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श्रीपदाचार्यादिविरचित्त. सुरदीपिकादि प्रकरण संग्रहः समस्त जैन बंधुउने अवश्य उपयोगी जाणी
स्थामति संशोधन करावी श्री जैन हीसिंघ सरस्वती सना तरफपी
श्रावक मंगळदास खस्दुलाइए. भन्दाबाद स्मि मिटिंग मेस मायक मुद्रालयमा शा. मणीलाल उगरचंदे मुद्रित को.
संवत १९९९ .
कीमवर.१-.-..
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- समर्पणपत्रिका. श्रीमन्नागपुरीय वृहत्तपगठाधिराज युगप्रवराचार्य जंगमतीर्थराजतुल्य सहश्राष्ट
श्रीयुत् परमपूज्य सद्गुरु नद्दारक श्री वातृचंप्रसूरीश्वर साहेव ! o आप श्रीमान सेवक जनमनवांछितपूरक कल्पवृक्ष सदृश छो, सत्यप्रवचनोपदेष्ठा होवाथी भविजीवो
द्वारक (भविजनतारक) प्रवहण रूप छो, माचीन जैनशैली मुजय विधिपरंपरा पद धारक शुद्ध क्रियान
ठानवंत छो, शांतरसना समुद्र , सुरूपगुणाकर, वचमातिशयवंत, चारित्रपात्रचूडामणि, कुमतांधकारनभोमणि 3 छो, अने मुनिजनमनमानसहंस होइ उग्रविहार युक्त भारतभूमंडल.मां विचरी स्वपरनुं सदा कल्याण कर्या * करोछो. इत्यादि प्रातःस्मरणीय सद्गुणोथी लोभाइ आकर्षायला मनोभावसह, आप परमोपकारी गुरुराजना
सद्गुणोनुं सदैव स्मरण रहेवा हितार्थ आ " मुरदीपिकादिप्रकरणसंग्रह" नामक परम लाभदायि पुस्तक * समर्पण करी अत्यानंद पामुंळु ते आप सेवकश्रेयकारी स्वीकारी लइ आभरी करशोजी !
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→* नपकार. * परमपूज्य प्रातःस्मरणीय परमगुणान्वित स्वछ मति गति रति (नाग्य) यश-* वंत गधपति श्रीमान् नद्दारक श्री वातृचंसूरीश्वरजीना सुविनयी सुशिष्य सादर श्री सागरचं जी मुनिमहाराज के जे साहेबे आ परम लानकारी पुस्तकने प्रसि-* हिमा लारवा हितार्थ अलग अलग स्थळे यी परमोपयोगी लेख एकत्र करी सुधारी थापयामां अवर्णनीय काळजीपूर्वक ध्यान थापो पोताना पठन पाठन क्रियानुष्ठानादि करवाना महान् कीमती समयनो लोग आप्यो , अने नव्यजीवोना आ. स्मकल्याणनो मार्ग खुस्लो करवा खंत राखी , ते माटे शुद्धांतःकरण पुरःसर तेश्रीनो उपकार मानी श्री जैन इनिसिंघ सरस्वतीसला अत्यानंद पामे ले.
ली. सदगुरु वार्षिद सेवक, PREAKICHIKIXEKSIKKIMIREDIRAKSIKKIKHENKIKE
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वीर संवत २४३९
विजय राज्ये श्री भ्रा श्री श्री भ्रातृ भ्रा श्री श्री भ्रातृ चंत भ्रा श्री श्रीभ्रातृ चंद्र चं तु भ्रा श्री श्री भ्रा त चंद्र सूदचत भ्रा श्री श्री भ्रातृ चंद्रमू रो मूद्र चंत भ्रा श्री श्री भ्रातृ चंद्र मूरीश्वरी मुद्रत भ्रा श्री श्रीभ्रातृ चंद्रसूरीश्व रवरी मूद्रत भ्रा श्री श्रीभ्रातृ चंद्रसूरीश्वर स र श्वरी मूद्र चं त भ्रा श्री
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नमोनमः
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शिवगंज नगरे भाचार्य पद समये ॥श्रानातचन्ऽसूराषट्पद।।। संवत. १९६७ ना पैशाख पदी १२
"ग्रजराज आज साँबरो घंसी बना गयो" इत्यनेन रागेण गीयते । श्रीवातृचन्द्र सूरिराजमर्थदायकं । जजस्व हे सखे गुरुं विरागिनायकम् ॥ टेर ॥ संसारमेतमुग्मितुं समीहसे यदा । मुक्तिं च यातुमिच्छसि प्रमोदतस्तदा श्रोत्रातृचन्द्र० ॥१॥ प्रवेशमीहसे यदा थियो निवेशने । तदा मनःप्रसारये ममोपदेशने ॥ श्रीवातृचन्द्र० ॥२॥ कराखकास एष संनिधौ समागतः । किमीक्षसे विनश्वरं फलं हि रागतः ॥ श्रीमातृचन्द्र० ॥३॥ विहाय कर्म शास्त्रमर्म धर्मकर्मणे । ग्रहीतुमीहसे यदा तदा सुशर्मणे ॥ श्रीवातृचन्द्र० ॥ ४ ॥ भीपार्श्वचन्द्रसूरिराजवंशदीपकं । सुमुक्तिराजधानिकाध्वनः समीपकम् ॥ श्रीत्रातृचन्छ० ॥५॥ तपः प्रकर्ष निर्जितोरुपञ्चसायकं । महानिदेशनासुधारसप्रपायकम् ॥ श्रीब्रातृचन्द्र० ॥ ६ ॥ नित्यानन्देन रचिता लाईसासेन गापिता । थाचार्यत्रातृचन्मस्य षट्पद्यास्तां मुखाम्बुजे ॥१॥
१ समीपयतीति समीपस्तं मुक्तिरामपान्पाः सापीरुपदर्शकपिति भावः ।
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भापाटीका । मित्र ! वाच्छित अर्थको देनेवाले,गुरु मनिराज आचार्य श्रीभ्रातचन्द्र मूरिराज महाराजको सेवन कर ॥टेश।
जो कि तु इस संसारको छोडना चाहता है, और जो मुक्तिको जाना चाहता है तो इर्षसे है मित्र ! वांछित अर्थको देनेवाले ॥१॥
तूं बुद्धिके घरमें जो प्रवेशको चाहता है तो मेरे उपदेशमें मन फैला।है पित्र॥२॥ यह भयंकर काल पासमेंही आया हुवा है, रागसे क्या अनित्य मुखको देख रहा है। हे मित्र.॥३॥ जोकि तूं (सांसारिक) कर्मको छोरकर धर्म करने के लिये शास्त्रके मर्मको लेना चाहता है तो मुक्ति के लिये हे मित्र०॥४॥
(श्रीवहत्तपागच्छीय) श्रीपार्थचन्द्रसूरीश्वरजीके वंशके दीपक, मुक्तिरूप राजधानीके मार्गको समीप करनेवाले। मित्र०॥५॥ .तपके प्रप.पसे कामको जीतने वाले, व्याख्यानरूप अमृतरसके पानेवाले हे मित्र वांछित भर्थको देनेवाले गुरु मुनिराज आचार्य श्रीभ्रातृचन्द्रजी मरिराज महाराजको सेवन कर ॥६॥
नित्यानन्दशर्मासे बनाई गई, और 'भाइलालजीसे गाइ गइ, यह आचार्य श्रीभ्रातृचन्द्र सूरीश्वरजीकी पद्पदी मुखरूप कमलपर रहो ॥१॥
ली. आपश्रीजीथी जन्म पामेली. श्री जैन इरिसिंघ सरस्वती सभा भने सेवक मंगलदास.
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॥ वांचनारने जलामण ॥ वांचनार ? हुं थाजे तमारा हस्तकमळमां श्रावुलु. मने यत्नपूर्वक वांचजो, मारां कहेलां सत्वने हृदयमा धारण करजो, हुँ जे जे वात कहुं ते ते विवेकथी विचारजो; एम करशो तो तमे | ज्ञान, ध्यान, नीति विवेक, सद्गुण आत्मशान्ति पामी शकशो.
तमो जाणता हशो के केटलाक अज्ञान मनुष्यो नहि वांचवा योग्य पुस्तको वांचीने | पोतानो वखत खो दे ले अने अवळे रस्ते चली जाय , आ लोकमां अपकीर्ति पामे ने तेमज परखोकमां नीची गतीए जाय .
- तमो कोई पण प्रकारे श्रा पुस्तकनी श्राशातना करशो नहि ! तेने फामशो नहि, माघ पामशो नहि, के बीजो कोइ पण रीते बगामशो नहि. विवेकथी सघळु काम खेजो. विचक्षण पुरुषो ए कधू डे के-ज्यां विनय विवेक त्यांज धर्म बे.
तमने एक ए पण नलामण ले के जेठने वांचतां नहि श्रावस्तुं होय अने तेनी श्छा होय
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| तो या पुस्तक अनुक्रमे तेने वांची संनळावq.
तमे जे वातनी गम पामो नहि ते माह्या पुरुष पासेथी समजी लेजो समजवामां थाळस | | के मनमा शंका करशो नहि. तमारा श्रात्मानुं आथी हित थाय. तमने ज्ञान, शान्ति, थानंद | | मळे, तमो परोपकारी, दयालु, क्षमावान, विवेकी अने बुद्धिशाळा था एवी शुन याचना श्र. ईत नगवान् कने करी था पाठ पूर्ण करुंडं.
- - ॥ पुस्तक प्रकट थवानुं प्रयोजन.॥ __ था पंचम कालनी अंदर विषय कषायनी लोलुपताने लीधे के धन धान्यादिनो लान | प्राप्त करवानी धामधूमने लीधे महान् पुस्तको (आगमो-सिद्धांतो ) ले सांजली विचारी मनन जेटलो अवकाश अने समजशक्ति हाथ न होवाथी जैनागमनी अंदरनु रहस्य आपणने प्राप्त थश् शकतुं नथी. केमके सागर समान अगाध जावनयाँ सूत्रोने ध्यानपूर्वक अवलोकवां ए कंश न्हानीशूनी वात नथी. महान् नूमंमलमांनी पूर रहेली के श्रागमनीअगम सूक्ष्म वस्तुनु नि-||
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रीक्षण करवा माटे तो खास उमदा पुर्बीननीज जरूर पसे बे. परंतुं तेवी दुर्वीनरूप ज्ञानचक्कु आपणां सतेज न होवाथो आपण तेवा सूक्ष्म विचारोने अंश मात्र पण जाणवा नाग्यशाली थता नथी.
आपणी आ अमचणने ध्यानमां लश् अगाउथी ते श्रुतसमुज्नुं मंथन करी आपणे समजी शकीए तेवी नाषामां आपणा परोपकारी पूर्वाचार्योए पृथक् पृथक् सत्य वार्ताउनुं रहस्य जाहे. रमां श्राणी सागरने गागरमा समावी दीधेल . जेथो गागरमां समायला सागर सम रहस्यनुं
अवकाश पूर्ण अवगाहन करी शकवा वखते शकिमान् थर शक्तिये. एज हेतुने अवलंबी आ | विविध विषयविजूषित प्रथम प्रकरणगुनने प्रसिद्धमा लाववा यत्न श्रादरेलो .
महान् खुलासानी प्रमाणिक चर्चा आपणा अल्पमतिवंत अल्पसमयमां समजी शकीए | एवां प्रकरणो रचवाना संबंधमां पूर्वाचार्योए उगवेलो अपार परिश्रम सफल थवा श्रापणे ए प्रकरणो नणवां-बांचवां-सांनत्रवां के मनन करवां ए अवश्य आपणुं कर्त्तव्य कर्म समजवू
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योग्य , आवी मान्यताने लीधे आपणी एज फर्ज अदा करवानेमाडे आ अमारो प्रथम प्रयास , ते तरफ सुलद दाखवी आ ग्रंथपकवाननी वानगी चाखवा तत्पर रहे अवश्यर्नु डे.
आपणा पूर्वाचार्यों निष्प्रेही, निरनिमानी, निलोनी, अप्रमत्त, परोपकारी, अममत्ववादी, तत्वगवेषी, हितचिंतक, स्वपरोन्नतिकारक, शास्त्राज्ञानुगामी, निष्पक्षपाति, सत्यवक्ता, प्रमा-| णिक अने नवनीरु हता. जेथी शंकाने स्थान प्रापवानुं कारण नथी के तेमणे टाढा पहोरनां गप्पां जगतजीवोने वंचवा माटे हांक्यां हशे. तेउनां तो संटंकः वचनो अक्षरशः मान्य करवाज योग्य .
पूर्वाचार्योए विषयत्नोगनी लालसात्यजी, सरसनीरस अहार तथा प्राशुक पाणीनो उपयोग करी, वनमां, उपाश्रय, के नयंकर स्थलोमां रही, आपणा उपकार माटे ग्रंथा निर्माण करेला बे. तेए पंथ वधारवा, किंवा शिष्य संततीनो फ़ूमो जमाववा के यशनी आकांक्षा यादि स्वार्थपरायणताने अवलंबी वाक्यजालमां बाल जीवाने फसावा उद्यम आदरेल न इतो. तो पड़ी तेवा
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परोपकारी प्रमाणिक प्रनाविक पुरुषोनां वचनोने स्वार्थीवचनो मानवां ए आपणी नूल नहि तो बीजु शुं गणाय ? एमनां विशुद्ध वचनोने हैयाना उमलकासाथ हीरा मोतीथी वधावी | लेवांज जोश्ये ..
• आपणा मुख्य पूर्वाचार्यजी के जेमनां रचेलां प्रकरणो या पुस्तकनी अंदर विशेष ने ते श्री पार्श्वचं सूरीश्वरजी महान् प्रनावशाली पुरुष हता अने जैनशासनना उत्तमोत्तम उद्योतकारी होवाथी अद्यापि लगण तेमना वचनानुसार चालनार हजारो सेवक विद्यमान ले. ते साहेबजी बुराजनी तलेटीमा आवेला हमीरपुरमा संवत १५३७ जन्म धरी पोरवामवंशी, वेळ.
गशाह पिता अने विमलादेवी माताने महत्तावंत कर्यां इता. ते कुसाग्र बुद्धिवंत महत् पुरुषने || | विद्या तो सुप्रसन्नज हती, तेमज ते सुखनबोधी इता, जेथी गुरुराज श्री साधुरत्न पंमितराजना || ||
उपदेशथी बांध पामी संवत १५४६ नो सालमां फक्त नव वर्षनी किशोरवयमांज दीक्षाअंगीकार || करी कुलनो उद्धार को हतो.
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मरुधरना सुरतरु सदृश जनमनवांबित पूरक अने पुष्करावर्त मेघसमान हृदयक्षेत्रने रसाल करनार देशनावंत पंमितराज श्रीसाधुरत्नजीनी कृपाथी नवदीक्षित मुनि शास्त्रोना पारगामी थया अने तेथी हृदयदेवमांथी तत्त्वज्ञानांकुर स्फुरायमान थतां संवत १५५४ नी सालमा उपाध्याय पदना अधिकारी थया. | ए समयमां जैनसमुदायनी अंदर शिथिलाचार विशेष वधी पमतां क्रियानुष्ठान विधिविप
रीत थया करतां हतां. एथी शिष्ठाचारनी प्रवृत्ति करावा त्यागी वैरागी सोनागी महदात्माए | गुरुराजनी आज्ञा संपादन करी संवत १५६५ नी शालमा क्रियाउद्धार करी शिथिलाचारने धीरे धीरे दूर करवा नगीरथ प्रयत्न आदयो. | दरम्यान पोते योधपुर पधार्या त्यां श्री संघे अने जोधाणनाथे आचार्यपद स्वीकारवा
वीनंती करी , जेथी नक्तजनोनी नावश्रेणीने वृधि साथे नेटामवा सर्वानुमतनी ऐक्यता थतां | पोते सूरिपद अंगीकार करी आचर्यताना गांनार्य अर्थने शोनाववा लाग्या. प्रमादी बनेला साधु
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|| साध्वी श्रावक-श्राविकाने सिद्धांतानुसार धर्मोपदेशना तत्त्ववमे जाग्रत करी शुद्ध क्रियानुष्ठान |
धारी बनाववा एक सरखो विचार राखी अमलमां आणता नारत नूमिना घणा नागोमां मि| थ्यांधकारनो अन्नाव को. तेमज महान् सूत्र सिद्धांतोनुं दोहन करी साररुप बालावबोध अने नाषाना ग्रंथो तैयार करी नव्य जीवोने नवतारक मार्ग खुल्लो मुक्यो.
ए सूरीश्वरजीमां उत्तमोत्तम काव्यशक्ति हती. तेथ। संस्कृत, मागधी नाषामां अने प्रा|| कृतमा विविधविषयमा काव्य रची चमत्कृती जाहेरमां लाव पोते आपणा उद्वारक थया. एट, | बुंज नहीं पण नारतवर्षनां दरेक शदेर श्रने बनतां लगे दरेक गामोमां विचरी असंख्य संकटो | सहन करी जव्यजीवो हितार्थ जैन ज्ञाननंमारो तपासी जे जे तत्व प्राप्त थयुं ते ते परोपकार निमित्त जाहेरमा मूको अनेक जीवोनुं श्रेय कयु. -- मजकुर महदात्माश्रीए रचेला प्रकरणो पैको यत् किचित् जे हाय लाग्यां तेमानां थोमांक | वानगीरुप प्रसिद्धिमा थाणवा आ सुरदीपिकादि प्रकरणसंग्रह 'नामक पुस्तक प्रगट करवामां
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॥ ४ ॥
याव्युं डे, खाने एथी मानवाने कारण मले के के तत्वप्राही पुरुषो तत्वसंग्रही पोतानी सद्द्मावना जर्या ज्ञानमा वृद्धि करी स्वर्गमां बिराजेला ते मद्दात्मा श्रीने आत्मानंद अर्पशेज !
पुस्तकर्मानां प्रकरणोमां शुं शुं रहस्यो समायल बे ते जाणवा माटे कद्देवानी जरुर बे के नीचे बता वेला ३५ प्रकरणो पैकी प्रथम प्रकरण 'सुरदीपिका'नी अंदर सिद्धांतोनुं दोड्न करी देव धर्मनो उत्तम प्रकारे निर्णय करी तेनी देलना करनारने मना करवानी भलामण करी बे. बीजा प्रकरण 'सिद्धांताराधनैकोनचत्वारिंशतिका'नी अंदर जैन सिद्धांतानुं केवी रीते आराधन करवुं ते स्पष्ट बनावेल डे. त्रीजा प्रकरण 'शोलदीपिका'नी अंदर पोतानुं शील शीरीते पालन कर ते प्रकाशमां लावेल d. चोथा प्रकरण 'आगम बत्रीशी'नी अंदर श्लोक संख्या परिमाण यादि तथा आराधन कर्त्ताने लाज शुं ते बतावेल डे. पांचमा प्रकरण 'गुरुत्रीशी' नी अंदर गुरुना तत्त्वने सारी पेठे चर्चेल बे. हा प्रकरण 'पाखी उत्रीशी' नी अंदर पाखी प्रतिक्रमण कर तिथिये करवुं तेनो निर्णय सि|द्धांतानुसार करेल . सातमा प्रकरण 'यसकाइ विचार' छाने 'असजाय सित्तरी' नी अंदर -
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सजाय क्या क्या लागे अने ते केटली मर्यादा लगी असला गणाय वगेरे आगमानुसार वर्णवी |||| वतावेल. आठमा 'श्री ब्रह्मवावनी' नी अंदर अध्यात्मशाननो खजानो खतो करेल. नवमा || प्रकरण 'कलिकाल स्वरुप कथन शतक' नी अंदर चतुर्विध संघर्नु उत्तम प्रकारे वर्णन करेल . दशमा प्रकरण 'गुणस्थान पंचाशिका' नी अंदर चौद गुणस्थानकोर्नु टुंकामां वर्णन करी बतावेल | वे. अगीयारमा प्रकरण 'गणितप्रमाण' नी अंदर श्री जगवतीजीमा बतावेल गणितनी सविस्तर समऊ आपी जे. बारमा प्रकरण 'षट् व्यविचार' नी अंदर अव्यविचार संबंधी संक्षिप्त व्याख्या उतां अति सरस आपेल . तेरमा प्रकरण 'अष्टकर्मबंध विचार' नी अंदर केवी रीते कर्म बंधाय जे अने केवी रीते ते लोगवाय डे तेनुं विवेचन करेल . चौदमा प्रकरण 'सद्दहणा द्वात्रिंशिका' नी अंदर श्री जिनोक्त सद्दहणा क्रियानुं वर्णन करेल . पंचदशमा प्रकरण 'बाग्मद | परिहार पचीशी' नी अंदर सरलताथी आठ मदनो त्याग करवानुं कथन करेल . सोलमा प्रकरण 'प्रश्नोना उत्तर अजवालामा लावेल . सत्तरमा प्रकरण 'श्री जिन प्रतिमा स्थापन रास' नी।
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अंदर प्रतिमा स्थापन संबंधी घणी उत्तम प्रकारे व्याख्या प्ररुपेल . अढारमा प्रकरण 'श्री श- || चुंजय रास' नी अंदर श्री तरणतारण तीर्थाधिराजनी स्तुति करेल . अंगणीशमा प्रकरण 'एश| णाशतक' नी अंदर चतुर्विध संघने कंठमणि करी राखवारुप गोचरी संबंधी दोषोनु सविस्तर | वर्णन करेल बे, वीसमा प्रकरणमां खंधक मुनि चरित्र सतकनी अंदर घणोज उत्तम बोध | दर्शावेल . एकवीशमा प्रकरण 'उपदेश रहस्य' तथा क्रियागुल जिनस्तुति' नी अंदर | परमात्म स्तुति सुधार्नु करण वहन कर रहेल ले. बावोशमा प्रकरण 'प्रश्नोत्तरपत्र' नी अंदर श्री पर्वनो प्रकाश प्रकाशित करेल बे. तेवीशमा प्रकरण 'चातुर्मासी निर्णय' नी अंदर बागम अने शब्दशास्त्रथी चातुर्मासीनो निर्णय करवामां श्रावेल ले. अने चोवीशमा प्रकरण 'सामायक || बत्रीश दोष स्वाध्याय' नी अंदर सामायकमां लागता बत्रीश दोषनो विचार, गुरुपरीक्षा, अने| दृष्टिराग खाध्याय वगेरेनुं वर्णन .
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था प्राचीन पूर्वाचार्य निर्मित्तग्रन्थोर्नु अवलोकन करवाथी वाचकवर्गने प्रमोद साथ || || प्रतीति मखशे के आपणा ऊपर पूर्वाचार्योनो केटलो बधो ( अगाध ) उपकार ? !! अने एनो वदलो कोइ पण वाली शकीए तेम नथ); तथापि एमना गुंथेला पुष्पगुच्छरुप था ग्रन्थगुच्छन। सुवासनाना नोगी ब्रमर जो के तत्वरुप मकरंद ग्रहण कर। पोतानी आत्मोन्नति करवा प्रवर्त थइ ए तो श्रापणे कंशक सहस्रांसे पण बदलो वालवावाला गणाश्ये अने ते पूज्यपादना अमर || आत्माने पुण्यना नागी करी शकिये. अस्तु !
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- ए शिवायना अन्यमहान् पुरुषोनां करेलां पण प्रकरणो था पुस्तकमां होवाथी तेऊनी, ||| अने जंगमयुगप्रवर श्राचार्य नगवान् श्री नातचंप्रसूरीश्वरजीनी कृपाप्रसादीनो आस्वाद अनुः | नवी आनंदमान यश् धर्मध्यानमां तत्पर रहिये तो सर्वना श्रमनी सफलता हाजर रहेज !
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था ग्रंथमां को घुफ सुधारवामां, लेखमां समजमां अशुद्धि रही होय तो ते संबंधी हुँ मिछामिकम दर निर्दोषतानो संगी थाई, अने इच्छंदु के-सदा सर्व जैनवीरो आवां रहस्य गर्मित पुस्तको प्रकट करवामांज तल्लीन रहे एवीज शासनदेवनी प्रेरणा था !
वीर संवत १४३७ ।
धनतेरश.
मददात्माना चरणांबुजनो मधुप
मंगलदास.
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| धन्यवाद था सुरदीपिका नामनो ग्रंथ;तथा(बीजो षडव्य नय स्वन्नावादिप्रकरण संग्रह नामनो |
ग्रंथ नीकलवानो ) ते बन्ने ग्रंथोमां आश्रय आपनार बिकानेर नीवासी. सुदेवगुरु नक्तिकारक सुद्ध धर्म थाराधक ज्ञानवृद्धिरूप उत्तम कार्यमा आश्रय आपनार श्रीवीरशाशनरागी सुश्रावक. रु. २००) बाबुसाहेब बाहादुरमलजी हजारीमलजी हीरालालजी रामपुरीया
५०) ,, जेवतमलजी रामपुरीया. ५०) , नेरुदानजी राखेचा. २५) ,, उदयचंदजी रामपुरीया.
नपरना ग्रहस्थो तरफथी बन्ने प्रस्तकोमां मदद आववाथी तेज साहेबोनो या सन्ना अंतः। करण पुर्वक थानार माने जे. ते दरेक पुस्तकनी कीमत रु. १। हती. तेमांथी रु. ४-० घटामी दरेक कीमत रु. १)राखवामां आवी जे. अने वन्ने पुस्तकनी कीमत रु. २) राखवामां आवी ने माटे जे ग्रहस्थोनी चोपमी प्रथम नराएली ने हवे पनी जरासे तेमने पण रुपीआ बेमां बन्ने पुस्तको नो लान मलसे. ली. श्री जैन हठीसींगसरस्वती सना. दा.मणीलाल वामीलाल. सेकटेरी.]
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पृ.
0000008092440DD
सुरदीपिकादि प्रकरणसंग्रहनी अनुक्रमणिका. विषय.
पृष्टः । विषय. सुरदीपीकादि प्रकरणसंग्रह पाने १ थी ते ४४ सुधी. | १० गुणस्थानक चिन्ह विचार ....
८१-८३ १ श्री सिद्धांता राधनकोन चित्वारिंशतिका ४४ थी ४७ | ११ प्रश्नोत्तर .. २ श्री शीलदीपिका....
.... ४७ थी ४८ १२ अष्टकर्म संबंधी बोल विचार.... ३ आगम छत्रीशी .... .... ४८-५२ | १३ अष्टमद परिहार सज्झाय ....
८९-९० ४ गुरु छत्रीशी ....
५२-५४ | १४ सामायिक वत्रीश दोषनी सज्झाय ५ पाखी छत्रीशी ....
५४-५६ | १५ सद्दहणा क्रियानी सज्झाय धात्रीशिका .... ९२-९४ ६ असज्झाइ विचार
.५६-६० १६ श्री भगवतीजीमां बतावेला मणितनुं प्रमाण ९४-११२ ७ अस्वाध्याय सित्तरी
६०-६६ | १७ गुरुपरीक्षानी सज्झाय .... .... ११२-११३ ८ ब्रह्मबावनी ....
६६-७४ १८ चौद गुणस्थानक कर्म प्रकृति विचार ग९ कलिकाल स्वरुप कथन शतक्रम
७५-८० भित श्री महावीर जिन स्तवन त्रिपंचाशिका ११३-१२१
HetasteMANBranopauBAREIGOD tourism
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MBASSADOR
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..... १७८-१७९
NaraavanNVADIRawaraNavavatatvastavaayaputantavaran
१९ राजर्षिकृत प्रश्नोत्तर ....
पदव्य विचाररुप प्रश्नोत्तर.... २१ श्री जिन प्रतिमा स्थापना रास २२ श्री शत्रुजय रास.... .... २३ श्री जिनाज्ञापालन स्वाध्याय.... २४ एषणा शतक प्रकरण .... २५ श्री खंधक मुनि चरित्र शतक २६ प्रश्नोत्तर पत्र .... २७ चातुर्मासि निर्णय
१२२-१२३ | २८ उपदेश रहस्य ....
.... १६२-२६८ .... १२३-१२६ | २९ क्रिया गून चतुर्विंशति जिन स्तुति .... १६८-१७१
१२६-१२९ । ३. श्री महावीर जिन स्तुति १२९-१३२ | ३१ श्री पार्श्वजिन स्तुति .... १३२-१३३ | ३२ श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र
.... १५९-११ .... १३३-१४० | ३३ पुद्गल पराइस्तव
१८१-१८५ ..... १४०-१४९ ३४ श्री आदि जिन चैत्यवंदन .... .... १५९-१५८ ३४ श्री शंखेश्वराजीनी स्तुति .... .... १५९-१६१ | ३५ शक्रस्तवाष्टक
१८५-१८६
PrasasaneeewaaaaaaaaooANG/RO/
AANDEY
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SHWASHBARABODOBERVIVeraavetaTre-Jetorava
॥ श्रीजिनेन्ऽस्तुतिसंग्रहः ॥ श्रादित्यादिमहामहः समुदयायस्यैकदेशंश्रिताः॥ श्रीकल्पद्रुमकामधेनुमणयोयदानदास्यंगताः॥ शुक्लध्यानधुराधृतां कथमपिश्रीयोगिनांगोचरः ॥श्रीआईत्यपदप्रदायिपरमज्योतिस्तदेवस्तुवे ॥१॥ दर्शनंदेघदेवस्य, दर्शनं पापनाशनम् ॥ दर्शनंस्वर्गसोपानं, दर्शनंमोक्षसाधनम् ॥ १॥दर्शनेनजिनेंप्राणां, साधूनां वंदनेनच ।। नतिष्टतिचिरंपापं, विठहस्तेयथोदकं ॥३॥ अद्यमेक्षालितगात्रं, नेत्रेचविमलीकते ॥ मक्तोहंसर्वपापेज्यो. जिनेंतवदर्शनात ॥४॥ दर्शनादेवतेनाथ दस्तरोपि द्यागाधापि मे जाता, जानुदन्नो नवोदधिः ॥५॥ सर्वामरेंडसंपज
व विज्ञान नास्करः ॥ सर्वसत्वहितानंदः, सर्वसौरव्य नमोस्तु ते ॥६॥ मिथ्यांबुलहरीधूतं, निमऊंतंन्नवार्णवे॥ कुग्राहग्रसितंनाथः, मामुत्तारय तारय ॥ ॥ जन्ममृत्युजरारोग, सोकसंतापवैरिणः ॥ पृष्टतोधावतो देव, मामुत्तारय तारय ॥ ७ ॥ अहोअमेघजावृष्टि रहोअकुसुमंफलं ॥ अहोपुराकृतंपुण्यं, यद्दष्टो
॥
२
॥
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नाथलोचनैः ॥ए॥ नकोपोनलोजोनमानोनमाया, नहास्यंनलास्यंनगीर्तनकान्ता ॥ नचापत्यशत्रुर्न मित्रकलत्रं तमेकं प्रपद्येजिनंदेवदेवं ॥ १० ॥ नवबीजांकुरजनना रागाद्यायमुपागतायस्य ॥ ब्रह्मा वाविष्णुर्वा, हरोजिनोवानमस्तस्मै ॥ ११ ॥ श्रीमते वीरनाथाय सनाथायामुतश्रिया ॥ महानद सरोराज-मरालायाईते नमः ॥ १२ ॥ जयतिकनकावदातः कृष्णजटामुकुटमंकितोवृषनः ॥ इक्ष्वाकुवं शतिलक - त्रिभुवनचूकामपिगवान् ॥ १३ ॥ श्रीवर्द्धमानं करुणानिधानं, श्रेयो निदानं कुगतेः पिधानं। शिवॆकयानं सुगुणैः प्रधानं, गतानिमानं स्तुतिसावधानं ॥ १४॥ वीरं जावारिवीरं प्रणतजयहरं, हेमरोचिः शरीरं, धीरं कामाग्निनीरं परमपदगतं प्राप्त संसारतीरं ॥ ज्ञातं सिद्धार्थजातं विबुधबुधनतं नूप सिद्धार्थजातं, सिद्धं बुद्धं प्रबुद्धानमतनमततं सिद्धये बुद्धयेच ॥ १५॥ कुंग्रामे निरामे त्रिभुवन जनता पावके पावकेत्रा, मोढेरे हस्तिकुंमी प्रवरतरपुरे वायमे नाणकेच ॥ नंदिग्रामेच मुरुस्वलग जपदयोस्तुंगवैज्ञारशैले देवं श्रीवर्द्धमानं विपुलगुणगणैर्वर्द्धमानंनतोस्मि ॥ १६ ॥ मदनदहननीरं क्रोधयोधैकवीरं, मदजलदसमीरं दंनमूनेदसीरं ॥ जलधिगुरुगजीरं लब्धलोनाब्धितीरं, कनकरुचि
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॥३
॥
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शरीरं श्रीजिननौमिवीरम् ॥ १७ ॥ हतविषयविकाराः कर्मवतीकुठारा, नतसुरनरवाराःप्राप्तसंसार पाराः॥ सुखमतुलमुदारा स्तीर्थपालोकसारा, ददतुशिववधूरोममनेतारदाराः॥१७॥ नमदमरशुरें प्रास्तसंमोदनिई सुगुणमणिसमुहं यत्कषायारिसैं॥ नमतविहितन्नसत्वपीमादरिलं, कुमत कमलचंडं शासनंजैनचंडं ।। १७ ॥ दर्शनंग्यानसूर्यस्य, संसारध्वांतनाशनं ॥ बोधचित्तपद्मस्य, समस्तार्थप्रकाशकं ॥ २०॥ दर्शनंजिनचं स्य, सद्धर्मामृतवर्षणं ॥जन्मदाघविनाशाय, वर्द्धनंसुख वारिधेः ॥ २१ ॥ जिनेनक्तिर्जिनेनक्तिर्जिनेनक्तिर्दिनेदिने ॥ सदामेस्तु सदामेस्तु सदामेस्तु नवेनवे ॥ २५ ॥ जयत्वंप्रनोप्राप्तसंसारतीर ! स्फुरत्पापधूलीप्रणाशेसमीर ! महामानमायावनी सारसीर ! ज्वलक्रोध दावानलेमेघनीर ! ॥१३॥ इति श्रीमद्सहजकलानिधि सूरीश्वरचरण सरोरुहचञ्चरीकेणाब्धिचन्प्रेण संकलिताः श्रीजिनेंऽ स्तुतिश्लोकाः॥
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३
॥
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________________
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असुध्य.
साध्वीय
सृ
प्रीतबोध व्रतो दवो
गड
घरा
विराइ
सुध्य.
साध्वी
कर्यो
,
सु
प्रतिबोध
व्रतो
देवा
थंभि
गंड
घरा
विराइय
पानु.
४
५
६
६
१०
१०
१०
११
शुद्धिपत्र.
लीटी. असुध्य.
९ गालवा
११ बुःख
फीगरम वाले
तत्थं
७
१२
२
१
१
२
२
सावे
दुवरा
झानादिक
मोह
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सुध्य
गालना
दुःख
बाले
तत्थ
व
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दुवारा ज्ञानादिक
मोहि लध्धाओ
पालु. लीटी.
~~~~ * 2 x V V
११
११
१२
१२
१३
१४
१५
१६
१८
१८
४
२१
४
१६
३
४
२५
२०
१०
१६
JANINEERIN
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________________
निरवाध
दाय यनमय
विरवाध दोय व्रजमय एम चउसह
२५ जीनधर्मनी १२ छली
करणीनो काउसग ठाणांगसूत्रनो
इम
vaasanawaravanaemonaDA
चउसठ
वह
बहु
BESTRATIDARD0004DDOO900ets
उद्वेशाना बीयीवएज्जा युच्च वीपीवएज्जा
उद्वेशाने बीइवएज्जा चुच वीइवएज्जा
मूब पर्याप्तायी छठा परभव पज्झीतीए एवंबयासी
चिठंती १५ | णमंसामा
अने जैन धर्मनी २६ छेल्ली करणीना काउस्सग ठाणांगसूत्रना पुरि मूत्र पर्याप्ताथी छठा परभव पज्झीतीए एवंवयासी चिढ़ती णमंसामो
सम्मायी वीयीवएजा
सम्माणे वीइव रज्जा
motowerestroetnavarik
॥
४
॥
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________________
पुजननो नंदावर्त यविर
पुजनना नंदावत स्थविर
साधु पाडकमणा इणह विचार बिमास
साचुं पडिकमणा इणेह विचार विमासी
३९
४०
SHIViratra/RAPRAMODARASANDEEWANG
ज्योतिस संकोपे माय उतपति कालें
आंतकमे नाससमरण बहुसुं झझयणे
ज्योतास संकोचे माथे उत्पत्ति काले आंतिकमे नामसमरण बहुभुं झयणे मूरिंद
DAANDONEOtruttave/OAD/Masoota/s
Grn
मप्णइ वद्दामो आराद्द घरिउण कुणहय धंतरानां
घनवंत ६ भावयण
मण्णइ बदामो आराह धारउण कुण हय धंतुरानां धनवंत भवियण
मूरि
tate/etes
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________________
१४८ १४९
१००
१००
18QaGa
अवछतो विमास हेमचंद्रसूरी हेमचंद्राचार्या
१५४
असंख्यातो युक्त सतकोटाकोटी गुण
अपछंतो विमास हेमचंद्रसूरी हेमचंद्राचार्य पूनम तोसुं शीर्लुणे
संख्यातो युक्ता दशकोटाकोटिं गुाभ
१६२
१०० १०९ ११८ १२६
११२
तामु
शीलिणे
Pooaaaaaaawaranevaaaaavaadevastatvasana
१२६
लोट
१६९ १७० १७१
.
१३३
स्तत्संबुद्धी
.
१३६
१७३
.
हियं दाप भरीयेर गावंतां जिम भाखेर दीघो
.
१४१
स्तसंबुद्धौ रतुतौ नाप्य बंधहेत पिनोति कीनि
१८२ ૧૮૪
दोष भरीयरे गावतां जीम भाखरे दीपओ
.
१४५
नाटय बंधहेत यिनोति कीर्ति
१८६ १८६
.
१४५
१४५
..
..
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च्या पुस्तक बपाती देखते जे जे सद्ग्रदस्थोये पुस्तक लेवा नकलो जरी ज्ञानी वृद्धी करनार सदायकोनां मुबारकना नामो नीचे मुजब.
कच्छ देशमां विचरता पंडितप्रवर मुनिराज श्री श्री श्री १००८ श्री कुशलचंद्रगणी महाराजश्रीना साधु साद्धओना ऊपदेशथी नकलो भरावी आवेल तेथी तेओ साहेबोनो आ सभा उपकार माने छे.
कच्छ देश - मु० कोडाय,
५ मोटी धर्मशालाना भंडार खाते. ५ नानी धर्मशालाना ज्ञान भंडार खाते, ५ शा. नथुभाइ मेघराज
५ शा. वनपार राणा हा. माकुबाइ
५ शा. वेलजी तेजसीह - गाम टुढा
५ शा. भाणजी भीमजी - गाम टुढा ५ शा. हीरजी भवानजी
४ शा. जेठाभाइ नथु हा. उमीबाइ २ शा. कोरसी लाघा
२ शा. खेरु जसा
२ शा. राणा करमशी
१ शा. बेलजी आठ
२ शा. वेरसीह मालु
२ शा. लाधा मुरजी
१ शा. वेलजी हंसराज हा. बांछइबाइ
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॥ ६॥
२ शा. उमाइआ कोरसी १ शा. नरसी वेलजी
४० शेठ. मोणसी कानजी हा. पानवाइ-गाम नागलपुर कच्छ - मोटी खाखर तथा नानी खाखर.
५० शेठ. रणसीभाइ देवराज
१५ शेठ. दुरपाळ खेराज मुंबाई दाणाबंदर
५ शेठ. रवजी देवराज
१ शा. गगुभाइ लघा
५ शेठ. लघाभाइ गुणपत
५ शेठ. नागजी गुणवत
५० वच्छ देश मध्ये तुंबडी गामना शा. कोरसी जेठाभाइनी विधवा बाई नागलवाइए पोताना पुन्यार्थे चतुर्विध संघने पठन पाठनने माटे आ पुस्तकनी नकल ५० अर्पण करी छे.
कच्छ - सुंथरी.
१ शेठ. भवानजी दामजी
१ शेठ. दोशाभाइ खीअसो
२ शा. भीमजी भोजराजदेहंजी
१ शा. पासवीर पानाचंद
१ शा. मुरजी मादण
१ शा. कांनजी थोभण
१ शा. हंसराज मुरजी
१ शा. वसनजी सीवसी
२ शा. रतनसी पीतांवर
२ शा. राजपार जेठा
१ शा. मेघजी कुरसी
५ शा. रुपसी प्रीतांबर
॥६॥
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कच्छ-सुथरी
१ गांधी. ठाकरसी कानजी .शा. करमसी गोवंदजी
१ गांधी. जेठाभाइ पानाचंद १ शा. रामजी मणसी
१ दोरा. चतुरभाइ धारसी २ शा. खीसी नरपार
१ गांधी. मानचंद हरचंद १ शा. राघवजी त्रीकम
१ शा. मुळचंद हीराचंद खंभात बंदर. २ शेठ. चांपसी भोजराज
२५ राजमान् राजश्री ठाकोरसाहेब. बीजयसींघनी शाहबान् १ शा. कल्याणजी खीमजी
जे. पी. एन. ३ शा. मादण शिवराज
१ यति. श्रीमानचंद पुनमचंदनी गाम रीयां जल्ले-मेडता १ शेठ. चुनीलाल दलछाराम हा. बेन चंदु गाम वीसनगर | १ शनि. श्री नारायणचंद किशनचंदजी जयपुर-सिटी. १ शा. हरगोवनदास जीवराज वीसनगर
१ शेठजी. जुठाभाइ सुंदरजी भरुच. धी मोफ्युमील कोटन १ शा. जुहारमल शेषमल गाम. व्यापी जील्ले अजमेर मीलना मेनेजर गुजरात गाम मांडल.
अमदावाद-शामळानी पोळ. ५ वोरा. मयाचंद मेघराज
| १ शा. मंगळदास ललुभाइ-छपावनार
मलिना म
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१ शा. हरगोपनदास हीराचंद १ शा. जमनादास छोटालाल १ शा. डाह्याभाइ होराचंद १ शा. मणीलाल वाडीलाल समाना मास्तर १ शा. साराभाइ चमन लाल ? शाः छगनलाल उमेदचंद १ शा. डाह्याभाइ हरीलाल ,शा चुनीलाल दीपचंद १शा. नाथाभाइललुमाइ १ शा. पोपटलाल चुनीलाल १ शा. चमनलाल मोहनलाल १ शा. भोगीलाल चमनलाल २ शा. पुजाभाइ चकुभाइ १ शा. अमरतलाल हेमचंद
१शा. वाडीलाल चकुभाइ देवशानो पाडो. १ शा. भोगीलाल ठाकरसी १ शा. सांकळचंद खेमचंद १ शेठ. हठीसंग रायचंद सरस्वती सभा साये नाम स्थापक १ शा. ललुभाइ हठीसंग ५ बाइ गजरी (१). बाइ जीवी (१). बाइ गंगा (१).
बाइ आधारी (१). बाइ. केवली (१). १ शा. मणीलाल घेहेलाभाइ लालामाइनी पोळ । १ शा. अम्रतलाल मोकमचंद मदनगोपाळनी हवेलि २ शा. सोमचंद नहानचंद गाम पेशापुर १ मास्तर. हीराचंद ककलभाइ १ शा. अमीचंद जेठाभाइ
१ झवेरी. केशवलाल गोकळभाइ ठा. रतनपोळ । १ मुनि महाराज श्री जीनवीजय मु० पेटलाइ.
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शुद्ध.
पार्नु लीटी.
ज्वलत् क्रोध
१ शा. जेसंगभाइ पोचाभाइ वकील. बी. ए. एल एल बी अशुद्ध.
दलाल. जीनेंद्र स्तुति स्लोकमा १ शेठ तेजकरणजी मूलचंदजी रामपुरीया विकानेर १५ शेठ कुरपाळ खेशज मुंबाइ. दाणाबंदर.
___ज्वल क्रोध. १ शेठ, दोशाभाइ खीअसी. सुथरी.
| ग्राहकना नाम मधे. विनंति-कोइ पण सद्ग्रहस्थनुं नाम भूलथी छापवानुं
साद्धवीओ रही गयु होय तेमणे पत्र लखी ग्रन्थ मंगावोलेवा कृपा करवी
शेठ. दुरपाळ अनुक्रमणीकामां भूलथी छपाएला विषयो रही
खीसो जवाथी नीचे मुजब जाणी लेवा. दश श्रावक संबंधी पा. १६४-१६५ चौरासी गच्छनां
| वांचनारने भलामण. नाम पा. १६६-१६६ श्री सुभाषित स्लोक मालिका पा. छे सांभळी १६६-१६. श्री पुद्गल परावर्त स्तवन पा. १७९-१८१ अंन्था मुरदीपिकादि प्रकरण संग्रह पा. १-४४ श्री सदूहगा क्रि. आचर्यता यानी सज्झाय द्वात्रिंशिका पा ९२-९४
क्रियागुल
साध्वी भो शेठ कुरपाळ खीसी
२
ते सांभळी ग्रन्थो
आचार्यता क्रियागुप्त
९
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Vaca
॥ अथ श्री सुर-दीपिका ॥
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॥ उपजाति छंदः॥ सणंत नो नो असुराश्या सुरा, जे वितरा जोइसियाय देवा ॥
वेमाणिया कप्पग कप्पतीया, जे संति सम्मत्त विशुद्ध चित्ता ॥१॥ भावार्थ-प्सम्यक्त्ववडे करीने जेमन चित्त विशुद्ध (निर्मळ ) थयुं छे एहवा भो (असुरकुमारादिक, व्यंतर, ज्योतषि अने वैमानिक एटले कल्पोत्पन्न अने कल्पातीत ) देवताओ तमे सांभळो.१
नामारिहंते उवणारिहंते, दव्वारिहंते जिण सासणमि ॥
हीलंति मन्नंति न पूणिके, नमनिया नाव जिणावि तेहिं ॥२॥ भावार्थ-जे मनुष्यो श्री जिनशासनने विषे जणावेला नाम, स्थापना, अने द्रव्य अरिहंतोने पूजवा योग्य मानता नथी, अने हीलना करे छे, तेओ भाव जिनेश्वर भगवानने पण मानता नथी एमज गणाय. ९
Veap/seasooarvasvandawvanesdecomport
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देवाय बालाय असंजयाय, सुत्ता अधम्मी तह मंदबुद्धि॥
असंवुमा नो विरश्य तेसिं, किंचित्ति नासंति सन्ना समकं. ॥३॥ भावार्थ-तेभो एम कहे छे के देवो चाल छे, असंजति छे, सुत्ता ( मोहमय ) छे, अमि छे, मंदबुद्धि छे, तथा | असंवुडा छे ( आश्रव नथी रोक्या जेणे) तथा अविरति छे, एवी जेभी सभा समक्ष प्ररूपणा करे छे. ३
वयंति नो किंचि विसेस नायं, सामन्न नावेणय पन्नवंति ॥
मिछत्त समत्त गुणेग बुद्धिं, कुणंति नेयाउय मेव नेयं ॥४॥ भावार्थ-तेओ काइपण विशेष रीते दृष्टांत सिद्धांत बतावीने समजावता नथी. पण लोकोने भ्रममा नाखवा सामान्य भावे मिथ्यात्व अने सम्यक्त्वगुणमा एक सरखी बुद्धि दर्शावे छे. अने स्याद्वादशैलीथी समजावी शकता नथी. ४
गुरूण पासंमि सुयं सुणेमो, वयंने एयं न पमिस्सुणेमो ॥
सुत्तपि मन्नंति न तेण तुम्हं, पुरो जिणुत्तं वयणं नमो ॥५॥ १ वयंतु, इति पाठान्तरम्.
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भावार्थ - अमे गुरु परंपरा अने तेमनी समक्ष जे सूत्रो सांभळ्यां छे. तेमां एवी वात सांभळी नथी, तेथी तमो सूत्रोने पण मानता नथी एमज समजाय छे. तेथी अमे श्री जिनेश्वर भगवानना वचनो सूत्रानुसार कहीए छीए ते सांभळो. ५ देवा जिणंदे परिबोदयंति, लोगंति याणा यति काले ॥ तिथ्यं पवत् दियं जाणं, नणित सामी जयवंति सव्वे ॥ ६ ॥ भावार्थ- जुवो लोकांतिक देवताओ अनंता काळथी स्वयंबुद्ध एवा श्री जिनेश्वर भगवानने दीक्षाना काळनुं स्मरण कराववा प्रतिबोधेछे के हे भगवन् जगत्ने हितकर तीर्थ वर्तावो. ६
गंम एयं पढमंमि वृत्तं पुणो दसाणं ज्जपणे मंमि ॥
मिमि ते देवा, मन्नामि बुद्धाण्य बोहगाणं ॥ ७ ॥
भावार्थ – प्रथम अंग ( आचारांग सूत्रना द्वितीय श्रुतस्कंध ) मां ए बात कहेली छे. वळी दशाश्रुतस्कंधना आठमा अध्ययनमां तेमज छठ्ठा अंग ज्ञाताजीमां पण कहेली छे. तेथी करीने ते देवताओने हुं स्वयंबुद्ध श्री जिनेश्वर भगवानना समयोचित बोधक मानुं छं. ७
सुद्धोवसे जिला सुराणं, बुज्छंति मुज्जंति नते सुदेहं ॥
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० दो०
॥
२
॥
Daomaniameramanu0/0406os/aswationळब
जेहेण तम्हा गुरु कारणेणं, वाला नणिति कहं नु देवा ॥७॥ भावार्थ-जे देवताओना शुद्ध उपदेशवडे करीने श्री जिनेश्वर भगवान पण पोतानो दोक्षानो समय जाणे छे, अने संसारिक सुखमां मुंझाता नथी, एवा देवताओने काइपण विशेष कारण शिवाय हे मुग्ध लोको तमे शाथी बाळ कोहो छो ?८
॥ढाल चोपाई. ॥ श्म बोल्या के बड़े अंग, सोहम गणधर मनने रंग; तेतलिपुत्र मंत्रि बोहियो, कनकध्वज हूँ राजा मोहियो ॥ ए ॥ बहु उपाय करि संयम दीध, आपण वाचा सफळी कीध; पोटिल देवे कर्यो उपकार, महुत्ते पाम्यो केवळ सार ॥ १० ॥
॥तेतलिपुत्र मंत्रि अधिकार ॥ छहा अंग ज्ञातासूत्र) ना चौढमा अध्ययनमा श्री सुधर्मस्वामीए श्री जंबुस्वामी प्रत्ये घणा उमंग साथे एम कां छे केःपूर्व तेतलीपुर नामर्नु नगर हतुं. त्यांनो राजा कनकरथ नामे हतो, तेनी पट्टराणी पद्मावती देवी हती, अने तेनो प्रधान तेतलिपुत्र करीने हतो. एकदा तेतलिपुत्र प्रधान घणा आडंबरसहित तेज नगरमां थइने जतो हतो. तेवामां तेनी दृष्टिए
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MARVADRIPED/Peaom/amarvare/asporarum/wasana
तेज नगरना रहीश एक कलाद नामना सोनारनी भार्या भद्रानी कुखथी उत्पन्न थयेली पोटीला नामनी नवयौवना कन्या के जे पोतानी अगाशीमां नाना प्रकारनी क्रिडा करती हती, ते जोवामां आवी. तेने जोइने प्रधानने कामराग उत्पन्न थयो, तेथी तेणे पोताना माणसो मार्फत सोनार पासे ते कन्यानी याचना करावी, अने घणुंज द्रव्य आपवा कहूं. सोनारे ते द्रव्य नहि लेतां प्रधाननी मागणी स्विकारी, पोटीला नामनी पोतानी कन्याने प्रधानने त्यां मोकलावी आपी, अने प्रधाने पण विधिपूर्वक तेनी साथे पाणीग्रहण कयु. पछी नाना प्रकारना भोगविलासमां ते तेनी साथे निमग्न थयो. अने कामरागमां तथा | अनेक प्रकारनी मदनक्रिडामां काल निर्गमवा लाग्यो.. __. अहीं कनकरथ राजा पोतांनी राज्यलक्ष्मी अने कामविलासमां लीन थइ गयो तेथी तेणे राजकाज छोडी दीधु. अने रणवासमां पडी रहेवा लाग्यो. राजा पोताना अंगथी जे जे पुत्रो उत्पन्न थाय तेमनां अंग छेदन राज्यलोभथी कराववा लाग्यो. अने पोताना राज्यसुखनो मालिक बीजो थाय नहि अने पोतार्नु मुख कायम रहे एवी इर्षाथी तेणे पोताना घणा पुत्रोनां अंग छेदावी राज्यपदने नालायक कीधा. ते उपरथी पद्मावती राणीए पोताना दक्ष प्रधान तेतलिपुत्रने एकांतमो बोलाब्यो, अने कह्यु के प्रधानजी राज्यना रक्षणार्थ अने मारा तथा तमारा अने प्रजाना सुखना अर्थे, मारा उदरमा जे गर्भ छे तेनु कोइपण रीते रक्षण थq जोइए, प्रधाने ते वात कबुल करी.
हवे जे समये पद्मावती देवीने गर्भ रह्यो हतो, तेज समये तेतलिपुत्र प्रधाननी पोटीला भार्याने पण गर्भ रह्यो हतो. गर्भ
D/GD/aGoodoow/DoudaastDEOPON
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सूर
दीपिका
॥ ३॥
काळ पूरो थवाथी राणीने पुत्रनो प्रसव थयो. अने तेवाज समयमां प्रधाननी पोटीला खीने पुत्रीनो प्रसव थयो आ उचित समय विचारी पद्मावती देवीना पुत्रने प्रधान पोताने घेर लाग्यो अने पोटीलाने सोप्पो पोटीलानी पासेथी मुवेली पुत्रीने लेइ जइ राणीने सोंपी. अने राजाने मुवेली दीकरी जनम्याना समाचार कहेबराव्या, अने मधाने राज्यपुत्रना जन्ममहोत्समां बंदीवानोने छोडी मूक्या.
के लोक काळ वित्या बाद तेतलिपुत्र प्रधान अने तेनी भार्या पोटीला बच्चे जे निवीड रागनी ग्रंथी हती, ते कोइ कारणसर तूटी गई, अने जे स्त्री पोताने अति प्रिय अने वल्लभा हती, ते आंखना पडदातुल्य अप्रिय बनी गइ. पोटीला घणोज खेद करवा लागी, तेथी प्रधाने तेने खेद नहि करतां एक रसोड करावी तेमां अनेक भिक्षुको अने ब्राह्मणोने दान आपी काळ निर्गमन करवा कहुँ, तेथी पोटीलाए अनेक श्रमण माहणादिकोने दान आपी संतोष कर्या. ए प्रमाणे काळ व्यतित करवा लागी.
एकदा सुव्रता नामनां साध्वी ज्ञानगुणे करी अनेक भव्यजीवोने उपकार करतां घणी शीष्यणीओ सहित विचरतां एज नगरमां पधार्थी. पोटीलाए सन्मानपूर्वक तेमनी निमंत्रणा करी, अने वस्त्र, पात्र आहारादिके तेमनी रुडी भक्ति करी. पछी पोटीलाए विनयपूर्वक कहां के, हे भगवति, मारो नाथ प्रधानजी पूर्वे मारा उपर अति प्रसन्न हतो अने हमणां तेनी मारा उपरथी अरुचि थइ छे माटे कोइ कामणटुमण वशिकरणादि विलक्षण प्रयोगो करी मारुं पुनः सन्मान थाय तेम करी आपो. ए बात सांभळी बहुश्रुत साध्वीजीए पोताना कान बंध करी दीघा, अने मधुर स्वरे बोल्यां के हे कल्याणि श्री जिनेश्वर भगवाने
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आगममा प्रतिनिषेधेला मुजब गृहस्थना आलाप संलापमा रही संसारनी वृद्धिना उपायो योजना अने तेवा प्रयोगो करवाएको साधु साध्वीनो बिलकुल आचार नथी. माटे जो तमारे संसारना दुःखथी विरमवानी इच्छा होय तो श्री जिनेश्वरभगवाने | कहेली प्रव्रज्या लेवी.
साध्वीजीना धर्मोपदेशथी पोटीलाने संसारनी असारता जणाइ वैराग्य थयो अने तेणे पोताना पति तेतलिपुत्र प्रधानजी | पासे दीक्षा लेवानी अनुमति मागी. प्रधाने कयु के हुँ तने अनुमति क्यारे आघु के तुं जिनराजे कहेली प्रत्रज्या पाळो, देवलोकमां जाय, अने त्यांची आवी मने प्रतिबोधी जिनराजनो धर्म अंगिकार करावे एवी तुं प्रतिज्ञा करे अने ते पाळे तोन तने दीक्षानी अनुमति आपु. पोटीलाए ते वात अंगीकार करी. पछी प्रधाने साध्वीजी पासे जइ विनयपूर्वक कपुं के, हे भगवति, मारी स्त्री संसारथी उदाशीन थइ छे, तेथी हुँ आपने शिष्यगीनी भिक्षा आपुं . एम कहो साध्वोजीने अर्पण करी.
पछी पाटीलाए ईशानकोणमा जइ पोताना अलंकारो उतारी पोतानी मेळे पंचमुष्टी लोच कर्यो, पछी सुत्रता साध्वी पासे आवी वंदन नमस्कार करी दीक्षा अंगीकार करी. पछी अग्यार अंग भणी, घमा वर्ष दीक्षापर्याय पाळी छेवटे एक महीनानी संलेषणा करी समाधिपूर्वक काळ समये काळ करी देवलोकने विषे पोटील नामना उत्कृष्ट देवपणे उत्पन्न थई. ___ अहीं तेतलिपुत्र प्रधान कनकरथ राजाना सन्मानपूर्वक राजकारभार करतो हवो. काळे करीने राजा कनकरय मरण पाम्यो, राजा अपुत्रीओ मरण पामवाथी प्रजावर्गमा तथा सामंतोमा अत्यंत शोक थयो. राजानुं प्रेतकार्य करी सामंतवर्म
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दीपिका ॥४ ॥
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तथा प्रजाना आगेवान पुरुषोने राज्यचिंता उत्पन्न थइ. तेथी तेओए तेतलिपुत्र प्रधानने कोइ योग्य राज्यकुमारने शोधी० लावी राजा स्थापना विज्ञापना करी. प्रधाने ए वात सांभळी घणाज हर्षपूर्वक कनकरथ राजा अने पदमावती देवीना गुप्त राखेला खरा अंगज पुत्र कनकध्वज कुमारने बोलावी सामंतो तथा प्रजावर्गने तेनो अथवी ते इति सुधी अहेवाल | संभलावी तेने राज्याभिषेक करवा तथा पोतानो राजा मानवा फरमाव्यु. आथी सामंतो तथा प्रजावर्गमा सानंदाश्चर्य उत्पन्न थयो. अने सर्वेए हर्षना आवेशमा तेने वधावी लेइ तेनी आण प्रवर्तावी. राज्याभिषेक कर्यो त्यारथी कनकध्वज कुमार राजा थयो. अने तेतलिपुत्र प्रधाननु पण घणुंज सन्मान थयु.
राजा कनकध्वज न्याय राज्य करे छे, अने ततलिपुत्र प्रधान राज्यकारभार चलावे छे, ते समयमा पद्मावती देवीए पोताना कुमार कनकध्वज राजाने बोलावी कयु के, हे कुमार तमे आ राज्य पाम्या छो ते मात्र तेतलिपुत्र प्रधाननोज प्रभाव अने उपकार छे. एम कही अथथी इति सुधी तमाम वृत्तांत कही संभळाव्यो, अने कह्यु के हे कुमार प्रधान, घणुं मान साचवजो, तेने अर्धासन आपजो, तेना हुकम प्रमाणे वर्तजो अने ते उठे तो तमे उठजो तथा तेनी पाछळ चालजो. इत्यादि बहु प्रकारे आदरसत्कार करवा कडं. ते वात राजाए अंगीकार करी त्यारथी प्रधानजी साथे घणाज मोभायी चालवा लाग्यो. राजानुं सन्मान वधवाथी सामंतो अने प्रजावर्गर्नु पण घणुंज सन्मान ययु. ए प्रमाणे तेतलिपुत्र प्रधान घणाज सुखमां काला करतो हतो.
हवे पोटीलदेव पोतानी पूर्वे करेली प्रतिज्ञा पाळवा सारु पृथ्वि उपर आव्यो. अने अनेक प्रकारे संसारनी अनित्यता
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दर्शावी तेतलिपुत्रने संसारथी विरमवा माटे प्रतिबोध करवा लाग्योः पण राज्यमद, यौवन, अने ठकुराइना सुखमां निमग्न थएलो प्रधान विवेक रहीत थयो, अने घणा प्रकारथी समजावतां छतां तथा युक्ति प्रयुक्ति करतां छतां पण प्रधानने बोध लाग्यो नहि. अने आत्मा, पुण्य पाप विगरे कांइ नथी, अने प्रत्यक्ष छे तेज साचुंछे एम मानवा लाग्यो.
पोटीलदेवे विचार कों के सुखमां उछरेलो जीवडो दुःखनी वात जाण्या शिवाय अनुकूळ उपसर्गथी बुझवानो नथी | पण राजा प्रजाना तिरस्काररूप प्रतिकुल उपसर्ग थशे तोए जीवनुं कल्याण थशे. एम विचारी तेणे राजानु मन परावर्तन कयु.
एकदा तेतलिपुत्र अश्वारूढ थइ घणा माणसो साये परवयों थको राज्यकचेरीमा जवा लाग्यो. ते वखते सामंतवर्ग तथा प्रजावर्गना जयजयकार शब्द थया अने सर्वे नीचा नमी नमस्कार कर्यो तेथी प्रधानने घणोज हर्ष थयो. पछी हर्षपूर्वक जेवो कचेरीमा प्रवेश करे छे तेवोज पोटील देवना प्रभावे राजा कनकध्वजनो प्रधान उपर तिरस्कार थयो. प्रधाननी सलाम लीधी नहीं, अने राजा क्रोधयुक्त थइ मुख फेरची बेठो. एकदम आवो अकस्मात बनाव बनवाथी प्रधान निस्तेज थयो, ते तरतज त्यांथी पाछो दब्यो, अने “यथा राजा तथा प्रजा" ए न्याय मुजब राजाए अपमान करवाथी सामंतो तथा प्रजाए पण अपमान कयु, अने सर्वेए परांगमुख कयु. ए प्रमाणे बाहिर सभा तरफ अपमान थवाथी प्रधान घेर चाल्यो. त्यां अभ्यंतर सभा जे स्वजनवर्गनी ते पण उपरांठी थइ अने मात, पिता, भाइ, बेन विगरे कोइए पण प्रधानना सन्मुख जोयु नहीं.
कुदरत तरणानो मेरु अने रंकने राजा करे छे. राजा भिखारी थाय छे. अने कामदेव जेवा स्वरुपवाळा होय तो पण
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दीपिका
॥ ५ ॥
रोगी थाय छे, एकाळनी बलिहारी छे. एम विचारतो तेतलिपुत्र प्रधान मानभ्र थयोयको आर्त रौद्र ध्यानमां गायो अने तेणे आत्मघात करवानो निश्चय कर्यो. तेणे तालपुट विष खाधुं, पण देवना प्रभावथी शरीरमां संक्रमण थयुं नहि, पछी गामां तलवार मारी छतां ते पण निरर्थक गइ पछी गळामां फांसो नांखी झाडनी डाळीए लटक्यो तो दोरडं तूटी गयुं, त्यार पछी गळे पथ्थरनी शिला बांधी कुत्रामां पड्यो, तो त्यां जल पण रेतीनुं थल थइ गयुं. सूकां लाकडी लावी अभिनी चिता खडकी अभि सळगावी तेमां पड्यो तो अग्नि पण बुझी गइ, ए प्रमाणे मरवाना अनेक उपाय कर्या ते बधा निष्फळ गया. त्यारे तेणे विचार कर्यो के, “घरना बळ्या रणमां गया तो रणमां लागी लाह्य” ए प्रमाणे यतो ततो भ्रष्ट थयो. एम अनेक संकल्प विकल्प करसो, आर्त रौद्रध्यान ध्यावतो रणमां उभो रह्यो तो तेनी आगळ एक मोटी खाइ थइ गइ छे, पाछळ एक विक्राळ हाथी उभो छे अने बीजी बने बाजुए एक महा अंधकार व्यापी रह्यो छे अने माथा उपर बाणनी दृष्टी थइ रही छे; एवा समयमा अति दूर नहीं तेमज अति नजीक नहीं ए प्रमाणे पोटीलदेव पोताना मूळरूपथी ( पोटीलाना रूपथी ) आवीने उभी छे. ते तेने घणोज मधुर ध्वनिथी प्रतिबोधे छे.
आ वेळा प्रधाननुं शांत चित्त दुःखगर्भित वैराग्यमय थयुं. तेणे विचार कर्यो के अहो हुं एक समये मोटा राज्येनो प्रधान हतो, में मरवाना घणा प्रयोगो कर्या ते निष्फळ गया, ए मारी वात कोण मानशे. एकवार ते पण समय हतो के मने सौ खमाखमा करतुं ते पण हुं हतो, अने एक आ पण समय छे अने हाल पण हुंज लुं. तेथी हुं जे विचार करुछु ते आत्मा छे, अने आत्मा छे तो पुण्य पण छे अने पाप पण छे अने छेवटे स्वर्ग अपवर्ग पण छे. अहा हुं भुल्यो, आथडयो, एम
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अनेक तर्कवितर्क करतां तेने जातिस्मरण ज्ञान थयुं. तेथी तेना जोवामां तथा अनुभववामां आवयं के हुं पूर्वे जंबुद्विपम महाविदेह क्षेत्रमां पुष्कलावती विजयमां पुंडरीकगिणी नगरीमां महा पद्म नामे राजा हतो, त्यां दोक्षा लेइ चौद पूर्वधारी थइ घणा वर्ष दीक्षा पाळी छेवटे संलेषणा करी महाशुक्र देवलोकमां देवपणे उत्पन्न थयो. त्यांथी आदी हुं अहीं तेतलिपुत्र प्रधान भद्रामातानी कुखे थयो. अहा ! आटलो काळ में प्रमादमां गुमान्यो. एम विचारी पोते पंचमुष्टी लोच करी मव्रज्या लीधी अने केवलज्ञान प्राप्त थयुं देवताओए वेष आध्यो अने केवळज्ञाननो महोत्सव कर्यो. राजा कनकध्वज आ वात सांभळी मुनिराजने वंदन करवा आव्यो. वंदन नमस्कार करी पोताना अपराध खमावतो केवळीना चरणकमळ प्रत्ये पडयो. सुनिए धर्मदेशना दीधी तेथी राजा श्रावक थयो, अने श्रावकनां बार व्रत अंगीकार कर्या, अने मुनि माक्षे पधार्या,
या कथानो सारः - कनकध्वज राजाना मोहमां पडेलो तेतलिपुत्र मंत्री तेने पोटिलदेवे बहु उपाय करी धर्मबोध आप्यो, तेथी तेणे जैन दीक्षा अंगीकार करी अने मुहूर्तमां केवळज्ञान पाम्या. आवा उत्तम उपकार करनारा देवोनी हीलना करवी ए आपणुंज भारी कर्मपणुं छे.
को बीजो तसु गुरु नव मल्यो, सुर वचने मिथ्या मत टब्यो | तेहज देव गुरु थानक दुवो, | उदाहरण दिव सांजली जुवो ॥ ११ ॥ निरयावलिया नाम उवंग, सोमिल 'माहतो प्रसंग ॥
१ ब्राह्मण.
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पंचरात्री देवे खप करी, मिथ्या बंमी विरती आदरी ॥१५॥ इस्या देव किम कहीये बाल, सू० दी० ए अवर्णमे मोटो आळ ॥ चनविह सुर सांजलज्यो तुमे, कहेतां नितु वारुडं अमे ॥ १३ ॥
सोमील श्रावकनो अधिकार.. निरियावलि सूत्रमा (नवमा अनुत्तरोववाइ अंगना पुष्फीया नामना उपांगना त्रीजा अध्ययनमा) श्री मुधर्मस्वामी श्री जंबुस्वामी प्रत्ये कहेता हवा के पूर्वे वणारशी नगरीमा एक सोमील नामे विद्वान ब्राह्मग रेहेतो हतो तेने पांचसे शिष्यो. नो परिवार हतो. एकदा श्री पार्श्वनाथ स्वामी तेज नगरीमां समोसर्या. श्री संघ वंदन नमस्कारार्थे गयो.प्रभुए मधुरस्वरथी धर्मदेशना दीधी तेथी भव्य स्त्री पुरुषोने प्रीतबोध थयो. नगरमा ठाम ठाम प्रभुनां गुण कीर्तन गवायां ते सांभळी सोमील ब्राह्मण प्रभुनी पासे गयो, अने अनेक प्रश्नो कर्या, तेना युक्तिपूर्वक धर्मशास्त्रने अनुसरी स्यावाद शैलीथी उत्तर आपी ब्राह्मणने निरुत्तर कर्यो अने प्रतिबोध्यो. तेथी तेणे भगवाननी पासे श्रावकधर्म अंगीकार को अने बार ब्रत उचा. भगवान विहार करी अन्यत्र यया.
॥ ६ ॥ हवे पाछळथी जैन मुनीनां दर्शन नहि थवाथी मिथ्यात्वीआनी सोबत अने परिचय थवाथी जेवो संग तेवो रंग एन्यायने अनुसरी तेणे श्रावकधर्मनोपरित्याग कर्यो, अने उचरेलांबार ब्रतो उपर अरुचि थइ, एकदामध्यरात्रीए तेणे विचार कर्यो के अहो !
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ब्राह्मणधर्म सूकी में श्रावकधर्म अंगिकार कर्यो; पण क्यां महारो ब्राह्मणनो शुचिधर्म अने क्यां ते धर्म. हुं अग्रिहोत्री ब्राह्मण यज्ञनो करनार तेने ए धर्म घटे नहीं. एवो विचार करी तेणे बागबगीचा अने कुवा तलाव कराव्या अने भिक्षुकोने दान दीधुं. वळी एकदा फरीथी विचार करी ते वानप्रस्थ थयो अने तेणे तापसी दीक्षा लीघी. ए प्रमाणे श्रावकधर्मनी करेली प्रतिज्ञा तेणे भंग करी दिशोपोख्खिया नामनी तापसी दीक्षा लीघी अने छठ छठनां पारणां करवा लाग्यो. सूर्यनी आतापना लेवानुं तथा दिशीयोनुं परिभ्रमण करवानुं शरु कर्यु.
प्रथम दिवसे पूर्व दिशामां जाय अने ते दिशाना सोम महाराजाने हाथ जोडी नमस्कार करी आज्ञा मागे के मने कंद फल फूलनी रजा आपो. ए प्रमाणे आज्ञा लेई एक आंकडीथी कंद फल फूलने तोडी लावे; वळी बीजे दिवसे उत्तर दिशामां जई वैश्रमण महाराजानी एज प्रमाणे रजा मागी त्यांथी लावे, अने त्रीजे दिवसे पश्चिम दिशाना वरुणदेव महाराजानी आज्ञा मागी त्यांथी लावे; फरी चोथे दिवसे दक्षिण दिशाना यम महाराजानी आज्ञा मागी त्यांथी लावे. ए प्रमाणे कंद फल फूल लावी गंगा नदीमां जई पूजन करी आश्रममां आत्रे, अने अनि सलगावी होम करी अग्निवैश्यदेवनुं पूजन करे अने बली आपी अतिथीनुं पूजन करी तेने संतोषी पछी पोते भोजन करे.
एकदा ते अनित्य भावना भाववा लाग्यो. तेणे विचार कयों के, अहो में ज्येष्ठपुत्रने घरनो भार सोंपी संसार त्याग करी प्रव्रज्या लीधी, छह छडनां पारणां करुहुँ, हुँ एकलो आव्यो ने एकलो जवानो हुँ, हुं कोईनो नथी ने मारुं
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सुर
दीपिका ।। ७ ।
कोई नथी; आ वधुं जे दृष्टिगोचर थाय छे ते भ्रम के मारे पोताना निज स्वरुपमां ज रमवुं जोइर; एन विचारी तेगे मौन व्रत धारण क. अने एक नेतर जेवा कोमळ काष्टनी मुखमुद्रा बनावी मुखमां घालीतेना बने छेडा काने पराव्या अने उत्तर दिशीमां जई मध्यरात्रिना समये अशोकवृक्ष नीचे पद्मासन लगावी ध्यानमां बेशी विचार करवा लाग्यो. ते समये एक देवता प्रगट धई प्रतिबोध कर्यो के - हे सोमील आ तारी प्रव्रज्या छे ते केवल दुःप्रव्रज्या छे, माटे श्री जिनेश्वर भगवाने कहेली सुमव्रज्या अंगिकार कर. ते उपर तेणे कांई लक्ष आप्युं नहि. ए प्रमाणे पांच रात्री सुधी उपदेश आप्यो. पांचमा दिवसे मध्यरात्रिए उत्तर दिशीमां उंबरवृक्ष नीचे पद्मासन लगावी सोमील बेठो छे, ते बखते देवताए प्रगट थई फरी फरीने कछु के, दे सोमील आ तारी दीक्षा जुठी छे ने आ तारुं कष्ट ते अज्ञान कष्ट छे, माटे तुं वारंवार विचार कर. एप्रमाणे वे त्रणवार कहेवाथी तेणे मौननो त्याग कर्यो अने देवताने कथं के तमे कोण छो, अने मारी दीक्षा केम खोटी छे ? देवताए क के, हुं देव लुं, ने तने हितबुद्धिधी कहुं हुं के आ तारुं अज्ञान कष्ट अने दीक्षा जुठी छे ! पण श्री • पार्श्वनाथजीए भाखेलो धर्म साचो छे अने तेमनी पासे तें जे व्रतो अंगिकार कर्यो छे ते पण साचां छे ने ते फरीथी आराधवा योग्य छे.
आसांभळी सोमीलने सानंदाश्चर्य थयो, तेणे फरीथी द्वादश व्रत अंगिकार कर्या अने व्रतमां स्थिर थयो. देवता नमस्कार करी स्वस्थानके गयो. पछी सोमीले घणो काळ चोयभक्त, छठ्ठभक्त अने अठ्ठपादिक पासखपण अने मासखम गादिक तपस्या
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करी पोताना आत्माने भावतो स्वरुपमा लीन थयो. अने प्रांत पनर दिवसनी संलेषगा करी पूर्व करेला मिथ्यात्वनुं दुष्कृत आलोची काल करी महाशुक्र विमानमां ग्रहदेवतापणे उत्पन्न थयो. त्यांथी चवी महाविदेह क्षेत्रमा मनुष्यपणे उत्पन्न यशे अने दीक्षा पाळी मोके जशे. ते शुक्र देवताए भगवान श्री महावीरस्वामी पासे आवी नाटक कर्यु. गौतमस्वामीए पूछयु के, महाराज ए देव कोण छे ? ते उपरथी श्रीमुखे गौतमस्वामीने उपर मुजब तेनो संबंध कह्यो, एम श्री सुधर्म स्वामीए जंबुस्वामीने कडं.
ए प्रमाणे अगीआरथी तेर सुधीनी गाथानो अर्थ छे अने ते एम. सूचन करे छे के एवो शुद्ध उपदेश समकितीदेव शिवाय बीजो कोण करे ? एवा समकिती देवने जे बाळजीवो बाळ अने अज्ञ कहे छे तेने सूचना करे छे के एवो आळ तमे समकिती देवो उपर मूकशो नहीं, पण तत्त्वातत्त्वनो विचार करजो. आ वात गितारथ गुरुमुखे सूत्रमांयी विस्तारपूर्वक सांभळीने मनन करवी.
सप्तम अंगे पुरपोलासी, सद्दालपुत्र वसे तिह वासी॥ते श्रावक 'आजीवक तणो, तसु उपर बे आदर घणो॥ १४ ॥ तसु अवसर आवश्यकतणे, एक देव आनंबर घणे ॥ श्रावी वीरतणा गुण कहे, तिण ते 'जीवक सबहे ॥१५॥ ते प्रनाते श्रावस्ये श्हां, तुं वंदेवा जाये तिहां ॥
१ आजीवक-गोशाळो. २ संध्याना समये. ३ गोशाळानो श्रावक.
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|| पीढ फलग सय्या संथार, निमंत्रणा करिजे सविचार ॥ १६ ॥ श्म करते सूधो गुरु लह्यो, कहो | वाल किम जाए ति करो ॥ पंमित विणु जिन गुण कुण कहे, मिथ्याती मूरख शुं लहे ॥ १७ ॥
श्री उपासक दशांग अंगने विषे सद्दाल श्रावकनो अधिकार. ___कोलासपुर नगरने विषे जितशत्रु नामनो राजा राज्य करतो हतो. ते नगर मध्ये सद्दालपुत्र नामनो एक धनाढ्य कुंभार रहेतो हतो, ते गौशालक मतनो उपासक अने तेना सिद्धांतोपर संपूर्ण श्रद्धावंत हतो. ते सद्दालपुत्र एक दिवस मध्य रात्रिए अशोकवाटिकाने विषे बेठो हतो ते प्रसंगे त्यां एक देव प्रगट थई कहेवा लाग्यो के, " हे देवानुपिय ! काले प्रभाते | अत्रे महामाहण, महागोप, महासार्थवाह धर्माचार्य पधारवाना छे तेमने तमे भक्तिपूर्वक वंदन करजो, तेमनी पपासना करजो अने पाट, पाटला, बाजोठ, संथारा विगेरेनी निमंत्रणा करजो." ए प्रमाणे वे त्रण वखत कही ते देव अदृष्य थयो. आ उपरथी सदाले विचायु के म्हारो धर्माचार्य (गोशालो) काले पधारशे, तेथी ते प्रभातमां व्हेलो स्नान विगेरे करी आनंद. युक्त थयो थको सहकुटुंब परिवार सहित धर्माचार्यना बंदनार्थे नगर बहारना ऊद्यानने विषे गयो. परंतु त्यांतो गौशालकने बदले महामाहण भगवंत श्री वर्द्धमानस्वामी पधार्या हता, पण सदाले देवना कहेवाथी ते भगवंतने वंदन करी बेठो; तेने जोई भगवंत सद्दाल प्रत्ये कहेता हवा के " हे सदाल काले मध्यरात्रिना समये अशोकवाटिकाने विषे तारी पासे एक देव प्रगट ॥
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थयो हतो अने तेणे तने एम कडं हतुं के, काले महामाहण, महागोप धर्माचार्य पधारवाना छे, अने हे सद्दाल ते धर्माचार्यने तुं गौशालक समज्यो हईश परंतु ते तारी भूल थई छे." एम कही जगतउपकारक श्री भगवंते तेने सद्उपदेश कयों के जे उपदेशथी सद्दाल मिथ्याव दूर करी शुद्ध श्रद्धावंत श्रावक थयो. खरेखर पंडित शिवाय जिनेश्वर भगवंतना गुण कोण कथी शके अने मिथ्यात्वी मूर्ख शुं समजे.
माटे आ दृष्टांत उपरथी मिथ्यादृष्टि अने सम्यक्दृष्टि देवमा केटलो महान अंतर छे ते सहज समजाय छे.
आ कथानो सविस्तर अधिकार सप्तम अंगमाथी गुरुद्वारा जाणी लेवो. बद्रो श्रावक कुंगकोलीयो, देव वचन ते नह मोलीयो॥करे प्रसंस आजीवकतणी, जिनव | रतणी क्रिया अवगणी ॥१०॥ श्म सांगली तिम कयों निपिट्ट, मुसा उवि गयो केणे न दी8॥ ते मिथ्याति कहीये 'बाल, सरिखा कहेतां लागे बाल ॥१५॥
॥श्री सप्तम अंगने विषे उहा कुंमकोलीया श्रावकनो अधिकार. ॥ कंपीलपुर नगरने विषे जीतशत्रु नामनो राजा राज्य करतो हतो, ते नगरने विषे एक महान् धनाढय कुंडकोलीया १ निरुत्तर. २ अज्ञानी. ३ कलंक.
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सुदी.
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नामनो गाथापती रहेतो हतो. अने पुशा नामनी तेनी भार्या(स्त्री) इती.एक दिवसे भगवंत श्रीमहावीरस्वामी नगर बहारना सहस्र आम्रवन नामना ऊद्यानने विषे समोसर्या, ते प्रसंगे भगवंतनी देशना सांभळी कुंडकोलीयाए शुद्ध श्रावकधर्म अंगिकार कर्यो. एक दिवसे ते कुंडकोलीयो नगर बहारनी अशोकवाटिका प्रत्ये दिवसना पाछला पहरे आवी पोतानी नामांकित महान् मूल्यवान मणीमुद्रा अने उत्तरीय वस्त्र उतारी शिलापर मूकी, तेनी नजीकनी शिलापर बेसी सामायककृत धारण कयु. ते प्रसंगे एक मिथ्यादृष्टि देव त्यां प्रगट थई तेमनी मुद्रा अने उत्तरीय वन लई ऊर्ध्व आकाशमार्गे जई घुघरीओ विगेरेना ध्वनीथी कुंडकोलीया प्रत्ये कहेवा लाग्यो के," हे देवानुप्रिय ! गौशालकनो कहेलो धर्म अति श्रेष्ट छे, कारण के तप, संयम अने चारित्र विगेरे पुरुषार्थ शिवाय, अने कोईपण प्रकारनी मुश्केली शिवाय स्वर्ग अने मोक्ष मेळवी शकाय छे. माटे भगवंत महावीरनो प्ररुपेलो धर्म योग्य नथी. कारण के ते तप, संयम, चारित्र विगेरे महान् पुरुषार्थ अने उपाधिमय छे. माटे हे कुंडकोलीया तुं ते धर्मनो त्याग करी में कहेला गौशालकना सत्य धर्मनो अंगिकार कर, अने आ महान् उपाधिथी मुक्त था." मिथ्यातीदेवना आ वचनो श्रवण करी कुंडकोलीयो ते देव प्रत्ये कहेवा लाग्यो के, "हे देव तें कहेलो धर्म जो सत्य होय तो महान् ऋद्धि सिद्धिवाळी उत्तम देवगतीने ते प्राप्त करी छे, ते शें कोईपण प्रकारना पुरुषार्थ अथवा प्रयत्न शिवाय प्राप्त करी छे के पुरुषार्थ के प्रयत्नथी प्राप्त करी छे ?" कुंडकोलीयानां आ वचनो श्रवण करी, देव कहेवा लाग्यो के, “में कोईपण प्रकारनो पुरुषार्थ किंवा प्रयत्न कर्यो नथी." देवनां आ मिथ्यावचन सांभळी कुंडकोलीयो कहेवा लाग्यो के," जो कोई पण प्रकारना
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पुरुषार्थ शिवाय देवगति प्राप्त यती होय तो तारा शिवाय अन्य दरेक प्राणी तारी माफक देवगति केम न पाम्या ?" आ प्रकारना कुंडकोलीयाना न्यायपूर्वक जवाबथी ते देव निरुत्तर थयो थको अनेक प्रकारनी शंका धारण करी, मणीमुद्रा अने वन शिलापर नांखी ते त्यांथो चाल्यो गयो. उपर प्रमाणेना कुंडकोलीयाना सत्य वचनोथी निरुत्तर थया छतां पण ते वचनो प्रत्ये श्रद्धावंत थयो नहीं, कारण के ते मिथ्यात्वी होवाथी तेनुं मिथ्याख तो गयुं ज नहीं. आ कथानो तात्पर्य ए छे के आवा | देवोने बाळ कहेवाय; परंतु कोईपण सम्यकत्वीदेवनी सरखामणीमां नज मुकाय, अने जो ते बनेने समान कहीए तो माटुं | कलंक मूक्युं कहेवाय.
