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NIWANANTARAVAN
सूत्र १७
जीमहाराजकूता
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बालब्रह्मचारी
शि पंडित मुनि श्री अमोलक ऋषिकी
48 हिन्दी भाषानुवाद साहित. - चन्द्र सूर्यप्रज्ञप्ति सूत्र
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NAYANAYNAVAYANAYANAVANAINA
जाह
प्रासिद्ध कर्ता-दाक्षिण हैदरावाद निवासी.
लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रमा
अमूल्य
प्रसादजी जौंदरा
प्रत १५
JANAVAR
AAWARAWAL मेन शास्त्रोद्वार मुद्रालय सीकंदराबाद (दक्षिण.)
Jisesign
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wreccccccce-teccene 6: अमुल्य शास्त्र दानदाता. G
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जैन स्थम्भ दानवीर
जन प्रभावक धर्म धरधर
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S.JWALA
जेन शास्त्रोद्धार मुद्रालय, सिकंदराबाद, (दक्षिण)
OR
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स्व राजा बहादा लाला सुखदेव सहायजी. जौहरी.
काला ज्याल प्रमादजा. जाहw.jainalitirary.org
जन्म मं.१९५०
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स्वगम्यम००७
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सप्तदश-चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र-षष्ट उपाङ्ग 4828
चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र की प्रस्तावना देवाधिदेवं जिनं नत्वा, सद्गुरू ज्ञान प्रसादते!चन्द्र प्रज्ञप्ति सूत्रस्य वार्तिकं कुरुते मया ॥१॥ १ सर्व देवों के देव श्री जिनेश्वर भगवन को नमस्कार करके श्री सद्गुरु .महाराजने दी हुई ज्ञान रूप प्रसादी के प्रसाद कर यह छठा अंग चन्द्रप्रज्ञति शास्त्र का हिन्दी भाषानुवाद करता हूं. ॥१॥ य ज्ञाताजी शास्त्र का उपांग कहा जाता है. ज्ञाता सूत्र के प्रथम श्रुतस्कन्ध का अध्ययन चन्द्रमा का है तथा दूसरे श्रूतस्कन्ध में चन्द्रमा की अग्रपहिषीयों के नाम मात्र व पूर्वभव की करणीका कथन किया है, वह चन्द्रमा किस प्रकार ऋद्धिवाला है. जिस का मंडल,गति,गमन, संवत्सरों,वर्ष,पक्ष, महिने, तीथि, नक्षत्रों: काल प्रमाण कलोपकुल नक्षत्रों ज्योतिषी के मुख वगैरह बहुत विस्तार से वर्णन किया है. यह चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र कैसा प्रभाविक (चमत्कारी) व कितना गहन हैं यह कुछ जैनों से छिपा नहीं है बडे २ महात्मा साधुओं भी इस का पठन मात्र करते अचकाते हैं. जिन २ ने इस का पठन किया उन २ ने इस के चमत्कार देख ऐसी दंत कथाओं भी बहससी प्रचित है. इस से सहज भान होगा कि इस को लिखना
और छपा के प्रसिद्धी में लाना यह कितना विकट काम है. सामान्य पुरुष से हो सकता है क्या? ऐसे दुष्पाप्य शास्त्र को आज हिन्दी भाषानुवाद युक्त प्रसिद्धी में रखने जो मैं समर्थ होता हूं यह प्रवल प्रताप कच्छ देश न करता आठ कोटी वडी पक्ष के प्रतापी परमपूज्य श्री कर्मसिंहजी महाराज के जेष्ट
Bo3gp 4882- प्रस्तावना 48488
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4. अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री
शिष्य कविवरेन्द्र परमोपकारी महात्मा मुनिराज श्री नागचन्द्र जी महाराज का ही है. इन महात्माने एक बत अर्थ वाली शुद्धलिपी दाली अपने पास की चन्द्र प्रज्ञप्ती की प्रत भेगी, तैसे ही परम प्रयास कर अहमदाबाद के भंडारमें रहे हुवे अष्ट कोटी दरियापुरी सम्प्रदाय के परमपूज्य रघुनाथजी महाराज के घिद्ध शि रोमणि, गणितानुयोग विशारद महापुरुष श्री हाथीनी स्वामीजी के परक प्रयास से लिखे हुवे बहुत ही खुलासा और यंत्रो के चन्द्र प्रज्ञप्ति की गुटके ( पुस्तके ) यहां भेजबाइ, उन के आधार से इस म प्रकार खुलासे सहित इस का उतारा कर सका हूं. तैसे ही गौणताणें भीनासर के सेठ हजारीमलज, बांठीया की तरफ से प्राप्त हुई प्रत की भी सहाय ली गई हैं. हमारे जानने में तो यथा बुद्धि बहुत खुलासा किया है तद्यपि इस के मूल में अशुद्धीयों का संभव रहा है क्योंकि इस प्रकार इस हस्त लिखित प्रतीयों भी क्वचित उपलब्ध होती है. इसलिये विट्टर सुधारा कर पठन की भीये.
परम पूज्य श्री कहाननी ऋषिजी महाराज सम्पदायकेवालग्रह्मचारी भनि श्री अमोलकऋषिजी ने सीर्फ तीन वर्ष में ३२ ही शास्त्रों का हिंदी भाषानुवाद किया, उन ३२ ही शास्त्रों की १०००१००० प्रतों को सीर्फ पांच ही वर्ष में छपवाकर दक्षिण हैद्राबाद निवासी राजा बहादूर लाला
मुर्खदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ने सब को उस का अमूल्य लाम दिया है !
* प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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KEE. शास्त्र प्रकाशक
दक्षिण हैद्राबाद निवासी जोहरी वर्ग में श्रेष्ठ दरवी दानवीर गना वहादुर लालाजी माहेव श्री मुखदेव महायजी ज्वालाप्रमादजी!
आपने माधु सेवा के और ज्ञान दान जैसे महालाभके लोभी बन जैन साधुमार्गीय धर्म के परम माननीय व परम आदरणीय बत्तीम शास्त्रों को हिन्दी भारानुवाद सहित छपाने को रु.२००००, का पर्चकर अमूल्य देना स्वीकार किया और युरोप यद्धारंभ से सब वस्तु के भाव में वृद्धि होने मे रु. ४०००० के खर्च में भी काम पूरा होनेका मंभव नही होते भी आपने उस ही उत्साह मे कार्य को समाप्त कर सबको अमूल्य महालाभ दिया, यह आप की उदारता माधुमार्गीयों की गौरव दर्शक व परमादरणीय है !
झयाला ( काटीयावाड ) निवासी धर्म प्रेमी कार्यदक्ष कृतज्ञ मणिलाल शिवलाल शेठ! इनोंने जैन टनिंग कालेज रतलाम में संस्कृत प्राकृत व अंग्रेजी का अभ्यास कर तीन वर्ष उपदेशक रह अच्छी कौशल्यता प्राप्त की.इन से शास्त्रोध्धार का कार्य अच्छा होगा ऐसी सूचना गुरुवर्य श्री रस्म रपिजी महाराज से मिलने से इन को बोलावे, इनोंने अन्य प्रेस में शुद्ध अच्छा और शीघ्र काम होना नहीं देख शास्त्रोध्धार प्रेस कायम किया
और प्रेस के कर्मचारियों को उत्साही कार्य दक्ष बना काम लिया.तैसे ही भापानुवाद की प्रेसकोपी बनाइ.यद्यपि यह भाइ पगार से रहे थे तथापि इनोंने इस कार्य की सेवा बेतन के प्रमाण भे अधिक की. इस लिये इनको भी धन्यवाद देते हैं.
SEars हैद्राबाद सिकन्द्राबाद जैन मंच
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ज्यालाप्रसाद KRTERESTER
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RSS महाय-मनिमंडल
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और भी-सहायदाता
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अपनी छत्ती ऋद्धि का त्याग कर हैद्राबाद सीकन्द्राबादमें दीक्षा धारक बाल ब्रह्मचारी पण्डित मुनि श्रीअमोलक ऋपिजीके शिष्यचर्य ज्ञानानंदी श्री देव ऋषिजी. भैय्यावृत्यी श्री राज ऋषिजी. तपस्वी श्री उदय ऋषिजी और विद्याविलासी श्री मोहन ऋषिजी. इन चारों मुनिवरोंने गुरु आज्ञाका बहमानसे स्वीकार कर आहार पानी आदि मुखोपचार का संयोग मिला. दो प्रहर का व्याख्यान, प्रसंगीसे वार्तालाप,कार्य दक्षता व समाधि भाव से सहाय दिया जिस से ही यह महा कार्य इतनी शीघ्रता से लेखक पूर्ण सके. इस लिये इस कार्य बद्दल उक्त मुनिवरों का भी बडा उपकार है.
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पंजाब देश पावन करता पूज्य श्री सोहनलालजी, महात्मा श्री माधव मुनिजी, शतावधानी श्री रमचन्द्रजी, तपस्वीजी माणकचन्दजी, कवीवर श्री अमी प्राषिजी,मवक्ता श्री दौलत ऋषिजी.पं. श्री नथमर.जी.पं.श्री जोरावरमलजी. कविधर श्री मानपन्द्रजी.प्रवर्तिनी सतीजी श्री पार्वतीजी.गुणज्ञसतीजी श्री रंभाजी. धोराजी सर्वज्ञ भंडार,भीना सरवाले कनीरामजी बहादरमलजी बाँठीया, लीवडी भंडार.कुचेरा भंडार, इत्यादिक की तरफ से शास्त्रों व सम्मति द्वारा इस कार्य को बहुत सहायता मिली है. इस लिये इन का भी बहुत उपकार मानते हैं.
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मु खदेष सहाय ज्याला प्रमाद
मुखदेव महाय चालाप्रसाद
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*** आभारी-महात्मा
कच्छ देश पावन कर्ता मोटी पक्ष के परम पूज्य श्री कर्मसिंहजी महाराज के शिष्यवर्य महाला कविवर्य श्री नागचन्द्रजी महाराज !
इस शास्त्रोद्धार कार्य में आद्योपान्त आप श्री प्राचिन शुद्ध शात्र, हुंडी, गुटका और समय पर आवश्यकीय शुभ सम्मति द्वारा मदत देते रहनेतेही मैं इस कार्य को पूर्ण कर सका. इस लिये केवल मैं ही नहीं परन्तु जो जो भव्य इन शाखाद्वारा लाभ प्राप्त करेंगें वे सब ही आप के अभारी होंगे.
आपका-अमोल ऋषि
* हिन्दी भाषानुवादक
शुद्धाचारी पुज्य श्री खूबा ऋषिजी महाराज के शिष्यवर्य, आर्य मुनि श्री चेना ऋषिजी महाराजके शिष्यवर्य बालब्रह्मचारी पण्डित मुनिश्री अमोलक ऋषिजी महाराज! आपने बडे साहस से शास्त्रोद्धार जैसे महा परिश्रम वाले कार्य का जिस उत्साहसे स्वीकार किया था उस ही उत्साह से तीन वर्ष जितने स्वल्प समय में अहर्निश कार्य को अच्छा बनाने के शुभाशय से सदैव एक भक्त भोजन और दिन के सात घंटे लेखन में व्यतीत कर पूर्ण किया और ऐसा सरल बनादिया कि कोई भी हिन्दी भाषज्ञ सहज में समज सके, ऐसे ज्ञानदान के महा उपकार तल दवे हुये हम आप के बडे अभारी हैं.
संघकी तर्फ से.
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सुखदेव सहाय ज्वालाप्रसाद
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YAMANASAN मख्याधिकारी-slashasanasexal
Heaslesesaste उपकारी महात्मा
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परम पूज्य श्री कहानजी ऋपिजी महागज की सम्प्रदाय के शुध्धाचारी पूज्य श्री खुबा ऋषिजी महाराज के शिष्यवर्य स्व. तपस्वीजी श्री केवल ऋषिजी महागज!आप श्रीने मुझे माथले महा परिश्रम से हैद्राबाद जैसा बडा क्षेत्र साधुमानिय धर्म में प्रसिद्ध किया व परमोपदेश से राजाबहादुर 21 दानवीर लाला मुखदेव सहायजी ज्वाला प्रसादजी को धर्मप्रेमी बनाये. उनके प्रतापसे ही शास्त्रोद्धारादि पहा कार्य हैद्राबाद में हुए. इस लिये इस कार्य के मुख्याधिकारी आपही हुए. जो जो भव्य जीवों इन शास्त्र द्वारा महालाभ प्राप्त करेंगे बे आपही के कृतज्ञ होंगे.
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. परम पूज्य श्री कहानजी ऋषिजी महाराज की सम्प्रदाय के कविवरेन्द्र महा पुरुष श्री तिलोक ऋषिजी महाराज के पाटयीय शिष्य वर्य, पूज्यपाद गुरुवर्य श्री रत्नऋषिजी महाराज! आप श्री की आज्ञासे ही शास्त्रोद्धार का कार्य स्वीकार किया और आपके परमाशिर्वाद से पूर्ण करसका. इस लिये इस कार्य के परमोपकारी महास्मा आप ही हैं. आप का उपकार केवल मेरे पर ।। ही नहीं परन्तु जो जो भव्यों इन शास्त्रोंद्वारा लाभ प्राप्त करेंगे उन मनपर ही होगा.
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News
शिश-अमोल ऋषि.EENA
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556
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488+ सप्तदश चंद्रमइति सूत्र- पष्ट उपाङ्ग 42
चन्द्रप्रज्ञप्ति मूत्र की विषयानुक्रमणिका.
| प्रथम मंगलाचरण बीस ही प्राभृत का संक्षिप्त वर्णन प्राभृत प्रति माभूत प्रतिवत्ति का यंत्र सब अन्तर पाहुडे का संक्षिप्त कथन ( प्रति प्राभृत मंडल प्रमाण
द्वितीय प्रति प्राभृत-मंडल संस्थान तृतीय प्रतिमाभूत-मंडल क्षेत्र चौथा प्रति प्राभृत-ज्योतिषी अंतर ( पांचवा प्रति प्राभृत-दीपादि में गति अन्तर छठा मति प्राभृत-अहोनिश क्षेत्र स्पर्श सातवा प्रति प्राभृत- मंडल संस्थान. आठवा प्रतिमाभृत-मंडळ प्रमान
द्वितीय प्राभृत
प्रथम पति प्राभृत-तिरछीगति प्रमाण. द्वितीय प्रति प्राभृत-मंडल संक्रमण.
१
८
२४
३३
३८
४५
४९
५६
५८
७०
७६
तृतीय प्रति प्राभृत-मुहूर्त गति प्रमाण ७७ तृतीय प्राभृत-क्षेत्र प्रमाण.
९४
चतुर्थ प्राभृत-ताप क्षेत्र संस्थान. ९९ 1. पांचवा प्राभृत-लेश्या प्रतिघात.
१११
षष्ट प्राभृत प्रकाश कथन.
998
सप्तम माभृत प्रकाश संक्षिप्त.
१२२
अष्ठम प्राभृत उदय अस्त प्रमान. १२४ नवम माभृत-पुरुष छाया प्रमाण. दशम प्राभृत.
१४०
प्रथम प्रतिपाहुड-नक्षत्रों का योग. द्वितीय प्रतिपाहुड-नक्षत्र मुहूर्त गति.
१५३
१५५
सूर्य चन्द्र के साथ नक्षत्र का काल का यंत्र. १६१ ततीय अन्नर पाहुड-नक्षत्र दिशा भाग. १६२
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__4%+488+ अनुक्रमणिका 4-848488+
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48 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
| चतुर्थ प्रतिपाहुडा युगादि के नक्षत्र योग चन्द्र के साथ नक्षत्र योग का यंत्र
पंचम प्रति पाहुडा कुल उपकुल नक्षत्र कुल उपकुल कुलोपकुल नक्षत्र यंव
{
छठा प्रतिपाहुडा· पूर्णिमा अमावास्या पूर्णिमा को नक्षत्र योग का यंत्र पर्व तिथी नक्षत्र निकालने की विधी
(
१८७
प्रथम से अन्तिम नक्षत्र के मुहूर्त यंत्र (पांच संवत्सर के पूर्णिमा के नक्षत्र का यंत्र. १८८ बारा अमावस्या के नक्षत्र.
अमावस्या के कुलादि नक्षत्र तथा यंत्र पांच संवत्सर की अमावास्या का यंत्र सातवा प्रति पाहुड-नक्षत्रों का सन्निपात
१६४
१७२
१७४
१७६
१.७७
१८३
१८३
१९३
१९५
१९६
२०१
अमावास्या पूर्णिमा कुलादि नक्षत्र का यंत्र २०३ आठवा प्रतिपाहुड-नक्षत्रों के संस्थान
२०४
नववा प्रति पाहुड-नक्षत्रों के तारे की संख्या २०६ 'दशवा प्रति पाहुड- अहोरात्र पूर्ण नक्षत्रों
२०८
२०९
२१३
नक्षत्रों के महिने दिन का यंत्र इग्यारमा प्रति पाहुड चन्द्र नक्षत्र मार्ग सूर्य मंडल के नक्षक्षों का यंत्र सूर्य मंडल के ऊपर के नक्षत्र विधी
२१७
२१८
बारा प्रति पाहुड-नक्षत्र के अधिष्ठाता बै० २२३ ग्वा प्रति पाहुड-तीस मुहर्त के नाम चौदवा प्रति पाहुड-तिथीयों के नाम
२२४
२२५
२२९
२३२
पन्दरवा प्रति पाहुड-तिथी निकाले की विधी २२७ सोलवा प्रति पाहुड- नक्षत्रों के गोत्र सतरहवा प्रतिपाहुडा-नक्षत्रों में भोजन अठारहवा प्रति पाहुडा चन्द्र सूर्य की गति २३५ उन्नीसवा प्रति पाहुडा - बारह महिने के नाम २३६ बीसवा प्रति पाडा-पांच संवत्सर वर्णन इक्कीसवा प्रतिपाहुडा चारों दिशा के नक्षत्र २४५ बाप्रति पाहुडा-नक्षत्रों का योग बि०२४९ नक्षत्रों के भोग प्रमाण का यंत्र
२३७
२४९
एकादश प्राभृत-संवत्सरका आदिअन्त २८५
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* प्रकाशक राजावहादुर लाला. सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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488
488+ सप्तदश चंद्रप्रज्ञाप्त सूत्र-पष्ट उपाङ्ग 4388
Aammmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmanman
द्वादश प्राभत-संवत्सर का परिमाण २९४ । ऋतु मास में चलने की मंडल संख्या यंत्र ३१ पांच संवत्सर के महिने दिन मुहूर्त का यंत्र ३०२ आदित्य मास में चलने की मंडल संख्या ३७४ } * पांच संवत्सर के संयोग के २६ भागेका यंत्र३०९ षोडश प्राभृत-उद्योत के लक्षण ३८१ ऋतु नक्षत्र परिमाण का यंत्र
३१९ चन्द्र नक्षत्र शेष रहे जिंस की आउटी यंत्र ३३३
सप्तदशप्राभृत-चन्द्र मूर्ध का चवन ३८९ प्रयोदशप्राभृत-चन्द्र कीवृद्धि अपवृष्टि ३३६ ।
| अष्टादश प्राभृत-ज्योतिषी की ऊंचाई ३८४ है । चतुर्दश प्राभृत-शुक्ल कृष्ण पक्ष ३५३ ।
एकोन विंशतिप्राभृत-चन्द्रसूर्य संख्या ३८८ पंचदश प्राभत-ज्योतिषी शीघ्रमंद गति ३५६ / विशतितम प्राभृत चन्द्रसूर्य अनुभव ३९५ नक्षत्र मास में चलने की मंडल संख्या यंत्र ३६५ | ज्योतिषीयों के भोग की उत्तमता का दृष्टान्त ४०५ चन्द्रमास में चलने की मंडल संख्या यंत्र ३६८ । अठ्यासी ग्रह के नाम ... ...
...४००
280 अनुक्रमाणका 28th
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PHTaal हायरीयादा वारा
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षष्ठ उपाङ्ग-चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र ।।
सदश चन्द्र प्रगति भूत्र-षष्ठ उपाङ्ग
जथइ नव गलिण कुवलय विगलियसयवत्थपतल दलत्थो ॥ वीरो गयंदमयंगल । प्रथम इष्टार्थ को सिद्धि के लिये मूत्रकर्ता इष्ट देवकी स्तवना करते हुए कहते हैं कि नविन विकसे हुवे नलिन, नीलोत्पल, सोपाखडी वाले, वगैरह कमल समान दीर्घ मनोहरकारी नेत्रों वाले और अपनी लीला सहित माता हुवा गजेन्द्रकी गति समान गति वाले भगवान महावीर स्वामी रागादि ओंको भविपने जीनते है. यहां पर काई प्रश्न करे कि रागादिश ओंकाजय होने से ही केवलज्ञानकीमा
और केवल ज्ञान की प्रापि होने से सत्र प्ररूपना हुइ तो यहां पर वर्तमान काल वाचक जयति भन्द का प्रयोग केस कहा ? उत्तर-पद्यपि जिनेश्वर ने सूत्र प्ररूाना के पूर्व ही रागादि शत्रुओं जीते । तपि जीतने का फल जो केवल ज्ञानादि गुनहैं वे वर्तमान काल में ही वर्त रहे हैं, इस तरह फल के उपना।"
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सललिय गयविक्कमो भयवं ॥ १ ॥ नमिऊण असुर सुंर गरूल भुयेंग परिवदिए
।
48 अनुवादक-बालब्रह्मचरी मुम्ने श्री अमोलक ऋषिजी +
रिक कारण मे भूतकाल की क्रिगा को वर्तमान कालवाची जयति शब्द के प्रयोग से बतलाइ है जिलेश्वर की भक्तिवाले भव्य जीवों ज्ञानादि में प्रवृत्ति करते हुए रागादि का जय करते हैं. कहा है किमताई जिनवराणं खिपति पुव्वसंचिया कम्मा । आयीरय णमोक्कारे विजा मंताय सिज्झति ॥ १ ॥ अर्थात् जिनेश्वर की भक्ति करने से पूर्व जन्मके संचित कर्मों का क्षय होता है, और आचार्य को नमस्कार करने से विद्या मंत्र वगैरह सिद्ध होते हैं इसलिये जयति शब्द का यहां पर प्रयोग कीया है. अथवा जिनेश्वर ने अ अपने सर्वाधिक गुणों के सुरासुर मानयादि भव्यगणोंको जीतकर अपने भक्त बनाय हैं वे भव्यों जिनेश्वर की सदैव भक्ति करते हैं, इस से भा जी शब्द का प्रयोग कीया है, अब वे जिनेश्वर कैसे हैं। प्रश्न-एसे रागादि शत्रुको कौन जीते हैं ? उत्तर महावीर भगवंतने ऐसे रागादि शत्रुओं जीते हैं? पायादि वलिष्ट मल्लों की साथ ध्यानादि युद्ध कर उनका पराजय कीया है, इसीसे आत्माको पुनर्मव प्राप्ति से पराङ्मुख कीया है, और शिव निरुपद्रव मोक्ष के शाश्वत सुख के सम्मुख कीया है, यहां पर वीर शब्द से भगवंत अपायअपगम अतिशय अर्थत् सांसारिक दुःख भोगने से दूर दर्शाया है, और भी जिनेश्वर कैसे हैं ? नविन उत्पन्न हुए विकसायमान नलिन ( रक्तोत्पल कमल) नीलोत्पल कमल की सोपांखडी वाला कमल की समान प्रफुल्लत दीर्घ व चक्षुओं वाले और भी तरुण मदोन्मत्त अपनी
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी..
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सत्र
48
अर्थ
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गयकिल से अरिहे सिद्वायरिए उवज्झाए सव्यसाहूअ ॥ २ ॥ फुडवियड पागइत्थं है वुत्थं पुव्वसुय सारणीसद, सुहुमगणिणावइट्ठ, जोइसगणराय पण्णत्ते ॥३॥ लीला लीन बना हुवा गजेन्द्र जैमे चलता है वैसे चलने वाले,और भी भगशब्द से ऐश्वर्यवाले,ठकुराइ बाले, अनुपम द ध रूप के धारक, तीन जगत में यशकीर्ति धारन करने वाले, उत्तम एक हजार आठ लक्षण धारण करनेवाले, धर्म के स्थापक, और सम्यक्ष प्रकार से
यत्ता पूर्वक प्रवर्तक इत्यादि गुणों युक्त, चारों प्रकार के महा अतिशय के धारक श्री जिनेश्वर भगवान हैं... # इस तरह प्रथम गाथा में वर्तमान तीर्थाधिपति श्री महावीर स्वामी को नमस्कार करके दूमरी गाथा में समुच्चय पंच परमेष्टि को नमस्कार करते हैं. ॥ १ ॥असुर ( अमुरकुमार) मुर (वैमानिक देव) गुरुली
सवर्णकमार ] भयंग ( नागकुमार अथवा व्यंतरादि देव के) वंदनिक, रागादि सब क्लेश से रहित ऐसे अरिहंत तीर्थंकर भगवान, सब कार्य की सिद्धि करने वाले सिद्ध भगवान, पंचाचार पालने वाले 4 आचार्य भगवान, मूत्र पठन पाठन के कर्ता उपाध्याय भगवान और मोक्ष के साधक साधु भगवान को नमस्कार होवे ॥२॥ इस प्रकार नमस्कार कर कहते हैं, किस को?-जिस का जैसा सरूप है वैस ही उस का जानपने का विषय है, वियड विस्तीर्ण सूक्ष्पबुद्धि गम्य प्रत्यक्ष साक्षात अक्षरों में जिस का अर्थ झलकता है, पूर्वश्रुत का सारभूत अर्थात् पूर्व में से उद्धार किया हुवा, सूक्ष्म बुद्धि वाले आचार्य ने कहा हुवा ऐसा ज्योतिषियों के गण के राजा जो चंद्र उस की प्ररूपणा सो. चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र कहा है. ॥३॥
प्रथम पाहुडा 4
सप्तदश चन्द्रप्राप्ति
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Jan Education International
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सूत्र
अर्थ
4 अनुादक- बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी
शाम ३५३, गायमा बंदिऊण सिविणं ॥ पुच्छइ जिनवर वसई, जोइस गणरायणसिं ॥ ४ ॥ कइ मंडलाई वचेति ॥ तिरिच्छा किंवा एच्छति ॥ आभासीत, केवइयं माए, किंति संदिति ॥ ५ ॥ कहिं घडिया ऐसा कहिं तेउय संठिति ॥ किरिया
ज्योतिषी के अधिकार की प्रथम पृच्छा गौतम स्वामीने की थी इस से उन का कथन कहते हैं. जिनेश्वर (श्री महावीर स्वामी को मन वचन बकाया से नमस्कार करके गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति नाम के अनगार चंद्रपति की पृच्छा करते हैं. ॥ ४ ॥ इस तरह मंगलाचरण करके चंद्रमसि सूत्र का संक्षिप्न में सम्बन्ध कहते हैं इस चंद्र के बीस बाहुडे कहे हैं. प्रथम पाहुडे में सूर्य के जो १८४ मांडले कहे हैं उन में { से एक वक्त में किनने मंडल स्पर्शता है और दो वक्त में कितने मंडल स्पर्शता है जिसका कथन है. इन के आठ अंतर पाहुडे हैं, दूसरे पाहुडे में से पूर्व प्रकार तीच्छ दिशा में सूर्य किस तरह चलता है यह कथन है, इस के तीन अंतर पाहुडे हैं. तीसरे पाहुडे में चंद्र सूर्य कितने क्षेत्र में रहे हुने प्रकाश करते हैं. इस में अन्य तीर्थी की प्ररूपना रूप बारह पडिवृति है. चौथे पाहुडे में चंद्रमा व सूर्य के संस्थान का वर्णन है. इस मे अन्य तीर्थ की प्ररूपणा रूप सोलह पडिवृति है. ताप क्षेत्र व अंधकार क्षेत्र की प्ररूपणा भी है. वैसे सूर्य ऊंचा नीचा व तीच्छ कितना सपना है उस का वर्णन है. ॥ ५ ॥ पांचत्रे ((नेज) का प्रतिघात कहां होगे तो कहा है. इसमें अन्यतीर्थिकी प्ररूपणा
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पाहुडे में सूर्य की लेइया बीस परिवृति कही है छड्डे पाहुडे में
प्रकाशक राजबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालापसादजी
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44874
+
be Baki Bike Gakat
. चरयंति, कहते उदय संठिति ॥ ६ ॥ कइकठा पोरसी छाया, जोएत्ति किंते आहिए, 41
सूर्यका प्रकाश किस तरह रहता है उस का कथन है,इम में अन्य तीयों की प्राणा रूप पच्चीस परिवृत्ति कही है.
