Book Title: Tattvartha Sutra Part 01 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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तत्वार्थ सूत्रे
तथाहि —- अनन्तप्रमाणं तावत् त्रिविधं प्रज्ञप्तम्. परीतानन्तम् - १ युक्तानन्तम् - २ अनन्तानन्तं च-३ तत्सर्वमपि - अनन्तसामान्येनैव परिगृह्यते । अथ लोकस्याऽसंख्यातप्रदेशत्वात् कथं स लोकोऽनन्तप्रदेशानाम् — अनन्ताऽनन्तप्रदेशानां च स्कन्धस्याऽधिकरणं भवेत्. परस्परविरोधात्, अतो नाऽनन्त्यमस्ति प्रदेशानामिति चेन्मैवम् सूक्ष्मपरिणामावगाहनशक्तियोगात् परमाण्वादयः पुद्गलाः सूक्ष्मभावेन परिणताः सन्तः एकैकस्मिन्नपि आकाशप्रदेशेऽनन्तानन्ताः सन्तिष्ठन्ते, एतेषाञ्च परमाणुपुद्गलानामवगहनशक्तिश्वाऽव्याहता विद्यते तस्मादेकस्मिन्नप्याकाशप्रदेशेऽनन्तानामपि प्रदेशानामवस्थानं न विरुद्धमिति ।
अथ पुद्गलानामिति सामान्यवचनात् परमाणूनामपि पुद्गलतया प्रदेशवत्वापत्तिरित्यत आह“णोपरमाणूणं -,,” नोपरमाणूनाम्, परमाणुरूपपुद्गलानां प्रदेशाः सन्ति, तेषां स्वतः प्रदेशमाऋत्वात् प्रदेशा न सम्भवन्ति । यथा - एकस्याकाशप्रदेशस्य प्रदेशभेदाभावात् प्रदेशाभावो वर्तते तथैवपरमाणोरपि प्रदेशमात्रत्वात् प्रदेशाभावोऽस्ति न तु प्रदेशोऽस्ति ।
किञ्च - परमाणुपरिणामापेक्षया कस्यचित्तदन्यस्याऽल्पपरिमाणाभावान्न परमाणोरल्पीयान् कश्चिदन्योऽस्ति येन परमाणोः प्रदेशा भिद्येरन् । एवञ्च यथैकाकाशप्रदेशस्यापि प्रदेशभेदाभावाचाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं है । अनन्तानन्त भी अनन्त का ही एक भेद है । अतएव सामान्य रूप से अनन्त कहने से अनन्तानन्त का भी ग्रहण हो जाता है । अनन्त के तीन भेद हैं-परितानन्त, युक्तानन्त और अनन्तानन्त । इन सब का अनन्त में ही ग्रहण हो जाता है ।
प्रश्न - लोकाकाश के प्रदेश असंख्यात ही हैं, ऐसी स्थिति में उसमें अनन्त प्रदेशी और अनतानन्द प्रदेशी स्कंध कैसे समा सकते हैं ? इससे तो प्रतीत होता है कि प्रदेश अनन्त नहीं हैं अथवा लोकाकाश भी अनन्त प्रदेशी हैं ।
उत्तर - पुद्गलों में सूक्ष्म रूप से परिणत होकर अवगाहन करने की शक्ति होती है । अतएव सूक्ष्म रूप में परिणत हो कर वे एक ही आकाश प्रदेश में अनन्तानन्त तक समा जाते हैं । इस कारण असंख्यातप्रदेशी लोकाकाश में अनन्त प्रदेशो अनन्त स्कंधों का समावेश होने में कोई विरोध नहीं है ।
सामान्य रूप से पुद्गलों के प्रदेश कहने से परमाणु भी प्रदेश होने की संभावना हो सकती है, अतः उसे दूर करने के लिए कहते हैं- 'नो परमाणूनाम्' अर्थात् परमाणुरूप पुद्गलों के प्रदेश नहीं होते, वह स्वयं एक प्रदेश बाला होता है । एक जैसे आकाश के एक प्रदेश में प्रदेश भेद नहीं होता, उसी प्रकार परमाणु में भी प्रदेश भेद नहीं होता है - वहस्वयं एक प्रदेश मात्र ही है ।
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परमाणु पुद्गल का सब से छोटा द्रव्य है । उससे छोटा अन्य कोई पुद्गल नहीं होता । अतः परमाणु में प्रदेशभेद की कल्पना ही नहीं की जा सकती । इस प्रकार जैसे आकाश के एक प्रदेश में प्रदेशभेद का अभाव है और वह अप्रदेशी है, इसी प्रकार अंश
શ્રી તત્વાર્થ સૂત્ર ઃ ૧