Book Title: Tattvartha Sutra Part 01 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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दीपिकानियुक्तिश्च अ.
त्रसजीवनिरूपणम् ७९ रस्यते रसनया-आस्वाद्यते इति रसः, स च तिक्त १ मधुर २ कटु ३ कषाया ४ ऽम्ल ५ भेदात् पञ्चविधः । लवणस्य मधुरान्तर्गतत्वात् , गन्धस्तावत् सुरभि १ दुरभि २ भेदात् द्विविधः प्रज्ञप्तः । वर्णस्तु-कृष्ण-नील-रक्त-पीत-शुक्लभेदात् पञ्चविधः । शब्दश्च–वाग्योगप्रयत्ननिसृष्टोऽनन्तानन्तप्रदेशिकपुद्गलस्कन्धप्रतिविशिष्टपरिणामः, ।
पुद्गलद्रव्यसंघातभेदजन्यो वा गर्जितादिरूपस्त्रिविधोऽवगन्तव्यः । जीवाजीवमिश्रभेदात् । एते च स्पर्शादयः पञ्चविषयाः क्रमशः स्पर्शन रसन–ध्राण चक्षुः श्रोत्राग्राह्या भवन्ति । अत एव स्पर्शादयः पञ्च अर्यमानत्वाद् अर्थाव्यपदिश्यन्ते, सर्वे मिलित्वा त्रयो विंशतिर्विषयाः। उक्तञ्च .-स्थानाङ्गस्य ५ पञ्चमस्थाने ३ उद्देशके ४४३ सूत्रे । "पंच इंदियत्था पण्णत्ता, तं जहा सोई दियत्थे चक्खि दियत्थे घाणिदियत्थे जिभिदियत्थे फासिंदियत्थे" इति । पञ्च-इन्द्रियार्थाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा
श्रोत्रेन्द्रियार्थः चक्षुरिन्द्रियार्थः प्राणेन्द्रियार्थः जिह्वेन्द्रियार्थः स्पर्शनेन्द्रियार्थः इति ॥२१॥ मूलसूत्रम्--"णो इंदियं मणे ताविसए सुअं ॥२२॥ छाया--नो इन्द्रियं मनः तद्विषयः श्रुतम् ॥२२॥
तत्त्वार्थदीपिका :--पूर्व तावद् इन्द्रियाणां तद्विषयाणाञ्च निरूपणं कृतम् तत्र श्रोत्रादीनामुपयोगकरणत्वाद् इन्द्रियत्वं संभवति तेषां शब्दादिविषयं प्रतिनियतत्वेनाऽवस्थितत्वात् मनसः पुनः शब्दादिकं प्रतिनियतत्वाऽभावेनाऽवस्थानादिन्द्रियत्वं न संभवति ।
वह आठ प्रकार का है-कर्कश (कठोर), मृदु (कोमल), गुरु (भारी) लघु (हल्का) शीत (ठंडा) उष्ण (गर्म), स्निग्ध (चिकना) और रूक्ष (रूखा)।
__जिह्वा द्वारा जो चखा जा सके वह रस कहलाता है । तिक्त, मधुर, कटु, कषाय, और अम्ल खट्टा के भेद से रस के पाँच भेद हैं। लवण (नमक) मधुर रस में सम्मिलित है। गंध के दो प्रकार हैं-सुरभि गंध और दुरभि गंध । वर्ण पाँच तरह का होता है-कृष्ण, नील, रक्त, पीत और शुक्ल । वचनयोग से निकला हुआ, अनन्तानप्रदेशी पुद्गलस्कंध का एक विशिष्ट परिणमन शब्द कहलाता है । शब्द कभी पुद्गल दव्यों के टकराने से और कभी पृथक्-पृथक् होने से उत्पन्न होता है । उसके तीन भेद हैं-जीवशब्द, अजीवशब्द और मिश्रशब्द ।
ये स्पर्श आदि पाँचों विषय अनुक्रम से स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य होते हैं । इस कारण इन्हें 'अर्थ' भी कहते हैं । क्योंकि जीव इनकी अभिलाषा करते हैं । ये सब मिलकर तेईस विषय हैं । स्थानांगसूत्र के पाँचवें स्थान में, तीसरे उद्देशक के ४४३ वें सूत्र में कहा है-इन्द्रियों के पाँच विषय कहे हैं, यथा-श्रोत्रेन्द्रिय का विषय, चक्षुरिन्द्रिय का विषय, घ्राणेन्द्रिय का विषय, रसनेन्द्रिय का विषय और स्पर्शेन्द्रिय का विषय ॥२१॥
શ્રી તત્વાર્થ સૂત્ર: ૧