मातो पाहु मे फितने दूर के पुद्गल चंद्र सूर्य के तेज को स्पर्श कर रहे हैं. सो कहा है, इस में अन्य * तीथिको प्ररूणा रूप बीस पडिवृत्ति कही है. आठो पाहुड में जा सूर्य का उदय अस्त होवे, जहां दिन व रात्रि होवे, उस का कथन है, और उत्तर दक्षिण में प्रथम समय होचे उम के दूसरे समय में
पूर्वपश्चिम में प्रथम समय होवे उस काजम्बूद्वीप अर्थ पुष्कर द्वीप तक का वर्णन हैं.इस में अन्यतीर्थी की प्ररूपणा E-रूप तीन पडिवृत्तियों हैं. ॥६॥ नवत्र पहुडे में ताप क्षेत्र का कथन है इस में अन्यतीर्थिकी
प्ररूपणा रूप तीन पडिवृत्ति हैं. इनमें सूर्य के तेज का सारूप बतलाया है. जिस समय सूर्य तेज से पुरुष की छ या बनाव उस वर्णन में अन्यनीकी प्ररूपगा रूप पच्चीम पडिबृति हैं. और पुरुष छ.ग का वर्ण हैं उस में अन्य तीथि की प्ररूरणा रूप दो पडिवृत्ति अथवा छन्नु पडिवृत्ति भी है. और पौरसी, अर्थ, पैरसी व दद औरसी में कितना दिन व्यतीत होता है और शेष कितना दिन रहता है, और पुरुष छ या मे कितना दिन जाता है और कितना दिन शेष रहना पचम प्रकार की छाया का वर्ण: या सत्र कथन इस. मे कीया है. दशवे पाहुडे में चंद्र की साथ कितने नक्षत्र का योग होता है. उस का कथन है. उस में अन्यतथि की प्ररूपणा रूप पर परिपुत्त हैं. अग्यारहवे. पाहुडे में कितने संबलर कहे हैं. और उन की आदि ५ अंत कहां
प्रथम पाहुडा. 42
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1
अमोलक ऋषिजी
केते संवच्छराणाइ, कइ संवच्छरेईच ॥७॥ कह चंदमसोवुढी, कायात दाक्षिणा बहुं . है और चंद्र सूर्य की साथ कौन २ नक्षत्र योग में लाते हैं उस का कथन है. बारहवे पाहुदे में पांव संवत्सर, उन के माप, दिन व मुहूर्न का कथन है, और युग में चंद्र ऋतु, सूर्य ऋतु का कथन सूर्य नक्षत्र योग मालावे, दश प्रकार के योगका कथन, व कौन नक्षत्र में छत्रपर छत्र का योग होवे वह सब कथन है. ॥ ७ ॥ तेरवे पाहुडे में कृष्णपक्ष में चंद्र का विमान राहु के विमान की साथ रक्त होवे, सब उद्यात की हानि और शुक्लपक्ष में विरक्त होवे तत्र उद्योत की वृद्धि होवे, मुहूर्नादिक का मान, चंद्र युग की आदि में कहां से प्रवेश करे, अब नक्षत्र के अर्थ पास में चंद्रमाके अर्ध मंडल कितने चलते हैं और चंद्र के अर्थ मास में चंद्र के मंडल कितने चलते है.. नक्षत्र के अर्धमास से चंद्र के अर्ध मास तक में चंद्र के कितने अर्ध मंडल अधिक चलते हैं चंद्र के स्वतःके कैन से मंडल हैं और अन्य के कौन २ से मंडल हैं.. वगैरह कथन है. चउदहवे पाहुडे में चद्र का अंधकार व उद्यात का वर्णन कीया हैं. पनवे पाइडे में पांच ज्योतिषियों को पंदागति व शीघ्रगति चंद्र सूर्य व नक्षत्र एक मडल पर कितने भाग चलते है, पांचों युगके मास में चंद्र सूर्य नक्षत्र कितने २ मांडले चलते हैं, एक अहोरात्रि में चंद्र सूर्य नक्षत्र कितने मांडले चलो हैं मूर्य व नक्षत्र को एक २ मांडले में कितनी अहोरात्रि हो। एक युग में प्रत्येक के कितने मांडल है, वगैरह कथन हैं. सोलहवे पहडे में चंद्र सूर्य की छाया के लक्षण
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी
42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी
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। अन्य साथी पाउडा अंतर कांप्ररूपणा ।
सप्तश चंद्रपज्ञाति सूत्र-पष्ट उपाङ्ग 483
पाहुडा
केइसिग्धगतिवत्ते, किंते दोसिणलक्खणं ॥८॥ चयणोववायं चत्तं, सरिया कति । का कथन है॥ ८ ॥ मत्तर वे पाइडे में चंद्र सर्य के चक्षण उत्पनाका कथन है इम मे मिथ्यावी की प्ररूपनाई रूप पच्चीम परिवृत्ति यो हैं अठारहवे पाइंड में सूर्यादि वे सम भूमे कितने ऊंचे हैं उसका कथन है है इसमें मिथ्यात्वा की प्ररूपना रूप पच्चीस पडिवृत्ति कही उन्नीसवा पाहुड में द्वीपसमुद्र में चंद्र सर्ग वगैरह कितने कहे हैं उसका कथन हैं और बासव पाहुड में चंद्र सूर्य का सुख किस प्रकार . .... पाहुडा अंतर पहुडा व पढिवृत्तियों का यंत्र
उसका कथन पाहुडा र अंतर अन्य तीर्थी
जन्य तीथी कीया है, इस में कीप्ररूपणा.
पाउडा अंतर
कीप्ररूपणा मिथ्यात्व की
पाहुडा रूप पडिवृत्ति रूप पडिवत्ति
रूपना रूप दो १२६
|में राहका भी न कथन है, अठासी महाग्रह काकथन चंद्र प्रज्ञप्तिका ज्ञान दान देना है।
वगैरह कथन है । इन बीस पाहुडे में अंतर पाहुडे कितने हैं, और अन्य तीथि की प्ररूपनारूप परिवृत्तियों कितनी हैं उतका कथनकहा ।
रूप पडिवृत्ति टिवीत है, इस
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अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
आहिया|अणुभावे रिसे वुत्ते, एवमेताणि वीसति ॥९॥ वड्डोवड्डी मुहुत्ताणे, अद्धमंडल संटिइ।किंते चिण्णं पडिचरंत्ति, अंतरं किं चरंतिया॥१०॥उग्गहति कवतियं, केवतियं । • इस तरह मूल पाहुई बीम है. जिन के तीन पाहुडे में अंतर पाहुड़े हैं, सत्तर पाहुडे में अंतर पाहुडे नहीं हैं. मूल पाहा को अंतर पाहुडा सरीखे के एक गिन कर और अन्तर पाहुडे पचास और अन्यनियर्थी की प्ररूपणा रूप पटिवृत्त सत्र मील कर ३५७ होवे॥२॥ और पाहुड़े का कथन करते हैं. प्रथम पाहुडे के प्रथम अंतर पाहुडे में सूर्य मंडल कितने हैं, और रात्रिदिन की छानिवृद्धि का कथन है, दुसरे अंतर पाहु में सूर्य मंडल अर्ध उत्तर दक्षिण चलें उस का कथन है, में तीसरा अंतर पाहुडा में मूर्य कितना क्षेत्र स्पर्श कर दूसरे क्षेत्रका आचरण करे,जम्बूद्वीपमें दो सूर्य हैं, उनमें कौनसा सूर्य भरतकाकारमा
बत का है. स्वतःकी तरफ सतःक मांडले कौन से और अन्य के मांडले कौन स. यह कथन चौथा अंतर पाहुडा में हैं, दोनो सूर्य कितने अंतर से चलन है, सो कहा है. इस में अन्य तीथि की प्ररूपणा रूप छ पहिवृत्तियो कही है. ॥ १०॥ पांचवे अंतर पाहड में स्यं कितना क्षेत्र आगाह कर चलते उस में अन्य तीर्थ की प्ररूपणा रूप पांच पडिवृत्तियों कही है, छठे अंतर पाहुरे में सूर्य क्षत्र उल्लंच कर चलना है इसका कथन है. इस में अन्यतीथि की प्ररूपणा रूप सात पत्तियों
सातव अंतर पाहड में सूर्यादिक के मंडल कौन से संस्थान वाले है. इसमें अन्यतीर्थ की प्ररूपण रूप आठ पावृत्तियों हैं. ८ बाठ व अंतर पाहुडे में सूर्य मंडल का जाडपन, चौहाई व परिधि
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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पण
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चविकप्पति । मंडलाणय संठाणं, विक्वंभ अट्रपाहुडा ॥ ११ ॥ छप्पंचय सत्तेवय, ॐ अट्ठय तिन्निय हवंति पडिवत्ती॥पढमस्स पाहुडस्स आहवंति एयाओपडिवत्ती ॥१२॥ सका कथन है, इसमें अन्यतीर्थ की प्ररूपणा रूप तीन पहिवत्तियों है. इस तरह प्रथम
पाहुरे के अंतर पाहुढे में सब मिलकर अन्यतीर्थी की प्ररूपणा रूप गुनतीस पडिवृत्तियों हुइ. ॥११॥ अब प्रथम पाहुड में अलग २ पडिवृत्ति कहते हैं. प्रथम पाहुडे से चौथे पाहुई तक सात पडिवते हैं."
पांचवे पाहुरे में पांच पडिवृत्ति हैं, छठे पाहुडं मे सात पडिवृत्ति है, मात वे पाहुडे में आठ पडिवृति हैं | और भाठवे पाहु में तीन पहिवृत्ति है, इन सब पडिवृति में अलग २ परमत की प्ररूपणा कह कर
फीर भगवंत ने स्वमत की प्ररूपना की है. ॥ १२ ॥ अब दूसर पाहुदे के तीन अंतर पाहुडे कहते हैं
प्रथम अंतर पाहुडे में सूर्य कहां उदय होना है और कहां अस्त होता है उस का कथन है, दूसर अंतर | पाहुडे में भेदघात व कर्णकला हानि का कथन है. अर्थात भेद कहते है मंडल के अंतर के
और घात कहते हैं उन पर गमन करने को. इस विषय में एकेक मन की मरूपना की है, जैसे विवक्षित मंडल में सूर्य फीर तदनंतर अभ्य मंडल में जावे, तथा कर्ण कला कर्ण को ही भाग सम्मुख कर परमन के अनुसार मे काल कहा. जैसे विवक्षित मंडल में दोनों मूर्य अन्दर क्षण मे प्रवेश कर पहिले पीछे की दोनों कोरों लकीरं रूप कर प्रतिपूर्ण यथावस्थित मंडल को वच्छिपने यों फोर दूसरे मंडल से कर्ण को ही कही. यह भाग रूप काल मात्रा करे फेर दूसरे मंडल के सम्मुख अंगीकार करे।
सप्तदश चंद्र प्रवति सूत्र षष्ठ-शा448
Niti+ प्रथा पाहुडा
+
2+
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२१ अनुवादक-बालब्रह्मचारीमान श्री अमोलक ऋषिजी १
१ पड़िवत्तीओ उदए, तह अस्थि मणेसुय॥भय घाए कण्णकला,मुहुत्ताणगती तिय॥१३॥
निक्वममाणे सिग्धगती,पविसंते मंदगति तीय॥चुलसीयसयंपुरिसाणं, तेसिंचपडिवत्ती-ओ ॥ १४ ॥ उदयंमि अट्ठभणिया, भयग्घाए दुवेयपडिवत्ती चत्तारि मुहुत्तगती,
होति वीयंमि पडिवत्ती ॥ १५ ॥ आवलियमुहुत्तग्गे, एवं भागाय जोगरस॥ कुलायतीसरे अंतरपाहुडेमें सूर्य मंडले २ एक मुहूर्त में कितना गमन करे ॥ १३ ॥ प्रथम मांडले से ल कर बाहिर के मांडल पर यथोक्त जाते हुए शीघगति होवे और सब के बाहर के मंडल से अंदर के मांडले में प्रवेश करते मंदगति होवे यो १८४ मंडल को मुहुर्त के प्रमाण में गतिप्रमाण पुरुषपडिवृत्ति कही। ॥ १४ ॥ अब जो तीन अंतर पाहुडे कहे उममें से पहिले अंतर पाहुदे में आठ पडिवृति दूसरे अंतर पाहुडे में दो पहिवृति और तीसरे अंतर पाहुडे में चार पांडवृत्ति कही; इस तरह दूप्तर पाहुडे के तीन अंतर पाहुडे में अन्य तीर्थीकी प्ररूपना रूप चउदह पडिबृत्तियों हुइ ॥ १५ ॥ अब दशवे पाहुडे के शवीस अंतर पाहुडे कहते हैं १ प्रथम अंतर पाहुडे में नक्षत्र की आवलिका का कथन है अर्थात् चंद्रमा मूर्य दोनों का साथ कितने नक्षत्र में अनुक्रम से योग होता है इस में अन्य ती की रूपना रूप पांच पडिबृति कही है. दूसरे अंतर पाहडे में चंद्र की साथ नक्षत्र का कितने महुर्त तक योग होता है और मूर्य की साथ कितनी अहोरात्रि में योग होता है. ३ तीसरे अंतर पाहुड में पूर्व,पश्चिम भाग की वक्तव्यता है ४ चौथे
पकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसाद जी.
...
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विणमासीय संण्णीचाएय संठिती ॥ १६ ॥ तारंगाचण्णेषाय चंदमग्गतियावरे,देवा
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अंतर पाहुडे में चंद्र की माथ युगकी आदि में प्रातःकाल व संध्या काल में नक्षत्र का योग होने उस का कथन है ५ पांचवे पाएड में कुल, उपकुल व कुलोपकुल नक्षत्रों का चंद्र की साथ योग कहा । ६ छ8 अंतर पाहुडे में पूर्णिमा की वक्तव्यता कही है, पूर्णिमा को जो नक्षत्र योग मीलावे वे कुल उपकुल व कुलोपकर का वर्णन है. वैसे ही अमावास्या की तीथि का जानना-युग का ६२ पूर्णिमा ६२१ । अमावास्या मीलाकर १२४ पर्व हैं. उत्तरही नक्षत्र का चंद्र की साथ योग होता है. मातवे अंतर पाहुडे में जो मास की पूर्णिमा में जिस नक्षत्र का चंद्र की माथ योग होता है वही नक्षत्र का किस मास
की अमावस्या को चंद्र की साथ योग होव. यह कथन है. ८ आठ वे अंतरपा हुडे में अठावीस "नक्षत्र के संस्थान कहे . ॥१६॥२ नववे अंतरपा हुडे मे अठाइस नक्षत्र के तारे कहे हैं १०
दशने अंतर पाहडे में जो२नक्षत्र जिम मास की अहो रात्रि पूर्ण करे व जो तिथि में पौरखी आवे उस का कथन है ११ अग्यारहवे पाहुडे में चंद्र के मंडल में बक्षत्रों के मंडल से कहते है, चंद्र के जिस मांड
पर नक्षत्र हैं. और जिस मांडले पर नक्षत्र नहीं हैं. छत्र पर छत्र होवे सूर्य चंद्रके मंडल में नक्षत्रों के रमंडल संक्रमते है, सूर्य चंद्र के विके कंपन क्षेत्र, सूर्य मंडल पर चंद्र मंडल कितने भाग से माश्रित और .] उचर दक्षिण नीकलता हुमा, चंद्र मंडल सूर्य मंडल की बीचमें तीर्छ अंतरा है. उसका
सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ति सत्र षष्ठ-उपाङ्ग
पाहुडा
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अमोलक ऋषिजी +
मय अज्झयगा, मुहुत्ताणं गामधेआई ॥ १७ ॥ दिवसराईयवुत्ता, तिहिंगुत्ता भोय. . णागिय ॥ आइच्च चार मासाय, पंचसंवच्छरातिय ॥ १८ ॥ जोइसिय दाराइ, मा
णक्खत्तीवजयतिय ॥ दसमे पाहुडपए बावीस पाहुडपाहुडा. ॥ * ॥ कथन है. १३ वारवे अंतर पाहुडे में आठाइस नक्षत्र के अधिष्टायफ देवों के माम कहे हैं १३ तेरवे , बंदर पाहुडे में एक अहो रात्रि के तीस मुहूर्म के नाम कहे हैं. ॥ १७॥ १४ चौदवे अंतर पहुडे में एक पक्ष के पन्नरह दिन व रात्रि के नाम कहे हैं १५ पन्नरहवे अंतर पाहुडे में पनर तिथिओं के नाम कहे हैं? १६ सोलहवे अंतर पाड मे अठावीस नक्षत्र के गोत्र कहे हैं १७ सत्तरचे अंतर पाहुडे अठाइस नक्षत्र में भोजनका कथन कहा है १८ अठारखे पाहडे में सर्य चंद्र चलने के लक्षण कहे है। १९ उनीस वे पाहुडे में एक संवत्सर के कितने मास उन के लोकिकवलाकोत्तर नामकहे हैं. बीसवे अंतर पाहुडे में पांच संवत्मर की वक्तव्यता कहीं है,॥१८॥इक्कीसवे अंतर पाहुडे में अठावीस नक्षत्र जिंसद्वारवाले है उसका कथन है. मे अन्यतिथि की प्ररूपना रूप पाच पडिवृतियों कही है-और २२ बावीसमें पाहुरे बाबोसा नक्षत्र चद्र मुर्यकी साथ जोग जोडकर चले उसका निर्णय कहा है इन बावीस पाहुडेमें बारह अंतर पाहुंडमें अन्य तीर्थीकी प्ररूपणा रूप दश पडिवृति कही हैं ॥ १९ ॥ दश से सोलह पहुडे तक . तर पाडे व पडिवृति नहीं है, सतरवे पाहुडेमें पच्चीस पडिवृत्ती, अठारवे पाहुडेमें पच्चीस परिवृति उभिस ये पाहमें बरह परिवृति, और बीसचे पाहुडमें चार पडिवृति. सत्र मिलाकर ३५७ पडिवृति होतीहै. उस कार चंद्र प्राप्ति के पाहुई, अंतर पाहुरे व पडिवृति का अधिकार हुआ,
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदवसहायजीवाला प्रसादजी
बनुवादक-चालय
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सूत्र
अर्थ
चन्द्रप्राप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग 48
तेणं का लेणं तेणं समएणं
महिलाए णामं णयरीए होत्या वण्णओ तीसेणं महिलाए णामं णयरीए बहिया उत्तर पुरात्थिमे दिसीभाए एत्थणं मणिभद्दे नामईए होस्था चिराइए वण्णओ || १ | तीसेणं महिलाए णयरीए जियसत्तू नामं राया धाराणि देवी वणओ || तेणं कालेणं तेणं समएणं सामी समोसढे परिसाणिग्गया, धम्मोकहिओ परिसा पडिगया || २ || तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवओ महावीरस्स
बाहिर ईशान कौन में नामक यक्षका वर्णन
उस काल चौथे आरे में, चरम जिनेश्वर भगवंत महावीर स्वामी विचरतेथे उस समय में मिथिला नामकी नगरी थी, उस का वर्णन उबवाइ सूत्र से जानना. उस मिथिला नगरी के ( मणिभद्र नामक यक्षका चैत्य-उद्यान था. उसका सत्र वर्णन उवबाई सूत्र में जैसे पूर्णभद्र कहा वैसे कहना. उस मिथिला नगरी में जितशत्रु राजा राज करता था. उन को धारणी नाम की राणी थी. इन दोनों का वर्णन उववाइ में जैसे कूनिक राजा का कहा वैसे कहना (ईशान कौन में मणिभद्र नामक उद्यान में श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी पधारे, परिषदा आइ, धर्म कथा सुनाई, परिषदा, पीछीगड़ वगैरह सब कथन उबवाइ सूत्र में कहे अनुसार जानना ॥ २ ॥ उस काल उस समय में श्री श्रमण भगवन महावीर स्वामी के ज्येष्ठ शिष्य गौतम गौत्रिय, सातद्दाथ की अवगाहना वाले
|| १ |
उस मिथिला नगरी की
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*** पहिला पाहुडे का पहिला अंतर पाहुडा
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जेट्टे अंतेवासी इंदभूई णाम अणगारे गोयमगोत्तेणं सत्तुस्सेहे जाव पजवासमाणे, एवं क्यासी-ता कहते महत्ताणं, वुड्डोवुड्डीय अहिएति वएजा? ताअट्ठसए ऊगूणवीसे मुहुत्तसए सत्तावीसंच सत्तसट्ठी भागे मुहुत्तस्स अहिएति वएज्जा ॥३ ॥ ता जयाणं ते सरिए सम्वन्भंतराओ मंडलाओ सव्व वाहिरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, सववाहि
राओ मंडलाओ सन्वन्भंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ ॥ एसणं अवाकेवतियं *इन्द्रभूति नामक अनगार यवात् पर्युपामना करते हुवे श्रमण भगवंत महावीर स्वामी की पास आकर इस प्रकार
प्रश्न पुछने लगे कि अहो भगवन! नक्षत्रमाम, मर्यमास,चंद्रमास तथा ऋतपास के कितने मुहर्न की हानि-द्धि कही है अर्थात् किस प्रकार हानिवृद्धि होती है? अहो गौनम! १ नक्षत्रम.स के ८.९१५ की हानिवृद्धि कही है। युग के नक्षत्रपाम ६७ हैं और युग कि दिन१८३० इम १८३० को चंद्रमास ६७ के भाग दन से एक माम के२७ दिन ९ मुहर्त और शेष२७ भाग रहता है. इन को तीस मुहुर्न की साथ गुनाकार करनेसे ८१९१७ मुहूर्त हावे. ऐसे ही मूर्यमास के ९१५ मुहुर्न हैं. युग के सूर्यमास ६० हैं और दिन १.८३. उस का ६० का भाग देने से एक मास के ३०॥ दिन होवे और इन को तीम मुहूर्त की साथ गुनाकार करने से एक माम के ११५ मुहूर्त होये. चंद्र मास के ८८५ मुहूर्न होवे. युग के चंद्र मास ६२ होवे और दिन
११८३ . होवे इसके ६२का भाग देने से एक मास के २२॥ रात्रीदिन व बासठीया एक भाग होबे, उस |Fसे तीस मुहूर्नका गुनाकार करने से८८५ : मुहूर्न होते है. ऋतुमास९०० मुहूर्त का होता है. युगकी अनु३ है।
__ अनुगदक- लबमचारीमुनि श्री अमोलक प्राषिजी
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखद वमहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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सूत्र
अर्थ
488- सप्तदश चंद्रमइति सूत्र- षष्ठ उपाङ्ग 4984
रादियंग्गोणं आहितेति वजा ? तातिष्णिछात्रट्ठी रायंदियसए रायदियगोणं आहिएति वएज्जा॥४॥ ता एएणं अद्धाए सूरिए कइ मंडलाइ चरंति ? कइ मंडलाई दुक्खुत्तो चरइ, कइमडलाइ एगक्खत्तो चरइ ? ता चुलसीति मंडलसयं चरइ, बायासीयंच मंडलसयं दुक्खुत्तो चरइ, तजहा निक्खममाणेचत्र पत्रिसमाणेचेत्र दुवेय खलु मंडलाई एगक्खुत्तो
और
दिन १८३० है. इस से १८३० को ३० का भाग देने से एक ऋतु के रात्रि दिन ६० होने उस से ३० मुहूर्त का गुनाकार करने से १८०० मुहूर्त होवे, और एक ऋतु के मास दो हैं तो १८०० को दो का भाग देने से ९०० होवे, अर्थात् एकमास के ९०० मुहूर्त इस का यंत्र. { ॥ ८ ॥ अव गौतम स्वामी प्रश्न करते हैं कि जब सूर्य सब से आभ्यंतर मांडले में से नीकलकर सबक बाहिर के मडले में चाल चले तथा सबके बाहिर के मांडले से नीकलकर सब के आभ्यंतर मडले में चाल चले तब यह काल कितने रात्रि दिन होवे ? यहां तीन सो छासठ ३६६ रात्रि दिन का काल होवे ॥ ४ ॥ प्रश्न — पूर्वोक्त काल में सूर्य कितने मांडले पर चलता है, कितने माडले पर एक वक्त चलता है। और कितने मांडले पर दो वक्त चलता है ? उत्तर - सामान्य प्रकार से सूर्य १८४ माडले पर चलता जिस में से १८२ मांडले पर सूर्य दो वक्त चलता है, और प्रथम व अन्तिम मांडले पर एक वक्त चलता { है; क्योंकि बचिके १८२ माडले पर सूर्य का आना व जाना होने से दो वक्त चलता है और प्रथम व
++ पहिला पाहुडे का पहिला अंतर पाहुडा
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बादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
मास के मुहर्त का यंत्र. चरइ तंजहा सम्वन्भंतरंचेव मंडलं सववाहिरंचे। . । यग कपक मास एक प स | मंडलं ॥ ५ ॥ जदि खलु तस्सेय आइच
मास के दिन के मुहूर्त | संबच्छरस्स सयं अट्रारस महत्ते दिवसे भवइ, नक्षत्र माम ६१ २७-
२ ८१९ सयं अदारस महत्ता राइ भवइ, सय दुवालस सूर्य म.स ६० ३०॥ ९.५ चंद्र पाम | ६२ २९॥ ८८५ मुहत्त दिवस भवइ, सयं दुवालस महत्वाराई ऋतु मास | ६१ ३०९०० भवइ, सेपढमे छम्मासे. अत्थि अट्ठारस
मुहुत्ता राई, णत्थि अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे, अत्थि दुवालम मुहत्ते दिवसे,
नत्थि दुवालस मुहुत्ता राई भवइ ॥ दोच्चे छम्मासे अस्थि अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे अंतिम मांडले में जाकर पीछा दुसरे पर आ जाता है इस से दोनों माडले पर एक वक्त ही चलता है ॥५॥ प्रश्न-इस आदित्य संवत्सर में क्या कभी अठ रह मुहूर्त का दिन, कभी अठारह मुहुर्त की रात्रि, कभी बारह मुहूर्त का दिन व बारह मुहूर्त की रात्रि होवे ? उत्तर-पहिले के छ मास में अर्थात् सूर्य १८४ वे मांडले पर होता हैं तब अठारह मुड़ की रात्रि होती है परंतु अठारह मुहुर्त का दिन नहीं होता है, और बारह मुहूर्न का दिन होता है परंतु बारह मुहूर्न की रात्रि नहीं होती है अर्थत् जब अठारह मुहून की रात्रि होती है तब बारह मुहूर्त का दिन होता है और बारह मुहूर्त का दिन होता है तब अठारह मुहूर्नकी रात्रि होती है. दुमर छ मास में अर्थात् पहिले मांडले पर जब सूर्य होता है तब अठारह मुहूर्त का दिन
* प्रकाशक-गजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
अर्थ
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र
सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग
त्थि अट्ठारस मुहुत्ताराई, अत्थि दुवालस मुहुत्ता राई पत्थि दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवइ ॥ पढमेवा छम्मासे दुच्चेवा छम्मासे णत्थि पण्णरस मुहुत्ते दिवसे भवति,णत्थि पणरस महुत्ताराई भवइ॥६॥तत्य का हेउ?अयण्णं जंयूद्दीवेहोवे सबद्दीव समुदाणं सव्व
भतराए जाव विसेमाहिए परिक्खेवेणं पण्णत्ते ॥ ताजयाणं सरिए सबभतरं मंडलं उवरुकमित्ता चारं चरति तयाणं उत्तम कट्टपत्ते उक्कोसेणं अट्ठारस महुत्ते दिवसे भवति,
तयाण दुवालस महुत्ता राई भवति, से निक्खममाणे सूरिए णवं संवच्छरं अयमाणे होता हैं तु अठारह मुहूर्त की रात्रि नहीं होती है और बारह मुहूर्त की रात्रि होती है परंतु वारह मुहूर्न का दिन नहीं होता है अर्थात् इस में अठारह मुहूर्त का दिन व बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. प्रथम
छ मास अधवा दूसरे छ मास अर्थात १८४ वे मांडले पर अथवा पहिले मांडले पर पथरहे 'मुहू का दिन नवरात्रि नहीं होती है ॥ ६ ॥ प्रश्न-इस का क्या हेतु है ? उत्तर-यह जम्बूद्वीप नामक द्वीप सब
द्वैप समुद्र के बीच में रहा हुया है. एक ल.ख योजन का लम्बा चौडा है, तीन लाख तोलह हजर दो सो सत्तावीस योजने, तीन कोश,एक सो अठावीस धनुष्य, साढी तेरह अंगुल से कुछ अधिक परिधि है.इस में जब 80 सब से आभ्यन्तर-अदर के (मेरु पर्वत के पास के).मांडल पर सूर्य आकर चाल चलता है तब उत्तम
अर्थ
पहिला पाहडे का पहिला अंतर पहुडा 48
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१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
पढ़मंसि अहोरत्तंसि अन्तराणतरं मंडलं उवसंकमिता चारंचरंति ता जयाणं सूरिए अभंतगणंतरंमंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति तयाणं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे. भवति, दोहिं एक? भाग मुहुत्तेहिं ऊगे दुवालप्त मुहुत्ता राई भवइ,दोहिं एगट्ठी भाग मुहुत्तेहिं अहिया.से निक्खममाणे सरिए दोच्चंपि अहोरत्तंसि अब्भंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, ताजयाणं सरिए अब्भंतरं तच्चं मंडलं उवसंकमित्ता चारंचरति तयाणं
अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति, चउहिं एगट्ठी भाग मुहुत्तेहिं ऊणे दुवालस मुहुत्ता काष्ट प्राप्त अर्थात् कर्क संक्रान्त को उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन होता है और बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. फिर उस प्रथम मंडल से बाहर नीकलता हुआ दूसरे मांडले में प्रवेश करे तब नया सूर्य संवत्सर होवे और नयी अयन स्पर्श, उस ममय अहोरात्रि में सब से आभ्यंतर जो पहिला मांडल उस से अनंतर दूसरा मांडला उस पर जाकर चाल चलता है. जब सूर्य दूसरे मांडले पर चाल चलता है तब अठारह मुहूर्त में एकमठिये दो भाग कम दिन अर्थात् १७५, मुहूर्न का दिन होवे और १२ , भाग की रात्रि होवे. वहां से नीकलता हुवा सूर्य प्रथप अयन की दूसरी अहोरात्रि में तीसरे से प्राभ्यन्तर मांडले पर चाल चलता है. जब आभ्यन्तर तीसरे मांडले पर सूर्य चाल चलता है तब अठारह ।
प्रकामाक-राजाबहादुर लाला मुखदव महाथकी चालाप्रसादजी,
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राई भवइ चउहि एगट्टी भाग मुहुत्तेहिं अहिआ एवं खलु एतेणं उवाएणं निक्ख ममाणे सूरिए तदाणंतराओ मंडलातो मंडलं संकममाणे दो दो एगट्ठी भाग मुहुत्ते एगमेगे मंडले दिवसखंत्तस्स निवुट्टेमाणे रयणि खेत्तस्स अभिवट्ठमाणे सव्व बाहिरं मंडलं उवसंकीमत्ता चारं चरति ता जयाणं सूरिए सम्व वाहिरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति तयाणं सव्वभंतर मंडलं पणिहाय एगेणं तेसीतेणं रातिदिय सतेणं तिन्नि छावट्ठीएगट्ठी भागट्टि भाग मुहुत्तरस दिवस खेत्तस्स
48 सप्तदश चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग 18+
मुहूर्त में एकसठीए चार भाग कम का दिन होता है अर्थात् १७५ मुहूर्त का दिन व १२, मुहूर्त की
रात्रि होती है. इसी तरह नीकलता हुवा सूर्य अनंतर मांडला अंगीकार करे, अर्थात् तीसरे से चौथे. Fचौथे से पांचवे यो अनंतर मांडल पर जाता हुवा सूर्य दिन विभाग में एकसठिये दो २ भाग कम करता है।
और उक्त दोनों भाग रात्रि क्षेत्र में बढाता है. इस तरह बढाता हुवा सब से बाहिर के १८४ वे मांडले ॐ जाता है. जब सूर्य सब मे बाहिर के १८४ वे मांडले पर चाल चलता है तर १८३ रात्रि में एक महूर्त के 4
एकसठिये ३६६ भाग दिन के क्षेत्र की हानि होती है और इतना ही रात्रि के क्षेत्र की वृद्धि होती है. जस समय अठारह मुहूर्त की रात्रि और बारह मुहूर्न को दिन होता है, यह पहिला छ मास हुवा, अब
पहिला पाहडे का पहिला अंतर पाहुडा 42
AMA
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निव्वट्टित्ता राइखेत्तस्स' अभिवट्टित्ता चारं चरति, तयाणं उत्तमकट्रपत्ता उक्कोसिया अट्ठारस्स मुहुत्ता राइ भवति जहण्णते दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति,. एसणं पढमे छम्मासे एसणं पढमस्स छम्मासस्स पज्जवासणे। से पविसमाणे सूरिए दोच्चं छम्मासं अयमाणे पढमंसि अहोरत्तंसि वाहिराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं अट्ठारस मुहत्ते राई भवति दोहिं एमट्ठिभाग मुहुत्तेहिं ऊणे दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति, दोहिं एगट्ठीभाग मुहुत्तहिं अहिए से पहिले छ मास के पर्यवसान में जो मूर्य होता है वह दूसरे छ माम की अयन में पहिली रात्रि में सब से वाहिर के अनंतर दूसरे मांडले पर आता है, तब अठारह महूर्त में एकसठिये दो भाग कम की गात्र होती है और बारह मुहूर्त पर एकसठिय दो भाग अधिक का दिन होता है. अब दूमरी अहोरात्रि में तीसर. मांडले पर सूर्य प्रवेश कर चाल चलता है. जब दूसरी अहोरात्रि में तीसरे मांडले पर आकर मूर्य चाल चलता है तब अट्टाह मुहूर्त में एकसठिये चार भाग कम की रात्रि होती है और बारह मुहू पर एकसाठिये
वार भाग अधिक का दिन होता है. इसी तरह प्रवेश करता हुवा सूर्य 15 अनंतर मांडले से दुसरे मांडले पर जाता हुवा एकसाठये दो २ भाग रात्रि क्षेत्र में कमी करता है और
मुनि श्री अमालक ऋषिजन
०प्रकाशक-राजाबहादूर लाला मुम्बदवसहायजी चालाप्रसादजी.
