Book Title: Savruttik Aagam Sootraani 1 Part 36 Uttaradhyayan Mool evam Vrutti Part 2
Author(s): Anandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Vardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रागमनमो नमो निम्मलदसणस्स पूज्य आनंद-क्षमा-ललित-सुशील-सुधर्मसागर-गुरुभ्यो नमः भाग सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि 36 आगम ४३ "उत्तराध्ययनानि” मूलं एवं वृत्ति: [२] साजरा मूल संशोधक :- पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यश्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजसाहेब अभिनव-संकलनकर्ता :- आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] पूज्य शासनप्रभावक आचार्यश्री हर्षसागरसूरिजी की प्रेरणा से 'वर्धमान जैन आगम मंदिर संस्था' पालिताणा। ~14 Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ईस प्रोजेक्ट के संपूर्ण-अनुदान-दाता श्री आगम मंदिर पालिताणा 55 RAS S HEKSHA Holiso-origotam Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ● आगम आजम आजम अजम BITOTSY आजम नमो नमो निम्मलदंसणस्स सवृत्तिक- आगम-सुत्ताणि मूल संशोधक पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज आजाम औजा आगत अभिनव संकलनकर्ता ~3~ आजसु आगम आवास आवास आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि ] आजम प्रत- प्राप्ति और पेज- सेटिंग कर्ता : के चेरमन श्री प्रवीणभाई शाह, अमेरिका मुद्रक : नवप्रभात प्रिन्टींग प्रेस अमदाबाद Mo 9825598855 / 9825306275 Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ਗੁਰਸ਼ ਦੋਰਸ ਸ਼ਾਕੰਸ਼ ਵਜ ਕਾਲ ਸੈਕਸ ਵੀਡੀਓ ਸDa समाज के प्राण वाचना शताब्दी वर्ष ਕਰ ਜਾ ਰਿਸ ਸੰਗ ਰਿਹਾ ਹਾਲ ਸ ਸ ਚਲ ਜ ਨਕ - 4 ~ Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [भाग-३६] श्री उत्तराध्ययनानि (मूलसूत्रम् - ४/२) नमो नमो निम्मलदंसणस्स पूज्य श्रीआनंद-क्षमा-ललित -सुशील सुधर्मसागर गुरुभ्यो नमः “उत्तराध्ययनानि” मूलं एवं वृत्तिः [मूलं + निर्युक्तिः + शान्तिसूरि-रचिता वृत्तिः] [आद्य संपादकश्री] पूज्य आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागर सूरीश्वरजी म. सा. (किञ्चित् वैशिष्ठ्यं समर्पितेन सह ) पुन: संकलनकर्ता मुनि दीपरत्नसागर (M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि) 'सवृत्तिक- आगम- सुत्ताणि' श्रेणि भाग-36 → 28/07/2017, शुक्रवार, २०७३ श्रावण शुक्ल ५ श्री आगमोद्धारक-वाचना- शताब्दी वर्ष - निमित्त 'आगम-वृत्ति - मुद्रण- प्रोजेक्ट' ~5~ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सामाचारी-संरक्षक, ज्ञानधनी, आगम-संशोधक, तीव्र-मेधावी, समाधिमृत्यु-प्राप्त, बहुमुखीप्रतिभाधारक पज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागरसरीश्वरजी महाराज साहेब | .जिन्होने शुद्ध-श्रद्धा, सम्यक्-श्रुत आराधना, यथाख्यातचारित्र के प्रति गति और अंत समय देह-ममत्व के त्याग के द्वारा कायोत्सर्ग नामक अभ्यंतर-तप कि मिशाल कायम कि है ऐसे बहुश्रुत आचार्य श्री सागरानंदसूरीश्वरजी महाराज का परिचय कराना मेरे लिए नामुमकिन है , फ़िर भी | गुरुभक्ति बुद्धि से श्रद्धांजली स्वरुप एक मामुली सी झलक पैस करने का यह प्रयास मात्र है। . चारित्र-ग्रहण के बाद अल्प कालमे जो अपने गुरुदेव की छत्रछाया से दूर हो गये , तो भी गुरुदेव के स्वर्ग-गमन को सिर्फ कर्मो का प्रभाव | मानकर अपने संयम के लक्ष्य प्रति स्थिर रहते हुए अकेले ज्ञान-मार्ग कि साधना के पथ पर चले । पढाई के लिए ही कितने महिनो तक रोज एकासणा तप के साथ बारह किल्लोमिटर पैदल विहार भी किया | लेकिन अपने मंझिल पे डटे रहे, और परिणाम स्वरुप संस्कृत एवं प्राकृत भाषा का, | प्राचीन लिपिओ का, व्याकरण-न्याय-साहित्य आदि का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया | जैन आगमशास्त्रो के समुद्र को भी पार कर गए। .एक अकेला आदमी भी क्या नहीं कर शकता? इस प्रश्न का उत्तर हमें इस महापुरुष के जीवन और कवन से मिल गया, जब वे चल पड़े। | देवर्द्धिगणी क्षमाश्रमण के स्थापित पथ पर. बिना किसी सहाय लिए हुए सिर्फ अकेले ही "जैन-आगम-शास्त्रो" को दीर्घजीवी बनाने के लिए अनेक : हस्तप्रतो से शुद्ध-पाठ तैयार किये | दो वैकल्पिक आगम, कल्पसूत्र और निर्यक्तिओ को जोड़कर ४५ आगम-शास्त्रो को संशोधित कर के संपादित किया : || फिर पालीताणामें आगम मंदिर बनवाकर आरस-पत्थर के ऊपर ये सभी आगम-साहित्य को कंडारा , सूरतमें तामपत्र पर भी अंकित करवाए और : "आगम मंजूषा" नाम से मुद्रण भी करवा के बड़ी बड़ी पेटीमें रखवा के गाँव गाँव भेज दिए | वर्तमानकालमे सर्व प्रथमबार ऐसा कार्य हुआ | • सिर्फ मूल आगम के कार्य से ही उन के कदम रुके नहीं थे , उन्होंने आगमो की वृत्ति, चूर्णि, नियुक्ति, अवचूरी, संस्कृत-छाया आदि का | : भी संशोधन-सम्पादन किया | उपयोगी विषयो के लिए उन्होंने एक लाख श्लोक प्रमाण संस्कृत-प्राकृत नए ग्रंथो की रचना भी की | कितने ही ग्रंथो: । की प्रस्तावना भी लिखी | ये सम्यक्-श्रुत मुद्रित करवाने के लिए आगमोदय समिति, देवचंद लालभाई इत्यादि विभिन्न संस्था की स्थापना भी की। .ज्ञानमार्ग के अलावा सम्मेतशिखर, अंतरीक्षजी, केशरियाजी आदि तीर्थरक्षा कर के सम्यक-दर्शन-आराधना का परिचय भी दिया | राजाओं . को प्रतिबोध कर के और वाचनाओ द्वारा अपनी प्रवचन-प्रभावकता भी उजागर करवाई । बालदिक्षा, देवद्रव्य-संरक्षण, तिथि-प्रश्न इत्यादि विषयोमे | सत्य-पक्षमें अंत तक दृढ़ रहे | जैनशासन के लिए जब जरुरत पड़ी तब अदालती कारवाईओ का सामना भी बड़ी निडरता से किया था | .सागरानंदजी के नाम से मशहूर हो चुके पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजीने अपने परिवार स्वरुप ८७० साधू-साध्वीजी भी शासन को भेट किये | ! ...ये थे हमारे गुरुदेव “सागरजी"... ......मुनि दीपरत्नसागर... - .. - .. - .. - .. - .. - .. ~64 Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संयमैकलक्षी, उपधान-तप-प्रेरक, चारित्र-मार्ग-रागी, प्रवचन-पटु, सुपरिवार-युक्त पूज्य गच्छाधिपतिआचार्यदेव श्री देवेन्द्रसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब ... परमपूज्य आचार्यश्री आनंदसागरसूरीश्वरजी के पाट-परंपरामे हुए तिसरे गच्छाधिपति थे पूज्य आचार्य श्री देवेन्द्रसागरसूरीश्वरजी , जो एक | पून्यवान् आत्मा थे, दीक्षा ग्रहण के बाद अल्पकालमे ही एक शिष्य के गुरु बन गये | फिर क्या । शिष्यो कि संख्या बढ़ती चली, बढ़ते हुए पुन्य के । • साथ-साथ वे आखिर 'गच्छाधिपति' पद पे आरूढ़ हो गए | इस महात्मा का पुन्य सिर्फ शिष्यों तक सिमित नही था, वे जहा कहीं भी 'उपधान-तप' की प्रेरणा करते थे, तुरंत ही वहां 'उपधान' हो जाते थे | प्रवचनपटुता एवं पर्षदापुन्य के कारण उन के उपदेश-प्राप्त बहोत आत्माओने संयम-मार्ग का स्वीकार किया | खुद भी संयमैकलक्षी होने के कारण चारित्रमार्ग के रागी तो थे ही, साथसाथ ज्ञानमार्ग का स्पर्श भी उन का निरंतर रहेता था | आप कभी भी दुपहर को चले जाइए, वे खुद अकेले या शिष्य-परिवार के साथ कोई भी ग्रन्थ के अध्ययन-अध्यापनमें रत दिखाई देंगे। ... ये तो हमने उनके जीवन के दो-तीन पहेल दिखाए । एक और भी अनुसरणीय बात उन के जीवन में देखने को मिली थी- 'आराधना-प्रेम'. | • कैसी भी शारीरिक स्थिति हो, मगर उन्होंने दोनों शाश्वती ओलीजी, [पोष दशमी, शुक्ल पंचमी, त्रिकाल देववंदन, पर्व या पर्वतिथि के देववंदन आदि : | आराधना कभी नहीं छोड़ी | आखरी सालोमें जब उन को एहसास हो गया की अब 'अंतिम-आराधना' का अवसर नजदीक है, तब उन के मुहमें एक ही | : रटण बारबार चालु हो गया- “अरिहंतनुं शरण, सिद्धनुं शरण, साधुनुं शरण, केवली भगवंते भाखेला धर्मनु शरण इसी चार शरणो के रटण के साथ ही वे : | समाधि-मृत्यु-रूप सम्यक् निद्रा को प्राप्त हुए थे | ऐसे महान् सूरिवर को भावबरी वंदना | ... मुनि दीपरत्नसागर... ... श्री वर्धमान जैन आगम मंदिर संस्था, पालिताणा ... पूज्यपाद आनंदसागर-सूरीश्वरजी की बौद्धिक-प्रतिभा का मूर्तिमंत स्वरुप ऐसी इस संस्था की स्थापना विक्रम संवत १९९९ मे महा-वद ५ को हुइ।। पूज्य आचार्य हर्षसागरसूरिजी की प्रेरणा से जिन की तरफ़ से इस सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि के लिए संपूर्ण द्रव्य-सहाय की प्राप्ति हुइ। | शिल्प-स्थापत्य , शिलोत्कीर्ण आगम और समवसरण स्थित नयनरम्य ४५ चौमुख जिन-प्रतिमाजी से सुशोभित ऐसा ये 'आगममंदिर' है, जो : शत्रुजय-गिरिराज कि तलेटीमे स्थित है | वर्तमान २४ जिनवर, २० विहरमान जिनवर और १ शाश्वत मिलाकर ४५ चौमुखजी यहा बिराजमान है | जहां : |४० समवसरण की रचना मेरु पर्वत के तिनो काण्ड के वर्णों के अनुसार चार अलग-अलग रंगो के आरस-पत्थर से बना है, देवो द्वारा रचित समवसरण | : के शास्त्र वर्णन-अनुसार आगम-मंदिर कि समवसरण का स्थापत्य है | ऐसी अनेक विशेषता से युक्त ये आगममंदिर है। *** मुनि दीपरत्नसागर... | . -.. -.. -.. . - . . - . . - . . - . . - . . - . . Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - .. - .. - .. . . - . . -.. -.. -.. __'सागर-समुदाय-एकता-संरक्षक, तीर्थ-उद्धार-कार्य-प्रवृत्त, गुणानुरागी' इस "सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' श्रेणि भाग १ से ४० के संपूर्ण अनुदान के प्रेरणादाता पूज्य शासनप्रभावक आचार्य श्री हर्षसागरसूरिजी महाराज साहेब पूज्यपाद स्व. गच्छाधिपति देवेन्द्रसागर-सूरीश्वरजी के विनयी शिष्य एवं दो गच्छाधिपतिओ के मुख्य सहायक के रुपमे 'सागर समुदाय' के सुचारु संचालक पूज्य हर्षसागरसूरिजी, जिन की प्रेरणा से ये "सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि" के मुद्रण के लिए संपूर्ण द्रव्यराशि प्राप्त हुई, उनका अत्यल्प परिचय यहां करेंगे| समुदाय-एकता के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हुए ये महात्मा समुदाय के साधु-साध्वीजी की आवश्यकताओकी पूर्ती के लिए भी : प्रवृत्त रहेते है, प्राचीन-अर्वाचीन तीर्थो के जीर्णोद्धार एवं विकाश के लिए भी उत्साहित रहेते है, ज्ञान-क्षेत्र अछूता न रहे इसीलिए अनुमोदना, अनुदान एवं | समय मिलने पर शास्त्र-वांचनमें भी रूचि रखते है | समुदाय के जरूरतमंद साध्वीजी भगवंतो के आवास का विषय हो या साध्वीजी के विहारमें मजदूर : का वेतन चुकाना हो, ऐसे छोटे-छोटे कार्यों के प्रति भी उन का लक्ष्य रहेता है | दर्शन-शुद्धि के लिए जब उन्होंने समग्र भारतवर्ष के १०० साल तक के | पुराने जिनालयो में १८ अभिषेक की प्रेरणा की, उस वक्त लगभग सभी अभिषेक-सामग्री की द्रव्य-शुद्धि का ख़याल रखते हुए अपनी मेधावी बुद्धि का : परिचय दिया था, साथमे अनुकंपा भाव से पुजारी या विधि करानेवाले को यत्किंचित् बहुमान प्रगट करते हुए कुछ धन-राशि प्रदान करवाई। ऐसे बहुगुण-संपन्न महात्मा पूज्य आचार्यश्री हर्षसागर-सूरिजी को हम भावभरी वंदना करते हुए इस श्रुतकार्य का प्रारंभ करने जा रहे है । ... मुनि दीपरत्नसागर [कात्रजपूना, कपडवंज, प्रभासपाटण आदि स्थानोमे आगममंदिर के प्रेरक, कर्मग्रंथ अभ्यास, निस्पृह महात्मा पूज्यपाद गच्छाधिपति आचार्य श्री दौलतसागर-सूरीश्वरजी महाराज साहेब (एवं) अजातशत्रु, स्वाध्याय-रसिक, प्रशांतमूर्ती और अपने गुरु के प्रीतिपात्र परम पूज्य आचार्य श्री नंदीवर्धनसागर-सूरिजी महाराज साहेब इस पवित्र श्रुत-कार्यमे दोनो सूरिवरो का स्मरण करते हुए कोटि कोटि वंदना के साथ .......मुनि दीपरत्नसागर -..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-.. . 48. Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मूलाका: १६४०+८८ उत्तराध्ययनानि मूल-सूत्रस्य विषयानुक्रम दीप-अनुक्रमा: १७३१ | पृष्ठांक मलांक: । अध्ययन | पृष्ठांक: | ०००१ ०१ विनयसत्तं ००४९ ०२ परिषह विभक्ति : ००९५ ०३ चातुरंगियं ०११५ ०४ असंस्कृतं ०१२८ ०५ अकाममरणियं ०१६००६ क्षुल्लकनिन्थियं । ००७ ०१७९ ०७ औरभियं ०३३ ०२०९ ०८ कापिलियं ०६८ ०२२८ ०९ नमिप्रव्रज्या ०९३ ०२९१ | १० द्रुमपत्रक १३७ ०३२८ | ११ बहुश्रुतपूजा १८० ०३६० | १२ हरिकेशियं २०४ | मूलांक: | मुलांक: अध्ययनं ०४०७ १३ चित्रसंभूतियं ०४४२ | १४ इषकारियं ०४९५ | १५ सभिक्षुकं ०५११ | १६ ब्रह्मचर्यसमाधि ०५३९ | १७ पापश्रमणियं ०५६० १८ संयतियं ०६१४ १९ मृगापुत्रिक ०७१३ |२० महानिर्ग्रन्थियं ०७७३ | २१ समुद्रपालितं ०७९७ २२ रथनेमियं ०८४७ २३ केशीगौतमियं | ०९३६ | २४ प्रवचनमाता पृष्ठांक: | २४५ २८३ ३२१ | ३३७ ३५८ ३७१ ३९७ मूलांक: अध्ययन ०९६३ | २५ यज्ञकियं १००७ २६ सामाचारी १०५९ | २७ खलंकियं १०७६ २८ मोक्षमार्गगति: १११२ | २९ सम्यक्त्वपराक्रम ११८९ | ३० तपोमार्गगति: १२२६ | ३१ चरणविधिः १२४७ ३२ प्रमादस्थानं १३५८ | ३३ कर्मप्रकृत्ति: १३८३ | ३४ लेश्या-अध्ययनं १४४४ | ३५ अणगारमार्गगति: १४६५ | ३६ जीवाजीव-विभक्तिः ४२९ ४६० पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४], मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [उत्तराध्ययनानि मूलं एवं वृत्तिः] इस प्रकाशन की विकास- गाथा यह प्रत सबसे पहले “उत्तराध्ययनानि सूत्र” के नामसे सन १९९६ (विक्रम संवत १९७२) में देवचन्द्र लालभाइ पुस्तकोद्धार संस्था द्वारा प्रकाश हुई, इस के संपादक-महोदय थे पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी (सागरानंदसूरिजी ) महाराज साहेब | 3 इसी प्रत को फिर अपने नामसे 'जिनशासन आराधना ट्रस्ट' की तरफ से आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरिजीने छपवाई, जिसमे उन्होंने खुदने तो कुछ नहीं किया, मगर इसी प्रत को ऑफसेट करवा के ऊपर अपना नाम एवं अपनी प्रकाशन संस्था का नाम छाप दिया. यह स्पष्ट रूपसे एक प्रकारसे अदत्तादान ही है, ऐसी अनेक प्रतो के अगले दो पेज पलटकर या नए डालकर उन्होंने अपने नामसे छपवाई है, इस तरह वो अपने आपको बड़ा आगम संरक्षक साबित करनेकी अनुचित चेष्टा कर चुके है। इसी उत्तराध्ययन०-सूत्र की प्रत को ऑफसेट की मदद से दुसरोने भी प्रकाशित करवाई है, किसीने पूज्यश्री सागरानंदसूरीश्वरजी महाराजश्री का नाम बड़ी इज्जत के साथ अपनी जगह पे ही रखा है, और खुदका नाम पुनः संपादक रूप से पेश किया है तो किसीने अपना नाम आगे कर दिया है और पूज्य सागरानंदसूरीश्वरजीका नाम गौण कर दिया है या उड़ा दिया है | ** हमारा ये प्रयास क्यों?* आगम की सेवा करने के हमें तो बहोत अवसर मिले, ४५ आगम सटीक भी हमने ३० भागोमे १२५०० से ज्यादा पृष्ठोमें प्रकाशित करवाए है, किन्तु लोगो की पूज्यश्री सागरानंदसूरीश्वरजी के प्रति श्रद्धा तथा प्रत स्वरुप प्राचीन प्रथा का आदर देखकर हमने इसी प्रत को स्केन करवाई, उसके बाद एक स्पेशियल फोरमेट बनवाया, जिसमे बीचमे पूज्यश्री संपादित प्रत ज्यों की त्यों रख दी, ऊपर शीर्षस्थानमे आगम का नाम, फिर अध्ययन--मूलसूत्र आदि के नंबर लिख दिए, ताँकि पढ़नेवाले को प्रत्येक पेज पर कौनसा अध्ययन, सूत्र, आदि चल रहे है उसका सरलतासे ज्ञान हो शके | बार्यों तरफ आगम का क्रम और इसी प्रत का सूत्रक्रम दिया है, उसके साथ वहाँ 'दीप अनुक्रम' भी दिया है, जिससे हमारे प्राकृत, संस्कृत, हिंदी गुजराती, | इंग्लिश आदि सभी आगम प्रकाशनोमें प्रवेश कर शके । हमारे अनुक्रम तो प्रत्येक प्रकाशनोमें एक सामान और क्रमशः आगे बढते हुए ही है। इसीलिए सिर्फ क्रम नंबर दिए है, मगर प्रत में गाथा और सूत्रों के नंबर अलग-अलग होने से हमने जहां सूत्र है वहाँ कौंस [-] दिए है और जहां गाथा है वहाँ II-II ऐसी दो लाइन खींची या 'गाथा' शब्द लिखा है। हर पृष्ठ के नीचे विशिष्ठ फूटनोट दी है | , शासनप्रभावक पूज्य आचार्यश्री हर्षसागरसूरिजी म०सा० की प्रेरणासे और श्री वर्धमान जैन आगममंदिर, पालिताणा की संपूर्ण द्रव्य सहाय से ये 'सवृत्तिक- आगम-सुत्ताणि' भाग - ३६ का मुद्रण हुआ है, हम उन के प्रति हमारा आभार व्यक्त करते है | ~ 10~ ..मुनि दीपरत्नसागर. ------ Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२३६] प्रत सूत्रांक ||३२|| - ॥ उक्तं पञ्चममध्ययनं, साम्प्रतं षष्ठमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययने मरणविभक्तिरक्ता, तत्रापि |चानन्तरं पण्डितमरणं, तच 'विरयाण पंडियं बेति'ति वचनाद्विरतानामेव, न चैते विद्याचरणविकला इति तत्खरूपमनेनोच्यते, इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्याध्ययनस्य महापुरस्येव चत्वार्यनुयोगद्वाराणि भवन्तीत्यादिचर्चस्तावद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे क्षुल्लकनिम्रन्थीयमिति नाम, ततः क्षुलकस्य निर्ग्रन्थस्य च निक्षेपः कार्यः, तत्र क्षुल्लकस्य विपक्षो महान् , तदपेक्षत्वात् क्षुल्लकस्य, इति तन्निक्षेपे निक्षिप्तमेव तद्भवतीत्यभिप्रायेणाहनामं ठवणा दविए खित्ते काले पहाण पइ भावो । एएसि महंताणं पडिवक्खो खुल्लया हुंति ॥ २३६ ॥ व्याख्या-अत्र नामस्थापने क्षुण्णे, महच्छन्दश्च प्रक्रमात् सर्वत्र गम्यते, तत्रागमतो ज्ञाताऽनुपयुक्तो द्रव्यमहत्, नोआगमतो ज्ञशरीरभव्यशरीरतद्वयतिरिक्तं द्रव्यमहद् अचित्तमहास्कन्धो दण्डादिकरणेन यश्चतुर्भिः समयैः सकललोकमापूरयति, क्षेत्रमहत् लोकालोकव्याप्याकाशं, कालमहद् अनागताद्धा, प्रधानमहत्रिधा-सचित्तमचित्तं मिश्र च, तत्र सचित्तं द्विपदं चतुष्पदमपदं च, तत्र द्विपदं तीर्थकृत् चतुष्पदं सरभः अपदं पनादिदोत्पन्नं पद्मम् , अचित्तं चिन्तामणिः, मिश्र तीर्थकदेव राज्याभिषेकादिष्वलकृतः, प्रतिमहत् यदन्यापेक्षया महदुच्यते, यथा सर्षपाचनकश्च+नकाद्वदरमित्यादि, भावमहत् प्राधान्यतः क्षायिको भावः कालतः पारिणामिकोऽनाद्यनन्तजीवाजीवत्वादिरूपत्वा - -- दीप अनुक्रम [१६०] - - - पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं -६ "क्षुल्लकनिर्ग्रन्थिय" आरभ्यते ~11 Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२३७] उत्तराध्य. प्रत बृहहृत्तिः ॥२५५॥ सूत्रांक ||३२|| त्तिस्य आश्रयतः औदयिको बहुतरजीवाश्रयत्वात् तस्य, तथा च वृद्धाः-"आसयओ ओदयितो भावो, तमि भावे ki बहुतरा जीवा बटुंति" पारिणामिकाविवक्षया चैतत् सम्भाव्यते, अतः पारिणामिक एवाश्रयतो महान् , अशेष-JAधीयम. |जीवाजीवद्रव्याश्रयत्वात् , प्रस्तुतमर्थमाह-'एतेषाम्' अनन्तरमुक्तानां नामादिमहतां 'प्रतिपक्षों विपक्षः क्षुल्लकानि || भवन्ति, तत्रापि नामस्थापने प्रतीते, द्रव्यतः परमाणुः, क्षेत्रतः आकाशप्रदेशः, कालतः समयः, प्राधान्यतः सचिचाचित्तमिश्रभेदतस्विधा, तत्र सचित्तं द्विपदमाहारकं शरीर चतुष्पदं सिंहः अपदं लवकपुष्पम् , अचित्तं हीरकः, मिश्र जन्मसमयानन्तरमलङ्कृतस्तीर्थकृत् , प्रतिक्षुलकमामलकाद्वदरं बदराचनक इत्यादि, भावक्षुलकं क्षायिको भावः, उक्तं हि वृद्धः-"सर्वत्थोवा जीवा खाइए भावे, बटुंति" सांसारिकसत्त्वापेक्षं चैतद् , अन्यथौपशमिक एव सर्वस्तोक||तया भावक्षुलकं सम्भवतीति गाथार्थः ॥ इत्थं क्षुलकनिक्षेपमभिधाय निर्ग्रन्थनिक्षेपमाहनिक्खेवो नियंठमि चउबिहो दुविहोय दवमि । आगमनोआगमओ नोआगमतो य सो तिविहो २३७| व्याख्या निक्षेपो' न्यासः 'णियंठमिति निर्गन्धे निर्गन्धविषयः 'चतुर्विधो नामस्थापनाद्रव्यभावभेदात् , तत्र नामस्थापने क्षुण्णो, द्विविधो भवति द्रव्ये आगमनोआगमतश्च, तत्रागमतः प्राग्वत् , नोआगमतश्च 'स' इति ॥२५५॥ निम्रन्थः 'त्रिविधः' त्रिभेद इति गाथार्थः ॥ त्रैविध्यमेवाह १ आश्रयत औदायिको भावः तस्मिन् भावे बहुतरा जीवा वर्तन्ते । २ सर्वस्तोका जीवाः क्षायिक भावे वर्तन्ते । दीप अनुक्रम [१६०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~12 Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२३८] प्रत सूत्रांक ||३२|| जाणगसरीरभविए तवतिरित्ते य निण्हगाईसु । भावंमि नियंठो खलु पंचविहो होइ नायवो ॥ २३८॥ व्याख्या-जाणगसरीरभविए'त्ति ज्ञशरीरनिर्ग्रन्थो भव्यशरीरनिर्ग्रन्थश्च पश्चात्कृतपुरस्कृतनिर्ग्रन्थपर्यायतयाऽयं । 1४घृतकुम्भ इत्यादिन्यायतः प्राग्वद्भावनीयः, तद्वयतिरिक्तश्च निवादिषु, आदिशब्दात् पार्श्वस्थादिपरिग्रहः, भावनि ग्रन्थोऽप्यागमतो नोआगमतश्च, तत्रागमतस्तथैव, नोआगमतस्तु खत एवाह नियुक्तिकृत्-भाये निर्ग्रन्थः, खलु-17 क्यालङ्कारे, 'पञ्चविधः' पञ्चभेदो भवति ज्ञातव्य इति गाथार्थः ॥ पञ्चविधनिम्रन्थस्वरूपं च वृद्धसम्प्रदायादबसेयं, स चायम्-पोआगमतो णियंठत्ते वट्टमाणा पश्च, तंजहा-पुलाए बकुसे कुसीले णियंठे सिणाए । पुलातो पंचविहो, जो आसेवणं प्रति, गाणपुलातो दरिसणपुलाओ चरित्तपुलातो लिंगपुलातो अहासुहुमपुलागोत्ति । पुलागो णाम असारो, जहा धन्नेसु पलंजी, एवं णाणदंसणचरित्तणिस्सारत्तं जो उवेति सो पुलागो, लिंगपुलागो लिंगाउ पुलागी होतो, अहासुहुमो य एएसु चेव पंचसुवि जो थोवं थोयं विराहेति, लद्धिपुलाओ पुण जस्स देविंद १ नोआगमतो निर्मन्थत्वे वर्तमानाः पञ्च, तद्यथा-पुलाको वकुश: कुशीलो निर्ग्रन्थः स्नातकः । पुलाकः पञ्चविधः-य आसेवनां प्रति, झानपुलाको दर्शनपुलाकश्चारित्रपुलाकः लिङ्गपुलाकः यथासूक्ष्मपुलाक इति । पुलाको नाम असारो, यथा धान्येषु पल जी, एवं ज्ञानदर्शनचारित्रनिस्सारत्वं य उपैति स पुलाकः, लिङ्गपुलाको लिङ्गात् पुलाकीभवन् , यथासूक्ष्मश्च एतेष्वेव पञ्चस्वपि यः स्तोकं स्तोक चिराधयति, लब्धिपुलाकः पुनर्यस्य देवेन्द्र दीप अनुक्रम [१६०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~13. Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: (२३८] प्रत सूत्रांक ||३२|| उत्तराध्य. रिद्धिसरिसा रिद्धी, सो सिंगणादियकजे समुप्पणे चक्कवदिपि सबलवाहणं चुण्णेउं समत्थो । बउसा सरीरोपकरण- क्षुल्लकनिबृहद्वृत्तिः विभूषाऽनुवर्तिनः ऋद्धियशस्कामाः सातगौरवाश्रिताः अविविक्तपरिवाराः छेदशबलचारित्तजुत्ता णिग्गंथा बउसा) अन्धीयम्भण्णंति, ते पंचविहा, तंजहा-आभोगवकुसा अणाभोगवकुसा संवुडवकुसा असंवुडवकुसा अहासुहुमबकुसा। ॥२५६॥ आभोगबकुसा आभोगेण जो जाणतो करेइ, अणाभोगेण अयाणंतो, संबुडो मूलगुणाइसु, असंवुडो तेसु चेव, अहासुहुमबकुसो अच्छासु पूसिया अवणेति सरीरे वा धूलिमाइ अवण्णेति । कुत्सितं शीलं यस्य पञ्चसु प्रत्येकं ज्ञानादादिषु, सो कुसीलो दुविहो-पडिसेवणाकुसीलो कसायकुसीलो, सम्माराहणविवरीया पडिगया वा सेवणा पडि+ सेवणा पंचसु णाणाइसु, कसायकुसीलो जस्स पंचसु णाणाइसु कसाएहिं विराहणा कजति सो कसायकुसीलोत्ति। १०र्द्धिसदृशा ऋद्धिः, स शृङ्गनादितकार्ये समुत्पन्ने चक्रवर्त्तिनमपि सबलवाहन चूरयितुं समर्थः । बकुशाः छेदशबलचारित्रयुक्ता निर्मन्था बकुशा भण्यन्ते, ते पञ्चविधाः, तद्यथा--आभोगबकुशा अनाभोगबकुशाः संवृतबकुशा असंवृतबकुशा यथासूक्ष्मवकुशाः । आभोगबकुशो आभोगेन यो जानन करोति, अनाभोगेनाजानन् , संवृतो मूलगुणादिषु, असंवृतस्तेष्वेव, यथासूक्ष्मबकुशः अक्ष्णोः पुष्पिकामपनयति शरीराद्वा ॥२५६ धूल्यादिकमपनयति । स कुशीलो द्विविधः-प्रतिसेवनाकुशीलः कषाबकुशीलः, सम्यगाराधनविपरीता प्रतिगता वा सेवना प्रतिसेवना पञ्चसु ज्ञानाविषु, कषायकुशीलो यस्य पञ्चसु ज्ञानादिषु कषायविराधना क्रियते स कपायकुशील इति । दीप अनुक्रम [१६०] 2. पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~14 Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२३८] - - प्रत सूत्रांक ||३२|| - हणियंठो अभितरवाहिरगंथणिग्गतो, सो उपसंतकसातो खीणकसातो वा अंतोमुत्तकालितो, सो पंचविहो-प ढमसमयणियंठो अपढमसमयनियंठो, अहवा चरमसमयनियंठो अचरमसमयनियंठो अहासुहुमणियंठोत्ति, अंतोमु-1 हुत्तणियंठकालसमयरासीए पढमसमए पडियजमाणो पढमसमयनियंठो, सेसेसु समयएसु वट्टमाणो अपढमसमयनि-1181 यंठो, चरमे-अंतिमे समए वट्टमाणो चरमसमयणियंठो, अचरमा-आदिमज्झा, अहासुहुमो एएसुसऽसुवि। सिणातो-स्नातको मोहणिज्जाइघातियचउकम्मावगतो सिणातो भण्णति, सो पंचविहो-अच्छवी असबलो अकमंसो संसुद्धणाणदंसणधरो अरहा जिणो केवली, अच्छवी-अव्यथकः, सबलो सुद्धासुद्धो एगंतसुद्धो असबलो, अंशा-अवयवाः कर्मणस्ते अवगया जस्स सो अकम्मंसो, संसुद्धाणि पाणदंसणाणि धारेति जो सो संसुद्धणाणदं-14 १ निम्रन्थः अभ्यन्तरवाह्यग्रन्थनिर्गतः, स उपशान्तकषायः क्षीणकषायो वा अन्तर्मुहूर्त्तकालिक;, स पञ्चविधः--प्रथमसमयनिर्मन्थः अप्रथमसमयनिर्मन्धः अथवा चरमसमयनिर्मन्यः अचरमसमयनिर्मन्थः यथासूक्ष्मनिर्मन्थ इति । अन्तमुहर्तनिर्मन्यकालसमयराशी प्रथ-13 * मसमयं प्रतिपद्यमानः प्रथमसमयनिम्रन्थः, शेषेषु समयेषु वर्तमानोऽप्रथमसमयनिम्रन्थः, चरमे-अन्तिम समये वर्तमानश्चरमसमयनि ग्रन्थः, अचरमा-आदिमध्याः, यथासूक्ष्म एतेषु सर्वेष्वपि । मोहनीवादिधातिचतुष्कर्मापगतः स्मातको भण्वते, स पञ्चविधः-अच्छविः || अशबल: अकर्माशः संशुद्धज्ञानदर्शनधरः अर्हन जिनः केवली, शबलः शुद्धाशुद्धः एकान्तशुद्धोऽशबलः,-अपगता यस्मात् सोऽकर्माशः, संशुद्धे ज्ञानदर्शने धारयति यः स संशुद्धज्ञान - दीप अनुक्रम [१६०] २-५ REsical For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~15 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२३८] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः प्रत ॥२५७॥ सूत्रांक ||३२|| सणधरो, पूजामर्हतीति अरहा, अथवा नास्य रहस्यं विद्यत इति अरहा, जितकषायत्वाजिनः, एसो पंचविहो सिणा-4 क्षुल्लकनियगो। आह च भाष्यकृत् ग्रन्धीयम्. तत्व णियंठालातो बकुसकुसीलो णियंठ पहातो य । तत्थ पुलाओ दुविहो आसेवण लद्धितो चेव ॥१॥ पुलागवकुसकुसीला नियंठसिणायगा य णायचा । एएर्सि पंचण्हवि होइ विभासा इमा कमसो ॥२॥ तत्थ पुलातो दुविहो लद्धिपुलातो तहेव इयरो वा । लद्धिपुलातो संघाइकज इयरो य पंचविहो॥३॥ णाणे दंसणचरणे लिंगे अहसुहुमए य णायचो । णाणे दंसणचरणे तेसिं तु विराहण असारो ॥४॥ लिंगपुलातो अन्नं णिक्कारणतो करेति सो लिंगं । मणसा अकप्पियाईणिसेवओ होयहासुहुमो ॥५॥ सरीरे उपकरणे वा बाउसियत्तं दुहा समक्खायं । सुकिलवत्थाणि धरे देसे सो सरीरं मि ॥६॥ आभोगमणाभोग संबुडमसंबुडे अहासुहुमे । सो दुविहोऽवी बउसो पंचविहो होइ णायद्यो॥७॥ आभोगे जाणतो करेति दोसं तहा अणाभोगे । मुलुत्तरेहि संबुडो विवरीय असंबुडो होति ॥८॥ अच्छिमुहमजमाणो होइ अहासुहुमतो तहा बउसो । पडिसेवणाकसाए होइ कुसीलो दुहा एसो ॥९॥ णाणे दंसणचरणे तवे य अहसुहुमए य बोद्धचे। पडिसेवणाकुसीलो पंचविहो ऊ मुणेयधो ॥१०॥ १० दर्शनधरः । एष पञ्चविधः सातकः । २ भाष्य प्राय एतदनुगतमेवेति न संस्कृतम् दीप अनुक्रम [१६०] ||२५७॥ matt Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~16 Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: (२३८] RSS प्रत सूत्रांक ||३२|| णाणादी उवजीवति जहसुहुमो अहा इमो मुणेयछो । सातितो रागं बच्चति एसो तवचरणी ॥११॥ एमेव कसायंमिवि पंचविहो होइ ऊ कुसीलो उ । कोहेणं विजाति पउंजए एय माणादी ॥१२॥ एमेव दंसणंमिवि सावं पुण देति ऊ चरितमि । मणसा कोहाईणि उ करेइ अह सो अहासुहुमो ॥१३॥ पढमापढमा चरिमे अचरिम सुहुमे य होति णिग्गंथे । अच्छबि अस्सबले या अकम्मसंसुद्ध अरहजिणो॥१४॥ ते च संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपातस्थानविकल्पतः साध्याः, एते पुलाकादयः पञ्च निग्रन्थविशेषाः एभिः संयमादिभिरनुगमविकल्पः साध्या भवन्ति, तत्र संयमे तावत् पुलाकबकुश कुशीलाः एए तिण्णिवि दोस। संजमेसु-सामाइते छेओवठ्ठावणीए य, कसायकुसीला दोसु-परिहारविसुद्धीए सुहुमसंपराए य इति सम्प्रदायः। प्रज्ञप्तिस्त्वाह-कसायकुसीले णं पुच्छा ?, सामाइयसंजमे वा हुज्जा, जाव मुहुमसंपरायसंजमे या हुजा, णो अह खायसंजमे हुजा, णियंठा सिणायगा य एए दोऽपि अहक्खायसंजमे पुलागवकुसपडिसेवणाकुसीला य उक्को-IA सेणं अभिन्नदसपुवधरा कसायकुसीलनिर्ग्रन्थौ चतुर्दशपूर्वधरौ । जघन्येन पुलाकस्य श्रुतमाचारवस्तु नवमपूर्वे, १ एते त्रयोऽपि द्वयोः संयमयोः-सामायिके छेदोषस्थानीये च, कषायकुशीला द्वयोः-परिहारविशुद्धौ सूक्ष्मसंपराये च । कषायकुशीलः पृच्छा, सामायिकसंयमे वा भवेत् यावत्सूक्ष्मसंपरायसंयमे वा भवेत् , न यथाख्यातसंयमे भवेत् , निर्मन्थाः स्नातकाचैते द्वयेऽपि यथाख्यातसंयमे । पुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीलाबोत्कृष्टेनाभिन्नदशपूर्वधयः । दीप अनुक्रम [१६०] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~17 Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: (२३८] A बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक उत्तराध्य. बकुशकुशीलनिग्रन्थानां श्रुतमष्टौ प्रवचनमातरः, श्रुतापगतः केवली सातक इति सम्प्रदायाभिप्रायः। प्रज्ञत्यभिप्रा- क्षुलकनियस्तु-"पुलाए णं भंते ! केवतियं सुयं अहिजेजा ?, गोयमा ! जहण्णेणं णवमस्स पुचस्स तइयं आयारवर, प्रन्थीयम्. उकोसेणं नव पुबाई अहिजेजा" । इदानी प्रतिसेवना-पश्चानां मूलगुणानां रात्रिभोजनस्य च पराभियोगाद्वला-IN ભારથ૮ कारेण अन्यतमत् प्रतिसेवमानः पुलाको भवति, मैथुनमेवेत्येके, प्रज्ञप्तिस्तु-"पुलाए णं पुच्छा, जाव मूलगुणे पडि-13 & सेवेमाणे पंचण्हं आसवाणं अन्नयरं पडिसेवेजा, उत्तरगुणे पडिसेवेमाणे दसविहस्स पञ्चक्खाणस्स अन्नयरं पडि-1 सेवेजा" बकुशो द्विविधः-उपकरणबकुशः शरीरबकुशश्च, तत्रोपकरणाभिव्यक्तचित्तो विविधविचित्रमहाधनोपक-15 रणपरिग्रहयुक्तः विशेषयुक्तोपकरणकाङ्क्षायुक्तो नित्यं तत्प्रतिकारसेवी भिक्षुरुपकरणवकुशो भवति, शरीराभिष्वक्तचित्तो विभूषार्थ तत्प्रतिकारसेवी शरीरवकुशः । प्रतिसेवनाकुशीलो मूलगुणानविराधयन्नुत्तरगुणेषु काश्चिद्विराधनां प्रतिसेवते, प्रज्ञप्तिस्तु-"बैकुसे णं पुच्छा, जाव णो मूलगुणपडिसेवए होजा, उत्तरगुणपडिसेवए हुजा, पडिसेव ||३२|| % दीप अनुक्रम [१६०] % + ॥२५॥ १ पुलाको भदन्त ! कियत् श्रुतमधीयेत', गौतम! जघन्येन नवमस्य पूर्वस्य तृतीयमाचारवस्तु, उत्कर्षेण नव पूर्वाणि भधीयेत । २ पुलाकः। पृच्छा, यावत् मूलगुणान् प्रतिसेवमानः पञ्चानामाश्रवाणामन्यतरं प्रतिसेवेत, उत्तरगुणान प्रतिसेबमानो दशविधस्य प्रत्यास्थानस्यान्यतरन् प्रतिसेवेत । ३ बकुशः पृच्छा, याचनो मूलगुणप्रतिसेवको भवेत् उत्तरगुणप्रतिसेवको भवेत् प्रतिसेवना पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~18 Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२३८] प्रत सूत्रांक ||३२|| जाणाकुसीले जहा पुलाए" कषायकुशीलनिम्रन्थस्नातकानां प्रतिसेवना नास्ति । तीर्थमिदानी, सर्वेषां तीर्थकराणां । तीर्थेषु भवन्ति, एके वाचार्या मन्यन्ते-पुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीलास्तीर्थे नित्यं, शेषास्तु तीर्थेऽतीर्थे वा । 'लिङ्गहै मिति लिङ्गं द्विविध-द्रव्यलिङ्गं भावलिङ्गं च, भावलिङ्ग प्रतीय सर्वे निर्ग्रन्थलिक भवन्ति, द्रव्यलिङ्गं प्रतीत्य भाज्याः। लेश्याः पुलाकस्योत्तरास्तिस्रो लेश्या भवन्ति, बकुशप्रतिसेवनाकुशीलयोः सर्वा अपि, कषायकुशीलस्य परिहारविशुदस्तिस्र उत्तराः, सूक्ष्मसम्परायस्य निर्ग्रन्थस्नातकयोश्च शुक्लच केवला भवति, अयोगः शैलेशीप्रतिपन्नोऽलेश्यो भवति, प्रज्ञप्तिस्तु-"पुलाए ण पुच्छा, जाव तिसु लेसासु होजा, तंजहा-तेउलेसाए पम्हलेसाए सुक्कलेसाए, एवं बउसस्सवि, एवं पडिसेवणाकुसीलस्सवि । कसायकुसीले पुच्छा, जाव छसु लेसासु होज"त्ति । उपपातः पुलाकस्योत्कृष्टस्थितिषु । राधा देवेषु सहस्रारे, बकुशप्रतिसेवनाकुशीलयोाविंशतिसागरोपमस्थितिष्वच्युते कल्पे, कषायकुशीलनिर्ग्रन्थयोखयविंशत्६ सागरोपमस्थितिषु सर्वार्थसिद्धे, सर्वेषामपि जघन्यं पल्योपमपृथक्त्वस्थितिषु सौधर्मे, प्रज्ञप्तिस्तु "कैसायकुसीले जहा पुलाए, णवरं उक्कोसेण अणुत्तरविमाणेसु, णियंठे णं एवं चेब, जाव बेमाणिएसु उववजमाणे अजहण्णमणुको सेणं १. कुशीलो यथा पुलाकः । २ पुलाको भवन्त ! पृच्छा, यावत्तिसृषु लेश्यासु भवेत् , तद्यथा-तेजोलेश्यायां पालेश्यायां शुखलेश्या-12 ४ याम् , एवं बकुशम्यापि, एवं प्रतिसेवनाकुशीलस्यापि । कषायकुशीले पृच्छा ?, यावत् षट्सु लेश्यासु भवेत् इति । ३ कषायकुशीलो यथा : Clपुलाकः, नवरमुत्कर्षेण अनुत्तरविमानेषु, निर्मन्थ एवमेव, यावद्वैमानिकेपूत्पद्यमानः अजघन्योत्कृष्टे दीप अनुक्रम [१६०] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~19 Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२३८] प्रत सूत्रांक ||३२|| उत्तराध्य. 18 अणुत्तरविमाणेसु उववज्जति," स्नातकस्य निर्वाणमिति । स्थानम्-असङ्ख्ययानि संयमस्थानानि कषायनिमित्तानि क्षुलकनि भवन्ति, तत्र सर्वजघन्यानि संयमलब्धिस्थानानि पुलाककषायकुशीलयोः, तो युगपदसङ्ख्येयानि स्थानानिन्धीयम, गच्छतः, ततः पुलाको ब्युच्छिद्यते, कषायकुशीलस्ततोऽसङ्ख्येयानि स्थानान्येकाकी गच्छति, ततः कषाय॥२५९॥ 5. कुशीलप्रतिसेवनाकुशीलबकुशा युगपदसङ्ख्ययानि स्थानानि गच्छन्ति, ततो बकुशो ब्युच्छिद्यते, ततोऽप्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा प्रतिसेवनाकुशीलो व्युच्छिद्यते, ततोऽसञ्जयेयानि स्थानानि गत्वा कषायकुशीलो व्युच्छिद्यते, अत: ऊर्द्धमकपायस्थानानि गत्वा निग्रन्थः प्रतिपद्यते, सोऽप्यसङ्घधेयानि स्थानानि गत्या व्युच्छिद्यते, प्रज्ञप्तिस्तु-"णियंHठस्स णं भंते ! केवइया णं संजमठाणा पन्नत्ता ?, गोयमा ! एगे अजहरणमुक्कोसए संजमठ्ठाणे पण्णत्ते” अत एव ऊर्द्धमेकमेव स्थानं गत्वा सातको निर्वाणं प्राप्नोति, एषां संयमलब्धिरुत्तरोत्तरस्थानन्तगुणा भवतीति एप सम्प्रदायः। भाष्यकारोऽप्याह संयम सुय पडिसेवण तिथे लिंगे य लेस उववाए। ठाणं च पति बिसेसो पुलागमाईण जोएज्जा ॥१॥ पुलाग बकुसकुसीला सामाइयछेयसंजमे होति । होति कसायकुसीलो परिहारे सुहुमरागे य॥२॥ .. णिग्गंथो य सिणातो अहखाए संजमे मुणेयबो । दसपुवधरुकोसा पडिसेव पुलाय बउसा य ॥३॥ १. नानुत्तरविमानेषु उत्पद्यते।२ निर्ग्रन्थस्य भदन्त ! क्रियन्ति संयमस्थानानि प्रज्ञप्तानि?, गौतम! एकं अजघन्योत्कृष्ट संयमस्थानं प्रज्ञप्तम् | दीप अनुक्रम [१६०] ॥२५॥ SamEducatimtintamasan Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~20~ Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२३८] प्रत सूत्रांक ||३२|| चोइसपुवधरातो कसायणियंठा य होंति णायचा । ववगयसुतो य केवलि मूलासेवीपुलाओ य ॥४॥ चित्तलवत्थासेवि बलाभिओगेण सो भवति बउसो । मूलगुण उत्तरगुणे सरीरवउसो मुणेयवो ॥५॥ पहाय कसायकुसीले निग्गंथाणं च नत्थि पडिसेवा । सधेसुं तित्थेसं होति पुलागादि य णियंठा ॥६॥ लिंगे उ भावलिंगे सच्चेसि दवलिंग भयणिज्जा । लेसाउ पुलागस्स य उवरिलातो भवे तिण्णि ॥७॥ बकुसपडिसेवगाणं सवा लेसाउ होंति णायबा । परिहारविसुद्धीणं तिण्हुवरिल्ला कसाए उ॥८॥ णिग्गंथसुहुमरागे सुक्का लेसा तहा सिणाएसुं । सेलेसिं पडिवण्णो लेसातीए मुणेयबो ॥९॥ पुलागस्स सहस्सारे सेवगवउसाण अचुए कप्पे । सकसायणियंठाणं सबढे पहायगो सिद्धो॥१०॥ पुलागकुसीलाणं सचजहण्णाई होति ठाणाई । वोलीणेहिं असंखेहिं होइ पुलागस्स योच्छित्ती॥११॥ कसायकुसीलो उवरिं असंखिजाई तु तत्थ ठाणाई । पडिसेवणबउसे वा कसायकुसीलो तओऽसंखा ॥१२॥ योच्छिपणे उ बउसो उवरिं पडिसेवणा कसाओ य। गंतुमसंखिजाई छिज्जइ पडिसेवणकुसीलो ॥१३॥ उपरि गंतुं छिजति कसायसेवी ततो हु सो णियमा । उद्धं एगठ्ठाणं णिग्गंथसिणायगाणं तु ॥१४॥ अत्र च यत्पुलाकादीनां मूलोत्तरगुणविराधकत्वेऽपि निर्ग्रन्थत्वमुक्तं तज्जघन्यजघन्यतरोत्कृष्टोत्कृष्टतरादिभेदतः संयमस्थानानामसङ्ख्यतया तदात्मकतया च चारित्रपरिणतेरिति भावनीयं । यदप्येषां संयमित्वेऽपि पड्लेश्याभिधानं दीप अनुक्रम [१६०] SamEducatan intimatema FaPROTHERwatatuwant पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~21 Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||32|| दीप अनुक्रम [१६०] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२६०॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || ३२...|| निर्युक्ति: [२३९] अध्ययनं [६], तदप्याद्यानां भावपरावृत्तिमपेक्ष्य 'आगरभावमायाए वा से सिया पलिभागमायाए वा से सिया' इत्याद्यागमप्रामाप्यादविरुद्धमेव इत्यलं प्रसङ्गेनेति ॥ सम्प्रति निर्युक्तिरनुस्रियते, तत्र च 'भावे निर्ग्रन्थः खलुः पञ्चविधो भवति ज्ञातव्यः' इत्यनेन वाह्याभ्यन्तरहेतुका निर्मन्धभेदा उक्ताः, साम्प्रतं त्वान्तरसंयमस्थान निबन्धनांस्तद्भेदानाह - उक्कोसो उ नियंठो जहन्नओ चेव होइ णायो । अजहन्नमणुकोसा हुंति णियंठा असंखिज्जा ॥ २३९ ॥ व्याख्या - उत्कृप्यत इत्युत्कर्षः स एवोत्कर्षकः, कोऽर्थः ? - उत्कृष्टो निर्मन्थो, जघन्यकश्चैव भवति ज्ञातव्यः, तथा 'अजहष्णमणुकोस' त्ति अजघन्या अनुत्कृष्टा भवन्ति निर्ग्रन्थाः असङ्ख्येयाः, संयमस्थानापेक्षया च निर्मन्धानां जघन्यत्वमुत्कृष्टत्वमजघन्यानुत्कृष्टत्वं वा ज्ञेयं, तथा च वृद्धाः – जो उकोसएस संजमट्ठाणेसु वहति सो उक्कोसगणियंटो भण्णति, एवं जहणणओ जहण्णएसु, सेसो अजहन्नमणुकोस त्ति गाथार्थः । इह च निर्गतो प्रन्थान्निर्मन्थ इति ग्रन्थमेव भेदाभिधानद्वारेणाह दुविहो य होइ गंथो बज्झो अभितरो य नायो। अंतो य चउदसविहो दसहा पुण बाहिरो गंथो २४० व्याख्या- 'द्विविधश्व' द्विभेदो भवति प्रश्यते-वध्यते कषायवशगेनात्मनेति ग्रन्थः, अथवा ग्रथ्नाति - वभात्या१ आकार भावनादाय (मात्रा) वा सा (तस्याः) स्यात् प्रतिभागमादाय (मात्रया) वा सा स्यात् । २ य उत्कृष्टेषु संयमस्थानेषु वर्त्तते स उत्कृष्टकनिर्प्रन्धो भण्यते, एवं जघन्यो जघन्यकेषु, शेषा अजघन्योत्कृष्टाः Education intemational For Parsons Praten क्षुल्लकनिग्रन्थीयम्. ~ 22~ ॥२६० ॥ intr पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२४०] प्रत सूत्रांक ||३२|| त्मानं कर्मणेति ग्रन्थः, तद्वैविध्यमेवाह-बहिर्मवो बायोऽभ्यन्तरश्च 'ज्ञातव्यः' अवबोद्धव्यः, तत्र च 'अंतो अति द अन्तःशब्दोऽधिकरणप्रधानमव्ययं, चः पूरणे, ततश्चान्तरिति मध्ये यो ग्रन्थोऽभ्यन्तर इत्यर्थः, स किमित्याह-'चतु देशविधः' चतुर्दशभेदो 'दशधा' दशप्रकारः, पुनःशब्दो विशेषद्योतकः, 'बाहिरो'त्ति बायो ग्रन्थ इति गाथार्थः ॥ तत्रान्तरस्य चतुर्दश भेदानाहलि कोहो माणो माया लोभे पिजे तहेव दोसे य । मिच्छत्त वेअ अरइ रइ हास सोगे य दुग्गंछा ॥ २४१॥ व्याख्या-क्रोधः' अप्रीतिलक्षणः, 'मानः' अहमितिप्रत्ययहेतुः, 'माया' खपरव्यामोहोत्पादकं शाठ्यं, 'लोभो द्रव्याद्यभिकाला, 'प्रेम' प्रियेषु प्रीतिहेतुः, तथैवे' त्यान्तरग्रन्धरूप एव, कोऽसौ ?-'दोषश्च' उपशमत्यागात्मको विकारो, द्वेष इत्यर्थः । इह च यद्यपि प्रेम मायालोमरूपं द्वेषश्च क्रोधमानात्मकः तथापि तयोः पृथगुपादानं कथञ्चित् सामान्यस्य विशेषेभ्योऽन्यत्वख्यापनार्थ, 'मिथ्यात्वं' तत्त्वार्थाश्रद्धानं, तब पडिः स्थानैर्भवति, तानि च नास्ति न नित्य इत्यादीनि, तदुक्तम्-"त्थि ण णिचो ण कुणति कयं ण वेएति पत्थि वाणं । णत्थि य मोक्खोवाओ छम्मिच्छतस्स ठाणाई ॥१॥" 'वेदः स्त्रीवेदादिविधा, 'अरतिः' संयमेऽप्रीतिः, 'रतिः' असंयमे प्रीतिः, आह च-"इत्थीवेयाईओ तिविहो वेओ य होइ बोद्धयो । अरती य संजमंमी होइ रती संजमे यावि ॥१॥" 'हासो' विस्मयादिषु नासि न नित्यो न करोति कृतं न वेदयति नास्ति निर्वाणम् । नास्ति च मोक्षोपायः षट् मिथ्यात्वस्य स्थानानि ।। १ ॥२ स्त्रीवेदाहै|दिकत्रिविधी वेदश्च भवति बोद्धव्यः । अरतिश्च संयमे भवति रतिः असंयमे पापि ॥ १॥ दीप अनुक्रम [१६०] SamEducatimotimatent FarramanaSPrwanatimony पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~23. Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२४१] प्रत सूत्रांक ||३२|| सत्तराध्य. वनविकाशात्मकः, 'शोक' इष्टवियोगात् मानसं दुःखं, 'भयम्' इहलोकभयादि सप्तधा, तथा चाह-"इहपरलोया- क्षुल्लकनिबृहद्वृत्तिः दाणे आजीसिलोय तह अकम्हा य । मरणभयं सत्तमयं विभासमेएसि वोच्छामि ॥१॥ इहलोगभयं च इमं जं | ग्रन्थीयम् . दमणुयाइओ सरिसजाईओ। बीहेइ जंतु परजाइयाणं परलोयभयमेयं ॥२॥ आयाणत्यो भण्णति मा हीरिजत्ति ॥२६१॥ तस्स जंबीहे । आयाणभयं तं तू आजीवोमे ण जीवेऽहं ॥ ३॥ असिलोगभयं अयसो होति अकम्हाभयं तु अणि- ६ मित्तं । मरियवस्स उभीए मरणभयं होइ एयं तु ॥४॥" 'जुगुप्सा' अस्नानादिमलिनतनुसाधुहीलना, तथा चाह-अण्हाणमाइएहि साधु तु दुगुंछति दुगुंछे'ति गाथार्थः ॥ साम्प्रतं वायग्रन्थभेदानाह खेत्तं वत्थू धणधन्नसंचओ मित्तनाइसंजोगो। जाणसयणासणाणि अ दासीदासंच कवियं च ॥ २४२ ॥ का व्याख्या-क्षेत्र सेत्यादि, 'वास्तु' खातादि, धनं-हिरण्यादि, धान्यं च-शाल्यादि तयोः सञ्चयो-राशिर्धनधान्यसञ्चयः, मित्राणि च-सहवर्द्धितानि ज्ञातयश्च-खजनाः तैः संयोगः-सम्बन्धो मित्रज्ञातिसंयोगः, यानानि च १ इहपरलोकादानानि आजीवाश्मोको तथाऽकस्माच । मरणभयं सप्तमक विभाषामेतेषां वक्ष्यामि ॥ १ ॥ इहलोकभयं चेदं यन्मनु-12 जादितः सदृशजातितो । बिभेति यत्तु परजातिभ्यः परलोकभयमेतत् ॥२॥ आदानमर्थो भण्यते मा हार्षीदिति तस्माद्यविभेति । आदानभयं ॥२५॥ ततु आजीवोऽयमे न जीविष्याम्यहम् ॥ ३ ॥ अश्लोकभयमयशो भवत्यकस्माद्भयं त्वनिमित्तम् । मर्त्तव्यात्तु भीते मरणभयं भवत्येतत्तु ॥४॥ द २ अनानादिकैः साधुं तु जुगुप्सते जुगुप्सा । दीप अनुक्रम [१६०] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~24 Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३२...|| नियुक्ति: [२४२] प्रत सूत्रांक ||३२|| शिचिकादीनि शयनानि च-पल्यङ्कादीनि आसनानि च-सिंहासनादीनि यानशयनासनानि, चः समुचये, दास्यः अङ्कपतिताः दासा अपि तथाविधा एव अनयोः समाहारः, चः प्राग्वत् , 'कुवियं च'त्ति कुप्यं च-विविधं गृहोपस्किरात्मकम् । अत्र च धनधान्यसञ्चयो मित्रज्ञातिसंयोगश्चेति द्वौ शेषाश्चाष्टेति दशविधो वायग्रन्थ इति गाथार्थः । निगमयितुमाह सावजगंथमुक्का अभितरबाहिरेण गंथेण । एसा खलु निजुत्ती खुड्डागनियंठसुत्तस्स ॥ २४३॥ व्याख्या-सहावयेन-दोषेण वर्चत इति सावद्यः स चासौ ग्रन्थश्च सावद्यमन्धस्तेन मुक्ताः सावद्यग्रन्थमुक्ताः, अनेन च रजोहरणमुखवस्त्रिकावर्षाकल्पादेर्दशविधवाह्यग्रन्थान्तर्गतत्वेऽपि धर्मोपकरणत्वेनानवद्यतयाऽमुक्तावपि निग्रन्थत्वमुक्तम् , एवं च मा भूत्कस्यचिद्यामोहो-बायेनैव सावधग्रन्थेन मुक्ता इत्साह-आभ्यन्तरवायेन ग्रन्थेन, न तु . बाह्येनैव, मुक्ता इति शेषः, 'एषा' अनन्तरोक्ता 'खलु' निश्चितं निरिति-निश्चिताऽधिका वा युक्तिरस्यामिति नि-II युक्तिः-नामनिष्पन्ननिक्षेपनियुक्तिरित्यर्थः, फस्खेत्याह-'खुड्डागणियंठसुत्तस्स'त्ति क्षुल्लकनिर्ग्रन्थनामकं सूत्र तस्येति| गाथार्थः ॥ इत्युक्तो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरा|ध्ययनसूत्रे 'मुनिः सकाममरणं म्रियते' इत्युक्तं, स च मननान्मुनिरिति ज्ञान्येव, ये त्वज्ञानिनस्ते किमित्याह जावंतविज्जा पुरिसा, सव्वे ते दुक्खसंभवा । लुप्पंति बहुसो मूढा, संसारंमि अणतए ॥१॥ दीप अनुक्रम [१६०] FarramaAPrwanataonk पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~25 Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति : [२४३...] क्षुल्लकनि प्रत सूत्रांक ||१|| उत्तराध्य. व्याख्या-यावन्तो' यत्परिमाणा वेदनं विद्या-तत्त्वज्ञानात्मिका न विद्या अविद्या-मिथ्यात्वोपहतकुत्सित- ज्ञानात्मिका तत्प्रधानाः पुरुषाः अविद्यापुरुषाः, अविद्यमाना वा विद्या येषां ते अविद्यापुरुषाः, इह च विद्याशब्देन प्रभूतश्रुतमुच्यते, न हि सर्वथा श्रुताभावः जीवस्य, अन्यथा अजीवत्वप्रासेः, उक्तं हि-"सघजीवाणपि य गं ॥२६२॥ 18 अक्खरस्सऽणंतभागो णिधुपाडितो, जदि सोऽपि आवरिजेज तो णं जीयो अजीवत्तणं पायेजा" । 'सर्वे'अखिलाः ४'ते' इत्यविद्यापुरुषा, 'दुक्खसंभव'त्ति दुःखस्य सम्भवो येषु ते दुःखसम्भवाः, यद्वा दुःखं करोति दुःखयति ततो दुःखयहै तीति दुःख-पापं कर्म ततः सम्भवः-उत्पत्तिर्येषां ते दुःखसम्भवाः, एवंविधाः सन्तः किमित्याह-'लुप्यन्ते' दारि यादिभिर्वाध्यन्ते 'बहुशः' अनेकशो 'मूढा' हिताहितविवेचनं प्रत्यसमर्थाः, क-संसरणं-तिर्यग्नरकादिषु भवेषु । भ्रमणं संसारः तस्मिन् , कीशि १-'अनन्तके' अविद्यमानान्ते, अनेन चानन्तसंसारिकतादर्शनेन तारा पण्डितद्र मरणाभाव उक्तः, अध्ययनार्थापेक्षया तु निर्ग्रन्थखरूपज्ञापनार्थं तद्विपक्ष उक्त इति भावनीयम् । इह चायमुदाहरण& सम्प्रदायः-एगो गोधो दोगण वाइतो गेहाओ णिग्गतो. सर्व पुहवि हिंडिऊण जाहे ण किंचि लहति ताहे पुण-|| १ सर्वजीवानामपि चाक्षरस्थानन्तभागो नित्योपाटितः, यदि सोऽपि आत्रियेत सदा जीवोऽजीवत्वं प्रामुयात् । २ एको गोधः (अलस:) दौर्गोन पातितो गृहानिर्गतः, सर्वा पृथ्वी हिण्डयित्वा यदा न किञ्चित् लभते तदा पुन दीप अनुक्रम [१६१] ॥२१॥ SamEducatimotimatent For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~26~ Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: २४३...] रवि घरं जतो णियत्तो, जाव एगमि पाणवाडगसमीवे गामदेवकुलियाए एगरतिं वासोवगतो जाव पेच्छइ ताव || देवउलियाओ एगो पाणो निग्गतो चित्तघडहत्थगतो, सो एगपासे ठातिऊणं तं वियडघडं भणति-लहु घरं सज्जेहि, एवं जंजं सो भणति तं चिय घडो करेइ, जाव सयणिज, इत्थीहिं सद्धिं भोगे भुंजति, जाव पहाए पडिसाहरति ।। तेण गोहेण सो दिट्ठो, पच्छा चिंतेइ-किं मज्झ बहुएण भमिएण, एतं चेव ओलग्गामि, सो तेण ओलग्गिओ, आराहितो भणति-किं करेमि ! ति, तेण भण्णति-तुम्ह पसाएण अहंपि एवं चेव भोगे मुंजामि, तेण भण्णति-4 किं विजं गेण्हसि ? उताहु विजाएऽभिमंतियं घडं गेण्हसि , तेण विजासाहणपुरचरणभीरुणा भोगतिसिएण य४ CAक प्रत सूत्रांक दीप अनुक्रम [१६१] १. रपि गृहं यतः ( ततः ) निवृत्तः, यावदेकस्य चाण्डालपाटकस्य समीपे मामदेवकुलिकायामेकरात्रं वासमुपगतः, यावत्प्रेक्षते तावदेवकुलिकातः एकः पाण: (चाण्डालः ) निर्गतचित्रपटहस्तगतः, स एकस्मिन् पाबें स्थित्वा तं विकृत (साधित ) घटं भणति-लघु गृह सजय, एवं यद्यत्स भणति तदेव घटः करोति, यावच्छयनीय, खीभिः सार्ध भोगान् भुनक्ति, यावत्प्रभाते प्रतिसंरति । सेन गोधेन स| कष्टा , पश्चात् चिन्तयति-किं मम बहुना भ्रान्तेन !, एनमेवावलगामि, सतेनावलगिता, आरादो भणति-किं करोमीति, सेम भण्यतेसातव प्रसादन अहमप्येवमेव भोगान मुले, तेन मण्यते-कि विद्यां गृहणासि उताहो विद्ययाऽभिमश्रितं घटं हासि, तेन विचासामना रणभीरुणा भोगदृषितेन च matt For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~27~ Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [२४३...] उत्तराध्य. क्षुलकनि बृद्धृत्तिः ॥२१॥ प्रत सूत्रांक ||१|| भणति-विजाभिमंतियं घडयं देहि, तेण से विजाए अभिमंतिऊण घडो दिण्णो, सो तं गहाय गतो सगाम, तत्थ बंधूहिं सहबासेहिवि समं जहारुइयं भवणं विगुरुवियं, भोगे तेहिं सह भुंजतो अच्छति, कम्मंता य से सीदिउमा-A रद्धा, गवादओ य असंगोविजमाणा प्रलयीभूताः, सो य कालंतरेण अतितोसएण तं घडं बंधे काऊण एयस्स पभावेण अहं बंधुमज्झे पमोयामि, आसवपीतो पणचितो, तस्स पमाएण सो घडो भग्गो, सो य विजाकओ उव-1 | भोगो णहो, पच्छा ते गामेयगा प्रलयीभूतविभवाः परपेसाईहिं दुक्खाणि अणुभवंति, जति पुण सा विजा गहिया है होता ततो भग्गेवि घडे पुणोवि करेंतो। एवं अविजाणरा दुक्खाणि संभूताः क्लिश्यन्ते, नागार्जुनीयास्तु पठन्ति-18 "ते सबे दुक्खमज्जिया" इह च मकारोऽलाक्षणिकः, अर्जितम्-उपार्जितं दुःखं यैस्तेऽर्जितदुःखाः, प्राकृतत्वान्निष्ठान्तस्य परनिपातः, शेष प्राग्वत् , यद्वा यावन्तो 'विद्यापुरुषा' विद्याप्रधानाः पुरुषास्ते सर्व 'अदुःखसम्भवाः' अविद्य १ भण्यते-विद्याभिमश्रितं घटं देहि, तेन तस्मै विद्ययाऽभिमख्य घटो दत्तः, स तं गृहीत्वा गतः स्वप्राम, तत्र बन्धुभिः सहवासिभिरपि । || समं यथारुचितं भवन विकुचित, भोगांस्तैः सह भुजानस्तिष्ठति, कर्मकराश्च तस्य सीदितुमारब्धाः, गवादयधासंगोप्यमानाः प्रलयीभूताः सच कालान्तरे अतितोषेण तं घटं स्कन्धे कृत्वा एतस्य प्रभावेणाहं बन्धुमध्ये प्रमोदे, पीतासवः प्रणतितः, तस्य प्रमादेन स घटो भग्नः, स च विद्याकृत उपभोगो नष्टः, पश्चात् ते प्रामेयकाः प्रलयीभूतविभवाः परप्रैषादिभिर्दुःखान्यनुभवन्ति, यदि पुनः सा विद्या गृहीताऽभविष्यत्तदा । भन्नेऽपि घटे पुनरप्यकरिष्यत् । एवमविद्यानरा दुःखानि ( समनुभवन्तः ) लिश्यन्ते । दीप अनुक्रम [१६१] SamEducatmimamational Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~28~ Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||२|| नियुक्ति : [२४३...] * * * प्रत सूत्रांक ||२|| मानदुःखोत्पत्तयः, अमुमेवार्थ व्यतिरेकेणाह-मूढा' अज्ञानाऽऽकुलितमतय एव लुप्यन्ते बहुशः संसारेऽनन्तक इति, काका वा व्याख्येयं, दृश्यन्ते हि यानपात्रिण इहैव मोहाद्वयालुप्यमानाः, तथा च वृद्धाः-जहा समुद्दे वाणिया दुबादयाहयजाणवत्ता दिसामूढा खणेण अंतोजलगयपच्चयमासाएऊण भिन्नपोया महानीतिकल्लोलेहिं बुज्झमाणा कुम्मग-2 मगराईहिं विलुप्पंति, एवं तेऽवि अविजा बहुसो मूढा सारीरमाणसेहिं महादुक्खेहिं विलुप्पन्तीति सूत्रार्थः । यतश्चैवं | ततो यत्कृत्यं तदाह समिक्ख पंडिए तम्हा, पास जाइपहे बहू । अप्पणा सच्चमेसेज्जा, मित्तिं भूएहिं कप्पए ॥२॥ | व्याख्या-'समीक्ष्य' आलोच्य 'पण्डितो' हिताहितविवेकभाक् 'त(ज)म्ह'त्ति यस्मादेवमविद्यावन्तो लुप्यन्ते तस्मा त, पाठान्तरतश्च तस्मात् , समीक्ष्य मेधावी-मर्यादावर्ती, किं तत् समीक्ष्येत्याह-पाशा-अत्यन्तपारवश्यहेतवः कलत्रादिदिसम्बन्धास्त एव तीव्रमोहोदयादिहेतुतया जातीनाम्-एकेन्द्रियादिजातीनां पन्धान:-तत्प्रापकत्वान्मागाः पाशजा-14 तिपथाः तान् 'बहून्' प्रभूतान् अविद्यावतां विलुप्तिहेतून् , किमित्याह-आत्मना स्वयं न तु परोपरोधादिना, सद्भयो । -जीवादिभ्यो हितः-सम्यग् रक्षणप्ररूपणादिभिः सत्यः-संयमः सदागमो वा तमेषयेत्-गवेषयेत् , एषयंश्च सत्यं किं । | कुर्याद् इत्याह-'मैत्री' मित्रभावं 'भूतेषु' पृथिव्यादिपु जन्तुषु 'कल्पयेत्' कुर्यात् , पठ्यते वा-'अत्तछा सचमेसेज्जा'। १ यथा समुद्रे वणिजो दुर्वाताहतयानपात्रा दिग्मूढाः क्षणेन जलान्तर्गतपर्वतमासाद्य भिन्नपोता महावीचिकल्लोलैरुह्यमानाः कूर्ममकरादिमिविर्तृप्यन्ते, एवं सेऽप्यविद्यामूढाः बहुशो शारीरमानसैहादुःखैः विलुप्यन्ते । दीप अनुक्रम [१६२] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~29 Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥३-४|| दीप अनुक्रम [१६३ -१६४] उत्तराध्य. वृतः ॥२६४|| [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||३-४|| निर्युक्ति: [२४३...] इह च यस्मादविद्यावन्तः संसारे लुप्यन्ते तस्मात् 'मय्येव निपतत्वेतज्जगदुश्चरितं हि यत् । मत्सुचरितयोगेन स वै कल्याणभाजनम् ॥ १ ॥ इति शाक्यादिपरिकल्पिताविद्यापरिहारेणात्मार्थमेव, न तु परार्थ, सत्यमेपयेद्, अपरकृतस्यापरत्रासङ्क्रमणेन परार्थानुष्ठानस्यानर्थकत्वाद्, अन्यत् प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ अपरं च Jam duration intimation माया पिया हा भाया, भज्जा पुत्ता य ओरसा । नालं ते मम ताणाय, लुप्पंतस्स सकम्मुणा ॥ ३ ॥ एम सपेहाए, पासे समिपदंसणे । छिंद गेहिं सिणेहं च, ण कंखे पुव्वसंथवं ॥ ४ ॥ व्याख्या -- तत्राद्यसूत्रपूर्वार्ध स्पष्टं, नवरं स्नुषा-वध्वः, पुत्राश्व उरसि भवा औरसाः स्वयमुत्पादिताः, आस्तां जातपुत्रादयः, किमित्याह - 'नाल' न समर्थाः 'ते' मात्रादयो मम 'त्राणाय' रक्षणाय, कथंभूतस्य १- 'लुप्यमानस्य' छिद्यमानस्य, केन ? - 'स्वकर्मणा' स्वकृतेन ज्ञानावरणादिना, किमुक्तं भवति १ - स्वकर्म्मविहितां वाधामनुभवतः एते मात्रादयो न प्राणायेति, एवमात्मकमनन्तरोक्तमर्थ वस्तु 'सपेहाए'ति प्राकृतत्वात् संप्रेक्षया सम्ययबुद्ध्या स्वप्रेक्षया वा, 'पासे'ति पश्येदवधारयेत् शमितं दर्शनं प्रस्तावात् मिथ्यात्वात्मकं येन स तथोक्तः, यदिवा सम्यक् |इतं गतं जीवादिपदार्थेषु दर्शनं दृष्टिरस्येति समितदर्शनः, कोऽर्थः १ - सम्यग्दृष्टिः सन् ततश्च 'छिंद' त्ति छिन्यात्, सूत्रस्यात्तिद्व्यत्ययः, एवं सर्वत्रानुष्यमानोऽप्ययं भावनीयः, 'मृद्धि' विषयाभिकाङ्क्षा 'सेहं च' खजनादिषु प्रेम 'न' नैव 'काद' अभिलषेद्, अपेर्गम्यमानत्वात् कादपि न, किं पुनः कुर्यादिति भावः । 'पूर्वसंस्तवं' पूर्वपरिचयमे For the Only क्षुल्लकनि अन्वीयम्. ६ ~30~ ॥२६४॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||५|| नियुक्ति: [२४३...] -09-0-50-90% प्रत सूत्रांक ||५|| 4 कग्रामोषितोऽयमित्यादिकं, यतो न कश्चिदिह परत्र वा त्राणाय खकर्मणा विलुप्यमानस्य धर्म विनेति भाव इति| सूत्रद्वयार्थः ॥ अमुमेवार्थ विशेषतोऽनूयास्वैव फलमाह गवासं मणिकुंडलं, पसवो दासपोरुसं । सबमेयं चहत्ता णं, कामरूपी भविस्ससि ॥५॥ ___ व्याख्या-गावचाश्वास गवावं, 'गवाश्वप्रभृतीनि चेति (पा०२-४-११) समाहारः, तत्र गावो-याहदोहोप-I ४|| लक्षिताः अश्वा:-तुरगाः, पशुत्वेऽप्यनयोः पृथगुपादानं अत्यन्तोपयोगित्वेन प्राधान्यात्, तथा मणयश्च-मरकतादयः कुण्डलानि च-कर्णाभरणानि मणिकुण्डलम् , उपलक्षणं चैतच्छेपालकाराणां वर्णादीनां च, पश्यन्ति प्रसूयन्ते वा पिशवः-अजैडकादयः, दासाथ-गृहजातादयः पोरुसंति सूत्रत्वात् पुरुषाणां समूह इत्यर्थः, 'पुरुषाधविकारसमूहे' यांदिना दकि पौरुषेयं च-पदात्यादिपुरुषसमूहो दासपौरुषेयं, यद्वा 'दासपोरस'ति दासपुरुषाणां समूहो दासपौरुषं. पुरुषाद् ढक् न भवति, ग्रहणवता प्रातिपदिकेन तदन्तविधेरभावात् , 'सर्व' निरवशेषं 'एतद्' अनन्तरोक्तं 'त्यक्त्वा । |हित्या, संयममनुपाल्येत्यभिप्रायः, किमित्याह-'कामरूपी' अभिलषितरूपविकरणशक्तिमान भविष्यसि, इहैव वैक्रियकरणाद्यनेकलब्धियोगात् परत्र च देवभावावाप्तेरिति सूत्रार्थः ॥ पुनः सत्यखरूपमेव विशेषत आह धावरं जंगमं चेव, धणं धणं उबक्खरं । पच्चमाणस्स कम्मेहिं, नालं दुक्खाउ मोयणे ॥६॥ अम्भत्थं सवओ सव्वं, दिस्स पाणे पियायए । न हणे पाणिणो पाणे, भयवेराओ सघरए ॥७॥ १ पुरुषाधविकारसमूहतेनकृतेषु इति भाष्यकारप्रयोगात् २ नैषा व्याख्याता दीप अनुक्रम [१६५] 6-090 FarramanaSPrwanatimony पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~31~ Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥६-७॥ दीप अनुक्रम [१६६ -१६७] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२६५॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||६-७ || निर्युक्ति: [२४३...] अध्ययनं [६], ग्रन्थीयम्. व्याख्या---' अभ्भत्थं 'ति अध्यात्ममात्मनि यद्वर्तते, यदिवा अध्यात्मं - मनः तस्मिंस्तिष्ठत्यध्यात्मस्थं, सूत्रत्वाद्वर्ण- ४ क्षुल्लकनिलोपः, तबेह प्रस्तावात् सुखादि 'सर्वतः इष्टसंयोगानिष्टसंप्रयोगादिहेतुभ्यो जातमिति गम्यते, 'सर्व' निरवशेषं 'दृष्ट्वा' | प्रियत्वादिखरूपेणावधार्य, तथा 'पाणे'त्ति चस्य गम्यमानत्वात् प्राणांश्च प्राणिनच 'पियादए 'त्ति आत्मवत् सुखप्रियत्वेन प्रिया दया रक्षणं येषां तान् प्रियदयान् प्रिय आत्मा येषां तान् प्रियात्मकान् वा, दृष्ट्वा इत्यत्रापि सम्बन्धनीयं, ततः किमित्याह - 'न हन्यात्' नातिपातयेत् उपलक्षणत्वान्नापि घातयेत् न वा प्रन्तं समनुजानीयात् प्राणिन इति जातावेकवचनं, पाठान्तरतश्च - प्राणिनां प्राणान् इन्द्रियादीन् कीदृशः सन् १ इत्याह-- भयं च उक्तखरूपं, वैरं चप्रद्वेषः भयवैरमिति समाहारस्तस्मादुपरतो निवृत्तः सन् यदिवा - अध्यात्मस्थशब्दस्याभिप्रेतपर्यायत्वेन रूढत्वादअध्यात्मस्थं- यद्यस्याभिमतं तच सुखमेव, 'सर्वत' इति सर्वाभ्यो दिग्भ्यः सर्वेभ्यो वा मनोऽभिमतशब्दादिभ्यो जातं सर्व शारीरं मानसं च यथा तवेष्टं तथाऽन्येषामपि प्राणिनामित्युपस्कारः, 'दृड्डा' अवधार्य, इहापि चस्य गम्यमानत्वात् प्राणान् प्राणप्राण्यभेदोपचारात् प्रियदयांश्च रत्यत्रापि योज्यते, अन्यत् प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ इत्थं प्राणातिपातलक्षणाश्रवनिरोधमभिधाय शेषाश्रवनिरोधमाह - Education International आयाणं नरयं दिस्स, नायइज तणामवि । दोगुंछी अपणो पाते, दिनं भुंजेन भोषणं ॥ ८ ॥ व्याख्या - आदीयत इत्यादानं धनधान्यादि “ कृत्यल्युटोऽन्यत्रापीति ( कृत्यल्युटो बहुलम् पा० ३-३-११३) For Parsons Privat ॥२६५॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~32~ Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक |||| दीप अनुक्रम [१६८] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||८|| निर्युक्तिः [२४३...] अध्ययनं [६], यावत्, कर्मणि ल्युद्र, आर्पत्वादादानीयं वा, नरककारणत्वान्नरकं दृष्ट्वा, किमित्याह - 'नाददीत' न गृह्णीत न स्वीकुर्यादिति'तणामवि'ति तृणमपि, आस्तां रजतरूप्यादि, कथं तर्हि प्राणधारणमित्याह - 'दोगुंछी' त्याद्यर्ध, जुगुप्सते आत्मानमाहारं विना धर्मधुराधरणाक्षममित्येवंशीलो जुगुप्सी, आत्मनः इति आत्मसम्बन्धिनि पात्रे - भाजने प्राप्ते वा भोजनसमय इति शेषः, 'दत्तं' निसृष्टं, गृहस्थैरिति गम्यते, 'भुंजेज'त्ति भुञ्जीत भोजनम् - आहारं, अनेनाहारस्वापि भावतोऽखीकरणमाह, जुगुप्सिशब्देन तदप्रतिबन्धदर्शनात्, ततश्च परिग्रहाश्रवनिरोध उक्तः, तदेवं 'तन्मध्यपतितस्तद्वहणेन गृह्यत' इति न्यायात् मृषावादादत्तादानमैथुनात्मका श्रयत्रय निरोध उक्तः, यद्वा 'सत्यमिच्छेदि 'ति | सत्यशब्देन साक्षात्संयममपि वदता मृषावादनिवृत्तिराक्षिप्ता, तद्वारेणापि तस्य सत्यत्वात्, आदानमित्यादिना तु साक्षाददत्तादानविरतिरुक्ता, आदानं हि ग्रहणमेव रूढं, तचादत्तस्येति गम्यते, तं 'नरक' नरकहेतुं दृष्ट्वा नाददीत तृणमप्यदत्तमितीहापि गम्यते, 'गवास 'मित्यादिना तु परिग्रहाश्रवनिरोधः, तन्निरोधाभिधानाच नापरिगृहीता स्त्री भुज्यत इतिकृत्वा मैथुनाश्रवनिरोधोऽप्युक्त एव । नन्वेवं स्वयं त्यक्तगवादिपरिग्रहस्य परकीयं चानाददानस्य कथं प्राणवृत्तिः १, इत्साह - जुगुप्स्यात्मनः पात्रे दत्तं भुञ्जीत भोजनमिति, पात्रग्रहणं तु व्याख्याद्वयेऽपि मा भूत् निष्परिग्रहतया पात्रस्याप्यग्रहणमिति कस्यचिद् व्यामोह इति ख्यापनार्थ, तदपरिग्रहे हि तथाविधलब्ध्याद्यभावेन पाणिभोक्तृत्वाभावाद्वहिभाजन एवं भोजनं भवेत्, तत्र च बहुदोपसम्भवः, तथा च शय्यम्भवाचार्यः "पेच्छा For Parsons Private Use Onl पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 33~ Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||९|| नियुक्ति: [२४३...] प्रत सूत्रांक ||९|| उत्तराध्य. कम्म पुरेकम्मं, सिया तत्थ ण कप्पइ । एयमटुं ण मुंजंति, णिग्गंधा गिहिभायणे ॥१॥" इतिसूत्रार्थः ॥ एवं |पञ्चाश्रयविरमणात्मके संयम उक्ते यथा परे विप्रतिपद्यन्ते तथा दर्शयितुमाह क्षुल्लकनिबृहद्वृत्तिः इहमेगे उ मन्नति, अप्पचक्खाय पावगं | आयरियं विदित्ता ण, सध्यदुक्खा चिमुच्चइ ॥९॥ न्धीयम्. REETIMI व्याख्या-'इहे'त्यस्मिन् जगति मुक्तिमार्गविचारे वा 'एके' केचन कपिलादिमतानुसारिणः 'तुः' पुनरर्थे मन्य-11 दन्ते' अभ्युपगच्छन्ति, उपलक्षणत्वात्प्ररूपयन्ति च, यथा 'अप्रत्याख्याय' अनिराकृत्य 'पापकं' प्राणातिपातादिविरति-II मकृत्वैव 'आयरियंति सूत्रत्वात् आराद्यातं सर्वकुयुक्तिभ्य इत्याय-तत्त्वं तद् 'विदित्वा' ज्ञात्वा 'सर्वदुःखेभ्य आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकलक्षणेभ्यः खपरिभाषया शारीरमानसेभ्यो वा 'मुच्यते' पृथग् भवति, तथा चाह “पञ्चविंशतितत्त्वज्ञो, यत्र तत्राश्रमे रतः। शिखी मुण्डी जटी वापि, मुच्यते नात्र संशयः ॥१॥” यद्वाऽऽचरणमाचहै रितं तत्तक्रियाकलापः, पाठान्तरतश्च-'आचारिक निजनिजाचारभवमनुष्ठानमेव, तद्विदित्वा-खसंवेदनतोऽनुभूय सर्वदुःखाद्विमुच्यते, एवं सर्वत्र ज्ञानमेय मुक्त्यङ्गं, न चैतचारु, न हि रोगिण इवौषधादिपरिज्ञानतो भावरोगेभ्यो| ज्ञानावरणादिकर्मभ्यो महानतात्मकपञ्चाङ्गोपलक्षितां क्रियामननुष्ठाय मुक्तिः ॥ ते चैवमनालोचयन्तो भवदुःखाकुलिता वाचालतयैवमात्मानं खस्थयन्ति, तथा चाहel १ पश्चात्कर्म पुरःकर्म स्यात्तत्र न कल्पते । एतदर्थ न भुजते, निम्रन्था गृहिभाजने ॥१॥२ अर्थतो युग्मरूपत्वान्नात्र सूत्रार्थ इति, एवमग्रेऽपि । MEROSAGAR दीप अनुक्रम [१६९] ॥२६६ SamEducatimotimatent For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~34~ Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||१०|| नियुक्ति : [२४३...] प्रत सूत्रांक ||१०|| भणंता अकरिता य, बंधमोक्खपइण्णिणो । वायाविरियमेत्तेणं, समासासेंति अप्पगं ॥१०॥ व्याख्या-भणन्तः प्रतिपादयन्तः, प्रक्रमात् ज्ञानमेव मुक्त्यङ्गमिति, 'अकुर्वन्तश्च मुक्त्युपायमनुष्ठान, बन्धमोक्षी-|| उक्तरूपी तयोः प्रतिज्ञा-अभ्युपगमः तद्वन्तः, सूत्रत्वाचेना निर्देश, अस्ति बन्धोऽस्ति च मोक्ष इत्येवंवादिन एवली केवलं, न तु तथाऽनुष्ठायिनः, वाचि वीर्यम्-आत्मशक्तिर्वाग्वीर्य वाचालतेति यावत् , तदेवानुष्ठानशून्यं वाग्वीमात्रं तेन 'समाश्वासयन्ति' विज्ञानादेव वयं मुक्तिगामिन इति स्वास्थ्यं प्रापयन्ति, कम् ?-आत्मानमिति सूत्रार्थः॥ यथा चैतन्त्र चारु तथा खत एवाहहै। न चित्ता तायए भासा, कओ विजाणुसासणं । विसपणा पावकम्मेहिं, बाला पंडियमाणिणो ॥११॥ व्याख्या-'न' नैव 'चित्रा' प्राकृतसंस्कृतादिरूपा आर्यविषयं ज्ञानमेव मुक्त्यङ्गमित्यादिका वा 'त्रायते' रक्षति, पापेभ्य इति गम्यते, केत्याह-भाष्यत इति भाषा-वचनामिका, स्यादेतत्-अचिन्त्यो हि मणिमत्रमहौषधीनां । प्रभाव इत्यघोरादिमन्त्रात्मिका वाक् त्राणाय भविष्यतीत्साह, कुतो ? विदन्त्यनया तत्वमिति विद्या-विचित्रमन्त्रात्मिका तस्या अनुशासनं-शिक्षणं विद्यानुशासनं त्रायते पापाद्भवाद्वा ?, न कुतोऽपि, तन्मात्रादेव मुक्ती शेषानुष्ठान वैयर्यप्रसङ्गादिति भावः । अत एव ये तदपि त्राणायेति वदन्ति ते यारशास्तदेवाह-विविधम्-अनेकप्रकारं सन्नादामना विषण्णाः , केपु ?-'पावकम्महि ति पापकर्मसु पापहेतुपु हिंसायनुष्ठानेषु, सततं तत्कारितयेति भावः, यद्वा | दीप अनुक्रम [१७०] mating पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~35 Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||११|| नियुक्ति: [२४३...] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२६७॥ प्रत सूत्रांक ||११|| विषण्णा-विषादं गताः पापकर्मभिः-पापानुष्ठानः यथा कथमेवमनुष्ठायिनो वयं भविष्याम इति, पठन्ति च-बिसन्ना क्षुल्लकनि॥ पावकिचेहि ति तथैव, कुतस्त एवंविधा इत्याह-'बाला' रागद्वेषाकुलिताः पण्डितमात्मानं मन्यन्ते इत्येवंशीलाः|४ जापण्डितमानिनः, ये हि बालाः पण्डितमानिनश्च न स्युस्ते खयं सम्यगजानानाः परं पृच्छेयुः तदुपदेशतश्च तानि र्घन्धीयम् परिहरेयुः न तु विषण्णा एवासीरन् , ये तु बालाः पण्डितमानिनश्च ते खयमजानाना अपि जानानमन्यमात्मन्यभिमानतोऽनुपासमाना एवंविधा एव भवन्तीति सूत्रार्थः ॥ साम्प्रतं सामान्येनैव मुक्तिपथपरिपन्थिनां दोषदर्शनायाह जे केइ सरीरे सत्ता, वण्णे स्वे य सब्यसो । मणसा कायवकेणं, सब्वे ते दुक्खसंभवा ॥१२॥ व्याख्या-ये केचित् 'शरीरे ' शरीरविषये 'सक्ता' बद्धाग्रहाः, क ? इत्याह-वर्णे' सुस्निग्धगौरत्वादिके 'रूपे च' सुसंस्थानतायां, चशब्दात् स्पर्शादिषु, वखाद्यभिष्वकोपलक्षणं चैतत् , 'सबसो'त्ति सूत्रत्वात् सर्वथा-सर्वैः खयं करणकारणादिभिः प्रकारैः, मनसा कथं वर्णादिमन्तो वयं भविष्याम ? इत्यभिसन्धिना, वचसा रसायनादिप्रश्ना-IITRA रात्मकेन, चशब्दात् कायेन च रसायनायुपयोगेन, एवेति पूरणे, पठ्यते च-कायवकेणं'ति कायश्च-शरीरं वाक्यं च-18 वचनं कायवाक्यं तेन, 'सर्वे' निरवशेषा गुरुपादुकातो मुक्तिः नास्ति वा मुक्तिरित्यादिवादिनोऽपि न केवलमार्यादि दीप अनुक्रम [१७१] FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~36~ Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||१२|| नियुक्ति: [२४३...] प्रत सूत्रांक ||१२|| विदित्वा दुःखाद्विमुक्तिरितिवादिन एवेति भावः, 'ते' इति ये अप्रत्याख्याय पापमित्यादिवादिनो 'दुःखसम्भवाः' ४ाइहान्यजन्मनि च दुःखभाजनं इति सूत्रार्थः । यथा चैते दुःखभाजनं तथा दर्शयन्नपदेशसर्वखमाह आवण्णा दीहमदाणं, संसारमि अणंतए । तम्हा सबदिसं पस्सं, अप्पमत्तो परिव्वए ॥१३॥ व्याख्या-'आपन्नाः' प्राप्ताः 'दीर्घम्' अनाद्यनन्तमध्वानमिवाध्यानम्-उत्पत्तिप्रलयरूपं, अन्यान्यभवभ्रमणेनै-| कत्रावस्थितेरभावात् , क?-'संसारे' नरकादिगतिचतुष्टयात्मके 'अनन्तके' अविद्यमानान्ते, अपर्यवसितानन्तका|यिकाद्युपलक्षितत्वेनेति गर्भः, 'तम्ह'त्ति यस्मादेवमेते मुक्तिपरिपन्थिनो दुःखसम्भवाः तस्मात् 'सबदिसं'ति सर्वदि श:-प्रस्तावादशेषभावदिशः, ताश्च पृथिव्याद्यष्टादशभेदाः, उक्तं च-पुढवि जलजलणवाया मूला खंधग्गपोरवीया य । |बितिचउपणिदितिरिया यणारया देवसंघाया ॥१॥ संम्मुच्छिमकम्माकम्मभूमिगणरा तहंतरद्दीवा। भावदिसा दिस्सइ जं संसारी णियममेयाहि ॥२॥” 'पश्यन् ' अवलोकयन् 'अप्रमत्तः' प्रमादविरहितः, यथैषामेकेन्द्रियादीनां विराधना न भवति तथा 'परिव्रजेः' संयमाध्वनि यायाः, यद्वा-संसारापन्नानां सर्वदिशः पश्य, दृष्ट्वा चाप्रमत्तो-निद्रा-8 दिप्रमादपरिहारतो यथतासु न पर्यटसि तथा परिव्रजेःसुशिष्येति सूत्रार्थः ॥ यथा चाप्रमत्तेन परिवजितव्यं तथा ४ | दर्शयितुमाह १ पृथ्वी जलज्वलनवाता मूलानि स्कन्धाप्रपर्वबीजानि च । द्वित्रिचतुष्पञ्चेन्द्रियतिर्यशश्च नारका देवसंघाताः ॥१॥ संमूछिमकर्माकर्मभू| मिगनरास्तथाऽऽन्तरद्वीपाः । भावदिशः दिश्यते यत्संसारी नियमादेताभिः ॥२॥ दीप अनुक्रम [१७२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~37~ Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥१४॥ दीप अनुक्रम [१७४] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥ २६८ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१४|| निर्युक्तिः [२४३...] अध्ययनं [६], पहिया उमायाय, नावकैखे कथाइवि । पुष्वकम्मकखपट्टाए, इमं देहमुदाहरे ।। १४ ।। व्याख्या- 'वहिय'त्ति वहिः कोऽर्थः १ - बहिर्भूतं भवादिति गम्यते, ऊर्ध्वं सर्वोपरिस्थितम् अर्थान्मोक्षमादायगृहीत्वा मयैतदर्थं यतितव्यमिति निश्चित्य बुद्धया सम्प्रधार्येतियावत्, अथवा बहिः - आत्मनो बहिर्भूतं धनधान्यादि ऊर्ध्वम् - अपवर्गमादाय गृहीत्वा, हेयत्वेनोपादेयतया च ज्ञात्वेतियावत्, 'नावकाङ्क्षेत्' विषयादिकं नाभिलषेत्, न क्वचिदभिध्यमं कुर्वीतेति तात्पर्य, 'कदाचिदपि' उपसर्गपरीपाकुलित तायामपि, आस्तामन्यदा, एवं सति शरीरधारणमध्ययुक्तमेव, एतद्धारणे सत्याकाङ्क्षासम्भवात् तस्यापि चात्मनो वहिर्भूतत्वात् अत आह— पुबेत्याद्यर्द्ध, पूर्व-पूर्वकालभावि तच्च तत्कर्म च पूर्वकर्म तस्य क्षयः तदर्थमिमं प्रत्यक्षं 'देह' शरीरं 'समुद्धरेद्' उचिताहारादिभोगतः परिपालयेत् तद्धारणस्य विशुद्धिहेतुत्वात्, तत्पाते हि भवान्तरोत्पत्तावविरतिरपि स्यात्, उक्तं च- "सर्वत्थ संजमं संजमाती अप्पाणमेव रक्खेजा । मुच्चति अतिवायातो पुणो विसोही ण याविरती ॥ १ ॥" ततः शरीरोद्धरणमपि निरभिष्वङ्गतयैव विधेयमिति सूत्रार्थः ॥ यथा च देहपालनेऽपि नाभिष्वङ्गसम्भवः तथा दर्शयितुमाह विविध कम्मणो हेड, कालकंखी परिव्वए । मायं पिंडस्स पाणस्स, कई लडूण भक्खए ।। १५ ।। व्याख्या -- विविच्य' पृथकृत्य 'कर्म्मणो' ज्ञानावरणादेः 'हेतुम्' उपादानकारणं मिथ्यात्वाविरत्यादि, कालम् - १ सर्वत्र संयमं संयमादात्मानमेव रक्षेत् । मुच्यतेऽविपातात् पुनर्विशुद्धिर्न चाविरतिः ॥ १ ॥ Education intemational For Parsons Privat क्षुल्लकनि ग्रन्थीयम्. ~38~ ॥२६८॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१५|| दीप अनुक्रम [१७५] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्तिः [२४३...] अध्ययनं [६], मूलं [-] / गाथा ||१५|| अनुष्ठानप्रस्तावं काङ्क्षत इत्येवंशीलः कालकाङ्क्षी, 'परित्रजे' रिति पूर्ववत्, पठन्ति च 'विगिंच कम्मुणो हेउ'न्ति अत्र च 'बेविग्धि' परित्यजेत्युपदेशान्तरतया व्याख्येयं मात्रां यावत्या संयमनिर्वाहस्तावतीं, ज्ञात्वेति गम्यते, कस्य १'पिण्डस्य' ओदनादेरन्नस्य 'पानस्य च ' आयामादेः, खाद्यखाद्यानुपादानं च यतेः प्रायस्तत्परिभोगासम्भवात् कृतम् - आत्मार्थमेव निर्वर्तितं, गृहिभिरिति गम्यते, प्रक्रमात्पिण्डादिकमेव 'लब्ध्वा' प्राप्य 'भक्षयेद्' अभ्यवहरेदिति सूत्रार्थः ॥ कदाचिद्भुक्तशेषं धारयतोऽभिष्वङ्गसम्भवः स्यादित्याह - सन्निहिं च न कुव्विज्जा, लेवमायाय संजए। पक्खी पत्तं समायाय, निरवेक्खो परिव्व ॥ १६ ॥ व्याख्या - सम्यग् - एकीभावेन निधीयते - निक्षिप्यतेऽनेनाऽऽत्मा नरकादिष्विति सन्निधिः- प्रातरिदं भविष्यतीत्याद्यभिसन्धितोऽतिरिक्ताशनादिस्थापनं तं च न कुर्वीत, चशब्दः पूर्वापेक्षया समुच्चये, 'लेवमायाय'त्ति लेपः-शकटाक्षादिनिष्पादितः पात्रगतः परिगृह्यते, तस्य मात्रा - मर्यादा, मात्राशब्दस्य मर्यादावाचित्वेनापि रूढत्वात् यथोक्तम्- " ईषदर्थक्रियायोगे, मर्यादायां परिच्छदे । परिमाणे धने चेति, मात्राशब्दः प्रकीर्तितः ॥ १॥” लेपमात्रतया, किमुक्तं भवति १-लेपमेकं मर्यादीकृत्य न खल्पमप्यन्यत् सन्निदधीत, यद्वा परिमाणार्थोऽयं मात्राशब्दः, लक्षणे तृतीया, ततोऽयमर्थः - लेपमात्रयेति यावता पात्रमुपलिप्यते तावत्परिमाणमपि सन्निधिं न कुर्वीत, आस्तां बहुमित्यभिप्रायः, 'संयतो' यतिः, किमित्येवं पात्राद्युपकरणसन्निधिरपि न कर्तव्य इत्याह- 'पक्खि 'त्ति पक्षीव पक्षी, यथा पक्षी For Parana Prato Use Onl ra पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~39~ Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||१६|| नियुक्ति: [२४३...] (४३) 14 उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२६॥ प्रत सूत्रांक ||१६|| पतन्तं त्रायत इति पत्रं-पक्षसञ्चयं 'समादाय' गृहीत्वा ब्रजति, एवं भिक्षुरपि 'पत्ते'त्ति पात्रमुपलक्षणत्वाच्छेषोप- क्षुलकनिकरणं चादाय परिव्रजेदिति सम्बन्धः, कीडग ?-निरपेक्षो' निरभिलाषः, तस्य वा विनाशादौ शोकाकरणतो निर-4 ग्रन्थीयम्. पक्षो-निरभिष्यक्ष तथा च प्रतिदिनमसंयमपलिमन्थभीरुतया पात्रायुपकरणसन्निधिकरणेऽपि न दोष इत्यर्थः, अथवा यदि लेपामात्रयाऽपि सन्निधिं न कुर्वीत कथमागामिनि दिने भोक्तव्यमित्याह-पक्षीव निरपेक्षः, पात्रं पतद्हादिभाजनमत्तन्निर्योगं च समादाय प्रजेद्-भिक्षार्थ पर्यटेद् , इदमुक्तं भवति-मधुकरवृत्त्या हि तस्य निर्वहणं, तरिकं तस्य सन्निधिना ? इति सूत्रार्थः ।। सम्प्रति यदुक्तं 'कृतं लब्ध्या भक्षयेदिति, तत्र कथं तल्लाभ इति तदुपायमाहयद्वा-यदुक्तं 'निरपेक्षः परिप्रजेदिति तदभिव्यक्तीकर्तुमाह एसणासमिओ लजू, गामे अनियओचरे । अप्पमत्तो पमत्तेहि, पिंडवात गवेसए ॥१७॥ व्याख्या-षणायाम्-उत्पादनग्रहणग्रासविषयायां सम्यगितः-स्थितः समितः एषणासमितः, प्राधान्याच इहै|षणाया एवोपादानं, प्रायस्तद्भावे ईर्याभाषादिसमितिसम्भव इति ज्ञापनार्थ वा, अनेन निरपेक्षत्वमुक्तं, 'लज्जू'त्ति || लज्जा-संयमस्तदुपयोगानन्यतया यतिरपि तथोक्तः, आपत्वाचे निर्देशः, ग्रामे उपलक्षणत्वान्नगरादौ च 'अनियतः' ॥२६९॥ अनियतवृत्तिः 'चरेदू' विहरेत् , अनेनापि निरपेक्षतेवोक्ता । चरंश्च किं कुर्यादित्याह-'अप्रमत्तः' प्रमादरहितः सन् 2 'पमत्तेहिति प्रमत्तेभ्यो गृहस्थेभ्यः, ते हि विषयादिप्रमादसेवनात् प्रमत्ता उच्यन्ते, 'पिण्डपातं' भिक्षां 'गवेषयेद् दीप अनुक्रम [१७६] THROmanorm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~40 Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||१८|| नियुक्ति: [२४३...] प्रत सूत्रांक ||१८|| अन्वेषयेदिति सूत्रार्थः ॥ इत्थं प्रसक्तानुप्रसक्त्या संयमखरूपमुक्तं, तदुक्तौ च निर्ग्रन्धखरूपं, सम्प्रत्यत्रैवादरोत्पादनार्थमाह एवं से उयाहु अणुत्तरनाणी अणुत्तरदसी अणुत्तरनाणदसणधरे । अरहा णायपुत्ते भयवं वेसालीए वियाहिए ॥ १९॥ तिमि ॥ व्याख्या-'एवम् ' अमुना प्रकारेण 'से' इति भगवान् ‘उदाहुत्ति उदाहृतवान् 'अनुत्तरज्ञानी' सर्वोत्कृष्टज्ञानवान् । ननु चानुत्तरज्ञानीति मत्वर्थीयेन न भवितव्यं, बहुव्रीहिणैव तदर्थस्योक्तत्वात् , सत्यम् , अनुत्तरज्ञानशब्दोऽयं गौरखरशब्दवत् संज्ञाप्रकार एव, केवलज्ञानवाचकत्वात् अस्य, ततो गौरखरषदरण्यमित्यादिवन्न दोषः, नास्योत्तरमस्तीत्यनुत्तरं तथा पश्यतीत्यनुत्तरदशी, सामान्यविशेषग्राहितया च ज्ञानदर्शनयोर्भेदः, यत उक्तम्-"जं सामण्णग्गहणं दसणमेयं बिसेसियं नाणं"ति, अनुत्तरे ज्ञानदर्शने युगपदुपयोगाभावेऽपि लब्धिरूपतया धारयतीत्यनुत्तरज्ञानदर्शनधरः। ननु प्रागुक्ताभ्यां विशेषणाभ्यामस्वार्थस्योक्तत्वात् कथं न पौनरुक्त्यम् !, उच्यते, अस्थान्याभिप्रायत्वात् , अत्र हि अनुत्तरज्ञान्यनुत्तरदर्शीति भेदाभिधानेन ज्ञानदर्शनयोर्भिन्नकालमाह, ततश्च मा भूदुपयोगवल्लन्धिद्वयमपि भिन्नकालभावीति व्यामोह इत्युपदिश्यते ज्ञानदर्शनधरः, अर्हति देवादिभ्यः पूजामित्यहन् , स चार्थात्तीर्थकृत् , ज्ञातः-उदा१ यत्सामान्यग्रहणं दर्शनमेतत् विशेषितं ज्ञानम् ॥ १ ॥ दीप अनुक्रम [१७८] CREACKS JAMEducational For any पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र सूत्रक्रमांक ||१८|| वर्तते, मूल संपादने मुद्रणदोषात् ||१९|| इति लिखितं ~41 Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [६], मूलं [-1 / गाथा ||१८|| नियुक्ति: [२४३...] क्षुल्लकनिग्रन्थीयम्. ल प्रत सूत्रांक उत्तराध्य. रक्षत्रियः स चेह प्रस्तावात् सिद्धार्थः तस्य पुत्रो ज्ञातपुत्रः-वर्तमानतीर्थाधिपतिर्महावीर इतियावत् 'भगवान् समग्रैश्वर्यादिमान् , 'वेसालीय'त्ति विशाला:-शिष्याः तीर्थ यशःप्रभृतयो वा गुणा विद्यन्ते यस्येति विशालिकः "इनि ठना" (अत इनि ठनी पा०५-२-११५) विति ठन् , यद्वा विशालेभ्यः-उक्तखरूपेभ्यो हित इति हितार्थे ठन्प्रत्ययः15 ॥२७०॥ (तस्मै हितम् पा०५-१-५), ततश्च विशालीयः 'वियाहिए'त्ति व्याख्याता सदेवमनुजासुरायां पर्षदि विशेषेणा-1 नन्यसाधारणात्मकेनाख्याता-कथयिता, केचित्त्वधीयते-'एवं से उदाहु अरिहा पासे पुरिसादाणीए भगवं बेसा लीए बुद्धे परिणिवुए ति स्पष्टमेव, नवरमर्हन्निति सामान्योक्तावपि प्रक्रमात् महावीरः, पश्यति समस्तभावान् केवदलालोकेनावलोकत इति पश्यः, तथा पुरुषश्चासौ पुरुषाकारवर्तितया आदानीयश्च आदेयवाक्यतया पुरुषादानीयः, पुरुषविशेषणं तु पुरुष एवं प्रायस्तीर्थकर इति ख्यापनार्थ, पुरुषैर्वाऽऽदानीयो ज्ञानादिगुणतया पुरुषादानीय इति सूत्रार्थः ॥ इतिः परिसमाप्तौ, अवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, ते च पूर्ववद्वाच्याः। इति श्रीशात्याचार्यविरचितायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटीकायां षष्टमध्ययनं समाप्तमिति ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ||१८|| ACCE%*दक दीप अनुक्रम [१७८] टर ॥ इति श्रीशान्त्याचायिटीकायां श्रीक्षुल्लकनिम्रन्थीयं षष्ठमध्ययनं समासम् ॥ पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं-६ परिसमाप्तं ~42 Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१८|| दीप अनुक्रम [१७८] Jam Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्ति: [२४४] अध्ययनं [७], मूलं [--] / गाथा ||१८...|| ॥ व्याख्यातं क्षुल्लक निर्ग्रन्थीयं षष्ठमध्ययनं साम्प्रतं सप्तममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - इहानन्तराध्ययने निर्ग्रन्थत्वमुक्तं तच रसगृद्धिपरिहारादेव जायते, स च विपक्षेऽपायदर्शनात्, तच दृष्टान्तोपन्यासद्वारेणैव परिस्फुटं भवतीति रसमृद्धिदोपदर्शकोरभ्रादिदृष्टान्तप्रतिपादकमिद्ममध्ययनमारभ्यते, इत्यनेनाभिसम्बन्धेनायातस्याध्ययनस्योपक्रमादिद्वारचतुष्टयमुपवर्ण्यं तावद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे उरश्रीयमिति नाम, अत उरभ्रनिक्षेपमाहनिक्खेवो उ उरब्भे चउत्रिहो दुविहो य होइ दबंमि । आगमनोआगमओ नोआगमओ अ सो तिविहो ॥ व्याख्या- 'निक्षेपः' न्यासः, तुः पूरणे, 'उरने' उरनविषयः 'चतुर्विधः' चतुष्प्रकारः, नामस्थापनाद्रव्यभावभेदात्, तत्र नामस्थापने क्षुण्णे एव इति द्रव्योरभ्रमाह - द्विविधो भवति 'द्रव्य' इति द्रव्यविषयः, आगमनोआगमतः, तत्रागमत उरभ्रशब्दार्थज्ञः तत्र चानुपयुक्तः, नोआगमतः पुनः, चस्य पुनरर्थत्वात्, 'स' इति द्रव्योरत्रः 'त्रिविधः' | त्रिभेद इति गाथार्थः ॥ त्रैविध्यमेवाह जाणगसरीरभविए तबइरित्ते अ सो पुणो तिविहो । एगभविअ बद्धाऊ अभिमुहओ नामगोए अ ॥ २४५ ॥ व्याख्या -- ज्ञशरीरोरन उरभ्रशब्दार्थज्ञस्य सिद्धशिलात लगतं शरीरमुच्यते, भव्यशरीरोरभ्रस्तु यस्तावदुरशब्दार्थ जानाति कालान्तरे च ज्ञास्यति तस्य यच्छरीरं, 'तद्व्यतिरिक्तश्च' ताभ्यां ज्ञशरीरभव्यशरीरोरभ्राभ्यां व्यतिरिक्तो For the Only पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अथ अध्ययनं - ७ “औरभीय" आरभ्यते ~ 43~ Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१८|| दीप अनुक्रम [१७८] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२७१ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्तिः [२४५] अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा ||१८...|| भिन्नः तद्व्यतिरिक्तः, चः समुचये, 'स' तद्व्यतिरिक्तः पुनः 'त्रिविधः' त्रिभेदः, त्रैविध्यमेवाह – एकस्मिन् भये तस्मि - नेवातिक्रान्ते भावी एकभविको योऽनन्तर एव भये उरभ्रतयोत्पत्स्यते, तथा स एवोरभ्रायुर्वन्धानन्तरं बद्धमायुरनेनेति बद्धायुष्क उच्यते, तृतीयमाह - 'अभिमुहतो नामगोए य'त्ति आर्यत्वादभिमुखनामगोत्रश्थ, तत्राभिमुखे-स| म्मुखे अन्तर्मुहूर्तानन्तरभावितया नामगोत्रे उरभ्रसम्बन्धिनी यस्य स तथोक्तः, अन्तर्मुहूर्तानन्तरमेवोरभ्रभवभावीति गाथार्थः ॥ भावोरभ्रमध्ययननामनिबन्धनं चाह - उरभाउणामगोयं वेयंतो भावओ उ ओरभो । तत्तो समुट्टियमिणं उरब्भिज्जन्ति अज्झयणं ॥ २४६ ॥ व्याख्या— उरभ्र- ऊरणकः तस्यायुश्च नाम च गोत्रं चोरभ्रायुर्नामगोत्रं, यदुदयादुरभ्रो भवति, 'वेदयन्' अनुभवन् 'भावतो' भावमाश्रित्योरभ्रः, तुशब्दः पर्यायास्तिक मतमेतदिति विशेषणार्थः, 'ततो' भावोरभाद् दृष्टान्ततयेहाभिधेया| त्समुत्थितम् - उत्पन्नमिदमिति प्रस्तुतं यस्मादिति गम्यते, 'उरभिज्जं 'ति उरश्रीयं ग्रहादित्वाच्चैषिकठप्रत्ययः 'इती' ति तस्माद् अध्ययनं प्रागुक्तनिरुक्तमुच्यत इति शेष इति गाधार्थः ॥ उरनस्यैव चेह प्रथममुच्यमानत्वाद्वहुवक्तव्यत्याच्चेत्थमुक्तम्, अन्यथा हि काकिण्यादयोऽपि दृष्टान्ता इहाभिधीयन्ते एव, तथा चाह नियुक्तिकृत् ओरखभे अ कागिणी अंबए अ ववहार सागरें चेव । पंचेए दिट्टंता उरविभजमि अज्झयणे ॥ २४७ ॥ For Parna Prat Education intentional औरश्री | याध्य. ७ ~44~ ॥२७१ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [२४८] प्रत सूत्रांक ||१८|| xi व्याख्या-'उरन' उक्तरूपः 'काकिणिः' विंशतिकपर्दकाः 'उरन्भे यति चशब्दस्य भिन्नक्रमत्वात् काकिणिश्च अंबए यत्ति आम्रकं च-आम्रफलं, व्यवहारश्च-क्रयविक्रयरूपो वणिग्धर्मः, चस्य गम्यमानत्वात् , सागरश्व-समुद्रः, चः सर्वत्र समुच्चये, एवोऽवधारणे, भिन्नक्रमश्चैवं योज्यते-पञ्चैवैते न तु न्यूनाधिकाः 'दृष्टान्ता' उदाहरणानि 'उरभ्रीये' 18 उरभ्रीयनाम्न्यध्ययन इति गाथार्थः ॥ सम्प्रति यदर्थसाधादुरभ्रस्य दृष्टान्तता तदुपदर्शनायाह आरंभे रसगिद्धी दुग्गतिगमणं च पच्चवाओ य । उवमा कया उरब्भे उरब्भिजस्स निजुत्ती ॥ २४८॥ | व्याख्या-आरम्भणं आरम्भः-पृथिव्याधुपमर्दः, रसेषु-मधुरादिषु गृद्धिः-अभिकाजा रसगृद्धिः, दुर्गतिगमनं चनरकतिर्यगादिषु च पर्यटनं, प्रत्यपायचेहैव शिरश्छेदादिः, वक्ष्यति हि "सिरं छेत्तूण भुजति त्ति शिरश्छेदादातरौद्रोपगतस्य दुर्गतिपाते दुःखानुभवनादिरुपमा-सादृश्योपदर्शनरूपा, प्रक्रमादेभिरेवारम्भादिभिरथैः 'कृता' विहिता 'उरभ्रे उरभ्रविषया, इदमुक्तं भवति-साम्प्रतक्षिणो हि विषयामिषगृनवस्तांस्तानारम्भानारभन्ते, आरभ्य चोपचितकर्मभिः कालशौकरिकादिवदिहैव दुःखमुपलभ्य नरकादिकां कुगतिमाप्नुवन्तीत्युरभ्रोदाहरणता इहोपदश्यते, काकिण्यादिसाधर्म्यदृष्टान्तोपलक्षणं चैतद्, 'उरनीयस्य नियुक्ति'रिति निगमनमेतदिति गाथार्थः ॥ इत्यवसितो नामनिष्पननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनिक्षेपावसरः, स च सूत्रे सति भवतीत्यतः सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तच्चेदम् जहाऽऽएसं समुहिस्स, कोइ पोसेज एलयं । ओयणं जवसं देजा, पोसेजावि सयंगणे ॥१॥ दीप अनुक्रम [१७८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~450 Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [२४८...] याध्य प्रत सूत्रांक ||१|| उत्तराध्या व्याख्या-'यथे'त्युदाहरणोपन्यासे, आदिश्यते-आज्ञाप्यते विविधव्यापारेषु परिजनोऽस्मिन्नायात इत्यादेशः-अ- औरत्रीबृहद्वृत्तिः । भ्यर्हितः प्राहुणकस्तं समुद्दिश्य' आश्रित्य यथाऽसौ समेष्यति समागतवैनं भोक्ष्यत इति 'कश्चित् ' परलोकापाय |निरपेक्षः 'पोषयेत्' पुष्टं कुर्यात् 'एलकम् ' ऊरणकं, कथमित्याह-'ओदन' भक्तं, तद्योग्यशेषानोपलक्षणमेतत् ,M ॥२७२।। यवस' मुद्गमाषादि 'दद्यात् ' तदअतो ढोकयेत् , तत एव पोषयेत् , पुनर्वचनमादरख्यापनाय, अपिः सम्भावने, & सम्भाव्यत एवैवंविधः कोऽपि गुरुकमति, 'स्वकाङ्गणे' स्वकीयगृहाङ्गणे, अन्यत्र नियुक्तकाः कदाचिन्नौदनादि दास्यन्तीतिखकाङ्गण इत्युक्तं, यदि वा 'पोसेजा विसयंगणे'त्ति विशन्त्यस्मिन् विषयो-गृहं तस्याङ्गणं विषयाङ्गणं तस्मिन् , अथवा विषयं-रसलक्षणं वचनव्यत्ययाद् विषयान्वा गणयन्-संप्रधारयन् धर्मनिरपेक्ष इति भावः, इहोदाहरणं सम्प्रदायादवसेयं, जहेगो ऊरणगो पाहुणयणिमित्तं पोसिज्जति, सो पीणियसरीरो सुण्हातो हलिद्दादिकयंगरागो कयकपणचूलतो कुमापरगा य तं नाणाविहेहिं कीलाविसेसेहिं कीलायेंति, तं च वच्छगो एवं लालिजमाणं दट्टण माऊए हेण य गोवियं दोहएण य तयणुकंपाए मुक्कमवि खीरं ण पिवति रोसेणं, ताए पुच्छिओ भणति-अम्मो ! एस शंदियगो सबेहिं| १ यथैक करणकः प्राघूर्णकनिमित्तं पोष्पते, स पीनशरीरः सुखातो हरिद्रादिकृताङ्गरागः कृतकर्णचूलकः कुमाराच तं नानाविधैः ||२७२॥ क्रीडाविशेषैः क्रीडयन्ति, तं च वत्स एवं लाल्यमानं दृष्ट्वा मात्रा बहेनैव गोपितं दोहकेन च तदनुकम्पया मुक्तमपि क्षीरं न पिचति रोपेण, तया पृष्टो भणति-अम्ब ! एष नन्दितका सबै - - दीप अनुक्रम [१७९] -- Fm ParmmaraPINaatimom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~46 Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||२|| नियुक्ति: [२४९] प्रत सूत्रांक ||२|| एएहिं अम्हसामिसालेहिं अहहिं जवसजोगासणेहिं तदुवओगेहिं च अलंकारविसेसेहिं अलंकारितो पुत्त इव परिपालिजति, अहं तु मंदभग्यो सुक्काणि तणाणि काहेवि लभामि, ताणिवि ण पज्जत्तगाणि, एवं पाणियंपि, ण यमं कोऽवि लालेति । ताए भण्णति-पुत्त ! आउरचिन्नाई एयाई, जाई चरइ नंदिओ। सुकत्तणेहिं लाढाहि, एयं दीहाउलक्खणं ॥ २४९ ॥ जहा आउरो मरिउकामो जं मग्गति पत्थं वा अपत्थं वा तं दिजति से, एवं सो पंदितो मारिजिहिति जदाग ४ तदा पेच्छिहिसि, इति सूत्रार्थः॥ ततोऽसौ कीदृशो जातः १ किं च कुरुते ? इत्याह तओ स पुढे परिब्बूढे, जायमेदे महोयरे । पीणिए विपुले देहे, आदेसं परिकखए ॥२॥ ४ व्याख्या-'तत इत्योदनादिदानाद्धेतौ पञ्चमी, 'स' इत्युरनः 'पुष्ट' उपचितमांसतया पुष्टिभाक् 'परिवृढः प्रभुः । १ रेतरस्मत्स्वामिश्यालैराढ्यैर्यवसयोग्याशनैस्तदुपयोगैश्वालङ्कारविशेषैरलड्कृतः पुत्र इव परिपाल्यते, अहं तु मन्दभाग्यः शुष्काणि । तृणानि कदापि लभे, तान्यपि न पर्याप्तानि, एवं पानीयमपि, न च मां कोऽपि लालयति । वया भण्यते-पुत्र ! आतुरचिहानि एतानि, यानि घरति नन्दिकः । शुष्कतृणैर्यापर्यतत् दीर्घायुलक्षणम् ॥ १॥ यथा आतुरो मर्नुकामो यन्मार्गयति पध्यमपथ्यं वा तहीयते तस्मै, एवं स नन्दिको मारयिष्यते यदा तदा प्रेक्षयिष्ये दीप अनुक्रम [१८०] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~474 Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||3|| दीप अनुक्रम [१८१] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२७३॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||३|| निर्युक्ति: [२४९...] अध्ययनं [७], समर्थ इतियावत् 'जातमेदा' उपचितचतुर्थधातुः अत एव 'महोदरः' बृहज्जठरः 'प्रीणितः' तर्पितः, यथासमयमुपढौकिताहारत्वात्, एभिरेव च हेतुभिः 'विपुले' विशाले 'देहे' शरीरे सति "यस्य च भावेन भावलक्षण" मिति (पा० (२-३-३७) सप्तमी, किमित्याह - आदेशं 'प्रतिकाङ्क्षति' प्रतिपालयति, पाठान्तरतः 'परिकाङ्क्षति' इच्छति, न चास्य तत्त्वत्तः प्रतिपालनमिच्छा वा सम्भवति, अतः प्रतिकाङ्क्षतीव प्रतिकाङ्क्षतीत्युपमार्थोऽवगन्तव्यः, एवं परिकाङ्क्षतीत्यत्रापि इति सूत्रार्थः ॥ स किमेवं चिरस्थायी स्यादित्याह ז जाव न एजति आएसो, तात्र जीवति सेऽदुही । अह पत्तंमि आएसे, सीसं छेत्तृण भुजति ॥ ३ ॥ व्याख्या- 'यावदिति कालावधारणे 'नेति' नायाति, कोऽसौ ? -आदेशः, तावत् नोत्तरकालं 'जीवति' प्राणान् धारयति, 'सेऽदुहि 'त्ति अकारप्रश्लेषात् स इत्युरभ्रोऽदुःखी सुखी सन्, अथवा बध्यमण्डन मिवास्यौदनदानादिनीति तत्त्वतो दुःखितैवास्येति दुःखी, 'अह पत्तंमि आएसे' अथानन्तरं 'प्राप्ते' आगते आदेशे श्रिता अस्मिन् प्राणा इति शिरः तच्छित्त्वा द्विधा विधाय भुज्यते, तेनैव खामिना प्राहणकस हितेनेति शेषः । सम्प्रति सम्प्रदायशेषमनुस्त्रियते- ततो सो वच्छगो तं नंदियगं पाहुणगेस आगएसु वधिजमाणं दहुं तिसितोऽवि भएणं माऊए थणं णाभि१ ततः स वत्सतं नन्दितकं प्राघूर्णकेष्वागतेषु वध्य (हन्य) मानं दृष्ट्वा तृषितोऽपि भयेन मातुः स्तन्यं नाभि For Permat& Preate Use One औरश्री याध्य. ७ ouston nimit पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 48~ ॥२७३ ॥ Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक |||| दीप अनुक्रम [१८२] moueatum nem [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||४|| निर्युक्ति: [२४९...] अध्ययनं [७], लसंति, ताए भण्णति-किं पुत ! भयभीतोऽसि ?, णेहेण पण्डयंपि मं ण पियसि, तेण भण्णइ-अम्म ! कतो मे थणाभिलासो ?, णणु सो बरातो मंदितो अज्ज केहिवि पाहुणएहिं आगएहिं ममं अग्गतो विणिग्गयजीहो विलोलनयणो विस्सरं रसंतो अत्ताणो असरणो मारितो, तम्भयातो कतो मे पाउमिच्छा ?, ततो ताए भण्णति-पुत्त ! णणु तदा चेब ते कहियं, जहा आउरचिण्णाई एवाई०, एस तेसिं विवागो अणुपत्तो । एस दिट्टंतो इति सूत्रार्थः ॥ इत्थं दृष्टान्तमभिधाय तमेवानुवदन् दार्शन्तिकमाह - जहा खलु से ओर भे, आएसाए समीहिए। एवं वाले अहम्मिट्ठे, ईहति निरयाज्यं ॥ ४ ॥ व्याख्या- 'यथा' येन प्रकारेण 'खलु' निश्चयेन 'स' इति प्रागुक्तस्वरूप उरभ्रः 'आदेशाय' आदेशार्थं 'समीहितः' कल्पितः सन् यथाऽयमस्मै भवितेत्यादेशं परिकाङ्क्षति इत्यनुवर्तते, 'एवम्' अमुनैव न्यायेन 'बालः' अज्ञोऽधर्मो-धर्म| विपक्षः पापमितियावत् स इष्टः-अभिलषितोऽस्येत्य धर्मिष्ठः, आहिताभ्यादेश कृतिगणत्वादिष्टशब्दस्य परनिपातः, यद्वा १० लप्यति, तया भण्यते - किं पुत्र ! भयभीतोऽसि ?, खेहेन प्रस्तुतामपि मां न पिबसि, तेन भण्यते-अम्ब! कुतो मे स्तन्याभिलाषः ?, ननु स वराको नन्दिकोऽय केध्वपि प्राचूर्णकेष्वागतेषु ममाग्रतो विनिर्गत जिड़ो बिलोलनयनो विखरं रसन् अत्राणोऽशरणो मारितः, तद्भया त्कुतो मे पातुमिच्छा 2 ततस्तया भण्यते - पुत्र ! ननु तदैव तुभ्यं कथितं यथा- आतुरचिह्नान्येतानि०, एष तेषां विपाकोऽनुप्राप्तः एष दृष्टान्तः । For Pet & Pre Us On पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~49~ Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा ||५-७|| नियुक्ति: [२४९...] याध्य.७ प्रत बृहदृत्तिः सूत्रांक ||५-७|| उत्तराध्य. ऽधर्मगुणयोगादधर्मोऽतिशयेनाधर्मोऽधर्मिष्ठः, ईहत इबेहते वाञ्छतीव तदनुकूलचारितया, किं तत् ?-'नरकायुष्क' नरकजीवितमिति सूत्रार्थः ॥ उक्तमेवार्थ प्रपञ्चयितुमाह हिंसे बाले मुसाबाई, अडाणमि विलोवए । अण्णदत्तहरे तेणे, माई कण्हुहरे सढे ॥५॥ ॥२७४॥ इत्धीविसयगिद्धे य, महारंभपरिग्गहे । भुजमाणे सुरं मंसं, परिवूढे परंदमे ॥६॥ अयककरभोई य, तुंदिले चिय लोहिए । आउयं नरए कंखे, जहाऽऽएसं व एलए ॥७॥ व्याख्या-हिनस्तीत्येवंशीलो हिंस्रः-खभावत एव प्राणव्यपरोपणकृत् 'बालः' अज्ञः, पाठान्तरश्च क्रुध्यति-हेतुमन्तरेणापि कुप्यतीत्येवंधा क्रोधी, मृषा-अलीकं वदति-प्रतिपादयतीत्येवंशीलो सृपावादी, 'अध्वनि' मार्गे| |'बिलुम्पति' मुष्णातीति बिलोपका, यः पथि गच्छतो जनान् सर्वखहरणतो लुण्टति, 'अण्णदत्तहरि ति अन्येभ्यो । टू दत्तं-राजादिना वितीर्ण हरति अपान्तराल एवाच्छिनत्त्यदत्तहरः, अन्योऽदत्तम्-अनिसृष्टं हरति-आदचे अन्यादत्तहरः-ग्रामनगरादिषु चौर्यकृत् , अत एव 'बालः' अज्ञः, विस्मरणशीलस्मरणार्थमेतदिति न पौनरुक्त्यं, सर्वावस्थासु वा बालवख्यापना, पाठान्तरश्च स्तेनः' स्तन्येनैवोपकल्पितात्मवृत्तिः, यद्वा-अन्यादत्तहरः अन्यादत्तं ग्रन्धिच्छेदा-18|॥२७॥ दिनोपायेनापहरति स्तेनः क्षत्रादिखननेनेति विशेषो, 'मायी' वञ्चनैकचित्तः, 'कण्हुहरः' कण्हु कस्वार्थ हरिष्यामीत्येवमध्यवसायी 'शठः' वक्राचारः । तथा स्त्रियश्च विषयाश्च स्त्रीविषयाः तेषु गृद्धः-अभिकाढावान् स्त्रीविषयगृद्धः, दीप अनुक्रम [१८३. -१८५] ARRoursd TAN Tu Panumaramaniwom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~50 Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||५-७|| नियुक्ति: [२४९..] X प्रत सूत्रांक ||५-७|| चः प्राग्वत् , महान्-अपरिमितः आरम्भः-अनेकजन्तूपघातकृयापारः परिग्रहश्व-धान्यादिसञ्चयो यस्य स तथोक्तः, लाभुआनः' अभ्यवहरन् , 'सुरां' मदिरां, 'मांसं' पिशितं, 'परिवूढे'त्ति परिवृढः प्रभुरुपचितमांसशोणिततया तक्रिया| समर्थ इतियावत् , अत एव परान्-अन्यान् दमयति-यत्कृत्याभिमतकृत्येषु प्रवर्तयतीति परन्दमः, किंच-अजः-- छागस्तस्य कर्कर-यचनकवद्भक्ष्यमाणं कर्करायते तचेह प्रस्तावान्मेदोदन्तुरमतिपक्कं वा मांसं तद्भोजी वा, अत एव | 'तुन्दिलः' जातबृहजठरः, चितम्-उपचयप्राप्तं लोहित-शोणितमस्येति चितलोहितः, शेषधातूपलक्षणमेतत् ,X | 'आयुः' जीवितं, 'नरके' सीमन्तकादौ काङ्क्षति तद्योग्यकारम्भितया, कमिव क इव ? इत्याह-जहाएसं व एडए'त्ति आदेशमिव यथैडकः-उक्तरूपः । इह च 'हिंसे' इत्यादिना सार्यश्लोकेनारम्भ उक्तः, 'भुंजमाणे सुर'मित्या|दिना चार्धद्वयेन रसद्धिः, 'आयुष्क मित्यादिना चार्धेन दुर्गतिगमनं, तत्प्रतिपादनाचार्थतः प्रत्यपायाभिधानमिति | सूत्रत्रयार्थः ॥ इदानीं यदुक्तम् 'आयुर्नरके काढ़ती ति, तदनन्तरमसौ किं कुरत इत्याह, यद्वा साक्षादैहिकापायदर्शनायाह आसणं सपण जाणं, वित्ते कामाणि भुजिया। दस्साहर्ड.धणं हिचा. वहं संचिणिया रयं ॥८॥ ततो कम्मगुरू जंतू, पचुप्पण्णपरायणे । अएब्ब आगया 'कखे, मरणतंमि सोयति ॥९॥ १ आगयाएसेत्ति टीका। दीप अनुक्रम CAX [१८३. -१८५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~51 Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [--1 / गाथा ||८-९|| नियुक्ति: [२४९...] 14 बृहद्धृत्तिः प्रत सूत्रांक ||८-९|| R उत्तराध्य. व्याख्या-आसनं शयनं यानमिति प्राग्वत् , नवरं भुक्त्वेति सम्बन्धनीयं, 'यित्ते'त्ति वित्तं द्रव्यं, 'कामान् मनो-1 | औरश्रीशब्दादीन् 'भुक्त्वा' उपभुज्य,दुःखेनात्मनः परेषां च दुःखकरणेन सुष्ठु-आदरातिशयेनाहृतम्-उपार्जितं दुःखाहृतं,यद्वा याध्य.७ प्राकृतत्वात् दुःखेन संहियते-मील्यते स्मेति दुःसंहृतं धनं' द्रव्यं हित्वा' आसनाधुपभोगेन घृताद्यसद्वययेन च त्यक्त्वा, ॥२७॥ तथा च मिथ्यात्वादिकर्मबन्धुहेतुसम्भवाद् 'बहु' प्रभूतं 'सञ्चित्य' उपाय रजः' अष्टप्रकारं कर्म, ततः किमित्याह 'ततो'त्ति ततो रजःसञ्चयात् तको वा सञ्चितरजाः, कर्मणा गुरुरिव गुरुः अधोनरकगामितया कर्मगुरुः, 'जन्तुः'। प्राणी 'प्रत्युत्पन्नं' वर्तमानं तस्मिन्परायणः-तन्निष्ठः प्रत्युत्पन्नपरायणः, एतावानेव लोकोऽयं,यावानिन्द्रियगोचरः' इति । नास्तिकमतानुसारितया परलोकनिरपेक्ष इतियावत् , 'अएव'त्ति अजः-पशुः, स चेह प्रक्रमादुरभ्रस्तद्वत् 'आगयाएसेत्ति प्राकृतत्वादागते-प्राप्ते आदेशे-पाहुणके, एतेन प्रपश्चितज्ञविनेयानुग्रहायोक्तमेयोरभ्रदृष्टान्तं स्मारयति, किमित्याह 'मरणान्ते' प्राणपरित्यागात्मनि, अवसाने शोचति, किमुक्तं भवति ?-यथाऽऽदेशे आगते उरभ्र उक्तनीत्या शोचति, दतथाऽयमपि धिङ्मा विषयच्यामोहत उपार्जितगुरुकर्माणं, हा ! केदानी मया गन्तव्यमित्यादिप्रलापतः खिद्यते, अत्यन्तनास्तिकस्यापि प्रायस्तदा शोकसम्भवादिति सूत्रद्वयार्थः ।। अनेनैहिकापाय उक्तः, सम्प्रति पारभविकमाह- ॥२७५।। तओ आउ परिक्खीणे, चुतदेहा विहिंसगा। आसुरियं दिसं बाला, गच्छंति अवसा तमं ॥१०॥ व्याख्या-'ततः' शोचनानन्तरं 'तको वा' उपार्जितगुरुका 'आउ'त्ति आयुपि तद्भवसम्बन्धिनि जीविते | दीप अनुक्रम [१८६ -१८७] R पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~52 Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१०|| दीप अनुक्रम [१८] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१०|| निर्युक्तिः [२४९...] अध्ययनं [७], 'परिक्षीणे' सर्वथा क्षयं गते, कदाचिदायुःक्षयस्याऽऽवीचिमरणेन प्रागपि सम्भवादेवमुच्यते, 'च्युतः ' भ्रष्टो 'देहात् ' शरीरात्, पाठान्तरतस्तु 'च्युतदेहो' अपगते हत्यशरीरः ''विहिंसकः ' विविधप्रकारैः प्राणिघातकः, 'आसुरियं'ति अविद्यमानसूर्याम्, उपलक्षणत्वाद्वहनक्षत्रविरहितां च दिश्यते नारकादित्येनास्यां संसारीति दिक् ताम्, अर्थात् भावदिशम्, अथवा रौद्रकर्मकारी सर्वोऽप्यसुर उच्यते, ततश्वासुराणामियमासुरी या तामासुरीयां दिशं नरकगतिमित्यर्थः, 'बालः' अज्ञो गच्छति - याति 'अवशः' कर्म्मपरवः शो, वचनव्यत्ययाच सर्वत्र बहुवचननिर्देशो व्याप्तिख्यापनार्थो वा, यथा नैक एवंविधः किन्तु बहव इति, 'तमीति तमोयुक्तत्वात् तमः, देवगतेरप्यसूर्यत्वसम्भवात् तद्वयवच्छेदाय दिशो विशेषणं, ततोऽर्थान्नरकगतिम् उक्तं हि - - " णिबंधयारत मसा ववगयगह चंदसूरणक्खत्ता" इत्यादि| स्वरूपख्यापकं वा द्वितीयं व्याख्यानमिति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति काकिण्यानदृष्टान्तद्वयमाह- जहा कागिणीए हे, सहस्सं हारए नरो। अभपत्थं अंबर्ग भोचा, राया रज्जं तु हारए ॥ ११ ॥ व्याख्या- 'यथा' इत्युदाहरणोपन्यासार्थः, 'काकिण्याः' उक्तरूपायाः 'हेउ'ति हेतोः कारणात् 'सहस्रं' दशशतात्मकं, कार्षापणानामिति गम्यते, 'हारयेत्' नाशयेतत् 'नरः' पुरुषः । अत्रोदाहरणसम्प्रदायः १ नित्यान्धकारतमसा व्यपगतग्रह्चन्द्रसूर्यनक्षत्राः । For Parana Praten notaro org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३], मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~53~ Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||28|| दीप अनुक्रम [१८९] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२७६॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || ११ || निर्युक्ति: [२४९...] अध्ययनं [७], एगो दमगो, तेण विर्त्ति करेंतेण सहस्सं काहावणाण अज्जियं, सो य तं गहाय सत्थेण समं समिहं पत्थितो, तेण भत्तणिमित्तं रूपगो कागिणीहिं भिन्नो, ततो दिणे दिणे कागिणीए भुंजति, तस्स य अबसेसा एगा कागणी, सा | विस्सारिया, सत्ये पहाविए सो चिंतेति मा मे रूपगो भिंदियो होहित्ति णउलगं एगत्थ गोवेडं कागिणीणिमित्तं णियत्तो, सावि कागिणी अन्त्रेण हडा, सोऽवि णउलतो अण्णेण दिट्ठो ठविजतो, सोबि तं घेतूण णहो, पच्छा सो घरं गतो सोयति । एस दितो, तथा 'अपथ्यं' अहितम् 'आम्रकम् आम्रफलं 'भुक्त्वा' अभ्यवहृत्य 'राजा' इति नृपतिः 'राज्य' पृथिवीपतित्वं, 'तुः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च तेन हारयेदेव, सम्भवत्येव अस्यापथ्यभोजिनो राज्यहरणमित्यक्षरार्थः । भावार्थस्तु वृद्धसम्प्रदायादवसेयः, स चायम् - १ एको द्रमक:, तेन वृत्तिं कुर्वता सहस्रं कार्षापणानामर्जितं स च तद् गृहीत्वा सार्थेन समं स्वगृहं प्रस्थितः तेन भक्तनिमित्तं | रूयकः काकिणीभ्यो भिन्नः, ततो दिने दिने काकिण्या भुझे, तस्य चावशेषा एका काकिणी, सा विस्मृता, सार्थे प्रधाविते स चिन्तयतिमा मे रूप्यको भेत्तव्यो भविष्यतीति नकुलकमेकत्र गोपयित्वा काकिणीनिमित्तं निवृत्तः, साऽपि काकिणी अन्येन हवा, सोऽपि नकुलकोऽन्येन दृष्टः स्थाप्यमानः सोऽपि तं गृहीत्वा नष्टः पश्चात्स गृहं गतः शोचति । एष दृष्टान्तः । Education international For Personal & Prva Use On औरश्री याध्य. ७ ~54~ ॥२७६॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा ||११|| नियुक्ति: [२४९...] CO प्रत सूत्रांक ||११|| - जहा कस्सइ रपणो अंबाजिपणेण विसूइया जाया, सा तस्स वेजेहिं महता जत्चेण तिगिच्छिया, भणितो य-11 जदि पुणो अंबाणि खासि तो विणस्सति, तस्स य अतीव पीयाणि अंबाणि, तेण सदेसे सके अंबा उच्छादिया। अण्णया अस्सवाहणियाए णिग्गतो सह अमञ्चेण, अस्सेण अवहरिओ, अस्सो दूरं गंतूण परिस्संतो ठितो, एगंमि वणसंडे चूयच्छायाते अमचेण बारिजमाणोऽवि णिविट्ठो, तस्स य हेटे अंबाणि पडियाणि, सो ताणि परामुसति, पच्छा अग्घाति, पच्छा चक्खिउं णिबुहति, अमचो वारेइ, पच्छा भक्खेउं मतो । इति सूत्रार्थः ॥ ४ इत्थं रष्टान्तमभिधाय दाटोन्तिकयोजनामाह एवं माणुस्सगा कामा, देवकामाण अंतिए । सहस्सगुणिया भुजो, आउँ कामा य दिब्विया ॥१२॥ व्याख्या-'एवं' काकिण्यामकसदृशा मनुष्याणाममी मानुष्यकाः, गोत्रप्रत्ययान्तत्वात् “गोत्रचरणादुनि"ति १ यथा कस्यचित् राज्ञ आम्राजीणेन विसूचिका जाता, सा तस्य वैद्यैर्महता यत्नेन चिकित्सिता, भणिखश्च-यदि पुनराम्राणि खादिप्यसि तदा विनड्डयसि, तस्य चातीव प्रियाणि आम्नाणि, तेन स्वदेशे सर्वाण्याम्राण्युत्सादितानि । अन्यदा अश्ववाहनिकायै निर्गतः सहामायेन, अश्वेनापहृतः, अश्वो दूर गत्या परिश्रान्तः स्थितः, एकस्मिन् वनखण्डे चूतच्छायायाममात्येन वार्यमाणोऽपि निविष्टः, तस्य चाधस्तात् आम्राणि पतितानि, स तानि परामृशति, पश्चादाजिघ्रति, पश्चात् खादयितुं निस्पृशति, अमात्यो वारयति, पश्वाक्षयित्वा मृतः। FOL- RXXX दीप As अनुक्रम [१८९] DIREducatimmimaramod Fmramatswastle:om पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~55 Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा ||१२|| नियुक्ति: [२४९...] प्रत सूत्रांक ||१२|| उत्तराध्य पा(पा०४-३-१२६) बुञ् 'कामाः' विषयाः, 'देवकामाना' देवसम्बन्धिनां विषयाणाम् 'अन्तिके समीपे, अन्तिकोपादानं । औरभ्रीबृहदृत्तिः च दूरेऽनवधारणमपि स्यादिति, किमित्येवम् ?,अत आह-'सहस्रगुणिताः सहस्रताडिता 'भूयः' अतिशयेन बहु, बहूनलयाध्य७ वारानित्यर्थः, मनुष्यायुःकामापेक्षयेति प्रक्रमः, अनेनैषामतिभूयस्त्वं सूचयन् कार्पोपणसहस्रराज्यतुल्यतामाह, 'आयुः || ॥२७७॥ जीवितं, कामाच-शब्दादयः, 'दिविय'त्ति दिवि भवा दिव्याः "धुप्रागपागुदप्रतीचो यदि"ति (पा०४-२-१०१) दियत् , त एव दिव्यकाः, इह चादौ 'देवकामाण अंतिए'त्ति काममात्रोपादानेऽपि 'आउं कामा य दिविय'त्ति आयु लापोऽप्युपादानं तत्रत्यप्रभायादीनामपि तदपेक्षयैवंविधत्वख्यापनार्थ, यद्वा 'सूचनात् सूत्र'मिति पूर्वत्राप्यायुपः सूचि४ तत्वाददोष इति सूत्रार्थः ।। मनुष्यकामानासेव काकिण्यानफलोपमत्वं भावयितुमाह ___ अणेगवासानउया, जा सा पण्णवओ ठिई । जाइं जीयंति तुम्मेहा, जाण वाससयाउए ॥ १३ ॥ wi व्याख्या-अनेकानि-बहूनि तानि चेहासङ्खयेयानि वर्षाणि-वत्सराणि तेषां नयुतानि-सहयाविशेषाणि वर्णनयु-15 साग्यनेकानि च तानि वर्षनयुतानि च अनेकवर्षनयुतानि “खरोऽन्योऽन्यस्य” इति प्राकृतलक्षणात् सकाराकारदीर्घत्वम् , एवमन्यत्रापि खरान्यत्वं भावनीयं,यदिवाऽनेकानि वर्पनयुतानि येषु तान्यनेकवर्षनयुतानि, उभयत्रार्थात् पल्यो। पमसागरोपमाणीतियावत् , नयुतानयनोपायस्त्वयम्-चतुरशीतिवर्षलक्षाः पूर्वाङ्गं, तच पूर्वाशन गुणितं पूर्व, पूर्व (क्रमेणेकानविंशतिवारान्)चतुरशीतिलक्षाहतं नयुताझं,नयुताङ्गमपि चतुरशीतिलक्षाभिताडितं नयुतं,केवमुच्यत इत्या। दीप अनुक्रम [१९०] ||२७७॥ (EducatomiN पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~56~ Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||१३|| नियुक्ति: [२४९...] प्रत सूत्रांक ||१३|| दह-'या से'ति प्रज्ञापकः शिष्यान् प्रत्येवमाह-या सा भवतामस्माकं च प्रतीता, प्रकर्षण ज्ञायते वस्तु-सतत्त्वमनयेति । प्रज्ञा-हेयोपादेयविवेचिका बुद्धिः सा विद्यतेऽस्यासौ प्रज्ञावान् , 'अतिशायने मतुप्' अतिशयश्चास्या हेयोपादेययोः हानोपादाननिवन्धनत्वमिहाभिमतं ततश्च क्रियाया अप्याक्षिप्तत्वात् यदिवा निश्चयनयमतेन क्रियारहिता प्रज्ञाPऽप्यप्रवेति प्रज्ञयैव क्रियाऽऽक्षिप्यते ततः प्रज्ञावान् ज्ञानक्रियावानित्युक्तं भवति, तस्य प्रज्ञावतः स्थीयतेऽनयाऽर्थात् देवभव इति स्थितिः-देवायुः, अधिकृतत्वात् दिव्यकामाश्च, तानि च कीदृशीत्याह-यान्यनेकवर्णनयुतानि दिव्यस्थितेर्दिव्यकामानां च विषयभूतानि 'जीयन्ते' हार्यन्ते, तद्धेतुभूतानुष्ठानानासेवनेनेति भावः, पाठान्तरतो 'हारयन्ति वा,' के ते?-दुष्टा-विपर्ययादिदोषदुष्टत्वेन मेधा-वस्तुखरूपावधारणशक्तिरेषां ते दुर्मेधसः, विषयैर्जिता जन्तव इति गम्यते, कदा पुनस्तानि दुर्मेधसो विषयीयन्त इत्याह-ऊने वर्षशतायुषि, अनेनायुषोऽल्पत्वात् मनुष्यकामानामप्यल्पतामाह, यदिवा प्रभूते वायुषि प्रमादेनैकदा हारितान्यपि पुनर्जीयेरन् , अस्मिंस्तु संक्षिप्तायुष्येकदा हारितानि हारितान्येव, भगवतश्च वीरस्य तीर्थे प्रायो न्यूनवर्पशतायुष एव जन्तव इतीत्थमुपन्यासः, अयं चात्र भावार्थ:-अल्पं मनुष्याणामायुर्विषयाश्चेति काकण्याम्रफलोपमाः, देवायुर्देवकामाश्चातिप्रभूततया कार्षापणसहस्र१भूमनिन्दाप्रशंसासु, नित्ययोगेऽतिशायने । संवन्धेऽस्ति विवक्षायां, भवन्ति मतुवादयः ।। १ ।। इत्युक्तेः दीप अनुक्रम [१९१] SOMEdition पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~57 Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||१४|| नियुक्ति: [२४९...] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||१४|| उत्तराध्य. राज्यतुल्याः, ततो यथा द्रमको राजा च काकण्याम्रफलकृते कार्षापणसहस्रं राज्यं च हारितवान् , एवमेतेऽपि दुर्म-14 औरभीपूधसोऽल्पतरमनुष्यायुःकामार्थे प्रभूतान् देवायुःकामान् हारयन्तीति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति व्यवहारोदाहरणमाह जहा य तिषिण वणिया, मूलं घेतूण निग्गया। एगोऽस्थ लभते लाभ, एगो मूलेण आगओ॥१४॥ याध्य, ७ ॥२७८1118 व्याख्या-'यथा' इति प्राग्वत् , 'चः' प्रतिपादित दृष्टान्तापेक्षया समुच्चये, त्रयो 'यणिजः' प्रतीताः 'मूलं' राशि नीवीमितियावत् गृहीत्वा 'निर्गताः' स्वस्थानात्स्थानान्तरं प्रति प्रस्थिताः, प्राप्ताश्च समीहितं स्थानं, तत्र च गता-18 नाम् एको वणिककलाकुशलः 'अत्र' एतेषु मध्ये 'लभते' प्राप्नोति 'लाभ' विशिष्टद्रव्योपचयलक्षणम् , 'एक'। तेष्वेवान्यतरो यस्तथा नातिनिपुणो नाप्यत्यन्तानिपुणः समूलेणे ति मूलधनेन यावत् गृहान्नीतं तावतैवोपलक्षितः 'आगतः' खस्थान प्राप्त इति सूत्रार्थः ॥ तधा एगो मूलंपि हारित्ता, आगओ तत्थ वाणिओ । ववहारे उवमा एसा, एवं धम्मे विजाणह ॥ १५॥ व्याख्या-'एकः' अन्यतरः प्रमादपरो द्यूतमद्यादिष्वत्यन्तमासक्तचेताः 'मूलमपि' उक्तरूपं 'हारयित्वा' नाश-2 यित्वा 'आगतः' प्राप्तः स्वस्थानमित्युपस्कारः, एवं सर्वत्रोदाहरणसूचायां सोपस्कारता द्रष्टव्या, 'तत्र' तेषु मध्ये वणिका एव वाणिजः। अत्र च सम्प्रदायःजहा एगस्स वाणियगस्स तिन्नि पुत्ता, तेण तेसिं सहस्सं सहस्सं दिन्नं काहावणाणं, भणिया य-एएण ववहरि-13/ ॥२७८॥ १ यथैकस्य वणिजखयः पुत्राः, तेन तेभ्यः सहस्रं सहस्र दत्तं कार्षीपणाना, भणिताच-एतेन व्यवहत्य दीप अनुक्रम [१९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~58~ Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||१५|| नियुक्ति: [२४९...] प्रत सूत्रांक ||१५|| ४। ऊण ऐत्तिएण कालेण एजाह, ते तं मूलं घेत्तूण णिग्गया सणगरातो, पिथप्पिथेसु पट्टणेसु ठिया, तत्थेगो भोय-21 गच्छायणवजं जूयमजमंसवेसावसणविरहितो विहीए यवहरमाणो विपुललाभसमनितो जातो, बितितो पुण मूलमयि देवंतो लाभगं भोयणच्छायणमल्लालंकारादिसु उवभुजति, ण य अचादरेण ववहरति, ततितो न किंचि संघव हरति, केवलं जूयमजमंसवेसगंधमल्लतंबोलसरीरकियासु अप्पेणेव कालेण तं दचं णिवियंति, जहावहिकालस्स | हैसपुरमागया। तत्थ जो छिन्नमूलो सो सबस्स असामी जातो, पेसए उवचरिजति, वितितो घरवावारे णिउत्तो भत्त-II पाणसंतट्रोण दायचभोत्तचेसु ववसायति, ततितो घरवित्थरस्स सामी जातो। केति पण कहंति-तिनि वाणियगा||2|| ४ पत्तेयं २ ववहरंति, तत्थेगो छिन्नमूलो पेसत्तमुवगतो, केण वा संववहारं करेउ ?, अच्छिन्नमूलो पुणरवि वाणिजाए| भवति, इयरो बंधुसहितो मोदए, एस दिट्ठतो। I १ इयता कालेनागच्छत । ते तन्मूल्यं गृहीत्वा निर्गताः खनगरात् , पृथक् पृथक् पत्तनेषु स्थिताः, तत्रैको भोजनाच्छादनवर्ज गृतमय-12 मांसवेश्याव्यसनविरहितो वीभ्यां व्यवहरन विपुललाभसमन्वितो जातः, द्वितीयः पुनः मूलमपि द्रव्यायमाणो लाभं भोजनाच्छादनमा-2 ल्यालङ्कारादिपूपभुङ्क्ते, न चात्यादरेण व्यवहरति, तृतीयो न किञ्चित्संव्यवहरति, केवलं यूतमद्यमांसवेश्यागन्धमाल्यताम्बूलशरीरक्रियासु अल्पे४ नैव कालेन तव्यं निष्ठितमिति, यथावधिकालेन स्वपुरमागताः । तत्र पश्छिन्नमूलः स सर्वस्यास्वामी जातः, प्रेष्ये उपचर्यते, द्वितीयो गृहन्यापारेर नियुक्तो भक्तपानसंतुष्टो न दातव्यभोक्तव्येषु व्यवस्यति, तृतीयो गृहविस्तारस्य स्वामी जातः । केचित्पुनः कथयन्ति-त्रयो वणिजः प्रत्येक प्रत्येकं व्यवहरन्ति, तत्रैकश्छिन्नमूल: प्रेष्यत्वमुपगतः, केनैव संव्यवहारं करोतु ?, अच्छिन्नमूल: पुनरपि वाणिज्यायै भवति, इतरो बन्धुसहितो मोदते, एष दृष्टान्तः । २० मविदवतो दीप अनुक्रम [१९३]] SamEducatan intamational For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~59~ Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१६|| दीप अनुक्रम [१९४] उत्तराध्य बृहद्वृत्तिः ॥२७९॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१६|| निर्युक्तिः [२४९...] अध्ययनं [७], सम्प्रति सूत्रमनुखियते - 'व्यवहारे' व्यवहारविषया 'उपमा' सादृश्यं 'एषा' अनन्तरोक्ता 'एवं' वक्ष्यमाणन्यायेन 'धर्मे' धर्मविषयामेवोपमां 'विजानीत' अवबुध्यध्वमिति सूत्रार्थः ॥ कथमित्याह माणुसतं भवे मूलं, लाभो देवगई भवे । मूलच्छेएण जीवाणं, नरगतिरिक्खत्तणं धुवं ॥ १६ ॥ व्याख्या- 'मानुषत्वं' मनुजत्वं 'भवेत्' स्यात् मूलमिव मूलं, खर्गापवर्गात्मकतदुत्तरोत्तरलाभहेतुतया, तथा | लाभ इव लाभः मनुजगत्यपेक्षया विषयसुखादिभिर्विशिष्टत्वात् 'देवगतिः' देवत्वावाप्तिर्भवेत्, एवं च स्थिते किमित्याह-- 'मूलच्छेदेन' मानुषत्वगतिहान्यात्मकेन 'जीवानां' प्राणिनां 'नरकतिर्यक्त्वं' नरकत्वं तिर्यक्त्वं च तद्गत्यात्मकं 'ध्रुवं' निश्चितम् इहापि सम्प्रदायः- तिन्नि संसारिणो सत्ता माणुस्सेसु आयाता, तत्थेगो मद्दवजवादिगुणसंपन्नो मज्झिमारंभपरिग्गहजुत्तों कालं काऊण काहावण सहस्समूलत्थाणीयं तमेव माणुस्सत्तं पडिलहति, बितितो पुण सम्महंसण चरित्तगुण सुपरिद्वतो सरागसंजमेण लद्धलाभवणिय इव देयेसु उपवन्नो, ततितो पुण हिंसे वाले मुसावाती इथेतेहिं पुचभणितेहिं सावज्जजोगेहिं बहिउं छिन्नमूलवणिय इव णारगेसु तिरिएसु वा उववज्जतित्ति सूत्रार्थः ॥ १ त्रयः संसारिणः सत्त्वा मानुषेष्वायाताः, तत्रैको मार्दवार्जवादिगुणसंपन्नो मध्यमारम्भपरिग्रहयुक्तः कालं कृत्वा कार्षापणसहस्रमूलस्थानीयं तदेव मानुषत्वं प्रतिलभते, द्वितीयः पुनः सम्यग्दर्शनचारित्रगुणमुपरिस्थितः सरागसंयमेन लब्धलाभवणिगिव देवेषूत्पन्नः, तृतीयः पुनर्हिस्रो वालो मृषावादीत्येतैः पूर्वभणितैः सावययोगैः वर्त्तित्वा छिन्नमूलवणिगिव नारकेषु तिर्यक्षु वत् । Education intemational For Personal Prat Use On औरश्री याध्य. ७ ~60~ ॥२७९ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||१७|| नियुक्ति: [२४९...] fotech प्रत सूत्रांक ||१७|| यथा मूलच्छेदेन नरकतिर्यक्त्वप्राप्तिः तथा खयं सूत्रकृदाह__ दुहओ गती बालस्स, आवती वहमूलिया। देवत्तं माणुसत्तं च, जं जिए लोलुआसढे ॥१७॥ व्याख्या-'दुहतो'त्ति द्विधा द्विप्रकारा, गस्यत इति गतिः, सा चेह प्रक्रमान्नरकगति स्तिर्यग्गतिश्च, कस्येत्याहबालस्य' द्वाभ्यां रागद्वेषाभ्यामाकुलितस्य, 'आवइति आगच्छत्यापतति वध:-प्राणिघातः, उपलक्षणत्वान्महारम्भमहापरिग्रहानृतभाषणमायादयश्च मूलं-कारणं यस्याः सा वधमूलिका, यदिवा-द्विधा गतिर्वालस्य, भवतीति गम्यते, तत्र च गतस्य 'आवई'ति आपत् , सा च कीदृशीत्याह-वधो-विनाशस्ताडनं वा मूलम्-आदिर्यस्याः सा वधमूलिका, वधग्रहणाच्छेदभेदातिभारारोपणादिपरिग्रहः, लभन्ते हि प्राणिनो नरकतिर्यक्षु विविधा वधाचापदः, किमिस्येवम् !, अत आह-'देवत्वं देवभवं 'मानुषत्वं' मनुजभवं 'यद' यस्मात् 'जितो' हारितो 'लोलयासढे'त्ति लोलतापिशितादिलाम्पट्यं तद्योगाजन्तुरपि तन्मयत्वख्यापनार्थ लोलतेत्युक्तः, शाख्ययोगाच्छठः-विश्वस्तजनवञ्चकः, ततो लोलता चासौ शठश्च लोलताशठः, इह च लोलता पञ्चेन्द्रियवधायुपलक्षणं, तथा च नरकहेतुत्वाभिधानमेतत् , यदुक्तम्-"महारंभयाए महापरिग्गयाए कुणिमाहारेणं पंचेंदियवहेणं जीवा जेरयाउयं णियच्छंति" शठ इत्यनेन तु शाठ्यमुक्तं, तच तिर्यग्गतिहेतुः, उक्तं च-"माया तैर्यग्योनस्ये" (तत्त्वार्थे अ०६-सू०१७) ति, अतश्चायमाशयः १ महारम्भतया महापरिग्रहतया मांसाहारेण पञ्चेन्द्रियवधेन जीवा नैरयिकायुनियमयन्ति । दीप अनुक्रम [१९५] Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~61~ Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा ||१८|| नियुक्ति: [२४९...] औरधी याध्य. ७ ४ प्रत सूत्रांक ||१८|| उत्तराध्य.8-यतोऽयं बालो लोलताशठः ततो नरकगतितिर्यग्गतिनिवन्धनाभ्यां लोलताशठत्वाभ्यां देवत्वमनुजत्वे हारितस्या- सोक्तरूपा द्विविधैव गतिः सम्भवति, एवं च मूलच्छेदेन जीवानां नरकतिर्यक्त्वमुच्यते, मूलं हि मनुष्यत्वं लाभश्च बृहद्वृत्तिः देवत्वम् , उभयोरपि तयोहारणादिति सूत्रार्थः ॥ पुनर्मूलच्छेदमेव समर्थयितुमाह॥२८॥ ततो जिए सई होइ, दुविहं दुग्गतिं गते । दुल्लहा तस्स उम्मजा, अहाए सुचिरादवि ॥१८॥ | व्याख्या-ततः' देवत्वमानुषत्वजयनात् तको वा बालः 'जिय'त्ति व्यवच्छेदफलत्वाद्वाक्यस्य जित एव: है सतित्ति सदा भवति 'द्विविधां' नारकतिर्यग्भेदां, दुनिन्दायां, दुष्टा-निन्दिता गतिर्दुर्गतिस्तां गतः' प्राप्तः, सदाजितत्वमेवाभिव्यनक्ति-'दुर्लभाः' दुष्प्रापाः 'तस्येति देवमनुजत्वे हारितवतो बालस्य 'उम्मजत्ति सूत्रत्वादुन्म-11 जनमुन्मजा-नरकतिर्यग्गतिनिर्गमनात्मिका, स्यादेतत्-चिरतरकालेनोन्मजाऽस्य भविष्यति, अत आह-'अद्धायां' काले अर्थादागामिन्यां, किं खल्पायामेव ?, इत्याह-सुचिरादपीत्सद्धाशब्देनैव कालाभिधानात् सुचिराच्छब्दः प्रभूतत्वमेवाह, ततोऽयमर्थः-अनागताद्धायां प्रभूतायामपि, बाहुल्याचेत्थमुक्तम् , अन्यथा हि केचिदेकभवेनैव तत है उद्धृत्य मुक्तिमप्यामुवन्त्येवेति सूत्रार्थः ॥ इत्थं पश्चानुपूर्व्यपि व्याख्यानमिति पश्चादुक्तेऽपि मूलहारिण्युपनय- मुपदय मूलप्रवेशिन्यभिधातुमाह-यद्वा विपक्षापायपरिज्ञानतयैवोपादेये प्रवृत्तिरिति पश्चादुक्तमपि मूलहारिणमा-1 दावुपदश्यंतदाह दीप अनुक्रम [१९६] ॥२८॥ For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~62 Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१९|| दीप अनुक्रम [१९७] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१९|| निर्युक्तिः [२४९...] अध्ययनं [७], एवं जियं सपेहाए, तुलिया बालं च पंडियं । मूलियं ते पविस्संति, माणुस जोणिमिति जे ॥ १९ ॥ व्याख्या- 'एवम्' उक्तनीत्या 'जिए'ति सुन्यत्ययाजितं डोलतया शाख्येन च देवमनुजत्वे हारितं वालमिति प्रक्रमः, 'सपेहाए' त्ति सम्प्रेक्ष्य सम्यगालोच्य, तथा तोलयित्येव तोलयित्वा गुणदोषवत्तया परिभाव्य, यदिवैवं जितं सम्यग् - अविपरीता प्रेक्षा- बुद्धिः सम्प्रेक्षा तया तोलयित्वा, कम् ? - 'बालं' चस्य भिन्नक्रमत्वात् 'पण्डितं च' तद्विपरीतम्, अथवा मनुष्यदेवगतिगामिनम्, इह च द्वितीयव्याख्यायामेवं जितमिति बालस्य विशेषणं, न तु पण्डितस्य, असम्भवात् तथा च सति मूले भवं मौलिकं-मौलधनं ते प्रवेशयन्तीव प्रवेशयन्ति, मूलप्रवेशकवणिक्सदृशास्त इत्यभिप्रायः ये किमित्याह - 'माणुस्सं'ति मनुष्याणामियं मानुषी तां 'योनिम् ' उत्पत्तिस्थानम् 'आयान्ति' आगच्छन्ति, बालत्वपरिहारेण पण्डितत्वमासेवमाना ये त इति सूत्रार्थः ॥ यथा च मानुषीं योनिमायान्ति तथा चाह मायाहिं सिक्खाहिं, जे नरा गिहि सुब्वया । उर्विति माणुसं जोणीं, कम्मसचा हु पाणिणो ॥ २० ॥ व्याख्या - विविधा मात्रा - परिमाणमासां विमात्राः - विचित्र परिमाणाः ताभिः परिमाणविशेषमाश्रित्य विसर - शीभिः 'शिक्षाभिः' प्रकृतिभद्रकत्वाद्यभ्यासरूपाभिः उक्तं हि - " चउहिं ठाणेहिं जीवा मणुयाउं बंधंति, तंजहा| पगतिभयाए पगतिविणीययाए साणुकोसयाए अमच्छरियाए "त्ति 'ये' इत्यविवक्षितविशेषाः 'नराः पुरुषाः, १ चतुर्भिः स्थानैर्जीवा मनुजायुर्वघ्नन्ति, तयथा प्रकृतिभद्रकतया प्रकृतिविनीततया सानुक्रोशतया अमत्सरितया । Jan Education intemational For Person Prat janetary org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~63~ Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||२०|| नियुक्ति: [२४९...] L उत्तराध्य. बृहद्धृत्तिः ॥२८॥ प्रत irikC सूत्रांक ||२०|| 'गृहिण ते गृहस्थाः 'सुव्रताच' धृतसत्पुरुषव्रताः, ते हि प्रकृतिभद्रकत्वाद्यभ्यासानुभावत एव न विपद्यपि विषी- औरत्रीदन्ति सदाचारं वा नावधीरयन्तीत्यादिगुणान्विताः, इदमेव च सतां व्रतं, लौकिका अप्याहु:-"विपद्युबैः स्यं । याध्य.७ पदमनुविधेयं च महता, प्रिया न्याय्या वृत्तिमलिनमसुभङ्गेऽप्यसुकरम् । असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यस्तनु-31 धनः, सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम् ? ॥१॥" आगमविहितव्रतधारणं त्वमीषामसम्भवि, देवगतिहेतुतयैव तदभिधानात् , त ईदृशाः किमित्याह-उपयन्ति 'माणुसं'ति मानुषीं-मानुषसम्बन्धिनी 'योनिम्' उक्तरूपां कर्मणा-मनोवाकायक्रियालक्षणेन सत्या-अविसंवादिनः कर्मसत्याः, 'हुः' अवधारणे, ततः कम्मेसत्या एव सन्तः, तदसत्यतायास्तिर्यग्योनिहेतुत्वेनोकत्वात् , तथा च वाचक:-"धूर्ता नैकृतिकाः स्तब्धा, लुब्धाः कापेटिकाः शठाः । विविधा ते प्रपद्यन्ते, तिर्यग्योनि दुरुत्तराम् ॥१॥" इत्यादि, पाठान्तरतश्च 'कर्मसु अर्थान्मनुष्यगतियोग्यक्रियारूपेषु सक्का-अभिष्वङ्गवन्तः कर्मसक्ताः प्राणिनः-जीवाः, इह च नरग्रहणेऽपि प्राणिग्रहणं देवादिपरिग्रहार्थमिति न |पुनरुक्तम् । यदिवा-विमात्रादिभिः शिक्षाभिर्ये नरा गृहिसुत्रताः यत्तदोर्नित्याभिसम्बन्धात् ते मानुषीं योनिमुपया|न्ति, किमित्येवम् ?, अत आह-'कम्मसच्चा हुपाणिणो त्ति हुशब्दो यस्मादर्थे, यस्मात् सत्यानि-अवन्ध्यफलानि ॥२८॥ कम्मोणि-ज्ञानावरणादीनि येषां ते सत्यकर्माणः प्राणिनः, निरुपक्रमकर्मापेक्षं चैतदिति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति लब्धलाभोपनयमाह दीप अनुक्रम [१९८] %E31-9 पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~64 Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा ||२१|| नियुक्ति: [२४९...] प्रत सूत्रांक ||२१|| जेसिं तु विउला सिक्खा, मूलियते अतिच्छिया । सीलवंता सविसेसा, अद्दीणा जंति देवयं ॥ २१॥ व्याख्या-'येषां तु' येषां पुनः 'विपुला' निःशङ्कितत्वादिसम्यक्त्वाचाराणुव्रतमहाव्रतादिविषयत्वेन विस्तीर्णा 'शिक्षा' ग्रहणासेवनात्मिका, अस्तीति गम्यते, मूले भवं मौलिक-मूलधनमिव मानुषत्वं, त एवंविधाः, विउट्टियत्ति अतिट्टियत्ति अतिच्छियचि पाठत्रयेऽपि अतिक्रान्ताः-उल्लचितवन्त इत्यर्थः, यद्वाऽतिकम्य-उल्लङय, कीरशाः सन्तः १-शील-सदाचारः अविरतसम्यग्दशां विरतिमतां तु देशसविरमणात्मकं चारित्रं तद्विद्यते येषां ते शील-| वन्तः, तथा सह विशेषेण-उत्तरोत्तरगुणप्रतिपत्तिलक्षणेन वर्तन्त इति सविशेषाः, अत एव 'अदीनाः कथं वयममुत्र भविष्याम इति वैक्लव्यरहिताः परिपहोपसर्गादिसम्भवे वा न दैन्यभाज इत्यदीनाः 'यान्ति' प्राप्नुवन्ति, देवभावो | देवता सैव दैवतं । ननु तत्त्वतो मुक्तिगतिरेव लाभः, तकिमिह तत्परिहारतो देवगतिरुक्तेति ?, उच्यते, सूत्रस्य | त्रिकालविषयत्वात्, मुक्तेश्चेदानीं विशिष्ट संहननाभावतोऽभावाद्देवगतेश्च "छेवढेण उ गम्मइ चत्तारि उ जाव आदिमा कप्पा" इति वचनाच्छेदपरिवर्तिसंहननिनामिदानींतनानामपि सम्भवादेवमुक्तमिति सूत्रार्थः । प्रस्तुतमेवार्थ निगमयन्नुपदेशमाहएवं अदीणवं भिक्खू, अगारिं च विजाणिया। कहन्नु जिञ्चमेलिक्खं, जिच्चमाणो न संविदे ॥ २२॥ १ सेवार्तेन तु गम्यते चत्वारो यावदादिमाः कल्पाः दीप अनुक्रम [१९९] m aintenang For any पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~65 Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||२२|| नियुक्ति: [२४९...] उत्तराध्य. बृहदृत्तिः प्रत ॥२८२॥ सूत्रांक ||२२|| व्याख्या-'एवम्' अमुना न्यायेन लाभान्वितं 'अदीणव'न्ति दीलवतौ दीनवन्तं न तथाऽदीनवन्तम्-अदीनं, औरधीदैन्यरहितमित्यर्थः 'भिक्षु' यतिम् 'अगारिणं' च गृहस्थं 'विज्ञाय' विशेषेण तथाविधशिक्षावशादेवमनुजगामित्व याध्य.७ लक्षणेन 'ज्ञात्वा' अवगम्य, यतमान इति शेषः, 'कथम् ? केन प्रकारेण ?, न कथञ्चिदित्यर्थः, 'नुः' वितर्के, 'जिच ति सूत्रत्वात् जीयेत-हार्येत विवेकी, तत्प्रतिकूलैः कपायोदयादिभिरिति गम्यते, 'ईदृक्षम्' अन्तरोक्तं देवगत्यात्मक है लाभ जिचमाणो'त्ति वाशब्दस्य गम्यमानत्याज्जीयमानो वा-हार्यमाणः, तैरेव कषायादिभिः 'न संविदंत्ति सूत्रत्वान्न संवित्ते-न जानीते यथाऽहमेभिर्जीये इति, कथं न्वितीहापि योज्यते, ततोऽयमर्थ:-कथं नु न संविते?, संवित्त एव,7 जानीत एव ज्ञपरिज्ञया, प्रत्याख्यानपरिजया च तन्निरोधं प्रति प्रवर्तत एव, इत्येवं च वदन् काकोपदिशति-यत एवं ततो यूयमप्येवं जानाना यथा न देवगतिलक्षणं लाभं जीयेध्वं कपायादिभिस्तथा यतध्वं, कथञ्चिजीयमानाश्च सम्यम् । विज्ञाय तत्प्रतीकारायैव प्रवर्तध्यमिति, यद्वा-एवमदीनवन्तं भिक्षुमगारिणं च विज्ञाय यतमानो 'जिचंति जीयते हार्यते अतिरौद्रैरिन्द्रियादिभिः आत्मा तदिति ज्ञेयं, तचेह प्रक्रमान्मनुष्यदेवगतिलक्षणम् , 'एलिक्खंति सुव्यत्यया-2 दादीदृक्षोऽभिहितार्थाभिज्ञः कथं नु जीयमानो न संवित्ते?, अपि तु संवित्त एव, संविदानश्च यथा न जीयेत तथा यतेतेत्यभिप्रायः । अथवा-एवमदीनवन्तं भिक्षुमगारिणं च लब्धलाभं विज्ञाय यतमानः कथं नु'जिचंति आपत्वाजायते-हार्यते, विषयादिभिरिति गम्यते, ईक्ष देवगतिलक्षणं लाभमिति शेषः, अयमाशयो-यदि लभमानान विज्ञाताः दीप अनुक्रम [२००] FOOPMEGPTAITRON पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~66~ Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा ||२३|| नियुक्ति: [२४९...] 4%A 4-% % प्रत सूत्रांक ||२३|| % स्युलाभो वा न तथाविधस्तदा जयनमपि स्यात् , यदा तु लभमानौ भिक्ष्वगारिणी दृश्येते लाभश्च देवत्वलक्षणः तदा कथमयं जानानोऽपि जन्तुर्जीयते ?, अत आह-जीयमानो न संवित्ते, किमुक्तं भवति ?-ययसी जीयमानो जानीयात्तदा तदुपायपरतया न जीयेत, यदा त्वसौ विषयव्यामोहतो न जानीते तदा जीयत एवेति किमत्र चित्रम् ? इति सूत्रार्थः ॥ समुद्रदृष्टान्तमाह जहा कुसग्गे उदयं, समुदेण समं मिणे । एवं माणुस्सगा कामा, देवकामाण अंतिए ॥२३॥ । व्याख्या-'यथा' इति दृष्टान्तोपन्यासे, कुशो-दर्भविशेषस्तस्याग्रं-कोटिः कुशाग्रं तस्मिन् 'उदक' जलं, तत्कि||मित्याह-'समुद्रेण' इति 'तात्स्थ्यात्तद्यपदेश' इतिन्यायात् समुद्रजलेन 'सम' तुल्यं 'मिनुयात्' परिच्छिन्द्यात् , तथा किमित्याह-'एवम् ' उक्तनीत्या 'मानुष्यकाः कामाः' मनुष्यसम्बन्धिनः कामा-विषयाः, मानुष्य विशेषणं | 4 तु तेषामेवोपदेशार्हत्वाद्विशिष्टभोगसम्भवाच, 'देवकामानां दिव्यभोगानाम् 'अन्तिके' समीपे, कृता इति शेषः, दूरस्थितानां हि न सम्यमवधारणमित्येवमाह, किमुक्तं भवति ?-यथाऽज्ञः कश्चित् कुशाग्रस्थितं जलबिन्दुमालोक्य समुद्रवन्मन्यते, एवं मूढाश्चकवादिमनुष्यकामान् दिव्यभोगोषमान् अध्यवस्यन्ति, तत्त्वतस्तु कुशाग्रजलविन्दोरिव समुद्रान्मनुष्यकामानां दिव्यभोगेभ्यो महदेवान्तरमिति सूत्रार्थः । उक्तमेवार्थ निगमयन्नुपदेशमाह कुसग्गमित्ता इमे कामा, सन्निरुहमि आउए । कस्स हेर्ड पुरा काउं, जोगक्षेमं न संघिदे ? ॥ २४ ॥ दीप अनुक्रम [२०१] ERESCRESS SamEducatm international Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~67 Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||२४|| नियुक्ति: [२४९...] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२८॥ प्रत सूत्रांक ||२४|| CHAR व्याख्या-कुशाग्रशब्देन कुशाग्रस्थितो जलविन्दुरुपलक्ष्यते, तन्मात्राः-तत्परिमाणाः 'इमे' इति प्रत्यक्षाः 'कामाः' औरभीप्रकृतत्वान्मनुष्यविषयाः, कदा य इत्याह-'सन्निरुद्धे' अत्यन्तसंक्षिसे, यद्वा सम्-एकीभावेन निरुद्धे-अध्यवसाना याध्य.७ दिभिरुपक्रमणकारणैरवष्टब्धे 'आयुपि' जीविते, अनेन मनुष्यायुषोऽल्पतया सोपक्रमतया वा कामानामल्पत्यमुक्तं, समृद्धवाद्यल्पतोपलक्षणं चैतद्, अस्मिंस्त्वर्थ उक्ते दिव्यकामास्तु जलधिजलतुल्या इत्यर्थागम्यते, 'कस्स हेउंति सूत्रत्वात् कं हेतु-कारणं 'पुरा काउंति तत एव पुरस्कृत्य-आश्रिय, अलब्धस्य लाभो-योगो लब्धस्य च परिपालनं ४ -क्षेमोऽनयोः समाहारो योगक्षेम, कोऽर्थः ?-अप्राप्तविशिष्टधर्मप्राप्ति प्राप्तस्य च परिपालनं 'न संवित्ते' न जानीते, जन इति शेषः, तदसंवित्तौ हि मनुष्यविषयाभिष्वङ्ग एव हेतुः, ते च धर्मप्राप्यदिव्यभोगापेक्षयैर्वप्रायाः, ततस्तत्यागतो विपयाभिलाषिणापि धर्म एव यतितव्यमित्यभिप्रायः, यद्वा-यतः कुशाग्रमात्रा-दर्भप्रान्तबदत्यल्पा इमे कामाः, तेऽपि न पल्योपमादिपरिमिती द्राधीयस्यायुपि, किन्तु 'सन्निरुद्धे' संक्षिप्ते आयुषि, ततः 'कस्स हेउंति कस्माद्धेतोः पुरस्कृत्येव पुरस्कृत्य मुख्यतयाऽङ्गीकृत्य, असंयममिति शेषः, योगक्षेमम्' उक्तरूपं न संवित्ते, भावार्थस्त्यभिहित एवेति ।। ४ सूत्राथेः॥ इत्थं दृष्टान्तपञ्चकमुक्तं, तत्र च प्रथममुरभ्रष्टान्तेन भोगानामायतायपायबहुलत्वमभिहितम् , आयती चापा-1 जयबहुलमपि यन्न तुच्छंन तत्परिहत शक्यत इति काकिण्यामफलरष्टान्ततस्तुच्छत्वं, तच्छमपि च लाभच्छेदात्मकव्य वहारविज्ञतयाऽऽयव्ययतोलनाकुशल एव हातुं शक्त इति बणिग्व्यवहारोदाहरणम् , आयव्ययतोलनाऽपि च दीप अनुक्रम [२०२] SamEducatim international For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~68~ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||२५|| नियुक्ति: [२४९...] प्रत सूत्रांक ||२५|| कथं कर्तव्येति समुद्रदृष्टान्तः, तत्र हि दिव्यकामानां समुद्रजलोपमत्वमुक्तं, तथा च तदुपार्जनं महानायोऽनुपार्जनं तु महान् व्यय इति तत्त्वतो दर्शितमेव भवति ॥ इह च योगक्षेमासंवेदने कामानिवृत्त एव भवतीति । तस्य दोषमाह इह कामानियहस्स, अत्तट्टे अवरज्झति । सुच्चा नेयाउअं मग्गं, जं भुजो परिभस्सति ॥ २५ ॥ द व्याख्या-'इह' इति मनुष्यत्वे जिनशासने वा, प्राप्त इति शेषः, कामेभ्योऽनिवृत्तः-अनुपरतः कामानिवृत्तः तस्यात्मनोऽर्थ आत्मार्थः-अर्यमानतया वर्गादिः 'अपराध्यति' अनेकार्थत्वाद्धातूनां नश्यति, यद्वा-आत्मैवाथै . आत्मार्थः स एवापराध्यति, नान्यः कश्चिदात्मव्यतिरिक्तोऽर्थः सापराधो भवति, उभयत्र दुर्गतिगमनेनेति भावः। आह-विषयवाञ्छाविरोधिनि जिनागमे सति कथं कामानिवृत्तिसम्भवः ?, उच्यते, 'श्रुत्वा' आकर्ण्य 'नैयायिक न्यायोपपन्नं 'मार्ग' सम्यग्दर्शनादिकं मुक्तिपथं यद् भूयः' पुनरपि परिनश्यति, कामानिवृत्तित इति शेषः, कोऽभि-3 प्रायः ?-जिनागमश्रवणात् कामनिवृत्तिं प्रतिपन्नोऽपि गुरुकर्मत्वात् प्रतिपतति, ये तु श्रुत्वापि तदप्रतिपन्नाः श्रवणं है 16च येषां नास्ति ते कामानिवृत्ता एवेतिभावः । यद्वा-यदसौ कामानिवृत्तः सन् श्रुत्वा नैयायिक मार्ग भूयः परिभ्र-3 श्यति-मिथ्यात्वं गच्छति तदस्यात्मार्थ एव गुरुकर्मापराध्यति, अनेन मा भूत्कस्यचिन्मूढस्य सिद्धान्तमधीत्याप्यु दीप अनुक्रम [२०३] medication Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~69~ Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [७], मूलं [-1 / गाथा ||२६|| नियुक्ति: [२४९...] प्रत सूत्रांक ||२६|| उत्तराध्य.त्पथस्थितान् विलोक्य सिद्धान्त एव दोष इति तदनपराधित्वमुक्तं, पठ्यते च-पत्तो णेयाउयति स्पष्टमिति | औरची सूत्रार्थः ॥ यस्तु कामेभ्यो निवृत्तस्तस्य गुणमाहबृहद्वृत्तिः याध्य. इह कामा नियहस्स, अत्तढे नावरज्झति । पूतिदेहनिरोहेणं, भवे देवेत्ति मे सुयं ॥ २६ ॥ ॥२८॥ व्याख्या-इह कामेभ्यो निवृत्तः कामनिवृत्तः तस्यात्मार्थः-खर्गादिः 'नापराध्यति' न भ्रश्यति, आत्मलक्षणो वाऽर्थो | न सापराधो भवति, किं पुनरेवं ?, यतः-पूतिः-कुथितो देहः-अर्थादौदारिकं शरीरं तस्य निरोधः-अभाषः पूतिदेहनिरोधः तेन 'भवेत् ' स्यात् , प्रकृतत्वात् कामनिवृत्तो 'देवः' सौधर्मादिनिवासी सुरः, उपलक्षणत्वात् सिद्धो वा, 'इती'त्येतत् मया 'श्रुतम्' आकर्णितं, परमगुरुभ्य इति गम्यते, अनेन खर्गाद्यवाप्तिः आत्मार्थानपराधे निमित्तमुक्तमिति सूत्रार्थः ॥ ततश्च यदसावाप्नोति तदाह इही जुती जसो वन्नो, आउं सुहमणुत्तरे । भुजो जत्थ मणुस्सेसुं, तत्थ से उववजति ॥२७॥ व्याख्या-'ऋद्धिः कनकादिसमुदायः 'द्युतिः' शरीरकान्तिः 'यशः' पराक्रमकृता प्रसिद्धिः 'वर्णः' गाम्भीर्यादिगुणैः श्लाघा गौरादि 'आयुः जीवितं 'सखं' यथेप्सितं विषया(अन्धाग्रम ७०००)वातावाल्हादः, न विद्यते उत्तरं ४-प्रधानमस्मादित्यनुत्तरम्, इदं च सर्वत्र योज्यते, 'भूयः' पुनः देवभवापेक्षमेतत. तत्रापि घनत्तराण्येवैतान्यस्य सम्भ-I दवन्ति यत्र येषु 'मनुष्येषु' मनुजेषु 'तत्र' तेषु 'सेति सोऽयशब्दार्थोवा, ततोऽनन्तरम् 'उत्पद्यते' जायत इति सूत्रायः॥ दीप अनुक्रम [२०४] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~70 Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२८ -३०|| दीप अनुक्रम [२०६ -२०८] उत्तराध्य बृहद्वृत्तिः [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [७], मूलं [-] / गाथा || २८-३०|| निर्युक्तिः [२४९...] एवं कामानिवृत्त्या यस्यात्मार्थोऽपराध्यति स वालः इतरस्तु पण्डित इत्यर्थादुक्तम् ॥ सम्प्रति पुनरनयोरेव साक्षात्स्वरूपं फलं चोपदर्शयन्नुपदेशमाह - बालस्स परस बालसं, अहम्मं पडिवजिआ । चिश्चा धम्मं अहम्मिट्टे, नरएसृववज्जइ ॥ २८ ॥ धीरस्स परस धीरतं सव्वधम्माणुवत्तिणो । चिया अधम्मं धम्मिट्टे, देवेसु उबवजह ॥ २९ ॥ तुलिआण बालभाव, अवालं चैव पंडिए । चऊण बालभावं, अबालं सेवए मुणी ॥ ३० ॥ सिबेमि ॥ व्याख्या- 'बालस्य' अज्ञस्य 'पश्य' अवधारय 'बालत्वम् ' अज्ञत्वं, किं तदित्याह - 'अधर्म' धर्मविपक्षं विषयासक्तिरूपं 'प्रतिपद्य' अभ्युपगम्य, पठ्यते च - 'पडिवजिणो' त्ति प्रतिपादिनोऽवश्यंप्रतिपद्यमानस्य त्यक्त्या' अपहाय 'धर्म' विषयनिवृत्तिरूपं सदाचारं 'अहमिट्ठेति प्राग्वत् 'नरके' सीमन्तकादावुपलक्षणत्वात् अन्यत्र वा दुर्गतावुत्पद्यते ॥ तथा धीः बुद्धिस्तया राजत इति धीरः- धीमान् परषहाद्यक्षोभ्यो वा धीरः तस्य 'पश्य' प्रेक्षस्व 'धीरत्वं' धीरभावं, सर्व धर्म क्षान्त्यादिरूपमनुवर्तते तदनुकूलाचारतया स्वीकुरुत इत्येवंशीलो यस्तस्य सर्वधर्मानुवर्तिनः, धीरत्वमेवाह- ' त्यक्त्वा' हित्वा अधर्म-विषयाभिरतिरूपमसदाचारं 'धम्मिट्ठेति इष्टधर्म्मा, यदिवा-अतिश येन धर्मवानिति, इष्टनि “विन्मतोर्तुगि” (पा० ५-३-६५ ) ति मतुलोपे धर्मिष्ठ इति देवेषूपपद्यत इत्याह || यतश्चैवमतो यद्विधेयं तदाह - 'तोलयित्वा' इति प्राग्वत् 'वाभाव' वात्वम् 'अवाल'ति भावप्रधानत्वान्निर्देशस्यावालत्वं धीरत्वं, 'चः' समुच्चये, एवेति प्राकृतत्वादनुखारलोपः 'एवम्' अनन्तरोक्तप्रकारेण 'पण्डितः' बुद्धिमान् त्यक्त्वा 'बालभावं' बालत्वम् 'अवाले'ति अवालत्वं 'सेवते' अनुतिष्ठति 'मुनिः' यतिरिति सूत्रत्रयार्थः ॥ 'इतिः' परिसमाप्तौ त्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, तेऽपि प्राग्यदेवेति सूत्रार्थः ॥ इति श्रीशान्याचार्य| विरचितायामुत्तराध्ययनटीकायामुरश्रीयमध्ययनं समाप्तम् ॥ ॥ औरश्री याध्य. ७ पज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मनि दीपरत्नसागरेण संकलित आगमसत्र 231 मलसत्र ५] उत्तराध्ययनानि मलं एवं शान्तिसरिविरचिता वत्तिः अत्र अध्ययनं ७ परिसमाप्तं ~71~ Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||३०...|| नियुक्ति: [२५०] प्रत सूत्रांक ||३०|| ॥ व्याख्यातं उरत्रीयाख्यं सप्तममध्ययनं, सम्प्रत्यष्टममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययने रसगृद्धे-& भरपायवहुलत्वमभिधाय तत्त्याग उक्तः, स च निर्लोभस्यैव भवतीति इह निर्लोभत्वमुच्यते, इत्यनेन सम्बन्धेनाया तस्यास्याध्ययनस्यानुयोगद्वारचर्चा प्राग्वद् यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे कापिलीयमिति नाम, अतः कपिलनिक्षेपमाहनिक्खेवो कविलंमी चउबिहो दुविहो य दवंमि । आगमनोआगमओ नोआगमओ य सो तिविहो २५०४ व्याख्या-'निक्षेपः' न्यासः 'कपिले कपिलविषयः 'चतुर्विधः' चतुष्प्रकारो नामस्थापनाद्रव्यभावभेदात् , तत्राये| प्रतीते, 'द्विविधः' द्विभेदो भवति 'द्रव्य' इति द्रव्यविषयः, द्वैविध्यमेवाह--आगमतो नोआगमतः, तत्रागमतो. जाताऽनुपयुक्तो नोआगमतश्च स 'त्रिविधः' त्रिभेद इति गाथार्थः ॥ त्रैविध्यमेवाहजाणगसरीरभविए तबतिरित्ते य सो पुणो तिविहो। एगभविअवद्धाउअ अभिमुहओनामगोए अ २५१/४ | व्याख्या-कपिलशब्दार्थज्ञशरीरं पश्चात्कृतपर्यायं ज्ञशरीरमित्युच्यते, तदेव द्रव्यकपिलो, 'भविय'त्ति भव्यशरीरं. पुरस्कृतकपिलशब्दार्थज्ञतात्मकपर्यायं द्रव्यकपिलः, तयतिरिक्तश्च, स तद्यतिरिक्तद्रव्यकपिलः पुनः 'त्रिविधः' त्रिभे४दः, त्रैविध्यमेवाह-एकमविको बद्धायुकोऽभिमुखनामगोत्रश्चेति गाथार्थः ॥ भावकपिलमाह कविलाउणामगोयं वेयंतो भावओ भवे कविलो। तत्तो समुट्टियमिणं अज्झयणं काविलिजंति ॥ २५२ ॥ दीप अनुक्रम [२०८] Dimtoucatmal पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं -८ "कापिलीय" आरभ्यते ~72 Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||३०|| दीप अनुक्रम [२०८] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२८६ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्तिः [२५२] अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||३०...|| व्याख्या - कपिलायुर्नामगोत्रं 'वेदयन् ' अनुभवन् 'भावतः ' भावमाश्रित्य भवेत् कपिलः, 'ततः' तस्मात् समुस्थितम् 'इदं' प्रस्तुतम् अध्ययनं 'काविलिजं त्ति कापिलीयमिति, उच्यत इति शेष इति गाथार्थः ॥ कथं पुनरिदं | कपिलात्समुत्थितमित्याह कोसंबी कासवजसा कविलो सावत्थि इंददत्तो य । इब्भे य सालिभद्दे धणसिट्टि पसेणई राया ॥ २५३ ॥ कविलो निश्चियपरिवेसिआइ आहारमित्तसंतुट्टे । वावारिओ (य) दुहि मासेहिं सो निग्गओ रतिं ॥२५४॥ दक्खिपणे पत्थंतो बद्धो अ तओ अ अप्पिओ रण्णो । राया से देइ वरं किं देमी केण ते अत्थो ? ॥२५५॥ जहा लाहो तहा लोहो, लाहा लोहो पवडति । दोमासकयं कज्जं, कोडिएवि न निट्ठियं ॥ २५६ ॥ कोडिंपि देमि अज्जेत्ति भणइ राया पहिट्ठमुहवण्णो सोऽवि चइऊण कोडिं समणो जाओ समिअपावो२५७ छम्मासे छउमत्थो अट्ठारस जोयणाइ रायगिहे । बलभद्दप्पमुहाणं इकडदासाण पंचयमे ॥ २५८ ॥ अइसेसे उप्पपणे होही अट्टो इमोति नाऊणं । अद्धाणगमणचित्तं करेइ धम्मट्टया गीयं ॥ २५९ ॥ आसामक्षरार्थः सुगम एवं, नवरं 'निचियपरिवेसियाए'ति नैत्यिकपरिवेषिकया-प्रतिदिननियुक्तभक्ताच्या वावारितो'त्ति व्यापारितो- नियुक्तः 'दुहिं मासेहिं'ति द्वाभ्यां मापकाभ्यां, “तादर्थ्ये चतुर्थी" (वार्त्तिकम्) 'दक्खि ocatum intemation For Pet & Prate Use Over कापिली याध्य. ८ ~73~ ॥२८६ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||३०...|| नियुक्ति: [२५३-२५९] (४३) प्रत सूत्रांक ||३०|| पण'ति प्राकृतत्वादक्षिणां 'पहट्टमुहवण्ण'त्ति प्रहृष्टः-प्रहर्षवान् मुखवर्णो-मुखच्छाया यस्य स तथा, मुखस्य प्रहृष्ट-2 दत्वादुपचारात्तद्वपर्णोऽपि प्रहृष्ट उक्तः, यद्वा प्रहृष्टमुखस्येव मुखवणो यस्य स तथा, मयूरव्यंसकादित्वात् समासः, मानसत्वाच हर्षादीनां मुखस्यापि प्रहृष्टत्वं रूढित इति भावनीयम् । 'इक्डदासाणंति इक्कडदासजातीनाम् 'अतिशेषे' अतिशये 'होही अटो इमोत्ति भविष्यति अर्थ:-प्रयोजनम् 'अयं' पूर्वसङ्गतिकचौरशतपञ्चकप्रतिबोधलक्षण द इति ज्ञात्वा च 'अद्धाणगमणचित्तंति अध्वा-मार्गस्तद्गमने चित्तम्-अभिप्रायोऽध्वगमनचित्तं तत्करोतीव करोति, तत्त्वतो हि केवलित्वेनामनस्कत्वान्न तस्याभिप्रायकरणसम्भवः, 'धम्मट्टय'ति आपत्वाद्धर्मार्थ-तत्त्वावबोधतस्तेषां धर्मः स्थादित्येवमथै 'गीय'ति चस्य गम्यमानत्वाद्गीतं च-खरग्रामानुगतगीतिकानिवद्धमिदमेवाध्ययनं करोतीति योगः, वर्तमाननिर्देशस्तु सूत्रस्य त्रिकालगोचरतामाह, यदिवा-'गीत'मिति खराद्यनुगमनेन शब्दितमिदमिति गम्यते । भावार्थः कथानकादवसेयः, तत्र च सम्प्रदायः| तेणं कालेणं तेणं समएणं कोसंबीए णयरीए जितसत्तू राया, कासवो बंभणो चोदसविज्जाठाणपारगो, रायणो बहुमतो, वित्ती से उवकप्पिया, तस्स जसा णाम भारिया, तेसिं पुत्तो कविलो णाम, कासवो तंमि कविले खुड १ तस्मिन् काले तस्मिन् समये कौशाम्ब्यां नगर्या जितशत्रू राजा, काश्यपो ब्राह्मणः चतुर्दशविद्यास्थानपारगः, राज्ञो बहुमतः, वृत्तिस्तस्मै उपकल्पिता, तस्व यशा नाम भार्या, तयोः पुत्रः कपिलो नाम, काश्यपस्तस्मिन् कपिले क्षुल्लक दीप अनुक्रम [२०८] Sam Editainidinama Far F r ont पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~74 Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||३०...|| नियुक्ति: [२५३-२५९] (४३) प्रत सूत्रांक ||३०|| उत्तराध्य. लिए चेव कालगतो, ताघे तंमि मए तं पयं रायणा अण्णस्स मरुयगस्स दिण्णं, सोय आसेण छत्तेण य धरिजमा- कापिलीबृहद्धृत्तिः पण बघह, तं दळूण जसा परुण्णा, कविलेण पुच्छिया, ताए सिटुं-जहा पिया ते एवंविहाए इड्डीए णिगच्छियाइओ, याध्य. तेण भण्णति-कथं १, सा भणति-जेण सो विजासंपण्णो, सो भणइ-अहंपि अहिज्जामि, सा भणइ-इहं तुम ॥२८७॥ मच्छरेण ण कोइ सिक्खवेति, वच्च सावत्थीए नयरीए पिइमित्तो इंददत्तो णाम माहणो सो ते सिक्खायेहित्ति । सो गतो तस्स सगासं, तेण पुच्छितो-कओऽसि तुमं?, तेण जहावत्तं कहियं, सो तस्स सगासे अहि जिउं पयत्तो। तत्थ सालिभद्दो णाम इभो, सो से तेण उवज्झाएणणेवतियं दवावितो, सो तत्थ जिमितो २ अहिजइ, दासचेडी 3 दय तं परिवेसेइ । सो य हसणसीलो तीए सद्धिं संपलग्यो, तीए भण्णइ-तुमे मे पीतो, ण य ते किंचिवि, णवरि मा ४ १एव कालगतः, तदा तस्मिन् मृते तत्पदं राज्ञाऽन्यस्मै मरुकाय (ब्राहाणाय) दत्तं, स चाश्वेन छत्रेण च प्रियमाणेन ब्रजति, तं दृष्ट्वा | सायशाः प्ररुदिता, कपिलेन पृष्टा, तया शिष्टु-यथा पिता तबैवंविधया ऋङ्ख्या निर्गतवान , तेन भण्यते-कथम् ?, सा भणति-येन स || विद्यासंपन्नः, स भणति-अहमप्यधीये, सा भणति-इह त्वां मत्सरेण न कोऽपि शिक्षयति, ब्रज श्रावस्त्यां नगर्या पितृमित्रमिन्द्रदत्तो नाम ब्राह्मणः स त्वां शिक्षयिष्यतीति । स गतस्तत्सकाश, तेन पृष्टः-कुतोऽसि त्वं ?, तेन यथावृत्तं कथितं, स तत्सकाशेऽध्येतुं प्रवृत्तः । तत्र |॥२८॥ शालिभद्रो नाम इभ्यः, अथ स तेन उपाध्यायेन नैयिकं दापितः, स तत्र जिमितो २ऽभ्येति, दासचेटी च तं परिवेषयति । स च हसनशीलस्तया सार्ध संप्रलनः, तया भण्यते-वं मे प्रियः, न च तव किञ्चिदपि, नवरं मा दीप अनुक्रम [२०८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~75 Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||३०...|| नियुक्ति: [२५३-२५९] प्रत सूत्रांक ||३०|| रुसिंजासि, पोत्तमुल्लणिमित्तं अहमण्णेहिं २ समं अच्छामि, इयरहाहं तुज्झ आणाभोजा । अण्णया दासीण महो दुक्का सा तेण समं णिविण्णिया, णिहं सा न लहइ, तेण पुच्छिया-कतो ते अरती , तीए भण्णति-दासीमहो उयद्वितो, ममं पत्तपुप्फाइमोलं णस्थि, सहीजणमज्झे विगुप्पिस्सं, ताहे सो अधिर्ति पगतो, ताए भण्णति-मा अद्विति करेहि, एत्थ धणोणाम सिट्ठी, अप्पभाए चेव जे णं पढमं वद्धावेइ से दो सुषण्णए मासए देइ, तत्थिमं | गंतूण तं वद्धावेहि, आमंति तेण भणियं । तीए लोभेण मा अण्णो गच्छिहित्ति अतिपभाए पेसितो, वच्चंतो य. आरक्खियपुरिसेहिं गहितो बद्धो य । ततो पभाए पसेणइस्स रणो उवणीतो, राइणा पुच्छितो, तेण सम्भा। यो कहितो, रायणा भणितो-जं मग्गसि तं देमि, सो भणति-विचिंतिउं मग्गामि, रायणा तहत्ति भणिए असो | १ रूपः, पोतमूल्यनिमित्तमहमन्यैरन्यैः समं तिष्ठामि, इतरथाऽहं तवाज्ञाभोया । अन्यदा दासीनां महो ढोकते, सा तेन समं निर्विआण्णा, निद्रा सा न लभते, तेन पृष्टा-कुतस्तेऽरतिः ?, तया भण्यते-दासीमह उपस्थितः, मम पत्रपुष्पादिमूल्यं नास्ति, सखीजनमध्ये विजु गुप्स्ये, तदा सोऽधृति प्रगतः, तया भण्वते-माऽधृति कार्षीः, अत्र धनो नाम श्रेष्ठी, अतिप्रभात एव यः एनं प्रथमं वर्धयति तस्मै द्वौ सुवर्णमाषकौ ददाति, तत्रेमं गत्वा त्वं वर्धापय, ओमिति तेन भणितं । क्या लोभेन माऽन्यो गम इत्यतिप्रभाते प्रेषितः, ब्रजंञ्चारक्षकपुरुषैहीतो बद्धश्च । ततः प्रभाते प्रसेनजितो राज्ञः उपनीतः, राज्ञा पृष्टः, तेन सद्भावः कथितः, राज्ञा भगितः-यन्मार्गयसि तदामि, स भणतिविचिन्त्य मार्गवामि, राज्ञा तथेति भणिते अशो दीप अनुक्रम [२०८] - - - SamEducatomotamatunt For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~76 Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||३०...|| नियुक्ति: [२५३-२५९] प्रत सूत्रांक ||३०|| उत्तराध्य. गणियाए चिंतेउमारद्धो-किं दोहिं मासेहिं साडिगाभरणे पडिवासिगा जाणवाहणाउजाणोवभोगा मम वयस्साणं - कापिलीपञ्चागयाण घरंभज्जाचउट्ठयं जंचण्णं उवउजं?, एवं जाव कोडीएविण ठाएति।चिंतंतो सुहज्झवसाणो संवेगमावण्णो । दयाध्य.८ वृहद्वात्तः जाई सरिऊण सर्यबुद्धो सयमेव लोयं काऊण देवयादिण्णगहियायारभंडगो आगतो रायसगासं, रायणा भण्णति॥२८॥ किं चिंतियं, सो भणति-जहा लाभो तहा लोभों' कण्ठ्यः, राया भणति-कोडिपि देमि अज्जोत्ति भणति राया | पहट्टमुहवण्णो । सोऽवि चइऊण कोडिं जातो समणो समियपावो ॥१॥ छम्मासा छउमत्थो आसि । इत्तो य रायगिहस्स नयरस्स अंतरा अट्ठारसजोयणाए अडवीए बलभद्दपामोक्खा इकडदासा णाम पंच चोरसया अच्छंति, णाणेण | जाणियं-जहा ते संबुझिस्संति, ततो पट्टितो संपत्तो य तं पएसं, सोहिएण (साहिएण)य दिवो कोवि एतिति आस १० कवनिकायां चिन्तयितुमारब्धः-किं द्वाभ्यां मासाभ्यां शाटिकाभरणे प्रतिवेशिका यानवाहनातोद्यानामुपभोगा (नानि उद्यानोपभोगाः) मम वयस्याना पर्वागतानां गृहं भार्योपकरणं यच्चान्यत् उपयोग्यम् , एवं यावत् कोट्याऽपि न तिष्ठति । चिन्तयन शुभाध्यवसानः संवेगमापनो जाति स्मृत्वा स्वयंबुद्धो लोचं स्वयमेव कृत्वा देवतादत्तगृहीताचारभाण्डक आगतो राजसकाश, राज्ञा भण्यते-कि चिन्तितम् । सभणति-यथा लाभस्तथा लोभः (लाभाहोभः प्रवर्धते । द्विमासकनकेनार्थः कोट्यान निवर्त्तते ॥ १॥)। राजा भणति-कोटीमपि ॥२८॥ Xददामि आये इति भणति राजा प्रमुखवर्णः । सोऽपि त्यक्त्वा कोटी जातः अमणः शमितपापः ॥१॥ पण्मासान् छद्मसभाला । इतश्च राजगृहस नगरस्य अन्तरा ( अवकाशे) अष्टादशयोजनायामटव्यां बलभद्रप्रमुखा इकटदासा नाम पञ्च चौरशतानि तिष्ठन्ति, ज्ञानेन | हात-यथा ते संभोत्स्यन्ते, ततः प्रस्थितः संप्राप्तश्च तं प्रदेश, शोधितेन (शोधकेन ) च दृष्टः कोऽप्येतील्यास दीप अनुक्रम [२०८] SamEducatmimamational FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~77 Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१|| दीप अनुक्रम [२०९] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || १ || निर्युक्ति: [२५३-२५९] अध्ययनं [८], णीभूतो नाओ जहा समणगोत्ति, अम्हं परिभविउं आगच्छति, रोसेण व गहितो सेणावइसमीवं णीतो, तेण भण्णति -मुयह एयंति, ते भांति खेलामो एतेणंति, तेहिं भण्णति-नच्चसु समणगोत्ति, सो भणइ-वायंतगो णत्थि, ताहे ताणवि पंचवि चोरस्याणि ताले कुट्टेति सोऽवि गायति ध्रुवगं, "अधुवे असासयंमी, संसारंमि दुक्खपउराए । किं णाम तं होज कम्मयं ? जेणाहं दुग्गई ण गच्छेजा ॥ १ ॥ एवं सवत्थ सिलोगन्तरे धुवगं गायति 'अधुवेत्यादि,' | तत्थ केइ पढमसिलोगे संबुद्धा, केइ बीए, एवं जाव पंचवि सया संबुद्धा पञ्चतियत्ति । इत्यभिहितः सम्प्रदायोऽवसितश्च नामनिष्पन्नो निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमेऽस्खलितादिगुणोपेतं सूत्रमुचारणीयं तचेदम् अधुवे असासयंमि संसारंमि दुक्खपउराए । किं नाम होज तं कम्मयं जेणाहं दुग्गई न गच्छेजा ॥ १ ॥ व्याख्या -- स हि भगवान् कपिलनामा खयंबुद्धचौरसङ्घातसम्बोधनायेमं ध्रुबकं सङ्गीतवान्, ध्रुवकलक्षणं चेदम्१० श्रीभूतः, ज्ञातो यथा अमणक इति, अस्मान् पराभवितुमागच्छति, रोपेण च गृहीतः सेनापतिसमीपं नीतः तेन भण्यते-मुश्चैनमिति, से भगन्ति-क्रीडाम एतेनेति, तैर्भण्यते नृत्य श्रमणकेति, स भणति-वादको नाखि, तदा तान्यपि पञ्चापि चौरशतानि तालान् कुट्टय न्ति, सोऽपि गायति ध्रुवकम् - अधुवे अशाश्वते संसारे प्रचुरदुःखे । किं नाम तद्भवेत्कर्म ? येनाहं दुर्गतिं न गच्छेयम् ॥ १॥ एवं सर्वत्र लोकान्तरे भुवकं गायति अधुवेत्यादि, तत्र केचित् प्रथमलोके संबुद्धाः केचिद्वितीये, एवं यावत्पश्चापि शतानि संबुद्धानि प्रब्रजिताः इति । Jan Education international For Parsons Private Onl janor पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~78~ Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति : [२५९...] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२८॥ प्रत सूत्रांक ||१|| CCT- 2 'जं गिजइ पुर्व चिय पुण पुणो सबकववंधेसु । धुवयंति तमिह तिविहं छप्पायं चउपयं दुपयं ॥१॥" तत्र ध्रुवो-या कापिलीएकास्पदप्रतिबद्धो न तथाऽध्रुवः तस्मिन् , संसार इति सम्बन्धः, भ्रमन्ति ह्यस्मिन् अनेकेषु उच्चावचस्थानेषु जन्तयः, तेषां । याध्य.८ कचिदनुत्पन्नपूर्वत्वाभावाद्, उक्तं च वाचकैः-"रङ्गभूमिन सा काचिच्छुद्धा जगति वर्तते । विचित्रैः कर्मनेपथ्र्ययंत्र, सत्त्वेने नाटितम् ॥१॥" इति, शाश्वतं-नित्यम् अविद्यमानं शाश्वतमस्मिन्निति अशाश्वतस्तस्मिन् , संसार एव, अशाश्वतं हि सकलमिह राज्यादि, तथा च हारिलवाचकः-'च लंराज्यैश्चर्य धनकनकसारः परिजनो, नृपाद्वालुभ्यं च चलममरसौख्यं च विपुलम् । चलं रूपाऽऽरोग्यं चलमिह चरं जीवितमिद, जनो दृष्टो यो वै जनयति सुखं सोऽपि साहि चलः ॥१॥" यद्वा-ध्रुवो-नियो न तथाऽभुवस्तस्मिन् , एवं च कियकालावस्थायित्वमप्याश येत अत आह-15 शश्चद्भवनाच्छाश्वतः न तयाऽशाश्चतस्तस्मिन् , शथद्भबने हि बादिक्षणावस्थितिरपि सम्भवेत् , तन्निषधे तु तस्या अपि निषेधात्पर्यायार्थतया तडित्सम्पातवत् क्षणमात्रावस्थायिनीत्युक्तं भवति, एका वा पदद्वयम् , उपदेशत्वादतिशयख्यापकत्वाचन पौनरुक्त्वं, क पुनः ईदृशि ?-संसरन्यस्मिन् कर्मवशवर्तिनो जन्तव इति संसारस्तस्मिन् , 'दुक्खपउराए'त्ति प्रचुराण्येव प्रचुरकाणि-प्रभूतानि दुःखानि शारीरमानसानि यस्मिन् स तथा तस्मिन् ,प्राकृतत्वाच सूत्रे एवं ॥२८॥ निर्देशः, यद्वा दुःखानां प्रचुरः आयो-लाभो यस्मिन् स तथा तस्मिन, 'कि'भिति प्रश्ने? 'नामेति संभावनायां वाक्यालङ्कारे । १ यद्गीयते पूर्वमेव पुनः पुनः सर्वकाव्यबन्धेषु । धुवकमिति तदिह विविध पद्रुपदं चतुष्पदं द्विपदं (च)॥१॥ दीप अनुक्रम [२०९] % 018 SamEducatonintamasana arjunothianarm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~79 Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||२|| नियुक्ति: [२५९...] प्रत सूत्रांक ||२|| या भवेत् ' स्यात् तत् क्रियत इति कर्म तदेव कर्मकम्-अनुठान, यत् कीदगियाह-येन कर्मणा हेतौ (पा०२-३ २३) तृतीया' अहमित्यात्मानं निर्दिशति, 'दुर्गति' नरकादिकां 'ण गच्छेज'ति न गच्छेयं-न यायां, पठन्ति च-जे णाचं दुग्गई तो मुचेजत्ति सुगमम् , अत्र भगवतश्छित्रसंशयत्वेऽपि मुक्तिगामितया दुर्गत्यसत्त्वेऽपि च प्रतियोध्या ४. पूर्वसङ्गतिकापेक्षमित्वमभिवानं, नागार्जुनीयास्तुप्रथमपदमेवं पठन्ति-'अधुमि मोहगहणए' तत्र मुद्यतेऽनेन जान नपि जन्तुरिति मोहो-दर्शनमोहनीपादिः तेन गहनो-गुपिलो मोहगहनः स एव मोहगहनास्तस्मिन्निति सूत्रार्थः ॥ एवं च भगवतोद्गीते तेऽप्येनमेव ध्रुवकं प्रत्युद्गायन्ति तालं च कुट्टयन्ति, तैश्च प्रत्युद्गीते भगवानाहविजहित्तु पुव्वसंजोगं न सिणेहं कहिंचि कुग्विजा । असिणेह सिणेहकरेहिं दोसपउसेहि मुच्चई भिक्खू ॥२॥ 6 व्याख्या-'विहाय' विशेषेण-तदननुस्मरणाद्यात्मकेन हित्वा-यक्त्वा, कमित्याह-पुरा परिचिता मातृपित्रादयः | A पूर्वशब्देनोचन्ते तत तैः, उपलक्षगत्वादन्यैश्व खजनधनादिभिः संयोगः-सम्बन्धः पूर्वसंयोगतं, ततः किमित्याह न'नेहम् ' अभिषकं कचिद्वाऽभ्यन्तरे वा वस्तुनि 'कुविज'त्ति कुति, तथा च को गुण इत्याह-असिणेह'त्ति प्राकृतत्वाद्विसर्जनीलोपेऽलेहः-अविद्यमानप्रतिवन्धः, 'सिणेहकरेहिति सुन्यत्ययादपेर्गम्यमानत्वाञ्च स्नेहकरेवपि दी-नेहकरणशीलेपपिपुत्रकलत्रादिषु, आस्तामन्येष्वित्यपिशब्दार्थः, 'दोषपदैः' अपराधस्थानः 'मुच्यते'त्यज्यते, किमुक्त। भवति-निरतिचारचारित्रो भवति, अनुक्तनेहो हि कलवाद्यभिषङ्गात् दोषपदमतिचाररूपमाप्नुयाद्, 'भिक्षु दीप अनुक्रम [२१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~80 Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||३|| नियुक्ति: [२५९...] (४३) कापिली बृहद्वृत्तिः याध्य.८ प्रत सूत्रांक ||३|| उत्तराध्य- रिति साधुः, पाठान्तरतश्च 'दोषप्रदोषैः तत्र दोषैः-इहैव मनस्तापादिभिः प्रदोषैश्च-परत्र नरकगत्यादिभिरिति सूत्रार्थः ॥ पुनर्यदसौ कृतवांस्तदाह तो नाणदंसणसमग्गो हियनिस्सेसाए य सब्यजीवाणं । तेसिं विमोक्खणढाएँ भासइ मुणिवरो विगयमोहो ३ । ॥२९०॥ व्याख्या-'तो'त्ति ततोऽनन्तरं, भाषते मुनिवर इति सम्बन्धः, स च कीरग ?-ज्ञायतेऽनेन विशेषात्मना वस्त्यिति । ज्ञानं, दृश्यतेऽनेन सामान्यरूपेण वस्त्विति दर्शनं, ताभ्यां प्रस्तावात् केवलाभ्यां समग्रः-समन्वितः, यदिवा प्राकृत४त्वात्समग्रे-परिपूर्ण ज्ञानदर्शने यस्थासौ समग्रज्ञानदर्शनः, किमर्थमसौ भापत इत्याह-हियणिस्सेसाए' इति सूत्रत्वात् हितः-पथ्यो भावाऽऽरोग्यहेतुत्वात् निःश्रेयसो-मोक्षः, हितश्चासौ निःश्रेयसश्च हितनिःश्रेयसस्तस्मै, यहा प्राकृतत्वादेव निश्शेष-समस्तं हितं-सम्यग्ज्ञानादि, तस्यैव तत्त्वतो हितत्वात् , ततो निश्शेषं च तद्धितं च निश्शेषहितं । तस्मै, कथं नाम निश्शेषहितावाप्तिः स्यादिति, चशब्दो भिन्नक्रमः, तेषामित्यत्र योज्यते, केषाम् ?-'सर्वजीवानाम् ' अशेषप्राणिनां तेषां' च पञ्चशतसङ्ख्यचौराणां विमोक्षणम्-अष्टविधकर्मणः पृथक्करणं तदेवार्थः-प्रयोजनं ६ विमोक्षणार्थस्तस्मै-तनिमित्तं, भापते इति वर्तमाननिर्देशः प्राग्वत् , यद्वा-'भवति स नामातीतः प्राप्तो यो नाम वर्तमानत्व'मितिवचनात् तस्यापि तदा वर्तमानतैवेति तत्कालत्वस्य विवक्षितत्वान्न दोपः, 'मुनिवरः' मुनिप्रधान, विगतो-विनष्टो मोहो यस्य यस्माद्वा स तारक । इह च विगतमोहवचनेन चारित्रमोहनीयाभावतो यथाख्यात दीप अनुक्रम [२११] SamEducatimotimatent For Pro vपूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~81~ Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||४|| नियुक्ति : [२५९...] प्रत सूत्रांक TABASSADORE ||४|| चारित्रमुकं । ननु 'हियणिस्सेसाए य सजीवाणीन्युक्तौ तेर्सि विमोक्खणट्ठाऐं इत्यतिरिच्यते, न, तानेवोद्दिश्यास्य भगवतः प्रवृत्तिरिति प्रधानत्वात् पुनस्त द्विमोक्षणार्थताऽभिधानं, दृश्यते हि-'ब्राह्मणा आयाता वशिष्ठोऽप्यायात इति सामान्योक्तावपि पुनः प्रधानस्याभिधानमिति सूत्रार्थः ॥ यदसी भाषते तदाह-. सवं गंथं कलहं च विप्पजहे तहाविहं भिक्खू । सब्वेसु कामजाएसु पासमाणोन लिप्पई ताई ॥४॥ व्याख्या-'सर्वम्' अशेष 'ग्रन्थं बाह्यमाभ्यन्तरंच, तत्र बाह्यं धनादि, आभ्यन्तरं मिथ्यात्वादि, कलहहेतुत्वा. कलह:-क्रोधस्तं, चशब्दान्मानादीच, अभ्यन्तरग्रन्थरूपत्वेऽपि चैषां पृथगुपादानं बहुदोषख्यापनार्थ, 'विप्पजहे ति* | विप्रजह्यात्-परित्यजेत् 'तथाविध मिति कर्मवन्धहेत, न तु धर्मोपकरणमपीत्यभिप्रायः, पाठान्तरतश्च-तथा-12 विधो, 'भिक्षुः' यतिस्तस्यैवविधधर्माहत्वादेवमभिधानम् , अन्योक्त्या या त एवैवमुच्यन्ते, ततश्च किं स्यादित्याह-'सर्वेषु' अशेषेषु 'कामजातेपु' मनोज्ञशब्दादीनां प्रकारेषु समूहेषु वा 'पासमाणो'त्ति पश्यन् प्रेक्षमाणो, विपाककटुकात्मकं तद्विषयं दोषमिति गम्यते, न लिप्यते' कर्मणा नोपदिह्यते, कामदोषज्ञस्य तेषु प्रायः प्रवृत्तेरभा| वादिति भावः, तायते त्रायते वा रक्षति दुर्गतरात्मानम् एकेन्द्रियादिप्राणिनो वाऽवश्यमिति तायी त्रायी वेतिर | सूत्रार्थः । इत्थं ग्रन्थत्यागिनो गुणमभिधाय व्यतिरेके दोषमाहभोगामिसदोसविसन्ने हियनिस्सेयसबुद्धिवोच्चत्थे । बाले य मंदिए मूढे वजमा मच्छिया व खेल मि ॥५॥ १ विपज्जत्थे प्र० दीप अनुक्रम [२१२] For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~82 Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||५|| नियुक्ति: [२५९...] उत्तराध्य. कापिली बृहदृत्तिः | याध्य.८ ॥२९॥ प्रत सूत्रांक ||५|| व्याख्या-भुज्यन्त इति भोगा:-मनोज्ञाः शब्दादयः ते च ते आमिषं चात्यन्तगृद्धिहेतुतया भोगामिषं तदेव दूपयत्यात्मानं दुःख लक्षणविकारकरणे न भोगामिपदोपस्तस्मिन् विशेषेण सन्नो-निमग्नो भोगामिपदोपविषण्णः, यद्वा-1 भोगामिपस्य दोषा भोगामिपदोषाः ते च तदासक्तस्य विचित्रक्लेशा अपयोत्पत्ती च तत्पालनोपायपरतया व्याकुलवादयस्तैपिण्णो-विपादं गतो भोगामिपदोपविषण्णः, आह च-"जया य कुटुंबस्ता, कुततीहि विहम्मद । हत्थीव बंधणे बद्धो, स पच्छा परितप्पद ॥१॥ पुत्तदारपरिविण्गो, मोहसंताणसंतता । पंकोसण्गो जहा णागो, स पच्छा परितप्पति ॥ २॥"ति। 'हियणिस्सेसबुद्धियोचत्धे'त्ति हितः-एकान्तपथ्यो निःश्रेषसो-मोशः अनयोः कमेधारये हितनिःश्रेयसः, यद्वा हितो-यथाभिलाषितविषयावास्याऽभ्युदयः निःश्रेयसः स एव तयोर्द्वन्द्वः, ततश्च तत्र तयोवा 'बुद्धिः' तत्प्राप्युपायविषया मतिः तस्यां विपर्ययवान् सा वा विपर्यस्ता यस्य स हितनिःश्रेयसबुद्धिविषयेस्तः विपर्यस्तहितनिःश्रेयसबुद्धिी, विपर्यस्तशब्दस्य तु परनिपातः प्राग्वत् , यद्वा विपर्यस्ता हिते निःशेषा बुद्धिर्यस्य स तथा, बालश्च-अज्ञः 'मंदिए'त्ति सूत्रत्वान्मन्दो-धर्मकार्यकरण प्रत्यनुद्यतः 'मूढों' मोहाकुलितमानसः, स एवंविधः किमिसाह-'बध्यते' श्लिप्यतेऽर्थाज्ञानावरणादिकर्मणा मक्षिकेव 'खेले श्लेष्मणि, रजसेति गम्यते, इदमुक्तं भवति १ यदा च कुकुटुम्भस्य कुततिमिहिन्यते । हस्तीव बन्धने बद्धः स पश्चातरितप्यते ॥१॥ पुत्रदारपरिकीगों मोदसंतानसंततः ।। पवावसन्नो यथा नागः स पश्चात्परितप्यते ॥२॥ 4562 दीप अनुक्रम २१३] ॥२९॥ Santaitation For Pro langtaran.arm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~834 Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||६|| नियुक्ति: [२५९...] प्रत सूत्रांक ||६|| जयथाऽसौ तन्निग्धतागन्धादिभिराकृष्यमाणा तत्र मजति, मन्ना च रेवादिना बध्यते, एवं जन्तुरपि भोगामि | मनः कर्मणेति सूत्रार्थः ॥ ननु यद्येवममी भोगाः कर्मवन्धकारणं किं नैतान् सर्वेऽपि जन्तवस्यजन्तीत्याहदुप्परिश्च या इमे कामा नो सुजहा अधीरपुरिसहिं । अह संति-सुब्बया साहू जे तरंति अतरं वणिया व ॥६॥ व्याख्या-दुःखेन-कृच्छेण परित्यज्यन्ते-परिहियन्त इति दुष्परित्यजाः 'इमें प्रत्यक्षत उपलभ्यमानाः 'कामाः' भोगाः 'नो' नैव 'सुजह'ति सूत्रत्वात् सुखेन-अनायासेन हीयन्त इति सुहाना:-मुत्यजाः, विषसम्पृक्तस्निग्धमधुरानवद्, कैः ?-'अधीरपुरुषः' अबुद्धिमद्भिरसत्त्वैर्वा नरैः, पुरुषग्रहणं तु ये ताबदल्पवेदोदयतया सुखेनैव त्यक्तारःसम्भवन्ति तैरप्यमी न सुखेन त्यज्यन्ते, आस्तामतिदारुणत्रीपण्डकवेदोदयाऽऽकुलितैः स्त्रीनपुंसकैरिति । यह दुष्परित्यजा इत्युक्त्वा पुनर्न सुहानाः इत्युक्तं तदत्यन्त दुस्त्यजताख्यापकं प्रश्चितज्ञविनेयानुप्राहकं वेति अपुनरुतमेव, अवीरग्रहणेन तु धीरैः सुत्यजा एवेत्युच्यते, अत एवाह-'अथ' इत्युपन्यासे 'सन्ति' विद्यन्ते शोभनानि सम्बगज्ञानाधिष्ठितत्वेन ब्रतानि-हिंसाविरमणादीनि येषां ते सुव्रताः, शान्त्या योपलक्षिताः सुव्रताः शान्तिसुव्रताः, इह च सन्तीति शेषः, साधयन्ति पौरुषेयीभिः क्रियाभिमुक्तिमिति साधवः, ये किमित्याह-ये 'तरन्ति' परपारावायाऽतिक्रामन्ति,कम् ?'अतर तरीतुमशक्यं विषयगणं भवं वा, क इव-वणिज इव, वाशब्दखेहेवार्थत्वात् , यथा हि वणिजोऽतरं नीराधि यानपात्रादिनोपायेन तरन्ति एवमेतेऽपि धीरा व्रतादिनोक्तरूपमतरम् , अधीरेखोकनीतितोऽस्य दुतरत्वात् , पठन्ति दीप अनुक्रम [२१४] SamEducatomima पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~84. Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||७|| नियुक्ति: [२५९...] याध्य.८ प्रत सुत्रांक ||७|| उत्तराध्याच-'जे तरंति वणिया व समुद्द'मिति, स्पष्टम् , उक्तं च केनचित्-"विषयगणः कापुरुषं करोति वशवर्तिनं न सत्पुरुषम्। कापिली विनाति मशकमेव हि लूतातन्तुर्न मातङ्गम् ॥१॥” इति सूत्रार्थः ॥ किं सर्वेऽपि साधवोऽतरं तरन्ति उत नेत्याहबृहद्वृत्तिः समणा मु एगे बदमाणा पाणयह मिया अजाणता । मंदा निरयं गच्छंति बाला पावियाहिं दिहीहि ॥७॥ ॥२९२॥ व्याख्या-श्राम्यन्ति-मुक्त्यर्थ खिद्यन्त इति श्रमणाः-साधवः 'मु' इत्यात्मनिर्देशार्थत्वाद्वयमिति 'एके' केचन हातीर्थान्तरीयाः 'बदमानाः' खाभिप्रायमुद्दीपयन्तो 'भासनोपसम्भाषाज्ञानयत्नविमत्युपनिमन्त्रणेषु बदः' (पा०१-३-४७) दाइत्यनेन भासने आत्मनेपदं, प्राणा-उक्तरूपास्तेषांवधो-घातस्तमजानन्त इति सम्बन्धः, मृगाइच मृगाःप्राग्वत् , अजा-115 नन्त इति ज्ञपरिज्ञया के प्राणिनः ? के च तेषां प्राणाः ? कथं वा वधः ? इत्यनवबुध्यमानाःप्रत्याख्यानपरिज्ञया च तद्वधमप्रत्याचक्षाणाः, अनेन च प्रथमत्रतमपि न विदन्ति आस्तां शेषाणीत्यक्तं भवति. अत एव मन्दा इव मन्दा मि-18 दध्यात्वमहारोगग्रस्ततया 'निरय' पाठान्तरतो 'नरकं वा' प्रतीतं गच्छन्ति यान्ति, बाला इव बाला-हेयोपादेयविवेक विकलत्वात् 'पावियाहिति प्रापयन्ति नरकमिति प्रापिकास्ताभिः, यद्वा-पापा एव पापिकाताभिः, परस्परविरो-|| धादिदोषात् खरूपेणैव कुत्सिताभिः, 'न हिंस्यात् सर्वभूतानी'त्याद्यभिधाय 'श्वेतं छागमालभेत वायव्यां दिशि भूतिकाम' इत्यादिपरस्परविरुद्धार्थाभिधायिनीभिः, पापहेभिर्वा पापिकाभिदृष्टिभिः-दर्शनाभिप्रायरूपाभिः 'ब्रह्मणे | ब्राह्मणमालभेत, इन्द्राय क्षत्रियं, मरुद्भयो वेश्य, तपसे शूद्रं तथा च-'यस्य बुद्धिर्न लिप्येत, हत्वा सर्वामद जगत् । दीप 15 अनुक्रम [२१५] ॥३९२n SAMEducatanimamarina Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~85 Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||८|| नियुक्ति: [२५९...] SCS प्रत सूत्रांक RSS ||८|| आकाशमिव पन, न स पापेन लिप्यते ॥१॥' इत्यादिकाभिर्दयादमवहिष्कृताभिः, तबहिष्कृतानां हि विविधवल्कलवेषादिधारिणामपि न केनचित्पापात् परित्राणं, तथा च वाचक:-"चर्मवल्कलचीराणि, कूर्चमुण्डजटाशिखाः । न व्यपोहन्ति पापानि, शोधको तु दयादमौ ॥१॥” इति सूत्रार्थः ॥ अत एवाह सूत्रकृत्नहु पाणवह अणुजाणे मुच्चेज कयाइ सव्वदुक्खाणं । एवमारिएहिमक्खायं जेहिं इमो साहुधम्मो पन्नत्तो८ | व्याख्या-'न हु' नैव 'प्राणवधं' प्राणघातं, मृषाधुपलक्षणं चैतत् , 'अणुजाणेत्ति अपिशब्दस्य लुप्तनिर्दिष्टत्वात् है अनुजानन्नपि, आस्तां कुर्वन् कारयन् वा, 'मुच्येत त्यज्येत , सम्भावने लिट् (), ततो मुक्तिसम्भावनाऽपि नास्तीत्युक्तं भवति, 'कदाचित् ' कस्मिंश्चिदपि काले, कैर्मुच्येत? इत्याह-सवदुक्खाणं ति दुःखयन्तीति दुःखानि-कर्माणि सर्वाणि च तानि दुःखानि च सर्वदुःखानि तैः, सुब्व्यत्ययाञ्च तृतीयार्थे पष्ठी, यद्वा सर्वदुःखैः-नरकादिगतिमाविभिः शारीरमानसः क्लेिशैः, ततः प्राणातिपातनिवृत्ता एव श्रमणास्त एव चातरं तरन्ति न वितर इत्युक्तं भवति, किमेतत् त्वयैवोच्यते । इत्याह-'एवारिएहिंति 'एवम्' उक्तप्रकारेणाऽऽयः-सकलहेयधर्मेभ्यो दूरं यातैस्तीर्थकरादिभिराचार्या आख्यातंकथितं, ये कीरश इत्याह-'य' आर्यैराचार्यैर्वाऽयं साधुधर्मो' हिंसानिवृत्त्यादिः 'प्रज्ञप्तः' प्ररूपितः, अयमित्यनेन|| चात्मनि वर्तमानं तेषां प्रज्ञाप्यचौराणां प्रत्यक्षं साधुधर्म निर्दिशतीति सूत्रार्थः ॥ यद्येवं ततः किं कृत्यम् ? इत्याहपाणे य नाइवाइजा से समियत्ति बुच्चई ताई । तओ से पावयं कम्म निजाइ उद्गं व थलाओ॥९॥ दीप * - अनुक्रम २१६] - - पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~86 Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||९|| नियुक्ति: [२५९...] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||९|| उत्तराध्य. व्याख्या-पाणे य णातिवाएज'त्ति चशब्दो व्यवहितसम्बन्धः, ततश्च प्राणान्-इन्द्रियपञ्चकादीन् नातिपात- कापिलीयेत् , यस्त्विति गम्यते, चशब्दात् कारणानुमत्योरपि निषेधः, मृषावादादिनिवृत्त्युपल झणं चैतत् , किमिति प्राणा-16 याध्य.८ नातिपातयेदित्याह-'से'त्ति यः प्राणान्नातिपातयिता स समितः' समितिमान् इति 'उच्यते' अभिधीयते, कीदृशः|| ॥२९॥ सन् ? इत्याह-'त्रायी' इत्यवश्य प्राणित्राता, समितत्वेऽपि को गुणः ?, उच्यते-'ततः' इति तस्मात् समितात् | हास' इत्यध 'पापकम् ' अशुभं 'कर्म' ज्ञानावरणादि निर्याति' निर्गच्छति, पठन्ति च-णिग्णाईत्ति अत्र देशीप-12 हादत्वादधोगच्छति, किमिव ?-उदकमिव, कुतः ?-स्थलाद' अत्युन्नतप्रदेशात् , अनेन च पूर्ववद्धस्य कर्मणोऽभाव उक्तः, न लिप्यते त्रायीति च बद्धमानस्येति न पौनरुक्त्यं, पापग्रहणं चास्यावश्यंतयाऽभावख्यापक, पुण्यस्य हि संहननादिदोपान्मुक्त्यनवाप्तेर्देवाद्युत्पत्तौ सम्भोऽपि स्यात् , अन्यथा हि पुण्यस्यापि खर्णनिगडप्रायतया विनिर्गम एव विनिमुक्तिरिति सूत्रार्थः ॥ यदुक्तं-'प्राणान्नातिपातयेदिति तदेव स्पष्टयितुमाह जगनिस्सिएहिं भूएहिं तसनामेहिं थावरेहिं च । नो तेसिमारभे दंडं मणसावयसाकायसा चेव ॥१०॥ NI व्याख्या-जगत्-लोकस्तस्मिन् निश्रितानि-आश्रितानि जगनिश्रितानि तेषु 'भूतेषु' जन्तुषु 'तसनामेसु'त्ति ॥२९॥ सनामकम्मोदयवत्सु द्वीन्द्रियादिषु 'स्थावरेषु' तनामकम्र्मोदयवर्तिपु पृथिव्यादिषु, चः समुच्चये, 'नो' नैव 'तेर्सि' ति तेषु रक्षणीयत्वेन प्रतीतेषु 'आरभेत' कुर्यात् दण्डनं दण्डः स चेहातिपातात्मकस्तं, 'मणसावयसाकायसा चेव' दीप अनुक्रम [२१७] SamEducatum international For Paraona a Privata u and! पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~87 Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||१०|| नियुक्ति: [२५९...] प्रत सूत्रांक ||१०|| त्ति आपत्वात् मनसा वचसा कायेन, चशब्दः शेषभोपलक्षका, ततश्च-यथा मनसा वचसा कायेन च दण्ड नारभते तथा नाऽऽरम्भयेत् न चारभमाणानप्यन्याननुमन्येत, 'एवः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च, अत एव नो इत्य-18 स्थानन्तरं योजितः, पठ्यते च-'जगणिस्सियाण भूयाणं, तसाणं थावराण य । णो तेसिमारमे दंड'ति गतार्थमेव, अपरे तु 'जगणिस्सिएही'त्यादि तृतीयान्ततयैवाधीयते, तत्र च जगनिश्रितैर्भूतैखसैः स्थावरच हन्यमानोऽपीति |शेषः, नैव तेष्वारभेत दण्डम् , उज्जयनीश्रावकपुत्रवत् , अत्र च सम्प्रदाया-उजेगीए सावगतो चोरेहिं हरिउं| 18/मालबके सूयगारस्स हत्थे विकीतो, लावगे मारयसु, ण मारयामीति हत्थीपादत्तासणसीसारक्खणं करणं चेति । स एवं प्राणत्यागेऽपि सत्त्वानपरोवी, एवमन्यैरपि यतितव्यमिति सूत्रार्थः ॥ उक्ता मूलगुणाः, सम्प्रत्युत्तरगुणा वाच्याः, तेष्वप्येपणासमितिः प्रधानेति तामाहसुडेसणा उ णचा णं तत्थ ठवेज भिक्खू अप्पाणं । जाताए घासमेसिजा रसगिद्दे न सिया भिक्खाए ११ व्याख्या-शुद्धाः-शुद्धिमत्यो दोषरहिता इत्यर्थः, ताश्च ता एषणाश्च-उद्गमैषणायाः शुद्धषणाः,एपणाः सप्त संस्पृखाद्याः, तद्यथा-'संसहमसंसट्टा उद्धड तह अपलेबडा चेव। उग्गहिया पग्गहिया उझियधम्माय सत्तमिय॥१॥'त्ति १ उज्जयिन्या श्रावकसुतश्चौरैर्दुत्वा मालवके सूपकाराणां हस्ते विक्रीतः, पारापतान् मारय, न मारयामीति इसिपादत्रासनं शीप-11 रक्षणं करणं च । २ संसृष्टाऽसंसृष्टोद्धृता तथाऽसलेपा चैव । अवगृहीता प्रगृहीतोझितधर्मा च सामिका ॥१॥ दीप अनुक्रम [२१८] % Education For any पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~88~ Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||१९|| नियुक्ति: [२५९...] कापिली प्रत सूत्रांक ||११|| एतासु च शुद्धषणाः पञ्च, जिनकल्पिकापेक्षमेतत् , उक्तं हि तदधिकारे-पंचसु गहो दोसु अभिग्गहों'त्ति, एताश्च 'ज्ञात्वा' अवबुध्य, किमित्याह-'ज्ञानस्य फलं विरतिरिति 'तो'त्येषणासु 'स्थापयेत्' निवेशयेत् , भिक्षत इत्येवंबृहद्वृत्तिः धर्मा तत्साधुकारी चेति भिक्षुः सन् 'आत्मानं खं, किमुक्तं भवति ?-अनेषणापरिहारेणेषणाशुद्धमेव गृहीयात् , ॥२९॥ तदपि किमर्थमित्याह-'जायाए'त्ति यात्रायै संयमनिर्वहणनिमित्तं 'घासंति ग्रासमेषयेद्-गवेपयेत् , उक्तं हि-"जह 8 ट सगडक्खोवंगो कीरति भरवहणकारणा णवरं । तह गुणभरवहणत्थं आहारो भयारीणं ॥१॥ति, एषणाशुद्धमप्या दाय कथं भोक्तव्यमिति प्रासैषणामाह-रसेपु-स्निग्धमधुरादिषु गृद्धो-गृद्धिमान् रसगृद्धो 'न स्यात्' न भवेत् , भिक्खाए'त्ति भिक्षादो भिक्षाको वा, अनेन रागपरिहार उक्तः, द्वेषपरिहारोपलक्षणं चैतत् , ततश्च रागद्वेषरहितो मुजीतेत्युक्तं भवति, यदुक्तम्-"रागद्दोसविमुत्तो भुंजेजा णिजरापही"ति, सूत्रगर्भार्थः ॥ अगृद्धश्च रसेषु । यत्कुर्यात्तदाहपंताणि चेव सेविजा सीयपिंड पुराणकुम्मासं । अदु बुक्कसं पुलागं वा जवणड्डा निसेवए मंधु ॥ १२ ॥ व्याख्या-'प्रान्तानि' नीरसानि, अन्नपानानीति गम्यते, चशब्दादन्तानि च, एवोऽवधारणे, स च भिन्नक्रमः १पञ्चसु महो द्वयोरभिग्रह इति । २ यथा शकटाक्षोपाङ्गः क्रियते भारवहनकारणात् नवरम् । तथा गुणभरवहनार्थमाहारो ब्रह्मचारिणाम् । ३ रागद्वेषविमुक्तो भुजीत निर्जराप्रेक्षी । दीप EKACHA अनुक्रम [२१९] २९४॥ SamEducation intimational For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~89~ Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-1 / गाथा ||१२|| नियुक्ति: [२५९...] प्रत सूत्रांक ||१२|| सेविजा इत्यस्यानन्तरं द्रष्टव्यः, ततश्च प्रान्तान्यन्तानि च सेवेतैव न त्वसाराणीति परिष्ठापयेद् , गच्छनिर्गतापेक्षया वा प्रान्तानि चैव सेवेत, तस्य तथाविधानामेव ग्रहणानुज्ञानात् , कानि पुनस्तानीत्याह-'सीयपिंड'ति शीतलः पिण्ड:-आहारः, शीतश्चासौ पिण्डश्च शीतपिण्डस्तं, शीतोऽपि शाल्यादिपिण्डः सरस एव स्यात् अत आह'पुराणा' प्रभूतवर्षधृताः 'कुल्माषाः' राजमाषाः, एते हि पुराणा अत्यन्तपूतयो नीरसाश्च भवन्तीत्येतद्रहणम् , उपलक्षणं चैतत् पुराणमुद्गादीनां, 'अदु' इति अथवा 'बुकसं' मुद्गमापादिनखिकानिष्पन्नमन्नमतिनिपीडितरसं वा 'पुलाकम् ' असारं बल्लचनकादि, या समुचये, 'जवणट्टत्ति यापनार्थ-शरीरनिर्वाहणार्थ, वा समुच्चये, उत्तरत्र योक्ष्यते, Kा सेवए'त्ति सेवेतोपभुजीत, यापनार्थमित्यनेनैतत सूचितं-यदि शरीरयापना भवति तदैव निपेवेत, यदि त्वतिवातो कादिना तथापनैव न स्यात्ततो न निपेवेवापि, गच्छगतापेक्षमेतत् , तन्निर्गतश्चैतान्येव यापनार्थमपि निषेवेत, मन्थु वा-पदरादिचूर्णम् , अतिरूक्षतया चास्य प्रान्तत्वं, सेवेतेति सम्बन्धः, पठ्यते च-'जवणवाए णिसेवए मंथु |ति, तथैव नवरं मन्थुमित्यत्र चशब्दो लुप्तनिर्दिष्टो द्रष्टव्यः, असारवस्तूपलक्षणं चोभयत्र मन्थुग्रहणं, पुनः क्रियाऽभिधानं च न सकृदेवावाप्सान्यमूनि सेवेत किन्त्वनेकधाऽपीतिख्यापनार्थमिति सूत्रार्थः ॥ यदुक्तं-'शुद्धपणाखात्मानं स्थापयेदिति, तद्विपर्यये वाधकमाहजे लक्खणं च सुविणं च अंगविजं च जे पति।न हु ते समणा बुचंति एवं आयरिएहिं अक्खापं ॥१॥ -22622- 04 दीप अनुक्रम [२२०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~90~ Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||१३|| नियुक्ति: [२५९...] % प्रत सूत्रांक ||१३|| % उत्तराध्य. IFI व्याख्या-'ये' इति प्राग्वत् , 'लक्षणं च' शुभाशुभसूचकं पुरुषलक्षणादि, रूढितः तत्प्रतिपादक शास्त्रमपि लक्षणं, कापिली द तद्यथा-अस्थिवर्थाः सुखं मांसे, त्वचि भोगाः स्त्रियोऽक्षिषु । गती यानं खरे चाज्ञा, सर्व सत्चे प्रतिष्ठितम् ॥१॥ 'खप्नं चे'त्यत्रापि रूढितः स्वप्नस्य शुभाशुभफलसूचकं शाखमेव, तद्यथा-'अलङ्कृतानां द्रव्याणां, वाजिबारणयोस्तथा। ॥२९॥ |वृषभस्य च शुक्लस्य, दर्शने प्रामुयाद्यशः ॥१॥ मूत्रं वा कुरुते खप्ने, पुरीषं चापि लोहितम् । प्रबुध्येत तदा कश्चि-1 दालभते सोऽर्थनाशनम् ॥२॥'अंगविजं च'त्ति अविद्यां च शिरःप्रभृत्यङ्गस्फुरणतः शुभाशुभसूचिका 'सिरफुरणे. किर रज' इत्यादिकां विद्या, प्रणवमायावीजादिवर्णविन्यासात्मिकां या, यद्वा-अङ्गानि-अङ्गविद्याव्यावर्णिणतानि भौमान्तरिक्षादीनि विद्या 'हलि !२ मातङ्गिनी स्वाहा' इत्यादयो विद्यानुवादप्रसिद्धाः, ततश्चाङ्गानि च विद्याश्चाङ्गविद्याः, प्राग्यद्वचनव्यत्ययः, 'चः' सर्वत्र वाशब्दार्थः, ये प्रयुञ्जते-व्यापारयन्ति, पुनर्ये इत्युपादानं लक्षणादिभिः पृथक् सम्बन्धसूचनार्थ, ततश्च प्रत्येकमपि लक्षणादीनि ये प्रयुञ्जते, न तु समस्तान्येव, ते किमित्याह-'न हु' नैव 'ते' एवंविधाः 'श्रमणाः' साधवः 'उच्यन्ते' प्रतिपाद्यन्ते, इह च पुष्टालम्बनं विनतयापारणत एवमुच्यते, अन्यथा करवीरलताभ्रामकतपखिनोऽप्येवंविधत्वापत्तेः, एवमाः आचार्य 'आख्यातं' कथितम् , अनेन यथावस्थितयस्तुवा- ॥२९५॥ दितयाऽऽत्मनि परापवाददोपं व्यपोहत इति सूत्रार्थः । ते चैवंविधा यदवामुवन्ति तदाह-- इह जीवियं अनियमित्ता पन्भट्टा समाहिजोगेहिं । ते कामभोगरसगिद्धा उववनंति आसुरे काए ॥ १४ ॥ % दीप % अनुक्रम [२२१] - 5 1 FaramarMarattimonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~91 Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥१४॥ दीप अनुक्रम [२२२] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१४|| निर्युक्तिः [२५९...] अध्ययनं [८], व्याख्या – 'इद्द' अस्मिन् जन्मनि 'जीवितं' असंयमजीवितम् 'अनियम्य' द्वादशविधतपोविधानादिनाऽनियत्र्य 'प्रभ्रष्टाः' च्युताः, केभ्यः १ - समाहियो गेहिं ति समाधिः- चित्तखास्थ्यं तत्प्रधाना योगाः- शुभमनोवाक्कायव्यापाराः समाधियोगाः, यद्वा समाधिश्च शुभचित्तैकाग्रता योगाव - पृथगेव प्रत्युपेक्षणादयो व्यापाराः समाधियोगाः तेभ्यः, अनियन्त्रितात्मनां हि पदे पदे तद्भ्रंशसम्भव इति, 'ते' अनन्तरमुक्ताः कामभोगेषु अभिहितखरूपेषु रसः - अत्यन्तासक्तिरूपस्तेन गृद्धाः तेष्वभिकाङ्क्षावन्तः कामभोगरसगृद्धाः, यद्वा रसाः- पृथगेव शृङ्गारादयो वा भोगान्तर्गतत्वेऽपि चैषां पृथगुपादानमतिगृद्धिविषयताख्यापनार्थम् 'उपपद्यन्ते' जायन्ते 'आसुरे' असुरसम्बन्धिनि काये, असुरनिकाये इत्यर्थः, इदमुक्तं भवति एवंविधाः किञ्चित् कादाचित्कमनुष्ठानमनुतिष्ठन्तोऽप्यसुरेष्वेवोत्पद्यन्ते इति सूत्रार्थः ॥ ततोऽपि च्युतास्ते किमामुवन्तीत्याह तत्तोऽवि उवहित्ता संसारं बहुं परियडति । बहुकम्मलेवलित्ताणं बोही होइ सुदुलहा तेसिं ॥ १५ ॥ व्याख्या- 'ततोऽपि च ' असुरनिकायाद् 'उद्धृत्य' तत्परित्यागेनान्यत्र गत्वा 'संसार' चतुर्गतिरूपं बहुशब्दस्य 'बहुपूपे घृतं श्रेय' इत्यादिषु विपुलवाचिनोऽपि दर्शनाद्वहुं विपुलं विस्तीर्णमितियावत्, बहुप्रकारं वा चतुरशीतियो निलक्षतया 'अणुपरियंति' त्ति अनुपरियन्ति, सातत्येन पर्यटन्तीत्यर्थः, पठन्ति च- 'अणुचरंति' ति स्पष्टं, किंच-बहूनि १ अणुपरियंति इति टीका For Parsons Privat antarany org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~92~ Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||१५|| नियुक्ति: [२५९...] (४३) कापिलीयाध्य. ८ प्रत सूत्रांक ||१५|| उत्तराध्य. च तान्यनन्ततया कर्माणि च-क्रियमाणतया ज्ञानावरणादीनि बहुकर्माणि तानि लेप इस लेपो बहुकम्मेणां या लेप-उपचयो बहुकर्मलेपस्तेन लिप्ता-उपचिता बहुकर्मलेपलिप्तास्तेषा 'बोधिः' प्रेत्य जिनधर्मावाप्तिः भवति' बृहद्वृत्तिः जायते 'सुदुर्लभा' अतिशयदुरापा, 'तेषाम्' इति ये लक्षणादि प्रयुञ्जते, पठन्ति च-'बोही जत्थ सुदुलहा तेसिं'ति ॥२९॥ बोधिर्यत्र-संसारे सुदुर्लभा तेषाम्-अनुपरियतामिति योजनीय, यतश्चैवमुत्तरगुणविराधनायां दोषस्ततस्तदाराधना यामेव यतितव्यमितिभावः इति सूत्रार्थः ॥ आह-किममी द्रव्यश्रमणा जानन्तोऽप्येवं लक्षणादि प्रयुञ्जते !, उच्यते, हा लोभतः, अत एव तदाकुलितस्यात्मनो दुष्पूरतामाहहै कसिणंपि जो इस लोयं पडिपुन्नं दलेज एगस्स । तेणावि से ण संतुस्से इइ दुप्पूरए इमे आया ॥१६॥ व्याख्या-'कृत्स्नमपि' परिपूर्णमपि यः' सुरेन्द्रादिः 'इम' प्रत्यक्षं 'लोकं' जगत् 'परिपूर्ण' धनधान्यहिरण्यादिभृतं ६'दलेज'त्ति दद्यात् , किंबहुभ्यः ? इत्याह-'एकस्स'त्ति एकस्मै कस्मैचित् कथञ्चिदाराधितवते, 'तेनापि' धनधाद न्यादिभृतसमस्तलोकदायकेन, हेतौ तृतीया, 'से' इति स 'न सन्तुष्येत्' न दृष्येत् , किमुक्तं भवति ?-ममैतावद्दद ताऽनेन परिपूर्णता कृतेति न तुष्टिमापात् , उक्तं हि-न वह्निस्तृणकाप्ठेपु, नदीभिर्वा महोदधिः। न चैवात्माऽथसासारण, शक्यतपेयितुं कचित् ॥१॥ यदि स्याद्रनण्णोऽपि, जम्बूद्वीपः कथश्चन । अपर्याप्तः प्रहर्षाय, लोभातेय जिनः स्मृतः॥२॥" 'इतिः' एवमर्थे, एवम्-अमुनोक्तन्यायेन दुःखेन-कृच्छ्रेण-पूरयितुं शक्यः दुष्पूरः दुष्पूर एवं दीप अनुक्रम [२२३] ९५॥ Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~93~ Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||१७|| नियुक्ति: [२५९...] प्रत सूत्रांक ||१७|| दुष्पूरकः 'इमेत्ति अयं प्रत्यक्षः 'आत्मा' जीवः, एतदिच्छायाः परिपूरयितुमशक्यत्वादिति सूत्रार्थः ॥ किमिति न सन्तुष्यतीति खसंविदितं हेतुमाह जहा लाभो तहा लोभो लाभा लोभो पवहति । दोमासकयं कर्ज कोडीएवि न निट्ठियं ॥१७॥ MI व्याख्या-'यथा' येन प्रकारेण 'लाभः' अर्थावाप्तिः 'तथा' तेन प्रकारेण 'लोभः' गार्थमभिकालेतियावत् , भव तीति शेषः, किमेवमित्याह-लाभालोभः 'प्रवर्धते' प्रकर्षण वृद्धिं भजते, इह च लाभाल्लोभः प्रवर्द्धत इति वचनाविद्यथा तयेत्यत्र वीप्सा गम्यते, ततश्च-यथा यथा लाभस्तथा तथा लोभो भवतीत्युक्तं भवति, लाभाल्लोभः प्रवर्द्धत - इत्यपि कुत इत्याह-द्वाभ्यां-द्विसङ्ख्याभ्यां मापाभ्यां-पञ्चरक्तिकामानाभ्यां क्रियते-निष्पाद्यत इति द्विमाषकृतम् ,K आपत्वाद्वर्तमानकाले क्तः, 'कार्य प्रयोजनं, तचेह दास्याः पुष्पताम्बूलमूल्यरूपं 'कोट्याऽपि' सुवर्णशतलक्षात्मिकया 18'न निष्ठित' न निष्पन्नं, तदुत्तरोत्तरविशेषवान्छात इति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति यदुक्तं-द्विमाषकृतं कार्य कोट्याऽपि दिन निष्ठित'मिति, तत्र तदनिष्ठितिः स्त्रीमूलेति तत्परिहार्यतोपदर्शनायाह नो रक्खसीसु गिझेजा गंडवच्छासु णेगचित्तासु । जाओ पुरिसं पलोभित्ता खेल्लंति जहा व दासेहिं ॥१८॥ 18| व्याख्या-'नो' नैव राक्षस्य इव राक्षस्यः-खियः तासु, यथा हि राक्षसो रक्तसर्वखमपकर्षन्ति जीवितं च प्राणि नामपहरन्ति एवमेता अपि, तत्त्वतो हि ज्ञानादीन्येव जीवितं च अर्थश्च (सर्वखं) तानि च ताभिरपहियन्त एव, तथा सटORSCORE दीप अनुक्रम [२२५] SamEducatm international Settingthangam पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~94~ Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१८|| दीप अनुक्रम [२२६] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२९७॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१८|| निर्युक्तिः [२५९...] अध्ययनं [८], च हारिल :- "वातोद्धृतो दहति हुतभुग्देहमेकं नराणां मत्तो नागः कुपितभुजगश्चैकदेहं तथैव । ज्ञानं शीलं विनयविभवौदार्यविज्ञानदेहान् सर्वानर्थान् दहति वनिताऽऽमुष्मिकानैहिकांश्च ॥ १ ॥” “गिज्झेज' त्ति गृद्धयेद्-अभिकाङ्क्षावान् भवेत् कीदृशीषु ? - 'गंडवच्छासु'त्ति गण्ड-गडु, इह चोपचितपिशितपिण्डरूपतया गल्त्पूतिरुधिरार्द्रतासम्भवाच तदुपमत्वाद्गण्डे कुचावुक्तौ ते वक्षसि यासां तास्तथाभूतास्तासु, वैराग्योत्पादनार्थं चेत्थमुक्तं, तथाऽनेकानि-अनेकसङ्ख्यानि चञ्चलतया चित्तानि - मनांसि यासां ता अनेकचित्तास्तासु, आह च - "अन्यस्याङ्के ललति विशदं चान्यमालिङ्गय शेते, अन्यं वाचा चपयति हसत्यन्यमन्यं च रौति । अन्यं द्वेष्टि स्पृशति कशति प्रोर्णुते वाऽन्यमिष्टं, नार्यो नृत्यत्तडित इव धिक् चञ्चलाञ्चालिकाश्च ॥ १ ॥” तथा 'जाओ' त्ति याः 'पुरुषं' मनुष्यं कुलीनभपीति गम्यते, 'प्रलोभ्य' त्वमेव मे शरणं त्वमेव च प्रीतिकृदित्यादिकाभिर्वाग्भिर्विप्रतार्य क्रीडन्ति, 'जहा व'| ति वाशब्दस्यैवकारार्थत्वाद्यथैव दासैः, एयागच्छ मा यासीरित्यादिवितथोक्तिप्रभृतिभिः क्रीडाभिर्विलसन्तीति । सूत्रार्थः ॥ पुनस्तासामेवातिहेयतां दर्शयन्नाह नारीसु नो पगिज्झिजा इत्थीविधपजहे अणगारे । धम्मं च पेसलं णचा तत्थ ठवेज भिक्खु अप्पाणं ॥ १९ ॥ व्याख्या- 'नारीषु' स्त्रीषु 'नो' नैव 'प्रगृध्येत्' प्रशब्द आदिकर्म्मणि ततो गृद्धिमारभेतापि न, किं पुनः कुर्यादिति भावः, 'इत्थी विष्पजहे ति स्त्रियो विविधैः प्रकारैः प्रकर्षेण च जहाति-त्यजतीति स्त्रीविप्रजहः, उणादयो बहु For Parsons Privat कापिली याध्य. ८ ~95~ ॥२९७॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [८], मूलं [-] / गाथा ||२०|| नियुक्ति: [२५९...] प्रत सूत्रांक ||२०|| लमिति (पा०३-३-१) बहुलवचनाच्छः, यद्वा-'इस्थिति थियो 'विप्पजहे'त्ति विप्रजयात्, पूर्वत्र च नारी-II ग्रहणान्मनुष्यस्त्रिय एवोक्ता, इह च देवतिर्यक्सम्बन्धिन्योऽपि त्याज्यतयोच्यन्ते इति न पौनरुक्त्यमुपदेशत्वाद्वा, तिअनगारः' प्राग्वत् , किं पुनः कुर्यादित्याह-'धर्ममेव ब्रह्मचर्यादिरूपं, चस्यावधारणार्थत्वात् , 'पेशलम्' इह परत्र चैकान्तहितत्वेनातिमनोज्ञं 'ज्ञात्वा' अवबुध्य, 'तत्र' इति धर्मे 'स्थापयेत्' निवेशयेद् 'भिक्षुः' यतिः आत्मानं विषया मिलापनिषेधत इति सूत्रार्थः ॥ अध्ययनार्थोपसंहारमाहदिइइ एस धम्मे अक्खाए कविलेणं च विसुद्धपपणेणं । तरिहिंति जे उ काहिंति तेहिं आराहिया दुवे लोगु२०त्तिषेमि - व्याख्या-'इति' अनेन प्रकारेण 'एषः' अनन्तरमुक्तरूपः 'धर्मः' यतिधर्मः आङिति सकलतत्व रूपाभिव्याप्त्या हाख्यातः-कथितः आख्यातः, केनेत्याह-'कपिलेन' इत्यात्मानमेव निर्दिशति, पूर्वसङ्गतिकत्वादमी मवचनतः प्रतिपद्यन्तामिति, 'चः' पूरणे, 'विशुद्धप्रज्ञेन' निर्मलावबोधेन, अतोऽर्थसिद्धिमाह-'तरिहिंति'त्ति तरिष्यन्ति, भवार्णवमिति शेषः, 'ये' इत्यविशेषाभिधानं, 'तुः' पूरणे, ततो विशेषत एवं तरिष्यन्ति, ये 'करिष्यन्ति' अनुष्ठास्यन्ति, प्रक्रमादमुं धर्मम् , अन्यच 'तैः' 'आराधितौ' सफलीकृतौ 'बी' द्विसयौ लोको, इहलोकपरलोकावित्यर्थः, इह १ महाजनपूज्यतया परत्र च निःश्रेयसाभ्युदयप्राप्त्येति सूत्रार्थः ।। 'इतिः' परिसमाप्ती ब्रवीमि इति नयाश्च प्राग्वदिति।। है इति श्रीशान्त्याचार्यविरचितायां शिष्यहितायां विशेषटीकायामिदमष्टममध्ययनं व्याख्यातं कापिलं नाम ।। दीप अनुक्रम [२२८] vपूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं- ८ परिसमाप्तं ~96~ Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२०|| दीप अनुक्रम [૨૨૮] उत्तराध्य. वृष्टवृत्तिः ॥२९८॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [९], मूलं [--] / गाथा || २०...|| निर्युक्तिः [२६०-२६३] अथ नवममध्ययनम् । ॥ उक्तमष्टममध्ययनं साम्प्रतं नवममारभ्यते - अस्य चायमभिसम्बन्धः - अनन्तराध्ययने निर्लोभत्वमुक्तम्, इह तु तदनुष्ठितेः इहैव देवेन्द्रादिपूजोपजायत इति दयेते, इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्याध्ययन स्यानुयोगद्वारचतुष्टयवर्णनं पूर्ववद्यावन्नामनिष्पन्न निक्षेपेऽन्वर्थानुगतं नमिप्रत्रज्येतिनाम, अतो नमेः प्रव्रज्यायाश्च निक्षेपो वाच्य इत्युभयनिक्षेपाभिधानायाह निर्युक्तिकृत् - निक्खेवो उ नमिमि चउविहो दु० ॥ २६० ॥ जाणग० ॥ २६९ ॥ | नमिआउनामगोयं वेयंतो भावतो नमी होइ । तस्स य खलु पवज्जा नमिपवज्जंति अज्झयणं ॥ २६२ ॥ पवज्जानिक्खेवो चउनिहो अन्नतित्थिगा दवे । भावंमि उ पवज्जा आरंभपरिग्गहञ्चाओ ॥ २६३ ॥ व्याख्या- 'निक्षेपः' न्यासः, 'तुः' पूरणे, 'नमो' नमिविषयः 'चतुर्विधः' चतुर्भेदो नामादिः, तत्र च नामस्थापने सुगमे, 'द्विविधः' द्विभेदो भवति 'द्रव्ये' द्रव्यविषयः, तमेवाह- आगमनोआगमतः, तत्रागमतो ज्ञाताऽनुपयुक्तः, नोआगमतश्च स 'त्रिविधः' त्रिभेदः, 'जाणगसरीरभविए तबइरिते यत्ति नमिशब्दस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धात् ज्ञशरीरनमिभैव्यशरीरन मिस्तद्व्यतिरिक्तनमिच, 'स' तद्व्यतिरिक्तनमिर्भवेत् त्रिविधः- एकभविको बद्धायुष्कोऽभिमुखनामगोत्रथ, ucato intemanoma For Permat& Prate Use One नमिप्रत्र ज्याध्य. ९ ~97~ ॥२९८॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अथ अध्ययनं - ९ " नमिप्रव्रज्या" आरभ्यते Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२६०-२६३] : प्रत सूत्रांक ||२०|| . एतत्खरूपं च प्राग्वत् , तथा नम्यायुर्नामगोत्रं वेदयन् भावतो नमिर्भवति, 'तस्य' नमः 'खलु' इति वाक्यालङ्कारे, 'प्रवज्या' वक्ष्यमाणखरूपा, इहाभिधीयत इत्युपस्कारः, अतश्च 'नमिप्रवज्येति नमिप्रव्रज्याख्यमिदमध्ययनमेव प्रस्तु तमुच्यत इति शेषः, प्रव्रज्यानिक्षेपश्चतुर्विधो नामादिः, नामस्थापने प्राग्वत् , अन्यानि च तान्यनहत्प्रणीततीर्थादन्यमात्वेन तीर्थानि च-निजनिजाभिप्रायेण भवजलधेः तरणं प्रति करणतया विकल्पितत्वेनान्यतीर्थानि तेषु भवा अन्यतीथिकाः, अध्यात्मादेराकृतिगणत्वाट्टक, तेच शाक्यसरजस्कादयः, 'द्रव्ये विचार्य, प्रव्रज्येति सम्बन्धः, प्रव्रज्यायोगाच त एवं प्रवज्येत्युच्यते, यथा दण्डयोगात् पुरुषोऽपि दण्ड इति, इह चान्यतीर्थिकशब्देन विवक्षितभावविकलतैव । सूचिता, ततोऽन्यतीथ्योः खती• वा प्रव्रज्यापर्यायशून्या द्रव्यप्रघ्रज्येति भण्यन्ते, अत एवाह-भावे तु विचार्यमाणे प्रवज्या आरम्भश्च-पृथिव्याधुपमर्दः परिग्रहश्च-मूर्छा आरम्भपरिग्रही तयोस्त्यागः-परिहारः आरम्भपरिग्रहत्यागः, हैन तु बहिर्वेषधारणाद्यवेति गाथाचतुष्टयार्थः ॥ इह च यद्यपि नमिप्रव्रज्यैव प्रक्रान्ता, तथापि यथाऽयं प्रत्येकबुद्धस्त थाऽन्येऽपि करकण्ड्वादयस्त्रयस्तत्समकालसुरलोकच्यवनप्रव्रज्याग्रहणकेवलज्ञानोत्पत्तिसिद्धिगतिभाजः इति प्रसङ्गतो पिनेयपैराग्योत्पादनार्थं तद्वक्तव्यतामपि विवक्षुरिदमाह नियुक्तिकृत्करकंड कलिंगेसु, पंचालेसु य दुम्मुहो । नमीराया विदेहेसु, गंधारेसु य नग्गई ॥ २६ ॥ वसभे अ इंदकेऊ वलए अंवे अ पुफिए बोही । करकंडु दुम्मुहस्सा नमिस्स गंधाररपणो अ॥२६५॥ दीप अनुक्रम [२२८] -%ACCASEAS .. 0 Farasamsrwmvaonly ~98~ Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२६४-२७३] प्रत 2054-5-%25 सूत्रांक ||२०|| उत्तराध्य. मिहिलावइस्स णमिणो छम्मासायंक विजपडिसेहो। कत्तिअसुमिणगर्दसणअहिमंदरनंदिघोसे अ२६६ नमिपत्र दुन्निवि नमी विदेहा रजाई पयहिऊण पवइआ। एगो नमितित्थयरो एगो पत्तेयबुद्धो अ॥ २६७ ॥ ज्याध्य.९ जो सो नमितित्थयरो सो साहस्सिय परिव्वुडो भयवं । गंथमवहाय पवइ पुत्तं रज्जे ठवेऊणं ॥२६॥ ॥२९॥ बीओवि नमीराया रजं चइऊण गुणसयसमग्गं । गंथमवहाय पवइ अहिगारो एत्थ बिइएणं ॥२६९॥ पुप्फुत्तराउ चवणं पवजा होइ एगसमएणं । पत्तेयबुद्धकेवलि सिद्धि गया एगसमएणं ॥ २७० ॥ सेअं सुजायं सुविभत्तसिंग, जो पासिआ वसहं गुटुमज्झे। रिद्धिं अरिद्धिं समुपेहिआ णं, कलिंगरायावि समिक्ख धम्मं ॥ २७१ ॥ जो इंदकेउं समलंकियं तु, दटुं पडतं पविलुप्पमाणं । रिद्धिं अरिद्धिं समुपेहिआ णं, पंचालरायावि समिक्खधम्मं ॥ २७२ ॥ बुद्धिं च हाणि च ससीव दटुं, पूरावरेगं च महानईणं । अहो अणिचं अधुवं च नच्चा, पंचालरायावि समिक्ख धर्म ॥ २७३ ॥ % % दीप अनुक्रम [२२८] IN ॥२९॥ 625 पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~99 Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२७४-२७९] प्रत सूत्रांक ||२०|| बहुआणं सद्दयं सुच्चा, एगस्स य असद्दयं । वलयाण नमीराया, निक्खंतो मिहिलाहिवो ॥ २७४ ॥ जो चूअरुक्खं तु मणाभिरामं, समंजरीपल्लवपुष्फचित्तं। रिद्धिं अरिद्धिं समुपेहिआ णं, गंधाररायावि समिक्ख धम्मं ॥ २७५ ॥ जया रजं च रटुं च, पुरं अंतेउरं तहा। सबमेअं परिच्चज, संचयं किं करेसिम ? ॥ २७६ ॥ जया ते पेइए रजे, कया किच्चकरा बहू । तेसिं किञ्च परिच्चज, अज्ज किञ्चकरो भवं ॥ २७७ ॥ जया सवं परिच्चज, मुक्खाय घडसी भवं । परं गरहसी कीस ?, अत्तनीसेसकारए ॥ २७८ ॥ मुक्खमग्गं पवन्नेसु, साहसु बंभयारिसु । अहिअत्थं निवारितो, न दोसं वत्तुमरिहसि ॥ २७९ ॥ एतदर्थस्तु प्रायः सम्प्रदायादवसेय इति तावत् स एवोच्यते-चंपानयरीए दहिवाहणो राया, चेडगधूया पउमावती देवी, तीसे दोहलो-किहाहं रायपणेवत्थेण वत्थिया उजाणकाणणाणि विहरेज्जा ?, सा उल्लगसरीरा जाया, राया पुच्छति, ताधे राया यसा य जयहत्धिमि आरूढा, राया छत्तं धरेइ, गया उजाणं, पढमपाउसंच, सीयलएणं १ चम्पानगर्वा दधिवाहनो राजा, चेटकदुहिता पद्मावती देवी, तस्या दौडद:-कथमहं राजनेपथ्येन नेपध्यिता उद्यानकाननानि विहरेयं. 13सा क्षीणशरीरा जाता, राजा पृच्छति, तदा राजा च सा च जयहस्तिनि आरूढा, राजा छत्रं धारयति, गतोद्यानं, प्रथमप्रावृद् च, शीतलेन 4 दीप अनुक्रम [२२८] DAREDuratmi Farremararwatimom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~100 Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: २७४-२७९] नमिग्रन ज्याध्य.९ प्रत सूत्रांक CRICA ||२०|| उत्तराध्य. मट्टियागंधेणं हत्थी अभाहतो वणं संभरति, नियट्टो बणाभिमुहो पयातो, जणो ण तरति ओलगिउं, दोवि अडविं पवेसियाई, राया बडरुक्खं पेच्छइ, देवि भणइ-एयस्स वडस्स हेट्टेण जाहित्तिति ता तुमं साखं गेण्हेजासि, ताए पडिवृद्धृत्तिः सुपं, ण तरति, राया दक्खो तेण साहा गहिया, सो उत्तिण्णो, णिराणंदो गतो चपं । सावि य इत्थिया णीया णिम्माणुसं ॥३०॥ ६ अडविं, जाच तिसायितो पेच्छति दहं महतिमहालयं, तत्थ ओइन्नो अभिरमति हत्थी, इमावि सणियं २ उइण्णा तला | गातो, न दिसातो जाणइ एकाए दिसाए सागारं भत्तं पञ्चक्खाइत्ता पहाविया, जाव दूरंगया ताप तावसो दिहो, तस्स मूलं गया, अभिवातितो, पुच्छति-कसोऽसि अम्मो इहं आगया ?, ताहे कहेइ-अहं चेडगस्स धूया, जाव इहं हथिणा आणीया, सो य तावसो चेडगनियल्लतो, तेण आसासिया-मा वीहेहित्ति, ताहे से वणफलाणि दाऊणं एकाए ५. १ मृत्तिकागन्धेन हस्यभ्याहतो वनं स्मरति, निवृत्तो वनाभिमुखः प्रयातः, जनो न शक्नोत्यवलगित, द्वावप्यटवी प्रवेशिती, राजा टवटवृक्षं प्रेक्षते, देवी भणति-एतस्य वटस्याधस्तनेन यास्यतीति तत्त्वं शाखां गृहीयाः, तया प्रतिश्रुतं, न शक्कोति, राजा दक्षतेन शाखा गृहीता, स उत्तीर्णो, निरानन्दो गतश्चम्पाम् । साऽपि च स्त्री निर्मानुषां नीता अटवी, यावत्तृषितः प्रेक्षते हई महातिमहालयं, तत्रा-1 शिवतीर्णोऽभिरमते हस्ती, इयमपि शनैः अवतीर्णा तडाकात् , न दिशो जानाति एकया दिशा साकारं भक्तं प्रत्याख्याय प्रभाविता, यावरं गता तावत्तापसो दृष्टः, तस्य मूलं गता, अभिवादितः, पृच्छति-कुतोऽसि अम्ब ! इहागता , तदा कथयति-अहं पेटकस्म दुहिता, यावदत्र हस्तिनाऽऽनीता, स च तापसभेटकस्य निजकः, तेनाश्वासिता—मा भैषीरिति, तदा तसौ पनफलानि दस्वैकया दीप अनुक्रम [२२८] H ॥३० ॥ Former पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~101 Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२०|| दीप अनुक्रम [२२८] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा || २०...|| निर्युक्ति: [२७४-२७९] दिसाएं अडवीओ णीणिया, एत्तोहिंतो हलच्छित्ता भूमी तं न अक्कमामो, एसो दंतपुरस्स विसतो दंतचको राया, तातो अडवीतो णिग्गया, दन्तपुरे अज्वाणं मूले पवइया, पुच्छियाए गन्भो ण अक्खातो, पच्छा णाए मयहरिकाणं | आलोएति, वियाया समाणी सह णाममुद्दाए कंबलरयणेण व सुसाणे उज्झति, पच्छा मसाणपाणो, तेण गहितो, भज्जाए अप्पितो, अवकिन्नतोत्ति नामं कर्य, सा अज्जा तीए पाणीए समं मेतिं करेइ, सा अज्जा ताहि संजईहिं पुच्छियाकहिं गन्भो १, भणइ-मयगो जातो, ता मे उज्झितो, सो तत्थ संबद्धति । ताहे दारगरूवेहिं समं रमइ, सो ताणि डिकरुवाणि भणद- अहं तु राया ममं करं देह, सो लुक्खकच्छूए गहितो, ताणि भणइ-ममं कंडुयह, ताहे से करकंडुत्ति नामं कथं, सो ताए संजईए अणुरत्तो, साय से मोयए देह, जं च भिक्खं लठ्ठे लहेइ । संवडिओ सो सुसाणं १ दिशाऽव्या निष्काशिता, अतो हलकष्टा भूमिः तां नाक्रमामहे, एष दन्तपुरस्य विषयो दन्तचक्रो राजा, तस्या अटव्या निर्गता, दन्तपुरे आर्याणां मूले प्रत्रजिता, पृष्ठया गर्भो नाख्यातः, पश्चाज्ञाते महत्तरिकाभ्य आलोचयति, विजाता सती सह नाममुद्रया कम्बलरत्नेन च श्मशाने उज्झति, पञ्चात् श्मशानचाण्डालः, तेन गृहीतः, भार्यायै अर्पितः, अवकीर्णक इति नाम कृतं, साऽऽर्या तया चाण्डाल्या समं मैत्री करोति, साऽऽर्या ताभिः संयतीभिः पृष्ठा—क गर्भः ?, भणति - मृतो जातस्ततो मयोज्झितः स तत्र संवर्धते । तदा दारकरूपैः समं रमते, | स तानि डिम्भरूपाणि भणति अहं युष्माकं राजा मां करं दत्त, स रूक्षच्छा गृहीतः, तानि भणति मां कण्डूयत, तदा तस्य करकण्डूरिति नाम कृतं स तस्यां संयत्यामनुरक्तः, सा च तस्मै मोदकान् ददाति यच्च भिक्षां लष्टां लभते । संवृद्धः स श्मशानं Education intemational For Parsons Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 102~ Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२७४-२७९] प्रत सूत्रांक ||२०|| उत्तराध्य- रक्खेति, तत्थ दो संजया तं मसाणं केणति कारणेन अतिगता, जाव एगत्य वंसकुडंगे दंडगं पेच्छंति, तत्थ एगोनिमिप्रनबृहद्वृत्तिः हा दंडलक्खणं जाणति, सो भणति-जो एवं दंडगं गिण्हति सो राया होतित्ति, किंतु पडिच्छियोति जाव अत्राणि ज्याध्य.९ चचारि अंगुलाणि वहति ताहे जोग्गोत्ति । तं तेणं मायंगचेडएणं सुयं, एकेम भिजाइएण य, ताधे सो धिज्जाइयिगो ॥३०॥ 8 अप्पसागारियं तस्स चउरंगुलं खणिऊण छिंदेइ, तेण य चेडएण दिट्ठो, सो उहालिओ, सो तेण धिजाइएण करणं णीतो भणइ-देहि दंडगं, सो भणइ-मम मसाणे, ण देमि, विजाइजो भणिो -अन्नं गिण्ह, सो णिच्छइ, भणति य-एएण मम कजंति, सो दारगो न देइ, ताहे सो दारगो पुग्छिओ-किन देहि !, भणई य-अहं एयस्स दंडगस्स पहावेण राया होहामित्ति, ताहे कारणिया हसिऊणं भति-जया तुमं राया होजासि तया एयस्स तुम KI १ रक्षसि, तत्र द्वौ संयत्तौ तं श्मशानं केनचित्कारणेनातिगतो, यावदेकत्र वंशजाल्या दण्डं प्रेक्षाते, तत्रैको दण्डलक्षणं जानाति, सभणति व एनं दण्डं गृहीयात् स राजा भवतीति, किंतु प्रतीक्षितव्य इति यावन्यांश्चतुरोऽङ्गुलान् वर्धते, तवा योग्य इति । तस्तेन माप्तङ्गाचेटेन श्रुतम् , एकेन धिग्जातीयेन च, तदा स घिग्जातीयोऽस्पसागारिके तस्य चतुरो लान सात्वा छिनत्ति, तेन च बेटेन दृष्टः, सोऽपहृतः, स धिम्जातीयेन तेन करणं नीतो भणति-देहि वण्डं, स भणति-मम श्मशाने, न ददामि, धिग्जातीयो भणितः-अन्यं गृहाण, स मार॥३०॥ नेच्छति, भणति च-एतेन मम कार्यमिति, स दारको न ददाति, तदा स दारकः पृष्ट:-किं न ददासि ?, भणति च-अहमेतस्य दण्डस्य | प्रभावेण राजा भविष्यामीति, तदा कारणिका हसित्वा भणन्ति-यदा त्वं राजाऽभविष्यस्तदैतस्मै त्वं दीप अनुक्रम [२२८] SamEducatan international पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~103 Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२७४-२७९] प्रत सूत्रांक ||२०|| गोमं देजासि, पडिवण्णो सो, तेण धिज्जाइएण अन्ने धिज्जाइया गहिया-जहा एवं मारिता हरामो, तं तस्स पियाए। सुयं, ताणि तिन्निवि णट्ठाणि जाव कंचणपुरं गयाणि । तत्थ राया मरइ अपुत्तो, आसो अहियासितो, तस्स बाहिं सुर्यतस्स मूलं आगो, पयाहिणीकाऊण ठितो, जाब णायरा पिच्छंति लक्खणजुत्तं, जयजयसहो कतो, गंदीतुरं आहयं, इमोवि जंभंतो उडिओ, वीसत्थो आसं विलग्गो, पवेसिजइ, मायंगो त्ति धिजाइगा ण देंति पसं. ताहे तेण दंडरयणं गहियं, तंजलिउमारद्धं, ते भीया ठिया, ताहे तेण वाडहाणगा हरिएसा धिजाइया कया, उक्तं च-"दधिवाहनपुत्रेण, राज्ञा तु करकण्डुना । वाटहानकवास्तव्याश्चण्डाला ब्राह्मणीकृताः ॥१॥" तस्स य धरनामं अवकिन्नगोत्ति, |पच्छा से तं चेव चेडगकयणामं पतिट्ठियं करकंडुत्ति । तहिं सो भिजातितो आगतो, देहि मम गार्म, भपति १ प्राममदास्यः, प्रतिपन्नः सः, तेन धिग्जातीयेन अन्ये धिग्जातीयाः स्वपक्षीकृताः-यथैनं मारयित्वा हरामः, तत्तस्य पित्रा श्रुतं, ते योऽपि मष्टा यावत्काञ्चनपुरं गताः । तत्र राजा मृतः अपुत्रः, अन्धोऽधिवासितः, वस्त्र बहिःसुप्तस्य मूलमागतः, प्रदक्षिणीकृत्य स्थितः यावन्नागराः प्रेक्षन्ते लक्षणयुक्तं, जयजयशब्दः कृतः, नन्दीतूर्यमाहतम् , अयमपि जृम्भमाण उत्थितः, विश्वस्तोऽश्वं विलयः, प्रवेश्यते, मातक इति धिग्जातीया न ददति प्रवेश, तदा तेन दण्डरनं गृहीतं, तज्ज्वलितुमारब्धं, ते भीताः स्थिताः, तदा तेन बादधानका हरिकेशा धिग्जातीयाः कृताः । तस्य च गृहनामाषकीर्णक इति, पश्चात् तस्य तदेव चेटककृतं नाम प्रतिष्टितं करकण्हूरिति । तत्र स धिग्जातीय आगतः, देहि मह्यं ग्राम, भणति दीप अनुक्रम [२२८] SamEducation intimatent For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~104 Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२०|| दीप अनुक्रम [२२८] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥ ३०२ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || २०...|| निर्युक्ति: [२७४-२७९] अध्ययनं [९], | जो ते रुच्चति, सो भणइ - मम चंपाए घरं, तो तहिं देहि, ताहे दधिवाहणस्स लेहेइ-देहि मम एगं गामं, अहं तुझं जं रुचइ गामं वा नगरं वा तं देमि, सो रुट्ठो दुट्टमायंगो अप्पाणं ण जाणइत्ति, जो ममं लेहूं देइति । दूपण पडिआगएण कहियं, करकंडू कुवितो, चंपा रोहिया, जुद्धं बट्टति, ताए संजईए सुर्य, मा जणक्खओ होहितित्ति करकं ओ रित्ता रहस्सं भिंदियत्ति, एस तव पियन्ति, तेण ताणि अम्मापियरो पुच्छियाणि, तेहिं सम्भावो कहितो, माणेणं ह ओ सरह, ताहे सा चंप अइगया, रण्णो घरं अतीति, णाया पायपडियाओ दासीओ परुष्णातो, रायणावि सुर्य, सोऽले आगतो, वंदित्ता आसणं दाऊण तं गन्धं पुच्छति, सा भणइ-एसो जो एसणयरं रोहित्ता अच्छर, तुडो णिग्गतौ, मिलितो, दोषि रज्जाणि तस्स दाऊण दहिवाहणो पचतितो । करकंडू य महासासणो जातो, सो य किर गोउलप्पितों Edicaone १ यस्तुभ्यं रोचते, स भणति - मम चम्पायां गृहं तत्तत्र देहि, तदा दधिवाहनाय लेखयति देहि मामेकं प्रामम्, अहं तुभ्यं यद्रोचते प्रामो वा नगरं वा तद्ददामि स रुष्टो दुष्टमातन आत्मानं न जानातीति, यो मह्यं लेखं ददातीति । दूतेन प्रत्यागतेन कथितं करकण्डू कुपितः, चम्पा रुद्धा, युद्धं वर्त्तते, तया संयत्या श्रुतं मा जनक्षयो भविष्यतीति करकण्डूमपसार्य रहस्यं भेदितवती - एष तक पितेति, तेन तौ मातापितरौ पृष्टौ ताभ्यां सद्भावः कथितः, मानेन नापसरति, तदा सा चम्पामतिगता, राज्ञो गृहमेति, ज्ञाता पादपतिता दास्यः प्ररुदिताः राज्ञापि श्रुतं सोऽव्यागतो, वन्दित्वाऽऽसनं दत्त्वा तं गर्भ पृच्छति सा भणति एष य एतन्नगरं रुद्धा तिष्ठति, तुष्टो निर्गतो, मीलितो, द्वे अपि राज्ये तस्मै दत्त्वा दधिवाहनः प्रब्रजितः । करकण्डूश्च महाशासनो जातः, स च किल गोकुलप्रियः For Parsons Praten नमिप्रत्र व्याध्य. ९ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~105~ Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२७४-२७९] प्रत सूत्रांक ||२०|| 18 अगाणि तस्स गोउलगाणि जायाणि जाव सरयकालेण एगं गोवच्छयं घोरगत्तं सेयं तंपेच्छइ, भणति य-एयस्स मायर मा दुहेजाहि, जया वद्वितो हुज्जा तया अण्णाणं गावीणं दुद्धं पाएजाह, ते गोवा पडिसुणंति, सो उच्चत्तविसाणो | खद्धवसभो जातो, राया पेच्छति, सो जुद्धिक्कओ जातो, पुणो कालेण राया आगतो पेच्छति-महाकायं जुण्णं वसभ, सापडएहिं परिघट्टयंत, गोवे पुच्छइ-कहिं सो बसहोति !, तेहिं सो दाइतो, पेच्छंतओ विसायं गतो, अणिच्चयं । चिंतितो संबुद्धो 'सेयं सुजायं० सुतं, 'गोटुंगणस्स.' गाहा, 'पोराण' गाथा १॥ इत्तो पंचालेसु जणवएसु कंपिल्लपुरं नयरं, तत्थ दुम्मुहो राया, सो य इंदकेउं पासति लोगेण महिजतं अणेगकुडभीसहस्सपडिमंडियाभिरामं, पुणो अ विलुत्तं पडियं च मुत्तपुरीसाण मज्झे, सोऽवि संबुद्धो पबतितो 'जो इंदकेउं सुयलंकियं तु' सोऽवि विहरति २॥ १ अनेकानि तस्य गोकुलानि जातानि यावच्छरत्काल एक गोवत्सं घोरगात्रं श्वेतं तं प्रेक्षते, भणति च एतस्य मातरं मा धौक्षिष्ट, यदा वृद्धो भवेत् तदाऽन्यासां गा दुग्धं पाययेत, ते गोपाः प्रतिशृण्वन्ति, स उच्चविषाणः समर्थवृषभो जातः, राजा पश्यति, स युद्ध एकको जातः ते पुनः कालेन राजाऽऽगतः पश्यति–महाकायं जीर्ण वृषभ, हस्खमहिषीभिः परिघट्यमानं, गोपान् पृच्छति-क स वृषभ इति !, तैः स दर्शितः, पश्यन् विषादं गतः, अनित्यतां चिन्तयन् संबुद्धः श्वेतं सुजातं.' सूत्र गोष्ठाङ्गणस्य० गाथा 'पुराण' गाथा १॥ इतः पाञ्चालेषु | जनपदेषु काम्पील्यपुरं नगरं, तत्र दुर्मुखो राजा, स चेन्द्रकेतुं पश्यति लोकेन मधमानमनेकपताकासहस्रपरिमण्डिताभिरामं, पुनश्च विलसं ४ पतित्तं च मूत्रपुरीषयोर्मध्ये, सोऽपि संबुद्धः प्रत्रजित: 'य इन्द्रकेतुं स्खलकृतं तु सोऽपि विहरति २ ॥ दीप अनुक्रम [२२८] SamEditatomic For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~106~ Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [--1 / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२७४-२७९] वृहदृत्तिः/लिंति. सो प्रत सूत्रांक ||२०|| उत्तराध्य. आय विदेहे जणवए महिलाए य णयरीए णमी राया, तस्स दाहो जातो, देवी चंदणं घसति, बलियाणि खलख-/नमिप्रन लिंति, सो भणति-कण्णाघातो होइ, देवीए एक्ककं अवणेतीए सवाणि अवणीयाणि, एकिकं ठियं, तं राया पुन्छ।|| -ताणि वलयाणि न खलखलिंति ?, सा भणति-अवणीयाणि, सो तेण दुक्खेण अभाहतो परलोगाभिमुहो चिंतेति॥३०३॥ बहुयाणं दोसो ण एगस्स, जइ य एयातो रोगाओ मुचामि तो पचयामि, तया य कत्तियपुण्णिमा वट्टति, एवं सो चिंतितो पासुत्तो, पभायाए श्यणीए सुमिणए पासति-सेयं नागरायं मंदरोवरि च अत्ताणमारूढं, गंदिघोसतूरेण य विवोहितो हट्टतट्टो चिंतेइ-अहो पहाणो सुविणो दिट्ठोत्ति, पुणो चिंतइ-कहिं मया एवंगुणजातितो परतो दिट्ठघोत्ति चिंतयंतेण जाती संभरिया, पुर्व माणुसभवे सामण्णं काऊण पुप्फुत्तरे विमाणे उबवण्णो आसि, तत्थ देवते १ इतश्च विदेहे जनपदे मिथिलायां च नगर्यां नमी राजा, तस्य च दाहो जातः, देवी चन्दनं वर्षति, बलयानि शब्द कुर्वन्ति, स ४ भणति-कर्णाघातो भवति, देव्यैकैकमपनयन्त्या सर्वाण्यपनीतानि, एकैकं स्थित, तो राजा पृच्छति-तानि बलयानि न खटत्कुर्वन्ति !, सा४ भणति-अपनीतानि, स तेन दुःखेनाभ्याहतः परलोकाभिमुखश्चिन्तयति-बहना दोषो नैकस्य, यदि चैतस्माद्रोगामुल्ये तदा प्रापजामि, तदा च कार्तिक पूर्णिमा वर्तते, एवं स चिन्तयन् प्रसुमः, प्रभातायां रजन्या स्वप्ने पश्यति-तं नागराज मन्दरस्योपरि चात्मानमारूढं, ॥३०॥ नन्दीघोपतूर्येण च विबोधितो हष्टतुष्टश्चिन्तयति-अहो प्रधानः स्वप्नो दृष्ट इति, पुनचिन्तयति-क मयैवंगुणजातीयः पर्वतो दृष्टपूर्व इति चिन्तयता जातिः स्मृता, पूर्व मनुष्यभवे श्रामण्यं कृत्वा पुष्पोत्तरे विमान उत्पन्न आसं, तत्र देवत्वे दीप अनुक्रम [२२८] APP Editotal पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~107~ Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२७४-२७९] प्रत सूत्रांक ||२०|| मंदरो जिणमहिमाइसु आगएण दिद्वपुवोत्ति संबुद्धो पतितो 'बहुयाण-'सिलोगो ३ ॥ इओ य गंधारजणविस-4 / एसु पुरिसपुरं णाम नयरं, तत्थ णग्गती राया, सो य अन्नया अणुजत्तं णिग्गतो पेच्छइ-चूयं कुसुमियं, तेणेगा दमंजरी गहिया, एवं खंधावारेणं लयंतेणं कट्ठायसेसो कतो, पडिनियत्तो पुच्छति-कहिं सो चूयरुक्खो?, अमञ्चेण अक्खातो एसोत्ति, तो किह कहाणि कतो, भणति-तुम्भेहिं एक्का मंजरी गहिया, पच्छा सवेणवि जणेण गहिया, सो चिंतेइ-एवं रजसिरित्ति, जाव रिद्धी ताव सोहति, अलाहि 'जो चूय.' गाहा, सोऽपि विहरति ४॥ चसारिवि विहरमाणा खिइपतिट्ठिए णयरे चाउद्दारं देउलं, पुषेण करकंडू पविट्ठो, दुम्मुहो दक्खिणेण, किह साहुस्स अन्नामुहो अच्छामित्ति तेण वाणमंतरेण दक्षिणपासेवि मुहं कयं, नमी अवरेण, तोऽवि मुहं कयं, गंधारो उत्तरेण, तमोऽपि १मन्दरो जिनमहिमादिष्वागतेन रष्टपूर्व इति संबुद्धः प्रव्रजितः 'बहूनां० श्लोकः ३ ॥ इता गान्धारजनविषयेषु पुरुषपुर नाम नगर, तत्र नम्गती राजा, स चान्यदाऽनुयात्रं निर्गतः पश्यति-चूतं कुसुमितं, तेनैका मञ्जरी गृहीता, एवं स्कन्धावारेणाददानेन काष्ठावशेषः कृतः, ६ प्रतिनिवृत्तः पुच्छति-क स चूतवृक्ष: ?, अमायेनाख्यात एष इति, तदा कथं काष्ठीकृतः १, भणति-युष्माभिरेका मन्जरी गृहीता, पश्चात्स-16 वेणापि जनेन गृहीता, स चिन्तयति-एवं राज्यश्रीरिति, यावदृद्धिस्तावच्छोभते, अलम् 'यभूत०' गाथा, सोऽपि विहरति ४ ॥ चत्वारोऽपि | विहरन्तः क्षितिप्रतिष्ठिते नगरे चतुर्वार देवकुलं, पूर्वेण करकण्डूः प्रविष्टः, दुर्मुखो दक्षिणेन, कथं साधोः पराङ्मुखस्तिष्वामीति तेन व्यन्तरेण दक्षिणपाधेऽपि मुखं कृतं, नमिरपरेण, ततोऽपि मुखं कृतं, गान्धार उत्तरेण, ततोऽपि ACCASSAGAR दीप अनुक्रम [२२८] SamEdicatomimmm FarramanaSPrwanatimony पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~108~ Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२७४-२७९] बृहवृत्तिः प्रत सूत्रांक ||२०|| उत्तराध्य. मुहं कयं । तस्स किर करकंडुस्स आबालत्तणा सा कंडू अत्थि चेव, तेण कंडूयगं गहाय मसिणं कण्णो कंडूइतो, तं नमिप्रवतेण एगत्व संगोवियं, तं दुम्मुहो पेच्छइ, सो भणइ-'जया रजं.' सिलोगो, जाव करकंडू पडिवयणं न देति ताव भाज्याध्य.९ णमी वयणसमकं इमं भणइ-'जया ते पेतिते रज्जे 'सिलोगो, किं तुमं एयस्स आउत्तगोति भणति, ताहे गंधारो ॥३०॥ भणति-'जया सई परिचज' सिलोगो, ताहे करकंडू भणति-'मोक्खमग्गपवण्णाणं.' सिलोगो "रूसऊ वा परो मा वा विसं वा परियत्तउ । भासियवा हिया भासा, सपक्वगुणकारिया ॥१॥” इत्येष सम्प्रदायः । एष एव च गाथा-1 कदम्बकभावार्थः, अक्षरार्थस्तु स्पष्ट एव, नवरं मिथिला नाम नगरी, तस्याः पतिः-खामी मिथिलापतिस्तस्य, अनेनान्येषामपि तत्पतीनां सम्भवात् तद्व्यवच्छेदमाह, 'नमे' नमिनाम्नः, 'छम्मासायंकविजपडिसेहो ति षण्मासानातको-दाहज्वरात्मको रोगः पण्मासातङ्कः तत्र वैद्यैः-भिषग्भिः प्रतिषेधो-निराकरणम् , अचिकित्स्योऽयमित्यभिधानरूपः षण्मासातङ्कवैद्यप्रतिषेधः, 'कत्तियत्ति कार्तिकमासे 'सुविणगर्दसणंति' खन्न एव खप्रकस्तस्मिन् दर्शनं १ भुखं कृतं । तस्य किल करकण्डो: आबाल्यात् सा कण्डूरस्ति चैव, तेन कयनं गृहीत्वा मसूर्ण कौँ कण्डूयिती, तत्तेनैकत्र संगोसापितं, तभुखः पश्यति, सभणति... यदा राज्य ऋोका, यावत्करकण्डूः प्रतिवचनं न ददाति सावत् नमिर्वचनसममिदं भणति यदा ते ॥२०॥ तातफे राज्ये० श्लोकः, किं त्वमेवस्थावर्तक इति भणति, तदा गान्धारो भणति यदा सर्व परित्यज्य० श्लोकः, सदा करकण्हभणति मोक्षमार्गप्रपन्नानां श्लोकः । रुप्यतु वा परो मा वा विष वा पर्यतु । भाषितव्या हिता भाषा स्वपक्षगुणकारिणी (का)॥१॥ दीप अनुक्रम [२२८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~109~ Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||२०...|| नियुक्ति: [२७४-२७९] प्रत सूत्रांक ||२०|| खप्नदर्शनम् , अभूदिति शेषः, कः?, यः 'अहिमंदर'त्ति अहिमन्दरयोः नागराजाचलराजयोः 'नंदिघोसे यत्ति' द्वादशतूर्यसङ्घातो नन्दी तस्या घोषः, स च खप्नमवलोकयतो जातः, तेन चासौ प्रतिबोधितः इत्युपस्कारः । इह च मिथिलापति मिरित्युक्ती मा भूत्तथाविधस्य तीर्थकरस्यापि नमः सम्भवायामोह इति 'द्वौ नमी वैदेही' इत्याधुक्त। तथा 'पुप्फुत्तरातोत्ति पुष्पोत्तरविमानाच्यवनं-भ्रंशनम्, एकसमयेनेति योज्यते, प्रव्रज्या च-निष्क्रमणं भवत्येकसमयेनैव, तथा प्रत्येकम्-एकैकं हेतुमाश्रित्य 'बुद्धाः' अवगततत्वाः प्रत्येकबुद्धाः, 'केवलिनः' उत्पन्नकेवलज्ञानाः, 'सिद्धिगताः' मुक्तिपदप्राप्ताः, त्रयाणामपि कर्मधारयः, एकसमयेनैवेति चतुर्णामपि समसमयसम्भवात् । तथा 'सेयं । सुजाय'ति श्रेतं वर्णतः सुजातं प्रथमत एवाहीनसमस्ताङ्गोपाङ्गतया, सुष्टु-शोभने विभक्ते-विभागेनावस्थिते शृङ्गेविषाणे यस्य स तथा तम् , ऋद्धूि-बलोपचयात्मिकाम् अनृद्धिः-तस्यैव बलापचयतस्तर्णकादिपरिभवरूपां 'समुपेहिया है ' ति सम्यगुत्प्रेक्ष्येति-पर्यालोच्य पाठान्तरतः 'समुत्प्रेक्षमाणो' वा कलिङ्गराजोऽपीत्यत्रापिशब्द उत्तरापेक्षया समुच्चये। तथा 'इन्द्रकेतुम्' इन्द्रध्वज 'प्रविलुप्यमान' मिति जनैः खखवस्त्रालङ्कारादिग्रहणतः इतवेतश्च विक्षिप्यमाणं । तथा| 'पूरावरेय'त्ति पूरः-पूर्णता अवरेको-रिक्तताऽनयोः समाहारे पूरावरेक । तथा 'समक्षरीपलवपुप्फचित्त' सह मअरी-2 भि:-प्रतीताभिः पल्लवैश्च-किशलयर्यानि पुष्पाणि-कुसुमानि तेचित्र:-कबुरः मञ्जरीपल्लवपुष्पचित्रस्तं, यद्वा सहमअरीपलयपुष्पैर्वर्तते यः स तथा चित्र-आश्चर्योऽनयोर्विशेषणसमासः, 'समिक्ख'त्ति आर्षत्वात् समीक्षते पर्यालोचयति, दीप अनुक्रम [२२८] For at arjainamratam पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~110~ Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२०|| दीप अनुक्रम [૨૨૮] उत्तराध्य. वृत्तिः ॥२०५॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || २०...|| निर्युक्तिः [२७४-२७९] अध्ययनं [९], अनेकार्थत्वादङ्गीकुरुते वा, वर्तमाननिर्देशः प्राग्वत्, यद्वा 'समिखति समैक्षिष्ट समीक्षितवान् 'धर्म' यतिधर्म । यदा 'ते' त्वया 'पैतृके' पितुरागते राज्ये कृता-विहिताः कृत्यानि कुर्वन्ति - अनुतिष्ठन्ति कृत्यकरा - नियोगिनो बहवः - प्रभूताः, तदैव कृत्यकरत्वं स्वयं तय कर्तुमुचितमासीदित्युपस्कारः, 'तेषामिति कृत्यकराणां कृत्यं - परापराधप(रिभावनादि कर्तव्यं 'परित्यज्य' प्रताङ्गीकारादपहाय अद्य 'कृत्यकरो' नियुक्तकः - अन्यदोषचिन्तको 'भवान्' त्वं, कि मिति जात इति शेषः । तथा 'मोक्खाय घडसी'ति प्राकृतत्वान्मोक्षाय - मोक्षार्थं 'घटते' चेष्टते, तथा 'अत्तणिस्सेसकारए' त्ति आत्मनो निःशेषमिति - शेषाभावं प्रक्रमात् कर्मणः करोति - विधत्त इत्यात्मनिःशेषकारकः, यद्वा 'णिस्सेस' त्ति निःश्रेयसो मोक्षस्तत्कारको । 'मोक्षमार्ग' मुक्तयध्वानं 'प्रतिपन्नेषु' अङ्गीकृतवत्सु साधुषु ब्रह्मचारिषु 'अहियत्थं' ति अहितार्थ 'निवारयन्' निषेधयन् 'न दोपं' परापवादलक्षणमस्येति शेषः, 'वक्तुम्' अभिधातुमर्हसि यथा हि भवान् अहितान्निवारयन् कथं गर्हसीत्यादि, एवं नमिरपि अद्य कृत्यकरो भवानिति कृत्यकरत्वलक्षणादहितान्निवारयति, तथा दुर्मुखोऽपि सञ्चयं किं करोषि ? इति सञ्चयत एवाहितान्निषेधयतीति नायं परापवाद इति वक्तुमुचितं यद्वा'अहियत्थं णिवारिंतो 'ति सुब्व्यत्ययादहितार्थान्निवारयन्तं न 'दोष'मिति मतुलोपान्न दोषवन्तं वक्तुमर्हसि तथा चार्षम् - "रूसक वा परो मा वा, बिसं वा परियत्तउ । भासियब्बा हिया भासा, सपक्खगुणकारिया ॥१॥" an Education intemational For Pan Private Onl नमिप्रत्र ज्याध्य. ९ ~111~ ॥ ३०५ ॥ janor पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [२७४-२७९] प्रत सूत्रांक द इत्यवसितो नामनिष्पन्नो निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनिष्पन्नस्यावसरः, स च सूत्रे सति भवतीति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तचेदम् चहऊण देवलोगाओ उववन्नो माणुसंमि लोगंमि । उपसंतमोहणिजो सरती पोराणियं जाई ॥१॥ त व्याख्या-युवा 'देवलोकात्' प्रतीतात् , 'उत्पन्नः जातः 'मानुषे' मानुषसम्बन्धिनि 'लोके' प्राणिगणे उप शान्तम्-अनुदयं प्राप्तं मोहनीयं-दर्शनमोहमीयं यस्यासावुपशान्तमोहनीयः ‘स्मरति चिन्तयति, स्मेति शेषः, वर्तमाननिर्देशो वा प्राग्वत् , कामित्याह-पोराणिय'ति पुराणामेव पौराणिकी, विनयादित्वात् ठक्, चिरन्तनीमित्यर्थः, 'जातिम्' उत्पत्ति, देवलोकादाविति प्रक्रमः, तद्गतसकलचेष्टोपलक्षणं घेह जातिरिति सूत्रार्थः । ततः४ किमित्याह जाई सरितु भयवं सहसंबुद्धो अणुत्तरे धम्मे । पुसं ठवित्तु रज्जे अभिनिक्खमति नमी राया ॥२॥ व्याख्या-'जातिम्' उक्तरूपां स्मृत्वा, भगशब्दो यद्यपि धैर्यादिष्वनेकेषु अर्थेषु वर्तते, यदुक्तं-"धैर्यसौभाग्यमा-18 हात्म्ययशोऽर्कश्रुतधीश्रियः । तपोऽर्थोपस्थपुण्येशप्रयत्नतनवो भगाः॥१॥” इति, तथापीह प्रस्तावाद्बुद्धिवचन एव गृह्यते, ततो भगो-बुद्धिर्यस्यास्तीति भगवान् , सहत्ति-खयमात्मनैव सम्बुद्धः-सम्यगवगततत्त्वः सहसम्बुद्धो, ॥ नान्येन प्रतियोधित इत्यर्थः, अथवा 'सहसत्ति आपत्वात् सहसा-जातिस्मृत्यनन्तरं झगित्येव बुद्धः, केत्याह दीप अनुक्रम [२२९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~112~ Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||R|| दीप अनुक्रम [२३०] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२|| निर्युक्ति: [२७९...] अध्ययनं [९], उत्तराध्य. 'अनुत्तरे' प्रधाने 'धर्मे' चारित्रधर्मे 'पुत्रं' सुतं 'स्थापयित्वा' निवेश्य, क्क ? - राज्ये 'अभिनिष्क्रामति' धर्माभिमुख्येन गृहस्थपर्यायान्निर्गच्छति, स्मेतीापि शेषः, ततश्च प्रत्रजितवानित्यर्थः, प्राग्वत् तिव्यत्ययेन वा व्याख्येयं, 'नमिः' बृहद्वृत्तिः ४ नमिनामा राजा पृथिवीपतिरिति सूत्रार्थः ॥ स्यादेतत् कुत्रावस्थितः १ कीदृशान् वा भोगान् भुक्त्वा सम्बुद्धः १ किं वाऽभिनिष्क्रामन् करोतीत्याह ॥३०६ ॥ सो देवलोगसरिसे अंडरवरगतो वरे भोए । भुंजित्तु णमी राया वुद्धो भोगे परिचय ॥ ३ ॥ व्याख्या- 'सः' इत्यनन्तरमुद्दिष्टः 'देवलोगसरिसे'त्ति देवलोकभोगैः सदृशा देवलोकसदृशाः, मयूरव्यंसकादित्वान्मध्यपदलोपी समासः, 'अंते उरवरगतो' त्ति वरं- प्रधानं तच तदन्तःपुरं च वरान्तःपुरं तत्र गतः स्थितो वराअन्तःपुरगतः, प्राकृतत्वाच वरशब्दस्य परनिपातः, वरान्तःपुरं हि रागहेतुरिति तद्गतस्य तस्य भोगपरित्यागाभिधानेन जीववीर्योल्लासातिरेक उक्तः, तत्रापि कदाचिद्वराः शब्दादयो न स्युः तत्सम्भवे वा सुबन्धुरिव कुतश्चिन्निमित्तान्न भुञ्जीतापीत्याह-'वरानू' प्रधानान् 'भोगानू' मनोज्ञशब्दादीन् 'मुक्त्वा' आसेव्य 'नमि:' नमिनामराजा 'बुद्धः' विज्ञाततत्त्वः 'भोगान्' उक्तरूपान् परित्यजति, स्पेति शेषः । इह पुनर्भोगग्रहणमतिविस्मरणशीला अप्यनुप्राया एवेति ज्ञापनार्थमिति सूत्रार्थः ॥ किं भोगानेच त्यक्त्वाऽभिनिष्क्रान्तवान् १ उतान्यदपीत्याह मिलिं सपुरजणवयं बलमोरोहं च परिपणं सव्वं । चेच्चा अभिभिक्खंतो एगतमहिडिओ भयवं ॥ ४ ॥ Education intemational For Parna Prato ne नमिप्रत्र ज्याध्य. ९ ~113~ ॥ ३०६ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||४|| नियुक्ति: [२७९,,,] प्रत सूत्रांक ||४|| व्याख्या-'मिथिला मिथिलानाम्नी नगरी, सह पुरैः-अन्यनगरैर्जनपदेन च वर्तते या सा तथोक्ता तां न त्वेकामेय, 'वलं' हस्त्यश्चादि चतुरङ्गम् 'अवरोधं च अन्तःपुरं 'परिजनं' परिवर्ग 'सर्व' निरवशेषं, न तु तथाविधप्रतिबन्धानास्पदं किञ्चिदेव 'त्यक्त्वा' अपहाय 'अभिनिष्क्रान्तः प्रत्रजितः, 'एगंत'त्ति एक:-अद्वितीयः कर्मणामन्तो यस्मिनिति, मयूरव्यंसकादित्वात् समासः, तत एकान्तो-मोक्षस्तम् 'अधिष्ठितः' इव आश्रितवानिवाधिष्ठितः, तदुपाय। सम्यग्दर्शनाद्यासेवनादधिष्ठित एव वा, इहैव जीवन्मुक्त्यवासेः, यद्वैकान्तं-द्रव्यतो विजनमुद्यानादि भावतश्च सदा al"एकोऽहं न च मे कश्चिन्नाहमन्यस्य कस्यचित् । न तं पश्यामि यस्याहं, नासौ दृश्योऽस्ति यो मम ॥१॥" इति भावनात एक एवाहमित्यन्तो-निश्चय एकान्तः, प्राग्वत् समासः, तमधिष्ठितः, 'भगवान्' इति धैर्यवान् श्रुतवान् वेति सूत्रार्थः ॥ तत्रैवमभिनिष्कामति यदभूत्तदाह-यदिवा यदुक्तं 'सर्व परित्यज्याभिनिष्क्रान्त' इति, तत्र कीरक् तत् त्यज्यमानमासीदित्याहकोलाहलगभूतं आसी मिहिलाए पब्वयंतमि । तइया रायरिसिम्मि नमिम्मि अभिनिक्खमंतमि ॥५॥ व्याख्या-कोलाहला-विलपिताऽऽक्रन्दितादिकलकलः कोलाहल एव कोलाहलकः स भूत इति-जातो यस्मिंस्तत् * कोलाहलकभूतम् आहितादेराकृतिगणत्वान्निष्ठान्तस्य परनिपातः, यदिवा भूतशब्द उपमार्थः, ततः-कोलाहलकभूत मिति कोलाहलकरूपतामिवापन्नं हा तात ! मातरित्यादिकलकलाकुलिततया 'आसीत्' अभूत् मिथिलायां, सर्व गृह-15 -04-HORRORK -3434%AC दीप अनुक्रम [२३२] -%AGES पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~114 Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||५|| नियुक्ति : [२७९...] प्रत सूत्रांक ||५|| उत्तराध्य. ६ विहारारामादीति प्रक्रमः, क्क सति -प्रव्रजति' प्रवज्यामाददाने 'तदा' तस्मिन् काले, राजा चासौ राज्यावस्था- नमिप्रनबृहद्वृत्तिः माश्रित्य ऋषिश्च तत्कालापेक्षया राजर्षिः, यदिवा राज्यावस्थायामपि ऋषिरिव ऋषिः-क्रोधादिषड्वर्गजयात् , ज्याध्य.९ तथा च राजनीति:-"कामः क्रोधस्तथा लोभो, हर्षो मानो मदस्तथा । षड्वर्गमुत्सृजेदेनं, तस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः १३०७॥18॥१॥" तस्मिन् 'नमो' नमिनानि, 'अभिनिष्क्रामति' गृहात् कपायादिभ्यो वा निर्गच्छतीति सूत्रार्थः ॥ पुन-2 रित्रान्तरे यदभूत्तदाह अभुद्वियं रायरिसिं, पव्वजाठाणमुत्तमं । सक्को माहणरूवेणं, इमं वयणमव्यवी ॥६॥ 18|व्याख्या-'अभ्युत्थितम्' अभ्युद्यतं 'राजर्षि प्राग्वत् प्रव्रज्यैव स्थानं तिष्ठन्ति सम्यग्दर्शनादयो गुणा अस्मिन्निति कृत्वा प्रव्रज्यास्थानं, प्रतीति शेषः, 'उत्तम प्रधान, सुब्व्यत्ययेन सप्तम्यर्थे वा द्वितीया, ततः प्रव्रज्यास्थान उत्तमे 'अभ्युपगतं तद्विषयोधमवन्तं 'शकः' इन्द्रो 'माहनरूपेण' ब्राह्मणवेषेण, आगत्येति शेषः, तदा हि तस्मिन् महामनि प्रव्रज्यां ग्रहीतुमनसि तदाशयं परीक्षितुकामः खयमिन्द्र आजगाम, ततः स 'इदं वक्ष्यमाणम्, उच्यत इति el वचनं-वाक्यम् 'अत्रवीत् उक्तवानिति सूत्रार्थः॥ यदुक्तवांस्तदाह ॥३०७॥ किं नु भो अज मिहिलाए, कोलाहलगसंकुला । सुचंति दारुणा सद्दा, पासाएसु गिहेसु अ॥७॥ | व्याख्या-'किम्' इति परिप्रश्ने 'नु' इति वितर्के 'भो' इत्यामन्त्रणे 'अद्य' एतस्मिन् दिने 'मिथिलायां' नगयों कोला दीप अनुक्रम [२३३] SamEducatam international For P an पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~115 Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक |||| दीप अनुक्रम [२३५] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||७|| निर्युक्ति: [२७९...] अध्ययनं [९], हलकेन-बहलकलकलात्मकेन सङ्कुलाः व्याकुलाः कोलाहलकसंकुलाः 'श्रूयन्ते' इत्याकर्ण्यन्ते 'शब्दा' ध्वनय इति सम्बन्धः, ते च कदाचिद्वन्दिवृन्दोदीरिता अपि स्युः तन्निराकरणायाह — दारयन्ति जनमनांसीति दारुणाः - विलपिताऽऽक्रन्दितादयः, व पुनस्ते ? - 'प्रासादेषु' सप्तभूमादिषु 'गृहेषु' सामान्यवेश्मसु यद्वा 'प्रासादो देवतानरेन्द्राणा'मितिवचनात् प्रासादेषु देवतानरेन्द्रसम्वन्धिष्यास्पदेषु 'गृहेषु' तदितरेषु चशब्दात्रिकचतुष्कचत्वरादिषु चेति सूत्रार्थः ॥ ततश्च- एयम निसामित्ता, हेडकारणचोइओ । ततो णमी रायरिसी, देविंदं इणमब्बवी ॥ ९ ॥ व्याख्या–‘एनम्' अनन्तरोक्तम् 'अर्थ' इत्युपचारादर्थाभिधायिनं ध्वनिं 'निशम्य' आकर्ण्य हिनोति - गमयति विवक्षितमर्थमिति हेतुः, स च पञ्चावयववाक्यरूपः कारणं च - अन्यथाऽनुपपत्तिमात्रं ताभ्यां चोदितः प्रेरितः हेतुकारणचोदितः, कोलाहलकसङ्कला दारुणाः शब्दाः श्रूयन्त इत्यनेन हि उभयमेतत् सूचितं, तथाहि - अनुचितमिदं भवतोऽभिनिष्क्रमणमिति प्रतिज्ञा, आक्रन्दादिदारुणशब्दहेतुत्वादिति हेतु:, प्राणव्यपरोपणादिवदिति दृष्टान्तः, यद्यदाक्रन्दादिदारुणशब्दहेतुस्तत्तद्धर्मार्थिनोऽनुचितं यथा प्राणव्यपरोपणादि, तथा चेदं भवतोऽभिनिष्क्रमणमित्युपनयः, तस्मादाक्रन्दादिदारुणशब्दादिहेतुत्वादनुचितं भवतोऽभिनिष्क्रमणमिति निगमनमिति पञ्चावयवं वाक्यमिह हेतुः शेषावययविवक्षाविरहितं त्वाक्रन्दादिदारुणशब्दहेतुत्वं भवदभिनिष्क्रमणानुचितत्वं विनाऽनुपपन्न For Parna Prat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३ ], मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः | अत्र सूत्रक्रम ८ वर्तते, मूल संपादने स्खलनत्वात् तस्य क्रम ९” मुद्रितं ~116~ Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||९|| नियुक्ति : [२७९...] नामपत्र ज्याध्य.९ प्रत सूत्रांक ||९|| उत्तराध्य. मिति एतावन्मात्रं कारणम् , अनयोस्तु पृथगुपादानं प्रतिपाद्यभेदतः साधनवाक्यवैचित्र्यसूचनार्थ, तथा चाह श्रुतकेबृहद्धृत्तिः वली-'कत्थवि पंचावयवं दसहा वा सम्बहा ण पडिसिद्धं । ण य पुण सर्व भण्णइ हंदी सवियारमक्खायं ॥१॥" दतथा-"जिणवयण सिद्धं चेव भण्णती कत्थती उदाहरणं । आसज उ सोयारं हेऊवि कहिंचि बोत्तधो ॥२॥" ॥३०॥ अथवाऽन्वयव्यतिरेकलक्षणो हेतुः, उपपत्तिमात्रं तु दृष्टान्तादिरहितं कारणं, यथा निरुपमसुखः सिद्धो ज्ञानानावा धप्रकर्षात्, अन्यत्र हि निरुपमसुखासम्भवात् नोदाहरणमस्ति, दृष्टान्तश्च प्रकृष्टमत्यादिज्ञानानाबाधाः परमसुखिनो मुनय इति ज्ञानानाबाधप्रकर्षः निरुपमसुखत्वे हेतुरुच्यते, तथा च पूज्याः-"हेतू अणुगमवइरेगलक्षणो सज्झवत्थुपजातो। आहरणं दिलुतो कारणमुववत्तिमेत्तं तु ॥१॥" इह हि आक्रन्दादिदारुणशब्दहेतुत्वमेव हेतुः, तस्सोक्तन्यायनान्थयान्वितत्वात् , सति चान्वये व्यतिरेकस्यापि सम्भवात् , इदमेव चान्वयव्यतिरेकविकलतया विवक्षितमुप४/पत्तिमात्रं कारणम्, एवं सर्वत्र कारणभावना कार्येत्यलं प्रसङ्गेन, प्रकृतमेव सूत्रमनुत्रियते, 'ततः' प्रेरणाऽनन्तरं 'नमिः' नमिनामा राजर्षिः 'देवेन्द्र' शक्रम् इदं वक्ष्यमाणम् 'अब्रवीत् उक्तवानिति सूत्रार्थः ॥ किं तदुक्तवानित्याह१ कुत्रापि पञ्चावयव दशधा या सर्वथा न प्रतिषिद्धम् । न च पुनः सर्व भण्यते हन्दि सविचारमाख्यातम् ॥ १॥ जिनवचनं सिद्ध स मेव भण्यते कुत्रचिदुदाहरणम् । आसाद्य तु श्रोतारं हेतुरपि कुत्रचिद्वक्तव्यः ॥ २ ॥२ हेतुरनुगमन्यतिरेकलक्षणः साध्यवस्तुपयर्यायः ।। आहरणं दृष्टान्तः कारणमुपपत्तिमात्र तु ॥१॥ दीप अनुक्रम [२३६] ॥३०८॥ matt For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~117 Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||१०|| नियुक्ति: [२७९...] % % % प्रत सूत्रांक ||१०|| **485 मिहिलाए चेइए बच्छे, सीतच्छाए मणोरमे । पत्तपुष्फफलोवेते, यहूर्ण बहुगुणे सता॥१०॥ ब्याख्या-मिथिलायां' पुरि चयनं चितिः-इह प्रस्तावात् पत्रपुष्पायुपचयः, तत्र साधुरित्यन्ततःप्रज्ञादेराकृतिगणत्वात खार्थिकेऽणि चैत्यम्-उद्यानं तस्मिन्, 'वच्छे'त्ति सूत्रत्वाद्धिशन्दलोपे वृक्षः शीता-शीतला छाया यस्य तच्छीतच्छायं तस्मिन् , मनः-चित्तं रमते-धृतिमानोति यस्मिन् तन्मनोरम-मनोरमाभिधानं तस्मिन्, पत्रपुष्पफलानि प्रतीतानि तैरुपेतं-युक्तं पत्रपुष्पफलोपेतं तस्मिन् , 'बहूनां प्रक्रमात् खगादीनां, बहवो गुणा यस्मात्चत् तथा : तस्मिन् , कोऽर्थः-फलादिभिः प्रचुरोपकारकारिणि 'सदा' सर्वकालमिति सूत्रार्थः ॥ तत्र किमित्याह वाएण हीरमाणंमि, चेइयंमि मणोरमे । दुहिया असरणा अत्ता, एए कंदति भो! खगा ॥१०॥ | व्याख्या-'वातेन' वायुना 'हियमाणे इतस्ततः क्षिप्यमाणे, वातश्च तदा शक्रेणैव कृत इति सम्प्रदायः, चितिरिहेष्टकादिचयः, तत्र साधुः-योग्यश्चित्यः प्राग्वत् , स एव चैत्यस्तस्मिन् , किमुक्तं भवति ?-अधोवद्धपीठिके उपरि चोच्छृितपताके 'मनोरमे' मनोऽभिरतिहेती, वृक्ष इति शेषः, दुःखं सजातं येषां ते दुःखिताः 'अशरणाः' त्राणरहिता अत एव 'आर्ताः' पीडिताः 'एते' प्रत्यक्षाः 'क्रन्दन्ति' आक्रन्दशब्दं कुर्वन्ति 'भो' इत्यामन्त्रणे 'खगाः' पक्षिणः । इह च किमद्य मिथिलायां दारुणाः शब्दाः श्रूयन्ते ? इति यत्खजनजनाक्रन्दनमुक्तं तत् खगक्रन्दन १ साक्षादाकृतिगणवेनानुक्तेः दीप अनुक्रम [२३७]] SamEditatumhamasana For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: मूल संपादने अत्र स्खलनत्वात १०" इति सूत्रक्रम द्वीवारान् मुद्रितं ~118~ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||१०|| नियुक्ति: [२७९...] 10नर्मिप्रम बृहत ज्याध्य. PROGR प्रत १२. सूत्रांक ||१०|| [प्रायम् , आत्मा च वृक्षकल्पः, तत्त्वतो हि नियतकालमेव सहावं स्थितत्वेन उत्तरकालंच खखगतिगामितया द्रुमा-11 |श्रितखगोपमा एवामी स्वजनादयः, उक्तं हि-"यद्वद् द्रुमे महति पक्षिगणा विचित्राः, कृत्वाऽऽश्रयं हि निशि| दयान्ति पुनःप्रभाते । तद्वजगत्यसकृदेव कुटुम्बजीवाः, सर्वे समेत्य पुनरेव दिशो भजन्ते ॥१॥” इति, ततश्चाऽऽ क्रन्दादिदारुणशब्दहेतुत्वं हेतुत्वेनाभिधीयमानमसिद्धम् , एते हि खजनादयो वातेर्यमाणद्रुमविश्लिष्यत्खगा इव ४ खखप्रयोजनहानिमेवाऽऽशङ्कमानाः क्रन्दन्ति, आह च-"आत्मार्थ सीदमानं खजनपरिजनो रौति हाहारवार्ता,भार्या चात्मोपभोगं गृहविभवसुखं स्वं च यस्याश्च कार्यम् । क्रन्दत्यन्योऽन्यमन्यस्त्यिह हि बहुजनो लोकयात्रानिमित्तं, यो वाऽन्यस्तत्र किञ्चिन्मृगयति हि गुणं रोदितीष्टः स तस्मै ॥१॥" एवं चाऽऽक्रन्दादिदारुणशब्दानामभिनिष्क्रमणहेतुकत्वमसिद्धं, खप्रयोजनहेतुकत्वात् तेषां, तथा च भवदुक्के हेतुकारणे असिद्धे एवेत्युक्तं भवतीति सूत्रार्थः ॥ ततश्चएयमहूँ निसामित्ता, हेउकारणचोइओ। ततो णमि रायरिसिं, देविंदो इणमन्यवी ॥ ११ ॥ ४ ॥३०॥ व्याख्या-एनमर्थं निशम्य हेतुकारणयोः अनन्तरसूत्रसूचितयोश्चोदितः-असिद्धोऽयं भवदभिहितो हेतुः ४ कारणं चेत्यनुपपत्त्या प्रेरितः हेतुकारणचोदितः, ततो नर्मि राजपि देवेन्द्रः 'इदं वक्ष्यमाणम् अब्रवीत् इति सूत्रार्थः ॥ ल दीप अनुक्रम [२३८] हैं किं तदित्याह DAREoucatininematumal FmemaraPwwtumom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~119~ Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१२|| दीप अनुक्रम [२४०] Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१२|| निर्युक्ति: [२७९...] अध्ययनं [९], एस अग्णी अ वाओ अ, एयं डज्झति मंदिरं । भगवं ! अंतेउरंतेणं, कीस णं नावपिक्खह ॥ १२ ॥ व्याख्या -- 'एप' इति प्रत्यक्षोपलभ्यमानः 'अग्निश्च' वैश्वानरः 'वातश्च' पवनस्तथा 'एतदिति प्रत्यक्षं 'दह्यते' भस्मसात् क्रियते, प्रक्रमाद्वातेरितेनाग्भिनैव, 'मन्दिर' वेश्म, भवत्सम्बन्धीति शेषः, भगवन्निति पूर्ववद्, 'अन्तेउरंतेणं' ति अन्तः पुराभिमुखं 'कीस 'त्ति कस्मात् ? 'णम्' इति वाक्यालङ्कारे 'नावप्रेक्षसे' नावलोकसे । इह च यद्यदात्मनः स्वं तत्तद्रक्षणीयं यथा ज्ञानादि, स्वं चेदं भवतोऽन्तःपुरमित्यादिहेतुकारणभावना प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ ततश्च ' एवं ' सूत्रं (१३) प्राग्वत् ॥ किमब्रवीत् ? इत्याह सुहं वसामो जीवामो, जेसि मो नत्थि किंचणं । मिहिलाए डज्झमाणीए, न मे इज्झर किंचणं ॥ १४ ॥ व्याख्या- 'सुख' यथा भवत्येवं 'वसामः' तिष्ठामः 'जीवामः प्राणान् धारयामः, येषां 'मो' इत्यस्माकं 'नास्ति' न विद्यते 'किञ्चन' वस्तुजातं, यतः - 'एकोऽहं न च मे कश्चित् खपरो वाऽपि विद्यते । यदेको जायते जन्तुर्भियतेऽप्येक एव हि ॥ १ ॥” इति न किञ्चिदन्तःपुरादि मत्सत्कं यतश्चैवमतो 'मिथिलायाम् अस्यां पुरि दद्यमानायां न मे दाते 'किञ्चन' खल्पमपि, मिथिलाग्रहणं तु न केवलमन्तः पुराद्येव न मत्सम्बन्धि किन्त्वन्यदपि खजनजनादि । स्वस्वकर्मफलभुजो हि जन्तवः तथा तथाऽस्मिन् भ्राम्यन्तीति किमत्र कस्य स्वं परं चेति ख्यापनार्थं । ततश्चानेन For Parsons Privat janetary org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 120~ Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||१५-१६|| नियुक्ति: [२७९...] नमिमत्र प्रत ज्याध्य.९ बृहद्वृत्तिः सूत्रांक ||१५-१६|| उत्तराध्यः ४/प्रागुक्तहेतोरसिद्धत्वमुक्तम्, तत्त्वतो ज्ञानादिव्यतिरिक्तस्य सर्वस्याखकीयत्वादित्यादिचर्चः प्राग्वदिति सूत्रार्थः॥ एतदेव तिच भाषयितुमाह चत्तपुत्तकलत्तस्स, निव्वावारस्स भिक्खुणो। पियं न विजई किंचि, अप्पियंपि न विजह ॥१५॥ ॥३१०॥ बहुं खु मुणिणो भई, अणगारस्स भिक्खुणो। सब्बतो विप्पमुकस्स, एगंतमणुपस्सओ ॥१६॥ व्याख्या-त्यक्ताः-परिहताः पुत्राश्च-सुताः कलत्राणि च-दारा येन स तथा तस्य, अत एव 'निर्व्यापारस्य परिहतकृषिपाशुपाल्यादिक्रियस्य 'भिक्षोः' उक्तरूपस्य 'प्रियम्' इष्टं 'न विद्यते' नास्ति 'किञ्चिद्' अल्पमपि, 'अप्रियमपि' अनिष्टमपि 'न विद्यते नास्ति, प्रियाप्रियविभागास्तित्वे हि सति पुत्रकलत्रत्यागं न कुर्यादेव, तयोरेवातिप्रतिबन्धविषयत्वादिति भावः, एतेन यदुक्तं-नास्ति किञ्चनेति तत्समर्थितं, तत् खकीयत्वं हि पुत्रायत्यागतोऽभिवङ्गतः स्यात् स च निषिद्ध इति, एवमपि कथं सुखेन वसनं जीवनं वत्याह-'बहु' विपुलं 'खुः' अवधारणे, बहेव |'मुनेः' तपखिनः 'भद्र' कल्याणं सुखं वा 'अनगारस्य' 'भिक्षोः' इति च प्राग्वत् , 'सर्वतः' बाह्यादभ्यन्तराञ्च, यद्वा खजनात् परिजनाच 'विप्रमुक्तस्य' इति पूर्ववत् , 'एकान्तम्' 'एकोऽहमित्यायुक्तरूपैकत्वभावनात्मकम् 'अनुपश्यतः' दूपर्यालोचयत इति सूत्रद्वयार्थः ॥ पुनरपि 'एय' सूत्रं प्राग्वत् (१७) पागारं कारइत्ता णं, गोपुरहालगाणि य । उस्सूलए सयग्घी य, ततो गच्छसि खत्तिया ॥१८॥ SCANCHECHNOCRACK दीप अनुक्रम [२४३-२४४] SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~121 Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||१७-१८|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक ||१७-१८|| & ब्याख्या-प्रकर्षण मर्यादया च कुर्वन्ति तमिति प्राकारस्तं-धूलीष्टकादिविरचित 'कारयित्वा' विधाप्य 'गोपुरा हालकानि च तत्र गोभिः पूर्यन्त इति गोपुराणि-प्रतोलीद्वाराणि, गोपुरग्रहणमर्गलाकपाटोपलक्षणम् , अट्ठालकानि-1 प्राकारकोष्ठकोपरिवर्तीनि आयोधनस्थानानि 'उस्मूलय'त्ति खातिका परबलपातार्थमुपरिच्छादितगर्ता या 'सयग्घी शायति शतं प्रन्तीति शतभ्यः, ताश्च यत्रविशेषरूपाः, 'ततः' एवं सकलं निराकुलीकृत्य 'गच्छसी'ति तिव्यत्ययादछ, क्षताायत इति क्षत्रियस्तत्सम्बोधनं हे क्षत्रिय !, हेतूपलक्षणं चेदं, स चार्य-यः क्षत्रियः स पुररक्षा प्रत्यवहितः, यथोदितोदयादिः, क्षत्रियश्च भवान् , शेष प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ ततः 'एयं' (१९) सूत्रं प्राग्वत्। सणगरि किच्चा, तवसंवरमग्गलं । खंतिं निउणपागारं, तिगुतं दुष्पधंसयं ॥२०॥ धणुं परफर्म किया, जीवं च ईरियं सदा । घिई च केयणं किचा, सचेणं परिमंथए ॥२१॥ तवनारायजुत्तेणं, भेत्तूणं कम्मकंचुअं । मुणी विगयसंगामो, भवाओ परिमुच्चति ॥२२॥ व्याख्या-'श्रद्धां' तत्त्वरुचिरूपामशेषगुणाधारतया 'नगरी पुरीं 'कृत्वा' हृदि विधाय, अनेन च प्रशमसंवेगादीनि गोपुराणि कृत्वेत्युपलक्ष्यते, अर्गलाकपाटं तर्हि किमित्याह-तपः-अनशनादि बाह्यं तत्प्रधानः संवर:-आश्रवनिरोधलक्षणस्तपःसंवरतं, मिथ्यात्वादिदुधुनिवारकत्वेन अर्गला-परिघस्तत्प्रधानं कपाटमप्यर्गलेत्युक्तं, ततोऽर्गलाम्-अर्गलाकपाटं कृत्वेति सम्बन्धः, प्राकारः क इत्याह-क्षांति क्षमा निपुणमिव निपुणं-शत्रुरक्षणं प्रति श्रद्धाविरोध्यनन्तानु दीप अनुक्रम [२४५-२४६] FaramanaSPrwara timonk पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~122 Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||१९-२२|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक ||१९-२२|| उत्तराध्य. वन्धिकोपोपरोधितया 'प्राकारं' शालं, कृत्येति सम्बन्धः, उपलक्षणं चैषां मानादि निरोधिनां मार्दवादीनां, तिसृभिः- नमिप्रवबृहद्वृत्तिः अट्टालकोचूलकशतधीसंस्थानीयाभिर्मनोगुप्त्यादिभिर्गुप्तिभिः गुप्तं त्रिगुप्त, मयूरव्यंसकादित्वात् समासः, प्राकारस्य वि साज्याध्य.९ शेषणं, अत एव दुःखेन प्रधृष्यते-परैरभिभूयत इति दुष्प्रधर्षः स एव दुष्प्रधर्षकस्तं, पठन्ति च-खंतिं निउणं पागारं ४ ॥३११॥1: तिगुत्तिदुप्पधंसयंति, स्पष्टं । इत्थं यदुक्तं 'प्राकारादीन् कारयित्वे ति तत्प्रतिषचनमुक्तं, सम्प्रति तु प्राकाराहालके-14 ववश्यं योद्धव्यं, तथ सत्सु प्रहरणादिषु प्रतिविधेये च वैरिणि सम्भवत्यत आह-'धनुः' कोदण्डं 'पराक्रम' जीव४/वीर्योलासरूपमुत्साहं कृत्वा 'जीवां च' प्रत्यञ्चां च 'म्' ईर्यासमितिमुपलक्षणत्वाच्छेपसमितीच 'सदा' सर्वकालं, तद्विरहितस्य जीववीर्यस्याप्यकिञ्चित्करत्वात् , 'धृति च धर्माभिरतिरूपां 'केतन' शृङ्गमयधनुर्मध्ये काष्ठमयमुष्टिकात्मकं, ननु तदुपरि स्नायुना निवध्यते इदं तु केन बन्धनीयमित्याह-'सत्येन' मनःसत्यादिना 'पलिमंथए'त्ति बनीयात् , ततः किमित्याह-'तपः' पविधमान्तरं परिगृह्यते, तदेव कर्म प्रत्यभिभेदितया 'नाराचः' अयोमयो बाणस्तद्युक्तेन प्रक्रमात् धनुषा, 'भित्त्या' विदार्य कर्म-ज्ञानावरणादि कक्षुक इव कर्मकचकस्तं, इह कर्मकञ्चकग्रहणेनैवात्मैवोद्धतो वैरीत्युक्तं भवति, वक्ष्यति च-"अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पडियसुपट्टियन्ति, कर्मणस्तु कशुकत्वं तद्गतमिथ्यात्वादिप्रकृत्युदयव- ॥३१॥ कार्तिनः श्रद्धानगरमुपरुन्धत आत्मनो दुर्निवारत्वात् , 'मुनिः प्राग्वत , कर्मभेदे जेवस्य जितत्वात् विगतः सङ्कामो यस्य | यस्माद्वेति विगतसङ्कामः-उपरतायाँधनः सन् , भवन्त्यस्मिन् शारीरमानसानि दुःखानीति भवः-संसारस्तस्मात परिमु दीप अनुक्रम [२४७-२५०] SamEducatimotimatent Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~1234 Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||२३-२४|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक ||२३-२४|| ६च्यते, एतेन च यदुक्तं-'प्राकारं कारयित्वे'त्यादि, तत्सिद्धसाधनम् , इत्थं श्रद्धानगररक्षणाभिधानात् भवतश्च तत्त्वत स्तदविज्ञतेति चोक्तं भवति, न च भवदभिमतप्राकारादिकरणे सकलशारीरमानसक्लेशवियुक्तिलक्षणा मुक्तिरवाप्यते, इतस्तु तदवाप्तिरपीति सूत्रत्रयार्थः ॥ एवं च तेनोक्ते 'एय' २३ सूत्रं प्राग्वत् ।| पासाए कारइत्ता णं, बहुमाणगिहाणि य । वालग्गपोइयाओ य, तओ गच्छसि खत्तिया! ॥ २४ ॥ व्याख्या-प्रसीदन्ति नृणां नयनमनांसि येषु ते प्रासादास्तान् उक्तरूपान् ‘बर्द्धमानगृहाणि च' अनेकधा वास्तुवि-1 द्याऽभिहितानि 'वालग्गपोइयातो यत्ति देशीपदं बलभीवाचकं, ततो वलभीश्च कारयित्वा, अन्ये त्वाकाशतडाग-12 मध्यस्थितं क्षुलकप्रासादमेव 'वालग्गपोइया य'त्ति देशीपदाभिधेयमाहुः, ततस्ताश्च क्रीडास्थानभूताः कारयित्वा, ततोऽनन्तरं गच्छ क्षत्रिय !। एतेन च यः प्रेक्षावान् स सति सामर्थे प्रासादादि कारयिता यथा ब्रह्मदत्तादिः, प्रेक्षायांश्च सति सामर्थे भवान् , इत्यादिहेतुकारणयोः सूचनमकारीति सूत्रार्थः ॥ एवं च शक्रेणोक्त 'एय' २५ सूत्रं प्राग्वत् ।-21 संसयं खलु सो कुणइ, जो मग्गे कुणई घर । जत्थेव गंतुमिच्छेज्जा, तत्थ कुविज सासयं ॥ २६ ॥ व्याख्या-संशीतिः संशयः-इदमित्थं भविष्यति नवेत्युभयांशावलम्बनः प्रत्ययस्तं, 'खलुः' एक्कारार्थः, ततः संशयमेव स कुरुते-यथा मम कदाचिद्मनं भविष्यतीति, यो मार्गे कुरुते गृहं, गमननिश्चये तत्करणायोगाद्, अहं तु न संशयित इत्याशयः, सम्यग्दर्शनादीनां मुक्ति प्रत्यवन्ध्यहेतुत्वेन मया निश्चितत्वादवाप्सत्वाचं, यदि नाम -SCOCCACA+ दीप अनुक्रम [२५१-२५२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~124 Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||२६|| नियुक्ति: [२७९...] ज्याध्य.९ बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||२६|| उत्तराध्य. न संशयितस्तथापि किमिहैव गृहं न कुरुषे ? अत आह-'यत्रैव' विवक्षितप्रदेशे 'गन्तुं' यातुम् 'इच्छेत्' अमिलषेत्न मित्र तत्य'त्ति व्यवच्छेदफलत्वाद्वाक्यस्य तत्रैव-जिगमिषितप्रदेशे 'कुर्वात' विदधीत खस्य-आत्मन आश्रयो वेश्म । खाश्रयस्तं, यद्वा शाश्वतं-निलं, प्रक्रमागहमेव, ततोऽयमर्थः-इदं तावदिहावस्थानं मार्गावस्थानप्रायमेव, यत्र तुला ॥३१२॥ || जिगमिषितमस्माभिस्तत् मुक्तिपदं, तदाश्रयविधाने च प्रवृत्ता एव वयं, ततस्तत्करणे प्रवृत्तत्वात्कथं प्रेक्षावत्त्वक्षतिः १, तथा च यः प्रेक्षावानित्याद्यपि तस्वतः सिद्धसाधनतयैवावस्थितमिति सूत्रार्थः ॥ ततः पुनरपि 'एय' (२७)। सूत्रं प्राग्वत् । ___ आमोसे लोमहारे य, गंठिभेए य तकरे । णगरस्स खेमं काऊणं, ततो गच्छसि खत्तिया ! ॥२८॥ व्याख्या-आ-समन्तात् मुष्णन्ति-स्तैन्यं कुर्वन्तीत्यामोषास्तान् , लोमानि-रोमाणि हरन्ति-अपनयन्ति प्राणिनां ये ते लोमहाराः, किमुक्तं भवति -अतिनिस्त्रिंशतया आत्मविघाताशकया च प्राणान् विहत्यैव ततः सर्वखमपहरन्ति, तथा च वृद्धाः-लोमहाराः प्राणहारा इति, तांश्च, प्रन्धि-द्रव्यसम्बन्धिनं भिन्दन्ति-घुघुरकद्विकर्तिकादिना विदारयन्तीति ग्रन्धिभेदास्तान , चशब्दो भिन्नक्रमः, ततस्तदेव कुर्वन्तीति तस्कराः सर्वकालं चौर्यकारिणस्तां-IM॥१२॥ च, यत आहुवैयाकरणा:-'तद्हतोः करपत्योश्चौरदेवतयोः सुटू तलोपश्च' (६-१-१५७ वाचिके) इह चोत्साघेति गम्यते 'प्रविश्य पिण्डी' मित्युक्तौ भक्षयतिवत् , यद्वा सप्तम्येवेयं बहर्थे चैकवचनं, ततश्चामोषादिषूपताप दीप अनुक्रम [२५४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~125 Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||२९-३०|| नियुक्ति : [२७९...] प्रत सूत्रांक ACAREy /२९ -३०|| कारिषु सत्सु 'नगरस्य' पुरस्य 'क्षेम' सुस्थं कृत्वा' विधाय 'ततः' तदनन्तरं गच्छ क्षत्रिय !, एतेनापि यः सधर्मा नृपतिः स इहाधर्मकारिनिग्रहकृत् , यथा भरतादिः, सधर्मनृपतिश्च भवानित्यादिहेतुकारणसूचना कृतैवेति सूत्रार्थः ॥ इत्थं शक्रोक्तो 'एय' २९ सूत्रं प्राग्वत् । असई तु मणुस्सेहिं, मिच्छादंडो पउंजइ । अकारिणोऽस्थ बज्झति, मुच्चई कारओ जणो॥३०॥ व्याख्या-'असकृदू' अनेकधा, 'तुः' एवकारार्थः, ततश्चासकृदेव 'मनुष्यैः' मनुजैः 'मिथ्या' व्यलीकः, किमुक्त भवति ?-अनपराधिष्वज्ञानाहङ्कारादिहेतुभिरपराधिष्विव दण्डनं दण्डः-देशत्यागशरीरनिग्रहादिः 'प्रयुज्यते' व्यापा-3 येते, कथमिदमित्याह-'अकारिणः' आमोषाधविधायिनः 'अत्र' इत्यस्मिन् प्रत्यक्षत उपलभ्यमाने मनुष्यलोके 'बध्यन्ते ।। निगडादिभिर्नियन्त्रयन्ते 'मुच्यते' त्यज्यते 'कारकः' विधायकः, प्रकृतत्वादामोषणादीनां, 'जनः' लोकः, तदनेन यदुक्तं प्राग्-'आमोपकाधुत्सादनेन नगरस्य क्षेमं कृत्वा गच्छेति, तत्र तेषां ज्ञातुमशक्यतया क्षेमकरणस्याप्यशक्यत्वमुक्त, यत्तु 'यः सधर्मेत्यादि' सूचितं, तत्रापरिज्ञानतोऽनपराधिनामपि दण्डमादधतां सधर्मनृपतित्वमपि तावचिन्त्यमित्यसिद्धता हेतोरिति सत्रार्थः ॥ एय'३१ सूत्रं प्राग्वत्, नवरमियता स्वजनान्तःपुरपुरादिप्रासादनृपतिधर्मविषयः किम। स्याभिष्वङ्गोऽस्ति ? नेति वेति विमृश्य सम्प्रति द्वेषाभावं विवेक्तुमिच्छर्षिजिगीषुतामूलत्वात् द्वेषस्य तामेव परीक्षितु कामः शक्र इदमुक्तवान् 4H- दीप अनुक्रम [२५७-२५८] RANG matt For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~126 Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||३१-३२|| नियुक्ति : [२७९...] - - प्रत सूत्रांक ||३१ RE- -३२|| उत्तराध्य. जे केइ पत्थिवा तुम्भ, नानमंति नराहिवा।। वसे ते ठावइत्ता णं, तओ गच्छसि खत्तिया!॥३२॥ व्याख्या-ये केचित् इति सामस्त्योपदर्शकं 'पार्थिवाः' भूपालाः, 'तुमति तुभ्यं 'नानमन्ति' न मर्यादया & बृहद्वृत्तिः | ज्याध्य.९ प्रतीभवन्ति, तुभ्यमिति च नमतियोगेऽपि चतुर्थीदर्शनात् , 'मात्रे पित्रे च सवित्रे च नमामी'त्यादिवददुष्टमेव, ॥३१३॥ पिठ्यते च-'तुम ति, तत्र च तवेति शेषविवक्षया पष्ठी, 'नराहिवा' इत्यत्र अकारो 'हस्वदीर्घा मिथ' इतिलक्षणात्, ततश्च हे 'नराधिप !' नृपते ! 'वशे' इत्यात्मायत्ती 'तानिति अनानमत्पार्थिवान् 'स्थापयित्वा' निवेश्य कृत्वेति-11 यावत्, ततो गच्छ क्षत्रिय ! । इहापि यो नृपतिः सोऽनमत्पार्थिवनमयिता, यथा भरतादिः, इत्यादिहेतुकारणे || अर्थतः आक्षिसे इति सूत्रार्थः ॥ एवं तु सुरपतिनोक्ते एय' ३३ सूत्रं प्राग्वत् । जो सहस्सं सहस्साणं, संगामे दुजए जिणे । एगं जिणेज अप्पाणं, एस से परमो जओ ॥ ३४ ॥ अप्पाणमेव जुज्झाहि, किं ते जुज्झेण बज्झओ। अप्पाणमेव अप्पाणं, जिणित्ता सुहमेहति ॥ ३५ ॥ __पंचिंदियाणि कोहं, माणंमायं तहेव लोहं च । दुजयं चेव अप्पाणं, सब्वमप्पे जिए जितं ॥३३॥ व्याख्या-'य' इत्यनुद्दिष्ट निर्देशे 'सहस्रं दशशतात्मकं सहस्राणां प्रक्रमात् सुभटसम्बन्धिनां 'सङ्ग्रामे युद्ध ॥३१३॥ 'दुजेये दुरापपरपरिभवे 'जयेद्' 'अभिभवेत् , सम्भावने लिट्, 'एकम्' अद्वितीयं 'जयेत्' यदि कथचिजीववीयर्योल्लास-1 तोऽभिभवेत् , कम् ?-'आत्मान' स्वं, दुराचारप्रवृत्तमिति गम्यते, 'एषः' अनन्तरोक्तः 'से' इति तस्य जेतुः सुभटदश - ---- - दीप अनुक्रम [२५९-२६०] -- - -- पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~127 Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||33 -३६|| दीप अनुक्रम [२६१ -२६२] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||३३-३६|| निर्युक्ति: [२७९...] शतसहस्रजयात् 'परमः प्रकृष्टः 'जयः' परेषामभिभवः, तदनेनाऽऽत्मन एवातिदुर्जयत्वमुक्तं, तथा च- 'अप्पाणमेवत्ति तृतीयार्थे द्वितीया, ततश्चाऽऽत्मनैव सह 'युध्यस्व' सङ्ग्रामं कुरु, यद्वा युद्धेरन्तर्भावितण्यर्थत्वात् युध्यखेति योधयस्व, कम् ? - आत्मानं, इहाप्यात्मनैव सहेति शेषः, किं ?, न किञ्चिदित्यर्थः, 'ते' तब 'युद्धेन' सङ्ग्रामेण 'बाह्यत' इति वा पार्थिवादिकमाश्रित्य यदिवा बाह्यत इति तृतीयार्थे तसिः, ततो वाह्येन युद्धेनेति सम्बध्यते, एवं च 'अप्पाणमेव 'त्ति आत्मनैवान्यव्यतिरिक्तेनाऽऽत्मानं स्वं 'जइत्त'ति जिल्ला 'सुखम्' ऐकान्तिकात्यन्तिकमुक्तिसुखात्मकम् 'एधते' इत्यनेकार्थत्वाद्धातूनां प्राप्नोति, अथवा 'सुहमे हए' त्ति शुभं - पुण्यमेधते - अन्तर्भावितण्यर्थत्वात् वृद्धिं नियति । कथमात्मन्येव जिते सुखावा सिरित्याह- 'पञ्चेन्द्रियाणि' श्रोत्रादीनि 'क्रोधः' कोपः 'मानः' अहङ्कारः 'माया' निकृतिः तथैव 'लोभव' गार्द्धलक्षणः 'दुर्जयः' दुरभिभवः, 'चः' समुचये, 'एव' इति पूरणे, अतति - सततं गच्छति तानि तान्यध्यवसायस्थानान्तराणीति व्युत्पत्तेः आत्मा- मनः, सर्वत्र च सूत्रत्वात् नपा निर्देशः, 'सर्वम्' अशेषमिन्द्रियादि उपलक्षणत्वान्मिथ्यात्वादि च, 'आत्मनि' जीवे 'जिते' अभिभूते 'जित' मिति अभिभूतमेव । ननु मनसि जिते | जितान्येवेन्द्रियादीनीति किं पृथक तजयाभिधानेन ?, सत्यं, तथापि प्रत्येकं दुर्जयत्वख्यापनाय पृथगुपन्यास इत्यदोषः, यद्वा- 'दुज्जयं चेव अप्पाणं'ति चकारो हेत्वर्थः, 'एवः' अवधारणे भिन्नक्रमच आत्मशब्दादनन्तरं द्रष्टव्यः, १ नपुंसकत्वेनेत्यर्थः Education intemational For Parsons Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~128~ Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||३७-३८|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक ||३७ -३८|| उत्तराध्य. ततश्च-यस्माद् 'आत्मैव' जीव एव दुर्जयः ततः सर्वमिन्द्रियाद्यात्मनि जिते जितम् , अनेन चेन्द्रियादीनामेव दुःखहेतु- नमिप्रान्त कत्वात्तजयतः सुखप्राप्तिः समर्थिता भवति । एवं च फलोपदर्शनद्वारेणैवंविधैव विजिगीपुता श्रेयसीत्याचष्टे, ततश्च । बृहद्वृत्तिः ज्याध्य.९ ४ यो नृपतिरित्याद्यपि तत्त्वतो विजिगीपुत्वदर्शनात् सिद्धसाधनतया प्रत्युक्तमिति सूत्रार्थः । भूयोऽपि-'एय' ३७ सूत्र ॥३१॥||प्राग्वत् । नवरमनन्तरपरीक्षातो द्वेषोऽप्यनेन परिहत इति निश्चित्य जिनप्रणीतधर्म प्रति स्थैर्य परीक्षितुकामः शक || इदमबोचत्8. जइत्ता विउले जन्ने, भोइत्ता समणमाहणे । दच्चा भोच्चा य जट्ठा य, ततो गच्छसि खत्तिया! ॥ ३९॥ ६ व्याख्या-'जइत्त'त्ति याजयित्वा 'विपुलान्' विस्तीर्णान् 'यज्ञान्' यागान् 'भोजयित्वा' अभ्यवहार्य श्रमणा श्र-निर्ग्रन्थादयो ब्राह्मणाच-द्विजाः श्रमणबामणास्तान्, 'दत्त्वा' द्विजादिभ्यो गोभूमिसुवर्णादीन् , मुक्त्वा च मनोज्ञशब्दादीन् दृष्ट्वा च राजर्षित्वावाप्ती खयं यागान् ततो गच्छ क्षत्रिय !, अनेन यद्यत्प्राणिप्रीतिकरं तत्तद्धर्माय, यथा हिंसोपरमादि, प्राणिप्रीतिकराणि चामूनि यागादीनीत्यादिहेतुकारणे सूचिते एवेति सूत्रार्थः ॥ शक्रवचनान-3 दन्तरम् 'एय' ३९ सूत्रं प्राग्वत् । जो सहस्सं सहस्साणं मासे मासे गवं दए। तस्साचि संजमो सेओ, अदितस्सवि किंचर्ण ॥ ४०॥ . व्याख्या-यः 'सहस्रं सहस्राणां दशलक्षात्मकं मासे मासे 'गवां' प्रतीतानां 'दए'त्ति दद्यात्, 'तस्यापि एव-४ दीप अनुक्रम [२६५-२६६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~129 Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||३९-४०|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक ||३९ -४०|| विधस्स दातुर्यदि कथञ्चिचारित्रमोहनीयक्षयोपशमेन 'संयमः आश्रयादिविरमणात्मकः स्यात् तदा स एव 'श्रेयान्' अतिशयप्रशस्यः, कथंभूतस्यापि ?-'अददतोऽपि' अयच्छतोऽपि 'किञ्चन' खल्पमपि वस्तु, यद्वा 'तस्सावित्ति तस्मादप्युक्तरूपाहातुरबधित्वेन विवक्षितात् , संयच्छति-प्राणिहिंसादिभ्यः सम्यगुपरमतीति सर्वधातूनां पचादिषु । है दर्शनादिति संयमः-संयमवान् , साधुरित्यर्थः, 'श्रेयान्' प्रशस्थतरः, अथवा तस्यापि दातुः प्रक्रमात् गोदानधर्मात् 'संयमः' उक्तरूपः श्रेयान् , शेषं पूर्ववत् , गोदानं चेह यागायुपलक्षणम् , अतिप्रभूतजनाचरितमित्युपात्तम् , एवं च | संयमस्ख प्रशस्थतरत्वमभिदधता यागादीनां सावद्यत्वमदावेदितं, तथा च यज्ञप्रणेतृभिरुक्तम्-“पट् शतानि है नियुज्यन्ते, पशूनां मध्यमेऽहनि । अश्वमेधस्य वचनान्यूनानि पशुभित्रिभिः ॥१॥" इयत्पशुवधे च कथमसावयता नाम ?, तथा दानान्यप्यशनादिविषयाणि धर्मोपकरणगोचराणि च धर्माय वर्ण्यन्ते, यत आह-"अशनादीनि । दानानि, धर्मोपकरणानि च । साधुभ्यः साधुयोग्यानि, देयानि विधिना बुधैः ॥१॥" शेषाणि तु सुवर्णगोभूदम्यादीनि प्राण्युपमर्दहेतुतया सायद्यान्येव, भोगानां तु सावद्यत्वं सुप्रसिद्धं । तथा च प्राणिप्रीतिकरत्वादित्यसिद्धो हेतुः, प्रयोगश्च-यत्सावधन तत प्राणिप्रीतिकरं, यथा हिंसादि. सावधानि च यागादीनि इति सूत्रार्थः ॥ 'एयम'। 11४१ सूत्रं प्राग्वत् । नवमित्थं जिनधर्मस्थैर्यमवधार्य प्रव्रज्यां प्रति दृढोऽयमुत नेति परीक्षणार्थ शक्र इदमवादी घोरासमं चहत्ता णं, अन्नं पत्थेसि आसमं । इहेव पोसहरओ, भवाहि मणुयाहिवा! ॥ ४२ ॥ दीप अनुक्रम [२६७-२६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~130 Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||४१-४२|| नियुक्ति: [२७९...] उत्तराध्य. प्रत ज्याध्य.९ बृहद्वृत्तिः ॥३१५॥ सूत्रांक ||४१ -४२|| व्याख्या-'घोरः' अत्यन्तदुरनुचरः, स चासावाश्रमश्च आङिति-खपरप्रयोजनाभिव्यात्या श्राम्यन्ति-खेदमनु- नमिप्रनभवन्त्यस्मिन्नितिकृत्वा घोराश्रमो-गार्हस्थ्यं, तस्यैवाल्पसत्त्वैर्दुष्करत्वात् , यत आहुः-"गृहाश्रमसमो धर्मो, न भूतो न । भविष्यति । पालयन्ति नराः शूराः, क्लीवाः पाखण्डमाश्रिताः॥१॥" तं त्यक्ता' अपहाय 'जहित्ता गं'ति क्वचित् । पाठः, तत्र च हित्वा-'अन्यत्' एतद्व्यतिरिक्तं कृषिपाशुपाल्यादि अशक्तकातरजनातिनिन्दितं 'प्रार्थयसे' अभिलपसि, 'आश्रमं प्रव्रज्यालक्षणं, नेदं क्लीवसत्त्वानुचरितं भवाशानामुचितमित्यभिप्रायः । तर्हि किमुचितमित्याह-'इह' अस्मिन्नेव गृहाश्रमे, स्थित इति गम्यते, पोषं-धर्मपुष्टिं धत्त इति पोषधः-अष्टम्यादितिधिषु व्रतविशेषः, तत्र रतःआसक्तः पोषधरतः 'भवाहित्ति भव, अणुव्रताधुपलक्षणमेतद्, अस्यैव चोपादानं पोषधदिनेष्ववश्यंभावतस्तपोऽनुछानख्यापकं, यत आह आससेनः-"सर्वेष्वपि तपोयोगः, प्रशस्तः कालपर्वसु । अष्टम्यां पञ्चदश्यां च, नियतं पोषधं|| बसेद् ॥१॥" इति 'मनुजाधिप ! नृपते ।। अत्र च घोरपदेन हेतुराक्षिप्तः, तथाहि-यद्यद् घोरं तत्तद् धर्मानिाऽनुष्ठेयं, यथाऽनशनादि, तथा चायं गृहाश्रमः, शेषमेतदनुसारतोऽभ्यूह्यमिति सूत्रार्थः ॥ ततश्च–'एय' सूत्र ॥४३॥ प्राग्वत्। ॥३१५॥ । मासे मासे उ जो बालो, कुसग्गेणं तु भुंजइ । न सो सुक्खायधम्मस्स, कलं अग्घइ सोलसिं ॥४४॥" ब्याख्या-'मासे मासे' इति वीप्सायां द्विर्वचनं, 'तुः' इहोत्तरत्र चैवकारार्थः, ततश्च मासे मास एव, न त्वेकस्सि दीप अनुक्रम [२६९-२७०] SamEducation intamatant पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~131 Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||४३-४४|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक ॥४३ -४४|| INI नेव मासेऽर्धमासादो वेति, 'यः कश्चिद् 'बालः' अविवेकः 'कुशाग्रेणैव' तृणविशेषप्रान्तेन भुते, एतदुक्तं भवति-|| यावत् कुशाग्रेऽवतिष्ठते तावदेवाभ्यवहरति नातोऽधिकम् , अथवा कुशाग्रेणेति जातावेकवचनं, तृतीया तु ओदनेनासौ भङ्ग इत्यादिवत् साधकतमत्वेनाभ्यवहियमाणत्वेऽपि विवक्षितत्वात् , 'न' इति निषेधे 'स' इति यः कशा गर्भस एवंविधकष्टानुष्ठाय्यपि सुष्टु-शोभन: सर्वसावद्यविरतिरूपत्वादाङिति-अभिव्याप्त्या ख्यातः-तीर्थकरा-12 दादिभिः कथितः खाख्यातः तथाविधो धर्मों यस्य सोऽयं स्वाख्यातधर्मा तस्य, चारित्रिण इत्यर्थः, 'कलो भागम् | 'अति' अर्हति, 'षोडशी' पोडशपूरणामित्युक्तं भवति, किं पुनस्तुल्योऽधिको वा ?, षोडशांशसमोऽपि न भवति, ततो यदुक्तम्-'यद्यद् घोरं तत्तद्धर्मार्थिनाऽनुष्ठेयमनशनादिवदिति, अत्र घोरत्वादित्यनैकान्तिको हेतुः, घोरस्यापि खाख्यातधर्मस्यैव धर्मार्थिनाऽनुष्ठेयत्वाद्, अन्यस्य त्वात्मविघातादिवत्, अन्यथात्वात् , प्रयोगश्चात्र-यत् खाख्यातधर्मरूपं न भवति घोरमपि न तद्धर्मार्थिनाऽनुष्ठेयं, यथाऽऽत्मवधादिः, तथा च गृहाश्रमः, तद्रूपत्वं चास्य सावद्यत्याद्धिंसावदित्यलं प्रसङ्गेन । शेपं प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ 'एय' ४५ सूत्रं प्राग्वत् । नवरं यतिधर्मे दृढोऽयमिति निश्चित्य दुरन्तोऽयमभिष्यत इति तदभावं परीक्षितमपि पुनः परीक्षितुमिदमिन्द्र उवाचहिरपणं सुवर्ण मणिमोसं, कंसं दूसं च बाहणं । कोसं च वड्डइत्सा णं, तओ गच्छसि खत्तिया! ॥ ४६ ।। व्याख्या-हिरण्यं स्वर्ण 'सुवर्ण' शोभनवर्ण' विशिष्टवर्णिकमित्यर्थः, यद्वा हिरण्यं-घटितवर्णमितरतु सवर्ण, दीप अनुक्रम [२७१ KOLESC -२७२] FairatanNM पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~132 Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||४५ -४६|| दीप अनुक्रम [२७३ -२७४] प्रतराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३१६॥ Educator [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्ति: [२७९...] अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||४५-४६ || मणयश्च - इन्द्रनीलादयो मुक्ताश्च-मौक्तिकानि मणिमुक्तं, तथा 'काय' कांस्यभाजनादि दूष्यं' वस्त्राणि, 'चः' स्वगतानेकभेदसंसूचकः, 'वाहनं' रथाश्वादि, पठन्ति च 'सवाहणं ति सह वाहनैर्वर्तत इति सवाहनं हिरण्यादीति सम्बन्धः, 'कोपं' भाण्डागारं चर्मलताद्यनेकवस्तुरूपं 'बहावइत्ता पंति वृद्धिं प्रापय्य ततः समस्तवस्तुविषयेच्छापरिपूर्ती गच्छ क्षत्रिय !, अयमाशयः यः साकाङ्क्षो नासौ धर्मानुष्ठानयोग्यो भवति, यथा मम्मणवणिक, साकाङ्क्षश्च भवान्, आकाक्षणीय हिरण्यादिवस्त्यपरिपूर्तेः, तथाविधद्रमकवदिति । शेषं प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ ततः 'एयं' ४७ सूत्रं प्राग्वत् । - सुवण्ण रूप्पस्स य पब्वया भवे, सिया हु केलाससमा असंखया । नरस्स लुद्धस्स न तेहि किंचि, इच्छा हु आगाससमा अणतया ॥ ४८ ॥ पुढवी साली जवा चैब, हिरण्णं पसुभिस्सह । पडिपुन्नं नालमेगस्स, इह विजा तवं चरे ॥ ४९ ॥ व्याख्या - सुवर्ण च रूप्यं च सुवर्णरूप्यमिति समाहारस्तस्य, 'तुः' पूरणे, यद्वाऽऽर्षत्वाद्विभक्तिलोपः, तुशब्दः समुधये, ततः स्वर्णस्य रूप्यस्य च पर्वता इव पर्वताः - पर्वतप्रमाणाः राशयो 'भवन्ति' भवेयुः, पर्वतप्रमाणत्वेऽपि च लघुपर्वतप्रमाणा एव स्युरत आह-' सिया हुति स्यात्- कदाचित्, हुरवधारणे भिन्नक्रमश्च, ततः 'कैलाससमा' एव कैलासपर्वततुल्या एव, न त्वन्यलघुपर्वतप्रमाणाः, तेऽपि 'असङ्ख्यकाः' सङ्ख्याविरहिताः, न तु द्वित्रा एव, नरस्य लुब्धस्य, उपलक्षणत्वात् स्त्रियाः पण्डकस्य था, न तैः कैलाशसमैरपि सुवर्णरूप्यपर्वतैः 'किञ्चिदपि' अल्पमपि परितोषोत्पादनं प्रति Liselk For Parsons Privat नमिप्रत्र ज्याध्य, ९ ~ 133 ~ ॥३१५॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||४७-४९|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक ||४७-४९|| 18क्रियत इति शेषः, पठ्यते च-'न तेणं'ति अत्र च सूत्रत्वाद्वचनव्यत्ययः, कुतः पुनरिदमित्याह-'इच्छा' अभिलाषः 'हु'-04 मारिति यस्मादाकाशेन समा-तुल्या आकाशसमा 'अनन्तिका' अन्तरहिता, तथा चैतदनुवादी वाचक:-"न तुष्टिरिह। शताजन्तोर्न सहस्रान्न कोटितः । न राज्यानच देवत्वान्नेन्द्रत्वादपि विद्यते ॥१॥" किं सुवर्णरूप्ये केवले एक नेच्छा-2 परिपतये इत्याशयाह-'पृथ्वी' मही 'शालयः' लोहितशाल्यादयः 'यवाः' प्रतीताः, 'चः शेषधान्यसमचयार्थः ।। एवः' अवधारणे स च भिन्नक्रमो नेत्यस्यानन्तरं योक्ष्यते, 'हिरण्यं' सुवर्ण, ताम्राथुपलक्षणमेतत् , 'पशुभिः' गवावादिभिः 'सह' साधैं 'प्रतिपूर्ण' समस्तं, पठन्ति च-'सचं तंति सर्वम्-अशेष, न तु कियदेव तत्-पृथिव्यादि न' इति नैव 'अलं' समर्थ, प्रक्रमादिच्छापरिपूर्तये 'एकस्य' अद्वितीयस्य, जन्तोरिति गम्यते, 'इति' एतत् श्लोक द्वयोक्तं 'विज'त्ति सूत्रत्वाद् विदित्वा, यद्वा 'इती'त्यस्माद्धेतोः 'विद्वान्' पण्डितः 'तपः' द्वादशविधं 'चरेत्' आसेवेत, दतत एव निःस्पृहतयेच्छापरिपूर्तिसम्भवादितिभावः । अनेन च सन्तोष एव निराकासतायां हेतुः, न तु हिरण्या दिवर्धनमित्युक्तं, तथा च हिरण्यादि वर्धयित्वेत्यत्र यदनुमानमुक्तं, तत्र साकाङ्गत्वलक्षणो हेतुरसिद्धः, न चाकाङ्क्षणी-4 यवस्वपरिपूर्तेस्तस्य सिद्धत्वं, सन्तुष्टतया ममाऽऽकाङ्क्षणीयवस्तुन एवाभावादिति सूत्रार्थः ।। भूयोऽपि 'एयं' ५० सूत्रं प्राग्वत् । नवरमविद्यमानविषयेषु विषयवाञ्छाविनिवृत्तोऽयमिति निश्चित्य सत्सु तेवभिष्वकोऽस्ति उत न वेति । विवेचयितुमिन्द्र उवाच दीप --- अनुक्रम [२७५-२७७] SamEducatimotimational For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~134 Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१], मूलं [-1 / गाथा ||५०-५१|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत ज्याध्य. बृहद्वृत्तिः सूत्रांक ||४७-४९|| उत्तराध्य. अच्छेरगमम्भुदए, भोए जहित्तु पत्थिवा!। असंते कामे पत्थेसि, संकप्पेण विहम्मसि ॥५१॥ व्याख्या-'अच्छेरगति आश्चर्य वर्तते, यत् त्वमेयंविधोऽपि 'अब्भुदए'त्ति अद्भुतकान् आश्चर्यरूपान् 'भोगाना कामान् 'जहासि' त्यजसि, पठ्यते च-'चयसित्ति, 'पार्थिव ! पृथिवीपते !, पाठान्तरतश्च क्षत्रिय !, अथवा ॥३१७॥ 'अब्भुयए'ति अभ्युदये, ततश्च यदभ्युदयेऽपि भोगांस्त्वं जहासि तदाश्चय वर्तते, तथा तत्त्यागतश्च 'असतः' अवि ४द्यमानान् कामान् 'प्रार्थयसे' अभिलपसि यत्तदप्याश्चर्यमिति सम्बन्धः, अथवाऽधिकस्तवात्र दोषः, 'सङ्कल्पेन' उत्त रोत्तराप्राप्तभोगाभिलापरूपेण विकल्पेन 'विहन्यसे' विविध बाध्यसे, एवंविधसङ्कल्पस्यापर्यवसितत्याद्, उक्तं हि"अमीषां स्थूलसूक्ष्माणामिन्द्रियार्थविधायिनाम् । शक्रादयोऽपि नो तृप्ति, विशेषाणामुपागताः ॥१॥" यहा 'अच्छेरगमभुदपत्ति मकारोऽलाक्षणिकः, ततश्च-आश्चर्याद्भुतयोरेकार्थत्वेऽप्युपादानमतिशयख्यापनार्थम्-अतिशयाद्भुतान् भोगान् जहासि पार्थिव ! असतश्च कामान् प्रार्थयसि यत्तत्सङ्कल्पेनैव उक्तरूपेण विहन्यसे-बाध्यसे, कथं ४ बन्यथा विवेकिनस्तवैतत् सम्भवेत् । अनेन च यः सद्विवेको नासौ प्राप्तान विषयानप्राप्ताकाङ्क्षया परिहरति, यथा । ब्रह्मदत्तचक्रवादिः, सद्विवेकश्च भवानित्यादिनीत्या हेतुकारणे सूचिते इति सूत्रार्थः॥ तदनु 'एय' ५२ सूत्रं प्राग्वत् ।-18/॥३१७॥ सल्लं कामा विसं कामा, कामा आसीविसोपमा । कामे पत्थेमाणा, अकामा जंति दुग्गई ।। ५३॥ व्याख्या-शलति-देहान्तश्चलतीति शल्यं-शरीरान्तःप्रविष्टं तोमरादि शल्यमिव शल्यं, के ते?-काम्यमानत्वात् -kCSC दीप अनुक्रम [२७५-२७७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~135 Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||५२ -५३|| दीप अनुक्रम [२८० -२८१] Jam Edicator [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||५२-५३|| निर्युक्तिः [२७९...] अध्ययनं [९], कामा:-मनोज्ञशब्दादयः, यथा हि शल्यमन्तश्वलद्विविधवाधाविधायि तथैतेऽपि, तस्थत एषामपि सदा वाधाविधायित्वात्, तथा वेवेष्टि-व्याप्नोतीति विषं तालपुटादि, विषमिव विषं कामाः, यथैव हि तदुपभुज्यमानं मधुरमित्यापातसुन्दरमिवाऽऽभाति, अथ च परिणतावतिदारुणमेवमेतेऽपि कामाः, तथा कामाः आस्यो- दंष्ट्रास्तासु विषमस्येत्याशीविषस्तदुपमाः, यथा ययमज्ञैरवलोक्यमानः स्फुरन्मणिफणाभूषित इति शोभन इव विभाव्यते, स्पर्शनादिभिरनुभूयमानश्च विनाशायैव भवति तथैतेऽपि कामाः, किं च कामान् 'प्रार्थयमाना' अभिलषन्तोऽपिशब्दस्य लुप्तनिर्दिष्टत्वात् प्रार्थयमाना अपि 'अकामा' इष्यमाणकामाभावात् 'यान्ति' गच्छन्ति 'दुर्गतिं' दुष्टां नरकादिगतिं, तदनेन न केवलं शल्यादिवदनुभूयमाना एवामी दोपकारिणः, किन्तु प्रार्थ्यमाना अपीत्युक्तं भवति । तथा च यः सद्विबेको नासो प्राप्तमग्रासकाङ्क्षया' इत्यादी सद्विवेकत्वमनैकान्तिको हेतुः, न वयमेकान्तः यथा प्राप्तमप्राप्तार्थे न परिहियते, प्राप्तस्वाप्यपायहेतोः तदुच्छेद काप्रात्यर्थं विधेकिभिः परिहियमाणत्वाद्, अनभ्युपगतोपालम्भश्चार्य, मुमुक्षूणां कचिदाकाङ्क्षाया एवासम्भवात् उक्तं हि - 'मोक्षे भये च सर्वत्र, निःस्पृहो मुनिसत्तमः' इति सूत्रार्थः ॥ कथं पुनः कामान् प्रार्थयमाना दुर्गतिं यान्ति ?, अत आह— अहे वय कोहेणं, माणेणं अहमा गई। माया गइपडिग्धाओ, लोहाओ दुहओ भयं ॥ ५४ ॥ व्याख्या- 'अघो' नरकगतौ 'प्रजति' गच्छति 'क्रोधेन' कोपेन, 'मानेन' अहङ्कारेण 'अधमा' नीचा गतिः, भव For Parsons Privat janetary org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 136~ Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||१४|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत +-04-%* सूत्रांक ||४|| उत्तराध्य. तीति गम्यते, 'माय'त्ति सुव्यत्ययात् 'मायया' परवञ्चनात्मिकया गतेः-प्रस्तावात् सुगतेः प्रतिघातो-विनाशो नमिप्रन गतिप्रतिघातो भवति, 'लोभाद्गाद्धलक्षणात् 'दुहतोचि द्विधा द्विप्रकारम्-ऐहिकं पारत्रिकं च भविष्यति अस्माबृहदृत्तिः |ज्याध्य.९ दिति भयं-दुःखं, तदाशङ्कातः साध्वसं वा, कामेषु हि प्रार्थ्यमानेष्ववश्यंभावी क्रोधादिसम्भवः, स चेय् इति | ॥३१८॥ कथं न तत्प्रार्थनातो दुर्गतिगमनमित्यभिप्रायः । यद्वा-सर्वमपि यदिन्द्रेणोक्तं तत् कषायानुपातीति तद्विपाकानुव दीर्णनमिदमिति सूत्रार्थः ॥ एवं बहुभिरप्युपायैस्तमिन्द्रः क्षोभयितुमशक्तः किमकरोदित्याह अवउज्झिऊण माहणरुवं विउरुब्धिऊण इंदत्तं । वंदति अभित्थुणंतो इमाहि महुराहि वग्गृहि ॥५५॥ अहो ते णिजिओ कोहो, अहो माणो पराइओ । अहो ते णिरकिया माया, अहो लोभो वसीको ॥५६॥ अहो ते अजवं साहू, अहो ते साहु ! मद्दवं । अहो ते उत्तमा खंती, अहो ते मुत्ति उत्तमा ।। ५७॥ अयउज्झियत्ति अपोब त्यक्त्वा 'ब्राह्मणरूप' धिग्वर्णवेषं 'विउरुविऊणं'ति विकृत्य 'इन्द्रत्वम्' उत्तरवैक्रियरूपमि-|| न्द्रस्वभावं 'वन्दते' अनेकार्थत्वात् प्रणमति अभिष्टुवन्' आभिमुख्येन स्तुतिं कुर्वन् , 'आभिः' अनन्तरं वक्ष्यमाणाभिः | ३१८॥ मधुराभिः' श्रुतिसुखाभिः' 'वग्गूर्हिति आर्षत्वाद्वाग्भिः-वाणीभिः, तद्यथा-'अहो' इति विस्मये 'ते' इति त्वया है। |नितराम्-अतिशयेन जितः अभिभूतः निर्जितः 'क्रोधः' कोपः, यतस्त्वमनमत्पार्थिववशीकरणप्रेरणायामपि न । क्षुभित इत्यभिप्रायः, तथा 'अहो' 'ते' त्वया 'मानः' अहमितिप्रत्ययहेतुः 'पराजितः' अभिभूतः, यस्त्वं मन्दिरं । दीप अनुक्रम [२८२] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~137 Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-1 / गाथा ||५५-५७|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक 9-% ||५५ -५७|| ANCE दखते इत्याधुक्तेऽपि कथं मयि जीवतीदमिति नाहङ्गतिं कृतवानिति, तथा 'अहो ते णरकिय'त्ति प्राकृतत्वान्निराकृता-अपास्ता माया, यस्त्वं पुररक्षाहेतुषु प्राकाराहालकोच्छूलकादिषु निकृतिहेतुकेष्यामोषकोच्छेदनादिषु च न मनो निहितवान् , तथा च अहो ते लोभो 'वशीकृत' इति नियन्त्रितः, यस्त्वं हिरण्यादि वर्द्धयित्वा गच्छेति सहेतुकमभिहितोऽपीच्छाया आकाशसमत्वमेवोदाहृतवान् , अत एव अहो 'ते' तव 'आजवम्' ऋजुत्वं साधु' शोभनम् , | अहो ते साधु 'मार्दयं मृदुत्वम् , अहो ते 'उत्तमा' प्रधाना 'शान्तिः' कोपोपशमलक्षणा, अहो ते 'मुक्तिः' निर्लोभता| उत्तमा, व्यत्ययनिर्देशस्त्वनानुपूर्यपि प्ररूपणाऽङ्गमितिकृत्वेति सूत्रत्रयार्थः ॥ इत्थं गुणोपवर्णनद्वारेणाभिष्टुत्य सम्प्रति है फलोपदर्शनद्वारेण स्तुवन्नाह इहंऽसि उत्तमो भंते !, पेचा होहिसि उत्तमो। लोगुत्तमुत्तमं ठाणं, सिद्धिं गच्छसि नीरओ ।।५८॥ व्याख्या-'इह' अस्मिन् जन्मनि 'असि' भवसि 'उत्तमः'प्रधानः, उत्तमगुणान्वितत्वात्, 'भंते'त्ति पूज्याभिधानं प्रेत्य' परलोके भविष्यसि उत्तमः, कथमित्याह-लोकस्य-चतुर्दशरज्यात्मकस्य 'उत्तमम्' उपरिवर्ति लोकोत्तमम् है उत्तम देवलोकाद्यपेक्षया प्रधानम् , अथवा 'लोगोत्तममुत्तमं ति मकारोऽलाक्षणिकः, ततो लोकस्य लोके वा उत्तमोत्तमम्-अतिशयप्रधानं लोकोत्तमोत्तम, तिष्ठत्यस्मिन् नातः परं गच्छतीति स्थानं, किं तदित्याह-"सिद्धि' ४/मुक्तिं 'गच्छसि त्ति सूत्रत्वाद्गमिष्यसि, निगेतो रजसः-कर्मण इति नीरजा इति सूत्रार्थः । उपसंहारमाह दीप अनुक्रम [२८३-२८५] SamEducatimlid Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~138~ Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||१९|| नियुक्ति: [२७९...] उत्तराध्य. ज्याध्य.९ बृहद्वृत्तिः प्रत ॥३१९॥ सूत्रांक ||५९|| एवं अभित्थुणतो रायरिसिं उत्तमाएँ सद्धाए । पायाहिणं करेंतो पुणो पुणो बंदती सक्को ॥ ५९॥ नमिप्रश्नव्याख्या-'एवम्' अमुनोक्तन्यायेन अभिष्टवन् 'राजर्षिम्' उक्तरूपं, प्रक्रमान्नमिम् , 'उत्तमया' प्रधानया 'श्रद्धयाला . भक्त्या 'पायाहिणन्ति प्रदक्षिणां 'कुर्वन्' विदधत् पुनः पुनः 'वन्दते' प्रणमति 'शक्रः' पुरन्दर इति सूत्रार्थः ॥ अन-12 न्तरं च यत् कृतवांस्तदाह तो वंदिऊण पाए चकंकुसलक्खिए मुणिवरस्स । आगासेणुप्पतिओ ललियचवलकुंडलतिरीडी ॥६॥ ___ व्याख्या-'ततः तदनन्तरं, पाठान्तरतश्च 'स' इति शक्रो वन्दित्वा पादौ चरणी, चक्र चाशश्च प्रतीतादेव, तत्प्रधानानि लक्षणानि ययोस्तौ तथा, मुनिवरस्य नमिनान इति प्रक्रमः, तत 'आकाशेन' नभसा उदिति-ऊध्ये देवलोकाभिमुखं पतितो गत उत्पतितः, ललिते च ते सविलासतया चपले च चञ्चलतया ललितचपले तथाविधे कुण्डले कर्णाभरणे यस्यासौ ललितचपलकुण्डलः, स चासौ किरीटी च-मुकुटवान् ललितचपलकुण्डलकिरीटी इति | सूत्रार्थः ॥ स एवंविधः खयमिन्द्रेणाभिष्ट्रयमानः किमुत्कर्ष मनस्याप्तवान् उत नेत्याहद्र णमी णमेइ अप्पाणं, सक्खं सक्केण चोइओ । चइऊण गेहं वइदेही, सामण्णे पज्जुवडिओ ॥ ६१॥ ॥१९॥ व्याख्या-नमिर्नमयति-भावतः प्रवीभवन्तमात्मानं स्वतत्त्वभावनया विशेषतः प्रगुणयति, न तूसिक्ता नयति, तत्कालापेक्षया लट्, कथंभूतः सन् ?-'साक्षात्' प्रत्यक्षतामुपगम्य 'शक्रेण' इन्द्रेण 'चोइतो'त्ति प्रेरितः 'त्यक्त्वा' दीप अनुक्रम [२८७] Rekha SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~139~ Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [९], मूलं [-] / गाथा ||६१|| नियुक्ति: [२७९...] प्रत सूत्रांक ||६१|| अपहाय 'गेहं' गृहं 'वइदेही'त्ति सूत्रत्वाद्विदेहा नाम जनपदः सोऽस्यास्तीति विदेही विदेहजनपदाधिपो, न त्वन्य | एव कश्चिदिति भावः, यद्वा-विदेहेषु भवा वैदेही-मिथिला पुरी, सुब्ब्यत्ययात्तां च त्यक्त्वेति सम्बन्धनीयं, 'श्रामण्ये श्रमणभावे 'पर्युपस्थितः' उद्यतः, अभूदिति शेषः, यद्वा-नमिर्नमयति संयम प्रति प्रवणीकरोत्यात्मानं, कीदृशः?| शक्रेण प्रेरितः, कथं ?-साक्षात् खयं, न त्वन्यपार्श्वप्रहितसन्देशकादिना,श्रामण्ये पर्युपस्थितः, न तु तत्प्रेरणातोऽपि धर्म प्रति विप्लुतोऽभूदितिभाव इति सूत्रार्थः । किमेष एवैवंविधः ? उतान्येऽपीत्याह एवं करिंति संबुद्धा, पंडिया पवियक्खणा । विणियति भोगेसु, जहा से णमिरायरिसि॥ १२॥ तिबेमि ४] व्याख्या-एवम्' इति यथतेन नमिना निश्चलत्वं कृतं तथाऽन्येऽपि कुर्वन्ति, उपलक्षणत्यादकार्पः करिष्यन्ति च, न त्वयमेव, निदर्शनतयैवास्योपात्तत्वात् , कीदृशाः पुनरन्येऽप्येवं कुर्वन्ति ?-'सम्बुद्धाः' मिथ्यात्वापगमतोऽवगतजीवाजीवादितत्त्वाः 'पण्डिताः' सुनिश्चितशास्त्रार्थाः 'प्रविचक्षणाः' अभ्यासातिशयतः क्रियां प्रति प्रावीण्यवन्तः, तथाविधाश्च सन्तः किं विदधति ?-'विनिवर्तन्ते' विशेषेण तदासेवनादुपरमन्ति, केभ्यः ?-भोगेसु'त्ति भोगेभ्यः, किंतवत् ?-यथा स 'नमिः' नमिराजर्षिः निश्चलो भूत्वा तेभ्यो निवृत्त इति, यद्वोपदेशपरमेतत् , यत एवं कुर्वन्ति सम्बुद्धाः पण्डिताः प्रविचक्षणाः, एवमिति कथमित्याह-भोगेभ्यो विनिवर्तन्ते, विशेषेण-अत्यन्तनिश्चलतालक्षणेन निवर्तन्ते || | भोगेभ्यो, यथा स 'नमिः' नमिनामा राजर्षिः, ततो भवद्भिरप्येवंविधैरित्थमेव विधेयमिति सूत्रार्थः। इतिः' परिसमाप्ती वीमि' इति पूर्ववत् । नयाश्च प्राग्वदिति ॥ इति श्रीशान्त्याचा मुत्तरा० शिष्य नवममध्ययनं समाप्तमिति ।। दीप अनुक्रम [२८९] SamEducatonintamatunt पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं- ९ परिसमाप्तं ~140 Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८०-२८२] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||२|| अथ द्रुमपत्रकं दशममध्ययनम् । द्रुमपत्रक॥ व्याख्यातं नमिप्रव्रज्याख्यं नवममध्ययनम् , अधुना दशममध्ययनमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहा-16 मध्ययनं. नन्तराध्ययने धर्मचरणं प्रति निष्कम्पत्वमुक्तं, तवानुशासनादेव प्रायो भवति, न च तदुपमा विना स्पष्टमिति प्रथमतः उपमाद्वारेणानुशासनाभिधायकमिदमध्ययनम् , अनेन सम्बन्धेनायातस्यास्वाध्ययनखानुयोगद्वारचतुष्टयमुपदश्यते, यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे द्रुमपत्रकमिति द्विपदं नाम, अतो द्रुमस्य पत्रस्य च निक्षेपमाह निक्खेवो उ दुमंमि चउबिहो० ॥ २८० ॥ जाणग०॥ २८१ ॥ दुमयाउनामगोयं वेयंतो भावओ दुमो होइ । एमेव य पत्तस्सवि निक्खेवो चउविहो होइ ॥ २८२ ॥ | व्याख्या-'निक्षेपः' न्यासः 'तुः' पूरणे 'द्रुमे' द्रुमविषयः 'चतुर्विधः' नामादिः, द्विविधो भवति द्रव्ये आगमतो नोआगमतश्च, स त्रिविधः-जशरीरभव्यशरीरद्रुमस्तयतिरिक्तश्च, स पुनत्रिविधः-एकमविको बद्धायुष्कोऽभिमुख-* नामगोत्रश्च, हुमायुर्नामगोत्रं वेदयन् भावतो द्रुमो भवति, एवमेव च पत्रस्यापि चतुर्विधो भवति निक्षेप इति | गाथात्रयाक्षरार्थः ॥ भावार्थस्तु पूर्ववत्, अन्वर्थनामतामस्थादर्शयन्नाह दुमपत्तेणोवम्मं अहाठिईए उवकमेणं च । इत्थ कयं आईमी तो तं दुमपत्तमज्झयणं ॥ २८३ ॥ दीप अनुक्रम [२९०] Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं -१० “द्रुमपत्रक" आरभ्यते ~141 Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||६२|| दीप अनुक्रम [२९०] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||६२...|| निर्युक्तिः [२८३] अध्ययनं [१०], व्याख्या - दुमो - वृक्षः तस्य पर्ण-पत्रं तेनौपम्यम् - उपमा, प्रक्रमादायुषः, केन पुनर्गुणेनीपम्यमित्याह - 'यथा - स्थित्या' वकालपरिपाकतः पातरूपया, तथा उपक्रमणं - दीर्घकालभाविन्याः स्थितेः खल्पकालताऽऽपादनमुपक्रमः, कोऽर्थः १- पाकादारत एव वातादिनाऽवस्थितिविनाशनं, तेन चात्राध्ययने 'कृतं' विहितम् 'आदी' प्रथमं यस्मात् ततः द्रुमपत्रमित्यध्ययनमिदम् उच्यते इति शेषः इति गाथार्थः ॥ यथा चास्य समुत्थानं तथा दर्शयंस्त्रयोविंशतिसङ्घयं गाथाकदम्बकमाह--- मगहापुरनयराओ वीरेण विसजणं तु सीसाणं । सालमहासालाणं पिट्टीचंपं च आगमणं ॥ २८४ ॥ पवजा गागिलिस्स य नाणस्सं य उप्पया उ तिपहंपि । आगमणं चंपपुरिं वीरस्स अवंदणं तेसिं ॥ २८५॥ | चंपाइ पुण्णभदंमि चेइए नायओ पहिअकित्ती । आमंतेउं समणे कहेइ भयवं महावीरो ॥ २८६ ॥ अट्ठविहकम्ममहणस्स तस्स पगईविसुद्धलेसस्स । अट्ठावए नगवरे निसीहिए निट्टिअट्ठस्स ॥ २८७ ॥ उसभस्स भरहपिउणो तेलुक्कपयासनिग्गयजसस्स । जो आरोढुं वंदइ चरिमसरीरो अ सो साहू २८८ साहुं संवासेइ अ असाहुं न किर संवसावेई । अह सिद्धपवओ सो पासे वेअड्डसिहरस्स ॥ २८९ ॥ चरिमसरीरो साहू आरुहइ नगवरं न अन्नोत्ति । एयं तु उदाहरणं कासीअ तहिं जिणवरिंदो ॥ २९० ॥ Education International For Person Prat org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 142 ~ Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति : [२८४-३०६] प्रत ॥३२॥ सूत्रांक ||२|| उत्तराध्य. सोऊण तं भगवओगच्छइ तहि गोअमो पहिअकित्ती। आरुहइ तं नगवरं पडिमाओबंदइ जिणाणं २९१ ।। दुमपत्रकबृहद्वृत्तिः अह आगओ सपरिसो सविडीए तहिं तु वेसमणो। वंदित्तु चेइयाई अह वंदइ गोअमं भयवं ॥२९२॥ | मध्ययनं. अह पुंडरीअनायं कहेइ तहि गोयमो पहियकित्ती । दसमस्स य पारणए पहावेसीअ कोडिन्नं ॥२९३॥ तस्स य वेसमणस्सा परिसाए सुरवरो पयणुकम्मो। तं पुंडरीयनाय गोयमकहि निसामेइ ॥२९॥ चित्तूण पुंडरीअं वग्गुविमाणाओ सो चुओ संतो। तुंबवणे धणगिरिस्सा अजसुनंदासुओ जाओ २९५ दिने कोडिन्ने या सेवाले चेव होइ तइए य । इकिकस्स य तेसिं परिवारो पंच पंच सया ॥ २९६ ॥ हेट्टिल्लाण चउत्थं मज्झिल्लाणं तु होइ छटुं तु । अट्रममुवरिल्लाणं आहारो तेसिमो होइ ॥ २९७ ॥ ४ कंदाई सञ्चित्तो हिटिल्लाणं तु होइ आहारो । बीआणं अञ्चित्तो तइआणं सुकसेवालो ॥ २९८ ॥ तं पासिऊण इढि गोयमरिसिणो तओ तिवग्गावि । अणगारा पवइआ सप्परिवारा विगयमोहा २९९|| दिएगस्स खीरभोअणहेऊ नाणुप्पया मुणेयवा। एगस्स परिसादसणेण एगस्सय य जिणंमि ॥ ३०॥ केवलिपरिसं तत्तो वच्चंतागोयमेण भणिआ य । इउ एह वंदह जिणं कयकिच्च जिणेण सो भणिओ ३०१ दीप अनुक्रम [२९०] ॥३२॥ Tu Perumaramantrom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~143 Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||६२..|| नियुक्ति: [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| सोऊण तं अरहओ हियएणं गोयमोऽवि चिंतेइ । नाणं मे न उपज्जइ भणिओ य जिणेण सो ताहे ३०२ चिरसंस, चिरपरिचि चिरमणुगयं च मे जाण । देहस्स य भेयंमि य दुण्णिवि तुल्ला भविस्सामो ३०३ जह मन्ने एअमटुं अम्हे जाणामु खीणसंसारा । तह मन्ने एअमटुं विमाणवासीवि जाणंति ॥ ३०४ ॥ जाणगपुच्छं पुच्छइ अरहा किर गोयमं पहिअकित्ती। किं देवाणं वयणं गिज्झं आतो जिणवराणं? ३०५ सोऊण तं भगवओ मिच्छायारस्स सो उबट्टाइ । तन्नीसाए भयवं सीसाणं देइ अणुसिद्धिं ॥ ३०६ ॥ है। व्याख्या-एतचाक्षरार्थ प्रति स्पष्टमेव, नवरं मगधापुरनगरं-राजगृहं, तस्यैव तत्कालापेक्षया मगधासु प्रधानपुर वादविद्यमानकरत्वाच, तथा 'णायओ पहियकित्ति'त्ति नायकः-सकलजगत्वामी ज्ञात एव वा ज्ञातक-उदारक्षत्रियः,न्यायतो वा प्रथिता-सकलजगत्प्रत्याख्याता कीर्तिर्यस्य स तथा, प्रकृत्या-खभावेन विशुद्धा-अत्यन्तनिर्मला है। लेश्या शुक्ललेश्या यस्य स तथा, णिसीहियत्ति निषिध्यन्ते-निराक्रियन्ते अस्यां कौणीति नैषेधिकी-निर्वाणभूमिः, |'कृत्यल्युटोऽन्यत्रापि' (पा-३-३-११३) इत्यपिग्रहणवलात् ल्युट्, निष्ठितार्थस्य-समाप्तसकलकृत्यस्य यद्वा निषेधेसकलकर्मनिराकरणलक्षणे भवा नैपेधिकी-मुक्तिगतिस्तया निष्ठितार्थो यस्तस्य ऋषभस्य-ऋषभनाम्नः, स चान्योऽपि | सम्भवति अत आह-भरतपितुरिति, 'वन्दते' स्तौति प्रक्रमान्नषेधिकी प्रतिमा वा,तथा साधु 'स'मिति भृशं वासयति दीप अनुक्रम [२९०] 962-6-% SamEditatinimumational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~144 Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ॥६२|| उत्तराध्य. संवासयति, कोऽर्थः ?-रात्रि दिवं चावस्थापयति, नोऽसाधु संहरणादिनाऽऽनीतमपि 'किल' इति परोक्षाप्तवाद- दुमपत्रकदसूचकः, 'अथ' इत्युपन्यासे सिद्धोपलक्षितः पर्वतः सिद्धपर्वतः 'तास्थ्यात्तद्वयपदेश' इति तदधिष्ठायकदेवताविशेष । | मध्ययनं. एवोक्तः, यद्वा तत्तीर्थानुभाव एवायं यदसाधोस्तत्रावस्थानमेव न सम्पद्यते, तथा च 'चरमशरीरः साधुः आरोह॥३२२॥ ती'त्यत्र पदप्रचारेणेति गम्यते, 'उदाहरणं' कथनं 'कासीति अकाद्, अनेन चैवंविधदेवप्रवादोत्थानकारणमुक्तं । 'घेत्तूण पुंडरीयम्' इत्यादिना च प्रसङ्गागतं वैरस्वामिजन्मोक्तं, तथा 'तं पासिऊण इहिन्ति तामिति-प्रतीतामेव । भगवति जकाचारणरूपलब्धिरूपां, तथा 'तिबग्गावि'त्ति त्रयो वर्गा येषां ते त्रिवर्गाः, तेऽपि प्रक्रमादिन्नकोण्डिन्यशैवलिनस्त्रयोऽपि, नैको द्वौ वेत्यपिशब्दार्थः, अणगारति अविद्यमानगृहाः,ते च तापसादयोऽपि स्युरत आह-प्रकर्षण अजिता-मिथ्यात्वादिभ्यो विनिर्गताः प्रत्रजिताः, तथा एगस्स खीरभोयणहेउ'त्ति क्षीरान्नभोजनमेव विशुद्धाध्यव सायविशेषोत्पत्तिनिवन्धनतया हेतु:-कारणं क्षीरभोजनहेतुः, मयूरव्यंसकादित्वात् समासः, तमाश्रित्येति शेषः, राणाणुप्पय'त्ति ज्ञानस्योत्पादनमुत्पत् 'सम्पदादित्वात् विप्' (पा.३-३-९४ )जानोत्पत् , तथा 'चिरसंसहन्ति चिर-12 प्रभूतकाल संसृष्टः-स्वखाम्यादिसम्बन्धेन सम्बधो यस्तं, 'चिरपरिचितः सहवासनादिना स पूर्वो यस्तम् , उभयत्र ॥३२२॥ द विस्पष्टं पटुर्विस्पष्टपटुरितिवत् सह सुपेत्यत्र सुपेति योगविभागात समासः, चिरमनुगतमभिप्रायानुवर्तिनमात्माननि ति शेषः, 'मम'त्यात्मनिर्देशः, ततः प्रभूतमोहनीयाच्छादिततया न ते ज्ञानोत्पत्तिरित्यभिप्रायः 'दहस्य तु' शरीरस्य दीप अनुक्रम [२९०] SamEducatimotimatent xjanothian.ora पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~145 Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| भेदे विनाशे द्वावप्यावां 'तुल्यौ' मुक्तिपदप्राप्त्या समौ भविष्यावः' इति मा त्वमधृति कृथा इति भावः, 'यथा' येन । प्रकारेण यथा 'मन्ने'त्ति आर्षत्वात् पुरुषव्यत्ययः, ततो मन्यसे त्वम् एनं ज्ञानावासिलक्षणम् 'अर्थ' वस्तु 'वयं' जानीमा अवबुध्यामहे, किंविशिष्टाः सन्तः ? इत्याह-क्षीणः-पुनर्भवाभावतः संसारो येषां ते क्षीणसंसाराः, तेन प्रकारेण तथा, व्यवच्छेदफलत्वात् तथैव, किमित्याह-'मन्नेत्ति प्राग्वत् , मन्यसे 'एनमर्थम्' अनन्तरोक्तं 'विमानवासिनोऽपि' देवा 'जानन्ति' अवबुध्यन्ते, एवं च यथा क्षीणसंसारा जानन्ति तथा विमानवासिनोऽपि जानन्तीत्याशयवतः क्षीणसंसारिणां च परिज्ञानं प्रति साम्यमभिमतमित्यहो तब विवेकितेत्युपालब्धः । तथा 'जाणगपुच्छं'ति ज्ञायकआपृच्छया पृच्छति, न हि तस्य भगवतः समस्तज्ञेयविषयविज्ञानचक्षुषः कचिदविज्ञानमस्ति, किन्तु गौतमं प्रतिबोधयनित्थमुपालभते, तथा यथा किम् ?-दीन्यन्ति-क्रीडन्ति देवाः तेषां वचनं वचो 'गिझं'ति ग्राबमुपादेयम् , 'आतो' (ग्रन्था ८०००)ति आपत्वादाहोखित् , जिनानां वरा:-प्रधानाः जिनवराः य उत्पन्नकेवलातीर्थकृतस्तेषां ?, तद ननैकमस्मत्परिज्ञानस्य देवपरिज्ञानस्य च साम्यापादनम्, अपरं तु साम्ये सत्यपि 'देहस्स य भेयंमी दोण्णिवि तुला 15/भविस्सामो'त्ति अस्मद्वचनतः शतशोऽपि श्रुतान्न विनिश्चयमपि विहितवान् , देववचनात्तु सकृदप्याकर्णितात् तथेति प्रतिपद्याष्टापदं प्रति प्रयात इत्यहो ते मोहविजृम्भितमित्युक्तं भवति । श्रुत्वा तदुपालम्भवचो भगवतः सम्बन्धि 'मिच्छाचारस्स'त्ति आर्पत्वान्मिथ्याचारादू-उक्तरूपाद्गम्यमानत्वात् प्रतिक्रमितुम् 'उपतिष्ठति' उद्यच्छति । 'तन्निश्रये ति 15 दीप अनुक्रम [२९०] SamEditatmilsina पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~146 Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३२शा मध्ययनं. प्रत सूत्रांक ||२|| गौतमनिश्रया 'अनुशिष्टिं शिक्षाम् । एतद्भावार्थस्तु सम्प्रदायादवसेयः, स चायम्-'तेणं कालेणं तेणं समएणं पिट्ठीचंपा णाम णयरी, तत्थ सालो राया, महासालो जुवराया, तेसिं सालमहासालाणं भगिणी जसवती, तीसे पिढरो भत्तारो, जसवतीए अत्ततो पिढरपुत्तो गागलीणाम कुमारो। तत्थ बद्धमाणसामी समोसढो सुभूमिभागे उजाणे,सालो णिग्गतो, धम्मं सुच्चा भणति-जंणवरं महासालं रजे ठावेमि, सो अतिगतो, तेण आपुच्छितो महासालो भणति-अहंपि संसारभउविग्गो जहा तुम्भे इहं मेढीपमाणं तहा पवइयस्सवि, ताहे गागलिं कपिलातो सद्दावेऊण पट्टो बद्धो अभिसित्तो य राया जातो। तस्स माया कपिलपुरे णयरे दिपिणलिया पिढरस्स, तेण ततो सहावितो, सो पुण तेसिं दो सिबियातो कारेति, जाव ते पवतिया, सा भगिणी समणोवासिया जाता,तए णं ते समणा होतगा, एकारस अंगाई अहि जिया। १ तस्मिन् काले तस्मिन् समये पृष्ठचम्पा नाम नगरी, तत्र शालो राजा, महाशालो युवराजः, तयोः शालमहाशालयोर्भगिनी यशस्वती, तस्याः पिठरो भर्ता, यशोमत्या आत्मजः पिठरपुत्रः गागलिनामा कुमारः । तत्र वर्धमानस्वामी समवसृतः सुभूमिभागे उद्याने, शालो निर्गतः, धर्म श्रुत्वा भणति-यमवर महाशालं राज्ये स्थापयामि, सोऽतिगतः, तेनापृष्टो महाशालो भणति-अहमपि संसारभयोद्विग्नो | यथा यूयमत्र मेदीप्रमाणाः तथा प्रबजितस्यापि, सदा गागलि काम्पील्यात् शदयित्वा पट्टो बद्धोऽभिषिक्तश्व राजा जातः । तस्य माता काम्पील्यपुरे नगरे दत्ता पिठराय, तेन सकः शब्दितः, स पुनस्तयोर्दै शिबिके कारयति, यावत्तौ प्रश्नजितौ, सा भगिनी श्रमणोपासिका ||जाता, ततस्तौ श्रमणौ जाती, एकादशानानि अधीतवन्तौ । दीप अनुक्रम [२९०] ॥३२शा For Prato Maratnammar पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~147 Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति : [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| तते णं समणे भगवं महावीरे बहिया जणवयविहारं विहरति । तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहं णाम भणयरं, तत्थ सामी समोसढो, ताहे सामी पुणोऽवि णिग्गतो चंपं पहावितो, ताहे सालमहासाला सामि आपुच्छंति४ अम्हे पिट्टीचंपं वच्चामो जदि णाम ताण कोवि बुझेजा, सम्मत्तं वा लभेज्जा, सामीवि जाणति-जहा ताणि संबुझिहिंति, ताहे सामिणा गोयमसामी से बिइजओ दिण्णो, गोयमसामी पिट्ठीचंपं गतो, तत्थ समोसरणं, गागली, पिढरो जसवती य णिग्गयाणि, भगवं धम्म कहेइ, ताणि धम्मं सोऊण संविग्गाणि, ताधे गागली भणति-जंणवरं अम्मापियरो आपुच्छामि, जेट्टपुत्तं च रज्जे ठवेमि, ताणि आपुच्छियाणि भणंति-जइ तुमं संसारभउविग्गो अम्हेवि,४ ताधे सो पुत्तं रजे ठावित्ता अम्मापितीहि समं पचहतो, गोयमसामी तागि घेत्तूण चंपं बच्चइ । तेसिं सालमहासालाणं १ ततः श्रमणो भगवान महावीरो बहिर्जनपदविहारं विहरति । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहं नाम नगरं, तत्र स्वामी समवसृतः, तदा स्वामी पुनरपि निर्गतश्चम्पा प्रधावितः, तदा शालमहाशालौ स्वामिनमापृच्छताम्-आवां पृष्ठचम्पा बजावः यदि नाम कोऽपि | तेषां बुध्येत, सम्यक्त्वं वा लभेत, स्वाम्यपि जानाति यथा ते संभोत्स्यन्ते, तदा स्वामिना गौतमस्वामी तयोद्धितीयको दत्तः, गौतमस्वामी | पृष्ठचम्पां गतः, तत्र समवसरणं, गागली पिठरो यशोमती च निर्गताः, भगवान् धर्म कथयति, ते धर्म श्रुत्वा संविघ्नाः, तदा गागलिर्भणति-यन्नवरं मातापितरावापृच्छामि, ज्येष्ठं पुत्रं च राज्ये स्थापयामि, तावापुष्टौ भणत:-यदि त्वं संसारभयोद्विग्न आवामपि, तदा 5स पुत्र राज्य स्थापयित्वा मातापितृभ्यां समं प्रत्रजितः, गौतमस्वामी तान् गृहीत्वा चम्पां व्रजति । तयोः शालमहाशालयोः दीप अनुक्रम [२९०] - - - SamEducatimotimatent Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~148~ Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||६२|| दीप अनुक्रम [२९०] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३२४ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||६२...|| निर्युक्ति: [२८४-३०६] पंथं वचंताणं हरिसो जाओ - जधा संसारं उत्तारियाणि, एवं च तेसिं सुद्देणं अज्झवसाणेणं केवलणाणं उप्पण्णं, | इयरेसिंपि चिंता जाया जहा एएहिं अम्हे रज्जे ठावियाणि संसारातो य मोइयाणि, एवं चितंताणं सुभेणं अज्झवसाणेणं तिण्हंपि केवलणाणं उप्पण्णं । एवं ताणि उप्पण्णणाणाणि चंपं गयाणि, सामिं पायाहिणं करेमाणाणि तित्थं | पणमिऊण केवलिपरिसं पहावियाणि, गोयमसामीवि भगवं वंदिऊण तिक्खुत्तो पयाहिणीकाऊण पाएस पडितो, उद्विओ भगति - कहिं वचह ?, एह तित्थयरं वंदह, ताथे सामी भगद - मा गोयमा ! केवली आसाएहि, ताहे आउट्टो खामेति, संवेगं च गतो । तत्थ गोयमसामिस्स संका जाया णाहं ण सिज्झिस्सामित्ति, एवं गोयमसामीवि चिंतेति । इओ य देवाण संलावो वट्टइ-जो अट्ठावयं विलग्गति चेइयाणि य वंदति धरणिगोयरो सो १ पन्थानं व्रजतो जातः, यथा संसारादुत्तारितानि, एवं च तयोः शुभेनाध्यवसायेन केवलज्ञानमुत्पन्नम्, अन्येषामपि चिन्ता जाता - यथा एतैर्वयं राज्ये स्थापिताः संसाराच मोचिताः एवं चिन्तयतां शुभेनाध्यवसायेन त्रयाणामपि केवलज्ञानमुत्पन्नम्। एवं ते उत्पन्नज्ञानाचम्पां गताः, स्वामिनं प्रदक्षिणां कुर्वन्तः तीर्थं प्रणम्य केवलिपपदं प्रधाविताः, गौतमस्वाम्यपि भगवन्तं वन्दित्वा त्रिकृत्वः प्रदक्षिणीकृत्य पादयोः पतितः, उस्थितो भणति - कुत्र ब्रजथ १, एत तीर्थकरं वन्दध्वम्, तदा स्वामी भणति मा गौतम! केवलिन आशातय, तदाssवृत्तः क्षमयति, संवेगं च गतः । तत्र गौतमस्वामिनः शङ्का जाता-नाहं न सेत्स्यामि इति, एवं गौतमस्वाम्यपि चिन्तयति । इतश्च देवानां संलापो वर्त्तते योऽष्टापदं विलगति चैत्यानि च वन्दते धरणिगोचरः स Education Intemational For Parana Private On द्रुमपत्रक मध्ययनं. १० ~149~ | ॥३२४॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] %. -56 4 %A 0-5 % प्रत सूत्रांक ||२|| % % तेणे भवग्गहणेणं सिज्झइ, ताधे सामी तस्स चित्तं जाणति तावसाण य संबोहणय, एयस्सवि थिरता भविस्सतित्ति दोषि कयाणि भविस्संति, एयस्सवि पचतो तेवि संबुझिस्संति'त्ति, सोऽवि सामि आपुच्छइ, अठ्ठावयं जामित्ति, तत्थ भगवया भणियं-बच्च अट्ठापयं चेइयाण बंदतो, तए णं भगवं हतुट्टो वंदित्ता स गतो, तत्व य अठ्ठावए जणवायं सोऊणं तिण्णि तावसा पंचपंचसयपरिवारा पत्तेयं अट्ठावयं विलग्गामोत्ति तत्थ किलिस्संति, कोडिनो दिनो सेवाली, जो कोडिन्नो सो चउत्थं २ काऊण पच्छा मूलकंदाणि आहारेति सचित्ताणि, सो पढमं मेहलं विलग्गो, दिण्णो छटुं छठेणं काऊणं परिसडियं पंडपत्ताणि आहारेइ, सो बीय मेहलं विलग्गो, सेवाली अट्ठमं २ काऊण जो सेवालो सयं मइलतो तं आहारेइ, सो तइयं मेहलं विलग्गो, एवं तेवि ताव किलिस्सति । भयवं च गोयमे १ तेन भवग्रहणेन सिध्यति, तदा स्वामी तस्य चित्तं जानाति तापसानां च संबोधन, एतस्यापि स्थिरता भविष्यतीति व अपि कृते भविष्यतः, एतस्यापि प्रत्ययः तेऽपि संभोत्स्यन्ते इति, सोऽपि स्वामिनमापृच्छति-अष्टापदं यामीति, तत्र भगवता भणितं-बजाष्टापदं चैत्यानि बन्दस्ख, ततो भगवान् हन्तुष्टो बन्दित्वा स गतः, तत्र चाष्टापदे जनवादं श्रुत्वा त्रयस्तापसाः पञ्चपञ्चशतपरिवाराः प्रत्येकमष्टापदं विलगाम इति | सत्र छिश्यन्ति-कौडिन्यो दत्तः शैवालः, यः कौडिन्यः स चतुर्थ चतुर्थेन कृत्वा पश्चान्मूलकन्दानाहारयति सचित्तान , स प्रथमा मेखला विलमः, दत्तः षष्ठं षष्ठेन कृत्वा परिशटितपाण्डुपत्राणि आहारयति, स द्वितीयां मेखलां विलग्नः, शैवालोऽष्टमाष्टमेन कृत्वा यः शेवालः स्वयं मलीनितस्तमादारयति, स तृतीयां मेखला बिलग्नः, एवं तेऽपि तावविश्यन्ति । भगवांश्च गौतम % % % दीप अनुक्रम [२९०] % % % % 4- SamEducatimotimatent FairamanaSPrwara tumonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~150 Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] उत्तराध्य बृहद्वृत्तिः मध्ययनं. प्रत ॥३२५॥ सूत्रांक ||२|| ओरालसरीरे हुयवहतडियतरुणरविकिरणसरिसए तेएणं,ते तंइत पेच्छेत्ता ते एवं भणंति-एस किर एत्थ थुलतो समणो दुमपत्रक बिलग्गिहिति ?, जं अम्हे महातबस्सी सुक्का भुक्खा न तरामोति बिलग्गिउं, भगवं च गोयमे जंघाचारणलद्धीए लूयातंतुपुडगंपि णीसाए उप्पयति, जाव ते पलोयंति-एस आगओत्ति, एसो अईसणं गतोत्ति, ताहे ते विम्हिया जाया पसंसंति, अच्छंति य पलोयंता, जति ओयरति तो एयस्स बयं सीसा, एवं ते पडिच्छंता अच्छंति। सामीवि चेइयाणि वंदित्ता उत्तरपुरच्छिमे दिसिभागे पुढपिसिलापट्टए तुयट्टो असोगवरपायबस्स अहे तं रयणि वासाए । उवागतो। इओय सकस्स लोगपालो बेसमणो, सोवि अट्ठावयचेइयवंदतो एति, सो चेइयाणि बंदित्ता गोयमसामि वंदति, ताहे सो धर्म कहेति, भगवं अणगारगुणे परिकहिउं पवतो, अंताहारा पंताहारा एवं वण्णेति, L१ उदारशरीरः हुतवहतडित्तरुणरविकिरणसदृशेन तेजसा, ते तमायान्तं प्रेक्ष्य ते एवं भणन्ति-एष किलात्र स्थूरः श्रमणो, विलगिष्यति', यं वयं महातपखिनः शुष्का बुभुक्षिता न शक्मो विलगितुं, भगवांश्च गौतमो जलाधारणलब्ध्या लूतातन्तुपुटकस्यापि निभ-18 योत्पतति, यावत्ते प्रलोकयन्ति-एष आगत एषोऽदर्शनं गत इति, तदा ते विस्मिता जाताः प्रशंसन्ति, तिष्ठन्ति च प्रलोकयन्तः, यदि अव ॥३२५॥ तरति तदा एतस्य वर्ष शिष्याः, एवं ते प्रतीम छन्तः तिष्ठन्ति । खाम्यपि. चैत्यानि बन्दित्वोत्तरपौरस्त्ये दिग्भागे पृथ्वीशिलापट्टके त्वग्वर्तितः अशोकवरपादपस्याधस्ता रजनी वासार्थमुपागतः । इतश्च शक्रस्य लोकपालो वैश्रमणः, सोऽपि अष्टापद चैत्यवन्दक एति, स चैत्यानि वन्दित्वा गौतमस्वामिनं वन्दते, तदा स धर्म कथयति, भगवान् अनगारगुणान् परिकथयितुं प्रवृत्तः, अन्ताहाराः प्रान्ताहारा एवं वर्णयति, दीप अनुक्रम [२९०] SamEducatimotimatent For on पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~151 Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||६२|| दीप अनुक्रम [२९०] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||६२...|| अध्ययनं [१०], निर्युक्ति: [२८४-३०६] - वेसमणी चिंतेति - एस भगवं एरिसे साहुगुणे वण्णेइ, अप्पणो य से इमा सरीरसुकुमारया जारिसा देवाणवि णत्थि, भगवं तस्स आकूतं नाउं पुंडरीयं नाम अज्झयणं पण्णवेद, जहा- पुक्खलावतीविजए पुंडरिगिणीए नगरीए गलिणिगुम्मं उज्जाणं, तत्थ णं महापउमे नाम राया होत्था, पउमावती देवी, ताणं दो पुत्ता- पुंडरीए कंडरीए य, सुकुमारा जाव पडिरूया, पुंडरीए जुवराया होत्था । तेणं कालेणं तेणं समर्पणं घेरा भगवंतो जाव णलिणिगुम्मे उज्जाणे समोसढा, महापउमे णिग्गए, धम्मं सोचा भणति-जं नवरं देवाणुप्पिया ! पुंडरीयं कुमारं रज्जे ठवेमि, अहासुहं मा पडिबंधं करेहि, एवं जाव पुंडरीए राया जाए जाव विहरइ । तते णं सेकंडरीए कुमारे जुबराया जाए। तए णं से महापउमे राया पुंडरीयं रायं आपुच्छति-तए णं से पुंडरीए सिवियं णीणेइ, जाव पचतिते, णवरं चोइसपुवाई अहिजति, १ वैश्रमणश्चिन्तयति — एष भगवान् ईदृशान् साधुगुणान् वर्णयति, आत्मनश्चास्यैषा शरीरसुकुमारता यादृशी देवानामपि नास्ति, भगवान् तस्याकूतं ज्ञात्वा पुण्डरीकनामाध्ययनं प्रज्ञापयति, यथा- पुष्कलावतीबिजये पुण्डरीकियां नगर्यां नलिनीगुल्ममुद्यानं, तत्र महापद्मो नाम राजाऽभवत्, पद्मावती देवी, तयोद्वाँ पुत्रौ पुण्डरीकः कण्डरीकश्च, सुकुमालौ यावत्प्रतिरूपी, पुण्डरीको युवराजोऽभवत् । तस्मिन् | काले तस्मिन् समये स्थविरा भगवन्तो यावन्नलिनीगुल्म उद्याने समयसृताः, महापद्मो निर्गतः, धर्म श्रुत्वा भणति — यन्नवरं देवानुप्रियाः ! पुण्डरीकं कुमारं राज्ये स्थापयामि, यथासुखं मा प्रतिबन्धं कार्षीः, एवं यावत्पुण्डरीको राजा जातः यावद्विहरति । ततः स कण्डरीकः कुमारो युवराजो जातः । ततः स महापद्मो राजा पुण्डरीकं राजानमापृच्छति ततः स पुण्डरीकः शिविकामानयति यावत्प्रत्रजितः, नवरं चतुर्दश पूर्वाभ्यभ्येति, For Parsons Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~152~ Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||६२|| दीप अनुक्रम [२९०] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३२६ ।। [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१०], मूलं [--] / गाथा ||६२...|| निर्युक्ति: [२८४-३०६] बहूहिं छट्टममहातबोवहाणेहिं बहूणि वासाणि सामण्णं पालिऊणं मासियाए संलेहणाए सद्धिं भत्ताहं शोसित्ता जाव सिद्धे । अन्नया य ते येरा पुषाणुपुषिं जाव पुंडरिगिणीए समोसढा, परिसा णिग्गया, तए णं से पुंडरीए राया कण्डरीएणं जुवरण्णा सद्धिं इमीसे कहाए उद्धट्ठे समाणे हट्ठे जाव गए, धम्मकहा, जाव से पुंडरीए सावगधम्मं पडिवण्णे, जाव पडिगए साबए जाए। तए णं से कंडरीए जुबराया थेराणं धम्मं सोचा हट्ठे जाव जहेदं तुज्झे यदह, जं नवरं देवाणुप्पिया ! पुंडरीयं रायं आपुच्छामि, तए णं जाव पचयामि, अहासुहं पञ्चग्रह। तते णं से कंडरीए जाव धेरे णमंसति श्राणं अंतितातो पडिनिक्खमति २त्ता तमेव चाउघंटं आसरहं दुरूहति, जाव पचोरुहति, जेणेव पुंडरीए राया तेणेव उबागच्छति, करयल जाव पुंडरीयं रायं एवं वयासी एवं खलु मए देवाणुप्पिया ! १ बहुभिः षष्ठाष्टममहातपउपधानैर्वहूनि वर्षाणि श्रामण्यं पालयित्वा मासिक्या संलेखनया षष्टिं भक्तान् जोषवित्वा यावत्सिद्धः । अन्यदा च ते स्थविराः पूर्वानुपूर्व्या यावत्पुण्डरीकियां समवसृताः, पर्षन्निर्गता, ततः स पुण्डरीको राजा कण्डरीकेन युबराजेन सार्धं अस्याः कथाया लब्धार्यः सन् दृष्टो यावद्भतः, धर्मकथा, यावत्स पुण्डरीकः श्रवकधर्म प्रतिपन्नः यावत् प्रतिगतः श्रावको जातः । ततः स कण्डरीको युवराजः स्थविरेभ्यो धर्मं श्रुत्वा दृष्टः यावत् यथैतत् यूयं वदध, यन्नवरं देवानुप्रियाः । पुण्डरीकं राजानमापृच्छामि ततो यावत्प्रत्रजामि, यथासुखं प्रब्रज । ततः स कण्डरीको यावत्स्थविरान् प्रणमति २ स्थविराणामन्तिकात् प्रतिनिष्कामति २ तमेव चातुर्घण्टमश्वरथमारोइति यावत्प्रत्यवतरति, यत्रैव पुण्डरीको राजा तत्रैवोपागच्छति, करतल यावत् पुण्डरीकं राजानमेवमवादीत् एवं खलु मया देवानुप्रियाः ! Education intemational For Parana Prat द्रुमपत्रक मध्ययनं. १० ~153~ ॥ ३२६॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति : [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| थेराणं अंतिए जाव धम्मे णिसंते, से य धम्मे इच्छिए पडिच्छिए अभिरुइए, तए णं अहं देवाणुप्पिया ! संसा-11 सारभविगे भीए जम्मणमरणाणं इच्छामि णं तुझेहि अणुण्णाए समाणे थेराण अंतिए जाव पचतित्तएत्ति । तए l से पंडरीप राया एवं बयासी-माणं तुम देवाणुप्पिया ! इयाणि थेराणं अंतिए जाव पदयाहि. अहणणं तमं ।। महया २रायाभिसेएणं अभिर्सिचिस्सामि, तए णं से कंडरीए पुंडरियस्स रपणो एयमढू णो आढाति णो परिजा-II माणति तसिणीए संचिट्टह, तए णं से कंडरीए पुंडरीयं दोचपि तचंपि एवं वयासी-इच्छामि णं देवाणप्पिया! जाव पचइत्तपत्ति । तए णं से पुंडरिए राया कंडरीयं कुमारं जाहे णो संचाएइ विसयाणुलोमाहिं बहूहिं आघवणाहि य पपणवणाहि य सण्णवणाहि य विष्णवणाहि य आघवित्तए वा ४ ताहे विसयपडिकूलाहिं संजमभउवेगकरीहिं| १ स्खचिराणामन्तिके यावत् धर्मो निशमितः, स च धर्म ईप्सितः प्रतीप्सितोऽभिरुचितः, ततोऽहं देवानुप्रियाः ! संसारभयोखिमः भीतो जन्म(जरा)मरणेभ्यः इच्छामि युष्माभिरनुज्ञातः सन् स्थविराणामन्तिके यावत्प्रनजितुमिति । ततः स पुण्डरीको राजैवमवादीत-मा त्वं देवा18नुप्रिय ! इदानी स्थविराणामन्तिके यावत्प्रव्रज, अहं पुनस्त्वां महता २ राज्याभिषेकेणाभिषिञ्चामि, ततः स कण्डरीकः पुण्डरीकस्य राज्ञ एनमर्थ || नाद्रियते न परिजानाति, तूष्णीकः संतिष्ठते, ततः स कण्डरीकः पुण्डरीकं राजानं द्विनिरपि एवमवादीत्-इच्छामि देवानुप्रियाः ! यावत्प्रजितुमिति । ततः स पुण्डरीको राजा कण्डरीकं कुमारं यदा न शक्नोति विषयानुलोमाभिश्च बहुभिराख्यापनाभिश्च प्रज्ञापनाभिश्च संज्ञपनामिश्र विज्ञपनाभिश्चाख्यातुं वा ४ तदा विषयप्रतिकूलाभिः संयमभयोगकरीभिः दीप अनुक्रम [२९०] SMEDuratonmhantanonal For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~154 Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति : [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| उत्तराध्य पण्णवाहि य पष्णवेमाणे २ एवं वयासी-एवं खलु जाया ! णिग्गंथे पावयणे सच्चे अणुत्तरे केवलिए एवं जहा दुमपत्रकबृहद्वृत्तिः पडिक्कमणे जाब सचदुक्खाण अंतं करेति, किंतु अहीव एगंतदिट्ठीए खुरो इव एगंतधाराए लोहमया वा जवा चावेया वालुयाकवले इव निस्साए गंगा वा महानई पडिसोयगमणाए महासमुद्दे इव भुयाहि दुरुत्तरेहिं तिक्खं चंकमियछ । का मध्ययनं. ॥३२७॥ गरुयं लंघियचं असिधारं च तवं चरियवं, णो य खलु कप्पई जाता!समणाणं णिग्गंधाणं पाणाइवाए वा जाय मिच्छादं सणसलेति वा १८ आहाकम्मेति या उद्देसेति वा मिस्सजाए वा अज्झोयरए पूइए कीए पामिचे अच्छेजे अणिसिडे अभिहडे वा ठइयए वा कंतारभत्तए इ वा दुभिक्खभत्ते इ वा गिलाणभत्ते इ वा पाहुणगभत्तेत्ति वा सिज्जातरपिंडे इ वा घरायपिंडे इ वा मूलभोयणे इ वा कन्दभोयणे इ वा फलभोयणे इ वा बीयभोयणे इ वा हरियभोयणे इ वा भोत्तए वा १ १ प्रज्ञापनाभिश्च प्रज्ञापयन् २ एवमवादीत्-एवं खलु जात! निम्रन्थे प्रवचने सत्येऽनुत्तरे कैवलिके एवं यथा प्रतिक्रमणे यावत्सर्व दुःखानामन्तं करोति, किन्त्वहिरिवैकान्तदृश्या क्षुरप्र इवैकान्तधारया लोहमया वा यवाश्चर्वितव्या वालुकाकवला इव निरास्वादः गङ्गामहानदीव प्रतिश्रोतोगमनाय महासमुद्र इव भुजाभ्यां दुरुत्तरः तीक्ष्णं चक्रमितव्यं गुरुकं लक्षायितव्यमसिधारं च तपः चरितव्यं, नो च खलु कल्पते। जात ! अमणानां निम्रन्थानां प्राणातिपातो वा यावन्मिध्यादर्शनशल्यमिति वा आधार्मिकमिति वा औद्देशिकमिति वा मिश्रजातमिति वा | ॥३२७॥ & अध्यवपूरकमिति वा पूति क्रीतं प्रामित्यमाच्छेद्यमनिःसृष्टमभ्याहृतं वा स्थापितं वा कान्तारभक्तं वा दुर्भिक्षभक्तं वा ग्लानभक्तं वा प्रापूर्णकभक्तं वा शय्यातरपिण्डो वा राजपिण्डो वा मूलभोजनं वा कन्दभोजनं वा फलभोजनं या बीजभोजनं वा हरितभोजनं बा भोक्तुं वा दीप अनुक्रम [२९०] FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~155 Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| ४/पायए वा, तुमं च णं जाया ! सुहसमुचिते णालं सीतं नालं उण्हं नालं खुहा णालं पिवासा नालं चोरा नालं याला दाणालं साणालं मसगा णालं वात्तियपित्तियसिंभियसन्निवाइयविविहे रोगायके उच्चावए वा गामकंटते वा बावीसं ५ परीसहोवसग्गे उदिपणे सम्म अहियासित्तएत्ति,तं नो खलु जाता! अम्हे इच्छामो तुझंखणमयि विष्पोगं, तं अच्छाही । ताव जाया ! अणुभवाहि रजसिरिं, पच्छा पवहिसि । तए णं से कंडरीए एवं क्यासी-तहेच णं देवाणुप्पिया ! जणं तुज्झे बयह, किं पुण देवाणुप्पिया ! निग्गंथे पावयणे कीवाणं कायराणं कापुरिसाणं इहलोयपडिबद्धाणं परलोगपरंमुहाणं विसयतिसियाणं दुरणुचरे पागयजणस्स, धीरस्स निच्छियस्स ववसियस्स णो खलु इत्थं किंचि दुकरकरणाए, तं इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! जाव पचतित्तएत्ति । तए णं तं कंडरीयं पुंडरीए राया जाहे णो संचाएति १ पातुं वा, त्वं च जात ! सुखसमुचितः नालं शीतं नालमुष्णं नालं क्षुत् नालं पिपासा नालं चौरा नालं च्याला नालं दंशा नालं मशका * नालं वातिकपैत्तिकस्मिकसान्निपातिकान विविधान् रोगातङ्कान् उच्चावचान वा ग्रामकण्टकान् वा द्वाविंशति परीपहोपसर्गान उदीर्णान सम्य-18 गध्यासितुमिति, तन्न खलु जात! वयमिच्छामस्तव क्षणमपि विप्रयोगं, तत्तिष्ठ तावन्नात ! अनुभव राज्यश्रियं पश्चात् प्रव्रजेः । ततः स कण्डरीक एवमवादीत्-तथैव देवानुप्रियाः ! यद्यूयं वदथ, किं पुनर्देवानुप्रियाः ! निम्रन्थं प्रावचनं क्लीवानां कातराणां कापुरुषाणामिहलोकप्रतिब द्वानां परलोकपराड्मुखानां विषयतृषितानां दुरनुचरं प्राकृतजनस्य, धीरस्य निश्चितस्य व्यवसितस्य न खलु अत्र किश्चित् दुष्करं कर्तु, तदि-18 हाच्छामि देवानुप्रियाः ! यावत् प्राजितुमिति । ततस्तं कण्डरीकं पुण्डरीको राजा यदा न शक्नोति दीप अनुक्रम [२९०] % 2 SamEdicatomu nt FairamanaSPrwara tumonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~156~ Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||२|| उत्तराध्य. बहूहिं आघवणाहि य ४ आषवित्तए चा ४ ताधे अकामए चेव णिक्खमणं अणुमण्णित्था । तए णं से पुंडरीए कोडुवि- दमपत्रक ४ायपुरिसे सद्दावेद २ एवं वयासी-जहा महामइग्धं महारिहं णिक्खमणमहिमं करेह, जाव पवतितो। तओसामाइयमाइ दियाई एकारस अंगाई अहि जियाई, बहहिं चउत्थच्छटुट्ठमाईहिं तवोवहाणेहिं जाब विहरइ । अन्नया तस्स कंडरीयस्समध्ययन ॥३२८॥ अंतेहि य पंतेहि य जाव रोगायके पाउम्भूए जाव दाहवनंतीए यावि विहरति । तते णं ते थेरा भगवंतो अन्नया कयाई पुषाणुपुछि चरमाणा गामाणुगाम विहरमाणा पुंडरिगिणीए नलिणिवणे समोसढा, तए णं से पुंडरीए राया है दाइमीसे कहाए लढे समाणे जाव पज्जुवासइ, पत्थुया धम्मकहा भगवया, तते णं से पुंडरीए राया धर्म सोचा जेणेव कंडरीए अणगारे तेणेव उवागच्छइ २ ता कंडरीयं वंदइ नमसइ २ कंडरीयस्स सरीरं सघावाहं सरुयं पासति २ १ बहुभिराख्यापनाभि ४ श्राख्यातुं वा ४ तदा अकाम एव निष्क्रमणमन्वमस्त । ततः स पुण्डरीकः कौटुम्बिकपुरुषान शब्दयति २ एवमवादीत-यथा महामहाग्गे महार्ह निष्क्रमणमहिमानं कुरुत, यावत्प्रनजितः । ततः सामायिकादीन्येकादशाङ्गान्यधीतानि, बहुभिश्चतुर्थषष्ठा टमादिभिः तपउपधानैर्यावद्विचरति । अन्यदा तस्य कण्डरीकस्य अन्तैश्च प्रान्तैश्च यावत् रोगातङ्काः प्रादुर्भूता यावद् दाहव्युत्कान्तिश्चापि विहरति । * ततस्ते स्थविरा भगवन्तोऽन्यदा कदाचित् पूर्वानुपूर्व चरन्तो प्राभानुप्रामं विहरन्तः पुण्डरीकिण्यां नलिनीवने समवमृताः, ततः सः पुण्डरीको ॥३२८॥ राजा अस्याः कथाया लम्धार्थः सन् यावत् पर्युपास्ते, प्रस्तुता धर्मकथा भगवता, ततः स पुण्डरीको राजा धर्म धुत्वा यत्रैव कण्डरी-14 ६ कोऽनगारसयोपागच्छति २ कण्डरीकं वन्दते प्रणमति २ कण्डरीकस्य शरीरं सख्यावाधं सरुजं पश्यति २ दीप अनुक्रम [२९०] 4%AE%2 mat पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~157 Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति : [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| जेणेब थेरा तेणेब उबागच्छइ, थेरे वंदति २ एवं वयासी-अहं गं भंते ! कंडरीयस्स अणगारस्स अहापवत्तेहि । रातगिच्छिएहिं फासुयएसणिजेहिं अहापवत्तेहिं ओसहमेसज्जभत्तपाणेहिं तिगिच्छं आउंटामि,तुज्झे णं भंते ! मम जाण-४ सालासु समोसरह, तते णं थेरा पुंडरीयस्स रण्णो एयमढे पडिसुणेति २ जाव जाणसालासु विहरंति । तए णं से पुंडरीए कंडरीयस्स तिगिच्छं आउंटेइ, तए णं तं मणुन्नं असणं ४ आहारतस्स समाणस्स से रोगायंके खिप्पामेव उवसंते हढे जाए आरोगे बलियसरीर, तओ रोगायंकाओ मुकेऽवि समाणे तंसि मणुपणंसि असणे ४ मुच्छिए जाव अज्झोपवण्णे विविहे य पाणगंसि, णो संचाएति बहिया अन्भुज्जएणं विहारेणं विहरित्तएत्ति । तते णं से पुंडरीए इमीसे कहाए लट्टे समाणे जेणेव कंडरीए तेणेव उवागच्छति २ कंडरीयं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं || - १ यत्रैव स्थविरास्तत्रैवोपागच्छति, खविरान् वन्दते २ एवमवादीत्---अहं भदन्ताः! कण्डरीकस्यानगारस्य यथाप्रवृत्तचिकित्सित्तैः प्रासुकैषणीयैर्यथाप्रवृत्तरौषधभैषज्यभक्तपानैचिकित्सां कारयानि, यूयं भदन्ताः! मग यानशालासु समवसरत, ततः स्थविराः पुण्डरीकस्य राज्ञ एनमर्थ प्रतिशृण्वन्ति २ यावद्यानशालासु विचरन्ति । ततः स पुण्डरीकः कण्डरीकस्य चिकित्सा कारयति,ततस्तत् मनोज्ञमशन ४ मा-४ हारयतः सतः तस्य रोगातवाः क्षिप्रमेवोपशान्ता हष्टो जातः अरोगो बलिकशरीरः, ततो रोगातश्कात् मुक्तोऽपि सन् तस्मिन् मनोशेऽशने | ४ मूर्छितो यावदध्युपपन्नः विविधे च पानके, न शक्नोति बहिरभ्युद्यतेन बिहारेण बिह मिति । ततः स पुण्डरीकोऽस्याः कथाया लब्धार्थः सन् यत्रैव कण्डरीकस्तत्रैवोपागच्छति २ कण्डरीक त्रिकूत्व आदक्षिणप्रदक्षिणं दीप अनुक्रम [२९०] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~158 Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||६२|| दीप अनुक्रम [२९०] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३२९॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||६२...|| निर्युक्ति: [२८४-३०६] अध्ययनं [१०], करेति २ बंदति २ एवं व्यासी- घण्णेऽसि णं तुमं देवाणुप्पिया ! एवं सपुण्णोऽसि णं कयत्थे कयलक्खणे सुलद्धे णं तव देवाणुप्पिया! माणुस्सए जम्मे जीवियफले, जण्णं तुमं रजं च जाव अंतेउरं च विच्छइत्ता जाब पचइए, अहणणं अहणणे अकयपुण्णे जाव माणुस्सए भवे अणेगजाइज रामरणरोगसोगसारीर माणसपकामदुक्खवेयणावसणसयउवद्दवाभिभूए अधुवे अणीइए असासए संज्झभरागसरिसे जलबुध्यसमाणे कुसग्गजलबिंदुसान्निहे सुमिणग७) दंसणोवमे विज्जुलयाचंचले अणिचे सडणपडणविद्धंसणधम्म के पुर्वि या पच्छा वा अवस्सं विष्पजहियवइत्ति, तहा माणुस्सयं सरीरगंपि दुक्खाययणं विविवाहिसयसन्निकेयं अद्वियकछुट्ठियं सिराहारुजालओणद्वसंविणद्धं मट्टियभंड व दुखलं असुइकिलिडं अणिटुंपि य सघकालं संठप्पयं जराघुणियं जज्जरघरं व सडणपडणविद्धंसणधम्मयं पुत्रिं वा १ करोति २ वन्दते २ एवमवादीत्-धन्योऽसि त्वं देवानुप्रिय ! एवं सपुण्योऽसि कृतार्थः कृतलक्षणः सुलक्ष्धं तव देवानुप्रिय ! मानुष्यं जन्म जीवितफलं यवं राज्यं च यावदन्तःपुरं च विच्छये यावत्प्रत्रजितः, अहमधन्योऽकृतपुण्यो यावन्मानुष्यो भवः अनेकजातिजरा| मरणरोगशोक शारीरमानसिकप्रकामदुःखवेदनाव्यसनशतोपद्रवाभिभूतोऽभुवोऽनैत्यिकोऽशाश्वतः सन्ध्याधरागसदृशः जलबुद्बुदसमानः कुशा| जलबिन्दुसन्निभः स्वप्नदर्शनोपमो विद्युलताच भ्वलोऽनित्यः शटनपतनविध्वंसनधर्मकः पूर्व वा पञ्चाद्वाऽवश्यं विप्रहातव्य इति, तथा मानुष्यकं शरीरमपि दुःखायतनं विविधव्याधिशतसन्निकेतमस्थिकाष्ठोत्थितं सिरास्नायुजालावनद्धसंविनद्धं मृत्तिकाभाण्डवदुर्बलमशुचिसंष्टिष्टमनिष्टमपि च सर्वकालं संखाप्यं जराघूर्णितं जर्जरगृहवत् शटनपतनविध्वंसनधर्मकं पूर्व वा Education International For Panas Private दुमपत्रकमध्यवनं. ~159~ १० ॥ ३२९॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] 84% प्रत सूत्रांक ||२|| IPापच्छा वा अवस्सविप्पजहियवं, कामभोगावि य णं माणुस्सगा असुई असासया वंतासवा एवं पित्ता० खेला. सुका. सोणियासवा उच्चारपासवणखेलसिंघाणवंतपित्तसुक्कसोणियसमुम्भवा अमणुण्णपु [९] रूयमुत्तपूतिपुरीसपुण्णा मय|गंधुस्सासअसुभणिस्सासउषीयणगा बीभच्छा अप्पकालिया लघुस्सगा कलमलाहिया सुदुक्खा बहुजणसाहरणा परिकिलेसकिच्छदुक्खसज्झा अबुहजणणिसेषिया सदा साधुगरहिणिजा अर्णतसंसारवडणा कडुगफलविवागा चुलियत |अमुंचमाणा दुक्खाणुवंघिणो सिद्धिगमणविग्घा पुखिंवा पच्छा वा अवस्स विप्पजहियबा भवंति, जेऽपि यणं रजे हिरणे सुवण्णे य जाव सावइज्जे सेऽवि यणं अग्गिसाहिए चोरसाहिए रायसाहिए दाइयसाहिए अधुवे अणितीए असासए पुर्वि वापच्छा वा अवस्सविप्पजहियचे भविस्सतित्ति, एवंविहम्मि रजे जाव अंतेउरे य माणुस्सएसु य कामभोगेसु मुच्छिए। १ पश्चाद्वाऽवश्यं विप्रहातव्यम् , कामभोगा अपि च मानुष्यका अशुचयोऽशाश्वता वान्तात्रवाः एवं पित्ता० श्लेष्मा० शुक्रा० शोणिता अवा उचारप्रस्रवणलेष्मसिद्धानवान्तपित्तशुकशोणितसमुद्भवा अमनोज्ञपूयमूत्रपूतिपुरीषपूर्णा मृतगन्धोच्छासाशुभनिःश्वासोद्वेजका बीभत्सा | अल्पकालीना लघुस्खकाः कश्मलाधिकाः सुदुःखा बहुजनसाधारणाः परिवेशकच्छूदुःखसाध्या अबुधजननिषेविताः सदा साधुगर्हणीया अनन्तसंसारवर्धनाःकटुकफलविपाकाः चुडलीव अमुच्यमानाः दुःखानुवन्धिनः सिद्धिगमनविनाः पूर्व वा पश्चाद्वाऽवश्यं विप्रहातव्या भवन्ति, यदपि च राज्यं हिरण्यं सुवर्ण च यावत्स्वापतेयं तदपि चाग्निस्वाधीनं चौरस्वाधीनं राजस्खाधीनं दायादृस्वाधीनमधुवमनित्यमशाश्वतं पूर्व वा पश्चाद्वाऽवश्यं । विप्रहातव्यं भविष्यतीति, एवंविधे राज्ये यावदन्तःपुरे च मानुष्यकेषु च कामभोगेषु भूञ्छितो ४ दीप अनुक्रम [२९०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~160 Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति : [२८४-३०६]] प्रत सूत्रांक ||२|| उत्तराध्य. णो संचाएमि जाव पवयित्तए, तं धण्णेऽसि गं तुमं जाव सुलद्धे पं मणुयजम्मे, जंणं पचइए । तते णं से कंडरीए दुमपत्रकदापुंडरीएणं एवं बुत्ते तुसिणीए संचिट्ठति, ततेणं से पुंडरीए दोचंपि तचंपि एवं बयासी-धण्णेऽसि तुमं अहं मध्ययनं. अहण्णे। तएणं से दोबपि तपि एवं बुत्ते समाणे अकामए अवसंबसे लजाए य गारवेण य पुंडरीयरायं आपुच्छह, ॥३३०॥ थेरेहिं सद्धिं बहिया जणवयविहारं विहरई । तए णं से कंडरीए थेरेहिं सद्धिं किंचि कालं उग्गं उग्गेणं विहरित्ता तओ दीपच्छा समणतणनिधिषणे समणत्तणणिन्मथिए समणगुणमुक्कजोगे घेराणं अंतियातो सणियं २ पचोसकई, जेणेव पुंडरगिणी णयरी जेणेष पुंडरीयस्स रण्णो भवणे जेणेव असोगवणिया जेणेव असोगवरपायवे जेणेव पुढविसिलावट्टए तेणेव उवागच्छति २ जाव सिलापट्टयं दुरुहइ २ ओहयमणसंकप्पे जाव झियायति । तए णं १न शक्रोमि यावत्प्रत्रजितुम् , गद्धन्योऽसि त्वं यावत् सुलब्धं मानुष जन्म यत्नजितः। ततः स कण्डरीकः पुण्डरीकेणैवमुक्ता तूष्णीकः संतिष्ठते, ततः स पुण्डरीकः द्विनिरपि एबमबादीत-धन्योऽसि त्वमहमधन्यः । ततः स द्वितिरप्येवमुक्तः सन्नकामोऽवशवशो लजया च गौरवेण च पुण्डरीक राजानमापूच्छति, खविरैः सा बहिर्जनपदविहारं विहरवि । ततः स कण्डरीकः स्थविरैः सा फश्चित्कालमुष-IN३३०॥ मुप्रेण बिहत्य ततः पश्चात् श्रामण्यनिर्विणः श्रामण्यनिरिसतः मुक्तामणगुणयोगः स्थविराणामतिकात् शनैः २ प्रत्यववष्कति, यावर पुण्डरीकिणी नगरी यौव पुण्डरीकस्य राज्ञो भवनं यत्रैवाशोकवनिका यत्रैवाशोकबरपादपो यत्रैव पृथ्वीशिलापट्टकस्तत्रैवोपागच्छति २ *यावच्छिलापट्टकमारोहति २ अपह्तमनःसंकल्पो यावद्यायति । ततः दीप अनुक्रम [२९०] matandang For P ation पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~161 Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||६२|| दीप अनुक्रम [२९०] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्तिः [२८४-३०६] अध्ययनं [१०], मूलं [--] / गाथा ||६२...|| पुंडरीयस्स अम्मधाई तत्थागच्छति, जाव तं तहा पासति २पुंडरीयस्स साहति, सेऽवि य णं अंतेउरपरिवाल संपरिबुडे तत्थागच्छति २ तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं जाव धण्णेऽसि णं सर्व्वं जाब तुसिणीए, तए णं पुंडरीए एवं क्यासी-अट्ठो भंते । भोगेहिं?, हंत अट्ठो, तए णं कोडंबियपुरिसे सहावे २ कलिकलुसेणेवाभिसित्तो रायाभिसेएणं जाव रज्जं पसासेमाणे विहरति । तए णं से पुंडरीए सयमेव पंचमुट्ठियं लोयं करेइ २ चाउज्जामं धम्मं पडिवज्जइ २ कंडरीयस्स आयारभंडगं सवसुहसमुदयंपिव गिण्हति २ इमं अभिग्गहं गिण्हति - कप्पति मे घेराणं अंतिते धम्मं पडि| वजेत्ता पच्छा आहारं आहारित्तएत्तिक थेराभिमुहे णिग्गए। कंडरीयस्स उ तं पणीयं पाणभोयणं आहारियस्स णो सम्मं परिणयं, बेयणा पाउन्भूया उज्जला विउला जाव दुरहियासा, तए णं से रज्जे य जाव अंतेउरे य मुच्छिए जाव १ पुण्डरीकस्य धात्री तत्रागच्छति यावत्तं तथा पश्यति २ पुण्डरीकाय कथयति सोऽपि च अन्तःपुरपरिवारसंपरिवृतस्तत्रागच्छति २ त्रिकृत्व आदक्षिणप्रदक्षिणं यावद्धन्योऽसि सर्व यावन्तूष्णीकः, ततः पुण्डरीक एवमवादीत्-अर्थो भदन्त ! भोगे ?, हन्तार्थः, ततः कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दयति २ कलिकलुषेणाभिषिक्तो राजाभिषेकेण यावद्राव्यं प्रशासयन् विहरति । ततः स पुण्डरीकः स्वयमेव पञ्चमौष्टिकं लोचं करोति २ बायोमं धर्म प्रतिपद्यते २ कण्डरीकस्याचारभाण्डं सर्वसुखसमुदायमिव गृह्णाति २ इममभिमदं गृहाति — कल्पते मम स्थवि राणामन्तिके धर्म प्रतिपद्य पश्चादाहारमाहारयितुमिति कृत्वा स्थविराभिमुखो निर्गतः । कण्डरीकस्य तु तत्प्रणीतं पानभोजनमाहारितस्य न सम्यक् परिणतं वेदना प्रादुर्भूता उज्ज्वला विपुला यावद्दरध्यास्या, ततः स राज्ये च यावदन्तःपुरे च मूर्च्छितो याव Education intemational For Personal Privat www.nary.org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~162~ Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति : [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| उत्तराध्य. अज्झोपवण्णे अट्टदुहट्टक्सट्टे अकामए कालं किया सत्तमीपुढवीए तेत्तीससागरोवमद्विईए जाए । पुंडरीएऽवि यण दुमपत्रकबदतिःलाथरे पप्प तेर्सि अंतिते दोघंपि चाउजामे धम्मे पडिबजति. अट्रमखमणपारणगंसि अदीणे जाव आहारेई. तेण य का-II मध्ययनं. लाईकंतसीयललुक्खअरसविरसेणं अपरिणतेण वेयणादुरहियासा जाया, तए णं से अधारणिज्जमितिकट्ठ करयलपरिग्ग-. ॥३३॥ हियं जाव अंजलिं कह णमोऽत्धुणं अरहताणं भगवंताणं जाव संपत्ताणं नमोऽत्थु णं घेरार्ण भगवंताणं मम धम्मायरियाणं धम्मोवएसयाणं पुर्विपि य णं मए थेराणं अंतिते सवे पाणाइवाए पञ्चक्खाए जावज्जीवाए जाव सधे अकरणिजे है|जोगे पच्चक्खाए, इयाणिपि तेसिं चेव णं भगवंताणं अंतिते जाव सर्व पाणातिवायं जाव सर्च अकरणिजं जोग पञ्चक्खामि, जंपि य मे इमं सरीरगं जाव एयपि चरिमेहिं ऊसासनीसासेहि बोसिरामित्ति, एवं आलोइयपडिकते H. १० ध्युपपन्नः आर्तदुःखार्तवशार्तः अकामः कालं कृत्वा सप्तमी पृथ्वी त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमस्थितिको गतः । पुण्डरीकोऽपि च स्थवि-17 रान् प्राप्य तेषामन्तिके द्विपि चातुर्याम धर्म प्रतिपद्यते, अष्टमक्षपणपारणे अदीनो यावदाहारयति, तेन च कालातिक्रान्तशीतलरक्षारस-11 [विरसेन अपरिणतेन वेदना दुरभ्यासा जाता, ततः सोऽधारणीयमितिकृत्वा करतलपरिगृहीतं यावदञ्जलिं कृत्वा नमोऽस्तु अहंन्यः भगवज्यो ॥३३॥ यावत्संप्राप्नेभ्यो नमोऽस्तु खविरेभ्यो भगवच्यो मम धर्माचार्येभ्यो धर्मोपदेशकेभ्यः, पूर्वमपि मया स्थविराणामन्तिके सर्वः प्राणातिपातः | प्रत्याख्यातो यावजीवतया यावत्सर्वोऽकरणीयो योगः प्रत्यारूपातः, इदानीमपि तेषामेव भगवतामन्तिके यावत्सर्व प्राणातिपातं यावत्सर्वमकरणीयं योगं प्रत्याख्यामि, यदपि च मे इदं शरीरमेतदपि यावत् चरमैरुच्छ्वासनिःश्वासयुत्सृजामीति एवमालोचितप्रतिक्रान्तः दीप अनुक्रम [२९०] 2 SamEducatmi For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~163 Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| समाहिपत्ते कालमासे कालं किना सबढसिद्धे तेत्तीससागरोवमाऊ देवे जाए, तओ चहत्ता महाविदेहे सिज्झिहित्ति । ता मा तुर्म दुव्बलत्तं बलियत्तं वा गिण्हाहि, जधा सो कंडरीओ तेणं दोयलेणं अट्टदुहवसहो। सत्तमीए उववण्णो, पुंडरीतो पडिपुण्णगलकवोलो सबट्ठसिद्धे उबवण्णो, एवं देवाणुप्पिया ! बलितो दुब्बलो| वा अकारणं, इत्थ झाणणिग्गहो कायबो, झाणणिग्गहो परमं पमाणं । तत्थ वेसमणो अहो भगवया आकृयं नायति। ४ एत्थ अतीव संवेगमावण्णोत्ति वंदित्ता पडिगतो। तत्थ वेसमणस्स एगो सामाणितो देवो, तेण तं पंडरीयज्झयणं ओगाहियं पंचसयाणि संमत्तं च पडियणगोत्ति, केई भणंति-जंभगो सो। ताहे भगवं कलं चेइयाणि वंदित्ता पचोरुहति,ते तायसा भणंति-तुज्झे अम्हाणं आयरिया अम्हे तुम्भं सीसा, सामी भणति-तुझं अम्हं च तिलोयगुरू आयरिया, १ प्राप्तसमाधिः कालमासे कालं कृत्वा सर्वार्थसिद्ध त्रयविंशत्सागरोपमायुर्देवो जातः, ततश्युत्वा महाविदेहेषु सेत्स्यतीति । तन्मा त्वं दुर्बलत्वं बलिवं वा गृहाण, यथा स कण्डरीकस्तेन दौर्बल्येन आ“दुःखार्त्तवशाः सप्तम्यामुत्पन्नः, पुण्डरीकः परिपूर्णगलकपोलः सर्वार्थसिद्धे | उत्पन्नः, एवं देवानुप्रिय ! बली दुर्बलो वाऽकारणमत्र ध्याननिग्रहः कर्त्तव्यः, भ्याननिग्रहः परमं प्रमाणं । तत्र वैश्रवणोऽहो, भगवताऽऽकूत ज्ञातमिति अन्नातीव संवेगमापन्न इति वन्दित्वा प्रतिगतः । तत्र वैश्रमणस्पैक: सामानिको देवतेन तत्पुण्डरीकमध्ययनमवगाहितं पञ्चशतानि । (शतवाय) सम्यक्त्वं च प्रतिपन्न इति, केचिद्भणन्ति–जृम्भकः सः । तदा भगवान् प्रभाते चैत्यानि वन्दित्वा प्रत्यवतरति, ते तापसा | भणन्ति-यूयमस्माकमाचार्या वर्ष युष्माकं शिष्याः, स्वामी भणति----युष्माकमस्माकं च त्रिलोकगुरव भाचार्याः, दीप अनुक्रम [२९०] Eaintion For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~164 Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||६२|| दीप अनुक्रम [२९०] उत्तराध्य. बृहद्वृत्ति: ॥३३२॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||६२...|| अध्ययनं [१०], निर्युक्ति: [२८४-३०६] ते मंगति-तुम्भवि अन्नो आयरिओ १, ताहे सामी भगवओ गुणथवणं करेइ, ते पवइया, देवयाए लिंगाणि उवणीयाणि, ताहे ते भगवया सद्धिं वचंति, भिक्खावेला य जाया, भगवं भणति किं आणिज्जउ ?, ते भांतिपायसो, भगवं च सवलद्धिसं पुण्णो पडिग्महगं महुसंजुत्तस्स पायसस्स भरिता आगतो, ताहे भणति - परिवाडीए ठाह, ते ठिया, भगवं च अक्खीणमहाणसितो, ते धाया, ते सुटुयरं आउट्टा, ताहे सयमाहारेति, ताधे पुणरवि पट्टविया । तेसिं च सेवालभक्खगाणं जेमंताणं चेव केवलणाणं उप्पण्णं, दिण्णस्स वग्गे छत्ताइच्छत्तं पच्छंताणं, कोडिन्नस्स वग्गे सामिं दडूण उबवण्णं । गोयमसामी पुरओ पकडमाणो सामिं पयाहिणीकरेति, तेवि केवलिपरिसं पहाविया, गोयमसामी भणह एध सामि बंदह, सामी भणइ - गोयमा ! मा केवली आसाएहि, गोयमसामी आउट्टो मिच्छादुकडं करेति । १ ते भणन्ति --- युष्माकमप्यन्य आचार्य ?, तदा स्वामी भगवतो गुणस्तवनं करोति, ते प्रब्रजिताः, देवतया लिङ्गान्युपनीतानि तदा ते भगवता सार्धं व्रजन्ति, भिक्षावेला च जाता, भगवान् भणति-किमानीयताम् ?, ते भणन्ति पायसः, भगवां सर्वलब्धिसंपूर्ण प्रतिग्रहं मधुसंयुक्तस्य पायसस्य भृत्याऽऽगतः, तदा भणति परिपाट्या तिष्ठत, ते स्थिताः, भगवांश्चाक्षीणमहानसिकः, ते धाताः, ते सुष्ठु आवजिताः, तदा स्वयमाहारयति, तदा पुनरपि प्रस्थापिताः तेषामथ शैवालभक्षकाणां जिमतामेव केवलज्ञानमुत्पन्नं दत्तस्य वर्गे छत्रातिच्छत्रं पश्यतां, कौडिन्यस्य वर्गे स्वामिनं दृष्ट्वोत्पन्नम् । गौतमस्वामी पुरतः प्रकर्षन् स्वामिनं प्रदक्षिणीकरोति तेऽपि केवलिपर्षदं प्रधाविताः, गौतमस्वामी भणति एव स्वामिनं बन्दध्वं, स्वामी भगति गौतम! मा केवलिन आशातय, गौतमस्वामी आवृत्ती मिध्यादुष्कृतं करोति । Education intemational For Parsons Private Use Onl दुमपत्रक मध्ययनं. १० ~ 165~ ||३३२|| पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||६२...|| नियुक्ति: [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||२|| तओ गोयमसामिस्स सुहुयरं अधिती जाया, ताधे सामी गोयम भणति-किं देवाणं वयणं गिझं? आतो जिणाणं?, गोयमो भणति-जिणवराणं, तो कीस अधिति करेसि ?, ताधे सामी चत्तारि कडे पण्णवेइ, तंजहा-मुंबकडे विदलकडे चम्मकडे कंबलकडे, एवं सामीवि गोयमसामीतो कंबलकडसमाणो, किंच-चिरसंसट्ठोऽसि मे गोयमा । जाव अविसेसमणाणत्ता भविस्सामो, ताधे सामी दुमपत्तयं नाम अज्झयणं पण्णवेइ । देवो वेसमणसामाणितो ४ ततो चइत्ता णं तुंबवणसन्निवेसे धणगिरीणाम गाधावई, सोय पबतिउकामो, तस्स य मायापियरो बारेंति, पच्छा ४ हासो जत्थ २ बरेंति तत्थ २ विष्परिणामेति जहा अहं पचाउकामो, तस्स य तयणुरुवस्स गाहावतिस्स धूया सुणदा Mणाम, सा भणइ-ममं देह, ताधि सा दिण्णा, तीसे य भाया अजसमितो णाम पुषपञ्चतितो, तीसे य सुर्णदाए कुच्छिसि १ ततो गीतमस्वामिनः सुष्टुतराऽधृतिर्जाता, तदा स्वामी गौतम भगति-किं देवानां वचनं ग्राह्यमुत जिनानाम् ', गौतमो भणतिजिनवराणां, तदा कुतोऽधृतिं करोपि', तदा स्वामी चतुरः कटान् प्रज्ञापयति, तद्यथा-गुम्बकटो विदलकटवर्मकटः कम्बलकटः, एवं स्वाम्यपि गौतमस्वामिनमाश्रित्य कम्बलकटसमानः, किं च-चिरसंसृष्टोऽसि मम गौतम ! यावत् अविशेषौ अनानात्वौ भविष्यावः, तदा स्वामी दुमपत्रीयमध्ययनं प्रज्ञापयति । देवो वैश्रमणसामानिकस्ततश्युत्वा तुम्बवनसन्निवेशे धनगिरिनाम गाथापतिः, स च प्रत्रजितुकामः, तस्य |च मातापितरौ वारयतः, पश्चात्ती यत्र यत्र वर्यतः तत्र तत्र विपरिणमयति यथा अहं प्रन्नजितुकामः, तस्य च तदनुरूपस्य गाथापतेदेंहिता | सुनन्दा नाम, सा भणति-मां दत्त, तदा सा दत्ता, तस्याश्च भ्राता आर्यसमितो नाम पूर्वप्रश्नजिवा, तस्याश्च सुनन्दायाः कुक्षी दीप अनुक्रम [२९०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~166~ Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [२८४-३०६] प्रत सूत्रांक ||१|| समाराध्य |सो देवो उथवष्णो, ताधे भणति धणगिरी-एस ते गम्भो विइजिओ होहिइ, सो सीहगिरिस्स पासे पबतितो, इमोवि दुमपत्रकहद्वत्तिःणवण्ह मासाणं दारतो जातो ॥ इत्यादि भगवद्वैरिखामिकथा आवश्यकचूर्णितोऽवसेया इत्युक्तो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, INमध्ययनं. सम्प्रति सूत्रालापकनिष्पन्ननिक्षेपावसरः, स च सूत्रे सतीत्यतः सूत्रानुगमे सूत्रमुञ्चारणीयं, तच्चेदम्॥३३॥ दुमपत्तए पंडुयए जहा, निवडद राइगणाण अचए । एवं मणुयाण जीवियं, समयं गोयममा पमायए ॥शान | व्याख्या-द्रुमो-वृक्षस्तस्य पत्रं-पलाशं तदेव तथाविधावस्थां प्राप्यानुकम्पितं द्रुमपत्रकं 'पंड्डयए'त्ति आषेत्वात् तपाण्डुरकं कालपरिणामतस्तथाविधरोगादेर्वा प्राप्तवेलक्षभावं, येन प्रकारेण यथा, 'निपतति' शिथिलवृन्तवन्धनत्वाद् भ्रश्यति, प्रक्रमात् द्रुमत एव, रात्रिगणानां दिनगणाविनामावित्वादुपलक्षणत्वाद्वा रात्रिन्दिवससमूहानाम् 'अत्यये' | अतिक्रमे, 'एवम्' इत्येवंप्रकारं 'मनुष्याणां' मनुजानां, शेषजीयोपलक्षणं चैतत् , 'जीवितं' आयुः, तदपि हि रात्रिन्दिवगणानामतिक्रमे यथास्थित्या स्थितिखण्डकापहारात्मकेनाध्यवसायादिना जनितेनोपक्रमणेन वा जीवप्रदे-४ शेभ्यो भ्रश्यतीत्येवमुच्यते, यतश्चैवमतोऽत्यन्तनिरुद्धः कालः समयस्तम् , अपिशब्दस्य गम्यमानत्वात्समयमप्या-13 स्तामावलिकादि, 'गौतम' इति गौतमसगोत्रस्येन्द्रभूतेरामन्त्रणं 'मा प्रमादी' मा प्रमादं कृथाः, शेषशिष्योपलक्ष- ॥३३॥ १स देव उत्पन्नः, तदा भणति धनगिरिः-एष तव गर्भो द्वितीयको भविष्यति, स सिंहगिरेः पार्थे प्रत्रजितः । अयमपि नबसु मासेषु दारको जातः, दीप अनुक्रम [२९१] SamEducatan intamatant For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~167~ Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक |||| दीप अनुक्रम [२९१] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१|| निर्युक्ति: [३०७-३०९] अध्ययनं [१०], णं च गौतमग्रहणम्, उक्तं हि नियुक्तिकृता- 'तण्णिस्साए भगवं सीसाणं देइ अणुसद्धिं,' अत्र च पाण्डुरकपदाक्षिसं यौवनस्याप्यनित्यत्वमाविश्चिकीर्षुराह नियुक्तिकृत् परियट्टियलावण्णं चलंतसंधिं मुयंतबिंटागं । पत्तं च वसणपत्तं कालप्पत्तं भणइ गाहं ॥ ३०७ ॥ जह तुम्भे तह अम्हे तुम्भेवि अ होहिहा जहा अम्हे । अप्पाहेर पडतं पंडुरवत्तं किसलयाणं ॥ ३०८|| निवि अस्थि नवि अ होही उल्लावो किसलपंडुपत्ताणं । उवमा खलु एस कया भवियजणविबोहणट्टाए व्याख्या -- परिवर्तितं - कालपरिणत्याऽन्यथाकृतं लावण्यम्-अभिरामगुणात्मकमस्येति परिवर्तित लावण्यं यतो न तस्य प्रागिव सौकुमार्यादि विद्यते, तथा चलन्तः- शिथिलीभवन्तः सन्धयो– यस्मिंस्तत्तथा, अत एव 'मुयंतबेटागं'ति मुञ्चत्-त्यजत् सामर्थ्याद् वृक्षं वृत्तकं पत्रबन्धनं यस्य तत् मुञ्चदृन्तकं, वृन्तस्य वृक्षमोचने पत्रस्य पतनमेव । भवतीति पतदित्युक्तं भवति, 'पत्र' (च) पर्ण, व्यसनम् - आपदं प्राप्तं व्यसनप्राप्तं तथा कालः- प्रक्रमात् पतनप्रस्ता- । वस्तं प्राप्तं गतं कालप्राप्तं 'भणति' अभिधत्ते, गीयत इति गाथा तां - छन्दोविशेषरूपां ॥ तामेवाह'यथा' इति सादृश्ये, ततो यथा यूयं सम्प्रति किशलय भावमनुभवथ त्रिग्धादिगुणैर्गर्व मुद्वहथ अस्मानुपह सथ, तथा वयमप्यतीतदशायां तथा यूयमपि च भविष्यथ यथा वयमिति, जीर्णभावे हि यथा वयमिदानीं विव Education International For Parsons Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~168~ Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||R|| दीप अनुक्रम [२९२] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः IITT [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२|| निर्युक्ति: [३०९...] अध्ययनं [१०], विच्छायतयोपहास्यानि, एवं यूयमपि भावीनीति, 'अप्पाहेद्दति उक्तन्यायेनोपदिशति पितेव पुत्रस्य 'पतत्' भ्रश्यत् 'पाण्डुरपत्रं' जीर्णपत्रं 'किसलयानाम्' अभिनवपत्राणां । ननु किमेवं पत्रकिसलयानामुहापः सम्भवति ? येनेदमुच्यते, अत आह- 'नैवास्ति' नैव विद्यते नैव भविष्यति उपलक्षणत्वात् नैव भूतः कोऽसौ ? - 'उल्लापः ' बचनं, केषां ? - 'किशलयपाण्डुपत्राणाम् उक्तरूपाणां, आर्षत्वाच्च यलोपः तदिह किमेवमुक्तमित्याह - 'उपमा' उपमितिः, खलु एवकारार्थत्वात्, ततः उपमैव, 'एषा' अनन्तरोक्ता 'कृता' विहिता 'भवियजणविवोहणट्टाए' त्ति 2 प्रतीतमेव । यथेह किशलयानि पाण्डुपत्रेणानुशिष्यन्ते तथाऽन्योऽपि यौवनगर्वितोऽनुशासनीयः, तथा चैतदनुवादिना ॐ वाचकेनावाचि- 'परिभव.स किमिति लोकं जरसा परिजर्जरीकृतशरीरम् । अचिरात् त्वमपि भविष्यसि यौवनगर्व किमुद्वहसि ? ॥ १ ॥ तदेवं जीवितयौवनयोरनित्यत्वमवगम्य न प्रमादो विधेय इति गाथात्रयार्थ युक्तसूत्रगर्भार्थः ॥ | पुनरायुषोऽनित्यत्वं ख्यापयितुमाह- सगे जह ओसविंदुए, थोवं चिट्ठति लंबमाणए। एवं मणुयाण जीवियं, समयं० ॥ २ ॥ व्याख्या - कुशो - दर्भसदृशस्तृणविशेषः, तनुतरत्वाच्च तस्योपादानं, तस्याग्रं प्रान्तस्तस्मिन्, 'यथा' इत्युपमानदर्शकः, अवश्यायः - शरत्कालभावी लक्ष्णवर्षस्तस्य विन्दुरेव विन्दुकः अवश्यायबिन्दुकः, 'स्तोकम्' अल्पकालमिति गम्यते, 'तिष्ठति' आस्ते, 'लम्बमानकः' मनारा निपतद्, बद्धास्पदो हि कदाचित् कालान्तरमपि क्षमेतेत्येवं विशे Education International For Parsons Private Onl द्रुमपत्रक मध्ययनं. १० ~169~ ॥ ३३४ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||३|| नियुक्ति: [३०९...] प्रत सूत्रांक ||३|| ४/प्यते, 'एवम्' इत्युक्तसरशं 'मनुजानां मनुष्याणां, मनुजग्रहणं च प्राग्वत् , 'जीविय'ति जीवितं, यत एवं ततः समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः ॥ अमुमेवार्थमुपसंहरन्नुपदेशमाह इइ इत्तरियंमि आउए, जीवितए बहुपञ्चवायए । विहुणाहि रयं पुराकडं, समयं ॥३॥ व्याख्या-'इति' इत्युक्तन्यायेन 'इत्वरे' अयनशीले, कोऽर्थः?-खल्पकालभाविनि, एति-उपक्रमहेतुभिः अनपव-14 यतया यथास्थित्यैवानुभवनीयतां गच्छतीति आयुः, तश्चैवं निरुपक्रममेव तस्मिन् , तथाऽनुकम्पितं जीवितं । जीवितकं चशब्दस्य गम्यमानत्वात् तस्मिंश्च, अर्थात् सोपक्रमायुषि, बहवः-प्रभूताः प्रत्यपाया-उपधातहेतवोऽध्यवसाननिमित्तादयो यस्मिंस्तत्तथा, अनेन चानुकम्प्यताहेतुराविष्कृतः, एवं चोक्तरूपद्रुमपत्रोदाहरणतः कुशाग्रजलबिन्दूदाहरणतश्च मनुजायुर्निरुपक्रम सोपक्रमं चेत्वरम् , अतोऽस्यानित्यतां मत्वा विधुनीहि' जीवात् पृथक् कुरु । रजः' कर्म 'पुरेकर्डति' पुरा-पूर्व तत्कालापेक्षया कृतं-विहितं, तद्विधुयनोपायमाह-समयमपि गौतम ! मा प्रमादी, पठन्ति च-एवं मणुयाण जीविए एत्तिरिए बहुपचवायए'त्ति सुगममेवेति सूत्रार्थः ॥ स्यात्-पुनर्मनुष्यभवावाप्ताबुद्यस्याम इत्याह दुलहे खलु माणुसे भवे, चिरकालेणवि सध्वपाणिणं । गाढा य विवाग कम्मुणो, समय० ॥ ४॥ व्याख्या-'दुलेभों' दुरवापः, 'खलुः' विशेषणे, अकृतसुकृतानामिति विशेष द्योतयति, 'मानुषो' मनुष्यसम्बन्धी -- दीप अनुक्रम [२९३] + SamEducatmintamation For Pro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~170~ Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||४|| नियुक्ति: [३०९...] (४३) मध्ययनं. प्रत सूत्रांक ||४|| उत्तराध्य. भवो' जन्म 'चिरकालेनापि' प्रभूतकालेनापि, आस्तामल्पकालेनेसपिशब्दार्थः, 'सर्वप्राणिनां सर्वेषामपि जीवाना, दुमपत्रकबृहद्धत्तिः । न तु युक्तिगमनं प्रति भव्यानामिय केषाञ्चित् मनुजभवावाप्ति प्रति सुलभत्वविशेषोऽस्ति, किमेवमत आह 'गाढा' विनाशयितुमशक्यतया दृढाः 'च' इति यस्मात्, 'विपाककम्मुणोति विपाका:-उदयाः कर्मणां-मनुष्यग॥३३५॥ तिविधातिप्रकृतिरूपाणां, यत एवमतः समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः।। कथं पुनर्मनुजत्वं दुर्लभं, यहा है यदुक्तं 'सर्वप्राणिनां दुर्लभ मनुजत्व'मिति, तत्र एकेन्द्रियादिप्राणिनां तदुर्लभत्वं दर्शयितुकामः कायस्थितिमाह पुढवीकायमइगओ उक्कोसं जीवो य संवसे । कालं संखातीयं समयं गोयममा पमायए ॥५॥ | आउकायम॥६॥ तेउक्काय॥७॥ वाउकाय० ॥८॥वणस्सहकाय उकोसं० । कालमर्णतदुरंतं समयं०९/४। इंदिघकाय उक्को । कालं संखिजसणियं समय० ॥१०॥ तेइंदिय०॥ ११॥ चरिंदियः॥१२॥ पंचिंदियकायमइगओ उकोसं० । सत्तभवग्गहणे समय० ॥१३॥ देवे गरए य गओ, उकोस । एकेकभवग्गहणे, समय॥१४॥ व्याख्या-पृथ्वी-कठिनरूपा सैव कायः-शरीरं पृथ्वीकायस्तमतिशयेन मृत्वा २ तदुत्पत्तिलक्षणेन गतः-प्राप्तः ॥३५॥ अतिगतः, 'उकोसं ति उत्कर्षतो 'जीवः' प्राणी 'तुः' पूरणे 'संवसेत् तद्रूपतयैवावतिष्ठत 'कालं' सङ्ख्यातीतं, असङ्ख्य-12 मित्यर्थः, यत एवमतः समयमपि गौतम! मा प्रमादीरिति । एवमपकायतेजस्कायवायुकायसूत्रत्रयमपि व्याख्येयं, दीप अनुक्रम [२९४] SamEducation intimatana पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~171 Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१०], मूलं [--1 / गाथा ||५-१४|| नियुक्ति: [३०९...] (४३) प्रत सूत्रांक ||५-१४|| तथा वनस्पतिसूत्रं च, नवरं कालमनन्तमिति, अनन्तकायिकापेक्षमेतत् , प्रत्येकवनस्पतीनां कायस्थितेरसङ्ख्यातत्वात.. तथा दुष्टोऽन्तोऽस्पेति दुरन्तस्तम् , इदमपि साधारणापेक्षयैव, ते खत्यन्ताल्पबोधतया तत उद्धृता अपिन प्रायो विशिष्ट |मानुपादिभवमोमुवन्ति। इह च 'कालं सङ्खयातीत मिति विशेषानभिधानेऽप्यसङ्ख्योत्सर्पिण्यवसर्पिणीमानम् , 'अनन्त-' मिति चानन्तोत्सर्पिण्यवसर्पिणीप्रमाणमित्यवगन्तव्यं, यत आगमः-"अस्संखोसप्पिणिउस्सप्पिणीउएगेंदियाण उचउहं । ता चेव ऊ अणंता वणस्सतीए उ बोद्धबा ॥ १॥" तथा द्वे-द्विसङ्खये इन्द्रिये-स्पर्शनरसनाख्ये येषां ते द्वीन्द्रियाः-कृम्यादयः,तत्कायमतिगत उत्कर्षतो जीवस्तु संवसेत् कालं सङ्खयेयसभूजित-सङ्ख्यातवर्षसहस्रात्मकम् , अतः समयमपि गौतम ! मा प्रमादीः।। एवं त्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियसूत्रे अपि भावनीये ॥ तथा पञ्च इन्द्रियाणि-स्पर्शनादीनि येषां ते तथा, ते चोत्तरत्र देवनारकयोरभिधानात् मनुष्यत्वस्य दुर्लभत्वेन प्रक्रान्तत्वात्तिर्यश्च एव गृह्यन्ते, तत्कायमतिगतः, तत्कायोत्पन्न इत्यर्थः, उत्कर्षतो जीवस्तु संवसेत् सप्त वा अष्ट वा सप्लाष्टानि तानि च तानि भवग्रहणानि च-जन्मोपादानानि सप्ताष्टभवग्रहणानि यतः अतः समयमपि गौतम ! मा प्रमादीः। तथा देवान्नैरयिकांश्च । अतिगत उत्कर्षतो जीवस्तु संवसेत् एकैकमवग्रहणं, ततः परमवश्यं नरेषु तिर्यक्षु वोत्पादात् । यद्वा 'उकोसति उत्कृष्यते तदन्येभ्य इत्युत्कर्षस्तमुत्कृष्टं कालं-त्रयस्त्रिंशत्सागरोपममानम् , 'एगेगभवग्गहणं'ति अपेर्गम्यमानत्वादेकै दीप अनुक्रम [२९५-३०४ पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~172 Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||५-१४|| नियुक्ति: [३०९...] बृहद्वृत्तिः 84-8-4-64GES प्रत ॥३३॥ १०. सूत्रांक ||५-१४|| कभवग्रहणमपि संवसति, अतो जीवः संवसेत् अतः समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रदशकार्थः ॥ उक्तमे-11 दुमपत्रक वार्थमुपसंहर्तुमाह मध्ययनं. । एवं भवसंसारे संसरति सुभासुभेहिं कम्मेहिं । जीवो पमायबहुलो, समय० ॥१५॥ व्याख्या-'एवम्' उक्तप्रकारेण पृथिव्यादिकायस्थितिलक्षणेन भवा एव-तिर्यगादिजन्मात्मकाः संस्त्रियमाणत्वात् । संसारो भवसंसारस्तस्मिन् , 'संसरन्ति'-पर्यटन्ति शुभानि च-शुभप्रकृत्यात्मकानि अशुभानि च-अशुभप्रकृतिरूपाणि शुभाशुभानि तैः 'कर्मभिः' पृथ्वीकायादिभवनिवन्धनैः 'जीवः' प्राणी प्रमादैहुलो-व्याप्तः प्रमादबहुलः, यद्वा बहून्-भेदान् लातीति बहुलो मद्याधनेकभेदतः प्रमादो-धर्म प्रत्यनुद्यमात्मको यस्य स बहुलप्रमादः, सूत्रे च व्यत्ययनिर्देशःप्राग्वत् ,इह चायमाशयः-यतोऽयं जीवः प्रमादबहुलः सन् शुभाशुभानि कर्माण्युपचिनोति,उपचित्य च तदनुरूपासु गतिप्याजवंजवीभावमुपगम्य भ्राम्यति, ततो दुर्लभत्वात् पुनर्मानुषत्वस्य प्रमादमूलत्वाच सकलानर्थपरम्परायाः समयमपि गीतम!! |मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः ॥ एवं मनुजभवदुर्लभत्वमुक्तम् , इदानीं तदवाप्तावप्युत्तरोत्तरगुणावाप्तिरतिदुरापैवेत्याहलहूणऽवि माणुसत्तणं, आयरिसणं पुणरावि दुल्लभं । यहये दसुया मिलेक्खुया, समय० ॥१६॥ ॥३३॥ लकूणऽवि आरियसणं, अहीणपंचिंदियया हवल्लहा। विगलिंदियता हु दीसइ, समय० ॥१७॥ अहीणपंचिदियत्तंपि से लहे, उत्तमधम्मसुती हुदल्लहा । मिच्छत्तनिसेवए जणे, समयं०॥ १८॥ दीप अनुक्रम [२९५-३०४ Faramanaran timonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~173 Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||१६-२०|| नियुक्ति: [३०९...] %C4 प्रत सूत्रांक ||१६-२०|| लणवि उत्तमं सुई, सद्दहणा पुणरावि दुल्लहा। मिकउत्त० समयं ॥१९॥ धम्मपि हु सरहंतया, दुल्लभया कारण फासया । इह कामुगुणेहिं मुछिया, समयं ॥२०॥ व्याख्या- लब्ध्वाऽपि प्राप्यापि 'मानुषत्वं' इदं तावदतिदुर्लभमेव कथञ्चित्तु लब्ध्वाऽपीत्यपिशब्दार्थः, 'आर्यत्वं' मगधाचार्यदेशोत्पत्तिलक्षणं 'पुनरपि भूयोऽपि, आकारस्त्वलाक्षणिकः, 'दुर्लभं' दुरवापं, किमिति ?, अत ४ आह-बहवः-प्रभूता दस्यवो-देशप्रत्यन्तवासिनश्चौराः 'मिलेक्खु यत्ति म्लेच्छा-अव्यक्तवाचो, न यदुक्तमायैरवधार्यते, दाते च शकयवनशवरादिदेशोद्भवाः, येष्यवाप्यापि मनुजत्वं जन्तुरुत्पद्यते, एते च सर्वेऽपि धर्माधर्मगम्यागम्यभक्ष्याभ क्ष्यादिसकलार्यव्यवहारबहिष्कृतास्तिर्यक्झाया एवेति समयमपि गौतम! मा प्रमादीः। इत्थमार्यदेशोत्पत्तिरूपमार्यत्वम तिदुर्लभं, तथाविधमपि लब्ध्वाऽपि 'आर्यत्वम्' उक्तरूपम् , अहीनानि-अविकलानि पञ्चेन्द्रियाणि-स्पर्शनादीनि यस्य दस तथा तद्भावोऽहीनपञ्चेन्द्रियता 'हुः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च, दुर्लभा एव, यद्वा हुः पुनरर्थे, अहीनपञ्चेन्द्रियता पुनहार्दुलभा, इहैव हेतुमाह-विकलानि-रोगादिभिरुपहतानीन्द्रियाणि येषां तद्भावो विकलेन्द्रियता, हुरिति निपातोऽनेकाकार्थतया च बाहुल्यसूचकः, ततश्च यतो बाहुल्येन विकलेन्द्रियता दृश्यते ततो दुर्लभैवाहीनपञ्चेन्द्रियता, तथा च समयमपि गौतम ! मा प्रमादीः। तथा कथञ्चिदहीनपञ्चेन्द्रियतामप्युक्तन्यायतोऽतिदुर्लभामपि 'स' इति जन्तुः 'लभेत' प्रामुयात्, तथाऽप्युत्तमः-प्रधानो यो धर्मस्तस्य 'श्रुतिः' आकर्णनामिका या सा तथा, 'हुः' अवधारणे भिन्नक्रमथ, ततो दुर्लभैव, दीप अनुक्रम [३०६-३१०] SamEducatim international पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~174 Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||१६-२०|| नियुक्ति: [३०९...] प्रत मध्ययनं. सूत्रांक ||१६-२०|| उत्तराध्य. किमिति-यतः कुत्सितानि च तानि तीर्थानि कुतीर्थानि च-शाक्यौलूक्यादिप्ररूपितानि तानि विद्यन्ते येषामनुष्ठेयतया । दुमपत्रकबृहद्वृत्तिः | खीकृतत्वात्ते कुतीर्थिनस्तानितरां सेवते यः स कुतीर्थिनिषेवको जनो-लोकः, कुतीर्थिनो हि यशःसत्काराद्येषिणो यदेव । प्राणिप्रियं विषयादि तदेवोपदिशन्ति, तत्तीर्थकृतामप्येवंविधत्वात् , उक्तं हि-"सत्कारयशोलाभार्थिभिश्च मूडैरिहान्य॥३३७॥ तीर्थकरैः । अवसादितं जगदिदं प्रियाण्यपध्यान्युपदिशद्भिः॥१॥” इति सुकरैव तेषां सेवा, तत्सेविनां च कुत उत्तम धर्मश्रुतिः, पठ्यते च-'कुतिस्थिणिसेवए जणे'त्ति स्पष्टः, एवं च तदुर्लभत्वमवधार्य समयमपि गौतम ! मा। दप्रमादीः । किंच-लब्ध्याऽपि उत्तमधर्मविषयत्वादुत्तमा तां 'श्रुतिम्' उक्तिरूपां श्रद्धानं' तत्त्वरुचिरूपं 'पुणरावित्ति: पुनरपि 'दुर्लभ' दुरापम् , इहैव हेतुमाह-मिथ्याभावो मिथ्यात्वम्-अतत्वेऽपि तत्त्वप्रत्ययरूपं तं निषेयते यः स मिथ्यात्वनिषेवको जनो-लोकः, अनादिभवाभ्यस्ततया गुरुकर्मतया च तत्रैव प्रायः प्रवृत्तेः, यत एवमतः समदायमपि गौतम मा प्रमादीः । अन्यत्र-'धर्म प्रक्रमात् सर्वज्ञप्रणीतम् 'अपिः' भिन्नक्रमः 'हुः' वाक्यालङ्कारे, ततः 'श्रद्दधतोऽपि' कर्तुमभिलषन्तोऽपि दुलेभकाः कायेन-शरीरेण, उपलक्षणत्वान्मनसा याचा च, 'स्पर्शका' अनुष्ठान तारः, कारणमाह-इह' अस्मिन् जगति 'कामगुणेषु' शब्दादिपु 'मूञ्छिता' मूढाः गृद्धिमन्त इत्यर्थः, जन्तव इति । A॥३३७॥ | शेषः, प्रायेण अपथ्येष्येव विषयेष्यभिष्वनः प्राणिनां, यत उक्तम्-"प्रायेण हि यदपथ्यं तदेव चातुरजनप्रियं भवति ।। |विषयातुरस्य जगतस्तथाऽनुकूलाः प्रिया विषयाः॥१॥" पाठान्तरतः कामगुणेछिता इव मूछिताः, विलुप्तधर्म दीप अनुक्रम [३०६-३१०] -१२-*-% For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~175 Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||२१-२६|| नियुक्ति: [३०९...] प्रत सूत्रांक ||२१ -२६|| विषयचैतन्यत्वात् , यतश्चैवमतो दुरापामिमामविकलां धर्मसामग्रीमवाप्य समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रपञ्चकार्थः ॥ अन्यच सति शरीरे तत्सामर्थे च सति धर्मस्पर्शनेति तदनित्यताऽभिधानद्वारेणाप्रमादोपदेशमाह परिजूगह ते सरीरयं, केसा पंडरगा (य) भवंति ते । से सोयबले य हायड, समयं ॥ २१॥ परि० चक्खुबले०॥ २२ ॥ घाणवले० ॥२३॥० रसणवले.॥२४॥० फासयले ॥२५॥ सव्वबले ॥२६॥ व्याख्या-'परिजीयति' सर्वप्रकारां वयोहानिमनुभवति 'ते' तव शरीरमेव जरादिभिरभिभूयमानतयाऽनुकम्पहनीयमिति शरीरकं, यद्वा 'परिजूरईत्ति 'निन्देजूर' इति प्राकृतलक्षणात् परिनिन्दतीवाऽऽत्मानमिति गम्यते, यथा-धिग्मां कीदृशं जातमिति, किमिति ?