आ कथानो पण सविस्तर अधिकार सप्तम अंगमाथी गुरुद्वारा जाणी लेवो. जिनवरे कह्या ते अविरति नणी, विणु विशेष आसातना घणी ॥ सूयगमांग सूत्र संचालिये, || निरतो सही अविनय टालीये ॥२०॥
श्रीसूत्रकृतांगेछितीयश्रुतस्कंधे द्वितीयाध्ययन आलापकः १४॥ " एगच्चाए पुणएगे भयंतारो भवंति अवरंगपुण पुवकम्भावसेसेणं कालमासे कालंकिच्चा अन्नयरेसु देवलोएस देवताए उबवत्तारोभवंति तंजहा:-महडिएसु महजुत्तिएस महापरिकमेमु महाजसेसु महाबलेसु महाणुभावेस महासुखेसु तेणे
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सुर
दीपिका
॥१०॥
तत्थ देवो भवंति महट्टिया महजुत्तिया जानमहासुखा हारविराइयवच्छा कढगतुडियथीभयभुया अंगयकुंडलम डयलकन पीधारी विचित्तहत्याभरणा विचित्तमाला मउलिंमउडा कल्लाणगंधपवरवत्थपरिहिया कल्लाणगपवरमल्लाणुलेवणघरा भासुरबोंदी पलंबवणमालधरा दिव्वेणंरुणं दिव्वेणवन्त्रेणं दिव्त्रेणंगंवेणं दिव्त्रेणंफासेणं दिव्वेणंसंघाएणं दिव्वेणंसंठाणेणं दिव्वाएइट्ठिए दिव्वापजुत्तीए दिव्वाएपभाए दिव्वाएछायाए दिव्वाएअच्चाए दिग्वेणंतेयणं दिव्वाएलेसाए दसदिसाओ उज्जोवेमाणा पभासेमाणा गइकलाणा ठिइकल्लाना आगमेसि भद्दयाविभवंति एसद्वाणे आयरिए जावसन्नदुः रकप्प हीणमग्गे एतसम्मे सुसाहू दोचस्स ठाणस्स धम्मपरूखस्स विभंगे एवमाहिए " ॥ ७४ ॥
अर्थ - ( एगचाए के० ) एम कोई एक पुरुष (पुण के० ) वली ( एगे के० ) एकज शरीरे एटले तेज एक भवमां (भयंतारो भवंति के ० ) सिद्धिगति गामि होय. ( अवरेगं पुण के० ) अपर एटले बीजा वली ( पुत्रकम्माव सेसेणं के० ) जेने पूर्वकृत कर्म अवशेष रह्यां दोय तो तेवा पुरुष ( कालम से कालंकिच्चा के० ) कालने अवसरे काल करीने ( अन्नयरेसु के० ) अन्यत्र ( देवलोएस के० ) देवलोकने विषे ( देवताए उबवत्ता रोभवंति के० ) देवपणे उपजनार थाय ( तंजहा के० ) ते देवलोक केवा होय ते कहे छे ( महट्टिएस के० ) महर्द्धिक मोटी रीद्धिना धणी, ( महजुत्तिएस के० ) मोटातिवान, ( महापरिकमेसु के ० ) महोटा पराक्रमवाला, ( महाजसेसु के० ) महोटा यशना धणी, ( महाबले के ० ) महोटा बलवान, (महाणुभावे के० ) महोटा अतिशयवान एवा महानुभाव वैक्रियादिक शक्तिये करी सहि होय. ( महासु
सु० दी०
| ॥ २० ॥
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PanemaDD/BEDARD
खेसु के.) महोटा सुखना धणी, एटला वाना जे स्थानकने विषे छे (तणतस्थदेवाभवंति के.) ते त्यां देवतापणे होय. ते देवता के.वा होय ते कहे छे. महोटी ऋद्धिआदिक गुणे सहति यावत् महोदा सुख सहित, (हारविराइवच्छा के०) हारे करी विराजित शोभायमान छे हृदयकमळ जेना वली ( कडगतुडियर्थभियभूयाअंगय के.) कटक, केयूर, अंगदादिके करो स्तंभित छे भुजा जेनी, वली देदीप्यमान( कुंडलमांडयल के०) कुंडले करी घसाएला एवा गालना तट जेणे शोभित कर्या के (कन्नपीढधारी के.) कुंडलना आधार माटे कान छे माटे कर्णपीठधारी कह्या, अथवा कर्णपीठ ते काननुं आभरण विशेष जाणवू. ते आभरण कुंडल छे, तेना धरनारा, (विचित्तहत्याभरणा के० ) विचित्र प्रकारना मुद्रादिक आभरण जेना हाथमां रहेला छे तेणे करी सहित (विचित्तमालामउलिमउडा के.) विचित्र प्रकारनी माला सहित मुकुटना धरनार, ( कल्लाणगंध पवरवत्थपरिहिया के०) कल्याणकारी सुगंधित वखना पेरनार, तथा ( कल्लाणगपवरमल्लाणुलेवणधरा के० ) कल्लाणकारी प्रवरमाल्य विलेपनना धरनार, (भासुरबोंदीपलंबवणमालधरा के. ) देदीप्यमान शरीरपलंच एवी लटकती जे वनमालारूप आभरण विशेष, तेना धरनारा, (दिवेणंरूवेणं के०) प्रधानरूपें करी सहित, (दिव्वेणंवनेणं के) दिव्यवर्णे करी सहित, (दिव्वेणंगंधेणं के.) दिव्य गंधे करी सहित, (दिव्वेणंफासेणं के०) दिव्य स्पर्श करी सहित, (दिव्वेणं संघाएणं के०) | दिव्य शरीरनो संघातन समुदाय तेणे करी सहित, (दिब्वेणं संगणेणं के) दिव्य संस्थान समचतुरस्ररूप तेणे करी सहित, (दिवाएइडीए के.) दिव्य वैमानादिकनी ऋद्धि. तेणे करी सहित. (दिवाएजुत्तीए के.) दिव्यद्युति एटले प्रधान
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सुर
दीपिका
॥ ११ ॥
अन्योन्य भक्तिए करी सहित, (दिव्वापभाए के० ) दिव्य प्रभा एटले कांति तथाविधद्रव्य जोडवाने प्रभावे महात्मे करी सहित, (दिव्वा छायाए के० ) दिव्य प्रतिबिंब एवा रूपें करी सहित, (दिव्वाए अच (ए के ० ) दिव्य अर्चा, (दिव्वेणंतेयणं के० ) प्रधान एवी शरीरथकी निकलति जे तेजनी ज्वाला तेणे करी सहित, एटले दिव्य तेंजेंकरी सहित (दिव्वाए लेसाए के० ) अभ्यंतरना परिणामरूप शुक्लादिक लेश्यायें करी सहित थका, ( दस दिसाओ उज्जोवेमाणा के० ) प्रधान शरीर माहेली कांति करी दशे दिशाओने उज्वल करता, ( पभासेमाणा के ० ) दरो दिशाओने अलंकारता प्रकासता, (गइकलाणा के०) देवता संबंधिनी गतिये करी प्रधान ( ठिइकल्लाणा के०) देवता संबंधिनी स्थितियें करी कल्याण एटले प्रधान, ( आगमे सिभद्दयावि भवंतिके० ) आगमिककाले भद्रक प्रधान मनुष्यभवरूप संपदा पामवा आश्री तथा रूडा धर्म प्रतिपत्ति सहित प्रत्ये पामवा आश्री आगमिककालें भद्रक कह्या छे. ए स्थानक आर्य यावत् सर्व दुःख थकी रहित थवानो मार्ग एकांते सम्यक्, सत्य, सुसाधुनुं स्थानक छे, एटले बीजुं स्थानक धर्मपक्षनो विचार एम कह्यो. ॥ ७४ ॥
विचार्या विना सर्व देवोने सरखा करी देवाथी आसातना घणी थाय छे, तेथी विचारी देवोने वाल कहेवा. श्री जिनेश्वरे जे "बाल" कीधेला छे ते अविरति मिथ्यादृष्टि आश्रिने “बाल" कीधेला छे, पण सम्यकदृष्टि आश्रिने “बाल" कीधेला नथी, माटे विचार कर्या बिना बोलवाथी घणी आसातना थाय छे, तेथी श्री सूयगडांग सूत्रनो अधिकार सारी रीते सांभळीने अविनय टालवानो खप करवो.
मु० दी०
॥ ११ ॥
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बालपंमित पंमित ने बाल, विरताविरत विरतगुण साल ॥ अविरत त्रण नंग ए जोई, | समकितधारी बाल न हो। ॥१॥
श्रीसूत्रकृतांगड़ितीयश्रुतस्कंधे द्वितीयाध्ययने ॥७॥ आलापकः - अविरई पडुच्च वाले आहिज्जइ विरइं पडुच्च पंडिए आहिज्जइ विरयाविरई पडुच बाल पंडिए आहिज्जा, तत्थणं जासा सव्वतो अविरइ एसहाणे आरंभठाणे अणारिए जाव असम्बदुख खपहीणमग्गे एगंतमिच्छे असाहू तत्थणं जासा सव्वता विरइ एसहाणे अणारंभठाणे आरिए जाव सव्वदुख्खप्पहीणमग्गे एगंतसम्मे साहू तत्थणं जासासयभो विरया विरई एसहाणे आरंभणारंभहाणे एसहाणे आरिए जावसम्बदुख्खप्पहीणमग्गे एगंतसम्म साहू ॥ ७८ ॥
हवे ए त्रणे स्थानकनें संक्षेपे करी सविशेष कहे छे, (अविरइंपडुच के० ) अविरति एटले असंयम ते आहीं सम्यकृत्वने अभावें जो पण मिथ्यादष्टिनी विरति छे, तो पण तेने अविरतिज कहेवाय; ते अविरति आश्री तेने (बाले आहिज्जर के०) बाल कहिये, (विरई पडुच्च पंहिए आहिज्जइ के.) अने विरति एटले सावध परित्यागरूप ते आश्री तेने पंडित परमार्थनो जाण कहिये, (विरयाविरइंपडुच्चवालपंडिएआहिज्जा के.) तथा विरताविरत एटले काइक संयम काइक असंयम ते आश्री तेने बाल पंडित कहीये, (तत्यणंजासासनतो अविरह के०) त्यां पूर्वोक्त त्रण स्थानकने विषे जे सर्व थकी अवि
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दीपिका.
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रति स्थानक छे एटले जेमां सर्वथा विरति परिणामनो अभाव छे. (एसहाणे के०)ए स्थानक ते (आरंभहाणे के०)आरंभर्नु स्थानक, (अणारिए के.) अनार्य, (जावअसव्वदुख्खप्पहीणमग्गे के०.) यावत् सर्व दुःख थकी मूकाववानो मार्ग नथी. ( एगंतमिच्छे असाहु के.) एकांत मिथ्यात्व मार्ग असाधु एटले ए सारो मार्ग नहीं. हवे बीजुं धर्मपक्षनुं स्थानक कहे छे. ( तत्थंणंजासासन्नता विरह के.) त्यां जे सर्व थकी विरति सम्यक् पूर्वक आरंभ परित्यागरूप (एसहाणे के०) ए स्थानक ( अणारंभहाणे के.) अनारंभनुं स्थानक (आरिए के.) आर्य (जाव सबदुख्खप्पहीणमग्गे के०) यावत् सर्व दुःख थकी मूकावभनो मार्ग, (एगंतसम्मेसाहु के..) एकान्त सम्यक्त्व साधु मार्ग जाणवो. हवे त्रीजुं मिश्रपक्षनुं स्थानक कहे छे. (तत्थणंजासासवओविरयाविरइ एसहाणेभारंभणोरंभहाणे के.) त्यां जे सर्वथकी विरताविरत एटले संयमासंयमरूप स्थानक ते आरंभ अने अनारंभरूप स्थानक जाणवू. (एसहाणे के०) ए. स्थानक ( आरिए के.) आर्य यावत् सर्व दुःख यकी मुकाववानो मार्ग एकांत सम्यक् भलो मार्ग जाणवो ॥ ७८॥ .
आ प्रमाणे त्रण भेद कहेला छे, (१) लो बालपंडित. (२) जो पंडित. (३) जो बाल. १ विरताविरती, २ विरति, ३ अविरति, एत्रण त्रग भांगाने विचारवा, अने योग्य रीते समजी समकिति देवोने "बाल" कहेवा नहि. .
मिथ्यादृष्टि पाले क्रिया, जिनवर वचन मिश्र ए थया ॥ पक्ष अधर्म डे एहनो, नाम विराधक | जेहनो ॥॥
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१२ ॥
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॥ श्रीसूत्रकृतांगे द्वितीयश्रुतस्कंध द्वितीयाध्ययने यालापकः ॥ ६० ॥
अहावरे तच्चस्स द्वाणस्स मिस्सगस्स विभंग एव माहिज्जइ जे इमे भवंति आरणिया आवसहिया गामणियंतिया कण्डुईरहस्सित्ता जाव ते तओविप्पमुच्चमाणा भुज्जो एलमूयत्ताए पच्चायंति एसठ्ठाणे अणारिए अकेवले जाव असवदुरकहीणमग्गे एगंतमिच्छे असाहु एसखलु तच्चरस ठाणस्स मिस्सगस्स विभंगे एव माहिए ॥ ३० ॥
अर्थ – वे अपर श्रीजुं स्थानक जे मिश्रपक्ष तेनुं स्वरुप आवी रीते कदेवाय छे. जे ए मिश्रस्थानक छे, ते एने मिश्रस्थानक शाकारणे कहीये ? ते माटे विशेष कहे छे. अधर्मपक्षे मिश्रित जे धर्मपक्ष, ते कारणे एने मित्रपक्ष कहीयें. परंतु अधर्मना बाहुल्यपणाथकी, ए अधर्म पक्षज जाणवो. यद्यपि मिध्यादृष्टि पण केटलीएक विरति करे छे, तथापि ते चित्तने अशुद्धपणे, अने परमार्थने अजाणपणे, तथा अभिनवपित्तना उदयें, साकर मिश्रित दूधपाननी पेठें, तथा उखर क्षेत्रमां मेघदृष्टिनी पेठें ते धर्म पण तेनो फलदायक न थाय. ते कारणे मिश्रपक्ष, विशेषअधर्मपक्षने मलतोज छे. (जेइमेभवंति आरणिया के ० ) कंदमूल फलाहारी, दृक्षने मूले वसता ( आवसहिया के० ) कोइएक पानडानी झुंडी करीने रहे, ( गामणियंतिया के ० ) आजीविका चलाववा निमित्ते ग्रामने समीपे रहे, ( कण्हुईरह स्सित्ता के० ) कोइएक कार्यने विषे रहस्यना करनार, एवा तापसादिक पूर्वोक्त जे होय ते मिश्र पक्षवाला जाणवा. ( जावतेत ओविप्पमुच्चमाणा के ० ) यावत् यद्यपि ए कांहीएक कायक्लेश करे तथापि ते आसुरी किल्बिपियाओने स्थानके जड़ उपजे. ते स्थानकथकी आयुष्यने क्षयें
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चवीने, (भुजो के०) वली मनुष्यभव पामें. तो (एलमृयत्ताए के.) बहेरा, मुंगा, आंधला, जन्मान्ध, (प. ) एवा थाय. ए रीतें चातुर्गतिक संसारमाहे परिभ्रमण करे. ए कारणे ए स्थानक अनार्य एटले महापुरुषने अनाचरणीय छ, एने विषे केवलज्ञान नथी. यावत् सर्व दुःखना क्षयर्नु कारक ए स्थानक नथी. ए मार्ग एकान्त मिथ्यात्वनुं स्थानक, माटे ए असाधुनो पंथ जाणवो.आवी रीते त्रीजा मिश्रपक्षनो विचार कह्यो. ॥ ६॥
तापसादि मिथ्यादृष्टिी तप, जप, आतापनादि क्रिया करवाथी तेमनो मिश्रपक्ष भगवाने कहेलो छे. तेनो मिश्रपक्ष विराधक होवाथी प्रभुए आ पक्षने अधर्म पक्षमांहि गणेलो छे. ॥ २२ ॥ ___समकित सहित बार व्रतधार, देशविरतिनो एह श्राचार ॥ ते पण सूत्रे मिश्रज कह्या, धर्म पक्ष मांहे संग्रह्या ॥ १३ ॥
श्रीसूत्रकृतांगेदितीयश्रुतस्कंधद्वितीयाध्ययने आलापकः ॥ ७५-७६॥
अहावरे तच्चस्स हाणस्स मिसगस्स विभंगे एव माहिज्जइ इह खलुपाईणंवा संतेगतिया मणुस्सा भवंति तंजहा अपिच्छा अप्पारंभा अप्पपरिग्गहा धम्मिया धम्माणुया जाव धम्मेणं चेव वित्तिकप्पेमाणा विहरति मुसीला सुव्वया सुपडियाणंदा साहू एगच्चाओ पाणाइवायाओ पडिविरता जावजीवाए एगच्चाओ अप्पडिविरया जाव जेयावण्णे तहप्पमारा सावज्जा
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अबोहिया कम्मंता परपाणपरितावणकरा कज्जति ततोवि एगचाओ अप्पडिविरया. ॥ ७ ॥ - अर्थ:-अथ हवे अपर त्रीजु स्थानक मिश्रपक्ष तेनो विचार कहियें छैयें; यद्यपि ए स्थानक धर्म अधर्म करीने मिश्रित छे, तथापि एमां धर्मर्नु बाहुल्यपणुं छे, ते माटे ए धर्मपक्षज जाणवो. आ जगत्माहे निचे पूर्वादिक दिशिने विषे कोई एक मनुष्य एवा छे, ते कहे छे. अल्प इच्छावाला,अल्पारंभी एटले थोडेज आरंभे व्यापारादिक साये संबंध छे जेने, अल्प परिग्रही एटले थोडोज परिग्रह संग्रह करवानी मूर्छा संबंधी बुद्धि छे जेनी, धर्मानुगामि एटळे धर्म जे श्रुत चारित्ररूप तेनी केडे चालनार, यावत् देशथकी चारित्रने अखंड पालवे करी, श्रुतने आराधवे करी आजीविका करताथका विचरे छे. भलो छे आचार जेनो, भला व्रत छे जेने, सुप्रत्यानंद, साधु एटले सुखसाध्यसाधु, तथा साधुने विषेज आनंद हर्ष सहित वर्ते छे, तथा ( एगचाओपाणाइवायाओ के०) एकेक प्राणी जे बेइंद्रियादिक त्रस जीवो छे, तेने हणवाथकी निवां एवा, तथा एकेक स्थूल प्राणातिपात थकी, अत्यंतपणे विरम्या छे, विरक्त थया छे, जावजीवसुधी एकेक प्राणी जे पृथिव्यादिक द्वार तेने हणवाथकी अत्यंत विरम्या नथी, ओसरया नथी एटले एक सूक्ष्म प्राणातिपातथकी अविरता इत्यादिक सर्वपद, जेवां अविरतने आलावे कयां छे, तेवा आही पण जाणी लेवां, परंतु एटलुं विशेष छे जे; एक पॐ विरति, अने एक पो अविरति, | (जावजेयावण्णे के० ) यावत् जे काइ अनेरा तथामकारना पूर्वोक्त सावध अबोधिना कारण एवा का व्यापार, बीजा जीवोने परितापना करनार नीपजावीयें, ते थकी पण एकपड़े विरति अने एकपछे अविरति, ते विरताविरत कहियें ॥ ७॥
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VANDON
मुदी
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से जहा णामएसमणोवासगा भवंति अभिगयजीवाजीवा उवलद्धपुण्णपावा आसवसंवरवेयणाणिज्जरा किरियाहिगरणबंधमोख्खकुसला असहेज्ज देवासुरनागमुवन जख्खरख्खस किंनर किंपुरिस गरुल गंधव महोरगाइएहिं देवगणेहिं निग्गंथाओ पावयणाओ अणइक्कमणिज्जा इणमे निग्गंथे पावयणे जिस्संकिया णिकखिया णिवितिगिच्छा लट्ठा गहीयहा पुछियट्ठा विणिछियठा अभिगयटा अडिमिंजपेम्माणुरागरत्ता अयमाउसो निग्गथे पावयणे अयं परम सेसे अणहे उसियफलिहा अवगुय दुवारा अचियत्तं तेउरपरघरपवेसा चाउद्दसामुद्दिपुण्णिमासिणीसुपडिपुन पोसहं सम्म अणुपालेमाणा समणे निग्गंथे फासु एसणिज्जेणं असण पाणखाइम साइमेणं वथ्थ पडिग्गह कंबल पायपुंच्छणेणं ओसह भेसज्जेणं पीठ फलग सेज्जा संथारएणं पडिलाभेमाणा बहूहिं सीलव्वय गुणवेरमण पचरूखाण पोसहोचवासेहिं अहापरिग्गहिएहिं तवोकम्मेहि अप्पाणं भावे माणा विहरंति ॥ ७६॥
तेणं एयारूवेणं विहारेणं विहरमाणा बहुई वासाई समणोवासगपरियागं पाउणंति पाउणंतित्ता आबाहंसि उप्पन्नंसिवा अणुप्पचसिवा बदुई भत्ताई अणसणाए पच्चखाए बहुई भत्ताई अणसणाए पच्चख्खाएत्ता बहुइं भत्ताई अणसणाए छेदेइ बहुई भत्ताई अणसणाए छेदेइत्ता आलोइय पडिकता समाहिपत्ता कालमासे काळंकिच्चा अनयरेसु देवलोएम देवताए उववतारो भवंति तंजहा महडिएसु महज्जुइएमु जाव महा सुखेसु सेसं तहेव जाव एसहाणे आयरिए जाव एगंतसम्मे साहू तच्चस्स ठाणस्स मिस्सगस्स विभंगेएवं आहिए ॥७७॥
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अर्थः-वली विशेष कहिये छैयें. ते यथा दृष्टांते नाम एवी संभावनायें जेम कोइएक उत्तम पुरुष, विशिष्ट उपदेश सांभलवाने अर्थे मुनिओने सेवे छे. ते(समणोवासगाभवंति के०) श्रमणोपासकनोधर्म सेवन करे, ते श्रमणोपासक विशेषतः धर्मना करनार जाणवा, ते श्रमणोपासकना लक्षण कहे छे. (अभिगय के०) अभिगत एटले ओलख्या छे, जाण्या छे, (जीवाजीवा के०) जीव जे चेतना लक्षणरूप, अने अजीव जे चेतनारहित, एटले जीवाजीवना ओलखनार तथा (उवलद्धपुण्णपावा के०) शुभ प्रकृतिरूप जे पुण्य, अने अशुभ प्रकृतिरूपजे पाप, तेना स्वरूपने उपलब्ध एटले जाण्या छे, तथा (आसव के) आश्रव ते शुभाशुभ कर्मर्नु आवद्यु, अने (संवर के०) संवर ते आवता कर्मनुं रोकवू, संवरचं, तथा ( वेयणा के०) वेदना ते साता | असातारूप चे प्रकारनी, (णिज्जरा के० ) निर्जरा ते कर्मनुं खपावQ, (किरियाहिगरण के०) क्रियाअधिकरण एटले घर, हाट, खज, कटारी, उखल, मुसलथकी कर्म बंधाय ते, (बंध के०) बंध चार प्रकारना तथा (मोख्ख के.) कर्मथकी मृका| वq ते जाणवाने विषे ( कुसला के• ) डाह्या छे, ( असहेज के० ) कोइ कष्ट पड्याथकी देवादिकनी सहायतानी वांछा |
न करे, सहायरहित धर्मना करनार होय. (देवासुरनागसुवनजख्खरख्खसकिननरकिंपुरिसगरुलगंधव्वमहोरगाइएहिं के०) तथा देव एटले वैमानिक देवो, असुर एटले असुरकुमार भवनवासी देवो, नागकुमार, सुवर्णकुमार, यक्ष, राक्षस, किंबर, किंपुरिस, अश्वमुख गरुड, गंधर्व, महोरगादिक, ( देवगणेहिं के०) इत्यादिक देवताना समूह ते, (निम्गंथाओपावयणाओ के.) निग्रंथना एटले भगवंतना प्रवचनथकी तेने (अणइक्कमणिज्जा के.) चलाची न शके, डोलवी न शके. (इणमेनिग्गये
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पावयणेणिस्तंकिया के.) तथा ए निग्रंथना प्रवचनने विषे निःशंकित एटले संदेहरहित होय, एटले जे श्री वीतराग पोल्या तेज सत्य छे एम जाणे. (णिकंखिया के०) सूत्र छोडी बीजु शास्त्र वांछे नही, (निवितिगिच्छा के.) धर्मना फलने विषे संदेहरहित होय, तथा सूत्रोक्त साधुना मार्गने विषे दुर्गच्छारहित होय, ( लद्धहा के०) सूत्र सांभलवायकी लाधा.छे सूत्रना अर्थ जेणे, (गहीयहा के० ) धारणाये करी ग्रह्या छे अर्थ जेणे, (पुच्छियहा के०) संशय उत्पन्न थया थकी पूछीने खरा कर्या छे अर्थ जेणे, (विणिच्छियहा के०) वारंवार विशेषे प्रछीने निश्चित कर्या छे अर्थ जेणे, (अभिगयहा के०) माप्त थयेला अर्थने पूछया पछी, निर्णय करी धार्या छे अर्थ जेणे, एटले प्रकारे तत्वार्थना जाण, (अद्विमिंज पेम्माणुरागरत्ता के०) अस्थि अने हाड मांहेली मिंजा जे धातु विशेष ते भगवंतना सिद्धांतरूप कसुंबादिकने विषे प्रेमरूप रागेकरी रंगाणा छे एटले रागरक्त छे, तथा पांच माहे मल्या थका एवी धर्मनी कथा कहे के, ( अयमाउसो के.) अहो आयुष्यमंतो! (निग्गथेपावयणे के.) निग्रंथ एटले साधु संबंधि जे प्रवचनसिद्धांत छे (अयंपरमटे के.) एज आत्माने अर्थे उत्कृष्ट मोक्ष साधनरूप मार्ग छे. ( सेसेअणठे के० ) अने शेष बीजा कपिलादिकना ग्रंथ, तथा धनधान्यादिक, पुत्रकलत्रादिक ए सहु अनर्थकारी छ, ए सर्व असार एवोजे आ संसारतेनी वृद्धिनां कारणरूपछे. एवी कथा करे. एरीते निग्रंथना प्रवचनने विषेरागी छे, (उसियफलिहा के०) निर्मल स्फाटिकना जेवू चित्त छे जेन ( अवगुयवरा के०) जेना घरना वारणा भोंगल रहित एटले सर्व काल उघाडां छे, ( अचियत्तंतेउरपरघरपवेसा के.) राजाना अंतःपुरनी पेठे लोकना घरने विषे प्रवेश करवानो जेणे त्याग कर्यो छे, अथवा
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अग्रीतिकारि छे, परदर्शनादिकना घरने विषे प्रवेश जेनो, एतावता परतोथिकने परघर जाणीने घगा मजबूत कारगो विना तेमने घरे न जाय तथा (चाउद्दसमुद्दिढ के.) चतुर्दशी, अष्टमी अने उद्दिष्टा एटले महाकल्याणिक तिथि (पुणिमासिणीसु के०) त्रण पूर्णिमा चतुर्मासिक तिथी, एटला दिवसोने विषे (पडिपुत्रंपोसहसम्मंअणुपालेमाणा के.) प्रतिपूर्ग पोसहने सम्यक् प्रकारे पालताथका विचरे छे. वली ते श्रावक कहेवा छे तो के (समणेनिग्गये के ) श्रमग तपस्वी निग्रंथने (फासुएसणिजेणं के० ) प्राशुक एटले निर्जीव, एषणीक एटले बहेंतालीस दोष रहित एवो (असणपाणखाइमसाइमेणं के.) अशन, पान, खादिम, स्वादिम (वथ्थपडिग्गहकंबलपायपुंच्छणेणं के.) तथा वस्त्र, पात्र, कंबल, पायपुंछग, (ओसहभेसजे गं के० ) औषध, भैषज्य, ( पीठफलगसेज्जासंथारएणंपडिलाभेमाणा के.) पीठ, फलक, शय्या, संथारो तेणे करो प्रतिला. भता थका, (बहुहिंसीलव्ययगुणवेरमणपच्चखाण पोसहोववासेहिं के०) घणां एक शीलवत तथा शील ते शुभाचार, तथा स्थूल प्राणातिपातविरमणादिक गुणव्रत ते दिशिवतादिक योग्यपणे लीघेला तथा नवकारसी पोरसी प्रमुख पच्चरूखाणना करनार, तथा पोषध सहित उपवासना करनार, ( अहापरिग्गहिएहिं के०) तथा यथा परिग्रहित एटले पोतानी इच्छा माफक आदर्या छे जेणे; ते शुं आदर्या छ ? तो के ( तवोकम्मेहिं के० ) तपकर्म तेणे करी ( अप्पाणंभावमागाविहरंति के. ) पोताना आत्माने भावता थका विचरे छे. ॥ ७६॥
(तेणंएयारूवेणं विहारेणं विहरमाणा के० ) ते एतद्रूपपणे एटले एवा पूर्वोक्त श्रावकने आचारे प्रार्चायका,
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(बहुइंवासाई के०) घणा वर्ष सुधी (समणोवासग परियागं के०) श्रमणोपासकना पर्यायने ( पाउणंति के० ) पाले, (पाउणंतित्ता के०) पालीने (आबाइंसिउप्पनसिवा के०) रोगादिक आवाधा उपनी, (अणुप्पमंसिवा के०) अथवा अनुत्पन्न एटले न उपनी छते (बहुइंभत्ताई के०) घणा भात पाणीनो ( अणसणाएपच्चरूखाए के० ) अनशन पच्चरखे ( पचरूखाएता के०) एम घणा भक्त पाननो अनशन पच्चख्खिने (बहुइंभत्ताइअणसणाएछेदेइ के०) ते अनशनने विषे घणा भक्त पानने छेदे, एटले परिहरे. (छेदेइत्ता के० ) छेदी एटले परिहरीने, घणा दिवस अनशन पालीने (आलोइय पडिकंता के०) आलोचे, पडिकमे एटले जे पाप लाग्यां होय, ते अरिहंतादिक आगल प्रकाशीने तेनां मिथ्यादुष्कृतादिक आपीने (समाहिपत्ता के.) झानादिकनी नियाघातपणे समाधि पामीने एटले पडिकमीने समाधि प्राप्त थइने, मरणना अवसरे काल करीने एटले समाधि मरण करीने अनेरा देवलोकने विषे देवतापणे उपजनार थाय. ते कहे छे. महोटी ऋद्धि छे वैमानिकादिकनी तेने विषे, महोटा द्युतिने विषे, यावत् घणा सुख तेने विषे, इत्यादिक शेष बोल पूर्ववत् एटले तेमज जाणवा. ज्यां सुधी एवं स्थानक आर्य धर्मपक्ष साधु छे एटले रुडु छे. यावद एकांत सम्यकत्वमार्ग साधु त्यां सुधीनो आलाको बधो कहेवो. ए त्रीजुं स्थानक जे मिश्रपक्ष तेनुं स्वरूप कह्यु. एटले धर्मपक्ष, अधर्मपक्ष, अने मिश्रपक्ष, ए प्रणे पक्ष कह्या ।७७॥
तात्पर्यः-समाकित सहीत बार व्रतोतुं ग्रहण कर ए देशविरतिनो आचार छ, ते देशविरति पालन करनारा | श्रावकोने देवाधिदेवें उपर कहेला बीजा अंगमां मिश्र पक्षवाळा कहेला छे, अने सन्मार्ग पामेला होवाथी श्री
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वीतरागे धर्म पक्षमांहे ग्रहण कर्या छे. ॥२३॥
मिथ्यादृष्टी ने अविरती, पक्ष अधर्म तेय उर्मती॥ सुत्ता बाल अधर्मी हुँति, असंयती अविरत एगंति ॥ २३ ॥ पंमितबाल पंमित व्यवहार, मिथ्यादृष्टि बाल विचार ॥ विरति थकी अधिको समकित्त, बाल न कहिये तिण संयुत्त ॥ २५॥
सामान्य रीते बचा देवताने आवी रीते न कहे, के देवता मिथ्यादृष्टि छे, देवता अविरति छ, तेथी तेमनो अधर्मपक्ष छे; देवता बाल छे, देवता अधर्मी छे, एकांते असंयति अविरति छे, माटे मिथ्यादृष्टिने बाल कहेवाय, परंतु विरतिथकी पण अधिक उत्तम समकित ते उत्पन्न थयेलो छे जेमने, एवा समकित सहित देवताने बाल कदी न कहेवाय. उपर लखेल बीजा अंगनो ७८ मो आलापक इहां पण जाणी लेवो. ॥२४-२५॥
पंचमंग बोल्यो नगवती, सुर नहु कहेवा असंयती ॥ 'निहुर वचन एम नाषता, गुणं सुधर्म अविनय राखतां ॥ २६ ॥ १ सुवचन. २ श्री मुधर्मास्वामीए अविनयने अटकावाथी गुण को छे, ते कियो गुण के निठुर वचन न बोलवू ते.
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॥१७॥
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श्री जगवतीजीना पंचमशतकना चोथा उद्देशाने विषे. देवाणं भंते ! संजयाइ वत्तव्बंसिया? गोयमा ! णोइणहे समढे अब्मख्खागमेयदेवाणं । देवाणं भंते! असंजयाइवत्तव सिया ? गोयमा! णोइगढे समढे निफुरवयणमेयं देवाणं । देवाणं भते! संजयासंजयाइवत्तव्बांस या ? गोयमा! नोइडे समझे असम्भूयमेयंदेवाणं । सेकिंखाइएणभंते ! देवाइवत्तव्यंसिया ? गोयमा! देवाणं नो संजयाइवत्तव्बंसिया॥
आधी देवताने असंयति न कहेवा, अने एम जो बोले तो निकुर वचन बोल्युं गणाय, अने देवताने संयति कहींये तो अभ्याख्यान लागे, अने देवोने संयतासंयति कहिये तो असदभूतवचन कहेवाय, माटे देवोने नोसंयति कहेवा एम श्री जिनेश्वर भगवाने कछु छे. ॥ २६ ॥
नोसंयत श्म कहेवा कह्या, तासु नाव गीतारथे सह्या ॥ नहीं संयत्त ए अर्थ न होय, आगम || ग्रंथ विचारी जोय ॥२७॥
नोसंयत एम भगवान कहेवा कह्या छे. अने तेनो तात्पर्य गीतारथ महाराजाभोए जाणेलो होय छे, ने जे | " नहीं संयत " एवो अर्थ करो तो ते अर्थ कदी थाय नहि. आगम ग्रंथ विचारीने जोइ लेजो. ॥ २७ ॥
वृत्तियें अर्थ श्हज संग्रहुं, वृत्ति न माने तेहने कहुँ ॥ मिलतो सूत्र करी आपीये, नहीं तो सूत्र
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॥१७॥
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नणि थापीये ॥७॥ नोकसाय नोइंजिय जेय, नोसन्ना नोआगम जेय ॥ जेम तेम नोसंयत || जाण, केवळ सूत्र तणे परमाण ॥ २॥
वृत्तिमा एहज अर्थ कहेलो छे. जो वृत्ति न मानो तो सूत्रने मलती व्याख्या करी आपीये. जेम सूत्रोमां " नोकसाय, नोइंद्रिय, नोसना, नोआगम" तेम " नोसंयत" केवल सूत्रना प्रमाणथी जाणी लेवू, एटले नोकसायनो अर्थ अकसाय एवो यतो नथी, नोइंद्रियनो अर्थ अनिद्रिय थतो नथी अने एम जो थाय तो उधो थई जायते माटे एवो अर्थ कदी करवो नहिं, अने देवताने अधर्मी एवा पण कदी नहीं कहेवा, केमके तेमनामां पण श्रुतधर्म नो सद्भाव छे एप सूत्रोमां कहेलुंछे ॥ २८-२९ ॥ | अनुत्तर उववाई देवता, तिहां बतां गणि जिण सेवता ॥ पूजे मन करि प्रश्न विचार, बझे जिन| वर नाषित सार ॥ ३० ॥ श्स्या नाण दसण निर्मला, किणे काले न हुवे सामला ॥ वलि उपशांत मोह ते कह्या, सुगुरु वचन ते में सहह्या ॥ ३१॥
श्रीनगवतीजीना ५ मा शतकना चोथा उद्देशाने विषे. पभूणं भंते ! अणुत्तरोववाइया देवा तत्थगयाचेव समाणा इहगएणं केवलिणा सद्धिं आलावंवा संलावंचा करेत्तए ?
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हंता पभू । सेकेणणं जाव पभूणं अणुत्तरोववाइया देवा जाव करेत्तए ? गोयमा ! जण्गं अणुत्तरोवाइया देवा तत्थगयाचेव समाणा अलुवा हेउवा पसिणंवा कारणंवा वागरणंवा पुच्छति तण्णं इहगए केवली अईचा जाव वारणंवा वागरेइ सेतेणणं भंते ! इहगए केवली अहंवा जाव वागरेइ तण्णं अणुत्तरोववाइया देवा तत्य गयाचेव समाणा जाणंति पासंति. सेकेणठेणं जाव पासंति ? गोयमा ! तेसिणं देवाणं अणंताओ मणोदबवग्गणाओ लद्वाओ पत्ताओ अभिसमण्णागयाओ भवंति सेतेणणं जण्णं इहगए केवली जाव पासइ ॥
भावार्थ-समर्थ छे हे भगवन् ! अनुत्तर विमानने विषे उपन्या जे देव तिहां अनुत्तर विमानने विषे रबाथका वसता | थका, निश्चे इहां मनुष्यक्षेत्रनेविशे रह्याथका केवली संघातें एकवार बोळवो मन संघातेज. वारवार बोलवो मन संघातेज. ते करवाने इति प्रश्न हा, गौतम ! समर्थ छे. ते स्ये अर्थे हे भगवन् ! यावत् समर्थ छे अनुत्तर विमाने उपना देव केवली संघाते आलाप संलाप करवामां ? हे गौतम ! जेह भणी अनुत्तर विमानवासी देव (जे माटे अच्युतदेव लोक उपरांत देवनो | गमन आगमन नथी,) ते माटे तिहां रह्या थकाज अर्थ प्रत्ये हेतु दृष्टान्त प्रत्ये अथवा प्रश्न प्रत्ये अथवा कारणप्रत्ये अथवा व्याकरण (क.ह्यानो उत्तर ते व्याकरण) प्रते पूछे, ते इहां मनुष्यक्षेत्र रह्या केवली अर्थ प्रत्ये यावत् प्रश्नना उत्तर कहे, ते तेणे अर्थे आलापादिक करवाने समर्थ छे. हे भगवन् ! इहां मनुष्यक्षेत्रने विषे रह्या केवली अर्थ प्रते यावत् प्रश्ननो उत्तर कहे ते प्रते अनुत्तर विमान उपना देव तिहांज रह्यायका निश्चे जाणे देखे ? हा गौतम! जाणे देखे कया
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कारणे हे भगवन् यावत् जाणे देखे ? हे गौतम ! तेह देवने अनंति मनोद्रव्यवर्गणा तेहना अवधिज्ञानविषे पहति, तेहने अवधिज्ञाने सामान्यथी पामी, विशेषथी पामी हुइ, जे माटे ते देवोर्नु अवधिज्ञान संभित्रलोकनाडी विषय छे. अने जे लोकनाडी ग्राहकहुवे ते मनोद्रव्यवर्गणा ग्राहकहुवेज; माटे जे पण लोकसंख्येयभाग विषयअवधिज्ञान हुवे ते पण मनोद्रव्यग्राही दुचे तो सभिन्नलोकनाडी विषय ते मनोद्रव्यग्राही केम न दुवे ? वांछीये छैये. लोकसंख्येयभाग अवधिने मनोद्रव्यवाहकपणो, इति. तेणे कारणे हे गौतम ! इहां रह्यो केवली प्रश्नोत्तर कहे ते अनुत्तर विमानवासीदेव जाणे देखे.
आवा देवता ज्ञानवान् तेने "बाल" शी रीते कहेवाय ? कहेनारज मूर्ख (बाल) कहेवाय. ____उपरनी गाथामां कह्या मुजब जेओनुं ज्ञान अने दर्शन निर्मल छे, अने कोइ काले पण ते ज्ञान दर्शन श्यामताने पामे नहि एवा देवताओ छे. वली परमात्माए जेमने उपशांतमोही कह्याछे, ते पाठ नीचे मुजबः
अणुत्तरोववाइयाणं भंते ! देवा किं उदिण्णमोहा, नवसंतमोहा, खीणमोहा ? गोयमा ! णो उदिण्णमोहा, उपसंतमोहा, णो खीणमोहा. | अर्थ-अनुत्तर विमानवासी हे भगवन् ! देव शुं उत्कट वेदमोहनीय छ, अथवा उपशमाव्या छे वेदमोहनीय जेणे एवाछे,
अथवा खपाव्या छे वेदमोहनीय जेणे एवा छे ? हे गौतम ! उत्कट वेदमोहनीय नहि, अनुकट वेदमोहनीय तेह छे, ते भणी उपशांतमोहनीय छे, एहने परिचारणाना (मैथुन) अभावथकी, परं सर्वथा उपशांतमोह तेमने न कहीये, केमके उपशमश्रेणी
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सुर
दीपिका ॥१९॥
तेमने नथी ते माटे. क्षपकश्रेणीना अभावयी क्षीणमोह नयी. आ पाठ श्री भगवती जीना ५ शतकना चोथा उद्देशीने विषे छे. वर्तमान चोथे सुर ढुंत, अगियारमें जावत विहत ॥ जीव गण इह बे स्यो जेद, श्रमण श्रावकथी अधिक वेद ॥ ३२ ॥
सम्यकदृष्टि सर्व देवो चोथा गुणस्थाने वर्ते छे, अने अनुत्तर विमानवासी अनुस्कटवेदी उपशांतमोहवाला होवाथी अगीआरमा गुणस्थानना जेवा भावमां वर्ते छे. जीवस्थानमां तो कांइ भेद नथी, छतां केम भेद ? तो के अनुत्कटवेदी एटले उपशांतमोही आश्रिभेद छे, अने ए अनुत्तर विमानवासी देवो अल्प विकारी होवाथी एटले एमने अवेदी का | छे, अने अनंत सुखी का छे. "अप्प वियारा अनंत सुहा" एम संघेणीमां कीधेलुं छे. साधु श्रावकथी अधिक अवेदी छे. आवा उत्तम देवोने हीलवा ते महा मोहनीयकर्म उपार्जन करवानुं छे. ते जीव पाप पोताना माथा उपर लइ ले छे. कूम वचन नहु आणे हृदे, शत्र सुरेसर साधुं वदे ॥ श्रावक स्थूल मृषा टालता, श्रावकथी देवे अधिकता ॥ ३३ ॥
॥ श्रीभगवतीजीना शोलमा शतकना त्रिजा उद्देशामां कह्युं बे. ॥ सक्केणंभंते! देविंदे देवराया कि सम्मावादी, मिच्छावादी ! गोयमा ! सम्मावादी, णो मिच्छावादी। सके भंते! देविंदे
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॥ १९ ॥
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देवराया, किं सच्चं भासंभासइ, मोसं भासंभासइ,सच्चा मोसं भासंभासइ, असच्चा मोसं भासंभासइ? गोयमा! सच्चंपि भासं भासइ, जाव असच्चामोसपि भासं भासइ॥
अर्थ-हे भगवन् ! शक्रदेवेन्द्र देवराजा सम्यवादी के मिथ्यावादी ? हे गौतम! सम्यवादी. मिथ्यावादी नहिज. हे भगवन् ! शक्रदेवेंद्र देवराजा शुं साची भाषाने बोले छे के मृषाभाषाने बोले छे के सत्यापाभाषाने बोले छे के असल्यामृषाभाषाने बोले छे ? हे गौतम ! साची भाषा पण बोले छे, यावत् असत्यामृषाभाषा बोले. एवा इंद्रमहाराज साचुं बोलवावाला, अने कूड वचन हृदयने विषे पण नहीं आणवावाला, स्थूलमृपावादने टाल गहार जे श्रावक तेथी पण अधिक गुणवाला, एवा देवोने “बाल" आदि विशेषणो केम कहेवाय ? नज कहे वाय..
ऊघामे मुखे हुवे सावध, ढांके मुखे नाखे निरवद्य ॥ सुरपति सुन्नमति हियमे धरे, नाषासपिति कम विनिचरे ॥ ३४॥ ..सक्केणं भंते ! देविंदे देवराया कि सावज भासंभासइ, अणवज भासंभासइ ? गोयमा ! सावजपि भासंभासइ,
भासंभासइ. जाव सेकेणठेणं भंते ! एवं वुच्चइ-सावजपि जाव अणवीप भासंभाप्तइ ? गोयमा ! जाहेणं सक्केदेविंदेदे
गया मुहुमकायं अणिजुहित्ताणं भासंभासइ, ताहेणं सक्केदेविंद देवराया सावज भासंभासइ, जाहेणं सक्केदेविंदे देवराया मुहुम
॥ "कायं णिज्जूहिताणं भासंभासइ, ताहेणं सकेदेविंदे देवराया अणवजं भासंभासइ, सेतेणठेगं जाव भासइ ।
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दीपिका
॥१९॥
भगवन ! शक्रदेवेन्द्र देवराजा शुं सावय भाषाने बोले छे, अनवद्य भाषाने बोले छे ? हे गौतम! सावय भाषाने अने अनत्रय भाषाने पण बोले छे. श्या अर्थे हे भगवन् ! आप आम कहो छो के सावय भाषाने पण बोलेछे जय भाषाने पण बोले छे ? हे गौतम! जेवारे शक्रदेवेंद्र देवराजा हस्त वखादिके करीने मुख अनाच्छादन करी बोले छे ते वारे शक्रदेवेंद्र देवराजा सावध भाषाने बोले छे, तथा ज्यारे शक्रदेवेन्द्र देवराजा हस्त तथा वस्त्रादि मुखे वक्दंइ बोले (मुख ढांकी बोले), तिकारे शक्रदेवेंद्र देवराजा जीव संरक्षण करतो यको अनवद्य निरवय भाषा बोले. हे भगवन ! देवेंद्र देवराजा थं भवसिद्धिक, अभवसिद्धिक, सम्यक्दृष्टि के मिथ्यादृष्टि ? हे गौतम! भवसिद्धिक अने सम्यक्दृष्टि छे, आवा सम्यकदृष्टि देवने " बाल " आदि विशेषणोथी उच्चारण न कराय.
मने नयी ते वर्तमान
...
महाशुक्र सुरलोक निवास, दोय सुर यावी जिनवर पास || मनस्युं विनय करी पूढंत, साधु सदूने हित वंबंत ॥ ३५ ॥ प्रभु तुम विजयवंत विहता, जप तप संयम खप विचरता | सुगुण साधु केता सीकस्यें, जवसायर पारे पहुंचस्यें ॥ ३६ ॥ वलतो जिनवर उत्तर कहे, मनस्युं ते सुर निरतो लदे ॥ गौतम मन श्राव्यो संदेह, नाणें इम अधिका बे ते ॥ ३७ ॥ संयम पाली सातसें साध, जास्ये मुक्ति थs निबाध ॥ श्म कदि निर्मळ मन परिणाम, नमि गोयम पहुंता ति
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| गम ॥ ३० ॥ बाल बुद्धिने ए खप किसी, को जा नावे गति तिसी ॥ पंमित बाल न दुवे सा| रिखा, जाण करे जाणी पारिखा ॥३॥
॥श्रीनगवतीजीना पंचम शतकना चोथा उद्देशामां कडं ॥ . जेणेव भगवं गोयमे तेणेव उवागच्छंति २ जावणमंसित्ता एवंवयासी एवंखलु भंते ? अम्हे महामुक्काओ कप्पागो महासग्गाओ विमाणाओ दोदेवा महिढीया जाव पाउब्भूया, तएणं अम्हे समणं भगवं महावीरं बंदामो णमंसामो मणसाचेव इमाई एयारूवाइं वागरणाई पुच्छामो. कइणं भंते ! देवाणुप्पियाणं अंतेवासिसयाइं सिज्झिहिंति जाव अंतकरहिंति ? तएणं समणे भगवं महावीरे सम्हहिं मणसा पुढे अम्हं मणसाचेव इमं एयास्वं वागरणं वागरेइ, एवंखलु देवाणुपिया! मम सत्त अंतेवासि सयाई जाव अंतंकरहिति. तएणं अम्हे समणेणं भगवया महावीरेणं मणसापुढेणं मणसाचेव इमं एयारूवं वागरणं वागरिया समामा समणं भगवं महावीरं वंदामो नमंसामो जाव पज्जुवासामोत्तिकटु भगवंगोयमंवदइ णमंसइ जामेवदिसं पाउन्भुया तामेव दिसि पडिगया.
अर्थः-जिहां भगवंत गौतम छे तिहां आवे, आवीने यावत् नमस्कार करे, करीने एम कहे. इम निश्चे हे भगवन् ! अम्हे महा शुक्रनामा सातमा देवलोकथकी, महास्वर्गनामा विमानयकी, दाय देव महर्दिक आव्या, त्यार पछी अम्हे श्रमगभगवंत श्रीमहावीरस्वामी प्रते बांधा, नमस्कार कीधां, मनेज करी निश्चे आवो प्रश्न पुछयो के हे भगवंत केटला देवानुपियना अंतेवासी
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दीपिका
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(शिष्य) ना सैकडा सीज्जस्ये, यावत् सर्व कर्मनो अंत करस्ये ? तेवारे श्रमणभगवंत महावीरदेवनें अम्हे मने करी पूछयां थकां अम्हपते मनेज करी निश्चयें एहवें में प्रश्ननो उत्तर दीधो. एम निश्चे अहो देवानुपिय ! माहरा सातसें शिष्य सीज्जस्य, | यावत् सर्व दुःखनो अंत करस्य. तिवारे अम्हे श्रमणभगवंत श्रीमहावीरदेवने मने करी पूच्या थकां मनेज करीने एहवेरूपे प्रश्ननो उत्तर दीधां थकां श्रमणभगवंत श्री महावीरस्वामी प्रत्ये वांदियें, नमस्कार करीए, पर्युपासना करीयें, इम कर्या पछी भगवन् गौतम प्रते महाशुक्रकल्पवाळा देवो वांदे, नमस्कार करे, वांदी नमस्कार करीने जे दिशिना देशथकी प्रगट थया | हता ते दिशिना देश प्रते पाछा गया. हवे वाचकवर्गने विचारवं जोइयें के बालबुद्धिवाला जो देवो होय तो आवी खप एमने | क्याथी होय के आपना साधु मोक्ष केटला जासे ? एवी इच्छा करी भगवान् पासे आवी विनयपूर्वक प्रश्न पूछी उत्तर सांभली
खुशी थQ, अने गणधरदेव साथे संभाषण कर. आवा संभाषण करवानी मिथ्यादृष्टिने भावना क्याथी होय ! अपितु नज | होय. मिथ्यादृष्टिने तो गमे तेवी गतिमां जाओ तेमा एमने शृं, ए तो कदी पूछेज नहि. माटे बाल, अने पंडित ए बे सरखा | | न दुवे. जाण पुरुष छे ते जाणीने परीक्षा करे छे, पण देवीने आल देता नथी. ___ जिनवर नक्तं राग सुरधणी, दंत दाढ सकथा जिनतणी ॥ वंदे पूजे नक्ति घणी, पाळे शील तिहां गुण गणी ॥४०॥ ए व्रत चोएं विणु उच्चार, पाळे निर्मल वारंवार ॥ घणा काल लगे राखे नाउ, साधु श्रावकनो पहोंचे थाउ ॥४१॥
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॥ श्री जगवती सूत्रना दशमा शतकना पांचमा उद्देशाने विष कधु ॥
पभूणंभंते ! चमरे असुरिंदे असुरकुमारराया चमरचंचारायहाणीए सभाए सुहम्माए चमरंसि सिंहासणंसि तुडिएणं सद्धिदिव्वाई भोगभोगाई भुंजमाणेविहरित्तए ? णो इण समठे. सेकेणणं भंते ! एवंवुच्चइ णो पभू चपरे अमुरिंदे असुरराया चमरचंचाए रायहाणीए जावविहरितए ? अज्जो ! चमरस्सणं असुरिंदस्स असुरकुमाररणो चमरचंचाए रायहाणीए सभाए मुहम्माए माणवए चेइए खंभेवइरामएमु गोलबट्ट समुग्गएमु बहूओजिसकहाओ सण्णिख्खित्ताओ चिट्ठति, जाओणं चपरस्स असुरिंदस्स असुरकुमाररण्णो अण्णेसिंचबहूणं असुरकुमाराणं देवाणय देवीणय अच्चणिज्जाओ वंदणिज्जाओ णमंसणिज्जाओ पूयणिज्जाओ सकारणिज्जाओ सम्माणणिज्जाओ कल्लाणं मंगलं देवयं चेइभं पज्जुवासणिज्जाओ भवंति, तेसिंपरिहाणे णो पभू सेतेणठेणं अज्जो ! एवंवुच्चइ णो पभू चमरे अमुरिंदे असुरराया चमरचंचाए रायहाणीए विहरित्तए ।।
अर्थ:-हे भगवन् ! चमर असुरेंद्र असुरकुमारराजा चमरचंचानाम राजधानीने विषे, सुधर्म सभाने विषे, चपर सिंहासनने विषे त्रुटिकवर्ग संघाते देव संबंधी भोगववा योग्य भोगमते भोगवतो थको विचरे ? नही. ते शा माटे हे भगवन् ! नही समर्थ चमर असुरेन्द्र असुरराजा चमरचंचा राजधानीने विषे यावत् विचरवाने ? हे आर्य ! चमर असुरेन्द्रनी राज| धानी चमरचंचा सुधर्मसभा तेने विषे माणवक नामना चैत्यना स्थंभमां बज्रमय गोल आकारवाला डाबलाने विष घणा | जिनना अस्थि, हाड, दाढा प्रमुख घाली राखेला रहे छे, ते चमर असुरेन्द्र अमुरकुमार राजाने पूजवा योग्य छे अनेरा पण
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दीपिका
॥ २२॥
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घणा असुरकुमार देवता देवीओने पूजवा योग्य छे, स्तुति करी वांदवा योग्य छे, प्रणाम विशेषे करी नमस्करणीय छ, फूलेंकरी पूजवा योग्य छे, वस्त्रादिके करी सत्कार करवा योग्य छ, विशेषे करी सन्मान करवा योग्य छे, कल्याण मंगलीक दैवत चैत्य इत्यादि बुद्धिकरी पर्युपासना करवा योग्य होय छे, तेनी समीपमा मनाहि वंद्य पूज्य जाणीने हे आर्य ते भोग करवाने समर्थ थता नथी, ते माटे हे आर्य इम कहीये छैये के ते समर्थ नथी, चमर असुरेन्द्र असुरराजा. चमरचंचाराजधानीने विपे, सुधर्म सभाने विषे, चमरसिंहासणने विषे, चउसठ सामानिक सहस्रदेव संघाते, त्रायत्रिंशक इत्यादि. जाव बीजा पण घणा असुरकुमार संबंधि देव संघाते, देवी संघाते, परिवयों मैथुन (भोग)करे नही, केवल स्त्रीयोनां शब्दनुं श्रवण अने रुपने देखता विचरे. " आवा विनय धर्मने पालण करनार देवने बाल केम कहेवाय ?" नज कहेवाय. आवी रीते शीलने पालन करी चोथु व्रत उचारण कर्या विना वारंवार निर्मलपणे पाले छे, साधु श्रावकनो भाव पोते, निमल वारंवार घणा काललगी राखे छे, अने तेवाज निर्मल विचारोथी पोतानुं आयुष पूरण करे छे, आवा उत्तम आशयवाला देवोने "मूर्ख' कहेवा तेतो कलंक देवा जेतुं छे, माटे समिति पूर्वक बोलवानो खप करवो, अने देवोने "मूर्ख" एवं कलंक न देवु.
इंश करी परियरण विमान, नेमि पनि रूव सुरत गुण गन ॥ सेवत टाळे आसातना, थाये |म जिन मत जावना ॥ ४२ ॥
अर्थ:-इंद्र परियरण माटे विमान करी नेमिना दृष्टांत समान ए जे सुरतगुणस्थान ते प्रति सेवताथका इंदमहारान
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आसतना टाळेछे, ते आसातना टाळवामां जिनमतनी भावना सिवाय बीजुं कारण छेज नहि. आ उपरथी सम्यकदृष्टि अने मिध्यादृष्टिनी श्रद्धा अने वर्त्तणुक्रमां भेद करावनार कोणछे, ते बुद्धिवाळाए विचार करवा.
जाणे जीवाजीव विचार, समकितधारीनो याचार ॥ विष्णु पञ्चखाण सचित्त परिहार, करिय करे सुरवर आदार ॥ ४३ ॥
वली इंद्रमहाराज जीव अजीवादि पदार्थनो विचार पण जाणे छे. अने जे जीव अजीवादि पदार्थने जाणे सद्दहे ते समतिधारी कवाय छे. वली पञ्चखखाण विना सचित्रानो परिहार करी सुरवर आहार करे छे, पण सचित्तनो आहार करता नथी. हवा इंद्रमहाराजने बाल केम कहेवाय.
एकण अवसर सोहम इंद, अवग्रह पू िथयो सानंद ॥ साधु सहुने अवग्रह दिये, बाळपएं तसु किम बोलिये ॥ ४४ ॥
॥ श्री जगवतीजीना १६ मा शतकना बीजा उद्देशाने विषे नीचे मुजब कह्युं छे. ॥
कइ विणं भंते ! उग्गहे पद्मत्ते ? सक्का ! पंचविहे पनते, तंजहाः - देविंदोग्गहे १, रायावग्गहे २, गहवइउग्गहे ३, सामारिउग्गहे ४, साहम्मिय उग्गहे ५, जेइमे भंते ! अज्जताए समणाणिग्गंथाविहरति एएसिणं अहं उग्गहं अणुजाणामीतिकट्टुमणं भग
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दीपिका
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॥ २३॥
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पहावीरंवंदइणमंसइ ॥अर्थः। एक वखत शक्रदेवेंद्र देवराजा श्रमण भगवंत श्री महावीरस्वामीने समीपे धर्मपते सांभलीने हृदय धरीने हर्ष संतोष पामी श्रमणभगवन्त श्री महावीरस्वामी प्रते वांदे, नमस्कार करे, वांदी नमस्कार करीने इम बोले. केटले
ISR.दी. भेदे हे भगवन् ! अवग्रह कह्यो ? उत्तर. हे शक्र! पंचप्रकारे अवग्रह कयो. देवेंद्र अवग्रह १, राजा ते चक्रवर्ति तेहनो अवग्रह पखंड भरताविक्षेत्र २, गृहपति कहिये मंडलीकराजा तेहनो अवग्रह ते गृहपति अवग्रह ३, सागारि कहेता गृहस्थ तेनो अव-| ग्रह ४, साधर्मिक ते साधुनो अवग्रह ५, आवी रीते सांभली इंद्रमहाराज कहे छे, जे हे भगवन् ! वर्तमानकालमा जे श्रमण निग्रंथ विचरे छे तेने हुं अवग्रह आपुछु. आम कही वंदन नमस्कार करी इंद्रमहाराज स्वर्गमां गया. आथी ध्यानमा लेवानु
जे मुनिओने वस्तिदान देवावाला देवने “बाल" केम कहेवाय, नज कहेवाय. __साहु साहुणी श्रावक श्राविका, श्रीजिनसासन सुप्रनाविका ॥ हित सुख पथ्य तासु चिंतवे, | सुरपति गुरुथानक श्म हुवे ॥ ४५॥
॥श्री जगवतीजीना ३ शतकना पहेला उद्देशामां कडं .॥ सणंकुमारेणं भंते ! देविंदे देवराया किं भवसिद्धिए अभवसिद्धिए सम्मदिछी मिच्छदिही परित्तसंसारिए अणंत संसारीप सुलहबोहीए दुल्लहबोहीए आराहए चरिमे अचरिमे ? गोयमा ! सणंकुमारणं देविंदे देवराया भवसिद्धिए णो अभवसिद्धिए,
॥२३॥ एवं सम्ममिच्छ परितअणंत मु. आ० च० पसत्यनेयव्वं. सेकेणडे गंभंते ? गोयमा ! सणंकुमारे देविंदेदेवराया बहूर्णसमणाणं
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बहुणंसमणीणं बहुणंसावयाणं बहुणंसावियाणं हियकामए मुहकामए पत्थकामए आणुकंपिए निस्सेयसिए हियमुहनिस्सेसकामए सेतेणठेणं गोयमा ! सणंकुमारणं भवसिद्धिए जाव णो अचरिमे.
अर्थ:-श्री गौतम पूछे छे. (सणंकुमारेणंभंते देविदेदेवराया) सनत्कुमार हे भगवन् देवेंद्रदेवराजा (किंभवसिद्धिए) शुं भवसिद्धिक भव्य छे, (अभवसिद्धिए) अभवसिद्धिक अभव्य छे. ( सम्मदिही) सम्यक्दृष्टि (मिच्छादिही) मिथ्यादृष्टि छे, (परित्त संसारिक) तुच्छ संसारी छे, (अणंत संसारिय) अनन्त संसारी छे ( सुलभबोहिए ) सुलभबोधि छे, (दुल्लहबोहिए ) दुर्लभवोधि छे. (आराहए विराहए चरिमे अचरिमे ) आराधक छे झानादिकनो के विराधक छे, छेल्लोज छे भव जेइनो अणपाम्यो रह्यो छे अथवा अचरिम छे ? इति प्रश्न, उत्तर. (गोयमा सर्णकुमारेणं देविदे देवराया भवसिद्धिए ) हे गौतम! सनत्कुमार देवेंद्र देवराजा भव्य छे (णो अभवसिद्धिए) अभव सिद्धिक नथी ( एवं सम्मदिछि परित्त संसारी) इम सम्यक् दृष्टि छ, मिथ्यादृष्टि नथी. तुच्छ संसारी छे, अनन्त संसारी नहीं (सुलभ बोहिए आराहए ) मुलभवोधी छे, दुर्लभबोधी नहीं, आराधक छे, विराधक नहीं (चरिमेपसत्यंणेतव्वं) चरिम छे, अचरिम नहीं, प्रशस्त भला कहेवा, अप्रशस्त छोडवा (सेकेणणंभंते एवंवुच्चइ) ते स्ये प्रयोजने हे भगवन् ! एम कडं ? इति प्रश्न उत्तर. (गोयमा सणंकुमारे देविंदे देवराया) हे गौतम, सनत्कुमार देवेंद्र देवराजा (बहूणंसमणाणं बहूणं समणीणं ) घणा श्रमण तपस्वी साधुनो, घणी श्रमणी साध्वीनो (बहणंसावयाणं बहूणं सावियाणं) घणां श्रावकनो घणी श्राविकानो (हियकामए मुहकामए पत्थकामए) हितमुख, निबन्धन वस्तु तेहनो बांछक ( पत्थकामए आणुकंपिए) पथ्य (दुःख त्राण) तेहनो वांछक कृपायेंकरी सहित (निस्सेयसिए)निःश्रेयस
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सुर
दीपिका
॥ २४ ॥
(मोक्ष) ते विषे जाणे (हियमुह णिस्सेसकामए सेतेणद्वेणं गोयमा सणकुमारे देविंदे भवसिद्धिए) हित जे सुख (अदुखनो बन्ध) इत्यर्थ ते निःशेष समस्त तेहने कामयते वांछे जे जाणे समस्त दुःख रहित याओ मुक्तिजाओ इत्यर्थः तेणें प्रयोजने (जंबाक्यालंकारे) हे गौतम, सनत्कुमार देवेंद्र भवसिद्धिक भव्य छे ( जाव णो अचरिमे ) यावत् चरिम छे पण अचरिम नही. आवा सुरपति शुभमतिवाला श्री जैनशासनना प्रभावक साधु साध्वी श्रावक श्राविकाओने हित सुख पथ्यकल्याण याओ. गुरुनी माफक आवी रीते चिंतन करवावाला देवेंद्रने अवर्णवादे करी कदि पण निंदवा नाहि.
जप तप संयम गुण जंकार, उत्तम क्षमावंत अणगार ॥ मिथ्यादृष्टि देखी अवगणे, न नमे धर्मकथा नदु सु ॥४६॥ सम्यदृष्टी सुरवर जोय, मुनिवर जाणी पंजली होय || जाण विमाण थकी उतरी, वंदे त्रण प्रदक्षणा करी ॥ ४७ ॥
॥ श्री जगवतीजीना १४ मा शतकना ३ जा उद्देशाना विषे कर्तुं बे. ॥
देवेभंते महाकाए महासरीरे अणगारस्स भावियप्पणो मझं मझेणं वीइवएज्जा ? गोयमा ! अत्थेगइया वीइवएज्जा अत्थेगइया को बीएज्जा, सेकेणद्वेणंभंते ! एवंयुचर, अत्थेमइया वीइवएज्जा अत्थेगइया णो वीइवएज्जा ? गोयमा ! देवा दुविहा पण्णत्ता, तंजहा मायमिच्छदिट्टी उववण्णगाय, अमायी सम्मदिठ्ठी उववण्णगाय, तत्थणं जेसे मायी मिच्छदिठ्ठी उवव
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॥॥ २४ ॥
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ore देवे, सेणं अणगारं भावियप्पाणं पास, पासइत्ता जो बंदर णो णमंसइ णो सकारेइ णो सम्माणेइ णो कल्लागं मंगलं देववं जाव पज्जुवासेइ, सेणं अणगारस्स भावियप्पणी मज्जंमज्जेणं वरित्र एज्जा, तत्थणं जेसे अपायी सम्महिठ्ठीत्रवण्णए देने, सेणं अणगारं भावयप्पाणं पासंद, पासइत्ता बंदर णमंसइ जात्र पज्जुवासइ, सेणं अणगारस्त भावियप्पणो मज्जं पज्जेणं णो वीइवएज्जा सेते द्वेणं गोयमा ! एवं बुच्चर जाव णो वीइवएज्जा, असुरकुमारेंणं भंते! महाकाए महासरीरे एवं चेत्र, एवं देवदंडओ भाणियन्त्र जाव वैमानिए.
अर्थः- ( देवेणभंते महाकाए महासरीरे अणगारस्स भावियप्पणो मज्जंमज्जेणं वीइव एज्जा ?) देव हे भगवन् ! मोटो अथवा घणी निकाय परिवार छे जेहने ते, तथा मोटो शरीरछे जेहनो तेह साधुने भावितात्माने मध्ये मध्यभागे थइ व्यतित्रजे जाय ? ३०प्र० उत्तर(गोमा ! अयेगइया वीइवएज्जा अत्थेगइया णो वीयीवएज्जा) हे गौतम! केटलाएक जाय, केटलाएक न जाय. (सेकेणद्वेगं भंते एवं बुच्चइ) ते स्येअर्थे हे भगवन् ! इम कहिये (अत्थे गइया वीयीवएज्जा अत्थेगइया णो वीथी व एज्जा) केटला एक व्यतित्रजे जाय, केटलाएक न जाय इ० प्र० उत्तर- ( गोयमा ! देवादुविहे पं० मायामिच्छादिठ्ठी उववण्णगाय अमायीसम्मदिठ्ठी उबवण्णगाय ) हे गौतम! देव वे प्रकारना कहा. मायी मिध्यादृष्टि उपपन्नका, अमायी सम्यकदृष्टि उपपन्नका (तत्थणं जेसे मायी मिच्छदिट्ठी उववण्णए देवे ) तिहां जे मायी मिध्यादृष्टी उपपन्नकदेव ( सेणं अणगारं भावियप्पाणं पास पासइत्ता णो वंदइ णो णमंसइ णो सकारे णो सम्माणेयी ) तेह साधु भावितात्मामते देखे, देखीने वांदे नहीं, नमस्कार करे नहीं, सत्कार न करे, सन्मान न करे (जो बलाणं मंगलं देवर्यं जाव पज्जुवासेइ ) नहीं कल्याण मंगलीक देवत यावत् पर्युपासना सेवा न करे ( से गं
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सुर दीपिका
॥ २५ ॥
अणगारस्त भावियप्पणो मज्जमज्जेणं वीर्याविएज्जा ) तेह अणगारने भावितात्माने मध्ये मध्यभागे व्यतिव्रजे जाय ( तत्थर्ण जेसे अमायी सम्मीि उबवण्णए देवे ) तिहां जे अमायी सम्यकदृष्टि उपपन्नकदेव ( सेणं अणगारं भावियप्पाणं पासइ पासइत्ता बंदर णमंसइ जाव पज्जुवासइ) तेद अणगार भावितात्मा प्रते देखे देखीने वांदे, नमस्कार करे, यावत् पर्युपासना सेवा करे (सेणं अणगारस्स भावियप्पणो मज्जं पज्जेणं णो वीर्यावएज्जा) तेह अणगारने भावितात्माने मध्ये मध्येकरी व्यतिव्रजे नहीं. (सेतेणंदेणं गोयमा ! एवं बुच्चइ जाव णो वीयीवरज्जा) ते तेणे अर्थे हे गौतम! इम कहिए यावत् व्यतित्रजे नहीं, जाय नहीं ( असुरकुमारेण भंते! महाकाए महासरीरे एवं चैत्र) असुरकुमार हे भगवन् ! महाकाय परिवारवन्त, मोटा शरीरवन्त इत्यादि इमहीज ( एवं देवदंडओ भाणियन्त्रो जाव वैमाणिए) इम देवदंडक कहेवो, नारकपृथिवीने ए कार्यनो असम्भव छे ते माटे न कहेवा, यावत् वैमानिकताई करेवा. जप तप संयमने सेवन करनार अने गुगना भंडार उत्तम क्षमावान् एवा अणगार तेने देखी मिथ्यादृष्टि अवगणना करे, नमस्कार न करे, तेमनी कहेली धर्मकथा ते मिथ्यातीन सांभले, एवा मिथ्यातीदेवो होय छे. अने सम्यकदृष्टिदेव, देवेंद्र उत्तम गुणना भंडार अने जप तप संयमने सेवन करनार मुनिओने जाणी अथवा तेत्रा मुनिओने देखी अने तेज बखते अंजली करे छे, अने पछी पोतानो यान जे विमान तेथकी उतरी अने ऋण प्रदक्षणा करी मुनीओने वंदना करे छे. एवा सम्यक्त्वधारीदेवोने मिध्यात्वीनी साथै सरखामणी करवी ते भूलभरेल छे. तेवी सरखामणी कदी थायज नहीं.
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घणा नाव श्म पंचम अंग, अन्ननथि सुर सत्तम अंग॥ वांके समे कहणे अांतरो, जुवा खल गुल इक कां करो ॥४॥
आवी रीतना सम्यक्दृष्टिदेवोना घणा जुदा जुदा भाव भगवतीसूत्रमा कह्या छे, अने अन्य जे मिथ्यादृष्टि देवो तेना भाव उपासकदशांगसूत्रमा कह्या छे. माटे वक्रताथी बोलवू अने शरलतायी बोलवू तेमां घणो आंतरो छे, तेम खोल अने गोल कोइ वर्णानुपाशथी सरखामणी करी साचुं माने तो ते साचुं होय ? नन होय. तेम एक देवना नामथी सम्पदृष्टि अने मिथ्यादृष्टि बने सरखा गणे तेनी सत्य परुपणा गणाय ? नज गणाय ॥४८॥
मिथ्यादृष्टी समकित धार, अंतर जाणी करो विचार ॥ सम्यकदृष्टी पंमित नणो, मिथ्यादृष्टि बाल श्म गणो ॥४॥
माटे मिथ्यादृष्टि देव बालना भंगमा छ, अने सम्यक्दृष्टिदेव पंडितभंगमां देवाधिदेवे कह्या छे. माटे हे भवभीरु पुरुषो | उत्सूत्रना फळ कटुक जाणी जे विचार करशे ते सम्यक्वादी; अने नहि विचार करे ते मिथ्यावादी ।। ४९ ॥
जिण अरिहंत अने केवली, उहिनाण नाखे ते वली॥ गणंगे इण गुणि देवता, अवगुण नाखी खासे खता ॥५०॥
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दीपिका
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वली तेनी व्याख्या तमो पण ठाणांगसूचना त्रीजा ठाणामां जुओछो, वांचोछो, परुपोछो, छतां जो नहि मानो तो खता खाशो. कारण जे अछती परुपणा करे ते समान पाप बीजुं कोइ नथी ॥ ५० ॥
तओजिणा पण्णत्ता तंजहा ओहिनाणजिणे मणपज्जवनाणजिणे केवलनाणजिणे तोकेवली पण्णत्ता तंजहा ओहिनाण | केवलीमणपज्जवनागकेवली केवलनाणकेवली तओअरहापन्नत्ता तंजहा ओहिनाणअरहा,मणपजवनाणअरहा, केवलनाणअरहा,
आधी एम न समजवू के नारकीमा तथा तिर्यंचमांपण अवधिज्ञान तो होय माटे थयुं शृं? मुनिराज काल करी | नरकतिर्यंचमां जता नथी, मात्र देवतामांज जायछे. माटे आ पाठ बहुज बारिकीथी विचारजो.
. पूरव नव तप संयम कर्या, सुरवरने नव जे अवतर्या ॥ तसु अवर्ण बोले गहगही, बोधि|| उर्लन करे ते सही ॥५१॥
॥श्री गणांग सूत्रना पांचमा गणा मध्ये कहूं बे के ॥ . पंचहिठाणहिं, जीवादुल्लभवोहि यत्ताए कम्मंपकरेंति तंजहा, अरहंताणमवनवदमाणे, अरहंताणपण्णत्तस्स धम्मस्सवन्नवदमाणे, आयरिय ऊवझयाणमवनवदमाणे, चाऊवनसंघस्सअवलंबदमाणे, विविकतबंभचेराणं देवाणंभवनबदमाणे.
-अर्थ-पांच थानके जीव दुर्लभबोधिपणानो कर्म बांधे, जीनधर्मनी प्राप्ति दोहिली होय ते कहेछ ॥१॥ अरिहंतना
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अवर्णवाद बोलतो, जेमके-अरिहंत यया तो समोसरणमा शुं बेसवू, अरिहंतना परुपेल जे श्रुतधर्म द्वादशांगी कहेवाय छे, ते पाकृत भाषामां रचायेलुं छे, तेथी कोइ निपुण समर्थ विद्वानोनो ए लेख गणाय नहि; जो परिपूर्ण विद्वान होय तो संस्कृतमा केम लखे नहि ? एहवी रीते अवर्णवाद बोलतो ॥२॥ तथा अरितना कहेल चारित्रधर्म तेनो अवर्णवाद बोलतो जेमके:-चारित्र ते शा कामनु, दान देवू तेज भलु छे, कारण के गृहस्थाश्रम विना दान दइ शकातुं नथी, तेथी गृहस्थमा रहेq तेज सारुं छे, इत्यादिक अवर्णवाद बोलतो ॥३॥ तथा आचार्य, उपाध्याय ए बालक छे, बुट्टा छे, इत्यादिक अवर्ण वाद बोलतो ॥ ४॥ चतुर्विधसंघनो अवर्णवाद बोलतो, जेमके:-ए संघ शेनो ? पशुनो समुदाय ए सरखो छे, इत्यादि अवर्णवाद बोलतो ॥ ५॥ विपक एटले प्रकर्षने पामेला जे तप अने ब्रह्मचर्य भवान्तरने विषे जेभोना, ते हेतुवाला देवायुष्कादि कर्मछे जेओना, एवा देवताओना अवणर्वाद बोलतो, जेमके:-देवो छेज नहि, देवता होय तो क्यारेक तो देखाय, माटे देवताओ छेज नहि. अथवा कामथी छाकटा बनी गयेला अथवा मरेला मडदा जेम उघाडी आंखोवाला अने शासननी खबर नहि लेवावाला; एवी रीते देवताना अवर्णवाद बोलतो-परिपूर्ण पाछला भवना तप, ब्रह्मचर्य पाल्याथी देवतापणुं पाम्या ते देवताना अवर्णवाद बोलतोधको जीव दुर्लभबोधिपणाने उपार्जन करे, तेथी जीवने जैनधर्म श्रद्धापूर्वक उदय आवq मुश्कल थई जाय छे ॥५१॥
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साचा सूत्र अर्थ पन्नवे, नूलो गुरु वली मारग वे॥ श्म गुरुथी सुर ऊरण होय, तसुजां-18 दी. मलि कहिले जग कोय ॥ ५॥
साचा एवां जे सूत्र अने तेनो अर्थ तेने पन्नो जगावे छे. वली भूला पडेला गुरुमहाराजने मार्गे चढावे, एवी रीवे गुरुना उपकारनो बदलो वाळी शके. आवी रीते उपकार करनार देवोने सामान्य पंक्तिमा केम गणाय, नज गणाय, मतलब के सम्यक् दृष्टिदेव अने मिथ्याष्टिदेवमा महान् अंतर छे.
.. ॥श्री गणांग सूत्रना ३ जा गणामां कह्यु के ॥
केइ तहारूवस्स समणस्सवा माहणस्सवा अंतियमेगमवि आरियंधम्मं सोचा निसम्म कालमासे कालीकच्चा अन्नयरेसुदेवलोएमु देवत्ताए उववन्ने तएणं सेदेवे तंधम्मायरियं दुभिरूखाओ वा देसाभो सुभिख्खदेस साहरेजा कंता. राओ वा णिक्वंतारंकरेजा दीहकालिएणं वा रोप्राप्केण अभिभूयं विमोइज्जा तेणावि तस्सधम्मायरियस्स दुप्पडियारं भवइ अहेणसे तंधम्मायरियं केवलीपण्णत्तामोधम्माओ भलुसमाणं भुजोवि केवलिपण्णत्तेषम्मे आयवइत्ता जाव हावइत्ता भवइ तेणामेवतस्सधम्मायरियस्स सुप्पडियारं भवइ.
॥२७॥ १ गुरुथो देव रणरहीत याय, २ सरखो.
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अर्थ:- कोइक पुरुष तथारूप भ्रमणसाधुमाहणने पासे एक आर्य (निष्पाप ) धर्मनां शुभ वचनप्रति सांभळीने - सम्यक् प्रकारे धर्म करी आउखं पूर्ण करी ( काल करीने ) अन्यतर कोइएक देवलोकने विषे देवतापणे उपजे, तिवारे | ते देवता ते धर्माचार्यने दुर्भिक्ष दोहली भिक्षा छे जिहां जे देशमां एटले दुकालपांथी सुभिक्ष जिहां सुकाल होय ते देशमां आणी मूके, अथवा अटवीमां पडया होय तिहांथी वस्तिमां आणी मूके, अथवा घणा कालनो रोग होय, रोगनी पीडाथी पराभव्यो होय, ते रोगथी मूकावे, देवशक्तिथी एटले प्रकारे पण ते धर्माचार्यने धर्मना आपनारने दुःप्रतिकार ओसिंगल न थाय; तो किम धाय ते कहे छे, जो ते धर्माचार्य केवलिभाषित धर्मथी पडिया प्रति धर्मथी भ्रष्ट थयो तो ते प्रति फरी केलीभाषित धर्म ते आगल कही समजावी पाछो धर्ममां थापे. आषाढाचार्य ने जेम चेले वाल्यो. देवता थने ते प्रकारे ते धर्माचार्यने ओसिंगल थाय, धर्मथी संसार तरिये अन्यथा बदलो वली शके नहीं.
विषय की विरते सुर सर्वे, थइ यति चिंते पूरव जवें ॥ आयरियादिक सुगुरु सुसाध, जसु पसाय ए में फल लाभ ॥ ५३ ॥ ते जदंत गुरु गणधार, जप तप संयम जग आधार ॥ बंडु विनय करी तेहनो, हुं हुंतो सेवक जेनो ॥ ५४ ॥ इम जाणी सुर श्रावे इहां, ए उत्तम गुण लाने किहां ॥ इम बोल्यो बे श्री ठाणंग, पूढी जाणे सुगुरु सुसंग ॥ ५५ ॥
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मु.दी.
॥२८॥
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विषय विकारयकी सर्व देवो निवृत्ति पामीने अने यति थइने एटले इंद्रिोनो संयम करीने देवलोकने विषे देवो विचार करे के, मारा पूर्वभवने विषे मारा आचार्य भगवानादि सुगुरु मुसाधु-के जेना पसायथी आवी समृद्धि देवपणानी मने मली, तो ते भगवान् महोटा गुणना भंडार अने जपतप संजमना आधार एंटले भाजनका अने मारा परम उपगारी हता, अने हुँ पूर्व भवमा जेहेनो सेवक हतो तेओ साहेबने हुँ विनय करी वंदन करूं. आची मनमा भावना करी अने उप. कारी जाणी इहां मनुष्यलोकने विष जिहां पोताना आचार्यादिक होय तिहां आवे, आवीने भक्तिपूर्वक वंदन नमस्कार करे.
आवो उत्तम विनयगुण मिथ्याष्टिदेवोमा किहांथी मले. एम श्री सूत्रकारे ठाणांगसूत्रमा फरमावेल छे तेनो रहस्य | जाणवानी इच्छा होय तो मुगुरुमहाराजनो सारी रीते संग करी तेमने पूछी अने रहस्य जाणवू. एम ग्रंथकार आचार्य भगवान् सूचन करे छे. .
॥ श्री गणांग सूत्रनां त्रिजा गणा मध्ये कथु बे के॥ - अहुणोववन्ने देवे देवलोगेसु दिन्वेसु कामभोगेसु अमुच्छिए अगिदे अगढिए अणझोववने तस्सणमेवं भवइ अस्थिणं मममाणुस्सए भवे आयरिएइवा उवज्झाएइबा पवत्तेइवा येरेइवा गणीइवा गणहरेइवा गणावच्छेएइवा जेसिं पभावेणं मएइमा एयारूवा दिव्वा देवड्डी दिव्वादेवजुइ दिव्वेदेवाणुभावे लद्धे पत्ते अभिसमण्णागए तंगच्छामिणं तंभगवं चंदामि णमंसामि | सकारेमि सम्मामि कल्लाणमंगलंदेवयंचेइयं पज्जुवासेमि..
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॥२८॥
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व अर्थ:-देवलोकमां नवो उपनो देवता दिव्यकामभोगमा मूर्छित नथी, अनित्य जाणी अगृद्ध गढित नथी, भति आसक्त नथी; तेहन पह, मन होय छे जे माहरे मनुष्यभवना धर्मनां उपदेशक आचार्य, उपाध्याय धर्मना प्रवर्तनार प्रवर्तक, स्थविर गणीगच्छना स्वामी गणधर भगवंतना शिध्य विशेष गणावच्छेद ते गच्छतुं अंश केटलोएक समुदाय लेइ विचरे, जेहना प्रभावथी महारे आ प्रत्यक्ष एहवो रूप देवतानी रिद्वि, दिव्यकांति, दिव्यदेवप्रभाव में सम्यमभावें पाम्यो तेहथी हुँ जाउं ते उपकारी भगवंतने वांदु, नमस्कार करूं, सत्कार आदर देउं, वस्त्रादिक देइ सन्मान दे कल्याण, मंगल, दैवत देवचैय अरिहंतनी प्रतिमाने जिम सेविए तिम सेवू. उचित मतिपत्तिवडे अने वली ते देवताने एहची भावना थाय छे के (एसणं माणुस्सए
भवे णाणीइवा तवस्सीइवा अइदुक्कर दुक्कर कारगे तं गच्छामिणं भगवंतं वंदामि णमंसामि जावपज्जुवासामि) देवताना मनमा || एवं आवे जे एह मनुष्यभवमां मोटा नाणी छे, अथवा तपस्वी छे, अति छेली करणीनो करनार छे, सिंहगुफा सर्पविले
काउसग करे छे, दुःकर ब्रह्मचर्य पाले छे, ते माटे हुं जाउं, ते भगवानने वांद, नमस्कार करुं यावत् सेवा भक्ति करूं; आवी उत्तम भावनावाला देवोने बाल शी रीते कहेवाय ? नज कहेवाय. ____ वलि सुरवर टाळी संताप, नावन नावे करे परिताप ॥ अहह फुलह माणसनव लही, || गुरुयोगे तप संयम ग्रही ॥ ५६ ॥ आलसि गुरु साहम्मी तणो, वेयावच्च न कीधो घणो ॥ श्रा- || |
गम पूरो न सक्यो नणी, चरण तीम नहुँ पाली घणी ॥५७ ॥ ए संयोग.किहां पावस्युं, सुद्ध |
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दीपिका
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ध्यान हियो ध्यावस्यु ॥ परम पदे वासो गवसुं, गर्नवास पुणरवि नाविसुं ॥ ५७॥ .
. बली उत्तम देवो संतापने टाली करी सारी भावना भावे अने मनमा खेद करे के, अहोहो ! दश दृष्टांत दुर्लभ एवो मनुष्यनो भव पामी पूर्वभवमा गुरुमहाराजना योगे तप संयमने में ग्रहणकरी प्रमाद छोड्यो नहि, तप संयम रुडी रीते पाल्या नहीं, अने आलसथी गुरु तथा साधर्मीनो घणो वैयावच्च करवो जोइये ते में कयों नहीं. अने प्रमादना योगो आगम एटले सिद्धांत तेने पण हुं पूरी जाणी शक्यो नहीं. अने वली चारित्रनी मर्यादा पण उत्तम रीते लांबा वखत सुधी रुडीरीते पालण करी शक्यो नहीं. हवे आवो संयोग फरी हुं कीहां पामीश, अने क्यारे शुद्ध ध्यान ह्रदयमा ध्यावीश अने परमपद एटले मोक्षपद तेमां निवास करीश, अने गर्भावासमा फरी पाछो नहीं आवीश. एवी उत्तम भावना देवो भावे छे, | ए हकीकत सूत्रमा कहेली छे ते नीचे मुजब.
॥ श्री गणांग सूत्रना विजा गणा मध्ये कयु के के ॥ तिहिंठाणेहिंदेवेपरितप्पेझा तंजहा अहोणं मए संतेवले संतेवीरिए संतेपुरिसक्कारपरक्कमे खेमंसि मुभिरूखंसि आयरियउपझ्झाएहिं विज्जमाणेहिं फल्लसरीरेणं णो बहुएसुएअहीए ॥१॥ अहोणंमए इहलोग पडिबद्धेणं परलोग परंमुहेणं विसयतिसिएणं णोदीहेसामनपरियाए अणुपालिए ॥ २॥ अहोणंमए इद्विरससायगुरुएणं भोगासंसगिद्धेगं गोविसुद्धचरित्ते फासिए ॥३॥
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. अर्थ:-त्रण थानके देवता पश्चात्ताप करे ते कहे छे. अहो इति खेदे माहरे शरीर संबंधी बल छते, जीवाश्रित वीर्यछते, पुरुषाकार अभिमान तेथी उपनो जे पराक्रम ते छते, क्षेम उपद्रवरहितपणे सुकाल छतें, आचार्य, उपाध्याय भणावनारनी सामग्रीछते, शरीर नीरोगछते, हुं मनुष्यनां भवमा घणुं श्रुत भण्यो नहीं एम पश्चाताप करे. अहो में इहलोक विषयादिकनें प्रतिबंधे अतृप्तपणे परलोकथी पराङमुख उपरांठे थके विषयतृष्णायें करी घणे काल लगि चारित्रनो पर्याय न पाल्यो, मोडी दीक्षा लीधी. अहो बली में रिखिने, रसनें, सातनें गारवें करी भोगनी आशामा गृधपणे शुद्ध चारित्र फरस्युं नहीं, ए तीन थानके पशाताप करें. आवी रीते भावना भाववावाला देवने मिथ्यात्वी साथे सरखा केम करी शकाय ? नज करी शकाय. ____ एवा सुर किम कहीये बाल, जिनवर आणतणा प्रतिपाल ॥ सुरगति लान मनुजने कह्यो, | उत्तर ज्यण सत्तम सद्दह्यो । एए॥
उपरनी गाथाओमा कहेली भावनाने भावनारा, एवा देवोने केम बाल कहेवाय! जे देवो श्री जिनेवरदेवनी आज्ञाने पालण करे छे, ते कदी बाल कहेवाय नहीं. अने वळी श्री उत्तराध्ययनना सातमा अध्ययनमा सुरनी गतिनो लाम मनुष्यने कसो छ, अने आचार्य भगवान् कहे छे के अमे पण तेमज सहीए छीए.