अर्थ
21-22
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सत्र।
सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ट-पाङ्ग 48
पविसमाणे सरिए दोचंसि अहोरसि बहिरं तच्चमंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, ता जयाणं सूरिए बहिरं तच्चं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति तयाणं अट्ठारस मुहुत्ता . राई भवति, चउहिं एगट्ठी भाग मुहुत्तेहिं ऊणे दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति चउहिं एगट्ठी भाग मुहत्तेहिं आहए ॥ एवं खलु एएणं उवाएणं पविसमाणे परिए तयाणं तराओ मंडलाओ मडलं संकममाणे दोदो एगट्ठीभाग मुहत्ते एगमेगे मंडले राति खेत्तरस निबट्टमाणे दिवसखेत्तरस अभिवडमाणेय २ सयभंतरं मंडल उवसं
कभित्ता चारं चरति,ता जयाणं मूरिए सवबाहिराओ सव्वभंतरं मंडलं उसकमित्ता उक्त दो २ भाग दिन के क्षेत्र में वृद्धि करता है. इस तरह करता हम सब अतर अर्थात पहिले मांडले पर्यंत चाल चलता है. जब सर्य सब के घहिर के मांडले से सब के आभ्यंतर मांडलेपर चाल चलता है तब सब का बाहिर का मांडला छोडकर १.८३ रात्रि दिन में एकमठीये ३६६ भाग की रात्रि क्षेत्र में हानि हुई, और इतना ही भाग की दिन के क्षेत्र में वृद्धि हुइ. और इसी से वहां उत्कृष्ट अठारह मुहूर्न का दिन व बारह मुहून की रात्रि हुई. यह दूसरा छ मास का पर्यवासन हुवा. यह अदित्य संवत्सर व आदित्य संवत्सर का पर्यवसान हुवा. इसी से आदित्य संवत्सर में एक ममय अठारह मुहूर्त का दिन, एक समय अठारह मुहूर्त की रात्रि हाव, एक समय बारह मुहूर्त का दिन होय. एक समय बारह मुहूर्त की रात्रि होय. ..
84 पहिला पाहुडे का पहिला अंतर पाहुडा 42
+
...
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अनवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक षिजी+
चारं चरति तयाणं सव्वबाहिरंमंडलं पणिहाय एगेणं तियासिएणं राइंदियसतेणं तिणि छावट्ठी एगसट्टी भागमुहुत्तसतेणं रातिखत्तस्स गिविट्टित्ता दिवसखेत्तस्स अभिवड्डित्ता चारं चरति, तयाणं उत्तमकट्ठ पत्त उक्कोसए अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति, जहणिया दुवालस मुहुत्ता राईभवति ॥ एसणं दोच्चस्स छम्मासस्स पजवासणे एसणं आदिच्चसंवच्छरे अदिच्च संवच्छरस्स एसणं पजवासणे, इति खलु तस्सेव अदिच्चसंवच्छरस्स सयं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति, सयं अट्ठारस मुहुत्तत्ता राइ
भवति, सयं दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति सयं दुवालस मुहुत्साराई भवति, पढमे इस में प्रथम छापाम के अंते में अठारह मुहूर्न की रात्रि होती है परंतु अठारह मुहूर्त का दिन नहीं होता है, और बारह मुहूर्त का दिन होता है परंतु बारह मुहूर्त की रात्रि नहीं होती है. दूपरे छ मास के अंतमें अठारह मुहूर्त का दिन होता है परंतु अठारह मुहूर्त की रात्रि नहीं होती हैं, बारह मुहूर्त का दिन नहीं होता है परंतु बारह महर्न की रात्रि होती है. पहिले व दूसरे छ मास के अंत में पसरह मुहूर्न का दिन व पन्नड मुहूर्त की रात्रि नहीं होती है. पन्नाह मुहू की रात्रि व पनाह मुहूर्त का दिन कदापि नहीं होता है. क्यों कि छमाम में सब मीलकर १८३ अहोरात्र और छ महून की हानिवृद्धि है. इस को अर्ध करने मे ९१॥ व दिन होवे. उम में पहिले का एक मारला वढाने से ९२॥ मांडला होवे. उस वक्त पभरह मुहूर्त का दिन व पनरह मुहून की रात्रि होते. परंतु १२ व मांडलेपर मूर्य चलता होवे तब
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी .
अर्थ
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छम्मासे अस्थि अट्टारसमुहुत्ता राति भवति, णत्थि अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति अस्थि दुवालस मुहुत्ते दिवसे त्यि दुवालम मुहुत्ता राई भवति । दोच्चे छम्मासे अस्थि अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति पत्थि अट्ठारस मुहुत्ता राई, अस्थि दुवालस मुहुत्ता राई जात्थ दुवालस मुहुत्ते दिवमे भवति पढमे वा छम्मासे दोच्च वा छम्मासे, णत्थि पण्णरस मुहुत्ते दिवसे णत्यि पण्णरस मुहुत्ता राति भवति, गण्णत्थ राइंदिघाणं वड्डोवढीए मुहत्ताणं चयोचतेणं, णण्गत्थवा अणुवाय गइयं पुवेणं दोणिभाग, पाहुडिया गाहाओ भाणियवा ॥ १ ॥१॥ *
*
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488+ सप्तदश चन्द्र प्रज्ञप्ति सूत्र-षष्ठ उपाङ्ग -
+ पहिला पाहुडे का पाइला अंतर पाहुडा 48
११५ - मुहू का दिन हो और रात्रि १४ मुहून की होवे और२३ वे मांडलेपर दिन १४ मुहर्न
का होवे और मात्र १५ मुहूर्त की होवे. इस कारन से पनाह मुहूर्त का दिन व पनाह मुर्त की रात्रि न होवं. इस तरह सूर्य के मांडलपर डानि वृद्धि कही. यहांर छ भाग का खुलासा करत हैं. १८३ मांडलपर छ मुहू ही हानिवृद्धि होती है. इस में १८३ को तीन का भागने मे ११ होते हैं। और छ मुहू का तीन का भागदेन से दो होते हैं. इसी से एक मुहू के एकमठिय दो भाग
की हानिवृद्धि होवे. मर्यादा से वृद्धि मर्यादा से हानि होवे. पन्नाह मुहूर्त के रात्रि दिन नहीं होते। १. पूर्वोक्त दो भाग की हानिवृद्धि होती है. यह प्रथम पाडा ग्रथम अंतर पाहडा ना ॥॥ ॥
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अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
ता कहते अड, मंडल संठिई आहितति वदेज्जा तत्थ खलु इमा दुविहा अद्धमंडल संठिई. पण्णत्ता तंजहा दाहिणा चेव उत्तराचेव ॥ १ ॥. ता कहते दाहिणअद्ध मंडलसंठिई अहितेति वेदेज्जा, वा अयण्णं जंवृद्दीवेदीवे सव्वदीवसमुदाणं जाव परिक्खवणं ता जयाणं सरिए सभंतर दाहिणं अद्धमंडलं संठिति उवसंकमित्ता चार चरति, तताणं उत्तमकटुपत्ते उक्कासए अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति जहण्णया
अब दूसरा अंतर पाहुडा में अर्धमंडल स्पर्शने का अधिकार कहा है. यहां गौतम स्वामी प्रश्न-पुछते 7 हैं. अहो भगवन् ! एकेक मूर्य एकेक अहोरात्रि से एकेक मांडले के अर्थ विभाग को परिभ्रमण कर
र्ण करे एकेक अहो रात्रि से प्राधे मंडल पर व्यवस्थित रहे यह कथन आप के मत में किस तरह उत्तर-अध मंडल दो प्रकार के कहे हैं . दक्षिण दिशा की तरफ आधा मंडल रहा है। और २ उत्तर दिशा के स्थान आधा मंडल रहा है. ॥१॥ प्रश्न-दक्षिण दिशा के अर्धमंडल की संस्थिति कैसे कही है ? उत्तर- सब द्वीप समुद्र में यह जम्बूद्वीप यावत् परिधिवाला है. इस में जब सूर्य दक्षिषा विभाग में सब के आभ्यंतर मांडले पर दक्षिण के अर्थ मंडल की संस्थिति कोई अंगीकार कर चाल चलता है तब उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन होवे और जघन्य बारह मुहून की रात्रि होवे. अब वह सूर्य उस प्रथम मांडले पर से नीकल कर दो योजन व एक योजन के एकसठिये ४८
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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सूत्र
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दवालस महत्ता राती भवति॥से निखममाण सरिए णवं संबछरं अयमाणे पढमंसि अहोरत्तंसि दाहिणाए अंतराए मागाए तसाए पदसाए अब्भतराणंतरं उत्तरहू मंडलं संठिई उवसंकमित्ता चारं चरति, जयाणं सूरिए अभंतराणतरं उत्तरद्धमंडलं संठिई उवसंकमित्ता चारं चरति तयाणं अट्ठारस मुहत्ते दिवसे भवति, दाहि एगट्ठीभाग मुहत्तेहिं ऊणे, दुवालस मुह ता राई भवति, दोहिं एगट्टी भाग महत्तेहिं अहिया॥ से निक्खममाणे सूरिए दोच्चंसि अहोरत्तीस, उत्तराए अंतराए भागाए तसाए
सनदश चन्द्र प्रज्ञप्ति मूत्र-पष्ट उपाङ्ग
भाग इतना उलंघ कर नया संवस्तर में आता है तब प्रथम अहोरात्र सर्शता हुधा, दक्षिण दिशा के अंतर भाग में से उस दक्षिण दिशा के प्रथम मांडलेक प्रदेश से, पहिला आभ्यंतर मांडले के अंतसे उत्तरार्ध मंडल पर रह कर चाल चलता है. जब दो योजन व एक ये जन के एकसाठय ४८ भाग मितने बाहिर नीकलता हुवा सूर्य आभ्यंतर मंडल के अंत से उत्तरार्ध मंडल को अंगीकार कर चाल चलता है तब अठारह मुहूर्त में एक सठिये दो भाग कम का दिन हाता है और बारह मुहूर्त में एकसठिये दो भाग 4 अधिक की रात्रि होती है. फीर दूसरे मांडले से सूर्य नीकलता हवा दूसरी अहोरात्रि में उत्तरार्ष माग से उस प्रदेश से नीकलकर दो योजन व एक योजन के एकसाठये ४८ भाग उल्लंघ कर प्र.मंजर
पहिला पाहुडे का दूनग अंतर पहुडा 42
કઈ
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* अनुावदक-सलब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी +
पदेसाए अभंतरं तच्चं दाहिणं अद्धमंडल संठिई उवसंकमित्ता चारं चरति ॥ ता जयाणं सुरिए अब्भंतरं तच्चं दाहिणं अद्ध मंडलं संठिई उवसंकमित्ता चार चरति, तदाणं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति चउहिं एगट्ठिया भाग मुहुत्तेहिं ऊणे, दुवालस मुहुत्ता राई भवति, चउहिं एगट्ठिभाग मुहुरोहिं अहिया॥ एवं खलु एतेणं उवाएणं निक्खममाणे सरिए तदाणंतराओ तदाणंतर संकं तंसि देससि ततं अद्वमंडलं संठिइं
संकममाणे २ दाहिणाए २ अंतराए भागाए तसाए पदसाते सव्वं बाहिरं उत्तरद्ध के तीसरे मांडले को अंगीकार कर चाल चलता है. जब सर्य आभ्यंतर के तीसरे अर्ध गंडले. के दक्षिणार्ध विभागपर संस्थित हो उपसंक्रम कर चाल चलता है तब अठारह मुहू म एक योजन के एकसठिये चार भाग कम का दिन होता है और बारह मुहूर्न व एकसठिए चार भाग अधिक की रात्रि होती है. इस तरह उक्त उपाय से नीकलता हुवा सूर्य प्रत्येक मंडल के एक योजन के एकसठिये ४८ भाग और दो २ योजन क्षेत्र उल्लंघता हुवा तदनन्तर मंडल में प्रवेश करता हुवा एक अहोरात्रि दक्षिणा विभाग में, एक बहोरात्रि, उत्तरार्ध विभाग में उन अर्थ मंडलपर संस्थित । संक्रमता हुवा दक्षिण दिशा के दो योजन व एक योजन के एकमठिये ४८ भाग उस प्रदेश से
प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालापसादजी
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+
अर्थ
सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग
मंडलं संठिई उवसंकमित्ता चारं चरति, ताजयाणं सूरिए सव्व बाहिरं उत्तरंअड मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं उत्तम कट्ठपत्ता उक्रोसिया अट्ठारस मुहत्ता राई भवति जहणिया दुवालस मुहुत्ते दिवसे भाति, एसणं पढमे छम्मासे, एसणं पढमरस छमासस्त पजवासणे ॥ से पविसमाणे सूरिए दोच्चे छम्मासे अयमाणे पढ़मंसि अहोरत्तंसि उत्तराए जाव पएसाए बाहिराणंतरं दाहिणं अद्धमंडलं संठिति उवसंकमित्ता
चारं चरति, ता जयाणं सरिए बाहिराणंतरं दाहिणं अद्धमंडलं संठिई उबसंकमित्ता सब के बाहिर के मंडलपर संस्थित हो उपक्रमकर चाल चलता है. जब मूर्य सब के बाहिर के मंडलपर उत्तरार्ध विभाग में उपसंक्रम कर · चलता है तब उत्कृष्ट अठारह महूर्त की रात्रि होती है और जघन्य बारह मुहूर्त का दिन होता है. यह प्रथम छ भास व प्रथम छ मास का पर्यवसान हुवा. अब वह सूर्य सब से वाहिर के मंडल से फीरकर अंदर के दूसरे मंडलपर सन्मुख होता हुवा अंदर प्रवेश करता है. दूसरे छ मास की आदि करता हुवा प्रथम महारात्रि में उत्तरदिशा के सब के बाहिर के मांडले से दो योजन व एक योजन के एकसठिये ४८ भाग क्षेत्र उल्लंघकर बाहिर के मंडल मे नंतर दूसरे मंडलपर चाल चलता है. जब सूर्य बाहिर के मंडल से तदनंतर दसरे मांडलेपर चाल
पहिला पाहुड का दूना अंतर पाहूडा
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१० अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
चारं चरति, तयाणं दिवसप्पमाण भाणिय ॥ से पविसमाणे मरिए दोच्चपि अहोरत्तंसि दाहिण जाव पदेसाए बाहिरं तच्चं उत्तरं अहमंडलं संठिइ उवसंकमित्ता चारं घरति, ता जयाणं सूरिए बाहिरं तच्चं उत्तरं अहमंडलं संठिई उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं रातिदिवसप्पमाणं तचे भागियत्वं ॥ एवं खलु एएणं उवाएंणं पविसमाणे सरिए तयाणं रातिदिवसप्पमाण तंचव भाणियन्वं, ततं अद्ध
मंडलं संठिइ, संकममाणे २ उत्तगए जाव पदसाए सवभंतरं दाहिणं अद्धमंडल चलता है तब एक महू के एकमठिये दो भाग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि होती है और दो भाग अधिक का दिन होता है. इस प्रकार वह प्रवेश करता हा सूर्य दमरी अहोरात्रि को दक्षिण दिशा के अंतर भाग से उत्तरादशा के अर्धभाग के आदि प्रदशपर बाहिर के तीमरे मंडल के उत्तगर्ध मंडलपर मस्थित हो उपमंक्रम कर चाल चलना है उम समय एकसाठिये चार भाग कम अठारह महून की रात्रि होती है और चार भाग अधिक बारह मुहू का दिन होता है. इस तरह प्रवेश करता हुवा सूर्य प्रत्येक दो योजन व एक योजन के एक मठिये अडतालीम भाग जितना क्षेत्र संक्रप कर अनंतर मांडले में प्रवेश करता हु सूर्य एक अहोरात्र दक्षिणार्ध मंडलपर एक अहोरात्र उत्तरार्ध
प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी उमाप्रमादजी.
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1
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सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ती सूत्रपष्ट-उपाइ
. वट्ठीभूए उभओवि बोयणे दुहओ उणए मज्झयण गंभीरए गंगापुलिण वालुता उद्दालि सलिलए उचिते पुपालपट्टपडिच्छपणे विरतिया ताणे रत्ते सुत्तबुडे सुरम्भे आयणिगसुप बूरणयमिततुलफासे सुगंधवर कुसुमतृणसयणोधकारिकासिए तारिसयाए भारियार सहिं लिपारागार चालवलाए लंगय जाय जोवणविलास कलियाए अणुरत्तार अविरल र काणेणुकुल र साई ३४ सदफरस रूयगंधे पचबिहे माणसए कामभागे पचणभयनाणा विहरेज्जा तिसेणं परिसे वितस्मकाल समयंसि
केरियं लाता सोक्खं पञ्चशुभवमाणे विहरति ?एतेणं समणाउसो ! तस्सणं पुरिसरस याको बाग, चाा नरफ समान, दोनों बाजु माल मसूर, दोनों वाजू कुच्छ ऊंचा, मध्य भाग गंभीर. जैस मंगा नदी की धालु पानी में स्वच्छ दिखती है वैसे ही स्वच्छ चादर से चारों नरफ अच्छी तरह टका हुवा, भय, बुर नानि समान कोमल, सुगंधित प्रधान पुष्प समान शैय्या में शृंगार के घर समान यात यावनी बिलासयता व मन को अनुकूल भार्या की साथ इष्ट शब्द, रूप, गंध, रस व पर्श यों है। पांच प्रकार के मनुष्य संबंधी क मभोग भोगता हुवा विचरता होवे. उस पुरुषका उस समय कैसा सुख होवे ? अहो कायुष्यंत श्रमणो ! उस पुरुष के काम भोग स वाणव्यंतर के काम भोग अनंतगुने विशिष्टनर हैं.
बीनना पाहुडा 4
4
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+8+सनदश चन्द्रप्राप्त पत्र षष्ठ उपाङ्ग 4
संठिइ उवसंकमित्ना चारं चरति, ता जयाणं सरिए सवभंतरं दाहिणं अद्धमंडलं संठिई उवसंकमित्ता चारं चरात, तताण उत्तम कट्टपत्ते उकोसए अट्रारम्महत्ते दिवसे भवति, जहाणिया दवालस महत्ता राई भवति ॥ एसणं दोच्चे छम्मासे, एसणं दोच्च छम्मा सस्स, पजवासणे॥ एसणं आइच संवच्छरे, एसणं आइच्चसंवच्छरस्स पजवासण॥२॥ ता कहं ते उत्तरा अहमंडलसंठि आहितेति वदेजा ? ता जयाणं सरिए सधभतरं उत्तर अद्धमंडलसंठिइं उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाण उत्तम कट्टपत्ते
उकासए अट्ठारसमहत्ते दिवसे भवति, जहणिया दुवालस मुहत्ता राई भवति । मंडलपर सस्थित हवा एक मुहूर्त के एक सठियदो २ भाग की दिन रात्रि में हानि वृद्धि करता हुग यावत् सबसे आभ्यंतर मंडल के दक्षिणार्थ विभाग में संस्थित होकर उपक्रम कर चाल चलता जब मूर्य सब के आभ्यंतर मंडल पर दक्षिणार्थ विभाग में स्थित होकर उपक्रमकर चाल चलता हैं तब सबसे अधिक उत्कृष्ट अठारह महून का दिन व जघन्य बारह महून की रात्रि होती है. यह है दसरे छमास कहे और यह दूसरे छ मास का पर्यवसान कहा. यह आदित्य संवत्सर व भादित्य संवत्सर का पर्यवसान हुग. यह दक्षिणार्ध मंटल का कथन संपूर्ण दुवा. यह दक्षिण दिशा के सूर्य के अर्ध मंडल आदित्य संवत्सर का कथन हुवा ॥२॥ अब उत्तर दिशा के सूर्य का अर्थ मंडल के आदित्य संवत्सर की पुच्छा' ।
अर्थ
पहिला पाहुड का दूसरा अतर पाहुडा 48.
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मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
स निक्खममाणे सरिए गवं संवच्छरं अयमाणे पढमंसि अहोरसि, उत्तराए जाव पएसाए अब्भंतराणंतरं दाहिणं अद्ध मंडलं संठिई उवंसकमित्ता चारं चरति । तदाणं सृरिए अभंतराणंतरं दाहिणं जाव चारं चरति, तयाणं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति, दोहिं एगट्टि भाग मुहुत्तेहिं ऊणे, दुवालस मुहुत्ताराई भबति दोहिं एगट्ठी भाग मुहुत्तेहिं अहिया ॥ से निक्खममाणे सूरिए दोच्चंसि अहोरत्तसि दाहिणाए जाव पदेसाए अब्भंतरं तचं उत्तरं अहंमंडलं संठिई उवसंकमित्ता चारं चरति,
ता जयाणं सुरिए अब्भंतराणं तचं उत्तरं जाव चार चरति तदाणं दिवसरातिप्पमाणं श्री गौतम स्वामी करते हैं. प्रश्न-उ नर का अर्ध मंडल किस प्रकार रहा हुवा है ? उत्तर-जब सूर्य सब से आभ्यं र के उत्तरार्ध मंडल की स्थिति को उपसंक्रम कर चाल चलता है तब उत्कृष्ट अठारह । दिन होता है और जघन्य बारह महुर्त की रात्रि होती है. वहां से नीकलता हवा सूर्य नविन संवत्सर में गमन करता प्रथम अहोरात्रि में उत्तरार्ध मंडल के अंतिम प्रदश स अभ्यंतर दूसरे दक्षिण की अर्धमंडल की संस्थिति को अंगीकार कर चाल चलता है. जब सूर्य आभ्यंतर दूरी दक्षिण की अर्ध मंडल के संस्थिति को उपसंक्रमकर चाल चलता है तब अठारह मुहूर्त में एकसठिये दो भाग कम का दिन होता है और एक सठिये दो भाग अधिक बारह मुहूर्न की रात्रि होती है. वहां से नीकलता हुवा सूय भरि
प्रकाशक-राजाबहादूर लालामुखदेवमहायजी ज्वालामसाहजी.