-यतः 'केशाः शिरसिजाः, उपलक्षणत्वात् लोमानि च पाण्डुरा एव पाण्डुरका भवन्ति, पूर्व जननयनहारिणोऽत्यन्तकृष्णाः सम्प्रति शुक्लतां भजन्ते 'ते' तय, पुनस्तेशब्दोपादानं भिन्न वाक्यत्वात् उपदेशाधिकारत्वाचादुष्टम् , एवमुत्तरत्रापि, तथा 'से' इति तत् यत् पूर्वमासीत् श्रोत्रयोः-कर्णयोभाल-दूरादिशब्दश्रवणसामय श्रोत्रबलं, 'च' समुच्चये, 'हीयते' जरातः क्षयमुपैति, यद्वा-शरीरजीर्णताऽवस्था भाव्येतद्वयमपि योज्यं, यथा-परिजीयते शरीरकं तथा च सति केशाः पाण्डुरका भवन्ति 'से' इत्यथ श्रोत्रवलं हीयते यतः ततः शरीरस्य तत्सामर्थ्यस्य चास्थिरत्वात् समयमपि गौतम ! मा प्रमादीः । एवं सूत्रपञ्चकमपि नेयं । मानवरमिह प्रथमतः श्रोत्रोपादानं प्रधानत्वात् , प्रधानत्वं च तस्मिन् सति शेषेन्द्रियाणामवश्यं भावात् पटुतरक्षयोपश दीप अनुक्रम [३११-३१६] SamEducatmnternational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~176~ Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||२१-२६|| नियुक्ति: [३०९...] दुमपत्रक प्रत मध्ययन सूत्रांक ||२१-२६|| उत्तराध्य. मजत्वाच, तथोपदेशाधिकारादुपदेशस्य च श्रोत्रग्राह्यत्वात् । तथा च 'सर्वदल मिति सर्वेषा-करचरणायवयवानां खखव्यापारसामय, यद्वा सर्वेषां मनोवाकायानां ध्यानाध्ययनपङ्कमणादिचेष्टाविषया शक्तिरिति सूत्रषट्कार्थः ॥ बृहद्वृत्तिः जरातः शरीराशक्तिरुक्ता, सम्प्रति रोगतस्तामाह॥२३८॥ अरई गंडं विसईया, आर्यका विविहा फुसंतिते । विहडइ बिद्धंसह ते सरीरयं, समर्य० ॥ २७॥ 3 व्याख्या-'अरतिः' वातादिजनितश्चित्तोद्वेगः 'गण्ड' गद्द, विध्यतीव शरीरं सूचिभिरिति विसूचिका-अजी विशेषः, आङिति सर्वात्मप्रदेशाभिव्यात्या तङ्कयन्ति-कृच्छ्रजीवितमात्मानं कुर्वन्तीत्यातङ्काः-सद्योघातिनो रोगविशेषाः 'विविधाः' अनेकप्रकाराः 'स्पृशन्ति' परामृशन्ति 'ते' तव, शरीरकमिति गम्यते, ततश्च 'विपतति' विशेषेण बलापचयादपैति 'विध्वस्यते' जीवविप्रमुक्तं च विशेषेणाधःपतति ते शरीरकम् , अतः समयमपि गौतम! मा प्रमादीः, सर्वत्र च वर्तमाननिर्देशः प्राग्वत् । केशपाण्डुरत्वादिकं यद्यपि गौतमे न सम्भवति तथापि तन्निश्रया शेष-| शिष्यप्रतिबोधनार्थत्वाददुष्टमिति सूत्रार्थः ॥ यथा चाप्रमादो विधेयस्तथा चाहका वुच्छिद सिणेहमप्पणो, कुमुयं सारइयं व पाणियं । से सम्वसिणेहवजिए, समय० ॥ २८ ॥ I व्याख्या-वोच्छिदत्ति विविधैः प्रकारैरुत-प्राबल्येन छिन्द्धि-अपनय व्युच्छिन्द्धि, कम् -'स्नेहम्' अभिष्वङ्ग, कस्य सम्बन्धिनम् ?-आत्मनः, किमिय :-'कुमुदमिव' चन्द्रोद्योतविकाश्युत्पलमिय 'सारइयं वत्ति सूत्रत्वाच्छरदि भवं दीप अनुक्रम [३११ ॥३३८॥ -३१६] SAMEdicatmntmational Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~177 Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-1 / गाथा ||२८|| नियुक्ति: [३०९...] प्रत सूत्रांक ||२८|| शारद, वेत्युपमार्थो भिन्नक्रमश्च प्राग योजितः 'पानीयं जलं, यथा तत् प्रथमं जलमग्नमपि जलमपहाय वर्तते तथा त्वमपि चिरसंसृष्टचिरपरिचितत्वादिभिर्मद्विषयस्नेहवशगोऽपि तमपनय, अपनीय च 'से' इत्यथानन्तरं सर्वस्नेहवर्जितः सन् समयमपि गौतम! मा प्रमादीः । इह च जलमपहायैतावति सिद्धे यच्छारदशब्दोपादानं तच्छारदजलस्येव स्नेहस्याप्यतिमनोरमत्वख्यापनार्थमिति सूत्रार्थः। किञ्च चिचा ण धणं च भारियं, पब्वइओ हि सि अणगारियं । मा वंतं पुणोवि आविए, समय० ॥ २९॥ __ व्याख्या-त्यक्त्वा' परिहत्व 'ण' इति वाक्यालङ्कारे 'धनं चतुष्पदादि चशब्दो भिन्नक्रमः, ततो 'भा च'। कलत्रं च 'प्रत्रजितः' गृहानिष्क्रान्तः 'हिः' इति यस्मात् 'सी'ति सूत्रत्वेनाकारलोपात् 'असि' भवसि 'अणगारियति । अनगारेषु-भावभिक्षुषु भवमानगारिकमनुष्ठानं, चस्य गम्यमानत्वात् तच्च प्रतिपन्नवानसीति शेषः, यद्वा प्रवजितःप्रतिपन्नः 'अणगारिय'ति अनगारिताम् , अतो 'मा' इति निषेधे, 'वान्तम्' उद्गीण 'पुणोवित्ति पुनरपि 'आषिए'। त्ति आपिच, किन्तु समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः । कथं च वान्ताऽऽपानं न भवतीत्याह अवउझिय मित्सबंधवं, विउलं चेव धणोहसंचयं । मा तं विइयं गवेसए, समय० ॥३०॥ | व्याख्या-अपोह्य' त्यक्त्वा, मित्राणि च-सुहृदो बान्धवाश्च-खजना इति समाहारे मित्रवान्धर्व, 'विपुलं |विस्तीर्ण 'च' समुचये भिन्नक्रमश्च 'एव' इति पूरणे, ततो धनं-कनकादिद्रव्यं, तस्थौधः-समूहस्तस्य सञ्चयो-राशी दीप अनुक्रम [३१८] Education intamariand For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~178~ Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||३०|| नियुक्ति : [३०९...] (४३) * दुमपंत्रक बुरहृत्तिः मध्ययनं. प्रत सूत्रांक ||३०|| * उत्तराध्य. करणं धनौघसञ्चयस्तं च, मा 'तदिति' मित्रादिकं, द्वितीयं, पुनर्ग्रहणार्थमिति गम्यते, 'गवेषय' अन्वेषय, तत्परित्या- गात् श्रामण्यमङ्गीकृत्य पुनस्तदभिष्वङ्गवान् मा भूः, त्यक्तं हि तद्वान्तोपमं तदभिष्वनाश्व बान्ताऽऽपानप्राय इत्यभिप्रायः, किन्तु समयमपि गौतम! मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः। इत्थं प्रतिवन्धनिराकरणार्थमभिधाय दर्शनविशुद्धयर्थमिदमाह॥३३॥ ण हु जिणे अज दीसइ, बहुमए दीसह मग्गदेसिए । संपइ नेआउए पहे, समय० ॥३१॥ व्याख्या-'न' व 'जिनः' तीर्थक 'अद्य' अस्मिन् काले 'रश्यते' अवलोक्यते, यद्यपीति गम्यते, तथापि 'बहुमए'त्ति पन्थाः, स च द्रव्यतो नगरादिमार्गः, भावतस्तु सातिशयश्रुतज्ञानदर्शनचारित्रात्मको मुक्तिमार्गः, तत्रेह भावमार्गः परिगृह्यते, 'दृश्यते' उपलभ्यते 'मग्गदेसिय'त्ति भावप्रधानत्वानिर्देशस्य मार्गत्वेन अर्थान्मुक्तेर्देशितो-जिनः कथितो मार्गदेशितः, अयमाशयः-यद्यपि सम्प्रति जिनो न दृश्यते तदुपदिष्टस्तु मागों ४ रश्यते, न चैवंविधोऽयमतीन्द्रियार्थदर्शिनं जिन बिना सम्भवति इत्यसन्दिग्धचेतसो भाविनोऽपि भव्या न प्रमाद| सविधास्वन्तीति, अतः 'सम्प्रति' इदानीं सत्यपि मयीति भावः, 'नैयायिके' निश्चितमुक्त्याख्यलाभप्रयोजने 'पधि मार्ग समयमपि गौतम ! केवलानुत्पत्तितः संशयविधानेन मा प्रमादीः, यद्वा-त्रिकालविषयत्वात् सूत्रस्य भाषि- भन्योपदेशकमप्येतत्, ततोऽयमर्थः-यथाऽऽद्यमार्गोपदेशक नगरं चापश्यन्तोऽपि पन्थानमवलोकयन्तस्तस्याविच्छि-13 नोपदेशतसत्प्रापकत्वं निश्चिन्वन्ति तथा यद्यप्यद्य जिन उपलक्षणत्वान्मोक्षश्च नैव दृश्यते तथाऽपि तद्देशितः * दीप अनुक्रम [३२० ॥३३॥ पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~179~ Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||३१|| नियुक्ति: [३०९...] प्रत सूत्रांक ||३१|| पन्था-मार्यमाणत्वात् मार्गो-मोक्षस्तस्य 'देसिय'त्ति सूत्रत्वाद्देशको मार्गदेशको दृश्यते, ततस्तस्यापि तत्तापकत्व मामपश्यद्भिरपि भाविभव्यैनिश्चेतव्यं, यतश्चैव भाविभव्यानामुपदिश्यते अतः सम्प्रतीत्यादि प्राग्वत् , द्विविधाऽपि । तावदित्थं व्याख्या सूचकत्वात् सूत्रस्येति गाथार्थः ।। अत्रैवार्थे पुनरुपदिशन्नाह अवसोहिय कंटगापह, ओइन्नोऽसि पहं महालयं गच्छसि मग्गं वि सोहिया, समपं०॥३२॥ व्याख्या-'अवसोहिय'त्ति अवशोध्य-अपसाये पृथकृत्य परिहत्येतियावत् , कम् ?-'कंटयापहंति आकारोऽला क्षणिकः, कण्टकाश्च द्रव्यतो बब्बूलकण्टकादयः भावतस्तु चरकादिकुश्रुतयस्तैराकुलः पन्थाः कण्टकपथस्त, नवा अवतीर्णोऽसि' अनुप्रविष्टो भवसि 'पहंति पन्थानं 'महालयंति महान्तं महतां वाऽऽलयः-आश्रयो महालया। स च द्रव्यतो राजमार्गः भावतस्तु महद्भिस्तीर्थकरादिभिरप्याश्रितः सम्यग्दर्शनादिमुक्तिमार्गसं, कविदवतीणों ऽपि मार्ग न गच्छेत् अत आह-'गच्छसि'-यासि मागे, न पुनरवस्थित एवासि, सम्यग्दर्शनायनुपालनेन क्तिका मार्गगमनप्रवृत्तत्वाद्भवतः, तत्राप्यनिश्चयेऽपायप्राप्तिरेव स्यात् इत्याह-'विशोध्य' इति विनिश्चित्य, तदेवं भवन सन् समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः ॥ एवं च पूर्वेण दर्शनविशुद्धिमनेन च मार्गप्रतिपत्तिमभिधाय तत्प्रतिपत्तावपि कस्यचिदनुतापसम्भव इति तन्निराचिकीर्षयाऽऽह अवले जह भारवाहए, मा मग्गे विसमेऽवगाहिया। पच्छा पच्छाणुतावए, समय० ॥ ३३ ॥ दीप अनुक्रम [३२१] Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~180 Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||३३|| नियुक्ति: [३०९...] प्रत सूत्रांक ||३३|| . उत्तराध्य. व्याख्या-'अबलः' अविद्यमानशरीरसामर्थ्यः 'यथा' इसौपम्ये भारं वहतीति भारवाहकः 'मा' निषेधे 'मग्गे त्ति मार्ग 'विसमें ति विषमं मन्दसत्त्वैरतिदुस्तरम् 'अवगाहिय'त्ति अवगाह प्रविश्य, त्यक्ताङ्गीकृतभारः सन्निति वृद्धृत्तिः गम्यते, 'पश्चात् तत्कालानन्तरं 'पश्चादनुतापकः' पश्चात्तापकृत् , भूरिति शेषः, इदमुक्तं भवति-यथा कश्चिद्देशान्त मध्ययन रगतो बहुभिरुपायैः वर्णादिकमुपाय खगृहाभिमुखमागच्छन्नतिभीरुतयाऽन्यवस्त्वन्तर्हितं वर्णादिकं स्खशिरस्यारोप्य कतिचिद्दिनानि सम्यगुद्वहति, अनन्तरं च कचिदुपलादिसङ्कले पथि अहो अहमनेन भारेणाऽऽक्रान्त इति तमुत्सृज्य है खगृहमागतः अत्यन्तनिर्धनतयाऽनुतप्यते-किं मया मन्दभाग्येन तत्परित्यक्तमिति ?, एवं त्वमपि प्रमादपरतया त्यक्त संयमभारः सन्नेवंविधो मा भूः, किन्तु समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः ॥ बहिदमद्यापि निस्तरणीयमल्पं च निस्तीर्णमित्यभिसन्धिनोत्साहभङ्गोऽपि स्यादिति तदपनोदायाह तिण्णो हु सि अण्णवं महं, किं पुण चिट्ठसि तीरमागओ। अभितुर पारं गमित्तए, समय० ॥ ३४ ॥ | व्याख्या-'तिण्णो हु सित्ति तीर्ण एवासि, अर्णवमियार्णवं 'महंति महान्तं गुरु, किमिति प्रश्ने पुनरिति वाक्यो| पन्यासे,ततः किं पुनस्तिष्ठसि ?, तीरं पारम् आगतः प्राप्तः, किमुक्तं भवति?-भव उत्कृष्टस्थितीनिषा कमोणि भावतो-18 |ऽर्णय इत्युच्यते, स च द्विविधोऽपि त्वयोत्तीर्णप्राय एव इति केन हेतुना तीरप्राप्तोऽप्यौदासीन्यं भजसे ?, नैवेदं । | तवोचितमित्याशयः।किन्तु 'अभितुर'त्ति अभि-आभिमुख्येन त्वरस्व-शीमो भव, पारं' परतीरं भावतो मुक्तिपदं 'गमि-112 दीप अनुक्रम [३२३] भजन SamEducatimotimatent Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~181 Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||३५|| नियुक्ति: [३०९...] 2- -06- प्रत सूत्रांक ||३५|| 4 उत्तए'त्ति गन्तुम् , अतश्च समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः ॥ अथापि स्यात्-मम पारप्राप्तियोग्यतैव न । समस्ति, अत आह-अथवा शेषशिष्यापेक्षया किमस्याप्रमादस्य फलम् ? यत्पुनः पुनरयमुपदिश्यते इत्याह अकलेवरसेणिमूसिया, सिद्धिं गोयम ! लोयं (य) गच्छसि । खेमं च सिवं अणुत्तरं, समय० ॥ ३५॥ । ___ व्याख्या-कलेवर-शरीरम् अविद्यमानं कडेवरमेषामकडेवरा-सिद्धास्तेषां श्रेणिरिव श्रेणिययोत्तरोत्तरशुभपरिणा-1 मप्राप्तिरूपया ते सिद्धिपदमारोहन्ति(ता), क्षपकश्रेणिमित्यर्थः । यद्वा कडेवराणि-एकेन्द्रियशरीराणि तन्मयत्वेन तेषां श्रेणिः कडेवरश्रेणिः-शादिविरचिता प्रासादादिष्वारोहणहेतुः, तथा च या न सा अकडेवरश्रेणिः-अनन्तरोक्तरूपैव ताम् 'उस्सिय'त्ति उत्सृतां, गमिष्यसीति सम्बन्धः, यद्वा 'उस्सिय'त्ति उच्छ्रित्येवोच्छ्रित्य-उत्तरोत्तरसंयमस्थानावात्या तामुच्छ्रितामिव कृत्वा 'सिद्धिम्' इति सिद्धिनामानं 'गोयम ! लोयं गच्छसि त्ति प्राग्वल्लोकं गमिष्यसि, संशयव्यवच्छेदफलत्वाचास्य गमिष्यस्येव, 'क्षेमं परचक्रायुपद्रवरहितं 'चः' समुचये भिन्नक्रमश्च, 'शिवमनुत्तरं च तत्र शिवमशेषदुरितोपशमेन अनुत्तरं नास्योत्तरमन्यत् प्रधानमस्तीत्यनुत्तरं, सर्वोत्कृष्टमित्यर्थः, यतश्चैवं ततः समयमपि गौतम ! |मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः ॥ ३६ ॥ सम्प्रति निगमयन्नुपदेशसर्वखमाह बुद्ध परिणिचुए चरे, गाम गए नगरे व संजए । संतिमग्गं च बहए, समयं ॥ ६ ॥ व्याख्या-'बुद्धः' अवगतहेयादिविभागः 'परिनिर्वृतः' कषायाम्युपशमतः समन्तात् शीतीभूतः 'चरेः' आसे 48 दीप अनुक्रम [३२५] MEducatimNRI पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~182 Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||३७|| दीप अनुक्रम [३२७] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३४१॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्ति: [३०९...] अध्ययनं [१०], मूलं [-] / गाथा ||३७|| वस्व, संयममिति शेषः, 'गाम'ति सुपो लोपात् ग्रामे 'गतः' स्थितो नगरे वा उपलक्षणत्वादण्यादिषु वा किमुक्तं भवति ? - सर्वस्मिन्ननभिष्वङ्गवान्, सम्यग् यतः - पापस्थानेभ्य उपरतः संयतः, शाम्यन्त्यस्यां सर्वदुरितानीति शान्तिः-निर्वाणं तस्या मार्गः - पन्थाः, यद्वा शान्तिः- उपशमः सैव मुक्तिहेतुतया मार्गः शान्तिमार्गो, दशविधधर्मोपलक्षणं शान्तिग्रहणं, चराब्दो भिन्नक्रमः, ततो वृंहयेश्व-भव्य जनप्ररूपणया वृद्धिं नयेः, ततः समयमपि गौतम ! मा प्रमादीरिति सूत्रार्थः ॥ इत्थं भगवदभिहितमिदमाकर्ण्य गौतमो यत् कृतवांस्तदाह बुद्धस्स निसम्म भासिय, सुकहियमदृपदोवसोहियं । रागं दोसं च छिंदिया, सिद्धिगई गए गोयमे ॥ ३७ ॥ तिमि ॥ - 'बुद्ध' केवलालोकावलोकितसमस्त वस्तुतस्त्रस्य प्रक्रमाच्छ्रीमन्महावीरस्य 'निशम्य' आकर्ण्य 'भाषितम् उक्तं, सुष्ठु - शोभनेन नयानुगतत्वादिना प्रकारेण कथितं प्रबन्धेन प्रतिपादितं सुकथितम्, अत एवार्थप्रधानानि पदानि अर्थपदानि तैरुपशोभितं-जातशोममर्थपदोपशोभितं 'रागं' विषयायभिध 'द्वेषम्' अपकारिण्यप्रीतिलक्षणं 'चः' समुचये 'छित्वा' अपनी 'सिद्विगर्ति' मुक्तिपतिं 'गतः' प्राप्तः 'गौतम:' इन्द्रभूतिनामा भगवत्प्रथमगणधर इति सूत्रार्थः ॥ 'इतिः' परिसमाप्तौ 'ब्रवीमि' इति पूर्ववत् इत्युक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, च पूर्ववदिति श्री शान्त्याचार्यविरचितायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटीकायां दशममध्ययनं समाप्तं ॥ Education Intemational For Person Prat दुमपत्रक मध्ययनं. १० ~ 183~ ||३४१|| jord पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अत्र अध्ययनं १० परिसमाप्तं Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||३७...|| नियुक्ति: [३१०] प्रत सूत्रांक ||३७|| अथ बहुश्रुतपूजाख्यमेकादशमध्ययनम् । उक्तं दशममध्ययनं, साम्प्रतमेकादशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-दहानन्तराध्ययनेऽप्रमादार्थमनुशासन-14 मुक्तं, तब विवेकिनैव भावयितुं शक्वं, विवेकश्च बहुश्रुतपूजात उपजायत इति बहुश्रुतपूजोच्यते इत्यनेन सम्बन्धे नाऽऽयातस्यास्याध्ययनस्य चत्वार्यनुयोगद्वाराणि प्ररूपयितव्यानि, यावन्नामनिष्पन्ने निक्षेपे 'बहुसूत्रपूजा बहुश्रुतदापूजेति वा नाम, अतस्त निक्षेपप्रतिपिपादयिषयेदमाह नियुक्तिकृत् बहु सुए पूजाए यतिण्हंपि चउक्कओ य निक्खेवो । दवबहुगेण बहुगा जीवा तह पुग्गला चेव ॥३१०॥ | व्याख्या-'बहु'चि बहोः 'सुए'त्ति शतमुखत्वात् प्राकृतस्य सूत्र थ श्रुतस्य वा 'पुयाए यत्ति पूजायाश्च 'त्रयाशणामपि' अमोषां पदानां 'चतुष्कस्तु' चतुष्परिमाण एक 'निक्षेपः' न्यासः, स च नामादिः, तत्र नामस्थापने क्षुण्णे, द्रव्यतस्तु बहभिधातुमाह-'देवबहुएण'त्ति आर्षत्वात् द्रव्यतो बहुत्वं द्रव्यवदुत्वं तेन 'बहुकाः' प्रभूताः 'जीवाः | |उपयोगलक्षणाः, तथा 'पुद्गलाः' स्पर्शादिलक्षणाः, चशब्दः पुद्गलानां जीवापेक्षया बहुतरत्वं ख्यापय ति, ते कैकस्मिन् संसारिजीवप्रदेशेऽनन्तानन्ता एव सन्ति, 'एवः' अवधारणे, जीवपुद्गला एव द्रव्यवह वः, तत्र धर्माधर्माऽ5-40 काशानामेकद्रव्यत्वात् कालस्थापि तत्वतः समयरूपत्वेन बडुवाभावादिति गाथार्थः ॥ दीप अनुक्रम [३२७] TRIORamaro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं - ११ "बहुश्रुतपूजा" आरभ्यते ~184 Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-1 / गाथा ||३७...|| नियुक्ति: [३११] ११ प्रत सूत्रांक ||३७|| भावबहुएण बहुगा चउदस पुत्वा अणंतगमजुत्ता।भावे खओवसमिए खइयमि य केवलं नाणं ॥ ३११॥ बहुश्रुतपू___ व्याख्या-'भावबहुगेण'ति प्राग्वत् भावबहुत्वेन 'बहुग'त्ति बहुकानि 'चतुर्दश' चतुर्दशसङ्ख्यानि 'पुच'त्ति पूर्वाण्युत्पादपूर्वादीनि 'अर्णतगमजुत्तत्ति अनन्ता-अपर्यवसिता गम्यते वस्तुखरूपमेभिरिति गमा-वस्तुपरिच्छेदप्रकाराः नामादयस्तैयुक्तानि-अन्वितान्यनन्तगमयुक्तानि, पर्यायाधुपलक्षणं च गमग्रहणम् , उक्तं हि-"अणंता गमा अयंता पजवा अणंता हेतू' इत्यादि, अनेनतदात्मकत्वात् पूर्वाणां तेषामप्यानन्त्यमुक्तं, क पुनरमूनि भावे वर्तन्ते येन भावबहून्युच्यन्ते इत्याह-'भाव' इत्यात्मपर्याये क्षायोपशमिके चतुर्दश पूर्वाणि वर्तन्ते इति प्रक्रमः, आह-किंन क्षायिके भावे किञ्चिद्भावबहु', अस्तीत्याह-क्षायिके च' कर्मक्षयादुत्पन्ने पुनः केवलज्ञानम् , अनन्तपर्यायत्वात् , तदपि । दभावबहुकमिति गाथार्थः ।। उक्तं बहु, सम्पति सूत्रं श्रुतं वाऽऽहदवसुय पोंडयाइ अहवा लिहियं तु पुत्थयाईसुं । भावसुयं पुण दुविहं सम्मसुयं चेव मिच्छसुयं ३१२४ व्याख्या-'दचसुय'त्ति अनुखारलोपात् द्रव्यसूत्रं द्रव्यश्रुतं च, तत्राऽऽयं पुण्डजादि, द्वितीयमाह-'अथया' इति[S३४२॥ पापक्षान्तरसूचकः, ततो द्रव्यश्रुतं 'लिखितम्' अक्षररूपतया न्यस्तं पुस्तकादिपु, तुशब्दादू भाष्यमाणं वा द्रव्यश्रुतमुच्यते, 11 १ अनन्ता गमा अनन्ताः पर्यवा अनन्ता हेतवः । दीप अनुक्रम [३२७] SamEducatimotimatent For any पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~185 Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-1 / गाथा ||३७..|| नियुक्ति: [३१३-३१४] प्रत सूत्रांक ||३७|| भावश्रुतं पुनः 'विविध विभेदं 'सम्यक्श्रुतं चैव' इति प्राग्यत् ततो मिथ्याश्रुतं चेति गाथार्थः ॥ एतत्खरूपमाहभवसिद्धिया उ जीवा सम्मइिट्ठी उ जं अहिजंति । तं सम्मसुएण सुयं कम्मट्टविहस्स सोहिकरं ३१३४ मिच्छट्टिी जीवा अभवसिद्धी य ज अहिजंति । तं मिच्छसुएण सुयं कम्मादाणं च तं भणियं ॥ ३१४॥ का व्याख्या-भवे भव्या वा सिद्धिरेषामिति भवसिद्धिका भव्यसिद्धिका था, 'तु' अवधारणे, एत एव 'जीवाः || प्राणिनः, तेऽपि 'सम्महिही उति सम्यग्दृष्टय एव 'यत्' इति श्रुतम् 'अधीयते' पठन्ति 'तं सम्मसुएणपत्ति सम्यक्थुतशब्देन 'श्रुतम्' इति प्रक्रमाद् भावश्रुतम् , उच्यते इति शेषः । आह-भाष्यमाणत्वेनास्य कथं न द्रव्य|| श्रुतत्वम् ?, उच्यते, अनेनैतजनित उपयोग एवोपलक्षित इति न दोषः, एवमन्यत्रापि भावनीयं । तन्माहात्म्यमाह-कम्मट्टविहस्स'त्ति अष्टविधकर्मणः 'शुद्धिकरम्' अपनयनकर्त। मिथ्याश्रुतमाह-मिध्यादृष्टयो जीवाः, भव्या ॥ इति गम्यते, 'अभव्यसिद्धयश्च' अभव्याः यदधीयते तत् 'मिथ्याश्रुतेन' मिथ्याश्रुतशब्देन 'श्रुतम्' इतीहापि भावश्रुतं । भणितमिति सम्बन्धः, कर्म-ज्ञानावरणादि आदीयते-खीक्रियतेऽनेन जन्तुभिरिति कर्मादानं-कर्मोपादानहेतुः, 'चा समुच्चये, 'तत्' श्रुतं 'भणितम्' उक्तमिति गाथाद्वयार्थः । इदानीं पूजा, साऽपि नामादिभेदतश्चतुर्धेव, तत्राxऽये सुगमे, द्रव्यपूजामाह KARTAL दीप अनुक्रम [३२७] SamEducatimlintimatland For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~186 Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||३७...|| नियुक्ति: [३१५] ११ प्रत सूत्रांक ||३७|| उत्तर. ईसरतलवरमाडंबिआण सिवइंदखंदविण्हूणं । जा किर कीरइ पूआ सा पूआ दवओ होइ ॥ ३१५॥ बहुश्रुतपू | व्याख्या-ईश्वरश्च-द्रव्यपतिः तलवरश्च-प्रभुस्थानीयो नगरादिचिन्तकः, मडम्ब-जलदुर्ग तस्मिन् भवो माडबृहतिः जाध्ययनं. म्बिकः-तद्भोक्ता स च ईश्वरतलबरमाडम्बिकास्तेपां, तथा शिवश्च-शम्भुः इन्द्रश्च-पुरन्दरः स्कन्दश्च-स्वामिकार्ति॥३॥ केयः विष्णुश्च-वासुदेवः शिवेन्द्रस्कन्दविष्णवस्तेषां, या किल क्रियते पूजा सा पूजा 'द्रव्यतः' द्रव्यनिक्षेपमाश्रित्या | भवति, द्रव्यपूजेति योऽर्थः, किलशब्दस्त्विहापारमार्थिकत्वख्यापकः, द्रव्यतोऽपि हि भावपूजाहेतुरेव पूजोच्यते, इयं तु द्रव्यार्थमप्रधाना वा पूजेति द्रव्यपूजा, अतोऽपारमार्थिक्येव, एतदभिधानं तु द्रव्यशब्दस्यानेकार्थत्वसूचकमिति गाधार्थः ॥ भावपूजामाहतित्थयरकेवलीणं सिद्धायरिआण सवसाहूणां । जा किर कीरइ पूआ सा पूआ भावओ होइ ॥ ३१६ ॥ । व्याख्या-तीर्थराश्च-अर्हन्तः केवलिनश्च-सामान्येनैवोत्पन्नकेवला: तीर्थकरकेवलिनस्तेषां, 'सिद्धाचार्याणां'| प्रतीतानां, तथा सर्वसाधूनां, का?-या किल 'क्रियते' विधीयते पूजा सा पूजा 'भावतः' भावनिक्षेपमाश्रित्य । ॥३४३॥ भवति, किलशब्दः परोक्षाप्तवादसूचकः, तीर्थङ्करादिपूजा हि सर्वाऽपि क्षायोपशमिकादिभाववर्तिन एव भवतीति भावपूजेय, यतु पुष्पादिपूजाया द्रव्यस्तवत्यमुक्तं तद् द्रव्यैः-पुष्पादिभिः स्तव इति व्युत्पत्तिमाश्रित्य सम्पूर्णभावकसबकारणत्वेन वेति गाथार्थः । सम्प्रति प्रस्तुतोपयोग्याह दीप अनुक्रम [३२७] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~187 Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [११], मूलं [--1 / गाथा ||९|| नियुक्ति: [३१७] - * -* % प्रत सूत्रांक -*- ||१|| जे किर चउदसपुत्री सव्वक्खरसन्निवाइणो निउणा। जा तेसिं पूया खलु सा भावे ताइ अहिगारो ३१७/ | व्याख्या-'ये' प्राग्वत् 'किल' इति वाक्यालङ्कारे 'चतुर्दशपूर्विणः' चतुर्दशपूर्वधराः सर्वाणि-समस्तानि या-10 न्यक्षराणि-अकारादीनि तेषां सन्निपातनं-तत्तदर्थाभिधायकतया साङ्गत्वेन घटनाकरणं सर्वाक्षरसन्निपातः स विद्यते अधिगमविषयतया येषां तेऽमी सर्वाक्षरसन्निपातिनः 'निपुणाः' कुशलाः, या 'तेषां चतुर्दशपूर्विणां 'पूजा उचितप्रतिपत्तिरूपा, उपलक्षणं चेयं शेषबहुश्रुतपूजायाः, प्राधान्याचास्या एवोपादानं, 'खलु' निश्चितं, सा 'भावे भावविषया, 'तया' बहुश्रुतपूजालक्षणया भावपूजया इह 'अधिकारः प्रकृतमिति गाथार्थः ॥ इत्युक्तो नामनिष्पन्न-2 निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तच्चेदम्IA संजोगा विप्पमुक्कस्स, अणगारस्स भिकखुणो । आयारं पाउकरिस्सामि, आणुपुब्बि सुणेह मे ॥ १॥ 180 व्याख्या-संयोगाद्विप्रमुक्तस्थानगारस्य भिक्षोः आचरणमाचार:-उचितक्रिया विनय इतियावत् , तथा च वृद्धाः४'आयारोत्ति वा विणओत्ति वा एगट्ठति स चेह बहुश्रुतपूजात्मक एवं गृह्यते, तस्या एवात्राधिकृतत्वात् , तं 'प्रादु करिष्यामि' प्रकटयिष्यामि आनुपा , शृणुत 'मे' मम कथयत इति शेषः इति सूत्रार्थः ।। इह च बहुश्रुतपूजा | १ आचार इति वा विनय इति वा एकाएँ। % दीप अनुक्रम [३२८] %% AC %* For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~188~ Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [११], मूलं [-1 / गाथा ||२|| नियुक्ति: [३१७] बहुश्रुतपूजाध्ययनं. प्रत सूत्रांक ||२|| उत्तराध्य. प्रक्रान्ता, सा च बहुश्रुतखरूपपरिज्ञान एवं कर्तुं शक्या, बहुश्रुतखरूपं च तद्विपर्ययपरिज्ञाने तद्विविक्तं सुखेनैव बृहद्वृत्तिः ज्ञायत इसबहुश्रुतखरूपमाह जे यावि होद निधिज्जे, धद्धे लुढे अनिग्गहे । अभिक्खणं उल्लवई, अविणीए अवहुस्सुए ॥२॥ ॥३४४॥ व्याख्या-'जे यावित्ति यः कश्चित्, चापिशब्दौ भिन्नक्रमायुत्तरत्र योध्येते, 'भवति' जायते निर्गतो विद्याया: सम्यकशास्त्रावगमरूपायाः निर्विद्यः, अपिशब्दसम्बन्धात् सविद्योऽपि, यः 'स्तब्धः' अहवारी 'लुब्धः' रसादिरद्धि मान् , न विद्यते इन्द्रियनिग्रहः-इन्द्रियनियमनात्मकोऽस्येति अनिग्रहः 'अभीक्ष्णं' पुनः पुनः उत्-प्रावल्येनासदम्बद्धभाषितादिरूपेण लपति-वक्ति उल्लपति 'अविनीतच विनयविरहितः 'अवहुस्सुए'ति यत्तदोर्नित्याभिससम्बन्धात् सोऽबहुश्रुतः, उच्यते इति शेषः, सविद्यस्थाप्यबहुश्रुतत्वं बाहुश्रुत्यफलाभावादिति भावनीयम् , एतद्विपरीतस्त्वर्थाद् बहुश्रुत इति सूत्रार्थः । कुतः पुनरीशमबहुश्रुतत्वं बहुश्रुतत्वं वा लभ्यत इत्याह अह पंचहि ठाणेहि, जेहिं सिक्खा ण लभइ । थंभा कोहा पमाएणं,रोगेणालस्सेण य॥३॥ अह अट्ठहिं ठाणेहि, सिक्खासीलेत्ति बुबह । अहस्सिरे सयादते, न य मम्ममुयाहरे ॥४॥ नासीले ण विसीले, ण सिया अइलोलुए। अकोहणे सच्चरए, सिक्खासीलेत्ति चुच्चइ ॥५॥ 'अर्थ' इत्युपन्यासार्थः 'पञ्चभिः' पञ्चसायैः तिष्ठन्त्येषु कर्मवशगा जन्तप इति स्थानानि तैः, 'यः' इति वक्ष्य दीप अनुक्रम [३२९] ॥३४४॥ For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~189~ Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||३-५|| नियुक्ति: [३१७] प्रत सूत्रांक ||३-५|| माणैर्हेतुभिः-शिक्षणं शिक्षा ग्रहणासेवनात्मिका न लभ्यते' नावाप्यते, तैरीदृशमवहुश्रुतत्वमवाप्यत इति शेषः, कैः पुनः सा न लभ्यते ? इत्याह-'स्तम्भात्' मानात् 'क्रोधात्' कोपात् 'प्रमादेन' मद्यविषयादिना 'रोगेण' गलत्कुष्ठादिना 'आलस्पेन' अनुत्साहात्मना, शिक्षा न लभ्यत इति प्रक्रमः, चः समस्तानां व्यस्तानां च हेतुत्वमेषां द्योतयति ॥ इत्थमबहुश्रुतत्वहेतूनभिधाय बहुश्रुतत्वहेतूनाह-अथाष्टभिः स्थानः शिक्षायां शीलः-खभावो यस्ख शिक्षा या शीलयति-अभ्यस्थतीति शिक्षाशीलः-द्विविधशिक्षाभ्यासकृद्, इतिशब्दः स्वरूपपरामर्शकः, उच्यते तीर्थ-| लकृद्गणधरादिभिरिति गम्यते, तान्येवाह-'अहस्सिरे'त्ति "तृन इर" इति प्राकृतलक्षणादहसनशीलः अहसिता-न सहे तुकमहेतुकं वा हसन्नेवास्ते,'सदा' सर्वकालं 'दान्तः'इन्द्रियनोइन्द्रियदमवान्, 'न च'नैव 'मर्म'परापभाजनाकारि कुत्सितं २ जात्यादि 'उदाहरेत्' उद्घट्टयेत् । 'न' नैव 'अशीलः' अविद्यमानशीलः, सर्वथा विनष्टचारित्रधर्म इत्यर्थः, न 'विशील। विरूपशीलः, अतीचारकलुपितत्रत इतियावत् , 'न खात्' न भवेद्, इह पूर्वत्र च सम्भावने लिट्, 'अतिलोलुपः। । अतीव रसलम्पटः, 'अक्रोधनः' अपराधिन्यनपराधिनि वा न कथञ्चित् क्रुध्यति, सत्यम्-अवितधभाषणं तस्मिन् । रतः-आसक्तः सत्यरतः इति, निगमयितुमाह-शिक्षाशील 'इति' इत्यनन्तरोक्तगुणभाग उच्यते, स च बहुश्रुत एव भवतीति भावः । इह च स्थानप्रक्रमेऽप्येवमभिधानं धर्मधर्मिणोः कथञ्चिदनन्यत्वख्यापनार्थ, विशेषाभिधायिहै त्याच क्वचित् केपाश्चिदन्तर्भावसम्भवेऽपि पृथगुपादानं, परिहारद्वयमपीदमुत्तरत्रापि भावनीयमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ दीप अनुक्रम [३३०-३३२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~190 Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||६-१३|| नियुक्ति: [३१७] प्रत ॥३४५॥ सूत्रांक ||६-१३|| किञ्च-अबहुश्रुतत्वे बहुश्रुतत्वे वाऽविनयो विनयश्च मूलकारणं, तत्त्वत उक्तहेतूनामप्यनयोरेवान्तर्भावात्, न च । बहुश्रुतपू. अविनीतविनीतयोः खरूपमविज्ञाय तो ज्ञातुं शक्याविति यः स्थानैरविनीत उच्यते यैश्च विनीतस्तान्यभिधातुमाह-2 जाध्ययनं. अह चोदसहिं ठाणेहिं, वहमाणो उ संजए । अविणीए बुच्चती सो उ, णिब्वाणं च ण गच्छा ॥६॥ अभिक्खणं कोही भवइ, पबंधं च पकुव्वइ । मित्तिज्जमाणो वमति, सुयं लबूण मजा ॥७॥ अवि पायपरिक्खेबी, अवि मित्तेसु कुप्पति । सुप्पियस्सावि मित्तस्स, रहे भासह पावगं ॥८॥ पइण्णवाई दुहिले, थद्धे लुढे अनिग्गहे । असं विभागी अचियत्ते, अविणीएत्ति बुच्चइ ।। ९॥ अह पन्नरसहिं ठाणेहिं, सुविणीएत्ति वुचइ । नीयावित्ती अचवले, अमाई अकुऊहले ॥१०॥ अप्पं च अहिक्खिपति, पबंधं च ण कुव्वइ । मित्तिजमाणो भजति, सुयं लटुं न मज्जति ॥११॥ न य पावपरिक्खेवी, न य मिसेसु कुप्पति । अप्पियस्सावि मित्तस्स, रहे कल्लाण भासइ ॥ १२ ॥ कलहडमरवज्जए, बुद्धे (अ) अभिआइए । हिरिमं पडिसलीणो, सुविणीएत्ति युवइ ॥ १३ ॥ व्याख्या-'अथ' इति प्राग्वत , चतुभिरधिका दश चतुर्दश तेषु चतुर्दशसङ्ख्येषु स्थानेषु, सूत्रे तु सुम्यत्ययेन ॥३४५॥ सप्तम्यर्थे तृतीया, 'वर्तमानः' तिष्ठन् 'तुः' पूरणे 'संयतः' तपखी, अविनीत उच्यते, 'स तु' इत्यविनीतः पुनः, |किमित्याह-'निर्वाणं च' मोक्षं, चशब्दादिहेय ज्ञानादींश्च 'न गच्छति' न प्राप्नोति ॥ कानि पुनश्चतुर्दश स्थानानी दीप अनुक्रम [३३३-३४०] SamEducatam intamational For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~191~ Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||६-१३|| | दीप अनुक्रम [333 -३४०] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||६-१३|| निर्युक्ति: [३१७] अध्ययनं [११], त्याह- 'अभीक्ष्णं' पुनः पुनः, यद्वा-क्षणं क्षणमभि अभिक्षणम् - अनवरतं 'क्रोधी' क्रोधनः भवति, सनिमित्तमनिमित्तं वा कुप्यन्ने वास्ते, 'प्रबन्धं च' प्रकृतत्वात् कोपस्यैवाविच्छेदात्मकं 'पकुवइ' त्ति प्रकर्षेण कुरुते, कुपितः सन् सान्त्वनैरनेकैरपि नोपशाम्यति, विकथादिषु याऽविच्छेदेन प्रवर्तनं प्रबन्धस्तं च प्रकुरुते तथा 'मेत्तिजमाणो त्ति मित्रीय्यमाणोऽपि मित्रं ममायमस्त्वितीप्यमाणोऽपि अपिशब्दस्य लुप्तनिर्दिष्टत्वात् 'वमति' त्यजति, प्रस्तावान्मित्रयितारं मैत्रीं या, किमुक्तं भवति ? - यदि कश्विद्धार्मिकतया यक्ति यथा त्वं न वेत्सिीत्यहं तब पात्रं लेपयामि, ततोऽसौ प्रत्युपकार भीरुतया प्रतिवक्ति-ममालमेतेन कृतमपि वा कृतनतया न मन्यत इति वमतीत्युच्यते, तथा 'सुर्य'ति अपेर्गम्यमानत्वात् श्रुतमपि आगममपि 'उच्च्या' प्राप्य 'मायति' दर्प याति, किमुक्तं भवति ?- श्रुतं हि मदापहारहेतुः, स तु तेनापि हृप्यति । तथा 'अपिः' सम्भावनायां सम्भाव्यत एतत्, यथाऽसौ पापैः- कथञ्चित् समित्यादिषु स्खलितलक्षणैः परिक्षिपति - तिरस्कुरुत इत्येवंशीलः पापपरिक्षेपी, आचार्यादीनामिति गम्यते, तथा 'अपिः' भिन्नक्रमः, ततः 'मित्रेभ्योऽपि सुहृयोऽप्यास्तामन्येभ्यः 'कुप्यति' क्रुध्यति, सूत्रे तु चतुर्थ्यर्थे सप्तमी, "कुधिदुहेर्ष्याऽसूयार्थानां यं प्रति कोप" ( पा० १-४-३७ ) इत्यनेनेह चतुर्थीविधानात्, तथा 'सुप्रियस्यापि' अतिवल्लभस्यापि मित्रस्य 'रहसि एकान्ते 'भाषते' वक्ति पापमेव पापर्क, किमुक्तं भवति ? - अग्रतः प्रियं वक्ति पृष्ठतस्तु प्रति१ प्राकृतानुकरणमेतत्, मित्रस्येयं मित्रीया तां क्रियमाण इति । For Parsons Prat norary.org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 192~ Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||६-१३|| नियुक्ति: [३१७] प्रत सूत्रांक ||६-१३|| उत्तराध्य. सेवकोऽयमित्यादिकमनाचारमेवाविष्करोति । तथा प्रकीर्णम्-इतस्ततो विक्षिप्तम् , असम्बद्धमित्यर्थः, यदति- बहुश्रुतपु टू जल्पतीत्येवंशीलः प्रकीर्णवादी, वस्तुतत्त्वविचारेऽपि यत्किञ्चनवादीत्यर्थः, अथवा-यः पात्रमिदमपात्रमिदमिति वाऽपबृहद्धृत्तिः जाध्ययनं. रीक्ष्यैव कथञ्चिदधिगतं श्रुतरहस्सं वदतीत्येवंशीलः प्रकीर्णवादी इति, प्रतिज्ञया वा-इदमित्थमेव इत्येकान्ताभ्युप-2 ॥३४६॥ गमरूपया वदनशीलः प्रतिज्ञावादी, तथा 'दुहिल'त्ति द्रोहणशीलो-द्रोग्धा, न मित्रमप्यनभिद्रुधास्ते, तथा 'स्तब्ध दि तपस्यहमित्यायहकृतिमान् , तथा 'लुब्धः' अन्नादिष्यभिकालावान्, तथा 'अनिग्रहः प्राग्वत् , तथाऽसंविभजनहै शीलः असंविभागी, नाऽऽहारादिकमवाप्यातिगर्द्धनोऽन्यस्मै खल्पमपि यच्छति, किन्त्वात्मानमेव पोषयति, तथा 'अचियत्तेति अप्रीतिकर:-दश्यमानः सम्भाष्यमाणो वा सर्वस्याप्रीतिमेयोत्पादयति, एवंविधदोषान्वितः अविनीत उच्यते इति निगमनम् । इत्थमविनीतस्थानान्यभिधाय विनीतस्थानान्याह-अथ पञ्चदशभिः स्थानी सुधु-शोभनो विनीतो-विनयान्वितः सुविनीत इत्युच्यते, तान्येवाह-नीयावित्ति'ति नीचम्-अनुद्धतं यथा भवत्येवं नीचेषु वा शय्यादिपु वर्तत इत्येवंशीलो नीचवर्ती-गुरुपु न्यगवृत्तिमान् , यथाऽऽह-"नीयं सेज्जं गई ठाणं, णियं च आसणाणि य । णियं च पाय बंदेजा, णीयं कुज्जा य अंजलिं ॥१॥'अचपलः' नाऽऽरब्धकायें प्रत्यस्थिर, ३४६॥ अथवाऽचपलो-गतिस्थानभाषाभावभेदतचतुर्धा, तत्र-गतिचपल:-द्वनचारी, स्थानचपलः-तिष्ठापि चलनवास्त १ नीचां शय्यां गतिं स्थानं नीचानि चासनानि च । नीचं पादौ वन्देत नीचं च कुच्चा चलिम् ॥ १॥ दीप अनुक्रम [३३३-३४० mat organothiamom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~193~ Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (13) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||६-१३|| नियुक्ति: [३१७] प्रत सूत्रांक ||६-१३|| हस्तादिभिः भाषाचपलः-असदसभ्यासमीक्ष्यादेशकालालापिभेदाच्चतुर्द्धा, तत्र असद्-अविद्यमानमसभ्यं-खरपरुषा-1 दि असमीक्ष्य-अनालोच्य प्रलपन्तीत्येवंशीला असदसभ्यासमीक्ष्यअलापिनस्त्रयः, अदेशकालप्रलापी चतुर्थः अतीते कार्य यो वक्ति-यदिदं तत्र देशे काले वाऽकरिष्यत् ततः सुन्दरमभविष्यद्, भावचपलः सूत्रेऽर्थे वाऽसमाप्त एवं योऽन्यद् गृह्णाति, 'अमायी' न मनोज्ञमाहारादिकमवाप्य गुर्वादिवञ्चकः, 'अकुतूहलः' न कुहुकेन्द्रजालाद्यवलोकन-1 | परः, 'अल्पं च' इति स्तोकमेव 'अधिक्षिपति' तिरस्कुरुते, किमुक्तं भवति ?-नाधिक्षिपत्येव तावदसौ कश्चन, अधि-13 क्षिपन् वा कञ्चन कङ्क?करूपं धर्म प्रति प्रेरयन्नल्पमेवाधिक्षिपति, अभाववचनो वाऽल्पशब्दः, तथा च वृद्धाः“अल्पशब्दो हि स्तोकेऽभावे च", ततो नैव कञ्चनाधिक्षिपति, 'प्रबन्ध' चोक्तरूपं न करोति, 'मित्रीय्यमाणः | उक्तन्यायेन 'भजते' मित्रीयितारमुपकुरुते, न तु प्रत्युपकारं प्रत्यसमर्थः कृतघ्नो वा, श्रुतं लब्ध्वा न माधति, किन्तु । मददोषपरिज्ञानतः सुतरामवनमति, 'न च' नैव 'पापपरिक्षेपी' उक्तरूपः, न च मित्रेभ्यः कृतज्ञतया कथश्चिदप-1 राधेऽपि कुप्यति, अप्रियस्यापि मित्रस्य रहसि 'कल्लाण'त्ति कल्याणं भापते, इदमुक्तं भवति-मित्रमिति यः प्रति-11 8/पन्नः स यद्यप्यपकृतिशतानि विधत्ते तथाऽप्येकमपि सुकृतमनुस्मरन् न रहस्यपि तहोपमुदीरयति, तथा चाह-1 "एकसुकृतेन दुष्कृतशतानि ये नाशयन्ति ते धन्याः। न त्वेकदोपजनितो येषां कापः स च कृतघ्नः॥१॥" इति, कलहश्व-वाचिको विग्रहः डमरं च-प्राणिघातादिभिस्तहर्जको, 'बुद्धो' बुद्धिमान् , एतच सर्वत्रानुगम्यत एवेति । दीप अनुक्रम [३३३-३४० पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~194 Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||६-१३|| नियुक्ति: [३१७] (४३) बहुश्रुतपू. जाध्यवनं. बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||६-१३|| उत्तराध्य. न प्रकृतसङ्ख्याविरोधः, 'अभिजातिए'त्ति अभिजातिः-कुलीनता ता गच्छति-उत्क्षिप्तभारनिर्वाहणादिनेत्यभि- जातिगः, ही:-लज्जा सा विद्यतेऽस्य ह्रीमान् , कथञ्चित् कलुषाध्यबसायतायामप्यकार्यमाचरन् लजते, 'प्रतिसंलीन गुरुसकाशेऽन्यत्र वा कार्य विना न यतस्ततश्चेष्टते, प्रस्तुतमुपसंहरन्नाह-'सुबिनीतः' सुविनीतशब्दवाच्यः 'इति ॥३४७॥ इत्येवंविधगुणान्वितः उच्यते, इति सूत्राष्टकार्थः । यश्चैवं विनीतः स कीटक स्यादित्याह वसे गुरुकुले निर्व, जोगवं उवहाणवं । पियंकरे पियवाई, से सिक्ख लडुमरिहति ॥ १४ ॥ व्याख्या-वसेत् आसीत क?-गुरूणाम्-आचार्यादीनां कुलम्-अन्वयो गच्छ इत्यर्थः गुरुकुलं तत्र, तदाज्ञोपललक्षणं च कुलग्रहणं, 'नित्यं' सदा, किमुक्तं भवति?-यावजीवमपि गुर्वाज्ञायामेव तिष्ठेत् , उक्तं हि-"णाशास्स होइ भागी"|3 इत्यादि, योजनं योगो-व्यापारः, स चेह प्रक्रमाद्धर्मगत एव तद्वान् , अतिशायने मतुप, यद्वा योगः-समाधिः सोड४ सास्तीति योगवान् , प्रशंसायां मतुप, उपधानम्-अङ्गानाध्ययनादौ यथायोगमाचाम्लादितपोविशेषस्तद्वान्, यद्यस्योपधानमुक्तं न तत् कृच्छभीरुतयोत्सृज्यान्यथा वाऽधीते शृणोति वा, प्रियम्-अनुकूलं करोतीति प्रियङ्करः, कश्चित् केनचिदपकृतोऽपि न तत्प्रतिकूलमाचरति, किन्तु ममैव कर्मणामयं दोष इत्यवधारयन्नप्रियकारिण्यपि प्रिय- मेव चेष्टते, अत एव च 'पियंवाईत्ति केनचिदप्रियमुक्तोऽपि प्रियमेव वदतीत्येवंशीलः प्रियवादी, यद्वा-'प्रियङ्करः' १ज्ञानस्य भवति भागी। (विरपरको ईसणे चरित्ते य । धण्णा आवकहाए गुरुकुलवासं न मुंचंति ॥ १॥) दीप अनुक्रम [३३३-३४० ॥३४७॥ For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~195 Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||१४|| नियुक्ति: [३१७] ॐSEXY प्रत सूत्रांक ||१४|| आचार्यादेरभिमताहारादिभिरनुकूलकारी, एवं 'प्रियवाद्यपि' आचार्याभिप्रायानुवर्तितयैव वक्ता, तथा चास्य को गुण इत्याह-'स' एवंगुणविशिष्टः 'शिक्षा शास्त्रार्थग्रहणादिरूपां 'लब्धुम्' अवामुम् 'अर्हति' योग्यो भवतीति, अनेनैव अविनीतस्त्वेतद्विपरीतः शिक्षा लब्धुं नाईतीत्यर्थादुक्तं भवति, तथा च यः शिक्षा लभते स बहुश्रुतः इतर स्त्वबहुश्रुत इति भाव इति सूत्रार्थः ॥ एवं च सविपक्षं बहुश्रुतं प्रपञ्चतोऽभिधाय प्रतिज्ञातं तत्प्रतिपत्तिरूपमाचारंगी तस्यैव स्तवद्वारेणाहMI जहा-संखमि पयं निहियं, दुहओवि विरायइ । एवं बहुस्सुए भिक्खू, धम्मो कित्ती तहा सुयं ।।१५।। A व्याख्या-'यथा' इति दृष्टान्तोपन्यासे 'शङ्के जलजे 'पयो' दुग्धं 'निहितं न्यस्त दुहओविति द्वाभ्यां प्रकासाराभ्यां द्विधा, न शुद्धतादिना खसम्वन्धिगुणलक्षणेनकेनैव प्रकारेण, किन्तु खसम्बन्ध्याश्रयसम्बन्धिगुणहयलक्षणेन प्रकारद्वयेनापीत्यपिशब्दार्थः, 'विराजते' शोभते, तत्र हि न तत् कलुपीभवति, न चाम्लतां भजते, नापि च परित्रवति, 'एवम्' अनेन प्रकारेण बहुश्रुते 'भिक्खुत्ति आपत्वाद् भिक्षी-तपखिनि, 'धर्मः' यतिधर्मः कीर्तिः' श्लाघा 'तथा' इति धर्मकीर्तिवत् 'श्रुतम्' आगमो, विराजत इति सम्बन्धः, किमुक्तं भवति ?-यद्यपि धर्मकीर्तिश्रुतानि निरुपलेपतादिगुणेन खयं शोभाभाजि तथापि मिथ्यात्वादिकालुष्यविगमतो निर्मलतादिगुणेन शङ्ख इव पयो बहुश्रुते स्थितान्याश्रयगुणेन विशेषतः शोभन्ते, तान्यपि हि न तत्र मालिन्यम् अन्यथाभावं हानि वा कदाचन प्रतिपद्य दीप अनुक्रम [३४१] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~196~ Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१५|| दीप अनुक्रम [३४२] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥ ३४८ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [११], मूलं [ - ] / गाथा ||१५|| निर्युक्ति: [३१७] न्ते, अन्यत्र त्वन्यथाभूतभाजनस्थपयोवदन्यथाऽपि स्युः, वृद्धास्तु व्याचक्षते - 'यथे' त्यौपम्ये, 'संखमि' संखभायणे 'पयं' खीरं 'निहितं' ठवितं न्यस्तमित्यर्थः, 'दुहतो' उभयतो संखो खीरं च, अहवा टवंतओ खीरं च, संखेण परिस्सवति ण य अंबीभवति, 'विरायति' सोभति 'एव' मुपसंहारे अणुमाणे वा 'बहुसुओ' सुत्तत्थविसारतो, जानक इत्यर्थः, 'तस्स' एवं भिक्खुभायणे दिंतस्स धम्मो भवति कित्ती जसो तथा सुयमाराधियं भवति, अपत्ते दिंतस्स असुयमेव भवति, अहवा इहलोए परलोए य सोहइ पत्तदाई, अहवा एवंगुणजाइए भिक्खू बहुस्सुए भवति, धम्मो कित्ती जसो य हवइ, सुर्य से ( सुयमाराहियं ) हवइ, अहवा इहलोए परलोए य बिरायइ, अहवा सीलेण य सुरण य" इति सूत्रार्थः ॥ पुनर्बहुश्रुतस्तवमाह - जहा से कंबोयाणं, आइने कंधए सिया। आसे जवेण पवरे, एवं हवइ बहुस्सु ॥ १६ ॥ व्याख्या- 'यथा' येन प्रकारेण 'स' इति प्रतीतः 'काम्बोजानां' कम्बोजदेशोद्भवानां प्रक्रमादश्वानां, निर्द्धारणे षष्ठी, 'आकीर्णः' व्याप्तः, शीलादिगुणैरिति गम्यते, 'कन्थकः' प्रधानोऽवो, यः किल टपच्छकलभृतकुतुपनिपतनध्वनेर्न सन्त्रस्यति, 'स्यात्' भवेत् 'अश्वः ' तुरङ्गमः 'जवेन' वेगेन 'प्रवरः' प्रधानः 'एवम्' इत्युपनये तत ईदृशो भवति ५ ॥ ३४८ ॥ बहुश्रुतः, जिनधर्मप्रपन्ना हि त्रतिनः काम्बोजा इवाश्वेषु जातिजयादिभिर्गुणैरन्यधार्मिकापेक्षया श्रुतशीलादिभिर्वरा * एव, अयं त्वाकीर्णकन्यकाववत् तेष्वपि प्रवर इति सूत्रार्थः ॥ १६ ॥ किञ्च Education Intematonal For Parsons Private बहुश्रुतपू जाध्ययनं. ११ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 197~ Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-1 / गाथा ||१७|| नियुक्ति: [३१७] प्रत सूत्रांक ||१७|| जहाइन्नसमारूढे, सूरे दहपरक्कमे । उभओ नंदिघोसेणं, एवं हवइ बहुस्सुए ॥१७॥ व्याख्या-यथा आकीर्ण-जात्यादिगुणोपेतं तुरङ्गमं सम्यगारुढः-अध्यासितः आकीर्णसमारूढः, सोऽपि कदाचित् । कातर एव स्यादत आह-'शरः' चारभटः दृढ़ः-गाढः पराक्रमः-शरीरसामर्थ्यात्मको यस्य स तथा, 'उभउत्ति उभयतो वामतो दक्षिणतश्च यद्वाऽग्रतः पृष्ठतश्च नन्दीघोषण' द्वादशतूर्यनिनादात्मकेन, यद्वा आशीर्वचनानि नान्दी जीयास्त्वमित्यादीनि तपोषण बन्दिकोलाहलात्मकेन, लक्षणे तृतीया, एवं भवति बहुश्रुतः, किमुक्तं भवति ?-यथैवंविधः शूरोन केनचिदभिभूयते न चान्यस्तदाश्रितः, तथाऽयमपि जिनप्रवचनतरकाश्रितो रप्यत्परवादिदशेनेऽपि चात्रस्तः तद्विजयं च प्रति समर्थः उभयतश्च दिनरजन्योः खाध्यायघोषरूपेण स्वपक्षपरपक्षयोर्वा चिरं जीवत्वसौ येनानेन प्रव चनमुद्दीपितमित्याद्याशीर्वचनात्मकेन नान्दीघोषेणोपलक्षितः परतीर्थिभिरतीव मदावलिप्तैरपि नाभिभवितुं शक्यः INIन चात्र प्रतपत्येतदाश्रितोऽन्योऽपि कथञ्चिज्जीयत इति सूत्रार्थः ॥ तथा जहा करेणुपरिकिपणे, कुंजरे सद्विहायणे । बलवंते अप्पडिहए, एवं भवह बहुस्सुए ॥१८॥ व्याख्या-यथा' करेणुकाभिः-हस्तिनीभिः परिकीर्णः-परिवृतो यः स तथा, न पुनरेकाक्येव 'कुञ्जरः' हस्ती पष्टिहायनान्यस्येति षष्टिहायनः-पष्टिवर्षप्रमाणः, तस्य हि एतावत्कालं यावत् प्रतिवर्ष बलोपचयः ततस्तदुपचय इत्येवमुक्तम् , अत एव च 'बलवंते'त्ति बलं-शरीरसामर्थ्यमस्यास्तीति बलवान सन् अप्रतिहतो भवति, कोऽर्थः-113 नान्यमैदमुखैरपि मतगजैः पराखीक्रियते, एवं भवति बहुश्रुतः, सोऽपि हि करेणुभिरिव परप्रसरनिरोधिनीभिरीत्प दीप अनुक्रम [३४४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~198~ Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१८|| दीप अनुक्रम [ ३४५] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३४९॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्ति: [३१७] अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||१८|| सिक्यादिबुद्धिभिर्विद्यामिश्च विविधाभिर्वृतः षष्टिहायनतया चात्यन्तस्थिरमतिः, अत एव च बलवस्वेनाप्रतिहतो भवति, दर्शनोपहन्तृभिर्बहुभिरपि न प्रतिहन्तुं शक्यत इति सूत्रार्थः ॥ अन्यथ जहा से तिक्खसिंगे, जायक्खंधे विराय । वसभे जूहाहिबती, एवं भवति बहुस्सु ॥ १९ ॥ व्याख्या- यथा स तीक्ष्णे निशिताग्रे शृङ्गे - विषाणे यस्य स तथा जातः - अत्यन्तोपचितीभूतः स्कन्धः - प्रतीत एवास्येति जातस्कन्धः, समस्ताङ्गोपाङ्गोपचितत्वोपलक्षणं चैतत्, तदुपचये हि शेषाङ्गान्युपचितान्येवास्य भवन्ति, 'विराजते' विशेषेण राजते-शोभते 'वृषभः' प्रतीतो, यूथस्य- गवां समूहस्याधिपतिः - खामी यूथाधिपतिः सन्, एवं भवति बहुश्रुतः, सोऽपि हि परपक्षभेतृतया तीक्ष्णाभ्यां खशास्त्र परशास्त्राभ्यां शृङ्गाभ्यामिवोपलक्षितः गच्छगुरुकार्यधुराधरणधीरेयतया च जातस्कन्ध इव जातस्कन्धः, अत एव च यूथस्य - साध्वादिसमूहस्याधिपतिः - आचार्यपदवीं गतः सन् विराजते इति सूत्रार्थः ॥ अन्यच जहा से तिक्खदाढे, ओदग्गे दुष्पहंसए। सीहे मियाण पवरे, एवं भवइ बहुस्सु ॥ २० ॥ व्याख्या- यथा स तीक्ष्णाः- निशिता दंष्ट्राः प्रतीता एव यस्य स तीक्ष्णदंष्ट्रः, 'उदयः' उत्कट उदग्रवयः स्थितत्वेन वा उदग्रः, अत एव 'दुप्पहंसए' ति दुष्प्रधर्ष एव दुष्प्रधर्षकः - अन्यैर्दुरभिभवः 'सिंह' केशरी 'मृगाणाम्' आरण्यप्राणिनां 'प्रवरः' प्रधानो भवति, एवं भवति बहुश्रुतः, अयमपि हि परपक्षभेतृतया तीक्ष्णदंष्ट्राभिरिव नैगमादि For Parana Prat बहुश्रुतपू जाध्ययनं ११ ~ 199~ ॥३४९॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||२०|| नियुक्ति: [३१७] प्रत सूत्रांक ||२०|| नयेः प्रतिभादिगुणोदप्रतया च दुरभिभवः इत्यन्यतीर्थानां मृगस्थानीयानां प्रवर एवेति सूत्रार्थः ॥ अपरं च जहा से वासुदेवे, संखचक्रगदाधरे । अप्पडिहयबले जोहे, एवं भवइ बहुस्सुए ॥२१॥ व्याख्या-यथा स 'वासुदेवः' विष्णुः, शङ्खश्च-पाञ्चजन्यः चक्रं च-सुदर्शनं गदा च-कौमोदकी शङ्खचक्रगदास्ताधारयति-वहतीति शङ्खचक्रगदाधरः, अप्रतिहतम्-अन्यैः स्खलयितुमशक्यं बलं-सामर्थ्यमस्खेत्यप्रतिहतबलः, किमुक्त भवति -एकं सहजसामर्थ्यवानन्यच्च तथाविधायोधान्वित इति, युध्यतीति योधः-सुभटो भवति, एवं भवति बहु-12 श्रुतः, सोऽपि ोकं खाभाविकप्रतिभाप्रागल्भ्यवान् अपरं शङ्खचक्रगदाभिरिव सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैरुपेत इति, योध इव योधः कर्मवेरिपराभवं प्रतीति सूत्रार्थः ॥ अपरं- . जहा से चाउरते, चक्कवट्टी महिहिए । चोदसरयणाहिवई, एवं हवइ बहुस्सुए ॥२२॥ व्याख्या-यथा स चतसृष्यपि दिक्ष्वन्तः-पर्यन्त एकत्र हिमवानन्यत्र च दिक्त्रये समुद्रः खसम्बन्धितयाऽस्पेतिर चतुरन्तः, चतुर्भिवा-हयगजरथनरात्मकैरन्तः-शत्रुविनाशात्मको यस्य स तथा, 'चक्रवर्ती' षट्खण्डभरताधिपः, महती ऋद्धिः-समृद्धिरस्पति महर्द्धिकः-दिव्यानुकारिलक्ष्मीकः, चतुर्दश च तानि रत्नानि च चतुर्दशरत्नानि, तानि । | चामूनि-सेणावइ गाहावइ पुरोहिय गय तुरंग बहइग इत्थी । चकं छत्तं चम्म मणि कागिणी खग्ग दंडो य ॥१॥ १ सेनापतिः गाथापतिः पुरोहितो गजस्तुरङ्गो वर्धकिः स्त्री। चक्रं छत्रं चर्म मणिः काकिणी खगो दण्डश्च ।। १ ।। दीप अनुक्रम [३४७]] Samtailstonia For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~200 Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२२|| दीप अनुक्रम [३५० ] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥ ३५० ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्ति: [३१७] अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||२२|| । तेषामधिपतिः चतुर्दश्रलाधिपतिः, 'एवं भवति बहुश्रुतः सोऽपि वासमुद्रमही मण्डलख्यातकीर्तिः तिसृषु दिक्षन्यत्र च बन्दीभूतविद्याधरवृन्द इति दिक्चतुष्टयव्यापिकीर्तितया चतुरन्त उच्यते, चतुर्भिर्वा दानादिधम्मैरन्तःकर्मवैरिविनाशोऽस्येति चतुरन्तः, ऋद्धयश्चामपौषध्यादयश्चक्रवर्तिनमपि योधयेदित्येवंविधपुलाकलब्ध्यादयश्च महत्य एवास्य भवन्ति, सन्ति चास्यापि चतुर्दशरत्त्रोपमानि सकलातिशयनिधानानि पूर्वाणीति कथं न चक्रवर्तितुल्यताऽ- | | स्येति सूत्रार्थः ॥ अन्यच - जहा से सहस्सखे, वज्रपाणी पुरंदरे । सके देवाहिवई, एवं हवइ बहुस्सुए ॥ २३ ॥ व्याख्या- यथा स सहस्रमक्षीण्यस्येति सहस्राक्षः सहस्रलोचनः, अत्र च सम्प्रदायः - 'सहस्सक्खत्ति पंच मंति सया देवाणं तस्स, तेसिं सहस्सं अच्छीणं, तेसिं नीईए विकमति, अहवा जं सहस्सेणं अच्छीणं दीसति तं सो दोहिं अच्छीहिं अमहियगरागं पेच्छती 'ति । वज्रं यजाभिधानमायुधं पाणावस्येति वज्रपाणिः, लोकोक्त्या च पुर्दारणात् पुरन्दरः, क ईदृगित्याह-शक्रो 'देवाधिपतिः' देवानां खामी, एवं भवति बहुश्रुतः, सोऽपि हि श्रुतज्ञानेना| शेषातिशयरत्त निधानतुल्येन लोचनसहस्रेणेव जानीते, यश्चैवं तस्यैवंविधत्वोपलक्षणं, वज्रमपि लक्षणं पाणौ सम्भ१ पश्च मन्त्रिशतानि देवानां तस्य तेषां सहस्रमक्ष्णां, तेषां नीती विक्रमते, अथवा यत्सहस्रेणाक्ष्णां दृश्यते तत् स द्वाभ्यामक्षिभ्यामभ्यधिकतरं प्रेक्षते इति । Jan Education intemational For Parsons Privat बहुश्रुतपू जाध्ययनं. ११ ~201~ ॥ ३५० ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||२३|| नियुक्ति: [३१७] प्रत सूत्रांक ||२३|| वतीति वज्रपाणिः, पूश्च शरीरमप्युच्यते, तद्विकृष्टतपोऽनुष्ठानतो दारयतीव दारयतीति पुरन्दरः, शक्रवत् देवैरपि धर्मेऽत्यन्तनिश्चलतया पूज्यते इति तत्पतिरप्युच्यते, तथा चाह-"देवावि तं नमसंति, जस्स धम्मे सया मणो"चि सूत्रार्थः ।। अपि च जहा से तिमिरविद्धंसे, उत्तिट्ठति दिवागरे । जलते इव तेएणं, एवं भवइ बहुस्सुए ॥ २४ ॥ व्याख्या-यथा सः तिमिरम्-अन्धकारं विध्वंसयति-अपनयति तिमिरविध्वंसः, 'उत्तिष्ठन्' उद्गच्छन् 'दिवाकरः' है। सूर्यः, स हि ऊर्य नभोभागमाक्रामन्नतितेजसितां भजते अवतरंस्तु न तथेत्येवं विशिष्यते, यद्वा उत्थानं-प्रथम मुद्गमनं तत्र चायं न तीन इति तीवत्वाभावख्यापकमेतत् , अन्यदा हि तीनोऽयमिति न सम्यग् दृष्टान्तः स्यात्, 'ज्वलन्निव' ज्याला मुश्चन्निव 'तेजसा महसा, एवं भवति बहुश्रुतः, सोऽपि यज्ञानरूपतिमिरापहारकः संयमस्थानेषु विशुद्धविशुद्धतराध्यवसायत उपसर्पस्तपस्तेजसा च ज्वलन्निव भवतीति सूत्रार्थः ॥ अन्यच्च जहा से उडुबई चंदे, नक्वत्तपरिवारिए । पडिपुण्णे पुण्णिमासीए, एवं भवइ बहुस्सुए ॥ २५ ॥ व्याख्या-यथा सः उडूनां-नक्षत्राणां पतिः-प्रभुः उडुपतिः, क इत्याह-'चन्द्रः' शशी, 'नक्षत्रैः' अश्विन्यादिभिः, उपलक्षणत्वाद्हैस्ताराभिश्च परिवारः-परिकरः सातोऽस्येति परिवारितः नक्षत्रपरिवारितः 'प्रतिपूर्णः | १ देवा अपि तं नमस्यन्ति यस्य धर्मे सदा मनः । दीप अनुक्रम [३५१] SamEaicatm totamarhand For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~ 202~ Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||२५|| नियुक्ति: [३१७] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||२५|| उत्तराध्य. समस्तकलोपेतः, स चेक् कदा भवति ? अत आह-पौर्णमास्याम् । इह च चन्द्र इत्युक्ते मा भून्नामचन्द्रादावपि बहुश्रुतपू. सम्प्रत्ययः इत्युहुपतिग्रहणं, उडुपतिरपि च कश्चिदेकाक्येव भवति मृगपतिवत् अत उक्तं नक्षत्रपरिवारितः, सोड-6 | जाध्ययनं. प्यपरिपूर्णोऽपि द्वितीयादिषु सम्भवतीति परिपूर्णः पौर्णमास्यामित्युक्तं, एवं भवति बहुश्रुतः, असावपि हि नक्ष- ॥३५१॥ त्राणामियानेकसाधूनामधिपतिः तथा तत्परिवारितः सकलकलोपेतत्वेन प्रतिपूर्णश्च भवतीति सूत्रार्थः ॥ अपरं च जहा से सामाइयाणं, कोडागारे सुरक्खिए । नाणाधपणपडिप्पुण्णे, एवं हवइ बहुस्सुए ॥ २६ ॥ । व्याख्या-यथा स 'सामाइयाणं ति समाजः-समूहस्तं समवयन्ति सामाजिकाः-समूहवृत्तयो लोकास्तेषां, पठन्ति च-'सामाइयंगाणं ति तत्र च श्यामा-अतसी तदादीनि च तानि अङ्गानि च उपभोगाङ्गतया श्यामाथलानि धान्यानि तेषां 'कोठागारे'त्ति कोष्ठा-धान्यपल्यास्तेपामगारं-तदाधारभूतं गृहम्, उपलक्षणत्वादन्यदपि । प्रभूतधान्यस्थानं, यत्र प्रदीपनकादिभयात् धान्यकोष्ठाः क्रियन्ते तत् कोष्ठागारमुच्यते, यदिवा कोष्टान् आ-सम-४ दन्तात् कुर्वते तस्मिन्निति कोष्ठाकारः, “अकर्तरि च कारके सज्ञाया" (पा. ३-३-१९)मिति घन, तथा सुष्टु प्राहरिकपुरुषादिव्यापारणद्वारेण रक्षितः-पालितो दस्युमूषिकादिभ्यः सुरक्षितः, स च कदाचित् प्रतिनियतधान्य- ॥३५१॥ विषयोऽप्रतिपूर्णश्च स्थात् अत आह-नाना-अनेकप्रकाराणि धान्यानि-शालिमुद्ादीनि तैः प्रतिपूर्णी-भृतः नानाधान्यप्रतिपूर्णः, आद्यपक्षे तु विशेषणे नपुंसकलिझतया नेये, एवं भवति बहुश्रुतः, असावपि सामाजिकलोकाना दीप अनुक्रम [३५३] SOMEdiradail . For F r ont पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~203~ Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||२६|| नियुक्ति: [३१७] % 23-452-% प्रत सूत्रांक ||२६|| मिव गच्छवासिनामुपयोगिभिर्नानाधान्यैरिवाजोपाङ्गप्रकीर्णकादिभेदैः श्रुतज्ञानविशेषैः प्रतिपूर्ण एव भवति, सुरक्षितश्च प्रवचनाधारतया, यत उक्तम्-"जेणे कुलं आयत्तं तं पुरिसं आयरेण रक्खेह" इत्यादीति सूत्रार्थः । अपि च जहा सा दुमाण पवरा, जंबूनाम सुदसणा । अणाढियस्स देवस्स, एवं हवइ बहुस्सुए ॥ २७ ॥ व्याख्या-यथा सा द्रुमाणां मध्ये प्रवरा-प्रधाना जम्बूः नाना-अभिधानेन सुदर्शना नाम सुदर्शना, न हि यथेयममृतोपमफला देवाद्याश्रयश्च तथाऽन्यः कश्चिद् हुमोऽस्ति, द्रुमत्वं फलव्यवहारश्चास्यास्तत्प्रतिरूपतयैव, वस्तुतः पार्थिवत्वेनोक्तत्वात् , वज्रवैडूर्यादिमयानि हि तन्मूलादीनि तत्र तत्रोक्तानि, सा च कस्खेत्याह-'अनाहतस्य' अनाहतनाम्रो 'देवस्य' जम्बूद्वीपाधिपतेय॑न्तरसुरस्य आश्रयत्वेन सम्बन्धिनी, एवं भवति बहुश्रुतः, सोऽपि यस्तोपमफलकल्पश्रुतान्वितो देवादीनामपि च पूज्यतयाऽभिगमनीयः शेषट्ठमोपमसाधुषु च प्रधान इति सूत्रार्थः ॥ अन्यच्च जहा सा नईण पवरा, सलिला सागरंगमा । सीया नीलवंतपवहा, एवं हवह बहुस्सुए ॥२८॥ व्याख्या-यथा सा 'नदीनां' सरितां 'प्रवरा प्रधाना सलिलं-जलमस्यामस्तीति, अर्शआदेराकृतिगणत्वादचि १ यस्मिन् कुलं स्वाधीनं तं पुरुषमादरेण रक्ष दीप अनुक्रम [३५२] 69- For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~ 204~ Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२८|| दीप अनुक्रम [३५५] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३५२॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||२८|| निर्युक्ति: [३१७] अध्ययनं [११], सलिला नदी, सागरं समुद्रं गच्छतीति सागरङ्गमा-समुद्रपातिनीत्यर्थः, न तु क्षुद्रनदीवदपान्तराल एव विशीर्यते, 'शीता' शीतानाम्नी, नीलवान् - मेरोरुत्तरस्यां दिशि वर्षधरपर्वतस्ततः प्रभवति पाठान्तरतः प्रवहति वा नीलवत्प्रभवा नीलवत्प्रवहा वा, 'एवं' शीतानदीवद्भवति बहुश्रुतः, असावपि हि सरितामिवान्यसाधूनामशेषश्रुतज्ञानिनां वा मध्ये प्रधानो विमलजलकल्पश्रुतज्ञानान्वितश्च तथा सागरमिव मुक्तिमेवासौ गच्छति, तदुचितानुष्ठान एवास्य प्रवृत्तत्वात्, न सन्यदर्श निनामिव देवादिभव एवास्य विवेकिनो वाञ्छा, तथा च कथमस्य तेषामित्र प्रायोपान्तरालावस्थानं ?, नीलवतुल्याच उच्छ्रितोच्छ्रितमहाकुलादेवास्य प्रसूतिः, कथमिवान्यथैवंविधयोग्यतासम्भव इति सूत्रार्थः ॥ किञ्च जहा से नगाण पवरे, सुमहं मंदरे गिरी । नाणोसही पज्ञलिए, एवं हवइ बहुस्सुए ॥ २९ ॥ व्याख्या -- यथा स 'नगानां' पर्वतानां मध्ये 'प्रवरः' अतिप्रधानः 'सुमहान्' अतिशयगुरुरत्युच्च इतियावत्, 'मन्दरः' मन्दराभिधानः, कः पुनरसौ ? इत्याह-गिरिः, किमुक्तं भवति १- मेरुपर्वतः, 'नानौषधिभिः' अनेकविध - | विशिष्टमाहात्म्य वनस्पतिविशेषरूपाभिः प्रकर्षेण ज्वलितो- दीप्तः नानौषधिप्रज्वलितः, ता अतिशायिन्यः प्रज्वलन्त्य एवासत इति तद्योगादसावपि प्रज्वलित इत्युक्तः, यद्वा-प्रज्वलिता नानोषधयोऽस्मिन्निति प्रज्वलितनानौषधिः, प्रज्वलितशब्दस्य तु परनिपातः प्राग्वत्, 'एवम्' इति मन्दरवत् भवति बहुश्रुतः, श्रुतमाहात्म्येन सावत्यन्त Education Internal For Parsons Privat बहुश्रुतपू जाध्ययनं. ११ ~205~ ||३५२॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [११], मूलं [--] / गाथा ||२९|| नियुक्ति: [३१७] प्रत सूत्रांक ||२९|| स्थिर इति शेषगिरिकल्पापरस्थिरसाध्वपेक्षया प्रवर एव भवति, तथाऽन्धकारेऽपि प्रकाशनशक्त्यन्विता आमषोंपध्यादयस्तत्रातिप्रतीता एवेति सूत्रार्थः ॥ किंबहुना? जहा से सयंभूरमणे, उदही अक्खओदए । नाणारयणपडिपुण्णे, एवं भवइ बहुस्सुए ॥३०॥ व्याख्या-यथा स 'खयम्भूरमणः' खयम्भूरमणाभिधानः 'उदधिः' समुद्रः अक्षयम्-अविनाश्युदकं-जलं यस्मिन् । स तथा, नानारतैः-नानाप्रकारैर्मरकतादिभिः प्रतिपूर्णो-भृतः नानारनप्रतिपूर्णः, एवं भवति बहुश्रुतः, अयमपि अक्षयसम्यगज्ञानोदको नानाऽतिशयरत्नवांश्च भवति, यदिवाऽक्षत उदयः-प्रादुर्भावो यस्य सोऽक्षतोदय इति । सूत्रायः ॥ साम्प्रतमुक्तगुणानुवादतः फलोपदर्शनतश्च तस्यैव माहात्म्यमाह समुदगंभीरसमा दुरासया, अचकिया केणइ दुप्पहंसया। सुयस्स पुपणा विजलस्स ताइणो, खवेत्तु कम्मं गइमुत्तमं गया ॥३१॥ व्याख्या-'समुदगंभीरसम'त्ति आर्षत्वाद्गाम्भीर्येण-अलब्धमध्यात्म केन गुणेन समा गाम्भीर्यसमाः समुद्रस्य गाम्भीर्यसमाः समुद्रगाम्भीर्यसमाः, 'दुरासयत्ति दुःखेनाश्रीयन्ते-अभिभवबुद्धबाऽऽसाधन्ते वा-जेतुं सम्भाव्यन्ते । केनापीति दुराश्रया दुरासदावा, अत एव 'अचक्किय'त्ति अचकिता:-अत्रासिताः, 'केनचिदिति परीषहादिना परप्रवादिना वा, तथा दुःखेन प्रवर्ण्यन्ते-पराभूयन्ते केनापीति दुष्प्रधर्षात एव दुष्प्रधर्षकाः, क एवंविधाः ? दीप अनुक्रम [३५६] Fac४४४** SamEducatimotimatent For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~206~ Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||38|| दीप अनुक्रम [ ३५८] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३५३॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [११], मूलं [-] / गाथा ||३१|| निर्युक्ति: [३१७] | इत्याह- 'सुयस्स पुण्णा विउलस्स' त्ति - सुव्यत्ययाच्छ्रुतेन - आगमेन पूर्णाः परिपूर्णा विपुलेन - अङ्गानङ्गादिभेदतो विस्तीर्णेन तायिनः त्रायिणो वा, एवंविधाश्च बहुश्रुता एव, तानेव फलतो विशेषयितुमाह- 'क्षपयित्वा' विनाश्य 'कर्म्म' ज्ञानावरणादि, गम्यत इति गतिस्ताम् 'उत्तमां' प्रधानां, मुक्तिमितियावत्, 'गताः' प्राप्ताः, उपलक्षणत्वाद्गच्छन्ति गमिष्यन्ति च । इह चैकवचनप्रक्रमेऽपि बहुवचननिर्देशः, पूज्यताख्यापनार्थ व्याप्तिप्रदर्शनार्थं चेति सूत्रार्थः ॥ इत्थं बहुश्रुतस्य गुणवर्णनात्मिकां पूजामभिधाय शिष्योपदेशमाह - तम्हा सुयमहिद्वेजा, उत्तमहगवेसए। जेणऽप्पाणं परं चैव, सिद्धिं संपाउणिञ्जासि ॥ ३२ ॥ तिमि ॥ व्याख्या यस्मादमी मुक्तिगमनावसाना बहुश्रुतगुणाः तस्मात् श्रुतम्' आगमम् 'अधितिष्ठेत्' अध्ययनश्रवणचिन्तनादिनाऽऽश्रयेत्, उत्तमः -- प्रधानोऽर्थः - प्रयोजनम् उत्तमार्थः, स च मोक्ष एव तं 'गवेषयति' अन्वेषयतीति उत्तमार्थगवेषकः, येन किं स्यादित्याह - 'येन' श्रुताश्रयणेन 'आत्मानं' एवं 'परं' चान्यं तपस्व्यादिकं 'एवः' अवधारणे भिन्नक्रमच सम्प्रापयेदित्यस्यानन्तरं द्रष्टव्यः, ततः 'सिद्धि' मुक्तिगतिं 'संपाउणिजासि'त्ति सम्यक् प्रापयेदेव, नेह कश्चित् सन्देह इति सूत्रार्थः । 'इतिः' परिसमाप्तौ 'ब्रवीमि' इति पूर्वयत् उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्तेऽपि पूर्ववदेव ।। इति श्रीशान्त्याचार्यविरचितायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटीकायामेकादशमध्ययनं समाप्तम् ॥ Education Intemational For Pana Prat बहुश्रुतपू जाध्ययनं. ११ ~ 207~ ॥ ३५३ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अत्र अध्ययनं ११ परिसमाप्तं Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||३२,,,|| नियुक्ति: [३१८-३२० प्रत सूत्रांक ||३२|| अथ द्वादशं हरिकेशीयमध्ययनम् । व्याख्यातमेकादशमध्ययनमधुना द्वादशमारभ्यते,अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययने बहुश्रुतपूजोक्ता,इह तु बहुश्रुतेनापि तपसि यत्नो विधेय इति ख्यापनार्थ तपःसमृद्धिरुपवर्ण्यत इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्याध्ययनस्य चतुरनुयोगद्वारचर्चा प्राग्वत् तावद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपेऽस्य हरिकेशीयमिति नाम, अतो हरिकेशनिक्षेपमाह नियुक्तिकृत् नाम ठवणादविए० ॥ ३१८॥ जाणयसरीरभविए०॥ ३१९ ॥ हरिएसनामगोअं वेअंतो भावओ अ हरिएसो। तत्तो समुट्रियमिणं हरिए-सिजति अज्झयणं ॥३२०॥ हरिकेशे निक्षेपश्चतुर्विधो नामादिः, तत्र नामस्थापने क्षुण्णे, द्विविधो भवति 'द्रव्ये' द्रव्यविषयः-आगमनोआग-1 ४ मतश्च,तत्र आगमतो ज्ञाताऽनुपयुक्तो, नोआगमतश्च स त्रिविधो-ज्ञशरीरभव्यशरीरतद्वयतिरिक्तश्थ, स पुनः त्रिविधः-|| |एकविको बद्धायुष्कोऽभिमुखनामगोत्रश्च, हरिकेशनामगोत्रं वेदयन् भावतस्तु हरिकेश उच्यते, ततोऽभिधेयभूतात् समुत्थितमिदं हरिकेशीयं इत्यध्ययनमुच्यते इति शेषः, इति गाथात्रयार्थः ॥ सम्प्रति हरिकेशवक्तव्यतामाह नियुक्तिकृत् पुवभवे संखस्स उ जुवरन्नो अंतिअं तु पवज्जा । जाईमयं तु काउं हरिएसकुलंमि आयाओ ॥३२१॥ दीप अनुक्रम [३५९] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं -१२ “हरिकेशिय" आरभ्यते ~208~ Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [--] / गाथा ||३२,,|| नियुक्ति : [३२१-३२७] (४३) प्रत सूत्रांक ||३२|| उत्तराध्य. महुराए संखो खलु पुरोहिअसुओ अ गयउरे आसी । दट्टण पाडिहेरं हुयवहरत्थाइ निक्खंतो ॥३२२॥ हरिकेशीबृहद्धत्तिः हरिएसा चंडाला सोवाग मयंग बाहिरा पाणा । साणधणा य मयासा सुसाणवित्तीय नीया य ३२३ । | यमध्ययजम्मं मयंगतीरे वाणारसिगंडितिंदुगवणं च । कोसलिएसु सुभदा इसिवंता जन्नवाडंमि ॥ ३२४ ॥ ॥३५॥ नम्.१२ बलकुट्टे बलकोहो गोरी गंधारि सुविणगवसंतो । नामनिरुत्ती छणसप्प संभवो दुंदुहे बीओ ॥३२५॥ भदएणेव होअवं पावइ भद्दाणि भदओ । सविसो हम्मए सप्पो, भेरुंडो तत्थ मुच्चइ ॥ ३२६॥ | इत्थीण कहित्थ वट्टई, जणवयरायकहित्थ वट्टई। पडिगच्छह रम्म तिंदुअं, अइसहसा बहुमुंडिए जणे ॥ _एतदक्षरार्थः सुगम एव, णवरं 'अंतियं तु' इति अन्तिके-समीपे, 'तुः' पूरणे, 'पाडिहेति प्रतिहारो-दौवा-18 रिकस्तद्वत्सदा सन्निहितवृत्तिर्देवताविशेषोऽपि प्रतिहारस्तस्य कर्म प्रातिहाय, तच्चेह हुतवहरथ्यायाः शीतलत्वं, तथा दाहरिकेशाचाण्डालाः श्वपाकाः मातझा वाद्याः पाणाः श्वधनाश्च मृताशाः श्मशानवृत्तयश्च नीचाश्चेत्येकार्थिकाः, तथा 'मयातीरे'त्ति मृतेव मृता विवक्षितभूदेशे तत्कालाप्रवाहिणी सा चासो गका च मृतगका तस्यास्तीरं तस्मिन् ॥३५४॥ ऋषिवान्ता-ऋषित्यक्ता, तथा भद्र एवं भद्रको यो न कस्यचिदशुभे प्रवर्त्तते, भद्राणि-कल्याणानि, तथा खीणां । कथा तासां नेपथ्याभरणभापादिविषया अत्र' अस्मिन् यत्साश्रमे प्रवर्तते, 'जणवयरायकह'त्ति जनपदकथा मालयकादि दीप अनुक्रम [३५९] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~209~ Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [--] / गाथा ||३२,,|| नियुक्ति: [३२१-३२७] प्रत सूत्रांक ||३२|| देशप्रशंसानिन्दात्मिका राजकथा च राज्ञां शौर्यादिगुणवर्णनादिरूपा, 'पडिगच्छह'त्ति तिङ्ग्यत्ययात् प्रतिगच्छामो-निवर्तावहे, 'अयी'त्यामन्त्रणे 'सहसे'त्यपर्यालोच्य, कोऽर्थः ?-अपरीक्षितयोग्यताविशेषो, 'बहुर्मुण्डितो जनो'| मुण्डमात्रेणैव गृहीतदीक्षः प्रायो जनो, गृहीतभावदीक्षस्तु खल्प एवेति भावः ॥ तथेहाद्यगाथाया एवं पादद्वयं द्वितीयगाथया स्पष्टीकृतं, ततस्तृतीयपादः स्पष्ट एवेति, शेषगाथाभिश्चतुर्थपादस्य पर्यायदर्शनतस्तत्सूचितार्थाभिधानतश्चाभिव्यञ्जनं । भावार्थस्तु कथानकादवसेयः, तत्र च सम्प्रदायः-महुराए नयरीए संखो नाम जुवराया, सो धम्म || सोउं पचतितो, विहरतो य गयउरं गओ। तहिं च भिक्खं हिंडंतो एग रत्थं पत्तो, सा य किर अतीव उण्हा मुम्मुरसमा, उण्हकाले ण सकति कोऽवि बोलेउं, जो तत्थ अजाणतो उप्फंदति सो विणस्सति, तीसे पुण णाम | चेव हुयवहरत्था, तेण साहुणा पुरोहियपुत्तो पुच्छितो-एसा रत्था निवहति , सो पुरोहियस्स पुत्तो चिंतेतिएस उज्झउत्ति निवहति इइ बुत्तं, सो पटिओ, इयरो य अलिंदटिओ पेच्छति अतुरियाए गईए वचत तं, सो| १ मथुरायां नगर्या शसो नाम युवराजः, स धर्म श्रुत्वा प्रनजितः, विहरंश्च गजपुरं गतः । तत्र च भिक्षां हिण्डमान एका रथ्यां प्राप्तः, सा च किलातीबोष्णा मुर्मुरसमा, उष्णकाले न शक्नोति कोऽपि व्यतिक्रमितुं, यस्तत्राजानान उत्पन्दते स विनश्यति, तस्याः पुनर्नामैव हुनयहरच्या, तेन साधुना पुरोहितपुत्रः पृष्टः-एपा रथ्या निर्वहति , स पुरोहितस्य पुत्रश्चिन्तयति-एष दह्यतामिति निर्व-| हतीति उक्तं, स प्रस्थितः, इतरचालिन्दकस्थितः प्रेक्षते अत्वरितया गत्या ब्रजन्तं तं, स दीप अनुक्रम [३५९] ANDLA matt पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~210~ Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [-1 / गाथा ||३२,,,|| नियुक्ति: [३२१-३२७] (४३) उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||३२|| आसंकाए उइण्णो तं रत्थं, जाय सा तस्स तवष्पभावेणं सीतीभूया, आउट्टो-अहो इमो महातबस्सी मए आसा हरिकेशीदितो, उजाणट्ठियं गन्तुं भणति-भगवं! मए पावकम्मं कयं, कहं वा तस्स मुंचेजामि?, तेण भण्णति-पवयह,४ यमध्यय. पचहतो, जातिमयं रूपमयं च काउं मओ, देवलोगगमणं, चुओ संतो मयगंगाए तीरे बलकोट्टा नाम हरिएसा, तेर्सि अहिवई वलकोट्टो नाम, तस्स दुवे भारियाओ-गोरी गंधारी य, गोरीए कुञ्छिसि उववष्णो, सुमिणदसणं,12 नम्.१२ वसंतमासं पेच्छति, तत्थ कुसुमियं चूयपायवं पेच्छइ, सुमिणपाढयाणं कहियं, तेहिं भण्णति-महप्पा ते पुत्तो भविस्सति, समएण पसूया, दारगो जाओ कालो विरूओ पवभवजाइरूवमयदोसेणं, बलकोट्टेस जाउत्ति बलो से | नाम कयं, भंडणसीलो असहणो । अण्णया ते छणेण समागया भुंजंति सुरं च पिवंति, सोऽवि अप्पिणियंत्र १ आशङ्कयाऽवतीर्णस्तां रथ्यां, यावत्सा तस्य तपःप्रभावेण शीतीभूता, आवृत्त:-अहो अयं महातपस्वी मया आशातितः, उद्यानस्थितं गत्वा भणति-भगवन् ! मया पापकर्म कृतं, कथं वा तस्मात् मुच्येय?, तेन भण्यते-प्रव्रज, प्रबजितः, जातिमई रूपमदं च कृत्वा मृतो, देवलोकगमन, मयुतः सन् मृतगङ्गायास्तीरे बलकोट्टा नाम हरिकेशाः, तेषामधिपतिलकोट्टो नाम, तस्स द्वे भार्ये-गौरी | गान्धारी च, गौर्याः कुक्षी उत्पन्ना, स्वप्नदर्शनं, वसन्तमासं प्रेक्षते, तत्र कुसुमितं चूतपादपं पश्यति, स्वप्नपाठकेभ्यः कथितं, ते ण्यते----| महात्मा ते पुत्रो भविष्यति, समये प्रसूता, दारको जात:-कालो विरूपः पूर्वभवजातिरूपमददोषण, बलकोट्टेषु जात इति पलस्तस्य नाम | कृतं, भण्डनशीलोऽसहनः । अन्यदा ते क्षणे समागता भुजते सुरां च पिबन्ति, सोऽप्यप्रीतिक दीप अनुक्रम [३५९] -16464 matt For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~211 Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||३२|| दीप अनुक्रम [३५९] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१२], मूलं [--] / गाथा ||३२,,,|| निर्युक्ति: [३२१-३२७] | करेइति निच्छूढो अच्छति समंतओ पलोएंतो, जाव अही आगतो, उडिया सहसा सत्रे, सो अही णेहिं मारिओ, | अण्णमुदुत्तरस मेरंडसप्पो आगतो, भेरुंडो नाम दिवगो, भीया पुणो उट्ठिया, गाए दिगोत्तिकाऊण मुक्को, वलस्स चिंता जाया-अहो सदोसेण जीवा किलेसभागिणो भवति, तम्हा- 'भहएणेव होयचं, पावति मद्दाणि भद्दओ । सविसो |हम्मती सप्पो, भेरुंडो तत्थ मुचति ॥ १॥" एयं चिंततो संबुद्धो पचति । विहरंतो वाणारसिं गओ, उज्जाणं तेंदुयवणं, | तेंदुगं नाम जक्खाययणं, तत्थ गंडीतेंदुगो नाम जक्खो परिवसति, सो तत्थ अणुण्णवेडं ठितो, जक्खो उवसंतो, अण्णो जक्खो अण्णहिं वणे वसति, तत्थवि अण्णे बहू साहूणो ठिया, सो य गंडीजक्खं पुच्छति-ण दीससि ?, पुणाई तेण भणियं-साहुं पज्जुवासामि, तत्थ य तेंदुएण दिट्टो, सोऽवि उवसंतो, सो भणति-ममवि उज्जाणे वहये। १ करोतीति निष्काशितस्तिष्ठति समन्ततः प्रलोकयन् यावदहिरागतः, उत्थिताः सहसा सर्वे, सोऽहिरेतै मारितः, अन्यस्मिन्मुहूर्त्ते भेरुण्डसर्प आगतः, भेरुण्डो नाम दिव्यकः भीताः पुनरुत्थिताः, ज्ञाते दिव्यक इतिकृत्वा मुक्तः, बलस्य चिन्ता जाता - अहो स्वदोषेण जीवाः कुशभागिनो भवन्ति, तस्मान् भद्रफेनैव भाव्यं प्राप्नोति भद्राणि भद्रकः । सविषो हन्यते सर्पों, भेरुण्डस्तत्र मुच्यते ॥ १ ॥ एवं चिन्तयन् संबुद्धः प्रब्रजितः। विहरन् बाणारसीं गतः, उद्यानं तिन्दुकवनं, तिन्दुकं नाम यज्ञायतनं, तत्र गण्डीतिन्दुको नाम यक्षः परिवसति स तत्रानुज्ञाप्य स्थितः, यक्ष उपशान्तः, अन्यो यक्षोऽन्यत्र वने वसति, तत्राप्यन्ये बहवः साधवः स्थिताः, स च गण्डीयक्ष पृच्छति न दृश्यसे ?, पुनस्तेन भणितं साधुं पर्युपासे, तत्र च तिन्दुकेन दर्शितः, सोऽप्युपशान्तः, स भणति - ममाप्युद्याने बहवः Jon Education infamational पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः For Parsons Privat ~212~ janetary org Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-1 / गाथा ||३२,,,|| नियुक्ति: [३२१-३२७] प्रत सूत्रांक ||३२|| उत्तराध्य. साहू ठिया, एहि पासामो, ते गया, तेऽवि समावत्तीए साहुणो विकहमाणा अच्छंति, ततो सो जक्खो इमं भणति- | हरिकेशी 18'इत्थीण कहऽत्थ वट्टइ, जणवयरायकहत्थ वट्टई । पडिगच्छह रम्म तेंदुगं, अइसहसा बहुमुंडिए जणे ॥१॥' अह है बृहद्वृत्तिः यमध्ययतिअण्णया जक्खाययणं कोसलियरायधूया भद्दा नाम पुप्फधूवमादी गहाय अचिरं निग्गया पयाहिणं करेमाणा तं दहण ॥३५६॥ | कालं विगरालं छित्तिकाऊण णिट्ठहति, जक्खेण रुटेण अण्णइटा कया, णीया नीयघरं, आवेसिया भणति ते-णवरं । नम्. १२ मुंचामि जइणं तस्सेव देह, तं च साहति-जहा एईए सो साह ओदूढो, रपणावि जीवउसिकाऊण दिण्णा, महत्तदरियाहिं समं तत्थाणीया, रतिं ताहिं भण्णति-बच पतिसगासंति, पविट्ठा जक्खाययणं, सो पडिम ठिओ णेच्छति, ताहे जक्खोवि इसिसरीरं छाइऊण दिवरूवं दंसेति, पुणो मुणिरूवं, एवं सवरतिं लंबिया, पभाए णेच्छ एत्ति १ साधवः स्थिताः, यावः पश्यावः, ती गती, तेऽपि भवितव्यतया साधवः विकथयन्तस्तिष्ठन्ति, ततः स यक्ष इदं भणति-1 स्त्रीणां कथाऽत्र वर्तते, जनपदराजकथाऽन्न वर्तते । प्रतिगच्छाबो रम्यतेन्दुकं, अतिसहसा वहुर्मुण्डितो जनः ॥ १॥ अथान्यदा यक्षाय-1 तन कौशलिकराजदुहिता भद्रानाम पुष्पधूपादि गृहीत्वाऽर्चयितुं निर्गता प्रदक्षिणां कुर्वती तं दृष्ट्वा कृष्णविकरालं थूत्कृत्य निष्ठीवति,131 यक्षेण रुष्टेनान्याविष्टा कृता, नीता निजगृह, आविष्टा भणति तान्-परं मुश्वामि यद्यनां तस्मायेव दत्त, तच्च कथयति-यथैतथा स साधु- ३५६॥ राशातितः (त्कृतः), रामाऽपि जीववितिकृत्वा दत्ता, महत्तराभिः समं तत्रानीता, रात्रौ ताभिर्मण्यते-त्रज पतिसकाशमिति, प्रविधा यक्षा-18 हायतनं,स प्रतिमा स्थितो नेल्छति,तदा यक्षोऽपि अपिशरीरं छादयित्वा दिव्यरूपं दर्शयति, पुनर्मुनिरूपं,एवं सर्वा रात्रि विडम्पिता,प्रभात नेण्डतीति दीप अनुक्रम [३५९] SamEducatam internatina FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~213~ Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-1 / गाथा ||९|| नियुक्ति: [३२१-३२७] प्रत सूत्रांक ||१|| काऊणं पविसंती सघरं पुरोहिएण राया भणिओ-एसा रिसिभज्जा बंभणाणं कप्पइत्ति, दिण्णा तस्सेव । सो य जण्णे | 18| दिक्खिजिउकामो सा अण्णेण लद्धा, सावि जण्णपत्तित्तिकाऊण दिक्खिया । इत्युक्तः सम्प्रदायोऽवसितश्च नामनिप्पन्न निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनिष्पन्नस्यावसरः, स च सूत्रे सति सम्भवत्यतः सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तथेदम् सोवागकुलसंभूओ, गुणुत्तरधरो मुणी । हरिएस बलो नाम, आसि भिक्खू जिइंदिओ॥१॥ श्वपाका:-चाण्डालास्तेषां कुलम्-अन्वयस्तस्मिन् सम्भूतः-समुत्पन्नः श्वपाककुलसम्भूतः, तकिं तत्कुलोत्पत्त्यनुरूप एवायमुत नेत्याह-गुणेषत्तरा:-प्रधाना गुणोत्तरा:-ज्ञानादयः तान् धारयति गुणोत्तरधरः, पठन्ति च-'अणु-15 |त्तरघरे'त्ति, तत्र न विद्यते उत्तरम्-अन्यत्प्रधानमेषामित्यनुत्तराः, ते च प्रक्रमात्प्रकर्षप्राप्ता ज्ञानादय एव गुणास्तान् धारयत्यनुत्तरधरो, यद्वा अनुत्तरान् गुणान् धारयतीत्यनुत्तरधर इति मयूरव्यंसकादिषु द्रष्टव्यो, मुणति-प्रतिजानीते | सर्वविरतिमिति मुणिः, श्वपाककुलोत्पन्नोऽपि कदाचित्सवासादिनाऽन्यथैव प्रतीतः स्यादत आह-हरिकेशः सर्वत्र हरिकेशतयैव प्रतीतो बलो नाम-बलाभिधानः आसीद्-अभूत् , तस्य च मुनित्वं प्रतिज्ञामात्रेणापि स्यादत आह १ कृत्वा प्रविशन्ती स्वगृहं पुरोहितेन राजा भणितः-एषा ऋषिभार्या ब्राह्मणानां कल्पते इति, दत्ता तस्माये । स च यज्ञे दीयितुकामः साऽन्ये ने न लब्धा, साऽपि यज्ञपनीतिकृत्वा दीक्षिता। 000-- दीप अनुक्रम [३६० SamEducatm international For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~214 Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||२|| नियुक्ति: [३२६,,] प्रत सूत्रांक ||२|| उत्तराध्य. भिक्खूति भिनत्ति-यथाप्रतिज्ञातेनानुष्ठानेन क्षुधमष्टविध वा कर्मेति भिक्षुः, अत एव जितानि-वशीकृतानीन्द्रि- हरिकेशीहतियाणि-स्पर्शनादीन्यनेनेति जितेन्द्रिय इति सूत्रार्थः ॥ तथा यमध्ययइरिएसणभासाए, उच्चारसमिईसु य । जओ आयाणणिक्खेिवे, संजओ सुसमाहिओ ॥२॥ ॥३५७॥ " ईरणमीयो,एष्यत इत्येपणा अनयोर्द्वन्द्वस्ततस्ताभ्यां सहिता भाष्यत इति भाषा ईर्यपणाभाषेति मध्यपदलोपी नम्. १२ समासः, तयां, तथा उच्चारं-पुरीपपरिष्ठापनमपीहोचार उक्तः, प्रश्रवणपरिष्ठापनोपलक्षणं चैतत् , तद्विषया समितिःदासम्यग्गमनं, तत्र सम्यक्प्रवर्तनमितियावत् , उच्चारसमितिः, तस्यां च, यतत इति यतो-यत्नवान् , तथा आदानंद च-ग्रहणं पीठफलकादेनिक्षेपश्च-स्थापनं तस्यैव आदाननिक्षेपं, तत इहापि चकारानुवृत्तेस्तस्मिंश्च, इह च 'उच्चारसमिएसु'त्ति एकत्वेऽपि बहुवचनं सूत्रत्वात् , समितिशब्दश्च मध्यव्यवस्थितो डमरुकमणिरिवाद्यन्तयोरपि सम्बध्यते, ततश्च ईयाँसमितावेषणासमिती भापासमितावादाननिक्षेपसमिताविति योज्यं, यद्वा ईर्येपणाभाषोच्चारसमितिष्विमासेकमेव पदं, 'भासाए' इति च एकारोऽलाक्षणिकः, स चैर्य कीरगित्याह-संयतः-संयमान्वितः सुसमाहितःसुष्टुसमाधिमानिति सूत्रार्थः ॥ तथा मणगुत्तो वयगुत्तो, कायगुत्तो जिइंदिओ। भिक्खडा भइजमि, जन्नवाडमुवडिओ ॥३॥ मनोगुप्त्या-मनोनियन्त्रणात्मिकया गुप्तः-संवृतो मनोगुप्तो, मध्यपदलोपी समासः, मनो गुप्तमस्खेति वा मनोगुप्तः, दीप अनुक्रम [३६१] CCASE ॥३५७॥ Medical For a t पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~215 Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||३|| नियुक्ति: [३२७...] 2-% % %25 प्रत सूत्रांक ||३|| आहिताभ्यादित्वाच गुप्तशब्दस्य परनिपातः, एवं वाग्गुप्तो-निरुद्धवानसरः, कायगुप्सः असत्कायक्रिया विकलो, जितेन्द्रियः प्राग्वत्, पुनरुपादानमस्य कादाचित्कत्वनिराकरणार्थमतिशयख्यापनार्थं वा, 'भिक्षार्थ' भिक्षानिमित्तं, न तु निष्प्रयोजनमेष, निष्प्रयोजनगमनस्यागमे निषिद्धत्वात् , 'बंभइजंमि'त्ति ब्रह्मणां-बामणानामिज्या-यजनं यस्मिन् सोऽयं ब्रसेज्यस्तस्मिन्, 'जण्णवार्ड'ति यज्ञवाटे यज्ञपाटे वा 'उपस्थितः' प्राप्त इति सूत्रार्थः ॥ तं च तत्रा[ऽऽयान्तमवलोक्य तत्रत्यलोका यदकुवस्तदाह तं पासिऊणमिळतं, तवेण परिसोसियं । पंतोवहिउवगरणं, उवहसंति अणारिया ॥४॥ 'त'मिति बलनामानं मुनि 'पासिऊर्ण'ति दृष्ट्वा-निरीक्ष्य 'एजंत'न्ति आयान्तमागच्छन्तं तपसा-पठाष्टमादि-. रूपेण परि-समन्ताच्छोषितम्-अपचितीकृतमांसशोणितं कृशीकृतमितियावत् परिशोषितं, तथा प्रान्तं-जीर्णमलिनत्वादिभिरसारमुपधिः-वर्याकल्पादिः स एव च उपकरणं-धर्मशरीरोपष्टम्भहेतुरस्येति प्रान्तोपध्युपकरणस्तं, यद्वोपधिः स एवोपकरणम्-औपग्रहिकं, द्वन्द्वगर्भश्च बहुव्रीहिः, 'उबहसंति'त्ति उपहसन्ति आर्याः-उक्तनिरुक्ता न तथा & अनार्याः, यद्वा अनार्या-म्लेच्छाः, ततश्च साधुनिन्दादिना अनार्या इच अनार्या इति सूत्रार्थः ॥ कथं पुनरनार्याः ।, कथं चोपहसितयन्तस्ते ? इत्याह___जाइमयं पडिथद्धा, हिंसगा अजिइंदिया। अवभचारिणो वाला, इमं वयणमब्यवी ॥५॥ दीप अनुक्रम [३६२] A 5%85%20-%2-% E SamEditatonmumational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~216 Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥६॥ दीप अनुक्रम [३६५ ] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ||३५८|| [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||६|| अध्ययनं [१२], निर्युक्तिः [३२७...] करे आगच्छई दित्तरुवे ?, काले विकराले फुकनासे । ओमचेलए सुपिसायभूए, संकरसं परिहरिय कंठे ॥ ६ ॥ जातिमदो-जातिदप्पों यदुत ब्राह्मणा वयमिति तेन प्रतिस्तब्धाः पाठान्तरतः प्रतिबद्धा या ये ते तथा, 'हिंसकाः' प्राण्युपमई कारिणः 'अजितेन्द्रिया' न वशीकृतस्पर्शनादयोऽत एवात्रस-मैथुनं तच्चरितुं -आसेवितुं शीलं धम्मों वा येषां तेऽमी अब्रह्मचारिणो, वर्ण्यते हि तन्मते मैथुनमपि - 'धम्र्म्मार्थ पुत्रकामस्य, खदारेष्वधिकारिणः । ऋतुकाले विधानेन, तत्र दोषो न विद्यते ॥ १ ॥' तथा 'अपुत्रस्य गतिर्नास्तीत्यादि, अत एव वाला इव बालक्रीडितानुकारिष्यग्निहोत्रादिषु तत्प्रवृत्तेः उक्तं हि केनचिद्-"अग्निहोत्रादिकं कर्म, बालक्रीडेति लक्ष्यते" ईदृशास्ते किमित्याह-'इदं' वक्ष्यमाणलक्षणं 'वचनं' चचः 'अब्बवित्ति आर्यत्वाद्वचनव्यत्ययेन अब्रुवन्—उक्तवन्तः । किं तदित्याह'कयरे'त्ति कतरः, एकारस्तु प्राकृतत्वात्, तथा च तलक्षणं 'ए होति अयारंते' इत्यादि, एवमन्यत्रापि, आगच्छति - आयाति, पठ्यते च-'को रे आगच्छइ' त्ति, ते ह्यन्योऽन्यमाहुः कोऽयमीदृक् 'रे' इति लघोरामन्त्रणं साक्षेपवचनेषु च दृश्यते, 'दित्सरूवे 'ति दीसं रूपमस्येति दीप्तरूपः, दीप्तवचनं त्वतिबीभत्सोपलक्षकम्, अत्यन्तदाहिषु स्फोटकेषु शीतलकव्यपदेशयत्, विकृततया वा दुर्दर्शमिति दीसमित्र दीसमुच्यते, कालो वर्णतो विकरालो दन्तुरतादिना भयानकः पिशाचयत् स एव विकरालकः, 'फोक' त्ति देशीपदं, ततश्च फोका अग्रे स्थूलोन्नता च नासाऽस्येति फोक - For Parsons Private Onl हरिकेशी यमध्यय ~217~ नम्. १२ ॥२५८॥ janetary org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [--] / गाथा ||६|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||६|| CRACK नासः, अवमानि-असाराणि लघुत्वजीर्णत्वादिना चेलानि-वस्त्राण्यस्येत्यवमचेलकः, पांशुना-रजसा पिशाचवद्धतो-जातः पांशुपिशाचभूतः, गमकत्वात्समासः, पिशाचो हि लौकिकानां दीर्घश्मश्रुनखरोमा पुनश्च पांशुभिः समविध्वस्त इष्टः, ततः सोऽपि निष्परिकर्मतया रजोदिग्धदेहतया चैवमुच्यते, 'संकरे ति सङ्करः, स चेह प्रस्तावात्तृणभस्मगोमयागारादिमीलक उक्करुडिकेतियावत् तत्र दुष्यं-वस्त्रं सङ्करदुष्यं, तत्र हि यदत्यन्तनिकृष्टं निरुपयोगि तल्लोकैरुत्सृज्यते, ततस्तत्प्रायमन्यदपि तथोक्तं, यद्वा उज्झितधर्मकमेवासौ गृह्णातीत्येवमभिधानं, 'परिहरियत्ति परिवृत्त्य, निक्षिप्येत्यर्थः, क ?-'कण्ठे' गले, स ह्यनिक्षिप्तोपकरण इति स्वमुपधिमुपादायैव भ्राम्यति, अत्र कण्ठैकपावैः कण्टशब्द इति कण्ठे परिवृत्त्येत्युच्यत इति सूत्रद्वयार्थः । इत्थं दूरादागच्छन्नुक्तः, सन्निकृष्टं चैनं किमूचुरित्याह कयरे तुम इय अदंसणिज्जे?, काए व आसा इहमागओऽसि?। ओमचेलगा पंसुपिसायभूया, गच्छ क्खलाहि किमिहं ठिओऽसि ॥७॥ कतरस्त्वं, पाठान्तरश्च-कोरे त्वम् , अधिक्षेपे रेशब्दः 'इती' सेवमदर्शनीयो-द्रष्टुमनहः, 'कया वा' किंरूपया वा ?, 8/ आसा इहमागओऽसित्ति 'अचां सन्धिलोपौ बहुल'मितिवचनादेकारलोपो, मकारश्चागमिकः, तत आशयाहवाञ्छया 'इह' अस्मिन्यज्ञपट्टके आगतः-प्राप्तोऽसि-भवसि, अवमचेलकः पांसुपिशाचभूत इति च प्राग्वत्, पुनरहै|नयोरुपादानमत्यन्ताधिक्षेपदर्शनार्थ, गच्छ-प्रत्रज, प्रक्रमादितो यज्ञवाटकात्, 'खलाहित्ति देशीपदमपसरेत्यस्यार्थे दीप अनुक्रम [३६५] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~218~ Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||७|| नियुक्ति: [३२७...] बृहद्वृत्तिः ॥३५९॥ प्रत सूत्रांक उत्तराध्य. वर्त्तते, ततोऽयमर्थः-अस्मदृष्टिपथादपसर, तथा किमिह स्थितोऽसि त्वं ?, नैवेह त्वया स्थातव्यमिति भाव इति | हरिकेशी। सूत्रार्थः ॥ एवमधिक्षिप्तेऽपि तस्मिन् मुनी प्रशमपरतया किञ्चिदप्यजल्पति तत्सान्निध्यकारी गण्डीतिन्दुकयक्षो यद यमध्ययचेष्टत तदाहजक्खो तहिं तिदुपरुक्खवासी, अणुकंपओ तस्स महामुणिरस । नम्. १२ पच्छायइत्ता नियगं सरीरं, इमाई वयणाई उदाहरित्था ॥ ८॥ यक्षो-प्यन्तरविशेषः, तस्मिन् अबसर इति गम्यते, तिन्दुको नाम वृक्षस्तद्वासी, तथा च सम्प्रदाया-तस्स तिदुगवणस्स मज्झे महंतो तिदुगरुक्खो, तहिं सो वसति, तस्सेव हेट्ठा चेइयं, जत्थ सो साहू चिट्ठति । 'अणुकं-13 पत्ति अनुशब्दोऽनुरूपार्थे ततश्चानुरूपं कम्पते-चेष्टत इत्यनुकम्पक:-अनुरूपक्रियाप्रवृत्तिः, कस्सेत्साह-'तस्य' हरिकेशवलस्य 'महामुनेः' प्रशस्थतपखिनः 'प्रच्छाध' प्रकर्षणात्य निजकम्-आत्मीयं शरीरं, कोऽभिप्रायः ?-तप- खिशरीर एवाविश्य स्खयमनुपलक्ष्यः सन्निमानि-वक्ष्यमाणानि 'वचनानि' वांसि 'उदाहरित्य'त्ति उदाहार्षीदुदाहतवानित्यर्थः, इति सूत्रार्थः ।। कानि पुनस्तानि !, इत्याह | ॥३५९॥ समणो अहं संजउ बंभयारी, विरओ धणपयणपरिग्गहाओ। परप्पवित्तस्स उ भिक्खकाले, अन्नस्स अट्ठा इहमागओमि ॥९॥ 2-58-52-53-52-5352-5*-%AR ||७|| दीप अनुक्रम [३६६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~219 Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥१०॥ दीप अनुक्रम [३६९] Jan Education intemation [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१०|| निर्युक्तिः [३२७...] अध्ययनं [१२], वियरिज खज्जइ भुजई य, अन्नं पनूयं भवयाणमेयं । जाणाहि मे जायणजीविणुत्ति, सेसावसेसं लहओ तवस्सी ॥ १० ॥ श्रमणो-मुनिः 'अहमित्यात्मनिर्देशः, किमभिधानत एवेत्याशङ्कयाह- सम्यग् यतः संयतः - असद्व्यापारेभ्य उपरतः, अत एव च ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यवान्, तथा विरतो निवृत्तः, कुतो ?-धनं च पचनं च परिग्रहश्च धनपचनपरिग्रहमिति समाहारः तस्मात्, तत्र धनं चतुष्पदादि पचनमाहारनिष्पादनं परिग्रहो द्रव्यादिषु मूर्च्छा, अत एव च परस्मै प्रवृत्तंपरैः खार्थ निष्पादितत्वेन परप्रवृत्तं तस्य तुरवधारणे, ततः परप्रवृत्तस्यैव, न तु मदर्थं साधितस्येति भावः, 'भिक्षाकाले' भिक्षाप्रस्तावे, कदाचिदकालोऽयं ब्रूयादित्येवमुक्तं, 'अन्नस्य' अशनस्य 'अटु'त्ति सूत्रत्वादर्थाय भोजनार्थमिति भावः, 'इह' अस्मिन् यज्ञवाटके आगतोऽस्मि, अनेन यदुक्तं-कतर त्वं किमिहागतोऽसि ?, तत्प्रतिवचनमुक्तम्, एवमुक्ते च ते कदाचिदभिदध्युः - नेह किञ्चित् कस्मैचिद्दीयते न वा देयमस्त्यत आह- 'वितीर्यते' दीयते दीनानाथा| दिभ्यः खाद्यते खण्डखाद्यादि, भुज्यते च भक्तसूपादि, अद्यत इत्यन्नं स सर्वमपि सामान्येनोच्यते, तदप्यल्पमेव स्वादत आह-'प्रभूतं' बहु प्रभूतमपि परकीयमेव स्यात्, अत आह- 'भक्तां' युष्माकमेव सम्बन्धि 'एतदिति प्रत्यक्षं, तथा च 'जानीत' अवगच्छत 'मे'त्ति सूत्रत्वान्मां 'जायणजीविणोति याचनेन जीवनं प्राणधारणमस्येति याचन For Parana Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~220~ Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||१०|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||१०|| उत्तराध्य. जीवनं, आर्षत्वादिकारः, पठ्यते च-'जायणजीवणोत्ति, इतिशब्दः स्वरूपपरामर्शकः, तत एवंखरूपं, यतश्चैवमतो हरिकेशी * मह्यमपि ददध्वमिति भावः, कदाचिदुत्कृष्टमेवासौ याचत इति तेषामाशयः स्यादत आह, अथवा जानीत मां याचबृहद्वृत्तिः यमध्ययनजीविनं-याचनेन जीवनशीलं, द्वितीयार्थे षष्ठी, पाठान्तरे तु प्रथमा, 'इती'त्यस्माद्धेतोः, किमित्याह-शेषावशेषम्उद्धरितस्याप्युद्धरितम् , अन्तप्रान्तमित्यर्थः, लभतां प्राप्नोतु, तपखी-यतिराको वा भवदभिप्रायेण, अनेनात्मानं नम्. १२ निर्शितीति सूत्रद्वयार्थः । एवं यक्षेणोक्ते यज्ञवाटवासिनः प्राहु: उवक्खई भोयण माहणाणं, अत्तट्टियं सिद्धमिहेगपक्खं । न ऊ वयं एरिसमन्नपाणं, दाहामु तुझं किमिहं ठिओऽसि ॥११॥ 'उपस्कृतं' लवणवेसवारादिसंस्कृतं भोयण'त्ति भोजनं माहनानां-ब्राह्मणानां आत्मनोऽर्थः आत्मार्थस्तस्मिन् |भवमात्मार्थिकं, ब्राह्मणैरप्यात्मनैव भोज्यं न त्यन्यस्मै देयं, किमिति ?, यतः सिद्धं-निष्पन्नं 'इह' अस्मिन् यज्ञे एकः तापक्षो-ब्राह्मणलक्षणो यस्य तदेकपक्षं, किमुक्तं भवति ?-यदस्मिन्नपस्क्रियते न तब्राह्मणव्यतिरिक्तायान्यस्मै दीयते,||३६०॥ विशेषतस्तु शुद्राय, यत उक्तम्-"न शद्राय मतिं दद्यानोच्छिष्टं न हविः कृतम् । न चास्योपदिशेद् धर्म, न चास्य | व्रतमादिशेत् ॥१॥" यतश्चैवमतो 'न तु' नैव वयमीरशमुक्तरूपं अन्नं च-ओदनादि पानं च-द्राक्षापानाद्य-18I दीप अनुक्रम [३६९] Furammarwata tiwand mariangtaram.org पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~221 Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [-1 / गाथा ||११|| नियुक्ति: [३२७...] - प्रत सूत्रांक ||१२|| - पानं 'दाहामो ति दास्यामः 'तुझं ति तुभ्यं, किमिह स्थितोऽसि ।, नैवेहावस्थितावपि तव किञ्चिदिति भाव इति । सूत्रार्थः ॥ यक्ष आह थलेसु बीयाई वयंति कासया, तहेव निम्नेसु य आसंसाए। एपाइ सद्धाइ दलाह मजलं, आराहए पुण्णमिणं खु खित्तं ॥१२॥ 'स्थलेषु' जलावस्थितिविरहितेषूचभूभागेषु 'वीजानि' गोधूमशाल्यादीनि 'वपन्ति' रोपयन्ति 'कासग'त्ति कर्षकाः कृषीवलाः, 'तथैव' यथोचस्थलेप्येवमेव 'निम्नेषु च'नीचभूभागेषु च 'आससाए'त्ति आशंसया-यद्यत्यन्तप्रवर्षणं भाषि* तदा स्थलेषु फलावाप्तिरथान्यथा तदा निस्रग्वित्येवमभिलाषात्मिकया, एतयेतया-एतदुपमया, कोऽथें: १-उक्त-17 रूपककासातुल्यया 'श्रद्धया वाग्छया 'दलाह'त्ति ददध्वं मां. किमक्तं भवति -यद्यपि भवतां निझोपमत्व-४ बुद्धिरात्मनि मयि तु स्थलतुल्यताधीः तथापि मधमपि दातुमुचितम् , अथ स्वादू-एवं दत्तेऽपि न फलावाप्तिरित्याह-आराहए पुण्णमिणं खु'त्ति खुशब्दस्यावधारणार्थस्य भिन्नक्रमत्वादाराधयेदेव-समन्तात्साधयेदेव, नानान्यथाभावः, 'पुण्यं' शुभमिदं-परिदृश्यमानं क्षेत्रमिव क्षेत्र पुण्यशस्यप्ररोहहेतुतया, आत्मानमेव पात्रभूतमेवमाह, पठ्यते । च-'आराहगा होहिम पुण्णखेत्त'न्ति आराधका-आवर्जका गम्यमानत्वात्पुण्यस्य भवत, अनेन दानफलमाह, कुत एतदित्याह-इदं पुण्यक्षेत्रं-पुण्यप्राप्तिहेतुः क्षेत्रं यत इति गम्यते, इति सूत्रार्थः ॥ यक्षवचनानन्तरं त इदमाहुः -- दीप अनुक्रम [३७१] SamEducatimotimatent For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~222 Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||23|| दीप अनुक्रम [३७२] उत्तराध्य. वृहद्वृत्तिः ॥३६२॥ Education t [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१३|| अध्ययनं [१२], निर्युक्तिः [३२७...] वित्ताणि अहं वियाणि लोए, जहिं पकिन्ना विरुति पुण्णा । जे माहणा जाइविज्जोववेया, ताई तु खिसाई सुपेसलाई ॥ १३ ॥ 'क्षेत्राणी 'ति क्षेत्रोपमान पात्राण्यस्माकं 'विदितानि' ज्ञातानि, वर्तन्त इति गम्यते, 'लोके' जगति 'जहिं'ति वचनव्यत्ययाद्येषु क्षेत्रेषु प्रकीर्णानीव प्रकीर्णानि - दत्तान्यशनादीनि 'विरोहन्ति' जन्मान्तरोपस्थानतः प्रादुर्भवन्ति 'पूर्णानि ' समस्तानि, न तु तथाविधदोषसद्भावतः कानिचिदेव, स्यादेतद् अहमपि तन्मध्यवस्यैवेत्याशङ्कयाह-ये । 'ब्राह्मणा' द्विजाः, तेऽपि न नामत एव, किन्तु जातिश्व-त्राह्मणजातिरूपा विद्या च - चतुर्द्दशविद्यास्थानात्मिका ताभ्याम् 'उववेय'त्ति उपेता-अन्यिता जातिविद्योपेताः, 'ताइं तु'ति तान्येव क्षेत्राणि 'सुपेसलाणि'त्ति सुपेशलं नाम शोभनं प्रीतिकरं वा इति वृद्धाः, ततश्च सुपेरालानि - शोभनानि प्रीतिकराणि वा, न तु भवादृशानि शूद्रजातीनि शूद्रजातित्वादेव वेदादिविद्या वहिष्कृतानीति, यत उक्तम् — “सममत्रोत्रिये दानं द्विगुणं ब्राह्मणत्रुवे । | सहस्रगुणमाचार्ये, अनन्तं वेदपारगे ॥ १ ॥” इति सूत्रार्थः ॥ यक्ष उवाच - कोहो य माणो य वहो य जेसिं, मोसं अदत्तं च परिग्गहं च । ते माहणा जाइविज्जाविहीणा, ताई तु खित्ताई सुपावयाई ॥ १४ ॥ 'ater' रोपः 'arta' गर्वः चशब्दान्मायालोभौ च 'वधश्च' प्राणिघातो 'येषा' मिति प्रक्रमाद्भवतां For Parana Prate ente हरिकेशी यमध्यय नम्. १२ ~223~ ॥३६१॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||१४|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||१४|| ब्राह्मणानां 'मोसं'ति मृषा-अलीकभाषणं 'अदत्तं ति पदेऽपि पदैकदेशस्य दर्शनात्सत्यभामा ससेतिवत् अदपत्तादानमुक्तं, चशब्दान्मैथुनं, 'परिग्रहश्च' गोभूम्यादिस्वीकारः, अस्तीति सर्वत्र गम्यते, 'ते' इति क्रोधाधुपेता यूयं ब्राह्मणा जातिविद्याभ्यां विहीना-रहिता जातिविद्याविहीनाः, क्रियाकर्मविभागेन हि चातुर्वर्ण्यव्यवस्था, यत । उक्तम्-“एकवर्णमिदं सर्व, पूर्वमासीधुधिष्ठिर ! क्रियाकर्मविभागेन, चातुर्वर्ण्य व्यवस्थितम् ॥ १॥ ब्राह्मणो ब्रह्म-4 चर्येण, यथा शिल्पेन शिल्पिकः । अन्यथा नाममात्र स्थादिन्द्रगोपककीटवत् ॥ २॥" न चैवंविधक्रिया ब्रह्मच-8 त्मिका कोपायुपेतेपु तत्त्वतः सम्भयत्यतो न तावजातिसम्भवः, तथा विद्यापि सच्छास्वात्मिका, सच्छास्त्रेषु च । सर्वेष्वहिंसादिपञ्चकमेव वाच्यं, यत उक्तम्-“पञ्चैतानि पवित्राणि, सर्वेषां धर्मचारिणाम् । अहिंसा सत्यमस्तेयं, त्यागो मैथुनवर्जनम् ॥ १॥" तद्युक्तत्वं च तत्तज्ज्ञानादेव भवति, ज्ञानस तु विरतिः फलं रागाधभावश्च, यत उक्तम् WI-"तज्ज्ञानमेव न भवति यस्मिन्नुदिते विभाति रागगणः । तमसः कुतोऽस्ति ? शक्तिर्दिनकरकिरणाग्रतः स्थातुम् ॥१॥" न चैवमन्याद्यारम्भिषु कोपादिमत्सु च भवत्सु विरते रागाधभावस्य च सम्भवोऽस्ति, न च निश्चयनयमतेन फलर18 हितं वस्तु सत् , तथा च निश्चयो यदेवार्थक्रियाकारि तदेव परमार्थसदित्याह, ततः स्थितमेतत्-'ताई तु'त्ति तुरविधारणे भिन्नक्रमश्च, ततश्च तानि भवद्विदितानि ब्राह्मणलक्षणानि क्षेत्राणि सुपापकान्येव, न तु सुपेशलानि, दीप अनुक्रम [३७३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~224 Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||१५|| नियुक्ति: [३२७...] यमध्यय. प्रत सूत्रांक ||१५|| उत्तराध्य. क्रोधाद्युपेतत्वेनातिशयपापहेतुत्वादिति सूत्रार्थः ॥ कदाचित्ते वदेयुः-वेदविद्याविदो वयमत एव च बाबणजातयINपाशित सूत्र हरिकेशीतत्कथं जातिविद्याविहीना इत्युक्तवानसीयाहबृहद्वृत्तिः तुभित्थ भो! भारहरा गिराणं, अटुं न याणाह अहिज वेए। ॥३६॥ उच्चावयाई मुणिणो चरंति, ताई तु खित्ताई सुपेसलाई ॥१५॥ नम्-१२ यूयमत्रेति-लोके 'भो' इत्यामवणे भारं धरन्तीति भारधराः, पाठान्तरतो वा-'भारवहा' वा, कासां ?-गिरा | दिवाचा,प्रक्रमाद्वेदसम्बन्धिनीनाम् , इह च भारस्तासां भूयस्त्वमेव, किमिति भारधरा भारवहा वेति उच्यते, यतोऽयम्-18 अभिधेयं न जानीथ-नावबुध्यध्वे ।, 'अहिज'त्ति अपेर्गम्यमानत्वादधीत्यापि 'वेदान्' ऋग्वेदादीन् , तथाहि-'आत्मा दावा रेज्ञातव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" तथा "कर्मभिर्मृत्युमृषयो निषेदुः, प्रजावन्तो द्रविणमन्विच्छमानाः, अथापरं कर्मभ्योऽमृतत्वमानशुः,-परेण नाकं निहितं गुहायां, विभाजते यद्यतयो विशन्ति । वेदाहमेनं पुरुषं महान्तं, तमेव विदित्वा अमृतत्वमेति ॥ १ ॥ नान्यः पन्थाः अयनाये' त्यादिवचनानां यद्यर्थवेत्तारः स्युस्तत्किमित्थं यागादि कुर्षीरन् ?, ततस्तत्त्वतो वेदविद्याविदो भवन्तो न भवन्ति, तत्कथं जातिविद्यासम्पन्नत्वेन क्षेत्रभूताः स्युःशा कानि तर्हि भवदभिप्रायेण क्षेत्राणीत्याह-'उच्चावयाईति उच्चावचानि-उत्तमाधमानि मुनयश्चरन्ति-भिक्षानिमित्तं । पापयटान्त गृहाण, ये इति गम्यते, न तु भवन्त इव पचनाद्यारम्भप्रवृत्तयः, त एव परमार्थतो वेदार्थ विदन्ति, तत्रापि दीप अनुक्रम [३७४] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~225 Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||१६|| नियुक्ति : [३२७...] प्रत सूत्रांक ||१६|| भैक्षवृत्तेरेव समर्थितत्वात् , तथा च वेदानुवादिनः-"चरेद् माधुकरी वृत्तिमपि म्लेच्छकुलादपि । एकानं नैव मुजीत, बृहस्पतिसमादपि ॥१॥" यदिवोच्चावचानि-विकृष्टाविकृष्टतया नानाविधानि, तपांसीति गम्यते, उच्चव्रतानि वा शेषत्रतापेक्षया महाप्रतानि ये मुनयश्चरन्ति-आसेवन्ते, न तु यूयमिवाजितेन्द्रिया अशीला वा, तान्येव मुनिलक्षगानि क्षेत्राणि सुपेशलानीति प्राग्वदिति सूत्रार्थः । इत्थमध्यापर्क यक्षेण निर्मुखीकृतमवलोक्य तच्छात्राः प्राहुः अज्झावयाणं पडिकूलभासी, पभाससे कि सगासि अहं। अवि एवं विणस्सउ अन्नपाणं, न य णं दाहामु तुमं नियंठा ! ॥ १६ ॥ __ अध्यापयन्ति-पाठयन्तीत्यध्यापकाः-उपाध्यायास्तेषां प्रतिकूल-प्रतिलोमं भाषते वक्तीत्येवंशीलः प्रतिकूलभाषी|3| सन् प्रकर्षण भाषसे-भूपे प्रभाषसे, किमिति क्षेपे, 'चरित्यक्षमायां, ततश्च धिम् भवन्तं न वयं क्षमामहे यदित्य भवान् ब्रूते सकाशे-समीपे 'अम्ह'ति अस्माकम् , अपिः सम्भावनाया, 'एतत्' परिदृश्यमानं 'विनश्यतु' कथित-|| त्यादिना खरूपहानिमाप्नोतु 'अन्नपानम्' ओदनकाधिकादि, 'नच' नैव 'ण'मिति वाक्यालङ्कारे 'दाहामुत्तिदास्या-18 मस्तव हे निर्ग्रन्थ !-निष्किञ्चन !, गुरुप्रत्यनीको हि भवान्, अन्यथा तु कदाचिदनुकम्पया किञ्चिदन्तप्रान्तादि दद्यामोऽपीति भाव इति सूत्रार्थः । यक्ष आह दीप अनुक्रम [३७५] Samsairatnmifinatana For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~226 Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||१७|| नियुक्ति: [३२७...] PCS प्रत सूत्रांक ||१७|| उत्तराध्यसमिईहिं मजसं सुसमाहियस्स, गुत्तीहि गुत्तस्स जिइंदियस्स। हरिकेशीबृहद्वृत्तिः जइ मे न दाहित्य अहेसणिज, किमज जन्नाण लभित्थ लाभं?॥१७॥ यमध्यष॥३६॥ 18 समितिभिः-र्यासमित्यादिभिर्मह्यं सुष्टु समाहिताय-समाधिमते सुसमाहिताय गुप्तिभिः-मनोगुप्त्यादिभिर्गुप्ताय | *नम्. १२ जितेन्द्रियायेति च प्राग्वत्, सर्वत्र च चतुर्थ्यर्थे षष्ठी, 'यदी त्यभ्युपगमे 'में मह्यं 'मझतीत्यस्य व्यवहितत्वात् ४ क्रिया प्रति पुनरुपादानमदुष्टमेव 'न दास्पथ' न वितरिष्यथ, 'अथे'त्युपन्यासे आनन्तर्ये वा, 'एपणीयम्' एपणाविशुद्धमन्नादिकं, किं न किञ्चिदित्यर्थः, 'अज'त्ति अद्य ये यज्ञास्तेषामिदानीमारब्धयज्ञानां, यद्वा 'अजति हे आयौं ! यज्ञानां 'लभित्यत्ति सूत्रत्वाल्लप्स्यध्वे-प्राप्स्यध्वं 'लाभ' पुण्यप्राप्तिरूपं, पात्रदानादेव हि विशिष्टपुण्यावाप्तिः, अन्यत्र तु तथाविधफलाभावेन दीयमानस्य हानिरेव, उक्तं हि-"दधिमधुघृतान्यपात्रे क्षिसानि यथाऽऽशु नाशमुपयान्ति । एवमपात्रे दत्तानि केवलं नाशमुपयान्ती ॥१॥" ति सूत्रार्थः । इत्थं तेनोक्ते यदध्यापकप्रधान आह तदुच्यते के इत्थ खत्ता उवजोइया वा, अज्झावया वा सह खंडिएहिं । एवं खु दंडेण फलेण हंता, कंठमि घिसूण खलिज्ज जो णं ॥१८॥ के 'अत्रे'त्येतस्मिन् स्थाने 'क्षत्राः' क्षत्रियजातयो वर्णसङ्करोत्पन्ना वा तत्कर्मनियुक्ताः 'उवजोइय'त्ति ज्योतिषः दीप अनुक्रम [३७६] W ॥३६॥ SamEducatm international Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~227 Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||१८|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||१८|| के समीपे ये त उपज्योतिषस्त एवोपज्योतिष्काः-अग्निसमीपवर्त्तिनो महानसिका ऋत्विजो वा 'अध्यापकाः' पाठकाः, ते वा उभयत्र वा विकल्पे 'सहेति युक्ताः, कैः ?-'खण्डिकैः' छात्रैः, ये किमित्याह-एन' श्रवणकं 'दण्डेन' वंशयध्यादिना 'फलेन' बिल्लादिना 'हते'ति हत्वा-ताडयित्वा यहा 'दण्डेनेति कूपराभिघातेन 'फलेन' च है मुष्टिप्रहारेणेति वृद्धाः, ततश्च 'कण्ठे' गले 'गृहीत्वा' उपादाय 'खलेज'त्ति स्खलयेयुः-निष्काशयेयुः, 'योति वचनव्यत्ययाये इत्यमेतदभिघाते निष्काशने वा शक्काः, 'णमिति वाक्यालङ्कारे इति सूत्रार्थः ॥ अत्रान्तरे यदभूत्वदाह अज्झावयाणं वयणं सुणित्ता, उद्धाइया तत्थ बह कुमारा। दंडेहि वित्तेहिं कसेहिँ चेव, समागया तं इसि तालयंति ॥१९॥ अध्यापकानाम्-उपाध्यायानाम्, एकत्वेऽपि पूज्यत्वाबहुवचनं, 'वचनम्' उक्तरूपं 'श्रुत्वा' आकर्ण्य 'उद्धाविता दि वेगेन प्रसृताः 'तत्र' यत्रासी मुनिस्तिष्ठति 'बहवः' प्रभूताः 'कुमारा' द्वितीयवयोवर्त्तिनश्छात्रादय इति गम्यते, ते हि क्रीडनकपरा इत्यहो कीडनकमागतमिति रभसतो 'दण्डैः' वंशयष्टयादिभित्रैः-जलजवंशात्मकः 'कशैः' वध्र विकारः, चः समुच्चये, एवेति पूरणे, 'समागताः' सम्प्राप्ता मिलिता वा तमृषि-मुनि 'ताडयन्ति' प्रन्ति, सर्वत्र 18 वर्तमाननिर्देशः प्राग्वत् इति सूत्रार्थः ॥ अस्मिंश्वावसरे दीप अनुक्रम [३७७] MEditUNT For Pro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~228~ Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||२०|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||२०|| उत्तराध्य. रणो तहिं कोसलियस्स धूया, भद्दत्ति नामेण अणिदियंगी। हरिकेशीतं पासिया संजय हम्ममाणं, कुद्धे कुमारे परिनिश्ववेइ ॥२०॥ वृदृत्तिः 'राज्ञों नृपतेस्तत्र-यज्ञवाटे कोशलायां भवः कौशलिकस्तस्य 'धूय'त्ति दुहिता भद्रेति 'नाना'अभिधानेन । यमध्यय॥३६॥ 13 अनिन्दिताङ्गी' कल्याणशरीरा 'त' हरिकेशवलं 'पासिय'त्ति दृष्ट्वा 'सञ्जय'त्ति संयतं तस्यामप्यवस्थायां हिंसादेः नम्. सम्यगुपरतं 'हन्यमानं दण्डादिमिस्ताब्यमानं 'कुद्धान्' कोपवतः 'कुमारान्' उक्तरूपान् 'परिनिर्धापयति' कोपा-2 निविध्यापनात् समन्तात् शीतीकरोति उपशमयतीतियावदिति सूत्रार्थः ॥ सा च तान् परिनिर्वापयन्ती तस्य । माहात्म्यमतिनिःस्पृहतां चाह देवाभिओगेण निओइएणं, दिन्ना मु रण्णा मणसा न झाया। नरिंददेविंदऽभिवंदिएणं, जेणामि वंता इसिणा स एसो॥२१॥ एसो हु सो उग्गतवो महप्पा, जिइंदिओ संजओं बंभयारी। जो मे तया निच्छई दिजमाणी, पिउणा सयं कोसलिएण रपणा ॥२२॥ | ॥२६॥ महाजसो एस महाणुभागो, घोरघओ घोरपरकमोय। मा एवं हीलह अहीलणिजं, मा सब्वे तेएण भे निदहिजा ॥२३॥ दीप अनुक्रम [३७९] 44SSES SamEducatonintamaront Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~229 Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२१ -२३|| दीप अनुक्रम [३८० -३८२] Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१२], मूलं [--] / गाथा ||२१-२३ || निर्युक्ति: [३२७...] देवस्य - अमरस्याभियोगो - बलात्कारो देवाभियोगस्तेन 'नियोजितेन' व्यापारितेन न त्वप्रियेतिकृत्वा 'दिन्ना मुत्ति दत्ताऽस्मि, अहं यस्मै इति गम्यते, दत्ता च केन ?- राज्ञा-प्रक्रमात्कौशलिकेन, तथापि 'मणस'त्ति अपेर्गम्यमानत्वान्मनसाऽपि - चित्तेनापि 'न ध्याता' न चिन्तिता नाभिलषितेतियावत्, प्रक्रमादेतेन मुनिना, कीदृशेन ?नरेन्द्राश्च नृपतयो देवेन्द्राश्थ - शक्रादयो नरेन्द्रदेवेन्द्रास्तैरभि - आभिमुख्येन वन्दितः - स्तुतो नरेन्द्रदेवेन्द्राभिवन्दितस्तेन, अनभिध्याताऽपि नृपोपरोधतः स्वीकृता स्यादत आह-येनास्म्यहं 'वान्ता' त्यक्ता 'ऋषिणा' मुनिना, स एष युष्माभिर्यः कदर्थयितुमारब्धः, ततो न कदर्थयितुमुचित इति भावः, पुनरिममेवार्थ समर्थयितुमाह-'एसो हु सोत्ति, एष एव स न मनागप्यत्र संशयः, उम्र - उत्कटं दारुणं वा कर्म्मशत्रून् प्रति तपः - अनशनाद्यस्येति उग्रतपाः, अत एव महान् प्रशस्यो विशिष्टवीर्योल्लासत आत्मा अस्येति महात्मा, जितेन्द्रियः संयतो ( ग्रं० ९००० ) ब्रह्मचारी च प्राग्वत् स इति क ? इत्याह-यो 'मि'ति मां 'तदा' तस्मिन् विवक्षितसमये 'नेच्छति' नाभिलपति 'दीयमानां' निसृज्यमानां केन ?- 'पित्रा' जनकेन 'स्वयं' आत्मना, न तु प्रधानप्रेषणादिना, तेनापि कीदृशा १कौशलिकेन राज्ञा, न त्वितरजनसाधारणेन, तदनेन विभूतावपि निःस्पृहत्वमुक्तं, पुनस्तन्माहात्म्यमाह-- 'महायसा' अपरिमितकीर्त्तिः 'एप' प्रत्यक्षो मुनिर्महानुभागः -- अतिशयाचिन्त्यशक्तिः, पाठान्तरतो महानुभावो बा, तत्र चानुभावः - शापानुग्रहसामर्थ्यं, 'घोरत्रतो' धृतात्यन्तदुर्द्धरमहाव्रतः 'घोरपराक्रमश्च' कषायादिजयं प्रति रौ For Parana Privat org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~230~ Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-1 / गाथा ||२१-२३|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ॥२६॥ ||२१ -२३|| उत्तराध्य. द्रसामध्यों, यतोऽयमीक ततः किमित्याह-मा' इति निषेधे 'एन' यति 'हीलयत' अवधूतं पश्यत 'अहील- हरिकेशीनीयम्' अवज्ञातुमनुचितं, किमित्यत आह-मा सर्वान्-समस्तांस्तेजसा-तपोमाहात्म्येन 'भे' भवतो निर्धाक्षीद् यमध्यय४ा भस्मसात्कार्षीद् , अयं हि हीलितो यदि कदाचिद्रुप्येत्तदा संघ भस्मसादेव कुर्यादिति भाव इति सूत्रत्रयार्थः ॥ अत्रान्तरे मा भूदेतस्या वचनं मृषेति यद्यक्षः कृतवांस्तदाह नम्. १२ एयाई तीसे वयणाई सुचा, पत्तीइ भहाइ सभासिया। इसिस्स वेयावडियट्टयाए, जक्खा कुमारे विणिवारयति ॥ २४ ॥ ते घोररूवा ठिअ अंतलिक्खे, असुरा तर्हि तं जणं तालयंति। ते भिन्नदेहे रुहिरं वमंते, पासित्तु भद्दा इणमाहु भुजो ॥ २५ ॥ 'एतानि' अनन्तरोक्तानि 'तस्याः' अनन्तरोक्तायाः 'वचनानि' भाषितानि 'श्रुत्वा' निशम्य 'पल्याः' यज्ञवाटकाप्राधिपतेः सोमदेवपुरोहितस्य, तस्यैव वा मुनेरिति गम्यते, 'भद्राया' भद्राभिधानायाः सुभाषितानि' सूक्तानि वच नानीति योज्यते, ऋषेः-तस्यैव तपखिनः 'वेयावडियठ्ठयाए'त्ति सूत्रत्वाद्वैयावृत्त्यार्थमेतत् प्रत्यनीकनिवारणलक्षणे||॥६५॥ प्रयोजने व्यावृत्ता भवाम इत्येवमर्थ यक्षाः, यक्षपरिवारस्य बहुत्वात् बहुवचनं, कुमारान् प्रक्रमात्तानेवोपहन्तॄन् 'विनिपातयन्ति' विविधं नितरां पातयन्ति-भूमौ विलोलयन्ति, पठ्यते च-'विणिवारयतित्ति विशेषेणोपहति दीप अनुक्रम [३८०-३८२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~231 Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक |२४ -२५|| दीप अनुक्रम [३८३ -३८४] Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१२], मूलं [--] / गाथा ||२४-२५|| निर्युक्ति: [३२७...] कुर्वतो निराकुर्वन्ति, तथा 'ते' इति यक्षाः 'घोररूपा' रौद्राकारधारिणः 'ठिय'त्ति स्थिताः 'अन्तरिक्षे' आकाशे 'असुरा' आसुरभावान्वितत्वात् त एव यक्षाः 'तस्मिन्' यज्ञवाटे 'तम्' उपसर्गकारिणं 'जनं' छात्रलोकं 'ताडयन्ति' नन्ति, ततस्तान् कुमारान् भिन्ना विदारिताः प्रक्रमा यक्षप्रहारैर्देहाः-शरीराणि येषां ते भिन्नदेहास्तान् रुधिरं शोणितं वमतः- उद्विरतः 'पासित्त'त्ति दृष्ट्वा 'भद्रा' सैव कौशलिकराजदुहिता 'इदं' वक्ष्यमाणं 'आहु' ति वचनव्यत्ययेनाहब्रूते 'भूयः' पुनरिति सूत्रद्वयार्थः ॥ किं तदित्याह - गिरिं नहिं खणह, अयं दंतेहिं खायह । जायतेयं पायेहिं हणह जे भिक्खु अवमन ॥ २६ ॥ आसीबिसो जग्गतवो महेसी, घोरव्यओ घोरपरक्कमो य। अगणिं व पक्वंद पयंगसेणा, जे भिक्खु भक्तकाले बहेह सीसेण एवं सरणं वेह, समागया सब्वजणेण तुम्हे । जइ इच्छह जीवियं वा धणं वा, लोगंपि एसो कुविओ डहिज्जा ॥ २८ ॥ 'गिरिं' पर्वतं 'नखैः' कररुहैः 'खनथ' विदारयथ, इह च मुख्यखनन क्रियाद्यसम्भवादिववतिमन्तरेणाप्युपमार्थो गम्यते, ततश्च खनथेव खनथ, 'अयो' लोहं 'दन्तैः' दशनैः खादथेव खादथ, जाततेजसम् - अमिं पादैः चरणैर्हथेव हथ, ताडयथेत्यर्थः, ये वयं किं कुर्मः इत्याह-ये यूयं भिक्षु प्रक्रमादेनं 'अवमन्नह'त्ति अवमन्यध्ये- अवधीरयथ, अनर्थफलत्वात् भिक्ष्वपमानस्येति भावः, कथमिदमित्याह – आस्यो - दंष्ट्रास्तासु विषमस्येत्यासीविषः --आसीविपलब्धि For Parana Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 232~ Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||२६-२८|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||२६ -२८|| उत्तराध्य. मान्, शापानुग्रहसमर्थ इत्यर्थः, यद्वा आसीविष इव आसीविषः, यथा हि तमत्यन्तमवजानानो मृत्युमेषाप्नोति हरिकेशी एवमेनमपि मुनिमवमन्यमानानामवश्यं भावि मरणमित्याशयः, कुतः पुनरयमेवंविधो ?, यतः-उग्रतपाः प्राग्वत् , बृहद्वृत्तिः यमध्यय'महेसित्ति महान–बृहन् शेषखर्गाद्यपेक्षया मोक्षस्तमिच्छति-अभिलपतीति महदेषी महर्षिा , घोरत्रतो घोर॥३६॥ पराक्रमश्च पूर्ववत् , यतश्चैवमतः 'अगणि वत्ति अग्निं-ज्वलनं, वाशब्द इवार्थो भिन्नक्रमश्च, ततः 'पक्खंद'त्ति प्रस्क- नम्.१२ न्दथेव-आक्रामथेव, केव ?-पतंगसेण'त्ति उपमार्थस्य गम्यमानत्वात्पतङ्गानां-शलभाना सेनेव सेना-महती सन्ततिः पतङ्गसेना तद्वत् , यथा हि असौ तत्र निपतन्त्याशु पातमामोत्येवं भवन्तोऽपीति भावः, ये यूयमनुकम्पितं | भिक्षु भिक्षुकं 'भक्तकाले' भोजनसमये, तत्र दीनादेवश्यं देयमिति शिष्टसमयो यूयं तु न केवलं न यच्छत किन्तु । तत्रापि 'वधह'त्ति विध्यथ-ताडयथ, अयमाशयो-यतोऽयमासीविषादिविशेषणान्वितो मुनिरतो गिरिनखखननादिप्रायमेव यदेनं भक्तकालेऽपि भक्कार्थिनमित्थं विध्यथ । अथ खकृत्योपदेशमाह-'शीर्षण' शिरसा 'एनं' मुनि 'शरणार्थ रक्षणार्थमाश्रयमुपेत-अभ्युपगच्छत, किमुक्तं भवति ?-शिरःप्रणामपूर्वकमयमेवास्माकं शरणमिति प्रपद्यध्वं, 'समागताः' सम्मिलिताः 'सर्वजनेन' समस्तलोकेन, सहाथै तृतीया. 'ययं भवन्तो. यदीच्छत-अभिलपत 'जीवि- ३६६॥ मातं' प्राणधारणात्मकं धनं वा द्रव्यं, न तस्मिन् कुपिते जीवितव्यादिरक्षाक्षममन्यच्छरणमस्ति, किमित्येवमत आह|'लोकमपि' भुवनमप्येष कुपितः-क्रुद्धो 'दहेद' भस्मसात्कुर्यात् , तथा च वाचक:-"कल्पान्तोमानलवत्प्रज्वलन । 1900 दीप अनुक्रम [३८५ -३८७] SamEducatimotimatent womjangtaram.orm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~233~ Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-1 / गाथा ||२६-२८|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||२६ -२८|| तेजसैकतस्तेषाम् ॥१॥" तथा लौकिका अप्याहुः-"न तत् दूरं यदथेषु, यवाग्नी यच मारुते । थिये च रुधिरप्रासे, साधौ च कृतनिश्चये ॥१॥" इति सूत्रत्रयार्थः ॥ सम्प्रति तत्पतिस्तान् यादृशान् ददर्श दृष्ट्वा च यदचेष्टत तदाह अवहेडियपिट्टिसउत्तमंगे, पसारियाबाहुअकम्मचिट्टे । निम्भेरियच्छे कहिरं वर्मते, उहुंमुहे निग्गयजीहनिसे ॥२९॥ ते पासिया खंडिय कट्ठभूए, विमणो विसन्नो अह माहणो सो। इसिं पसाएर सभारियाओ, हीलं च निंदं च खमाह भते ॥३०॥ 'अवे'त्यधो 'हेडिय'सि हेठितानि-बाधितानि. किमुक्तं भवति ?-अधोनामितानि, पठन्ति च 'आयडिए'त्ति तत्र सूत्रत्वादवकोटितानि-अधस्तादामोटितानि 'पट्टि 'त्ति पृष्ठं यावत् तदभिमुखं वा सन्ति-शोभनान्युत्तमाङ्गानि येषां ते अयद्देठितपृष्ठसदुत्तमाकाः अवकोटितपृष्ठसदुत्तमाझौवा, प्राग्यन्मध्यपदलोपी समासस्तान्, 'पसारियावाहु-14 अकम्मचिट्ठ'त्ति प्रसारिता-विरलीकृता वाहवो-भुजा यैर्येषां वा ते तथा ततस्ते च ते अकर्मचेष्टाश्च-अविद्यमानकर्महेतुब्यापारतया प्रसारितवाडकर्मचेष्टास्तान् , यद्वा क्रियन्त इति कर्माणि-अग्नौ समित्प्रक्षेपणादीनि तद्विपया चेष्टा कर्मचेष्टेह गृह्यते, 'निम्भेरिय'त्ति प्रसारितान्यक्षीणि-लोचनानि येषां ते तथोक्तास्तान् , रुधिरं बमदउद्गिरत् 'उहंमुह'त्ति ऊर्ध्वमुखान्-उन्मुखीभूतवान् , अत एव निर्गतानि-निःसृतानि जिताश्च प्रतीता नेत्राणि दीप अनुक्रम [३८५ -३८७] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~234 Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||२९-३०|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ॥२९ -३०|| च-नयनानि जिह्वानेत्राणि येषां ते तथा तान् , 'तानित्युक्तरूपान् ‘दृष्ट्वा' अवलोक्य 'खंडिय'त्ति आर्षत्वात्सुपो । हरिकेशीलुकि खण्डिकान्-छात्रान् काष्ठभूतान्-अत्यन्तनिश्चेष्टतया काष्ठोपमा विगतमिव विगतं मनः-चित्तमस्येति विमनाः, यमध्ययविपण्णः कथममी प्रवणीभविष्यन्तीति चिन्तया व्याकुलितः 'अथेति दर्शनानन्तरं 'ब्राह्मणो'द्विजातिः 'स' इति । ॥३६७॥ 18 सोमदेवनामा 'ऋषि' तमेव हरिकेशवलनामानं मुनि 'प्रसादयति प्रसत्तिं ग्राहयति, सह भार्यया-पल्या तयैव नम्. भद्राभिधानया वर्तते इति सभार्याकः, कथमित्याह-हीलांच-अवज्ञां निन्दांच-दोषोद्घट्टनं 'खमाह'त्ति क्षमख ४ सहस्ख 'भंतेति' सूत्रद्वयार्थः ॥ पुनः स प्रसादनामेवाह बालेहिं मूढेहिं अयाणएहिं, जं हीलिया तस्स खमाह भंते!। महप्पसाया इसिणो हवंति, न हु मुणी कोचपरा हवंति ॥ ३१॥ बाले:-शिशुभिर्मूढैः-कषायमोहनीयोदयाद्विचित्तता गतैः अत एव चाज्ञैः-हिताहितविवेकविकलैः यदि'त्युपत्र ॥३६७॥ दर्शने 'हीलिताः' अवज्ञाताः 'तस्स'त्ति सूत्रत्वात् तत् 'खमाह'त्ति क्षमध्वं भदन्त !, अनेनैतदाह-यतोऽमी शिशवो मूढा अज्ञानाथ तक्किमेषामुपरि कोपेन ?, यतोऽनुकम्पनीया एवामी, उक्तं च केनचिदू-"आत्मद्रुहममयोद, मूढमु-1 |ज्झितसत्पथम् । सुतरामनुकम्पेत, नरकार्चिष्मदिन्धनम् ॥१॥" किं च-महान् प्रसादः-चित्तप्रसत्तिरूपो येपा ते दीप अनुक्रम [३८८-३८९] mating For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~235 Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||३१|| नियुक्ति: [३२७...] (४३) प्रत सूत्रांक ||३१|| *महाप्रसादा ऋषयः-साधयो भवन्ति, व्यतिरेकमाह-न हुत्ति न पुनर्मुनयो-यतयः 'कोपपराः' क्रोधवशगा। भवन्ति, भिन्नवाक्यत्वाच मुनिग्रहणमदुष्टमेवेति सूत्रार्थः ॥ मुनिराह पुवि च इहि च अणागयं च, मणप्पओसो न में अत्थि कोई । जक्खा हु वेयावडियं करिति, तम्हा हु एए निहया कुमारा ॥ ३२ ॥ 'पुच्विं च'त्ति पूर्व च पुरा इदानीं च-अस्मिन् काले 'अणागयं चेति अनागते च भविष्यत्काले मनःप्रद्वेषः-चित्तानुशयलक्षणोन में ममास्तीत्युपलक्षणत्वादासीद्भविष्यति च, 'कोऽपी'सल्पोऽपि, इह च भाविनि प्रमाणाभावेऽपि ४'अनागतं प्रत्याचक्ष' इति वचनादनागतस्यापि तस्य निपिद्धत्वाच्छृतज्ञानवलतः कालत्रयपरिज्ञानसम्भवाचैवमभिदधानं, पठन्ति च 'पुद्धिं च पच्छा व तहेव मझे' तत्र च पूर्व वा पश्चाद्वेति विहेठनकालापेक्षं तथैव मध्ये विहेठन काल एव, न च कुमारावहेठनादिदर्शनात्प्रत्यक्षविरुद्धता शङ्कनीया, 'यक्षा' देवविशेषा 'हुरिति यस्माद्वैयावृत्त्यप्रत्यनीकप्रतिघातरूपं 'कुर्वन्ति' विदधति, 'तम्ह'चि तस्मात् हुरवधारणे ततस्तस्मादेव हेतोरेते-पुरोवर्तिनो नितरां हताः-ताडिता निहताः कुमाराः, न तु मम मनःप्रद्वेषोऽत्र हेतुरिति भाव इति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति तद्गुणाकृष्टचेतस उपाध्यायप्रमुखा इदमाहुः दीप अनुक्रम [३९० SOMEditadimahal For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~236~ Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||३३|| नियुक्ति: [३२७...] (४३) उत्तराध्यबृहद्वृत्तिः ॥३६॥ प्रत सूत्रांक ||३३|| XXXXXX** अत्थं च धम्मं च बियाणमाणा, तुब्भे नवि कुप्पह भूइपन्ना । हरिकेशीतुम्भं तु पाए सरणं उवेमो, समागया सव्वजणेण अम्हे ॥ ३३ ॥ । अर्यत इत्यों-ज्ञेयत्वात्सर्वमेव वस्तु, इह तु प्रक्रमाच्छुभाशुभकर्मविभागो रागद्वेषविपाको वा परिगृह्यते, या यमध्यय. अर्थ:-अभिधेयः स चार्थाच्छाखाणामेव तं, चशब्दस्तद्तानेकभेदसंसूचकः, धर्म-सदाचारो दशविधो वा यतिध-41 मर्मस्तं च 'पियाणमाणे'त्ति विशेपेण विविधं वा जानन्तः-आगच्छन्तो यूयं 'नापि' नैव कुप्यथ-क्रोधं कुरुध्वं,X भूतिप्रज्ञा इति, भूतिमङ्गलं वृद्धी रक्षा चेति वृद्धाः, प्रज्ञायतेऽनया वस्तुतत्त्वमिति प्रज्ञा, ततश्च। भूतिः-मङ्गलं सर्वमङ्गलोत्तमत्वेन वृद्धिर्वा वृद्धिविशिष्टत्वेन रक्षा वा प्राणिरक्षकत्वेन प्रज्ञा-बुद्धिरस्पेति भूतिप्रज्ञः, अतश्च 'तुम्भ तुतिक तुशब्दस्येवकारार्थत्वात् युष्माकमेव पादौ-चरणी शरणमुपेमः-उपगच्छामः समागताः-मिलिताः, केन सह ?