तथाचतत्पाठः-धीरस्सपस्सधीरत्त, सम्बधम्माणुवात्तिणो चिच्चाअधम्म धम्मिठे, देवेसु उवाज्जइ ॥ २९ ॥
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दी.
दीपिका
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बालपणा थवाने काज, तप संयम साधी जिनराज ॥ साधु अने श्रावक खप करे, बाल || कहे ते स्युं अनुसरे ॥ ६० ॥
भावार्थ:-इहां मनुष्यभवमां देवाधिदेवे कीघेला तप संयम तेने साधी देवलोकने विषे देवपणे उत्पन्न थया जे देव, ते शं बाल थवाने वास्ते जिनराजना कहेला संयम साध्या ? अने तप संयमना प्रभावयी ते बाल यया ? कारणके तमारूं कहेQ एम छे जे देव थाय ते बाल, एम कहेदूं तमारे व्याजबी नथी.
- कारण के जिनेश्वर भगवानना साधु अने श्रावक जे तपादि करे छे ते शुं बाल थवाने वास्ते तपादिनो खप करे। छे ? कदी नहीं. एम कहेवु तदन विरुद्धज छे...
कारण के देवताओ जिनेश्वरने पण १०८ स्तुतिपूर्वक मीठी वाणीए करीने कहेछे के, हे जगन्नाथ ! आप जीवोना हित वास्ते तीर्थ प्रवर्तावो, अने वली देवताओ साधु तथा श्रावकने धर्ममां पण थिर करे छे, देवे थिर करेला ते धर्मनेविषे थिर थाय छे. तेवा देवोने शुं समजीने बाल कहेता इशे, अथवा तेवा बाल देवोए कधेिल मार्गमा साधु अने श्रावक के प्रवर्तता हशे ? माटे सर्व देवो बाल नथी, एमां पण तारतम्य छे...
__ आवस्यक सुर थासातना, टालि श्रवरण वदे तेहना ॥ करे जे पुस्तक वेंगण' जिस्युं, कहो || तेहने कहिये किस्युं ॥ ६१॥
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३०॥
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आवश्यक एटले श्रमण सूत्र तेमा "देवाणं आसायणाए" ए पाठ भणी मिच्छामिदुःकडं दे छे ने अवर्णवाद | बोलता जाय छे, तेथी तेश्रो पुराणीना बेंगणनो न्याय (पोथीमांना रौंगणा जेवो) करे छे तेहने | कही शकीए. हे जिनराज।
जीवानिगमे नाम उवंग, जो खेज्यो मनने रंग ॥ अणुश्र तुल्झ गुरुआ गुरु कह्या, गिरथा | | गुरुने वचने लह्या ॥ ६ ॥ बंनचेर तप संयम जिस्या, पोते जेहने ते ने तिस्या ॥ रिद्वि गणो | | तेहने अनुसार, सुरवर सुगुण ते एम विचार ॥ ६३ ॥
श्री ठाणंगसूत्रनो उपांग “जीवाभिगमसूत्र " ने विषे कह्यु छ के, देव त्रण प्रकारना छे. सम्यदृष्टि, मिथ्यादृष्टि, सम्यमिथ्यादृष्टि, तेमा जेणे पूर्वभवमा तप, ब्रह्मचर्य, संयम, अणु" अल्प " तुल्य " मध्यम" गुरु " मोटा "जेवा जेवा कर्या छे, तेवा तेवा स्वामीपणाने पामेला छे, आनो विशेष खुलासो उक्त मूत्रमाथी जागी लेवो. अने ऋद्धि पण पूर्वकृत तप ब्रह्मचर्य संयमने अनुसार तेवी तेवी पामेला छे. इहां विचारवानुं छे ने सम्यक्दृष्टिदेव छे ते उत्तम अने सारा गुणवाला छ तेओने मिथ्यादृष्टिनी साये सरखा न करवा.
गणांगे त्रएणे व्यवसाय, सुरवर जश् सन्ना व्यवसाय ॥ तिहां ग्रहे धम्मिय व्यवसाय, बीजे त्रीय उवंग कहाय ॥ ६ ॥
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॥३१॥
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॥ श्री गणांग सूत्रना त्रीजा गणामां आम कां . ॥ तिविहे ववसायेपन्नत्ते तंजहा-धम्मिए ववसाये, अधम्मिए वासाये, धम्मियाधम्मिएववसाये ३. अर्थ:-हे भगवन् ! व्यवसाय केटला प्रकारे? उत्तर. हे आर्य त्रण प्रकारे, व्यवसाय एटले शृं? जवाब. पुरुषार्थसिद्धि माटे जे अनुष्ठान कराय ते. तेमां प्रथम धार्मिक व्यवसाय ते मुख्य मुख्य मुनिराजनो होय. बीजो अधर्मिक व्यवसाय ते संसारीजीव जेणे धर्मर्नु सरूप जाण्युं नथी तेनो होय, त्रीजो धार्मिकाधर्मिकव्यवसाय ते देशसंयम पालनार सम्यदृष्टि श्रावकवनो होय, उक्त व्यवसायना विचार माटे सुरवर सम्यक्दृष्टि सभामा जइने व्यवसायमध्ये धार्मिक व्यवसायमति ग्रहें, विचारे. तेनो खुलासो चीजें उपांग जे रायपसेणी तथा त्रीजु जीवाभिगम तेमां पग घनी व्याख्या छे. तयाच तत्सूत्रम्-जेणेव ववसाय सभा तेणेव उबागच्छइ ववसायं सभं अणुपयाहिणी करेमाणे पुरेत्थमिल्लेगं दारेणं अणुपविसंति जेगेव सिहासणे जावसण्णिसणे तएणं तस्स सरियाभस्स देवस्स सामाणिय परिसोववन्नगा देवा पोत्थरयणं उवएणति तएणं से सूरियाभेदेवे पोत्ययरयणं गिण्हइ पोत्थयरयणं मुयइ पोत्थयरयगं विहाडे पोत्ययरयणं वायेति वारता धम्मियवसायांगहा पोत्ययरय गं पडिणिरुख मति.
अर्थ:-जिहां व्यवसाय सभा (पुस्तकसभा) तिहां आवे, व्यवसाय सपा प्रत्ये प्रदक्षिणा करतोयको पूर्वने द्वार प्रते पेसोने जिहां सिंहासन तिहां पूर्व साहामो थइ बेसे, तिवार पछी तेहने सूर्याभदेवना सामानिक अभ्यंतर परिषदना देवता पुस्तक रत्त आणी मुंपे, तिबार पछी तेह सूर्याभदेव पुस्तकरत्न हे पुस्तकरलो डामलो उघाडे, उघाडीने पुस्तकरल वांवे, वांची
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॥३१
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ने धर्म सबंधि व्यापार प्रते रहे, पुस्तकरत्न ठामे मुंके इत्यादिक रायपसेगी सूत्रमा कहेल विचार, तेमन जीवामिगम मूत्रमा | कहेल छे ते नीचे मुजब.
. जेणेव ववसाय सभा तेणेव उवागच्छति ते-त्ता ववसायसभं अगुप्षदाहिगं करेमाणे करेमाणे पुरथिमिरले गं दारेणं अणुपविसति अत्ता जेणेव सोहासणे तेणे वागच्छति ते-त्ता सीहासण वरगते पुरच्छाभिमुहे सण्णितण्णे तरग तस्त विनयस देवस्स अभियोगियादेवा पोत्ययरयगं उवगेति तएणं से विजए देवे पोत्थयरयगं गिण्हा पो-ता पोत्थयरय गं मुयति पो-ता पोत्थयरयणं विहाडेति पो-त्ता पोत्थयरयणं वाएइ पो-त्ता धम्मियं ववसायंपि गेण्हेति.
अर्थ:-जिहां निश्चे व्यवसायनी सभा छे तिहां आवे, आवीने व्यवसायसभा प्रत्ये प्रदक्षणा करतो थको पूर्व दिशाने बारणे प्रवेश करे. प्रवेश करीने जिहां सिंहासन छे तिहां आवे, विहां आवीने सिंहासनने विषे प्रधान एवं, ते सिंहासन पाम्ये थके पूर्वाभिमुखे पूर्व दिशाने सामो बेसे, तेवारे ते विजयदेवना आभियोगिक नामे देवता पुस्तकरत्नने आणि आगल मुके तेवारे ते विजयदेवता पुस्तकरत्नने ग्रहण करे, ग्रहण करिने मुके, मुकीने पुस्तकरत्नने उघाडे, उघाडिने पुस्तकरत्नने वांचे, वाचीने धार्मिक एटले धर्म सबंधी व्यवसाय धर्मनी करणी तेहना अर्थ हइयामांधारे. माटे देवो धर्म व्यवसाय करनारा हो. बाथी श्रुतधर्मी कहेला छे ते आगली गाथामां बतावे छे.
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दीपिका
मुदी
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श्म श्रुतधर्मे ते धम्मीया, चारित्र धर्म अधम्मेडिया॥ ते पण जाणे वाववहार, निश्चे वलीय | विशेष विचार ॥ ६५॥
उपर कहेल धर्म व्यवसायने ग्रहण करनार होवाथी ते देवो श्रुतधर्मवाला होवाथी धम्मिा कहेल छे. अने ते देवताओ चारित्र धर्मवाला न होवाथी चारित्रधर्मनी अपेक्षाए अधम्मेठिया कहेवाय छे. ठाणांगजीना बीजा ठाणामां आ प्रमाणे छे,-" दुविहे धम्मे पन्नत्ते-सुयधम्मेय, चरित्त धम्मेय" अर्थ:-धर्म के प्रकारनो कहेल छे. श्रुतधर्म अने चारित्रधर्म. बधा सम्यक्दृष्टि देवोमां श्रुतधर्म गुण रहेल छे, अने चारित्र धर्मनी अपेक्षाए अधर्मस्थित छे तेनो पाठ भगवतीना १७मा शतकना वीजा उद्देशाने विषे आ प्रमाणेछे. सेणूगंभंते ! संजयविरय पडिहय पञ्चख्खाय पावकम्मे धम्मेहीए-असंजय अविरय अपडिहय अपञ्चख्खाय पावकम्मे अधम्मेटिए संजयासंजए धम्मा धम्मोहए ? हंता गोयमा ! संजयविरय जाव धम्मा धम्मोहिए.
अर्थ:-हे भगवन् संजत अने विरतिवाळा वळी पापकर्मने जेणे प्रतिहत कर्या एहवा मुनिराज छे ते धम्मेहिया कहीये एटले सर्वविरति धर्ममां स्थित कहेवाय ? अने असंयत अने अविरति वळी पापकर्मने जेणे रोक्या नथी तथा प्रातहत कर्या नथी ते अधम्मठिया कहेवाय एटले अधर्ममां स्थित छे एम कहेवाय ? अने संजतासंजत एटले श्रावक देशविरति मार्ग पालनार ते धमाधम्मेटिया कहेवाय-धर्माधर्मस्थित भेदयी बोलाय ? हता गोयमा! तमे जेम कहोछो ते तमज छे. तथा उपर कहेल मूत्र तेना पछीनो पाठ पण उपयोगी होवाथी लखेल छे. एएसिणं भंते ! धम्मंसिवा अधम्मंसिवा धम्माधम्मासिवा च
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॥३२॥
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|किया केइ आसइत्तएवा जावतुयहितएवा ? णोइणहे समठे, सेकेणटेणं खाइअटेणं भंते ! वुच जाव धम्माधम्मोठिए ? गोयमा !
संजय विरय जाव पावकम्मे धम्मेठिए धम्मंचेव उवसंपज्जित्ताणं विहरइ, असंजय पावकम्मे अधम्मोठिए अधम्मंचेव उवसंपजिताणं विहरइ, संजयासंजए धम्माधम्महिए धम्माधम्म उपसंपन्जित्ताणं विहरइ, से तेणठेणं गोयमा! जावाहिए. | हे भगवन् आपश्रीए प्ररुपेला धर्मने विषे, एटले संयमने विषे तथा अधर्मने विषे एटले असंयमने विषे तथा धर्माधर्मने विषे एटले देशविरति धर्मने विषे बेसवाने तथा पासु फेरववाने कोइ समर्थ छे ? कोइ समर्थ नथी. तेनुं शुं कारण छे के ते समर्थ नथी ? उत्तर. हे गौतम ! सम्यक् जतनावाळा एटले चालवामां, बेसवामां, उभा रहेवामां, शयन करवामां, भोजन करवामां, बोलवामां, तथा पापथकी निरमेला प्रतिहत कयों छे पापने जेणे एहबा धम्मोहिया छे ते धर्मनेज अंगीकार करी विचरे छ; अने असंजत, अविरत, पापकर्मी अधर्मस्थित छे ते अधर्ममांज वर्तनाराज होय छे, अने संजतासंजत धम्माधम्मे स्थित छे, ते देशविरति धर्माधर्मने आदरी अंगीकार करी विचरे छे, माटे हे गौतम एम कहिये छीये.
कोइक एम कहेछे जे श्रावकधर्म ते पण धर्मपक्षमांज छे एटले जेम मुनिराजनो धर्मपक्ष छे तेज प्रमाणे श्रावक देशविरतिनो धर्म पण छे. आ उपर बुद्धिमान समीक्षक पुरुषोए विचार करवो जोइये के धर्मपक्ष पालनारा तो अणगार पंचमहाव्रत, दशविध यतिधर्म, आठ प्रवचनमाताना परिपूर्ण पालनारा, अढार हजार शीलांगरथना धोरी ते अणगार धर्ममा निरारंभ निःपरिग्रहपणुं तेम प्रवचनना सारभूत छकायजीवनुं पालन छे, जेमा तेथी भिन्न आगार एटले गृहस्थ देशविरतिनो
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सुर
दीपिका
॥ ३३ ॥
धर्म छे, ते मिश्रपक्ष मुनिराजनी अपेक्षाए छे, ते आगारधर्म कही वर्गन कर्यो, तो तेने एकांत धर्मपक्ष श्रावकधर्मनी अपेक्षाये कहेवाय, पण मुनिराजनी अपेक्षाये तो नज कहेवाय. एकांत सम्पकमार्ग कहेवाय, पण जो एकांत धर्मपक्षमांज गणत हो तो साधु अने श्रावकना बच्चे जे अंतर राखवामां आवे छे के मेरु अने सरसव तेनो विचार करवो समीक्षकने सोंपीये छीए.
मात्र जे कोइ मिश्रपक्ष उडावाने माटेज डोल करेतो ते ज्ञानाजीर्ण कहेवाय. अने वळी सूत्र पांचांगमां जे धम्मिया, अमिया, नो मिया, तथा पच्चरुखाणी, अपच्चख्खाणी, पच्चरुखाणापच्चख्खाणी, संजया, असंजया, संजय संजया, बाल, पंडित, बालपंडित, धमेोहिया, अधम्मेड़िया, धम्माधम्मेहिया, विरति, अविरति, विरताविरति, धर्मपक्ष, अधर्मपक्ष, मिश्रपक्ष, विगेरे त्रण त्रण भेद कहे छे ते उत्थापाथ छे. उत्थापाय तो उथपो जेओनुं आ वचन छे ते स्वाधिरूढशाखामोटन न्याय जेवुं छे, कारण के ज्यारे गृहस्थने घेर वेडा मुनिना धर्मपक्षनो लाभ थाय तो तेने सर्वथा चारित्र श्रमणधर्म माटे संसार त्याग करावा उपदेश आपको ते काष्टघंटा विटंबना न्याय सरखोज थाय छे.
देवताओने चारित्र धर्मनी अपेक्षाये अधम्मेडिया कह्या छे, ते पण मात्र व्यवहारनयनी अपेक्षाए जाणवा, अने निश्रेयी वलि विशेष विचार - एटले निश्चय नयनी अपेक्षाये तो विशेष विचार छे तेनी व्याख्या आगेनी गायामां आवर्से, ते व्याख्या गुरु गीतार्थ भवभीरु बहुश्रुत समाधिनिष्ठ एहवा गुणभंडार महाराजनी पासे श्रुत सांभली तथा भणी विशेष
सु० दी०
।। ३१ ।
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VanamamaeevanewsVEReautawaharasvam
| विचारजो, विचारीने सारी रीते हृदयमा धारजो, कुमतिने वारजो अने देष म आणजो.
श्रमण मिथ्याति बालज हुँत, यद्यपि सर्वविरति पालंत ॥ नवमा अवेयक लग जंत, पन्न-|| | वणा नगवश्य नणंत ॥ ६६ ॥
श्रमण एटले साधु (मुनि) सर्वज्ञ परूपेल सर्वविरति मुनिधर्म सर्वथा विरति परिणामला पालन करतो होप छनौ पण सम्यक्ज्ञान दर्शनथी रहीत होय, सदहणा परूपणा शुद्ध न होयते द्रव्यलिंगी साधु मिथ्यावो कहेवाय, अने ते दालन कदेवाय छे. __ते जो के सर्वविरति पाले छे, उग्र कष्ट करेछे तेथी नवमा अवेयक सुधी जायछे तेनो पाठ श्रीपन प्रणासूम तथा श्री भगवतीसूत्रमा कहेलो छे. ते आ प्रमाणे-अविराहियसंजमासंजमाणं जहण्णंसोहम्मकप्पे उक्कोसेणं अच्चुए, सलिंगीणं दंसण बावनगाणं जहण्णेणं भवणवासीसु उक्कोसेणंउवरिम गेवेज्जएसु.
अर्थ:-अविराधक एहवा संजतासंजत एटले देवाधिदेवे जे भाव गुणने रीते परुप्या ते पदार्थने तेज प्रमाणे श्रदा| वाळा, अने जे देशवितिमार्ग धर्म तेनुज नाम संजतासंजत छे, ते धर्मपति फर्शना, पालना, तीर, विशोधि निःशल्य यह ते श्रावकर्मि क्या उपजे, कई गतिमां जाय ? उत्तर. जघन्यथी सौधर्मदेवलोक प्रथम स्वर्गमा, अने उत्कृष्टयी चारमा अच्युत देवलोकमां जाय.
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सुर
दीपिका
॥ ३४ ॥
बळी जे स्वलिंगी एटले जिनेश्वरे कहेला साधुना उपकरण तेने धारे के छतां दर्शन- सम्यक्त्व तेथी पडेला ते हे भगवन् ! क्यों उपजे ? उत्तर - जघन्यथी भवनवासीनिकायमां उपजे अने उत्कृष्टथी उपरला ग्रैवेयकमां उपजे. एवी रीतनोज आलावा पण श्री भगवती सूत्रमां छे, ते गुरुमहाराज पासे पुछी जाणवुं सर्वविरतिने पालण करनारा छतां पण आणा रहीत एटले सम्यक्ज्ञान अने दर्शन रहित होवाथी मिध्यात्वी तथा बाल कीधेल छे ते निश्वेनयनी व्याख्या जाणवी. विशेष खुलास गीतार्थ पासेधी समजवो.
देस वितरित गति एक, उत्कृष्टी बारम सुरलोक ॥ समकित विरति किस् तरो बोलो टाली मन पांतरो ॥ ६७ ॥
देशविरति सम्यकदृष्टि अने अविरति सम्यकदृष्टि ए बनेनी गति एक उत्कृष्टि बारमा देवलोक सुधीनी कही छे, तेनो पाठ पनवणाना छठा पद मध्ये छे, तथा च तत्पाठः- जदिसम्मदिट्ठी पज्जत संखेज्ज वासाज्य कम्मभूमि गन्भवकंतिय मणुस्सेहिंतो उववज्जंति किं संजयसम्मदिठ्ठी पज्जत्तएहिंतो असंजयसम्मदिद्वी पज्जत्तएहिंतो संजयासं जयसम्मदिठ्ठी पज्जत संखेज्जेहिंतो उदवज्जति ? गोयमा ! तिहितोवि उववज्र्ज्जति, एवं जाव अच्युगोकप्पो.
अर्थ :- जो सम्यकदृष्टि पर्याप्ता संख्याता वरसना आउखावाळा जो कर्मभूमि गर्भजमनुष्यथी उपजे तो श्युं संजत सम्यकदृष्टि पर्याप्तायी उपजे ? के असंजत सम्यकदृष्टि पर्याप्ताथि उपजे ? के संजता संजत जे देशविरति तेनाथी उपजे ?
सु० दी०
॥ ३४ ॥
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हे गौतम ! त्रणे थकी पण उपजे, क्यां सुधी? जाव बारमा अच्युतदेवलोक सुधी, सम्यक्दृष्टि जीव तथा सम्यकदृष्टि साधु तथा सम्यक्दृष्टि श्रावक देशविरति बारमा देवलोकमां उपजे. आनो पाठ पनवणामूत्रना छठा पदमध्ये छे. माटे समकितिमां अने देसविरतिमां शो तफावत छे. आ बावतमा विचार करी मननो हठ मुकी उत्तर आपवो जोइये.
पेच्चा कही परनव एकंत, श्ह नव परनव पण एकंत ॥ पुत्विं पचा शब्दे जाण, श्ह नव | | परनव बेवि वखाण ॥ ६॥
सूत्रमा पेचा शब्द छे तेनो अर्थ एकांते परभव थाय छे अने आगममा पुब्धिपच्छा शब्द जे छ तेना अर्थ पण आभव परभव एकांते थाय छे. सूत्रमा कोइ स्थले पेक्षा शब्द अथवा तेना बदले परभव शब्द कहेल छे अने कोइ स्थले पुचिपच्छा शब्द अथवा तेना बदले आभव परभव शब्द कहेल छे, पेचा अने पच्छा ए बे शब्दनो अर्थ एकज छे. परभव अर्थ पच्छा ! शब्दनो थाय छे तेज पेच्चा शब्दनो पण थाय छे, तेथी शब्द पर्याय रचनाये भ्रममा पडवू नही, कारण के सूत्रोना कोइ स्थलमा (पेचाहियाए) एवो पाठ छे अने कोइ आलावामां (इहभवे परभवे वा आणुगामियत्ताए) एवो पाठ पण छे पण अर्थ एकज थाय छे एमां फेरफार समजवो नहीं.
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सुर
दीपिका
॥ ३५ ॥
॥ श्री रायपसेणी सूत्रमां या प्रमाणे कह्युं बे. ॥
तणं तस्स सूरियाभस्स पंचविहाए षज्झतीए पज्झति भावंगयस्स समाणस्स इमेयारूत्रे अम्मत्थिए चितिए पत्थिए मोगर संकपे समुपज्जित्था किं-मे- पुर्विब- करणिज्जं किं-मे- पच्छा-करणिज्जं किं-मे-पुत्रि - सेयं किं-मे- पच्छा - सेयं किं मे - पुत्रि - पच्छावि-हिताए सुहाए खमाए णिस्सेसाए अणुगार्मित्ताए भविस्सर, तरणं - तस्स - सूरियाभस्त देवस्स सामाणिय परिसोत्रवण्णा - देवा सूरियाभस्स देवस्स इमेयारूत्र मब्भत्थियं - जाव-समुप्यण्णं समभिजाणित्ता जेगेव-सूरिया भे- देवे-तेणेव उवागच्छ उवागच्छिता सूरियाभं देवं करयल - परिग्गहियं सिरसावत्तं मत्यए - अंजलि - कट्टु जरणं विजए-बद्धाति २. ता एवंबयासी - एवंखलु देवाणुप्रियाणं सूरिया - विमाने सिद्धाययगं असयं जिगरडिमाणं जिणु लेह-पपाण-ताणं सगिखित्तं चिरंति, समाएणं सुहम्माएणं माणवते चेइए खंभे - बड़रामए गोलबट्ट - समुग्गर, बहुउ-जिगरूप काउ-सग. खिचाउ चिति, ताणं - देवाणुधियाणं अण्गेहिंच वरुणं वेमाणियाणं देवाणय देवीणय अच्चाणिज्झाए जान बंदणिज्झाओ
सणिज्झाओ णिज्झाओ समाणणिज्झाओ कल्लाणं- मंगलं- देवयं-वेइयं पज्जुवासणिज्झाओ तं - एयणं देवाणुपियाणं पुर्वित्रकरणिज्यं तं - एयणं देवाणुवियाणं पच्छाकरणिज्यं तं स्यगं देवाणुवियाणं पुत्र- सेयं तं - एवणं देवाणुविषाणं पच्छासेयं तं - एयणं देवाणुनियाणं पुत्रि-पच्छावि-हियाए सुहाए खमाए जिहसेसाए अणुगामियताए भविस्संति.
अर्थ:-त्यारे ते सूर्याभदेव पांच प्रकारनी पर्याप्तिये पर्याप्तिभाव प्रति पामेला ते सूर्यदेवना मनने विषे आबा मका
सु० दी०
॥ ३५ ॥
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रनो विचार थयो के मारे प्रथम शुं करवुं जोइये ने पछी भुं कर जोइये. वळी मारे प्रथम श्रेय (कल्याणकारी) शुं छे, अने पछी मारे श्रेय शुं (कल्याणकारी) छे, ने प्रथम पहेला तथा पछे कल्याणकारी मुंछे. बळी आत्माने हितभणी, सुखमणी, क्षेमभणी एटले पांगेल तेना रक्षण भणी वळी मोक्षमणी एटले सर्वथा दुःखथी मुक्त थवा भणी अने परंपराये हित करनार शुं हशे ? ज्यारे आवा विचार थया त्यारे ते सूर्याभदेवना सामानिक सभाना उत्पन्न थयेला देवो छे ते सूर्याभदेवना उपर कहेला मनोगत उपजेला विचार जाणीने जे ठिकाणे सूर्याभदेव छे ते स्थानमां आवे आवीने सूर्याभदेव प्रत्ये करसंपुट एकठा करी मस्तकमां आवर्तन करो अंजलि करी जय अने विजयवडे वधावे, वधावीने आ प्रमाणे बोल्या के - हे देवानुप्रिय आपलावना सूर्याभविमानने विषे सिद्धायतन छे तेमां १०८ जिन प्रतिमा छे, ते जिननी अवगाहना प्रमाणे उंचैमां छे, वळी सुधर्मा समाना माणवकचैत्यस्थंभमां वज्रमय गोळ आकारवाळा डाबडाओमां धणी जिनेश्वर भगवाननी डाढाओ रुडी रीते स्थापन करेली छे, ते जिनमतिमा अने डाढाओ आपसाहेबने तथा बीजा पण घणा विमानवासी देवता देवीयोने अर्चन करवा योग्य, वंदन करवा योग्य, नमस्कार करवा योग्य, पूजवा योग्य, सन्मान करवा योग्य, वळी कल्याणकारी, मंगलकारी
लोकना अधिपतिपणाथी देवता तथा सुप्रशस्त मन करवानो हेतु होवाथी आपने पूजवा योग्य छे; माटे आप साहेबने प्रथम करवा योग्य एहज छे, पछी करवा योग्य पण एहज छे, ने वळी एहज पहेला श्रेय अने पाछल श्रेय ते एहज छे. आप साहेब ने पहेला भने पछे पण हितभणी, सुखभणी, क्षेमभणी, मोक्षभणी, अने परंपराये हितभणी थशे. ए रायपसेगी सूत्रनो पाठ गुरुगमथी अवधारवो.
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देसविरति धारी इम कह्यो, गुरु मुख बहु बागम मे लह्यो॥ श्हनव परनव हित सुख || 8 ||सु० दी० नणी, जिनवरनुं वंदण श्म गिणी॥ ६ए॥
देशथकी जेनी विरति होय एटले विरमणना जे परिणाम होय तेने देशविरति कहीये; तेवा देशविरति धर्मने धारण करनारा श्रावकोने देशविरति धर्मना अधिकारे आवी रीते घणा आगममा कहेल छे, अने ते गुरु महाराजना मुखकमळथी | में जाणेल छे के श्री जिनेश्वरनुं वंदन नमस्कार ते आ भवनेविषे, परभवने विषे हितभणी, सुखभणी छे. आवी रीते जाणी
ने श्रावक जिनेश्वर भगवाननु वंदन, नमन, पूजन करे छे. ते नीचे प्रमाणे आगममांहि पण कर्तुं छे, ते हठ कदाग्रह निवारी विचारजो अने हृदयमा धारण करजो.
॥श्री झाताधर्म कथाना तेरमा अध्ययन मध्ये कयु ॥ समणे भगवं महावीरे इहेव गुणसिलए चेइए समोसढे तं गच्छामोणं देवाणुप्पिया समणं भगवं महावीरं बंदामो णमंसामा जाव पज्जुवासामो इहभवे परभवे हियाए खमाए णिस्सेसाए अणुगामियत्ताए भविस्सइ, तएणं तस्स ददुरस्स बहु जणस्स अंतिएएयमलु सोच्याणिसम्म अयमेया रुवे अभ्भत्थिए समुप्पज्जित्था एवं खलु समणं भगवं महावीरं तं गच्छामिणं वंदामि-णमंसामि जाव-एवं संपेहेइ.
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अर्थः-श्रमण भगवान महावीरस्वामी अत्रेनान गुणसिलानाम यक्षना चैत्यने विषे समवसर्या छे, माटे हे देवाणुमिय | आपणे पण जइए. चालो श्रमण भगवान् महावीरपते वांदीए, नमस्कार करीए, यावत् पर्युपासना करीए, कारण के ते वंदनादि आ भव परभवमां हितभणी, सुखभणी, निरुपद्रवभणी, निःश्रेयसभणी, मोक्षभणी, अनुगामिपणामणी थशे. ते समयने विषे ते दर्दुरने (देडको) घणा मनुष्योनी पासे आ बाबत सांभलीने हैयामांधारीने मनमां एवो विचार उत्पन्न ययो के हुँ पण जाउं, श्रमण भगवान् महावीर प्रते वंदन करूं, नमस्कार करुं, एज मने जावत् कल्याणकारी हितभणी सुखभणी थशे. तेमज पूजा करवानुं पण आगममा कछु छे. ते नीचे मुजव:
॥श्री उबवाइ उपांगमांदि कडं . ।। ____ अंबडस्सणं णो कप्पति अन्न उत्थियावा अन्न उत्थिय देवयाणिवा अन्न उत्थिय परिगहियाइं अरिहंत चेइयाणिवा वंदित्तएवा णमंसित्तएवा पज्जुवासित्तएवा नण्णथ्य अरिहंतेवा अरिहंत चेइयाणिवा.
अर्थ:-अंबढनामा परिव्राजक कहे छे के, हे भगवन् आजथी मने अन्ययूथिक वा अन्यधिक देवो वा अन्ययूथिक परिग्रहित एटले पोताना देव करी मानेली अरिहंतनी प्रतिमाने वंदन, नमस्कार, पर्युपासनादिक करवा कल्पे नहि किंतु देवमां तो अरिहंत देव अने अरिहंत भगवान्ना बिंब (जिनपडिमा ) ते प्रत्ये वांदवा, पूजवा, पर्युपासना करवा कल्पे, एम श्रावकने अधिकारे वीतरागना उपदेशे जिनपतिमा बंदन पूजननो विधिवाद जाणवो. (तथा वली) श्री महानिशीथ मध्ये
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सुदी
दीपिका
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कां छे:-पुणोवि वीयरागाणं, पडिमा चेइयालए: पत्तेयं संथुणे वंदे, एगग्गो भत्ति निम्मरं ॥१॥ वली प्रत्येक वीतराग देवनी पडिमानें तो विशेषे करी चैत्यालयने विषे स्तुति करे, वंदना करे, केवी रीते करे तो एकाग्र वली तन्मय थइ भक्तिपूर्वक वंदन करे, ए पण श्रावकना अधिकारे प्रतिमा वंदननो विधिवाद जाणवो, कदाग्रह निवारवो.
श्री ज्ञाताधर्म कथाना सोळमा अध्ययनने विषे कडु के केःतएणं सादोवइ रायवरकन्ना जेणेव मज्जग घरे तेणेव उरागच्छइरत्ता मजण घरं अणुपविस्सहरचा ण्हायाकयकिकम्मा कय कोउय मंगल पायच्छित्ता मुद्धप्पावेसाई मंगलाई वत्थाईपवर परिहिया, मजग घराउपडिनिरुखमइरत्ता जेणेव जिगघरे देणेव उवागच्छइरत्ता जिणघरं अणुपविसतिरत्ता जिणपडिमाणं आलोएपणामं करेतिरत्ता वंदति नमसतिरत्ता लोमहत्वयं परामसति एवं जहा सूरियामे जिणपडिमाउ अच्वेड तहेव भाणियन्वं जाव धूभं डहइ वाजाणुं अंचेइ दाहिणजाणुं धरणि तलंसि निहट्ट तिख्खुत्तो मुद्धाणं धरणितलंसि नमेइरत्ता इसिं-पच्चुन्नमइ करयल-जाव कहुएवं वयासि नमोत्युगं अरिहंतागं जाव संपत्ताणं वंदइ नमसइ.
अर्थ:-त्यारपछी ते द्रौपदी नामवाळी राजकन्या छे ते जे ठिकाणे मजनघर छे ते ठिकाणे आवे, आवीने मजनः । घर पटले नावाचें घर तेमां प्रवेश करे, प्रवेश करीने प्रथम नाही, पछी जेणीये बलिकर्म कर्या, तथा कौतुकमंगल कर्या के मननी शुदि माटे जेणीये, एहवी राजवन्या द्रौपदी, शुद्ध दोपरहित पूजनयोग्य, वळी मांगल्यकारी एहवा प्रधान वन पहेरी,
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मज्जन करवाना घरथी निकले, निकलीने जे ठिकाणे जिनवर छे ते ठिकाणे आवे, आवीने निघरमति अनुमत्रेश करे, करीने जिनप्रतिमाना दर्शन करे, प्रणाम करे, करीने मोरपीछीवडे प्रमार्जन करे, करीने बाकी पूजानी विधि जेम सूर्याभदेवे करी ते प्रमाणे १७ भेद पूजा करे, (प्रतिमाओ पूजे), धूपमति उखेवे, उखेवीने यावत् सविस्तर पूजननो विधि प्रमाणे पूजे, एटले अंग पूजा शरीरनी ने अग्रपूजा जे धूप तथा अमंगळ प्रभुनी आगल करे तेना नामः - साथीयो १, श्रीवच्छ २, नंदावर्त ३, भद्राशन ४, कलस ५, दर्पण ६, सराव संपुट ७, मच्छजुगल ८, विगेरे करीने योगमुद्राये बेसी नमोत्थुगंनो पाठ भणे, जावठा संपत्ताणं, इत्यादिवडे वंदन तथा नमन करे.
श्रावक बहुला पहुंता जिहां, निःश्रेयसपद पुण दीसे तिहां ॥
जिनेश्वर गणधर स्थवीर बहुश्रुत महाराज पधारेला जाणी श्रावकोना मनमां आवी रीतनी भावना उत्पन्न याय छे के ओने वंदन कर, नमस्कार करवो, तेमना सामे जनुं, तेमनो उपदेश सांभलवो, ते आ भवमां परभवमां अमने हितकारी, सुखकारी छे; एम जाणी घणा श्रावक पूजनीय पुरुषने वंदन करवा गया छे एवा आलावाओ घणा सिद्धांतोमां छे तेमां निःश्रेयसपद पण देखाय छे.
केटला आलापको पाठ नीचे मुजब जाणी लेवो.
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सुर
दीपिका
॥ ३८ ॥
॥ श्री जगवतीशतक बीजाना त्रिजा उद्देशामां कह्यं बेः ॥
तरणं तुंगिया नयरीए सिंघाडग-तिग- चउक-चच्चर - चउम्मुह - महापद्द - पहेसु जाव - एगदिसाभिमुहा णिज्जायंति, तणं ते समणोवासगा इमीसे-कहाए लद्धट्ठासमाणा हट्ठ-तुट्ठा जाव - सद्दावंति, सदावित्ता एवंवयासी, एवंखलु देवाणुपिया पासावच्चेज्जा थेराभगवंतो जातिसंपण्णा जाव - अहापडिरूवं- उग्गहं ओगिव्हित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणा विहरंति, तं महाफलं खलुदेवाणुप्पिया तहारूवाणं थेराणं भगवंताणं नामगोयस्स-विसवणयाए किमंगपुण अभिगमण-वंदण - नमसण-पडिपुच्छण - पज्जुवा सणयाए जाव - गहणयाए तं गच्छामोणं देवाणुपिया थेरे भगवंते वंदामो णमंसामो जाव- पज्जुवासामो, एणे इहभवे परभवे जाव आणुगामियत्ताए भविस्सई तिकटु-अण्णमण्णस्स अंतिए एयमहं पडिसुणंति.
अर्थ :- तेनारे तुंगियानाम नगरीने विषे सिंघाडग के० शृंगाटकफलाकारस्थान, सिग के० त्रण रस्ता एकठा थवानुं स्थान, तथा - चउक्क - के० चार रस्ता मलवानुं स्थान, तथा चच्चर - के० घणा रस्ता मलवानुं स्थान, महापह - के० राजमार्ग, पंथा- के० (रथ्यामात्रं) रथना रस्ता, जाव - के० यावत् एक दिशिना सन्मुख निकलेछे, ते समयने विषे, ते श्रमणोपाशको, स्थविर भगवान् अत्रे पधारया छे, एहवी खबर मलवाथी घणाज खुशी थया, यावत् ते श्रावकवर्गे एकठा मली सकल वर्गने बोलावीने एमक के - हे देवानुप्रिय ! पार्श्वनाथना स्थविर भगवान् सकलगुणसंपन्न, सकलगुणभंडार, जाति कुलवडे प्रधान, एहवा ते साधुने योग्य अवग्रहप्रति ग्रहण करीने संजम तपवडे आत्माने भावता विचरे छे, ते माटे हे देवानुप्रिय ! तथा
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|| ३८ ॥
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रूप थविर भगवान्ना नाम गोत्र सांभलवावडे कल्याण थायछे, तो जे महानुभाव पुरुषोना सन्मुख जड़ वंदन, नमन, प्रतिपृच्छा, पर्युपासना करीयें, ते तेनाथी अधिक ने वळी जे विनयपूर्वक ते थविरमहाराजा पासेथी अर्थ धारीयें, तो तेनाथी पण अधिक फल छे, माटे चालो आपणे देवाणुप्रिय थविर भगवंतने वांदीये, नमीये, पावन थइये, पर्युपासना करीये, नें वळी आ करणी आभव परभव जाव हितभणी, सुखभणी, यावत् अनुगामि थशे. आ प्रमाणे परस्पर विचार करी जे ठिकाणे घर छे तिहां आवे, आवीने नाइ धोइ पवित्र थइ पोताना घरदेवनुं पूजन करी शुद्ध अने अमूल्य वस्त्र पहेरी वांदवा गया, अने त्यां जइ अनेक प्रकारना प्रश्न पूछया. इत्यादि.
सुराव्या जिन वंदन काज, पेच्चापद तिह भएयो समाज ॥ ७० ॥
देवताओ श्री जिनेश्वर भगवानने वंदन करवाने वास्ते आव्या ते आलावामां " पेच्चापद " तिहां समाजे ( सभामा ) भणेलो छे.
॥ रायपसेणी सूत्र मध्ये कधुं वे के ॥
नमोणं समणस्स भगवओ महावीरस्स आदिगरस्स जाव संपाविउँकामस्स वंदामिणं भगवंतं तथ्यगयं पास उमे भगवं तथ्थगए इहगयं तिकट्टु वंदति णमंसति वंदित्ता णमंसित्ता इमेया रुत्रे अब्भयिए चिंतिए मणोगए पथ्थिए संकप्पे समुप्पजिथ्था एवंखलु समणे भगवं महावीरे जंबुद्दीवे भारहेवासे आमलकप्पाए णयरीए बहिया अंबसालवणे चेइये
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सु०दी.
दीपिका
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अहा पडिरुवं उम्गह उगिण्हित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावे माणे विहरति तं-महाफलं खलु तहारुपाणं अरहताणं भगवंताणं नाम गोयस्स वि-सवणयाएकिमंगपुण अभिगमण वंदण णमंसण पडिपुच्छण पज्जुवासणयाए एगस्सविआयरिस्स धम्मियस्स मुवयणस्स सवणयाए किंमंगपुग विउलस्त अस्स गहणयाए तंगच्छामिणं समणं भगवं महावीर वंदामि मंसापि सक्कारेमि सम्मामि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि एवं मे-पेचाहियाए सुहाए खमाए निस्सेयसाए अणुगामियचाए भविस्सति इतिकट्ठएवं संपेहेति. .
अर्थ:-पोतपोताना तीर्थनी अपेक्षाए धर्मनी आदि करनार जाव मोशनी इच्छावाला एवा श्री महावीरस्वामी | भणी नमस्कार थापो. तिहां रहेला भगवान् प्रत्ये ९ वंदन करुं छु; हे भगवन् ! त्यो रहेला आप, इहाँ रहेलो हूं, तेने आप देखो; एम करी वंदन नमस्कार करे, वंदन नमस्कार करीने आवा प्रकारनो मनोगत संकल्प उत्पन थयो के आ जंबुद्वीप नामनो द्वीप तेना भरतक्षेत्रने विषे आमलकल्पा नामनी नगरी, तेना बाहेर आम्रसालवन चैत्य तेने विषे श्रमग भगवान् | महावीरस्वामी यथायोग्य अवग्रहनी अनुज्ञा लइने संजमे करी, तपे करी, आत्माने भावता थकां विचरे छे ते माटे खरेखर तथारूप अहंत भगवंत तेभोना नाम गोत्र पण सांभलवाथी महाकल्याणकारी छे, तो वली जे भगवान्ना सन्मुख जवू, वंदन करवू, नमन करवं, पूछवू, पर्युपासना करवा वडे करी, तथा वळी एक धार्मिक आर्य सुवचन तेना सांभलवावडे करी, जे फल थाय छे ते तो बली विशेष कल्याणकारी छे. वली विशाल अर्थना ग्रहणवडे जे लाभ थाय तेनु कहेवु शृं! एटले
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घणोज लाभ थाय छे ते माटे हुं जाउं, पणभगवान् महावीरस्वामीने वंदन करूं, नमस्कार करूं, सत्कार करु, सन्मान करूं; भगवान् केदा छे, के जेओ कल्याणकारी, मंगलकारी, इष्ट देवरूप, चित्तने प्रसन्नताना हेतुरूप एवा भगवान् छे, ते प्रते जा पर्युपासना करुं आ करणी मने परभवमां हितभणी, सुखभणी, निरुपद्रवभणी, छेवट मोक्षभणी यशे, एप विचार करे. अहिं भी महावीरस्वामीने बंदन नमस्कार करवानुं फल सूर्याभदेवे जे मनमांहे चिंतव्यु ते फल साधु श्रावकने सद्दहवा योग्य छे, कारण के सम्पदृष्टिदेवे बोलेलुं धर्मर्नु फल डाह्या मनुष्योए उपादेय ( अंगीकार ) करवा योग्य छे.
तेमज बळी श्री भगवतीमूत्र मध्ये इन्द्रमहाराज विचार करे छे के, चमर अनुरेंद्र अनुरराजा अरिहंत वा अरिहंत चैत्य (जिनबिंब ) अथवा भावित-आत्मा कोइपण मुनि तेनुं शरण लीधा विना अहीं आची शके नहीं, माटे रखेने कोइनी आशातना थाय एम विचारी जल्दी अवधिज्ञानथी जाणी, भगवान्थी चार आंगुल दूर रहेल बनने पकडी
इत्यादि आलापक छे ते तिहाथी जाणी लेवं. इहां कोई वादी एम कहे छे जे देवलोकमांही प्रतिमा छे तेनुं शरण केम लीधु नहीं ? उत्तर के महाविदेहक्षेत्रने विषे पण तीर्थंकरभगवान् विचरे छे तिहां जइ शरण केम लीधुं नहि. माटे एवो खोटो तर्क करवायी काइ आत्मकल्याण थवान नथी. ए आलापकने विषे पण चैत्यशन्दे जिनपतिमा जाणवी, अने जीवाभिगम सूत्रमादि देवताना अधिकारे जिन प्रवचन प्रतिमानी भक्तिनो विधिवाद कह्यो छे, ते नीचे मुजवः-तत्थणं वहवे भवणवह वाणमंतर जोतिस वेमाणिया देवा चाउमासिय पडिवएम संवत्छरेसुय अण्णेमुय बहुजिण-जम्मण-निरूखमण-णाणु
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सुर दीपिका
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पाय परि- निव्वाण मादिपसुय- देवकज्जेसुय देवसमुदयस्य देवसमितीसुय देवसमवा एस्य देवपडणेय एगंत उसहिया समुवा गया समाजा पमुदित पक्कीलिया अठ्ठाहियाउ महामहिमाउ कारेमाणा पालेमाणा सुहंसुहेण विहरंति.
अर्थ:-तहां घणा भवनपति, वाणत्रंतर, ज्योतिस, वैमानिक देवता चौमासी पडिवाने विषे, संवच्छरीने विषे, बीजा वली तीर्थकरना जन्मना, वळी दीक्षा लेवानी वेलाये, बळी ज्ञान उपजती वेलाये, निर्वाण (मोक्ष) जवानी वेलाये ए आदि देने वेलाये, देवता संबंधी कार्य वेलाये, देवताना मेलावे, देवताना समूह मिलेथके, देवतानुं प्रयोजन, सर्व देवता एकठा थवानुं प्रयोजन उत्पन्न थये छते, एकठां थयाथका, एक समुदाय थयाथका, हर्षवंत थयाथका, क्रीडावंत थयाथका, अष्टाहिकादिक मोटा मोटा महामहिमावंत उत्सव करताथका, सुखे समाधिये विचरे छे.
जिनवर प्रतिमा पूजी नमी, पुव्वि पन्छा ए पद जणी ॥ हित सुख निःश्रेयस श्रणुगाम, सुर अधिकार बिहूने ठाम ॥ ७१ ॥
जिनेश्वर परमात्मानी प्रतिमाने देवताओए “ पुत्रि " अने " पच्छा " ए वे शब्द करी पूजा करी नमन कर्यु, ते शा वास्ते ? हितने वास्ते, सुखने वास्ते, कल्याणने वास्ते, अनुक्रमे मोक्ष मेळववाने वास्ते. आ हकीकत- सूत्रमां देवताओना अधिकारमां लखेल छे. एवी रीते सूत्रोमां सम्यक्दृष्टि अने देशविरति ए बेउना अधिकारमां सरखा पाठ छे.
सु० दी०
।।४० ॥
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Vasas/APae/amue/aERVaseDow
॥श्री रायपसेणी सूत्रमा आ प्रमाणे कडु के के-- ॥ ___ अम्हेणं भंते ! सूरियाभस्स देवस्स आभिओगिया देवा देवाणुप्पियं वंदामो णमंसामो सक्कारेमो समाणेमो कल्लाणं मंगलं देवयं पज्जुवासामो देवाइ समणे भगवं महावीरे-तेदेवे एवंवयासी जुत्तमेयंदेवा पोराणमेयंदेवा जीयमेयंदेवा किच्चमेयंदेवा करणिज्जमेयंदेवा आइनमेयंदेवा अप्मणुनायमेयंदेवा जण्णं भुवणवइ, वाणमंतर, जोइस वेमाणियादेवा अरहंते भगवंते वंदंति, णमंसंति, वंदिता णमंसित्ता तओ साइं२ नाम गोत्ताई साहंति तं पौराणमेयंदेवा जावअभणुनाय मेयंदेवा. इति
हे भगवन् ! अमे सूर्याभदेवना आभियोगिक देवताओ छीए, आपसाहेब पति अमे वंदन करीए छीए, नमस्कार करीए छीए, सत्कार करीए छीए, सन्मान करीए छीए; कल्याणना हेतु, मंगलना हेतु, इष्टदेव अने चित्तनी निर्मलतानां कारण एहवा आपसाहेव ते प्रते अमो पर्युपासना करीए छीए. भगवान् कहे छे के हे देवा! हे देवानुपिय! युक्त छे, आतमारी करणी युक्त छे, हे देवानुपिय! आ करणी कांह नवी नथी, पण पुरव कालथी छे, एटले चिरंतन कालथी तोर्थकर मते देवेकडे करायेली के जे माटे भवनपति, वाणवंतर, ज्योतषी अने विमानवासी देवताओ अरिहंत भगवंतने वांदे, नमस्कार करे, वंदन नमस्कार करीने पोतपोताना नाम गोत्रने कहे छे. माटे आ करणी तमारी पेहेलानी छे, वळी आजीत छे. वळी हे देवानुपिय! आ कृत्य छे, करवा योग्य छे, वळी आ वंदन, नमन, सत्कार, सन्मान, तीर्थकर प्रति आचीर्ण छे, तथा अभ्यनुज्ञात छे एटले
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वंदनादिक तीर्थकरभणी देवूज जोइए. कारण के सर्व तीर्थंकरोए कहुं छे के तमारा देवोनाज आ कय छे. आचीण छे. आ प्रमाणे श्रमण भगवान् महावीरना वचन सांभली देवो बहुज खुशी थया. पछी जवानी वखते भगवान्ने वंदन नमन करीने || इत्यादि पाठ रायपसेणीमां के.
॥अथ श्री जीवानिगमे तृतीय प्रतिपत्तिः॥ जेणेवणंदा पुष्करणी तेणेव उवागच्छति तेरत्ता गंदापुष्करिणं पुरच्छिमिलेगं तोरणेग अगुपविसति अरत्ता पुरच्छि मिल्लेणं तिसमाणे पडिरूवेणं पचोरूहति परत्ता हत्थपादं पख्खालेति हरत्ता एग महं सेतं रजतामयं विमलसलिलपुण्णमत्तगयमह | मुहाकिति समाणं भिंगारंपगिण्हति भिरत्ता जाइं तत्थउप्पलाइंप उमाई जाव सतसहस्तपत्ताई ताई गिण्हतिता-ताणंदातोपुष्करिणित पच्चुत्तरेइ प-त्ता जेणेव सिद्धायतणे तेणेच पाहारेत्यगमणाए तएगं तंविनयंदेवं चतारि सामाणिय साहस्सीउ जावअण्णे बहवेवाणमंतरायदेवादेवीउ अपेगतिया उप्पलहत्थगता जाव सतपत्त सहस्सपत्त इत्थगया विजयं देवं पिडितो अणुगच्छति वि-त्ता तएणं तस्स विजयस्स बहवे आभिभोगिया देवा देवीउय कलस हत्यगता जाधवपकडुछुप इत्यगता विजयं देवं पिट्टतो अणुगच्छंति तएणं सेविजएदेवे चउहिं सामाणिय साहस्सीहिं जाव अण्णेहिय बहुर्हि वाणमंतरेहिं देवेहिय सर्दि संपरिखुडे सविडीए सबजुत्तीए जाव निग्घोसणाइए रवेगं जेणेत्र सिद्धाययणे तेणे उगइ ते-ता सिद्वायतगं अणुप्पयाहिणी
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॥४१॥
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करेमाणे २ पुरच्छिमिल्लेणं दारेणं अणुपविसइ अणुपविसिचा जेणेव देवच्छंदए तेणे पागच्छति ते-ता आलोए निगपडिमाण पणामं करेति आ-ता लोमहत्थगं गेण्डति लो-त्ता जिणपडिमा उलोमहत्यएगं पमज्जति लोपहत्थरग पन्जिता सुरभिणा गंधोदएणं ण्हाणेइ सुरभिणा गंधोदरणं हाणित्ता दिबाए सुरभीए गंधकासाइए गानाइंलूहिता सरसेगं गोसीसचंदणेणं गात्ताई अणुलिंपइ अणुलिंपित्ता जिग पडिमाणं अहयाई सेताई दियाई देवदसजुयलाई णियंसेइ णिसिता ग्गेहिं वरेहिय मल्लेहिय अच्चहि-त्ता पुष्फारुहणं गंधारुहणं, चुण्णारुहणं आभरणारुहणं करेति करेत्ता आसत्तोसत्त विउलवट्ट वग्धारित मल्लदाम कलावं || करोति आसत्तोसत्तविउल ववग्धारित मल्लदाम कलावं करेत्ता अच्छेहि सण्णेहिं सेएहिं रयतामएहि अच्छरस तंदुलेहि जिगपडि माणं पुरतो अमंगलए आलिहतितं० सोत्थिय सिरिवच्छे जावदप्पणं अहमंगलगे आलेहित्ता कयग्गाह गहितकरतलपमह विप्पमुक्केणं दसवनेणं कुसुमेणं मुक्कपुष्फपुंजोवयारकलितं करेति२ चंदप्पभवहरवेरुलियविमलदंड कंचणमणिरयण भत्तिचि चं कालागरुपवर कुंदुरुक्कतुरुक्कधूव गंधुत्तमाणुविदंचधूमवटि विणिमुयंत वेरुलियम कडुछुयं पग्गहियं पयत्तेणं धृवंदाऊगमिण वराणं असयं विसुद्धगंथजुत्तेहिं महावित्तेहिं अत्यजुचेहि अपुणरुचेहिं संथुगइ संथुणिवा सतह पयाई उसरति स-त्ता वामंजा' अंचतिवा-त्ता दाहिणं जाणुंधरणितलंसिनिहटु धरणितलंसिणिवाडेतिरत्ता तिख्खुत्तो मुदाणं धरणिय लंसि णामइयत्ता इसिं पच्चुण्णमतिर त्ता कडयतुडिययंभियाउ भुयाउ पडिसाहरति । करतलपरिगहिय सिरसावत्तंमत्यये अंजलिकट्टरवं वदासि ॥ णमोत्थुणं अरहंताणं भगवंताणं जावसिद्धिगइ णामधे ठाणसंपत्ताणं तिकट्टादति णमंसति ॥
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सु० दी
॥४२॥
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अर्थः-जिहां नंदानाम पुष्करिणी छे तिहां आवे, आवीने नंदापुष्करिणी प्रत्ये प्रदक्षिणा करतो थको पूर्वदिशने तोरणे प्रवेश करे, प्रवेश करिने पूर्व दिशने द्वारे त्रिसोपान, प्रतिरूपके करीने मांहि प्रवेश करे, प्रवेश करीने हस्त पगने पखाले (धोवे), हस्तपगने पखालिने (धोइने) ए, मोटुं धोलु रजत रुपामय निर्मल जल (पाणी) तेणे परिपूर्ण भरेलु मोटा हाथीन मोटुं मुख तेनी आकृति आकार ते सरिखं शृंगार नामे एक भाजन (पात्र) विशेष तेने परिगृहण करे. गार परिग्रहण करीने पछी जे तिहां उत्पलकमल, पद्मकमल जावत शतपत्र सहस्रपत्र तिहां लगिनो पाठ लेवो ते सर्व ग्रहण करे, ग्रहण करीने नंदी नामे पुष्करिणिथकी पाछो उतरे, पाछो उतरीने जिहां सिद्धायतन तिहां जावाने चाले, तिवारे ते विजयदेवना च्यार हजार सामानिक देव जावत् अन्य बीमा घणा वाणवंतर देवता देवीयो तेमां केटलाक देवता उत्पल कमल छे इस्तने विषे ते जेने, जावत शतपत्र सहस्रपत्र कमल छ हस्तने विषे जेमने एवा छता विजयदेवने पाछल परिपाटीये जाय, विजयदेवनी पाछल परिपारीये (अनुक्रमे) जाइने तिवारे ते विजयदेवना घणा आभियोगिक देवता देवीयो कलशछे हाथमा जेमने जावत धूपनां भाजन पात्र छे हाथमा जेने एवा छतां विजयदेवने पुंठे पाछल जाय, तिवारे ते विजयदेव ते चार हजार सामा निक देव जावत अन्य बीजा घणा वाणवंतर देवता देवीयो तेणे सहित भली रीते विंटयो थको परिवों थको सघली ऋद्धिये, सघली द्युति कांतिये, जावत् वाजितना निर्घोष शब्द थाते थके जिहां सिद्धायतन प्रासादछे तिहां आवे, तिहां आवांने सिद्धायतनने प्रदक्षणा करतो थको पूर्व दिशाने बारणे परिपाटीये प्रवेश करे प्रवेश करीने जिहां देवदांदो तिहां अनुक्रमे
vaasapana/D/D/0Beautam/awa
॥४
॥
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आवे, आवीने दीठे थके जिननी प्रतिमाने नमस्कार करे, दीठे थके नमस्कार करीने पुंजणी ममुख हाथमां ग्रहण करे, पुंजणी प्रमुख हाथमां ग्रहण करीने जिननी प्रतिमाने पुंजे प्रमार्जे, प्रमार्जिने सुगंधि गंधजल तेणे करी स्नान करावे, स्नान करावीने दिव्य मनोहर सुरभि एवं गंधकषाय, एवा लूगडे करी गात्र (शरीर ) ने लूछे, गात्र (शरीर) ने लूछीने सरस नीलां एहवां बावनाचंदन ते चंदने करी गात्र (शरीर ) ने लिपे - विलेपन करे, विलेपन करीने जिननी प्रतिमाने अहत मांघां घणाज उत्कृष्ट उजलां दिव्य मनोहर देवदूष्य (जुगल) वे वे देवदृष्य वस्त्र पहेरावे-चढावे, श्वेत दिव्य देवदूष्य जुगल वे वे देवदूष्य वस्र पहेरावीनेचढावीने अग्र (प्रधान) गंधद्रव्ये करी, मालाये करी पूजा करे, हवे विस्तारे देखावे छे जेः- फूल चढावे, गंधारोपण गंधद्रव्य चढावे, मालानुं आरोपण करे, वरणनुं आरोपण करे, चूरणनुं आरोपण करे, आभरणनुं आरोपण करे; आरोपण करीने हेठलनी भूमि भागने तथा उपरनी भूमि भागने लगतो विस्तीर्ण वाटला आकारे लांबो प्रसार्यो फूलनी मालानो समूह ते करे, करीने निर्मल श्लक्ष्णं वाला श्वेत (उजला) रूपामय अछ सुंदर छे रस जेने विषे, पासेनी वस्तुनुं प्रतिबिंब जेमां पडे एवा निर्मल तंदुल (चोखा) तेणे करी जिन प्रतिमानी आगल आठ आठ मंगलिक आलेखे. ते जेमः - साथियो १ श्री वत्स २ जावत् दर्पण तिहां सुधीनों लेवो. आठ मंगलिक आलेखिने केशपाश ग्रहण कर्यानी पेठे करवडे ग्रहण कर्यो, करतल थकी छुटां मूक्यां पांच वफूल तेनो समूह ते मुकेला फूलना समूह वडे युक्त करे, करीने चंद्रप्रभ वज्रवैदुर्यमय निर्मल छे दंड जेहनो एवो कंचन मणिरतनकी भक्ति रचना तेणे करी चित्र विचित्र युक्त कृष्णाग रूप्रधान कुंदुरु, शिलारस, तुरुष्कनो जे धूप तेनो जे उत्तम गंध
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मुर
दीपिका
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तेणे युक्त धूपनी वर्तिका (वाटय)ने मुकतो वैडुर्यरत्नमय धूपनो कड छो (भाजन) विशेष तेने ग्रहण करी, प्रयत्ने करी धूप | 'खेवे, धूप देइने जिनवरथकी सात आठ पगला पाछेपगे खसे-पाछो हठे, पाछो खसीने दश अंगुलि सहित अंजलिने मस्तके करी सावधान थई विशुद्ध निर्मल एटले दोष रहित छे शब्द संदर्भ शब्दनी रचना जेने विषे अर्थ करीने प्रधान एवां वलो-पुनरुक्ति दोषेरहित एवा एकसो आठ मोटा वृत्ते करी स्तुति करे; पछी डाबो ढींचण उपाडे-उंचो राखे-एटले उभो राखे, जमणो दींचण पृथ्वीतलने विषे नमावे-एटले पृथ्वी उपर अडाडे-लगावे, पृथ्वी उपर लगावीने त्रणवार पृथ्वीने विषे मस्तक नमावे, नमावीने कांइक उंचो नमे-थोडोक उंचो थाय, कांइक उंचो थइने कड बेरखा तेणे करी थंमेला एवा जेबे भुजा तेने प्रति संहरे-एका करी संकोचे, बे हाथ एका करी संकोचीने माये आवर्तन करे-माये फेरवे, माये आवर्तन करी अंजलि करे, अंजलि करीने एम बोले, एटले आ प्रकारे नमोत्थुणं कहेतो वोः- नमस्कार थामो अरिहंत प्रत्ये, देवतादिकने पूजवा योग्य ए अर्थ. वली भगवंत प्रत्ये नमस्कार थाओ समग्र अश्वर्य यूक्त ए अर्थ छे. जावत् सिद्धिगतिनामवेय स्थानक प्रत्ये पाम्या एवा भगवंतने नमस्कार थाो तिहां मुधीनो पाठ जाणवो. एम कहीने सामान्यपणे वाद-नमस्कार करे एटले विशेषे करी अभ्युथानादिके करी वांदे.
ए प्रमाणे वंदन नमस्कारनो ठाम ठाम विधिवादे अधिकार छे, तेने सारी रीते समजतो, कदाग्रह टालो, विशेष जाणवानी इच्छा होय तो श्री गुरु महाराजने पूछq.
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॥४३॥
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इण कारण कांश ज हुस्ये, गीतारथ समरय जाणस्ये ॥ ते पुठी आणीये विवेक, जिनमत | थश्ये सहुए एक ॥ ७ ॥
ते कारण वास्ते काइपण समजवा लायक समजवान हशे ते गोतारथ समरथ पोतानी मेळे जागशे, तेवा गीतारथ महाराजाओने पूछी करी अने हृदयनी अंदर विवेक आणवो जोइए, अने तेवो विवेक आववाथी आपणे बधा जिनमतमा एक थइए.
साधु श्रावक सुर एकज हुँत, श्रुत धर्मे जिन एम कहंत ॥ चरण धर्म अंतर ववहार, जोई | | लेज्यो सूत्र विचार ॥ ३ ॥
साधु, श्रावक, अने देवता श्रुतधर्मे करी सम्खा गणाय छे, एम जिनेश्वर परमात्माए कोधेल छे. व्याहारथी चारित्र धर्षे अंतर पडे छे, ते सिद्धांतोने विचारो अने जोई लेनो.
जिनशासन निंदा टाखजो, जिनवर आंण खरी पालजो ॥ श्री पार्श्वचंड करे विनतो, साजलज्यो सहुए जिनमति ॥ १४ ॥ इति सुरदीपिका समाप्ता.॥ .
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सुर
दीपिका
॥ ४४
हे भव्यजीवो जिनशासन विषे निंदाने टालजो (अछति परुपणा करवी ते निंदा तेने टालजो ). अने जिनेश्वर परमात्मानी आणाने खरी रीते पालन करजो. एवी रीते श्री पार्श्व चंद्र सूरीश्वर विनंती करे छे, ते विनंती जैनधर्मीओए सौए सांभळवी, अने हृदयमां धारण करवी.
॥ इति श्रीमन्नागपुरीयवृहत्तपागच्छाधिराज युगमधान सुविहित भट्टारकोत्तमाचार्य श्री पार्श्वचन्द्र सूरीश्वर विरचिता सुरदीपिका समाप्ता ॥
॥ इति श्री सुरदीपिका समाप्ता ॥
सु० दी०
।।। ४४ ॥
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॥अथश्रीसिद्धान्ताराधनकोनचत्वारिंशतिका ॥
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श्री गुरुन्योनमः ॥ श्री जिनागम बोहि ॥ संसारार्णवतारणं । ममेदं दर्शितं येन ॥ तस्मै | श्री गुरवेनमः ॥१॥ देशी अढीयानी ढाल ॥ श्री गुरु जगे दिनकार, ज्ञान किरण गणधार ॥ नाव | प्रगट कर ए, संसय तम हर ए ॥२॥ गुरु हिमकर उपमान, सौम्यकला सुप्रधान॥ वाणिय अमिय कर ए, देखत तनु र ए ॥३॥ दीपक जेम दीपंत, आपण पर दीपंत॥ अवगुण सविदह ए। गुण गौरव लह ए ॥॥ श्री गुरु कहीये देव, जेने सेवे देव ॥ अन्नगति मीये ए, आण न खमिये ए | ॥५॥ ढाल फागनी ॥ श्री गुरु समतुल ममतुल, दिनकर निशिथ प्रकाश॥ हिम करन करे दिनपह, | पवन न दीप उल्हास ॥ए जग दीसे उत्तम, उपम देशत हो ॥ सर्व थकी गुरु जामलि, श्राम
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Voodo/PDOOD/
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दीपिका
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| खरे नहु कोश६॥ ॥ढाल अढीयानी॥सविसुख तणा उपाय, प्रणमुं तेहना पाय, हरख हीये धरी ए, |81 दी. मंदमति परिहरी ए॥७॥ पामी सुगुरु पसाय, आण वहु जिनराय। पुलह ए कही ए, तेहज में लहीए ॥॥ ते श्रुत आधार, ए वचन मन धार॥ श्रुत आराधिये ए, शीवसुख साधी ए ए॥हा॥ गुरुपय | पणमी जिनतणी, उवह पामी आण ॥ श्री पार्श्वचंड सूरि विनवे, आगम मुज प्रमाण ॥१०॥ ॥ ढाल ॥ हवे कहीये आगम नणिय सीख, म विराधो दुल्लह लहिय दीख ॥ जन अश्य काले | आगम विराधि, पमिया अनंत नवजल अगाधि ॥१९॥ पमशे अनंत आगामि काल, बहु पमता संपर मन संन्नाल ॥ आराधि सूत्र सीधा अनंत, सीकस्ये तासु न लहिये अंत ॥१२॥ बहु सीके हमणां एम जाणि, समवायंगे चोथे वखाणि ॥ तेह काल संख ग्यार अंगे, बोली डे जाणुं मन रंगे ॥१३॥ उद्देश पमुह किरिया विशेष, अणुयोगबारे बोल्या अशेष ॥ विणुकालग्रहण सकाय शुद्ध, नहु बोली उत्तर जायण मज्ज ॥१॥ आसायण श्रागमतणीय टाल, मन वयण काय जिन | आण पाल ॥ आवरण नाण देसणह बंध, पंचमे अंगे नाप्यो प्रसिद्ध ॥१५॥ जे एम तो मुणिवर
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१५॥
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ParvanesamvowerPowereamuRATHIVARNEWateway
| पत्नणंत ॥ गीयच वयण श्रावय सुणंत॥ जेम साहु तेम साहुणि विचार, वेदंतरि अंतर इणे प्रकार | ॥१६॥ पर्याये बहुमो जेय जोय, मुनि साहुणिने वंदेवो होय ॥ नहु बेद पुत्व वांचे नणे, आयस्थि || | मुखे विधिशुं सुणे ॥१७॥ साहुणी प्रवर लखणाहि नाण, ए विधि जाणे विच्छेद गण॥ तेह पम्वो | चम्बो कर्मदोस, ए वचन म मुखसि रागि रोस ॥१०॥ आगम विधि लोपी धर्मदाण, ए वचन सहु | करजो प्रमाण ॥ श्री आगम नमतां हुए आणंद, कर जोमी पत्नणे श्री पार्श्वचं ॥ १५ ॥ ढाल ॥ | सनिलो शीख हवे उत्तम श्राविया, पुन्य संयोगे नव मानुष्ये आविया ॥ दसह दृष्टांतहि जनम | | ए दोहिलो, कर्मवशे तुमने ए थयो सोहिलो ॥२०॥ तत्थ वली थारिय खेत्त उत्तम कुलं, जा | रुवाइ सयलंपि अति निम्मलं ॥ साहु साहुणि सामग्री पामी करो, देव गुरु धर्म अशम्म निय | मन खरो ॥२१॥ दंसण नाण चारित्त रयणत्तयं, आगम परख करी परख दिढ बद्धयं ॥ वळीय कर || बुट्टते कत्थ पाविऊ ए, पुग्गला संख मणुयत्त जाणिक ए॥॥ जाणिए अंतरो म कर मन पंतरो, | दाखव्यो आगमे एह पटतरो ।। शुद्ध सम्मत्त मिच्चत्त जुअ जुब करो, पाली सम्मत्त संसार सा
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पर तरो ॥३॥ देह संबंध तिय गारवा परिहरी, नाविय नावना अशुचिनी मनधरी ॥ बार जे || सु० दी० श्रोत्र ते बार तनु मल अवे, देह नारीतणो शौच ते केम हुवे ॥२४॥ मंस पेसी जीसी जुवई जो| खम घणी, संखगुण नरथकी नारी आगम नणी ॥ पापनी राश बहु वास आवी मले, स्त्रीतको | वेद सुद दतो संपळे ॥२५॥ कर्मबले महबले सबल माया करी, तित्थकर रूप नृपकुनघर || अवतरी॥ पुत्रिका मलि ए गरुष अछेर, जश् पण स्त्रीपणो एह नढेर ॥ २६ ॥ पूर्वला मित्र बह परणवा बाविया, अशुचि तनु दाखवी परमपद गविया ॥ हरि प्रत्ये दीकरी दासी थाशं कहे, वसिहि कोलीतणे पमिय परिनव लहे ॥२॥ इणिपरे नारि अवधार परवस सदा, | विरह वली वरतणे प्रगट परमापदा ॥ जाण एम टाल ऋतुकाल श्रासातना, श्रुततणी तुम नणी न हुए नवयातना ॥२॥ उहा ॥ असा सजाय जे, नणे गुणंत सुणंत ॥ ते नारी बहु नव जमे, श्री पार्श्वचं पत्नयंत ॥रणा ढालदिऊढीनी॥ जाणीय पुष्प प्रवाह, अवसर अवसर, संनारे त्रिजुवन धणी ए॥ इंश्ये धरे बहु दाह, धिगु धिगु नारीय, नारिय कमें जिन नणी ए॥
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रहे रहे दिन च्यार, आगम अक्षर, अक्षर मुखहि न उचरेए ॥ नावे सनामजार, । बिवश न कांश्य, लाज का श्रति घणी करे ए ॥ ३०॥ समूहिम नरवाण, चजदह थानक, पनवणे जिन उचरे ए, तेहनी उतपति जाणी, जयणा निय मन, नियम निरतिशुं खप करे ए; श्रोरालिय दस जेद, बोलिय गांग, असकाइ ते टालवी ए॥ वळी वखाणे बेद, आप इसी जिम, जननी जिननी पालवी ए|३१| सूत्र तणो व्यवहार, जिपवर नाखिय, साखिय जाणो शिवतणो ए ॥ त्रिभुवननो आधार, एह म विराधो, साधो स्वास्थ आपणो ए ॥ होशे मूरख कोइ, कुमतियें नंकित, कुरु पंकित जाखशे ए ॥
दुषण नतु कोइ, आ किसीपर, सूत्र विराधक राखसे ए ॥ ३२॥ ग्रंथे जाख्यो दोष, मुनिवर जिनवर, प्रतिमा श्रगल नहु फिरे ए ॥ नाणे मन संतोष, इसे न बोल ए, वाचा संवर बहु करे ए ॥ निंदे गरहे आप संचालि स्वामिय, पानिय शासन ताहरो ए ॥ केके पमियो पाप, संयम तपविणु, काल निफल ए माहरो ए ॥ ३३ ॥ जंगम तीरथ साधु, विहग तणीपरे, विहरत श्रव्या कोइ कहे ए ॥ ए मोटो अपराध, काल विलंबण, नारी वंदेवा लहे ए ॥ एणे अवसरे मुज होय, मरण कि
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॥४७॥
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वारे, तो जश्ये निःसंबलाए।एह ध्यान जसु होइ दिन दिन दीप, चमतीचमतीत सुकला ए॥३४॥ | परदरसणे पण साख, ऋतु विण मैथुन, जे नर सेवा नितु करे ए॥ब्रह्मघात तसु दाखी, जे ए अवगुण, | | नारी नहु निज तन धरे ए ॥ तो न होय ब्रह्महाणी, कश्ये पण किमे, कीधां कर्म न बुटियें ए| ॥ एक तप संयम प्राणी, श्रुत आराधन, साधन शिवसुख पामी ए॥३५॥ ढाल काव्यनी ॥ श्री वीतराग तुम शासन ए सुचंग, सिद्धांत आराधन धर्म रंग ॥ टालंत श्राशातन दोषनारी, ते मुक्ति पामे नरवृंद नारी ॥३६॥ जिनेनी वाणी सुधा समाणी, नरेंद्र देवेंज सहु वखाणी ॥ हुँ। विनवं जोमी बेबेवि हाथ, होजो सदा श्री अरिहंत नाथ ॥३॥ प्रनात उठी सुणीये तमारी, वाणी तणा नाव दिये विचारी ॥ तहत्ति जाणी जिन आण पालुं, संसार संचार अपार टालुं ॥३०॥ | "कलश" इम दोष जाणी दिये आणी श्रृत आशातन टालशे॥जिन नाम निर्मल सलिल पामी पापपंक पखालशे। जिन वचने राचो कहे साचो श्री पार्श्वचंद्र कृपा लही। गुरुतणीय सुको नविय बुझो रिद्धिसिद्धि लहो सही॥ ३५॥ इति श्री सिद्धांताराधनकोनचत्वारिंशतिका ॥
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॥४७॥
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॥अथ श्री शीख दीपिका ॥
सुण सुण कंतरे शीख सोहामणी ए देशी. ॐ श्री परमगुरुन्योनमः ॥ सुदगुरुनाखरे नवियणसांनलो । पालेशीलजेतसुकुल निरमलो । | निरमसोमनही वचन काया, शीलपालेजेसहीं। बलिहारिजाउं एकजीने, तासगुण नसकुकही। इणकालेंथोमा रहसि रहता, नारिनरयोगेंमिले । थूलनाजिम विरतिराखे, वेदकर्मविणुटले ॥१॥ जातिकुलवतनीरे खळा जेवहे । ते मनध्यावतरंधीनिरवहे । निरवहे उत्तम देशविरती, जीवगणेपंचमे। बसत्तमसर्व विरती, एहथीनहुयातक्रमे । नबनला जे साहुसाहुणि, वेदसहित ते नाखीया । जगन्नाथागमता तेणें, धन्य जेणे व्रतराखिया ॥२॥ रूपीलखणा जिमजे नदुकहे । मननोचिं. तन उनमल किमसहे । किमलहेनिरतो, कहेनिरतो जेम लोकें प्रौपदी । नारदंपूव्यापंचसाचा,
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सु० दी
दीपिका
शीलनिरमलसुरनदी । सहकारवाव्यो वृद्धिपाव्यो, पत्रपुष्पफलेनस्यो। ततकालमहिमासत्यकरो,
शीलआपणउद्धरयो । ३ वेद उदयजे आवे नावना । तसुव्रतमोहोळयुंकीइनहीतिणविना । तिण॥४८॥8॥ विना उत्तम काल जेणे, तेहकेवल सिरिवरया। उवसांतमोहें चीनपड्या ते अणुत्तरअवतरया।ध
|नधन्य तेपिण विरतिपाखे, पंचमअंगे अविरती। उपसांतमोहा कह्याजिणवरें, सीमस्ये गतिश्राव-|| | ती॥४॥ वेद सुवेदी पाले शीलजे । आगलपामे मोटी लोलते । तसलीलमोटी, पवि कडोटी, | कालपंचम जेहनी । मंमिज्यो उत्तमकाल सरिसी, शीलरेखा तेहनी । तसुनाससमरण जाएपातिक, बंन धरज्यो तनखरो । मनवचनजयणा नणे श्रीपार्श्वचन्मसूरिजमशिवरमणीवसे ॥५॥ इति श्री शीलदीपकस्वाध्यायः संपूर्णः॥
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-8॥ अथ श्री आगम त्रीशी॥
॥ ढाळ पेहेलो ॥ चोपाइ छंद.॥ सुहगुरु चरणकमळ प्रणमेसुं, प्रवचन गुण हुँ केवि कहेसुं ॥ श्रुत वीजक जोइ जाणोये, | नाम ग्रंथ संख्या आणिये. ॥१॥ आगे जिणवर गणधर काल, आगम हूंता अति सुविशाल ॥ | मुनिने मुखपाठे आवता, खिण खिण दीगग ते खीजता. ॥२॥ पंचमकाल तणे परमाण, विद्यावंत तणी बहु हाण ॥ देवढिगणिए जाणि करी, श्रुतरागे शुन्न मति मन धरी. ॥ ३॥ हिवमां एक पंचम अरो, दसम अरो वलि उत्तरो ॥ नस्मक ग्रह महिमा गहगहे, ढुंमाअवसर्पिणि तिह वहे ॥४॥ सदा काल संततो मिथ्यात, पंच मलि ए करस्ये घात ॥ त्रिजुवनतारक जिन मत | तणो, आगम तेहनो उठनणो ॥ ५॥ आगम समरथ सुख दातार, आगम तीरथनो आधार ॥ आगम जामलि को नहीं, आगम महिमा मोटी कही ॥६॥ श्री जिन आगमने आधार,
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आगम
आ००
छत्रीशी
।। ४९
VaiDRDOcead/DBAPUmar/ROVIDADAMODADI
| अनंत जण पहुंता नवपार ॥ वनि अनंत मुक्ति पहुचशे, सब कर्मनो बल वंचशे ॥ ७॥ हि-|
वमा जे पहुंचे इण काल, ते पण आगम मत प्रतिपाल ॥ थोमे बहु बहु सुं नाखिये, ऋण कारण आगम राखिए ॥७॥ बहु आगम विवित्तियें गया, जे जे ते पण थोमां थयां॥ एटला पण जे किम रहे, तो जन सूधो मारग लहे.॥ए॥ श्म लिखि श्रुत बह जयणा करी, कर्यो काज तीरथ उधरी ॥ देवढिगणि जयो गुणवंत, क्षमाश्रमण वंषु नगवंत ॥ १०॥ पहेलु श्री आवश्यक नपुं, बह अध्ययने गुण संथुगुं ॥ (१२५) पंचवीस अधिको शत एक, ग्रंथमान जाणे सविवेक ॥ १॥ दस अध्ययन पुन्नी चूलिका, पाप रोग वारण मूलिका ॥ दसवैकालिक श्रुत (Fav) सातसें, तसु नामे मुज मन जबसे ॥ १५॥
॥ ढाळ बीजी ॥ गौतम स्वामीना रासनी, वीर जिणेसर चरणकमल कमला कय वासो, एराग ।। उत्तराध्ययने सहसपुन्नि (२०००) अध्ययन(३६)बत्रीस,तासु नाम गुण मंत्र जिमसमरूं निसदीस॥ आचारंगे (२५)पंचवीस अध्ययन संन्नार, बिह खंधे उद्देस () असी वली पंच विचारूं ॥१३॥ सत्तब
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१०
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च च हृद्य पंचम (८) चन
केरा, एगारस तिति दुडु दु दुन्नि इक सरग अनेरा ॥ सोल उदेसा एक पण की धोविच्छेद, नहु लिखियो किए हि विशेष ते न लहु नेद ॥ १४॥ पंचवीशसत ग्रंथ मान (२००) दिवे बीजो अंग, सहस दुन्नि (२०००) जसमान तेय सिरि सूयगभग ॥ चन तिति दुदु इम पंचलगी चउदद 'उद्देसा, इक सरगा अध्ययन अवर वीस असेसा ॥ १५ ॥ गणांगे अध्ययन जाए दस पनर उदेसा, तिन्नि सहससय सत्तसही ( ३७६० ) जिह बहु विसेसा ॥ चोथे अंगे एक थकी समवाय विचार्या, कोमाकोमी सीम सुगुरु वचने मन धार्या ॥ १६ ॥ एक खंध एक सदस बसय सत्तसहि (१६६७) परिमाणे, एहना जे बे नाव तेह गीतारथ जाणे ॥ पंचम अंगे सतक संख ए| कसो अमतीस (१३८), उद्देसक तिह एक सहस नवसय पंचवीस (२०२५) ॥ १७ ॥ पनर सदस यस सहि (१६०) ए ग्रंथ प्रमाण, बठे अंगे खंध दुन्नि तिह पहिले जाए ॥ एगुणवीस (१५) न्याय के बीजे दस वग्ग, धम्मका हु कोमी तिह मिलिय समग्ग ॥ १७ ॥ ब सहस (६०००) संख्या ग्रंथती दिवे सत्तम अंग, खंध एक अध्ययन दसय श्रावक गुण चंग ॥ अमसय बारुत्तर
ककक ककककक
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आगम
छत्रीशी
॥ ५० ॥
(१२) प्रमाण अंग अहम जाएं, यह वग्ग अध्ययन नेवु तसु विगत वखाणुं ॥ १०९ ॥ पहिले दस बीय वग्गि तेरह तह त्रीजे, दस चोथे दस पंचम ए बठे सोल गणीजे ॥ तेरह सत्तम म ए दस एह प्रमाण, अमंग अध्ययन तो जाणो न वियण जाण ॥ २० ॥ नव छाधिक सय (८०) ग्रंथ अनुत्तर उववाइ, नवम अंग (१०२) सत एक उपर बाणु कहाई ॥ त्रण वर्ग दस तेर दसय अध्ययन तेत्रीस, दसम अंग परिमाण कहेशुं मन आणी जगीश ॥ २१ ॥ ॥ ढाळ त्रिजी ॥ जमावसीनी देशी ॥
जिद व संवरनो विचार, तिह बोल्या दस अध्ययन सार ॥ बारहस्य साढा (१२५०) ग्रंथमान, पन्ढ्वागरणंग सुगुण प्रधान ॥ २२ ॥ दुख ने सुख नाना विभाग, जसु श्रवण टले संसार राग ॥ बारहसय सोल (१२२६) अध्ययन वीस, अगीयारमांगे मन जगीश ॥ २३ ॥ दवे कहियेबे बार जवंग, ते सुणो जवि मन धरी रंग ॥ उववाइय पनर सय (१५०० ) प्रमाण, तिद मयि वंदन गण ॥ २४ ॥ वली रायपसेणी सहस दुन्नि, मसत्तरी (२०१८) अधिका धरु
आ०छ०
५० ॥
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मनि ॥ हिवे जीवानिगमे सहस च्यार, सय सत्त (UID0) ग्रंथ संख्या विचार ॥२५॥ सग स. | हस सत्यासी अधिक सत्त, सय () पन्नवणा नावे विचित्त।। चनसहस तहा ग सय ब्याल, | (४१४६), जंबुद्धिपपन्नत्ति गुण विशाल ॥ २६ ॥ दो सहस दुन्निसय (२२००) ससिपन्नत्ति, दो स| इस दुन्निसय (२२००) रैविपन्नति ॥ हिवे पंच उवंगे सत अगियार, नव (११०ए) अधिका तिह
बहुला विचार ॥ २ ॥ तिहां पहेलो निरयावलि जाण, अध्ययन दस महिमा वखाण ॥ दस | इयणे कप्पवमंसयाय, त्रीजो दस ऊयणे पुफ्फियाय ॥ २७ ॥ पुप्फचुलिय चोथो ए उवंग, अ-| | ध्ययन दसय बोल्या प्रसंग ॥ वन्दियदसा पंचम विचार, अध्ययन बार नव नव प्रकार ॥शए॥ |श्म पंच उवंगे पंच वग्ग, अध्ययन मली बावन समग्ग ॥ हिवे छेद ग्रंथना कहिस्युं नाम, ते | समरि समरि करीयें प्रणाम ॥ ३०॥
१ चंद पन्नति. २ सूर पन्नति.