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सप्तदश चंद्रप्रज्ञति सूत्र-पष्ट उपात 48
तंचव भाणियव्यं ॥ एवं खलु एएणं उवाएणं निक्खममाणे सरिए तदाणंतराओ तदाणंतर तंसि तंसि देसंसि तं तं अद्धमंडलं सट्रिइ जाव चारं चरति ॥ ता जयाणं सृरिए सब बाहिरं दाहिणं अहमंडलं जाव चारंचरति तदाणं उत्तम कट्टपत्ता उक्कोसिया अट्ठारस मुहत्ता राई भवति, जहण्णये दुवाल समुहत्ते दिवसे भवति ॥ एमणं पढमे छम्मासे, एसणं पढम छम्मासरत पज्जवासणे से पविसमाणे मरिए दोच्चं छम्मासं अयमाणे पढमांस अहोरत्तंसि दाहिणाए जाव पदेसाए वाहिराणं उत्तरं
अद्धमंडल संठिई उवसंकमित्ता चारं चरति ॥ ता जयाणं मूरिए बाहिराणं उत्तरं । अहोरात्र में दक्षिण के आभ्यंतर मंडल के प्रदेश के तीसरा आभ्यंतर उत्तरार्ध पंडल की संस्थिति को अंगीकार कर चाल चलता है तब एकसठिये चार भाग कम अठारह मुहू का दिन होता है चार भाग अधिक बारह महून की रात्रि होती है. इसी तरह नी ठता हुवा सूर्य एक पंछ एक मंडल को उस २ देश में उस २ अर्थ मंडल संस्थिति को अंगीकार कर चल चलता है. जब सूर्य सब स बाहिर दक्षिण के अर्थ मंडलपर चाल चलता है तब उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त की रात्रि और जघन्य बारह मुहूर्त का दिन होता है. यह पहिला छ माम हुआ और यह पहिला छ मास का पर्यवसान हुआ. पुनही मर्य प्रवेश करता
432 पहिला पाहुई का दूसरा अंतर पाहुडा
અર્થ
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सूत्र
अर्थ
42 अनुवादक बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
अद्धमंडल संठिइ जात्र चारं चरति ताणं अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति दोहिं एगट्टी भाग मुहुत्तेहिं ऊगे, दुबालस मुहुत्ते दिवसे भवति दोहिं एगट्टी भाग मुहुत्तहिं अहिया || से परिमाणे सृरिए दोसि अहोरत्तंसि उत्तराए जाव पदेसाए बाहिरं तच्चं दाहिणं अद्धमंडल संठिई जाव चारं चरति, ता जयाणं सुरिए बाहिरं तच्चं दाहिणं जात्र चारं चरति तयाणं अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति चउहिं एगट्ठी भाग मुहु तेहिं ऊणे, दुबालस मुहुत्ते दिवसे भवति चउहिं एगट्ठी भाग मुहुत्तेहिं अहिए| एवं खलु एएणं उचएणं पत्रिसमाणे सूरिए तदाणंतराओ तदाणतरसि तंसि २ देसि तं तं अद्ध
हूवा दूसरे छ मास की पहिली अहोरात्र में दक्षिण के मांडल की संस्थिति को अंगीकार कर चाल चलता है. दो भाग अधिक बारह मुहूर्त का दिन होवे. अब दूसरी
आभ्यंतर मांडल के प्रदेश से बाहर की उत्तर तब एकमठिये दो भाग कम की रात्रि हो और अहोरात्र में प्रवेश करते उत्तर के अर्ध मंडल के
प्रदेश से बाहिर का तीसरा दक्षिण का अर्थ मंडल की संस्थिति को अंगीकार कर यावत् विचरता है तब एक सठिये चार भाग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि होती है और चार भाग अधिक बारह मुहूर्त का दिन | होता है. इसी तरह प्रवेश करता हुवा मर्य एक पीछे एक मांडला के उस देश में उस अर्ध मंडल सस्त
* प्रकाशक- राजबहादुर लाला सुखदेव महायजी ज्वाला प्रसादजी •
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३२
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श्रसू
अर्थ
488+ सप्तदश चन्द्रमज्ञप्ति सूत्र- षष्ठ उपाङ्ग
मंडल संटिई उबसंकममाणे २
दाहिणाए जात्र पदेसाए सव्वमंतरं उत्तरद्ध मंडलं संठि उवसंकमित्ता चारं चरति, ता जयाणं सूरिए सव्वमंतरं उत्तर अद्ध मंडलं संठि जाव चारं चरति तदाणं उत्तमकटुत्ते उक्कोमए अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति जहणिया दुवालस मुहुत्ता राती भवति || एसणं दोघे छम्मासे एसणं देोच्च छम्मासस्स पजवासणे, । एसणं आइच्चसंवच्छरे एसणं अइच्च संवच्छरस्स पज्जवासणे || पढमस्त बीअं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १ ॥ २ ॥
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ता के ते चिन्हं पडिचरंति आहितेति वदेज ? तत्थ खलु इमे दुबे सूरिया पण्णत्ता
( को अंगीकार कर चाल चलता है. जब सूर्य सत्र से आभ्यंतर उत्तरार्ध मंडल की संस्थिति को अंगीकार कर चाल चलता है नत्र उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन होवे और जघन्य बारह मुहूर्त की रात्रि होव. यह दूसरा छ मास हुवा यह दूसरा छ मास का पर्यवसान हुवा यह आदित्य, संवत्सर' हुवा यह आदित्य संवत्सर का पर्यवसान हुवा यह पहिला पाहुडा का दूसरा अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा. ॥ १ ॥ २ ॥ अब तीसरा अंतर पहुडा कहते हैं. प्रश्न - गौतम स्वामी प्रश्न करते है. कि इस जम्बूदीपमें कितने सूर्य प्रतिक्षेत्र चाल चलते हैं ? अर्थात् अपना या अन्य के क्षेत्र को अंगीकार कर चलते हैं ? उत्तर -- इस जम्बूद्वीप में दो सूर्य कहे हैं. १ भरत का सूर्य और २ एरवत का सूर्य. उक्त दोनों सूर्य अलग २ तीस २
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+ पहिला पाहुड का तीसरा अंतर पाहुडा स
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42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
जहा-भरहेचैव सूरिए एरवएचव सरिए । ता एएणं दुवे सरिया तीसाए २ मुहत्तेहिं .. एगमेग अद्ध मंडलं चरंति सट्ठीए २ मुहुत्तेहिं एगमगे मंडले चरंति संघतेति, तानिक्खम. माणे खलु एए दुवे सूरिया णो अण्णमण्णरस चिणं पडि चरंति, पविसमाणे खलु एए दुवे चेय सूरिया अण्णमण्णस्स चिण्णं पडिचरंति ॥ १ ॥ तत्थणं । कोहेउ वदेजा ? ता अयणं जम्बुद्दीवदीवे जाव परिक्खवेणं, तित्थणं
अयंभरहे चव सूरिए जम्बुद्दीवरस दविस्स पाईण पडाणायताए उदीण दाहिणताए मुहूर्व में एकेक अर्ध मंडलपर चलते हैं, और साठ मुहूर्त में एकेक मांडले पर चलते हैं और साथ ही मांडले प्रतिपूर्ण करते हैं. वहां से नीकलते हो दोनों सूर्य परस्पर अपने क्षत्र व अन्य के क्षेत्र पर नहीं चलते हैं, परंतु १८४ मांडले में प्रवेश करते उक्त दोनों मूर्य अपने २ क्षेत्र पर चलते हैं अन्य क्षेत्र में प्रवेश करते उद्यात करे नहीं. क्यों की भरत क्षेत्र का मूर्य अग्निकोने के बकी मांडले स्पर्श और वायव्य कौन के एकी मांडले स्पर्श और एरवत क्षेत्र का मूर्य वायव्य न के बकी मांडल स्पर्श और अग्नि कौन के एकी मांडले स्पर्श॥१॥ यहां गतम स्वामी प्रश्न करते हैं कि इस में कौनसा हेत है ? उत्तर-यह जम्बूद्वीप नामक द्वीप यावत् परिधि वाला है. इस जम्बूद्वीप में पूर्व पश्चिम की लम्बाई व उत्तर दक्षिण की जिव्हा से चार
. प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी
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सप्तदश चद्रं प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग
जीवाए मंडलं च उवीससतेणं छेत्ता दाहिण पुरथिमिलंसि चउभाग मंडलांस बाण उतिं सरियमंताई जाइं सरिए अप्पणो चेव चिन्नं पडिचरंति उत्तर पञ्चस्थिमिति च उभाग मंडलांस एकाण उति सूरियमंताई जाइं मुरिए अप्पणी चेव चिण्णं पडिचरति तथणं अयं भारहे सरिए॥२॥ एरवयस्त सरियस्ल जंबुद्दीवरस दोवस्स पाईण पडीणायताए उदीण दाहिणताए जीवाए मंडलं चउवीस
सतेणं छत्ता उत्तरपुरथिमिलसि च उभाग मंडलंसिं बाणउतिं सूरियमंयाइं जाई भाग के एक पंडल के १२४ भाग करके उस का विभाम करे. इस से प्रत्येक दिशा में एक २ मंडलके ३११ भाग रहे. इस तरह दक्षिण पूर्व अग्निकून के मंडल के ३१ भाग में सूर्य अब ९२ वे मांडले से नीकले तब भरत क्षेत्र का सूर्य भरत क्षेत्र में ही उद्योत करता हवा चले और उत्तरपश्चिम-वायव्यकून के मांडले के चौथे भाग में जब मूर्य ९१ वे मांडले से नीकले तब भरत क्षेत्र का मूर्य एरवत क्षेत्र में उद्योग करता हुवा नीकले. यही भरत क्षेत्र का सूर्य जानना ॥२॥ एरवत क्षेत्र के सूर्य के मंडल के १२४ गाग कर जम्बूद्वीप के पूर्व पश्चिम की लम्बाइ, उत्तरदक्षिण की जिन्दा से छेदकर उत्तरपूर्व के चौथे भाग में ५२ वे मांडलेस नीकलता हुवा सूर्य क्षेत्र अर्थात्-पूर्वमहाविदह क्षेत्र में उद्यात करता हुवा चले, दक्षिण पश्चिम के नैऋत्यकन के चौथे भाग में ९. वे मांडले से नीकलता मूर्य पर क्षेत्र सो पश्चिम पहावि.
+2+ पहिला पाहुडे का तीसरा अंतर पाहुडा
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श्री अमोलक ऋषिणी + 47 अनुवादक-चालब्रह्मचारी मुनि
सरिए परस्त चिण्णं पडिचरंति दाहिणपञ्चथिमिल्लंसि चउभागं मंडलसि एकागउति मरियमयाई, जाइं सूरिए परस्स चिण्णं पडिचरंति तत्थणं अयं एरवए सूरिए ॥ ३ ॥ जंबूद्दीवस्त दीवस्स पाईण पडीणायताए. उदिणदाहिणताए जीवाए मंडलं चउवीससएणं छत्ता उत्तर पञ्चथिमिल्लांस चउभाग मंडलंसि बाणउइ सरिय मयाइं जाइं सूरिए अपणो चेव चिण्णं पडिचरंति दाहिणपुरथिमिल्लंसि चउभाग मंडलंसि,एक्काणउत्ति सरिए मताई अपणो चेव चिणं पडिचरंति,तत्थणं अयं
एरवए सूरिए ॥ ४ ॥ भारहस्स सूरियस्स जंबूद्दीवस्स पाईणपडीण देह क्षेत्र में सूर्य उद्योत करता हुवा चले. यह एरयत का सूर्य कहा. जम्बूद्वीप की पूर्व पश्चिम की लम्बाइ से व उत्तर दक्षिण की जिदी मे मांडले को १२४ भाग से छेद कर उत्तरपश्चिम. वायव्य कून के चं विभाग में ९२ चे मांडले से नीकलता हुवा म अाना क्षेत्र एरवत क्षेत्र में उद्योत करता हुवा चले और दक्षिण पूर्व के [ अग्निकून ] के चौथे भाग में एकाण मांडले से नीकलता हुवा सूर्य अपना क्षेत्र भरत क्षेत्र में उद्योत करता हुवा चले. यह एरवत क्षेत्र का मूर्य हुवा ॥ ४ ॥ जम्बूद्वीप में पूर्व पश्चिम की लम्बाइब उत्तर दक्षिण की जिव्हां से एक मंडल के १२४ भागको छेदकर दक्षिण पश्चिम (नैऋत्यकून)
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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ताए उदीपदाहिणताए जीवाए मंडलं चउवीसमएणं छेत्ता दाहिणपञ्चस्थि मिलंसि चउभागमंडलंसि बाणउति सूरियमयाइं ॥ जाई सरिए परस्स चिण्णं पडिचरंति उत्तरपरात मिल्लुसि चउ बाग मंडलंसि एक्काणउति सा आई, जाई सरिए परस्सचेच चिण्या पडिचरंनि तत्थ अयं भारहे सारए ॥ ता निक्खममाणे खलु एते दुवे सूरिया अण्णमस्स चिण्णं पाडेचरंति पविसमाणे खलु ते दुवे सूरिया अण्णमष्णस्स चिणं पडिचरति॥तं सयमेगं चोयालं गाहा॥चंद पण्णत्तिस्स पढमस्त
सदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र-पृष उपाङ्ग
++ पहिला पाहडे का तीसरा अंतर
के चौथे भाग में ९२ वे मांडले से नीकलता हुवा पर क्षेत्र पश्चिम महा विदेह क्षेत्र में उद्योत करता हुधा सूर्य चले. उत्तर पूर्व के (ईशान कून) के चौथे भाग २१ वे मांडले से नीकलता हुवा सूर्य पर क्षेत्र सो पूर्व महा विदेश में उद्योत करता हुआ चले. यह भरत क्षेत्र का सूर्य कहा. इमी हेतु से प्रथम मांडले से नीक लते हुये दोनों क्षेत्र के मूर्य परस्पर के क्षेत्र उद्यन करे नहीं, परंतु पर क्षेत्र में उद्योत करते हुये चले.
उक्त दोनों सूर्य १.०४ मांडले में प्रवेश करते हुये परस्पर क्षेत्र में उद्योत करे परंतु अन्य के क्षेत्र में उद्योत ** करे नहीं. इस तरह भरत क्षेत्र का सूर्य व एरवत क्षत्र का सूर्य अन्य के क्षेत्र में परस्पर के क्षेत्र में चार दिशा व विदिशा से परिभ्राण करते हुये चलते हैं. इस की सतमगं चोतालं यह गाथा का अर्थ नहीं रसकते हैं. क्योंकि गाथा अपूर्ण है. शेष का व्यवच्छ : हुवा है. यह पहिला IDR 1
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48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋषिजी
ततीयं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १॥ ३ ॥ ता केवइयं त एते दुवे भूरिया अण्णमण्णस्म अंतरं कटु चारंचरइ अहिते ति वएजा? तत्थ खल इमाओ छ पडीवत्तीओ पण्णताओतंजहा तत्थेग एवं माइंसु एग जोयण सहस्सं एगच ते सीम जायणसयं अपणमण्णम अंतरं कटु, मारया चारं चरंति आहितेति वएज्जा? एगेएवं मासु ॥ १ ॥ एगेपुण एवमासु ता एगं जोगणसहस्सं एकां चउत्तिसं जोयणसतं अण्णमण्णरस अतरं कटु नरिया चारं चरंति आहितेति वएज, एगे एवं माहंसु ॥ २ ॥ एगेपुण एवं मासु ता एगं जोयण सहस्सं, एगं च पन्नतीसजाय अण्णमण्णं अंतरंकटु सूरिया चरं चरति आहिते ति वएज्जा, एगेएवमाहंसु ॥ ३ ॥
. प्रकाशक-राजाबहादूर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ १ ॥ ३ ॥
अब परस्पर सूर्य में अंतर रूप चौथा पाहुडा कहते हैं. प्रश्न-अहो भगवन ! इस जम्बूद्वीप के दोनों सूर्य परस्पर कितना अंतर रखकर चलते हैं? उत्तर-अहो शिष्य : इस में अन्य तीथि की प्ररूपणा
छ पत्तियों कही हैं. इनका अलग कथन का -१ कितनेक ऐसा कहते कि दोनों सूर्य परस्पर एक हजार एक का तेत्तीय १३३ यजल का अंतर रखकर चलते हैं, २ कितनेक ऐसा |00 कहते हैं कि एक हजार एक सा चौतीस ११३४ योजन के अंतर से चलते हैं ३. कितनेक ऐसा कहते हैं।
कि एक हजार एक सो पेंतीस ११३५ योजन के अंतर से चलते हैं, ४ कितनेक ऐसा कहते हैं कि एक
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अर्थ
अर्थ
- सप्तदश चंद्र मइति सूत्र पठ
एगेपुण एवं मासु, एगदिवं एगंसमुद्द अण्णमण्णस्स अंतर कट्टु र आहितेति वदेज्जा एगेएवमाहंसु ॥ ४ ॥ एगेपुण एवं माहंसु ता दोन अण्णमण्णस्म अंतरं कट्टु महितति वदेजा, एगेएवं माहं ॥ ५ ता तिग्निदिने तिग्भिलनु, अण्ण्णस्स अंतरं कहुजन हि मासु || ६ || त्रयपुण एवं वयामो-ता पंचपंच जोयणाई पन्न जोयणस्स एगमंगे मंडले अण्णमण्णस्स अंतरं, चारं चरंति अहितेति वदेजा ॥ १ ॥ सत्थणं
द्वीप व एक समुद्र का अंतर रखकर चलते हैं, ५ कितने अंतर रखकर चलते और ६ कितनेक ऐना कहते हैं कि चाल चलते हैं. और हम ऐसा कहते हैं कि पांच २ यो योजन का परस्पर अंतर करते हुवे आभ्यन्तर मंड मांडले से आभ्यंतर के मंडलपर जावे. ॥ १ ॥ प्रश्न- इस चलता है ? उत्तर- यह जम्बूद्वीप नामक द्वीप यावत् प
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14.दीके जाब परिक्खेवेर्ण ता जयाणं एते दवे
चार चरंति, तयाणं णवणवति जोयणसहस्स - अंतरं कटु चारं मृरिया चरंति, तयाणं उत्तम भवति जहणिया दुवालप्त मुहुत्ताराई भवति अयमाणे पढमंसि अहोरत्तसि अन्भंतराणंतरं जयाणं दुबे सरिया अब्भराणंतरं जाव चारं
सहस्साई छच्चपण्णयाले जोयणसए पण्णतसिंर Fमंडलपर रह कर चाल चलते हैं. तब निन्यानवे हजार छसो चालीस...
कि एक लक्ष योजन के जम्बूद्वीप में दोनों सूर्य एकमो अस्सी योजना. को दुगुने करने से ३६० होवे. इतना एक लक्ष योजन में कमो करने से ९९६) दोनों सूर्य आभ्यंतर क पंडलपर उक्त अंतर मे चाल चलते हैं. उम सपय उ व बारह महून की रात्रि होती हैं ॥२॥फीर आभ्यंतर मंडल से नीकलते हुच दा: करते हुवे पहिली अहोरात्रि में दूसरे मांडलेपर चलते हैं. जब वे दोनों पूर्य अ
अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अोलक ऋपिनी
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सूत्र
* Bb-E BIKE : 4
चारं चरंति तयाणं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति दोहिं एगट्ठी भाग मुहुत्तेहिं ऊणे, दुबालस मुहुत्ता राई, दोहिं एगट्ठी भाग महुत्तेर्हि अहिया । तेनिक्खममाणे सुरिया दोश्चंसि अहोरत्तंसि अन्तरं तचमंडलं उक्रुकमित्ता चारं चरंति ॥ जयाण एते दुबे सूरिया अम्मितरं तवं मंडल जाब चारं चरति तयाणं णवणवउति जोयण सहस्साइं छच्च एक्कात्रण जोयणसए नवएगट्ठी भागे जोयणस्स अंतरं कट्टु चारं चरंति, तयाणं अट्ठारस्ल मुहुत्ते दिवसे भवति चउहिं एगट्टि भाग मुहुत्तहिं ऊणे, दुवालरस मुहुसा राई भवति, चउहिं एगट्टि भाग मुहुत्तेहिं अहिया ॥
एवं खलु
कर चाल चलते हैं तब निन्यानवे हजार छतो पैंतालीस योजन व एक योजन के एक जितना अंतर होजाता है. एक २ मंडल को दो २ योजन व एकसठिये ४८ (है. इतना अंदर दोनों तरफ से पांच योजन व एकसदिये ३५ भाग होते. इतर दरे मंडलेवर १९६४५ । याजन का अंतर रहता है और उस वक्त एक्सठि दा भाग कम मुहूर्त का दिन व दो भाग अधिक वारह मुहूर्त की रात्रि होती है. वे वहां से निकलकर दूसरी अोरात्रि में तीसरे आभ्यंतर मंडलेपर रहकर चाल चलते हैं. जब उक्त दोनों सूर्य तीसरे मंडलेपर रहकर चाल चलते हैं.
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ठिये पैंतीस भाग भाग का अंतर
पहिला पाहुडे का चौथा अंतर पडा
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सूत्र
अर्थ
4 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
एतेणं उवाएणं णिक्खममाणे एते दुवे सूरिया, तयाणंतराओ तथाणंतरं मंडलाओ मंडलं संकममाणा पंचपंच जोयणाई पण्णतीसंच एगट्टि भागे गोयणस्स एगमंगे मंडले अण्णमण्णस्स अंतरं कट्टु अभित्रड्डेमाणे २ सब्ववाहिरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरंति, ता जयाणं एते दुवे सूरिया सव्वबाहिरं मंडलं उवसंक्रमित्ता चारं चरति तयाणं एगजोयणसयसहस्सं छन्बसट्ठि जोयणसते अण्णमण्णस्स अंतरं कट्टु चारं चरंति, तयाणं उत्तमकटूपता उक्कोसिया अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति जट्टपेणं दुबालस मुहुरो दिवसे भवति, एसणं पढमे छम्मासे, एसणं पढमछम्मासस्य पज्जला तब निन्यानवे हजार छसो एकावन योजन व एक सठिये नव भाग जितना अंतर होता है. क् सठिये चार भाग कम अठारह मुहूर्त का दिन व उक्त चार भाग अधिक बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. { इस उपाय से नीकलते हुए दोनों सूर्य प्रत्येक आगे के मंडल पर संक्रमते हुवे परस्पर पांच २ योजन एक योजन के एकसाठिये पेंतीस भाग की परस्पर अंतर की वृद्धि करते हुवे और दिन के एकसठिये दो भाग घटाते हुवे व रात्रि के भाग बढाते हुवे बाहिर के अंतिम मांडले पर होकर चाल चले. जब दोनों सूर्य बाहिर के अंतिम मांडले पर रहकर चाल चलते हैं तब दोनों सूर्य में एक लाख
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* प्रकाशक- राजबहादुर लाल
ज्वालाप्रसादजी •
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सूत्र
अर्थ
++ सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपा
साणे ॥ ३
॥ सेपत्रिसमाणे सुरिया दोच्चं छम्मासं अयमाणे पढमंसि अहोरत्तांस बाहिराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरंति॥ता जयाणं एते दुवे भूरिया बाहिराणंतरं मंडलं जाव चारं चरंति, तयाणं एगजोयण सयसहस्सं छच्च चउप्पण जोयणसए छत्रिसंच एगट्टी भागे जोयणस्स अंतरंक चारंचरंति, तयाणं अट्ठारस महत्ता राई भवति दोहिं एगट्टी भाग मुहुत्तेहिं ऊणे दुवाल महते दिवसे जाव अहिए ॥ ते पविसमा सुरिया दो से
भाग
कमत्ता मंडले जाव चारवरति तयानं
जात्र चारंचरति ॥ ता जयाणंए ते दुवे सूरिया बाहिर त
छ सो साठ १००६६० योजन का अंतर होता है.
उस वक्त उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त की रात्रि और वन्य बारह मुहूर्त का दिन होता है. यह एक २ मंडल में ५ योजन के अंतर के हिसाब से होता है. यह प्रथम छ मास व प्रथम छ मास का पर्यवसान हुआ. वहां से उक्त दोनों सूर्य प्रवेश करते हुवे प्रथम अहोरात्रि में बाहिर के अनंतर का दूसरा मंडल पर रहकर चाल चलते हैं. जब उक्त दोनों सूर्य बाहिर के मंडल पर { यावत् चाल चलते हैं तब एक लाख छ सो चौपन योजन व एकसठिये छब्बीस ( १००६५८६३) भाग का अंतर रहता है उस वक्त उत्कृष्ट एकसठिये दो भाग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि व जघन्य
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** पहिला पाहुडे का चौथा अंतर पाहुडा
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4+ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
एगं जोयणसय सहस्सं छच्च अडयाल जायणसेऐ बावणं च एगट्ठी भाग जोयणस्स. अण्णमण्णस्स अतर कटू चारं चरति, तयाणं अट्ठारस्स मुहुत्ता राती भवति चउहिएगट्टि भाग ज ! ऊण, दुवालस्स मडुत्ते दिवसे भवति चउहिंएगठी भाग अहिए ॥ एवं खलु एत. उणं गाविसमा एते दुवे सरिया तदाणंतराओ तदाणतरं मंडलं उसकममाणे २ पच जोयणाई पपणतीसंच एगट्ठी भाग जोयणस्स एगमेग मंडल अण्णमण्णस्स अंतरं निबद्रिमाणे २ सबभंतरं मंडलं उबसंकमित्ता चारं चरंत, ता जयाणं एते दुवे सुरिया सव्वभंतरं मंडलं उयसंकमित्ता चारंचरति तयाणं णवणउति जोयण सहस्साई छच्चचताले जोयणसए अण्णमण्णरस अंतरंकटु,
.प्रकाशक-राजावहादरलाना मुखदव सहायनी ज्वालाप्रसादजी.
उक्त दो भाग आधबारह महतका दिनै हाती फीर वे नीकलने हो दोनों मूर्य दसरी अहोरात्रि में तीसरे मांडल पर रहकर चाल चलते. जर तीपरे मांडले पर रहकर चाल चलते हैं तब दोनों को परस्पर एक लाग्य छ मो अडनालीप यांजन और एरपटिये वावन भाग का अंतर रहता है और उत्कृष्ट एकसठिये चार भाग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि व जयन्य उक्त चार भाग अधिक बारह महूर्त का दिन होता हे इंगतरह अंदर प्रवेश करने हो दोनों नूई प्रयक मंडल में पांच २यजन व एकमाठिये पंतीस
भय आसतर. कम करते हुवे सब से आभ्यन्तर मंडल पर उपसंक्रम कर चलते हैं. जब दोनों सर्य सब से 16 मकान्तर मंडल ५३ घाल चलते हैं तब ९९६४० योजन का परस्पर अंतर रहता है और अठारह.
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1
4 सप्तदश चंद्रप्रज्ञति सूत्र- षष्ठ उपाङ्ग 48
अर्थ
चारंचरंति, तयाणं उत्तम कट्टुपत्ते जाब दिवसे भवति जहणिया दुबालस मुहुतारती भवति, एसणं दो छम्मासे, एसणं दोच्चछम्मासस्स पज्जबसणे, एसणं आईच संवच्छरान्तस्स पज्ञत्रसाणे ॥ इति चंदरन्नत्तिस्म पढमस्त चउत्थं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १॥ ४ ॥ ताइदवस मुद्दे उग्गाहित्ता सूरिए चारं चरंति आहितेति वदेज्ञा ? तत्थखलु
इमाओ पंचपडिवत्तीओ तंजहा-तत्येंगे एवमहंस- एग जोयण सहस्से एगंच तेत्तीसं मुहूर्त का दिन व बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. यह दूसरा छ माम हुवा व दूसरा छ मास का पर्यव मान हुवा यह आदित्य संवत्सर आदित्य संवत्सर का पर्यवसान हुवा यह पहिला पाहुडे का चौथा अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ १ ॥ ४ ॥
७
अब द्वीप समुद्र में सूर्य कितनी दूर चलते हैं सो कहते हैं— अहो भगवन् ! क्षेत्र व समुद्र का कितना क्षेत्र अवगाहकर चाल चलते हैं ? भगवान महावीर
एमा
यहां अन्यतीर्थ की तरुण रूप पांच प्रकार की पंडित कही है. कितने एना कहते हैं कि एक हजार एक मोती ११३३ योजन द्वीप या समुद्र भवर सूर्य चाल चलते हैं, २ कितने द्वीप या समुद्र अवगाहकर चाल चलते हैं, कितनेक ऐसा द्वीप या समुद्र अवगाहकर सूर्य चाल चलते हैं ४ कित
कहते हैं कि एक हजार एक सो चौंतीस योजन कहते हैं कि एक हजार एक सो पेनीस योजन
०
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सूर्य द्वीप का कितना स्वामी कहते हैं कि
4- पहिला पाहुडे
का पांचवा अंतर पाहुडा
४५
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ऋषिजी -
4. अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनिक
जोयणंसतं दिवंधा समुदंबा उग्गाहित्ता सरिए चार चरंति अहितेति वदेज्जा, एग एवं माहंसु॥१॥एगपुण एवं मासु ताएग जोयणहसरसं एगंच चोत्तीसं जोयणसतं दिवंवा समुदंवा उग्गाहित्ता सरिए चार चरंति एगे एवं माहं तु ॥२॥ एगे पुण एवं माहंसु ता एगं जोयण सहस्सं एगेच पणतीसं जोयणसत दीवा समुद्दबा उग्गाहित्त सूरिए चार चरति एगे एवं मासु ॥ ३ ॥ एगे पुण एवं मासु ता अवट्ठ दिवंवा समुदंवा उग्गाहिता सूरिश चार चरति एगे एवं माह ॥ ४ ॥ एग पुण एवं माहसुता नो किंचि दोधासमवा उग्गाहित्ता सरिए चार चरति.॥५॥ तत्थ जत एवं माहंसु ता एग जोयण
राहस्सं एगंच तेत्तीस जोय सतं दिवा समुदवा उग्गाहित्ता मरिए चरं चरंति नेक ऐसा कहते हैं कि शाधा द्वीप ३ आध, समुद्र का क्षेत्र अवगाहकर मूर्य चाल चलते हैं, ५ कितनेक ऐसा कहते हैं कि किंचिन्यात्र द्वीप किंचिन्मात्र समुद्र अवगाहे विना सूर्य चाल चलते हैं ॥ १ ॥ इन पांच में से जो ऐसा कहते हैं कि एक हजार एक सो तीच गोजन द्वीप या समुद्र को अवगाहकर सू चलते हैं उन का कथन इस हेतु से है कि जब सूर्य मब से आभ्यन्तर के मरु के पास के मंडल
रहकर चाल चलते हैं, तब जम्बूद्वीप का ११३३ योजन अवगाहकर चाल चलते हैं उस समय , अठारह समूहूर्त का दिन व बारह मुहून की रात्रि होती है. जव सूर्य सब से बाहिर के मंडल पर रहकर चाल
प्रकाशक-राजाबहादूर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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सत्र
4884 सप्तदश चन्द्रवज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग 4
ते एव माहंसु, जयाणं सूरिए सव्वमंतरं मंडलं उत्रसंकमित्ता चारं चरंति, तयाणं जंबूद्दीवं दिवं एगं जीयण सहस्सं एगच तेत्तिस जोयण सतं उग्गाहित्ता चारं चरंति, तयाणं उत्तम कट्टपत्त उक्कोसए अट्ठारस महुते दिवसे भवति, जहष्णिया दुबालस मुहुत्ताराई भवति, ता जयागं गरिए सम्बाहिरं मंडल उत्रसंकमित्ता वारं चरंति, तयालवण समुदं एग गण हस्सं एगंचतेतीस जोगणसतं उग्गाहिला चार चरंति, तयाणं उत्तम कटुपा उसिया अट्ठारस मुहुत्ता रात्ति भवति, जहणते दुवालस महत्त दिवसे भवति, एवं चोतसिं जोयणसतं, एवं पण्णत्तीसं जोयणसतं ॥ तत्थ जेते एवं माहंनु अत्रदिवं अवसमुदं उग्गाहित्ता मूरिए चारं चरंति ते
चलते हैं तब लवण समुद्र में ११३३ योजन क्षेत्र अवगाहकर रहते हैं. उस समय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त की रात्रि व जघन्य बारह मुहूर्त का दिन होता है. ऐसे ही एक हजार चौवीस व एक हजार पेंतीस योजन वाले का मत कहना. उस में जो ऐसा कहते हैं कि आधा द्वीप आधा समुद्र अवगाहकर सूर्य चाल चलते हैं उन का कथन इस प्रकार है कि जब सूर्य सब से आभ्यन्तर मंडल पर रहकर चाल चलते हैं तब आधा जम्बूद्वीप का क्षेत्र अवगाहकर चाल चलते हैं उस समय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन व जघन्य बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. ऐसे ही सब बाहिर के मांडले पर रहकर सूर्य चाल चलते हैं तब आधा
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4 पहिला पाहुडे का पांचवा अंतर पाहुड
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* अनुवादक- ब्रह्मचारीमान श्री अमोलक ऋषिजी
एवं माहंसु-जयाणं मृरिए सवभंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति तयाणं अवद जंदिवं २ उग्गाहिता चारं चांति, तथाणं उत्तम कट्रपत्ते उक्कोसेणं अटुर: मत। दिन भवति जहा गणवा दालन महत्ता राती भवति ॥ एवं सब्ध बाहिरएवि. पवर अबदलवा समुई, तया रायंदियं रहव ॥ तत्थ जेते एवं माहंमु ता नो किंचिदिवंवा समुहंवा उग्गाहित्ता सुरिए चार चरंति, ते एवं माहंमु जयाणं सरिए सध्यभंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरंति, तयाणं नो किंचि. दिवंवा, समईवा उग्गापिता चारं चरति, तयाणं उत्तम कट्रपत्ते उक्कोसए अटारस
मुहत्ते दि से भवति, तहेव एवं सब्वे बाहिर मंडलं णवर नो किंचिलवणसमुदं लवण समुद्रका क्षेत्र अगाहकर चाल चलते हैं और उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त की रात्रि व जघन्य बारह मुहूर्तका दिन ६ है. जो ऐमा कहते हैं कि किंचिन्मात्र जम्बूद्वीप व किंचिन्त्रात्र लवण समुद्र अवगाहे विन. सर्य चल चलते हैं उनका. कथन इस प्रकार है कि जब सूर्य सब से आभ्यन्तर मांडले पर रहकर चाल चलते तब किंचिन्मात्र दंप क्षेत्र को अवगाहे बिना चाल जलते हैं. उस समय अठारह मुहूर्त का दिन व बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. और जब सूर्य सत्र के शहर के मंडलं पर चाल चलता है तब किंचि1-1- ma rai बिना चलते हैं, उस समय अठारह मुहर्त की रात्रि व बारह मुहूर्त का दिन
प्रकाशक-राजासादुर लाला सुखदेवमहायजी चालाप्रसादमी.
