Book Title: Tattvartha Sutra Part 01 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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दीपिकानिर्युक्तिश्च अ० १ सू० ४१
नारकादीनामायुःस्थितिनिरूपणम् १६३
तत्वार्थ नियुक्तिः - नारक - क - तिर्यङ् - मनुष्य - देवात्मकचतुर्गतिरूपे संसारे आयुषः स्थितिः किं व्यवथिता वर्तते उताहो अकालमृत्युरपि भवतीत्याशङ्कायामुच्यते “आऊ दुविहे, सोबक्कमे निरुवक्कमे य" - इति ।
आयुस्तावद् द्विविधं भवति, अपवर्तनीयम् अनपर्वनीयं च । तत्रापि - अनपवर्तनीयं पुनद्विविधम्, सोपक्रमं निरुपक्रमं च । तत्रोपक्रमणमुपक्रमः क्षयः तेन सहितं सोपक्रमम्, अतिदीर्घकालस्थित्यपि - आयुर्येन कारणविशेषेणाऽध्यवसानादिनाऽल्पकालस्थितिक मापायते स कारणकलापः उपक्रमः स्वल्पकरणम्, प्रत्यासन्नीकरणकारणमित्यर्थः ।
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तेन तादृशोपक्रमेण सहितं सोपक्रममनपवर्तनीयमायुर्विषाग्निजलादिमज्जनादिकं । निर्गत उपक्रमो यस्य तद् निरुपक्रमं चायुर्भवति अध्यवसानादिकारणकलापाभावात् । अथ यथा - ऽतिदीर्घका लस्थितिकमप्यायुः स्वपरिणतिविशेषाद् अल्पकालस्थितिकमापाद्यते, एवम् - अल्पकालस्थितिकमपि आयुः रसायनाद्युपयोगतो दीर्घकालस्थितिरूपां वृद्धिमप्यापादयिष्यते ?
इति चेदुच्चते, दीर्घकालस्थितिकत्वेनाऽबद्धत्वात् - अल्पस्यायुषो वर्धनासम्भवात् । जन्मान्तरे वृद्धस्यैवाऽऽयुषस्तावता कालेन वाऽनुभवो भवति लघीयसा - दीर्घेण वाऽध्यवसानादियोगात् । अभि चारिककर्मणोवाऽपि अकालफलपाकवत् क्षीयते । अबद्धमायुस्तु- - न शक्यते सम्बर्धयितुममृतरसा यनोपयोगेनापि कदाचित्, यथा - दीर्घपटः बेष्टनयाऽल्पः शक्यते कर्तुम् ।
तत्वार्थनियुक्ति - नरक तिर्यंच, मनुष्य और देवगति रूप संसार में आयु को स्थिति क्या व्यवस्थित है ? अथवा क्या अकालमृत्यु भी होती है ? इस प्रकार की आशंका होने पर कहते हैं - आयु दो प्रकार का होता है - अपवर्त्तनीय और अनपवर्त्तनीय । अनपवर्तनीय आयु के भी दो भेद हैं-सोपक्रम और निरुपक्रम । जो आयु उपक्रमण अर्थात् क्षय वाली हो वह सोपक्रम कहलाता है | लम्बे समय तक भोगने योग्य आयु जिस कारण विशेष से अर्थात् अध्यवसान आदि निमित्त से अल्पकालिक हो जाता है, वह कारण उपक्रम कहलाता है, उसे स्वल्पकरण या प्रत्यासन्नीकरण भी कह सकते हैं, क्योंकि उससे आयु स्वल्प होता है या सन्निकट आ जाती है । जो आयु इसप्रकार के उपक्रम से सहित हो उसे सोपक्रम आयु कहते हैं ।
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जिस आयु में विष, अग्नि, जलनिमज्जन आदि उपक्रम लागू न हो सके, वह निरुपक्रम कहलाती है । वहाँ अध्यवसान आदि कारण नहीं होते ।
शंका - जैसे दीर्घकाल की स्थिति वाला आयु कारण मिलने पर अल्पकालिक हो जाता हैं, इसी प्रकार क्या अल्पकालिक आयु रसायन आदि के सेवन से वृद्धि को प्राप्त होकर दीर्घकालिक भी होता है। ?
समाधान - जो आयु दीर्घकालिक रूप में नहीं बँधा है,
ऐसी अल्प आयु की वृद्धि
।
वास्तविकता यह है कि पूर्वजन्म में
जो आयु जितना बँधा गया है, भोगना ही पडेगा, न उसमें कोई कमी होती हैं और न वृद्धि ही हो शस्त्र आदि कारण उपस्थित हो जाने पर दीर्घ काल तक भोगे जाने
होना संभव नहीं है अगले जन्म में वह सब सकती है केवल विष
શ્રી તત્વાર્થ સૂત્ર ઃ ૧