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आगम
छत्रीशी
॥५१॥
॥ ढाळ चोथी. स्वामिओए वीरजिणंद पुनिमचंद जिम उलसिय- एराग ॥
सय ए पनर (०१५) निशीथ, वीस (२०) उद्देसा सवि मीलीए ॥ शीखवे ए सुगुरु निशीथं सीस उत्तम मन खटकलीए ॥ त्रितरी ए अधिक सत चार (४७३) वृहत् कल्पे उदेस बद, बयें ए ( ६०० ) श्री ववदार दस उद्देसा गुण गुहिर ॥ ३१ ॥ श्रुतदसा ए अढारसय त्रीस (१०३०) जिए मणिया दस अयण, अगियारसें ए उवरि तेत्रीस (१९३३) पंचकल्पे बहुगुणरय
॥ बट्टो ए महानिशीथ ( ४५००) च्यार सदस्स सय पंचहिय, एटलो ए जेहनो ग्रंथ एकहत्तरी उद्देस सहि ||३२|| एहनो ए जे परमथ्य ारतें सुद्गुरु कहे ए, तेदनो ए जाव गीयथ्य निरतो गुणनिधि गुरु लए ॥ उद्धर्यो ए पंचमकाळ बहुअ आचारजें इम कह्योए, नहु मिले एतसु अंतराल बंयि मिलतो संग्रह्योए ॥ ३३ ॥ सातसें ( 900 ) ए नंदीविस्तार इक उणा उगणीससय, एटलो (१००) ए अनुयोगद्वार बहु पन्नाश्रुत जणीय ॥ ते सहु ए मुज प्रमाण जे आगम
१ रात्रिमां ४ मध्यरात्रिमां
आ०छ०
।।५१ ॥
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सरिसा मिलेए; प्रकरणु ए जे जिनवाण ते आगम जामलि तुलए ॥ ३४॥ चउदह ए पूरवधार दस पूरवधर जे कह्याए, तिह नही ए कोई विकार केवळी जिम ते उच्चाए ॥ दसथकी ए पूरव उण तेह विसे नजना कहीए, किमकहु ए नाण विहूण श्म ने श्रुत नाख्यु सहिए ॥ ३५ ॥ | (कलश) इणि परे सुविशाले पंचम काले जेआगमगणि उद्धरिय, पुस्तक लिखिराख्या जिनवर ना | ख्या नवियण हितकारण करिय ॥ तसु नाम पमाणं गणि पहाणं बीजकजोइ स्मृति नणिय, || |ए चिहुंवर बंदे मन आणंदे पार्श्वचं सूरि दे जणिय ॥ ३६॥
+* ॥ अथ श्री गुरु त्रीशी
चोपाइ छंद. ॥ रिपन्न प्रमुख जिनवर चोवीस, विहरमान तिर्थकर वीस ॥ विचरे दुन्नि कोमी केवली, || || प्रह उठी वंदो मन रली ॥१॥ साधु शिरोमणि विसहस कोमि, ते नितु प्रणमो बे करजोनि ॥ | B| कर्मभूमिका पनर मांह, जघन्य पदे बोख्या जगनाह ॥२॥ तसु पयकमल अमर जिम लीण, ||४||
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दुसमकाल अतिसय हीण ॥ कर्मयोग नरतें अवतों, बहुमत देखी संशय नर्यो ॥ ३ ॥ ते संशयनो नंजणहार, एक अरिहंतज जगदाधार ॥३॥ हिवमा तेहने विरहे करी, असंयति पूजा विस्तरी॥४॥ मामा थया वरस सय सात, विरला जाणे प्रवचन वात ॥ कीधा कल्पित ग्रंथ अनेक, प्रवचन प्रकरण नाषे एक ॥ ५॥ श्रीश्रुत ढांकी मूक्यो पूर, प्रकरण कहे उगमते
सूर ॥ अव्यत देव गुरु धर्म कह्या, नोळे नावतणे ब्रमे ग्रह्या ॥ ६॥ एक गमे चोरासी थया, || मांहो मांहे सहु जुजूवा ॥ निज निज चैत्य संघ मन वस्यो, एह किम लाने सासन क- | || स्यो ॥ ७॥ पमियो लोक गामरि प्रवाह, राशिबद्ध जिम ताएयो जाय ॥ परदरशन जे दी|गे बहु, नाम फेरि ते मंगयो सहु ॥ ॥ एक कहे प्रतिमा एकली, घर पूजंता न हूवे नलीम-| |लि नेमि श्रीवीर जिणंद, जिणदी हुवे परमाणंद ॥ ए ॥ तेहनी प्रतिमा घर नाणियें, श्म || || कहेतां किम गुरु जाणीयें ॥ एक कहे स्त्री पूजे नहीं, दोवर पूजी श्रागमे कही ॥ १० ॥ एक जैन जोमावा गणे, लान हानि जिन पूज्ये नणे ॥ करे प्रतिष्टा आपणे हाथ, करे जात्र
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14॥५२॥
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| जळनी जइ साथ ॥ ११ ॥ मुखे जिन प्रतिमा पूजा कही, तेह मुखे वळी बोले नहीं ॥ माहरी ||| |मात अने वांझणी, एह वात जेणे साची गणी ॥ १२ ॥ बोले निज निज गुरु अवदात, बह | कायनो जिहां घात॥एक कहे वरसाव्यो मेह, रोग रहित कीधो निज देह ॥१३॥ नोंय उपर थाण्या श्री पास, तो तेहनी तेणे पूरी श्रास ॥ एहवा वोल अनाहत कहे, मुग्ध लोक कांश नवि. लहे ॥ १४ ॥ आराधि एके चामुंग, तेणे जे कीधो पाप प्रचंम ॥ तेह वात तो में न कहाय, नोळाना तेहज गुरु थाय ॥ १५ ॥ नदीमांही पेसी साधियो, बलि बाकुल सुर आराधियो॥ जीव तणी हिंसा नव गणे, तेहने पण गुरु गुरु मुख नणे ॥१६॥ एक कहे बांधी वीजली, अमावासनी पूनम करी ॥ वम उपामी चलाव्यो साथ, जिन आशिस दिये निज हाथ ॥ १७ ॥ श्म
१॥ तिथ्योगाली पयन्ना मध्ये ॥ हो हिंतिय पासंडा, मंतख्खरकुहग संपउत्ताय ॥ मंडल मुद्दा जोगा, दंस उच्चाडण परायददं ॥ १॥ ते हिं मुसिज्जमाणो, लोगो सच्छंद रइय कन्वेहिं ॥ अवमग्गिय सम्भावो, जाओ अलिभोय पलिओय ॥२॥ हो हिं ति साहुणो बिय, सपख्ख निरावरुख नियाणियं ॥ समण गुण मुक्क जोगी, के.ई संसार च्छेतारो॥३॥ हिति हीति गुरुकुलवासो, मंदाय मतीय समण धम्ममि ॥ एयंतं संपत्तं, बहु मुंडे अप्प समणेय ॥४॥
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॥५३॥
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| कहेता हुवे श्रासातना, तेहने बोलो सुप्रनावना ॥ कणयरनी कंबा फेरवी, सौगतहणी यात्रा का
साधर्मीना नोजन नणी, संघ तणे मन आरति घणी ॥ ताण मंत्री बहु घृत - ०० | णीयो, तिणे ते साचो गुरु जाणीयो ॥१॥ लोक कुगुरु धूते धूतियो, मिथ्यामत वाहिणी जोत्रीयो | कल्पित ग्रंथ पुराणे करी, वहे मान खंधे धूसरी ॥ २०॥ राग दोष तेणे कर्यो प्रमाद, पण जे |
नाखे ए विधिवाद ॥ पंचमें अंगे प्रगटज कह्यो, तेय नाव तेणे नव लह्यो॥१॥ विण आलोवे || || काल करंत, ते अणगार विराधक हुँत ॥ विधि वादे आलोयण नहीं, एह मर्म ते न लहे सही है।
॥२॥ एवं आदि कहिये केटला, बहु विरुद्ध दीसे जेटला ॥ पण देखाड्यो वानकी मात्र, | थोमे बहु जाणो मति पात्र ॥ २३ ॥ दसमो अछेरो गहगहे, विरलो कोश्क मारग लहे ॥ श्ण अवसर गुरु पण दोहिला, साधु किम लाने सोहिला ॥ २४ ॥ जगन्नाथ तीरथ जगमगे, | वरस सहस एकवीसह लगे ॥ ते प्रवचनने आधार, गुरु सुसाधु तेने अनुसार ॥ २५॥ सुधो | नासे ते गुरु जाण, जे पाळे ते साधु वखाण ॥ पाळे पण साधु नवि कहे, समकित विन चारित्र |
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५३॥
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किम लहे ॥ २६ ॥ सूधे कहिवे दंसण सही, चारित्रनी तिह नजना कही ।। श्ण कारण प्रवचन । लखो. शिवपुर जाता पठी रखो ॥२॥ दस पुरव लगे सूत्र कहाय, निन्न विषे तसुनजना थाय॥|||| |इस्या वचन गुरु मख सांगली, प्रकरण सूत्र एक मति टली॥२७॥ वली जे सत्र संघाते मले. ते || प्रकरण आगमसम तुले ॥ मलतो अणमळतो जे हुस्ये, श्रुत सांजलि बहुश्रुत जाणस्ये ॥ए ॥ रागी मति कल्पी बोलिये, वीतराग वचने तोलिये ॥ एह असमंजस जे कोई कहे, मारो हुवे ते किम सद्दहे ॥ ३० ॥ इण कारण जिन नाषित सही, श्ण जामली कां बीजो नहीं ॥ तेह ने जीवाजीव विचार, एक एकना घणा प्रकार ॥३१॥ तेह तणो हुँ पार न लडं, सारजूत परमारथ कहुं ॥ विधिवादे हिंसा उपदेश, मिथ्यामतनो एह निवेस ॥ ३ ॥ जे उपदेशज डे निर वद्य, विधिवादे ते लहे सावद्य ॥ धर्मारथ कामारथ सही, हिंसा लव जिन वचने नही॥ ॥ ३३ ॥ एह साख श्री आचारंग, अध्ययन चोथे बोले रंग ॥ धर्म मूल समकित अधिकार, जोर लेज्यो चतुर विचार ॥ ३४ ॥ श्री जिन बहकाय हितकार, जगजीवन जगना आधार ॥
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है| सवि त्रस थावरना दुख लहे, आप समाणी वेदन कहे ॥ ३५ ॥ इस्यो जाणी कोहणीये नहीं, |
|| वाणी मधुर जिनवरनी कही ॥ जे नाखे तेहने अनुसार, ते साचो उपदेश विचार ॥ ३६ ॥ ॥५४॥
एह वचन साचा सदहे, नवियण आगळ साचा कहे ॥ तेह सुगुरुनो समरी नाम, पार्श्वचंद्रसू|रि करे प्रणाम ॥ ३७॥
.* ॥ अथ श्री पाखी त्रीशीर
॥चोपाइ छंद ॥ प्रणमीए पहिलो वीर जिणंद, नविय कमल पमिबोहे दिणंद ॥ पत्नणेसु पाखी तणो विचार, करी साख जिन आगमसार ॥१॥ के कहे पाखी चजदसे, के कहे पुनम अमावसे ॥ श्हनो निर्णय तो जाणीये, जो प्रवचन हियमे आणीये ॥२॥ पनर दिवसे जे बोल्यो पद, काल सरुप ते जाणे दद ॥ पाखी नाखी पोसह काज, दिन गणवे ते नहु जिनराज ॥३॥ पाखी मासे मासी, पक्षे पहुंचे किम चनमासी॥पंच दिवसे पाखी थको, संवत्सर बोली किम शको॥४॥
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॥३॥ पाखी प
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| संवष्ठर हुँत्ती दस दीह, किम हुइ पाखी जो निरीह ॥ अष्टिराग जे नव मुंकस्ये, सत्य वचन ते जन चूकस्ये ॥५॥ प्रगट नाम जिन आगम लहो, दिन गणवा किण कारण कहो ॥ पर्व जा.
णी पोसह पालिये, दिन गणवानो ब्रम टालीये ॥६॥ दिन गणतां आवे चउदसी, मुख कहिये | | पुनम अमावसी ॥ प्रगट मृषा ए लागे सही, करिये अवर अनेरो कही ॥७॥ जिण तिथिमाहिं | सूर उगमे, तेहज दिन अहनिशि संक्रमे ॥ उदयिक तिथि ते करो प्रमाण, मूल सूत्र ने एहनो गण ॥७॥ चंद सूरपन्नत्ति उवंग, नगव नामे पंचम अंग ॥ पमिकमणा वेला डे जिहां, सूत्र साख विणु कहिये किहां ॥ ए ॥ आंतो परक नणि पूनमे, पाखी पमिकमणो अम्हगमे ॥ एम | कहे ते न लहे सही, अंतो कहेतां अंतज नहीं ॥ १० ॥ मध्यतणो इह जाणो अत्थ, गुरु पूडी जाणो परमस्थ ॥ श्रृत नाखे माणिस संदेह, अंतो म कहि पक्षनो बेह॥ ११॥ अंतो जे श्राव्यो अवसाण, तत्ते एक मात्र तो जाण ॥ वयण विन्नत्ति होय सत्तमी, एक वचन जाणे संजमी॥१२॥ मात्र सहित कानो ने जिहां, वयण विन्नत्ति कांइ नहु तिहां॥ शब्दशास्त्र अध्यय पद एह, अर्थ |
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विचालानो ठे तेह ॥ १३ ॥ चउदस अने अमावस वेव, बीजे पखी पूनम मे लेत्र ॥ बिहुँ दिवस जे पोसह हो, पाखी चनत्य किसी परे जोश ॥ १४ ॥ कयो उ चोमासा नणी, बिहुँ दिवसनी संख्या गणी॥ एक चौदस बीजो पूनमे, बे उपवास हुए अनुक्रमे ॥ १५ ॥ पंचम अंगे शतक पनरमें, जाण्यो चोमासो पूनमे ॥ पनवे दिन श्रीवीरविहार, साधु सहुनो एह आचार ॥१६॥ | निशि पमिकमणो दिन न कराय, दिन पमिकमणो निशि न थाय ॥ पाखी चौमासी दिन केम,
चौमासी पाखी दिन एम ॥ १७॥ पाखी चौमासी जूजुवा, ज्ञक पमिकमणे बे किम थया ॥ | देसी पाखी नहु मूकिये, त्रिहुं पाखीथी किम चूकीये ॥ १०॥ चौमासी पामकमणा तिन्नि, देसी | पाखी मलिया दुन्नि ॥ त्रीजो चोमासो जोश्य, जुगते करी जुगतो होश्ये ॥ १५ ॥ अहमि | चौदसि ने उद्दि, पूनम आगम ए दिन दिउ॥पोसह श्रावकने अधिकार, चरित यथास्थित एह | विचार ॥ २० ॥ विधिवादे ए नहु उपदेश, जिनविधि ऊणो अधिक न लेश॥पाखो संखे पोसह | कीध, पुरुखलोसाहमीभोजन दीध ॥१॥ कुमर सुबाहु पोसह बहु, विपाक श्रुत ए जाणे सहु ॥
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PORANDERADIOSIO/mo/S/Batomaa
करतो चिहुँनें गमें बार, पोसह त्रिण नंदमणियार ॥ ॥ तिण कारण ए नहु विधिवाद, श्ण दिवस परिहरि प्रमाद॥कीधा करतां पोसह थाय, सह यथास्थित चरित कहाय ॥२३॥ पोसह करवानी विधि जाण, काल ते सघला दीह वखाण ॥ उत्तरमयण नएयो पंचमे, जिनवरवचन | कवण अतिक्रमे ॥ २४ ॥ अरिहंत तणा महा कल्याण, दिदा ज्ञान अने निर्वाण ॥ ए उचित | पोसह अधिकार, पूनम त्रीहुँ चोमासे सार ॥ २५॥ सूत्रअर्थ जगमांहि अदोन्न, चौथे अंगे | दीधो थोन॥ सूयगमांगने अर्थे जोश, श्रुत मिलतो माने सहु को॥२६॥ नव पूनम बार अमा-| | वसी, पाखी बुद्धे नहु मन वसी॥ण कारण पाखी चउदसे, जाणी जोश कसी आगम कसे ॥२७॥ | पर्युषणाथ सित्तरी दीस, चौमासी पमिकमण जगीस ॥पने प्रथम सित्तरि पंचास, चोथे अंगणह |
प्रकाश ॥ २७ ॥ चोथ करते एक अधिको थाय, जिणवर तणी बाण लोपाय॥ एक दिवस तिण | पालो कर्यो, पाखी नाम तिहां उच्चर्यो ॥२५॥कल्पसूत्रनो जेहले अत्थ, तेह थकी जाणो परमच्य | ॥ संनल वली दसासुयख्खंध, वर्धमान जिनवर संबंध ॥ ३०॥ मल लच्छगण, राय अढार,
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पाखी
॥५६॥
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निरतिचार बारह व्रतधार ॥ तण थाप्यो पोसहमावसे, वीरनिर्वाण थया तिण मिसें ॥३१॥ | हिव गया जिन नावउद्योत, करीस्युं इहां अव्यन्योत ॥ दीवा कहतां श्रुति नहु मिले, || ||० सू० श्रावक श्राश्रव ढुंती टले ॥ ३५॥ थाप्यानो वली स्युं थापिये, कीधानो स्युं करी आपीये ॥ हुँतो पोसह पाखी नणी, तो थापे स्युं गणना धणी ॥ ३३ ॥ उदिढे कल्याणक सर्व, पूनम चोमासानो पर्व ॥ श्ण कारण पाखी चउदसे, जाणी म पमिश मतने वशे ॥ ३४॥ जलधि वृद्धि | नागादिक नत्ति, शेलग जतणी बहु सत्ति ॥ तिहोद्दिक श्रमावस कही, लौकिक लोकोत्तर श्क | नही ॥ ३५ ॥ पंचमी पोसह संवधरी, केम करे श्रावक संवरी ॥ चिहुं तिथि अधिक पर्व न | होय, चतुर चेत चित्त चिंती जोय ॥ ३६ ॥ अनिनिवेस नवियण परिहरो, आगम ऊपर श्रादर | करो ॥ पाखी चौदस दिन सद्दहो, श्री पार्श्वचंडसूरि सुख लहो ॥ ३७॥
॥५६॥
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॥ चप्रथ सज्जाइ विचार. ॥
साइ क्यारे क्यारे ने क्या क्यां सूधी लागे बेतेन विधिनीचे मुजब बे:आकाशनी अंदरथी ज्यां लगी सूक्ष्म ( जीणी) रज पड्या करती होय त्यां लगी साइ गणाय बे. तथा जेटला वखत लगी घुमस गर्या करतो होय त्यां लगी सज्जार गणाय . धुमस गरवाथी सघली जमीन छप्पकाय ( पाणीना जीव ) मय थइ रहे बे, जेथी ते समय पंचमहाव्रतधारी साधु उपाश्रयनी अंदर कांबलीव सघलां अंग उपांग छाने म्हों वगेरे ढांकी तथा अंगोपांग इलाव्या विना बेसी रहे छाने ज्यारे धुमस गरतो बंध पदे त्यारे तमाम क्रिया करवी, जेथी जीवदया सचवाय बे. तथा याकाशमां देवतानुं करेल गांधर्वनगर | देखाय, तेमज उल्कापात ( तारानुं खरखुं - वीजलीनुं परुवुं, वगेरे उपद्रवीय कारण ) याय, | अथवा उल्का पमतां तेजमय रेषा छाने अजुवालुं देखाय बे ते, तथा कणग एटले जेना परुवा
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असज्झा
विचार
॥ ५७ ॥
पढी रेषा अजुवालुं न देखाय ते, धने दिशिदाह. एटले के दशे दिशा सलगता प्रचंग अनि समान लाल देखाय, ते समयमां पण असज्जाइ लागे बे. एउनुं देखावुं ज्यारे बंध पदे त्यारे एक पोर पढी सज्जा निवृत्त याय बे. तेमज वर्षाऋतुमां 9 कणग, शियाला मां ५ धने उन्हालामां ३ कणग परे तो ४ पोर लगी सज्जाइ लागे बे. वगर समय विजली ऊत्रके तो १ पहोर लगी सज्काइ लागे बे. आषाढी चोमासी प्रतिक्रमण कर्या पी पकवाना दिवसे यसज्काइ लागे डे, ते बीजने दिवसे निवृत्त थाय छे. ( या संबंधी श्री गणांगजीमां चतुर्थ स्थानना | बोजा उद्देशामां कह्युं बे के - " नोक पर निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा चउहिं महा पमित्र हिं सज्जायं करित्तए तं असा पविए १, महपमित्रए २, कत्ति अपमित्रए ३, गिम्हपविए ४ ” कार्तिक चोमासीए पण एज प्रमाणे सज्जाई लागे बे. आशो शूदि पांचमना बे पोरथी मांगी कार्तिक वदी परुवा लगी सज्जाइ लागे बे, ते बीजने दिवसे (असज्जाइ) मटे बे. " चैत्र शुक्ल पंचमी मध्यान्दादारज्य वैशाखवदं प्रतिपदं यावदस्वाध्यायः, अत्रायं विशेष. ” एवीज रीते चैत्र
अoवि•
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शुदि ११ थीमांमी पूनमना दिवस लगी त्रण दिवस "अचित्त रजउमावणी करेमि काउसग्ग” लोगस्त |४d चितवन कर. कदाचित अगीआरसना दिवसे याद न रहे तो बारस तेरस चौदशना दिवसे, तथा बारसे न सांजरे तो तेरस चौदश पूनम लगी चार चार लोगस्स चिंतववा. तेरसने दिवस न सांजरे तो श्रावता चैत्र लगी ज्यां सुधी धूल उमे त्यां सुधी असझा लागे . तेमज ज्यां लगी बे | राजा वच्चे क्लेश चालतो होय, तथा म्लादिकनोनय होय, उपाश्रयनी नजीक स्त्री पुरुष लमे अथवा
होली पर्वनी धून उमे त्यां लगी असताइ लागे . तथा राजाना मरणथी मामी नवो राजा गादीए न विसे त्यां लगीघसकाइ लागे . गाममां कोश्वगर विचार्यु कार्य के विचार अमलमा मूकायो होय | (असमंजस प्रवर्ते) तेनो निकाल जो न लावे तो छ पहोरनी असक्काइ लागे . उपाश्रयथी | सात घर लगीमां को प्रसिद्ध पुरुषर्नु मरण थाय तो अहोरात्रि लगो असकाइ लागे . “ नगर प्रधान पुरुषे मृते प्रहराष्टकं यावद स्वाध्यायः" तथा बीजा सामान्य पुरुषy ममदुं जपामया पली असक्राइमटे बे. तिर्यंच (पशु)नुं क्लेवर उपामी गया पली अप्सकाइमटे . तथा “ श्राचार्य, ||
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अ०वि०
असज्झा विचार
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॥५८
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महर्द्धिक, कृतानसनमहातपस्वि, बहुस्वजनववनमरणे दिनत्रयं यावद स्वाध्याय एकदिनेऽप्युपवास अन्येषां मरणे घ्यमपिन" तेमज तिर्यंचनुं लोही पड्ये, झां फूट्ये, गाय वियाय ने ज्यां मेली पके त्यांथी १०० हाथ लगी त्रण पहोरनी असहा लागे . मनुष्यनुं लोही पड्या बतां उपामी लीधुं होय तो पण एक अहोरात्री लगी असलाइ लागे . तथा ज्यां घणी मेघवृष्टि थश्ने जमीन | धोवा साफ थई गई होय तो थोमी वेला वीत्या पड़ी असलाइ मटे . तथा घमीरात्र बाकी || होय ते वखते मनुष्यनुं लोही पड्या बतां उपामी लीधुं होय तो सूर्य उग्या पडी असजाइ मटे बे. तेमज ज्यां मनुष्यतुं हामकुं पगडं होय त्यां १२ वर्ष लगी असता लागे . तथा दांत दाढ | पमया पड़ी शोध्या बतां न जमे तो “ दंत उमहावणियं करेमिकाउसग्गं.” एम बोली १ नवकार चिंतववाथी असा मटे . तेमज बिलामी लंदरने जीवतो ने जीवतो लश् जाय तो असजाय न | होय अथवा विणासीने लइ जाय तो अहोरात्रीलगी असतारखागे . तिर्यंचनां अवयव तथा
पमवाथी ६० हाथ लगी असजाइलागे .मनुष्यनुं सधिर तथा तेना अवयव पम्याथी १००
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हाथ लगी असलाइ लागे ; पण वचमा गाउँ नीकळी शके तेवो मार्ग होय तो न लागे. तथा|| स्त्रीने महीने महीने स्त्रीधर्म (अटकाव) आवे तो ३ दिवस असलाइ लागे . जे स्त्रीने लोहीवा | होय तो त्रण दिवस रजोदर्शनना वीत्या बतां पण रुधिर वहे तो असलाइ उमहावणि लोगस्स || १ नो काउसग्ग कर्या पनी १ पहोर वीत्ये असलाइ मटे . आगल उल्कापातथी लागती || असा संबंधी लखा गयुं बे; पण जो आओ नक्षत्रथी मामी चित्रा स्वाति नक्षत्र लगी गाज | वीज थाय तो असकाइ लागती नथी. तथा नूमिकंप-धरती धूजे तो पहोरनी असलाइ लागे बे. | तथा आग लाग्यो होय ते न उलाय त्यां सुधी असज्जाइ तथा चंग्रहण ग्रस्तास्त थयेल होय तो | | उत्कृष्टपणे १५ पहोरनी असाइलागे कारण के-उगेलोजचंड असायलो अथवा खग्रास होवाथी | असायलोज रात्रिने अंते अस्त थयो होय तेथी ए पूर्णिमानी रात्रिना ४ पहोर अने पम्वेनीरात तथा | दिवस मली - पहोर, एम १५ पहोरनी असला गणाय . अथवा को साधु न जाणतो होय के ग्रहण क्यारे थशे, मात्र एटझुंज जाणतो होय के आज पूनम दोवाथी ग्रहण थशे; तथापि
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असज्झा
विचार
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वादलां थवाथी चंद्रने प्रथम प्रसायलो जोइ शके नही; पण प्रभाते चंद्रास्त समय प्रसायलो नजरे प तेथी ते रात्रिमा चार पोर लगी ने यवता दिवसनां अहोरात्री मली पहोर १२ नी असकाइ लागे बे. पण प्रस्तास्त के खग्रास चंद्रग्रहण न होय तो जघन्य रीते पहोर छ नी एटले के पूनमनी रात्रीना ते चंद्रग्रहण थयुं होय अने पकमायलो श्राथमी जाय तो अहोरात्रीनी असकाइ लागे डे. पण ते वचमां ग्रहण थयुं होय तो मध्यम असजाइ गणाय बे, एटले के जे रात्रे चंद्र पकमायो तेज रात्रे १ घमी रात्र बाकी रहेतां मुक्त थयो तो सूर्य उग्ये श्रसज्जा मटी जायडे. सूर्यग्रहण होय तो १६ पोरनी असजाइ लागे बे; कारण के उत्पात ग्रहणमां उगतो सूर्यज घेरायो ने घेरायलो यो तो ते दिवसना ४ पदोर, रात्रिना ४ पदोर ने आगलनी अहोरात्री एम १६ पहोर गाय बे. अथवा कोई साधु एम न जाणे के अमुक वखते सूर्यग्रहण थशे, मात्र एटलुंज जाणे के आज ग्रहय थशे. वादल बतां सूर्य उदयथी प्रारंभी सज्जाय बंध पाने ते ४ पदोर तथा अस्त थवा वखते वादल दूर थये घेरायलो व्यस्त यतो जोवामां आव्यो तो ते रात्रिना पहोर
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श्रगामीनी अहोरात्रीना ७ पहोर एम १६पहोर असज्जायनी मर्यादा जे. जघन्यपणे १५ पहोरनी असज्जा लागे. एटलेके अस्त यतो सूर्य घेरायवोने घेरायसोज आथम्यो जेथी ते रात्रिना ४ पहोर अने बोजा दिपसनी अहोरात्रीना पहोर मली १५ पहोर थाय . ए मर्यादानी वचेनो नाग मध्यम असज्जाइ मनाय डे, एटले के जे दिवसे घेरायो तेज दिवसे मुक्त थयो तो फक्त चार पहोरनीज असज्मा गणाय जे.-"पुत्रे जाते शतहस्त मध्ये दिन सप्तकंयावदस्वाध्यायः, पुड्यांजातायांतु दिनाष्टकमस्वाध्यायः, स्त्रियारक्तोत्कटत्वात् "-पुत्रनो जन्म थयो होय त्यांथी १०० हाथ लगी ७ दिवस पर्यंत अने पुत्रीना जन्मस्थलथी १०० हाथ लगी थाप दिवस पर्यंत अस-|
इलागे. तथा बारेमास परपोटा थनारा वर्षाटनी वृष्टिपाय तो अहोरात्र ऊपर ज्यां सधी वरसे || त्यां सुधी असज्जा लागे, परपोटा रहित वरसे तो बे अहोरात्र उपरांत असलाइ, पण न्हानी || फरफर वरसे तो सात अहोरात्री लगी असज्मा लागे. तथा प्रजात-(सूर्येऽनुद्गते), मध्यान्ह, || अस्तमन समय अने अर्धरात्री ए चार संध्या समय तथा अजुआले पखवामे पवा, बीज, ||
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असज्झा विचार
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त्रीज लगी रात्रिना पहेखे पहोरे असज्माश्यागे .या प्रमाणे ४२ असज्जय. ॥ पाखीनी रात्रि पण || || सजाय न सूझे "युपकनामा अस्वाभ्यायो नवति"-श्रानुं विस्तारपूर्वक वर्णन समाचारी शतकथी| जाणवू. या प्रमाणे असज्माश्नो विचारले. असज्जा संबंधी अर्थात् थकाले स्वाध्याय करवाथी दूषण लागे एम श्री बाणांगजीना चतुर्थ स्थानकना बीजा उद्देशामां कडं बे के-" सुथनाणं मिअन्नत्ती १, लोगविरुद्धं २, पमत्तबलणाय ३, विजासाहणवगुण ४, धम्मया ५. एवमाकुणसु -" इत्यादि इत्यादि
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॥ अथ श्री अस्वाध्याय सित्तरी ॥
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(चोपाइ छंद.) श्री गुरुपयनमि नामीशीश, सूत्र नणणविधिकहणि जगीस॥नणिये गुणिये जिणि परि नही, ते पुण कहिशुं गुरुमति सही॥१॥ अर्थ प्रकाशे श्री अरिहंत, सूत्र रचे गणधर गुणवंत ॥ सूत्र अर्थ श्म दोय प्रमाण, परंपरागम नाखे जाण ॥२॥ गम कहिये त्रिजुवन सार, आगम नवियण तारणहार॥ तेहवो जगमा कोइ न सहुं, श्रागमनी जामलि जे कद्यं ॥ ३॥ ए आराधी शुद्धाचार, जन अनंत पहुता नवपार ॥ए विराधी संसार अनंत, कीधो सही दूरि नववंत ॥४॥श्म नाख्यु
जे चोथे अंग, गुरु पूठी जाणजो प्रसंग ॥ इणि कारणि श्रुत आराधिये, निर्मल मुक्ति पंथ सा| धिये ॥ ५॥ श्रावश्यकावश्यकवितिरित्त, कालिक उतकालिक श्म वुत्त॥ अंग बाहिर ने अंगपविह, | | सूत्र उ नेद गणांगि दिछ ॥६॥ काल ग्रहण करि जणिये जेह, श्रागम नाख्यो कालिक तेह ॥
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अस्वा० सितरी
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उत्तराध्ययनबेदने अंग, बारमांहि केईय उवंग ॥ ७ ॥ इम कालिक घ्यावश्यक आदि, एना तप उपधानादि ॥ विधि विण जपतां बहुला दोष, थाय सही आसायण पोष ॥ ८ ॥ श्रसायण वारण मिछत्त, टाळंतां निर्मल समत्ति ॥ इसो जाणि विधिशुं सद्दहो, श्रुत नथिवो जिम शिवसुख लहो ॥ ए ॥ सूत्र अर्थ अधिकारी साध, गृही अर्थ अधिकारी लाभ ॥ अंगजवंग सूत्रनी शाखि, एह मर्म निश्चल मन राखि ॥ १० ॥ पासी वेरत्ति जाण, पानाई इम त्रिषि वखाण ॥ उत्तराध्ययने बीसमें, त्रिहुं काले मुझ मन वीसमे ॥ ११ ॥ कालग्रहण यति विष नवि होय, एह विचार विमासी जोय ॥ तिपि विष गृही कहो किम जणे, गुणे ते साधु मुखि सु ॥ १२ ॥ साधु गृहीने नहु वाणा, दिये निसित्थे पमिसेदणा ॥ ठाणांगि वायण वारणा, संजालु ए गुरु सारणा ।। १३ ।। पूर्व कालि पुस्तक नहु हुता, गृही कहो ति किम वांचता ॥ आशातन टालो एम जाणि, जयो जयो जिनवरनी वाणि ॥ १४ ॥ विधिये नएयुं पुण जिम न जलाए, नदु वंचाए नहु गुणाए ॥ ते कारण असकाइ तयुं, गुरुमुखि संचालि ते दिव जणुं ॥ १५ ॥
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॥ ६१ ॥
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(ढाळ. छप्पय समान) ते असलाइ बिहुअ नेदि आगममति जाणो, जेह विवेकी लोक तेह ए हियमे थाणो॥ आपण यी ऊग्जे जेह ते थायसमुत्थ, परसमुत्थ जे परहथको गिणि श्म परमत्य ॥ १६ ॥ परसमुस्यना नेद पंथ श्क संयमघातक, धुअरि प्रमुख दुतिय नेद कहिये उतपातिक ॥ रजरुधिरा|दिक वृष्टि नेद हिव त्रीय सदिवा, करे नगर घर गयणि विविध सुर जे गंधवा ॥ १७ ॥ चोथो व्युग्रह नेद ए कहिये संग्राम, शारीरिक नर तिरिय अंग पुजलनो गम ॥ ए बोल्यो |पंचमो नेद हिव त्रीयनि, कहिशुं लहिणुं जेह सुगुरुवाणीनी जुगति ॥ १७ ॥ संयमघातक | | प्रथम नेद धुंधरि शिवाले, जां लगि हुइ तां सीम साधु संनाषण टाले ॥ अंग संकोची
वस्त्र सहित ढांकी एकांति, बेसे किरिया किंपि करे नहु माणिस ब्रांति ॥ १५ ॥ तो नणवानुं क| हण किसुं बीजी जे चारि, असज्मा तिह सूत्र नणण तसु गुणण निवारि ॥ किरिया करवी स-| हुअ अवर हिव बीजी नणिये, संयमघातक तणो नेद शणि परि ए सुणिये ॥ २० ॥ राती बाया |
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अस्वा० सित्तरी ॥३२
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गगन थकी रजरेणु वरसे, तेह निरंतर त्रिणि दिवस ऊपर जो दीसे ॥ तो असज्माइ जा-|| णवी जां लगी तां सीम, सूत्र नणण गुणिवा निषेध श्म पाले नीम ॥ २१॥ घण वरसंते || बुदबुदाकारें जिणिवारें, बिहु दिन ऊपर होय जाणि असजाय तिवारें॥ वरसे बुद बुद रहित मेह सत्रेह निरंतर, तिह असजाइ होय पंच दिन यकीय अंतर ॥ २५ ॥ न्हानी धारे वरसतो जब न रहे मेह, सग वासर उपरांत हुश् असजाइ एह ॥ संयमघातक एह पंच जाणिवा प्रकार, पहिले परहसमुत्थतणो असजाय विचार ॥ २३ ॥ टाले नणवो जेह साधु पाले जिणाण, निरते मा-|| रगें चालता लहिये निर्वाण ॥ हिव उत्पातक तणिय विगति कहिशु संखेवी, रुधिर मांसनी वृष्टि एह जूजुश्य कहेवी ॥ २४ ॥ असलाइ हुए एहतणी अहोरत्त प्रमाण, नणण न सूळे सूत्रतणो | तेहना ए गण ॥ वात सहित वा वात रहित रजने उद्घाति, रज पमती जिह शब्द थाय तेहने थापाति ॥ २५॥ धूलि शला ने केश वृष्टि जातां असजाइ, चैत्रमासि उजले पख ऋमि पंचमि | आश्॥ योगतणो निक्षेप करे तिणि दिवस प्रनाति, जो न करे तो बीज हुवे ए आगम ख्याति ॥२६॥
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अंतराले ऊतरे नही वलि तेरसि चउदशि, पूनम लोगस्स चारि चारि काउसग बिहु दिवसी ||
जो न करे तो वरष लगी जब ऊमे धूलि, तव असजाइ सूत्र सहु नणिये नहु मूलि ॥७॥श्राशु || है। शुदि पंचमी पहर बिहु थकी गिणीजे, पमिवे लगी गिणि सूत्रतणो सजाय न कीजे ॥श्म उत्पा। तिक नेद कह्या त्रीजो हिव कहिये, तासु नाम सादिव्य जेह गुरु वचने लहिये ॥ ॥ नगर|| तणा थाकार सरिस गयणांगण होई, ते नणिये गंधर्वनगर विरचे सुर कोई ॥ अग्नि वर्ण राती है। || प्रना जलती दीसे दिशि, ते दिग्दाह विचारि जाणि नणिये आगम किसि ॥ २५ ॥ गयणि ऊबक्के वीजली विणुकाले जिवारे, उल्कापाते एक पहर असज्जाइ तिवारे ॥ गाजि अकाले प्रहर उन्निसकाय निवारे, इणिपरि जे परिहरे दोष ते आप उतारे॥३०॥पख्खि अजुश्राले पमिव बीज || | त्रीजें इक जाम, निशिनो पहिलो जाणिजो असका गम ॥ तिणि दिशि संध्या निरति नही तिणि काल न सूझे, पाउसी श्रागम विचार गीतारथ बूझे ॥३१॥
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अस्वा सित्तरी
॥ ६३ ॥
( दुहा. ) रवि याथमते त्र्यंबरे, दीसे लांबी मोघ ॥ राती अथवा सामली, ए उतपात अमोघ ॥ ३२ ॥ तो असा इक पहर, जाणी लेजो जाण ॥ जलधरने मंबरे, प्रह ऊगमते जाण ॥ ३३ ॥ श्याम वर्ण अथवा लप, रातो दीसे जोई ॥ अथवा उंधण सारिखो, ए उत्पातज होई ॥ ३४ ॥ असकाइ तव इक पद, इकगीयछ कति ॥ प्रहर तिन्नि मुनिजन तदा, नणिवा श्रुत न लति । ३५ । भूमिकंप ाथ घमदने, पदर आठ सजाय ॥ घमदने, मोटे सादिनणि, नामंतरि निग्धाय ॥ ३६ ॥ शब्द रहित धूजे धरा, भूमिकंप ए जाणी ॥ ए घशातन टालिये, ए श्री प्रवचन वाणि ॥ ३७ ॥ चंद सूरना ग्रहणनी, सफाइ जिम होय ॥ गुरुमुखिं संजलि ते कहिशुं, ते टालो सहु कोय ॥ ३८ ॥ उतकृष्टी बारह पहर, चंदतणी जे थाय ॥ ते किम किए उतपात वश, ऊगत चंद ग्रहाय ॥ ३९ ॥ ग्रो बतो शशि थमे, निशिना पहर विचार ॥ श्रवंता आठे पदर, इणिपरि बार विचार ॥ ४० ॥ एहनो न्नेरी परिं, बीजो सुणो प्रकार | ग्रहण हुसे किए अवसरें, जाणे नहु अणगार ॥ ४१ ॥
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।।। ६३ ।।
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इम जाणे होशे सही, ग्रहण ति वादलमांहि ॥ नहु दीवो निशि बेहके, दीगे प्रह्मो प्रवादि ॥ ४२ ॥ | श्राथमतो इम रयणिना, टाल्या पदर चियार ॥ वलि घ्यावंता दिवस निशि, इम बारह अवधार ॥ ४३ ॥ यवसापि पूनिमतणे, चंदग्रहण जे दीड || पदर आठ एपीपरें, श्रुति जघन्य निर्दिष्ठ ॥ ४४ ॥ रयणि मध्ये जे ग्रह्मो, वलि मध्यें मूकाय ॥ तो जेती निशि थाकतो, ते असफाई थाय ॥ ४५ ॥ उतकृष्टि मजिम जद्दन, एवं त्रिणी प्रकार ॥ चंद ग्रहणना एजण्या, दिव रविग्रह्ण विचार ॥४६॥ ( ढाळ. देशी आदिसरजीनी विनतिनी )
दिव रविग्रहण विचार, कहिशुं जिपि परें, सज्जाइ दुइ एह तणीए । राहु केतु ग्रहवार, करतां यावरे, मंगल रविनो ते जणी ए ॥ लोक कहें शशि सूर, राहु गले इह, एह वचन मिथ्या कहे ए । श्री जिन केवलसूर, छांगें पंचमि, बारमे शतकें संग्रहे ए ॥ ४७ ॥ बट्टे उद्देशे इम, बोल्यो विस्तर, ग्रहण तो तिढ़ जावो ए। तो सफाइ केम, केवल कारण, उतपातिक मन ध्याणिवो ए ॥ सोल पहर उत्कृष्ट, ए असाध्य, उदयावसरें रवि ग्रह्मो ए । अस्तमि पु तिम दृष्ट, ते निशि
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थागिलो, अहनिशि इम निरतो लह्यो ए॥४०॥ कहिये अवर, प्रकार गयणि सवादल, दिवस || ग्रहण दीसे नही ए। श्म जाणे अणगार, बाज अमावश , तिणि ग्रहण हुशे सही ए ॥ निर्मल || अंबर दिछ, अंस्तमिसंग्रह, तिणि निशि निशि दिन थागिलो ए। पहर सोलनी दिहि, आगमि जिनवर, असमाय ए संगिलोए॥४९॥ बारह पहर जघन, ते किम संनलो दिनकर, बाथमियो ग्रह्यो ए । तिहि निशि टाले धन्य, मुनिजन सज्काय, अहोरात्र बीजे लह्यो ए ॥ बारह पहर श्म || जाणि, ॥ जे पुण दिवसि, ग्रह्यो दिवसि मूक्यो वली ए, । ग्रहण काल मन आणि, वेला ||| श्रावती, तां लगी सज्माई टली ए ॥५०॥ वितर कृत गुंजार, नादिरं ऊपने, आठ प्रहर असज्जाश्या ए। दिवसि संध्या चारि, उदे हिबे पहरे, अस्तमनिएं मध्यराश्या ए॥ तिणि| वेला असजाय, नणिवो वांचवो, सूत्रतणो सूके नही ए। कातिग ने अषाढ, पमिकमि चउमासी, | है | पमिवा लगि जाणो सही ए ॥५१॥ श्रसका दिन बीज, सूझे सजाय, एहनो दोष अडे घणो ए। प्रवचनि वार्यो काल, नणतां प्रवचन, मुनिने बल हु सुर तणो ए ॥ जे हुए साधु प्रमत्त, तासु
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॥६४।
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विशेषहि, बलना सुरनी ऊपजे ए। जे हुए मुनि श्रप्रमत्त, तिहनें सागर, अर्द्ध ऊण थिति संपजे ए ॥५२॥ जसु ते सुर न बसंत, आधा सागर, परिमिति थिति वरते सदा ए। पुवर समरंत, | तिणि सुर ते पुण, बलिये बलिए ए कहा ए तिणि कारणि असाय, टालिय गुरु नणिवो, वहिवो || योग तणो करे ए। ते मुनिवर समुदाय; श्रुत आराधीय, हेले नवसागर तरे ए॥ ५३॥
(दुहा.) - व्युग्राहिक असताश्या, कहिये चोथो नेद ॥ श्रुत बलि गुरुमुख संनली, हिवे जाणिज्यो । सन्नेद ॥ ५४॥ म्लेष्ठादिक नरवश्तणो, महायुद्ध जां होय ॥ वसतिथकी आसन्न नर, श्वी कलहें । जोय ॥ ५५ ॥ पर्व वासें रज जां लगी, ऊमे फागुण मासि ॥ असलाइ तां लगी हुए, जो जो हिये विमासि ॥ ५६ ॥
(दाल भुजंगी छंद जेवी.) ...... देशनो अधिपति विपति पामे तदा, होय असलाइ अवर बेसे तदा ॥ सूत्रनो जणण करिये
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अस्वा०
सितरी
॥ ६५ ॥
विमासि सही, एह विणुं सूत्र सक्काय नलिवो नही || ११ || होय परचक्रनय तह नवि उपशमे, तां असाय कर पिएं अतिक्रमे ॥ आपण जिवरती जणे त्रिभुवन धणी, तासु परंपरे यज लगी ते गिणी ॥ ५८ ॥ नगर नर मोटिको मरण पामे जदा, इग अहोरत असज्जाय हुए तदा ॥ वसतिथी सात घरमांहि दीपत नरें, विहमिये पहर श्रम सूत्र नदु उच्चरे ॥ ५५ ॥ पाधरा पुरुषने मरणि शब जां पड्यो, रहे तां होइ समाइ चिते चड्यो | पड्यो तिरि रुधिर तह फूटए अंकए, गायने प्रसवि जर धरणि जव गए ॥ ६०॥ एटले जाम तिय सूत्र नहु सूकए, नणिवए गुणिवए पदं नडु बूए ॥ विवुध जन जाणि ए दूषण टालए, सुमति जल डुरितमलपक पखाल ॥ ६१ ॥ नरत शोणिते उद्धर्ये इहां वली, इक अहोरत असाय टकली ॥ मेघनी वृष्टिते धोवराणो जदा, ततखिणे टले असज्जाश्य ते तदा ॥ ६२ ॥ पाउलि निशि पमयो उद्धर्यो ऊगते, सूरि सूके तदा चिरा बलि जागतें ॥ दंत देखि पमयो हाथ सो बाहिरें, परिवव्ये शुद्ध नहु दोष श्रुत वागरें ॥ ६३ ॥ अव जाणि पमयो शोधतां नदु लह्यो, दंत उदडावणी का सग्ग तिह को ||
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६५॥
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चार लोगस्सनो शुद्ध जे इम करे, सूत्र आशातना इणि परि परिहरे ॥ ६४ ॥ प्रेतवनि नरतणा || अस्थि जे जे दह्या, ततखिणे मेघजलवृष्टिगुं ते वह्या ॥ तिह असमाश्य सर्वथा पें नही, अन्यथा | वरस दश कुन्नि सूझ नहीं ॥ ६५ ॥ जे बिलाम तणी जाति जीव जीवतो, ग्रहिय न जाय तो न | हिय असूझतो ॥ करत तसु घात जे कोश्अवयव पमे, पहर अम सूत्र सज्जायने ते नमे ॥ ६६ ॥ साठ करमांहि तिर्यंच अवयव तथा, हाथ शत मांहि नर अवयव संकथा ॥ करे असमाय विचि से रजें बिटु दिसें, होय तो शुद्ध सज्माय आगम कसें ॥६७ ॥ नारिने ऋतुसमय मास मास |
सुण्यो, वासर त्रिणि असमाय कारण गिरायो । तेहथी अधिक असमाय ओहमावणी, करिय का- | M उसग्ग तो शुद्धि थाये घणी ॥ ६ ॥
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आजा मंगी स्वाति लगी, गाजवीज जो होय ॥ तो असमाइ नहु कही, हिये विमास जोय | ॥ ६॥ शेषकाक्षि तारा तणि, दंसणि सूके काल ॥ पुत्र प्रसवि दिन सत्न गिणी, पुत्रि श्रम दिन टाल
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अस्वा० सित्तरी
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॥३०॥ श्म शारीरिक पंचमी, असमा ए जाणि ॥ श्री पार्श्वचंड हरखे नणे, सांजलि प्रवचन वाणि॥१॥ (कलश) शणिपरि निजुत्ती बहु विह जुत्ति जोश्यावश्यक तणिय ॥गणंगिं चंगे जाणि || प्रसंगें संखेपे ते में नणिय ॥ सांजलि ए वाणि सगुणज प्राणी श्रुत श्राशायण परिहर ए॥ ते | नहीय विराधक सहीय थाराधक नवसायर हेलें तर ए ॥ २ ॥ ॥ इति श्री नागपुरीय वृहत्तपागछाधिराज युगप्रधान श्री पार्श्वचन्मसूरि विरचिता
___ अस्वाध्याये द्विसप्ततिका संपूर्णा ॥
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१ आ प्रकरणमां बनती महेनते सुद्धि करवामां आवेली छे, उतां पण तथाविध मुद्ध पुस्तक न मलवायी केटलीक | गाथाओमा रु.य रहे छे, माटे जेमनी पासे आ शुद्ध पुस्तक होय अने ते अमने लखी जणावशे तो बीजी आवृत्ति वखते उपयोगी थइ पडशे.
॥६६॥
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॥ अथ श्रीब्रह्मबावनी॥
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( एकत्रिसा सवैया छंद.) कार आप परमेश्वर परमज्योति अगम अगोचर अलख सुरूप गायो है, उव्यतामै एक पे || अनेक नेद परजैमैं जाको जसवास मत्त बहुनमैं बायो है ॥ त्रिगुन त्रिकाल नेव तानु लोक तीनु देव अष्ट सिद्धि नवो निद्धिदायक कहायो है, अक्षरके रूपमैं स्वरूप नूअलोकहुको ऐसो कार | हरखचंदमुनि ध्यायो है ॥१॥ नमत सुरासुर खगेंड धरणे जाकों मुनिनके वृंद ध्येयरूप करि | ध्यायो है, जैनी कहैं जिन शिवमति शिवरूप मानै वेदपाठी ब्रह्म बोध बोधरूप गायो है ॥ कोउ | कहै अलख असाह यौं अथाह रूप कार ऐसो जिन जैसोइ बतायो है, वर्ननको रुंद जा | की महिमा अमंद ताहि वंदत हरखचंद सब सुख पायो है ॥२॥ मत्तहुमैं तत्तहुमैं जोगकी है| जुगतिहुमैं जुगति मुगतिहुमैं जाको विसतार है, वेदमें कितवमैं अवेदहुके नेदमैं सुथापना || |
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ब्रह्मवा वनी
॥ ६७ ॥
| उच्छेद मैंदु कियौ निरधार है ॥ जंतरमै मंतरमैं वकै व तंतरमैं शब्द निरंतर में दोवत उच्चार है, प्रणव प्रसिद्ध ऋद्धि वृद्धि सुखदायक है जपत हरखचंद ऐसो उ जॅकार है ॥ ३॥ सिद्धिनकौं सिद्धि ऋद्धि वृद्धि देहि संतनिकौं महिमा महंतनकौं देत बिन मांदी है, जोगी कौं जुगति मुकति देति मुनिनकौं जोगी कौं जुगति गति मति उन पाढ़ी है | चिंतामनि रतन कलप वृक्ष कामधेनु सुखके समाज सब याकी परिठांदी है, कहे मुनि हर्षचंद लखि देख ग्यानदृष्टि कार मंत्र सम और मंत्र नांदी है ॥ ४ ॥ धंधनावकोसो इह जगको सुजाव ता मैं अधिक ग्यान जावदुकी अँधियारी है, मोहकी वयार सेती उमत मिथ्यातरज जिन्हें ग्यानदृष्टिकौं मलीन कर मारी हैं ॥ काम क्रोध लोन मोद प्रगट प्रमाद वसै रागदोष चोरढुकी नीति जहां जारी है, ऐसे जववासतें उदास ह्वेकें ग्यानीजीव साधत मुकति ताकौं वंदना हमारी है ॥ ५ ॥ अगम अगोचर अलख अविनाशी ब्रह्म मोहकै मिलाप देखो कैसी नाच नाचा है, कबहु ए केंद्री विककेंद्री सककेंद्री जयो गयो नरकादि गंति जहां दुख साचा है ॥ कबहु नरेंद्र
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॥ ६७ ॥
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| धरणेऽहु खगें5 इंश दिव्य देह पाय स्वाद विषयके राचा है, जौलौं ग्यानन्नावकों स्वन्नाव घट
प्रगटै न तोलों श्ह चिदानंद सब खेल काचा है ॥ ६॥ आदि है अनादि है अखंमित अवा- || |धि है न कमी है न ज्यादेहै सुव्यापक सरब है, एक है अनेक है अलेख लेख रेख ऐसो परजै विशेषहीमें जाहीको परबहै। तोहीमें है मोहिमें है जहां देखो जाहीमें है सत्ताकी समोहोमाहि
चेतन जरब है, परजै प्रवान है अनंत ग्यानवान है सो मोखको निदान ऐसो आतमदरब है |॥ ७॥ श्नहीके ध्यान निरवान पद पाश्यत श्नहीके ध्यान ग्यान केवल लहतु है, श्नहीके | ध्यान कीए मिटत करममल अचल अमल गुन श्रातमा गहतु है ॥ श्नहोके ध्यान सुरलोक नरलोकहुमें पावै प्रजुताई नवपातिक दहतुहै, सोहे घटमंदिरमें आतमा प्रगट देव ताकी कर सेव मुनि हर्ष यु कहतु है ॥ ७॥ ईश जगदीश औ अधीश शीष अवनीश करत मुनीश सब याहिकी उपासना, वही चिदानंदप्रनु पूरन परमब्रह्म पुग्गलमै मिख्यौ जैसे पुहपमैं वासना॥ || | नेद ग्यानदिष्टिसौं विचच्छन विभिन्न करे जैसें मथि काढियतु काठमैं हुतासना, कहे हरख- ||४||
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ब्रह्मबा
वनी ॥६॥
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| चंद मुनि तिहुं लोकमांहि आतमप्रकाश सम फ़ेसरी न प्रकाशना ॥ए॥ उपजै न उपजतु विनसे न विनसतु श्रातमा अखंग ब्रहममको विकाशीहै, परजैके नेदसौं नया अनेक वेद तोह अव्यतामै एक एह अज अविनाशी है। वरनादि वीसन्नेद नाखै प्रजु पुग्गल के तिन्हौइतें जिन्न | निज सत्ताको उपासी है, मनमैं न गही जाय वानीसौं न कही जाय ऐसी शुद्ध आतमाकी ज्योति | | परगासी है ॥ १०॥ ऊरध सपत राज सात राज अधोलोक तीनसै तयालराज तिरबै प्रमानिये, । | तामैं खट दरब सरब नव तत्वन्नेद ऐसे नरे जैसे घट घृतपूर जानिये ॥ ताहीकौं कहत गेय गेय | परमान ग्यान ग्यान परमान शुद्ध आतमा बखानिये, व्यापित अखिल ब्रहमममैं अखंम ज्योति , ताते ह ातमा सरब गति मानिये ॥१॥ अहैि अपार अधिकार तेरे निकटही प्रगटै ऊपट पट खुलै जो अग्यानके, तेरेहि नंमारमांहि नरे ग्यानरतन सो जतनके कीन्हे बिना नए वश आनके ॥ तेरी प्रजुता पहिचानवेकौं मुनिजन होकैं मगन अधिकारी नये ध्यानके, Inten अहो प्रजु चेतन अग्यानताके नाव त्याग आपुकौं सन्नारौ ब्रम टारी दरम्यानके ॥ १५ ॥
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रीति विपरीत गढ़ी शुद्धताकौं बांकि दइ तातैं बुति मंद न राजा चिदानंदकी, जम्यो जव बीच एक सासमैं सतर बेर जनम मरन करि सही दशा दंदकी || मोहकी मलिनतासौं दीनता नइ अनेक राह गिरासे जैसे घटै कला चंदकी, अनुभौ अन्यास शुद्ध आतमप्रकाश भयो तमकै मिटै| तैं कला प्रगटी दिनंदकी ॥ १३ ॥ लिख देख्यो शीख देख्यो शीखन शीखाइ देख्यो रह्यौ न परेखा कहुं वेबहुकातमा, ग्रंथ देखे पंथ देखे कुमतिकुपंथ देखे नगन निग्रंथ देखे मुनि श्रौ महातमा ॥ सिद्ध देखे सती देखे जोगी रु जती देखे लेखे नलेखे देखे पंमित द्विजातमा, गुनी देखे ग्यानी देखे तीरथ केदेखे ते सब देखे पै न देख्यो एक यातमा ॥ १४ ॥ लीन्दौ कहा जोग जो तौ जोगसौं न सूर्यो मन लोग के रिजायवेकों धूम्रपान गटकैं, को शीष धारे जटा कोज तो उखारै लटा कोज कनफटा को क्रियाही में खटकें ॥ कोउ तो संन्यासी मठवासी वनवासी कोट दोयकै उदासी परे तीरथकों जटकें, ब्रह्मीकौं चीन्यो नांदि मन वश कीन्हौ नांदी एते पर होत कहा | फटकै ॥ १५ ॥ एकही सिलोक पढौ पढौ क्यौं न कोटि ग्रंथ पंथदु कुपंथनिमैं जेती जेती कथा है, वेद
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ब्रह्मवा बनी
वा.
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| निरवेद पढौ औरहु कितेब पढौ पोथीहु पुराननमैं नाख्यो जेसे जथा है। गुरु कहै ग्यानी कहै बमे | मतिमानी कहै ब्रह्महीकै जानवैकों श्रुतसिंधु मथाहै, आपा पर पहिचान्यो सब तंत विरतंत ||
जान्यो और जानवैकी रही कौंन तथा है ॥ १६ ॥ एही प्रनु आतमा अलख अविनाशी ब्रह्म | कर्मके नरमवश कैसें रूप है रह्यो, रच्यो परन्नाव पै सुनावको न लीन्हो शोध श्रातम प्रबोध विनु | जमताकौं वैरह्यो; मानकी मगनतासौं क्रोधकीजगनतासौं लोनको लगनतासौं मोहनिंद रह्यो, | सुगुरु चितावै जिनबानी सममावै तब थापा निधि पावै जो अनादिहीसौं ख्वैरह्यो ॥ १७ ॥ उह | जो ब्रहम जाकौं वेदमती ब्रह्ममानै न्यायके पढ़या माने करता करमकौं, बोध कहै बुद्ध अरु सबसौं करे | | विरुद्ध जैनी कहैं शुद्ध यहै धरता धरमकौं; एते मतवारे मतवारे मतवारे मोलै करें पछपात पाट खुल्यो, |न नरमको, वह तो है एक ए अनेक नांति नांति कहै विना ब्रांति मिटे पैमो पावै क्युं परमको, | ॥ १७ ॥ और नही जान्यौ कहूं अंत न वखान्यौ काहु ऐसो न प्रमान्यो कौन रूप कोन रंग है, काहु नही देख्यो कहूं चित्तमें न रेख्यो ताते आपते परेखौ को बतावै कौन ढंग है।
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॥९॥
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जान्यो तो न जाय इह कह्यो गयो जाय कैसे लख्यो नहुँ जाय इह श्रातमा श्रजंग है,
और मतवादी बकवादी क, एक अंग जैनी स्यादवादी कहै ब्रह्म सरवंग है ॥ १९ ॥ कोउ | शिष्य सुगुरुसौं कहै कर जोरि करि स्वामि मोही ब्रह्मको स्वरूप सममाश्य, कोन नांति जान्यो ||
जाय काइते प्रमान्यो जाय कैसें करि मान्यौ जाय कैसे उहिराश्यै॥ गुरु कहैं तेरो ब्रह्म तेरे घट- है। | बीच तातें निपट नगीच दूर कहांलों बताश्य, पूरण प्रधान बश्यो तेरे घट आन सो तो परजै|
प्रमान ग्यान चेतनात पाश्यै ॥ २० ॥ खट गुनी हानि वृद्धि कही व्यवहार मांहि निहमें एक | दुजो नेद श्हां नांही है, वरण विकार औ आकार सब पुग्गलमैं वह निराकार ब्रह्म जहां देखो ताही ॥ रूप है न रेखहै न वरण विशेष ष ऐसो है अलेख जामै धूप है न ही है, अरे मन क्रूर कहा खोजत फिरत पूर तेरे हजूर नूर तेरो तुझ मांही है ॥ २१ ॥ गरु नयेते कलु गरु |
श्री कह्यौ न जात हरुये नयेतें कबु हरु नाही नयो, जब देह धारी तब जयो नर नारी फिर | जब देहि टारी तब जैसैंको तैसो रह्यौ ॥ किये लेख नामा नयो बालक जवान वह पुरुष प्रधान
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ब्रह्मवा
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वृद्ध बालक नदी कह्यो, न जज्यो अपार पारावारकौसो विसतार व मतधारिहूने पार वाको न लह्यौ ॥ २२ ॥ घटमैं है निकट प्रगट ब्रह्म तेरे तूं तो मोदकै अंधरे मांदि खोजत जहांनमैं, अपनेदि पास मृगमदकी सुवास मृग सुंघत फिरत घास जैसें रान रानमैं; तूं तो जम रह्यो गमिरह्यो वह नांदि कहूं तो में रमिरह्यो जैसैं पावक पाषाण मैं, दहिमांहि घीव जैसें देही मांदि जीव तैसैं देखत सदी ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मग्यानमै ॥ २३ ॥ ग्यानदृष्टि वेदसौं नेद एह श्रातमा हैं यद्यपि है वेद पै तथापि एक कड़िये, जैसें तृण काठ घास इंधनसौं जिन्ह वन्दि दाइक स्वरूप करि एकै जांति लहियें ॥ तैसें देहधारी देह देह में अनेक जांति जयौ नाना क्रांति पै लेख लेख सहिये, तीनहू त्रिकालमांदि ग्यानतें विभिन्न नांदि आपनी शकति बांग परकी न गहियै ॥ २४ ॥ चंचल तरंग उठे पौनकै प्रसंग सेति अपने स्वभावही तैं नीर ज्यौं अमोल है, तैसें ग्यान चेतना स तम सुधिर सदा परकै प्रभाव सेती नाना कजोल है ॥ देव नर नारी पशु पंखी जलथलचारी पुन्य पाप सुख दुख करम किलोल है, मिटै परनाव शुद्ध आतम सुजाव यावे पावै निज संपदा जो
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अखय अमोल है॥२५॥ बिनवादी कहै जीव लिन लिन आवै जावै जलमै तरंग जैसें अंगमांहि आतमा, | दरबके सबसनेद कौन पावै शठ करै हवाद वाद गनै वातवातमां॥नही पहिचान शुद्ध ग्यानकी न है तातें मनके किलोलकौं कहतुहे त्रिधातमा, जैनमती कहै जीव ग्यानमयि है सदीव अमल अखंग जैसें जातिरूप जातमां ॥२६॥ जलमैं है थलमैं है अनिल अनल मैं है सबल निबलमैं समायकै रह्यो वही, ग्यानहु में ध्यान में निखिल निदानहुमैं वझे मतिमानमें प्रमानमैं कियो सही॥ | रूपमें रचा है अन रूपमें सचा है घट कोंन धोव चाहै जामें आप रूप है नही, साहिबकै | नोरे तूं तो ढुंढतहै औरैं और घटमें ढंढोरै तो घटमैंहै बतै अही ॥१७॥ ऊघमत फिरत अनाहक
अग्यानीजीव कोउ कहै आतमा है कोउ कहै नांही है, कोउ कहै व्यापक अव्यापक बतावै कोज कोउ | | कहै ईश्वरके ज्योतिहुकी मांहीहै ॥ कोउ शून्य गनै कोट पंचतत्व मानै तातें जैनी कहै जीव तो | सदीव ग्यान मांही है, चेतन खरूप है अखंमित अरूप है सुतत्वनिको नूप ऐसौ ब्रह्मघटमाहिद | ॥२॥ नांही रूप रंग अंग वचन प्रसंग संग अकल अन्नंग ढंग कहांलौं कहीजिये, नाही कबु
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मूरतिन सूरति गरूर तन ग्यानकी जदूरतसौं पूरत लही जिये। ऐसोहे अलख जौलौं श्रापमैं लखे न | | तोलों परके बताए कहो कैसो के पतीजिये, काहेकों करत वाद अनुनौंको पायो स्वाद गूंगे कैसो |||
गुम खाय चुप व्है रहीजियै ॥ श्ए ॥ टरत न टरै निज सत्ताको स्वन्नाव जीव परके विनावमें || कदापि काल नां मिले, जैसैं शुद्ध कंचन कुधातमें मिलत त निज गुन बांमि पर गुनमैं नही
जिले ॥ ज्युंही इह आतमा अलख अविनाशी ब्रह्म परकै मिलाप गति च्यारुमैं सदा रुलै, है। परजै प्रसंग नयौ नाना विधि रंग तोउ आतमा अन्नंग शुद्ध चेतनासौं नां टले ॥ ३० ॥ | गम गम गाम गाम धाम देवी देवहुकी करें शठ सेव पै न नेवर्कौं पावही, फूल फल | पाती तो धूप दीप वाती जोरै वझे उतपाती केते जीवकौं सतावही ॥ पहै सचेत 4 अचेत नूत प्रेत पूजै आपकौं न सूझे मूढ और नरमावही, घटमैं निकट परमातमा प्रगट देव ताकी करै सेव तेतो सबै फल पावही॥ ३१॥ मलै न मलाय जैसैं उपल अटलखंन्न जलके समीप गदौ | अपने सुनावसौं, पौनकै हिलोरे उठे जलमैं किलोल तातें मूलतोसो दीसे सो तो परके विना- !!
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वसौं ॥ तैसे ही अनादि विकार निराधा मुख्म आप तो अमोल मूलै कुमति कुनावसौं, मिटे तैं अग्यान घट प्रगटै परमग्यान पावै निरवान पद कर्म के मावसौं ॥ ३२ ॥ ढरत ढरत नीर ज्यौं ज्यों नीचे जात त्यौं त्यौं विमल स्वभाव मिटे जइहै मलीनता, कहुं ऊकजोर कहुं धारकी मरोर कहुं उठत हिलोर कहुं वृद्धि कहुं हीनता ॥ तैसें इह ब्रह्म पर्यो करम जरममांहि परम धरम बिन नइ बवि बीनता, जब म मेटै तब आपदी मैं आप नेटै विना तादि नेटै नांदि मिटै जवदी|नता ॥ ३३ ॥ नांदी कदै नांदी नांदी है कहै तो है ही सही नाही रू है ए दोउ स्यादवाद रूप है, व्योममें कुसुम जैसैं अस्ति नास्ति उनै रूप कैसे ठहरावे घनघटा मध्य धूपहै | ऐसें सप्त जंगी नय साधी सरवंग अंग वचन प्रसंग जाखी जिनमत नूप है, जानै स्यादवादी और | वादी जाने माने नांदि कल अलख रूपी ब्रह्मको स्वरूप है ॥ ३४ ॥ तनमैं तिहारै परमेसर वसत तूं तो तौलुं न निहारे जौलौं पमल अग्यानके, उगेहु विरोचनके लोचन खुलत नांदि कौशिक के बाल चाल पात्रे न विज्ञानके ॥ करि ग्यान अंजन निरंजन निजर यावे सुगुरु बतावे
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ब्रह्मबा॥ वनी
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उपचार जोजोध्यानके, तजिमति फैन गहौ जिन मति बैन ऐन ताहित विमल नैन होत ब्रह्मग्यानके | | ॥३५॥ थिर चर देहधारी जेते है संसारी ताकी करम प्रकृति न्यारी न्यारी गति टेक है, वरन विकार |
औ अकारहुतें न्यारे सब न्यारे न्यारे कर्मबंध फल व्यतिरेक है ॥ जनमते मरनतें चरनतें करन” | न्यारे न्यारे सब जीव अव्यतै अनेक है, परजै प्रवान सब दीसतुहै यानि आनि निदचै समान | ग्यान चेतनामैं एक है ॥ ३६ ॥ अव्यत स्वरूप कलधौत एक रूप जैसे कुंमल कटिक परि जेते | बहु रूप है, परजैकी हानि वृद्धि प्रव्य घटै वढे नाहि अपने स्वन्नाव लीने अचल स्वरूप है ॥ तैसैं | | जीवअव्य ताके ग्यान चेतनादि गुन नरनारकादि गति परजै निरूप है, घटेतें घटत नांहि वढेतें | | वढत नांहि असो अविनाशी ब्रह्म घटमें अनूप है॥ ३७॥ धरे बहु नेख 4 अलेखकीन लखी रेख | ज्ञानदृष्टि देख अनमेखमै लख्यौ परै, तजिकै नरम परब्रह्मको पिठान लेहु थापहीमैं जानकर हृदैमें | न क्युं धरै ॥ काहिकौं करत खेद बोम जम्बुद्धि नेद आपतुं अन्नेद ब्रह्म मुक्तितो सदा करै, जप तप ध्यान दान तीरथसनान व्रत बिन ब्रह्म को बिना कलु काज नां सरै ॥ ३० ॥ नयको निवास |
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॥७२॥
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न प्रकाश प्रमाणहुको ध्यान ध्येय धारनाकी मुख्यता सबै मिटि, जात रहे वाद विवाद के | फिसाद सबी थापना उथापनाकी चाह चित्ततैं हटी ॥ सुखकी न इछा अनइछा दुखढुकी नांदि उदै कर्म बंध तिहुंकी घटना घटी, पायौ निज धाम तब किरियाको कौन काम सुख विसराम सोई सोई रटना रटी || ३ || पढ्यो तुं पुराण पै पुराणकौं न पहिचान्यो आगमतें अगम लखकी नलखी गति, वेदकु पढे तैं भेद पायो न निरंजनको करमके व्यंजन (नै) मैली करि राखी | मति ॥ नहीं पहिचान ब्रह्मग्यानकी नइहै जातैं जप तप ध्यान व्रत पूजा न फलति यति, नरमके टारे बिनु आतमा निहारे नांदि यातमा निहारे बिनु कैसेंहु न मुगति ॥ ४० ॥ फैल्यो चिह्न र्नर वार पारको उपावै नांहि मोदकी कोर नौर देखत लगत कर, क्रोध वर्गवानल जलत र आठौ जाम राग रु दोष कछ मछनिको जो घर ॥ जनम मरणतैं जयानक लगति जामैं आपदा मिलत नदी लोनकी उवै लहर, ऐसो नवसागर दुखाकर बखान्यौ जिनबिना ब्रह्मग्यानके कैसैं न गयो तर ॥ ४१ ॥ बग धरै ध्यान मौन फणी पैं आहार पौन मछ कह जल
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ब्रह्मवा बनी
॥ ७३ ॥
गौन स्नान करते रहैं, बटशीश धारै जटा नेमहु लुंचावे लटा पशु अनपटा खर जसम सदा वहै ॥ व्याल पौनाहारी कष्ट जुरुइ सहत जारी पिजरे मैं परयो शुक राम रामदी है, किए कर्म
न सिद्ध न नइ निदान बिना ब्रह्मग्यान निरवान कोउ नां लहे ॥ ४२ ॥ जरममै नूले मूढ फिरत हैं फूले फूले वाय के बघूले जैसे उबटन वाटके, आपकों न बोध परवोधकरै लोगनिक जोगनिके लिए गर्ने जगल कुवाटके ॥ कोउ तो महंत को आपकों कहावें संत मायामें लिपटी रहें की मा जैसें पाटके, उत घर तज्यौं इत ब्रह्महुकौं नांहि जज्यो धोबी केसे कूकरा घरके न घाटके ॥ ४३ ॥ मानसे महीधर उतंग अति उंचे जहां मायासी सरित जामें पापजल है अथगा, क्रोधसे दावानल जल रहे या जाम कालसे मृगाधिके मरसौं मरात जगा ॥ कामसे कुचील जील बीन लेत सत्य शीघ्र रागद्वेष चोर जहां मोहसे रहत वगा, सो जववन महा दुखको निवास घन तहां द जनकौं तो गुरुदी बतावै मगा ॥ ४४ ॥ योगकी युगति कर साधत मुगति मुनि मन पवनकी निरूंधि गति गहरी, जेदि खट चक्रकौं अवत्र गति अनिलकी त्रिकुटी प्रवाटके कपाट खुलें
ब्र०बा०
॥ ७३ ॥
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कही ॥ पात्रै सुधारस जहां अष्ट दल कमज तहां इद हंस वसे निज गम उही, अखय अमोल सुख-सिंधु में करे कलोल सो परमातमा परमब्रह्म लहरी ॥ ४५ ॥ रमी रह्यो घट घट ताहीते कहायो राम व्यापित सकल विश्व तातैं विष्णु है सही, आप अनादि ब्रह्म तादितैं कदायो ब्रह्म शिवपद साधे तातें शिवरूप है यही ॥ जीते सब रागद्वेष ताहि | तैं कहायौ जिन बुद्धिकै प्रकाश नए बुद्ध पदवी लही, नय व्यवहारमैं अनंत नाम तमाके निचै विचारे परमातमा सबे वही ॥ ४६ ॥ लक्ष लक्ष कोम कोम कंचनकौं जो जोन वांके गढ तो तो केते केते लीन्द राज पदार चेरे राखे चाकर घनेरे चमे छावल ढोरे द्वारे गये गाढे गजराज, मंदिरके अंदर में रही बाल यावत रसाल माल सुखके समाज साज, पाहू प्रभुके जजन बिन सबही नइ छाकाज ॥ ४७ ॥ वचनकी
ऐसी ऋद्धिहु पै कहुहु न म | रचना रची है गणधरदेव रथतैं आप जिनराज जू वखानी है, उपति खपति थिति त्रिपदी त्रिनंग अंग द्वादश प्रमाण नय सातमें समानी है; थापना उछेद खट द्रव्य नव तत्व जेद प्रत्यक्ष
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ब्रह्मबा
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बनी
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परोक्ष के प्रमाणते प्रमाणी है, मुक्तिकी निशानी जाकौं मानी नविप्रानी करुनाके रस- || सानी सो अनादि जिनबानी है ॥ ४ ॥ शबद प्रमान ग्रंथ पंथमें प्रमान जिनबानी परमान परमानहमें गा३ हैं, म्यानमें प्रमान ध्येय ध्यानमें प्रमान मेय मानके प्रमान उनमानमें बतावें हैं। तत्वमैं प्रमान सब मतमें प्रमान गवचन प्रमान करि शिष्यकौं बुजावें हैं, सोहै आप श्रातमा अनादि अविनाशी ब्रह्म कै उमति नर ताकौ पार पावें हैं ॥ ४ए ॥ खगहुको पग कैसैं | व्योममें निकाले जग मीनहको मग क्युं पिलान्यो जात पानीमैं, सरकौं उद्योत अरु रतनकी | ज्योति जैसे पुष्पमैं सुगंध रहै कौन और गनीमैं ॥ त्युंही इह श्रातमा रहत कौन देश नेष | मेटत अंदेस मौ कहावै गुरुग्यानीमैं, पंमित बिचारतें विचार करि करिहारे कोउ ठहरात नाहि
ब्रह्मकी कहानीमैं ॥५०॥ संवत अढारसै अधिक एक कातीमास पख उजियारे तिथि द्वितिया | ||२|| सुहावनी, पुरमैं प्रसिद्ध मखसुदावाद बंगदेश जहां जैनधर्म दया पतितकौं पावनी ॥ पासचंद | 8॥ ७४॥
गह स्वध वाचक हरखचंद कीरति प्रसिद्ध जाकी साधु मन नावनी, ताके चरणारविंद पुन्यते ||
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निहालचंद किन्ही निज मतिते पुनीत ब्रह्मवावनी ॥५१॥ हम दयालकै सऊन विशाल चित्त || | मेरी एक विनति प्रवान कर लीजियो, मेरी मति हीन तातें कीन्हो बालख्याल श्ह अपनीसुबुद्धि” सुधार तुम दीजियो।पौंनकै स्वन्नावतें प्रसिद्ध कीज्यो गैरौर पन्नग स्वन्नाव एक चित्तमैं सुणीजीयो, अलीके स्वन्नावतें सुगंध लीज्यो अरथकी हंसके स्वन्नावकै गुनकौं गहीजियो ॥ ५५ ॥ | इति श्री ब्रह्मबावनी संपूर्ण ॥
१ आ ब्रह्मबावनीनी ३ए मी गाथार्नु त्रिजु पद पागंतर रूपे आवी रीते ले “क्रिया के कलाप तब लागत विलाप सब बातम प्रबोध बिन जूले बहु कापटी"
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॥ अथ श्री कलिकाल स्वरूप कथन शतकम् ॥
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७५॥
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पणमिय सिरि जिणवीर, तस्सुवएसो जहा सुए नणी ॥ तस्सणुसारेण महं, वोठामि | कलिजुग सरूवं ॥१॥ जे आयरिया वुत्ता, पणमायारं च पालण समत्था ॥ ते अहुणा नहु दीसई | दोसई विवरीय रूवधरा॥२॥जे आयरिश्रा वुत्ता, धम्मसुअपारगासुविहि जुत्ता ॥ ते मुकाहु अह|म्मा, आयरिया एरिसा अऊ ॥ ३ ॥ जे उबएसे रित्ता, तव विमुद्दा कवम जुत्त उयरत्नरा ॥ | माणी पायविमुक्का, आयरिया एरिसा अऊ ॥४॥जे गुरुनाया सिस्ता, अण्णमुणी चिवमिवाय
गा चेव ॥ पाढगपए विऊर, आयरिश्रा एरिसा अऊ ॥५॥कुटिल कुरूव कुवाया, कुजुत्तिजुत्ता | कुपरकपरककरा ॥ विषय कसाए निजणा, आयरिया एरिसा अज ॥ ६॥ अण्णाणी अण्णा, पमाय बहुलो असुद्ध जवएसी। मायीय अणायारी, गणव एवारिसा बहुला ॥ ७ ॥ रसजुत्ता
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७५॥
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सुहपेही, सलोल सपरिग्गहो समबर ॥समद सलोह सविसई, गणवर एयारिसा बहुला ॥७॥ | सिस्सा वा गुरुनाया, अहवा मणमणिय अण्णगणवासी ॥ उच्चपएसु ग्वंते, गणवर एारिसे बहुले
॥ए। जोई अहव अजोई, पढ अपढ गुणीयर मुणीवा ॥ वलिय पय आएसे, उवईएवारिसा पुजा |॥ १० ॥ सुद्धायार वियारी, सुद्धाहारीय सुद्ध उबएसी । ते साहुगण बज्गे, कुणदे एवारिसा | पुजा ॥ ११ ॥ जे उवएसे कुशला, थिवरागण गुरुपरंपरा जुत्ता ॥ तेसिं कुण अणायर, कलि| काले एरिसा पुजा ॥ १२ ॥ आगम मम्मे विसा, णिबय ववहार साहगा साहु ॥ तं मुस्को |
पासमी, नणई एारिसा पुजा ॥ १३ ॥ लोए जस्स पसंसा, सावय जण कुणई जस्स विण्णत्ती॥ | तस्सा वरिवहश् देसं, गणवइ एयारिसा दुसुमे ॥ १४ ॥ जे उठ नह विगला, नंमणशीला कुमग्ग | चारीय ॥ ते दुत्ति पुश्चणिका, दुसम कालेहु पुजाणं ॥१५॥ कलह गराम मरपरा, नीअपसंगीय नीय कम्मकरा ॥ नलि गवार अहम्मी, गणवईणं ववहा ए ए॥१६॥ किं बहुणाश्श वुत्ते, जेणय | वुत्तेण हवश् गुणढवणं ॥ गुरुनिंदा अत्रमाणं, कहणे तेणवर मुहूं ॥१७॥ एगंतणहु मण्णह, है|
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जम्हा अवित्ति रयणनि अवसुहा॥ तम्हा दोस चश्चा, गुणगहणं कुणद नोवत्ता ॥१०॥ अऊ-| वि सुगुण सुरूवा, थायरिया धम्मधारगासंति ॥ पवयणमग्गे विसा, उज्जमवंता च थायारे ॥१५॥ सुवय सुपरकजुत्ता, काणरया जेय अमय अकसाया ॥ आयरिया कलिकाले, अवि एथारिसा संति ॥ २० ॥ जे उवएशे कुशखा, पंचायारे सुउऊमं कुणई॥णाणिणाए जिनणा, काले || कोकोवि श्दसा थहि ॥२१॥ सुकुल सुजा सुधम्मा, सुविही सुबयण सुबमइ जुत्ता ॥ इहि || समवि कलिकाले, आयरिया केवि महिमस्थि ॥ ॥ किज्जर जस्स पसंसा, थोवा ते अवि पुजा
आयरिया ॥ नामजुआ गुणरहिया, बहुआ ऽसुमेसु २२ मुणह ॥ १३ ॥ थोवावि गुणवंता, जिण धम्म पन्नावगा महा पुरसा ॥ वंदण नमसणिता, ते पुका अञ्चणीयाय ॥ २४ ॥ तेविदु प्रसंसणिका, जे पुजा सरल चित्त गुणगाही ॥ कुणई जहा सत्तीए, समय पमाणं सुहायरणं ॥ २५॥ उवज्झाया पुण दुसुमे, उवाहिजुत्ता विसेस गुणरहिया ॥णिय गुण विमुक्क मुस्का, जव काया एरिसा अऊ ॥ २६ ॥ पायम नासा किंचिकि, किंचिवि वागरण कव्व तक्का॥ कदमविए
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सुपरिचय, मवि बहुम कुलई ॥ २७ ॥ पुष जणरंजण कदमवि, सुदमकला दव प मित्तंपि ॥ धरणितले सुतयाते, न माइ व्यवरं च किं जणिमो ॥ २७ ॥ पाढग तिरकर अत्यं, काल सहावेण धर विवरीयं ॥ पावं व्यणं कवमं, एदे हे पवत्तएच्चिं ॥ २९ ॥ उवहि उवायं चिंत पावद्वाणं च सेवएपिचं ॥ कायइ विसय कसायं, उवज्जाया एरिसा अजा ॥ ३० ॥ जद एरिस जवाया, काल सहात्रेण हुंति वियलतरा ॥ तवायपारियो मुणी, साहुणिचि इद्दिसा ऐया ॥ ३१ ॥ कुई जंतंमंतं, जेसजकम्मं च कुपर सऊणाइ ॥ कुलई बिमित्त नासण, साहुवि एरिसा ज ॥ ३२ ॥ सेव रायद्दारं पुणो पकखेण सेवए जवणं ॥ विहारइ गणिय कला, साहूवि एरिसा ज ॥ ३३ ॥ कोई कोऊदल, सामुद्दाई अएण सत्थेसु ॥ परिचय कुणए जो, ते साहू अज बदवो ॥ ३४ ॥ कामका विकहासु, कीमाकम्मेसु तप्परा बुद्धा ॥ कलद्गरा श्रइ मंत्री, कलिकाले साहु सधरा ॥ ३५ ॥ वायाला अश्माणी, बिंदग मायी परप्परदेशी ॥ पयपूया अनिवासी सुमेरासादु || ३६ || हिंग गेहे गेहे, वहा वहु जायणे दीणा ॥ जायइ कवद्दि
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कलिकालस्वरूप
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थार, उसुमे एए मुणी जाण ॥ ३७ ॥ आयारे अ नहा, तव संजम कायराय विसणजुश्रा ॥ || मुस्का पमायसीला, दुसुमे एयारिसा साहु ॥३७ ॥ जे केई सुविधारा, अप्पगवेसीहु अबि सं. | सारे ॥ तदुवरि समरा जे, ते साहू अऊ विनलतरा॥ ३५॥श्वी दवं ईदई, ईद सिस्सं च पयविसेसं च ॥ इहंतोय विणस्सई, कलिकाले एरिसा साहु ॥ ४०॥ बागम पुराण सवं, अलवं | पगरणं च अण्णेवि ॥ पररंजणाय पढई, दुसमे एयारिसा साहु ॥४१॥ सुत्तं च तत्तसळ, नंमागारेय |
खिव मूढप्पा ॥ वित्थारेश कुविद्या, दुसमे एयारिसा साहु ॥ ४२ ॥ सिस्कावेर कुविजा, सिस्साणं | एग उभरतरण ॥ दुग्ग नयं न कुणई, पंचमकाले श्मे साहु ॥४३॥ आणाखंण दम, न | मुण जर मुण तहवि णो सझा ॥ सवंदं विहरेश, पंचमकाले श्मे साहु ॥ ४५ ॥ दत्व गुणं पज्जायं, सयपरदवाण जाणणे मूढा ॥ जर जाणश् णोचिंतई, पंचमकाले श्मे साहु ॥ ४५ ॥ परोवएसे कुशला, अप्पाणं णेव बोहए किंचि ॥ बन्नप्पा पासंमी, दुसमे गुरु श्दसा विजला ॥ ६ ॥ | पासबाद वियारं, कुणएणिस्संस संघ मलेय॥ अप्पा सहणो लज, दुसमे गुरु हसा पनरा॥४॥H
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जद्दवि हं दुसमेस, विसमायारा हवंति बहु साहु ॥ तदवि तहा रूवा पुण, समणा अबिद को| कोवि ॥ ४ ॥ अजवि संजमवंता, अजवि गुणरयणधारगा साहु ॥ अजवि उजमवंता, तव णियम अन्निग्गहेणिच्चं ॥ ४ए ॥ अजवि दवं खित्तं, कालं नावं जे वियारंति ॥ तस्सणुसारे अजवि, साह धम्मं जहा सत्ती ॥ ५० ॥ अजवि तवसी साहु, अऊवि कुशलाहु सुफ उवएसे ॥ अङ वि वहुस्सुया मुणी, अजवि सनाय जाणरया ॥५१॥ अजवि बहु गीयत्रा, अज्जवि विवहार सा| हगाधीरा ॥ अजवि अप्पगवेसो, दीस कोकोवि समणमुणी ॥ ५५ ॥ अजवि समदम जुत्ता,
अजवि शीसे अलंकिया साहु ॥ अजवि जिणमय णितणा, अऊवि परसमय खंगा साहु ॥५३॥ जह गुरु तह सिस्सावि, जह सिस्सा तहेव साहुणी णेया ॥ दुसमे काल सहावे, सवेवि एरिसा. । हुंती ॥ ५५ ॥ जे कलिकाले सिस्ता, ते गुरुआणाहु णोपमाणंते ॥ गुरुजत्तिराग रहिया, नि
खज्जा निष्कला मूढा ॥ ५५ ॥ दुव्वसणे अणुरत्ता, तत्ता आसासणेय दुव्वयण ॥ गिद्धा दुछ कुवाई, कलिकाले एरिसा सिस्सा ॥ ५६ ॥ गुरुर्णिदगोनिमाणी, उन्नमवेसा सर्षिद सहमाश् ॥
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बोहितो विण वुज्ज, दुसमे एयरिसा सिस्सा ॥ ५७ ॥ विशला अन्नस्क नोई, निहुरवयणा कुवत्त मंदमई॥ विससमणाणं मुणए, दुसुमे एयारिसा सिस्सा ॥ ७ ॥ ज बह हवश कुसिस्सा, || दुसुमे काले तहा सुसिस्सावि ॥ विणई विवेथ जुत्ता, अवि एयारिसा सिस्सा ॥ एए ॥ गुरु जण आणाकारी, सलज सुवियारकारगा सुनगा ॥ सुद्धायार सुसवं, अप्नसई तेवि सिसोनि ॥ ६ ॥ श्रायरिय उवप्नाया, गीयबा थिवर सुद्धमायारी॥तसु पय सेवण कुशला, कालेवि एरिसा | सिस्सा ॥ ६१ ॥ समदम सुछ वियारी, सुहु विहारिय सुद्ध आहारी ॥ सुगुरु परंपरकारी, सिस्सा | दुसुमेवि आयारी॥ ६२॥ दुसमे साहु सरूवं, वण्ण वियं वदृमाण जं दिकं॥ साहु सहाय मुणित्ता, सावय रूवं नणिस्सामि ॥ ६३ ॥ समणाणं नहु मएणश, कुगुरु कुदेवाण मएणए अहियं ॥बोहिंतो पहबुज्छ, कलिकाले एरिसा सदा ॥६४॥णहमुणजिणवयणं, साहु सरूवं ण जाणए सम्म॥ जश मुणई णोसद्धा, कलिकाले एरिसा सहा ॥६५॥ णहु जाण ववहारं, पिच्यरूवं ण जाणए किंचि ॥ णिंद साहुसरूवं, कलिकाले एरिसा सवा ॥ ६६ ॥ णहु मएण जिणपमिमा, जिणमय
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संघ व मएएच ॥ साहु जावं मएइ, कलिकाले एरिसा सढा ॥ ६७ ॥ बहु शिंदर गणवासी बहु सिंदइ ढूंढमा जिपमा || बहु शिंदर जिपवयण, कलिकाले एरिसा सढा ॥ ६८ ॥ बहु जाइ सम्मत्तं, बहु षय बहु तत्तविरइ दबाइ ॥ गुरु देवाई न यापई, अप्पर मुणई सद्वृत्तं ॥ ६ए॥ बहु षमकाय सरूवं, मुबई बहु पंचइंदि विसयाणि ॥ श्रावस्सगं ण मुण, सद्वृत्तं तदवि मण्णेई ॥ ७० ॥ साहिं साग साहब, मुबई ज्ञेया ण मूढ बनप्पा ॥ खाया खलु अप्पाणं, मुबई एयरिसा सट्टा ॥ ७१ ॥ य शिष्य ववदारं, मुबई एय साहु सावगं धम्मं ॥ तविष वंदइ जइणो, कलिकाले एरिसा सढा ॥ ७२ ॥ जस्सुवएसंसुच्चा, जाणइ धम्मं च चच्चए अप्पा || मरणई तस्स कुलिंगी, काले खुकयग्घिणो सढ़ा ॥ ७३ ॥ इदि मम मणेसु विम्हय, अवगुण गणेष मुबइ अत्तदिशं ॥ नइ श्रदं समदिठी, डुसुमे एयारिसा सढा ॥ ७५ ॥ मण मणियं मएई, साहु साहु गुणागुणे धम्मे || जेबहु कुई परिस्का, ते मूढा हुंति कुल सढा ॥ ७५ ॥ संजइ श्रसंज ठेवा, गीयता इयर सील डुरसीला ॥ सव्व समाणं मध्ई, कलिकाले एरिसा सढा ॥ ७६ ॥ जह एरिसा कुसढ़ा,
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दीस बहुलाहु उस्समे समए ॥ तहवि सुसदायोवा. अवि दीसंति गुणगाही ॥७॥ अकवि | लस्वरूप हा
|| सम्मत्तधरा, वयपमिमा धारगा सुसीलावि ॥ साहुगुणे सुविरत्ता, सहा एयारिसा अधि॥ ७ ॥ | | ॥७९
| जिणपूया गुरुनत्ति, कुणई साहम्मियाण वडवं ॥ सगखित्ते धणववणं, जवणं विहि पंच परमेही | | ॥ ७ए ॥ गुरुजण गमणागमणे, पयठवणे साहु दिलणे चेव ॥ दव्वुडन्नावुलव, करणे अज्जा-| वि उज्जमा सदा ॥ ७० ॥ अजवि सुधम्मपरकी, समवयाराहु सदय सुवियारी ॥ सुहकरणी अणुरत्ता, अनधि एरिसा सहा ॥१॥ अजवि सुगुण सुरूवा, दोह वियारी सलज सुविणीया ॥ सुव्वयणा | गुणपरकी: गुणरागी एरिसा अधि॥२॥धम्मी धम्मसणेहि, धम्मसहाय धम्मउवएसी॥ धम्माणु रागरत्ता, अज्जवि सट्टाय धम्मिका ॥ ३॥चनविह धम्मपवत्तग. अवर पवत्तावणेवि जे कुशता ॥ गेहेविय वसमाणा, समण समाणा गिही अवि ॥ ४ ॥ जद्दवि उक्किटगुणा, न हुंति
1 ॥७९॥ दुसुमेण काल नावेण ॥ तहविय जहन मलिम, गुणा पवतंति संघेसु ॥५॥ सजण सरस सहावा है। गुणथुश् सीता अनिंदगा मिळा ॥ एए गुणा जहएणा, जस्सहवे तेजहण्ण गुणी ॥ ६ ॥
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सम्मत्त देस विरई, सब विरदस्स साहणं कुणई ॥ तिसुगणे सुवि मनिम, गुणी विमग्गाणु सारीवि ॥ ॥ जं तिय मलण्णयरं, गुणं सु लदिऊण दिढयरं धरई ॥ मूलगुणं उत्तरमवि, जयणं | जकिवणादत्वं ॥ ७ ॥ यरिय उवनाया, साहु सहाय चनविदो संघो ॥ उकिहा ति नंगा, || निय नियगणेसु जुंजिव्वा॥ए॥ दवाइ चननंगाणि, वियारियवाणि आदमीणं जेणय ममथ्य नावं || हवदिढं दोसपरिहरणं ए०॥ दूसम समय सहावे,अप्प गुणा दोस बहुयरा होई ॥ इदिमुणि ऊणय | नविया, गुणगहणं कुणह अत्तहिये॥१॥ दोसग्गहणे दोसं, गुणगहणे होश् अत्तगुणवुढी ।। श्य जाणे नोनवा, गुणगहणं दोस चयण वरं। ए॥ थायरिय उवलाया, साहु सिस्साय साहुणी सहा ।।
अवमाणियाहु जेमे, श्रवराह खमंतु मे सव्वे ॥ ए३ ॥ णहु मेरा दोसो, णहु मे णिंदापयोश्रणं | | किंचि ॥ दुसम सहावं कहियं, नवियाणं जाणण णिमित्तं ॥ ए४ ॥ जं सामाण विसेस, रूवं न. पियं च समण संघस्स. ॥ अहमवि तेणय रूवे, वद्दामो कम्मजोएण ॥ ए५॥ तब जब नाणताण | समिई गुत्तीय समण धम्मं च ॥ सुह किरियाणुट्टाणं, गहु मे एकोवि पुण्ण गुणो ॥ ए६ ॥
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| जय जिपमय सद्दहणे, वाराहग नाव. नापिणा दिई । ता तेण गुणाधारे, अहमवि थाराहगो- | होमि ॥ ए॥ सण नाण चरित, रयणत्तयः वंदणीय णमणीयं ॥ पढम पुगं सुयधम्म, तिश्य | गुणं होई सगनामे ॥ ए७ ॥ दुगधम्मे अवयरणं, तिपिण गुणाणं च सोवि दु दु ये॥णय पिछय | ववहारं, सद सद नूएण तेवि दुहा ॥ एए॥ गीय गुरु समीवे, उस्सग्गापवाय नेय मुणिकण ॥ वंदण नमसणाई, जहाविहुं कुणह नोनवा॥१०॥ जे सामाण सरूवं, वण्णवियं विङमाण जंदिउँ॥ तं वायमाण गुणियण, ममुवरि वेसं च मा वहसु ॥११॥ जं जं सञ्चासचं, वट्टर वत्थु सुहासुहं | सत्वं ॥ गिएह विणापरिका, तस्स विही का नवे विज्ञ ॥ १० ॥ आयरिया अण्णाई, उवादि | | जुत्ता च हव उज्जाया ॥ साहु हवई असाहु, पुनामि विह्मयं कस्स ॥ १०३ ॥ जय सदावि कु सदा, गुणा गुणणेव जाणए किंचि ॥ कस्स.णिवेयेएमि णायं, जश् नवई एरिसो संघो॥१०॥ सा- | हण सहाय रहिर्ज, कुणई कधं धम्म साहगो साहु ॥ साहण सहाय सरिसं, सिज्म कजं सुहासुहं सत्वं ॥ १०५ ॥ चिच्चा सढहढवायं, मयवायं माण मायबायं च ॥ जय श्छह गुणलाई, रिज |
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नावे सुणह चच्चेह ॥ १०६ ॥ कुणई कुमिल कुन्नावे, नणणं गुणणं च कहण सुषणं च ॥ पुषण | चचणयायी, सईपि निरम्यं तस्स ॥१०॥ तम्हा कुमिल कुलावं, चिच्चा घरिऊण हियय रिज नावं ॥ नईऊण लोय नावं, जिणधम्म कुणह लोलवा ॥१०॥ जे साक्वाद धम्म, उ जय नउत्तं न जा| पए मूढो ॥ एगंतं गही ऊणय, थावण उत्थावणं कुणई ॥ १० ॥ तं जिणधम्म विराग, नूदाखलु नमदिणंत संसारे ॥ तम्हा थाणपमाणं, कुणहय इजण मय वायं ॥१९॥ तम्हा परिकणं || खा, कत्तई देव धम्म गुरु गंथे ॥ सच्चेयरमिस्सेहव, गेयं हेयं जवाएयं ॥ १९९ ॥ सिरि नागपुरी नाम, कम तव गछे जुगप्पहाणोय ॥ सिरि पासचंदसूरि, सरपट्टे अहमे अछि ॥ ११॥ सिरि मि-|| चंदसूरी, सररचे दुसम समयगुणं ॥ मालारूवं सदगं, रश्य मुणि कम्मसिंहेण ॥ ११३ ॥ जो नवि ||७|| नब सहावे, पढदी गुणदी कुणोदि गुणगहणं ॥ गुणगहणे गुण लहणं, गुण लहणे सददि परमपयं ॥ ११४॥ इतिश्री महामहोपाध्याय मुनिश्री कर्मसिंहेन रचितं श्री कलिकाल स्वरूप कथनशतकं समाप्तम्।।
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गुरुचि
अथ श्री गुणस्थानकचिन्हानि कथ्यते.