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सूत्र
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चन्द्रप्राप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग सप्तदश चन्द्रम
उग्गाहिता चारं चरंति, रातिदिय तहेव माहंमु ॥ वयं पुण एवं वयामो, ता जयाण मूरिए सव्वळभतरं मंडलं उवतंकमित्ता चारं चरति तयाणं जंबुद्दीवं असीतं जोयण सतं उग्गाहित्ता चार
काम टुपते अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति जहणिया दुवालस मुहुत्ता राई भवति, ता जयाणं सबवाहिरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं लवणसमुई तिण्णितिसे जोयणसए उग्गाहित्ता चारं चरति, तयाणं उत्तम कट्ठपत्ता अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति, जहण्णए दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति ॥ इति चंदपन्नत्तिस्स पढमरस पंचमं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १ ॥ ५ ॥ *
ताकेवइयं ते एगमेगेणं रातिदिए गं विकंपइ २ त्ता सूरिए चारं चरति होता है. इस कथन को मैं इस प्रकार कहता हूं कि जब सूर्य सब से अभ्यन्तर मंडल पर चलते हैं तब में जम्बूद्ध १ का १८० योजन क्षेत्र अवगाहकर चाल चलते हैं. उस समय अठारह मुहूर्त का दिन व चारह मुहूर्त की रात्रि होती है. और जब सूर्यसब से वाहिर के मंडल पर चलते हैं तव लवण समुद्र का । योजन क्षेत्र अवगाहकर चाल चलते हैं. उस समय उत्कृष्ट अठारह मुहर्त की रात्रि व बारह मुहूर्त का दिन 4 होता है. यह पहिला पाहुडे का पांचवा अंतर पाहुडा मंपूर्ण हुवा ॥१॥५॥
अब छठे अंतर पाहुढे में एक रात्रि दिन में सूर्य कितने क्षेत्र स्पर्श कर चलते हैं. प्रश्न-एक २ रात्री
पहिला पाहुडे का छठा अंतर पाहुडा 488
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अनुवादक-चालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी
भाहितेति वदेजा ? तत्थ खलु इमाओ सत्त पडिवत्तीओ पण्णताओ तंजहा तत्थेगे एव माहंमु ता दो जोयणाई अद्ध बयालीसंच तेत्तीसं सतभागे. जोयणस्स एगमेगेणं रातिदिएणं विकंपइ २त्ता मूरिए चार चरति,आहितेति वदेजा,एगे एव माहंमु॥१॥एगे पुण एवं माहेसु ता अड्डाइजाइ जोयणाई,एगमेगणं रातिदिएणं विकंपइ २ता सूरिए चारं चरति आहि तेति वदेज्जा, एगे एक मासु ॥ २ ॥ एगे पुण एव माहेसु तिपिणतिभागूणाई जोयणाई एगमेगेणं रातिदिएणं विकंपइ २त्ता जाव चारं चरंति आहितेति वदेज्जा,एगे एव माहंसु
॥ ३ ॥ एगेपुण एवमासु, ता सिण्णि जोयणाई अडसीयालीसंच तेत्तीसंसचभागे दिन में कितना क्षेत्र विकंपन कर सूर्य चलता है अर्थात् अपने मंडल से कितना क्षेत्र जाता है ? उत्तरइस विषय में अन्यतीथि की प्ररूपणा रूपसात पडिचियों कही है. तद्यथा-किसनेक ऐसा कहते हैं कि योजन व एक योजन के एक सो ध्यासी भाग में से साटी एकतालीम भाग [२ ] क्षेत्र एक रात्रि दिन में अपने मंडल से अन्य मंडल पर उल्लंघकर जाता है. २कितनेक ऐसा कहते कि एक रात्रि दिन में 4 अढाइ (२॥) योजन क्षेत्र उलंधकर एक मंडल से दूसरे मंडल पर जाकर चाल चलता है ३ कितनेक
कहते हैं कि तीन योजन में तीसरा भाग कम क्षेत्र उलंघकर मूर्य चाल चलता है,४ कितनेक ऐमा
• प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालापसादजी।
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सप्तदश-चंद्र प्रज्ञाप्त सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 420
जोयणस्स एगमेगेणं रातिदिएणं विकंपइत्ता चारं चरति आहितेति वदेजा एगे एव मासु ॥ ४ ॥ एमेपुण एवमाहंसु ता अहुटाई जोयणाई एगमेगेणं राइदिएणं जाव वदेजा एगे एवमाहंतु ॥ ५ ॥ एगेपुण एवमाहंसु चत्तारि चउभागूणाई जोयणाई जाव आहितति वदेज्जा एगे एवमासु ॥ ६ ॥ एगेपुण एवमासु चत्तारि जोयणाई अद्ध पावणंच तेत्तीसं सयभागे जोयणस्स एगमेगेणं रातिदिएणं जाव आहितेति वदेजा, एगे एवमाहंस ॥ ७ ॥ वयं पुण एवं वदामो ता दोदो जोयणाई अडयालीसंच एग
सट्ठी भागे जोयणस्स एगमगेणं मंडले, एगमेगेणं रातिदिएणं विकंपावतित्ता सृरिए भी कहते हैं कि तीन योजन व एक योजन के १.३३ भाग करे वैसे ४५॥ भाग (३) जितना क्षेत्र एक अहोरात्रि में उल्लंघकर दूसरे मंडलपर जाकर चाल चलता है, ६ कितनेक ऐमा कहते हैं चार योजन में चौथा भाग कम (३॥) योजन क्षेत्र उल्लंघकर सूर्य चाल चलता है, . कितनेक ऐसा कहते हैं, कि चार योजन व एक के १८३ भाग में से ५१॥ भाग (४ ) क्षेत्र एक रात्रिदिन में उल्लं
घकर सूर्य चाल चलता है. भावंत कहते हैं कि इस कथनको मैं इसप्रकार कहता हूं कि दो योजन व एक सठिये '} अडतालीस भाग (२ ) इतना क्षेत्र एक २ मंडल से एक रात्रि दिन में उल्लंघकर मूर्य चलता है ॥१॥
488- पहिला पाहुड का छठा अंतर पाहुडा 4
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१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
चार चरति अहिते ते वदेजा ॥ १ ॥ तत्थणं कओ हेतुति वदेजा? अयणं जंबूद्दीवे. दीवे जाव परिवखवेगं ता जयागं सूरिए सव्वब्भंतरं मंडलं उसंकमित्ता चारं चरति तयाणं उत्तम कट्टपत्ते अटारल भहुत्ते दिवसे भवति, जहाणिया दुवालस मुहुत्ता राई भवति, सेनिक्खममाण सरिए गवं संवच्चारं अपमाणे पढमसि अहोरत्तसि अष्भतराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं दा., जायणाई अडयालीसच एगट्ठीभाग जायणस्स एगमगणं रातिदिएगं दिकपावतिता चारं चरति, तयाणं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति दोहि एगट्ठीभाग मुहुत्तेहिं ऊगे, दुवालस मुहुत्ता राई
भवति दोहिं एगट्ठीभाग मुहुत्तहिं अहिया. सनिक्खममाणे सूरिए दोच्चंसि अहोरत्तंसि प्रश्न-इस में क्या हेतु रहा है ? उत्तर-यह जम्बूद्वीप एक लाख योजन का लम्बा चौडा यावत् परिधि वाला १६. इस में जब सूर्य सब के आभ्यंतर मंडलपर रहकर चाल चलता है तब उत्कृष्ट अठारह मुहर्न का
व अघम्य बारह महूर्त की रात्रि होती है. वहां से नीकलता हुवा सूर्य नया संवत्सर में प्रवेश करते प्रथम जरात्रिमें आभ्यंतर मंडलसे दमश मंडल पर रहकर चाल चलता है तब दो योजन व एकयोजन के एकसठिय ४८
भाग (२:7 क्षेत्र एक रात्रिदिन में उल्लंघकर चाल चलता है. उससमय उत्कृष्ट एकसाठये दाभाग कम अठारह व मुर्नका दिन व दो भाग अधिक बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. यहां से नीकलता हुवा सूर्य दूमरी अहो।
प्रकाशक-राजाबहादुर.लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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असू
सप्तदश चंद्रप्रजाति सूक्षष्ठ उपाङ्ग 48
अभंतरं, तचमंडलं उसकमित्ता चारं चरति, ता जयाणं सूरिए अब्भंतरे तचमंडलं उवसंकभित्ता चारं चरात तयाणं पंच जोषणाइं पण्णतसिंच एगद्रीभागे जोयणस्स दाहिं रातिदिएणं विकंपावतित्ता चारं चरति, तयाणं अट्रारस महत्ते दिवसे भवति चउहि एगट्ठी भाग मुहुत्तेहिं ऊणे, दुवालम मुहुना राई भवति चउहिँ एगट्ठी भाग अहिया ॥ एवं खल एएणं उवाएणं निक्खममाणे सरिए तयाणतरं मंडलातो मंडलं संकममाणे दो दो जोयणाई अडतालीसंच एगट्टी भागे जोयणरस एगमेगेणं मंडले एगमगणं रातिदिएणं विकंपमाणे २ सय बाहिरं मंडल उवसंकर्मित्ता चारं चग्इ, ता जयाणं सरिए सबब्भंतरं मंडलातो उवसंकमित्ता सव्व बाहिरं मंडलं उरसं..
488+ पहिला पाहुडे का छठा अंतर पाहडा 488+
रात्रि में अभ्यन्नर तीसरा मंडलपर रहार चाल चलता है. जब आभ्यन्तर तीसरा मंडलपर रहकर सूर्य चाल चलता है तब पांच योजन व एकसठिय पेंतीस भाग (५ ) जितना क्षेत्र दो रात्रि दिन में उल्लंघ कर चाल चलता है. तब एस ठये चार भाग कम अठ.र ह मुहून का दिन व चार भाग अधिक है - चारह मुहूर्त की रात्रि होती है. इसी तरह से नीकलता हुवा सूर्य एक पीछे एक मंडल को संक्रमता हुवा २ योजन का क्षेत्र एक रात्रिदिन में उईघता हुवा सब से बाहिर के मंडल पर रहकर चाल चलता है.org जब सूर्य सब से बाहिर के मंडलपर रहकर चाल चलता है तब १८३ रात्रि दिन में ५१० योजन क्षेत्र ।
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१ अनुावदक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
कमिता चारं चरति, तयाणं सम्वन्भंतरं मंडलं पणिहाय एगेणं तासिणं राइंदिय सतेणं पंचदसूत्तरे जोयण सते विकंपावइत्ता चारं चरति, तयाणं उत्तम कटुपत्ता उक्कोसिया अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति, जहण्णए दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति, एसणं पढमे छम्मासे, एसणं पढमरस छम्मासस्स पजवासणे ॥ से पविसमाणे सुरिए दुच्च छम्मासं अयमाणे पढमांस अहोरत्तसि बाहिराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति तयाणं दो जोयणाति अडयालीसंच एगट्ठी भाग जोयणस्स एगेणं
वतित्ता चार चरति, तयाणं अट्ठारस महत्ता राई भवति, दोहिं एगट्ठी भाग ऊणे, दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति, दोहिं एगट्ठी भाग अहिया ॥ उल्लंघकर चलता है. उस समय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त की रात्रि व जघन्य बारह मुहूर्त का दिन होता है. यह प्रथम छमास व प्रथम छमास का पर्यवसान हवा ॥ २॥ अब वहां से आभ्यंतर मंडलों में प्रवेश करता हुवा मूर्य दूसरे छमास की अयन करता या प्रथम अहोरात्र में बाहिर के अनंतर दूसरे मंडलेपर रहकर चाल चलता है तब दो योजन व एकसाठये अडतालीस भाग २६ जितना क्षेत्र एक रात्रि दिन में उलंघकर चाल चलता है. उस समय एकसठिये दो भाग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि व दो भाग अधिक बाहर मुहूर्तका दिन होता है. वहां से प्रवेश करता हुवा सूर्य दूसरी अहोरात्रि में बाहिर से नीमो मांदल पर।
प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखवसायजी ज्वालामसादजी
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सूत्र
सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र-पृष उपाङ्ग
सेपविसमाणे सरिए दोच्चसि अहोरसि बाहिरं तच्चं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, ता जयाणं सूरिए बाहिरं तच्चं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं पंच जोयणाए पणतीसंच एगट्ठी भागे जोयणस्स दोहिं रातिदिएणं विकंपावित्ता चारं चरति तयाणं अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति चउहिं एगट्ठी भाग महत्तेहिं ऊणे, दुवालस मुहत्ते दिवसे भवति, चउहिं एगीभाग अहिते ॥ एवं खलु एएणं उवाएणं पविसमाणे सरिए तयाणंतराओ तयाणंतर मंडलातो मंडलं सकम माणे २ दो २ जायणाई अडयालसिंच एगसेट्ठी भाग जोयणस्स, एगमेग मंडले एगमेगे रातिदिएणं विकंपमाणे २ सयभंतरं मडलं उवसंकमित्ता चारं चरति ॥ जयाणं सूरिए सव्व रहकर चाल चलता है.जब बाहिर से तीसो मंडल पर रह कर चाल चलता है तब। योजन भाग जितना क्षेत्र दो रात्रि दिन में अवगाहकर चाल चलता है. उस समय एकसठिये चार भाग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि ब चार भाग अधिक बारह मुहूर्त का दिन होता है. इसी तरह प्रवेश करता हुवा सूर्य एक पीछे एक मंडलंपर रहता हुवा २० योजन क्षेत्र एक २ रात्रिदिन में उल्लघंता हुवा सब से आभ्यंतर पहिले मंडलंपर रहकर चाल चलता है. जब सूर्य सब से बाहिर के मंडलंपर से सब से भाभ्यंतर मंडलंपर रहकर चाल चलता है तब सब से बाहिर का मंडल छोडकर १८३ रात्रिदिन में ५१० योजन क्षेत्र उल्लंघकर
48 पहिला पाहुड का छठा अंतर पाहुँडा 428
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4. अनुवादक-वाला मामी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
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बाहिरातो सबभतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं सव्व बाहिरं मंडलं पणिहाय एगमेगेणं तेसिय रातिदियसतेणं पंचसुत्तरे जोयणसए विकंपइता चारं चरति, तयाणं उत्तम कट्टले दिवसे भवति, जहणिया दुवालस मुहुत्ता राई भवति ॥ एसणं दोच्चे छम्मासे, एस दोच छम्मासस्स पजवासणे, एसणं आइच्चे संवच्छरे, एसणं आइच्चस्स संवच्छरस्स पज्जवासण ॥ इति पढमस्स ट्ठय चंदपण्णात्तस्स पाहडं सम्मत्तं ॥ १ ॥ ६॥ * * * ताकहं ते मंडलसठिति आहितेति वदेजा ॥ तत्य खलु इमातो अट्ठ पडिवत्तीओ पणत्ताओ तंजहा-तत्थएगे एवं मानु ता समचउरंस मंडलं संठियाणं मंडलं संठिति चाल चलता है. उस समय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन व जघन्य बारह महूर्त की राशि होती है. यह दूसरा छमास का पर्यवासान हुवा. यह अदित्य संवत्सर का पर्यवसान हुआ. यह पहिला पाहुडे । का छठा अंऔर पाहुडा मंपूर्ण हुवा. ॥ १ ॥ ६ ॥ ___ अब सावा और पाहुडा मंडल के संस्थान आश्रीय कहते हैं: अहो भगवन ! मंडल का संस्थान किस प्रकार कहा है ? उत्तर-इस कथन में अन्यतीथि की प्ररूपणा रूा आठ पडिवत्तियों कही है. तद्यथा-१ कितनेक ऐसा कहते हैं कि समचतुत्र संस्थान बाला मंडल कहा
प्रकाखक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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सप्तदश चद्रं प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ-पाङ्ग 48
आहितेति वदेजा ॥ एगे एवं मासु ॥ १ ॥ एगे पुण एव माइंसु ता विसम चउरसं संठाण संठियाणं मंडलं संठिति आहितेति वदेजा एगे एव माहं सु ॥ २ ॥ एगे पुण एव माहंस ता समचउकोण संठियाणं मंडल संठिति आहितेति वदेजा, एगे एव माहंस॥३॥एग पण एव माहंस ताधिसम चउकोणं संठियाणं मंडलसंठिति आहितेति वदेजा एगे एवं मासु ॥ ४ ॥ एग पुगएवमासु तासचावाल संठियाणं मंडल संठिति आहितेति वदज्जा. एगे एक माइंस ॥ ५॥ एगे पुण एक माहंसु ता विसम चक्कवाल संठियाणं मंडल संठिति आहितेति वदेजा, एगे एवमासु ॥ ६॥ एगे पुण एवमासु ता चक्काद्ध चकवाल संठियाणं मंडलं संठिति आहितेति वदेजा, एगे
4+8+ पहिला पाहुई का सातवा अंतर पाहुडा
है २ कितनेक ऐपा कहते हैं कि विषमचतुख संस्थान वाला पंडल है ३ कितनेक एसा कहते हैं कि समचतुष्कौन के संस्थान वाला मंडल है ४ कितनेक ऐसा कहते हैं कि विषम चतुष्कोन संस्थान वाला मंडल है ५ कितनेक ऐसा हैं कि समचक्रवाल के संस्थान वाला यंडल है ६ किलनेक ऐमा कहते हैं विषम चक्रवाल संस्थान वाला मंडल है कितनेक ऐमा कहते हैं कि अर्धचक्रवाल के संस्थान वाला मंडल रहा हुवा है. और कितनेक ऐमा कहते हैं कि छत्र के आकारवाला मंडले है.. इस तरह अन्य भिन्न २ मतों से एक ही सु की प्ररूपणा की. इस में अन्तिम प्ररूपणा
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सूत्र
अर्थ
अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
एवमाहं ॥ ७ ॥ एगेपुण एवमाहंसु ता छत्तागार संठियाणं मंडल संठिति आहिति वदेज्ज | ॥ एतेणं नाएणं यव्वं नोचवणं इतरेहिं ॥ ढमस्स सत्तमं पाहुडं सम्मचं ॥ १॥ ७ ॥ ता सव्वात्रिणं मंडलं च केवतियं बाहल्लेणं केवतियं आयाम विक्खभेणं केवतियं परिक्खेवेणं आहितेति वदेजा, तत्थखलु इमातो तिन्नि पडिवत्तीओ पण्णत्ताओं तजहा- तत्थेगे एव माहंसु ता सव्वाणिं मंडलंत्रया जोयण बाहल्लेणं एगजीयणं सहस्सं एगंच तेत्तीसं
में भगवंतने अपना अभिप्राय कहा. अर्थात् चित्ते छत्राकार मंडल का संस्थान है. ( अन्य स्थान अर्ध कविठ फल जैसा कहा है वह अर्ध कवि के फल का समविभाग उपर कीया हुवा और छत्र आकार बनाया। बही जानना परंतु अन्य इन सूत्रों से नहीं जानना. वह प्रथम पाहुडाका सातवा अंतरपाहुडा हुआ। ॥ १ ॥७॥ अब आठवा अंतर पाहुडे में प्रमाण कहते हैं—प्रश्न - सव मंडल कितने जाडे हैं कितने लम्बे हैं, कितनी परिधि वाले हैं ? उत्तर- इस में तीन पडिवृत्तियों कही है. इस में कितनेक ऐसा कहते हैं कि सबही मंडलं पृथक् २ एकेक योजन के जाड़े हैं. एक हजार एकसो तेत्तीस योजन के लम्बे चौडे {हैं, और तीन हजार तीनसों न्यावे योजन की परिधि वाले हैं २ कितनेक ऐसा भी कहते है कि वे सब { मंडल एक योजन के जाडे हैं, एक हजार एकसो चौतीस योजन के लम्बे चौड़े हैं और तीन हजार चारसो दो ( ३०४०२) योजन की परिधि वाले हैं. ३ कितनेक ऐसा
कहते हैं कि वे सब मंडले एक योजन
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• प्रकाशक- राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी*
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सूत्र
अर्थ
+8+ सप्तदश चन्द्रप्रशति सूत्र- षष्ठ उपाङ्ग 48
जायणसयं आयामत्रिक्खंभेणं तिष्णि जोयणसहस्साइं तिन्निय नवणउत्ति जोयण सते परिक्खेत्रेणं आहितेति वदेना एगे एवमाहंसु ॥ १ ॥ एगपुणे एवमाहंसु ता सव्वाविणं मंडलंवया जोयणवाहलेणं एवं जोयण सहस्सं एगंच चउन्तीसं जोयणमयं आयामविक्रमेणं तिन्नि जोयण सहस्साई चत्तारिवि उत्तर जोयणसते परिक्खेवेणं आहितेति वदेजाएगे एवाहं ॥ २ ॥ एगे पुण एवं माहंसु ता सव्वाविणं मंडलवया जोयण बाहल्लेणं, एवं जोयणं सहस्सं एगच पण्णतीसं जोयणसयं आयामविक्खंभेणं, तिण्णिय जोयण सहस्साइं चत्तारिय पंचुत्तरे जोयणसए परिक्खेवेणं आहितति वदेज्जा, एगे एव माहंसु ॥ ३॥ वर्ष पुण एवं वयामो ता सव्वाविणं मंडलं
इम का क्या
{ के जाडे व एक हजार एकसो पेंतीन योजन के लम्बे चौड़े हैं, और तीन हजार चारसो पांच योजन का परिधि वाले हैं. मै इस कथन को इ प्रकार कहता हूं कि वे सब मंडल एक योजन के एक सठिये अडनालीस भाग के जाडे हैं. मंडल की लम्बाई चौडाइ का कुच्छ नियम नहीं है ॥ १ ॥ कारन है ? उत्तर – यह जम्बूद्वीप एक लाख योजन का लम्बा चौडा यावत् परिधि वाला { हैं. इस में जब सूर्य सब से आभ्यंतर मंडलपर रहकर चाल चलता है तब वह मंडल एक योजन के एकसठिये अडतालील भाग का बाडा है और नन्यानवे हजार छ सो चालीस ( ९९६-४० )
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4 पहिला पाहुडे का सातवा अंतर पाहुडा
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Fo
अर्थ
4. अनुवादक -बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
चिट्ठीभागे जोयणस्स बाहल्लेणं, अणियया आयाम विक्खंभेणं परिवखे
वेणं आहितेति वदेज॥॥ १॥ तत्वणं को हेतु वदेज्जा ? ताअयणं जंबूद्दीवेदीवे जाव परिक्खेवेणं, ता जाणं सुरिए सव्वव्यंतरं मंडलं उवसंकमित्ता, चारं चरति, तयाणं मंडलवया अडयालीसंच एगट्टी भाग जोपणस्स बाहल्लेणं, णवणउति जोयण सहरसाई छच्चचत्ताले जोण ते आयाम विक्खेभेणं, तिण्णि जोयण सहस्साति एगुणउति जोयणाइ परिक्खेवेणं ॥ तयाणं उत्तम कट्ठपत्ते दिवसे भवति जहणिया दुवालस मुहुत्ता योजन का लम्बा चौडा है, क्यों कि सब से आभ्यंतर का मंडल जम्बूद्वीप की जगती से १८० योजन अंदर है इतना ही पश्चिम दिशा में है दोनों मीलाने से ३६० योजन होते हैं. योजन एक लाख योजन के जम्बूद्वीप में से कम करते शेष ९९६४० योजन का मंडल लम्बाइ चौडाइवाला रहता है, इस की परिधि तीन लाख पन्नरह हजार निव्यासी ३१५०८९ योजन व्यवहार से जानना. निश्चय से २१५०८९ योजन एक कोश, ७३८ धनुष्य, ४५ मंडल, ४ बालाग्र के ६३०१७८ भाग में से ३४३९०२ भाग जितनी परिधि है.
यव, ४ यूका, ६ लिंख और एक इस मंडल पर सूर्य आता है तब
अठारह मुहूर्त का दिन व बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. इस मंडल से नीकलता हुवा सूर्य नवे संवत्सर में प्रवेश करता हुवा प्रथम अहोरात्र में आभ्यन्तर मंडल से अनंतर दसरे मंडल पर जाकर चाल चलता है.
