणेन वा प्रकारेण जिनभवनाधुचितानुष्ठानस्य द्रव्यस्तवत्वमव्याहतम्, एकान्तेन भावशून्यस्यैव विपरीतत्वात् । तथा अपुनर्बन्धकस्यापि भावाज्ञानुरागभावलेशयुक्तस्य व्यवधानेऽपि द्रव्याज्ञाया न विरोध इति । अत एव भवामिष्वङ्गानाभोगासङ्गतत्वात् अन्यावर्तापेक्षया विलक्षणमेव चरमावर्ते गुरुदेवादिपूजनं व्यवस्थितम् ।। तदुक्तं योगबिन्दौ । "एतद्युक्तमनुष्ठान-मन्यावर्तेषु तद् ध्रुवम् ।। चरमे त्वन्यथा ज्ञेयं, सहजाल्पमलत्वतः॥१५॥ एकमेव ह्यनुष्ठानं, कर्तृभेदेन मिद्यते ॥ सरुजेतरभेदेन, भोजनादिगतं यथा ॥१५३॥ इत्थं चैतद् यतः प्रोक्तं, सामान्येनैव पञ्चधा ॥ विषादिकमनुष्ठानं, विचारेऽत्रैव योगिमिः CCOCCASCALE Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ le धर्मपरीक्षा ॥७५॥ ॥१५४ ॥ विषं गरोऽननुष्ठानं, तद्धेतुरमृतं परम् ॥ गुर्वादिपूजाऽनुष्ठान-मपेक्षादिविधानतः ॥ १५५॥ विषं लब्ध्याद्यपेक्षात, इदंते सटिप्पणा सच्चित्तमारणात् । महतोऽल्पार्थनाद् ज्ञेयं, लघुत्वापादनात्तथा ॥१५६ ।। दिव्यभोगाभिलाषेण, गरमाहुर्मनीषिणः। एतद्विहितनीत्येव, 12 ॥खोपन कालान्तरनिपातनात् ॥ १५७ ॥ अनाभोगवतश्चैत-दननुष्ठानमुच्यते ॥ सम्प्रमुग्धं मनोऽस्येति, ततश्चैतद् यथोदितम् ॥ १५८ ॥ एत वृत्तिः ॥ द्रागादिदं हेतुः, श्रेष्ठो योगविदो विदुः ।। सदनुष्ठानभावस्य, शुभभावांशयोगतः ॥१५९॥ जिनोदितमिति स्वाहु-र्भावसारमदः पुनः॥ गाथा-१७ संवेगगर्भमत्यन्त-ममृतं मुनिपुङ्गवाः ॥ १६० ॥ एवं च कर्तृभेदेन, चरमेऽन्यादृशं स्थितम् ।। पुद्गलानां परावर्ते, गुरुदेवादिपूजनम् ॥७ ॥ ॥ १६१॥ यतो विशिष्टः कर्ताऽयं, तदन्येभ्यो नियोगतः। तद्योगयोग्यताभेदा-दिति सम्यग् विचिन्त्यताम् ॥ १६२॥” अत्र पूर्व ह्येकान्तेन योगायोग्यस्यैव देवादिपूजनमासीत, चरमावर्ते तु समुल्लसितयोगायोग्यभावस्येति । चरमावर्तदेवादिपूजनस्यान्यावर्तदेवादिपूजनादन्यादृशत्वमिति वृत्तिकृद् विवृतवान् ॥ एतेन यत्वन्यतीर्थिकाभिमताकरणनियमादेः सुन्दरत्वेन भणनं तद् हिंसाद्यासक्तजनस्य मनुष्यत्वस्येव खरूपयोग्यतया व्यवहारतो मन्तव्यम् । निश्चयतस्तु मिथ्यागकरणनियमो हिंसाबासक्तजनमनुष्यत्वं वेत्युभयमपि संसारकारणत्वेनानर्थहेतुत्वादसुन्दरमेवेति यत्केनचिदुक्तम् , तदपास्तम् । न तादृशं वचनमभिनिवेशं विना सम्भवति, यतः पूर्वसेवापि मुफ्त्यद्वेषादिसङ्गता चरमावर्तभाविनी, निश्चयतः प्राच्यावर्तभावितद्विलक्षणा योगयोग्यतयाऽऽचारतिशयितोक्ता, किं पुनरकरणनियमस्य साक्षाद् योगाङ्गस्य वक्तव्यमिति । न हि मनुष्यत्वसदृशमकरणनियमादिकम् , अन्येषामपि सदाचाररूपस्य तस्य सामान्यधर्मप्र ष्टत्वात्, सामान्यधर्मस्य च भावलेशसङ्गतस्य विशेषधर्मप्रकृतित्वात्, मनुष्यत्वं चानीदृशम् । किं च-हिंसाद्यासक्तमनुष्यत्वस्थानीयं यदि मिथ्यात्वविशिष्टमकरणनियमादिकं तदा मेघकुमारजीवहस्त्यादिदयापि तादृशी स्याद् , उत्कटमिथ्यात्वविशिष्टस्य तस्य तथात्वे + % EOOK Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ०६॥ C सटिप्पणा ॥स्वोपड़ वृत्तिः ॥ गाथा-१७ ॥७६॥ ४ ACADAICCCORE चेष्टापत्तिः, अपुनर्बन्धकादीनामुत्कटमिथ्यात्वाभावात्पूर्वसेवायामपि च तेषामेवाधिकृतत्वात् । तदुक्तम्-"अस्यैषा मुख्यरूपा स्यात्, पूर्वसेवा यथोदिता । कल्याणाशययोगेन, शेषस्याप्युपचारतः।।१७९॥” इति । न चापुनर्बन्धकादेरपि न सम्यगनुष्ठानमिति शङ्कनीयम्, | उपदेशपदे"सम्माणुष्ठाणं चिय, ता सबमिणंति तत्तओ णेयं । ण य अपुणबंधगाई, मुत्तुं एवं इहं होइ॥१॥" [सम्यगनुष्ठानमेव तस्मा सर्वमिदं तत्त्वतो ज्ञेयम् । न चापुनर्बन्धकादि मुक्त्वा एतदिह भवति ॥] सम्यगनुष्ठानमेवाज्ञानुकूलाचरणमेव, तत्-तस्मात्, सर्व | त्रिप्रकारमपि, इदमनुष्ठानं, तत्त्वतः-पारमार्थिकव्यवहारनयदृष्ट्या, ज्ञेयम् । अत्र हेतुमाह-न च नैव, यतोऽपुनर्बन्धक-मार्गाभिमुखमार्गपतितान् मुक्त्वा एतदनुष्ठानमिहैतेषु जीवेषु भवति'अपुनर्बन्धकादयश्चसम्यगनुष्ठानवन्त एवं'-इति उपदेशपदसूत्रवृत्तिवचनाद् अपुनर्बन्धकादेः सम्यगनुष्ठाननियमप्रतिपादनात त्रिप्रकारं धनुष्ठानं सतताभ्यास-विषयाभ्यास-भावाभ्यासभेदात्।।तत्र नित्यमेवोपादेयतया लोकोत्तरगुणावाप्तियोग्यतापादकमातापितविनयादिवृत्तिः सतताभ्यासः। विषयेऽहल्लक्षणे मोक्षमार्गस्वामिनि वा विनयादिवृत्तिः स विषयोभ्यासः । दूरं भवादुद्विग्नस्य सम्यग्दर्शनादीनां भावानामभ्यासश्च भावाभ्यास इति३ । तच्च निश्चयतो मोक्षानुकूलभावप्रतिबद्धत्वाद् विषयगतमेवेत्यपुनर्बन्धकादिः सम्यगनुष्ठानवानेवेति योगमार्गोपनिषद्विदः, येन चात्यन्तं सम्यक्त्वाभिमुख एव मिथ्यादृष्टिर्मार्गानुसारी गृह्यते, तेनादिधार्मिकप्रतिक्षेपाद् अपुनर्बन्धकादयस्त्रयो धर्माधिकारिण इति मूलप्रवन्ध एव न ज्ञातः, सम्यक्त्वाभिमुखस्यैवापुनर्बन्धकस्य पृथग्गणने चारित्राभिमुखादीनामपि पृथग्गणनापच्या विभागव्याघाताद । तस्माद् यथा चारित्राद्वयवहितस्यापि सम्यग्दृशः शमसंवेगादिना सम्यग्दृष्टित्वं निश्चीयते, तथा सम्यक्त्वाद् व्यवहितस्यापुनर्बन्धकादेरपि तल्लक्षणैस्तद्भावो निश्चयः । तल्लक्षणप्रतिपादिका चेयं पश्चाशकगाथा-"पावंण निवभावा,कुणइ ण बहु मन्नइ भवं घोरं । उचियढिइं च सेवइ, सवत्थ विं अपुणवंधो॥१॥" LCAREOGAOCALC Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥७७॥ ति ॥ ९८|| पंचा० ३ - [पापं न तीव्र भावात्करोति, न बहु मन्यते भवं घोरम् | उचितस्थितिं च सेवते सर्वत्रापि अपुनर्बन्धकः || १ || ] एतवृत्तिर्यथा - पापमशुद्धं कर्म, तत्कारणत्वाद् हिंसाद्यपि पापं तद्, न नैव, तीव्रभावाद् गाढसंक्लिष्टपरिणामात् करोति विधत्ते, अत्यन्तोत्कट मिथ्यात्वादिक्षयोपशमेन लब्धात्मनैर्मल्य विशेषत्वाद् । तीव्रेति विशेषणादापन्नमतीवभावात्करोत्यपि, तथाविधकर्मदोषात् । तथा न बहु मन्यते न बहुमानविषयीकरोति । भवं संसारं, 'घोरं रौद्रम्, तस्य घोरत्वावगमात् । तथा उचितस्थितिम् - अनुरूपप्रतिपत्तिम्, चशब्दः समुच्चये, सेवते - भजते कर्मलाघवात्, सर्वत्रापि आस्तामेकत्र देशकालावस्थापेक्षया समस्तेष्वपि देवाऽतिथिमाता- पितृप्रभृतिषु, मार्गानुसारिताऽभिमुखत्वेन मयूर शिशु दृष्टान्तात्, अपुनर्बन्धक उक्तनिर्वचनो जीवः, इत्येवंविधक्रियालिङ्गो भवतीति गाथार्थ इति । न चापुनर्बन्धकस्य क्वचिन्मार्गानुसारितायाः क्वचिच्च तदभिमुखत्वस्य दर्शनेन भ्रमकलुषितं चेतो विधेयम्, द्रव्यभवा योगाभिप्रायेणोभयाभिधानाविरोधात् । एतेन " मार्गानुसारित्वात्" इत्यत्र धर्मबिन्दुप्रकरणे अ०६०२२ मार्गस्य सम्यग्ज्ञानादेर्मुक्तिपथस्यानुवर्तनादिति व्याख्यानात् || वन्दारुवृत्तावपि 'मग्गाणुसारिअ'त्ति अमग्रहपरित्यागेनैव तत्त्वप्रतिपत्तिर्मार्गानुसारितेत्येवंव्याख्यानाद् मिथ्यादृष्टेरकरणनियमादिकारिणोऽपि मार्गानुसारित्वमित्यपास्तम् || पराभिमतस्य सम्यक्त्वाभिमुखस्येवापुनर्बन्ध कादेः सर्वस्यापि धर्माधिकारिणो योग्यतया तत्त्रप्रतिपत्तेर्मार्गानुसारिताया अप्रतिघातात्, मुख्यतत्वप्रतिपत्तेश्व मेघकुमारजीव हस्त्यादावपि वक्तुमशक्यत्वात् । तस्मात्संगमनय सारादिवदतिसंनिहितसम्यक्त्व प्राप्तीनामेव मार्गानुसारित्वमिति मुग्धप्रतारणमात्रम्, अपुनर्बन्धकादिलक्षणवतामेव तथाभावाद्, अन्यथा तादृशसंनिहितत्वानिश्चयेऽपुनर्बन्ध काद्युद्देशेनादिधार्मिकाचारानुपदेशोऽप्युच्छिद्येतेति सकलजैनप्रक्रियाविलोपपत्तिः । किं च- बीजादीनां चरमपुद्गलपरावर्तभावित्वस्य तत्प्राप्तावु कर्पत एकपुद्गल परावर्तकालमानस्य तेषां सान्तरे सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा - १७ ॥ ७७ ॥ Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा || 26 || तरत्वमेदस्य च प्रतिपादनान्न सम्यक्त्वातिसंनिहितमेव मार्गानुसारित्वं भवतीति नियमः श्रद्धेयः । तदुक्तं पञ्चमविंशिकायाम्"बीजाइकमेष पुणो, जायइ एमुत्थ भवमत्ताणं ।। णियमा न अन्नहा वि हु (उ), इट्ठफलो कप्परुक्खुव ॥ १॥ बीजं विमस्स णेयं, दट्टू एयकारिणो जीवे । बहुमाण संगयाए, सुद्धपसंसार करणिच्छा ||२|| तीए चेवणुबंधो, अकलंको अंकुरो इहं णेओ । कट्ठे पुण विष्णेया, | तद्भुवायन्नेसणा चित्ता || ३ || तेसु पवित्तीय तहा, चित्ता पत्ताइसरिसिंगा होइ । तस्संपत्तीइ पुप्फ, गुरुसंजोगाइरूवं तु ॥४॥ तत्तो सुदेसणाईहिं, होइ जा भावधम्मसंपत्ती । तं फलमिह विनेयं, परमफलपसाहगं णियमा ||५|| बीजस्सवि संपत्ती, जायइ चरमंमि चेव परिअहे । अच्चंत सुंदरा जं, एसावि तओ ण सेसेसु ॥ ६ ॥ ण य एअमि अणतो, जुञ्जइ णेयस्य णाम कालुति । ओस (उस्स) प्पिणी अनंता, हुति जओ एगपरिअड्डे ||७|| बीजाइआ य एए, तहा तहा संतरेतरा पेया । तहभन्वत क्खित्ता, एगंत सहावऽवाहाए ||" चि ॥८॥ ( बीजादिक्रमेण पुनर्जायते एषोत्र भव्य सत्त्वानाम् । नियमाद् नान्यथाऽपि खलु इष्टफलः कल्पवृक्ष इव ॥ १ ॥ बीजमप्यस्य ज्ञेयं दृष्ट्वा एतत्कारिणो | जीवान् । बहुमानसंगतया शुद्धप्रशंसया करणेच्छा ||२|| तस्याचैवानुबन्धोऽकलङ्कोऽङ्कुर इह ज्ञेयः । कष्टं पुनर्विज्ञेया तदुपायान्वेषणा चित्रा ||३|| तेषु प्रवृत्तिश्च तथा चित्रा पत्रादिसदृशी भवति ।। तत्संप्राप्त्याः पुष्पं गुरुसंयोगादिरूपं तु ॥४॥ ततः सुदेशनादिभिर्भवति यो भावधर्मसंप्राप्तिः । तत्फलमिह विज्ञेयं परमफलप्रसाधकं नियमाद् || २ || बीजस्यापि संप्राप्तिर्जायते चरम एव परावर्ते । अत्यन्त सुन्दरा यदेषाऽपि ततो न शेषेषु ||६|| न चैतस्मिन् अनन्तो युज्यते नैतस्य नाम काल इति । अवसर्पिण्योऽनन्ता भवन्ति यत एकपरावर्ते । ॥ ७ ॥ बीजादिकाश्च एते तथा तथा सान्तरेतरा ज्ञेया । तथा भव्यत्वाक्षिप्ता एकान्तस्वभावाबाधया || इति ॥ ८ ॥ ) एतेन यदुच्यते केनचिद् 'बीजादिप्राप्तौ मार्गानुसार्यां (रिण्यां) सम्यक्त्वोपलम्भं संज्ञित्वमेव न व्यभिचरतीति' तदपास्तं द्रष्टव्यम् || "सण्णीणं पुच्छा - सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा - १७ ॥७८॥ Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥७९॥ 62-4- सटिप्पणा ॥खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-१७ ॥७९॥ 4 - गोयमा! जहन्नेणं अंतोमुहत्त, उक्कोसेणं सागरोवमसतपुहुत्तं सातिरेगं ।" (संज्ञिनां पृच्छा-गौतम! जघन्येनान्तर्मुहर्तम् , उत्कर्षेण सागरो पमशतपृथक्त्वं सातिरेकम् ।) इत्यागमवचनात्संज्ञिकालस्योत्कर्षतः सातिरेकसागरोपमशतपृथक्त्वमानत्वाद, अपुनर्बन्धकपदस्थापुनर्बन्धकत्वेनोत्कृष्टकर्मस्थितिक्षपणार्थपर्यालोचनायामप्येतदधिकसंसारावश्यकत्वाद् , बीजादिप्राप्तपूर्विणोप्यकपुद्गलपरावर्तनियतानन्तोत्सर्पिण्यवसर्पिणीरूपकालमाननिर्देशात् । न च पञ्चमारके ज्ञानपञ्चकसद्भावाभिधानवद् बीजादिप्राप्तौ चरमपुद्गलपरावर्तकालमानाभिधानेऽपि नोत्कर्षतस्तावदन्तरं तस्य लभ्यते इति वाच्यम्, बीजादिप्राप्तौ चरमावर्तमान एव संसार इति परिपाट्या व्यापककालस्यैव लाभादधिकरणकालमानाभिप्रायेणेत्थमभिधानासंभवाद् , अन्यथा सम्यक्त्वेऽप्येतावान् संसार इति वचनस्थाप्यनवद्यत्वप्रसङ्गात् । किं च-"अचरिमपरिअडेसु, कालो भवबालकालमो भणिओ । चरिमो अ(उ) धम्मजुवण-कालो तह चित्तभेओति ॥१९॥ ता बीजपुवकालो, ओ भवबालकाल एवेह । इयरो उ धम्मजुबण-कालो विह(हि)लिंगगम्मुत्ति॥१६॥ (अचरमपरावर्तेषु कालो भवबालकालो भणितः । चरमश्च धर्मयौवनकालस्तथा चित्रभेद इति ॥१९॥ तस्माद् बीजपूर्वकालो ज्ञेयो भवबालकाल एवेह । इतरस्तु धर्मयौवनकालोऽपीह लिङ्गगम्य | इति।।) इत्येतच्चतुर्थपञ्चमविशिकागाथाद्वयार्थविचारणया बीजकालस्य चरमावर्तमानत्वमेव सिध्यति॥अपि च-"नवनीतादिकल्पस्त तद्भावेऽत्र निवन्धनम् । पुद्गलानां परावर्त-चरमो न्यायसङ्गतः (तम्)" ॥९६॥ इति योगबिन्दुवचनाचरमावर्तस्य घृतादिप| रिणामस्थानीये योगे म्रक्षणादिस्थानीयत्वसिद्धौ सत्यन्यकारणसाम्राज्येऽपापुद्गलपरावर्तमध्ये सम्यक्त्वादिगुणानामिव चरमावर्तमध्ये बीजोचितगुणानामप्युत्पचिः कदाप्यविरुद्धैव, कालप्रतिबन्धाभावादिति व्यक्तमेव प्रतीयते । अत एव हि भोगाद्यर्थ यमनियमाराधनरूपां कापिलादिभिरभ्युपगतां पूर्वसेवाम्"-अत एवेह निर्दिष्टा, पूर्वसेवाऽपि या परैः। सासन्नान्यगता मन्ये, भवाभिष्वङ्गभावतः ॥९॥" 3 CALCOHICH G C Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -S धर्मपरीक्षा ॥८॥ इति ग्रन्थेन चरमावर्तासन्नान्यतरपखवर्तवर्तिनी हरिभद्रसरिरभ्यधात , तात्रिकपूर्वसेवाया अपार्द्धपुद्गलपरावर्तादिमानत्वे चासन्नतोपलक्षणाय तत्पूर्वकालनियतामेवैनामवक्ष्यद् ग्रन्थकार इति । अपि च-"मनागपि हि तन्निवृत्तौ तस्यापुनर्बन्धकत्वमेव स्याद् "-18 सटिप्पणा ॥स्वोपड़ इति वचनात् मनागपि संसारासङ्गनिवृत्तौ जीवस्यापुनर्बन्धकत्वं सिद्ध्यति तन्निवृत्तिश्च मुक्त्यद्वेषेणापि स्यात् , तस्य च चरमपुद्गलप. वृत्तिः ॥ रावर्तव्यवधानेनापि मोक्ष हेतुत्वमुक्तम् । तथा च योगबिन्दुसूत्रवृत्ती-" नास्ति येपामयं तत्र, तेऽपि धन्याः प्रकीर्तिताः ॥ भवः | *गाथा-१७ बीजपरित्यागा-तथा कल्याणभागिनः॥४०॥" न नैव. अस्ति विद्यते, येषां भव्यविशेषाणाम् , अयं द्वेषः, तत्र मुक्ती, तेऽपि किंपुनस्तत्रानुरागभाज इत्यपिशब्दार्थः, धन्याः धर्मधनलग्नाः(ब्धारः)प्रकीर्तिताः। पुनरपि कीदृशाः? इत्याह। भवबीजपरित्यागात् मनाक् स्वगतसंसारयोग्यतापरिहाणेः सकाशात्, तथा तेन प्रकारेण चरमपुद्गलपरावर्तव्यवधानादिना, कल्याणभागिनः तीर्थकरादिपदगाप्तिद्वारेण शिवध(श)मभाज इति ॥" तथा च चरमपुद्गलपरावर्तवर्तिनां मुक्त्यद्वेषतद्रागाक्षुद्रतादिगुणवतां गलितकदाग्रहाणां | सम्यक्त्वप्राप्तिसांनिध्यव्यवधानविशेषेऽपि सर्वेषामपुनर्बन्धकादीनामविशेषेण मार्गानुसारित्वमङ्गीकर्तव्यम् । यत्तु "पढमकरणोवरि तहा, अणहिनिविट्ठाण संगया एमा ॥ " पंचा०३-२८(प्रथमकरणोपरि तथाऽनभिनिविष्टानां संगता एपा ॥) इति वचनात्प्रथमकरणोपर्येव ह्यतत्त्वाभिनिवेशिनो भवन्तीति । 'प्रथमकरणोपरि वर्तमानानामपुनर्बन्धकादीनां शुद्धवन्दना भवति' इत्यभिधाय "णो भावओ इमीए, परोवि हु अवड्डपोग्गला अहिगो। संसारो जीवाणं, हंदि पसिद्धं जिणमयंमि" ॥३-३२॥ (नो भावतोऽस्यां परोऽपि खलु अपार्द्धपुद्गलादधिकः । संसारो जीवानां हन्दि प्रसिद्धं जिनमते।।) इत्यनेन ग्रन्थेन शुद्धाध्यवसायशुद्धायां वन्दनायां सत्यामुत्कृष्टोऽप्यपार्द्धपुद्गलावाधिकः संसारो जीवानां न भवतीति पञ्चाशके प्रोक्तम् , तदपुनर्बन्धकस्यावस्थाभेदेन विचित्रत्वाद् विधिशुद्धजैनक्रियाऽऽराधकमपुन A-PRACTRONICA% Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्म परीक्षा ॥८१॥ मधिकृत्यावसेयम् ; सर्वस्यापुनर्बन्धकस्य प्रागुक्तयुक्त्यैतावत्कालमानानियमाद् भावशुद्ध जैनक्रियाया एव एतावत्कालनियतत्वाद् | अत एवास्मिन्नर्थे "कालमणंतं च सुए, अद्धापरिअडओ उ देणो । आसायणबहुलाणं, उक्कोसं अंतरं होई ||" (आव०८५३) [ कालमनन्तं च श्रुते अर्धपरिवर्तश्च देशोनः । आशातना बहुलानामुत्कृष्टमन्तरं भवति ।। ] इति संमतितयोद्भावितं वृत्तिकृता । मोक्षार्थितया क्रियमाणा हि विधिशुद्धा जैनक्रिया उत्कर्षत एतावत्कालव्यवधानेन मोक्षं प्रापयतीति विषय विशेष एषः । भवति च भावाविशेषेऽपि विषयवि| शेषात्फलविशेषः, सामान्यसाधु - भगवद्दानादौ तद्दर्शनादिति श्रद्धेयम् । न चेदेवं तदा स्वतन्त्रान्यतन्त्रसिद्ध क्रियाकार्य पुनर्बन्धकभेदो न | स्यादिति भावनीयं सुधीभिः । यदपि "बीजाधानमपि ह्यपुनर्बन्धकस्य, न चास्यापि पुद्गलपरावर्तः संसार इति" भगवतां सर्वसत्यनाथत्वे " अन्यतरस्माद् भगवतो बीजाधानादिसिद्धेरल्पेनैव कालेन सर्वभव्यमुक्तिः स्यादित्यत्र हेतुतयोक्तं " तदपि भगवत्प्रदेय विचित्रबीजापेक्षया । अत एव पूर्वसेवादेः पृथग्गणनया बीजाधाने पुद्गलपरावर्ताभ्यन्तरसंसार भणनोपपत्तिः, अन्यथाल्पतरकालाक्षेपकतया न चास्या - प्यपार्द्धपुद्गल परावर्ताधिकः संसार इत्येवोपन्यसनीयं स्यादिति सूक्ष्मधिया विभावनीयम् । ये तु वदन्ति - " मिध्यादृष्टीनां मार्गानुसा रिवाभ्युपगमे तेषां गुणवश्वावश्यंभावाद् मिथ्यात्वेऽपि गुणश्रेण्यभ्युपगमप्रसङ्गः " न चैतदिष्टम्, सम्यक्त्वप्रतिपत्तिमारभ्यैव कर्मग्रम्यादौ गुणश्रेण्यभिधानादिति तेषामृजुबुद्धीनां हरिभद्राचार्योपदर्शिताऽन्वर्थगुणस्थानपदप्रवृत्तिरेव मिध्यात्वेऽपि गुणसद्भावसाक्षिणी गुणश्रेणी च धर्मपृच्छादौ मिथ्यादृशामपि सम्यक्त्वोत्पत्याद्युपलक्षितैव द्रष्टव्या । यदाहाऽऽचारवृत्तिकृद् (अ०४) 'इह मिथ्यादृष्टयो | देशोन कोटी कोटिकर्मस्थितिकाश्च ग्रन्थिकसन्च्त्वास्ते कर्मनिर्जरामाश्रित्य तुल्याः, धर्मप्रच्छनोत्पन्नसंज्ञास्तेभ्यो ऽसंख्येय गुणनिर्जरकाः, ततोऽपि पिपृच्छिषुः सन्साधुसमीपं जिगमिषुः तस्मादपि क्रियाऽविष्टः पृच्छन्, ततोऽपि धर्म प्रतिपित्सुः, तस्मादपि क्रियाविष्टः प्रतिपद्यमानः, सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ दृचिः ॥ गाथा - १७ ॥ ८१ ॥ Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Cak धर्मपरीक्षा ॥८२॥ ++ सटिप्पणा ॥ खोषज्ञ वृतिः ॥ गाथा-१८ ॥८२॥ तस्मादपि पूर्वप्रतिपन्नोऽसंख्येयगुणनिर्जरकः इति सम्यक्त्वोत्पत्तिाख्यातेति"। यदि चैतद्वचनबलादेव चारित्रादाविव सम्यक्त्वे|ऽप्यभिमुखप्रतिपद्यमान-प्रतिपन्नत्रयस्यैव गुणश्रेणीसद्भावात् सम्यक्त्वानमिमुखमिथ्यादृष्टेन मार्गानुसारित्वमित्याग्रहस्तदासंगम नयसारादेरपि मार्गानुसारित्वं न स्याद् । न हि भवान्तरव्यवधानेऽपि गुणश्रेण्यनुकूलमाभिमुख्यं सम्भवतीति सम्यक्त्वादिनियतP-गुणश्रेणी विनाऽपि मिथ्यादृशामप्यल्पमोहमलानां संसारप्रतनुताकारिणी दयादानादिगुणपरिणतिर्मार्गानुसारितानिबन्धनं भवतीति प्रतिपत्तव्यम् । अत एव-"भवाभिनन्दिदोषाणां, प्रतिपक्षगुणैर्युतः । वर्द्धमानगुणप्रायो, ह्यपुनर्बन्धको मतः ॥१७८॥" इति योगबि. न्दावुक्तम् । अपुनर्बन्धकश्च प्रथमगुणस्थानावस्थाविशेष इति तत्र सर्वथा गुणप्रतिक्षेपवचनं निर्गुणानामेवेति मन्तव्यम् ॥ १७ ॥ तदेवं मार्गानुसारिभावस्य कालमानमुक्तम् , अथानेन सदाचारक्रियारूपेण ज्ञानदर्शनयोगायोगाभ्यां यथा चतुर्भङ्गी निष्पद्यते तथाऽऽह६ एअम्मि नाणदंसण-जोगाजोगेहिं देससव्वकओ ॥ चउभंगो आराहग-विराहगत्तेसु सुअसिद्धो ॥ १८ ॥1 - एतस्मिन् ज्ञानदर्शनयोगायोगाभ्यां देशसर्वकृतः । चतुर्भङ्ग आराधकविराधकत्वयोः श्रुतसिद्धः ॥ १८ ] एअम्मित्ति । एतस्मिन्-मार्गानुसारिभावे सदाचारक्रियारूपे ज्ञानदर्शनयोगायोगाभ्यामाराधकत्वविराधकत्वयो. देशसर्वकृतश्चतुर्भङ्गसमाहारः श्रुतसिद्धः। तथाहि-१ मार्गानुसारिक्रियावान ज्ञानदर्शनहीनश्च देशाराधक इति प्रथमो भङ्गः। २ ज्ञानदर्शनसम्पन्नः क्रियाहीनश्च देशविराधक इति द्वितीयः। ३ ज्ञानदर्शनसम्पन्नः क्रियासम्पन्नश्च सर्वाराधक इति तृतीयः । ४ ज्ञानदर्शनासम्पन्नः क्रियाहीनश्च सर्वविराधक इति चतुर्थः॥ तथा च भगवतीसूत्रम्-(श०८उ०१०)"एवं खलु मए चत्वारि पुरिसजाया पण्णत्ता । तंजहा-१ सीलसंपन्ने णामं एगे णो सुअसंपन्ने । २ सुप्रसंपन्ने णाम एगेणो सीलसंपन्ने । ३ एगे सीलसंपन्ने वि सुअसंपन्ने वि। SAAE5 Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ४ एगे णो सीलसंपन्ने णो सुअसंपन्ने । तत्थ णं जे से पढमे पुरिसजाए से णं पुरिसे सीलवं असुअब, उवरए अविण्णायधम्मे । एस सटिप्पण |णं गोअमा! मए पुरिसे देसाराहए पण्णत्ते । तत्थ णं जे से दुच्चे प्ररिसजाए से णं पुरिसे असीलवं सुअवं, अणुवरए विण्णायधम्मे । 151॥खोपन एस णं गोअमा! मए पुरिसे देसविराहए पण्णत्त। तत्थ णं जे से तच्चे पुरिसजाए से णं परिसे सीलवं सुअर्व, उवरए विण्णायधम्मे । |हात्तः । एस णं गोअमा! मए पुरिसे सबाराहए पण्णत्ते । तत्थ ण जे से चउत्थे पुरिसजाए से णं पुरिसे असील असुअवं, अणुवरए अवि गाथा-२८ ॥८३॥ | ण्णायधम्मे । एस ण गोयमा मए पुरिसे सव्वविराहए पण्णत्तेत्ति४॥ एतवृत्तिर्यथा-वमित्यादि। एवं वक्ष्यमाणन्यायेन, 'पुरि| सजाए'त्ति पुरुषप्रकाराः। 'सीलवं असुयवत्ति, कोऽर्थः-'उबरए अविण्णायधम्मे'त्ति उपरतो निवृत्तः स्वबुद्ध्या पापात, अवि-18 ज्ञातधर्मा भावतोऽनधिगतश्रुतज्ञानो बालतपस्वीत्यर्थः, गीतार्थानिधिततपश्चरणनिरतोऽगीतार्थ इत्यन्ये । 'देमाराहए'त्ति देशं स्तोकमंशं मोक्षमार्गस्याराधयतीत्यर्थः, सम्यग्योधरहितत्वात क्रियापरत्वाचेति । 'असीलवं सुअव'त्ति कोऽर्थः-अणुवरए विणायधम्म'त्ति | पापादनिवृत्तो विज्ञातधर्मा चाविरतसम्यग्दृष्टिरिति भावः। 'देसविराहए'त्ति देश स्तोकमंशं ज्ञानादित्रयरूपस्य मोक्षमार्गस्य तृतीयभागरूपं चारित्रं विराधयतीत्यर्थः, प्राप्तस्य तस्यापालनाद् अप्राप्तेर्वा । 'सव्वाराहए'त्ति सर्व त्रिप्रकारमपि मोक्षमार्गमागधयतीत्यर्थः, | श्रुतशब्देन ज्ञानदर्शनयोः संगृहीतत्वात् , न हि मिथ्यादृष्टिर्विज्ञातधर्मा तत्वतो भवति । एतेन समुदितयोः शीलश्रुतयोः श्रेयस्त्वमुक्त मिति " ॥ १८ ॥ अत्र प्रथमभङ्गस्वामिनं भगवतीवृत्त्यनुसारेणैव स्वयं विवृण्वन्नन्यमतं दृषयितुमुपन्यस्यतिहै| पढमो बालतवस्सी, गियत्थाणिस्सिओ व अग्गीओ।अण्णे भणंति लिंगी, सम्मग्गमुणिमग्गकिरियधरो॥१९॥ [ प्रथमो बालतपस्वीं गीतार्थानिश्रितो वाऽगीतः । अन्ये भणन्ति लिङ्गी समग्रमुनिमार्गक्रियाधरः ॥ १९ ॥] 455 Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्मपरीक्षा ॥४॥ ESHESHCHESEARCHERS पढमोत्ति । प्रथमः प्रथमभङ्गखामी ज्ञानदर्शनरहितः क्रियापरश्च देशागधकत्वेनाधिकृतो, बालतपस्वी परतन्त्रोक्तमुमुक्षुज- सिटिप्पणा नोचिताचास्वान् वृत्तिकृन्मते । गीतार्थानिश्रितोऽगीत:-पदैकदेशे पदसमुदायोपचारादगीतार्थी वाऽन्येषामाचार्याणां मते । ॥स्वोपड़ असिंश्च साम्प्रदायिकमतद्वये नातिभेद इत्यग्रे दर्शयिष्यते। अन्ये-संप्रदायबाह्याः, भणन्ति-लिङ्गी-केवललिङ्गभृत, ममग्रमुनिमा वृत्तिः ॥ गक्रियाधरो मिथ्यादृष्टिरेव सन् कुतश्चिनिमिचादगीकृतजिनोक्तसाधुसामाचारीपरिपालनपरायणो देशाराधकः प्रथमभङ्गस्वामीति । गाथा-१९ "अयमेतेषामाशयः-शाक्यादिमार्गस्थः शीलवानपिन देशाराधकः,प्रतिपन्नय(स)दनुष्ठानाकरणेन जिनाज्ञाया विराधकत्वम् ,न(स)दनुष्ठानकरणेनैव जिनाज्ञाया आराधकत्वमिति नियमात् , शाक्यादिमार्गानुष्ठानस्य चानीदृशत्वात् तदङ्गीकृत्यापि तत्करणाकरणाभ्यां जिनाज्ञा-11 राधनविराधनयोरभावाद्, अन्यथा तन्मार्गानुष्ठानत्याजनेन जैनमार्गानुष्ठानव्यवस्थापनाऽयुक्तत्वप्रसङ्गात् । किं च मिथ्यादृष्टीनां ज्ञानस्याप्यज्ञानत्वेनैव तन्मार्गपतितशीलस्याप्यशीलत्वेन प्रज्ञप्तत्वादन्यमार्गस्थानां शीलवत्वमेव नेति कुतस्तेषां देशाराधकत्वम् । अन्यभिक्षवो हि जीवाद्यास्तिक्यरहिताः सर्वथाऽचारित्रिण एवेति। "संति एगेहिं भिक्खूहि, गारत्था संजमुत्तरा।"(उत्त०५-२०) इत्यादि बहुग्रन्थप्रसिदम्, अन्यथाऽन्यतीथिकाभिमतदेवादयोऽपि देवत्वादिनाऽभ्युपगन्तव्याः प्रसज्येरन् , मोक्षमार्गभूतशीलस्योपदिष्टत्वात् । तस्माद् भव्या अभव्याश्च निखिलजैनसामाचार्यनुष्ठानयुक्ता मिथ्यादृष्टय एव देशाराधका ग्राह्याः, तेषां द्रव्यशीलस्यापि मागपतितत्वेन व्यवहारनया पेक्षया प्रशस्तत्वाद् । अत एवाराधकानां सतामेतेषां नवमवेयकं यावदुपपातो न विरुद्धः, अखण्डसामाचारीपरिपालनबलेन तत्रोत्पादात् । यदागमः "अह भंते असंजयभविअदवदेवाणं यावत्-जहण्णेणं भवणवासीसु उक्कोसेण उवरिमगेविजएमुं"त्ति (भ. श. १ उ०२)वृत्त्येकदेशो यथा"तस्मान्मिथ्यादृष्टय एवाभव्या भव्या वाऽसंयतभव्यद्रव्यदेवाः श्रमणगुणधारिणो निखिलसामाचार्यनुष्ठानयुक्ता Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥८५॥ द्रव्यलिङ्गधारिणो गृह्यन्ते । ते झखिलसामाचारी केवलक्रियाप्रभावत एवोपरितन (रिम) ग्रैवेय के पूत्पद्यन्त इति असंयताश्चते सत्यप्यनुष्ठाने चारित्रपरिणामशून्यत्वादिति ” । इत्थं चैतदङ्गीकर्तव्यम् - जिनोक्तमनुष्ठानमन्तरेणाराधकत्वाभावाद् मिथ्यादृष्टित्वमन्तरेण बालतपस्वित्वाभावाच्चेति ।। १९ ।। एतन्मतं दूषयति तं मिच्छा जं फलओ, मुक्खं आराहगत्तमिह पगयं ॥ तं च ण एगंतेणं, किरियाए भावसुन्ना ॥ २० ॥ [ तन्मिथ्या यत्फलतो मुख्यमाराधकत्वमिह प्रकृतम् । तच्च नैकान्तेन क्रियया भावशून्यया ॥ २० ॥ ] तं मिच्छति । तत्सम्प्रदाय बाह्योक्तं मतं, मिथ्या, यद् यस्मात् इह प्रकृतचतुर्भङ्गीप्रतिपादकभगवतीसूत्रे, मुख्यं मोक्षानुकूलम्, आराधकत्वं प्रकृतम्, ज्ञान - क्रियाऽन्यतरमोक्षकारणवादिनामन्य तीर्थिकानां मतनिरासार्थं तत्समुच्चयवाद विशदीकरणायै तत्सूत्रप्रवृत्तेः । प्रत्येकं ज्ञानक्रिययोः स्वल्पसामर्थ्यस्य समुदितयोश्च तयोः सम्पूर्ण सामर्थ्यस्य प्रदर्शनार्थ देशाराधकादिचतुर्भङ्गयुपन्यासस्य सार्थक्यात्, प्रत्येकं स्वल्पसामर्थ्यस्याभावे च सिकता समुदायात्तैलस्येव तत्समुदायादपि मोक्षस्यानुपपत्तेः ।। तदिदमाहाक्षेपसमाधानपूर्व भाष्यकारः“पत्तेयमभावाओ, णिवाणं समुदियासु ण जुत्तं ॥ नाणकिरियासु वोत्तु ं, सिकता समुदाये तेल्लं व ॥ १ ॥ वीसुंण सबह च्चिय, सिकता तेल्लं व साहणाभावो || देसोवगारिया जा, सा समवायमि संपुण्णा ||२||" [ प्रत्येकमभावाद् निर्वाणं समुदितयोर्न युक्तम् । ज्ञानक्रिययोर्वक्तुं ||सिकतीसमुदाये तैल इव ॥ विष्वग् न सर्वथैव सिकतातैल इव साधनाभावः । देशोपकारिता या सा समवाये संपूर्णा || ] अग्रिमगाथार्थो यथा न च विश्वक् पृथक्, सर्वथैव सिकताकणानां तैल इव साध्ये ज्ञानक्रिययोर्मोक्षिं प्रति साधनत्वाभावः, किन्तु या च यावती च तयोर्मोक्षं प्रति देशोपकारिता प्रत्येकावस्थायामप्यस्ति सा च समुदाये संपूर्णा भवत्येतावान् विशेषः, अतः सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा - २० ॥ ८५ ॥ Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा INSPEECHNICICIC संयोग एव ज्ञानक्रिययोः कार्यसिद्धिरिति ॥ तच्च मुख्यमाराधकत्वमसंयतभव्यद्रव्यदेवानामेकान्तेन भावशून्यया क्रियया न सम्भवतीति। यदि च देशाराधकत्वमभ्युदयापेक्षया व्याख्येयं तदा सर्वाराधकत्वमप्यभ्युदयापेक्षयैव पर्यवस्येदिति न काचित्प्रयोजन- सिटिप्पणा सिद्धिर, प्रत्युत प्रत्येकपक्षविशेषसङ्घटनानुएपत्तिः । किं च-'शीलवान् श्रुतवान् देशाराधकः' इत्यत्र योग्यताबलादपि मार्गानुसारी ॥ खोषज्ञ बालतपस्व्येव गृहीतुं युज्यते नान्यः, तद्गतभावशून्यक्रियायाः समुदायादेशत्वादपुनर्बन्धकादिक्रियायामेव मोक्षसमुचितशक्तिसमर्थ |वृतिः ॥ नाद् , अनुपचितशक्तिकोपादानकारणस्यैव देशत्वेन शास्त्रे व्यवहाराद्, अत एव मृद्रव्यमेव घटदेशो न तु तन्त्वादिर्दण्डादि । गाथा-२१ ॥८६॥ मोक्षोपादानत्वं च क्रियायां योगरूपायामुपयोगरूपायां वेत्यन्यदेतत् ॥ २० ।। अमुख्याराधकत्वाङ्गीकारेऽपि दोषान्तरमाह जइणीए किरियाए, दवेणाराहगत्तपक्खे य ॥ सव्वाराहगंभावो, होज अभव्वाइलिङ्गीणं ॥ २१॥ । . [जैन्या क्रियया द्रव्येणाराधकत्वपक्षे च । सर्वाधिकभावो भवेद् अभव्यादिलिङ्गिनाम् ॥ २१ ॥] जहणीएत्ति । जैन्या क्रियया निखिलसाधुसामाचार्यनुष्ठानरूपया, द्रव्येणाराधकत्वपक्षे च देशाराधकत्वाभ्युपगमे चाभव्यादिलिङ्गिनामभव्यादीनां द्रव्यलिङ्गधारिणां सर्वाराधकभावो भवेत्, कुतोऽपि प्रयोजनात्तेषां निखिलसाधुसामाचारीग्रहणे तस्याः पश्चाचाररूपत्वाद्, द्रव्यतश्चारित्रस्येव द्रव्यतो ज्ञानदर्शनयोरप्याराधकत्वस्य तेषां बलादुपनिपाताद् । न हि ते 'सम्यक्त्वांशेऽनाराधका एव चारित्रांशे त्वाराधका' इत्यर्धजरतीयन्यायाश्रयणं प्रेक्षावतां घटते । सम्यक्त्वांशे भावतः सम्यक्त्वाभावेनोत्सूत्रभाषण-व्रतभङ्गाद्यभावेन चाराधकविराधकस्वभावाभावादनाराधकत्वस्येव चारित्रांशेऽपि भावतश्चारित्राभावेन प्राणातिपातादिवतभङ्गाद्यभावेन चाराधकविराधकस्वभावाभावादनाराधकत्वस्याविशेषाद् द्रव्यतश्चोभयाराधकत्वाविशेषादिति । यत्तु तेषां द्रव्यतोऽपि स्वेच्छा CRECIPECASX Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ ८७ ॥ विशेषाद् व्रतांशस्यैव ग्रहणं न तुश्रद्धानांशस्य इति परस्य मतम्, तदुन्मत्तप्रलपितम् अखण्ड सामाचारीपालनबलेनैव तेषां ग्रैवेयकोत्पादाभिधानादिति ॥ २१ ॥ दोषान्तरमप्याह " तह णिवाण देखा-रागभावो अवट्टिओ हुज्जा | तो परिभासा जुत्ता, वित्तिं परिगिज्झ वुत्तुं जे ॥ २२ ॥ [ तथा निवानां देशाराधक भावोऽवस्थितो भवेत् । ततः परिभाषा युक्ता वृत्तिं परिगृह्य वक्तुं ॥ २२ ॥ ] तह ति । तथेति दोषान्तरसमुच्चये । एकान्तद्रव्य क्रिययैवाराधकत्वाभ्युपगमे, निहृवानामभिनिवेशादिना परित्यक्तरत्नत्रयाणां सर्वविराधकत्व कालेऽपि देशाराधकत्वभावो भवेद् । यथा प्रतिज्ञातद्रव्य क्रियया अपरित्यक्तत्वादिष्टापत्तौ को दोपः ? इति चेद्, व्यवहारविरोध एव, न हि सर्वविराधको देशाराधकश्च कोऽपि व्यवहिते || अथ द्रव्यक्रियामाश्रित्यैवाराधकत्व - विराधकत्वव्यवस्थाकरणात्सर्वविराधकत्वं निवानां नेष्यते एव, प्रतिपन्नचारित्र विषयकद्रव्याज्ञा भङ्गाभावाद्देशाराधकत्वम् उत्सूत्र भाषणेन सम्यक्त्वविषयकप्रतिपन्नजिनाज्ञापरित्यागाद्देश विराधकत्वं चाविरुद्धमेव, अंशभेदादेकत्रैव सप्रतिपक्षोभयधर्मसमावेशा विरोधादिति चेद् । न, एवं सत्यसंयतभव्यद्रव्यदेवानां निहवानामभव्यादीनां चोपपत्तिमधिकृत्य साम्याभावप्रसङ्गात् । अथ नास्त्येव तेषामुपपातसाम्यम्, ग्रैवेयकेष्वपि निह्नवस्य देवदुर्गततयोत्पादाद् । देवदुर्गतत्वं च न केवलं देव किल्बिपिकत्वादिनैत्र, तत्र तेषामभावाद्, किन्तु संमोहत्वेन । स च देवदुर्गतस्ततश्च्युतोऽनन्तकालं संसारे परिभ्रमति । यदागमः-- "कंदष्पदेव किब्बिस - अभिओगा आसुरी य संमोहा । ता देवदुग्गईओ, मरणमि विराहिआ हुंति ||१|| ति । [ कन्दर्पदेव - किल्विषाभियोगा आसुरी च संमोहाः । ता देवदुर्गतयो मरणे विराधिता भवन्ति ||] आतुरप्रत्यानप्रकीर्णके व्याख्यादेशो यथा - " संमोह 'ति संमोहयन्ति - उन्मार्गदेशनादिना मोक्षमार्गाद् भ्रंशयन्ति ये ते सटिप्पणा ||खोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा - २२ ॥८७॥ Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा Mel सटिप्पणा स्वोपत्र वृत्तिः ॥ गाथा-२२ ॥८८॥ МЕСЕЧЕ ЕXках संमोहाः, संयता अप्येवंविधा देवत्वेनोत्पन्ना संमोहा एवं रूपा दुर्गतिः, ता एव देवदुर्गतयो मरणेऽपध्यानादिना विराधिता भवन्ति, ततश्च्युता अनन्तसंसारं परिभ्रमन्तीति चेद् । न, अभव्यादीनामप्यकालवचनौषधप्रयोगात् प्राप्तग्रैवेयकोत्पादानां संमोहप्राबल्येन लुप्तमुखानां देवदुर्गतत्वाविशेषाद् । उक्तं चोपदेशपदे-"कह णु अकालपओगे, इत्तो गेविजगाइसुहसिद्धी ।। णणु साहिगओसहजोगसोक्खतुल्ला मुणेयव्वा ॥१॥४३८॥ कुणइ जह संणिवाए, सदोसहं जोगसोक्खमित्तं तु । तह एवं विण्णेयं, अणोरपारंमि संसारे ॥४३०॥1 | ण य तत्तओ तयंपि हु, सोक्खं मिच्छत्तमोहिअमइस्स ॥ जह रोद्दवाहिगहिअस्स, ओसहाओ वि तम्भावे ॥४४०॥ जह चेवोवहयन यणो, सम्मं रूवं ण पासई पुरिसो ॥ तह चेव मिच्छदिट्ठी, विउलं सोक्खं ण पावेइ ॥४४१।। असदभिणिवेसर्व सो, णिओगओ ताण | तत्तओ भोगो । सव्वत्थ तदुवघाया, विसघारियभोगतुल्लो त्ति ।।४४२॥ [कथं न्वकालप्रयोगे इतो अवेयकादिसुखसिद्धिः । ननु साऽधिकृतौषधयोगसौख्यतुल्या ज्ञातव्या१॥ करोति यथा सन्निपाते सदोषधं योगसौख्यमानं तु । तथैतद् विज्ञेयं अनर्वापारे संसारे ॥२॥ न च तत्वतस्तदपि खलु सौख्यं मिथ्यात्वमोहितमतेः॥ यथा रौद्रव्याधिगृहीत -स्यौपधादपि तद्भावे ॥ यथा चैवोपहतनयनः | सम्यग्रूपं न पश्यति पुरुषः । तथा चैव मिथ्यादृष्टिः विपुलं सौख्यं न प्रामोति ।। असदमिनिवेशवान्स नियोगतस्तन्न तत्वतो भोगः॥ सर्वत्र तदुपघाताद्विपघारितभोगतुल्य इति ॥ एतस्माद्धि वचनादभव्यादीनामेव निवाद्यपेक्षयाऽप्यकालवचनौषधप्रयोगेण मिथ्याभि| निवेशदादतिदुःखितत्वेन क्लिष्टतरदेवदुर्गतत्वं प्रतीयते,परेण त्वभव्यनिहवानामनाराधकत्वविराधकत्वाभ्यां वैपरीत्यमङ्गीकृतं, प्रसज्यते |च तत्प्रक्रियया द्रव्याज्ञापेक्षयाऽभव्यादीनामपि सर्वाराधकत्वात् तात्विकसुदेवत्वमेवेति यत्किचिदेतत् । अथ चारित्रापेक्षयाऽऽराधकत्वं द्रव्यप्रतिपस्यैव परिभाष्यते, ज्ञानदर्शनापेक्षया तु भावप्रतिपत्त्या ततोऽभव्यादीनो द्रव्यलिङ्गिनां देशाराधकत्वमेव । निहवानां च SAECIAS Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्ष ॥८९॥ ! | देशाराधकत्वं देश विराधकत्वं च ततो देशाराधकत्वापेक्षयो भयोपपातसाम्यं दुर्गतित्वनिबन्धनं चैकस्य साहजिकं मिध्यात्वं, अपरस्य च विराधनाजन्यमिति परिभाषायां को दोष इति चेत्, नन्वेवं परिभाषाऽऽश्रयणावश्यकत्वे वृत्तिकृत्स्वारस्येनैव साऽऽश्रयणीया इत्यभिप्रायवानाह - तत् तस्माद्, वृत्तिं परिगृह्य परिभाषा वक्तुं युक्ता । जे इति पादपूरणार्थे निपातः । वृत्तौ हि श्रुतशब्देन ज्ञानदर्शनयोः शीलशब्देन च प्राणातिपातादिक्रियाया एव परिभाषणाद् । अश्रुतवान् शीलवांच मार्गानुसार्येव बालतपस्वी पर्यवस्यतीति भावः । न हि द्रव्यलिङ्गधरोऽभव्यादिर्व्यवहारेण बालतपस्वी वक्तुं युज्यते । " ता एते बालतवस्सिणो दट्ठव्वेति " ( तत एमे बालतपखिनो द्रष्टव्या इति । ) महानिशीथे नागिलवचनं कुशीलेषु बालनिश्चयाभिप्रायकमेवेति । न चैकस्मिन्नेव वाक्ये देशाराधकत्वमशुद्धव्यवहारात्, तदुपपादकं बालतपस्वित्वं च निश्चयादिति वक्तुं युक्तम्, सन्दर्भविरोधात्, किन्तु निश्चयप्रापकाद्वयवहाराद्देशाराधकत्वं तदुपपादकं च मार्गानुसारियमनियमादिक्रियावत्त्वं बालतपस्वित्वमित्येवं सन्दर्भाविरोधः । न च व्यवहारे निश्चये प्रापकत्वाप्रापकत्वाभ्यां विशेषः शास्त्रासिद्ध इति व्यामूढधिया शङ्कनीयम्, योगबिन्दूपदेश पदादावे तद्विशेषप्रसिद्धेः । नन्वस्यामपि परिभाषायां कथं बालतपस्विनो देशाराधकत्वम्, तद्गतमार्गानुसारिक्रियाया अपि मोक्षमार्गत्वाभावात्, तदंशचारित्रक्रियाया एवांशत्वादिति चेद् । न, संग्रहनयादेशादनुयोग द्वारप्रसिद्ध प्रदेश दृष्टान्तेन स्वदेश देशस्यापि स्वदेशत्वाविरोधादिति सूक्ष्ममीक्षणीयम् ॥ २२ ॥ नन्वन्यमार्गस्थशीलादिक्रियाया अपि जैनमार्गानुष्ठानत्वाभावात्कथं तया देशाराधकत्वम् । इत्यत्राह - माणुसारिकिरिया, जइणिच्चिय भावओ उ सव्वत्थ ॥ जेणं जिणोवएसो, चित्तो अपमायसारोवि ॥२३॥ ( मार्गानुसारिक्रिया जैन्येव भावतस्तु सर्वत्र । येन जिनोपदेशचित्रोऽप्रमादसारोऽपि ॥ २३ ॥ ) 1 सटिप्पणा ॥ स्वोपच वृत्तिः ॥ गाथा- २३ ॥ ८९ ॥ Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ P धर्मपरीक्षा RAMMARSto 'मग्गाणुमारिकिरियत्ति'। मार्गानुमारिणी क्रिया शीलदयादानादिरूपा, सर्वत्र भावतस्तु जैन्येव, आदितो भगवत्प्र-13 सटिप्पणा णीताया एच.तस्याः सर्वत्रोपनिबन्धाद. मार्गानुसारिणां च तन्मात्र एव तात्पर्यात् । ते हि क्षीरनीरविवेककृतो हंसा इव निसर्गत एव ॥ खोपड शुद्धाशुद्धक्रियाविशेषग्राहिण इति कथमियं जैनी ? इत्यत्र हेतुमाह-यद यरमाद्, अप्रमादसारोऽपि परमोपेयाप्रमादमुख्योद्देशोऽपि, | वृत्तिः ॥ जिनोपदेशः चित्रः पुरुषविशेषापेक्षयोचितगुणाधायकतया नानाप्रकारो यो यत्प्रमाणोपदेशयोग्यस्तस्य तावत्प्रमाणगुणाधानपर्यव- | संन्न इति यावत् । तदुक्तमुपदेशपदे-"एवं जिणोवएसो, उचियाविक्खाइ चित्तरूवोत्ति ॥ अपमायसारयाए, वि तो सविसय मोटू ॥९ ॥ मुणेयचो ॥१॥ ति" ९३३ ( एवं जिनोपदेश उचितापेक्षया चित्ररूप इति । अप्रमादसारतायामपि ततः सविषयो ज्ञातव्यः ॥) एतदवृत्तियथा-"एवं गुरुकर्मणां प्रव्रज्याप्रतिपस्यसहिष्णुत्वे सति, जिनोपदेशः-सर्वज्ञप्रज्ञापनारूपः, उचितापेक्षया यो यत्प्रमाणस्योपदेशस्य योग्यस्तदपेक्षया, चित्ररूपो नानारूपतया, प्रवर्तते इति प्राग्वत् । अप्रमादसारतायामपि अप्रमादः सारः करणीयतया यत्र जिनोपदेशे स तथा तस्य भावस्तत्वा तस्यामपि, तत् तस्मात, मविषयः सगोचरः, मो इति पूर्ववत्, 'मुणेयव्वोति मुणितव्यः । यदा हि जिनोपदेशश्चित्ररूपतया व्यवस्थितोऽप्रमादसारोऽपि तदाऽपुनर्बन्धकादीन् निर्वाणमार्गप्रज्ञापनायोग्यानधिकृत्य केचित्सामान्यदेशनायाः, केचित्सम्यग्दृष्टिगुणयोग्यप्रज्ञापनायाः, केचिद्देशविरतिगुणस्थानकाईप्ररूपणायाः, केचिन्नि तचारित्रमोहमालिन्या अप्रमत्ततारूपप्रव्रज्यादेशनाया योग्या इति नाऽविषयाऽप्रमत्तताप्रज्ञापनेति ।" ततश्च मार्गानुसारिक्रियाऽपि भगवत्सामान्यदेशनार्थ इति भावतो जैन्येवेति प्रतिपत्तव्यम् ॥ २३ ॥ नन्वेवं भागवतीं सामान्यदेशनामनुसृत्य प्रवर्तमानानां मिथ्यादृशामपि सा मार्गानुसारिणी क्रिया सिद्धयनुदया दानादिका जैनी, पतञ्जल्यायुक्तमनुसृत्य प्रवर्तमानानां तु सा कथं जैनी! जिनदेशनानु. BARAOKAR Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥९ ॥ + ACCU सटिप्पणा ||खोपक्ष दृचिः ॥ गाथा-२४ + | सन्धानमूलप्रवृत्त्यनुपहितत्वादित्याशङ्कायामाह-- | अण्णथवि जमभिण्णं, अत्थपयं तं जिणिंदसुअमूलं ॥ अण्णोवि तयणुसारी, तो देसाराहगो जुत्तो॥२४॥ [अन्यत्रापि यदभिन्नमर्थपदं नजिनेन्द्र श्रुतमूलम् । अन्योऽपि तदनुसारी ततो देशाराधको युक्तः ॥२४॥] 'अण्णत्थवित्ति । अन्यत्रापि पातञ्जलादिशास्त्रेऽपि, यदर्थपदं पुरुषार्थोपयोगिवचनम्, अभिन्नं-भगवद्वचनैकाथै तजि. नेन्द्र श्रुतमूलम् , तदनुसारेणैव तत्र तदुपनिबन्धात् । तथा च ततोऽपि जायमाना मार्गानुसारिणी क्रिया वस्तुतो भगवद्देशनाविषयत्वेन भावतो जैन्येव । न हि मध्यस्थस्यान्योक्तत्वज्ञानं तत्फलप्रतिबन्धकम् , दृष्टिरागसहकृतस्यैव तस्य तथात्वात् । अत एव नामिन्नार्थेऽन्योक्तत्वमात्रेण सर्वनयवादसंग्रहहेतुचिन्ताज्ञानापादने(पादित) माध्यस्थ्यगुणानां साधुश्रावकाणां प्रद्वेषः, तत्प्रद्वेषस्य तन्मूलदृष्टिवादप्रद्वेषमूलत्वेन महापापत्वात् । तदुक्तमुपदेशपदसूत्रवृत्त्यो:-"नं अत्थओ अमिन्न, अण्णत्था सद्दओवि तह चेव ॥ तंमि पओसो मोहो, विसेसओ जिणमयठिआणं ॥१॥ ६९३ [यदर्थतोऽमिन्नमन्वर्थाच्छन्दतोऽपि तथा चैव । तस्मिन्प्रद्वेषो मोहाद् विशेषतो जिनमतस्थितानाम् ॥] यदाक्यमर्थतो वचनभेदेऽप्यर्थमपेक्ष्यापेक्षया), अभिन्नमेकामिप्रावम् , तथा अन्वर्थाद् अनुगतार्थात्, शन्दतोऽपि शब्दसन्दर्भमपेक्ष्य, तथैव-अमित्रमेव । इह परसमये द्विधा वाक्यान्युपलभ्यन्ते । कानिचिदर्थत | एवामिन्नानि-" अप्पा णई वेयरणी, अप्पा मे कूडसामली । अप्पा कामदुधा घेणू, अप्पा मे नंदणं वणं ॥१॥" उत्त० अ० २० गा० ३६ [ आत्मा नदी वैतरणी आत्मा मे कूटशाल्मली। आत्मा कामदुधा धेनुरात्मा मे नन्दनं वनम् ॥] इत्यादिभिर्वाक्यैर्यथा भारतोक्तानि " इन्द्रियाण्येव तत्सर्व, यत्खननरकावुभौ ॥ निगृहीतविशिष्टानि, स्वर्गाय नरकाय च ॥१॥ आपदा प्रथितः पन्था, + + + Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥९२॥ इन्द्रियाणामसंयमः । तज्जयः सम्पदामये, येनेष्टं तेन गम्यताम् ||२||" इत्यादीनीति । कानिचिच्छन्दतोऽर्थतश्च - "जीवदया सच्चवयणं" [ जीवदया सत्यवचनम् ] इत्यादिभिः प्रसिद्धैरेव वाक्यैः सह, यथा-" पञ्चैतानि पवित्राणि, सर्वेषां धर्मचारिणाम् || अहिंसा सत्यमस्तेयं, त्यागो मैथुनवर्जनम् || १ ||" इत्यादीनि । एवं स्थिते तस्मिन्नभिन्नार्थेऽकरण नियमादौ वाक्ये विशिष्टक्षयोपशमादिवाक्येन सह, प्रद्वेषः 'परसमयप्रज्ञापनेयम्' इतीर्ष्या, मोहो मूढभावलक्षणों वर्तते बौद्धादिसामान्यधार्मिकजनस्यापि, विशेषतो जिनमूतस्थितानां सर्वनयवादसङ्ग्रहान्मध्यस्यभावानीतहृदयाणां साधुश्रावकाणाम् " अत एवान्यत्राप्यनेनोक्तम् - षो०४-११ “गुणतस्तुल्ये तवे, संज्ञाभेदागमान्यथादृष्टिः । भवति यतोऽसावधमो, दोषः खलु दृष्टिसंमोहः ॥ १॥” इति एतत्सर्व समर्थयन्नाह - "सवप्पवाय मूलं, दुवाल संगं जओ समक्खायं ।। रयणागरतुल्लं खलु, तो सव्वं सुंदरं तंमि ॥ ९९४ ॥ २ ॥ ( सर्वप्रवादमूलं द्वादशाङ्गं यतः समाख्यातम् । रत्नाकरतुल्यं खलु ततः सर्व सुन्दरं तस्मिन् ।।) सर्वप्रवादमूलं - भिक्षुकणभक्षाऽक्षपादादितीर्थान्तरीयदर्शनप्रज्ञापनानामादिकारणम् । किं तद् ? इत्याह- द्वादशाङ्गं द्वादशानामाचारादीनामङ्गानां प्रवचन पुरुषावयत्र भूतानां समाहारो, यतः कारणात् समाख्यातं सम्यक् प्रज्ञप्तम् सिद्धसेनदिवाकरादिभिः, यतः पठ्यते - "उदधाविव सर्वसिन्धवः, समुदीर्णास्त्वयि नाथ ! दृष्टयः । न च तासु भवान् प्रदृश्यते, प्रविभक्तासु सरित्स्विवोदधिः || १ ||" अत एव रत्नाकरतुल्यं - क्षीरोदधिप्रभृतिजलनिधिनिभम् खलु निश्वये, तत्तस्मात् सर्वमपरिशेषं सुन्दरं यत्किचित्प्रवादान्तरेषु समुपलभ्यते, तत्तत्र समवतारणीयम् । इत्यकरण नियमादीन्यपि वाक्यानि तेषु तेषु योगशास्त्रेषु व्यासकपिलातीतपतञ्जल्यादिप्रणीतानि जिनवचनमहोदधिमध्यलब्धोदयान्येव दृश्यानीति । तेषामवज्ञाकरणे सकलदुःखमूलभूताया भगवदवज्ञायाः प्रसङ्गात् न काचित्कल्याण सिद्धिरिति ।" यत्तु कश्चिदाह - "जैनानामकरण नियमपरिहारशङ्कानिरासार्थमेव तीर्था सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा - २४ ॥ ९२ ॥ Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ + + धर्मपरीक्षा + ॥९॥ सटिप्पणा स्वोपड़ वृत्तिः ॥ | गाथा-२४ ॥१३॥ + न्तरीयवर्णितत्वमुपवर्णितं न त्वन्यतीर्थिकेष्वकरणनियमोऽस्तीति भणितम् । वर्णनं च वर्णनीयवस्तुविषयकयथार्थज्ञानसापेक्षमेव, अन्यथा च तथाभूतवर्णनं सम्यगेव न स्यात् , तथा च तद्दर्शनेऽपि धर्मसद्भावप्रसङ्गः। इत्थं च कपिलस्य पुरस्तात् “मनागिहापि धर्मोऽस्तीति" परिव्राजकदर्शनमधिकृत्य मरीचिवचनमुत्सूत्रं न स्यादिति। तदसत , तीर्थान्तरीयाणामपि सद्भुताकरणनियमवर्णनस्य शुभभावविशे. षसापेक्षत्वेन मार्गानुसारितया तेषु सामान्यधर्मसिद्धेः।। शुभभावविशेषसापेक्षत्वं च तस्य "इचो अकरणनियमो, अण्णेहि वि वण्णिओ ससत्थंमि । सुहभावविसेसाओ, ण चेवमेसो ण जुत्तोत्ति ॥" ६९२ (इतोऽकरणनियमोऽन्यैरपि वर्णितः स्वशाखे । शुभभावविशेषाद् न चैवमेव न युक्त इति ॥ ) इति उपदेशपदवचनेनैव प्रसिद्धम् । न चैवंविधस्तेषां शुभाध्ययसायस्तथाभूतज्ञानावरणीयमोहनीयक्षयोपशमजनितत्वेन स्वयमेवोक्तो निरनुबन्धशुभप्रकृतिहेतुत्वादन!हेतुरेवेति परेण वक्तुं युक्तम् । निरुपधिभवबीजप्रहाणेच्छागोचरमार्गानुसा. रिशुभाध्यवसायस्य शुभानुबन्धिपुण्यनिमित्तत्वेनोक्तत्वात् । तदुक्तमपुनर्बन्धकाधिकारे योगबिन्दौ-"क्रोधायबाधितः शान्त, उदा. तस्तु महाशयः ।। शुभानुबन्धिपुण्याच्च, विशिष्टमति(गुण)सङ्गतः ॥१९३॥ ऊहतेऽयमतः प्रायो, भवबीजादिगोचरम् ॥ कान्तादिगतगेयादि, तथा भोगीव सुन्दरम् ।।१९४॥" इति । अत एव परेषामकरणनियमवर्णनं हेतुः शुभभावविशेषो वज्रवदभेद्यः प्रशस्तपरिणामभेद उपदेशपदवृत्तौ विवृतः । अयमेव ह्यस्य विशेषो यद्विशेषशदेनाप्रतिसन्धान विनाऽपि तद्विशेषपर्यवसायित्वमिति । अत एव मार्गा नुसारिणां. परेषां जनामिमतप्रकारेण जीवाद्यनभ्युपगमान्न नास्तिकत्वम् , विप्रतिपन्नांशे पक्षपातपरित्यागे सति वस्तुतस्तदभ्युपगमपर्यवसानाद् । अत एव शुभभावविशेषादकरणनियमवर्णनं मार्गानुसारिणामेव यदृच्छाप्रणयनप्रवृत्तानामर्वाचीनानां च प्रवाहपतितत्वेन घुणाक्षरन्यायेनैवेति जिनवचन विषयकपरोपनिवन्धेऽप्यस्ति विशेषः । तदिदमुक्तं धर्मबिन्दुवृत्तौ अ०१ श्लो०३ “यच्च यदृच्छाप्र | Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4% धर्मपरीक्षा ॥९४॥ 8CALCIECCAREER णयनप्रवृत्तेषु तीर्थान्तरीयेषु रागादिमत्स्वपि घुणाक्षरोकिरणव्यवहारेण क्वचित्किचिदविरुद्धमपि वचनमुपलभ्यते मार्गानुसारिबुद्धौ वा सटिप्पणा प्राणिनि कचित् तदपि जिनप्रणीतमेव, तन्मूलत्वात्तस्येति" । एतेन घुणाक्षरन्यायेन जैनाभिमतवस्तुवर्णनानुकारि वर्णनमन्यतीथिकेषु ॥ खोपक्ष भवत्यपीति प्रवचने प्रतीतमेवेति तेषामकरणनियमवचनमाकृतिमात्रमेवेत्यपास्तम् । मार्गानुसारिदृष्टया तद्वर्णनस्य घुणाक्षरविलक्षण है वृतिः ॥ त्वात् , औदथिकयोगदृष्टया सर्व विशेषावगाहिसम्यक्त्वाभावेऽपि सामान्यधर्मप्रदर्शनाविरोधात , सामान्यधर्मसत्ता च तेषु बौद्धादिसा गाथा-२४ ॥१४॥ मान्यधार्मिकजनस्थापीतिवदत उपदेशपदवृत्तिकर्तुरेव वचनाद् व्यक्तं प्रतीयते । एवं सति "मनागिहापि धर्मोऽस्तीति" मरीचिवचनस्योत्सूत्रत्वं न स्वादिति त्वसमीक्षिताभिधानम् .खतन्त्रप्रमाणप्रतिपत्त्यनुबन्धिविषयतयाऽन्यदर्शने मनाग् धर्मस्याप्यभावेन तद्वच नस्योत्सूत्रत्वात् , तद्वृत्तिसामान्यधर्मेऽपि भगवद्वचनस्यैव खतन्त्रप्रमाणत्वात् अथवा कपिलस्य बालत्वादन्यलिङ्गमेवान्यदर्शनत्वेन तेन प्रतीतम् , तत्र च स्वनिरूपितकारणताविशेषेण न कोऽपि धर्मोऽस्तीति भावासत्यत्वात् तद्वचनस्योत्सूत्रत्वाव्याघात इति यथातन्त्रं विभावत्रीयम् । अथैवमन्यदर्शने क्वचित्सत्यत्वम् , क्वचिच्चासत्यत्वमिति मिश्रत्वं स्याद् नत्वेकान्तमिथ्यात्वम् , न चैवमिष्यते, तस्यै| कान्तमिथ्यारूपस्यैवाभ्युपगमात् । तदुक्तं दशवकालिकनियुक्ती (अ०८) "सम्मदिट्ठी उ सुअंमि, अणुवउत्तो अहेउअं चेत्र ॥ जं भासइ सा मोसा, मिच्छदिट्ठी पि य ल देवत्ति ॥१॥" (सम्यग्दृष्टिः श्रुतेऽनुपयुक्तोऽहेतुकं चैव । यद् भाषते सा मृषा मिथ्यादृष्टिरपीति च तथैवेति ।)।। एतवृत्तिर्यथा-सम्यग्दृष्टिरेव, श्रुते आगमे, अनुपयुक्तः प्रमादाद् यत्किचित्, अहेतुकं चैव युक्तिविकलं चैव यद्, भाषते 'तन्तुभ्यः पट एव भवतीत्येवमादि, सा मृषा, विज्ञानादेरपि तत एव भावादिति । मिथ्याष्टिरपि तथै| वेत्युपयुक्तोऽनुपयुक्तो वा, यद् भाषते सा मृषैव घुणाक्षरन्यायेन संवादेऽपि " सदसतोरविशेषाद यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत्" इति वेत्युपयुक्तोऽनय तन्तुभ्यः पट एवष्टिरेव, श्रुते आगलऽनुपयुक्तोऽहेतुकं चैव Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ % धर्मपरीक्षा ॥९५॥ 4SXE सटिप्पणा ॥खोपच वृत्तिः ॥ गाथा-२४ ॥९५॥ + गाथाथः, इति चेद् । न, अनमिनिविष्टं प्रत्यन्यदर्शनस्य सर्वस्यैव फलतोऽप्रामाण्यात् , मार्गानुसारिणं प्रति च सुन्दरवचनस्य जैनवचनपर्यवसिततयाऽवशिष्टस्यान्यदर्शनस्यैकान्तमिथ्यात्वतादवस्थ्यात् । कश्चित्तु दृढदृष्टिरागविलुप्तबुद्धिः पातञ्जलादिगताकरणनियमा. दिवाक्यानां जिनवचनमूलत्वमनमिमन्यमानः"सव्वप्पवायमूल" इत्याधुपदेशपद(६९४)गाथायामिमामनुपपात्तमुद्भावयति-'सर्वप्रवादानां मूलं द्वादशाङ्गम्' इत्यत्र प्रवादा नयवादविशेषास्ते च सर्वग्रहणेन शुभा अशुभाश्च ग्राह्याः । तत्र शुभा जीवरक्षाद्यभिप्रायघटिताः, अशुभाश्च ततो विलक्षणाः तेषां च मूलं द्वादशाङ्गं श्रीवीरवचनोबोधितश्रीसुधर्मस्वामिसम्बन्धि न भवति, अशुभानामपि प्रवादानां प्रवृत्तेनिनवचनमूलकत्वप्रसक्त्या शुभानामिवोपादेयता स्यादिति । ते च प्रवादाः शुभाशुभरूपा अपि संख्यया वचनसंख्याकाः। तदुक्तम्-" जावइआ वयणपहा० (तावइया चेव हुति नयवादा)" इत्यादि, तेषां प्रवृत्तिरनादिप्रवाहपतिता कथं जिनवचनमूलिका सम्भवति ?, प्रत्यक्षबाधात् । किं च-तेषां सर्वेषामप्यवज्ञाकरणेन जिनावज्ञाऽभ्युपगमे "जीवो हन्तव्यः" इत्यादिनयप्रवादानामप्यवज्ञाकरणे तथात्वापत्तिरिति ॥ एतद(म)यमन्यभावं कल्पयति-द्वादशाङ्गं हि सर्वोत्कृष्टं श्रुतज्ञानं केवलज्ञानदिवाकरस्य प्रकाशभूतं केवलज्ञानमिव प्रत्यात्मवर्तित्वादधिकरणभेदेन भिन्नमपि स्वरूपतो न भिन्नम् , किन्तु केवलज्ञानमिवैकमेव, तुल्यविषयकत्वात् तुल्य सम्बन्धित्वाच्च । उदयमधिकृत्य तु स्वरूपतोऽपि भिन्नमेव, तत्कारणस्य क्षयोपशमस्य प्रत्यात्मभिन्नत्वात् , श्रुतज्ञानोदयस्य च क्षायोपशर्मिकत्वात् । ते च प्रवादा निजनिजद्वादशाङ्गमूलका अपि सामान्यतो द्वादशाङ्गमूलका एवोच्यन्ते । यथा नानाजलसम्भूतान्यपि कमलानि सामान्यतों जलजान्येव, अत एव सर्वप्रवादानां मूलं द्वादशाङ्गमेवेति सामान्यतोऽभिहितम् , सर्वस्यापि द्वादशाङ्गस्य सर्वोत्कृष्टश्रुतत्वेन सर्वाक्षरसंनिपातात्मकत्वात्, प्रवादा अप्यक्षरात्मका एव । अत एव द्वादशाङ्गं रत्नाकरतुल्यम् , रत्नाकरस्येव तस्याप्यनेकजातीय + 4 - 3 Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१६॥ ན་ཏཱ་ཏོ་ सटिप्पणा स्वोपड़ वृत्तिः ॥ गाथा-२४ का शुभाशुभनयलक्षणवस्तूनामाश्रयत्वात् । परं मिथ्यादृशां यद् द्वादशाङ्गं तत्स्वरूपत एव सर्वनयात्मकं सत्तामात्रवर्तित्वात् , न पुनः | फलतोऽपि कस्यापि मिथ्यादृशः कदाचिदपि सर्वांशक्षयोपशमाभावात , मिथ्याइष्टिमात्रस्योत्कृष्टतोऽपि क्षयोपशमः सर्वांशक्षयोपशमलक्षणसमुद्रापेक्षया बिन्दुकल्पो भवति । यदुक्तं-"जयति विजितरागः (केवलालोकशाली, सुरपतिकृतसेवः श्रीमहाबीरदेवः॥ यदसमसमयाब्धेश्चारुगाम्भीर्यभाजः, सकलनयसमूहा बिन्दुभावं भजन्ते ॥१॥) इत्यादि । सम्यग्दृशां तु केषाश्चित्संयतानां फलतोऽपि 'द्वादशाङ्गस्य सर्वनयात्मकत्वम् , सर्वांशक्षयोपशमस्य सम्भवाद् । अत एव गौतमादयः सर्वाक्षरसंनिपातिनः प्रवचने भणिताः, परं तेषां संयतानां सकलमपि द्वादशाङ्गं शुभनयात्मकत्वेनैव परिणमति सावद्यनयविषयकानुज्ञादिवचनप्रवृत्तेरप्यभावाद् । एतेन सर्वेऽपि शाक्यादिप्रवादा जैनागमसमुद्रसम्बन्धिनो विन्दवइति भ्रान्तिरपि निरस्ता, "पद्शतानि नियुज्यन्ते, पशूनां मध्यमेऽहनि" इत्यादि| प्रवादानामपि जैनागममूलकत्वापच्या संयतानां सावद्यभाषाप्रवृत्तिप्रसक्तेः । तस्मात्सर्वांशक्षयोपशमसमुत्थद्वादशाङ्गलक्षणसमुद्रस्य पुरस्तादन्यतीथिकाभिमतप्रवादाः समुदिता अपि विन्दूपमा इत्यर्थो युक्तः, अन्यथा 'बिन्दुभावं भजन्ते' इति प्रयोगानुपपत्तिः म्गत् ॥ अवयवाऽवयविनोरुपमानोपमेयभावेन वर्णने निजावयवापेक्षया महत्त्वेऽप्यवयविनो गौरवाभावाद् ,न ह्यङ्गुष्ठो हस्तावयवभावं भजते इति हस्तस्य स्तुतिः सम्भवति । किं च-समुद्रस्य बिन्दव इति भणनमप्यसङ्गतम् , समुद्रप्रभवा हि वेलाकल्लोलोादयो भवन्ति, न पुनर्बिन्दवः, हैं| तेषां चोत्पचिौघाद् हस्तवस्त्रादिव्यापाराद्वा स्यादिति सर्वानुभवसिद्धम् । अन्यथा समुद्रान्निर्गतबिन्दुभिः समुद्रस्य न्यूनत्वापत्या तस्य गाम्भीर्य हानिः स्याद् इत्येवंस्थिते वृत्तिव्याख्यानसङ्गतिरियम्-यद् यस्मात्कारणाद् द्वादशाङ्ग रत्नाकरोपमया शुभाशुभसर्वप्रवादमूलम् , तस्मात्कारणात्स्वरूपतः फलतश्च यावत्सुन्दरमात्मनिष्ठाकरणनियमादिवाच्यवाचकं वाक्यादिकं तत्तसिन् द्वादशाङ्गे, एवकारो RKERALACE Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षां ॥९७॥ गम्यः, द्वादशाङ्ग एव समवतारणीयं, तत्र वर्तते एवेत्यर्थः, द्वादशाङ्गस्य सर्वोत्कृष्टश्रुतत्वेन तद्वयापक (की) भूतस्य सर्व सुन्दरात्मकत्वस्या वश्यंभावात् परं सम्यग्दृशां यावत्सुन्दरं तावत्सर्वमपि द्वादशाङ्गमूलकमुदितं भवति, फलतोऽपि शुभत्वात् तदागमन विधिपरिज्ञानाच्च । तच्च सानुबन्धपुण्यप्रकृतिहेतुः । मिथ्यादृशां तु स्वरूपतः क्वचिदंशे शुभत्वेऽपि फलतोऽशुभत्वमेवेति । विरुद्धखरूपपरिणतयो रुभयोः सम्यग्मिथ्यादृशोरकरण नियमयोरभेदेन भणनमुदितस्याकरण नियमस्यावज्ञया जिनावज्ञा स्यात्, सा चानन्तसंसारहेतुरिति भणितम् । यथा मोक्षाङ्गं स्वरूपतः शुभमपि मनुष्यत्वं संयतजनस्य फलतोऽपि शुभमेव मोक्षप्राप्तिपर्यन्तं सुगतिहेतुत्वात् । तदेव मनुष्यत्वं व्याधादेव फलतोऽशुभमेव, जीवघाताद्यसंयमहेतुत्वेन दुर्गतिहेतुत्वात् । एवं सत्यपि भेदे द्वयोरपि मनुष्यत्वयोस्तुल्यतया भणनं संयतजन मनुष्यत्वस्यावज्ञया जिनावज्ञैव, जिनेनैव भेदेनाभिधानात् दृश्यते च लोकेऽपि लक्षणोपेत- तदनुपेतयोर्मण्योस्तुल्यतया भण लक्षणोपेतमणेरवज्ञया तत्परीक्षकस्यावज्ञैवेति । तदिदमखिलमकाण्डतुण्डताण्डवाडम्बरमात्रम्, अनुपपत्तेरेवाभावात् । द्वादशाङ्गस्य विधिनिषेधविधया स्वसमयपरसमय प्रज्ञापनाविधया वा शुभाशुभसर्वप्रवादमूलत्वे दोषाभावात् । न चाशुभानामपि प्रवादानां ततः प्रवृस्तन्मूलकतयोपादेयताप्रसङ्गः, तज्जन्यप्रतिपत्तिविषयत्वरूपस्य तन्मूलकत्वस्योपादेयत्वाप्रयोजकत्वात्, जिनवचन विहितत्वस्यैवो पादेयतायां तत्रत्वात् । सर्वेषामपि परवादानामवज्ञाकरणे च न जिनावज्ञाऽभ्युपगम्यते, किन्तु तद्गतसुन्दरप्रवादानामेवेति । 'जीवो इन्तव्यः' इत्यादिनयप्रवादानामवज्ञायां जिनावज्ञाऽऽपादनमसङ्गतमेवेति, ततो भावान्तरकल्पनं निर्मूलकमेवासङ्गततरं च । अन्योक्ताकरणनियमावज्ञापरिहारार्थ प्रकृतगाथोपन्यासात्परकल्पितभावस्य च तद्विपरीतत्वात् तदनुसारेणोभयाकरणनियमवर्णनाभेदे भग वदवज्ञाप्रसङ्गात् तद्भेदव्यक्तये अन्याकरणनियमवर्णनावज्ञाया एव न्याय्यत्वप्रसङ्गादिति । तथाऽपि तत्र किञ्चिदुच्यते - द्वादशाङ्गं हि , सटिप्पणा || स्वोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा - २४ ॥ ९७ ॥ Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा SPECIALA सर्वोत्कृष्टश्रुतज्ञानं सन्तानभेदाविवक्षया गृह्यते, तच्छुद्धज्ञानमेव ज्ञानाज्ञानसाधारणं वा, आये तस्य सर्वप्रवादमूलत्वानुपपत्तिः, शुद्धाशुद्ध सटिप्पणा | योरेक्यायोगाद् । अन्त्ये च सङ्ग्रहनयाश्रयणेन द्वादशाङ्गसामान्यस्य वस्तुतः सर्वनयप्रवादात्मकत्वसिद्धावपि व्यक्त्यनुपसङ्ग्रहापत्तिः।। |॥ खोक्न न हि.यथा नानाजलोत्पन्नानि जलजानि जलजत्वेनोच्यन्ते तथा 'जलं सर्वजलजोत्पादकम्' इत्यपि व्यवहारः क्रियते, एवमेव हि वृतिः । 'सर्वप्रवादमूलं द्वादशाङ्गम्' इत्यपि न स्यात् । यदि चैकवचनेनापि व्यक्त्युपसङ्ग्रहः क्रियते, भेदविवक्षयैव च मिथ्यादृशां द्वादशाङ्ग- गाथा-२४ मत्यल्पक्षयोपशमात्मकं सर्वांशक्षयोपशमशुद्धसम्यग्दृष्टिद्वादशाङ्गरत्नाकरापेक्षया विन्दुतुल्यं व्यवस्थाप्यते, तदा केयं वाचोयुक्तिः १, स- ॥९८॥ र्वेऽपि शाक्यादिप्रवादा जैनागमसमुद्रसम्बन्धिनो बिन्दव इति भ्रान्तिः' इति ज्ञानवाक्ययोमिथ्यारूपयोरविशिष्टयोरेकत्र जैनागमसम्बन्धित्वमपरत्र नेत्यत्र प्रमाणाभावात् , प्रत्युत वाक्यमुत्सर्गतो न प्रमाणं नवाऽप्रमाणम्, अर्थापेक्षया तु तत्र प्रामाण्यमप्रामाण्यं वा व्यवतिष्ठते इति कल्पभाष्यप्रसिद्धार्थानुसारेणोदासीनेषु बाक्यरूपपरप्रवादेषु तत्सम्बन्धित्वमत्यन्तासुन्दरम्, साक्षात्प्रतिपक्षभूतेषु मिथ्याज्ञानरूपेषु प्रवादेषु तदत्यन्तासुन्दरमिति भावभेदे च सति वाक्यरचनायां न विशेषः । 'सम्यग्दृष्टिपरिगृहीतं मिथ्याश्रुतमपि सम्यक्श्रुतम् , मिथ्यादृष्टिपरिगृहीतं च सम्यक्श्रुतमपि मिथ्याश्रुतम्' इति सिद्धान्तव्यवस्थितत्वाच्छाक्यादिप्रवादेषु जैनागमोद्गतत्वरूपतत्सम्बन्धित्वाभ्युपगमस्य तदेकानुपूर्वीकरचनारूपसम्बन्धाभावेन खण्डनं त्वपाण्डित्यविजृम्भितमेव । न ह्येवंभृतसम्बन्धेन साधूनां तद्वचनादसंयतत्वापत्तिः, शुद्धाशुद्धविवेकेनैव साधुभिस्तत्परिग्रहात् । न च 'शाक्यादिप्रवादा जैनागमसमुद्रसम्बन्धिनो बिन्दवः' इति प्रवाहपतितमेव वचनम्, "पावंति जसं असमंजसावि, वयणेहि जेहिं परसमया । तुह समयमहोअहिणो, ते मंदा बिंदुणिस्संदा ॥ १॥” (धनपालपंचाशिका गाथा ॥४१॥) (प्राप्नुवन्ति यशः असमञ्जसा अपि यैर्वचनैः परसमयाः। तव समयमहोदधेः Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा + तानि मन्दा बिन्दुनिःस्यन्दाः ।।) इति परमश्रावकेण धनपालपण्डितेनापीत्थमभिधानात् । किश्च-"ज काविलं दरिसणं, एG! सटिप्पणा दबढिअस्स बत्तवं । सुद्धोअणतणयस्स उ, परिसुद्धो पज्जवविअप्पो ॥१॥ दोहि विणएहिं णीअं, मत्थमुलूएण तहवि मिच्छत्तं । जं खोपज्ञ सविसयपहाणतणेण अणुण्णणिरवेक्खं ।।२॥"(यत्कापिलं दर्शनमेतद् द्रव्यार्थिकस्य वक्तव्यम् । शुद्धोदनतनयस्य तु परिशुद्धः पर्यववि दृत्तिः ॥ कल्पः ॥ द्वाभ्यां नयाभ्यां नीतं शास्त्रमुलूकेन तथाऽपि मिथ्यात्वम् । यत्स्वविषयप्रधानत्वेन अन्योन्यनिरपेक्षम् ।।) इत्यादि सम्मतिग्र गाथा-२४ ॥१९॥ न्थेऽपि (तृतीयकांड गाथा ४८-४९) शाक्यादिप्रवादानां जैनागममूलत्वं सुप्रसिद्धम्, तस्य द्रव्यार्थिक-पर्यायार्थिकोभयनयरूपत्वात् । यच्च सिद्धसेनः- "तित्थयरवयणसंगह-विसेसपत्थारमूलवागरणी ॥ दवढिओ अपज्जव-णओ अ सेसा विअप्पा सिं ॥१॥" इति । (तीर्थकरवचनसङ्ग्रहविशेषप्रस्तारमूलव्याकरणी। द्रव्यार्थिकश्च पर्यवनयश्च शेषा विकल्पा अनयोः।।) (संमतिप्रथमनयकाण्ड. गाथा ३) यच्चोक्तम् 'बिन्दुभावं भजन्ते' इति प्रयोगानुपपत्तिः, अवयवावयविनोरुपमानोपमेयभावे गौरवाभावादिति । तदसत , न पत्र हस्ताद्य| वयवसाधारणमवयवत्वम् , किन्तु समुदितेषु परप्रवादेषु तदेकदेशार्थत्वमिति गौरवाप्रतिघातात् । यच्चोक्तम्–समुद्रस्य बिन्दव इति |P लाभणनमप्यसङ्गतम्' इत्यादि, तदपि असत् , समुद्रस्थानीयजैनमहाशास्त्रप्रभवकल्लोलस्थानीयावान्तरशास्त्रेभ्यः सामान्यदृष्टिपवनप्रेरितप-18 रसमध्यबिन्दुद्गमस्याविरोधात्, 'समुद्रान्निर्गतबिन्दुभिः समुद्रस्य गाम्भीर्यहानिः' इति तु न पामरस्यापि सम्मतमिति यत्किचिदेतत् । | एवकाराद्यध्याहारेण वृत्तिसङ्घटना तु वृत्तिकृदभिप्रायेणैव विरुद्धा, 'अन्यत्र न सुन्दरम्' इत्यस्यार्थस्य वृत्तिकृदनभिप्रेतत्वात् , उदितानुदितयोः करणनियमयोरमेदेन भणनं च यद्युदितस्याकरणनियमस्यावज्ञा तन्दवादिभगवदवज्ञापर्यवसायिनी स्थात, तदा तद्भदवर्णनमपि सामान्याकरणनियमावज्ञा तदमेदवादिभगवदवज्ञापर्यवसायिनी स्वात् , न हि तद्भेदमेव भगवान् वदति नत्वभेदमित्येकान्तोऽ. + SH A Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ICICICICE स्ति, भेदाभेदवादित्वात्तस्येति वक्रतां परित्यज्य विचारणीयम्; परगुणद्वेष एव भगवतामवज्ञेति । एतदर्थसमर्थनायैव हि 'सर्वप्रवा ★ सटिप्पणा दमूलं द्वादशाङ्ग रत्नाकरतुल्यम्' इत्यत्र "उदधाविव०" इत्यादिसम्मतितयोद्भावित वृत्तिकृता । अत्र परः प्राह-यत्तु 'सर्वप्रवादानां स्वोपड़ द्वादशाङ्गं रत्नाकरतुल्यम्' इति समर्थनाय टीकाकारेण "उदधाविव सर्वसिन्धवः” इत्यादिरूपं श्रीसिद्धसेनदिवाकरवचनं | वृत्तिः ॥ | सम्मतितयोद्भावितं तच्च विचार्यमाणमसङ्गतमिवाभाति । तथाहि-यदि द्वादशाङ्गं रत्नाकरतुल्यम्, तर्हि नदीतुल्याः प्रवादा न भवेयुः, | गाथा-२४ समुद्रानदीनामुत्पत्तेरभावात्, समुद्रस्य च नदीपितृत्वापत्त्या "नदीपतिः समुद्रः" इति कविसमयव्याहतिप्रसक्तः, समुद्रस्य गाम्भीर्यहा ॥१०॥ निप्रसक्तेश्च । तस्मात्स्तुतिकर्तुरभिप्रायोऽयम्-हे नाथ! 'त्वयि सर्वज्ञे, दृष्टयोऽन्यतीर्थिकानां निजनिजमार्गश्रद्धानलक्षणाः, 'समु. दीर्णाः' सम्यगुदयं प्राप्ताः, तद्विपयो भगवान जात इत्यर्थः । अयं भावः-यत्किचिदकरणनियमादिकं जिनेन सुन्दरतया भणितम् , सदन्यतीथिकैरपि तथैव प्रतिपन्नम् । एतच्च साम्प्रतं नालिकेरादिफलाहारेणैकादशीपर्वोपवासं कुर्वाणा जनाभिमतोपवासं सम्यक्तया मन्यन्ते, जैनाश्च तदुपवास लेशतोऽपि न मन्यन्ते । अत एव च 'न च तासु भवान् प्रदृश्यते' इति । तासु-अन्यतीर्थिकदृष्टिषु | 'भवान् न प्रदृश्यते' अन्यतीर्थिकश्रद्धानविषयीभूतं धार्मिकानुष्ठानं गङ्गास्नानादिकं भवान् लेशतोऽपि न मन्यते इत्यर्थः । अन्य-IKI तीथिकानां दृष्टयो भगवति वर्तन्ते । तत्र दृष्टान्तमाह-यथोदधौ सर्वाः सिन्धवः समुदीर्णा भवन्ति-सम्यगुदयं प्राप्ताः स्युः, लोकेऽपि | भर्तृसम्बन्धेन स्त्रिय उदिता भवन्तीति प्रसिद्धेः । तासु च भवान्नास्ति' इत्यत्र दृष्टान्तमाह-यथा प्रविभक्तासु सरित्सु नदीषु समुद्रो | नास्ति । तासु च समुद्रो नावतरतीत्यर्थः । अनेनाभिप्रायेण स्तुतिः, न पुनरहेदुपदिष्टप्रवचनद्वाराऽर्हत्सकाशादन्यतीर्थिकदृष्टयः समुत्पन्ना इत्यभिप्रायेणेति ॥ तदसत, प्राचीनाचार्यव्याख्यामुल्लङ्घ्य विपरीतव्याख्यानस्यापसिद्धान्तत्वात् । तदाहुः श्रीहेमचन्द्रसूरयः IAS Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ F धर्मपरीक्षा ॥१०॥ CHAUHHOREA ता"यदार्जवादुक्तमयुक्तमन्यै-स्तदन्यथाकारमकारि शिष्यैः।। न विप्लवोऽयं तव शासनेऽभू-दहो अधृष्या तव शासनश्रीः॥"(अयोग द्वा. सटिप्पणा श्लोक१६) इति । न चेदमुपदेशपदवृत्तिकृत एव दूषणदानम् , किन्तु “एक एव हि मार्गोऽपि, तेषां शमपरायणः ॥” इत्यादिव-17 ॥खोषज्ञ | दतां श्रीहरिभद्रसूरीणां 'समाख्यातम्' इति पदसूचितग्रन्थकृदेकवाक्यताशालिश्रीसिद्धसेनदिवाकराणां तदनुसारिणामन्येषां वृचिः ॥ चेत्यतिदरन्तोऽयं कोऽपि मोहमहिमा। या चानुपपत्तिरुद्भाविता 'यदि द्वादशाङ्गं रत्नाकरतुल्यम्' इत्यादिना साऽनुपपन्ना, 'समुद्राजलं गाथा-२४ गृहीत्वा मेघो वर्षति, ततश्च नद्यः प्रवृद्धा भवन्तीति प्रसिद्धेः' परप्रवादानामपि नदीतुल्यानां जैनागमस्य समुद्रगृहीतार्थजलादांशि- ॥१०॥ कक्षयोपशममेघात्प्रवृद्धिसम्भवात् । एवं नदीतुल्यानां परप्रवादानां जैनागमसमुद्रमूलत्वे लोकनीत्याऽपि बाधकाभावात् ॥ अत एव न समुद्रस्य नदीपितृत्वापत्तिदोषोऽपि, लोकनीत्यापि तदनुपपत्तेः । यदि चोपमानबललभ्यधर्मेण तत्सहचरितानभिमतधर्मापत्तिः स्यात, तदा चन्द्रोपमया मुखादौ कलङ्कितत्वाद्यापत्तिरपि स्यादिति ॥ न चैवं मेघात्प्राग् नदीनामिव जैनागमानुसारिक्षयोपशमात्प्राक् परवादानामनुपचितावस्थत्वप्रसङ्गः, इष्टत्वात् , जैनागमानुसारिनयपरिज्ञानं विनाऽनुपनिबद्धमिथ्यात्वरूपतयैव तेषां स्थितत्वात् । न चैवं जिनदेशनाया उपचितमिथ्यात्वमूलत्वेनानर्थमूलत्वापत्तिः, विश्वहितार्थिप्रवृत्तावनुषङ्गतस्तदुपस्थितावपि दोषाभावाद् भावस्यैव प्राधान्यात् ॥ तदुक्तमष्टके-(२८ श्लोक ८) " इत्थं चैतदिहेष्टव्य-मन्यथा देशनाऽप्यलम् । कुधर्मादिनिमित्चत्वा-दोषायैव प्रसज्यते ॥” इति पराभिप्रायेण प्रकृतस्तुतिवृत्तव्याख्याने च त्वत्तः समुदीर्णाः-इति वाच्ये 'त्वयि समुदीर्णाः' इति पाठस्य क्लिष्टत्वापत्तिः किं च-'एवं परेषां भगवदभिहितार्थश्रद्धानम् भगवतश्च तल्लेशस्याप्यश्रद्धानम्' एतावता भगवत्यतिशयालाभः । साम्प्रदायिके त्वर्थे 'भगवत्यन्यदृष्टयः | समवतरन्ति, भवांश्च न तासु' इत्येवं स्वेतरसकलदर्शनार्थव्याप्यार्थप्रवचनवक्तृत्वरूपातिशयालाम इत्युपमया व्यतिरेकालङ्काराक्षेपात ACANAGAR Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा |॥ खोक्न | वृत्तिः ॥ गाथा-२४ ॥१०२॥ धर्मपरीक्षा | *I दुष्टार्थकत्वं काव्यस्य स्यात् । किं.च-एवमपि परेषां जिनाभिहितार्थश्रद्धानाभ्युपगमे सत्प्रशंसारूपबीजलाभाभ्युपगमप्रसङ्गः । न च ॥१.२॥ तेषां क्वचिद् यथार्थ जिनोक्तश्रद्धानेऽपि तत्प्रणेतहति देवत्वेन भावाभावाद् । देवो रागद्वेषरहितः सर्वज्ञ एव भवति नापरः, स चास्मदमिमतः सुगतादिरेवेति शाक्यादीनाम् , देवोहन्नेव, परमस्मन्मार्गप्रणेतेत्यादि च मिथ्यात्वबीजं दिगम्बरादीनामस्त्येवेति न तेषु धर्मबीजसम्भव इति वाच्यम् । तथाऽपि तादृशपक्षपातरहितानां यः कश्चिद् रागादिरहितो विशिष्टपुरुषः स देवः' इत्यादिसंमुग्धश्रद्धानवतां भगवदभिहितकतिपयमुन्दरार्थग्राहिणां धर्मबीजसद्भावस्य प्रतिहन्तुमशक्यत्वात् , औधिकयोगदृष्ट्या तत्प्रणीतवाक्येषु सुन्दरार्थमुपलभ्येत्यस्याप्यादिधार्मिकत्वोपपत्तश्चेत्यध्यात्मदृष्टया विचारणीयम् , तां विना वादप्रतिवादादिव्यापारात् तत्त्वाप्रतिपत्तेः । तदुक्तं योगबिन्दौ-"वादांश्च प्रतिवादांश्च, वदन्तो निश्चितांस्तथा ॥ तत्त्वान्तं नैव गच्छन्ति, तिलपीड (ल) कवद् गतौ ।। ६७ ॥ अध्यात्ममत्र परम, उपायः परिकीर्तितः॥गतौ सन्मार्गगमनं, यथैव ह्यप्रमादिनः" ॥६८॥ इति । अन्योपि व्यवहारेणान्यमार्गस्थोपि, तदनुसारी जिनेन्द्रभुतमूलार्थपदानुसारी, तत् तस्मात्कारणात् , देशाराधको युक्त इति॥२४॥ नन्वेतदयुक्तम्-मिथ्यादृशां प्राणातिपातादिविनिवृत्तेरप्यधर्मपक्षे निवेशितत्वात् तया तेषां देशाराधकत्वाभावात् । तदुक्तं सूत्रकृताङ्गे(द्वि.श्रु०अ०२०३४)"अहावरे तच्चस्स हाणस्स मीसगस्स विभंगे एवमाहिजइ, जे इमे भवंति आरणिआ" इत्यादि यावत् । जाव असव्वदुक्खप्पहीणमग्गे एगंतमिच्छे असाहु" ति । [ अथापरस्तृतीयस्य स्थानस्य मिश्रकस्य विभङ्ग एवमाख्यायते-य इमे भवन्ति आरण्यिकाः। (यावत्) असर्वदुःखप्रक्षीणमार्गमेकान्तमिथ्यमसाध्विति ॥] एतवृत्त्येकदेशो यथा-"अत्र चाधर्मपक्षेण युक्तो धर्मपक्षो मिश्र इत्युच्यते, तत्राधर्मस्येह भूयिष्ठत्वादधर्मपक्ष एवायं द्रष्टव्यः । एतदुक्तं भवति-यद्यपि मिथ्यादृष्टयः काञ्चित्तथाप्रकारां प्राणातिपातादिविनिवृत्तिं विदधति, तथाप्याशयस्याशुद्धत्वा CATEGICHEHRECE Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १.3 45454-5 धर्मपरीक्षादभिनवे पित्तोदये सति शर्करामिश्रक्षीरपानवदूपरप्रदेशवृष्टिवद्विवक्षितार्थासाधकत्वान्निरर्थकतामापद्यते, ततो मिथ्यात्वानुभावाद् मिश्रप- सटिप्पणा क्षोऽप्यधर्मपक्ष एवावगन्तव्य इति।" इत्यादीति चेत् । सत्यम् , न हि वयमपि सन्मार्गगर्दादिहेतुप्रबलमिथ्यात्वविशिष्टया प्राणातिपा खोपन तादिविनिवृत्तिक्रियया देशाराधकत्वं ब्रूमः, किन्तु रागद्वेषासद्हादिमान्येन मार्गानुसारिण्यैव तया। सा च सामान्यधर्मपर्यवसन्नाऽपि | वृत्तिः ॥ | धर्मपक्षे न समवतरति, तत्र भावविरतेरेव परिगणनात् , तदभावे बालत्वात् , तदुक्तम्-"अविरई पडुच्च वाले आहिजई"त्ति (अवि *गाथा-२४ ॥१०३॥ रति प्रतीत्य बाल आधीपते) एतवृत्तिर्यथा-"येयमविरतिरसंयमरूपा सम्यक्त्वाभावान्मिथ्यादृष्टेव्यतो विरतिप्यविरतिरेव, तां प्रतीत्य-आश्रित्य बालवद् बालोऽज्ञः, सदसद्विवेकविकलत्वाद् , इत्येवमाधीयते व्यवस्थाप्यते वेति"।। द्रव्यविरतिश्च मिथ्यात्वप्रावल्ये प्राधान्येन तन्मान्ये च मार्गानुसारित्वरूपप्राधान्येनापि सम्भवतीत्येवं विषय विभागपर्यालोचनायां न कोऽपि दोष इति । अवश्य चैतदङ्गीकर्तव्यम् , अन्यथा परस्य मार्गानुसारिणो मिथ्यादृष्टेविलोपापत्तिः, मिथ्यात्वसहिताया अनुकम्पादि क्रियाया अप्यकिश्चित्करत्वाद्, 'यदीयानन्तानुबन्धिनां जीर्णत्वेन सम्यक्त्वप्राप्तिप्रतिबन्धकत्वं तेषां मार्गानुसारित्वम् , तेच सम्यक्त्वाभिमुखत्वेन सम्यग्दृष्टिबदेवावसातव्याः' इति त्वावयोः समानमिति । न चेदेवं तदाऽऽदिधार्मिकविधिः सर्वोऽप्युच्छियेतेति सर्वथाऽमिनिविष्टचित्तानां मिथ्या शां दयादिकमदुष्टम् , अनमिनिविष्टानां तु मार्गानुसारितानिमित्तमिति ध्येयम् , सामान्यधर्मस्थापि सद्धर्मवीजप्ररोहत्वेनोक्तत्वात् । | तदुक्तं धर्मबिन्दौ (अ.२) "प्रायः सद्धर्मबीजानि, गृहिष्वेवंविधेवलम् ॥ रोहन्ति विधिनोप्तानि, यथा बीजानि सत्क्षितौ॥१॥"इति। एतेन-"जे.अ(या)बुद्धा महाभागा, वीरा असम्मत्तदंसिणो । असुद्धं तेसिं परकंत, सफलं होइ सबसो॥" [ये चाबुद्धा महाभागा, वीरा असम्यक्त्वदर्शिनः । अशुद्धं तेषां पराक्रान्तं सफलं भवति सर्वशः॥] इति सूत्रकृताऽष्टमाध्ययन(२२)गाथाणं तेषां च बालानां 554 HASHA Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१.४॥ सटिप्पणा स्वोपड़ | वृत्तिः ॥ गाथा-२५ | ॥१.४॥ PLACESCALCUMES यत्किमपि तपोदानाध्ययनयमनिममादिषु पराक्रान्तमुद्यमः कृतस्तदशुद्धम्-अविशुद्धकारि प्रत्युत कर्मबन्धाय, भावोपहतत्वाद् सनि. दानत्वाद्वेति, कुवैद्यचिकित्सावद् विपरीतानुबन्धित्वाचेति (बन्धीति) तच्च तेषां पराक्रान्तं सह फलेन कर्मबन्धेन वर्तते इति सफलं । सर्वश इति । सर्वा अपि तक्रियास्तपोऽनुष्ठानादिकाः, कर्मबन्धायैव इत्युत्तरार्द्धव्याख्यानात । 'पण्डितानामपि त्यागादिभिर्लोकपूज्यानामपि सुभटवादं वहतामपि सम्यक्तत्वपरिज्ञानविकलानां सर्वक्रियाफल्याद न मिथ्यादृशां केषामपि क्रियावतामपि लेशतोऽप्याराधकत्वम्' इत्यपास्तम् । एतेन भवामिनन्दिनां मिथ्यादृशां सर्व क्रियावैफल्यसिद्धावपि तद्विलक्षणानां भावानुपहतत्वेन देशाराधकत्वाप्रतिघातात्, एतेन 'मिथ्याशा सर्व कृत्यं निरर्थकम्' इत्यादीन्यपि वचनानि व्याख्यातानि, विशिष्टफलाभावापेक्षयाऽपि निरर्थकत्वव चनदर्शनात् । पठ्यते च-"नाणं चरित्तहीणं, लिंगरगहणं च दंसणविहूण। संजमहीणं च तवं, जो चरइ णिरत्ययं तस्स ॥' (उप- | देशमाला गाथा ४६५) इत्यादि। [ज्ञानं चारित्रहीनं लिङ्गग्रहणं च दर्शनविहीनम् । संयमहीनं च तपो यश्चरति निरर्थकं तस्य ॥] अथ पोषमासे वटवृक्षाम्रवृक्षयोः सहकारफलं प्रत्यकारणत्ववचनयोर्यथा स्वरूपयोग्यता-महकारियोग्यताऽभावेन विशेषस्तथा मिथ्याकृत्यचारित्रहीनज्ञानादिनिरर्थकतावचनयोरपि स्फुट एव विशेष इति चेत् , तर्हि अयमपरोऽपि विशेषः परिभाव्यतां । सहकारफलस्थानीयं मोक्षं प्रति भवाभिनन्दिमिथ्याक्कृत्यं वटवृक्षवदयोग्यम् , अपुनर्बन्धकादिकृत्यं तु सहकाराङ्करवत्पारम्पर्येण योग्यमिति सर्वमिदं निपुणं निभालनीयम्।.२४॥ तदेवं श्रुतवांश्च बालतपस्वी देशाराधकः' इति वृत्तिगतः प्रथमपक्षः समर्थितः,अथ तद्गतं द्वितीयं पक्षं समर्थयतिपक्खंतरम्मि भणिओ, गीयत्थाणिस्सिओ अगीओ सो ॥ जो णभिणिविद्वचित्तो, भीरू एगंतसुत्तरुई ॥२५॥ [पक्षान्तरे भणितो गीतार्था निश्रितोऽगीतः सः। योऽनभिनिविष्टचित्तो भीरुरेकान्तसूत्ररुचिः॥ २५॥] Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा १०५i SSAASIA पक्खतरम्मित्ति । पक्षान्तरे-अन्येषामाचार्याणां व्याख्याने, गीतार्थानिश्रितोऽगीतार्थः स देवाराधको भणितः, सटिप्पणा योऽनभिनिविष्टचित्तः-आत्मोत्कर्ष-परद्रोह-गुरु-गच्छादिप्रद्वेषमूलासद्ग्रहाकलङ्कितचित्तः, भीरु:-कुतोऽपि हेतोरेकाकिभावमा ॥स्वोपत्र श्रयन्नपि स्वेच्छानुसारेण प्रवर्तमानोऽपि खारसिकजिनाज्ञाभयः(यवान्),एकान्तसूत्ररुचिः-अव्याकृतसूत्रमात्रानुसारी। अयं भावः-3 वृचिः ॥ एकाकिनस्तावत्प्रायश्चारित्रासम्भव एव, स्वयं गीतार्थस्य तनिश्रितागीतार्थस्य वा चारित्रसम्भवात् । न हि चारित्रपरिणामे सति गुरुकु- गाथा-२५ लवासमोचनादिकमसमञ्जसमापद्यते । उक्तं च पश्चाशके(११)"ता ण चरणपरिणामे, एयं असमंजसं इहं होइ ॥ आसन्नसिद्धियाणं, ॥१.५॥ जीवाण तहा य भणियमिणं ॥१५॥ नाणस्स होइ भागी, थिरयरओ दंसणे चरित्ते य॥धन्ना आवकहाए, गुरुकुलवासंण मुंचंति ॥१६॥" [ततो न चरणपरिणामे एतदसमञ्जसमिह भवति । आसनसिद्धिकानां जीवानां, तथा च भणितमिदम् ॥ ज्ञानस्य भवति भागी स्थिरतरको दर्शने चारित्रे च । धन्या यावत्कथं गुरुकुलवासं न मुञ्चन्ति..] ततः कष्टविहारिणोऽप्येकाकिनो गुरुकुलवासैकाकिविहारयोर्गुणदोषविपर्यासमवबुध्यमानस्य स्वाभिनिवेशात्तपोरतस्यानागमिकत्वेनकाकित्वेन च प्रवचननिन्दाकारिणः शेषसाधुषु पूजाविच्छेदाभिप्रायतश्च प्रायो बह्वसमीक्षितकारित्वेनाभिन्नग्रन्थित्वाद् बाह्यवदसाधुत्वमेव ॥ तदुक्तम्-"जे उ तह विवजत्था, सम्म गुरुलाघवं अयाणता ॥ सग्गाहा किरियरया, पवयणखिसावहा खुद्दा ॥३७॥ पायं अभिन्नगठी, तमाउ तह दुक्करंपि कुव्वंता॥ बज्झा व | ण ते साहू, धंखाहरणेण विनेया ॥३८॥"त्ति [ये तु तथा विपर्यस्ताः सम्यग् गुरुलाघवमजानन्तः।खाग्रहात् क्रियारताः प्रवचनखिंसा(निन्दा) वहां क्षुद्राः ॥ प्रायोऽभिन्नग्रन्थयः तमसः तथा दुष्करमपि कुर्वन्तः। बाह्या इव न ते साधवः ध्वांक्षोदाहरणेन विज्ञेयाः] तथापि । न सर्वेषां सदृशः परिणाम इति, यस्यैकाकिनो विहारिणो नातिङ्करः परिणामः, किन्तु मृगपर्षदन्तर्गतस्य साधोरपवादादिभीरुतयैव HARSHILOSOISSECASSA) Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१०६॥ तथाविधकर्मवशाद् गच्छवास भीरुतयैवैकाकित्वं सम्पन्नम्, सूत्ररुचिश्च न निवृत्ता, तस्य स्वमत्यनुसारेण सदाप्रवृत्तेर्बह्वज्ञानकष्टे पतति । | किञ्चित्तु कदाचित्परिणामविशेषवशादागमानुपात्यपि स्यात् । तदुक्तमुपदेशमालायाम् - " अपरिणिच्छियसु अणिहस - रस केवल|मभिन्नसुत्तचारिस || सब्बुजमेण वि कथं, अन्नाणतवे बहुं पडइ ।। " ( गाथा ४१५) इति । एतद्वृत्तिर्यथा - "अपरिनिश्चितः सम्यगपरिच्छिन्नः श्रुतनिकष आगमसद्भावो येन स तथा तस्य, केवलमभिन्नमविवृतार्थ यत्सूत्रं विशिष्टव्याख्यानरहितं सूत्रमात्रमित्यर्थः तेन चरितुं तदनुसारेणानुष्ठानं कर्तुं धर्मों यस्य सोऽभिन्न सूत्रचारी तस्य, सर्वोद्यमेनापि समस्तयत्नेनापि, कृतमनुष्ठानम्, अज्ञानतपसि पञ्चाग्निसेवनादिरूपे, बहु पतति खल्पमेवागमानुसारि भवति, विषय विभागविज्ञानशून्यत्वादिति ॥ " यद्यपि स्वमत्या प्रवर्तमानानां घुणाक्षरन्यायात्समागतं किञ्चिच्छुद्धमपि कृत्यं नागमानुपाति, अन्यथा निह्नवानामपि तदापत्तेः, तथाऽपि शुद्धक्रियाजन्य निर्जरा प्रतिबन्धकस्वमतिविकल्पे यत्किञ्चिदागमानुपाति शिष्टसंमतं च तत्प्रमाणम्, न तु मन्मतानुसारित्वेनैवागमः प्रमाणमित्येवंविधोऽनभिनिवेशविकल्प उत्तेजक इति न दोषः । तदेवंविधो गीतार्थनिश्रिततपश्चरणरतोऽगीतार्थः बालतपस्वी च शीलवान् श्रुतवान् मार्गानुसारित्वेन देशाराधक इत्युभयोः पक्षयोर्नातिविशेष इति द्रष्टव्यम् ।। २५ ।। ननु 'लौकिकमिथ्यात्वाल्लोकोत्तरमिध्यात्वं बलीयः' इति हेतोरुभयोर्महाभेद एव इत्यत आह लोइ अमिच्छत्ताओ, लोउत्तरियं तयं महापावं ॥ इअ गंतो जुत्तो, जं परिणामा बहुविअप्पा ॥ २६ ॥ [ लौकिक मिथ्यात्वाल्लोकोत्तरिकं तद् महापापम् । इत्येकान्तो न युक्तो यत्परिणामा बहुविकल्पाः || २६ । ] लोइ अमिच्छत्ताओत्ति । 'लौकिक मिथ्यात्वाल्लोकोत्तरिकं तत् मिथ्यात्वं, महापापम्' इत्येकान्तो न युक्तः, सटिप्पणा ॥ खोपड वृचिः ॥ गाथा - २५ ॥१०६ ॥ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ALA धर्मपरीक्षा ॥१०७॥ का MUSPEEG यत्परिणामा बहुविकल्पा नानाभेदाः सम्भवन्ति । तथा च यथा लौकिक मिथ्यात्वं तीव्रमन्दादिभेदान्नानाविधं तथा लोकोत्तर सटिप्पणा मपीति न विशेषः, प्रत्युत ग्रन्थिभेदानन्तरमल्पबन्धापेक्षया लोकोत्तरमेवाल्पपापमिति । तदुक्तं योगविन्दुसूत्रवृत्त्योः-"भिन्न ॥खोपज्ञ ग्रन्थेस्तृतीयं तु, सम्यगदृष्टेरतो हि न । पतितस्याप्यते बन्धो. ग्रन्थिमुल्लङ्घय देशितः ॥ २६६ ॥ व्याख्या-भिन्नग्रन्थेस्तृतीयं तु | वृत्तिः ॥ अनिवृत्तिकरणं पुनर्भवति । एवं सति यत्सिद्धं तदाह-सम्यग्दृष्टीवस्य, अतो हि अत एव करणत्रयलाभादेव हेतोः,न नैव, पतितस्य गाथा-२६ ॥१०७॥ है तथाविधसंक्लेशात्सम्यक्त्वात्परिभ्रष्टस्य, आप्यते लभ्यते, बन्धो ज्ञानावरणादिपुद्गलग्रहरूपः, कीडशोऽयं ? इत्याह-ग्रन्थि ग्रन्थिभेद-18 कालभाविनी कर्मस्थितिमित्यर्थः, उल्लङ्घच अतिक्रम्य, देशितः सप्ततिकोट्यादिप्रमाणतया प्रज्ञप्तः, "बंधेण ण वोलइ कयाइ"[बन्धेन नातिकामति कदाचिद् ।] इत्यादिवचनप्रामाण्यात् ॥२६६।। एवं सामान्यतो ज्ञेयः, परिणामोऽस्य शोभनः॥ मिथ्यादृष्टेरपि सतो, महाबन्धविशेषतः॥२६७॥ एवं ग्रन्थेरुल्लङ्घनेन बन्धाभावात्, सामान्यतःन विशेषेण, ज्ञेयः परिणामोऽस्य-सम्यग्दृशः, शोभनः प्रशस्तो, मिथ्यादृष्टेरपि सतः तथाविधमिथ्यात्वमोहोदयात, कुतः? इत्याह-महाबन्धविशेषतः इह द्विधा बन्धः, महाबन्ध इतरबन्धश्च । तत्र मिथ्यादृष्टर्महाबन्धः, शेषश्चेतरस्य । ततो महाबन्धस्य विशेषतोऽवस्थान्तरविशेषात् । इदमुक्तं भवति-लब्धसम्यक्त्वस्य प्राणिनो मिथ्यादृष्टित्वेऽपि न सामान्यमिथ्यादृष्टेरिव बन्धः, किन्तु कश्चिदत्यन्तन्यूनः।।२६७ातद्विशेष एव कुतः ? इत्याह-सागरोपमकोटीनां, कोटयो मोहस्य सप्ततिः ॥ अभिन्नग्रन्थिबन्धो यद्, न त्वेको(का)पीतरस्य तु ॥ २६८॥ सागरोपमकोटीनां कोट्यो मोहस्य सप्ततिः कर्मग्रन्थप्रसिद्धा, अभिन्नग्रन्थे वस्योत्कर्षतो बन्धो,यद् यस्मात्कारणात्, न तु न पुनः, एको(का)पि सागरोपमकोटाकोटीबन्धः, इतरस्यन्तु भिन्नग्रन्थेः पुनर्मिथ्यादृष्टेरपि सतः।।१६८॥अथोपसंहरबाह-तदत्र परिणामस्य, भेदकत्वं नियोगतः Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१८॥ सटिप्पा ॥खोपड़ वृतिः ॥ गाथा-७ ॥१०८॥ CASSAR बाह्यं त्वसदनुष्ठानं, प्रायस्तुल्यं दूयोरपि ॥२६९॥ यतो ग्रन्थिमतिक्रम्यास्य न बन्धः, तत् तस्माद्, अत्र अनयोभिन्नग्रन्थीतरयोर्जीवयोर्विषये, परिणामस्य अन्तःकरणस्य, भेदकत्वं भेदकभावो,नियोगतः नियोगेन, (नियमेन) बाह्य तु बहिर्भवं पुनः, असद |नुष्ठानमर्थीपार्जनादि, प्रायोबाहुल्येन, तुल्यं समं, द्वयोरप्यनयोरिति ॥२६९॥" सैद्धान्तिकमतमेतद् ।येऽपि कार्मग्रन्थिका | भिन्नग्रन्थेरपि मिथ्यात्वप्राप्तावुत्कृष्टस्थितिबन्धमिच्छन्ति,तेषामपि मतेन तथाविधरसाभावात् तस्य शोभनपरिणामत्वे न विप्रतिपत्तिः। यद्यपि अल्पबन्धेऽपि मिन्नग्रन्थेरशुभानुबन्धान्मिथ्यात्वप्राबल्येऽनन्तसंसारित्वं सम्भवति, तथापि मन्दीभूतं लोकोत्तरमिथ्यात्वं सन्नि| हितमार्गावतरणबीजं स्यादिति विशेषः । न चैवं 'लौकिकमिथ्यात्वाल्लोकोत्तरमिथ्यात्वं शोभनं'-इत्येकान्तोऽपि ग्राह्यः, लोकोत्तरस्यापि भिन्नग्रन्थीतरसाधारणत्वात् , मुग्धानां परेषां मिथ्यात्ववृद्धिजनकतया लोकोत्तरमिथ्यात्वस्यापि महापापत्वेनोक्तत्वाच । यदागमः"जो जहवायं ण कुणइ, मिच्छद्दिट्ठी तओ हु को अण्णो॥ वड्डेइ य मिच्छत्तं,परस्स संकं जणेमाणो॥” (पिण्डनियुक्ति गाथा. १८३योयथावादं न करोति मिथ्यादृष्टिस्ततः खलु कोऽन्यःवर्धयति च मिथ्यात्वं परेषां शङ्का जनयन्)" इति। तस्मादत्रानेकान्त एव श्रेयानिति॥२६॥ गीतार्थनिश्रितमपि देशाराधकमाहपढमकरणभेएणं, गंथासन्नो जई व सड्ढो वा ॥णेगमणयमयभेआ, इह देसाराहगो णेओ ॥ २७ ॥ [प्रथमकरणभेदेन ग्रन्थ्यासत्रो यतिर्वा श्राद्धो वा । नैगमनयमतभेदादिह देशाराधको ज्ञेयः ॥ २७॥] पढमत्ति। प्रथमकरणभेदेन यथाप्रवृत्तकरणावस्थाविशेषेण, ग्रन्थ्यासन्नो ग्रन्थिनिकटवर्ती अपुनर्बन्धकादिभावशाली,यतिर्वा श्राद्धो वा, इह प्रकृतविचारे, नैगमनयमतभेदात्प्रस्थ कन्यायेन विचित्रावस्थाऽभ्युपगन्तनैगमनयमतविशेषाश्रयणाद्देशाराधको REGUAG E Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा ॥स्वोपत्र गाथा-२७ ॥१.९॥ ज्ञेयः॥ अयं भावः ॥ गीतार्थस्तावत्प्रकृतिभद्रकत्वादिगुणवतां प्राणिनां योग्यताविशेषमवगम्य केषाश्चिन्जिनपूजा-तपोविशेष-प्रतिक्रधर्मपरीक्षा मण-सामायिकादिश्रावकधर्म समर्पयन्ति, केषाश्चिच्च प्रव्रज्यामपि, तेषां चाव्युत्पन्नदशायां सदनुष्ठानरागमात्रेण तदनुष्ठानं धर्ममात्र॥१.९॥ ५ हेतुतया पर्यवस्यति । तदुक्तं पूजामधिकृत्य विशिकायाम् (वि०८) "पढमकरणमेएणं, गंथासन्नस्स धम्ममित्तफला ।। सा हुज्जुगा. इभावो, जायइ तह नाणुबंधुत्ति ॥८॥"[प्रथमकरणभेदेन ग्रन्थ्यासन्नस्य धर्ममात्रफला । सा खल्बृजुकादिभावो जायते नानुबन्ध इति॥] तपोविशेषमाश्रित्योक्तं पश्चाशके(पं०१९)"एवं पडिवत्तीए, इत्तो मग्गाणुसारिभावाओ।।चरणं विहि बहवे, पत्ता जीवा महाभागा |॥२७॥[एवं प्रतिपत्त्येतो मार्गानुसारिभावात् । चरणं विहितं बहवः प्राप्ता जीवा महाभागाः ॥] तथा प्रव्रज्यामाश्रित्य तत्रैवोक्तम् (पं०२)"दिक्खाविहाणमेअं, भाविजंतं तु तंतणीईए। सइअपुणबंधगाणं, कुग्गहविरहं लहुं कुणह॥४४॥"[दीक्षाविधानमेतद् भाव्यमानं तु तन्त्रनीत्या । सकृदपुनर्बन्धकयोः कुग्रहविरहं लघु करोति ॥]"एतवृत्तियथा-दीक्षाविधानं जिनदीक्षाविधिः, एतदनन्तरोक्तं, भाविजंतं तुत्ति भाव्यमानमपि पर्यालोच्यमानमपि, आस्तामासेव्यमानं। सकृदन्धकापुनर्बन्धकाभ्यामिति गम्यम् । अथवा भाव्यमानमेव नाभाव्यमानमपि, तुशब्दोऽपिशब्दार्थ एवकारार्थो वा, तन्त्रनीत्या-आगमन्यायेन, कयोः? इत्याह-सकृदेकदा, न पुनरपि च बन्धो | मोहनीयकर्मोत्कृष्टस्थितिबन्धनं ययोस्तौ सकृदपुनर्बन्धको तयोः, सकृदन्धकस्यापुनर्बन्धकस्य चेत्यर्थः । तथा(त्र) यो यथाप्रवृसकरणेन प्रन्थिप्रदेशमागतोऽभिन्नयन्थिः सकृदेवोत्कृष्टां सागरोपमकोटाकोटिसप्ततिलक्षणां स्थिति भन्त्स्यति असौ सकृद्वन्धक उच्यते' 'यस्तु दूतां तथैव क्षैपयन् ग्रन्थिप्रदेशमागतः पुनर्न ता भन्स्यति भेत्स्यति च ग्रन्थिं सोऽपुनर्बन्धक उच्यते'। एतयोश्वाभिन्नग्रन्थित्वेन कुग्रहः सम्भवति, न पुनरविरतसम्यग्दृष्टयादीनाम्, मार्गाभिमुखमार्गपतितयोस्तु कृग्रहसम्भवेऽपि तत्त्याग एव तद्भावनामात्रसाध्य इत्यत उक्तं ROCHAKASHNEHAAEECIA Aधर Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥११०॥ सकृद्बन्धका पुनर्बन्धकयोरिति । एतयोश्च भावसम्यक्त्वाभावाद्दीक्षायां द्रव्यसम्यक्त्वमेवमास्त्रेप्यते इति । कुग्रहविरहं असंदर्भिनिवेशवियोग, लघु शीघ्रं करोति विधत्ते, [ इह विरहशब्देन हरिभद्राचार्यकृतत्वं प्रकरणस्यावेदितं विरहाङ्कत्वात्तस्येत्येनं सर्वत्रेति गाथार्थः] ।” तथा च धर्ममात्रफलानुष्ठानवतां गीतार्थनिश्रितसाधु श्रावकाणामपि भावतोऽनधिगतश्रुतज्ञानत्वाच्छीलवच्चाच्च देशाराधकत्वमेव तथैव परिभाषणात्, चारित्रमोहनीयक्षयोपशम विशेषाद्भावतोऽधिगत श्रुतज्ञानानां शीलवतां द्रव्यतोऽल्पश्रुतानामपि माषतु'षादीनां त्वेवं सर्वाधिकत्वमेव परिशिष्यते इति दृष्टव्यम् || २७ ॥ विवेचितः प्रथमो भङ्गः, अथ द्वितीयं भङ्गं विवेचयन्नाह - देस भंगओवा, अलाहओ वा विराहगो बीओ ॥ संविग्गपक्खिओ वा, सम्मद्दिट्ठी अविरओ वा ॥२८॥ [ देशस्य भङ्गतो वा अलाभतो वा विराधको द्वितीयः । संविग्नपाक्षिको वा सम्यग्दृष्टिरविरतो वा ॥ २८ ॥ ] देस सत्ति | देशस्य मोक्षमार्गतृतीयांशभूतस्य चारित्रस्य गृहीतस्य, भङ्गादलाभाद्वा देशस्य, विराधको ज्ञेयः । स च देशभङ्गापेक्षा संविग्नपाक्षिको, देशाप्राप्त्यपेक्षया चाविरतसम्यग्दृष्टिः, तथा च 'ज्ञानदर्शनवच्चे सति चारित्रभङ्गाप्राप्त्यन्यतरवत्वं, | देशविराधकत्वमिति' परिभाषितं भवति ॥ इत्थं च जिनोक्तानुष्ठानमधिकृत्यैव कृतप्रतिज्ञानिर्वहणा देशाराधकः, विरतिपरित्यागेनैव चाविरतसम्यग्दृष्टिरपि देशविराधकः, " प्राप्तस्य तस्यापालनाद् " इति वचनात् । इत्युभयोरपि प्रकारयोः सविषयत्वेन प्रामाण्यसिद्धेः 'दप्राप्ते' इति विकल्पेन व्याख्यानं तत्केनाभिप्रायेण १ इति संशये सम्यग्वक्तृवचनं वयमपि श्रोतुकामाः स्म इति बोध्यम्, यतो यद्यप्राप्तिमात्रेण विराधकत्वं स्यात् तर्हि चरकपरिव्राजकादीनां ज्योतिष्कादूर्ध्वमुपपाताभावः प्रसज्येत, मोक्षकारणभूतानां सम्यगुज्ञानादीनां त्रयाणां लेशतोऽप्यभावेन देशविरति सर्वविरत्योर्युगपद्विराधकत्वात् । तथा 'द्वादशाङ्गपर्यन्तनानाश्रुतावधिप्रवृश्यप्राप्तिमान् सटिप्पणा ॥ खोपन चिः ॥ गाथा - २८ ॥११०॥ Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥११॥ AKAASHRA छद्मखसंयतो दूरे, केवल्यप्यप्राप्तजिनकल्पादेविराधकः प्रसज्येत' इति यत्परेण प्राचीनग्रन्थदूषणरनिकेण प्रोक्तं तत्परिभाषाज्ञानामावविजृम्भितमिति द्रष्टव्यम् । 'यो यदप्राप्तिमान् स तद्विराधक' इति व्याप्तौ च तत्र (सावत्र) तात्पर्याभावात् , किन्तूक्तपरिभाषायामेव ४iसटिप्पणा तात्पर्यात् । तत्फलं च देशविराधकत्वेन देशद्वयाराधकत्वाक्षेपः । तथा च पूर्वभङ्गादाधिक्यं लभ्यते, तेन देशविराधकत्वेऽविरतसम्य खोपन वृत्तिः ॥ गेदृष्टर्देशाराधकादप्यधमत्वं स्थादित्यपास्तम् , परिभाषितस्य विराधकत्वस्याधमत्वाप्रयोजकत्वात, प्रत्युत देशद्वयाराधकत्वाक्षेपकतयोत्क गाथा-२९ प्रयोजकत्वात् । न च परिभाषा न सूत्रनीतिरिति शङ्कनीयम्, “ सवामगंध परिचज निरामगंधो परिवए " [सर्वामगन्धं परित्यज्य ॥११॥ निरामगन्धः परिव्रजेत् ॥ [आचा. अ०२ उ०३०८७] इत्यादीनां परिभाषासूत्राणामपि तत्रव्यवस्थापितत्वाद् । यदि च देशविराधकत्वं नैवं पारिभाषिकमङ्गीक्रियते, तदाऽनुपातव्रतः सम्यग्दृष्टिः कस्मिन् भङ्गेऽवतारणीयः ?, न च नावतारणीय एव, सर्वाराधकादन्यत्र सहकारियोग्यताभावाभिधानाय त्रिमिरेव भङ्गैः सर्वेषां तद्विलक्षणानां सङ्ग्राह्यत्वादिति सूक्ष्ममीक्षणीयम् ॥ २८ ॥ तृतीयचतुर्थभङ्गी विवेचयति| तइए भंगे साहू, सुअवंतो चेव सीलवंतो अ॥ उवयारा सड्ढोवि य, भवाभिणंदी चउत्थंमि ॥ २९ ॥ [तृतीये भङ्गे साधुः श्रुतवाँश्चैव शीलवाँश्च । उपचारात् श्राद्धोऽपि च भवाभिनन्दी चतुर्थे ॥ २९॥] 'तइए भंगेत्ति । श्रुतवाश्चैव शीलवाँश्च साधुस्तृतीयभङ्गे सर्वाराधकलक्षणे समवतारणीयः, उपरतत्वाद् भावतो विज्ञातधर्मत्वाच त्रिपकारस्थापि मोक्षमार्गस्याराधकत्वात् । श्राद्धोऽपि चोपचारात् वतीयभङ्ग एच, देशविरतौ सर्वविरत्युपचारात् ज्ञानदर्शनयोश्वाप्रतिहतत्वात् । तत्र चचतुर्थभने सर्व विराधकलक्षणे भवाभिनन्दी क्षुद्रत्वादिदोषवान् देशतीऽप्यनुपरतो मिथ्यादृष्टिरिति॥२९॥ + Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥११२॥ PERMA सटिप्पणा खोपन वृत्तिः ॥ गाथा-३० ॥११२॥ ASHASSAAS अत्र केचिद्वदन्ति यो मिथ्यादृष्टिरन्यमार्गस्थः स सर्वविराधको भवतु, यस्तु जैनमार्गस्थः स भवाभिनन्द्यपि न तथा, व्यवहारल स्व बलवत्त्वात, "ववहारोवि हु बलवं" [व्यवहारोऽपि खलु बलवान् ] । इति वचनप्रामाण्यादिति तन्मतनिराकरणार्थमाह भावो जेसिमसुद्धो, ते ववहारहियावि एरिसया॥ णिच्छयपरंमुहो खलु, ववहारो होइ उम्मग्गो ॥ ३०॥ - [भावो येषामशुद्धस्ते व्यवहारस्थिता अपीदृशकाः । निश्चयपराशुखः खलु ब्यवहारो भवत्युन्मार्गः ॥ ३०॥ ५ भावोत्ति। भावश्चित्तपरिणामो, येषामशुद्धः-अपुनर्बन्धकाात्तीर्णत्वन लेशेनापि निश्चयास्पर्शी, ते व्यवहारस्थिता अपि खामिमतैहिकप्रयोजनार्थ व्यवहारमाश्रिता अपि,ईशकाःसर्वविराधका एव,निश्चयपराङ्मुखः खलु व्यवहार उन्मार्गो भवतीति न तेषां क्लिष्टकर्मणां स त्राणायेति । यस्तु व्यवहारो बलबानभ्यधायि प्रवचने स निश्चयप्रापको, न तु तदप्रापकः। अत एव 'अविधिनाप्यभ्यासो(प्यसौ)विधेयः(या),दुःषमायां विधेदुर्लभत्वात, तस्यैव चाश्रयणे मार्गोच्छेदप्रसङ्गाद्' इत्याद्यशास्त्रीयाभिनिवेशपरित्यागार्थ विधियन एव व्यवहारशुद्धिहेतुः शास्त्रे कर्तव्यतयोपदेशि(दर्शि)तः । तदुक्तं पश्चाशके(पं०३)आलोइऊण एवं, तंतं पूछावरण सूरीहि । विहिजत्तो कायवो,मुद्धाण हियडया सम्म॥४९॥"इति। एतवृत्तियथा-"आलोच्य-विमृश्य, एवं पूर्वोक्तन्यायेन, तन्त्रप्रवचनम्, कथम् ?,इत्याह पूर्वश्च-तन्त्रस्य पूर्वी भागः, अपरश्च-तस्यैवापरो भागः पूर्वापरं तेन सप्तम्यर्थो वा एनप्रत्यये सति पुर्वापरेणेति स्यात्, पूर्वापरभावयोरित्यर्थः, तयोरविरोधेनेति यावत् । अनेन चालोचनमात्रस्य व्यवच्छेदः, तस्य तत्त्वावबोधासमर्थत्वादिति । सूरिभिराचार्यैः पण्डितैर्वा, विधौ विधाने वन्दनागते वेलाचाराधनरूपे यत्न उद्यमो विधियत्नः। स कर्तव्यो विधातव्यो, विमुक्तालस्यैः स्वयं विधिना वन्दना कार्या, अन्येऽपि विधिनैव तां विधापयितव्या इत्यर्थः। किमर्थमेतदेवम् ? इत्याह-मुग्धानामन्युत्पन्नबुद्धीनां । हितं Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रेयः, तद्पो योऽर्थः वस्तु स हितार्थस्तस्मै हितार्थाय, सम्यगविपरीततया। यदा हि गीतार्था विधिना खयं वन्दनां विदधति, अन्याँ सटिप्पवा धमपरीक्षाश्च तथैव विधापयन्ति, तदा मुग्धबुद्धयोऽपि तथैव प्रवर्तन्ते, प्रधानानुसारित्वान्मार्गाणाम् ॥ आह च-"जो उत्तमेहिं मग्गो, पहओ | | ॥स्वोपड़ ॥११३॥ | सो दुक्करो न सेसाणं ।। आयरिश्रमि जयंते,तयणुचरा(रो)के णु सीयंति(केणसीएज्जा)।[य उत्तमैर्मार्गः प्रहतः स दुष्करो न शेषाणाम् । वृत्तिः ॥ | आचार्य जयति(यतमाने)तदनुचराः के नु सीदन्तिः॥]तथा ॥जे जत्थ जया जइआ, बहुस्सुआ चरणकरणउज्जुत्ता॥ जंते समायरंती, गाथा-३. आलंवणं तिब्बसद्धाण। [ये यत्र यदा यदा बहुश्रुताश्चरणकरणोपयुक्ताः। यत्ते समाचरन्ति आलम्बनं तीव्रश्रद्धानाम् ।]जयत्ति दुःषमादौ, IP॥११३॥ जइअति दुर्भिक्षादाविति । तथाप्रवृत्ताश्च ते वन्दनाराधनजन्यं हितमासादयन्ति, तद्विराधनाजन्यप्रत्यपायेभ्यश्च मोचिता भवन्तीति । अयं चोपदेशोऽसमञ्जसतया स्वयं वन्दनां विदधानांस्तथाऽनवाप्तापुनर्बन्धकाद्यवस्थेभ्यस्तथाविधजिज्ञासादितल्लिङ्गविकलेभ्यो जनेभ्यस्तां प्रयच्छतः सूरीन् वीक्ष्य आचार्येण विहितः, एवं हि तत्प्रवृत्तौ तेषामन्येषां चानर्थोऽसमञ्जसक्रियाजन्या च शासनापभ्राजना मा भूदित्यभिप्रायेणेति गाथार्थ इति ।" अत एव च कालानुभावान्जैनप्रवचनेऽप्यल्पस्यैव जनस्याराधकस्य दर्शनात् जिनाज्ञारुचिशुद्धेष्वेव भक्तिबहुमानादि कार्यमिति पूर्वाचार्या वदन्ति ॥ उक्तं चोपदेशपदे "एवं पाएण जणा, कालणुभावा इहंपि सब्वेवि । णो सुंदरति तम्हा, आणासुद्धेसु पडिबंधो ॥"त्ति ॥८३९॥ एतवृत्तिर्यथा, एवमनन्तरोक्तोदाहरणवत्, प्रायेण बाहुल्येन, जना लोकाः, कालामुभावाद वर्तमानकालसामर्थ्याद्, इहापि जने मतेऽपि, सर्वेऽपि साधवः श्रावकाच, नो नैव, सुन्दराः शास्त्रोक्ताचारसारा वर्तन्ते, किन्त्वनाभोगादिदोषाच्छास्त्रप्रतिकूलप्रवृत्तयः, इतिः पूर्ववत्, तस्मात्कारणात्, आज्ञाशुद्धेषु सम्यगधीतजिनागमाचारवशाच्छुद्धिमागतेषु साधुषु श्रावकेषु च, प्रतिबन्धः बहुमानः कर्तव्य इति"॥३०॥ नन्वेवं विधिविकलव्यवहारस्याराधकत्वाप्रयोजकत्वेऽपि SANCHANNECHECE Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्ष ॥११४॥ विधिशुद्धव्यवहारस्य भावहीनस्याप्याराधकत्व प्रयोजकत्वे किं बाधकं परं प्रति तस्य निश्चयप्रापकत्वाद् इत्यत आहभावुझियवहारा, ण किंपि आराहगत्तणं होइ ॥ भावो उ बोहिबीजं, सव्वणुमयंमि थोवोवि ॥ ३१ ॥ [ भावोज्झितव्यवहारान्न किमप्याराधकत्वं भवति । भावस्तु बोधिवीजं सर्वज्ञमते स्तोकोऽपि ॥ ३१ ॥ ] भावुझिअति । भावोज्झितव्यवहाराद् भवामिनन्दिनां द्रव्यत्रतधारिणां विधिसमग्रादपि न किमप्याराधकत्वं भवति, परं प्रति निश्चयप्रापकस्यापि तस्य स्वकार्याकारित्वाद् । भावस्तु सर्वज्ञमते स्तोकोऽपि बोधिबीजभू, विशेषधर्मविषयस्य स्तोकस्यापि भावस्य विशेषफलत्वाद् । अत एवापूर्वा धर्मचिन्ताऽपि प्रथमं समाधिस्थानमुक्तम् । तदुक्तं समवायाङ्गे (१० सम० ) " धम्मचिंता वा से असमुप्पण्णपुद्दा समुप्पजेजा सवं धम्मं जाणित्तए " ति ॥ एतद्वृत्तिर्यथा - " तत्र धर्मा जीवादिद्रव्याणां उपयोगोस्पादादयः स्वभावास्तेषां चिन्ता - अनुप्रेक्षा, धर्मस्य वा श्रुतचारित्रात्मकस्य सर्वज्ञभाषितस्य 'हरिहरादिनिगदितधर्मेभ्यः प्रधाaiseम्' इत्येवं चिन्ता धर्मचिन्ता, वाशब्दो वक्ष्यमाणसमाधिस्थानापेक्षया विकल्पार्थः, से इति यः कल्याणभागी तस्य साधोः, असमुत्पन्नपूर्वा पूर्वस्मिन्ननादावतीतकालेऽनुपजाता, तदुत्पादे झपार्द्धपुद्गलपरावर्तान्ते (न्तः) कल्याणस्यावश्यंभावात्, समुत्पद्येतजायेत सः । किं प्रयोजनाय चेयम् १ अत आह- सर्वं निरवशेषं, धर्मं जीवादिद्रव्यस्वभावमुपयोगोत्पादादिकं श्रुतादिरूपं वा, जाणितर ज्ञपरिज्ञया ज्ञातुं ज्ञात्वा च प्रत्याख्यानपरिज्ञया परिहरणीयधर्म (कर्म) परिहर्तुम् । इदमुक्तं भवति - धर्मचिन्ता धर्मज्ञानकरणरूपा (भूता) जायते इति ॥ " अत्रापूर्वधर्मचिन्ताया उत्कर्षतोऽपार्द्धपुद्गलपरावर्तव्यवधानेन कल्याणकारणत्वमुक्तम्, अन्यत्र च मुक्त्यद्वेषादिगुणानां चरमपुद्गलपरावर्तव्यवधानेनेति प्रवचनपूर्वापरभावपर्यालोचनया गुणसामान्यस्य चरमावर्तमानत्वमस्माभिरुन्नीयते । यदि सटिप्पणा ॥ खोपय वृचिः ॥ गाथा - ३१ ॥११४॥ Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥११५॥ SHATABACH चैवमपि खतन्त्रपरतन्त्रसाधारणापुनर्बन्धकांदिगुणानामपार्द्धपुद्गलपरावर्तमानत्वमेव सकलगीतार्थसंमतं स्यात् तदा नास्माकमाग्रह इत्यः | त सटिप्पणा स्यां परीक्षायामुपयुक्तैर्भवितव्यं गीतार्थेः प्रवचनाशातनामीरुभिः ॥ ३१॥ खोपन ___तदेवं विवेचिता चतुर्भङ्गी, अथास्यां को भङ्गोऽनुमोद्यः ? को वा न ? इति परीक्षते वृत्तिः ॥ है तिणि अणुमोयणिज्जा, एएसुं णो पुणो तुरियभंगो ॥ जेणमणुमोयणिजो, लेसोवि हु होइ भावस्स॥३२॥ गाथा-३२ [त्रयोऽनुमोदनीया एतेषु न पुनस्तुरीयभङ्गः। येनानुमोदनीयो लेशोऽपि हि भवति भावस्य ॥ ३२ ॥] ॥११५॥ तिपिणत्ति । एतेषु देशाराधकादिषु चतुर्यु भङ्गेषु, त्रयो भङ्गाः । देशाराधक-देशविराधक-सर्वाराधकलक्षणा अनुमोदनीयाः, न पुनस्तुरीयो भङ्गः सर्वविराधकलक्षणः, येन कारणेन, भावस्य लेशोऽपि ह्यनुमोदनीयः, न चासौ सर्वविराध के सम्भवति, देशाराधकादिषु तु मार्गानुसारिभावविशेषसम्भवात् , तदनुमोदनीयत्वे तद्वारा तेषामप्यनुमोदनीयत्वमावश्यकमिति भावः ॥ ३२॥ ____ अथ किमनुमोदनीयत्वम् ? का चानुमोदना ? इत्येतल्लक्षणमाह| अणुमोअणाइ विसओ, जं तं अणुमोअणिजयं होइ॥ सा पुण पमोअमूलो, वावारो तिण्ह जोगाणं ॥३३॥3 • [ अनुमोदनाया विषयो यद्वस्तु तदनुमोदनीयं भवति । सा पुनः प्रमोदमूलो व्यापारो त्रयाणां योगानाम् ॥ ३३ ॥] 'अणुगोअणाई'त्ति । अनुमोदनाया विषयो, यद्वस्तु, तदनुमोदनीयं भवति । तद्विषयत्वं च भावस्य साक्षाद् भावप्रधानत्वात्साधूनाम् । तदुक्तमोघनिर्युक्तो-"परमरहस्समिसीणं, समत्तगणिपिडगझरिअसाराणं । परिणामियं पमाण, णिच्छयमवलंबमाणाणं"ति॥७६०॥ [परमरहस्यमेषां समस्तगणिपिटकक्षरितसाराणाम् । परिणामःप्रमाणं निश्चयमवलम्बमानानाम् ॥] तत्कारणक्रियायाश्च AR Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा ॥स्वोपक्ष दृचिः ॥ गाथा-३४ ॥११६॥ धर्मपरीक्षा ४ तदुत्पादनद्वारा । यद् हारिभद्रं वचः-(पंचा०६)"कजं इच्छंतेण, अणंतरं कारणंपि इटुंति(तु)।जह आहारजतित्ति, इच्छंतेणेहमाहारो ॥३४॥"त्ति [कार्यमिच्छता अनन्तरं कारणमपीष्टमिति । यथाऽऽहारजतृप्तिमिच्छता इहाहारः॥] पुरुषस्य च तत्सम्बन्धितयेति तत्त्वतः ॥११॥ सर्वत्र भावापेक्षमेवानुमोदनीयत्वं पर्यवस्यति । साऽनुमोदना, पुनःप्रमोदमूलो हर्षपूर्वकः,त्रयाणां योगानां कायवाङ्मनसां, व्यापारो रोमाञ्चोद्गम-प्रशंसा-प्रणिधानलक्षणो न तु मानसव्यापार एव, करणकारणयोरिवानुमोदनाया अपि योगभेदेन त्रिविधायाः सिद्धान्ते प्रतिपादनात् । मानसव्यापारस्यैवानुमोदनात्वे प्रशंसादिसंवलनादनुमोदनाफलविशेषानुपपत्तेश्च । न च यथा नैयायिकैकदेशिनां मङ्गलत्वादिकं मानसत्वव्याप्या जातिस्तथाऽस्माकमनुमोदनात्वमपि तथेति, त्रयाणामपि योगानां हर्षमूलो व्यापारोऽनुमोदनेति वस्तुस्थितिः, यश्चानुमोदनाव्यपदेशः क्वचिच्चित्तोत्साहे एव प्रवर्तते स सामान्यवाचकपदस्य विशेषपरत्वात् निश्चयाश्रयणाद्वेत्यवधेयम्।।३३।। _____एवं सति योऽनुमोदनाप्रशंसयोर्विषयभेदेन भेदमेवाभ्युपगच्छति तन्मतनिरासार्थमाह-- है सामन्नविसेसत्ता, भेओ अणुमोअणापसंसाणं । जह पुढवीदव्वाणं, ण पुढो विसयस्स भेएणं ॥ ३४ ॥ [सामान्य विशेषत्वाद् भेदोऽनुमोदनाप्रशंसयोः । यथा पृथिवीद्रव्ययोः, न पृथग् विषयस्य भेदेन ॥ ३४॥] 'सामन्नविसेसत्त'त्ति। अनुमोदनाप्रशंसयोःसामान्यविशेषत्वात् सामान्य विशेषभावाद्भेदः,यथा पृथिवीद्रव्ययोः, द्रव्यं हि सामान्य, पृथिवी च विशेषः । एवमनुमोदना सामान्य प्रशंसा च विशेष इत्येतावाननयोर्मेदः, न पुनः पृथग् विषयस्य भेदेनात्यन्तिको भेदः, प्रशंसाया अनुमोदनाभेदत्वेन तदन्यविषयत्वासिद्धेः। न हि घटप्रत्यक्षं प्रत्यक्षभिन्नविषयमिति विपश्चिता वक्तुं | युक्तम् , न च मानसोत्साहरूपाऽनुमोदनाया अपि प्रशंसाया भिन्नविषयत्वनियमः, प्रकृतिसुन्दरस्यैव वस्तुनः सम्यग्दृशामनुमोदनी AAAAAA Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥११७॥ १ यत्वात्प्रशंसनीयत्वाच्च । न चानुमोदनायाः स्वष्टसाधकमेव वस्तु विषयः, तादृशस्यैव तपःसंयमादेरारम्भपरिग्रहादेव विरतैरविरतैश्चानुमोदनात् न तु परेष्टसाधकम्, आत्मनश्चानिष्टसाधनमपि निजधनापहारस्याप्यनुमोदनीयत्वापत्तेः । प्रशंसाया श्रेष्ठमनिष्टं च वस्तु वियः इष्टस्य धार्मिकानुष्ठानस्यानिष्टस्य चाज्ञाबाह्यस्य वस्तुनः प्रशंसा व्यवस्थितेः । भवति हि निजकार्यादिनिमित्तमसद्गुणस्यापि प्रशंसा । अत एवायमागमोsपि - ( स्थानांगअ०४०३७० ) " चउहिं ठाणेहिं असं ते गुणे दीवेज्जा, १अब्भासवत्तियं २परछंदाणुवत्तियं ३ कज्जहे उ ४ कयपडिकइए "त्ति । [ चतुर्भिः स्थानैरसतो गुणान् दीपयेत् १ अभ्यासप्रत्ययं २ परच्छन्दानुवृत्तिकं ३ कार्यहेतु ४ कृतप्रतिकृत्याः इति ||] सा चेयमनिष्टप्रशंसाऽतिचाररूपापि प्रयोजन विशेषेण कस्यचित्कादाचित्की स्यादित्येतदपि वचनं शोभनम्, स्वारसिकप्रशंसाया अनिष्टा विषयत्वात्पुष्टालम्बनकानिष्टप्रशंसाया अपीष्टविषयत्वपर्यवसानात् । न हि किञ्चित्येष्टमनिष्टं वा वस्तु विद्यतें, किन्तु परिणामविशेषेण भजनीयमिति । यदुवाच कल्पाकल्पविभागमाश्रित्य वाचकमुख्यः - " किश्चिच्छुद्धं कल्प्यमकल्प्यं, स्यादकल्प्यमपि कल्प्यम् ॥ पिण्डः शय्या वस्त्रं, पात्रं वा भेषजाद्यं वा ॥ १ ॥” इति । मोहप्रमादादिनाऽनिष्टविषयत्वं च प्रशंसाया इवानुमोदनाया |अपि भवतीति न कोऽपि विषयभेदः । न चानिष्टविषयतावच्छेदेनोपचारानुपचार प्रवृत्त्याऽनयोरतिचारभङ्गभावाद् भेदः, अभिमतोपचारेणातिचारत्वाभावात् । अन्यथा - "संथरणंमि असुद्धं, दोण्हवि गिण्तदितयाणहियं । आउरदितेणं, तं चैव हियं असंथरणे ॥ १ ॥” [ संस्तरणे अशुद्धं द्वयोरपि गृह्णद्ददतोरहितम् । आतुरदृष्टान्तेन तदेव हितमसंस्तरणे ||] इत्यादौ कारणिका शुद्धग्रहणप्रशंसाया अप्यतिचा| रत्वप्रसङ्गाद् | अनभिमतोपचारादतिचारभङ्गयोस्तु परिणामभेदः प्रयोजको न तु विषयभेद इति यत्किञ्चिदेतत् । शास्त्रेऽपि प्रशंसा अनुमोदनाविशेष एव गीयते । तदुक्तं पञ्चाशक वृत्तिकृता - " जइणोवि हु दवत्थय मेओ अणुमोअणेण अत्थित्ति । [ एयंच सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा - ३४ ॥११॥ Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥११८॥ यं इय सुद्धं तंतजुती ॥ २८॥ पं० ६ ] इति प्रतीकं विवृण्वता यतेरपि भावस्तवारूढसाधोरपि न केवलं गृहिण एव । हुशब्दोऽलङ्कृतौ । द्रव्यस्त व भेदो द्रव्यस्तवविशेषः, अनुमोदनेन जिनपूजादिदर्शनजनितप्रमोदप्रशंसादिलक्षणयाऽनुमत्या अस्ति विद्यते, इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्ताविति ॥ ३४ ॥ एवमनुमोदनाप्रशंसयोर्विषयभेदाभावे सिद्धेऽनुमोदनीय प्रशंसनीययोर्विषमव्याप्तिं परिहरन्नाहते ममोअणिज्जं, पसंसणिज्जं च होइ जाईए ॥ सुद्धं किच्चं सव्वं, भावविसिहं तु अन्नंपि ॥ ३५ ॥ [ तेनानुमोदनीयं प्रशंसनीयं च भवति जात्या । शुद्धं कृत्यं सर्वे भावविशिष्टं त्वन्यदपि ॥ ३५ ॥ ] 'तेणं'ति । तेनानुमोदनाप्रशंसयोर्विषय भेदाभावेन, अनुमोदनीयं प्रशंसनीयंच सर्वं शुद्धं स्वरूपकृत्यं दयादानशीलादिकं च, जात्या स्वरूपयोग्यतावच्छेदकरूपेण भवति । यद्वपावच्छेदेन यत्र सुन्दरत्वज्ञानं तद्रूपविशिष्टप्रतिसन्धानस्य तद्रूपावच्छिन्नविषयकहर्षजनकत्वाद् । अत एव शुद्धाहारग्रहणदानादिव्यक्तीनां सर्वासामसुन्दरत्वेऽपि कासा ञ्चिच्चाशुद्धाहारग्रहणदानादिव्यक्तीनामप्यपवादकालभांविनीनां सुन्दरत्वेऽपि साधोः शुद्धाहारग्रहणं सुन्दरम् श्रावकस्थ च शुद्धाहारदानमित्ययमेवोपदेशो युक्तो न त्वशुद्धाहारग्रहणदानो|पदेशोऽपि, सामान्य पर्यवसायित्वात्तस्य; सामान्यपर्यवसानस्य च स्वरूपशुद्ध एव वस्तुन्युचितत्वात् स्वरूपशुद्धं हि वस्तु जात्याप्यनुमोद्यमानं हितावहमिति । भावविशिष्टं तु-अपुनर्बन्धकादिभावसंवलितं तु, अन्यदपि विषयशुद्धादिकमपि वस्त्वनुमोद्यम् । 'भावविशिष्टा क्रिया सुन्दरा' इत्यादिप्रशंसया भावकारणत्वेन विषयशुद्धादावपि कृत्ये स्वोत्साहसम्भवात् । न चैवमपुनर्बन्धकोचितविपयशुद्धकृत्येऽपि साधोः प्रवृत्यापत्तिः, स्वाभिमततत्तद्धर्माधिकारीष्टसाधनत्वेन प्रतिसंहितेऽधस्तनगुणस्थानवर्त्यनुष्ठाने स्वोत्साहसम्भवेऽपि स्वाधिकाराभावेन तत्राप्रवृत्तेः । अत एवं 'शोभनमिदमे तावज्जन्मफलम विरतानाम्' इतिवचन लिङ्गगम्य स्वोत्साहविषयेऽपि जिनपूजादौ सटिप्पणा ॥ खोपड़ वृचिः ॥ गाथा - ३५ ॥११८॥ Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥११९॥ HA+ श्राद्धाचारे न साधूनां प्रवृत्तिरिति बोध्यम् । इत्थं च भावानुरोधादपुनर्बन्धकादेरारम्यायोगिकेवलिगुणस्थानं यावत्सर्वमपि धर्मानुष्ठान सटिप्पणा मनुमोदनीयं प्रशंसनीयं चेति सिद्धम् ॥ उक्तं चोपदेशपदसूत्रवृत्त्योः -"ता एअम्मि पयत्तो, ओहेणं बीयरायवयणंमि । बहुमाणो खोपज्ञ कायबो, धीरेहिं कयं पसंगेणं ॥२३४॥ तत् तस्माद् , एतस्मिन् धर्मबीजे, प्रयत्नो यत्नातिशयः, कर्तव्यो धीरैः इत्युत्तरेण योगः। वृत्तिः ॥ किंलक्षणः प्रयत्नः कर्तव्यः ? इत्याशङ्कथ आह-ओघेन सामान्येन, वीतरागवचने वीतरागागमप्रतिपादितेऽपुनर्बन्धकचेष्टाप्रभृत्ययो. ★ गाथा-३५ गिकेवलिपर्यवसाने तत्तच्चित्र(त)शुद्धसमाचारे, बहुमानो भावप्रतिबन्धः क्षयोपशमवैचित्र्यान्मृदुमध्याधिमात्रः, कर्तव्यो धीरैबुद्धि- | ॥११॥ मद्भिः। उपसंहरबाह-कृतं प्रसङ्गेन पर्याप्तं धर्मबीजप्रख्यापनेनेति ॥" भावानुरोधेन ह्यनुष्ठानस्यानुमोदनप्रशंसे विहिते, भावश्चापुनबन्धकाद्यनुष्ठाने नियत एव, अन्ततो मोक्षाशयस्यापि सत्वात् , तस्याप्यचरमपुद्गलपरावर्ताभावित्वेन मोहमलमन्दतानिमित्तकत्वेन शुद्धत्वात् । तदुक्तं विशिकायाम्-(४) "मोक्खासओवि णण्णस्थ, होइ गुरुभावमलपहावेणं ।। जह गुरुवाहिविगारे, ण जाउ पत्थासओ सम्मं ॥॥" इति । [ मोक्षाशयोऽपि नान्यत्र भवति गुरुभावमलप्रभावेण । यथा गुरुव्याधिविकारे न जातु पथ्याशयः सम्यक् ॥] | अन्यत्र चरमपुद्गलपरावर्तादन्यत्र । ततो विषयशुद्धादिकं त्रिविधमप्यनुष्ठानं प्रशस्तमिति सिद्धम् ।। उक्तं च विंशिकायामेव(३)"विस यसरूवणुबंधेण, होइ सुद्धो तिहा इहं धम्मो । जं ता मुक्खासयाओ, सम्वो किल सुन्दरो णेओ॥२०॥” इति । [विषयस्नरूपानुबन्धेन | भवति शुद्धो विधेह धर्मः। यत्ततो मोक्षाशयात्सर्वः किल सुन्दरो ज्ञेयः। विषयशुद्धादिभेदश्वायं योगबिन्दावुपदर्शितः-"विषयात्मानुबन्धैस्तु, त्रिधा शुद्धमुदाहृतम् । अनुष्ठानं, प्रधानत्वं, ज्ञेयमस्य यथोत्तरम् ।।२११॥ आद्यं यदेव मुक्त्यर्थ, क्रियते पतनाद्यपि ॥ तदेव मुक्त्युपादेय-लेशभावाच्छुभं मसम् ॥२१२॥ द्वितीयं तु यमायेव, लोकदृष्टया यमादिकम् (व्यवस्थितम्)। न यथाशास्त्रमेवेह, सम्य IRCUMBASSES AR Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१२०॥ सटिप्पणा खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-३५ ॥१२०॥ + गज्ञानाद्ययोगतः ॥ २१३ ॥ तृतीयमप्यदः किन्तु, तत्वसंवेदनानुगम् ॥ प्रशान्तवृत्त्या सर्वत्र, दृढमौत्सुक्य वर्जितम् ॥२१४॥” इति । ननु भवतु विषयशुद्धाद्यनुष्ठानत्रयमपुनर्बन्धकादौ कथश्चित्सुन्दरम् , तथापि वीतरागवचनप्रतिपादितस्यैव तद्गतस्यानुष्ठानस्यानुमोद्यत्वं नान्यस्य, "जो चेव भावलेसो सो चेव भगवओ अणुमओ।"[य एव भावलेशः स एव भगवतोऽनुमतः ॥] इत्यत्र भगवद्वहुमानरू. | पस्यैव भावलेशस्थानुमोद्यत्वप्रतिपादनादिति चेद् । न, अन्यत्रापि भवामिनन्दिदोषप्रतिपक्षमोक्षाशयभावस्य तवतो भगवद्वहुमानरूपत्वाद् भवनिर्वेदस्यैव भगवद्वहुमानत्वाद्' इति ललितविस्तरापञ्जिकावचनात् , स्वरूपशुद्धं चानुष्ठानं सर्वत्रापि तत्त्वतो भगव त्प्रणीतमेवेति तत्प्रशंसया भवत्येव भगवद्वहुमानः । व्युत्पन्ना ह्यन्यशास्त्रे कथश्चिदुपनिबद्धानपि मार्गानुसारिगुणान् भगवत्प्रणीतत्वेनैव प्रतियन्ति । तदाहुः श्रीसिद्धसेनसूरयः(द्वा०१) सुनिश्चित नः परतन्त्रयुक्तिषु, स्फुरन्ति याः काश्चन सूक्त(क्ति)सम्पदः॥ तवैव ताः पूर्वमहार्णवोद्धृता (त्थिता) जगत्प्रमाणं जिनवाक्यविपुषः॥३०॥इति" नन्दिवृत्तावप्येवमेवोक्तम्-“परदर्शनशास्त्रेष्वपि हि यःकश्चित्समीचीनोऽर्थः संसारासारता-स्वर्गापवर्गादिहेतुःप्राण्यहिंसादिरूपः स भगवत्प्रणीतशास्त्रेभ्य एव समुद्धृतो वेदितव्यः। न खल्वतीन्द्रियार्थपरिज्ञानमन्तरेणातीन्द्रियः प्रमाणाबाधितार्थः पुरुषमात्रेणोपदेष्टुं शक्यते, अविषयत्वाद् । न चातीन्द्रियार्थपरिज्ञानं परतीथिकानामस्तीत्येतदने वक्ष्यामः। ततस्ते भगवत्प्रणीतशास्त्रेभ्यो मौलं समीचीनमर्थलेशमुपादाय पश्चादमिनिवेशवशतः स्वस्वमत्यनुसारेण तास्ताः स्वस्वप्रक्रियाः प्रपश्चितवन्तः । उक्तं च स्तुतिकारेण- "सुनिश्चितं." इत्यादि ॥" ननु दयादिवचनानि परमते तत्वतो जिनवचनमूलान्यपि स्वस्वमताधिदैवतवचनत्वेन परिगृहीतत्वादेव नानुमोदनीयानि, अत एव मिथ्यादृष्टिमिः स्वस्वदैवतबिम्बत्वेन परिगृहीता. ऽहत्प्रतिमाऽप्युपासकदशाङ्गादिष्ववन्धत्वेन प्रतिपादितेति चेत् । अत्र वदन्ति सम्प्रदायविदः यथा मिथ्याहपरिगृहीता AASHISCALASAHEGENERAL 5 + Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१२॥ सटिप्पणा वृचिः ॥ गाथा-३५ ॥१२१॥ CBSAIR549 तीर्थकृत्प्रतिमा मिथ्यात्वाभिवृद्धिनिवारणाय न विशेषेण नमस्क्रियते, सामान्येन तु"ज किंचि नाम तित्थं " [ यत्किंचिद् नाम तीर्थ । ] इत्यादिना, "जावंति चेइआई." [यावन्ति चैत्यानि० ॥] इत्यादिना चाभिवन्द्यते एव, तत्वतस्तासामपि तीर्थत्वात् जिनबिम्वत्वाच्च । तथाऽत्रापि मिथ्यादृशां गुणाः सर्वेषां जीवानां दयाशीलादिकं शोभनम्' इत्येवं सामान्यरूपेणानुमोद्यमानाः केन वारयितुं शक्यन्ते ? इति । उक्तं चैतत् धर्मविन्दुसूत्रवृत्त्योरपि (अ० २ ० ३) सद्धर्मदेशनाधिकारसाधारण्येन लोकलोकोत्तरगुणप्रशंसाप्रतिपादनात् तथाहि ।। “साधारणगुणप्रशंसेति ॥ साधारणानां लोकलोकोत्तरयोः सामान्यानां, गुणानां, प्रशंसा-पुरस्कारो देशनार्हस्याग्रतो विधेया। यथा-"प्रदानं प्रच्छन्नं गृहमुपगते सम्भ्रमविधिः, प्रियं कृत्वा मौनं सदसि कथनं चाप्युपकृतेः॥ अनुत्सेको लक्ष्म्या निरभिभवसाराः परकथाः, श्रुते चासन्तोषः कथमनभिजाते निवसति ॥१॥” इति ।" इयं च पुरुषविशेपानुपग्रहात्सामान्यप्रशंसैवेति । यद्यप्यत्रापि वाक्यार्थस्य विशेष एव पर्यवसानम् , तथाऽपि साधारणगुणानुरागस्यैवाभिव्यङ्गयत्वान्न मिथ्यात्वाभिवृद्धिरिति | द्रष्टव्यम् । स्यादत्र परस्येयमाशङ्का 'एवं सति मिथ्यादृष्टेः पुरुषविशेषस्य दयाशीलादिगुणपुरस्कारेण प्रशंसा न कर्तव्या स्यात् , अन्यतीर्थिकपरिगृहीताईत्प्रतिमाया विशेषेणावन्द्यत्ववद् अन्यतीर्थिकपरिगृहीतगुणानामपि विशेषतोऽप्रशंसनीयत्वात् । दोपवत्वेन प्रतिसन्धीयमाने पुरुषे तद्गतगुणप्रशंसायास्तद्गतदोषानुमतिपर्यवसितत्वात् । अत एव सुखशीलजनवन्दनप्रशंसयोस्तद्गतप्रमादस्थानानुमोदनापतिरुक्ता । "किइकम्मं च पसंसा, सुहसीलजणमि कम्मबंधाय । जे जे पमायठाणा, ते तें उबबृहिया हुंति ॥" [कृतिकर्म च प्रशंसा | सुखशीलजने कर्मवन्धाय । यानि यानि प्रमादस्थानानि तानि तानि उपबंहितानि भवन्ति ॥ ] इत्यादिनाऽऽवश्यकादाविति " तत्र हैब्रमः-यदि नाम तद्गतदोषज्ञानमेव तत्प्रशंसायास्तदीयतदोषानुमतिपर्यवसायकमिति मिथ्यादृष्टिगुणप्रशंसात्यागस्तवाभिमतस्तदाऽविरत CARRCHEACHEKHAR1 यास्तगतदोषानुमतिपयतीर्थिकपरिगृहीतगुणाकालादिगणपुरस्कारेण प्र Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्यग्दृष्टेः सम्यक्त्वादिगुणप्रशंसाऽप्यकर्तव्या स्यात् , तद्गताविरतिदोषज्ञानात्तस्यास्तदनुमतिपर्यवसानात् । अथाविरतसम्यग्दृष्टयाधर्मपरीक्षा 5 दावविरत्यादेन स्फुटदोषप्रतिसन्धानमेव च तद्गतप्रशंसाया दोषानुमतिपर्यवसानबीजम्,अत एव शैलकराजर्षिप्रभृतीनां पार्श्वस्थत्वा लासटिप्पणा ॥१२२॥ | दिस्फुग्दोषप्रतिसन्धाने हीलनीयत्वमेवोक्तं शास्त्रे न तु गुणसामान्यमादाय प्रशंसनीयत्वम् , तत्कालीनतत्प्रशंसाया दोषानुमतिरूप | खोपड | चिः ॥ वादित्यविरतसम्यग्दृष्टयादीनां सम्यक्त्वादिगुणानुमोदनेन दोष इति चेत् । तर्हि मार्गानुसारिणां मिथ्यादृशां मिथ्यात्वमपि न स्फुटो गाथा-३५ दोषः, तत्वेतरनिन्दनायुपहितप्रबलमिथ्यात्वस्यैव स्फुटदोषत्वादिति तद्गतगुणप्रशंसायामपि न दोषः। अवश्यं चैतदित्थं प्रतिपत्तव्यम् , ॥१२२॥ | अन्यथा मेधकुमारजीवहस्तिनोऽपि दयागुणपुरस्कारेण प्रशंसानुपपतिरिति । अन्यतीथिंकपरिगृहीतत्वं चाहत्प्रतिमायामिव दयादिगुणेषु न स्फुटो दोषः, दयादिगुणानामभिनिविष्टान्यतीथिकसाक्षिकत्वाभावेन मिथ्यात्ववृद्धिनिबन्धनत्वाभावात् , प्रत्युत तत्त्वतो जिनप्रवचनामिहितत्वप्रतिसन्धानेन तदस्फुटीकृतमेव । अतः 'स्तोकस्यापि भगवदभिमतस्य गुणस्योपेक्षा न श्रेयसी' इत्यध्यवसायदशायां | तत्प्रशंसा गुणानुरागातिशयद्वारा कल्याणावहा । अत एव गुणानुरागसङ्कोचपरिहाराय स्तोकगुणालम्बनेनापि भवत्युद्धानं विधेयमि त्युपदिशन्ति पूर्वाचार्याः। तदुक्तं बृहत्कल्पभाष्यवृत्त्योः-"दंसणनाणचरितं, तबविणयं जत्थ जत्तियं पासे । जिणपन भत्तीए, | पूयए तं तहिं भावं ॥ दर्शनं च निःशङ्कितादिगुणोपेतं सम्यक्त्वं, ज्ञानं चाचारादि, चारित्रं च मूलोत्तरगुणानुपालनात्मकं दर्शनज्ञानचारित्रं द्वन्द्वैकवद्भावः । एवं तपश्चानशनादि, विनयश्वाभ्युत्थानादिरूपस्तपोविनयम् । एतद्दर्शनादि, यन्त्र पार्श्वस्थादौ पुरुष, यावत् यत्परिमाणं स्वल्पं बहु वा, पश्येत् जानीयात् , तत्र तमेव भावं जिनप्रज्ञप्तं वचेतसि व्यवस्थाप्य तावत्यैव भक्त्या कृतिकर्मादिलक्षणया पूजयेद्" इति ॥ तेन मार्गानुसारिकृत्ये सर्वमपि भावयोगादनुमोदनीयं प्रशंसनीयं चेति सिद्धम् । ३५॥ AGAUR SECSIRECE Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्मपरीक्षा ॥१२३॥ COM AASHA ततश्च 'मिथ्याशा गुणा न ग्राह्याः' इति कदाग्रहः परित्याज्य इत्यभिप्रायेणाह इसटिप्पणा है| इअ लोइअलोउत्तर-सामन्नगुणप्पसंसणे सिद्धे ॥ मिच्छदिट्ठीण गुणे, ण पसंसामोत्ति दुव्वयणं ॥ ३६ ॥ खोपड़ [इति लौकिकलोकोत्तरसामान्यगुणप्रशंसने सिद्धे ॥ मिथ्यादृष्टीनां गुणान् न प्रशंसाम इति दुर्वचनम् ॥ ३५॥] वृत्तिः ॥ गाथा-१६ 'इत्ति इत्यमुना प्रकारेण, लौकिकलोकोत्तरसामान्यगुणप्रशंसने सिद्धे इष्टसाधनत्वेन व्यवस्थिते, मिथ्यादृष्टीनां ॥१२३॥ गुणान्न प्रशंसाम इति दुर्वचनं गुणमात्सर्यादेव तथावचनप्रवृत्तः । न च नैवम्भृतं मात्सर्यादेवोच्यते, किन्तु सम्यग्दृष्टिमिथ्याहष्टिसाधारणगुणप्रशंसया विशेषगुणातिशयभनापत्तिभयादेवेति शङ्कनीयम् । एवं सति विरताविरतसाधारणसम्यक्त्वादिगुणप्रशंसाया अपि परिहारापत्ता, तथापि विरतविशेषगुणातिशयभङ्गापत्तिभयतावदस्थ्यादिति ॥ ३६॥ ___ दुर्वचनत्वं चास्य व्यक्त्या तत्प्रशंसाविधायकसद्वचनबाधात्सिद्धयतीति तदुपदर्शयति___ मग्गाणुसारिकिच्चं, तेसिमणुमोअणिज्जमुवइडं ॥ सिवमग्गकारणं तं, गम्मं लिंगेहि धोरेहि ॥ ३७॥ | [मार्गानुसारिकृत्यं, तेषामनुमोदनीयमुपदिष्टम् ॥ शिवमार्गकारणं तद् , गम्यं लिङ्गधीरैः ॥ ३७ ॥] मंग्गाणुसारित्ति।मार्गानुसारिकृत्यं तेषामपि मिथ्यादृशामपि, अनुमोदनीयमुपदिष्टं भगवता । तदुक्तं चतुःशरणप्रकीर्णके-" अहवा सव्वं चिय वीय-रायवयणाणुसारि जं सुकडं ॥ कालत्तएवि तिविहं, अणुमोएमो तयं सव्वं ॥" एतदत्तिर्यथा- " अथवेति सामान्वरूपप्रकारदर्शने । 'चिय'ति एवार्थे । ततः सर्वमेव वीतरागवचनानुसारि जिनमतानुयायि Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१२४॥ त्सुकृतं जिनभवन-बिम्बकारण-तत्प्रतिष्ठा-सिद्धान्तपुस्तकलेखन-तीर्थयात्रा-श्रीसङ्घवात्सल्य-जिनशासनप्रभावना-ज्ञानाद्युपष्टम्भ सटिप्पणा धर्मसान्निध्य-क्षमा-मार्दव संवेगादिरूपं मिथ्याक्सम्बन्ध्यपि मार्गानुयायिकृत्यं, कालत्रयेऽपि त्रिविधं मनोवाक्कायैः कृतं कारित खोपज्ञ मनुमतं च यदद् भवति भविष्यति चेति तत्तदित्यर्थः, तत्सर्व निरव शेषम्, अनुमन्यामहे हर्षगोचरतां प्रापयाम इति ॥" ननु मा वृचिः ॥ र्गानुसारिकृत्यं न जैनाभिमतधार्मिकानुष्ठानानुकारिमिथ्यादृष्टिमार्गपतितं क्षमादिकम्, किन्तु सम्यक्त्वाभिमुखगतं जैनाभिमतमेव, तच्च गाथा-३० सम्यग्दृष्टिगतानुष्ठानान्न पार्थक्येन गणयितुं शक्यमित्याशङ्कायामाह-तन्मार्गानुसारिकृत्यं, शिवमार्गस्य ज्ञानदर्शनचारित्रलक्षणस्य, ॥१२४॥ कारणं धीरैनिश्चितागमतः, लिङ्गैः "पावंण तिव्व भावा कुगई" [पापं न तीवभावात्करोति ॥] इत्याद्यपुनर्बन्धकादिलक्षणैर्गम्यम् । अयं भावः-सम्यग्दृष्टिकृत्यं यथा वस्तुतश्चारित्रानुकूलमेवानुमोदनीयं तथा मार्गानुसारिकृत्यमपि सम्यक्त्वानुकूलमेव स्वल्पकालपाप्रव्याफलज्ञानं च तत्रानुमोदनीयतायां न तन्त्रम्, किन्तु स्वलक्षणज्ञानमेव । तथा च यत्र भवाभिनन्दिदोषप्रतिपक्षगुणानामपुनर्बन्धकादिलक्षणानां निश्चयस्तत्र मार्गानुसारिकृत्यानुमोदनायां न बाधकम् , विविच्याग्रिमकालभाविफलज्ञानस्य प्रवर्तकत्वे तु छमस्थस्य | प्रवृत्तिमात्रोच्छेदप्रसङ्ग इति । अत एव मार्गानुयायिकृत्यं लक्षणशुद्धं जिनभवनकारणायेवोक्तम्, तस्यैव मोक्षमार्गकारणत्वाद्। मोक्षमार्गो12 हि भावाज्ञा सम्यग्दर्शनादिरूपा, तत्कारणं चापुनर्बन्धकचेष्टा द्रव्याज्ञा । तत्र भावाज्ञा मोक्ष प्रति कारणत्वेनानुमोदनीया, द्रव्याज्ञा तु कारणकारणत्वेनेति न कश्चिद्दोष इति । तदिदमुक्तं व्यक्त्यैवाराधनापताकायाम्-अह दुक्कडगरहानल-ज्झामियकम्मिधणो पुणो भणइ ॥ मुकडाणुमोअणं तिव्व-सुद्धपुलयचियसरीरो ॥१॥ [अथ दुष्कृतगर्हाऽनलक्ष्मातकर्मेन्धनः पुन भणति । सुकृतानुमोदनं तीवशुद्धपुलकाश्चितशरीरः ॥ १॥] चउतीसबुद्ध अइसअ-अट्ठमहापाडिहेरधम्मकहा ॥ तित्थपवत्तणपभिई, अणुमोएमि जिणिंदाणं ॥२॥ PUNISAARCHAEOUS Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१२५॥ SAR सटिप्पणा स्वोपन वृतिः ॥ गाथा-१७ ॥१२५॥ &ा सिद्धत्तमणताण, वरदंसणनाणमुक्खविरिआई । इगतीसं सिद्धगुणे, अणुमन्ने सबसिद्धाणं ॥ ३॥ पंचविहं आयारं, देसकुलाई गुणे य छत्तीसं । सिस्सेसु अत्थभासण-पमुहं सूरीण अणुमोए ॥४॥ अंगाण उवंगाणं, पइण्णसुअछेअमूलगंथाणं । उवज्झायाणं अज्झा-वणाइ | सत्वं समणुमन्ने ॥५॥ समिईगुत्तीमहत्वय-संजमजइधम्मगुरुकुलणिवासं। उज्जुअविहारपमुहं, अणुमोए समणसमणीणं ॥६॥ सामा- इअपोसहाई, अणुवयाई जिणिंदविहिपूयं । एक्कारपडिमप्पमिई, अणुमन्ने सडसड्ढीणं ॥७॥ जिणजम्माइसु ऊसब-करणं तह महरिसीणं पारणए । जिणसासणंमि भत्ती-पमुहं देवाण अणुमन्ने ॥८॥ तिरियाण देसविरई, पजताराहणं च अणुमोए । सम्मइंसणभं, अणुमन्ने नारयाणंपि ॥९॥ सेसाणं जीवाणं, दाणरुइत्तं सहावविणिअत्तं । तह पयणुकसायत्तं, परोवयारित्त भवत्तं ॥१०॥ दक्खिन्नदयालुत्तं, पियभासित्ताइ विविहगुणणिवहं । सिवमग्गकारणं जं, तं सत्वं अणुमयं मज्झ ॥११॥ [चतुस्त्रिंशद्बुद्धातिशयाष्टमहापातिहार्यधमकथाः । तीर्थप्रवर्तनप्रभृतीरनुमोदयामि जिनेन्द्राणाम् ॥२॥ सिद्धत्वमनन्तानां वरदर्शनज्ञानसौख्यवीयर्याणि । एकत्रिंशतं सिद्धगुणान् अनुमन्ये सर्वसिद्धानाम् ॥३॥ पञ्चविधमाचार देशकुलादीन्गुणांश्च पत्रिंशतम् । शिष्येषु अर्थभाषणप्रमुखं सूरीणामनुमोदे ॥ ४॥ अङ्गानामुपाङ्गानां प्रकीर्णकश्रुतच्छेदमूलग्रन्थानाम् । उपाध्यायानामध्यापनादि सर्व समनुमन्ये ।। ५ ॥ समिति-गुप्ति-महाव्रत-संयम-यतिधर्म गुरुकुलनिवासम् । उद्युक्तविहारप्रमुखं अनुमोदे श्रमणश्रमणीनाम् ॥ ६॥ सामायिकपौषधादि अणुनतानि जिनेन्द्रविधिपूजाम् । एकादशप्रतिमाप्रभृतीरनुमन्ये श्राद्धश्राद्धीनाम् ॥ ७॥ जिनजन्मादिषूत्सवकरणं तथा महर्षीणां पारणके । जिनशासने भक्तिप्रमुख देवानामनुमन्ये ॥८॥ तिरश्चां देशविरतिं पर्यन्ताराधनं च अनुमोदे । सम्यग्दर्शनलाभमनुमन्ये नारकाणामपि ॥९॥ शेषाणां जीवानां | दानरुचित्वं स्वभावविनीतत्वम् । तथा प्रतनुकषायत्वं परोपकारित्व-भव्यत्वं ।। १०॥ दाक्षिण्यदयालुत्वं प्रियभाषित्वादिविविधगुण ALASA%A9 Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ११२६॥ सटिप्पणा खोपड वृधिः ॥ गाथा-३० ॥१२६॥ निवहम् । शिवमार्गकारणं यत्तत्सर्वेमनुमतं मम ॥ ११ ॥] पञ्चसूत्र्यामप्युक्तम्-"अणुमोएमि सबेसि अरहंताणमणुट्ठाणं, सम्वेसिं सिद्धाणं सिद्धभावं, सव्वेसि आयरियाणं आयारं, सब्वेसिं उवज्झायाणं सुत्तप्पयाणं, सव्वेसि साहूणं साहुकिरियं, सम्वेसि सावगाणं मुक्खसाहणजोए, सम्वेसि देवयाणं सम्वेसिं जीवाणं होउकामाणं कल्लाणासयाणां मग्गसाहणजोए । होउ मे एसा अणुमोअणा ॥" | पतवृत्तिर्यथा-"अनुमोदेऽहमिति प्रक्रमः । सर्वेषामहतामनुष्ठान धर्मकथादि, सर्वेषां सिद्धानां सिद्धभावमव्यावाधादिरूपम् , एवं सर्वेषामाचार्याणामाचारं ज्ञानाचारादिलक्षणम् , एवं सर्वेषामुपाध्यायानां सूत्रप्रदानं सद्विधिवद् , एवं सर्वेषां साधूनां साधूक्रियां सत्स्वाध्यायादिरूपाम् , एवं सर्वेषां श्रावकाणां मोक्षसाधनयोगान् वैयावृत्यादीन् , एवं सर्वेषां देवानामिन्द्रादीनां सर्वेषां जीवानां सामान्येनैव भवितुकामानामासन्नभव्यानां कल्याणाशयानाम् , एतेषां किम् ? इत्याहमार्गसाधनयोगान् सामान्येनैव कुशलव्यापारान् , अनुमोदे इति क्रियानुवृत्तिः। भवन्ति चैतेषामपि मार्गसाधनयोगाः, मिथ्यादृष्टीनामपि गुणस्थानकत्वाभ्युपगमाद् । अनभिग्रहे सति प्रणिधिशुद्धिमाह-भवतु ममैषाऽनुमोदनेत्यादि ॥' अत्र हि सामान्येनैव कुशलव्यापाराणामनुमोद्यत्वमुक्तमिति मिथ्यादृशामपि स्वाभाविकदानरुचित्वादिगुणसमूहो व्यक्त्याऽनुमोद्यो न तु तद्विशेष एवाश्रयणीयः । यत्तु दानमपि परेषामधर्मपोषकत्वादधिकरणमिति दानरुचित्वादिगुणेष्वपि विशेषाश्रयणमावश्यकमित्यासन्नसम्यक्त्वसङ्गमनयसारादिसशसाधुदानादिनैव दानरुचित्वादिकं ग्राह्यमिति परस्याभिमतम् , तदसत् । भूमिकामेदेन दानविधेरपि भेदात् , सम्यग्दृष्टिं प्रति प्रासुकैषणीयादिदानविधेरिवादिधार्मिकं प्रति "पात्रे दीनादिवर्गे च" इत्यादेरपि दानविधेः प्रतिपादनात् । ततः सामान्येन कुशलव्यापारा आदिधार्मिकयोग्या एव ग्राह्या इति युक्तं पश्यामः॥ एतेन "पुण्यप्रकृतिहेतोरेवानुमोद्यत्वे क्षुत्तृट्महन-रज्जुयहण-विषभक्षणादी BADAREKARNAKAL Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥१२७॥ सटिप्पणा | ॥खोपड वृत्तिः ॥ गाथा-३० ॥१२७॥ 3GRIHSHOBHA नामप्यनुमोद्यत्वापत्तिः । पुण्यप्रकृत्युदयप्राप्तस्यैव धर्मखानुमोद्यत्वे च चक्रवर्तिनः स्त्रीरत्नोपभोगादेरप्यनुमोद्यत्वापत्तिः । सम्यक्त्वनि- मित्तमात्रस्थ चानुमोद्यत्वेऽकामनिर्जराव्यसनादेरप्यनुमोद्यत्वापत्तिः । (आवश्यकनियुक्तिः) "अणुकंप-ऽकामणिज्जर-बालतवो दाणविणय विभंगे। संजोगविप्पओगे, वसणूसव-इड्डिसक्कारे ॥८४५॥" [अनुकम्पाऽकामनिर्जरा बालतपो-दानविनय-विभङ्गम् । संयोगविप्रयोगौ व्यसनोत्सवद्धिसत्कारम् ॥] इत्यादिनाऽनुकम्पादीनामपि सम्यक्त्वप्राप्तिनिमित्तत्वप्रतिपादनात् । धर्मबुद्ध्या क्रियमाणस्यैवानुष्ठानस्यानुमोद्यत्वे चामिग्रहिकमिथ्यादृशा धर्मबुद्ध्या क्रियमाणस्य जैनसमयत्यजनत्याजनादेरप्यनुमोद्यत्वापत्तिरिति 'सम्यक्त्वाभिमुखस्यैव | मार्गानुसारिकृत्यं साधुदानधर्मश्रवणाद्यनुमोद्यम्, नत्वन्यमार्गस्थस्य क्षमादिकमपि' इति परस्य कल्पनाजालमपास्तम्,” सामान्येनैव कुशलव्यापाराणामादिधार्मिकयोग्यानामनुमोद्यत्वप्रतिपादनात् , असत्कल्पनाऽनवकाशात , तीव्र प्रमादादिशबलस्य सम्यक्त्वस्येव तीब्राभिनिवेशदुष्टस्य मोक्षाशयादेरप्यननुमोद्यत्वेऽपि जात्या तदनुमोद्यत्वाऽनपायादिति फलतः स्वरूपतश्चानुमोद्यत्वविशेषव्यवस्था न काप्यनुपत्तिरिति । यस्त्वाह-सम्यग्दृष्टय एव क्रियावादिनः शुक्लपाक्षिकाच, न तु मिथ्यादृष्टय इति तेषां कृत्यं किमपि नानुमोद्यमिति । तेन न |मुष्ठ दृष्टम् , धर्मरुचिशालिनां सम्यग्दृशां मिथ्यादृशांचाविशेषेण क्रियावादित्वस्य शुक्लपाक्षिकत्वस्य च प्रतिपादनात् ॥ तदुक्तं दशाश्रुतस्कुन्धचूर्णी-"जो अकिरियावाई सोभविओ अभविओवा,णियमा कण्हपक्खिओ। किरियावादी णियमा भविओणियमा सुक्कपक्खिओ अंतोपुग्गलपुरिअट्टस्स णियमा सिज्झिहिति, सम्मदिट्ठीवा मिच्छदिट्ठी वा हुजत्ति॥"[योऽक्रियावादी स भव्योऽभन्यो वा, नियमात्कृष्णपाक्षिकः क्रियावादी नियमाद्भव्यो नियमाच्छुक्लपाक्षिकः,अन्तःपुद्गलपरावर्तस्य नियमात्सेत्स्यति,सम्यग्दृष्टिा मिथ्यादृष्टिा भवेदिति॥] एतत्संमतिपूर्वमुपदेशरत्नाकरे येवमुक्तम् तथाहि,(१तट अंशतरंग)"केचित्संसारवासिनो जीवा देवादिगतौ च्यवनादिदुःखभन्ना + + Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'धर्मपरीक्षा ॥ १२८ ॥ E | मोक्षसौख्यमनुपमं ज्ञात्वा तदर्थ ज्ञातस्पृहाः कर्मपरिणतिवशादेव मनुष्यगतिं प्रापुः । तत्र चैकः प्रश्नमः कुगुरूपदिष्टशास्त्रार्थभाविततयाऽभिगृहीतमिथ्यात्वे दिग्मोहसमतश्वव्यामोहवान् पूर्वोक्तमिथ्याक्रियासु मनोवाक्कायधनादिबलवत्तया भृशमुद्युक्तो विष्णुपुराणाद्युक्तशतधनुर्नृपादिदृष्टान्तेभ्यो वेदपुराणा युक्तिभ्यश्च सञ्जातजिनधर्मद्वेषात्स्वज्ञानक्रियागर्वाच्च यक्षतुल्यं सम्यग्गुरुं तदुपदेशांश्च दूरतः परिहारादिनाऽवगणय्य सर्वेभ्यः प्रागेवेष्टपुरसमं मोक्षं गन्तुं समुत्थितो निजज्ञानक्रियादिगर्वादिनाऽन्यदर्शनि संसर्गालापजप्रायश्चित्तभिया मार्गमिलितसम्यक् पथिक तुल्यान् जैनमुनिश्राद्धादीन् समार्गमपृच्छन् यथा यथा प्रबलपादत्वरितगतिसमा अनन्तजीव पिण्डात्मकमूलकसेवालादिभोजनाग्निहोत्रादिका मिथ्यात्वक्रियाः प्रबलाः कुरुते, तथा तथा तज्जनितमहारम् भजीव घातादिपापकर्मवशादश्वग्रीवनृपतिपु रोहितादिवद् गाढगाढतरगाढत मदुःखयय कुमानुष्य तिर्यग्नरकादिकुगतिपतितो दुर्लभबोधितयाऽनन्तभव्यारण्ये चतुरशीतिलक्षजीवयोनिषु भ्राम्यन् शिवपुराद् भृशं दुरवत्यैव जायते पुनरनन्तेन कालेन तत्रागामुकत्वाद् || "किरियाबाई णियमा भविओ, नियमा सुकपक्लिओ, अंतो पुग्गलपरिअडस्स णियमा सिज्झिहिति, सम्मदिट्ठी वा मिच्छादिट्ठी वा हुआ ।। " इति दशाश्रुतस्कन्धचूर्ण्यपासक प्रतिमाधिकारादिवचनात् क्रियारुचित्वेनावश्यं शिवगामितया यथाप्रवृत्त करणादुत्तीर्णोऽपूर्वकरणसूर्योदये स्वं भ्रान्तं मन्यमानोऽकानिर्जरायोगादिना कथश्चिन्मनुजभवं प्राप्य कर्मक्षयोपशमवशाञ्जाततच्चान्वेषणश्रद्धो मिश्रादिगुणस्थानकयोगादपगत दिग्मोहसममिध्यात्वहेतुकव्यामोहः कथमपि यक्षसमसद्गुरुं प्राप्य तदुपदेश बहुमानादवगतं ज्ञानादिमोक्षमार्ग तदनुगतसम्यगनुष्ठानादिना भजमान उत्कर्षतः पुद्गलपरावर्तमध्ये परेभ्यः पञ्चभ्यो (चतुभ्यों)पि मित्रेभ्यः पश्चादनन्तेन कालेन स्वेष्टपुरसमं मोक्षमवाप्नोतीति । ” ननु यद्यप्येवं दशाश्रुतस्कन्धचूर्ण्यनुसारेण क्रियवादिनः सम्यग्दृष्टि-मिथ्यादृष्टयन्यतरत्वमुत्कर्षतोऽन्तः पुद्गलपरावर्तमान संसारत्वेन शुक्लपाक्षिकत्वं सटिप्पणा ॥ खोपड़ वृत्तिः ॥ गाथा - ३७ ॥१२८॥ Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ +A सटिप्पणा स्वोपड वृधि: गाथा-३७ ॥१२९॥ च नियमतो लभ्यते, अक्रियावादिनश्च नियमान्मिथ्यादृष्टित्वं कृष्णपाक्षिकत्वं च तथापि नात्र निश्चयः कर्तुं पार्यते, अन्यत्रापापुद्गधर्मपरीक्षा लपरावर्ताधिकसंसारस्यैव कृष्णपाक्षिकत्वप्रतिपादनात् । तदुक्तम्-"जेसिमवड्डो पुग्गल-परिअट्टो सेसओ उ संसारो॥ते सुक्कपक्खिा ॥१२९॥ खलु, अहिए पुण कण्हपक्खिया ॥१॥" "येषामपार्द्धपुद्गलपरावर्त एव शेषः संसारस्तत ऊर्ध्व सेत्स्यते, ते शुक्लपाक्षिकाः दक्षीणप्रायसंसाराः । खलुशब्दो विशेषणार्थः । प्राप्तदर्शना अप्राप्तदर्शना वा सन्तीति विशेषयति । अधिके पुनरपार्द्धपुद्गलपरावर्तात्सं सारे, कृष्णपाक्षिकाः क्रूरकर्माण इत्यर्थः॥" इत्यादि श्रावकप्रज्ञप्तिवृत्तौ। योगबिन्दुवृत्तावप्युक्तम् । तत्रापि शुक्लपाक्षिकोऽपार्द्धपुद्गलपरावर्तान्तर्गतसंसारः । यत उक्तं "जेसिमबड्डो पुग्गल०" इत्यादि । ततो हि क्रियावादिनः शुक्लपाक्षिकत्वं भजनीयमेव लभ्यते, अक्रियावादिनोऽपि नियमतः कृष्णपाक्षिकत्वमिति विघटते एव अपार्धपुद्गलपरावर्ताभ्यन्तरीभृतसंसाराणामप्यक्रियावादिनां सम्भवात् , तस्यापि कृष्णपाक्षिकत्वभजनाया एव सम्भवात् । नास्तिकत्वपक्षो ह्यक्रियावादः "अत्थित्ति किरियवाई वयन्ति, णस्थित्ति | अकिरियवाई"त्ति [ अस्तीति क्रियावादिनो वदन्ति, नास्तीति अक्रियावादिनः] वचनात् । स च कर्मवैचित्र्यवशादल्पतरभवानामपि प्रदेश्यादिवद् भवतीति । अत एव भगवत्यां "सुकपक्खिया जहा सलेस्स"त्ति [शुक्लपाक्षिका यथा सलेश्या इति ।] सलेश्यातिदेशेन शुक्लपाक्षिकस्याप्यक्रियावादसम्भव उपदर्शितः। तथा च सलेश्याधिकारप्रश्ननिर्वचनसूत्रम्-"सलेस्सा णं भंते जीवा किं किरियावादी ? पुच्छा । गोयमा ! किरियावादीवि, जाव बेणइअवादीवि"त्ति [सलेश्या भगवन् ! जीवाः किं क्रियावादिनः ? प्रश्नः। गौतम ! क्रियावादिनोऽपि यावत् वैनयिकवादिनोऽपीति ॥] तत इमामनुपपत्तिं दृष्ट्वा भगवत्यर्थ एव मनो देयम् । भगवत्यां हि सम्यग्दृष्टय एव क्रियावादिनः प्रतिपादिताः, "मिच्छदिछी जहा कण्हपक्खिया" इत्यतिदेशात् "कण्हपक्खियाणं भंते जीवा किं किरियावादी ? पुच्छा। ISHABHAAL Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा 8 ॥१३०॥ सटिप्पणा |॥ खोप्रह वृचिः ॥ गाथा-३७ ॥१३॥ -964956GRE गोयमा ! णो किरियावादी, अकिरियावादीवि अन्नाणियवादीवि वेणइअवादीवि"त्ति [कृष्णपाक्षिका भगवन् ! जीवाः किं क्रियावादिनः? प्रश्नः गौतम ! नो क्रियावादिनः, अक्रियावादिनोऽपि, अज्ञानिकवादिनोऽपि, वैनयिकवादिनोऽपीति ।] वचनात्कृष्णपाक्षिकाणां च क्रियावादित्वप्रतिषेधादिति । युक्तं चैतत् ॥ सूत्रकृताङ्गेऽपि (१२) समवसरणाध्ययननिर्युक्तावित्थं प्रतिपादितत्वात् । तथा च तत्पाठः-"सम्मदिही किरिया-वादी मिच्छा य सेसगा वादी॥ जहिऊण मिच्छवाय, सेवह वादं इमं सच्च ॥१२१॥" [सम्यग्दृष्टयः क्रियावादिनो मिथ्याश्च शेषका वादिनः । हित्वा मिथ्यावादं सेवध्वं वादमिमं सत्यम् ॥] इति चेत् । मैवम् । एकशास्त्रावलम्बनेनापर शास्त्रदूषणस्य महाशातनारूपत्वाद् उभयशास्त्रसमाधानस्यैव न्याय्यत्वात् । तत्र भगवत्या सूत्रकृतनियुक्तौ च क्रियावादिविशे|पस्यैव ग्रहणाद् अत्र च क्रियावादिसामान्यस्य ग्रहणान्न ग्रन्थविरोधः। तदुक्तं भगवतीवृत्ती-" एते च सर्वेऽप्यन्यत्र यद्यपि मिथ्यादृष्टय एवोक्तास्तथापीह क्रियावादिनः सम्यग्दृष्टयो ग्राह्याः, सम्यगस्तित्ववादिनामेव तेषां समाश्रयणात्" इति । सूत्रकृतवृत्तावप्युक्तम्-"ननु च क्रियावाद्यप्यशीत्युत्तरशतभेदोऽपि तत्र तत्र प्रदेशे कालादीनभ्युपगच्छन्नेव मिथ्यावादित्वेनोपन्यस्तस्तत्कथमिह सम्यग्दृष्टित्वेनोच्यते?, उच्यते-स तत्र 'अस्त्येव जीवः' इत्येवं सावधारणतयाऽभ्युपगमं कुर्वन् , तथा काल एवैकः सर्वस्यास्य जगतः, कारणं, तथा स्वभाव एव, नियतिरेव, पूर्वकृतमेव, पुरुषकार एव इत्येवमपरनिरपेक्षतयैकान्तेन कालादीनां कारणत्वेनाश्रयणान्मिथ्यात्वम् । तथाहि-अस्त्येव जीवः इत्येवमस्तिना सह जीवस्य सामानाधिकरण्याद् यद्यदस्ति तत्तजीव इति प्राप्तम् , अतो निरवधारणपक्षसमाश्रयणादिह सम्यक्त्वमभिहितम् । तथा कालादीनामपि समुदितानां परस्परसव्यपेक्षाणां कारणत्वेनेहाश्रयणात्सम्यक्त्वमिति । ननु च कथं कालादीनां प्रत्येकं निरपेक्षाणां मिथ्यात्वखभांवत्वे सति समुदितानां सम्यक्त्वसद्भावः१, न हि यत्प्रत्येकं नास्ति तत्समुदाये भवितुमर्हति RAELAHALAGE Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षां. ॥१३१॥ " सिकतातैलवत् । नैतदस्ति, प्रत्येकं पद्मरागादिमणिष्वविद्यमानाऽपि रत्नावली समुदाये भवन्ती दृष्टा, न च दृष्टेऽनुपपन्नं नामेति यत्कि - श्चिदेतदित्यादि ॥ या च क्रियावादिसामान्यस्यान्तः पुद्गलपरावर्ताभ्यन्तरसंसारत्वेन नियमतः शुक्लपाक्षिकत्वानुपपत्तिः सा क्रियारुचिरूपेण शुक्लपक्षेण शुक्लपाक्षिकत्वमवलम्ब्य परिहर्तव्या । अत एवाक्रियावादिनो नियमात्कृष्णपाक्षिकत्वमपि सङ्गच्छते, "क्रियापक्ष एव शुक्लोsयापक्षस्तु कृष्ण" इति । अन्यथा निरवधारणपक्षाश्रयणे क्रियावादिवदक्रियावाद्यपि सम्यग्दृष्टिः स्यात् । अथवोत्कृष्टतः पुद्गलपरावर्त संसारिजाती यत्वमत्र शुक्लपाक्षिकत्वं तदधिकसंसारिजातीयत्वं च कृष्णपाक्षिकत्वं विवक्षितमित्यदोष इति प्रतिभाति । तवं तु बहुश्रुता विदन्ति ॥ यत्तूच्यते केनचित् - अकामनिर्जराङ्गत्वान्न मिथ्यादृशां किमपि कृत्यमनुमोदनीयमिति । तदसत् मिथ्यादृशामपि प्रकृतिभद्रकत्वादिगुणवतां ' कर्मक्षयो मे भूयाद् इतीच्छया स्वयोग्यशीलतपःप्रभृतिसदनुष्ठान कारिणां सकामनिराsनपायात् । 'सह कामेन मोक्षाभिलाषेण वर्तते या सा सकामा' 'तद्विपरीता त्वकामा' इति हि सकामा कामयोर्निर्जरयोर्लक्षणम् । तदुक्तं योगशास्त्रवृत्तौ (प्र० ४ श्लो० ८६ ) “सा निर्जरा द्वेधा । सह कामेन 'निर्जरा मे भूयाद्' इत्यभिलाषेण युक्ता सकामा, न त्विहलोक परलोक फलादिकामेन युक्ता, तस्य प्रतिषिद्धत्वात् । यदाहुः - "नो इहलोगट्टयाए तवम हिद्विजा, (नो परलोगट्टयाए तब महिडिज, नो कित्तीवण्णसद्दसिलोगट्टयाए तवमहिद्विज, नन्नत्थ निज्जरख्याए तवमहिद्विजा ) इत्यादि ” इत्येका निर्जरा । द्वितीया तु कामवर्जिता कामेन पूर्वोक्तेन वर्जितेति । न च वाच्यं “ ज्ञेया सकामा यमिना -मकामा त्वन्यदेहिनाम् " ॥ ८७ ॥ इत्यनेन योगशास्त्रस्यैव वचनान्तरेण यतीनामेव सकामा निर्जरा सिध्यति मिथ्यादृशां तु कर्मक्षयाद्यर्थं तपःकष्टं तन्वतामप्यकामैवेति ? । ' 64 ' ज्ञेया सकामा यमिनाम् " -- इत्यादिवचनस्योत्कृष्टसकामनिर्जरास्वामिकथनपरत्वाद्, उत्कृष्टा हि सकामनिर्जरा तेषामेव भवेदिति । सटिप्पणा ||खोपच वृतिः ॥ गाथा - ३७ ॥ १३१ ॥ Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा K ॥१३२॥ + AREAM सटिप्पणा ॥खोपड़ चिः ॥ | गाथा-३७ ॥१३२॥ + अन्यथा देशविरतानामविरतसम्यग्दृशां चाकामनिर्जरैव प्रामोति, तेषामपि यमिशब्दाव्यपदेश्यत्वेन विशेषाभावाद् । न चैतदिष्टम् , तस्मादेतद्वचनमुत्कृष्टसकामनिर्जराधिकारिकथनपरमिति न दोषः। किश्च-ज्ञेया सकामेत्यादिश्लोकव्याख्यानेऽप्यकामनिर्जरास्वामिनो निरभिलाषं निरभिप्रायं च कष्टं सहमाना एकेन्द्रियादय एवोक्ताः, न तु बालतपस्व्यादयो मिथ्यादृशोऽपि । तथा हि-"सकामा निर्जराऽभिलाषवता(ती), यमिनां यतीनां विज्ञेया। ते हि कर्मक्षयार्थ तपस्तप्यन्ते । अकामा तु कर्मक्षयलक्षणफलनिरपेक्षा निर्जरा, अन्यदेहिनां यतिव्यतिरिक्तानामेकेन्द्रियादीनां प्राणिनाम् । तथाहि-एकेन्द्रियाः पृथिव्यादयो वनस्पतिपर्यन्ताः शीतोष्णवर्षजलाग्निशस्त्राद्यभिघातच्छेदभेदादिनाऽसद्वेद्य कर्मानुभूय नीरसं तत्स्वप्रदेशेभ्यः परिशाटयन्ति, विकलेन्द्रियाश्च क्षुत्पिपासाशीतोष्णवातादिभिः पञ्चेन्द्रियास्तिर्यञ्चश्च छेदभेददाहशस्त्रादिभिः, नारकाचत्रि विधया वेदनया. मनुष्याश्चक्षुत्पिपासाव्याधिदारिद्रयादिना, देवाश्च पराभियोगकिल्विषत्वादिनाऽसद्वेद्यं कर्मानुभूय स्वप्रदेशेभ्यः परिशाटयन्तीत्येषामकामनिर्जरेति ॥" ममयसारसूत्रवृत्त्योरप्येवमेवोक्तम् (अ०६) तथाहि-"इदानीं निर्जरातत्त्वं निगद्यते-"अणुभूअरसाणं कम्मपुग्गलाणं परिसडणं णिजरा ।" अनुभूतरसानां उपभुक्तविपाकानां कर्मपुद्गलानां, परिशटनमात्मप्रदेशेभ्यः प्रच्यवनं निर्जरा । अथ तस्या भेदावाह-“सा दुविहा पण्णत्ता सकामा अकामा य ।" सह कामेन 'निर्जरा मे भृयाद्' इत्यभिलाषेण न विहपरलोकादिकामेन युक्ता सकामा । अनन्तरोक्तकामवर्जिता त्वकामा । चशब्दः समुच्चये । उपायात्स्वतोऽपि वा फलानामिव कर्मणां पाकस्य भावानिर्जराया इदं द्वैविध्यमिति भावः । तत्राकामा केषाम् | इत्याह-" तत्थ अकामा सव्वजीवाणं" निर्जराभिलाषिणां तपस्तप्यमानानां सकामनिर्जरेति वक्ष्यमाणत्वाद् तद्वयतिरिक्तानां सर्वेषां जीवानामकामा, कर्मक्षयलक्षणाभिलमवर्जितत्वाद् । एतदेव चतुर्गतिगतजन्तुषु व्यक्तीकुर्वन्नाह । तथाहि-"एगिदिआई तिरिआ 5 Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१३३॥ * सटिप्पणा खोपड़ वृतिः ।। गाथा-३७ १३३।। | जहासंभवं छेअ-भेअ-सी-उण्ह-वास-जल-ग्गि-छुहा-पिवासा-कसंकुसाईएहि, नारगा तिविहाए वेअणाए, मणुआ छुहा-पिवासा-वाहि-दालि ६-चारगणिरोहणाइणा, देवा पराभिओग-किब्बिसिअत्ताइणा असायावेअणिज्जं कम्ममणुभविउं पडि(रि)साडिति, तेसिमकामणिज्जरा।" म[एकेन्द्रियादयस्तियश्चो यथासम्भवं छेद-भेद-शीतोष्ण-वर्षा-जलाग्नि-क्षुधा-पिपासा कशा-ऽकुशादिभिः, नारकास्त्रिविधया वेदनया, मनुजाः क्षुधा-पिपासा-व्याधि-दारिद्य-चारकनिरोधनादिना, देवाः पराभियोग-किल्विपिकत्वादिना अशातावेदनीयं कर्मानुभूय प्रति- (परि)शातयन्ति तेषामकामनिजरा ।] "तथा हीति पूर्वोक्तस्यैवोपक्षेपे। छेद-भेद-शीतोष्ण-वर्ष-जला-ग्नि-क्षुधा-पिपासा-कशाङ्कुशादय है। एकेन्द्रियादिषु पञ्चन्द्रियपर्यन्ततिर्यक्षु यथायोग योज्याः। नारकाणां त्रिविधा वेदना क्षेत्रजा-ऽन्योन्योदीरित-परमाधार्मिकजनितस्वरूपा। 'वाहित्ति व्याधिः, चारकनिरोधः कारागारग्रहः। शेष सुबोधम् । सकामनिर्जरामाह-"सकामणिजरा पुण णिजराभिलासीणं अणसणऊणो(ओमो)यरिआ-भिरकायरिय रैसञ्चाय-कायकिलेस-पडिसंलिणआभेयं छव्विहं बाहिरं, पोयच्छित्त-विणअ-यावच्च संसज्झार्यझाण-विउस्सग्गभे छविहमभितरं च तवं तवेंताण।।" [सकामनिर्जरा पुनर्निर्जराभिलाषिणामनशनो-नोदरिका-भिक्षाचर्या-रसत्याग-कायक्लेश-प्रतिसंलीनताभेदं षड्विधं बाह्य, प्रायश्चित्त-विनय-वैयावृत्त्य-स्वाध्याय-ध्यान-व्युत्सर्गभेदं षड्विधमाभ्यन्तरं तपस्तप्यमानानाम् ॥] "निर्जराभिलाषिणामनशनादिभेदं षड्विधं बाह्य, प्रायश्चित्तादिभेदं षद्विधमाभ्यन्तरं च तपस्तप्यमानानां भवति सकामा निर्जरेति संटक इत्यादि ॥" न चात्रापि तपसः सकामनिर्जरारूपत्वप्रतिपादनाद् मिथ्यादृशां च तदभावान सकामनिर्जरेति वाच्यम् , मिथ्याहशामपि मार्गानुसारिणां 'तपश्चा(तच्च चान्द्रायणं कृच्छ्रम्" इत्यादिना ( योगविं० १३१) तपसः प्रतिपादनात् । किञ्च-मार्गानुसार्यनुष्ठानमात्रमेव सकामनिर्जरायां.बीजम् , अविरतसम्यग्दृष्टयनुरोधात् न तु तपोमात्रमेवेति न काप्यनुपपत्तिः । अत एव स्फुटे मोक्षा MAHAऊर Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१३४॥ %E55 सटिप्पणा खोपड़ पूचिः ॥ गाथा-३७ ॥१३४॥ | भिलाषत्वेऽपि मिथ्यादृशां प्रबलासद्ग्रहदोषवतां तदभाववतामादिधार्मिकाणामिव फलतो न सकामनिर्जरा, मार्गानुसार्यनुष्ठानाभावात् , तदभावेऽपि च स्वाभाविकानुकम्पादिगुणवतां मेघकुमारजीवहस्त्यादीनां फलतः साबाधितेति विभावनीयम् । युक्तं चैतत् पश्चस्वनुष्ठानेषु नरेत्वमृतानुष्ठानयोरिव सकामनिर्जराङ्गत्वव्यवस्थितेः। अत एवानुचितानुष्ठानमकामनिर्जराङ्गमुक्तम् । तथा च धर्मबिन्दुसूत्रवृत्तिवचनम् । “अननुष्ठानमन्यदकामनिर्जराङ्गमुक्तविपर्ययादिति" अ०६सू०१५।। अननुष्ठानमनुष्ठानमेव न भवति, 'अन्यद्' विलक्षणमुचितानुष्ठानाद् । तर्हि कीदृशं तती इत्याह-'अकामनिर्जराङ्गम्'अकामस्य निरभिलाषस्य तथाविधबलीवर्दादेखि या निजरा कर्मक्षपणा तस्या अङ्ग निमित्तम् , न तु मुक्तिफलाया निर्जरायाः, कुतः? इत्याह-'उक्तविपर्ययाद्' उदग्रविवेकाभावेन रत्नत्रयाराधनाऽभावादिति।। उचितानुष्ठानं च साध्वादीनां यथा शुद्धचारित्रपालनादिकं, तथा मार्गानुसारिणां मिथ्याशामपि सामान्यतः सदाचारादिकम् , भूमिकाभेदेनौचित्यव्यवस्थानात् , ततोऽधिकारिभेदेन यद् यदोचितमनुष्ठानं तत्तदा साक्षात्पारम्पर्येण वा निर्वाणफलमिति सकामनिर्जराङ्गम् । यच्चानुचितं तदनुचितप्रतिपत्तौ नियमादसदभिनिवेशोज्यत्रानाभोगमात्रादिति ॥” वचनात् अभिनिवेशसहकृतत्वेन है विपरीतफलमिति तत्त्वतोऽकामनिर्जराङ्गमिति मन्तव्यम् । इत्थं च "तओ भणियं नाइलेण, जहा मा वच्छ ! तुम एतेणं परिओसमुवयासु। जहा अहयं आसवारेण परिमुसिओ अकामणिजराए वि किंचि कम्मक्खओ हवइ किं पुण जं बालतवेणं । ता एते बालतवस्सियोदट्टव्वे, जओ णं किञ्चि उस्सुत्तुम्मग्गयारित्तमेएसि य दीसह" । [ततो भणितं नागिलेन, यथा मा वत्स ! त्वमेतेन परितोषमुपयाहि । यथाऽहमश्ववारेण परिमुषितोऽकामनिर्जरयापि किञ्चित्कर्मक्षयो भवति किं पुनर्यद् बालतपसा ? । तस्मादेते बालतपस्विनो द्रष्टव्याः। यतः खलु किश्चिदुत्सूत्रोन्मार्गचारित्वमेतेषां च दृश्यते ।] इत्यादि महानिशीथचतुर्थाध्ययनवचनाद् अकामनिर्जराजन्यात्कर्मक्षयाद् *ECAUSPEECAUCHHUSICR C -%A A CK Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 3 धर्मपरीक्षा ॥१३५॥ बालतपोजन्यस्य तस्य भूयस्त्वसिद्धः । “अणुकंपकामणिजर-बालतवे दाणविणयविन्भंगे।" [अनुकम्पाऽकामनिर्जराबालतपोदानविनयवि &ासटिप्पणा | भङ्गाः ।] इत्यादौ सम्यक्त्वप्राप्तिहेतुपु-"महव्वयअणुब्बएहि य, बालतवोकामणिज्जराए य॥ देवाउअंणिबंधई, सम्मद्दिवी य जो जीवो SIोपण | ॥१॥" [महाव्रताणुव्रतैश्च बालतपोऽकामनिर्जराभ्यां च। देवायुर्निबध्नाति सम्यग्दृष्टिश्च यो जीवः ॥] इत्यादौ देवायुःकारणेषु च भेदे-15 | वृचिः ॥ नाभिधानादकामनिर्जरा-बालतपसो/दो यः प्रोच्यते स स्वरूपभेदं निजनिजफलभेदं चापेक्ष्य बालतपः सर्वमेवाकामनिर्जराङ्गमिति परस्य | गाथा-३७ भ्रान्तिनिरासाय । तत्त्वतस्तु यदुचितानुष्ठानं तन्नाकामनिर्जराङ्गम् , यच्चानुचितानुष्ठानं तन्निर्वाणानङ्गत्वात्फलतो बालतपो वोच्यताम् , ॥१३५॥ अकामनिर्जराङ्ग वा नात्र कश्चिद्विशेष इति युक्तं पश्यामः । किञ्च-मिथ्यादृष्टीनामपि मार्गसाधनयोगा गुणस्थानकत्वाभ्युपगमादेव हरिभद्राचार्यैः प्रदर्शिताः, तथा च तेषामपि सकामनिर्जरायां न बाधकम् , गुणलक्षणायास्तस्याः कुशलमूलत्वात् । तदुक्तं तत्त्वार्थभाष्ये नवमाध्याये-"निर्जरा वेदना विपाक इत्यनान्तरम् । स द्विविधोऽबुद्धिपूर्वः कुशलमूलश्च । तत्र नरकादिषु कर्मफलवि|पाको योऽबुद्धिपूर्वकस्तमवद्यतोऽनुचिन्तयेद् अकुशलानुबन्ध इति । तपःपरिषहजयकृतः कुशलमूलस्तं गुणतोऽनुचिन्तयेत्-शुभानुबन्धो निरनुबन्धो वति । एवमनुचिन्तयन् कर्मनिर्जरणायैव घटते इति ॥" अत्र ह्यकुशलानुबन्धो विपाक इत्यकामनिर्जरायाः कुशलमूलश्च स. कामनिर्जरायाः संज्ञान्तरमेवेति । अथ मिथ्यादृष्टेबुद्धिबुद्धिरेवेति न बुद्धिपूर्विका निजरेति चेद् । न, मार्गानुसारिण्या बुद्धबुद्धित्वेना| पनौतुमशक्यत्वाद् , अन्यथा माषतुषादीनामप्यकामनिर्जराप्रसङ्गात् , तेषां निर्जराया अबुद्धिपूर्वकत्वात्फलतो बुद्धिसद्धावस्य चोभ यत्राविशेषाद् । उचितगुणस्थानपरिणतिसत्त्वे फलतो बुद्धिमत्त्वमबाधितमेवेति । तदुक्तम् (उपदेशपद६०३)"गुणठाणगपरिणामे, संते * तह बुद्धिमपि पाएण ॥ जायइ जीवो तप्फल-मवेक्खमन्ने उ णियमत्ति ॥" गुणविशेषस्य जीवदयादिरूपस्यात्मनि परिणामे सति, 5 +AAR Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परीक्षा ॥३६॥ सटिप्पण ॥ खोपत्र वृतिः ॥ माथा-३० ॥१३॥ तथेति समुच्चये, बुद्धिमानपि युक्तायुक्तविवेचनचतुरशेमुषीपरिगतोऽपि न केवलधर्मसारः सदा भवति, प्रायेण बाहुल्येन, जायते जीवः। महतामप्यनाभोगसम्भवेन कदाचित्कृत्येवबुद्धिमत्त्वमपि कस्यचित्स्यादिति प्रायोग्रहणम् । अत्रैव मतान्तरमाह-तत्फलं बुद्धि मत्त्वफलं स्वर्गापवर्गादिप्राप्तिलक्षणम्, अपेक्ष्यान्ये पुनराचार्याः, नियमोऽवश्यंभावो बुद्धिमत्त्वस्य अनाभोगेऽपि गुणस्थानपरिणतौ सत्यामिति ब्रुवते । अयमभिप्रायः–'सम्पन्ननिव्रणव्रतपरिणामाः प्राणिनो जिनभणितमिदमिति श्रद्दधानाः क्वचिदर्थेऽनाभोगबहुलतया प्रज्ञापकदोषाद् वितथश्रद्धानवन्तोऽपि न सम्यक्त्वादिगुणभङ्गभाजो जायन्ते । यथोक्तम् ( उत्तराध्ययननियुक्ति) “सम्मघवी जीवो, उवइ8 पवयणं तु सद्दहह ॥ सद्दहइ असम्भावं, अयाणमाणो गुरुणिओगा ॥१६३॥" [सम्यग्दृष्टिर्जीव उपदिष्टं प्रवचनं तु श्रद्दधाति । श्रद्दधात्यसद्भावमजानन् गुरुनियोगात् ॥] इति ॥ बुद्धिमत्त्वे सति ते व्रतपरिणामफलमविकलमुपलभन्त एवेति । यथा च सम्यग्दृष्टयादिगुणस्थानावान्तरपरिणतितारतम्येऽपि बुद्धिमत्त्वसामान्यफलाभेदस्तथा मार्गानुसारिणां मिथ्यादृशां मिथ्यात्वगुणस्थानावान्तरपरिणति| तारतम्येपि । अत एवापुनर्बन्धकादीनामादित एवारभ्यानाभोगतोऽपि 'सदन्धन्यायेन' मार्गगमनमेवेत्युपदिशन्त्यध्यात्मचिन्तकाः । यत्तु मिथ्यादृशां सकामनिर्जरासम्भवे सम्यग्दृष्टिमिथ्यादृष्टयोरविशेषप्रसङ्ग इति केनचिदुच्यते, तदसत् । एवं सति मिथ्यादृष्टयादीनां सयोगिकेवलिपर्यन्तानां शुक्ललेश्यावत्त्वेनाविशेषप्रसङ्गात् । अवान्तरविशेषान्न तदविशेष इति चेत् ? । सोऽयं प्रकृतेऽपि तुल्यः, सम्यग्दृष्टिनिर्जराऽपेक्षया मिथ्यादृष्टिनिर्जराया अल्पत्वस्याभ्युपगमादिति यथाशास्त्रं भावनीयम् ।। ३७ ॥ नन्वेवं मिथ्यादृशां गुणानुमोदनेन परपाखण्डिप्रशंसालक्षणः सम्यक्त्वातिचारः स्यादित्याशङ्कां परिहर्तुमाह| परपाखंडिपसंसा, इहई खलु कोवि णेवमइआरो ॥ सो तम्मयगुणमोहा, अणवत्थाए व होजाहि ॥ Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१३७॥ सटिप्पणा खोपड़ वृत्तिः ।। गाथा-३८ ॥१३७॥ ॐUAR 33+15+SAHAK [परपाखण्डिप्रशंसा, इह खलु कोऽपि नैवमतिचारः ॥ स तन्मतगुणमोहाद् , अनवस्थया वा भवेद् ॥ ३८ ॥] परपाखंडिपसंमत्ति । एवमुक्तप्रकारेण, इह मार्गानुसारिगुणानुमोदने, परपाखण्डिप्रशंसा तिचारः, कोऽपि न स्यात् । यतः स परपाखण्डिप्रशंसातिचारः तन्मताः परपाखण्डिमात्रसंमता ये गुणा अग्निहोत्रपञ्चाग्निसाधनकष्टादयस्तेषु मोहोज्ञानं तत्त्वतो जिनप्रणीततुल्यत्वादिमिथ्याज्ञानलक्षणं ततो भवेत् , 'परपाखण्डिनः परदर्शनिनः तेषां प्रशंसा' इत्यत्र व्युत्पत्तावर्थात् पाखण्डताऽवच्छेदकधर्मप्रशंसाया एवातिचारत्वलाभाद् । यथा हि 'प्रमादिनो न प्रशंसनीयाः' इत्यत्र प्रमादिनां प्रमादितावच्छेदकधर्मेणाप्रशंसनीयत्वं लभ्यते, न त्वविरतसम्यग्दृष्टयादीनां सम्यक्त्वादिनापि, 'तथा पाखण्डिनो न प्रशंसनीयाः' इत्यत्रापि पाखण्डिनां पाखण्डतावच्छेदकधर्मेणैवाप्रशंसनीयत्वं लभ्यते, नतु मार्गानुसारिणां क्षमादिगुणेनापि । अभिनिवेशविशिष्टक्षमादिगुणानामपि पाखण्डतावच्छेदकत्वमेवेति तद्रूपेण प्रशंसायामप्यतिचार एव । अत एवोग्रकष्टकारिणामप्याज्ञोल्लङ्घनवृत्तीनां प्रशंसाया दोषावहत्वमुक्तं तेसिं बहुमाणेणं, उम्मग्गणुमोअणा अणिट्ठफला । तम्हा तित्थयराणा-ठिएसु जुत्तोत्थ बहुमाणो॥३९॥पंचाशक ११९ ॥(तेषां बहुमानेनोन्मार्गानुमोदनाऽनिष्टफला। वस्मात्तीर्थकराज्ञास्थितेषु युक्तोत्र बहुमानः ॥) इत्यादिना श्रीहरिभद्रसूरिभिः । वा अथवा, अनवस्थया मार्गभ्रंशलक्षणया, | अतिचारो भवेद् । मुग्धपर्षदि क्षमादिगुणमादायापि मिथ्यादृष्टिप्रशंसायां परदर्शनिभक्तत्वप्रसङ्गादेकैकासमञ्जसाचाराद् , एवं मार्गोच्छेदापत्तेः । अत एवाभिमुख मुग्धपर्षद्गतस्य परपाखण्डिसम्बन्धिकष्टप्रशंसादिना महानिशीथे परमाशर्मिकमध्योत्पत्तिरुक्ता । तथा च तत्पाठः “जे भिक्खू वा भिक्खुणी वा परपासंडीणं पसंसं करेजा, जे यावि णं णिण्हवाणं पसंसं करेजा, जेणं णिण्हवाणं आययणं ट्र पविसेजा, जे णं णिण्हवाणं गंथ सत्थ-पय-क्खरं वा परूवेजा, जे णं णिण्हवाणं संतिए कायकिलेसाइए तवे इ वा संजमे इ वा नाणे इ Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१३८॥ --AAAAA% वा विन्नाणे इ वासुए इवा पंडित्ते इ वा अभिमुहमुद्धपरिसागए सिलाहेजा सेवि यण परमाहम्मिएसु उववज्जेजा, जहा सुमतित्ति"॥ (यो भिक्षुर्वा भिक्षुकी वा परपाखण्डिनां प्रशंसां कुर्यात् , योऽपि च निलवानां प्रशंसां कुर्यात् , यः खलु निह्नवानामायतनं प्रविशेत् , यः सटिप्पणा खलु निवानां ग्रन्थशास्त्रपदाक्षरं वा प्ररूपयेत् , यः खलु निवानां सत्कान् कायक्लेशादीन् तपो वा संयम वा ज्ञानं वा विज्ञानं वा ॥खोपड़ श्रुतं वा पाण्डित्यं वा अभिमुखमुग्धपर्षद्गतः श्लाघयेत् सोऽपि च परमाधार्मिकेषु उपपद्येत, यथा सुमतिरिति ॥) तथा च यः खस्य वृचिः ॥ परेषां च गुणानुरागवृद्धिकारणमवगम्यैव जिनप्रणीतक्षमादिगुणगणमादाय मार्गानुसारिणां मिथ्यादृशां प्रशंसां करोति तस्य न दोषग गाथा-३९ |॥१३८॥ न्धोऽपि, प्रत्युत 'अहो सकलगुणसारं जिनप्रवचनम्', इति धर्मोन्नतिरेव स्यादिति भावः ॥ ३८ ॥ अथ भवन्तु मिथ्यादृशामपि केपि केपि गुणास्तथापि हीनत्वादेव ते नानुमोद्या इत्याशङ्काशेष निराकर्तुमाह| जइ हीणं तेसि गुणं, सम्मत्तधरो ण मन्नइत्ति मई ॥ ता कस्सवि सुहजोगं, तित्थयरो णाणुमन्निज्जा ॥३९॥18 ['यदि हीनं तेषां गुणं, सम्यक्त्वधरो न मन्यते इति मतिः ॥ ततः कस्यापि शुभयोगं, तीर्थकरो नानुमन्येत ॥ ३९ ॥] जह हीणंति । यदि हीनं तेषां मिथ्यादृशां, गुणं क्षमादिकं, न मन्यते नानुमन्यते, सम्यक्त्वधरः, उत्कृष्टपदत्वादिति तव मतिः स्यात् , तदा कस्यापि शुभयोगं तीर्थकरो नानुमन्येत, तीर्थकरापेक्षया सर्वेषामपि छद्मस्थानामधस्तनस्थानवर्तित्वात् । न चैतदिष्टम् , तत उपरितनगुणस्थानस्थानामपि सर्व मार्गानुसारिकृत्यमनुमोदनीयमेव । यच्च सम्यक्त्वगुणविशेषप्रदर्शनार्थ मिथ्यादृग्गु-हू णमात्रस्य शास्त्रेऽकिञ्चित्करत्वप्रतिपादनं नैतावता सर्वथा तद्विलोप एव सिध्यति, चारित्रगुणविशेषप्रदर्शनार्थ (आवश्यके) "दसारसीहस्स य सेणियस्स, पेढालपुत्तस्स य सच्चईस्स ॥ अणुत्तरा दंसणसंपया सिया, विणा चरित्तेण हरंगई गया ॥११७२॥"(दशारसिंहस्य बाब AAAAAAAN Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१३९॥ सटिप्पणा स्वोपड वृतिः ॥ * गाथा-४० ॥१३९॥ च श्रेणिकस्य पेढालपुत्रस्य च सत्यकः । अनुत्तरा दर्शनसम्पदासीद्विना चारित्रेणाधरां गतिं गता।।) इत्यादिना सम्यक्त्वस्यापि तत्प्रति पादनादिति द्रष्टव्यम् ॥३९॥ तदेवमन्येषामपि मार्गानुसारिगुणानामनुमोद्यत्वसिद्धौ ‘सम्यग्दृशाज्येषां गुणा नानुमोद्या एवं' इत्युत्सूत्रं त्यक्तव्यम् , स्तोकस्याप्युत्सूत्रस्य महानर्थहेतुत्वादित्युपदेशमाहता उस्सुत्तं मोत्तुं, अणुमोइज्जा गुणे उ सव्वेसि ॥ जं थोवा वि तओ (लह), लहेज दुख्खं मरीइव्व ॥४०॥ [तत उत्सूत्रं मुक्त्वाऽनुमोदेत गुणान् सर्वेषां तु । यत्स्तोकादपि ततः (लघु) लभेत दुःख मरीचिरिव ॥ ४० ॥] ता उस्सुत्तंति । तत् तस्मात्कारणात , उत्सूत्रं मुक्त्वा , तुरेवकारार्थः, स च सर्वेषाम् इत्यनन्तरं योज्यः सर्वेषामेव गुणाननुमोदेत; भव्य इति शेषः । यद्यस्मात् , स्तोकादपि ततः उत्सूत्रात् , मरीचिरिब दुःखं लभेत । मरीचिहि "कविला इत्थंपि इहयंपि" ( कपिल ! इत्थमपीहापि । ) इति स्तोकादप्युत्सूत्रात्सागरोपमकोटाकोटीमानसंसारपरिभ्रमणजन्यदुःखं लब्धवान् , ततो यो मार्गानुसार्यनुमोदनां लुम्पन्नुत्सूत्रसहस्रवादी तस्य किं वाच्यमिति भावः।। अत्र केचिदाहु:-"मरिचिरुत्सूत्राद् दुःख लब्धवानिति वयं Pान सहामहे, उत्सूत्रस्य नियमतोऽनन्तसंसारकारणत्वात् , तेन चासंख्येयसंसारार्जनात् , तत उत्सूत्रमिश्रितमेवेदं मरीचिवचनं, नतूत्सूत्र8| मिति प्रतिपत्तव्यम् । तथा हि-साधुधर्मे द्विरुक्तेऽपि साधुधर्मानभिमुखेन कपिलेन 'युष्मत्समीपे कश्चिद्धर्मोऽस्तीति' पृष्टे, आवश्यक. त्यभिप्रायेण तु 'भवद्दर्शने किञ्चिद्धर्मोस्तीति' पृष्टे, 'अहो! अयं प्रचुरकर्मा द्विरुक्तोऽपि साधुधर्मानभिमुखो मदुचितः सहायः संवृत्त' इति विचिन्त्य मम देशविरतिधर्मोस्तीत्यभिप्रायेण मनागिहाप्यस्तीति मरीचिरक्तवान् । तत्र मरीचेर्यदि देशविरतिविमर्शना नाभविध्यत् तर्हि मनागिति नाभणिष्यम् । एतद्वचनं परिव्राजकवेषे सति परिव्राजकदर्शने किञ्चिद्धर्मव्यबस्थापकं सम्पन्नम् । इह शब्दस्यास्पष्टा CINESCORCHECIAL Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ४ार्थवाचकत्वेन श्रोतुः कपिलस्य परिव्राजकदर्शनेऽपि किश्चिद्धर्मोस्तीत्यवबोधात् , अन्यथा कपिलः परिव्राजकवेषं नाग्रहीष्यत् , तस्य धर्मचिकीर्षचैव तद्वेषोपादानात् , राजपुत्रत्वेनान्यकारणासम्भवात् , ततश्च कापिलीयदर्शनप्रवृत्तिः । सा च कपिलस्य मरीचेरन्येषां च महानर्थकारणम् , कुप्रवचनरूपत्वात् । तदेवम्भूतं वचनमुत्सूत्रमिश्रं, मरीच्यपेक्षया सूत्रत्वेऽपि कपिलापेक्षया उत्सूत्रत्वात् । मम पार्श्वे मनाम् धर्मोऽस्तीति देशविरतस्य मरीचेरभिप्रायान्मरीच्यपेक्षया हि सत्यमेवैतत् , परिव्राजकदर्शने मनाग धर्मोऽस्तीति कपिलस्य बुद्धिजनकत्वेन कपिलापेक्षयाचासत्यरूपमेवेति।।" तदसत्, उत्सूत्रकथनाभिप्रायेण प्रवृत्तस्यास्य वचनस्य मायानिश्रितासत्यरूपस्योत्सूत्रत्वाद् । आपेक्षिकसत्यासत्यभावाभ्यामुत्सूत्रमिश्रितत्वाभ्युपगमे च भगवद्वचनस्यापि तथात्वप्रसङ्गात् । तदपि हि भगवतस्तद्भक्तानां चापेक्षया सत्यं पाखण्डिनां चापेक्षयाऽसत्यमिति । अथ भगवता वचनं परस्यासत्यबोधाभिप्रायेण न प्रयुक्तमिति नोत्सूत्रम् , मरीचिना तु प्रकृतवचनं कपिलस्यासत्यबोधाभिप्रायेणैव प्रयुक्तम् । स ह्येवं ज्ञातवान्-पतन्मद्वचनं कपिलस्य परिव्राजकदर्शने धर्मबुद्धिजनकं भविष्यतीत्येवमेवार्य बोधनीय इति, कथमन्यथाऽस्य परित्राजकवेषमयमदास्यद्? इति महद्वैषम्यमिति चेत् । हन्त तहिं उत्सूत्रमेवेदं प्राप्तमिति गतमुत्सूत्रमिश्रेण । द्रव्यतोऽसत्यस्य किशलयपाण्डुपत्राद्युल्लापरूपसूत्रवचनस्येव द्रव्यतः सत्यस्य प्रकृतवचनस्योत्सूत्ररूपस्यापि मिश्रत्वायोगात् , शुद्धाशुद्धद्रव्यभावाभ्यां मिश्रत्वाभ्युपगमे जिनपूजादावपि मिश्रपक्षाभ्युपगमप्रसङ्गाच्च । अथ देशविरत्यभिप्रायेण मदपेक्षया मया सत्यं वक्तव्यम् , परिव्राजकवेषाभिप्रायेण कपिलापेक्षया त्व(चा)सत्यमित्येवं भावभेदादेवेदमुत्सूत्रमिश्रमिति चेत् , न, एतादृशभावयोरेकदाऽसम्भवात् , उपयोगद्वययोगपद्याभ्युपगमस्यापसिद्धान्तत्वाद् । एक एवायं समूहालम्बनोपयोग इति चेत् , तर्हि केन कस्य मिश्रत्वम् । नियमतः पदार्थद्वयापेक्षयैतदिति विषयभेदादेकत्रापि मिश्रत्वमिति चेत् , तर्हि गतं केव सटिप्पणा ॥खोपत्र वृतिः ॥ गाथा-४. ॥१४॥ 345454305 +LOAUGAT Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१४॥ | सटिप्पणा | ॥खोपड़ वृत्तिः ॥ गाथा-४. ॥१४॥ लेनोत्सूत्रेण, सर्वस्याप्यसत्याभिप्रायस्य धयंशे सत्यत्वात् " सर्व ज्ञानं धर्मिण्यभ्रान्तं प्रकारे तु विपर्ययः" इति शास्त्रीयप्रवादप्रसिद्धेः। तर्हि प्रकारभेदादस्तु मिश्रत्वम् ,एकत्रैव वचने सत्यासत्यबोधकत्वावच्छिन्नप्रकारभेदोपरक्ताभिप्रायोपश्लेषादुत्सूत्रमिश्रत्वसम्भवा| दिति चेत् । न, सूत्रकथनांशेऽभिप्रायस्य प्राबल्येऽनुत्सूत्रस्योत्सूत्रकथनांशे तत्प्राबल्ये चोत्सूत्रस्यैव सम्भवान्मिथ्याव्यपदेशेन मिश्रस्या नवकाशाद् । अन्यथा 'क्रियमाणं न कृतम्' इत्यंशेऽसत्यं प्रतिपादयामि इतरांशे च सत्यमिति मिथ्याव्यपदेशेन वदतो जमाल्यनुसारिणोऽपि नोत्सूत्रं स्यात् किन्तूत्सूत्रमिश्रमिति महदसमञ्जसम् । अपि च-इदं मरीचिवचनमुत्सूत्रमिश्रमिति वदता मूलत एव जैनी प्रक्रिया न ज्ञाता । यतः सूत्रोत्सूत्रव्यवस्था तावच्छ्रुतभावभाषामाश्रित्य क्रियते । सा च सत्यासत्यानुभयरूपत्वात् त्रिविधैव दशवकालिकनियुक्त्यादिसिद्धान्तप्रतिपादिता । पराभिप्रायेण तु मिश्ररूपाया अपि तस्याः सिद्धौ भगवद्भद्रबाहुक्तविभागव्याघातप्रप्रसङ्ग इति न किश्चिदेतत् । इत्थं च मरीच्यपेक्षया मरीचेरनुत्सूत्रमेवेदं वचनं कपिलापेक्षया च विपर्यासबुद्धिजनकत्वज्ञानपीत्थमुच्यमानमेतद्वचनं ममोत्सूत्रमिति परिज्ञानाभावात्कथञ्चिदनाभोगहेतुकमुत्सूत्रमिति वदतो माता च मे वन्ध्या चेति न्यायापात इति द्रष्टव्यम् । किश्च- तस्योत्सूत्राभोगो नासीदित्यपि दुःश्रद्धानम् , व्युत्पन्नस्य तस्य तादृशास्पष्टवचनेऽप्युत्सूत्रत्वप्रत्ययावश्यकत्वाद् । न च साधुभक्तस्य तस्य तथोत्सूत्रभाषणमसम्भव्येवेति शङ्कनीयम् , कर्मपरिणतेविचित्रत्वाद् । अस्पष्टत्वं च तत्राभिमतानभिमतविधिनिषेधावधारणाऽक्षमत्वलक्षणं न, उत्सूत्राभोगाभावात् किन्त्वनभिमतनिषेधांशे देशविध्यारोपप्रयोजकतथाविधसङ्क्केशात् । अत एव स्फुटा प्ररूपणमप्यस्यास्पष्टताख्यजातिविशेषशालिन्युत्सूत्रप्ररूपण एव पर्यवस्यति । तदुक्तं पाक्षिकसप्ततिकावृत्ती-"उत्सूत्रप्ररूपणायाः संसारहेतुत्वात् । यथोक्तम् - "फुडपागडमकहतो, जहडिय बोहिलाभमुवहणइ । जह भगवओ विसालो, जरामरणमहोअही आसि ॥"त्ति। Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१४२॥ सटिप्पणा ॥खोपक्ष | वृति ॥ माथा-. ॥१४॥ ३ उपदेशमाला १०६ [स्फुटप्रकटमकथयन् यथास्थितं बोधिलाभमुपहन्ति । यथा भगवतो विशालो जरामरणमहोदधिरासीत् ॥१॥]" किश्च-इहर्ति देशविरत्यभिप्रायेण वोक्तमिति कुतो निर्णीतम् । उपदेशमालावृत्तौ "कपिल ! इहान्यत्रापीति" मत्सम्बन्धिनि साधुसम्बन्धिनि चानुष्ठाने धर्मोऽस्तीति भणनात् । न च तत्र 'साधुसम्बन्धिनि' इति भणनेन 'मत्सम्बन्धिनि देशविरत्यनुष्ठाने धर्मोऽस्ति' इत्वेवाभिप्राय इति वाच्यम्॥"जिनधर्मालसं ज्ञात्वा, शिष्यमिच्छन् स तं जगौमार्गे जैनेऽपि धर्मोऽस्ति,मम मार्गेऽपि विद्यते॥१॥"इति हैमवीरचरित्रवचनात्वमार्गेऽपि तेन धर्माभिधानात् । स्वमार्गश्च तस्य स्वपरिगृहीतलिङ्गाचारलक्षणं कापिलदर्शनमेव । तत्र च मार्गे नियतकारणताविशेषसम्बन्धेन धर्ममात्रमेव नास्ति कुतो देशविरत्यनुष्ठानम् ? इत्युत्सूत्रमेवैतदिति । अनियमाभिप्रायेण त्वस्योत्सूत्रपरिहारेऽन्यलिङ्गादिसिद्धाभ्युपगमाचारित्रादेरपि तत्राभ्युपगमापत्तिरिति न किञ्चिदेतत् । एतेन कविला इत्थंपित्ति अपिशब्दस्यैवकारार्थत्वान्निरुपचरितः खल्वत्रैव साधुमार्गे 'इहयंपि'त्ति खल्पस्त्वत्रापि विद्यते । स ह्येवमाकर्ण्य तत्सकाश एव प्रबजितः । मरीचिनाऽप्यनेन दुर्वचनेन संसारोऽभिनिर्वर्तित इति ज्ञानसागरसूरिवचनमपि व्याख्यातम्॥तत्रापि मार्गभेदाभिप्रायेणैव धर्मभेदाभिधानाद् । न हि | साधुश्रावकयोर्मार्गभेदेन धर्मभेदः सम्भवदुक्तिकोऽपीति विचारणीयम् । यत्तु मरीचिवचनमिदमावश्यकनियुक्तौ'दुर्भाषितमेवोक्तंन तूत्सूत्रमिति' नेदमुत्सूत्रं वक्तव्यमिति केनचिदुच्यते । तदसत् ,दुर्भाषितपदस्यानागमिकार्थोपदेशे रूढत्वात् ,तदुत्सूत्रताया व्यक्तत्वात् । तदुक्तं१२ पञ्चाशकसूत्रवृत्त्योः -"संविग्गोणुवएसं, ण देइ दुब्भासियं कडुविवागं । जाणतो तंमि तहा, अतहकारो उ मिच्छत्तं ॥१७॥" व्याख्या-संविग्नो भवभीरुर्गुरुः, अनुपदेशं नञः कुत्सितार्थत्वेन कुत्सितोपदेशमागमबाधितार्थानुशासनं, न ददाति-परस्मै न करोति, तद्दाने संविग्नत्वहानिप्रसङ्गात् । किम्भूतः सन् ? इत्याह-दुर्भाषितमनागमिकार्थोपदेशं, केटुविपाकं दारुणफलं दुरन्तसंसा AAAAAAACK Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ १४३॥ रावहं मरीचि भवे महावीरस्येव, जानन् – अवबुध्यमानः । को हि पश्यन्ने वात्मानं कूपे क्षिपतीत्यादि ।।" तथा श्रावक दिनकृत्यवृतावप्युक्तम्- "विपरीतप्ररूपणा उन्मार्गदेशना । इयं हि चतुरन्तादभ्रभवभ्रमणहेतुर्मरीच्यादेरिवेति ||" धर्मरत्नप्रकरणसूत्रवृ श्योरप्युक्तम् "अइसाहसमेथं जं, उस्सुत्तपरूवणा कडुविवागा । जाणतेहि वि दिजइ, णिद्देस्सो सुतबज्झत्थे ॥१॥” “ज्वलज्ज्वालानल प्रवेशकारिनरसाहसादप्यधिकमति साहसमेतद्वर्तते, यदुत्सूत्रप्ररूपणा (णाः ) – सूत्र निरपेक्ष देशना (नाः) कटुविपाका दारुणफला, जानानैः अवबुध्यमानैः, अपि, दीयते वितीर्थते, निर्देशो निश्चयः, सूत्र बाह्ये- जिनेन्द्रा (जिनागमा) नुक्ते, अर्थे - वस्तुविचारे । किमुक्तं भवति “दुब्भासिएण इक्केण, मरीई दुक्खसागरं पत्तो ॥ भमिओ कोडाकोडी, सागरसरिणामधिजाणं । आव ०४३८॥ उस्सुतमायरंतो, बंधइ कम्मं सुचिकणं जीवो । संसारं च पवड्डर, मायामोसं च कुव्वइ य || उपदेशमा० २२१|| [दुर्भाषितेनैकेन मरीचि - दुःखसागरं प्राप्तः । भ्रान्तः कोटाकोटीसागरसह ग्नामधेयानाम् || उत्सूत्रमाचरन् बध्नाति कर्म सुचिकणं जीवः । संसारं च प्रवर्धयति | मायामृषां च करोति च ॥ १ ॥ |] उम्मग्गदेसओ मग्ग - णासओ गूढहिययमाइलो ।। सढसीलो अ ससल्लो, तिरिआउं (अआउं - गई) बंधइ (ए) जीवो || पंचव० १६५५ ।। उम्मग्गदेसणाए, चरणं णासंति जिणवरिंदाणं || वावण्णदंसणा खलु, न हु लब्भा तारिसा दद्धुं ॥ प्रव चनसा० ६४६||" [उन्मार्गदेशको मार्गनाशको गूढहृदयमायावान् । शठशीलच सशल्यः तिर्यग्गतिं (गायुः) बध्नाति जीवः ॥ उन्मार्गदेशनया चरणं नाशयन्ति जिनवरेन्द्राणाम् । व्यापन्नदर्शनाः खलु नैव लभ्यास्तादृशा द्रष्टुं ||] इत्या ( द्या) गमबचनानि श्रुत्वाऽपि स्वाग्रहग्रस्तचेतसो यदन्यथाऽन्यथाऽव्याचक्षते विदधति च तन्महासाहसमेव, अनवक्पारासारसंसारापारपारावारोदरविवरभाविभूरिदुःख| भाराङ्गीकारादिति । तथा श्राद्धविधिवृत्तावप्याशातनाधिकारे प्रोक्तम् -- " एतासु चोत्सूत्र भाषणार्हद्गुवद्यिवज्ञादिर्महत्याशात सटिप्पणा ॥ स्वोपच वृतिः ॥ गाथा-४० ॥१४३॥ Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ १४४ ॥ नाऽनन्तसंसारहेतुश्च सावद्याचार्य - मरीचि - जमालि-कूलवालकादेवि । यतः — उस्सुतवासगाणं, वोहिणासो अनंतसंसारो ॥ पाणच्चएवि धीरा, उस्सुत्तं ता ण भासति ॥ १ ॥ तित्थयरपवयणसुअं, आयरिअं गणहरं महिड्डीयं ।" इत्यादि ।। [उत्सूत्र भाषकानां बोधिनाशोऽनन्तसंसारः । प्राणत्यागेऽपि धीरा उत्सूत्रं ततो न भाषन्ते । तीर्थकरं प्रवचनं श्रुतमाचार्य गणधरं महर्द्धिकञ्च । ] तथा योगशास्त्रवृत्तावप्युक्तम् — "भगवानपि हि भुवनगुरुरुन्मार्गदेशनात्सागरोपमकोटा कोटी यावद्भवे भ्रान्तस्तत्काऽन्येषां स्वपापप्रतीकारं कर्तुमशक्नुवतां गतिरिति । तथा तत्रैव — “ अल्पादपि मृपावादाद् " इत्यस्य व्याख्यायाम्, अल्पस्यापि मृषावादस्य महानर्थहेतुत्वे संमतिवचनमिदमुपदर्शितम् — अहह सयलन्नपावा, वितहपन्नवणमणुमवि दुरंतं ॥ जं मरीइभवउवज्जियदुक्कय अवसेसलेसवसा ||१|| सुरथुअगुणो वि तित्थं-करो वि तिहुअणअतुल्लमल्लो वि ।। गोवाईहिं वि बहुसो, कयत्थिओ तिजयपहू तं सि ॥ २ ॥ त्ति | गोवंभणभूणंतगावि, केइ इह दढप्पहाराई | बहुपावा वि य सिद्धा, सिद्धा किर तंमि चैव भवे || ३ || "त्ति । [ अहह सकलान्यपापाद् वितथप्रज्ञापनमण्वपि दुरन्तम् । | यन्मरीचिभवोपार्जितदुष्कृतावशेषलेशवशात् ॥ सुरस्तुतगुणोऽपि तीर्थंकरोऽपि त्रिभुवने अतुल्यमल्लोऽपि गोपादिभिरपि बहुशः कदर्थितस्त्रिजगत्प्रभुस्त्वमसि ।। गो-ब्राह्मण-भ्रूणान्तका अपि केचिदिह दृढप्रहार्यादयः । बहुपापा अपि च सिद्धाः सिद्धाः किल तस्मिन्नेव भवे ।।] तथोपदेश रत्नाकरेऽपि प्रोक्तम् - " तथा केषाञ्चिदेशना पुनः प्रस्तावौचित्यादिसर्वगुणसुभगा परं केवलेनोत्सूत्रप्ररूपणदूषणेन कलिता, साऽपि पुरनिर्द्धमनजलतुल्या, अमेध्यलेशेन निर्मलजलमिवोत्सूत्र लेशप्ररूपणेनापि सर्वेऽपि गुणा यतो दूषणतामिव भजन्ति, तस्य विषमविपाकत्वाद् । यदागमः- “दुब्भासिएण इक्केण" इत्यादि । तथा तत्रैव प्रदेशान्तरे प्रोक्तम् - "केचिद् गुरव आलम्बनं विनैव सततं बहुतरप्रमादसेवितया कुचारित्रिणः देशनायामप्यचातुर्यभृतश्च यथा तथाविधाः पार्श्वस्थादयः, यथा वा मरीचिः יין सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ चिः ॥ गाथा-४० ॥ १४४ ॥ Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ १४५ ॥ "कविला इत्थपि इयंपि” इत्यादिदेशनाकृद् । “देशनाचातुर्य (सौभाग्यं) चोत्सूत्रपरीहारेण सम्यक् सभाप्रस्तावौचित्यादिगुणवत्त्वेन च ज्ञेयं ॥" (तट १ अंश २ तरंग ११) इत्यादि । यत्तु कश्चिदाह - उत्सूत्रलेशवचनसामर्थ्यादेव प्रतीयते मरीचेर्वचनं न केवलमुत्सूत्रं किन्तु त्सूत्रमिश्रमिति । तन्न, एवं सति "जो चैव भावलेसो, सो चेव भगवओ बहुमओ उ ॥ ३३ ॥ त्ति [यश्चैव भावलेशः स एव भगवतो बहुमतस्तु।] षष्ठपञ्चाशकवचनाद् ॥ य एव, भावलेशो भगवद्बहुमानरूपो द्रव्यस्तवाद् भवति, स एव भगवतो मुख्यवृस्याऽनुमत इत्यर्थप्रतीतौ तत्र भावलेशस्याभावमिश्रितस्य भगवद्बहुमतत्वापत्तेः; तस्माल्लेशपदमपकर्षाभिधायकं न तु मिश्रितत्वाभिधायकमिति मन्तव्यं । स्यादयमभिप्रायः - धर्मस्यापि ह्यशुभानुबन्धादिति, आह - " धम्मो वि सबलओ होइ " [धर्मोऽपि शबलो भवति ।] | इत्यादिना शास्त्र शबलत्वमुच्यते शबलत्वं च मिश्रत्वमेव मरीचिवचनस्यापि कुदर्शनप्रवृत्त्याऽशुभानुबन्धान्मिश्रत्वमविरूद्धं, कुदर्शनप्रवृत्तेरेव तस्य संसारवृद्धिहेतुत्वे नावश्यकचूर्णायुक्तत्वादिति । सोऽयं दुरभिप्रायः, यतः इत्थं सति फलत एवेदमुत्सूत्रं स्याद् न तु स्वरूपतः, उच्यते स्वरूपतोऽपीदमुत्सूत्रं, उत्सूत्रत्वादेव च संसारहेतुरिति, यत्किश्चिदेतत् । अत एव श्राद्धप्रतिक्रमणसूत्र चूर्णावपि "पडिसिद्धाणं करणे " इति व्याख्याने विपरीतप्ररूपणा विविच्य तत्कृताशुभफलभागित्वेन मरीचिरेव दृष्टान्ततयोपदर्शितः । तथा हि"विवरीअपरूवणाए य"त्ति, चशब्दः पूर्वापेक्षया "विवरीअं वितहं उस्सुतं भण्णइ, परूवणा पनवणा देसनत्ति णे पजाया" [विपरीतं वितथं उत्सूत्रं भण्यते, प्ररूपणा प्रज्ञापना देशनेति एषां पर्यायाः ।] विपरीता चासौ प्ररूपणा च विपरीतप्ररूपणा तस्यां सत्यां प्रतिमणं भवति । सा चैवरूपा - "सिअवायमए समए, परूवणेगंतवायमहिगिच्च ॥ उस्सग्ग-ववायाइसु, कुग्गहरूवा मुणेयव्वा ॥ १ ॥ पिंड असोहयंतो, अचरित्ती इत्थ संसओ णत्थि । चारितंमि असंते, सव्वा दिक्खा निरत्थिया ||२|| एवं उस्सग्गमेव केवलं पण्ण सटिप्पणा ॥ खोपड चिः ॥ गाथा-४० ॥१४५॥ Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 8/ वेइ ॥ अववायं च-"चेइअपूऔकजा, जइणा वि हु वयरसामिणव्व किल ।। अनियसुअसूरीण ब, नीआवासे वि न हु दोसो॥३॥" धर्मपरीक्षा TARA [स्थाद्वादमये-समये प्ररूपणैकान्तवादमधिकृत्य । उत्सर्गापवादादिषु कुग्रहरूपा ज्ञातव्या॥ पिण्डमशोधयन्नचारित्री अत्र संशयो नास्ति। सटिप्पणा ॥१४६॥ खोपक्ष चारिबेऽसति सर्वा दीक्षा निरर्थका ॥ एवमुत्सर्गमेव केवलं प्रज्ञापयति । अपवादं च-चैत्यपूजा कार्या यतिनापि खलु वज्रस्वामिनेव वृतिः ॥ क्किल । अनिकासुतमरिण इव नित्यावासेऽपि नैव दोषः॥३॥] तहा-"लिंगावसेसमित्तेवि, वंदणं साहुणा वि दायव्वं ॥ 'मुक्कधुरा गाथा-४० संपागड-सेवी' इच्चाइ वयणाओ॥१॥"अहवा-लिङ्गावशेषमात्रेऽपि वन्दनं साधुनाऽपि दातव्यम् । 'मुक्तधूः संप्रकटसेवी' इत्यादि वच- ॥१४६॥ नात् ॥ अथवा] पासत्थो-सन्न-हाछंदे, कुसीले सबले तहा । दिट्ठीए वि इमे पंच, गोयमा न निरिक्खए ॥१॥ जो जहावायं न कुणइ, मिच्छद्दिवी तओ हु को अन्नो। वड्डेइ य मिच्छत्तं, परस्स संकं जणेमाणो॥२॥ (पिंडनि गा०१८६ उपदेशमा०५०४)[पार्श्वस्थो-त्सन्नयथाछन्दाः कुशीलः शबलस्तथा। दृष्टयाऽपि इमान् पश्च गौतम!न निरीक्षेत।। यो यथावादं न करोति मिथ्यादृष्टिस्ततः खलु कोऽन्यः। | वर्द्धयति च मिथ्यात्वं परस्य शङ्कां जनयन् ॥] इचाइ णिच्छयमेव पुरओ करेइ। किरिया कारण(मोखस्स)न नाणं, नाणं वा न किरिया, कम्म पहाणं न ववसाओ, ववसाओ वा न कम्म, एगंतेण णिच्चमणिचं वा दवमयं पजायमयं वा सामनरूवं विसेसरूवं वा वत्थु पयासेइ, एवंविहा || ६ एगंतवायप्पहाणा परूवणा विवरीयपरूवणा भवइ । अओ तेसिं पडिक्कमणंति चउत्थो हेऊ । [इत्यादि निश्चयमेव पुरतः करोति। क्रिया कारणं टन ज्ञानं, ज्ञानं वा न क्रिया, कर्म प्रधानं न व्यवसायो, व्यवसायो वा न कर्म, एकान्तेन नित्यमनित्यं वा द्रव्यमयं पर्यायमयं वा सामा न्यरूपं विशेषरूपं वा वस्तु प्रकाशयति, एवंविधा एकान्तवादप्रधाना प्ररूपणा विपरीतप्ररूपणा भवति । अतस्तेषां प्रतिक्रमणमिति चतुर्थो हेतुः।] इयमयुक्ततरा दुरन्तानन्तसंसारकारणम् । यदुक्तमागमे-"दुब्भासिएण इक्केण, मरीई दुक्खसागरं पत्तो ॥ भमिओ कोडाकोडी, AAAAAAAG Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१४७॥ ROBABASAH सागरसरिणामधिजाणं।। ।।इत्यादि(आव०४३८)[दुर्भाषितेनैकेन मरीचिःखसागरं प्राप्तः। भ्रान्ता कोटाकोटी सागरसहग्नामधेयानाम्॥] सटिप्पणा अत्र कश्चिदाह-'नन्वत्र दुरन्तानन्तशब्दौ दुःखलभ्यान्तत्वेनाऽन्ताभावेन चासंख्यातानन्ताभिधायको विरुद्धार्थाविति कथमेतदुपपत्तिरिति,स ॥स्वोपड़ भ्रान्तः । “वणस्सइकायमइगओ, उक्कोसं जीवो उ संवसे ॥ काल-मणंतदुरंतं, समयं गोअम! मा पमाएह(यए)॥१॥"(उत्तरा० अ०१०)[वन- वृतिः ॥ | स्पतिकायमतिगत उत्कृष्टं जीवस्तु संवसेत् । कालनन्तं दुरन्तं समयं गौतम मा प्रमादीः॥] इत्यादावनन्तशब्दसमानाधिकरणस्य दुरन्तम- गाथा-४. शब्दस्य दर्शनाद् दुरन्तानन्तवचनस्यातिशयितानन्तवाचकत्वेन विरोधाभावाद्। इत्थं सति विपरीतप्ररूपणाया दुरन्तानन्तसंसारकारणत्वे म ॥१४७॥ रीचिदृष्टान्तोपन्यासस्य साक्षात्तस्यासंख्यातभववाचकप्रमाणविरोधेनानुपपत्तिस्तु तस्या दुरन्तानन्तसंसारकारणत्वोपलक्षितायुक्ततरत्वोपनयनाभिप्रायेण निरसनीया ॥ यत्तु श्रावकस्य विपरीतप्ररूपणाया अत्र प्रकृतत्वात्तस्य चानाभोगाद् गुरुनियोगाद्वा तत्सम्भवात्तथाविधक्लिष्टपरिणामाभावान्नासावनन्तसंसारहेतुः,अत एव श्रावकप्रतिक्रमणसूत्रस्य वृत्तौ केवलं दुरन्तशब्दस्यैवाभिधानम् । या च विपरीतप्ररूपणा मार्गपतितानामनन्तसंसारहेतुः सा सभाप्रबन्धेन धर्मदेशनाधिकारिणां बहुश्रुतत्वेन लोकपूज्यानामाचार्यादीनां कुतश्चिनिमित्तान्निजलजादिहानिभयेन सावद्याचार्यादीनामिव, परविषयकमात्सर्येण गोष्ठामाहिलादीनामिव, तीर्थकुद्वचनस्साश्रद्धाने(न) जमा-14 ल्यादीनामिवाभोगपूर्विकाऽवसातव्या। ते चेहाधिकाराभावेनानुक्ता अप्यनन्तसंसारित्वेन खत एव भाव्याः। येन कारणेन कस्यचिदना भोगमूलकमप्युत्सूत्रं कुदर्शनप्रवृत्तिहेतुत्वेन दीर्घसंसारहेतुरपि भवति, तेन दुरन्तसंसारमधिकृत्य मरीचिरिव(रेव) दृष्टान्ततया दर्शितः। तस्य च तथाभूतमप्युत्सूत्रं तथैव सञ्जातम् , श्रीआवश्यकचूर्णावपि तथैवोक्तत्वात् ; अन्यथा द्वित्रादिभवभाविमुक्तीनामपि मुनिप्रभृतीनामनन्तसंसारित्ववक्तव्यताऽऽपत्तौ जैनप्रक्रियाया मूलत एवोच्छेदः स्यादित्यादि परेणोक्तं, तदसत् । श्रावकस्यापि “जणस्स धम्म परिक SCAMODARA ABIRBE Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Cl साहेइ"त्ति [जनस्य धर्म परिकथयन्ति ।] वचनाद् गुरूपदेशायत्ततया धर्मकथनाधिकारित्वश्रवणात्कर्मपरिणतिवैचित्र्येण तस्यापि गुरूपदेधर्मपरीक्षा सटिप्पण शायत्ततां परित्यज्य कथञ्चित्मावद्याचार्यादीनामिव विपरीतप्ररूपणासम्भवात् तस्याश्च स्वरूपतोऽनन्तसंसारकारणत्वात् तत्प्रतिक्रम- | ॥खोपत्र ॥१४८॥Pाविधानमा णार्थमिहेत्थमुपनिबन्धाद् । न चान्यत्र दुरन्ताभिधानमनन्तत्वप्रतिक्षेपकम् , दुरन्तत्वस्थानन्तत्वाविरोधित्वाद् । अनन्तसंसाराधिकाराभावा- वृतिः ॥ दिह दृष्टान्तानुक्तिरिति तु प्रकृतग्रन्थस्य खण्डनं न तु मण्डनम् । सा चायुक्ततरा, 'दुरन्तानन्तसंसारहेतुः' इत्यवस्थितपाठपरित्यागेनैव गाथा-४. ॥१४८॥ तंदृष्टान्ताध्याहारसम्भवात् , तस्मादुक्तोपलक्षणव्याख्यानरीत्यैव प्रकृतोपनयसमर्थनन्याय्यम्। ईदृशोत्सूत्रवचने स्वरूपतोऽनन्तसंसारहेतुत्ववचने चरमशरीरिक्रियमाणारम्भेऽपि स्वरूपतो नरकहेतुत्ववचनवत् प्रक्रियाविरोधादिति सम्यग्विभावनीयम् । इत्थं च-"आयरिअपरंपरएण, आगयं जोउ आणुपुब्बीए(छेयबुद्धीए)।कोवेइ छेयवाई,जमालिणासं व णासीहि॥१॥"आचार्याः श्रीसुधर्मस्वामि-जम्बूनामप्रभवार्यरक्षिताद्यास्तेषां परम्परा-प्रणालिका पारम्पयं तेन, आगतं यद्वयाख्यानं सूत्राभिप्रायः,तद्यथा-व्यवहारनयाभिप्रायेण क्रिय-14 माणमपि कृतं भवति। यस्तु कुतर्कदध्मातमनसा(मानसो) मिथ्यात्वोपहतदृष्टितया छेकबुद्धया-निपुणबुद्धया 'कुशाग्रीयशेमुषीकोऽहम्' इति कृत्वा, कोपयति दूषयति-अन्यथा तमर्थं सर्वज्ञप्रणीतमपि व्याचष्टे 'कृतं कृतम्' इत्येवं ब्रूयाद् ।। वक्ति च न हि मृत्पिण्डक्रियाकाल एव घटो निष्पद्यते, कर्मगुणव्यपदेशानामनुपलब्धेः, स एवं छेकवादी-निपुणोऽहम् इत्येवंवादी पण्डिताभिमानी, जमालिनाशं-जमालिनिववत्सर्वज्ञमतविगो(को)पको, विनथति-अरघट्टघटीयन्त्रन्यायेन संसारचक्रवालं बम्भ्रमिष्यति" इत्यादिसूत्रकृताङ्ग याथातथ्याध्ययन नियुक्तिवृत्तिवचनमात्रमवलम्ब्य ये जमालेररघट्टघटीयन्त्रन्यायेन संसारचक्रवालभ्रमणे साध्ये दृष्टान्ततयोपदर्शितत्वाद् दृष्टान्तस्य च निश्चितसाभ्यधर्मवृत्त्वात् तस्यानन्तसंसारित्वसिद्धिरिति वदन्ति ते पर्यनुयोज्याः । नन्वयमपि दृष्टान्तः प्रागुक्त Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१४९॥ मरीचिदृष्टान्तवदुपलक्षणपर एवेत्यरघट्टघटीयन्त्रन्यायोपलक्षितसंसारचक्रवालपरिभ्रमणे साध्ये नाऽयुक्त इति कथमस्माद्भवतामिष्टसिद्धिः१, अन्यथाऽरघट्टघटीयन्त्रन्यायोऽत्र प्रकरणमहिना पुनः पुनञ्चतुर्गतिभ्रमणपर्यवसित इति चतुर्गतिभ्रमणमपि जमालेरनेन न्यायेन सिद्धयेत् । यत्तु यस्यैकेन्द्रियादिषु पुनः पुनरुत्पादेन द्राघीयसी संसारस्थितिस्तमुद्दिश्यैवायं न्याय: प्रवर्तते । तदुक्तम्- 'एयं पुण एवं खलु, अन्नाणपमायदोसओ पोयं । जं दीहा कायठिई, भणिआ एगिंदियाईणं ॥ १६ ॥ 'ति [ एतत्पुनरेवं खलु अज्ञानप्रमाददोपतो ज्ञेयम् । यद्दीर्घा काय स्थितिर्भणिता एकेन्द्रियादीनाम् ] ।। इति उपदेश पदे । व्याख्यायां च 'एकेन्द्रियादिजातिषु दूरं मनुजत्वविलक्षणास्वरघट्टघटीयन्त्रन्यायक्रमेण पुनः पुनरावर्तते । एतदपि कुतः सिद्धम् ? इत्याह यद् यस्मात्कारणाद्, दीर्घा द्राघीयसी, काय स्थितिः पुनः पुनर्मृत्वा तत्रैव काये उत्पादलक्षणा, भणिता प्रतिपादिता सिद्धान्ते, एकेन्द्रियादीनां जातीनामिति एकेन्द्रियद्वीन्द्रियादिलक्षणानां जीवानामिति ।।" तत एकेन्द्रियादिजात्याश्रितस्यैवारघट्टघटीयन्त्रन्यायस्याश्रयणान्न दृष्टान्तदाष्टन्तिकयोर्वैषम्यमिति । तदसत् । तत्र मनुजत्वगतिदौर्लभ्याधिकारादरघट्टघटीयन्त्रन्यायसामान्यस्यैकेन्द्रियादिजातिमात्रेण विशेषविवक्षायामप्यत्र सर्वज्ञमतविकोपकस्य चतुरशीतिलक्षजीवयोनिस ङकुलसंसारपरिभ्रमणाधिकारात्पुनः पुनर्गतिचतुष्टय भ्रमणाश्रितस्यैव विवक्षितत्वाद् । अत एव श्रुतविराधनातथातुर्गतिक संसारपरिभ्रमणं भवतीति स्फुटमेवान्यत्राभिहितम्, जमालिदृष्टान्तश्च तत्रोपन्यस्त इति । तथा हि- " इच्चेइयं दुवालसँग गणिपिडगं तीते काले अणंता जीवा आणाए विराहेत्ता चातुरंतसंसारकंतारं अणुपरिअविंसु १ । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडुप्पन्ने काले परित्ता जीवा आणाए विराहित्ता चातुरंत संसारकंतारं अणुपरिअÎति २ । इच्चेइयं दुवालसँग गणिपिडगं अणागए काले अणंता जीवा आणाए विराहित्ता चाउरंनसंसारकंतारं अणुपरिअट्टिस्संतित्ति” ॥ नन्दिसूत्रे - एतद्वृत्तिर्मलयगिरिकृता यथा - इचेइयमि सटिप्पणा ॥ खोप वृत्तिः ॥ गाथा-४० ॥१४९॥ Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१५०॥ सटिप्पणा | ॥खोपड़ वृतिः ।। गाथा-४. ॥१५॥ | त्यादि इत्येतद्वादशाङ्गं गणिपिटकम्, अतीतकालेऽनन्ता जीवा आज्ञया यथोक्ताज्ञापरिपालनाभावतो विराध्य, चतुरन्तसंसारकान्तारं विविधशारीरमानसानेकदुःखविटपिशतसहस्रदुस्तरं भवगहनं, अणुपरिअहिंसुत्ति अनुपरावृत्तवन्त आसन् । इह द्वादशाङ्गं सूत्रार्थोभयभेदेन त्रिविधं, द्वादशाङ्गमेव चाज्ञा "आज्ञाप्यते जन्तुगणो हितप्रवृत्तौ यया साऽऽज्ञेति" व्युत्पत्तः, ततः सा आज्ञा च त्रिधा तद्यथा-सूत्राज्ञा अर्थाज्ञा तदुभयाज्ञा च । सम्प्रत्यमूषामाज्ञानां विराधनाश्चिन्त्यन्ते । तत्र यदाभिनिवेशतोऽन्यथा सूत्रं पठति तदा सूत्राज्ञाविराधना । सा च यथा जमालिप्रभृतीनाम् । यदात्वभिनिवेशवशतोऽन्यथा द्वादशाङ्गार्थ प्ररूपयति तदाऽर्थाज्ञाविराध. ना । सा च गोष्ठामाहिलादीनामिवावसातव्या। यदा पुनरभिनिवेशवशतः श्रद्धाविहीनतया हास्यादितो वा द्वादशाङ्गस्य सूत्रमथ च विकुट्टयति तदोभयाज्ञाविराधना; सा च दीर्घसंसारिणामभव्यानां चानेकेषां विज्ञेयेति । तथा आज्ञया सूत्राज्ञयाभिनिवेशतोऽन्यथापाठादिलक्षणया विराधनया विराध्यातीते कालेऽनन्ता जीवाश्चतुरन्तं संसारकान्तारं नारकतिर्यग्नरामरविविधवृक्षजालदुस्तरं भवाटवीगहनमित्यर्थः, अनुपरावृत्तवन्त आसन् जमालिवद् । अर्थाज्ञया पुनरभिनिवेशतोऽन्यथाप्ररूपणादिलक्षणया विराधनया गोष्ठामाहिलवत्, उभयाज्ञया पुनः पञ्चविधाचारपरिज्ञानकरणोद्यतगुर्वादेशादिलक्षणया गुरुप्रत्यनीकद्रव्यलिङ्गधार्य नेकश्रमणवद्, इति तु हारिभद्यामेतवृत्तावुक्तमिति ॥" तस्मादुपलक्षणव्याख्यान एव यथोक्तदृष्टान्तोपपत्तिरिति स्मर्तव्यम् । यत्तु आशातनाबहुलानां नियमनानन्तसंसारो भवतीति ज्ञापनार्थमेवेदं जमालिदृष्टान्तोपदर्शनं, चतुरन्तशब्दस्तु संसारविशेषणत्वेन संसारस्वरूपाभिधायको न पुनः सर्वेषामप्याशातनाकारिणां गतिचतुष्टयाभिधायकः, न हि गतिचतुष्टयगमनमेवानन्तसंसारित्वाभिव्यञ्जकं, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां व्यभिचारात् , तस्माद् गत्यादीनां प्रति प्राणिनं भिन्नत्वान्न तौल्यमिति परेणात्र समाधानं क्रियते, तदसम्बद्धवाग्वादमात्रम् । चतुरन्तश AKASARAIGARH Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ब्दार्थस्य संसारविशेषणत्वे चतुरन्तसंसारपरिभ्रमणस्य विशिष्टसाध्यस्य पर्यवसानात् चतुरन्तान्वितसंसारस्य भ्रमणेऽन्वयात् , तथा च सटिप्पणा धर्मपरीक्षामा दृष्टान्ते जमालो साध्यवैकल्यदोषानुद्धारात् । न हि विशिष्टे साध्ये विशेष्यांशसद्भावमात्रेण दृष्टान्ते साध्यबैकल्यदोष उद्धर्तुं शक्यते । स्वोपड़ अनभिज्ञस्याहच्चैत्यानगारशब्दाभ्यामिव चतुरन्तसंसारकान्तारशब्दाभ्यामेकस्यैवार्थस्य बोधनमित्यभ्युपगमे च प्रेक्षावतामुपहासपात्र- वृधिः ॥ त्वापत्तिः । गत्यादीनां च यथा प्रति प्राणिनं भिन्नत्वं तथा संसारस्याप्यध्यवसायविशेषाद् भिन्नत्वं किं नेष्यते । “उम्मग्गमग्गसंपट्ठि गाथा-४. याण" इत्यादिनोन्सूत्रभाषिणां नियमादनन्तसंसारसिद्धौ च - "सीअलविहारओ खलु, भगवंतासायणाणिओगेण ॥ तत्तो भवो अणंतो, किले| सबहुलो जओ भणिअं ॥४२२।। 'तित्थयरपवयणसुअं ॥४२३॥ [शीतलविहारतः खलु भगवदाशातनानियोगेन । ततो भवोऽनन्तः क्लेश-18 बहुलो यतो भणितम् ॥ तीर्थकरप्रवचनश्रुतं] इत्याद्युपदेशपदवचनाच्छीतलविहारिणां पार्श्वस्थादीनां नियमादनन्तसंसारापत्तिः। इष्यते |च तत्र परिणामभेदाढ़ेद इत्यत्राप्यध्यवसायप्रत्ययः संसारविशेषो महानिशीथोक्तरीत्या श्रद्धेयः । किश्च-अरघट्टघटीयन्त्रन्यायेन में | यत्र संसारपरिभ्रमणप्रदर्शनं तत्र नियमादनन्तसंसार इत्यभ्युपगमे उत्सूत्रभाषिणामिव कामासक्तानामपि नियमतोऽनन्तसंसाराभ्युपगमप्रसङ्गः, तेषामपि संसारभ्रमणे तन्न्यायप्रदर्शनात् । तदुक्तमाचाराङ्गशीतोष्णीयाध्ययन उ०२ गाथा २ वृत्तौ-“संसिच्चमाणा पुणरिति गम्भं" इत्यवयवव्याख्याने "तेन-कामोपादानजनितेन कर्मणा, संसिच्यमाना आपूर्यमाणाः, गर्भाद् गर्भान्तरमुपयान्तिसंसारचक्रवालेऽरघट्टघटीयन्त्रन्यायेन पर्यटन्त आसते इत्युक्तं भवतीति।" एवमनेकेषु प्रदेशेष्वित्थमभिधानमस्तीति न किश्चिदेतत् । यच्च "जमाली णं भंते ! देवे ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव कहिं उववजिहि ?, गोयमा! चत्वारि पंच तिरिक्खजोणिय-मणुअ-देवभवगहणाई संसारं अणुपरिअद्वित्ता तओ पच्छा सिज्झिहिति जाव अंतं काहेति ।" [जमालिसंगवन् ! देवस्तस्माद् देवलोकादायुम्क्ष %EMBER OCCASIRABHAE Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१५२॥ येण यावत्क्व उत्पत्स्यते ? गौतम ! चत्वारि पञ्च तिर्यग्योनिक- मनुज देव भवग्रहणानि संसारमनुपर्यट्य ततः पश्चात्सेत्स्यति यावदन्तं करिष्यतीति ॥ ] इत्यत्र चत्वारो द्वीन्द्रियादयः पञ्च चैकेन्द्रियाः पृथिव्यादयस्ते च ते तिर्यग्योनिकाश्च तेषु देवमनुष्येषु भवग्रहणानि भ्रान्त्वा" इति व्याख्यानादत्र च तीर्थकराशातनाकृतोऽधिकृतत्वाद् भवानन्त्यलक्षणब हुत्वस्य स्पष्टत्वाद् भगवत्यपेक्षयैव जमालेरनन्तभवसिद्धिरिति परस्य मतं तदपूर्वबुद्धिपाटवमूलम् । एतादृशस्य गम्भीरार्थस्य वृत्तिकृताऽस्पष्टीकृतस्य खयमेव स्पष्टीकरणात् कथं चायं तपस्वी नाकलयत्येतावदपि, यदमू चतुष्पञ्चशब्दौ भवग्रहणसमानाधिकरणौ भिन्नविभक्त्यन्तौ व्यस्तौ समासान्तःपातिनः तिर्यग्योनिकशब्दस्य विशेषणतामापद्यते इति । न चेमौ न विभक्त्यन्ताविति वाच्यम्, विभक्त्य तमन्तरेण शसन्तचतुःशब्दनिष्पन्नस्य 'चत्तारि' इति शब्दस्य सर्वथाऽसिद्धेः । नाप्यत्रालुप् (क्) समासोऽस्तीति एतेन चतसृषु पञ्चसु च जातिषु तिर्यग्मनुजदेवभवग्रहणानीति भणनादनन्तभवसिद्धिरित्यप्यपास्तम्, 'चत्तारि' इत्यत्र द्वितीयाबहुवचने सप्तमीबहुवचनार्थत्वस्य 'पञ्च' इत्यन तरसप्तमीबहुवचनलोपस्य समुच्चयार्थकचकाराध्याहारस्य च प्रसङ्गात् । किञ्च – चतुष्पञ्चशब्दयोः संख्यावाचकयोर्व्यक्तिवचनत्वेन कुतस्ताभ्यां जातिरुपस्थितिरिति विभावनीयम् । यदि च जमालेरनन्तः संसारः सूत्रे वक्तव्योऽभविष्यत् तदा 'तिरिय- मणुस्सदेवेसु अणताई भवरगहणाई संसारमणुपरिअट्टित्ता तओ पच्छा सिज्झिस्सइ' [ तिर्यग्मनुष्यदेवेष्वनन्तानि ग्रहणानि संसारमनुपर्यट्य ततः पश्चात्सेत्स्यति ||] इत्यादि । अथवा "जहा गोसाले मंखलिपुत्ते तहेव णेरइअवजं संसारमणुपरिअट्टित्ता तओ पच्छा सिज्झिस्सइ " [ यथा गोशालो मंखलिपुत्रस्तथैव नैरयिकवर्ज संसारमनुपर्यय्य ततः पश्चात्सेत्स्यति ॥ ] इत्यादि भणनीयमभविष्यद् । अन्यथा नवसु जातिषु भवग्रहणेन भ्रमणादपि कुत आनन्त्यलाभ: १, नवभिरपि वारैः तत्पूर्तिसम्भवात् प्रतिव्यक्तिभ्रमणं च नाक्षरबलाल्लभ्यते बाधितं च सर्वतिर्यग्देवमनुजेषु तत् स्वेच्छामात्रेण सटिप्पणा ॥खोपच चिः ॥ गाथा-४० ॥१५२॥ Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Sale सटिप्पणा खोपत्र वृतिः । गाथा-४. ॥१५३॥ धर्मपरीक्षा नियतानन्ततिर्यग्योनिकभवग्रहणाश्रयणे च किं सूत्रावलम्बनव्यपदेशेन?, स्वकल्पनाया महत्वध्यारोपस्य महदाशातनारूपत्वात् । एतेन "च्युत्वा ततः पञ्चकृत्वो, भ्रान्त्वा तिर्यग्नृनाकिषु॥ अवाप्तबोधिनिर्वाणं, जमालिः समवाप्स्यति ॥१०६॥” इति हैमवीरचरित्रीयपर्व ॥१५॥ १० (सर्ग ८) श्लोके पञ्चकृत्वशब्दः पञ्चवाराभिधायकः, स च तिर्यशब्देन योजितः सन् जमालिस्तिर्यग्योनौ पञ्चवारान् यास्थतीत्यर्थाभिधायकः सम्पन्नः, तथा च तिर्यग्योनौ बारपूर्तिमनुजादिगत्यन्तरभवान्तरप्राप्तिमन्तरेण न भवति, सा च प्राप्तिराशातनाबहुलस्य जमालेरनन्तकालान्तरितैव स्याद् , एवं पञ्चवारगमनेऽनन्तभवग्रहणमनन्तगुणमपि सम्भवति। मनुजगतिवारपूर्तिस्तूत्कर्षतोऽपि सप्ताष्टभवैरेव स्याद् । देवनारकयोस्त्वनन्तरं पुनरुत्पादाभावेनैकेनैव भवेन वारपूर्तिः स्याद् इत्यादिकापि परस्य कल्पना दूरमपास्ता वेदितव्या । | 'पञ्चकृत्वः' इत्यस्य तिर्यक्शब्देनैव योजनाया असम्भवात् , द्वन्द्वसमासमर्यादया प्रत्येकमेव तदन्वयाद् भवग्रहणव्यक्त्यपेक्षस्य पञ्चवारत्वस्यानन्तवारभवग्रहणेषु जात्यपेक्षसङ्कोचेन समर्थयितुमशक्यत्वात् , तादृशशाब्दबोधस्याकाङ्क्ष विनाऽनुपपत्तेः । न ह्येकत्रानन्तवारभवग्रहणाभ्युपगमेऽप्येकवारभ्रमणमेव वक्तुं युक्तम् , स्थानभेदेन तत्स्थानावच्छिन्नाधिकृतक्रियाजन्यव्यापारोपहितकाललक्षणवारभेदाद्; निजातीयस्थानगमनानन्तरिततजातीयस्थानावच्छिन्नभ्रमणक्रियाजन्यभवग्रहणव्यापारोपहितो यावान् कालस्तावत एकवारत्वाभ्युपगमे च."तिर्यक्ष्वनन्तवारं भ्रान्तः” इति वदत एव व्याघातः । किञ्च एवं " बहवो जीवा नित्यनिगोदेष्वनन्तवारं जन्ममरणानि कुर्वन्ति" का इत्याद्यखिलप्रवचनवचनविलोपप्रसङ्ग इति न किञ्चिदेतत् । किञ्च-'च्युत्वा ततः पञ्चकृत्वः' इत्यादिश्लोकैकवाक्यतया हि 'चत्तारि पंच' इत्यादिभगवतीसूत्रं त्वया व्याख्यातुमिष्टं तथा च तत्र विजातीयभवान्तरिततया तिर्यक्षु पञ्चवारमेवानन्तभवग्रहणसिद्धिरिति सर्वेषाहैमपि प्रत्यनीकानामीदृशमेव संसौरपरिभ्रमण सिध्येत् न त्वनन्तान्यान्यभवान्तरितभवबहुलम् । यती "देवकिबिसिया णं भंते ! ताओ 45454545454545454 Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१५४॥ सटिप्पणा ॥खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-४० | ॥१५४॥ + 4 देवलोगाओ आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइक्खएणं अणंतरं चयं चइत्ता कहिंगच्छिहिंति ? कहिं उपवजिहिंति ? गोयमा! जाव चत्तारि पंच णेरइय-तिरिक्खजोणिय-मणुस्स-देवभवग्गहणाई संसारं अणुपरिअट्टित्ता तओ पच्छा सिज्झहिंति, बुज्झिहिंति, जाव अंतं काहेति"त्ति | देिवकिल्बिषिका भदन्त ! तस्माद्देवलोकादायुःक्षयेण भवक्षयेण स्थितिक्षयेण अनन्तरं च्यवं च्युत्वा क्व गमिष्यन्ति ? क्व उत्पत्स्यन्ते ! गौतम ! यावच्चत्वारि पञ्च नैरयिक-तिर्यग्योनिक-मनुष्य-देवभवग्रहणानि संसारमनुपर्यठ्य ततः पश्चात्सेत्स्यन्ति, भोत्स्यन्ति यावदन्तं करिष्यन्तीति । ] त्वया सामान्यसूत्रमङ्गीक्रियते ततश्चोक्तस्य 'चत्तारि पंच' इत्यादिविशेषसूत्रस्य नारकगतिप्रतिषेधमात्रेणैव विशेषोऽभ्युपगम्यते न त्वधिकः कश्चिदपीति । अथास्त्वन्यत्र यथा तथा भगवत्यपेक्षया (श० ९ उ० ३३) तु जमालेरनन्ता एव भवा लभ्यन्ते, यतो यावच्छब्दः सामान्यसूत्रेऽस्ति, तस्य च प्रयोगः क्वचिद्विशेष्यत्वेन क्वचिच्च विशेषणत्वेन स्यात् , तत्र विशेष्यत्वेन प्रयुक्तो यावच्छन्द उक्तगणसम्बन्धिभ्यामाद्यन्तपदाभ्यां विशिष्टः सन्नेव गणमध्यवर्तिनां पदार्थानां सङ्ग्राहको भवति । यथा-"जमाली णं भंते! अणगारे अरसाहारे विरसाहारे अंताहारे पंताहारे लूहाहारे तुच्छाहारे अरसजीवी विरसजीवी जाव तुच्छजीवी उवसंतजीवी पसंतजीवी विवित्तजीवी? हेता गोयमा !" [जमालिभदन्तानगारोरसाहारो विरसाहारोऽन्ताहारः प्रान्ताहारो रूक्षाहारस्तुच्छाहारोरसजीवी विरसजीवी यावनुच्छजीवी उपशान्तजीवी प्रशान्तजीवी विविक्तजीवी? हन्त गौतम।] इत्यादिसामान्यसूत्रोक्तस्य गणस्याद्यन्तशब्दाभ्यां विशिष्टो 'गोअमा! जमाली णं अणगारे अरसाहारे जाव विवित्तजीवीति सूत्रोक्तवाक्यगतो यावच्छब्दस्तस्य च सर्वादित्वेन बुद्धिस्थवाचकत्वान्मध्यवर्तिनामपि पदार्थानां नानारूपाणां नानासंख्याकानां च सङ्ग्राहकत्वम् , एवमाद्यन्तशब्दयोरपि गणानुरोधेन भिन्नत्वमेव बोध्यं | न पुनर्यावच्छब्दोऽपि घटपटादितन्नियतपदार्थवाचक इति । विशेषणभृतस्तु यावच्छब्द उक्तपदवाच्यानामर्थानां देशकालादिनियामको AAAAAAAAAX -4-64 Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१५॥ सटिप्पण ॥स्वोपड वृतिः ॥ गाथा-४० ॥१५॥ SEARCHES भवति । तत्र देशनियामकत्वं-यावत्पश्चविंशतिर्योजनानि पत्तनं तावद्गन्तव्यमित्यादौ । कालनियामकत्वं च "जाव णं से जीवे सया समिअं तं तं भावं परिणमइ ताव च णं से जीवे आरभइ सारभइ समारभई" [यावत्स जीवः सदा समितं तं तं भावं परिणमति, तावच्च स जीव आरम्भते संरम्भते समारम्भते ।] इत्यादौ प्रसिद्धम् । विशेषणत्वविशेष्यत्वस्वरूपविकलस्तु यावच्छब्दो डित्थडवित्थादिवदर्थशून्य एव स्यात् । तदिह यावच्छब्दो नानर्थको न वा विशेष्यभृतः, आद्यन्तशब्दाभ्यामविशिष्टत्वाद् ; विशेष्यभृतस्य च तस्य त्वाभ्यां विशिष्टस्यैव प्रयोगात् , किन्तु विशेषणभूतः; 'प्राक् पतितं विशेषणम्' इति वचनात् , स चात्राधिकारात्कालनियामक इति । यावत्कालं चतुष्पञ्चसूत्रे स स्थावरजातिषु नारकतिर्यग्योनिकमनुजदेवानां भवग्रहणानि यत्तदोर्नित्याभिसम्बन्धात् तावत्कालं संसारमनुपरावृत्त्य ततः पश्चात्सेत्स्यन्ति, यावत्सर्वदुःखानामन्तं करिष्यन्तीति सामान्यसूत्रार्थः पर्यवस्यति । एवं सामान्यसूत्रोक्तानुसारेण विशेषसूत्रेऽपि कालनियमार्थं तावच्छन्दवद् यावच्छब्दोऽप्यध्याहार्यः, तावन्तरेण वाक्यद्वयानुपपत्त्या कालनियमानुपपत्तिरिति व्यक्तैव सामान्यसूत्रादिव विशेषसूत्रादप्यनन्तभवसिद्धिरिति चेत् , तदिदमसिद्धमसिद्धेन साधयतो महातार्किकत्वमायुष्मतः। यतो 'जाव चत्तारि' इत्यादावपि शसन्तचतुष्पश्चपदसमानाधिकरणभवग्रहणपदोत्तरद्वितीयाविभक्तरेव "कालाध्वनोाप्तौ" [सिद्धहैम०-२-२-४२] इत्यनुशासनात्कालनियमसिद्धौ न पुनस्तदभिधानाय यावच्छब्दप्रयोगः, व्यर्थपुनरुक्ततयोः प्रसङ्गात् , तस्मात्तदनुरोधेन तावच्छब्दस्य विशेषसूत्रे यावत्तावच्छन्दयोश्चाध्याहारकल्पनातिजघन्यैवेति । नन्वेवं "स्थितेगतिचिन्तनीया" इति यावच्छब्दस्य सूत्रस्थस्य कोऽर्थः ? इति चेत्, ततो देवलोकादायुःक्षयादिना च्युत्वेति पूर्वप्रक्रान्तपदसमुदायार्थ एवेत्यवेहि, अथैवं गणसम्बन्धाधन्तपदविशिष्टस्यैव यावच्छब्दस्य पूर्वप्रक्रान्तगणवाक्यार्थवाचकत्वमिति व्युत्पत्तिभङ्ग इति चेत्, न, तादृशनियमे प्रमाणाभावात् , पूर्वप्रक्रान्तवाक्यार्थवाचकत्वे यावच्छब्दस्य स्वस Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१५६॥ म्बन्धिपदो पसन्दानमात्रस्य तात्पर्यैग्राहकत्वेनापेक्षितत्वाद् । अत एव क्वचिद्गणसम्बन्ध्याद्यन्तपदविशिष्टादिव क्वचिदन्त्य पदविशिष्टादपि यावच्छन्दान्तदुपस्थितिः । तथा हि- एगंतपंडिए णं भंते । मणुस्से किं णेरइआउं पकरेइ ४१ पुच्छा । गोअमा ! एगंतपंडिए मस्से आउ सिअ पकरे, सिअ णो पकरेइ । जइ पकरेइ णो णेरइआउअं पकरेह, णो तिरि०, णो मणु०, देवाउअं पकरेइ । णो णेरइआउअं किच्चा रइएस उववजह, णो तिरि०, णो मणु०, देवाउअं किच्चा देवेसु उववज्जइ १ ।। गोअमा ! एगंतपंडिअस्स णं मणुस्सस्स केवलमेव दो गतीओ पण्णत्ताओ, तं० अंतकिरिया चैव कप्पोववत्तिया चेव, से तेणद्वेणं गोअमा ! जाव देवाउअं किच्चा देवेसु उववज्जइत्ति ।। " [ एकान्तपंडितो भदन्त मनुष्यः किं नैरयिकायुः प्रकरोति ४ पृच्छा! गौतम! एकान्तपण्डितः आयुः स्यात्प्रकरोति स्यान्न प्रकरोति । यदि प्रकरोति नो नैरयिकायुः प्रकरोति, नो ति०, नो म०, देवायुः प्रकरोति ।। नो नैरयिकायुः कृत्वा नैरयिकेषूत्पद्यते नो ति०, नो म०, देवायुः कृत्वा देवेषूत्पद्यते ? गौतम ! एकान्तपण्डितस्य मनुष्यस्य केवले एव द्वे गती प्रज्ञप्ते तद्यथा अन्तक्रियैव कल्पोपपत्तिरेव अथ तेनार्थेन गौतम यावद्देवाः कृत्वा देवेषूत्पद्यते ] अत्र हि यावच्छन्दस्य न गणसम्बन्ध्याद्यन्त्यपदविशिष्टतयैव पूर्वप्रक्रान्तवाक्यार्थवाचकत्वं किन्तु स्वसम्बन्ध्यन्त्य पदोपसन्दानादेव, तद्वदिहापि चत्वारि पञ्चेत्यादिस्व सम्बन्धिपदोपसन्दानाद् यावच्छन्दस्य पूर्वप्रक्रान्तवाक्यार्थवाचकत्वेन किञ्चिद्वाधकमिति युक्तं पश्यामः । किञ्च सूत्रे द्योतकरचनारूपमपि यावत्पदं दृश्यते । यथा स्कन्दकाधिकारेश. २ उ० १ " भावओ णं सिद्धे अणता नाणपञ्जवा अणंता दंसणपञ्जवा जाव अणंता अगुरुअलहुअपजवा" [भावतः सिद्धे अनन्ता ज्ञानपर्यवा अनन्ता दर्शनपर्यवा यावदनन्ता अगुर्वलघुपर्थवाः] इत्यत्र । न ह्यत्र गणमध्यस्थस्यान्यस्यार्थस्य परामर्शो यावच्छन्देन कर्तुं शक्यते, यतोऽसौ गणस्तावदित्थमुपदर्शितः "भावओ णं जीवे अणंता नाणपज्जवा अणता दंसणपञ्जवा अणंता चरित्तपञ्जवा अणंता गुरुअलहुअपजवा अणंता अगुरु सटिप्पणा ॥खोपच वृतिः ॥ गाथा-४० ।। १५६ ।। Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१५७॥ अलहुपञ्जव त्ति" [ भावतो जीवे अनन्ता ज्ञानपर्यवा अनन्ता दर्शनपर्यवा अनन्ताश्चारित्रपर्यवा अनन्तगुरुलघुकपर्यवा अनन्ता अगुर्व| लघुकपर्यवाः ] तत्र ज्ञानदर्शनपर्यायाः सिद्धस्य साक्षादेवोक्ताः, चारित्रपर्यायाश्च तस्य न सम्भवन्ति " णो पारभविए चरित्ते" [नो पारभविकं चारित्रं] इत्यत्र सिद्धानां चारित्रस्य व्यक्तमेव निषिद्धत्वाद् । गुरुलघुपर्यायाश्चौदारिकादिशरीराण्याश्रित्य व्याख्याता इति तेऽपि सिद्धस्य न सम्भवन्ति । अगुरुलघुपर्यायाश्च कार्मणादिद्रव्याणि जीवखरूपं चाश्रित्य व्याख्याताः, तत्र कार्मणादिद्रव्याश्रितास्ते सिद्धस्य न सम्भवन्ति, जीवस्वरूपं त्वाश्रित्य सर्वांशशुद्धास्ते सम्भवन्ति परं तेऽपि साक्षाच्छब्देनोक्ता इति यावच्छन्दवाच्यं नावशिष्यते इति ततो यथा तत्र वाक्यार्थद्योतक एव यावच्छब्दस्तद्वदिहापि स्यादिति किमनुपपन्नमिति निपुणधिया निभालनीयं प्रेक्षावद्भिः । किञ्च - 'जाव चत्तारि पंच' इत्यादिसूत्रमपि नरकोपपातातिरिक्तविशेषाभावमादाय परिमितभव जमालिजातीयदेवकिल्बिषिकविषयं जमालिसाहश्यप्रदर्शनायोपन्यस्तं न तु देवकिल्विषिकसामान्यविषयमिति सम्भाव्यते, अन्यथा “अत्थेगइआ अणादीयं अणवदग्गं दीहमद्धं चाउरंतं संसारकंतारं अणुपरिअङ्कंति” [सन्त्येकेऽनादिकमनवदग्रं संसारकान्तारमनुपरिवर्तन्ते ] इत्यग्रिमसूत्राभिधानानुपपत्तेः, ततो 'अत्थेगइआ ' इत्यादिकमपरिमितभवाभिधायकं 'जाव चत्तारि' इत्यादिकं च परिमितभवाभिधायकमिति युक्तम्, भवति हि सामान्याभिधानस्याये कविशेषप्रदर्शने तदितरविशेषपरत्वम् । यथा 'ब्राह्मणा भोजयितव्याः कौडिन्यो न भोजयितव्य' इत्यत्र ब्राह्मणा भोजयितव्या इति वचनस्य कौण्डिन्येतरब्राह्मणभोजनविधिपरत्वमिति । यत्तु 'अत्थेगइआ' इत्यादिसूत्रमभव्यविशेषमधिकृत्याव सातव्यं, तद्वयञ्जकं तु अन्ते निर्वाणाभणनमेचेति परेणोच्यते । तदसत्, अन्ते निर्वाणाभणनादीदृशसूत्राणामभव्यविशेषविषयत्वे – “असंवुडे णं अणगारे आउअवजाओ सत्तकम्मपगडीओ सिढिलबंधूणबद्धाओ घणियबंधणबद्धाओ पकरेइ, हस्सकालठितिआओ दीह्कालठितिआओ पकरेह, मंदाणु सटिप्पना ||खोपड़ वृचिः ॥ गाथा-४० ॥१५७॥ Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भागा(वा)ओ तिव्वाणुभागा(वा)ओं पकरेइ, अप्पपदेसग्गाओ बहुप्पदेसग्गाओ पकरेइ । आउयं च णं कम्मं सिअ बंधइ, सिअ णो| धर्मपरीक्षा बंधइ, असायवेअणिजं च णं कम्मं भुजो भुजो उवचिणाइ, अणाइयं चणं अणवदग्गं दीहमळू चाउरंतसंसारकतारमणुपरिअट्टइ।" "को- सटिप्पण ॥१५८॥ | हवसट्टेणं भंते जीवे किं बंधइ ? किं पकरेइ ? किं चिणाइ ? किं उवचिणाइ ? संखा? । कोहवसट्टे णं जीवे आउअवजाओ सत्तकम्म ॥खोपत्र वृत्तिः ॥ पगडीओ सिढिलबंधणबद्धाओ, एवं जहा पढमसए असंवुडस्स अणगारस्स जाव अणुपरिअट्टइ । माणवसट्टे णं भंते ! जीवे एवं चेव, 12 गाथा-४. एवं मायावसट्टेवि, एवं लोभवसट्टेवि, जाव अणुपरिअट्टई" [असंवृतोऽनगारः आयुर्वर्जाः सप्त कर्मप्रकृतीः शिथिलबन्धनबद्धा दृढबन्धन ॥१५८॥ बद्धाः प्रकरोति ह्रस्वकालस्थितिका दीर्घकालस्थितिकाःप्रकरोति मन्दानुभावास्तीवानुभावाः प्रकरोति अल्पप्रदेशाग्रा बहुप्रदेशाग्राः प्रकरोति। आयुश्च कर्म स्थानाति स्यान्न बध्नाति अशातावेदनीयं च कर्म भृयोभृय उपचिनाति अनादिकं चानवदाग्रं दीर्घाध्वं चातुरन्तसंसारकान्तारमनुपरिवर्तते क्रोधवशा” भदन्त जीवः किं बध्नाति किं प्रकरोति किं चिनाति किमुपचिनाति शंख (श्रावक) क्रोधवशातों जीवः आयुर्वर्जाः सप्त कर्मप्रकृतीः शिथिलबन्धनबद्धा एवं यथा प्रथमशतके असंवृतस्यानगारस्य यावदनुपरिवर्तते । मानवशातों भदन्त जीव एवमेव, एवं मायावशा?ऽपि । एवं लोभवशार्तोऽपि यावदनुपरिवर्तते भ० श०१२ उ०१ इत्यादिसूत्राणामपि तथात्वापत्तेरिति । ननु यद्येवं । 'चत्तारिपंच' इत्यादिसूत्रे जमाले नन्तभवविषयता तदा निर्विषयता स्यात् , चतुःपञ्चशब्दाभ्यामेकार्थानभिधानादिति चेद् । न, "सिअ भंते ! जीवे जाव चत्तारि पंच पुढवीकाइआ एगतओ साहारणसरीरं बंधंति, एगतो पच्छाहारेंति परिणामेति वा सरीरं वा बंधंति ? गो. मणो इणढे समढे । सिअ भंते जाव चत्तारि पंच आउकाइआ, एवं सिअ भंते जाव चत्तारि पंच तेउक्काइआ" [ स्याद्भदन्त यावच्चत्वारः मापंच पृथ्वीकायिका एकतः साधारणशरीरं बघ्नन्ति एकतः पश्चादाहारयन्ति परिणामयन्ति वा शरीरं वनंति? गौतम ! नायमर्थः समर्थः AAAAAAAAAA Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१५९॥ SAR गाथा-४. OBAEBAADS खाद्भदन्त यावच्चत्वारः पंच अप्कायिकाः यावत्स्याद्भदन्त यावच्चत्वारः पंच तेजस्कायिकाः] इत्यादिषु सूत्रेषु भगवत्यां "जया णं भंते! सटिप्पण तेसिं देवाणं इंदे चयइ से कहमिआणि पकरेइ? जाव चत्तारि पंच सामाणिआ तं तं ठाणं उवसंपन्जित्ता णं विहरंति” [यदा भदन्त तेषां ॥स्वोपड देवानामिन्द्रश्यौति स कथमिदानी प्रकरोति ? यावच्चत्वारः पञ्चसामानिका देवास्तत्तत्स्थानमुपसम्पद्य विहरन्ति] इत्यादि जीवाभिगम- वृचिः ॥ सूत्रेऽन्येषु च बहुषु स्थानेषु तयोः “सत्तट्ठ भवग्गहणाई, सत्तट्ठ पयाई" इत्यत्र सप्ताष्टपदयोरिव संकेतविशेषादेकसंख्यावाचकत्वसिद्धेः। | पंच तिरिक्खजोणिय-मणुस्स-देवभवग्गहणाई' इत्यादिकोऽप्यादर्शान्तरे पाठोऽस्ति, तत्र च शङ्कालेशस्याप्यभाव एव । नन्वेवमपि ॥१५॥ 'पञ्चशब्दो गतित्रयानुरोधेन त्रिगुणितः किं पञ्चदशभवाऽभिधायकः? उत तिर्यग्योनिकदेवसम्बन्धिनौ द्वौ द्वौ भवौ एकश्च मनुजसम्बन्धी, अथवा त्रयो भवास्तियक्सम्बन्धिन एको देवसम्बन्धी एकश्च मनुष्यसम्बन्धीत्येवं पञ्चभवाभिधायकः? इत्येवं सन्देहानिवृत्तिरेवेति चेद् । न, शास्त्रव्युत्पन्नस्यैतादृशसन्देहानुदयाद् , द्वन्द्वसमासस्य सर्वपदप्रधानत्वेन प्रत्येकमेव पञ्चसंख्याऽन्वयाद्, अनेनैव वाभिप्रायेण "च्युत्वा ततः पञ्चकृत्वः" इत्याद्यभिधानात् । “जिणणाहेण भणिय, सुरतिरियनरेसु पंचवेलाओ । भमिऊण पत्तबोही, लहिही 18 निव्वाणसुक्खाई ॥१॥" [जिननाथेन भणितं सुरतिर्यग्नरेषु पञ्चवेलाः। भ्रान्त्वा प्राप्तबोधिर्लप्स्यते निर्वाणसौख्यानि] इति श्रीअभयदेवसूरिसन्तानीयगुणचन्द्रगणिकृते प्राकृतवीरचरित्रेऽपीत्थमेवोक्तम् । “तिर्यग्मनुष्यदेवेषु, भ्रान्त्वा स कतिचिद् भवान् ।। भृत्वा महाविदेहेषु, दूरान्निवृतिमेष्यति ॥१॥” इत्युपदेशमालाकर्णिकायामपीत्थमेव निगदितम् । अत्र यत्परेणोच्यते 'कतिचिद् भवान्' इति यद् भणितं तत्किल्बिषिकदेवभवाच्च्युतो जमालिरनन्तरं सर्वलोकगर्हणीयान् मनुष्यादिदुर्गतिसम्बन्धिनः कतिचिद् भवा. नवाप्य पश्चात्सूक्ष्मैकेन्द्रियादिषु यास्थतीति ज्ञापनार्थमेव । तथा चागमोऽपि दश०अ०५उ०२"लब्धृण विदेवत्वं, उववन्नो देवकिब्बिसे॥ Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१६॥ HA 18॥खोपत्र L ASSICALCASS तत्थवि से न याणेइ, किं मे किच्चा इमं फलं ॥४७॥ तत्तो वि से चइत्ता णं, लम्भिही एलमृअगं.।। णरगं तिरिक्खजोणिं वा, बोही तसटिप्पण जत्थ सुदुल्लहा ॥४८॥" [लब्ध्वापि देवत्वं उपपन्नो देवकिल्बिषे । तत्रापि स न जानाति किं मम कृत्वेदं फलम् ।। ततोऽपि स च्युत्वा लप्स्यते एडमुकत्वं ।। नारकतिर्यग्योनि वा बोधिर्यत्र सुदुर्लभा॥] इति । तदतिकदाग्रहविजृम्भितम् , अत्र तिर्यगादिषु प्रत्येकं परिमितभव वृतिः ॥ भ्रमणस्य व्यक्तमेवाभिधानात् , इच्छामात्रेणाविशिष्टानन्तभवकल्पनस्याप्रामाणिकत्वात् , स्थूलभवाभिधानमात्रमेतदित्यत्र प्रमाणाभावात् , गाथा-४. न च 'दूरान्निवृति मेष्यतीति' वचनानुपपत्तिरेवात्र प्रमाणम् , आसन्नतादरतयोरापेक्षिकत्वात् । किञ्च दूरपदं विनाऽप्येवंविधोऽर्थोऽन्यत्र ॥१६॥ | दृश्यते । तदुक्तं सर्वानन्दसूरिविरचितोपदेशमालावृत्तौ-"तिर्यक्षु कानपि भवानतिवाह्य कांश्चि-देवेषु चोपचितसञ्चितकर्मवश्यः॥ लब्ध्वा ततः सुकृतजन्मगृहे विदेहे, जन्मायमेष्यति सुखैकखनिर्विमुक्तिम् ॥१॥" इति । यत्तु जमाले साक्षात्तीर्थकरदूषकस्थापि पश्चदश भवाः, सुबाहुकुमारस्य च जिनाज्ञाराधकस्यापि पोडश भवा इति जिनाज्ञाराधनापेक्षया तद्विराधनमेव सम्यगिति परस्याभिधानं तदविवेकमूलम् । एवं हि दृढपहारिप्रभृतीनां घोरपापकारिणां तद्भवमुक्तिगामित्वम् , आनन्दादीनां च देवमनुजभवप्राप्तिक्रमणेति सुकृतापेक्षया दुष्कृतमेव सम्यगिति वदतोऽपि मुखं कः पिदध्यादिति । यदपि साधुभक्तस्य द्रव्यतस्तीर्थकृतोऽपि मरीचेः कापिलीयदर्शनप्रवृत्तिहेतुसन्दिग्धोत्सूत्रभाषणनिमित्तदुर्वचनमात्रेणाप्येकेन्द्रियादिष्वसंख्येयभवभ्रमणं, जमालेश्च साक्षात्तीर्थकरदृषकस्यापि पञ्चदश भवा इति महदसमञ्जसमिति परेणोपुष्यते तदपि तथाभव्यताविशेषादेव न पर्यनुयोगाईम् , अन्यथा सन्दि| ग्धोत्सूत्रभाषिणोऽपि मरीचेनरकभवदुःखप्राप्तिः, निश्चितोत्सूत्रभाषिणश्च जमालेनेयमित्यत्र भवतोऽपि किमुत्तरं वाच्यमिति रागद्वेषरहितेन चेतसा चिन्तनीयम् । दोघहीसंज्ञकायां वृत्तौ तु 'ततच्युतश्चत्वारि पंच तिर्यग्मनुष्यदेवभवग्रहणानि संसारमनुपर्यव्य महाविदेहे Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षां ॥१६१ ॥ सेत्स्यति' - इति शब्दसन्दर्भेण भगवती सूत्रालापकानुवाद्येव दृश्यते । सिद्धर्षीयोपदेश माला टीकायास्त्वादर्श भेदात्पाठभेदो दृश्यते । तथा हि-“आजीवन्ति द्रव्यलिङ्गेन लोकमित्याजीवका निवास्तेषां गणो गच्छस्तस्य नेता नायको गुरुरित्यर्थः, राज्यश्रियं प्रहाय - परित्यज्य, प्रव्रज्यां गृहीत्वा चशब्दादागमं चाधीत्य, जमालिर्भगवज्जामाता, हितमात्मनोऽकरिष्यद्, 'यदि' इत्यध्याहारः, ततो न-नैव वचनीये निन्द्यत्वे, इह लोके प्रवचने वा अपतिष्यत् । तथा हि- मिथ्यात्वाभिनिवेशादसौ भगवद्वचनं 'क्रियमाणं कृतम्' इत्यश्रद्दधानः " कृतमेव कृतम्” इति विपरीतप्ररूपणालक्षणादहिताचरणादेव लोकमध्ये वचनीये पतितोऽति दुष्करतपोविधानेऽपि किल्बि षदेवत्वं भवं चानन्तं निर्वर्तितवान्" इत्ययं (त्येवं) केषुचिदादर्शेषु पाठो दृश्यते ॥ “विपरीतप्ररूपणादहिता चरणादेव 'निह्वोऽयम्'इति लोकमध्ये वचनीये पतितोऽतिदुष्करतपोविधानेऽपि किल्बिषदेवत्वं निर्वर्तितवान् । ” इत्ययमपि कचिदादर्शे पाठो दृश्यते ॥ कचिच्च "तथामिथ्यात्वाभिनिवेशादसौ भगवद्वचनं 'क्रियमाणं कृनम्' – इत्यश्रद्दधानः " कृतमेव कृतम् इति विपरीतप्ररूपणलक्षणादहिताचरणादेव 'निवोऽयम्' इति लोकमध्ये वचनीये पतितोऽतिदुष्कर तपोविधानेऽपि किल्बिषदेवत्वं भवं चानन्तं निर्वर्तितवान् । उक्तं च प्रज्ञप्तौ 'जइ णं भंते ! जमाली अणगारे अरसाहारे विरसाहारे जाव विवित्तजीवी कम्हा णं भंते ! जमाली अणगारे कालमांसे कालं किच्चा लंतए कप्पे तेरससागरोवमठिइएस देवकिञ्चिसिएस देवेसु देवकिब्बिसियत्ताए उववन्ने ?, गोयमा ! जमाली णं अणगारे आयरियपडिणीए इत्यादि यावत् लंतए कप्पे जाव उववन्ने । जमाली णं भंते! देवे ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव कहिं | उववज्जिहिति ?, गोयमा ! चत्तारि पंच तिरिक्खजोणियमणुस्सदेवभवग्गहणाई संसारमणुपरिअट्टित्ता तओ पच्छा सिज्झिहिति जाव अंतं काहेति । " [ यदि भदन्त जमालिरनगारोऽरसाहारो विरसाहारो यावद्विविक्तजीवी कस्माद्भदन्त जमालिरनगारः कालमासे कालं 1 सटिप्पणा ॥खो पत्र वृचिः ॥ गाथा-४० ॥ १६९ ॥ Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ १६२॥ कृत्वा लांतके कल्पे त्रयोदश सागरोपमस्थितिकेषु देवकिल्विकेषु देवेषु देवकिल्बिषिकतया उत्पन्नः, गौतम जमालिरनगारः आचार्यप्रत्यनीक इत्यादि यावत् लान्तके कल्पे यावदुत्पन्नः ॥ जमालिर्भदन्त ततो देवलोकादायुःक्षयेण यावत्कुत्रोत्पत्स्यते गौतम चत्वारि पंच तिर्यग्योनिक मनुष्यदेव भवग्रहणानि संसारमनुपर्यय्य ततः पश्चात्सेत्स्यति यावदन्तं करिष्यति ] इत्येवम्भूतः पाठोऽस्ति । ” हेयोपादेयवृत्ताaft केषुचिदादर्शेष्वयमेव पाठोस्ति । आदर्शान्तरे च- "अतिदुष्करतपोविधानेऽपि किल्बिषदेवत्वं निर्वर्तितवान् " - इति । उक्तं च प्रज्ञप्ती - 'जइ णं भंते ०" इत्यादिरचनया पाठोऽस्ति । एवंस्थिते मध्यस्था गीतार्था इत्थं प्रतिपादयन्ति यदुत भगवत्यादिबहुग्रन्धानुसारेण परिमितभवत्वं जमा लेर्ज्ञायते, सिद्धर्षीय वृत्तिपाठविशेषाद्यनुसारेण चानन्तभवत्वमिति, तत्त्वं तु तत्त्वविद्वेद्यमिति; परं भगवती सूत्रं प्रकृतार्थेन विवृतमस्ति, तत्सांमुख्यं च वीरचरित्रादिग्रन्थं तेषु दृश्यते, संमतिप्रदर्शनं त्वर्थद्वयाभिधानप्रक्रमेऽप्येकार्था पुरस्कारेणापि सम्भवति । यथा “नानाकारं कायेन्द्रियम्, असंख्येय भेदत्वात्, अस्य चान्तर्बहिर्भेदो निर्वृत्तेर्न कश्चित् प्रायः, प्रदीर्घत्र्यस्रसंस्थितं कर्णाटकायुधं क्षुरप्रस्तदाकारं रसनेन्द्रियम्, अतिमुक्तक पुष्पदलचन्द्रकाकारं किंचित्सकेसरवृत्ताकारमध्यविनतं घ्राणेन्द्रियम्, किंचित्समुन्नतमध्यपरिमण्डलाकारं धान्यमसूरवच्चक्षुरिन्द्रियम्, पाथेयभाण्डकयवनालिकाकारं श्रोत्रेन्द्रियं नालिककुसुमाकृति चावसेयम्, तत्राद्यं स्वकायपरिमाणं द्रव्यमनश्च, शेषाण्यङ्गुलासंख्येय भागप्रमाणानि सर्वजीवानाम् । तथा चागमः (प्रज्ञापना) "फा सिंदिए णं भंते किंसंठि पण्णत्ते, गोयमा ! णाणासंठाणसंठिए । जिम्भिदिए णं भंते किंसंटिए पण्णत्ते ?, गोयमा ? खुरप्पसंठिए । घार्णिदिए णं भंते किंसंठिए पण्णत्ते ?, गोयमा ! अतिमुत्तय चंदगसंठिए पण्णत्ते । चक्खुरिंदिए णं भंते किंसंटिए पण्णत्ते ? गोयमा ! मस्तूरयचंदसंठिए । सोइंदिए णं भंते! किं संठिए पण्णत्ते !, गोयमा ! कलंबुआपुप्फसंठिए पण्णत्ते" [स्पर्शनेन्द्रियं भदन्त किं संस्थितं प्रज्ञप्तं, गौतम नानासंस्थानसंस्थितं । सटिप्पना || खोप वृतिः ॥ गाथा- ४० ।।१६२॥ Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ % धर्मपरीक्षा ॥१३॥ सटिप्पणा स्वोपड़ पति गाथा-". |॥१६॥ Dark जिद्वेन्द्रियं भदन्त किं संस्थितं प्रज्ञप्तं, गौतम क्षुरप्रसंस्थितं । घ्राणेन्द्रियं भदन्त किं संस्थितं प्रज्ञप्तं, गौतम अतिमुक्तकचन्द्रकसंस्थितं । चक्षुरिन्द्रियं भदन्त किं संस्थित प्रज्ञप्तं, गौतम मसूरकचन्द्रसंस्थितं । श्रोत्रेन्द्रियं भदन्त किं संस्थितं प्रज्ञप्तं, गौतम कदम्बपुष्पसंस्थितं प्रज्ञप्तं] इति तत्त्वार्थवृत्तौ अ० २ सू० १७।” अत्र हीन्द्रियसंस्थानं तत्परिमाणं चेति द्वयमुपक्रान्तं, संमतिप्रदर्शन तु पूर्वार्थ एवेत्येवं सिद्धर्षी- यवृत्त्यादर्शविशेषेऽपि जमालेरनन्तभवस्वामित्वप्रदर्शनं चतुरन्तसंसारकान्तारदृष्टान्तत्वप्रदर्शनसदृशम् , सूत्रसंमतिस्तु देवकिविषिकत्वांश एव-इत्ययमर्थो न्याय्योऽन्यो वा तत्र कश्चित्सुन्दरोऽभिप्राय इति यथा बहुश्रुताः प्रतिपादयन्ति तथा प्रमाणीकर्तव्यं न तु कुविकल्पचक्रेण ग्रन्थकदर्थना कर्तव्या । यत्तु वस्तुगत्या समयभाषया तिर्यग्योनिकशब्द एवानन्तभवाभिधायको भवति । यदुक्तं "तिर्यग्योनीनां च" इति तत्त्वार्थ सूत्र अ०३ सू० १८ भाष्यवृत्तौ-"तिर्यग्योनयः पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिद्वित्रिचतुःपञ्चन्द्रियास्तेषामपि परापरे स्थिती इत्यादि यावत्साधारणवनस्पतेरनन्ता अवसर्पिण्युत्सर्पिण्यः"-इत्यादि इति । परेणोक्तं तत्त्वनाकलितग्रन्थानां विभ्रमापादकं प्रेक्षावतां तूपहासपात्रम् । परापरभवस्थितिकायस्थितिविवेकस्य तत्र प्रतिपादितत्वात् , उत्कृष्टकायस्थितेरेव तिर्यग्योनीनामनन्तत्वपर्यवसानात् प्रकृते च भवग्रहणाधिकारात् न तत्कायस्थितिग्रहणं कथमपि सम्भवतीति किं पल्लवग्राहिण्या समधिकविचारणयेति कृतं असक्तानुप्रसक्त्या ॥४०॥ तदेवं मरीचेरिव स्तोकस्याप्युत्सूत्रस्य दुःखदायित्वात् 'अन्येषां गुणानुमोदनं न कर्त्तव्यम्'-इत्युत्सूत्रं त्याज्यम् , कर्तव्या च गुणानुमोदना सर्वेषामपीति व्यवस्थापितम् । अथ सूत्रभाषकाणां गुणमाहसुत्तं भासंताणं, णिच्चं हिययहिओ हवइ भयवं ॥ हियद्विअंमि तमि य, णियमा कल्लाणसंपत्ती ॥४१॥ [सूत्रं भाषमाणानां नित्यं हृदयस्थितो भवति भगवान् । हृदयस्थिते तस्मिंश्च नियमात्कल्याणसंपत्तिः॥४१॥] -RE GAA-RESS SS Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१६४॥ 'सुत्तं भासंताणं ति। सूत्रं भाषमाणानां, नित्यं निरन्तरं, भगवांस्तीर्थङ्करो, हृदयस्थितो भवति, भगवदाज्ञाप्रणिधाने PIसटिप्पणा भगवत्प्रणिधानस्यावश्यकत्वात् , आज्ञायाः ससम्बन्धिकत्वात् । हृदयस्थिते च तस्मिन् भगवति सति, नियमानिश्चयात् , कल्या ॥खोपत्र णसम्पत्तिः, समापत्त्यादिभेदेन तीर्थकद्दर्शनस्य महाकल्याणावहतायाः पूर्वाचार्यः प्रदर्शितत्वादिति ॥४१॥ चिः ॥ कल्याणप्रापकत्वं च हृदयस्थितस्य भगवतोऽनर्थनिराकरणद्वारा स्थादित्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां तस्यानर्थनिराकरणहेतुत्वगुणमभिष्टुवन्नाह गाथा-४१ हिययडिओ अभयवं, छिंदइ कुविगप्पमत्तभत्तस्स ॥ तयभत्तस्स उ तंमि वि, भत्तिमिसा होइ कुविगप्पो॥४२॥ ४२-४३ • [ हृदयस्थितश्च भगवान् छिनत्ति कुविकल्पमात्मभक्तस्य । तदभक्तस्य तु तस्मिन्नपि भक्तिमिषाद् भवति कुविकल्पः ॥४२॥] ॥१६॥ | हिययडिओ 'त्ति हृदयस्थितश्च भगवानात्मभक्तस्य स्खसेवकस्य, कुविकल्पं कुतर्काभिनिवेशरूपं, छिनत्ति । दुनिवारो हि प्राणिनामनादिभवपरम्परापरिचयान्मोहमाहात्म्यजनितः कुविकल्पः, केवलं भगवद्भक्तिरेव तमुच्छिद्य तदुत्पादं निरुद्धथ वा तत्कृताशुभविपाकानिस्तारयतीति । तदुक्तमन्यैरपि-“पुण्ये मनः कस्य मुनेरपि स्यात् , प्रमाणमेतस्य हि (मेनस्यपि) दृश्यवृत्ति ॥ तचिन्तिचित्तं परमेश्वरस्तु, भक्तस्य हृष्यत्करुणो रुणद्धि ॥१॥" इति । अन्वयप्रदर्शनमेतद् । व्यतिरेकमाह-तदभक्तस्य तु कुतर्काध्माततया भगवद्भक्तिरहितस्य तु, तस्मिन्नपि सकलदोषरहिते जगजीवहिते भगवत्यपि, भक्तिमिषाल्लोकसाक्षिककृत्रिमभक्ति व्यप-12 देशात् , कुविकल्पोऽसदोषाध्यारोपलक्षणो भवतीति, भगवतो हृदयेऽवस्थानाभावादिति भावः॥ ४२ ॥ कथं भगवत्यपि भक्तिमिषात् कुविकल्पो भवतीत्याहजेणं भणंति केइ, जोगाउ कयावि जस्स जीववहो। सो केवली ण अम्हं, सो खलु सक्खं मुसावाई ॥४३॥ [येन भणन्ति केचिद् योगात् कदापि यस्य जीववधः । स केवली नास्माकं, स खलु साक्षान्मृपावादी ॥४३॥] SA564 Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१६५॥ । 'जेणं'ति । येन कारणेन, भांति केचिद्, यदुत यस्य योगात्कदाचिदपि जीववधो भवति, सोऽस्माकं केवली न भवति । स खलु साक्षान्मृषावादी, जीववधं प्रत्याख्यायापि तत्करणात् इदं हि भक्तिवचनं मुग्धैर्ज्ञायते, परमार्थतस्तु भगवत्य| सद्दोपाध्यारोपात् कुविकल्प एवेति भाव: ।। ४३ ।। एतन्निराकरणार्थमुपक्रमते - ते इय पजणुजुज्जा, कह सिद्धो हंदि एस नियमो भे ॥ जोगवओ दुव्वारा, हिंसा जमसक्क परिहारा ॥४४॥ [ ते इति पर्यनुयोज्याः कथं सिद्धो हंदि एष नियमो भवताम् । योगवतो दुर्वारा हिंसा यदशक्यपरिहारा ॥ ४४ ॥ ] 'ते इय'त्ति । ते एवं वादिनः पर्यनुयोज्याः प्रतिप्रष्टव्याः इत्यमुनाप्रकारेण यदुत एष नियमो - यस्य योगात् कदाचिदपि जीववधो भवति स न केवलीत्येवंलक्षणः, कथं मे भवतां, सिद्धः?, यद्यस्मात्कारणाद्, योगवतः प्राणिन आत्रयोदशगुणस्थानम्, | अशक्यपरिहारा हिंसा दुर्वारा, योगनिरोधं विना तस्याः परिहर्तुमशक्यत्वात्, तदीययोगनिमित्तकहिंसानुकूलहिंस्य कर्मविपाकप्रयुक्ता हि हिंसा तदीययोगाद् भवन्ती केन वार्यतामिति । अथैवं सर्वेषामपि हिंसाऽशक्यपरिहारा स्यादिति चेत्, न । अनाभोगप्रमादादिकारणघटितसामग्रीजन्यायास्तस्या आभोगाप्रमत्ततादिना कारणविघटनेन शक्यपरिहारत्वाद्, योगमात्रजन्यायास्त्वनिरुद्धयोगस्याशक्य परिहारत्वादिति विभावनीयम् । नन्वीदृश्यां जीवविराधनायां जायमानायां केवलिना जीवरक्षाप्रयत्नः क्रियते न वा १, आधे न क्रियते चेत्, तदाऽसंयतत्वापत्तिः । क्रियते चेत्, तदा चिकीर्षितजीवरक्षणाभावात्प्रयत्नवैफल्यापत्तिः; सा च केवलिनो न सम्भवति, तत्कारणस्य वीर्यान्तरायस्य क्षीणत्वाद्, अत एव देशनाविषयकप्रयत्नविफलतायां केवलिनः केवलित्वं न सम्भवतीति परेषां सम्यक्त्वाद्यलाभे धर्मदेशनामप्यसौ न करोतीत्यभ्युपगम्यते । तदुक्तमावश्यकनिर्युक्तौ - "सव्वं च देसविरई, सम्मं पिच्छइ य होइ कहणाउ ॥ इहरा सटिप्पणा ॥खोपय चिः ॥ गाथा-४४ ॥१६५॥ Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पण धर्मपरीक्षा ॥१६६॥ वृधिः ॥ माधा-४५ CAMERABADMAS अमृढलक्खो, ण कहेइ भविस्सईण तं बत्ति ॥५६४॥" [सर्वां च देशविरतिं सम्यक्(क्त्वं) पश्यति च भवति कथनात् । इतरथा अमूढलक्ष्यो न कथयति भविष्यति न तद्वेति ॥१॥] ततः क्षीणवीर्यान्तरायत्वादशक्यपरिहारापि जीवविराधना केवलिनो न सम्भवतीति चेत् ।। न, यथा हि-भगवतः सामान्यतः सर्वजीवहितोद्देशविषयोऽपि वाक्प्रयत्नः खल्पसंसारिष्वेव सफलो भवति, न तु बहुलसंसारिषु, प्रत्युत ४। तेषु कर्णशूलायते । यत उक्तं सिद्धसेनदिवाकरः(द्वा०२)"सद्धर्मबीजवपनानघकौशलस्य, यल्लोकबान्धव ! तवापि खिलान्यभूवन् ।। तन्नाद्भुतं खगकुलेष्विह तामसेषु, सूर्यांशवो मधुकरीचरणावदाताः॥१३॥" इति । अत एव च लोकनाथत्वमपि भगवतो बीजाधानादि| संविभक्तभव्यलोकापेक्षया व्याख्यातं ललितविस्तरायाम् , “अनीशि नाथत्वानुपपत्तेरिति” । न चैतावता भगवतो वाक्प्रयत्नस्य विफलत्वं, शक्यविषय एव विशेषतः साध्यत्वाख्यविषयतया तत्प्रवृत्तेस्तत्फलवत्त्वव्यवस्थितेः। तथा सामान्यतः सर्वजीवरक्षाविषयोऽपि भगवतः कायप्रयत्नो विशेषतः शक्यजीवरक्षाविषयत्वेन सफलः सन् नाशक्यविषये वैफल्यमात्रेण प्रतिक्षेप्तुं शक्यत इति । न चाधिकृतविषये वाक्प्रयत्नो न विफलः, स्वल्पसंसार्यपेक्षया साफल्याद् , इतरापेक्षया वैफल्यस्य तत्रावास्तवत्वाद् । अशक्यपरिहारजीवविराधनायां तु तद्रक्षाप्रयत्नः सर्वथैव विफल इति वैषम्यमिति तत्र वीर्यान्तरायक्षयवैफल्यापत्तिरिति तत्साफल्याथ भगवद्योगानां हिंसायां स्वरूपायोग्यत्वमेवाभ्युपेयमिति शङ्कनीयम् । एवं सति हि भगवतः क्षुत्पिपासापरीषहविजयप्रयत्नाक्षुत्पिपासानिरोधं विना विफल इति वीर्यान्तरायक्षयवैफल्यापत्तिनिरासार्थे भगवतः क्षुत्पिपासयोरपि स्वरूपायोग्यत्वं कल्पनीयमिति दिगम्बरस्य वदतो दूषणं न दातव्यं स्यादिति । यदि च क्षुत्पिपासयोनिरोधुमशक्यत्वात् तत्परीषहविजयप्रयत्नो भगवतो मार्गाच्यवनादिस्वरूपेणैव फलवानिति विभाव्यते तदाऽशक्यपरिहारजीवविराधनाया अपि त्यक्तुमशक्यत्वात् , तत्र जीवरक्षाप्रयत्नस्यापि भगवतस्तथा स्वरूपेणैव फलवत्वमिति किं वैष BAHAARADAISABUA Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१६॥ म्यम् । इत्थं च-"तस्स असंचेययओ, संचेययओ अ जाई सत्ताई।जोगं पप्प विणस्संति, णत्थि हिंसाफलं तस्स ॥७५१॥” "तस्यै इसटिप्पणा वंप्रकारस्य ज्ञानिनः कर्मक्षयार्थमभ्युद्यतस्य, असचेतयतोऽजानानस्य,किं ? सत्त्वानि, कथं ? प्रयत्नं कुर्वतोऽपि, कथमपि न दृष्टः प्राणी, ॥स्वोपड़ | व्यापादितश्च । तथा सञ्चेतयतो जानानस्य, कथम् ? अस्त्यत्र प्राणी ज्ञातो दृष्टश्च, न च प्रयत्नं कुर्वताऽपि रक्षितुं पारितः, ततश्च तस्यैवंविधस्य, यानि मत्त्वानि, योग कायादिव्यापार, प्राप्य विनश्यन्ति । तत्र नास्ति नस्य साधोः, हिंसाफलं साम्परायिक गाथा-४५ संसारजननं दुःखजननमित्यर्थः । यदि परमीर्याप्रत्ययं कर्म भवति, तच्चैकस्मिन् समये बद्धमन्यस्मिन्समये क्षिप(क्षपय)तीति" ओघ- ॥१६७॥ नियुक्तिसूत्रवृत्तिवचने "नच प्रयत्नं कुर्वतापि रक्षितुं पारितः" इति प्रतीकस्य दर्शनाजीवरक्षोपायानाभोगादेव तदर्थोपपत्तः, केवलि. मिन्नस्यैव ज्ञानिनो योगानामीर्यापथप्रत्ययकर्मबन्धानुकूलसत्त्वहिंसाहेतुत्वं सिद्धथति न तु केवलिन इति निरस्तम् । न च प्रयत्नं कुर्वतापीत्यनेन प्रयत्नवैफल्यासिद्धिः, निजकायव्यापारसाध्ययतनाविषयत्वेन तत्साफल्याद् , अन्यथा तेन केवलिनो वीर्याविशुद्धिमापादयतो निर्ग्रन्थस्य चारित्राविशुद्धथापत्तः, तस्याप्याचाररूपप्रयत्नघटितत्वाद् यतनात्वेन चोभयत्र शुद्धयविशेषाद् । न चाशक्यजीवरक्षास्थलीययतनायां तद्रक्षोपहितत्वाभावो रक्षोपायानाभोगस्यैव दोषो, न तु निर्ग्रन्थस्य चारित्रदोषः, स्नातकस्य तु केवलित्वान्न तदनाभोगः सम्भवतीति तद्योगा रक्षोपहिता एव स्वीकर्तव्या इति वाच्यम् । तथाविधप्रयत्नस्यैव जीवरक्षोपायत्वात् , केवलिनापि तदर्थमुल्लचनप्रलङ्घनादिकरणात् ॥ तदुक्तं प्रज्ञापनायां समुद्धातानिवृत्तस्य केवलिनः काययोगव्यापाराधिकारे-"कायजोगं जुजमाणे आगच्छेज वा, गच्छेज वा, चिद्वेज वा, णिसीएज वा, तुअर्टेज वा, उल्लंघेज वा, पलंधेज वा, पाडिहारियं पीढफलगसेजासंथारंग पच्चप्पिणेजत्ति ॥ [ पद ३६]" अत्र उल्लंघेज वा पलंघेजवे'त्येतत्पदव्याख्यानं यथा-" अथवा विवक्षिते स्थाने तथाविधस LORANHAIR Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१६८॥ म्पातिमसत्वाकुलां भूमिमवलोक्य तत्परिहाराय जन्तुरक्षानिमित्तमुल्लङ्घनं प्रलङ्घनं वा कुर्यात् । तत्र सहजात्पादविक्षेपान्मनागधिकतरः पादविक्षेप उल्लङ्घनं स एवातिविकटः प्रलङ्घनमिति ॥ " स च जीवरक्षोपायप्रयत्नो निर्ग्रन्थेन ज्ञात एवेति तस्याशक्यपरिहारजीवहिंसायां तद्रक्षाविघटको नानाभोगः, किन्त्वशक्तिः, सा च योगापकर्षरूपा निर्ग्रथस्नातकयोः स्थानौचित्येनाविरुद्धेति प्रतिपत्तव्यम् ।। यदि च तादृशरक्षोपायाः केवलियोगा एव, तदनाभोगश्च निर्ग्रन्थस्य तद्विघटक इति वक्रः पन्थाः समाश्रीयते तदा प्रेक्षावतामुपहासपात्रताऽऽयुष्मतः, यत एवमनुपायादेव तस्य तद्रक्षाभाव इति वक्तव्यं स्यात्, न तूपायानाभोगादिति कारणवैकल्यमेव हि कार्यविघटने तन्त्रं न तु कारणज्ञानवैकल्यमपि । न च केवलियोगानां स्वरूपत एव जीवरक्षा हेतुत्वमित्यपि युक्तिमद्, उल्लङ्घनप्रलङ्घनादिवैफल्यापत्तेः, केवलियोगेभ्यः स्वत एव जीवरक्षासिद्धौ तत्र तदन्यथासिद्धेः, अनुपायविषयेऽपि क्रियाव्यापाराभ्युपगमे च कोशादिस्थितिसाधनार्थमपि तदभ्युपगमप्रसङ्गात् । यदि च साध्वाचारविशेषपरिपालनार्थ एव केवलिनोऽसौ व्यापारो न तु जन्तुरक्षानिमित्तः, तस्याः स्वतः सिद्धत्वेन तत्साधनोद्देशवैयर्थ्यात् जन्तुरक्षानिमित्तत्वं तूपचारादुच्यते, मुख्यप्रयोजनसिद्धेश्व न तद्वैफल्यमिति च वक्रकल्पना त्वयाऽऽश्रीयते, तदा 'स्वशस्त्रं स्वोपघाताये 'ति न्यायप्रसङ्गः । एवं ह्यशक्य परिहारजीव हिंसास्थलेऽपि साध्वाचारविशेषपरिपालनार्थस्य भगवत्प्रयत्नस्य सार्थक्यसिद्धौ 'संचेययओ अ जाई सत्ताइं जोगं पप्प विणस्संती'त्यत्र छद्मस्थ एवाधिकृत इति स्वप्रक्रियाभङ्गप्रसङ्गात् । तस्मादाभोगादनाभोगाद्वा जायमानायां हिंसायां प्राणातिपातप्रत्ययकर्मबन्धजनकयोगशक्ति विघटनं यतनापरिणामेन क्रियत इत्येदर्थप्रतिपादनार्थ " न च प्रयत्नं कुर्वताऽपि रक्षितुं पारितः " इत्युक्तम् । अत एव सूत्रेऽपीत्यमेव व्यवस्थितम् । तथा हि- " वजेमित्तिपरिणओ, संपती विमुच्चई वेरा ॥ अवर्हतो वि ण मुच इ. किलिङ भावोऽतिवायस्स ||६१॥” इति ॥ [ ओघनिर्युक्ति ] एतद्वृत्तिर्यथा - वर्जयाम्यहं सटिप्पणा ॥ खोपड़ वृचिः ॥ गाथा-४४ ॥ १६८ ॥ Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा॥१६९॥ प्राणातिपातादीत्येवं परिणतः सन् सम्प्राप्तावपि, कस्य अतिपातस्य प्राणिप्राणविनाशस्येत्युपरिष्टात् सम्बन्धः, तथाऽपि विमुच्यते | वैरात् कर्मबन्धाद् । यस्तु पुनः, क्लिष्टपरिणामः सोऽव्यापादयन्नपि न मुच्यते वैरादिति ज्ञात्वा जीवघातस्येयपथप्रत्य - यकर्मबन्धजनने यतनापरिणामस्य सहकारित्वप्रतिपादनार्थ 'न च प्रयत्नं कुर्वतापि रक्षितुं पारितः' इत्युक्तमित्यपरे ।। यत्तु वर्जनाभिप्राये सत्यनाभोगवशेन जायमानो जीवधातो द्रव्य हिंसात्मको न कर्मबन्धहेतुः, वर्जनाभिप्रायस्य कारणं तु जीवघाते नियमेन दुर्गतिहेतुकर्मबन्धो भवतीत्यभिप्राय एव, अन्यथा सुगतिहेतुषु ज्ञानादिष्वपि वर्जनाभिप्रायः प्रसज्येत । केवलिनस्तु वर्जनाभिप्रायो न भवत्येव, | सर्वकालं सामयिकसात वेदनीयकर्मबन्धकत्वेन दुर्गतिहेतुकर्मबन्धाभावस्य निर्णीतत्वात् तस्माञ्जीवघातस्तञ्जनितकर्मबन्धभावश्चेत्युभयमप्यनाभोगवन्तं तं संयतलोकमासाद्यैव सिद्धयतीति परस्य मतं तदसद् | वर्जनाभिप्रायस्य भगवतः प्रज्ञापनावृत्तावेवोक्तत्वात्, स्वकीयदुर्गतिहेतुकर्मबन्धहेतुत्वाज्ञानेपि स्वरूपेण वर्जनीये वर्जनाभिप्रायस्य भगवत उचितप्रवृत्तिप्रधानसामयिकफलमहिम्नैव सम्भवाद् ; अन्यथाऽनेषणीयपरिहाराभिप्रायोऽपि भगवतो न स्याद् अनेषणीयस्यापि खापेक्षया क्लिष्टकर्मबन्धहेतुत्वनिश्चयात्, तथा च ' तत्थ णं रेवतीए गाहावइणीए मम अट्ठाए दुवे कवोअसरीरा उबक्खडिया तेहिं णो अट्ठोत्ति । " [ तत्र च रेवत्या गाथापतिन्या मदर्थं द्वे कपोतशरीरे (कूष्मांडफले) उपस्कृते ताभ्यां नार्थ इति । ] अनेषणीयपरिहाराभिप्रायाभिव्यञ्जकं प्रज्ञप्तिसूत्रं शतक १५ व्याहन्येत, तस्माद्यथोचितकेवलिव्यवहारानुसारेण वर्जनाद्यभिप्रायस्तस्य सम्भवत्येवः प्रयत्नसाफल्यं तु शक्यविषयापेक्षया न त्वितरापेक्षयेति मन्तव्यम् । एतेन केवलज्ञानोत्पत्तिसमय एव केवलिना सर्वकालीनं सर्वमपि कार्य नियतकारणसामग्रीसहितमेव दृष्टं तत्र केवलिना निजप्रयत्नोऽपि विवक्षितजीवरक्षाया नियतकारणसामय्यामन्तर्भूतो दृष्टोऽनन्तर्भूतो वा, आद्ये केवलिप्रयत्नस्य वैफल्यं न स्यात्, तस्य तस्या नियतकारणसा सटिप्पणा ॥ खोपड दुचिः ॥ गाथा-४४ ॥१६९ ।। Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१७०॥ सटिप्पणा खोपत्र वृतिः ॥ गाथा-४५ ॥१७॥ PotatuREGIBABAUMISHNDIA मयन्त तत्वेन दृष्त्वाद् , द्वितीय विवक्षितजीवरक्षार्थ केवलिनः प्रयत्न एव न भवेत् , केवलिना तत्सामग्न्यनतर्भूतत्वेन दृष्टत्वादिति, 'न च प्रयत्नं कुर्वतापि रक्षितुं न पारित' इति वचनं छमस्थसंयतमधिकृत्यैवेति कल्पनाऽप्यपास्ता, स्वव्यवहारविषयनियतत्वेनैव केवलिना खप्रयत्नस्य दृष्टत्वादिति दिग् ॥ ४४ ॥ ननु जीवहिंसा गर्हणीयाऽगहनीया वा?, अन्त्ये लोकलोकोत्तरव्यवहारबाधः ।आये च गर्हणीयं कृत्यं भगवतो न भवतीति भगवतस्तदभावसिद्धिरित्याशङ्कायामाहखोणे मोहे णियमा, गरहाविसओ ण होइ किच्चंति ॥सा ण जिणाणंति मई, दव्ववहे होइ णिब्बिसया ॥४५॥ [क्षीणे मोहे नियमाद् गर्दाविषयो न भवति कृत्यमिति । सा न जिनानामिति मतिर्द्रव्यवधे भवति निर्विषया ॥४५॥] 'खीणे मोहे'त्ति क्षीणे मोहे निस्सत्ताकीभूते मोहनीयकर्मणि, नियमानिश्चयेन, गहाँ विषयः। कृत्यं गर्हणीयं प्राणातिपातादिकर्म, | न भवति, कस्यापि प्राणिनः। तदुक्तमुपदेशपदे-"इत्तो उ वीयरागो, ण किंचि वि करेइ गरहणिज्जं तु"त्ति । एतवृत्त्येकदेशो यथा-"इतस्त्वित एवाकरणनियमात्प्रकृतरूपाद्, वीतरागःक्षीणमोहादिगुणस्थानवर्ती मुमिः, न नैव, किश्चिदपि करोति जीवघातादिकं सर्व गर्हणीयं त्ववद्यं, देशोनपूर्वकोटीकालं जीवनपीति।" इति हेतोः। सा हिंसा, जिनानां विगलितसकलगर्हणीयकर्मणां क्षीणमोहवीतरागाणां न भवतीति तव मतिः, केवलं भावप्राणातिपातनिषेधापेक्षया सविषया स्याद्, द्रव्यवधे तु निर्विषया भवति, तस्याशक्यपरिहारत्वेनागर्हणीयत्वात् ; द्रव्यभावोभयरूपस्य केवलभावरूपस्य च प्राणातिपातादेव्रतभङ्गरूपत्वेन शिष्टलोकगर्हणीयत्वादशिष्टगर्दायाश्चाप्रयोजकत्वात् । क्रूरकर्माणो हि 'न स्वयंभूरयं किन्तु मनुष्य इति कथमस्य देवत्वम् ?, कवलाहारवतो वा कथं केवलित्वम् ?' इत्यादिकां भगवतोऽपि गहीं कुर्वन्त्येवेति । न चेदेवं तदोपशान्तमोहगुणस्थानवर्तिनो गर्हणीयप्राणातिपातायभुपगमे यथाख्यातचारि PAC%ACANDRABHA Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१७॥ सटिप्पा ॥स्वोपड़ वृधिः ॥ गाथा-४५ | ॥१७॥ HAPPEARN त्रविलोपप्रसङ्गः । अथोपशान्तमोहवीतरागख मोहनीयसत्ताहेतुकः कदाचिदनाभोगसहकारिकारणवशेन गर्दापरायणजनस्व प्रत्यक्षत्वाद् गर्हणीयो जीवघातो भवत्येव, न तु यथाख्यातचारित्रलोपस्तेन भवति, उत्सूत्रप्रवृत्तरेव तल्लोपहेतुत्वात् । न च प्रतिषिद्धप्रतिषेवणमात्रेणोत्सूत्रप्रवृत्तिः, किन्तु साम्परायिकक्रियाहेतुमोहनीयोदयसहकृतेन प्रतिषिद्धप्रतिषेवणेन । सा चोपशान्तवीतरागस्य न भवति, तस्या मोहनीयानुदयजन्येर्यापथिकीक्रियया बाधितत्वात् ; उत्सूत्रप्रवृत्तीर्यापथिकीक्रिययोः सहानवस्थानाद् । यदागम:-"जस्स णं कोहमाणमायालोमा वुच्छिण्णा भवन्ति तस्स णं इरियावहिया किरिया कजति। तहेव जाव उस्सुत्तं रीयमाणस्स संपराइआ किरिया कजति, से णं उस्सुत्तमेव रीयइत्ति ॥” [यस्य खलु क्रोधमानमायालोमा व्युच्छिन्ना भवन्ति, तस्य खलु ईर्यापथिकी क्रिया क्रियते तथैव यावत् | उत्सूत्रं रीयमाणस्य साम्परायिका क्रिया क्रियते । स खलु उत्सूत्रं रीयते ।। भ० श०७३०१] तथाऽस्मादुत्सूत्रप्रवृत्तिप्रतिबन्धिका भावत ईर्यापथिकी क्रियैव, यथाख्यातचारित्रप्रतिबन्धिका च मोहनीयोदयजन्या साम्परायिकी क्रिया भवतीति सम्यकपर्यालोचनायामुपशान्तवीतरागस्य नोत्सूत्रप्रवृत्तिर्न वा यथाख्यातचारित्रहानिरिति चेत् । न, द्रव्यवधस्य गर्हणीयत्वे प्रतिषिद्धप्रतिषेवणरूपत्वे च तेनोपशान्तमोहस्यापि यथाख्यातचारित्रस्य निग्रन्थत्वस्य च विलोपप्रसङ्गस्य वज्रलेपन्वात् । “परिहारविसुद्धियसंजए पुच्छा, गो० णो पडिसेवए होजा, अपडिसेवए होजा । एवं जाव अहक्खायसंजए" उद्देश६।। "कसायकुसीलेणं पुच्छा, गो०णो पडिसेवए होजा, अपडिसेवए होजा, एवं णिग्गंथेवि, एवं सिणाएवि ।" भ० श० २५ उद्देश७ [परिहारविशुद्धिकसंयते पृच्छा, गौतम! न प्रतिषेवको भवेत् , अप्रतिषेवको भवेद् , एवं यावत् यथाख्यातसंयते ॥ कषायकुशीले पृच्छा, नो प्रतिषेवको भवेद् अप्रतिषेवको भवेत् । एवं निग्रन्थेऽपि, एवं स्नातकेऽपि ॥] इत्याद्यागमेन प्रतिषिद्धप्रतिषेवणस्योपरितनचारित्रनिर्ग्रन्थत्रयविरोधिताप्रतिपादनात् , 'प्रति संयमप्रतिकूलार्थस्य सज्वलनकषायोद AAAA%D Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१७॥ |सटिप्पना खोपड चिः ॥ गाथा-४५ ॥१७॥ SAHASRCISHRA यातू, सेवक:-प्रतिषेवक' इति प्रतिषेवणाद्वारे व्याख्यानात् प्रतिषेवणाविशेषेणैव यथाख्यातचारित्रादिविरोधव्यवस्थितेः ॥ अनाभोगजद्रव्यहिंसायाः प्रतिषिद्धप्रतिषेवणरूपत्वे उपशान्तमोहवृत्तित्वे च न बाघकमिति चेत् । न, प्रतिषेवापदविषयविभागेऽनाभोगजप्र तिषेवाप्या अपि परिगणनाद् । यदागम:-"दसविहा पडिसेवणा पण्णत्ता । तं० दप्प१प्पमाय२ऽणाभोगे ३, आउरे ४ आवईइ(सु) ॐा५य ॥ संकिए ६ सहसकारे ७, भय८प्पदोसा ९ य वीमंस १०त्ति ॥१॥" [दर्पप्रमादानाभोगे आतुरे आपत्सु च ॥ शंकिते सहसा कारे भयात्प्रद्वेषाद्विमर्शाच्च ।। स्थानांग सू० ७३३] तस्माद् द्रव्यहिंसायाः प्रतिषेवणारूपत्वाभ्युपगमे तवाप्युपशान्तमोहस्य प्रतिषेवित्वं स्यादित्यप्रतिषवित्वव्याप्ययथाख्यातचारित्रनिर्ग्रन्थत्वयोस्तत्र का प्रत्याशा? मोहोदयविशिष्टप्रतिषवणत्वेनोत्सूत्रप्रवृत्तिहेतुमभ्युपगम्य वीतरागे मोहसत्ताजन्यप्रतिषेवणाश्रयणेऽपसिद्धान्तादिदोषा दुर्द्धरा एव प्रसज्येरन् , मोहोदयसत्ताजन्योत्सूत्रप्रवृत्तिहेतुप्रतिषेवणाभेदस्य कापि प्रवचनेऽश्रुतत्वात् , प्रत्युत कषायकुशीलादिपरिहारविशुद्धिकाद्युपरितननिर्ग्रन्थसंयमत्रयस्याप्रतिषवित्वाभिधानाद् । मोहोदयमात्रमपि न प्रतिषेवणाजनकमिति तत्सत्ताजन्यप्रतिषवणवाापि दूरोत्सारितैवेति तस्या उत्सूत्रप्रवृत्तिहेतुन्चे मोहोदयविशिष्टत्वं तन्त्रमित्यत्र सूत्रसम्मतिप्रदर्शनमत्यसमञ्जसम् , ततः पुलाकवकुशप्रतिसेवाकुशीलत्रयवृत्त्यपकृष्टसंयमस्थाननियतसञ्ज्वलनोदयव्याप्य एव व्यापारविशेषः प्रतिषेवणारूपः स्वीकर्तव्यः, स एव च साधूनां गर्हणीय इति । " इत्तो उ वीयरागो, ण किंचि वि करेइ गरहणिजं तु ॥" इत्यनेन तदत्यन्ताभाव एव वीतरागस्य प्रतिपाद्यते, न तु द्रव्यहिंसाभावोऽपीति प्रतिपत्तव्यम् ॥ ४५ ॥ एतदेव स्फुटीकुर्वनाहअकरणणियमावेक्ख, एयं भणिति अपडिसेवाए॥ इत्तो जिणाण सिद्धी, ण उदव्ववहस्स पडिसेहो॥४६॥ [अकरणनियमापेक्षमेतद् भणितमिति अप्रतिषेवायाः । इतो जिनानां सिद्धिर्न तु द्रव्यवधस्य प्रतिषेधः॥ ४६॥] PERS Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिपणा खोपड वृचिः ॥ गाथा-४६ ॥१७॥ ___ 'अकरणणियमावेक्वं' ति । एतद् 'वीतरागो न किश्चिद् गर्हणीयं करोति' इत्यकरणनियमापेक्ष भणितमुपदेशपदे, धर्मपरीक्षा तत्र तस्यैवाधिकाराद्, अकरणनियमच पापशरीरकायहेतुराजयक्ष्मरोगस्थानीयः क्षयोपशमविशेषः, स च ग्रन्थिभेदादारभ्याऽऽक्षीण॥१७॥ | मोहं प्रवर्द्रते, यथा यथा च तत्प्रवृद्धिस्तथा तथा पापप्रवृत्त्यपकर्ष इति क्षीणमोहे मोहक्षयरूपस्याकरणनियमस्यात्यन्तोत्कर्षस्य सिझौ पापप्रवृत्तरत्यन्तापकर्ष इति तत्र पापप्रवृत्त्यत्यन्ताभावः सिद्धयतीति सूत्रसन्दर्भेणैव तत्र (उपदेशपदे) स्फुटं प्रतीयते । तथा हि-"पाये अकरणणियमो, पायं परतिनिवित्तिकरणाओ॥णेओ य गंठिभेए, भुजो तयकरणरूवो उ ॥६९५॥ [पापे अकरणनियमः प्रायः परतनिवृत्तिकरणात् । ज्ञेयश्च ग्रन्थिभेदे भूयस्तदकरणरूपस्तु ॥१॥] कियदन्तरे च-"देसविरहगुणठाणे, अकरणणियमस्स एव सम्भावो ॥ | सव्वविरइगुणठाणे, विसिद्रुतरओ इमो होइ ॥७२९॥ जं सो पहाणतरओ, आसयभेओ अओ य एसो ति ॥ एत्तो चिय सेढीए, णेओ सव्वत्थवी एसो॥७३०॥ एत्तो उ वीयरागो,ण किंचि वि करेइ गरहणिजे तु। ता तत्तग्गइखवणाइ-कप्पमो एस विण्णेओ ॥७३॥" त्ति । [देशविरतिगुणस्थाने अकरणनियमस्य एव सद्भावः। सर्वविरतिगुणस्थाने विशिष्टतरश्चायं भवति ॥ १॥ यत्स प्रधानतर आशयभेदोतश्च एष इति । इत एव श्रेण्यां ज्ञेयः सर्वत्राप्येषः ॥२॥ इतश्च वीतरागो न किंचिदपि करोति गर्हणीयं तु । ततस्तत्तद्गतिक्षपणादिविकल्प एष विज्ञेयः॥ ३ ॥ इति तथा चेतो वचनादप्रतिसेवाया जिनानां सिद्धिः, प्रतिषेवारूपपापस्यैव(वा)प्रवृत्तेः पूर्वगुण| स्थानेष्वपकप्तारतम्याजिनानां तदत्यन्तापकर्षसम्भवाद् न तु द्रव्यवधस्य प्रतिषेधः, तस्यापकर्षतारतम्यादर्शनाद् , न हि सम्यम्मु-| ष्टिदेशविरत्यादियोगाजायमानायां द्रव्यहिंसायामपकर्षभेदो दृश्यते, येन जिनेषु तदत्यन्ताभावः सिद्धयेद् , अभ्यन्तरपापप्रतिषेवणे तु है। प्रतिगुणस्थानं महानेव भेदो दृश्वत इति केवलिनि तदत्यन्ताभावसिद्धिरनाचाधैवेति ॥ ४६॥ . Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पमा ॥खोपड़ वृतिः ॥ गाथा-४७ ॥१७४॥ धर्मपरीक्षा नन्वेवं वीतरागपदेनोपशान्तमोहोऽपि (उपदेशपद) वृत्तिकृता कथं न गृहीतः १ तस्याप्यप्रतिषेवित्वाद्-इत्याशङ्कायामाहहै परिणिष्टियवयणमिणं, जं एसो होइ खीणमोहमि ॥ उवसमसेढीए पुण, एसो परिणिडिओ ण हवे ॥४७॥ ॥१७४॥ . [परिनिष्ठितवचनमिदं यदेषो भवति क्षीणमोहे । उपशमश्रेण्यां पुनः, एष परिनिष्ठितो न भवेद् ।। ४७॥] • 'परिणिट्ठियवयणमिणं' त्ति । परिनिष्ठितवचनं सम्पूर्णफलवचनमेतद्, यदेषोऽकरणनियमः, क्षीणमोहे भवतीति । उपशमश्रेण्यां त्वयमकरणनियमः, परिनिष्ठितो न भवेत् , तस्याः प्रतिपातस्य नियमात , तत्राकरणनियमवैशिष्टयासिद्धे, परि निष्ठितविशिष्टाकरणनियमाधिकारादेव क्षीणमोहादिर्वीतरागो वृत्तिकृता विवक्षित इति न कोऽपि दोष इति भावः। परिनिष्ठिताप्रतिलषेवित्वफलभागित्वादेव च क्षीणमोहस्य कषायकुशीलादेर्विशेषोप्रतिषेवित्वं वा भगवतोऽभिधीयमानमपकृष्यमाणसकलपापाभावोपलक्ष| णमिति स्मर्तव्यम् ॥४७॥ ननु 'वीतरागो गर्हणीयं पापं न करोतीति' वचनाद् गर्हणीयपापाभावः क्षीणमोहस्य सिद्धथति, गर्हणीयं च पापं द्रव्याश्रव एव, तस्य गर्हापरायणजनस्य प्रत्यक्षत्वादिति द्रव्याश्रवाभावस्तत्र सिद्ध एव, अत एव क्षीणमोहस्य कदाचिदनाभोगमा त्रजन्यसम्भावनारूढाश्रवच्छायारूपदोषसम्भवेऽपि न क्षतिः, तस्याध्यवसायरूपस्य छमस्थज्ञान(ना)गोचरत्वेनागर्हणीयत्वाद, गर्हणीयद्रव्याश्रवाभावादेव तत्र वीतरागत्वाहाने:-इत्याशङ्कायामाहदव्वासवस्स विगमा, गरहाविसयस्स जइ तहिं इठो॥ ता भावगयं पावं, पडिवन्नं अत्थओ होइ ॥ ४८॥ [ द्रव्याश्रवस्य विगमो गर्दाविषयस्य यदि तत्रेष्टः ॥ ततो भावगतं पापं प्रतिपन्नमर्थतो भवति ॥ ४८ ॥] RAKASCHIARRIBE AAAAACKE Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१७५॥ ABRI- . 'दव्यासवस्स'त्ति । गऱ्याविषयस्य द्रव्याश्रवस्य विगमो यदि, तहिति तत्र क्षीणमोहे, इष्टोऽभिमतो भवतः, तर्हि सटिप्पणा अर्थतोऽर्थापच्या, भावगतं पापं तत्र, प्रतिपन्नं भवति, गर्हणीयपापत्वावच्छिन्न प्रति त्वन्मते मोहनीयकर्मणो हेतुत्वात् , तन्निवृत्तौ । ॥स्वोपज्ञ गर्हणीयपापनिवृत्तावप्यगर्हणीयभावरूपपापानिवृत्तः अगहणीयपापेऽप्यनाभोगस्य हेतुत्वात तन्निवृत्तौ केवलिनस्तन्निवृत्तिः। क्षीणमोहस्य त्वाश्रवच्छायारूपमगर्हणीयपापमभ्युपगम्यत एवेति न दोष इति चेत्, न । अभ्यन्तरपापमात्रस्य गर्हापरायणजनाप्रत्यक्षत्वेन त्वन्मते- लगाथा-४८ ऽगर्हणीयत्वात् तत्सामान्येनाभोगस्य हेतुत्वात् । मोहाजन्यागर्हणीयपापेऽनाभोगस्यान्यत्र च तत्र मोहस्य हेतुत्वान्न दोष इति चेत् , न, गहणीयपापहेतोर्मोहस्यागर्हणीयपापहेतुत्वाभावाद् , अन्यथा तज्जन्यगर्हणीयागर्हणीयोभयस्वभावैकपापप्रसङ्गादिति न किश्चिदेतत् ॥४८॥ ॥१७५॥ - द्रव्याश्रवस्य मोहजन्यत्वमेव व्यक्त्या निराकुर्वन्नाहणियणियकारणपभवा, दव्वासवपरिणईण मोहाओ। इहरा दवपरिग्गह-जुओ जिणो मोहवं हुज्जा ॥४९॥ [निजनिजकारणप्रभवा द्रव्यास्रवपरिणतिर्न मोहात् । इतरथा द्रव्यपरिग्रहयुतो जिनो मोहवान् भवेत् ॥ ४९॥] . व्याख्या-द्रव्याश्रवाणां प्राणातिपात-मृषावादादीनां, परिणतिः, निजनिजानि कारणानि यानि नोदनाभिघातादियोगव्यापारमषाभाषावर्गणाप्रयोगादीनि, तत्प्रभवा सती, न मोहान्मोहनीयकर्मणो भवति-मोहजन्या नेत्यर्थः । क्वचिन्प्रवृत्यर्थ मोहोदयापेथायामपि दृव्याश्रवत्वावच्छिन्ने मोहनीयस्याहेतुत्वाद् , अन्यथाऽऽहारसंज्ञावतां कवलाहारप्रवृत्तौ बुभुक्षारूपमोहोदयापेक्षणात्कबलाहारत्वावच्छिन्नेऽपि मोहस्य हेतुत्वात् केवली कवलभोज्यपि न स्यादिति दिगम्बरसगोत्रत्वापत्तिरायुष्मतः। अथ कवलाहारस्य वेदनीयकमप्रभवत्वान्न तत्र मोहनीयस्य हेतुत्वम् , आश्रवस्य तु मोहप्रभवत्वप्रसिद्धद्रव्याश्रवपरिणतिरपि मोहजन्यैव, तत्रोदितं चारित्रमोहनीयं ARO Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ P धर्मपरीक्षा ॥१७६॥ | सटिप्पणा ॥खोपड़ - र भावाश्रवहेतुरसंयतानां सम्पद्यते, संयतानां तु प्रमत्तानामपि सत्तावर्तिचारित्रमोहनीयं द्रव्याश्रवमेव सम्पादयति, सुमङ्गलसाधोरि. वाऽऽभोगेनापि जायमानस्यं तस्य ज्ञानाद्यर्थमत्यापवादिकत्वेन तजन्यकर्मवन्धाभावात्संयमपरिणामस्यानपायेनाविरतिपरिणामस्याभावात्तदुपपत्तेः। या तु तेषामारम्भिकी क्रिया सा न जीवघातजन्या, किन्तु प्रमत्तयोगजन्या; “सव्वो पमत्तजोगो आरंभोत्ति[सर्वः प्रमत्तयोगः आरम्भ इति । ] वचनात् ; अन्यथाऽऽरम्भिकी क्रिया कस्यचित्प्रमत्तस्य कादाचित्क्येव स्यात् , तत्कारणस्य जीवघातस्य कस्यचित्कादाचित्कत्वात् , अस्ति चाऽऽरम्भिकी क्रिया प्रमत्तगुणस्थानं यावदनवरतमेव । किश्च-यदि जीवघातेनाऽऽरम्भिकी क्रिया भवेत् । तदाऽपरोप्रमत्तो दरे, उपशान्तवीतरागस्याप्यारम्भिकी क्रिया वक्तव्या स्याद् अस्ति च तस्य सत्यपि जीवधाते ईर्यापथिक्येव क्रियेति न जीवघातात्संयतस्यारम्भिकी क्रिया, किन्तु प्रमत्तयोगादिति स्थितम् । स च प्रमत्तो योगः प्रमादैर्भवति । ते च प्रमादा अष्टधा शास्त्रे प्रोक्ताः-१अज्ञानरसंशय३विपर्यय४रागद्वेषमतिभ्रंश योगदुष्प्रणिधानाधर्मानादरभेदात् । ते चाज्ञानवर्जिताः सम्यग्दृष्टे रपि सम्भवन्तोऽतः प्रमत्तसंयतपर्यन्तानामेव भवन्ति न पुनरप्रमत्तानामपि, प्रमादाप्रमादयोः सहानवस्थानात् । तेनेहाष्टासु प्रमादेषु यौ रागद्वेषौ प्रमादत्वेनोपाचौ तौ योगानां दुष्प्रणिधानजननद्वाराऽऽरम्भिकीक्रियाहेतूग्राह्यौ। तयोश्च तथा तयोः फलोपहितयोग्यतया जीवघातं प्रति कारणत्वस्य कादाचित्कत्वेऽपि स्वरूपयोग्यतया तथात्वं सार्वदिकमेव । यद्यपि सामान्यतो रागद्वेषावप्रमत्तसंयतानामपि कदाचिफलोपहितयोग्यतयापि जीवघातहेतू भवतस्तथापि तेषां तौ न प्रमादौ यतनाविशिष्टया प्रवृत्त्या सहकृतयोस्तयोरारम्भिकीक्रियाया अहे तुत्वात , तदप्यनाभोगसहकृतयतनाविशिष्टयो रागद्वेषयोर्योगानां दुष्प्रणिधानजनने सामर्थ्याभावात् , सम्यगीर्यया प्रवृत्त्या तयोस्तथा15 भूतसामर्थ्यस्यापहरणात् । न चैवं प्रमत्तानां सम्भवति, तेषामयतनया विशिष्टयोस्तयोर्योगानामशुभताजनकत्वेनारम्भिकीक्रियाहेतत्वाद. 454555 गाथा-४९ ॥१७६॥ - 5 Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अत एव प्रमत्तानां विनाऽपवादं जीवघातादिकं प्रमादसहकृतानाभोगजन्यम् । तदुक्तं दशवकालिक अ४वृत्तौ-"अयतनया चरन् धर्मपरीक्षा प्रमादानाभोगाभ्यां प्राणि(ण)भूतानि हिनस्तीति ।" ततः संयतानां सर्वेषां द्रव्याश्रव एव भवति । तत्र प्रमत्तसंयतानामपवादपदप्रतिषेव- सटिप्पणा ॥१७७॥ णावस्थायामाभोगेऽपि ज्ञानादिरक्षाभिप्रायेण संयमपरिणामानपायाद् द्रव्यत्वम् , अन्यावस्थायां त्वनाभोगाद् । अप्रमत्तसंयतानां त्वपवा ॥खोपड़ वृत्तिः ॥ दानधिकारिणां घात्यजीवविषयकाभोगप्रमादयोरभाव एवेत्यर्थादनाभोगसहकृतमविशेषितं मोहनीयं कमैव जीवघातादिकारणं सम्पन्नम् , गाथा-४९ तयोरेकतरस्याभावेऽप्यप्रमत्तसंयतानां द्रव्याश्रवो न भवत्येवेति ततः प्रमत्तान्तानां प्रमादाद् अप्रमत्तानां तु मोहनीयानाभोगाभ्यां द्रव्या- ॥१७॥ श्रवपरिणतिरिति सिद्धमिति ॥ मोहं विना द्रव्याश्रवपरिणतिर्न स्वकारणप्रभवा केवलिनः सम्भवतीति चेत् , तत्राह-इतरथा द्रव्याश्रवपरिणतेोहजन्यत्वनियमे, द्रव्यपरिग्रहेण वस्त्रपात्ररजोहरणादिलक्षणेन, युतो जिनो मोहवान् भवेत् , द्रव्यहिंसाया इव द्रव्यप-10 रिग्रहपरिणतेरपि त्वन्मते मोहजन्यत्वाद् । न च धर्मोपकरणस्य द्रव्यपरिग्रहत्वमशास्त्रीयमिति शङ्कनीयम् । “दव्वओ णाम एगे परिग्गहे | राणो भावओ १; भावओ णामेगे णो दव्वओ २, एगे दबओवि भाववि ३, एगे णो दव्वओवि णो भावओवि ४। तत्थ अरत्तदुस्स लाधम्मोवगरणं दव्वओ परिग्गहो णो भावओ १ । मुच्छियस्स तदसंपत्तीए भावओ णो दव्वओ २, एवं चेव संपत्तीए दव्वओवि भावHओवि ३ चरिमभंगो पुण सुन्नोत्ति ४ ॥ [द्रव्यतो नाम एकः परिग्रहः, नो भावतः । भावतो नाम एकः परिग्रहः, नो द्रव्यतः । एको द्रव्यतो पि भावतोऽपि । एको नो द्रव्यतोऽपि नो भावतोऽपि । १ तत्र अरक्तद्विष्टस्य धर्मोपकरणं द्रव्यतः परिग्रहः, नो भावतः । २ मूर्छितस्य तदसंप्राप्त्या भावतो नो द्रव्यतः । ३ एवं चैव संप्राप्त्या द्रव्यतोऽपि भावतोऽपि । ४ चरमभङ्गः पुनः शून्य इति । ] इति चतुर्भङ्गया दशवैक लिक-पाक्षिकसूत्रवृत्तिचूपर्यादौ सुप्रसिद्धत्वात् । न च द्रव्यपरिग्रहयुतस्यापि भगवतो मोहवत्त्वमिष्यते, अतो RSS RSHASHTRA Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१७८॥ m-0%AAAA न द्रव्याअवपरिणतिर्मोहजन्येति भावः ॥४९॥ अनयैव प्रतिबन्धा केवलिनो द्रव्यहिंसायां सत्यां रौद्रध्यानप्रसङ्गं परापादितं परिहरनाहएएणं.दव्ववहे, जिणस्स हिंसाणुबंधसंपत्ती॥ इय वयणं पक्खित्तं, सारक्खणभावसारिच्छा ॥ ५० ॥ सटिप्पणा ॥खोपड़ . [एतेन द्रव्यवधे जिनस्य हिंसानुबंधसंप्राप्तिः । इति वचनं प्रक्षिप्तं संरक्षणभावसादृश्यात् ॥ ५० ॥] वृतिः ॥ . 'एएण'ति । एतेन द्रव्यपरिग्रहयुतस्यापि भगवतो मोहाभावेन, द्रव्यवधेऽभ्युपगम्यमाने, जिनस्य हिंसानुबन्धसम्प्राप्तिः माधा-५. हिंसानुबन्धिरौद्रध्यानप्रसङ्गः, छद्मस्थसंयतानां हि घात्यजीवविषयकानाभोगसहकृतमोहनीयलक्षणसहकारिकारणवशेन कायादिव्यापारा ॥१८॥ जीवघातहेतवो भवन्ति, त एव च योगा घात्यजीवविषयकाभोगसहकृततथाविधमोहनीयक्षयोपशमादिसहकारिकारणविशिष्टा जीवरक्षा-16 हेतव इत्यनुभवसिद्धम् । केवलिनस्तु योगाः पराभिप्रायेणानाभोगमोहनीयाद्यभावेन परिशेषात् केवलज्ञानसहकृता एव जीवघातहेतवो भवन्ति, केवलज्ञानेन 'एतावन्तो जीवा अमुकक्षेत्रादौ ममावश्यं हन्तव्याः' इति ज्ञात्वैव केवलिना तद्घातातू , तथा च तस्य जीवरक्षादिकं कदापि न भवेत् , केवलज्ञानसहकृततद्योगानां सदा घातकत्वात् , जीवघातस्येव जीवरक्षायाम(अ)प्यवश्यभावित्वेन परिज्ञानाद्, उभयत्र केवलज्ञानस्य सहकारिकारणत्वकल्पने च केवलिनो योगानां जीवघातजीवरक्षाहेतू शुभाशुभत्वे सर्वकालं युगपद् भवतः ॥ एतच्चानुपपन्नम् , परस्परं प्रतिबन्धकत्वादित्येकतरस्याभ्युपगमे परामिप्रायेण सर्वकालमशुभत्वमेव सिद्धयतीति हन्तव्यचरमजीवहननं यावद्धिंसानुबन्धिरौद्रध्यानप्रसङ्गः, इति-एतद्वचनं परस्य, प्रक्षिप्तम् , संरक्षणभावस्य संरक्षणानुबन्धिरौद्रध्यानस्य, सादृश्याद् द्रव्यपरिग्रहाभ्युपगमे भगवतस्तुल्ययोगक्षेमत्वात् । शक्यं ह्यत्रापि भवादृशेन वक्तुम् , छद्मस्थसंयतानां परिग्राह्यवस्तुविषयकानाभोगसहकृतमोहनीयलक्षणसहकारिकारणवशेन कायादिव्यापाराः परिग्रहग्रहणहेतवः, अत एव च परिग्राह्यवस्तुविषयकाऽऽभोगसहकृततथावि. PAAAAAAE ABAR Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१७९॥ सटिप्पणा ॥स्वोपक्ष वृषिः ॥ गाथा-५० ॥१७९॥ धमोहनीयक्षयोपशमादिसहकारिकारणविशिष्टाः परिग्रहत्यागहेतब इत्यनाभोगमोहनीयाभावे केवलियोगानां परिग्रहग्रहणे केवलज्ञानमेव सहकारिकारणमिति यावत्केवलिनो धर्मोपकरणधरणं तावत् संरक्षणानुबन्धिरौद्रध्यानमक्षतमेवेति । द्रव्यपरिग्रहऽभिलापमूलसंरक्षणीयत्वज्ञानाभावान्न रौद्रध्यानमिति यदि विभाव्यते, तदा द्रव्यहिंसायामपि स्वयोगनिमित्तकहिंसाप्रतियोगिनि जीवे स्वेष्टहिंसाप्रतियोगित्वरूपधात्वत्वज्ञानाभावादेव न तदिति प्रगुणमेव पन्थानं किमिति न वीक्षसे ? ॥५०॥ अथ वस्त्रादिधरणं साधोरुत्सर्गतो नास्त्येव, कारणिकत्वात् ; “तिहिं ठाणेहिं वत्थं धरेजा, हिरिवत्तियं परीसहवत्तिय दुगंछावत्तियं' (स्थानांग) [त्रिभिः स्थानः वस्त्रं धारयेत् -ह्रीप्रत्ययं परिषहप्रत्ययं जुगुप्साप्रत्ययम् ॥] इत्यागमेऽभिधानात् , किन्त्वापवादिकम् । तद्धरणकारणं च जिनकल्पायोग्यानां स्थविरकल्पिकानां सार्वदिकमेव, निरतिशयत्वादिति तद्धरणमपि सार्वदिकं प्राप्तम् । तदुक्तं विशेषावश्यके–“विहियं सुए च्चिय जओ, धरेज तिहि कारणेहिं वत्थं ति ॥ तेणं चिय तदवस, णिरतिसएणं धरेयव्वं ॥ २६०२ ॥ जिणकप्पाजोग्गाणं, ही-कुच्छ-परिसहा जओ वस्सं ॥ ही लज्जत्ति व सो सं-जमो, तयत्थं विसेसेणं ॥२६०३॥"ति [विहितं श्रुत एव यतो धारयेत् त्रिभिः कारणैः वस्त्रमिति । तेनैव तदव| इयं निरतिशयेन धारयितव्यं ॥ जिनकल्पायोग्यानां ह्रीकुत्सापरिषहा यतोऽवश्यम् । ही लज्जेति वा स संयमस्तदर्थ विशेषेण ॥ इति । 'भगवतश्च यद्यपि वस्त्रादिधरणं ह्री-कुत्सापरिषहप्रत्ययं न सम्भवति, तस्य तदभावात् , तथापि शीतोष्णादिपरीपहप्रत्ययं तत् , आहारनिमित्तक्षुत्पिपासापरीपहवद्वस्त्रधरणनिमित्तशीतोष्णादिपरिषहसत्ताया अपि भगवत्यविरोधात् , तथाप्रकारेण तथाविधं कर्म क्षपणीयमित्यभिप्रायोच्च न रागादिविकल्पः, तथाविधसाध्वाचारस्थितिपरिपालनाभिप्रायेणैव वा तदिति धर्मार्थमत्युपगृहीतत्वाद् द्रव्यपरिग्रहे भगवतो न दोषः । यजातीयव्याश्रवे संयतानामनाभोगेनैव प्रवृत्तिस्तज्जातीयद्रव्याश्रवस्यैव मोहजन्यत्वाभ्युपगमादनर्थदण्डभूतद्रव्य Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१८॥ सटिप्पणा | खोपड चिः ॥ गाथा-५१ ॥१८॥ RSSSSSSSONG हिंसादेरेव तथात्वाद् , धर्मोपकरणरूपे द्रव्याश्रवे तु संयतानां नानाभोगेनैव प्रवृत्तिः, किन्तु धर्माधर्मार्थमत्याऽपरिग्रहत्वाभोगेनैवेति |स्वकारणलब्धजन्मनस्तस्य भगवत्यविरोधः-इत्याशङ्कायामाहअववाओवगमे पुण, इत्थं नृणं पइण्णहाणी ते ॥ पावंति असुहजोगा, एवं च जिणस्स तुज्झ मए ॥५१॥ [अपवादोपगमे पुनरित्थं नूनं प्रतिज्ञाहानिस्ते । प्राप्नुवन्ति अशुभयोगा एवं च जिनस्य तव मते ॥५१॥] 'अववाओवगमे पुण'त्ति, अत्र भगवतो द्रव्यपरिग्रहे. अपवादोपगमेऽपवादाङ्गीकारे, पुनस्ते तव, प्रतिज्ञाहानिः, अपवादप्रतिषेवणं च संयतेष्वपि प्रमत्तस्यैव भवतीति तव प्रतिज्ञेति । च पुनः, एवं धर्मोपकरणसद्भावनापवादतो द्रव्याश्रवाभ्युपगमे, तब मते जिनस्याशुभयोगाः प्राप्नुवन्ति । इदं हि तव मतम्-योगानामशुभत्वं तावन्न जीवघातहेतुत्वमात्रेण, उपशान्तगुणस्थानं यावदप्रमत्तसंयतानां कदाचित्सद्भुतजीवघातसम्भवेन भग०शत०१२०१ "तत्थ णं जे ते अपमत्तसंजया ते णं णो आयारंभा, णो परारंभा, णो तदुभयारंभा, अणारंभा" [तत्र ये ते अप्रमत्तसंयतास्ते नो आत्मारम्भा नो परारम्भा नो तदुभयारम्भाः अनारम्भाः ॥] इत्याग मप्रतिपादितानारम्भकत्वानुपपत्तिप्रसक्तेरशुभयोगानामारम्भकत्वव्यवस्थितेः, किन्तु फलोपहितयोग्यतया घात्यजीवविषयकाभोग| पूर्वकजीवघातहेतुत्वेन; अत्र फलोपहितयोग्यतयेति पदं केवलियोगानामशुभत्वनिवारणार्थमेव, तेषां खरूपयोग्यतयैव यथोक्तजीवघातहेतुत्वाद् , न पुनः फलोपहितयोग्यतयापि, कारणानामभावात् । तथाऽशुभत्वं प्रमत्तयोगानामेव तदभिव्यञ्जकं तु प्रमत्तयोगानां फलवच्छुभाशुभत्वाभ्यां द्वैविध्याभिधायकमागमवचनमेव । तथा हि-"तत्थ णं जे ते पमत्तसंजया ते ण सुहं जोगं पडुच्च णो आयारंभा, जाव अणारंभा। असुहं जोगं पडुच्च आयारंभावि जाव णो अणारंभत्ति।" [तत्र ये ते प्रमत्तसंयतास्ते शुभं योगं प्रतीत्य नो आत्मारम्भा SARASHARA Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१८॥ सटिप्पणा ॥खोपक्ष हुचिः ॥ माथा-५१ ॥१८॥ 1265585 यावदनारम्भाः । अशुभ योग प्रतीत्य आत्मारम्भा अपि यावद् नो अनारम्भा इति ॥ ] अत्रापि प्रमत्तसंयतानां सामान्यतः प्रमत्ततासिद्धयर्थ तदीययोगानां स्वरूपयोग्यतयाऽभोगपूर्वकजीवघातहेतुत्वं वक्तव्यम् , कादाचित्काशुभयोगजन्यारम्भकत्वसिद्धयर्थ चाभो. गोऽपि घात्यजीवविषयत्वेन व्यक्तो वक्तव्यः, तद्वत एव कस्यचित्प्रमत्तस्य सुमङ्गलसाधोरिवापवादावस्थां प्राप्तस्यात्माघारम्भकत्वात् , संयतत्वं च तस्य तदानीमपवादपदोपाधिकविरतिपरिणामस्थानपायाद्, न चैवमप्रमत्तसंयतस्य भवति, तस्यापवादपदाधिकारित्वाभावेनाभोगपूर्वकजीवघातहेतूनां योगानामभावात् । यस्त्वपवादप्रतिषेवणाराहित्यावस्थायामप्यप्रमत्तानामिव सद्भूतजीवघातः स चानाभोगजन्य एव, तदानीमनाभोगस्यापि तस्य विद्यमानत्वाद् , अत एवाप्रमत्तानामिव योगानां शुभत्वेन नात्माघारम्भकत्वमिति । फलोपहितयोग्यताखरूपयोग्यतयोश्चायं भेद:-'यस्य यदन्तर्गतत्वेन विवक्षितकार्य प्रति कारणता तस्य तदन्तर्गतत्वेनैव फलवत्तया फलोपहितयोग्यता', 'अन्यथा तु खरूपयोग्यता, सत्यपि तस्य कारणत्वे तदितरसकलकारणराहित्येन विवक्षितकार्याजनकत्वात् , परं स्वरूप. योग्यता एकस्मिन्नपि कारणे सजातीयविजातीयानेकशुभाशुभकार्याणां नानाप्रकारा आधाराधेयभावसम्बन्धेन सह जाताः कारणसमानकालीनाः, फलोपहितयोग्यतास्तु खरूपयोग्यताजनिता अपि कादाचित्का एव, तदितरसकलकारणसाहित्यस्य कादाचित्कत्वात् , यच्च कादाचित्कं तत्केषाश्चित्कारणानां सम्भवन्त्योऽपि कादाचित्क्य एव मन्तव्याः; अत एव केवलिनां योगा अशुभकार्यमा प्रति सर्वकालं स्वरूपयोग्यतामाज एव भवन्ति, न पुनः कदाचिदपि फलोपहितयोग्यताभाजोऽपि, अशुभकार्यमात्रस्य कारणानां ज्ञानावरणोदयादिघातिकर्मणामभावेन तद्वितरसकलकारणसाहित्याभावात् । शुभकार्याणां तु यथासम्भवं कदाचित्फलोपहितयोग्यतापि स्यात् , तथैव | तदितरसकलकारणसाहित्यस्य सम्भवादिति न कश्चिद्विरोधः। इत्थं चापवाददशायां प्रमत्तसंयतानां योगानां फलोपहितयोग्यतया. S Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१८२॥ सटिप्पणा ॥खोपत्र वृत्तिः ॥ गाथा-५१ ॥१८२॥ ऽऽभोगपूर्वकजीवघातहेतुन्वेन यथाऽशुभत्वं तथा केवलिन आपवादिकस्य धर्मार्थमन्या धर्मोपकरणस धरणेऽपि त्वन्मतनीन्याऽऽभोगपूर्वकपरिग्रहग्रहणस्य फलोपहितयोग्यतया हेतूनां योगानामशुभत्वापत्तिः स्फूटवेति । अथ यद्यपवादेन धर्मोपकरणग्रहणं भगवतोऽभ्युपगम्येत तदा स्वादयं दोपः, अपवादं च केवलिनः कदापि नाभ्युपगच्छामः, तस्य प्रतिपिद्धप्रतिपेवणान्मकत्वेन स्वरूपतः सावद्यत्वात् । निवर्धत्वं चास्य पुष्टालम्बनप्रतिपेधितस्य रोगविशेषविनाशकस्य परिकर्मितवत्सनागस्येव प्रायश्तिप्रतिपच्यादिना सोपाधिकमेव । यापि 'भगाए णाविओ णदो" [ 'गंगायां नाविको नन्दः' इत्यादि धर्मरुचिकथानके द्रष्टव्यम् । ] इत्यादिव्यतिकरोपलक्षितस्य धर्मरुचे रनगारस्य नाविकादिव्यापादनप्रवृत्तिः सापि परमार्थपर्यालोचनायां पुष्टालम्बनैव, तत्कृतोपसर्गस्य ज्ञानादिहानिहेतुत्वाद् , ज्ञानादिहानिजन्यपरलोकानाराधनाभयेन प्रतिपिद्धप्रवृत्तेः पुष्टालम्बनमूलत्वात् : केवलं शक्त्यभावभावाभ्यां पुष्टालम्बनतदितरापवादयोः प्रशस्ताप्र- शस्तसज्वलनकपायोदयकृतो विशेपो द्रष्टव्यःः ज्ञानादिहानिभयं च केवलिनो न भवतीति तस्य नापवादवाापि । यच्च धर्मोपकरणधरणं तद्वयवहारनयप्रामाण्यार्थम् , व्यवहारनयस्यापि भगवतः प्रमाणीकर्तव्यत्वाद् । इत्थं च श्रुतोदितरूपेण धर्मोपकरणधरणे न केवलिलक्षणहानिः, 'इदं सावद्यम्' इति प्रज्ञाप्य तत्प्रतिपेवणाद्, अत एव-"ववहारो वि हु बलवं, जं वंदड़ केवली वि छउमत्यं ।। आहाकम्मं मुंजइ, मुअबवहारं पमाणतो" ।।२२९॥ (पुष्पमाला) नवृत्तिः-"न केवलं निश्चयोऽपि तु स्वविपये व्यवहारोऽपि बलवान् । यद्यस्मात्कारणात् समुत्पन्न केवलज्ञानोऽपि शिप्यो यद्यपि निश्चयतो विनयसाध्यस्य कार्यस्य सिद्धत्वात्केवली न कस्यचिद्वन्दनादिविनयं कगेति, तथापि व्यवहाग्नयमनुवर्तमानः पूर्वविहितविनयो गुरुं वन्दते-आसनदानादिकं च विनयं तस्य तथैव करोति, याबदद्यापि | न ज्ञायते, ज्ञात पुनगुरुपि निवारयत्येवेति भावः । अपरं च---अतीवगृढाचारेण केनचिद् गृहिणा विहितमाधाकर्म तच्च श्रुतोक्त Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्मपरीक्षा ॥१८॥ सटिप्पणा ॥स्वोपन वृतिः ॥ गाथा-५१ |॥१८३॥ परीक्षया परीक्षमाणेनाप्यशठेन छद्मस्थसाधुनाऽविज्ञातं गृहीत्वा केवलिनिमित्तमानीतं यथावस्थितं च केवलिनस्तजानतो निश्चयनयमतेनाभोक्तव्यमपि श्रुतरूपं व्यवहारनयं प्रमाणीकुर्वन्नसो भुङ्क्त एव, अन्यथा श्रुतमप्रमाणं कृतं स्यात् , एतच्च किल न कर्त्तव्यम् , व्यवहारस्य सर्वस्य प्रायः श्रुतेनैव प्रवर्तमानत्वात् , तस्माद् व्यवहारनयोऽपि बलवानव केवलिना समर्थितत्वाद् ।” इति पुष्पमालासूत्रवृत्त्यादिवचनात् केवलिनोऽनेषणीयाहारस्य प्रवृत्तिसिद्धावपि नापवादसिद्धिः, ज्ञानादिहानिभयेन तत्राऽप्रवृत्तेः, श्रुतव्यवहारशुद्धयर्थमेव तत्र प्रवृत्तः, तत्र 'इदं सावद्यम्' इति भणितेरभावान्न वचनविरोधः। 'यदि च तदनेषणीयं कथञ्चित कदाचिदपि केवलिना भुक्तम्' इति छद्मस्थज्ञानगोचरीभवेत् तर्हि केवली न भुत एव केवल्यपेक्षया श्रुतव्यवहारशुद्धेरेवाभावाद्, 'अशुद्धमिति ज्ञात्वापि | केवलिना भुक्तम्' इति छद्मस्थेन ज्ञातत्वात् । अत एव रकातिसारोपशमनार्थ रेवतीकृतकूष्माण्डपाको भगवता श्रीमहावीरेण प्रतिषिद्धः, कदाचित्साधुना श्रुतव्यवहारशुद्धथानीतोऽपि रेवती तु जानात्येव-पद् भगवता श्रीमहावीरेण ज्ञात्वैव भुक्तं इति छद्मस्थज्ञानगोचरत्वेन श्रुतव्यवहारभङ्ग एवेति । एतेन केवलिनोभिप्रायाभावाजीवघातादौ सत्यपि न दोष इति पराशङ्कापि परास्ता, रेवतीकृतकूष्माण्डपाकपरित्यागानुपपत्तिप्रसक्तेः । किश्च-खतन्त्रक्रियावतो ज्ञानपूर्वकप्रवृत्तावभिप्रायाभावं वक्तुं का समर्थः । न च श्रुतव्यवहारशुद्धमनेषणीयं भुञ्जानः केवली सावधप्रतिषेधि(वि)ता भविष्यतीति शङ्कनीयम् , सर्वेषामपि व्यवहाराणां जिनाज्ञारूपत्वेन श्रुतव्यवहारस्य सावद्यत्वाभावात् , तच्छुद्धथानीतस्य निरवद्यत्वाद् । अयं भावः-यथाऽप्रमत्तसंयतो जीववधेऽप्यवधकः, 'अवहगो सो उ' गा० ७५०'त्ति [ अवधक: स तु । ] ओघनियुक्तिवचनात् , अनाभोगे सत्यप्यप्रमत्ततायास्तथामाहात्म्यात् , यथा चोपशान्तमोहवीतरागो मोहसत्तामात्रहेतुके सत्यपि जीवघाते केवलिवद्वीतरागो नोत्सूत्रचारी च, मोहनीयानुदयस्य तथामाहात्म्यात् , तथा श्रुतव्य NE -HEIBAR Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ट धर्मपरीक्षा ॥१८॥ सटिप्पणा ॥खोपन गाथा-५१ ॥१८॥ ABHISHEKHABARGUST वहारशुद्धर्माहात्म्यादनेषणीयमपीतरैषणीयमेवेति कुतः सावधप्रतिषेवित्वगन्धोऽपीति चेत् , तदिदमखिलं गूढशब्दमात्रेणैव मुग्धप्रतारणम् । यतो यदि भगवत्स्वीकृतद्रव्यपरिग्रहानेषणीयाहारयोः स्वरूपतः सावद्यत्वेऽपि श्रुतव्यवहारशुद्धस्योपादेयत्वधिया दोषानावहत्वं तदाऽपवादस्थानीयत्वमेव तयोः प्राप्तम् , औपाधिकशुद्धताशालित्वात् । न चापवादः स्थविरकल्पनियत इति कल्पातीतस्य भगवतस्तदभावः, एवं सत्युत्सर्गस्याप्यभावापत्तेः, तस्यापि जिनकल्पस्थविरकल्पनियतत्वाद् । यदि चोत्सर्गविशेष एव कल्पनियत इति तत्सामान्यस्य भगवति नासम्भवस्तदाऽपवादविशेषस्यैव तथात्वे तत्सामान्यस्थापि भगवत्यनपायत्वमेव । युक्तं चैतत् , तीर्थकृतोऽप्यतिशयाधुपजीवनरू| पखजीतकल्पादन्यत्र साधुसामान्यधर्मताप्रतिपादनात् । तदुक्तं बृहत्कल्पभाष्यवृत्त्योः उद्देश. १-"अत्र परः प्राह-यदि यद्य त्प्राचीनगुरुभिराचीण तत्तत्पाश्चात्यैरप्याचरितव्यम् , तर्हि तीर्थकरैः प्राकारत्रयच्छत्रत्रयादिका प्राभृतिका तेषामेवार्थाय सुरविरचिता यथा | समुपजीविता, तथा वयमप्यस्मन्निमित्तकृतं किं नोपजीवामः । सूरिराह-कामं खलु अणुगुरुणो, धम्मा तह वि हु ण सव्यसाहम्मा। गुरुणो जंतु अइसए, पाहुडिआई समुवजीवे ॥९९६॥ काममनुमतं, खल्वस्माकं, यदनुगुरवो धर्मास्तथापि न सर्वसाधा चिन्त्यते, किन्तु देशसाधादेव। तथाहि-गुरवस्तीर्थकराः, यत्तु यत्पुनः, अतिशयान् प्राभृतिकादीन , प्राभृतिका सुरेन्द्रादिकृता समवसरणरचना तदादीन् , आदिशब्दादवस्थितनखरोमाधोमुखकण्टकादिसुरकृतातिशयपरिग्रहः; समुपजीवन्ति स तीर्थकुजीतकल्प इति कृत्वा न तत्रानुधर्मता चिन्तनीया, यत्र पुनस्तीर्थकृतामितरेषां च साधूनां सामान्यधर्मत्वं तत्रैवानुधर्मताचिन्त्यते ॥ सा चेयमाचीऐति दर्श्यते ॥ सगड-दह-समभोमे, अविअ विसेसेण विरहिअतरागं ॥ तहवि खलु अणाइन्न, एसऽणुधम्मो पवयणस्स ॥९९७॥ यदा भगवान श्रीमन्महावीरस्वामी राजगृहनगरादुदायननरेन्द्रप्रव्राजनार्थ सिन्धुसौवीरदेशवतंसं वीतभयं नगरं प्रस्थितस्तदा %-5 Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१८५॥ किलापान्तराले बहवः साधवः क्षुधार्त्तास्तृवार्दिताः संज्ञाबाधिताश्च बभूवुः । यत्र च भगवानावासितस्तत्र दिलभृतानि शकटानि, पानीयपूर्णश्च हृदः, समभौमं च गर्त्ताबिलादिवर्जितं स्थण्डिलमभवद्, अपि च विशेषेण तत्तिलोदकस्थण्डिलजातं विरहिततरमति-| शयेनागन्तुकैस्तदुत्थैश्च जीवैर्वर्जितमित्यर्थः । तथापि खलु भगवतानाचीर्ण नानुज्ञातम् एषोऽनुधर्मः प्रवचनस्य, सर्वैरपि प्रव चनमध्यमध्यासीनैरशस्त्रो पहतपरिहारलक्षण एव धर्मोऽनुगन्तव्य इति भावः । अथैतदेव विवृणोति - "व (बु) कंतजोणि- थंडिल-अतसा, दिन्ना ठिई अवि छुहाइ || तहविण गेण्हेसुं जिणो, मा हु पसंगो असत्थहए ॥ ९९८ ॥ " यत्र भगवानावासिस्तत्र बहूनि तिलशकटान्यावासितान्यासन् । तेषु च तिला व्युत्क्रान्तयोनिका अशस्त्रोपहता अप्यायुः क्षयेणाचित्तीभूताः । ते च यद्यस्थण्डिले स्थिता भवेयुस्ततो न कल्पेरन्, इत्यत आह स्थण्डिले स्थिताः, एवंविधा अपि त्रसैः संसक्ता भविष्यन्ति, अत आह-अत्रसाः - तदुद्भवागन्तुकत्रसविरहिताः, तिलशकटस्वामिभिर्गृहस्थैश्व दत्ताः, एतेनादत्तादानदोषोऽपि तेषु नास्तीत्युक्तं भवति, अपि च ते साधवः, क्षुधा पीडिता आयुषः स्थितिक्षयमकार्षुः, तथापि श्रीजिनो वर्द्धमानस्वामी नाऽग्रहीत् मा भूदशस्त्रहते प्रसङ्गः, 'तीर्थङ्करेणापि गृहीतम्' इति मदीयमालम्बनं कृत्वा मत्सन्तानवर्त्तिनः शिष्या अशस्त्रोपहतं मा ग्राहिषुरिति भावः । 'व्यवहारनय बलीयस्त्वख्यापनाय भगवता न गृहीता' इति हृदयम् ।। युक्तियुक्तं चैतत् प्रमाणस्थपुरुषाणाम् । यत उक्तम् - " प्रमाणानि प्रमाणस्यै, रक्षणीयानि यत्नतः ॥ विषीदन्ति प्रमाणानि, प्रमाणस्थैर्विसंस्थुलैः ॥ १ ॥ इत्यादि ॥' अत्र हि खजीतकल्पातिरिक्तस्थले तीर्थकृतः साधुसमानधर्मता प्रोक्ता, सा चाशत्रोपहतसचित्तवस्तुनोऽग्रहणेनोपपादिता, तच्चातिप्रसङ्गनिराकरणाभिप्रायेण, स च श्रुताप्रामाण्यबुद्धचैव स्यात् न तु भगवता प्रतिषेवितमिति छद्मस्थबुद्धिमात्रेण, छद्मस्थैरुत्सर्गतः प्रतिषिद्धत्वेन ज्ञायमानाया अपि भगवतो निशाहिण्डन - भेषज ग्रहणादिप्रवृत्तेः श्रवणाद्, अपवादतोऽप्र सटिप्पणा ॥ खोपड चिः ॥ गाथा - ५१ ॥ १८५ ॥ Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१८६॥ सटिप्पणा । ॥खोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा-५१ ॥१८॥ तिषिद्धन्वज्ञानात , तद्दर्शनेन छद्मस्थानामतिप्रसङ्ग इत्युक्तौ च सिद्धाऽनायासेनैव भगवतोऽपवादप्रवृत्तिः, तस्मादुन्नतनिम्नदृष्टान्तप्रदर्शितपरस्परप्रतियोगिकप्रकर्षापकर्षशालिगुणोपहितक्रियारूपोत्सर्गापवादाभावेऽपि साधुसमानधर्मतावचनाद् भगवति सूत्रोदितक्रियाविशेषरूपयोस्तयोयथोचिततया सम्भवोऽविरुद्ध इति युक्तं पश्यामः, तथा च धर्मोपकरणानेषणीयादिविषयप्रवृत्तेर्भगवतः स्वरूपत आपवादिकत्वेन तव मते आभोगेन प्रतिषिद्धविषयप्रवृत्त्युपधानस्य योगाशुभतानियामकत्वात् , तया भगवद्योगानामशुभत्वापत्तिर्वज्रलेपायितैव । यदि च यत्तु श्रुतव्यवहारशुद्धस्याप्यनपणीयत्वेनाभिधानं तत् श्रुतव्यवस्थामधिकृत्यैवावसातव्यम् , 'यथाऽयं साधुरुदयनो राजा' इत्यत्र | राजत्वमगृहीतश्रामण्यावस्थामपेक्ष्यैवेति स्ववचनाश्रयणाद् , भगवत्स्वीकृतानां श्रुतव्यवहारसिद्धानां प्रतिषिद्धत्वाभिमतविषयप्रवृतीनां वस्तुतो न प्रतिषिद्धविषयत्वम् , न वा ताभिः 'इदं सावद्यम्' इति प्रज्ञाप्य प्रतिषेवित्वम् , इदमित्यनेन प्रत्यक्षव्यक्तिग्रहणात् तस्याश्चानवद्यन्वादिति विभाव्यते, तदा 'अनेषणीयं न ग्राह्यम्' इत्यादिप्रतिषेधवाक्ये श्रुतव्यवहारशुद्धानेषणोयातिरिक्तानेषणीयादेनिषे. ध्यत्वं वक्तव्यम् । तथा चापवादिकमन्यदपि कृत्यं श्रुतव्यवहारसिद्धमित्यप्रतिषिद्धमेवेत्याभोगेन प्रतिषिद्धविषयप्रवृत्तिः साधूनां क्वापि न स्यादिति त्वदपेक्षया यतीनामशुभयोगत्वमुच्छियेतेवेति प्रमत्तानां शुभाशुभयोगत्वेन द्वैविध्यप्रतिपादकागमविरोधः, तस्मादाभोगेन जीवघातोपहितत्वं न योगानामशुभत्वम् , अशुभयोगजन्यजीवघातो जीवारम्भकत्वव्यवहारविषयः, अशुभयोगारम्भकपदयोः पर्यायत्वप्रसङ्गा, एकेन्द्रियादिष्वारम्भकत्वव्यवहाराभावप्रसङ्गाच्च ।। न हि ते आभोगेन जीवं मन्तीति । अस्ति च तेष्वप्यारम्भकत्वव्यवहारः। तदुक्तं भगवतीवृत्तौ-'तत्थ णं जे ते असंजया ते अविरई पडुच्च आयारंभा वि जाव णो अणारंभा॥" [तत्र ये ते असंयतास्ते | अविरतिं प्रतीत्य आत्मारम्भा अपि यावद् नो अनारम्भाः । ] इत्यस्य व्याख्याने "इहायं भावः-यद्यप्यसंयतानां सूक्ष्मैकेन्द्रियादीनां Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्मपरीक्षा ॥१८७॥ सटिप्पणा ॥स्वोपन वृधिः ॥ गाथा-५१ ॥१८७॥ नात्मारम्भकादित्वं साक्षादस्ति, तथाप्यविरतिं प्रतीत्य तदस्ति तेषाम् , न हि ते ततो निवृत्ता; अतोऽसंयतानामविरतिस्तत्र कारणमिति । निवृत्तानां तु कथञ्चिदात्माघारम्भकत्वेऽप्यनारम्भकत्वम् । यदाह-'जा जयमाणस्स' इत्यादि किन्तु सूत्रोदितेतिकर्तव्यतोपयोगपू. वकव्यापारत्वं च शुभयोगत्वम् , तदुक्तं भगवतीवृत्ती-"शुभयोग उपयुक्ततया प्रत्युपेक्षणादिकरणम् , अशुभयोगस्तु तदेवानुपयुक्ततयेति । तत्र शुभयोगः संयतानां षष्ठेऽपि गुणस्थाने संयमस्वभावादेव, अशुभयोगश्च प्रमादोपाधिकः । तदुक्तं तत्रैव-"प्रमत्तसं| यतस्य हि शुभोऽशुभश्च योगः स्यात् , संयतत्वात्प्रमादपरत्वाच्चेति” तत्र प्रमत्तसंयतानामनुपयोगेन प्रत्युपेक्षणादिकरणादशुभयोगदशायामारम्भिकीक्रियाहेतुव्यापारवत्वेन सामान्यत आरम्भकत्वादात्मारम्भकादित्वम् , शुभयोगदशायां तु सभ्यक्रियोपयोगस्यारम्भिकीक्रियाप्रतिबन्धकत्वात् , तदुपहितव्यापाराभावेनानारम्भकत्वम् , प्रमत्तगुणस्थाने सर्वदाऽऽरम्भिकीक्रियाभ्युपगमस्त्वयुक्तः, अनियमेन तत्र तत्प्रतिपादनात् । तदुक्तं प्रज्ञापनायां २२ क्रियापदे-"आरंभिया णं भंते ! किरिया कस्स कजइ ? गोयमा ! अण्णयरस्सावि पमत्तसंजयस्स ॥” इति । [ आरम्भिकी भदन्त ! क्रिया कस्य क्रियते ? गौतम ! अन्यतरस्यापि प्रमत्तसंयतस्य । ] एतवृत्तिर्यथा "आरंभिया णं इत्यादि अण्णयरस्सावित्ति । अत्रापिशब्दो भिन्नक्रमः, प्रमत्तसंयतस्याप्यन्यतरस्यैकतरस्य कस्यचित्प्रमादे सति कायदुष्प्रयोगभावतः पृथिव्यादेरुपमईसम्भवाद् , अपिशब्दोऽन्येषामधस्तनगुणस्थानवर्तिनां नियमप्रदर्शनार्थः । प्रमत्तसंयतस्याप्यारम्भिकी क्रिया भवति किं पुनः शेषाणां देशविरतप्रभृतीनामिति" ॥ अस्यां व्यवस्थायां सिद्धायां जानतोऽपि भगवतो धर्मोपकरणधरणेऽवजनीयस्य द्रव्यपरिग्रहस्येव गमनागमनादिधर्म्यव्यापारेऽवर्जनीयद्रव्य हिंसायामप्यप्रमत्तत्वादेव नाशुभयोगत्वमिति प्रतिपत्तव्यं । न च भगवतो धर्मोपकरणसत्त्वेऽपि मूर्छाऽभावेन परिग्रहत्वत्यागान्न परिग्रहदोषः, द्रव्यहिंसायां तु सत्यां प्राणवियोगरूपतल्लक्षणसत्त्वात्तदोषः 90%A4% A ADA Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१८॥ सटिप्पना | खोपत्र वृतिः ॥ गाथा-५१ ॥१८॥ SSSSSSSS स्यादेवेति व्यामूढधिया शङ्कनीयम् ; 'प्रमादयोगेन प्राणव्यपरोपणं हिंसा'-इति तत्त्वार्थे तल्लक्षणकरणाद् भगवति तदभावादेव, अत एव 'हिंसा नियतो दोषः, परिग्रहस्त्वनियतो दोषः' इत्यप्यपास्तम् , मैथुनादन्यत्राश्रवेऽनियतदोषत्वप्रतिपादनात् । तदुक्तं तत्त्वार्थवृत्ती| अ०७सू०११ "प्रमत्तयोगादसदभिधानमनृतम् , प्रमत्तयोगाददत्तादानं स्तेयम् , प्रमत्तयोगान्मृर्छा परिग्रहः, मैथुने प्रमत्तयोगादिति पदं न, यंत्राप्रमत्तस्य तथाभावे सति कर्मवन्धाभावस्तत्र प्रमत्तयोगग्रहणमर्थवद् भवति, प्रमत्तस्य कर्मबन्धो नाप्रमत्तस्येति, प्राणातिपातवत् , मैथुने तु रागाद्वेषान्वयाविच्छेदात सर्वावस्थासु मैथुनासेविनः कर्मबन्ध इत्यादि।” एतेन द्रव्यहिंसया भगवतः प्राणातिपातकन्वप्रसङ्गोऽपि निरस्तः, द्रव्यपरिग्रहेण परिग्रहित्वप्रसङ्गतुल्य योगक्षेमत्वात् । किश्च वीतरागाणामप्रमत्तानां च जीवविराधनायां सत्यामप्यारम्भिकीप्राणातिपातिकीक्रियाऽभाव एव भणितः । तदुक्तं भगवत्यां शतक १ उद्देश २ "तत्थ णं जे ते संजया ते दुविहा पण्णत्ता । तंजहासरागसंजया य वीयरागसंजयाय । तत्थणं जे ते वीयरागसंजया ते णं अकिरिया। तत्थ ण जे ते सरागसंजया, ते दुविहा पण्णत्ता । तंजहा-पमत्तसंजया य अपमत्तसंजया य । तत्थ ण जे ते अपमत्तसंजया. तेसिणं एगा मायावत्तिया किरिया कजइ, तत्थ णं जे ते पमत्तसंजया तेसि णं दो किरियाओ कजंति । तंजहा-आरंभिया य मायावत्तिआ य इत्यादि॥" [तत्र च ये ते संयतास्ते द्विविधाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-सरागसंषताश्च वीतरागसंयताश्च । तत्र च ये ते वीतरागसंयतास्ते चाक्रियाः। तत्र ये ते सरागसंयतास्ते द्विविधाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-प्रमत्तसंयताश्च अप्रमत्तसंयताश्च । तत्र ये ते अप्रमत्तसंयतास्तेषामेका मायाप्रत्ययिकी क्रिया क्रियते । तत्र ये ते प्रमत्तसंयतास्तेषां द्वे क्रिये क्रियेते, तद्यथा आरम्भिकी मायाप्रत्ययिकी च ॥] एतवृत्तिर्यथा “सरागसंजय"त्ति अक्षीणानुपशान्तकषायाः, 'वीय. रागसंजय'त्ति उपशान्तकषायाः क्षीणकषायाश्च । 'अकिरिय'त्ति वीतरागत्वेनारम्भादीनामभावाद क्रियाः। 'एगा मायावत्तियति Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-५१ ॥१८९॥ अप्रमत्तसंयतानामेकैव मायाप्रत्यया क्रिया 'कजाइ'त्ति क्रियते भवति; कदाचिदुड्डाहरक्षणप्रवृत्तानामक्षीणकषायत्वादिति । 'आरंभियत्ति प्रमत्तसंयतानां च 'सर्वः प्रमत्तयोग आरम्भ इति कृत्वाऽऽरम्भिकी स्यात् . अक्षीणकषायत्वाच्च मायाप्रत्ययेति ।" तथा तत्रैवाष्टमशते षष्ठोद्देशके प्रोक्तं-"जीवे णं भंते ! ओरालियसरीराओ कइकिरिए ? गोयमा! सिय तिकिरिए, सिय चउकिरिए, सिय पंच किरिए, सिय अकिरिएत्ति॥" एतवृत्तिर्यथा-"परशरीरमौदारिकाद्याश्रित्य जीवस्य नारकादेश्व क्रिया अभिधातुमाह-'जीवेण- मि'त्यादि । 'ओरालियसरीराओ'त्ति औदारिकशरीरात्परकीयमौदारिकशरीरमाश्रित्य कतिक्रियो जीव इति प्रश्नः । उत्तरं तु 'सिय तिकिरिए'त्ति यदकजीवोऽन्यस्य पृथिव्याः सम्बन्ध्यौदारिकशरीरमाश्रित्य कार्य व्यापारयति तदा त्रिक्रियः, कायिक्यधिकरणिकीप्राद्वेषिकीनां भावाद्, एतासां च परस्परेणाविनाभूतत्वात् स्यात् 'त्रिक्रियः' इत्युक्तम् , न पुनः स्याद् 'एकक्रियः स्याद् 'द्विक्रिय' इति । अविनाभावश्च तासामेवमधिकृतक्रिया हवीतरागस्यैव नेतरस्य, तथाविधकर्मबन्धहेतुत्वाद् , अवीतरागकायस्य चाधिकरणत्वेन प्रद्वेषान्वितत्वेन च कायक्रियासद्भावे इतरयोरवश्यंभावः, इतरभावे च कायिकीसद्भावः । उक्तं च प्रज्ञापनायामिहार्थे-"जस्सणं ट्रा.जीवस्स काइआ किरिया कजइ तस्स अहिगरणिया किरिया णियमा कञ्जइ, जस्स अहिगरणिया किरिया कन्जइ तस्स वि काइया किरिया |णियमा कजई" इत्यादि । [ यस्य जीवस्य कायिकी क्रिया क्रियते, तस्याधिकरणिकी नियमाक्रियते । यस्याधिकरणिकी क्रिया क्रियते ॐ तस्यापि क यिकी क्रिया नियमात्क्रियते । ] तथाऽऽद्यक्रियात्रयसद्भावे उत्तरक्रियाद्वयं भजनया भवति । यदाह-"जस्स णं जीवस्स काइया किरिया कजइ, तस्स पारियावणिया सिय कन्जइ, सिय णो कजइ" इत्यादि। [यस्य जीवस्य कायिकी क्रियाक्रियते तस्य पारितापनिकी स्यात् क्रियते, स्यात् नो क्रियते । ] ततश्च यदा कायव्यापारद्वारेणाद्यक्रियात्रय एवं वर्त्तते, न तु परितापयति न चातिपातयति, तदा PUCHUCHI Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Miss त्रिक्रिय एवेति, अतोऽपि स्यात् 'त्रिक्रिय' इत्युक्तम् । यदा तु परितापयति तदा चतुष्क्रियः, आयक्रियात्रयस्य तत्रावश्यंभावाद् । यदा धर्मपरीक्षा | त्वतिपातयति तदा पञ्चक्रियः, आद्यक्रियाचतुष्कस्य तत्रावश्यंभावाद् । उक्तं च-"जस्स पारिआवणिया किरिया कजइ तस्स काइया || त्वतिपातयति तदा पञ्चकित सटिप्पणा णियमा कजई" इत्यादि। [यस्य पारितापनिकी क्रिया क्रियते तस्य कायिकी नियमात क्रियते । अत एवाह-"सिय चउकिरिए, सिय ॥खोपड़ वृतिः ॥ दू पंचकिरिए"त्ति तथा 'सियअकिरिए"त्ति वीतरागावस्थामाश्रित्य, तस्यां(स्या)हि वीतरागत्वादेव न सन्त्यधिकृतक्रिया इति।" एतद्वचना गाथा-५१ नुसारेण ह्येतत्प्रतीयते- यदारम्भिकी क्रिया प्रमादपर्यन्तमेव, न तु जीवविराधनायां सत्यामप्युपरिष्टादपि । प्राणातिपातक्रिया च प्रद्वेषण ॥१९॥ प्राणातिपातकाल एव, न च पृथिव्यादीनां तदसम्भवः, तत्कृताकुशलपरिणामानिवृत्त्यैव तत्प्रतिपादनादिति । साप्यप्रमत्तस्य न सम्भवति । वन चावीतरागकायस्याधिकरणत्वेन प्रद्वेषान्वितत्वेन च कायिकीक्रियासद्भावे त्रिक्रियत्वस्य नियमप्रतिपादनाद् एवंभूतस्याप्रमत्तस्थापि | प्राणातिपातव्यापारकाले प्राणातिपातिकीक्रियासम्भव इतिवाच्यम् ,कायिकीक्रियाया अपि प्राणातिपातजनकप्रद्वेषविशिष्टाया एव ग्रहणाद् , इत्थमेवाद्यक्रियात्रयनियमसम्भवात् । तदुक्तं 'प्रज्ञापनावृत्तौ'-"इह कायिकी क्रिया औदारिकादिका(क्रि)याश्रिता प्राणातिपातनिर्वनिसमर्था प्रतिविशिष्टा परिगृह्यते, तथा(न या)काचन कार्मणकायाश्रिता वा, तत आद्यानां तिसृणां क्रियाणां परस्परं नियम्यनियामकभावः । कथमिति चेत् ; उच्यते-कायोऽधिकरणमपि भवतीत्युक्तं प्राक्, ततः कायस्याधिकरणत्वात् कायिक्यां सत्यामवश्यमाधिकरणिकी, आधिकरणिक्यामवश्यं कायिकी, सा च प्रतिविशिष्टा कायिकी क्रिया प्रद्वेषमन्तरेण न भवति, ततः प्राद्वेषिक्यापि सह परस्परमविनाभावः । प्रद्वेषोऽपि च काये स्फुटलिङ्ग एव, वक्त्ररुक्षत्वादेस्तदविनाभाविनः प्रत्यक्षत एवोपलम्भाद् । उक्तं च-"रुक्षयति रुष्यतो ननु. व स्निह्यति च रज्यतः पुंसः। औदारिकोऽपि देहो, भाववशात् परिणमत्येवम् ॥१॥ इति । " यदि च प्रद्वेषान्वयाविच्छे -se-ECEN Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्ष ॥१९१॥ दमात्रादवीतरागमात्रस्य कायिकयादिक्रियात्रय नियमः स्यात्, तदा सूक्ष्मसंपराये प्राणातिपातसम्पत्तौ प्राणातिपातक्रियया षड्विधबन्धकत्वस्याप्युपपत्तौ "जीवे णं भंते ! पाणाइवाएणं कइ कम्मपगडीओ बंधड़ ? गोअमा ! सत्तविहबंधए वा अडविहबंधए वा ।" [जीवो भदन्त ! प्राणातिपातेन कति कर्मप्रकृतीर्वध्नाति ?, गौतम !, सप्तविधबन्धको वाऽष्टविधबन्धको वा ।] इत्युक्तव्यवस्थानुपपत्तिः । नन्वेवं "जीवे णं भंते! नाणावरणिजं कम्मं बंधमाणे कइकिरिए ?, गोअमा !, सिय तिकिरिए सिय चउकिरिए सिय पंचकरिए । [ जीवो भदन्त ! ज्ञानावरणीयं कर्म वध्नन कतिक्रियः १ गौतम ! स्यात् त्रिक्रियः स्यात् चतुष्क्रियः स्यात् पञ्चक्रियः । ] इति प्रज्ञापनासूत्रस्य पद२२ का गतिः ? भवदुक्तरीत्या ज्ञानावरणीयं कर्म बघ्नतो दशमगुणस्थानवर्तिनोऽक्रियत्वस्यायि सम्भवेन स्यादक्रियः' इति भङ्गन्यूनत्वादिति चेत्, खसहचरिते स्वकार्ये वा ज्ञानावरणीये प्राणातिपातस्य परिसमाप्तिनिर्वृत्ति भेदप्रकारो पदर्शनपरमेतत् सूत्रम्, न तु तद्धन्धे क्रियाविभागनियमप्रदर्शनपरम् - इत्येषा गतिरिति गृहाण । तदुक्तं तद्वृत्तौ “इह प्रागुक्तं जीवः प्राणातिपातेन सप्तविधमष्टविधं वा कर्मबध्नाति स तु तमेव प्राणातिपातं ज्ञानावरणीयादि कर्म वध्नन् कतिभिः क्रियाभिः समापयतीति प्रतिपाद्यते । अपि च कार्येण ज्ञानावरणीयाख्येन कर्मणा कारणस्य प्राणातिपाताख्यस्य निवृत्तिभेद उपदर्श्यते, तद्भेदाच्च बन्धविशेषोऽपीति । उक्तं च- "तिसृभिचतसृभिरथ, पञ्चभि (क्रियाभिः ) हिंसा समाप्यते क्रमशः । बन्धोऽस्य विशिष्टः स्याद्, योगप्रद्वेषसाम्यं चेद् ॥ १ ॥” इति तमेव प्राणातिपांतस्य निवृत्तिभेदं दर्शयति- 'सिय तिकिरिए' इत्यादीति,” अथैवमप्रमत्तस्यैवा क्रियत्वखामिनः सुलभत्वाद् भगवतीवृत्तौ अक्रियत्वं वीतरागावस्थामाश्रित्यैव कथमुपपादितम् ?, इति चेत्, स्पष्टत्वार्थम् । बादरसम्परायं यावत् प्रद्वेषान्वयेन त्रिक्रियत्वाभ्युपगमेऽपि सूक्ष्मसम्परायस्याऽक्रियत्वस्थानस्य, परिशिष्टत्वेनैतदुपपादनार्थम् एतत्प्रकारस्यावश्याश्रयणीयत्वात् । प्रद्वेषाभावेन तत्र कायिक्यधिकरणिकी J सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा - ५१ ॥१९१॥ Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥१९२॥ सटिप्पणा | ॥खोपत्र वृत्तिः । गाथा-५१ ॥१९॥ 4354OK क्रियाभ्युपगमे च कायिक्यादिक्रियात्रयस्य परस्परं नियमानुपपत्तिरिति॥ कायिकी क्रिया द्विविधा-अनुपरतकायिकी क्रिया दुष्प्रयुक्तकायिकी क्रिया चेति सिद्धान्तेऽभिधानात, कायिकी क्रियाऽऽरम्भिक्यासमनियता, प्राणातिपातिकी च प्राणातिपातव्यापारफलोपहितत्वात् तद्वयाप्यैवेति प्रतिपत्तव्यम् , तत आरम्भकत्वं प्राणातिपातकत्वं च सत्यामपि द्रव्यहिंसायां प्रमत्तस्यैव नाप्रमत्तस्येति भगवतस्तया तदापादनमयुक्तमेवेति दिक ॥५१॥ अथावश्यंभाविन्यां जीवविराधनायामाभोगवतो भगवतो यद् घातकत्वमापाद्यते तकि लोकोत्तरव्यवहाराद्, उत लौकिकव्यवहाराद्, उताहो खमतिविकल्पितव्यवहाराद्।। नाद्यः, लोकोत्तरघातकत्वव्यवहारे आभोगेन जीवविराधनामात्रस्यातन्त्रत्वाद्, आभोगेनापि जायमानायां तस्यामपवादपदप्रतिषेविणोऽघातकत्वस्य, अनाभोगेनापि जायम नायां तस्यां प्रमादिनो घातकन्वस्य च तद्व्यवहारेणेष्टत्वाद् । नापि द्वितीयः, यतो लोका अपि नाभोगेन जीवघातमात्रादेव घातकत्वं व्यवहरन्ति, कूपनष्टायां गवि तत्कषुर्गोवधकर्तृत्वप्रसङ्गाद्, गोराभोगस्यापि तदा स्फुटत्वाद् , आभोगजन्यस्य च हिंसायामसिद्धत्वाद् । हिंसायां हि जिघांसाहेतु राभोगस्त्वन्यथा सद्ध इत्येतद्दोषवारणार्थ 'मरणोद्देश्यकमरणानुकूलशपारवत्वं हिंसा वक्तव्या, तथापि काशीमरणोद्देशपूर्वकानुष्ठाने आत्म हिंसात्वापत्तिवारणार्थमदृष्टाद्वारकत्वं विशेषणं देयम् , इत्यदृष्टाद्वारकमरणोद्देश्यकमरणानुकूलव्यपारवत्त्वमेव हि हिंसा न्यायशास्त्र सिद्धति तृतीयस्तु पक्षोऽवशिष्यते । स तु स्वमतिविकल्पितत्वादेव स्वशास्त्रप्रतिज्ञाबाधया महादोषावह इत्यभिप्रायेणाहअणुसंगयहिंसाए, जिणस्स दोसं तुहं भणंतस्स ॥ साहूण वि आभोगा, णइउत्ताराइ विहडिज्जा ॥ ५२ ॥ [अनुषङ्गाजहिंसया, जिनस्य दोषं तव भणतः । साधूनामप्याभोगाद् . नद्युत्तारादि विघटेत ॥ ५२॥] 'अणुसंगयहिंमाए'त्ति अनुषजया-धर्मदेशनामात्रोद्देश्यकप्रवृत्त्युपजायमानकुनयमतखेदादिवत्स्वानुद्देश्यकप्रवृत्तिजनितया BAR SA%% 64 Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पर्नपरीक्षा सटिप्पणा खोपा गाथा-५२ SHRESS हिंसया जिनस्य दोष भगतस्तव साधूनामप्याभोगनिद्युत्तारादि विघटेन, तेषामपि नधुत्तारादौ जलजीवादिविराधनाया अध्यक्षसिद्धत्वादिति। नन्वेतदसिद्धम् , नहि जलजीवानामप्रत्यक्षन्वेन तद्विराधनायाः प्रत्यक्षत्वं सम्भवति, प्रतियोगिनोऽप्रत्यक्षत्वे तदनुयोगिनोऽप्यप्रत्यक्षत्वात् । न च जलस्य प्रत्यक्षत्वेन तज्जीवानामपि प्रत्यक्षत्वमिति वाच्यम् , इदं जलमिति ज्ञानमात्रणेदं जलं सचित्तमिति विवेकेन परिज्ञानोदय प्रसक्तः। तस्मात् "दुविहा पुढविकाइआ पन्नत्ता तंजहा परिणया चेव अपरिणया चेव, जाव वणप्फइकाइति [ द्विविधाः पृथ्वीकायिकाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-परिणताव अपरिणताश्चैव यावद् वनस्पतिकायिका इति ॥] श्रीस्थानाङ्ग सू० ७३ । “तत्र परिणताः स्वकायपरकायशस्त्रादिना परिणामान्तरमापादिता अचित्तीभृता इत्यर्थः-इत्यादिप्रवचनवचनेन नद्यादिजले सचित्ताचित्तयोरन्यतरन्वेन परिज्ञाने सत्यपि इदं जलं सचित्तम् , इदं वा अचित्तम् इति व्यक्त्या विवेकमधिकृत्य परिज्ञानाभावेन छमस्थसंयतानामनाभोग एव, तेन सिद्धा नथुत्तारादौ जलजीवविराधनानाभोगजन्याशक्यपरिहारेण इत्याशङ्कायामाहवजंतो अ अणिटुं, जलजीवविराहणं तहिं सक्खं । जलजीवाणाभोगं, जंपतो किंण लज्जेसि ॥ ५३॥ 1 [वर्जयश्चानिष्टां जलजीवविराधनां तत्र साक्षात् । जलजीवानाभोग जल्पन् किं न लजसे ॥५३॥ 'वजंतो यत्ति । तत्र नद्युत्तारे, जलजीव विराधनामनिष्टां माक्षादर्जयन् वर्जनीयाभ्युपगच्छंश्च, जलजीवानाभोगं Bा जलपन किं न लजसे ॥ अयं भावः-नयुत्तारे बहुजलप्रदेशपरित्यागेनाल्पजलप्रदेशप्रवेशरूपा यतना तावत्वयापि स्वीक्रियते, सा| च जलजीवानाभोगाभ्युपगमे दुर्घटा, स्वल्पजलं सचित्तं भविष्यति बहुजलं चाऽचित्तमिति विपरीतप्रवृत्ति हेतुशङ्कापिशाचीप्रचारस्थापि दुर्वारत्वाद् । भगवदुक्तयतनाक्रमप्रामाण्यानेय शकेति चेत्, तर्हि यतनाया अपि बहुतरासत्प्रवृत्तिनिवृत्तिरूपाया विवेकेन परिज्ञानं Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१९४॥ न्यूनाधिक जल जीवविराधना भोगाधीनमिति व्यवहारसचित्ततया जलजीवाभोगाभ्युपगमावश्यकत्वात् तव वदतो व्याघात एव महात्रपाकारणमिति । किञ्च - नद्यादिजलजीवानां निश्चयतश्छद्मस्थानां सचित्तत्वापरिज्ञानेऽपि तत्र स्थितपनकसेवालादीनां निश्चयतोऽपि सचितत्वं परिज्ञायते एव । तदुक्तमोघ निर्युक्तौ - "सब्वो वऽणंतकाओ, सच्चित्तो होइ णिच्छयणयस्स । वबहारओ अ सेसो, मीसो फम्हाणरोट्टाइ ॥ ३६३ ॥ " पिंडनि० ४४ " एतद्वृत्तिर्यथा - सर्व एवानन्तवनस्पतिकायो निश्चयनयेन सचित्तः, शेषः परीत वनस्पतिर्व्यवहार नय मतेन सचित्तो मिश्रश्च प्रम्लानानि यानि फलानि कुसुमानि पर्णानि च, "रोट्टो लोट्टो तंदुलाः कुट्टिताः तत्थ तंदुलमुहाई अच्छंति, तेण कारणेन सो मीसो भन्नइत्ति ।" ते च पनकशेवालादयो जलेऽवश्यं भाविन इति तद्विषयविराधना निश्वयतोऽप्याभोगेन सिद्धेति । तत्राना भोगेनैव जीवविराधनेति दुर्वचनम् । न च ते तत्रास्माभिः प्रत्यक्षतो न दृश्यन्ते, अतस्तद्विराधनानाभोगजैवेति वक्तव्यम्, स्वच्छस्तोकजलनद्यादिषु पनकादीनामस्माभिरप्युपलभ्यमानत्वेन 'नास्माभिस्ते तत्र दृश्यन्त' - इत्यस्यासिद्धत्वात् । किञ्च आगमवचनादपि तत्र तदवश्यंभावो निश्चीयते । तदुक्तं प्रज्ञापनातृतीय पदवृत्तौ - "बादरतेजस्कायिकेभ्योऽसङ्ख्येयगुणाः प्रत्येकशरीरबादरवनस्पतिकायिकाः, तेभ्यो बादरनिगोदा असङ्ख्येयगुणाः, तेषामत्यन्तमूक्ष्मावगाहनत्वाद्, जलेषु सर्वत्रापि च भावात् । पनकसेवालादयो हि जलेऽवश्यंभाविनः, ते च बादरानन्तकायिका इति । तथा बादरेष्वपि मध्ये सर्वबहवो वनस्पतिकायिकाः, अनन्तसङ्ख्याकतया तेषां प्राप्यमाणत्वात् । ततो यत्र ते बहवस्तत्र बहुत्वं जीवानाम्, यत्र त्वल्पे तत्राल्पत्वम् । वनस्पतयश्च तत्र बहवो यत्र प्रभूता आप:, ' जत्थ जलं तत्थ वर्ण' इति वचनात् तत्रावश्यं पनकसेवालादीनां भावात्, ते च पनकसेवालादयो बादरनामकमोंदये वर्त्तमाना अपि अत्यन्तसूक्ष्मावगाहनत्वाद् अतिप्रभूतपिण्डीभावाच्च सर्वत्र सन्तोऽपि न चक्षुषा ग्राह्याः । तथा चोक्तमनुयोग JAY सटिप्पना ॥खो हचिः ।। गाथा - ५३ ॥१९४॥ Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पा स्वोरण वृषिः ॥ गाथा-48 Vाद्वारेषु ते णं वालग्गा दिट्ठीओगाहणाओ असंखेजहभागमेत्ता सुहमपणगजीवस्स सरीरोगाहणाओ असंखेजगुणा ॥ इति ।" [तानि अर्मपरीक्षा | च बालाग्राणि दृष्टयवगाहनातोऽसंख्येयभागमात्राणि सूक्ष्मपनकजीवस्य शरीरावगाहनातोऽसंख्येयगुणानि ॥ ततो यत्रापि नैते दृश्यन्ते, तत्रापि ते सन्तीति प्रतिपत्तव्याः। आह च मूलटीकाकार:-इह " सर्वबहवो वनस्पतयः इति कृत्वा यत्र ते सन्ति तत्र बहुत्वं जीवानाम् , तेषां च बहुत्वम् , "जत्थ आऊकाओ तत्थ णियमा वणस्सइकाइआ इति पणगसेवालहढाई बायरा वि होंति, सुहुमा आणाज्झा, ण चक्खुण"त्ति ॥" पनकसेवालहढादयो बादरा अपि भवन्ति सूक्ष्मा आज्ञाग्राह्या न चक्षुषेति ॥] किश्च-नयुत्तारादौ मण्डूकादित्रसविराधना "तसा य पचक्खया चेव"त्ति वचनात् अवश्यं जायमानाभोगपूर्विकैव, इत्येवं च सति जीवोऽयमिति साक्षात्कृत्वा यो जीवघातं करोति तस्य विरतिपरिणामो दूरे, निश्चयतः सम्यक्त्वमपि न स्यात् , अनुकम्पाया अभावेन सम्यक्त्वलक्षणाभावाद्-इत्यादि परोतं. यत्किञ्चिदेव, आप्तवचनाजीवत्वेन निश्चितस्य विराधनायाः स्वादर्शनमात्रेणाभोगपूर्वपूर्वकत्वाभावे आप्तोक्तवस्त्राद्यन्तरितत्रसादिविराधनायामपि तदापत्तेः, दृष्ट्वा स्थूलत्रसविराधनायामाभोगविशेषाद्विषयविशेषाच्च पातकविशेषस्तु स्याद् , न चतावताऽन्यत्रानाभोग एव व्यवस्थापयितुं शक्यते । न खलु राजदारगमने महापातकाभिधानादन्यत्र परदारगमने परदारगमनत्वमेव नेति वक्तुं युक्तम् । एतेनाभोगमूलाऽऽोगपूर्विका च जीवविराधना विनापराधं मिथ्यादृशोऽपि प्रायोऽनार्यजनस्यैव भवति, सा च नावश्यंभाविनी, प्रायः | सम्भविसम्भवात् । संयतानां त्वनाभोगमूलैव सा, नत्वाभोगमूला, अत एव नद्युत्तारादौ सत्यामपि जलजीवविराधनायां संयमो दुराराधो न भणितः, भणितश्च कुन्थत्पत्तिमात्रेणापि, तत्र निदानं तावदाभोगाऽनाभोगावेव । तत्र यद्यपि संपतानामुभयत्रापि जीवविराधनाऽनामोगादेव, तथापि स्थावरसूक्ष्मत्रसजीवविषयकोऽनाभोगः सर्वांशैरपि सर्वकालीनो न पुनः काचित्कः कादाचित्कश्च, तस्य चापगमः Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१९६॥। प्रथत्त्रशतैरप्यशक्यः, केवलज्ञानसाध्यत्वात्, शक्यच कुन्ध्वादिस्थूलत्रसजीवविषयकस्थानाभोगस्य भूयो निरीक्षणादिनेति, तथाभूतं च निरीक्षणं दुःसाधमिति संयमो दुराराधो भणितः । एवं सम्यक् प्रयत्नपरायणानामपि कदाचित् कुन्ध्वादिस्थूलत्रसजीवविराधना स्यात् । सा च प्रायोऽसम्भविसम्भवेनावश्यंभाविनीति वक्तव्यम्, शक्यपरिहार जीवविषयकप्रयत्नवतोऽपि तत्परिहरणोपायस्यापरिज्ञानात्सा - प्यवश्यंभाविनी, विराधना द्वेधा - अनाभोगमूला अनाभोगपूर्विका, अनाभोगमूला आभोगपूर्विका चेति । तत्राद्या जीवघाते जाते " तत्परिज्ञानाद् | द्वितीया तु निम्नप्रदेशादौ पिपीलिक । दिकमदृष्ट्वैवोत्पाटिते पादे दृष्ट्वाऽपि पादं प्रत्यादातुमशक्तस्य जीवघातावसरे जीवविषयकाभोगस्य विद्यमानत्वात् परमनाभोगमूलिकापि स्थूलत्र सजीवविरराधना संपतानां तज्जन्यकर्मबन्धाभावेऽपि लोकनिन्द्या भवत्येव, तत्कर्तुर्हिसाव्यपदेशहेतुत्वात् तथाव्यपदेशः स्थूलत्रसजीवसम्बन्धित्वेन निजसाक्षात्कारविषयत्वात् । न चैवं केवलिवचसा निश्चिताऽपि सूक्ष्मत्रसजीवविराधना. तस्याश्छद्मस्थसाक्षात्कारविषयत्वाभावेन हिंसकव्यपदेशहेतुत्वाभावात् । अत एवाब्रह्मसेवायाम - कशतसहस्रपञ्चेन्द्रियजीवविराधकोऽपि देशविरतिश्रात्रको 'जीवविराधकः' इति व्यपदेशविषयो न भवति, भवति चैकस्या अपिपिपी - लिकाया विराधनेनाऽभोगेनापि, आभोगे च स्वज्ञातिज्ञ । तेऽपांक्तेयोऽपि स्यान, तेन निजसाक्षात्कारविषयीभूताविषयीभूतयोर्जीवघातयोर्महान् भेदः, अन्यथाऽब्रह्मसेवी श्रावको व्याधादिभ्योऽपि जीवघातक वेनाधिको वक्तव्यः स्यात्-इत्यादि परस्य कल्पना जालमपासंयतानां नद्युत्तारे जलजीवविराधनाया आभोगमूलत्वेऽप्याज्ञाशुद्धत्वेनैव दुष्टत्वात् । यच्च तया न संयमस्य दुराराधत्वम्, तस्याः कादाचित्कत्वाद|लम्बनशुद्धत्वाच्च । यथा च कुन्थुत्पत्तिमात्रेण सार्वदिकयत नाहेत्वाभोगदौर्लभ्यात् संयमस्य दुराराधत्वम्, तथा तथाविधक्षेत्रकाला दिवशात् सूक्ष्मबीजहरितादिप्रादुर्भावेऽपि सार्वदिकतद्यतन। हेत्वाभोगदौर्लभ्यात् संयमस्य दुराराधत्वमेवेति तु दशवेकालिका स्तम् सटिप्पणा ॥ पोपत्र वृचिः । गाथा - ५३ ॥१९६॥ Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥१९७॥ सटिप्पणा | ॥खोपक्ष BASNEKACIDISHA द्यध्ययनवतामपि सूक्ष्माष्टकविदां परिणतलोकोत्तरदयावरूपाणां प्रतीतमेव । स्थावरसूक्ष्मत्रसविषयकोऽनाभोगः केवलज्ञानं विना दुरत्यय इति तु सूक्ष्माष्टकयतनाविधानान्यथानुपपत्त्यैव बाधित परिणामशुद्धयर्थ तद्, न तु तदाभोगार्थम्-इत्येवं तदाभोगापलापे च स्थूल साभोगाभ्युपगमोऽप्युच्छियेत, तत्रापीत्थं वक्तुं शक्यत्वात् , चेष्टालिङ्गाभिव्यक्तेः स्थूलत्रसाभोगोऽभिव्यक्त एवेति चेत्, पृथिव्यादिजीवाभोगोऽपि जिनवचनाभिहितलिङ्गादाज्ञाप्रामाण्याद्वा किं नाभिव्यक्तः ? व्यक्तीयत्तयाऽनाभोगस्तु मनाक्स्पन्दत्कुन्थुतदनुकारिरजस्त्रुटिपुञ्जेऽपि वक्तुं शक्यत इति न किञ्चिदेतत् । ततो यतनां कुर्वतामशक्यपरिहारा हिंसा सूक्ष्मस्थूलजीवविषयकमेदेऽप्यशक्यपरिहा. रत्वेन समानैव, विषयभेदात् तद्भेदं तु व्यवहारेण न वारयामः। अत एवाब्रह्मसेवायामपि देशविरतस्य कृतसङ्कल्पमूलस्थूलजीवहिंसाप्रत्याख्यानाभङ्गान्न व्याधादिवदुष्टत्वम् । न चैवं देशविरतम्येव साधोरप्याभोगेन पृथिव्यादिवधे न दुष्टत्वमिति साधोः प्रत्याख्यानभङ्गदोपविशेषसमर्थनार्थ पृथिव्यादिजीवाभोगोऽप्यवश्यमभ्युपेयः। यदि च स्थूलत्रसविषयक एवाभोगोभ्युपगम्येत, तदा तद्विषयैव हिंसकान्ततो दुष्टा स्यात् . न चैवं जैनप्रक्रियाविदो वदन्ति, तैः क्षुद्रमहत्सत्त्ववधसादृश्यवसदृश्ययोरनेकान्तस्यैवाभ्युपगमात् । तदुक्तं सूत्रकृताङ्गे श्रु०२ अ०५ "जे केइ खुद्दगा पाणा, अदुवा संति महालया ॥ सरिसं तेहि वेरं ति, असरिसं ति य णो वए॥६॥ एतेहिं दोहिं 'ठाणेहिं, ववहारो ण विजई। एतेहिं दोहि ठाणेहिं, अणायारं तु जाणए ॥७॥"त्ति एतवृत्तिर्यथा-"ये केचन क्षुद्रकाः सत्त्वाः प्राणिन एकेन्द्रियद्वीन्द्रियादयोऽल्पकाया वा पञ्चेन्द्रिया अथवा महालया महाकायाः सन्ति विद्यन्ते,तेषां च क्षुद्रकाणामल्पकायानां कुन्थ्वादीनां महान् वाऽऽलयः शरीरं येषां ते महालया हस्त्यश्वादयस्तेषां च व्यापादने सदृशं बेरमिति वजं-कर्म विरोधलक्षणं वा वैरं, सदृशं समानम् , तुल्यप्रदेश वा सर्वजन्तूनामित्येवमेकान्तेन नो वदेत् । तथा विसदृशमसदृशम् , तद्व्यापत्तौ वैरं कर्मबन्धो विरोधो वा, Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थर्मपरीक्षा ॥१९८॥ इन्द्रियविज्ञानकायानां विसदृशत्वात् , सत्यपि प्रदेशतुल्यत्वे न सदृशं वैरमित्येवमपि नो वदेत् । यदि हि वध्यापेक्षयै(क्ष ए)व कर्मबन्धः स्यात् | ततस्तद्वशान कर्मणोऽपि सादृश्यमसादृश्यं वा वक्तुं युज्यते, नच तत्तद्वशादेव बन्धः, अपि त्वध्यवसायवशादपि ततश्च तीव्राध्यवसायि सटिप्पणा नोल्पकायसत्त्वव्यापादनेऽपि महद्वैरम् , अकामस्य तु महाकायसत्त्वव्यापादनेऽपि खल्पमिति । एतदेव सूत्रेणैव दर्शयितुमाह-एतेही वृचिः ॥ त्यादि। आभ्यामनन्तरोक्ताभ्यां स्थानाभ्यामनयोर्वा स्थानयोरल्पकायमहाकायव्यापादनापादितकर्मबन्धमदृशत्वविसदृशत्वयोर्व्यव जगाथा-५३ हरण व्यवहारो नियुक्तिकत्वान्न युज्यते। तथाहि-न वभ्यस्य सहशत्वमसदृशत्वं वैकमेव कर्मवन्धस्य कारणम् , अपि तु वधकस्य तीव्रभावो | ॥१९८॥ का मन्दभावो ज्ञात(न)भावोऽज्ञात(न)भावो महावीर्यत्वमल्पवीर्यत्वं चेत्येतदपि तदेवं वध्यवधकयोर्विशेषात् कर्मबन्धविशेष इत्येवं व्यवस्थिते वध्यमेवाश्रित्य सहशत्वासदृशत्वव्यवहारो न वियत इति । तथाऽनयोरेव स्थानयोः प्रवृत्तस्यानाचारं विजानीयादिति ॥ तथाहियजीवसाम्यात् कर्मबन्धसदृशत्वमुच्यते, तदयुक्तम् , यतो नहि जीवन्यापच्या हिंसोच्यते, तस्य शाश्वतत्वेन व्यापादयितुमशक्यत्वाद्, अपि त्विन्द्रियादिव्यापच्या। तथा चोक्तम्-पञ्चेन्द्रियाणि त्रिविधं बलं च, उच्छ्वासनिःश्वासमथान्यदायुः॥ प्राणा दशैते भगवद्भिरुक्ता-स्तेषां वियोजीकरण तु हिंसा ॥१॥ इत्यादि । अपि च भावसव्यपेक्षस्यैव कर्मवन्धोऽभ्युपेतुं युक्तः। तथाहि-वैद्यस्थागमसन्यपेक्षस्य सम्यक् क्रियां कुर्वतो यद्यातुरविपत्तिर्भवति, तथापि न वैरानुषङ्गीभवेद्भावदोषाभावात् । अपरस्य तु सर्पबुद्धया रज्जुमपि नतो भावदोषात् कर्मबन्धः, तद्रहितस्य तु न बन्ध इति, उक्तं चागमे-'ऊच्चालिअंमि पाए [उच्चालिते पादे। इत्यादि। तन्दुलमत्स्याख्यान तु सुप्रसिद्धमेव । तदेवंविधवध्यवधकभावापेक्षया स्यात्सहशत्वम् , स्थादसदृशत्वमिति, अन्यथाऽनाचार इति ॥" एतेन लौकिकघातकत्वव्यवहारविषयीभूतैव हिंसा महाऽनर्थहेतुरिति परस्य यत्र तत्र प्रलपनमपास्तम् ॥ अपि चैवमापवादिकोऽपि वधो महानर्थाय सम्पद्यते, +%AARAKHAND Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ १९९॥ ज्ञानादिहानिनिवारण मात्राभिप्रायस्य संयमपरिणतेऽ ( रन ) पायहेतुत्वेऽपि तत्कृतबधे लौकिकपातकन्वव्यवहारविषयत्वेनाशुद्धत्वानिवृत्तेः । पठ्यते च यतनादिनाऽपवादस्य शुद्धत्वमेव । तदुक्तं बृहत्कल्प भाष्ये - " गीयत्थो जयणाए, कडजोगी कारणंमि णिद्दोसो || एगेसिं गीयकडो, अरतदुट्ठो य जयणाए || ४९४६ ।। "त्ति । [ गीतार्थो यतनया कृतयोगी कारणे निर्दोषः । एकेषां गीतकृतोऽरक्तद्विष्टश्च यतनया ।। ] तस्मादागमोदितयतनयाऽध्यात्मशुद्धिरेव संयमरक्षाहेतुर्नत्वनाभोग इति स्थितम् । अत एव विरताविरतयोजनतोरजानतोश्व विराधनायां यतनाऽयतनानिमित्तकाऽध्यात्मशुद्धि-तदशुद्धिविशेषात् कर्म्मनिर्जरा बन्धविशेषो व्यवस्थितः । तदुक्तं बृहत्कल्प भाष्यवृत्त्योद्वितीयखण्डे - " अथ ज्ञाताज्ञातद्वारमाह-जाणं करेइ इक्को, हिंसमजाणमपरो अविरओ अ ।। तत्थवि बंधविसेसो, महंतरं देसिओ समए ॥ ३९३८ ॥ इह द्वावविरतौ, तंत्रकस्तयोर्जानन् हिंसां करोति विचिन्त्येत्यर्थः, अपरः पुनरजानन्, तत्रापि तयोरपि बन्धविशेषः 'महंतरं 'ति महतान्तरेण देशितः समये - सिद्धान्ते । तथाहि - यो जानन् हिंसां करोति स तीव्रानुभावं बहुतरं पापकर्मोपचिनोति; इतरस्तु मन्दतरविपाकमल्पतरं तदेवोपादसे । “विरतो पुण जो जाणं, कुणति अजाणं व अप्पमतो य । तत्थवि अज्झत्यसमा, संजायति णिञ्जरा ण चओ ||३९३९||” यः पुनर्विरतः प्राणातिपातादिनिवृत्तः स जानानोऽपि सदोषमिदम् इत्यवबुध्यमानोऽपि गीतार्थतया द्रव्य• क्षेत्राद्यागाढेषु प्रलम्बादिग्रहणेन हिंसां करोति, यद्वा न जानाति परमप्रमत्तो विकथादिप्रमादरहित उपयुक्तः सन् यत्कदाचित् प्राण्युपतं करोति तत्राप्यध्यात्मसमा चित्तप्रणिधानतुल्या निर्जरा सञ्जायते । यस्य यादृशस्तीत्रो मन्दो मध्यमो वा शुभाध्यवसायस्तस्य तादृश्येव कर्मनिर्जरा भवतीति भावः । 'न चओ'ति न पुनश्चयः कर्मबन्धः सूक्ष्मोऽपि भवति, प्रथमस्य भगवदाज्ञया यतनया प्रवर्त्तमानत्वाद्, द्वितीयस्य तु प्रमादरहितस्याजानतः कथञ्चित्प्राण्युपघातसम्भवेऽप्यदुष्टत्वादिति । यत्तु जीवघातवर्जनाभिप्रायवतां 1 सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा - ५३ ॥१९९॥ Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२०॥ RSS सटिप्पणा ॥खोपड़ वृचिः ॥ गाथा-५३ ॥२०॥ यतनया प्रवर्त्तमानानां छबस्थसंयतानामनाभोगजन्याशक्यपरिहारेण जायमानं जीवघातानृतभाषणादिकं संयमपरिणामानपायहेतुः,संयमपरिणामानपायहेतुत्वं हि वर्जनाभिप्रायोपाधिकमेव, जीवविराधनायाः संयमपरिणामापगमहेतोर्जीवघातपरिणामजन्यत्वलक्षणस्य निजस्वरूपस्य वर्जनाभिप्रायेण परित्याजनात् ॥ अयं भावः-"यद्धर्मविशिष्ट यद्वस्तु निजस्वरूपं जहाति स धर्मः तत्रोपाधिरिति” नियमाद्, वर्जनाभिप्रायविशिष्टा हि जीवविराधना जीवघातपरिणामजन्यत्वं संयमनाशहेतुं परित्यजति, तेन संयमपरिणामानपायद्वारा वर्जनाभिप्रायजन्यां निर्जरां प्रति जीवविराधनाया अपि प्रतिबन्धकाभावत्वेन कारणतापि । गदागमः ओघनि० "जा जयमाणस्स भवे, विराहणा सुत्तविहिसमग्गस्स । सा होइ णिजरफला, अज्झत्थविसोहिजुत्तस्स ।।७५९॥"त्ति ७६० पिंडनियुक्ति । अत्र हि 'सुत्तविहिममग्गस्म'त्ति कृतसर्वसावधप्रत्याख्यानस्य वर्जनाभिप्रायवतः साधोरित्यर्थः। तत्र जायमानाया निर्जराया जीवविराधना प्रतिबन्धिका न भवति, जीवघातपरिणामजन्यत्वाभावेन वर्जनाभिप्रायोपाध्यपेक्षया दुर्बलत्वाद् , एतेन जीवबिराधनापि यदि निर्जरां प्रति कारणं भवेत् , तर्हि तथाभूतापि विराधना तपःसंयमादिवद्भयस्येव श्रेयस्करी, भूयोनिर्जराहेतुत्वादिति पराशङ्कापि परास्ता, स्वरूपतः कारणभूतस्य तथा वक्तुं शक्यत्वात् । न चैवं जीवविराधना तथा, तस्याः संयमपरिणामापगमद्वारा स्वरूपतो निर्जरायाः प्रतिबन्धकत्वात् । प्रतिबन्धकं च यथायथाऽल्पमसमर्थ च तथातथा श्रेयः, तेन तस्याः कारणत्वं प्रतिबन्धकाभावत्वेन, प्रतिबन्धकाभावस्य च भूयस्त्वं प्रतिबन्धकानामल्पत्वेनैव स्याद् . अन्यथा तदभावस्य कारणता न स्यादित्यादिकूटकल्पनारसिकेणोच्यते । तदसत् , निश्चयतः सर्वत्र संयमप्रत्ययनिजरायामध्यात्मशुद्धिरूपस्य भावस्यैव हेतुत्वात् , तदङ्गभूतव्यवहारेण चापवादपदादिप्रत्ययाया हिंसाया अपि निमित्तत्वे बाधकाभावात् , "जे आसवा ते परिस्सवा" [ये आस्रवास्ते परिस्रवाः] इत्यादिवचनप्रामाण्यात् । निमित्तकारणोत्कर्षापकर्षों च न कार्योत्कर्षापकर्ष Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२०१॥ सटिप्पणा खोपक्ष वृधिः ॥ गाथा-५३ ॥२०१॥ SHESHALA53434 प्रयोजकाविति न निर्जरोत्कर्षार्थ तादृशाहिंस्रोत्कर्षाश्रयणापत्तिः, यच्च 'जा जयमाणस्से'त्यादिवचनपुरस्कारेण वर्जनाभिप्रायेणानाभोगजन्याशक्यपरिहारहिंसायाः प्रतिबन्धकाभावत्वेन कारणत्वाभिधानं तत्तु तवृत्त्यर्थानाभोगविजृम्भितम् , तत्रापवादप्रत्ययाया एव हिंसाया व्याख्यानात् । तथाहि यतमानस्य सूत्रोक्तविधिसमग्रस्य-सूत्रोक्तविधिपरिपालनपूर्णस्य, अध्यात्मविशोधियुक्तस्यरागद्वेषाभ्यां रहितस्येति भावः, या भवेद्विराधनाऽपवादपदप्रत्यया, सा भवति निर्जराफला । इदमुक्तं भवति-कृतयोगिनो गीतार्थस्य कार णवशेन यतनयाऽपवादपदमासेवमानस्य या विराधना सा सिद्धिफला भवतीति पिण्डनियुक्तिवृत्तौ। न चेयमनाभोगजन्या वर्जनाभि| प्रायवती वा, किन्तु ज्ञानपूर्वकत्वेन सूत्रनयमतेन विलक्षणैव सती व्यवहारनयमतेन च विलक्षणा कारणसहकृता सती बन्धहेतुरपि निर्जराहेतुर्घटकारणमिव दण्डो घटभङ्गाभिप्रायेण गृहीतो घटभङ्गे, अत एवेयमनुबन्धतो हिंसारूपा सत्यैदम्पर्यार्थापेक्षया 'न हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि' इति निषेधार्थलेशमपि न स्पृशति, अविधिहिंसाया एवात्र निषेधाद् । विधिपूर्वकस्वरूपहिंसायास्तु सदनुष्ठानान्तर्भूतत्वेन परमार्थतो मोक्षफलत्वात् । तदुक्तमुपदेशपदसूत्रवृत्त्योः-"अथ साक्षादेव कतिचित्सूत्राण्याश्रित्य पदार्थादीनि व्याख्याङ्गानि दर्शयबाह-"हिंसिज ण भूयाई, इत्थ पयत्थो पसिद्धगो चेव ॥ मणमाइएहिं पीडां, सव्वेसिं चेव ण करिजा" ॥८६५॥ " हिंस्याद व्या. पादयेद् , न नैव, भूतानि पृथिव्यादीन् प्राणिनः, अत्र सूत्रे, पदार्थः प्रसिद्धश्चैव प्रख्यातरूप एव, तमेव दर्शयति-मन आदिभिमनोवाकायैः, पीडां बाधा, सर्वेषां चैव समस्तानामपि जीवानां, न कुर्याद् न विदध्यादिति ॥ तथा "आरंभिपमत्ताणं, इत्तो चेइहर लोचकरणाई। तकरणमेव अणुवं-धओ तहा एस वक्त्यो" ॥८६६॥ व्याख्या-आरम्भा-पृथिव्याधुपमईः स विद्यते येषां ते आरहैम्भिणो गृहस्थाः, प्रमाद्यन्ति निद्राविकथादिभिः प्रमादैः सर्वसावद्ययोगविरताबपि सत्यां ये ते प्रमत्ता यतिविशेषाः, आरम्भिणश्च SANSARADRASIMI Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२०॥ सटिप्पणा खोप चिः ॥ ४ गाथा-५३ ॥२.२॥ RECEMCHOOTORARMA प्रमत्ताश्च आरम्भिप्रमत्ताः तेषाम् ,इतः पदार्थात्, चैत्यगृहलोचकरणादि,चैत्यगृहमहतो भगवतो बिम्बाश्रयः, लोचकरणं च केशोत्पाटनरूपम् , आदिशब्दात् तत्तदपवादपदाश्रयणेन तथा तथा प्रवचनदुष्टनिग्रहादिपरपीडाग्रहस्तेषां करणं, तत्करणमेव प्राग्निषिद्धहिंसादिकरणमेव प्राप्तम् । कुतः? इत्याशङ्कयाह-अनुषन्धतोऽनुगमात् , तथा तत्प्रकारायाः परपीडाया इत्येष चालनारूपो वाक्यार्थ इत्यर्थः॥ "अविहिकरणमि आणा-विराहणा दुट्टमेव एएसि । तो विहिणा जइअव्वं, ति महावक्कत्थरूवं तु" |८६७|| व्याख्या-अविधिकरणेऽनीतिविधाने चैत्यगृहलोचादेरर्थस्य,आज्ञाविराधनाद् भगवद्वचनविलोपनाद्, दुष्टमेव,एतेषां चैत्यगृहादीनां करणम् , तत्र चेयमाज्ञा"जिनभवनकारणविधिः, शुद्धा भूमिर्दलं च काष्ठादि। भृतकानतिसन्धान, स्वाशयवृद्धिः समासेन ॥१॥" लोचकर्मविधिस्तु-"धुवलोओ अजिणाणं, वासावासेसु होइ थेराण ॥तरुणाणं चउमासे, वुड्डाणं होइ छम्मासे ॥१॥” इत्यादि । [ध्रुवलोचश्च जिनानां वर्षावासेषु भवति स्थविराणाम् । तरुणानां चतुर्मास्यां वृद्धानां भवति षण्मास्याम्॥] तत्तस्माद् , विधिना जिनोपदेशेन यतितव्यम्-इत्येवं महावाक्यार्थस्य प्राक्चालितप्रत्यवस्थानरूपस्य, रूपं तु स्वभावः पुनः॥८६७|| महावाक्यार्थमेव गाथापूर्वार्धेनोपसंहरनैदम्पर्यमाह ॥ "एवं एसा अणुबंध-भावओ तत्तओ कया होइ॥अइदंपज्जं एवं, आणा धम्मम्मि सारोत्ति"॥८६८॥ एवं विधिना यत्ने क्रियमाणे, एषा हिंसा, अनुबन्ध भावतउत्तरोत्तरानुबन्धभाषान्मोक्षप्राप्तिपर्यवसानानुगमात्,तत्वतःपरमार्थतः कृता भवति,मोक्षसम्पाद्यजिनाज्ञाया उपरमाभावादिति ऐदम्पर्यमेतदत्र यदुताज्ञा धर्म सारः। इतिः परिसमाप्ताविति।" प्रतिबन्धकाभावत्वेनोक्तहिंसाया निर्जराहेतुत्वे चाभ्युपगम्यमाने केवलायास्तस्याः प्रतिबन्धकत्वाभावाजीवघातपरिणामविशिष्टत्वेन प्रतिबन्धकत्वे विशेषणाभावप्रयुक्तस्य विशिष्टाभावस्य शुद्धविशेप्यस्वरूपत्वे विशेष्याभावप्रयुक्तस्य तस्य शुद्धविशेषणरूपस्यापि सम्भवाजीवघातपरिणामोऽपि देवानांप्रियस्य निर्जराहेतुः प्रसज्येतेत्यहो! RECEIAG Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२०॥ -WASHT काचनापूर्वेयं तर्कागमचातुरी । वर्जनाभिप्रायेण जीवघातपरिणामजन्यत्वलक्षणं स्वरूपमेव विराधनायास्त्याज्यतेऽतो नेयमसती प्रतिबन्धिकेति चेत्, किमेतद्विराधनापदप्रवृत्तिनिमित्तमुत विशेषणं विराधनापदार्थस्य । आये पदप्रवृत्तिनिमित्तं नास्ति, पदार्यश्च प्रति- | सटिप्पबा पाद्यते इत्ययमुन्मत्तप्रलापः । अन्त्ये च विशिष्टप्रतिबन्धकत्वपर्यवसाने उक्तदोषतादवस्थ्यमिति मुग्धशिष्यप्रतारणमात्रमेतत् । न च 'यद्ध ॥स्वोपज्ञ | मविशिष्टं यदस्तु निजस्वरूपं जहाति स धर्मस्तत्रोपाधिः' इति नियमाद् वर्जनाभिप्रायविशिष्टा हि जीवविराधना जीवघातपरिणामज कगाथा-५३ न्यत्वं संयमनाशहेतुं परित्यजतीति भावार्थपर्यालोचनादनुपहितविराधनात्वेन प्रतिबन्धकत्वं लभ्यत इत्युपहितायास्तस्याः प्रतिबन्धका | ॥२०॥ भावत्वं स्वरूपेणैवाक्षतमित्यपि युक्तम्, प्रकृतविराधनाव्यक्ती जीवघातपरिणामजन्यत्वस्यासत्त्वेन त्याजयितुमशक्यत्वाद्, अत एव तत्प्रकारकप्रमितिप्रतिवन्धरूपस्यापि तद्धानखानुपपत्तेः। अथ वर्जनाभिप्रायाभावविशिष्टविराधनात्वेन प्रतिबन्धकत्वे न कोऽपि दोषः, प्रत्युत वर्जनाभिप्रायस्य पृथकारणत्वाकल्पनाल्लाघवमेवेति चेत्, न । वर्जनाभिप्रायमात्रस्याज्ञाबाह्यानुष्ठानेऽपि सत्त्वामोत्तेजकत्वमित्याज्ञाशुद्धभावस्येहोचेजकत्वं वाच्यम् , स च विशिष्टनिर्जरामात्रे खतन्त्रकारणमिति न तत्रास्येहोत्तेजकत्वं युज्यते; अन्यथा दण्डाभाववि| शिष्टचक्रत्वादिनापि घटादौ प्रतिबन्धकता कल्पनीया स्यादिति न किञ्चिदेतत् । तस्मादाज्ञाशुद्धभाव एव सर्वत्र संयमरक्षाहेतुने त्वना| मोगमात्रमिति । नयुत्तारेऽपि यतीनां तत एवादुष्टत्वम्, न तु जलजीवानाभोगादिति स्थितम् ।। ५३ ॥ ___ • अथ तत्र जलजीवानामोगे व्यक्तं दूषणमाहजलजीवाणाभोगा, गइउत्तारंमि जइ ण तुह दोसो॥ पाणेवि तस्स ता सो, मूलच्छेजो ण हुजाहि ॥५४॥ [जलजीवानांभोगाद् नद्युत्तारे यदि न तव दोषः । पानेऽपि तस्य तर्हि स मूलच्छेद्यो न भवेद् ॥ ५४॥] FORUBBAADAARI HUR Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२०४॥ 454534343430AMOUS व्याख्या-'जलजीवाणाभोग'त्ति नद्युत्तारे जलजीवानाभोगाद यदि तव न दोषः, तर्हि तस्य जलस्य, पानेऽपि स दोषो, मूलच्छेद्यो मूलप्रायश्चित्तविशोध्यो न भवेत्, नहि नदीमुत्तरतो जलजीवानाभोगस्तत्पाने च तदाभोग इति त्वया वक्तुं सटिप्पणा ॥खोपड़ शक्यते, तदनाभोगस्य त्वया केवलज्ञाननिवर्तनीयत्वाभ्युपगमात् , तथा चोभयत्रैव मिथ्यादुष्कृतप्रायश्चित्तशोध्यमेव पापं स्यात् । ननु वृचिः ॥ ज्ञात्वा जलपानेऽपि मूलच्छेद्यम् , तच्च श्रुतपरम्पराविरुद्धमित्याभोगविषयतापि जलजीवानामवश्यं वक्तव्या, प्रायश्चित्तभेदस्तु यतनाऽय गाथा-५४ तनाविशेषादिति । यदि च ज्ञात्वा जलपाने न जलजीवाभोगात्प्रायश्चित्तविशेषः, किन्तु निःशूकत्वादित्युच्यते, तर्हि स्थूलत्रसाभोगो- का॥२०४॥ ऽप्युच्छियेत, तद्वधेऽपि निःशूकताविशेषादेव पातकविशेषोपपत्तेः। शास्त्रे त्वाभोगाऽनाभोगावकर्तव्यत्वज्ञानतदभावरूपावेवोक्तौ। तदुक्तं पञ्चाशकवृत्ती- "तत्राभोगोऽकर्तव्यमिति ज्ञानम् , अनाभोगस्त्वज्ञानमिति । तौ चोभयविराधनायामपि सम्भवत एव ॥" प्रतिपादितं च प्रायश्चित्तमाभोगानाभोगभेदात् पृथिव्यादिविराधनायामपि पृथगेवेति न किञ्चिदेतत् । एतेन यदुच्यते विनापवादं ज्ञात्वा जीवघातको यद्यसंयतो न भवेत् , तर्हि असंयतत्वमुच्छिन्नसंकथं भवेद्-इत्यादि परेण तदपास्तम् । अपवादमन्तरेणापि सामान्यसाधूनामपवादपदानधिकारिणां चोत्कृष्टचारित्रवतां प्रतिमाप्रतिपन्नजिनकल्पिकादीनां नात्तारादावाभोगपूर्वकजीवविराधनायाः साधितत्वात् । नद्युत्तारश्च जिनकल्पिकादीनामपि, 'जत्थत्थमेइसरो' (यत्रास्तमियात्सूर्यः) इत्यादि प्रवचनेषु दिवसतृतीयपौरुष्यतिक्रमे नद्याद्युत्तरतस्ते जलात्पदमात्रमपि बहिर्न निक्षिपन्ति. किन्तु तत्रैव तिष्ठन्ति-इत्यादिभणनेन प्रतीत एव । सोऽप्यापवादिकश्चेत , तर्हि विहाराऽऽहारादिक्रियास्वौत्सर्गिकीषु जीवविराधनया योगसमुत्थया जिनकल्पिकादीनामसंयतत्वप्रसक्तेर्वज्रलेपत्वमेव, तस्या योगावश्यंभावित्वस्य प्रवचनादेव, | निश्चयाद् , अङ्गीकृतं चैतत्परेणापि । यदुक्तं तेन-“यत्रानुष्ठाने आरम्भस्तजिनैः प्रतिषिद्धमेव, उत जिनोपदिष्टक्रियायामारम्भो न 2 Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२०५॥ भवत्येव ” इति लुम्पकीयपक्षद्वयदूषणार्थ ग्रन्थान्तरे । आद्यपक्षे साधूनां विहारा-ऽऽहार- नीहार- नधुत्तार- प्रतिक्रमण-प्रतिलेखनो-पाश्रय| प्रमार्जनादिक्रियाणां प्रवचनप्रसिद्धानामारम्भाविनाभाविनीनां प्रतिषेधे सम्पन्ने तत्रैव गलपादुका । द्वितीयेऽध्यक्षबाधा, नघुतारादिषु षण्णामपि जीवानां विराधनासम्भवात्, 'जत्थ जलं तत्थ वर्ण' [यत्र जलं तत्र वनम् |] इत्यागमवचनात् प्रतिक्रमणप्रतिलेखनादिषु च वायुजीवादीनामारम्भस्यागमप्रसिद्धत्वात्, एजना दिक्रियायुक्तस्यारम्भाद्यवश्यंभावात् । यदागमः - " जाव णं एस जीवे एअइ वेयइ चलइ फंदह इत्यादि यावदारंभे वट्टह" [ यावदेष जीव एजते व्येजते चलति स्पन्दते इत्यादि यावदारम्भे वर्तते । ] इत्यादि । किंच| अपवादे आभोगपूर्विकायामपि जीवविराधनायां सम्यक्त्वनाशादिदूषणं यत् त्वया नोच्यते, तत्र किं म्रियमाणानां जीवानां प्राणत्या - गाभावः, सद्गतिर्वा कारणं, द्वयमप्यागमबाधितमित्याशयशुद्धत्वमेव तत्र कारणं वाच्यमित्यशक्यपरिहार जीवविराधनायामप्याशयशुत्वादेव दोषाभावोsस्तु, किमनाभोगप्रपञ्श्चेन अत एव जीवघातेऽपि लोके द्रव्यहिंसावा भावहिंसायां शब्दादीनां रताविव। नैकान्तिककारणत्वात्, जीवरक्षाविषयकप्रयत्नेनैव साधोरन्तस्तत्त्वशुद्धेरदुष्टत्वं विशेषावश्यके उपपादितं नत्वनाभोगेनैव, तथा च तद्ग्रन्थः - "एवमहिंसाऽभावो, जीवघणंति ण य तं जओ भिहियं ॥ सत्थोवहयमजीवं, ण य जीवघणंति तो हिंसा ॥१७६२ । ।" नन्वेयं सति लोकस्यातीव पृथिव्यादिजीव घनत्वादहिंसाभावः, संयतैरप्यहिंसात्रतमित्थं निर्वाहयितुमशक्यमिति भावः, तदेतद् न, यतोऽनन्तरमेवाभिहितमस्माभिः -शस्त्रोपहतं पृथिव्यादिकमजीवं भवति । तद्जीवत्वे चाकृताकारितादिपरिभोगेन निर्वहत्येव यतीनां संयमः । न च ' जीव घनो लोकः' इत्येतावन्मात्रेणैव हिंसा सम्भवतीति ॥ १॥ आह ननु जीवाकुले लोकेऽवश्यमेव जीवघातः सम्भाव्यते (सम्भवी) जीवाँश्च घ्नन् कथं हिंसको न स्याद् ? इत्याह । “ ण य घायउति हिंसो, णाघातोति णिच्छियमहिंसो । ण विरल जीवमहिंसो, सटिप्पणा ॥ खोपच चिः ॥ गाथा - ५४ ॥२०५॥ Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SACEBCAME धर्मपरीक्षा ॥२०६॥ |ण य जीवघणंति तो हिंसो॥१.७६३॥ अहणतोवि हु हिंसो,दुहृत्तणओ मओ अहिमरोड्छ । बाहिंतो ण वि हिंसो, सुद्धत्तणओ जहा विजो ॥१७६४॥" नहि घातक इत्येताबता हिंस्रः, नचाघ्नन्नपि निश्चयनयमतेनाहिंस्रः, नापि विरलजीवम् इत्येतावन्मात्रेणाहिंस्रः, सटिप्पणा न चापि जीवघनम् इत्येतावता च हिंस्र इति॥ किं तर्हि ? अभिमरो गजादिधातकः स इव दुष्टाध्यवसायोऽनन्नपि हिंस्रो ॥खापत्र मतः । बाधमानोऽपि च शुद्धपरिणामो न हिंस्रः, यथा वैद्य इति ॥घ्नन्नप्यहिंस्रोऽघ्नन्नपि च हिंस्र उक्तः। स इह कथंभूतो ग्राह्यः ? चिः ॥ इत्याह-"पंचसमिओ तिगुत्तो, नाणी अविहिंसओ ण विवरीओ। होउ व संपत्ती से. मा वा जीवोवरोहेणं ॥१७६५॥" पञ्चभिः|गाथा-५४ समितिभिः समितः तिसृभिश्च गुप्तिभिर्गुप्तो ज्ञानी जीवस्वरूपतद्रक्षाक्रियाभिज्ञः सर्वथा जीवरक्षापरिणामपरिणतस्तत्प्रयतश्च ॥२०६॥ कथमपि हिंसन्नप्यविहिंसको मतः । एतद्विपरीतलक्षणस्तु नाहिंसकः, किन्तु हिंस्र एवायम् , अशुभपरिणामत्वाद् , भाव(बाह्य) जीवहिंसायास्तु, जीवोपरोधेन जीवस्य कीटादेरुपरोधेनोपघातेन, सम्पत्तिर्भवतु मा भूद्वा, से तस्य साध्यादेः हिंसकत्वे तस्या अनैकान्तिकत्वादिति ।। कुतस्तस्या अनैकान्तिकत्वम् ? इत्याह-"असुहो जो परिणामो, सा हिंसा सो उ बाहिरणिमित्तं । कोवि अवेक्खेज ण वा, जम्हा गतियं बझं ॥१७६६॥" यस्मादिह निश्चयनयतो योऽशुभपरिणामः स एव हिंसेत्याख्यायते । स च बाह्य सवातिपातक्रियालक्षणं निमित्तं कोऽप्यपेक्षते,कोऽपि पुनस्तनिरपेक्षोपि भवेत् ,यथा तन्दुलमत्स्यादीनाम् ,य(तस्मादनकान्तिकमेवं बाह्यनिमित्तम् , तत्सद्भावेऽप्यहिंसकत्वात् , तदभावेऽपि च हिंसकत्वादिति ॥ नन्वेवं तर्हि बाह्यो जीवघातः किं सर्वथैव हिंसा न भवति?; उच्यते, कश्चिद्भवति, कश्चित् न, कथम् ? इत्याह-"असुहपरिणामहेऊ, जीवाबाहोत्ति तो मयं हिंसा । जस्स उ ण सो णिमित्तं, संतोवि ण तस्स सा हिंसा" ॥१७६७॥ ततस्तस्माद् यो जीवाबाधोऽशुभपरिणामस्य हेतुरथवाशुभपरिणामो हेतुः कारणं यस्यासाव R SACARSAMACa IOR Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२०७॥ सटिप्पवा ॥स्वोपक्ष वृधिः ॥ गाथा-५४ ॥२०७॥ शुभपरिणामहेतुर्जीवाबाधो जीवधातः स एव हिंसेति मतं तीर्थकरगणधराणाम् । यस्य तु जीवावाधस्य सोऽशुभपरिणामो, न| निमित्तं स जीवाबाधः, सन्नपि तस्य साधोन हिंसेति ॥ अमुमेवार्थ दृष्टान्तेन द्रढयन्नाह-"सद्दादओ रइफला, ण वीयमोहस्स भावसुद्धीओ। जह तह जीवाबाहो. ण सुद्धमणसो वि हिंसाए ॥१७६८॥" यथेह वीतरागद्वेषमोहस्य भगवत, इष्टाः शब्दरूपादयो, भावविशुद्धितो न कदाचिद्रतिफला रतिजनकाः सम्पद्यन्ते, यथा वेह शुद्धात्मनो रूपवत्यामपि मातरि न विषयाभिलाषः सञ्जायते, तथा शुद्धपरिणामस्य यत्नवतः साधोः सत्त्वोपघातोऽपि, न हिमायै सम्पद्यते, ततोऽशुभपरिणामजनकत्वे बाह्यं निमित्तमनैकान्तिकमेवेति ॥" यदि चाशक्यपरिहारविराधनाभोगः साधूनां सम्यक्त्वक्षतिकरः स्यात् तदौत्सर्गिकविहारादिक्रियापरित्याग एव खात् , तत्रापि योगजन्यविराधनानिश्चयाद्, न च प्रमाणान्तरेण निश्तेिऽपि स्वादर्शनमात्रेणानाभोगः शक्यो वक्तुमित्युक्तमेघ, न चेदेवं तदा निरन्तरजीवाकुलभूमि निर्णीयापि रात्रौ तत्रैव स्वैरंगमने जीवाप्रत्यक्षत्वेन तत्र तज्जीवविराधनाऽनाभोगजा बक्तन्या स्यात् । तथा च लोकशास्त्रविरोधः। किंचैवमब्रह्मसेवायामपि केवलिवचसा निश्चीयमानाया अपि त्रसविराधनाया अनाभोगपूर्वकत्वे साधोः प्रथममहाव्रतभङ्गो न स्थात् , स्याच प्रकृष्टावधिमतां प्रत्यक्षयोगजन्यघिराधनानामिति न किञ्चिदेतत् ॥ ५४॥ • एवं व्यवस्थिते सत्यत्र विश्रान्तस्य परस्याक्षेपं समाधत्तेनणु आभोगा इत्थं, विरयाणं हुज देसविरयत्तं ॥ णेबं, जं पडिपुन्ना, पडिवत्ती सुत्तआणा य ॥ ५५ ॥ • [नवाभोगादत्र विरतानां भवेद् देशविरतत्वम् । नैवं, यत्प्रतिपूर्णा प्रतिपत्तिः सूत्राज्ञा च ।। ५५ ॥ ] व्याख्या-नणुत्ति। नन्वत्र नद्युत्तारे जल जीवविराधनायामाभोगाद्विरतानां, सर्वसंयमवतां देशविरतत्वं भवेत् , निश्चि NEERIES Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्मपरीक्षा ॥२०८॥ तेऽपि जलजीवघातेऽवस्थितस्य विरतिपरिणामस्याभ्युपगमे तस्य देशविरतिरूपस्यैव पर्यवसानाद, निश्चितेऽपि जलजीवघाते तज्जीवविषयकविरतिपरिणामस्यानपायेन चारित्राखण्डताभ्युपगमे च सर्वेषामपि सम्यग्दशां सर्वविरतिप्रतिपत्तौ न किञ्चिद्वाधकमिति देश सटिप्पणा विरत्युच्छेद एव स्यादिति भावः । नैवम् , यद्-यस्मात् कारणाद्विरतानां प्रतिपूर्णा प्रतिपत्तिः-अष्टादशशीलाङ्गसहस्रग्रहणलक्षणा ॥खोपक्ष वृचिः ॥ सूत्राज्ञा; तेन न निश्चितायामपि जलजीवविराधनायां नद्युत्तारादौ देशविरतत्वम्, प्रतिपन्नसर्व विरतेः सूत्राज्ञयाऽखण्डनात् । न च Kगाथा-५५ प्रतिदिनकर्तव्यविचित्रोत्सर्गापवादगहनाष्टादशशीलाङ्गसहस्रप्रतिपत्तियोग्यतां स्वात्मन्यनिश्चित्यादित एव तत्प्रतिपत्तियुक्तेति तदधस्त- ॥२०८॥ नगुणस्थानयोग्यतया देशविरतिप्रतिपत्तिसम्भवान्न तदुच्छेद इति भावः । इदं तु ध्येयम्-निश्चयनयमतेनाष्टादशापि शीलाङ्गसहस्रा-14 ण्यसङ्ख्येयात्मप्रदेशवत्परस्परनियतान्येवेत्येकस्यापि सुपरिशुद्धस्य शीलाङ्गस्य सत्वं शेषसद्भाव एव स्यादिति समुदितैरेव तैः सर्वविरतिसम्भवः। तदुक्तं हरिभद्राचार्यैः पंचाशक १४ "एत्थ इमं विण्णेयं, अइदंपज्जं तु बुद्धिमंतेहिं । इक्कपि परिसुद्धं, सीलंगं सेसस-15) ब्भावे ॥१०॥ एक्को वाऽऽयपएसोऽसंखेज्जपएससंगओ जह उ । एयपि तहा णेयं, मतत्तचाओ इहरहा उ ॥११॥ जम्हा समगमेयंपि, सव्वसावजजोगविरई उ॥ तत्तेणेगसरूवं, ण खंडरूवत्तणमुवेइ ॥१२॥ (अत्रेदं विज्ञेयमैदंपर्य तु बुद्धिमद्भः। एकमपि सुपरिशुद्धं शीलाङ्गं शेषसद्भावे ॥ एकोऽप्याऽऽत्मप्रदेशोऽसंख्येयप्रदेशसंगतो यथा तु । एतदपि तथा ज्ञेयं स्वतत्वत्याग इतरथा तु ॥ यस्मात्समग्रमेतदपि सर्वसावद्ययोगविरतिस्तु । तत्त्वनैकस्वरूपं न खण्डरूपत्वमुपैति ॥) व्यवहारनयमते त्वेकाद्यङ्गभङ्गेऽपि सज्वलनोदयस्य चरणैकदेशभगहेतुत्वादपरशीलाङ्गसद्भावादवशिष्टप्रतिपन्नचारित्रसद्भावान देशविरतत्वम् न हि पर्वतैकदेशलोष्ट्वाद्यपगमेऽपि पर्वतस्य लोष्टुत्वमाप-12 द्यते, मूलभङ्गे तु चारित्रभङ्ग एव, “अत एव यो मन्यते 'लवणं भक्षयामीति' इति तेन मनसा न करोत्याअहारसंज्ञाविहीनो रसने Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न्द्रियसंवृतः पृथिवीकायसमारम्भ मुक्तिसम्पन्न इत्येकतद्भङ्गः कृतः। ततस्तद्भङ्गेन च प्रतिक्रमणप्रायश्चित्तेन शुद्धिः स्यात् , अन्यथा मृले-18 धर्मपरीक्षा नैव स्यादिति । न च तद्भक्षणेऽपि शेषाङ्गसत्त्वान्न मूलापत्तिरिति शङ्कनीयम् ; मण्डपशिलादृष्टान्तेनैकस्यापि गुरुदोषस्य मूलनाशकत्वा-2 सटिप्पणा ॥२०॥ भ्युपगमात् । इदं च शीलाङ्गान्यूनत्वं भावविरतिमपेक्ष्य द्रष्टव्यम् , न तु बाह्यामपि प्रवृत्तिमपेक्ष्य, यतः सा परतन्त्रस्य खतन्त्रस्य वा ॥ स्वोपन वृचिः पुष्टालम्बनदयागां खतन्त्र भनेच्छारूपाविरतिभावं विना द्रव्यहिंसादिकारिण्यपि स्वादेव, न च तया सर्वार्थानभिष्वङ्गस्य भावविरति ॥ गाथा-५५ बाधनम् , उत्सूत्रा तु प्रवृत्तिर्बाधत एव विरतिभावम् , केवलं सा गीतार्थप्रज्ञापनायोग्या निरनुबन्धा, अभिनिवेशवती तु न मूलच्छेद्या Vा॥२०९॥ तिचारजातमन्तरेण स्यादिति गीतार्थस्य तनिश्रितस्य वाऽऽज्ञापरतन्त्रस्योत्सूत्रप्रवृत्तिरहितस्याष्टादशशीलाङ्गसहस्रमयो सर्वविरतिपरिणामः पूर्णो भवति, बाह्यप्रवृत्तिपूर्णतामात्रं त्वत्रातन्त्रमिति । तदुक्तं-"एयं च एत्थ एवं, विरईभावं पडुच्च दट्ठव्वं । ण उ बझपि पवित्ति, जं सा भावं विणा वि भवे ॥ १३ ॥ जह उस्सग्गमि ठिओ, खित्तो उदगंमि केणइ तवस्सी । तव्वहपवित्तकाओ, वचलियभावोऽपवित्तो उ(अ)॥१४॥ एवं चिय मज्झत्थो. आणाओ(इ)कत्थई पयद॒तो । सेहगिलाणादट्ठा, अपवतो चेव णायब्वो॥१५॥ आणा परततो सो, सा पुण सम्वन्नुवयणओ चेव । एगंतहिया वेजग-णाएणं सव्वजीवाणं ॥१६॥ भावं विणावि एवं, होइ पवित्तीण बाहए । *- एसा । सव्वत्थ अणभिसंगा, विरईभावं सुसाहुस्स ॥ १७ ॥ उस्सुत्ता पुण बाहइ, समइविअप्पसुद्धा वि णियमेण । गीयणिसिद्धपव-| जग-रूवा णवरं णिरणुबंधा ॥ १८ ॥ इह(य)रा उ अभिणिवेसा, इयरा नय मूलछजविरहेण । होएसा एत्तो च्चिय, पुवायरिआ इम वाह॥ १९॥ गीयत्थो अविहारो, बीओ गीयत्थमीसिओ चेव(भणिओ)। इत्तो तइअविहारो णाणुनाओ जिणवरेहिं ॥२०॥ गीयस्स ण उ सुत्ता, तज्जुत्तस्सेयरस्त य(वि)तहेव । णियमेण चरणवं ज ण जाउ आणं विलंघेइ ॥२१॥ ण य तज्जुत्तो (गीयत्थो) अण्णं, न णिवारए +SCRICRORSCRECTOBER Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा खोपड़ वृतिः ॥ ४/गाथा-५५ ॥२१॥ जोग्गय मुणेऊणं । एवं दोण्हवि चरण, परिसुद्धं अण्णहा णव ॥ २२ ॥ ता एवं विरतिभावो, संपुनो एत्थ होइ णायचो । णियमेणं धर्मपरीक्षा, अट्ठारससीलंगसहस्सरूवो उ ॥ २३ ॥ त्ति [एतच्च अत्रैवं विरतिभावं प्रतीत्य द्रष्टव्यम् । न तु बाह्यामपि प्रवृत्तिं यत्सा भावं विनाऽपि ॥२१०॥ भवेद् ।। यथा कायोत्सर्ग स्थितः क्षिप्त उदके केनचित्तपस्वी । तद्वधप्रवृत्तकायोऽप्यचलितभावोऽप्रवृत्तस्तु ।। एवमेव मध्यस्थ आज्ञया (आज्ञातः) क्वचित्प्रवर्तमानः । शैक्षग्लानाद्यर्थमप्रवृत्त एव ज्ञातव्यः॥आज्ञापरतन्त्रःमः, सा पुनः सर्वज्ञवचनतश्चैव । एकान्तहिता वैद्यकज्ञातेन सर्वजीवानाम् ॥ भावं विनाऽप्येवं भवति प्रवृत्तिन बाधते एषा । सर्वत्रानभिष्वङ्गाद(ङ्गा) विरतिभावं सुसाधोः॥ उत्सूत्रा पुनर्वाधते खमतिविकल्पशुद्धाऽपि नियमेन । गीतार्थनिषिद्धप्रपदनरूपा नवरं निरनुबन्धा ॥ इतरथा त्वभिनिवेशादितरात् (रा) न च मूलच्छेद्य| विरहेण । भवत्येषाऽत एव पूर्वाचार्या इदं चाहुः॥ गैतार्थश्च विहारो द्वितीयो गीतार्थमिश्रितश्चैव । इतस्तृतीयो विहारो नानुज्ञातो जिनवरैः ॥ गीतार्थस्य नोन्सूत्रा तयुक्तस्येतरस्य च तथैव । नियमेन चरणवान् यन्न जात्वाज्ञां विलयति ॥ न च तयुक्तोऽन्यं न निवारयति योग्यतां ज्ञात्वा । एवं द्वयोरपि चरणं परिशुद्धमन्यथा नैव ॥ तस्मादेवं विरतिभावः संपूर्णोऽत्र भवति ज्ञातव्यः। नियमेनाष्टादशशीलां| गसहस्ररूपस्तु ॥ इति ] ततो नयुत्तारादावुत्सूत्रप्रवृत्त्यभावादाज्ञाशुद्धस्य साधोर्न सातिचारत्वमपीति कुतस्तरां देशविरतत्वम् ? तदेवं | नयुत्तारेऽन्यत्र वाऽपवादपदे भगवदाज्ञया द्रव्याश्रवप्रवृत्तावपि न दोषत्वमिति स्थितम् । एवं चात्र विहितानुष्ठानेऽनुबन्धतोऽहिंसात्वेन परिणतायां द्रव्यहिंसायामपीति भगवदाजैव प्रवृत्तिहेतुरिति सम्पन्नम् , आज्ञातः क्वचिद् द्रव्यहिंसादौ प्रवर्चमानोऽप्यप्रवृत्त इति 'पश्चाशकवृत्ति' वचनात् । यत्तूच्यते परेण नद्युत्तारादौ जलजीवविराधनाऽनुज्ञा कि साक्षादादेशरूपा, उत कल्पनाभिव्यञ्जिता ?, नाद्यः, 'स साधुर्जीवविराधनां करोतु' इत्यादिरूपेण केवलिनो वाक्प्रयोगासम्भवात् । यदुक्तं-'अरिहंता भगवंतो' इत्यादि । अत एव RAIGARH RANE Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दीक्षां जिघृक्षताऽपि विज्ञप्तो भगवान् 'जहासुहं' इत्येवोक्तवान् न पुनस्त्वं गृहाणेत्यादि । यत्तु क्रियाकालेऽभ्यर्थितो भगवानादेशमुखेधर्मपरीक्षा राक्षानाप्यनुज्ञां ददाति, तत्रानुनायाः फलवत्वेन भाषाया निरवद्यत्वात् । नापि द्वितीयः, यतः कल्प्यता नद्युत्तारस्येष्टफलहेतुत्वेनैव स्यात् , सटिप्पणा ॥२१॥ ॥स्वोपच इष्टफलं सहेतुत्वं च नधुत्तारस्य यतनाविशिष्टस्यैव भणितम् , अयतनाविशिष्टस्य तु तस्य प्रतिषेध एवेत्ययतनाजन्यजीवविराधनयव नधु वृतिः ॥ दत्तारोऽप्यनिष्टफलहेतुत्वेनाकल्प्यो भणित इति जलजीवविराधनाविशिष्टो नद्युत्तारः केवलिनाऽनुज्ञात इति वक्तुमप्यकल्प्यम् । न च यत- दगाथा-५५ नया नदीमुत्तरतः साधोरनाभोगजन्याशक्यपरिहारेण या जलजीवविराधना साऽनुज्ञातेत्युच्यत इति वाच्यम् , तस्यामनुज्ञाया अनपेक्ष- ॥२१॥ णानिष्फलत्वाद् , ज्ञातेऽपि प्रायश्चित्तानुपपत्तिप्रसक्तेश्च, जिनाज्ञया कृतत्वात् । एवमन्यत्रापि कल्प्यताऽकल्प्यता च फलद्वारा साक्षाद्वोक्ताऽवसातव्या; परं सर्वत्रापि वस्तुस्वरूपनिरूपणोपदेशेन न पुनः क्वाप्यादेशेनापि । अयं भावः-जिनोपदेशो हि सम्यग्दृशां वस्तुस्वरूपपरिज्ञानार्थमेव भवति । तत्र वस्तुनः स्वरूपं हेयत्वज्ञेयत्वोपादेयत्वभेदेन त्रिधा । तत्र किश्चिद्वस्तु जीवघाताद्याश्रवभूतं हेयम् , दुर्गतिहेतुत्वात् । किञ्चिच्च जीवरक्षादि संवररूपमुपादेयम् , सुगतिहेतुत्वात् , किञ्चिच्च स्वर्गनरकादिकं ज्ञेयमेव, उभयस्वभावविकलत्वात् । यत्तु ज्ञातं सर्वमपि वस्तु सुगतिहेतुत्तत्र "सविशेषणे०" इत्यादिन्यायेन ज्ञानस्यैव प्राधान्यम् , तच्चोपादेयान्तर्भूतमवसातव्यम् । एवं च 'किञ्चिदेकमेव वस्तु विशेषणाद्यपेथया त्रिप्रकारमपि भवति । यथा एकैव गमनक्रिया जीवघातादिहेतुत्वेनाऽयतनाविशिष्टा साधूनां हैयैव, हेयत्वेन चाकल्प्येव तथा सैव क्रिया जीवरक्षादिहेतुत्वेन यतनाविशिष्टा साधूनामुपादेया, उपादेयत्वेन चकल्प्या; उभयविशेषणरहिता तु ज्ञेयैव । एवं धार्मिकानुष्ठानमात्रे वक्तव्ये "सविशेषणे०"-इत्यादिन्यायेन विधिनिषेधमुखेन यतनाऽयतनाविषयक एव जिनोपदेशः सम्यन्नः, तथा च जीवरक्षार्थ यतनोपादेयत्वेन कल्प्या, अयतना च जीवघातहेतुत्वेन हेयत्वेनाकल्प्येत्येवंविधिनिषेधमुखेन वस्तुस्वरूपावबोधको KAKKACEBOOK Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२१२॥ SHISHER-PRE जिनोपदेशो ज्ञानाद्यर्थमपलादपदप्रतिषेवणेऽप्यनादिसिद्धकल्प्यत्वादिलक्षणवस्तुस्वरूपाववोधको जिनोपदेशो भवति । यथा साध्व्या उपसर्गकरिमधिकृत्य "पंचिंदियववरोवणा कप्पि"त्ति [पञ्चेन्द्रियव्यपरोपणा कल्प्या इति ॥] निशीथचूर्णावुक्तं पुनः स हन्तव्य इति सटिप्पणा विधिमुखेन जिनोपदेशो भवति; "सव्वे पाणा सवे भूआ सव्वे जीवा सव्वे सत्ता ण हन्तवा" [सर्वे प्राणः सर्वे भृताः सर्वे जीवाः सर्वे ॥ खोपक्ष चिः ॥ सत्त्वा न हन्तन्याः ॥] इत्याद्यागमेन विरोधप्रसङ्गात् । यच्च दशाश्रुतस्कन्धचूर्णी- "अवण्णवाइं पडिहणेज"त्ति [ अवर्णवादिनं * गाथा-५५ प्रतिहन्यात् । ] भणितं तदाचार्यशिष्याणां परवादनिराकरणे सामर्थ्य दर्शितम् । यथा-"मिच्छदिट्ठीसु पडिहएसु सम्मत्तं थिरं होई". | ॥२१२॥ त्ति [ मिथ्यादृष्टिषु प्रतिहतेषु सम्यक्त्वं स्थिरं भवति । ] श्रीसूत्रकृदङ्गचूर्णौ भणितम् । अत एव "साहूणं चेइआण य” [ साधूनां चैत्यानां च ।] इत्यादौ सर्वबलेनेति स्वप्राणव्यपरोपणं यावदित्येवं भणितम् , न पुनर्जिनप्रवचनाहितकर्ता 'हन्तव्य' इति, जैनानां तथाभाषाया वस्तुमप्यनुचितत्वात् । यद्यपि सर्वबलेन निवारणे पञ्चेन्द्रियव्यापादनं कादाचित्कं भवत्यपि, तथापि 'स व्यापादनीयो व्यापाद्यतां च' इत्यादिरूपेण मनोव्यापारवानपि केवली न भवति, तथाभूतस्यापि मनोव्यापारस्य सावद्यत्वेन प्रत्याख्यातत्वाद् । न चापवादिकस्तथाव्यापारः सावद्यो न भविष्यतीति शङ्कनीयम् , यतोऽपवादप्रतिषेवणं च संयतेष्वपि प्रमत्तस्यैव भवति, कथं तर्हि सों त्कृष्टनियताप्रमत्तस्य केवलिनोऽपीति !, परं पञ्चेन्द्रियव्यापादनभयेन यदि सति सामर्थ्य प्रवचनाहितं न निवारयति, तर्हि संसारवृद्धिदुर्लभबोधिता चेत्यादि श्रीकालिकाचार्यकथादो भणितम् । अहितनिवारणे च क्रियमाणे कदाचित्पश्चेन्द्रियव्यापत्तौ प्रायश्चित्तप्रतिपत्त्याशयस्य शुद्धत्वाजिनाज्ञाऽऽराधकः सुलभबोधिश्चेत्यादिरूपेण वस्तुस्वरूपावबोधको जिनोपदेशो भवतीति तात्पर्यम् । एवं जिनो. पदेशेन वस्तुस्वरूपमवगम्य स्वत एव यथौचित्येन प्रवृत्तिनिवृत्तिभ्यां जिनाज्ञाराधको भवतीति जिनोपदेशस्य कल्प्याकल्प्यतावबोध Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२१३॥ सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा-६० ॥२१३॥ HAIR555-5555 एव चरितार्थत्वाजलजीवविराधनानुज्ञा केवलिनः कलङ्क एव । न च नद्युत्तारस कारणत्वेन जलजीवविराधनाऽऽप्यापवादिकीति तत्र जिनोपदेशो भविष्यतीति शङ्कनीयम् , अचित्तजलनद्युत्तारस्याभावापच्या तस्या नद्युत्तारे कारणत्वाभावात् । तस्मान्नद्युत्तारस्य कारणं न जलजीवविराधना, किन्तु पादादिक्रियैवेति । एतेन 'जलं वस्त्रगलितमेव पेयम् नागलितम् , इत्युपदिशता केवलिना जले जीवविराधना सचित्तजलपानं चोपदिष्टं भविष्यतीति शङ्कापि परास्ता । यतः "सविशेषणे.” इत्यादिना न्यायेन तत्र जलगलनमेवोपदिष्टम् , तच त्रसजीवरक्षार्थमिति । न च केवलिना जीवघातादिकं साक्षादनुन्नातमिति न ब्रूमः, विहारादिकमनुजानता तदविनाभावेन जायमानमनुज्ञात| मित्यस्यापि वचनस्थावकाशः, एवं सति गजसुकुमालश्मशानकायोत्सर्गमनुजानतःश्रीनेमिनाथस्य तदविनाभावितदीयशिरःप्रज्वालनस्याप्यनुज्ञापत्तेः । न च नद्युत्तारे जलजीवविराधना यतनया कर्त्तव्येति जिनोपदेशो भविष्यतीत्यपि सम्भावनीयम् , यतनाविराधनयोः परस्परं विरोधाद् , यतना हि जीवरक्षाहेतुरयतना च जीवघातहेतुरिति । तस्माजीवविराधना नियमादयतनाजन्यैव, अयतना चान्ततो जीवघातवदनाभोगजन्याशक्यपरिहारेणैव, जीवरक्षा च यतनाजन्यवेत्यनादिसिद्धो नियमो मन्तव्यः । अत एव छद्मस्थसंयतानामुपशान्तवीतरागपर्यन्तानां यतनया प्रवर्तमानानामपि या विराधना सा नियमादनाभोगवशेनायतनाजन्यैव, परमप्रमत्तसंयतानां नातिचारहेतुरपि, आशयस्य शुद्धत्वात् । एतच्च सम्भावनयाप्यात्मकृतत्वेनाज्ञातायां छद्मस्थसाक्षात्कारगम्यजीवविराधनायामवसातव्यम् , ज्ञातायां चयायश्चित्तप्रतिपित्सोरेव, अन्यथा तु निःशूकतया संयमापगमः प्रतीत एव । न चाप्रमत्तानामयतना न भविष्यतीति शङ्कनीयम् , अनाभोगनन्यायतनायाश्छद्मस्थमात्रस्य सत्त्वेनाप्रमत्तताया अनावाधकत्वात् , तेन संयतानां सर्वत्राप्यनाभोगजन्याशक्यपरिहारेण जायमाने जीवघातमृषाभाषणायंशे जिनोपदेशो न भवत्येव, तथाभूताया अपि विराधनाया अयतनाजन्यत्वेन निषिद्धत्वाद् , अत एव संय BUSHUSHUSHUSHUSHUSIKU CHAS* Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ASC धर्मपरीक्षा ॥२१४॥ | तानां द्रव्यतोऽपि हिंसा कर्मबन्धकारणम् , असत्यपि कृतप्रत्याख्यानभङ्गेनालोचनाविषयः। यदागमः-"से अ पाणाइवाए चउबिहे पण्णत्ते, तं०-दव्यओ खित्तओ कालओ भावओ"[सच प्राणातिपातश्चतुर्विधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालओ भावतश्च ॥] इत्यादि सटिप्पणा प्रत्याख्यानं च सर्वविरतिसिद्धयर्थमेव, तस्या अपि द्रव्यत आश्रवरूपत्वात् , सूक्ष्मपृथिव्यादीनामिवाविरतिप्रत्ययकर्मबन्धहेतुत्वात् , भाव- | ॥खोपड़ हिंसायाः कारणत्वाच; एतेन यत्र क्वापि धार्मिकानुष्ठाने सम्भावनयाप्यवयं भवति तदनुष्ठानविषयको जिनोपदेशो न भवति, तावन्मात्रस्याप्याश्रवस्योपदेशविषयत्वापत्त्या कृतसर्वसावधप्रत्याख्यानवतः प्रत्याख्यानभङ्गेन 'केवली यथा वादी तथा कर्ता न भवेद्' इत्येवं प्ररू-15 गाथा-५५ ॥२१४॥ पणात्मकं पाशचन्द्रमतमप्युपेक्षितं द्रष्टव्यम् , जैनप्रवचने प्रागुक्तप्रकारेण तदंशे जिनोपदेशापत्तरेवानङ्गीकारात ; तस्मादयं भावः।। यद्वस्तुजातं चिकीर्षितकार्यस्य प्रतिकूलमननुकूलं वा भवेत्तदविनाभावसम्बन्धेन जायमानमप्यनुकूलकारणवदुपदेशविषयो न भवति । यथा नात्ताराद्युपदेशे जीवघातो यथा वा क्षुद्वेदनाद्युपशमनार्थाहारविधौ तिक्तमधुरादिरसास्वादः, परं यत्र चिकीर्षितकार्यस्यानुकूलकारणान्यपि व्यवहारतः सावधानि भवन्ति तद्विषया जिनानुज्ञा क्रियाकालेऽप्यादेशमुखेन न स्याद् , एवं व्यवहारतो भाषायाः सावद्यत्वप्रसक्तेः; किं त्विष्टफलोपदर्शनेन कल्प्यत्वाभिव्यजितोपदेशमुखेनैवावसातव्या। सा चानुज्ञा निश्चयतो निरबद्यैव, संसारप्रतनुकरणपूर्वकसानुबन्धिपुण्यप्रकृतिबन्धहेतुत्वात् । एतेन कुसुमादिभिर्जिनेन्द्रपूजामुपदिशता कुसुमादिजीवविराधनाप्युपदिष्टैव, पूजाविनाभावित्वेन ज्ञात्वैव पूजायामुपदिष्टत्वादिति वचनमपास्तम् , कुसुमादिजीवविराधनायाः पूजायाः कर्तुष्टश्चाप्रत्यक्षत्वेन पूजाविषयकपरिणामव्यवहाराहेतुत्वेन कल्पितकुसुमादीनामिव द्रव्यपूजासामय्यनन्तर्भूतत्वात् , उपदेशमन्तरेणापि जायमानत्वात् , पूजां कुर्वता त्यक्तुमशक्यत्वाच्च, अन्यथा कुसुमादीनामिव तस्या अपि भूयस्त्वमेव विशिष्टपूजाङ्गं वाच्यं स्याद्, न च कुसुमादिभूयस्त्वे तद्भ्यस्त्वमावश्यकम् , कुसुमादीनां सचित्ताचित्ततया HAHERA Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा १२१५| सटिप्पणा स्वोपज्ञ COACCREACTERAC गाथा-५५ ॥२१५॥ द्वैविध्यव्यवस्थानात् । तस्मात्तीर्थकृतामाज्ञोपदेशः कर्मक्षयनिमित्त प्रत्युपेक्षणेर्यासमित्यादिषु संयता यतनया प्रवत्तरन् नान्यथा, संसारवृद्धिहेतुत्वादित्येवंविधिनिषेधमुखाभ्यामेवावसातव्यो न पुनस्त्वमित्थं कुरु इत्यादिसाक्षादादेशमुखेनापि । न च यतनया नयुत्तारवत्तया द्रव्यपूजापि संयतानां भवत्विति शङ्कनीयम् , साधूनां त्रसस्थावरजीवरक्षायतनाधिकाराद् , नधुत्तारे 'एगं पायं जले किच्चा' [ एकं पादं जले कृत्वा ॥] इत्यादिविधिना तन्निर्वाहाद् , द्रव्यस्तवे च त्रसजीवरक्षार्थयतनावतां श्राद्धानामेवाधिकारात , सर्वारम्भपरिजिहीर्षापूर्वकपृथिव्यादियतनापरिणामे च तेषामपि चारित्र एवाधिकार इति तत्कारापणं च साधूनामुपदेशमुखेन युक्तम् , निश्चयतोऽनुज्ञाविषयत्वाद् , न स्वादेशमुखेनं पृथिवीदलादीनां तत्कारणानां व्यवहारतः सावद्यत्वात् , सोऽप्युपदेशोजिनपूजायतनाविषय एवेति सर्वत्र यतनायामेव भगवदाज्ञा, नतु क्वचिद् द्रव्यहिंसायामपीति । तत्र ब्रूमः-अनुज्ञा तावद्भगवतो विधिवचनरूपा नद्युत्ताराद्यविनाभाविन्यां जलजीवप्राणवियोग| रूपायां जलजीवविराधनायां न कथञ्चिदेव, तस्या उदासीनत्वात् । तदनुकूलव्यापाररूपायां तु तस्या नद्युत्तारादिव्यापाररूपायां साऽवजनीयैव उभयस्वभावस्यानैकान्तिकस्य निमित्तकारणस्य बुद्धिभेदेन पृथक्क मशक्यत्वाद् , यत एव च यतनाविशिष्टस्य नात्तारस्येष्टफलहेतुत्वं भणितम् । अत एव नैमित्तिकविधिरूपाया भगवदाज्ञाया बहुलाभाल्पव्ययद्रव्यहिंसायां व्यवहारतः पर्यवसानमुत्सर्गतः प्रतिषिद्धं हि केनचिनिमित्तैनव विधीयत इति तत इदमुच्यते "अप्पेण बहुं इच्छइ विसुद्धआलंबणो समणो।" [अल्पेन बहु इच्छति विशुद्धालम्बनः श्रमण इति ॥] निश्चयतस्तु नैकान्ततो वाह्य वस्तु विधीयते निषिध्यते वा, केवलं शुभभावो विधीयतेऽशुभभावस्तु निषिध्यते, अत एव | भावानुरोधेन बाह्य वस्तुनि विधिनिषेधकामचारः। तदुक्तं सङ्घदासगणिक्षमाश्रमणपूज्यपादैः-(वृ०कल्पभाष्ये) “ण य(वि) किंचि अणुण्णायं, पडिसिद्धं वावि जिणवरिंदेहिं । एसा तेसिं आणा, कजे सच्चण होअव्वं ॥३३३०॥ ति । [ नापि किश्चिदनुज्ञातं प्रतिषिद्धं CUSACAUSA KAKKARE Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२१॥ RORECASKAR वापि जिनवरेन्द्रः । एषा तेषामाज्ञा कार्य सत्येन भवितव्यम् । तथा च 'यदेव निश्चयाङ्गव्यवहारेण नद्युत्तारादेरनुज्ञातत्वं तदेव द्रव्यहिं 1४सटिपणा साया अघि' इत्यवशिष्टकल्पनाजालमनुन्थानोपहतम् । इदं तु ध्येयम्-अनुज्ञाविषयतावच्छेदकं न हिंसात्वं नधुत्तारत्वादिकं वा, किन्तु ॥ खोपक्ष सामान्यविशेषविधिविधेयतावच्छेदकविधिशुद्धव्यापारत्वं यतनाविशिष्टनद्युत्तारत्वादिकं वा फलतस्तु विधिशुद्धहिंसाया अप्यनुज्ञाविषयत्वं वृत्तिः ॥ च्यवहाराबाधितमेव अत एव विधिना क्रियमाणाया जिनपूजादिविषयहिंसाया अनुबन्धभावतो मोक्षप्राप्तिपर्यवसानत्वमुपदेशपदपञ्च गाथा-५५ का वस्तुकादावुक्तम् । यत्तु 'अरिहंता भगवंतो' इत्यादि सम्मतिप्रदर्शनेन भगवतो विराधनाविषयकवाक्प्रयोगासम्भव उपपादितस्तदत्य-15॥२१॥ न्तमसमञ्जसम् , सम्मतिवचनस्य कायव्यापारेणैव प्रवर्तकत्वनिवर्तकत्वाभावाभिधानतात्पर्याद्वाप्रयोगस्याप्यप्रवर्तकनिवर्तकत्वविधिनिषेधव्यापारवैयाद् । यदपि "सविशेषणे०" इत्यादिन्यायेन यतनाऽयतनाविषयत्वमेव सर्वत्र जिनोपदेशस्योपदर्शितं तदपि विशेष्य| भागस्याकिश्चित्करत्वप्रदर्शनार्थ महावाक्यार्थपर्यवसानार्थमैदम्पर्यार्थपर्यवसानार्थवा?, नाद्यः, नात्तारजन्यस्य भिक्षाचर्याविहारादिफलस्य | यतनामात्रादसिद्धर्विशेष्यभागस्याकिश्चित्करत्वासम्भवाद् । न द्वितीयः, महावाक्यार्थस्य सर्वैरेव पदाथैः पर्यवसानाद् । नापि तृतीयः,15 'आज्ञा धर्मे सार' इति सार्वत्रिकैदम्पर्यार्थस्य प्रकृतवाक्याथै योजनायामपि विशेष्यस्य त्यागायोगात् । किश्चैवं 'जयं चरे' [यतं चरेत् ।] इत्यादौ यतनांश एवोपदेशो न तु चरणाद्यश इत्येकत्र वाक्ये कथं पदपदार्थयोजना ?, यदपि ज्ञानाद्यर्थमपवादप्रतिषेवणेऽप्यनादिसिद्धकल्प्यत्वादिलक्षणवस्तुस्वरूपावबोधक एव जिनोपदेशः, प्रवृत्तिस्त्वौचित्यज्ञानेन स्वत एवेत्युक्तं, तदप्यगाधभ्रमसमुद्रमजनविजृम्भितम् , | जिनोपदेशात् कल्प्यत्वादिबोधे स्वत एव प्रवृत्तिवचनस्याविचारितरमणीयत्वात् , कल्प्यताबोधकस्योपदेशस्यैव प्रवृत्तिजनकेच्छाजनकज्ञा| नविषयेष्टसाधनतादिबोधकत्वेन प्रवर्तकत्वाद् , एतदेव हि सर्वत्र विधेः प्रवर्तकत्वमभ्युपयन्ति शास्त्रविदः। विधेः प्रवर्तकत्वादेव च ALSCRECR-C प्रवर्तकत्वाद् , एतदेवासाविचारितरमणीयवान खत एवेत्युक्त, Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२१७॥ सटिप्पणा स्वोपन वृत्तिः ॥ गाथा-५५ ॥२१७॥ कल्प्यतादिबोधकादर्थवादादपि विधिकल्पनमाद्रियते, इत्थं च 'पञ्चेन्द्रियववरोवणा वि कप्पियत्ति [ पञ्चेन्द्रियव्यपरोपणाऽपि कल्प्या' इति । ] निशीथचूर्णावुक्तं न पुनः ‘स हन्तव्य' इतीति यदुक्तं तत् ध्वनिभेदेनार्थपरावर्त्तमात्रम् । यच्च 'सव्वे पाणा' इत्यादिना विरो४ धोद्भावनं कृतं तत् 'न हन्तव्य' इत्यादिशब्दसादृश्यमात्रेणैव, किन्तु हिंसाविषयकोपदेशार्थमात्रेण स्यात् , तन्निराकरणं चैतत्सूत्रस्थाविधि कृतहिंसाविषयत्वेनैव हरिभद्रसूरिभिः कृतमिति नात्र पर्यनुयोगावकाशः। किञ्च सामान्यतः सर्वजीवपरितापनानिषेधेऽपि क्वचिदपवादतस्तदुपदेशो विधिमुखेनापि दृश्यते, यथा भगवत्यां-"तं छदेण अजो तुब्भे गोसालं मंखलिपुत्तं धम्मियाए पडिचोयणाए पडिचोएह, धम्मिआए पडिसारणाए पडिसारेह, धम्मिएणं पडोआरेणं पडोआरेह; धम्मियाएहिं अद्वेहिं हेऊहिं पसिणेहि य णिप्पिट्ठपसिणवागरण करेह" । त्ति [तच्छन्देन आर्य! यूयं गोशालं मंखलिपुत्रं धार्मिकया प्रतिचोदनया प्रतिचोदयत, धार्मिकया प्रतिसारणया प्रतिसारयत, धार्मिकेण प्रत्यवतारेण प्रत्यवतारयत धार्मिकैरथर्हे तुभिः प्रश्नैश्च निष्पृष्टप्रश्नव्याकरणं कुरुतेति । एतद्धि गोशालस्य परितापजनकं वचनं | भगवतेय लाभं दृष्ट्वाऽऽज्ञप्तम् , न चोत्सर्गतः परपरितापजनकं वचनं साधूनां वक्तुं युज्यत इत्यवश्यमपवादविधिरुत्सर्गविधिवदङ्गीकतिव्यः । इत्थं च 'अवण्णवाई पडिहणेजति [अवर्णवादिनं प्रतिहन्यात् । ] दशाश्रुतस्कन्धचूर्णिवचनस्य यदन्यार्थपरिकल्पनं तद"युक्तमेव, मिथोविरुद्धं चेदं यदुतापवादविधिप्रतिषेधः, पञ्चेन्द्रियव्यापादनभयेन सति सामर्थ्य प्रवचनाहितानिवारणे संसारवृद्धिदुर्लभबोधिता चेति । इत्थं हि प्रवचनाहितनिवारणे निमित्ते पञ्चेन्द्रियव्यापादनस्य बलवदनिष्टाननुबन्धित्वबोधार्थमपवादविधिरवश्यं कल्पनीयः, अन्यथा सामान्यनिषेधजनितभयानिवृत्तरिति । यच्चाहितनिवारणे क्रियमाणे कदाचित्पश्चन्द्रियव्यापत्तौ प्रायश्चित्तप्रतिपच्याशयस्य शुद्धवाजिनाराधकत्वं सुलभबोधिकत्वं चोक्तं तदविचारितरमणीयम् , यतनावतोऽपवादेऽपि प्रायश्चित्तानुपदेशात् । तदुक्तं बृहत्कल्पवृत्ती Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ MORE धर्मपरीक्षा ॥२१८॥ तृतीयखण्डे-"तथा मूलगुणप्रतिसेव्यप्यालम्बनसहितः पूज्यः, पुलाकवत् । स हि कुलादिकार्ये चक्रवर्तिस्कन्धावारमपि गृह्णीयाद् , विनाशयेद्वा, न चप्रायश्चित्तमाप्नुयाद् ।" इत्यादि । यत्तु तस्य"हिट्ठाणडिओ वि" ॥४५२५॥ [अधस्तनस्थानस्थितोऽपि।]-इत्यादिनाऽध- सटिप्पणा स्तनस्थानस्थायित्वमुक्तं तत्स्वाभाविकम् , न तु प्रतिषेवणाकृतमिति बोध्यम् । किञ्च तस्य प्रायश्चित्तं स्यात् तदा पुनर्वतारोपणादि स्याद् , खोपन वृचिः ॥ | आट्या पश्चेन्द्रियघाते मूलादिमहाप्रायश्चित्ताभिधानाद् । उक्तं च-"तस्य हस्तशताबहिर्गमन इव निरतिचारताभिव्यञ्जकं सूक्ष्माश्रव-STATE | विशोधकमालोचनाप्रायश्चित्तमेव । तथा च द्वितीयखण्डे बृहत्कल्पभाष्यवृत्तिग्रन्धा-"आयरिए गच्छम्मि य, कुलगणसंघे अचेइ- २१८॥ अविणासे । आलोइअपडिक्कतो, सुद्धोज णिज्जरा विउला ॥२९६३॥"व्या० षष्ठीसप्तम्योरथ प्रत्यभेदात् , आचार्यस्य वा गच्छस्य वा कुल स्य वा गणस्य वा सङ्घस्य वा चैत्यस्य वा विनाशे उपस्थिते सति सहस्रयोधिप्रभृतिना खवीर्यमहापयता तथा पराक्रमणीयं यथा | तेषामाचार्यादीनां विनाशो नोपजायते, स च तथा पराक्रममाणो यद्यपराधमापन्नस्तथाऽप्यालोचितप्रतिक्रान्तः शुद्धः-गुरुसमक्षमा-18 | लोच्य मिथ्यादुष्कृतप्रदानमात्रेणैवासौ शुद्ध इति भावः । कुतः ? इत्याह-पद्यस्मात्कारणाद् , विपुला महती, निर्जरा कर्मक्षयलक्षणा | तस्व भवति, पुष्टालम्बनमवगम्य भगवदाज्ञया प्रवर्त्तमानत्वादिति ॥” इत्थं च सर्वत्र वस्तुस्वरूपावबोधक एवापवादोपदेशो नतु विधि-12 | मुख इति यत्किञ्चिदेव, बहूनां छेदग्रन्थस्थापवादसूत्राणां विधिमुखेन स्पष्टमुपलम्भात् । तथा आचाराङ्गेऽपि “से तत्थ पयलमाणे वा | पवडमाणे वा रुक्खाणि वा गुच्छाणि वा लयाओ वा वल्लीओ वा तणाणि वा तणगहणाणि वा हरिआणि वा अवलंबिया उत्तरिजा, से | तत्थ पाडिपहिआ उवागच्छंति ते पाणिं जाएजा, तओ संजयामेव अवलंबिय २ उत्तरेजा, तओ संजयामेव गामाणुगाम दुइजिजा ।" [अथ स तत्र प्रचलन् प्रपतन् वृक्षान् गुच्छान् वा लता वा वल्ली; तृणानि वा तृणगहनानि वा हरितानि वा अवलम्ब्य उत्तरेत , अथ तत्र AASHARA Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ C धर्मपरीक्षा ॥२१९॥ सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ प्रधिः ॥ गाथा-५५ | ॥२१९॥ L SCRECRULECRUCTURE प्रातिपथिका उपागच्छन्ति तेषां पाणिं याचेत, ततः संयत एव अबलम्ब्य उत्तरेत् , ततः संयत एवं ग्रामानुग्राम गच्छेत् ॥] इत्यत्र गच्छगतस्य साधोवल्ल्याद्यालम्बनस्य विधिमुखेनवोपदेशात् । न च “से भिक्खू वा २ गामाणुगामं दुइजमाणे अंतरा से वप्पाणि वा फलिहाणि | वा पागाराणि वा तोरणाणि वा अग्गलाणि वा अग्गलपासगाणि वा गत्ताओ वा दरीओ वा सति परक्कमे संजयामेव परकमिजा णो उज्जु गच्छिज्जा । केवली बूआ, आयाणमेयंति" ॥ [अथ भिक्षुर्वा भिक्षुकी वा ग्रामानुग्राम गच्छन् अन्तरा तस्य वा वा परिखा वा प्राकारावा तोरणानि वा अर्गला वा अर्गलपाशका वा गर्ता या दोवा सति पराक्रमे संयत एव पराक्रमेत, नोऋजुकं गच्छेत् । केवली ब्रूयादादानमेतत्][द्वि.श्रु.१०३ उ०२] प्रागुक्तनिषेधकारणानिष्टसम्भावनावचनमेतद् , नतु विधिवचनमिति वाच्यम् । विधिवचनत्वेनापि वृत्तिकृता वृत्त्यां व्याख्यानात् । तथाहि “से इत्यादि । स भिक्षुामान्तराले यदि वप्रादिकं पश्येत् , ततः सत्यन्यस्मिन् सङ्क्रमे तेन ऋजुना पथा न गच्छेद् , यतस्तत्र गर्तादौ निपतन् सचित्र वृक्षादिकमवलम्बेत, तच्चायुक्तम् । अथ कारणिकस्तेनैव गच्छेत् , कथश्चित्पतितश्च गच्छगतो वल्ल्यादिकमप्यवलम्ब्य प्रातिपथिकं हस्तं वा याचित्वा संयत एव गच्छेदिति ।" तथा सामान्यतः प्रतिषिद्धं लवणभक्षणमप्यपवादतो विधिमुखेन तत्रैवानुज्ञातं दृश्यते । तथाहि “से भिक्खू वा २ जाव समाणे सिया से परो अवहट्टु अंतो पडिग्गहे विडं वा लोणं वा उभियं वा लोणं परिभाइत्ता णीहटु दलइन्जा, तहप्पगारं पडिग्गहं परहत्थंसि वा परपायसि वा अफासुअं जाव णो पडिग्ग| हिजा, से आहच्च पडिग्गाहिए सिया, तं च णाइदूरगयं जाणेजा, से तमादाय तत्थ गच्छज्जा, पुवामेव आलोइजा, आउसोत्ति वा भगिणित्ति वा इमं ते किं जाणया दिन, उदाहु अजाणया? से य भणेजा, नो खलु मे जाणया दिन्नं, अजाणया दिन्नं, कामं खलु आउसो इदाणिं णिसिरामि तं भुजह वा णं परिभाएह वा णं तं परेहिं समणुन्नायं समणुसिद्ध तओ संजयामेव मुंजेज वा पिवेज वा, जं च णो ASSACCOUCHCHER Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संचाएति भोत्तए वा पायएवा साहम्मिया तत्थ वसंति, संभोइआ समगुण्णा अपरिहारिआ अदूरगया तेसिं अणुप्पदायत्वं सिया, णो जत्थ धर्मपरीक्षा सटिप्पणा [४] साहम्मिश्रा सिआ, जहेव बहुपरिआव कीरइ तहेव कायव्वं सिया, एवं खलु तस्स भिक्खुस्स भिख्खुणीए वा सामग्गिअंति।" (द्वि.श्रु. ॥२२॥ 1 ॥ खोपत्र 1₹१३०१०) एतवृत्तिर्यथा-"स भिक्षुगृहादौ प्रविष्टःस्यात् , तस्य च कदाचित्परो गृहस्थः 'अभिहहु अंतो' इति अन्तः प्रविश्य चिः ॥ पतगृहे काष्ठम्छब्बकादौ, ग्लानाद्यर्थ खण्डादियाचने सति बिडं वा लवणं खनिविशेषोत्पन्नं, उद्भिज वालवणाकराद्युत्पन्नं, परिभाइ- गाथा-१५ अत्तत्ति दातव्यं विभज्य दातव्यद्रव्यात कश्चिदंशं गृहीत्वेत्यर्थः । ततो निःसृत्य दद्यात् , तथाप्रकारं परहस्तादिगतमेव प्रतिषेधयेत् , ॥२२०॥ 'तच्चाहच्चेति सहसा प्रतिगृहीतं भवेत् । तं च दातारमदूरगतं ज्ञात्वा स भिक्षुस्तल्लपणादिकमादाय तत्समीपं गच्छेद् , गत्वा च पूर्व 8 मेव तल्लपणादिकमालोकयेद्दर्शयेद् , एतच्च ब्रूयाद् 'अमुक' इति वा, भगीनीति वा! एतच्च लवणादिकं किं त्वया जानता दत्तमुताजानता ? एवमुक्तः सन् पर एवं वदेद् , यथा पूर्व मयाऽजानता दत्तम् , साम्प्रतं तु यदि भवतोऽनेन प्रयोजनं ततो दत्तमेतत्परिभोगं कुरुध्वम् । तदेवं परैः समनुज्ञातं समनुसृष्टं सत्प्रासुकं कारणवशादप्रासुकं वा भुजीत पिबेद्वा, यच न शक्नोति भोक्तुं पातुं वा तत् साध मिकादिभ्यो दद्यात , तदभावे बहुपर्यापनविधि प्राक्तनं विदध्याद्, एतत्तस्य भिक्षोः सामग्यमिति ।' न चापवादविषयोऽपि मनोव्यापारः सावद्यत्वात् केवलिनो न सम्भवतीति शङ्कनीयम् , अधिकृतपुरुषविशेषेऽधिकनिवृत्तितात्पर्यावगाहित्वेनास्य निरवद्यत्वाद् , अन्यथा देशविरत्युपदेशोऽपि न स्यात् , तस्य चरणाशक्तपुरुषविषयत्वेनापवादिकत्वात् , अत एव चारित्रमार्गमनुपदिश्य देशविरत्युपदेशे स्था| वरहिंसाप्रतिषेधानुमतेः क्रमभङ्गादपसिद्धान्त उपदर्शितः। यत्तु 'जलं वस्त्राऽऽगलितमेव पेयम्' इत्यत्र “सविशेषणे०" [सविशेषेणे हि प्रयुज्यमानौ विधिनिषेधौ विशेषणमुपसङ्क्रामतः] इत्यादिन्यायाजलगलनमेवोपदिष्टं न तु विधिमुखेन निषिद्धोपदेशः कारणतोऽपीति, तदसद, RESORROCEACHECREACHER ECOR Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२२॥ SEAR | सटिप्पणा | ॥स्वोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा-६५ ॥२२१॥ यतो जलगालनमपि जलशस्त्रमेव, तदुक्तमाचाराङ्गनिर्युक्तो-"उस्सिचण-गालण-धोअणे य उवगरण-कोस(मत्त)भंडे अ॥ बावरआउक्काए एयं तु समासओ सत्थं" ॥११३।। [उत्सेचन-गालन-धावनं चोपकरण-कोशभाण्डं च । बादराप्काये एतत्तु समासतः शस्त्रम् ॥] ति अत्र गालनं 'धनमसृणवस्त्रान्तेिन' इति वृत्तौ मम्पूर्य व्याख्यातम् । तच्च त्रिविधं त्रिविधेन निषिद्धमिति विधिमुखेन तदपदेशे निषिद्धस्यापवादतस्तथोपदेशाविरोधाद् , निषिद्धमपि हि क्वचित्कदाचित्कथञ्चिद्विहितमपि भवतीति । यत्तूक्तं द्रव्यहिंसाया अप्यनाभो*मवशादयतनाजन्यत्वेन निषिद्धन्वमेवेति तत्रायतनाजन्यहिंसायाः कटुकफलहेतुत्वात् , तन्न, आशयशुद्धेः प्रतिबन्धिकाया यतनातिरिक्ताया असिद्धेः, तस्याश्चायतनया सह विरोधात् , स्थूलयतनायां स्थूलायतनायाः प्रतिबन्धकत्वेन सूक्ष्मायतनाकल्पने प्रमाणाभावाद् , अयतना| सत्त्वेअमत्तानामप्रमत्तताऽसिद्धेः । या च सूक्ष्मा विराधना द्वादशगुणस्थानपर्यन्तमालोचनाप्रायश्चित्तवीजमिष्यते सा न सूक्ष्मायतनारूपा, सूक्ष्माया अप्ययतनायाश्चारित्रदोषत्वेनोपशान्तक्षीणमोहयोर्यथाख्यातचारित्रिणोस्तदनुपपत्तेः; किन्त्वनाभोगलक्षणसूक्ष्मप्रमादजनितचेष्टाश्रवरूपा, अत एव द्वादशगुणस्थानपर्यन्तं तन्निमित्तालोचनाप्रायश्चित्तसम्भवः । तदुक्तं प्रवचनसारोद्धारवृत्तौ-"इयं चालोचना गमनागमनादिष्षवश्यंकर्तव्येषु सम्यगुपयुक्तस्यादुष्टभावतया निरतिचारस्य छद्मस्थस्याप्रमत्तयतेद्रष्टव्या, सातिचारस्य तूपरितनप्रायश्चित्तसम्भवात् , केवलज्ञानिनश्च कृतकृत्यत्वेनालोचनाया अयोगात् । आह-यतीनामवश्यकर्त्तव्यानि गमनागमनादीनि तेषु सम्यगुपयुक्तस्यादुष्टभावतया निरतिचारस्याप्रमत्तस्य किमालोचनया ? तामन्तरेणापि तस्य शुद्धत्वाद् , यथासूत्रं प्रवृत्तेः । सत्यमेतत् , केवलं याश्चेष्टानिमित्ताः सूक्ष्मप्रमादनिमित्ता वा सूक्ष्मा आश्रवक्रियास्ता आलोचनामात्रेण शुद्धयन्तीति तच्छुद्धिनिमित्तमालोचनेति । तथा व्यवहारदशमोद्देशकवृत्तावप्युक्तं-"निग्रन्थस्यालोचना-विवेकरूपे द्वे प्रायश्चित्ते, स्नातकस्यैको विवेक इति । तथाऽऽलोचना गुरोः पुरतः Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जयते, धर्मपरीक्षा ॥२२२॥ खापराधस्य प्रकटनम् क्वचित्तावन्मात्रेणैव शुद्धिः, यथाऽवश्यकृत्ये हस्तशतात् परतो गमनागमनादौ सम्यगुपयुक्तस्य निरतिचारस्य यतेः, सातिचारस्यन्तूपरितनप्रायश्चित्तसम्भवात् । यतेरवश्यकृत्ये गमनागमनादौ निरतिचारखालोचनां विनाऽपि कथं न शुद्धिः, यथासूत्रं सिटिप्पणा प्रवृत्तेः । सत्यम् ; परं याश्चेष्टानिमित्ताः सूक्ष्मा आश्रवक्रियास्तासां शुद्धयर्थमालोचनेति ॥" तथा यतिजीतकल्पवृत्तावप्युक्तम्-"अ- ॥खोपत्र वाह शिष्यः-निरतिचारो यतिः करणीयान् योगान् करोति, ततः किमालोचनया विशोध्यम् ?, गुरुराह-मूक्ष्मा आश्रयक्रियाः सूक्ष्मप्र वृत्तिः । मादनिमित्तका अविज्ञातास्तासामालोचनमात्रेण शुद्धिरित्यादि।"तथा१६ पश्चाशकसूत्रवृत्योरप्युक्तम्-"ता एवं चिय एय, विहियाणु गाथा-५५ ॥२२२॥ ट्ठाणमेत्थ हवइत्ति । कम्माणुबंधछेअण-मणहं आलोअणाइजु॥५॥""यस्मात्सर्वावस्थासु कर्मबन्धोऽस्ति कर्मवन्धानुमेया च विराधना,इष्यते | चासौ द्रव्यतो वीतरागस्यापि छद्मस्थस्य, चतुर्णामपि मनोयोगादीनामभिधानात् , ता तस्माद् , एवंचियत्ति एवमेव विराधनायाः शोधनीयत्वेन, एतद् भिक्षाटनादिकं, विहितानुष्ठान विधेयक्रिया, अत्र कर्मानयनप्रक्रमे, भवति स्याद् । इति शब्दः समाप्त्यर्थो गाथान्ते | योज्यः । किंविधं भवति ? इत्याह-कर्मानुबन्धच्छेदनं कर्मसन्तानछेदकं, अनघं-अदोषम् , परोक्तदूषणाभावात् । किंभूतं सद्? इत्याह आलोचनादियुनं आलोचनाप्रतिक्रमणादिप्रायश्चित्तसमन्वितमिति गाथार्थ इति ॥” वस्तुतः कर्मबन्धानुमेया द्रव्यविराधना निर्ग्रन्थस्य स्नातकस्य च तुल्या, द्वयोरपि सामयिककर्मबन्धहेतुत्वात् ; परं छद्मस्थानां विहितानुष्ठानमालोचनादियुतमिष्टसाधनम् , तथैव विधानात् छद्मस्थयोगानां शोध्यत्वेन प्रायश्चित्तस्य च शोधकत्वेन व्यवस्थितेरित्यकषायस्य योगा ऐपिथिककर्मबन्धहेतुत्वेन नायतनयाऽशुद्धाः । अकषायश्च वीतरागः सरागश्च सज्वलनकषायवानप्यविद्यमानतदुदयो मन्दानुभावत्वात् तत्त्वार्थवृत्तौ निर्दिष्टः, अनुदरा कन्यानिर्देशवद् इत्यकषायस्य नायतना, न वा तस्यावश्यंभाविद्रव्यहिंसादिकमप्ययतनाजन्यमिति प्रतिपत्तव्यम् । यत्नक्तं 'द्रव्यतोऽपि हिंसायाः कृतप्रत्या Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा *स्वोपन वृषिः ॥ गाथा-५५ ॥२२३n धर्मपरीक्षा | ख्यानभङ्गेनालोचनाविषयत्वमिति नज्जैन सिद्धान्तपरिभाषाज्ञानाभावविजृम्भितम् , द्रव्याद्याश्रयेण हिंसादिभावस्यैव प्रत्याख्यातत्वाद् , द्रव्याहिंसादिना हिंसादिप्रत्याख्यानभङ्गाभावाद् अनेनैवाभिप्रायेण धर्मोपकरणाङ्गीकरणे “से अपरिग्गहे चउबिहे पण्णते, दबओ खित्त॥२२३॥ ओ."(स च परिग्रहश्चतुर्विधः प्रज्ञप्तः, द्रव्यतः क्षेत्रतः०१) इत्यादिक्रमेण प्रत्याख्यातस्य परिग्रहस्य न भङ्गदोष इति विशेषावश्यके दिगम्बरनिराकरणस्थलेभिहितम् । नथा च तदृन था-'अपरिग्गहया सुत्तत्ति, जा य मुच्छा परिग्गहोऽभिमओ । सबदव्वेसु न सा, कायदा सुत्तसम्भावो ॥२५८०॥ या च "सबाओ परिग्गहाओ वेरमणम्" इत्यादिनाऽपरिग्रहता सूत्रे प्रोक्तेति त्वया गीयते, तत्रापि मूच्छे- व परिग्रहस्तीर्थकृता-भिमतो नान्यः। मा च मुर्छा यथा वने तथा मर्वेष्वपि शरीराहारादिद्रव्येषु न कर्तव्येति सूत्रसद्भावः सूत्रपरमार्थः, न पुनस्त्वदभिमतः सर्वथावस्त्रपरित्यागोऽपरिग्रहतेति सूत्राभिप्रायः, तस्मादपरिज्ञातसूत्रभावाथों मिथ्येव खिद्यसे त्वमिति हृदयमिति।।" किश्च यदि द्रव्यहिंसया कृतप्रत्याख्यानभङ्गः स्यात् तदा तवाप्युपशान्तमोहस्य यथाख्यातचारित्रं न स्यात् . अंशतो भङ्गा| वश्यं भावादिति । यच्च सर्वविरतिसिद्धयर्थ द्रव्यहिंसाया अँपि प्रत्याख्यानमुपपादितम् , तदयुक्तम् , एवं योगानामपि प्रत्याख्यानापत्तः "अयोगिकेवलिष्वेव, सर्वतः संवरो मतः।।" इति वचनादयोगिन्येव सर्वसंवरसिद्धेः । यच्च द्रव्याश्रवस्य मूक्ष्मपृथिव्यादीनामिवाविरतिप्रत्ययकर्मबन्धहेतुन्वमुक्त तद् वृधव तेषामविरतिभावं प्रतीत्यैव कर्मबन्धाभिधानात् . तद्योगानां द्रव्यहिंसाऽहेतुन्वाद् , भावहिंसाकारणत्वं च योगांनामिव द्रव्यहिंसाया अपि न बाधकमिति । 'यत्वेतेनेत्यादिना पाशचन्द्रमतमुपेक्ष्य तस्मादयं भावः इत्यादिना किञ्चित् सम्प्रददायानुसारि भणितं तदर्द्धजरतीयन्यायानुकारि, हिंसांशे जिनोपदेशाभावेन तन्मताश्रयणे 'पूजाशुपदेशाभावापत्तः, तदविनाभाविहिंसांशे | उपदेशाभावेन प्रकृतोपदेशसमर्थनसम्भवेऽपि तदङ्गकुसुमार्चनाद्यंशे तस्य कुसुमादिजीववधानुकूलव्यापाररूपहिंसावगाहिन्वस्य निराकर्त GENCRUAR Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२२४॥ साया दोषा-द्रव्यस्तवस्थलीययतरप्यनुपपत्तेः ॐॐॐ मशक्यत्वाद् , एवमनिष्टबीजरूपमनयोबेष्टफलहेतुत्वन कल्प्यावाभिव्यक्तरप्यनुपपत्तेः, कुसुमादिहिंसायाः सन्दिग्धत्वेन तथाविधपातकाहेतुत्वे मिथ्यादृशामपि तस्यास्तथात्वापत्तेः, तस्माद् द्रव्यस्तवस्थलीयहिंसायामनुबन्धशुद्धत्वेनैव भगवदाज्ञा सम्यक्त्वादिभावहेतुत्वा |सटिप्पणा |दिति ॥ ५५ ॥ तदेवमाभोगेऽपि द्रव्यहिंसाया दोषानावहत्वं यत्सिद्धं तदाह | वृचिः ॥ तम्हा व्यपरिग्गह-दव्यवहाणं समंमि(मेवि)आभोगे॥ण ह दोसो केवलिणो, केवलनाणे वचरणे वा ॥५६॥ गाथा५६५७ [तस्माद् द्रव्यपरिग्रह-द्रव्यवधयोः समेऽप्याभोगे ॥ नैव दोषः केवलिनः केवलज्ञाने वा चरणे वा ॥५६॥] IRRI 'तम्ह'त्ति । तस्माद् द्रव्यपरिग्रह-द्रव्यवधयोः समेऽप्याभोगे साक्षात्कारे, केवलिनो नैव दोषः, केवलज्ञाने 6 चारित्रे वा ज्ञानावरण-चारित्रमोहनीयक्षयजन्ययोः केवलज्ञान-चारित्रयोर्द्रव्याश्रनमात्रेणानपवादात् । यतु 'क्षीणमोहस्यापि स्नातकचारित्राभावात्सम्भावनारूढातिचाररूपस्यापि द्रव्याश्रवस्य यदि तत्प्रतिबन्धकत्वं तदा साक्षाजीवघातस्य द्रव्यरूपस्यापि तन्न्यायप्राप्तमेवेति केवलिनोऽपि द्रव्यहिंसा चारित्रदोष एवेति परेण प्रोच्यते, तदसत् , स्नातकस्य निग्रन्थभेदत्वाद् यथाख्यातस्यैव चारित्रभेदम्बात् तत्प्रति| बन्धकत्वस्य च द्रव्यहिंसायां त्वयाऽप्यनभ्युपगमात् । यदि च स्नातकचारित्रस्य द्रव्यहिंसा दोषः स्यात् तदा निर्ग्रन्थचारित्रस्यापि दोषः स्थादेव, निग्रन्थस्नातकयोरेकसंयमस्थानाभ्युपगमात् । “णिग्गंथ सणायाण, तुलं इकं च संजमट्ठाण" (निर्ग्रन्थस्नातकयोस्तुल्यमेकं च संयमस्थानम् ) इति पञ्चनिन्थीवचनादिति द्रष्टव्यम् ।। ५६ ॥ हिंसाचतुर्भङ्गयनुसारेणैव द्रव्याहंसया भगवतो दोषाभावमाहणोदव्वा णोभावा, जह तह हिंसा ण दव्वमित्तेणं॥ तेणं तीए दोसं, जिणस्स को भासए सण्णी ॥५७॥ [नोद्रब्बाद् नोभावाद् यथा तथा हिंसा न द्रव्यमात्रेण ॥ तेन तया दोषं जिनस्य को भाषते संज्ञी ॥ ५७ ॥] Res Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२२५॥ SAMOH सटिप्पणा || खोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा-५७ ॥२२५॥ व्याख्या-णोडव्व'त्ति। नोद्रव्याद नोभावाद् यथान हिंसा, तथा द्रव्यमात्रेणापि हिंसा, तत्त्वतो न हिंसा। तेन तया द्रव्यहिंसया, दोषं जिनस्य कः संज्ञी भाषेत-अपि तु न कोऽपीत्यर्थः । इदमुक्तं भवति-हिंसामधिकृत्य द्रव्यभावाभ्यां चतुभङ्गी तावदियं श्रावकप्रतिक्रमणसूत्रवृत्तावुक्ता, १ द्रव्यतो भावतश्च हिंसा-'हन्मि' इति परिणतस्य व्याधादेमंगवधे। २ द्रव्यतो न भावतः-ईर्यासमितस्य साधोः सत्चबंध । यदागम:-"वजेमित्ति परिणओ, संपत्तीए विमुच्चइ वेरा ॥ अवहंतो वि ण मुच्चइ, किलिट्ठभावोऽतिवायस्स ॥६१॥ [चतुश्चत्वारिंशगाथावृत्तौ १६८ पृष्ठे विवरणमस्या गाथायाः]"त्ति । ३ भावतो न द्रव्यतः-अङ्गारमर्दकस्य कीटबुथाऽङ्गारमर्दने, मन्दप्रकाशे रज्जुमहिबुद्धया प्रतो वा । ४ न द्रव्यतो न भावतः-मनोवाकायशुद्धस्य साधोरिति । अत्र परश्चतुर्थभङ्गखामिनं सयोगिकेवलिनमेवाह । यत्तु चूर्णिकारेण "चउत्थो सुण्णो"त्ति भणितम् , तत्र खामिनमधिकृत्य केवलिनस्तत्स्वामिनो विद्यमानत्वात् तस्य सर्वोत्कृष्टचारित्रान्यथानुपपल्या मनोवाकायः शुद्धत्वाद् , अन्यथा स्नातकः केवली न स्यात् , किन्तु हिंसास्वरूपमधिकत्यैवोक्तम् , तच्चैवम्-यदि हिंसा तर्हि न द्रव्यतो न भावत इति वक्तुमप्यशक्यम् , द्रव्यभावयोरन्यतरत्वेनावश्यम्भावात् , तेन चतुर्थो भङ्गः शून्यो भणितः, विरोधाद् । न च शैलेश्यवस्थायां केवली खामी भविष्यतीति शङ्कनीयम् , तस्य सिद्धस्येव योगाभावेन मनोवाकायैः शुद्धत्वाभावाद् , नह्यविद्यमाने वस्त्रे 'वस्त्रेण शुद्ध' इति व्यवहियत इत्याद्यसौ समर्थयामास । तच्चायुक्तम् , हिंसाव्यवहाराभावमधिकृत्यैव चतुर्थभङ्गशून्यत्वाभिधानाद् विरुद्धधर्माभ्यां तदभावस्येव तद्वद्भेदस्यापि सम्भवेन तच्छ्न्यत्वव्यवहारोपपत्तेः । हिंसास्वरूपमधिकृत्य तु द्रव्यमात्रहिंसायामप्यहिंसात्वं प्रवचने प्रतीतमिति कदाचिद् द्वितीयभङ्गस्वामित्वेऽपि भगवतः स्नातकस्य निग्रन्थस्येव चतुर्थभङ्गस्वामित्वाऽविरोध एव, अहिंसापरिणत्यभेदाश्रयणेन तद्भङ्गस्यापि सम्भवक्तिकत्वात् । न चैवं द्वितीयभङ्गकालेऽपि चतुर्थभङ्गा Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२२६॥ पत्तिर्द्रव्य हिंसाकालेऽप्यप्रमत्तयतीनां मनोवाक्कायशुद्धत्वानपायादिति वाच्यम्, चतुर्थभङ्गोपपादकमनोवाक्कायशुद्धताया गुप्तिरूपाया एव ग्रहणाकू, अत एव नियतचतुर्थभङ्गस्वामित्वमयोगिकेवलिनोऽपि नानुपपन्नम्, शुद्धप्रवृत्तिव्यापारेणैव निरोधव्यापारेणापि मनोवाक्कायशुद्धताऽनपायाद्, अन्यथा तदविनाभावि ध्यानानुपपत्तेः । उक्तं हि - " ध्यानं करणानां सत्प्रवृत्ति-निरोधान्यतरनियतम् ” - “सुदढप्पयचवावारणं, णिरोहो व विजमाणाणं || झाणं करणाण मयं, ण उ चित्तणिरोहमेत्तागं ॥ ३०७१ ।। [ सुदृढप्रयत्नव्यापारणं निरोधो वा विद्यमानानाम् । ध्यानं करणानां मतं न तु चित्तनिरोधमात्रकम् ||] इत्यादिग्रन्थेन विशेषावश्यके शोधकेन च व्यापारमुपसम्पद्यो - परतेनापि शुद्धत्वव्यवहारो भवत्येव, यथा जलेन शुद्धं वस्त्रमिति । सर्वोत्कृष्टमनोवाक्कायशुद्धतयाऽयोगिकेवली नियमेनैव चतुर्थभङ्गस्वामी युज्यत इति । न च शैलेश्यवस्थायामपि शारीरस्पर्शमागतानां मशकादीनां व्यापत्तौ चतुर्थभङ्गस्वामित्वनियमानुपपत्तिः, द्रव्यहिंसायास्तदनुकूलनोदनाख्ययोगव्यापारनियतत्वात्, तत्र तदभावात्तत्सम्बन्धमात्रस्यातिप्रसञ्जकत्वादिति दिक् ।। ५७ ॥ यदि च 'न द्रव्यतो न भावतो मनोवाक्कायशुद्धस्य साधोः' इति वचनानुरोधेन सयोगिकेवलिनश्चतुर्थभङ्गस्वामित्वमेवाभिमतं भवेत् तदाऽप्रमत्तादीनां सयोगिकेवलिपर्यन्तानां द्रव्यहिंसया दोषाभावतौल्यं प्रवचनाभिहितं न घटेतेत्याहपडं चि वयणमिणं, दहव्वं होइ कप्पभासस्स ॥ जं अपमत्ताईणं, सजोगिचरमाण जो हिंसा ॥ ५८ ॥ [ प्रकटमेव वचनमिदं द्रष्टव्यं भवति कल्पभाष्यस्य । यदप्रमत्तादीनां सयोगिचरमाणां नो हिंसा ।। ५८ ।। ] व्याख्या - 'पयडं चिय'त्ति । प्रकटमेवैतद्वचनं कल्पभाष्यस्य द्रष्टव्यं भवति रागद्वेपरहितेन परीक्षण, यदप्रमत्तादीनां सयोगिकेवलिचरमाणां नो नैव हिंसा, व्याप्रियमाणयोगानामपीति शेषः । तथा च तद्ग्रन्थ:- "अप्पेव सिद्धंतमजा सटिप्पणा ॥खोपन वृत्तिः ॥ गाथा - ५७ ॥२२६॥ Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२२७ ॥ णमाणो, तं हिंसगं भाससि जोगवंतं । दव्वेण भावेण य संविभत्ता, चत्तारि भंगा खलु हिंसगते" || ३९३२ | अपीत्यभ्युच्चये, अस्त्यन्यदपि वक्तव्यमिति भावः । यदेवं योगवन्तं वस्त्रच्छेदनादिव्यापारवन्तं जीवं, हिंसकं त्वं भाषसे, तन्निश्रीयते सम्यक् सिद्धातमजानत ( नान) एवं प्रलापः (लपसि) । सिद्धान्ते योगमात्रप्रत्ययादेव न हिंसोपवर्ण्यते, अप्रमत्तसंयतादीनां सयोगिकेवलिपर्यन्तानां योगवतामपि तदभावात् । कथं तहिं सा प्रवचने प्ररूप्यते ? इत्याह-द्रव्येग भावेन च संविभक्ताश्रत्वारो भङ्गाः खलु हिंसकत्वे भवन्ति । तथाहि - १. द्रव्यतो नामका हिंसा न भावतः, २. भावतो नामैका हिंसा न द्रव्यतः, ३. एका द्रव्यतोऽपि भावतोऽपि, ४. एका न द्रव्यतो नापि भावतः । अथेषामेव यथाक्रमं भावनां कुर्वन्नाह - "आहच्च हिंसा समिअस्स जाउ, सा दबओ होड़ ण भावओ उ || भावेण हिंसा उ असंजयस्स, जे वा वि सत्ते ण सदा वहेइ ।। ३९३३ । संपत्ति तस्सेव जदा भविजा, सा दवहिंसा खलु भावओ अ || अज्झत्थसुद्धसजदा ण होजा, वघेण जोगो दुहओ वि हिंसा ।। ३९३४ ।। " ममितस्येर्यासमितावुपयुक्तस्य, ग्राSSत्य कदाचिदपि, हिंसा भवेत् सा द्रव्यतो हिंसा । इयं च प्रमादयोगाभावात् तत्त्वतो अहिंसैव, "मन्तव्याप्रमत्त योगात्प्राणव्यपरोपण हिंसा" इति (तत्वार्थ अ. ७ सू. ८) वचनात्, न भावत इति । भावेन भावतो, या हिंसा, न तु द्रव्यतः, साऽसंघतस्य प्राणातिपातादेरनिवृत्तस्य, उपलक्षणत्वात्संयतस्य वाऽनुपयुक्तगमनागमनादि कुर्वतो, ग्रानपि सत्त्वानसौ, मदैव न हन्ति तानप्याश्रित्य मन्तव्या, "जे वि न वाणिजंती, णियमा तेसिंग हिंसओ सो उ || ७५३ || ( ओघनि० ) "त्ति वचनाद् ॥ यदा तु तस्यैव प्राणिव्यपरोपण सम्प्राप्तिर्भवति, तदा सा द्रव्यतो भावतश्च (तोपि ) हिंसा प्रतिपत्तव्या । यः पुनरध्यात्मना चेतःप्रणिधानेन शुद्ध उपयुक्तगमनागमनादिक्रियाकारीत्यर्थः तस्य यदा वधेन प्राणिव्यपरोपणेन सह, योगः सम्बन्धो न भवति, तदा द्विधापि द्रव्यतो भावतोऽपि च , • सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ वृषिः ॥ गाथा-५८ ॥२२७! Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अहिंसा हिंसा न भवतीति भावः॥" तदेवं भगवन्प्रणीते प्रवचने हिंसाविषयाश्चत्वारो भङ्गा उपवर्ण्यन्ते । अत्र चाद्यभङ्गे हिंसायां धर्मपरीक्षा सटिप्पणा व्याप्रियमाणकाययोगेऽपि भावत उपयुक्ततया भगवद्भिरहिंसक एवोक्तः, ततो यदुक्तं भवता वस्त्रच्छेदनव्यापारं कुर्वतो हिंसा भवति' इति | Bास्वोपन ॥२२८॥ तत्त्रवचनरहस्यानभिज्ञतासूचकमिति ॥५८॥ नन्वत्र 'अप्रमत्तादीनामधिकृतवस्त्रच्छेदनव्यापारवान् हिंसकः, योगवत्वाद्-इति परोपन्यस्ता-पटू वृतिः ॥ नुमानक्षणव्यभिचारस्फोरणाय व्यभिचारस्थानत्वं प्रदर्शितम् । व्यभिचारश्च 'हेतुसत्त्वे साध्यासच्चमिति' केवलिनोऽप्रमत्तादिसाधारण्येन गाथा-५८ योगवचम् , अहिंसकत्वं च सिद्धथति, नतु कथमपि द्रव्यहिंसेति चेत्, न । अत्र च 'आद्यभङ्गः' इयादिनिगमनवचनविचारणयाऽधिक ॥२२८॥ । तवस्त्रच्छेदनब्यापारवानहिंसकः, हिंसाव्याप्रियमाणकाययोगवत्वेऽपि भावत उपयुक्तत्वात् ,अप्रमत्तादिवद्-इति स्वतन्त्रसाधनदृष्टान्त एव * भगवति तत्सिद्धेः । किश्च पूर्वपक्षिणा वस्त्रच्छेदनादिव्यापारे हिंसान्वितयोगत्वं तावद् भगवती बचनेनैव प्रदर्शितम् । तथाहि-"सद्दो तहिं मुच्छइ च्छेअणा वा, धाति ते दो वि उ जाव लोगो । वत्थस्स देहस्स य जो विकम्पो, ततोवि वातादि भरेन्ति लोग" ॥३९२२।। भो आचार्य ! तत्र वस्त्रे छिद्यमाने, शब्दः सम्मूच्छति, छेदनका वा सूक्ष्मपक्ष्मावयवा उड्डीयन्ते, पते च द्वयेऽपि ततो विनिर्गता लोकान्तं यावत, धावन्ति प्रा'नुवन्ति । तथा वस्त्रस्य देहस्य च यो विकम्पश्चलनं ननोऽपि विनिर्गता वानादयः प्रसरन्तः सकलमपि लोकमापूरयन्ति ॥ “अहिच्छसी जंति ण ते उ(य) दूरं, संखोभिया तेहऽवरे वयंती ।। उड्ड अहेया वि चउद्दिसं पि, पूरिंति लोगं तु खणेण सवं ॥३९२३॥" अथाचार्य, त्वमिच्छसि-मन्यसे ते च वस्त्रच्छेदनसमुत्थाः शब्दपक्ष्मवातादिपुद्गला, न दूरं लोकातं यान्ति, तर्हि तैः संक्षोभिताश्चालिताः सन्तोऽपरे ब्रजन्ति; एवमपरापरपुद्गलप्रेरिताः पुद्गलाः प्रसरन्तः श्णेनोर्ध्वमधस्तिर्यक्चनसृष्वपि दिक्षु सर्वनपि लोकमापूरयन्ति ॥ यत एवमतः-"विनाय आरंभमिणं सदोसं, तम्हा जहालद्धमहिडिएजा॥ Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२२९॥ CCCCESSORRECCASCANCE वुत्तं सएओ खलु जाव देही, ण होइ सो अंतकरी तु ताव ॥३९२४ ॥” इदमनन्तरोक्तं सर्वलोकपूरणात्मकमारम्भ, सदोषं सूक्ष्म सटिप्पणा जीवविराधनया सावा, विज्ञाय तस्मात् कारणाद् , यथालन्धं वस्त्रमधितिष्ठेत्-न च्छेदनादिकं कुर्यात् । यत उक्तं भणितं व्या-12 ॥ खोपड़ ख्याप्रज्ञप्तौ-यावदयं देही जीवः, सैजः सकम्पश्चेष्टावानित्यर्थः, तावदसौ कर्मणो भवस्य वाऽन्तकारी न भवति । तथा च वृत्तिः ॥ तदालापकः:-"जाव णं एस जीवे सया समिश्र एअइ वेअइ चलइ फंदइ घट्टइ खुब्भइ उदीरइ तं तं भावं परिणमइ ताव णं तस्स गाथा-५९ जीवस्स अंते अंतकिरिया ण भवइ"त्ति । (वृत्तिरस्यैकषष्टितमगाथावृत्तौ) तथा च हिंसान्वितयोगत्वेन वस्त्रच्छेदनव्यापारवतो हिंसकत्व ॥२२९॥ मापादयन्तं पूर्वपक्षिण प्रत्यप्रमत्तादिष्वापादकसत्त्वेप्यापाद्याभावात् तर्कमूलव्याप्त्यसिद्धेस्तस्य मूलशैथिल्यरूपदोषप्रदर्शनार्थमित्थमुक्तम् , | तथा चापादकसत्वादेवाप्रमत्तादिवत्केवलिनोऽपि द्रव्यहिंसासम्भवेऽपि न दोष इत्येतदेवाह- . हिंसगभावो हज्जा, हिंसविणयजोगओत्ति तकस्स ॥ दाएउं इय भणि, पसिढिलमलत्तणं दोसं ॥ ५९ ।। [हिंसकभावो भवेत् , हिंसान्वितयोगतइति तर्कस्य ॥ दर्शयितुमिति भणितं, प्रशिथिलमूलत्वं दोषम् ॥ ५९॥] "हिंसगभावो"त्ति । हिंसकभावो भवेद्धिंसान्वितयोगतोऽधिकृतवस्त्रच्छेदनव्यापारवत इति शेषः, इत्येतस्य तर्कस्य प्रशिथिलमूलत्वमापाद्यापादकव्याप्त्यसिद्धिरूपं दोषं दर्शयितुमिति भणितं-यदुताप्रमत्तादीनां सयोगिकेवलिपर्यन्तानां हिंसाव्याप्रियमाणकाययोगे सत्यपि भावत उपयुक्तत्वान्न हिंसकत्वमिति योगवत्वमात्रं च नापादकमिति तत्रापाद्यव्याप्त्यसिद्धिप्रदर्शनमकिश्चि| करमेवेति भावः ॥ ५९ ॥ नन्वप्रमत्तादीनामुपयुक्तानां योगवतामप्यहिंसकत्वप्रदर्शनेन हिंसान्वितयोगाभाव एवं प्रदर्शितो भवति तथा च प्रकृते आपादकाप्रसिद्धिप्रदर्शनपर एवायं ग्रन्थोऽस्तु इत्यत आह SAMSUGARCANESHARING Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२३०॥ आपागापसिद्धी, भणिया बत्थच्छेय अहिगारे ॥ ता तस्सं (हिं सं ) मइत्रयणं, पण्णत्तीए ण अपण ॥ ६०॥ [ आपादकाऽप्रसिद्धिर्न च भणिता वस्त्रच्छेदाधिकारे ॥ ततः तत्संमतिवचनं प्रज्ञप्तेर्नान्यार्थम् ॥ ६० ॥ ] 'आपायगापसिद्धि'त्ति । आपादकस्य हिंसान्वितयोगस्याऽप्रसिद्धिः, न च भणिता वस्त्रच्छेदाधिकारे; किं भगवतीवचनादारम्भस्य क्रियाविनाभावित्वमङ्गीकृत्यापि प्रतिबन्धैव पूर्वपक्षिणा दूषणं दत्तम् । तथाहि - "आरंभमिट्ठो जह (इ) आसवाय, आता तु साहू || णो (मा) फंद वारेहि व छिज्जमाणं, पइण्णहाणी व अतोऽण्णहा ते” ||३९२७|| 'आरम्भमिट्ठो'ति । कालाक्षणिकः । हे नोदक ! यथाssरम्भस्तव, आस्त्रवाय कर्मोपादानाय, इष्टोऽभिमतः, गुप्तिश्च तत्परिहाररूपा, श्रेय से कर्मानुपादानायाभिप्रेता, तथा च सति हे साधो ! मा स्पन्द, मा वा वस्त्र छिद्यमानं वारय । किमुक्तं भवति यदि वस्त्रच्छेदनमारम्भतया भवता कर्मबन्धनिबन्धनमभ्युपगम्यते ततो येयं वस्त्रच्छेदनप्रतिषेधाय हस्तस्पन्दनात्मिका चेष्टा क्रियते, यो वा तत्प्रतिषेधको ध्वनिरुच्चा . तावप्यारम्भतया भवता न कर्त्तव्यौ, अनो मदुक्तो (क्तादु) पदेशादन्यथा चेत् करोषि ततस्ते प्रतिज्ञाहानिः - खवचनविरोधलक्षणं दूषण मापद्यत इत्यर्थः अथ ब्रुवीथा-योऽयं मया वस्त्रच्छेदनप्रतिषेधको ध्वनिरुच्चार्यते स आरम्भप्रतिषेधकत्वान्निर्दोष इति ? । अत्रोच्यते"अदोसवं ते जइ एस सद्दो, अष्णोवि कम्हा ण भवे अदोसो | अहिच्छया तुज्झ सदोस एक्को, एवं सती कस्स भवेण सिद्धी ||३९२८ ||" यद्येष त्वदीयः शब्दोऽदोषवान्, ततोऽन्योऽपि वस्त्रच्छेदनादिसमुत्थः शब्दः कस्माददोषो न भवेत् तस्यापि प्रमाणातिरिक्तपरिभोगविभूषादिदोषपरिहारहेतुत्वात् । अथेच्छ्या स्वाभिप्रायेण तवैको वस्त्रच्छेदनशब्दः, सदोषोऽपरस्तु निर्दोषः, एवं सति कस्य न खपक्षसिद्धिर्भवेत् - सर्वस्यापि वा गाढवचन (वागाडम्बर) मात्रेण भवत इव स्वाभिप्रेतार्थसिद्धिर्भवेदिति भावः । ततश्चास्माभिरप्येवं सटिप्पणा | खोपड़ वृचिः ॥ गाथा- ६० ॥२३०॥ Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ +CRUCHA वक्तुं शक्यम् , योऽयं वस्त्रच्छेदनसमुत्थः शब्दः स निदोषः, शब्दत्वाद्, भवत्परिकल्पित(निर्दोष)शब्दवदित्यादि ॥" तत्तस्मात्कारणात् , धर्मपरीक्षा 8 | तत्र वस्त्रच्छेदाधिकारे, सम्मतिवचनं प्रज्ञप्तेः “जीवे णं एस जीवे" इत्यादि, नान्यार्थ किं त्वेजनादिक्रियाणामारम्भाविनाभावित्व इसटिप्पणा ॥२३॥ स्वोपज्ञ 18 प्रतिपादकमेव, अन्यथैतदर्थसमर्थनार्थमेतत्सूत्रमुपन्यस्तवन्तं तं पूर्वपक्षिणमन्यार्थप्रदर्शनेनैतदभिप्रायानभिज्ञमवक्ष्यत् कल्पभाष्यकृ वृधिः ॥ |दिति । अस्मादेव भगवतीसूत्रादबाधितयथाश्रुतार्थाद्यावदेजनादिक्रिया तावदारम्भादिसम्भव इति केवलिनो द्रव्यहिंसायां न सन्देह गाथा-६१ २] इति भावः ॥ ६० ॥ एतदेव स्पष्टयति | ॥२३॥ | किरिआओ अंतकिरिया-विरोहिणीओ जिणेण भणिआओ ॥ आरंभाइजुआओ मंडियपुत्तेण पुढेणं ॥६१॥16 [क्रिया अन्तक्रियाविरोधिन्यो जिनेन भणिताः ।। आरम्भादियुता मण्डितपुत्रेण पृष्टेन ॥ ६१॥] व्याख्या-'किरिआओ'त्ति । मण्डितपुत्रेण पृष्टेन जिनेन श्रीवर्द्धमानस्वामिना, क्रिया एजनाद्याः, आम्भादियुता:| आरम्भादिनियताः, अन्तक्रियाविरोधिन्यो भणिताः । तथा च भगवतीसूत्रम्-'जीवे णं भंते ! सया समियं एअइ वेयइ ५ चलइ फंदइ घट्टइ खुम्भइ उदीरइ तं तं भावं परिणमइ ?, हंता मण्डियपुत्ता! जीवेणं सया समियं एअइ, जाव तं तं भावं परिणमइ ॥ जावं | च णं भंते ! से जीवे सया समियं जाव तं तं भावं परिणमइ, तावं च णं तस्स जीवस्स अंते अंतकिरया भवइ ?, णो इणढे समढे । से केणद्वेण भंते ! एवं वुच्चइ-जावं च णं से जीवे सया समिअंजाव अंतकिरिया णो भवइ ?, मंडियपुत्ता ! जावं च णं से जीवे सया सनिअंजाव परिणमइ, तावं च णं से जीवे आरंभइ सारंभइ समारंभइ, आरंभे वट्टइ सारंमे वडइ समारंभे वट्टइ, आरंभमाणे सारंभमाणे समरंभमाणे, आरंभे वट्टमाणे सारंभे वट्टमाणे समारंभे वट्टमाणे, बहूणं पाणाणं भूआणं जीवाणं सत्ताणं दुक्खावणयाए सोआ RUKUR-USEX Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२३२॥ सटिप्पणा टू।स्वोपक्ष वृतिः ॥ गाथा-६१ ॥२३२॥ GRAHALISAHARSHASHA वणयाए जूरावणयाए तिप्पावणयाए पिट्टावणयाए किलामणया उद्दावणयाए परियावणयाए वट्टइ, से तेणद्वेण मंडियपुत्ता एवं वुच्चइ, जावं |च से जीवे सया समियं एजति जाव परिणमति, तावं च णं तस्स जीवस्स अंते अंतकिरिया ण हवइत्ति ।" एतवृत्तिर्यथा-'क्रि माधिकारादिदमाह-जीवेणं इत्यादि । इह जीवग्रहणेऽपि सयोग एवासौ ग्राह्यः, अयोगम्यैजनादेरसम्भवात् ; मदा-नित्यं, समियं ति-सप्रमाण, एयइत्ति एजते कम्पते, 'एज कम्पने इति वचनात् । वेयात्ति व्येजते विविधं कम्पते. 'चलई ति स्थानान्तरं गच्छति, | 'फंदइति स्पन्दते किश्चिचलति, 'स्पदि किञ्चिच्चलने' इति वचनात , अन्यमवकाशं गत्वा पुनस्तत्रयागच्छतीत्यन्ये, 'घ'त्ति सर्वदिक्षु चलति, पदार्थान्तरं वा स्पृशति; 'खुम्भइ'त्ति क्षुभ्यति-पृथिवीं प्रविशति, क्षोभयति वा पृथिवीम् , बिभेति वा; 'उदीग्इ'त्ति प्राबल्येन प्रेरयति, पदार्थान्तरं वा प्रतिपादयति । शेषक्रियासङ्ग्रहार्थमाह-'तं तं भायं परिणमति'त्ति उत्क्षेपणाव(प)क्षेपणाकुश्चनप्रसा| रणादिकं परिणाम यातीत्यर्थः । एषां वैजनादिभावानां क्रमभावित्वन सामान्यतः सदेति मन्तव्यम् , नतु प्रत्येकापेक्षया, क्रमभाविनां युगपदभावादिति । 'तस्स जीवस्स अंते'त्ति मरणान्ते 'अंतकिरिय'त्ति सकलकर्मक्षयरूपा । 'आरम्भईत्ति आरभते पृथिव्यादीनुपद्रवयति, 'सारंभइत्ति संरभते-तेषु विनाशसंकल्पं करोति, 'समारंभइ'त्ति समारभते-तानेव परितापयति, आह च| "संकप्पो संरंभो, परितावकरो ह(भ)वे समारंभो ॥ आरंभो उद्दवओ, सवणयाणं विसुद्धाणं ॥१॥ इदं च क्रियाक्रियावतोः कथञ्चिदभेद | इत्यभिधानाय तयोः समानाधिकरणतः सूत्रमुक्तम् । अथ तयोः कथञ्चिद्भेदोऽप्यस्तीति दर्शयितुं पूर्वोक्तमेवार्थ व्यधिकरणत आह'आरंभे'इत्यादि । आरम्भेऽधिकरणभृते वर्तते जीवः, एवं संरंभे समारम्भे च, अनन्तरोक्तवाक्यार्थद्वयानुवादेन प्रकृतयोजनामाह-आरभमाण. संरभमाणः समारभमाणो जीवः-इत्यनेन प्रथमो वाक्यार्थोऽनुदितः, 'आरम्भे वर्तमानः' इत्यादिना तु द्वितीयः, CANCAUSANGALOCAR Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्र सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-६१ &ा दुक्खावणयाए' इत्यादौ वशब्दस्य प्राकृतप्रभवत्वाद् दुःखापनायां-मरणलक्षणदुःखप्रापणायाम् , अथवेष्टवियोगादिदुःखहेतुप्रापणायां धर्मपरीक्षा वर्त्तते, इति योगः, तथा शोकापनायां दैन्यनापणायाम् , 'जूरावणयाए'त्ति शोकातिरेकाच्छरीरजीर्णताप्रापणायाम् , 'तिप्पावण॥२३३॥ माए'त्ति पापनायां 'तिपृ-टेप क्षरणार्थाविति वचनात्' शोकातिरेकादेवाश्रुलालादिक्षरणप्रापणायाम् । 'पिट्टावणयाए'त्ति पिट्टनप्रा- &ापणायाम् , ततश्च परितापनायां शरीरसन्तापे वर्तते, क्वचित्पठ्यते 'दुक्खावणयाए'इत्यादि, तच्च व्यक्तमेव । यच्च तत्र 'किला मणयाए उद्दवणयाए' इत्यधिकमभिधीयते. तत्र 'किलामणयाए'त्ति ग्लानिनयने, 'उद्दवणयाए'त्ति उत्रासन इति । अत्र ह्येजनादिक्रियाणामारम्भादिद्वारैवान्तक्रियाविरोधित्वं प्रतीयते । आरम्भादीनां चैजनादिक्रियानियतत्वम् , नियमश्चायं यथासम्भवं द्रष्टव्यः, तेन नाप्रमत्तानामारम्भवत्संरम्भसमारम्भयोरप्यापत्तिरिति वृद्धाः । युक्तं चैतत्-"जाव णं एस जीवे सया समिअं एअइ वेयइ जाव तं तं भावं परिणमइ ताव पं अट्ठविहबंधए वा सत्तविहबंधए वा छविहबंधए वा एगविहबंधए वा, नो णं अबंधए ।" [यावदेष जीवः | सदा समितमेजते, व्येजते यावत् तं तं भावं परिणमते तावदष्टविधवन्धको वा सप्तविधबन्धको वा षड्विधबन्धको वा एकविधबन्धको हवा, नो अबन्धकः ॥] इत्यत्रैजनादिक्रियाणामष्टविधाद्यन्यतरबन्धव्याप्यत्ववत्प्रकृतेऽप्यारम्भाद्यन्यतरव्याप्यत्वस्यैव व्युत्पत्तिमर्यादया लाभात् । परः पुनरेनमेवार्थ "सुमुनीनां शोभना मुनयः सुमुनयः सुसाधवस्तेषामप्रमत्तगुणस्थानकादारभ्य त्रयोदशगुणस्थानं यावदारम्भे वर्तमानानामप्यारम्भिकी क्रिया न भवति" इत्यादि स्वयमेव ग्रन्थान्तरे लिखितमस्मरन्निवान्यथैवात्र व्याख्याप्रकारमारचयति । तथाहि-अन्तक्रियाप्रतिबन्धकास्तावद्योगा एव. यावद् योगास्तावदन्तक्रिया न भवति, योगनिरोधे च भवतीति तेषां तत्प्रतिबन्धकत्वाद्, I 'यदभावो यत्र कारणं तदेव तत्र प्रतिबन्धकमिति' जगत्स्थितेः। न चैवं क्वाप्यागमे जीवघातनिरोधे तजन्यकर्मबन्धनिरोधे वाऽन्तक्रिया GANGANAGAURANGACANCINGH Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२३४॥ | खोपड़ ASS भणिता । तस्मात्साक्षाजीवघातलंक्षण आरम्भो नान्तक्रियायाः प्रतिबन्धकः, तदभावेऽन्तक्रियाया अभणनात् , प्रत्युतान्निकापुत्राचार्य-1 सटिप्पणा गजसुकुमारादिदृष्टान्तेन सत्यामपि जीवविराधनायां केवलज्ञानान्तक्रिययोर्जायमानत्वात् कुतस्तत्प्रतिबन्धकत्वशङ्कापीति । अत्र सूत्रे एजनादिक्रियाजन्य आरम्भो न भणितः, किन्तु क्रियारम्भयोरेकाधिकरणे नियमो भणितः, स चैवं-यो यावत्कालं यत(एज)नादिक्रि-18| वृत्तिः॥ | यावान् तावत्कालं स आरम्भादिमानेव, एवं च सति कम्पनादिक्रिया व्याप्या, आरम्भश्च व्यापकः, तेन कम्पनादिक्रिया नारम्भहेतुः, गाथा-६१ किन्त्वारम्भः कम्पनादिक्रियाहेतुः । यथा 'यावत्कालं यो धूमवाँस्तावत्कालं स आर्दैन्धनप्रभववह्निमानेव' इत्यत्र धूमस्तथाभूतवहर्जनको ॥२३४॥ न भवति, भवति च तथाभूतो वहिधूमजनक इत्यन्तक्रियाप्रतिबन्धकारम्भव्याप्यत्वेन कम्पनादिक्रियाणामन्तक्रियाप्रतिवन्धकत्वं व्या| ख्येयम् , आरम्भशब्देन च योगा उच्यन्ते, जीवघातादिलक्षणारम्भादिजनकत्वेन कारणे कार्योपचारात् , शास्त्रसम्मतं च योगानामार-14 म्भत्वम् । तदुक्तं भगवतीवृत्ती-"ननु 'मिथ्यात्वाविरतिकषाययोगाः कर्मबन्धहेतव' इति प्रसिद्धिः, इह तु आरम्भिक्यादयोऽभिहिता इति कथं न विरोधः? उच्यते-आरम्भपरिग्रहशब्दाभ्यां योगपरिग्रहः, योगानां तद्रूपत्वात् , शेषपदेषु च शेषबन्धहेतुपरिग्रहः प्रतीत एवेति ।” एतच्चायुक्तम् , आरम्भादिशब्दत्रयेण योगामिधानस्य दुर्घटत्वाद् , एजनादिक्रियातिरिक्तकायादिसध्रीचीनजीवव्यापाररूपयोगसद्भावे प्रमाणाभावाद् , योगानां योगनिरोधरूपान्तक्रियायां प्रतिबन्धकत्वाभावाच्च, नहि घटो घटनाशं प्रति प्रतिबन्धक इति । | तस्मादेजनादिरहितो नारम्भादिषु वर्त्तते, तथा च न प्राणादीनां दुःखापनादिषु, तथा च योगनिरोधाभिधानशुक्लध्यानेन सकलकर्मध्वं-15 सरूपाऽन्तक्रिया भवतीति भगवतीवृत्तावेवाग्रे व्यतिरेकप्रदर्शनादेजनादीनामारम्भादिद्वाराऽन्तक्रियाविरोधित्वव्याख्यानमेव न्याय्यमिति । “यत्तु एवमपि यद्यारम्भादिशब्दैरुक्तप्रकारेणेहाव्याख्यातत्वात् साक्षाजीवघातोऽभिमतः, तहिं "जीवे णं भंते ! सया समिश्र Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२३५॥ सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा-६२ ॥२३५॥ USECREGACCUDAMAULI एयइ' इत्यादिसामान्यसूत्रे सयोगिजीवः केवलिव्यतिरिक्त एव ग्राह्यः, अन्यथा "सत्तहिं ठाणेहिं केवलिं जाणेजा"-इत्यादि विशेषमूत्रविरोधेन सूत्राभिप्रायकल्पने मतिकल्पना महानर्थहेतुः-इत्यायुक्तं" तदुपहासपात्रम् , वृत्ति कृदभिप्रायोलङ्घनेन स्वस्यव मतिकल्पनाया | महानर्थहेतुत्वात् , 'सत्तहिं ठाणेहि' इत्यादिसूत्रस्य भिन्नविषयत्वेन प्रकृतसामान्यसूत्रावधिकविशेषसूत्रस्य केनापि ग्रन्थकारेणानुपदर्शितत्वाचेति ॥६१॥ स्यादियमाशङ्का-सकलसयोगिगतेजनादिक्रियासामान्यस्य न साक्षादारम्भादिनियतत्वम् , भगवतीवृत्तावेव मूक्ष्मपृथिव्यादीनां साक्षादा-मारम्भकन्वनिषेधाद् , एवं च भवत्यपि केवलिनः सदा साक्षादारम्भानभ्युपगमेन यदा तदभावस्तदा द्वाराभावादेजनादिक्रिययाऽप्रतिबन्धात्केवलज्ञानो पत्त्यनन्तरमेव केवलिनोऽन्तक्रियाप्रसङ्गः । यदि चान्तक्रियायां कदाचित् क्रियामात्रस्य कदा| चिच्च साक्षादारम्भस्यानियतविरोधित्वं स्वीक्रियते तदा नियतारम्भादिद्वारकत्वेन तद्विरोधित्वव्याख्यानविरोध इत्यत्राहआरंभाइजुअत्तं, तस्सत्तीए फुडेहि ण उ तेहि ॥ तस्सत्तीविगमे पुण, जोगणिरोहो अपडिबद्धो॥६॥ [आरम्भादियुतत्वं तच्छक्त्या स्फुटन तु तैः । तच्छक्तिविगमे पुनर्योगनिरोधोऽप्रतिबद्धः ॥ ६२ ॥ व्याख्या-आरम्भादियुनत्वं' आरम्भादिनियतत्वं 'क्रियाणाम्' इति प्राक्तनमिहानुषज्यते; 'तच्छक्त्या' आरम्भादिशक्त्या, तुरेवकारार्थों भिन्नक्रमश्च, नतु तैः स्फुटैः-स्फुटैरेव तैरारम्भादिभिनेत्यर्थः । अयं भाव:- स्थूलकालावच्छेदेन तावदेतत्सूत्रोक्त एजनादिक्रियाणां साक्षादारम्भनियमो बादरयोगस्य नासम्भवी, इत्थम्भृतनियमस्यापि सूत्रेऽभिधानाद् , अत एव यस्मिन् समयें कायिकी क्रिया तस्मिन् पारितापनिकी प्राणातिपातिकी च प्रज्ञापनोक्तेशनियमेनैव वृत्तिकृतोपपादिता । तथाहि-"समयग्रहणेन चेह सामान्यः कालो गृह्यते, न पुनः परमनिरुद्धो यथोक्तखरूपो नैश्चयिका समयः, परितापनस्य प्राणातिपातस्य वा बाणादिक्षेपजन्यतया Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२३६॥ कायिक्याः प्रथमसमय एवासम्भवादिति ॥" अयं च नियम आरम्भजातीयस्य दोपत्वस्फुटीकरणार्थ व्यवहारेणोच्यते, न तु केवलिनो-16 भासटिप्पणा ऽप्यारम्भो दोष इति नानुपपत्तिः, तथापि निश्चयतो योगानां केवलानामेव यत्प्रतिवन्धकत्वं परेणोद्भाव्यते, तत्र वयं वदामः-न स्फु-Rोपन टारम्भयुक्तानां नवा केवलानां योगानामन्तक्रियाप्रतिबन्धकत्वं निश्चिनुमः, किन्वारम्भशक्तियुक्तानामन्तक्रियाविरोधित्वं प्राणिघातानु-18 वृत्तिः॥ कूलपुद्गलप्रेरणाकारिस्थूलक्रियारूपारम्भजननशक्तिसहितैयोगैः स्थूलक्रियारूपारम्भजननद्वाराऽन्तक्रियाप्रतिघाताद् , अत एव चरमयोगेगाथा-६३ आरम्भजननशक्त्यनन्वयात् , तेन नान्तक्रियाप्रतिबन्ध इति तदनन्तरमेवान्तक्रियासम्भवस्तदिदमाह- छक्तिविगमे' आरम्भा ॥२३६॥ दिजननशक्तिविलये, पुनर्योगनिरोधोऽप्रतिबद्धोऽस्खलितसामग्रीकः, चरमयोगक्षणस्यैव योगनिरोधजनकत्वाद् । इदं च सूक्ष्मणुसूत्रनयमतमित्यविरुद्धमिति मन्तव्यम् ।। ६२ ।। नन्वेवमनेन सूत्रेण केवलिन आरम्भजननशक्त्यन्वितयोगवत्वं भवद्भिरभ्युपगतम् , तच्चास्माकमपि सम्मतमेव, आरम्भस्वरूपयोग्यतायाः केवलियोगेष्वस्माभिरभ्युपगमात् । न चातः केवलिन्यारम्भसम्भवोऽपि, मोहनीयाभावेन तभिरूपितफलोपहितयोग्यतायास्तत्रास्वीकारादिति पराशङ्कायामाहपोग्गलपणोलणाए, जो आरंभो इमोइ किरियाए ॥ णियमा मुणीण भणि ओ, सस्सिअनाएण सोऽदुट्टो ॥६३॥181 [पुमलप्रणोदनायां य आरम्भोज्नया क्रियया ॥ नियमान्मुनीनां भणितः शास्टिकज्ञातेन सोऽदुष्टः ॥ ६३ ॥] व्याख्या-'पोग्गलपणोल्लणाए'त्ति । अनयाऽऽरम्भशक्त्या हेतुभूतया, क्रियया-एजनादिलक्षणया, पुद्गलप्रणोदनायां जीवघनलोकान्तःस्थापरापरपुद्गलप्रेरणायां तथाविधसहकारिसम्पर्कसमुद्भूतायां सत्यां, य आरम्भो भवति, स नियमान्मुनीनां शास्यिकज्ञातेनादुष्टो भणितः। अयं भावः-स्थूलक्रियया पुद्गलप्रेरणायामारम्भस्तावत्साधूनामप्यवर्जनीयो भवति । अत एवाऽऽ Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२३७॥ SHRSS हारकसमुद्घातनिःसृष्टपुद्गलैरपि शरीरसम्बद्धस्तदसम्बद्धैर्वा प्राणादिधाते त्रिक्रियत्वादिकमुक्तम् । तथा च समुद्घातपदे प्रज्ञापनासूत्रम्-"तेणं भंते ! पोग्गला णिच्छूढा समाणा जाई तत्थ पाणाई भूआई जीवाई सत्ताई अभिहणंति जाव उवद्दवंति, ते णं भंते जीवे सटिप्पणा ॥ खोपज्ञ कइकिरिए?, गोयमा! सिय तिकिरिए सिय चउकिरिए सिय पंचकिरिए। तेणं भंते ! जीवा ताओ जीवाओ कइकिरिआ?,गो एवं चेव, वृत्तिः ॥ से णं भंते ! नीचे ते य जीवा अण्णेसि जीवाणं परंपराधाएणं कइकिरिया ?, गो०! तिकिरियावि चउकिरियावि पंचकिरियावि"त्ति । INमाथा-६३ ते भदन्त ! पुद्गला निक्षिप्ताः सन्तः यान् तत्र प्राणान् भूतान् जीवान् सत्त्वान् अभिनन्ति, यावदुपद्रवन्ति स भदन्त ! जीवः कतिक्रिया, ॥२३७॥ | गौ० ! स्यात् त्रिक्रियः स्यात् चतुष्क्रियः स्यात्पञ्चक्रियः। ते च भदन्त जीवाः ते कतिक्रियाः१ । गौ० एवमेव स च भदन्त ! जीवः तेच जीवा अन्येषां जीवानां परम्पराघातेन कतिक्रियाः?, गौ०! स्याद् त्रिक्रिया अपि, चतुष्क्रिया अपि, पञ्चक्रिया वेति ॥] परं प्रमत्ततादशायामारम्भप्रत्यया क्रिया निमित्तम् , अप्रमत्ततादशायां तु धार्मिकक्रियायोगान्तर्भूततया शास्यिकदृष्टान्तेन हितत्वाद् योगातिरिक्त दोषविधया न दोषभाक् । तदुक्तं बृहत्कल्पभाष्ये-"आहारणीहारविहीसु जोगो, सव्वो अदोसाय जहा जयस्स ॥ हिआय सस्संमि व सस्सियस्स, भंडस्स एवं परिकम्मणं तु ॥३९३१॥" यथा यतस्य प्रयत्नपरस्य साधोः, आहारनीहारादिविधिविषयः मर्वोऽपि | योगो भवन्मतेनाप्यदोषाय भवति, तथा भाण्डस्योपकरणस्य परिकर्मणमपि छेदनादिकमेवमेव यतनया क्रियमाणं निर्दोषं द्रष्टव्यम् । दृष्टान्तमाह-'हियाय सरसंमि व सस्मि अस्सत्ति । शस्येन चरतीति शास्यिकः कृषीवलः, तस्य यथा तद्वि(शस्यविषयं परिकर्मण निद्दिणनादिकं, हिताय भवति, तथेदमपि भाण्डपरिकर्मणम् । तथा चोक्तं-"यद्वच्छस्यहितार्थ, शस्थाकीर्णेऽपि विचरतः क्षेत्रे॥ या भवति शस्यपीडा, यत्नवतः साऽल्पदोषाय ॥१॥ तद्वज्जीवहितार्थ, जीवाकीर्णेऽपि विचरतो लोके ॥ या भवति जीवपीडा, यत्नवतः SCHECRUCRECRECRUCROCOM -SHA Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२३८॥ साऽल्पदोषाय || २ ||" इति । तथा च स्थूलक्रियैवारम्भरूपा सम्पन्ना, मोहनीयं च न तस्यां हेतुः, दृष्टेष्टविरोधाद्-इत्येवम्भूतारम्भस्य भगवति सत्त्वेन बाधकमित्यारम्भशक्ति रेवारम्भाक्षेपिका, अन्यथा तु चरमयोग इव प्राक्तनयोगेष्वप्यारम्भशक्तिकल्पने प्रमाणाभावः, निश्चयेनं कार्य कुर्वत एव कारणत्वाभ्युपगमाद् । न च शक्तिविशेषं विना योगत्वेनैव केवलियोगस्यारम्भस्वरूपयोग्यत्वाभ्युपगमो यौक्तिकः, चरमयोगस्यापि तत्त्वापत्तेः । न चेष्टापत्तिः, आरम्भस्वरूपयोग्ययोगत्वेनान्तक्रियाविरोधित्वाद् - इत्यारम्भशक्तिसवें केवलिनः स्थूलक्रियारूपारम्भो नानुपपन्न इति ।। ६३ ।। एतदेवाह - सो केवल हवे, चलोवगरणत्तणं जमेयस्स ॥ सहगारिवसा मिययं, पायं थूलाइ किरिया ॥ ६४ ॥ [ स केवलिनोऽपि भवेद् चलोपकरणत्वं यदेतस्य । सहकारिवशान्नियतं प्रायः स्थूलया क्रियया ॥ ६४ ॥ ] व्याख्या - 'सो त्ति' स पुद्गलप्रेरणाद्वारक आरम्भः, केव लिनोऽपि भवेद्, यद् यस्माद, एतस्य केवलिनश्च लोपकरणत्वं सहकारिवशाद् - गमनक्रिया परिणामादिसहकारिवशात्, प्रायः स्थूलया क्रियया नियतं वर्त्तते । अयं भावः - चलोपकरणत्वं तावद् भगवतोऽप्यस्त्येव, तथा च भगवती सूत्रम् - "केवली णं भंते! अस्सि समयंसि जेसु आगासपएसेसु हत्थं वा पायं वा बाहुं वा उरुं वा ओगाहित्ताणं चिट्ठह पभू णं केवली सेअकालंसि तेसु चैव आगासपएसेसु हत्थं वा जाव ओगाहित्ता णं चिट्ठित्तए १, गोयमा ! इसम | से णं भंते ! एवं बुच्चइ ? जाव केवली णं अस्सि समयंसि जेसु आगासपएसेसु जाव चिट्ठइ णो णं पभू केवली सेयकालंसि वि तेसु चैव आगासपएसेसु हत्थं वा जाव चिट्ठित्तए १, गोयमा ! केवलिस्स णं वीरियसजोगसद्दव्वयाए चलाई उवगरणाई भवति, चलोवगरणट्टयाए अ णं केवली अस्सि समयंसि जेसु आगासपएसेसु हत्थं वा जाव चिह्न णो णं पभू केवली से कालंसि वि सटिप्पणा | खोपड वृचिः ॥ गाथा- ६४ ॥२३८॥ Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२३९॥ तेसु चेत्र चिट्ठित्तए, से तेणट्ठेणं जाव बुच्चइ केवली अस्सि समयंसि जाव चिट्ठित्तए | " [केवली भदन्त । अस्मिन् समये येष्वाकाशप्रदेशेषु हस्तं वा पादं वा बाहुं वा उरुं वा अवगाह्य तिष्ठति प्रभुः केवली एष्यत्काले तेष्वेवाकाशप्रदेशेषु हस्तं वा यावदवगाह्य स्थातुम् ? गौतम ! नायमर्थः समर्थः । स केनार्थेन भदन्त ? एवमुच्यते - यावत्केवली अस्मिन् समये येष्वाकाशप्रदेशेषु यावतिष्ठति न प्रभुः केवली एष्यत्कालेऽपि तेष्वेवाकाशप्रदेशेषु हस्तं वा यावत्स्थातुम् । गौतम ! केवलिनो वीर्यसयोगसद्द्रव्यतया चलानि उपकरणानि भवन्ति, 'चलोपकरणार्थतया च केवली अस्मिन् समये येष्वाकाशप्रदेशेषु हस्तं वा यावत्तिष्ठति, न प्रभुः केवली एष्यत्कालेऽपि तेष्वेव स्थातुम्, स तेनार्थेन यावदुच्यते अस्मिन् समये यावत्स्थातुम् |] एतद्वृत्तिर्यथा - 'अस्मि समयंसि'त्ति । अस्मिन् वर्त्तमानसमये 'उरगाहित्ता णं' ति अवगाद्य - आक्रम्य 'सेवकालंसि वित्ति एण्यत्कालेsपि वीरियस जोगसन्याएति वीर्य - वीर्यान्तरायक्षयप्रभवा शक्तिः तत्प्रधानं सयोगं मानसादिव्यापारयुक्तं यत् सद्विद्यमानं द्रव्यं जीवद्रव्यं तत्तथा वीर्यसद्भावेऽपि जीवद्रव्यस्य योगान् विना चलनं न स्यादिति सयोगशब्देन सद्द्रव्यं विशेषितम् । सदिति विशेषणं च तस्य सदासत्तावधारणार्थम् । अथवा ख आत्मा तद्रूपं द्रव्यं स्वद्रव्यम्, ततः कर्मधारयः, अथवा वीर्यप्रधानः सयोगो योगवान् वीर्यसयोगः, स चासौ सद्रव्यश्च मनःप्रभृतिवर्गणायुतो वीर्यसयोगसद्द्रव्यस्तस्य भावस्तत्ता, तया हेतुभूतया 'चलाई 'त्ति अस्थिराणि 'उबगरणाई' अङ्गानि, 'चलोवगरणदृगाए अ चिलोपकरणलक्षणो योऽर्थस्तद्भावश्चलोपकरणता तया चशब्दः पुनरर्थ इति । एतच्च चलोपकरणत्वं निरन्तर सूक्ष्मगात्रसञ्चारबीजं चलनसामान्नसामग्र्यां निविशमानं गमनादिक्रियापरिणाममात्रसहकृतं सद् गमनादिस्थूलक्रियामपि जनयत्येव । सा च स्थूलक्रियाऽव| जनीयारम्भसङ्गता सती केवलिनो न वीर्यान्तरायक्षयक्षतिकरी, यतस्तत्सामान्यकारणं चलोपकरणत्वमपि नामकर्मपरिणतिविशेषापादि सटिप्पणा || स्वोपज्ञ वृषः ॥ गाथा - ६४ ॥२३९॥ Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२४०॥ तयोगाशक्तिनियतमेव । यदाह सूत्रकृताङ्गवृत्तिकृत् - "सयोगी जीवो न शक्नोति क्षणमप्येकं निश्चलं स्थातुम्, अग्निना ताप्यमानोदकवत् कार्मणशरीरानुगतः सदा परिवर्त्तयन्ने वास्ते" इत्यादीति । तत्कार्यस्थूलक्रियायामप्यशक्यपरिहारारम्भ (म्भा) त्यागे योगाशक्तिरेव निमित्तमिति । केचित्तु सूक्ष्मक्रियाणामिव स्थूलक्रियाणामपि चलोपकरणतावशादनियत देशत्वावश्यकत्वात् तत्प्रयुक्तारम्भसम्भवः केवलिनोऽपि दुर्निवार इत्याहुः ||६८ || ननु यद्येवं स्थूलक्रियैव द्रव्यारम्भस्तदा केवलिनस्तस्य कादाचित्कत्वं न स्याद् इष्यते चायम - | न्यसाधूनामपि कादाचित्क एव, 'आहच्च हिंसा समिअस्स जा उ, सा दव्वओ होइ ण भावओ उ (वृत्तिः २२७ पृष्ठे ) । "त्ति वचनाद्इत्याशङ्कामेतद्वचनं फलीभूतसाक्षात्सम्बद्धारम्भविषयत्वान्नानुपपन्नम्, स च केवलिनोऽपि कादाचित्क एवेत्यभिप्रायेण निराचिकीर्षुराहसक्खं तु कायफासे, जो आरंभो कयाइ सो हुज्जा | अहिगिश्च तं णिमित्तं, भग्गिजइ कम्मबंधठिई ॥ ६५॥ ( साक्षात्तु कायस्पर्शे य आरम्भो कदाचित्स भवेत् ।। अधिकृत्य तं निमित्तं मृग्यते कर्मबन्धस्थितिः ॥ ६५ ॥ ) 'सक्खं तुत्ति साक्षान्नु कायस्पर्शे य आरम्भः स कदाचिदेव भवेत् तं च साक्षात्कायस्पर्शाज्जायमानं द्रव्यारम्भं व्यवहारिजनप्रतीयमानमिति गम्यं, निमित्तमधिकृत्य कर्मबन्धस्थितिर्मृग्यते शास्त्रकारैरिति गम्यम् । यद्यप्यप्रमत्तानामवश्यम्भावी जीवघातो न प्राणातिपात्वेन दोष:, तथापि निमित्तभूतस्यास्यैकाधिकरणोपादान सद्भावासद्भावकृतं फलवैचित्र्यं विचार्यत इत्यर्थः । कथमित्याहतत्थ णिमित्सरिसे, जेणोवादाणकारणाविक्खो । बंधाबंधविसेसो, भणिओ आयारवित्तीय ॥ ६६ ॥ [ तत्र निमित्ते सदृशे येनोपादानकारणापेक्षः । बन्धाबन्धविशेषो भणित आचारवृयाम् ।। ६६ ।। ] सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ दुचिः ॥ गाथा - ६५ ६६ ॥२४० ॥ Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्याख्या-'तत्थ'त्ति । तत्र साक्षात्कायस्पर्शाजायमानारम्भ निमित्ते सहशे आकेवलिनमेकरूपे सति येन कारणेनोपादाधर्मपरीक्षा नकारणस्यापेक्षा नियतसद्भावासद्भावाश्रयणरूपा यत्र स तथा बन्धाबन्धविशेषः, कर्मबन्धतारतम्यतदभावप्रकारो भणित इति सटिप्पणा ॥२४॥ F॥ खोपड़ आचारवृत्तौ । तत्र प्रथममेतदधिकारसम्बद्धमाचाराङ्गलोकसाराध्ययनचतुर्थोद्देशकस्थं सूत्रं (१५८) लिख्यते-"से अभिकम वृतिः ॥ माणे पडिकममाणे संकुचे(च)माणे पसारमाणे विणिवट्टमाणे संपलिजमाणे एगया गुणसमिअस्स रीयंतो कायसंफासं समणुचिन्ना गाथा-६६ एगइआ पाणा उद्दाइंति, इहलोगवेदणवेजावडियं जं आउट्टिकयं कम्मं तप्परिन्नाय विवेगमेति एवं से अप्पमादेणं विवेगं किट्टइ वेयवी ॥२४॥ त्ति" ॥ अथैतवृत्तिः-'सेइत्यादि । स भिक्षुः सदा गुर्वादेशविधायी एतद्व्यापारवान् भवति, तद्यथा-अभिकामन्-गच्छन् , प्रतिक्रामन् -निवर्तमानः, सङ्कुचन हस्तपादादिसङ्कोचनतः, प्रसारमन हस्तादीनवयवान् , विनिवर्तमानः समस्ताशुभव्यापाहै। रात , सम्यक् परिः समन्ताद् हस्तपादादीनवयवांस्तन्निक्षेपस्थानानि वा रजोहरणादिना मृजन सम्परिमृजन , गुरुकुलवासे वसेदिति सर्वत्र सम्बन्धनीयम् । तत्र निविष्टस्य विधिः-भूम्यामेकमूरुं व्यवस्थाप्य द्वितीयमुरिक्षप्य तिष्ठेत् , निश्चलस्थानासहिष्णुतया भूमीं प्रत्युपेक्ष्य प्रमृज्य(माय) च कुक्कुटीविज़म्भितदृष्टान्तेन सङ्कोचयेत्प्रसारयेद्वा, स्वपन्नपि मयूरवत् स्वपिति, स किलान्यसत्त्वभयादेकपार्श्वशायी सचेतनश्च स्वपिति, निरीक्ष्य च परिवर्तनादिकाः क्रिया विधत्ते इत्येवमादि सम्परिमृजन् सर्वाः क्रियाः करोति । एवं चाप्रमत्ततया पूर्वोक्ताः क्रियाः कुर्वतोऽपि कदाचिदवश्यम्भावितया यत् स्यात्तदाह-एगया' इत्यादि । एकदा कदाचिद् गुणसमितस्य गुणयुक्तस्याप्रमत्ततया यतेः रीयमाणस्य सम्यगनुष्ठानवतोऽभिक्रामतः प्रतिक्रामतः सकुचतः प्रसारयतो विनिवर्तमानस्य सम्परिमृजतः कस्याश्चिदवस्थायां कायः शरीरं तत्संस्पर्शमनुचीर्णाः कायसङ्गमागताः सम्पातिमादयः प्राणिन एके परितापमाप्नुवन्ति, एके | Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२४॥ | साटिप्पणा ४॥खोपक वृचिः ॥ गाथा-६६ ॥२४२॥ ग्लानतामुपयान्ति, एकेऽवयवषिध्वंसमापद्यन्ते । अपश्चिमावस्थां तु सूत्रेणेव दर्शयति-एके प्राणाःप्राणिनः, अपद्रान्ति-प्राणैर्विमुच्यन्ते। अत्र च कर्मबन्धं प्रति विचित्रता । तथाहि-शैलेश्यवस्थायां मशकादीनां कायसंस्पर्शन प्राणत्यागेऽपि बन्धोपादानकारणयोगाभावान्नास्ति बन्धः, उपशान्तक्षीणमोहसयोगिकेवलिनां स्थितिनिमित्तकषायाभावात् सामयिकः, अप्रमत्तयतेर्जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्तम् , उत्कृष्टतश्चान्तःकोटाकोटिस्थितिरिति । प्रमत्तस्य त्वनाकुट्टिकयाऽनुपेत्य प्रवृत्तस्य क्वचित्पाण्याद्यवयवसंस्पर्शात् प्राण्युपतापनादौ जघन्यत उत्कृष्टतश्च कर्मबन्धः प्राक्तन एव विशेषिततरः। स च तेनैव भवेन क्षिप्यत इति सूत्रेणैव दर्शयितुमाह-'इहलोग इत्यादि। इहास्मिन् लोके जन्मनि वेदनमनुभवनमिहलोकवेदनं तेन वेद्यमनुभवनीयमिहलोकवेदनवेद्यं तत्रापतितमिहलोकवेदनवेद्यापतितम् , इदमुक्कं भवति-प्रमत्तयतिनापि यदकामतः कृतं कर्म कायसङ्घट्टनादिना तदैहिकभवानुबन्धि, तेनैव भवेन क्षिप्यमाणत्वाद् , आकुट्टि(ट्टी)कृतकर्मणि तु यद्विधेयं तदाह 'ज आउद्दी' इत्यादि । यत्तु पुनः कर्माकुट्टया कृतमागमोक्तकारणमन्तरेणोपेत्य प्राण्युपमर्दनेन विहितं तत्परिज्ञाय ज्ञपरिज्ञया विवेकमेति विविच्यतेऽनेनेति विवेकः, प्रायश्चित्तं दशविधं तस्याऽऽन्तरं भेदमुपैति तद् , विवेकं वाऽभावाख्यमुपैति, तत्करोति येन कर्मणोऽभावो भवतीति ॥' अत्र गुर्वादेशविधायिनमभिक्रमणादिव्यापारवन्तमप्रमत्तसंयतमवश्यम्भाविजीवविराधनाभागिनमनूद्य कर्मबन्धाबन्धविशेषविधानं वृत्तौ पूरितम् , अनाकुट्टिकयाऽऽकुट्टिकया च जीवविराधनाकारिणं प्रमत्तसंयतमनूयेहलोकवेदनवेद्यापतितस्य विवेकयोग्यस्य च कर्मबन्धस्य विधानं साक्षादेव सूत्रेऽभिहितम् , तत्र केवली 'उद्देसो पासगस्स पत्थिति वचनाद् गुर्वादेशविधायित्वाभावात् सम्भावितभाविजीवघातभयाविनाभाविनियताभिक्रमणादिक्रियाभावाच नानूद्य इति तद्वहिर्भावनैवाघश्यम्भाविजीवविराधनानिमित्तकबन्धाबन्धविचार इति परोऽभिमन्यते, तन्महामृषावादविलसितम् । साक्षादेव केवलिनमनूध वृत्तौ तत्स AAAAAAA Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा स्वोपक्ष गाथा-६६ ॥२४३॥ मर्थनस्य ब्रह्मणापि पराकर्तुमशक्यत्वात् । तत्रानूद्यतावच्छेदकधर्म विरोधोद्भावनेन च वृत्तिकृत एव सूत्राभिप्रायानभिज्ञता वक्तुमुपधर्मपरीक्षा क्रान्तो देवानांप्रियस्तमेव मन्यमानस्तमेव चाऽवमन्यस इति महाकष्टं तद् । न चैतद्विरोधोद्भावनं विचार्यमाणं चमत्कारकारि, गुर्वादेश॥२४३॥ विधायित्वस्य भगवति फलतोऽभिधानाविरोधाद् , अत एव " किं ते भंते ! जत्ता ? सोमिला ! जं मे तवणियमसंजमसज्झायज्झाणायस्सयमाईसु जयणा । सेतं जत्ता" । इत्यत्र सूत्रे एतेषु च यद्यपि भगवतो न किञ्चित्तदानीं विशेषतः सम्भवति, तथापि तत्फलसद्भा- वाचदस्तीत्यवगन्तव्यमित्युक्तम् । अभिक्रमणादियतनाव्यापाराश्च यादृशाश्छद्मस्थसंयतानामयतनामयाविनाभाविनस्तादृशा एवायतना| भयाभावेऽपि भगवतः सम्भवन्त्येव साधुसमानधर्मतयैव तस्याकल्पिकपरिहारादियतनावदभिक्रमणादियतनाया अप्युपपत्तेरिति न किञ्चि देतत् । यत्त्ववश्यम्भावित्वं प्रायोऽसम्भविसम्भविकार्यत्वम् , यदेव हि प्रायोऽसम्भवि सत् कदाचित्सम्भवति तदेवावश्यम्भावीति व्यवलाहियते, अन्यथा सर्वमपि कार्यमवश्यम्भावित्वेन वक्तव्यं स्यात् , पञ्चसमवायवादिभिजनैः सर्वस्यापि कार्यस्य नियतिजन्यतामधिकृत्या वश्यम्भावित्वेनेष्टत्वात् , कालादिषु पञ्चसु कारणेषु नियतेरपि परिगणनाद्, अत एव जमालिनिमित्तकनिह्ववमार्गोत्पत्तिरवश्यम्भाविनीति प्रवचने प्रतीतिः । तीर्थकरदीक्षितशिष्यात् निदवमार्गोत्पत्तेः प्रायोऽसम्भविसम्भवाद्, एवमप्रमत्तसंयतस्य कायादिव्यापाराजायमानानाभोगवशेन कादाचित्कीत्यवश्यम्भाविनी वक्तुं युज्यते मतु केवलिनः, तस्य तत्कादाचित्कतानियामकानाभोगाभावादिति नावश्यम्भाविविराधनावन्तं केवलिनमनूध किमपि विचारणीयमस्ति' इति परेणो ष्यते, तदसद् । अनाभोगादेरिव विषयासन्निधानादेर पिकादाचिकत्वेनावश्यम्भावित्वोपपत्तेः केवलिनोऽप्यप्रमत्तयतेरिवावश्यम्भाविजीवविराधनोपपत्तेः। अन्यथा तमधिकृत्य वृत्तिकृता जयत्सामयिककर्मबन्धाबन्धव्याख्यानं कृतं तस्यात्यन्तमनुपपत्तेः। किञ्च अवश्यम्भाविनी जीवविराधना प्रायोऽसम्भविसम्भवाऽप्रमत्तस्यैव Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मा नतु प्रमत्तस्य, तदीयकायव्यापाराजायमानस्य जीवघातस्य प्रायः सम्भविसम्भवत्वात् , प्रमत्तयोगानां तथास्वभावत्वाद् , अत एव प्रम-12 धर्मपरीक्षा है सटिप्पणा त्तसंयतस्य प्रमत्तयोगानङ्गीकृत्यारम्भिकी क्रियापि, तेषां योगानां जीवघातार्हत्वाद्, अन्यथा प्रमत्ताप्रमत्तयोरविशेषः सम्पयेतेति पर ॥ स्वोपक्ष ॥२४४॥ | स्वाभ्युपगमेऽवस्थितसूत्रस्यैवानुपपत्तिः, अनाकुट्टिकयाउनुपेत्य प्रवृत्तमवश्यम्भाविजीवविराधनावन्तं प्रमत्तसंयतमधिकृत्यैवेहलोकवेदन- वृतिः ॥ वेद्यापतितफर्मबन्धस्य साक्षात्सूत्रेऽभिधानात् , तस्य च जीवविराधनाया अवश्यम्भावित्वस्य प्रायः सम्भविसम्भवत्वेन परेण निषेधात् , गाथा-६६ तस्मानायं पन्थाः, किन्त्वनभिमतत्वे सत्यवर्जनीयसामग्रीकत्वमवश्यम्भावित्वव्यवहारविषयः, अत एव जिज्ञासितयोयोर्वस्तुनोः पुरः |॥२४४॥ स्थितयोरेकस्य दर्शनार्थमुन्मीलितेन चक्षुषाऽपरस्यापि दर्शनमवश्यं भवतीति व्यवहियते । अत एव च जमालेभंगवता दीक्षणे निह्न| वमार्गोत्पादस्यावश्यम्भावित्वमपि नानुपपन्नम् , तदानीं तस्यानभिमतस्याप्यवर्जनीयसामग्रीकत्वाद् एवंविधा चावश्यम्भाविनी विरा| धना संयतानां सर्वेषामपि सम्भवतीति तानधिकृत्य वृत्तिकृदुक्ता व्यवस्था केवलिन्यपि युक्तिमत्येवेति । वस्तुतः सर्वस्यापि कार्यस्य पुरुषकारभवितव्यतोभयजन्यत्वेऽपीदं कार्य पुरुषकारजनितमिदं च भवितव्यताजनितमिति विभक्तो व्यवहार एकैकस्योत्कटत्वलक्षणां बहुत्वलक्षणां वा मुख्यतामादायैव शास्त्रकाररुपपादितः! ॥ तदिह साधूनामनाकुट्या जायमाने जीवघाते भवितव्यताया एव मुख्यतया | व्याप्रियमाणत्वात् तत्रावश्यम्भावित्वव्यवहारः, न त्वनाभोगजन्यत्वमेव तत्र तन्त्रम् , आभोगपूर्वकस्य कारणिकस्यापि तस्य विवेकयो| ग्यबन्धहेतोः पृथक्करणेनेहलोकवेदनवेद्यापतितकर्मबन्धहेतुतया परिशेषितस्यावश्यम्भावित्वेनैव परिगणनात् , ततो जीवरक्षापरिणामव-13 तामाकुट्या जीवघातप्रवृत्तिरहितानां सर्वेषामेव संयतानां या काचिद्विराधना भवति साऽवश्यम्भाविनीति कायस्पर्शमनुचीर्णैः प्राणिभिरुपजायमानां तामाश्रित्याऽऽकेवलिनं वृत्ति कृदुक्तव्यवस्थायां न कोऽपि सन्देह इति सूक्ष्ममीक्षणीयम् । एवं सत्यपि परस्येयं शङ्को MORROSONAL Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्ष ॥२४५॥ मावान्नास्ति बन्धः' इत्वकर्तत्वाभावात् ;नाह का जीवघातस्तन्निमित्तका निमित्तत्वमात्रेण च कतृत्वात न्मीलति-यदुतात्र कर्मबन्धं प्रति विचित्रता । तथाहि-शैलेश्यवस्थायां कायसंस्पर्शन मशकादीनां प्राणत्यागेऽपि पञ्चविधोपादानकार*णाभावान्नास्ति बन्धः' इत्यत्र कर्तुः सम्यग्विचारे मशकादीनां प्राणत्यागस्य कर्ता किमयोगिकेवली, उताऽन्यः कश्चिद् । नाद्यः, अयोगि- सटिप्पणा कात्वकर्तृत्वयोर्विरोधेनायोगिकेवलिनः कर्तृत्वाभावात् ; नहि कायादिव्यापारमन्तरेण कर्त्ता भवितुमर्हति, 'क्रियाहेतुः स्वतन्त्रः कर्ता' इति ॥ खोपड़ | वचनात् । यदि चायोगिकेवलिनः शरीरस्य सम्पर्कादपि जायमानो जीवघातस्तन्निमित्तकत्वेन तत्कर्तृको भण्यते, तर्हि अपसिद्धान्तः वृचिः ॥ कपका मण्यत, ताह अपातवान्तादगाथा-६६ स्यात् । पुरुषप्रयत्नमन्तरेणापि प्राणत्यागलक्षणस्य कार्यस्य जायमानत्वेन पञ्चसमवायवादित्वहानेः । निमित्तत्वमात्रेण च कर्तृत्वव्यप ॥२४५॥ देशोऽपि न भवति, साध्वादिनिमित्तकोपसर्गस्य दानादेश्च साध्वादिकर्तृकत्वेन व्यपदेशप्रसक्तेः। द्वितीयविकल्पेऽन्यः कश्चित् कर्ताइत्यत्रानन्यगत्याऽनाभोगवतः कूपपातवदनिष्टोऽपि मशकादीनां निजप्राणत्यागोऽनाभोगवशेन म्रियमाणमशकादिकर्तृक एव, 'यदि मशकादीनां निजकायादिव्यापारो नाभविष्यत् तर्हि शरीरसम्पर्काभावेन निजप्राणत्यागोऽपि नाभविष्यद्-इति व्याप्तिबलेन मशकादियोगजन्यत्वात् । तथा चायोगिकेवलिनि मशकादिकर्तृका जीवविराधना बन्धाभाववती सम्भवत्यपि सयोगिकेवलिनि तु सा कथं स्यात् ? तत्र हिंसा भवन्ती तद्योगान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वेन तत्कर्तृकापि स्यात्, न च केवलिनो जीवविराधनाकर्तृत्वमिष्यत इति कर्तृकार्यभावसम्बन्धेन जीवविराधनाविचारे कथं केवलिनो निर्देशो युज्यते ? इति ॥ ६६ ॥ तत्र आहकारगसंबंधेणं, तस्स णिमित्तस्सिमा उ मजाया ॥ कत्ता पुणो पमत्तो, णियमा पाणाइवायस्स ॥ ६७ ॥ • [कारकसम्बन्धेन, तस्य निमित्तस्येयं तु मर्यादा ।। कर्ता पुनः प्रमत्तो, नियमात्प्राणातिपातस्य ॥ ६७॥] व्याख्या-'कारगसंबंधेणे'ति । कारकस्याधिकरणादिरूपस्यायोगिकेवल्यादेः पश्चानुपूर्व्या प्रमत्तसंयतान्तस्य सम्बन्धेन, Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२४६॥ सटिप्पणा खोपत्र वृत्तिः ॥ गाथा-६७ ॥२४६॥ HिAMACHUS तस्य साक्षात्कायस्पर्शप्रत्यवारम्भस्य, निमित्तस्य, इयमाचाराङ्गवृत्तिकृदुक्ता मर्यादा-अयोगिकेवल्यादिकारकसम्बन्धमात्रेणैव साक्षादारम्भस्य बाह्यस्य निमित्तस्य प्रस्तुता फलाफलविचारणा क्रियते, नतु कर्तृकार्यभावसम्बन्धेन जीवविराधनाविचारः क्रियत इति नोक्तानुपपत्तिरित्यर्थः । कर्ता पुनः प्राणातिपातस्य नियमात् प्रमत्त एव, शास्त्रीयव्यवहारेण प्रमादवत एव प्राणातिपातकत्वव्यवस्थितेः, ततो यदि कर्तृकार्यभावसम्बन्धेनैवात्र जीवविराधनाविचारः प्रस्तुतस्तदा पराभ्युपगमरीत्या केवलिन इवाऽप्रमत्तसंयतस्यापि निर्देशोऽप्रामाणिक इति सर्वमेव वृत्तिकृदुक्तं विशीर्येत । यदि चोपचारेणाप्रमत्तयतेरपि कथञ्चित्तत्कर्तृत्वमिष्यते, तदोपरिष्टादप्युपचारेणैतत्कल्पनं ग्रन्थकाराभिप्रायानुरोधादेव निराबाधमिति यदुच्यते परेण "सयोगिकेवली कदाचिजीवविराधकः सम्भवति, भवस्थकेवलित्वाद् अयोगिकेवलिवद्' इत्यत्र कदाचिजीवविराधकत्वं साध्यमयोगिकेवलिनि दृष्टान्ते नास्ति, तस्याकर्तृत्वात् । किश्च-अयोगिकेवलिदृष्टान्तदातुरयोगित्वकर्तृत्वयोविरोधापरिज्ञानमपि स्फुटमेवेत्यादि," तत्सर्वं ग्रन्थाभिप्रायापरिज्ञानविजृम्भितमिति मन्तव्यम्; न ह्येवमधिकृताचाराङ्गवृत्तिग्रन्थः कथमप्युपपादितो भवतीति ॥ ६७॥ नन्वयं ग्रन्थः प्रासङ्गिक एव । तथाहि-अयोगिकेवलिनि मशकादिघातस्तावन्मशकादिकर्तृक एव, तथा च कर्मबन्धोऽप्यध्यवसायानुगतो मशकादीनामेव भवति, एककर्तृकयोरेव कर्मबन्धोपादानकारणयोः परस्परं कार्यकारणभावसम्बन्धाद् न पुनर्भिन्नकर्तृकयोरपि, है| सांसारिकजीवकर्तृकैः पञ्चविधोपादानकारणैः सिद्धानामपि कर्मबन्धप्रसक्तेः। तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्यामनादिसिद्धकार्यकारणभावव्यवस्था सिद्धयर्थमत्र च कर्मबन्धं प्रति विचित्रतेत्यादि प्रसङ्गतोऽभिहितम् । तत्रायोगिन्युपादानकारणाभावात् कर्मबन्धाभाव इति व्यतिरेकनियमः प्रदर्शितः, स चान्वयनियमस्य दाढर्थहेतुः, अन्यथा कर्मबन्धविचित्रताविचारेऽवन्धकस्यायोगिकेवलिनो भणनमनर्थकमेव सम्पद्येत, AAAAAAA Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२४७॥ SUBCRECENGHLIG प्रयोजनाभावाद् । योगवत्सु चोपादानकारणसत्त्वे कर्मबन्धलक्षणकार्यसत्त्वमित्यन्वयनियमं प्रदर्शयन्नेव योगवतामपि कर्मबन्धवैचित्र्यमुपादानकारणवैचित्र्यायत्तमेवेति नियमसिद्धयर्थ प्रथमं कारणावैचित्र्ये कार्यर्या वैचित्र्यमुपशान्तक्षीणमोहसयोगिकेवलिनां स्थितिनिमि #सटिप्पणा ॥स्वोपन तकषायोदयाभावात् सामयिकः कर्मबन्ध इति समुच्चयभणनेन बमाण वृत्तिकारः, तेषां च त्रयाणामपि मिथ्यात्वाविरतिकषाययोगप्रमादलक्षणानां पञ्चविधोपादानकारणानां मध्ये केवलयोगस्यैव सत्त्वेन कर्मबन्धोऽपि तत्प्रत्यय एव स च सामयिकसातवेदनीयकर्मब- गाथा-६७ न्धलक्षणः समान एव भवति, विचित्रताहेतुमोहनीयोदयाभावाद्, न पुनरुपशान्तस्येव क्षीणमोहस्यापि जीवघातादिकं भवतीति बुद्धया |॥२४७॥ समुच्चयेन भणनम् ,सर्वांशसाम्यमधिकृत्य समुच्चयेन भणितेरसम्भवाद् ,अन्यथोपशान्तस्येव क्षीणमोहस्यापि जीवघातादिहेतुमोहनीयसत्तापि वक्तव्या स्यात् , तथा केवलिवदुपशान्तस्याऽपि सर्वज्ञत्वं वक्तव्यं प्रसज्येत; नहि नारकर्तियनरामराः कर्मबन्धका इत्यादिसमुच्चयभणनेन | सर्वेषामपि साम्यं कस्यापि संमतम् । तस्माद्यथा सामान्यतः कर्मबन्धमधिकृत्य नारकादीनां समुच्चयेन भणनं तथा सामयिकसातवेदनी|यकर्मबन्धमधिकृत्योपशान्तादीनां समुच्चयेन भणनमित्यत्र प्रासङ्गिके प्रथमावृत्तिग्रन्थे नास्माकमनभीप्सितसिद्धिरित्याशङ्कायामाहजो पुण इह कत्तारं, नियमा मसगाइजीवमहिकिच्च ॥ भणइ इमं पासंगिय-मइप्पसंगो फुडो तस्स ॥६८॥ [यः पुनरिह कर्तारं, नियमान्मशकादिजीवमधिकृत्य ॥ भणतीदं प्रासङ्गिकं, अतिप्रसङ्गः स्फुटस्तस्य ॥ ६८॥] . व्याख्या-'जो पुण'त्ति । यः पुनरिह शैलेश्यवस्थायामवश्यम्भाविन्या जीवविराधनायां कर्तारं नियमान्मशकादिजी | वमधिकृट्येदमाचाराङ्गवृत्त्युक्तं प्रासङ्गिक भणति तद्विराधनाकर्तृमशकादिजीवगतोपादानकर्मबन्धकार्यकारणभावप्रपञ्चप्रदर्शनमात्रप्रसङ्गप्राप्तं वदति, नतु, स्वसम्बद्धजीवविराधनाफलाफलवैचित्र्यप्रदर्शनपरम् , तस्य स्फुट एवातिप्रसङ्गः । एवं ह्यप्रमत्तसंयतस्यापि BARDASKAcc. Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RSS प्रमादनियतजीवविराधनाकर्तृत्वाभावेन जीवविराधनानिमित्तककर्मबन्धो म्रियमाणजीवगत एव पर्यवस्येद् , नत्वप्रमत्तसंयतनिष्ठ इति कर्म | सटिप्पणा धर्मपरीक्षा बन्धानुमेय विराधनाया अप्रमत्तसंयतादिषु विचित्राया अभिधानमखिलं व्यधिकरणमेव स्यादिति । किञ्च-अत्र 'कर्मबन्धं प्रति विचि ॥स्वोपत्र ॥२४८॥ त्रता' इत्यत्र 'अत्र' इति निमित्तसप्तम्याश्रयणात् संयतसम्बद्धावश्यम्भाविजीवविराधनानिमित्तमधिकृत्यैव कर्मबन्धविचित्रता वक्तुमुपक्रा वृतिः ॥ न्ता, सा च कर्मबन्धामावकर्मबन्धावान्तरभेदान्यतररूपेति नायोगिनि तद्विचित्रताऽनुपपत्तिः। अन एय-"सेलेसिं पडिवनस्स जे सत्ता तगाथा-६८ फरिसं पप्प उद्दायति मसगादी, तत्थ कम्मबंधो णत्थि। सजोगिस्स कम्मबंधो दो समया। जो अपमत्तो उद्दवेह तस्स जहन्नेण अंतोमुहुतं, ॥२४८॥ उक्कोसेणं अट्ठमुहुत्ता । जो पुण पमत्तो न य आउट्टिआए तस्स जहन्नेण अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं अट्ठसंबच्छराई । जो उण आउट्टिआए पाणे उवद्दवेइ तवो वा छेओ वा वेयावडं वा करेइ॥” (शैलेशी प्रतिपन्नस्य ये सवाः स्पर्श प्राप्यापद्रान्ति मशकादयः तत्र कर्मवन्धो नास्ति । सयोगिनः कर्मबन्धो द्वौ समयौ । यः अप्रमत्तोऽपद्रापयति तस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तमुत्कर्षेणाष्टमुहूर्तानि ॥ यः पुनः प्रमत्तो न चाकुट्टया | तस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तमुत्कृर्षेणाष्ट संवत्सराणि ॥ यः पुनराकुट्टया प्राणिनोऽपद्रापयति तपो वा छेदो वा व्यावृत्तं वा करोतीत्यादि)" इत्याचाराङ्गचूर्णावयवश्यम्भाविजीवविराधनानिमित्तक एव कर्मबन्धाभावः कर्मबन्धविशेषश्चायोगिकेवल्यादीनां संयतानां पश्चानुपू या व्यक्तः प्रतीयते । कर्मबन्धाभावादौ निमित्तत्वं च तत्र स्वसमानाधिकरणोपादानानुरोधेनाऽभिधीयमानं निमित्तमनैकान्तिकमिति दासम्प्रदायादविरुद्धम् । तथा च 'सजोगिस्स कम्मबंधो दो समया' इत्यत्र 'तत्र' इत्यस्यावश्यमनुषङ्गात् । तत्र कायस्पर्श प्राप्य सत्त्वोप द्रवे सयोगिकेवलिनो द्वौ समयो कर्मबन्ध इति स्फुटार्थप्रतीतावुपशान्तक्षीणमोहयोरपि तत्समानजातीयत्वेन तत्र द्वावेव समयौ कर्मबन्धः स्फुट इति वृत्तावुपशान्तादीनां समुच्चयेन भणनं न जीवघातमधिकृत्य, इति यदुच्यते तद्बहुश्रुतत्वयशक्षतिकरमेव, समुच्चयप्रतियोगिनां + nasto R Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | सटिप्पणा ॥ खोपड़ वृचिः ॥ गाथा-६८ ॥२४९॥ पदार्थानां तुल्यवत्प्रकृतधर्मविशिष्टक्रियान्वयित्वेनैव समुच्चयनिर्वाहाद् । एवं च यथा सिकतादौ घृतादिसंसर्गेऽपि स्नेहाभावान बन्धः, धर्मपरीक्षा बदरचूर्णसक्तुचूर्णादीनां तु चिरकालस्थितिहेतुस्नेहविशेषाभावादल्पकालीनो बन्धः, कणिकादीनां तु स्नेहोत्कर्षादुत्कृष्टबन्ध इत्यत्र ॥२४९॥ बदरचूर्णादीनां तुल्यवदेव स्नेहविशेषाभावविशिष्टप्रकृतघृतादिसंसर्गनिमित्तकाल्पकालीनबन्धभवनक्रियान्वयेनैव समुच्चयः प्रतीयते, तथा प्रकृतेऽप्युपशान्तादीनां तुल्यवदेव स्थितिनिमित्तकषायाभावविशिष्टप्रकृतजीवघातनिमित्तकसामयिकबन्धभवनक्रियान्वयेनैव समुच्चयोपपत्तरिति नारकतिर्यग्नरामरा इति दृष्टान्तेन प्रत्येकपदार्थधर्ममादाय समुच्चयखण्डनमपाण्डित्यविजृम्भितमेव, तस्य केनाप्यनभ्युपगतत्वात् । प्रकृतधर्मविशिष्टक्रियान्वयतुल्यतारूपसमुच्चयखण्डने तु समुच्चयतात्पर्यकवाक्यस्यैवानुपपत्तिरिति न किञ्चिदेतत् ॥ ६८॥ तदेवमाचाराङ्गवृत्त्यभिप्रायेण यावदयोगिकेवलिनं संयतानामपि कायस्पर्शनावश्यम्भाविन्या जीवविराधनाया व्यक्तमेव प्रतीता&ावपि ये 'अयोगिकेवलिन्यवश्यम्भावी मशकादिघातो मशकादिकर्तृको नत्वयोगिकेवलिकर्तृकः' इति शब्दमात्रेण मुग्धान् प्रतारयन्ति त एवं प्रष्टव्याः सोऽयमेवंविध एव सयोगिकेवलिनः कथं न भवति ? इति । इत्थं पृष्टाश्च त एवमुत्तरं ददते-योगवतो हि केवलिनो जीवरक्षेव भवति, तत्कारणानां शुभयोगानां सत्त्वात् । अयोगिकेवलिनस्तु योगानामेवाभावेन स्वरूपयोग्यतयापि निजयोगजन्यजीवघातसामग्र्या अभाववज्जीवरक्षासामग्र्या अप्यभाव एवेति तत्राहजियरक्खा सुहजोगा, जइ तुह इट्टा सजोगिकेवलिणो॥ हंदि तया तयभावे, अजोगिणो हुज हीणत्तं ॥६९॥ [नीवरक्षा शुभयोगाद् , यदि तवेष्टा सयोगिकेवलिनः॥ हन्दि तदा तदभावे अयोगिनो भवेद्धीनत्वम् ॥ ६९ ॥] 'जिअरख'त्ति।जीवरक्षा-जीवघाताभावरूपा, यदि तव मते सयोगिकेवलिन इष्टा, केवलियोगानामेव जीवरक्षाहेतुत्वात, HARASSO Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२५० ॥ हन्दीत्याक्षेपे, तदा तदभावे - योगाभावेन जीवरक्षाऽभावेऽद्योगिकेवलिनो हीनत्वं सयोगिकेवल्यपेक्षयाऽपकृष्टत्वं भवेद् । अयं भावः - जीवघाताभावरूपा जीवरक्षा किं त्वया गुणरूपाऽभ्युपगम्यते, दोषरूपा, उभयरूपा, अनुभयरूपा वा ?, आद्ये तद्गुणवैकल्येन्ायोगिकेवलिनो हीनत्वं दुर्निवारमेव । द्वितीये तु स्वाभ्युपगमस्य हानिर्लोकशास्त्रविरोधश्च । तृतीयश्च पक्षो विहितक्रियापरिणतयोगरूपां जीवरक्षामधिकृत्य विहितक्रियात्वेन गुणत्वं योगत्वेन च दोषत्वमभिप्रेत्य सम्भवदुक्तिकोऽपि स्वाभाविकजीवघाताभावरूपां जीवरक्षामधिकृत्यासम्भवदुक्तिक एव; नहि स गुणो दोषश्चेत्युभयरूपतामास्कन्दतीति । चतुर्थे तु तदभावेऽप्ययोगिकेवलिन इवसयोfree footsपि न बाधक इति, किं तत्रावश्यम्भाविजीव विराधनानिरासव्यसनितया १ ॥ अथ जीवघाताभावमात्ररूपा जीवरक्षा न गुणः, किन्तु योगजन्यजीवघाताभावरूपा, सा च मशकादिकर्तृकमशकादिजीव घातकाले ज्योगिकेवलिनोऽपि विशिष्टाभावसच्चान्नानुपपन्नेति न तस्य तद्गुणवैकल्यम् । न वा सयोगिकेवलिनोऽपि योगात् कदाचिदपि जीवघातापत्तिः, तादृशजीवरक्षारूपातिशयस्य चारित्रमोहनीयक्षयसमुत्थस्य ज्ञानावरणीयक्षयसमुत्थकेवलज्ञानस्येव सर्वकेवलिसाधारणत्वात् संयतानां यज्ञ्जीवविषयका भोगस्तज्ञ्जीवरक्षाया नियतत्वाच्च । अत एव सामान्यसाधूनामप्यनाभोगजन्यायामेव विराधनायां परिणामशुद्धया फलतोऽवधकत्वमुपदर्शितम् ॥ तथा चोक्तं हितोपदेशमालायां-" 'णणु कह उवउत्ताण वि, छउमत्थमुणीण सुहुमजिअरक्खा १ || सच्च तहवि ण वहगा, उवओगवरा जओ भणिअं ॥१॥” एतद्व्याख्या यथा - नन्विति पूर्वपक्षोपन्यासे । छद्मस्थानां विशिष्टातिशयज्ञानरहितानां मुनीनां साधूनामुपयुक्तानामपि सम्यगीर्यासमितानामपि, सूक्ष्माणां चर्मचक्षुषामदृश्यानां जीवानां कथं रक्षासम्भवः ?, आचार्य आह-सत्यमवितथमेतत्, तथापि विशिष्टज्ञानशून्या अपि यद्युपयोगपराः पूर्वोक्तयुक्त्या चङ्क्रमणप्रवृत्तास्तदा सम्भवत्यपि प्राणिवधे न बधका-न वधकार्य सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा - ६९ ॥२५०॥ Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२५१॥ | पापभाजः । न चैतत्काल्पनिकम्, यन 'उच्चालिअंमि पाए' इत्यादिः भणितम् ||" यत एव भगवतोऽहिंसातिशयः, अत एव 'अणासवो केवलीणं ठाणं' इति प्रश्नव्याकरणसूत्रे केवलिनां स्थानं केवलिनामहिंसायां व्यवस्थितत्वादित्युक्तम् । तथा चतुःशरणप्रकीर्णकेऽपि 'सबजिआणमहिंसं, अरिहंता' - इत्यत्र सर्वे सूक्ष्मवादरत्रसस्थावरलक्षणा ये जीवास्तेषां न हिंसाऽहिंसा तामर्हन्त इति विवृतमिति चेत्, नन्वेवं योगजन्यजीव घाताभावरूपाया जीवरक्षाया भगवतोऽतिशयत्वं स्वीकुर्वाणस्य तव मते सयोगिकेवलिनो योगाज्जीवघातो मा भूद्, अयोगिकेवलिवन्मशकादियोगादेव तत्कायस्पर्शेन मशकादिघातस्तु जायमानः कथं वारणीयः ? समानावच्छेदकतासम्बन्धेन तत्र केवलि| योगानां प्रतिबन्धकत्वात् स वारणीय इति चेत् । तत्किं प्रतिबन्धकत्वं शुभयोगत्वेन, उत केवलियोगत्वेन, आहोस्वित् क्षीणमोहयोगत्वेन ? | नाद्यः, अप्रमत्तसंयतानामपि जीवघातानापत्तेः तेषामप्यात्माद्यनारम्भकत्वेन शुभयोगत्वात् । न द्वितीयः, केवलियोगत्वेन जीवघातप्रतिबन्धकत्वे क्षीणमोहयोगात् तदापत्तेरप्रतिबन्धात्, सा च तवानिष्टेति । नापि तृतीयः क्षीणमोहयोगत्वेन तत्प्रतिबन्धकत्वे कल्पनीये आवश्यकत्वाल्लाघवाच्च मोहक्षयस्यैव तथात्वकल्पनौचित्यात् । तथा चायोगिकेवलिनोऽपि कायस्पर्शान्मशकादिव्यापरत्यभ्युपगमो दुर्घटः स्यादिति । न च सर्वजीवाहिंसालक्षणोऽतिशयोऽहिंसायाः केवलिस्थानत्वं वाऽयोगिकेवलिबहिर्भावेन क्वापि प्रतिपादितमस्ति, येन त्वया तत्र व्यभिचारवारणाय क्षीणमोहयोगत्वेन जीव घातप्रतिबन्धकत्वं कल्प्यमानं युक्तिक्षमं स्यादिति सर्वजीवा हिंसादिप्रतिपादनं सकलभावाकरणनियमनिष्ठाभिधानाभिप्रायेणैव नतु हिंसाया अपि सर्वथाऽभावाभिप्रायेण । अनाभोगस्तु न तज्जनको येन तदभावातदभावः स्यादिति तु शतशः प्रतिपादितमेवेति न किञ्चिदेतदिति स्मर्त्तव्यम् । किंच - मशकादिकर्तृकजीवघातं प्रत्यपि केवलियोगानां त्वया प्रतिबन्धकत्वं कल्प्यते तत् केवलं व्यसनितयैव, उत तादृशस्यापि तस्य दोषत्वात् । नाद्यः, व्यसनितामात्रकृतकल्पनाया अनादे सटिप्पणा | खोप चिः ॥ गाथा - ६९ ॥२५१ ॥ Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | सटिप्पणा ॥स्वोपड़ चिः ॥ गाथा-७० ॥२५२॥ यत्वाद् । न द्वितीयः, तादृशस्य जीवघातस्य सयोगिकेवलिनो दोपत्वेऽयोगिकेवलिनोऽपि तद्दोषत्वाप्रच्यवादिति बहुतरमृहनीयम् ।।६९॥ धर्मपरीक्षा अथ केवलिनो योगा एव रक्षाहेतव इति पराभ्युपगमप्रकारं विकल्प्य दूषयन्नाह॥२५२॥ सा तस्स सरूवेणं, वा वावारेण आइमे पक्खे ॥ पडिलेहणाइहाणी, बितिए अ असक्कपरिहारो॥ ७० ॥ [सा तस्य स्वरूपेण वा व्यापारेण आदिमे पक्षे ॥ प्रतिलेखनादिहानिः, द्वितीये चाशक्यपरिहारः॥ ७० ॥] व्याख्या-'सा तस्स'त्ति । सा जीवरक्षा, तस्य केवलिनः शुभयोगस्य, स्वरूपेण सत्तामात्रेण, वा अथवा, व्यापारेणजीवरक्षार्थ स्वस्य रक्षणीयजीवस्य वाऽन्यदेशनयनाभिमुखपरिणामेन । आदिमे प्रथमे, पक्षे प्रति लेखनादिहानिः। प्रतिलेखना हि ट्र केवलिनः प्राणैः संसक्तस्यैव वस्त्रादेः प्रवचने प्रसिद्धा ॥ तदुक्तमोघनियुक्तो-"पाणेहि उ संसत्ता, पडिलेहा होइ केवलीणं तु ॥ संसत्त मसंसत्ता, छउमस्थाणं पडिलेहा" ॥२५७॥ (प्राणैः संसक्तानां प्रतिलेखा भवति केवलिनां तु । संसक्तासंसक्तानां छद्मस्थानां तु प्रतिलेखा।) सा च स्वरूपेणैव योगानां जीवरक्षाहेतुत्वेऽनुपपन्ना स्यात् , तद्व्यापारं विनापि जीवरक्षोपपत्तौ तद्विविक्तीकरणप्रयासस्य पलिमन्थत्वाद्, न च पलिमन्थः केवलिनोऽपि युज्यते, अत एव प्रत्युपेक्षितमपि वस्त्राद्यवश्यम्भाविजीवसंसर्ग जानन् केवली पलिमन्थादेव नाऽनागतमेव प्रत्युपेक्षते, किन्तूपभोगकाल एव प्रत्युपेक्षते इति व्यवस्थितम् ॥ तदुक्तम्-"संसञ्जइ धुवमेअं, अपेहि तेण पुव पडिलेहे ॥ पडिलेहिअंपि संस-जइत्ति संसत्तमेव जिणा ॥२५८॥" त्ति । एतद्वयाख्या यथा-संसज्यते प्राणिभिः संसर्गमुपयाति, ध्रुवमवश्यम् , एतद्वस्त्रादि, अप्रत्युपेक्षित सत् , तेन पूर्वमेव केवलिनः प्रत्युपेक्षणां कुर्वन्ति । यदि पुनरपि (यदा तु पुनरेवं) संविद्रते-इदमिदानी वस्त्रादि, प्रत्युपेक्षितमप्युपभोगकाले संसज्यते, तदा 'संसत्तमेव जिण'त्ति संसक्तमेव जिनाः केवलिनः प्रत्युपेक्षन्ते, Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कान त्वनागतमेव, पलिमन्थदोषादिति ॥" 'पडिलेहणाइहाणी' इत्यत्रादिना जीवरक्षाहेतूल्लङ्घनप्रलङ्घनादिव्यापारस्यापि केवलिनो धर्मपरीक्षा | वैयर्थ्य बोध्यम, नियतव्यापारेणैव केवलियोगाजीवरक्षेति ॥ द्वितीये च पक्षेऽङ्गीक्रियमाणेऽशक्यपरिहारोऽप्यवश्यमभ्युपगन्तव्य इति सटिप्पणा || खोपड़ ॥२५३॥ गम्यम् , सर्वत्र जीवरक्षाव्यापारस्य स्खकायस्य जीवानां वा विविक्तीकरणपर्यवसितस्य दुष्करत्वात् ॥ ७० ॥ तथाहि वृत्तिः ॥ ण ह सक्का काउंजे, इह बायरवाउकायउद्धरणं ॥ केवलिणावि विहारे, जलाइजीवाण य तयंति ॥७१ गाथा-७२ हा ७२ [नैव शक्यं कर्तुमिह बादरवायुकायिकोद्धरणम् ।। केवलिनाऽपि विहारे जलादिजीवानां च तदिति ॥ ७१॥] | ॥२५३॥ ___व्याख्या-'णहु सक्क'त्ति । 'ण हुनैव शक्यम् , दीर्घत्वं प्राकृतत्वात् , क 'जे'इति पादपूरणार्थों निपातः । इह जीव-18 घने लोके, बादरवायुकायिकानां जीवानां खत एवोपनिपत्य केवलिनः कायमुपस्पृशतामुद्धरणं-विविक्तदेशसंक्रमणम् , केवलिनापि, च पुन:, विहारे जलादिजीवानां तद्-उद्धरणम् , इतिः वाक्यार्थपरिसमाप्तौ । अयं भावः-केवलियोगव्यापारस्य जीवरक्षाहेतुत्वे यत्र स्वाभावप्रयुक्तं तद्वैकल्यं तत्र तत्सार्थक्यमस्तु, यत्र तु जीवनिरन्तरतयैव जीवविविक्तीकरणमशक्यं, तत्रावश्यम्भाविन्यां जीवविराधनायां जिनस्य तद्योगानां वा को दोषः? नहि कारणान्तरवैकल्यप्रयुक्तकार्याभावेऽधिकृतकारणस्थाशक्ततोद्भावनमधीततर्कशास्त्रा.विदधते। इत्थं सति दण्डसत्त्वेऽपि चक्राभावे घटाभावाद्दण्डस्यापि घटाशक्तताया उद्भावनीयत्वप्रसङ्गादिति । अत्र परः शङ्कतेनण जिणजोगाउ तहा, जलाइजीवाणऽघायपरिणामो ॥ अचित्तपएसे णं, जह गमणं पुप्फचलाए ॥७२॥ [ननु जिनयोगातू तथा जलादिजीवानामघातपरिणामः॥ अचित्तप्रदेशे यथा गमनं पुष्पचूलायाः ॥७२॥] 5 HAGRICURRIAGECORRIORANG - 5 ' Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२५४॥ व्याख्या- ''ति । नन्विति पूर्वपक्षे, यथा पुष्पचूलायाः साध्व्या अवाप्तकेवलज्ञानाया अपि मेघे वर्षत्यपि अतथाविधजलपरिणतिविशेषाद्, अचित्तप्रदेशे खे, गमनं सम्पन्नम्, तथा विहारेऽपि जलादिजीवानां जिनयोगादघातपरिणामोऽस्तु, नवमस्माकं काप्यनुपपत्तिरस्ति, केवलिमात्र जीवमात्रयोर्घात्यघातकसम्बन्धाभावें केवलिनोऽघातकस्वभावेन जीवानां चाघात्यस्वभावेन तथैव केवलिनो विहारादिनिर्वाहो भवति, यथा न पृथिव्यादिजीवानां स्वयोगेन भयादिलेशोऽपि सम्पद्यत इति । अत्र समाधानमाहभइ सव्वं एवं भणियं णु तए परोप्परविरुद्धं ॥ दितियदिहंता, जमेगरूवा ण संपन्ना ॥ ७३ ॥ [भण्यते सर्वमेतद् भणितं नु त्वया परस्परविरुद्धम् || दार्शन्तिकदृष्टान्तौ यदेकरूपौ न सम्पन्नौ ॥ ७३ ॥] व्याख्या- 'भाइ'त्ति । भण्यते-अत्रोत्तरं दीयते, सर्वमेतत्, 'नु' इति वितर्के, त्वया परस्परविरुद्धं भणितम्, यद् यस्माद्, दाष्टनिकदृष्टान्तौ नैकरूपौ सम्पन्नौ ।। ७३ ।। तथाहि एगत्थ जलमचित्तं, अण्णत्थ सचित्तयंति महभेओ | अफुसिअगमणं तीए, ण सुअं अण्णस्स व जिणस्स ॥७४॥ [ एकत्र जलमचित्तमन्यत्र सचित्तमिति महाभेदः । अस्पृष्टगमनं तस्या न श्रुतमन्यस्य वा जिनस्य ॥ ७४ ॥ ] व्याख्या- 'एगथ'त्ति | एकत्र पुष्पचूलाया वर्षति मेघे गमने, अचित्तं जलं साक्षादेव शास्त्रे प्रोक्तम्, अन्यत्र केवलिनां विहारादौ नत्तारे च जलं, सचित्तमिति महान् तर्योर्दृष्टान्तदाष्टन्तिकयोर्भेदः । नहि केवलिनो विहारादावनियतनद्युत्तारे निरन्तरप्रवाहपतितं तज्जलमचित्तमेवेति क्वाप्युक्तमस्ति । अथैवमप्युक्तं नास्ति 'यदुत तीर्थकृद्व्यतिरिक्तोऽमुकनामा केवली नदीमुत्तीर्णवानिति' सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा-७३ ७४ ॥२५४॥ Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२५५॥ AMSTER तीर्थकृतस्तु सुरसञ्चारितकनककमलोपरि गमनागमनपरिणतस्य जलस्पर्शस्याप्यभावात् तथापि केवलिनो नात्तरणसम्भावनायामचि सटिप्पणा त्तप्रदेशैरेव नद्युत्तारः कल्प्यते, नहि स विविच्य व्यवहाँ परिहत्तुं च जानन् सचित्तप्रदेशनंदीमुत्तरति; केवलित्वहानेः । तस्मात्पुष्प ॥खोपत्र चूलादिदृष्टान्ते नद्यादौ यथास्थितमेव जलं जलवायुसूर्यकिरणादिलक्षणखकायपरकायशस्त्रादिना तथाविधकालादिसामग्रीयोगेन कदा-18 वृत्तिः ॥ चिदचित्ततया परिणमतिः पुनरपि तदेव जलं सचित्तभवनहेतुकालादिसामग्रीयोगेन सचित्ततयाऽपि परिणमति । तत्र दष्टान्तः सम्मू- गाथा-७४ छिममनुष्योत्पत्तिस्थानान्येव, परमेतत्परिणतिस्तथाभूता केवलिगम्येति केवली तथापरिणतमेव जलं निश्चित्य नदीमुत्तरतीति कल्प्यत ॥२५॥ | इति चेत् , सर्वमेतदभिनिवेशविजृम्भितम् । स्वकर्णाश्रवणमात्रेण केवलिनो नद्युत्तारस्य निषेधुमशक्यत्वाद् । अन्ततोऽनन्तानां जलमध्ये| ऽन्तकृत्केवलिनामपि श्रवणेन सर्वत्र जलाचित्तताकल्पनस्याप्रामाणिकत्वात् ॥ किश्च सर्वत्र स्वोत्तरणादिकाले जलमचित्ततया परिणतंत | तदाश्रितपनकत्रसादिजीवाश्चापक्रान्ता इति किं तव कणे केवलिनोक्तम् ? येनेत्थं कल्पयसि । पुष्पलादृष्टान्तेन तथा कल्पयामीति में चेत् , तत्कि दृष्टान्तमात्रेण साध्यं साधयन्नपूर्वनैयायिकत्वमात्मनः प्रकटीकर्तुमुद्यतोऽसि । केवलियोगानामघातकत्वान्यथानुपपत्त्यैव तथा कल्पयामीति चेत्, तर्हि जलाचित्तताकल्पने तव का व्यसनिता ? सचित्तमेव जलं केवलियोगमवेक्ष्याघात्यस्वभावं त्वया किं न कल्प्यते ?, न खलु तब श्रुतपरम्पराङ्कुशरहितस्यादृष्टार्थकल्पने बाधकमस्ति, न चेदेवं तदा सचित्तवायुस्पर्शऽपि तव केवलियोगानामघातकस्नसमर्थनं कथं स्याद् ? इति । अथ वायुरपि सचित्ताचित्ततया प्रवचने द्विप्रकार उक्त इति सचित्तवायुस्पर्शमपि भगवतो नाभ्युपगच्छामः, किं त्वचित्तवायुस्पर्शमेव, अन्यथा तु भगवत्कायस्पर्शेनापि पृथिव्यादीनां भयोत्पत्तिः स्याद् , न चैवं सम्भवति । यदस्माकमभ्युपगमः-"पुढवीपमुहा नीवा, उप्पत्तिप्पमुहभाइणो हुंति ॥ जह केवलिजोगाओ, भयाइलेसंपि ण लहंति ॥१॥" (पृथिवीप्रमुखा +MACHAR Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२५६॥ ASSASS-15 सटिप्पणा ॥स्वोपक्ष वृतिः ॥ गाथा-७५ ॥२५६॥ जीवा उत्पत्तिप्रमुखभाजो भवन्ति ।। यथा केवलियोगाद् भयादिलेशमपि न लभन्ते ।) इति चेत् , हन्तैवं सचित्तास्पर्श एव भगवतोऽतिशयः प्राप्तः, तत्राह-सचित्तस्यास्पर्शो न पुनर्जिनातिशयः सिद्धः, भक्तिभरनम्रमनुष्यादिस्पर्शस्य भगवति सार्वजनीनत्वाद् । अथ न सचित्तस्पर्शाभावमात्रं भगवतोऽतिशयः, किन्तु यादृशसचित्तस्पर्शः साधूनां निषिद्धस्तादृशस्पर्शाभाव एवेति सचित्तजलादिस्पर्शाभावो भगवतोऽतिशयसिद्ध इति नानुपपत्तिरिति ॥ ७४ ॥ तत्राहसोऽइसओ कायकओ, जोगकओ वा हविज केवलिणो॥दुहओ वण्णियपुत्ता-इणायओ पायडविरोहो ॥७५॥ [सोऽतिशयः कायकृतो योगकृतो वा भवेत्केवलिनः ।। उभयतोऽप्यन्निकापुत्रादिज्ञाततः प्रकटविरोधः ॥ ७५ ॥] व्याख्या:-'सोडसओ'त्ति। म जलादिस्पर्शाभावलक्षणोऽतिशयः, काय कृत:-कायनिष्ठफलविपाकप्रदर्शको, योगकृतोवायोगनिष्ठफलविपाकप्रदर्शको वा, केवलिनो भवेद । उभयतोऽप्यन्निकापुत्रादिज्ञाततः प्रकट विरोध एव । नयन्निकापुत्रगजसुकुमारादीनामन्तकृत्केवलिनां सयोगिनामयोगिनां वा सचित्तजलतेजस्कायिकजीवादिस्पर्शस्त्वयापि नाभ्युपगम्यते; केवलं योगवतामयोगवतां वा तेषामन्तकृत्केवलिनां कायस्पर्शात्तजीवविराधनाविशेषेण 'घुणाऽक्षरन्यायेन' स्वयमेव भवता स्वग्रन्थे क्वापि लिखिताः | स्वाभ्युपगमरीत्या तु त्रयोदशगुणस्थानमुल्लध्य चतुर्दशगुणस्थाने वक्तुमुचितेति विशेषः । परतन्त्रस्यैवायं जलादिस्पर्शः केवलिनो नतु स्वतन्त्रस्येति चद् । नेयं भाषा भवतस्त्राणाय “खीणम्मि अंतराए, णो से य असक्कपरिहारो॥त्ति॥" वामात्रेणाशक्यपरिहाराभावमावेदयत आयुष्मतः केवलिनः परतन्त्रतयामि जलादिस्पर्शतजीवविराधनयोरभ्युपगातुमनुचितत्वाद् , अन्यथा केवली यत्र स्थितस्तत्रागन्तुकवायोरपि सचित्तताया अनिषेधप्रसङ्गात्(ङ्गः), तस्मात् सचित्तजलादिस्पर्शन केवलिनः सयोगस्याप्यवश्यम्भाविनी जीवविराधना Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२५७॥ वा स्वीक्रियताम्, तद्योगाक्रान्तानामपि वा जीवानामघातपरिणाम एव (मोवा) स्वीक्रियतां नतु तृतीया गतिरस्ति । तत्र च प्रथमः पक्षोऽस्मन्मत प्रवेश भयादेव त्वयानाभ्युपगन्तव्य इति द्वितीयः पक्षस्तवाभ्युपगन्तुमवशिष्यते ॥ ७५ ॥ तत्राह - एवं सव्वजिआणं, जोगाओ च्चिय अघायपरिणामे ॥ केवलिणो उल्लंघण - पल्लंघाईण वेफलं ॥ ७६ ॥ [ एवं सर्वजीवानां योगादे वाघातपरिणामे । केवलिन उल्लङ्घनप्रलङ्घनादीनां वैफल्यम् ।। ७६ ।। ] व्याख्या – 'एवं 'ति । एवं जलादिस्पर्शाभावाभ्युपगमस्य विरोधग्रस्तत्वे, सर्वजीवानां केवलिनो योगादेव घातपरिणामे स्वीक्रियमाणे, उल्लङ्घनप्रलङ्घनादीनां व्यापाराणां, वैफल्यं प्रसज्यते । स्वावच्छिन्नप्रदेशवर्त्तिजीवेषु केव लियोगक्रियाजनितात् केव - लियोगजन्यजीवघातप्रतिबन्धकपरिणामादेव जीवघाताभावोपपत्तौ हि जीवाकुलां भूमिं वीक्ष्य केवलिन उल्लङ्घनादिकमकर्त्तव्यमेव स्यात्, प्रत्युत तेषु स्वयोगव्यापार एव कर्त्तव्यः स्यात्, तस्य जीवरक्षाहेतुत्वादिति महदसमञ्जसमापद्यते । यदि चोल्लङ्घनादिव्यापारः शास्त्रसिद्धः केवलिनोऽप्यभ्युपगन्तव्यस्तदा केवलियोगानां न स्वरूपतो रक्षाहेतुत्वं किन्तु नियतव्यापारद्वारेति तदविषयावश्यम्भाविजीवविराधना दुर्निवारा । यदि च केवलियोगानां स्वरूपत एव जीवरक्षाहेतुत्वम्, उल्लङ्घनादिव्यापारश्च न तस्य जीवरक्षामात्रप्रयोजनः, किन्तु स्वव्यवहारानुपातिश्रुतव्यवहारपरिपालनमात्रप्रयोजन इति विभाव्यते, तदा तादृशादपि ततो जीवानामपसरणं भवति नवेति वक्तव्यम् ? । आधे सासरणक्रिया भयपूर्विकेति 'केवलियोगात्पृथिव्यादिजीवा भयलेशमपि न प्राप्नुवन्ति' इति स्वप्रतिज्ञाव्याघातः । अन्त्ये चादृष्टपरिकल्पना, नयुल्लङ्घनादिक्रिययोल्लङ्घन्यमानादिजीवानामनपसरणं क्वापि दृष्टमिति । किंच - एवमादिपदग्राद्यप्रतिलेखनावैफल्यं दुरुद्धरमेव, जीवसंसक्तवस्त्रादेर्विविक्तीकरणेनैव तत्साफल्य सम्भवाद् । न च तत्केवलियोगाजीवानामनपसरणस्वभावकल्पने निर्वहतीति ॥७६॥ सटिप्पणा ॥ खोपड वृतिः ॥ गाथा- ७६ ॥ २५७॥ Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं चापसरणादिद्वारं विना स्वरूपत एव केवलियोगानां जीवरक्षाहेतुत्वे उल्लङ्घनादिव्यापारवैफल्यापत्ती व्यवस्थापितायां केवलिधर्मपरीक्षा सटिप्पणा 18| योगव्यापारकाले जीवानां स्वत एवापसरणस्वभावत्वं यत्परेण कल्पितं तदपि निरस्तमित्याह॥२५८॥ | ॥स्वोपज्ञ एएण मच्छियाई, सहावकिरिआपरायणा हं ण ह जिकिरियापेरिअ-किरियं तित्ति पडिसिद्धं ॥७७॥ [एतेन मक्षिकादयः स्वभावक्रियापरायणा भवन्ति ॥ न खलु जिनक्रियाप्रेरितक्रियां यान्तीति प्रतिषिद्धम् ॥ ७७॥] गाथा-७७ व्याख्या-'एएण मच्छि आईत्ति एतेनोक्तहेतुना, मक्षिकादयो मक्षिकापिपीलिकादंशमशकादयः, खभावक्रियापरायणाः ॥२५८॥ सहजसमुत्थगमनादिक्रियाकारिणो, भवन्ति, 'ण' नैव, जिनस्य या क्रिया गमनागमनादिरूपा, तया प्रेरिता-तन्निमित्तका या क्रिया तां, यान्ति-केवलियोगहेतुकस्वशरीरसङ्कोचमपि न कुर्वन्तीत्यर्थः । केवलिनो हि गमनागमनादिपरिणतो पिपीलिकादयः क्षुद्रजन्तवः स्वत एवेतस्ततोऽपसरन्ति, अपमृता वा भवन्ति । यदि च कदाचिदसातवेदनीयकर्मोदयेन दंशमशकादयो नापसरन्ति, तदा | केवली तत्कर्मक्षयनिमित्तं तत्कृतवेदनां सम्यगधिसहते, केवलज्ञानोत्पत्तिसमय एव तेनैव प्रकारेणात्मीयासातवेदनीयकर्मक्षयस्य दृष्टत्वात् । ८ नतु केवलियोगजनितां किमपि क्रियां कुर्वन्ति ॥ तदिदमाह-"तेणं मच्छिअपमुहा, सहावकिरियापरायणा हुंति ॥ण य जिणकिरियापेरिअ-किरियालेसंपि कुवंति" ॥१॥ (तेन मक्षिकाप्रमुखाः स्वभाव क्रियापरायणा भवन्ति । न च जिनक्रियाप्रेरितक्रियालेशमपि कुर्वन्ति)॥ इति एतत्, प्रतिषिद्धं, स्वत एव जीवानामपसरणस्वभावत्वे केवलिन उल्लङ्घनादिव्यापारवैफल्यापत्तेर्वज्रलेपत्वाद् । यच्च केवलियोगव्यापारमपेक्ष्य जीवानां खतोऽपसरणखभावत्वकल्पनं तदपां दहनान्तिके दाहजननखभावकल्पनसदृशमेव । अथ केवलिनः प्रतिलेखनादिव्यापाराजीवानामपसरणस्य प्रमाणसिद्धत्वात् केवलिक्रियानिमित्तकं क्रियामात्रं न तेषां प्रतिषिध्यते, किन्तु भयपूर्विका क्रिया BACEBOOK Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२५९॥ SADA प्रतिषिध्यते; नस्लभयदस्य भगवतःप्राणिनां साक्षात्रासजनकव्यापाररूपं भयदानं सम्भवतिः परेषां भापनस्य भयमोहनीयाश्रवत्वात् , सटिप्पणा केवलिक्रियातः प्रतिलेखनादिव्यापारकाले यां प्राणिनामपसरणादिक्रिया भवति सा न भयमलेति खत एवेत्युच्यत इति चेत् । न, भयं ॥खोपड़ विनैव केवलियोगात् सत्त्वापसरणकल्पने हिंसां विना तन्मरणकल्पनेऽपि वाधकाभावाद्, अदृष्टकल्पनाया उभयत्र तुल्यत्वाद् । आव- वृतिः ॥ | श्यकक्रियावश्यम्भाविना च प्राणिभयेन च यदि भयमोहनीयाश्रवभूतं भापनमुच्यते, तदा तव मतेऽपि सूक्ष्मसम्परायोपशान्तमोहयो- गाथा-७७ द्रव्यहिंसाऽभ्युपगमेन भापनावश्यम्भावाद् भयमोहनीयकर्मबन्धसम्भवे षड्विधबन्धकत्वमेकविधवन्धकत्वं च भज्येत । न च जानतो ॥२५९॥ भयप्रयोजकव्यापाररूपमेव भापनं भयमोहनीयाश्रव इति नायं दोष इति वाच्यम् , जानतोऽपि भगवतो योगात् त्रिपृष्टवासुदेवभववि-18 | दारितसिंहजीवस्य पलायननिमित्तकभयश्रवणात् । यत्तु तस्य भयहेतवो न श्रीमहावीरयोगाः, किंतु तदीययोगा एव, यथाऽयोगि- केवलिशरीरान्मशकादीनां व्यापत्तौ मशकादीनां योगा एव कारणमिति कल्पनं तत्तु स्फुटातिप्रसङ्गग्रस्तं, शक्यं ह्येवं वक्तुं, साधुयोगादपि न केषामपि भयमुत्पद्यते, किन्तु वयोगादेवेति । अथ भगवत्यभयदत्वं प्रसिद्धम् , नदुक्तं शक्रस्तवे 'अभयदयाणं'ति । एतवृत्त्येकदेशो यथा “प्राणान्तिकोपसर्गकारिष्वपि न भयं दयन्ते, यद्वाऽभया सर्वप्राणिभयत्यागवती दया कृपा येषां तेऽभयदयास्तेभ्य इति"। | तन्निर्वाहार्थ केवलियोगादन्येषां न भयोत्पत्तिरिति कल्प्यते, साधुषु च तथाकल्पने न प्रयोजनमस्तीति चेद्, न । अस्मिन्नप्यर्थे सम्यगव्युत्पन्नोऽसि?, किं न जानासि ? संयमस्यैवाभयत्वं येन संयमिनां संयमप्रामाण्यादेवान्यभयाजनकयोगत्वं न कल्पयसि। न जानामीति चेत् , तर्हि "तं नो करिस्सामि समुट्ठाए मंता मइमं अभयं विदित्ता" इत्याचाराङ्गसूत्र एवाभयपदार्थ पर्यालोचय येनाज्ञाननिवृत्तिः स्याद् , “अविद्यमानं भयमस्मिन् सचानामित्यभयः संयमः" इति धुक्तं वृत्ताविति ॥७७॥ परमतस्यैवोपपादकान्तरं निराकरोति N GARCAD Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२६॥ जपि मयं णारंभो, लद्धिविसेसाउ चेव केवलिणो॥ तं पि इमीइ दिसाए, णिराकयं हाइ णायव्वं ॥७८॥8 सटिप्पणा . [यदपि मतं नारम्भः लब्धिविशेषादेव केवलिनः ॥ तदप्यनया दिशा निराकृतं भवति ज्ञातव्यम् ॥ ७८ ॥] ॥स्वोपन व्याख्या-'जपि मयति । यदपि मतं लब्धिविशेषादेव केवलिनो नारम्भः, प्रसिद्धं खल्वेतद्-यदुत घातिकर्मक्षयो- वृधिः ॥ पशमावाप्तजलचारणादिनानालब्धिमतां साधूनां नदीसमुद्रादिजलज्वलनशिखोपवनवनस्पतिपत्रपुष्पफलादिकमवलम्ब्य यदृच्छया गमना- गाथा-७८ गमनादिपरायणानामपि जलजीवादिविराधना न भवतीति । तदुक्तं 'खीरासवमहुआसव' इत्यादिचतुःशरण३४गाथावृत्ती-"चारणे ॥२६॥ त्यादि यावत्केचित्तु पुष्पफलपत्रहिमवदादिगिरिश्रेणि-अनिशिखानीहारावश्यायमेघवारिधारामर्कटतन्तुज्योतीरश्मिपवनलताद्यालम्बनेन गतिपरिणामकुशलाः, तथा वापीनद्यादिजले तज्जीवानचिराधयन्तो भूमाविव पादोत्क्षेपनिःक्षेपकुशला जलचारणा इत्यादि"। कथं तर्हि घातिकर्मक्षयावाप्तलब्धिभाजः केवलिनो जीवविराधनासम्भवः? एकस्या अपि क्षायिकलब्धेः सर्वक्षायोपशमिकलब्ध्यात्मकत्वेन क्षायोपशमिकलब्धिसाध्यस्य जीवरक्षादिकार्यमात्रस्य साधकत्वात् । सा च क्षायिकी लब्धिभगवतो जीवरक्षाहेतुरनुत्तरचारित्रान्तर्भूता द्रष्टव्या। तत्प्रभावादेव न केवलिनः कदाप्यारम्भ इति । तदपि मतमनया दिशा निराकृतं ज्ञातव्यं भवति, लब्धिखभावादेव जीवरक्षोपपत्तौ केवलिन उल्लङ्घनादिव्यापारवैयापत्तरिति भावः ॥ ७८ ॥ दिग्दर्शितमेव दूषणं विकल्प्य स्फुटीकुर्वन्नाह| तं खलु उवजीवंतो, पमायवं तुह मए जिणो हुज्जा ॥ सेलेसीए वि फलं, ण तस्स उवजीवणाभावे ॥७९॥ [तं खलूपजीवन् प्रमादवांस्तव मते जिनो भवेत् ॥ शैलेश्यामपि फलं न तस्योपजीवनाभावे ॥ ७९ ॥] Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२६१॥ HASHISAITES का सटिप्पणा ॥ खोपड वृचिः ॥ गाथा-७९ ॥२६१॥ व्याख्या-'तं खलु'त्ति । तं लब्धिविशेषमुपजीवन्-जीवरक्षार्थ व्यापारयन् , खलु निश्चितं, जिनः केवली, तब मते प्रमादवान् स्याद् , 'लब्ध्युपजीवनं हि प्रमत्तस्यैव भवतीति' शास्त्रमर्यादा । अस्तु तहिं स लब्धिविशेषोऽनुपजीवित एव जीवरक्षाहेतुः, क्षायिकीनां हि लब्धीनां न प्रयुञ्जना भवति, तासामनवरतमेकस्वभावेनैव सर्वकालीनत्वात् , तासां च फलवत्त्वमपि तथैव । तदितराणां तु कादाचित्कत्वेन फलवत्त्वात् प्रयुञ्जनेति विशेषः-इत्येव ह्यस्मन्मतमित्यत्राह-तस्य लब्धिविशेषस्य, उपजीवनाभावे तु शैलेश्यामपि फलं जीवरक्षारूपं नास्ति, तदानीं तत्कायस्पर्शेन मशकादिव्यापत्तेस्त्वयापि स्वीकारात् , किं पुनःसयोगिकेवलिनि वाच्यम् ; तथा चोपजीवनानुपजीवनविकल्पव्याघातात् तादृशलब्धिविशेषकल्पनमप्रामाणिकमेवेति भावः ॥ ७९ ॥ अथ चारित्रमोहनीयकर्मक्षयजनिता जीवरक्षाहेतुर्लब्धिर्योगगतैव कल्प्यत इति शैलेश्यवस्थाथां नोक्तदोष इत्याशङ्कायामाहजोगगया सा लद्वी, अजोगिणो खाइगावि जइ णस्थि ॥ ता तकम्मस्सुदओ, तस्सेव हवे पराहुत्तो ॥८॥ [योगगता सा लब्धिः, अयोगिनः क्षायिक्यपि यदि नास्ति ॥ तदा तत्कर्मण उदयः, तस्यैव भवेत्परावृत्तः॥८॥] व्याख्या-'जोगगय'त्ति । सा जीवरक्षाहेतुः, लब्धिर्योगगतेति कृत्वा, क्षायिक्यपि यदि अयोगिनोऽयोगिकेवलिनो, |नास्ति, तदा तस्यैवायोगिकेवलिन एव, तत्कर्मणश्चारित्रमोहनीयकर्मण, उदयः परावृत्तो भवेत् , चारित्रमोहक्षयकार्याभावस्य चारित्रमोहोदयव्याप्यत्वादिति भावः ।। किंच-यदि लब्ध्युपजीविजलचारणादिषु परिदृष्टा जीवविराधनाऽभावलब्धिरनुपजीव्या यदि केवलिनि कल्प्यते, तदा तादृशजङ्घाचारणादिषु परिदृष्टातिशयचरणलब्धिरप्यनुपजीव्या केवलिनि कस्मान्न कल्प्यते ?, तस्या उपजीव्यत्वनियमान तत्कल्पनं केवलिनि कत्तुं शक्यत इति चेद्, तदेतदन्यत्रापि तुल्यमिति स्वयमेव विभावय । तस्मानियतयोगव्यापारा Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२६२॥ सटिप्पणा ॥स्वोपक्ष -SECRECRUCAMKA गाथा-८१ ॥२६२॥ देव भगवतां जीवरक्षा, नतु स्वरूपंत इत्यवश्यम्भाविन्यां जीवविराधनायां न किञ्चिद्वाधकमिति स्थितम् ॥८०॥ नन्वेवमवश्यम्भाविन्यापि जीवविराधनया केवलिनोऽष्टादशदोषरहितत्वं न स्याद् , हिंसादोषस्य तदवस्थत्वाद् । न 'देवोऽष्टादशदोषरहित एव'-इत्यत्राप्येकान्तवादो जनानामनिष्ट इति शङ्कनीयम् , अनेकान्तवादस्याप्यनेकान्तत्वेनात्रैकान्ताभ्युपगमेऽपि दोषाभावादित्याशङ्कायामाहदव्वारंभं दोसं, अट्ठारसदोसमज्झयारम्मि ॥ जो इच्छइ सो इच्छइ, णो दव्वपरिग्गहं कम्हा ॥ ८१॥ [द्रव्यारम्भं दोषं, अष्टादशदोषमध्ये ॥ य इच्छति स इच्छति न द्रव्यपरिग्रहं कस्मात् ॥ ८१ ॥] 'दवारंभंति। अष्टादशदोषमध्ये यो द्रव्यारम्भं दोषमिच्छति, स द्रव्यपरिग्रहं दोषं, कस्मान्नेच्छति ?। तथा च धर्मोपकरणसद्भावाद् द्रव्यपरिग्रहेण यथा न दोषवत्त्वं तथा द्रव्यारम्मेणापि न दोषवत्त्वम् , भावदोषविगमादेव भगवति निर्दोषत्वव्यवस्थितेरिति भावनीयम् । यच्चोक्तं निर्दोषत्वे भगवतो नानेकान्त इति, तदसद् ; दोषविभागकृतानेकान्तस्य तत्राप्यविरोधाद् । यच्चानेकान्तस्यानेकान्तत्वमधिकरणानियमापेक्षयोद्भावितं तत्केनाभिप्रायेण ? इति वक्तव्यम् , अन्ततः स्वपररूपापेक्षयाऽप्यनेकान्तस्य सर्वत्र सम्भवाद् , अत एवात्मानात्मापेक्षया सर्वत्रानेकान्तो वाचकपुङ्गवेनोक्तः प्रशमरतो॥ “द्रव्यात्मेत्युपचारः, सर्वद्रव्येषु नयविशेषेण ॥ आत्मादेशादात्मा, भवत्यनात्मा परादेशात् ॥२०२॥ इति । अनेकान्तस्यानेकान्तत्वं तु स्याद्वादाङ्गसप्तभङ्गीवाक्यघटकैकतरभङ्गावच्छेदक-| रूपाऽपेक्षया व्यवस्थितम् । अत एव ॥ "भयणा वि हु भइअवा, जह भयणा भयइ सबदवाई ॥ एवं भयणाणियमो वि, होइ समयाविराहणया (रोहेण)॥२७॥"त्ति [टी० यथा भजना अनेकान्तो भजते सर्ववस्तूनि तदतत्स्वभावतया ज्ञापयति, तथा भजनानेकान्तोपि भजनीयोऽनेकान्तोऽप्यनेकान्त इत्यर्थः । नयत्रमाणापेक्षया एकान्तश्चानेकान्तश्चेति । एवं ज्ञापनीय एवं च भजनाउनेकाना तन्नपति BAAE AURORA + SH Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२६३॥ नियमश्चैकान्तश्च सिद्धान्तस्य " रयणप्पभा सिय सासया सिय असासया इति" एवमनेकान्तप्रतिपादकं स्यादित्यादि तृतीयकांडे] सम्मतिगाथायां भजना भजनायाः समग्राऽविराधना । "इमा णं भंते । रयणप्पभा पुढवी किं सासया असासया ?, गोयमा ! सिय सासया, सिअ असासया " इति । स्याद्वाददेशनायां द्रव्यार्थतया शाश्वत्येव पर्यायार्थतया त्वशाश्वत्येवेत्यधिकृतभङ्गरूपनिर्द्धारणापेक्षया वृत्तौ व्याख्याता । निक्षेपादिप्रपञ्चोऽपि हि सर्वत्र स्याद्वादघटनार्थमेव, यतः “प्रस्तुतार्थव्याकरणादप्रस्तुतार्थापाकरणाच्च निक्षेपः फलवानुच्यते " ततश्च स्याद्वादसिद्धिरिति । अत एव सर्वत्रौत्सर्गिकी स्याद्वाददेश नैवोक्तेति सम्मत्यादिग्रन्धानुसारेण सूक्ष्ममीक्षणीयम् ॥ ८१ ॥ अथ य एवमवश्यम्भाविन्याऽपि जीवविराधनया सद्भूतदोषमुत्प्रेक्ष्य भगवतोऽसद्दोपाध्यारोपणं कुर्वन्ति तेषामपायमाविष्कुर्वन्नाह - मिच्छादोसवयणओ, संसाराडविमहाकडिल्लंमि ॥ जिणवरणिंदारसिआ भमिहिंति अणोरपारम्भ ॥ ८२ ॥ [ मिथ्यादोषवचनतः संसाराटवी महागहने । जिनवरनिन्दारसिका, भ्रमिष्यन्ति अनवक्पारे ।। ८२ ।। ] 'मिच्छादोसवणओ'त्ति । मिथ्यादोषवचनाद्-असद्भूतदोषाभिधानाद्, जिनवर निन्दारसिका अभव्या दूरभव्या वा जनाः, संसाराटवी महागहनेऽनवक्पारे भ्रमिष्यन्ति, तीव्राभिनिवेशेन तीर्थकराशातनाया दुरन्तानन्तसंसारहेतुत्वात् । उक्तञ्च “तित्थयरपवयणसुअं, आयरियं गणहरं महिड्डीयं ।। आसायंतो बहुसो, अनंतसंसारिओ होइ ॥ १ ॥ " इत्यादि । अथ केवलि - छनस्थलिङ्गविचारगया न केवलिनोऽवश्यम्भाविनी विराधना सम्भवतीति व्यामोहोऽपि न कर्त्तव्यः, सम्यग्विचारपर्यवसानत्वात्तस्य, इत्यभिप्रायवानाह - जोत्रिय जीयइ मोहो, छउमत्थजिणाण लिंगवयणाओ ॥ उवउत्तस्स ण चिट्ठइ, सोविय परमत्थदिडी ॥ ८३ ॥ सटिप्पणा ॥ खोपड वृतिः ॥ गाथा-८२ ॥२६३॥ Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा ॥स्वोषज्ञ वृत्तिः ॥ गाथा-८३ ॥२६४॥ [योऽपि च जायते मोहः, छद्मस्थजिनयोर्लिङ्गवचनात् ।। उपयुक्तस्य न तिष्ठति सोऽपि च परमार्थदृष्टौ ।। ८३ ॥] धर्मपरीक्षा जो वित्ति'। योऽपि च छद्मस्थजिनयोलिङ्गवचनात् स्थानाङ्गस्थात्, मोहो जायते दुर्व्याख्यातुाख्यां शृण्वता॥२६॥ मिति शेषः, सोऽपि परमार्थदृष्टावुपयुक्तस्य न तिष्ठति; अपण्डितव्याख्याकृतभ्रमस्य पण्डितकृतव्याख्याऽवधारणमात्रनिवर्तनी यत्वादिति भावः । तत्र छद्मस्थकेवलिलिङ्गवचनमित्थं स्थानाङ्गे व्यवस्थितम्-"सत्तहिं ठाणेहिं छउमत्थं जाणेजा । तंजहा-पाणे अइवइत्ता भवति१, मुसं बदित्ता भवतिर, अदिनमादित्ता भवति३, सद्दकरिसरसरूवगंधे आसाइत्ता भवति४, पूसकारमणुवूहित्ता भवइ५, 'इमं सावज्जति पण्णवेत्ता पडिसेवेत्ता भवति६, णो जहावादी तहाकारी यावि भवति ॥ सत्तहिं ठाणेहिं केवली जाणिज्जा । तंजहा-णो हापाणे अइवाइत्ता भवइ, जाव जहावाई तहाकारी यावि भवइ" इति । एतवृत्तियथा-"भयं च छद्मस्थस्यैव भवति, स च यैः स्थान आयते तान्याह-'सत्तहिं ठाणेहिं' इत्यादि। सप्तभिः स्थानैर्हेतुभूतै छद्मस्थं जानीयात् । तद् यथा-प्राणान तिपातयिता| तेषां कदाचिद् व्यापादनशीलो भवतीति । इह च प्राणातिपातनमिति वक्तव्येऽपि धर्मधर्मिणोरभेदादतिपातयितेति धर्मी निर्दिष्टः। प्राणा- | तिपातनाच्छद्मस्थोऽयमित्यवसीयते,केवली हि क्षीणचारित्रावरणत्वानिरतिचारसंयमत्वादप्रतिषेवित्वान्न कदाचिदपि प्राणानामतिपातयिता भवति इत्येवं सर्वत्र भावना कार्या तथा मृषा वदिता भवति । अदत्तमादाता-ग्रहीता भवति । शब्दादीनास्वादयिता भवति । पूजासत्कारी-पुष्पार्चनवस्त्राद्यर्चने, अनुवृंहयिता-परेण स्वस्य क्रियमाणस्य तस्यानुमोदयिता तद्भावे हर्षकारीत्यर्थः। तथेदमाधाकर्मादि सावयं सपापमित्येवं प्रज्ञाप्य तदेव प्रतिपेविता भवति । तथा सामान्यतो नो यथावादी तथाकारी-अन्यथाऽभिधायान्यथा कर्ता भवति । चापीति समुच्चये । एतान्येव विपर्यस्तानि केवलिगमकानि भवन्ति । इत्येतत्प्रतिपादनपरं केवलिसूत्रं सुगममेवेति ॥" 135555555ASSES HARRIGANGANGACA SSAGES Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ A 567 धर्मपरीक्षा ॥२६५।। SCHOCACHCCCCCCESCORESCR अत्रेयं परस्य प्रक्रिया-छद्रस्थसंयतः परीक्षावसरे प्रमत्त एव पक्षीकर्तव्यः, तत्रैव चक्षुःसूक्ष्मनिपातमपि सूत्रोक्तयतनया कुर्वाणे 'किमयं छद्मस्थ उत केवली' इति संशये सति छद्मस्थतासाधनाय लिङ्गापेक्षोपपत्तः, उक्तस्वरूपरहितस्य तु निद्राविकथादिप्र सटिप्पणा मादवतश्छद्मस्थत्वेन संशयाभावान्न परीक्षायां प्रवेश इति न तस्य पक्षत्वम् , आह च-"छउमत्थो पुण केवलि-कप्पो अपमत्तसंजओ ॥ खोपक्ष | वृति णेओ॥ गो विअ संजमजोगे, उवउत्तो सुत्ताणाए ॥१॥"त्ति । (छद्मस्थः पुनः केवलिकल्पः अप्रमत्तसंयतो ज्ञेयः। सोपि च संयमयोगे, गाथा-८३ | उपयुक्तः सूत्राज्ञया ॥) लिंगानि च तत्र पञ्चमहाव्रतातिक्रमापवादानाभोगविषयसप्तस्थानप्रतिपादितानि द्रव्यप्राणातिपातादिरूपाण्येव है। ॥२६५॥ ग्राह्याणि, नतु भावप्राणातिपातादिरूपाण्यपि, तेषां छद्मस्थज्ञानागोचरत्वेन लिङ्गत्वाभावाद् । लिङ्ग हि छद्मस्थज्ञानहेतवे प्रयुज्यते, तच्च | ज्ञातमेव ज्ञापकं नाज्ञातमपीति, तानि च मोहनीयाविनाभावीनि यावदुपशान्तवीतरागं भवन्ति, न परतोऽपि; तत ऊर्ध्व मोहनीयसत्ताया अप्यभावाद् । आह च-"छउमत्थनाणहेऊ, लिंगाई दव्वओ ण भावाओ॥ उवसंतवीयराय, जा तावं ताणि जाणाहिं ॥२॥" ति । (छद्मस्थज्ञानहेतवो लिङ्गानि द्रव्यतो न भावतः॥ उपशान्तवीतराग यावत्तावत्तानि जानीहि ॥) नन्वपूर्वादिषु पञ्चसु गुणस्थानकेषु चतस्रोऽपि भाषा भवन्तीति कर्मग्रन्धे भणितम् , तथा च सिद्धं क्षीणमोहस्यापि मृषा भाषणम् , तच्च छद्मस्थत्वावबोधकं लिङ्गमेव, तत्क| थमुच्यते छद्मस्थत्वज्ञापकलिङ्गानि यावदुपशान्तवीतरागमेव भवन्ति ? इति चेद् । मैवम् , छद्मस्थज्ञानगोचरस्यैव मृषाभाषणस्य लिङ्गत्वेनाभिमतत्वात् । तच्च द्रव्यतो मृषाभाषणं क्षीणमोहस्य न भवति, क्रोधादिजन्यत्वाद् । यदागमः-" सव्वं भंते ! मुसावायं पच्चक्खामि । से कोहा वा, लोहा वा, भया बा, हासा वा इत्यादि।क्षीणमोहस्य च क्रोधादयो न भवन्तीति कारणाभावाद् द्रव्यतो मृषाभाषणस्याभावः, तथा च भावतो मृषाभाषणस्य सुतरामभावः, तस्य मोहनीयोदयजन्यत्वात् । तथा च क्षीणमोहमात्रस्य द्रव्यतो भावतो NCHORRHORRIORSHAN Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वा मृषाभाषणं न भवत्येव, संयतानां जीवघातादावनाभोगसहकृतमोहनीयकर्मणो हेतुत्वात् ; मोहनीयाभावे चानाभोगो वास्तवमृषाभाधर्मपरीक्षा पणं प्रत्यकारणं सन्नपि सम्भावनारूढमृषाभाषणं प्रति कारणं भवत्येव, अनाभोगस्य तथाखभावस्यानुभवसिद्धत्वात् । तेन क्षीणमोहस्या सटिप्पणा ॥२६६॥ प्यनाभोगहेतुकं सम्भावनारूढजीवविराधनावन्मृषाभाषणमपि भवत्येव; तच्च छद्मस्थज्ञानागोचरत्वेन छद्मस्थत्वावबोधकं लिङ्गं न भवति, स्वोपन तस्य केवलज्ञानगम्यत्वात् । न च सम्भावनारूढस्य मृषाभाषणस्य मृषाभाषणत्वव्यपदेशो न भविष्यतीति शङ्कनीयम् , सम्भावनारूढं वृतिः ॥ मृषाभाषणमिति भणित्वापि मृषाभाषणव्यपदेशो न भविष्यतीति भणतो वदव्याघातापत्तः। किञ्च-जैनानामलोकेऽपि कल्पितलो गाथा-८३ ॥२६६॥ | कस्याङ्गीकारे कल्पनाया इव सम्भावनाया अपि प्रामाण्यमेव, अत एव कालशौकरिकस्य कल्पितमहिषव्यापादनं महिषव्यापादनतया भगवता श्रीमहावीरेण भणितमिति प्रवचने प्रसिद्धिः, तस्मात् कर्मबन्धाहेतुत्वेऽपि सम्भावनारूढमृषाभाषणस्य स्नातकचारित्रप्रतिबन्धकत्वेन द्रव्यमृषाभाषणस्येव दोषत्वम् , चित्रलिखितायां नार्यां नारीत्वव्यपदेशस्येव मृषावादव्यपदेशस्य च विषयत्वं प्रतिपत्त| व्यमिति न दोष इति; तस्माद् यावदुपशान्तवीतरागमेव छद्मस्थत्वज्ञापकानि लिङ्गानीति स्थितम् । तानि च प्रत्यक्षगम्यानि | मिथ्याकारादिलिङ्गगम्यानि वा, 'अयं साधुः साक्षात् सम्भावनया वा प्राणातिपातादिप्रतिषेवितैव, मिथ्याकारान्यथानुपपत्तेः, अस्मदादिवद्'-इत्येवंलिङ्गगम्येनापि प्राणातिपातादिना लिङ्गेन 'छद्मस्थोऽयं संयतः' इत्येवं निश्चयसम्भवात् । स च मिथ्याकारः कादाचित्क एव जीवघातादौ भवति, पुनरकरणाभिप्रायेण तस्य फलवत्वात, सार्वदिकस्य तु तस्य सम्भवे सर्वविरतिपरिणामस्यैवानुपपत्तिः, प्रतिस मयमनवरतं जीवघातो भवत्येव इत्यभिप्रायस्य तत्प्रतिबन्धकत्वादिति । अत्र च छद्मस्थत्वज्ञापकलिङ्गानां सप्तानामपि मोहनीयकर्मजकन्यत्वेन परस्परानुविद्धानां स्वरूपयोग्यतया निश्चयतः सर्वकालीनत्वेऽपि फलोपहितयोग्यतया व्यवहारेणानवरतं नियमाभावोऽप्यायेषु 8/ RECECK+CHECH CAAAAHEADACA Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा खोपड़ वृचिः ॥ गाथा-८३ ॥२७॥ पश्चस्वेव, चरमयोस्तु द्वयोर्लिङ्गयोः सामान्यतः सर्वकालीनत्वेन सूक्ष्मदृशां पुरःस्फूर्तिकत्वात् , ताभ्यां छद्मस्थत्वनिर्णयो विवक्षितपरीधर्मपरीक्षा क्षाकाले सुलभ एव । तथाहि-इच्छाकारादिसाधुसामाचारीपरायणस्य छमस्थसंयतस्य गमनागमनस्थितिशयनाशनासनप्रत्युपेक्षणादिक्रि॥२६७॥ यासु चक्षुषा पुनः पुनर्निरीक्षण, निरीक्ष्य च यथासम्भवं रजोहरणादिना प्रमार्जनं, प्रमृज्य च हस्तपादाद्यवयवानां यथास्थानेऽभ्यसनं त्वपरावर्तनं, तथैव वस्त्रपात्राद्युपकरणानामादाननिक्षेपणम् , प्रमृजतश्च रजोहरणादिक्रियया मक्षिकापिपीलिकादीनां भयत्रासोत्पादनेनेतस्ततो नयनं चेत्याद्यनेकप्रकारमनुष्ठानं सम्भावितभाविजीवधातादिदोषभयजन्यं कालमधिकृत्यानियतमप्यन्यतम(र)त्किचिदनव| रतं भवत्येव, तत्रापि पिपिलीकादिजन्तूनां भयत्रासोत्पादनं सावधमिति प्रज्ञाप्य जीवघातवर्जनाभिप्रायवतोऽप्यशक्यपरिहारेण तत्प्रति&ाषेवणं षष्ठलिङ्गात्मकं छमस्थत्वाभिव्यञ्जकं सामान्यतः सर्वकालीनं सुलभमेव ॥ तत्प्रतिषेवणे च संयतो न यथावादी तथाकतत्यपि मन्त व्यम् , अशक्यपरिहारेणापि प्रत्याख्यातस्य सावद्यस्य प्रतिषेवणादिति केवलिनोऽपि परीक्षायां विपरीतानि छद्मस्थलिङ्गानि द्रव्यरूपा ण्येव ग्राह्याणि, तेषामेव छद्मस्थज्ञानगोचरत्वेनानुमितिजनकत्वात् । यथाहि-छद्मस्थसंयतोऽनाभोगसहकृतमोहनीयवशेन कदाचित्प्राणाहनामतिपातयिता भवति, परीक्षोपयोगिघात्यजीवानां सम्पर्कस्य तद्विषयकानाभोगस्य च कादाचित्कत्वातः तथा केवली न भवति, इत्येवं प्राणातिपातादिविपर्ययलिङ्गेद्रव्यरूपैः केवलित्वं साध्यमिति ॥ स च केवली द्विविधो ग्राह्यः-सद्भूतकेवली, अन्तर्मुहूर्तभाविकेवलज्ञानाभिमुखःक्षीणमोहश्च । यथाहि बद्धदेवायुर्देवगत्यभिमुखत्वेन देवत्वव्यपदेशविषयः प्रवचने प्रतीतः,तथाऽन्तर्मुहर्तेनोत्पत्स्यमानकेवलज्ञानः क्षीणमोहोऽपि केवलिव्यपदेशविपयो भवत्येवेति, तथा 'भाविनि भूतवदुपच्चारः' इति न्यायात् प्रत्यासन्नभाविपर्यायस्य भूतवद्भणनं युक्तमेव । यथा गर्भस्थोप्यईन् शक्रेण भावार्हत्तया स्तुतः। एवं क्षीणमोहमात्रस्य छद्मस्थवीतरागस्यापि कथञ्चित्केवलित्वव्यपदेशो न SCREGULAMUHUSA BACHAR Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा RUS ॥२६॥ सटिप्पणा ॥स्वोषज्ञ वृचिः ॥ गाथा-८३ ॥२६८॥ -SSAGGRESOU दोषावहः । किं च केवलित्वगमकानि सप्तापि लिङ्गानि मोहनीयक्षयसमुत्थान्येव, 'केवली हि क्षीणचारित्रावरणत्वानिरतिचारसंयमत्वादप्रतिषवित्वान्न कदाचिदपि प्राणानामतिपातयिता भवति' इति वचनात् , तेन लिङ्गापेक्षया द्वयोरपि साम्यमेव । एवं च सति यदि क्षीणमोहस्य छद्मस्थवीतरागस्य कथंचित्केवलित्वं नाभ्युपगम्यते, तर्हि क्षीणमोहे छद्मस्थवीतरागे सप्तापि लिङ्गानि व्यभिचरन्ति, तत्र हेतुषु विद्यमानेषु साध्यस्य केवलित्वस्यासत्त्वात् । नन्वास्तामन्यत् , परं केवलिनः पश्चानुत्तराणि भवन्ति । यदागम:-"केवलिस्स णं पंच अणुत्तरा पन्नत्ता । तंजहा-अणुत्तरे नाणे, अणुत्तरे दंसणे, अणुत्तरे चरित्ते, अणुत्तरे तवे, अणुत्तरे वीरिए"त्ति । एतानि पश्चापि केवलिनि वर्तमानानि कथं केवलित्वगमकलिङ्गतया नोक्तानि? इति चेद्, उच्यते-एतेषां पञ्चानामपि छद्मस्थज्ञानागोचरत्वेनानुमितिजनकत्वाभावात् न लिङ्गानि भवितुमर्हन्ति, प्रत्युत केवलज्ञानादिपरिज्ञानार्थमेवोक्तलिङ्गानां प्रज्ञापनेति। एतेन 'सप्तापि प्राणातिपातादीनि छद्मस्थानां रागद्वेषजनितानि, तेषां तयोः सत्त्वात् । केवलिनस्तु रागद्वेषजनितानां तेषां निषेधो न पुनः सर्वथा निषेधः, चक्षुःपक्ष्मनिपातमात्रजन्याया असङ्ख्येयवायुकायजीवविराधनायाः केवलिनोऽप्यनिवृत्तेः,' इति निरस्तम् , अशक्यपरिहारस्यापि केवलिनि निरासात् । | किंच-परकीयरागद्वेषयोस्तदभावस्य च निरतिशयच्छमस्थज्ञानागोचरत्वेन तथाभूतच्छद्मस्थमात्रानुमितिजनकलिङ्गानां विशेषणत्वासम्भवात् , सम्भवे च यो रागद्वेषवान् स छद्मस्थः, यस्तु रागद्वेषरहितः स केवलीति विशेषणज्ञानमात्रेण छद्मस्थकेवलिनोविवेकेन सम्यग्निर्णये जाते प्राणातिपातादीनां तनिषेधरूपाणां च विशेष्यपदानां भणनमुन्मत्तप्रलापकल्पं सम्पयेत, प्रयोजनाभावात् , धर्मोपदेशादिक्रियामात्रस्यापि तथात्वेन सप्तसङ्ख्याभणनस्यायुक्तत्वाच्च । किंच-अप्रसिद्धविशेषणदानेन हेतूनां सन्दिग्धस्वरूपासिद्धतापि, तथा रागद्वेषवस्वछद्मस्थत्वयोस्तद्राहित्यकेवलित्वयोश्चैक्यमेवेति हेतोः साध्यघटितत्वेन हेतुस्वरूपहानिः; तस्मादविशिष्टानामेव छद्मस्थगम्यप्राणातिपाता-1 ARASOSLASHGg3.90* 5 Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दिनिषेधरूपाणां केवलित्वगमकलिङ्गत्वं प्रतिमत्तव्यम् । यत्तु छद्मस्थत्वज्ञापकलिङ्गेषु कदाचिद्' इति विशेषणं टीकाकारेण दत्तं तत्सप्ताबमपराक्षानामपि लिङ्गानां स्वरूपासिद्धिवारणार्थम् , नहि छमस्थसाधावनवरतं प्राणातिपातादिशीलत्वं सम्भवतीति । यच्च केवलित्वज्ञापकलिङ्गेषु ॥२६९॥ 'कदाचिदपि'इति विशिष्टविशेषणमुपात्तं तच्छबस्थसाधौ व्यभिचारवारणाय; भवति ह्येतद्विशेषणं विना छद्मस्थसाधौ प्राणातिपाताद्यभा वावस्थायां हेतुषु विद्यमानेषु केवलित्वाभावेन व्यभिचार इति ॥ अत्र वदन्ति 'सत्तहिं ठाणेहिं छउमत्थं जाणिज्जा' इत्यत्राप्रमत्तस्य पक्षीकरणे प्राणातिपातकत्वादयः सर्वेऽपि हेतवः स्वरूपासिद्धतामाप्नुवन्ति, प्राणातिपातादिनिमित्तक्रियाभावेन तस्य प्राणातिपातकत्वाद्यभावात । यथाहि-कर्मग्रन्थाद्यभिप्रायेण निद्रोदयस्याप्रमत्तादिगुणस्थानेषु सत्त्वेऽपि न तेन प्रमत्तत्वम् ,द्रव्यतो निद्राविषयादिवत्वस्य प्रमत्तत्वाप्रयोजकत्वात् । तथा द्रव्यतो जीवविराधनायामप्यप्रमत्ताः प्राणातिपातका न प्रोच्यन्त इति । न चौपचारिकैरपारमार्थिकैर्द्रव्यतः प्राणातिपातकत्वादिभिस्त्वत्कल्पितैरपि पारमार्थिकं छद्मस्थत्वं साधयितुं शक्यते, द्रव्यतो विरतिमहाव्रतवत्वादिभिः परित्राजकेप्वभव्यनिह्नवादिषु च पारमार्थिकविरतत्वचारित्रित्वादिसाधनप्रसक्तेः। किश्च-औपचारिकं प्राणातिपातकत्वं 'यावजीवः सयोगस्तावदारभते' इत्याद्यागमवचनादेव प्रसिद्धव्यभिचारमिति सद्भूतप्राणातिपातकत्वादिभिश्छद्मस्थत्वस्य साधनात् प्रमत्त एवात्र पक्षीकार्यः, तेन | न स्वरूपासिद्धिः, तत्र पारमार्थिकानां हेतूनां सत्त्वादिति । किञ्च 'व्यापादनशीलो भवति' इत्यत्र "फलनिरपेक्षा वृत्तिः शीलम्" इति शीलार्थत्वात् , तस्याश्च स्वभावनिबन्धनत्वात्प्राणातिपातादिस्वभावहेतुसिद्धयर्थं प्रमत्त एव पक्षीकर्तव्य इति । न च प्रमत्तत्वादेव तत्र छद्मस्थत्वरूपसाध्यस्यापि प्रतीतत्वात्साध्यत्वाभावः, 'अप्रतीतमनिराकृतमभीप्सितं साध्यम्'इति(प्रमाणन००परि०३सू०१४)वचनादिति वाच्यम् , व्यामूढमनसां तद्व्यामोहनिवृत्त्यर्थ छद्मस्थत्वस्य साध्यमानत्वोपपत्तेः। “प्रसिद्धानां प्रमाणानां, लक्षणोक्तौ प्रयोजनम्॥ तव्यामोहनिवृत्तिः सटिप्पणा || खोपड़ चिः ॥ गाथा-८३ ॥२६९॥ -RECAUCAUSEUM Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२७॥ सटिप्पणा ||स्वोपन गाथा-८३ | ॥२७॥ स्याद् , व्यामूढमनसामिह । ४॥ इति न्यायावतारवचनात् । यथाहि-सानादिमत्वाद् गवि गोत्वे सिद्धेऽपि व्यामृढस्य तत्प्रतिपत्त्यर्थ का प्रयोगः क्रियते-यथा इयं गौः, सास्नादिमच्चात् , यत्र गोत्वाभावस्तत्र सास्नादिमचाभावो यथा महिष इत्यादि । एवमत्रापि पुरुषविशेषे | प्रमत्तत्वाच्छस्थत्वे सिद्धेऽपि व्यामूढस्य ज्ञापनार्थमनुमाने कर्तव्ये छद्मस्थत्वस्य साध्यत्वं घटत एवेति । एतेन निद्राविकथादिप्रमादवतश्छद्मस्र्थत्वेन संशयानुपपत्तेर्न तत्परिज्ञानाय लिङ्गापेक्षेत्यपि निरस्तम्, उक्तयुक्त्या व्यामोहनिरासार्थ तदुपपत्तः, विप्रतिपत्त्यादिना केवलिछमस्थविशेषज्ञस्यापि संशये सति तत्साधनोपपत्तेश्च । न च सूत्रे प्राणातिपातकत्वादीनां सामान्येन छद्मस्थलिङ्गत्वेन प्रोक्तत्वात् प्रमत्तछद्मस्थरूपविशेषे व्याख्यायमाने सूत्राशातनेति वाच्यम् , सूत्रस्य सूत्रान्तरसम्मत्या व्याख्यानकरणे आशातनायाः परित्यागात् । किञ्च-भवतोऽप्यप्रमत्तरूपछद्मस्थविशेषमुपादायैव व्याख्यानकरणान्नैतद्विपये पर्यनुयोग एव युज्यते । “यत्रोभयोः समो दोषः, परिहारोऽपि वा समः॥ नैकः पर्यनुयोक्तव्य-स्तागर्थविचारणे ॥१॥" इति वचनात् । ननु प्रमत्तस्य पक्षत्वेऽप्रमत्तसंयते कथं छद्मस्थत्वं स्याद् ?, लिङ्गाभावाद्-इति चेद्, न । लिङ्गिनि लिङ्गावश्यम्भावनियमाभावाद्, धूमं विनापि तप्तायोगोलके वह्निदर्शनात् । ननु यद्येवं प्रमत्तस्य पक्षत्वं भावतः प्राणातिपातकत्वादीनां च लिङ्गत्वं तदा छद्मस्थत्वगमकलिङ्गेषु 'कदाचिद्'-इति विशेषणं यत् टीकाकारेण दत्तं तदनुपपन्नं स्याद् , अप्रमत्तसंयतपक्षे द्रव्यप्राणातिपातादीनां लिङ्गत्वे हि तेषां सार्वदिकत्वाभावेन स्वरूपासिद्धिवारणार्थ तदुपपन्नं स्यात् । प्रमत्तसंयतपक्षे भावप्राणातिपातस्य सार्वदिकत्वेन तद्विशेषणस्यानुपपत्तिरेवेति । मैवम् , अविशेषणोक्तस्य प्राणातिपातकत्वादेः स्वरूपाऽसिद्धत्वाभावेन 'कदाचिद्'-इत्यस्योभयमतेऽपि स्वरूपविशेषणत्वात कालिकसम्बन्धेन व्याप्तेरभिप्रेतत्वेऽपि 'कदाचित्' इत्यस्य कालान्तरोपसङ्ग्रहेऽनुपयोगाद्, यदा प्राणातिपातकत्वादिकं तदा छद्मस्थत्वमिति नियमसिद्धौ ‘कदाचिद्' इत्यनेन किमुपकर्तव्यमेतादृश OCEROSAGE Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नियमस्फोरणं विनेति । केचित्तु 'केवली कदाचिदपि प्राणानामतिपातयिता न भवतीति' यत्केवलिनो लिङ्गमुक्तं तत्सर्वाप्रमत्तानामपि धर्मपराक्षासमानमिति तद्व्यावृत्यर्थ छद्मस्थलिङ्गेषु 'कंदाचिद्' इति विशेषणमुक्तम् । इत्थं चाप्रमत्तानां प्रमत्तगुणस्थानवर्तित्वे प्रमत्तत्वात् कदा-12 सटिप्पणा ॥२७१॥ | चिद्भावतोऽपि यत्प्राणातिपातकत्वं सम्भवति, न तु केवलिनः, तस्य देशोनपूर्वकोटीकालमप्यप्रमत्तत्वस्यैव भावादिति विशेषोऽवबुद्धो वृत्तिः॥ भवति । न चाप्रमत्ता अपि सर्वदा प्राणानतिपातका एव भवन्ति, प्रमत्तत्वेन प्राणातिपातकत्वे त्वप्रमत्ता एव नोच्यन्ते इत्यतिप्रसक्तमे- तगाथा-८३ | वैतल्लक्षणमिति वाच्यम् , अप्रमत्तस्य प्रमत्तगुणस्थानवर्त्तिनो जीवघाते अहो 'अप्रमत्तोऽपि जीवघातं करोति' इति व्यपदेशसम्भवात् , IP ॥२७॥ चतुर्दशपूर्व्यादीनां चतुर्गतिकत्वादिवचनवदेतदुपपत्तेः। यथाहि-"भगवानपि भुवनगुरुरुन्मार्गदेशनात्सागरोपमकोटाकोटी भ्रान्तः" इति योगशास्त्रवृत्तिवचनम् । लोकेऽपि च घृतघटे घृताभावेऽपि 'घृतघट' इति व्यपदेशो भाविनि भूतवदुपचारेण दृश्यते, तथै-16 वाप्रमत्तादिगुणस्थानवर्त्तिनोऽपि प्रमादवत्त्वे भावतः प्राणातिपातकत्वादिव्यपदेशो भवति नतु केवलिनः, तस्य कदाचिदपि प्रमादवत्त्वाभावादिति नातिव्याप्त्यादिदोष इत्याहुः ॥ तेषां यद्ययमाशयोऽप्रमत्तसंयतेषु केवलित्वगमकप्राणातिपाताभावादिलिङ्गानां व्यभिचारः, 'कदाचिदपि' इति विशेषणेन तद्योग्यताभावानां लिङ्गत्वलाभेन वार्यत इति छद्मस्थलिङ्गेषु 'कदाचिद्' इति विशेषणं योग्यतास्पष्टत्वा र्थमिति तदा सा योग्यता प्राणातिपातादिप्रागभावरूपा ग्राह्येति केवलिपरीक्षायां क्षपकश्रेणावपूर्वकरणादीनां तदभावात्तेषु व्यभिचारो | दुर्वारः। छद्मस्थपरीक्षायां च प्रमत्तस्यैव पक्षत्वे योग्यताग्रहणवैफल्यम्, सर्वेषां तु छद्मस्थानां पक्षत्वे तेष्वेवासिद्धिरिति किमप्रमत्तादाद वौपचारिकप्राणातिपातकत्वादिविवक्षया ? इति प्रमत्ताप्रमत्तसाधारणपक्षकछमस्थत्वसाधने प्राणातिपातादिलिङ्गेषु 'कदाचिद्' इति विश पणेन साध्याधिकरणकिञ्चित्कालावच्छिन्नत्वं देवम् , केवलित्वगमकलिङ्गेषु च साध्याधिकरणयावत्कालावच्छिन्नत्वं देयमिति नोद्देश्या. MICROCHACH ES Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ।।२७२ ॥ सिद्धिर्न वा व्यभिचार इति विभावनीयम् । यत्तु भावभूतलिङ्गानां न छद्मस्थज्ञानोपयोगित्वमिति । तदसद् भावभूतानामेव शमादिलिङ्गानां | छद्मस्थानां परनिष्ठसम्यक्त्वज्ञानजनकत्वप्रतिपादनात् । तदुक्तं योगशास्त्र प्र०२ श्लो० १५वृत्तौ “पञ्चभिर्लक्षणे लिंङ्गैः परस्थं परोक्षमपि सम्पतवं सम्यगुपलक्ष्यते, लिङ्गानि तु शमसंवेगनिर्वेदानुकम्पास्तिक्यस्वरूपाणीत्यादि । बाह्यपरिणतिविशेषादेव तत्र शमादिभावलिङ्गज्ञानसौलभ्यमिति चेद्, अत्रापि तत एव न भावलिङ्गज्ञानदौर्लभ्यं परीक्षकाणाम् । एतेन छद्मस्थत्वगमकानि लिङ्गानि यावदुपशान्तवीतरागमेव भवन्ति । यच्च 'क्षीणमोहस्य मृषाभाषणं तच्छद्मस्थज्ञानागोचरत्वेन न लिङ्गम्, द्रव्यतो मृषाभाषणस्य क्रोधाद्यभावेन क्षीणमोहेऽभावादित्यादि यदुक्तं तन्निरस्तम्, उक्तरीत्या द्रव्यव्यतिरिक्तस्यापि मृषावादस्य सुपरीक्षकाणां सुग्रहत्वात् । किञ्च क्षीणमोहस्य द्रव्यतो मृषाभाषणं नास्तीति सर्वशास्त्रविरुद्धम्, यस्मात्सर्वावस्थासु कर्मबन्धोऽस्ति, कर्मबन्धानुमेया च विराधना, इप्यते चासौ द्रव्यतो वीतरागस्यापि छद्मस्थस्य चतुर्णामपि मनोयोगादीनामभिधानादिति पञ्चाशक वृत्तौ द्रव्यत एव मृषावादस्य क्षीणमोहेऽभिधानात् । अत एव सूक्ष्मप्रमादनिमित्तविराधनयाऽऽलोचनाप्रायश्चित्तं तत्रोक्तम् । तथाहि आलोअणा विवोगो वा, णियंठस्स दुवे भवे || विवेगो अ सिणायस्स, एमेया पडिवत्तिओ || १||"त्ति यतिजीत कल्पसूत्रे प्रोक्तम् । “आलोचनाप्रायश्चित्तं विवेकप्रायश्चित्तमित्येते द्वे प्रायश्चित्ते निर्ग्रन्थस्य भवतः, स्नातकस्य केवल एको विवेकः ।" इति तद्वृत्तौ । अत्र स्नातकस्य केवलविवेकप्रायश्चित्तभणनेन निर्ग्रन्थयोरुपशान्तक्षीणमोहयोरालोचनाविवेकप्रायश्चित्ते द्वे अविशेषेणैवोक्ते सम्भाव्येते; अन्यथा निर्ग्रन्थे विकल्पद्वयमकरिष्यद्; यथा - कुत्रचिन्निर्ग्रन्थे विवेकप्रायश्चित्तमेव, कुत्रचिच्चालोचनाविवेकरूपे द्वे इति; न चैवं क्वचिदुपदर्शितमिति माध्यस्थ्येन पर्यालोच्यम् । तथा चालोचनाप्रायश्चित्तशोध्या द्रव्यविराधना केवलिविलक्षणे क्षीणमोहे शास्त्रसिद्धेति द्रव्यतो मृषाभाषणं क्षीणमोहे न भवतीति सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ हुचिः ॥ गाथा-८३ ॥२७२ ॥ Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२७३॥ यद्वचनं तन्निरर्थकमेव । यत्तु तत्रानाभोगहेतुकं सम्भावनारूढं जीवविराधनावन्मृषाभाषणमुपपादितं तत्र दृष्टान्तासिद्धिः, द्रव्यतो जीबविराधनायास्तत्रोपपादितत्वाद् , भगवत्यामपि तत्र जीवविराधनायाः स्पष्टमुक्तत्वाच्च । तथा च तत्सूत्रं १८ श०८ उ० "अणगार |सटिप्पणा ॥ खोपड़ | स्स णं भंते ! भाविअप्पणो पुरओ दुहओ जुगमायाए पेहाए रीयं रीयमाणस्स पायस्स अहे कुक्कुडपोयए वा वट्टापोयए वा कुलिंगच्छाए वृतिः ॥ वा परियावजेजा, तस्स णं भंते ! किं इरियावहिया किरिया कजइ, संपराइआ किरिया कजइ ? गोयमा! अणगारस्स णं भाविअप्पणो गाथा-८३ | जाव तस्स णं इरियावहिआ किरिया कजइ, णो संपराइआ किरिया कजइ । से केणद्वेणं भंते ! एवं वुच्चइ ? जहा सत्तमसए संवुडुद्देसए|| ॥२७॥ जाव अट्ठो णिक्खित्तो'त्ति ॥ 'पुरओ'त्ति अग्रतः, 'दुहओ'त्ति द्विधा-अन्तराऽन्तरा पार्श्वतः पृष्ठतश्चेत्यर्थः, 'जुगमायाए'त्ति यूप(युग)मात्रया दृष्टया, 'पेहाए'त्ति प्रेक्ष्य, 'रीयं ति गतं गमनं, 'रीयमाणस्स'त्ति कुर्वत इत्यर्थः, 'कुक्कुडपोयए'त्ति कुर्कुटादिपोतः, (टडिम्भः) वडापोयए'त्ति इह वर्तकः पक्षिविशेषः, 'कुलिंगच्छाए वत्ति पिपीलिकादिसदृशः, 'परियावजेजत्ति पर्यापद्येत-म्रियते। 'एवं जहा सत्तमसए'इत्यादि । अनेन च यत्सूचितं तस्यार्थलेश एवम्-अथ केनार्थेन भदंत ! एवमुच्यते ? गौतम! यस्य क्रोधादयो व्यवच्छिन्ना भवन्ति, तस्यर्यापथिक्येव क्रिया भवतीति"-इत्यादि तवृत्तावुक्तम् । अत्र भावितात्माऽनगार उपशान्तः क्षीणमोहश्च ग्राह्यः, अन्यस्येय पथिकीक्रियाऽभावात् , केवलिनचानाभोगप्रयुक्तोक्तविशिष्टगमनासम्भवादिति वदन्ति । तथा सम्भावनारूढं मृषाभाषण द्रव्यभावाभ्यां भिन्नं न कुत्राप्युपदर्शितमिति क्षीणमोहे तदभिधानं भवतोऽपूर्वपाण्डित्याभिव्यञ्जकमेव, द्रव्यभावातिरिक्तस्य सम्भावनारूढस्य शशविषाणवदवस्तुत्वात् । यच्च व्यक्तिशक्तिरूपं सम्भवे सम्भाव्ये च योगवीर्यमुक्तं तद्भावपरिणामरूपमेव, यथोक्तं सूत्रकृताङ्गवीर्याध्ययनवृत्ती। "तथा मनोवाकायादीनां तद्भावपरिणतानां यद्वीय सामर्थ्य तद्विविधं-सम्भवे सम्भाव्ये Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा !!२७४॥ : च । सम्भवे तावत्तीर्थ कृनामनुत्तरोपपातिकानां च सुराणामतीवपटूनि मनोद्रव्याणि भवन्ति । तथाहि तीर्थकृतामनुत्तरोपपातिकसुरमनः पर्याय ज्ञानिप्रश्नव्याकरणस्य द्रव्यमनसैव करणाद्, अनुत्तरोपपातिकसुराणां च सर्वव्यापारस्यैव मनसा निष्पादनादिति । सम्भाव्ये तु यो हि यमर्थ पटुमतिना प्रोच्यमानं न शक्नोति साम्प्रतं परिणमयितुं, सम्भाव्यते त्वेष परिकर्म्यमाणः शक्ष्यत्यमुमर्थ परिणमयितुमिति । वाग्वीर्यमपि द्विविधं-सम्भवे सम्भाव्ये च । तत्र सम्भवे तीर्थकृतां योजननिहारिणी वाक् सर्वस्वस्वभाषानुगता च तथाऽन्येषामपि क्षीरमध्वाश्रवादिलब्धिमतां वाचः सौभाग्यमिति । तथा हंसकोकिलादीनां सम्भवति स्वरमाधुर्यम् । सम्भाव्ये तु सम्भाव्यते श्यामायाः स्त्रियो गानमाधुर्यम् । तथा चोक्तम् - "इया (सा)मा गायति मधुरं, काली गायति खरं च ऋक्षं (रुक्खं ) च' इत्यादि । तथा सम्भावयाम एनं श्रावकदारकम कृतमुखसंस्कारमप्यक्षरेषु यथावदभिलप्तव्येष्विति, तथा सम्भावयामः - शुकसारिकादीनां वाचो मानुषभाषापरिणामः । का वीर्यमप्यरस्यं यद्यस्य बलम् । तदपि द्विविधं सम्भवे सम्भाव्ये च । सम्भवे यथा चक्रवर्त्तिबलदेव वासुदेवादीनां यद्वाहुबलादिकायबलम् । तद्यथा - कोटिशिला त्रिपृष्ठेन वामकरतलेनोद्धृता, यदि वा 'सोलसराय सहस्सा' इत्यादि यावदपरिमितबला जिनवरेन्द्रा इति । सम्भाव्येतु सम्भाव्यते तीर्थकरो लोकमलोके कन्दुकवत् प्रक्षेप्तुम्, तथा मेरुं दण्डवत् गृहीत्वा वसुधां छत्रकवद्भर्तुमिति । तथा सम्भाव्यतेऽन्यतरसुराधिपो जम्बूद्वीपं वामहस्तेन छत्रकवद्धर्तुमयत्नेनैव मन्दरमिति । तथा सम्भाव्यतेऽयं दारकः परिवर्द्धमानः शिलामेनामुद्ध हस्तिनं दमयितुमश्रं वाहयितुमित्यादि [ इन्द्रियबलमपि श्रोत्रेन्द्रियादिस्वविषयग्रहणसमर्थ पञ्चधा । एकैकमपि द्विधा सम्भवे सम्भाव्ये च । सम्भवे यथा श्रोत्रेन्द्रियस्य द्वादशयोजनानि विषयः एवं शेषाणामपि यस्य यो विषय इति । सम्भाव्ये तु यस्य कस्यचिदनुपहतेन्द्रियस्य श्रान्तस्य क्रुद्धस्य पिपासितस्य परिग्लानस्य वा अर्थग्रहणासमर्थमपि इन्द्रियं सद्यथोक्तदोषोपशमे तु सति सम्भाव्यते विष T ASOCHIS सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृचिः ॥ गाथा-८३ ॥२७४॥ Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२७५॥ CRACREAUCCCCCCCA-U यग्रहणायेति]" तद्वदिह यदि क्षीणमोहे सम्भावनारूढं मृषाभाषणं सम्भवे वक्तव्यं तदा व्यक्तित एव भावरूपं सम्पन्नम् , यदि च सम्भाव्ये तदा शक्तित इति न कथमपि पृथग् भवितुमर्हति । न च क्षीणमोहे मृषाभाषणं केवलं सम्भाव्यमेव, अपूर्वादिषु पञ्चसु गुणस्थान सटिप्पणा ॥स्वोपड़ केषु चतसृणां भाषाणां कर्मग्रन्थे द्वितीयतृतीयवाग्योगौ मिथ्यादृष्टेरारब्धौ यावत् क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थस्तावल्लभ्येते । तथोपशान्त-15 वृत्तिः ॥ कषायस्थाने क्षीणकषायस्थाने च 'नवयोगा बन्धहेतवः' इत्यस्य चार्थस्याविशेषेणैवाभिधानाद् । अवश्यंभावित्वाभिप्रायेण च यत्सम्भा लै गाथा-८३ व्यत्वाभिधानं तत्तु सत्संयतमात्रस्यैव मृषाभाषणादेः स्यादिति द्रष्टव्यम् । किञ्च-सर्वमपि मृषाभाषणं क्रोधमूलकमेवेति वदतस्तव सम्भा- ॥२७॥ वनारूढमपि मृषाभाषणं तन्मूलकमेव स्यात् , तथा च क्षीणमोहे तस्याप्यभावः प्राप्नोति । ननूक्तं तदनाभोगहेतुकमेवेति चेत् , तर्हि तादृशं द्रव्यतो मृषाभाषणमेव किमिति नाभ्युपेयते ? किं सम्भावनया?, न च द्रव्यभूतेन तेन प्रत्याख्यानभङ्गो भवति, भावभूतस्यैव तस्य प्रत्याख्यातत्वात् , "प्रमत्तयोगादसदभिधानं मृषा" इति तत्त्वार्थवृत्तिवचनात् । न च भावतः प्राणातिपातमृषाभाषणादेयत्कारणं तदेव तस्य द्रव्यतोऽपीति क्षीणमोहे न तत्सम्भवतीति वाच्यम्, एवं सति भावतो ज्ञानदर्शनचारित्राणां यानि कारणानि तान्येव द्रव्यभूतानां तेषां कारणानि स्युरिति, अभव्यादीनामपि द्रव्यतो ज्ञानदर्शनचारित्रवतां ज्ञानावरणीय-दर्शनमोहनीय-चारित्रमोहनीयकर्मक्षयोपशमाः कारणानि स्युः । तथा चागमबाधा । किश्च-एवं केवलिनो द्रव्येन्द्रियाणामप्यभावापत्तिः, भावेन्द्रियहेतुज्ञानावरणदर्शनावरणक्षयो8| पशमयोः केवलिन्यभावाद् । न च द्रव्येन्द्रियाभावः केवलिन्युक्तः, किन्तु भावेन्द्रियाभाव एवेति । किञ्च-उपशान्तमोहे यथा जीव-13 विराधना मोहनीयकारणमन्तरेणापि भवति, तथा क्षीणमोहे मोहाभावेऽपि द्रव्यतो जीवविराधनामृषाभाषादिसद्भावे किं बाधकम् ?, अथास्त्येवागमबाधा । तथाहि-"रायगिहे जाव एवं वयासी, अह भंते ! पाणाइवाए मुसावाए अदिण्णादाणे मेहुणे परिग्गहे एस Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सटिप्पणा ॥स्वोपन वृत्तिः ॥ माथा-८३ ॥२७६॥ माणं कतिवण्णे कतिगंधे कतिरसें कतिफासे पण्णत्ते ? गोयमा ! पंचवण्णे दुगंधे पंचरसे चउफासे पण्णत्ते ॥" इत्यादि भगवतीसूत्रे धर्मपरीक्षा द्वादशशते पश्चमोद्देशके प्रोक्तम् । 'रायगिहे'इत्यादि । 'पाणाइवाए'त्ति प्राणातिपातजनितं तज्जनकं वा चारित्रमोहनीयं को॥२७६॥ पचाराद प्राणातिपात एव, एवमुत्तरत्रापि, तस्य च पुद्गलरूपत्वात् वर्णादयो भवन्ति, अत उक्तं 'पंचवण्णे इत्यादि । आह च-"पंचरस-पंचवण्णेहि, परिणयं दुविहगंधचउफासं । दवियमणंतपएस, सिद्धेहिं णंतगुणहीणं ॥१॥" इत्यायनवृत्तावुक्तम् । एतदनुसारेण च प्राणातिपातादीनां चारित्रमोहनीयत्वात् क्षीणमोहे तदनुपपत्तेः। उपशान्तमोहे तु मोहसद्भावात्प्राणातिपाताद्यङ्गीकारे न किञ्चिद्वाधकमिति चेद् । एतदप्यसत् , भावप्राणातिपातापेक्षयैवोक्तोपचारव्यवस्थितेः, अन्यथा द्रव्यप्राणातिपातादीनां चारित्रमोहनीयकर्मजनकत्वे | सूक्ष्मसम्परायादौ पड्विधबन्धकत्वादि न स्यात् । तजन्यत्वे च तस्योदितस्यानुदितस्य वा जनकत्वं वाच्यम् । आधे उपशान्तमोहे द्रव्यप्राणातिपाताद्यनुपपत्तिः। अन्त्ये च चारित्रमोहनीयसत्तामात्रादुपशान्तमोहे तत्कार्यप्राणातिपातस्वीकारे नाग्न्यादीनां सप्तानां परीषहाणामपि तत्र स्वीकारापत्तेः, तेषामपि चारित्रमोहनीयकार्यत्वप्रतिपादनात् । तदुक्तं भगवत्यां श०८ उ०८"चरित्तमोहणिजे णं भंते! कम्मे कति परीसहा समोअरंति ?, गोयमा सत्त परीसहा समोअरंति । तंजहा-"अरती अचेल इत्थी, णिसीहिआ जायणा य अक्कोसा ॥ सक्कारपुरकारे, चरित्तमोहमि सत्तेते ॥१॥" तत्त्वार्थभाष्येऽप्युक्तम् अ०९ सू०१५ "चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशयाचनासत्कारपुरस्काराः ॥ परीषहा उक्ताः।" इति । एतवृत्तिर्यथा-"दर्शनमोहवर्ज शेषं चारित्रमोहनीयं-चारित्रं मूलोत्तरगुणसम्पन्नान्मोहनात्पराङ्मुखत्वाचारित्रमोहनीयम् , तदुक्ये सत्येते नाग्न्यादयः सप्त परीषहा भवन्ति । नाग्न्यं जुगुप्सोदयाद्१, अरत्युदयादरतिः२, स्त्रीवेदोदयात स्त्रीपरिषहः३, निषद्या स्थानासेवित्वं भयोदयात्४, क्रोधोदयादाक्रोशपरीषहः५, मानोदयाद् याश्चापरीषहः६, लोभोदया CREASRECCHOCHOCOINEK * Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२७७॥ त्सत्कारपुरस्कारपरीषहः७, इति । अथ चारित्रमोहोदये सत्येते परीषहाः प्रोक्ता, तस्मादुपशान्ते न भवन्तीति चेत् , तर्हि चारित्रमोहनी सटिप्पणा यकर्मोदये सति प्राणातिपातादयः प्रोक्ताः, अतस्तेऽपि तत्र मा भूवन् । अथ भावत एव प्राणातिपातादयश्चारित्रमोहनीयोदयसमुत्थाः, ॥ खोपड़ | द्रव्यतस्तु चारित्रमोहनीयस्य सत्तायामपि तत्र ते भवन्तीति चेत् , तर्हि भावत एव चारित्रमोहनीयोदयसमुत्थाः सप्त परीषहाः सूक्ष्मस-18 वृचिः ॥ म्परायगुणस्थानं यावद्भवन्ति, द्रव्यतस्तु त एवोपशान्तमोहेऽपि चारित्रमोहसत्तानिमित्तका भवन्तु, युक्तरुभयत्र तौल्यादिति । यच्च गाथा-८३ सम्भावनारूढमृषाभाषणनिषेधव्याघातेनैव तत्सिद्धिसमर्थनं कृतं तत्तु शशशृङ्गस्यापि निषेधव्याघातात्तत्सिद्धिसमर्थनप्रायम् । या चा- ॥२७७॥ |ऽलोके लोककल्पनातुल्या सम्भावना प्रोक्ता, सा तु प्रकृतार्थस्यातिशयितत्वमेव प्रतिपादयेद् । अलोके लोकप्रमाणासंख्येयखण्डप्रमाणा-19 वधिज्ञानविषयकल्पना हि वैज्ञानिकसम्बन्धेन तद्विषयविशिष्टतामवधिज्ञानस्यैव ज्ञापयतीति । आह च (विशे०) भाष्यकार॥"वडतो पुण बाहिं, लोगत्थं चेव पासई दव्वं ॥सुहुमयरं सुहुमयरं, परमोही जावपरमाणु॥६०६॥"( वर्धमानः पुनरवधिलॊकस्थमेव पश्यति द्रव्यं । सूक्ष्मतरं सूक्ष्मतरं परमावधिर्यावत् परमाणुम् ।।) इति । तद्वदिहापि सम्भावनया विशिष्टमेव मृषाभाषणं प्रसज्यतेति विपरीतैवेयं कल्पना भवत इति । यच्च अत एव 'कालशौकरिकस्य'इत्यायुक्तं, तत्तु तं प्रत्येव गति, यतः कालशौकरिकस्य महिपव्यापादनं महिषव्यापादनत्वेन भगवतोक्तं तद्भावमाश्रित्य, तेन तत्र तत्कल्पनायाः प्रामाण्यम् , सम्भावनारूढमृषाभाषणादेम॒षाभाषात्वादिकं तु भावतो नोच्यत इति कथं तत्कल्पना स्याद् ? न ह्यसतः सम्भावनापि सम्भवति, नहि क्षीणमोहे मैथुनादीनां भवतापि सम्भावना क्रियते; अत एव क्षीणमोहे सम्भावनारूढमृषाभाषादेः स्नातकचारित्रप्रतिबन्धकत्वेन दोषत्वमित्यपि निरस्तम् , असतो दोषत्वायोगात् । अत एव चित्रलिखितनारीदृष्टान्तोऽपि.निरस्तः, असत आकारमात्रताया अप्यभावादिति न किञ्चिदेतत् । यच्च छद्मस्थलिङ्गानां द्रव्यभूतानां मिथ्या HLCUCUCUCURRECRUI Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२७८॥ सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा-८३ ॥२७८॥ SOURCHAS कारादिलिङ्गगम्यत्वस्यापि सैम्भवान्मिथ्याकारस्य वाऽनवरतप्रवृत्तावसम्भवात संयतानां द्रव्यहिंसादिकं कादाचित्कत्वेनानाभोगप्रयुक्तमेवेत्यभिधानं तदयुक्तम् , प्रत्याख्यातभावहिंसादेरेवानाभोगप्रयुक्तकादाचित्कभङ्गपरिणतिवतो मिथ्याकारविषयत्वाद् , द्रव्यहिंसामात्रे तदभाषाद् , अन्यथाऽपवादपदजिनपूजाऽऽहारविहारादिक्रियाणामपि मिथ्याकारविषयत्वापत्तेः। यच्च षष्ठसप्तमलिङ्गयोश्छद्मस्थमात्रे सुलभत्वमुक्तम् , तत्प्रतिलेखनाप्रमार्जनादिक्रियाणां पिपीलिकादिक्षुद्रजन्तुभयोत्पादकत्वेन सावद्यत्वे स्यात् , तदेव तु नास्ति, कायादिनियताचाररूपाणां तासामौत्सर्गिकीणां क्रियाणामत्यन्तनिरवद्यत्वाद् । अपवादकल्पत्वादासां कथञ्चित्सावद्यत्वमिति चेद्, न । अपवादस्यापि विधिशुद्धस्य सावद्यत्वाभावे तत्कल्पत्वेनाभिमते तदभावाद् । न चोत्सर्गापवादव्यतिरिक्तोऽपवादकल्पो राशित्रयकल्पनारसिकं भवन्तं विनाऽन्येन केनापीष्यत इति तत्सद्भावे प्रमाणमस्ति । शक्याशक्यपरिहारविषयभेदेनापवादापवादकल्पयोर्भेदाभ्युपगमे च दुष्करसुकरत्वादिभेदेनानशनयुक्ताहारादिक्रियाणामुत्सर्गोत्सर्गकल्पभेदकल्पनाया अप्यापत्तेरिति न किश्चिदेतत् । तस्मात् षष्ठसप्तमलिंगयोः सौलभ्यमपि प्रमत्तस्यैव प्रतिषेवणदशायां ज्ञेयम् , अप्रमत्तस्य तु सत्तामात्रेणैव तद् द्रष्टव्यम् । यत्तु केवलिनोऽपि परीक्षायां छद्मस्थज्ञानगोचरत्वेन द्रव्यरूपाण्येव लिङ्गानि ग्राह्याणीत्युक्तम् , तन्न चतुरचेतश्चमत्कारकारि, द्रव्यरूपाणामपि प्राणातिपातादीनामभावस्य सर्वकालीनत्वस्य हेतुघटकस्य दुग्रहत्वात् । सूक्ष्मदृष्टया तद्ग्रहे च भावरूपलिङ्गानामपि न दुहत्वमिति । यच्चोक्तं स च केवली द्विविधो ग्राह्य इत्यादि, तदसत् । क्षीणमोहे केवलित्वस्यागमबाधितत्वात् , आगमे छद्मस्थवीतरागमध्य एव क्षीणमोहस्य परिगणितत्वात् । उक्तं च प्रज्ञापनायां 8"से किंतं खीणकसायवीयरायचरित्तायरिथा?,खीणकसायवीयरागचरित्तायरिआ दुविहा पन्नत्ता । जहा छउमत्थखीणकसायवीयरायच रित्तायरिया य, केवली खीणकसायवीयरागचरित्तायरिया य" इत्यादि। यदि चैतामागमबाधामुल्लङ्घयापि 'भाविनि भूतवदुपचारः' इति CSCRIKA Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२७९॥ 46 RECAUSEUR-USA न्यायाद् द्वादशे गुणस्थाने कथञ्चित्केवलित्वमभ्युपगम्यते, तर्हि चरमशरीरिणि प्रथमादिगुणस्थानवनिनि क्षपकश्रेण्यारूढे वा सप्तमा सटिप्पणा दिगुणस्थानवर्तिनि तदभ्युपगन्तव्यं स्यात् । किञ्च-क्षीणमोहस्य केवलित्वविवक्षा केनापि न कृतेति कथं भवता कर्तव्या ? नहि स्वल्प ||खोपज्ञ कालभाविकेवलज्ञानस्यापि छद्मस्थस्य केवलित्वविवक्षा कर्तुं युज्यते । अत एव "छ ठाणाई छउमत्थे सबभावेणं ण जाणइ, ण पासइ । वृत्तिः ॥ तंजहा धम्मत्थिकायं१ अधम्मत्थिकायर आगासं३ जीवं असरीरपडिबद्धं४ परमाणुपोग्गलं५ सद६ । एताणि चेव उप्पण्णणाणदंसणधरे गाथा-८३ अरहा जिणे जाव सव्वभावेणं जाणति पासति तंजहा-धम्मत्थिकायं जाव सदं जाणति' इत्यादि स्थानाङ्गसूत्रे । "इह छमस्थो वि-2॥२७९॥ शिष्टावध्यादिविकलो न त्वकेवली, यतो यद्यपि धर्माधर्माकाशान्यशरीरजीवं च परमावधिर्न जानाति, तथापि परमाणुशब्दौ जानात्येव, 13 रूपित्वात् तयोः, रूपिद्रव्यविषयत्वाचावधेः।" इत्यादि वृत्तायुक्तम् । अत्र परमावधेरन्तर्मुहूर्तादूर्ध्वमुत्पत्स्यमानकेवलज्ञानस्यापि केवलित्वविवक्षा न कृता । यदि च परमावधिमतः केवलित्वविवक्षामकरिष्यत् तदा व्यभिचारशकैव नास्तीति छद्मस्थपदस्य विशेषपरत्वं नावक्ष्यद् वृत्तिकारः । तस्मात् क्षीणमोहस्याप्यन्तर्मुह दूर्ध्वमुत्पत्स्यमानकेवलज्ञानस्य कथश्चित्केवलित्वविवक्षा शास्त्रवाधितैवेति । यदि च क्षीणचारित्रावरणत्वाद्धेतोः क्षीणमोहे केवलित्वं दुर्निवारं, तदा निरतिचारसंयमत्वादप्रतिषेवित्वाचोपशान्तमोहे कषायकुशीले च तद् दुर्निवारं स्यादिति बोध्यम् । यच्च रागद्वेषवत्त्वच्छद्मस्थत्वादीनामैक्योद्भावनेन दूषणं दत्तं, तत्तु न किश्चिद् ; एवं सति समनियतधर्ममा व्याप्त्युच्छेदप्रसङ्गादिति दिग् । इदं विहास्माकमाभाति-यदालोचनायोग्यविराधनादिकं छद्मस्थमात्रलिङ्गं, तदभावश्च केवलिनो | लिङ्गम् , 'कदाचिद्' इत्यनेन 'न कदाचिदपि' इत्यनेन चैतदर्थस्यैव स्फोरणात् । आलोचनायोग्यताया अनाभोगप्रयुक्तकादाचित्कतानियतत्वाद् , इतरत्र च तदभावाद् । इत्थं च केवली न कदाचिदपि प्राणानामतिपातयिता भवति, क्षीणचारित्रावरणत्वाद्-इत्यादौ विशिष्टो RECE Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा • ॥२८॥का 45544554MASS हेतुरनुसन्धेमः, अन्यथा केवलित्वगमकानि लिङ्गानि क्षीणमोहे न सन्ति, किन्तु स्वरूपतः सन्ति । यथा-वह्निरनुष्णः, कृतकत्वाद्इत्यनुमाने कृतकत्वं वनौ स्वरूपतः सदप्यनुष्णत्वगमकलिङ्गत्वेन नास्तीति प्रत्यक्षबाधितपक्षत्वादगमकं प्रोच्यते, तद्वत् 'क्षीणमोहे सटिप्पणा ॥स्वोपक्ष सप्तापि स्थानानि' इत्युक्तावपि न निस्तारः, तद्वदेवाप्रयोजकत्वेन प्रकृतलिङ्गव्यभिचारानुद्धारात् । नह्ययः पिण्डो धूमवान् , वह्निमत्त्वाद् चिः ॥ इत्यत्र पक्षदोषमात्रेण हेतुदोषो निराकर्तुं शक्यते, इत्यनुमानहेतुत्वे उक्तप्रकार आश्रयणीयः, सम्भावनाहेतुत्वे तु न किमप्युपपादनी- गाथा-८४ य मित्युपयुक्तैर्विभावनीयमिति दिक ॥ ८३ ॥ तदेवं केवलिनोऽवश्यम्भाविनी जीवविराधना न भवति' इति खमतिविकल्पनमनर्थहेतु- ॥२८०॥ रित्येतादृशाः कुविकल्पा मोक्षार्थिना त्याज्या इत्याहतिव्वासग्गहदोसा, एयारिसया हवंति कुविगप्पा ॥ ते उच्छिदिय सम्म, आणाड मुणी पहिजा ॥४॥ [तीवासद्ग्रहदोषा(दभिनिवेशा)देतादृशका भवन्ति कुविकल्पाः ॥ तानुच्छिद्य सम्यग् आज्ञायां मुनिः प्रवर्तेत ॥ ८४ ॥] तीव्रात्-सम्यग्वक्तृवचनानिवर्तनीयत्वेनोत्कटाद् , अभिनिवेशाद्विपर्ययग्रहादेताशकाः कुविकल्पा भवन्ति, तानुच्छिद्य सम्यगाज्ञायां गुरुशास्त्रपारतन्त्र्यलक्षणायां मुनिः प्रवर्तेत, न तु बहुश्रुतत्वादिख्यातिमात्रेण स्वमतिविकल्पजालग्रथनरसिको भवेदिति 'एताशका:'-इत्यतिदेशेन यः परस्यायं कुविकल्पोऽस्ति-'यो मांसमश्नाति तस्य सम्यक्त्वं न भवत्येवेति', सोऽप्यपास्तो बो व्यः, केवलसम्यक्त्वधारिणोऽविरतेरेव माहात्म्यादितराभक्ष्यभक्षणस्येव मांसभक्षणादपि निवृत्तेरनियमात् । यदि च "सद्यः सम्मूच्छि-18 तानन्त-जन्तुसन्तानषितम् ॥ तद् ज्ञात्वा भुञ्जानस्य सर्वांशानुकम्पाराहित्यान सम्यक्त्वमित्यभ्युपगमः, तदाऽनन्तजन्तुमयं ज्ञात्वा | मूलकादिकं भक्षयतोऽपि सम्यक्त्वक्षतिरभ्युपगन्तव्या स्याद् । यदि च मांसभक्षणस्यातिनिन्द्यत्वात्तस्य सम्यक्त्वनाशकत्वं तदा परदार-IN Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा सटिप्पणा ॥ खोपड़ चिः ॥ गाथा-८४ ॥२८॥ गमनस्य तत्सुतरां स्यादिति तद्व्यसनवतः सत्य किप्रभृतेः सम्यक्त्वमुच्छिद्येत । एतेन 'बिलवासिनामपि मनुजानां तथाविधकर्मक्षयो पशमेन यदि मांसपरिहारनियन्तृत्वं तदा सम्यग्दृशां तत्सुतरां स्यादिति मांसभक्षणे सम्यक्त्वक्षतिरेव इति निरस्तम् , सम्यक्त्वस्य भाव॥२८॥ धर्मत्वेन कुलधर्ममात्रत्वाभावात् , तथाविधकर्मपरिणतेरनुचितप्रवृत्तिमतोऽपि श्रद्धानगुणेन तदनपगमात् । अन्यथा स्तेनानामपि केषाञ्चि त्परदारगमनपरिहारनियन्तृत्वात् , ततोऽनिवृत्तस्य सत्यकिप्रभृतेः सम्यक्त्वमुच्छिद्येतैवेति ।। न च मांसाहारस्य नरकायुर्बन्धस्थानत्वादेव तदनिवृत्तौ न सम्यक्त्वमिति शङ्कनीयम् , महारम्भमहापरिग्रहादीनामपि तथात्वात् , तदनिवृत्तौ कृष्णवासुदेवादीनामपि सम्यक्त्वापगमापत्तेः॥ किश्च-सम्यक्त्वधारिणां कृष्णप्रभृतीनां मांसभक्षणेऽपि सम्यक्त्वानपगमः शास्त्रेऽपि श्रूयते । तदुक्तं षष्टाङ्गे (अ०१६) तएणं से दुवए राया कंपिल्लपुरं णगरं अणुपविसइ, अणुपविसित्ता विउलं असणं ४ उवक्खडावेइ, उवक्खडावित्ता कोडुंबियपुरिसे सद्दावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया विउलं असणं ४ सुरं च मजं च मंसं च सीधुं च पसन्नं च सुबहुपुप्फफलवत्थगधमल्लालंकारं च वासुदेवप्पामोक्खाणं रायसहस्साणं आवासेसु साहरह तेवि साहरति तएणं ते वासुदेवप्पामोक्खा तं विउलं असणं ४ जाव पसन्नं च आसाएमाणा विहरंति"ति। न चात्र मांसभक्षणादिकं खपरिवारभूतमिथ्यादृशामेव 'तदाज्ञानिमित्तकत्वात् तत्कर्तृकं' व्यपदिइष्टमिति शङ्कनीयम् , 'वासुदेवप्रमुखा' इत्यत्र सर्वेषामेकक्रियायोगात् सम्यक्त्वनाशके तत्र तदाज्ञापनस्याप्यनुपपत्तेश्च ॥ यत्तु वर्णनमात्र त्वेनैवत्सूत्रस्याकिञ्चित्करत्वं परेणोद्भाव्यते, तस्य महानेव कृतान्तकोपः। एवं सति स्वर्गद्धर्यादिप्रतिपादकसूत्राणामपि वर्णनमात्रत्वेनाकि श्चित्करताया वावदूकेन वक्तुं शक्यत्वाद् , लोकनिन्द्यविषयमात्रेणापि यथास्थितार्थप्रतिपादकसूत्रविलोपे नास्तिकत्वस्यानिवारितप्रसरतया ५ सर्वविलोपप्रसङ्गादिति ॥ किश्च-यद्यनन्तकायादिमांसादिभक्षणे सम्यक्त्वस्य मूलोच्छेदः स्यात् तदा तत्र तपः प्रायश्चित्तं नोपदिष्ट स्यात्, CCCCAMERA PRICORRECARSHA ACC Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥ २८२ ॥ उक्तश्च तत्तत्र । तदुक्तं श्राद्धंजीत सूत्रवृत्योः- “चउगुरु णंते, चउलहु, परित्तभोगे सचित्तवज्जिस्स । मंसासववयभंगे, छग्गुरु चउगुरु अणाभोग ।। ९९ ।। " व्याख्या - "मचित्तवर्जकस्य श्रावकादेः 'अनन्त'त्ति अनन्तकायानां मूलकार्द्रकादीनां भक्षणे चतुर्गुरु प्रायश्चित्तं भवति । यदागमः - "सो उण जिणपडिकुट्ठो, अनंतजीवाण गायणिफण्णो || गेही पसंगदोसो, अनंतकाओ अओ गुरुगा ||१||" तथा सचित्तवर्जकस्यैव श्राद्धादेः, 'परित्त 'त्ति प्रत्येक परिभोगे - प्रत्येकाम्रादिपुष्पफलादिभोगे चतुर्लघु प्रायश्चित्तम् । तथा मांसासत्रयोरुपलक्षणान्मधुनवनीतयोश्च 'वयभंगे' त्ति अनाभोगतः पृथग्वक्ष्यमाणत्वादत्राभोगतो ज्ञेयम् । ततश्चाभोगे सति व्रतस्य नियमस्य भङ्गे षड्गुरु, 'चउगुरु'त्ति अनाभोगे सति मांसासत्रमधुनवनीतानां व्रतभङ्गे चतुर्गुरु प्रायश्चित्तं भवतीति गाथाक्षरार्थ इति ॥" ततो मांसभक्षणे सम्यक्त्वं नश्यत्येव' इत्ययमपि कुविकल्प एवेति बोध्यम् ॥ ८४ ॥ ननु विकल्पोच्छेदेनाज्ञया प्रवृत्तिर्हितावहोक्ता । न चाज्ञामात्रानुसरणं हितावहं सम्भवति, सर्वत्र सौलभ्याद्, दृश्यन्ते हि सर्वेऽपि निजनिजगुर्वाद्याज्ञायत्ता इत्युपादेयाज्ञाविशेषमाह - आणा पुण जगगुरुणो, एगंत सुहा वहा सुपरिसुद्धा ॥ अपरिक्खिआ ण गिज्झा, सा सव्वा णाममितेणं ॥८५॥ [आज्ञा पुनर्जगद्गुरोरेकान्तसुखावहा सुपरिशुद्धा || अपरीक्षिता न ग्राह्या सा सर्वा नाममात्रेण || ८५ ॥] व्याख्या- 'आणा पुण'त्ति आज्ञा पुनर्जगद्गुरो त्रिभुवनधर्मगुरोर्भगवतो वीतरागस्य, सुपरिशुद्धा सम्यक्परीक्षा प्राप्ता, एकान्तसुखावहा नियमेन स्वर्गापवर्गादिसुखहेतुर्ग्राह्येति योगः । माऽऽज्ञा सर्वा नाममात्रेणापरीक्षिता सती न ग्राह्या, प्रेक्षावप्रवृत्तेः परीक्षा नियतत्वादिति भावः ॥ ८५० ॥ एतत्परीक्षोपायमाह कस छेय- तावजोगा, परिक्खियव्वा य सा सुवण्णं व ॥ एसा धम्मपरिक्खा, णायव्वा बुद्धिमंतेणं ॥ ८६ ॥ सटिप्पणा || स्वोपज्ञ ॥ गाथा-८५ ॥२८२ ॥ Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२८३॥ [ कपच्छेदतापयोगात् परीक्षितव्या च सा सुवर्णमिव । एषा धर्मपरीक्षा ज्ञातव्या बुद्धिमता ॥ ८६ ॥ ] व्याख्या-सा आज्ञा, कषच्छेदतापयोगात् सुवर्णमिव परीक्षणीया । यथाहि -युक्तिस्वर्ण जात्यवर्णे च सुवर्णमात्रसाम्येन मुग्धलोकैरभेदेन प्रतीयमाने कपच्छेदतापैर्विचक्षणास्तत्परीक्षणं कर्त्तुमुत्सहन्ते, तथाऽऽज्ञायामपि मुग्धैः सर्वत्र नाममात्रादेकत्वेन प्रतीयमानायां विचक्षणास्तत्परीक्षां कपच्छेदतापैः कर्त्तुमुत्सहन्त इति बुद्धिमतैषा धर्मपरीक्षा ज्ञातव्या । यैव ह्याज्ञा सा सर्व एव धर्म इत्याज्ञापरीक्षेव धर्मपरीक्षेति भावः ।। ८६ ।। कपादीनेवात्र योजयितुमाह विहिपडिसे हा उ कसो, तज्जोगक खेमकारिणी किरीया । छेओ तावो य इहं, वाओ जीवाइतत्ताणं ॥ ८७ ॥ [विधिप्रतिषेधौ तु कपः तद्योगक्षेमकारिणी क्रिया ।। छेदः तापश्च इह वादो जीवादितच्चानाम् ॥ ८७ ॥ ] व्याख्या- 'विहिप डिसेहाउ' त्ति । विधिः - अविरुद्धकर्त्तव्यार्थोपदेशकं वाक्यम् । यथा-स्वर्ग - केवलार्थिना तपोध्यानादि कर्त्तव्यमित्यादि । प्रतिषेधः पुनर्न हिंस्यात् सर्वभूतानीत्यादि । एतौ द्वाविह धर्मपरीक्षायां कष एव, सुवर्णपरीक्षायां कषपट्टकरेखेव । इदमुक्तं भवति-यत्र धर्मे उक्तलक्षणौ विधिप्रतिषेधौ पुष्कलावुपलभ्येते स धर्मः कषशुद्धः, न पुनः - "अन्यधर्मस्थिताः सत्त्वा, असुरा इव विष्णुना । उच्छेदनीयास्तेषां हि वधे दोषो न विद्यते || १ ||" इत्यादिवाक्यगर्भ इति । तयोर्विधिप्रतिषेधयोर्योगोऽनाविर्भूतयोः सम्भवः, क्षेमं चाविभूतयोः पालना, तत्कारिणी क्रिया भिक्षाटनादिवाह्यव्यापाररूपा छेदः । यथा कषशुद्धावप्यन्तर्गतामशुद्धिमाशङ्कमानाः सौवर्णिकाः सुवर्णगुलिकादे छेदमाद्रियन्ते, तथा कपशुद्धावपि धर्मस्य छेदमपेक्षन्ते प्रेक्षावन्तः । स च छेदो विशुद्धबाह्यचेष्टरूपः, विशुद्धा च चष्टा सा यत्रासन्तावपि विधिप्रतिषेधावबाधितरूपौ खात्मानं लभेते, लब्धात्मानौ चातिचारविरहितावुत्तरोत्तरां वृद्धिमनुभ : सटिप्पणा ||खोपज्ञ वृतिः ॥ गाथा-८६ ८७ ॥२८३ Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२८४॥ वतः, ईदृशी यत्र धर्मे चेष्टा सप्रपञ्चा प्रोच्यते स धर्म छेदशुद्ध इति ॥ तापश्च जीवादिनश्वानां वादः - स्याद्वादरीत्योपन्यासः । यथाहि - कषच्छेदशुद्धमपि सुवर्ण तापमसहमानं कालिकोन्मीलनदोषान्न सुवर्णभावमश्नुते, एवं धर्मोऽपि सत्यामपि कषच्छेद शुद्धौ तापपरीक्षायाम निर्वहमाणो न स्वभावमासादयति, अतो. जीवादितत्वानां स्याद्वादप्ररूपणया तापशुद्धिरन्वेषणीया । यत्र हि शास्त्र द्रव्यरूपतया - प्रच्युतानुत्पन्नः, पर्यायात्मकतया च प्रतिस्वमपरापरस्वभावास्कन्दनेनानित्यस्वभावो जीवादिरवस्थाप्यते, स्यात्तत्र तापशुद्धिः । यतः | परिणामिन्येवात्मादौ तथाविधाशुद्धपर्यायप्रादुर्भावादुक्तलक्षणः कपो बाह्यचेष्टाशुद्धिलक्षणश्च छेद उपपद्यते न पुनरन्यथेति । अत्र च ताप| परीक्षा बूलवती, कपच्छेदभावेऽपि तापाभावे परीक्षाऽसिद्धः, नहि तापे विघटमानं हेम कपच्छेदयोः सतोरपि स्वं स्वरूपं प्रतिपत्तुमलम्, युक्तिस्वर्णत्वात्तस्येति ॥ ८७ ॥ एताभिः परीक्षाभिर्धमें परीक्षिते, धर्मवान् गुरुरपि परीक्षित एव भवतीत्यभिप्रायवानाह— याहिं परिक्खाहिं, सुद्धे धम्मंमि परिणया जे उ ॥ गुरुणो गुणजलणिहिणो, ते वि विसुद्धा सुवण्णं व ॥८८॥ [ एताभिः परीक्षाभिः शुद्धे धर्मे परिणता ये तु ॥ गुरवो गुणजलनिधयः, तेपि विशुद्धाः सुवर्णमिव ॥ ८८ ॥ ] व्याख्या - एताभिः कषादिपरीक्षाभिः शुद्धे धर्मे ये परिणता एव ते गुरवोऽपि गुणजलनिधयः सुवर्णमिव विशुद्धा द्रष्टव्याः, यद्द्द्रव्यं यदा यद्रूपेण परिणमते तत् तदा तन्मयमेवेति शुद्धधर्मपरिणता गुरवोऽपि शुद्धधर्मरूपत्वेनैवादरणीया इति भावः ॥ ८८ ॥ सुवर्णसदृशत्वमेव गुरूणां भावयन्नाह - सत्थोइयगुणजुत्तो, सुवन्नसरिसो गुरु विणिदिहो ॥ ता तत्थ भांति इमे, विसघायाई सुवन्नगुणे ॥ ८९ ॥ [शास्त्रोदितगुणयुक्तः सुवर्णसदृशो गुरुर्विनिर्दिष्टः । तस्मात्चत्र भणन्ति विषघातादीन्सुवर्णगुणान् ॥ ८९ ॥] सटिप्पणा ॥ स्वोपच चिः ॥ गाथा-८८ ८९ ॥२८४ ॥ Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | व्याख्या-'सत्थोइय'त्ति । शास्त्रे दशवकालिकादावुदिताः प्रतिपादिता ये गुणाः साधुगुणास्तैर्युक्तः सहितः, सुवर्णसह- 121 सटिप्पणा धमपरीक्षामाशो गुरुर्विनिर्दिष्टः, तत्तस्मात्कारणात् , तत्र गुरौ विषघातादीन इमाननन्तरमेव वक्ष्यमाणान् , सुवर्णगुणान् योजयन्ति।।८९॥६ ॥२८५ अत्रार्थेऽष्टसुवर्णगुणप्रतिपादनाय भावंसाधौ गुरौ तद्योजनाय च पूर्वाचार्य(श्रीहरिभद्रसूरि)कृता एव तिस्रो गाथा उपन्यस्य ति ॥ खोपड़ वृत्तिः ॥ है। विसघाइ-रसायण-मं-गलत्थ-विणए-पयाहिणावत्ते ॥ गुरुए-अडज्झ-ऽकुच्छे, अह सुवन्ने गुणा इंति ॥ ९० ॥ || गाथा-९० [विषघाति रसायनमङ्गलार्थविनतं प्रदक्षिणावर्त ॥ गुरुकमदाह्याकुत्स्यमष्टौ सुवर्णे गुणा भवन्ति ॥ ९० ॥] ___व्याख्या-'विसघाई' इत्यादि । विषघाति-गरदोषहननशीलं सुवर्ण भवति । रसायनमङ्गलार्थविनीतमिति कर्मधार ॥२८५॥ यपदम् । रसायनं-वयःस्तम्भनम् , मङ्गलार्थ-मङ्गलप्रयोजनम् , विनीतमिव विनीतम् , कटककेयूरादीष्टविशेषैः परिणमनात् । तथा प्रदक्षिणावर्तमतितापने प्रदक्षिणावृत्ति, तथा गुरुकम् , अलघुसारत्वात् । अदाह्याकुत्स्यमिति कर्मधारयपदम् , तत्रादायमग्नेरदहनीयम् , सारत्वादेव; अकुत्स्यमकुत्सनीयम् , अकुथितगन्धत्वादिति । एवमष्टौ सुवर्णे हेम्नि, गुणा असाधारणधर्मा, भवन्ति स्युरिति गाथार्थः॥ ९० ॥ एतत्समानान् साधुगुणानाहडय मोहविसं घायड १. सिवोवएसा रसायणं होइ २॥गुणओय मंगलत्थं३. कुणड विणीओ अ जोग्गोत्तिा [इति मोहविषं घातयति शिवोपदेशाद्रसायनं भवति ॥ गुणतश्च मङ्गलाथै करोति विनीतश्च योग्य इति ॥ ९१॥] 'व्याख्या-'इय'त्ति । इत्येवं सुवर्णवदित्यर्थः, १मोहविष-विवेकचैतन्यापहारि, घातयति-नाशयति केषाञ्चित् , साधुरिति प्रक्रमः। कुतः ? इत्याह-शिवोपदेशान्मोक्षमार्गप्ररूपणात् ।। तथा स एव २ रसायनमिव रसायनं भवति जायते, शिवोपदेशा Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा * ॥ २८६ ॥ देवाऽजरामरक्षा हेतुत्वात् । तथा गुणतश्च स्वगुणमाहात्म्येन च, ३ मङ्गलार्थं मङ्गलप्रयोजनदुरितोपशममित्यर्थः करोति विधत्ते ॥ ४ facts प्रकृत्यैव भवत्यसौ, योग्य इति कृत्वा ।। ९९ ।। तथामग्गणुसार पाहिण५, गंभीरो गरुअओ तहा होइ६ ॥ कोहग्गिणा अडज्झो७, अकुच्छो सइ सीलभावेणं८॥ [ मार्गानुसारित्वं प्रदक्षिणत्वं गंभीरः गुरुककस्तथा भवति ।। क्रोधाग्निनाऽदाह्यः अकुत्स्यः सदा शीलभावेन ॥ ९२ ॥ ] व्याख्या - मग्गणुमारि'ति । ५ मार्गानुसारित्वं सर्वत्र यत्साधोस्तत्प्रदक्षिणावर्त्तत्वमुच्यते ।। ६ गम्भीरोऽतुच्छचेताः गुरुकको गुरुक इत्यर्थः ।। ' तथा ' इति समुच्चये, भवति स्यात् । तथा ७ क्रोधाग्निना अदाह्यः, सुवर्णवत् ॥ ८तथाsकुत्स्यः सदा शीलभावेन शीललक्षण सौगन्ध्यसद्भावेनेति ।। ९२ ।। निगमयन्नाह - एवं सुन्न सरिसो, पडिपुन्नाहिअगुणो गुरू ओ ॥ इयरो वि समुचियगुणो, ण उ मूलगुणेहि परिहीणो ॥९३॥ [ एवं सुवर्णसदृशः प्रतिपूर्णाधिकगुणो गुरुर्ज्ञेयः ॥ इतरोपि समुचितगुणो न तु मूलगुणैः परिहीनः ॥ ९३ ॥ ] ' एवं 'ति एवमुक्तप्रकारेण सुवर्णमदृशः, सामान्यतो भावसाधुगुणयोगात् । तथा प्रतिपूर्णा अन्यूनाः अधिकगुणाः प्रतिरूपा - दिविशेषगुणा यस्य स तथा, गुरुर्ज्ञेयः । अपवादाभिप्रायेणाह - इतरोऽपि कालादिवैगुण्यादेकादिगुणहीनोऽपि समुचितगुणः पादाहीनगुणो गुरुर्ज्ञेयः नतु मूलगुणैः परिहीनः, तद्रहितस्य गुरुलक्षणवैकल्यप्रतिपादनाद् । उक्तं च (पंचाशक ११ मुं) गुरुगुणरहिओ वि इहं, दव्वो मूलगुणवितो जो "त्ति । मूलगुणसाहित्ये तु सम्मुचितगुणलाभाद् न किञ्चिद्गुणवैकल्येनाऽगुरुत्वमुद्भावनीयमिति भावः ॥ उक्तं च- "ण उ गुणमित्तविहूणोत्ति, चंडरुद्दो उदाहरणं ।। ३५ ।। " ति ॥ ९३ ॥ सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ वृषः ॥ गाथा - ९२ ९३ ॥२८६॥ Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा उचितगुणश्च गुरुर्न परित्याज्यः, किन्तु तदाज्ञायामेव वर्तितव्यमित्याहएयारिसो खलु गुरू, कुलवहुणाएण णेव मोत्तव्यो॥ एयस्स उ आणाए, जइणा धम्ममि जइअव्वं ॥९४॥ | पाटणा खोपज्ञ [एतादृशः खलु गुरुः कुलवधूज्ञातेन नैव मोक्तव्यः॥ एतस्य त्वाज्ञया यतिना धर्मे यतितव्यम् ॥ ९४॥] शुचिः ॥ व्याख्या-एतादृश उचितगुणः, खलु निश्चये, गुरुः कुलवधूज्ञातेन नैव मोक्तव्यः । यथाहि-कुलवधूभा भत्सिताऽपि गाथा-९४ तच्चरणौ न परित्यजति, तथा सुशिष्येण भत्सितेनाप्युचितगुणस्य गुरोश्चरणसेवा न परित्याज्येति भावः । 'तु' पुनः, एतस्योचितगु- ९५-९६ णस्य, गुरोराज्ञया यतिना धर्मे यतितव्यम् ॥१४॥ तदाज्ञास्थितस्य च यो गुणः सम्पद्यते तमाह ॥२८७॥ | गुरुआणाइ ठियस्त य, बज्झाणुढाणसुद्धचित्तस्त ॥ अज्झप्पज्झाणम्मि वि, एगग्गत्तं समुल्लसइ ॥ ९५॥ [गुर्वाज्ञायां च स्थितस्य च बाह्यानुष्ठानशुद्धचित्तस्य ।। अध्यात्मध्यानेपि एकाग्रत्वं समुल्लसति ॥ ९५॥] व्याख्या-'गुरुआणाईत्ति । गुज्ञास्थितस्य च परिणतव्यवहारस्य सतो, वाह्यानुष्ठानेन-विहितावश्यकादिक्रियायोगरूपेण शुद्धचित्तस्य ज्ञानयोगप्रतिबन्धककर्ममलविगमविशदीकृतहृदयस्य निश्चयावलम्बनदशायां शुद्धात्मस्वभावपरिणतौ प्रकटीभृतायाम्, अध्यात्मध्यानेऽपि एकाग्रत्वं समुल्लमति ।। ९५॥ ततः किं भवति ? इत्याहतमि य आयसरूवं, विसयकसायाइदोसमलरहि ॥ विन्नाणाणंदघणं, परिसुद्धं होइ पच्चक्खं ॥ ९६ ॥ • [तस्मिंश्चात्मस्वरूपं विषयकषायादिदोषमलरहितं ॥ विज्ञानानन्दघनं परिशुद्धं भवति प्रत्यक्षम् ॥ ९६ ॥] HABARCELECT Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा १. ॥२८८॥ व्याख्या- 'तंमि यत्ति । तस्मिंश्चाध्यात्म ध्यानैकाग्रत्वे समुल्लसिते, विषयाः शब्दादय इन्द्रियार्थाः कषायाः क्रोधमानमायालो भारतदादयो ये दोषमला जीवगुणमालिन्य हेतवस्तद्रहितं तथा विज्ञानानन्दघनं खरूपप्रतिभासप्रशमसुखैकरसतामापन्नं, परिशुद्ध मनुपहितस्फटिकरत्नवत् प्रकृत्यैव निर्मलमात्मस्वरूपम्, प्रत्यक्षं भवति ॥ ९६ ॥ ततश्वात्मन्येव रतस्य तत्रैव तृप्तस्य तत्रैव च सन्तुष्टस्य स्वात्ममात्रप्रतिबन्धविश्रान्ततया विकल्पोपरमः स्यादित्याह - जलहिम्मि असंखोभे, पत्रणाभावे जहा जलतरंगा ॥ परपरिणामाभावे, णेव विअप्पा तथा हुंति ॥ ९७॥ [ जलघावसंक्षोभे पवनाभावे यथा जलतरङ्गाः । परपरिणामाभावे नैव विकल्पास्तदा भवन्ति ।। ९७ ।। ] 'जल हिम्मि'त्ति | असंक्षोभे संक्षोभपरिणामरहिते, जलधौ समुद्रे, पवनाभावे यथा जलतरङ्गा नैव भवन्ति, तथा तदा आत्मस्वरूपप्रत्यक्षतादशायां, पर परिणामस्य पुद्गलग्रहणमोचन परिणामस्याभावे, नैव विकल्पाः शुभाशुभरूपाश्चित्तविप्लवा, भवन्ति ॥९७॥अध्यात्मध्यानजनितायामात्मस्वरूपप्रत्यक्षतादशायां संहृतसकलविकल्पावस्थायां सूक्ष्मविकल्पोपरमेणैव स्थूल विकल्पो परमदाढर्थमाह का अरती आणंदे, केवत्ति वियप्पणं ण जत्थुत्तं ॥ अपणे तत्थ वियष्पा, पुग्गलसंजोगजा कत्तो ॥ ९८॥ [ का अरतिः आनन्दः कोवेति विकल्पनं न यत्रोक्तम् ।। अन्ये तत्र विकल्पाः पुद्गलसंयोगजाः कुतः ।। ९८ ।। ] व्याख्या- ' का अरति'त्ति । का. अरतिः १ को वा आनन्दः १ इति विकल्पनमपि न, यत्र - आत्मस्वरूपप्रत्यक्षतायाम्, उक्तम्, अध्यात्मशास्त्रे स्वरूपानुभवमग्नतया सन्निहितसुखदुःखविकल्पस्य सूक्ष्मस्याप्यनवकाशात्, तत्रान्ये विकल्पाः स्थूलाः पुद्गलसंयोगजा गृहधनस्त्रजनभोजनादिपुद्गलसंसर्गजनिताः, कुतो भवन्ति ? अपि तु न कुतश्चित् ; स्वाभाविकधर्मज्ञानसामग्र्या सटिप्पणा ॥ स्वोपज्ञ चिः ॥ गाथा - ९७ ९८ ॥२८८॥ Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२८॥ सटिप्पणा || खोपड़ वृत्तिः ॥ गाथा-९९ ॥२८९॥ औपाधिकधर्मज्ञानमात्रं प्रति प्रतिबन्धकत्वादिति भावः । तदयं शुद्धात्मस्वभावानुभवनामा सन्मात्रार्थनिर्भासो धर्मशुक्लध्यानफलं विगलितवेद्यान्तरचिदानन्दनिष्यन्दभूतोऽविकल्पः समाधिरुपगीयते ॥ ९८ ॥ अस्यैवाविकल्पसमाधेरुपायभूतं शुद्धं विकल्पमुपदर्शयतिअपणे पुग्गलभावा, अण्णो एगो य नाणमित्तोहं॥ सुद्धो एस वियप्पो, अविअप्पसमाहिसंजणओ ॥९९॥ [अन्ये पुद्गलभावा अन्य एकश्च ज्ञानमात्रमहं ॥ शुद्ध एष विकल्पः अविकल्पसमाधिसंजनकः ॥ ९९॥] व्याख्या-'अण्णे'त्ति। पुद्गलभावाः पुद्गलपरिणामाः-कायमनोवागानप्राणकर्मवर्गणाधनगृहक्षेत्रारामादिसंस्थानभाजोऽविद्याप्रपञ्चोपरचितममकारविषयीभूताः, अन्ये-मदात्मद्रव्यादेकान्तेन पृथग्भूताः, कालत्रयेऽप्युपयोगलक्षणासंस्पर्शादिति भावः । अहं च ज्ञानमात्रमुपयोगमात्रस्वभाव इति हेतोः पुद्गलभावेभ्योऽभ्य एकश्च, कालत्रयेऽप्यन्यद्रव्यसंसर्गेऽपि तत्स्वभावापरिग्रहाद् अनन्तपर्यायाविर्भावतिरोभावाभ्यामप्यविचलितशुद्धात्मद्रव्यैकशक्तिमत्त्वाच्च । न च ज्ञानदर्शनचारित्ररूपरत्नत्रयस्वभावशालित्वेनापि शुद्धात्मद्रव्यस्यैकत्वक्षतिः सम्भवति प्रभानैर्मल्यदोषहरणशक्तिगुणयोगाजात्यरत्नस्येवेति । एष शुद्धात्मद्रव्यविषयत्वेन शुद्धो विकल्पः, अविकल्पसमाधेः सम्यक प्रकारेण जनकः, एतजनितसंस्कारस्य विकल्पान्तरसंस्कारविरोधित्वेन ततस्तदनुत्थानाद् , एतस्य च वढेर्दाह्य नाश्यानु विनाशवदशुभविकल्पजालमुच्छेद्य खत एवोपरमादिति ॥ ९९ ॥ तदेतदध्यात्मध्यानमविकल्पसमाधिसम्बन्धबन्धुरमित्येतदेवाभिष्टुवन्नाहएयं परमं नाणं, परमो धम्मो इमो च्चिय पसिद्धो॥ एयं परमरहस्स, णिच्छयसुद्धं जिणा बिति ॥१०॥ [ एतत्परमं ज्ञानं परमो धर्मोयमेव प्रसिद्धः । एतत्परमरहस्यं निश्चयशुद्धं जिना ब्रुवते ॥१०॥] ACCORRENOUGUARA Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ CALCRECRUNC धर्मपरीक्षा व्याख्या-'एयं परमं'ति । एतदध्यात्मध्यानं परमं ज्ञान, ज्ञानस्य विरतिफलत्वाद्, विरतेश्च समतासारत्वात् , समताया चैतद्वायत्तत्वादिति भावः। परमो धर्मोऽयमेव प्रसिद्धः, दुर्गतौ पततो जन्तोधरणात् , सिद्धिगतौ नियमेन धारणाच ॥ एतच्च पर- सटिप्पणा ॥२९॥ मरहस्यमुत्कृष्टोपनिषद्भूतं, निश्चयशुद्धं पारमार्थिकनयविशदीकृतं, जिनास्तीर्थकरा, ब्रुवते । यदागम:-( ओघनिर्युक्तो) तस्वोपत्र "परमरहस्समिसी(मी)णं, समत्तगणिपिडगझरिअसाराणं । परिणामियं पमाण, णिच्छयमवलंबमाणाणं ॥७६०॥" [परमरहस्यमृ वृतिः ॥ गाथा-१०१ षीणां (मेषां) समस्तगणिपिटकस्मृतसाराणां । परिणामः प्रमाणं निश्चयमवलम्बमानानाम्] पंचवस्तु गाथा ६०२ ॥ १० ॥ ॥२९॥ __अध्यात्मस्य प्रवचने परमरहस्यत्वादेव परीक्षकैः सर्वत्र तदनुल्लङ्घनेनैव प्रवृत्तिः कर्तव्येत्यभिप्रायवानाह४ अज्झप्पाबाहेणं, विसयविवेगं अओ मुणी बिति ॥ जुत्तो हु(हि)धम्मवाओ, ण सुकवाओ विवाओ वा॥१०१॥ [अध्यात्माबाधेन विषयविवेकमतो मुनयो ब्रुवन्ति ॥ युक्तः खलु (हि) धर्मवादः न शुष्कवादो विवादो वा ॥ १०१॥] व्याख्या- 'अज्झप्पाबाहेणं'ति । अतोऽध्यात्मस्य परमरहस्यत्वादध्यात्माबाधेन-स्वपरगतमैत्र्यादिसमन्वितशुभाशयाविच्छेदेन, विषय विवेकं निर्णिनीषितार्थनिर्णय, ब्रुवते मुनयो विगलितरागद्वेषाः साधवः, कर्त्तव्यमिति शेषः । हि यतो धर्मवाद एव मध्यस्थेन पापभीरुणा च समं तत्वनिर्णयार्थमपक्षपातेन कथाप्रारम्भलक्षणो युक्तः, तत्त्वज्ञानफलत्वात् तस्य(स्याः), न शुष्कवादः, जये पराजये वा परस्य स्वस्य चानर्थलघुत्वापचेः कण्ठशोषमात्रफलः, विवादोवा-दुःस्थितेनार्थिना सह छलजातिप्रधानो जल्पः, युक्तः, 18 साधूनां माध्यस्थ्यप्रधानत्वात् , शुभानुबन्धित्वाच्च साधूनां प्रयत्नस्य ।। १०१॥ ___तदेवं धर्मवादेनैवाध्यात्मावाधेन तत्त्वनिर्णयस्य कर्तव्यत्वाच्छिष्टाचारानुरोधेन तथोद्देशेनैव प्रारब्धस्य स्वग्रन्थफलोपहितत्वं प्रदर्श H Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धर्मपरीक्षा ॥२९॥ RECA- यन्नन्यैरपि तत्त्वनिर्णयसिद्धयर्थमित्थमेव भणितव्यमित्युपदेशमाहभणियं किंचि फुडमिणं,दिसाइ इय धम्मवायमग्गस्स। अण्णेहि वि एवं चिय, सुआणुसारेण भणियवं॥१०२॥ सटिप्पणा ॥खोपक्ष [भणितं किश्चित्स्फुटमिदं दिशेति धर्मवादमार्गस्य ॥ अन्यैरप्येवमेव श्रुतानुसारेण भणितव्यम् ॥१०२॥] वृत्तिः ॥ व्याख्या--'भणिय'ति । इत्युक्तहेतोः, धर्मवादमार्गस्य दिशैव स्फुटमिद किश्चित्प्रकृतार्थगोचरं, भणितं मया, तेन गाथा-१०२ च तात्पर्यार्थदृष्टया तत्त्वनिर्णयसिद्धिरपि कृतैवेति भावः ॥ अन्यैरपि धर्मपरीक्षकः, एवमेव श्रुतानुसारेण भणितव्यम् । इत्थ- १०३-१०४ मेव प्रकृतार्थभ्रमनिवृत्त्या तत्त्वज्ञानसिद्धे रागद्वेषपरिणामाभावेन कल्याणबीजसम्पत्तेश्चेति भावनीयम् ॥ १०२॥ सर्वस्वोपदेशमाह ॥२९ ॥ | किं बहुणा इह जह जह, रागद्दोसा लहुं विलिजंति ॥ तह तह पट्टियव्वं, एसा आणा जिगिदाणं ॥१०३॥18 [किं बहुनेह यथा यथा रागद्वेषौ लघु विलीयेते ॥ तथा तथा प्रवर्तितव्यं एषा आज्ञा जिनेन्द्राणाम् ॥] स्पष्टा ॥ १०३ ॥ एसा धम्मपरिक्खा, रइआ भविआण तत्तबोहहा ॥ सोहिंतु पसायपरा, तं गीयत्था विसेसविऊ ॥१०४॥ [एषा धर्मपरीक्षा रचिता भव्यानां तत्त्वबोधार्थाय ॥ शोधयन्तु प्रसादपराः तां गीतार्थाः विशेषविदः ॥] स्पष्टा ॥१०४॥ A सूरिश्रीविजयादिदेवसुगुरोः पट्टाम्बराहर्मणी, सूरिश्रीविजयादिसिंहसुगुरौ शक्रासनं भेजुषि ॥ सूरिश्रीविजयप्रभे श्रितवति प्राज्यं च राज्यं कृतो, ग्रन्थोऽयं वितनोतु कोविदकुले मोदं विनोदं तथा ॥१॥ न Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -4 - धर्मपरीक्षा // 29 // R सटिप्पणा ॥स्वोपज्ञ वृतिः // // 292 // महोपाध्यायश्रीविनयविजयैश्चारुमतिभिः, प्रचक्रे साहाय्यं तदिह घटनामौष्ठवमभूत् // प्रसर्पकस्तूरीपरिमलविशेषाद्भवति हि, प्रसिद्धः शृङ्गारस्त्रिभुवनजनानन्दजननः // 2 // सन्तः सन्तु प्रसन्ना मे, ग्रन्थश्रमविदो भृशम् // येषामनुग्रहादस्य, सौभाग्यं प्रथितं भवेत् // 3 // // इति जगद्गुरुबिरुदधारिभट्टारकश्रीहीरविजय सूरीश्वरशिष्यमुख्यपदतर्कीविद्याविशारदमहोपाध्यायश्रीकल्याणविजयगणिशिष्यावतंसशास्त्रज्ञतिलकपण्डितश्रीलाभविजयगणिशिष्यरत्नगुणगणगरिष्ठपण्डितश्रीजीतविजयगणिसतीर्थ्यतिलकविपुलयशःप्रतापसौभाग्यनिधिपण्डितश्रीनयविजयगणिचरणकमलसेविना पण्डितश्रीपद्मविजयगणिसहोदरेण पण्डितयशोविजयेन कृतोऽक्षय्यतृतीयायां धर्मपरीक्षानामा ग्रन्थः सम्पूर्णः // संवद्रसाक्षिसप्तेन्दु-नभे च सितपक्षके / / अष्टमीविधुवारे (1726 [1] श्रावण शुक्ल 8 सोम) हि, लिखिता पत्तने पुरे // 1 // SS+ MUSINUSUCCC CLUGk न्यायविशारद-न्यायाचार्य-निजप्रतिभाप्राग्भारोबोधितातीतपूर्वश्रुतकेवलिभगवत् - कूर्चालसरस्वती-पूर्वधरासन्नकालवर्तिचतुश्चत्वारिंशदुत्तरचतुर्दशशतग्रन्थप्रासादसूत्रणसूत्रधारायमाणमूरिकुलोत्तंसश्रीहरिभद्रसूरिलघुबान्धवप्रभृतिविशदबिरुदावलीविभूषित-महोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिप्रणीता स्वोपज्ञविवरणसमेता धर्मपरीक्षा सम्पूर्णा //