सागुरुचि०
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जीवना गुण ज्ञान दर्शन चारित्र रूष (जीवस्वन्नावना) तरतम विशेष कृत दवमे गुण- | | स्थानके जीवना पण नेद थाय ते ए केः-प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थानक एटले के जिनवचनथी विपरीतदृष्टिये अर्थात जीवादिनव तत्वनी विपरीत प्रतिपत्ति, जेम धंतरानां बीज खावामां बाववाथी धोळीचीज पण पीळीजन्नासे अथवा पीळीज एम मानीबेसे. तेम मिथ्यात्वमोहनीना जो | गुरु धर्म ए ३ विपरीतपणे अने सर्व वस्तुने एकांतपणे मानी ले, पण सापेक्षपणे न माने, अथवा जिनवचन संपूर्ण सद्दहतां पण एक अक्षर मात्रनो अविश्वास जमालीनी पेठे लावे ते मिथ्यादृष्टिनु चिन्ह जे. कोइ कहेशे के- मिथ्यात्व दोष पुष्टने गुणगणी केम कही शकीए ! तेना उत्त| रमा एटपुंज के- यद्यपि मिथ्यात्व मोहनीय प्रकृति सर्वघातिनी तथापि तेथी सर्व ते स्वप्रतिपत्ति
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॥८
॥
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हणाए; तोपण मेघावादित सूर्यप्रनानी पेठे रात्रि दिवस विनागनी करनारी प्रना अनावृति होय |, तेवीज रीते जीवने पण एकांशे घटादिकनी प्रतिपत्ती अविरुद्ध होय तथा अक्षरनो अनंतमो | | नाग ऊघामो हमेशां जीवने रहे बे, ते परम निकृष्ट गुणनी अपेक्षाये मिथ्यात्वीने गुणस्थनाक कहेल ने पुनः कोइ कहेले के-- ज्यारे मिथ्यात्वी पण मुक्ति हेतु क्रिया करे त्यारे गुणगणी गणाय बे, पण ते सिवाय मिथ्यात्व नूमिस्थ गणाय . अथवा ए सम्यक्त्वादि गुण प्राप्त करशे | तेथी गुणगणी कहेंवा शकाय ?
बीजु सास्वादन गुणस्थानक एटले के, उपशम सम्यकत्व पामी एक समय तथा बावळी | है शेष सम्यकत्व काळ होवा बवां अनंतानुबंधियाना उदयथी उपशमिक वमतां क्षीर स्वाद समान नाव मिथ्यात्व प्राप्त थयां पहेला होय ते सास्वादन सम्यक्दृष्टि गुणस्थाक गणाय . २.
- मिश्र गुणस्थानक एटले के मिश्र मोहनीना उदयवमे श्री जिनना वचनोनी ऊपर रागद्वेष -18|| न होय ते त्रीजुं गुणस्थानक कहेवाय जे. ३
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सचिना
11८२॥
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चोथु थविरति सम्यकदृष्टि गुणस्थानक एटले के-विरति गुण जाणतां बता नवप्रत्ययें अप्र
16 चिन त्याख्यानावरणकषायोदयें करीने श्रादरी न शके, ते जाणे न श्रादरी न पाळी शके १, तथा जाणे न आदरे पाळे २, अने जाणे आदरे पण पाळी न शके ३, था त्रण नांगे वर्त्ततां दायिक १, उपसमिक , थने वेदक ३, थामांथी एकज तत्व रुचिरूप सम्यकत्व प्राप्त करी जे जे अध्यवसाए जिनवचन यथास्थितपणे परिणमे ते चोथु मुणगणुं कहेवाय . ४. ..
पांच, देशविरति गुणस्थानक एटले के-सावद्य योगनी एकदेशे विरति जेम निरपराधि || निरपेक्षसंकल्पी त्रसजीवनुं न हणवू इत्यादि हिंसा निषेधरूप सम्यक्त्व सहित अध्यवसाय जाणे || आदरे पाळें एनांगें वर्चे ते पांच, गुणस्थानक स्यां नवकारसी आदि प्रत्याख्याननो उदय होय २५.
वं प्रमत्त गुणगणुं एटले के-पांच प्रमादव चारित्र मलीन अध्यवसायथी थाय ते अप्रमनना अध्यवसायनी अपेक्षायें पमतां, देशविरतिनी अपेक्षायें चमतां अनंत गुणविशुद्ध एवी माया परिणामें वचेंडे. ६. . .
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611८२॥
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Bramue-SIVDrasvateTad apataBaruaaman
__ सातमुं अप्रमत्त संथम गुणगणुं एटले के-ते पांच प्रमाद रहित अनंत गुण विशुद्ध निश्चय चारित्र विषे स्थिरता रूप ते सहित जे अध्यवसाय तेज सातमुं गुणगणुं कहेवाय . .
श्राम निवृत्ति गुणगणुं एटले के चारित्रमोहनी प्रकृति उपसमाववा तथा खपाववाने माटे जेणे अतिविशुद्ध अध्यवसायवमे विशेष वीयर्योहास युक्त स्थितिघात, १, रसघात २, गुणश्रेणि ३, गुणसंक्रम ४ श्रने अपूर्व स्थितिबंध ५ ए पांच वस्तु यथी अपूर्वकरणे कद्देवाय बे, तथा एक समय अनेक जीव गुणगणे चड्या तेने शुद्ध शुद्धतरादिक अध्यवसाय नेदवमे निवृत्ति कहेतां फेरफार होय त्यां एनुं नाम निवृत्ति गुणगणुं पण कहवाय. या गुणस्थानके समय समय अनंतगुण विशुद्ध थाय . 6 :
नवमुं बादरसंपराय गुणगएं एटले के-एक समयमां अनेक जीव चमे अने अध्यवसाय फेरफार न होय तेथी एनुं नाम अनिवृत्ति कहेवाय , तथा बादर (मोटा) संपराय ( कषाय) ना थहींयां खेम थाय बे तेथी बादर संपराय कहेवाय .ए
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याचि०
मागुरुचि
॥८३
nayamvara-ODD9a09/09/9/D/BRAID/am
... दशसूक्ष्मसंपराय गुणगाणुं एटले के-सूक्ष्म कोहीकृत लोन वेदतां शेष मोहनीयना क्यहै || वके तथा उपसमवमें जे विशुद्ध अध्यवसाय ते दशम गुणस्थानक कहेवाय जे. १०..
अग्यारमुं उपशांतमोहनी बद्मस्थ वीतराग गुणगणुं एटले के-जेम पाणी नीतरवाथी तेमांनो मेल तळिये ठरी जतां पाणी निर्मल थाय तेम मोहनी कर्मना उपसमवाथो अध्यवसाय निर्मल थायडे. तेमज कषाय सत्तामा रहे ते माटे कषाय उदय थया के मोलायला पाणीनी पेठे मलीन अध्यवसाय थवानो संनक होय , तेना लीधे उपशांत मोहनी कहेवाय . या गुणगणथी अवश्य पालो पमे अनेजो मरे तो अनुत्तरवासि देव थाय त्यां पण चोथु गुणगणुं प्राप्त थाय जे. अन्यथा | दशमुं प्राप्त थाय जे. ११ . ___ बारमुं क्षीणमोह वीतराग बास्थ गुणस्थानक एटले के-सर्व मोहप्रकृति खपाव्याथी मोहनी सत्ता दूर थाय तेथी अत्यंत विशुद्ध अध्यवसायवंत थाय . १२ ..
तेर# संयोगी केवळी गुणगणुं एटले के-केवळज्ञान प्राप्त थया पली ज्यां लगी बादर योग
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| मन वचन कायाना प्रार्ने हाले चाले बोले त्यां खो संयोगी केवळी कहेवाय .
- चौदमुं अयोगी केवळी गुणगणुं एटले के-बादरयोग रंधवाथी मन वचन कायानाव्यापारना अनावधी करण वीर्यरहित मेरुनी पेठे निःप्रकर नणो शैलेसीकरण करवाने खीधे अयोगी केवळी गुणस्थान कहेवाय. था गुणस्थानके व्युपरत-क्रिय अप्रतिपाती नामनो शुक्नध्योननो चोथो पायो प्राप्त थाय तेथी शुक्लकाययोगवमे केवळीने योगनिरोध थायजे, पण ते सर्वथा योगना अनावो न थाय. अयोगीपणुं ते बादर योगना अनाववमे अपेक्षाए खेवाय. इत्यादि.
• ए चौद गुणस्थाननु कालमान कहे जे. मिथ्यात्व गुणगणुं अन्नव्यने अनादि अनंत, जव्यने अनादिसांत तथा सादिसांत होय. || ५-६-७-२३ ए गुणगणे देशे ऊणो पूर्वकोमी काल . ४ थे सागर ३३ साधिक कालमान.५ जे ||१|| श्रावळी, १४ पांच हृस्वादर प्रमाण काल होय. शेष ब गुणगणे काल उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त होय.
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॥ मुनि श्री नाणचंाजी कृत प्रश्नोत्तर.॥
प्रश्नीचर
प्रश्नः-जीव साये कर्म अनादिनां तेनो वियोग केम थाय?
उत्तरः कर्म के प्रकारनां होय एटले के-सहलू स्वन्नाव संपाद्य कर्म अने बाजु सहकारी || स्वन्नाव संपाय कर्म. ते पैकी जे सहनू स्वन्नाव संपाद्य कर्म ते अनादि तेथी तेनो वियोग
नथी. पण जे सहकारी स्वन्नाव संपाय कर्म ते सादि तेथी तेनो वियोग थायले ए माटे क|| मनो अने जीवनो संबंध संयोगवझे सादि अने प्रवाहे अनादिले. जे संयोगी नाव ते वियोगराह|| गर्मित तो ते विन्नावजनित कर्म जातेज अन्य. अन्य होय ते पूर थाय तेमां संदेह खाववा || जे, पण शं? ! मूळथीज कर्मबंध समयेज जीव ते निमित्त कारण, उपादान कारण नथी. मात्र ||
1८४॥ जुक्तवा वखते उपादान पणे परिणामे , एम मूळ थीज जे बेळ अव्य निन्न डे ते उपाय वमे ||
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वियोग थतां अमचण आवती नथी. पुनः जीवने कर्मनो कर्त्ता कहिये लिये ते व्यवहारथी बे. जेम कुंभार घमानो कर्त्ता , पण निमित्त मात्रथी ते कर्त्ता कदेवाय , तेम जीव पण कर्मनो निमित्त कारणज बे, पुजलास्तिकाय अव्य ते लोकाकाशमां सर्व स्थळे फरतो . सकर्मा जीपण एमज . ते ज्यारे एक क्षेत्रावगाही थाय डे त्यारे ग्राह्य ग्राहकन्नाव संबंधे तथाविध व्यादि | सामग्री संयोगवझे कर्मपणे थाय जे. ते बनता कर्म प्रत्ये जीव पोते निमित्त कारण थाय ने तेज | कर्म जोगववा वखते उपादान कारणपणे थाय , ते कर्मस्थिति मात्रायेज रहे डे ते सादि | एम हमेशांनो नियम , ते माटे अनादि कहेवाय , तेनो वियोग . जेम खाणमां पेदा थयेवं सोनुं सदा माटीनी साथे नेगुंडे; परंतु तथाविध उपायवमे सुवर्ण ते माटीथी रहित थाय डे, तेमज | जीव पण प्रवाहे अनादि कर्म संबंधे सहित; पण योग साधनादि सामग्री संयोगे शुद्ध अव्यरूप | थाय एमज सद्दह, योग्य . ॥ इति महामहोपाध्याय मुनिश्री नाणचन्द्र कृत प्रश्नोत्तरम् ॥
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अ०बो०
116'41
अथ ष्टकर्म संबंधी बोल विचार.
या कर्मना स्वभाव कोना जेवा बे ए संबंधी नो विचार नवतत्त्वनी अंदर कथन करेल बे. ते आठे कर्म पैकी ज्ञानावरणी कर्मव मे अनंत ज्ञानगुण ढंकाइ जाय बे, दर्शनावरणीव अनंत दर्शन गुण ढंकाइ जाय बे. वेदनी कर्मत्रमे अनंत अव्यावाध आत्मिक सुख रोका जाय बे, मोहनी कर्मव मे क्षायिक समकित गुण रोकाइ जाय बे, आयुकर्मवमे अक्षय स्थिति गुण रोकाइ रहे बे, नामकर्मना उदयवमे मूर्त्तिगुण रोकाय बे. गोत्र कर्मवमे अगुरुलघु गुण रोकाय बे छाने अंतराय कर्मव अनंतवीर्य आत्मशक्ति रोकाय बे.
ज्ञानावरणी कर्म प्रकारथी बंधाय बे, ते ( कर्मबंधनी विगत श्री भगवतीजी मां | बे.) ए के - " नाप मिलियाए ” - ज्ञानीनुं मुंकुं बोले १ " नायनिन्दवण्याए" ज्ञानीनो उपकार न माने २, “नांतराएं" सूत्र जणनारने विघ्न करे. ३, "नागप्प सेणं” ज्ञान घने ज्ञानी ऊपर
अ० बो०
।। ८५ ॥
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Varmavemama/RamvasasaramamVIBaa/navam
केष राखे. ५, “ नाणयासायणाए"-शाननी आशातना करे. ५, पाणविसंवादणा जोगेणं "-शा|| ननो व्यनिचार बतावे अथवा ज्ञानथी विपरीत उपदेश करे. ६, था प्रकारे ज्ञानावरणी कर्म | शरीर प्रयोग नामकर्मना उदयवमे झानावरणी कर्म शरीर प्रयोग बंध अर्थात् था उ प्रकारथी झानावरणी कर्म बंधाय जे. तथा ते कर्म पांच अथवा दश प्रकारथीनोगवाय जे. तेमां मतिज्ञानावरणी १, श्रुतझानावरणी २, अवधिज्ञानावरणी ३, मनपर्यवज्ञानावरणी, अने केवलज्ञानावरणी५, | ए पांच ज्ञान प्रकट थवा न दे. तेमज दश प्रकार ए जे के सोयावरणे १, सोयविन्नाणवरणे २, | नेतावरणे ३, नेतविन्नाणवरणे , घाणावरणे ५, घाणविन्नाणवरणे ६, जीनावरणे , जीनविन्नाण| वरणे ७, फासावरणे ए, फासविन्नाणवरणे १०, आ दश प्रकारे नोगवाय . ए ज्ञानावरणी कर्मनी | स्थिति था प्रमाणे ले के-जघन्य अंतर्मुहूर्त अने उत्कृष्ट त्रीश कोमाकोमी सागरनी तथा अबाधा | काळ त्रण हजार वर्षनो .
दर्शनावरणी उ प्रकारे बंधाय डे अने नव प्रकारे नोगवाय ले, ते ए के-( प्रकार ज्ञानावर
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daaDDENDEDGDADAR
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अ.
DVERD/DVDavatyamaraavane
| पीनी पेठेज समजी लेवा.) चहु दर्शनावरणी १, अचक्कु दर्शनावरणी. १, अवधि दर्शनावरणी.३, | केवळ दर्शनावरणी ४, निता ५, निजानिता ६, प्रचला ७, प्रचलाप्रचला, ७ अने थिणद्धि ए आ नव प्रकारथी नोगवाय जे. दर्शनावरणीनी स्थिति जघन्य अंतर्मुहूर्त, उत्कृष्ट त्रीश कोमाकोम || सागरोपम अने अबाधा काल त्रण हजार वर्षनो बे.
वेदनी कर्म बे प्रकारे होय बे-एटले के शाता वेदनीने अशाता वेदनी. शाता वेदनी दश || प्रकारे बंधाय डे ते एवी रीते के,-पाणाणुकंपयाए १, नूआणुकंपयाए २, जीवाणुकंपयाए ३, सत्ताणुकंपयाए ४, बहूणं पाणाणं नूयाणं जीवाणं सत्ताणं अख्खणयाए ५, असोयणाए ६, अफूरणयाए , अतिप्पणयाए , थपिदृणयाए ए, अपरियावणयाए १० था दश प्रकारे बंधाय डे, अने या प्रकारे नोगवाय ते ए के-मणुन्नासदा १, मणुन्नारूवा २, मणुन्नागंधा ३, मणुन्नारसा |४, मणुन्नाफासा ५, मणसुहाए ६, वयसुहाए ७, कायसुहाए ७ था 6 प्रकार जे.
अशाता वेदनी.बार प्रकारे बंधाय, अने आठ प्रकारेनोगवाय ते एके-परदुख्खणयाए।
Samaramavasavarome/m//awaadam
॥८६॥
B/AINMD/IN/AMD/
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परसोयणयाए २, परफूरणयाए ३, परतिप्पणयाए ४, परपिट्टणयाए ५, परपरियावणयाए ६, बहुणं पाणाणं नूयाणं जीवाणं सत्ताणं दुख्खणयाए , सोयणथाए ७, रणयाए ए, तिप्पणयाए १०, पिट्टणयाए ११, परियावणयाए १२ आ बार प्रकार बंधना , अने अमणन्नसहा १, रूवा, गंधा, फासा, असा, मणदुइया, वयदुइया अने कायदुहया आ ७ जुक्तवाना प्रकार ले. वेदनी कर्मनी | स्थिति त्रीश कोमाकोमी सागरोपमनी अने अबाधाकाळ त्रण हजार वर्षनो . ___मोहनीकर्म प्रकारे बंधाय अने अव्यावीश प्रकारे नोगवाय ले ते एवी रीते के-तिव्वकोहे , तिवमाणे २, तिवमायाए ३, तिव्वलोहे , तिवदंसणमोहणीजाए ५, तिवचरित्तमोहणी जाए ६, या प्रकार बंधना बे, अने अनंतानुबंधी क्रोध के जे पर्वतनी रेखा सरखो १, अनंतानु बंधी मान के जे पथराना थानला जेवो २, अनंतानुबंधी माया के जे वांसमानी गांव समान |३, अनंतानुबंधी लोन के जे किरमजना रंग समान . या चारे नरकनी गति थापेले अने जावजीव. रही समकितनो घात करे बे. अप्रत्याख्यानी क्रोध पृथ्विनी रेखा समान १, मान
Pos/monomenonevaasaseGBan
क ळBARSoad
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अ०बी०
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road/Draupoup/amous/oD/ABus/apps/oDa
(अप्रत्याख्यानी) अस्थि समान ,अप्रत्याख्यानीमाया घेटानाशिंगमा सरखोअने अप्रत्याख्यानी || लोन गामानी धरीनी मळी समान डे अने एओ तिर्यंचनी गतिदाता . स्थिति वर्ष दिवसनी
अने देशविरतीनो घात करनार जे. प्रत्याख्यानी क्रोध वेळुनी रेखा समान १, प्र मान काष्ट सर २, प्र० माया गोमूत्रना समान ३, प्रलोन नगरनी खाळना कादव समान होय बे. एयोनी स्थिति चार मासनी, गति मनुष्यनी यापी शके अने सर्वविरतीनो घात करे वे. संज्वलन क्रोध पाणीनी लीटो समान १, सं० मान नेत्रनी सळी समान २, सं माया वांसमानी बोल समान ३, अने संग लोन हळदरना रंग समान ४. एयोनी स्थिति पंदर दिवसनी, देवगतिदा| ता, अने यथाख्यात चारित्रनो नंग करे बे.
_ या सर्व मळी १६ कषाय ए नोकषाय . हास्य, रति, अरति, नय, शोक, दुगंग, स्त्रीवेद, | पुरुषवेद अने नपुंसकवेद ए चारित्र मोहनीनो पच्चीश प्रकृति. समकित मोहनीनी त्रण प्रकृतिसमकित मोहनी, मिश्रमोहनीश, मिथ्यात्व मोहनी३ए सर्व मळी २० प्रकृति बे. एजनी स्थिति
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amara/are/am/meramepranase
|| जघन्यथी अंतर्मुहूर्त्तनी अने उत्कृष्टथी ७० कोमा कोम सागरोपमनी तथा श्रवाधा काळ जघन्य | अंतर्मुहूर्त अने उत्कृष्टी son० वर्षनी ले.
आयु कर्म सोळ प्रकारथी बंधाय डे अने चार गतिमा चार प्रकारे नोगवाय एटले के-नारSI कीनुं श्रायु चार प्रकारथी बंधाय जे ते ए के-महारंनियाए १, महा परिगहाए २, कुणिमाहा- ||
रेणं ३, पंचिंदियवहेणं ४. तिर्यंचर्नु थायु चार प्रकारे बंधाय जे ते ए के-माइलियाए १, नियमि द्वियाए २, अनीयवयणेणं ३. कुम्तुहकूममाणेणं ४. मनुष्यतुं श्रायु पण चार प्रकारथो बंधाय ने | ते एज के-पगश्नयाए १, पगई विणियाए २, साणुकोसियाए ३, अमरियाए ५. एज रीते दे| वनुं श्रायु पण चार रोते बंधाय डे तेए के-सराग संजमेणं १, संजमासंजमेणं २, बालतको कामेणं ३, अकाम निकराएणं ४, या चार प्रकारना ४-४ मळी १६ नेद थयाते चारे गतिनी अंदर चार चार रीते लोगवाय डे. नारकी, देवतानी स्थिति जघन्य दश हजार वर्षको अने उत्कृष्टपणे ३३ सागरो. पमनी, तेमज मनुष्य, तिर्यंचनी स्थिति जघन्ययो अंतर्मुहर्तनी यो उत्कृष्टपणे त्रा पक्ष्योपमनोबे.
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अ० बो० ७
॥ ८८ ॥
नाम कर्मनाबे दबे ते ए के पहेलुं शुभ नाम कर्माने बीजुं अशुभ नाम कर्म छे. ते पैकी शुभ नाम कर्म चार प्रकारथी बंधाय डे अर्थात् काय उज्जुखाए १, नासजज्जु आए २, नावज्जुया ३, विसंवायाजोगेणं ४ या चार प्रकारे बंधाय डे ने चौद प्रकारथी जोगवाय बे ते ए के-इठा सद्दा रूवा रसा गंधा जाव फासा १ थी ५, इहागर ६, इहाविई ७, इठेलावन्ने प, इट्ठाजसो कित्ति ए, ईट्टेउडा कम्मबलवी रियपुरिसक्कारपरकम्मे १०, हसरया १९, कंतसरया १२, प्रियस - रया १३, मणुन्नसरया १४ या चौद प्रकारे जोगवाय डे. अशुभ नाम कर्मनी प्रकृति ४ प्रकारे बंधाय बे ते ए के - काया पुज्जुआए १, नासाज्जुआए २, नावापुज्जुयाए ३, विसंवायणाजोगे ४ श्र चार कारणथी बंधाय डे ने चौद प्रकारथी जोगवाय बे ते ए के हिसिद्दाजाव अािफासा, अगिई ६, बिहारि ७, अपिलावण्णे ८, अपिधाजसो कित्ति ए, अ पिठे उठाए कम्मबळवी रियपुरिसक्कारपरकम्मे १०, दीसरया ११, दीप १२, यहि १३, अकंतसरया १४ ए चौद डे. नाम कर्मनी त्राणु प्रकृति बे. ते कर्मग्रंथथी जाणी लेवी. एनी स्थिति
अब
॥ ८८ ॥
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Depaotomaasoor
| जघन्यथी आठ मुहूर्त्तनी अने उत्कृष्टपणे वीश कोर कोमी सागरोपमनी, तथा अबाधा काळ |बे हजार वर्षनो .
गोत्र कर्मना । नेद ने ते ए के-उच्च गोत्र अने नीच गोत्र. ए७ प्रकारे बंधाय ने माटे आठ |मद न करवा. उच्च गोत्र बांधे ते पण आठ प्रकारे लोगवाय जे एटले के-जा विसिया १, कुलवि| सिया २, बलविसिट्टया ३, रूवविसिठ्ठया ४, तवविसिया ५, सुयविसिठ्ठया ६, लानविसिघ्या |, इसरियविसिट्टयाए ७ आ आठ प्रकारथी नोगवाय हे अने उच्चपणुं पामे . नीच गोत्र पाठ
प्रकारे बंधाय डे ते ए के-जाश्मएणं १, कुलमएणं २, जावईस्सरियमएणं ए आठ प्रकारे जे || मद करे ते नीच गोत्र बांधे , अने ते याच प्रकारे लोगवाय जे. एटले के आर्शविहीणया, कुलवि
होणया, जाव ईस्सरियविहीणया. ए आठ प्रकारथी हीणपणुं नोगवे . ए कर्मनी स्थिति जघन्यथी. मुहूर्त्तनी, उत्कृष्टथी २० कोमाकोमी सागरोपमनी, अने अबाधाकाळ २०० वर्षनो ..
अंतराय कर्म पांच प्रकारथी बंधाय ने एटले के-दानांतराय पामवाथी, लालांतराय करावाथी
Bapatidad/DDOGODD/कप
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बा०स०
आ०स०
॥८९॥
|ाए नोगांतराय करावाथी, उपनोगांतराय करावाथी अने वीर्यातराय करावाथी आ पांच प्र. कारथी बंधाय बे अने पांच प्रकारथीनोगवाय बे एटले के-दानांतराय, लानांतराय, नोगांतराय, उपनोगांतराय अने वीर्यातराय. ए कर्मनी स्थिति जघन्यथी अंतर्मुहूर्तनी, उत्कृष्टथी ३० कोमा कोमी सागरोपमनी अने अबाधाकाळ ३००० वर्षनो बे. ॥ इति श्रष्टकर्म विचारः॥
॥ अथ श्री आठ मद परिहार सज्काय.॥
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(राह त्रिताल चोपाइनो.) सुगुरु सीख रे जीव संनाळि, थावे मद मनहुंता टाळी ॥ दिनकर तापें ग्रीषमकाळि, जिम जळ बंमे सरवर पाळि॥१॥ यावे आठ करमना गम, जेवं नाम ते, परिणाम ॥ घणो काळ एनो उनमाद, पंचमांहि ए प्रयम प्रमाद ॥१॥ माता पक जाति जगे कही, कर्मवशे ते उत्तम
८९॥
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लही ॥ एइनो मद म कर लगार, ए तें लड़ी अनंती वार ॥ ३ ॥ अथम जाति पुष वार अनंत, ते कद्देतां न लड़िये अंत ॥ करिये गर्व किशुं मन जाणि, परिहर संजळि आगमवाणी ॥ ४ ॥ पिता पक्षतणो कुल तेह, प्राणीने मद कारण जेद ॥ उचम नर पुए इ मदे कळ्या, छावर लोक किहां जाय टब्या ॥ ५ ॥ मरीचिने जवे श्री वर्द्धमान, कुलमद करी अति सपराण ॥ ते पुण माइण कुळ छावतर्या, कर्म खप्ये नवसायर तर्या ॥ ६ ॥ इशो जाणी कुळमद टाळीजे, निरतो सूत्र वचन पाळीजे ॥ प्राणी ए तु पूरव नहीं, काळ अनंतो इम गयो वही ॥ ७ ॥ गुण पाखें रूपें हुए किशुं, परमारथि जनमनंगुण वश्युं ॥ श्राउळ फूल सेवंत्री जोय, गुण विण रूपें राचे न को. य ॥ ८ ॥ जो गुण हुए तो जरा पावोजे, रूप विष पुष इम जावीजे ॥ इस कारण गुण करो प्रमाण, रूप लदी मद तजो सुजाण ॥ ए ॥ रूप मदे चक्री सनतकुमार, उपन्या अंगे कोढ - ढार ॥ संयम लेइ परिसद सह्या, तिथे मद ढंकी परमपद लया ॥ १० ॥ रूप तो मद जीवनवार, इम नहु पामिश जवजळ पार ॥ गर्ने कोइ न सीजे काज, गरवे न लहे शिवपुरराज ॥११॥
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प्राणी तुज बळ केहो होय, काळ अतीत विमासी जोय ॥ वेशपशिलाका पुरुष जे दुश्रा, तेहना || आ.स चरित जाणि जुजूया ॥१२॥. तसु बल केहनी जामलि नहीं, तसु प्रमाद हुं न शकुं कही। अनंत काळे ते थया अनंत, गुण गिस्था मोटा बळवंत ॥१३॥ ते चिंताची थापण' जोय, खजूया सूर सम अंतर होय ॥ बळ मद टाळी चरण बळ धरे, काया निर्मळ इणि परे करे ॥२४॥ श्रुतसागर जिम ले अपार, चनद पूरव अंग अग्यार ॥ जेणे श्रुत पार ऊतर्या तिणे पुण श्रुत मद नहुँ कर्या ॥ १५ ॥ श्रादि एग ७२ श्रुतकेवळी, तरतमयोगें श्रुत से वळी ॥श्म करतां शुं| श्रुत तुज पास, म करिश मद श्म हिये विमासः ॥ १६ ॥ श्रादीश्वरें वरखी तप कों, वीरें | मासी तप आदर्यो । वर्गप्रतरघन एकावळी, सिंहनी क्रीमित कनकावळी॥१७॥इत्याविक कर तपन्नएया, वळी अनंते कीधासुण्या ॥बारह प्रतिमा समरसें वही, जावजीव खगी निरवही ॥१७॥ रे जीव तेहवो तप नहु थाय, तो पुःकर केम कराय॥ फोकट मद श्म जाणि करीकिशुं करे अशक्ति छादरी ॥ १९ ॥ क्वहरतां एकांते लान, कधुन जाय एकति अलान ॥ करमयोंगें
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ए थाए सही, मद करतां होय अधिको नहीं ॥२०॥ शुं विचारी लान्नमद बंमी, संजम ववहरखे बळ मंमी ॥ इणिपरे होशे अनंतो लाह, एह ऊपर मन करे उछाह ॥१॥ अथिर ल-| हि जिम संध्याराग, सूखिम सूत्र जिम काचो ताग; बे पहरनी जिम गंदनी, कापुरिष केरी
जिम बांहमी. ॥ २२ ॥ खिण खिण आवे खिण खिण जाय, जे घनवंत ते निरधन थाय; करम । उदय ते वळि धनवंत, लखमीमद म करीश गुणवंत ॥ २३॥ ए मद करता हीणा सह, मद टा.
ळंतां वृद्धि हुए बहू; सांतळि सुगुरु तणो उपदेश, आठे मदनो टाळो लेश ॥ २४ ॥ सूत्र साखे | ए करो विचार, पाळो पूरा पंचाचार; (श्री) पार्श्वचंडसूरीश्वर कहे, जे पाळ ते शिवसुख लहे ॥२५॥
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॥ ९१ ॥
॥ सामायिकना बत्रीश देोषनी स्वाध्याय ॥
(त्रिताल चोपाइ )
पहिला प्रमुं जिण चजवीश, सुगुरु नाम समरुं निशिदीश ॥ पनशि श्रावकने अधिकार, सामायिक विधि श्रुतवाधार ॥ १ ॥ आरत रौद्र तणो परिहार, अवधि सीम संजम थाधार ॥ आणी समतानो परिणाम, सामायिक करवो अभिराम ॥ २ ॥ तेह तपाढ़े दोष वत्रीश, ते पनशि मन धरी जगीश ॥ जे सांजळी श्रावक खप करे, देलें जिम जवसायर तरे ॥ ३ ॥ वस्त्र बांह वाळी पालवी, प्रथम दोष ए जुगतो नथी । आधुं पाहुं सण थाय, बीजुं ए दूषण | कद्देवाय ॥ ४ ॥ दृष्टि न राखे एका दिशे, जोवे चपळपणे चिहुं दिशें ॥ त्रीजो दोष सामायिक जाण, व्रत घरी परिहर ही अने आए ॥ ५ ॥ अल्प बहुल लागे सावऊ, चोथे दोष निवारो कज्ज ॥ पूंठ जीत पाटि ने स्तंन, पंचम दोष जे ल्ये श्रवतंन ॥ ६ ॥ यति संकोने अंग उवंग, उठो दोष करे व्रतनंग ॥ आलस मोमे ए सातमो, गंजे करमक ए आठमो ॥ ७ ॥ नवमो मेल उतारे जेद,
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॥ ९१ ॥
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दीलतणो व्रत दूषे तेह ॥ खणे खाज ए दशमो जाण, टाळंतां व्रत चमे प्रमाण ॥ ७॥ अंगे वी. सामण कारवे, दोष ग्यारम व्रत हारवे ॥ बारम दोष जे निसा करे, बार दोष काया परिहरे ॥ ए ॥ वचनतणा दश दोष पिठाण, परिहरि चतुरपणो चित थाण ॥ बोले कुवचन पहिलो दोष, लागो जाणीमधरिश तोष ॥१०॥बीजे मनषिश सहसाकार. आयो पागे हिवत्रीजो। वार ॥ आपणलंदे जे बोलिये, चनथो दोष विषे तोलिये ॥१९॥ नणतो सूत्र मकर संक्षेप, पं-|| चम दोषतणो निक्षेप ॥ कलह म मंमिश जां व्रतनार, बहा दोषतणो परिहार ॥ १२ ॥ विकथा | | सप्तम दोष निवार, परउपहास आठमो विचार ॥ संपद पद विण उतावळो, म नणो नवम | दोषथी टळो ॥ १३ ॥ जाव आव श्म कहिये नहीं, दशम दोष परिहरिये सही ॥ वचनतणा
ए जाणी दोष, टाळि करो सामायिक पोष ॥ १४ ॥ मनना दोष दिवे सांनळो, परिहर नवियण | पूरे रळी ॥ प्रथम दोष मन नहीं विवेक, नहु जाणे कणो अतिरेक ॥ १५ ॥ यश कीरति वांडे | अति घणी, करे सामायिक जे तिह नणी ॥ बीजो दोष ए गम कह्यो, नवियण जण जाणि
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९२॥
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निग्रह्यो ॥ १६॥ हियके वांजे धननोलाह, त्रीजे दोषे घणो गुण दाह॥ चन्यो दोष जे करिए गर्व, एदयी निर्गमीए फळ सर्व ॥ १७ ॥ करे सामायिक जे बीहतो, वारे सुगुण दोष ईहतो ॥ पुत्र धनादिकतणो निदान, करतां बहो दोष निदान ॥ १७ ॥ सामायिक फळ विधिजे कही, शुं जाएं होशे वा नहीं ॥श्म संशय हियमे श्राणिये, सप्तम दोष ते श्रुति जाणिये ॥ १५ ॥ अष्टम करे जे आणी रोष, अविनय करतां नवमो दोष ॥ नगति हीण ए दशमो सही, श्रावक ए श्रादरवो नहीं ॥ २० ॥ ( उपजाति बंद ) बत्तीस दोसेहिं विसुद्धमेवं, करिङ सामाश्य मप्पमत्तो ॥ निच्च नरो तस्स सुहं समग्गं, कहेश एवं मुणि पासचंदो ॥१॥
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॥ श्री जनाक्त सद्दहणा क्रिया स्वाध्याय घात्रिंशिका.॥
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(राग भुपाल अथवा भेखरे उतारो राजा भरथरी-ए देशी.) सोहम गणहर पय नमी, कहीशुं किंपि विचारजी ॥सदहणा किरीयातणो, जिम आगम विस्तारजी ॥१॥ नवियण निरतो उळखो, श्री जिनशासन मर्मजी॥ सद्दहणा सूधी क्रिया, जिम लहिये शिवशर्मजी॥ नवियण ॥२॥ व्यत श्णे जीवें लह्यो, धर्म अनंती वारजी ॥श्क | समकित विण बहु रूळ्यो, चगगहन ममारजी॥नवियण ॥३॥ सदहणा जे श्रुतें कही, पहिले बीजे अंगजी ॥ धर्मपरीक्षा तिह अडे, जो जो मनने रंगजी ॥ नवियण ॥ ४॥ पढम अंग चन्थे ऊयणे, जैन शैव संवादजी ॥ त्रिणिशत त्रयशव एकठा, बोल्या गाढे सादजी नवियण ॥ ॥५॥ धारथ आरंन जिहां, तिहां अम दोष न कोयजी ॥ जैनीओं एह वचन सुण्यो, उत्तर वाळे सोयजी ॥ नवियण ॥६॥ अहो अनारज तुमे किशुं ? बोब्यु वचन विरुद्धजी॥ जिनमतना
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निसा जे जाण बे, वचन वदे ते शुद्धजी॥ नवियण ॥७॥जीव जिहां हणिये नहीं, तिहां नहि दोष ॥९३॥
लगारजी ॥ अम्ह तित्थेसर श्म कहें, शणिपरें जिनमत सारजी ॥ नवियण ॥ ७॥ जिन विधिवादे जे कहें, सावद्यनो लवलेशजी ॥ ते मिथ्याती जाणवो, नवमांहि बहे कलेशजी ॥नवियण ॥ ए॥ धरम मिश्र धारंज जिहां, देखी रहे उदासजी॥त्रिकरण शुद्धे साधु ते, पामे सौख्य निवासजी॥ नवियण ॥ १०॥ उदयक तिथि जिणवरें कही, चंद सूरपन्नत्तिजी॥ पंचमंग शत बारमें, एहतणी वळि वृत्तिजी ॥ नवियण ॥ ११॥ दिन ऊगमते जे तिथि, समयादिक जब होयजी॥ अहोरात्री ते तेहनो, सबहे तिथिमांहे सोयजी॥ नवियण ॥ १२ ॥ बीय अंगे वीशमें, अध्ययन अर्थि चउमासिजी। पनम त्रिणि पाखी सवे, चउदशे हिये विमासिजी ॥ नवियण ॥ १३ ॥ पंचमंगि पनरम शतें, पूनम चमासि साखिजी॥ कल्पसूत्र वृत्तिये वळी, पाखी चनदशि दाखिजी ॥ नवियण ॥ १४॥ दशाश्रुतस्कंधे कही. चउदशि थरथे पाखीजी॥ पंचमे पजूसण नाखिर्ड, निशिथकल्पसूय साखिजी॥नधियण ॥ १५॥श्म चउमासु पूनमें, पाखी चनदशें होयजी॥
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संवत्सरी पंचमें जल्यो, दिये विमासि जोयजी ॥ जवियण ॥ १६ ॥ दवे पकिम जिम कहुँ, काउस्सग्ग निरयुक्तिजी | काउस्सग्ग चार त्रण वांदा, देवसी राई युक्तिजी ॥ जवियण ॥ १७ ॥ काउस्सा इक अतिचारनो, करी वंदा गुरुपायजी ॥ आलोवीने परिक्रमे, वंदण खामण जायजी ॥ जविय ॥ १८ ॥ चारित्र दंशण नापनी, तिहुं काजस्सग्गें शुद्धिजी ॥ करिय ने गुरुवांदणुं, | देतां आवश्यक शुद्धजी ॥ जविय ॥ १५ ॥ राई परिक्रमणे कर्त्तुं पहिलां चरणाचारजी ॥ बीजो दंसण शुद्धिनों, त्रीजो ज्ञानाचारजी ॥ जवियय ॥ २० ॥ तिहां अतिचार चिंतवी, पारी वांदण देइजी || लोइने परिक्रमे, वंदी खामे तेजी || नविण ॥ २१ ॥ काउस्सग्ग मांहि तप चिं| तवी, वंदी करे पच्चरका जी ॥ देववंद गुणत्रीशमे, उत्तरकपणे ठाणजी ॥ नविण ॥ २२ ॥ यत्र मंगळपद कह्यो, सूत्रे अर्थ विचारजी ॥ स्तुति इक आदे सात ज्यां, श्लोकानो अधिकारजी ॥ जवियण ॥ २३ ॥ स्तव ते शक्रस्तव कह्यो, ए जिननो विधिवादजी ॥ चखविद संघ समाचरे, टाळे सयळ प्रमादजी ॥ नविण ॥ २४ ॥ बीजे त्रीजे जगुों, पंचम बठ्ठे अंगेजी ॥
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॥ ९४ ॥
अत्तर सो स्तुति करी, ऊजा रही मन रंगेजी ॥ जवियण ॥ २५ ॥ बेसी शक्रस्तव जल्यो, सम्यग्दृष्टि एमजी ॥ इणी परे चैत्यवंदन करे, संघ सिद्धांतें जेमजी ॥ जवियण ॥ २६ ॥ विरत सुर जिन जामंलिये, राधे बिहु कालजी ॥ तसु निरमल मति किम हुवे, श्रावश्यकें - तिचारजी ॥ नविय ॥ २७ ॥ इक अरिहंत आराधतां, सीके सघळां काजजी ॥ बीजा देव रातां किम लदिये शिवराजजी ॥ नविय ॥ २८ ॥ पांचे पक्किमणे कला, त्रिणिगमा विस्तारजी ॥ पक्किमणे वार त्रिणि करे, सामायिक उच्चारजी ॥ नविय ॥ १ ॥ इक ठावी बीजो वली, पक्किमतां काउस्सग्गजी, त्रीजो इम पांचे करे, तसु पक्किममुं जुग्गजी ॥ नविय ॥ ३० ॥ ए विधि संक्षेपें जी, विस्तार श्रागम मजारजी ॥ चतुर हुशे ते जाणशे, करशे श्रुतअनुसारजी ॥ नविय ॥ ३१ ॥ गछाचरणा जे करे, करिय सद्दहा पर्वजी ॥ तसु मति विपरीत जाणवी, सूत्रे बोल्युं सर्वजी ॥ जवियण ॥ ३२ ॥
॥कलश॥ इमजाणी श्रुतनी साखे सहा पर्व किरिया किजए ॥ डुल्न माणुस जनम पामी
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९४ ॥
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करि परीक्षा लिङए । सूरी श्री पार्श्वचंड शिष्यवर समरचंड श्म उच्चरे ॥ शुद्ध जिनधर्म करे श्क चित्तें तेह नवसायर तरे ॥
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॥ अथ श्री जगवति सूत्रमा बतावेलुं गणित प्रमाण ॥ श्री नगवति सूत्रमा बढे शतके बढे उदेशे गणित प्रमाण कहल ले तेनुं सुगम नाषांतर || आ. मुजब ले के,-श्री लगवंत समीपे गौतमस्वामिये पूयुं, हे नगवन्! एक मूहुर्ते के|| टला उसासा होय ? स्वामीए गौतम प्रत्ये कयु. अहो गौतम! समय-अति सूक्ष्मकाळ जेना एकना | बेनाग न थाय एवा असंख्याता समय जाय तो एक श्रावलिका थाय. संख्याती श्रावलिका एक उसास, संख्याती आवलिकाए एक निःश्वास थाय. थाधि व्याधि रहित हर्षित पुरुषनो एक जसास एक निःश्वास के जेने एक प्राण कहेवामां आवेने एवा सात प्राणे एक थोव थाय, एवा सात थोवनो एक लव कहेवायडे, एवा सित्योतेर (७७) लवर्नु एक मुहूर्त थायजे. एक मुहूर्ते
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त्रण सहस्र सातसो त्योतेर श्वासोश्वास थाय. ए मुहूर्त्तने प्रमाणे त्रीस मुहूर्ते एक अहोरात थाय. एवा पंदर अहोरात्र जाय, एटले एक पक्ष थाय, बे पके एक मास थाय, बे मासे एक ऋतु, त्रण ऋतुये एक अयन, बे अयने एक संवत्सर, पांच संवत्सरे एक युग, वीस युगे सो वरस, दससो वरषे सहस्र वरष थाय, सो सहन वरषे लाख वरष, चोरासी लाख वरषे एक पूर्वांग, चोरासी लाख पूर्वांगे एक पूर्व, ए पूर्व चोराशी लाख गुणो करीए एटले एक त्रुटितांग, || | वळी एने चोरासी लाख गुणो करीए एटले एक त्रुटित थायजे.ए अनुक्रमे प्रत्येक प्रत्येक चोराशी | लाखे गुणतां, अममांग, अमम, अवांग, अवव, हुदुरंग, हुहुअ, उत्पलांग, उत्पल, पद्मांग, पद्म, नलिनांग, नलिन, अनिउरांग, थनिजर, अयुतांग, अयुत, नयुतांग, नयुत, प्रयुतांग, प्रयुत, चूलिकांग, चूलिका, सीसपहेलियंग, सीसपहेलिया, एटला लगे गणित गणाय डे.
हवे पूर्वांगथी प्रारंजी सीसपहेलिका लगे गणितनानेद अठ्ठावीस ले ते सघळा अंक वो नीचे मुजब मंमाय .
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१८४००००० एटला वर्षे एक पूर्वांग थाय ते पूर्वांग. २७०५६०००००००००० एटला वर्षे एक पूर्व ते पर्व. ३ ५९२७०४००००००००००००००० एटला वर्षे ते त्रुटितीन. ४४९७८७१३६०००००००००००००००००००० एटला वर्षे ते त्रुटित. ५ ४१८२११९४२४ अहीं आगळ शून्य २५ मांडवां ते अडडांग. ६ १५१२९८०३१६१६ आगल शून्य ३० मांडवां ते अहह. ७ २९५०९० ३४६५५७४४ आगळ शून्य ३५ मांडवा ते अवांग. ८२४७८७५८९११०८२४९६ आगल शून्य ४० मांडवां ते अवव. ९२०८२१५७४८५३०९२९६६४ आगल शून्य ४५ मांडवां ते हुहुआंग. १. १७४९०१२२८७६५९८०९१७७६ आगल शून्य ५० मांडवा ते हुहुअ. ११ १४६९१७०३२१६३४२३९७०९१८४ आगल शून्य ५५ मांडवा ते उत्पलांग. १२ १२३४१०३०७०१७२७६१३५५७१४५६ आगल शून्य ६० मांडवां ते उत्पल, १३ १०३६६४६५७८९४५११९५३८८००२३०४ आगल शून्य ६५ मांडवां ते पद्मांग. १४ ८७०७८३१२१३१३९००४१२५९२१९३५३६ आगल शून्य ७० मांडवां ते पा.
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१५ ७३१४५७८२६१०३६७६३४६५७७४४२५७०२४ आगल शून्य ७५ मांडवां ते नलिनांग. १६६१४४२४५७३९२७०८८१३११२५०५१७५९००१६ आगल शून्य ८० मांडवा ते नलिन. १७ ५१६११६६४२०९८७५४०३०१४५०४३४७७५६१३४४ आगल शून्य ८५ मांढवा ते अच्छिनिउरंग. १८ ४३३५३७९७९३६२९५३३८५३२१८३६५२११५१५२८९६ आंगल शून्य ९० मांडवां ते अच्छानउर. १९ ३६.१७१९०२६६४८८०८४३६७०३४२६७७७६७२८४३२६४ शून्य ९५ , ते अयुतांग. २० ३०५९०४३९८२३८४९९९०८६८३०८७८४९३२४५१८८३४१७६ शून्य १००, ते अयुत. २१ २५१९५९६९४५२०३३९९२३२९३७९३७९३४३२५९५८२०७०७८४ शून्य १०५ गते नयुतांग. २२ २१५८४६१४३३९७०८५५३५५६६७८६७८६४८३३८०५१०३९४५८५६ शून्य ११० , ते नयुत. २३१८१३१०७६०४५३५५१८४९८७६१००९००६४६०३९६२८७३१४५१९०४ शुन्य ११५ ते प्रयुतांग. २४ १५२३०१०१८७८०९८३५५३८९५९२४७५६५४२६७३२८८१३४४१९५९९३६ शून्य १२० ते प्रयुत. २५१२७९३२८७२५७६०२११८५२७२५७६७९५४९५८४५५६२०३२९१२४६३४६२४ शून्य १२५ चूलिकांग. २६ १०७४६३६१२९६३८६१९९५६२८९६४५०८२१६५१०२७२१०७६४६४६९३०८४१६ शून्य १३० चूलिका. २७९०२६९४३४८८९६४४०७६३२८३३०१८६९०१८६८६२८५७०४२३०३४२८१९०६९४४ शून्य१३५सीसपहलियगं२०५५८२६३२५३०७३.१०२४११५७९७३५६९९७५६९६४७९९९१५५३४८७४४०१८३२९६शुन्य१४०सीसपहेलिया|
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ए उपरांत गणित नथी. उपमित ले. ते उपमितना प्रकार बेः-पख्योपम १, सागरोपम , पढ्योपमनुं प्रमाण ए के-अनंतानंत परमाणुया एका थाय एटले एक ओसण्हसण्हिया,
अनंत परमाणुया मले एटले सहसएिहया, तेटली सहसण्डिया आठ मले तो एक उर्द्धरेणु | एटले के जे जालांतरे सूर्यकिरण आवे तेमां जे सूक्ष्म रज देखाय ते उर्द्धरेणुं कहेवाय ले. ते आठ | उर्द्धरेणु मख्ये एक त्रसरेणु थाय जे. जे वाये करी रज ऊमे ते त्रसरेणु कहेवाय . ए आवें एक रथरेणु थाय, आठ रथरेणु मध्ये तो एक देवकुरू उत्तरकुरूना मनुष्यनो वालाग्र थाय, ते आवें एक हरिवर्ष रम्यकदेत्रना मनुष्यनो एक वालाग्र होय. ते श्राठे एक हैमवंत औरण्यवत क्षेत्रना मनुष्यनो वालाग्र थाय, ते था पूर्व विदेह पश्चिमविदेहना मनुष्यनो वासाम थाय, ते आठ वाला एक लीख होय, आठ लीखे एक जू होय, आठ जूए एक जव, आठ जवे एक आंगल, तेने उत्सेधांगुल कहीयें, एवा उ आंगुले एक पाद थाय, वे पादे एक विहस्त (व्हेंत) थाय, वे विहस्ते एक हस्त चार हस्ते एक धनुष, बे सहस्र धनुषे एक कोस, चार कोसे १ जोयण थाय,
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एक जोजनप्रमाण मो, एटलोज पहोळो कुवो, ते कुवो देवकुरु उत्तरकुरु क्षेत्रनो उरूणो सात | दिवसनो तेने शरीरे अंगुल प्रमाण एक रोम ते सात वार बाठ गुणो करवो एम करतां सातमी वार रोमखंम (रुवामाना टुकमा) वीस लाख सत्ताणुं सहस्र एकसो बावन एटला थाय. ए रोमखम स्थूळ जाणवा. जेह नणी संख्याता एज थया. परं असत्करूपनाये एकेक रोमखमना असंख्याता कल्पीये एवा जे सूक्ष्मखम, तेणे ते कूवो गाढो निन्नच नरवो. ते ऊपर बासठ योजनने पटे गंगा नदी वेहवराये पण एक रोमखम खेसवी न शके. तथा इंद्र सबल प्राणे करी वज्र मूके पण एक रंथामुनेदे नहीं, अथवा अग्नि ते ऊपर मूकवाथी थोल्हा जाय, पण एक रोम प्रज्वले नहीं एवा कठिन नरवा, अथवा चक्रवर्तिन कटक सघj ऊपर वही जाय तोपण एक रुवाउँ खसे नहीं एवोनरीने पठी सो सो वरसे एकेको खंग काढवो. ज्यारे ते कुवो सर्वथा प्रकारे खाली थाय त्यारे एक पक्ष्योपम कहेवाय, एवा दस कोमाकोमी पस्योपम जाय त्यारे एक सागरोपम थाय. एवा वीस कोमाकोमी सागरोपम जाय तो एक कालचक्र
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कवाय. ते कालचक्रे बार चारा, व धारा उत्सर्पिणी, उ यारा अवसर्पिणी काल कहे वाय. उत्स र्पिणी काले पेहेलो यारो एकवीस सदस वरस प्रमाण, बीजो आरो एकवीस सहस्र वरस प्रमाण, त्री जो आरो एक कोमाकोमी सागरोपम बेतालीस सहस वरसे ऊणो जाणवो, चोथो यारो बे | कोमा कोमी सागरोपम प्रमाण, पांचमो यारो त्रण कोमा कोमी सागरोपम प्रमाण, बट्टो आरो चार | कोमाकोमी सागरोपम प्रमाण, एवं दस कोमाकोमी सागरोपम प्रमाण उत्सर्पिणी काल जाणवो. एम ऊतरता व यारा, पेहेलो चार कोमाकोमी सागर, बीजो त्रण कोमाकोमी सागर, त्रीजो बे कोमाकोमी सागर, चोथो बेतालीस सदस वरसे ऊंणो एक कोमाकोमी सागर, पांचमो एकवीस सहस्र वरस प्रमाण, बट्टो पण एकवीस सहस्र वरस प्रमाण जाणवो. एवं दस कोकाकोमी सागरोपम प्रमाण अवसर्पिणी ने दस कोमाकोमी सागरोपमे एक उत्सर्पिणी एवं बने मली वीस को माकोमी सागरोपमे एक कालचक्र थाय एवा अनंता कालचक्रे एक पुद्गलपरावर्त थाय, ते पुद्गलप रावर्त्तना चार जेद बे. ते द्रव्यपुद्गलपरावर्त्त १, क्षेत्र पुद्गलपरावर्त्त २, काल पुद्गलपरावर्त्त ३,
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नाव पुद्गलपरावर्त्त ४, ए चारेना सूदम बादर नेदे बेबे नेद जाणवा, बादर प्रव्य पुद्गल || परावर्त्त, सूदम ऽव्य पुद्गलपरावर्त. २ एवं क्षेत्र काल नाव नेदना पण बे नेद, ए प्रकारे पुद्गलपरावर्त्त आठ जाणवा ॥ हवे पुद्गलपरावर्त्तनुं स्वरुप संदेपथी पोताने समजवा ने, परने समजाववा माटे याप्रमाणे बे-पेहेला जीवने अव्य पुद्गल पूरवानाप्रकार सात कहीये बीये. औ
शरीर मनुष्य तिर्यंचना, वैकिय शरीर देवता नारकीना, तेजस शरीर कार्मण शरीर ए बे शरीर सर्व जीवने होय. ए चार शरीरे करी, तथा नाषाए करी बेडियादिक जीवने नाषा होय, तेणे कारणे जीव पुद्गल लइ बोलेतथा श्वासोश्वास ए सर्व जीवने डे. पण संसारी जीवने असंसारी सिद्ध जाणवा, जीव पुद्गल ग्रहण करी करी श्वासोश्वास ले ते कारणे ए बहो प्रकार, तथा मन ते पण पुद्गली, नवा नवा पुद्गल ग्रहण करी गर्नज पंचेंडि ते पण सन्निया मनने परिणामे परिणमाबे, ए सात प्रकार पद्गल पूरवाना कारण बे. हवे जीव औदारिक १, वैक्रिय २, तेजस ३, कार्मण ४, ए चार शरीरे करीनाषाये५, श्वासोश्वासे ६, मने ७, करी
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| चौद रज्जुप्रमाण लोकमां जेटला पुद्गल डे ते सघला औदारिक १, वैक्रिय र, तेजस ३, कार्म- || है || ४, नाषा ५, श्वासोश्वास ६, मनपणे, आगल पाबले करी सर्व पुद्गल परिणमावे ते बादर अव्य पुद्गलपरावर्त कहेवायडे. हवे सूक्ष्म अव्य पुद्गलपरावर्त केम करे ते कहिये बीये. पहेलो औदारिक शरीरे करी लोकमांडिला पुदगल परिणमावे, पली वैक्रिये, पडी तेजसे, कार्मणे नाषाये, श्वा| सोश्वासे, मने ए अनुक्रमे सात प्रकारे करी जुजुआ सर्व पुद्गल परिणमावे ते सूदम द्रव्य पुद्गल | परावर्त कहेवाय. ५ एम अव्य पुद्गलपरावर्त्तना बे नेद कह्या. हवे क्षेत्राश्री सूक्ष्म बादर बे
कहिए बीए. एक जीव सर्वलोकना आकाश प्रदेश मरणे करी जेम तेम आगल पाउल फरसे | एटले बादर क्षेत्र ते पुद्गलपरावर्त्त कहेवाय १, एक जीव सर्व लोकना आकाश प्रदेश अनुक्रमे अंतर रहित प्रदेश मरणे करी फरसे, विचाले अंतर पमे तो वली धुर थकी गणवो, एम करतां जेटले काले निरंतर सर्व लोकना आकाश, प्रदेश जन्म मरणे करी अनुक्रमे फरसे तेटले काले सूदम क्षेत्र पुद्गलपरावर्त्त कहेवाय. २. एम क्षेत्र पुद्गलपरावर्त्तना बे नेद कह्या. हवे काला
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श्री पुद्गलपरावर्तना नेद कहिये बीये. उत्सर्पिणीकालना जेटला समय बे तेटला सर्व समय जेम तेम आगळ पाळ जन्म मरणे करी एक जीव फरसे एटले बादरथी कालपुदगलपरावर्त्त कहेवाय. १ तथा एक जीव उत्सर्पिणीकालना समय जेटला, तेटला अनुक्रमे अंतर रहित जन्ममरणे करी फरसे एटले सूक्ष्मकाल पुद्गलपरावर्त कहेवाय. २. एम काल पुद्गलपरावतैना बे नेद जाणवा. हवे नाव पुद्गलपरावर्त्तनुं स्वरुप कहिये बीये. सूक्ष्म पृथ्वी कायादिक थी जीव चवी समय समय प्रत्ये असंख्याता सूक्ष्म अग्निकायमांहि जाय, तेथकी सर्व लोकाकाश प्रदेश असंख्याता , तेथकी कायस्थिति काल असंख्यातो, तेथकी संयमाध्यवसाय स्थान असंख्याता , ते सघळां संयमाध्यवसायनां स्थान जे को एक जीव मरणे करी जेमतेम फरसे ते बादर नावपुद्गलपरावर्त्त जाणवो तथा जेटलां संजमना अध्यवसायनां स्थानक अनुक्रमे एकेक स्थानक फरसे ते सूक्ष्मथको नाव पुद्गलपरावर्त्त जाणवो ॥२॥ एणीपरे नाव पुद्गलपरावर्त्तना नेद कह्या. एवं पुद्गलपरावर्त्त कह्या. एकेके जीवे ए पुद्गलपरावर्त्त अ
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॥ ९९॥
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नंतीवार कोधा ॥ श्रव्य जीव आगामि काले अनंता पुद्गलपरावर्त्त करशे ॥ तो मुहूतमित्तंपि कासिदु जेहिं सम्मत्तं ॥ तेसिं वढ पुग्गल, परियहो चेव संसारो ॥ १ ॥ अंतर्मुहूर्त्त मात्र पण जेणे. सम्यक्त्व फरस्युं होय तेने संसार अर्ध पुद्गलपरावर्त्तथी थोटो संसार जावो ए निश्चय करयो ॥ सम्यक्त्व रहित जव्यजीव होय तेने पुद्गलपरावर्त्त थाय अथवा न थाय, परं प्रांते मोक्षगति पामे ॥ एकेके जीवे तितकाले अनंता पुद्गलपरावर्त्त कीधां ए सही. एकेके जीव एवा बे तेने आगामिकाले कोने एक पुद्गलपरावर्त्त, कोइने बे, कोइने ऋण, कोइने चार, एम कोइने संख्याता, कोइने असंख्याता, कोइने अनंता, जे नव्य होय तो अनंता | पुद्गल परावर्त्त करी बेहेने अंत करे - अल्पसंसार करी मुक्ति पामे, जेथी अनंता अनंते दे जाणवा. अनव्यने अनंतानंते काले पण संसारनो अंत यशे नहीं ॥
ट्वे संख्याता, असंख्याता ने अनंताना जेद ब्यासिया कर्मग्रंथ अनुसारे सूत्र arrot it
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गत
॥१०
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१ जघन्य संख्यातो, २ मध्यम संख्यातो, ३ उत्कृष्ट संख्यातो॥१ जघन्य परितो संख्यातो, ग. प्र. २ मध्यम परितो असंख्यातो, ३ उत्कृष्ट परितो असंख्यातो, ४ जघन्य युक्ता असंख्यातो, ५ मध्यम || | युक्ता असंख्यातो, ६ उत्कृष्ट युक्ता असंख्यातो, ७ जघन्य असंख्याता असंख्यातो, ७ मध्यम श्र-| |संख्याता असंख्यातो, ए उत्कृष्ट असंख्याता असंख्यातो ॥ १ जघन्य परिता अनंतो, ५ मध्यम | | परिता अनंतो, ३ उत्कृष्ट परिता अनंतो,४ जघन्य युक्ता अनंतो, ५ मध्यम युक्ता अनंतो, ६ उ- | | कृष्ट युक्ता अनंतो, ७ जघन्य अनंता अनंतो, मध्यम अनंता अनंतो, ए उत्कृष्ट अनंता अनंतो. __ हवे ए संख्याता असंख्याता अनंताना नेद १ तेनी विगत कहिये बीये. अहींयां एक गणवानी || संख्या न लहे. जे नणी कोणी एक घटादि पदार्थ दीए घटादिक वस्तु दीसे ले एवी प्रतिति उपजे
पण एक ए एम को न जाय, लेवा श्रापवाना व्यवहारने काले एक एवी गणत संख्या करी लीजे. अथवा आपीए तेणी वेलाये, अथवा लोकव्यवहारे एवं प्रसिद्ध ले. ज्यां एकनी संख्या त्यां| ॥१०॥ | खान एवो शब्द कहे, ते कारणे एक गणाय नहीं. असव्यवहारपणाथकी, अल्पपणाथकी न
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| गणीये. बेउ प्रनृतिथकी गणवानी संख्या होय, एटले वे लगी जघन्य संख्यातो कहीए. त्यां | थकी उपहरो त्रण चार पांच इत्यादि अनेक नेदे मध्यम संख्यातो होय. केटला लगे मध्यम सं-||
ख्यातो कहेवाय? ज्यां लगी उत्कृष्टु संख्यातुं न थाय त्यां लगे मध्यम संख्यातो कहीए. हवे || | उत्कृष्ट संख्यातुं केम जाणीये ते कहिये बीये-जंबुद्धीपपल्यनी प्ररूपणाये जाणीये. ते केम ? || | जंबुद्धीप आयामे विख्खंने लक्ष जोजन प्रमाण दे. एम पण पक्ष्य प्रत्येक प्रत्येक लद जोजन | प्रमाण वाटुला एवा चार पल्य तेनां नाम--अनवस्थितपस्य १, शलाकापल्य २, प्रतिशलाकापल्य | ३, महाशलाका पक्ष्य ४; ए चारे सहस्र जोजन उंमा आठ योजन प्रमाण जगति सहित बे | गाउ ऊंची पनवरवेदिकाए संयुक्त एवा शिखा लखी करण क्रम पूर्वक सरसवे नर्या. ए सामान्य || पदे कह्या. विशेषथकी हवे कहीये बीये ॥ पेहेलो अनवस्थित पख्य सरसवे नर्या करवो, बीजा || त्रण यथा प्रस्तावे सरसवे नराशे तेम कहेशे. हवे अनवस्थित पक्ष्य सरसवे नरीने शुं करीए || ते कहे जे. ते अनवस्थित पल्य सरसवे नरीने उपामीये, असत्कल्पनाये ए कयों, शिष्य प्रतिबोधवा
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॥१०॥
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जाणी एक सरसव छीपे एक सरसव समुद्रे घालतां घालतां ते जेवारे पूरो थाय जेणे श्रीपे श्र- | थवा जेणे समुद्रे, त्यां तेटले प्रमाणे आदिथकी प्रारंनी अनवस्थित पल्य बीजी वार कल्पिये, वली तेमज एक छीपे समुझे सरसव घालतां घालतां जेवारे पूरो थाय तेवारे एक
शलाका पल्यमां घालीये, ते अनवस्थित प्याला मांहेलो नही, अनेरो सरस घालीये एक कहे अनवस्थित पाला मांहेलोज घालीये, अहीं तत्व केवली जाणे. श्हां बीजीवार
अनवस्थित पख्य नीठवे एक सरसव शलाका पक्ष्यमां घालीये ते केम? पेहेलीवारने अनव| स्थित पक्ष्ये नीवव्येंज कांश न घालीए ? एवे प्रश्ने उत्तर कहे जे. जेह नणी अनवस्थित पक्ष्यनी | शलाकाए शलाका पत्ये जरवो कह्यो ते कारणे पेहेलो अनवस्थित पल्य न कहीये. बोजी वारनो
आदि द सघला अनवस्थित पक्ष्य कहेवाय, एम जाणी संदेह टालवो. एम अनवस्थित पक्ष्य |नरतां गलबतां अकेंकी शलाकाये घालतां घालतां शलाकापल्य शिखा सहित एवो नराय, जेवो |||२०१५ | के उपर एक सरसव न माय एटले अनवस्थित शलाकापक्ष्य बेबे नर्या दीसे. ते वार पनी झुं
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करीये ते कहे बे-शलाकापल्य मावे हाथे उपामी अनवस्थित पल्यने बेले सरसवे आक्रांत द्वीप अथवा समुद्र ते अगले एक सरसव द्वीपे एक समुद्रे प्रक्षेपतां जेटले ते पत्यनिःशेष वालो थाय तवारे प्रतिशलाका मांहे एक प्रतिशलाका प्रदेपीये शलाकापल्य स्थानके थापीये, पी अवस्थित पल्य उपामी शलाका पत्यने सरसवे जेटला द्वीप समुद्र याक्रम्या बे, त्यां आगल एक सरसव द्वीपे एक समुझे घालतां जे वारे ते सर्वथापि वालो थाय तेवारे एक संरसव शलाकापल्य मां मुकीये, वली तेटले प्रमाणे अनवस्थित पस्य सरसवे जरी तेमज एक द्वीप एक समुद्रे सरसव मूकतां अकेको सरसव शलाकापल्यमां मूकतां, जेवारे ते बीजी वार शला कापल्य शिखा सहित राय वारे अनवस्थित पल्य नर्योज मुकीये, शलाकापल्य वली उपामी एकेक सरसव द्वीप समुझे मुकतां जेवारे ते निःशेष वालो थाय तेवारे प्रतिशलाकापल्य मांहे बीजी प्रतिशलाका मूकीये, पढी अनवस्थित पल्य उपामी वली द्वीप समुझे एकेको सरसव मूकतां वली शलाकामांदे एकेकी शलाका मूकतां जेवारे संपूर्ण राय, तेवार पढी शलाकापल्य उपामी,
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॥१०॥
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एकेक सरसव छीप समुद्रे मूकतां उलवाय ते वारे एक सरसव प्रतिशलाका पल्यमांहे घालतां| त्यांलगी अनवस्थित पल्य शलाका पल्यने ठालववेनरवे प्रतिशलाका पक्ष्यमांहे एकेका सरस-1 | वने मूकतां लगी करीये. ज्यां लगी शलाका पक्ष्य, प्रतिशलाका पक्ष्य अनवस्थित पल्य त्रणे |
जराय. तेवार पली शलाका पल्य अनवस्थितपणे नराय तेवार पली प्रतिशलाका पक्ष्य उपामीये, | ज्यां लगी छीप समुख नीठया डे त्यां आगले एक एक सरसव द्वीपे समुझे मूकीये, जेटलीवारे है | निःशेष गलो थाय तेटली वार महाशलाका पट्ये एकेको सरसव मूकीये, पडी शलाकापल्य | उपामी प्रतिकलाका पक्ष्यगत चरम सरसवे आक्रम्या द्वीप समुन आगले एकेक सरसव द्वीप | समुझे मुकतां गलो थाय तेवारे एक सरसव प्रतिशलाका पक्ष्यमांहे मूकीये, पली अनवस्थित | पढ्य उपामी शलाका पक्ष्यगत चरम सरसवाक्रांत द्वीप समुद्र विषे, एकेको सरसव द्वीप समुझे | मूकतां जेटले उलवाय तेटले एक सरसव शलाका पल्ये मूकीये, एणीपरे अनवस्थित पल्य जरतां | गलवतां शलाकापल्य जरीये. वली तेमज अनुक्रमे जरतां गलबतां त्यां करीए के ज्यां चार |
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१०२
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| पख्य शिखा सहित संपूर्ण राय एम अनवस्थित पक्ष्ये शलाका जरीये, शलाका पत्ये करी
प्रतिशलाका पत्य जरीए. प्रतिशलाका पल्ये महाशलाका पक्ष्य जरीए एम अनवस्थित पक्ष्य, | शलाका पस्य, प्रतिशलाका पक्ष्य, महाशलाका पल्य-एम चिहु पत्ये नर्या अनंतर शुं करीए ते कहे :-एवं चिहु पल्यना सरसव तथा छीप समुप प्रक्षिप्त सरसव तेनी सघळी राशि मांहि थको एक सरसव ऊणो करीए एटले उत्कृष्टुं संख्यातुं होय. हवे बे लगी जघन्य संख्यातुं अने एजे कह्यो सरसव राशि प्रमाण ए उत्कृष्टुं. ए उत्कृष्ट संख्याता अने जघन्य संख्याता विचाले
जेटला संख्याता स्थानक ते सर्व मध्यम संख्यातुं कहिये. श्री सिद्धांतमां ज्यां क्यांय संख्यातार्नु | ग्रहण करे त्यां मध्यम संख्यातुं जाणवू. एणीपेरे संख्याताना नेद कह्या. हवे असंख्याताना
नेद नव कहीए बीए. जे उत्कृष्टुं संख्यातुं कडं ते एक सरसव सहित करीए एटले जघन्य | परीत असंख्यातुं होय. अनुयोगदार सूत्रमाहे कयु डे ते लखीये बोये. उक्कोसए संखिजए रूवे परिखत्ते ॥ जहन्नयं परित्ता संखियं होश॥ तेणपरं अजहन्न-मणुक्कोसयारंगणाई जाव उक्कोसयं
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ग०प०
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॥१०३
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| परित्तासंखेजयं न पावश्, उक्कोसयं परित्तासंखिऊयं केवश्यं होश ! जहनपरित्तासंखिजय मित्ताणं रासीणं अन्नमन्नन्नासो रूवूणो उक्कोसयं परित्तासंखिज्जयं हो॥अहवा जहन्नयं जुत्ता संखिऊ यं रूवूणं ॥ नकोसयं परित्तासंखिजयं हो ॥ जहन्नयं जुत्ता संखिऊयं कित्तियं होइ ? । जहन्न | परित्ता संखिज मित्ताणं रासीणं अन्नमन्नन्नासो पनिपुन्नो जहन्नयं जुत्ता संखिजयं हो ॥ अहवा|
उक्कोसए परित्ता संखिजए रूवं पस्कित्तं ॥ जहन्नयं जुत्ता संखिजयं हो। आवलियावि तिति- | लिया चेव ॥ तेणपरं अजहन्न-मणुक्कोसयां गणारं जाव नकोसयं जुत्ता संखिजयं न पाव ॥ उकोसयं जुत्ता संखिजयं कित्तियं हो? ॥ जहन्नएणं जुत्ता संखिज्जएणं आवलिया गुणीया अन्नमन्नान्नसो रूवूणो ॥ उक्कोसयं जुत्ता संखिजयं हो॥अहवा जहन्नयं असंखिजा संखिऊयं रूवणं, उकोसयं जुत्ता संखिऊयं हो ॥ जहन्नयं असंखिज्जा संखिऊयं कित्तियं हो ? ॥ जहन्नणं जुत्ता संखिकएणं आवलिया गुणिया अन्नमन्नन्नासो पमिपुन्नो जहन्नयं असंखिका संखिजयं हो ॥ श्र-|| हवा उक्कोसए जुत्ता संखिजए रूवं पख्खित्तं जहन्नयं असंखिका संखिऊयं हो ॥ तेणपरं अज-|
rel॥१०॥
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हन्नामणुक्कोसयाई गणाई जाव उक्कोसं असंखिळा संखियं न पावइ उकोसयं असंखिका संखि| ऊयं कित्तियं होइ?॥ जहन्नयं असंखिका संखिऊयमित्ताणं रासीणं अन्नमन्नन्नासो रूबूणो उको| सयं असंखिका संखिऊयं ॥
एनो नावार्थ लखिये बीये ॥ पूर्वे जे उत्कृष्टुं संख्यातुं कडं, तेमां एक सरसव मूकीये | एटले जघन्य परितअसंख्यातो होय, अहीं आघु जघन्य पण नहीं, उत्कृष्टुं पण नहीं एम | करतां जेटले उत्कृष्टुं परितअसंख्यातुं नावे तेटला विचाले जे स्थानक ते सर्व मध्यम | परितअसंख्यातुं कहीये ॥
___ हवे उत्कृष्टुं परितअसंख्यातुं केटलुं होय ते कहे जे. जघन्य परितअसंख्याते जेटले प्रमाणे | | सरसवनी राशि होय तेनो अन्योअन्य मांहोमांहे अन्यास कहेतां गुणाकार करीए. ते केम | करीए ते देखामे . केवली विना एनो परस्पर गुणाकार कोण जाणे ? तथापि उद्मस्थने प्रति | वोधवा नणी वानगी मात्र देखामीए बीए. असत्कल्पनाये॥ जे नणी ए जेटला सरसव ले ते बद्म
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ग०प्र०
॥१०४॥
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स्थने जाणवां दोहिला, तेणे कारणे थोमा देखामी घणानो ज्ञान करावाय जे. जघन्य परितअसंख्या-1 गमा ते जेटला सरसव तेटलाने गमे पांच रुप कल्पीये, ते विवरीए बिये. एक श्रेणीए एकमा पांच मांमिये तेहनी स्थापना १११११ हवे जेटला उपला राशीना आंक तेटली संख्याए तेटला यांक हेगळ मांझिये. जे ऊपर पांच एकमा डे, एटला प्रत्येकने पांच ५५५५५ मांमिये. घणा होय तो| घणा मांमिए. हवे मांदोमांहे केम गुणीए ते दखामे , पांचमो पेहेलो ते बीजा पांचमाशुं गुणीए. एटले २५ थया. ए पचीस त्रीजा पांचमाशुं गुणीए, थया एकसो पचीस १२५ अने चोथा पांचमाशुं | गुणीए, थया बसेंपचीस.ए वळी पांचमा पांचमाशुं गुणीए, थया एकत्रीससे पचीस ३१२५ ए कल्पित | | राशीनो अन्योअन्य गुणाकार कीधो. एणीपेरे जघन्य परितअसंख्याते जेटला सरसव ते मांहो- | | मांहे सर्व गुणीए, जेटला होय तेटला माहेथको एक कणो करीए. एटले उत्कृष्ट परितअसंख्यातो होय ॥ एवं जघन्य परित असंख्यातो, मध्यम परितअसंख्यातो, उत्कृष्ट परितअसंख्यातो एवं अ-| संख्याताना नेद ३ त्रण थया. हवे युक्त असंख्यातो जघन्य-मध्यम अने उत्कृष्ट एवं त्रिहुं नेदे ||
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मांगिये aिये ॥ जघन्य युक्त संख्यातो केटलो होय ते कहे बे. जघन्य परिसंख्यातो परस्पर गुण जेटलो होय, ते प्रतिपूर्ण, एक ऊणो न करीये एटलो जघन्य युक्त संख्यातो होय, अथवा उत्कृष्ट परित संख्याते एक रूप घालीये एटले जघन्य युक्त संख्यातो होय. जेटला जघन्ययुक्त संख्याते रूप होय, तेटला एक घ्यावलिना समय जाणवा. वे एटला याघे ज्यां लगी उत्कृष्टो युक्त संख्यातो नावे तेटला विचाले असंख्यातनेदे मध्यमयुक्त संख्यातो जाणवो. दवे उत्कृष्ट युक्त असंख्यातो केटलो ते देखा बे ॥ जघन्ययुक्त संख्याते श्रावली गुणये जेटला होय तेटला वली परस्परे गुणीये, जेम पेहेलां देखामी तेजपरे जाणवी, तेम मांहोमांदे गुणतां जेटलां रूप थाय, तेटला मांहेथी एक ऊणो करीए एटले उत्कृष्टो युक्त संख्यातो होय. अथवा जघन्य श्रसंख्याता - संख्यातो एक रूप ऊणो करीए. एटले पण उत्कृष्टो युक्त संख्यातो होय एटले युक्त संख्याताना जेद त्रण कह्या. एवं असंख्याताना व नेद कह्या.
दवे जघन्य संख्याता संख्यातो १, मध्यम असंख्याता संख्यातो २, उत्कृष्टो असंख्याता
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딩딩
१०५॥
संख्यातो ३, ए त्रण भेद कहिये बिये. जघन्य असंख्याता संख्यातो केटलो दोय ते लखिये बिये:जघन्ययुक्त संख्याते जघन्ययुक्त संख्यातेज गुणीए अथवा यावळी जघन्ययुक्त संख्याता गुणी करीये, जेटली राशि होय तेटली वळी मांहोमांहे गुणीये एटले प्रतिपूर्ण जघन्य असंख्य संख्यातो होय ॥ इहां श्रघो ज्यां लगी उत्कृष्टो असंख्याता संख्यातो ना यावे त्यां लगी संख्या नेदे मध्यम संख्याता संख्यातो दोय. दवे उत्कृष्टो असंख्यात संख्यातो केटलो होय ते लखिये डिये. जघन्य त्र्यसंख्याता संख्यात प्रमाण राशि मांहोमांदे गुणीए पढी एक कणो करीए एटले उत्कृष्टो असंख्यात संख्यातो जाणवो, अथवा जघन्य परितानंतो एक रूपे ऊणो करीए. एटलो उत्कृष्ट असंख्याता संख्यातो होय, एटले असंख्याताना नेद ए थया.