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राई
पूर्व दिशा में
उक्त ३६०
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वाला प्रसादजी ।
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सूत्र
सप्तदश चन्द्रप्रज्ञाप्ति सूत्र-षष्ठ उपाङ्ग ++
भवति ॥ से निक्खममाणे गरिए णवं संवकर अयमाणे पढमंसि अहोरलि अभंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, जयाणं मूरिए अभंतराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चार चरति,तयाणं सा मंडलवया, अडयालीसंच एगट्ठी भागे जोयणस्स.. वाहल्लेणं, णवणउति जोयण सहस्साई छच्च पणयाले जोयणसते पण्णतीसंच एगट्ठी
भागे जोयणरस आयामविश्वभेणं, तिन्नि जोयण सय सहस्साति १णरस सहस्त्ताति जब सूर्य दूसरे मंडल पर जाकर चाल चलता है तब वह दूसरा मंडल एक योनन के एकसठये अतालीस भाग का जाडा है. और नन्यानवे हजार छ सो पेंतालीम योजन व एक योजन के एकसठिये ३५ भाग [९१६४५ ] इतना लम्बा चौडा है. आभ्यन्तर मंडल से दूमरा मंडल तक दो योजन व एक योजन के एकसठिये अडताल.स भाग का अंतर है, इतना ही अंतर दूसरी तरफ है. इस से इन के दुगुने
पांच योजन व एस ठेये ३५ भाग हुवा. यह पहिले मंडल की लम्बाइ चौडाइ में मीलाने से *१९१६४५ में योजन हार, और ३१५१०६ योजन से कुछ अधिक की परिधि कही. क्यों कि इसमें 4
५ है योजत की लम्बाई चौडाइ की परिधि मीलाना. ५. की पूर्णाक में लाने से ३४० हो, उस का वर्ग करने से २१५६०० होवे उसे १० गुने करने से ११५६०००. इस का फीर वर्ग मूल
48 पहला पार्ट का आठमा अंतर पाड्डा 42
મર્થ
.+28
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सूत्र
अर्थ
4: अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
मुहुच दिवसे भवति, दोहिं एगट्ठी भाग अहिया ॥
एगंच छच्चुसरय परिक्खेत्रेणं तयाणं अट्ठारस एगट्ठीभागूणा, दुबालस मुहुत्ता राई दोहिं से निक्खममाणे सूरिए दोच्चांसि अहोरत्तांत अनंतरं तच्चं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, ता जयाणं सूरिए जाव चारं चरति, तयाणं सा मंडलवया अडयालीसंच एग भागे जोयणस्स णवणउत्ति जोयण सहस्साई छच्चएकावणे जोयणसते णत्रय
{ करने से १०७९ होवे और इस को ६१ भाग से भाग देने से १७ योजन व शेष ३८२२८|| है इसी की प्रथम मंडल की परिधि में मीलाने से ३१५१०६ योजन से कुछ अधिक होवे इस समय यहां पर एकसठिये दो भाग कम अठारह मुहूर्त का दिन होता है और दो भाग अधिक बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. इम { तरह नीकलता हुवा सूर्य दूसरी अहारात्रि में आभ्यंतर तीसरे मंडल पर रहकर चाल चलता है. जब सूर्य आभ्यंतर तीसरे मंडल पर चाल चलता है तब वह तीसरा मंडल एक यांजा के एकसठिये अडतालीस भाग ( जाडा है और नन्यानवे हजार छ सो एक्कावन योजन एक योजन के एकसठिये नव भाग २९६५१ जितना लम्बा चौडा है. दूसरे मंडल की लम्बाई चौडाइ में ५ परिधे तीन लाख पनरह हजार एक सो पच्चीस योजन से
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भाग मीलाने से इतने होते हैं. इस की कुछ अधिक है ( ३१५१२५ ) इस
* प्रकाशक - राजादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालयमसादजी
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मत्र
maraananmins
सप्तदश चद्रं प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 418
एगट्टी भागे जोयणस्स अयामविक्खंभेणं तिन्नि जोयण सयसहस्साई पण्णरस सहस्साई एगच पणवीसं जोयण सयं परिक्खेवेणं,तयाणं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति चउहिं एगट्ठी भाग ऊणे दुवालस मुहुत्ता राई भवति चउहिं आहिया।एवं खलु एतेण उवाएणं निक्खममाणे मूरिए तयाणंतर मंडलाओ मंडलं उवसंकममाणे २ पंचजोयणाई पणतीसंच एगट्ठी भागे
जोयणस्स एगमेगेगं मंडले विक्खंभ बुड्ढि अभिवढेमाणे अट्ठारस २ जोयणाई परिक्खेवेणं समय एकसठिये चार भाग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि होती है और चार भाग अधिक बारह मुहूर्त में का दिन होता है. इस तरह नीकलता हुवा सूर्य एक मंडल से दूसरे मंडलपर जाता हुवा ५: योजन की एक २ मंडलं में लम्बाइ चौडाई की वृद्धि करता हुवा और परिधि में अठारह योजन की वृद्धि करता हुवा सब से बाहिर के मंडलपर रहकर चाल चलता है. जब मूर्य सब से बाहिर के मंडलपर चाल चलता है। तब वह मंडल एक योजन के एकसठिये अडतालीस भागका जाडा है, एक लाख छ सो छासठ(२००६६०) योजन की लम्बाइ चौडाइ वाला है. इम में पहिला मंडल छोडकर शेष १८३ मंडलपर सूर्य चाल चलताहै.4 प्रत्येक मंडलं में योजन की लम्बाई चौडाइ की वृद्धि होती है. इस से ५ को १८३ से गुना करने से १९१५ योजन होवे और ३५ को १८३मे गुना करने से ६४०५ भाग होवे उसे ६१ का भाग देने से १०५होवे।
+ पहिला पाहड का आठवा अंतर पाडुडा 48+
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दिक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमेलक ऋषिजी 80
बुद्धि अभिवढेमाणे २ सध्यबाहिरं मंडलं उवसंकमित्ता चार चरंति, जयाणं मरिए सब जाव चारं चरति, तयाणं मंडलवया अडयालीसंच एगट्ठी भाग जोयणस्स बाहल्लेणं एगं जोयण सयसहस्सं छच्चसट्ठीजोयण सते आयामविक्खंभेणं तिन्नि जोयण सयसहस्सति अट्ठारससहस्साति तिन्नियपण्णरमुत्तरं जोयगमते परिक्खयेणं, तयाणं उत्तम कट्टपत्ते र ई भवति, जहण्गते दुवालस मुहुत्ते दिवसे
भवति ॥ एसणं पढमे छम्मासे, एसणं जाव पजवासणे, ॥ २ ॥ से पविसमाणे से उपर्यक्त९१५ में मीलाने से१०२० योजन की लम्बाइ यौटाइकी वृद्धि हुड,इम प्रथम मंडल के १९६५ योजन में मीलाने से १००६६० हावे. यह अंतिम मंडल की लम्बाइ चौडाइ का प्रमाण जानना. अब परिधि का कहते हैं बाहिर के मंडलकी परिधि:००६६० योजन की है. इस का वर्ग १७१३२४३५६०० हावे, इम को दश गुना करने से १.१३२४३५६... होवे. इस का वर्ग मूल नीकाले तब ३१८३१४ योजन होवे इस की छद राशी ५५३४०४ होती है और भागाकार राशि ६३६६२८ होती है इम से पनरह योजन से कुच्छ कम होवे; परंतु सूत्र कर्नाने व्यवहार नयसे पूर्ण पनरह लिया है. उस साय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्न की रात्रि व जघन्य बारह मुहूर्त का दिन होना है. यह प्रथम छमास व प्रथम छमामले का पर्यवसान हवा. ॥२॥ वहां से प्रवेश करता हुना मर्य दूसरे छमास बनामा हु। पहिली अहोरात्रि में
• प्रकायाक-राजाबहादुर लाला मुखदेव महायगी मालामपादनी
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दश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र-प उपाङ्ग
मृरिए दार्च छम्मासं भायमाणे पदमसि अहोरत्तसि वाहिराणंतरं मंडलं उवर्म. कामित्ता चारं चरति, ता जयाणं सरिए जव चारं करति, तयाणं सा मंडलवया अडयालसिंच एगट्टी भाग जोयरस वाहलेणं, एग जोयण सय सहस्सं उच्च च3८पणे जोराण संत छव्य संच एगट्टी भागे जोयणस्त आयामाविक्खंभेणं तिन्नि जोयण सया महसमाइ अट्ठारस सहस्माइ दोन्निय सत्ताण उए जोयण सते परिक्खेघेणं, तयाणं अट्ठारस महत्ता राई गमन दौणि एगट्टी भाग ऊगे. दुवालम मुहत्तदिवासे भवति
दोहिं एगट्ठी भाग अहिए ॥ से पविप्तमाण गरिए दोच्चसि अहोरसि वाहिरं तचं गाहेर मे अगर दूसरे मंडलपर चाल चलना है. जब सूर्य दूसरे मंडलपर यावत् चाल चलता है तब वह मडल एक योजन के एकसठिये अउनालीस भाग का जाना है और एक लाख छसो चौपन योजन व एक मठिये छबीम आग १०८६५४ का लम्बा चौडा है. अंतिम मंडल की लम्बाइ में मे भाग कम कीय और तीन लाख अठारह हजार दो सो ससाणवे ३१८२१७ योजन की गिधि हैं. बाहिर के मंडल की परिधि में से १८ योजन परिधि के कम कीये उ.म. समय एकसठीये दो भाग कम अठारह महर्न की रात्रि व दो भाग, अधिक बारह मुहूर्त का दिन
पाहेला पाहुद का आठवा अंतर पाहुडा 4260
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48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
मंडलं उवसंकमित्ता चार चरति, ता जयाणं सरिए बाहिरं जाव चार चरति, तयाणं सा मंडलवया अडयालीसं एगट्ठी भ गे जोयणस्स बाहल्लेणं, एगं जोयण सयसहस्सं छच्च अडयाले जोयण वावणंच एगट्ठी भागे जायणस्स आयामविक्खंभेणं, तिन्निय जोयण सय सहस्साई अट्ठारस सहरसाइं दोणिय अउणासी जयणसए परिक्खवेणं तयाणं अट्ठारस मुहु ता र ई चउहि ऊणा, दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति, चउहिं
अहिए ॥ एवं खलु एतेण उवाएणं से पविसमाणे सूरिए तयाणंतराओ, तयाणंतरं मंडलाओ मंडलं जाव संकममाणे २ पंच २ जोयणाई पणतीसंच एगट्ठी भागे होता है. वहां से प्रवेश करता हुवा सूर्य दूसरी अहोरात्र में वाहिर के तीसरे मंडल पर रहकर चाल चलता है. जब सूर्य बाहिर के तीसरे मंडल पर रहकर चाल चलता है तब वह मंडल एक योजन के.
एकसाठय अडतालीस भाग का जाडा है, एक लाख छ सो अडतालीम योजन व एकसठिय बाचन भाग E११००६४८ योजन का लम्बा चौडा है, क्यों कि दूसरे मंडल की लम्बाई में से ५ योजन कम
करते इतने शेष रहे. और परिधि तीन लाख अठारह हजार दो सो गुन्यासी ३१८२७९ योजन की है। दसरे मंडल की परिधि में से इतनी कम करे, यहां पर एकस दिये चार भाग कम अदारद मुहूर्त की रादि।
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव महायजी ज्वालाप्रसादजी.
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अस्
सप्तदश चंद्रप्राति सूत्र-पष्ट उपाङ्ग 4
जोगणरस, एगमेगेणं मंडले विक्खंभ वुढिनिवडिमाणे २ अट्रारस जोयणाइ परिक्खवे वुट्टिणिवुट्ठिमाणे २ सवभिंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति ॥ ता जयाणं मारिए सव्वब्भतरं जाव चा चरति, तयाणं सा मंडलवया अडयालीमंच एगट्ठी भागे जोयणरस वाहल्लेणं, गवणउति जोयण सहस्साइं छच्च चालिस जोयण सते आयामविक्खंभेणं, तिन्नि जोयण सय सहस्साई पण्णरस सहस्साति एगूण उर्तिच जोयण परिक्खवणं, तयाणं उत्तम कटुपत्त उक्कोसए अट्ठारस मुहत्ते दिवसे भवति जहाणिया दुवालस मुहुत्ता राई भवति ॥ एसणं दोच्च छम्मासे, एसणं दोच्च च.भाग अधिक बारह मुहूर्त का दिन है. इस तरह अंदर प्रवेश करता हुवा मूर्य अनंतर मंडल पर आता हुवा प्रत्यक मंडल पर ५ योजन की लम्बाइ चौडाइ व अठारह योजन की परिधि कम क हुवा सब स आभ्यन्तर मंडल पर रहकर चाल चलता है. जब सब से बाभ्यन्तर मंडल पर चाल चलता है तब वह मंडल एक योजन के एकसाठय अडतालीम भाग का जाडा है. उस की लम्बाइ चौडाइ ९१.६४० योजन की है और परिधि ३१००८९ योजन की है. उस समय अठारह मुहूर्त का दिन व बारह महून की रात्रि होती है. यह दूसरा छमास हुवा, यह दूसरा छमास का पर्यवसान हुवा. यह आदित्य
4227 पहिला पाह का आठवा अंतर पाहु। 4989
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अनुवादक- लब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
छम्मासस्त, पजवसाणे एसणं आदिच्चे संवच्छरे, एसणं आदिच्चरम संवच्छरस्स पज्जवासणे ॥ ३ ॥ तासव्वाविणं मंडलवया अडयालीसंच एगठि भागे जोयणस्स वाहनेणं, सवाविणं मंडलंतरिया दोजोयणाति विक्खंभेणं ॥ . एसणं अहा एतासिय सए स पडिपुण्णा पंवदसुत्तर जायण सए आहितेति बदेजा, ता अभंतरातो मंडलवतातो बाहिरापडलवता, वाहिरामडलवतातो,
अब्भंतरा मंडलबया एसणं अद्ध। पचदमुत्तर जोयण सते, अडयालसिंच एगट्ठीभागे संवत्मर व आदित्य मरसर का पर्यवसान हुवा ॥ ३ ॥ सब मंडल एक योजन के भाग में मे ४८ भाग जितने जाड हैं, सब मंडल का अंतर दो योजन का है. अर्थत् एक बंडल से दूसरे मंडल तक में हो योजन का अंतर रहा हवा है. मूर्य उक्त सब मार्ग १८३ रात्रि दिन में पूर्ण करे. ५१० योजन में जा. १८३ को दो योजन के अंतरमे गणाकार वरो मे ३०६ होवे और एकमठिये अडतालीम भाग से गणने से ८७८४ की राशि बनाकर ६१ का भाग देने से १४४ हार वह ३६६ में मीलाने से ५१० योजन होवे. आभ्यन्तर मंडल के अंदर के चरिमांत से बाहिर क मंडल के बाहिर के चरिमांत तक अथवा बाहिर के मंडल के बाहर के चरिमांत से आभ्यन्तर मंडल के अंदर के चरिमांन तक मर्य का मार्ग ५१० है योजन का होता है, यहां पर मूर्य के प्रथर मंइल को जाड इ ग्रहण की है. अभ्यंतर
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संत्र
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सप्तदश चंद्र प्रनप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग
जोयण अहिया, ता अभंतराए मंडलवाते. बाहिरा मंडलवता बा हराए मडलवताए अनंतरा मडलवता एसणं अद्धा पंचनवृत्तरे जायण सते तेरस एगट्ठीमागे जोयणस्स आहितेति वदेजा, अपराते. भेडलबताते, काहिराए मंडलवताए बाहिरा मंडल वया, अभंतरा मंडलवता अहा केवतियं आहितेति वदेजा, ता पंचद सुत्तरे जोयसते आहितेति वदेजा ॥ चंदपण्यत्तिस्ले पढमस्स अट्ठमं पाझुडं सम्मत्तं
॥ १ ॥ ८ ॥ इति पढम पाहुडं सम्मतं ॥ १॥ मंडल के काहिर के चस्मिांत से वाहिर के मंडल के अंदर के चरिमांत और बाहिर के मंडल के
दर के रिमांत मे अभ्यंतर मंडल के वाहिर चरिमांतर मूर्य का मार्ग ५०९योजन का होना है.
और आअपनर मंडल के अंदर के चरिमन से व बाहिर के मंडल के अंदर के चरिमांत से बाहिर के म मंडल के बाहिर के चरमांत तक और आभ्यन्तर मंडल के बाहिर के चरिमांत तक सूर्य का मार्ग:१० योजन
का कदाहै. यह दिला पाहडेका अठया अंतर पाहुडा संपूर्ण वा॥१॥८॥यह पहिला पाहुडा समाप्त हुव ॥२॥
पहिला पाहु का आठवा अंतर पहुहै। 42
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* अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री पाठक ऋषिजी +
॥ द्वितीय प्रामृतम् ॥ ता कहते तिरच्छगति आहितेति वदेजा ? तत्थ खलु इमातो अट्ट पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ तंजहां-तत्थ एगएव माहसु-ता पुरथिमिलातो लोगंताओ पाओसृरिए आगासंसि उत्तिटुंति,सेणं इम लोग तिरियं करति २ त्ता पच्चथिमिलंसि लोगतसि सायं सरिए आगासंसि विद्धसति एग एच माहंम् ॥ १ ॥ एगपुण एव माहंसु ता पुरत्थिीमलाता लोगताओ पातो सरिए आगासातो तिटुंति, सेणं इमलोयं तिरियं करति २ त्ता पञ्चत्थिमिल्लंसि लागतास सायं सरिए आगाससि विहरति, एगे एवमासु ॥ २ ॥
अब दूसरा पाहुडा कहते हैं. अहो भगवन् ! सूर्य की तीर्छगति किस प्रकार की है ? उत्तर-अहो शिष्य! इस में अन्यतीथि की प्ररूपणा रूप अठ पडिवृत्तियों कही है. उन में से कितनेक ऐमा कहते हैं कि पूर्वदिशा के लोक के चरिमांत से प्रभात में सूर्य आकाश में नीकलता है. वह तीछे लोक में प्रकाश करके पश्चिम दिशा के लोक के अंत में संध्या समय में विनाश को प्राप्त होवे, २ कितनेक ऐमा कहते हैं कि पूर्व दिशा के लोक के चरिमांत से प्रभात में सूर्य आकाश में रहता है. वही सूर्य ताछ लोक में प्रकाश
करके पश्चिपदिशा के गेकांत में संध्या समय में आकाश में विचरे. ३ कितनेक ऐसा कहते हैं कि के पूर्व दिशा के लोक के चरिमांत में प्रभात में सूर्य आकाश में रहता है. वह तीछी लोक
प्रकाशक-राजाबहादूर लाला सुखदवसहायजी ज्वालापसादजी.
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सूत्र |
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एगेपुण एव माहंस, ता पुरथिमिल्लातो लागंताओपादो मूरिए आगासातो तिट्ठइ सेणं इमं लोगं तिरियं करेति २ सा पच्चत्थीमलंसि लोगसि सायं सरिए आगासं अणुपविसइ २ त्ता अहे पडियागच्छति, अहे पुणरवि अवरभू पुरथिमिल्लातो लोगंतातो पासा मरिए आगासातो तिउट्ठति, एगे एव माहंसु ॥३॥ एगे पुण एवमाहमु ता पुरस्थि मिल्लातो लोगंतातो पातो सूरिए पुढविपातो उतिद्वइ, सेणं इमं लोगं तिरियं करतिरता,
पच्चथिमिल्लांस लोगंसि सायं सूरिए पुढविकायंसि विडंसति, एगे एवमाहंसु 1 में प्रकाश करके पश्चिम के चरिमांत में संध्या समय आकाश में प्रवेशकर अधो लोक में जाता है. वहां वह #प्रकाश करता है. फीर पृथ्वी में से नीकलकर लोक के अंत में प्रभात में सूर्य आकाश में रहता है. इस
नासरे मत से यह लोक वर्तुलाकारवाला है एसा होता है. इस से सूर्य दिन को उपर के भाम में और रात्रिको नीने के भाग में प्रकाश करता है. जहां प्रकाशता है वहां दिन और जहां अदृश्य होता है वही रात्रि. यह मत
राण प्रसिद्ध व विदेशीय प्रजाका है. उक्त तीनों मत्त वाले में विशेषता है सो बताते हैं. पहिला का *कथन है कि यह सूर्य का विमान नहीं है, डेवता रूप मूर्य भी नहीं है परंतु किरणोंके संघातरूप गोलाकार
है. लोकोंके अनुभव से प्रतिदिन पूर्वदिशा के आकाश में उत्पन्न हो सर्व स्थान प्रकाश करता है. दूसरे
48 सप्तदश चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग
दूसरा पाहुडे का पहिला अंतर पाहुडा
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॥ ४ ॥ एगेपुण एवमाहं मु ता पुरथिमिल्लातो लोगंतातो पाओ सरिए पुढवीआतो उतिटइ सेणं इमं लोगं तिरियं करति २ त्ता पचत्थिमिलंसि लोगंसि सायं सूरिए. पुढविकायं अणुपविसति २ ता पुढवि अहे पडिगच्छति, अहे २ पुणरवि अवरभू पुरथिमिलातो लोगंताओ पादो सृरिए पुढवियातो उत्तिति, एगे एव माहंभु ॥ ५ ॥ एगेपुण एवमाहंसु ता पुरथिमिल्लाओ लोगंताओ पादो सृरिए आउकाए उत्तिट्ठति
सेणं इमं लोगं तिरिच्छं करेति २ त्ता पच्चत्थमित्रंसि लोगप्ति सायं सरिए आउकायं का कथन यह है कि यह देवतारूप सूर्य तथाविध जगत के सभाव से आकाश में उत्पन्न होता है और अस्त होता है और तीसरे का कथन यह है कि यह देवतारूप सूर्प सदैव स्थित पृथ्वीपर प्रदक्षिणा करता है. अब आगे और भी तीन मत आकाशोदय व समुद्रोदय के कहते हैं. ४ अब चतुर्थ मत वाले किनमेक अन्यतीथि ऐसा कहते हैं कि पूर्वदिशा के लोकांत के चरिमांत से प्रभात करता हुवा मूर्य पृथ्वी में से नीकलता है और तीच लोक में प्रकाश करता हुवा पश्चिमदिशा के लोक के अंत में संध्या समय पृथ्वी
में ही अस्त होता है. कितनेक ऐसा कहते हैं कि पूर्व दिशा के लोकांत में प्रातःसमय में सूर्य पृथ्वी में से जनकलकर तीर्छ लोक में प्रकाश करता हुवा संध्या समय में पश्चिमदिशा के लोकांत में पृथ्वी में प्रवेश
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
. प्रकाशक-राजाबहादर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी...
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सत्र
सनदश चंद्र मज्ञप्ति सूत्र-टप उपाङ्ग
अणुपविसति, एगै एवंमाहंस ॥६॥ एगेपुण एयमाहंस-ता पुरथिमिजातो लोगंतातो पातो सूरिए आउकायंसिउत्तिटुंति, सेणं इमं लोगं तिरियं करेति. २ त्ता पचत्थिमिल्लसि लोगंसि सायं सूरिए आउकाय अणुपविसइ २त्ता, अहे पडियागच्छति २सा पुणरवि अवरभू पुरथिमिल्लातो लोगंतातो पातो सूरिए आउकायंति उत्तिटुंति, एगे एवमासु ॥ ७ ॥ एगे पुण ९वमाहंमु-ता पुरथिमिल्लातो लोगंताओ यहुई जोयणाई, बहूई जायणसयाति, बहूई जोयणसहस्साति उट्टे दूर
उप्पतित्ता एत्थणं पातो सूरिए आगासातो उत्तिटुंति, सेणं इमं दाहिणद्वंलोगं तिरियं करता है. और वहां अधोलोक प्रकाश करता है. फोर वहाँ से पूर्व के लोकान में प्रगट होता हुवा सूर्य पृथ्वी में से नीकलता है ६ कितनेक एसा कहते हैं. कि पूर्वदिशा के लोकांत में प्रातःकाल में उदय होता हवा सूर्य अप्काय-समुद्र में स नीकलता है और तीच्छी लोक में प्रकाश करके संध्या समय पश्चिम दिशा के लोभमद में प्रवेशकर अस्त हो जाता है. ७ कितनेक ऐसा कहते हैं कि पूर्वके लोगों में प्रात: समय में भूर्य
अ समुहको समुद्र में से नीकलता यह तीर्छालाक में प्रकाश करता हुवा सध्या समय पश्चिम के लोकांनमुद्र में प्रवेश करता है. वहां नीचे जाकर नीचे के लोक से पर्वक लोक के अंत में प्रगट होकर मर्य अपाय में से नीकलकर रहता है ८ कितनेक ऐना कहते कि पूर्व के
8. दूसरा पाहुड क पहिला अंतर
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सूत्र 3
__ करेति २ त्ता, उत्तर लोगं तामेवरातो सेणं उत्तरद्वं लोगंतिरियं करेंइ २ 'ता
दाहिण, लोग तामेवरातो सेणं इमाति दाहिणत्तरड लोगाइं तिरियं करेइ २त्ता परस्थिमिल्लातो लोगताओ बहूति जोयणतिं तंचव जाव उड्ढें उप्पतित्ता दृरं, एत्थणं पातो सरिए आगासातो उत्तिति एगे एव माहं ॥ ८ ॥ वयं पुण एवं वयामो-ता जंबूदीवरस २ पाईण पडीणायताए उदिणादाहिणायताए जीवाए मंडलं चउविसेणं सतेणं छत्ता दाहिणंपुरथिमसिया उत्तरपञ्चत्थिमंसिया चउभाग मंडलंसि इमीसेणं
रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिजातो भूमिभागातो अट्ठजोयगसयाति उड्ड लोक के अंत से बहुत योजन, बहुत सो योजन बहुत गहन गोजन ऊंचा जाकर प्रभात समय सूर्य आकाश में रहा हुना तीर्छा दक्षिणार्थ में प्रकाश करता हुवा उत्तरार्ध में जाता है. जब दक्षिणार्ध में दिन होता है तब उत्तरार्ध में रात्रि होती है और जब उत्तरार्ध में दिन होता है तब दक्षिणार्ध में गति होती है. इस तरह दक्षिणार्ध व उत्तरार्ध दोनों में तीन प्रकाश करता हुवा दिशा के लोरांत से बहुत योजन, बहुत सो योजन व बहुत सहस्र याजन दूर आकाश में प्रकाश करता हुवा रहता है. इस कथन को हम ऐसे
कहते हैं. कि इस जंबद्वीप नामक द्वीप में पश्चिम की रेखा व उत्तर दक्षिण की जिव्हा अर्थात् सूर्य 16के विमान को गमन करने के मंडल को १२४ भाग से उदकर चार भाग करना. तद्यथा-अनि:।
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
• प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुख्दकमहायजी ज्वालापसादजी.
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उप्पतित्ता एत्थणं पातो वे सरिया आगासातो उत्तिटुंति, तेणं इमाति दाहि णुत्तराति जंबद्दीव भागाति तिरियं करेति २ ता पुरथिम पञ्चस्थिमाई जंवृद्दीवस भागाति तामवरातातो पञ्चत्यिम पुरथिमाई जम्बूद्दीव भागाइं तिरियं करेति २ ता दाहिणुत्तराति जंबूद्दीव भागाइं तामेवरातातो तेण इमाइं दाहिणुत्तराति पुरथिम पञ्चत्थिमातिं जंबुद्दीव भागाइं तिरिय करेति २ ता जंबूद्दीवरस २ पाईण पडीणायताए तंचेव, एत्थणं पातो दुवे सूरिया आगासातो उत्तिटुंति ॥ इति वीय पाहुडस्स
पढमं पाहुडं सम्मत्तं ॥ २ ॥ १ ॥ * कून, वायव्यन, नैऋत्यकन व ईशानकून. इन चारकून में इस रत्नप्रभा पृथ्वी के समरमणीय भूमिभाग से ८०० योजन ऊंचे जावे तब दो सूर्य प्रकाश करते हैं. व अ.काश में उदित होते हैं. ये दोनों में एक सूर्य दक्षिण दिशा के विभाग में मारे और दादा इत्तविभाग में प्रकाशकरे तब जम्बूद्वीप के पूर्व पश्चिम विभाग में रात्रि होते. और जब पूर्वपश्चिम विभाग में प्रकाशकरे तब उत्तर दक्षिण विभाग रात्रि होवे. इस तरह वे दोनों मूर्य जम्बूदीप क दक्षिण उत्तर विभाग में रात्रि व पूर्वपश्चिम विभाग
प्रकाश करते हुवे जम्बूद्वीप की पूर्वपश्चिम रेखा वगैरह प्रभात करते हुवे दोनों सूर्य आकाश में प्रकाश 'चि.करते है. यह दूसरा पाहुडा का पहिला अंतर. पाहुडा हुवा. ॥ २॥१॥ . . .
सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ट-वराज
हुडे का पहिला अंतर पाहुडा 498
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48 अनुपिदक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पनी
ता कहते मंडलाता मंडलं संक्रममाणे २ मृरिए चारं चरति आहितेति वदेजा ? तत्थ खलु इमातो दो पडिवत्तीओपण्णत्तानो तंजहा तत्थ एगे एव माहं ता मंडलातो मंडलं संकममाण २ सरिए भेदधाते संकमति आहितेति वदेजा, एगे एवं मासु ॥ १॥ एगे पुण एव माहमु ता मंडलाओ मंडलं संकममाणे २ मूरिए कण्ण कला निवति आहितेति वदेजा एगे एव माहंमु ॥ २ ॥ तत्थण जेते एव माहंमु ता मलाल मंडलं संकममाणे २ सरिए भेदघाती सकमति तेसिणं अयं दासो जेणंतरेणं मडलानो मडलं संकममाण सरिए भदघाओ संकमति, एव तियं चणं अद्धं पुरतोण गच्छति, पुरओ आगच्छमाणे मंडल कालं परिहावति, तेसिणं
अब दूसरा अंतर पाहुडा कहते हैं. अहं भगवन्! एक मंडल मे द पर मंडलपर सूर्य किस प्रकार चलना में है ? अहो शिष्य ? इस विषय में दो पडियत्तियों कही हैं. कितनेक ऐसा कहते हैक सूर्य मंडलपर चलता हुवा भेद घात करता हुवा चले २ किननेक अन्यतीर्थ ऐसा करते हैं कि मंडल २ पर। चलना हुवा सूर्य कर्णकला की हानि करता हुवा चल. उक्त दोनों में से जो ऐसा कहने कि मंडल २ पर मंकपता हुवा भेद घात कर चले उन को यह दोष है. अंतर मंडल २पर रहकर जो सूर्य भेद घात से चलता है वह लोक में अर्ध मंडल पूरता हुवा जावे और अर्थ मंडल पूरना हुवा आवे. और जो अंतर मंडल २ पर पूरता हुवा कर्ण कला की हानि करता हुआ चले ए जो अन्यतीथि कहते
• प्रकाशक रम्जाबहादुर लाला मुवकि सहायजी कालप्रसाद जी.
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तनि मुत्र-पष्ट उपाङ्ग 4
अयं दोसो ॥१॥ तत्थणं जे ते एव मासु मंडलाओ मंडलं संकममाणे मूरिए कण्ण कला निवदृत, तेसिणं अय दासा जणतरेण मंडलातो मडलं संकममाणे २ मूरिए कण्ण कला निति , एनालियं चणं अह-परतो गच्छति,पुरओ आगच्छमाण २ मंडल कालं परिहावति, रणं अदास ॥ तत्थ जे ते एकमाईसु ता मंडलातो मंडल संकममाणे २ मूरिए कण्णालानति एएणं णएणणेयव्वं नो चरणं इतरणं गेयव्यं ॥ इति बीय पाहुडस्म विसियं पाहाड सम्मत्त ॥ २ ॥ २ ॥
ता कवतियं खत एगमेगण मुहुत्तेग सूरिए गच्छति आहितति वदेज्जा ? तत्य खलु उनको यह दोप है. जो अपनर मंडल पर रहकर कर्ण कला की हानि करता है वह
द्धा लोक में अर्थ मंडल पूरता हुवा जाये और अर्थ मंडल पूरता हवा आवे. यह मंडल से काल प्रति पूर्ण करे नहीं. इसी म अन्यतीयि को यह दोष है. इन में जा ऐ कहते हैं कि एक मंडल से दुमरे मंडलपर नाता हुवा सूर्य कर्ण कला की हानि करता है इसी कारण स उनको प्रज्ञा नहीं है. यहां कोई अन्यन्याय से नहीं होता है. या दूसरा पाहुना का दूारा अंतर पाहुडा हुआ ॥२॥ २॥ . है अब तीसरा अंतर पाहुडा कहते है-..अहो भगवन् ! आपके मत से सूर्य एकेक मुहूर्त में कितना क्षेत्र ११जाता है ? अहो शिष्य ! इस में अतीर्थी की प्ररूपणारूप चार पडिवृत्ति कही है अर्थात् इस में भिन्न २
चार मत हैं. १कितनेक ऐसा कहते हैं कि एक २ मुहूर्त में मुछ२ हजार योजन चलता है, २ कितने
48 दूमरा पाहुडे का तीसरा अंतर पाहुडा 487
सप्तदश
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बनुवादक-कालब्रह्मचारीमान श्री अमोलक ऋषिजी
इमाओ चत्वारि पडिवत्तीओ पण्णनाओ तंजहा तत्थ एगे एवमाहंसु ता छ छ जोयण सहस्साति सूरिए एगमेगेणं महत्तेणं गच्छति, आहितात वंदना, एग स्त्रमा ॥ १ ॥ एगे पुण एवमाहनु ता पच २ जोग । १२सारिस ग नुहोस गच्छति आहितति वदेजा, एगे एवमासु ॥ २ ॥ ९गण एवमाहंसु ता चत्तारि २ जोयण सहस्साति सरिए एगमगणं महतगं गच्छति आहितेति बदजा एगे एवमासु ॥ ३ ॥एगेपुण एवमा नु ता छ। पंचवि चत्तारिवि जोयण सहस्साई ऐमा कहते हैं के एक २ मुहू में सूर्य पांव २ हजार ये जा चलता है. ३ किनक ऐमा कहते हैं कि
२मुहर्न में मर्य चार हार योजन चलता है ४ और कितनेक ऐसा कहते कि-एक २ सूर्य छ हजार, पांव हज र भौर चार हजार शेजा भी चलता है. इस में जो ऐमा कहते हैं कि सूर्य ए: २ मुहूर्त में छ २ हजार गोजन चलना है. उनका कथन इस हेतु स है कि जय सूर्य मब से आभ्यंतर मंडलपर रहकर चा चलता है तब उत्कृष्ट अहमहू का दि व जघन्य रहन ६ रात्रि होती है. इस समय एक लाख आठ हजार योजन का यावत् क्षत्र कहा है एक मुहूर्त मेंउ २ हजार योजन चलने से १८ मुहूर्त में एक लाख आठ हजार योजन चले और सूर्य सब से बाहिर के मंडलपर चलता है तब उस्कृष्ट अठारह मुहूर्त की रात्रि और बारह मुहूर्त का दिन होता है. इस समय में साप क्षेत्र
भवहार का मुख्दवमहायजी उदारा प्रमादजी.