-स-3 जनेन, वयमिति सूत्रार्थः ॥ किंच अचेमु ते महाभागा!, न ते किंचन नाच्चिमो। भुंजाहि सालिमं करं, नाणावंजणसंजुयं ॥ ३४ ॥ 'अर्चयामः' पूजयामते-तव सम्बन्धि सर्वमपीति गम्यते, प्रविश पिण्डिमित्युक्ते यथा गृहमिति भक्षयेति च,15 ॥३६८॥ महाभाग ! अतिशयाचिन्त्यशक्तियुक्तत्वेनेति, नैव 'ते' तव किञ्चिदिति चरणरेण्यादिकमपि नार्चयामो-न पूजयामो, अपि तु सवेमचेंयामः, अस्य च पूर्वणव गतार्थत्वे पुनरभिधानमन्वयव्यतिरेकाभ्यामुक्तोऽर्थः सुखावगमो भवतीतिकृत्वा, दीप अनुक्रम [३९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~237 Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-1 / गाथा ||३४|| नियुक्ति : [३२७...] प्रत सूत्रांक ||३५|| अथवा अर्चयामस्ते इति सुव्यत्त्ययात्त्वाम् , अनेन खतस्तस्य पूज्यत्वमुक्त, उत्तरेण तु तत्खामित्वमपि पूज्यताहेतुरिति, तथा मुझेतो गृहीत्वेति गम्यते 'शालिम'न्ति शालिमयं, कोऽर्थः ?-शालिनिष्पन्नं 'कूरम्' ओदनं नानाव्यजनैः-अनेकप्रकारैर्दध्यादिभिः संयुतं-सम्मिश्रं नानाव्यञ्जनसंयुतं, न त्वेकमेवेति सूत्रार्थः ॥ अन्यच इमं च मे अस्थि पभूयमन्नं तं भुंजसू अम्ह अणुग्गहट्ठा। बाढंति पडिच्छइ भत्तपाणं, मासस्स ऊ पारणए महप्पा ॥ ३५॥ 'इदं च' प्रत्यक्षत एव परिदृश्यमानं 'मे'ममास्ति-विद्यते 'प्रभूतं'प्रचरमन्नं-मण्डकखण्डखाद्यादि समस्तमपि भोजन, यत्प्राक् पृथगोदनग्रहणं तत्तस्य सर्वान्नप्रधानत्वख्यापनार्थ, तद्भवास्माकमनुग्रहार्थ-वयमनुगृहीता भवाम इति हेतोः, एवं च तेनोक्त मुनिराह-'बाढम्' एवं कुर्म इतीत्येवं त्रुयाण इति शेषः, 'प्रतीच्छति' द्रव्यादितः शुद्धमिति गृह्णाति, भक्तपानमुक्तरूपं, 'मासस्स उत्ति मासादेव, यद्वा अन्त इत्यध्याहियते, ततश्च मासस्यैवान्ते यत्पार्यते-पर्यन्तः क्रियते | गृहीतनियमस्थानेनेति पारणं तदेव पारणकं, भोजनमित्युक्तं भवति, तस्मिन्-तन्निमित्तं, 'निमित्तात्कर्मसंयोगे कासप्तमीति' (पा०२-३-३६ वार्तिकम् ) सप्तमी, माहात्म्येति प्राग्वत् इति सूत्रार्थः । तदा च तत्र यदभूत्तदाह तहियं गंधोदयपुष्फवासं, दिव्या तहिं वसुहारा य बुट्टा। पहया बुंदुहीओ सुरेहिं, आगासे अहोदाणं च घुटु ॥ ३६॥ दीप अनुक्रम [३९४] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~238~ Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||३६|| नियुक्ति : [३२७...] प्रत सूत्रांक ||३६|| उत्तराध्य. 'तहिय'ति तस्मिन् मुनौ भक्तपानं प्रतीच्छति यज्ञवाटे वा गन्धः-आमोदस्तत्प्रधानमुदक-जलं गन्धोदकं तच्च हरिकेशीपुष्पाणि च-कुसुमानि तेषां वर्ष-वर्षणं गन्धोदकपुष्पवर्ष, सुरैरिति सम्बधात् कृतमिति गम्यते, दिव्या-श्रेष्ठा ४ यमध्ययहात्त यदिवा दिवि-गगने भया दिव्या, 'तहिति तस्मिन्नेव नान्यत्र, अनेन कथमियतामेकत्र कल्याणानां मीलक इत्य॥३६॥ न्यत्रैवान्यतरत्कल्याणान्तरं भविष्यतीत्याशङ्का निराकृता, वसु-द्रव्यं तस्य धारा-सततपातजनिता सन्ततिर्व- नम्. १२ सुधारा सा च 'वृष्टे'ति पातिता, सुरैरित्यत्रापि सम्बध्यते, तथा प्रकर्षेण हताः-ताडिताः प्रहताः, के ते'दुन्दुभयो' देवानकाः, उपलक्षणत्वाच्छेषातोद्यानि च, कैः -'सुरैः' देवैः, तथा तैरेव 'आकाशे' नभसि 'अहो' इति विस्मये, विस्मयनीयमिदं दानं, कोऽन्यः किलैवं शक्नोति दातुं ?, एवं दत्तं सुदत्तमिति च 'घुष्टं संशब्दितमिति 15 सूत्रार्थः ॥ तेऽपि ब्राह्मणा विस्मितमनस इदमाहुः सक्खं खुदीसइ तवोविसेसो, न दीसई जाइविसेस कोई। सोवागपुसं हरिएससाहुं, जस्सेरिसा इहि महाणुभाग। ॥ ३७॥ 'साक्षात्' प्रत्यक्षं 'खुरिति निश्चित अवधारणे वा ततः साक्षादेव 'दृश्यते' अवलोक्यते, कोऽसौ ?-तपो-लो-1॥३६॥ र कासिद्धा तमुपवासादिवो तस्य विशेषो-विशिष्टत्वं माहात्म्यमितियायत्तपोविशेषो, 'न' नैव दृश्यते 'जाति-181 विशेषो' जातिमाहात्म्यलक्षणः 'कोऽपी'ति खल्पोऽपि, किमित्येवमत आह-यतः खपाकपुत्रः-चाण्डालसुतो हरि-17 दीप अनुक्रम [३९५] SamEducatan internatant For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~239~ Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||३७|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||३७|| केशश्चासौ मातङ्गत्वेन प्रसिद्धत्वात् साधुश्च यतित्वाद्धरिकेशसाधुः, पठ्यते च-'सोवायपुत्तं हरिएससाहुन्ति, अत्र च पश्यतेति शेषः, कदाचिदन्य एव कश्चिदत आह-यस्खेदशी-दृश्यमानरूपा ऋद्धिः-देवसन्निधानात्मिका सम्पत् महानु६ भागा-सातिशयमाहात्म्या, जातिविशेषे हि सति सर्वोत्तमत्वाद्राझणजातेस्तद्वतामस्माकमेव देवा वैयावृत्त्यं कुर्युरिति भाव इति सूत्रार्थः ॥ साम्प्रतं स एव मुनिस्तानुपशान्तमिथ्यात्वमोहनीयोदयानिय पश्यन्निदमाह किं माहणा! जोइसमारभंता, उदएण सोहिं बहिया विमग्गहा। जं मग्गहा बाहिरियं विसोहिं, न तं सुदिदं कुसला वयंति ॥ ३८ ॥ 'कि'मिति क्षेपे, ततो न युक्तमिदं, यत् 'माहना' बामणा ! 'ज्योतिः' अग्निं 'समारभमाणाः' प्रस्तावाद्यागकरणतः प्रवर्त्तमानाः, यागं कुर्वन्त इत्यर्थः, 'उदकेन' जलेन 'सोहिंति शुद्धिं निर्मलता 'पहिय'त्ति बायां, कोऽर्थों - वाघहेतुका, यागं हि समारभमाणैजेलेन या शुद्धिर्मायते तत्र यागनाने एव तत्त्वतो हेतुत्वेनेष्टे, ते च भवदभिमते बाये एवेति 'विमार्गयथ' विशेषेणान्वेषयथ, किमेवमुपदिश्यत इत्याह-यद्यूयं मार्गयथ वायां-बाहेतुकां विशुद्धिं, न तत् सुदृष्ट-सुष्टु प्रेक्षितं 'कुशलाः' तत्त्वविचारं प्रति निपुणा वदन्ति' प्रतिपादयन्तीति सूत्रार्थः॥ यथा चैतत् सुष्टुं न भवति तथा खत एवाह %85%2555 दीप अनुक्रम [३९६] mate For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~240 Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||३९|| नियुक्ति: [३२७...] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३७॥ प्रत सूत्रांक ||३९|| कुसं च जूर्व तणकट्ठमग्गि, सायं च पायं उदयं फुसंता। | हरिकेशीपाणाई भूयाई विहेडयंता, भूजोऽवि मंदा! पकरेह पावं ।। ३९ ॥ 'कुशं च दर्भ च 'यूप' प्रतीतमेव तृणंच-वीरणादि काष्ठं-समिदादि तृणकाष्ठम् अग्नि-प्रतीतं, सर्वत्र परिगृह्णन्त इति यमध्ययशेषः, 'सायं' सन्ध्यायां, चशब्दो भिन्नक्रमस्ततः 'पाय'ति प्रातश्च प्रभाते उदकं-जलं 'स्पृशन्त': आचमनादिषु । नम्. १२ परामृशन्तः 'पाणाई'ति प्राणयोगात् प्राणिनो यद्वा प्रकर्षणानन्तीति–वसन्तीति प्राणा:-द्वीन्द्रियादयः, सम्भ-4 वन्ति हि जले पूतरकादिरूपास्त इति, 'भूयाई' इति भूतान्-तरून् 'भूताश्च तरवः स्मृता' इति वचनात्, पृथिव्या केन्द्रियोपलक्षणं चैतत् 'विहेडयंति'त्ति विहेठयन्तो-विशेषेण विविधं वा बाधमानाः विनाशयन्त इत्यर्थः, किमित्याह-'भूयोऽपि पुनरपि, न केवलं पुरा किन्तु विशुद्धिकालेऽपि जलानलादिजीवोपमईतो 'मन्दाः' जडाः 'प्रकुरुथ' प्रकर्षणोपचिनुथ यूयं, किं तत् ?-पापम्-अशुभकर्म, अयमाशयः-कुशला हि कर्ममलविलयात्मिक तात्विकीमेव शुद्धिं मन्यन्ते, भवदभिमतयागनाने च यूपादिपरिग्रहजलस्पर्शाविनामावित्वेन भूतोपमहेतुतया प्रत्युत कर्ममलोपचयनिबन्धने एवेति नातः तत्सम्भव इति कथं तद्धेतुकशुद्धिमार्गणं सुरष्टं ते वदेयुः, तथा च वाचकः ॥३७०॥ है"शीचमाध्यात्मिकं त्यक्त्या, भावशद्वयात्मकं शुभम् । जलादिशौचं यत्रेष्टं मढविसापकं हि तदि॥१॥"ति सूत्रायः॥ इत्थं तद्वचनतः समुत्पन्नशङ्कास्ते यागं प्रति तावदेवं पप्रच्छु: 4-54- 55%25A5%2525 दीप अनुक्रम [३९८] P manning FarramanaSPrwatataonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~241 Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-1 / गाथा ||४०|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||४०|| कह घरे भिक्खु ! वयं जयामो ?, पावाई कम्माई पणुल्लयामो। अक्खाहि णे संजय जक्खपूइआ, कहं सुजटुं कुसला वयंति॥४०॥ ___ 'कथं' केन प्रकारेण 'चरि'त्ति 'विभाषा कथमि लिङ् च इति(पा०३-३-१४३)लिङि वचनव्यत्यये वचनव्यत्ययाचरेमहि-यागार्थ प्रवर्तेमहि, हे भिक्षो!-मुने ! वयमित्यात्मनिर्देशः, तथा यजामो' यागं कुर्मः, कथमिति योगः?, पापानि -अशुभानि कर्माणि पुरोपचिताविद्यारूपाणि 'पणुल्लयामोति प्रणुदामःप्रेरयामो, येनेति गम्यते, 'आख्याहि कथय । 'नः' अस्माकं 'संयतः' पापस्थानेभ्यः सम्यगुपरतः 'यक्षपूजित' यक्षार्चित!, किमुक्तं भवति-यो खस्मद्विदितः कर्मप्रणोदनोपायत्वेन यागः स युष्माभिर्दूषित इति भवन्त एवापरं यागमुपदिशन्तु, कदाचिदविशिष्टमेव यजनमुप| दिशेदित्याशङ्कयाह-'क' केन प्रकारेण 'स्विष्टं शोभनं यजनं 'कुशला' उक्तरूपा 'वदन्ति' प्रतिपादयन्ति, 'न तं? 'सुदिदं कुसला वयंति'त्ति कुशलमुखेनैव मुनिना दूषितमिति तैरपि तथैव पृष्टमिति सूत्रार्थः ॥ मुनिराह छज्जीवकाए असमारभंता, मोसं अदत्तं च असेवमाणा। परिग्गहं इथिउ माण मायं, एयं परिन्नाय चरति देता ॥४१॥ पड़ जीवकायान्-पृथिव्यादीन् 'असमारभमाणा' अनुपमईयन्तः 'मोसं'ति मृपा अलीकभाषणं 'अदत्तं चेत्यदत्तादानं चानासेवमानाः-अनाचरन्तः परिग्रह-मूछी स्त्रियो-योषितो 'माण'ति मानम्-अहङ्कारं मायां-परव दीप अनुक्रम [३९९] SamEducatan intamasant FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~242 Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||४१|| दीप अनुक्रम [ ४०० ] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३७१॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||४९|| निर्युक्ति: [३२७...] अध्ययनं [१२], ञ्चनात्मिकां तत्सहचारित्वात्कोपलोभौ च, 'एतद्' अनन्तरोक्तं परिग्रहादि 'परिज्ञाय' ज्ञपरिज्ञया सर्वप्रकारं ज्ञात्वा प्रत्याख्यानपरिज्ञया च प्रत्याख्याय 'चरेज दन्त'त्ति वचनव्यत्ययाच्चरेयुर्यागे प्रवर्त्तेरन्, भवन्त इति गम्यते, पठन्ति च- 'चरन्ति दंत'त्ति अत्र च यत एवं दान्ताश्चरन्त्यतो भवद्भिरप्येवं चरितव्यमिति भाव इति सूत्रार्थः ॥ प्रथमप्रश्नप्रतिवचनमुक्तं, शेषप्रश्नप्रतिवचनमाह- Education international सुसंकुडा पंचाहिँ संवरेहिं, इह जीवियं अणवखमाणो । areकाओ सुदेहो, महाजयं जयई जन्नसिहं ॥ ४२ ॥ •सुष्ठु संवृतः - स्थगित समस्ताश्रवद्वारः सुसंवृतः, कैः ? – पञ्चभिः -- पञ्चसङ्घयैः संवरैः - प्राणातिपात विरत्यादित्रतैः 'इहे' त्यस्मिन् मनुष्यजन्मनि उपलक्षणत्वात्परत्र च 'जीवितं ' प्रस्तावादसंयमजीवितम् 'अनवकाङ्गन्' अनिच्छन्, यद्वा अपेर्गम्यमानत्वा जीवितमपि - आयुरप्यास्तामन्यद्धनादि, अनवकाङ्क्षन्, यत्र हि व्रतबाधा तत्रासौ जीवितमपि न गणयति, अत एव व्युत्सृष्टो - विविधैरुपायैर्विशेषेण वा परीषहोपसर्गसहिष्णुतालक्षणेनोत्सृष्टः - त्यक्तः कायः शरीरमनेनेति व्युत्सृष्टकायः, शुचिः -- अकलुपत्रतः स चासौ त्यक्तदेहश्च अत्यन्त निष्प्रतिकर्म्मतया शुचित्यतदेहो महान् | जयः - कर्म शत्रुपराभवन लक्षणो यस्मिन् यज्ञश्रेष्ठेऽसौ महाजयस्तं, क्रियाविशेषणं या महाजयं यथा भवत्येवं यजते यतिरिति गम्यते, ततो भवन्तोऽप्येवमेव यजन्तामिति भावः, तिङ्यचनव्यत्ययेन वा 'जय'त्ति यजतां, कमि For Parna Privat हरिकेशी यमध्यय नम्. १२ ~243~ ॥३७१॥ g पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||४२|| नियुक्ति: [३२७...] प्रत सूत्रांक ||४२|| साह-'जण्णसेट्ठति प्राकृतत्वाच्छ्रेष्ठयज्ञ, श्रेष्ठवचनेन चैतद्यजन एव खिष्टं कुशला वदन्ति, एष एव च कर्मप्रणोदनोपाय इत्युक्तं भवतीति सूत्रार्थः ॥ यदीग्गुणः श्रेष्ठयचं यजते अतस्त्वमपीडग्गुण एव, तथा च तं यजमानस्य कान्युपकरणानि को या यजनविधिरित्यभिप्रायेण त एवमाहुः के ते जोई के व ते जोईठाणा?, का ते सूया किं च ते कारिसंग। एहा य ते कयरा संति भिक्खू!, कयरेण होमेण हुणासि जोई ? ॥४३॥ 6 किं, अयमर्थः-किरूपं 'ते' तब 'ज्योति'रिति अग्निः 'के व ते जोइठाणेत्ति किंवा ते-तव ज्योतिःस्थानं यत्र ज्योतिर्निधीयते, का श्रुवो ?-घृतादिप्रक्षेपिका दर्ग्यः, 'किं चति किं वा करीषः-प्रतीतः स एवाङ्गम्-अयुद्दीपनकारणं करीपाझं येनासौ सन्धुक्ष्यते, एधाश्च-समिधो यकाभिरमिः प्रज्वाल्यते, 'ते' तव कतरा इति-काः ? 'संति' त्ति चस्य गम्यमानत्वाच्छान्तिश्च-दुरितोपशमनहेतुरध्ययनपद्धतिः कतरेति प्रक्रमो, 'भिक्षु' इति भिक्षो ! कतरेण 'होमेन' हवनविधिना, समेन धावतीत्यादिवत् तृतीया, जुहोषि-आहुतिभिः प्रीणयसि, किं-ज्योतिः-अमिम् , षड्जीवनिकायसमारम्भनिषेधेन बस्सदभिमतो होमः तदुपकरणानि च पूर्व निषिद्धानीति कथं भवतो यजनसम्भवः? इति सूत्रार्थः ॥ मुनिराह 22 दीप अनुक्रम [४०१] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~244 Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||४४|| नियुक्ति: [३२७...] (४३) प्रत सूत्रांक ॥४४|| उत्तराध्य. तवो जोई जीवो जोइठाणं, जोगा सुया सरीरं कारिसंग । हरिकेशीकम्म पहा संजमजोग संती, होम हुणामी इसिणं पसत्थं ॥ ४४ ॥ बृहद्वृत्तिः Pal 'तपो' बाह्याभ्यन्तरभेदभिन्नं 'ज्योतिः' अग्निः, यथा हि ज्योतिरिन्धनानि भस्मीकरोत्येवं तपोऽपि भावेन्धनानि यमध्यय॥३७२॥ कर्माणि, जीवो-जन्तुर्योतिःस्थानं, तपोज्योतिषस्तदाश्रयत्वात् , युज्यन्ते-सम्बन्ध्यन्ते खकर्मणेति योगाः-मनो-18 नम्.१२ वाक्कायाः श्रुवः, ते हि शुभव्यापाराः स्नेहस्थानीयाः, तपोज्योतिपो ज्वलनहेतुभूताः तत्र संस्थाप्यन्त इति, शरीरं करीषा, तेनैव हि तपोज्योतिरुद्दीप्यते, तद्भावभावित्वात्तस्ख, 'कर्म' उक्तरूपं एधास्तस्यैव तपसा भस्मीभावनयनात् , 'संजमजोग'त्ति संयमयोगाः-संयमव्यापाराः शान्तिः सर्वप्राण्युपद्रयापहारित्वात्तेषां, तथा 'होम'न्ति होमेन जुहोति तपोज्योतिरिति गम्यते, ऋषीणां-मुनीनां सम्बन्धिना 'पसत्थं ति प्रशस्तेन जीवोपघातरहितत्वेन विवे-18 किभिः श्लाषितेन सम्यक्चारित्रेणेति भावः, अनेन च कतरेण होमेन जुहोषि ज्योतिरिति प्रत्युक्तमिति सूत्रार्थः ॥ तदेतेन 'किं माहना जोइसमारहंता' इत्यादिना लोकप्रसिद्धयज्ञानां स्नानस्य च निषिद्धत्वायज्ञखरूपं तैः पृष्टं कथितं की |च मुनिना ॥ इदानी खानस्वरूपं पिच्छिषय इदमाहुः के ते हरए के य ते संतितित्थे, कहंसि पहाओ व रयं जहासि। आयक्ख णे संजय जक्खपूहया, इच्छामु नाउँ भवओ सगासे ॥ ४५ ॥ दीप अनुक्रम [४०२] ॥३७ 2-% 81-% SamEducatantntamatana Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~245 Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१२], मूलं [-] / गाथा ||४५|| नियुक्ति : [३२७...] 45464 प्रत सूत्रांक ||४|| 80-%A8% कस्ते-तव 'इदः' नदः?, 'के च ते संतितित्थेति किं च ते-तब शान्त्यै-पापोपशमननिमित्तं तीर्थ-पुण्यक्षेत्र शान्तितीर्थम् , अथवा 'कानि च' किंरूपाणि 'ते' तव 'सन्ति' विद्यन्ते 'तीर्थानि' संसारोदधितरणोपायभूतानि, लोकप्रसिदीद्धतीर्थानि हि त्वया निषिद्धानीति, तथा च 'कर्हिसि पहाओ ' ति वाशब्दस्य भिन्नक्रमत्वात्कस्मिन् वा खातः शुचिर्भूतो रज इव रजः-कर्म जहासि-त्यजसि त्वं ?, गम्भीराभिप्रायो हि भवांस्तत् किमस्माकमिव भवतोऽपि हृदतीर्थ एव शुद्धिस्थानमन्यद्वेति न विन इति भावः, 'आचक्ष्व' व्यक्तं वद संयत ! यक्षपूजित ! 'इच्छामः' अभिलपामो 'ज्ञातुम्' अवगन्तुं 'भवतः तव 'सकाशे' समीपे इति सूत्रार्थः । मुनिराह धम्मे हरए बंभे संतितित्थे, अणाविले अत्तपसन्नलेसे । जर्हि सि पहाओ विमलो विसुद्धो, मुसीइओ पजहामि दोसं ॥ ४६॥ एवं सिणाणं कुसलेण दिडं, महासिणाणं इसिणं पसत्य। जहिं सि पहाया विमला विसुद्धा, महारिसी उत्तम ठाणं पत्ति ॥४७॥ तिमि इति हरिकेशीयं बारसमं अज्झयणं सम्मत्तं ॥ १२ ॥ 'धर्मः' अहिंसाद्यात्मको हृदः कर्मरजोऽपहन्तृत्वाद्रसेति-ब्रह्मचर्य शान्तितीर्थ, तदासेवनेन हि सकलमलमूलं रागद्वेषावुन्मूलितादेव भवतः, तदुन्मूलनाच न कदाचिन्मलस्य सम्भवोऽस्ति, सत्याधुपलक्षणं चैतत्, तथा चाह दीप अनुक्रम [४०३] +RAR ASIA Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~246~ Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||४६ -४७|| दीप अनुक्रम [४०४ -४०५] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥ ३७३ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||४६-४७|| निर्युक्ति: [३२७...] अध्ययनं [१२], "ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा संयमेन च । मातङ्गर्षिर्गतः शुद्धि, न शुद्धिस्तीर्थयात्रया ॥१॥" अथवा 'बले'ति ब्रह्मचर्यवन्तो मतुब्लोपादभेदोपचाराद्वा साधव उच्यन्ते, सुच्यत्ययाच्चैकवचनं, 'संति' विद्यन्ते तीर्थानि ममेति गम्यते, उक्तं हि "साधूनां दर्शनं श्रेष्ठं तीर्थभूता हि साधवः । तीर्थं पुनाति कालेन, सद्यः साधुसमागमः ॥ १ ॥ " किं च-भवत्प्रतीततीर्थानि प्राण्युपमद्देहेतुतया प्रत्युत मलोपचयनिमित्तानीति कुतस्तेषां शुद्धिहेतुता १ तथा चोक्तम्"कुर्याद्वर्षसहस्रं तु, अहन्यहनि मज्जनम् । सागरेणापि कृत्स्लेन, वधको नैव शुद्धयति ॥ १ ॥ इदशान्तितीर्थे एव | विशिनष्टि - 'अनाविले' मिथ्यात्वगुतिविराधनादिभिरकलुषे अनाविलत्वादेवात्मनो - जीवस्य प्रसन्ना-मनागप्यकलुषा | पीताद्यन्यतरा लेश्या यस्मिंस्तदासप्रसन्न लेश्यं तस्मिन्, अथवा आता प्राणिनामिह परत्र च हिता प्राप्ता वा तैरेव | प्रसन्न लेश्या - उक्तरूपा यस्मिंस्तदाप्तप्रसन्नलेश्यं तस्मिन्नेवंविधे धर्म्महदे, ब्रह्माख्यशान्तितीर्थे च यदा ब्रह्मशब्देन | ब्रह्मचर्यवन्त उच्यन्ते तत्पक्षे वचनविपरिणामेन विशेषणद्वयं व्याख्येयं, 'जहिंसि'त्ति यत्रास्मि सात इव स्रातः- अत्यन्तशुद्धिभवनाद्विमलो - भावमलरहितोऽत एवाति (य) विशुद्धो-गतकलङ्कः, 'मुसीतीभूओ'ति सुशीतीभूतो रागाद्युत्पत्तिबिरहृतः सुष्ठु शैत्यं प्राप्तः, पठ्यते च- 'सुसीलभूओ' ति सुष्ठु शोभनं शीलं समाधानं चारित्रं वा भूतः - प्राप्तः सुशीलभूतः 'प्रजहामि' प्रकर्षेण त्यजामि दूषयति- विशुद्धमप्यात्मानं विकृतिं नयतीति दोष:- कर्म्म तं, अनेनैतदाहममापि इदतीर्थे एव शुद्धिस्थानं परमेवंविधे एवेति, निगमयितुमाह- 'एतदित्यनन्तरमुक्तं 'स्त्रानं' रजोहीनं 'कुशलैः' For Panas Private हरिकेशी. यमध्यय ~ 247~ नमू. १२ Educationinemational पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ॥३७३॥ Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||४६ -४७|| दीप अनुक्रम [४०४ -४०५] Educaton [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||४६-४७|| निर्युक्तिः [३२७...] अध्ययनं [१२], प्रागुक्तरूपैर्दृष्टं - प्रेक्षितमिदमेव च महास्त्रानं, न तु युष्मत्प्रतीतम्, अस्यैव सकलमलापहारित्वाद्, अत एव चेदं ऋषीणां । प्रशस्तं - प्रशंसास्पदं, न तु जलखानवत्सदोषतया निन्यम्, अस्यैव फलमाह-- 'जहिंसि' त्ति सुव्यत्ययाद्येन खाता | विमला विशुद्धा इति च प्राग्वत् महर्षयो- महामुनय उत्तमं स्थानं मुक्तिलक्षणं 'प्राप्ताः' गता इति सूत्रद्वयार्थः ॥ इतिः परिसमाप्तौ त्रवीमीति पूर्ववद्, गतोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्ते च प्राग्यदेव || श्रीशान्त्याचार्यकृतायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटीकायां द्वादशमध्ययनं समाप्तमिति ॥ १२ ॥ * ॥ इति श्रीशान्याचार्यकृतायां शिष्य हितायामुत्तराध्ययनटी०द्वादशमध्ययनं समाप्तम् ॥ For Parana Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अत्र अध्ययनं १२ परिसमाप्तं ~248~ Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||४७....|| नियुक्ति: [३३०-३३२] उत्तराध्य. चित्रसंभू प्रत बृहद्वृत्तिः ॥३७४॥ सूत्रांक ||४६-४७|| *% अथ त्रयोदशाध्ययनम् । तीयाध्य. व्याख्यातं हरिकेशीयं नाम द्वादशमध्ययनम् , अधुना त्रयोदशममारभ्यते, अस्स चायममिसंबन्धः-इहान-4 न्तराध्ययने श्रुतवत्तपस्यपि यनो विधेय इति ख्यापयितुं तपःसमृद्धिरभिहिता, इह तु तत्प्राप्तायपि निदानं परि-2 हर्त्तव्यमिति दर्शयितुं यथा तत् महापायहेतुस्तथा चित्रसंभूतोदाहरणेन निदर्यत इति, अनेन सम्बन्धेनायातस्थास्याध्ययनस्यानुयोगद्वारचतुष्टयचर्चा प्राग्वद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे चित्रसंभूतीयमिति नाम, अतश्चित्रसंभूतनिक्षेपाभिधानायाह नियुक्तिकृत्चित्ते संभूअंमि अनिक्खेवो चउक्कओ दुहा दवे।आगमनोआगमओ नोआगमओ असो तिविहो ॥३३० जाणगसरीरभविए तवतिरित्ते य सो पुणो तिविहो। एगभविअ बद्धाऊ अभिमुहओ नामगोए य ॥३३१॥ चित्तेसंभूआउ बेअंतो भावओ अ नायवो । तत्तो समुट्रिअमिणं अज्झयणं चित्तसंभूयं ॥ ३३२ ॥3 गाथात्रयं स्पष्टमेव, नवरं 'चित्तेसंभूयाउंति एकारोऽलाक्षणिकः, 'ततः समुत्थित मिति ताभ्यां-चित्रसम्भू % दीप अनुक्रम [४०४-४०५] %A5 FairamanaSPrwara tumonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं - १३ "चित्रसंभूतिय" आरभ्यते अत्र मूल-संपादने नियुक्तिगाथा क्रमांकने किञ्चित् स्खलना दृश्यते, मया नियुक्ति-गाथा २२८,२२९ न दृष्टं ~ 249~ Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||४६ -४७|| दीप अनुक्रम [४०४ -४०५] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||४७....|| अध्ययनं [१३], निर्युक्ति: [३३३-३३५] ताभ्यामभिधेयभूतामागतं, 'तेसुं'ति च पाठे तयोः 'समुत्थित' मिति भवं चित्रसंभूतीयं, 'वृद्धाच्छः' इति ( पा० | ४-२ - ११४ ) छप्रत्यये वृद्धसज्ञा तु 'वा नामधेयं यस्ये' ति ( वा नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा वक्तव्या । वार्त्तिक) वचनात् ॥ सम्प्रति काविमौ चित्रसंभूतौ ? केन चानयोरत्राधिकारः ? इत्याशङ्कयाह- सागेए चंडवडिंसयस्स पुत्तो अ आसि मुणिचंदो । सोऽवि अ सागरचंदस्स अंतिए पबए समणो ॥ ३३३ ॥ ॥ तण्हाळुहाकिलंतं समणं दहूण अडविनी हुतं । पडिलाहणा य बोही पत्ता गोवालपुत्तेहिं ॥ ३३४ ॥ तत्तो दुन्नि दुगळं काउं दासा दसन्नि आयाया । दुन्नि अ उसुआरपुरे अहिगारो बंभदत्तेणं ॥ ३३५ ॥ गाथात्रयमस्याप्यक्षरार्थः स्पष्ट एव, णवरं 'पचए समणो' ति प्राब्राजीत् समानं मनोऽस्येति समनाः- सर्वत्रारक्त द्विष्टचित्तः सन्, यद्वा श्राम्यतीति श्रमणः - तपस्वी सन् निश्चयनयापेक्षं चैतत्, "णेरंइए शेरइएसु उववज्जति" इत्यादिवत्, तथा 'अडविणीदुत्तं'ति अटवीनिःसृतम् अरण्यान्निष्कान्तमित्यर्थः । भावार्थस्तु कथानकगम्यः तचेदम्-अस्ति कोसलालङ्कारभूतं साकेतं नाम नगरं तत्र चाभूदधिगतजीवा जीवादितश्वश्चन्द्रावतंसको नाम राजा, तस्य च धारिणी देवी, तदङ्गजो मुनिचन्द्रः, स च राजाऽन्यदा समुत्पन्न संवेगस्तमेव सुतं राज्येऽभिषिच्य प्रत्रज्यामशिश्रियत्, १ नैरयिको नैरयिकेपूत्पद्यते For Parna Prat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~250~ Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||४७....|| नियुक्ति : [३३३-३३५] प्रत सूत्रांक ||४६-४७|| उत्तराध्य. प्रतिपाल्य च प्रव्रज्यामपगतमलकलकोऽपवर्गमगमत् । अन्यदा च सागरचन्द्राचार्या बहुशिष्यपरिवृतास्तत्रागताः चित्रसंभू निर्गतश्च मुनिचन्द्रनृपतिस्तद्वन्दनाय, दृष्टाश्चानेन सूरयः, स्तुत्वा च तानुपविष्टस्तदन्तिके, श्रुतश्च तत्कथितो विशु-21 बृहद्वृत्तिः तीयाध्य. धर्मः, समुत्पन्नश्चास्य तत्करणाभिलाषः, ततः खसुतं राज्ये निवेश्य प्रतिपन्नोऽसौ श्रामण्यं, गृहीता चानेन ग्रहणा-16 सेवनोभयलक्षणा शिक्षा, प्रवृत्ताश्चान्यदा सुसार्थेन सगच्छाः सागरचन्द्रसूरयोऽध्वानं, मुनिचन्द्रमुनिश्च तैः समं । व्रजन् गुरुनियोगादेकाक्येय भक्तपाननिमित्तं क्वचित्प्रत्यन्तग्रामे प्राविशत् , प्रविष्टे चास्मिन् प्रवृत्तः सार्थो गन्तुं, प्रचलिताः सहानेन सूरयो, विस्मृतश्चायमेषां, प्रस्थितश्च क्षणान्तरेण गृहीतभक्तपानस्तदनुमार्गेण, पतितश्च मूढदिक्-४ |चक्रवालः सार्थगवेषणापरो, मार्गात्परिभ्रष्टो भ्रमदनेकशार्दूलजाला द्विपकदम्बकमज्यमानशालशल्लकीप्रभृतितर|निकरामनर्वापारतया च संसारानुकारिणीं विन्ध्याटवीं, तत्र चासौ परिभ्रमन् गिरिकन्दराण्यतिक्रामन्नतिनिमोनतभूभागान् पश्यन् भयानकानेकद्वीपितरक्षाच्छभलादिश्वापदान् उत्तीर्णस्तृतीयदिने, तदा च क्षुरक्षामकुक्षिः शुष्को-11 छकण्ठतालुरेकत्र वृक्षच्छायायां मूर्छावशनष्टचेष्टो दृष्टश्चतुर्भिर्गोपालदारकैः, उत्पन्ना अमीपामनुकम्पा, सिक्तस्त्वरि-14 तमागत्य गोरसोम्मिश्रतिजलेन, पायितोऽसौ तदेव, समाश्वस्तश्च नीतो गोकुलं, प्रतिजागरितश्च तत्कालोचित-I7॥३७५|| ६ कृत्येन, प्रतिलाभितः प्रामुकानादिना, कथितस्तेषामनेन जिनप्रणीतधर्मः, गृहीतश्चायमेतैर्भावगर्भ, गतश्चासौ विवदक्षितस्थानं, तं च मलदिग्धदेहमवलोक्य द्वयोः समजनि जुगुप्सा, तदनुकम्पातः सम्यक्त्वानुभावतश्च नियर्तितं । दीप अनुक्रम [४०४-४०५] SamEducatmidaimatunt पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~251 Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३३३-३३५] प्रत सूत्रांक ||१|| ACKASHere चतुभिरपि देवायुः, जग्मुश्च देवलोकं, ततश्युतौ चाकृतजुगुप्सौ तु कतिचिद्भवान्तरिती द्वाविषुकारपुरे द्विजकुले जातो, तद्वक्तव्यता च इषुकारीयनाम्यनन्तराध्ययनेऽभिधास्यते, यौ च द्वौ जुगुप्सको तो दशार्णजनपदे ब्राह्मणकुले दासतयोत्पन्नौ, तयोश्च य इह ब्रह्मदत्तो भविष्यति तेनात्राधिकारो, निदानस्यैवात्र वक्तुमुपक्रान्तत्वात्तेनैव च तद्विधा-४ नाद , द्वितीयस्य तु प्रसङ्गत एवाभिधीयमानत्वात् , इह च नामनिष्पन्ननिक्षेपे प्रस्तुते प्रसङ्गतोऽर्थाधिकारोऽप्युक्त इति गाथात्रयभावार्थः । उक्तो नामनिष्पननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनिष्पन्नस्यावसर इति सूत्रमुच्चारणीयं, तवेदम् जाईपराजिओ खलु कासि नियाणं तु हथिणपुरंमि । चुलणीइ वंभदत्तो उववन्नो नलिण (पउम) गुम्माओ॥१॥ 'जातिपराजितः' इति जात्या-प्रस्तावाचाण्डालाख्यया पराजितः-अभिभूतः, स हि वाराणस्यां हस्तिनागपुरे च वक्ष्यमाणन्यायतो नृपेण नमुचिनाम्ना च द्विजेन चाण्डाल इति नगरनिष्कासनन्यक्कारादिना पुरा जन्मन्यपमानित | 2 इत्येवमुक्तः, यद्वा जातिभिः-दासादिनीचस्थानोत्पत्तिभिरुपर्युपरिजाताभिः पराजित इति-पराभवं मन्यमानोऽहो! अहमधन्यो यदित्थं नीचाखेव जातिषु पुनः पुनरुत्पन्न इति, 'खलुः' वाक्यालङ्कारे, स चैवंविधः किमित्याह'कासित्ति अकार्षीत् , किमित्याह-निदान' चक्रवर्चिपदावाप्तिर्मम भवेदित्येवमात्मक 'तुः' पूरणे, केदं कृतवान् ? दाइत्याह-'हत्थिणपुरंमि'त्ति हस्तिनागपुरे, चुलन्यां ब्रह्मदत्तः 'उववण्णोत्ति उत्पन्नः 'पभगुल्मात्' इति नलिनगुल्मवि दीप अनुक्रम [४०७] m inem Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~252~ Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३३५...] प्रत सूत्रांक ||१|| उत्तराध्य. मानाच्युत्येति शेषः, इति सूत्राक्षरार्थः ॥ भावार्थस्त्वयम्-स हि ब्रह्मदत्तः पूर्वजन्मनि वाराणस्या संभूतनामा चण्डाल-चित्रसंभू श्चित्रश्च तज्ज्येष्ठ आसीत् , तत्र च नमुचिनामा ब्राह्मणो ममान्तःपुरमपधर्षितमनेनेत्युत्पन्नकोपेन राज्ञा समर्पितो, बृहद्वृत्तिः मारणनिमित्तं मातङ्गाधिपस्य तत्पितुः, उक्तश्चायमेतेन-यदि मत्सुती सकलकलाकलापकुशली विधत्से ततोऽस्ति ॥३७६॥ ते जीवितमन्यथा नेति, प्रारब्धं च तदर्थनाऽनेन तह एवातिगुप्तस्थानस्थितेन तदध्यापनं, ग्राहितो तो व्याक रणवीणापुरःसराः सफला अपि कलाः, अन्यदा च शुश्रूषापरायां तन्मातरि मोहोदयादयमुपपतित्वमाजगाम, ज्ञातस्तजनकेन, इष्टश्च मारयितुं, ज्ञातं तत्ताभ्यां, ज्ञापितं चास्मै, उपाध्यायोऽयमावयोस्त तो मा भूदस्यापदिति, तदव गमाच पलायितोऽसौ ततः स्थानात्, प्रासो हस्तिनागपुरं, कृतः सनत्कुमारचक्रवर्त्तिना मन्त्री । इतश्च ती चित्रदिसंभूतौ सातिशयगीतकलाक्षिततरुणीजनात्यासक्तिहेतुतया त्याजितस्पृश्यास्पृश्य विभागौ जनेन राज्ञे निवेदिती, यथा विनाशितं नगरमाभ्यां, निषिद्धस्तेन नगरस्थान्तस्तत्प्रचारः, कदाचिच तावतिकुतूहलतया कौमुदीमहविलोकनार्थमागतो, दृष्टी जनेन, कदर्थितावत्यर्थ, प्रवत्रजतुश्च तत एवोत्पन्नवैराग्यौ, जाती विकृष्टतपोनिष्टप्तदेही, प्रासाश्चाभ्यां हातेजोलेश्यादिलब्धयः, समापत्तितश्च गतौ हस्तिनागपुरं.प्रविष्टो मासक्षपणपारण के तत्र भिक्षार्थ संभूतयतिः, दृष्टश्च नमु].3 दचिना, जातोऽस्य चेतसि दुरध्यवसायो-महश्चरितमयं प्रकाशयिष्यतीति, निर्भत्सितो-धिग मुण्ड चाण्डाल! क नगर स्वान्तःप्रविष्टोऽसि? इत्यादिनिष्ठरवचोभिः, प्रहत इष्टकोपलशकलादिभिस्तत्परिजनेन, तदनु च समस्तलोकन, दीप अनुक्रम [४०७] SAMEditatam intamatuna FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~253 Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३३५...] (४३) प्रत सूत्रांक ||१|| कुपितश्चासौ तेभ्यः समस्तजनदहनक्षमामसह्यतेजोलेश्यां मोक्तुमुपचक्रमे, तत्र च मुखविनिर्यबहलधूमपटलान्धकारितदिकचक्रवाले व्याकुलितः सान्तःपुरः सनत्कुमारचक्रवर्ती सकलो नगरलोकश्च समायातस्तत्पार्थे, तद्वृत्तान्तश्रवणतश्चित्रश्च, प्रारब्धस्तैरनेकधा सान्त्वनवचनैरुपशमयितुं, तथापि तत्रात्मानमस्मरत्यतिकोपवशगे भगवति मा भूदस्माकमकस्माद्भस्मीभवनमिति स्त्रीरत्नसहितो महीपतिस्तं क्षमयाम्बभूव, यथा-भगवन् ! क्षमितव्यमस्माकमिदमिति, अस्मिंश्चान्तरे स्त्रीरत्नकोमलालकस्पर्शसमुत्पन्नतदभिलाषो विगलितानुशयश्चाण्डालजातिरेव ममैवमनेकधा कदर्थनाहेतुरिति चिन्तयश्चित्रयतिना निवार्यमाणोऽपि यदि ममास्य तपसः फलमस्ति तदाऽन्यजन्मनि चक्रवर्तित्वमेव । मम भूयाद् येनाहमप्येवं ललितललनाविलासास्पदमुत्तमजातिश्च भवामीति निदानवशगोऽनशनं प्रपेदे । ततः सदा तपोऽनुभावतो नलिनगुल्मविमाने वैमानिकत्वेनाजनि, ततश्च च्युतश्शुलन्यां ब्रह्मदत्तः समुत्पेदे । क ? इत्साह कंपिल्ले संभओ। है 'काम्पिल्य' इति पञ्चालमण्डलस्य तिलक इव काम्पिल्यनाम्नि नगरे 'संभूत' इति पूर्वजन्मनि संभूतनामा । अमुं पादमतिकान्तसूत्रोत्तरपादद्वयं चैतद्गदितार्थप्रसङ्गायातार्थान्तराभिधानद्वारतः स्पृशन् सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिमाह नियुक्तिकृत् दीप अनुक्रम [४०७] SamEdicatonmannadiand For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~254 Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३३६-३३८] 4 प्रत सूत्रांक उत्तराध्य. राया य तत्थ बंभो कडओ तइओ कणेरदत्तोत्ति । राया य पुप्फचूलो दीहो पुण होइ कोसलिओ ॥३३६चित्रसंभूबृहद्धत्तिःएए पंच वयंसा सवे सह दारदरिसिणो भोच्चा । संवच्छरं अणूर्ण वसंति इक्किक्करजंमि ॥ ३३७ ॥ तीयाध्य. राया य बंभदत्तो धणुओ सेणावई अवरधणुओ। इंदसिरी इंदजसा इन्दुवसु चुलणिदेवीओ ॥ ३३८॥ ॥३७७॥ राजा च तत्र पाञ्चालेषु काम्पिल्ये 'ब्रह्म इति ब्रह्मनामा कासीजनपदाधिपः कटकस्तृतीयः कुरुषु गजपुराधिपतिः कणेरुदत्त इति राजा च अङ्गेषु चम्पाखामी पुष्पचूलो यः किल ब्रह्मपल्याश्शुलिन्या भ्राता, 'दीर्घ' इति दीर्घ-12 &ापृष्ठः पुनर्भवति कोशलिकः साकेतपुराधिपतिः। एतेऽनन्तरोक्ताः पञ्च वयस्याः 'सर्वे' समस्ताः सह दारान् पश्य-14 न्तीत्येवंशीलाः सहदारदर्शिनः, किमुक्तं भवति :-एककालकृतकलत्रस्वीकाराः समानवयस इतियावत् 'भोचति है भूत्वा संवत्सरं वर्षम् 'अन्यूनं' परिपूर्ण 'वसन्ति' आसते, तत्कालापेक्षया वर्तमानता, 'एकैकराज्ये' एकैकसंव-2 ट्रान्धिनि नृपतित्वे । एष तावद्गाथाद्वयार्थः, तृतीयगाथा तु तात्पर्यतो व्याख्यायते-ब्रह्मराजस्वेन्द्रश्रीप्रमुखाश्चतस्रो| देव्यः, तत्र च चुलन्याः पुत्रोऽजनि, धनुर्नाम्नः सेनापतेरपि तत्रैवाहनि सुतः समुदपादि, कृतानि द्वयोरपि मङ्गल-18|| कौतुकानि, दत्तानि च दीनानाथेभ्यो दानानि, विहितं च खसमये राजपुत्रस्य ब्रह्मदत्त इति नाम, इतरस्यतु सवरधनुरिति, कालक्रमेण च जातो कलाग्रहणोचितौ, माहिती सर्वा अपि कलाः, अस्मिंश्चान्तरे मरणपर्यवसान दीप अनुक्रम [४०७] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~255 Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३३६-३३८] प्रत सूत्रांक ||१|| तया जीवलोकस्य मृतो ब्रह्मराजः, कृतमौ देहिकम् , अतिक्रान्तेषु च कतिपयदिनेषु तद्वयस्यैरभिषिक्तो राज्ये ब्रह्मदत्तः, पर्यालोचितं च तैः-यथैष नाद्यापि राज्यधुराधरणधीरेय इति पालयितुमुचितः कतिचित्संवत्सराणि, निरोपितस्तैस्तत्र दीर्घपृष्ठः, गताः खस्वदेशेषु कटकादयः, जातश्च सर्वत्राप्रतिहतप्रवेशतया दीर्घपृष्ठस्य सह चुलन्या सम्बन्धः, ज्ञातं चैतदन्तःपुरपालिकया, न्यवेदि च तया धनुर्नाम्नः सेनापतिमत्रिणः सकलमपि तद्वृत्तं, निरूपितस्तेन वरध-2/ नुर्यथा न कदाचित्कुमारस्त्वया मोक्तव्य इति, आरब्धश्चासौ तथैवानुष्ठातुम् , अन्यदा चायं विदितदीर्घपृष्ठचुलनी-1 वृत्तान्तः केनचिदुपायेनामू निवारयामीति विजातिशकुनिकसङ्ग्रहणकमानीय कुमारायोपनिन्ये, तचातिनियमित-11 मादायान्तःपुरस्वान्तः किलान्योऽपि य एवं दुष्टशीलः सोऽस्माभिरित्थं नियत्रणीय इति तो खयं खसहचरैश्च डिम्भरुद्घोषयन्तौ प्रतिदिनमितश्चेतश्च भ्रमितुमारब्धी, उपलब्धं च तत्ताभ्यामनुष्ठीयमानं दीर्घपृष्ठेन, कुपितश्चासौ कुमाराय, भणिता च चुलनी-यथाऽयमुपायेन केनापि विनाश्यतां यतो न विषकन्दल इथप उपेक्षितः क्षेमरोऽस्माकं भवितेति, प्रतिपन्नं च तत्तया दुरन्ततया मोहोदयस्य, निरूपितश्च ताभ्यामुपाय:-यथाऽस्मै पुष्पचूलमातुलेन खदुहिता पुष्पचूला नाम पूर्वदत्तेति तामसौ परिणाय्यते, कार्यते चैतच्छयनाय जतुगृहम् , एतच्च तन्मत्रितमशेषमपि तधैवान्तःपुररक्षिकया निवेदितं धनोः, तेनापि विनष्टमेतदिति पर्यालोच्य कुमारसंरक्षणाय प्रयत्नः कर्तुमुपचक्रमे, तथाहि-पृष्टोऽसावनेन दीर्घपृष्ठो यथा वयमिदानी वृद्धास्तत्किमिदानीमपरेण ?, युष्माभिरनुज्ञाता धर्ममेवैतत्कालो दीप अनुक्रम [४०७] SamEducatamintamatunal FaPROTHERwatatuwant पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~256~ Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३३६-३३८] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक - उत्तराध्य. चितं कुर्मः, तेनालोचित-यथैष दुरात्मा दूरस्थो न सुन्दर इति, उक्तश्च-यथैतत्वद्रहितमखिलमपि राज्यं विनश्य-चित्रसंभ सत्यत इहैव स्थितो जपहोमदानादिभिर्धर्ममुपचिनु, तेन चोक्त-यदादिशन्ति भवन्तः, इत्युक्त्वा च गतः खगृह, कारित चानेन भागीरथ्यास्तटे खनिवासस्थान, निरूपितं तत्र सत्रं, खानिता च तत्र प्रत्सयिकपुरुपैर्जतुगृहं यावत्सुरङ्गा, ज्ञापि-11 तीयाध्य. ॥३७८॥ ताऽसी वरधनोः, इतश्च गणितं तत्परिणयनलझं, निष्पन्नं च जतुगृह, प्रेषिता च मत्रिवचनतोऽन्यैव कन्यका मातुलेन, समागतो लग्मदिनः, कृतं सर्वसमृद्धयोपयमनं, शायितश्च रजन्यां जतुगृहे कुमारः, प्रदीपितं च तद्वार एव सुप्तजनायां |रजन्यां, ज्ञातं चासन्नस्थितेन वरधनुना, उत्थापितः कुमारो, दृष्टं च सर्वतः प्रदीप्तमेतेन, उक्तश्च वरधनु:-मित्र ! किमिहदानी क्रियतामिति, तेनोक्त-मा भैपीः, यतः प्रतिविहितमत्र तातेन, अत्रान्तरे चागतं नागकुमारद्वयानुकारि भुवनमु|द्भिद्य पुरुषद्वयम् , अभ्यधाच तत्-मा भैष्टाम् , आवां हि धनोहजातौ दासचेटको, तक्रियतां प्रसादो, निर्गम्यतां सुरङ्गामार्गेण, इत्युक्तौ च तो गतौ सुरङ्गाद्वारं, दृष्टं च तत्र प्रधानमथद्वयम् , उक्तं च ताभ्यां चेटकाभ्याम्एतावारुख देशान्तरापक्रमणेनात्मानं रक्षतां दीर्घपृयाद्भयन्तौ यावत्कचिदवसरः शुभो भवति, ततस्तद्वचनमाकार्य कि किमेतत् ? इत्याकुलितचेतसो ब्रह्मदत्तस्य कथितः सर्वोऽपि वरधनुना चुलनीवृत्तान्तः, अभिहितं च-यथेदमेवेदानी है ॥३७८॥ प्राप्तकालमिति, विनिर्गती च तत्प्रधानमश्वयुगलमारुखेति तृतीयगाथातात्पर्यार्थः । एवं च प्राप्तावसरा प्रदत्तहिण्डी, ततस्तत्र ये कन्यालाभा ये च तत्पितरस्तदुपदर्शनाय गाथापञ्चकमाह -- दीप अनुक्रम [४०७] -%82-*- -82-% 2 +% 4 4 SamEducation inematoint For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~257 Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक |||| दीप अनुक्रम [४०७ ] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१|| निर्युक्ति: [३३९-३४३] अध्ययनं [१३], | चित्तेअ विज्जुमाला विज्जुमई चित्तसेणओ भद्दा । पंथग नागजसा पुण कित्तिमई कित्तिसेणो य ॥ ३३९ ॥ देवी अ नागदत्ता जसवइ रयणवइ जक्खहरिलो य । वच्छी अ चारुदत्तो उसभो कच्चाइणी य सिला ३४० धणदेवे वसुमित्ते सुदंसणे दारुप य निअडिले । पुत्थी पिंगल पोए सागरदत्ते अ दीवसिहा ॥ ३४१|| कंपिल्ले मलयवई वणराई सिंधुदत्त सोमा य । तह सिंधुसेण पज्जुन्नसेण वाणीर पइगा य ॥ ३४२ ॥ हरिएसा गोदत्ता कणेरुदत्ता कणेरुपगा य । कुंजरकणेरुसेणा इसिवुड्डी कुरुमई देवी ॥ ३४३ ॥ इदं च सोपस्कारतया व्याख्यायते - 'चित्रश्व' चित्रनामा जनकस्तदुहितरौ विद्युन्माला विद्युन्मती च, तथा चित्रसेनकः पिता भद्रा च तद्दुहिता, तथा पत्थकः पिता नागजसा कन्यका, पुनः समुचये, तथा कीर्त्तिमती कन्या कीर्त्तिसेनश्च तत्पिता । तथा देवी च नागदत्ता यशोमती रत्नवती च, पिता च सर्वासामपि यक्षहरिलः, 'चः समुघये, वच्छी च कन्या चारुदत्तः पिता, तथा वृषभो जनकः, कात्यायनसगोत्रा तत्सुता शिला नाम । तथा धनदेवो नाम वणिक् अपरश्च वसुमित्रोऽन्यश्च सुदर्शनो दारुकश्च 'निकृतिमान्' मायापरः, चत्वारोऽमी कुकुटयुद्धव्यतिकरे मिठितास्तत्र च पुस्ती नाम कन्यका, तथा पिङ्गला नाम कन्या पोतश्च तत्पिता, सागरदत्तश्च वणिक् तद Education intemational For Parsons Praten पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~258~ Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति: अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३३९-३४३] प्रत सूत्रांक ||१|| उत्तराध्य. अजा च दीपशिखा । तथा काम्पिल्यः पिता मलयवती दुहिता, तथा वनराजी नाम कन्या तजनकश्च सिन्धुदत्तः, चित्रसंभू तथा तस्यैवान्या सोमा च नाम कन्या, तथा सिन्धुसेनप्रद्युम्नसेनयोर्यथाक्रम वानीरनाम्नी प्रतिकाभिधाना चेति, बृहद्वृत्तिः तीयाध्य. पिठ्यते च 'प्रतिभा वे'ति, द्वे दुहितरौ । तथा हरिकेशा गोदत्ता करेणुदत्ता करेणुपदिका च, 'कुंजरकरेणुसेण'ति ॥३७९॥ सेनाशब्दस्य प्रत्येकमभिसंबन्धात्कुञ्जरसेना करेणुसेना च, ऋपिवृद्धिः कुरुमती च देवी सकलान्तःपुरप्रधाना अष्टौ, १ कुरुमती च स्त्रीरत्नं, ब्रह्मदत्तेनायाप्तेति सर्वत्र शेषः, अतिप्रसिद्धत्वाच तदैतजनकनानामनभिधानमिति माथाप| पञ्चकार्थः ॥ अधुना येषु स्थानेषु असौ भ्रान्तस्तान्यभिधातुमाहकंपिल्लं गिरितडगं चंपा हत्थिणपुरं च सायं। समकडगं ओसाणं(नंदोसा)वंसीपासाय समकडगं ॥३४॥ समकडगाओ अडवी तण्हा वडपायमि संकेओ। गहणं वरवणुअस्स य बंधणमकोसणं चेव ॥३४५॥ सोहम्मई अमच्चो देहि कुमारं कहिं तुमे नीओ?। गुलियविरेयणपीओ कवडमओ छड्डिओ तेहिं ॥३४६॥ ॥३७९॥ तं सोऊण कुमारो भीओ अह उप्पहं पलाइत्था । काऊण थेररूवं देवो वाहेसिअ कुमारं ॥ ३४७॥ वडपुरगबंभथलयं वडथलगं चेव होइ कोसंबी। वाणारसि रायगिहि गिरिपुर महरा य अहिछत्ता॥३४॥ -- दीप अनुक्रम [४०७] -- Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~259~ Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक |||| दीप अनुक्रम [४०७ ] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१|| निर्युक्ति: [३४४-३५४] अध्ययनं [१३], विणहत्थी अ कुमारं जणयइ आहरण वसणगुणलुद्धो । वच्चंतो अ पुराओ (वडपुरओ) अहिछत्तं अंतरा गामो गहणं नईकुडंग गहणतरागाणि पुरिसहिअयाणि । देहाणिं पुण्णपत्तं पिअं खु णो दारओ जाओ ॥ ३५० ॥ सुपट्टे कुसकुंडिं भिकुंडिवित्तासिअंमि जिअसत्तू । महुराओ अहिछत्तं वच्चंतो अंतरा लहइ ॥ ३५९ ॥ इंदपुरे रुदपुरे सिवदत विसाहदत्त धूआओ। बहुअत्तणेण लहइ कन्नाओ दुन्नि रजं च ॥ ३५२ ॥ रायगिहमिहिलहत्थिणपुरं च चंपा तहेव सावत्थी। एसा उ नगरहिंडी बोद्धवा बंभदत्तस्स ॥ ३५३ ॥ रयणुप्पया य विजओ वोल्वो दीहरोसमुक्खे य । संभरणनलिणिगुम्मं जाईइ पगासणं चैव ॥ ३५४ ॥ गाथा एकादश, आसामपि तथैव व्याख्या, काम्पिल्यं पुरं यत्रास्य जन्म, ततोऽसौ गतो गिरितटकं सन्निवेशं तस्माचम्पां ततो हस्तिनागपुरं चानन्तरं च साकेतं साकेतात्समकटकं, ततश्च नन्दिनामकं संनिवेशं, ततोऽवश्यानकं नाम स्थानं, ततोऽपि चारण्यं परिभ्रमन् वंशीति-वंशगहनं तदुपलक्षितं प्रासादं वंशीप्रासादं, ततोऽपि समकटकं ॥ समकटकादटवीं तां च पर्यटतो ब्रह्मदत्तस्य तृडतिशयतः शुष्ककण्ठौष्ठतालुताऽजनि ततस्तेनोक्तो वरधनुः- भ्रातः ! | Education Intemational For Persona Prat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~260~ Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३४४-३५४] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३८॥ CCCCX प्रत सूत्रांक ||१|| बाधते मां तृद, तदुपाहर कुतोऽपि जलम् , अत्रान्तरे दृष्टोऽनेन निटकवी वटपादपः, शायितस्तत्र शीतलच्छाये चित्रसंभू. तत्पल्लवोपरचितश्रस्तरे ब्रह्मदत्तः, कृतश्च वरधनुना तेन सह सङ्केतः-यथा यदि मां कथञ्चिदीर्घप्रहितपुरुषाः प्राप्स्यन्ति ततोऽहमन्योक्त्याऽभिज्ञानं करिष्ये, तत इतस्त्वया पलायितव्यमिति, गतोऽसौ जलान्वेषणाय, दृष्टं चैकत्र । तीयाध्य. पद्मिनीखण्डमण्डितं सरः, गृहीतं च पद्मिनीपत्रपुटके जलं, प्रवृत्तस्य च ब्रह्मदत्ताभिमुखमागन्तुं ग्रहणं तहटासन्न- १३ देशे, कथञ्चिदुपलब्धतदपसरणवृत्तान्तैर्दीर्घपृष्ठप्रहितपुरुषैरतिरोषवद्भिर्वरधनोर्वन्धनं वल्लीवितानेन आक्रोशनं चैव दुष्टवचसा कृतं । अन्यच-स हन्यते मुष्टिप्रहारादिभिरमायो-वरधनुः, भण्यते च यथा 'देही ति ढोकय कुमारमरे ! दुराचार ! क पुनरसी नीतस्त्वया राजपुत्र इति ?, अत्रान्तरे सङ्केतमनुसरता पठितमिदमनेन-'सहकारमअरीमनु-12 धावति मधुपो विमुच्य मधु मधुरम् । कमले कलयन् पश्चात्सकोचकृतां खतनुवाधाम् ॥१॥' 'गुलीयविरेयणपी-| तो'त्ति प्राकृतत्वात्पीतविरेचनगुलिकः, स हि संग्रहीतुमुपक्रान्तोऽन्यथाऽऽत्मनो विमुक्तिमनवगच्छन् पूर्वलब्धां विरेचनगुटिकां प्रथममेव पयसा पीतवान् , विरक्तश्च तया, जाताश्च मुखे फेनबुबुदाः, एवं च कपटेन मृतः कप रमतो मृत इति 'छर्दितः' त्यक्तस्तैः । इतच तत्पठितं श्रुत्वा कुमारो 'भीतः' इति त्रस्तः 'अर्थ' अनन्तरम् 'उप्प-IIcon साहति उत्पधन ‘पलायित्थ'त्ति पलायितवान्, तथा च तं पलायमानमवलोक्य कृत्वा स्थविररूपं देवः किमस्य सत्त्व- मस्त्युत नेति परीक्षणार्थ 'वाहेसित्ति वाहितवान् व्यंसितवानित्यर्थः कुमारं । ततश्च परिभ्रमतो बटपुरका दीप अनुक्रम [४०७] SamEducatimotimatent FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~261 Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३४४-३५४] (४३) 5 % प्रत सूत्रांक ||१|| तस्माच ब्रह्मस्थलकं वटस्थलकं चैव भवति विश्रामविषयः कौशाम्बी वाराणसी राजगृहं गिरिपुर मथुरा अहिच्छत्रा दाच । ततोऽपि गच्छताऽरण्यानीं प्रविष्टेन दृष्टास्तापसाः, प्रत्यभिज्ञातश्च तै–झराजस्यास्मन्निजकस्य सुत इति, धृतश्चातुर्मासी, तत्र च तापसकुमारकैः सह क्रीडतैकस्मिन् दिनेऽवलोकितो वनहस्ती, समुत्पन्नं च नृपसुतसुलभमस्य कुतूहलं, प्रारब्धश्च विविधगजशिक्षाभिरमुं खेदयितुं, आरूढश्च निष्पन्दीकृत्य तत्पृष्ठं, प्रवृत्तश्चासौ कुमारापहरगाय, वीक्षितश्च कियदपि दूरं गतेनैकस्तरुः, लग्नश्च तदधो ब्रजति हस्तिनि विटपैकदेशे कुमारः, अपक्रान्ते च 1 करिणि ततस्तरोरुत्तीर्य विमूढदिग्भागो भ्रमितुमारेभे, भ्राम्यंश्चारण्याद्विनिर्गस गतो वटपुरं, बटपुराच प्रस्थितः| श्रावस्ति, गच्छंश्च प्राप्तस्तथाविधमेकमन्तरा ग्राम, उपविष्टश्च तन्निकटविटपिनि विश्रमितुं, दृष्टश्चैकेन तत्रत्यवेष्ठिना, नीतश्च तेन स्वं गृह, कृतं चाभ्यागतकर्त्तव्यं, परिणायितश्च नैमित्तिकादेशतः खदुहितरं, उपचरितश्च भुजगनिदमौकसहशैविविधवसनैर्लग्नेन्द्रनीलादिप्रधानमणिभिः कटककेयूरकुण्डलादिभिश्चाभरणैः, ततस्तद्गुणलुब्धमानसः स्थित|स्तत्रैव कियत्कालं, जनयति तदा त हितरि कुमारं । इतश्च प्राप्ताः कृतान्तानुकारिणो दीर्घपृष्ठप्रहितपुरुषाः, प्रारब्धाः समन्ततस्तमबलोफितुं, उपलब्धतद्वृत्तान्तश्च नष्टस्तद्भयात् , प्रचलितश्च सुप्रतिष्ठपुराभिमुखं गन्तुं, तत्र च मिलितः कश्चिद्विटः कार्पटिको, दृष्टं चाभिमुखमागच्छत् किञ्चित् तथाविधं मिथुनकं, दृष्ट्वा च तदङ्गनां उदाररूपां कुमारमयमवोचत्-यदि युष्मत्प्रसादतः कथञ्चिदेनां कामयेय इति, ततस्तदुपरोधात्तेनोक्त-प्रविश तहि वंशीकुडकं, * दीप अनुक्रम [४०७] SAMEauraimintimational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~262 Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३४४-३५४] -* प्रत सूत्रांक ||१|| उत्तराध्य स्थितः पथि कुमारः प्राप्तं च मिथुनं, उक्तस्तत्पतिः-मदीयं कलत्रमिह गर्भशूलाभ्याहतमास्ते तद्विसर्जय क्षणमेकं चित्रसंभू खकीयपनी, विसर्जिता चासौ तेनानुकम्पापरेण, दृष्टश्च तयाऽसौ, जातस्तस्यापि तदनुरागः, प्रवृत्तं च तयोर्मोह-४ बृहद्वृत्तिः तीयाध्य. नकं, एवं च कियतीमपि येलामतिक्रम्य विनिर्गताऽसौ कुडङ्गात् , उक्तं चात्मानं ख्यापयितुं कुमारं प्रति, यथा-1 ॥३८१॥ गहनं नदीकुडकं ततोऽपि गहनतराण्येव गहनतरकाणि पुरुषहृदयानि भवन्ति, अयं चानेन ध्वनितोऽर्थः-यथा , ४ वयं जानीमः स्त्रीहृदयान्यतिगहनानि भवचित्तेन च तान्यपि जितानीत्युक्त्वा पतिं प्रत्याययितुमाह-'देहाणिन्ति देहीदानीं 'पूर्णपात्रम्' अक्षतभृतभाजनं प्रियं खलु 'नः' अस्माकं यद्दारको जात इति, ते (इति) वक्तव्ये यन्न || इत्युक्तं तदैक्यं द्योतयितुं, इत्युक्त्वा च तया धूर्त्या गृहीतं ब्रह्मदत्तोत्तरीयं, गता च पत्यैव सह, ततश्च निर्गतोऽसौ । कुडङ्गात्कृतपरिहासः प्रवृत्तो गन्तुं, प्राप्तः सुप्रतिष्ठं, तत्र च कुस कुण्डी नाम कन्या 'भिकुंडिवित्तासियंमि जियसत्तुं'ति |आपत्वादुभयत्र सुब्ब्यत्ययः, 'भिकुण्डिवित्रासिताद्' भिकुण्डिनामनृपतिनिष्काशितात् 'जितशत्रो' जितशत्रुनाम-| नृपतेः सकाशान्मथुरातोऽहिच्छत्रां प्रजन् 'अन्तरे' अन्तराले 'लभते' प्राप्नोति । तधेन्द्रपुरे शिवदत्तो नाम रुद्रपुरे च है। ४विशाखदत्ताभिधानम्तहुहितरौ 'बटुकत्वेन' दीर्घपृष्ठपुरुषभीत्या कृतब्राह्मणवेषेण लभते कन्ये द्वे राज्यं च । ततो राज-IP॥३८॥ गृहं मिथिला हस्तिनागपुरं चम्पां तथैव श्रावस्तीम् , अभ्रमीदिति शेषः 'एषा तु' अनन्तरमुपदर्शिता नगरहिण्डि-18 वोद्धच्या ब्रह्मदत्तस्येति ॥ एवं च भ्रमतोऽस्य मिलिताः कटककरेणुदत्तादयः पितृवयस्याः, गृहीताः कियन्तोऽपि - दीप अनुक्रम [४०७] SamEditatammamerand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~263~ Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||२|| नियुक्ति: [३४४-३५४] प्रत सूत्रांक ||२|| प्रत्यन्तराजानः, समुत्पन्नं चक्ररत्नं, प्रारब्धस्तदुपदर्शितमार्गेण दिग्विजयः, प्राप्तः काम्पिल्ये, निर्गतस्तदभिमुखं दीर्घपृष्ठो, लग्नमनयोरायोधनं, विनिपातितोऽसौ ब्रह्मदत्तेन, एवं च बोद्धव्यस्तस्य दीर्घपृष्ठविषयरोपमोक्षश्च, अत्रान्तरे मिलिताः परिणीतकन्यापितरः, समुत्पन्नानि च यथाऽवसरं शेषरत्नानि, साधितं षट्रखण्डमपि भरतं, प्राप्ताश्च नवापिर निधयः, परिणतं चक्रवर्तिपदं, एवं च सुकृतफलमुपभुञ्जतोऽतिक्रान्तः कियानपि कालः, अन्यदा चोपनीतं देवतया मन्दारदाम, समुत्पन्नं तद्दर्शनादस्य जातिस्मरणं-अनुभूतानि मयैवंविधकुसुमदामानि, अहं हि नलिनगुल्मवि-2 माने देवोऽभवं ॥ इत्येकादशनियुक्तिगाथार्थः । इत्थं तावत्काम्पिल्ये संभूतश्चक्रवर्ती जातः, चित्रस्य तु का वार्तेत्याह चित्तो पुण जाओं पुरिमतालंमि । सिट्टिकुलंमि विसाले धम्म सोऊण पञ्चइओ॥२॥ पादत्रय, चित्रः पुनर्जातः पुरिमताले, स हि चित्रनामा महर्षिः तत्र संभूतिनाम्नि भ्रातरि तथाऽनशनं प्रतिपन्नवत्यहो दुरन्तो मोहश्चित्रा कर्मपरिणतिश्चञ्चलं चित्तमित्यादि विचिन्त्य चतुर्विधमप्याहारं प्रत्याख्यातवान् , मृत्वा च पण्डितमरणेन समुत्पन्नस्तत्रैव नलिनगुल्मनाम्नि विमाने, ततस्तत्र खस्थितिमनुपाल्योत्पन्नः पुरिमतालपुरे, तत्रापि केत्याह-'श्रेष्टिकुले' वणिकप्रधानान्वये 'विशाले' विस्तीर्णे पुत्रपौत्रादिवृद्धिमति, प्रासवयाश्च तथाविधस्थविरसन्निधौ । दीप अनुक्रम [४०८] Faramaarwatatuwant पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~264~ Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||3|| दीप अनुक्रम [ ४०९ ] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३८२|| [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||३|| निर्युक्ति: [३५५] अध्ययनं [१३], 'धर्म' यतिधर्म क्षान्त्यादिकं 'श्रुत्वा' आकर्ण्य 'प्रत्रजितः प्रव्रज्यां प्रतिपन्नवान् इति सूत्रभावार्थः ॥ ततः किमित्याह कंपिल्लुंमि अनयरे समागया दोऽवि चित्तसंभूया । सुहदुकखफल विवागं कहिंति ते इकमिकस्स ॥ ३ ॥ काम्पिल्ये च नगरे - ब्रह्मदत्तोत्पत्तिस्थाने 'समागतौ' मिलितौ द्वावपि चित्रसंभूतौ जन्मान्तरनामतः 'सुखदुःखफलविपार्क' सुकृतदुष्कृतकर्मानुभवरूपं 'कहति'ति कथयतः स्मेति शेषः, ततश्च कथितवन्तौ तौ चित्रजीवयतिब्रह्मदत्तो 'एकमेकस्स' ति एकैकस्य परस्परमितियावत् इति सूत्राक्षरार्थः ॥ भावार्थस्तु निर्युक्तिकृतोच्यतेजाईइ पगास निवेयणं च जाईपयासणं चित्ते । चित्तस्स य आगमणं इहिपरिचागसुतत्थो ॥ ३५५ ॥ तदा हि ब्रह्मदत्तो जातिस्मरणोपलब्धस्वजातीनां 'दासा दसन्नये आसी' इत्यादिना सार्द्धश्लोकेन जनाय प्रका शनं निवेदनं च य इमं द्वितीयश्लोकं पूरयति तस्मै राज्यार्द्धमहं प्रयच्छामीति विहितवान् ततस्तदर्थिना जनेनोद्धुप्यते, तद् ग्रामनगराकारादिषु पठ्यमानं चाकर्णितं कर्ण्यपकर्ष्या चित्रजीवयतिना, ततस्तथाविधज्ञानातिशयोउपयोगतः स्वजातीरुपलभ्य जातोऽस्याभिप्रायो यथा - गत्वा तं जन्मान्तरनिजभ्रातरं संभूतजीवमववोधयामीति, प्रस्थितस्ततः स्थानात् प्राप्तः क्रमेण काम्पिल्यं, स्थितस्तद्वहिरुद्याने, श्रुतश्वारपट्टिकपरिपठ्यमानः सार्द्धश्लोकः, पूरितश्चानेन द्वितीयश्लोकः, अवधारितश्चारघट्टिकेन, धावितवासी नृपसकाशं राज्यलोमेन, पठितं चैतेन तत्पुरतः, Education intematonal For Parana Prat चित्रसंभू तीयाध्य १३ ~265~ ॥ ३८२॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||3|| दीप अनुक्रम [ ४०९ ] Educato [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||३|| निर्युक्ति: [३५५...] अध्ययनं [१३], परिपूर्ण लोकद्वयं जातस्तदाकर्णनात्तस्य चित्तावेशः, निरुद्धश्च तज्जनितमूर्च्छयाऽऽश्वासमार्गो, निमीलितं लोचनयुगलं, लुठितः स आसनात्, निपतितो भुवि, किमेतत् किमेतदित्यादिनाऽऽकुलितः सर्वोऽपि तत्परिच्छदः, दृष्टश्व तेनारघट्टिकः, ताडितः पाणिप्रहारादिभिः, आरटितमेतेन न मयैतत्पूरितं न मयेति, किन्त्वन्येनैव भिक्षुणैतत्कलिकन्दमूलेनेति, अत्रान्तरे लब्धा चेतना, प्राप्तं च स्वास्थ्यं चक्रवर्त्तिना, उक्तं च-कासौ लोकपूरयिताssस्त इति ?, कथितस्तद्व्यतिकरो यथा - केनचिद् भिक्षुणैतत्पूरितं न त्वमुनेति पृष्टं च पुनरनेन हर्षोत्फुल्लनयनयुगलेन-क तसाविति कथितमारघट्टिकेन देव! मदीयवाटिकायां एतच्चाकर्ण्य प्रचलितः सबलवाहनः सकलान्तःपुरसमन्वितश्च तद्दर्शनाय, प्राप्तस्तदुद्यानं, दृष्टो मुनिः, वन्दितः सबहुमानं, उपवेशितश्चैकासने, पप्रच्छतुः परस्परमनामयं कथयामासतुश्च यथाखमनुभूतसुखदुःखफलविपाकं, तत्कथनानन्तरं च वर्णिता निजसमृद्धिश्चक्रवर्त्तिना, प्ररूपितस्त| द्विपाकदर्शनतस्तत्परित्यागश्चित्रयतिना, एतावानेव प्रस्तुताध्ययन सूत्र स्वार्थोऽभिधेय इति सूत्रनिर्युक्तिगाथयोर्भावार्थः । सम्प्रति यदुक्तं - 'सुखदुःखफलविपाकं तौ कथयामासतुरिति, तत्र चक्रवर्त्ती यथा कथयामास तथा संबन्धपुरस्सरमाह चट्टी महिडीओ, भदत्तो महायसो । भायरं बहुमाणेण, इमं वयणमब्बवी ॥ ४ ॥ आसिमो भायरा दोsवि, अन्नमन्नवसाणुगा । अन्नमन्नमणूरत्ता, अन्नमन्नहिएसिणो ॥ ५ ॥ For Persona Prat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~266~ Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [--1 / गाथा ||४-७|| नियुक्ति: [३५५...] -- प्रत १३ सूत्रांक ||४-७|| उत्तराध्य. दासा दसन्नये आसी, मिआ कालिंजरे नगे । हंसा मयंगतीराए, सोचागा कासिमिए ॥६॥ चित्रसंभू देवा य देवलोगंमि, आसि अम्हे महिडिआ । इमा णो छट्ठिया जाई, अन्नमन्नेण जा विणा ॥ ७॥ बृहद्धृत्तिः तीयाध्य. चक्रवर्ती 'महर्द्धिकः' बृहविभूतिब्रह्मदत्तो महायशाः 'भ्रातरं' जन्मान्तरसोदय 'बहुमानेन' मानसप्रतिवन्धेन 'इदं'। ॥३८३॥ यक्ष्यमाणलक्षणं 'वचनं' वाक्यं 'अब्रवीद्' इत्युक्तवान्, यथा 'आसिमो'त्ति अभूवावां भ्रातरौ द्वावपि 'अन्योऽन्य' परस्परं 'वसाणुग'त्ति वशम्-आयत्ततामनुगच्छन्तौ यो तावन्योऽन्यवशानुगौ, तथा 'अन्योऽन्यमनुरक्तौ' अतीव स्नेहदावन्ती, तथा अन्योऽन्यहितैषिणी' परस्परशुभाभिलाषिणी, पुनः पुनरन्योऽन्यग्रहणं च तुल्यचित्ततातिशयख्यापनार्थ, मकारश्च सर्वत्रालाक्षणिकः । केषु पुनर्भवेष्वित्थमायामभूवेत्याह-दासौ 'दशाणे' दशार्णदेशे 'आसि'त्ति अभूव, मृगौ 'कालिञ्जरे' कालिअरनाम्नि नगे, हंसौ 'मृतगङ्गातीरे उक्तरूपे, 'श्वपाको चाण्डालौ 'कासिभू४/मिए'त्ति काशीभूम्यां काश्यभिधाने जनपदे, देवौ च देवलोके सौधर्माभिधानेऽभूव 'अहो'त्ति आवां महर्द्धि कौन | तु किल्विपिकी, 'इमा में 'त्ति 'इमा णोति वा उभयत्रेयमावयोः पाठयेय पष्ठिका जातिः, कीरशी येत्याह-'अन्नम-| नेणं'ति अन्योऽन्येन परस्परेण या विना, कोऽर्थः -परस्परसाहित्यरहिता, वियुक्तयोर्यकेति भाव इति सूत्रचतु-||॥३८॥ लष्टयार्थः । इत्थं चक्रवर्तिनोक्ते मुनिराह कम्मा नियाणप्पगडा, तुमे राय ! विचिंतिया। तेर्सि फलविवागणं, विप्पओगमुवागया ॥८॥ दीप - अनुक्रम [४१०-४१३] -- -- पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~267 Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||८|| नियुक्ति: [३५५...] (४३) प्रत सूत्रांक ||८|| 'कर्माणि ज्ञानावरणादीनि नितरां दीयन्ते-लूयन्ते दीयन्ते वा खण्ड्यन्ते तथाविधसानुबन्धफलाभावतस्तपः-13 प्रभृतीन्यनेनेति निदानं-साभिष्वङ्गप्रार्थनारूपं तेन प्रकर्पण कृतानि-विहितानि निदानप्रकृतानि, निदानवशनिबद्धानीति योऽर्थः, त्वया राजन् ! विचिन्तितानीति, तद्धेतुभूतार्तध्यानादिध्यानतः कर्माण्यपि तथोच्यन्ते 'तेषाम् | एवंविधकर्मणां फलं चासौ विपाकश्च-शुभाशुभजनकत्वलक्षणः फलविपाकस्तेन, यद्वा कर्माणि-अनुष्ठानानि 'णिया-14 Aणपयड'त्ति निदानेनैव शेषशुभानुष्ठानस्याच्छादितत्वात्प्राग्वत्प्रकटनिदानानि त्वया राजन् ! विचिन्तितानि कृतानी-12 तियावत् , तेषां फलं कमात्कर्म तद्विपाकेन 'विप्रयोग' विरहं 'उपागतो' प्राप्ती, किमुक्तं भवति ?-यत्तदा त्वयाऽ-12 स्मन्निवारितेनापि निदानमनुष्ठितं तत्फलमेतद् यदावयोस्तथाभूतयोरपि वियोग इति सूत्रार्थः ॥ इत्थमवगतवियो-2 गहेतुश्चक्री पुनः प्रश्नयितुमाह सच्चसोअप्पगडा, कम्मा भए पुरा कडा । ते अज परिझुंजामो, किं नु चित्तेवि से तहा॥९॥ सत्यं-मृपाभाषापरिहाररूपं शौचम्-अमायमनुष्ठानं ताभ्यां प्रकटानि-प्रख्यातानि कर्माणि-प्रक्रमाच्छु-४ भानुष्ठानानि शुभप्रकृतिरूपाणि वा मया पुरा कृतानि, यानीति गम्यते, तानि 'अद्य' अस्मिन्नहनि, शेषतद्भवकालोपलक्षणं चैतत् 'परिभुंजामो'त्ति परिभुओ-तद्विपाकोपनतस्त्रीरत्नादिपरिभोगद्वारेण वेदये, यथेति गम्यते, किमिति | प्रश्ने, 'नु' इति वितर्के, 'चित्रोऽपि' चित्रनामाऽपि, कोऽर्थः?-भवानपि 'से' इति तानि तथा परिभुझे ?, नैव मुझे, दीप अनुक्रम [४१४] SOMEdirade IN . FoPROTESriwaatimall पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~268~ Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||९|| नयुक्ति : [३५५...] वृहदृत्तिः तीयाध्य. ॥३८४॥ प्रत सूत्रांक ||९|| उत्तराध्य. भिक्षुकत्वाद्भवतः, तथा च किमिति भवताऽपि मयैव सहोपार्जितानि शुभकर्माणि विफलानि जातानीत्याशय इति चित्रसंभूद सूत्रार्थः ॥ मुनिराह सब्वं सुचिपणं सफल नराणं, कडाण कम्माण न मुक्खु अस्थि । अत्थेहि कामेहि अ उसमेहिं, आया ममं पुण्णफलोववेओ॥ १०॥ जाणाहि संभूय! महाणुभाग, महिहियं पुण्णफलोववेयं । चिसपि जाणाहि तहेव राय !, इड्डी जुई तस्सवि अप्पभूआ ॥ ११ ॥ महत्थरूवा चयणप्पभूया, गाहाणुगीया नरसंघमज्झे। जंभिक्खुणो सीलगुणोववेया, इहलयंते समणोऽम्हि जाओ॥१२॥ 'सर्व' निरवशेष 'सुचीण' शोभनमनुष्ठितं, तपःप्रभृतीति गम्यते, चीर्णशब्दस्य 'सुचीर्ण प्रोपितत्रत'मित्यादिरूढितः साधुत्वं, सह फलेन वर्तत इति सफलं, नराणामिति, उपलक्षणत्वादशेषाणामपि प्राणिनां, किमिति ?, यतः कृतेभ्यः-अर्थादवश्यवेद्यतयोपरचितेभ्यः कर्मभ्यो न 'मोक्षः' मुक्तिरस्तीति ददति हि तानि निजफलमवश्य-18|॥३८॥ मिति भावः, प्राकृतत्वाच सुव्यत्ययः, स्यादेतत्-त्वयैव व्यभिचार इत्याह-'अथैः' द्रव्यैरथैर्वा-प्रार्थनीयैः, वस्तु-| भिरिति गम्यते, कामेश्व-मनोजशब्दादिभिः 'उत्तमैः' प्रधानः, लक्षणे तृतीया, तत एतदुपलक्षितः सन्नात्मा मम दीप अनुक्रम [४१५] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~269~ Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१०-१२|| नियुक्ति: [३५५...] प्रत सूत्रांक ||१० -१२|| पुण्यफलेन-शुभकर्मफलेनोपपेतः-अन्वितः स पुण्यफलोपपेतः इति ॥ यथा त्वं 'जानासि' अवधारयसि 'संभूत । पर्वजन्मनि संभताभिधान ! 'महानुभाग बृहन्माहात्म्यं 'महर्द्धिक' सातिशयविभूतियुक्तम् अत एव पुण्यफलो-11 दिपेतं चित्रमपि 'जानीहि' अवबुद्ध्यख तथैव' अविशिष्टमेव 'राजन्! नृप!, किमित्येवमत आह-ऋद्धिः-सम्पत् द्युतिः-11 दीप्तिस्तस्यापीति-जन्मान्तरनामतश्चित्राभिधानस्य, ममापीति भावः, चशब्दो यस्मादर्थे, ततो यस्मात्प्रभूता-बदीत्यर्थः, यद्वाऽऽत्मा मम पुण्यफलोपेत इति, अनेन चित्र एवात्मानं निर्दिशति, तथा जानीहि संभूत इत्यादी आत्मेत्यनुवर्तते, अर्थवशाच विभक्तिपरिणामः, ततश्चैवं योज्यते-हे संभूत ! यथा त्वमात्मानं महानुभागादिविहै शेषणविशिष्टं जानासि तथा चित्रमपि जानीहि, चित्रनाम्रो ममापि गृहस्थभावे एवंविधत्यादेवेति भावः, शेष प्राग्वत् ॥ यदि तवाप्येवंविधा समृद्धिरासीत् तत्किमिति प्रबजित इत्याह-महान्-अपरिमितोऽनन्तद्रव्यपर्यायात्मकतयाऽर्थः-अभिधेयं यस्य तन्महाथै रूप-खरूपं न तु चक्षुायो गुणः, ततो महार्थ रूपं यस्याः सा तथा, महतो वाऽर्थान-जीवादितत्त्वरूपान् रूपयति-दर्शयतीति महार्थरूपा, 'वयणप्पभूय'चि वचनेन अप्रभूता अल्पभूता वा-अल्पत्वं प्राप्ता वचनाल्पभूता वचनात्प्रभूता वा स्तोकाक्षरेतियावत्, केयमीरशीत्याह-गीयत इति गाथा, सा चेहार्थाद्धर्माभिधायिनी सूत्रपद्धतिः, अन्विति-तीर्घकृद्गणधरादिभ्यः पश्चाद्गीता अनुगीता, कोऽर्थः ?-तीथेकरादिभ्यः श्रुत्वा प्रतिपादिता स्थविरैरिति शेषः, अनुलोमं वा गीताऽनुगीता, अनेन श्रोत्रनुकूलैच देशना क्रियत है। दीप अनुक्रम [४१६-४१८] SamEducation international पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~270~ Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१०-१२|| नियुक्ति: [३५५...] (४३) प्रत सूत्रांक **** इति ख्यापितं भवति । केल्याह-नराणां-पुरुषाणां सः-समूहस्तन्मध्ये, गाथामेव पुनर्विशेषयितुमाह-'या' उत्तराध्य. द गाथां 'भिक्षवः' मुनयः शीलं-चारित्रं तदेव गुणः, यद्वा गुणः पृथगेव ज्ञानं, ततः शीलगुणेन शीलगुणाभ्यांतीयाध्य. बृहद्वृत्तिः वा-चारित्रज्ञानाभ्यामुपेताः-युक्ताः शीलगुणोपेताः 'इह' अस्मिन् जगति 'अञ्जयते'त्ति अर्जयन्ति पठनश्रवणत॥३८५॥ दानुष्ठानादिभिरावर्जयन्ति । यद्वा 'जं भिक्खुणों' इत्यत्र श्रुत्वेति शेपः, ततो यां श्रुत्वा 'जयंत'त्ति 'इह' अस्मिन् जिनप्रबचने 'यतन्ते' यत्नवन्तो भवन्ति, सोपस्कारत्वात्सा मयाऽप्याकर्णिता, ततः 'श्रमणः' तपखी अस्मि अहं। जातो, न तु दुःखदग्धत्वादिति भावः, पठ्यते च-'सुमणो'त्ति सुमनाः शोभनमना इति सूत्रत्रयार्थः ॥ इत्थं । | मुनिनाऽभिहिते ब्रह्मदत्तः स्वसमृद्धया निमन्त्रयितुमाह उच्चोभए महुकक्के य यंभे, पवेइया आवसहा य रम्मा। इमं गिहं वित्तघणप्पभूयं, पसाहि पंचालगुणोववेयं ॥१३॥ नहेहि गीएहि य वाइएहिं, नारीजणाहिं परिचारयंतो। ॥३८५॥ मुंजाहि भोगाई इमाई भिक्खू, मम रोअई. पब्वज्जा हु दुक्खं ॥१४॥ उच्चोदयो मधुः कर्कः, चशब्दान्मध्यो ब्रह्मा च पञ्च प्रधानाः प्रासादाः प्रवेदिताः, मम वर्द्धकिपुरःसरैः सुरैरुप-2 नीता इत्यर्थः, 'आवसथाच' शेषभवनप्रकारा 'रम्याः' रमणीयाः, पाठान्तरतश्च आवसथाः अतिरम्याः-मुरम्या -१२|| - % - % - दीप अनुक्रम [४१६-४१८] 82-%% SamEducatolitntimaana Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~271 Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1] / गाथा ||१३-१४|| नियुक्ति: [३५५...] (४३) -% % % प्रत सूत्रांक ॥१३ % -१४|| वा, एते तु यत्रैव चक्रिणे रोचते तत्रैव भवन्तीति वृद्धाः, किञ्च-'इदं प्रत्यक्षं 'गृहम्' अवस्थितप्रासादरूपं वित्तप्रतीतं तच्च तद्धनं च-हिरण्यादि तेनोपेतं-युक्तं वित्तधनोपेतं, पठन्ति च 'चित्तधणप्पभूय'ति, तत्र प्रभूतं-बहु । चित्रम्-आश्चर्यमनेकप्रकारं वा धनमस्मिन्निति प्रभूतचित्रधनं, सूत्रे तु प्रभूतशब्दस्य परनिपातः प्राग्वत्, 'प्रसाधि' प्रतिपालय पञ्चाला नाम जनपदस्तस्मिन् गुणा-इन्द्रियोपकारिणो रूपादयस्तैरुपेतं पञ्चालगुणोपेतं, किमुक्तं भवति?-2 पञ्चालेषु यानि विशिष्टवस्तूनि तान्यस्मिन् गृहे सर्वाण्यपि सन्ति, तदा पञ्चालानामत्युदीर्णत्वात्पञ्चालग्रहणम् , दि अन्यथा हि भरतेऽपि यद्विशिष्टवस्तु तत् तदेह एव तदासीत् ॥ किं च णटेहिं ति द्वात्रिंशत्पात्रोपलक्षितै व्यैर्नृत्य -विविधाङ्गहारादिस्वरूपैर्गीतैः-ग्रामखरमूर्च्छनालक्षणैः, चस्य भिन्नक्रमत्वात् , 'वाइएहिति वादित्रैश्च मृदगमुकुन्दादिभिः 'नारीजनान्' स्त्रीजनान् 'परिवारयन्' परिवारीकुर्वन् , पठ्यते च-'पवियारियंतो ति प्रविचारयन् । सेवमानो, 'भुआहित्ति भुल भोगानिमान्-परिदृश्यमानान् , सूत्रत्वात् सर्वत्र लिङ्गव्यत्ययः, भिक्षो !, इह तु यद्गजतुरङ्गमाद्यनभिधाय स्त्रीणामेवाभिधानं तत् स्त्रीलोलुपत्वात्तस्य, तासामेव वाऽत्यन्ताक्षेपकत्वख्यापनार्थ, कदाचिचित्रो विदेदित्यमेव सुखमित्याह-मह्यं रोचते' प्रतिभाति प्रव्रज्या, 'हुः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च, दुःखमेव, न मनागपि है सुखं, दुःखहेतुत्वादिति भाव इति सूत्रद्वयार्थः । इत्थं चक्रिणोक्ते मुनिः किं कृतवान् ? इत्याह % % दीप अनुक्रम [४१९-४२०] %% % SamEducatan intemarama पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~272 Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||१५|| नियुक्ति: [३५५...] बृद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||१५|| उत्तराध्य. तं पुवनेहेण कयाणुरागं, नराहिवं कामगुणेसु गिर्छ । चित्रसंभूधम्मस्सिओ तस्स हियाणुपेही, चित्तो इमं वयणमुदाहरित्या ॥१५॥ "तं' अमदत्तं 'पूर्वलेहेन' जन्मान्तरप्ररूढप्रणयेन 'कृतानुराग' विहिताभिष्वङ्गं 'नराधिपं राजानं 'कामगुणेपुतीयाध, ॥३८॥ अभिलष्यमाणशब्दादिषु 'गृद्धम्' अभिकासान्वितं 'धर्माश्रितः' धर्मस्थितः 'तस्य' इति चक्रिणः हितं-पथ्यम् । ४ अनुप्रेक्षते-पर्यालोचयतीत्येवंशीलो हितानुप्रेक्षी-कथं नु नामास्य हितं स्यादिति विचिन्तनपरश्चित्रजीपयतिरिदं वाक्यं दापाठान्तरतो पचनं या 'उदाहरित्य'त्ति 'उदाहतवान्' उक्तवानिति सूत्रार्थः ॥ किं तदुदाहतवानित्याहसव्वं विलचियं गीयं, सव्वं नई विषणा। सब्वे आभरणा भारा, सच्चे कामा दुहावहा ॥ १६ ॥ बालाभिरामेसु दुहावहेसु, न तं सुई कामगुणेसु राय।। विरत्तकामाण तयोधणाणं, जं भिक्खुणं सीलगुणे रयाणं ॥१७॥ 'सर्वम्' अशेषं विलपितमिव विलपितं निरर्थकतया रुदितयोनितया च, तत्र निरर्थकतया मत्तबालकगीत-17 वत् रुदितयोनितया च विरहावस्थमृतप्रोषितभर्तृकागीतवत् , किमित्याह-'गीतं' गानं, तथा सर्व 'नृत्य' गात्र-3 ॥३८६॥ ४ विक्षेपणरूपं विडम्बितमिव विडम्बितं, यथा हि यक्षाविष्टः पीतमद्यादिवा यतस्ततो हस्तपादादीन् विक्षिपति, एवं है नृत्यन्नपीति, तथा सर्याणि 'आभरणानि' मुकुटाङ्गदादीनि 'भाराः' तत्त्वतो भाररूपत्वात्तेषां, तथाविधवनितामर्तृ-- दीप अनुक्रम [४२१] SamEducatmidamational N anaman.ara पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~273~ Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥१६ -१७|| दीप अनुक्रम [४२२ -४२३] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||१६-१७|| निर्युक्ति: [३५५...] कारितसुवर्ण स्थगित शिलापुत्रकाभरणवत्, सर्वे 'कामाः शब्दादयो 'दुःखावहाः' मृगादीनामिवायतौ दुःखावातिहेतुत्वात्, मत्सरेर्ष्याविषादादिभिश्चित्तन्याकुलत्वोत्पादकत्वान्नरकादिहेतुत्वाच्चेति । तथा बालानां विवेकरहि| तानामभिरामाः - चित्ताभिरतिहेतवो ये तेषु 'दुःखावहेषु' उक्तन्यायेन दुःखप्रापकेषु न तत्सुखं 'कामगुणेषु' मनो| ज्ञशब्दादिषु, सेव्यमानेष्विति शेषः, 'राजन् ।' पृथ्वीपते । 'विरत्तकामाणं'ति प्राग्वत्, कामविरक्तानां विषयपराखानां तप एव धनं येषां ते तपोधनास्तेषां यत्सुखमिति संबन्धः, 'भिक्षूणां' यतीनां शीलगुणयोर्वा सूत्रत्वाद् 'रतानां' आसक्तानामिति सूत्रद्वयार्थः । वालेत्यादिसूत्रं चूर्णिकृता न व्याख्यातं कचित्तु दृश्यत इत्यस्माभिरुन्नीतं ॥ सम्प्रति धर्मफलोपदर्शनपुरःसरमुपदेशमाह Education Intimational नरिंद जाई अहमा नराणं, सोवागजाई दुइओ गयाणं । जहिं वयं सव्वजणस्स वेसा, वसीअ सोवागनिवेसणे ॥ १८ ॥ तीसे अ जाई उ पाविपाए, कुच्छा मु सोवागनिवेसणेसुं । सव्वस्स लोगस्स दुर्गुछणिजा, इहं तु कम्माई पुरेकढाई ॥ १९ ॥ सो दाणि सिं राय ! महाणुभागो महिडिओ पुष्णफलोवेओ । भोगाई असासवाई, आयाणहे अभिनिक्खमाहि ॥ २० ॥ Entre ni पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः For Parsons Privat ~274~ Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||१८-२०|| नियुक्ति: [३५५...] प्रत सूत्रांक ॥१८ -२०|| उत्तराध्य 'नरेन्द्र !' चक्रवर्त्तिन् ! जायन्तेऽस्यामिति जातिः 'अधमा' निकृष्टा 'नराणां' मनुष्याणा मध्ये 'श्वपाकजाति' चित्रसंभूबृहद्वृत्तिः चाण्डालजातिः 'दुहतो'त्ति द्वयोरपि 'गतयोः' प्राप्तयोः, किमुक्तं भवति ?-यदाऽऽवां श्वपाकजातावुत्पन्नौ तदा सर्वज-2 तीयाध्य. नगर्हिता जातिरासीत् , कदाचित्तामवाप्याप्यन्यत्रैवोषितौ स्यातामित्याह-यस्थां, वयं प्राग्वश्च बहुवचनं, सर्वजनस्य ॥३८७॥ अशेषलोकस्य 'द्वेष्यो' अप्रीतिकरी 'वसीय'त्ति अवसाव-उषिती, केषु ?-श्वपाकानां निवेशनानि-गृहाणि || श्वपाकनिवेशनानि तेषु, कदाचित्तत्रापि विज्ञान विशेषादिनाउहीलनीयावेव स्थातामित्याह-तस्यां च जाती श्वपा-15 तकसम्बन्धिन्यां च, 'तुः' विशेषणे, ततश्च जात्यन्तरेभ्यः कुत्सितत्वं विशिनष्टि, पापैव पापिका तस्यां कुत्सितायां, पापहेतुभूतत्वेन वा पापिका तस्यां, प्रापिकायां वा नरकादिकुगतेरिति गम्यते, 'बुच्छे'ति उषिती 'मु' इत्यावां, केपु-वपाकनिवेशनेषु, कीदृशौ ?-सर्वस्य लोकस्य 'जुगुप्सनीयौ' हीलनीयौ 'इह' इत्यस्मिन् जन्मनि 'तुः' पुन-12 रर्थस्तत इह पुनः 'कर्माणि शुभानुष्ठानानि 'पुरेकडाईति पूर्वजन्मोपार्जितानि विशिष्टजात्यादिनिवन्धनानीति शेषः, तत उत्पन्नप्रत्ययैः पुनस्तदुपार्जन एव यलो विधेयो न तु विषयाभिष्वङ्गव्याकुलितमानसैरेव स्थेयमिति भाव इति ।। यतश्चैवमतः 'सः' इति यः पुरा संभूतनामाऽनगार आसीद् इदानीम्' अस्मिन् काले 'सित्ति पूरणे यद्वा । ६'दाणिसि'ति देशीयभाषयेदानी राजा महानुभागो महर्द्धिकः पुण्यफलोपेतश्च सन् दृष्टधर्मफलत्वेनाभिनिष्क्रामेति है संबन्धः, अथवा सोपस्कारत्वाद्यत् स एव त्वमिदानी राजा महानुभागताधन्धित इह जातस्तस्कमोणि पुराकृतानीति दीप अनुक्रम [४२४-४२६] 6 ॥३८७॥ SamEducatantitamarina Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~275 Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥१८ -२०|| दीप अनुक्रम [ ४२४ -४२६] Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा || १८-२० || निर्युक्ति: [३५५...] पूर्वेण संबन्धः कोऽर्थः ? - पुराकृतकर्मविजृम्भितमेवैतत् कथमन्यथा तथाभूतस्यैवंविधसमृद्ध्यवाप्तिरिति भावः, यतश्चैव मतोऽभिनिष्क्रामेति संवन्धः, किं कृत्वेत्याह- 'त्यक्त्वा' अपहाय भुज्यन्त इति भोगाः - द्रव्यनिचयाः कामा वा तान् 'अशाश्वतान्' अनित्यान् आदीयते- सद्विवेकैर्गृद्यत इत्यादानः- चरित्रधर्मस्तद्धेतोरभिनिष्क्राम-आभि मुख्येन प्रत्रजितो भव, गृहस्थतायां हि न सर्वविरतिरूपचारित्र सम्भव इति भावः, पठन्ति च- 'आयाणमेवा अणुचिंतयाहीति, स्पष्टमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ क एवमकरणे दाष इत्याह- इह जीविए राय ! असासयंमि, धणियं तु पुण्णाइँ अकुच्यमाणो । सो महोबणी, धम्मं अकाऊण परंमि लोगे ॥ २१ ॥ इह 'जीविते' मनुष्यसम्बन्धिन्यायुषि राजन् ! 'अशाश्वते' अस्थिरे 'धणियं तु'त्ति अतिशयेनैव न तु ध्वजपट| प्रान्ताद्यन्यास्थिरवस्तुसाधारणतया 'पुण्यानि' पुण्यहेतुभूतानि शुभानुष्ठानान्यकुर्वाणः 'सः' इति पुण्यानुपार्जकः 'शोचते' दुःखार्त्तः पश्चात्तापं विधत्ते, मृत्युः - आयुः परिक्षयस्तस्य मुखभित्र मुखं मृत्युमुखं-शिथिलीभवद्वन्धनाद्य|वस्था तदुपनीतस्तथाविधकर्मभिरुपढौकितो मृत्युमुखोपनीतः सन् 'धर्म' शुभानुष्ठानम् 'अकृत्वा' अननुष्ठाय 'परंमि' त्ति चस्य गम्यमानत्वात् परस्मिंश्च 'लोके' जन्मान्तररूपे, गत इति शेषः, नरकादिषु सह्या सातवे दनार्दितशरीरः For Parsons Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~276~ Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२१|| दीप अनुक्रम [४२७] सत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ||३८८|| [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२१|| निर्युक्तिः [३५५...] अध्ययनं [१३], शशिनृपतिवत्किं न मया तदैव सदनुष्ठानमनुष्ठितमिति खिद्यत एवाधर्मकारीति सूत्रार्थः ॥ स्यादेतत्-मृत्युमुखो ५ चित्रसंभूपनीतस्य परत्र या दुःखाभिहतस्य खजनादयस्त्राणाय भविष्यन्ति, ततो न शोचिष्यन्ते इत्याशङ्कयाहजह सीहो व मियं गहाय, मनू नरं नेह हु अंतकाले । तीयाध्य. १३ न तस्स माया व पिया व भाया, कालंमि तं सहरा भवति ॥ २२ ॥ न तरस दुक्खं विभयंति नायओ, न मित्तवग्गा न सुआ न बंधवा । इको सयं पचोर दुक्खं, कत्तारमेवं अणुजाह कम्मं ॥ २३ ॥ 'येथे' लौपम्ये 'इहे 'ति लोके 'सिंह' मृगपतिः, बेति पूरणे, यद्वा वाशब्दोऽयं विकल्पार्थे, ततो व्याघ्रादिर्वा 'मृगं' कुरनं 'गृहीत्वा' उपादाय प्रक्रमात्स्वमुखं परलोकं वा नयतीति सम्बन्धः, एवं 'मृत्युः' कृतान्तः 'नरं' पुरुषं नयति 'हुः' अवधारणे, ततो नयत्येय, कदा ? - अन्तकाले जीवितव्यावसानसमये, किमुक्तं भवति ? - यथाऽसौ सिंहेन नीयमानो न तस्मै अलम्, एवमयमपि जन्तुर्मृत्युना, कदाचित्खजनस्तत्र साहाय्यं करिष्यत्यत आह-न तस्य| मृत्युना नीयमानस्य माता वा पिता वा 'माय'त्ति वाशब्दस्येह गम्यमानत्वाद्धाता वा 'काले तस्मिन्' जीवितान्तरूपे अंशं प्रक्रमाज्जीवितव्यभागं धारयन्ति मृत्युना नीयमानं रक्षन्तीवंशधराः, यथा हि नृपादौ स्वजनसर्वखमपहरति स्वद्रविणदानतः खजनादिभिस्तद्रक्ष्यते नैवं स्वजीवितव्यांशदानतस्तजीवितं मृत्युना नीयमानम्, उक्त Education ideational For Panas Private ॥१८८॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~277~ Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||२२-२३|| नियुक्ति: [३५५...] प्रत सूत्रांक ||२२ -२३|| हि-"न पिता भ्रातरः पुत्रा, न भार्या न च बान्धवाः । न शक्ताः मरणात्रातुं, शक्काः संसारसागरे ॥१॥” इति, अथवाउंशो-दुःखभागस्तं हरन्ति-अपनयन्ति ये तेऽशहरा भवन्तीति, इदमेवाभिव्यनक्ति, आद्यव्याख्याने तु स्यादेतभाद-जीवितारक्षणेऽपि दुःखांशहारिणो भविष्यन्त्यत आह-न तस्य-मृत्युना नीयमानस्य तत्कालभाविना दुःखेनात्यन्त पीडितस्य दुःखं शारीरं मानसं वा 'विभजन्ति' विभागीकुर्वन्ति 'ज्ञातयः' दूरवर्तिनः खजना न 'मित्रवर्गा' सुहमत्समूहा न 'सुताः पुत्रा न 'बान्धवाः' निकटवर्जिनः खजनाः, किन्तु एक:-अद्वितीयः खयम् आत्मना 'प्रत्यनुभ-4 भवति' वेदयते 'दुःखं क्लेशं, किमिति ?, यतः 'कर्तारमेव' उपार्जयितारमेव 'अनुयाति' अनुगच्छति, किं तत् - कर्म, येन तत्कृतं तस्यैव फलमुपनयतीति भाव इति सूत्रद्वयार्थः ॥ इत्थमशरणत्वभावनामभिधायैकत्वभावनामाह-2 चिचा दुपयं च चउप्पयं च, खितं गिहं धणधन्नं च सव्वं । कम्मप्पबीओ अवसो पयाई, परं भवं सुंदर पावगं वा ॥ २४ ॥ तं इक्कगं तुच्छसरीरगं से, चिईगयं दहि पावगेणं । भबा य पुत्तावि य नायभो अ. दायारमन्नं अणुसंकमंति ॥२५॥ 'त्यक्त्वा' उत्सृज्य 'द्विपदं च भार्यादि 'चतुष्पदं च हस्त्यादि क्षेत्रम्' इक्षक्षेत्रादि 'गृह' धवलगृहादि कधण'त्ति धनं-कनकादि 'धान्यं' शाल्यादि, चशब्दाद् वस्त्रादि च, 'सर्व' निरवशेष, ततः किमित्याह-कर्मेवात्मनो दीप अनुक्रम [४२८-४२९] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~278~ Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥२४ -२५|| दीप अनुक्रम [४३० -४३१] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥ ३८९ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१३], मूलं [--] / गाथा ||२४-२५|| निर्युक्ति: [३५५...] ||द्वितीयमस्येति कर्मात्मद्वितीयः 'अवशः' अखतन्त्रः प्रकर्षेण याति प्राप्नोति प्रयाति, कं ? - 'परम्' अन्यं 'भयं' जन्म 'सुंदर'त्ति विन्दुलोपात् 'सुन्दर' स्वर्गादि 'पापकं वा' नरकादि, स्वकृतकर्मानुरूपमिति भावः ॥ तत्र किमन्यदर्शनिनामिव सशरीर एव भवान्तरं यात्युत अन्यधेति ?, उच्यते, औदारिकशरीरापेक्षयाऽशरीर एव, तर्हि तत्त्यक्त्वेत्यत्र का वार्चेत्याह- 'तद्' इति यत्तेन त्यक्तम् 'एकम्' अद्वितीयं तद्वितीयस्य जन्तोरन्यत्र सङ्क्रमणात् तुच्छमूअसारमत एव कुत्सितं शरीरं शरीरकम् अनयोस्तु विशेषणसमासः, 'से' तस्य भवान्तरगतस्य संबन्धि चीयन्तेमृतकदहनाय इन्धनानि अस्यामिति चितिः - काष्ठरचनात्मिका तस्यां गतं स्थितं चितिगतं दग्ध्वा 'तुः' पूरणे 'पावकेन' अग्निना भार्या च पुत्रोऽपि च ज्ञातयश्च 'दातारम्' अभिलपितवस्तुसम्पादयितारमन्यम् 'अनुसङ्क्रामन्ति' उपसर्पन्ति, ते हि गृहमनेनावरुद्धमास्त इति तद्वहिर्निष्काश्य जनजादिना च भस्मसात्कृत्य कृत्वा च लौकिकत्यान्याक्रन्द्य च कतिचिद्दिनानि पुनः स्वार्थतत्परतया तथाविधमन्यमेवानुवर्त्तन्ते, न तु तत्प्रवृत्तिमपि पृच्छन्ति, | आस्तां तदनुगमनमित्यभिप्राय इति सूत्रद्वयार्थः ॥ किञ्च Education Intemational वाई जीवियमप्पमायं, वण्णं जरा हरइ नरस्स रायं ! | पंचाय! सुणाहि मा कासि कम्माई महालयाई ॥ २६ ॥ 'उपनीयते' ढोक्यते प्रक्रमान्मृत्यवे तथाविधकर्मभिः 'जीवितम् ' आयुः 'अप्रमादं' प्रमादं विनैव, आधीचीमर For Parana Prat चित्रसंभू तीयाध्य १३ ~279~ ॥ ३८९ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२६|| दीप अनुक्रम [४३२] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२६|| निर्युक्तिः [३५५...] अध्ययनं [१३], णतो निरन्तरमित्यभिप्रायः, सत्यपि च जीविते 'वर्ण' सुखिग्धच्छायात्मकं 'जरा' विश्रसा 'हरति' अपनयति 'नरस्य' मनुष्यस्य 'राजन्!' चक्रवर्त्तिन् !, यतश्चैवमतः 'पञ्चालराज !' पञ्चमण्डलोद्भवनृपते ! 'वचनं' वाक्यं 'शृणु' आकर्णय, किं तत् ? - मा कार्षीः कानि १- कर्माणि' असदारम्भरूपाणि 'महालयाणि'त्ति अतिशयमहान्ति, महान् वा लयः-कर्माश्लेषो येषु तानि, उभयत्र पञ्चेन्द्रियव्यपरोपणकुणिमभक्षणादीनीति सूत्रार्थः ॥ एवं मुनिनोक्ते नृपतिराह or way अपि जानामि जहेह साह!, जं मे तुमं साहसि वज्रमेयं । भोगाइमे संगकरा भवति, जे दुखया अजो ! अम्हारिसेहिं ॥ २७ ॥ अहमपि न केवलं भवानित्यपिशब्दार्थः, 'जानामि' अवबुध्ये, तथा इति शेषः, 'यथा' येन प्रकारेण 'इह' अस्मिन् जगति साधो ! यत् 'मे' मम त्वं 'साधयसि' कथयसि वाक्यम्' उपदेशरूपं वचः 'एतत् यदनन्तरं भवतोक्तं, सत् किं न विषयान् परित्यजस्यत आह- 'भोगाः ' शब्दादयः 'इमे' प्रत्यक्षाः 'सङ्गकराः ' प्रतिबन्धोत्पादका भवन्ति ये यतदोश्च नित्याभिसम्बन्धात्ते दुःखेन जीयन्ते - अभिभूयन्ते इति दुर्जयाः दुस्त्यजा इतियावत् 'अज्जो'त्ति आर्य ! अस्मादृशेः, गुरुकर्मभिर्जन्तुभिरिति गम्यते, पठ्यते च 'अहंपि जाणामि जो एत्थ सारो' पादत्रयं तदेव, अहमपि For Parana Private On पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~280~ Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||२८-२९|| नियुक्ति : [३५५...] उत्तराध्य बृहद्वृत्तिः सूत्रांक ॥३९०॥ ||२४ -२५|| जानामि योऽत्र सारो-यदिह मनुजजन्मनि प्रधानं चारित्रधर्मात्मकं, चस्य गम्यमानत्वात्, यच मे त्वं साधयसि, चित्रसंभूशेषं प्राग्वदिति सूत्रार्थः । किञ्च | तीयाध्य. हस्थिणपुरंमि चित्ता! दणं नरवई महिड्डियं । कामभोगेसु गिद्धेणं नियाणमसुभं कडं ॥२८॥ ६ १३ तस्स मे अप्पडिकंतस्स, इमं एयारिसं फलं । जाणमाणोऽवि जं धम्म, कामभोगेसु मुच्छिओ ॥२९॥ हस्तिनागपुरे 'चित्ता' इति आकारोऽलाक्षणिकः, हे 'चित्र ! चित्रनामन् सुने ! दृष्ट्वा 'नरपति' सनत्कुमारनामानं चतुर्थचक्रवर्तिनं 'महर्द्धिक' सातिशयसम्पदं 'कामभोगेषु' उक्तरूपेषु 'गृद्धेन' अभिकालावता 'निदान' जन्मान्तरे |भोगाशंसात्मकम् 'अशुभ अशुभानुवन्धि 'कृतं' निवर्तितमिति ॥ कदाचित्तत्र कृतेऽपि ततः प्रतिक्रान्तः स्यादत आह'तस्स'त्ति सुब्ब्यत्ययेन तस्मात् निदानात् 'मे' मम 'अप्रतिक्रान्तस्य' अप्रतिनिवृत्तस्य, तदा हि त्वया बहुधोच्यमानेऽपि न मचेतसः प्रत्यावृत्तिरभूदिति, 'इदमेतादृशम्' अनन्तरवक्ष्यमाणरूपं 'फलं' काय, यत् कीरगियाह-'जाणमाणोऽवित्ति प्राकृतत्वात् 'जाननपि' अवबुध्यमानोऽपि यदहं 'धर्म' श्रुतधर्मादिकं कामभोगेषु मूर्छितः-गृद्धः, तदेत- ३९०॥ कामभोगेषु मूर्छनं मम निदानकर्मणः फलम् , अग्यथा हि 'ज्ञानस्य फलं विरति'रिति कथं न जानतोऽपि धर्मानुष्ठानावाप्तिः स्यादिति भाव इति सूत्रद्वयार्थः ॥ पुनर्निदानफलमेवोदाहरणतो दर्शयितुमाह IMi दीप अनुक्रम [४३०-४३१] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~281 Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||३०|| दीप अनुक्रम [४३६ ] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||३०|| निर्युक्तिः [३५५...] अध्ययनं [१३], नागो जहा पंकजलावसन्नो, द थलं नाभिसमेइ तीरं । एवं वयं कामगुणेसु गिद्धा, न भिक्खुणो मग्गमणुब्वयामो ॥ ३० ॥ 'नागः' हस्ती 'यथे 'ति दृष्टान्तोपदर्शकः पङ्कप्रधानं जलं पङ्कजलं यत्कलमुच्यते तत्रावसन्नो - निमग्नः पङ्कजलावसन्नः सन् 'दृष्ट्वा' अवलोक्य 'स्थलं' जलविकलभूतलं 'न' नैव 'अभिसमेति' प्राप्नोति 'तीर' पारम् अपेर्गम्यमा नत्वात्तीरमप्यास्तां स्थलमिति भावः इत्येवंविधनागवत् वयमित्यात्मनिर्देशे 'कामगुणेषु' उक्तरूपेषु 'गृद्धाः ' मूर्च्छिता न 'भिक्षोः' साधोः 'मार्ग' पन्धानं सदाचारलक्षणम् 'अनुव्रजामः' अनुसरामः । अमी हि पङ्कजलोपमाः कामभोगाः, ततस्तत्परतन्त्रतया न तत्परित्यागतो निरपायतया स्थलमिव मुनिमार्गमवगच्छन्तोऽपि पङ्कजला मनगजवद्वयमनुगन्तुं शक्नुम इति सूत्रार्थः ॥ पुनरनित्यतादर्शनाय मुनिराह अचेर कालो तूरंति राइओ, न यावि भोगा पुरिसाण निया । विच भोगा पुरिसं चयंति, दुमं जहा खीणफलं व पक्खी ॥ ३१ ॥ 'अत्येति' अतिक्रामति कालः यथाऽऽयुः कालः किमित्येवमुच्यते ?, अत आह- 'त्वरन्ति' शीघ्रं गच्छन्ति 'रात्रयः' रजन्यः, दिनोपलक्षणं चैतत्, ततोऽनेन जीवितव्यस्यानित्यत्वमुक्तम् उक्तं हि "क्षणयामदिवसमासच्छटेन गच्छन्ति जीवितदलानि । इति विद्वानपि कथमिह गच्छसि निद्रावशं रात्रौ १ ॥ १॥" अथवा 'अत्येति' अतीव Jan Education intemational For Parna Prat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~282 ~ Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||३१|| नियुक्ति : [३५५...] प्रत सूत्रांक ||३१|| उत्तराध्य.18 याति, कोऽसौ?-कालः, कुत एतत् ?-यतस्त्वरन्ति रात्रयो, न चापि भोगाः पुरुषाणां 'नित्याः' शाश्वताः, अपे- चित्रसम भिन्नक्रमत्वान्न केवलं जीवितमुक्तिनीतितो न नित्यं, किन्तु भोगा अपि, यत उपेत्य खप्रवृत्त्या न तु पुरुषाभिबृहद्वृत्तिः तीयाध्य. प्रायेण भोगाः पुरुषं त्यजन्ति' परिहरन्ति, कमिव क इवेत्साह-'द्रुमं' वृक्षं यथा क्षीणानि-विनष्टानि फलानि ॥३९१॥ यस्यासी क्षीणफलस्तं, 'वा' इत्यौपम्ये, उक्तं हि-"पिव मिव विव वा इवार्थे" भिन्नक्रमश्चार्य, ततः 'पक्षीव' विहग इव, ६ फलोपमानि हि पुण्यानि, ततस्तदपगमे क्षीणफलं वृक्षमिव पुरुषं पक्षिबद्भोगा विमुञ्चन्तीति सूत्रार्थः॥ यत एवमतः जईऽसि भोगे चइउं असत्तो, अज्जाई कम्माई करेहि राय !! धम्मे ठिओ सव्वपयाणुकंपी, तं होहिसि देवो इओ विउव्वी ।। ३२ ।। | यदि तावदसि त्वं भोगान् ‘त्यक्तुम्' अपहातुम् 'अशक्तः' असमर्थः, पठ्यते च-'जइ तसि भोगे चइतुं असत्ते'त्ति, यदि चैवं तावत्कत्तुं न शक्तस्ततः किमित्याह-'आर्याणि' हेयधर्मेभ्यः-अतिनिखिंशतादिभ्यो दूरयातानि शिष्टजनो-131 ४चितानीतियावत् 'कर्माणि' अनुष्ठानानि कुरु राजन् ! 'धर्म' प्रक्रमाद्हस्थधर्म सम्यग्दृष्टयादिशिष्टाचरिताचा-2 दरलक्षणे स्थितः सन् 'सर्वप्रजानुकम्पी' समस्तप्राणिदयापरः, ततः किं फलमित्याह-ततः' इत्यार्यकर्मकरणाद् भवि-18 प्यसि 'देवः' वैमानिकः 'इतः' इत्यस्मान्मनुष्यभवादनन्तरं 'बिउवित्ति वैक्रियशरीरवानित्यर्थ इति वृद्धाः, गृहस्थ दीप अनुक्रम [४३७]] X ॥३९ ॥ पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~283 Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||३२|| नियुक्ति: [३५५...] * *- *- प्रत सूत्रांक ||३२|| धर्मस्वापि सम्यक्त्वदेशविरतिरूपस्य देवलोकफलत्वेनोक्तत्वादिति भाव इति सूत्रार्थः ॥ एवमुक्तोऽपि यदाऽसौ न र किश्चित्प्रतिपद्यते तदा तदविनेयतामवधार्य मुनिराह न तुज्झ भोगे चईऊण बुद्धी, गिद्धोऽसि आरंभपरिग्गहेसुं। मोहं कओ इत्तिउ विप्पलावो, गच्छामि रायं ! आमंतिओऽसि ॥ ३३ ॥ 'नेति प्रतिषेधे तब 'भोगान्' शब्दादीन् , उपलक्षणत्वादनार्यकर्माणि वा, 'चइऊणत्ति त्यक्तुं, यद्वा सोपस्कादरत्वाद्भोगांस्त्यक्त्वा धर्मो मया विधेय इति 'बुद्धिः' अवगतिः, किन्तु 'गृद्धः' मूञ्छितः 'असि' भवसि, केषु ? 'आरम्भपरिग्रहेषु' अबद्यहेतुषु व्यापारेषु चतुष्पदद्विपदादिखीकारेषु च, 'मोहंति मोघं निष्फलं यथा भवति एवं, सुब्ब्यत्ययाद्वा मोघो-निष्फलो मोहेन वा-पूर्वजन्मनि मम भ्राताऽऽसीदिति नेहलक्षणेन 'कृतः' विहितः एतान् । 'विप्रलापः' विविधव्यर्थवचनोपन्यासात्मकः, सम्प्रति तु 'गच्छामि' ब्रजामि राजन् ! आमन्त्रितः-संभाषितः, अने-४ कार्थत्वाद्धातूनां पृष्टो वा 'असि' भवसि, अयमाशयः-अनेकधा जीवितानित्यत्वादिदर्शनद्वारेणानुशिष्यमाणस्यापि ते न मनागपि विषयविरक्तिरित्यविनेयत्वादुपेक्षेव श्रेयस्करी, उक्तं हि "मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि सत्त्वद गुणाधिकक्लिश्यमानाविनेयेपु" (तत्त्वा० अ० ७-सू०-६) इति सूत्रार्थः ॥ इत्थमुक्त्वा गते मुनी ब्रह्मदत्तस्य है यदभूतदाह दीप अनुक्रम [४३८] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~284 Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१३], मूलं [-] / गाथा ||३४|| नियुक्ति: [३५५R-३५९] प्रत सूत्रांक ||३४|| उत्तराध्यपंचालरायाऽविय बंभदत्तो, साहुस्स तस्स वयणं अकाउं। चित्रसंभूअणुत्तरे भुंजिय काम भोगे, अणुत्तरे सो नरए पविट्ठो ॥ ३४ ॥ बृहद्वृत्तिः तीयाध्य. 'पंचालराआऽविय'त्ति 'अपि' पुनरर्थः, 'चः' पूरणे, ततः पश्चालराजः पुनर्बह्मदत्तो-ब्रमदत्ताभिधानः 'साधोः।। ॥३९२।। तपखिनः 'तस्य' अनन्तरोक्तस्य 'वचनं हितोपदेशदर्शकं वाक्यम् 'अकृत्वा' वतन्दुलवद्गुरुकौतयाऽत्यन्तदुर्भेद-11 त्वादननुष्ठाय 'अनुत्तरान्' सर्वोत्तमान् ‘भुङ्क्त्वा ' अनुपाल्य 'कामभोगान्' उक्तरूपान् ‘अनुत्तरे स्थित्यादिभिः सक-1 लनरकज्येष्ठेऽप्रतिष्ठान इतियावत् 'स' ब्रह्मदत्तः 'नरके' प्रतीते 'प्रविष्टः' तदन्तरुत्पन्नः, तदनेन निदानस्य नरकपर्यव-15 सानफलत्वमुपदर्शितं भवतीति सूत्रार्थः ॥ इह चास्य शेषवक्तव्यतासूचिका अपि नियुक्तिगाथाः पञ्च दृश्यन्ते, तद्यथा इत्थीरयणपुरोहियभिजाणं वुग्गहो विणासंमि । सेणावइस्स भेओ वकमणं चेव पुत्ताणं ॥ ३५५॥४ दासंगाम अस्थि भेओ मरणं पुण चूयपायवुजाणे।कडगस्स य निब्भेओ दंडो अपुरोहियकुलस्स ३५६ जउघरपासायंमि अ दारे य सयंवरे अथाले आतत्तोअ आसए हथिए अ तह कुंडए चेव ॥३५७॥11॥३९२॥ कुक्कुडरहतिलपत्ते सुदंसणो दारुए य नयणिल्ले । पत्तच्छिजसयंवर कलाउ तह आसणे चेव ॥ ३५८ ॥ दीप अनुक्रम [४४० Samsairatantimidana पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~285 Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१३], मूलं [-1 / गाथा ||३५|| नियुक्ति: [३५५R-३५९] ॐॐॐ4% प्रत सूत्रांक ||३५|| कंचुयपजुण्णंमि अ हत्थो वणकुंजरे कुरुमई अ। एए कन्नालंभा बोद्धवा बभदत्तस्स ॥ ३५९ ॥ एतास्तु विशिष्टसम्प्रदायाभावान वित्रियन्ते ॥ सम्प्रति प्रसङ्गत एव चित्रवक्तव्यतोच्यते चित्तोऽवि कामेहिं विरत्तकामो, उदत्तचारित्ततवो महेसी। अणुत्तरं संजम पालइत्ता, अणुत्तरं सिद्धिगई गओ ॥ ३५॥ तिबेमि ॥ ॥चित्तसंभूइज समत्तं ॥१३॥ 'चित्रोऽपि' जन्मान्तरनामतचित्राभिधानस्तपस्व्यपि, अत्रापि 'अपिः' पुनरर्थ, ततचित्रः पुनः 'कामेभ्यः'। अभिलषणीयशब्दादिभ्यो विरक्तः-पराङ्मुखीभूतः कामः-अभिलाषोऽस्पति विरक्तकामः उदात्तं-प्रधानं चारित्रं चसर्वविरतिरूपं तपश्च-द्वादशविधं यस्य स उदात्तचारित्रतपाः, पाठान्तरतः-उदग्रचारित्रतपा वा महेषी महर्षिर्वा, 'अनुत्तरं सर्वसंयमस्थानोपरिवर्तिनं 'संजम'ति संयमम्-आश्रवोपरमणादिकं पालयित्वा' आसेव्य 'अनुत्तरी' सर्वलोकाकाशोपरिवर्तिनीमतिप्रधानां वा 'सिद्धिगति' मुक्तिनानी गति 'गतः' प्रास इति सूत्रार्थः ॥ 'इति' परिसमाप्ती, ब्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्ते च पूर्ववत् । इत्याचार्य श्रीशान्तिसूरिकृतायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटीकायां चित्रसंभूतीयं त्रयोदशमध्ययनं समासमिति ॥१३॥ दीप अनुक्रम [४४१] REticatimJAN Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं- १३ परिसमाप्तं ~286 Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||३५|| दीप अनुक्रम [ ४४१] उत्तराध्य बृहद्वृत्तिः ॥ ३९३ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||३५...|| अध्ययनं [१४], निर्युक्ति: [३६०-३६१] अथ चतुर्दशमिषुकारीयमध्ययनम् । व्याख्यातं त्रयोदशमध्ययनं चित्रसम्भूतीयम् अधुना चतुर्दशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - इहानन्तराध्ययने मुख्यतो निदानदोष उक्तः प्रसङ्गतो निर्निदानतागुणश्च, अत्र तु मुख्यतः स एवोच्यते इत्यनेन सम्ब - न्धेनायातमिदमध्ययनम् अस्य चानुयोगद्वारचतुष्टयचर्चः प्राग्वत्तावद्यावन्नाम निष्पन्ननिक्षेपे इषुकारीयमिति नाम, | अत इपुकारनिक्षेपमभिधातुमाह नियुक्तिकृत् उसुआरे निक्खेवो चउ० ॥ ३६० ॥ जाण० ।। ३६९ ।। उसुआरनामगोए वेयंतो भावओ अ उसुआरो। तत्तो समुट्टियमिणं उसुआरिज्जति अज्झयणं ॥३६२॥ गाथात्रयं स्पष्टमेव, नवरमिषुकाराभिलापेन नेयं, तथा यदिपुकारात्समुत्थितं तत्तस्मै प्रायो हितमेव भवतीति |इपुकाराय हितमिषुकारीयमुच्यते, प्राधान्याच राज्ञा निर्देशः, अन्यथा षड्भ्योऽप्येतत्समुत्थानं तुल्यमेवेति ॥ सम्प्रति कोऽयमिषुकार इति तद्वक्तव्यतामाह नियुक्तिकृत् — Jam Education intemational For Parana Private On इषुकारीयमध्ययनं १४ ~ 287~ ॥ ३९३ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अथ अध्ययनं – १४ “इषुकारिय” आरभ्यते Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [--1 / गाथा ||३५...|| नियुक्ति: [३६३-३७३] - प्रत सूत्रांक ||३५|| पुत्वभवे संघडिआ संपीआ अन्नमन्नमणुरत्ता । भुत्तण भोगभोए निग्गंथा पवए समणा ॥ ३६३ ॥ काऊण य सामन्नं पउमगुम्मे विमाणि उववन्ना। पलिओवमाई चउरो ठिई उक्कोसिआ तेसिं ॥३६॥ तत्तो य चुआ संता कुरुजणक्यपुरवरंमि उसुआरे। छावि जणा उववन्ना चरिमसरीरा विगयमोहा॥३६५॥ राया उसुयारो या कमलावइ देवि अग्गमहिसी से।भिगुनामे य पुरोहिय वासिट्रा भारिआतस्स ३६६ उसुआरपुरेनयरे उसुआरपुरोहिओ अ अणवच्चो। पुत्तस्स कए बहुसो परितप्पंती दुअग्गावि ॥३६७॥ काऊण समणरूवं तहिअं देवो पुरोहि भणइ । होहिंति तुज्झ पुत्ता दुन्नि जणादेवलोगचुआ ॥३६८॥ तेहि अपवइअवं जहा य न करेह अंतरायं ण्हे । ते पवइआ संता बोहेहिती जणं बहुअं ॥ ३६९ ॥ तं वयणं सोऊणं नगराओ निति ते वयग्गामे । वढति अ ते तहि गाहिंति अणं असब्भाव ३७० एए समणा धुत्ता पेयपिसाया य पोरुसादा य। मा तेसिं अल्लिअहा मा भे पुत्ता! विणासिज्जा ॥३७१॥ दादण तहिं समणे जाई पोराणि च सरिऊणं । बोहितऽम्मापिअरं उसुआरं रायपुत्तं च ॥ ३७२ ॥ सीमंधरो य राया भिगू अ वासिट्र रायपत्ती य । बभणी दारगा चेव छप्पेए परिनिव्वुआ ॥ ३७३ ॥ AMC दीप अनुक्रम [४४१] SARLS SanEditation पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~288 Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [--1 / गाथा ||३५...|| नियुक्ति: [३६३-३७३] १४ प्रत सूत्रांक उत्तराध्य. आसामक्षरार्थः स्पष्ट एव, नवरं 'संघडिय'त्ति सम्यग घटिताः-परस्परं स्नेहन संबद्धा वयस्या इतियावत् , तेऽपि इषुकारीय कदाचिद्विगलितान्तरप्रीतयोऽपि दाक्षिण्याजनलजादितस्तथा स्युरत आह-'संप्रीताः' सम्यगान्तरप्रीतिभाजः, बृहद्वृत्तिः सामध्ययनं. " तथा 'अन्योऽन्यमनुरक्ताः' अतिशयख्यापनफलत्वादत्यन्तस्नेहभाजः, अथवा 'संघडिय'त्ति देशीपदमव्युत्पन्नमेव । ॥३९४॥मित्राभिधायि, प्रीतिर्बाह्या अनुरागस्तु भावतः प्रतिबन्धः, पठ्यते च-'घडियाउ'ति घटिता-मिलिताः, तथा 18 भोगभोगे'त्ति भोक्तुं योग्या भोग्या ये भोगास्तान् भोग्यभोगान् भोगभोगान् वाऽतिशायिनो भोगान् , पाठान्तरतः कामभोगान् वा, 'णिग्गंधा पचए समण'त्ति निर्ग्रन्थाः-त्यक्तग्रन्थाः प्रावजन्' प्रत्रज्यां गृहीतवन्तः, ततश्च श्रमणाः' तपखिनोऽभूवन्निति शेषः । 'दुयग्गावित्ति देशीपदं प्रक्रमाच द्वायपि दम्पती, तथा 'अन्तरायं' विघ्नं & Pाहेति अनयोः, तथा 'णिति'त्ति निर्यन्ति आधिक्येन गच्छन्ति, कं -'ब्रजग्राम' गोकुलपायग्राम, प्रत्यन्तग्रा-129 ४ ममित्यर्थः,'गाहिति अणं असम्भावं'ति ग्राहयतोऽसद्भावमसन्तम् असुन्दरं वाऽर्थ-साधुप्रेतत्वादिलक्षणं प्रेताः 'पिशा चाच' पिशाचनिकायोत्पन्नाः 'पौरुषादाच' प्रस्तावात्पुरुषसम्बन्धिमांसभक्षका राक्षसा इतियावत् , 'तेसिं'ति सूत्रत्वात् तान् 'अल्लियह'त्ति आलीयेताम-आश्रयतां. किमित्यत आह-मा में भवन्तौ पुत्रौ विनश्येतामिति । अत्र चंपुकारमिति राज्यकालनाना सीमन्धरश्चेति मौलिकनामेति सम्भावयामः इति गाथैकादशकावयवार्थः ॥ ||३५|| दीप अनुक्रम [४४१] SamEducatan international FarparmanaSPrwanatimony पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~289~ Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||३५...|| नियुक्ति: [३६३-३७३] (४३) % % प्रत सूत्रांक ||३५|| भावार्थस्तु सम्प्रदायादयसेयः, स चायं-जे ते दोन्नि गोवदारया साहुअणुकंपयाए लद्धसंमत्ता कालं काऊण देवलोगे उववन्ना, ते तओ देवलोगाउ चइउं खिइपइ ट्ठियनयरे इन्भकुले दोवि भायरो जाया, तत्थ तेर्सि अन्नेवि चत्तारि इन्भदारगा वयंसिया जाया, तत्थवि भोगे भुंजिउं तहारूवाणं थेराणं अंतिते धम्म सोऊण पवइया, सुचिरकालं संयम अणुपालेऊण भत्तं पञ्चक्खाउँ कालं काऊण सोहम्मे कप्पे पउमगुम्मे विमाणे छावि जणा चउपलिओवमठि-15 प्रतिया देवा उबवण्णा, तत्थ जे ते गोववजा देवा ते चइऊण कुरुजणवए उसुयारपुरे नयरे एगो उसुयारो णाम राया जातो, पीओ तस्सेव महादेवी कमलाबईनाम संवत्ता. ततिओ तस्स चेव राइणो भिगुणाम पुरोहितो संवुत्तो, चउत्थो तस्स चेष पुरोहियस्स भारिया संयुत्ता वसिट्टा गोत्तेण जसानामं । सो य भिगु अणवचो गाढं तप्पए 31 १ यी ती द्वौ गोपदारको साध्वनुकम्पया लब्धसम्यक्त्वी कालं कृत्वा देवलोके उत्पन्नी, ती ततो देवलोकाग्युत्वा क्षितिप्रतिष्ठिते || दिनगरे इस्यकुले द्वावपि भ्रातरौ जातो, तत्र तयोरन्येऽपि चत्वार इभ्यदारका बयस्या जाताः, तत्रापि भोगान् भुक्त्वा तथारूपाणां स्थवि राणामन्तिके धर्म श्रुत्वा प्रत्रजिताः, सुचिरकालं संयममनुपाल्य भक्तं प्रत्याख्याय कालं कृत्वा सौधर्मे कल्पे पद्मगुल्मे विमाने पद्धपि जनाः चतुष्पल्योपमस्थितिका देवा उत्पन्नाः, तत्र ये ते गोपवर्जा देवास्ते च्युत्ता कुरुजनपदे इषुकारपुरे नगरे एक इपुकारो नाम राजा जातः, द्वितीयस्तस्यैव महादेवी कमलावती नाम संवृत्ता, तृतीयस्तस्यैव राज्ञों भृगु म पुरोहितः संवृत्तः, चतुर्थस्तस्यैव पुरोहितस्य भार्या संघृत्ता | वाशिष्ठा गोत्रेण यशा नाम । स च भृगुरनपत्यो गाढं ताम्यति % दीप अनुक्रम [४४१] A For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~290 Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [--1 / गाथा ||३५...|| नियुक्ति: [३६३-३७३] (४३) १४ प्रत सूत्रांक ||३५|| उत्तराध्य. अवचनिमित्तं, उवायणए देवयाणि पुच्छइ नेमित्तिए । ते दोऽवि पुत्वभवगोवा देवभवे वट्टमाणा ओहिणा जाणिउ इधुकारीयबृहद्वृत्तिः जधा अम्हे एयस्स भिगुस्स पुरोहियस्स पुत्ता भविस्सामो, तओ समणरूवं काऊण उवगया भिगुसमीवं, भिगुणा मध्ययनं. सभारिएण वंदिया, सुहासणत्था य धम्मं कहेंति, तेहिं दोहिवि सावगवयाणि गहियाणि, पुरोहिएण भण्णति॥३९५॥ भगवं! अम्हं अवचं होजत्ति?, साहूहि भण्णति-भविस्संति दुवेऽपि दारगा, ते य डहरगा चेव पवइस्संति, तेसिं तुहिं बाधाओ ण कायचो पचयंताणं, ते सुबहुं जणं संबोहिस्संतित्ति भणिऊण पडिगया देवा, णातिचिरेण 2 चइऊण य तस्स पुरोहियस्स भारियाए वासिट्ठीए दुवे उदरे पञ्चायाया, ततो पुरोहितो सभारितो नगरविणि ग्गतो पर्चतगामे ठितो, तत्थेय सा माहिणी पसूया, दारगा जाया, तओ मा पपइस्संतित्ति काउं मायावित्तेहि P १ अपत्यनिमित्तं, उपयाचयति देवताः पृच्छति नैमित्तिकान् । तौ द्वावपि पूर्वभवगोपी देवभवे वर्तमानौ अवधिना ज्ञात्वा यथा आवा18मेतस्य भूगोः पुरोहितस्य पुत्रौ भविष्यावः, ततः श्रमणरूपं कृत्वोपगतौ भृगुसमीपं, भृगुना सभार्येण वन्दिती, सुखासनस्थौ च धर्म कथ-2 यतः, ताभ्यां द्वाभ्यामपि श्रावकब्रतानि गृहीतानि, पुरोहितेन भण्यते-भगवन ! आवयोरपसं भविष्यतीति?, साधुभ्या भण्यते-भविष्यतो द्वावपि दारकी, सौ च बालकावेव प्रत्रजिष्यतः, तयोर्युवाभ्यां व्याघातो न कर्तव्यः प्रव्रजतोः, तौ सुबहु जनं संबोधयिष्यत इति ॥३९५।। भणिवा प्रतिगती देवी, नातिचिरेण च्युत्वा च तस्यैव पुरोहितस्य भार्याया वाशिष्ठया द्वौ उदरे प्रत्यायाती, ततः पुरोहितः सभार्यो नगरवि-12 दानिर्गतः प्रतान्तपामे खितः, तत्रैव सा ब्राह्मणी प्रसूता, दारको जाती, ततो मा प्रवाजिष्ठामितिकृत्वा मातापितृभ्यां दीप अनुक्रम [४४१] SNEditatmNIL Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~291 Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [--1 / गाथा ||३५...|| नियुक्ति: [३६३-३७३] प्रत सूत्रांक ||३५|| Mबुग्गाहिजंति-जहा एए पवइयगा दिवरूवाई घेर्नु मारंति, पच्छा तेसि मंसं खायंति, मा तुम्भे कयाई एएसि अलियस्सह । अन्नया ते तम्मि गामे रमंता वाहिं निग्गया, इओ य अद्धाणपडिवण्णा साहू आगच्छंति, ततो ते दारमा साहू दलूण भयभीया पलायंता एगम्मि वडपायवे आरूढा, साहूणो समावत्तीए गहियभत्तपाणा तम्मि |चेय वडपायवहिढे ठिया, मुहुत्तं च वीसमिऊणं भुंजिउं पयत्ता, ते वडारूढा पासंति साभावियं भत्तपाणं, नत्थि मं-13 है संति तओ चिंतिउं पयत्ता-कत्थ अम्हहिं एयारिसाणि रूवाणि दिट्ठपुवाणित्ति ?, जाई संभरिया, संबुद्धा, साहुणो दिउं गया अम्मापिउसमीवं, मायावित्तं संबोहिऊण सह मायाविते पञ्चया, देवी संबुद्धा, देवीए राया संबोहिओ, १व्युद्वायते-यथैते प्रत्रजितका दिव्यरूपाणि गृहीत्वा मारयन्ति, पश्चात् तेषां मांस खादन्ति, (तत्) मा यूयं कदाचित् एतेषामाश्रयत । अन्यदा ते तस्मिन् प्रामे रममाणी बहिर्निर्गती, इतश्चाध्वप्रतिपन्नाः साधव आगच्छन्ति, ततस्तौ दारको साधून दृया भयभीती पलायमानौ ? एकस्मिन् वटपो आरूढी, साधवो भवितव्यतया गृहीतभक्तपानास्तस्मिन्नेव बटपादपेऽधस्तात् स्थिताः, मुहूर्त च विश्रभ्य भोक्तुं प्रवृत्ताः, ती वटारूढी पश्यतः स्वाभाविक भक्तपानं, नासि मांसमिति ततचिन्तितुं प्रवृत्तौ-कावाभ्यामीरशानि रूपाणि दृष्टपूर्वाणीति ?, जातिः उस्मता. संबद्धौ, साधून वन्दित्वा गती मातापितृसकाश, मातरपितरं संबोध्य सह मातापितराभ्यां प्रबजिती, देवी संबुद्धा, देव्या राजा संबोधितः, तावपि प्रबजिती, एवं ते पडपि केवलज्ञानं प्राप्य निर्वाणमुपगता इति । दीप अनुक्रम [४४१] matang FairamanaSPrwara tumonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~292 Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [--1 / गाथा ||१-३|| नियुक्ति: [३७३...] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥३९६॥ १४ प्रत सूत्रांक ||१-३|| A% ताणिवि पवइयाणि, एवं ताणि छावि केवलणाणं पाविऊण णिवाणमुवगयाणित्ति ॥ इह तु सूत्रोक्तस्याप्यर्थ- इषुकारीयस्वाभिधानं प्रसङ्गत इत्यदोषः । उक्तो नामनिष्पन्नो निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तवेदम् | मध्ययनं. देवा भवित्ताण पुरे भवमी, केई चुया एगविमाणवासी। पुरे पुराणे इसुयारनामे, खाए समिद्धे सुरलोगरम्मे ॥ १॥ सकम्मसेसेण पुराकएणं, कुलेसु उग्गे (सुदत्ते०) सुय ते पसूआ। निविण्णसंसारभया जहाय, जिणिंदमग्गं सरणं पवन्ना ॥२॥ पुमत्तमागम्म कुमार दोऽवि, पुरोहिओ तस्स जसा य पत्ती। विसालकित्ती य तहेसुआरो, रायऽस्थ देवी कमलावई य॥३॥ 'देवाः' सुराः 'भूत्वा' उत्पद्य 'पुरे भवंमिति अनन्तरातीतजन्मनि केचित्' इत्यनिर्दिष्टनामानः 'च्युताः' भ्रष्टाः। एकस्मिन् पद्मगुल्मनानि विमाने वसन्तीत्येवंशीला एकविमानवासिनः 'पुरे' नगरे 'पुराणे' चिरन्तने इषुकारनानि 'ख्याते' प्रथिते 'समृद्धे' ऋद्धिमत्यत एव 'सुरलोकरम्ये देवलोकवद्रमणीये । ते च किं सर्वथोपभुक्तपुण्या एव ततध्युता उतान्यथेत्याह-खम्-आत्मीय कर्म-पुण्यप्रकृतिलक्षणं तस्य शेषमू-उद्धरितं खकर्मशेषस्तेन, लक्षण तृतीया, 'पुराकृतेन' पूर्वजन्मान्तरोपार्जितेन 'कुलेषु' अन्वयेषु 'उदात्तेपु' उच्चेषु 'चः' पूरणे, 'ते' इति ये देवा भूत्वा । दीप अनुक्रम [४४१] ॥२६॥ । Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~293 Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-1 / गाथा ||१-३|| नियुक्ति : [३७३...] प्रत सूत्रांक ||१-३|| -- च्युताः 'प्रसूताः' उत्पन्नाः, 'निविण्ण'त्ति आपत्वात् 'निर्विण्णाः' उद्विग्नाः, कुतः ?-संसारभयात् , 'जहाय'त्ति परि-4 त्यज्य, भोगादीनिति गम्यते, किमित्याह-'जिनेन्द्रमार्ग' तीर्थकृदुपदर्शितं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मकं मुक्तिपथं शरणम्' अपायरक्षाक्षममाश्रयं प्रपन्नाः' अभ्युपगता इत्यध्ययनार्थसूचनम् । कश्च किंरूपः सन् जिनेन्द्रमार्ग शरणं । प्रपन्न इत्याह-'पुंस्त्वं' पुरुषत्वम् 'आगम्य' प्राप्य 'कुमार'त्ति 'कुमारौं' अकृतपाणिग्रहणौ द्वौ, 'अपिः' पूरणे, सुलभबोधिकत्वेन प्राधान्यख्यापनार्थ चानयोः पूर्वमुपादानम् , पुरोहितस्तृतीयस्तस्य जसा च नाना पत्नी चतुर्थः, 'विशा-13 लकीर्तिश्च' विस्तीर्णयशाच तथेपुकारो नाम राजा पञ्चमः, 'अत्र' एतस्मिन् भवे 'देवी' इति प्रधानपत्नी, प्रक्रमात्तस्यैव राज्ञः कमलावती नाना पष्ठ इति सूत्रत्रयार्थः ॥ सम्प्रति यथैतेषु जिनेन्द्रमार्गप्रतिपत्तिः कुमारयोर्जाता तथा दर्शयितुमाह जाईजरामचुभयाभिभूया, बहिविहाराभिणिविट्ठचित्ता। संसारचकरस विमुक्खणट्ठा, दण ते कामगुणे विरत्ता ॥४॥ पियपुत्तगा दुन्निवि माहणस्स, सकम्मसीलस्स पुरोहियस्स। सरित्तु पोराणिय तत्थ जाई, तहा सुचिण्णं तव संजमं च ।। ५॥ जातिः-जन्म जरा-विश्रसा मृत्युः-प्राणत्यागलक्षणस्तेभ्यो भयं-साध्वसं तेनाभिभूती-बाधितौ जातिज दीप अनुक्रम [४४२-४४४] ---- matt Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~294 Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||४-५|| नियुक्ति: [३७३...] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||४-५|| उत्तराध्य. रामृत्युभयाभिभूती, पाठान्तरतश्च जातिजरामृत्युभयाभिभूते सत्यर्थात् संसारिजने वहिः संसाराद्विहारः-स्थानं पुकारीय दबहिर्विहारः, स चार्थान्मोक्षस्तस्मिन्नभिनिविष्ट-बद्धवाग्रहं चित्तम्-अन्तःकरणं ययोस्तो, तथा संसारचक्रमिय चक्रामध्ययनं. है भ्रमणोपलक्षितत्वात्संसारचक्रं तस्य विमोक्षणार्थ-परित्यागनिमित्तं 'दृष्टा' निरीक्ष्य साधूनिति शेषः, यद्वा 'रष्ट्रेति प्रेक्ष्य ॥३९७॥ मुक्तिपरिपन्धिनोऽमी कामगुणा इति पर्यालोच्य 'तो' अनन्तरोक्तो 'कामगुणे'त्ति सुव्यत्ययात् 'कामगुणेभ्यः' शब्दादिभ्यो, विषयसप्तमी वा, 'विरक्ती' पराझाखीभूतौ प्रियौ-बल्लभौ तौ च ती पुत्रायेव पुत्रको, द्वावपि नैक एव 4 इत्यपिशब्दार्थः 'माहनस्य' ब्राह्मणस्य 'स्वकर्मशीलस्य यजनयाजनादिखकीयानुष्ठाननिरतस्य 'पुरोहितख' शान्तिकर्तुःपर जसरितु'त्ति स्मृत्वा पोराणिय'त्ति सूत्रत्वात्पुराणामेव पौराणिकी-चिरन्तनीं 'तने ति सन्निवेशे कुमारभावे घा, वर्तमानाविति शेषः 'जाति' जन्म तथा 'सुचिण्णं ति सुचीर्ण सुचरितं या निदानादिनाऽनुपहतत्वात् तपः-अनशनादिः, प्राकृतत्वाद्विन्दुलोपः, संयमं च, तपःसंयममिति समाहारद्वन्द्वो चा, अत्र कामगुणविरक्तिरेत्र जिनेन्द्रमार्गप्रतिपत्तिरिति सूत्रद्वयार्थः ॥ ततस्तौ किमकार्याम् ? इत्याह ते कामभोगेसु असजभाणा, माणुस्सएमुंजे पावि दिया। मुक्वाभिकखी अभिजायसहा, नानं उवागम्म ४ उदाहु ॥ ३॥ 'ती' पुरोहितपुत्री कामभोगेपु' उतरूपेषु 'अराजमाणति असंसजती-सकामकुर्वन्तो 'भानुप्यकेपु' मनुजसम्म - - -- दीप अनुक्रम [४४५-४४६] ३९७॥ Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~295 Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||&|| दीप अनुक्रम [४४७ ] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||६|| निर्युक्ति: [३७३...] अध्ययनं [१४], | न्धिषु ये चापि 'दिव्याः' देवसम्बन्धिनः कामभोगास्तेषु चेति प्रक्रमः, 'मोक्षाभिकाङ्क्षिणी' मुक्त्यभिलापिणी 'अभिजातश्रद्धौ' उत्पन्नत्तत्त्वरुची 'तातं' पितरमुपागम्य 'इदं वक्ष्यमाणं 'उदाहु' त्ति उदाहरताम् । तयोर्हि साधुदर्शनानन्तरं कास्माभिरित्थंभूतानि रूपाणि पुराऽपि दृष्टानीति चिन्तयतोर्जातिस्मरणमुत्पन्नं, ततो जातवैराग्यौ प्रव्रज्याभिमुखावात्ममुत्कलीकरणाय तयोश्च प्रतिवोधोत्पादनाय वक्ष्यमाणमुक्तवन्ताविति सूत्रार्थः ॥ यच तायुक्तवन्तौ तदाहअसासर्य दड इमं विहारं, बहुअंतरायं न य दीहमा । तम्हा गिर्हसि न रई लभामो, आमंतयामो चरिसामु मोणं ॥ ७ ॥ 'अशाश्वतम्' अनित्यं दृष्ट्वा 'इ' प्रत्यक्षं विहरणं विहारं, मनुष्यत्येनावस्थानमित्यर्थः, भण्यते हि "भोगभोगाई भुंजमाणे विहरति "त्ति, किमित्येवमत आह-बहवः प्रभूता अन्तरायाः-विघ्ना व्याध्यादयो यस्य तद्वह्वन्तरायं, बहुतरायमपि दीर्घत्वा (घोडा)वस्थायि स्यादित्याह - 'न च' नैव 'दीर्घ' दीर्घकालस्थिया 'आयुः' जीवितं, सम्प्रति पल्योपमायुष्कताया अप्यभावात् यत एवं सर्वमनित्यं तस्माद् 'गिहंसि 'न्ति 'गृहे' वेश्मनि न 'रतिं' धृतिं 'लभामो 'ति लभावहे - प्रामुयः, अतश्च 'आमन्त्र्यावह' पृच्छाव आयां यथा 'चरिष्यामः' आसेवियावहे 'मौन' मुनिभावं संयममिति सूत्रार्थः ॥ एवं च ताभ्यामुक्ते For Parana Private On पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~296~ Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||८-९|| नियुक्ति: [३७३...] -3--5 2 1 १४ प्रत सूत्रांक ||८-९|| अह तायो तत्थ मुणीण तेसिं, तवस्स वाघायकरं वयासी। इषुकारीयउत्तराध्य. इमं वयं वेयविओ वयंति, जहा न होई असुआण लोगो ॥८॥ मध्ययनं. अहिज्ज वेए परिविस्स विप्पे, पुत्ते परिदृपप गिहंसि जाया। बृहद्वृत्तिः भुचा ण भोए सह इत्थियाहिं, आरणगा होह मुणी पसस्था ॥९॥ ॥३९॥ 'अथ' अनन्तरं तायते-सन्तानं करोति पालयति च सर्वापद्भ्य इति तातः स एव तातकः 'तत्र' तस्मिन् संनिवेशेऽवसरे वा 'मुन्योः' भावतः प्रतिपन्नमुनिभावयोः 'तयोः' कुमारयोः 'तपसः' अनशनादेः उपलक्षणत्वाच्छेषसद्धर्मानुष्ठानस्य च 'व्याघातकरं' वाधाविधायि, वचनमिति शेषः, 'वयासि'त्ति अवादीत् , यद-15 ४ वादीत्तदाह-इमां वाचं वेदविदो वदन्ति' प्रतिपादयन्ति, यथा-'न भवति' न जायते 'असुतानाम्' अविद्यमानदीपुत्राणां 'लोकः' परलोकः, तं विना पिण्डप्रदानाद्यभावे गत्याधभावात् , तथा च वेदवचः-'अनपत्यस्य लोका न सन्ति", तथाऽन्यैरप्युक्तम्-"पुत्रेण जायते लोकः, इत्येपा वैदिकी श्रुतिः । अथ पुत्रस्य पुत्रेण, स्वर्गलोके मही18|यते ॥१॥" तथा-"अपुत्रस्य गति स्ति, खर्गो नैव च नैव च । गृहिधर्ममनुष्ठाय, तेन स्वर्ग गमिष्यति ॥१॥" दायत एवं तस्माद् 'अधीत्य' पठित्वा 'वेदान्' ऋग्वेदादीन् 'परिवेष्य' भोजयित्वा 'विप्रान्' ब्राह्मणान् , तथा पुत्रान् । 'प्रतिष्ठाप्य' कलाकलत्रग्रहणादिना गृहस्थधर्मे निवेश्य, कीदृशः पुत्रान् ?-गृहे जातान्, न तु गृहीतप्रतिपन्नका-13 teri-CA दीप अनुक्रम [४४९-४५०] ॥३९८ पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~297 Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१० -१५|| दीप अनुक्रम [४५१ -४५६] Jam Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१४], मूलं [--] / गाथा ||१०-१५|| निर्युक्तिः [३७३...] दीनू, पाठान्तरे च पुत्रान् 'परिष्ठाप्य' खामित्वेन निवेश्य गृहे 'जाय'त्ति हे जाती- पुत्रौ !, तथा 'भुक्त्वा' भुक्त्वा 'ण' इति वाक्यालङ्कारे 'भोगान्' शब्दादीन् सह 'स्त्रीभिः' नारीभिस्ततोऽरण्ये भवौ आरण्यो, 'अरण्याण्णो 'वक्तव्यः' (अरण्याण्णः । वार्त्तिकं ) इति णप्रत्ययः, आरण्यावेव आरण्यको- आरण्यकप्रतधारिणौ 'होह'त्ति भवतंसम्पद्येथां युवां 'मुनी' तपखिनौ 'प्रशस्ती' श्लाघ्यो, इत्थमेव ब्रह्मचर्याद्याश्रमव्यवस्थानात् उक्तं हि - " त्रह्मचारी गृहस्थश्च, वानप्रस्थो यतिस्तथे "ति, इह च 'अधीत्य वेदानित्यनेन ब्रह्मचार्याश्रम उक्तः परिवेष्येत्यादिना च गृहस्थाश्रमः | आरण्यकावित्यनेन च वानप्रस्थाश्रमः मुनिग्रहणेन च यत्याश्रम इति सूत्रद्वयार्थः ॥ इत्थं तेनोक्ते कुमारकौ यदकाष्ट तदाह- सोअग्गिणा आयगुणिघणेणं, मोहानिला पज्जलणाहिएणं । संतत्तभावं परितप्यमाणं, लोलुप्यमाणं बहुहा बहुं च ॥ १० ॥ पुरोहितं कम सोऽणुर्णतं, निमंतयंतं च सुए घणेणं । remi कामगुणेहिं चेव, कुमारगा ते पसमिक्ख वकं ॥ ११ ॥ अघी न भवति ताणं, भुसा दिया निंति तमं तमेणं । जाया य पुत्ता न हवंति ताणं, को नाम ते अणुमन्निज एवं १ ॥ १२ ॥ For Parana Privat org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~298~ Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||१०-१५|| नियुक्ति : [३७३...] प्रत सूत्रांक -१५|| उत्तराध्य. खणमित्तसुक्खा बहुकालदुक्खा, पगामनुक्खा अणिगामसुक्खा । इषुकारीयसंसारमुक्खस्स विपक्वआ, खाणी अणधाण उ कामभोगा ॥१३॥ बृद्धृत्तिः परिब्बयंते अनियसकामे, अहो अराओ परितप्पमाणे । | मध्ययनं. ॥३९॥ अन्नप्पमत्ते धणमेसमाणे, पप्पुत्ति मछु पुरिसो जरं च ॥ १४ ॥ इमं च मे अस्थि इमं च नथि, इमं च मे किच इमं अकिचं। तं एवमेवं लालप्पमाणं, हरा हरतित्ति कहं पमाओ? ॥१५॥ सुतवियोगसम्भावनाजनितं मनोदुःखमिह शोकः स चाग्निरिव शोकाग्निस्तेन, आत्मनो गुणा आत्मगुणाः-कमक्षयोपशमादिसमुद्भूताः सम्यग्दर्शनादयस्त इन्धनमिवेन्धनं दायतया यस्य स तथा तेन, अनादिकालसहचरितत्वेन हरागादयो वाऽऽत्मगुणास्त इन्धनमुद्दीपकतया यस्य स तथा तेन, मोहो मूढताऽज्ञानमित्तियावत् सोऽनिल इव मोहानिलस्तस्मादधिकं-महानगरदाहादिभ्योऽप्यर्गलं प्रज्वलनं-प्रकर्पण दीपनमस्येति अधिकप्रज्वलनः, यद्वाद प्रज्वलनेनाधिक इतराश्यपेक्षया यस्तेन, पूर्वत्र प्राकृतत्वादधिकशब्दस्यं परनिपातः, तथा समिति-समन्तात् तप्स ॥३९ ॥ हाइव तसः अनितत्वेन भावः-अन्तःकरणमस्येति संतप्तभावस्तम्, अत एव च 'परितप्यमानं' समन्ताहवमानम्, है अर्थात् शरीरे दाहस्यापि शोकावेशत उत्पत्तेः, लोलुप्यमानं तद्वियोगशङ्कायशोत्पन्नदुःखपरशुभिरतिशयेन हदि छिद्य दीप अनुक्रम [४५१-४५६] Damrooratim Tm.Puremaramaniwom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~299~ Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१० -१५|| दीप अनुक्रम [४५१ -४५६] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१४], मूलं [ - ] / गाथा || १०-१५ || निर्युक्ति: [३७३...] मानं, वृद्धास्तु व्याचक्षते - 'लोलुप्यमाणं' ति लालप्यमानं - 'भरणपोषणकुलसंताणेसु य तुम्भे भविस्सह'त्ति, 'बहुधा ' अनेकप्रकारं 'बहु' च प्रभूतं यथा भवत्येवं लोलुप्यमानं लालप्यमानं वेति सम्बन्धः, 'पुरोहितं' 'पुरोधसं 'त'मिति प्रक्रान्तं 'कमसो'त्ति क्रमेण परिपाठ्या 'अनुनयन्तं' स्वाभिप्रायेण प्रज्ञापयन्तं निमन्त्रयन्तं च-तौ भोगेरुपच्छन्दयन्तं 'सुती' पुत्री 'धनेन' द्रव्येण यथाक्रमं प्रक्रमानतिक्रमेण 'कामगुणैः' अभिलषणीयशब्दादिविषयैः पाठान्तरतःकामगुणेषु या, 'चः' समुच्चये 'एव' इति पूरणे, कुमारकौ तावनन्तरप्रक्रान्तौ 'प्रसमीक्ष्य' प्रकर्षेणाज्ञानाच्छादितमतिमालोच्य 'वाक्यं' वचो वक्ष्यमाणमुक्तवन्ताविति गम्यते । किं तदित्याह 'वेदाः' ऋग्वेदादयः 'अधीताः' पठिता न 'भवन्ति' जायन्ते 'त्राणं शरणं, तदध्ययनमात्रतो दुर्गतिपतनरक्षणासिद्धेः उक्तं हि तैरपि - "अकारणमधीयानो, ब्राह्मणस्तु युधिष्ठिरः । दुष्कुलेनाप्यधीयन्ते, शीलं यस्य स रोचते ॥ १ ॥" तथा "शिल्पमध्ययनं नाम, वृत्तं ब्राह्मणलक्षणम् । वृत्तस्थं ब्राह्मणं प्राहुर्नेतरान् वेदजीवकान् ॥ २ ॥” तथा 'भुज'ति अन्तर्भावितण्यर्थत्वाद्भोजिताः 'द्विजाः ' त्राह्मणाः 'नयन्ति' प्रापयन्ति तमोरूपत्वात्तमो नरकस्तत्तमसा - अज्ञानेन यद्वा तमसोऽपि यत्तमस्तस्मिन् अतिरौद्रे रौरवादिनरके णमिति वाक्यालङ्कारे, ते हि भोजिताः कुमार्गप्ररूपणपशुवधादावेव कर्मोपचयनिबन्धने असद्व्यापारे प्रवर्त्तन्त इत्यसरप्रवर्त्तनतस्तद्भोजनस्य नरकगतिहेतुत्वमेव, अनेन च तेषां निस्तारकत्वं दूरापास्तमित्यर्थादुक्तं, तथा 'जाताश्च' उत्पन्नाः 'पुत्राः' सुता न भवन्ति 'त्राणं' शरणं नरकादिगतौ निपततामिति गम्यते, उक्तं हि तन्मतानुसा For P&PU wandmary org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~300~ Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||१०-१५|| नियुक्ति: [३७३...] उत्तराध्य. प्रत वृहात ॥४०॥ १४ सूत्रांक -१५|| रिभिरपि-"यदि पुत्राद्भवेत्स्वर्गो, दानधर्मो न विद्यते । मुषितस्तत्र लोकोऽयं, दानधर्मो निरर्थकः ॥१॥ बहुपुत्रा दुली इषुकारीयगोधा, ताम्रचूडस्तथैव च। तेषां च प्रथम खर्गः,पश्चाल्लोको गमिष्यति ॥२॥" यतश्चैवं ततः को नाम ? न कश्चित्सम्भाव्यते यस्ते-तवानुमन्येत-शोभनमिदमित्यनुजानीयात्सविवेक इति गम्यते, 'एतद अनन्तरमुक्तं वेदाध्ययनादित्रितयमिति, भुक्त्वा भोगानिति च चतुर्थोपदेशप्रतिवचनमाह-क्षणमात्रं सौख्यं येषु ते तथा, बहुकालं नरकादिषु दुःखं ॥ शारीरं मानसं च येभ्यस्ते तथाविधाः, कदाचित्खल्पकालमपि सुखमतिशायि स्याद् दुःखं त्वन्यथेति खल्पकालमपि/X तबहुकालभाविनोऽपि दुःखस्योपहन्तृ स्यादत आह-प्रकामम्-अतिशयेन दुःखं येभ्यस्ते तथा, 'अनिकामसौख्याः' अप्रकृष्टसुखाः, ईदृशा अप्यायती शुभफलाः स्युरत आह-संसारान्मोक्षो-विश्लेषः संसारमोक्षो निवृत्तिरित्यर्थस्तस्य विपक्षभूताः-तत्प्रतिवन्धकतयाऽत्यन्तप्रतिकूलाः, किमित्येवंविधास्ते इत्याह-खनिरिव खनिः-आकरः 'अनर्थानाम्' इहपरलोकदुःखावाप्तिरूपाणां, तुशब्दोऽवधारणे भिन्नक्रमश्च ततः खनिरेव, के एवंविधाः?-'कामभोगाः' उक्तरूपाः, |अनर्थखनित्वमेव स्पष्टयितुमाह-'परिव्रजन्' विषयसुखलाभार्थमितस्ततो भ्राम्यन् अनिवृत्तकामः' अनुपरतेच्छः सन् ॥४०॥ 'अहो य राओ'त्ति आर्षत्वाचख च भिन्नक्रमादहि रात्री च अहर्निशमितियावत् परितप्यमानः तदवात्यै समन्ताचिन्तामिना दयमानः, अन्ये-सुहृत्वजनादयः, अथवाऽन्न-भोजनं तदर्थ प्रमत्तः-तत्कृत्यासक्तचेता अन्यप्रमत्तः अन्न दीप अनुक्रम [४५१-४५६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~301 Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [--1 / गाथा ||१६|| नियुक्ति: [३७३...] CRESCRECASEAC प्रत सूत्रांक ||१६|| प्रमत्तो वा 'धन' वित्तं 'एसमाणे ति 'एषयन्' विविधोपायगवेषयमाणः 'पप्पोत्ति' प्राप्नोति 'मृत्यु' प्राणत्यागं, कोऽसौ ?-पुरुषः 'जरां च' वयोहानिलक्षणाम् । किञ्च-इदं च मेऽस्ति रजतरूप्यादि इदं च नास्ति पनरागादि, इदं च 'मे' मम 'कृत्यं' कर्तव्यं' गृहप्राकारादि, इदमकृत्यमारब्धमपि वणिज्यादि न कर्तुमुचितं 'त'मिति पुरुष-21 ४ मेयमेव-वृथैव 'लालप्यमानम्' अत्यर्थ व्यक्तवाचा बदन्तं हरन्ति-अपनयन्त्यायुरिति हरा:-दिनरजन्यादयो व्याधिविशेषा वा 'हरन्ति' जन्मान्तरं नयन्ति, उपसंहर्तुमाह-'इती'त्यस्माद्धेतोः 'कथं' केन प्रकारेण 'प्रमादः' अनुद्यमः प्रक्रमाद्धर्मे कर्तुमुचित इति शेषः, इति सूत्रपट्वार्थः ॥ सम्प्रति तो धनादिभिर्लोभयितुं पुरोहितःप्राह धणं पभूयं सह इत्थियाहिं, सयणा तहा कामगुणा पगामा । तचं कए तप्प जस्स लोगो,तं सव्व साहीणमिहेव तुज्झं ॥ १६॥ 'धनं' द्रव्यं 'प्रभूतं' प्रचुरं 'सह स्वीभिः' समं नारीभिः 'खजनाः' पितृपितृव्यादयः, तथा 'कामगुणाः' शब्दा-13 दयः 'पगामत्ति 'प्रकामाः' अतिशायिनः 'तपः' कष्टानुष्ठानं 'कृते' निमित्तं 'तप्यते' अनुतिष्ठति 'यस्य' धनादेः ४ दालोकः' जनस्तत् 'सर्वम्' अशेषं 'खाधीनम्' आत्मायत्तम् 'इहैव' अस्मिन्नेव गृहे 'तुझंति सूत्रत्वायुवयोः, यद्यपि च तयोः स्त्रियस्तदा न सन्ति तथाऽपि तदवाप्तियोग्यताऽस्तीति तासामभिधानमिति सूत्रार्थः ॥ तावाहतुः दीप अनुक्रम [४५७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~302~ Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||१७|| नियुक्ति: [३७३...] प्रत सूत्रांक ||१७|| उत्तराध्य. धणेण किं धम्मधुराहिगारे, सयणेण या कामगुणेहिं चेव । इषुकारीयबृहद्वृत्तिः समणा भविस्सामु गुणोहधारी, बहिंविहारा अभिगम्म भिक्खं ॥ १७ ॥ | 'धनेन' द्रव्येण किं ?, न किञ्चिदित्यर्थः, धर्म एवातिसात्विकैरुह्यमानतया धूरिव धूर्धर्मधुरा तदधिकारे- मध्य ॥४०१॥ तत्प्रस्तावे खजनेन वा कामगुणैश्चैव ?, तथा च वेदेऽप्युक्त-"न प्रजया न धनेन त्यागेनैकेनामृतत्वमानशु"रित्यादि, ततः 'श्रमणी' तपखिनौ भविष्यावः, गुणोघं-सम्यग्दर्शनादिगुणसमूहं धारयत इत्येवंशीलौ गुणौषधारिणी बहि:ग्रामनगरादिभ्यो बहिर्वर्तित्वाद् द्रव्यतो भावतश्च कचिदप्रतिबद्धत्वाद् विहारः-विहरणं ययोस्तौ वहिबिहारी अप्रति-४ बद्धविहारावितियावत् 'अभिगम्य' आश्रित्य 'भिक्षा' शुद्धोष्ठां तामेवाहारयन्ताविति भाव इति सूत्रार्थः॥ आत्माशस्तित्वमूलत्वात्सकलधर्मानुष्ठानस्य तन्निराकरणायाह पुरोहितः जहा य अग्गी अरणीऽसंतो, खीरे घयं तिल्लमहा तिलेमु। एमेव जाया सरीरंमि सत्ता, संमुच्छई नासह नावचिढे ।। १८॥ 'यथे' त्यौपम्ये चशब्दोऽवधारणे, यथैव 'अग्निः' वैश्वानरः 'अरणिउत्ति अरणितः-अग्निमन्धनकाष्ठाद् 'असन् ॥४०१| अविद्यमान एव संमूर्छति, तथा क्षीरे घृतं तैलमथ तिलेषु, एवमेव हे जाती' पुत्रौ ! 'सरीरंसि'त्ति शरीरे काये । ['सत्त्वाः' प्राणिनः 'समुच्छंति'त्ति संमूर्छन्ति, पूर्वमसन्त एव शरीराकारपरिणतभूतसमुदायत उत्पद्यन्ते, तथा चाहुः-11 R- CAREEReceCE SPRISESSIC दीप अनुक्रम [४५८] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~303~ Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-1 / गाथा ||१८|| नियुक्ति: [३७३...] प्रत सूत्रांक ||१८|| CCCCCCESCR पृथिव्यपस्तेजोवायुरिति तत्त्वानि, एतेभ्यश्चैतन्यं, मद्यानेभ्यो मदशक्तिवत्", तथा 'नासइत्ति नश्यन्ति-अभ्रपटलवत्प्रलयमुपयान्ति 'णावचिट्टे'त्ति न पुनः अवतिष्ठन्ते-शरीरनाशे सति न क्षणमप्यवस्थितिभाजो भवन्ति, यहा शरीरे सत्यप्यमी सत्त्वा नश्यन्ति, नावतिष्ठन्ते, जलवुदुदवत् , उक्तं हि-"जलवुद्वदवजीवाः" अत्र च प्रत्यक्षतोऽनुपलम्भ एव प्रमाणं, न बसौ शरीरे शरीरव्यतिरिक्तो वा भवान्तरप्राप्ती प्रत्यक्षत उपलभ्यत इति नास्ति, शशविपाणवदिति भाव इति सूत्रार्थः ।। कुमारकावाहतुः नो इंदियग्गिज्झु अमुत्तभावा, अमुत्तभावा चिय होइ निचो। अज्झत्यहे निययऽस्स बंधो, संसारहेउं च वयंति बंधं ॥ १९ ॥ 'नो' इति प्रतिषेधे इन्द्रियैः-श्रोत्रादिभियः-संवेद्य इन्द्रियग्राह्यः, सत्त्व इति प्रक्रमः, असत्त्वादेवायमिन्द्रियामाह्य इत्याशङ्कयाह-'अमूर्तभावात्' इन्द्रियग्राबरूपाद्यभावात् , अयमाशयः-यदिन्द्रियग्राचं सन्नोपलभ्यते तदसदिति निश्चीयते, यथा प्रदेशविशेषे घटो, यत्तु तद्बाह्यमेव न भवति न तस्यानुपलम्भेऽप्यभावनिश्चयः, पिशाचादिवत्, तद्विषयानुपलम्भस्य संशयहेतुत्वात् , न च साधकबाधकप्रमाणाभावात् संशयविषयतैवास्त्विति वाच्यं, तत्साधकस्यानुमानस्य सद्भावात् , तथाहि-अस्त्यात्मा अहं पश्यामि जिनामीत्याद्यनुगतप्रत्ययान्यथानुपपत्तेः, आत्माभावे । हीन्द्रियाण्येव द्रष्ट्रणि स्युः, तेषु च परस्परं विभिन्नेष्यहं पश्यामि जिघ्रामीत्यादिरनुगतोऽहमितिप्रत्ययोऽनेकेष्विव दीप अनुक्रम [४५९] SMEDuratimintamarana पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~304 Page #305 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||१९|| नियुक्ति: [३७३...] (४३) वृहद्वृत्तिः 16 मध्ययनं. प्रत सूत्रांक ||१९|| उत्तराध्य. प्रतिपत्तृषु न स्यात् , उक्तं हि-“अहं शृणोमि पश्यामि, जिनाम्याखादयामि च । चेतयाम्यध्यवस्यामि, बुध्यामी-इषुकारीय है येवमति सः॥१॥” वृद्धास्तु व्याचक्षते-अमूर्त्तत्वान्नोइन्द्रियग्राह्यो, नोइन्द्रियं च मनो, मनश्चात्मैव, अतः खप्रत्यक्ष एवायमात्मा, कस्मात् ?, उच्यते, त्रैकाल्यकार्यव्यपदेशात् , तद्यथा-कृतवानहं करोम्यहं करिष्या॥४०॥ म्यहमुक्तवानहं ब्रवीम्यहं वक्ष्याम्यहं ज्ञातवानहं जानेऽहं ज्ञास्येऽहमिति योऽयं त्रिकालकार्यव्यपदेशहेतुरहंप्रत्ययो । लनायमानुमानिको न चागमिकः, किं तहिं ?, प्रत्यक्षकृत एवायम् , अनेनैवात्मानं प्रतिपद्यस्ख, नायमनात्मके घटा दावुपलभ्यत इति, तथाऽमूर्तभावादपि च भवति नित्यः, तथाहि-यद्रव्यत्वे सत्यमूर्त तन्नित्यं, यथा व्योम, अमूर्त-11 श्वायं द्रव्यत्वे सत्यनेन विनाशानवस्थाने प्रत्युक्ते, न चैवममूर्तत्वादेव तस्य बन्धासम्भवः सम्भवे या सर्वस्य सर्वदा।। तत्प्रसङ्ग इति वाच्यं, यतः 'अज्झत्थहेउं णिययऽस्स बंधो' अध्यात्मशब्देन आत्मस्था मिथ्यात्वादय इहोच्यन्ते, ततस्तद्धेतुः-तन्निमित्तोऽपरस्थहेतुकृतत्वेऽतिप्रसङ्गादिदोपसम्भवानियतो-निश्चितो न संदिग्धो, जगद्वैचित्र्यान्यधानु-14 पपत्तेः, 'अस्य' जन्तोर्वन्धः-कर्मभिः संश्लेषः, यथा ह्यमूर्तस्यापि व्योम्नो मूतैरपि घटादिभिः सम्बन्धः एवमस्याप्यमूर्त-14 | स्यापि मूतैरपि कर्मभिरसी न विरुध्यते, तथा चाह-"अरूपं हि यथाऽऽकाशं, रूपिद्रव्यादिभाजनम् । तथा यरूपी जीवो, रूपिकमोदिभाजनम् ॥१॥" इति, मिथ्यात्वादिहेतत्वाचन सर्वस्य सर्वदा तत्प्रसङ्ग इत्यदापा, एव। हि येषामेव मिथ्यात्वादित ढेतुसम्भवस्तेपामेवासौ न तु तद्विरहितानां सिद्धानामपि, तथा संसार:-चतुतिप-18 34- दीप अनुक्रम [४६० For Pro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~305 Page #306 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||२०|| नियुक्ति: [३७३...] (४३) % प्रत सूत्रांक ||२०|| र्यटनरूपस्तद्धेतुं च-तत्कारणं वदन्ति 'बन्ध' कर्मवन्धम् , एतेनामूर्तत्वाथोम्न इव निष्क्रियत्वमपि निराकृतमिति सूत्रार्थः ॥ यत एवमस्त्यात्मा नित्योऽत एव च भवान्तरानुयायी तस्य च बन्धो बन्धादेव मोक्ष इत्यतः जहा वयं धम्ममजाणमाणा, पावं पुरा कम्ममकासि मोहा। ओरुज्झमाणा परिरक्खयंता, तं व भुजोऽवि समायरामो ॥२०॥ 'यथा' येन प्रकारेण वयं 'धर्म' सम्यग्दर्शनादिकम् 'अजानानाः' अनवबुध्यमानाः 'पावं' पापहेतुं 'पुरा' पूर्व 'कर्म' क्रियाम् 'अकासित्ति अकार्म कृतवन्तः 'मोहात्' तत्त्वानवबोधात् 'अवरुध्यमानाः' गृहानिर्गममलभमानाः 'परिरक्षमाणाः' अनुजीविभिरनुपाल्यमानाः 'तद्' इति पापकर्म 'नेप'त्ति नैव 'भूयोऽपि' पुनरपि 'समाचरामः' अनुतिष्ठामो, यतः सम्प्रत्युपलब्धमेवास्माभिर्वस्तुतत्त्वमिति भावः, सर्वत्र च 'अस्मदो द्वयोश्चेति (पा.१-२-५९) द्वित्वेऽपि बहुवचनमिति सूत्रार्थः ॥ अन्यच अब्भाहयंमि लोगंमि, सचओ परिवारिए । अमोहाहिं पडतीहिं, गिहंसि न रई लभे ॥२१॥ 'अभ्याहते' आभिमुख्येन पीडिते 'लोके' जने 'सर्वत्र' सर्वासु दिक्षु 'परिवारिते' परिवेष्टिते 'अमोघाभिः' अव-13 ध्यामिः प्रहरणोपमाभिः 'पतन्तीभि' आगच्छन्तीभिः 'गिहंसि'त्ति गृहे तस्य चोपलक्षणत्वाद् गृहवासे न 'रतिम् । A5%82%ACC दीप अनुक्रम [४६१] Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~306~ Page #307 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||२१|| नियुक्ति: [३७३...] इषुकारीय प्रत सूत्रांक ||२१|| उत्तराध्य. आसक्ति 'लभे'त्ति लभावहे, यथा हि वागुरया परिवेष्टितो मृगोऽमोघेश्च प्रहरणैयोधनाभ्याहतो न रतिं लभते. द एवमावामपीति सूत्रार्थः ॥ भृगुराह-(ग्रन्थानम् १००००) बृहद्वृत्तिः मध्ययनं. केण अब्भाहओ लोओ, केण वा परिवारिओ । का वा अमोहा वुत्ता!, जाया !चिंतावरो हुमि ॥२२॥ ॥४०॥ केन ब्याधतुल्येनाभ्याहतो लोकः ?, केन वा वागुरास्थानीयेन परिवारितः १, का वा 'अमोघा' अमोघप्रहरणो-4 १४ दिपमा अभ्याहतिक्रियां प्रति करणतयोक्ता, 'जाती! पुत्री चिन्तापरः 'हुमि त्ति भवामि, ततो ममावेद्यतामयमर्थ र इति भाव इति सूत्रार्थः । तावाहतुः3 मञ्चुणाऽभाहओ लोओ, जराए परिवारिओ। अमोहा रयणी वुत्ता, एवं ताय! बियाणह ॥ २३ ॥ 'मृत्युना' कृतान्तेनाभ्याहतो लोकः, तस्य सर्वत्राप्रतिहतप्रसरत्वात् , जरया परिवारितः, तस्या एव तदभिघातयोग्यतापादनपटीयस्त्वात् , अमोघा 'रयणित्ति रजन्य उक्ताः, दिवसाविनाभावित्वात्तासां दिवसाच, तत्पतने बवश्यंभावी जनस्याभिघातः, एवं तात ! 'विजानीत' अवगच्छतेति सूत्रार्थः । किञ्च ४०३॥ जा जा वह रयणी, न सा पडिनियतई । अहम्मं कुणमाणस्स, अहला जति राइओ ॥ २४ ॥ जा जा वच्चाह रयणी, न सा पडिनियई। धम्मं तु च कुणमाणस्स, सफला जति राइओ ॥ २५॥ IR या या 'वयति' ब्रजति 'रजनी' रात्रिरुपलक्षणत्वादिनं च न सा 'प्रतिनिवर्तते' पुनरागच्छति, तदागमने हि Faramanantimonld दीप अनुक्रम [४६२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~307~ Page #308 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥२४ -२५|| दीप अनुक्रम [ ४६५ -४६६] Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||२४-२५|| निर्युक्तिः [३७३...] सर्वदा सैबैका जन्मरात्रिः स्यात्ततो न द्वितीया मरणरात्रिः कदाचित्प्रादुण्ण्यात्, ताश्चाधर्म कुर्वतो जन्तोरिति गम्यते अफला यान्ति रात्रयः, अधर्मनिबन्धनं च गृहस्थतेत्यायुपोऽनित्यत्वादधर्मकरणे च तस्य निष्फलत्वात्तत्परित्याग एव श्रेयानिति भावः । इत्थं व्यतिरेकद्वारेण प्रव्रज्याप्रतिपत्तिहेतुमभिधाय तमेवान्ययमुखेनाह - 'जा जे त्यादि पूर्ववत्, नवरं 'धम्मं च' ति चशब्दः पुनरर्थे धर्म पुनः कुर्वतः सफला धर्मलक्षणफलोपार्जनतो, न च व्रतप्रतिपत्तिं विना धर्म इत्यतो व्रतं प्रतिपत्स्यावहे इत्यभिप्राय इति सूत्रद्वयार्थः ॥ इत्थं कुमारवचनादाविर्भूतसम्यक्त्वस्तद्वचनमेव पुरस्कुर्वन् भृगुराह— एमओ संवसित्ता णं, दुहओ संमत्त संजया । पच्छा जाया । गमिस्सामो, भिक्खमाणा कुले कुले ॥ २६ ॥ 'एकता' एकस्मिन् स्थाने 'समुष्य' सहैवासित्वा 'दुहतो' त्ति द्वयं च द्वयं च द्वये आवां युवां च, व्यक्त्यपेक्षया बहुवचनं पुरुषप्राधान्याच पुंलिङ्गता, 'सम्यक्त्वसंयुक्ताः' सम्यक्त्वेन तत्त्वरुचिलक्षणेन संयुताः सहिताः उपलक्षणत्वाद्देशविरत्या च 'पश्चाद्' यौवनावस्थोत्तरकालं, कोऽर्थः ? - पश्चिमे वयसि, 'जाती' पुत्रौ ! 'गमिष्यामः' प्रजिष्यामो वयं ग्रामनगरादिषु, मासकल्पादिक्रमेणेति शेषः, अर्थाच प्रत्रज्यां प्रतिपद्य, 'भिक्षमाणाः' याचमानाः, पिण्डादिकमिति गम्यते, क ? - 'कुले कुले' गृहे गृहे न त्वेकस्मिन्नेव वेश्मनि, किमुक्तं भवति ? - अज्ञातोच्छवृत्त्येति सूत्रार्थः ॥ कुमारावाहतुः --- For Parsons Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~308~ Page #309 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-1 / गाथा ||२६-२८|| नियुक्ति: [३७३...] 1942 वृहद्वृत्तिः ॥४०४॥ सूत्रांक % A ||२६ -२८|| उत्तराध्य. जस्सऽस्थि मचुणा सक्खं, जस्स वऽस्थि पलायणं । जो जाणइ न मरिस्सामि, सो हु कंखे सुए सिया ॥२७॥ इषुकारीय. अजेय धम्म पडिवजयामो, जहिं पवन्ना न पुणभवामो। अणागय नेव य अस्थि किंची, सद्धाखमं नो विणइत्सु रागं ॥ २८॥ | मध्ययनं. 'यस्य' इत्यनिर्दिष्टस्वरूपस्य 'अस्ति' विद्यते 'मृत्युना' कृतान्तेन 'सख्यं' मित्रत्वं, यस्य चास्ति 'पलायनं' नशनं, मृत्योरिति प्रक्रमः, तथा 'जो जाणइत्ति यो जानीते यथाऽहं न मरिष्यामि, 'सो हु कंखे सुए सिय'त्ति स एव 'काङ्क्षति' प्रार्थयते 'श्वः' आगामिनि दिने स्यादिदमिति गम्यते । न च कस्यचिन्मृत्युना सह सख्यं ततो वा पलायनं तदभावज्ञानं वा अतोऽद्यैव 'धर्म' प्रक्रमाद्यतिधर्म 'पडियजयामो'त्ति 'प्रतिपद्यामहे' अङ्गीकुर्महे, तमेव फलो-12 पदर्शनद्वारेण विशिनष्टि-'जहिंति आर्षत्वाद्यं धर्म 'प्रपन्नाः' आश्रिताः ‘ण पुणब्भवामो'त्ति न पुनर्भविष्यामो-न दि पुनर्जन्मानुभविष्यामः, तन्निवन्धनभूतकर्मापगमात् , जरामरणाद्यभावोपलक्षणं चैतत्, किञ्च-'अनागतम्' अप्राप्त नैव चास्ति किञ्चिदिति मनोरममपि विषयसौख्यादि अनादौ संसारे सर्वस्य प्राप्तपूर्वत्वात्ततो न तदर्थमपि गृहावस्थान कायुक्तमिति भावः, यद्वा 'अनागतम्' आगतिविरहितं नैव चास्ति किंचित् , किन्तु सर्वमागतिमदेव जरामरणादि-13 ॥४०४॥ व्यसनजातं, ध्रुवभाविवादस्य भवस्थानां, यद्वाऽनागतं यत्र मृत्योरागतिर्नास्ति तन्न किश्चित्स्थानमस्ति, यतश्चैवमतः श्रद्धा-अभिलाषः क्षम-युक्तमिहलोकपरलोकयोः श्रेयःप्राप्तिनिमित्तमनुष्ठानं कर्तुमिति शेषः, 'ण' इति नोऽ C4 दीप अनुक्रम [४६७-४६९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~309~ Page #310 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [--1 / गाथा ||२९-३०|| नियुक्ति: [३७३...] प्रत सूत्रांक ||२९ AAAAAACCX -३०|| स्माकं 'विनीय' अपसार्य, के ?-'राग' खजनाभिष्वङ्गलक्षणं, तत्त्वतो हि कः कस्य खजनो न वा खजन इति, उक्तं । च-"अयं णं 'भंते ! जीवे एगमेगस्स जीवस्स माइत्ताए (पियताए) भाइत्ताए पुत्तत्ताए धूयत्ताए सुण्हत्ताए भजताए है सुहिसयणसंबंधसंथुयत्ताए उववण्णपुधे ?, हंता गोयमा !, असतिं अदुवा अणंतखुत्तो"त्ति, इति सूत्रद्वयार्थः ॥ ततस्तयोर्वचनमाकर्ण्य पुरोहित उत्पन्नव्रतग्रहणपरिणामो ब्राह्मणी धर्मविनकारिणीं मत्वेदमाह पहीणपुत्तस्स हु नत्थि वासो, वासिद्धि भिक्खायरियाइ कालो। साहाहि रुक्खो लहई समाहिं, छिन्नाहिं साहाहिं तमेव खाणुं ॥२९॥ पंखाविहणो व जहेव पक्खी, भिच्चव्यिहणो व रणे नरिंदो। विवन्नसारो वणिउव्व पोए, पहीणपुत्तोमि तहा अहंपि ॥ ३० ॥ प्रहीणी-प्रभ्रष्टौ पुत्रौ यस्मात्स प्रहीणपुत्रः, अथवा प्राकृते पूर्वापरनिपातयातनत्वात्पुत्राभ्यां प्रहीणः-त्यक्तः पुत्रग्रहीणः तस्य 'हुः' पूरणे 'नास्ति' न विद्यते 'वासः' अवस्थान, मम गृह इति गम्यते, वाशिष्टि!-वशिष्टगोत्रोद्भवे, गौरवख्यापनार्थ गोत्राभिधानं, तच कथं नु नाम धर्माभिमुख्यमस्याः स्यादिति, भिक्षाचर्यायाः-भिक्षाटनस्य, | १ अयं भदन्त ! जीव एकैकस्य जीवस्य मातृतया (पितृतया ) भ्रातृतया पुत्रतया दुहितृतया स्नुषातया भार्यातया सुहृत्स्वजनसम्बबान्धसंस्तुततया उत्पन्नपूर्वः ?, हन्त गौतम ! असकृत् अथवाऽनन्तकृत्वः । दीप अनुक्रम [४७०-४७१] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~310~ Page #311 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२९ -३०|| दीप अनुक्रम [४७० -४७१] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४०५॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||२९-३०|| निर्युक्ति: [३७३...] उपलक्षणं चैतद् व्रतग्रहणस्य कालः - प्रस्तावो वर्त्तत इति शेषः । किमित्येवमत आह-'शाखाभिः' प्रतीताभिः 'वृक्षः ' द्रुमः 'लभते' प्राप्नोति 'समाधि' स्वास्थ्यं, 'छिन्नाभिः' द्विधाकृताभिः शाखाभिः 'तमेव' वृक्षं यस्ताभिः समा धिमाप्तवान् 'खाणुं'ति स्थाणुं जनोऽप्युपदिशतीत्युपस्कारः, यथा हि तास्तस्य शोभासंरक्षण सहायकृत्यकरणादिना | समाधिहेतवः एवं ममाप्येतौ सुतावतस्तद्विरहितोऽहमपि स्थाणुकल्प एवेति किं ममैवंविधस्य खपरयोः कञ्चिदु|पकारमपुष्णत एव गृहवासेनेत्यभिप्रायः । किञ्च पक्षाभ्यां - पतत्राभ्यां विहीनो-विरहितः पक्षविहीनः, 'वा' दृष्टान्तान्तरसमुचये, यथा 'इह' अस्मिँल्लोके 'पक्षी' विहङ्गमः पलायितुमप्यशक्त इति मार्जारादिभिरभिभूयते । तथा | भृत्याः पदातयस्त द्विहीनो, वा प्राग्वत्, 'रणे' सङ्ग्रामे 'नरेन्द्रः' राजा शत्रुजनपराजयस्थानमेव जायते, तथा विपन्न:विनष्टः सारो-हिरण्यरत्नादिरस्येति विपन्नसारो वणिक सांयात्रिको, येति प्राग्वत्, 'पोते' प्रवहणे भिन्न इति गम्यते नार्वाग् न च परत इत्युदधिमध्यवर्त्ती विषीदति, पुत्रप्रहीणोऽस्मि तथाऽहमपि, कोऽर्थः ? - पक्षभृत्यार्थसारभूताभ्यां सुताभ्यां विरहितोऽहमप्येवंविध एवेति सूत्रद्वयार्थः ॥ वाशिष्टयाह--- Jam Education Intimational सुसंभिया कामगुणा इमे ते, संपिंडिया अग्गरसा पनूया । भुंजामु ता कामगुणे पगामं, पच्छा गमिस्सामु पहाणमगं ॥ ३१ ॥ सुष्ठु -- अतिशयेन संभृताः - संस्कृताः सुसंभृताः, के ते ? 'कामगुणा' वेणुवीणाकणितकाकलीगीतादयः 'इमे' For Parsons Private On इषुकारीय मध्ययनं. १४ ~311~ ॥४०५॥ tr पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #312 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [--1 / गाथा ||३१|| नियुक्ति: [३७३...] (४३) प्रत सूत्रांक ||३१|| इति खगृहवर्त्तिनः, तान् प्रत्यक्षतया निर्दिशति, 'ते' तव तथा 'संपिण्डिताः सम्यकपुञ्जीकृताः 'अग्गरस'त्ति चशशब्दस्य गम्यमानत्वादण्या रसाश्च-प्रधाना मधुरादयश्च प्रभूताः-प्रचुराः, कामगुणान्तर्गतत्वेऽपि रसानां पृथगु पादानमतिगृद्धिहेतुत्वाच्छन्दादिष्यपि चैषामेव प्रवर्तकत्वात् ,कामगुणविशेषणं वा अत्र्या रसास्त एव शृङ्गारादयो वा येषु ते तथा, वृद्धास्त्वाहुः-रसाना-सुखानामग्रं रसागं ये कामगुणाः, सूत्रे च प्राकृतत्वादनशब्दस्य पूर्वनिपातः, 'भुंजामो'त्ति भुञ्जीमहि 'तत् तस्मादमी सुसंभृतादिविशेषणविशिष्टास्ते च खाधीनाः सन्ति, 'कामगुणान्' उक्त18/रूपान् 'प्रकामम्' अतिशयेन, ततो भुक्तभोगाः 'पश्चाद्' इति वृद्धावस्थायां 'गमिष्यामः' प्रतिपत्स्यामहे 'प्रधानमार्ग' महापुरुषसेवितं प्रव्रज्यारूपं मुक्तिपथमिति सूत्रार्थः ॥ पुरोहितः प्राह भुत्ता रसा भोइ ! जहाइ णे वओ, न जीवियट्ठा पजहामि भोए। लाभं अलाभं च सुहं च दुक्खं, संचिक्खमाणो चरिसामि मोणं ॥ ३२ ॥ 'भुक्ताः' सेयिताः 'रसाः' मधुरादयः, उपलक्षणत्वाच्छेपकामगुणाश्च, यद्वा रसा इह सामान्येनैवाखाद्यमानहैवानोगा भण्यन्ते 'होति'त्ति हे भवति !, आमन्त्रणवचनमेतत् , 'जहाति' त्यजति 'नः' इत्यस्मान् वयः शरीरावस्था कालकृतोच्यते, सा चेहाभिमतक्रियाकरणक्षमा गृयते, ततश्च यतो मुक्ता एवानेकशो भोगा वयश्चाभिमतक्रियाकरणक्षमं जहाति, उपलक्षणत्वाज्जीवितं च, ततो यावन्नैतत्त्यजति ताबद्दीक्षां प्रतिपद्यामह इत्यभिप्रायः, दीप अनुक्रम [४७२] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~312~ Page #313 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||३२|| दीप अनुक्रम [४७३] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४०६ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [ - ] / गाथा ||३२|| निर्युक्तिः [३७३...] अध्ययनं [१४], तत्किं वयःस्थैर्याद्यर्थं दीक्षां प्रतिपद्यसे ?, उच्यते हि कैश्चित् दीक्षा वयःस्थैर्यादिविधायिनीत्याशङ्कयाह'न' इति निषेधे जीवितम्-असंयमजीवितम् उपलक्षणत्वाद्वयश्च तदर्थे 'प्रजहामि' प्रक्रर्षेण त्यजामि 'भोगान्' शब्दादीन्, किन्तु 'लाभम्' अभिमतवस्त्वातिरूपम् 'अलामं च' तदभावरूपं 'सुखम्' अभिलषणीय विषयसम्भोगजं, चस्य भिन्नक्रमत्वाद् 'दुःखं च' बाधात्मकं 'संचिक्खमाणो'त्ति समतया ईक्षमाणः पश्यन् किमुक्तं भवति ? - लाभालाभयोस्तथा सुखदुःखयोरुपलक्षणत्वाज्जीवितमरणादीनां च समतामेव भावयन् 'चरिष्यामि' आसेविष्ये, किं तत् ?'मौनं' मुनिभावं, ततो मुक्त्यर्थमेव मम दीक्षाप्रतिपत्तिरिति भाव इति सूत्रार्थः ॥ वाशिष्ट्याह मा हू तुमं सोदरियाण संभरे, जुन्नो व हंसो पडिसोयगामी । • भुंजाहि भोगाई मए समाणं, दुक्खं खु भिक्खायरिया बिहारो ॥ ३३ ॥ 'मा' इति निषेधे 'हू:' इति वाक्यालङ्कारे त्वं सोदरे शयिताः सोदर्याः, 'सोदराद्य इति ( पा०४-४-१०९ ) यः प्रत्ययः, ते च समानकुक्षिभवा भ्रातरस्तेषाम् उपलक्षणत्वाच्छेषखजनानां भोगानां च, 'संभरे'त्ति अस्मापः, क इव :'जुण्णो व हंसो 'ति इवशब्दस्य भिन्नक्रमत्वात् 'जीर्णः' वयोहानिमुपगतो 'हंस इव' प्रधानपक्षीव प्रतिकूलं स्रोतः प्रतिस्रोतस्तद्गामी सन् किमुक्तं भवति ? - यथाऽसौ नदीस्रोतस्यतिकष्टं प्रतिकूलगमनमारभ्यापि तत्राशक्तः पुनरनुस्रोत एवानुधावति, एवं भवानपि दुरनुचरं संयमभारं वोडमसमर्थः पुनः सहोदरादीन् भोगान् वा स्मरिष्यति, For P&Prale Use One इपुकारीय मध्ययनं. ~313~ १४ ॥४०६ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३ ], मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #314 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||३३|| नियुक्ति: [३७३...] (४३) प्रत सूत्रांक ||३|| तदिदमेवास्तु, भुज भोगान् मया 'समाण'ति सह 'दुःख'मिति दुःखहेतुः 'खु' इति खलु निश्चितं "भिक्षाचर्या'! भिक्षाटनं 'विहारः' प्रामादिष्वप्रतिबद्धविहारो, दीक्षोपलक्षणं चैतदिति सूत्रार्थः ॥ पुरोहित आह जहा य भोई ! तणुयं भुयंगे, निम्मोअणि हिच पलाइ मुत्तो। एमे जाया पजहंति भोए, तेऽहं कहं नाणुगमिस्समिको ? ॥ ३४॥ छिदित्तु जालं अबलं व रोहिया, मच्छा जहा कामगुणे पहाय । घोरेयसीला तवसा उदारा, धीरा हु भिक्खायरियं चरंति ॥ ३५॥ यथा हे भवति ! पठ्यते च-भोगि'त्ति हे भोगिनि ! तनुः-शरीर तत्र जातां तनुजा 'भुजङ्गमः' सर्पः 'निर्मो-18 चर्नी' निर्माकं हित्वा 'पर्येति' समन्ताद्गएछति 'मुक्तः' इति निरपेक्षोऽनभिष्वक्त इत्यर्थः, 'एमेए'त्ति एवमेती, पठ्यते च 'इमेति'त्ति अत्र च तथेति गम्यते, ततस्तथेमौ 'ते' तव 'जातो' पुत्रौ 'पजहंति' प्रजहीतः प्रकर्षण त्यजतो सभोगान् , ततः किमित्याह-तो भोगांस्त्यजन्तौ जातो अहं कथं न 'अनुगमिष्यामि' प्रव्रज्याग्रहणेनानुसरिष्यामि |'एकः' अद्वितीयः? । यदि तावदनयोः कुमारकयोरपीयान् विवेको यन्निर्मोकवदत्यन्तसहचरितानपि भोगान् दाभुजङ्गबत्त्यजतस्तकिमिति भुक्तभोगोऽप्यहमेतान्न त्यक्ष्यामि ?, किंवा ममासहायस्य गृहवासेनेति भावः । तथा 'छित्त्वा' द्विधाकृत्वा तीक्ष्णपुच्छादिना 'जालम्' आनायम् 'अबलमिव' जीर्णत्वादिना निःसारमिव, बलीयोऽपीति 44- दीप अनुक्रम [४७४] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~314 Page #315 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-1 / गाथा ||३५|| नियुक्ति: [३७३...] प्रत सूत्रांक ||३५|| तराध्यागम्यते, 'रोहिताः' रोहितजातीयाः 'मत्स्या' मीनाश्चरन्तीति सम्बन्धः, 'यथेति दृष्टान्तोपदर्शने, यत्तदोश्च नित्यस- इधुकारीयबृहद्धत्तिःम्बन्धात्तथेति गम्यते, ततस्तथा जालपायान् कामगुणान् 'प्रहाय' परित्यज्य, धुरि वहन्ति धौरेयास्तेपामिव ? मध्ययनं. शीलम्-उत्क्षिप्तमारवाहितालक्षणं स्वभावो येषां ते धौरेयशीलाः 'तपसा' अनशनादिना 'उदाराः'प्रधानाः 'धीराः' ॥४०७|| सत्त्ववन्तः हुरिति यस्मादू भिक्षाचयाँ 'चरन्ति' आसेवन्ते, व्रतग्रहणोपलक्षणमेतद् , अतोऽहमपीत्थं प्रतमेव ग्रहीष्ये इति भाव इति सूत्रद्वयार्थः ॥ इत्थं तत्प्रतिबोधिता ब्रामण्याह नहेब कुंचा समइकमता, तयाणि जालाणि दलित्तु हंसा। पलिंति पुत्ता य पई य मज्झं, तेऽहं कहं नाणुगमिस्समिक्का ? ॥ ३६॥ 'नभसीव' आकाश इब 'क्रौञ्चाः' पक्षिविशेषाः 'समतिकामन्तः' तांस्तान् देशानुलक्ष्यन्तः 'सतानि विस्तीर्णानि 'जालानि बन्धनविशेषरूपाण्यात्मनोऽनर्थहेतुन् 'दलयित्वा' भित्त्या 'हंस'त्ति चशब्दस्य गम्यमानत्वासाश्च 'पलिंति'त्ति परियन्ति-समन्ताद्गच्छन्ति 'पुत्रौ च सुती पतिश्च' भर्ती मम सम्बन्धिनो,गम्यमानत्वादेतत् (न)जालो-R पमविपयाभिष्वङ्गं भित्त्वा नभःकल्पे निरुपलेपतया संयमाध्वनि तानि तानि संयमस्थानानि अतिक्रामन्तस्तानहं | ॥४०७॥ कथं नानुगमिष्याम्येका सती ?, किन्त्वनुगमिष्याम्येव, एवंविधवयसां हि स्त्रीणां भर्त्ता वा पुत्रो वा गतिरिति, यदिवा जालानि भित्त्येति हंसानामेव संबध्यते, समतिकामन्तः स्वातत्र्येण गच्छन्त इति तु क्रौञ्चानां, ततश्च क्रौञ्चोदा दीप अनुक्रम [४७६] Furammarwata tiwand HarjaiTOEnantarm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~315 Page #316 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||३६|| नियुक्ति: [३७३...] प्रत सूत्रांक ||३६|| दाहरणमजातकलत्रादिबन्धनसुतापेक्षं, हंसोदाहरणं तु तद्विपरीतपत्यपेक्षमिति भावनीयमिति सत्रार्थः ॥ इत्थं चतुर्णामप्येकवाक्यतायां प्रव्रज्याप्रतिपत्तौ यदभूत्तदाह पुरोहियं तं ससुयं सदारं, सुच्चाभिमिक्खम्म पहाय भोए। कुईवसारं विउलुत्तमं तं, रायं अभिक्खं समुवाय देवी ॥ ३७॥ वंतासी पुरिसोरायं !, न सो होइ पसंसिओ। माहणेण परिचत्तं, धणं आदाउमिच्छसि ॥ ३८ ॥ सव्वं जर्ग जइ तुरं, सव्वं वावि धणं भवे । सब्बंपि ते अपज्जतं, नेव ताणाय तं तव ॥३९॥ मरिहिसि रायं । जया तया वा, मणोरमे कामगुणे पहाय। इको हु धम्मो नरदेव ! ताणं, न विजई अजमिहेह किंचि ॥४॥ 'पुरोहितं' पुरोधसं 'तम्' इति भृगुनामानं 'ससुतं' पुत्रद्वयान्वितं 'सदारं' सपत्नीक 'श्रुत्वा' आकर्ण्य 'अभिनिक्रम्य' गृहानिर्गत्य 'प्रहाय' प्रकर्षण सक्त्वा 'भोगान्' शब्दादीन् प्रत्रजितमिति गम्यते, 'कुटुम्बसारं धनधा-18 न्यादि विपुलं च-विस्तीर्णतया उत्तमंच-प्रधानतया विपुलोत्तमं 'तदिति यत्पुरोहितेन त्यक्तं गृह्णन्तमिति शेषः, 'राय'ति राजानं नृपतिम् 'अभीक्ष्णं' पुनः पुनः 'समुवाच' सम्यगुक्तवती 'देवी' कमलावती नाम तदनमहिषी, किमुक्तवतीत्साह-वान्तम्-उद्गीर्णमशितुं-भोक्तुं शीलमस्येति वान्ताशी 'पुरुषः पुमान्, य इति गम्यते, 'राजन् ! दीप अनुक्रम [४७७] matt FarramanaSPrwanatimony पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~316~ Page #317 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||३७-४०|| नियुक्ति : [३७३...] प्रत सूत्रांक १४ ||३७-४०|| उत्तराध्य. नृप ! न स 'भवति प्रशंसितः' शाघितो बिद्वद्भिरिति शेषः, स्यादेतत्-कथमहं वान्ताशीत्यत आह-त्रामणेन इषुकारीय परित्यक्तं' परिहतं 'धन' द्रव्यम् 'आदातुं' गृहीतुमिच्छसि, परिहतधनं हि गृहीतोज्झितत्वाद्वान्तमिव तत्तदा- मध्ययन बृहद्वृत्तिः दातुमिच्छंस्त्वमपि वान्ताशीव, न चेदमुचितं भवाशामित्यभिप्रायः । अथवा काक्का नीयते-राजनू ! वान्ताशी ॥४०८॥ यः स प्रशस्यो न भवत्यतो ब्राह्मणेन परित्यक्तं धनं त्वमादातुमिच्छसि नैवैतद्भवत उचितं, यतस्त्वमप्येवं वान्ता | शितयाऽश्लाघ्य एव भविष्यसीति काकर्थः ॥ किं ?-'सर्व' निरवशेष 'जगद्' भुवनं, भवेदिति सम्बन्धः, 'यदी'त्यस्यायमर्थ:-न संभवत्येवैतत्, कथञ्चित्सम्भवे वा 'तुह'न्ति तव सर्व वाऽपि धनं-रजतरूप्यादिद्रव्यं भवेत् यदि तवेतीहापि योज्यते, तदा सर्वमपि 'ते' तव 'अपर्याप्तम्' अशक्तम् , इच्छापरिपूर्ति प्रतीति शेषः, आकाशसमत्वेन तस्या अपर्यवसितत्वात् , तथा नैव 'त्राणाय' जरामरणाबापदपनोदाय 'तदिति सर्व जगद्धनं वा भवति ते, इह च पुनः पुनः सर्वशब्दस्य युष्मदश्चोपादानं भिन्नवाक्यत्वादपुनरुक्तमिति भावनीयं, पूर्वेण गर्हितत्वमनेन चानुपका४ारिता पुरोहितधनायग्रहणहेतमादय सम्प्रत्यनित्यतां तद्धेतुमाह-'मरिष्यसि प्राणांस्त्वक्ष्यसि 'राजन् !' नृप।।। GI'यदा तदा या' यसिंतस्मिनू वा कालेऽवश्यमेव मर्त्तव्यं, 'जातस्य हि वो मृत्यु रिति, उक्तं हि-कभित्तावश्यया||१०८॥ भारष्टः, श्रुतो वा शङ्कितोऽपि वा। क्षिती वा यदिवा स्वर्गे, यो जातो न मरिष्यति ॥१॥" तत्रापि च कदाचिदाभल पितवस्त्वादायैव मरिष्यतीत्यत आह-'मनोरमान्' चित्ताहादकान् 'कामगुणान्' उक्तरूपान् 'महाय' प्रकर्षण दीप अनुक्रम [४७८ -४८१] SamEducatimotimatent Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~317 Page #318 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-1 / गाथा ||३७-४०|| नियुक्ति: [३७३...] प्रत सूत्रांक ||३७-४०|| त्यक्त्वा त्वम्' एकाक्येव मरिष्यसि, न किञ्चिदन्यत्त्वया सह यास्थतीत्यभिप्रायः। तथा 'एको हुत्ति एक एव18 अद्वितीयः 'धर्म एवं सम्यग्दर्शनादिरूपः 'नरदेव !' नृप ! 'त्राणं' शरणमापत्परिरक्षणे क्षमं न विद्यते' नास्ति | 'अन्यद' अपरम् 'इहेहेति वीप्साभिधानं सम्भ्रमख्यापनार्थ, 'किञ्चिदिति खजनधनादिकं,यदिवा 'इहेति लोके 'इहे'त्यस्मिन मृत्यौ धर्म एवैकखाणं, मुक्तिहेतुत्वेन, नान्यत्किञ्चित्, ततः स एवानुष्ठेय इति भाव, इति सूत्रचतुष्टयार्थः। यतश्च धर्मारते नान्यत्राणमतः नाहं रमे पक्खिणि पंजरे वा, संताणछिन्ना चरिसामि मोणं । अकिंचणा उजुकडा निरामिसा, परिग्गहारंभनियत्त दोसा ॥४१॥ दवग्गिणा जहा रपणे, डज्झमाणेसु जंतुसुं। अन्ने सत्ता पमोयंति, रागद्दोसवसं गया ॥ ४२ ॥ एवमेव वयं मूढा, कामभोगसु मुच्छिया । डझमाणं न बुज्झामो, रागहोसग्गिणा जगं॥४३॥ भोगे भुच्चा वमित्ता य, लहुभूयविहारिणो । आमोअमाणा गच्छति, दिया कामकमा इव ॥४४॥ इमे य बद्धा फंदंति, मम हत्थनमागया । वयं च सत्ता कामेसु, भविस्सामी जहा इमे ॥ ४०॥ सामिसं कुललं दिस्सा, वज्झमाणं निरामिसं । आमिसं सव्वमुज्झित्ता, विहरिस्सामो निरामिसा ।। गिद्धोवमे प नचा ण, कामे संसारवडणे। उरगो सुवण्णपासिव्व, संकमाणो तणुं चरे ॥४७॥ दीप अनुक्रम [४७८ -४८१] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~318~ Page #319 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-1 / गाथा ||४१-४८|| नियुक्ति : [३७३...] बृहदृत्तिः प्रत सूत्रांक ॥४१-४८|| उत्तराध्य. नागुब्व बंधणं छित्ता, अप्पणो वसहिं वए । इति एत्थं महाराय !, उसुआरित्ति मे सुयं ॥४८॥ | इषुकारीय'नेति निषेधे, 'अहमित्यात्मनिर्देशे 'रमे' इति रतिमवाप्नोमि 'पक्खिणि पंजरे वत्ति वाशब्द औपम्ये भिन्नक- मध्ययनं. मश्च ततः 'पक्षिणीव' शकुनिकेय सारिकादिः 'पञ्जरे' प्रतीत एव, किमुक्तं भवति ?-यथाऽसौ दुःखोत्पादिनि पञ्जरे || ॥४०९॥ न रति प्रामोति एवमहमपि जरामरणाद्युपद्रवविद्रुते भवपञ्जरे न रमे, अतश्छिन्नसन्ताना प्रक्रमाद् विनाशितस्नेह४ सन्ततिः सती, छिन्नशब्दस्य सूत्रे परनिपातः प्राग्वत् , 'चरिष्यामि' अनुष्ठास्यामि 'मौन' मुनिभावम् , अविद्यमान दकिञ्चनं-द्रव्यतो हिरण्यादि भावतः कपायादिरूपमस्या इत्यकिञ्चना, अत एव ऋजु-मायाविरहितं कृतम्-अनुष्टिमतमस्या इति ऋजुकृता, कथं चैवंभूतेत्साह-निष्क्रान्ता आमिषाद-गृद्धिहेतोरभिलपितविपयादेः निर्गत वा आमि-13 पमस्या इति निरामिषा, परिग्गहारंभणियत्तदोस'त्ति, प्राकृतत्वात् पूर्वापरनिपातोऽतत्रमिति, परिग्रहारम्भयोहार्दोषाः-अभिष्वङ्गनिस्तूंशतादयस्तेभ्यो निवृत्ता-उपरता परिग्रहारम्भदोषनिवृत्ता, यद्वा परिग्रहारम्भनिवृत्ता अत| एव चादोपा-विकृतिविरहिता, अनयोर्विशेषणसमासः । अपरं च 'दवाग्निना' दावानलेन यथा 'अरण्ये' बने 'दह्य- ०९॥ मानेषु' भस्मसाक्रियमाणेषु 'जन्तुषु' प्राणिषु 'अन्ये अपरे 'सत्त्वाः' प्राणिनोऽविवेकिनः 'प्रमोदन्ते' प्रकर्षण : हष्यन्ति,किमित्येवंविधास्ते इत्याह-रागद्वेपयोर्वशः-आयत्तता रागद्वेषवशस्तं गताः-प्राप्ताः। एवमेव ति बिन्दोरला-1 क्षणिकत्वादेयमेव वयं 'मूढ'त्ति 'मूढानि' मोहवशगानि 'कामभोगेषु' उक्तरूपेषु 'मुच्छियत्ति मूर्छितानि गृद्धानि दीप अनुक्रम [४८२-४८९] SamEducatam international FairamanaSPrwara tumonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~319~ Page #320 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥४१ -४८|| दीप अनुक्रम [४८२ -४८९] Educator [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||४१-४८|| निर्युक्ति: [३७३...] दद्यमानमिव दद्यमानं न 'बुध्यामहे' नावगच्छामो रागद्वेषाचग्निरिव रागद्वेपानिस्तेन किं तत् ? -'जगत्' प्राणिस मूह, यो हि सविवेको रागादिमांथ न भवति स दावानलेन दह्यमानानन्य सस्थानवलोक्य अहमप्येवमनेन दहनीय इति तद्रक्षणोपायतत्पर एव भवति, न तु प्रमादवशगः सन् प्रमोदते, यस्त्वत्यन्तमज्ञो रागादिमांथ स जयतिमचिन्तयन् हृप्यति न तु तदुपशमनोपाये प्रवर्त्तते, ततो वयमपि भोगापरित्यागादेवंविधान्येवेति भावः । ये त्वेवंविधा न भवन्ति ते किं कुर्वन्तीत्याह - 'भोगान्' मनोजशब्दादीन् 'भोच्च'त्ति 'भुक्त्वा' आसेव्य पुनरुत्तरकालं 'वान्त्वा च' अपहाय विपाकदारुणत्वालघुः - वायुस्तद्वद्भूतं भवनमेषां लघुभूताः कोऽर्थः १ - वायूपमाः तथाविधाः सन्तो विहरन्तीत्येवंशीलाः लघुभूतविहारिणः- अप्रतिबद्धविहारिण इत्यर्थः यद्वा लघुभूतः - संयमस्तेन विहर्त्तुं शीलं येषां ते तथाविधाः, आ-- समन्तान्मोदमाना हृप्यन्त आमोदमानाः, तथाविधानुष्ठानेनेति गम्यते, गच्छन्ति विवक्षितं स्थानमिति शेषः क इव ? - दिया कामकमा इय'त्ति इवशब्दो भिन्नक्रमस्ततो द्विजा इव-पक्षिण इव कामःअभिलापस्तेन क्रामन्तीति कामक्रमाः, यथा पक्षिणः स्वेच्छया यत्र यत्रावभासते तत्र तत्रामोदमाना भ्राम्यन्ति एवमेतेऽप्यभिष्वङ्गस्य परतन्त्रताहेतोरभावाद्यत्र यत्र संयमयात्रानिर्वहणं तत्र तत्र यान्तीत्याशयः । पुनर्वहिरास्थां निराकुर्वन्त्याह- 'इमे' इत्यनुभूयमानतया प्रत्यक्षाः शब्दादयः, 'चः' समुचये 'बद्धाः' नियन्त्रिता अनेकधोपायै रक्षिता इत्यर्थः एते किमित्याह-स्पन्दन्त इव स्पन्दन्ते अस्थितिधर्मतया, ये कीदृश इत्याह-मम हत्थजमाग For Parsons Private Onl पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~320~ Page #321 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-1 / गाथा ||४१-४८|| नियुक्ति: [३७३...] प्रत सूत्रांक ॥४१-४८|| उसराध्या पावसामान यत्ति 'मम' त्यात्मनिर्देशे उपलक्षणत्वात्तव च 'हस्तं' करम् , आर्य ! अद्य वा 'आगताः' प्राप्ताः, कोऽर्थः -स्खवशाः, इपुकारीय. आत्मनोऽज्ञतां दर्शयितुमाह-वयं च सत्त'त्ति वयं पुनः 'सक्तानि' संबद्धानि अभिष्यनयन्तीत्यर्थः, अबहुत्येबृहद्वृत्तिः प्यस्मदोर्द्वयोश्चेति (पा०-१-२-५९) बहुवचनं, 'कामेषु' अभिलषणीयशब्दादिपु, एवं विधेष्वपि चामीवभिष्वङ्ग इति मध्ययन. ॥४१॥ मोहविलसितमिति भावः, यद्वा 'इमे चेति चशब्दाद्वयं च स्पन्दामह इव स्पन्दामहे आयुपश्चञ्चलतया परलोकगमनाय, शेषं तथैव, यत एवमतो भविष्यामो यथेमे पुरोहितादयः, किमुक्तं भवति ?-यथाऽमीभिश्चञ्चलत्वमवलोक्यैते परिदत्यक्तास्तथा वयमपि त्यक्ष्याम इति । स्यादेतद्-अस्थिरत्वेऽपि सुखहेतुत्वात्किमित्यमी त्यज्यन्ते इत्याह सहामिषेण-पिशितरूपेण वर्तत इति सामिपस्तं कुललमिह गृधं शकुनिकां वा 'दृष्ट्वा' अवलोक्य 'याध्यमानं' पीड्य/मानं पश्यन्तरैरिति गम्यते, निरामिषम्-आमिपविरहितमन्यथाभूतं दृष्ट्वति गम्यते, 'आमिषम्' अभिष्वङ्गहेतुं धनधान्यादि 'सर्व' निरवशेषम् 'उज्झित्वा' त्यक्त्वा 'विहरिस्सामो'त्ति विहरिष्याम्यप्रतिवद्धविहारितया चरिष्यामीत्यर्थः, 'निरामिपा' परित्यक्ताभिष्वङ्गहेतुः । उक्तानुवादेनोपदेष्टुमाह-गृढ़ेणोपमा येपां ते गृङोपमास्तानुक्तन्यायेन, 'तुः समुच्चये भिन्नक्रमश्च योक्ष्यते, ज्ञात्वा' अवबुध्य, णमिति प्राग्वत् ,कान् ?-प्रक्रमाद्विपयामिपवतो लोकान् कामाची ४१० विषयांश्च 'संसारवर्द्धनान्' संसारवृद्धिहेतून् ज्ञाखेति सम्बन्धः,अथवा कामयन्त इति कामा इति व्युत्पत्त्या कामयोगाद्वाऽत्यन्तरद्धिण्यापनार्थ कागा विषयिण एवोक्ता अतस्तान् गृद्धोपमान् संसारवर्द्धनाथ ज्ञात्वा किमित्याह-'उरगा दीप अनुक्रम [४८२-४८९] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~321 Page #322 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-1 / गाथा ||४१-४८|| नियुक्ति : [३७३...] 1544 प्रत सूत्रांक ॥४१-४८|| सुवण्णपासे बत्ति इवशब्दस भिन्नक्रमत्वात् आषत्वाच 'उरग इव भुजग इब 'सौपर्णेयपाः गरुडसमीपे 'शङ्कमानः' भयत्रस्तस्तन्विति-स्तोकं मन्दं यतनयेतियावत् 'चरेः' क्रियासु प्रवत्तेख, अस्थायमाशयः-यथा सौपर्णेयोपमै| विषयैर्न बाध्यसे तथा संयममासेवख, ततश्च किमित्याह-णागोध' अर्द्ध स्पष्टम् , आशयश्चार्य-यथा नागः बन्धनं | वरत्रान्दुकादि 'छित्त्वा' द्विधा विधायात्मनो 'वसति' विन्ध्याटवीं ब्रजति, एवं भवानपि कर्मवन्धनमुपहत्यात्मनो| वसतिः-कर्मविगमतः शुद्धो यत्रात्माऽवतिष्ठते सा च मुक्तिरेव तां ब्रजे, अनेन दीक्षायाः प्रसङ्गतः फलमुक्तम् । द एवं चोपदिश्य निगमयितुमाह-'एतद् यन्मयोक्तं 'पथ्यं हितं 'महाराज!' प्रशस्यभूपते ? 'इपुकार!' इषु कारनामन् !, एतच न मया खमनीपिकयेवोच्यते, किन्तु 'इति' इत्येतन्मया 'श्रुतम्' अवधारितं साधुसकाशादिति । गम्यत इति सूत्राष्टकार्थः ॥ एवं च तद्वचनमाकर्ण्य प्रतिबुद्धो नृपः, ततश्च यत्ती द्वावपि चक्रतुस्तदाह चइता विपुल रज, कामभोगे अदुचए। निविसया निरामिसा. निन्नेहा निप्परिग्गहा ॥५०॥ सम्म धम्म वियाणित्ता, चिया कामगुणे चरे। तवं पगिज्झऽहक्वाय, घोरं घोरपरकमा!॥५१॥ 'त्यक्त्वा' प्रहाय 'विपुलं' विस्तीर्ण 'राष्ट्रं मण्डलं, पाठान्तरतो राज्यं वा 'कामभोगांश्च' उक्तरूपान् 'दुस्त्यजान्' दुष्परिहारान् 'निर्विषयौ' शब्दादिविषयविरहितौ अत एव निरामिषौ, यद्वा विषयो-देशस्त द्विरहिती राष्ट्रपरित्यागतः कामभोगत्यागतश्च निरामिषौ-अभिष्वगहेतुविरहितौ, कुतः पुनरेवंविधौ ?, यतो 'निःस्नेही निष्प्रति दीप अनुक्रम [४८२-४८९] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र गाथा क्रमांकने मूलसंपादने किञ्चित् स्खलनं अस्ति यत् गाथाक्रम ||४९|| स्थाने गाथाक्रम ||१०|| इति मुद्रितं ~322 Page #323 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||५०-५१|| नियुक्ति: [३७३...] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४१॥ सूत्रांक ||५० -५१|| वन्धौ ‘निष्परिग्रहों कचिदविद्यमानखीकारौ 'सम्यग् अविपरीतं 'धर्म' श्रुतचारित्रात्मकं 'विज्ञाय' विशेषतोऽव- इषुकारीयबुद्धध 'चेच'त्ति त्यक्त्वा 'कामगुणान्' शब्दादीन् 'वरान्' प्रधानान् पूर्वविशेषणैर्गतार्थत्वेऽपि पुनरभिधानमति- Ham. |शयख्यापर्क, 'तपः' अनशनादि 'प्रगृह्म' अभ्युपगम्य 'यथाख्यातं येन प्रकारेण तीर्थकरादिभिः कथितं 'चोरम्'। || असन्तदुरनुचरं घोरकर्मा-वैरिणः प्रति रौद्रः पराक्रमो धर्मानुष्ठानविषयसामर्थ्यात्मको ययोता तथा देवीनूपौ। तथैव च कृतवन्ताविति शेष इति सूत्रद्वयार्थः ।। सम्प्रति समस्तोपसंहारमाह एवं ते कमसो बुद्धा, सब्वे धम्मपरायणा । जम्ममधुभउब्विग्गा, दुक्खस्संतगवेसिणो ॥५२॥ सासणि विगयमोहाण, पुब्धि भावणभाविया । अचिरेणेव कालेण, दुवस्संतमुवागया ॥५३॥ राया सह देवीए, माहणो उ पुरोहिओ। माहणी दारगा चेव, सम्वे ते परिनिव्वुद्धि ॥२४॥ तिमि ॥१४॥ ॥ उमुआरिज चउहसमं ॥ ६ एवम्' अमुना प्रकारेण 'तानि' अनन्तरमुक्तरूपाणि पडपि 'क्रमशः' अभिहितपरिपाट्या 'बुद्धानि' अवगत तत्त्वानि 'सर्वाणि' अशेषाणि 'धर्मपरायणानि' धर्मैकनिष्ठानि, पठ्यते च-'धम्मपरंपर'त्ति परम्परया धर्मो येषां ॥४१॥ तानि परम्पराधर्माणि, प्राकृतत्वाच परम्पराशब्दस्य परनिपातः, तथा हि-साधुदर्शनात्कुमारकयोः कुमारयचनात्तस्पिनोस्तदवलोकनात्कमलावत्यास्ततोऽपि च राज्ञ इति परम्परयैव धर्मप्राप्तिः, जन्ममृत्युभयेभ्यः-उक्तरूपेभ्य दीप अनुक्रम [४९०-४९१] SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~323 Page #324 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१४], मूलं [-] / गाथा ||५२-५४|| नियुक्ति : [३७३...] AS सूत्रांक ||५२-५४|| एवोद्विमानि-त्रस्तानि जन्ममृत्युभयोद्विग्नानि 'दुःखस्य' असातस्यान्तः-पर्यन्तस्तद्वेषकाणि तदन्वेषकाणि सापेक्षस्यापि समासो यथा देवदत्तस्य गुरुकुलमिति । पुनस्तद्वक्तव्यतामेवाह-शासने दर्शने विगतमोहानाम्-अर्हतां 'पूर्व मित्यन्यजन्मनि भावनया-अभ्यासरूपया भावितानि-वासितानि भावनामावितानि, यद्वा भाविता भावना यैस्तानि दभावितभावनानि, पूर्वोत्तरनिपातस्यातन्त्रत्वाद् , अत एवाचिरेणैव-खल्पनैव कालेन 'दुःखस्यान्तं' मोक्षम् 'उपा गतानि' प्राप्तानि, सर्वत्र च प्राकृतत्वात्पुंलिङ्गनिर्देशः । मन्दमति स्मरणायाध्ययनार्थमुपसंहर्तुमाह-राजा' इषुकारः सह 'देव्या कमलावत्या ब्राह्मणश्च पुरोहितो भृगुनामा ब्राह्मणी तत्पनी यसा दारको तत्पुत्रौ चैवेति पूर्ववत्सवाणि तानि 'परिनिर्वृतानि' काग्युपशमतः शीतीभूतानि मुक्तिं गतानीतियावदिति सूत्रत्रयार्थः ॥ इति' परिसमाप्ती प्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्ते च पूर्ववत् ॥ Pa-RITRA-MARAT TRACTREATRASTRO-STREETERan इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां चतुर्दशमध्ययनं समासमिति ॥ *astaara k दीप अनुक्रम [४९२-४९४] C For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं- १४ परिसमाप्तं -~324 Page #325 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१५], मूलं [--1 / गाथा ||४८..|| नियुक्ति: [३७४-३७५] उत्तराध्य. अथ पञ्चदशं सभिक्षुकमध्ययनम् । सभिक्षुकमध्ययन. प्रत बृहद्वृत्तिः ॥४१२॥ सूत्रांक ||५२-५४|| व्याख्यातं चतुर्दशमध्ययनं, सम्प्रति पञ्चदशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययने निर्निदानतागुण उक्तः, स च मुख्यतो भिक्षोरेव, भिक्षुश्च गुणत इति तद्गुणा अनेनोच्यन्त इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्वाध्ययनस्य चत्वार्यनुयोगद्वाराणि पूर्ववद्यावानि ताषद्यायन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे सभिक्षुकमिति नाम, तत्र च सशब्दो भिक्षुशब्दश्च दशकालिक एव निक्षिप्तस्तथाऽपि स्थानाशून्यार्थं भिक्षुनिक्षेपमाह नियुक्तिकृत निक्खेवो भिक्खुंमी चउव्विहो० ॥ ३७४ ॥ जाणयसरीरभविए तबइरिते अनिण्हगाईसु । जो भिंदेइ खुहं खलु सो भिक्खू भावओ होइ ३७५/७ _ 'निक्षेपः' न्यासः भिक्षी विचार्य चतुर्विधो नामस्थापनाद्रव्यभावभेदात् , तत्र नामस्थापने क्षुण्णे, द्विविधो भवति - द्रव्ये विचार्य भागमतो नोआगमतः, तत्रागमतो भिक्षुपदार्थज्ञस्तत्र चानुपयुक्तो, नोआगमतश्च स त्रिविधः-'जाणगसरीरभविए'त्ति ज्ञशरीरभव्यशरीरे तयतिरिक्तश्च, तत्राद्यौ सुगमायेव, तयतिरिक्तस्तु द्रव्यभिक्षुर्निहवादिष, आदि दीप अनुक्रम [४९२-४९४] ४१२॥ पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं - १५ “सभिक्षुक" आरभ्यते ~325 Page #326 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१५], मूलं [--] / गाथा ||४८...|| नियुक्ति: [३७४-३७५] (४३) सूत्रांक ||५२-५४|| शब्दात्सरजस्कादिषु चान्यतरो विवक्षित इति गम्यते, द्रव्यत्वं चास्य रागादिलक्षणक्षुद्रेत्तृत्वाभावात् , भावभिचमाह-यो भिनत्ति' विदारयति क्षुध 'खलुः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च, ततः स एव भिक्षुर्भावतो भवतीति गाथाद्वयार्थः ॥ इह च भिनत्तीत्युक्तमतः कर्तृकरणकर्मभिः प्रयोजनं, सकर्मकत्वाद्भिदेः, अत आह भेत्ता य भेअणं वा नायवं भिदियत्वयं चेव । इकिकपि अ दुविहं दवे भावे अ नायवं ॥ ३७६ ॥ रहकारपरसुमाई दारुगमाई अ दवओ इंति । साहू कम्मऽट्टविहं तवो अ भावंमि नायवो ॥३७७॥ रागद्दोसा दंडा जोगा तह गारवा य सल्ला याविगहाओ सण्णाओ खुहं कसाया पमाया य ॥३७॥ भेत्ता च कर्ता यो भिनत्ति, भेदनं करणं येन भिनत्ति 'वा' समुचये 'ज्ञातव्यं' बोद्धव्यं भेत्तव्यमेव भेत्तव्यक कर्म यद्भिद्यते, 'चः समुच्चये, 'एव' इति पूरणे, 'एकैकमपि चेति भेत्ता भेदनं भेत्तव्यकं च 'द्विविधं' द्विभेदं । द्रव्ये भावे च विचार्यमाणे 'ज्ञातव्यम्' अवगन्तव्यं । तत्र द्रव्ये 'रहगारपरसुमाइति आदिशब्दस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धाद् रथकारः-तक्षकस्तदादिद्रव्यतो भेत्ता, आदिशब्दादयस्कारादिपरिग्रहः, परशुः-कुठारस्तदादिद्रव्यतो भेदनम् , आदिशब्दाद् धनादयो गृह्यन्ते, 'दारुगमाई यत्ति दारुक-काष्ठं तदादि च द्रव्यतो भेयम् , आदिशब्दालोहादि 5555575515 दीप अनुक्रम [४९२-४९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~ 326~ Page #327 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१५], मूलं [-1 / गाथा ||४८..|| नियुक्ति: [३७६-३७८] सूत्रांक ||५२-५४|| उत्तराध्य. परिग्रहः, भवन्तीति सर्वापेक्षं बहुवचनम् । 'साधुः तपखी 'कर्म' ज्ञानावरणादि 'अष्टविधम्' अष्टप्रकारं 'तपश्च सभिक्षुक Bअनशनादि भाये विचार्य भेत्ता भेत्तव्यं भेदनं च क्रमेण ज्ञातव्यम् । इत्थं 'जो भिंदई खुहं खलु' इति ग्रहणकवाक्यं । बृहद्वृत्तिः गतं, भिनत्तीति व्याख्याय क्षुधं व्याख्यातुमाह-'रागद्वेषौ' उक्तरूपी 'दण्डाः' मनोदण्डादयो 'योगा' फरणकारणानुम-14 | मध्ययनं. ॥४१३॥ तिरूपाः, पठन्ति च-'रागद्दोसा छुहं दंडा' अत्र च 'छुहंति क्षुध-बुभुक्षा उच्यते, तथा 'गौरवाणि च' ऋद्धिगौरवादीनि है शल्यानि च' मायाशल्यादीनि 'विकथाः'स्त्रीकथादयः सज्ञाः' आहारसज्ञादयः,'खुह'ति एतद्भावभाविवादष्टविधकदमरूपायाः क्षुधः एतान्यपि श्रुदित्युच्यन्ते, प्राकृतत्वाच नपा निर्देशः, 'कषायाः क्रोधादयः 'प्रमादाश्च' मद्यादयः क्षुदिति सम्बन्धनीयमिति गाथात्रयार्थः ॥ उपसंहर्तुमाहएयाई तु खुहाई जे खलु भिंदंति सुवया रिसओ। ते भिन्नकम्मगंठी उदिति अयरामरं ठाणं ३७९/ A एतानि' रागादीनि 'खुहाईति क्षुच्छब्दवाच्यानि ये खलु 'भिंदति विदारयन्ति, खलुशब्द एवकारार्थो भिन्द न्त्येवेति शोभनानि अनतिचारतया व्रतानि-प्राणातिपातविरत्यादीनि येषां ते सुत्रताः 'ऋपयः' मुनयः,ते किमित्याह- ४१३॥ भिन्नः कमैवातिदुर्भेदतया प्रन्धिः कर्मग्रन्धिय॑स्ते तथाविधाः 'उपयान्ति' प्राप्नुवन्ति 'अजरामरं स्थानं' मुक्तिपदमिति गाथार्थः ॥ उक्तो नामनिष्पन्न निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तवेदम् दीप अनुक्रम [४९२-४९४] SamEducatmiminational Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~327 Page #328 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१५], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३७९] मोणं चरिस्सामि समिच धम्म, सहिए उज्जुकडे नियाणछिन्ने । संथर्व जहिज अकामकामे, अन्नायएसी परिचए स भिक्खू ॥१॥ प्रत सूत्रांक ||१|| मुनेः कर्म मौनं तच सम्यक्चारित्रं 'चरिस्सामोत्ति सूत्रत्वात् चरिष्यामि-आसेविण्ये इत्यभिप्रायेणेत्युपस्कारः, IN | समेत्य' प्राप्य 'धर्म' श्रुतचारित्रभेदं दीक्षामित्युक्तं भवति, 'सहितः सम्यग्दर्शनादिभिरन्यसाधुभिर्वेति गम्यते, खस्मै हितः खहितो वा सदनुष्ठानकरणतः, कश्चैवम् ?-ऋजुः-संयमस्तत्प्रधानं ऋजु वा-मायात्यागतः कृतम्-अनुष्ठानं यस्येति ऋजुकृतः, ईटक्क इत्याह-निदानं-विषयाभिष्वङ्गात्मकं, यदिवा' 'निदान बन्धने' ततश्च करणे ल्युट्र, नि-13 दान-प्राणातिपातादिकर्मबन्धकारणं छिन्नम्-अपनीतं येन स तथा, क्तान्तस्य परनिपातः प्राग्वत्प्राकृतत्वात् , छिन्ननिदानो वा अप्रमत्तसंयत इत्यर्थः, 'संस्तवं' पूर्वसंस्तुतैर्मात्रादिभिः पश्चात्संस्तुतैश्च श्वश्वादिभिः परिचयं 'जह्यात्' त्यजेत् , 'शकि च लिङ् (शकि लिङ् च पा-३-३-१७३) इत्यनेन शक्याथै लिङ्, ततः संस्तवं हातुं शक्तो य इति, एवं लिङर्थभावना सर्वत्र कार्या,तथा कामान्-इच्छाकाममदनकामभेदान् कामयते-प्रार्थयते यः स कामकामो न तथा अकामकामः, यद्वाऽकामो-मोक्षस्तत्र सकलाभिलापनिवृत्तेस्तं कामयते यः स तथा, अत एव अज्ञातः-तपखिता-I |||दिभिर्गुणैरनवगतः एषयते-ग्रासादिकं गवेषयतीत्येवंशीलोऽज्ञातैषी 'परिप्रजेद्' अनियतविहारितया विहरेत् ‘स भि दीप अनुक्रम [४९५] Samsairatamamaland FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~328 Page #329 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१५], मूलं [-] / गाथा ||२|| नियुक्ति: [३७९...] प्रत RAKAR सूत्रांक उत्तराध्य. खुत्ति' यत्तदोर्नित्याभिसम्बन्धाद् य एवंविधः स भिक्षुः, अनेन सिंहतयैव विहरणं भिक्षुत्वनिधन्धनमुक्तमिति सभिक्षुकसूत्रार्थः ॥ तच सिंहतया विहरणं यथा स्यात्तथा विशेषत आह मध्ययनं. राओवरयं चरिज लाडे, विरए वेदवियाऽऽयरक्खिए। ॥४१४|| पन्ने अभिभूय सव्वदंसी, जे कम्हिवि न मुच्छिए स भिक्खू ॥२॥ रागः-अभिष्वङ्गः उपरतो-निवृत्तो यस्मिंस्तद्रागोपरतं यथा भवत्येयं 'चरेद्' विहरेत् , तान्तस्य परनिपातः || प्राग्वत् , अनेन मैथुननिवृत्तिरुक्ता, रागाविनाभावित्वान्मैथुनस्य, यद्वाऽऽवृत्तिन्यायेन 'रातोवरयति राज्युपरतं । 'चरेत् भक्षयेदित्यनेनैव रात्रिभोजननिवृत्तिरप्युक्ता, 'लाढे'त्ति सदनुष्ठानतया प्रधानो विरत:-असंयमानिवृत्तः, अनेन च संयमस्याक्षेपात्प्राणातिपातनिवृत्तिः सावधवचननिवृत्तिरूपत्वाद्वाक्संयमय मृपावादनिवृत्तिश्चाभिहिता, वेदितव्या, वेद्यतेऽनेन तत्त्वमिति वेदः-सिद्धान्तस्तस्य वेदनं वित्तया आत्मा रक्षितो-दुर्गतिपतनात्रातोऽनेनेति वेदपू विदात्मरक्षितः, यद्वा बेदं वेतीति वेदवित् , तथा रक्षिता आयाः-सम्पग्दर्शनादिलाभा येनेति रक्षितायः, रक्षि-13 | ॥४१४॥ है तशब्दस्य परनिपातः प्राग्यत, 'प्राज्ञः' हेयोपादेयबुद्धिमान 'अभिभय' पराजित्य परीपहोपसर्गानिति गम्यते, 'सर्व' समस्तं गम्यमानत्वात्प्राणिगणं पश्यति-आत्मवत्प्रेक्षत इत्येवंशीलः, अथवाऽभिभूय रागद्वेषौ सर्व वस्तु समतया ||२|| दीप अनुक्रम [४९६] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~329~ Page #330 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||3|| दीप अनुक्रम [४९७] dam Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||३|| निर्युक्ति: [३७९...] अध्ययनं [१५], | पश्यतीत्येवंशीलः सर्वदर्शी, यदिवा सर्वे दशति भक्षयतीत्येवंशीलः सर्वदंशी, उक्तं हि "पेडिग्गहं संलिहित्ता णं, लेवमायाऍ संजए। दुग्गंधं वा सुगंधं वा, सवं भुंजे ण छडए ॥ १ ॥” अत एव यः कस्मिंश्चित्सचित्तादिवस्तुनि न मूच्छितः प्रतिबद्धः, एतेन परिग्रहे निवृत्तेरभिधानमप्रतिबद्धश्च कथमदत्तमाददीत ? इत्यदत्तादाननिवृत्तेश्च तथा च य एवं मूलगुणान्वितः स भिक्षुरित्युक्तं भवतीति सूत्रार्थः ॥ अन्यच - अकोसवहं विदितु धीरे, मुणी चरे लाडे निचमायगुत्ते । अवगमणे असंपहिडे, जो कसिणं अहिआसए स भिक्खू ॥ ३ ॥ आक्रोशनमाक्रोशः - असभ्यालापो वधो- घातस्ताडनं वा, अनयोः समाहारद्वन्द्वे आक्रोशवधं तद्विदित्वा स्वकृतकर्मफलमेतदिति मत्वा 'धीरः' अक्षोभ्यः सम्यक् सोढेतियावत् 'मुनिः' यतिः 'चरेत्' पर्यटेद् अनियतविहारतयेति गम्यते, ततश्चानेनाक्रोशवधचर्यापरी पहसहनमुक्तं, 'लाढे'त्ति प्राग्वत्, 'नित्यम्' इति सदा 'आत्मा' शरीरम्, आत्मशब्दस्य शरीरवचनस्यापि दर्शनात् उक्तं हि - "धर्म नृत्यनिधीन्द्व र्कत्वक्तत्त्व खार्थदेहिषु । शीलानिलमनोयलेकवीर्येष्वात्मनः स्मृतिः ॥ १ ॥” इति, तेन गुप्त आत्मगुप्तो-न यतस्ततः करणचरणादिविक्षेपकृत्, यद्वा गुप्तोरक्षितोऽसंयमस्थानेभ्य आत्मा येन स तथा अव्यग्रम् - अनाकुलमसम असचिन्तोपरमतो मनः - चित्तमस्येत्यव्य१ पत संलिख्य लेपमात्रया संयतः । दुर्गन्धि वा सुगन्धं वा सर्व भुते न त्यजति ॥ १ ॥ For Parana Praten पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~330~ Page #331 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१५], मूलं [-1 / गाथा ||४|| नियुक्ति: [३७९...] कर प्रत सूत्रांक उत्तराध्य. प्रमना न संप्रहृष्टः असंप्रहृष्टः-आक्रोशादिषु न प्रहर्षवान्, यथा कश्चिदाह-"कश्चित् पुमान् क्षिपति मां परि सभिक्षुकबृहद्वृत्तिः 8 रूक्षवाक्यैः, श्रीमत्क्षमाभरणमेत्य मुदं ब्रजामि" इत्यादि, प्रकृतोपसंहारमाह-पः 'कृत्वम्' उत्कृष्टादिभेदतः समस्त- मध्ययनं. माक्रोशवधम् 'अध्याते' सहते समतयेति गम्यते, स भिक्षुरिति सूत्रार्थः ॥ किंच॥४१५॥ पंतं सयणासणं भइत्ता, सीउण्हं विविहं च दंसमसगं । अव्वग्गमणे असंपहिहे, जो कसिणं अहिआसए स भिक्खू ॥४॥ 'प्रान्तम्' अवमं शयनं च–संस्तारकादि आसनं च-पीठकादि शयनासनम् उपलक्षणत्वाद्भोजनाच्छादनादिर च 'भुक्त्वा' सेवित्वा शीतं चोष्णं च शीतोष्णम्-उक्तरूपं, चस्य गम्यमानत्वात्तच सेवित्या 'विविधं च नानाप्रकार, दिशाच मशकाच दंशमशकं प्राय व्याख्यातमेव प्राप्येति शेषो, मत्कुणाद्युपलक्षणं चैतत् , अव्यग्रमना असंप्रष्टो यः। कृत्स्नमध्यास्ते स भिक्षुरिति प्राग्वत् । इह च प्रान्तं शयनासनं भुक्त्वेति अतिसात्त्विकतादर्शनार्थ, प्रान्तशयनापादितायां हि सुदुःसहाः शीतादयः, अनेन शीतोष्णदंशमशकपरीषहसहनमुक्तमिति सूत्रार्थः ॥ अपरं च ॥४१५॥ नो सक्कियमिच्छई न पूनं, नोवि य बंदणगं कुओ पसंस।। से संजए सुवए तवस्सी, सहिए आयगवेसए स भिक्खू ॥५॥ 'नो' निषेधे 'सत्कृतं' सत्कारमभ्युत्थानानुगमादिरूपम् इच्छति' अभिलपति, प्राकृतत्वाथ सूत्रे दीपेनिर्देशः, दीप अनुक्रम [४९८] REnical पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~331 Page #332 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१५], मूलं [-] / गाथा ||५|| नियुक्ति : [३७९...] (४३) - -X-K.COM प्रत सूत्रांक न 'पूजा' वस्त्रपात्रादिभिः सपर्या, 'नो अपि च' इति नैव च 'बन्दनक' द्वादशावर्त्तादिरूपं, कुतः 'प्रशंसा' निजगुणोत्कीर्तनरूपां ?, नैवेच्छतीत्यभिप्रायः, 'सः' एवंविधः सम्यग् यतते सदनुष्ठानं प्रतीति संयतोऽत एव च |सुत्रतः, सुव्रतत्वाच 'तपस्वी' प्रशस्यतपाः, तथा च सहितः सम्यगज्ञानक्रियाभ्यां, यद्वा सह हितेन-आयतिपश्येन । अर्थादनुष्ठानेन वर्तत इति सहितः, तत एव चात्मानं-कर्मविगमाच्छुद्धखरूपं गवेषयति-कथमयमित्थंभूतो भवेदित्यन्वेषयते यः स आत्मगवेषकः, यद्वा आयः-सम्यग्दर्शनादिलाभः सूत्रत्वादायतो वा-मोक्षत गवेषयतीत्यायगवेषक आयतगवेषको वा यः स भिक्षुरिति सूत्रार्थः ॥ अनेन सत्कारपुरस्कारपरीषहसहनमुक्तं, सम्प्रति खीपरी-21 पहसहनमाह जेण पुणो जहाइ जीवियं, मोहं वा कसिणं नियच्छई। नरनारिं पयहे सया तवस्सी, न य कोऊहलं उवेइ स भिक्खू ॥ ६ ॥ येन हेतुना, पुनःशब्दोऽस्य सर्वथा संयमघातित्वविशेषद्योतकः, 'जहाति' सजति 'जीवितं' संयमजीवितं 'मोहं वा' मोहनीयं वा कपायनोकषायादिरूपं 'कृत्लं' समस्तं कृष्णं वा शुद्धाशयविनाशकतया 'नियच्छति' वनाति तदेवंविधं नरश्च नारी च नरनारि 'प्रजयात्' प्रकर्षण त्यजेत् यः 'सदा' सकालं तपस्वी, न च 'कुतूहलम्' अभु ||५|| दीप अनुक्रम [४९९] ब SamsairatomicMAnd For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~332~ Page #333 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१५], मूलं [-] / गाथा ||७|| नयुक्ति : [३७९...] प्रत सूत्रांक ||६|| 1क्तभोगतायां ख्यादिविषयं कौतुकम् , उपलक्षणत्वाद्भुक्तभोगताया स्मृति च, 'उपैति' गच्छति स भिक्षुरिति सूत्रार्थः॥ सभिक्षुकउत्तराध्य. दिइत्थं परीपहसहनेन भिक्षुत्वसमर्थनात् सिंहविहारित्वमुक्त्वा तदेव पिण्डविशुद्धिद्वारेणाह मध्ययनबृहद्वृत्तिः छिन्नं सरं भोमं अंतलिक्वं, सुविणं लक्खणं दंड वस्थुविजं । अंगविगारं सरस्सविजयं, जो विजाहिं न जीवई स भिक्खू ॥७॥ ॥४१६॥ द छेदनं छिन्नं वसनदशनदादीनां, तद्विषयशुभाशुभनिरूपिका विद्यापि छिन्नमित्युक्ता, एवं सर्वत्र । "देवेसु उत्तमो लाभों" इत्यादि, तथा 'सति खरखरूपाभिधानं, “सज्जं रखइ मयूरो, कुकुडो रिसभं सरं । हंसो रवति गंधारं, मज्झिमं तु गवेलए ॥१॥” इत्यादि,तथा-"सज्जेण लहइ वित्ति, कयं च न विणस्सई । गायो पुत्ता य मित्ता य, ट्रनारीणं होइ वल्लहो ॥१॥ रिसहेण उ ईसरियं, सेणायचं धणाणि य।" इत्यादि । तथा भूमिः-पृथ्वी भूमौ भवं भौम-भूकम्पादिलक्षणं, यथा-"शब्देन महता भूमिर्यदा रसति कम्पते । सेनापतिरमात्यश्च, राजा राष्टं च पीज्यते । ॥१॥” इत्यादि । तथा अन्तरिक्षम्-आकाशं तत्र भवम् आन्तरिक्षं-गन्धर्वनगरादिलक्षणं,यथा-"कपिलं शस्य81 १ देवेपूत्तमो लाभः (कोणेषु) २ षटु रौति मयूरः कुकुट अपभं खरम् । हंसो रौति गान्धारं मध्यमं तु गवेलकः ॥ १॥॥४१॥ IC३ पजेन लभते वृत्ति कृतं च न विनश्यति । गावः पुत्राच मित्राणि च नारीणां भवति बलभः ॥ १॥ ऋषमेण वैश्वये सेनाप तित्वं धनानि च । दीप अनुक्रम [५०० For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~333~ Page #334 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१५], मूलं [-] / गाथा ||७|| नियुक्ति: [३७९...] (४३) प्रत सूत्रांक ||७|| घाताय, माजिष्टे हरणं गवाम् । अव्यक्तवर्ण कुरुते, बलक्षोभं न संशयः॥१॥ गन्धर्वनगरं स्निग्धं, सप्राकारं सतोहै रणम् । सौम्या दिशं समाश्रित्य, राज्ञस्तद्विजयङ्करम् ॥२॥” इत्यादि । तथा 'ख' स्वप्नगतं शुभाशुभकथनं, यथा-"गायने रोदनं ब्यानर्त्तने यधवन्धनम् । हसने शोचनं ब्रूयात्पठने कलहं तथा ॥१॥" इत्यादि । तथा| लक्षणं' स्त्रीपुरुषयोर्यथा-"चक्खुसिणेहे सुहितो दंतसिणेहे य भोयणं मिडं । तयणेहेण य सोक्खं णहणेहे होइ परमदूधणं ॥१॥” इत्यादि, गजादीनां च यथायथं वालुकाप्यादिविहितम् । तथा 'दंड'त्ति 'दण्डः' यष्टिस्तत्वरूपकसाधनम् , “एकैपत्वं पसंसंति, दुपाचा कलहकारिय"त्ति, इत्यादि । तथा 'वास्तुविद्या प्रासादादिलक्षणाभिधायिशा खात्मिका "कुटिला भूमिजाश्चैव, वैनीका द्वन्द्वजास्तथा । लतिनो नागराश्चैव, प्रासादाः क्षितिमण्डनाः ॥१॥ सूक्ताः पदविभागेन, कर्ममार्गेण सुन्दराः । फलावाप्तिकरा लोके, भङ्गभेदयुता विभोः ॥२॥ अण्डकैस्तु विविभक्तास्ते, निर्गमैश्चारुरूपकैः । चित्रपत्रैर्विचित्रैश्च, विविधाऽऽकाररूपकैः ॥३॥” इत्यादि । तथा 'अङ्गविकारः शिरः स्फुरणादिस्तच्छुभाशुभसूचकं शाखमप्यविकारो यथा 'दक्षिणाक्षिस्पन्दने प्रियं भविष्यतीत्यादि । तथा खरः-पोददूकीशिवादिरुतरूपस्तस्य विषयः-तत्सम्बन्धी शुभाशुभनिरूपणाभ्यासः, यथा-"गतिस्तारा खरो वामः, पोदक्याः | । १ चक्षुःनेहेन सुखितो दन्तस्नेहेन च भोजनमिष्टम् । त्वक्लेहेन च सौख्यं नखलेहेन भवति परमधनम् ॥ १॥ पालकादिविहितं | प्र०।२ एकपर्वा प्रशंसन्ति द्विपर्वा केशकारिणी। दीप अनुक्रम [५०१] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~334 Page #335 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१५], मूलं [-] / गाथा ||८|| नियुक्ति : [३७९...] (४३) उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः १५ प्रत सूत्रांक ||८|| शुभदः स्मृतः । विपरीतःप्रवेशे तु, स एवाभीष्टदायकः ॥१॥" तथा-"दुर्गाखरत्रयं स्याज्ज्ञातव्यं शाकुनेन नैपु- मधुर ण्यात् । चिलिचिलिशब्दः सफलः सुसु मध्यश्चलचलो विफलः ॥१॥" इत्यादि । ततो य एताभिर्विद्याभिर्न जीवति मध्ययनं. नेता एव जीविकाः शुभाशुभाः प्रकल्प्य प्राणान् धारयति स भिक्षुरिति सूत्रार्थः । अनेन निमित्तलक्षणोत्पादनादो-४ पपरिहार उक्तः, सम्प्रति मन्त्रादिरूपतद्दोषपरिहारायाह मंतं मूलं विविहं विजचिंतं, वमणविरेयणधूमनित्तसिणाणं । आउरे सरणं तिगिच्छियं च, तं परिन्नाय परिब्वए स भिक्खू ॥ ८॥ 'मत्रम्' ॐकारादिस्वाहापर्यन्तो हीकारादिवर्णविन्यासात्मकत, 'मूलं' सहदेवीमूलिकाकल्पादि तत्तच्छास्त्र-IN विहितं मूलकर्म वा विविध' नानाप्रकारं 'वैद्यचिन्ता वैद्यसम्बन्धिनी नानाविधौषधपथ्यादिव्यापारात्मिका, विविधामित्यत्रापि डमरुकमणिन्यायेन योज्यते, बमनम्-उद्दिरणं विरेचन-कोष्ठशुद्धिरूपं धूम-मनःशिलादिसम्बन्धि नेतंति-नेत्रशब्देन नेत्रसंस्कारकमिह समीराअनादि परिगृह्यते, स्नानम्-अपत्यार्थ मत्रौषधिसंस्कृतजलाभिषेचनं, ॥४१७॥ वमनादीनां च नानायसानानामिह कृतसमाहाराणां निर्देशः, 'आउरे सरणं ति, सुब्ब्यत्ययाद् 'आतुरस्य' रोगादिपीडितस्य 'शरण' स्मरणं हा तात ! हा मातः ! इत्यादिरूपं 'चिकित्सितं च' आत्मनो रोगप्रतीकाररूपं 'तद्' इति । दीप अनुक्रम [५०२] 64680Skck SamEducation tntimational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~335 Page #336 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१५], मूलं [-1 / गाथा ||९|| नियुक्ति: [३७९...] (४३) प्रत सूत्रांक ||२|| यदनन्तरमुक्तं परिन्नाय'त्ति ज्ञपरिज्ञया परिज्ञाय प्रत्याख्यानपरिज्ञया च प्रत्याख्याय 'परिव्रजेत्' सर्वप्रकारं संयमाध्वनि यायाधः स भिक्षुरिति सूत्रार्थः ॥ अपरं च खत्तियगणउग्गरायपुत्ता, माहणभोई य विविहा य सिप्पिणो। नो तेसिं वयह सिलोगपूअं, तं परिन्नाय परिवए स भिक्खू ॥९॥ क्षत्रियाः-हेहेयाद्यन्वयजा गणाः-मलादिसमूहाः उग्राः-आरक्षकादयः राजपुत्राः-नृपसुताः, एपो द्वन्द्वः, 'माहनभोगिकाः' तत्र माहना ब्राह्मणास्तथा भोगेन-विशिष्टनेपथ्यादिना चरन्ति भोगिकाः-नृपतिमान्याः प्रधानपुरुषाः, विविधाच नानाप्रकाराः 'शिल्पिनः' स्थपतिप्रभृतयः, पठन्ति च-सिप्पिणोऽपणे' तत्र चान्ये इति शिल्पिविशेषण मुभयत्र च य इति शेषः, 'नो' नैव 'तेषां' क्षत्रियादीनां 'बदति' प्रतिपादयति, के ?-'श्लोकपूजे श्लोक-श्लाघां जयथैते शोभना इति, पूजां च-यथैतान् पूजयतेति, उभयत्र पापानुमत्सादिमहादोषसम्भवात् , किंतु 'तदिति श्लोक पूजादिकं द्विविधयाऽपि परिज्ञया परिज्ञाय परिव्रजेद्यः स भिक्षुरिति सूत्रार्थः॥ अनेन वनीपकत्वस्य परिहार उक्तः, साम्प्रतं संस्तवपरिहारमाह गिहिणो जे पव्वइएण दिहा, अप्पवईएण व संथुया हविजा। तेसिं इहलोयफलट्ठयाए, जो संथवं न करेइ स भिक्खू ॥१०॥ दीप अनुक्रम [५०३] SamEducation intamaront For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~336~ Page #337 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१५], मूलं [-1 / गाथा ||१०|| नियुक्ति: [३७९...] १५ प्रत सूत्रांक ||१०|| उत्तराध्य. 'गृहिणः' गृहस्था ये 'प्रबजितेन' गृहीतदीक्षेण दृष्टा उपलक्षणत्वात्परिचिताश्च 'अप्रबजितेन वा' गृहस्थावस्थेन सह 'संस्तुताः' परिचिता भवेयुमुहिणो य इति सम्बन्धः 'तेसिं'ति 'तैः' उभयावस्थयोः परिचितैहिभिः | | मध्ययनं. इहलौकिकफलार्थे' वस्त्रपात्रादिलाभनिमित्तं यः 'संस्तवं परिचयं न करोति स भिक्षुरिति सूत्रार्थः ॥ तथा॥४१॥ सयणासणपाणभोयर्ण, विविहं खाइमसाइम परेसिं । अदए पडिसेहिए नियंठे, जे तत्थ ण पओसई स भिक्खू ॥११॥ 'शयनासनपानभोजन'मिति शयनादीनि प्रतीतानि 'विविधम्' अनेकप्रकारं 'खादिमखादिम मिति खादिम1 पिण्डखजूरादि खादिमम्-एलालबादि, उभयत्र समाहारः, 'परेसिं ति 'परेभ्यः' गृहस्थादिभ्यः 'अदईत्ति अद-18 दन्यः 'प्रतिपिद्धः कचित् कारणान्तरे याचमानो निराकृतः सः 'निर्ग्रन्थः' मुक्तद्रव्यभावग्रन्थो यः 'तत्र' इत्यदाने|| 'न प्रदुष्यति' न प्रद्वेषं याति पुनस्यतीत्यभिधायकक्षपकर्षिवत्स भिक्षुरिति सूत्रार्थः । अनेन क्रोधपिण्डपरिहार है। ४/ उक्तः, उपलक्षणं चैतदशेषभिक्षादोषपरिहारस्य, इदानीं ग्रासैषणादोपपरिहारमाहजं किंचाहारपाणगं विविहं, खाइमसाइमं परेसिं लहूं। ॥४१८॥ जो तं तिविहेण नाणुकंपे, मणवयकायसुसंवुडे जे स भिक्खू ॥१२॥ __'यत् किञ्चित्' अल्पमपि 'आहारपानम्' अशनपानीयं विविधं 'खाइमसाइम'ति चस्स गम्यमानत्वात् खादि-15 CARBABCSAGAR दीप अनुक्रम [५०४] SamEditatammandana For Paw an पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~337 Page #338 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१५], मूलं [-] / गाथा ||१२|| नियुक्ति: [३७९...] प्रत सूत्रांक ||१२|| हमखादिमं च उक्तरूपं 'परेसिति परेभ्यः' गृहस्थेभ्यः 'लढुं'ति 'लब्ध्वा' प्राप्य यः 'तंति सुब्ब्यत्ययात्तेनाहारा दिना 'त्रिविधेन' मनोवाकायलक्षणेन प्रकारत्रयेण नानुकम्पते, कोऽर्थः -ग्लानबालादीनोपकुरुते न स भिक्षुरिति वाक्यशेपः, यस्तु मनोवाकायैः सुष्टु संवृतो निरुद्धतथाविधाहाराद्यभिलापः सुसंवृता या मनोवाकाया यस्येति सुसंवृत-- मनोवाकायः, तत एव ग्लानादीननुकम्पत इति गम्यते, स भिक्षुः, यदिया 'नानुकम्पते' इत्यत्र 'ना' पुरुषोऽनुकम्पते [नानुरूपो न कम्पते ] मनोवाकायसुसंवृतः सन् स भिक्षुरिति सूत्रार्थः ॥ अनेनार्थतो गृद्ध्यभावाभिधानादङ्गासरदोषपरिहार उक्तः, सम्प्रति धूमपरिहारमाह आयामगं चेच जवोदणं च, सीयं सोचीरजयोदगं च । नो हीलए पिंडं नीरसं तु, पंतकुलाणि परिचए स भिक्खू ॥ १३ ॥ आयाममेव आयामकम्-अवश्रावणं चशब्द उत्तरापेक्षया समुच्चये खगतानेकभेदख्यापको वा, 'एव' इति प्राग्वत् , 'यवोदनं च' यवभक्तं 'सीयं ति शीतं-शीतलमन्तप्रान्तोपलक्षणं चैतत् , सोवीरं-आचाम्लं यवोदकं च-यवप्रक्षालन पानीयं सोवीरयवोदकं, तब 'नो हीलयेत्' धिगिर्द किमनेनामनोज्ञेनेति न निन्देत् , पिण्ड्यते-सात्यते, कोऽर्थः ? | -गृहिभ्यः उपलभ्य संमील्यत इति पिण्डस्तमायामकायेव 'नीरसं' विगताखादं 'तुः' अप्पर्थस्ततो नीरसमपि, अत| |एव 'प्रान्तकुलानि' तुच्छाशयगृहाणि दरिद्रकुलानि वा यः परिप्रजेत्स भिक्षुरिति सूत्रार्थः ॥ अन्यच दीप अनुक्रम [५०६] matting For पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~338~ Page #339 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१५], मूलं [-1 / गाथा ||१४|| नियुक्ति: [३७९...] बृहद्वृत्तिः ॥४१॥ प्रत सूत्रांक प्रचराध्य. सहा विविहा भवंति लोए, दिव्या माणुसया तहा तिरिच्छा। सभिक्षुकभीमा भयभेरवा उराला, जो सुच्चा ण विहिजई स भिक्खू ॥ १४ ॥ | मध्ययनं. 'शब्दाः' ध्वनयः 'विविधाः' विमर्शप्रद्वेषादिना विधीयमानतया नानाप्रकाराः भवन्ति' जायन्ते 'लोके' जगति|| दिव्याः' देवसम्बन्धिनः 'मानुष्यकाः' मनुष्यसम्बन्धिनस्तथा 'तैरश्वाः' तिर्यक्सम्बन्धिनः 'भीमाः' रौद्राः भयेन | भैरवाः-अत्यन्तसाध्वसोत्पादका भयभैरवाः 'उदाराः' महान्तो यः 'श्रुत्वा' आकर्य प्रक्रमादुक्तविशेषणविशिष्टानेव, शब्दान् 'न व्यथते' न बिभेति धर्मध्यानतो न चलति वास भिक्षुरिति सूत्रार्थः । अनेनोपसर्गसहिष्णुत्वं सिंहविहा-3 MIरितायां निमित्तमुक्तं, सम्प्रति समस्तधर्माचारमूलं सम्यक्त्वस्थैर्यमाह वायं विविहं समिच लोए, सहिए खेयाणुगए अ कोवियप्पा। पन्ने अभिभूय सब्वदंसी, उवसंते अविहेडए स भिक्खू ॥ १५ ॥ _ 'वाद' च खखदर्शनाभिप्रायवचनविज्ञानात्मकं 'विविधम्' अनेकप्रकार, धर्मविषयेऽपि बनेकधा विवदन्ते, यथोक्तं-४ "सेतुकरणेऽपि धर्मो भवत्यसेतुकरणेऽपि किल धर्मः । गृहवासेऽपि च धर्मो बनेऽपि वसतां भवति धर्मः ॥१॥४॥४१९॥ मुण्डस्य भवति धर्मस्तथा जटाभिः सयाससां धर्मः" इत्यादिरूपं 'समेत्य' ज्ञात्वा लोके सहितः स्वहितो वा प्राग्वत् खेदयत्यनेन कर्मेति खेदः-संयमस्तेनानुगतो-युक्तः खेदानुगतः 'चः' पूरणे कोविदः--लब्धशास्त्रपरमार्थ आत्मा-४ SAEXACEBCASERACK ||१४|| दीप अनुक्रम [५०८] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~339 Page #340 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१५], मूलं [-1 / गाथा ||१६|| नियुक्ति: [३७९...] (४३) प्रत सूत्रांक ||१६|| स्पेति कोविदात्मा, 'पपणे अभिभूय सबदंसी उवसंते'त्ति प्राग्वत् , 'अविहेठकः' न कस्यचिद्विवाधको यः स भिक्ष-IX रिति सूत्रार्थः ॥ तथा असिप्पजीवी अगिहे अमित्ते, जिइंदिओ सव्वओ विप्पमुक्के । अणुकसाई लहु अप्पभक्खी, चिचा गिह एगचरे स भिक्खू ॥ १६ ॥ तिबेमि ।। ॥सभिक्खूअज्झयणं ॥ १५॥ शिल्पेन-चित्रपत्रच्छेदादिविज्ञानेन जीवितुं शीलमस्येति शिल्पजीवी न तथाऽशिल्पजीची 'अगृहः' गृहविरहितः तथा अविद्यमानानि मित्राणि-अभिष्वङ्गतवो वयस्था यस्यासावमित्रः, जितानि-यशीकृतानि 'इन्द्रियाणि' श्रोत्रादी-1 नि येन स तथा, 'सर्वतः बाह्यादभ्यन्तराच ग्रन्थादिति गम्यते, विविधैः प्रकारैःप्रकर्षण मुक्तो विप्रमुक्तः, तथा अणवः-18 दाखल्पाः सज्वलननामान इतियावत् कषायाः-क्रोधादयो यस्येति सबंधनादित्वादिनि प्रत्ययेऽणुकषायी, प्राकृतत्वा-3 सूत्रे ककारस्य द्वित्वं, यद्वा उत्कषायी-प्रवलकषायी न तथाऽनुत्कषायी अल्पानि-स्तोकानि लघूनि-निःसाराणि निष्पावादीनि भक्षयितुं शीलमखेति अल्पलघुमक्षी, सूत्रे तिव्यत्ययः प्राग्वत्, 'त्यक्त्वा' अपहाय गृहं द्रव्यभावभेदभिन्नम् , एको-रागद्वेषविरहितः तथाविधयोग्यतावासावसहायो वा चरति-विहरत्येकचरो यः स भिक्षुः, अनेनैकाकिविहार उपलक्षित इति सूत्रार्थः ॥ इति' परिसमाप्तौ, ब्रयीमीति पूर्ववदेव, नया अपि पूर्ववदेव ।। 5 ॥ इति श्री शान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां पञ्चदशमध्ययनं समाप्तमिति ॥१५॥ SXI.XXX दीप अनुक्रम [५१०] +न. SHREaintimal Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं- १५ परिसमाप्त ~340 Page #341 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१६], मूलं [-] / गाथा ||१६...|| नियुक्ति: [३७९] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४२०॥ प्रत सूत्रांक ||१६|| अथ षोडशं ब्रह्मचर्यसमाधिनामकम् । दश ब्रह्म समाधिः उक्त पञ्चदशमध्ययनम् , अधुना पोडशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययने भिक्षुगुणा उक्ताः, ते च तत्त्वतो ब्रह्मचर्यव्यवस्थितस्य भवन्ति, तदपि च ब्रह्मगुप्तिपरिज्ञानत इति ता इहाभिधीयन्ते इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्याध्ययनस्य चतुरनुयोगद्वारचर्चा प्राग्वद्यावन्नामनिष्पन्न निक्षेपे दशब्रह्मचर्यसमाधिस्थानमिति नाम, ततो दशादिपदानां पञ्चानां निक्षेपः कर्तव्यः, तत्र च नैककाद्यभाये दशसम्भव इत्येककनिक्षेपमाह नियुक्तिकृत् णामंठवणादविएमाउयपयसंगहेक्कए चेव । पजव भावे अतहा सत्तेए इक्कगा इंति ॥ ३७९ ॥ | एतदर्थस्तु चतुरङ्गीयाध्ययन एव कथित इति न प्रतन्यते ॥ एतदनुसारतश्च द्वयादिनिक्षेपः सुकर एवेति तमुपेक्ष्यैव दशनिक्षेपमाह ४२०॥ दससु अ छक्को दवे नायब्बो दसपएसिओखंधो। ओगाहणाठिईए नायब्बों पजवदुगे अ॥३८०॥ दशसु च निक्षेप्तव्येषु षट्को निक्षेप इति गम्यते, स च नामस्थापनाद्रव्यक्षेत्रकालभावभेदात् , तत्र नामस्था-४ - दीप अनुक्रम [५१०] SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं -१६ "ब्रह्मचर्यसमाधि" आरभ्यते ~341 Page #342 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१६], मूलं [-1 / गाथा ||१६...|| नियुक्ति: [३८०] प्रत पने क्षपणे, 'द'त्ति द्रव्यविषयेषु दशसु विचार्यमाणेषु 'ज्ञातव्यः' अवगन्तव्यः दश प्रदेशाः परिमाणमस्येति दशप्रदेशिकः स्कन्धो दशोच्यते, दशपरमाणुद्रव्यनिष्पन्नत्वात् , तथा 'ओगाहणाटिईए'त्ति स्कन्ध एवावगाहनायां चिन्त्य-1 मानः प्रक्रमाद्दशप्रदेशावगाढः क्षेत्रदशोच्यते, स्थिती च दशसमयस्थितिकः स एव कालदशोच्यते, उपलक्षणं चैतत्सर्य, यत आह चूर्णिकृत्-"द्रव्यदश दश सचित्तादीनि द्रव्याणि, क्षेत्रदश दशाकाशप्रदेशाः, कालदश दश समया इति ज्ञातव्याः,"'पजव'त्ति पर्याया दशसङ्ख्यत्वेन विवक्षिता भावदश [क्षये] (कये) पर्याया इत्याह-द्विके च' जीवाजीवरूपे 'चः' पूरणे, तत्र जीवपर्याया विवक्षया कषायादयः, अजीवपर्यायाश्च पुद्गलसम्बन्धिनो वर्णादय इति गाथार्थः ॥ इदानी ब्रह्मनिक्षेपमाह भंमि(मी) उ चउक्कं ठवणाभंमि भणुप्पत्ती। दवमि वत्थिनिग्गह अन्नाणीणं मुणेयव्यो ॥ ३८१॥ भावे उ वस्थिनिग्गह नायव्वोतस्स रक्खणहाए। ठाणाणि ताणि वजिज जाणि भणियाणि अज्झयणे। 'वभमि उत्ति ब्रह्मणि पुनर्विचार्ये 'चउकति चतुष्को नामस्थापनाद्रव्यभायभेदानिक्षेप इति गम्यते, तत्र नामब्रह्म यस्य ब्रह्मेति नाम, स्थापनाब्रह्मणि भाषणोत्पत्तिवेतव्या, यथाऽऽचारनाग्नि प्रधमाङ्गे "एका मणसजाई रज १ एका मनुष्यजातिः राज्योत्पत्ती च द्वे कृते वृषभस्य । तिम्रश्च शिल्पवाणिध्ये भावकधर्मे चतस्रः ॥१॥ AdSkse%%* सूत्रांक ||१६|| दीप अनुक्रम [५१०] SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~342 Page #343 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१६|| दीप अनुक्रम [५१० ] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४२१॥ Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [ १६ ], मूलं [--] / गाथा ||१६...|| निर्युक्ति: [३८१-३८२] प्यत्तीय दो कया उसमे । तिन्नि य सिप्पवणिए सावगधम्मंमि चचारि ॥ १ ॥" इत्यादिना निर्युक्तिकृताऽभिहिता, 'द्रव्ये वस्तिनिग्रहः' उपस्थनिरोधमात्रम् ' अज्ञानिनां' मिथ्यादृशां दशत्रह्मचर्य समाधिस्थानावगमशून्याना 'मुणितव्यः' प्रतिज्ञातव्यो ब्रह्मेति प्रक्रमः, 'भावे उ'ति भावे पुनर्विचार्ये वस्तिनिग्रहो 'ज्ञातव्यः' अवगन्तव्यः, कस्य सम्बन्धीत्याह - 'तस्य' इति ब्रह्मणो 'रक्षणार्थाय' रक्षणप्रयोजनाय 'स्थानानि' विविक्तशयनासनसेवनादीनि तानि 'वर्जयेत्' परिहरेद्यस्तस्येति प्रक्रमः, स च ज्ञान्येव तानि कानीत्याह — यानि 'भणितानि' उक्तानि 'अध्ययने' इहैव प्रक्रान्त इति गाथाद्वयार्थः ॥ चरणनिक्षेपमाह चरणे छको दव्वे गइचरणं चैव भक्खणेचरणं । खित्ते काले जंमि उ भावे उ गुणाण आयरणं ॥ ३८३ ॥ चरणविषयः पङ्कः' षट्परिमाण उक्तरूपो निक्षेपः, तत्र नामस्थापने गतार्थे, द्रव्ये गतिरूपं चरणं गतिचरणं ग्रामादिगमनात्मकमित्यर्थः, 'चः' समुच्चये भिन्नक्रमच 'एवेति पूरणे, 'भक्खणेचरणं ति एकारोऽलाक्षणिकस्ततो भक्षणचरणं, चरणशब्दस्योभयार्थत्वात् पय्यते हि 'चर गतिभक्षणयोः' इति, तथा 'खेत्ते काले जंमि'त्ति यस्मिन् क्षेत्रे काले वा चरणं चर्यते व्यावर्ण्यते वा तत्क्षेत्रचरणं कालचरणं चेति प्रक्रमः, भावे तु 'गुणानां' मूलोत्तरगुणरूपाणाम् 'आचरणम्' आसेवनमिति गाथार्थः ॥ समाधिनिक्षेपमाह For Parsons Praten दशब्रह्म समाधिः, १६ ~343~ ॥४२१ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #344 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१६], मूलं [-] / गाथा ||१६...|| नियुक्ति: [३८४] प्रत सूत्रांक ||१६|| - समाहीइ चउकं दव्वं दव्वेण जेण उ समाही । भावमि नाणदंसणतवे चरिते अ नायव्वं ॥ ३८४ ॥ समाधौ ‘चउक'ति प्राग्वच्चतुष्को नामादिनिक्षेपः, तत्र नामस्थापने प्रसिद्धे, 'द्रव्य मिति द्रव्यसमाधिः 'द्रव्येण' माधुर्यादिगुणान्वितेन 'येन' हेतुना 'तुः' पूरणे 'समाधिः' खास्थ्यमुपजायते तदेव समाधिहेतुत्वात्समाधिरिति । 'भावंमि णाणदसणतवे चरिते अत्ति सूत्रत्वाद्भावे ज्ञानदर्शनतपांसि चरित्रं च स्वस्वरूपाविरोधेनावस्थानात्समा घिर्जातव्यः, यद्वा ज्ञानं च दर्शनं च तपश्चेति समाहारः ततो ज्ञानदर्शनतपसि चरित्रे च, प्रक्रमाद्यः समाधिः18 अमीषामेव परस्परमविरोधेनावस्थानं स भावसमाधिरिति ज्ञातव्यमिति गाथार्थः । स्थाननिक्षेपमाह10. (२) () ) ) (१२) नामंठवणादविए खित्तद्धा उद्दउवरई वसही। संजमपग्गह जोहे अचलगणणसंधणा भावे ॥ ३८५॥ | सर्वत्र स्थानमिति योजनीयं, नामस्थानमित्यादि, तत्र नामस्थानं प्रतीतं, स्थापनास्थानं तु यो यद्गुणोपेतो यस्मिनाचार्यादिपदे स्थाप्यते स एव तिष्ठत्यस्मिन् स्थान इति स्थापनास्थानमुच्यते, 'द्रव्यस्थानम्' आकाशम् , अत्र हि जीवादिद्रव्याणि तिष्ठन्तीति, क्षेत्रस्थानमप्याकाशमेव, यतः क्षेत्रमाकाशं तच्चाकाश एव तिष्ठति, उक्तं हि-'आकाशं तु खप्रतिष्ठित मिति, अद्धास्थानमर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्ररूपं समयक्षेत्रं, तत्रैव समयावलिकाद्युपलक्षितस्याद्धाकालस्य स्थितेः, 'ऊर्द्धस्थान' यत्रोझै स्थीयते, तब कायोत्सर्गः, 'उपरतिस्थानं' यत्र सर्वसावधविरतिरवाप्यते, 'वसतिस्थानं' यत्र दीप अनुक्रम [५१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~344 Page #345 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१६], मूलं [१] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [३८५] १६ २ [१] उत्तराध्य. स्वीपण्डकादिदोषविकले यतिनिवासः, संयमस्थानं-शुभशुभतराध्यवसायविशेषा येषु संयमस्याबस्थितिः, प्रग्रह- दशब्रह्म स्थानं यद्यस्यायुधस्य ग्रहणस्थानं, योधस्थानम्-आलीढप्रत्यालीढादि, अचलस्थानं यस्मिन्न मनागपि चलनसम्भ-12 बृहद्वृत्तिः Hसमाधिःहैवः, तब मुख्यतो मुक्तिरेव, गणनास्थानं यत्रेककादो शीपप्रहेलिकावसाने गणनाऽवतिष्ठते, 'संधण'त्ति सन्धानस्थान है। ॥४२२॥ यत्र देशे त्रुटितमुक्तावल्यादेरेकत्वं विधीयते, 'भावस्थानम्' औदयिकादिभावानां यथाखमयस्थानविपय इति गाथार्थः । गतो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तच्चेदम् समे आउस! तेणं भगवया एवमक्खायं-इह खलु थेरेहिं भगवतेहिं दसवंभचेरसमाहिठाणा पन्नत्ता, जे भिक्खू सुच्चा निसम्म संजमबहुले संयरबहुले समाहियहुले गुत्ते गुत्तिदिए गुत्तवंभयारी सया अप्पमत्ते विहरिजा ॥१॥ | श्रुतं मयाऽऽयुष्मंस्तेन भगवतैयम् 'आख्यातं' कथितं, कथमित्याह-सोपस्कारत्वात्सूत्रस्य यथेति गम्यते, ततो यथेह क्षेत्रे प्रबचने वा 'खलु' निश्चयेन स्थविरैः-गणधरैः 'भगवद्भिः' परमैश्चर्यादियुक्तैर्दशब्रह्मचर्यसमाधिस्थानानि 'प्रज्ञप्तानि' प्ररूपितानि, कोऽभिप्रायः ?-नैपामियं वमनीपिका, किन्तु भगवताऽप्येवमाख्यातं मया श्रुतं ४२२॥ ततोऽत्र मा अनास्थां कृथाः, तान्येव विशिनष्टि-'ये' इति यानि ब्रह्मचर्यसमाधिस्थानानि भिक्षुः 'श्रुत्वा' आकर्य शब्दतः 'निशम्य' अवधार्धितः 'संजमवहुले'त्ति संयमम्-आश्रयविरमणादिकं बहु इति-बहुसङ्खवं यथाभवत्येवं -- दीप अनुक्रम [५११] DAREDuratimmamatamol TOTATONSPIRodeeomm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~345 Page #346 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक [१] दीप अनुक्रम [५१२] Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१] / गाथा || -- || निर्युक्ति: [३८५] अध्ययनं [१६], | लाति -गृह्णाति कोऽभिप्रायः ? - विशुद्धविशुद्धतरं पुनः पुनः संयमं करोतीति संयमबहुलः, मयूरव्यंसकादित्वात्समासः, यदिवा बहुलः प्रभूतः संयमोऽस्येति बहुलसंयमः, सूत्रे पूर्वापरनिपातस्यातत्रत्वात्, अत एव संवरः| आश्रवद्वारनिरोधः तदुलो बहुलसंवरो वा तत एव समाधिः- चित्तखास्थ्यं तद्वदुलो बहुलसमाधिर्वा, 'गुप्तः' मनोवाक्कायगुप्तिभिः, गुप्तत्वादेव व गुप्तानि विषयप्रवृत्तितो रक्षितानि इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि येन स तथा तत एव गुसं नवगुतिसेवनात् 'ब्रह्मेति ब्रह्मचर्यं चरितुम् आसेवितुं शीलमस्येति गुप्तब्रह्मचारी 'सदा' सर्वकालम् 'अप्रमत्तः प्रमाद'विरहितः 'विहरेत्' अप्रतिवद्धविहारितया चरेत् । एतेन संयमबहुलत्वादि दशत्रसचर्यसमाधिस्थानफलमुक्तम्, एतद| विनाभावित्वात्तस्येति सूत्रार्थः ॥ करे खलु धेरेहिं भगवंतेहिं दसवंभवेरसमाहिठाणा पन्नत्ता ?, इमे खलु ते जाव विहरिजा, तंजहाविविताई सयणासणारं सेविज्जा से निरगंथे, नो इत्थीपसुपंडगसंसत्ताई सयणासणाई सेवित्ता हवह से निम्गंधे, तं कहं इति चेदायरियाह - निग्गंधस्स खलु इत्थिपसुपंडगसंसत्ताई सयणासणाई सेव माणस्स बंभयारिस्स वंभचेरे संका वा कखा वा वितिमिच्छा वा समुप्पज्जिज्जा, भेयं वा लभिज्जा, उम्मायं वा पाउणिजा, दीहकालियं वा रोगायकं हविजा, केवलिपन्नत्ताओ धम्माओ वा भंसिज्जा, तम्हा नो इत्थिपसुपंडगसंसत्ताई सरणासणाई सेवित्ता हवइ से निग्गंथे ॥ १ ॥ For Permat& Private Use On पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 346~ Page #347 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक [१] दीप अनुक्रम [५१२] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४२३॥ सूद [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१६], मूलं [१] / गाथा || --II निर्युक्ति: [३८५...] कतराणीत्यादिप्रश्नसूत्रम् इमानीत्यादि निर्वाचनसूत्रं च प्राग्वत्, तान्येवाह - 'तं जहे' त्यादि, 'तद्यथे' त्युपन्यासे 'विविक्तानि ' स्त्रीपशुपण्डकाकीर्णत्वविरहितानि शय्यते येषु तानि शयनानि च - फलकसंस्तारकादीनि, आस्यते | येषु तानि आसनानि च -- पादपीठपुज्छनादीनि शयनासनानि, उपलक्षणत्वात्स्थानानि च 'सेवेत' भजेत यः सः 'निर्ग्रन्थः ' द्रव्यभावग्रन्थान्निष्क्रान्तो भवतीति शेषः । इत्थमन्वयेनाभिधायाव्युत्पन्नविनेयानुग्रहाया मुमेवार्थं व्यतिरे केणाह 'नो' नैव स्त्रियश्च - दिव्या मानुष्यो वा पशवश्च - अजैडकादयः पण्डकाश्च - नपुंसकानि स्त्रीपशुपण्डकास्तैः | संसक्तानि - आकीर्णानि स्त्रीपशुपण्डकसंसक्तानि शयनासनानि' उक्तरूपाणि 'सेविता' उपभोक्ता भवति, 'तदित्यनन्तरोक्तं 'कथं' केनोपपत्तिप्रकारेण ?, 'इति चेद' एवं यदि मन्यसे, अत्रोच्यते-निर्ग्रन्थस्य खलु निश्चितं स्त्रीपशुपगण्डकसंसक्तानि शयनासनानि 'सेवमानस्य' उपभुञ्जानस्य 'वंभयारिस्स' त्ति अपिशब्दस्य गम्यमानत्वाद् ब्रह्मचारिणोऽपि सतो ब्रह्मचर्ये 'शङ्का वा' किमेताः सेवे उत नेत्येवंरूपा, यदिवा इहाम्येपामिति गम्यते, ततः शङ्का वाऽन्येषां - यथा किमसावेवंविधशयनासनसेवी ब्रह्मचार्युत नेति, 'काङ्क्षा' वा ख्याद्यभिलापरूपा 'विचिकित्सा' वा धर्म प्रति चितविश्रुतिः 'समुत्पद्यते' जायते, अथवा शङ्का ख्यादिभिरत्यन्तापहृतचित्ततया विस्मृतसकलाप्तोपदेशस्य “सत्यं वच्मि हितं वच्मि, सारं वच्मि पुनः पुनः । अस्मिन्नसारे संसारे, सारं सारङ्गलोचनाः ॥ १॥" इत्यादिकुविकल्पान् विकल्पयतो | मिथ्यात्वोदयतः कदाचिदेतत्परिहार एव न तीथकृद्भिरुक्तो भविष्यति, एतदासेवने वा यो दोष उक्तः स दोष एव न Eguration Intemational For Permal & Pre Or दशब्रह्म समाधिः१६ ~347~ ॥४२३॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #348 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक [१] दीप अनुक्रम [५१२] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [३८५...] अध्ययनं [१६], भवतीत्येवंरूपः संशय उत्पद्यते, काङ्क्षा वा तत एव हेतो: “प्रियादर्शनमेवास्तु, किमन्यैर्दर्शनान्तरैः १ । प्राप्यते येन निर्वाणं, सरागेणापि चेतसा || १||" इत्याद्यभिधायकान्यान्यनीलपटादिदर्शनाग्रहरूपा, विचिकित्सा वा-धर्मं प्रतिकिमेतावतः कष्टानुष्ठानस्य फलं भविष्यति न वा ? तद्वरमेतदासेवनमे वास्त्वित्येवंरूपा, 'भेदं' वा विनाशं चारित्रस्येति गम्यते, 'लभेत' प्राप्नुयात्, 'उन्मादं वा' कामग्रहात्मकं प्राप्नुयात् स्त्रीविषयाभिलाषातिरेकतस्तथाविधचित्तविप्लवसंभवात्, 'दीर्घकालिकं वा' प्रभूतकालभावि रोगश्च - दाहज्यरादिरातङ्कश्थ – आशुघाती शूलादि रोगातङ्कं 'भवेत्' स्यात्, संभवति हि ख्याद्यभिलाषातिरेकतोऽरोचकत्वं ततश्च ज्यरादीनि, केवलिप्रज्ञतात् 'धर्मात् श्रुतचारित्ररूपात् समस्ताद् 'भ्रश्येत्' अधः प्रतिपतेत्, कस्यचिदतिक्लिष्टकर्मोदयात्सर्वथा धर्मपरित्यागसम्भवात्, यत एवं तस्मादित्यादिनिगमनवाक्यं प्रकटार्थमेवेति सूत्रार्थः ॥ उक्तं प्रथमं समाधिस्थानं द्वितीय माह इत्थी कहूं कहित्ता हवइ से निग्गंधे, तं कहमिति चेदायरियाऽऽह — निग्गंधस्स खलु इत्थीणं कह कहेमाणस्स बंभयारिस्स बंभचेरे संका वा कंखा वा वितिमिच्छा वा समुप्पत्विजा भेयं वा लभिजा उम्मायं वा पाउणिज्जा दीहकालियं वा रोगायकं हविज्जा केवलिपन्नताओ वा धम्माओ भंसिज्जा, तम्हा नो इत्थीणं कहं कहिजा ॥ २ ॥ taurantaraामिति गम्यते, 'कथा' वाक्यप्रबन्धरूपा, यदिवा स्त्रीणां कथा, – “कर्णाटी सुरतोपचा - Jan Education mational For Parana Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~348~ Page #349 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१६], मूलं [२] / गाथा ||--II नियुक्ति: [३८५...] प्रत सत्राक [२] उत्तराध्य. 18/रचतुरा लाटी विदग्धप्रिया" इत्यादिका, अथवा जातिकुलरूपनेपथ्यभेदाचतुर्धा स्वीकथा, तत्र जातिव्रह्मण्यादिः दशन टाकलम-उनादि रूप-महाराष्टिकादि संस्थान-नेपथ्य-तत्तहेशप्रसिद्ध. तां कथयिता भवति 'से निग्गंथे'त्ति या एवंविधः स निर्ग्रन्थः । शेषं प्रश्नप्रतिवचनाभिधायि पूर्ववदिति सूत्रार्थः ॥ तृतीयमाह समाधिः॥४२४॥ IP नो इत्थीहिं सद्धिं संनिसिज्जागए विहरित्ता हवइ से निग्गंथे, तं कहं इति चेदायरियाह-निग्गंधस्स खलु १६ उत्थीहिं सद्धिं संनिसिज्जागयस्स बंभयारिस्स बंभचेरे संका वा कंखा वा वितिगिच्छा वा समुप्पजिजा: दाभयं वा लभिजा उम्मायं वा पाउणिज्जा दीहकालियं वा रोगायंक हविजा केवलिपन्नताओ वा धम्माओ भंसिज्जा, तम्हा खलु नो निग्गंथे इत्थीहिं सद्धिं संनिसिजागए विहरइ ॥३॥ | नो खीभिः 'सार्द्ध सह सम्यग निषीदन्ति-उपविशन्त्यस्यामिति संनिपद्या-पीठाद्यासनं तस्यां गतः-स्थितः |संनिषद्यागतः सन् 'विहर्ता' अवस्थाता भवति, कोऽर्थः ?-खीभिः सहकासने नोपविशेत् , उत्थिताखपि हि तासु मुहूर्त तत्र नोपवेष्टव्यमिति सम्प्रदायः, य एवंविधः स निर्गन्धः, न त्वन्य इत्यभिप्रायः, शेष प्रश्नप्रतिवचना-14 ॥४२४॥ भिधायि पूर्ववदिति सूत्रार्थः॥ चतुर्थमाह१ निम्नांवित्तियः स निप्रन्यो न त्वन्याभिप्रायस्तरकथमित्यादिप्राग्वदिति सूत्रार्थः । दीप अनुक्रम [५१३] 4CACASSACS For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~349~ Page #350 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक [४] दीप अनुक्रम [५१५] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [४] / गाथा ||- -|| निर्युक्ति: [३८५...] अध्ययनं [१६], नो इत्थी इंदिuri मणोहराई मणोरमाई आलोहत्ता निज्झाइत्ता हवइ से निग्गंथे, तं कहं इति चेदावरियाऽऽह - निग्गंथस्स खलु इत्थीणं इंदियाई मणोहराई मणोरमाई जाव निज्झाएमाणस्स बंभचेरे संका वा कंखा वा वितिमिच्छा वा समुदयजिजा भेयं वा लभिजा उम्मायं वा पाउणिना दीहकालियं वा रोगापकं हविजा केवलिपन्नताओ वा धम्माओ भंसिजा, तम्हा खलु निग्गंथे तो इस्थीणं इंदियाई निज्झाइ ॥ ४ ॥ नो स्त्रीणां 'इन्द्रियाणि' नयननासिकादीनि मनः - चित्तं हरन्ति दृष्टमात्राण्यप्याक्षिपन्तीति मनोहराणि, तथा मनो रमयन्तीति दर्शनानन्तरमनुचिन्त्यमानान्याहादयन्तीति मनोरमाणि 'आलोकिता' समन्ताद्रष्टा 'निर्ध्याता' | दर्शनानन्तरमतिशयेन चिन्तयिता, यथा-अहो ! सलवणत्वं लोचनयोः, ऋजुत्वं नासावंशस्येत्यादि, यद्वा 'आङीपदर्थे' तत 'आलोकिता' ईषद्रष्टा 'निर्ध्याता' प्रबन्धेन निरीक्षिता भवति यः स निर्ग्रन्थः, अन्यत्प्रतीतमेवेति | सूत्रार्थः ॥ पञ्चममाह - नो frrie इत्थti कुतरंसि वा दूसंतरंसि वा भित्तिअंतरंसि वा कूहयसहं वा रुहयस वा गीपसदं वा हसियसदं वा धणियसद्दं वा कंदिवस वा विलवियस वा सुणित्ता हवइ से निग्गंथे, तं कहं इति वेदापरियाह—- इत्थीणं कुतरंसि वा दूसंतरंसि वा भित्तिअंतरंसि वा जाव विलवियस वा सुणमाणस्स For Parana Privat org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~350~ Page #351 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१६], मूलं [७] / गाथा ||--II नियुक्ति: [३८५...] १६ प्रत [५] उत्तराध्य. भयारिस्स बंभचेरे संका वा कंखा वा वितिगिच्छा वा समुप्पजिजा भेयं वा लभिज्जा उम्मायं वा पाउ- दशब्रह्म णिजा दीहकालियं वा रोगायक हविजा केवलिपन्नत्ताओ वा धम्माओ जाव भंसिज्जा, तम्हा खलु निग्गथे । वृहदात्तानो इत्थीर्ण कुडतरंसि वा जाव सुणेमाणे विहरिजा ॥५॥ समाधिः ॥४२५॥ ४ नो स्त्रीणां कुड्य-खटिकादिरचितं तेनान्तरं-व्यवधानं कुड्यान्तरं तस्मिन् वा, दूष्य-वस्त्रं तदन्तरे वा, यवनि कान्तर इत्यर्थः, भित्तिः-पक्केष्टकादिरचिता तदन्तरे, वाशब्दः सर्वत्र विकल्पाभिधायी, स्थित्वेति शेषः, 'कूजितशब्द वा' विविधविहगभाषयाऽव्यक्तशब्दं सुरतसमयभाविनं 'रुदितशब्दं वा रतिकलहादिकं मानिनीकृतं 'गीतशब्द वा' पञ्चमादिहुकृतिरूपं 'हसितशब्दं वा' कहकहादिकं 'स्तनितशब्दं वा' रतिसमयकृतं 'ऋन्दितशब्दं वा' प्रोपितभर्तृकादिकृताक्रन्दरूपं 'विलपितशब्दं वा' प्रलापरूपं श्रोता यो न भवति स निर्ग्रन्थः, शेषं स्पष्टमिति सूत्रार्थः ॥ षष्ठमाह नो निग्गंथे पुव्वरयं पुश्वकीलियं अणुसरित्ता हवइ, तं कहं इति चेदायरियाह-निग्गंधस्स खलु इस्थीणं पुब्वरयं पुम्बकीलियं अणुसरमाणस्स भयारिस्स बंभचेरे संका या कंखा वा वितिगिच्छा वा समुप्प-IR॥४२५।। जिजा भेयं वा लभिजा उम्मायं वा पाउणिजा दीहकालियं वा रोगायक हविजा केवलिपन्नत्ताओ वा धम्माओ भंसिज्जा, तम्हा खलु नो निग्गंथे इत्थीणं पुब्वरयं पुब्वकीलियं अणुसरिजा ॥६॥ दीप अनुक्रम [५१६] SamEducatmimarma For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~351 Page #352 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१६], मूलं [६] / गाथा ||--II नियुक्ति: [३८५...] (४३) प्रत [६] नो निर्ग्रन्थः पूर्वस्मिन्-गृहावस्धालक्षणे काले रत-रूयादिभिः सह विषयानुभवनं पूर्वरतं, 'पूर्वक्रीडितं या ख्यादिभिरेव पूर्वकालभावि दुरोदरादिरमणात्मकं वाशब्दस्य गम्यमानत्वात् , 'अनुस्मता' अनुचिन्तयिता भवति, ४ शेषं प्राग्वदिति सूत्रार्थः ।। ससममाह- नो पणीयं आहारं आहारित्ता हवइ से निग्गंथे, तं कहं इति चेदायरियाह-नि० पणीयं पाणभोयणं आहारेमाणस्स बंभयारिस्स बंभचेरे संका वा कंखा वा वितिगिच्छा वा समुप्पजिला भेयं वा लभिजा उम्मायं वा पाउणिजा दीहकालियं वा रोगायक हविजा केवलिपन्नत्ताओ वा धम्माओ भंसिज्जा, तम्हा खलु नोनिग्गंथे पणीयं आहारं आहारिज्जा ॥७॥ नो' नैव प्रणीत' गलद्विन्दु, उपलक्षणत्यादन्यमप्यत्यन्तधातूद्रेककारिणम् 'आहारम्' अशनादिकम् 'आहारशयिता' भोक्ता भवति यः स निर्ग्रन्थः, शेषं व्याख्यातमेव, नवरं 'प्रणीतं पानभोजनम्' इति पानभोजनयोरेवोपा दानम् , एतयोरेव मुख्यतया यतिभिराहार्यमाणत्वात् , अन्यथा खाद्यखाद्ये अप्येवंविधे वर्जनीये एवेति सूत्रार्थः ।। है अष्टममाह नो अइमायाए पाणभोयणं आहारित्ता हवा से निग्गंथे, तं कहं इति चेदायरियाह- अइमायाए पाणभोयणं आहारेमाणस्स बंभयारिस्स बंभचेरे संका वा कंखा वा वितिगिच्छा वा समुप्पजिजा भेयं वा दीप अनुक्रम [५१७] SMEditation पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~352 Page #353 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक [4] दीप अनुक्रम [५१९] उत्तराध्य. वृहद्वृत्तिः ॥४२६ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [८] / गाथा ||--|| अध्ययनं [१६], निर्युक्ति: [३८५...] लभिज्जा उम्मायं वा पाउणिवा दीहकालियं वा रोगार्थकं हविज्जा केवलिपन्नत्ताओ वा धम्माओ भंसिज्जा, तम्हा खलु नो निग्गंथे अइमायाए पाणभोयणं भुंजिला ॥ ८ ॥ 'नो' नैव 'अतिमात्रया' मात्रातिक्रमेण, तत्र मात्रा - परिमाणं, सा च पुरुषस्य द्वात्रिंशत्कलाः स्त्रियाः पुनरष्टाविंशतिः, उक्तं हि "वेत्तीस किर कपला आहारो कुच्छिपूरओ भणिओ। पुरिसस्स महिलियाए अट्ठावीसं भवे कवला ॥ १ ॥" अतिक्रमस्तु तदाधिक्यसेवनं 'पानभोजनं' प्रतीतमेव 'आहारयिता' भोक्ता भवति यः स निर्ग्रन्थः, शेषं तथैवेति सूत्रार्थः ॥ नवममाह - नो विभूसावाई हव से निग्गंथे, तं कहूं इति चेदायरियाह— विसावत्तिए विभूसियसरीरे इत्थिजणस्स अभिलस्सणिजे हवइ, तओ णं तस्स इत्थिजणेणं अभिलसिजमाणस्स भयारिस्स बंभचेरे संका वा कंखा वा वितिमिच्छा वा समुप्पजिजा भेयं वा लभिजा उम्मायं वा पाउणिज्ञा दीहकालियं वा रोगायेकं हविज्जा केवलिपन्नत्ताओ वा धम्माओ भंसिज्जा, तम्हा खलु नो निग्गंधे विभूसाणुबाई सिया ॥ ९ ॥ 'नो' नैव विभूषणं विभूषा - शरीरोपकरणादिषु खानधावनादिभिः संस्कारस्तदनुपाती, कोऽर्थः ? - तत्कर्त्ता भवति यः स निर्ग्रन्थः, तत्कथमिति चेदुच्यते- 'विभूसावत्तिए'त्ति विभूषां वर्त्तयितुं विधातुं शीलमस्येति विभूषा१ द्वात्रिंशत् किल कवला आहारः कुक्षिपूरको भणितः पुरुषस्य महेलाया अष्टाविंशतिर्भवेयुः कवलाः ॥ १ ॥ Education intemational For Parsons Privat दशब्रह्म समाधिः १६ ~ 353~ ॥४२६॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #354 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१६], मूलं [९] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [३८५...] प्रत [१] वर्ती, ताच्छीलिको णिन् , स एव विभूषावर्त्तिकः, स किमित्याह-विभूषितम्-अलङ्कतं सानादिना संस्कृतमितियावत् शरीरं-देहो यस्य स विभूषितशरीरः, तथा च 'उज्वलवेषं पुरुषं दृष्ट्वा खी कामयते' इति वचनाद्युबतिजनप्रार्थनीयो भवति, आह च सूत्रकारः-'इत्विजणस्स अहिलसणिज्जे हवई'त्ति, ततः को दोष इत्याह-ततः' खीजनाभिलषणीयत्वतः, णमिति प्राग्वत् , 'तस्य' निर्ग्रन्थस्य 'खीजनेन' युवतिजनेनाभिलष्यमाणस्व-प्राय॑मानस्य ब्रह्मचाVारिणोऽपि ब्रह्मचर्ये शङ्का वा, यथा किमेतास्तावदित्थं प्रार्थयमाना उपभुले, आयती तु यद्भावि तद्भवत, उतश्चि-11 कष्टाः शाल्मलीश्लेष्मादयो नरक एतद्विपाका इति परिहरामीत्येवंरूपः संशयः, शेष प्राग्वदिति सूत्रार्थः॥ दशममाह| नो सहरूवरसगंधफासाणुवाई हवा से निग्गंधे, तं कहं इति चेदायरियाह-निग्गंधस्स खलु सहरूवरसगधफासाणुवाइयस्स बंभयारिस्स बंभचेरे संका वा कंखा वा वितिगिच्छा वा समुप्पजिजा भेयं वा लभिजा उम्मायं वा पाउणिज्जा दीहकालियं वा रोगायक हविज्जा केवलिपन्नताओ धम्माओ जाव भंसिज्जा, तम्हाद दाखलु नो निग्गंधे सहरूवरसगंधफासाणुवाई हवा से निग्गथे, दसमे बंभचेरसमाहिठाणे हवह ॥१०॥ IA 'नो' नैव शब्दो-मन्मनभाषितादि रूपं-कटाक्षनिरीक्षणादि चित्रादिगतं वा ख्यादिसम्बन्धि रसो-मधुरादिरभिबृंहणीयो गन्धः-सुरभिः स्पर्शः-स्पर्शनानुकूलः कोमलमृणालादेरेतानभिष्वङ्गहेतून् अनुपतति-अनुयातीसेब-18 शीलः शब्दरूपरसगन्धस्पर्शानुपाती भवति यः स निम्रन्थः । तत्कथमिति चेदित्यादि सुगम, दशमं ब्रह्मचर्यसमा दीप अनुक्रम [५२०] DAREducatimimimatlamod FareenaraPowan lemom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~354 Page #355 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१६], मूलं [१०] / गाथा ||१-१०|| नियुक्ति: [३८५...] वृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक [१०] उत्तराध्य. घिस्थानं भवतीति निगमनम्।। इह च प्रत्येकं स्यादिसंसक्तशयनादेः शङ्कादिदोपदर्शनं तदत्यन्तदुष्टतादर्शकं प्रत्येकमपा- दशब्रह्मद यहेतुतां प्रति तुल्यबलत्वख्यापकं चेति सूत्रार्थः ॥ समाधिः __ भवन्ति य इत्थ सिलोगा, तंजहा॥४२७॥ भवन्ति' विद्यन्ते 'अत्रे ति उक्त एवार्थे, किमुक्तं भवति-उक्तार्थाभिधायिनः श्लोकाः पद्यरूपाः, 'तद्यथा' इत्युपप्रदर्शने । जं विवित्तमणाइन्नं, रहियं थीजणेण य । पंभचेरस्स रक्खडा, आलयं तु निसेवए ॥१॥मणपल्हायजण-110 दणी, कामरागविवडणी। बंभचेररओ भिक्खू, थीकहं तु विवजए ॥२॥ समं च संथवं थीहिं, संकहं च अभि-2 Vखणं । बंभचेररओ भिक्खू, निचसो परिवजए ॥३॥ अंगपञ्चंगसंठाणं, चारुल्लवियपेहियं । बंभचेररओ साथीणं, सोअगिज्झं विचजए ॥ ४॥ कुइयं रुइअंगीयं, हसियं थणिय कंदियं । भचेररओ थीणं, सोअगिझं विवजए ॥५॥हासं खिई रई दप्पं, सहसावत्तासियाणि य । बंभचेररओ थीणं, नाणुचिंते कयाइवि ॥६॥ दापणीय भत्तपाणं च, खिप्पं मयविवढणं । बंभचेररओ भिक्खू, निचसो परिवज्जए ॥७॥ धम्मलद्धं मियं काले, जत्तत्थं पणिहाणवं । णाइमत्तं तु भुजिज्जा, बंभचेररओ सया ॥८॥ विभूसं परिवज्जिज्जा, सरी दीप अनुक्रम [५२१] cata rjaunctaram.org पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~355 Page #356 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१६], मूलं [१०] / गाथा ||१-१०|| नियुक्ति: [३८५...] प्रत सूत्रांक ||१-१०|| घरपरिमंडणं । भचेररओ भिक्खू, सिंगारत्थं न धारए ॥९॥ सद्दे रूवे य गंधे य, रसे फासे तहेव या पंचविहे कामगुणे, निचसो परिवजए ॥१०॥ जमित्यादिसूत्राणि दश । यः 'विविक्तः' रहस्यभूतस्तत्रैव वास्तव्यख्याद्यभावाद् 'अनाकीर्णः' असङ्कलस्तत्तत्प्रयो18जनागतख्याधनाकुलत्वात् , 'रहितः' परित्यक्तोऽकालचारिणा चन्दनश्रवणादिनिमित्तागतेन स्त्रीजनेन, चशब्दात्पदण्डकैः पिड्गादिपुरुषश्च, प्रक्रमापेक्षया चैवं व्याख्या, अन्यत्रापि चैवं प्रक्रमाद्यपेक्षत्वं भावनीयम्, उक्तं हि-15 WI"अर्थात् प्रकरणालिङ्गादौचित्याद्देशकालतः । शब्दार्थाः प्रविभज्यन्ते, न शब्दादेव केवलात् ॥१॥" 'ब्रह्मचर्यस्य'| 8 उक्तरूपस्य 'रक्षार्थ' पालननिमित्तम् 'आलयः' आश्रयः, सर्वत्र लिङ्गव्यत्ययः प्राग्यत्, यत्तदोर्नित्यसम्बन्धात्तं 'तुः | पूरणे 'निषेवते' भजते॥शामनः-चित्तं तस्य प्रल्हादः अहो ! अभिरूपा एता इत्यादिविकल्पज आनन्दतं जनयतीति मनःप्रहादजननी ताम् , अत एव कामरागो-विषयाभिष्वङ्गतस्य विवर्द्धनी-विशेषेण वृद्धिहेतुः कामरागषिवर्द्धनी तां.IX शेपं स्पष्टं, नवरं, 'स्वीकथा' "तद्वकं यदि मुद्रिता शशिकथा" इत्यादिरूपां ॥२॥ 'समं च' सह 'संस्तव' परिचयं । स्त्रीभिर्निपद्या प्रक्रमादेकासनभोगेनेति गम्यते, 'संकथां च' ताभिरेव समं सन्ततभाषणात्मिकाम् 'अभीक्ष्ण' पुनः पुन 'णिचसो'त्ति नित्यमन्यत्स्पष्टम्॥३॥अङ्गानि-शिरःप्रभृतीनि प्रत्यङ्गानि-कुचकक्षादीनि संस्थान-कटीनिविष्टक * वकादीनि दीप अनुक्रम [५२२-५३१] MEducational For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~356~ Page #357 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१६], मूलं [१०] / गाथा ||१-१०|| नियुक्ति: [३८५...] दशब्रह्म l૪ર૮) प्रत सूत्रांक ||१-१०|| उत्तराध्य. रादिसन्निवेशात्मकम् , अमीषां समाहारनिर्देशः, अङ्गप्रत्यङ्गयोवी संस्थानम्-आकारविशेषोऽअप्रत्यङ्गसंस्थानं चार ४ शोभनम् उल्लपितं च-मन्मनभाषितादि तत्सहगतमुखादिविकारोपलक्षणमेतत् प्रेक्षितं च-अर्द्धकटाक्षनिरीक्षितादि बृहद्वृत्तिः उल्लपितप्रेक्षितं ब्रह्मचर्यरतः स्त्रीणां सम्बन्धि चक्षुषा गृह्यत इति चक्षुधं सद्विवर्जयेत् , किमुक्तं भवति ?-चक्षुपि हि | समाधिःसति रूपग्रहणमवश्यंभाषि, परं तदर्शनेऽपि तत्परिहार एव कर्तव्यो न तु रागवशगेन पुनः पुनस्तदेव वीक्षणीय-121 ४/मिति, उक्तं हि-"असक्का रूवमहद, चक्खुगोयरमागयं । रागहोसे उजे तत्थ, ते वुहो परिवजए॥१॥"॥४॥कुइयं सूत्रं प्रायो व्याख्यातमेव, नबरं कुब्यान्तरादिष्विति शेषः॥५॥ हाससूत्रमपि तथैव, नवरं 'रति' दयितासहज* नितां प्रीतिं 'दर्प' मनखिनीमानदलनोत्थं गर्व 'सहसाऽवत्रासितानि च' पराङ्मुखदयितादेः सपदि त्रासोत्पाद कान्यक्षिस्थगनमर्मघट्टनादीनि, पठ्यते च-'हस्सं दप्पं रई किहुं सह भुत्तासियाणि य' अत्र च 'सहे'ति स्त्रीभिः४ ट्रासाद्ध भुक्तानि च-भोजनानि आसितानि च-स्थितानि भुक्तासितानि, शेषं स्पष्टं, नवरं सर्वत्र पूर्वकृतत्वं प्रक्रमा दपेक्षणीयम् ॥ ६॥ पणीयसूत्रं निगदसिद्धमेव, नवरं मदः-कामोद्रेक इह गृह्यते, तस्य विवर्द्धनम्-अतिबृहकतया विशेषतो वृद्धिहेतुं परिवर्जयेत्॥७॥धर्मादनपेतं धर्म्यमेषणीयमित्यर्थः 'लब्ध प्राप्त गृहस्थेभ्य इति गम्यते, न तु खय-IFI४२८॥ मेवोपस्कृतं,पठ्यते च,-'धम्मलद्धं ति धर्मण हेतुनोपलक्षणत्वाद्धर्मलाभेन वा न तु कुण्डलादिकरणेन लब्धं धर्मलन्धं, १ अशक्य रूपमद्रष्टुं चक्षुर्गोचरमागतम् । रागद्वेषौ तु यौ तत्र ती युधः परिवर्जयेत् ॥ १ ॥ दीप अनुक्रम [५२२-५३१] SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~357 Page #358 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१-१०|| दीप अनुक्रम [५२२ -५३१] Jam Educator [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१६], मूलं [१०] / गाथा ||१-१०|| निर्युक्ति: [३८५...] पठ्यते च 'धर्म्मलडं'ति धर्मः- उत्तमः क्षमादिरूपः यथाऽऽह वाचक:- 'उत्तमः क्षमामार्दवार्जवसत्यशौच संयमतपस्त्यागाकिञ्चन्यत्रह्मचर्याणि धर्मः" (तत्त्वार्थ अ०९ सू०६) इति, तं ' लब्धुं' प्राप्तुं कथं ममायं निरतिचारः स्यात् इति, 'मितम्' 'अद्धमसणस्स' इत्याद्यागमोक्तमानान्वितमाहारमिति गम्यते, 'काले' प्रस्तावे 'यात्रार्थ' संयमनिर्वाहणार्थं न तु रूपाद्यर्थ 'प्रणिधानवान्' चित्तस्वास्थ्योपेतो न तु रागद्वेषवशगो भुञ्जीत 'न' इति निषेधे मात्रामतिक्रान्तः अतिमात्रःअतिरिक्त इत्यर्थस्तं, यदिवा 'ईषदर्थे क्रियायोगे, मर्यादायां परिच्छद' इत्यादिना मात्राशब्दस्य मर्यादार्थस्यापि दर्शनाद 'अतिमात्रम्' अतिक्रान्तमर्यादं, तुशब्दस्यैवकारार्थत्वाद्व्यवहितसम्बन्धत्वाच नैव 'भुञ्जीत' अभ्यवहरेद् ब्रह्मचर्ये रतः - आसक्तो ब्रह्मचर्यरतः 'सदा' सर्वकालं, कदाचित्कारणतोऽतिमात्रस्याप्याहारस्यादुष्टत्वात् ॥ ८ ॥ 'विभूषाम्' उपकरणगता-मुत्कृष्टवत्राद्यात्मिकां 'परिवर्जयेत्' परिहरेत् 'शरीरपरिमण्डनं'' केशश्मश्रुसमारचनादि ब्रह्मचर्यरतो भिक्षुः 'शृङ्गारार्थ' विलासार्थ' 'न धारयेत्' न स्थापयेत् न कुर्यादितियावत् ॥९॥ 'सदे' सूत्रं स्पष्टमेव, नवरं कामः - इच्छाम | दनरूपस्तस्य द्विविधस्यापि गुणाः- साधनभूता उपकारका इतियावत् उक्तं हि - 'गुणः साधनमुपकारकं कामगुणास्तानेवंविधान् शब्दादीनिति सूत्रदशकार्थः ॥ १० ॥ सम्प्रति यत्प्राक् प्रत्येकमुक्तं शङ्का वा स्यादित्यादि तद्दृष्टान्ततः स्पष्टयितुमाह आलओ पीजणाइन्नो, धीकहा य मणोरमा । संथवो चेव नारीणं, तासिं इंदिवरसणं ॥ ११ ॥ कुइयं रुइयं गीयं, हसियं भुत्तासियाणि य । पणीयं भत्तपाणं च अहमायं पाणभोयणं ॥ १२ ॥ For Parsons Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~358~ Page #359 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१६], मूलं [१०] / गाथा ||११-१३|| नियुक्ति: [३८५...] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः 4 प्रत समाधिः सूत्रांक ॥४२९॥ %95% C -१३|| गत भूसणमिटुं च, कामभोगा य दुज्जया। नरस्सऽत्तगवेसिस्सा, विसं तालउड जहा ॥१३॥ दशब्राः नवरं 'संस्तवः' परिचयः, स चेहाप्येकासनभोगेनेति प्रक्रमः, कूजितादीनि हसितपर्यन्तानि कुड्यान्तराद्यवस्थि-3 तिनिषेधोपलक्षणानि, भुक्तासितानि च स्मृतानीति शेषः, तत्र भुक्तानि-भोगरूपाणि आसितानि-रुयादिभिरेष सहावस्थितानि, हास्याद्युपलक्षणं चैतत् , गात्रभूषणमिष्टं चेति, चशब्दोऽपिशब्दार्थः, तत इष्टमप्यास्तां विहितं, तथा काम्यन्त इति कामाः भुज्यन्त इति भोगाः विशेषणसमासस्ते चेष्टाः शब्दादयः, नरस्योपलक्षणत्वालयादेश्व आत्मगयेषिणः 'विष' गरलः 'तालपुटं' सद्योघाति यत्रौष्ठपुटान्तर्वर्तिनि तालमात्रकालविलम्बतो मृत्युरुपजायते, 'यथे'त्यौपम्ये, ततोऽयमर्थः-यथैतद्विपाकदारुणं तथा स्त्रीजनाकीर्णालयाद्यपि, शङ्कादिकरणतः संयमात्मकभावजी-IN वितस्थेतरस्य च नाशहेतुत्वादिति सूत्रत्रयार्थः ॥ सम्प्रति निगमयितुमाह दुज्जए कामभोगे य, निचसो परिवज्जए । संकाठाणाणि सब्वाणि, वज्जिज्जा पणिहाणवं ॥ १४ ॥ धम्मारामे चरे भिक्खू, घिईमं धम्मसारही । धम्मारामरए दंते, बंभचेरसमाहिए ॥१५॥ दुःखेन जीयन्त इति दुर्जयास्तान 'कामभोगान्' उक्तरूपान् 'णिचसो'त्ति नित्यं 'परिवर्जयेत्' सर्वप्रकारं त्यजेत् ||४२९॥ 'शङ्कास्थानानि च' अनन्तरोक्तानि, पूर्वत्र चस्प भिन्नक्रमत्वात् 'सर्वाणि' दशापि वर्जयेद्, अन्यथा आज्ञाऽनवस्था-1 | मिथ्यात्यविराधनादोषसम्भवः 'प्रणिधानवान्' एकाग्रमनाः । एतद्वर्जकश्च किं कुर्यादित्याह-धर्म आराम इव पाप 5%-4% दीप अनुक्रम [५३२-५३४] FairamanaSPrwara tumonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~359~ Page #360 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥१४ -१५|| दीप अनुक्रम [५३५ -५३६] Educa [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [ १६ ], मूलं [१०] / गाथा || १४-१५ || निर्युक्ति: [३८५...] सन्तापोपतसानां जन्तूनां निर्वृत्तिहेतुतयाऽभिलपित्तफलप्रदानतश्च धर्मारामस्तस्मिन् 'चरेत्' गच्छेत् प्रवर्त्तेतेतियावत्, यद्वा धर्मे आ - समन्ताद्रमत इति धर्मारामः 'संचरेत् संयमाध्वनि यायाद् भिक्षुः प्राग्वत् 'धृतिमान्' धृतिःचित्तखास्थ्यं तद्वान् स चैवं धर्मसारथिः - "ठिओ उठावए परं" इति वचनादन्येषामपि धर्मे प्रवर्त्तयिता, ततोऽन्यानपि धर्मे व्यवस्थितानुपलभ्य विशेषतो धर्मारामे रतः - आसक्तिमान् धर्मारामरतः तथा च 'दान्तः' उपशान्तो ब्रह्मचर्ये समाहितः - समाधानवान् ब्रह्मचर्यसमाहित इति सूत्रद्वयार्थः ॥ ब्रह्मचर्यविशुद्धयर्योऽयं सर्वोऽप्युपक्रम इति तन्माहात्म्यमाह - देवदाणवगंधा, अक्खरक्खसकिन्नरा । वंभयारिं नर्मसंति, दुकरं जे करंति तं ॥ १६ ॥ देवाः - ज्योतिष्क वैमानिकाः दानवाः- भुवनपतयः गन्धर्वयक्षराक्षस किन्नराः व्यन्तरविशेषाः समासः सुकर एव, उपलक्षणं चैतद्भूतपिशाचमहोरगकिंपुरुषाणाम्, एते सर्वेऽपि 'ब्रह्मचारिणं' ब्रह्मचर्यवन्तं यतिमिति शेषः, 'नमस्यन्ति' नमस्कुर्वन्ति 'दुष्करं' कातरजनदुरनुचरं 'जे' इति यः 'करोति' अनुतिष्ठति 'तदिति प्रक्रमाद्ब्रह्मचर्यमिति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति सकलाध्ययनार्थोपसंहारमाह— एस धम्मे धुवे नियए, सासए जिणदेसिए । सिद्धा सिज्झति चाणेणं, सिज्झिस्संति तहापरे ॥ १७ ॥ ति बेमि ॥ For Parsons Praten पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~360~ Page #361 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१६], मूलं [१०] / गाथा ||१७|| नियुक्ति: [३८५...] (४३) 52-57 प्रत सूत्रांक ||१७|| उत्तराध्य. ॥ बंभचेरसमाहिठाणअज्झयणं समत्तं १६ ॥ बृहद्वृत्तिः 'एपः' इत्यनन्तरोक्तः 'धर्मः' ब्रह्मचर्यलक्षणः, ध्रुवः परप्रवादिभिरप्रकम्प्यतया प्रमाणप्रतिष्ठित इतियावत् 'नित्यः'। समाधि ॥३०॥ अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकखभावो द्रव्यार्थितया 'शाश्वतः' शश्वदन्यान्यरूपतया उत्पन्न()पर्यायार्थितया, यद्वा 'नित्यः त्रिकालमपि सम्भवात् 'शावतः' अनवरतभवनात्, एकार्थिकानि वा नानादेशजविनेयानुग्रहार्थमुक्तानि, जिनैःतीर्थकृद्भिर्देशितः-प्रतिपादितो जिनदेशितः, अस्यैव त्रिकालगोचरफलमाह-सिद्धाः' पुरा अनन्तासूत्सर्पिण्यवस-2 पिणीषु सिद्धयन्ति 'चः' समुच्चये महाविदेहे इहापि वा तत्कालापेक्षया 'अनेन' इति ब्रह्मचर्यलक्षणेन धर्मेण है सेत्स्यन्ति तथा 'परें' अन्येऽनन्तायामनागताद्धायामिति सूत्रार्थः । 'इति' परिसमाप्ती ब्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोनुगमः, सम्प्रति नयास्ते च पूर्ववत् ॥ ॥ श्रीशान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां पोडशमध्ययनं समासमिति ॥ ॥४०॥ । -% दीप अनुक्रम [५३८] % % पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं- १६ परिसमाप्तं ~361~ Page #362 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१७|| दीप अनुक्रम [५३८] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१७], मूलं [१०...] / गाथा ||१७...|| निर्युक्ति: [३८७-३८९] अथ सप्तदशं पापश्रमणीयमध्ययनम् । व्याख्यातं षोडशमध्ययनम् अधुना सप्तदशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - इहानन्तराध्ययने ब्रह्मचर्यगुप्तय उक्ताः, ताथ पापस्थानवर्जनादेवासेवितुं शक्यन्ते इति पापश्रमणस्वरूपाभिधानतस्तदेवात्र काक्कोच्यत इत्यनेन सम्बअन्धेनायात मिदमध्ययनम्, अस्य च चतुरनुयोगद्वारप्ररूपणा प्राग्वत्तावद्यावन्नाम निष्पन्ननिक्षेपेऽस्य पापश्रमणीयमिति । नाम, अतः पापस्य श्रमणस्य च निक्षेपमाह निर्युक्तिकृत् पावे छकं दधे सचित्ताचित्तमीसगं चैव । खित्तंमि निरयमाई कालो अइदुस्समाईओ ॥ ३८७ ॥ भावे पावं इणमो हिंस मुसा चोरिअ च अब्बंभं । तत्तो परिग्गहो चिअ अगुणा भणिआ य जे सुत्ते ३८८ समणे चउक्कनिक्खेवओ उ दव्वंमि निहगाईआ । नाणी संजमसहिओ नायव्वो भावओ समणो३८९ | 'पापे' पापविषयः 'छकं' ति पङ्कः पट्परिमाणो नामस्थापनाद्रव्यक्षेत्र कालभावभेदान्निक्षेप इति गम्यते, तत्र च नामस्थापने सुज्ञाने, द्रव्ये विचार्ये आगमतो ज्ञाताऽनुपयुक्तः, नोआगमतस्तु व्यतिरिक्तमाह - 'सचित्ताचित्तमीसगं For Parsons Private Onl पूज्य आगमोद्धारक श्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अथ अध्ययनं - १७ “ पापश्रमणीय" आरभ्यते ... मूल संपादने निर्युक्तिक्रमे किञ्चित् स्खलना संभाव्यते, यत् मया निर्युक्ति ||३८६|| न दृष्टं ~362~ Page #363 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१७], मूलं [१०...] / गाथा ||१७...|| नियुक्ति: [३८७-३८९] प्रत सूत्रांक ||१७|| चेवत्ति, इह च पापमिति योज्यते, प्राकृतत्वाचोभयत्र बिन्दुलोपः, तत्र सचित्तद्रव्यपापं-यविपदचतुष्पदापदेषु पापश्रमबद्धतिः॥ मनुष्यपशुवृक्षादिष्वसुन्दरम् , अचित्तद्रव्यपाप-तदेव जीवविप्रयुक्तं चतुरशीतिपापप्रकृतयो वा वक्ष्यमाणाः, मिश्र-131 द्रव्यपापं-तथाविधद्विपदाघेवाशुभवस्वादियुक्तं तत्शरीराणि वा जीववियुक्तैकदेशयुक्तानि, सन्ति हि जीवशरी-|| रेष्वपि जीववियुक्ता नखकेशादयस्तदेकदेशाः, उक्तं हि-"तस्सेव देसे चिए तस्सेव देसे अणुवचिए"त्ति, जीवप्रदेशा४/पेक्षमेव हि तत्र चितत्वमनुपचितत्वं च विवक्षितं, पापप्रकृतियुक्तो वा जन्तुरेव मिश्रद्रव्यपापमुच्यते, 'चेवेति प्राग्वत् , क्षेत्रे विचार्ये 'पापं' नरकादिपापप्रकृत्युदयविषयभूतं यत्र तदुदयोऽस्ति, 'काल' इति कालपापं-दुष्प-17 |मादिको यत्र कालानुभावतः प्रायः पापोदय एव जन्तूनां जायते, आदिशब्दादन्यत्र वा काले यत्र कस्यचिजन्तो-14 स्तदुदयः, भावे विचारयितुमुपक्रान्ते पापम् इदम् अनन्तरमेव वक्ष्यमाणं 'हिंस'त्ति हिंसा प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपहारोपणं 'मृषा' असदभिधानं 'चौर्य च' स्सैन्यम् 'अब्रह्म' मैथुनं ततः 'परिग्रहः' मूत्मिकः 'अपिः' समुच्चये 'चः | पूरणे 'गुणाः सम्यग्दर्शनादयस्तद्विपक्षभूताः अगुणाः-मिथ्यात्वादयो दोषाः, नञो विपक्षेऽपि दर्शनादमित्रादिवत्, भणिताः' उक्ताः, 'तुः' समुचये व्यवहितक्रमश्च, अगुणाश्च ये 'सूत्रे' आगमे अन्यत्र इहैव वा प्रस्तुताध्ययने । 'श्रमणे ॥३२॥ श्रमणविषयः 'चतुष्कनिक्षेपकः' नामादिः 'तुः पूरणे नामस्थापने पूर्ववत् , द्रव्ये निह्नवादय एव निलबादिकाः १ तस्यैव देशश्चितः तस्यैव देशोऽनुपचितः ROCRANCCC दीप अनुक्रम [५३८] For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~363~ Page #364 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१७], मूलं [१०...] / गाथा ||१७...|| नियुक्ति: [३८७-३८९] प्रत सूत्रांक ||१७|| उक्तरूपाः 'ज्ञानी' प्रशंसायां मत्वर्थीयोत्पत्तेः प्रशस्तज्ञानवान् समिति-सम्यक् सदनुष्टानप्रवृत्त्या यमनं-पापस्थानेभ्य उपरमण संयमचारित्रमितियावत्तेन सहितः-युक्तः संयमसहितो ज्ञातव्यो भावतः श्रमण इति गाथात्रयार्थः॥ सम्प्रति प्रस्तुते योजयन्नाहजे भावा अकरणिजा इहमज्झयणमि बन्निअ जिणेहिं । ते भावे सेवंतो नायवो पावसमणोत्ति ३९० ये 'भावाः' संसक्तापठनशीलतादयोऽर्थाः 'अकरणीयाः' कर्तुमनुचिताः 'इह' प्रस्तुतेऽध्ययने 'वन्निय'त्ति वर्णिताः प्ररूपिताः 'जिन' तीर्थकृद्भिस्तान् भावान् 'सेवमानः' अनुतिष्ठन् 'ज्ञातव्यः' अयबोद्धन्यः पापेन-उक्तरूपेणोपल क्षितः श्रमणः पापश्रमणः, इतिशब्दः पापश्रमणशब्दस्य खरूपपरामर्शक इति गाथार्थः ॥ एतद्विपरीतास्तु श्रमNणाः, तेषां फलमाह एयाई पावाइं जे खलु वजंति सुक्या रिसओ। ते पावकम्ममुक्का सिद्धिमविग्घेण वच्चंति ॥३९१॥ R "एतानि' एतदध्ययनोक्तानि 'पापानि' पापहेतुभूतानि शयालुतादीनि 'ये' इत्यनिर्दिष्टरूपाः 'खलुः' वाक्या लङ्कारे 'वर्जयन्ति' परिहरन्ति सुव्रता ऋषयः पूर्ववत् , ते पापं च तत्कर्म च पापकर्म तेन उपलक्षणत्वात्पुण्यकर्मणा च मुक्ताः-त्यक्ताः पापकर्ममुक्ताः 'सिद्धि सिद्धिगतिम् 'अविलेन' अन्तरायाभावेन 'वचंति'त्ति 'बजन्ति' गच्छआन्तीति गाथार्थः ॥ गतो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तचेदम् दीप अनुक्रम [५३८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~364 Page #365 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१७], मूलं [-] / गाथा ||१-२|| नियुक्ति: [३९१] प्रत सूत्रांक ||१-२|| उत्तराध्य. जे केइ उ पब्वइए नियंठे, धम्म सुणित्ता विणओववन्ने । पापश्रमसुदुल्लह लहिउ बोहिलाभ, विहरिज पच्छा य जहासुहं तु ॥१॥ बृहद्वृत्तिः णा०१७ सिजा दढा पाउरणं मि अत्थि, उपजई भुत्तु तहेव पार्छ। ॥४३२॥ जाणामि जं बद्दइ आउमुत्ति, किं नाम काहामि सुरण भंते ! ॥२॥ M 'यः कश्चित्' इत्यविवक्षितविशेषः 'तुः' पूरणे, पठन्ति च-'जे के इम'त्ति, तत्र च 'इमे'त्ति अयं 'प्रबजितः' | निष्क्रान्तः निर्ग्रन्थः प्राग्वत्, कथं पुनरयं प्रत्रजित इत्याह-'धर्म' श्रुतचारित्ररूपं श्रुत्वा' निशम्य विनयेन-ज्ञान-15 विदर्शनचारित्रोपचारात्मकेनोपपन्नो-युक्तो विनयोपपन्नः सन् ‘सुदुर्लभम्' अतिशयदुष्प्रापं 'लभिति लब्ध्वा 'बोधि लाभ' जिनप्रणीतधर्मप्राप्तिरूपम् , अनेन भावप्रतिपत्त्याऽसौ प्रत्रजित इत्युक्तं भवति, स किमित्याह-विहरेत्' चरेत् , पश्चात्' प्रजजनोत्तरकालं 'चः' पुनरर्थो विशेषद्योतकस्ततश्च प्रथमं सिंहवृत्त्या प्रव्रज्य पश्चात्पुनः 'यथासुखं' यथा यथा विकथादिकरणलक्षणेन प्रकारेण सुखमात्मनोऽवभासते तुशब्दस्यैवकारार्थत्वाद्यथासुखमेव शृगालवृत्त्यैव विहटारेदित्यर्थः, उक्तं हि-“सीहत्ताए णिक्खंतो सीयालत्ताए विहरति"त्ति, स च गुरुणाऽन्येन वा हितैषिणाऽध्ययनं| प्रति प्रेरितो यक्ति तदाह-'शय्या' वसतिः 'दृढा' वातातपजलाधुपद्रवैरनभिभाव्या, तथा 'प्रावरणं' वर्षाकल्पादि १ सिंहृतया निष्कान्तः शृगालतया विहरति दीप अनुक्रम [५३९ -५४०] SamEducatiminanational For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~365 Page #366 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१७], मूलं [-] / गाथा ||१-२|| नियुक्ति: [३९१...] 1%- प्रत सूत्रांक ||१-२|| मे ममास्ति, किञ्च-'उत्पद्यते' जायते 'भोक्तुं' भोजनाय तथैव 'पातुं' पानाय यथाक्रममशनं पानं चेति शेषः,॥ तथा 'जानामि' अवगच्छामि यद्वर्त्तते' यदिदानीमस्ति 'आयुष्मन्निति प्रेरयितुरामन्त्रणमिति, एतस्माद्धेतोः किं नाम ?,|| न किञ्चिदित्यर्थः, 'काहामि'त्ति करिष्यामि 'श्रुतेन' आगमेनाधीतेनेत्यध्याहारः, 'भंतेत्ति पूज्यामन्त्रणम् , इह च || प्रक्रमात्क्षेपे, अयं हि किलास्याशयो यथा ये भवन्तो भदन्ता अधीयन्ते तेऽपि नातीन्द्रियं वस्तु किञ्चनावबुध्यन्ते, किन्तु ?, साम्प्रतमात्रेक्षिण एव, तचेतावदस्माखेवमप्यस्ति, तत्किं हृदयगलतालुशोपविधायिनाऽधीतेनेति !, एवम-16 ध्ययसितो यः स पापश्रमण इत्युच्यत इतीहापि सिंहावलोकितन्यायेन संबध्यत इति सूत्रद्वयार्थः ॥ किंच जे केइ उ पवईए, निद्दासीले पगामसो। भुचा पिचा मुहं सुअई, पावसमणित्ति बुचई ॥३॥ यः कश्चित्प्रत्रजितः 'निद्राशीलः' निद्रालुः 'प्रकामशः' बहुशो 'भुक्त्वा' दध्योदनादि 'पीत्वा' तक्रादि 'सुखं यथा भवत्येवं सकलक्रियानुष्ठाननिरपेक्ष एव 'खपिति' शेते, पठ्यते च-वसइ'त्ति 'वसति' आस्ते प्रामादिषु, स| 8 इत्यम्भूतः किमित्याह-पापश्रमण इति 'उच्यते' प्रतिपाद्यत इति सूत्रार्थः ॥ इत्थं न केवलमनधीयान एव पापश्रमण उच्यते, किन्तु आयरियउवज्झाएहि, सुझं विणयं च गाहिए। ते चेव खिसई वाले, पावसमणित्ति बुचई ॥४॥ आचार्योपाध्यायैः श्रुतम्' आगममर्थतः शब्दतश्च 'विनयं च उक्तरूपं 'ग्राहितः' शिक्षितो यैरिति गम्यते । -----44 है दीप अनुक्रम [५३९-५४०] ECAN SamEducation tntamatuna Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~366~ Page #367 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१७], मूलं [-1 / गाथा ||४|| नियुक्ति: [३९१..] (४३) णा० १७ प्रत सूत्रांक उत्तराध्य. तानेव' आचार्यादीन् 'खिंसति' निन्दति बाल विवेकविकलो गम्यमानत्वाद्यः स पापश्रमण इत्युच्यत इति सूत्रार्थः॥ पापश्रमबृहद्वृत्तिः इत्थं ज्ञानाचारनिरपेक्षं पापश्चमणमभिधाय दर्शनाचारनिरपेक्षं तमेवाह आयरियउवझायाणं, सम्म नो पडितप्पई। अप्पडिपूअए थडे, पावसमणित्ति वुचई ॥५॥ ॥४३॥ | आचार्योपाध्यायानां सम्यगू' अवैपरीत्येन 'न परितप्यतेन तत्तप्ति विधत्ते, दर्शनाचारान्तर्गतवात्सल्यविर-IN ६ हितो न तत्कार्येष्वभियोगं विधत्त इति भावः, 'अप्रतिपूजकः' प्रस्तावादहंदादिपु यथोचितप्रतिपत्तिपराङ्मुखः स्तब्धः। गर्वाध्मातः केनचित्प्रेर्यमाणोऽपि न तद्वचनतः प्रवर्तते यः स पापश्रमण इत्युच्यत इति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति चारित्रा-13 चारविकलं तमेवाह संमद्दमाणे पाणाणि, बीयाणि हरियाणि य । असंजए संजय मन्नमाणे, पावसमणित्ति वुचई ॥ ६ ॥ संथारं फलगं पीठं, निसिजं पायकवलं । अप्पमज्जियमारहई, पावसमणित्ति वुबई ॥७॥ दवदवस्स चरडे, *पमत्ते अ अभिक्षणं । उल्लंघणे अ चंडे अ, पावसमणित्ति बुचई ॥८॥ पडिलेहेइ पमत्तो, अवउज्नइ पायक- ४३३|| बलं । पडिलेहाअणाउत्ते, पावसमणित्ति वुच्चई ॥९॥ पडिलेहेइ पमत्ते, से किंचि हु निसामिआ। गुरु परिभावए नियं, पावसमणित्ति बुचई ॥ १०॥ बहुमाई पमुहरी, थद्धे लुद्धे अणिग्गहे । असंविभागी अचि-18 यत्ते, पावसमणित्ति वुचई ॥११॥ विवायं च उदीरेइ, अधम्मे अत्तपण्हहा। बुग्गहे कलहे रत्ते, पावसमणित्ति दीप अनुक्रम [५४२]] Educationa l Former पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~367 Page #368 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१७], मूलं [-1 / गाथा ||६-१४|| नियुक्ति: [३९१...] प्रत सूत्रांक ||६-१४|| SC-S Miवुचई ॥ १२ ॥ अधिरासणे कुकुईए, जत्थ तत्थ निसीअई। आसणंमि अणाउत्ते, पावसमणित्ति बुचई॥१३॥ ससरक्खपाओ सुअई, सिजं न पडिलेहई । संधारए अणाउत्तो, पावसमणित्ति बुचई ॥ १४ ॥ 'संमर्दन्' हिंसन् 'प्राणानिति प्राणयोगात् प्राणिनः-द्वीन्द्रियादीन् 'बीजानि' शाल्यादीनि 'हरितानि च दूर्वाऽङ्करादीनि, सकलैकेन्द्रियोपलक्षणमेतत्, स्पष्टतरचैतन्यलिङ्गत्वाचैतदुपादानम् , अत एवासंयतस्तथाऽपि 'संजय मन्नमाणे'त्ति सोपस्कारत्वात्संयतोऽहमिति मन्यमानः, अनेन च संविग्नपाक्षिकत्वमप्यस्य नास्तीत्युक्तं, पापश्रमण इत्युच्यते ॥ तथा 'संस्तारं' कम्बल्यादि 'फलकं' चम्पकपट्टादि 'पीठम्' आसनं' 'निपद्या' खाध्यायभूम्यादिकां यत्र निपद्यते 'पादकम्बलं' पादपुग्छनम् 'अप्रमृज्य' रजोहरणादिनाऽसंशोध्य उपलक्षणत्वादप्रत्युपेक्ष्य च 'आरोहति' समाक्रामति यः स पापश्रमण इत्युच्यते ॥ तथा 'दयदयस्स'त्ति द्रुतं द्रुतं तथाविधालम्बनं विनाऽपि त्वरित २ 'चरति| गोचरचर्यादिपु परिभ्राम्यति, 'प्रमत्तश्च' प्रमादवशगश्च भवतीति शेषः 'अभीक्ष्णं वारं वारम् 'उलाहनश्च' वालादीनामु|चितप्रतिपत्त्यकरणतोऽधःकर्ता 'चण्डश्च' क्रोधनः, यद्वा 'प्रमत्तः' अनुपयुक्त ईर्यासमिती उलघनश्च वत्सडिम्भा-| दीनां चण्डश्चारभटवृत्त्याश्रयणतः, शेपं तथैव ॥ तथा 'प्रतिलेखयति' अनेकार्थत्वात्प्रत्युपेक्षते प्रमत्तः सम् 'भवउहै ज्झइत्ति 'अपोज्झति' यत्र तत्र निक्षिपति, प्रत्युपेक्षमाणो वा अपोज्झति, न प्रत्युपेक्षत इत्यर्थः, किं तत् ?-पाद ब दीप अनुक्रम [५४४-५५२] TORG MEducatiniaSkI पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~368~ Page #369 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१७], मूलं [-1 / गाथा ||६-१४|| नियुक्ति : [३९१...] उत्तराध्य पापश्रम प्रत ॥४३४॥ सूत्रांक ||६-१४|| कम्बलं पात्रकम्बलं या प्रतीतमेव, समस्तोपध्युपलक्षणं चैतत्, स एवं 'प्रतिलेखनाऽनायुक्तः' प्रत्युपेक्षानुपयुक्तः, शेषं सथैव ॥ तथा प्रतिलेखयति प्रमत्तः सन् 'किंचि हु'त्ति 'हु।' अपिशब्दार्थः, ततः किञ्चिदपि विकथादीति गम्यते, है। णिसामिति 'निशम्य आकर्ण्य तत्राक्षिसचित्ततयेति भावः, 'गुरुपरिभासय'त्ति गुरुन् परिभापते-विवदते गुरुपरिभाषकः, पाठान्तरतो गुरुपरिभावकः, 'नित्यं' सदा, किमुक्तं भवति ?-असम्यक्प्रत्युपेक्षमाणोऽन्यद्वा वितथमाचरन् गुरुभिश्चोदितस्तानेय विवदतेऽभिभवति वाऽसभ्यवचनैः, यथा-खयमेव प्रत्युपेक्षध्वं, युष्माभिरेव वयमित्थं | शिक्षितास्ततो युष्माकमेवैप दोष इत्यादि, शेष तथैव, गुरुपरिभाषकत्वं प्रमत्तत्वस्य च निशमनहेतुत्वं पूर्वस्माद्विशेष इति न पौनरुक्त्यम् ॥ किञ्च-'बहुमायी' प्रभूतवञ्चनाप्रयोगवान् प्रकर्षण मुखरः प्रमुखरः स्तब्धो लुब्ध इति च प्राग्वत्, अविद्यमानो निग्रहः-इन्द्रियनोइन्द्रियनियत्रणात्मकोऽस्येत्यनिग्रहः, संविभजति-गुरुग्लानबालादिभ्य उचितमशसानादि यच्छतीत्येवंशीलः संविभागीन तथा य आत्मपोषकत्वेनैव सोऽसंविभागी, 'अचियत्तेति गुर्वादिष्वप्रीतिमान् , शेपं पूर्ववत् ॥ अन्यच्च-विरूपो वादो विवाद:-वाकलहस्तं 'चः' पूरणे 'उदीरेइ'त्ति कथञ्चिदुपशान्तमप्युपासनादिना वृद्धि नयति, 'अधर्मः' अविद्यमानसदाचारः 'अत्तपण्हह'त्ति आत्मनि प्रश्नः आत्मप्रश्नस्तं हन्त्यात्म- प्रश्नहाः, यदि कश्चित्परः पृच्छेत्-किं भवान्तरयायी आत्मा उत नेति ?, ततस्तमेव प्रश्नमतियाचालतया हन्ति, यथा |-नास्त्यात्मा प्रत्यक्षादिप्रमाणैरनुपलभ्यमानत्वात्, ततोऽयुक्तोऽयं प्रश्नः, सति हि धर्मिणि धर्माश्चिन्त्यन्त इति, पठ्यते % * दीप अनुक्रम [५४४-५५२] ४३४॥ Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~369~ Page #370 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१७], मूलं [-1 / गाथा ||६-१४|| नियुक्ति : [३९१...] KA प्रत सूत्रांक ||६-१४|| च-'अत्तपण्णहत्ति तत्र च आत्तां-सिद्धान्तादिश्रवणतो गृहीतामाता वा इहपरलोकयोः सद्बोधरूपतया हिता प्रज्ञाम्-आत्मनोऽन्येषां वा बुद्धिं कुतर्कव्याकुलीकरणतो हन्ति यः स आत्तप्रज्ञाहा आसप्रज्ञाहा था, 'बुग्गहे'त्ति || है। व्युद्हे दण्डादिधातजनिते विरोधे 'कलहे' तस्मिन्नेव वाचिके 'रक्तः' अभिष्वक्तः, शेष प्राग्वत् ॥ अपरं च अस्थिरासनः, कुकुचः कुकुचो वा द्वयमपि पूर्ववत्, 'यत्र तत्र' इति संसक्तसरजस्कादावपीत्यर्थः 'निषीदति' उपविशति 'आसने' पीठादी 'अनायुक्तः' अनुपयुक्तः सन् , शेषं प्राग्वत् ॥ तथा सह रजसा वर्त्तते इति सरजस्को तथाविधी पादौ यस्य स तथा 'खपिति'शेते, किमुक्तं भवति ?-संयमविराधनां प्रत्यभीरुतया पादावप्रमृज्यैव शेते, तथा शय्यां' वसतिं न प्रति-13 लेखयति, उपलक्षणत्वान्न च प्रमार्जयति, 'संस्तारके' फलककम्बलादी, मुप्त इति शेषः, 'अनायुक्तः' "कुकडिपायपसारण आयामेउं पुणोवि आउंटे" इत्याद्यागमार्थानुपयुक्तः, अन्यत्तथैवेति सूत्रनवकार्थः । इदानीं तपआचारातिक्रमतः पापश्रमणमाह दुद्धदहीविगईओ, आहारेइ अभिक्खणं । अरए अ तवोकम्मे, पावसमणित्ति वुच्चई ॥ १५ ॥ अत्यंतमि य सूरंमि, आहारेइ अभिक्खणं । चोइओ पहिचोएइ, पावसमणित्ति वुचई ॥ १६ ॥ आयरियपरिचाई, परपासंडसेवए । गाणंगणिए दुभूए, पावसमणित्ति वुचई ॥ १७ ॥ १ कुकुटीवत्पादप्रसारणं आयम्य (विस्तार्य) पुनरपि आकुश्चयेत् । दीप अनुक्रम [५४४-५५२] For Prato hirjaungtarangaro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~370 Page #371 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१७], मूलं [-1 / गाथा ||१५-१७|| नियुक्ति: [३९१...] पापश्रम *णा०१७ प्रत सूत्रांक ||१५-१७|| उत्तराध्य. दुग्धं च-क्षीरं दधि च-तद्विकार एव दधिदुग्धे, सूत्रे च व्यत्ययः प्राग्वद्, विकृतिहेतुत्वाद्विकृती, उपलक्षण- बृहद्धत्तिः18/त्वाद् घृताधशेषविकृतिपरिग्रहः, 'आहारयति' अभ्ययहरति 'अभीक्ष्णं' वारं वारं, तथाविधपुष्टालम्बनं विनाऽपीति भावः, अत एव 'अरतश्च' अप्रीतिमांश्च 'तपःकर्मणि' अनशनादौ, शेष प्राग्वत् ॥ अपि च-'अत्यंतमि यत्ति ॥४३५॥ IN'अस्तान्ते' अस्तमयपर्यन्ते, 'चः' पूरणे, उदयादारभ्येति गम्यते, 'सूर्ये भाखति आहारयत्यभीक्ष्ण, किमुक्तं भवति : प्रातरारभ्य सन्ध्यां यावत्पुनः पुनर्भुले, यदिवा 'अत्यंतमयंमि यत्ति अस्तमयति सूर्ये आहारयति, तिष्ठति तु किमुदच्यते ? इति भावः, किमेकदैवेत्साह-'अभीक्ष्णं पुनः पुनः, दिने दिने इत्युक्तं भवति, यदि चासौ केनचिगीतार्थ साधुना चोद्यते, यथा-आयुष्मन् ! किमेवं त्वयाऽऽहारतत्परेणैव स्थीयते ।, दुर्लभा खल्वियं मनुजत्वादिचतुरङ्गसासामग्री, तत एनामवाप्य तपस्येयोद्यन्तुमुचितमिति, ततः किमित्याह-'चोइओ पडिचोएइ'त्ति चोदितः सन् प्रति चोदयति यथा कुशलस्त्वमुपदेशकर्मणि न तु स्वयमनुष्ठाने, अन्यथा किमेवमवगच्छन्नपि भवान्न विकृष्टं तपोऽनुतिदति ?, शेषं तथैव । 'आचार्यपरित्यागी' ते हि तपःकर्मणि विपीदन्तमुद्यमयन्ति, आनीतमपि चान्नादि वालग्ला नादिभ्यो दापयन्त्यतोऽतीवाहारलौल्यात्तत्परित्यजनशीलः परान्-अन्यान् पापण्डान्-सौगतप्रभृतीन् 'मृद्वी शय्या प्रातरुत्थाय पेया' इत्यादिकदभिप्रायतोऽत्यन्तमाहारप्रसक्तांस्तत एव हेतोः सेवते-तथा तथाऽपसर्पतीति परपापण्ड-18 |सेवकः, तथा च खेच्छाप्रवृत्ततया 'गाणंगणिए'त्ति गणागणं षण्मासाभ्यन्तर एव संक्रामतीति गाणहणिक इत्या दीप अनुक्रम [५५३-५५५] ॥४३५॥ maintang पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~371 Page #372 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१७], मूलं [-1 / गाथा ||१५-१७|| नियुक्ति: [३९१...] प्रत सूत्रांक ||१५-१७|| गमिकी परिभाषा, तथा चागमः-"छम्मासऽभंतरतो गणा गणं संकम करेमाणो" इत्यादि, अत एव च 'दुनिन्दायां', ततश्च 'दुः' इति निन्दितं भूतं-भवनमखेति दुर्भूतः, दुराचारतया निन्द्यो भूत इत्यर्थः, अपरं तथैवेति सूत्रत्रयार्थः ॥ सम्प्रति वीर्याविचारविरहतस्तमेवाह सयं गेहं परिचज्ज, परगहंसि वावरे । निमित्तेण य ववहरई, पावसमणित्ति वुचई ॥१८॥ संनाइपिंडं जेमेइ, निच्छई सामुदाणियं । गिहिनिसिज्जं च बाहेइ, पावसमणित्ति वुचई ॥१९॥ खमेव खकं, निजकमित्यर्थः, 'गेहं' गृहं 'परित्यज्य' परिहत्य प्रवज्याङ्गीकरणतः 'परगेहे' अन्यवेश्मनि 'बावरे'ति व्याप्रियते-पिण्डार्थी सन् गृहिणामासभावं दर्शयन् खतस्तत्कृत्यानि कुरुते, पठ्यते च-'वयहरे'त्ति तत एव हेतोकर्व्यवहरति-गृहिनिमित्तं क्रयविक्रयव्यवहारं करोति, 'निमित्तेन च' शुभाशुभसूचकेन 'व्यवहरति' द्रव्यार्जनं करोति, अपरं च पूर्ववत् । अपि च-सन्नाय'त्ति खज्ञातयः-स्वकीयखजनास्तैर्निजक इति यथेप्सितो यः स्निग्धमधुरादिरा-15) हारो दीयते स खज्ञातिपिण्डस्तं 'जेमति' भुक्ते, 'नेच्छति' नाभिलपति समुदानानि-भिक्षास्तेषां समूहः सामुदा-12 निकम् , 'अचित्त हसिधेनोष्ठ (पा०४-२-४७) इति ठक्, बहुगृहसम्बन्धिनं भिक्षासमूहमज्ञातोञ्छमितियावत् , गृहिणां निषद्या-पर्यङ्कतूल्यादिका शय्या तां च 'बाहयति'त्ति सुखशीलतयाऽऽरोहति, शेषं तथैवेति सूत्रद्वयार्थः ॥ दिसम्प्रत्यध्ययनार्थमुपसंहरनुक्तरूपदोषासेवनपरिहारयोः फलमाह 6562-62525263525**5 दीप अनुक्रम [५५३-५५५] For Pro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~372 Page #373 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१७], मूलं [-1 / गाथा ||१९-२१|| नियुक्ति : [३९१...] प्रत सूत्रांक ||१९-२१|| सच्चराध्य. एयारिसे पंचकुसीलसंवुडे, रूबंघरे मुणिपवराण हिटिमे । अयंसि लोए विसमेव गरहिए, न से इहं नेवी पापश्रमपरत्थलोए ॥ २० ॥ जे वज एए उ सदा उ दोसे, से सुब्वए होड मुणीण मज्झे । अयंसि लोए अमयं व बृहद्वृत्तिः पूइए, आराहए दुहओ लोगमिणं ॥ २१ ॥ तिबेमि ॥ णा०१७ ॥४३६॥ ॥ पावसमणिजं ॥१७॥ 'एतादृशः' याश उक्तः 'पञ्चेति पञ्चसङ्ख्यः कुत्सितं शीलमेषां कुशीला:-पार्श्वस्थादयः समाहृताः पञ्चकुशीलं तद्वदसंवृतः-अनिरुद्धाश्रवद्वारः पञ्चकुशीलासंवृतो रूप-रजोहरणादिकं वेषं धारयति रूपधरः सूत्रे तु प्राकृतत्वाद्विदुनिर्देशः, 'मुनिप्रवराणाम्' अतिप्रधानतपखिना 'हिटिमो' अधस्ताद्वर्ती, अतिजघन्यसंयमस्थानयतित्यानिकृष्ट इत्यर्थः । एतत्फलमाह-'अयंसि'ति अस्मिन् 'लोके' जगति 'विपमिव'त्ति गर इव 'गर्हितः' निन्दितो, भ्रष्टप्रतिज्ञो हि प्राकृतजनैरपि निन्द्यते धिगेनमिति, अत एव न स 'इह' इतीह लोके 'नैवेति नापि परत्र लोके, परमार्थतः सन्निति शेषः, यो हि नैहिकमामुष्मिकं वा कञ्चन गुणमुपार्जयति स तद्गणनायामप्रवेशतस्तत्त्वतोऽविद्यमान एवेति। है यः 'वर्जयति' परित्यजति 'एतान्' उक्तरूपान् 'सया उत्ति सदैव दोपान् यथासुखविहारादिपापानुष्ठानरूपान् स|| ४३६॥ तथाविधः 'सुव्रतः' निरतिचारतया प्रशस्यव्रतो भवति मुनीनां मध्ये, किमुक्तं भवति ?-भाषमुनित्वेनासी मुनि SC-ACCCCCCC दीप अनुक्रम [५५७-५५९] Skx SamEducatrin international FaramanaSPrwara timonik पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~373 Page #374 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१७], मूलं [-] / गाथा ||१९|| नियुक्ति: [३९१...] प्रत सूत्रांक ||१९-२१|| मध्ये गण्यते, तया वाऽस्मिन् लोके 'अमृतमिय' सुरभोज्यमिव 'पूजितः' अभ्यर्हित आराधयति 'दुहतो लोगमिण-18 दति इहलोकपरलोकभेदेन द्विविधं लोकम् 'इणं ति इममनेन चातिप्रतीततया प्रत्यक्षं निर्दिशतीति, इहलोके च सकललोकपूज्यतया परलोके च सुगत्यवाप्तेः, ततः पापवर्जनमेव विधेयमिति भाव इति सूत्रद्वयार्थः ॥ इति परिसमाप्ती, वीमीति पूर्ववत् , नया अपि तथैव ॥ इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां सप्तदशमध्ययनं समाप्तमिति ॥ ॥ इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटी०सप्तदशमध्ययनं समाप्तम् ॥ दीप अनुक्रम [५५७-५५९] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं-१७ परिसमाप्तं ~374 Page #375 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [--1 / गाथा ||१९...|| नियुक्ति: [३९२-३९४] (४३) 5 प्रत बृहद्वृत्तिः ॥४३७॥ 586 सूत्रांक ||१९-२१|| उत्तराध्य. अथ संवतीयाख्यमष्टादशमध्ययनम् । संयतीया ध्य. उक्तं सप्तदशमध्ययनम् , अधुनाऽष्टादशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः, इहानन्तराध्ययने पापवर्जनमुक्तं, तच संयतस्यैव, स च भोगर्द्धित्यागत एवेति स एव संजयोदाहरणत इहोच्यत इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम् , अस्स च चतुरनुयोगद्वारप्ररूपणा प्राग्वद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेप संजयीयमिति नाम, ततः सञ्जयशब्दनिक्षेपायाह नियुक्तिकृत् निक्खेवो संजइजमि चउ० ॥ ३९२॥ जाणगसरीरभविए०॥ ३९३ ॥ संजयनाम गोयं वेयंतो भावसंजओ होइ । तत्तो समुट्रियमिणं अज्झयणं संजइजति ॥ ३९४ ॥ गाथात्रयं व्याख्यातप्रायं, नवरं 'णिक्खेवो संजइजमिति निक्षेपः' न्यासः सञ्जयीयाध्ययने अर्थात्सञ्जयस्येति गम्यते । तथा च तृतीयगाथायां 'संजयनाम गोयं यंतो' इत्युक्तं तत' इति सञ्जयादभिधेयभूतात् 'समुत्थितम् ॥४३७॥ का उत्पन्नम् इदं अध्ययनं सजयीयमिति, तस्माद्धेतोरुच्यत इति गाथात्रयार्थः । इत्युक्तो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति 51 सूत्रालापकनिष्पन्नस्यावसरः, स च सूत्रे सति भवत्यतः सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तचेदम् - -- दीप अनुक्रम [५५७-५५९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं -१८ “संजयिय" आरभ्यते ~375 Page #376 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [३९५] प्रत सूत्रांक ||१|| कपिल्ले नयरे राया, उदिन्नबलवाहणे । नामेणं संजओ नाम, मिगव्वं उवनिग्गए ॥१॥ ___ काम्पिल्ये नगरे 'राजा' नृपतिरुदीर्णम्-उदयप्रासं बलं-चतुरङ्गं वाहनं च-गिल्लिथिल्यादिरूपं यस्य सोऽयमुदी बलवाहनः, यद्वा वलं-शरीरसामर्थ्य वाहनं-गजाश्वादि, पदात्युपलक्षणं चैतत्, स च 'नाना' अभिधानेन सञ्जयः 'नाम' इति प्राकाश्ये, ततोऽयमर्थः-संजय इति नाना प्रसिद्धो, मृगव्यां-मृगयां प्रतीति शेषः, उप–सामीप्येन । निर्गतो-निष्क्रान्त उपनिर्गतस्तत एव नगरादिति शेष इति सूत्रार्थः ॥ स च कीटग् विनिर्गतः किं च कृतवानित्याह हयाणीए गयाणीए, रहाणीए तहेव य । पायताणीए महया, सवओ परिवारिए ॥२॥ मिए छुभित्ता हयगओ, कंपिल्लुजाणकेसरे । भीए संते मिए तत्थ, वहेइ रसमुच्छिए ॥ ३॥ पाठसिद्धं, नवरं पदातीनां समूहः पादातं तस्यानीकं-कटकं पादातानीकं तेन, सुव्यत्ययः प्राग्वत्, एवं पूर्वेप्यपि, 'महता' बृहत्प्रमाणेन मृगान् क्षित्वा 'कंपिल्लुजाणकेसरि'त्ति तस्यैव काम्पील्यस्य नगरस्य सम्बन्धिनि केशरनाम्युधाने 'भीतान्' त्रस्तान् सतो 'मितान्' परिमितान् 'तत्र' तेपु मृगेषु मध्ये 'बहेइति व्यथति हन्ति वा, शरै-- रिति गम्यते, रसः-तत्पिशिताखादस्तत्र मूच्छितो-गृद्धो रसमूर्छित इति सूत्रद्वयार्थः ॥ अमुमेवाणे सूत्रस्पर्शिकनि-IA युक्त्या स्पष्टयितुमाहकंपिल्लपुरवरंमि अ नामेणं संजओ नरवरिंदो। सो सेणाए सहिओ नासीरं निग्गओ कयाइ ॥३९५॥ श दीप अनुक्रम [५६० Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~376 Page #377 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [--1 / गाथा ||३|| नियुक्ति: [३९६] (४३) प्रत सूत्रांक ||३|| उत्तराध्य. हयमारूढो राया मिए छहिताण केसरुजाणे । ते तत्थ उ उत्तत्थे वहेइ रसमुच्छिओ संतो ॥ ३९६ ॥ | संयतीयाबृहद्भुत्तिः || गाथाद्वयं प्रतीतमेव, नवरमिह नासीरं-मृगयां प्रति 'उत्रस्तान्' अतिभीतानिति गाथाद्वयार्थः ॥ अत्रान्तरे ध्य. १८ ॥४३८॥ यदभूत्तदाह सूत्रकृत् अह केसरंमि उजाणे, अणगारे तबोधणे । सज्झायझाणजुत्तो, धम्मज्झाणं झियायह ॥४॥ अप्फोवमंडबमी, झायई झवियासवे । तस्सागए मिए पासं, वहेइ से नराहिये ॥५॥ 'अथ' अनन्तरं केशरे उद्यानेऽनगारतपोधनः स्वाध्यायः-अनुप्रेक्षणादिर्ध्यान-धर्मध्यानादि ताभ्यां युक्तो-यथा| कालं तदासेवकतया सहितः खाध्यायध्यानयुक्तोऽत एव 'धर्मध्यानम्' आज्ञाषिजयादि 'झियायइत्ति ध्यायति । चिन्तयति, क?-'अप्फोयमंडयंमिति अप्फोवमण्डवमिति घृक्षाद्याकीणे, तथा च वृद्धाः-अप्फोव इति, किमुक्तं | | भवति ?-आस्तीर्णे, वृक्षगुच्छगुल्मलतासंछन्न इत्यर्थः, 'मण्डपे' नागवल्यादिसम्बन्धिनि ध्यायति धर्मध्यानमिति गम्यते, पुनरभिधानमतिशयख्यापकं, झवियत्ति-क्षपिता निर्मलिता आश्रयाः-कर्मवन्धहेतवो हिंसादयो येन स||४३८॥ तथा, 'तस्य' इत्युक्तविशेषणान्वितस्यानमारस्य 'पार्थ' समीपमिति सम्बन्धः, 'आगतान्' प्राप्तान् मृगान् 'यहात्ति विध्यति हन्ति वा 'स' इति सञ्जयनामा 'नराधिपः' राजेति सूत्रद्वयार्थः ॥ अमुमेवार्थ सविशेषमाह नियुक्तिकृत् * दीप 4 अनुक्रम [५६२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~377~ Page #378 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||५|| नियुक्ति: [३९७] प्रत सूत्रांक ||५|| अह केसरमुजाणे नामेणं गहभालि अणगारो।अप्फोवमंडवंमि अ झायइ झाणं झविअदोसो॥ ३९७॥ अहेति गाथा व्याख्यातप्रायैव, नवरं 'नाना' अभिधानेन गर्दभालि-गर्दभालिनामेत्यर्थः, 'झविय'त्ति क्षपिता दोषाः-कर्माश्रवहेतुभूता हिंसादयो येन स तथा ॥ पुनस्तत्र यदभूत्तदाह___अह आसगओ राया, खिप्पमागम्म सो तहिं । हए मिए उ पासित्ता, अणगारं तत्थ पासई ॥६॥ 'अर्थ' अनन्तरम् 'अश्वगतः' तुरगारूढो राजा 'क्षिप्रं' शीघ्रमागत्य 'स' इति सञ्जयनामा 'तस्मिन् यत्र मण्डपे स भगवान् ध्यायति, 'हतान्' विनाशितान् मृगान् तुशब्द एवकारार्थस्ततो मृगानेव, न पुनरनगारमित्यर्थः, 'पासित्त'त्ति दृष्ट्वा 'अनगारं' साधु तत्र' इति तस्मिन्नेव स्थाने पश्यतीति सूत्रार्थः ॥ ततः किमसावकापीदित्याह| अह राया तत्थ संभंतो, अणगारो मणाहओ। मए उ मंदपुण्णणं, रसगिद्धेण धंतुणा ॥७॥ आसं विस-* साज्जहत्तार्ण, अणगारस्स सो निवो । विणएणं बंदई पाए, भगवं । इत्य मे खमे ॥८॥ अह मोणेण सो भगवं, अणगारो झाणमस्सिओ । रापाणं न पडिमंतेइ, तओ राया भयदुओ ॥ ९॥ संजओ अहमस्सीति, भगवं! वाहिराहि मे । कुद्धे तेएण अणगारे, दहिज्जा नरकोडिओ ॥१०॥ . का अथ राजा 'तत्रेति तद्दर्शने सति 'संभ्रान्तः' भयव्याकुलो, यथाऽनगारो-मुनिर्मनागिति-स्तोकेनेय 'आहतः'। दिविनाशितः, तदासन्नमृगहननादित्यभिप्रायः, मया तु मन्दपुण्येन 'रसगृद्धेन' रसमूर्छितेन 'घंतुण'त्ति घातुकेन हनन दीप अनुक्रम [५६४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~378 Page #379 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [--1 / गाथा ||७-१०|| नियुक्ति: [३९८-४०१] EX संयतीया प्रवृत्तिः ध्य. १८ प्रत सूत्रांक ||७-१०|| उत्तराध्य. शीलेनेत्यर्थः । ततश्च 'अ' तुरगं 'विसृज्य' विमुच्य ''प्राग्वत् , 'अनगारस्य' उक्तस्यैव 'सः' सञ्जयनामा नृपः 'विन दयेन' उचितप्रतिपत्तिरूपेण 'वन्दते' स्तौति पादौ चरणी, अत्यादरख्यापकं चैतत् , पादावपि तस्य भगवतः स्तवनीया विति, वक्ति च-यथा भगवन् ! 'अत्र' एतस्मिन् मृगव्ये, मम अपराधमिति शेषः, 'क्षमख' सहख ॥ 'अर्थ' इत्यनन्तरं ॥४३९॥ 'मौनेन' वाग्निरोधात्मकेन 'सो'त्ति स गर्दभालिनामा भगवान् अनगारः 'ध्यान' धर्मध्यानम् 'आश्रितः' स्थितः 'राजानं' नृपं 'न प्रतिमन्त्रयते' न प्रतिवक्ति यथाऽहं क्षमिष्ये न वेति, 'ततः' तत्प्रतिवचनाभावतोऽवश्यमयं कुद्ध है| इति न किमपि मां प्रभाषते इति राजा 'भयद्रुतः' अतीव भयत्रस्तो, यथा न ज्ञायते किमसौ क्रुद्धः करिष्यतीति, उक्तवांश्च यथा- ॥ 'सञ्जयः' सञ्जयनामा राजाऽहमस्मि, मा भून्नीच एवायमिति सुतरां कोप इत्येतदभिधानमिति, इति' अस्माद्धेतोभगवन् ! 'वाहराहि'त्ति व्याहर-संभाषय 'मे' इति सुव्यत्ययान्माम् , अथापि स्यात्-किमेवं भवान् । भयद्भुत इत्याह-'क्रुद्धः' कुपितः 'तेजसा' तपोमाहात्म्यजनितेन तेजोलेश्यादिना 'अनगारः' मुनिः 'दहेत्' भस्मसाकुर्यात् नरकोटीः, आस्तां शतं सहस्रं येति, अतोऽत्यन्तभयदुतोऽहमिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ इदमेव व्यक्तीकत्तुमाह नियुक्तिकृत्अह आसगओराया तं पासिअसंभमागओतत्था भणइ अहा जह इहि इसिवज्झाए मणा लित्तो ३९० दीप अनुक्रम [५६६-५६९] ॥४३९|| For any पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~379~ Page #380 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१८], मूलं [--1 / गाथा ||७-१०|| नियुक्ति: [३९८-४०१] (४३) प्रत सूत्रांक ||७-१०|| वीसजिऊण आसं अह अणगारस्स एइ सो पासं । विणएण वंदिऊणं अवराहं ते खमावेइ ॥ ३९९ ॥ अह मोणमस्सिओ सो अणगारो नरवई न वाहरइ । तस्स तवतेयभीओ इणमद्रं सो उदाहरइ ४०० 18 कंपिल्लपुराहिवई नामेणं संजओ अहं राया । तुज्झ सरणागओऽम्हि निदहिहा मा मि तेएणं ॥ ४०१॥ KI गाथाचतुष्टयं स्पष्टमेव, नवरं तं पासिय 'संभमागतो'त्ति मुनिरत्र दृश्यत इत्यसावपि मया विद्धो भविष्यतीत्याकु लत्वमापन्नो, 'भणति च' वक्ति च 'हा' इति खेदे यथेदानीं 'इसिवज्झाए'त्ति ऋषिहत्यया मनागपि लिप्तोऽहं खल्पेनैव न स्पृष्टः 'तुभ'त्ति तव 'शरणागतोऽस्मि' त्वामेव शरणम्-आश्रयं प्रतिपन्नोऽस्मि, ततश्च निर्धक्षीः 'मा' १४ निषेधे 'मि' इति मां 'तेजसा' तपोजनितेनेति गम्यते, इति गाथाचतुष्टयार्थः॥ इत्थं तेनोक्ते यन्मुनिरुक्तांस्तदाह-12 अभओ पत्थिवा! तुझं, अभयदाया भवाहि य । अणिचे जीवलोगंमि, किं हिंसाए पसज्जसि ? ॥११॥ जया सव्वं परिचज, गंतव्यमवसस्स ते । अणिचे जीवलोगंमि, किरज्वमि पसज्जसि ॥१२॥ जीवियं चेव स्वं च, विजुसंपायचंचलं । जत्थ तं मुझसी रायं, पिचत्थं नावबुज्झसी ॥ १३ ॥ दाराणि य सुया चेव, |मित्ता य तह बंधवा । जीवंतमणुजीवंति, मयं नाणुव्वयंति य ॥१४॥ नीहरंति मयं पुत्ता, पियरं परमदु-18 क्खिया । पियरो अतहा पुत्ते, बंधू रायं तवं चरे ॥ १५॥ तओ तेणऽजिए व्वे, दारे य परिरक्खिए। दीप अनुक्रम [५६६-५६९] SNEdirandy पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~380 Page #381 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||११ -१७|| दीप अनुक्रम [५७० -५७६] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४४०॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||११-१७|| निर्युक्ति: [३९८-४०१] अध्ययनं [१८], कीलंडने नरा रायं !, हट्टतुट्ठमलंकिया ॥ १६ ॥ तेणावि जं कथं कम्मं, सुहं वा जइ वा दुहं । कम्मुणा तेण संजुत्तो, गच्छई उ परं भवं ॥ १७ ॥ 'अमओ'त्ति अभयं भयाभाव: 'पार्थिव !' नृपते ! आकारोऽलाक्षणिकः, कस्य ? - 'तुम्भं'ति तव, न कश्चित्त्वां दहतीति भावः, इत्थं समाश्वास्योपदेशमाह-'अभयदाता च' प्राणिनां त्राणकर्त्ता 'भवाहि य'त्ति भव, यथा हि भवतो मृत्युभयमेवमन्येषामपीति भावः, चशब्दो योजित एव, अमुमेवार्थ सहेतुकं व्यतिरेकद्वारेणाह - 'अनिये' अशाश्रते 'जीवलोके' प्राणिगणे, किमिति परिप्रश्ने 'हिंसायां' प्राणिवधरूपायां 'प्रसजति' अभिव्यक्तो भवसि ?, जीवलोकस्य ह्यनित्यत्वे भवानप्यनित्यस्वत्किमिति-केन हेतुना खल्पदिनकृते पापमित्यमुपार्जयसि ?, नैवेदमुचितमिति | भावः । इत्थं हिंसात्यागमुपदिश्य राज्य परित्यागोपदेशमाह-यदा 'सर्व' कोशान्तः पुरादि परित्यज्य - इहैव विमुष्य गन्तव्यं भवान्तरमिति शेषः, तदपि न खवशस्य किन्तु अवशस्य - अखतन्त्रस्य 'ते' तच क्व सति ? - अनिले जीवलोके, ततः किं 'राज्ये नृपतित्वे प्रसजसि ?, राज्यपरित्याग एव युक्त इति भावः, पाठान्तरतश्च किं हिंसायां प्रसजसि ?, इह च पुनर्वचनमादरातिशयख्यापनार्थमिति न पुनरुक्तता ।। जीवलोकानित्यत्वमेव भावयितुमाह-'जीवितम्' आयुः 'चः' समुचये 'एवे 'ति पूरणे 'रूपं च' पिशितादिपुष्टस्य शरीरशोभात्मकं विद्युतः संपातः- चलनचमत्कारो विद्युत्सम्पातस्तद्वचञ्च - लम्-अतीवास्थिरं विद्युत्सम्पातचञ्चलं 'यत्र' जीविते रूपे च 'त'ति त्वं 'मुहासि' मोहं विधत्से, मूढश्च हिंसादौ प्रस Education Intemational For Parsons Private Onl संयतीया ध्य. १ ~381~ ॥४४णी org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #382 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||११-१७|| नियुक्ति: [३९८-४०१] प्रत सूत्रांक ||११ -१७|| जसीति भावः, 'राजन्' नृपते ! 'प्रेत्यार्थ परलोकप्रयोजनं नावबुध्यसे, किमुक्तं भवति :-जानास्यपि न, किं पुनस्तत्करणमिति ॥ तथा 'दाराश्च कलत्राणि प्राकृतत्वान्नपा निर्देशः, सुताश्चैव 'मित्राणि च' प्रतीतान्येव, तथा 'बान्धवाः खजनाः जीवन्तम् 'अनुजीवन्ति' तदुपार्जितवित्ताधुपभोगत उपजीवन्ति, मृतं 'णाणुधयंति यत्ति चशब्दस्यापिश-|| ब्दार्थत्वादनुव्रजन्त्यपि न, किं पुनः सह यास्यन्तीति, तदनेन दारादीनामपि कृतघ्नतया न तेष्वास्था विधाय धर्म उदासितव्यमित्युक्तमिति, इदं च सूत्रं चिरन्तनवृत्तिकृता न व्याख्यातं, प्रत्यन्तरेषु च दृश्यत इत्यस्माभिरुनीतम् ॥ पुनस्तत्प्रतिबन्धनिराकरणायाह-'नीहरंति'त्ति निस्सारयन्ति 'मृतम्' इति गतायुपं 'पुत्राः' सुताः पितरं' जनकं || 'परमदुःखिताः' अतिशयसञ्जातदुःखा अपि, किं पुनर्ये न तथा दुःखभाज इति भावः, पितरोऽपि तथा पुत्रान् , 'बंधु'त्ति वन्धवश्व बन्धूनिति शेषः, अतश्च किं कृत्यमित्याह-राजन्! तप उपलक्षणत्वादानादि 'चरेः' आसेवखेति ॥ | 18 अपरञ्च 'ततो'त्ति मृतनिःसारणादनन्तरं 'तेन' इति मित्रपित्रादिना 'अर्जिते' विढपिते 'द्रव्ये' वित्ते 'दारेषु च' कल त्रेषु च 'परिरक्षितेषु' सर्वापायपरिपालितेषु, उभयत्रार्पत्वादेकवचनं, 'क्रीडन्ति' विलसन्ति तेनैव वित्तेन दारैश्चेति || गम्यते 'अन्ये' अपरे राजन् ! 'हट्टतुटुमलंकिय'त्ति दृष्टाः-बहिःपुलकादिमन्तः तुष्टा:-आन्तरप्रीतिभाजः 'अलङ्कृताः' |विभूषिताः, यत ईरशी भवस्थितिस्ततो राजनू ! तपश्चरेरिति मध्यदीपकत्वादनन्तरसूत्रोक्तेन सम्बन्धः ।। मृतस्य च | को वृत्तान्त इत्याह-'तेनापि मृतेन यत् 'कृतम्' अनुष्ठितं कर्म 'शुभं वा' पुण्यप्रकृतिरूपं, यद्वा 'सुखं वा सुखहेतुः दीप अनुक्रम [५७० % -५७६]] 2% Educational For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~ 382 Page #383 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१८ -१९|| दीप अनुक्रम [५७७ -५७८] उत्तराध्य. वृहद्वृत्तिः ॥४४१॥ Educato [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||१८-१९ || निर्युक्ति: [३९८-४०१] 'यदिवे' त्यथवा 'दुःख' दुःखहेतुः पापप्रकृत्यात्मकमित्यर्थः । कर्मणा तेन सुखहेतुना दुःखहेतुना वा, उत्तरत्र तुशब्दस्यैवकारार्थत्वाद् भिन्नक्रमत्वाच्च तेनैव, न तु दुःखपरिरक्षितेनापि द्रव्यादिना 'संयुक्तः' सहितः 'गच्छति' याति 'परम्' अन्यं 'भवं' जन्म, यतश्च शुभाशुभयोरेवानुयायिता ततः शुभहेतुं तप एव चरेरिति भाव इति सूत्रसप्तकार्थः ॥ ततस्तद्वचः श्रुत्वा राजा किमचेष्टतेत्याह सोऊण तस्स सो धम्मं, अणगारस्स अंतिए । महया संवेग निच्वेयं, समावन्नो नराहिवो ॥ १८ ॥ संजओ चहउं रज्ज, निक्वंतो जिणसासणे । गद्दभालिस्स भगवओ, अणगारस्स अंतिए ॥ १९ ॥ ‘श्रुत्वा' आकर्ण्य ‘तस्य' इत्यनगारस्य 'स' इति सञ्जयाभिधानो राजा 'धर्मम्' उक्तरूपम् 'अनगारस्य' भिक्षोः 'अन्तिके' समीपे 'महय'त्ति महता आदरेणेति शेषः, सुच्यत्ययेन वा महत्, 'संवेग निर्वेद' तत्र संवेगो - मोक्षामि लापो निर्वेदः - संसारोद्विग्नता ' समापन्नः' प्राप्तः 'नराधिपः' राजा 'सञ्जयः' सञ्जयनामा 'चह' त्यक्त्वा 'राज्यं' राष्ट्राधिपत्यरूपं 'निष्क्रान्तः' प्रत्रजितः 'जिनशासने' अर्हद्दर्शने, न तु सुगतादिदेशितेऽसद्दर्शने एवेति भावः, 'गर्दभाले:' गर्दभालिनाम्नो भगवतोऽनगारस्यान्तिक इति सूत्रद्वयार्थः ॥ सूत्रनवकोक्तमेवार्थ स्पष्टयितुमाह नियुक्तिकृत्अभयं तुज्झ नरवई ! जलबुब्बुअसंनिभे अ माणुस्से । किं हिंसाइ पसज्जसि जाणतो अप्पणो दुक्खं ? ४०१ For Parsons Private संवतीया ध्य. १८ ~383~ ||४४१॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः | मूल संपादने स्खलन्त्वात् अत्र निर्युक्तिक्रम ||४०१ || द्वीवारान् मुद्रितं Page #384 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||१८-१९|| नियुक्ति: [४०१R-४०३] (४३) ॐSAN प्रत सूत्रांक ||१८-१९|| सबमिणं चइऊणं अवस्स जया य होइ गंतवं । किं भोगेसु पसजसि ?, किंपागफलोवमनिभेसु ॥४०॥ सोऊण य सो धम्मं तस्सऽणगारस्स अंतिए राया। अणगारो पव्वइओ रजं चहउं गुणसमग्गं ॥४०॥ | व्याख्यातप्रायमेव, नवरं 'अप्पणो दुक्खंति आत्मनो दुःखमिति-दुःखजनक मरणमिति शेषः, 'किपागफलोपमणिभेसु'न्ति किम्पाकफलोपमा निभा-छाया येषां ते तथा आपातमधुरत्वपरिणतिदारुणत्वाभ्यां, तथा 'अनगारः' अविद्यमानगृहो, जात इति शेषः, स च शाक्यादिरपि संभवेदत आह-पपइओ'त्ति प्रकर्षण-विषयाभिष्वङ्गादि-18 परिहाररूपेण ब्रजितो-निष्क्रान्तः प्रत्रजितो, भावभिक्षुरितियावत्, तथा गुणाः-कामगुणा मनोजशब्दादय आज्ञैश्वर्यादयो बा तैः समग्रं-सम्पूर्ण गुणसमग्रमिति गाथात्रयार्थः । स चैवं गृहीतप्रवज्योऽधिगतहेयोपादेयविभागो दशविधचक्रवालसामाचारीरतश्चानियतविहारितया बिहरन् तथाविधसन्निवेशमाजगाम, तत्र च तस्य यदभूत्तदाह चिच्चा रट्ट पब्बईओ, खत्तिओ परिभासई । जहा ते दीसई रूवं, पसन्नं ते तहा मणो ॥२०॥ किनामे किंगुत्ते कस्सट्टाए व माहणे? । कहं पडियरसी बुद्धे ?, कहं विणीयत्ति युबसि? ॥२१॥ त्यक्त्वा 'राष्ट्र' ग्रामनगरादिसमुदाय प्रबजितः प्रतिपन्नदीक्षः 'क्षत्रियः' क्षत्रजातिरनिर्दिष्टनामा परिभापते, सञ्जय६ मुनिमित्युपस्कारः, स हि पूर्वजन्मनि वैमानिक आसीत् , ततश्युतः क्षत्रियकुलेऽजनि, तत्र च कुतश्चित्तथायिध दीप अनुक्रम [५७७ -५७८] SonEditatiamiME For a t पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: -~384 Page #385 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||२०-२१|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ||२०. -२१|| सत्तराध्य. || निमित्ततः स्मृतपूर्वजन्मा तत एव चोत्पन्नवैराग्यः प्रव्रज्यां गृहीतवान् , गृहीतप्रव्रज्यश्च बिहरन् सञ्जयमुनिं दृष्ट्वा । तद्विमर्शार्थमिदमुक्तवान् यथा ते 'दृश्यते' अवलोक्यते 'रूपम्' आकृतिः 'प्रसन्नं' विकाररहितं 'ते' तव 'तथा' ध्य. १८ तेनैव प्रकारेण प्रसन्नमिति प्रक्रमः, किं तत् ?-'मनः' चित्तं, न ह्यन्तः कलुषतायां बहिरप्येवं प्रसन्नतासम्भवः, तथा 'कि॥४४॥ नामा' किमभिधानः 'किंगोत्रः' किमन्वयः 'कस्सट्ठाए वत्ति कस्मै वा 'अर्थाय' प्रयोजनाय 'माहणे'त्ति मा बधी दूत्येवरूपं मनो वाक् क्रिया च यस्यासी माहनः, सर्वे धातवः पचादिषु दृश्यन्त इति वचनात्पचादित्वादच्, स चै-४ विधः प्रबजित एवं संभवत्यतः किं वा प्रयोजनमुद्दिश्य प्रअजितः, 'कथं' केन प्रकारेण 'प्रतिचरसि' सेवसे, कान् ?-14 'बुद्धान्' आचार्यादीन् , कथं 'विणीय'त्ति 'विनीतः' विनयवानित्युच्यत इति सूत्रद्वयार्थः ।। समयमुनिराह___ संजओ नाम नामेणं, तहा गुत्तेण गोयमो । गद्दभाली ममायरिया, विजाचरणपारगा ॥२२॥ यदुक्तं त्वया-किनामा त्वमिति, तत्र सञ्जयो नाम नाम्ना । यच्चावोचः-किंगोत्रः १ इति, तत्राह-तथा 'गोत्रेण| अन्वयेन गोतमः, उभयत्राहमिति गम्यते, शेषप्रश्नत्रयप्रतिवचनमाह-'गर्दभालयः' गर्दभाल्यभिधाना मम 'आचार्याः' धर्मोपदेशकत्वादिना, विद्यतेऽनया तत्त्वमिति विद्या-श्रुतज्ञानं तथा चर्यत इति चरणं--चारित्रं विद्या च चरणं ॥४४शा च विद्याचरणे तयोः पारगाः-पर्यन्तगामिनो विद्याचरणपारगाः, एवं च बदतोऽयमाशयः-यथा गर्दभालिभि-II धाचार्यजविद्यातान्त्रिवर्तितोऽहं, विद्याचरणपारगत्वाच तेस्तनिवृत्ती मुक्तिलक्षणं फलमुकं, ततस्तदर्थ माहनोऽस्मि, दीप अनुक्रम [५७९-५८०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~385 Page #386 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||२२|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ||२२|| यथा च तदुपदेशस्तथा गुरून् प्रतिचरामि, तदुपदेशासेवनाच विनीत इति सूत्रार्थः ॥ इत्थं विमृश्य तद्गुणबहुमानाकृष्टचेता अपृष्टोऽपि क्षत्रिय इदमाह किरियं अकिरिअं विणयं, अन्नाणं च महामुणी!। एएहिं चाहिं ठाणेहिं, मेअन्ने किं पभासई ॥२३॥ 'क्रिया' अस्तीत्येवंरूपा, लिङ्गव्यत्ययान्नपुंसकनिर्देशः, 'अक्रिया' तद्विपरीता 'बिनयः' नमस्कारकरणादिः, लिङ्गव्यत्ययःप्राग्वत्, तथा ज्ञान-वस्तुतत्त्वावगमस्तदभावोऽज्ञानं, 'चः' समुचये, 'महामुने!' सम्यकप्रत्रज्याप्रतिपत्तिगुरुपरिचर्यादिकरणतः प्रशस्ययते ! 'एतैः' क्रियादिभिश्चतुर्भिः तिष्ठन्त्येषु कर्मवशमा जन्तव इति स्थानानि-मिथ्या| ध्यवसायाधारभूतानि तैः, 'मेयण्णेत्ति, मीयत इति मेयं-ज्ञेयं जीवादिवस्तु तजानन्तीति मेयज्ञाः क्रियादिभिश्च-15 तुर्भिः स्थानः स्वखाभिप्रायकल्पितर्वस्तुतत्वपरिच्छेदिन इतियावत्, 'किम्' इति कुत्सितं 'पभासइत्ति प्रकर्षण है भाषन्ते प्रभाषन्ते, विचाराक्षमत्वात् , तथाहि ये तावक्रियावादिनस्तेऽस्तिक्रियाविशिष्टमात्मानं मन्यमाना अपि तस्य सदा विभुत्वाविभुत्वकर्तृत्वाकर्तृत्वादिभिर्विप्रतिपद्यन्ते, उक्तं हि वाचकः-क्रियावादिनो नाम येषामात्मनोऽस्तित्वं प्रत्यविप्रतिपत्तिः, किन्तु स विभुरविभुः कर्ताकर्ता क्रियावानितरो मूर्त्तिमानमूर्तिरित्येवमाद्याग्रहोपहृतप्रीतयतेऽस्ति माता पिताऽस्ति न कुशलाकुशलकर्मवैफल्यं न न सन्ति गतय इत्येवंप्रतिज्ञाश्च, इह च विभुत्वं व्यापित्वं, तच्चाटात्मनो न घटते, शरीर एव तलिङ्गभूतचैतन्योपलब्धेः, न च वक्तव्यमात्मनोऽध्यापित्वे 'सुखदुःखवुद्धीच्छाद्वेषप्रयत्नधर्मा-1 दीप अनुक्रम [५८१] RElicatml For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~386~ Page #387 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||२३|| नियुक्ति: [४०३...] बृहदत्तिः प्रत सूत्रांक ||२३|| उत्तराध्य धर्मसंस्कारा नवात्मगुणा' इतिवचनात्तद्गुणयोधर्माधर्मयोरप्यव्यापित्वं, तथा च द्वीपान्तरगतदेवदत्तादृष्टाकृष्टमणिमु- संयतीया तादीनां नेहागमनं स्यादिति, विभिन्नदेशस्याप्ययस्कान्तादेरयःप्रभृतियस्त्वाकर्षणशक्तिदर्शनाद्धर्माधर्मयोरपि शरी हरमात्रव्यापित्वेऽपि तद्वद्विप्रकृष्टवस्त्वाकर्षकत्वादिति न तावद्विभुरात्मा युज्यते । तथाऽविभुरप्यङ्गुष्ठपर्वाद्य- ध्य. १८ ॥४४॥ धिष्ठानो यैरिष्यते तेषां सकलशरीरव्यापिचैतन्यासत्त्वं, तदसत्वाञ्च शेषशरीरावयवेषु शस्त्रादिभेदादौ वेदनानुभवासंभवो, न चैतद् दृष्टमिष्टं वा, एवं सर्वदा कर्तृत्वादिकमपि यथा न युज्यते तथा खधिया वाच्यं १। ये त्वक्रियावादिनस्तेऽस्ती18तिक्रियाविशिष्टमात्मानं नेच्छन्त्येव, अस्तित्वे वा शरीरेण सहकत्वान्यत्वाभ्यामवक्तव्यमिच्छन्ति, एकत्वे ह्यविनष्टश रीरावस्थितौ न कदाचिन्मरणप्रशस्तिः, आत्मनः शरीरानन्यत्वेनावस्थितत्वात् , तथा मुत्यभावाबनेकदोषापत्तिश्चर शरीरान्यत्वे तु शरीरच्छेदादौ तस्य वेदनाऽभावप्रसङ्गः, तस्मादवक्तव्य एवेति, अक्रियावादित्वं चैषां कथञ्चिद्भेदाभेदल क्षणप्रकारान्तराभावेन तदभावस्यैवावशिष्यमाणत्वात् , येऽप्युत्पत्त्यनन्तरमात्मनः प्रलयमिच्छन्ति तेषामपि तदस्तिदत्वाभ्युपगमेऽप्यनुपचरितपरलोकायसम्भवात् तत्त्वतस्तदसत्त्वमेवेत्यक्रियावादित्वम् , उक्तं हि वाचकैः-"ये पुनरिहा|क्रियावादिनस्तेषामात्मैव नास्ति, न चावक्तव्यः शरीरेण सहकत्वान्यत्वे प्रति, उत्पत्त्यनन्तरप्रलयखभावको वा, तस्मिन्न-||॥४४३॥ निर्णिक्ते च कर्तृत्वादिविशेषमूढा एवे"ति, अमीषां तु विचाराक्षमत्वमात्माऽस्तित्वस्य प्राक् प्रत्यक्षानुमानलक्षणप्रमाणद्वयसमधिगम्यत्वेन साधनात् , तस्य च शरीरात्कथञ्चिद्भिन्नाभिन्नरूपतया तत्र तत्र वक्तव्ये (व्यत्वे)न । स्थापितत्वात् , दीप अनुक्रम [५८२] FaramanaSPrwara tumond Harjaingthangam पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~ 387 Page #388 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||२३|| नियुक्ति: [४०३...] **** प्रत सूत्रांक * ||२३|| लाक्षणिकपक्षस्य तु सामुच्छेदिकनिह्नववक्तव्यतायामेवोन्मूलितत्वादिति २। विनयवादिनो विनयादेय मुक्तिमिच्छन्ति. कायत उक्त-"नयिकवादिनो नाम येषां सुरासुरनृपतपखिकरितुरगहरिणगोमहिष्यजाविकश्वशृगालजलचरकपोतका-IN कोलूकचटकप्रभृतिभ्यो नमस्कारकरणात् क्लेशनाशोऽभिप्रेतो, विनयाच्छ्यो भवति नान्यथेत्यध्यवसिताः" एतेऽपि न टू विचारसहिष्णवो, न हि विनयमानादिहापि विशिष्टानुष्ठानविकलादभिलषितार्थावाप्तिरवलोक्यते, नापि चैषां विन याहत्वं, येन पारलौकिकश्रेयोहेतुता भवेत् , तथाहि-लोकसमयवेदेषु गुणाभ्यधिकस्यैव विनयाहत्वमिति प्रसिद्धिः, गुणास्तु तत्त्वतो ज्ञानध्यानानुष्ठानात्मका एव, न च सुरादीनामज्ञानाश्रवाविरमणादिदोषदूपितानामेतेष्वन्यतरस्यापि |गुणस्य सम्भव इति कथं यदृच्छया विधीयमानस्य तस्य श्रेयोहेतुतेति? ३। अज्ञानवादिनस्त्याहुः-यथेदं जगत् कैश्चिद् ॥ ब्रह्मादिविवर्त इष्यते, अन्यैः प्रकृतिपुरुषात्मकमपरैर्द्रव्यादिपभेदं तदपरैश्चतुरार्यसत्यात्मकमितरैर्विज्ञानमयमन्यैस्तु शून्यमेवेत्यनेकधा भिन्नाः पन्थानः, तथाऽऽत्माऽपि नित्यानित्यादिभेदतोऽनेकधैवोच्यते, तत्को ह्येतद्वेद किंचानेन ज्ञातेन !, अपवर्ग प्रत्यनुपयोगित्वात् ज्ञानस्य, केवलं कष्टं तप एवानुष्ठेयं, न हि कष्टं विनेष्टसिद्धिः, तथा चाह-'अज्ञानिका नाम येषामियमुपधृतिः, यथेह ज्ञानाधिगमप्रयासोऽपवर्ग प्रति अकिञ्चित्करो, घोरततपोभिरपवर्गोऽवाप्यते' इति । विचारासहत्वं चैषां विज्ञानरहितस्य महतोऽपि कष्टस्य तिर्यग्नारकादीनामियापवर्ग प्रत्यहेतुत्वात् , तदन्तधारण व्रततपोपसर्गादीनामपि खरूपापरिज्ञानतः क्वचित्प्रवृत्त्यसम्भवादिति । एषां च क्रियावादिनामुत्तरोत्तरभेदतोऽने * दीप अनुक्रम [५८२] SamEducatin international पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~388~ Page #389 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||२३|| नियुक्ति: [४०३...] (४३) प्रत सूत्रांक 4%95%450 ||२३|| उत्तराध्य. विधत्वं, उक्तं वाचकैः-"एषां मौलेषु चतुषु कल्पेष्ववस्थितेषु तद्भेदाः सुबहवोऽवनिरुहशाखाप्रशाखानिकरवदवग-1 संयतीया न्तव्याः", तत्र तावच्छतमशीतं क्रियावादिनां, अक्रियावादिनश्च चतुरशीतिसङ्ख्याः, अज्ञानिकाः सप्तषष्टिविधाः, वैनबृहद्वृत्ति |यिकवादिनो द्वात्रिंशत् , एवं त्रिषष्ट्यधिकशतत्रयं, सर्वेऽपि चामी विचाराक्षमत्वात्कुत्सितं प्रभाषन्ते इति स्थितमिति ध्य. १८ ॥४४४॥ | सूत्रार्थः ॥ न चैतत्वाभिप्रायेणैवोच्यते, किन्तु इइ पाउकरे बुद्धे, नायए परिनिव्वुडे । विजाचरणसंपन्ने, सचे सचपरक्कमे ।। २४ ॥ 'इती'त्येतत् क्रियादिवादिनः किं प्रभाषन्ते । इत्येवंरूपं 'पाउकरें'त्ति प्रादुरका(त्-प्रकटितवान् 'बुद्धः' अवगततत्त्वः सन् ज्ञात एव ज्ञातकः-जगत्प्रतीतः क्षत्रियो वा, स चेह प्रस्तावान्महावीर एव, 'परिनिर्वृतः' कपायानलविध्यापनात्समन्ताच्छीतीभूतो विद्याचरणाभ्यामर्थात् क्षायिकज्ञानचारित्राभ्यां संपन्नो-युक्तो विद्याचरणसंपन्नोऽत एव 'सत्या' सत्यवाक्, तथा सत्यः-अवितथस्तात्त्विकत्वेन परे-भावशत्रवस्तेषामाक्रमणं आक्रम:-अभिभवो 18 यस्यासी सत्यपराक्रम इति सूत्रार्थः ॥ तेषां च फलमाहपडंति नरए घोरे, जे नरा पायकारिणो । दिव्वं च गई गच्छंति, चरित्ता धम्ममारियं ॥२५॥ ४४४॥ I 'पतन्ति' गच्छन्ति 'नरके' सीमन्तकादौ 'घोरे' नित्यान्धकारादिना भयानके ये नराः उपलक्षणत्यात्रुयादयो* 13वा पातयति नरकादिपु जन्तुमिति पापं तच हिंसाधनेकधा, इह स्वसत्प्ररूपणैव, तत्कघुम्-अनुष्ठातुं शीलमपामिति KE% % % दीप अनुक्रम [५८२] %% SAMEdiratan intamatana पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~389~ Page #390 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||२५|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ||२५|| पापकारिणः, ये त्वेवंविधा न भवन्ति ते किमित्याह-'दिव्यां च गति' देवलोकगति, चशब्दः पुनरर्थे, सच पूर्वेभ्यो विशेषद्योतकः, 'गच्छन्ति' यान्ति 'चरित्वा' आसेव्य धर्मः-श्रुतधर्मादिरनेकविधः, इह च सत्प्ररूपणारूपः श्रुतधर्म एव तं, आय-प्राग्वत् , तदयमभिप्रायः-असत्प्ररूपणापरिहारेण सत्प्ररूपणापरेणैव च भवता भवितव्यमिति ४ सूत्रार्थः । कथं पुनरमी पापकारिण इत्याह___ मायावुइयमेयं तु, मुसा भासा निरस्थिया । संजममाणोऽपि अहं, वसामि इरियामि य ॥ २६ ॥ मायया-शाठ्येन बुइयंति-उक्तं मायोक्तम् एतत्' यदनन्तरं क्रियादिवादिभिरुक्तं, 'तुः'एवकारार्थो भिन्नक्रमच समायोक्कमेव, अतश्चैतत् 'मृषा' अलीका 'भाषा' उक्तिः 'निरर्थिका सम्यगभिधेयशून्या, तत एव च 'संजममामणोऽवि'त्ति 'अपिः' एवकारार्थस्ततः संयच्छन्नेव-उपरमन्नेव तदुक्त्याकर्णनादितः 'अहम्' इत्यात्मनिर्देशे विशेषतस्तस्थिरीकरणार्थम् , उक्तं हि-"ठियतो ठावए परं"ति, 'वसामि' तिष्ठामि उपाश्रय इति शेषः, 'इरियामि यति ईरे । च-च्छामि च गोचरचर्यादिष्विति सूत्रार्थः ॥ इदमपि सूत्रं प्रायो न दृश्यते । कुतः पुनस्त्वं तदुत्त्याकर्णनादिभ्यः । है. संयच्छसीत्याह-अनन्तरसूत्राभावे च यदुक्तं चतुर्भिः स्थानमयज्ञाः किंप्रभाषन्ते इति, तत्कुत इत्याह सब्वे ते विइया मज्झं, मिच्छादिही अणारिया। विजमाणे परे लोए, सम्मं जाणामि अप्पगं ॥ २७॥ 'सर्वे' निरवशेषाः 'ते' क्रियादिवादिनः 'विदिताः' ज्ञाता मम, यथाऽमी 'मिच्छद्दिष्टित्ति मिथ्या-विपरीता| दीप अनुक्रम [५८४] Furammarwata tiwand warjanatarangaro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~390 Page #391 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||२७|| दीप अनुक्रम [५८६ ] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४४५॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२७|| निर्युक्तिः [४०३...] अध्ययनं [१८], परलोकात्माद्यपलापित्वेन दृष्टि:- बुद्धिरेषामिति मिथ्यादृश्यः तत एव 'अनार्थी' अनार्यकर्मप्रवृत्ताः कथं पुनस्त एवंविधास्ते विदिता इत्याह- 'विद्यमाने' सति 'परलोके' अन्यजन्मनि 'सम्यम्' अविपरीतं 'जानामि' अवगच्छामि 'अप्पमं' ति आत्मानं, ततः परलोकात्मनोः सम्यग्वेदनात् ममैवंविधत्वेन विदितास्ततोऽहं तदुक्त्याकर्णनादितः संय|च्छामि किं प्रभाषकाश्चैत इति सूत्रार्थः ॥ कथं पुनस्त्वमात्मानमन्यजन्मनि जानासीत्याह अहमासी महापाणे, जुइमं वरिससओवमे । जा सा पाली महापाली, दिव्वा वरिसस ओवमा ॥ २८ ॥ से चुप भलोगाओ, माणुस्सं भवमागए। अप्पणो य परेसिं च, आउँ जाणे जहा तहा ।। २९ ।। 'अहमासि'ति अहमभूवं 'महाप्राणे' महाप्राणनाम्नि ब्रह्मलोकविमाने 'धुतिमान्' दीप्तिमान् 'वरिससतोयमे' ति वर्षशतजीविना उपमा-दृष्टान्तो यस्यासौ वर्षशतोपमो मयूरव्यंसकादित्वात्समासः, ततोऽयमर्थः यथेह वर्षशतजीवी इदानीं परिपूर्णायुरुच्यते, एवमहमपि तत्र परिपूर्णायुरभूवं, तथाहि - या सा पालिरित्र पालि:- जीवितजलधारणाद्भवस्थितिः, सा चोत्तरत्र महाशब्दोपादानादिह पल्योपमप्रमाणा, 'महापाली' सागरोपमप्रमाणा, तस्या एव महत्त्वात्, दिवि भवा दिव्या वर्षशतेनोपमा यस्याः सा वर्षशतोपमा, यथा हि वर्षशतमिह परमायुः तथा तत्र महापाली, उत्कृष्टतोऽपि हि तत्र सागरोपमैरेवायुरुपनीयते, न तत्सर्पिण्यादिभिः, अथवा - " योजनं विस्तृतः पल्यस्तथा योजनमुत्सृतः । सप्तरात्रप्ररूढाणां, केशाग्राणां स पूरितः ॥ १ ॥ ततो वर्षशते पूर्णे, एकैकं केशमुद्धरेत् । क्षीयते For Parsons Private संयतीया ध्य. १८ ~391~ ॥४४५|| org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #392 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||२८-२९|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ||२८ -२९|| येन कालेन, तत्पल्योपममुच्यते ॥ २॥” इति वचनाद्वर्षशतैः केशोद्धारहेतुभिरुपमा अर्थात्पल्यविपया यस्खा सा वर्षशतोपमा, द्विविधाऽपि स्थितिः, सागरोपमस्यापि पल्योपमनिष्पाद्यत्वात् , तत्र मम महापाली दिव्या भवस्थिहै तिरासीदित्युपस्कारः, अतश्चाहं वर्षशतोपमायुरभूवमिति भावः । 'से' इत्यथ स्थितिपरिपालनादनन्तरं 'च्युतः' भ्रष्टः 'ब्रह्मलोकात्' पञ्चमकल्पात् 'मानुष्यं मनुष्यसम्बन्धिनं 'भवं' जन्म 'आगत' आयातः । इत्थमात्मनो जातिस्मरण४ लक्षणमतिशयमाख्यायातिशयान्तरमाह-आत्मनश्च परेषां वा 'आयुः' जीवितं 'जाने' अवयुध्ये 'यथा' येन प्रकारेण सास्थितमिति गम्यते 'तथा' तेनैव प्रकारेण न त्वन्यथेत्यभिप्रायः, इति सूत्रद्वयार्थः । इत्थं प्रसङ्गतः परितोपतचापृष्टमपि खवृत्तान्तमावेद्योपदेष्टुमाह नाणा रडं च छंदं च, परिवजिज संजओ। अणट्ठा जे अ सव्यस्था, हर विजामणुसंचरे ॥३०॥ | | 'नाने' त्यनेकधा 'रुचिंच' प्रक्रमाक्रियावाद्यादिमतविषयमभिलाषं 'छन्दश्च' खमतिकल्पितमभिप्रायम्, इहापि सनानेति सम्बन्धादनेकविधं परिवर्जयेत्' परित्यजेत् ‘संयतः' यतिः । तथा 'अनर्थाः' अनर्थहेतवो ये च सर्वार्थाः अशेषहिंसादयो गम्यमानत्वात्तान् वर्जयेदिति सम्बन्धः, यद्वा 'सबत्थे'त्याकारस्थालाक्षणिकत्वात्सर्वत्र क्षेत्रादावना इति-निष्प्रयोजना ये च ब्यापारा इति गम्यते, तान् परिवर्जयेत् , 'इती' सेवंरूपां 'विद्या' सम्यग्ज्ञानरूपामन्विति -लक्षीकृत्य 'संचरेः' त्वं सम्यक् संयमाध्वनि याया इति सूत्रार्थः ॥ अन्यच दीप अनुक्रम [५८७-५८८] SamEducation intumhatana पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~392 Page #393 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||३०-३१|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ||३० -३१|| उत्तराध्य. पडिक्कमामि पसिणाणं, परमंतेहिं वा पुणो । अहो उढिओ अहोरायं, इइ विजा तवं चेर ॥ ३१॥ संयतीया प्रतीपं कामामि प्रतिक्रामामि-प्रतिनिवर्ते, केभ्यः ?-'पसिणाणं'ति सुब्व्यत्ययात् 'प्रश्नेभ्यः' शुभाशुभसूचकेभ्यो-18 वृहद्वृत्तिः ध्य. १८ दाऽङ्गुष्ठप्रश्नादिभ्यः, अन्येभ्यो वा साधिकरणेभ्यः, तथा परे-गृहस्थास्तेषां मन्त्राः परमन्त्राः-तत्कार्यालोचनरूपास्तेभ्यः,| ॥४४६॥ 'या' समुच्चये 'पुनः' विशेषणे, विशेषेण परमन्त्रेभ्यः प्रतिक्रमामि, अतिसावद्यत्वात्तेषां, सोपस्कारत्वात्सूत्रस्यामु मनाऽभिप्रायेण यः संयम प्रत्युत्थानवान् सः 'अहो' इति विस्मये 'उत्थितः' धर्म प्रत्युद्यतः, कश्चिदेव हि महात्मैवंविधः संभवति 'अहोरात्रम्' अहर्निशम् 'इति' इत्येतदनन्तरोक्तं 'विज'त्ति विद्वान् जानन् 'तवं ति अवधारणफलत्वाद्वाहै क्यस्य तप एव न तु प्रश्नादि 'चरेः' आसेवखेति सूत्रार्थः । पुनस्तस्थिरीकरणार्थमाह जं च मे पुच्छसी काले, सम्मं सुरेण (बुद्धण) चेयसा । ताई पाउकरे वुद्धे, तं नाणं जिणसासणे ||३२॥ यथ 'मे' इति मां 'पृच्छसि' प्रश्नयसि 'काले' प्रस्तावे 'सम्यगवुद्धेन' अविपरीतबोधवता 'चेतसा' चित्तेन, लक्षणे : दतृतीया, 'ता' इति सूत्रत्वात्तत् पाउकरे'चि 'प्रादुष्करोमि' प्रकटीकरोमि प्रतिपादयामीतियावत् , 'बुद्धः' अवगत*सकलवस्तुतत्वः, कुतः पुनर्बुद्धोऽसयत आह-तदिति यत्किञ्चिदिह जगति प्रचरति ज्ञान-यथाविधवस्त्ववबोध रूपं तजिनशासनेऽस्तीति गम्यते, ततोऽहं तत्र स्थित इति तत्प्रसादाबद्धोऽस्मीसभिप्रायः, इह च यतस्वं सम्य-31 गबुद्धेन चेतसा पृच्छस्यतः प्रतिक्रान्तप्रश्नादिरप्यहं यत्पृच्छसि तत्प्रादुष्करोमीयतः पृच्छ यथेच्छमित्वदम्पयाँधे । दीप अनुक्रम [५८९-५९०] For any पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~393 Page #394 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||३२|| नियुक्ति: [४०३...] *% % % % प्रत सूत्रांक ||३२|| % अथवाऽत एव लक्ष्यते यथा 'अप्पणो य परेसिं च' इत्यादिना तस्यायुर्विज्ञतामवगम्य सञ्जयमुनिनाऽसौ पृष्टः | कियन्ममायुरिति, ततोऽसौ प्राहयच्च त्वं मां कालविषयं पृच्छसि तत्प्रादुष्कृतवान् 'बुद्ध' सर्वज्ञोऽत एव तज्ज्ञानं जिनशासने व्यवच्छेदफलत्वाजिनशासन एव न त्वन्यस्मिन् सुगतादिशासने,अतो जिनशासन एव यत्नो विधेयो येन यथाऽहं जानामि तथा त्वमपि जानीये, शेष प्राग्वदिति सूत्रार्थः । पुनरुपदेष्टुमाह किरियं च रोअए धीरो, अकिरियं परिवजए । दिट्ठीए दिहिसंपन्नो, धम्मं चरसु दुचरं ॥ ३३ ॥ A 'क्रियां च' अस्ति जीव इत्यादिरूपां सदनुष्ठानात्मिकां वा रोचयेत्' तथा तथा भावनातो यथाऽसावात्मने रुचिता जायते तथा विदध्यात् 'धीरः' मिथ्याग्भिरक्षोभ्यः, तथा 'अक्रियां' नास्त्यात्मेत्यादिकां मिथ्यापरिकल्पिततत्तदनुष्ठानरूपां वा 'परिवर्जयेत् परिहरेत् , ततश्च 'दृष्ट्या' सम्यग्दर्शनात्मिकया हेतुभूतया 'दिद्विसंपन्नो'त्ति "धीदृष्टिः शेमुषी धिपणा" इति शाब्दिकश्रुतेदृष्टिः-बुद्धिः, सा चेह प्रस्तावात्सम्यगुज्ञानात्मिका तया संपन्नोयुक्तो दृष्टिसंपन्नः, एवं च सम्यग्दर्शनज्ञानान्वितः सन् 'धर्म' चारित्रधर्म 'चर' आसेवख 'सुदुश्चरम्' अत्यन्तदुरनुठेयमिति सूत्रार्थः । पुनः क्षत्रियमुनिरेव सञ्जयमुनि महापुरुषोदाहरणैः स्थिरीकर्तुमाह| एवं पुण्णपर्य सुच्चा, अत्थधम्मोवसोहियं । भरहोऽवि भारहं वासं, चिचा कामाई पब्बए॥ ३४ ॥सगरोऽपि सागरंतं, भरहवासं नराहियो । इस्सरियं केवलं हिचा, दयाए परिनिव्वुडे ॥ ३५ ॥ चहत्ता भारहं वासं, % दीप % % अनुक्रम [५९१] % % पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~394 Page #395 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||३४-५०|| नियुक्ति: [४०३...], प्रक्षेपगाथा [१] वृहदृत्तिः प्रत सूत्रांक ||३४ -५०|| उत्तराध्य. चक्कवही महिहीओ। पव्वजमभुवगओ, मघवं नाम महाजसो ॥ ३६॥ सर्णकुमारो मणुस्सिदो, चकवधी संयतीयामहिहीओ। पुत्तं रजे ठवित्ता णं, सोवि राया तवं चरे ॥ ३७॥ चहत्ता भारहं वासं, चक्कवट्टी महिडीओ। ध्य. १८ संती संतिकरो लोए, पत्तो गइमणुत्तरं ॥३८॥ इक्खागरायवसहो, कुंथूनाम नरेसरो। विक्खायकित्ती घिइम, ॥४४७॥ मुक्खं गओ अणुत्तरं ॥ ३९॥ सागरंतं जहित्ता गं, भरहवासं नरेसरो। अरो अ अरयं पत्तो, पत्तो गइम णुत्तरं ॥४०॥ चइत्ता भारहं वासं, चकवट्टी महिडीओ। चिच्चा य उत्तमे भोए, महापउमो दर्म चरे॥४१॥ एगच्छत्तं पसाहित्ता, महिं माणनिसूरणो । हरिसेणो मणुस्सिदो, पत्तो गइमणुत्तरं ॥४२॥ अनिओ राय सहस्सेहि, सुपरिचाई दमं चरे । जयनामो जिणक्खायं, पत्तो गइमणुत्तरं ॥४३॥ दसपणरज्ज़ मुइयं, चइत्ता दाणं मुणी गरे । दसण्णभद्दो निक्खंतो, सक्ख सकेण चोइओ॥४४॥ नमी नमेह अप्पाणं,सक्खं सकेण चोइओ जहितो रजं वहदेही, सामने पजुवडिओ। (प्रक्षिसा)। करकंडू कलिंगाणं, पंचालाण य दुम्मुहो। णमी राया # ४|| विदेहाण, गंधाराण य नग्ग॥४५॥ एए नरिंदवसभा, निक्खंता जिणसासणे । पुत्ते रजे ठवित्ता णं का १ नमिप्रव्रज्याध्ययनगतेयं, अव्याख्यानं अग्रेतनाया अपि परं सूत्राणि सप्तदश इति सप्तदशसूत्रार्थ इति चाद्यान्त्यभागयोः पाठात् अवश्य ॥४४७॥ दि अत्र गाथा। सप्तदश ग्रामाः,नम्यधिकारशाप्रेतन्यामपि,नियुक्तौ च नवमाध्ययने इयमिति युक्तियुक्तं मूले उच्चारणमस्या अत्रेति एपैव प्रक्षिप्ताऽ-13 ति २ चइऊण गेहं प्र० नमिप्रव्रज्याध्ययने च दीप अनुक्रम [५९३ -६१०] For any पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~395 Page #396 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||३४-५०|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ||३४ -५०|| सामन्ने पज्जुबहिआ ॥ ४६॥ सोवीररायवसभो, चइत्ता ण मुणीचरे । उद्दायणो पब्वइओ, पसो गइमणुत्तरं ॥४७॥ तहेव कासिरायावि, सेओ सञ्चपरक्कमो । कामभोगे परिचन्न, पहणे कम्ममहावणं ॥ ४८॥ तहेव विजओ राया, अणहा कित्तिपब्वए । रज्जं तु गुणसमिद्धं, पयहिन महायसो ॥ ४९ ॥ तहेबुग्गं तवं किच्चा, अब्वक्खित्रोण चेयसा । महायलो रायरिसी, अद्दाय सिरसा सिरं ॥५०॥ 1 सूत्राणि सप्तदश। एतत् अनन्तरोक्तं पुण्यहेतुत्वात्पुण्यं तच्च तत् पद्यते-गम्यतेऽनेनार्थ इति पदं च पुण्यपदं, पुण्यस्य दवा पद-स्थानं पुण्यपदं-क्रियादिवादिस्वरूपनानारुचिपरिवर्जनाद्यावेदकं शब्दसंदर्भ 'श्रुत्वा' आकर्ण्य, अर्थात इत्यर्थः खगोपवादिः धर्म:- तदुपायभूतः श्रुतधर्मादिस्ताभ्यामुपशोभित-विभूषितमर्थधर्मोपशोभितं 'भरतोऽपि' भरतनामा चक्रवत्यैपि, अपिशब्द उत्तरापेक्षया समुच्चये 'भारहंति प्राकृतत्वाद्धारतं 'वर्ष' क्षेत्र 'सक्त्वा' हित्वा 'कामाईति र चस्य गम्यमानत्वात् 'कामांश्च' विषयान् प्राकृतत्वानपुंसकनिर्देशः, पवए'त्ति प्रात्राजीत् ॥ 'सगरोऽवी" त्यादि सर्व मपि स्पष्टं, नवरं 'सागरान्तं' समुद्रपर्यन्तं दिकत्रये, अन्यत्र तु हिमवत्पर्यन्तमित्युपस्कारः, तथा 'ऐश्वर्यम्' आज्ञैश्वयोदि केवलं' परिपूर्णमनन्यसाधारणं वा 'दयया' संयमेन 'परिनिर्वृतः' इहैव विध्यातकपायानलत्वाच्छीतीभूतो मुक्तो वा॥ तथा 'अरो यत्ति अरनामा च तीर्थकृचक्रवर्ती 'अरय'ति रतस्य रजसो वाऽभावरूपमरतमरजो वा, पाठान्तरतोऽरसं वा-शृङ्गारादिरसाभावं, प्रातः सन् 'प्राप्तः' गतो गतिमनुत्तरां-मुक्तिमित्यर्थः । तथा त्यक्त्वोत्तमान दीप अनुक्रम [५९३ -६१०] SamEditatantmumational Faramaarwatatuwant पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~396 Page #397 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||३४-५०|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ॥४४॥ ||३४ -५०|| लाभोगानिति, पुनस्त्यक्त्वेत्यभिधानं भिन्नवाक्यत्वादपौनरुक्त्यं, 'महापद्मः' महापद्मनामा 'चरे'त्ति आचरत् ॥ तथा एका संयतीया. उत्रं-नृपतिचिह्नमस्यामित्येकच्छत्रां तां, कोऽर्थः-अविद्यमानद्वितीयनृपति 'महीं पृथ्वीं 'प्रसाध्य' वशीकृत्येति || बृहद्वृत्तिः सम्बन्धः, 'माणनिसूरणो'त्ति रसारात्यहङ्कारविनाशकः 'मनुष्येन्द्रः' इति चक्री । तथा 'अग्नितो'त्ति 'अन्वितः' युक्तः 'सुपरिचाईत्ति सु-शोभनेन प्रकारेण राज्यादि परित्यजतीत्येवंशीलः सुपरित्यागी दमं जिनाख्यातमिति सम्बन्धः, चिरित्ति अचारीचरित्वा च जयनामा चक्रीति शेषः प्राप्तोगतिमनुत्तराम् ॥ तथा दशार्णो नाम देशस्तद्राज्यं तदाधिहै पसं 'मुदितं' सकलोपद्रवविरहितं प्रमोदवत् सक्त्वा 'ण' प्राग्वत् 'चरे'त्ति अचारीत्, अप्रतिबद्धविहारतया विह-18 तयानित्यर्थः, साक्षाच्छक्केण 'चोदितः' अधिकविभूतिदर्शनेन धर्म प्रति प्रेरितः ॥ तथा 'निष्कान्ताः' प्रजिता । 18/निष्कम्य च 'श्रामण्ये श्रमणभावे 'पयुपस्थिताः' तदनुष्ठानं प्रत्युद्यता अभूवन्निति शेषः॥ तथा सौवीरेषु राजवृषभ: तत्कालभाविनृपतिप्रधानत्वात्सौवीरराजवृषभः 'चेचत्ति त्यक्त्वा राज्यमिति शेषः प्राग्वत्, मुनिः' त्रैकाल्यावस्थावेदी सन् 'चरे'त्ति अचारीत् , कोऽसौ ?-'उदायणोति उदायन्नामा प्रबजितः, चरित्वा च किमित्याह-प्राप्तो गतिम४/नुत्तराम् ॥ 'तथैव' तेनेष प्रकारेण 'काशिराजः काशिमण्डलाधिपतिः श्रेयसि-अतिप्रशस्ये सत्से-संयमे पराक्रमः-12॥४४८॥ दासामध्यें यस्यासी श्रेयः-सत्यपराक्रमः 'पहणे'त्ति प्राहन्-प्रहतवान् कर्म महावनमिवातिगहनतया कमेमहाव-1४ नम् ॥ तथैव 'विजयः' इति बिजयनामा 'अणट्टा कित्ति पवए'ति, आर्षत्वाद् अनार्चः-आध्यानविकलः कीर्त्या दीप अनुक्रम [५९३ -६१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~397 Page #398 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१८], मूलं [-1 / गाथा ||३४-५०|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ||३४ -५०|| दीनानाथादिदानोत्थया प्रसिद्धयोपलक्षितः सन् , यद्वा अनार्ता-सकलदोषविगमतोऽवाधिता कीर्तिरखेत्यनातकीर्तिः सन् , पठ्यते च 'आणटाकिइपबत्ति, आज्ञा-आगमोऽर्थशब्दस्य हेतुवचनस्यापि दर्शनादर्थो-हेतुरस्याः सा तथाविधा आकृतिरान्मुनिवेषात्मिका यत्र तदाज्ञार्थाकृति यथा भवत्येवं प्रात्राजीद्गुणैः-राज्यगुणैः शब्दादिभिवों समृद्धं-संपन्नं गुणसमृद्ध, पूर्वत्र तुशब्दस्थापिशब्दार्थत्वाधवहितसम्बन्धत्वाच गुणसमृद्धमपि । तथा 'अदाय'त्ति आर्षत्वाद् 'आदित' गृहीतवांस्तद्गमनेन स्वीकृतवान् शिरसेव शिरसा शिरःप्रदानेनेव जीवितनिरपेक्षमिति योऽर्थः, 'शिरति शिर इव शिरः सर्वजगदुपरिवर्णितया मोक्षः, पठ्यते च-'आदाय सिरसो सिरिंति, अन च आदाय' गृहीत्वा 'शिरः श्रियं' सर्वोत्तमां केवललक्ष्मी परिनिर्वृत इति शेषः, इति सप्तदशसूत्रार्थः ॥ इत्थं महापुरुषोदाहरणेानपूर्वकक्रियामाहात्म्यमभिधायोपदेष्टुमाह कहं धीरो अहेऊहिं, उम्मत्तो व्च महिं चरे। एए विसेसमादाय, सूरा दढपरकमा ॥५१॥ 'क' केन प्रकारेण 'धीरः' उक्तरूपः 'अहेतुभिः' क्रियावाद्यादिपरिकल्पितकुहेतुभिः 'उन्मत्त इव' ग्रहगृहीत इस तात्त्विकवस्त्वपलपनेनालजालभाषितया 'महीं पृथ्वी 'चरेत्' भ्रमेत् ?, नैव चरेदित्यर्थः, किमिति !, ये 'एते अनन्तरोदिता भरतादयः 'विशेष' विशिष्टतां गम्यमानत्वान्मिथ्यादर्शनेभ्यो जिनशासनस्य 'आदाय' गृहीत्वा मनसि संप्रधायतियावत् शूरा रढपराक्रमा एतदेवाश्रितवन्त इति शेषः, अयमभिप्रायः-यथैते महात्मानो विशेषमादायी दीप अनुक्रम [५९३ -६१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~398 Page #399 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [४०३...] प्रत सूत्रांक ||५१|| उत्तराध्य. कुवादिपरिकल्पितक्रियावाद्यादिदर्शनपरिहारतो जिनशासन एव निश्चितमतयोऽभूवंस्तथा भवताऽपि धीरेण सताs-II संयतीयाबृहद्वृत्तिः स्मिन्नेव निश्चितं चेतो विधेयमिति सूत्रार्थः । किञ्च | ध्य. १८ अचंतनियाणखमा, एसा मे भासिया वई । अतरिंसु तरंतेगे, तरिस्संति अणागया ॥५२॥ ॥४४९॥ अत्यन्तम्-अतिशयेन निदानः-कारणैः, कोऽर्थः १-हेतुभिर्न तु परप्रत्ययेनैव, क्षमा-युक्ताऽत्यन्तनिदानक्षमा, यद्वा । निदानं-कर्ममलशोधनं तस्मिन् क्षमा-समर्था 'एपा' अनन्तरोक्ता पाठान्तरतः 'सर्वा' अशेषा सत्सा वा 'मे' मया । भाषिता' उक्ता 'वाग्' वाणी जिनशासनमेवाश्रयणीयमित्येवंरूपा, अनयाऽङ्गीकृतया 'अतीर्घः' तीर्णवन्तः तरन्ति ४ एके' अपरे, पाठान्तरतोऽन्ये, सम्प्रत्यपि तत्कालापेक्षया क्षेत्रान्तरापेक्षया वेत्थमभिधानमिति, तथा तरिष्यन्ति जा'अनागताः' भाविनो, भवोदधिमिति सर्वत्र शेष इति सूत्रार्थः ॥ यतश्चैवमतःकहं धीरे अहेऊहिं, अद्दायं परियावसे । सव्वसंगविणिम्मुक्को, सिद्धे भवइ नीरए ॥५३॥ त्तिवेमि ।। ॥संजइज १८॥ X४४९॥ कथं धीरोऽहेतुभिः 'आदाय' गृहीत्वा, क्रियादिवादिमतमिति शेषः 'पर्यावसेत्' परीति-सर्वप्रकारमावसेत्-तत्रैव 21 ४ निलीयेत, नैव तत्राभिनिविष्टो भवेदिति भावः, पठ्यते च-'अत्ताणं परियावसित्ति आत्मानं पर्यावासयेद्, अहेतुभिः कथमात्मानमहेत्वावासं कुर्यात् ?, नैव कुर्यादित्यर्थः । किं पुनरित्वमकरणे फलमित्याह-सर्वे-निरवशेषाः सजन्ति ****** दीप अनुक्रम [६११] CAKACCटक * पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~399~ Page #400 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||५३|| दीप अनुक्रम [६१३] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्ति: [४०४] अध्ययनं [१८], मूलं [-] / गाथा || ५३ || कर्मणा संबध्यन्ते जन्तत्र एभिरिति सङ्गाः- द्रव्यतो द्रविणादयो भावतस्तु मिध्यात्वरूपत्वादेत एव क्रियादिवादास्तैविनिर्मुक्तो - विरहितः सर्वसङ्गविनिर्मुक्तः सन् सिद्धो भवति नीरजाः, तदनेनाहेतुपरिहारस्य सम्यग्ज्ञानहेतुत्वेन सिद्धत्वं फलमुक्तमिति सूत्रार्थः ॥ इत्थं तमनुशास्य गतो विवक्षितं स्थानं क्षत्रियः, शेषसञ्जयवक्तव्यतां त्वाह नियुक्तिकृत्काऊण तवच्चरणं बहूणि वासाणि सो धुयकिलेसो । तं ठाणं संपत्ती जं संपत्ता न सोयंति ॥ १०४॥ सुगमैव, नवरं धुताः- अपनीताः क्लिश्यन्त्येषु सत्सु जन्तव इति क्लेशाः - रागादयो येन स धुतक्लेशो, यत्संप्राप्ता न शोचन्ते, शोकहेतुशारीरमानसदुःखाभावादिति गाथार्थः ॥ 'इति' परिसमाप्तौ त्रवीमीति पूर्ववत् नयाश्च ॥ इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटीकायां सज्जयीयनामाष्टादशमध्ययनं समाप्तमिति ॥ इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां अष्टादशमध्ययनं समाप्तमिति ॥ For Parsons Private Onl पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अत्र अध्ययनं १८ परिसमाप्तं ~ 400~ Page #401 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [--1 / गाथा ||५३...|| नियुक्ति: [४०५-४०७] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ४५०॥ प्रत सूत्रांक ||५३|| अथ एकोनविंशं मृगापुत्रीयमध्ययनम् । मृगापुत्री दिया. १९ व्याख्यातमष्टादशमध्ययनम् , अधुनैकोनविंशमारभ्यते, अस्स चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययने भोगर्द्धित्याग उक्तः, तस्साच श्रामण्यमुपजायते, तचाप्रतिकर्मतया प्रशस्यतरं भवतीत्यप्रतिकर्मतोच्यत इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम् , अस्य तु चतुरनुयोगद्वारचर्चा प्राग्वद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे मृगापुत्रीयमिति नामातो मृगायाः पुत्रस्य च निक्षेपमाह नियुक्तिकृत् निक्लेवो अमिआए चउक्कओ दुविहो० ॥ ४०५॥ जाण० ॥ ४०६ ॥ मिअआउनामगोयं वेयंतो भावओ मिओ होइ । एमेव य पुत्तस्सवि चउक्कओ होइ निक्लेवो ॥४०॥ F गाथात्रयं प्राग्वत् , नवरं मृगाभिलापेन नेयम् ॥ नामनिरुक्तिमाह६ मिगदेवीपुत्ताओ बलसिरिनामा समुट्रियं जम्हा । तम्हा मिगपुत्तिजं अज्झयणं होइ नायव्वं ॥४०॥ ४५०॥ | मृगा-नाना देवी-अग्रमहिषी तस्याः पुत्रः-सुतो मृगादेवीपुत्रस्तस्मादलश्रीनाम्नः 'समुत्थितं' समुत्पन्नं यस्मा-1 तस्मान्मृगापुत्रीयं-मृगापुत्रीयनामकं मृगाशब्देन मृगादेव्युक्तरध्ययनमिदमिति शेषः, भवति 'ज्ञातव्यम्' अवबोद्धव्य-10 दीप अनुक्रम [६१३] MEducational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अथ अध्ययनं - १९ "मृगापुत्रीय" आरभ्यते ~401~ Page #402 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||१-४|| नियुक्ति: [४०८] (४३) प्रत सूत्रांक ||१-४|| मिति गाथार्थः ॥ गतो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनिष्पन्ननिक्षेपस्वावसरः, स च सूत्रे सति भवति, अतः सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तञ्चेदम्४. सुग्गीवे मयरे रम्मे, काणणुज्जाणसोहिए। राया बलभहुत्ति, मिया तस्सग्गमाहिसी॥१॥तेसिं पुत्ते बलदसिरी, मियापुत्तत्ति विस्सुए। अम्मापिऊहिं दइए, जुवराया दमीसरे ॥२॥ नंदणे सो उ पासाए, कीलए सह इस्थिहिं । देवो दोगुंदगो चेव, निचं मुइयमाणसो॥३॥ मणिरयणकुटिमतले, पासायालोअणे ठिओ। आलोएइ नगरस्स, चउक्कतियचच्चरे ॥४॥ हा 'सुग्रीवे' सुग्रीवनानि नगरे 'रम्ये रमणीये काननैः-बृहदक्षाश्रयैर्वनरुद्यानैः-आरामैः क्रीडावना शोभिते राजिते काननोद्यानशोभिते 'राजा' नृपो बलभद्र इति नाम्नेति शेषः, 'मृगा' मृगानाम्नी 'तस्य' इति बलभद्रस्य राज्ञः 'अग्गमहिसि'त्ति 'अग्रमहिषी' प्रधानपत्नी ॥ 'तयोः' राज्ञोः पुत्रः 'बलश्रीः' बलश्रीनामा मातापितृविहितनाम्ना लोके च मृगापुत्र इति 'विश्रुतः' विख्यातः, 'अम्मापिऊणं'ति अम्मा(म्बा)पित्रोः 'दयितः' बल्लभः 'युवराज' कृतयौवराज्याभिषेको दमिनः-उद्धतदमनशीलास्ते च राजानस्तेषामीश्वर:-प्रभुर्दमीवरः, यद्वा दमिनः-उपशमिनस्तेषां सहजोपशमभावत ईश्वरो दमीश्वरः, भाविकालापेक्षं चैतत् ॥ 'नन्दने लक्षणोपेततया समृद्धिजनके 'सः । मृगापुत्रः 'तुः वाक्यान्तरोपन्यासार्थः प्रासादे 'क्रीडति' विलसति 'सह' समं 'सीभिः' प्रमदाभिः, क इव ?-'देवः | 54-52- 53-925ARACK दीप अनुक्रम [६१४ -६१७] MEducational Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~402 Page #403 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [--1 / गाथा ||१-४|| नियुक्ति: [४०८], प्रक्षेप [१] वृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||१-४|| HI उत्तराध्यासुरः 'दोगुंदगो चेव'त्ति 'चा' पूरणे दोगुन्दग इव, दोगुन्दगाश्च त्रायखिंशाः, तथा च वृद्धा:-"त्रायस्त्रिंशा देवा निस मृगापुत्री द भोगपरायणा दोगुंदुगा इति भण्णंति", 'नित्यं सदा 'मुदितमानसः' इष्टचित्तः । स चैवं क्रीडन् कदाचिन्मणयश्चविशिष्टमाहात्म्याश्चन्द्रकान्तादयो रत्नानि च-गोमेयकादीनि मणिरत्नानि तैरुपलक्षितं कुहिमतलं यस्मिन्नसौ मणिरत्न या०१९ ॥४५॥ कुट्टिमतलः, गमकत्वाद्वहुव्रीहिः, तस्मिन् , आलोक्यन्ते दिशोऽस्मिन् स्थितरित्यालोकनं प्रासादे प्रासादस्य वाऽऽलोकन प्रासादालोकनं तस्मिन्-सर्वोपरिवर्तिचतुरिकारूपे गवाक्षे वा स्थितः-उपविष्टः 'आलोकते' कुतूहलतः पश्यति, कानि?-४ 'नगरस्य' तस्यैव सुग्रीवनाम्नः सम्बन्धीनि 'चतुष्कत्रिकचत्वराणि' प्रतीतान्येवेति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ ततः किमित्याह अह तत्थ अइच्छेतं, पासई समणसंजयं । तवनियमसंजमधर, सीलई गुणआगरं ॥२॥ तं पेहई मियापुत्ते, दिट्ठीए अणिमिसाइ उ । कहिं मन्नेरिसं रूवं, दिट्टपुर्व मए पुरा? ॥६॥ साहुस्स दरिसणे तस्स, अज्झय-14 साणमि सोहणे । मोहं गयस्स संतस्स, जाईसरणं समुप्पन्नं ॥ ७॥ देवलोगचुओ संतो, माणुसं भवमागओ।। सन्निनाणसमुप्पन्ने, जाई सरह पुराणयं । (प्र०)। जाईसरणे समुप्पण्णे, मियापुत्ते महिहिए । सरइ पोराणिों । जाई, सामण्णं च पुराकयं ॥८॥ ॥४५॥ 'अथ' अनन्तरं 'तत्र' इति तेषु चतुष्कत्रिकचत्वरेषु 'अतिच्छत'न्ति अतिक्रामन्तं पश्यति श्रम-11 माणसंयतमिति श्रमणस्य शाक्यादेरपि सम्भवात्तयवच्छेद्दार्थ संयतग्रहणं, तपश्च-अनशनादि नियमश्व-द्रव्याद्यभि दीप अनुक्रम [६१४ -६१७] SamEducation intimatana Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~403 Page #404 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥५-८|| दीप अनुक्रम [६१८ -६२१] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||५-८|| निर्युक्ति: [४०७R-४१३] | ग्रहात्मकः संयमश्च- उक्तरूपस्तान् धारयति तपोनियमसंयमधरस्तम्, अत एव शीलम् - अष्टादशशीलाङ्गसहस्ररूपं तेनाढ्यं परिपूर्ण शीलाढ्यं तत एव च गुणानां-ज्ञानादीनामाकर इव गुणाकरस्तं ॥ 'तमिति श्रमणसंयतं 'पेहद 'ति पश्यति 'मृगापुत्रः' युवराजः 'दृष्टया' दशा 'अणमिसाइ उ'त्ति तुशब्दस्यैवकारार्थत्वादविद्यमाननिमेपयैव, व 'मन्ये' जाने 'ईदृशम्' एवंविधं 'रूपम्' आकारो दृष्टपूर्वम्-अवलोकितं मया 'पुरा' इति पूर्वजन्मनि १, शेषं प्रतीतमेव, नवरम् 'अध्यवसाने' इत्यन्तःकरणपरिणामे 'शोभने' प्रधाने क्षायोपशमिकभाववर्त्तिनीतियावत् 'मोहं' केदं मया दृष्टं क्वेदमित्यतिचिन्तातश्चित्तसङ्घट्टजमूच्छीत्मकं 'गतस्य' प्राप्तस्य सतः ॥ तथा 'सरति'त्ति स्मरति पौराणिकी 'जाति' जन्म 'श्रामण्यं च ' श्रमणभावं 'पुराकृतं' जन्मान्तरानुष्ठितमिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ एतदेवातिस्पष्टताहेतोरनुगदितुमाह निर्युक्तिकृत्— | सुग्गीवे नयरंमि अ राया नामेण आसि बलभद्दो । तस्सासि अग्गमहिसी देवी उ मिगावई नामं ॥ ४०७ ॥ तेसिं दुण्हवि पुतो आसी नामेण बलसिरी धीमं । वयरोसभसंघयणो जुवराया चरमभवधारी ॥ ४०८ ॥ उन्नंदमाणहिअओ पासाए नंदणंमि सो रम्मे । किलई पमदासहिओ देवो दुकुंदगो चेव ॥ ४०९ ॥ अह अन्नया कथाई पासायतलंमि सो ठिओ संतो । आलोएइ पुरवरे रुंदे मग्गे गुणसमग्गे ॥ ४१० ॥ For Persona Prat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३], मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः | मूल संपादने अत्र निर्युक्तिगाथा: क्रमांकने किञ्चित् स्खलना दृश्यते, यत् क्रमांक ||४०७|| ||४०८ || द्वीवारान् लिखितं ~ 404~ Page #405 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१९], मूलं [--1 / गाथा ||५-८|| नियुक्ति: [४०७R-४१३] सूत्रांक ||५-८|| उत्तराध्य. अह पिच्छइ रायपहे वोलंत समणसंजयं तत्थ । तवनियमसंजमधरं सुअसागरपारगं धीरं ॥ ४११ ॥ 21 अह देहइ रायसुओ तं समणं अणमिसाइ दिट्रीए । कहि परिसयं रूवं दिटुं मन्ने मए पुवं ? ॥४१२॥ या. १९ एवमणुचिंतयंतस्स सन्नीनाणं तहिं समुप्पन्नं । पुत्वभवे सामन्नं मएवि एवं कयं आसि ॥ ४१३ ॥ ॥४५२॥ | गाथासप्तकं स्पष्टमेव, नवरं 'धृतिमान्' चितखास्थ्यवान् 'वऋषभ'मिति अर्थाद्वजऋषभनाराचं संहननं यस्य | हैस तथा 'चरमभवधारी' पर्यन्तजन्मवती, तथा 'उण्णंदमाणहियओं'त्ति, उत्-प्रावल्येन नन्दद्-आनन्दं गच्छत् हृदयं-मनो यस्य स तथा, प्राकृतत्वाच्छतृविषये शानचू, तथा 'रुन्दान्' विस्तीर्णान् 'मार्गान् विपणिमार्गादीन् । गुणैः-ऋजुत्वसमत्वादिभिः समग्राः-परिपूर्णा गुणसमग्रास्तान् , तथा श्रुतसागरपारगं धीरमिति तपोनियमसं-12 यमधरमित्यस्य सूत्रपदस्य हेतुदर्शनद्वारतस्तात्पर्यव्याख्यानम् , अनेनैव च भावभिक्षुत्वमुपदर्शितम् , अत एवान्यस्यैवं ला विशेषणायोगाच्छ्रमणसंयतमित्याह, सजिज्ञानं चेह सम्यग्दृशः स्मृतिरूपमतिभेदात्मकमिति गाथासप्तकावयवार्थः ।। सम्प्रति यदसावुत्पन्नजातिस्मरणः कृतवांस्तदाह ४५ विसएसु अरजतो, रज्जतो संजमंमि य । अम्मापियरं उवागम्म, इमं वयणमध्यवी ॥९॥ 'विसएहित्ति सुव्यत्ययाद 'विषयेषु' मनोज्ञशब्दादिषु 'अरजन्' अभिष्वामकुर्वन् , क-'संयमे' उक्तरूपे RECENE दीप अनुक्रम [६१८ -६२१] SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~4054 Page #406 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||९|| नियुक्ति : [४१३...] प्रत सूत्रांक ||९|| 'चः पुनरर्थः 'अम्मापियति अम्मा(म्बा)पितरौ 'उपागम्य' उपसृत्य 'इदम्' अनन्तरवक्ष्यमाणं वचनम् 'अब्रवीत इत्याह, इति सूत्रार्थः ॥ किं तदब्रवीदित्याह सुआणि मे पंच महब्वयाणि, नरएसु दुक्खं च तिरिक्वजोणिसु । निविण्णकामो मि महण्णवाओ, अणुजाणह पध्वइस्सामि अम्मो! ॥१०॥ 'श्रुतानि' आकर्णितानि, अन्यजन्मनीत्यभिप्रायः, 'मे' मया 'पञ्च' इति पञ्चसङ्ख्यानि 'महाव्रतानि' हिंसाविरम-15 दणादीनि, तथा नरकेषु 'दुःखं च' असातमिहैव वक्ष्यमाणं 'तिरिक्खजोणिसुत्ति चशब्दस्याप्रयुज्यमानस्यापि “अह-14 रिहर्नयमानो गामश्वं पुरुषं पशुम्" इत्यादाविय गम्यमानत्वात् तिर्यग्योनिषु च, सर्वत्र चायं न्यायो द्रष्टव्यः, उपलक्षणं चैतद् देवमनुष्यभवयोः, ततः किमित्याह-णिविण्णकामोमि'त्ति निर्विण्णकामः' प्रतिनि-4 वृत्ताभिलापोऽस्म्यहं, कुतः ?-महार्णव इव महार्णवः-संसारस्तस्माद्, यतश्चैवमतः 'अनुजानीत' अनुमन्यध्वं, मामिति शेषः, 'पञ्चइस्सामी ति प्रत्रजिष्यामि 'अम्मो'त्ति पूज्यतरत्वाद्विशिष्टप्रतिबन्धास्पदत्वाच मातुरामवणं, यो हि भविष्यदुःखं नावैति तत्प्रतिकारहेतुं वा स कदाचिदित्थमेवासीत, अहं तूभयत्रापि विज्ञ इति कथं न । दुःखप्रतीकारोपायभूतां महाव्रतात्मिकां प्रव्रज्या प्रतिपत्स्य इति सूत्रगर्भार्थः ॥ अमुमेवार्थमनुवादतः स्पष्टयितुमाह दीप अनुक्रम [६२३] नियुक्तिकृत् matt For at पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~406~ Page #407 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥१०॥ दीप अनुक्रम [६२४] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४५३॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१९], मूलं [--] / गाथा ||१०|| निर्युक्तिः [४१४] | सो लद्धबोहिलाभो चलणे जणगाण वंदिउं भणइ । वीसज्जिउमिच्छामो काहं समणत्तणं ताया ! ॥ ४१४ ॥ 'सः' इति मृगापुत्रो लब्धः - प्राप्तो बोधिलाभो – जिनधर्मप्राप्तिरूपो येन स तथा, 'चरणान्' पादान् 'जनकयोः' मात्रापित्रोर्वन्दित्वा भणति, यथा 'विसर्जयितुम्' मुत्कलयितुं वयमात्मानमिति गम्यते 'इच्छामः' अभिलषामः, किमिति ?, यतः 'काह'ति वचनव्यत्ययात्करिष्यामः 'श्रमणत्वं' प्रत्रज्यां 'तात !' इति पितः !, उपलक्षणत्वान्मातश्चेति गाथार्थः ॥ इदानीं तो कदाचिद्भोगैरुपनिमन्त्रये यातामित्यभिप्रायतो यत्तेनोक्तं तत्सूत्रकृदाह ! भोग, मुत्ता विसफलोवमा । पच्छा कडुयविवागा, अणुबंध दुहावहा ॥ ११ ॥ इमं सरीरं अणिचं, असुरं असुहसंभवं । असासयावासमिणं, दुक्खकेसाण भाषणं ॥ १२ ॥ असासए सरीरंमि, रई नोवलभामहं। पच्छा पुरा व चइयच्चे, फेणबुव्य संनिभे ॥ १३ ॥ सूत्रत्रयं प्रतीतार्थमेव, नवरं विपमिति---विषवृक्षस्तस्य फलं विषफलं तदुपमाः, तदुपमत्वमेव भावयितुमाह| पश्चात्कटुक इव कटुकोऽनिष्ठत्वेन विपाको येषां ते तथा, आपात एव मधुरा इति भावः, 'अनुबन्धदुःखावहाः' अनवच्छिन्नदुःखदायिनः, यथा हि विषफलमाखाद्यमानमादौ मधुरमुत्तरकालं च कटुकविपाकं सातत्येन च दुःखो| पनेतृ एवमेतेऽपीति, किञ्च -- अमी कामाः स्पर्शप्रधानाः, स्पर्शश्च शरीराश्रयः तच्चेदं शरीरम् 'अनित्यम्' अशाश्वतम् 'अशुचि' स्वाभाविकशौचरहितम् 'अशुचिसंभवम्' अशुचिरूपशुक्रशोणितोत्पन्नम्, अशाश्वतः -- कथञ्चिद Education intemational For Parna Prat मृगापुत्री या० १९ ~ 407~ | ॥४५३॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #408 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||११-१३|| नियुक्ति: [४१४...] प्रत सूत्रांक ||११ ESCRICAX वस्थितत्वेऽप्यनित्य आवासः-प्रक्रमाजीवस्यावस्थानं यस्मिन्नित्यशाश्वतावासं, पुनः 'इदमित्यभिधानमतीवासार वावेशसूचक, दुःखम्-असातं तद्धेतवः क्लेशा:-ज्वरादयो रोगा दुःखक्लेशाः शाकपार्थिवादिवत्समासस्तेषां 'भाजनं' ६ स्थान, यतश्चैवमतोऽशाश्वते शरीरे 'रति' चित्तखास्थ्यं 'नोपलभेन प्राप्नोम्यहं, भोगेषु सत्खपीति गम्यते, शरीरा श्रयत्वात्तेषामिति भावः, शरीराशाश्वतत्वमेवाह-पश्चात्पुरा वा त्यक्तव्ये शरीरे इति प्रक्रमः, तद्धि पश्चादिति भुक्त भोगावस्थायां वार्धक्यादी, पुरा अभुक्तभोगितायां वा बाल्यादौ त्यज्यत इति, यद्वा पश्चादिति-यथास्थित्यायुःक्षयो६चरकालं पुरा वेत्युपक्रमहेतोर्वषेशताद्यासंकलितजीवितप्रमाणात्प्रागपि 'वक्तव्ये' अवश्यत्याज्ये 'फेनबुद्धदसंनिभे क्षणष्टनष्टतया, अनेनाशाश्वतत्वमेव भावितमिति न पौनरुक्त्यमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ एवं भोगनिमन्त्रणपरिहारमभिधाय प्रस्तुतस्यैव संसारनिर्वेदस्य हेतुमाह| माणुसत्ते असारंमि, वाहीरोगाण आलए । जरामरणपत्थंमि, खणंपि न रमामहं ॥१४॥ जम्म दुक्खं: दाजरा दुक्खं, रोगा य मरणाणि य । अहो दुक्खो हु संसारो, जत्थ कीसंति जंतुणो॥१५॥ खित्तं वत्धुं हिरणं च, पुत्तदारं च बंधवा । चइत्ता ण इमं देहं, गंतब्यमवसस्स मे ॥ १६ ॥ जह किंपागफलाणं, परिणामो| 18 सुंदरो।एवं भुत्ताण भोगाणं, परिणामो न सुंदरो॥१७॥ सूत्रचतुष्टयं स्पष्टं, नवरं व्याधयः-अतीव बाधाहेतवः कुष्ठादयो रोगाः-ज्वरादयस्तेषाम् 'आलये' आश्रये 'जरा-1* -१३|| दीप अनुक्रम [६२५६२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~408 Page #409 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||१४-१७|| नियुक्ति : [४१४...] प्रत सत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४५४॥ सूत्रांक ||१४ -१७|| मरणग्रस्ते' वार्द्धक्यमृत्युक्रोडीकृते, अनेन मानुषत्वासारत्वमेव भावितं, क्षणमपि 'न रमे' नाभिरतिं लभेऽहमिति । मृगापुत्रीइत्थं मनुष्यभवस्थानुभूयमानत्वेन निर्वेदहेतुत्वमभिधाय सम्प्रति चतुर्गतिकस्यापि संसारस्य तदाह-'जम्म'मित्यादिना, या० १९ अत्र च अहो इति सम्बोधने 'दुक्खो हु'त्ति दुःखहेतुरेव संसारो जन्मादिनिवन्धनत्वात्तस्य 'यत्र' यस्मिन् गतिचतटयात्मके संसारे 'क्लिश्यन्ति' बाधामनुभवन्ति, जन्मादिदुःखैरेवेति गम्यते, 'जन्तवः' प्राणिनः, इह च दुःखानुभवाधारत्वेन संसारस्य दुःखहेतुत्वमिति भावः । तथा 'खेत्तमित्यादिनेष्टवियोगोऽशरणत्वं च संसारान्निदहेतुरुक्तः, तथा किम्पाको-वृक्षविशेषस्तस्य फलान्यतीव सुखादानि, अनेन चोपसंहारसूत्रेणोदाहरणान्तरद्वारेण भोगदुरन्ततैव निर्वेदहेतुरुक्ता इति सूत्रचतुष्टयावयवार्थः॥ इत्थं निर्वेदहेतुमभिधाय दृष्टान्तद्वयोपन्यासतः खाभिप्रायमेव प्रकटयितुमाह-2 - अहाणं जो महंत तु, अपाहेजो पवजई । गच्छंतो से दुही होइ, छुहातण्हाइपीडिओ ॥ १८ ॥ एवं धम्म । अकाऊणं, जो गच्छद परं भव । गच्छंतो से दुही होई, वाहिरोगेहिं पीडिओ ॥१९॥ अद्धाणं जो महंत तु, सपाहे जो पवजई । गच्छंती से सुही होइ, छुहातहाविवजिओ॥२०॥ एवं धम्मपि काऊणं, जो गच्छह परं ४५४|| भवं । गच्छंते से सुही होइ, अप्पकम्मे अवेयणे ॥ २१॥ जहा गेहे पलित्तंमि, तस्स गेहस्स जो पहू । सार-14 भंडाणि नीणेइ, असारं अबउज्झइ ॥ २२॥ एवं लोए पलिमि, जराए मरणेण य । अप्पाणं तारहस्सामि, तुन्भेहिं अणुमनिओ ॥ २३ ॥ दीप अनुक्रम [६२८६२९] For Prato THROEnantarm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~409~ Page #410 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१८ -२३|| दीप अनुक्रम [६३० -६३७] Ex [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा || १८-२३|| निर्युक्ति: [४१४...] सूत्रषङ्कं प्रकटार्थमेव केवलमत्र प्रथमसूत्रेण दृष्टान्त उक्तः, अत्र च 'अध्वानं' मार्ग पथि साधु पाथेयं-सम्बलकं तद्यस्याविद्यमानं सोऽपाथेयः 'प्रपद्यते' अङ्गीकुरुते, क्षुत्तृष्णापीडितत्वं चेह दुःखित्वभवने हेतुः । द्वितीयसूत्रेण दार्शन्तिकोपदर्शनं, व्याधिरोगपीडितत्वं चात्र दुःखित्वभवने निमित्तं, दारिद्र्यादिपीडोपलक्षणं चैतत् । उत्तरसूत्रद्वयेन चैतत्सूत्रद्वयोक्तस्यैवार्थस्य व्यतिरेक उक्तः, तत्र सुखित्वे हेतुः क्षुत्तृष्णाविवर्जितत्वमुक्तम् । 'धर्म' पापविरतिरूपम् 'अपिः' पूरणे 'कृत्वा' विधाय गच्छन्नुपलक्षणत्वाद्वतच 'सः' इति धर्मकर्त्ता प्रक्रमात्पाथेयोपमधर्मसहितः सुखी भवति, सुखित्वे चाल्पकर्मत्वं हेतुरवेदनत्वं च अत्र च प्रस्तावात्कर्म पापं वेदना चासातरूपा गृह्यते, अनेन धर्म| कर्मकरणाकरणयोर्गुणदोपदर्शनाद्धर्मकरणाभिप्रायः प्रकटितः । 'जहे'त्यादिना च सूत्रद्वयेन तमेव दृढयति, अत्र च यथा सारभाण्डानि - महामूल्य वस्त्रादीनि 'णीणेइति निष्काशयति 'असारं' जरद्वस्त्रादि 'अवउज्झइ'त्ति अपोहति-त्यजति, एवं 'लोके' जगति 'पलित्तंमि त्ति प्रदीप्त इव प्रदीसे अत्याकुलीकृते 'आत्मानं' सारभाण्डतुल्यं 'तारयिष्यामि' जरामरणप्रदीप्तलोकपारं नेष्यामि, धर्मकरणेनेति प्रक्रमः, असारं तु कामभोगादि त्यक्ष्यामीति भावः, अनेन धर्मकरणे विलम्बासहिष्णुत्वमुक्तं युष्माभिरिति द्वित्वेऽपि पूज्यत्वाद् बहुवचनम्, 'अणुमन्निओ'त्ति अनुमतः - अभ्यनुज्ञात इति सूत्रषङ्कावयवार्थः ॥ एवं च तेनोके तिम्मापियरो, सामन्नं पुत ! दुच्चरं । गुणाणं तु सहस्त्राणि धारयन्वाई भिक्खुणा ॥ २४ ॥ समया For Parana Privat org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~410~ Page #411 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||२४-४३|| नियुक्ति : [४१४...] या०१९ प्रत सूत्रांक ||२४-४३|| उत्तराध्य. सब्वभूएसुं, सत्चमित्तेसु वा जगे। पाणाइवायविरई, जावज्जीवाय दुकरं ॥ २५ ॥ निचकालऽप्पमत्तेणं, मुसा- मृगापुत्रीबृहद्वृत्तिः । वायविवज्जणं । भासियब्वं हियं सचं, निचाउत्तेण दुफरं ॥ २६ ॥ दंतसोहणमाइस्स, अदत्तस्स विवजणं । अणवजेसणिज्जस्स, गिण्हणा अवि दुकरं ॥२७॥ विरई अयंभचेरस्स, कामभोगरसन्नुणा । उग्गं महब्वयं भं, ॥४५५॥ धारेयव्वं सुदुक्करं ॥२८॥ धणधन्नपेसवग्गेसु, परिग्गहविवजणं । सब्बारंभपरिचागो, निम्ममत्तं सुनुकरं ॥२९॥ चरब्बिहेवि आहारे, राईभोयणवञ्जणा । संनिहीसंचओ चेव, बजेयब्यो सुदुक्करं ॥ ३० ॥ छुहा तण्हा या सीउण्हं, दंसमसगा य वेयणा । अकोसा दुक्खसिज्जा य, तणफासा जल्लमेव य ॥ ३१॥ तालणा तज्जणा - बचेष, वहवंधपरीसहा । दुक्खं भिक्खायरिया, जायणा य अलाभया ॥ ३२॥ काबोया जा इमा वित्ती, केसलोओ अ दारुणो। दुक्खं बंभव्वयं घोरं, धारे अमहप्पणो ॥ ३३ ॥ सुहोइओ तुमं पुत्ता!, सुकुमालो सुमजिओ। न हुसी पभू तुमं पुत्ता, सामन्नमणुपालिया ॥ ३४ ॥ जावलीवमविस्सामो, गुणाणं तु महन्भरो। गरुओ लोहभारु व्व, जो पुत्ता! होइ दुब्वहो ।। ३५ ॥ आगासे गंगसोउ ब्व, पडिसोउब्व दुत्तरो। बाहाहिं। सागरो चेव,तरियव्वो य गुणोयही ॥३६।। वालुयाकवले चेब,निरस्साए उ संजमे । असिधारागमणं चेव, दुफरं चरिउ तवो ।। ३७ ॥ अहीवेगंतदिट्ठीए, चरित्ते पुत्त ! दुच्चरे। जवा लोहमया चेव, चावेयब्वा सुदुकरं ॥ ३८॥2 जहा अग्गिसिहा दित्ता, पाउं होड सुदुकरं । तह दुकर करेउं जे, तारुण्णे समणत्तणं ॥ ३९॥ जहा दुक्खं दीप अनुक्रम [६३०-६५७] SSC ॥४५५ SamEducatum tnternational Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~411 Page #412 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||२४-४३|| नियुक्ति : [४१४...] प्रत सूत्रांक ||२४-४३|| करटर भरे जे, होइ वायस्स कुत्थलो। तहा दुक्खं करेउं जे, कीवेणं समणत्तणं ॥४०॥ जहा तुलाए तोले, दुकर मंदरो गिरी । तहा णिहुअणीसंकं, दुक्करं समणतणं ॥४१॥ जहा भुयाहि तरिगं, दुकरं रयणायरो । तहा। अणुवसंतेणं, दुकरं दमसायरो॥४२॥ मुंज माणुस्सए भोए, पंचलक्खणए तुमं । भुत्तभोगी तओ जाया, पच्छा धम्म चरिस्ससि ।। ४३ ॥ M सूत्रविंशतिः सुगमैव, नवरं 'त'मिति बलश्रियं मृगापुत्रापरनामक युवराज 'विति'ति बेतः-अभिधत्तः 'अम्मापियरोत्ति अम्बापितरौ श्रामण्यं पुत्र! दुश्चरं, यतस्तत्र 'गुणानां' श्रामण्योपकारकाणां शीलाङ्गरूपाणां सह-12 स्राणि धारयितव्यानि आत्मनि स्थापयितव्यानि, प्राक्तुशब्दस्यैवकारार्थस्पेह सम्बन्धाद्धारयितव्यान्येव प्रतग्रहण इति गम्यते 'भिक्षुणा' भिक्षणशीलेन सता, पठ्यते च-भिक्खुणोति भिक्षोः सम्बन्धिनां गुणानामिति योगः। तथा है। RI'समता' रागद्वेषाविधानतस्तुल्यता 'सर्वभूतेषु' समस्तजन्तुषु, उदासीनेष्विति गम्यते, 'शत्रुमित्रेषु वा अपकार्युपकारिपु, जगति' लोके, अनेन सामायिकमुक्तं, तथा 'प्राणातिपातविरतिः' प्रथमत्रतरूपा 'जावजीव(वा य)त्ति यावज्जीवं 'दुष्करं' दुरनुचरमेतदिति शेषः । नित्यकालाप्रमत्तेनेत्यप्रमत्तग्रहणं निद्रादिप्रमादवशगो हि मृषाऽपि भाषेतेति, नित्यायु-15 क्तेन-सततोपयुक्तेन अनुपयुक्तस्यान्यथाऽपि भाषणसंभवाद् ,एतच्च दुष्कर,यच्चान्वयव्यतिरेकाभ्यामेकस्याप्यर्थस्थाभिधानं । तत्स्पष्टतार्थमदुष्टमेवेत्येवं सर्वत्र भावनीयम् , अनेन द्वितीयत्रतदुष्करत्वमभिहितम्। 'दंतसोहणमादिस्स'त्ति, मकारो दीप अनुक्रम [६३०-६५७] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~412~ Page #413 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||२४-४३|| नियुक्ति : [४१४...] प्रत बृहदत्तिः या०१९ ॥४५६॥ सूत्रांक ||२४-४३|| % Msलाक्षणिकः, अपिशब्दस्य गम्यमानत्वात् 'दन्तशोधनादेरपि' अतितुच्छस्यास्तामन्यस्य, तथाऽनवद्यैषणीयस्य दत्तस्या- मृगापुत्री पीति गम्यते 'गिण्हण'त्ति ग्रहणमिति तृतीयत्रतदुष्करत्वोक्तिः । 'कामभोगरसण्णुण'त्ति कामभोगाः-उक्तरूपाजास्तेयां रसः-आखादः कामभोगरसः यद्वा रसाः-शृङ्गारादयस्ततः कामभोगाश्च रसाच कामभोगरसास्त्रज्ञन, तदज्ञस्य | हि तदनवगमात्तद्विषयोऽभिलाप एव न भवेत् तथा च सुकरत्वमपि स्यादित्याशयेनैवमभिधानम् , अनेन चतुर्थ-|| है तदुष्करत्वमुक्तम् । परिग्रहः-सत्सु स्वीकारस्तद्विवर्जनं, तथा सर्वे-निरवशेषा ये आरम्भाः-द्रव्योत्पादनव्यापारास्तत्प-11 |रित्यागः, अनेन निराकात्यमुक्तं निर्ममत्वं च, गम्यमानत्वाचस्य, सर्वत्र ममेति बुद्धिपरिहारः, अनेन पञ्चमहाव्रत-14 दुष्करतोक्ता । संनिधीयते नरकादिष्वनेनात्मेति संनिधिः-घृतादेरुचितकालातिक्रमेण स्थापनं स चासी सञ्चयश्च सनिधिसञ्चयः स चैव वर्जयितव्य इत्येतत्सदुष्करम , अनेन पष्ठत्रतदुष्करत्वमुक्तं, दिवाग्रहीतदिवाभुक्तादिभङ्गचतुष्ट-13 यरूपत्वात्तस्य । 'छुहे'त्यादिना परीपहाभिधानम् , अत्र च 'दंशमशकवेदना' तद्भक्षणोत्थदुःखानुभवरूपा 'दुःख-141 ४ शय्या च' विषमोन्नतत्वादिना दुःखहेतुर्वसतिः, 'ताडना' करादिभिराहननं 'तर्जना' अङ्गुलिभ्रमणभूत्क्षेपादिरूपा 21 दावधश्च-लकुदादिग्रहारो बन्धश्च-मयूरवन्धादिस्तावेव परीषही वधबन्धपरीषही, 'याजा' प्रार्थना चकारोऽनुक्का- ४५६॥ शंषपरीपहसमुपयार्थः, दुःखशब्दह वहःखमित्यादि प्रत्येक योजनीयः, इह च बन्धताडने वधपरीपहेऽन्तभेवतः, तजेना आक्रोश, भिक्षाचर्या च याञ्चायां भेदोपादानं च व्युत्पत्त्यर्थमिति भावनीयं, कपोता:-पक्षिविशेपास्त %% %% % दीप अनुक्रम [६३०-६५७] H - R SamEducatml For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~413 Page #414 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||२४-४३|| नियुक्ति : [४१४...] प्रत सूत्रांक ||२४-४३|| तोपामियं कापोती येयं वृत्तिः-निर्वहणोपायः, यथा हि ते नित्यशङ्किताः कणकीटकादिग्रहणे प्रवर्त्तन्ते, एवं भिक्षु रप्येषणादोपशवयेच भिक्षादौ प्रवर्तते, सा च दुरनुचरत्वेन दारयति कातरमनांसीति दारुणेत्युत्तरेण योगः, अभि-12 धेयवशाच लिङ्गविपरिणामः, उपलक्षणं चैतत्समस्तोत्तरगुणानामिति, याचेह ब्रह्मत्रतस्य पुनर्दुद्धरत्या भिधानं तदस्याति६ दुष्करत्वख्यापनार्थम् ॥ उपसंहारमाह-सुखं-सातं तस्योचितो-योग्यः सुखोचितः 'सुकुमारः' अकठिनदेहः 'सुमजितः' सुप्तु सपितः, सकलनेपथ्योपलक्षणं चैतत्, इह च सुमजितत्वं सुकुमारत्वे हेतुः, उभयं चैतत्सु खोचितत्वे, अतश्च 'न हुसि'त्ति नैव असि-भवसि 'प्रभुः' समर्थः 'श्रामण्यम्' अनन्तरोदितगुणरूपम् 'अणुपालेउ'न्ति | ४ अनुपालयितुम् , इह च सुखोचितत्वाभिधानमनीशो हीरशं दुःखमपि न दुःखमिति मन्यते ॥ पुनरप्रभुत्वमेवोदा-14 दहरणैः समर्थयितुमाह-'अविश्रामः' यत्रोदते न विश्रम्यते 'गुणानां' यतिगुणानां 'तुः' पूरणे 'महाभरः' महासमूहो गुरुको लोहमार इव यो दुर्वहः स वोढव्य इति शेषः, त्वं तु सुखोचित इत्यतो न प्रभुरसीत्युत्तरत्रापि योजनीयम् ॥ आकाशे गङ्गाश्रोतोचद् दुस्तर इति योज्यते, लोकरूढ्या चैतदुक्तं, तथा प्रतिश्रोतोवत्' यथा प्रतीपं जलप्रवाहो 'दुस्तरः दुःखेन तीर्यत इति, वाहुभ्यां 'सागरो चेव'त्ति सागरवच दुस्तरो यः सः 'वरितव्यः' पारगमनायावगाहयितव्यः, कोऽसौ ?, गुणाः-ज्ञानादयस्त उदधिरिव गुणोदधिः, कायवाअनोनियत्रणा चात्र दुष्करत्वे हेतुः, 'निराखादः' नीरसो विषयगृद्धानां बरस्यहेतुत्वात् ॥ 'अही'त्यादि, अहिरियैकोऽन्तो-निश्चयो यस्याः सा तथा, दीप अनुक्रम [६३०-६५७] SamEducatam intimational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~414~ Page #415 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||२४-४३|| नियुक्ति : [४१४...] प्रत सूत्रांक ||२४-४३|| सा चासौ दृष्टिश्चैकान्तदृष्टिस्तया-अनन्याक्षिप्तया, अहिपक्षे दशा, अन्यत्र तु बुझ्योपलक्षितम्, एकान्त- मृगापुत्रीभारष्टिकं वा चारित्रं दुश्चरं, विषयेभ्यो मनसो दुर्निवारत्वादिति भावः, 'जया लोहमया चेव'त्ति एवकारस्योपमार्थ या०१९ बृहद्वृत्तिः । त्वाद्यवा लोहमया इव चर्वयितव्याः, किमुक्तं भवति -लोहमययवचर्वणवत्सुदुष्करं चारित्रम् ॥ 'अग्निशिखा' अग्निज्वाला 'दीसे' त्युज्ज्वला ज्वालाकराला वा, द्वितीयार्थे चात्र प्रथमा, ततो यथाऽग्निशिखां दीसां पातुं सुदुष्करं, है नृभिरिति गम्यते, यदिवा लिङ्गव्यत्ययात् सर्वधात्वर्थत्वाच करोतेः 'सुदुष्करा' सुदुःशका यथाऽग्निशिखा दीसा पातुं भवतीति योगः, एवमुत्तरत्रापि भावना, 'जे' इति निपातः सर्वत्र पूरणे, कोत्थल इह वस्त्रकम्बलादिमयो , गृह्यते, चर्ममयो हि सुखेनैव नियेतेति, 'क्लीवेन' निःसत्त्वेन 'निभृतं निःशक' मित्यत्र निभृतं-निश्चल विषयाभिKलापादिभिरक्षोभ्यं 'निःश' शरीरादिनिरपेक्षं शङ्काख्यसम्यक्त्वातिचारविरहितं वा ॥ १८ 'अनुपशान्तेन' उत्क-४ टकषायेण, इह च दमसागर इत्यनेन प्राधान्यख्यापनार्थ केवलस्यैवोपशमस्य समुद्रोपमाभिधानं, पूर्वत्र तु गुणोदधिरित्यनेन निःशेषगुणानामिति न पौनरुक्त्यं ॥ यतश्चैवं तारुण्ये दुष्करा प्रव्रज्याऽतो भुजेत्यादिना पितरौ कृत्योपदेशं ब्रूतः, भुज्यन्त इति भोगास्तान् 'पञ्चलक्षणकान्' शब्दादिपञ्चकखरूपान् 'ततः' इति भोगभुक्तेरनन्तरं 'जाय'त्ति जातपुत्रः 'पश्चादिति वार्धक्ये 'चरिस्ससित्ति चरेरिति विंशतिसूत्रावयवार्थः ॥ २४-४३ ॥ सम्प्रति तद्वचनानन्तरं यन्मृगापुत्र उक्तवांस्तदाह दीप अनुक्रम [६३०-६५७] ॥४५७॥ SamEducatimotimatent For at warjunothianarm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~415 Page #416 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥४४ -७४|| दीप अनुक्रम [६५८ -६८८] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||४४-७४|| निर्युक्ति: [४१४...] तिम्मापरो, एवमेषं जहाफुडं । इहलोगे निष्पिवासरस, नत्थि किंचिवि दुक्करं ||४४ || सारीर माणसा चेव, बेयणा उ अणंतसो । मए सोढाओ[ई] भीमाओ[ई], असई दुक्खभयाणि य ।। ४५ ।। जरामरणकंतारे, चाउरंते भयागरे । मया सोढाणि भीमाई, जम्माई मरणाणि य ॥ ४६ ॥ जहा इहं अगणी उण्हो, इतोऽणंतगुणो तहिं । नरएसु वेयणा उण्हा, अस्साया बेइया मए ॥४७॥ जहा इहं इमं सीयं, इत्तोऽणंतगुणं तहिं । नरएसु वेयणा सीया, अस्साया बेहया मए ॥ ४८ ॥ कंदतो कंदुकुंभीसु, उद्धपाओ अहोसिरो। हुयासणे जलंतंमि, पक्कपुव्वो अनंतसो ॥४९॥ महादवग्गिसंकासे, मरुंमि वहरबालुए। कालंबवालुआए उ, दहृपुण्वो अनंतसो ॥ ५० ॥ रसंतो कंदुकुंभीसु, उहुं बद्धो अबंधवो । करवसकरकयाईहिं, छिन्नपुव्वो अनंतसो ॥ ५१ ॥ अइतिक्खकंटगाहणे, तुंगे सिंबलिपायवे । खेविधं पासवद्वेणं, कहोकडा हि दुक्करं ॥ ५२ ॥ महाजंतेसु उच्छुवा, आरसंतो सुभेरवं । पीलिओमि सकम्मेहिं, पावकम्मो अनंतसो ॥ ५३ ॥ कृतो कोलसुणएहिं, सामेहिं | सबलेहि य । पाडिओ फालिओ छिन्नो, विष्फुरंतो अणेगसो ||१४|| असीहिं अयसिवण्णेहिं, भल्लीहिं पहिसेहि य। छिन्नो भिन्नो विभिन्नो य, उववन्नो पावकस्मुणा ।। ५५ ।। अवसो लोहरहे जुत्तो, जलते समिलाजुए । वोइओ तुत्तजुतेहिं, रुज्झो वा जह पाडिओ ॥ ५६ ॥ हुआसणे जलंतंमि, चिआसु महिसो विव । दद्धो एक्को अ अवसो, पावकम्मेहिं पाविओ ॥ ५७ ॥ बला संडासतुंडेहिं, लोहतुंडेहिं पक्खिहिं । विलुत्तो विल For Parsons Prat wwro पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~416~ Page #417 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||४४-७४|| नियुक्ति: [४१४...] प्रत सूत्रांक ||४४-७४|| उत्तराध्य. वतोऽहं, ढंकगिद्धेहिंऽणतसो॥५८ ॥ तपहाकिलंतो धावतो, पत्तो वेयरणिं नई । जलं पाहति चिंतंतो, मृगापुत्री खुरधाराहिं विवाइओ॥ ५९॥ उपहाभितत्तो संपत्तो, असिपत्तं महावणं । असिपत्तेहिं पडतेहिं, छिन्नबृहद्वृत्तिः दपुवो अणेगसो ।। ६०॥ मुग्गरेहिं मुसुंदीहिं, सूलेहिं मुसलेहि य । गयासंभग्गगत्तेहिं, पत्तं दुक्खं अर्ण॥४५॥ तसो॥११॥ खुरेहिं तिक्खधाराहिं, छुरियाहिं कप्पणीहि य । कपिओ फालिओ छिन्नो, उकित्तो अ अणे गसो ॥ ६२॥ पासेहिं कूडजालेहिं, मिओ वा अवसो अहं । वाहिओ बद्धरुद्धो अ, विवसो चेव विवाइओ ॥६३|| गलेहिं मगरजालेहि, वच्छो वा अवसो अहं । उल्लिओ फालिओ गहिओ, मारिओ अ अणंतसो ॥३४॥ विदसएहिं जालेहि, लिपाहिं सउणो विव । गहिओ लग्गो अ बद्धो अ, मारिओ अ अर्णतसो ॥१५॥ कुहाडपरसुमाईहिं, वहईहिं दुमो विव । कुहिओ फालिओ छिन्नो, तच्छिओ अ अणंतसो ॥६६॥ चवेडमुहि-11 माईहिं, कुमारेहिं अयं पिव । ताडिओ कुडिओ भिन्नो, चुपिणओ अ अर्णतसो ॥६७ ॥ तत्ताई तंवलोहाई, तउआई सीसगाणि य । पाइओ कलकलंताई, आरसंतो सुभेरवं ॥ ६८॥ तुहप्पियाई मंसाई, खंडाई मुल्ल-13 ₹ गाणि य । खाविओ मि समंसाई, अग्गिवण्णाई णेगसो ॥६॥ तुहं पिया मुरा सीह, मेरओ अ महणि य । ॥४५८॥ पजिओ मि जलंतीओ, वसाओ रुहिराणि य ॥७०॥ निच्चं भीएण तत्धेणं, दुहिएणं वहिएणय । परमा दुहसंबद्धा, वेयणा वेड्या मए ॥ ७१ ॥ तिब्वचंडप्पगाढाओ, घोराओ अहदुस्सहा । महाभयाओ भीमाभो, नरएसुं दीप अनुक्रम [६५८-६८८] SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~417 Page #418 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥४४ -७४|| दीप अनुक्रम [६५८ -६८८] Educato [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||४४-७४|| निर्युक्ति: [४१४...] वेइया मए ॥ ७२ ॥ जारिसा माणुसेलोए, ताया ! दीसंति बेयणा । इतो अनंतगुणिया, नरएखं दुक्खवेयणा ॥ ७३ ॥ सव्वभवेसु अस्साया, वेयणा बेहया मए । निमितरमित्तंपि, जं साधा नत्थि वेयणा ॥ ७४ ॥ सूत्राण्येकत्रिंशत् प्रतीतान्येव, नवरं 'तद्' अनन्तरोक्तं 'विंति' 'ब्रुवन्ती' अभिदधतौ अम्बापितरौ प्रक्रमान्मृगापुत्र आह, यथा एवमित्यादि, पठ्यते च 'सो वेअम्मापियरो ।' त्ति स्पष्टमेव नवरमिह अम्बापितरावित्यामन्त्रणपदं पठन्ति च - 'तो बेंतऽम्मापियरो'त्ति 'विंति 'त्ति वचनव्यत्ययात्ततो ब्रूते अम्बापितरौ मृगापुत्र इति प्रक्रमः, 'एव' मिति यथोक्तं भवद्भ्यां तथा 'एतत्' प्रत्रज्यादुष्करत्वं 'यथास्फुटं' सत्यतामनतिक्रान्तमवितथमिति - यावत्, तथाऽपीहठोके 'निष्पिपासस्य' निःस्पृहस्य, इहलोकशब्देन च 'तात्स्थ्यात्तयपदेश' इतिकृत्वा ऐहलौकिकाः वजनधनसम्बन्धादयो गृह्यन्ते, 'नास्ति' न विद्यते किञ्चित्' अतिकष्टमपि शुभानुष्ठानमिति गम्यते, 'अपिः' संभावने 'दुष्करं' दुरनुष्ठेयं, भोगादिस्पृहायामेवास्य दुष्करत्वादिति भावः ॥ निःस्पृहताहेतुमाह-'शारीरे 'त्यादिना, तत्राप्याद्यसूत्रद्वयेन सामान्येन संसारस्य दुःखरूपत्वमुक्तम्, इह च शरीरमानसयोर्भवाः शारीरमानस्यो वेदनाः प्रस्तावादसातरूपाः 'दुक्खभयाणि यत्ति दुःखोत्पादकानि राजविरादिजनितानि ( भयानि ) दुःखभयानि, जरामरणाभ्यामतिगहन तया कान्तारं जरामरणकान्तारं तस्मिंश्चत्वारो देवादिभवा जन्ता - अवयवा यस्यासौ चतुरन्तः संसारः तत्र 'सोढानि' तदुत्थवेद नासहनेनानुभूतानि 'भीमानि' अतिदुःखजनकत्वेन रौद्राणि ॥ शारीरमानस्यो वेदना यत्रोत्कृष्टाः सोढा For Parsons Private Onl org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 418 ~ Page #419 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||४४-७४|| नियुक्ति : [४१४...] उत्तराध्य बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||४४-७४|| ॥४५९॥ यथेत्यादिभिः सूत्रैस्तदाह-यथा 'इह' मनुष्यलोकेऽनिरुष्णोऽनुभूयते 'अत' इत्येवमनुभूयमानादनन्तगुणः 'तहिति मृगापुत्री तेषु,येष्वहमुत्पन्न इति भावः,तत्र च बादरानेरभावात्पृथिव्या एव तथाविधः स्पर्श इति गम्यते,ततश्चोष्णानुभवात्म किया. १९ कत्वेन 'असातः' दुःखरूपा वेदिता मया,पठन्ति च-'इत्तोऽणंतगुणा तहिति, अत्र चातः-इहत्यामेरनन्तगुणा नरके-टी पूष्णा वेदना वेदिता मयेति योज्यम् ॥ तथा 'इदं यदनुभूयते 'इह' मनुष्यलोके 'शीतं' तच्च माघादिसंभवं हिमक-1 वाणानुषक्तमात्यन्तिकं परिगृह्यते, इहापि पठन्ति-'एत्तोऽणतगुणा तहिंति प्राग्वत् , 'कंदुकुम्भीषु' पाकभाजनविशेष-| रूपासु लोहादिमयीषु 'हुताशने' अग्नौ देवमायाकृते, महादवाग्निना संकाशः-सदृशोऽतिदाहकतया महादवाग्निसकाशस्तस्मिन् , इह चान्यस्य दाहकतरस्यासंभवादित्थमुपमाभिधानम् , अन्यथेहत्याग्नेरनन्तगुण एव तत्रोष्णपृथिव्य-|| नुभाव उक्तः, 'मरौं' इति मरुवालुकानिवह इव तात्स्थ्यात्तधपदेशसंभवादन्तभूतवार्थत्वाचात एव वज्रवालुकानदीस-IA म्बन्धिपुलिनमपि बज्रवालुका तत्र, यद्वा वज्रवद्वालुका यस्मिंस्त (स्मिन् स त) था तस्मिन्नरकप्रदेश इति गम्यते, |'कदम्बवालुकायां च' तथैव कदम्बवालुकानदीपुलिने च महादवाग्निसङ्काश इति योज्यते । 'ऊर्द्धम् उपरि वृक्षशाखादी 'बद्धः' नियत्रितो माऽयमितो नङ्गीदित्यवान्धव इति च तत्राशरणतामाह, करपत्र-प्रतीतं क्रकचमपि तद्विशेष एव 'खेदियति खिन्नं खेदः क्लेशोऽनुभूतः क्षिपितं वा पापमिति गम्यते, 'कहोकहाहि ति कर्पणापकर्षणैः परमाधार्मिककृतैः 'दुष्करम्' इति दुस्सहम् ॥'उच्छू वत्ति वाशब्द उपमार्थे,तत इक्षुरिव 'आरसन्' आक्रन्दन् 'खकर्मभिः' हिंसाधुपार्जिते दीप अनुक्रम [६५८-६८८] IR॥४५९॥ SamEducatm international hirjanatarangam पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~419~ Page #420 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||४४-७४|| नियुक्ति: [४१४...] RECA प्रत सूत्रांक ॥४४-७४|| निावरणादिभिः 'पापकर्मा' पापानुष्ठानः॥ 'कूवंतो'त्ति कूजन् 'कोलसुणएहिंति सूकरखरूपधारिभिः श्यामैः शवलैश्च | परमाधार्मिकविशेषैः 'पातितो' भुवि 'फाटितो' जीर्णवस्त्रवत् 'छिन्नो' वृक्षवदुभयदंष्ट्रादिभिरिति गम्यते 'बिस्फुरन् । इतस्ततश्चलन् 'अरसाहिति प्रहरणविशेषैः, पठ्यते च-'असीहिति 'असिभिः' खडैः अत एव 'अतसी'त्यतसीपुष्पं । तद्वर्णाभिः-कृष्णाभिः 'पदिशैश्च' प्रहरणविशेषैः 'छिन्नः' द्विधाकृतः 'भिन्नः' विदारितः 'विभिन्नः' सूक्ष्मखण्डीकृतः, यद्वा छिन्नः' ऊई 'भिन्नः' तिर्यग् 'विभिन्नः' विविधप्रकारैरूद्धै तिर्यक्च अवतीर्णो नरक इति गम्यते,पापकर्मणेति हेतु-12 दर्शनं पापानुष्ठानपरिहार्यताख्यापनार्थम् । 'लोहरथे' लोहमयशकटे 'जुत्तो'त्ति युजेरन्तर्भावितण्यर्थत्वाद्योजितः || परमाधार्मिकैरिति सर्वत्र गम्यते, 'ज्वलति' दीप्यमाने, कदाचिदाहभीत्या ततो नश्येदपीत्याह-समिलोपलक्षितं | का युगं यस्मिन् स तथा तत्र समिलायुते वा, पाठान्तरतश्च ज्वलत्समिलायुगे, 'चोइओ'त्ति प्रेरितः 'तोत्रयोः प्राज-120 नकबन्धनविशेषैमाघट्टनाहननाभ्यामिति गम्यते, 'रोज्झः'पशुविशेषः 'या' समुच्चये भिन्नक्रमः 'यथा' औपम्ये ततो रोज्झवत्पातितो वा लकुटादिपिट्टनेनेति गम्यते,हुताशने ज्वलति,केत्याह-'चितासु' परमाधार्मिकनिर्मितेन्धनसञ्चयरूपासु 'महिसो विव'त्ति, 'पिव मिव विव वा इवार्थे' इति वचनात्, महिष इव 'दग्धः' भस्मसात्कृतः 'पक्कः' भटित्रीकृतः 'पावितो'त्ति पापमस्यास्तीति भूनि मत्वर्थीयष्ठक् पापिकः 'बलात्' हठात् संदंशः-प्रतीतस्तदाकृतीनि तुण्डानि-मुखानि येषां ते संदंशतुण्डास्तैः, तथा लोहवनिष्ठुरतया तुण्डानि येषां तैलॊहतुण्डैः पक्सिहिंति पक्षि % दीप अनुक्रम [६५८-६८८] CACADAK SamEdicatml पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~420 Page #421 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||४४-७४|| नियुक्ति: [४१४...] प्रत सूत्रांक ||४४-७४|| सचराध्यमिकराद्धैरिति योगः, एते च वैक्रिया एव, तत्र तिरश्चामभावात् , 'विलुप्तः विविध छिन्नः। तख चैवं कदीमा- मृगापुत्रीनस्य तृड्डुत्पत्ती का वार्तेत्याह-तृष्णया क्लान्तो-ग्लानिमुपगतस्तृष्णालान्तः 'पाहंतीति पास्यामीति चिन्तयन् ।। पतयन्या०१९ - 'खुरधाराहिन्ति क्षुरधाराभिरतिच्छेदकतया वैतरणीजलोम्मिभिरिति शेषः, विपाटितः, पाठान्तरतश्च विपादितः॥४०॥ व्यापादित इत्यर्थः, उष्णेन-वज्रवालुकादिसम्बन्धिना तापेनाभि-आभिमुख्येन तप्त उष्णाभितप्तः संप्राप्तोऽसयः खड्गास्तद्वद्भेदकतया पत्राणि-पर्णानि यस्मिंस्तदसिपत्रं, 'मुद्रादिभिः' आयुधविशेषैर्गता-नष्टा आशा-परित्राण-2/ है गोचरमनोरथात्मिका यत्र तद्गताशं यथा भवत्येवं 'भग्गगत्तेहिं ति भग्नगात्रेण सता प्राप्त दुःखमिति योगः, कल्पितः वस्त्रवत् खण्डितः कल्पनीभिः पाटितः द्विधाकृतः ऊर्द्ध छुरिकामिश्छिन्नः खण्डितः क्षुरैरिति पश्चानुपूर्व्या सम्बन्धः, ४/इत्थं च 'उर्फतो यति उत्क्रान्तश्चायुःक्षये मृतश्चेत्यर्थः, पाठान्तरतो बोत्कृतः-स्वगपनयनेन प्रत्येकं वा क्षुरादिभिः | दिकल्पितादीनां सम्बन्धः ॥ 'पाशैः कूटजालैः' प्रतीतैरेव बन्धनविशेषैः 'अवशः' परवशः 'वाहितः' विप्रलब्धः, पठ्यते #च-'गहितो ति गृहीतो बद्धो बन्धनेन रुद्धो बहिःप्रचारनिषेधनेन, अनयोर्विशेषणसमासः, 'विवाइतो तिक विपादितो विनाशित इत्यर्थः, तथा 'गलैः' बडिशेर्मकरैः-मकराकारानुकारिभिः परमाधार्मिकैर्जालैश्च-तद्विरचिते-B४६०॥ विक्रियैरनयोर्द्वन्द्वः, समूहवाची वा जालशब्दस्तत्पुरुषश्च समासः, तथा 'उल्लिउ'त्ति आर्षत्वाद् उल्लिखितो गलैः पाहैटितो मकरैहीतश्च जालैः, यद्वा गृहीतोऽपि मकरजालैरेव मारितश्च सर्वैरपि, विशेषेण दशन्तीति विदंशकाः दीप अनुक्रम [६५८-६८८] SamEducatan fotamatana Faramanantimonld पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~421 Page #422 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||४४-७४|| नियुक्ति: [४१४...] प्रत सूत्रांक ॥४४-७४|| श्येनादयस्तैर्जालैः-तथाविधबन्धनैः लेप्पाहिति लेपैर्वज्रलेपादिभिः श्लेषद्रव्यैः 'सउणोविव'त्ति 'शकुन इव' पक्षीव । ६ गृहीतो विदंशकैर्जालैश्च लमश्च 'श्लिष्टो' लेपद्रव्यैर्वद्धः, तैर्जालैश्च, मारितश्च सर्वैरपि, 'कुट्टितः'सूक्ष्मखण्डीकृतः पाटि-4 तश्छिन्नश्च प्राग्वत् ,तक्षितश्च त्वगपनयनतो तुम इवेति सर्वत्र योज्यं।'चवेडमुट्ठिमाईहिं ति चपेटामुष्ट्यादिभिः प्रती तैरेव 'कुमारैः' अयस्कारैः 'अयं पिय'त्ति अय इव घनादिभिरिति गम्यते 'ताडितः' आहतः 'कुट्टितः' इह छिन्त्रः दि भिन्नः' खण्डीकृतः 'चूर्णितः' श्लक्ष्णीकृतः प्रक्रमात्परमाधार्मिकैः तप्तताम्रादीनि वैक्रियाणि पृथव्यनुभावभूतानि 8 वा 'कलकलंत'ति अतिकायतः कलकलशब्दं कुर्वन्ति॥ तब प्रियाणि मांसानि खण्डरूपाणि 'सोल्लगाणि ति भडित्रीकृतानि स्मारयित्वेति शेषः,स्खमांसानि मच्छरीरादेवोत्कृत्योत्कृत्य ढौकितानि 'अग्निवर्णानि' अतितप्ततयाऽग्निच्छायानि । ४ सुरादीनि मद्यविशेषणरूपाणि, इहापि स्मारयित्वेति शेषः, 'पजितोमिति पायितोऽस्मि 'जलंतीओ'ति ज्वलन्तीदारिव ज्वलन्तीरत्युष्णतया यशा रुधिराणि च,ज्वलन्तीति लिङ्गविपरिणामेन सम्बन्धनीयम् ॥ णिच' मित्यादि, नरक वक्तव्यतोपसंहर्तृ सूत्रत्रयम् ,अत्र च 'भीतेन' उत्पन्नसाध्वसेन तथा 'त्रसी उद्वेगे' 'त्रस्तेन' उद्विग्नेनात एव 'दुःखितेनस संजातविविधदुःखेन 'व्यथितेन च' कम्पमानसकलाङ्गोपाङ्गतया चलितेन,दुःखसंबद्धेति वेदनाविशेषणं सुखसम्बन्धिन्या र अपि वेदनायाः सम्भवाद्, 'वेदितेति चानुभूता, तीत्रा अनुभागतोऽत एव चण्डाः-उत्कटाः प्रगाढाः-गुरुस्थितिकास्तत एव 'घोराः' रौद्राः 'अतिदुस्सहाः' अत्यन्तदुरध्यासास्तत एव च महद्भयं यकाभ्यस्ता महाभयाः, दीप अनुक्रम [६५८-६८८] matt For Pro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~422~ Page #423 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||४४-७४|| नियुक्ति : [४१४...] प्रत EXCE सूत्रांक ||४४-७४|| उत्तराध्य. पठ्यते च-महालयाः-महत्यः, 'भीमाः' श्रूयमाणा अपि भयप्रदाः, एकार्थिकानि वैतान्यत्यन्तभयोत्पादनायोक्तानि, मृगापुत्रीबृहदृत्तिः इह च वेदना इति प्रक्रमः ॥ कथं पुनस्तस्यास्तीत्रादिरूपत्वमित्याशङ्कय 'जारिसे' त्यादिना इहत्यवेदनापेक्षया नरक | दुःखवेदनाया अनन्तगुणत्वमाह, 'वेयण त्ति प्रक्रमाद् दुःखवेदना ॥ न केवलं नरक एव दुःखवेदना मयाऽनुभूता किन्तु ॥४६१ सर्वाखपि गतिष्विति पुनर्निगमनद्वारेणाह-सवे' त्यादिना, इह च 'असाता' दुःखरूपा निमेषः-अक्षिनिमीलनं हातस्यान्तरं-व्यवधानं यावता कालेनासौ भूत्वा पुनर्भवति तन्मात्रमपि-तत्परिमाणमपि कालमिति शेषः 'यद्' इति यस्मात् 'साता' सुखरूपा नास्ति वेदना, तत्त्वतो वैषयिकसुखमसुखमेव, ईयाद्यनेकदुःखानुविद्धत्वाद्विपाकदारुण-14 *त्वाच ॥ सर्वस्य चास्य प्रकरणस्यायमाशयः-य एवमहं निमेषान्तरमात्रमपि कालं न सुखं लब्धवान् स कथं तत्त्वतः सुखोचितः सुकुमारो वेति शक्यते वक्तुं ?, येन च नरकेम्वत्युष्णशीतादयो महावेदना अनेकशः सोढास्तस्य महात्रतपालन क्षुदादिसहनं वा कथमिव बाधाविधायि ?, तत्त्वतस्तस्य परमानन्दहेतुत्वात् ,तत्प्रवज्यैव मया प्रतिपत्तव्येत्येकत्रिंशत्सू-| त्रावयवार्थः ॥ तत्रैवमुक्त्वोपरते ॥४६शा तं बितऽम्मापियरो, छदेणं पुत्त ! पब्वया । नवरं पुण सामण्णे, दुक्खं निप्पडिकम्मया ॥ ७५ ॥ 'त' मृगापुत्रं ब्रूतोऽम्बापितरौ छन्दः-अभिप्रायस्तेन खकीयेनेति गम्यते, किमुक्तं भवति ?-यथाऽभिरुचितं पुत्र! दीप अनुक्रम [६५८-६८८] Educatantanuman पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~423~ Page #424 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||७५|| दीप अनुक्रम [६८९] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||७५|| अध्ययनं [१९], निर्युक्तिः [४१४...] 'प्रत्रज' प्रत्रजितो भव, 'नवरम्' इति केवलं 'पुनः' विशेषणे 'श्रामण्ये' श्रमणभावे 'दुःखं' दुःखहेतुः 'निष्प्रतिकमंता' कथञ्चिद्रोगोत्पत्तौ चिकित्साकरणरूपेति सूत्रार्थः ॥ इत्थं जनकाभ्यामुक्ते सो तिम्मापयरो !, एवमेयं जहाफुडं परिकम्मं को कुणई, अरने मिगपक्खिणं ॥ ७६ ॥ एगओ अरन्ने वा, जहा ऊ चरई मिगो । एवं धम्मं चरिस्सामि, संजमेण तवेण य ॥ ७७ ॥ जया मिगस्स आर्यको, महारण्णंमि जायई। अच्छंतं रुक्खमूलंमि को णं ताहे चिगिच्छई १ ||१८|| को वा से ओसहं देहः को वा से पुच्छई सुहं को से भतं व पाणं वा, आहरितु पणामई १ ।। ७९ ।। जया य से सुही होइ, तथा गच्छइ गोअरं । भत्तपाणस्स अट्ठाए, वल्लराणि सराणि य ||८०|| खाइता पाणियं पाउं, वल्लरेहिं सरेहि य । मिगचारियं परित्ता णं, गच्छई मिगधारियं ॥ ८१ ॥ एवं समुट्टिए भिक्खू, एवमेव अगए । मिगचारिय चरिता णं, उ पक्कमई दिसं ॥८२॥ जहा मिए एग अणेगचारी, अणेगवासे धुवगोअरे अ । एवं मुणी गोयरियं पविट्ठे, नो हीलए नोवि य खिसहजा ॥ ८३ ॥ 'स' इति युवराजः 'विन्ति'त्ति आर्यत्वाद् ब्रूतेऽम्बापितरौ यथैतन्निष्प्रतिकर्मताया दुःखरूपत्वं युवाभ्यामुक्तं यथास्फुटमिति प्राग्वत् परं परिभाव्यतामिदं परिकर्म रोगोत्पत्तौ चिकित्सारूपं कः करोति ?, न कश्चिदित्यर्थः, क ?- अरण्ये, केषां ? -मृगपक्षिणाम्, अथचैतेऽपि जीवन्ति विचरन्ति च ततः किमस्या दुःखरूपत्वमिति भावः, For Parsons Praten पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~424~ Page #425 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||७६-८३|| नियुक्ति: [४१४...] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||७६ -८३|| उत्तराध्य. यतश्चैवमतः 'एगे'त्यादि सर्व स्पष्टमेव, नवरम् ‘एकभूतः' एकत्वं प्राप्तोऽरण्ये, 'चेति वा पूरणे 'जहा उत्ति यथैव 8 मृगापुत्रीएवमित्येकभूतः संयमेन तपसा चेति धर्मचरणहेतुः, यदा 'आतङ्कः' आशुधाती रोगो, 'महारण्य' इति महाग्रहणम या०१९ महति बरण्येऽपि कश्चित्कदाचित्पश्येत् दृष्ट्वा च कृपातश्चिकित्सेदपि, श्रूयते हि केनचिद्भिपजा व्याघ्रस्य चक्षुरुद्॥४६२॥ घाटितमटव्यामिति, वृक्षमूल इति तथाविधावासाभावदर्शनं, 'को 'ति 'अचां सन्धिलोपौ बहुल'मितिवचनादज लोपे क एनं 'तदा' आतङ्कोत्पत्तिकाले चिकित्सति-औषधायुपदेशेन नीरोगं कुरुते ?, न कश्चिदित्यर्थः, चिकित्सके चासति को वेति वाशब्दः समुच्चये औषधं ददातीत्येवमुत्तरोत्तराप्राप्तिरुपदर्शनीया ॥ आहरितु'त्ति आहृत्य 'प्रणामयेत्' अपयेत् , 'अर्पः पणाम' इति वचनात् ॥ कथं तर्हि तस्य निर्वहणमित्याह-यदा स सुखी भवति,खत एव रोगाभाव इति । दगम्यते, 'गच्छति' याति गौरिव परिचितेतरभूभागपरिभावनारहितत्वेन चरण-भ्रमणमस्मिन्निति गोचरस्तं भक्तमिव भक्तं तद्भक्ष्य-तृणादि तच पानं च भक्तपानं तस्य 'अर्थाय प्रयोजनाय, गोचरमेव विशेषत आह-वल्लराणि' गहनानि, उक्तश्च-"गहणमवाणियदेसं रपणे छेत्तं च वल्लरं जाण" 'सरांसि च' जलस्थानानि । खादित्वा निजभक्ष्यमिति गम्यते, वलरेषु सरःसु वेति सुब्ब्यत्ययेन नेयं, तथा मृगाणां चर्या-इतश्चेतश्चोरप्लवनात्मकं चरणं मृगचर्या तां,8||४६२॥ है।'मितचारितां' वा परिमितभक्षणात्मिका 'चरित्वा' आसेव्य परिमिताहारा एव हि खरूपेणैव मृगा भवन्ति, विशे पाभिधायित्वाचन पौनरुक्त्य, ततश्च 'गच्छति' याति मृगाणां चर्या-चेष्टा स्वातन्योपवेशनादिका यस्यां सा मृगच दीप अनुक्रम [६९० -६९७] SamEducatimotimatent For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~425 Page #426 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||७६ -८३|| दीप अनुक्रम [६९० -६९७] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || ७६-८३|| निर्युक्तिः [४१४...] अध्ययनं [१९], र्या मृगाश्रयभूस्ताम् । अनेन च सूत्रपञ्चकेन दृष्टान्त उक्तः, उत्तरेण सूत्रद्वयेनात्मन्येत दुपसंहारः, इह च 'एव' मिति मृगवत्समुत्थितः - संयमानुष्ठानं प्रत्युद्यतस्तथाविधाऽऽतङ्कोत्पत्तावपि न कश्चित् चिकित्साऽभिमुख इति भावः, 'एवमेव' मृगबदेव 'अणेगय'त्ति अनेकगो यथा ह्यसौ वृक्षमूले नैकस्मिन्नेवास्ते किन्तु कदाचित्कचिदेवमेषोऽप्यनियतस्थानस्थतया, पठ्यते च- 'अणिएयणे 'ति 'अनिकेतनः' अग्रहः, स चैवं मृगचर्यं चरित्वा मृगवदातङ्काभावे भक्तपानार्थं गोचरं गत्वा तलब्धभक्तपानोपष्टम्भतश्च विशिष्टसम्यग्ज्ञानादिभावतः शुक्लध्यानारोहणादपगताशेषकर्माश ऊर्द्ध दिशमिति सम्बन्धः प्रकर्षेण क्रामति-गच्छति प्रक्रामति, किमुक्तं भवति ? - सर्वोपरिस्थानस्थितो भवति, निर्वृत इतियावत्, एवं च निर्वृतिरेवेह मृगचर्योपमार्थत उक्ता, तत्र हि मृगोपमा मुनय इत इतश्चाप्रतिवद्धविहारितया विहृत्य गच्छन्तीति ॥ मृगचर्यामेव स्पष्टयितुमाह-यथा मृगः 'एग'त्ति 'एकः' अद्वितीयः 'अनेकचारी' नैकत्रैव भक्तपानार्थं चरतीत्येवंशीलः, 'अनेकवासः' नैकत्र वासः - अवस्थानमस्यास्तीति, 'ध्रुवगोचरश्च' सर्वदा गोचरलब्धमेवाहारमाहारयतीति, 'एवं' मृगवदेकत्वादिविशेषणविशिष्टो मुनिः 'गोचर्यो' भिक्षाटनं प्रविष्टो न 'हीलयेद्' अवजानीयात् कदशनादीति गम्यते, नापि च 'खिसएज'ति निन्देत्तथाविधाहाराप्राप्तौ खं परं वा । इह च मृगपक्षिणामुभयेषामुपक्षेपे यन्मृगस्यैव पुनः पुनर्दृष्टान्तत्वेन समर्थनं तत्तस्य प्रायः प्रशमप्रधानत्वादिति सम्प्रदाय इति सूत्राष्टकार्थः ॥ एवं मृगचर्या स्वरूपमुक्त्वा यत्तेनोक्तं यच पितृभ्यां पितृवचनानन्तरं च यदसौ कृतवांस्तदाह Jan Education intemational For Parna Prat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~426~ Page #427 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||८४-८७|| नियुक्ति: [४१४...] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक ||८४ या०१९ -८७|| दीप अनुक्रम [६९८-७०१] उत्तराध्य. मिगचारियं चरिस्सामि, एवं पुत्ता ! जहासुहं । अम्मापिऊहिंऽणुपणाओ, जहाइ उवहिं तओ॥ ८४॥ मृगापुत्री मिगचारियं चरिस्सामो, सब्बदक्खविमुक्खणि। तुम्भेहिं अम्ब ! sगुण्णाओ,गच्छ पुत्त!जहासुहं ॥४५॥ एवं l बृहद्वृत्तिः सो अम्मापियर,अणुमाणित्ता ण बहुविहं । ममत्तं छिंदई ताहे,महानागुब्य कंचुपं ॥८६॥ इही वित्तं च मित्तेय, शादि पुत्तदारं च नायओ। रेणुअं व पडे लग्गं, निद्भुणित्ता ण निग्गओ॥ ८॥ गाथा चतुष्टयं स्पष्टमेव,नवरं मृगस्येव चर्या-चेष्टा मृगचर्या तां निष्प्रतिकर्मतादिरूपां चरिष्यामीति बलश्रिया युवराजेनोक्त पितृभ्यामभाणि-एवं यथा भवतोऽभिरुचितं तथा यथासुखं तेऽस्त्विति शेषः, एवं चानुज्ञातः सन् 'जहाति' त्यजति उपधिम्-उपकरणमाभरणादि द्रव्यतो भावतस्तु छादि येनात्मा नरक उपधीयते, ततश्च प्रत्रभजतीत्युक्तं भवति । उक्तमेवार्थ सविस्तरमाह-'सबदुक्खविमोक्खणि' सकलासातविमुक्तिहेतुं 'तुभेहिं ति युवाभ्या मम्ब ! उपलक्षणत्वात्पितश्च 'अनुज्ञातः' अनुमतः सन् , तावाहतुः-गच्छ मृगचर्ययेति प्रक्रमः पुत्र ! 'यथासुखं| सुखानतिक्रमेण । 'अनुमन्य' अनुज्ञाप्य 'ममत्वं' प्रतिवन्धं 'छिनत्ति' अपनयति महानाग इव कचुकं, यथाऽसावति जरठतया चिरप्ररूढमपि कशुकमपनयति, एवमसाबपि ममत्वमनादिभवाभ्यस्तमुपलक्षणत्वात् मायादींश्च ॥ अनेनान्त-1॥४६॥ ४ रोपधित्याग उक्तः, बहिरुपधि त्यागमाह-'ऋद्धिं' करितुरगादिसम्पदं 'वित्त' द्रव्यं 'णायओ'त्ति 'ज्ञातीन्' सोदरादादीन् 'णिदुणित्त'त्ति नियेच निर्दय त्यक्त्वेतियावत् 'निर्गतः' निष्कान्तो गृहादिति गम्यते, प्रत्रजित इति योऽधः ।। इति सूत्रचतुष्टयार्थः । एनमेवाथै स्पष्टयितुमाह नियुक्तिकृत् HEREDICOtomitalia ~427~ Page #428 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||८४-८७|| नियुक्ति: [४१५-४१८] प्रत सूत्रांक ||८४ -८७|| नाऊण निच्छयमई एव करेहित्ति तेहिँ सो भणिओ। धन्नोऽसि तुमं पुत्ता ! जंसि विरत्तो सुहसएसु ४१५/ सीहत्ता निक्खमिउं सीहत्ता चेव विहरसू पुत्ता ! । जह नवरि धम्मकामा विरत्तकामा उ विहरन्ति४१६ नाणेण दंसणेण य चरित्ततवनियमसंजमगुणेहिं । खंतीए मुत्तीए होहि तुम वड्डमाणो उ ॥ ४१७ ॥ तसंवेगजणिअहासो मुक्खगमणबद्धचिंधसन्नाहो । अम्मापिऊण वयणं सो पंजलिओ पडिच्छीय ॥४१॥ गाथाचतुष्टयं पाठसिद्धमेव, नवरमाद्यगाथात्रयेण एवं पुत्र ! यथासुख'मित्येतत्सूचितार्थाभिधानतो व्याख्यातं, चतुर्थगाथया त्ववशिष्टसूत्रं भावार्थाभिधानतः, 'सुखशतेभ्य' इति बहुत्योपलक्षणं शतग्रहणं, 'सीहत्ता' इति सिंह-४ तया 'निष्क्रम्य' प्रव्रज्य सिंहतयैव विहर 'पुत्र !' इति जात !, किमुक्तं भवति ?-यथा सिंहः खस्थानादिनिरपेक्ष एव । निष्क्रामति, निष्क्रम्य च तथैव निरपेक्षवृत्त्या विहरति, एवं त्वमपि विहरेति, 'नवरंति परं धर्म एव कामःभू अभिलापो येषां ते धर्मकामाः, 'विरत्तकामे 'त्ति प्राग्यत् 'कामविरक्ताः' विषयपराङ्मुखाः, 'चरित्रतपोनियमसंयम-15 गुणै'रित्यत्र चारित्रान्तर्गतत्वेऽपि तपःप्रभृतीनामुपदेशात्सामान्यविशेषयोश्च कथञ्चिद्भिन्नत्वाच न पौनरत्यं, तथा संवेगो-मोक्षाभिलाषस्तेन जनितो हासो-मुखविकाशात्मकोऽस्येति संवेगजनितहासः-मुक्त्युपायोऽयं दीक्षेत्युत्सव दीप अनुक्रम [६९८-७०१] Jamaicatma For F r ont पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~428~ Page #429 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥८४ -८७|| दीप अनुक्रम [६९८ -७०१] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४६४॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||८४-८७|| निर्युक्ति: [४१५-४१८] मित्र तां मन्यमानः प्रहसितमुख इत्यर्थः, पठन्ति च- 'संवेगजणियसद्धो'त्ति स्पष्टमेव, तथा मोक्षो-मुक्तिस्तद्गमनाय वद्धमिति घृतं चिह्न - धर्मध्वजादि तदेव सन्नाहो - दुर्वचनशरप्रसरनिवारकः क्षान्त्यादिर्वा येन स तथा, 'पढिच्छी- S 'य'त्ति 'प्रत्यैपीत्' प्रतिपन्नवानिति गाथाचतुष्टयार्थः ॥ ततोऽसौ कीदृक् सञ्जात इत्याह पंचमह्वयजुत्तो पंचसमिओ तिगुत्तिगुप्तो अ । सभितर बाहिरिए, तवोकम्मंभि उज्जुओ ||८८ || निम्ममो निरहंकारो, निस्संगो चत्तगारवो। समो अ सव्वभूएस, तसेसु थावरेसु अ ॥ ८९ ॥ लाभालाभे सुहे दुक्खे, जीविए मरणे तहा। समो निंदापसंसासु, तहा माणावमाणओ ॥ ९० ॥ गारवेसु कसाएसु, दंडसल्लभएस अ । नियत्तो हाससोगाओ, अनियाणो अबंधणो ॥ ९१ ॥ अणिस्सिओ इ लोए, परलोए अणिस्सिओ वासीचंदणकप्पो अ, असणे अणसणे तहा ॥ ९२ ॥ अप्पसत्थेहिं दारेहिं सव्वओ पिहियासवो । अज्झ प्पझाणजोगेहिं, पसत्थदमसासणो ॥ ९३ ॥ सूत्रपङ्कं निगदसिद्धमेव, नवरं 'सभितरवाहिरिए 'त्ति सहाभ्यन्तरैः - प्रायश्चित्तादिभिर्वाद्यैश्व-अनशनादिभिर्भेदैर्वर्त्तत इति सवाद्याभ्यन्तरं तस्मिन् प्रधानत्वाच प्रथममभ्यन्तरोपादानं । 'निर्ममः' ममत्वबुद्धिपरिहारतः 'निस्सङ्गः ' सङ्गहेतुधनादित्यागतः 'समश्च' न रागद्वेषवान्निर्ममत्वादेरेव || ठाभेत्यादिना समत्वमेव प्रकारान्तरेणाह, अत्र च 'समः' न लाभादौ चित्तोत्कर्षभाग् नाप्यलाभादी दैन्यवान्, जीविते मरणे समो, नैकत्राप्याकाङ्क्षावान्, 'माणावमाणओ' त्ति Education Intimational For Person Prat मृगापुत्रीया० १९ ~429~ ॥४६४॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #430 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥८८ -९३|| दीप अनुक्रम [ ७०२ -७०७] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||८८-९३ || निर्युक्ति: [४१८...] मानापमानयोः, गौरवादीनि सूत्रे सुच्च्यत्ययेन सप्तम्यन्ततया निर्दिष्टानि पञ्चम्यन्ततया व्याख्येयानि, निर्वृत्त इति च सर्वत्र सम्बन्धनीयम्, 'अबन्धनः' रागद्वेषवन्धनरहितः ॥ अत एव 'अनिश्रितः' इहलोके परलोके वाऽनिश्रितो नेहलोकार्थे परलोकार्थं वाऽनुष्ठानवान् 'णो इहलोगट्टयाए तत्रमहिद्वेज्जा नो परलो गट्टयाए तब म हिडेजा' इत्याद्यागमात् पुनरनिश्रिताभिधानं च मन्दमतिविनेयानुग्रहार्थमदुष्टमेव, वासीचन्दनकल्प इत्यनेन समत्वमेव विशेपत आह, वासी चन्दनशब्दाभ्यां च तद्व्यापारकपुरुषावुपलक्षितौ, ततश्च यदि किलेको वास्या तक्ष्णोति, अन्यश्च गोशीर्षादिना चन्दनेनालिम्पति, तथाऽपि रागद्वेषाभावतो द्वयोरपि तुल्यः, कल्पशब्दस्येह सदृशपर्यायत्वात्, 'अनशने' इति च नञाऽभावे कुत्सायां वा, ततश्वाशनस्य-भोजनस्याभावे कुत्सिताशनभावे वा कल्पः, इह चेष्टितोऽधिकाराणां प्रवृत्तिरिति पूर्वत्र समस्तमपि कल्प इत्यनुवर्त्तते, 'अप्रशस्तेभ्यः' प्रशंसाऽनास्पदेभ्यः 'द्वारेभ्यः ' कर्मोपार्जनोपायेभ्यो हिंसादिभ्यः 'सर्वतः सर्वेभ्यो य आश्रवः- कर्मसंलगनात्मकः स पिहितः - तद्द्वारस्थगनतो निरुद्धो येनासौ पिहिताश्रवः, सापेक्षस्यापि गमकत्वात्समासः, यद्वाऽप्रशस्तेभ्यो द्वारेभ्यः सर्वेभ्यो निर्वृत्त इति गम्यते, अत एव पिहिताश्रवः, कैः पुनरयमेवंविधः ? - अध्यात्मेत्यात्मनि ध्यानयोगाः - शुभध्यानव्यापारा अध्यात्मध्यानयोगास्तैः, अध्यात्मग्रहणं तु परस्थानां तेपामकिञ्चित्करत्वाद्, अन्यथाऽतिप्रसङ्गात्, प्रशस्तः प्रशंसास्पदो दमश्च – उपशमः शासनं च - सर्वज्ञागमात्मकं यस्य स प्रशस्तदमशासन इति सूत्रपङ्कार्थः ॥ सम्प्रति तत्फलोपदर्शनायाह Education Indematanal For Parsons Private Onl पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~430~ Page #431 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-] / गाथा ||९४-९५|| नियुक्ति : [४१८...] मृगापुत्री प्रत बृहद्वृत्तिः सूत्रांक ||९४-९५|| उत्तराध्य. एवं नाणेण चरणेण, दंसणेण तवेण या भावणाहिं विसुद्धाह, सम्म भावि तु अप्पयं ॥१४॥ बहुयांणि उ थासाणि, सामन्नमणुपालिया। मासिएण उ भत्तेणं, सिद्धिं पत्तो अणुत्तरं ।।९५॥ II सूत्रद्वयमुत्तानार्थमेव, नवरं 'भावनाभिः' महाघ्रतसम्बन्धिनीभिवक्ष्यमाणाभिरनित्यत्वादिविषयाभिर्वा 'विशु- या द्धाभिः' निदानादिदोषरहिताभिर्भावयित्वा-तन्मयता नीत्वा 'अप्पयंति आत्मानं, मासिएण उ भत्तेण ति मासे भवं ॥४६५॥ मासिकं तेन तुः पूरणे 'भक्तेन' भोजनेन मासोपत्रासोपलक्षकत्वादस्य मासोपवासेनेतियावत् 'सिद्धिं' निष्ठितार्थतां सकलकर्मक्षयेणेति गम्यते, 'अनुत्तरां' सकलसिद्धिप्रधानाम् , अनेनाअनसियादिव्यवच्छेदमाहेति सूत्रद्वयार्थः ॥ इडीत्यादिसूत्रकदम्बकस्य तात्पर्यार्थमाह नियुक्तिकृत्दिइड्डीए निक्खंतो काऊं समणत्तणं परमघोरं । तत्थ गओ सो धीरो जत्थ गया खीणसंसारा ॥४१९॥ । सुगमैव, नवरम् , 'ऋया' दीनानाथदानादिकया विभूत्या निष्क्रान्तः सन् 'परमपोरं' कातरजनातिशयदुरनुचरं यन्त्र गताः क्षीणसंसारा इति मोक्ष इत्यभिप्राय इति गाथाऽवयवार्थः ॥ साम्प्रतं सकलाध्ययनार्थोपसंहारद्वारणोपदिशन्नाह सूत्रकृत् एवं करंति संबुद्धा (संपन्ना), पंडिया पवियक्खणा । विणियति भोगेसु, मियापुत्ते जहामिसी ।। ९६ ॥ Reen |व्याख्यातप्रायमेव, संगता प्रज्ञा येषां ते संप्रज्ञाः संपन्ना वा ज्ञानादिभिः 'जहामिसि'ति, मकारोऽलाक्षणिको यथेसीपम्याभिधायी 'ऋषिः' मुनिरिति सूत्रावययार्थः । इत्थमन्योक्त्योपदिश्य पुनर्भयन्तरेणोपदिशन्नाह दीप अनुक्रम [७०८ -७०९]] SamEducatim intamational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~431 Page #432 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [१९], मूलं [-1 / गाथा ||९७-९८|| नियुक्ति: [४१९] प्रत सूत्रांक ||९७ -९८|| महप्पभावस्स महाजसस्स, मियाइपुत्तस्स निसम्म भासियं । तबप्पहाणं चरियं च उत्तम, गइप्पहाणं । ६च तिलोअविस्सुतं ।। ९७॥ वियाणिया दुक्खचिवहर्ण धर्ण, ममत्तबंधं च महाभयावहं । सुहावह धम्मधुरं अणुत्तरं, धारेह निब्वाणगुणावहं महं ॥९८॥ तिबेमि ।। ॥ मियापुत्तीजं ॥ १७ ॥ सूत्रद्वयं निगदसिद्धमेव, नवरं मृगापुत्रस्य 'भाषितं' संसारदुःखरूपतावेदकं यत्तेन पित्रोः पुरत उक्तं, प्रधानं तपो यत्र ६चरिते तत्प्रधानतपो, व्यत्ययनिर्देशश्च प्राग्वत्, 'चरितं' च चेष्टितं 'गतिप्पहाणं च'इति प्रधानगतिं च मुक्तिमिति योऽर्थः, त्रिलोकविश्रुतां' जगत्रितयप्रतीताम् , अनेन च फललिप्सयो हि प्रेक्षावन्तः प्रवर्त्तन्त इति काका फलमाह । एतन्नि-1 शमनाच ममत्वं बन्ध इव सत्प्रवृत्तिविघातितया ममत्ववन्धस्तं च, महाभयावहं तत एव चौरादिभ्यो महाभया- वाः, धर्मो धूरिख महासत्त्वैरुबमानतया धर्मधुरा-महाव्रतपञ्चकात्मिका तां, तथा निर्वाणगुणा-अनन्तज्ञानदर्श-16 नवीर्यसुखादयस्तदावहां-तत्प्रापिका धर्मधुरां धारयतेति सम्बन्धः । इह च निर्वाणगुणावहत्वं सुखावहत्वे हेतुः 'महंति' अपरिमितमाहात्म्यतया महतीं, सूत्रत्वाचैवं निर्देश इति सूत्रद्वयार्थः ॥ इति' परिसमासो अवीमीति पूर्व वत्, उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्तेऽपि प्राग्वदेव ।। इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायां शिष्यहि तायामुत्तराध्ययनटीकायादमेकोनविंशमध्ययनं समाप्तम् ।। दीप अनुक्रम [७११ -७१२]] HElication For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं- १९ परिसमाप्त ~432~ Page #433 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||९८|| दीप अनुक्रम [७१२] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४६६॥ Education [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||९८...|| अध्ययनं [२०], निर्युक्तिः [४२०-४२२] अथ विंशतितमं महानिर्ग्रन्थीयमध्ययनम् । व्याख्यातमेकोनविंशमध्ययनम् अधुना विंशतितममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - अनन्तराध्ययने निष्प्र तिकर्मतोक्ता, इयं चानाथत्वपरिभावनेनैव पालयितुं शक्येति महानिर्ग्रन्धहितमभिधातुमनाथतैवानेकधाऽनेनोच्यते इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम्, अस्य च चतुरनुयोगद्वारप्ररूपणा प्राग्वत् यावन्नाम निष्पन्ननिक्षेपे महानिर्ग्रन्थीयमिति नाम, धुलुकप्रतिपक्षश्च महान् इति क्षुल्लकस्य निर्ग्रन्थस्य च निक्षेपमाह निर्मुक्तिकृत् नामं ठवणादविए खित्ते काले अ ठाण पइ भावे । एएसि खुड्डगाणं पडिवक्ख महंतगा हुंति ॥ ४२० || निक्खेवो नियंमि चउकओ दुविह० ॥ ४२१ ॥ जाणगसरीरभविए तबइरिते अ निण्हगाईसु । भावे पंचविहे खलु इमेहिं दारेहिं सो नेओ ॥ ४२२ ॥ अत्र च नामस्थापने सुगमे, द्रव्यक्षुलकादीनि क्षुल्लकनिर्ग्रन्थीयाध्ययन एवं महत्प्रतिपक्षं व्याख्यानयद्भिर्व्याख्यातानीति न पुनः प्रतन्यन्ते । 'णिक्खेवो नियंठमी' त्यादि प्रतीतार्थ, नवरम्, 'एभिः' इति वक्ष्यमाणैः 'द्वारैः' व्याख्या(नोपायैः 'सः' इति निर्ग्रन्थो ज्ञेय इति गाथात्रयार्थः ॥ तानि चामूनि द्वाराणि - For Parsons Private Onl महानिर्भ न्थीया० ~433~ २० ॥४६६ ॥ पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अथ अध्ययनं - २० “महानिर्ग्रन्थीय" आरभ्यते Page #434 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||९८...|| नियुक्ति : [४२३-४२५] प्रत सूत्रांक ||९८|| पण्णवण १ वेय २ रागे ३ कप्प ४ चरित्त ५ पडिसेवणा ६ नाणे ७ । तित्थ लिंग ९ सरिर । १० खित्ते ११ काल १२ गइ १३ ठिइ १४ संजम १५ निगासे १६ ॥ ४२३ ॥ जोगु १७ वओग १८ कसाए । १९ लेसा २० परिणाम २१ बंधणे २२ उदए २३ । कम्मोदीरण २४ उवसंपजहण २५ सपणा २६ य । आहारे २७॥ ४२४ ॥ भावा २८ ऽऽगरिसे २९ कालं ३० तरे ३१ समुग्धाय ३२ खित्त ३३ फुसणा य३४।। भावे ३५ परिणामे ३६ खलु महानियंठाण अप्पबहू ३७ ॥ ४२५ ॥ | तत्र प्रज्ञापना-खरूपनिरूपणं, तथैषां क्षुल्लकनिम्रन्थीयाध्ययन एवाभिहितमिति नेहाभिधीयते १ द्वार। 'वेद'त्ति वेदः-स्त्रीपुंनपुंसकभेदः, तत्र पुलाकः पुनपुंसकवेदयोर्न तु वीवेदे, तत्र तथाविधलब्धेरभावात्, बकुशः स्त्रीपुंन-2 पुंसकवेदतेषु त्रिष्वपि, एवं प्रतिसेवनाकुशीलोऽपि, कषायकुशीलः सवेदो वा स्यादवेदो वा, यदि सवेदविष्वपि वेदेषु, अथावेद उपशान्तवेदः क्षीणवेदो वा, निर्गन्धस्त्ववेद एव, सोऽप्युपशान्तयेदः क्षीणवेदो वा, एवं सात कोऽपि, न त्वसाबुपशान्तवेदः, क्षीणमोहत्वात् २। द्वारं । 'राग' इति पुलाकवकुशप्रतिसेवककषायकुशीलाः सरागा । न एव, कषायोदयवर्तित्वात्तेपा, निर्ग्रन्थो वीतरागः, स चोपशान्तकषायवीतरागः क्षीणकपायो वा वीतरागः, एवं दीप अनुक्रम [७१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~434~ Page #435 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-1 / गाथा ||९८..|| नियुक्ति: [४२३-४२५] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ॥९८|| उत्तराध्य. सातकोऽपि, नवरमयं क्षीणकषायवीतराग एव ३॥ द्वारं । कप्पो'त्ति 'कल्पः' स्थितास्थितकल्पो जिनकल्पादिा, महानिर्मतत एव पुलाकादयः किं स्थितकल्पेऽस्थितकल्पे वा?, द्वयोरपि स्युः, स्थविरकल्पादिरूपकल्पापेक्षया तु पुलाकः न्थीया० द स्थविरकल्पे जिनकल्पे वा, न तु कल्पातीतः, तथा चागमः-"पुलाए णं भंते ! किं जिणकप्पे होजा थेरकप्पे ॥४६७॥ होजा? कप्पाईए होजा ?, गोयमा ! जिणकप्पे वा होजा धेरकप्पे या होजा णो कप्पातीते होज"त्ति, अन्ये त्वाः स्थविरकल्प एवेति, बकुशप्रतिसेवनाकुशीलावपि जिनकल्पे स्थविरकल्पे वा, न तु कल्पातीती, कपायकुशीलखिष्वपि । स्थात्, निर्ग्रन्थस्रातको कल्पातीतावपि ४ । द्वारं । 'चरित्तमिति पुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीलाः सामायिकच्छेदो-४ पस्थापनीययोः, कषायकुशीलश्चैतयोः परिहारविशुद्धिसूक्ष्मसंपराययोश्च, निर्ग्रन्थो यथाख्यात एव, एवं सातकोऽपि ५ द्वारं । 'पडिसेवण'त्ति, पुलाकः प्रतिसेवको नाप्रतिसेवक, स हि मूलगुणोत्तरगुणानामन्यतमविराधनात एव भवति, वकुशोऽपि प्रतिसेवक एव, नवरमुत्तरगुणविराधनातः, प्रतिसेवनाकुशीलः पुलाकवत् , कषायकुशीलनिर्ग्रन्थस्रातका अप्रतिसेवका एव ६ । द्वारं । 'णाण'त्ति, पुलाकबकुशप्रतिसेवका द्वयो ज्ञानयोखिषु वा, तत्र द्वयोर्मतिश्रुतयोस्त्रिपु.ne मतिश्रुतावधिपु, इह च पुलाकस्य श्रुतं नवमपूर्वतृतीयाचारवस्तुन आरभ्य यावन्नव पूर्वाणि पूर्णानि, उक्तं हि"आरतो परओ वा न लद्धी लभइ" कपायकुशीलो द्वयोखिषु चतुर्पु वा, तत्र द्वयोर्मतिश्रुतयोस्त्रिषु मतिश्रुतावधिपु मतिश्रुतमनःपर्यायेषु (वा चतुर्प) मतिश्रुतावधिमनःपर्यायेषु, निर्ग्रन्थोऽप्येवमेव, स्नातकस्तु केवलज्ञान एव, श्रुतज्ञाने दीप अनुक्रम [७१२] m int FarramanaSPrwanatimony पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~435 Page #436 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||९८...|| नियुक्ति: [४२३-४२५] प्रत सूत्रांक ||९८|| तु कः कुत्र वर्तते इति क्षुलकनिर्ग्रन्थीय एवोक्तत्वान्न पुनरुच्यते ७ । द्वारं । 'तित्थ'ति इह च 'तीर्थ' यत्तीर्थकरेण प्रक्रियते, पुलाको बकुशप्रतिसेवकौ च तीर्थे, कपायकुशीलस्तु तीर्थेऽतीर्थे वा, अतीर्थे च भवन् तीर्थकरो वा स्यात् 8/प्रत्येकबुद्धो वा, एवं निम्रन्थस्नातकावपि ८ द्वार। 'लिंगित्ति लिङ्गं द्विधा-द्रव्यभावभेदात् , तत्रामी द्रव्यतः खलिङ्गे अन्यलिङ्गे गृहिलिङ्गे वा स्युः, भावतस्तु खलिङ्ग एव ९। द्वारं । सरीरे'त्ति पुलाकस्विष्वौदारिकतैजसकामणेषु, बकुशप्रतिसेवनाकुशीलौ त्रिपु चतुर्प वा, वैक्रियस्यापि तयो संभवात् , कपायकुशीलोऽप्येवं पञ्चसु च, तस्याहारकेऽपि सम्भवात् , निम्रन्थः स्नातकश्च पुलाकवत् १० । द्वारं। 'खेत्त'त्ति क्षेत्र कर्मभूम्यादि, तत्र जन्म सद्भावं च प्रतीत्य पञ्चाप्यमी कर्मभूमावेव स्युः, यथासम्भवं च संहरणं प्रतीत्य कर्मभूमावकर्मभूमौ वा ११ । द्वारं । 'कालोत्ति कालतः पश्चापि पुलाकादयो जन्मतः सद्भावतश्चावसर्पिण्यां सुषमदुष्पमादुष्पमसुषमादुष्षमाभिधानेषु कालेषु स्युः, उत्सर्पिण्यां दुषमसुषमासुषमदुप्पमयोः, इदं च भरतैरावतदशके, विदेहपञ्चकेषु चतुर्थकालप्रतिभागे यथासम्भव संहरणं प्रतीत्य यथो-18 तादन्यत्रापि काले स्युः, प्रज्ञत्यभिप्रायस्त्वयं-जन्मतः सद्भावतश्च पुलाकोऽवसर्पिण्यां सुषमदुष्षमदुष्पमसुषमाकाले च, दोन तु शेषेषु, उत्सर्पिण्यां जन्मतो दुष्पमायाँ दुष्पमासुषमायां सुपमाटुप्षमायां, सद्भायतश्च दुष्पमासुपमायां सुषमादुष्प मायां चेति भरतैरावतयोः, महाविदेहे तु चतुर्थप्रतिभागे पञ्चापि सर्वदैव स्युः, यथासम्भवं संहरणतो न कदाचिनिषिध्यन्ते, नवरं तत्पुलाकस्य नास्ति,लातकादीनां तु पूर्वसंहृतत्वेन तत्संभवः, उक्तं हि-"पुलागलद्धीए वट्टमाणो ण सकि दीप अनुक्रम [७१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~436 Page #437 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [--] / गाथा ||९८...|| नियुक्ति: [४२३-४२५] उत्तराध्य. बृहद्धृत्तिः ॥४६८॥ न्धीवा० प्रत सूत्रांक ||९८|| जइ उवसंहरि, तहा सिणाइयाणं जो संहरणादिसंभवो सो पुचोवसंहरियाणं, जओ केवलियादिणो नोक्संहरिजं- महानिर्यति"त्ति १२॥ द्वारं। 'गति'त्ति 'गतिः' प्रागुक्तैव नवरमिहाराधनाविराधनाकृतो विशेष उच्यते-तत्र पुलाकोऽविराधनाद् इन्द्रेपूत्पद्यते, विराधनातस्विन्द्रसामानिकत्रयस्त्रिंशलोकपालानामन्यतमेषु, एवं बकुशप्रतिसेवनाकुशीलावपि, कपायकुशीलः पुनरविराधनया इन्द्रेष्वहमिन्द्रेषु वा जायते, विराधनयेन्द्रादीनामन्यतमेपु, निर्ग्रन्थस्त्वहमिन्द्रेष्वेवोत्पद्यते है। १३ । द्वारं । 'ठिति'त्ति, पुलाकस्य जघन्येन पल्योपमपृथक्त्वं स्थितिरुत्कृष्टतोऽष्टादश सागरोपमाणि, बकुशप्रतिसेवनाकपायकुशीलानामपि जघन्यतः पल्योपमपृथक्त्वमुत्कृष्टतो बकुशप्रतिसेवकयोद्वाविंशतिसागरोपमाणि, कपायकुशीलस्य तु त्रयखिंशत् , निर्ग्रन्थस्याजघन्योत्कृष्टा त्रयविंशदेवेति १४ । द्वारं । 'संजमे'त्ति पुलाकबकुशप्रतिसेवककपायकुशीलानामसङ्ख्ययानि संयमस्थानानि, निर्ग्रन्धस्नातकयोरजघन्योत्कृष्टमेकमेव संयमस्थानं १५ । द्वारं। 'णिगासित्ति, आपत्वात्समा( मो)लोपे सन्निकर्पः-स्वस्थानपरस्थानापेक्षया तुल्याधिकहीनत्वचिन्तनं, तत्र च । संयमस्थानापेक्षया सर्वस्तो निर्गन्धस्य, सातकस्य चैकमजघन्योत्कृष्टं संयमस्थानं ततः पुलाकस्थासङ्गयेयगुणानि, एवं बकुशप्रतिसेवककपायकुशीलानामपि पूर्वपूर्वापेक्षयाऽसहयगुणत्वं भावनीयम् , अमीपां च पश्चानामपि प्रत्येकमनन्ताधारित्रपर्यायाः, यत उक्तम्-"पुलाकस्स णं भंते ! केवतिया चरितपजवा पण्णत्ता, गोयमा ! अर्णता चरित्तपजवा पण्णत्ता, एवं जाय सिणायस्सत्ति" तथा च-चारित्रपर्यायापेक्षया स्वस्थान सन्त्रिकपेचिन्तायां दीप अनुक्रम [७१२] ४६८ SamEducatimintamatunt पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~437 Page #438 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [--1 / गाथा ||९८..|| नियुक्ति: [४२३-४२५] प्रत सूत्रांक ||९८|| पुलाकः पुलाकस्य चरित्रपर्यायैः स्याद्धीनस्तुल्योऽधिको बा, तत्र हीनोऽधिको वा भवन्ननन्तासङ्घयसङ्ख्येयभागसङ्ख्यातासङ्ख्यातानन्तगुणलक्षणेन षट्स्थानकेन स्यात् ,एवं बकुशप्रतिसेवककषायकुशीला अपि स्वस्थानहीनाधिकचिन्ताया । षट्स्थानपतिता एव,निम्रन्थस्नातको तु स्वस्थानचिन्तायां तुल्यावेव, परस्थानसन्निकर्षचिन्तायां पुलाको बकुशप्रतिसेयकनिग्रन्थस्नातकेभ्यश्चरित्रपर्यायैरनन्तगुणहीनो न तु तुल्योऽधिको वा, कषायकुशीलापेक्षया पट्रस्थानपतितः, तथा चागमः-"पुलाए णं भंते ! वउसस्स परट्ठाणसन्निगासेणं चरित्तपजवेहिं कि हीणे तुले अन्भहिए?, गोयमा! हीणे णो तुल्ले णो अन्भहिए, अणंतगुणहीणे, एवं पडिसेवणाकुसीलस्सवि, कसायकुसीलेण समं छट्ठाणवडिए, जहेव सट्ठाणणियंठस्स, जहा वउसस्स एवं सिणायस्सवि" केचित्तु प्रतिसेवनाकुशीलापेक्षयापि षट्रस्थानपतित इत्याहुः, बकुशः पुलाकापेक्षया चरित्रपर्यायैरनन्तगुणाधिकः प्रतिसेवककषायकुशीलौ तु प्रति पट्रस्थानपतितः निग्रेन्थस्नातकाभ्यामनन्तगुणहीनः, एवं प्रतिसेवककपायकुशीलयोरपि परस्थानसंनिकों वाच्यो नवरं कषायकुशीलः पुलाकापेक्षया पट्| स्थानपतितः, निर्ग्रन्थस्नातकी पुलाकाद्यपेक्षयाऽनन्तगुणाधिकाविति १६। द्वारं। 'जोग'त्ति पुलाकादीनां निर्ग्रन्थावसानानां मनोवाकायास्त्रयोऽपि योगाः स्युः, सातकः सयोगोऽयोगो वा स्यात् १७ । द्वारं । 'उबओग'त्ति, पुलाकादयश्चत्वारो मतिश्रुतावधिमनःपर्यायभेदतश्चतुर्भेदे साकारोपयोगे चक्षुरचक्षुरवधिविकल्पतस्विविधे चानाकारोपयोगे स्युः, सातकः केवलज्ञानदर्शनाख्ययोर्द्वयोरेव १८ । द्वार । 'कसाय'त्ति पुलाकवकुशप्रतिसेवकाः संज्वलनकपायैश्चतुःकपायाः || दीप अनुक्रम [७१२] -१० 24-26 SamEducatmintamatarna For Prato arjanothianarm पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~438~ Page #439 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||९८|| दीप अनुक्रम [७१२] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ||४६९ ॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [२०], मूलं [--] / गाथा ||९८...|| निर्युक्तिः [४२३-४२५] कषायकुशीलवतुर्षु संज्वलनक्रोधादिषु त्रिषु द्वयोरेकस्मिन् वा स्यात्, निर्ग्रन्थोऽकषायः, स चोपशमतः क्षयतो वा, एवं स्नातको, नवरमसौ क्षीणकपाय एव १९ । द्वारं । 'लेस 'ति पुलाकवकुशप्रतिसेवकाः पीतपद्मशुक्लाभिधानासु तिसृषु लेश्यासु, कषायकुशीलः षट्खपि, निर्ग्रन्थः शुक्कलेश्यायां, स्नातकस्तस्यामेवातिशुद्धायाम् २० । द्वारं । 'परिणामे य'त्ति पुलाकवकुशप्रतिसेवक कषायकुशीला वर्द्धमाने हीयमानेऽवस्थिते वा परिणामे स्युः, निर्ग्रन्थसातको वर्द्धमानावस्थितपरि णामायेव, तत्र च पुलाकादयखयो वर्द्धमाने परिणामे अवस्थिते तु जघन्येनैकं समयं समयानन्तरं कषायकुशीलत्यादिगमनेन मरणेन वा, नवरं पुलाकस्य मरणं नास्ति, उक्तं च- "पुलाके तत्थ णो मरति" ति । उत्कृष्टेनान्तर्मुहूर्त्तम्, एवं हीयमानेऽपि, अवस्थिते तु जघन्यतः समयमुत्कृष्टेन सप्त समयान्, निर्ग्रन्थो जघन्यत उत्कृष्टतश्चान्तर्मुहुर्त वर्द्धमाने परिणामे अवस्थिते तु जघन्येनैकं समयम् उत्कृष्टेनान्तर्मुहूर्त्त तथा चागमः - “णियंठे णं भंते ! केवतियं कालं वद्धमाणपरिणामे होजा ?, गोयमा ! जहन्त्रेणं अंतोमुहतं, उक्कोसेर्णपि अंतोमुहुत्तं । केवइयं कालं अवट्ठियपरिणामे होज्जा ?, गोयमा ! जहणणेणं एकं समयं उक्कोसेणं अंतोमुद्दत्तं "ति । अपरे त्वयमुत्कृष्टतोऽवस्थितपरिणामे सप्त समयानित्याहुः, सातको जघन्येन उत्कृष्टेन च वर्द्धमानपरिणामेऽन्तर्मुहूर्त्तमवस्थितपरिणामे जघ न्यतोऽन्तर्मुहूर्त्तमुत्कृष्टेन देशोनां पूर्वकोटीम् २१ । द्वारं । 'बंधण'त्ति कर्मबन्धनं, तत्रायुर्वर्जाः सप्त कर्मप्रकृतीः पुलाको वनाति, वकुशप्रतिसेवकौ तु सप्त अष्टौ वा, आयुपोऽपि तयोर्वन्धसम्भवात् कषायकुशलोऽष्टौ सप्त पड् वाss Education Intemational For Parsons Privat महानिर्भन्थीया० ~439~ २० ॥४६९|| पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #440 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [--] / गाथा ||९८...|| नियुक्ति: [४२३-४२५] प्रत सूत्रांक ||९८|| युर्मोहवर्जाः, निम्रन्थस्त्वेकमेव सात,स्रातकोऽप्येवमबन्धको वा २२ । द्वारं । 'उदय'ति कर्मोदयः, पुलाकवकुशप्रतिसेFयककषायकुशीला अष्टविधमपि कर्म वेदयन्ते,निर्ग्रन्थो मोहबर्जाः सप्त, सातको वेद्यायुर्नामगोत्राख्याश्चतस्रः२३॥ द्वारं। 'कम्मोदीरण'त्ति पुलाक आयुर्वेदनीयवर्जाः षट् कर्मप्रकृतीरुदीरयति, बकुशप्रतिसेवकावष्टावायुर्वोः सप्त षड्र आयुर्वेदनीयवर्जाः, कषायकुशीलोऽप्येवमष्टौ सप्त षड् वेद्यायुर्मोहनीयवर्जाः पञ्च वा, निम्रन्थोऽप्येता एवं पञ्च द्वे वा नामगोत्राख्ये, स्नातकस्त्वेते एव द्वे अनुदीरको वा २४ । द्वारं । 'उवसंपजहण'त्ति उवसंपदनम्-उपसम्पद्द अन्यरूपप्रतिपत्तिः, सा च हानं च-खरूपपरित्याग उपसम्पद्धानं, तत्र पुलाकः पुलाकतां त्यजस्तां परित्यजति कषा यकुशीलत्वमसंयमं वोपसम्पद्यते, कोऽभिप्रायः?-न रूपान्तरापत्तिं विना पूर्वरूपपरित्यागो नापि तत्परित्यागं विना ४ तदापत्तिः, कथञ्चिन्नित्यानित्यरूपत्वाद्वस्तुनः, एवं सर्वत्र भावनीयं, बकुशोऽपि वकुशतां त्यजन् तां परित्यजति प्रति| सेवकत्वं कपायकुशीलत्वमसंयम संयमासंयम पोपसंपद्यते, प्रतिसेयना कुशीलः प्रतिसेवनाकुशीलत्वं सस्तत्परि। त्यजति वकुशत्वं कषायकुशीलत्वमसंयम संयमासंयम बोपसम्पद्यते, कपायकुशीलः कपायकुशीलत्वं त्यज॑स्तत्परित्यजति पुलाकादित्रयं निग्रन्थत्वमसंयम संयमासंयमं वोपसम्पद्यते, निर्ग्रन्थो निर्ग्रन्धत्वं त्यजंतत्परित्यजति कषायकुशीलत्वं स्नातकत्वमसंयमं वोपसम्पद्यते, सातकः स्नातकत्वं त्यजस्तत्परित्यजति सिद्धिगतिमुपसम्पद्यते २५ । द्वार। 'सन्न'त्ति सज्ञा, तत्र पुलाकनिम्रन्थस्त्रातका नोसझोपयुक्ताः, बकुशप्रतिसेवककषायकुशीलाः सज्ञोपयुक्ता नो ACCORRENCESSORK RRCRESCOACHAR दीप अनुक्रम [७१२] Samsairatanimathatana पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~440 Page #441 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-1 / गाथा ||९८..|| नियुक्ति: [४२३-४२५] महानिर्म न्धीया० प्रत सूत्रांक ॥९८|| सज्ञोपयुक्ताश्च, २६ । द्वारम् । 'आहार'त्ति पुलाकादयो निग्रेन्थावसाना आहारका एब, लातकस्तु आहारकोड- नाहारको वा २७ । द्वारं । तथा 'भवति पुलाकादयश्चत्वारो जघन्यत एकं भवग्रहणमुत्कृष्टतस्तु पुलाकनिम्रबृहद्वृत्तिः न्थयोस्त्रीणि, बकुशप्रतिसेवककषायकुशीलानामष्टो सातकस्याजघन्योत्कृष्टमेकमेव २८ । द्वारं । 'आगरिस'त्ति ॥४७॥ आकर्षणमाकर्षः, स चेह सर्वविरतर्ग्रहणमोक्षी, पुलाकादीनां चतुर्णा जघन्येनकभविक एक एवाकर्षः, उत्कृष्टेन पुलाकस्य त्रयो बकुशप्रतिसेवककपाय कुशीलानां शतशो, निर्ग्रन्थस्य द्वौ, सातकस्याजघन्योत्कृष्ट एकः, नानाभवि काकर्षापेक्षया पुलाकादीनां चतुणी जघन्येन द्वौ उत्कृष्टेन पुलाकस्य सप्त, बकुशस्य कुशीलद्वयस्य च सहस्रशो, निम्रपन्थस्य पञ्च, स्नातकस्य तु नास्त्येव २९॥ द्वार। 'काले ति पुलाको जघन्यत उत्कृष्टतश्चान्तर्मुहूत यावद्भवति, बकुशप्रति सेवककषायकुशीलास्तु जघन्येनैकसमयमुत्कृष्टेन देशोनां पूर्वकोटिं, निर्ग्रन्धोऽपि जघन्यत एक समयमुत्कृष्टेनान्तमहत्त, तथा च भगवत्याम्-“णियंठे पुच्छा, गोयमा ! जहण्णेणं एकं समयं उक्कोसेणं अंतोमुहुत्तं” अन्ये तु निम्रधोऽपि जघन्यत उत्कृष्टतश्चान्तर्मुहूर्चमेवेति मन्यन्ते, स्नातको जघन्येनान्तर्मुहूर्तमुत्कृष्टतो देशोनां पूर्वकोटिम् , एवमेकजीवापेक्षया, बहुजीवापेक्षया तु पुलाकनिम्रन्थौ जघन्यत एक समयमुत्कृष्टेनान्तर्मुहूर्त, बकुशः सर्वाद्धम्, एवं प्रतिसेवककषायकुशीललातका अपि ३० । द्वारम् । अंतरे यत्ति पुलाकादीनां चतुर्णामन्तरं जघन्येनान्तर्मुहूर्तमुत्कृटतोऽनन्तं कालं, स च कालतोऽनन्ता उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः, क्षेत्रत उपार्द्धपुद्गलपरावर्तों देशोनः, स्नातकस्य नास्त्य दीप अनुक्रम [७१२] ॥४ ॥ SamEducation intimational FarramanaSPrwanatimony पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~441~ Page #442 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||९८...|| नियुक्ति: [४२३-४२५] प्रत सूत्रांक ||९८|| शान्तरम् , इत्यमेकं प्रति, बहूनां तु पुलाकनिर्ग्रन्थानां जघन्येनैकसमय उत्कृष्टेन पुलाकस्य सङ्खयेयानि वर्षाणि निम्रन्यस्य षण्मासाः, उक्तं हि-"सेदि नियमा छम्मासाउ पडिवजंतित्ति" शेषाणां नास्त्येव ३१॥ द्वारं । 'समुग्धायत्ति पुलाकस्य वेदनाकषायमारणान्तिकसमुद्घातास्त्रयो, धकुशप्रतिसेवकयोस्त एव वैक्रियतैजसान्विताः पञ्च, | कषायकुशीलस्य तु त एवाहारकसहिताः षड्,निर्ग्रन्धस्यैकोऽपि नास्ति, स्नातकस्य केवलिसमुद्घात एकः३२॥ द्वारं । 'खेत्त'त्ति पुलाकादयश्चत्वारो लोकस्यासङ्घयेयभागे नो सङ्खयेयभागे न सङ्खयेयेष्वसङ्खयेयेषुवा भागेषु नापि सर्वलोके, खातकोऽसङ्ख्येयभागेऽसङ्ख्ययेषु भागेषु सर्वलोके वा, न शेषेषु, तथा च प्रज्ञप्तिः-"सिणाए पुच्छा, गोयमा ! नो संखिजे भागे हुज्जा असंखिज्जे भागे हुज्जा णो संखेजेसु भागेसु होजा असंखिजेसु भागेसु हुज्जा सबलोए वा होज्जत्ति" चूर्णिकारस्त्वाह-सङ्ख्ययभागादिपु सर्वेषु भवति ३३ । द्वारं । 'फुसणा उत्ति स्पर्शना च क्षेत्रवद्वाच्या |३५ । द्वारं। 'भावे ति पुलाकादयस्वयः क्षायोपशमिके भावे, निम्रन्थ औपशमिके क्षायिके वा,स्नातकः क्षायिके, इह तु पुलाकादयो निग्रन्थाः, निर्ग्रन्धत्तं तु चारित्रनिमित्तमिति तद्धेतुभूतस्यैव भावस्थ विवक्षितत्वादित्थमभिधानम् , अन्यथा मनुष्यत्वादेरौदयिकादेरपि भावस्थ सम्भवात् ३५ । द्वारं। 'परिमाण'त्ति पुलाकाः प्रतिपद्यमानकाः कदा-2 चित्सन्ति कदाचिन्नेति, यदा सन्ति तदा जघन्येनैको द्वौ वा त्रयो वा, उत्कृष्टतः शतपृथक्त्वं, पूर्वप्रतिपन्ना अपि | दायदि स्युसदा जघन्येन तथैवोत्कृष्टेन सहसपृथक्त्वं, बकुशाः प्रतिपद्यमानका यदा स्युस्तदा जघन्येनोत्कृष्टेन च पुला-II दीप अनुक्रम [७१२] FarramanaSPrwanatimony पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~442~ Page #443 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [--1 / गाथा ||९८...|| नियुक्ति: [४२३-४२५] बृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||९८|| उत्तराध्य कबद्वाच्या, पूर्वप्रतिपन्नकास्तु जघन्येन कोटिशतपृथक्त्वमुत्कृष्टेनापि तदेव, एवं प्रतिसेवका अपि, कपायकुशीला महानिर्मप्रतिपद्यमानका जघन्येन तथैव उत्कृष्टेन सहस्रपृथक्त्वं, पूर्वप्रतिपन्ना जघन्येनोत्कृष्टेन च कोटिसहस्रपृथक्त्वं, न्धीया निर्ग्रन्थाः प्रतिपद्यमानका जघन्येन तथैव उत्कृप्टेन द्विपष्ट्यधिकं शतं, तत्राष्टोत्तरं शतं क्षपकाणां चतुष्पञ्चाशदुपशम॥४७॥ | कानां, पूर्वप्रतिपन्नका अपि यदा स्युस्तदा जघन्येन तथैव उत्कृष्टेन शतपृथक्त्वं, सातकाः प्रतिपद्यमानका जघन्येन | तथैव उत्कृष्टेनाष्टोत्तरं शतं, पूर्वप्रतिपन्नकास्तु जघन्येनोत्कृष्टेन च कोटिपृथक्त्वम् , इह च जघन्यत उत्कृष्टतस्तु पृथ-: त्वमेवोच्यते, तत्र तजघन्य लघुतरमुत्कृष्टं बृहत्तरमिति भावनीय ३६ । द्वारं । 'खलु महानिग्गंथाण अप्पबहुं'ति खलु वाक्यालङ्कारे महानिर्ग्रन्थानां द्रव्यनिर्ग्रन्थापेक्षयाऽमीषामेव प्रशस्यमुनीनामल्पबहुत्वं वाच्यमिति शेषः, तत्र सर्वस्तोका निर्ग्रन्थास्ततः पुलाकाः सङ्ख्येयगुणाः, पुलाकेभ्यः स्नातकाः, स्नातकेभ्यो बकुशाः, बकुशेभ्यः प्रतिसेवकाः, प्रतिसेवकेभ्यः कपायकुशीला इति ३७ द्वारगाथात्रयार्थः॥ साम्प्रतं निर्ग्रन्थनिरुक्तिद्वारेणोपसंहरन्नाहसावजगंथमुक्का अब्भंतरबाहिरेण गंथेण । एसा खल्लु निज्जुत्ती महानियंठस्स सुत्तस्स ॥ ४२२ ॥ प्राग्वत् । गतो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तचेदम्सिद्धाण नमो किच्चा संजयाणं च भावओ। अत्थधम्मगई तच्चं, अणुसिढि सुणेह मे ॥१॥ दीप अनुक्रम [७१२] ॥४७१२॥ SamEducation intimational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: मूल संपादने अत्र नियुक्तिगाथा क्रमांकने किञ्चित् स्खलनासंभाव्यते, यत् गाथाक्रम ४२२ पुन: दृष्टम् ~443~ Page #444 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [४२२R...] 25XAS प्रत सूत्रांक ACC सितं-बद्धमिहाष्टविधं कर्म तद् मातं-भस्मसातमेपामिति सिद्धा:-ध्यानानलनिर्दग्धाष्टकर्मेन्धनाः, उक्तं हि"सियं धंतन्ति सिद्धस्स, सिद्धत्तमुवजायति"त्ति, तेभ्यः, कोऽभिप्रायः-तीर्थकरसिद्धेभ्य इतरेभ्यश्च 'नमो नम-12 स्कारं 'कृत्वा'-विधाय 'संयतेभ्यश्च' सकलसावद्यन्यापारोपरतेभ्य आचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः इतियावत् ४ | भावतः' परमार्थतो न तु संवृत्त्यैव, इत्थं पञ्चपरमेष्ठिरूपेष्टदेवतास्तवमभिधायाभिधेयादित्रयमेवाह-अर्थश्च धर्मश्वार्थधौं यदिवाऽयंते-हितार्थिभिरभिलप्यते इत्यर्थः, स चासौ धर्मश्चार्थधर्मस्ततस्तयोस्तस्य वा गतिः-त्यर्थानां ज्ञानार्थतया हिताहितलक्षणा स्वरूपपरिच्छित्तिर्यया यस्यां वा साऽर्थधर्मगतिस्तां, पाठान्तरतोऽर्थधर्मवती वा ४ 'तचंति तथ्याम्-अविपरीताम् 'अनुशिष्टिं हितोपदेशरूपां शिक्षा 'शृणुत' आकर्णयत 'मे' इति मम मया वा कथयतः कथ्यमानां वेति शेषः, स्थविरवचनमेतत् , अनेन च पूर्वोत्तरकालभाबिक्रियाद्वयानुगतेककर्तृप्रतिपादनेनात्मनो नित्यानित्यत्वमाह, एकान्तनित्यत्वे बविचलित रूपत्वान्न पूर्व क्रियाकर्तृत्वखरूपपरिहारेणोत्तरक्रियाकर्तृत्वाख्यख| रूपान्तरसम्भवः, एकान्तानित्यत्वपक्षे तु क्षणध्वंसित्वादुत्तरक्रियाकाल आत्मनोऽसत्त्वमेवेति नैकान्तनित्यानित्यपक्षयोः पूर्वोत्तरक्रियानुगतैककर्तृसम्भव इति भावनीयम् , इह चानुशिष्टिरभिधेया, अर्थधर्मगतिः प्रयोजनम् , अनयोश्च परस्परमुपायोपेयभावलक्षणः सम्बन्धः सामर्थ्यादुक्त इति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति धर्मकथानुयोगत्वादस्य धर्मकथाकथनव्याजेन प्रतिज्ञातमुपक्रमितुमाह ** दीप अनुक्रम [७१३] * ***** mtouRA rima पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~444~ Page #445 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-1 / गाथा ||२-८|| नयुक्ति : [४२२R...] प्रत सत्रांक ||२-८|| सत्तराध्य. पभूयरयणो राया, सेणिओ मगहाहियो । विहारजसं निजाओ,मंडिकुञ्छिसि चेहए ॥२॥ नाणादुमलया- महानिर्म नं. नाणापक्खिनिसेवियं । नाणाकसमसंछण्णं, उजाणं नंदणोवमं ॥३॥ तस्थ सो पासए साह, संजय बृहद्वृत्तिः सुसमाहियं । निसन्नं रुक्खमूलंमि, सुकुमालं सुहोइयं ॥ ४ ॥ तस्स रूवं तु पासित्ता, राइणो तंमि संजए। न्धीया० ॥४७२॥ अचंतपरमो आसी, अउलो स्वविम्हओ ॥५॥ अहो वन्नो अहो रूवं, अहो अवस्स सोमया । अहो खंती है अहो मुत्ती, अहो भोगे असंगया ॥६॥ तस्स पाए उ वंदित्सा, काऊण य पयाहिणं । नाइदूरमणासन्ने, पिंजली पटिपुच्छई॥७॥ तरुणोऽसि अजो! पब्वइओ. भोगकालंमि संजया!। उवडिओऽसि सामने, ए-12 अमटुं सुणेमु ता ॥८॥ सूत्रसप्तकं पाठसिद्धमेव, नवरं प्रभूतानि रत्नानि-मरकतादीनि प्रवरगजाश्वादिरूपाणि वा यस्यासी प्रभूतरत्रः । हाविहारजत्तन्ति सुव्यत्ययाद् विहारयात्रया क्रीडार्थमश्ववाहनिकादिरूपया 'निर्यातः' निर्गतो नगरादिति गम्यते, मंडिकुच्छिसित्ति मण्डिकुक्षौ मण्डिकुक्षिनाम्नि 'चैत्ये' इत्युद्याने । तदेव नानेत्यादिना विशिनष्टि-'साई संजयं सुस-1 18 माहियंति,साधुः सर्वोऽपि शिष्ट उच्यते तद्वयवच्छेदार्थ संयतमित्युक्तं, सोऽपि च बहिःसंयमवान्त्रिवादिरपि स्यादिति ॥४७२।। सुष्टु समाहितो-मनःसमाधानवान् सुसमाहितस्तमित्युक्तं, 'सुहोइय'ति सुखोचितं शुभोचितं वा । 'अत्यन्तपरमः'। अतिशयप्रधानः 'अतुलः' अनन्यसदृशो रूपविषयो विस्मयो रूपविस्मयः 'अहो ?' इत्यादिना विस्मयखरूपमुक्तम् , इह दीप अनुक्रम [७१४-७२०] 4-650% + Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~445~ Page #446 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||२-८|| नियुक्ति: [४२२R...] (४३) प्रत सत्रांक ||२-८|| च 'अहो ?' इत्याश्चर्ये 'वर्णः' सुस्निग्धो गौरतादिः 'रूपम्' आकारः सौम्यता' चन्द्रस्येव द्रष्टुरानन्ददायिता 'असकता निःस्पृहता, पादवन्दनानन्तरं प्रदक्षिणाऽभिधानं पूज्यानामालोक एवं प्रणामः क्रियत इति ख्यापनार्थ, तथा चागमः-"आलोए जिणपडिमाणं पणामं करेति"त्ति । 'प्रतिपृच्छति' प्रश्नयति, तरुणेत्यादिना प्रश्नखरूपमुक्तम् , इह च यत एव तरुणोऽत एव प्राजितो भोगकाल इत्युच्यते, तारुण्यस्य भोगकालत्वात् , यद्वा तारुण्येऽपि रोगादिपीदडायां न भोगकालः स्थादित्येवमभिधानं, सोऽपि कदाचित्संयमेऽनुद्यत एव स्यात् त्वं पुनरुपस्थितश्च-कृतोद्यमश्च श्रामण्ये, पठन्ति च 'उवहितोऽसि चि, एनम् 'अध'निमित्तं येनार्थेन त्वमीश्यामप्यवस्थायां प्रवजितः शृणोमि 'ता' इति तावत्, पश्चात्तु यत्त्वं भणिष्यसि तदपि श्रोष्यामीति भाव इति श्लोकसप्तकार्थः । इत्थं राज्ञोक्ते मुनिराह-2 अणाहो मि महाराय!, नाहो मज्झन विजई । अणुकंपयं मुहिं वावि, कंची नाहि तुमे महं ॥९॥ ही 'अनाथः' अखामिकोऽस्मीत्यहं 'महाराज! प्रशस्यनृपते !, किमित्येवं ? यतो 'नाथः' योगक्षेमविधाता मम न विद्यते, तथा 'अणुकंपगं'ति आपत्वादनुकम्पको यो मामनुकम्पते, 'सुहिति तत एव सुहृदू वापित्ति प्राग्वदेव ६ 'कंचित्ति कश्चिन विद्यते, ममेति सम्बन्धः, 'नाहिति प्रक्रमादनन्तरोक्तमर्थ जानीहि 'तुमि'त्ति त्वं, पठ्यते चहै।'कंची नाभिसमेमहं' कश्चिदनुकम्पकं सुहृदं वाऽपि 'नाभिसमेमि' नाभिसंगच्छामि, न केनचिदनुकम्पेन सुहृदा वा सङ्गतोऽहमित्यादिनाऽर्थेन तारुण्येऽपि प्रबजित इति भाव इति सूत्रार्थः ॥ एवं च मुनिनोक्ते RECENSEX दीप अनुक्रम [७१४ -७२०] Faramaarwatatuwant पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~446 Page #447 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||१०-११|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||१० -११|| उत्तराध्य. तो सो पहसिओ राया, सेणिओ मगहाहियो । एवं ते इडिमंतस्स, कहं नाहो न विवई १ ॥१०॥ महानिर्म होमि नाहो भयंताणं, भोगे भुंजाहि संजया!। मित्तनाईपरिवुडो, माणुस्सं खु मुदुल्लहं ॥१॥ बृहद्वृत्तिः है सूत्रद्वयं प्रतीतार्थमेव, नवरम् 'एव'मिति दृश्यमानप्रकारेण 'ऋद्धिमतः' विस्मयनीयवर्णादिसम्पत्तिमतः 'कथम्' न्थीया. ॥४७॥ इति केन प्रकारेण नाथो न विद्यते !, तत्कालापेक्षया सर्वत्र वर्तमाननिर्देशः, “यत्राकृतिस्तत्र गुणा वसन्ति", तथा है I'गुणपति धनं ततः श्रीः श्रीमत्याज्ञा ततो राज्य मिति हि लोकप्रवादः, तथा च न कथञ्चिदनाथत्वं भवतः संभ-17 वतीति भावः, यदि चानाथतैव भवतः प्रत्रज्याप्रतिपत्तिहेतुस्ततः 'होमि'त्ति भवाम्यहं 'भदन्तानां पूज्यानां, ततश्च : मयि नाथे मित्राणि ज्ञातयो भोगाश्च तव सुलभा एवेत्यभिप्रायेण भोगेत्याधुक्तवान् , मानुष्यं खलु सुदुर्लभमिति च हेत्वभिधानमिति सूत्रद्वयार्थः ॥ मुनिराह अप्पणावि अणाहोऽसि, सेणिया! मगहाहिवा । अप्पणा अणाहो संतो, कहं नाहो भविस्ससि ॥१२॥ दिएवं वुत्तो नरिंदो सो, सुसंभंतो सुबिम्हिओ। वयणं अस्सुअपुवं, साहुणा विम्हयं निओ ॥ १३ ॥ अस्सा हत्थी मणुस्सा मे, पुरं अंतेउरं च मे । भुंजामि माणुसे भोए, आणा इस्सरियं च मे ॥ १४ ॥ एरिसे संपय18|गंमि, सव्वकामसमप्पिओ । कहं अणाहो भवई , मा हुभंते ! मुसं वए ॥१५॥ 'अप्पणावि' सूत्रं सुगममेव, एवं च मुनिनोक्ते एवं सूत्रत्रयं स्पष्टमेव, नवरमाद्यस्य घटनैवं-स श्रेणिकनामा नरेन्द्रो दीप k ॥४७३॥ अनुक्रम [७२२-७२३] SamEducatammtainaranel पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~447 Page #448 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१२ -१५|| दीप अनुक्रम [७२४ -७२७] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१२-१५|| निर्युक्ति: [४२२R...] अध्ययनं [२०], | विस्मयान्वितः प्रागपि रूपादिविषयविस्मयोपेतः सन् एवम्' उक्तनीत्या वचनमात्मनाऽप्यनाथस्त्वमित्यादिरूपमश्रुतपूर्व साधुनोक्तः सुसम्भ्रान्तः- अत्याकुलः सुविस्मितश्च-अतीव विस्मयोपेतो भूत्योक्तवानिति शेषः, यदुक्तवांस्तदाह-'अस्सा' | इत्यादिना सूत्रद्वयेन, अत्र चाश्वा मे सन्तीत्यादिक्रिया सर्वत्राध्याहर्त्तव्या, अत एव भुनज्मि 'माणुसित्ति मानुष्यकान् भोगान् 'आज्ञा' अस्खलितशासनात्मिका 'ऐश्वर्य च' द्रव्यादिसमृद्धिः, यद्वा आज्ञया ऐश्वर्यम् प्रभुत्वं आज्ञेश्वर्य, तथा च 'ईदृशे' अनन्तरमुक्तरूपे सम्पदामयं सम्पद-समृद्धिप्रकर्षस्तस्मिन् सति, पठ्यते च - 'एरिसे संपयार्यमि' ति तत्र च सम्पदामायो - लाभः सम्पदायस्तस्मिन् 'सवकामसमप्पिय'त्ति प्राकृतत्वात् समर्पित सर्वकामे 'कथं केन प्रकारेण 'अनाथः' अवामी 'भवई' ति पुरुषव्यत्ययेन भवामि 'मा हु'त्ति हुशब्दस्तस्मादर्थे, यत एवं तस्मान्मा भदन्त ! मृषा 'वए'ति वादीः पठन्ति च 'भंते ! मा हु मुसं वय'त्ति सूत्रत्रयार्थः ॥ यतिस्तमुवाच जासि ( अ ) नाहस्स, अत्थं पुच्छ्रे च पत्थिवा । जहा अणाहो भवई, सणाहो वा नराहिव ! ॥ १६ ॥ सुणेहि मे महारायं !, अव्यक्खिन्तेण चेयसा । जहा अणाहो भवई, जहां मेअ पवन्तियं ||२७|| कोसंबीनाम नयरी, पुराणपुर भेयिणी । तत्थ आसी पिया मज्झं, पभूयधणसंचओ ॥ १८ ॥ पढमे वए महारायं !, अडला मे अच्छिवेयणा । अहुत्था तिउलो दाहो, सव्वगशेसु पत्थिवा ! ॥ १९ ॥ सत्यं जहा परम तिक्खं, सरीरविवरंतरे। पविसिज्ज अरी कुडो, एवं मे अच्छिवेयणा ॥ २० ॥ तिअं मे अंतरिच्छं च, उत्ति Education Intimational For Parana Private On पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~ 448~ Page #449 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||१६ -३५|| दीप अनुक्रम [७२८ -७४७] उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४७४॥ [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [२०], मूलं [--] / गाथा ||१६-३५|| निर्युक्तिः [४२२R...] मंगं च पीडई। इंदासणिसमा घोरा, वेयणा परमदारुणा ॥ २१ ॥ उबडिया मे आयरिया, विज्ञामंतचिगिच्छगा। अबीआ सत्थकुसला, मंतमूलविसारया ॥ २२ ॥ ते मे तिमिच्छं कुव्वंति चाउपायं जहाहियं न य मे दुक्खा विमोयंति, एसा मज्झ अणाया || २३ || पिया मे सव्वसारंपि, दिजाहि मम कारणा न य दुक्खा विमोयंति, एसा मज्झ अणाया ||२४|| माया (वि) मे महाराय !, पुत्तसोगदुहदिया। न य दुक्खा विमोयंति, एसा मज्झ अणाहया || २५ || भायरा मे महाराय !, सगा जिट्टकणिहगा । न य दुक्खा विमोयंति, एसा मज्झ अणाया ॥ २६ ॥ भइणीओ मे महाराय !, सगा जिद्वकणिङगा । न य दुक्खा विमोयंति, | एसा मज्झ अणाया || २७ ॥ भारिया मे महाराय !, अणुरन्तमणुब्वया । अंसुपुन्नेहिं नयणेहिं, उरं मे परिसिंचाई ॥ २८ ॥ अन्नं पाणं च पहाणं च, गंधमल्लविलेवणं । मए नायमनायं वा, सा बाला नोवभुंजई ॥ २९ ॥ खर्णपि मे महाराय !, पासाओवि न फिटई । न य दुक्खा विमोएइ, एसा मज्झ अणाया ॥ ३० ॥ तओऽह एवमाहंसु, दुक्खमा हु पुणो पुणो । वेयणा अणुहविडं जे संसारंमि अनंतए ॥ ३१ ॥ सयं च जह मुंचिज्ञा, वेयणा विउला इओ । तो दंतो निरारंभो, पव्वइए अनगारियं ॥ ३२ ॥ एवं च चिंतदत्ताणं, पासुतो मि नराहिवा। परियसंती राईए, वेषणा मे खयं गया ॥ ३३ ॥ तओ कल्ले पभार्थमि, आउच्छिता ण बंधवे । खंतो दंतो निरारंभो, पब्बईओ अगगारियं ॥ ३४ ॥ तोऽहं नाहो जाओ, अप्पणो अ परस्स य । सव्वेसिं चैव भूयाणं, तसाणं धावरण य ॥ ३५ ॥ For Parana Privat महानिर्य न्थीया० २० ~449~ ॥४७४॥ anotary.org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #450 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||१६-३५|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||१६ -३५|| विंशतिः सूत्राणि प्रायः प्रतीतार्थान्येव,नवरं 'न तुम जाणे अणाहस्स'त्ति न त्वं 'जानीषे' अवबुध्यसे,अनाथखेतिअनाथशब्दस्यार्थ च-अभिधेयमुत्या वा-उत्थानं मूलोत्पत्ति केनाभिप्रायेण मयोक्त इत्येवंरूपांपठ्यते च-'अत्थं पोत्थं वत्ति, अर्थ प्रोत्यां वा-प्रकृष्टोत्थानरूपामत एव यथाऽनाथः सनाथो वा भवति तथा च न जानीपे इति सम्बन्धः ॥ शृणु 'मे' मम कथयत इति शेषः, किं तदित्याह-यथाऽनाथो भवतीत्यनाथशब्दस्याभिधेयः पुरुषो भवति, यथा 'मेय'त्ति मया च प्रवर्तितमिति-प्ररूपितमनाथत्वमिति प्रक्रमः, अनेनोत्थानमुक्तम् ।। 'पुराणपुरभेयणि त्ति, पुराणपु-IP राणि भिनत्ति-खगुणैरसाधारणत्वाद्भेदेन व्यवस्थापयति पुराणपुरभेदिनी, बहुलवचनात्कर्तरि ल्युत्,पठ्यते च-'नग- राण पुडभेयण'त्ति लिङ्गव्यत्ययानगराणां मध्ये पुटभेदनं, पुनरिदमुक्तं भवति-प्रधाननगरी ॥ प्रथमे वयसि, इह प्र-15 है क्रमाद्यौवने 'अतुला' अनुपमा अक्ष्णोर्वेदना-अक्षिरोगजनिता व्यथा 'अहोत्थति अभूत् 'तिउले'त्ति आपत्वात् । तोदक' व्यथकः 'सर्वगात्रेषु' सर्वाङ्गेषु, पठ्यते च 'विउलो दाहो सवंगेसु यत्ति गतार्थ, 'सरीरविवरंतरे'त्ति शरीरविवराणि-कर्णरन्धादीनि तेपामन्तरं-मध्यं शरीरविवरान्तरं तस्मिन् 'पवेसेज'त्ति 'प्रवेशयेत्' प्रक्षिपेत् , शरीरविवरग्रहणमतिसुकुमारत्वादान्तरत्वचो गाढवेदनोपलक्षणं, पठ्यते च-'सरीरवीयअंतरे आवेलिज'त्ति शरीरवीज-सप्तधातवस्तदन्तरे-तन्मध्ये 'आपीडयेद्' गाढमवगाहयेत्, 'एय'मित्यापीड्यमानस्य शखवत् 'मे' ममाक्षिवेदना, कोऽर्थः -यथा तदत्यन्तवाधाविधायि तथैपापीति ॥ 'त्रिक मिति कटिभागम् 'अन्तरा' मध्ये 'इच्छां वा' दीप अनुक्रम [७२८-७४७] SamEducatimotimatent Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~450 Page #451 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||१६-३५|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||१६ -३५|| उत्तराध्य. अभिमतवस्त्वभिलाषं न केवलं बहित्रिकायेवेति भावः 'पीडयति' वाधते, वेदनेति सम्बन्धः, तत्कालापेक्षया च महानिर्ग है वर्तमाननिर्देशः, एवमन्यत्रापि, इन्द्राशनिः-इन्द्रवजं तत्समाना-तुल्या अतिदाहोत्पादकत्वादिति भावः 'घोरा' परेबृहद्वृत्तिः न्धीया० षामपि दृश्यमाना भयोत्पादनी 'परमदारुणा' अतीवदुःखोत्पादिका । किं न कश्चित्तां प्रतिकृतवानित्याह-'उप-18 ॥४७५॥ स्थिताः' बेदनाप्रतीकारं प्रत्युद्यताः 'मे' मम 'आचार्याः' इति प्राणाचार्या वैद्या इतियावत् , 'विद्यामन्त्रचिकित्सकाः' है विद्यामन्त्राभ्याम्-उक्तरूपाभ्यां व्याधिप्रतिकारः 'अद्वितीयाः' अनन्यसाधारणतया तथाविधद्वितीयाभावात् , 'सत्यकुसल'त्ति शस्त्रेषु शास्त्रेषु वा कुशलाः शस्त्रकुशला शास्त्रकुशला वा, पठ्यते च 'नानासत्यत्वकुसल'त्ति सुगम,मत्राणि च-उक्तरूपाणि मूलानि च-ओषधयस्तेषु विशारदाः-विज्ञा मत्रमूलविशारदाः ॥ नैवोपस्थानमात्रेणैव ते स्थिताः किन्तु लते मे चिकित्सां कुर्वन्ति 'चाउप्पाय'ति 'चतुष्पदा' भिषग्भेषजातुरप्रतिचारकात्मकचतुर्भा(त्मकभा)गचतुष्टयात्मिका 'जहाहिय'ति 'यथाहितं' हितानतिक्रमेण यथाऽधीतं बा-गुरुसम्प्रदायागतवमनविरेचकादिरूपांततः किमित्याह-न चैवं कुर्वन्तोऽपि 'दुःखाद' एवंविधरोगजनितादसातादू 'विमोचयन्ति' विशेषेण मुत्क लयन्ति, एषा दुःखाविमोचनात्मिका ममानाथता ॥ अन्यच्च-सर्वसारमपि' निःशेषप्रधानं वस्तुरूपं दिजाहित्ति दद्यात् न त्वेवमादरवानपि दुःखात् ॥४७॥ ['विमोचयंतित्ति वचनव्यत्ययाद्विमोचयति, एवं सर्वत्र ॥ तथा पुत्रविषयः शोकः पुत्रशोकः, हा! कथमित्थ दुःखी मत्सुतो जात इत्यादिरूपस्ततो दुःखं तेन 'अहिय'त्ति आर्ता 'अहियत्ति वा अर्दिता' उभयत्र पीडितेत्यर्थः, दीप अनुक्रम [७२८-७४७] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~451 Page #452 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||१६-३५|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||१६ -३५|| ततः पुत्रशोकदुःखार्ता पुत्रशोकदुःखार्दिता वा ॥ तथा 'सग'त्ति लोकरूढितः सौदर्याः खका वा-आत्मीया वा॥ तथा 'भइणि'त्ति भगिन्यः ॥ अपरं च 'भायों' पनी 'अनुरक्ता' अनुरागवती 'अणुवय'त्ति अन्विति-कुलानुरूपं प्रतम्-आचारोऽस्था अनुत्रता पतिव्रतेति यावत्, वयोऽनुरूपा बा, पठ्यते च-'अणुत्तरमणुवय'त्ति, इह च मकारोऽलाक्षणिकः, अनुत्तरा-अतिप्रधाना 'उर'न्ति 'उरः' वक्षः 'परिषिञ्चति' समन्तात्प्लावयति ॥ स्त्रात्यनेनेति खान-गन्धोदकादि मया ज्ञातमज्ञातं चेत्यनेन सद्भावसारतामाह, पठ्यते च-'तारिसं रोगमावण्णे'त्ति, 'तादृशम्' Nउक्तरूपं 'रोगम्' अक्षिरोगादिकम् 'आपन्ने' प्राप्ते मयीति गम्यते, सेति-भार्या बालेव बाला-अभिनवयौवना 'नोप भुले' नासेवते ॥ 'पासाओऽषि ण फिटइत्ति, अपिः चशब्दार्थः, मत्पार्थाच नापयाति, सदा सन्निहितैवास्ते, अनेन तस्या अतिवत्सलत्वमाह ॥'ततः' इति रोगाप्रतिकार्यतानन्तरमहम् 'एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण 'आइंसुति उक्तवान् , यथा 'दुक्खमा हुत्ति, हु एवकारार्थ, ततो दुःक्षमैव-दुःसहैव पुनः पुनः 'वेदना' उक्तखरूपा रोगव्यथा 'अनुभवितुं' वेदयितुं जे इति निपातः पूरणे ॥ यतश्चैवमतः 'सयं चत्ति चशब्दोऽपिशब्दार्थस्ततः सकृदपि-एकदापि यदि मुच्येऽहमिति गम्यते, कुतः ?-'वेयण'त्ति वेदनायाः 'विउल'त्ति विपुलाया:-विस्तीर्णायाः 'इतः' इत्यनुभूयमानायाः, ततः किमित्याह-क्षान्तः' क्षमावान् 'दान्तः' इन्द्रियनोइन्द्रियदमेन 'पवइए अणगारिय'त्ति, 'प्रव्रजेयं' गृहान्निष्कामेयं ततश्च 'अनगारता" भावभिक्षुतामझीकुर्यामिति शेषः,यद्वा 'प्रबजेयं' प्रतिपद्येयमनगारितां येन संसा दीप अनुक्रम [७२८-७४७] SAMEditatin intamaana पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~452~ Page #453 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-1 / गाथा ||१६-३५|| नियुक्ति: [४२२R...] 15% प्रत बृहद्वृत्तिः सूत्रांक ||१६ -३५|| % उत्तराध्य रोच्छित्तितो मूलत एव न वेदनासम्भवः स्यादिति भावः ॥ एवं च चिंतइत्ता णं'ति न केवलमुक्त्वा चिन्तयित्वा महानिर्म चैवं 'पासुत्तोमिति प्रसुप्तोऽस्मि परियट्टतियति परिवर्त्तमानायाम्-अतिक्रामन्यां 'ततः' वेदनोपशमानन्तरं 'कल्ल'ति कल्यो नीरोगः सन् 'प्रभाते' प्रातः, यद्वा 'कल' इति चिन्तादिनापेक्षया द्वितीयदिने प्रकर्षेण अजितो-गतः प्रत्र थीया ॥४७६॥ I|जितः, कोऽर्थः -प्रतिपन्नवाननगारिताम् ॥ तत इति प्रव्रज्याप्रतिपत्तेरहं नाथो जातः-संवृत्तो, योगक्षेमकरणक्षम इति भावः, 'आत्मनः' खस्य 'परख वा अन्यस्य पुरुषादेः सर्वेषां भूतानां-जीवानां त्रसानां स्थावराणां चेति-त्रस-2 स्थावरभेदभिन्नानामिति विंशतिसूत्रावयवार्थः॥ किमिति प्रत्रज्याप्रतिपत्त्यनन्तरं नाथस्त्वं जातः पुरातुन इत्याह अप्पा नई बेयरणी, अप्पा मे कूडसामली । अप्पा कामदुहा घेणू, अप्पा मे नंदणं वर्ण ॥३३॥ अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य । अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पडियमुपडिओ ॥ ३७॥ 'आत्मेति व्यवच्छेदफलत्वाद्वाक्यस्यात्मैव नान्यः कश्चित् , किमित्याह-'नदी' सरित् 'वैतरणी' नरकनधा नाम, ततो महाऽनर्थहेतुतया नरकनदीव, अत एवात्मैव कूटमिव जन्तुयातनाहेतुत्वाच्छाल्मली कूटशाल्मली नरकोद्भवा। तथाऽऽत्मैव कामान्-अभिलाषान् दोग्धि-कामिताप्रापकतया प्रपूरयति कामदुधा धेनुविधेनुः,इयं च रूढित उक्ता, ॥४७६॥ एतदुपमत्वं चाभिलापितखर्गापवर्गावाप्तिहेतुतया, आत्मैव 'मे' मम 'नन्दनं' नन्दननामक 'बनम्' उद्यानम्, एत-18 दौपम्यं चास्य चित्तप्रल्हत्तिहेतुतया ॥ यथा चैतदेवं तथाऽऽह-आत्मैव 'कर्ता' विधायको दुःखानां सुखानां चेति % % दीप अनुक्रम [७२८-७४७] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~453 Page #454 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||३६-३७|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||३६-३७|| योगः, प्रक्रमाचात्मन एव 'विकरिता च' विक्षेपकश्चात्मैव तेषामेव, अतश्चात्मैव 'मित्रम्' उपकारितया सुहत् । 18/ अमित्तंति 'अमित्रं च' अपकारितयाऽसुहृत् । कीडक सन् ?-'दुष्पट्ठियसुप्पटिओ'त्ति, दुष्टं प्रस्थितः-प्रवृत्तो दुष्प्रदि स्थितः दुराचारविधातेतियावत् सुष्टु प्रस्थितः सुप्रस्थितः सदनुष्ठानकत्तेतियावत् योऽर्थः, एतयोविशेषणसमासः, है दुष्प्रस्थितो यात्मा समस्तदुःखहेतुरिति वैतरण्यादिरूपः सुप्रस्थितश्च सकलसुखहेतुरिति कामधेन्वादिकल्पः । तथा च प्रव्रज्याऽवस्थायामेव सुप्रस्थितत्वेनात्मनोऽन्येषां च योगकरणसमर्थत्वान्नाथत्वमिति सूत्रद्वयगर्भार्थः ॥ पुनरन्यथाऽनाथत्वमाह इमा हु अन्नावि अणाहया निवा, तामेगचित्तो निहुओ सुणेहि मे। नियंठधम्म लहियाणवी जहा, सीयंति एगे बहुकायरा नरा॥ ३८॥ जे पचहत्ताण महव्वयाई, सम्म (च)नो फासयई पमाया । अणिग्गहप्पा य रसेमु गिद्धे, न मूलओ छिंदह बंधणं से ॥ ३९ ॥ आउत्तया जस्स य नस्थि कावि, इरियाइ भासाइ |तहेसणाए। आयाणनिक्खेवदुगुंछणाए, न वीरजायं अणुजाइ मग ॥४०॥ चिरंपि से मुंडई भवित्ता, अधि-II रचए तवनियमेहिं भट्टे । चिरंपि अप्पाण किलेसइत्ता, न पारए होइ हु संपराए ॥४१॥ पुल्लेव मुट्ठी जह से असारे, अयंतिते कडकहावणे य । राढामणी बेरुलियप्पगासे, अमहग्घर होहहु जाणएसु ॥४२॥3 कुसीललिंगं इह धारइत्ता, इसिज्झयं जीविय बृहइत्ता । असंजए संजय लप्पमाणे, विणिघायमागच्छइ ACCORDABALIKA दीप अनुक्रम [७४८-७४९] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~4544 Page #455 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||३८-५०|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||३८ -५०|| उत्तराध्य-13 से चिरंपि ॥४३॥ विसं तु पीयं जह कालकूडं, हणाइ सत्थं जह कुग्गहीअं । एसेव धम्मो विसओव- महानिर्गबृहद्धृत्तिः द वन्नो, हणाइ वेयाल इवाविवन्नो ॥ ४४ ॥जो लक्खणं सुविण पउंजमाणो, निमित्तकोऊहलसंपगाढे । कुहेड विज्ञासवदारजीवी, न गच्छई सरणं तंमि काले ॥४५॥ तमंतमेणेव उ से असीले, सया दुही विपरि॥४७७॥ यासुवेइ । संधावई नरगतिरिक्खज़ोणी, मोणं विराहित्तु असाहुरूवे ॥ ४६॥ उद्देसियं कीयगडं नियागं, न मुच्चई किंचि अणेसणिज । अग्गीविवा सव्वभक्खी भवित्ता, इओ चुओ गच्छइ कट्ट पावं ॥४७॥न तं अरीx कंठ छित्ता करेइ, जं से करे अप्पणिया दुरप्पा । से नाहिई मधुमुहं तु पत्ते, पच्छाणुतावेण दयाविहूणो ॥४८॥ निरस्थया नग्गरुई उ तस्स, जे उत्तमट्टे विवयासमेइ । इमेवि से नत्थि परेवि लोए, दुहओऽवि से झिज्झइ तत्थ लोए ॥४९॥ एमेवऽहाछंदकुसीलरूवे, मग्गं विराहितु जिणुत्तमाणं । कुररी विवा भोगरसाणुगिद्धा, निरहसोया परितावमेइ ॥५०॥ 'इयम्' अनन्तरमेव वक्ष्यमाणा 'हु।' पूरणे 'अन्या' अपरा 'अपिः' समुचये 'अनाथता' अखामिता, यदभावतोऽहं| नाथो जात इत्याशयः, 'णिव'त्ति नृप 'ता'मित्यनाथताम् 'एकचित्तः' एकाग्रमनाः 'निभृतः' स्थिरः शृणु, का ७७॥ द्र पुनरसावित्याह-निर्ग्रन्थानां धर्मः-आचारो निर्ग्रन्थधर्मस्तं 'लभियाणविति लब्ध्वाऽपि 'यथा' इत्युपप्रदर्शने 'सी-|| है दन्ति' तदनुष्ठानं प्रति शिथिलीभवन्ति 'एके' केचन ईषदपरिसमाप्ताः कातराः-निःसत्त्वाः बहुकातराः 'विभाषा सुपो दीप अनुक्रम [७५० -७६२] SEducatarLE पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~455 Page #456 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||३८-५०|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक SCENESCk ||३८ -५०|| बहु च पुरस्तात्त्वि'ति प्राग्बहुप्रत्ययः, ये हि सर्वथा निःसत्त्वास्ते मूलत एव न निम्रन्धमार्ग प्रतिपद्यन्त इत्येवमुच्यते.. | यदिया कातरा एव बहवः संभवन्तीति बहुशब्दो विशेषणं, 'नराः' पुरुषाः सीदन्तश्च नात्मानमन्यांश्च रक्षयितुं क्षमा इतीयं सीदनलक्षणाऽपराऽनाधतेति भावः ॥ 'जो पबइत्ताणे' त्यादि सूत्राणि सीदनस्यैवानेकधा खरूपानुवादतः फलदर्शकानि स्पष्टान्येव नवरं 'नो स्पृशति' इति नासेचते 'प्रमादात्' निद्रादेरनिगृहीतः-अविद्यमानविषयनियन्त्रण आत्माऽस्पेत्यनिग्रहात्मा, अत एव 'रसेषु' मधुरादिषु 'गृद्धः' गृद्धिमान् वध्यतेऽनेन कर्मेति बन्धनं-रागद्वेषात्मकं 'सेइति सः।। 'आयुक्तता' दत्तावधानता 'काचिदिति खल्पाऽपि 'आयाणणिक्खेवदुगुंछणाए'त्ति आदाननिक्षेपयो:उपकरणग्रहणन्यासयोर्जुगुप्सनायाम् , इह चोचारादीनां संयमानुपयोगितया जुगुप्सनीयत्वेनैव परिस्थापना जुगुप्सनोक्का, स ईरकू किमित्याह-वीर्यातो-गतो वीरयातस्तम् 'अनुयाति' अनुगच्छति, नेति सम्बन्धः, अल्पसत्वतयेति भावः, कं-'मार्ग' सम्यग्दर्शनादिकं मुक्तिपथम् । तथा च 'चिरमपि' प्रभूतकालमपि मुण्ड एवमुण्डन एव केशापनयनात्मनि शेषानुष्ठानपरामुखतया रुचिर्यस्यासौ मुण्डरुचिः, अस्थिराणि-गृहीतमुक्ततया ४ चलानि व्रतान्यस्येत्यस्थिरवतः 'तपोनियमेभ्यः' उक्तरूपेभ्यः 'भ्रष्टः' च्युतश्विरमपि 'अप्पाण'त्ति आत्मानं 'क्लेश यित्वा' लोचादिनां बाधयित्वा, आत्मनैवेति गम्यते, न 'पारगः' पर्यन्तगामी भवति 'हु' वाक्यालङ्कारे 'संपरादिएत्ति संपरायन्ति-भृशं पर्यटन्त्यस्मिन् जन्तव इति सम्परायः-संसारस्तस्य, सूत्रे च सुब्व्यत्ययात्सप्तमी ४॥ स चैवं दीप अनुक्रम [७५० -७६२] AR SAMEdicatmomale For Pro Paritingthangaro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~456 Page #457 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||३८-५०|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||३८ -५०|| उत्तराध्य.विधः पोल्लेत्यन्तःशुपिरा 'एवं' इत्यवधारणे तेन पोलैय, न मनागपि निविडा 'मुष्टिः' अङ्गुलिसन्निवेशविशेषात्मिका महानिर्य 'यथा' इति सादृश्ये, पठ्यते वा-'पोल्लारमुट्ठीजह'त्ति इहापि 'पोलर त्ति शुषिरा, असारत्वं चोभयोरपि सदर्थशून्यतया बृहद्धृत्तिः न्धीया. M'अयंतियत्ति 'अयत्रितः' अनियमितः कूटकार्षापणवत्, वाशब्दस्खेहोपमार्थत्वात् , यथा ह्यसौ न केनचित्कूटतया ॥४७॥ नियन्यते, तथैषोऽपि गुरूणामप्यविनीततयोपेक्षणीयत्वात् , 'राढामणि'त्ति काचमणिवैडूर्यवत्प्रकाशते-प्रतिभासत इति वेडूर्यप्रकाश:-वैडूर्यमणिसदृशः 'अमहार्घकः' इत्यमहामूल्यो भवति, 'चः' समुच्चये भिन्नक्रमस्ततोऽमहार्घकश्च है 'जाणएम'त्ति ज्ञेषु मुग्धजनविप्रतारकत्वात्तस्य ॥ 'कुशीललिङ्ग पार्थस्थादिवेपम् 'इह' अस्मिन् जन्मनि धारयित्वा । ऋषिध्वज' मुनिचिहं रजोहरणादि 'जीरिय'त्ति आर्षत्वाजीविकायै 'हयित्वा' इदमेव प्रधानमितिख्यापनेनोपबृंह्य यद्वा 'इसिज्झयंमि' सुवव्यत्ययाद् ऋषिध्वजेन 'जीविय'त्ति विन्दुलोपात् 'जीवितम्' असंयमजीवितं जीविका वा-निर्वहणोपायरूपां बृंहयित्वेति-पोषयित्वाऽत एवासंयतः सन् 'संजय लप्पमाणे त्ति प्राकृतत्वात्सोपस्कारत्याच संयतमात्मानं लपन , पठ्यते च-'संजयलाभमाणे ति आपत्वात् संयतलाभः-स्वर्गापवर्गाप्राप्तिरूपस्तं मन्यमानो ममायं, भविष्यतीति गणयन् 'विनिघात विविधाभिघातरूपम् आगच्छति' आयाति स 'चिरमपि' प्रभूतकालमप्यास्तामल्पं नरकगत्यादाविति भावः ॥ इहैव हेतुमाह-विष पिबन्तीति आपत्वात्पीतं यथा 'कालकूट' कालकूटनामकं 'हणाइ'त्ति हन्ति, चस्य च गम्यमानत्वात् शस्त्रं च, यथा कुत्सितं गृहीतं कुगृहीतम् 'एसेव'त्ति एप एवं SCSCRACC दीप अनुक्रम [७५० -७६२] SamEducatimotimatent For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~457 Page #458 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||३८-५०|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||३८ -५०|| विषादिवत् 'धम्मोत्तिधर्मो-यतिधर्मः 'विपयोपपन्नः' शब्दादिविषययुक्तो हन्ति, दुर्गतिपातहेतुत्वेन द्रध्ययतिमिति शेषः 'वेताल इवाविवण्ण'त्ति अविपन्नः अप्राप्तविपत् मन्त्रादिभिरनियबित इत्यर्थः,पठ्यते च-'वेयाल इवावि-- बंधणो'त्ति इह च 'अविवन्धनः' अविद्यमानमत्रादिनियन्त्रणः, उभयत्र साधकमिति गम्यते ॥ यो लक्षणं 'सुविणोत्ति खप्नं चोकरूपं 'प्रयुञ्जानः' व्यापारयन् निमित्तं च-भौमादि कौतुकं च-अपत्याद्यर्थ सपनादि तयोः संप्रगाढा-अतिशयासक्तो निमित्तकौतुकसंप्रगाढः 'कुहेडविज'त्ति कुहेटकविद्या-अलीकाश्चर्यविधायिमत्रतत्रज्ञानात्मिकास्ता एव कर्मबन्धहेतुतयाऽऽश्रवद्वाराणि तेर्जीवितुं शीलमस्येति कुहेटकविद्याऽऽश्रवद्वारजीवी 'न गच्छति' न| प्राप्नोति 'शरणं' त्राणं दुष्कृतरक्षाक्षम 'तस्मिन्' फलोपभोगोपलक्षिते 'काले' समये ॥ अमुमेवा) भावयितुमाह-तम18/तमेणेव उत्ति अतिमिथ्यात्वोपहततया 'तमस्तमसैव' प्रकृष्टाज्ञानेनैव 'तुः' पूरणे सः' द्रव्ययतिः अशीलः सदा दुःखी विराधनाजनितदुःखेनैव 'विष्परियासुवेईत्ति विपर्यासं तत्त्वादिषु वैपरीत्यम् 'अति' उपगच्छति, ततश्च 'संधावति' | सततं गच्छति नरकतिर्यग्योनीः 'मौन' चारित्रं विराध्य 'असाधुरूपः तत्त्वतोऽयतिखभावः सन् , अनेन विराधनाया अनुबन्धवत्फलमुक्तम् ॥ कथं पुनर्मोनं विराध्य कथं वा नारकतिर्यग्गतीः संधायतीत्याह-'उद्देसिय मित्यादि, क्रयणं-क्रीतं तेन कृतं-निर्चितं क्रीतकृतं नित्यागं नित्यपिण्डम् 'अग्गीविवत्ति अग्निरिव प्राकृतत्वादाकारः | सर्वम्-अप्राशुकमपि भक्षयतीत्येवंशीलः सर्वभक्षी भूत्वा कृत्वा च पापमिति योगः, मच्छति' याति कुगतिमिति शेषः॥ दीप अनुक्रम % [७५० % -७६२] * SamEducatminer For Pro पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~458~ Page #459 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||३८-५०|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥४७९॥ सूत्रांक ||३८ २० २० -५०|| यतश्चैवं दुश्चरितैरेव दुर्गतिप्राप्तिरतः 'न' नैव 'तम्' इति प्रस्तावादन 'कण्ठछेत्ता' प्राणहर्ता 'से' तस्य 'दुरप्पत्ति महानिर्गप्राकृतत्वात् 'दुरात्मता' दुष्टाचारप्रवृत्तिरूपा, न चैनामाचरन्नपि जन्तुरत्यन्तमूढतया वेत्ति, ततः किमुत्तरकालमपि न वत्स्यतीत्याह-'स' दुरात्मताकर्ता ज्ञास्थति प्रक्रमाद् दुरात्मतां 'मृत्युमुखं तु' मरणसमयं पुनः प्राप्तः पश्चादनुता-1 न्थीया. पेन-हा दुष्ठु मयाऽनुष्ठितमित्येवंरूपेण, दया-संयमः सत्याधुपलक्षणमहिंसा वा तद्विहीनः सन् , मरणसमये हि प्रायोऽतिमन्दधर्मस्थापि धर्माभिप्रायोत्पत्तिरित्येवमभिधानं, यतश्चैवं महाऽनर्थहेतुः पश्चात्तापहेतुश्च दुरात्मता तत2 आदित एव मूढतामपहाय परिहर्तव्येयमिति भावः॥ यस्तु मृत्युमुखप्राप्तोऽपि न तां वेत्स्यति तस्य का वातत्याह'णिरहिए' इत्यादि, निरर्थिका तुशब्दस्यैवकारार्थस्येह सम्बन्धात् 'निरर्थकैव' निष्फलैय नाम्ये-श्रामण्ये रुचिः-15 इच्छा नान्यरुचिस्तस्य 'जे उत्तमति सुव्यत्ययादपेश्च गम्यमानत्वाद् 'उत्तमार्थेऽपि' पर्यन्तसमयाराधनारूपेऽपि आस्तांग पूर्वमित्यपिशब्दार्थः 'विपर्यासं' दुरात्मतायामपि सुन्दरात्मतापरिज्ञानरूपम् 'एति' गच्छति, इतरस्य तु कथञ्चित्स्यादपि किश्चित्फलमिति भावः, किमेयमुच्यते ?, यतः 'इमेवित्ति अयमपि प्रत्यक्षो लोक इति सम्बन्धः, 'से' इति तस्य 'नास्ति' न विद्यते, न केवलमयमेव परोऽपि लोको-जन्मान्तरलक्षणः, तत्रेहलोकाभावः शरीरक्लेशहेतुलोचादिसेवनात् । परलोकाभावश्च कुगतिगमनतः शारीरमानसदुःखसम्भवात् ,तथा च दुहतोऽवित्ति द्विधाऽपि ऐहिकपारत्रिकार्थाभावेन । 'स झिज्झइ'ति, स ऐहिकपारत्रिकार्यसम्पत्तिमतो जनान् विलोक्य धिग् मामपुण्यभाजनमुभयभ्रष्टतयेति चिन्तयार दीप अनुक्रम . .. .. .. H ॥४७॥ [७५० -७६२] SAMEauratmintamariana पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~459~ Page #460 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ||३८ -५०|| दीप अनुक्रम [७५० -७६२] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [२०], मूलं [--] / गाथा ||३८-५०|| निर्युक्तिः [४२२R...] क्षीयते, 'तत्र' इत्युभयलोकाभावे सति 'लोके' जगति || यदुक्तं स ज्ञास्यति पश्चादनुतापेनेति, तत्र यथाऽसौ परितप्यते तथा दर्शयन्नुपसंहारमाह-'एवमेव' उक्तरूपेणैव महाव्रतास्पर्शादिना प्रकारेण 'यथाच्छन्दाः स्वरुचिविरचिताचाराः | कुशीलाः- कुत्सितशीलास्तद्रूपः- तत्स्वभावः 'कुररीव' पक्षिणीव 'णिरसोय'त्ति निरर्थी- निष्प्रयोजनः शोको यस्याः | सा निरर्थशोका 'परिताप' पश्चात्तापरूपम् 'एति' गच्छति, यथा चैषाऽऽमिषगृद्धा पक्ष्यन्तरेभ्यो विपत्प्राप्तौ शोचते न च ततः कश्चिद् विपत्प्रतीकार इति, एवमसावपि भोगरसगृद्ध ऐहिकामुष्मिकानर्थप्राप्तौ ततोऽस्य खपरपरित्राणासमर्थत्वेनानाथ त्वमिति भाव इति त्रयोदशसूत्रार्थः ॥ एतत् श्रुत्वा यत्कृत्यं तदुपदेष्टुमाह- सुचाण मेहावि सुभासियं इमं, अणुसासणं नाणगुणोचवेयं । मग्गं कुसीलाण जहाय सव्वं, महानियंठाण वए पहेणं ॥ ५१ ॥ सुगम, नवरं 'मेहावि'त्ति मेधाविन् ! सुष्ठु - शोभनप्रकारेण भाषितं सुभाषितम् 'इमम्' इत्यनन्तरोक्तम् 'अनुशासनं विषदनदोषदर्शनेनार्थावृत्त्या शिक्षणं ज्ञानस्य गुणो ज्ञात्वा विरमणात्मकस्तेन, ज्ञानगुणाभ्यां वोपपेतं युक्तं ज्ञानगुणोपपेतं 'वयेति प्रजेस्त्वं 'पहेणं' ति ' पथा' मार्गेण महानिर्ग्रन्थानामिति सम्बन्धः ॥ ततः किं फलमित्याहचरितमायारगुणन्निए तओ, अणुत्तरं संजम पालिया णं । निरासवे संखविया ण कम्मं, उबेर ठाणं विलुउत्तमं धुवं ॥ ५२ ॥ For Parsons Praten पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~460~ Page #461 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२०], मूलं [-1 / गाथा ||१२|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||५२|| उचराध्य. 'चरित्तमायारगुणन्निए'त्ति मकारोऽलाक्षणिकः, चरित्रस्याचरणम् आचार:-आसेवनं स एव गुणः, यद्वा गुणो-15 महानिर्मबृहद्वृत्तिः ज्ञानं ततस्तेन ताभ्यां चाऽन्वितश्चारित्राचारगुणान्वितः 'ततः' महानिर्ग्रन्थमार्गगमनाद् 'अनुत्तरं' प्रधानं 'संजम || सजमधीया० पालिया णं'ति 'संयम' यथाख्यातचारित्रात्मकं 'पालयित्वा' आसेव्य 'निराश्रयः' हिंसाद्याश्रवरहितः सन् क्षप जा ॥४८०॥ यित्वा यदिया 'संखविया 'ति 'सङ्घपय्य' संक्षयं नीत्वा 'कर्म' ज्ञानावरणीयादि 'उपैति' उपगच्छति 'स्थानं पदं विपुलं च तदनन्तानामपि तत्रावस्थितेरुत्तमं च प्रधानत्वादू विपुलोत्तमं 'ध्रुवं' नित्यं मुक्तिपदमितियावदिति सूत्रार्थः ॥ सर्वोपसंहारमाह एबुग्गदतेवि महातबोधणे, महामुणी महापडणे महापसे। महानियंठिजमिणं महासुअं, से काहए महया वित्थरेणं ॥५३ ॥ 'एवम्' उक्तप्रकारेण 'से काहए'त्ति स श्रेणिकपृष्टो मुनिरकथयत् , तत्कालापेक्षया कथयति वेति सम्बन्धः,15 उग्रः-उत्कटः कर्मशत्रुजयंप्रति स एव 'दान्तः'प्राग्वत् उग्रदान्तः अपिः पूरणे ‘महाप्रतिज्ञः' अतिदृढव्रताभ्युपगमोऽत | ॥४८॥ एव महायशा महानिग्रन्थेभ्यो हितं महानिन्धीयम् इदम्' अनन्तरोक्तं, शेष स्पष्टमिति सूत्राथेंः ॥ ततश्च- 13 दा तुट्टो अ सेणिओ राया, इणमुदाह कपंजली। अनाहयं जहाभूयं, मुगु मे उबदंसियं ॥५४॥ तुझं सुलद्धं माखु मणुस्सजम्म, लाभा सुलद्धा प तुमे महेसी तुम्भे सणाहा य सर्वधवा य, जंभे ठिया मग्गि जिणु-14 दीप अनुक्रम [७६४] % % पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~461 Page #462 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२०], मूलं [-] / गाथा ||१४-१७|| नियुक्ति: [४२२R...] प्रत सूत्रांक ||५४ -५७|| आत्तमाणं ।। ५५ ॥ तसि नाहो अणाहाणं, सव्वभूयाण संजया!। खामेमि ते महाभाग!, इच्छामि अणुसा सिउं ॥५६॥ पुच्छि ऊण मए तुम्भ, झाणविग्यो य जं कओ। निमंतिया य भोगेहिं,तं सव्वं मरिसेहि मे।।५७॥ 2 सूत्रचतुष्टयं स्पष्टमेव, नवरं तुष्टश्चेति 'चः' पुनरर्थे भिन्नक्रमश्च, ततः श्रेणिकः पुनरिदमाह-'यथाभूत' यथाऽवस्थितम् उपदर्शितं त्वयेति प्रक्रमः, 'सुलद्धं खुत्ति सुलब्धमेव 'लाभा' वर्णरूपाद्यवाप्तिरूपा धर्मविशेषोपलम्भात्मका वा मुलब्धा उत्तरोत्तरगुणप्रकपहेतुत्वात् , सनाथाश्च सबान्धवाश्च तत्त्वत इति गम्यते, 'यद' यस्माद् 'भ' इति भवन्तो, जिनोत्तममार्गस्थितत्वं सुलब्धजन्मत्वादौ हेतुः 'तंसी ति पूर्वार्द्धन पुनरुपबृंहणा कृता, उत्तरार्द्धन तु क्षम-113 गोपसंपन्नते दर्शिते, इह तु तेत्ति त्यां। 'अणुसासिउंति 'अनुशासयितुं' शिक्षयितुमात्मानं भवतेति गम्यते, पुनः क्षमणामेव विशेषत आह-पृष्ट्वा 'कथं त्वं प्रथमचयसि प्रबजित' इत्यादि पर्युनुयुज्य निमन्त्रिताश्च भोगैयदिति सम्बन्ध इति सूत्रचतुष्टयाथैः ॥ सकलाध्ययनार्थोपसंहारमाह| एवं थुणित्ताण स रायसीहो, अणगारसीहं परमाइ भत्तिए । सोरोहो य सपरियणो [सबंधवो य], धम्माणुरत्तो विमलेण चेयसा ।।५८॥ ऊससियरोमकूवो, काऊण य पयाहिणं । अभिवंदिऊण सिरसा, अइयाओ नराहिवो ॥ ५९॥ इयरोवि गुणसमिद्धो तिगुत्तिगुत्तो तिदंडविरओ य। विहग इव विप्पमुक्को विहरह वमुहं विगयमोहु ॥ ६०॥त्तिवेमि ॥ दीप अनुक्रम [७६६-७६९] न .. For woman पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~462 Page #463 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२०], मूलं [--1 / गाथा ||५८-६०|| नियुक्ति: [४२२R...] उत्तराध्य. प्रत बृहद्वृत्तिः सूत्रांक ||५८-६०|| ॥ महानियंठिनं ॥२०॥ महानिर्गराजा चासौ सिंहवातिपराक्रमवत्तया राजसिंहः, अनगारस्य च सिंहत्वं कर्ममृगान् प्रत्यतिदारुणत्वात् प्रशंसा न्थीया. ख्यापकं वा उभयत्र सिंह इति, सावरोधः'सान्तःपुरः सपरिजनः'सपरिवारः विमलेन' विगत मिथ्यात्वमलेन ।उसिता |इयोच्छ्रसिताः-उद्भिन्ना रोमकूपा-रोमराणि यस्यासावुच्छृसितरोमकूपः 'अतियातोत्ति 'अतियातः' गतः |स्वस्थानमिति गम्यते, 'इतरः' संयतः सोऽपि हि विहग इव' पक्षीव 'विप्रमुक्तः' क्वचिदपि प्रतिबन्धविरहितो विहरतीति वर्तमाननिर्देशः प्राग्वत्, 'विगतमोहः' विगतवैचित्त्यः, शेषं सुगममिति सूत्रत्रयार्थः ॥ इति' परिसमाप्ती, प्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्तेऽपि प्राग्वदेव ॥ इति श्रीशान्त्याचार्यविरचिताया-14 मुत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां महानिर्ग्रन्थीयं नाम विंशतितममध्ययनं समाप्तमिति ॥ २०॥ 2%3A%25A5%80% दीप अनुक्रम ॥४८॥ [७७० इति श्रीशान्याचार्यकृतायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटी०पिंशतितममध्ययनं समाप्तम् ॥ % -७७२] For Prato पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र अध्ययनं-२० परिसमाप्तं ~463 Page #464 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक |||| दीप अनुक्रम [७७३] % % % % % % % %s [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१|| अध्ययनं [२१], निर्युक्तिः [४२३-४२४] अथ समुद्रपालीयं एकविंशमध्ययनम् । व्याख्यातं महानिर्ग्रन्थीयं नाम विंशतितममध्ययनम् इदानीमेकविंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययनेऽनाथत्वमनेकधोक्तम्, इह तु तदालोचनाद्विविक्तचर्ययैव चरितव्यमित्यभिप्रायेण सैवोच्यत इत्यनेनाभिसम्बन्धेनायातस्याध्ययनस्य प्राग्वदनुयोगद्वारचतुष्टयं प्ररूप्यं तावद् यावन्नाम निष्पन्ननिक्षेपे समुद्रपालीयमिति नामातः समुद्रपालनिक्षेपाभिधानायाह निर्मुक्तिकृत्समुद्देण पालिअंमि अ निक्खेवु चउक्कओ दुविह दव | समुदपालिआऊ वेयंतो भावओ य नायवो । तत्तो समुट्ठिअमिणं समुहपालिजमज्झयणं ॥ ४२४ ॥ गाथाद्वयं प्रतीतार्थमेव, नवरं समुद्रपालनिक्षेपप्रस्तावे यत्समुद्रेण पालित इत्युक्तं तत्समुद्रपाल इत्यत्र समुद्रेण पाल्यते । स्मेति समुद्रपाल इति व्युत्पत्तिख्यापनार्थमिति गाथाद्वयार्थः ॥ गतो नामनिष्पन्नो निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनि ष्पन्न निक्षेपावसरः, स च सति सूत्र इति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं तचेदम् आग० || ४२३ ॥ चंपाए पालिए नाम, सावए आसि वाणिए । महावीरस्स भगवओ, सीसो सो उमहपणो ॥ १ ॥ For Parana Private On पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अथ अध्ययनं - २१ "समुद्रपालीय” आरभ्यते ~464~ Page #465 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२१], मूलं [-] / गाथा ||२-१०|| नियुक्ति: [४२४,,,] प्रत सूत्रांक ||१|| उत्तराध्य-12 निग्गंथे पावयणे, सावए से विकोविए । पोएण ववहरंते, पिहुंडं नयरमागए ॥ २॥ पिहुंडे ववहरंतस्स, समुद्रपा वाणिओ देश धूअरं । तं ससत्तं पइगिज्झ, सदेसमह पत्थिओ॥ ३ ॥ अह पालियस्स घरणी, समुदंमि पस-1 बृहद्वृत्तिः लीया. हैवई । अह दारए तहिं जाए, समुद्दपालित्ति नामए ॥४॥ खेमेण आगए चंप, सावए वाणिए घरं । संवहई घरे ॥४८॥ तस्स, दारए से सुहोइए ॥५॥ यावत्तरीकलाओ अ, सिक्खिए नीइकोविए। जुठवणेण य अप्फुरणे, सुरूवे पियर्दसणे ॥६॥ तस्स रूववई भज, पिया आणेइ रूविणिं । पासाए कीलए रम्मे, देवो दोगुंदगो जहा ॥७॥ अह अन्नया कयाई, पासायालोअणे ठिओ । वज्झमंडनसोभाग, वज्झं पासह बज्झगं ॥८॥ तं, पासिऊण संविग्गो, समुहपालो इणमब्यवी। अहो असुहाण कम्भाणं, निजाणं पावगं इमं ॥९॥ संबुद्धो के दूसो तहिं भयवं परमं संवेगमागओ। आपुच्छऽम्मापियरो, पवए अणगारियं ॥ १०॥ सूत्राणि दश । इदमुत्तरं चाध्यनं कचित्सोपस्कारतया व्याख्यास्यते-'चम्पायां' चम्पाऽभिधानायां पुरि पालितो है नाम सार्थवाहः श्रावकः' श्रमणोपासकः आसीत् अभूद् वणिगेव पणिजः-पणिग्जातिः महावीरस्य भगवतः 'शिष्यः | विनेयः स इति, सतुः विशेषणे 'महात्मनः प्रशस्वात्मनः । स च कीगित्याह-नैनन्धे' निबन्धसम्बन्धिनि ॥४८२] 'पावयणे'त्ति प्रवचने श्रावकः सः इति पालितो विशेषेण कोविदः-पण्डितो विकोविदः, कोऽर्थः ?-विदितजीवादिपदार्थः 'पोतेन व्यवहरन्' प्रवहणवाणिज्यं कुर्वन् पिहुण्डं' पिहुण्डनामकं नगरम् 'आगतः'प्राप्तः । तत्र च पिहुण्डे LX दीप अनुक्रम [७७३] Tm.Puremaramaniwom पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~465 Page #466 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥२-१०॥ दीप अनुक्रम [७७४ -७८२] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्तिः [४२४,,,] अध्ययनं [२१], मूलं [--] / गाथा ||२-१०|| | व्यवहरते तद्गुणाकृष्टचेताः कश्चिद्वाणिजो 'ददाति' यच्छति 'धूयरं 'ति दुहितरम्, उदृढवांश्च तामसी, स्थित्वा च तत्र कियन्तमपि कालं तां 'ससत्त्वा'मित्यापन्नसत्त्वां 'परिगृस' आदाय वदेशम् 'अथ' अनन्तरं 'प्रस्थितः' चलितः । तत्र चागच्छतोऽथ पालितस्य गृहिणी 'समुद्र' जलधी 'प्रसूते' गर्भ विमुञ्चति खेति शेषः, 'अथेत्युपन्यासे 'दारकः' सुतः 'तस्मिन्' इति प्रसवने 'जातः' उत्पन्नः समुद्रपाल इति 'नामतो' नामाश्रित्य । क्रमेण चागच्छन् 'क्षेमेण' कुशलेनागतम्पाय श्रावको वाणिजः 'घर'ति चस्य गम्यमानत्वाद् गृहं च खकीयं कृतं च तत्र वर्द्धापनकादि, संवर्द्धते च 'गृहे' वेश्मनि, 'तस्य' इति पालिताभिधानवणिजो दारकः सः 'सुखोचितः' सुकुमारः । एवं च प्राप्तः कलाग्रहणयोग्यतां द्विसप्ततिकलाश्च शिक्षितः, शिक्षते वा पाठान्तरतः, जातश्च 'नीतिकोविदः' न्यायाभिज्ञः, 'जोबणेण य अप्फुण्णे'त्ति, चस्य भिन्नक्रमत्वाद्यौवनेन 'आपूर्णश्व' परिपूर्णशरीरश्च, पठ्यते च ' जोवणेण य संपण्णे'त्ति, तत्र च 'संपन्नः' युक्तोऽत एव 'सुरूपः' सुसंस्थानः 'प्रियदर्शनः सर्वस्यैवानन्ददाता । परिणयनयोग्यतां च तस्य विज्ञाय 'रूपवती' विशिष्टकृतिं भार्या' पत्नीं 'पिता' पालितवणिग् 'आनयति' तथाविधकुलादागमयति 'रूपिणीं' रूपिणीनानीं, परिणायितश्च तामसी, प्रासादे क्रीडति -रमंति तथा सह 'रम्ये' अभिरतिहेतौ देवो दोगुन्दको यथा । अथान्यदा | कदाचित 'प्रासादालोकने' उक्तरूपे स्थितः सन् बधमर्हति वध्यस्तस्य मण्डनानि रक्तचन्दनकरवीरादीनि तैः | शोभा - तत्कालोचितपरभागलक्षणा यस्यासौ वध्यमण्डनशोभाकस्तं 'वध्यं' वधाई कञ्चन तथाविधाकार्यकारिणं Education Intematinal For Persona Prat www.yo पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~466~ Page #467 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥२-१०॥ दीप अनुक्रम [७७४ -७८२] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [२१], मूलं [-] / गाथा ||२-१०|| निर्युक्ति: [४२४,,,] ॥४८३ ॥ उत्तराध्य. * पश्यति बाह्यं - नगरवहिर्वर्त्तिप्रदेशं गच्छतीति वाह्यगस्तं, कोऽर्थः ? - बहिर्निष्क्रामन्तं यद्वा 'वध्यगम्' इह वध्यशबृहद्वृत्तिः |ब्देनोपचाराद्वध्यभूमिरुक्ता । तथाविधं वध्यं दृष्ट्वा संवेगः - संसारवैमुख्यतो मुक्तत्यभिलाषस्तद्धेतुत्वात्सोऽपि संवेगस्तं समुद्रपालः 'इदं' वक्ष्यमाणमत्रवीत्, यथा-अहो ! 'अशुभानां कर्मणां पापानामनुष्ठानानां 'निर्याणम्' अवसानं 'पापकम्' अशुभम् 'इदं' प्रत्यक्षं यदसौ बराको वधार्थमित्थं नीयत इति भावः । एवं परिभावयन् 'संबुद्धः' अवगंतत्तत्त्वः 'सः' वणिक्पुत्रः 'तत्रे'ति तस्मिन्नेव प्रासादालोकने 'भगवान्' माहात्म्यवान्, माहात्म्येऽपि भगवच्छव्दस्य दर्शनात् परं प्रकृष्टं संवेगमागतः, ततश्चापृच्छय मातापितरौ 'पवयेत्ति 'प्रात्राजीत' प्रकर्षेण गतवान्, कोऽर्थः ? - प्रतिपन्नवान्, 'अनगारितां' निस्सङ्गतामिति सूत्रदशकार्थः ॥ सम्प्रति अनुवादोऽपि स्पष्टताहेतुर्व्याख्याङ्गमिति ख्यापनायैवोक्तमेवार्थमनुवदन् विशेषं च वदन्नाह नियुक्तिकारः- Education t चंपाऍ सत्थवाहो नामेणं आसि पालिओ नामं । वीरवरस्स भगवओ सो सीसो खीणमोहस्स ॥ ४२५ ॥ अह अन्नया कयाई पोषणं गणिमधरिमभरिएणं । तो नगरं संपत्तो पिहुंडं नाम नामणं ॥ ४२६ ।। ववहरमाणस्स तहिं पिहुंडे देइ वाणिओ धूअं । तंपि अ पत्तिं घितॄण निग्गओ सो सदेसस्स ॥ ४२७ ॥ अह सा सत्थाहसुआ समुद्दमज्झमि पसवई पुत्तं । पिअदंसणसवंगं नामेण समुद्दपालित्ति ॥ ४२८ ॥ For Parsons Praten समुद्रपा लीया. २१ ~467~ ॥४८३ ॥ g पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः Page #468 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२१], मूलं [--1 / गाथा ||२-१०|| नियुक्ति: [४२५-४३५] (४३) प्रत सूत्रांक ||२-१०|| खेमेणं संपत्तो सो पालिअ सावगो घरं निययं ।धाईदसद्धपरिवुडो अह वहइ सो उदाहिनामो॥४२९॥ बावत्तरि कलाओ असिक्खिओ नीइकोविओ जाहे। तो जुवणमप्फुन्नो जाओ पिअदंसणो अहिआ४३०॥ अह तस्स पिआ पत्तिं आणेई रूविणित्ति नामेणं । चउसट्रिगुणोवेयं अमरवहणं सरिसरूवं ॥ ४३१॥ अह रूविणीइ सहिओ कीलइ सो भवणपुंडरीअंमि।दोगुदगुव देवो किंकरपरिवारिओ निच्च ॥ ४३२ ॥ अह अन्नया कयाई ओलोअणसंठिओ सदेवीओ । वझं नीणिजंतं अन्निजंतं जणसएहिं ॥ ४३३ ॥ अह भणइ सन्निनाणी भीओ संसारिआण दुक्खाणं । नीआण पावकम्माण हा जहा पावगं इणमो ४३४ दिसंबुद्धो सो भयवं संवेगमणुत्तरं च संपत्तो। आपुच्छिऊण जणए निक्खतो खायजसकित्ती ॥ ४३५॥ व्याख्यातप्राया एव, नवरं 'वीरवरस्स'त्ति नामतोऽन्येऽपि वीराः संभवन्ति स तु भगवान् भावतोऽपि वीर इति | प्राधान्यख्यापकं बरग्रहणम् , अनेन भगवत्समकालतामध्यस्य दर्शयति, गणिमधरिमभरिएणं ति गणिमं-पूगफ-18 लादि धरिमं सुवर्णकादि । प्रियदर्शनानि-सकलजनाभिमतावलोकनानि सर्वाण्यङ्गानि-शिरउरःप्रभृतीन्यस्पेति प्रियदर्शनसर्वाङ्गस्तम् । 'धाईदसद्धपरिवुडे'त्ति दशार्द्धधात्रीपरिवृतो, दशार्द्ध च पञ्च ताश्च क्षीरमजनमण्डन दीप अनुक्रम [७७४ -७८२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~468~ Page #469 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२१], मूलं [--] / गाथा ||२-१०|| नियुक्ति: [४२५-४३५] प्रत सूत्रांक ||२-१०|| उत्तराध्य. क्रीडनाङ्कधान्यः, 'उदधिनामा' उदधिसमानार्थसमुद्रपदोपलक्षिताभिधानः समुद्रपालनामेति यावत् । 'जोवणम-18 समुद्रपा प्फुण्ण'चि मकारोऽलाक्षणिको जातः प्रियदर्शनः 'अधिक'मित्यतिशयेन सविशेषलावण्यहेतुत्वाद् यौवनस्य, चतुःष-13 बृहद्वृत्तिः||ष्टिगुणा अश्वशिक्षादिकलाष्टकरहिताः कला एव विज्ञानापरनामिका उच्यन्ते, 'भवनपुण्डरीके' भवनप्रधाने, ॥४८४॥ [४] पुण्डरीकशब्दस्पेह प्रशंसावचनत्वात् । वध्यं पश्यतीति शेपः, 'नीणिजंत'न्ति नीयमानम् ('अणिजंत'न्ति) 'अन्वी-131 दयमानम्' अनुगम्यमानं जनशतैरविवेकिभिरिति गम्यते, पठन्ति च-'बझं णीणीजंतं पेच्छा तो सो जणवए-13 हिंति स्पष्टं, सजी-सम्यग्दृष्टिः स चासौ ज्ञानी च सजिज्ञानी 'भीतः' त्रस्तः सन् सांसारिकेभ्यो दुःखेभ्य है। इति, आपत्याच सुव्यत्ययः, किं भणतीत्याह-'नीचानां' निकृष्टानां 'पापकर्मणां' पापहेत्वनुष्ठानानां चौर्यादीनां दाहा' इति खेदे यथा पापकं फलमिति गम्यते, 'इणमोति 'इदं प्रत्यक्षं, किमुक्तं भवति?-यथाऽस्य चौर-13 स्थानिष्टं फलं पापकर्मणां तथाऽस्मादृशामपीति नियुक्तिगाधैकादशकार्थः ॥ प्रवज्य च यदसौ कृतवांस्तदाह सूत्रकृत् जहिज सगंथ महाकिलेसं, महंतमोहं कसिणं भयाणगं। परियायधम्म चऽभिरोअइजा, क्याणि सीलाणि, परीसहे य ॥१५॥ अहिंस सचं च अतेणगं च, तसो अ बंभं अपरिग्गहं च । पडिबजिया पंच महब्वयाणि,6 दाचरिज धम्मं जिणदेसियं विऊ ॥ १६ ॥ सब्बेहि भूएहि दयाणुकंपी, खतिवमे संजयवंभयारी । सावज-|| *जोगे परिवजयंतो, चरिज भिक्खू सुसमाहिइंदिए ॥१७ ।। कालेण कालं विहरिज रहे, बलापलं जाणिय|| दीप अनुक्रम [७७४-७८२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र गाथा क्रम ||११,१२,...||एव वर्तते, परन्तु मूल संपादने मुद्रण अशुद्धित्वात् क्रमांकने ||१५.१६...||इति मुद्रितं ~469~ Page #470 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥११ -२३|| दीप अनुक्रम [७८३ -७९५] Jam Educato [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [२१], मूलं [-] / गाथा ||११-२३|| निर्युक्ति: [४३५...] अप्पणी अ । सीहो व सद्देण न संतसिज्जा, वड्जोग सुच्चा न असम्भमाह ॥ १८ ॥ उबेहमाणो उ परिब्ब इज्जा, पियमप्पियं सव्व तितिक्खइज्जा । न सव्व सव्वत्थऽभिरो अइज्जा, न यावि पूर्य गरिहं च संजय ॥ १९ ॥ अणेग छंदा मिह माणवेहिं, जे भावओ से पकरेइ भिक्खू । भयभेरवा तत्थ उईति भीमा, दिव्या मणुस्सा अदुवा तिरिच्छा ||२०|| परीसहा दुब्विसहा अणेगे, सीयंति जत्था बहुकायरा नरा से तत्थ पते न वहिज पंडिए, संगामसीसे इव नागराया ॥ २१ ॥ सीओसिणा दंसमसगा य फासा, आर्यका विविहा फुसंति देहं । अक्कुक्कुओं तत्थऽहियासइज्जा, रयाई खेविज पुराकडाई ॥ २२ ॥ पहाय रागं च तहेव दोसं, मोहं च भिक्खू सययं वियक्खणे । मेरुव्व वाएण अकंपमाणे, परीसहे आयगुत्ते सहिज्जा ॥ २३ ॥ अणुन्नए नावणए महेसी, न यावि पूयं गरिहं च संजए। से उज्जुभावं परिवज्र संजए, निव्वाणमग्गं विरए उबेइ ॥ २४ ॥ अरहरइसहे पहीणसंथवे, बिरए आयहिए पहाणवं । परमपरहिं चिट्ठाई, छिन्नसोए अममे अकिंचणे ।। २५ ।। विवित्तलयणाई भहज ताई, निरोवलेवाई असंथडाई । इसीहिं चिन्नाहं महायसेहिं, कारण फासिज परीसहाई ॥ २६ ॥ सण्णाणनाणोवगए महेसी, अणुत्तरं चरियं धम्मसंचयं । अणुत्तरेनाणधरे जसंसी, ओभासई सूरिए वंडत लिक्खे ॥ २७ ॥ त्रयोदश सूत्राणि प्रायः सुगमान्येव, नवरं 'हित्वा' वक्त्वा संश्चासौ प्रत्बश्व सन्धः, प्राकृतत्वाद्विन्दुलोपस्तं, For Parsons Paton janothony org पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः | अत्र गाथा क्रम ||११,१२,...|| एव वर्तते, परन्तु मूल संपादने मुद्रण अशुद्धित्वात् क्रमांकने || १५.१६..|| इति मुद्रितं ~470~ Page #471 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२१], मूलं [-1 / गाथा ||११-२३|| नियुक्ति : [४३५...] प्रत लीया सूत्रांक ||११-२३|| उत्तराध्य. पठन्ति च-'जहित्तु संगं चत्ति जहाय संग च'त्ति या उभयत्र हित्वा 'सर' खजनादिप्रतिबन्धं 'चः' पूरणे निपातः, निपातासमुद्रपामहान् क्लेशो यस्माद्यस्मिन् वा तं महाक्लेशं, 'महंतमोहति महान् मोहः-अभिष्वङ्गो यस्मिन् यतो वा तं तथा-12 विधं, 'कसिणं'ति कृत्वं कृष्णं वा कृष्णलेश्यापरिणामहेतुत्वेन 'भयानक' महाकेशादिरूपत्वादेव विवेकिनां भया-४ ॥४८५॥ दावह 'परियाय'ति प्रक्रमात् प्रत्रज्यापर्यायस्तत्र धर्मः पर्यायधर्मस्तं, चशब्दः पादपूरणे, 'अभिरोयएज्ज'त्ति आर्ष-18 स्वाद् बस्तन्यर्थे सप्तमी, ततः 'अभ्यरोचत' अभिरोचितवान् तदनुष्ठानविषयां प्रीतिं कृतवान् , उपदेशरूपतां च तन्त्र-13 न्यायेन ख्यापयितुमित्थं प्रयोगः, यद्वाऽऽत्मानमेवायमनुशास्ति-यथा हे आत्मन् ! सई त्यक्त्वा प्राज्याधर्ममभिरोचयेद् भवान् , एवमुत्तरक्रियासपि यथासम्भवं भावनीय, प्रत्रज्यापर्यायधर्ममेव विशेषत आह-'प्रतानि' महा-13 प्रतानि 'शीलानि पिण्डविशुद्धयाद्युत्तरगुणरूपाणि 'परीषहान्' इति भीमसेनन्यायेन परीषहसहनानि च । एतदभिरुच्य तदनन्तरं च यत् कृतवांस्तदाह-अहिंसा सत्यमस्तैन्यकं च 'तत्तो अ व अपरिग्गहं च'त्ति ततश्च ब्रह्मचर्य-14 मपरिग्रहं च 'प्रतिपद्य' अङ्गीकृत्य 'अचंभपरिग्गहं च' इति तु पाठे परिवयं चेत्यध्याहार्य 'पञ्च महाव्रतानि' उक्त-2 ४८५॥ रूपाणि 'चरेज'ति प्राग्वदचरत् , नाङ्गीकृत्यैव तिष्ठेदिति भावः, 'धर्म' श्रुतचारित्ररूपं जिनदेशितं 'विऊ'ति विद्वान्जानानः । 'सवेहिं भूपहि' सुब्व्यत्ययात् 'सर्वेषु' अशेषेषु प्राणिषु दयया-हितोपदेशादिदानात्मिकया रक्षणरूपया वाऽनुकम्पनशीलो दयानुकम्पी पाठान्तरतो दयानुकम्पो वा, क्षान्त्या न त्वशक्त्या क्षमते-प्रत्पनीकाद्युदीरितदु दीप अनुक्रम [७८३-७९५] SamEaicstomimumational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र गाथा क्रम ||११,१२,...||एव वर्तते, परन्तु मूल संपादने मुद्रण अशुद्धित्वात् क्रमांकने ||१५.१६...||इति मुद्रितं ~471 Page #472 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) प्रत सूत्रांक ॥११ -२३|| दीप अनुक्रम [७८३ -७९५] [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [२१], मूलं [-] / गाथा ||११-२३|| निर्युक्ति: [४३५...] र्वचनादिकं सहत इति क्षान्तिक्षमः, संयत इति संयतः स चासौ ब्रह्मचारी च संयतत्रह्मचारी पूर्व प्रति| पत्या गतत्वेऽपि ब्रह्मचारीत्यभिधानं ब्रह्मचर्यस्य दुरनुचरत्वख्यापनार्थम् अनेन च मूलगुणरक्षणोपाय उक्तः । | 'कालेण काल'ति रूढितः काले - प्रस्तावे यद्वा कालेन -पादोनपौरुप्यादिना कालमिति — कालोचितं प्रत्युपेक्षणादि कुर्वन्निति शेषः, 'राष्ट्र' मण्डले 'बलावल सहिष्णुत्वासहिष्णुत्वलक्षणं ज्ञात्वाऽऽत्मनः यथा यथाssत्मनः संयमयोगहानिर्न जायते तथा तथेत्यभिप्रायः, अन्यच सिंहवत् 'शब्देन' प्रस्तावाद्भयोत्पादकेन 'न समत्रस्यत्' नैव सच्याचलितवान् सिंहरन्ताभिधानं च तस्य सात्त्विकत्वेनातिस्थिरत्वात्, अत एव बाग्योगम् अर्थाद् दुःखोत्पादकं 'सोच'ति श्रुत्वा 'न' नैव 'असभ्यम्' अश्लीलरूपम् ' आहुत्ति उक्तवान् । तर्हि किमयमकरोदित्याह – 'उपेक्षमाणः' तमवधीरयन् पर्यत्रजत्, तथा 'प्रियम्' अनुकूलम् 'अप्रियम्') अननुकूलं 'सब तितिक्खएज'त्ति सर्वम् 'अतितिक्षत' सोढवान् किञ्चन सवत्ति सर्व वस्तु सर्वत्र स्थानेऽभ्यरोचयत, न यथादृष्टाभिलाषुकोऽभूदिति भावः यदिवा यदेकत्र पुष्टालम्बनतः सेवितं न तत्सर्वम् - अभिमताहारादि सर्वत्राभिलषितवान्, न चापि पूजां गहीं वाऽभ्यरोचयतेति सम्बन्धः, इह च गहतोऽपि कर्मक्षय इति केचिदतस्तन्मतव्यवच्छेदार्थे गर्हाग्रहणं, यद्वा गर्हा - परापवादरूपा । ननु भिक्षोरपि किमन्यथाभावः संभवति ? येनेत्थमित्थं च तगुणाभिधानमित्याह - 'अणेग' त्ति वृत्तार्द्ध, तत्र च 'अणेग' त्ति अनेके 'छन्दाः' अभिप्रायाः संभवन्तीति Samaicamatond For Parsons Privat पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः ~472~ Page #473 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२१], मूलं [-1 / गाथा ||११-२३|| नियुक्ति : [४३५...] वृहद्वृत्तिः प्रत सूत्रांक ||११-२३|| उत्तराध्यागम्यते, 'मिह'त्ति मकारोऽलाक्षणिकः 'इह' जगति 'माणयेहि ति सुव्यत्ययान्मानवेषु 'जे' इति याननेकान् छन्दान समुद्रपा'भावतः' तत्ववृत्त्योदयिकादिभावतो वा सः 'प्रकरोति' भृशं विधत्ते 'भिक्खुति अपिशब्दस्य गम्यमानत्वाद् भिक्षु होलीया, रपि-अनगारोऽपि सन् , अत इत्थमित्थं च तद्गुणाभिधानमिति भावः । अपरञ्च- भयभैरवाः' भयोत्पादकत्वेन ॥४८॥ भीपणाः 'तत्र' इति ब्रह्मप्रतिपत्तौ 'उइंति'त्ति 'उद्यन्ति' उदयं यान्ति, पठ्यते च-'उति'ति, उपयन्ति भयभैरवा इत्यनेनापि गते भीमा इति पुनरभिधानमतिरौद्रताख्यापनायोक्तं, 'दिव्या' इत्यादावुपसर्गा इति गम्यते, 'तिरिच्छत्ति तैरश्चाः। तथा 'परिसह'त्ति परीपहाच उद्यन्तीति सम्बन्धः, 'सीदन्ति' संयमप्रति शिथिलीभवन्ति 'जत्थति यत्रयेपूपसर्गपु परीपहेपु च सत्सु 'से' इति सः तत्र' तेषु 'पत्ते'त्ति वचनव्यत्ययात्प्राप्तेषु प्राप्तो वा-अनुभवनद्वारेणायातो न ('व्यथेत' स्यात्) व्यथाभीतश्चलितो वा सत्त्वाद् भिक्षुः सन् 'सङ्ग्रामशीर्ष इव' युद्धप्रकर्ष इव 'नागराजः' हस्तिराजः। 'स्पशों।' तृणस्पर्शादयः 'आतङ्काः' रोगाः 'स्पृशन्ति' उपतापयन्ति 'अकुकय'त्ति आपत्वात् कुत्सितं कूजति-पी[डितः सन्नाक्रन्दति कुकूजो न तथेत्यकुकूजः, पठ्यते च-'अकक्करेति कदाचिद्वेदनाऽऽकुलितो न कर्करायितकारी, अनेन चानन्तरसूत्रोक्त एवार्थो विस्पष्टतार्थमन्वयेनोक्तः, एवंविधश्च स रजांसीव रजांसि-जीवमालिन्थहेतुतया||"" कमाणि खेविजे'ति अक्षिपत् परीपहसहनादिभिः क्षिप्तवान् । 'मोह(म्) इति मिथ्यात्वहास्यादिरूपोऽज्ञानं वा गृपते, आत्मना गुप्तः आत्मगुप्तः-कूर्मवत्सङ्कुचितसर्वाङ्गः, अनेन परीषहसहनोपाय उक्तः । किञ्च-'नयावि पूर्य गरिहं च TECCANCE दीप अनुक्रम [७८३-७९५] SamEducatimotimatent पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~473 Page #474 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२१], मूलं [-] / गाथा ||११-२३|| नियुक्ति : [४३५...] प्रत सूत्रांक ||११-२३|| संजयेत्ति न चापि पूजां गहीं च प्रतीति शेषः 'असजत् सङ्गं विहितवान् ,तत्र च अनुन्नतत्वमनवनततं च हेतुर्भावतः, उन्नतो हि पूजां प्रति अवनतश्च गहाँ प्रति सङ्गं कुर्यान त्वन्यथेति भावः, पूर्वत्राभिरुचिनिषेध उक्तः, इह तु || सङ्गस्येति पूर्वस्माद्विशेषः, 'स' इति सः' एवंगुणः 'ऋजुभायम्' आर्जवं 'प्रतिपद्य' अङ्गीकृत्य संयतो 'निर्वाणमार्ग' सम्य-15 ग्दर्शनादिरूपं विरतः सन् 'उपैति' विशेषेण प्राप्नोति, वर्तमाननिर्देश इहोत्तरत्र च प्राग्वत् । ततः स तदा कीदृशः किं करोतीत्याह-अरतिरती संयमासंयमविषये सहते-न ताभ्यां वाध्यत इत्यरतिरतिसहः, 'पहीणसंथवेत्ति प्रक्षीणसंस्तवः संस्तवाहीणो वा, संस्तवश्च पूर्वपश्चात्संस्तवरूपो वचनसंवासरूपो वा गृहिभिः सह, प्रधानः स च संयमो |मुक्तिहेतुत्वात् स यस्यास्त्यसौ प्रधानवान् , परमः-प्रधानोऽर्थः पुरुषार्थो वाऽनयोः कर्मधारये परमार्थी-मोक्षः स पद्यते। |-गम्यते यैस्तानि परमार्थपदानि-सम्यग्दर्शनादीनि सुव्यत्ययात् तेषु तिष्ठति-अविराधकतयाऽऽस्ते 'छिन्नसोय'त्ति छिन्नशोकः छिन्नानि वा श्रोतांसीव श्रोतांसि-मिथ्यादर्शनादीनि येनासौ छिन्नश्रोताः अत एवाममोऽकिञ्चनः, इह च संयमविशेषाणामानन्त्यात्तदभिधायिपदानां पुनः पुनर्वचनेऽपि न पौनरुतयं, तथा 'विविक्तलयनानि' ख्यादिविरहितोपाश्रयरूपाणि विविक्तत्वादेव च 'निरोवलेवाईति निरुपलेपानि-अभिष्यङ्गरूपोपलेपवर्जितानि भावतो द्रव्यतस्तु तदर्थ नोपलिप्तानि 'असंसृतानि' बीजादिभिरख्यातानि, अत एव च निर्दोपतया 'ऋषिभिः' मुनिभिः 'चीर्णानि' आसेवितानि, चीर्णशब्दस्य तु 'सुचीर्ण प्रोपितत्रत मितिवत्साधुता, 'फासेज'त्ति अस्पृशत् , सोढयानित्यर्थः, पुनः पुनः दीप अनुक्रम [७८३-७९५] SamEducatum totumational पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~474 Page #475 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२१], मूलं [-1 / गाथा ||११-२३|| नियुक्ति: [४३५...] प्रत सूत्रांक ||११-२३|| उत्तराध्य. परीषहस्पर्शनाभिधानमतिशयख्यापनार्थं, ततः स कीडगभूदित्याह-'सः' इति समुद्रपालनामा मुनि नमिह श्रुत- समुद्रपा ज्ञानं तेन ज्ञानम्-अवगमः प्रक्रमाद् यथावरिक्रयाकलापस्य तेनोपगतो-युक्तो ज्ञानज्ञानोपगतः, पाठान्तरतःबृहद्वृत्तिः ४लीया. सन्ति-शोभनानि 'नाने त्यनेकरूपाणि ज्ञानानि-सङ्गत्यागपर्यायधर्माभिरुचितत्वाधवबोधात्मकानि तैरुपगतः सन्ना॥४८७॥ 18 नाज्ञानोपगतः 'धर्मसञ्चयं क्षान्त्यादियतिधर्मसमुदयम् 'अणुत्तरेणाणधरे'त्ति एकारस्थालाक्षणिकत्वादनुत्तरज्ञान दि केवलाख्यं तद्धारयत्यनुत्तरज्ञानधरः, पठ्यते च-गुणुत्तरे जाणधरे'त्ति, तत्र च गुणोत्तरो-गुणप्रधानो, ज्ञानं प्रस्ता वात्केवलज्ञानं तद्धरः, एकारस्थालाक्षणिकत्वाद् गुणोत्तरं यद् ज्ञानं तद्धरो वाऽत एव यशस्वी 'ओभासद यत्ति अब-| भासते प्रकाशते सूर्यवदन्तरिक्षे, यथा नभसि सूर्योऽवभासते तथाऽसायप्युत्पन्नकेंबलज्ञान इति त्रयोदशसूत्रार्थः ।। वि सम्प्रत्यध्ययनार्थमुपसंहरंस्तस्यैव फलमाह दुविहं खवेऊण य पुन्नपार्व, निरंजणे सव्वओ विप्पमुफे। तरित्ता समुई व महाभवोहं, समुहपाले अपुणागमं गए ॥ २४ ॥ तिमि ॥ ॥समुद्दपालिजं ॥२१॥ ४॥४८७॥ 'द्विविध' विभेदं घातिकर्मभवोपग्राहिभेदेन 'पुण्यपापं शुभाशुभप्रकृतिरूपं 'निरञ्जनः' कर्मसारहितः, पठ्यते। |च-'निरंगणे'त्ति अक्षेर्गत्यर्थत्वात् निरङ्गनः-प्रस्तावात्संयम प्रति निश्चलः शैलेश्यवस्थाप्राप्त इतियावत्, अत एव #C8 दीप अनुक्रम [७८३-७९५] Furammarwata tiwand पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~475 Page #476 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (४३) [भाग-३६] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२१], मूलं [--1 / गाथा ||२४|| नियुक्ति: [४३६] प्रत सूत्रांक ||२४|| ARCASTAKALA Miसर्वतः' इति बाधादान्तराञ्च प्रक्रमादभिष्वङ्गहेतोः 'ती|' उलङ्घय 'समुद्रमिय' अतिदुस्तरतया महाश्चासौ भवौ पश्च-देवादिभवसमूहस्तं, शेष स्पष्टमिति सूत्रार्थः ॥ अमुमेवार्थ स्पष्टयितुमाह नियुक्तिकृत्काऊण तवचरणं बहुणि वासाणि सो धुयकिलेसो । तं ठाणं संपत्तो जं संपत्ता न सोयंति ॥ ४३६॥ सुगमैव । 'इति' परिसमाप्तौ, ब्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्तेऽपि प्राग्वत् ॥ इति श्रीशान्त्या|चार्यविरचितायामुत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां समुद्रपालीयं नामैकविंशतितममध्ययनं समाप्तमिति ॥ २१ ॥ CAKCARSA दीप अनुक्रम [७९६] श्रीशान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटी०शिष्य समुद्रपालीयं नामैकविंशतितममध्ययनं समाप्तम् । पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: भाग 36 आगम ४३/२ 'उत्तराध्ययनानि'मूलसूत्र [४/२] मूलं एवं शान्त्याचार्यजी रचिता टीका परिसमाप्ता: मूल संशोधकः सम्पादकश्च पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब किंचित् वैशिष्ट्य समर्पितेन सह पुन: संकलनकर्ता मुनि दीपरत्नसागरजी M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि) ~476 Page #477 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भाग कलपृष्ठ ३१४ ५८६ ४९८ ३९२ ५९४ ४९४ ३३८ ५९२ ५५२ सवृत्तिक-आगम-सत्ताणि भाग १ से ४० में कहां क्या मिलेगा? इस भागमे समाविष्ट आगम के नाम और आगम-क्रम 01 | | आगम ०१ आचार मूलं एवं वृत्ति भाग-१ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन-१,२ 02 | आगम ०१ आचार मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन- ३ से ९, श्रुतस्कन्ध- २ 03 | आगम ०२ सूत्रकृत मूलं एवं वृत्ति, भाग-१ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन- १ से १३ | 04 | आगम ०२ सूत्रकृत मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ श्रुतस्कन्ध-१, अध्ययन १४ से १६, श्रुतस्कन्ध-२ | 05 | आगम ०३ स्थान मुलं एवं वत्ति, भाग-१ स्थान-१ से ४ 06 | आगम ०३ स्थान मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ स्थान-५ से १० संपूर्ण 07 | आगम ०४ समवाय मूलं एवं वृत्ति. 08 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-१ शतक-१ से ६ 09 | आगम ०५ भगवती मुलं एवं वृत्ति, भाग-२ शतक-0 से ११ 10 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-३ शतक- १२ से २० 11 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-४ शतक- २१ से ४१ संपूर्ण 12 | | आगम ०६ ज्ञाताधर्मकथा मूलं एवं वृत्ति. 13 | आगम-७,८,९,१०उपासकदशा, अंतकृतदशा, अनुत्तरोपपातिकदशा, प्रश्नव्याकरण मूलं एवं वृत्ति. 14 | आगम-११,१२, विपाक, उववाई मूलं एवं वृत्ति. 15 | आगम १३ राजप्रश्नीय मूलं एवं वृत्ति. 16 | आगम९४ जीवाजीवाभिगम भाग-१ मलं एवं वृत्ति. [प्रतिपत्ति-३-अतर्गत] सूत्र-१ से १३८ 17 | आगम९४ जीवाजीवाभिगम भाग-२ मलं एवं वृत्ति. [प्रतिपत्ति-३-अतर्गत] सूत्र- १३९ से प्रतिपत्ती-१० संपूर्ण 18 | आगम १५ प्रज्ञापना भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. पद-१ से ५ 19 | आगम १५ प्रज्ञापना भाग-२ मलं एवं वत्ति. पद-६ से २२ | 20 | आगम १५ प्रज्ञापना भाग-३ मलं एवं वत्ति. पद- २३ से ३६ संपूर्ण | 21 | आगम १६ सूर्यप्रज्ञप्ति मूलं एवं वृत्ति. ५१४ ३८४ ५२२ ५३८ ३८४ ३१४ ४८० ४८८ ४२६ ५१४ ૨૩૬ ६१० ~477~ Page #478 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भाग कलपृष्ठ ६१४ ३७६ ४२६ ३४४ ३१२ ३३० 28 ४६६ ४४२ सवृत्तिक-आगम-सत्ताणि भाग १ से ४० में कहां क्या मिलेगा? इस भागमे समाविष्ट आगम के नाम और आगम-क्रम 22 | आगम १७ चन्द्रप्रज्ञप्ति मूलं एवं वृत्ति. 23 | | आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- १ एवं २. 24 | आगम१८ जंबूदविपप्रज्ञप्ति भाग-२ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- ३ एवं ४. 25 | आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-३ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- ५ से ७. | आगम १९-३२ निरयावलिका, कल्पवतंसिका, पुष्पिका, पुष्पचूलिका, वृष्णिदशा, चतुःशरण, आतुरपरत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान, ___भक्तपरिज्ञा, तंदलवैचारिक, संस्तारक, गच्छाचार, गणिविदया, देवेन्द्रस्तव मूलं एवं छाया 27 आगम ३३ थी ३९ मरणसमाधि मूलं एवं छाया, निशीथ, बुहत्कल्प, व्यवहार, दशाश्रुतस्कंध, जीतकल्प/पंचकल्प, महानिशीथ मूलं एव आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-१, नियुक्ति-१ से ५२१ 29 | आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-२, निर्यक्ति- ५२२ से ९५१ | आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-३ नियुक्ति- ९५२ से १२७३ अपूर्ण, [अध्ययन- १ से ४ अपूर्ण] 31 | आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-४ नियुक्ति- १२७३ अपूर्ण से १६२३, [अध्ययन- ४ अपूर्ण से ६ संपूर्ण] | आगम ४१/१ ओघनियुक्ति मूलं एवं वृत्ति.. 33 | आगम ४१/२ पिंडनियुक्ति मूलं एवं वृत्ति. | आगम ४२ दशवैकालिक मूलं एवं वृत्ति. 35 | आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-१, अध्ययन- १ से ५ 36 | आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-२, अध्ययन-६ से २१ 37 | | आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-३, अध्ययन- २२ से ३६ | आगम ४४ नन्दिसूत्र मूलं एवं वृत्ति. | आगम ४५ अनुयोगद्वार मूलं एवं वृत्ति. | 40 | कल्पाबारसा]सूत्र... चतुःशरण, तन्दुलवैचारिक, गच्छाचार मूलं एवं वृत्ति. 30 ४६४ । ४२६ 32 ४७२ ३७६ ५९० ५२२ ४८२ ४६६ ५२८ 38 39 ५६० ३९४ ~478 Page #479 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ਸਤਗੁਰ ਦੀ ਤਹਾਸ ਰਸ ਸ ਸ ਸ ਸ ਸ ਤੇ 17 ਰ ਸ਼ ਨੂੰ ਭਾਰਤ ਕਾਹਲ ਕਰਨ ਦੀ ਹਾਲਤ ਤ ਤਾ ਬ ਸ आगम . ਪਸ ਨਾ ਪਲ ਹੈ * 479 » Page #480 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वाज आजम आजमाव नमो नमो निम्मलदसणस्स सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि मूल सशोधक अभिनव-संकलनकर्ता ONS पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महायज आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] MAHARASHeat प्रत-प्राप्ति और पेज-सेटिंग कर्ता : के चेरमन श्री प्रवीणभाई शाह, अमेरिका मुद्रक : नवप्रभात प्रिन्टींग प्रेस अमदाबाद Mo 982559885519825306275 ~480~ Page #481 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ईस प्रोजेक्ट के संपूर्ण-अनुदान-दाता gasusahakara श्री आगम मंदिर पालिताणा R P DHis OPINIOENi sosi onsortina HEORIEO ROPER (ORHEOREPOEE ~481 Page #482 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम आगम आगम आगा मूल संशोधक पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजसाहेब आजम आजम आगम आणम् आगम आगम आगमा आगम 43 "उत्तराध्ययनानि” मूलं एवं वृत्ति: [2] आगम आजम आज अभिनव-संकलनकर्ता आजमा आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी __ [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] आजम आजमआजम आजमरा ~482