हवे अनंताना जेद नव लखिये बिये, पेहेलो जघन्य परित अनंतो केटलो होय ? ते लखिये ब्रिये. जघन्य असंख्यात संख्यातो जघन्य संख्याता संख्यात प्रमाण राशीने मांहे गुणीये अने जेटलो होय तेटले प्रमाणे जघन्य परितानंता जाणवो अथवा उत्कृष्टे असंख्यात असंख्यातमांदे
ग०प्र०
| ॥१०५॥
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| एकरूप घालीपे एटले पण जघन्य परितानंतो होय, त्यां आयोज्यां लगी उत्कृष्ट परितानंतो न थाय || है| त्यां लगीअनंत नेदे मध्यम परितानंतो होय. उत्कृष्ट परितानंतो केटलो होय. जघन्य परितानंतोजघ|न्य परितानंत प्रमाण राशी मांदोमांहे गुणीये, एतावता तेटली राशिने तेटलीराशि गुणी करिये जेटला होय तेटलामांहेथी एक काढीये, एटलो उत्कृष्ट परितानंतो होय.अथवा जघन्य युक्तानंतो एके || ऊणो करीए,एटले उत्कृष्टो परितानंतो थाय एटले अनंताना नेद त्रण थया. हवे युक्तानंतना नेदत्रण || लखिये लिये. जघन्य युक्तानंतो केटलो थाय ते कहीए बीए.जघन्य परितानंतो जघन्यपरितानंत प्रमा
राशि परस्पर गुणी करीये जेटलारूप होय तेटलां पूरांजघन्य युक्तानंतो होय. अथवा उत्कृष्ट परिता| नंते एक रूपघालीये एटले जघन्ययुक्तानंतो होय. जगमाहे अन्नव्य पण तेटलाज .जघन्य युक्तानंते जेटलां रूप तेटला अन्नव्य जाणवा. त्यां आघो ज्यां उत्कृष्टो युक्तानंतो न आवे त्यां लगे अनंतनेद |
मध्यमयुक्तानंतो होय. उत्कृष्टोयुक्तानंतो केटलो होय ते कहे जे.जघन्य युक्तानंते जेटला अन्नव्य M ले तेटला गुणीये, पनी वळी अन्योन्याच्यास माहोमांहे गुणाकार करीये, जेटलो होय तेटलो एके
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ऊणो करीये एटले उत्कृष्टो युक्तानंतो होय,अथवा जघन्य अनंतानंतो एक ऊणो करीये एटले उत्कृष्टो | युक्तानंतो होय.एटले अनंताना नेद थया.हवे अनंतानंतानानेदकहीए बीए.जघन्य अनंतानतो केटलो होय ते कडे. जघन्य युक्तानंते अन्नव्य गुणीए पली वळी परस्पर गुणीए, जेटला होय तेटले || परे जघन्य अनंतानंतो होय अथवा उत्कृष्टे युक्तानंतें एक रूप घालीये एटले पण जघन्य अनंतानंतो है थाय त्यां आघोज्यां लगी उत्कृष्टो अनंतानंतोना आवे त्यां लगीअनंतनेदे मध्यम अनंतानंतो कहीए, | पण श्रीअनुयोगद्धार मांहि एम कह्यो के “अणंताएंतयनश्थि” ए सूत्रने अनुसारे उत्कृष्टो अनंतानंतो |
नथी. ॥ तथा मतांतरे कर्मग्रंथ वादी अनंतानो नेद एम प्ररूपे. जघन्य परितानंतो तेहने मते के| टलो होय ते देखामे जे. जघन्य असंख्यात असंख्यातो त्रणवार मांहोमांदे गुणीये, एटले शो अ
पसंख्यात असंख्याते जे राशि ते सरखी बेराशि वळीमांमीये ते वर्गराशिनो। | वळी वर्ग करीये. वळी त्रीजीवार तेनो वर्ग करीए तेवार पड़ी ते मांहे दश प्रदेप घालीये. ते केवा प्रकारे ॥ एक लोकाकाशना प्रदेश १, धर्मास्तिकायना प्रदेश २, अधर्मासिकायना प्रदेश ३, एक
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जीवना प्रदेश ४, जीवनां अध्यवसाय स्थानक, ज्ञानावरणादिक याठ कर्मनो स्थितिबंध, जेणे अध्यवसाये करे ते स्थितिबंधनां अध्यवसाय स्थान थे, अनुभाग, ज्ञानावरणादि कर्मना जघन्य, मध्यम, उत्कृष्ट जेद जिन्न जे रस विशेष ६, तथा जोगच्छेय पक्षिभाग मनवचनकाय विषश्यो वीर्य ते योग कहीये, तेना केवळी प्रज्ञाए बेदीने जुया जुआ जे विभाग 9, तथा उत्सर्पिणी अवसर्पिणी बेट कालना समय जेटला छ, तथा प्रत्येक अनंतकाय टाली बोजा पृथ्वी, आप, तेज, वाउ, वनस्पति,
स प्रत्येक शरीरी जेटला ए, तथा निगोद सूक्ष्म बादर अनंतकाय वनस्पती जीवना निगोद क| देतां शरीर १० ए दश असंख्याता प्रदेपा घालीये तेवार पढी त्रणवार वर्गकरीए, जेम पेहलो को | तेमज, एम करतां जेटलो होय ते जघन्य परितानंतो होय, ते जघन्य परितानतानी राशि पर | स्परे गुणाकार करतां जेटली राशि होय, एटले जघन्य युक्तानंतो दोय, जेटला जघन्य युक्तानंते रूप तेटला नव्य जीव केवलीये दीवा जघन्य अनंतानंतो केटलो होय ? जघन्ययुक्तानंतक राशि एकवार वर्ग करी वळी बीजीवार वर्ग करीए एटले जघन्य अनंतानंतो होय, दवे उत्कृष्ट नं
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॥ १०७
MaVARDHSROBansanonom/wata/am/ODM
| तातो कहीए वीए. ते जघन्य अनंतानंतो त्रणवार तेटली राशि गुणो करीए. तोपण उत्कृष्टो M०म०
अनंतानंतो न थाय तो पड़ी केम करवू ते कडे, ते माहे ए प्रदेपा उ घालीए, ते कया ? सिद्ध जेटला डे १, निगोदना जीव सूदम बादर निगोदना सघला जीव २, वनस्पति प्रत्येक अनंत सघली एतावता सर्व वनस्पतिना जीव ३, काल अतित, अनागत, वर्तमान समस्त ४, पुद्गल सघ-|| | ला परमाणुआ ५, तथा समस्त लोक अलोकनो आकाश ६, ए बये अनंता ते मांहे घालीने वळी ।
त्रणवार वर्ग करीये अने जेटली राशि होय तेटली राशि सहित त्रिगुणी करीये, तेवारपडी के | वलज्ञान, केवलदर्शन एतावता एना पर्याय अनंता ले ते घालीये तो कर्मग्रंथ वादी एम कहे के | उत्कृष्टो अनंतानंतो होय. सूत्र श्री अनुयोगहार मांहे कयो ने “उकोसयं अणंताणंतयं नथ्थी" इति वचनात् ॥ तत्वं पुनः केवलिनो विदंति' ॥ एटले श्री जगन्नाथ नाखे ते प्रमाण ज्यां सूत्रमांहे अनंतानंतो कह्यो त्यां सघले मध्यमेज अनंतानंतो जाणवो “उत्कृष्टं नास्ति अनंतानंत" ॥ इति संख्याता असंख्याता अनंताना नेद श्री अनुयोगधार तथा कर्मग्रंथ ए वेहुनी वृत्ति जोश
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NABINNavamaramanawwvom/aavana
| सख्या . माह्या होय ते विचारी जोजो ॥
प्रिय पांच तेनां संस्थान श्राकार लखिये डिये. श्रोत्रंजियनो संस्थान कयंब फुल सरीखो | |॥१॥ चक्षुरिंजियनो संस्थान मसूर चंद्रमा सरिखो ॥२॥ घ्राणेंद्रियनो संस्थान अतिमुक्तक
पुष्प सरीखो ॥ ३॥ रसनेंदियनो संस्थान रपला सरीखो ॥४॥ स्पर्शनेंद्रियनो संस्थान नाना ६ प्रकारनो जाणवो ॥ इंडियनुं जामपणुं लखिये लिये. श्रोत्रंपियनो अंगुलनो असंख्यातमो नाग
॥१॥ चकुरिंद्रियनो अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥ २॥ घाणेजियनो अंगुलनोअसंख्यातमो नाग ॥३॥ रसनेंजियनो अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥४॥ फरसनेजियनो अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥५॥
इंडियनुं विस्तारपणुं लखिये बिये. श्रोत्रेजियनो विस्तार अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥१॥||| । चनुरेंजियनो विस्तार अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥२॥ प्राणेजियनो विस्तार अंगुलनो असं
ख्यातमो नाग ॥३॥ रसनेजियनो विस्तार अंगुलपुहुत्त अंगुल (नव) लगी ॥४॥ फरसनेजियनो
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31१०८||
विस्तार शरीरप जातुं ॥ पांचइंडिय अनंत प्रदेशिक जाणवा. एकेकी इंद्रिये अनंता पुल बे, श्रप्रियनो विषय जघन्य थकी अंगुलनो असंख्यातमो जाग, उत्कृष्टो विषय योजन बार. चतुरेंद्रियनो विषय जघन्यथकी अंगुलनो असंख्यातमो नाग, उत्कृष्टो विषय एक लाख जोजन कारो, घ्राणेंद्रियनो विषय जघन्य अंगुलनो संख्यातमो नाग, उत्कृष्टो विषय योजन नव, रसनेंद्रियनो विषय जघन्य गुलनो श्रसंख्यातमो जाग उत्कृष्टो योजन नव, फरसनेंद्रियनो विषय जघन्य गुलनो संख्यातमो जाग उत्कृष्ठो योजन नव.
पांच इंद्रिय असंख्यात आकाश प्रदेश अवगाढ बे. इंडियना बे जेद जाणवा ते कया ? द्रव्येंद्रि१ने जावेंद्र २, त्यां द्रव्येंद्रि ७ जावेंद्रि ५ ॥ श्रोत्र १ नेत्र २ प्राण २ जिह्वा १ फरस १ एवं द्रव्येंद्रियाव जाणवा ॥
ग०म०
॥१०८॥
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motsavevsaedog/AARIWANTO/ARAI/AATE/TIMES
१ एक ११ सहस्रकोर्टि
२१ दशलक्षकोटाकोटिं २ दश १२ दशसहस्रकोर्टि
२२ कोटाकोटिकोर्टि ३ शा १३ लक्षकोटिं
२३ दशकोटाकोटिकोटिं ४ सहस्रं १४ दशलक्षकोटिं
२४ शतकोटाकोटिकोटिं ५ दशसहस्रं १५ कोटाकोटिं
२५ सहस्रकोटाकोटिकोर्टि ६ लक्षं १६ दशकोटाकोर्टि
२६ दशसहस्रकोटाकोटिकोटि ७ दशलक्षं १८ सहस्रकोटाकोटिं
२७ लक्षकोटाकोटिकोर्ट ८ कोटि १९ दशसहस्रकोटाकोटिं
२८ दशलक्षकोटाकोटिकोटिं ९ दशकोर्टि २. लक्षकोटाकोटि .
२९ कोटाकोटिकोटिकोटिं १० शतकोटिं
नयवं ! बीयप्पमुहास पंचसु तिहीसु अणुठाणकयं किं फलं होश ? ॥ गोयमा!॥ बहु फलं नवश्. जनणं जीवेपाएणं एयासु तिही परनवाउयं बंधश्, तम्हासमणेण वा समणीए वा ॥साव एवा सावियाएवा विसेस धम्माणुंडाणं कायवं ॥ ७ ॥
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ग० प्र०
॥१०९॥ ।
यावश्यक निर्युक्तिमा अग्नियादिक सेवेंनही ए अधिकार काउसग अध्ययनमां बे. - मिना फरस लागे तो शरीर ढांकी राखे ए अधिकार ठे. पत्रमां पुछेला प्रश्न तेनो उत्तर संपूर्णः ॥ शतक विचार प्रकृतिनो ॥ ध्रुवबंधनी कयी ? वर्णादिचतुष्क ४, तेजस काम 2, - रु १, निर्माणकर्म १, उपघात १, जय १, डुगंठा १, मिथ्यात १, कषाय १६, ज्ञानावरणी ५, दर्शनावरणी अंतराय ५, एवं ध्रुवबंधनी ४७ ॥
ध्रुवबंधनी ७३ ॥ तनु ३, उपांग ३, संस्थान ६, संघयण ६, जाति ५, गति ४, खगति थे, नुपूर्वी ४, जिन १, उश्वास १, उद्योत १, आतप १, त्रसथावर २०, गोत्र २, वेदनी २, हास्य १, रति १, अरति १, शोक १, वेद ३, आयु ४, पराघात १, एवं ७३.
१,
ध्रुवदनी प्रकृति २७ ॥ निर्माण १, थिर १, अथिर १, गुरु, शुभनाम १, तेजस १, कार्मण १, वर्ष ४, ज्ञानावरणी ५, दर्शनावरणी ४, अंतराय ए, मिथ्यात १, एवं सत्तावीस दीनी प्रकृति. पूर्वे ध्रुवबंधिनी १३ प्रकृति मांदेली ४ प्रकृति काढीये ते कयी ? थिर १,
ग० प्र०
।। १०९ ॥
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watsaasarampasrepeavagavanapatsuiteawayatest
अथिर २, शुन्न ३, अशुन्न ४, ए चार काढीये त्यारे ६ए रहे ॥ ६ए अध्रुवबंध मांदेली ॥ ध्रुवबंध मांहेली १७ ते कयी ? १६ कषाय, १ पुगंछा, १ नय, ए अढार ध्रुवबंध मांहेली ॥ निमा ५, उपघात १, मिश्र १, समकित १ ॥ अध्रुव उदयनी एवं ए५ ॥ ध्रुवसत्तानी प्रकृति १३०, सादि २०, वर्णादि २०, तेजस शरीरकेरी प्रकृति ते केश ? तेजस १, कार्मण १, तेजससंघातन १, कार्मणसंघातन १, तेजसबंधण १, कार्मणबंधन १, तेजसकार्मणबंधन १, ॥ ४७ माथी ४१ प्रकृतिध्रुवबंधिनी लीजे, ६ मांहे थकी टाळीए, ते कया? वर्णादिक ४ तेजस कार्मण २, एम ६ टालवी एटले ७ होय ॥ वेद ३, संस्थान ६, संघयण ६, जाति ५, वेदनीय २, हास्य १, रति १, अरति १, शोक १, औदारिक सात प्रकृति ते कया? औदारिक १, औदारिकरंगोपांग १, औदारिकसंघातन १, औदारिकबंधन १, औदारिकतेजसबंधन १, औदारिककामणबंधन १, औदारिकतेजस कार्मणबंधन १, ए औदारिक सप्त ॥ जश्वास १ उद्योत १; आतप १, पराघात १; खगति ५; तिर्यंचगति,श्; नीचैर्गोत्र १ एवं १३० ध्रुवसत्तानी प्रकृति जाणवी.॥अध्रुवसत्ता प्रकृति श्ण; समकित १ मिश्र
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१; मनुष्यग २; वैक्रिय ११ ते कयी? नरकदग; सुरदुग :वैक्रिय शरीर १, वैक्रिय अंगोपांग; वैक्रिय बंधन १; वैक्रियसंघातन १; वैक्रियतेजस बंधन १; वैक्रियकार्मण वंधन १; वैक्रियतैजसका. मण बंधन १, जिननामकर्म १; श्रायु ४ आहारक सप्त वैक्रियवत् ७, उच्चैगोत्र १ एवं प्रकृति २७ अध्रुवसत्तानी जाणवी॥सर्वघाति प्रकृति २०. केवलज्ञानावरण १. केवलदर्शनावरण १, निजा ५, कषायधुरला १२, मिथ्यात्व १, एवं २० सर्वघातिनी जाणवी॥ देशघातिनी प्रकृति २५ ते कयी? झानावरणी, चकुदर्शनावरणी १, अचकुदर्शनावरणी १, अवधिदर्शनावरणी २, संजलनी चोकमी ४, नोकषाय ए, अंतराय ५, एवं पचीस प्रकृति देशघातिनी जाणवी॥ अघातिनी प्रकृति ७५ ॥ पराघात १, उश्वास १, यातप १, नद्योत १, अगुरुलघु १, तिर्थंकरनामकर्म १. निर्माण १: उपघात १; तनु ५; उपांग ३; संस्थान ६; संघयण ६, जाति ५; गति; खगति २; श्रानुपूर्वी ४; त्रसादि २०; मोत्र ; वेदनीय ३; वायु ४; वर्णादिक ४; एवं ७५ प्रकृति अघातिनी जाणवी.
पुन्यप्रकृति ४२ ते केश? सुर ३, नर ३, शातावेदनी १, प्रसादि १०, शरीर ५, वऋषन
HavitwavasavasatsaWARE/AmavaaNWaterawatsAGAVAamai
११०
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yasawalNetaavastavana
नाराच संघयण १, समचतुरस्र संस्थान १, पराघातादि ५, अगुरुलघुनाम १, वर्णादिक ४, उपांग ३, तीर्थकरनाम १, तिर्यंचयाउ १, उच्चैर्गोत्र १, पंचेंद्रिजाति १, शुनविहायोगति १. एवं ४५ पुन्यप्रकृति.
पापप्रकृतिना २ नेद ॥ संघयण ५, संस्थान ५, कुखग १, तिर्यंच २, अशातावेदनी १, नीचैर्गोत्र १, उपघात १, जातिचतुष्क ४, नरकत्रिक ३, थावरादि १०, अप्रशस्तवर्ण ४, सर्वघाति देशघाति ४५ एवं ७२ प्रकृति पापनी जाणवी.
अपरावर्तनी प्रकृति ए ते कयी? वर्ण चतुष्क ४, तेजस १, कार्मण १, अगुरुलघु १, निर्मा| ण १, उपघात १. दर्शनावरण ४, ज्ञानावरण ५, अंतराय ५, पराघात १,जय १, जुगंबा १, मिथ्या| स्वर, उश्वास १, जिननाम १, एवं श्ए अपरावर्तनी प्रकृति जाणवी.
__ परावर्तनी ए१ प्रकृति ते केइ ? तनु ३, उपांग ३, संघयण ६, संस्थान ६, जाति ५, गति ४, | खगति , आनुपूवीं , वेद ३, हास्यादिक ४, कषाय १६, उद्योतयातप २, गोत्र २, वेदनी २, | निमा ५, सादि २०, आउ ४, एवं परावर्तनी ए१ प्रकृति जाणवी.
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; मनुष्यजतनी ४७ प्रकृति ते कइ ? सर्वघाति ५० प्रकृति, देशघाति २५ प्रकृति, समकित १,
सरवे मली घनघातिनी ४७ प्रकृति जाणवी. म" जीवविपाकनी ७७ प्रकृति ते कयो ? घनघाति ४७, गोत्र २, वेदनी २, जिन १, त्रस ३, थावर ३, सुनगादि ४, उगादि ५, उस्वास १, जाति ५, गति ४, खगति २, एम ७० प्रकृति जीवविपाकनी जाणवी.
हवे पुद्गल विपाकी केहे ॥ नामकर्मनी ध्रुव उदयनी प्रकृति १५, संघयण ६, संस्थान ६, शरीर | उपांग ६, उपघात १ साधारण प्रत्येक २, थातपउद्योत २, पराघात १, एवं ३६ प्रकृति, पुद्गल| विपाकीनी जाणवी.
खेत्रविपाकीनी ४ ते कयी ? आनुपूर्वी प्रकृति ४, नबविपाकनी प्रकृति ४, आयु चार वि. पाक ॥ इति संपूर्ण ॥ तमारा पुल प्रश्ननो उत्तर टुंकमा लखेल बे.
१ मिथ्यात्वे-हेतु ५५ श्राहारक दुग र वेद.॥५साखादने हेतु ५० मिथ्यात्द ५डेद.॥३ मिश्रे
vie/asa/esaweetsswokvacavaravasawanp/aGB/S
१११॥
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हेतु ४३, अनंतानुबंधि ४, मिश्र २, खोदारिक, वैक्रिय, कार्मण काययोग १. ॥ ४ अविरति हेतु ४६, मिश्र ३ प्रप! दारिक, वैक्रिय, कार्मण काययोग १. ॥ ५ देशविरति हेतु ३, प्रत्याख्यानी ४, विरति १, कार्मणकाययोग १, यदारिकमिश्र १, ॥ ६ प्रमत्ते - हेतु २६, विरते ११ जा कषायनी चोकमी बेद यदारिक वैक्रीयसरीय उदय || 9 अप्रमत्ते - हेतु २४ वैक्रियमिश्र ने आहारक मिश्र २ छेद ॥ ८ नियहि-देतु २२ वैक्रियशरीर आहारकशरीर बेद. ॥ अनियहिहेतु १६ दास्यादि व बेद. || १० सूक्ष्मसंपराये - हेतु १० वेद ३ संज्वलना ३ ॥ ११-१२ मे हेतु संजलनो लोन ॥ १३ मे हेतु ७ असत्यनाषा, मिश्र ए २ नो बेद ॥ मनना जोग २ उदय होय. सत्यमनयोग ने व्यवहार मनयोग ए बे उदय होय ॥
४ रत्न
३ रत्ननं मागारमां उपजे ॥ कागणी १,
२ रन वैताढये उपजे ॥ अश्व १, गज
युद्धशाळाये उपजे ॥ चक्र १, बत्र १, खम्ग १, दंग १ एम चार. चर्म १, मणि ॥ एम त्रण.
१
एम बे.
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शु० प०
५११९॥
४ रन निजनगरीये उपजे ॥ सेनानी १, गादावर १, पुरोहित १, वार्द्धिक १ एम चार.. १ स्त्रीरत्नखेचरश्रेणीमध्ये उपजे ॥
चत्तारि मेढ़ा पन्नत्ता ? ॥ तंजदा ॥ पुरुखलसंवट्टे | पज्जुन्ने । जीमूए । जिम्मे । पुख्खल संवह एवं महामेदेणं एगेणं वासेणं दसवाससदस्साई जावेइ ॥ १ ॥ पज्जुन्नेषं महामेदेणं एगेणं वासेणं दसवाससदस्साईं नावे ॥ २ ॥ जीमूएणं महामेदेयं दसवासाईं वासे ॥ ३ ॥ जिम्मे महामेदेणं बहु वासेहिं एगं वासं जावेश्वा न वा ॥ ४ ॥ इत्यादिक पाठ श्रीगणांगें बे ॥ ॥
तत्रसुए सत्तेण एगत्तेष बलेण्य । तुलणा पंचविदावुत्ता जिएकप्पं परिवज्जो ॥ १ ॥ श्री सूयगकांग मूलसूत्रे ॥ चाउदसह मुदिट्ठपुन्निमा सिणीसु ॥ चतुर्दश्यष्टम्यादिषु तिथिषूपदिष्टासु महाकल्याणिकसंबंधिनीवापुण्यतिथित्वेन प्रख्यातासु । तथापूर्णिमासीषु च तृसृष्वपि चातुर्मासिक तिथिषु ॥ उ ॥ इति श्री साधुरत्न शिष्येण श्रीपार्श्व विधुसूरिणा लिखिताप्रश्नोत्तरपत्रिका संपूर्णा ॥ ॥ श्रेयसेनूयात्पृच्छक पाठका दिसज्जनानाम् ॥
गु० प०
११२ ॥
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ViaNe/As/sweets/savane.vdoastavinasmasatrasatsey
॥अथश्रीगुरुपरीक्षा स्वाध्यायः॥ चोपा बंद-गुरु गिरुआ गुणमणिनंमार ॥ सुगुरु तरे तारे संसार ॥ सुगुरु सुधो मारग कहे, | तेहथकी नवियण जण लहे॥१॥परदेशी नृप नास्तिकमति, न मानतो ते जिणवर यति ॥ देव सुधर्म | सुगति उर्गति, उथापी थापे निजमति ॥२॥ ते पण पाम्यो मोटो लान, सम्यक्दृष्टि सुर सूरि| यान ॥ नव अंतर लेशे निर्वाण, जुर्व सुहगुरुतणो प्रमाण ॥३॥ शुद्ध प्रकाशे सूधो करे, व्यव
हारे ते तारे तरे ॥ पोते जे ले कर्म अनादि, कोश्क बहीखले प्रमादि ॥४॥ प्रयो आपणा है अवगुण कहे, पढे घणी खप करवा हे ॥ ते पण सुहगुरु पदवीलहे, तसु दंसणे मुज मन गह
गहे ॥५॥ करे शुरु नाषे उत्सूत्र, तेय विणासे निज पर सूत्र ॥ श्ह जोवो चित्तधरो जमालि, | चारित्र सहि हार्यो जिण आली ॥६॥ चनथे नांगे केवल वेष, असंयती नीपावे रेष ॥ तेय पती नहु कहीए गृही, साधु सुगुरुनी मति तिह नही ॥७॥ गुरु परखे उत्तम श्राविका, जिन शासननी सुप्रनाविका ॥ भोजन अवसरे जोवे पंथ, नाग्य योगे आवे निग्रंथ ॥७॥ साल
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स्त०५०
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अ तेने घरबार, जीव न सूझे घण अंधयार ॥ ते देखी एक पागे वल्यो, साधु सुगुरुने पदे ते || मल्यो ॥ए ॥ बीजो व्यवहारे तेह साध, श्राव्यो पण लाग्यो अपराध ॥ प्रमादवश पूजयो ते स्त०५० तिहां, उत्तम जूगे बोले किहां ॥१०॥ श्रापण दोष नाखीने वक्ष्यो, ते वाद्यो मन गुरु अटकल्यो॥ एम गुरु परखणे सहुये त्रहे, निरता गुरु को वीरलो लहे ॥ ११॥ शुद्ध प्रकाशक गुण आगार, समकित सहित धरे आचार॥ गुरु परखो नागिलनी परे, शिव पामो जिम वसता घरे॥१शा नागील वमो सुमति लघु नाय, कर्म उदे आव्यो अंतराय ॥ तेने बले ते निर्धन थया, गुरु परखण परदेशे गया ॥ १३॥ महानिशिथे एनो विस्तार, जाणी करवो हिये विचार ॥ सुमतिक्रिया
परखी एकली, विणुसमकित तेवी नहु नली ॥१५॥ नागिले परख्या दसण नाण, जिणे गुरुपदवी | थाये प्रमाण ॥ तिणविणु संयम कर्यो असार, अगणि मसाण जेम सविकार ॥१५॥ जेहने लागे | बहु अपराध, ते कहीये संवेगी साध ॥ तेहथी ऊण घणा श्ह तणा; नागिल बोल्या दूषण घणा
॥११३॥ ॥ १६ ॥ निंदक मुनिजननो ते नहीं, अल्पदोषि बहु दूषण ग्रह। ॥ कह्यो नहीं चारित्रनो गंध,
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ए केहो श्रावक संबंध ॥१७॥ पूजये सवि अवगुण थापिया, वाचक दोष जगमे वापिया ॥ण कारण नागिल पॉरखी, करहु परीख तेण सारिखी ॥१॥ उत्कृष्ट चारित्रे अवेक, लगे पहोता वे साधु अनेक ॥ विणु समकित आराधक नहीं; नव अनंत ते रुलश्ये सही ॥१॥ समकित सहित एक दिन पालि, संयम सकल कर्ममा टालि ॥ गयसुकुमाल प्रमुख शिवगम, पहोता फल तसु पाय प्रणाम ॥२०॥ श्णपरे शुद्ध प्रकाशक साध, व्यवहारे तेहज गुरु लाध ॥ (श्री) पार्श्वचंड एम कहे विचार, ते वंदी पामो नव पार ॥१॥ इतिश्रीपार्श्वचन्द्रसूरिविरचितगुरुपरीक्षास्वाध्यायः ॥ श्रीचतुर्दशगुणस्थानककर्मप्रकृतिविचारगर्जित श्रीमहावीरजिनेन्द्र
स्तवनत्रिपंचाशिका. श्री गुरुन्यो नमः॥ वस्तुबंद ॥ सयल गुणनिधि सयल गुणनिधि वीरजिणनाह, तसु पयप्रणमी हनावशु, गुणस्थानक चदशनणेस्युं ॥ जिण जिण थानक जेटली कर्म प्रकृति तेती थुणशं ॥
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Supritsavna
स्त.पं.
११४॥
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| बंध ने उदय उदीरणा, सत्तातणो विचार ॥ मूल आठ अमवन्नसय, उत्तर पयमी धार॥१॥ नाण |
दसण नाण सण तासु आवरण, वेदनी मोहनी आउखु, नाम गोत्र अंतराय जाणो॥ पट प्रति- || | हार खमंग सरिस मद्य निगम चित्रकर समायो॥ कुंनकार मारिसम, अनुक्रमे आठ वखाण;
मिथ्या अविरति कषाय योग, बंधहेतु चउ जाण ॥२॥ इति वस्तुबंदद्धयं ॥ ढाल. केशी बाव| नीनी ॥ प्रकृति स्थिति अनुनाग, प्रदेश बंध चिहुं प्रकारे ॥ प्रकृति सुन्नासुननो खन्नाव; स्थिति
काले अवधारे ॥ नाण सण आवरण; वेदनी अंतराय चार ॥ ए चिहुंनी स्थिति सायर; त्रीस कोमाकोमी धार ॥ मोहनी सित्तरि नाम; गोय वीसवीस कोमाकोम ॥ सागर तेत्रीस श्राउखा; उत्कृष्टि नही खोम ॥ ३ ॥ जघन स्थिति बह कर्म तणी, अंतमुहुत्त नणीजे, नाम गोत्रनो जघ न्य बंध, आठ मुहुत्त सुणीजे ॥ वेदनी मुहुत्त बार, केश् जघन्य वखाणे ॥ आचारज मत अंतर एह गीतारथ जाणे ॥ रसबंध एकछिक त्रिगुण, श्रादें प्रदेश ते अल्प बहुत ॥ मूल प्रकृति एपीपरे कही, उत्तर सुणो जुहुत्त ॥४॥ मतिश्रुत ओही मणहनाण, केवल थावरण ॥ ग्यानाव
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११४॥
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रण प्रकार पंच, सण आवरणं ॥ नवविध चख्खु अचख्खु ओहि, केवल आवरणं ॥ निशा पंच प्रकार, निद्रा ते सुख जागरणं ॥ निशानिशा प्रचलावली, पयल पयल थीणद्धी ॥ वेदनी सात असात पुश्, मोहनी अठ्ठावीस विधि ॥५॥ मुख्यदसण चारित्र, मोह दसण त्रिकारे ॥ समकित | मिथ्या मिश्रमोह, हवे चारित्र धारे॥चारित्र मोहना उन्निनेय, सोल कषाय जाणीजे ॥नोकषाय नव नाम, तसु हवे विगति थुणीजे ॥ क्रोध मान माया लोनाचत, एकेके चार प्रकार ॥ अनंत
अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान संजलण संन्नार॥६॥ हास्य अने रति अरति नय सोग पुगंडा जाणो॥ | स्त्री पुं नपुंसक वेद, एम पंचवीस वखाणो ॥ आउकर्म चउन्नेय, निरय तिरिनरदेवसहिय ॥ नामकर्मना नेद, एक शतत्रण वली अहिय॥हवे तेहनो विवरो सुणो, ए नरकतिरि नरदेव ॥ गति चल ग विथ तिण चड, पंचेंजिना नेव ॥७॥ शरीर उदारिक विक्रिय, आहारक तैजस कर्मणलणे ॥ उपांग त्रण उदारिक विक्रिय आहारकना सुणे ॥ औदारिक औदारिक विक्रिय,-विक्रिय थाहारक आहारक ॥ तैजस तैजस कम्मण, कम्मण पणसरीरा धारक ॥ औदारिक विक्रियाहारक
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स्त०५०
स्त.
११२
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| कार्मण, तेजसमिश्र ए चार ॥ औदारिक विक्रियाहारक मख्या, कार्मण त्रण विचार ॥॥ श्रौ- दारिक तेजस कमण, तिमसे विक्रियाहारक श्म ॥ पन्नर बंधण शणिपरे, पंच संघातन तनु जिम। वज्रऋषननाराच, ऋषननाराच नाराच ॥ अछनाराच कीलिका वह उसाच ॥ सम चरंग निग्गोह, सादि कुबज वामन हुंम एह ॥ संगण वर्ण सीत कृष्ण, नील पीत रक्त न संदेह ॥ए॥ गंध सुगंध उगंध, सुन्नि रस पंचविचारो॥ तित्त कय कसाय, अंबिल मधुर संन्नारो॥ गुरु लघु मृफु ने कठिन; शीत उन्हा सिणि बुख्ख ॥ फास निरय तिरि सुर, मनुष्य आनुपूवी चन पुख्ख ॥ | विहाय गति उय सुन्न असुन, उसास आतप पराघात ॥ उद्योत अगुरुलघु तित्थंकर, नाम नि
मर्माण उपघात ॥ १०॥ त्रस बादर पजत्त, पत्तेय थिर शुन वली सुनगं॥सुसर अने आदेय यश | एणीपेरे त्रस दसगं॥थावर सुहुम अपज नाम साधारण अथिर॥असुन दुनगवली दुसर अनादेय अजस दस ए थिर ॥ नामकर्मनी एकशत त्रण अधिक चित्ते धारि, गोत्रकर्मनी दोय प्रकृति उच्चनीच सुविचारि ॥११॥ दान लान नोगोपन्नोग वीरिय अंतराय ॥ अहावन चन सर्व प्रकृति एम
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॥१
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VI
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| कहे जिनराय ॥ एकसो त्रिमूत्तर नाम प्रकृति सतसहिनो बंध ॥ जेह नणी बत्रीत प्रकृति सम| कालिन बंध ॥बंधन पन्नर संघात पणवीस शरीरह मांहि॥वर्णगंधरस फरसनी सोलनो बंध प्रवाही | | ॥ १५ ॥ वस्तु ॥ अठ्ठकम्मद अट्ठकम्मह बंधना हेतु कहीशु सघला जूजुआ सुगुरु वचन मनमाहि धारिय ॥ नाण दसण आवर्ण दोय पो थाय जिय कर्म नारिय ॥प्रत्यनीक निन्दवपणे, जपघाते प्रदेष ॥ अंतराय नणतां करे बंध दो कर्म अशेष ॥ १३ ॥ सातवेदन सातवेदन बंध गुरु नक्ति ॥ क्षमा दयावत पालतां असुन योग क्रोधादि टाले । अशासबंध विपरीतथी थाय दया दिक जे न पाले । उनमारगनी परूवणा करे मारगनो नाश । पमणीय जिनमनि संघचे चेश्य
व्य विणास ॥ १४॥ पणलक्षण पणलक्षण मोहनी बंध । दसण चारित्र मोहनी कषाय सोल नवनोकषाये । विषय पंच परवश थको बंध करे एणे उपाये ॥ नरक बाउ आरंन महा बंधे परिग्रह जेय । पंचेंजी वध पल नक्षण करे बंध जिय तेय ॥ १५ ॥ नियमिमाया नियमिमाया | अलिय जंपे। अधिको लिये थोडो दिये तिरिय आन ते जीव बंधे । प्रकृति ना प्रकृतिये
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विनय दया नाव मछर जे रंधे । मनुष्यपणो एणीपरे लहे ॥ सराग संयम व्रत बार ॥ बाल
स्त०५० तप अकाम निरजरा लहे देव अवतार ॥ १६ ॥ नामकर्मह नामकर्मह सुनतणो बंध सरल अगपणे करे । अशुन एड विपरीत बंधे उच्चगोय गुण रागे मद रहित जिनादिक नक्ति संघे । नणे नणावे एदथी विपरीत नीचे थाय । जिनपूजा अंतरायथी हिंसादिक अंतराय ॥१७॥ इति वस्तु पंचकं । ढाल गीता बंदानी ॥चालतो॥ गुणथानकरे चनदतणी विगती कहो ॥ | आदि मिथ्यारे बीजो सासादन लहो ॥ मिश्र तीजोरे अविरति चौथो जाणिये ॥ देसविरतिरे || है पंचमगण वखाणीये ॥ त्रुटक ॥ प्रमत्त अप्रमत्त निवृति अनिवृति बादर सहम संपराश्यं ॥ उवसंतखीण मोहसयोगी अयोगी केवली धारयं ॥ जिण गणे जेटली प्रकृति बंधे कर्म उदय उदीरणा ॥ सत्ता सवे गुणगणे कहीशु आगमले विस्तर घणा ॥१७॥ चालती ॥ एकसो वीसरे प्रकृति सामान्ये बंध करे ॥ तसु नामजरे कहीशुं चतुर जे मन धरे ॥ नाण दंसणरे आवरणं ||
॥११६॥ पण नव कही ॥ वेदनी दोयरे मोहनी बवीसज सही ॥ त्रुटक ॥ नही समकित मिश्र मोहनी
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बंध आज च्यारे करे ॥ नामनी सतसही पयमी बत्रीस मांहीथी निसरे ॥ पनर बंधण पणसंघातन सोल वर्णदिक नहीं ॥ गोत्र दोय अंतराय पंचय मिली एकसोवीस लही ॥णा चालती॥ हवे पेहेलेरे गणे एकसो सत्तर हुवे ॥ जिननाम कर्मरे थाहारक न संनवे ॥ सासादनरे एकसो कउत्तर गणो । नरक त्रिकरे एक वि तिचत जाति मतन्नो ॥टक ॥ मत नणो ढंगसंगण आतप संघयण बेवघ्यं ॥ मिथ्यात थावर सूदम अपज्जत्त साधारण नपुंसयं ॥ ए सोख पयमी पढम गणे बंध बीजे नहु करे ॥ मिश्र थानके प्रकृति चिहुंतरि बंध गियत्थ उचरे ॥२०॥ चालती॥ तिर्यंचत्रिकरे निझानिडा जाणिये ॥ थीणधीरे पयलापयल वखाणोये ॥ | दोहग दुसररे अनादेयानंत चोकमी ॥ क्रोध मान मायारे लोन संगणद चोकमी ॥ त्रुटक ॥ निग्रोध सादिय कुबज वामण संघयण चल वली जाणीये ॥ ऋषन्न नाराच नाराच तसु अधिकी| लिक एम वखाणीये ॥ नीचगोत्र उद्योत असुन विहायगति स्त्री वेदयं ॥ मनुष्य देवह उ सत्तावीस पयमि कणंकिठयं ॥ १॥ चालती ॥ चोथे अविरतिरे गुणथानके सतहत्तरि ॥ नर सुर
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स्त० पं०
॥ ११७॥
आरे जिननामद एक करी ॥ देशविरतियेरे सतसद्वि दस बेठी करी ॥ यदि संघयणरे मनुजत्रिक बंधे नहीं ||| क्रोध मान माया लोन च्यारे अपच्चरकाणवरणा टब्या ॥ उदारिक तनु तसु उवंगद बंध नहीं एम सांजल्या ॥ त्रेसठ बंधे प्रमत्तठाणे पच्चरकाणावरणीया ॥ क्रोध मान माया लोज बंधन च्यारे उणी जालिया ॥ १२ ॥ चालती ॥ अप्रमतेरे प्रकृति अठ्ठावन जाएज्यो, जंगणसहिरे अथवा हिये आज्यो | तेतो एली परेरे त्रेतव्यी बह नीकली, दोय घालीरे व्याहारकद्विकस्युं मिली
टक। शोक थिर अशुन अरति अजस असातावेदनी, एम गुणसहि दवे अठावन प्रकृति कहुं परे बंधनी ॥ देव आनो बंध गयो बट्टो पुरो सातमे, करे तो गणस हि नहींतरे बट्टे पूरो अन्न ईमे ॥ २३ ॥ चालती । दवे अट्ट मरे अब करण गुणठाण्यं, श्रेणी दोइरे उत्रसम खवगति जाण्यं ॥ जीवमंमेरे इस थानके जाग साते करे, पहेले जागेरे बंध अट्ठावन उच्चरे ॥ त्रुटक ॥ उच्चरे गीयथ्य बितिय च पण बट्टे उपन्न जाणिये, निद्रा डुगं नहु बंध निद्रा पयल दुन्नि वखाणिये ॥ सातमे जागे बहीस पयमी बंध दोत्रे त्रीसनो, प्रकृति बहे जाग रह्यो सुखो दिवरण तेहनो ॥ २४ ॥
स्त० पं०
॥११७॥
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चालती॥ देवगति देवरे आनुपूवी पंचिंदिपणो, विहायगतिरे सुन्न त्रस बादर वलीलणो। पजत्तथिररे पत्तेय सुन्नग सुत्न सुस्वरं, आहारकरे विक्रय तेजस कम्मण मन धरं ॥त्रुटकाविक्रियाहारक उपांग दोई आदेय समचनरंसए, संगण निर्माण तिबनाम वर्णचनक बवीत ए, अगुरुलघु उपघात पराघात जसास इणपरे त्रीस ए ॥ आठमे श्म बीत नवमे बंध होय बावीस ए ॥२५॥ चालती ॥ नवमे गुण थानकेरे नाग वली पंचयकरे, तिहां पेहेलेरे नागे बाविस धाररे ॥ तिहां चन टालीरे हास र जय कुछए, बीजें नागेंरे पुरुषविणु ३ग वीसए ॥टक ॥ वीसबंध तश्य नागें क्रोधविणु ते जाणीयें, तुरीय नागें मान टाली ओगणीस एम संजारी ॥ पंचम नागें विणुमाया बढारनो बंध श्ह नएयो, गुणगण दशमें लोन टाली बंध सत्तरनो सुंण्यों ॥२६॥ गुम दशमेरे नाम सुहम संपराश्य, तिहां पयमीरे सत्तर बंधह उवदेशियं ॥ चन दंशणरे साता उच्च जस श्मलही, नाण विग्धंरे दश मिली समग्ग ते कही ॥ त्रुटक ॥ ग्यारमे एक पयमी बंधे सातावेदनी जिन कहे, आवरण चढ चरकु अचस्कु उही केवल बंध दशमे रहे ॥ उच गोय
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स्व०पं०
स्त०५०
॥११८॥
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जसनाम ज्ञानावरण पणयंतराश्यं ॥ पंच श्म सवि सोल पयमी बंध रह्यो संपराश्यं ॥१७॥ वस्तु ॥ खीणमोहे खीणमोहे एकनो बंध, तेरमे थानके एकनो, बंध सातावेदनी नणीजे ॥ चउदमे थानक बंध नहु कर्म रहित सिरि सिद्ध थुणी जे॥ हवे हुँ उदय विचारणा, एकसोने बावीस ॥ समकित मिश्र सहित नएया, सामान्ये स जगीस ॥२७॥
॥ ढाल ॥ जंबूस्वामीना विवाहलो ।। चालती ॥ पेहेले गणे एकसो सतरतणो, पयमी पंचनो उद मत नको. समकित मिश्रने आहारक पुगं, तित्थंकर नाम मिले नह जुगं ॥त्रटक॥ गणगणे बीजे पयमि उदए एकसो ग्यारु ए । सुरिकम अपऊत यातप मिथ्या साधारण मन धारु ए । नरकानुपुत्री उहय पयमी सतरमांही उबी करी । हवे मिश्र एकसो उदय बारे काढी मिश्र मांहे धरी ॥श्ए॥ चालती ॥ ते श्म च्यारे अनंतानु बंधीया । थावर नामकर्म गबिति | चरिंदिया। सुरनर तिर्यग आनुपुवी तियं । समकितठाणे चउ अधिक सयं ॥त्रुटक॥ सत एक || मांहे पंच घाली मिश्र एक उसारियें । समकित च्यारे आनुपुवी नरकादिकनीधारिये ॥ प्रकृति
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॥१२॥
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पंचम गण सत्यासी सतर पयमी जणी करो। चिनुत्तरसो मांदेथीदेशविरति उदउँ मन धरो॥३॥ चालती॥ अप्रत्याख्यानी क्रोधादिक चल । देवगति देवाणुपुत्व। देव बाजयं । विक्रिय तनुवली विक्रिय उपांग ए । नेरश्यगतिने आनुपुवी आजए ॥ त्रुटक ॥ तिरि मणुअपुत्वी अयस दुर्लग अनादेय ए सविटले । प्रमत्ते उदय एकासि आठे काढी दोयमांहि मिले। उद्योत नीयंगोय तिरिगति आज प्रत्याख्यान चोकमी। ए काढी श्रादारक तणु उपांग पुन्नी पयमी मांहि जमी ॥३१॥ चालती॥ अप्रमत्त गणे उदय बिहुत्तरी। एकाशीथी पंच पानी करीनिमानिमा प्रचलाप्रचलय। थीणद्धीने आहारक दोय॥त्रुटक॥थाम्मे गणे उदय बिहुत्तरी। च्यार काढो तेहनी। पयमी अर्द्ध नाराच कीलिका बेवट समकित मोहनी। नवमे गणे डासहि जाणो । हास्य रतिभरति नयं ।
शोक दुगंडा बह्य काढी बहुत्तरि मांहिथी बसव्यं ॥३॥चालती॥ दसमे गणे साठ प्रकृति कही। । स्त्री पुं नपुंसक वेद उदय नहीं । क्रोध मान माया संजलनातियं । ए बह जणी बासहिथी कियं ।।
त्रुटक ॥ ग्यारमे गुणगणे संजलनो लोन तेह नही। साथी एक एह काढि उदय गुणसहि
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स्व० पं
॥ ११९॥
हुए सही | बारमे सत्तावन ऋषन नाराच दोय उणी करी । अथ पंचावन निद्रा प्रचला दोय |ागले परि ॥ ३३ ॥ चालती ॥ तेरमे ठाणे बेतालीस जाणीये । पंचावनथी चउद जण वखाये । नाणावरणी पंच अंतराश्यं । पंचच दंसणावरणं निरधारियं ॥ त्रुटक || इम चौद काढें एकतालीस हुए तिछंकर नाम मांहि वो । इम बेतालीस पथमी तेरम ठाणे जिन थवो ॥ | चउदमे ठाणे बार उदर्ज त्रीस पयमी नहु हुवे । चरम समये ते बारे पयमी खपि शिवपुरे रमे ॥ ३४ ॥ चालती ॥ उदारिक तनु तासु उवंगुए। अस्थिर असुनं नाम नचंगुए। सुनने सुना विहायोगति । पत्तेय थिरि सुन्न नहु उदर्ज रति ॥ त्रुटक || संवाण बद उपघात पराघात गुरुलघु उसासए । वर्ण गंध रस फास निर्माण तेजस कम्मण निवासए । संघयण पेहेलुं दुसर सुसर साता अव यसातए । ए त्रीत पयमी उदय नहुए बारहुए विख्यातए ॥ ३५ ॥ चालती ॥ ते बारे इम त्रस बादर पत्तयं । पंचेंद्रि जाति नरगति आयुयं । उच्चगोय सुनगं तित्थंकर नामयं । आदेय जस साय व सातयं ॥ त्रुटक ॥ ए बार पयमी चनदमे गुणठाणे चरमसमे खवे ।
स्त० पं०
॥ ११९॥
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चउद गुणथानके उदउँ बोल्या जे जिहां संन्नवे। दवे उदीरणं कहु उदउ जेमतेम उदीरण । विस्तार जेम जेम पाबले कहियो तेम लहेज्यो धीधणा ॥ ३६॥ चालती॥ पहेलेठाणे एकसो सतरुए । बीजे एकसो अधिक ग्यारुए। एकसो त्रीजे चोथे चिमत्त । पंचमे थानके सत्यासी मने धरु ॥ त्रुटक ॥ बढे श्कासी हुइ हुश्दीरणा सातमाथी विवरणा। तेरमो थानक होय ज्यां लगी त्रिणि न करे जदीरणा । साता असाता मनुष्य आयु सातमे न उदीरए । तेणे उदय बिहुत्तरी करे उदीरण त्रिहत्तरी कदे जिनवीरए ॥३७॥ चालती ॥ श्राग्मे थानके हुए उगुणहत्तरी || नवमे त्रेसठ उदीरणा मने धरी। दसमे सत्तावन उप्पन्न अगियारमे । बारमे चोपन्न नगुण-15 चालीस तेरमे ॥ त्रुटक ॥ त्रण त्रण पयमी उदयमांहिथी उदीरण उडी करो। सातमा गुणथानके प्रारंजी तेर लगे हिय धरो। चनदमे गणे उदीरणा नदु अयोगी गुणगणयं श्म चनद थानक कही उदीरण पयमि विवरण माणयं ॥ ३०॥
॥ ढाल ॥ दोमी ॥ सत्तातणो विचार पूरव बंधीय । पयमी पोते जे रहेए । पेहेले स्थानके |
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०
स्त०५०
॥१२०॥
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| एकसत अमतालीस । दस बंधन उनी कहेए । बीजे त्रीजेगणे एकसो समतालीस। तिलंकरनाम ||
तिहां टल्योए । चोथेगणे एकसत अमतालीस । तिछंकर नाम मांहिं मिल्योए ॥ ३५ ॥ पंचमे | |बहे गणे सातमे थानके । सत अट्टतालीस जाणवीए । बाग्मे नवमेगणे दसमे ग्यारमे । वि-|
गति क्षणी मने आणवीए । अनंतानुबंधी च्यारे तिरिनरगायुष । बह पयमी सत्ता नहीए । तेणे | एकसो बेताल इणे चीहुं थानके । सुगुरु वचने आगमे लहीए ॥ ४० ॥अथवा चोथे गणे पंचम |
बढ़ए । सत्तमे इण चिहु नाथके । अनंतानुबंधी च्यारे समकित मिथ्यात । मिश्रमोहनी साते | | वकेंए । पकश्रेणी मांझे साते खय करे । तो एकतालीस आगलीए।अहव अधिक पचताल चोथे | पंचमे । बडे सत्तमे संनलीए ॥४१॥ एकसत अधिक पेताल ते इणिपरे । तिरि निरय देव आउ | विणाए । निज निजलवे विछेद कीधो ने जिणेए । हेते जीव लाने घणाए । श्रहवा अविरति । आदें नवम पढम नाग लगे । एकसो अमतीस जाणीए ए।प्रकृति सत्ताए विचार तेतो इणिपरे। १२०॥ सुगुरु गायथ्थ वखाणीये ए ॥ ४५ ॥ पेंतालीस मांहे सात काढी जे चउ । अनंतानु बंधीतिय |
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मोहनी ए। चउथो पंचम बह, सत्तम अहमा, जीवगणे परे एहनीए, नवमानानव नाग, कीजे पढेले जागे । एक सत्त अत्रीसे लणीए । बीजे प्रकृति बावीस । एक सत अधिकीय। थपत्रीसथी सोल अवगिणीए ॥४३॥ थावर सूक्षिमनाम तिरिगति, तिरिपुत्वनिरकड़िक श्णपरेजणोए। यातपने उद्योत, थीणद्धि निमानिझा,पयलपयल गणोए। गबिति चरिंदि, जाति साधारण,नाम कर्म ए सोलमीए । त्रीजे नागे चउद, एकसो आगली, आठ बावीसथी नीगमीए ॥ ॥ अप्रत्याख्यानीचार, चारप्रत्याख्यानी,आटे क्रोधादिक टलीए। चोथे नागे नपुंसक वेद टल्यो, तिहां एक सयथी तेर आगलीए । पंचमे नागे बार, एकसो अधिकीय, स्त्रीवेद टाली संनलीए । एक सत्त बढेन्नागे, बह फ्यमी विणु, हास्यादिक गिणतां मिलीए ॥ ४५ ॥हास्यवरति रति, सोगन्नय दुर्गबाए । सातमे पंचाधिक जाणज्योए । पुरुषवेद परिहार, ठमे संजजनो । क्रोध टालि चल वखाणज्योए । नवमे नागे मान, संजलनो टख्यो। तेणे एकसोत्रण चित्त धरोए । बिहुत्तर सुहम संपराय, थानके थानके सत्ताए । मायाविणु लेखो करो ए ॥४६॥ बारमे संजलनो खोन, बेला
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॥१२॥
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|| समयने, पहेले समय वखाणीए । तिहां एकसोएक, हवे डेहले समये । निता प्रचला नमाविए | ए । तेणे हेते पयमी नवाणु, दपकश्रेणी करीये, कोणमोहे सत्ता लहीए। अगियारमे गुणगणे, ते
उपशम श्रेणी, तासु विविक्षा इहां नहींए ॥ ४ ॥ सयोगे पयमी पंच्यासी, सत्ताए हुवे । नवाणु | मांहे चौद नीसरेए । नाण सण यावरण, अंतराय चन पंच, पंच ए चनद समकाले हरे ए। | हवे अयोगी गुणगणे, बेल्खा समयथी। प्रथम समय बिहुत्तरि खपेए । डेढे समय तेर, प्रकृति ते | एटली, सत्ताए जिण लपेए ॥ ४ ॥ देवगति देवाणु पुत्री, सुन असुजागति । गंधदु फास अम| रसपणुं ए। पंच बंधन पंचवर्ण, पंच संघातन । संघयण बह पंचय तणुए । दुनग दुसर निर्माण, | असुन्न अनादेय । अयस अगुरुल बु सून थिए । उ संगण उपघात, नसास पराघात । पत्तेय
अपज्जत्त सूसरुए ॥ ४५ ॥ त्रण उपांग नीयगोत्र । अथिर असाताए, अहवा सातावेदनीए ॥ बहुत्तरि खपावी एह, अथवा तिहत्तरी, मनुजानुपुब्बी सहितनीए। बहुत्तरि तो रहे तेर, तिदु त्तरितो बार । शेष रहे बेहले समयए । सत्ताए ते एह, नरगति आउघ । आणुपुत्री नरनी रमेए
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॥ ५० ॥ त्रस बादर पज्जत्त, जस यादेय, सुनग उच्चगोय जिननामस्युए । पंचेंद्रिय जाति, साता साताए । मांदेल एकज वामइयुंए । तेरह पयो एह, चन्दमे गुणठाणे, चरम समय सघजी पीए । अथवा मी वार, चरम समये खरे, नर आणुश्र्वी त्रिणुलुपीए ॥ ५१ ॥ तुम्ह दरसण स्वामी, कर्म तवसे । नवे नवे रोल या जीत्रकोए । जीव चनराशी लाख, मांहे दुःख सुख, पाया मोह नमे नमयोए । सद्गुरु तो पसाये, तुम्ह सासन लह्यो । कर्म तयो दवे जय टब्याए | दूर थया सवि दुःख, शुभ मति संपनी, समकित सुरतरु मुजफल्योए ॥ ५२ ॥
॥ कलश ॥ इम चन्द ठाणे पथमी विवरण नाम मात्रे संयुण्यो । सूरीन्द्र श्री पार्श्व चंद्र शिष्ये श्री समरचंद्र जेम मुण्यो । जे भए मात्रे मने घ्यावे कर्मपथमी खय करे ॥ ते लदे केवल विमल सुखकर ंले शिवरमणी वरे ॥ ५३ ॥
॥ इतिश्री चतुर्दशगुणस्थान कबंधनद यउदीरणा सत्ता कर्मप्रकृतिविचारगर्भित श्रीमहावीर जिनस्त वन रूप त्रिपंचाशिका रचिता समरचंद्रसूरिणा समाप्ता ॥ शुनं जयतु ॥
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प्रश्नोचर
प्रश्नोत्तर
॥ अथ श्रीराजर्षिकृतप्रश्नस्योत्तरम् ॥ पुरुषकाय स्थिति रहेतो सागरोपम ए०० कामेरा ॥ स्त्री वेद रहेतो पत्योपम ११० पृथक्त्व, पूर्वकोमी ॥ नपुंसक वेदे रहे अनंति उत्सर्पिणी अवसर्पिणी रहे। पंचेंद्रि पंचेंद्रिपणे रहे तो, सागरोपम १००० कामेरा॥जीवत्रसकाय मांहे आवी त्रसपणे रहे तो सागरोपम २००० कामेरा रहे।
पांच ज्ञान त्रण अज्ञान कासथकी जघन्य तथा उत्कृष्टो केटलो काल रहे ते सखीये बीये, || | मतिज्ञान अने श्रुत ज्ञाननो कालजघन्यत अंतर्मुहूर्त एक॥ उत्कृष्टो काल सागरोपम ६६ कामेरा ___अवधिज्ञाननो कास जघन्यत एक समय, उत्कृष्टो ६६ सागरोपम मारा, अवधिज्ञाननो एक || समय ते केम? विनंगज्ञानी समकित पमिबजे तेवारे विनंग मटी अवधिज्ञान थाय, ते एक | समय रही वली पझे, विनंगज्ञाननो विनंगाने ज आवे एटले विनंगनो विनंग ज थाय. एम अवधिज्ञान जघन्यत एक समय होय.
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॥१२२॥
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मनःपर्यवज्ञान जघन्यत एक समय,उत्कृष्टोतो देशत उणोपूर्व कोमी एक एक समय ते केम?, जेवारे अप्रमत्त गुणगणे वर्तता मनः पर्यत्रज्ञान उपजीने जाय त्यां एक समय जाणवो.
केवलज्ञाननाधणीने केवलझान सादि अने अनंत होय मति अज्ञान अने श्रुत अज्ञानना नांगा काल आश्रीत्रण जाणवा एक अनादि अने अनंत ए अन्नव्यने १, अनादि अने सांत एनव्यने २, सादि अने सांत जे समकित थकी पमी वली चमे तेने ३. जे सादि अने सांत ने तेने जघन्यत श्रेकअंतमुईत, उत्कृष्टोतो अर्द्ध पुद्गल जाणवो.
हवे विनंग ज्ञाननो काल कहे जे. जघन्यतो एक समय, उत्कृष्टोतो सागर ३३ मारा. म. है|| नुष्यनो आयुष्य पूर्वकोमि एक पाली पड़ी अपश्गणे नरके जाय एटले एक पूर्वकोमिने तेत्रीस सागरोपम थाय.
हवे ए आग्ज्ञाननो अांतरो लखीये बीये,मतिकाननो अांतरो जघन्यत अंतर्मुहूर्न १,उत्कृप्टो तो छ पुजल माठेरो. एवं एणेज प्रमाणे श्रुतझान,अवधिज्ञान,मनःपर्यवज्ञाननो पण अांतरो
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प्रश्नोत्तर
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प्रश्नो
॥१२३॥
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| जाणवो, केवलज्ञाननो आंतरो नहीं. हवे मतिअज्ञान अने श्रुतअज्ञाननो कहीये बीये. जघन्यतो || एक अंतर्मुहर्त, उत्कृष्टो सागरोपम ६६ माऊरो. हवे विनंगनो अांतरो कहीए बीए. जघन्यतो | अंतर्मुहर्त एक. उत्कृष्टो तो वनस्पतिनो काल जाणवो.
नेद अजीवना १४ ते मांदेला केटला नेद लोक मांदे लाने, केटला नेद लोक बहार अ| लोकमांदे लाने, केटला नेद अढीछीपमा लाने. केटमा नेद अढीछीप बहार लाने. ते विवरो
लखीये बोये. लोकमांदे नेद तेर ते केम ! आकाशव्यनो खंध टलतां बाकी १३ नेद. अलोक | मांहे नेद २ ते कया ? आकाशव्यनो देश १, प्रदेश २ अढी छोप मध्ये ११ ते केम ? | धर्म अधर्म आकाश ए त्रणना त्रण खंध टख्या एवं ११, हवे अढीदीप वाहार नेद १० ते केम? पाउला त्रण खंध तेमज काल सहित ४ एवं बाकी नेद १० जाणवा.
षटव्यमां कयोषव्य गुरु ? कयो अव्य लघु ? कयो अगुरुल ? ते विवरी कहीये बीये.॥ जे पुद्गल ते गुरुषव्य १, अने जे काल ते लघुप्रव्य २, धर्मप्रव्य १, अधर्मव्य २,आकाशव्य ३,
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॥१२३॥
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ए गुरुलघु, जीवाव्य ते थगुरुलघु ॥१॥ षटद्रव्यमां कोण नित्य कोण अनित्य ते लखीये बीये. श्राकाश १, काल २, धर्म ३, अधर्म ५ ए नित्य जे जीव तथा पुद्गल ए बन्ने अनित्य. पर्याय आश्री एना पर्याय फरे ते नणी ए अनित्य. इतिश्रीराजर्षिकृतप्रश्नस्योत्तरं विहितं श्रीमत्पार्श्वचन्प्रसूरिणा
॥ अथश्रीषट् व्यविचाररूपप्रश्नोत्तरम् ॥ ॥ श्रीसरस्वत्यैनमः ॥ अथश्री षटद्रव्यविचारो लिख्यते ॥ जीवाव्य १, पुदगलद्रव्य २, धर्मास्तिकायव्य ३, अधर्मास्तिकायद्रव्य ४, कालव्य ५, थाकाशास्तिकायव्य ६, ॥ श्रथ जीवद्रव्य नेद बे, एक शुद्ध जीवऽव्य बीजो अशुद्धजीवद्रव्य. शुद्धजीवद्रव्य ते कोने कहीये ? नो कर्म जे शरीर द्रव्यकर्म आठ कर्म पिमरूप, नावकर्म रागद्वेष मोहरूप ते नोकर्मव्यकर्म नावकर्म तेणे रहित जे श्रात्मा सिद्ध स्वरूपते शुद्धजीव कहीये.
अशुद्ध जीवद्रव्य ते जे च्यार गति संबंधि नरनारकादिक कर्मोपाधिसहित जीव ते श्रशुद्ध
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प्रश्नोत्तर
प्रश्नोत्तर
१२४
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जीवाव्य. अथ जीवना गुण तेना नेद २, एक शुद्ध गुण बीजो अशुद्ध गुण. शुभ गुण केवलज्ञानादि अनंतगुण. अशुद्ध गुण मतिश्रुताऽवधि मनःपर्यवः कुमति कुश्रुत विनंगशान चक्षुदर्शन अचकुदर्शन अवधिदर्शन ए दस जीवना अशुद्धगुण ॥
अथ जीवयना पर्याय तेहना नेद २ एक व्यंजन पर्याय बीजो अर्थपर्याय. त्या व्यंजनपर्यायना नेद २, एक शुद्धव्यंजनपर्याय बीजो अशुद्धव्यंजनपर्याय. शुद्ध व्यंजनपर्याय ते जे चरम शरीरथकी त्रीजे नागे न्यून सिद्धनी अवगाहना ते शुद्धव्यंजनपर्याय, अशुद्धव्यंजनपर्याय, ते जे नरनारकादि शरीरपर्याय. हवे अर्थपर्यायना नेद २. एक शुद्धअर्थपर्याय, बीजो अशुद्ध अर्थपर्याय. ज्यां केवलज्ञानादि शुद्धगुण षटगुण हानि वृद्धिरूप परिणमे ते शुद्धयर्थपर्याय कहीए. तथा उत्कृष्ट मतिज्ञानादिकनो प्रकाश घटतो घटतो अदरने अनंतमे नागे निगोदादिकने विषे जाणपणो आवी रहे ते अशुद्धयर्थपर्यायकहीए. तथा अव्यगतपर्याय ते व्यंजनपर्याय, गुणना पर्याय ते अर्थपर्याय. एवं व्यंजनपर्याय अने अर्थपर्यायनो नेद जाणवो. जीवद्रव्य उत्पाद |
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॥१२४॥
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व्यय अने ध्रुव संयुक्त जे. जीव द्रव्यथकी ध्रुव पर्यायथकी उत्पत्तिरूप विनाशरूप बे. इति द्रव्यगुपर्याय व्याख्यानं ॥ ____अथ पुद्गल अव्यनो स्वरूप कहे , त्यां पुद्गलमय महाखंधनी अपेक्षाये लोक व्यापी २. परमाणुनी अपेक्षाये लोकना एक देश मात्र रहे बे. हवे पुद्गलप्रव्यना २ नेद एक शुद्ध पुद्गलप्रव्य अने बीजो अशुद्धपुद्गलप्रव्य तिहां शुद्ध अविनागीअवेद्य अनेद्य एहवो एक परमाणु आकाश प्रदेशने विषे रहे ते शुद्धपुद्गलप्रव्य तथा द्वयणुकादिक महाखंध पर्यंत स्कंध रूप जे पुद्गल ते अशुद्धपुद्गलप्रव्य कहीए.
अथ पुद्गलप्रव्यना गुण तेना बेनेद. एक शुद्ध गुण बीजो अशुभ गुण त्यां अविनागी परमाणुने विषे रह्या जे वर्णगंधादिक गुण ते शुद्ध गुण तथा वीसगुण आदि देश अनंत गुण मिश्रित एवा च्यणुकादिक स्कंधना जे गुण ते अशुद्धगुण. स्कंधने विषे वीसगुण मध्ये सात गुणनी मुल्यता , तेर गुणनी गौणता बे.
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प्रश्नोत्तर
नोचर
॥१२५॥
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अथ पुद्गल अव्यना पर्याय तेना नेद २. एक व्यंजनपर्याय अने बीजो अर्थपर्याय, त्यां || है | व्यंजनपर्यायना नेद ५. एक शुदव्यंजनपर्याय बीजो अशुद्धव्यंजनपर्याय, त्यां अविनागी | एक परमाणु एक वर्ण एक गंध एक रस बे स्पर्श एवं पांच गुण संयुक्त दिगंम्बरमते षट्कोणना
आकारे श्वेतांबरमते गिरदाकार शुद्ध आकाश प्रदेशने विष एवो शुद्ध परमाणु रहे , ते शुद्ध | व्यजंनपर्याय तथा व्यणुकादि स्कंध सूदमरूप स्थूलरूप त्रयंशचनरंशादि अनेक आकारे परिण मे, ते अशुद्धव्यंजनपर्याय तया पुद्गलना अर्यपर्याय तेना नेद २. एक शुद्धअर्थपर्याय बीजो अशुद्धअर्थपर्याय, त्यां शुद्धपुद्गल परमाणु आपणा वर्णादि शुद्ध गुणे करी षट् गुण हानि || वृद्धिरूप परिणमे ते शुद्ध अर्थपर्याय. तथा घ्यणुकादि स्कंधना जे वर्णादिक गुण तिवमंदादि || तरतम नेदे परिणमे ते अशुद्धअर्थपर्याय, पुद्गलव्य उत्पाद व्यय अने ध्रौव्य रूप . द्रव्य पुद्गल परमाणु रूप ध्रुव . पर्याय थको उत्पत्ति नाशरूप ले. इति पुद्गलप्रव्यव्याख्यानं.
अथ धर्मव्य शुद्ध लोक व्यापी जाणवो तेनो गुण गति लक्षण जाणवो. तथा धर्मव्यना
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॥१२॥
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पर्याय, एक व्यंजनपर्याय एक अर्थ पर्याय, त्यां लोक व्यारी धर्मास्तिकाय लोकाकार रूप परिणमे ते शुद्धव्यंजनपर्याय, तथा धर्मद्रव्यनो गति लक्षण जे गुण ते षट्गुण दानिवृद्धि रूप परिणमे ते शुद्धार्थ पर्याय. धर्मास्तिकाय द्रव्यने विषे अशुद्धगुणपर्याय नथी. धर्मास्तिकाय उत्पाद व्यय प्रोव्य संयुक्त बे. द्रव्य थकी ध्रुव बे, पर्याय थकी उतत्ति नाशरूप बे. ॥ इति धर्मास्तिकाय व्याख्यानं ॥
अथ अधर्मास्तिकाय द्रव्य शुद्ध अखंग लोक प्रमाण ठे. तेनी स्थितिलक्षण शुद्ध गुण बे, तेना पर्याय एक व्यंजनपर्याय बोजो अर्थपर्याय त्यां वर्मास्तिकायद्रव्य लोक प्रमाण लोकने
कारे परिणमे ते शुद्धव्यंजनपर्याय तथा अधर्मास्तिकायनो स्थिति लक्षण जे गुण ते षट् गुण दानि वृद्धि रूप परिणमे ते शुद्ध अर्थपर्याय कहीए. अधर्मास्तिकायने पण अशुद्धगुण पर्याय नथी. अधर्मास्तिकाय द्रव्य उत्पाद व्यय प्रोव्य संयुक्त बे. द्रव्य थकी नित्य पर्याय थकी उत्तत्ति नाश रूप बे. इति अधर्मास्तिकाय व्याख्यानं ॥
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प्रनोत्तरा
__ अथ काल द्रव्य व्याख्यानं ॥ शुद्ध काल द्रव्यना अणुया एक एक आकाश प्रदेशने विषेपश्नोत्तर ४१२६|| एक ए कालाणु रहे . ते शुद्धकालद्रव्य कहीए. तेनो गुण वर्तनालक्षण. तेना पर्याय बे. एक
व्यंजनपर्याय एक अर्थपर्याय त्यां एक एक कालाणु एक प्रदेशो . ते आकाश प्रदेशने विष अमूर्त थको रहे ते शुद्धव्यंजनपर्याय. तथा काल द्रव्यनो वर्तना लक्षण जे गुण ते षट्गुण हानि वृद्धि रूप परिणमे ते शुद्धअर्थपर्याय कहीए. काल अव्यने पण अशुद्ध गुण पर्याय नथी समय || श्रावली प्रमुख जे काल ते पण शुद्धकालाणु अव्यपर्यायना जाणवा. काल अव्ययकी नित्य, | | पर्याय थकी उत्पत्ति विनाश रूप ॥ इति कालव्य व्याख्यानं. ।।
अथाकाशजव्य व्याख्यान॥ श्राकाशव्य लोकालोक व्यापिअखंमअमूर्त अनंत प्रदेशीएकद्रव्य बे.ते आकाश द्रव्यनो गुण अवकाशरूपपर्याय एक व्यंजनपर्याय एक अर्थपर्याय त्यां आकाश द्रव्य || अखंग लोकालोक प्रमाण अमूर्तरूप परिणमे ते शुद्धव्यंजनपर्याय कहीए. तथा अवकाश ल. "
१२६॥ कणजे गुण ते षगुण हानिवृद्धिरूप परिणम ते शुद्धअर्थपर्याय एने पण अशुद्धअर्थपर्याय न
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थी.थाकाशव्य व्यथकी नित्य पर्यायथकी उत्पत्ति नाशरूप बे. ॥ इति श्रीमन्नागपुरीयवृहत्तपागवाधिराजयुगप्रधान श्रीपार्श्वचन्द्रसूरीश्वरकृतं
षट्रव्यविचाररूपप्रश्नोत्तरंसंपूर्णम् ॥
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॥ अथश्रीजिनप्रतिमास्थापनारासः॥ ॥ ॥ सार वचन जिन नाखीओ, श्ण जामति नहीं बीजो कोय के ॥ हीये विमासी जोयज्यो, सोवन पीतल सम किम होय के ॥ श्रुतनो पक्ष म मेलज्यो ॥१॥ एहजे नाई सीख | रसाल के आदर करीने मानज्यो । नयगम नंग गुण सुविसालके, एकमने आराधज्यो ॥ मो-| ह मिथ्यात विचे वट पाम्के, उपसम समकित जीपज्यो ॥ मुगति पुर्गनी उपरे मालके, सुखे चमी सुख पामज्यो ॥ श्रुतनो ॥२॥ कल्प साल किहां केरमो, किहां नूमितल किहां सुरलोक के ॥ किहां चिंतामणी कांकरो, सायर बीबर सरस म जोयके ॥ श्रुतनो० ॥ ३॥ राजहंस
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रास.
शारास
1॥१२७॥
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है किहां बगलमो, किहां नूमिपति किहां ले रंकके॥ किहां उज्जल किहां मेलमो, किहां सरसो कि|| हां वंक निसंक के ॥ श्रुतनो० ॥ ४॥ किहां हयवर किहां रासनो, किहां मयगल किहां महिष विचारके ॥ किहां रायण किहां रींगणी, किहां मजन किहां तरवो पारके ॥ श्रुतनो० ॥५॥ तिम केवली उदमस्थने, वचने अंतर जाणो जाण के ॥ केवलि नाख्यो ते सही, तेहने मिलतो सर्व प्रमाण के ॥ श्रुतनो० ॥ ६॥ सूत्र सूत्र मुखे सहु कहे, तिहां पण गिर सरसवह प्रमाणके ॥ केलवणहार यांतरो ॥ तिण थाये विस अमीय समाणके ॥ श्रुतनो० ॥७॥ जिम किणही कागले लख्यो, पुत्र चोरतो हुँ पण चोरके ॥ वांचणहारे वांचीयो, तिम जिम लेखक मंग कगेर के ॥ श्रुतनो० ॥॥ धणिये तिणपर वांचीयो, निणपर दुवोराजपसायके ॥ केअवतां श्म आंतरो, दुलहो| लहितां निरतो नावके ॥ श्रुतनो० ॥ ए। परंपरा जे आवीयो, गुरुमुख सनिबज्यो परमथ्यके ॥ थागम वांचे ते खरो, ते गुरुजन तारेवा समथ्थके ॥ श्रुतनो ॥१०॥ दया वखाणी तेहनी, जे | | निरति राखे जिनवर थाणके ॥ आण दया अंतर घणो, करज्यो ए तुमे वचन प्रमाणके ॥
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श्रुतनो० ॥ ११ ॥ आगम त्र आराधना, नाण दंसण ते जाणो णके ॥ चारित्र कहीए ते दया, वे वे मीली शिवपुरनो गणके ॥ श्रुतनो० ॥ १२॥ अनव्य जीव पाले दया, वार अनंत खरी व्यवहारके ॥ श्रज्ञा विणु ते जव जमे, कदी न पहोचे पेले पारके ॥ श्रुतनो० ॥ १३ ॥ देसविरती अविरति तणी, उत्कृष्टी जुवो गति एकके ॥ देवलोक हुवे वारमें, आप दयाने एह विवे कके ॥ श्रुतनो० ॥ १४ ॥ आण पखे ( विना ) पाले दया, उत्कृष्टो नवमे मैरेयके ॥ सर्वविरतिने पहुचे सदा, थाण ते सिद्धि पे खीण एकके ॥ श्रुतनो० ॥ १५ ॥ एक पुकारे मुख दया, नाम मात्र नवि जाणे आपके | सूत्र मर्म जे नहुल, कह्यो तासु केम होय प्रमाणके ॥ श्रुतनो० ॥ १६ ॥ मुग्ध न जाये बापमा, प्राये धन खरच्यो न सुहायके ॥ ( रासें बंध्या जेम वलधीया ) रासी बद्ध जीम बलधीया, प्रतिमा ढांगे नास्तिक याय के ॥ श्रुतनो ॥ १७ ॥ आगम बोली बे दया, खाण सहित तसु जाणो मर्मके ॥ मन वचन तने पालज्यो, जेम तमे पामो सुधो धर्मके ॥ श्रुतनो० ॥ १८ ॥ ते कांई परने चिंतवे, जे आपले मन न सुहायके ॥ मूल मर्म ए धर्मनो,
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रास.
॥१२॥
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|| परनी निंदा (ए) ते सहु जायके ॥ श्रुतनो० ॥ १५ ॥ वलीय विशेषे जिनतणो, मने माणज्यो
मोह लगारके ॥ तेहनो अवरण बोलतां, चोथे अंगे सुणिय विचारके ॥ श्रुतनो० ॥ २०॥ जिन ||| प्रतिमानी हेलणा, सूत्र वचन जिनवर हिलायके ॥ पंचम अंगे विमासज्यो, घासायण तसु || णिपरे थायके ॥ श्रुतनो० ॥१॥ वीतराग जिणवर कह्यो, प्रतिमाने जोज्यो अधिकारके ॥ बीजे || तिम त्रीजे वली, अंगे उगे लेहु विचारके ॥ श्रुतनो ॥ १२॥ पंचम उढे अंगे नएयो, सांजली हीयमे आण विवेकके ॥ मं-बोलज्यो उपरावग, साखी श्हां ग्रंथ अनेकके ॥ श्रुतनो॥३॥
जगवर अंगे नांखीयो, वीसमे सय नवमे उद्देशके ॥ बार गम प्रतिमा तणा, वंदेवा श्री साधु | विशेषके ॥ श्रुतनो० ॥ २५ ॥ आवे गमे शाश्वती, असाश्वति प्रतिमा चिहु गमके ॥ वंदे ते | चारण यती, श्म बोल्या श्री सोहमस्वाम के ॥ श्रुतनो० ॥ २५॥ दशमे अंगे आठमे, अध्ययने जिनप्रतिमा काजके ॥ मुनिवर यावच करे, तेहने नास्ति नहीं जिनराजके ॥श्रुतनो० ॥ २६ ॥ ॥१२॥ पंचम आवश्यक करे, वीरजिणंद चनविद संघके॥ उन्नयकाले किरिया नणी, प्रतिमा वंदन पूजन
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रंगके ॥ श्रुतनो ॥ २७ ॥ बीजे गमे मानीये, सघले धर्मारथ श्रारंनके ॥ एक प्रतिमा नहु मानीये, एह म करज्यो कूमो दनके ॥श्रुतनो॥२७॥ पर अवगुण लव म ग्रहो; परनिंदा म करो मन रीसके । पूर्व मांसन्नकण कह्यो, श्री श्रागम गिरुवे जगदीशके ॥ श्रुतनो० ॥ ॥ इह लोकिक पण इम कहे; मातंगीनो जोवो दृष्टांतके॥नूमि आनोखी चालती, निंदक रुलसीकाल अनंतके ॥ श्रुतनो० ॥ ३० ॥ एहज बागम वांचतां, रुसीया चोग साध अनंतके ॥ एह थाराधी उद्धर्या, पहोता सिद्धे साधु अनंतके ॥ श्रुतनो॥३१॥ एम जिनेसर नाखीयो, चोथे श्री समवाये अंगके ॥ जिन नाषित नहु अन्यथा, वानी ओलखज्यो मन रंगके ॥ श्रुतनो ॥३२॥ अणजाएयो असूएयो कहे; अणदीठो जे सन्ना मझारके ॥ पंचम अंगे प्रगट कह्यो, ते नर नमस्ये अनंत संसारके ॥ श्रुतनो० ॥३३॥ प्रतिमा वंदण आखमी, कही नथी जिनमारगमांहिके। साधु श्रावकने मारगे, म पमज्यो गामरीय प्रवाहके ॥ श्रुतनो०॥३४॥ सूत्र बता म उथपो, श्म करतां नाजे जिन आणके ॥ एह मूल समकित तणो, श्री जिनप्रतिमा करो प्रमाणके॥श्रुतनो०
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रास.
॥१२९ ।।
॥ ३५ ॥ जिन वंद फल जेटलो, ते जिन प्रतिमा वंदण होयक || रायपशेणी जाखीयो, हृदय नयन धामी जोयके ॥ श्रुतनो० ॥ ३६ ॥ प्रतिमा पुस्तक सारिखा, दंसण नाणतो बे अंगके ॥ एक ढंको एक आदरो, इणपरे दुवे त्रिदुनो जंगके ॥ श्रुतनो० ॥ ३७ ॥ पुस्तकतो पछी हुवा, प्रतिमानी जोवो बुन्या दिके (अनादि ) | नवी कही बोगवे, ते तो पमिया मिथ्यावादके ॥ श्रुतनो० ॥ ३८ ॥ तेहने जो न आराधीये, जेदथी हुवे परजव उपकारके ॥ इमतो कृतघ्नज थाइये, इम केम लहीये वो पारके || श्रुतनो० ॥ ३९ ॥ रूसो सजण जब इसो, विड्सो दुरजण मूरख लोकके ॥ जिनवर आण वदंतमा, तेम जावे जेम विरुयो न दोयके ॥ श्रुतनो० ॥ ४० ॥ श्राज्ञा आचरणायें मिल्यो, परिक्रमणो करोज्यो बिहु काल के || बिदु विण बंदे व्यापणे, करतां पमीये जव जंजाल के ॥ श्रुतनो० ॥ ४२ ॥ तेहनी संगति टालज्यो, जेह विराधे देव गुरु धर्मके, नित समतारस कीलज्यो, मननो टाली मिथ्या जर्मके ॥ श्रुतनो० ॥ ४२ ॥ श्रीपार्श्व चंद्रसूरि विनवे, जिन प्रतिमा | जिनवरनी बुद्धि के || एकमना याराधज्यो, लहेज्यो मनवंबित फल सिद्धिके ॥ श्रुतनो० ॥४३॥
रास.
|॥ १२९ ॥
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इति श्रीजिनप्रतिमास्थापनारासः संपूर्णः ॥ श्रीरस्तु ॥
॥ अथश्रीशत्रुजयनो रास.॥ राग गोमी. नली नावना विमळगिरि नेटवानी, वसी चित्त कसवट जिम हेमवानी ॥ तिणे उलटे तीरथराय गाउं, महा घोर संसारनो तीर पाउं ॥१॥ लहे घिद तन रुशमी तेज जीद, थुणे तेदना गुण गणुं धन सुदीद ॥ वहे पाय तसु पंथी ते धन्य जाणुं, करे अंजली जेय कर ते वखाएं ॥२॥ जिणे जोश्ये रंगी ते धन्य नेत्र, दियो ते जिणे समरिये सिकदेत्र ॥ हरे नावि नयनूरि नवज्रमण केरो, इणे जामली नहींय तीरथ अनेरो॥३॥जिम ध्यानमांदे नझुं शुक्न ध्यान, मणीमांहे चिंतामणी जेम प्रधान ॥जिम गिरिवरे मेरु तरुवरे मंदार, तिम तीरथ मांहि शत्रुजय सार ॥४॥ वमी जंबुदीपे नदी मांहि सीता, सति शीलगुण नारीगण गणीय सीता ॥ जिनधर्म करुणा नरे जिम उदार, तिम तीर्थमांहे शेजेज सार ॥५॥ जिम वंशमांदि वमो जैन वंश, विहंगमा जिम रुमो राजहंस ॥ जिम मंत्र नवकार महिमा अपार, तिम तीर्थमांहि शेजेज सार ॥६॥ अडे कमळ
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रास
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वन परिमळे जळ घणेरा, नहीं मन विना मानसहंस केरा ॥ जगे नवियण चित्त आणंदकार, || तीम तीर्थमांहि शेज सार ॥ ढाळ ॥७॥ पृथवी मंमण तीर्थ घणा ए, 2 जण जण मण श्तो॥ शत्रुजय समवम अवर मे, कोइ न तीरथ दीवतो।गावोण गावो गावो आपणो ए, ए मनमाणो ब्रांत तो॥जेद गुणना पारखीय, ते परखी गुण लिंत तो ॥गावोगाए॥ जिण दीठे गुणवंतना ए, गुण समरीये अनेक तो ॥ लेखतणे अहिनाण तिहां, मन आणीये वीवेक तो।गा॥१०॥ साधारण | नावे नएयो ए, पग पग सिद्ध अनंत तो॥ शत्रुजय जेम सविशेष तिहां, नहु लाने गुणवंत तो ||गा॥११॥ निरतो ज्ञान न उपजे ए, ज्यां लगे नर उदमस्थ तो ॥ त्यां मन थालंबन क्रियाए, | अक्षर प्रतिमा तिब तो ॥ गावो० ॥१॥ सहि जिनसासन जेहनो ए, ए उपर नवि राग तो॥ ते है मिथ्याति जाणीए ए, के केवली वैराग तो गावोग॥१३॥जे पण राग नलो नथी ए, थाये तो जिन | है मत था तो॥ सिफ राग मन सांजरे ए, वळी वळी तीर्थराज तो ॥गावोगा ढाल ॥१॥ शत्रुजय | | गिरि गिरी अवर समाणो, एहवी मतिनो नाव म ाणो ॥ जाणे हिये विचारी सोवन पीतळ है
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रजत कथीर, काच रतन ए पृथवी सरीर, धीर नीरु नर नारी ॥ १५॥ अंब निब तरुवरनी जात, काळ विशेष दिवस ने रात, जाति कनक जे फुल, दूध नाम गोअक्क सरीखो॥ए सहु ए समवम जश् देखो, लेखो गिरि गिरि तुल ॥१६॥ श्स्युं जाणी गणि शत्रुजय तीर्थ, णगिर आव। सिद्धा समर्थ, अर्थ सिद्धि जे पामी ॥ सिद्धतणे गुण रागे रमीए, माणसनो नव एले न गमीये, नमिये ते सिर नामी॥१७॥ बंमी राजरिद्धिनी ममता, इंडीयने दमी आदरी समता, करता विधिए विहार ॥ नेम जिनेश्वर सांनळी सिद्धगति, चिंतवि धिक् धिक् कर्मतणी गति ॥ निंदिय
अथिर संसार ॥ १७ ॥ धरि वैराग राग मति परिहरी, पांच पांमत्र चड्या विमलगिरि, शिव| पुरी पाम्या राज ॥ श्ण गिरि सहस साधु परिवरीयो, थावच्चो गुणमाणिक नरीयो, तरीयो सारी काज, ॥ १५ ॥ सहस सहित इह शुक परिव्राजक, तेहतणा गुण जाणे सहु जग, जगमग ते जस लीधो॥पूर प्रमादे पापह चेलग, विनय क्षमा देखी ऋषि सेलग, पंथक गुणे प्रतिबूधो ॥ ३० ॥ पंच सयास्युं शत्रुजे आव्यो, कर्मतणो मळ दूर खपाव्यो, पाम्यो शिवपुर गण ॥
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रास.
॥१३॥
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बढे अंगे इणिपरे नणीये, नावे तेह तणा गुण थुणिये, गणिय जनम प्रमाण ॥१॥ ढाल ॥ || |गस धन धन धारणी नाम ए माय, पुत्ररत्न जेणे उद्धयों ए ॥ अंधक वृष्णि धन यादवराय, जेहनो || है। तात तेजे नर्यो ए ॥ गौतम उत्तम पुरुष प्रधान, आठ रमणी तजी व्रत धर्यो ए॥ पामीय केवल || | झान निर्वाण, शेजेजे दरिसण साजयों ए ॥१२॥ नवय सहोदर तासु उदार, अथिर संसार है। मन संतरी ए, आदरे आदरी संयमन्नार, रिद्धि रमणी सर्व परिदरी ए॥ सम दम न धरे बालस || अंग, समुष प्रमुख आगम नर्या ए ॥ करीय संलेखण शत्रुजे श्रृंग, रंगे मुक्ति नारी वर्या ए ॥५३॥ सुलसा नंदन नाग आनंदन, कुमर अणियस जसनिलो ए ॥ दसणे शीतल नयण जेम || चंदन, दोष निकदन कुलतिलो ए॥ एक दिन परणीय नारी वत्रीस, कोमी वत्रीस सोवन मिल्यो ए। | इणिपरे पुरीय सज्जन जगीस, दीसे दोगुंडक सुरतिलो ए ॥ २४ ॥ मी गृहवास धरी धर्म || अन्यास. सास वेसास न आवीयो ए॥ततक्षण तोमीय मोह अढ पास, मास संलेखणानावीयो
॥१३॥ | ए॥ शिखर शेर्बुजतणो करीय निश्रेणि, सिद्ध निश्रेणि वेगे चड्यो ए ॥ गिरु गिरवर कारण
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तेण, वीसरे ते किम चित्त अझयो ए ॥ २५॥ ढाल ॥ अजित सेनादिक जास जगीस, कोमी | रमणी बत्रीस बत्रीत ॥ सहोदर तासु पंचय व्रत धरी, शेजेजे चमी पहुंता शिवपुरी ॥२६॥ वसुदेव नंदन सारण कुवर, दारुक बीजो रूपे अमर ॥ कोमी पंचास रमणी पंचास, डंमी रिद्धि | | मंम्यो शिववास ॥ २७ ॥ उमुह सुमुह कुंमर कुमार, ए त्रणे बलदेव मलार ॥ सांजली धर्मकथा | प्रतिबुद्ध, विमलगिरि शिखरे थया सिद्ध ॥२०॥ सांब प्रद्युम्न ने जाली मयाली, प्रमुख कुंवर दसकुल उजाली ॥ एक एक धन कोमी पचास, जोगवी रमणी पचास विलास ॥२ए। ए बोध्या |
ने अष्टम अंग, सयल संगी मी मन रंग ॥ शेजागिरी संथारो करी, सिद्धि पहुंता नव | सायर तरी ॥ ३० ॥ एणिपरे शेर्जेजे सिद्धा अनंत, तेह तणो कुण पामे अंत ॥ ज्ञानहीण हुं हुं || बद्मस्थ, पण जाणुंए मोटो तीर्थ ॥३१॥ इसिपरे शिखर समेतगिरिंद, ज्यां सिद्धाश्री वीस जिणंद ॥ अष्टापद गिरु गिरनार, गिरिवर विपुल अने वैनार ॥३२॥ जिनवर साधु मुक्तिनो गम, दी || निर्मल मन परणाम ॥ आणी हियमे तेहy नाम, त्रिकरण शुद्धे करुं प्रणाम ॥ ३३ ॥ उहा ॥
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॥१३२॥
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|अतिशय विणु नवि जाणीये, सिद्ध तणो ए गण ।। राग तिणे प्रतिमा ग्वी, नक्ति तणो अहि | नाण ॥३४॥ कर्मयोगे शेजो चम्, गणु सफल अवतार ॥ दर्शन देखी वीन, वली वली नानी मल्हार ॥ ३५ ॥ रिसह जिणेसर जगतिलो, जयो जयो जगदीस ॥ यो दरिसण करुणा करी, पूरो मनह जगीस।३६॥ढाल। स्वामी तुम दरिसण विना तो नमरली,नवनवनम्यो अनंत तो। वेरी विशय कसाय वसे तो नमरली, चउगति पुःख सहंत तो॥दश अष्टांते दोहिलो तो जमरली, लाध्यो | नरनव सारतो ॥ आर्यदेशमा मुज हुवो तो नमरली, उत्तम कुळ अवतार तो॥३७॥ सद्गुरु देशना सांजली तो नमरती, जाएयो जिनवर धर्म तो। पूरो पाली नवि शकुं तो नमरली, पोते बहुला कर्म तो ॥ कर्मह गंजण जाणीये तो नमरली, नव जण जगनाथ तो । हुं तुम शरणे आवीयो तो नमरली, स्वामी ग्रहो मुज हाथतो ॥ ३० ॥ तुम पसाय पामीयो तो नमरली, उस्तर नत्र
S॥१३२॥ दुःख पारतो । जो प्रनु तुमे उवेखशो तो नमरली, तो कुण करस्ये सार तो॥ हुं प्रजुसेवक तुम तणो तो नमरली, उलग करुं प्रसाद तो जाणु ते तुम मन धरूं तो नमरली, जन हुकर पसाद
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तो ॥ ३९ ॥ सरवर तरुवर नहु करे तो नमरली, जल फलतणा थहार तो ॥ गिरुवा गुण संचे घणा तो नमरली, कारण परउपगार तो ॥ जिम जग जलधर वरसंत तो नमरली, सम विसम न गणेय तो ॥ ए गुण तुमने जोइये तो जमरली, गिरुवा करेसु होय तो, पुरो संयम नहुं पले तो जमरली, दुक्कर तप न कराय तो ॥ तत्ति करी तुम जाखीये तो जमरली, सद्दहिये मनमांय तो ॥ अवर किंपि नहु मागीये तो नमरली, राजरमणी जंकार तो ॥ प्रभु एक सेवा | तादरी तो जमरली, दोजो जव जव सार तो ॥ ४१ ॥ काव्यं ॥ पुंकरिकगिरि मंदन राया, करे सेव सुरनरवरराया, (श्री) पार्श्व चंद्रसूरि चरणे लागे, बोधी लान जिन मारग मागे ॥ ४२ ॥ ॥ श्रीजिनाज्ञापालन स्वाध्यायः ॥
जिनवर देव सु साधु गुरु, केवली जाषित धर्म, सदा प्रतिवालो ॥ ति जाएयो हो जिनमतनो मर्म ॥ सदा प्र० ॥ १ ॥ मनकेरो दो तुमे | टाळो ॥ प्रभु सरिसो हो, किसो पराण के दिये संभाळो ॥ एक चित्ते हो
ए हियं जेहने वस्था, चतुरसुजाण, कदाग्रह श्री जिनवर आण, सदा
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॥ प्रतिपाळो ॥ श्रांकणी ॥ जे जिण आण विराधसे, ते लेस्थे हो उर्गतिदम ॥ सदा प्र०॥ मस्तक ॥१३३॥ धरी जे पाळस्ये, तसु महिमा हो जगमाहि अखम ॥ सदाप्रणा॥ केश्प्रवाहे वाहीया, केश माने
हो कुळक्रम याचार ॥सदा प्राविणु जिन बागमनख्ये, किम लहिये हो दुत्तर नवपार ॥सदा प्र० ॥३॥ विधि मारग मुकी करी, जे राचे हो कुळ लोकप्रवाह ॥ सदा प्र० ॥ लोहसिल्ला उपर चमी, किम तरस्ये होते मी नाद सदा प्र०॥ ४ ॥ सुगुरुवचन साचो सही, ॥ मत राचो हो तुम कुगुरु बोल॥ सदाप्रा विधि प्रवाहसम नहीं गणो,मत तोलो हो खम गुम सम मोल ॥ सदा प्रा५॥ काच रत्न ब्रमे जग नम्यो, हीरागर हो वे विरले गण ॥ सदा प्र० ॥जे नर होस्ये पारखी, ते लहिस्ये हो जगमाहे पिडाण ॥ सदा प्र० ॥६॥ आगम नाख्यो ते खरो, श्म जाणो हो तुम हियमा मांह्य ॥ सदा प्र० ॥ तहत्त करीने आदरो, मत भूलो हो गामरोये प्रवाह ।। सदा प्र० ॥ ७॥ सोनो सुगंधी जाणीये, जस कुळक्रम हो जिनवर आण ॥ सदा प्र०॥आगममति जसु । वसे. त्रिहं काले होते संघ प्रमाण ॥ सदा प्र०॥७॥ मज मन हर कोई नहीं नविन
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|| मंमयो हो कोइ नवो विनाण ॥ सदा प्र० ॥(श्री) पार्श्वचंद्रसूरि वीनवे, मुज नवोजव हो जिन-|| | आण प्रमाण ॥ सदा प्र० ॥ ए ॥ इति श्रीजिनाझापालनस्वाध्यायः॥
अथ श्री एषणाशतक प्रकरणम् ॥ ॥हा॥ श्री जिनसासन समवझे, अवर न सासन कोय।। कहो किम हिरागर तुले, जग लवणागर | होय ॥१॥ ते पाम त्रिहुं तत्व धुर, गुरुनो करो विचार ॥ ते विण परख्ये नवि लहिये, देव धर्म |
व्यवहार ॥२॥ आगम कस पहुंचे नहीं, जे जे दीसे जगमांहि ॥ वीरतीर्थ ज्यां ने बतां, | एह वचन आराहि ॥३॥ ते दिन क्यारे आवशे, ज्यारे बंदिस्युं साध ॥ तेहनी साख खमा| वस्युं, आपणला अपराध ॥४॥ शुद्ध जिनागम सन्निसुं, लहिस्युं निर्मळ ज्ञान ॥ स्वहस्ते || यदि प्रतिमानस्यु, ते दिन गणीशुं प्रधान ॥५॥ पंच महाव्रत आदरी, थावे प्रवचन मात ॥ | तेह विशे जयणा करूं, जे आगमे विख्यात ॥६॥पूरो संयम नवि पले, श्णे ऽसम काल ॥ है| जेह जतन मे नहीं, तसु प्रणाम त्रिकाल ॥७॥ वळी विशेष एसणा, शुद्धि विशुद्ध अहार ॥ ||
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एषणा
॥१३४
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दायक ग्राहक जो मळे, तो लाने नवपार ॥॥ सोल दोष दायक थकी, साधुथकी पण सोल॥ दस मिश्रित साचा लही, टाळो मननी नोळ ॥ ए॥ चोपा ॥ वंदिय वीर जिणेसरराय, पामी गुरुया सगुरु पसाय॥ विवरण दोष बेंतालीस तणं, लान्न काज श्रत जोइन्न॥१॥यागममां घणो विस्तार, तेहनो में किम लहिये पार ॥ संदेपे कहीस्युं तेदवा, गुरुमुखे जाएया जे जेहवा ||| | ॥ १९॥ उद्गम उत्पादन एषणा, सोल सोल दस क्रम लेखणा ॥ सर्व मत्री थया बेंतालीस, || | | परिहरवा मुनि करे जगीश ॥ १२॥ धर्मति पय बे पमह प्रघोष, श्राधाकर्म उद्देसिक दोष ॥ पुंतिमिश्र उवणा पाहुमी, एवं बह उर्गति पाउमी ॥१३॥ प्रादुःकरण दोष सातमा, क्रीत जाणी बागम बाग्मो ॥ नवमो ऽषण प्रामित्य नाम, परिवर्तित नण दसमे गम ॥१४॥ अनिहम || थगियारमो विचार, बारसमो उन्निन्न निवार ॥ मालोहम तेरसमो जाण, चउदसमा आबिद्य वखाण ॥१५॥ अनिसृष्ट कहिये पनरमो, अध्यवपूरक ने सोलमो, ॥ नाम थकी ए सोलह ॥१३४॥ | नण्या, गुरुमुखे आगम वचने सुण्या ॥ १६ ॥ हिवे संक्षेपयको विवरिये, प्रगट नाव जिम
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संज्ञारिये ॥ ते सांगली श्रावक खप करे, देले जिम जवसायर तरे ॥ १७ ॥ साधु काज व्यारे आहार, दीजे देहतणा आधार ॥ उयेकाय आरंभी जिदां, धाकर्मिक कह | ये तिहां ॥ १८ ॥ सहुमांहि ए गुरु दोष, तेथे करे जे मुनि तनु पोष । अष्टकर्म द्रढ बंधण करे, चजगति काल अनंतो फरे ॥ १९ ॥ श्री जिननाषित पंचम अंग, ते मांहि इम जरयो प्रसंग ॥ कारण विणु जे प्रदीप ते बांधे सही ॥ २० ॥ श्राधाकर्मिक दुष्ट अदार, पर आग्यानो लेइ आधार ॥ जे मुंजे तसु परिसेवणा, चोर तणीपरे परिभव घणा ॥ २१ ॥ कर्मिक जक्कनणी संचरे, तेने जे गुरु अंगि करे ॥ परिसुणा ते श्रुत जाणीये, नृप सुत न्याय तिदां आलीये ॥ २२ ॥ श्रधाकर्मिक जे जुजंत, तेहतणे सहवास वसंत ॥ जिणवर जाख्यो ते संवास, पल्ली जिम उघामो | पास ॥ २३ ॥ श्रधाकर्म जोग जे करे, तासु प्रसंसे दोष न करे ॥ ते अनुमोदन जिनवर कही, राजपुष्ट जेम ते निग्रही ॥ २४ ॥ उपमा शुचीतणी बे इहां, एहज बिलगे पात्रे जीदां ॥ ण काप कारीसी घर्षिए, तो सुजे प्रवचन बोलिये || २५ || लदे शुद्ध वरते इणे जाइ, लींगी
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जिम ते तिणे बंधार ॥ शुद्ध गवेशक जे ते बले, पक जेम अविचलपद मले ॥६॥ ए जिमतो शंका नवि करे, अवसर अवसर गुरुपद धरे ॥ जिनवरयाण विमुख ते सही, श्ण कारण आराधक नहीं ॥॥ धन्य तेह ए उषण टालता, विचरे मुनिवर व्रत पालता ॥ मारो मन तसु चरणे रमे, कर्मयोग ते देखु किमे ॥ ॥ ॥ ढाळ रासनी ॥ वीरजिणेसर चरणकमल | कमला कयवासो-ए देशी। मन संकल्पे श्म गृहस्य बहु नत्त कराविशु, जे कोश् मुजघर आवस्ये ए || तेहने आपिशुं ॥ साधुतणो संयोग मळे ज ते वहोरावे, ते उद्देसिकदोष घणो संसार नमावे ॥३ए। बहु आहार विशुद्धिमाहि जे मेले लगार, आधाकर्मीक अशुचि जिसो न करे सवि || चार ॥ कुंकुम विणसें लसण लवें जिम कंजीय खोर, पुतिकर्म तिम जाणी करी परिहरे ते धीर || || ॥३०॥ कोई मुनि कांश आपत्नणी मिश्रित रंधावे, मिश्रजात ते दोष नएयो बहुकाळ संतावे ॥ || ||॥१३५।। थापी मुंके साधुकाज ते वणा जाणो, श्णपरे देवातणो नाव सपरिठ म आणो ॥३१॥ आघो पाडगे साधु नणी घर उडव जाणी, संखमोनो श्रारंन करे हणीने जे प्राणी ॥ ते पाहुमिया दोष
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कह्यो बहु दुषण ठाम, जाणी टाळे तास करे सुर नर गुणग्राम ॥ ३२॥ अंधारे उद्योत करी मुनिने प्रतिलाने, ए प्रादुकृत दोष प्रगट मारग कीम लाने ॥ लेइ मोलें साधुनणी मनराग थणावे, | वस्त्र पात्र अहार वस्ति ते क्रीत कहावे, ॥३३॥ नजम आणी अंग छाधन उधारे आणे, ते कही ये प्रामित्य दोष श्रीवीर वखाये ॥ एदयकी बहु कर्मबंध मुनि बदेन दीवंते, उजा आण्या तेल तथे जाणो व्रतांते ||३४|| पालट | आणी निखर शखर जे मुनिने दी जे, ते परिवर्तित दोष जाणी जिनवरे कहीजे ॥ श्रागममते बिहुं वणिक बनिने न्याये लाधे, नवि टाळे रसलोलपणे जिनवचन विराधे ॥ ३५ ॥ निजघर बाहिर गामयकी मुनि सनमुख खाणी, आपे अजीम तेय दोष दुखखाणी ॥ तेद कहिये उदूभीन्न जेय मुद्रित लेवामी, साधुनी ये अपरिनोग उघाम कवादी ॥ ३६ ॥ जंचे ठामे चमीय पीढ दुःख्खे उतार, थाणे संयम घात करे मालोहरु नारी ॥ निर्वळ पात्र जे सबळपणे आले उदाली, ते कहीये यानि दोष लेजो संजाळी ॥ ३७ ॥ बहु साधा तषी अनुमति विष एक, जे द्ये ते अनिसृष्ट दुष्ट गणि खाणे विवेक ॥ मूळा
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क्षणा
१३६॥
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उहण धानमांदी अधिकरो उरे, साधु निमित्ते बाधियो ए ते अध्यव पूरे ॥ ३० ॥ इण परे सो-नए |ळह दोष नएया मन स्मरण मात्र, टाळी जे अहार लिये तसु निमळ मात्र ॥ हवे || | उत्पादन दोष सोळना नणीये नाम, सुगुरुप्रसादे संनळीये जे बागम गम ॥ ३५ ॥ |॥दोहा॥ धाइ दोष श्हां प्रथम, दुति नामे ने बीव ॥ निमित्त मित्रीजो विषम, चोथो ||
नणी श्राजीव ॥ ४० ॥ पंचम दोष वणिमग्गह, हो तिगिठा होय ॥ क्रोध मान माया लोन | करे, च्यार मळी दश जोय ॥४१॥ पहेलो पळे संस्तवन, श्म अगियार विचार ॥ विद्यापिंग || | ते बारमो, तेरमो मंत्र निवार ॥ ४५ ॥ चूर्णपिंम गणो चउदमो, जाणीक गिरवर टोल ॥ योग || पिंग पण पनरमो, मूळ कर्म मळी सोल ॥४३॥ एणे दोषे आजीविका, करे तिम गणे सुसाध || | मोह्यो संजम निगमे, करे चिंतामणी लाध ॥४४॥ ॥ ढाळ ॥ राग मल्हार ॥शील शोहावीर | साजन सेवियें ॥ ए राग ॥ आश्रव परिहरे संजम मन धरे, जे पूरा व्रत पाळेरे ॥ ते मुनिवर || | गोचरीये फरतां, ए दूषण सवि टाळेरे ॥४५॥ सुणो सुणो रे सुगुणनिधि सुंदर, मुनिवर नणे
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| सुगुरु उपगारिरे॥जे जे दोष सबळ तुम हुति लागे, ते परिहरो विचारीरे ॥टेक०॥४६॥ धात्रीदोष
जे धायतणी परे, बाळ रमामी लीजेरे ॥ पामी दुर्घट बाढी अरहट, चतुर चरण न गमीजेरे ॥ सुणो ॥ ४ ॥ गुप्त प्रगट पूड़ी संदेसा, जे जण जण प्रते बोलेरे ॥ गाम नगर अहारतणे रस, | ते मुनि दृते तोलेरे ॥ सुणो० ॥ ४ ॥ लान अलान्न जीवन मृति सुख दुःख, त्रिहुं काळ जे
नाखेरे॥ निमित्त पिंक ते अनरथ कारण, श्री वीरजिनेश्वर दाखेरे ॥ सुणो ॥४ए ॥ उत्तम जा| ति कुळ धनवंत लागे, तणसम आपण नाखीरे ॥ लीये अहार आजीव ते कहिये, श्ह जे आ|| गम साखीरे ॥ सुणो० ॥ ५० ॥ दीन दयालु देखी दरसावे, आपण अति दीणरे ॥ इणपरे | | मुनि अशनादिक लेतो, वणिमग थाय गुणहीणरे ॥ सुणो ॥५१॥ ओसम वेसम वमन वीरे|| चन, प्रमुख वैद्यकर्म करीयेरे ॥ भोजन काज तिगिठा दोष ए, पाप नंमारज नरीयेरे ॥ सुणो० |॥ ५५ ॥ श्रशन अलान शाप आपी जे, कोप चम्यो बिहामेरे ॥ घेबर खपकतणी परे क्रोधे, | आपे आप नमाझे रे ॥ सुणो० ॥ ५३॥ लब्धि प्रसंसा मानी ग्रहीने, दोष विमंबण नंमीरे ॥
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एषणी
॥१३७॥
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|| सेवे खुडग जिम जे मागे, साधु लिह तिणे बंभीरे ॥ सुणो० ॥ ५४॥ माया दोष विषम बहु | बोल्या, बीजे अंग विचाररे ॥ मास मास तप पारणो पामे, मायाए अनंत संसाररे ॥ सुणो० ॥ ५५॥ माया फळे किल्विशगति तेह वली, कीधो कर्म न सूझेरे ॥ बेरो मुंगो नरक तिर्यंच गति, दुर्लन्न बोधे ते बरे ॥ सणोः॥५६॥ जोवो माया मोदक लेतो, नाटक घर अहाररे ॥ चरम | शरीरी आषामनूति पमियो, अवर कवण आधाररे ॥ सुणो० ॥५७ ॥ रसनबीना पमियो | लोने, लोन पीमे ते थाणीरे ।। टालो अहह लोनी मुनि केसरी, विहरतें रजनी न जाणारे ॥ सुणो० ॥ २७ ॥ दान थकी पहेलो वा पडे, दायक कीरति करीयेरे ॥ पुट्विं पच्छा संथव दोसे, || नवसायर किम तरियेरे ॥ सुणो० ॥ ५५ ॥ सुर साधी नोजन जे साधे, विद्या पिंझ ते नणीये | रे ॥ कामण मोहन यंत्र मंत्र बहु, मंत्र दोष ते सुणियेरे ॥ सुणो० ॥६० ॥ एहवा नयणतणा | डे अंजन, तेदने को न देखेरे ॥ इणिपरे चूर्ण अनेक करतो, नवना बहु दुःख पेखेरे॥सुणो० ॥१३॥ ॥ ६१ ॥ द्रव्य योग करी अंग विलेपन, मुग्धलोक जे रंजेरे ॥ जळ थळ तरणी सुन्नग उभंग |
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FISERINVERN
विधि, जिननी श्राण ते जेरे ॥ सुणो० ॥ ६ ॥ गर्नतणा कारणने घातन, मूळ नवण विवाहरे ॥ इण उपदेसे मूळ कर्म लागे, बंमी ख्यो नवलाहरे ॥ सुणो ॥ ६३ ॥
- वस्तु बंद ॥ सुगुरु वयणे सुगुरु वयणे, सुण्या ए दोष, पंचमहाव्रत श्रादरी, करे जेय मुनि लोन कारण ॥ तेय लोन नावे समा, किम समर्थ संसार तारण ॥ श्म जाणी आदर करी, सुधो लियो अहार ॥ दुस्तर नवसायरतणो, जिम तुम पामो पार ॥ ६४ ॥ ढाळ वेलीनी ॥ श्म गवेषण एषणा दोष नण्या बत्तीप्त, हवे कहिस्यु ग्रहणेसणा वंदी जिण चौवीस ॥ नणे सुगुरु हित मति नितु चित धरी, सीस प्रते जगीस ॥६५॥ शीख संजाळीये दोष सहित थाहार दूरे टालीये, संयमनो आधार नयणे नीहालीये ॥ एसणा समिति आचार, निरतो पाळीये ॥ सीखण
॥ ६६ ॥ संकेत पहेलो दोष सुणी बीजो मृक्षित जाणी, त्रीजो निक्षेपनो चोथो पिहित वखापणी ॥ साहरिय पंचम नाम बे, बो दायक लेल पिडाणी ॥ सीख० ॥ ६७ ॥ उन्मीश्रित गणि
सातमो, अपरिणत अष्टम हो ॥ लिप्त दोष नामे नवम, बर्दित दसमो जोश॥ सुणो नाव हिवे
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एषणा
॥१३॥
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विरस तेण विणु, जिम विणु लवण रसोश ।। सीख० ॥६॥ दायक देतो देखी करी, जेहनी आणे || एषणा संक, ते तेणे दोषे दुःखीये, ए जिन वचन निसंक ॥ लोलपणे व्ये लोनी जाणीक, लूट। ति लहि | लंक ॥ सीखः ॥ ६ए ॥ म्रदित बिंदु नेदे नण्यो, खरमयो सचित्त अचित्त ॥ वनस्पति पाणी | पृथवी, तेह जाण्यो सचित्त ॥ अव सुक्क जन प्रवचन दूषित, म गणे तस गुण अचित्त ॥ सीख० | ॥ ७० ॥ पाणी माटी अगनि वन, त्रस थिति थाप्यो जेय ॥ एक अणंतर निदेप्यो, अवर परंपर || | जेय ॥ ए निक्षिप्त अचित्त , जो पण तो पुण परिहरे तेय ॥ सीख० ॥१॥ जेह सचित्ते ढांकीयो, अने अचित्त होय ॥ पीहित दोषनी श्णी परे, श्रुत चउनंगी जोय ॥ त्रण नांगा तिह मुनि परिहरिया. चोथे दोष न कोय ॥ सीख० ॥७॥ जिण नाजन देवा तणे, वस्तु अयोग्य विचारी, साधु काज देवा नणी, ते अनेथी उसारी ॥ तिणेज ये अशनादिक दायक, साहरिय दोष तिवार ॥ सीख० ॥ ३ ॥ अप्रजु पंमक शिशु थविर, अंध मत्त उमत्त करी ॥ तापित तनु कंपतो, निगमबद्ध इमि जुत्त ॥ गलित बिन्नकर चरण पाउमी, ए दातार बजुत्त ॥ सीख० ॥ ४ ॥
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चुरी अरहटियो घर, उसळ मूशळ निसाह, लोढण पिंजण सूपको, सावरणी व्यवसाद ॥ एह तणो श्रारंन करंता, उठे मनमां उछाह ॥सीख॥५॥ जेह नोजन करतीय, पूरे गर्न जे नारी, | बेनी उठे उगी करी, बेसे जेअविचारी, धावत बाळ मेली रोवंतो, दीये अहार तिवारी ॥सीख०॥६॥ ब्येकाय संघट्टति, साधु देखी उमेश, अग्रपिंग उपर थको, लेश पास ग्वे॥ एह दातार जे टाळ नहीं, दायक दोष हवे॥सीख ॥७॥ मेली युक्त अयुक्त बे,आपे जे अणालोग अल्प जाणी उत्सुकपणे, अथवा नाव वियोग ।। श्म लेतां जन्मिश्रित लागे, बिहुतणे संयोग॥सीख०॥॥ अव्यथकी वर्णादिके, अपरिणम्यो जे जाण, बिहुँ जणमांदे एकने, देवाने परिणाम ॥ व्यन्नाव बिहुं नेदे टालो, अपरिणत दोष पिडाण ॥सीख०॥ए ॥ दहीं बाश नोजन रसे, नाजन कर खरमाय, पछाकर्म विशेष गणी, प्राय ते न लेवाय ॥ इणिपरे मुग्धपणे ले तेने, लिप्त दोष कहेवाय ॥ सीख० ॥ ७० ॥ अन्न सीथ रस बिंषु, जे देतां धरणी पमंत, बर्दित दोष ते परिदरो ।। बहुळ जीव निवर्मत, खीर खांम घृत बहु पमियो, जोवो तासु दिवंत ॥ सीख ॥१॥
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चौपाश्न। ढाळ ॥ मुहतो धर्मघोष इण नामे, लेश् वा मनन परिणामे ॥ गुरु आदेशे || || एषणा करे विहार, पाळे संयम निरतीचार ॥ ७ ॥ उग्र तपे तनु शामे सदा, नयरी वारत्तें गयो एकदा ॥ राजा मंत्री तिहां ले वारत्त, उत्तम गुणगण करी पत्त ॥ ३ ॥ तस घर पहोत्यो नोजन काल, नारी हर्ष थयो नयण निहाळ ॥ नोजन श्राएयो देवा नणी, खोर खांम घृत नक्ति घणी ॥ ४॥ पमतो देख। तिहां रसबिंड, अनेषणी यति गणीय मुर्णिदु ॥ परिसामित दोषे खळनळ्यो, विणु लीधे ते पागे वढ्यो ॥ ५॥ बेठे गोखे देखी वारत्त, चिंते कां न लीधो | नत्त ॥ मुज घर मुनिवर जाणुं नहीं, का कारण एह ने सह। ॥ ६ ॥ण अवसर तिहां जोवो वळी, तेणे बिंड बहु मांखी मळी ॥ घरकोयल आवि तिण केम, जाणे कर्म ते आणी तेम ॥७॥ काकीमो धाव्यो उबळी, जीव जीवने पामे बळी ॥ मठ गिलागिल इण संसार, ते देखी धावी || ||॥१३९।। | मंजार ॥ ७॥ तिहां श्वान श्राव्यो पाहणो, सहवासी मन मच्छर घणो ॥ जाति जातिना ||| वैरी केव, श्म वढवा लाग्या ते बेव ॥ नए ॥ बिहुँ दिसि आव्या बिहुँना धणी, कलह करे ते |
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कूकर जणी ॥ मांदोमांहि थयो संग्राम, घणा जीवनी हींसा ताम ॥ ए० ॥ ति वारत मंत्र ( चिंतत्रे, ए असमंजस इण किम हवे || बिंदु पड्यानो कारण जाण, साधु प्रसंसे समरस आण ॥ १ ॥ धन धन उत्तम मुनिवर सही, इस कारण निक्षा नवि ग्रही ॥ एदवा नाना टाळे दोष, किम बुटस्युं मे बहु दोष ॥ ५२ ॥ खूच्या परिग्रहने आरंभ, वरतुं मोह लोह बहु दंन ॥ इम चिंतता जाती संजरी, ततक्षण संयम नारी वरी ॥ ९३ ॥ स्त्रयंबुद्ध ते साधु वखाण, मुक्ति गयो थ केवळनाथ ॥ श्रनिस तेहनो समरो नाम, त्रिकरण शुद्धे करूं प्रणाम ||४|| दुहा ॥ ग्रहण गवे पण एषणा, बोली त्रिहुय प्रकार ॥ हिव कदिस्युं ग्रासेसपा, लेज्यो चतुर विचार ॥ ९५ ॥
॥ ढाळ ॥ वीर जिनेश्वर उपदेशे, सांजलज्यो चित्त लाइरे ॥ महावीर०- ए देशी ॥ मुनिवर गोचरी करी वल्या, खाव्या वसति मजाररे ॥ जोजन विधिस्युं तेह करे, प्रासेसण मन धाररे ॥ ए६ ॥ मंगळी डूषण परिहरो, पंच प्रकास्या नागीरे ॥ गोपय पय तुमे सुखे तरो, | जलधि तर्यो जुज प्राणीरे ॥ मंगळी दू० ॥ ए७ ॥ लालचि रस लंपटपणे, सरस संयोग जे मेलेरे ॥
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|ते कहिये संयोजना, प्रथम दोष नवि नेसेरे ॥ ममळी ५० ॥ए॥ प्रवचन जिनवरे जे नएयो, नोजन जेह प्रमाणरे ॥ अधिक मुंजे नहीं ते थकी, बीजो दोष ते जाणरे ॥ मंगळी दू० ॥एए || दायकने रस बहु गुणे, रागी प्रसंसा कीजेरे ॥ चारित्र दहन ते तीसरो, दोष इंगाल कहीजेरे ॥ मंगळी दू० ॥ १०० ॥ दोषि दाताने दूषतो, अरस विरस रस नाखेरे ॥ चोथो दोष ते धूमनो, || जाणी जिनेश्वर दाखेरे ॥ मंगळी दू० ॥ ११॥ कारण बह नोजनतणा, तिण विणु तनुबळ का- || है| जेरे ॥ करतां पूषण पंचमो, कारण जिनने राजेरे ॥ मंगळी ५० ॥१०॥ धन्य ते झूषण टाळी जे, || लीये सूजतो अहाररे ॥ असक ते निरतो सदहे, ते पण गुण नंमाररे ॥ मंगळी ५० ॥ १०३ ॥ ॥ वस्तु बंद ॥ जेह मुनिवर जेह मुनिवर पंच आचार, पाळे पंचिंछिय दमण, पंचवाण नममाण गंजण सुद्ध जिनागम पन्नवे, नविलाय नवनीम नंजण, साहु रयण तारणतरण, ते समरो निसदीस; श्री पार्श्वचं सूरि वीनवे, तसु पाय नामुं सीस ॥ १४॥ इतिश्रीमन्नागपुरीयवृहत्तपागहाधिराज वचनातिशयधारकयुगप्रद र श्रीपार्श्वचं सूरीश्वरविरचितमेषणाशतकप्रकरण संपूर्णम् ॥
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१४॥
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॥ अथश्रीखंधकमुनिचरित्रशतकम् ॥ प्रनाति-राग ॥ श्रादि जिन रिषन्न श्रीवीर चोवीसमो, नाविनोन्नविय जगदीश चउ जुश्र | नमो ॥ हुं पण पणमिय नणीसु खंदगचरी, गुरु मुखे सांनळ्यो सुणो आदर करी॥१॥ नाखियो नगवर अंग सतत बीजए, पढम उद्देस गुण गहण तसु कीजए। साधु गुण गावंतां दूरिय दूरे टळे, | साधु गुण गावतां चित्त वंबित फळे ॥२॥ दुखनी अर्गला पूरिय कयंगला, दीस ए उब्वे करिय
बहु मंगला ॥ तत्थ ईसान कूर्णमि गुण सुंदरे, उत्त पलासए चेश्ये मणहरे ॥३॥ वृक्ष अशोक | | तळे पुढवी सिलवट्टयं, कसिण घण मसिण किर जाण कसवयं ।। तासु श्राकार सिंहासणं सोहए, | विविध रूपे करी जण मणं मोहए ॥ ४॥ त्रिजुवन तारक वीर समोसर्या, तिहां प्रजु वंदवा बहु | जण नीसर्या ॥ श्रावतां दुख संसारना वीसर्या, खामिपय सेवतां काज सहुए सर्या ॥५॥ ढाळ ॥ |॥ चोपा ॥ तिहाथकी नासन्न न दूर, सावत्थी नगरी गुणनूर ॥ गर्धनाल तापसनो शीष, | | गुरुपय सेव करे निसदीस ॥ ६ ॥ खंधक परिव्राजक इणे नाम, घणुं ते निवसे तेणे गम ॥ रियु
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यजुसाम अथर्वण च्यार; पंचम वेद इतिहास विचार ॥७॥ बहो जाणेवो निग्घंट, तेहतणे जाणवे || निघंट ॥ वेद चिहंना जेब अंग, वळी रहस्य ने अंग जवंग ॥ ॥ सारे वारे धारे सही, पारग | काई ऊणो नहीं ॥ बंद निरुत्त जोईस संखाण, शिदा कल्प व्याकरण पुराण ॥ए ॥ शष्टितंत्रनो जाणे नेद, नणवे मणवे सदा अखेद ॥ वळीय अनेरा ब्राह्मण तणा, शास्त्र विदीता डे जग घणा ॥१०॥ ते सघळानो कहीये जाण, कळा बहुत्तर तणो निधान ॥ सोचादिक निज धर्म पन्नवे, | अवसर जाणी सन्ना साचवे ॥११॥ तिण गमे पिंगलक निग्रंथ, जैनतणा जाणे बहु ग्रंथ ॥ | एकदा श्राव्यो खंधक पास, पूजे प्रश्न हियमले विमास ॥१५॥ ___॥ढाळ ॥ वीर जिनेश्वर चरणकमल कमळा कयवासो.॥एराग॥श्रावि तीहां आक्षेप सहित पोंगल श्म नाखे, श्री जिनसासनतणो नाव निरतो मन राखे ॥ लोक जोवने सिद्धि सिद्ध ए | संत अनंत, ए चिहुंनो कही लहिय मर्म मिरतो व्रतंत ॥ १३ ॥ केणे मरतो मरणे जीव वाधे हु हीणो, पूज्या पंचे प्रश्न एह तब ते थयो दीणो ॥ संकित कंखित कलुस सहित सुणी रह्यो श्र
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॥१४॥
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बोल्यो, वे त्रण वार पूछतां तेह निज मतथी मोख्यो ॥१५॥ इणे अवसरे तेह पुरीयमांही बहुजन | समवाय, जातो देखी कयंगला नगरी नरराय ॥ खंधक नीय चिस चिंतवे ए श्राव्यो महावीर, जिनमत राजा कर्मवीरवर साहसधीर ॥१५॥ जाउ तिहां करी विनय बहु पुढे प्रश्न विचार, श्म जाणी निज वस्ति श्रावी उपगरण प्रकार ॥ त्रिदंग कमंगलू कंचणीया निसिया केसरीय, बत्रा| लय अंकुस करोग पवित्रीय गणेत्रीय ॥ १६ ॥ उत्र उपानह पादुका धातु रंग्या चीर, ए चउदह |
उपगरणे करी सोनीय सरीर ॥ लई चाल्यो जेटले मारगे थावेवो, प्रारंन्यो तेटले स्वामी गोयम | बोलाच्यो॥१७॥ देखसी पूरव संगतियो ते कुणं कहो स्वाम, प्रनु पत्नणे गौतम संन्नार खंधक | है || | इण नाम ॥ ते श्रावे कवण काज मिलस्ये किणकाल, गौतम पूडे एह वचन कर मेलविन्नाल
॥ २७ ॥ वळतो स्वामी पूर्वचरित्र तसु लाखे सहुआ, आसन्नो आवीयो धरलंघिय बहुश्र॥ | हिवां देखिस एम सुणी वळी गौतम बोले, चारित्र लेस्ये तुम समीप थास्ये मुनि तोले ॥१॥ हंता गोयम जेटले ए अर्थ प्रकासे, स्वामी गौतम तेटले ते अष्टिये पासे ॥ देखी गौतम हर्ष धरी
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खंधक
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तसु सन्मुख जावे, कहे श्रहो तुम मिलण एह मुज चित्त सहावे ॥ २०॥ नले श्राव्यो खंधका || | वळी वळी श्म नाखे, पींगळ पसिण स्वरूप सहु तसु आगळ दाखे ॥ चित्त चमक्यो ए एम कहे कुण तपसी नाणी, तुम मिल्यो जेह थकीय मुज वसीए ते मति जाणी॥१॥
॥ ढाल ॥ चालती॥ नाखे गोयम मुज गुरु केवळी, वीर जिन दरसण संसयमति टळी॥ तेहने कहणे जाण्यो एटलो, खंधक तुजने वीत्यो जेटलो ॥ त्रुटक ॥ केटलो कहिये स्वामीनो गुण एक जीने में सही, कहे वळतो परिव्राजक गौतमनो आदर लही। चालो जश्ये तुम गुरुने वांदवा साथे करी, बे वेई श्राव्या वीर जिनवर पास दृष्टि सुधा नरी॥२२॥ चालती ॥ तिणे अवसरे स्वामी नितु जिमे, कर्म अघातीय खपिये नहु कीमे॥णपरे पेखे तिण तनु सिरिजयों, सक्षण व्यंजन गुणहि अलंकर्यो ॥ त्रुटक ॥ अलंकों देखी चित्त हरखी देई प्रदक्षणा वंदए, | परिणाम सूधे नाव लावत ऽरित कंद निकंदए । तिणे काळे वीर खंधक प्रति प्रश्नति वागरें, पिंगळे पूज्या पूब्वा ते श्राव्यो इहां श्म उचरें ॥३॥ चालती ॥ रिजु ते जाणी नगवन वागरे,
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॥१४२
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प्रश्न केरो निर्णय सतु करे, लोक चिहुँ परे द्रव्यत क्षेत्रतो, काळत जावत सिंहांगणे द्रव्यतो॥ टक | लोक व्यत एक जाख्यो क्षेत्रतो दिव जाणीये, जोयण कोमाकोमी असंख्य प्रशुळ दीद प्रमाणीये ॥ असंख कोकाकोमी जोयण परधी फरतां काळथी, लोकनां तुं जाण खंधक यदि अंत बेव नथी ॥ २४ ॥ चालती ॥ जाव थकी सुणी गंध रस फास ए, वर्ण अनंता पर्यव पास ए ॥ काळ अनंते अनंता केवळी, ति अनुक्रमे जाखुं हुं वळी ॥ त्रुटक ॥ वळी द्रव्य क्षेत्रे संत जणी काळ नाव अनंतयो, जीव द्रव्यत एक चेतनतले जाव विदीत ॥ श्रवगाढ असंख्य प्रदेश अंबर असंख्य प्रदेशत खित्तओ, काळथी जसु यदि अंत न हि तेही जाणो जाव ॥ २५ ॥ चालती ॥ चारित्र दर्शन ज्ञानद पज्जवा, एह अनंता अगुरुलघु पज्जवा ॥ अंत बिहुं
दिये बहुं करिते नहीं, द्रव्यत सिद्धि एकज जिले कही || त्रुटक || जिले कही क्षेत्रत लाख जोया पंचतालीस दिजण्या, पिहुलीय लंबी वृत्त संठीत जाव ए गुरु मुखे सुरया ॥ एक कोमी लाख बयालीसय सदसबीसय पंचासए, ( १४२३०२५०) एकजण जोयण किंचिह्नाधिक परधि एम
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खंधक
११४३॥
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प्रकाशए ॥ १६ ॥ चालती ॥ काळत लावत लोक तणी परे, संत बिहुकरी पंत बिडंपरे ॥ चोथे ||३|| प्रश्ने सिद्ध विचारीये, द्रव्यत एक गणी क्षेत्र संन्नारीये ॥ त्रुटक ॥ संसारिये ए जीवनी परे का-है। |ळथी श्म नाखीये, सादि अप्पजवसिय नावत जीव जामली दाखीये ॥ द्रव्यत क्षेत्रत संत ||६|| | जापो, काळ नावि अणंतज, हिवे निसुणी पंचम प्रश्न खंधक होस्ये चित्त पसंत ॥ २७ ॥||
चालती ॥ केणे मरणे मरतो प्राणीयो, वढई हायई ते श्म जाणीयो, मरण बेनेदे खंधक में कह्यो, || बाळ एक पंमित बीजो संग्रह्यो ॥ त्रटक॥संग्रह्यो पहिलो बारनेदे बाळमरण प्रसिद्धयो, वलय मरणति प्रथम जिनवर साधुने प्रतिसिद्धयो ॥ नूख तृषा बहु वाहि वेदन जेय वलवलतो मरे, बीजो ते मरण वसह इंदीय वसे जीव ते परिहरे ॥२०॥ चालती ॥ मृग झख मधुकर नाग पतं|| गीया, पंचय इन्जितणे प्रसंगीया ॥प्राण तजंता जग सुख बहु सहे, बीजो मरण ते स्वामी श्म | कहे ॥ त्रुटक ॥ श्म कहे त्रीजो सब्य राखी मरे तद्नव जाणवो, मरिय माणस नव लहंतो |
॥१४॥ एह चोथो आणवो ॥ गिरी वृदथी पमि मरे पंचम सत्तम अहमो, जल जलण पेसी मरे
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नवमो करे विषनक्षणतणो ॥ श्ए ॥ चालती ॥ सत्यो वामण शस्त्रे जे मरे, दसमो ए गणी जि|नवर उच्चरे ॥ वेदाणस पासे ग्रहण ग्यारमो, ग्रीडपीठ मरण ते नणीये बारमो ॥ त्रुटक ॥ | बारमो जे गज कलेवरमांहि पेसीने रहे, श्वानादि नदण करे श्णीपरे तेय दुस्सह दुख सहे ॥| |ए मरण मरतो बाळ अनंता, मरण चिहुँ गतिना लहे॥ चउरत जब कंतारिनमतो काळ अनं- | | तो निरवहे ॥३०॥ चालती ॥ पंमित मरण दुविध प्रकासोयो, पादोपगमन संवर वासियो । नत्त परिन्ना बीजो जाणवो, बिहुमां पहेलो श्म मन आणवो ॥ त्रुटक ॥ आणवो मन श्म प्रथम | पादप माल जिम धरणी ध्रसे, लव मात्र उंची न नीची थाये थाघीय पानी नहु खसे ॥णीपरे | अंग जवंग राखे अमग संथारो करी, जिवंत मृत जिम रहे निश्चळ मोह माया परिहरी ॥ ३१॥ | चालती ॥ तेह निहारीम 'निहरण जेहनो, बाहिर करवो ज्वालन देइनो ॥ ते अनिहारीम गिरी-|| | वर दरी रही, करे संथारो अवसर जे लही ॥त्रुटक ॥जेहथकी निदरण थाये नहु ते थनिहारीम | जाणीये, नियम हुँती अपमि चरणातणी अतीहि. वखाणीये ॥ बीय प्रमित मरण पञ्चखी नात
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|पाणी संथरे, प्रथम जिम अनीहरण निहरण नेद बे जिन वागरे ॥ ३२ ॥ दोहा ॥ नियमा ए| बंधक
सप्रतिचरण, सपमिकम्म कहेवाय ॥ प्राणी बिहुँ मरणे मरत, परित संसारी थाय ॥ ३३ ॥ वट्ठः | तिहायति श्ण मरण, पंचय प्रश्न ते जाण ॥ संबुद्धो खंधक तिहां, सांनळी जिनवर वाण ॥३॥ त्रण प्रदक्षणा देश करी, वंदे गुरु मतियाणी ॥ मन इच्छं बु तुम कने, केवळ नाषित वाणी ॥ ३५॥ स्वामी धर्मकथा कही, पढमोवंग प्रसिद्ध ॥ सांनळी हियमे गहगह्यो, हरखे थयो समृद्ध ॥३६॥ चोपाइ॥ उनी वंदे खंधक वळी, नगवन प्रते बोल्यो मन रळी ॥ निग्रंथनो प्रवचन सद्दहुं, थाणी प्रतीति चित्त रोचवं ॥ ३७॥ एह विशे उद्यम आदरुं, ए तइत्ति करी हियो धरुं ॥ ए साचो इह नहु संदेह, रतन रेख जाणेवी एह ॥३०॥ श्च्ब्युं पमिब्यु ए में सही, साची वाणीजे है। तुमे कह। ॥ श्म नाखी वंदी जिन वीर, ईसाने गयो साहसधीर ॥३॥ त्रिदंम कमगळु प्रमुख | ||
१४४॥ एमंत, वस्त्रादिक सहुए एकंत ॥ पालो श्रावे जिनवर पास, वंदी बोल्यो हिये विमास ॥ ४० ॥ जरा मरण जलणि परजळे, ए संसारी लोक चवचले ॥ एहमादि सकिये किम रही, उरीये
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| वाणी पाणी लही ॥४१॥ ।जम कोई गृहपति घरमांद, पेसे वहते दाह अगाह ॥ काढे | वस्तु अप जे सार, घणो मूल जसु थोमो नार ॥ ४२ ॥ ए निस्तार्यो हित सुख गम,
खम निश्रेयस वळी अनुगाम ॥ पच्छा पुरा हुस्ये मुजन्नणी, इस्युं जाणी काढे धन धणी ॥४३॥ | इणपरे हुं पण करस्युं स्वाम, तनुघर आतम धनने गम ॥ ए काढ्यो परनव हितनणो, | मुजने थास्ये सहु ए घणी ॥४४॥ तिण कारण श्छा माहरी, पूरो नगवन करुणा करी ॥ स्वहस्ते दीक्षा द्यो तुमे, शिष्य करी सीखावो अमे ॥ ४५ ॥ आचार गोचर विनय विशेष, | है। चरण करण जिन धर्म अशेष ॥ तासु वचने स्वामी सहुए करे, श्रीमुखे शिक्षा प्रजु सीखवे हैं। ॥ ४६ ॥ देवानुप्रिय श्म चालवो, श्णपरे तिम उन्नो तिष्टवो ॥ इणिपरे आसन बेसवो, सुवो जमवो श्म नाखवो ॥ ७ ॥ प्राण नूत जीव सत्वहतणी, जीम जयणा हुवे अति घणी ॥ एक जीव मुहवाये नहीं, तिणीपरे किरीया करवी सही ॥ ४० ॥ ए उपदेश सहु साधुने, काळ अनंते जिन श्म कहे ॥ कहेस्ये वळी एहवो उपदेश, जिहां नहीं हींसा लवलेस ॥ ४ ॥
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॥ ढाळ॥ चालती ॥ त्रिजुवन प्रजुनीरे वाणी तहत्ति करी आदरी, परिव्राजकरे खंधके संयम || | सिरीवरी ॥अणगारतिरे गुणमणी रयणागर हुवा, पंच समितीरे त्रिहुं गुप्ति जण संथुवा ॥त्रुटक॥ संथु त्रिजुवन गुत्तेंद्रीय गुप्त ब्रह्मचरी धरे, आण सुधी स्वामी केरी जाणी तिमश्ज खप करे ॥ लाज ागर सर्व त्यागी खंती खमतो किं बहु, निग्रंथ प्रवचन करी आगळ आदरे मारग सहु ॥५०॥ चालती॥ वीर जिनवररे कयंगल नामे जे पुरी, तिह हुँतीरे बहिया विहरण मन धरी। संपत्तारे जणवय गामागर पुरे, मुनि खंधकरे स्वामी साथे संचरे ॥ त्रुटक ॥ संचरत साथे वीरथेरा तसु समीपे अन्यसे, ग्रहण आ सेवणा शिक्षा सीखतां मन उबसे । अग्यार अंग उवंग सूत्रत अर्थथी नणी संपदा, गीयथ्य केरी लहिय मनधरी नाव उत्तम एकदा ॥५१॥ चालती॥ प्रजु वंदीरे त्रण प्रदक्षणा दे करी, श्म नाखेर संवेगी उद्यम धरी । निकु पमिमारे बारह |
18॥१४५॥ वहेवा वंद्रिये, तुम अनुमतिरे पामी निर्जर संचीये ॥त्रुटक ॥ संचिये निर्जर एम सांनळी | स्वामी आदेस दीघ, जिम थाय सुख तिम तुम करजो तिण प्रमाणति कि । श्कमास
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SOMVATIMADIRA
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लगी तिणे प्रथम प्रतिमा सूत्र मारग दरी, दत्ती इके नातपाणी तणी कीधी गोचरी ॥५॥ चालती ॥ दत्तो वधतीरे श्क इक वृद्धियें मासनी, सात प्रतिमारे इणिपरे कोधि श्रासनी। सवि | मलीरे मास अट्ठावीस ए हुवा, श्ह आगारे रे प्रतिमा मारग जुजुवा ॥त्रुटक ॥ जुजू अठम नवम दसमी त्रिहुं दिन इकवास ए, नगर बाहिर जश्परीसह सहे बहु निसदीस ए। नीरवर्जित चउथ | | तप करी पम्मिए प्रारंनी ए, उत्तान अथवा सपन पासे चित्त एक पद थंनीये ॥५३॥ चालती॥ | श्म नवमी रे प्रतिमा वहतां.बेसीये, उकम आसन रे सयण लगम विमासीये । वच्चे उंचोरे नूमि || | लाग्यो बिडं दिसे, काठ वंकोरे करे शयन ते श्म निसे ॥७टक ॥ निसे ते दुश् लगमसाइ धरणी || | लग सिर पानही, अवर तनु राखंत उंचो नूमिका लागे नहीं । श्म दसमी प्रतिमा वहत रहेवो | वीरासणे गोदोहिया, बाजो बेग पाउं नीचा तेण विणु ए आहिया ॥५॥चालती॥ गाय उहतां रे || [] मुंथी उंची पानि कहीं, अंगुलियारे श्राधारे बेसे सही। जानु उपर रे दोवा नाजन मुकीये, विणु | दोहण रे एहथकी नहुं चुकीये ॥त्रुटक॥ चूकीये नहीं जिन मारग हुँती इणी परे ग्यारमी, डउ |
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खंघक०
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॥१४६
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नत्ते दीवस रयणे लंब नुज उन्नो समी। एक रात्रीक एम बारम अधम नत्तिए मंमिये, अनि| मेष लोचन रयणी त्रीजी काउसग्गज बंमीए॥५५॥चालती॥श्म बारह रे प्रतिमा निख्खुनी वही, | फासी पाळीरे सोधी तीरी निरवही । तिम किट्टीरे आराधी आणे करी, वळी वंदेरे स्वामी प्रदक्षणा करी ॥त्रुटक॥ करी प्रदक्षणा वीर वंदी इसो आइस मग्गए, गुणरयण संवछर करेवा नाव मुज मन जग्गए। ए तप कह्यो तुमे सोळमासी में विमासी हिव लही, तुम अनुमति करिय | तरिये वेगेनवजळनिधि सही ॥ ५६ ॥
ढाळ ॥राग-गोम॥ पहेले मासे एकेक सोलह सोलमें, मासे खंधकझषि करे ए। ए उपवास विवेक चउथ चोत्रीसम,तप दिन थाळस परिहरे ए ॥ सूरज साहमीदिहि उरध बाहूय, दिवसे | कासग्ग करि रहे ए । रयणि वीरासन मंमि अंगणवावम, दिवस निसि परिसह सहे ए॥५॥ इणिपरे तप पुरेवि वीर जिणंदह,पय वंदी म विनवे ए । हियो हरख धरेवि निरुपम पामीय,
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॥१४६॥
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बहुगुण संथ संथवे ए ॥ तुम पसाए लदेवि स्वामिय ए तप, वेगे प्रमाण चमावीयो ए । सिद्धि साधनने काज इस तप भावना, आतम रस इम जावियो ए ॥ ५८ ॥ चथ बम नाम दसम वालस, परक मासखमण करे ए । निरुपम मन परिणाम मनथी दमी समी, वि. षय कसाय समुद्धरे ए ॥ जिनवर साथै विहार विहरत क्रमे क्रमे, कर्म बहू मुनि निर्जरे ए । संवर पंच विचाराम मद टाले ए, अढारसहस सीलंगधरे ए ॥ ५ए ॥ उत्तम उग्र उदार ति तपे खंदक, रूषिवरति कृश तनु दुवो ए । इणीपरे चित्त विचार जीवह अनेरमो, देहरो जुजुवो ए ॥ निर्मम निरंकार तंसुं तन शोषित, मंस लेश दिसे नहीं ए। अस्थि चर्म नस जाळ वेदित केवल कम कम रव करतो सही ए ॥ ६० ॥ देदतणे बळ खीण चाले जीवस्युं, जीव एम रध रहे ए । बोलिस्युं किम गिलाइ जाषिय जाषंतो, खिषेक मूर्जित जिम हुवे ए ॥ पंचं गुल तिलक जंग इंगालद, सगड जेम खम खम करे ए । तप उपचित सुविशाळ अपचित शो - पित, मंसहिं गुणमणि तनु जरे ए ॥ ६१ ॥ नासरासि पलिन्न हुतवद अंतर, तप तेजे ते
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खंधक
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फवहले ए । मूरतमंतो धर्म जाणीक दीसए, कोई सुर नहु तसुबळे ए ॥ तेणे काळ जिणंद || राजगृह नगरीय, स्वामीय वीर समोसर्या ए। आव्या इंद नरिंद सांनळी वाणीय, बहु जण पारे । जतर्या ए ॥ ६ ॥ पुवरत्ता वरत्त काळे खंदक, मुनिवर चिंतवे एकदा ए । धर्मजागरी जागंत || स्वामी प्रसादेहि, पामी चारित्र संपदा ए ॥ सकतिसीम में कोध तप तिणे माहरो, अंग थयो | | अति उबळो ए। जाणीक साथे लोध संयम संवर, परनव कारण संबळो ए ॥ ६३ ॥
॥ ढाळ ॥ कायबळ मुज हिण पमयो ए, तो पग पग पमे ते अमवमयो ए ॥ काज, || सरामे मुज चमयो ए, जे चारित्र निर्मळ संपमयो ए॥६५॥ वीरीय जीवतणो य ए, क्रमे ते पुण हीण थास्ये पड़े ए ॥ विजयवंत ज्यां स्वामि ए, जाये दूरे उरित जसु नामि ए ॥ ६५ ॥ श्री जिनवर वर्द्धमान ए. जग महिमा जसु वर्धमान ए ॥ आत्मार्थता साधीये ए, श्री जिनवर | श्राण आराधिये ए, ॥ ६६ ॥ कुशळे रयणि विहायस्ये ए, सुप्रन्नात किमे जश् श्रावस्ये ए ॥| |प्रनु नमि अनुमति मागस्युं ए, जिननाषित मारग लागस्युं ए ॥ ६७ ॥ पंच महावत उचरी ए,
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१४७॥
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अतिचार विराहण परिहरी ए ॥ खामीय साहुति साहुणी ए, तप संयम जस कोरति घणी ए ॥६०॥ कमाइ थिवर साथि करी ए, गुण विपुळ विपुळ गिरिवर चमी ए॥ मेघ सरीखी सांमळी ए, पमिले हिय पमजिय वळी वळी ए ॥ ६ए ॥ पुढवीसीला उपर कर्यो ए, कुश तृण संथारो संथर्यो ए ॥ पत्यकासन संगियो ए, पूरव दिति सन्मुख ते तीन ए ॥ ७० ॥ करतल बे एकठा करी ए, दस नख मळी मस्तक अंजळी ए ॥ सिरसावर्त करी नणे ए, शक्रस्तव संस्तवी संथुणे | ए ॥ १ ॥ पंच महावत नचर्या ए, श्रीवीर समोपे मन धर्या ए ॥ हिवां पण तसु पासे ए, || | उच्चरस्युं वळीय विमासी ए ॥ ३२॥ संवर पंचे आदर्या ए, ए परजव संबळ जिम कर्या ए॥
अढार पापना गण ए, तसु त्रिविध त्रिविध पचखाण ए ॥ ३ ॥ असनादिक अहार ए, जाव | जीव को परिहार ए ॥ देह इष्ट जे में धर्यो ए, ते चरम उसासे वोसों ए ॥ ४ ॥ श्णपरे काळ असतो ए, जग अध्रुवपणो चित्ते चिंततो ए ॥ मोह महानमस्युं नीमे ए, क्रमे सुगुण तणी श्रेणी चमे ए॥ ३५॥
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॥ ढाळ ॥ राग सिंधु ॥ शुन्न नावना मन नावतां, सुणतां अंग इग्यार, निर्यामक पासे || खंधक ॥१४॥ नला, अंहनिस करे विचार ॥ ६ ॥ गुण गाश्स्युं गिरुया खंधक श्री अणगार ॥ एयांकणी॥
महिमा मोटी जेहनी, सम दम संयम सार । एकण नबने अंतरे, लहेस्ये नवनो पार ॥ गुण || गा० ॥ ७ ॥ श्रुतरस मांहे मीलता, पंक पखाळे अंग ॥ श्रुत चारित्र धर्म आदरी, टाळ्यो सकळनो संग ॥ गुण गु० ॥ ७ ॥ श्म संयमगुण पाळीयो, पूरा बार वरीस ॥ मास एक संलेखणा, कीधी आण जगीस ॥ गुण गु० ॥ ए ॥ साठीनक्त अणसण कों, पक्किमिने |
आलो ॥ लही समाधि विधिसुं यती, आण श्राराधक हो ॥ गुण गु० ॥ ७० ॥ वीर जिणेसर हासमरतां, पाळी तेहनी आण ॥ धरता ध्यान मन धर्मनो, बंमी नर दस प्राण ।।गुण गाा। तिण अवसर जाणी करी, काळ गयो ते साध ॥ वीर थविर उन्ना थ, मरण हुवो निरबाध || ||
॥ गुण गा० ॥ २ ॥ श्म कही थर उपरावग, कानसग सहुए करंत ॥ पात्र चिवर ग्रही है। | तेहना, पाबा तेय वळंत ॥ गुण गा० ॥ ३॥ विपुळशिखरथी उतरे ।। आवे वीरजिण पास ॥
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वंदिय करीय प्रदक्षणा, बोल्या वचन विमास ॥ गुण गा० ॥ ४ ॥ स्वामी शिष्य तुमाहरो, | खंधक नाम जयंत ॥ प्रकृति नद्रक नावीयो, सहजे जे उपसंत ॥ गुण गार ॥ ५ ॥ पंच महाव्रत आरुही, अणसण करी निकलंक ॥ श्रायु पुरी परनव गयो, परिहरि सहुए वंक ॥ गुण गा० ॥ ६ ॥ धर्मोपगरण तेहनो, एह में आएयो स्वामि ॥ मनवंडित फळ पामीयो, जेणे तुमारे नामि ॥ गुण गा० ॥ ७॥ ___ढाळ ॥चौपाश्-बंद॥ श्म सुणी गोयम गणधार, झानादिक गुण रयणनंमार । प्रश्न करे हवे अंजळी करी, खंधकना गुण हिय धरी ॥७॥ स्वामी एह तुमारो शीश, जसु गुण पुरा विश्वावीस ॥ काळ करी केश गती गयो, परनवनो आराधक थयो।ए॥ गौतम प्रत्ये नाखे नगवंत, ए जुज शिष्य प्रकृति नवसंत॥नाण चरण सूधा प्रतिपाळ, चार कसाय विषय सवि टाळ ॥ए॥ आलोइ पमिकमि निसल, लही समाधि थर एकल ॥ अच्युतदेवलोक बारमें, पहुंतो निरुपम सुखसिरिरमे ॥ १॥ आयु तासु सागर बावीस, समकित पाळे ते निसदीस ॥ नगवन ते खं
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खंधक०
खंधक
॥१४॥
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|| धक देवता, देव अनेक अडे सेवता ॥ ए ॥ तिहां थकी जास्येक्यांचवी, देवतणी नवस्थितिथी | चवी ॥ पुढयानंतर स्वामी कहे, तेह नाव गौतम संग्रहे ॥ ५३॥ गौतम तिहाथी खंधक देव, |
आयु नवस्थितिनो संदेव ॥ करी पूरूं हिव महाविदेह, क्षेत्र जप शिवसुखने गेह ॥ ए४ ॥ है| | पामी उत्तम कुळ अवतार, थविर संगे लही समकित सार ॥ श्रादरि संयम पूरो पाळी, ध्यान है। जळे ता पंक पखाळी ॥ ए५ ॥ यथाख्यात चारित्रे करी, राग द्वेष बेन परिहरी ॥ गुणगणे || तेरमो सयोग, केवळनाणतणो संयोग ॥ ए६ ॥ कर्म च्यार जे जे घातीया, ते खपस्ये सवि तसु || है | जातीया ॥ लहेस्ये लोकालोक प्रकाश, करस्ये थास्ये लील विलास ॥ ए ॥ अघातिया जे चारे || 8 | कर्म, खपस्ये सुखे तासु ए मर्म ॥ एम खपावीने सीजस्ये, जगनो तत्व सहु बुझस्ये ॥ ए७ ॥ || है| करस्ये अंत सह मुखतणो, पद लेस्ये श्री सिद्धज तणो ।। खंधकतणो चरित्रज करी, पंचम अंग थकी उद्धरी ॥ एए ॥ वमतपगछ गुणरत्न निधान, साधुरत्न पंमित सुप्रधान ॥ पार्श्वचंप्रसूरि | ||॥१४९॥ तसु शिष, तिणे कीधो मन आण जगीस ॥ १० ॥ सूत्रथकी कांश अधिको उण, तेह खमो |
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| जिन वाणी नूण ॥ ख. ख. रस. चंड. (१६००) वरसे उजळी, वैसाख आम मनरळी ॥११॥ | शुक्रवारे ए पुरो करीयो, महारुषीश्वर नवजळ तरीयो ॥ ते मुनिवरनो समरी नाम, त्रिकरण : शुद्धे करुं प्रणाम ॥ १० ॥
इति श्री मन्नागपुरीय वृहत्तपागच्छाधिराज शतार्थशक्तिपरसिद्धान्तवृत्त्यनुसारिबा लावबोधविधायक श्रीयुगप्रवर श्वेतांबराचार्य पार्श्वचन्द्रसूरिकृतं श्रीखंधक मुनिचरित्रशतकं संपूर्णम् ॥
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अमोचर.
॥ प्रश्नोत्तर पत्रम् ॥
प्रश्नोत्तर
॥१०॥
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बीकानेरनिवाशी श्रावक भव्यजीव मुखचंदनाइ रामपुरीयायें पूजेल प्रश्ननो उत्तर____ सिधान्तमां सर्व स्थले श्रीपर्व पंचमीनो कहेल . श्रीनिशीथचूर्णिमां पण पर्युषणा पंचमीनोज कहेल , चोथ करवानुं आदेश तेमां आपेल नथी. अने वली श्री कालकाचार्ये जे चोथ करी ते पण कारणेज करी अने ते चलाववा माटे नथी एम चूर्णिकार स्पष्ट रीते कहे . विवेकपूर्वक विचारी जोजो. तेनो पाठ नीचे प्रमाणे बे.
यतः-आसाढे पुमिमाएहिया मगलादियं गेण्हंति, पद्योसवणकप्पंच कहेंति, || पंचदिणा ततो सावणबहुलपंचमीए पद्योसवेति, खित्तानावे कारणेण पणगेसु वुढे |
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॥१५॥
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दसमीए पचासवेंति, एवं पसरसीए, एवं पणगबुडी ताव कद्यति - जाव सवीसति मा - सोपुसो सोय सवीसति मासो जद्ददयसुद्ध पंचमीए पघोसवेंति यह आसाढ सुह | दसमीह वासाखित्ते पविठा, दवा जत्य प्रासादमास कप्पोकर्ज, तं वासप्पाजग्गं खेत्तं. प्रपंच च्चि, तादे तबेव पचासवेंति. वासंच गाढं अणुवरयं यदत्तं ताहे त चैव पद्य सर्वेति, एक्कारसीन आढवेन मगलादि तं गेएहंति पद्योसवणाकप्पं कहेंति, तादे आसाढ पुसमा पद्योसवेंति, एस उसग्गो सेसकाल पद्योसवेंताणं, प्रववातो प्रववातेवि सर्वीसति राय मासातो प्रतिकमेनं ए-वहति, सवीसति राते मासे पुले | जति वासखेत्तं - ए - तन्नति, तो रोक देहावि-पोसवेयवं, तं- पुलिमाए पंचमीए एवमादि पंधे पोसवेयवं, गो- अपवेसु. सीसोपुचत्ति, इयाणिं कदं चनचीए अपने पद्य सविद्यति ? प्रायरि जाति, कारणिया चची अद्यकालगया रिएण पवत्तिया.
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प्रश्नोत्तर.
प्रश्नोत्तर
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कहं नमतेकारणं? कालगायरि विहरंतो उधेणिगंतो, तबवासावासंतरंगिन, तब ण| गरीए बलमित्तोराया, तस्सकणिछोनाया, नाणुमित्तो जुवराया, तेसिं नगिणी नाणुसिरीणाम, तस्सपुत्तो वलनाणुणाम, सोयपगतिभद्दविणीययाए साढूपधुवासति आ| यरेहिं सें धम्मोकहितो, पडिबुझो, पवावितोय. तेहिय बलमित्तनाणुमित्तेहिं कालगयो | पद्योसविते णिविसतो कतो केति आयरिया जणंति, जहा-बलमित्त नाणु मित्ता कालग अारियाण नागेणिद्यानवंति, मानलेत्तिकाचं महंतं आयरं करेंति अनुहाणादियं, तं च पुरोहियस्स अप्पत्तियं, नणति य एस सुद्द पासंमो वेत्तावि तोहिं रमा अगतो पुणोपुणो नल्लावेतो आयरिएण णिप्पा पसिण वागरणो कतो, तादे से पुरोहितो आयरियस्स पउछो रायाणं अणुलोमेहिं विप्परिणामेति एतेरिसतो मदाणु-| नावा, एते जेणपदेणं गति तेण पहेणं जति रमागति एताणिवा अकमति तोअ
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॥१५॥
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सिवंभवति, ते ताहेणिग्गता एवमादियाण कारणा असतमेण पिंग्गता विहरता पतिठाणं णगरं तेण पठिता. पतिठाण समण संघस्सय यद्य कालगेहिंसंदिहं, जावाहं आगामि ताव तुझेदिं णो पद्योसवियवं तचय सयवादणो राया, सोयकालगां एतं सोनं ग्गितो अनिमुहो, समणसंघोय मढ्याविभूतीए पविठो, कालगद्यो पविठेहि यणियं द्दवय सु-पंचमीए पद्य सविद्यति. समणसंघेण परिवन्नं, तादे रमा -
यं तद्दिवसं ममलोगाणुबत्तीए दो प्रणुजाएवाघोदे दित्ति, साहूचेतिते - पोवासेस्स तो बीए पोसवणा करून, आयरिएहिं जयिं ण वहति प्रतिक्कामे, तादे रमा जलियं, तो अणागयचनन्त्रीए पोस विज्ञति, आयरिएण नणियं, एवं जवन, तादे, चउच्च ए पोसवियं एवं. ( इति निशीथ चूर्णो )
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प्रश्नोत्तर. ११५२॥
DURING
नावार्थः-आषाढ मासनी पूनमना दिवसे वर्षाकालसुधि वापरवायोग्य चीजो (उपकरण) | तथा मगल, राख विगेरे ग्रहण करी चोमासीपमिक्कमणुं कर्याबाद, चोमासीलायक था क्षेत्र में || पश्नोत्तरके केम? ते विचारमा कोश्ये पूब्युं, तो ते साधु कहे के श्रावण वद पांचम पनि बने ते खरूं, तेम करतां जणायुं के क्षेत्रमा योग्यता नथी, एम विचारी पांच पांच दिवसनी वृद्धि त्यांसुधि करे के यावत् एक मास अने वीस दिवस एटले नाऽवा शुदि पंचमीये पर्युषणा करे. शिष्यशंका (प्रश्न) कोइ कहे जे के वीस दिवसे कल्प तथा पांच पांच दिवसनी वृद्धिवमे कल्पस्थापनरीति संघनी आझावझे विछेद पामी ते केम? उत्तर.-चूर्णिमां तो विछेदनी वातज जणाती नथी, विछेद एटले फरी तेनी उत्पत्ति संन्नवे नहि ते, अने अद्यापि क्षेत्रादिकनी योग्यता तथाविध न होवाथी तेम बनवा संन्नव ने, ने चूर्णिकार पण एज विधि लखी उतां विछेद थै एम कहे , परूपे दे, ते बाबत समीक्षकोये विचार करवो जोश्ये, जे कोश् या बाबतमां तिबोगालीनुं नाम | दे ने पण तेने लगती हकिकत तेमां नथी; माटे मध्यस्थ (तटस्थ) पुरुषोये यथार्थ चारे बाजु
AND
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विचारी सत्य स्वीकारखं. माटे आषाढवून मे रहेतुं ते मूल मार्ग बे, तथाविध योग्य क्षेत्र नम तो अपवाद.
अपवादमां पण विहार करतां करतां वीस दिवस सहित महिनो ( ५० मो दिवस ) - घाय नदि . जो के क्षेत्र न मले तोपण बेवट जाद्रवा शुद पांचमे तो अवश्य वृक्षदेवे पण पयुषण कर. शिष्य प्रश्न. क तिथिये रहे बुं ? उ० पूर्णातिथिये. प्रश्न - पूर्णातिथि पांचम तेमां कां प्रमाण बे ? उ० जुवो ! निशीथसूत्र मूलमां, - पर्व ते पांचममांज कराय“ पर्व्वसुपघोसवेयवं यो पसु ” एंटले पर्वमांज पजुसण कराय. अपर्वमां एटले 'चोथ' जे पर्व तेमां पजुसण कराय नदि करे तो श्यो दोष ? आनंग विगेरे दोष. आपनंग थवाथी प्रायश्चित्त "चजगुरु पठितं.” त्यारे शिष्य पूढे बे के जेनुं प्रायश्चित लेवुं जोइये तो श्यामाटे ते कर जोइये. ने इमां पर्व जे चोथ कराय बे ने श्राप कहोबो के पर्व तो पर्वना दिवसेज थाय. ते पर्व दिवस तो पांच मनोज सिद्धांतमां कहेल बे ते मुकी अपर्व चोथ करवायी आणाविराधक चारगुरुप्रायश्चित्त तो
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प्रश्नोत्तर. ॥ १५३ ॥
चोथ थायज केम ? गुरु कहे बे के जाइ ! तहारी बात खरी बे, पण कारणथी सपमाय. - बीजो उपाय न जमे तो पुष्ट कारणे करवुं पये. तेवुं शुं कारण अने ते कारण श्या प्रसंगे बन्युं ते कहो. गुरु कहे बेकारथिया ( एटले सकारणिक ) जो होय तो कराय. जेम आर्यका लिकमहाराजे करी तेम. ते या प्रमाणे:- कालकार्यमहाराज विहार करता उजेपीनगरी पधारया, त्यां वर्षाकाल माटे ह्या. ( चोमासामाटे रह्या ) ते नगरीने विषे बलमित्र राजा तेनो कनिष्ट जाता ( नानोजाइ) युवराजपदनो धरनार जानुमित्र हतो. तेनी बढेन जानुश्री नामे हती, तेणीनो पुत्र बलजानुनामे हतो. ते बलजानु स्वभावथी शरल यने विनयवान होवाथी साधुनी सेवा पर्युपासना करतो, ते जीव योग्य जाणी आदरपूर्वक ते प्रत्ये धर्म को अने प्रतिबोध पामवाथी दीक्षा ग्र द करावी. ते समय बलमित्रराजाने रीस चमवाथी जे कालकाचारज चोमासा माटे रहेला तेने देशबदार ( 'देशनिकालो ) करथो. एहवा कोइपण सबल कारणथी ते बलमित्रराजाना राज्यमा चोमासी करी शक्या नदि ने त्यांथी विहार करी पश्चाषनगर चाल्या. ते पश्वाणनग
प्रश्नोत्तर
॥१५३॥
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| रमा पोताना संघामाना जे साधु हता तेने पण संदेशो कदेवराव्यो जे हुं आq टुं त्यां सुधी तमे रहेवा माटे नक्की करशो नहि. संदेशानुं कारण एज के एकेक राजाना संबंधथी (वली ती. सरूं पेदा थवाना संनवथी) हरकत पमे तो बीजा स्थानांतर जर शकाय. ते नगरनो राजा जे | सतवाहन तेणे सारं मान आप्युं, ने ते पश्गणनगरना साधुये पण आवकारसाथे नगरमा प्रवेश कराव्या, अने तेज समय कालकार्ये कयु के नाजवा शुद पांचमनाज श्रीपर्व , ने ते वात | पश्चगणनगरना साधुये कबूल करी. ते प्रसंगे राजाये कयु के ते दिवस तो माहरे इंध्याग थ. || वानो तेथी साधुचैत्यनु आराधन करी शकाशे नहीं, माटे उपनो दिवस राखो. आचार्ये कह्यु
के पांचमनुं श्री पर्व उद्धंघाय नहीं. त्यारे राजाये कयु, चोथ करो. श्रावा कारणथी राजाना आ|| ग्रहवमे चोथ करी. परंतु चलावाने माटे करी नथी एम स्पष्टरीते चूर्णिकार कही बतावे वे अने
जे को लखे जे के चोय आर्यकालकमहाराजनी आझाथी करिये लिये, तो कालकसूरिये नगर|| मां प्रवेश करतांज केम कडं के नामवाशुद पांचमनां पजुसण , ने साधुये पण ते वात मान्य
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मनोतर.
प्रश्नोत्तर
११५४
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केमकरी. या बाबतमां चूर्णिकार स्पष्टरीते लखे ले के, चोथनी बाबतनो श्रादेश राजाए कराव्यो बे, पण कालकाचार्यमहाराजनो आदेश तो चूर्णिकारे पांचमनोज लख्यो . चूर्णिकारे कार्तिक पूनमनी चोमासी कर्याबाद एकमना दिवसे विहार करवानी थाझा श्रापेली . आ उपरथी सार समजवानो के चूर्णिकार पोते चोथने अपर्व कहे डे, ने अपर्वमां पजुसण कराय नहि, अने करे तो प्रायश्चित कडं . माटे पर्वमांज श्रीपर्व कराय. एम खुल्लीरीते निशीथसूत्र १, निशीथ
चूर्णि २, कस्पनियुक्ति तथा समवायांग टीका ३, कल्पचूर्णि ४, दशाश्रुतस्कंध ५, तथा तेनी | चूर्णि ६, तथा पंचासक हरिनद्रसूरिकृत तेनी टीका . विगेरेमां पर्वना दिवसे पजुसण पांचमनांज करां बे. वली चोथ कर्या पड़ी पांचम न थाय, एम जे कहे जे ते खोटुं . कारण के जो | | फरी न कराती होय तो, पंचांगीवालाये मना केम करी नहि ? अने जे एक दिवस वधे एवी || | | कुयुक्ति करी वमल (ब्रम) मां नांखेडे, ते पुरुषे पंचांगीना अदर बताइवा जोइए. हवेथी चो-|| थज करवी, एवा अक्षर को स्थले बेज नहि, अने टीका पण सर्वमान्य होय तेज सत्य जाणवी.
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॥१५४
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Stedentes desde
सुत्तं-जेजिग्कु पजोसवणाए ण पङोसवेति इत्यादि ॥ जेनिरकु अपजोसवणाए | पजोसवेति इत्यादि ॥ दोसुत्ताजुगवं वचंति । इमो सुत्तथ्थो पजोसवणा गादा ॥ जेनिकुपजोसवणाकाले पत्ते ण पजोसवेति । अपजोसवणएत्ति अपत्तेमतीते वा जो | पङोसवेति । तस्साणादियादोसा चउगुरु पचित्तं, एससमहो॥ इति निशीथचूर्णो. ___सूत्रनो सारांस ए के अपर्वमां पजुसण न थाय अने जो करे तो प्रायश्चित, अने पर्वमां न करे तो प्रायश्चित; माटे आगल न थाय, तेम पाउल न थाय, पजुसणना दिवसे पजुसण थाय; एटले नाजवा शुद पांचमना दिवसेज पजुसण करवां. न करे तो चार गुरु प्रायश्चित. आ आज्ञा तीर्थंकरदेवे तेमज आचार्यलगवाने पण आपेली .
प्रश्न -पजुसणना दिवसोमां ज्यारे सन्नासमक्ष श्री आर्यकालिकसूरि महाराजे पोतानाज मुखथी श्री कल्पसूत्र वांची संनळाव्युं हतुं त्यारे ते श्री कल्पसूत्रमा केटलां व्याख्यान (वखाण)
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प्रश्नोत्तर
प्रश्नीचर.
॥१५॥
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कर्या हता ? अथवा तो ते व्याख्याननी मर्यादा चूर्णिकारे बतावी डे के केम ?
___ उत्तर १-या बाबत संबंधी चूर्णिकारे श्री कालिकाचार्यजीने उद्देशीने कशी पण हकीकत || दर्शावी नथी.
प्रश्न -थार्यकालिकसूरिमहाराज एकज थया डे के जुदा जुदा थया ले ?
उत्तर ५-ए नामावाळा आचार्य एकज नथी यया, परंतु जुदा जुदा थया दे, ते ए के एक कालिकाचार्य दत्तपुरोहितना मामा तरीके उळखमां आवे जे एम योगशास्त्रनो बीजो प्रकाश साबिती आपे बे, अने ते कालिकाचार्यना नाणेज दत्तपुरोहिते तेजश्राचार्यने पूब्यु के'महाराजजी ! यतुं शुं फल मले बे ?' आना उत्तरमा गुरुए कह्यु के-'यझना फलमां | नरक मले !' इत्यादि इत्यादि.
१५५।। वली.पूर्वश्रुतसमृद्ध श्रार्यकालिकाचार्य के जे आर्यश्यामाचार्यना नामथी पण उलखवामां || ||
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यावे ठे अने तेमज श्री पन्नवणा उद्धरेल बे एम श्री पन्नवणामी टीकाज साबिती पी रहे बे !
कालिकाचार्य सूक्ष्मनिगोद संबंधी व्याख्या प्रकाशक तरीके उलखमां यावे से एम श्री निर्युक्तिनी टीका तेमनी कथा सहित साक्षी आपे बे !
कालिकाचार्यजी गर्दनीलराजाना उच्छेदक तरीके उलखमां आवे छे, एम श्री निशथचूर्णि बतावी रहेल बे !
बहुश्रुत कालिकाचार्य घणा शिष्यना परिवारवाला बतां पोताना शिष्यो अविनीत दोवाने लीधे एक शय्यातरने जलावी पोते एकलाज विहार करी बीजे स्थले पधार्या, ए वृत्तान्तथी उलख आपे ढे अने एनी साबिती श्री उत्तराध्ययन वृदवृत्ति आपी रहेल बे !
वली श्री कालिकाचार्य राजाना आदेशने लीधे सकारणीक चोथ करनार तरीके उलखाय बे ने ए विषेनी साबिती श्री निशीथचूर्णिमां विद्यमान बे !
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प्रश्नोत्तर
प्रश्नोत्तर. ॥१५६॥
IND
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प्रश्न ३-केटलाक महाशयो जाहेर करे ले के वाचना तो श्री स्कंदिलाचार्यजीए शरु करी ने अने श्रीदेवर्द्धिगणिक्षमाश्रमणजीए ते वाचनाने पुस्तकारूढ करेल , एम आत्मप्रबोध ग्रंथमां जे?
उत्तर ३-हा, ते वात तेमां ! .
प्रश्न ४--केटलाक कहे जे के--चोथना पजुसण करनारज सन्नासमद श्री कल्पसूत्र वांची शके एवीज मर्यादा जे. जो चोथ न करे तो श्री कल्पसूत्र सन्नानी अंदर न वंचाय ए बाबतनो खुलासो केवी रीतिनो ? ___ उत्तर ४-हे समीक्षक! तमारा कहेवा प्रमाणे श्री कल्पसूत्रनी व्याख्याउनी अंदर आने अंतरवाचनानी अंदर 'एगग्ग चित्ताजिणसासणंमि, पन्नावणा पूय परायणा जे ॥ तिसत्तवारं निसुणंति कप्पं, नवएणवं गोयम ते तरंति ॥ १॥ एटले के श्री वीरप्रनुजी गौतमस्वामीप्रत्ये फरमावे के-'गौतम! जे प्राणी, था कल्पसूत्रने पूजी अने प्रनावनायुक्त एकाग्रचित्तनी सावधानी सहित आ जिनशासनने विषे विधिपूर्वक श्री गुरुमहाराजनी पासे एकवीश वखत सां
॥१५६॥
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नले ? तो ते प्राणी अवश्य था संसारसमुऽ तरीने मोक्षने पामे.' एम श्री जिनेश्वरे प्रथम ग| पधरदेवने कयु. ए कथन तथा कल्पसूत्रनी पूर्णाहुती समयनो आलायो (के जे अर्थसहित
पागल कहेवामां आवशे ते) तहन खंमित थह जाय. माटे लवपर्वकए शंकानं समाधान श्र|वण करः-ज्यारे श्री कल्पसूत्र (श्री वीरप्रनु पड़ी एG० वर्षे ) पुस्तकारूढ कयों, ते पनीथी एवो | उराव कया आचार्ये कयों डे के चोथ करे तेज कल्पसूत्र वांची शके, अने ते शिवाय वांचे तो | विराधक थाय, ते तमारेज विचारवानुं . मतलब के उपर बतावेल गाथाज बीजाने संनला|ववानी साबिती स्पष्टपणे आपी रहेल के, श्री कल्पसूत्र एकवीसवार सानले तेनुं कल्याण थाय. ( एम श्री जिनेश्वरेज प्रथम गणधरप्रत्ये फरमावेj .) ।
प्रश्न ५-ज्यारे श्री नाबाहुस्वामीएज श्री कल्पसूत्र रच्यु जे त्यारे ते पहेलां पजुसणपर्वनी अंदर ( कल्पसूत्र रचायेल न होवाथी) शुं वांचवामां आवतुं हतुं ?
उत्तर ५-देवाधिदेव श्री महावीरस्वामीजीए श्री जिनेश्वरोनां चरित्र तेमज श्री वीरप्रजुना
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प्रश्नोतर. 18 सत्तावीश नव जे पोतानुज चरित्र प्रकाश कर्यु डे तेज श्री गौतमादि गणधरोए रचेल डे श्रने || प्रश्नोत्तर॥१५॥
तेज मुजब परंपरागमना आधारे श्रुतकेवली श्री नवाहुस्वामीजीए कल्पसूत्रनी रचना करेल , माटे गौतमस्वामीने उद्देशीनेज ते कल्पसूत्रनुं महात्म्य श्रीमखे वर्णव्यु. ए वाक्यनी विशेष साबितीमां खुद श्री कल्पसूत्रना अंतिम आलावामांज पुरावो डे के:-तेणं कालेणं तेणं समएणं । समणेनगवं महावीरे रायगिहे नगरे गुणसिलए चेश्ए बहूणं समणाणं वर्णं समणीणं बहूणं | सावयाणं बहूणं सावियाणं बहूणं देवाणं वहूणं देवीणं मज्जगए चेव एवमाश्कर एवं नास एवं पन्नवेश एवं परूवेशपङोसवणाकप्पोनामंअज्जयणं सब सहेज्यं सकारणं ससुत्तं सब सउन्नयं सवागरणं नुको जुको उबदंसेत्तिबेमि." एटले के श्री नम्बाहुस्वामी पोताना शिष्यमंमळने | कहेले के-में जे आ कल्पसूत्रनो अंदर त्रण अधिकार अर्थात श्री जिनोनां चरित्र १. थिविरा
॥१५॥ वली २. अने साधुसमाचारीरूप वाचना प्ररूपेल , ते में मारी मनकल्पनाथी कदेल नथी; परंतु श्री तीर्थंकरदेवना उपदेशयी में अधिकार कहेल . मतलब के-ते काल चोथा याराना अंतने
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| विषे, राजगृहीनगरीना गुणशील चैत्यने विषे वारप्रनु समोसर्या, ते समये घणा मुनि, घणी
साध्विर्ज, घणा श्रावको, घण। श्राविकाठ, घणा देवो अने घणी देवीउ, अर्थात् चतुर्विधसंघनी | सना वच्चे जेवी रीते या त्रण अधिकारवाद्वं पर्युषणाकल्प श्रीमुखथी प्ररूप्यु, तेवीज रीते हूं।
(नप्रबाहुस्वामी) पण तमो शिष्यवर्ग अने चतुर्विधसंघ अगामी कहुं बु. तात्पर्य एज के श्री | वीरप्रजुए कंश एकलाएज कोई एकांत खुणानो आश्रय लइ आ त्रण वाचना वांची के कही | नथी, परंतु चतुर्विधसंघ सम्यक्दृष्टिवंतनी सन्नामां विराजमान थर स्वयं वाणीवमे त्रण अधि| कार गौतमादि गणधरदेव प्रत्ये प्ररूपेल . तथा जेम ते गौतम तथा सुधर्मास्वामीए जेवी रीते ए त्रणे वाचनाउँने अमलमां मूकी तेवीज रीते हुं (जवाहुस्वामी) पण गुरुपरंपरा क्रमवमे ते त्रण अधिकार न्यूनाधिक कर्या विनाज कहुं बु. ते त्रण अधिकारवावं पर्युषणा कल्पनाम अध्ययन ‘सअहं' कहेता प्रयोजनयुक्त, परंतु निरर्थक नहीं. 'सहेजयं'-कहेतां हेतुसहित थे, एटले
१ आ व्याख्या टीकामां छे.