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सप्तदश चन्द्रप्रज्ञप्ति मत्र-पष्ट उपाङ्ग 48+
मूरिए एगणं मुहत्तणं गच्छति आहितेति वदेजा ॥ ४ ॥१॥ तत्थ खल जे ते एव माहम छछ जायण सहस्साति सूरिए एगमेगेणं महत्तेणं गच्छति तेणं एवमाहंमु-ता जयाणं मूरिए सव्वभंतर मडलं उवम्कमित्ता चार चरति तयाणं उत्तम कट्टपत्ते दिवसे भवति जहाणिया दुवालस महत्ता राई भवति, तेसिंचणं दिवसंसि एग जोयण सयमहरसं अट्ठ जोयण सहस्हाति हाव खेने पणने । ता जयाणं सरिए सव्वबाहिरं मडल उचसंकमित्ता चरं चरति, तयाणे उत्तम कट्रपत्ता
१७२ हजार योजन का कहा है. चारह को छ गुने करने से ७२ होते हैं २ जो ऐमा कहते हैं कि सर्य एक मुहूर्तमें पांच हजार योजन चलता है उनका कथन इसहेतुमे है कि जब सूर्य सबसे आभ्यंतर मंडलपर रहकर चाल चलता है तब उत्कृष्ट अठारह महूर्नका दिन जघन्य बारह मुहूर्नकी रात्रि होती है. इस सायमें ताप क्षेत्र १० हजार योजनकाहै. अठारह को पांचम गुणनेमे९. हमार योजन होते हैं. जर सूर्य व हिरक मंडलपर चलना है तव अठारह मुहूर्त की रात्रि व बारह मुहूर्गका दिन होता है इसमय नाप क्षेत्रक० हजार यातन का है बारह को पांच स गुणने से ६० होते हैं. जो एमा कहते है कि एक २ मुहूर्त में मूर्य चार २ हजार योजन चलता है उन का कथन इस हेतु स है कि जब सूर्य सब से आभ्यम्तर मंडल पर चलता है तब अठारह मुहूर्त का दिन व बारह मुहूड़ की रात्रि तोती है, उस समय ताप क्षेत्र बहत्तर हजार योजन का है क्योंकि ।
48. दूसरा पहुड का तीसरा अंतर पाहुडा Rod
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। अमोलक ऋषिजी + अनुवादक-बालब्रह्मचारीमानश्री
उकेसिया अट्ठारम मुहुत्ता राई भवति, जहण्णये दुवाल मुहत्ते दिवसे भवति ॥ तेसिं चणं दिवसंसि वावत्तरि जोयण सहरमाति ताव खत्ते, पण्णत्त, तयाणं छछ जोयण सहस्वाति एगमेगेणं मह लेणं गच्छति ॥ १ ॥ तत्थ जे ते एवमाहंस ता पंच जोयण सहस्सातिं सूरिए एगमेगणं महत्तणं गच्छति तेणं एवमाहंमु ता जयाणं
मुरिए सबभतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं उत्तम जाव दिवसे चार हजार को अठार गुना करने मे बहत्तर हजार होते हैं. और ना सूर्य सब से बाहिर के मंडल पर रहता है तब उत्कृष्ट अठारह मुहूर्नकी गधि व जघन्य बारह मुहूका दिन होता है. इस समय अडनालीस हजार योजर का ताप क्षेत्र होता है, चार हजार को बारह गना करने से इतने होते हैं. अब जो एगा। कहते हैं कि सूर्य छ, पांच व चार हजार याजन एक २ मुहूर्त में चलता है उनका कथन इस हे त म है कि सर्य उदय पाना हुवा अस्त होता हुंबा बहुत शीघ्र गति से चलता है. और तब एक २ मुहूर्त में छ २१ हतार योजन चलना है. जब मध्यम क्षन में सूर्य रहना है तो उस की गति मध्यम रहती है इसमें समय एक २ समय में पांच २ हजार योजन चलता है, और जब मध घीच के क्षेत्र पर चलना है तब उस की गति मंद होती है, इस समय एक २ मा में चार २ हजार योजन चलता है. यह कथन किस तु से है ? उत्तर-पद्द जम्बद्रीप नामक द्वीप यावत् पसिंधवाला है. इस में मूर्य जब सत्र से आभ्यन्तर
प्रकाशकाजावहादुर लाला मुखदरमहायजा ज्वालाप्रसादजी.
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सप्तदश चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग 48
भवति जहणिया दुवालस महता राई भवति ॥ तेसिं चणं दिवसंसि उर्ति जोयण सहस्साति ताव खेत्ते पण्णत्ते ॥ ता जयाणं मूरिए सब्ध बाहिर मंडलं जाव चारं चरति तयाणं उत्तम कट्ठपत्ते उक्कोसए जाव राई भवति जहणिए दुवालस मुहत्ते दिवसे भवति ॥तेसिं चणं दिवसांस सहि जोयण सहस्साति ताव खत्ते पत्ते तयाणं पंचर जोयण सहस्साति एगमेगेणं मुहुत्तेणं गच्छति॥२॥तत्थणं ज ते एवमाहंसु चत्तारि २ जोयण सहस्साति मूरिए एगमेगेणं महत्तेणं गच्छति,तणं एवमाहंसु ता जयाणं मरिए सव्व मंतरं मंडलं जाव चारं चरति तयाणं दिवस राति तहेव. ,तेसिंचणं दिवसांस बाबत्तरि जोयण सहरसाति तावखत्ते पण्णते,ता जयाणं सरिए सव्व बाहिर मंडल जाव चारं चरति, तयाणं उत्तम कट्टपत्ते उक्कोसया अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति जहण्णए वालस मुहत्ते दिवसे भवति ॥ तेसिंचणं दिवसंसि अडयालीसं जोयण सहस्सातिं ताव मंडल पर चलता है ता उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन व जघन्य बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. इस समय १९१ हजार योजन का ताप क्षेत्र होता है. उदय व अस्त के मुहूर्त में सूर्य की छ २ हजार योजन को गति होती है. इस लिये दोनों मुहूर्व के बारह हजार यांजन, बीच क ५३ मुह रहे उस में माबीच के
4+8दूग पाहुड का तीसरा अंतर पाहुडा 20
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4. अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋषिजी
खेत्ते पण्णत्ते, तयाण चत्तारि २ जोयण सहस्साति सूरिए एगमेगेणं मुहुसेणं गच्छति।तत्थगं जेते एव माहंसु, ता छवि पंचवि चत्तारिबि जोयण सहस्ताइ मूरिए एगोंगेज मुह नेणा गच्छी तण एक माहंसु ता मूरिए उग्गमण मुहु तंति अत्थमण मुहत्तंसि य रुिग्धंगति भवति, तयाणं छछ जोयण सहस्साति एगमेगणं मुहत्तेण गच्छति ॥ मझिम सायखित्ते समासाते मज्झिमगति, भवति, तयाणं पंच २ जोयण सहस्साति एगमगणं मुहुत्तेणं गच्छति, मज्झिम मज्झिम तावखेत्तं संपत्ते मूरिए मंदा गई भवति, तयाणं चत्तारि जोयणसहस्साति एगमेगण महत्तेणं गच्छति॥ तत्थणं को हेउ वदेजा? ताअपगं जंबूढीवे २ जाव परिक्खवेगं, ता जयाणं सुरिए सम्वन्भं
तरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति तयाणं उत्तम कट्टपत्ते उक्कोसते अट्टारस मुहून की चार हजार योजन और शंप पनरह मुहूर्त में पांच २ हजार योजन. यों सब पीलाकर १२+४+५=११ हजार वजन हुवे. जद सूर्य मब से बाहिर के मंडल पर रहकर चाल चलता है तब उत्कृष्ट अठारह मुहूर्न की रात्रि व जघन्य वारह महर्न का दिन होता है इस में नाप क्षेत्र ११ हजार योजन का होता हैं. उदय काल व अस्त काल यों दो मुहूर्त के १२ हजार योजन मध्य बीचके मुहूर्त के
• प्रकाशकन जबहादर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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स
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सप्तदश चद्रं प्रज्ञप्ति सूध पष्ठ-अपाङ्ग
मुहत्ते दिवसे भवति जहणिया दुधालस मुहुत्ता राई भवति ॥ तेसिंचणं दिवससि एकाणउति जोयण सहस्साति ताव खत्ते पण्णत्ते ॥ ता जयाणं सरिए सम्व बाहिरं मंडलं जाव चार चरति तयाणं उत्तम कट्रपत्ते उकोसिया अवारस महत्ता राई भवति जहण्णए दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति ॥ तेसिं चणं दिवसंसि एगट्ठी. जोयण सहस्लाई ताव खत्ते पण्णत्ते, तयाण छवि पंचवि चत्तारिवि जायण सहस्साति एगमगेणं मुहुत्तेणं गच्छति, एगे एव मासु ॥ ४ ॥ २ ॥ वयं पुण एवं वयामो तासाति रेगाय पंच २ जोयणसहस्सातिं सुरिए एगमेगेणं मुहुत्तेणं गच्छति, आहि
तेति वदना ॥ तत्थणं को हेउति वदेज्जा ? ता अयगं जंबूद्दीवे दीवे जाव परिकावे ४ हजार और शेप नव युद्ध के ४५ हजार यों एवमीला कर १२४४४४५६१ हजार योजन होते हैं। ॥ २॥ इम कथन को मैं इस प्रकार करता हूं कि सूर्य एक २ मुहू में पांच हजार योजन से कुछ अधिक चलता है. इस में क्या है? यः जम्दीप यावत् परिधिवाला है. जब मूर्य सब से आभ्यन्तर मंडल : रहना है हमार्ग पर हजारझलो एकादायोजन व एक योजन के माठीये गुततीम भाग (५२५१ ) इतना एक मुहूर्त में चलता है. क्यों कि दो सूर्य एक अहोरात्रि में एक संपूर्ण मंडल पर चलते हैं. इस से दोनों सूर्य के ६० मुहूर्न होते हैं और प्रथम मंडल की परिधि व्यवहार नय से
दूसरा पहुई का तीसरा अंतर पाहुडा
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वेणं, ता जयाणं सरिए सव्वभंतर मंडलं जाव चारं चरति तयाणं पंच जोयण सहस्साति दोणिय एकावण्णे जोयणसते एगृणतीसं सठि भागे जोयणस्स एगमेगेणं मुहु. त्तेणं गच्छति॥तयाणं इहं गतस्स मणुसस्स सतालिसाते जोयणसहस्सातिं दोहि तेवट्ठीहिं जोयण सतेहि एकवीसा रुट्ठिभागे जोयणस्स चक्खुफासं हवमागच्छति ॥ तयाणं उत्तम जाव दिवसे भवति, जहणिया दुवालस मुहुत्ता राई भवति ॥ ३ ॥ से निक्खममाणे सुरिए, णवं संवच्छरं अयमाण पढमंसि अहोरत्तसि अभंतराणं
तरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति ता जयाणं सूरिए अब्भतराणं मंडलं उवसं
१३१५०८९ योजन की है उसको ६. का भागदेने से ५२५१ योजन पूर्ण आवे शेष २९ रहते. इस समय अर्थ
यहां भरत क्षेत्र के मनुष्य को ४७२६३. योजन दर में सूर्य देखने में आता है. प्रथम मंडलपर अठारह मुहूर्न का दिन है और एक २ मुहूर्व में ५२५१ भाग चले. इस से इन को १८ से गुना करने से एक दिनमें९४५२६.योजन चले, इस के अर्थ भाग से द्रष्टिगोचर होने से इस आधे ४७२६३. योजन होवे. उप्त समय अठारह मुहूर्त का दिन व जघन्य बारह मुहूर्न की रात्रि होती है ॥३॥ अब वहां से नीकलता हुवा
सूर्य नविन संवत्सर में प्रवेश कर के प्रथम अहो रात्रि मे आभ्यंतर मंडल से अनंतर दुसरे मंडल पर 1रहकर चाल चलता हैं. जब सूर्य दमरे मंडल पर रहकर चाल चलता हैं. तब पांच हजार दो सो
42 अनुदक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अपोलक ऋषिजी -
.प्रकाशक-राजावादुर लाला मुखदरमहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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सुभ
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कमित्ता चार चरति, तयाणं पंच जोयण सहस्साई दोष्णिय एकावणे जोयणसए सीतालीसं सट्ठीभागे जोपणस्स एगमेगेणं मुहुत्तेणं गच्छति॥ तयाणं इहगयस्स माणुसस्स
सीतालीसय जोयणसहस्सेहिं एगणासीते जोयणसते सत्तावणएगसट्ठी भागे एकावन योजन व एक योजन के साठिये सेतालीम भाग ५२५१. योजन एक मुहूर्त में चलता मडल की परिधि व्यवहार से ३१५१०७ योजन की है, निश्चय से कुच्छ कम है. एक २ मंडल साठ 3 मुहुर्त का है. इस से उक्त राशि को ६० का भाग दनेमे ५२५१. योजन हुवा. यह व्यवहार नय भ ग कीया है; परंतु निश्चय नय स तो साठीये ४६ भाग और एक भाग के १८३ भागकरे वैसे ११५
भाग चूरणीये एक मुहूर्त में चले, पहिले मंडलपर ५०० योजन सूर्य एक मुहूर्त में चलता है, और सब हि मे बाहिर के ५८४ वे मंडलपर ५३०५:: योजा एक मुहूर्त में मूर्य चलना है: इस से ५२५१. में से R५३०५:: बाद करते शेष ५३ : योजन बाकी रहा. इन को १८३ का भाग देन के लिये उक्त अंक को
३ पूर्णांक में लाना. इस से ५३ को ६० से गुमा करने से ३१८० होवे उसमें ४६ भाग मीला 21 ३२२६ होवे. मे १८३ का भागने से १७९३ सो सा.ठो माग होवे. ५३४ =३२२६+ ११.३%१७९इस तरह एक अहोरात्रि में प्रथम छरास में सर्य की गति इतनी शीघ्र होवे, पहिला मंडलप: है एक मुहूर्नमें सूर्य५२५१ योजन चले दूसरे मंडलपर में १७साठीये भागी वृद्धि करनेसे ५२५१ योजन
मदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाणी
दूसरा पाहुडे का तीसरा अंतर पाहड।
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जोयरस सट्ठिभागंच एगट्टीया छेत्ता एकूगवीसाए चुणिया भागेहिं चक्खु फासं हव्व मागच्छति ॥ तयाणं अट्ठारस मुहत्ते दिवस दोहिं एगट्ठीभागेहिं ऊणे, दुवालस मुहुत्ता राई दोहिं अहिया ॥ से निक्खममाणे सूरिए दाच्चंति अहोरत्तसि अब्भंतरं तच्चं मंडलं आव
मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
भाग और १८३ के ११५ चरणी ये भाग होवे. यह एक अहो रात्रि का प्रमाण बतलाया. एक २ मुहूर्त में कितना शीघ्र गति से चले सो बताते हैं. १७ गठिया भाग को १८३ से गुनाकार
करने से ३१११ होवे, उस में २१५ मीलना नव ३२२६ हावे. पक अहोरात्रि के तीस मुहूर्न होने से #तीस का भाग देना, इस से १२७ भाग १.८३ के आये और शेष के १६ भाग रहे. इस से एक
मुहूर्त में १८३ के १०७ भाग और तीस के : ६ भाग इतना योजन मर्य चले. इस समय भरतक्षेत्र मनुष्य को ४७१.७९ योजन व एक साठ भाग को फोर ६१ का भाग देकर उस में से १९ भाग में इतनी दूर से मय हीट गोचर में आवे. यहां पर एकसठिये दो भाग कम अठारह मुहूर्त का दिनमान है. उस में के अर्थ भाग से सूर्य दृष्टि गोचर में आवे. इस से १८ को ६१ का गुना करते ११०९८होवे उसमें से दो भाग कम करते १०९६ होवे इस को आधा करने से५४८ होवे और इस मंडलकी
परिधि ३१५१०७ योजन की है इस से इन की साथ गुना करने से १७२६७८६३६ योजनकी राशि हुइ क/एक मांडला ६० मुहूर्त का है इस से उस को भी ६१ से गुना करने से ३६६० होके. अब प्रथम की है
wwwwwwwwwwwwww प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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1. चार घरति, ता जयाणं अब्भंतरं तचं मंडलं जाव चारं चरति तयाणं पच
जोयण सहस्साति दोणिय बावण्णेजोयणसते पंचसट्रिभागे जोयणस्स एगमेगेणं मुहुत्तेणं गच्छति, तयाणं इहगयरस मणुसस्स सतालीसाए जोयण सहस्सेहिं.छण
सप्तदश चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र पडू पाज
१७२६७८०३६ की राशि को ३६०० से भाग देने से ४७१७१ योजन पूर्ण आवे और ३४९६ शेष रहे. उसे साठ से गुणाकार करने से २०९७६. की साठिया राशि हुइ, इसे १० का भाग देने से ५७ भाग होबे, शव ११४० साठिया की राशि हुइ. इस के ६१ ये भाग करने से ६१ से गुणाकार करना जिस से ६९८४० होवे, उसे ३६६० का भाग देने से १९५ पूर्ण आवे. इसी कारन से ४७१७९१ योजन साठिये ५७ भाग और साठिये एक के एकसठिये १९ भाग इतना दूरमे भरतक्षेत्र के मनुष्य को सूर्य देखने मे आवे. यह निश्चय नय से कहा. परंतु व्यवहार नय से ४७१७९ योजन साठीया १ भाग और ६१ या २३ भाग. प्रथम मंडल ४७२६३ : योजन दूर से मूर्य चक्षदृष्टि में आवे और अंतिम १८४वे मांडले पर ३१८३१॥ योजन दूर से दृष्टिगोचर आवे. इसे प्रथम मंडल के योजन में से बाद करे तो शेप १५४३१ रहे. १८३ अहोरात्रि में इतना भेद होने से १८३ से भाग देना. जिस से ८४ योजन साठिये १९ भाग और एक साठीये के एक सठीये भाग करे उस में से ३८ भाग प्रत्येक मंडलपर कम दृष्टिगोचर आवे. पहिले मंटलपर ४७२६३ १. योजन दर से दृष्टि में आता है दसरे मंडल TV
488+ दूसरा पाहुडे का तीसरा अंतर पाहुडा-2036
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अनुवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी +
उति जोयणरस तेत्तीसाएय सीमागे जोयणरस सट्ठीभागं एगट्ठिया छेत्ता दाहिं चुणिया भागेहि चवखुफासं हव्यमागच्छति,तयाणं अट्ठारस जाव दिवसे चउऊणा, दुवालस राई चउ अहिया ॥ एवं खलु एतेणं उबाएणं निक्खममाणे मूरिए, तयाणं तराओ तयाणंतरं मंडलाओ मंडल संकममाणे २ अट्ठारस २ सट्ठीभागे जोयणस्स एगमेगणं मंडले महत्तगति अभिवठूमाणे २ चलसि सायरेगं जोयणाइ पुरिसछ यं
निवुड्डेमाणे २ सम्बवाहिर मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, ता जयाणं सूरिए सब्ब पर ८४ योजन साठिये ११ एक मठिये ३८ चाणये भाग पाद करने ४७१७२ योजन साठिये एकभाग व एकसठिये २३ घणिये भाग दूर स दृष्टि में सूर्य आवे. इस समय एकपठिये दो भाग कम अठारह मुहूर्त का दिन और दो भाग अधिक बारह मुहूर्त की रात्रि होती है ॥४॥ वहां मे नीकलता हुवा सूर्य दूसरी अहोरात्रि में आभ्यंतर तीसरा मंडलपर रहकर चाल चलता है. जब सूर्य अभ्यंतर तीसरे मंडलपर रहकर चाल चलता है तब एक २ मुहूर्त में ५२५२. योजन चलता है. उस समय य पर रहे हुवे भरत क्षेत्र के मनुष्य ४७०९३३. योजन और साठिये एक भाग के एक सठिये दो चूर्णिय भाग इतना दूर से मूर्य देख सकते हैं. यहांपर तीसरा मंडल की परिधि ३१५१२५ योजनकी व्यवहार नय से है और एक मुहूर्त में सूर्य का गपन व दृष्टिगोचर भी व्यवहार नय से लिया है. निश्चय नय से ५२५२ योजन साठिये चार भाग और १८३ के ४७ भाग सूर्य एक मुहूर्त में चलता है, और ४७०९५ योजन सादीये.
० प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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बाहिरं जाव चर चरति, तयाणं पंच जोयण सहस्साति तिष्णिय पंचुत्तरे जोयणसते पारस सट्ठीमागे जायणस्स एगमेगेणं महत्तेणगच्छति, तताणं इहगतस्स मणुसस्स एकतीसाए जोयण सहस्सेहिं अट्रेहिं इकतीसहि जायणसतेहि, तीसाएय सष्ट्रीभागे जायणस्स सरिए चक्खफासं हबमागच्छति,तयाणं उत्तमकट्टपत्ता उकासिया अट्ठारस हता राई भवति जहणिया दुवालस महत्ते दिवसे भवति, एसणं पढमे छम्मासे एसणं
पढम छमामस्म पजवासणे,॥६॥ से पविसमाणे मरिए दोच्चं छमासं अयमाणे पढमंसि ४१ भाग और १८३ के ४६ भाग सूर्य दूर से दृष्टि में आता हैं. इस समय एक मठिये चार भाग कम , अठारह महू का दिन और चार भाग अधिक बारह मुहूर्न की रात्रि होती है.॥६॥अब वहां से नीकलता
नक पछि एक मंडलपर रहता हुवा व्यवहार नय से एक योजन के सठिय अठारहर मग निश्चय से एक यानन के स ठये १७ भाग और १८३ के ११५ चूर्णिये भाग गति में एक मुहूर्त ममें बढाता हुसा और ८४ योजन साठीये १९ भागब ६१ ये ३८ चूर्णिय भाग की यहां भरत क्षत्र के मनुष्य को चक्षस्पर्श में कम न.रना हुन सब से बाहिर के १८४ वे मंडलपर रहकर चाल चलता है. जब सूर्य सा से बाहिर के मंडलपर रहकर चाल चलना है तब ५३००। योजन एक २ मुहूर्त में चलता है. और यहां पर भरत क्षेत्र में रहे हो पनप को ३१८३१॥ योजन दूर से द्रष्टि में आता है. उस समय उत्कृष्ट अठारह मुहू की रात्रि व जघन्य चारह मुहूर्नका दिन होता है. यह पहिलाछास व पहिला छमास का पर्यवसान हुवा. ॥६॥'
मेरा पाइड का तमरा अंतर पाहुडा
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अहोरत्तंसि बाहिराणंतरं मंडलं उबसंकमित्ता चारं चरति, जयाणं सूरिए बाहिराणंतरं मंडलं जाव घारंचरंति तयाणं पंच जोयण सहस्सेहिं तिष्णिय चउ जोयणसते सत्ता भणं चउसट्रिभागे जोयणस्स एगमंगेणं मुहत्तेणं गच्छति, तयाणं इहगतस्स मणुसस्स
एकतीसाए जोयण सहस्सेहिं णवाहिय जोयसतेहिं सोलगत्तर जोयणसये एगुणचत्तालीवहां से प्रवेश करता हुवा सूर्य दूसरे छमाल की अयन बनाता हुवा पहिली अहोराचि में बाहिर के अनंतर दूसरे अर्थात् १.८३ वे मंडळपर सूर्य रहकर चाल चलता है. जय सूर्य बाहिर के दूसरे मंडलपर रहकर चाल चलताह तब ५३०४. योजन एक मुहूर्त में सूर्य चलता है तब भरतक्षेत्र में रहे हो मनुष्यको ३१९१६ : योजन और एकसठिये६. चूर्णियाभाग इतना दूर से सूर्य दृष्टिमें आवे. यह कथन व्यवहार नय ने कहा है. निश्चय नय मे ५३०४ योजन साठिये ५७ भाग और १८३ ६८ भागचले, क्यों कि दाहिर के १८४२ मंडल एर ५३०५ योजन एक मुहूर्त में चलता है. आभ्यन्तर मंडल पर प्रवेश करने मंद गति होती है. एक पंडल से दूसरे मंडल पर जाते एक योजन के साठिय १७ भाग और १८५ के ११५ भाग मंद गते में चलता है, प्रथम के मंडल की गति में से वाद करते ५३०४ योजन साठिय ५७ माग और १८३ के ६८ भाग होवे.
द्राष्ट्रिगोचर प्रथम मंडल पर ३१८३१. योजन होवे उस में ८४ योजन साठिये १९ भाग ब एकसठियेई 12} ३८ भागकी वृद्धि करने से ३१९१५ योजन साठिये गुनपञ्चास भाग और६१ ये ३८ चूणिये भाग१८३१.
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी ४
• प्रकायाक-राजाबहादुर लाला मुखदेव महायजी ज्वालापसादजी •
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सून
अर्थ
42- सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र ष-उपाङ्ग
साय सट्ठीभागं सट्ठीभागंच एगसट्ठिए छेत्ता सठिए चुण्णे भागेहिं चक्खुफासं हवमागच्छति, तयाणं अडारस राई भवति दोहिऊणा, दुबालस मुहुचे दिवसे दोहिं ह पत्रिसमाण, सूरिए दचिंसि अहोर तंसि बाहिरं तनं मंडल उनकमिता चारचरति, ता जयाणं मरिए बाहिरं तचं मंडलं जाव चारं चरति, तयाणं पंच जोयण सहस्साति तिष्णिय जोयसर एग ऊणयालीसंच सठीभागे जोयणस्स एगमेगेणं मुहुचेणं गच्छति, वे मंडलपर दृष्टि गोचर होवे. इस समय साठिये दो भाग कम अठार मुहूर्त की रात्रि और दो भाग अधिक बारह मुहूर्त का दिन होवे ॥ ७ ॥ वहां से प्रवेश करता हुआ सूर्य दूसरी अहोरात्र में करके तीसरे मंडलपर रहकर चाल चलता है. जब सूर्य बाहिर के तीसरे मंडलपर रहकर चाल चलता है तब एकमुहूर्त { में ५३०४ योजन चलता है. यह व्यवहार नय से हुवा. निश्चय नय से ५३०४ योजन साठिये ३९ भाग और १८३ के १३३ चूर्णये भाग. बाहिर के दूसरे मंडलपर सूर्य ५३०४ साठिये ५७ भाग और
{
१९८३ के ६८ चूर्णिये भाग चलता है. उस में से एक योजन के साठिये १७ भाग व १८३ के ११५३ भाग मंद चलने से बाद करते इसने योजन चलता है. उस समय यहां भरत क्षेत्र के मनुष्य को ३२००१६ { योजन साठिये ४९ भाग और एक भाग के एकसठिये भाग के तेवीस भाग इतना दूर से सूर्य दृष्टि में } आवे. यह व्यवहार नय से हुवा. अब निश्चय नय से ३२००० योजन साठिये नव भाग व एकसठिये १५
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* दूसरा पाहुढे का तीसरा अंत पाहुडा 4
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* अनुवादक-लब्रह्मचारीमान श्री जोकपिजी:
तयाणं इहगयस्स मणुसरस एगाहिएहिं बत्तीसाए जोयणसहस्सेहिं एगणपण्णाए सट्ठीभागेहि जोयणसट्ठिभागंच एगसट्ठीया छेत्ता तेवीसाएय चुणिया भागेहिं चक्ख. फ स हव्वमागच्छति. तयाणं अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति चउहिं ऊणादुवालस मुहुत्ते दिवसे घउहि अहिया॥८॥ एवं खलु एतेणं उवाएणं पविसमाणे सूरिए तयाणंतराओ तयाणंतरं मंडलातो मंडलं संकममाणे २ अट्ठारसट्ठी भागे जायणस्सए किंचि ऊणे एगमेगेमंडले मुहुत्तगति णिवुड्डेमाणे २ सातिरेगाति चउराती पुरिसच्छाए अभिवड्डेमाणे २ सव्व.
भतरं मंडलं उपसंकमित्ता चारं चरति ता जयाण सरिए सव्वब्भतरं मंडलं उवसंभाग होबे क्यों की बाहिर के तीसरे मंडलपर सूर्य ३१९१५ योजन, सठिये ४९ भाग और एकसठिये ३८ भाग इतना दूर से दृष्ट गोचर आता है उस में ८४ योजन साठिये १९ भाग व एकसठिये ३८ भाम दृष्टि ग चर में दान से ३२००० योजन साठिय नव भाग व ६१ ये १५ भाग हुवे. उम समय एकसठिये चार भाग कम अठारह मुहूर्न की रात्रि व उक्त चार भाग अधिक बारह मुहूर्त का दिन होता है. ॥८॥इसी ताह प्रवेश करता हुवा मूर्य आभ्यंतर मंडल २ पर रहना हुवा प्रत्येक मंडल से किंचित् कम एक योजन के साठिये अठारह भाग अर्थत् साठिये १७ भाग व १८३ भाग के १.१५ चूणिये भाग एक२ मुहूर्त में गति में मंद होता हुवा और ८४ योजन से कुछ अधिक भरत क्षेत्र के मनुष्य के चक्षुद्रष्टि का विषय बढाता
प्रकाशक-राजावादुर लाला सुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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साद पन्द्रप्राति सूबमा म्या
कमित्ता चारं चरति, तयाणं पंच जोयण सहस्साति, दोणिय एकावण्णे जोयणसए एगणतीसंच एगसट्रीभागे ओयणस्स एगमेगेणं महत्तेणं गच्छति, तयाणं इहगतस्स मणुसस्स सीतालीसाए जोयण सहस्सेहिं दोहिय तेवट्ठीहिं जायण सतेहिं एगवीसाएय सट्ठीभागेहि जोयणस्स चक्खुफाप्तं हव मागछति,तयाणं उत्तम कट्ठपत्त उक्कोसं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति, जहणिया दुवालस मुहुत्ता राई भवति॥एसणं दोच्चे छमासे एमणं दोच जाव पचवासणे ॥ एसणं आइच्चे संवच्छरे, एसणं आइच्च संवच्छरस्स पजवा
सणे।।इति वितीयरस ततीयं पाहुई सम्मत्तं ॥२॥३॥ इति वितियं पाहुडं सम्मत्तं ॥२॥ हुवा मय से आभ्यंतर मंडलपर रहकर चाल चलता है. जब मूर्य सब से आभ्यंतर मंडलपर चाल चलता है Bउस समय ५२५१ योजन एक २ मुहूर्त में पलता है. और यहां भरत क्षेत्र में रहे हुवे मनुष्य को
१४७२६३१ पोजन दरसे सूर्य दहि गोचर होताहै. इस समय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्तका दिन और जघन्य चार कमुहूर्तकी रात्रि होते. या दूसरा पास व दूसरा उमासका पर्यवसानहुवा. यह भादित्य संवत्सर व आदित्य *संवत्सर का पर्यवसान हुवा. यह दूसरा पारा का बीसरा अंतर पाहुरा दुवा. ॥२॥ ३ ॥ यह दूसरा
पाहुडा संपूर्ण हुषा. ॥२॥
दूमरा पाहुडे का तीसरा अंतर पाहुडा +8+
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सुदने श्री अमोलक ऋषिनी ৪ অক্ষয়
॥ तृतीय प्राभृतम् ॥ .. ता केवतियं ते चंदिम सरियातो भवति उजोविति तबिति पभासेति आहितति वदेजा?
