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________________ स्व.00 Supritsavna स्त.पं. ११४॥ /aupace | बंध ने उदय उदीरणा, सत्तातणो विचार ॥ मूल आठ अमवन्नसय, उत्तर पयमी धार॥१॥ नाण | दसण नाण सण तासु आवरण, वेदनी मोहनी आउखु, नाम गोत्र अंतराय जाणो॥ पट प्रति- || | हार खमंग सरिस मद्य निगम चित्रकर समायो॥ कुंनकार मारिसम, अनुक्रमे आठ वखाण; मिथ्या अविरति कषाय योग, बंधहेतु चउ जाण ॥२॥ इति वस्तुबंदद्धयं ॥ ढाल. केशी बाव| नीनी ॥ प्रकृति स्थिति अनुनाग, प्रदेश बंध चिहुं प्रकारे ॥ प्रकृति सुन्नासुननो खन्नाव; स्थिति काले अवधारे ॥ नाण सण आवरण; वेदनी अंतराय चार ॥ ए चिहुंनी स्थिति सायर; त्रीस कोमाकोमी धार ॥ मोहनी सित्तरि नाम; गोय वीसवीस कोमाकोम ॥ सागर तेत्रीस श्राउखा; उत्कृष्टि नही खोम ॥ ३ ॥ जघन स्थिति बह कर्म तणी, अंतमुहुत्त नणीजे, नाम गोत्रनो जघ न्य बंध, आठ मुहुत्त सुणीजे ॥ वेदनी मुहुत्त बार, केश् जघन्य वखाणे ॥ आचारज मत अंतर एह गीतारथ जाणे ॥ रसबंध एकछिक त्रिगुण, श्रादें प्रदेश ते अल्प बहुत ॥ मूल प्रकृति एपीपरे कही, उत्तर सुणो जुहुत्त ॥४॥ मतिश्रुत ओही मणहनाण, केवल थावरण ॥ ग्यानाव /S ANTD/0 ११४॥ /B /AIDYA
SR No.600329
Book TitleSurdipikadi Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurvacharyadi, Mangaldas Lalubhai
PublisherMangaldas Lalubhai
Publication Year1913
Total Pages412
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size29 MB
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