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प्रश्नोत्तर,
प्रश्नोत्तर. ર૫૮
के जेम गुरुराजने अथवा वमीलोने, तथा जेनी निश्राये रह्या होय ते श्रीने पूज्या विना के ते| उश्रीना श्रादेश ( हुकम---आझा) विना कंश्पण काम करवं कल्पे नहीं. केमके आचार्य महा| राज ते संबंधी तपास करनार अथवा तेमनु हित चाहनार होवाथी जेम आपणुं कल्याण थाय. | तेम करवाने समर्थ डे, माटेज तेजेश्रीने पूर्वी, ते श्रीनी आज्ञा मेळवी दरेक क्रिया-कार्य करवाथीज लान . जो तेम करवामां आवे तो ते कार्य करनार दश विधिसाधु चक्रवाल समाचारीनो पण आराधक थाय . 'सकारणं'-कदेतां साधुने सुखे संयमयात्रानी आराधना तथा समाधिना लायक तथाविध योग्य क्षेत्र न मले तो अपवादे आषाढी पुनम वीत्याबाद पण बीजा क्षेत्रने माटे तपास करतां पांच पांच दिवसनी वृद्धि कहे. यावत् पर्वदिवस नावाशुदी पांच में वस्ती न मले तो काम नीच रहेवं, पण एक मगर्यु आगल जर नहीं. ए विगेरे घणां कारण बताव्यां , तेनं | नाम सकारण, पुनः 'ससुत्तं सपत्थं सउनयं-कहेतां सूत्रसहित, अर्थसहित, उन्नयसहित, 'सवागरणं'--कदेतां पूजेला अथवा अण पूजेला पदार्थनी व्याख्या तेणे करी सहित. 'जुको नुको
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त्ति' कहेतां वारंवार, 'उवदंसेत्तिबेमि'-कहेता श्रोताजनना हितने माटे उपदेश करे , तेमन | जे प्रमाणे श्री तीर्थंकरदेवे त्रण अधिकार गणधर नणी (प्रत्ये) प्रकाश्या, अने ते श्री गणधरम| हाराजे शिष्य प्रशिष्यने जे मुजब प्ररूप्या तेज मुजब हुँ पण चतुर्विधसंघ समक्ष ते त्रण अधि| कारज संनसावं . मतलब एज के था परूपणा गुरुपरंपराव; परंपरागमनी रीति प्रमाणे में | परूपणा करी पण में मारी मतिकल्पनाथी परूपणा करी नथी.
प्रश्न ६-महावीरस्वामी पोतार्नु चरित्र पोते कही शके ?
उत्तर ६--हा, कही शके. जो न कहे तो बीजा केम जाणी शके, किंतु पोताना मुखथी | पोतानी प्रशंसा न करे पण चरित्र तो कही शकेज.
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चा०नि०
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॥१५९॥
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॥ जिज्ञासुये पूजेव-चातुर्मासी निर्णय ॥
हचान चातुर्मासी पूर्णिमाने शास्त्रकारो कहे - कोई पण शास्त्रकारे चातुर्मासी चतुर्दशीने कहेल नथी. जो कोश् चातुर्मासी चतुर्दशीने कहे तो ते शब्दशास्त्रथी तथा धर्मशास्त्रथी विरुद्ध ले. कारण के शब्दशास्त्रमा शब्दशास्त्रकारे | तथा धर्मशास्त्रमा धर्मशास्त्रकारे तेवी रीतनी हकीकत कोइ पण स्थलमां कोइ पण शास्त्रकारे
बतावेली नथी. माटे चतुर्दशीने चातुर्मासी कहेवी ते शास्त्रसंमत नथी. परंतु चातुर्मासी पूर्णिमाने | कहेल ले. ते या प्रमाणे-आचार्य श्री हेमचं सूरी विरचित सिद्धहेमचन्द्रानिधान स्वोप शब्दानुशासन वृहवृत्तिने विषे प्रतिपादन करे :--. चतुर्मासान्नाम्नि । ६।३।१३३। चतुर्मासशब्दात्तत्र नवेडण् प्रत्ययो भवति
॥१९॥ नाम्नि-समुदायश्वेन्नाम नवति चतुर्षु मासेषु नवा चातुर्मासी---आषाढी कार्तिकी
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| फाल्गुनी च पौर्णमासी जण्यते ॥
नावार्थ:-" चतुर्मासान्नाम्नि" ए हा अभ्यायना त्रीजा पादमध्ये एकशो तेत्रिशमुं| सूत्र ले. तेनो अर्थ. " चतुर्मास शब्दात्" चतुर्मास जे शब्द तेथी “ तत्रनवे" तिहां थाय | ए अर्थमां “ अण्प्रत्ययो भवति" अण्प्रत्यय थाय ने “ नाम्नि-समुदायश्चेन्नामनवति-समु. दायथी जो कोश्नी संज्ञा थति होय तो “चतुर्षमासेषु नवा चातुर्मासी ” चार महीने थयेल | तेने चातुर्मासी कहीये. ते कोनी संझाडे ते हवे आचार्य बतावे . " आषाढी, कार्तिकी, फाल्गुनीच पौर्णमासी नएयते " ते चातुर्मासीने आषाढी, कार्तिकी, फाल्गुणनी पूर्णीमा (नी संज्ञा ) कहेवाय बे; था व्याख्या स्वसमयवर्ति श्राचार्ये कहेस .
हवे परसमयवर्ति आचार्ये कहेल (करेस) व्याख्या बताविये जिये, पाणिनीय व्याकरणनी वृत्ति जे काशिका तेमां प्रमाणे व्याख्या लखेल बेः
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थानिक
संज्ञायामण वक्तव्यः ॥ चतुर्षु मासेषु नवा चातुर्मासी-पौर्णमासी आषाढी का-
चा०नि०
॥१६०
तिकी फाल्गुनी.॥
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अर्थः-" संझायामणवक्तव्यः” ए वार्तिक सूत्र ने एनो अर्थ आ प्रमाणे -चतुर्मात | प्रातिपदिकथी अण्प्रत्यय थाय एम कहे, जोश्ये. संज्ञा अर्थमा “चतुर्युमासेषुनवा चातुर्मासी" | चार महीने थयेली तेने चातुर्मासी कहिये. चातुर्मासी ए संज्ञामां थाय जे एम कहेल डे माटे
शी अहीं संज्ञा ते बतावे . “पौर्णमासी” चातुर्मासो ए पूनमनी संज्ञा . ते पण कर | पूनम लेवी ते माटे कहे जे के-" आषाढी, कार्तिकी, फाल्गुनी” पूर्वाषाढा, अथवा उत्तराषाढा | नत्रयुक्त आषाढ महीनानी जे पूर्णिमा होय तेने आषाढी पौर्णमासी चातुर्मासी कहिये. का ( वृद्धि क्षय विनानी तिथी नक्षत्र सहचारिणी होय .) पूर्वाफाल्गुण अथवा उत्तराफा| दगुण नक्षत्रयुक्त फाल्गुण महिनानी जे पूर्णिमातिथी होय तेने फाल्गुणी पौर्णमासी चातुर्मासी
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| कहिये. अने कृतिकानक्षत्र युक्त जे कार्तिक महिनानी पूर्णिमा तेने कार्तिकी पौर्णमासी || चातुर्मासी कहिये. एवीज रीते कौमुदीकारे पृष्ट १५६ तद्धितान्तर्गत कालाधिकार मध्ये पण | व्याख्या करेल डे ते या प्रमाणे
_“संज्ञायामण्” चतुषु मासेषु भवति सा चातुर्मासी-आषाढी आषाढनत्रयुक्ता | पौर्णमासीत्यर्थः
___अर्थः-चतुर्मास शब्दथी संज्ञामा अण् प्रत्यय थाय जे. चार महिने थयेली तेने चातुर्मासी || कहिये अने ते पौर्णमासीनी संज्ञा ले. माटे जे शब्दशास्त्रकारो थयेल ने तेमणे ते चातुर्मासी त्रण | पूनमनीज सिद्ध करेल डे परंतु चउदशनी सिद्ध करेल नथी. अने धर्मशास्त्रकारो पण चातुर्मा|सी त्रण पूनमनेज कहे ते आगळ बताववामां आवे जे. हवे विचारतो ए डे के आवी रीते | शब्दशास्त्रथी अने धर्मशास्त्रथी सिद्ध थएल त्रण पूनमनी चतुर्मासी ने बतां जे कोश् स्वमत
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चा०नि०|| आग्रहमा पमी ते वातने कबुल नही करे तो तेने पराणे कोण मनावी शके. जागतो सुश् रहेल || पानि
तेने कोण उगमवामां समर्थ थाय? आंखो बतां जे जोशे नही तेने पराणे कोण बताववाने समर्थ || थशे? माटे जेने तत्व ग्रहण करवानी श्छा हशे अने खोज करनार नवनयनीह जिनप्रणीत सूत्राराधक हशे, ते पुरुष आपो आप शोध करी सत्य अंगीकार करशे. एमां अमारे का आग्रह करवानी जरूर नथी.कोइपण जिज्ञासु थप तेने शुद्ध रस्तो बताववो ए अमा काम डे पड़े | करो न करो ते एनी मरजी उपर . हवे धर्मशास्त्रमा बतावेल चातुर्मासी त्रण पूनमनी थायडे | ते वतावीए बीए. श्री सुयगमांगसूत्र तथा तेनी वृहद्वत्तिमां था प्रमाणे फरमाल करेल ः
___ " चाउद्दसम्मुहिछ पुममासिणीसु" आ मूल सूत्र ने तेनी वृत्तिः
तथा चतुर्दश्यष्टम्यादिषु तिथिषूपदिष्टासु महाकल्याणिकत्वेन प्रसिधासु तया पौर्णमासोषु च तिसृष्यपि चतुर्मासकतिथिष्वित्यर्थः । एवंनूतेषु धर्मदिवसेषु सुष्वतिश.
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येन प्रतिपूर्णोय पोषधोव्रतानिग्रह विशेषस्तं, प्रतिपूर्णमादारशरीरसंस्कारब्रह्मचर्या| व्यापाररूपं पौषधमनुपालयन् संपूर्णश्रावकधर्ममनुचरति.
नावार्थः-चउदश, आठम, पूनम एटले चोमासानी त्रण पूनम ( श्राषाढी पूनम, कार्तिक | पूनम, फाल्गुणनी पूनम ) ए पर्व विगेरे पुण्यतिथी/ने विषे, (इत्यादिक धर्मना दिवसोने विषे)
अतिशय मनोहर अने संपूर्ण एवो जे पौषधवत अन्निग्रह विशेष, तेने संपूर्ण रीते एटले आहा. | रनो त्याग, अने शरीरसंस्कारनो त्याग, ब्रह्मचर्य पालन, व्यापारत्यागरूप पौषधवतने पालन करता | | संपूर्ण श्रावकधर्मने आचरण करे . एवी रीते चोमासी त्रण पूनमनी सूत्रकृतांग नगवती, उत्तराध्ययन आदि सूत्रोनी वृत्तिमा बतावेली . माटे उपर बतावेल (श्री हेमचन्झाचार्यदिकनी) व्याख्याना थाधारथी नव्यजीवोए त्रण पूनमनी चोमासीनु अवश्य श्रद्धा न करवामां परा. यण थर्बु. ( इति जिज्ञा० पूल चातुः निर्णय )
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उपदेश रहस्य.
"सिद्धचक्रपद वंदोरे नविका०" ए देशी. ॥ अथवा आगम वचन विचारी रुमा, क्रोध म || करिश लगार-ए राग ॥ जे जे जिनधर्म जाण शिरोमणी, जे हुई पर उपगारी ॥ तोसुं संघ कण || एक म मूकीस, प्रवचन वचन विचारी ॥ रे जीवमा ॥१॥ दृष्टिराग जे लागो, तेह सरिस तुं वाद म मंमिस, प्रवचन संशय नागो ॥ रे जी० ॥२॥ श्री जीनशासन जयवंत जागे, प्राप्ति विणु कुण पावे ॥ लोक घणो परमारथ हीणो, नामे जैन कहावे ॥रे जी० ॥ ३॥ गरथ सहीत सारनी दीसे, कहे अम्हे गुरु गिरुया ॥ जे जग वरते नले आचारे, तेहने नांखे विरुया ॥ रे जी० ॥४॥ अर्थथकी जे जिणवरे नाख्यो, सूत्र ते सोहमस्वामि ॥ कहिये आगम तेह परंपर, अ
॥१६॥ वर कहे तसु गमि ॥ रे जी० ॥ ५॥ पंचम अंगे पंच प्रकाश्या, जगनाथे व्यवहार ॥ श्रागम | । श्रुतने आणा धारण, जीत ते एह प्रकार ॥ रे जो० ॥ ६ ॥ प्रथम नही इण काले हवणां, बीजे ||
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सहूए वरते ॥ ते उजेदी पंचमे लाग्या, ते किम मारग निरते ॥ रे जी० ॥ ७॥ नक्ति काजे श्रा| रंन करावे, अनुमोदे वली कीधो ॥ सश्हथ करतां दूषण बोले, अवह पंथ ए लीधो ।। रे जी० | |॥ ॥ पूजानी विधि नाख्या पाखे, मुगध लोक किम जाणे ॥ त्रोमी मूल फल लान ते वंडे, | | पहुता पहेले गणे ॥ रे जी० ॥ ए॥ गुरुगम गुरुगम करि करि वांचे, आगम जण जण आगे ॥
प्रगट अरथ तेह तारण समरथ, तोपण मूढ न जागे ॥रे जी०॥ १०॥ श्रेणीक नरवै नंदन | | दिन दिन, सहस आठ इक लाख ॥ वीर प्रवृत्ति जाणवा कारण, देतो केहनी नाख ॥रे जी०॥ | ११ ॥ स्वामी आगमन संनली साढा, बारह लाख वधाइ ॥ आपी चतुरंग सेना मेलवी, वंदण | पहुता नाश् ॥रे जी० ॥ १५ ॥ इणपरे बहुला राजा श्रावक, जे बारह व्रतधारी ॥ घणे महोडवे | वंदण आवे, कहणे कवण अधिकारी ॥ रे जी० ॥ १३ ॥ सूरियाने जिन प्रतिमा पूजी, सतरह
नेद विशाल ॥ नक्ति कहीने नाटक मंमयो, परदेशी दानशाल ॥रे जी० ॥ १४ ॥ विजयादिक | सुर सोहमशंदे, दोवर राजकुमारी ॥ केहतणे उपदेशे पूजी, प्रतिमा बहु विस्तारी ॥रे जी० ॥
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| १५ ॥ मंत्री सुबुद्धिए निर्मल कीधो, फरहोदक धर्म काज ॥ चित्र सारथि हयदमन प्रकास्यो, उ. | परदेशी नृपराज ॥रे जी० ॥ १६ ॥ संनली कृष्ण नेमीतणे मुख, घारमतीनो दाह ॥ घोषण
कारवत नगरी मंमयो, चारीत्रनो नबाह ॥रे जी॥१७॥ कुमर जमाली मेघमर वर, थावच्चादिक | सुणीये ॥ एहने संजम लेवा अवसर, श्रोत्र आगम नषीये ॥ रे जी० ॥ १७ ॥ लाखे लाखे
ओघो पमघो, नापित लाख बुलावे ॥ सीस नणी दीखेवा कारण, गुरुने किम विहरावे ॥ रेजी. ॥ १ए ॥ संयम ग्राही कूण श्शाने, ऊतारे सिंगार ॥ ते लेश् दृढ चोयण थापे, माश् पमुह परि
वार ॥ रेजी० ॥ २०॥ चित्रे केशी अवग्रह काजे, थाढवीयो वनमाली ॥ तिंयुकवासी यदे बंहै। नण, कीधी बन्नक्ति टाली ॥ रेजी० ॥१॥ सोवनमयि निजरूपे प्रतिमा, जालि घरंतर वाली है। हैं|| धर्म हेत योगणीसमो जिणवर, जो जो हीये विमासी ॥ रेजी० ॥ २२ ॥ सिंहो नामे साधु सि-||
॥१६३॥ | रोमणी, मोटी पोके रोयो ॥ रेवश् कीधो श्राधाकर्मिक, उषध मुनिने ढोयो ॥ रेजी० ॥ २३ ॥ | नागसिरि धर्मघोषे होली, केशीराय प्रदेशो ॥ विमलवाहनने साधु सुमंगल, क्रोधे नस्म करे
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| सी ॥ रेजी० ॥ २४ ॥ वीरजिणंदे वार्या सुनखत्त, सर्वानुभुति अणगार, गोशालासुं सनमुख वोया || एह कीसो आचार ॥ रेजी० ॥ २५ ॥ सीतल तेजोलेश्या मूकी, याजीवक ऊगार्यो ॥ दृष्टिए देखी साधु हणंतु, तेज कांइ न वार्यो । रेजी० ॥ २६ ॥ धर्मरुची करु तुंब आहार्यो, | ते केहनी राखी ॥ खंदक सामो उठी गोयम, आगति स्वागति नांखी || रेजी० ॥ २७ ॥ ऋषी घातके रीसायो केसव, श्री नेमिश्वर राख्यो ॥ धरणि अनोखी ते चंमाले, हरि वचने पूरि नायो || जी० ॥ २८ ॥ ब्रह्मदत्तश्युं चित्रे कीधो, धर्म वचन यालाप ॥ बेद तेवारे कांइ न मान्यो, तव कर्यो मोघ प्रलाप || रेजी० ॥ २७ ॥ पर्वे पुख्खली श्रावक कीधो, सादमी जोजनरूप ॥ पोसत संखे उच्च रियो, स्यो उपदेश स्वरूप ॥ रेजी० ॥ ३० ॥ श्री वीर देखी विजयगादावश, देश (तिन) प्रदक्षिणा वंदे ॥ अशनादिक ले जावे यापे, दियने अति आनंदे ॥ रेजी० ॥ ३१ || गौतम गणधर अश्मत्तो, बालक किम प्रतिलाने || साथै थने वंद आवे, कह्या विना किम लाने || रेजी० ॥ ३२ ॥ ए केहने उपदेशे कीधा, पूढी गीतारथ जाली ॥ विधिरूपे
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॥१६४।
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जिह साक्ष दीसे, ते नहु जिनवर वाणी ॥ रेजी० ॥ ३३ ॥जे तप संजम मिलतो थव थुई, मं- उ० र० । गलनो फल जाणो ॥आगम बोल्यो अवर जे सारंन, तेहनो कांश न आणो ॥ रेजी० ॥ ३४ ॥ करे करावे ने अनुमोदे, जिनवरनो उपदेश ॥ तिण विणु जाणे किरिया कीजे, ते सवि कायकिलेश ॥ रेजी० ॥ ३५॥ दूर्ड को किमे दू को किमे, म करिस किही किणवार ॥ आपण थापणी कीधी करणी, उतरवो नवपार ॥रेजी ॥ ३६ ॥ अरिहंत साधु साहम्मी आगम, जिन प्रतीमादिक जाणी॥ तेह तणे जे वंदन पूजन, नगतिति बिह समाणी ॥रेजी ॥ ३७ ।। जिन उपदेशे नगति म जाणीश, निश्चे ने व्यवहार ॥ जिहां सावद्यनो लवलेश लागे, (साधु) श्रावकने अधिकार ॥ रेजी० ॥ ३० ॥ नक्ति नेलो जिह सावध हुए, तिह विधि निषेध म नांखो ॥ गुरु प्रशादिए उल्लह लाधो, रतन जतन करी राखो ॥ रेजी० ॥ ३५ ॥ ए उपदेश रहश्य जे जाणे, है। जिनमतथी नवि मोले ॥ (जिनमति ते नवि मोले,) आपणी आतम शिक्षा कारण, श्री पार्श्वचंद्र || ( सूरि ) श्म बोले ॥ रे जीव० ॥ ४० ॥ इतिश्रीमन्नागपुरीयवृहत्तपागबाधिराजयुग
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॥१६४
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प्रवरन्यायचक्रवर्तिश्री जैन श्वेतांबराचार्यश्री पार्श्वचंद्रसूरीश्वरविरचितोपदेश रहस्यः समाप्तः ॥
दश मदाश्रावक संबंधी.
पहेलो आणंद नामनो श्रीवीर प्रजुनो महाश्रावक वाणिज्य नामना गाममां हतो. तेनी स्त्रीनुं नाम शिवानंदा हतुं तथा तेनी पासे बार कोमी धन घने दश हजार गायोनुं एक गोकुळ एवां चार गोकुळनी संपदा हती.
बीज कामदेव नामनो श्रावक दतो, ते चंपानगरीमां दतो, तेनी स्त्रीनुं नाम ना हतुं. तथा तेनी पासे १८ कोमी धन थाने व गोकुळनी संपदा हती.
जो चुली पिता नामनो श्रावक दतो ते वाराणसी (काशी) मां इतो, तेनी स्त्रीनुं नाम
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॥१६॥
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सोमा हतुं. तथा २५ कोमी धन अने आठ गोकुळनी संपदा हती.
चोथो सुरदेव नामनो श्रावक हतो ते पण वाराणसोमा हतो, तेनी स्त्रीनुं नाम धन्ना हतुं, | तथा २४ कोमि धन अने उ गोकुळनी संपदा हती.
____ पांचमो चुलसतक नामनो श्रावक हतो ते यासंनिया नगरीमा हतो. अने तेनी स्त्रीन | नाम बहुला हतुं, तथा तेनी पासे १७ कोमी धन अने उ गोकुळनी संपदा हती.
हो कुंझकोळियो श्रावक हतो, ते कांपिढ्यपुर नगरमा हतो, तेनी स्त्रीनुं नाम पूसा हतुं, | तथा तेनी पासे २० कोमी धन अने उ गोकुळनी संपदा हती.
सातमो सद्दालपुत्त नामनो श्रावक हतो, ते पोलासपुर नगरमा हतो, तेनी स्त्रीनुं नाम | अग्निमित्ता हतुं, तथा तेमनी पासे ३ कोमि धन अने एक गोकुळनी संपदा हती. ____ आठमो महासतक नामनो श्रावक हतो, तेने रेवती वगेरे १३ स्त्रो हतो. तथा २४ | कोमी धन अने ७ गोकुळनी संपदा हती, तया रेवती नामनी स्त्रीनी पदरमा स्त्रीधन
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॥१६॥
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|| तरीके - कोमि धन अने ७ गोकुळ, तेमज बोजी बधी (१५) स्त्रीउनी पासे स्त्रीधन तरीके १५ कोमी धन अने १५ गोकुळनी संपदा हतो. ए राजगृहीमा रहेतो हतो.
नवमो नंदिणीपिया नामनो श्रावक हतो ते सावत्थी नगरीमा हतो, तेनी स्त्रोनुं नाम | अश्विनी हतुं, तथा तेनी पासे १२ कोमी धन अने ४ गोकुळनी संपदा हती..
दशमो लंतियापिया नामनो श्रावक हतो ते पण सावत्यीमांज हतो, तेनी स्त्रीनुं नाम फाल्गुणी हतुं, तथा तेनी पाले १३ कोमी धन अने चार गोकुळनी संपदा हती.
श्रा प्रमाणे विशाळ वैनववाळी संपत्ति हती उतां ते शुद्ध श्रावक-गर्व रहित-एकवीश गुणथी शोलता अने नमनताश्वमे रत्नत्रयी ते आराधता हता. ए दश श्रावकोनी संपदा अने रीतनात तथा अचळ श्रद्धा वगेरेने ध्यानमा लइ पोताना मननी नावनाउँने उच्च थाशयो साथे नेटामी गर्वपणे श्रद्धानी दृढता साथे स्वधर्मने अजुश्राळी उन्नयजन्म सुधारवा था लेख लक्षमा राखवा पुनः पुनः वीनती .
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चौराशी गच्छनां नाम.
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॥१६॥
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वंदनीक १, धर्मघोषा २, संमेरा ३, किनरसा ४, नागपुरीयतपा ५, मलधारा ६, मधुकर , चित्रवाळ , उसवाळा ए, नाणावाला १०, आगमिया ११, पहिवाळा १५, बोकमिया १३, निन्नवाळ १४, नागेंडा १५, सेवंतरिया १६, नंमारा १७, जयबवाळ १७, विद्याधरा १ए, लहुमी || पोषाल २०, नाणसोल्पा २१, वरगच्च १५, नावमा २३, सूराणा २४, वमीपोसाळ २५, नरु- | अच्चा २६, कुतबपुरा २७, शंखला, २७, जावमहरा शए, जाखमीआ ३०, कोरंटवाळ ३१, ब्रह्मा- || | पीया ३१, मंमाहमा ३३, नीगमिया ३५, खेलाहरा ३५, उछितवाळ ३६, रूवोळिया ३७, बाप-|| रिया ३७, वघेरवाळ ३ए, खेजमीआ ४०, वांडितवाळ ४१, जीरानलिया ४२, जेसळमेरा ४३, १६ ललवाणिया ४४, तातहरू ४५, बाजहरू ४६, खंनायता ४७, शंखवाळिया ४७, कमळकळशा ४ए, | सोमतरीया ५०, सोमतिया ५१, पिंपळिया ५२, खीमसरा ५३, चोरबेमिया ५४, प्रामेवा ५५, ||
se/ADAaivitie/awesom
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जलिया २६, गोलवा ५७, वधेरा ५०, नटेरा एए, नावरिया ६०, बादामेरा ६१, कक्करिया ६२, रंकवाळ ६३, वोरसवा ६४, वेगमा ६५, वीशळपुरा ६६, संवामिया ६७, घुघुकिया ६०, विद्याधरा ६, आयरिया ७०, हरसोरा ११, कोटिकगणा चंद्र कुल वइरी शाखानो बिरुद ७२, वामियगण १३, मवायिगण १४, मालवगण १५, उत्तरवाळशाह १६, उदेहगण 99, चारणगण १८, कोलिया ७९, लूलिया ८०, साधु पुनमिया ८१, चागमी या ८२, तिबलिया ८३, छाने साचोरा ८४, या प्रमाणे चोराशी गछ दता.
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श्री सुभाषितश्लेाकमालिका.
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लघुर्जनो गौरवसंघसंगात् करोति दुःसाध्यमपि सुसाध्यम् ॥ पुष्पाश्रयाउंनु शिरोधिरूढापिपीलिका चुंबति चन्द्र बिम्बम् ॥ १ ॥ विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीमनाय ||
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६७.
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खलस्य साधोविपरीतमेतत्, दानाय मानाय च रक्षणाय ॥२॥श्रायोपि दोषान् खलवत् परेषां, लोमा. वक्तुं च जानाति परं न वक्ति ॥ किंकाकवत्तीक्ष्णतराननोपि, कीरः करोत्यस्थिविघटनानि ॥३॥
आगमं श्रायरंतेण, अत्तणो हियकंखिणा ॥ तिच्छनाहो गुरुधम्मो, सवे ते बहु मनिया ॥४॥ | तिबयर समोसूरी, सम्म जो जिणमयं पयासेई ॥ आणं अश्कमंतो, सोकाउरिसो न सोपुरिसो || | ॥ ५॥ रक्तौ च पद्मप्रनवासुपूज्यो, शुक्लौ च चंद्रप्रनपुष्पदन्तौ ॥ कृष्णो पुनर्नेमिमुनी विनीलौ | श्रीमल्लिपार्थो कनकत्विषोऽन्ये ॥ ६ ॥ इक्ष्वाकुकुलसंजूता स्याद्वाविंशतिरईताम् ॥ मुनि- ||| सुव्रतनेमी तु, हरिवंशसमुनवौ ॥ ७॥ वरं ज्वलदयःस्तनपरिरनो विधीयते ॥ न पुनर्नरकहार-|| रामाजघनसेवनं ॥ ॥ श्रावतः संशयानामविनयन्नवनं पत्तनं साहसानां, दोषाणां सन्निधानं कपटशतमयं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् ॥ स्वर्गद्वारस्य विघ्नं नरकपुरमुखं सर्वमायाकरण, स्त्री-|| यंत्र केन सृष्टं विषममृतमयं प्राणिनामेकपाशः ॥ ए ॥ वृदं कीण फलं त्यजति विहगाःशुष्कं ||१६॥ सरः सारसाः, पुष्पं पर्युषितं त्यजति मधुपा दग्धं वनांतं मृगाः ॥ निर्द्रव्यं पुरुषं त्यजन्ति गणिका
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ष्टं नृपं सेवकाः, सर्वः स्वार्थवशाजनोऽनिरमते नो कस्य को वलनः ॥ १० ॥ माल्यग्लानिः कल्पवृक्षप्रकंपः, श्रीहीनाशो वाससां चोपरागः ॥ दैन्यं तन्द्रा कामरागांगजंगो, दृष्टे शो वेपथुश्वारतिश्च ॥ ११ ॥ पापी रूपविवर्जितः परुषवाक् यो नारकादागत स्तिर्यग्योनिसमागतश्च | कपटी नित्यं बुनुकातुरः ॥ मानी ज्ञानविवेकबुद्धिकलितो यो मर्त्यलोकागतो, यस्तु स्वर्गपरि| च्युतः स सुनगः पाज्ञः कविः श्रीयुतः ॥ १२ ॥ शिष्टाय दुष्टो विरताय कामी, निसर्गतो जाग - रूकाय चौरः ॥ धर्मार्थिने कुप्यति पापवृत्तिः, शूराय जीरुः कवये कविश्च ॥ १३ ॥ न सति इकमिक्कं न विणा चि ंति इक मिक्केण ॥ रासदसाणतुरंगा, ज्यारिपंमियाना ॥ १४ ॥ अनुचितकर्मारंभः स्वजन विरोधो बलीयसि स्पर्द्धा ॥ प्रमदाजन विश्वासो मृत्युद्वाराणि चत्वारि ॥ १५ ॥ व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती, रोगाश्च शत्रव इव व्यथयन्ति देहम् । ययुः परिस्रवति निन्नघटादिवाऽम्नो, लोकस्तथापि कुरुते न कदापि धर्मम् ॥ १६ ॥ कामैत्री मरुता समं हुतनुजो नौमस्य यद्वायुना स्पृष्टः प्रज्वलति प्रतीपवलनां धत्ते च वैश्वानरः ॥ तथ्यं प्राणसमीरकोष्ठ शिखिनोः
॥
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लो०मा. ॥१६॥
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|| सख्यं यतस्ताविमौ, विश्वेषामुदरं सहेव विशतः काले सहोत्क्रामतः॥ १७॥ गुणानगृह्णन्सुजनो | || श्लोक न निर्वृति, प्रयाति दोषानवदन्न दुर्जनः। चिरन्तनाच्यासनिबन्धनेरिता, गुणेषु दोषेषु च जायते मतिः॥१॥निरीदय विद्युन्नयनैः पयोदो, मुखं निशायामनिसारिकायाः। धारानिपातैस्सह किं नु वान्त---श्चंद्रोयमित्याततरं ररासे ॥१५॥ अल्पीयसां पूर्वनिवासनूमित्यागाद्विपत्तिर्महतां सुसंपत् ।। अब्धेरपेता मणयो वसंति, राज्ञां शिरः काकमुखेषु नेकाः ॥२०॥ सुखस्य उःखस्य न कोपि दाता,
अहं करोमीति वृथानिमानः । परो ददातीति कुबुद्धिरेषा, स्वकर्मसूत्रग्रथितो हि लोकः ॥ १॥ | जीवंतु मे शत्रुगणाः सदैव, येषां प्रसादेन विचक्षणोहम् । यदा यदा मे शिथिला च बुद्धि---स्तदा | तदा ते प्रतिबोधयन्ति ॥२॥ बिन्नोपि चंदनतरुन जहाति गंध, वृद्धोपिवारणपतिर्न जहाति ली. लाम् । यंत्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्नु---हीणोपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः ॥ २३॥ इतिश्रीमजैनश्वेताम्बराचार्य श्रीसहजकलानिधिसूरीन्द्रविनेयाब्धिशशिना संगृहीता
१६८३ सुन्नापितश्लोकमालिका संपूर्णा ॥
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॥ श्री क्रियागुप्तचतुर्विंशतिजिनस्तुतयः ॥
॥ मालिनीछन्दः ॥
जगति जमिजाज व्यञ्जितापूर्वनीते प्रथमजनिततीर्थाच्युन्नते नानिसूते । जिन जिन वितानध्वंसिनी तावकीनक्रमकमलनमस्या के जनस्याभिलाषम् ॥१॥
जगतीति प्रथमं जनिता तीर्थस्यान्युन्न तिर्येन तत्संबुद्धो व्यञ्जिता प्रकटिताऽपूर्वाऽनिर्वचनीया नीतिर्न्यायो येन तत्संबुद्धौ हे जिन जमिमानमज्ञानं जजतीत्येवं शीले जगति संसारे ब्रजि नानां पापानां वितानं समूहं ध्वंसयतीत्येतादृशी तव इमे क्रमौ कमले श्व तयोर्नमस्या नमस्कारः जनस्य कमभिलाषं वा छितं न निसूते न प्रसूते षाणि प्रसवे इत्यस्य लट् प्रथमैकवचनम् ॥१॥ शिखरिणी छन्दः च्यपेतः कर्माब्धेरचलवरचर्या परिचयात् प्रतिष्ठामापन्नः शिवमजरमासाद्य परमम् ।
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क्रि.जिन
क्रि.जि०
१६९॥
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रजन्याःस्वामीव त्वमजित जिनास्मासु तमसः
समुच्छायं गया दलिततपनीयाम्धुजरुचे॥२॥ अपेत शति-दलिता विदलिता तपनीयाम्बुजस्य तप्तहेमपद्मस्य रुनिः कान्तिर्येन तत्स| म्बुद्धौ हे अजित हे जिन वं अस्मासु तमसः पापस्य समुच्ब्रायं समूहं बायाः बिन्द्याः । जो डे|दनेश्त्यस्याशीर्बुडो मध्यमपुरुषैकवचनम् । किंतस्त्वं कर्माब्धेः कर्मसमुझात् अपेतः निर्गतः पुनः किंविशिष्टः परमं प्रकृष्टं अजरं जरारहितं शिवं मोक्षमासाद्य प्राप्य अचला या वरा प्रधाना परिचर्या विहारक्रमः तस्याः परिचयात् संचारात् प्रतिष्ठा महत्व प्राप्तः। क व रजन्याः क्षणदायाः स्वामीव यथा चन्छः परमं श्रेष्ठं अजरं जराविहीनं शिवं ईश्वरमासाद्य प्राप्य प्रतिष्ठां ख्यातिमापन्नस्तमसोऽन्धकारस्य समुच्ड्रायं बिनत्ति ॥ २॥
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।।१६९॥
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वसन्ततिलकाछन्दः श्रीसंनव विजुवनाधिप तेरयेण-व्यालोलमिन्द्रियबलं बलवन्निगृह्य । निर्मूलितोच्चतममोहमदोरहेण गम्भीर एष नवता लगवन् नवाब्धिः ॥ ३ ॥ श्रीसंनवेति-दे त्रयाणां जुबनानामधिपस्तत्सम्बुधो हे जगवन् हे श्रीमांश्चासौ संजयश्च तत्सम्बुद्धौ। जवता त्वया हन इन्द्रियवलं निगृह्य नव एव अब्धिःतेरे ॥ तृप्लवनतरणयोरिति नौवादिकस्य विटः कर्मणि प्रथमैकवचनम् " तृफलनजत्रपश्च" इत्यनेनैत्वाभ्यासलोपो। कीदृशेन त्वया निः | शेषं मूलितो नाशित अतिशयेन उच्चः मोह एव महीरुहो वृदो येन तेन कीदृशो नवाब्धिः एष प्रत्य | दृश्यमानः पुनःको गम्नीरो दुस्तरः। किशमिन्द्रियबलम् । एणो मृगस्तद्वत् व्यालोलं चपलम् ॥
मजुभाषिणीछन्दः नवतः स्वनावसुनगाङ्गचङ्गिमव्यवधाननीरुमनसोऽनिनन्दन ।
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क्रि.जि०
॥१७०1
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शक्रि.जि. मरुतां गिरौ जननमजनोत्तरं न बबन्धुराचरणमम्वरं सुराः॥४॥
नवत इति-हे अनिनन्दन मस्तां देवानां गिरौ मेरुपर्वते जननमकानोत्तरं जन्मानिषेकानन्तरं सुरा खादय थानरणानां मम्बरं अलंकरणं नवबन्धुःबन्ध बन्धन इत्येतस्य क्रयादेरूपम् कीदृशाः सुराः नवतस्तव स्वन्नावेन निसर्गेण सुनगा या अगस्य चङ्गिमा सौन्दर्यं तस्या व्यवधाने थागदने नीरूणि मनांसि येषां ते ॥४॥
त्रोटकछन्दः यदिसिध्वधूपरिरम्नविधौ त्वरितोसि ततःसुमते सुमतिम् ।
विनिबर्हणमुल्बणमोदतते स्तुहि नाम लसद्गुणकेलिगृहम् ॥ ५॥ __ यदीति ! सुष्टुमतिर्यस्य तत्सम्बुद्धौ हे सुबुद्धे यदि सिद्धानां वधूरिव वधूः मुक्तिस्तस्याः | | परिरम्नस्य आश्लेषस्य विधौ त्वरितोऽसि सावधानोऽसि ततस्तर्हि सुमतिजिनं स्तुहि ष्टुञ्स्तुतावित्येतस्य लोटमध्यमैकवचनम् नाम इति संभावनायाम् कीदृशं सुमतिमुल्बणा वामा या || है |
18॥१७॥
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मोहस्यत तिर्विस्तारः तस्या विनिबईणं नाशनं पुनः की० लसन्तो ब्राजमाना गुणाः शान्त्यादयस्तेषां केलिगृहं क्रीमा स्थानभूतम् ॥ ५ ॥
मन्दाक्रान्ता छन्दः
श्रीमन्पद्मप्रजिन नवान् जव्यपद्मकजानो पादानम्रान पुनरितरान् दुर्गतिद्वारतो यत् नैतन्याय्यं तव खलु जने दर्शितप्रातिकूल्ये सौहार्द वा दधति सदृशी विश्रुता चित्तवृत्तिः ॥ ६॥
श्रीमदितिते नव्या एव पद्मानि तेषामेकः केवलो जानुस्तत्सम्बुद्धौ ॥ श्रीमाँश्चासौ पद्मप्रननामा जिनस्तत्सम्बुद्धौ । नवान् यत् समन्तान्नम्रान् जव्यान् प्राणिनो दुर्गतेर्नरकस्य द्वारं तस्मात् अपात् रक्षत् पारक्षणे इत्यादादिकस्य लङः प्रथमैकवचनम् पुनः इतरानजव्यान् नापात् नारत्
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७
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दोवकछन्दः
एतत् उन्नयथारक्षणं नन्याय्यम् नयोग्यम् । दर्शितं प्रातिकूष्यं विरुद्धजावो येन तस्मिन् जने वाथवा
क्रि.जि० |६|| सुहृदो नावो तत् दधति जने तव चित्तवृत्तिः सदृशी तुल्या खबु निश्चयेन विश्रुता प्रसिद्धा ॥६॥ |||
विश्वजनीन सुपार्श्वजिनेन्दो वारिनिधे करुणारसराशे।
त्वद्गुणनावनया मतिमान्यः स्वस्तिपरंपरयापि स तुल्यम् ॥ ७॥ विश्वेति विश्वस्मै जनाय हितस्तसंबुद्धौ हेनिधे गुणसागर हे करुणारसराशे हे सुपार्श्वजिनेन्दो || | यो नरस्त्वद्गुणानां नावना चिन्तना तया मतिमान् स स्वस्तिपरंपरया कल्याणश्रेण्यापि तुव्यम् || | समकालं गुणचिन्तनसमय एव अवारि वृतः । वृञ् वरणे कर्मणि बुङः प्रथमैकवचनम् ॥७॥
भुजङ्गप्रयातछंदः तवान्तःसनं देशनारंजनाज: स्फुरन्त्या रदानावितत्या समन्तात् ॥
१७२० जनःश्वेतिमानं चिरोपार्जितैनोमलेनेव चन्प्रन प्रोफितात्मा ॥७॥
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तवेति-हे चन्द्रप्रन चअवत्प्रनायस्यतत्संबुद्धौ।जनो मनुष्यः श्वेतिमानं उज्वलत्वं समन्तात् थारत् | अगमत् ॥ ऋ गतावित्येतस्य श्लुविकरणस्य लुङः प्रथमैकवचनम् । सर्तिशास्त्यतिन्यश्चेत्यनेनाङ्। कथंनूतःजनः चिरं उपार्जितं संपादित एनः पापं तदेव मलस्तेन यथा प्रोमितः परित्यक्त थात्मा देहो यस्य कया रीत्या अन्तःसनं सनामध्ये देशनाया आरंजः तं नजतीति तस्य तव समन्तात् | सर्वतः स्फुरन्त्योससन्त्या रदानां दन्तानामानायाः कान्त्याः वितत्या श्रेण्या ॥७॥
पुष्पिताग्राछन्दः सुविधिजिन कदाचनापिपङ्कोद्नवसुनगो सकलश्रियां निवासौ।
न हृदयविषयं त्वदीयपादौ नियतमतोदमनाजनं शुनानाम् ॥ ५ ॥ सुविधिजिन इति-हे सुविधिजिन त्वदीयपादो हृदयविषयं हृद्देशं कदाचनापि नापिपं नापन्नम् आप्लव्यातोश्त्यस्य एयन्तस्य कर्मकतरि बुङ् । किंजूतोत्वदी के पानी उद्भवो यस्य तद्वत् कमल
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क्रि.जि०
१९७२
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वत् सुन्नगौ सुन्दरी पुनःकिः । सकला याः श्रियः संपदस्तासां निवासौ ॥ अतः हेतोरदं नियतं || कि जि० निश्चितंशुनानां मङ्गलानां अनाजनमपात्रं जातः॥ ए॥
॥दुतविलम्बितछन्दः॥ खरतराघनिदाघनवक्कमप्रशमवारि ददे वनतात्मनाम् ।
जगवता नवता शुनमद्लुतं चरितपूतमहीतल शीतल ॥ १० ॥ ___ खरेति-चरितेन पूतं पवित्रितं । महोतलं येन तत्सम्बुद्धौ हे शीतल जगवता पूज्येन नवता | त्वयाऽवनतात्मनां नमस्कुर्वतां शुन्नं ददे दत्तम् । सुदादान इत्यस्य कर्मणिलिमेकवचनम् । कथंभूतं शुन्नम् खरतरं कर्कशं यद् अघ पापं तदेव निदाघो ग्रीष्मः तस्य नवक्लमः जन्मग्लानिः तस्य प्रशमे शान्तौ वारि जलं । पुनः किं । अजुतमाश्चर्यजनकम् ॥
॥उपेन्द्रवजाछन्दः॥ जलाञ्जलिं दातुमना जन त्वं बलीयसे चेद्भवशात्रवाय ।
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॥१७॥
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वितीर्णलोकत्रयकं पनाय श्रेयांसमश्रस्तरसस्तदानीम् ॥११॥ जलेति-हे जन संसारिन् बलीयसे बलिष्ठाय नव एव शात्रवःतस्मै संसारारये चेद्यदि त्वं जलाखलिं दातुं मनो यस्य तादृशः वर्तसे तदानीमश्रस्तरसः सदानुरागःसन् श्रेयांसं जिनं पनाय स्तुहि | पन व्यवहारे स्तुतौ च इत्येतस्य लोम्मध्यमैकवचनम्। कथंभूतं श्रेयांसं वितीर्ण दत्तं लोकानां त्रयं | तस्मै कं सुखं येन तं ॥ ११॥
॥स्रग्विणीछन्दः॥ . स्वामिनः किनराणां नराणां च ये स्वर्गिणो येसुरैश्वर्यनाजश्च ये।
प्राप्य सर्वेप्यपूर्विकां सर्वदा ते नवत्पूजने वासुपूज्यप्रनो ॥१२॥ खामिन इति-हे वासुपूज्यप्रनो ये।कन्नराणां च ये नराणां स्वामिनः च ये स्वर्गिणो देवाये | ऐश्वर्य नजन्ति ते सर्वेऽपि सर्वदा निरन्तरं नंवतः पूजनं तस्मिन् अहंपूर्विकां प्राप्य येसुः उद्यम चक्रुः यसी प्रयत्ने इत्यस्य लिटः प्रथमबहुवचनम् ॥ १२ ॥
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जि०
॥१७३
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॥ गुणमणिनिकरछन्दः॥ निरुपधिपरहितवितरणनिरत त्वमसमशमधन निधनविरहित ।
विमल विमलतमगुणगणविनवैःसकलजुवनतलवदनतिलकताम् ॥१३॥ निरुपधीति-निर्गता उपधिर्यस्मिन् कर्मणि यथा परेषां हितं तस्य दाने निरतःतत्सम्बुद्धौ ॥ समो गुरुतरःशमःशान्तिः सा धनं यस्य तत्सम्बुद्धौ निधनं मरणं तेन विरहितःतत्संग अतिशयने | विमला गुणास्तेषां गणःसमूहस्तस्य विजुः तत्सं०। हे विमल जिन त्वं सकलं यद् जुवनतलं तदेव | वदनं तस्य तिलकतां विशेषतामैः आगाः। श्णगतावित्यस्य लङो मध्यमैकवचनम् ॥ १३ ॥
॥ वागताछन्दः॥ शीतदीधितिकवारुचिरामा त्वद्गुणावलिरनन्तजिनेश । या न कृत्स्नजगतामपिकुदो मादृशां कथमसौ कलनीया ॥ १४ ॥
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॥१७३॥
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SNINGEN
शीतेति-हेअनन्तजिनेश या तव गुणानामावलिः श्रेणिः कृत्स्नजगतां समस्तजगतामपि कुक्षौ जठरे न अमात् न ममौ । मा माने इत्यस्य बुङःप्रयमेकवचनम् । कथंजूता त्वद्गुणाशाताःदी | धितयो यस्य तस्य चन्द्रस्य कला तद्वत् रुचिरा। असौ त्वद्गुणावलिःमादृशां कथं कलनीया गणयितुं योग्या नवेदिति शेषः ॥ १४ ॥
॥रुचिराछन्दः॥ चिरार्जितासुचरितपित्तजन्मनागुरूप्मणा प्रतिकलमाकुलीकृता।
गिरं पयोमधुरतां निपीय ते शरीरिणो जिनवरधर्म निर्टत्तिम् ॥१५॥ चिरेति-दे जिनवरधर्म हे धर्मजिनेन्छ । शरीरिणो देहिनस्ते तब पयोदुग्धमिव मधुरता माधुर्यं यस्यास्तां गिरं वाणी निपीय सादरं श्रुत्वा निवृत्ति मोक्षमाः । इण् गतावित्यस्य खुङः प्रथमबहुवचनम् । जग्मुः। कथं शरी०चिरमार्जितमसुचरितं पापं तदेव पित्तं तापस्तस्मात् जन्म यस्य तेनोष्मणा धर्मणा प्रतिकलं प्रतिक्षणमाकुलीकृता विधुरतां प्रापिताः ॥ १५ ॥
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varawat
क्रिजि०
Beraprdausaouaranews
॥१७॥
॥ प्रहर्षणीछन्दः॥ संसारे वन इव उर्गतित्रियामाव्यापारस्खलितहशा चिरं जनेन। प्रत्यूषे रविमिव सुदणे न वीक्ष्य त्वां शान्ते प्रकटितउर्गमोदमार्गम् ॥ १६ ॥
संसार इति-हे शान्ते जनेन चिरं संसारे न प्रत्यूषे न स्थितम् वस्निवासे इत्यस्य नावे लिट् प्रथमैकवचनम् ।कस्मिन्निव वने व किंकृत्वा सुतणे प्रधानावसरे रविमिव सूर्यमिव त्वां वीक्ष्य दृष्ट्वा कथंण्जनेन उर्गतिरेव त्रियामा रात्रिस्तस्या व्यापारे स्खलिता दृग् यस्य तेन कथं त्वाम् प्रकटितो दुर्गो दुर्गमःमोक्षस्य मार्गों येन तम् ॥ १६ ॥
॥प्रमिताक्षराछन्दः ।। कृतकर्मनिर्मथन कुंथुजिन प्रयतस्त्वमुज्वलतपश्चरणे । अपि सार्वजोमविनवं तृणवन्नतनैकनाकजनराजगण: ॥१७॥
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॥१७४।
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BEDITANTRVADODo0O/RMEDIASRDSTNAAD
कृतेति दे कृतकर्मनिर्मथन नता न एके नाकजाः सुरा नराश्च यस्मिन् तत्सम्बुद्धौ हे कुंथुजिन वं सार्वनोमस्य चक्रवर्तिनः विनवं तृणवत् तृणमिवाजगणः गणयामासिथ । गण संख्याने इत्यस्य बुङमध्यमैकवचनम् । कथं वं उज्वलं तपस्तस्य चरणं तत्र प्रयतः सावधानः ॥ १७ ॥
॥ शालिनीछन्दः॥ . दान्त्याधार ध्वस्तारमार ज्ञानोदार प्राप्तसंसारपार ।
मुक्तेरि व्यक्तधर्माव तारस्वर्णाकार प्राणिजातं जिनार ।। १७ ॥ दान्तीति-क्षान्त्या आधारः तत्सम्बुद्धौ शस्तो उर्वारो मारः कामो येन तत्सं० ज्ञानेनोदार स्तत्सम्बुद्धौ प्राप्तः संसारस्य पार अन्तो येन तत्सं० मुक्तेर्मोक्षस्य द्वारं यस्मात् तत्सं० व्यक्तो| धर्मोयस्य तत्सं० तारं यत् स्वर्णं तद्वत् श्राकारो यस्य तत्सं० हे अरजिन प्राणिनां जातं समहं अव रद । अव रक्षणे इत्यस्यलोट्मध्यमैकवचनम् ॥ १७ ॥
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क्रि. जि०
1125411
॥ वैश्वदेवछन्दः ॥
गीर्वाणश्रेणीमुक्तमन्दारमालास्त्रस्तं किंजल्कं सर्वतो विस्फुरन्तम् । एतस्मिन्नीले मल्लिनाथ त्वदङ्गे प्रातस्त्यं जानोव्यमनीव प्रतापम् ॥१॥ - एतस्मिन् तवाङ्गे सर्वतो निखिलाङ्गोपाङ्गेषु विस्फुरन्तं किंजल्कम् परांग ईमे स्तुवे श्रमितिशेषः इक् स्तुतावित्यस्यल कुत्तमैकवचनम् मलयोननेद इति कारस्थाने लकारः किभूतं किंजल्कम् गीर्वाणानां देवानां श्रेणी राजिस्तया मुक्ता मन्दाराणां कल्पतरूणां माला स्त्रक् तस्यास्त्रस्तं पतितम् कस्मिन्निव नीले व्योमनि श्राकाशे कमिव प्रातस्त्यं प्रातःकालीनं मानोः प्रतापमिव ॥ १९ ॥
|| प्रबोधिताछन्दः ||
मृगनासिनानितां रुचा वपुषस्त्वं यदि सुव्रत प्रजो । ननु निर्मम निर्मलात्मना मुपमानत्वमुपागतः कथम् ॥ २० ॥
क्रिजि०
।। १७५ ।।
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NDIANEDENIEarnasamavasacan
मृगेति-हे निर्मम सुव्रत प्रनो मुनिसुव्रत जिन यदि त्वं रुची कान्त्यां मृगनानेः कस्तूरिकायाः सनानितां साम्यं अपुषः पुष्टिमकार्षीत् । पुष्पुष्टावित्यस्य बुङ्मध्यमैकवचनम् । ननु निश्चितं निर्मलः आत्मा वपु र्येषां तेषामुपमानत्वमधिकगुणत्वं कथमुपागतः प्राप्तः ॥ २० ॥
॥वैतालिकाछन्दः॥ भवतःक्रमाङ्गलिनखावलीनिर्गतैरजनीश्वरोज्वलतरैःप्रनाजालकैः । जगवन्नमे नमनशालिनां मौलिषु स्मितमालतोकुसुममालिकालङ्कतिः ॥२१॥
जवत इति-हे लगवन्नमे नमिजिन नमनेन शालन्ते शोजन्ते तेषां मौलिषु नवतस्तव क्रमयोः पादयोरङलयस्तेषां नखावली तस्या निर्गतानि तैः प्रनायाः जालकानि समूहाः तैः स्मितानि विकसितानि मालत्याः कुसुमानि तेषां मालिका श्रेणिः तस्या अलङ्कतिरजनि । जनी प्रापुर्जावे इत्यस्य खुप्रथमैकवचनम् । कथं प्रना० ईश्वरः शंजुः तत् उज्वलतरैः विशदैः ॥१॥
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क्रि.जि०
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॥१७६।
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॥ हरिणीछन्दः॥ नियतमिति नो मिथ्यावादाः स्मरं सद तृण्णया यदसि विमुखो राजीमत्यामथापि नृपश्रियाम् । कथमिव ततःस्वामिन्नेमेरतो विरतिस्त्रियाम्
शिवपदपुरीसाम्राज्याप्ती नृशं च समुत्सुकः ॥२२॥ नियतमिति-हेस्वामिन्नेमे नियतं निश्चितमिति नो मिथ्या नासत्यं यद् असि त्वं राजीमत्यां अथापि नृपश्रियां विमुखः पराङ्मुखःसन् तृष्णया सह स्मरं काममवादाःअखएमयः दो अवखएमने इत्यस्य बुङः मध्यमैकवचनम् । ततस्तर्हि शिवपदपुरीसाम्नाज्यस्य मोक्षस्थानपुरीचक्रवर्तित्वस्याप्तो प्राप्ती नृशमत्यर्थं समुत्सुकः सन् विरतिरेव स्त्री तस्यां कथमिव रतः ॥ २५ ॥
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॥ शार्दूलविक्रीडितम् ॥ नर्ता नोगनृतां मणिप्रणयवान् यन्मूर्धनागे शुनध्यानाग्नेःकलयन् स्फुलिङ्गशवलं धूमोजमामम्बरम् स त्वं पार्श्व विशुद्धवैनवनिधेऽव्याधूतनूतग्रह
ग्रामस्थाम सुनामधेय जगवन् विघ्नोपनिनं जनम् ॥२३॥ नतेति-हे विशुद्धवैनवनिधे धूताःनूतग्रहा येन तत्सम्बुद्धौ हे ग्रामस्थाम समग्रबल हे सुनामधेय हे नगवन् पार्श्व सः त्वं विघ्नानामोघः समूहस्तस्य निघ्नःपरवशस्तं जनमव्याः पालय अव रक्षण इत्यस्याशिलिङ्मध्यमैकवचनम् । यस्य मूनों नागे मणौ प्रणयोस्ति यस्य स नोगनृतां सर्पाणां नर्ता | धरणेन्योऽशुन्नत् । किंकुर्वन् धूमोजमस्यामम्बरो यस्मिन् तं ध्यानाग्नेः स्फुलिङानां शवलं कलयन् तुलयन् ॥ १३॥
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क्रि. जि० ॥ १७७॥
॥ स्रग्धराछन्दः ॥
आत्मन्युद्भूतरागे ऽविशदतरल सद्ज्ञानलक्ष्मीर्यदीये यस्मिन् कल्पद्रुरूपे प्रणयमुपगतैः स्वेषु वेश्माङ्गणेषु । यः पादाग्रेण मेरुं दितिधरमधुना देव देवं पुमांसोऽ जीतत्राणैकतानं व्यसनशतविनाशाय तं वर्धमानम् ॥ २४ ॥
आत्मनीति - हे पुमांसः व्यसनानां दुःखानां शतं तस्य विनाशाय त्राणे रक्षणे एकतानः एक तत्परस्तं देवं वर्धमानमनीत स्तुत एव निश्चितं यो वर्धमानः पादाग्रेण मेहं दितेर्धरमधु नात् यदीये वर्धमानसम्बधिन उडूतरागे श्रात्मनि देहे न तरला सद्ज्ञानस्य लक्ष्मीः अविशत् यस्मिन् वर्धमाने प्रणयं स्नेहमुपगतै र्नरैः स्वेषु वेश्मनामङ्गणेषु कल्पटुः ऊपे उप्तः । अत्र चतस्रः क्रिया गुप्ताः ताश्चयथा अजीत अनि उपसर्गपूर्वक इक् स्मरणे इत्यस्य लोट् मध्यमबहुवचनम् । अधुनात् धुञ् क
क्रि. जि०
॥ १७७॥
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म्पने इत्यस्य क्रयादेर्लङ् प्रथमैकवचम्। अविशत् विश् प्रवेशने श्यस्य तुदादेर्लप्रथमैकवचनम्। ऊपे टुवप् बीजसन्ताने इत्यस्य कर्मणिलिट्प्रथमैकवचनम् ॥ २४ ॥
॥ शार्दूलविक्रीडितम् ॥ इत्थं तीर्थकृतां ततेस्त्रिनुवनश्रोमौलिलोलास्रजो विज्ञान सागरचन्द्र इत्यनिधया लब्धप्रसिदिः स्तुतिम् ॥ सर्वाङ्गं परितन्वती सुमनसा मानन्दरोमोजमं
नानाटत्तनिवेशपेशलतरैर्युक्तां क्रियागुप्तकैः ॥ २५ ॥ थमिति । विद्वान् इत्थं पूर्वोक्तप्रकारेण तीर्थकृतां तीर्थकराणां ततेः श्रेण्याः स्तुतिमानन्द चकार । अति अदि बन्धने इत्यर्थस्य लिट्प्रथमैकवचनम् । कथं० विद्वान् सागरचन्ड इत्यनिधया नाम्ना लब्धा प्रसिद्धियेन । कथं० स्ततेस्त्रिजुवनश्रीमौलिलीलास्रजः कथं स्तुतिम् सुमनसां विषां
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मस्तु
॥१७८
सर्वाङ्गं रोम्णामुजमस्तं परितन्वती विस्तारयन्ती पुनः कथं नानावृत्तानां निवेशस्तेन पेशलतराणि ||मस्तु रम्यतराणि तैः छन्दोनिरितिशेषः कथंजूतैः गुप्ता क्रिया येषु तानि तैः युक्ताम् ॥ २५॥
इतिश्रीमन्नागपुरीयवृहत्तपागाधिराजयुगप्रवरप्रखरपएिमतसमाराधिताचार्यश्रीपार्श्वविधुसू. रीश्वरसंतानीयमहामहोपाध्यायश्रीसागरचन्द्रमुनिराजेन कृता क्रियागुप्तवृत्तैः श्रीचतुर्विंशतिजिनस्तुतयस्समाप्ताः॥
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॥ श्रीमहावीरस्तुतिः॥
॥ भुजङ्गप्रयातम् ॥ ___ जगत्कल्पना कल्पवृक्षोपमानं लसत्केवलज्ञानलक्ष्मीनिधानम् ॥ महानन्दशोनाकरं स्वर्ण- ॥१७८३ | देहं सदा श्रीमहावीरदेवं स्तुवेऽहम् ॥ १ ॥ तपोलब्धिसंप्राप्तसंसारपारं हतानेकरिनावारिवारम् ॥ शुनध्यानतेजोजितानङ्गदेहं सदा श्रीमहावीरदेवं स्तुवेऽहम् ॥ २॥ सुराणामधीशै रलं | ||
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सेव्यमानं त्रिलोके नवं जूरिविस्तीर्णदानम् ॥ नमन्नाकिनागेन्द्रसंपूज्यदेहं सदा श्रीमहावीरदेवं स्तुवेऽहम् ॥ ३ ॥ विषव्यालवेतालदोषैरजेयं सदानोगसौभाग्यन्नागैरमेयम् ॥ कृताशेषनव्या लिमाङ्गल्यगेहं सदा श्रीमहावीरदेवं स्तुवेदम् ॥ ४ ॥ एवं महावीरजिनाधिराजं जक्त्यानिशं येनविनः स्तुवन्ति ॥ कल्याणमालाकलितं त्रिलोके ते शाश्वतं सौख्यन्नरं लनन्ते ॥ ५ ॥ इति श्रीमनागपुरीय वृहत्तपागछाधिराज श्रीपार्श्वेन्दुसूरिकृता श्रीमहावीरस्तुतिः समाप्ता ॥ ॥ श्रीपार्श्वनाथस्तुतिः ॥
॥ भुजङ्गप्रयातम् ॥
जगन्मएकले मस्यमालानिधाने प्रधाने सुदेशेऽवतीर्णः सुरडुः ॥ कृपालुः स्थितो जालपादे पुरेऽस्मिन् मनोवांछितार्थप्रदः पार्श्वनाथः ॥ १ ॥ प्रस्त्वं मया वीक्षितो नक्तिनाजाधुनालोचना नन्दराकेयराजा ॥ विजेजीयसे तीर्थनाथः सुपाथस्तमः पङ्कसंहारिणे शुद्धगाथः ॥ २ ॥ जिनाधीश ते मूर्ति रेषेन्डुरेखा यशः शालिनी पन्नताशेषलेखा ॥ प्रमोदं विधत्तेऽनिशं नाथ चेतश्वकोरस्य मे
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पार. तो०
॥१७९.
ऽत्यद्भुतं दृष्टमेतत् ॥ ३ ॥ प्रजुस्त्वं गुरुस्त्वं पिता त्वं त्वमम्बा सखा त्वं सुबन्धुः शरण्यो वरेण्यः ॥ नवात्तारको वारकोऽमित्रजीते स्त्वमेव त्वमेव त्वमेव त्वमेव ॥ ४ ॥ जनोयं तवादेशवर्ती पुरस्थो नियोज्य स्ततो नो वियोज्यः कदापि ॥ सदा किंकरस्ते प्रनो पार्श्वचन्द्रः करोतीतिविज्ञप्तिमेतां वितन्द्रः ॥ ५ ॥ इति श्रीजैन श्वेताम्बराचार्य श्रीपार्श्व चन्द्रसूरिकृता श्रीपार्श्वनाथस्तुतिः समाप्ता ॥
॥ श्रीपार्श्वनाथस्तोत्रप्रारम्भः ॥
प्रणम्य परमात्मानं श्री पार्श्व तव दर्शनात्
पवित्रयामि सद्योदं म्लानवासो जलादिव ॥ १ ॥
प्रणम्येति - प्रकर्षेण नम्यते इति तत्सम्बुद्धौ परा प्रधाना मा लक्ष्मीर्यस्य तत्सम्बुद्धौ हे श्रीपार्श्व अहं सद्यः म्लानवस्त्रं जलादिव तव दर्शनात् आत्मानं पवित्रयामि निर्मलं करोमि ॥ अनुष्टुप् ॥१॥
पा. स्तो०
॥ १७९ ॥
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चरीक्रति नमस्कारं बाल धीवृद्धिसि ये
श्रीमत्पार्श्वजिनेन्शाय तेषां जन्म फलेग्रहि ॥२॥ चरोक्रतीति-हे वाल हे मूर्ख धियोबुध्या वृद्धिराधिक्यं तयासिद्धस्तत्सम्बुद्धौ हे पमित ये | पुरुषा श्रीमत्पार्श्वजिनेन्द्राय नमस्कारं चरीक्रति अतिशयेन नूयोजूयः प्रणामं कुर्वन्ति तेषां जन्म | फलेग्रहि सफलम् तत्रमूर्खपमितविवदा न कर्तव्येत्यर्थः ॥ ॥
जस्थितस्तव घाताय श्रीवामानन्दनो जिनः
सारस्वतीमजुं कुर्वे गतिं त्रस्ते सतां न सा ॥३॥ जस्थित इति-: कामस्तत्संबुद्धौ हे काम श्रीवामानन्दनो जिनः पार्श्वनाथस्तव घाताय | विनाशाय उत्थितः। श्रत ऋजुं सरलां सारस्वती समुषसंबन्धिनीं गतिं कुरु विधेहि यतःसतां सजनानां त्रस्ते जने सा गतिर्ननवति इति विचिन्त्य समुद्रे प्रविशेत्यर्थः ॥ ३ ॥
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पा. स्तो०
॥ १८० ॥
देवसेने सन्ताराधनं तावकं विना विदधानोपि नासि इयेत् प्रक्रियां नातिविस्तराम् ॥४॥
हे श्राश्वसेने इति-अश्वसेनस्यापत्यमाश्वसे निस्तत्सम्बुद्धौ हे श्रीपार्श्व तावकं त्वदीयं सिद्धाताराधनमागम पर्युपासनं विना ना पुरुषोऽतिविस्तरां महतीमुत्कृष्ठां क्रियां विदधानोपि कुर्वाणो ऽपि न सिद्धयेत् मुक्तिं न याति ॥ ४ ॥
इन्द्रादयपि यस्यान्तं फणिनां त्वमनुग्रहात् कृतवानुत्तमं तस्य युक्तं क्रमचणो जव ॥ ५ ॥
इन्द्रंति - फणिनां सर्पाणामिन्द्र हे धरणेन्द्र त्वमदयोपि निर्दयोऽपि यस्य श्री पार्श्वस्यानुग्रहात् प्रसादात् अन्तं मरण (मुत्तमं देवगतिं प्राप्य) कृतवान् तस्य श्रीपार्श्वस्य क्रमचणः चरणसेवको जव इति युक्तं सांप्रतम् ॥ ५ ॥
पा. स्तो०.
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पारदृश्वा शुनोदर्को नययुः शब्दवारिधः
ऋभिवृद्धिनिधिःसिद्धिं भजते पार्श्वसेवकः ॥ ६॥ पारदृश्वेति-पार्श्वस्यसेवकः श्रीपार्श्वनाथस्योपासकः सिद्धिं शहनवेऽणिमादिकं परनवे मुक्तिं नजते प्राप्नोतीत्यर्थः । कीदृशः शब्दवारिधेः शब्दसमुजस्य व्याकरणस्य उपलक्षणत्वात् सर्व शास्त्रस्य पारदृश्वा पारगामी नवति पुनः की० शुनः उदर्कः उत्तरकालो यस्य पुनः की० नययुः नयंयातीति नयवत्सलः पुनःकी ऋद्धिवृद्धिनिधिः ऋद्धिवृध्योःसमद्रः ॥६॥
पादप्रसाद पार्श्व स्य श्रीमतो हि ममैनस:
प्रक्रियां तस्य कृत्स्नस्य यस्मात् क्वेशो जव नवे ॥ ७ ॥ पादेति-हे पार्श्व हे पादप्रसाद हि निश्चितं श्रीमतो विद्यमानस्य कृत्स्नस्य तस्य ममैनसः मम पापस्य प्रक्रियां दुःखोत्पादनरूपां क्रियां स्य अन्तंकुरु । षोन्तकर्मणीत्यस्य देवादिकस्य लो
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पा. स्तो० !
॥१८२॥
मध्यमैकवचनम् - यस्मादेनसः पापात् नवे नवे क्लेशो भवतीतिशेषः ॥ ७ ॥ सुधान्धसां गुरुः पारं येषां नाप समायुषा
तान् गुणान् पार्श्वदेवस्य कमो वक्तुं नरः कथम् ॥ ८ ॥ सुधेति-सुधाऽमृतमन्धोऽन्नं येषां तेषां देवानां गुरुः बृहस्पतिः येषां गुणानां पारं तीरं समायुषा संपूर्णेन जीवितेन न प न लेने तान् पार्श्वदेवस्य गुणान् वक्तुं नरः कथं क्षमः शक्तः नवेदितिशेषः ॥ ८ ॥
इति श्रीमान् जिनः पार्श्वे जीरावली पुरीप्रभुः ॥ फणितः पार्श्वचन्द्रेण नूयाद् भूरिविनूतये ॥ ए ॥ इतीति- स्पष्टार्थः नवरं फषितः स्तुतः इति ॥ ए ॥
इतिश्री जैनाचार्य श्री पार्श्वचन्द्रसूरिराजकृतं पार्श्वनाथस्तोत्रं संपूर्णम्
पा. स्तो०
॥१८२॥
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ranspace/Sapnearesasuparuvanes
॥ श्रीपुद्गलपरावर्तस्तवः॥ श्रीवीतराग जगवंस्तव समयालोकनं विना ऽनूवन् ॥
जव्ये क्षेत्रे काले जावे मे पुजवावर्ताः ॥ १ ॥ श्रीवीतरागेति-हे श्रीवीतराग हे नगवन् मे मम पुजलानामावर्ताः परावर्ता श्रवन् कस्मिन् विषये प्रव्ये द्रव्यविषये क्षेत्रे क्षेत्रविषये काले कालविषये नावे नावविषये कथमनूवन् तव समयस्य सिद्धान्तस्यावलोकनं विचारणं विना ॥ आर्याबन्दः॥ १ ॥
मोहप्ररोहरोहान्नट इव नवरङ्गसङ्गतः स्वामिन् ॥
कालमनन्तानन्तं ब्रान्तः षट्कायकृतकायः॥२॥ मोहेति-हे खामिन् (अहं ) ब्रान्त एकस्मानवाद् द्वितीयादिषु प्राप्तः नवः संसार एव है।
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रङ्गो नाय्यस्थानं तत्र संगतः स्थितः कस्मात् मोहोऽज्ञानं सएव प्ररोहोङ्करस्तस्य रोदो वृद्धि स्त- ||8|| प. पु. || स्मात् कश्व नटश्व कियन्तं कालं ब्रान्तमनन्तानन्तं कालं सिद्धान्तनाषया सर्वत्रचतुःपल्यदृष्टान्ते||| नानन्तं शेयम् । किंनूतः षट्सु पृथ्व्यादिषु कायेषु कृतः कायं शरीरं येन सः ॥५॥
__ औदारिकवैक्रियतैजसनाषाप्राणचित्तकर्मतया ॥
सर्वाणुपरिणतो मे स्थूलोऽनूत् पुद्गलावर्तः ॥ ३ ॥ श्रौदारिकेति-ौदारिकपुजलपरावर्तश्चतुर्की व्यतः देवतः कासतो नावतश्च एकैकोपि द्विधा सूदमबादरनेदतः । औदारिकशरीरेण वैक्रियशरीरेण कार्मणशरीरेण वा नाषान्नप्राणचितैर्वा सर्वान् चतुर्दशरज्जूगतपरमाणून् परिणतः। औदारिके दिनसप्तकेन स्पृशति तदा मे मम || पुजलावर्तः स्थूलः अव्यस्थूलोऽजूत् ॥ ३॥
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DDESSOCTOB000
117
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Sarasveegereleavageance/PGDeeweetsdevasanp/se
तत्सप्तकैकैकैन समस्तपरमाणुपरिणतेर्यस्य ॥
संसारे संसरतः सूक्ष्मो मे जिन तदावर्तः ॥ ४॥ तदिति-तस्यौदारिकादेः सप्तकं तस्य एकैकेन संसारे संसरतो गलतो यस्य समस्तानां परमाणूनां परिणतिाप्तिस्तस्याः (सर्वान् परमाणून् आत्मा संस्पृश्य ५ मुञ्चति प्रकारान्तरेण | प्रस्तावापन्नत्वात् शरीरादिचतुष्टयेन सर्वान् लोकाकाशपरमाणून् क्रमाक्रमान्यां संस्पृष्टा २ मञ्चति | तदा) हे जिन मे तेषां पुजलानामावतः द्रव्यपुजलपरावर्त सूक्ष्मः ॥४॥
निःशेषलोकदेशान् नवे नवे पूर्वसंनवैर्मरणः ॥
स्पृशतः क्रमाक्रमान्यां क्षेत्रे स्थूल स्तदावर्तः ॥५॥ नशेषेति-निशेषा लोके चतुर्दशरज्वात्मके देशा प्रदेशा स्तान् नवे नवे पूर्वसंनवै मरणैः | || कृत्वा क्रमोऽनुक्रमोऽक्रमो व्यतिक्रमस्तान्यां स्पृशतः ( स्पृशति तदा) क्षेत्रे स्थूलस्तेषामावर्तः
Poravasare/aGVARG/GOOOOGookGanga
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प०
॥१८३॥
Velamoroustiavanaom/Aawnance/ekamvaavaasna
| क्षेत्रस्थूलपुजलपरावर्तः स्यात् ॥ ५॥
प्राग् मृत्युनिः क्रमेण च लोकाकाशप्रदेशसंस्पर्शः
मम यो जनि स स्वामिन् देत्रे सूक्ष्मस्तदावर्तः ॥६॥ प्रागिति-(यदायात्मा) लोके श्राकाशप्रदेशाः तेषां संस्पर्शः क्रमेण प्रागमृत्युजिर्वा नवती| तिशेषः ( यावता कालेन स्पृशति) तत्र मम योऽजनि जातः सः हे खामिन् क्षेत्रे सूक्ष्मस्तेषामावर्तः | क्षेत्रसूक्ष्मपुजलपरावर्तः स्यात् ॥ ६॥
मम सकलकालसमयान् संस्पृशतोऽतीतमृत्युनिाथ ॥
अक्रमतःकमतश्च स्थूलः काले तदावर्तः ॥ ७ ॥ ममेति-हे नाथ सकंलाः कालस्योत्सर्पिएयवसर्पिण्योः समयास्तान् अतीतमृत्युनि मरणैः || She क्रमाक्रमाभ्यां संस्पृशतो मम (जीवस्य ) स्थूलः कालपुजलपरावर्तः स्यात् ॥ ७ ॥
meance/amastDAEOraoratoanawanemendra
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S/AaavaneaouravotpatwasnaanavsPMAVATMIDASHOKA
क्रमतस्तानेव समयान् प्राग्नूतै म॒त्युनि: प्रनूते में ॥
संस्पृशतः सूक्ष्मोईन कालगतः पुजलावर्तः ॥ ॥ क्रमत इति-(कश्चन जीवोऽवसर्पिण्याः प्रथमसमये मृतस्तत्सदृशावसार्पण्या अनन्तरे द्वितीये समये यावता कालेन म्रियते स समयो लेखकै गण्यते नान्यःएवम्) तानेव समयान् अवसर्पिएयुत्सर्पिण्यो ईयोरपि समयान् जीवस्य क्रमेण प्राग्जूतैः प्रजूतै मरणैः संस्पृशतः मे मम हे अईन् सूक्ष्मः कालपुजलपरावर्तः स्यात् ॥ ७॥
___ अनुनागबंधदेवन् समस्तलोकादेशपरिसंख्यान् ॥
घियतःक्रमाक्रमाच्या नावे स्थूलस्तदावर्तः ॥॥ अनुनागेति-पूर्वं सूक्ष्मानिकायेषु ये पृथिव्यादयो जीवाः प्रविश्यमाना एकस्मिन् समये सन्ति | ते ऽसंख्याता क व चतुर्दशरज्जुगताकाशप्रदेशतुख्या ते जीवा झेपा यतः “एगसमयम्मि
ANDARDARDetoup
DAGDPGDaका
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१०
॥१८॥
PRVAINEEVANVelavalesavitewide-
| खोए सुहुमजीवा जे पविस्सन्ति। ते ढुंतसंखलोए पएस तुला असंखिज्जा” एकस्मिन् अङल
नूमिस्थाने असंख्याता श्राकाशप्रदेशा झेयाः यतः "सुहुमोथ होइकालो तत्तो सुहुमयरं हवा खित्तं | अंगुलसेढीमित्ते उसप्पिणिड असंखिज्जा ” तेन्योपि पृथिव्यादिजीवेन्यः सूक्ष्माग्निदेहे पूर्वप्रवि
या पृथिव्यादयः सन्ति ये जीवास्तेजीवा प्रविश्यमानजीवेन्यः पूर्वप्रविष्टा असंख्यातगुणेनाधिकाः। पूर्वप्रविष्टेच्योपि जीवेन्योसंख्यात गुणेनाधिकाः सूक्ष्माग्निकायिकानां कायस्थितिः असंख्यातं कालं यावद्वन्हिकाये उत्पद्यते पुनर्मुत्युः पुनरुत्पत्तिरेवमसंख्यातं कालं यावत्झेयम् अग्निका| यिकेन्योऽ संख्यातगुणेनाधिकानि संयमस्थानानि तेन्योपि नानाजीवानाश्रित्य वा संयमपरिणा माःसंयमन्नेदाः । समस्तलोकाकाशप्रदेशपरिसंख्यान् अनुनागबंधहेतून क्रमाक्रमान्यां म्रियतो नावस्थूलपुजलपरावर्तःस्यात् । अनुनागबन्धस्थानानिच प्रत्येकं २ असंख्यातगुणेनाधिकानि सं-|||॥१८४॥ | यमपरिणामा अनुनागबन्धाश्च तत्तुल्या नवन्ति अष्टानां कर्मपरमाणूनां ये रसा नेदास्ते असंख्याता | वर्तन्ते तान् कर्मपुजलान् रसविशेषान् निबध्य २ स्पृष्ट्वाश् मुञ्चति तदा बादरनावपुजलपरावर्तःस्यात् ||
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vanistan/totaasD AAADATANDARDEDD/EDA
प्राङ्मरणे:सर्वेषामपि तेषां यः क्रमाक्रमेण संश्लेषः
नावे सूक्ष्मः सोनूजिनेश विश्वत्रयाधीश ॥ १० ॥ ___ प्राङिति---एकैकं कर्मपुजलरसन्नेदं स्पृष्ट्वा तदनु द्वितीयम् इतिक्रमेणाष्ठरसकर्मपुजलान् सर्वान् । क्रमेण स्पृष्ट्वा मुञ्चति तदा हेविश्वत्रयाधीश जिनेश सूक्ष्मो नावतःपुजलपरावर्तःस्यात् ॥१०॥
॥ शार्दूलविक्रीडितम् ॥ नानापुलपुजलावलिपरावर्ताननन्तानहं । . पूरं पूरमियच्चिरं कियदशं बाढं दृढं नोढवान् ॥ दृष्ट्वा दृष्टचरं जवन्तमा न्यार्थयामि प्रनो।
तस्मान्मोचय रोचय यःश्रियं प्रापय ॥१२॥ नाना-हे नाथ अशं असुखं उढवान् न प्राप्तवान् किंकृत्वा नाना अनेके
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आ. चै० ॥१८५
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|| पुजलाःकाल विशेषास्तेषां पुजलानां तसंखलोए पास्तासां श्रेणीनां परावर्ता गृहीतपूर्वमोच-|
नानि तान् पुनःकिः अनन्तान् अनन्ततः यतः “सुहात् एतत्परिमाणं चिरकालं पूरयित्वा | हे प्रनो अधुना नवन्तं दृष्ट्वा नक्त्याऽर्थः तेन्योथियामि किंवि० पूर्व दृष्टो दृष्टचरस्तं किं प्रार्थ|| यामि तदेवाह तस्मादसुखात मोचय खचरणं रोचय श्रेयसो मोक्षस्य श्रियं प्रापय ॥ ११ ॥ | तश्री वृहत्तपागलाचार्ययुगप्रधान सूरीश्वरकृतः पुजलपरावर्तस्तवः संपूर्णः ॥
॥आदिजिनचैत्यवन्दनम् ॥ जयत्यादिमतीर्थेश स्त्रिलोकीमङलद्रुमः ॥ श्रेयःफलं सदालोका यथा लोकाऊपासते ॥ १॥ श्रीमन्नान्निकुलादित्यमरुदेव्यङज प्रनो ॥ संसाराब्धिमहापोत जय त्वं वृषनध्वज ॥२॥ नमस्ते । | जगदानन्द मोक्षमार्गविधायक ॥ जैनेन्ज विदिताशेषनाव तद्नावनायक ॥ ३॥ प्रदीणाशेष
॥१८५॥ | संस्कार विस्तार परमेश्वर ॥ नमस्ते वापथातीत त्रिलोकनरशेखर ॥४॥ नवाब्धिपतितानन्तसत्वसंसारतारक ॥ घोरसंसारकान्तारसार्थवाह नमोस्तु ते ॥५॥ इत्यादिजिनचैत्यवन्दनम् ।।
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Panveranamanuevonp/new/DEmaanpappeneone
॥ श्री शंखेश्वरपार्श्वनाथस्तुतिः॥ (त्रिनडी बन्दः) शिवसुखदातारं विश्वाधारंसौख्याकारं नेतारं जितमदनविकारं करुणागारं हत| रिपुवारं जेतारम्॥ कृतनवनिस्तारं परमोदारं स्तवनापारंत्रातारं, गुणपारावार कीर्तिस्फारं केवलधार । धातारम्॥१॥आनन्दासक्तं तोषितनक्तं उद्मवियुक्तं सुव्यक्तं, मदमत्सरमुक्तं तारणसक्तं विषयविरक्त शिवरक्तम्॥अव्याहतन्नधैर्यगिरी क्षमासमुद्रं सन्मुझं, मुखनिर्जितचन्दं प्रणतसुरेन्दं महामु. नी निस्तन्त्रम् ॥ ॥ सुखदायिस्मरणं पुखितशरणं वन्दितचरणं विगतरणं, कृतदानोधरणं | कलिमलहरणं विमलीकरणं प्रवरपदम् ॥ प्रकटीकृत विनयं दर्शितसुनयं प्रवचननिलयं सुगुणमयं ह्यगणितगुणनिचयं मुनिजनहृदयं पार्श्वजिनं च पितनयम् ॥ ३॥ इतिश्रीशंखेश्वरस्तुतिः ॥
॥श्री पार्श्वच शकस्तवाष्टकम् ॥ चतुरशीतिगणाधिकविश्रुता दर्गदम्बकपकिताः । निविमसंयमसाधनतत्परा | गुरुतपोगणनारधुरंधराः ॥१॥ श्रम वासव प्रकरगीतगुणा विशदाशयाः ॥ श्रनु
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| चरेप्सितदानसुरद्रुमा विजयिनो गुरवः ॥२॥ वाक्यं यदीयं प्रथितं प्रधानं चारुत्वः माधुर्यसुधासमानम् ॥ नानाविधग्रन्थरसादौ तदीयो प्रणमामि कामम् ॥३॥ ग्रामे || | श्रीपुरनेदने जलनिधौ कान्तारदुर्गे वटे, सं गणे बिलेशयमुखे शार्दूलनीराग्निषु ॥ इत्येवं विषमस्थलेषु पुरुषा ध्यायन्ति ये नावतस्तेषांख्यकरा नवन्ति गुरुवः श्रीपार्श्वचन्ता वराः ॥४॥ रोगाम्लोवन्हिनागाहवकरिमृगपावन्धमातङसंख्यक्रूराघातङ्कवर्गाः स्मरणसुकरणान्नामधेयस्य । साधोः ॥ श्रीमत्पार्श्वेन्फुसूर्दिनकर किरणाधान्तवारा यथोग्राः सर्वे यान्त्याशु नाशं शिवसुख- || निवहाः सुन्दराः संजवन्ति ॥ ५॥ आराधितो देवमणिर्ददाति चित्तेष्टासधि खवु सेवकानाम् , तस्मादलं श्रीगुरुपार्श्वचजः खान्तप्सितं पूरयतीह सद्यः॥६॥ मुण्णाति दुःखानि शिवं तनोति पुष्णाति || | शर्माणि रमां चिनोति ॥ कीर्ति प्रसूते विदधाति धर्म श्रीपार्श्वचन्द्रामलसूरिनाम ॥ ७॥ कल्याण
राजीवनतोयदानान् नव्यात्मनां, 'वाछितदत्तलानान् ॥ श्रीसाधुरत्नोदितशिष्यशिष्टान् संस्तौमि II निप्रेमचन्द्रः ॥ ७ ॥ इति श्रीपार्श्वचन्द्रसूरीश्वरशक्रगुरुस्तवाष्टकं संपूर्णम् ॥
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धर्मैक्यता कायम थार्ज,
जूदा जूदा धर्मानुयायि मां रसपरस देखतो धर्मदेव दूर था, प्रातृभाव स्थापित था, सादसंप कायम रहो ने दुर्गुणो दूर थइ सद्गुणोनो संचार यार्ड,
दुनियारमां यास्यनो नाश थार्ड, उद्यमनी वृद्धि थार्ज, विद्यानो विकाश था, सत्यनो प्रकाश था, ने ए रीते धर्मनो जय था,
विनी प्रजापणा करतां आगळ वधो, आपणा करतां वधु ज्ञान मेळवो, आपणा करतां वधु सत्य शोधन करो, किं बहुना, आपणा करतां बळ -बुद्धि, विद्या-कळा, विज्ञान-वैभव, सुख-संपत्ति, रंग-रूप, होंस - हिम्मत वगेरे तमाम रूमी बावतोमां आगल आगल वधीने आपणा करतां वायु जोवो, ते आपणां मूकेलां अधूरां कामाने परिपूर्ण करो तथा आप स्वते पण नहि जोली अजब शोधो करीने जगद्- विख्यात था,
वीर !
वीर !
वीर !
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- आशिर्वाद. - जगत्मा रहेला तमाम जीवो सुख पामो, तेमना- तमाम सुःख दूर था, अने ते मां सत्यज्ञाननो प्रकाश था,
धर्मशास्त्र अने सायन्स ( सिद्धपदार्थ विज्ञानशास्त्र )नो ज्या परस्पर विरोध पमतो होय, तेवा स्थळे धर्म शास्त्रोमां वपरायली गुप्त (सांकेतिक) नाषा लकमां लश् तेना सम्यक् अर्थ करवा माटे खरेखरा बुद्धिमान् महापुरुषो आमंमळपर अवतरो, जे बांधळी श्रद्धाए न दोरातां खरं सत्य शोधीने सत्यनेज कायम राखवा दरेक धर्मशास्त्रनी गुप्त वाणीना ने ते देशकाळने अनुसरता घटित अर्थ बतावीने जनमंमळमां व्यापी रहेला मिथ्यात्व ( जूठ अने व्हेम )नो उल्लेदन करो, ____ धर्मविरोध दूर थाउँ, सघळा धर्मोमां दयानो महिमा दृढमूळ था, सघळा धर्मोमां सत्यनां मूळ शोधाउँ, अने ते रीते सघळा धर्मो दया अने सत्यना मजबूत पायापर स्थापित
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________________ CSK श्री सुरदीपिकादि प्रकरण संग्रहतल ग्रन्थः समाप्तः