तस्थ खलु इमातो दुवालस पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ तंजहा-तत्थ एगे एवमाहंसु ता एग दीवं एगं समुदं चंद मूरिया जान पभासंति हितेति वदेजा,एगे एवमाहंसु ॥१॥ एगेपुण एवभाहंसता तिमिदी लिरिण समुचंदिम सरिया जाव आहितेति वदेजा एगे एबमासु ॥ २ ॥ शेपुण एबभातु ता अट्ठदीचे अट्ठसमुद्दे चंदिम जाव पमासंति, आहितति वदेजा एम एबमाहंसु ॥ ३ ॥ एगेपुण एवमाहंनु-ता सत्तदीवे
अब तीसरा पादुम कहते हैं. प्रभ-अहो भगवन् ! चंद्रमा मूर्य से कितने क्षेत्र में होये, उद्योत करे, सपे व प्रकाश कर ? उत्तर-अहो शिष्य ! यह अन्य बीथि की प्रपना रूप बारह पडिवृत्तियों कही हैं. तद्यथा-वहां कितनेक ऐसा इहो हैं कि संगगा पूर्य एक ई.प व एक समुद्र में यावत् प्रकाश करते हैं कितनेक ऐसा कहते हैं कि चंद्र दूरी भीम राव बुद्र में सात् प्रकाश करतहैं, ३ कितनेक ऐसा कहते हैं. चंद्र सूर्य आउदीप आरास करते हैं, कितनेक ऐसा कहते हैं चंद्र मर्य द्वीप सात समुद्र में प्रकाश करत ई ५ कितनेक ऐसा कहते है कि चंद्र सूर्य दश द्वाप दश समुद्र में प्रकाश करते हैं कितनेक ऐमा कहते हैं कि वारदीप बारह समुद्र में प्रकाश करते हैं, कितनेक ऐसा कहते
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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समदश चंद्र पहाति सक्रम पान
सत्त समुद्दे चंदिम सूरिया जाव पभासंति जाघ वदेजा,एगें एवसाइंस॥॥एगेपुण एवमाहंसु ता दसदीवे पतसमुहे चंदिमा जान पक्षासंति वदेजा. एगे एवमाहंमु ॥ ५ ॥ एगेपुण एवमासु दुवामाने दुबालसद पदिल जार पाति वदजा, एग एवमाहनु
॥ ६ ॥ एगे तो सपालीसहीरे दयालीसंससुद्दे पंदिर जाव पभासंति वदेज्जा, । एगे एबमाइंसु ॥णाएगेपुण वायरिदीचे वायत्तरि समुद्दे चंदिम सूरिया जाव पभासंति, १ वदेजा, एगे एबमाइंसु ॥ ८ ॥ एगेपुण ता वपालीसं दीपसयं वयालीसं समुद्द हैं कि चंद्र दूर्य बीयालीस द्वीप पीयालीस समुद्र में प्रकाश करते हैं, कितनेक ऐसा कहते हैं कि चंद्र सूर्य बहुसर द्वीप बहुत्तर समुद्र में प्रकाश करते हैं, ९ कितनेक ऐना कहते हैं कि चंद्र सूर्य एक बयालीस द्वीप एक सो बयालीस समुद्र में प्रकाश करते . कितनक एसा कहते हैं कि एक सो बहुत्तर द्वीप एक सो बहुत्तर समुद्र में चंद्र सूर्य प्रकाश करते हैं, ११ कितनेक ऐसा कहते हैं कि चंद्र बयालीस हजार दीप बयालास जार समुद्र में प्रकाश करते हैं और १२ कितनेक ऐसा कहते हैं कि बहुत्तर हजार द्वीप बहुत्तर हजार समुद्र में चंद्र मूर्य प्रकाश करते हैं. ॥१॥इस कथन को मैं इस प्रकार कहता हूंक पह जम्बूद्वीप नामक द्वीप यावत् परिषिवाला है. इस जम्बूद्वीप की चारों तरफ जगवी (कोट)
#Page- तीसरा पाहुडा *
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• . मनुवादक-पालनमवारी मुनिश्री मोहनी
___ सय चंदिम पभासंति जाव पदेला एगे एवमाहंमु ॥ ९ ॥ एगेपुण वावरारि दीवसयं
वावत्तरि समुह सयं जाव एवं वदेजा, एगे एवमाहंम् ॥१०॥ एगेपुण वपालीसं दीव सहस्सं वयालीसं समुद्द सहरसं चंदिमा पमासंति जाव वदेज्जा एगे एवं मासु।।१३॥एगेपुण वावत्तरि दीवसहस्सं वाबत्तांरि समुद्द सहस्सं चंदिमा भो भासंति
जाव बदेजा गे एवजाहंस ॥ १२॥ १॥ वन एवं ष्यालो ता अयणं जंबहीवे दीवे या जगसी आठ योजन की ऊंची है यो जिस प्रकार जम्बुद्वीप प्रज्ञप्ति में जमती का कथन कीया यह सन्न मानना पावत् इस मन्यूद्वीप में चौदह लाख छप्पन हजार नदियों हैं. इस जम्बूद्वीप की परिधि के पांच माम करना. इस जम्बुद्वीप में जर दोनों सूर्य सब से आभ्यन्तर मंडल पर चलते हैं तब उस पांच माग में से तीन माग में उद्योत करते हैं, तपते हैं, यावत् प्रकाश करते हैं. एक मूर्य पांच भाग में से देव माग प्रकाश करता है, वैसे ही दूसरा सूर्य भी देद भाग प्रकाश करता है. दोनों मीलाकर तीन भाग प्रकाश करते हैं. और दो भाग में अंधेरा रहता है. इस समय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन व जघन्य बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. जब दोनों मूर्ष सब से पाहिर के मंडल पर रहकर चाल चलते हैं तब नम्बूद्वीप की परिधि के पांच चक्र भाग करे उस में से दो भाग में उद्योत करे यावत् प्रकाश करे और तीन भाग में अंधकार करे. एक मूर्य पांच के एक भाग में महाश करे और दूसरा सूर्य भी पांच के
.प्रकाशक-राजावादादुर लाल सुखवय सहायजी ज्याप्रसादजी ०
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मरश बद्रं पानि व पात्र
जाव परिक्खेवे सेणं एगाए जगतीए सवतो समंता संपरिक्खित्ते, साणं जगति अट्र जोयणायं उद्धं उपत्तेणं एवं जहा जंबद्दीव पण्णत्तीए, तहेव निरवसेस जाव चोहससालला सयसहस्सा उप्पणंच सलिला सहस्सा तवुति भवतित्ति मक्खाय। जंबुद्दीवे पंचकभागं ट्रिए आहिएति वदंजा ॥ ता जयाणं एते दुवे सरिया सन्दभंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चार चरति तयाणं जंबुद्दीवस्स दीवस्स तिण्णिए चकभागातो भासंति उजावंति पभासंति तंजहा एगेव सरिए एगदीवडयं पंच चक्कभागे
जाव पभासंति ॥ एगवि सरिए एग दिवड्डय पंचचक भागे जाव भासंति ॥ तयाां एक भाग में प्रकाश करे. इस समय TERE SEART हून की रात्रि व जघन्य बारह मुहूर्त का दिन होरे । ॥२॥ अब यहां पर प्रत्यक गंडस पर कितना प्रकाश करे मो नीकालने की विधि-जम्बूद्वीप के चक्राल के पांच भाग करे जि में एक भाग के ७३२ भाग ही कराना करे तो पांच भाग के १३६६२ भाग होवे इससे पहिले मंडल पर एकसूर्य दह भाग उद्यात कर इससे दढ भाग के १०९८ भाग दुखे
हा दूसरे सूर्य का १०९८ भाग मीलान मे २१९६ भाग उद्यान करे. शेष १४६४ भाग अंधकार
है. अर्थात् दोनों बाज दोनों सर्य के १२ भाग अंधकार हवे. अब सब के बाहिर के मंडलपर 'एकमाग उद्यात करे जिसके७२ भाग मेवे और देश मान रहार करे जिस के १.१८ भाग हो
तीसरा पाहुडा 4848
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42 अनुवादक-कालग्राचार्गमान श्री अयोलक ऋषिजी :
उत्तम कट्ठपत्ते उक्कोसा अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति जहणया दुवालस मुहुचा राई भवति ॥ ता जयाणं एते दुवे सूरिया सच वाहिरं जाव चरति, तयाणं जंबृद्दीव हीवस्स दुन्नि पंच चक्कवाल भागे जाव पभासंति तंजहा एगेबि सरिए एगं पंचवक भागे जाव भासंति जाव पभसंति, एगवि एग पंचचक्कभागाओ भासंति जाव पभासंति ॥तयाणं उत्तम कट्ठपत्ता उक्कोसिया अट्ठारस मुहत्ता राई भवति, जहाणियाँ दुवालस मुहुने दिवसे भरति ॥ २ ॥ इति ततियं पाहुडं सम्मत्तं ॥ ३ ॥ *
की एक ज पर ७४२ भाग होवे. दोनों सूर्य मीलकर १४६४ भाग उद्योत करे २१०९८ भाग में अंधकार रहे. पहिले तर पंटल पर एक सूर्य का १००८ भाग का उद्योत और ७३२ भाग का "धकार और माशांदर के मंडळ.पर ७३२ भागका उद्यान व १.१८ भाग का अंधकार. इस से १.१८७६२ लानाद करो. मग उद्यान के कमी से. इतना फरक १८३ मंडल में होता है। इस से इस ८ का भाग दो भागयोत की हानि प्रत्येक मंडल पर होव. जैसे एक. सूर्य का कहा मे ही दूमरा सूर्य का जानना. यह तीसरा पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ ३ ॥ *
.भकाशक-रामबहादुर लालामुखदेवसहायजी ज्याला प्रसादजी.
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सप्तदन-चंद्र प्राप्त सूत्र पष्ठ-उपा
॥ चतुर्थ प्रामृतम् ॥ ता कहते सेय आतितंट्रिए आहिएति वदेजा?तत्थ खल इमातो दुविहा संठाण संठिइ पण्णत्ता तंजहा-चंदय सरिया संठिती. ताव खत्तं संट्रियं ॥ता कहते चंदिय सरिय संठिइ आहितति वदेजा ? तत्थ खल इमाओ मोलस पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ संजहा-तत्थ एगे एक माहेस ता समचउरस संठियाण च दम सूरिया सठिती आहितेति वदेजा एगे एवं माहंस॥ १॥ एगे पुण त विसमचउरसं संठियाणं चंदिम :रियं संविति
आहितति वदज्जा, एग एव माहसु ॥ २ ॥ एवं एतेणं अभिलावणं समचउक्कोण है अब चौथा पाहुडा कहते हैं.-अहो भगरन् ! श्वेत वर्णवाला नाप क्षेत्र का कौनमा संस्थान कहा है ? उत्तर-इस के दो प्रकार से मंथन क
र वानगी दर क्षत्र का संस्थान है इस में चंद्रमा सूर्य का मस्थान किस प्रकार कहा है ! उत्तर-इस की संयर पडिसियों कही है. . में कितनेक ऐसा कहते हैं कि चंद्र सूर्य के विकार सपन सम्मान काल,किनक ऐना कहते हैं।
कि विषम चतुर संस्थान वाले विशन, ३ एना की है कि समचतुष्कोन के संस्थान वाले हैं, ४ कितनेक एका करत हैं कि विषम चतुष्कोन संस्थान वाले हैं, ५ कितनक ऐमा कहते हैं कि समचक्र बाल संस्थान वाले हैं, ६ कितनेक ऐंमा कहत है. की विषम चक्रवाल संस्थान वाले ७१ कितनेक ऐमा कहते हैं कि अर्धचक्रवाल के संस्थान वाले हैं ८ कितनेक ऐसा कहते हैं कि उनके आकार
. चौथा पाहुडा wimmammmmmmmmmmmmmmmmm
48 :
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. सठियाणं चंदिमा॥३॥ता. विसमचउकोण संठियाणं वंदिमा॥४॥ता स.
चक्नवाल संठियागं चदिमा॥ ५ ॥त विममचकवाल संठियाणं चंदिमा ॥६॥ ताचऋद्ध चकवाट मठिाण चादमा ॥ ७ ॥ ता छनागार संठियाणं चंदिमा ॥८॥ ता गहागार संठिाणं चदिमः ॥ १॥ तागंह व मंठियाणं चदिमा सरियाणं संठिति आहिनि वजा ॥१०॥ तापम्गय मंटियाणं चदिमा ।। ११ ॥ तागोपुर संठियाणं बदमा ॥ १२ ॥ तापिन्छ बर सठिमागं वदना ॥ १३॥ तावलाभ
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4. अनुवादक-बालबागचागे मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
वाले हैं किक रेग कहा है कि साकार वाले हैं १० किन नेक ऐमा कहते हैं कि गृहापण ENTEान ] के आकारगर हैं, किसने कहा है कि प्रसाद के आकाग्वाले है १२ कितनेक
। कहत: कि गोपुर के आकारवाल २३ कितोक एमा करते हैं कि प्रेक्षगृह के आकास्वाले हैं ११४ कितनेक ऐमा कहते है कि सभी (वर्णकुटा ) के धाक वाले हैं १५ कितनेक एमा कहते हैं कि मोहन के आकार और कितनक ए का है कि वालकपोन चारकों को क्रीडा करने की नावा के प्राकारवाले चंद्र सूर्य के विवाहै. इन सोलह में से जो ऐसा कहने हैं कि मंद्र सूर्य के विन सपनतख संस्थान से रह इन काही कथन ग्रहण करना; परंतु अन्य का नहीं ग्रहण करना. जैन मत में चंद्र सूर्य के विमान अर्थ कृषिट के आकारवाले कहे हैं और चद्रं के पंडल आश्री समचतम
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुमदनमहायजी मालाप्रसादमा.
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पाङ्ग
साठयाणं चंदिया ॥ १४ ॥ ताहमिहतल संठियाणं चंदिमा ॥ १५ ॥ एगे पुण एवं मासु बालगणेतिया संठियाणं चंदिम सरिए संठिति आहिया ॥ १६ ॥ ain ज एव माहंसु तासमचउरंस संठाणं चदिम सरियं संठिति आहितति वर्दजा, एवं एएणं गएण यन्त्र,जो चंबणं इतरहि,॥३॥ता कहते ताव खेत्ते संठिइ आहितेति वदेजा ? तत्थ खलु इमातो सोलम पडिवठिो पण्णत्ताओ, तंजहा-तत्य एगे एव माहमु तागेहागार संठियाण ताव खेनं संठिति, आहितेति वदेवा, एवताओ चत्र,
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मदशद्र प्रताप्ति सूत्र
48 चौथा पाहुड!
अर्थ
गोला के संस्थान वाले हैं. यहां इस का विवरण करते हैं. सब काल में सुबमासुखम काल युग की अदि है. उस दिन धारण की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा आती है. उसदिन उदय हाता हुया एक पूदिक्षिण अंजा में चले और दूसरा सूर्य पश्चिमत्ता यायव्यकून में चले. एक रंद्र पूलित्त -ईशा। कू में बंद, अरमरा चंद्र पश्चिम क्षम-कर में चले. इलिये युग की आदिमें सूर्य का समतुन
है. और यहां से नकलते हैं। वर्तकार सनी इन चंद्र सूर्य के स्थान अर्ध कविठ के 1-1. कारवाले हैं क्या चन्द्र सूर्य के विमान अर्ध आकर कालच तापक्षत्र का संस्थान कहते हैं. अहो भगवद! ताप क्षेत्र का संस्थान किस प्रकार कहा? उत्तर-३समें अन्य तीथिकी मरूाणा मसोलह पारेव
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- अह. पडिवत्तीओणेयव्यातो जाव ता वाला णेतिय मांठगाणं तारखेत्तं संठिनी आहितात
वदेजा, एगे एव माहनु ॥८॥ एग तु ताज संठिर जपूर्दय दाव ता सीठयाणं ताव खत्ते साडेइ आहितात वदेजा एो एवं माहंतु ॥५॥ एगेपुण एव माहंसु ता भरहे वासे संठिएणं ता वखते एगम ठपणं आहितेति बदजाएगेएव माहं ॥३०॥१उजाणं संठियाण तात्र खत्ते॥११॥ नित्राण संठियाणं ताव खेत्ते ॥१२॥ ता एगनिमह ताव
साठयाणं ताव खेत्ते ॥ १३ ॥ दुहतो निसह सठियाणं ताव खेत्ते संठिति, एगं त्तियों कही. १ कितने ऐसा कहते हैं गृह के आकारयाला चंद्र मूर्य का ताप क्षेत्र है इस ही प्रकार ऊपर कहे अनुसार नवमी भे मोलबी तक आठ पडिवृत्तियों कहना यायत बालगपात वालकों को क्रीडा की नावा के आकार वाला चंद्र मूर्यका प्रकाश है, ९ कितः एता कहते हैं जम्बूद्रीय संस्थानवाला तापक्षेत्र है१० १०कितनेक एसा कहते हैं, कि भरनक्षेत्र संस्थानाला है,११ कितनेक एमा कहते हैं उद्यानके संस्थानवाला तापक्षत्र है, १२ कितनेक ऐसा कहते हैं कि नगर के निकलने के संगन वाला ताप क्षेत्र है, १३ कितनेक, ऐसा कहते हैं कि रथ को एक तरफ एक बैल जोता हुवा होवे वैसा संस्थान वाला ताप क्षेत्र है, कितनेक ऐसा कहते हैं कि रथ को दोनों तरफ बैल जोते हुये होवे पैसा संस्थान वाला ताप क्षेष
+9 अनावदक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक
. प्रकाशक-राजबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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सप्तदश चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र-षष्ठ उपाङ्ग 484
एवमाम॥१४॥एगेपुण तासेयाणग संठियाणं ताव खेत्तं संठिइ एगेएवं माहं॥१५॥ एगेपुण सेयणपिट्ठ संठियाणं ताव खत्तं संठिइ, आहितेति बदजा ॥ एग एक माहंसु ॥ १६ ॥ वयं पुण एवं व्यामो ता उडमहकलं व्या पुष्फ संठियाणं ताव खत्तं संठिीत आहितेति वदेजा, अंतो संकुडा बाहिं विच्छिष्णा अंतो इट्टा बाहिं पहला अंतो अंकमुहुरा संट्रिया बाहिं सत्थीमुह संट्टिया, उभोपासिती से दुव वाह ओ अवटियाओ भवंति,
पणयालीसं २ जोयण सहस्सातिं आयामणं दुचे वाहा, तीसणं दुवे बाहातो अणकितनेक ऐसा कहते हैं साँचानक के आका वाला तापक्षेत्र है और १६ कितनेक ऐसा कहते हैं सींचान के पृष्ट भाग के आकार वाला ताप क्षेत्र है. ॥२॥ में इस कथन को इस प्रकार करता हूं कि जर्भमुख कलंबु (धतुरे) के पुष्प के संस्थान वाला तापक्षेत्र है. वर अंदर मे मेरुपर्दन की पाम साडा और बाहिर लरण समुद्र में चौडा है. बाहिर समुद्र की तरफ विस्तीर्ण अंदर मर्नु ाकार. वाहिर चौडा अंदर अंकमहू के मंस्थान वाला. जैसे कइ मनुष्य मेरुकी न फष्टकर बैठे और जमुद्रकी तरफ पालखी कर बैठे तब उस की पालखा का संस्थान मेरु की तरफ सडर व ममद्र की तरफ चौडा है ऐसा ही सूर्य के तापक्षेत्र का संस्थान जानना. उम तापक्षेत्र की मेरु पर्वत के दोनों तरफकी दोनों बांये पेंतालीस२ हजार योजन की लम्बी है चौडाइ अनवस्थित है. अहो भगवन् ! यह किस हेतु से कहा है ? उत्तर-यह
44488+ चौथा पाहुडा 42+
अर्थ
8
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मत
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48 अनुमादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजो +
वट्टियाओ भवति ॥ ता सबभंतरियाचेव वाहा सव्व बाहिरिया चे वाहा ।। तत्थ कोहेऊ वदेजा ? ता अयणं जंबूहीवेदीये जाव परिक्खेतेणं ता जय.णं सरिए सयभंतरं मंडलं उवसंकभित्ता चारं चरति. तयाण उद्धमह कलंबूया पुप्फ संठियाणं ताव खतं सर्टिति, अहेतति वदंजा, अंतो संकुडा बाहिरंविच्छिण्णा जाब सयब हिरया चेव बाह। तीसेणं सबभतरिया बाहा नंदरपब्व
तेणं व जोयण सहस्साति चत्तारिय छासीए जायणसतेया णवयदस भागे जोय. जम्बूदीप यावत परिधि वाला है इस में जा मूर्य सब मे आयतर के मंडलपर रहकर चाल चलना है तब अर्व मुख कबुक स्थान वाला तापक्षेत्र कहा है. अंदर मकडा बाहिर चौडा यात्रन सब के वाहिर के
वाय मेरु पर्वत की पास ९४८४२. योजन की परिधि है. मरुपर्वत की समभुमि की जो परिधि ह उन का रवर्ग कला के दश स गुणा करना फोर इस का वर्ग नीकाल कर जो आये उसे
तीन गुनी करके दश के भागस छदनी. क्योंकी सब से अभ्यंतर मंडलपर जब सूर्य रहता है तक तीन भाग में उयत और दो भाग में अंधकार रहना है. इससे वर्ग तीन गुना कर के दश में छदनी जिम से यथोक्त तापक्षत्र का प्रमाण अ.ब. रुपर्वत समभत्रिपर १०००० योजन का चौडाहै इम की परिधि करने वर्ग:०००००००० योजन होब इसकी दश गुना करने से सो कार होव. इसका वर्ग मूल नीकाले तब १३१६२३ योजन की परिधि हावे. इस को तीन गुना करने ९४८६१ योजन हाये उसे दश का भाग देने मे ९४८६ योजन हाच. अब लवण समुद्र में बाहिर परिधि का प्रमाण कहते हैं. सब से बाहिर को वाहा
• प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुरुम्बसहायजी ज्वालाप्रसादभी.
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. स्स परिक्ववेणं तंजहा-परिक्खेवेतिहिं गुणिया दसहिं भागेहिं भागे हीरमाणे २९सणं
परिक्खेव विसेस अहितेति बदजा ॥ तीसेणं सब बाहिरिया बाहा लवणसमई तेणं चरणति जायणसहस्साई अट्रयं अट्रमने जोयणसत चत्तारि दसभागेजोपणस्स परिक्खं णातीसेणं परिक्खेवे विसेसे कतो आहिया ?ताजणं जंबुद्दीवस्स परिक्खो तिहिं गुणिया दसहिं भागहीरमाणे २ एयणं परिक्खेव विसेसे आहितमि वदेजातीसेणं ताव खेत्ते कवतियं आयामेणं आहितेति वदेजा, ता अट्टोत्तरि जोयणसहस्साति निष्णिय
Nika
सब चंद्रपति मूत्र-पष्ट स्पा +
चौथा पाहुडा
लवण समुद्र में १४८६८५. योजन की परिधि है. जंबद्वीप की परिधि व्यवहार नय से ३१६२२८ योजन की है इस को तीगुना करने से ९४८६८४ इस को दश का भागदवे तब ९४८६८६ योजन हावे.. बब तारक्षेत्र की लम्बाइ चौडाइ कहत है. प्रश्न-वह तापक्षष की लम्बाइ कितनी कही है ? उत्तर अठहत्तर हजार तीनसो तमीम योजन व एकयोजन के तीन भाग में एक भाग ७८३३३योजन तापक्षत्र लम्बाइ कही है. जिसमें में जम्बूदीए के ४५००० हजार योजन ग्रहण करना क्यों कि एकलाख योजनका जम्बूद्वीप लम्बाईजिपस दश हजार योमन का मेरु पर्वत बाद करते ९० हजार योजन रहे,उम क दो भाग करने से ४५ हजार याजन हो. और लवण समुद्र ३३३३ लम्बा है क्यों कि लवण समुद्र दो लाख योजन का विस के छठे भाय में ताप क्षेत्र हैं इस मे ३३३३ योजन होवे सा
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सूत्र
अनुमदक कालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
तेत्तिय जोयणसते एगति भागे जोयणस्त आयामेणं आहितेति वदेजा ॥३॥तयाणं किं अंधकार संठिया आहितेति वदेजा ? ता उद्दमुहं कलबया पुप्फसंठीया आहितति वदेजा, अतो संकुडा बाहिं। वीच्छणा,तंचर जाव तीसेगंदु बाहाआ अगुवद्विताआ भवंति, ता सव्वभंतरिया चेव वाहा,सव्वबाहिरिया चेव बाहातीसेणं सबभतरिया सहा मंदर पवातणं छ जोयणसहस्साति तिणिय चउबीसे जोयणसते, छच्चदस भागे जोयणरस परिक्खातिसेणं परिक्खवणं विससेकतो आहिया?ता जणं मदरस्स पव्वयस्स परिक्खेत्र
अर्थ
उपयुक्त भाग में पीलाने से ४८३३३ योजन होवे ॥३॥ अथ संस्थान कहते हैं. प्रश्न-उस समय Bअंधकार का क्या संस्थान है ? उत्तर-ऊर्थ मुख कलंबु का संस्थान कहा है, वह अंदर से सकडा बाहिर
से चौडा यावत् पूर्वोक्त प्रकार उस को दोनों वांहा अनवस्थित होती है. सब से आभ्यन्तर की वांहा व सब से बाहिर की बांहा. उम में सब से आभ्यन्तर की बांडा मेरु पर्वत की पास छ हजार तीन सो चौवीस योजन और एक योजन के दश भाग में से छ भाग ६३२४६. योजन की परिधिवाली है. किम तरह आभ्यन्तर बांहा की परिधि कही ? जो मेरु पर्वत की परिधि है उस से दुगुनी परिधि करना क्यों कि सर्व आभ्यन्तर मंडल में चार काल में एक मूर्य जम्बूद्वीप के चक्रवाल में प्रवेश करते हुवे पोशाक
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवस हायजी ज्वालाप्रसादमी.
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तंपरिक्खेवे दोहिं गुणिया दसहि भागे हीरमाणे २ एसणं परिक्खेवे विसेसे आहितेति वदेजातीसेणं सब बाहिरिया वाहा लवण समुदं तेणं तेवष्टुिं जोयण सहस्सातिं दोणिय पणयाले जोयणसते छचदसभागे जोयगस्स परिक्खवेणं तीसेणं परिवखेवेवि. संसं कतो आहितेति वदैजा? ता जणं जंबूद्दीवरस दीवस्स परिखेवे तं परिक्खवं दोहिं गुणिया दसहि मांग हीरमाणे २ एसणं परिक्षेत्र विसेसे आहितेति वदेजा ॥ तीसेणं अंधकार केवतियं आयामेण आहितेति वदेजा? ता अटुत्तरं जोयण सहस्सातिं तिण्णि
42
488 सप्तदश चन्द्रप्रज्ञप्ति सूत्र पष्ठ उपाङ्ग 488
अर्थ
चक्रनाल क्षेत्र अनमा दश भाग में के तीन भाग प्रकाश करे तब दो भाग अंधकार रहे, यों दोनों सूर्यके मीलाकर दश के छ भाग प्रकाश ४ भाग अंधकार होवे, इस लिय मेरु की परिधि ३१६२३ योजन की है इस को दुगुनी करे तब ६३२४६ होवे, इम को दश का भाग देवे ६३२४. प्राप्त होवे इतना अंधकार क्षत्र जानना. अंधकार की सब से वाहिर की बहा लवण समुद्र के अंत में सठ हजार दो सो पैंतालीस योजन और एक योजन के दश भाग में के छ भाग जितनी है. प्रश्न-किस तरह इतनी बांहा कही? उत्तर- * इस जम्चद्वीप की परिधि को दुगुनी करके दश के भाग से छेदना. जस इस जम्बूद्वीप की पारीधे १३१६२२८ योजन है इसे दुगुनी करने से ६३२४५६ होवे, इसे दश का भाम देने से ६३२४५.६ योजन
चौथा पाहुडा 44gal
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चास मनि श्री अमोलक ऋषिनी
तेतिसे जोषणसय एगती भामेजोयणस्स आयामेणं आहितेति,बदेजा तयाणं उत्तम कट्टपत्ते उक्कोसिया अट्टारस मुहुत्ता दिवसा भवंति, जहगिया दुवालस्स मुहुत्ता राई भवंति ॥ ४ ