Book Title: Tattvartha Sutra Part 01 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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तत्त्वार्थसूत्रे मानाऽग्निपुञ्जसदृशं दाह्यं वस्तुपरिवेष्टचाऽवतिष्ठते । यदा तत्र चिरकालं तिष्ठति तदा - दाह्यं वस्तु भस्मसात् करोति, एतन्नि; सरणात्मकं तैजसं शरीरमवसेयम् । अनिःसरणात्मकं पुनरौदारिकवैक्रियाहारकशरीराऽभ्यन्तरवर्ति तेषां त्रयाणामपि - औदारिकादीनां दीप्तिहेतुकमवगन्तव्यम् ॥३४॥
तत्त्वार्थनिर्युक्तिः — तेजोमयं तैजसं शरीरं द्विविधं प्रज्ञप्तम् लब्धिप्रत्ययं - सहजं च । तत्र—तपोर्विशेषजनिता शक्तिः लब्धिरुच्यते, तत्प्रत्ययं - तत्कारणकं तैजसं शरीरं लब्धिप्रत्ययमुच्यते इदञ्च–प्रथमं तैजसं शरीरं तैजसशरीरलब्धिकारणसमुद्भुतशक्तितपोविशेषानुष्ठानात् कस्यचिदेव महात्मनो जीवस्य कदाचिद् भवति । न तु सर्वस्य ।
उक्तश्च स्थानाङ्गे ३–स्थाने ३ - उददेशके “तिहि ठाणेहिं समणे निग्गंथे संखित्तविउलतेउलेस्से भवइ, तं जहा - आयावणयाए - १ खतिखमाए - २ अपाणगेणं तवोकम्मेणं" - इति । त्रिभिः स्थानैः श्रमणो निर्ग्रन्थः संक्षिप्तविपुलतेजोलेश्यो भवति, तद्यथा - आतापनातः, क्षान्तिक्षमातः, अपानकेन तपः कर्मणा, इति ।
सहजन्तु - द्वितीयं तैजसं शरीरं रसाद्याहारपाकजनकं सर्वप्राणिविषयमभ्युपगन्तव्यम् । तस्मात् - सर्वजन्मसु सहजं तैजसं भवतीति ॥ ३४ ॥
मूलसूत्रम् — “आहारगं एगविहं, पमत्तसंजयस्स चेव" - ॥२५॥ छाया—आहारकमेकविधम्, प्रमत्तसंयतस्यैव " - ॥ ३५॥
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वह जाज्वल्यमान अग्नि के पुंज के समान होता है । जिसे जलाना है उसे घेर कर वह रह जाता है । जब वहाँ चिरकाल तक ठहरता है तो उस जलाने योग्य वस्तु को भस्म कर देता है। इस प्रकार का तैजस शरीर निःसरणात्मक कहलाता है । दूसरा जो अनिःसरणात्मक तैजस शरीर है वह औदारिक, वैक्रिय और आहारक शरीर के भीतर रहता है और इन तीनों शरीरों की दीप्ति का कारण होता है ॥ ३४ ॥
तत्त्वार्थनियुक्ति - तेजोमय या तेज का पिण्ड तैजस शरीर दो प्रकार का कहा गया है - लब्धिप्रत्यय और सहज । विशिष्ट प्रकार के तप से जो शक्ति उत्पन्न होती है, वह लब्धि कहलाती है । उसके निमित्त से उत्पन्न होने वाला शरीर लब्धि प्रत्यय तैजस शरीर कहा जाता है । ऐसा शरीर किसी-किसी महात्माओं को कभी-कभी ही प्राप्त होता है, सब को नहीं ।
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स्थानांग सूत्र के तीसरे स्थानक, दूसरे उद्देशक में कहा है— निर्ग्रन्थ श्रमण तीन कारणों से अपनी विपुल तेजोलेश्या को संक्षिप्त करता है - ( १ ) आतापना लेकर (२) क्षमाभाव धारण करके और (३) चौबीहार तपस्या करके ।
दूसरा सहज तैजस शरीर समस्त संसारी प्राणियों को प्राप्त होता है और वह रस आदि आहार के परिपाक का कारण होता है । अर्थात् हम जो भोजन करते हैं उसे पचाना इसी तैजस शरीर का काम है ॥३४॥
मूलसूत्रार्थ - ' आहारगं एगविहं' ||सूत्र ३५||
શ્રી તત્વાર્થ સૂત્ર : ૧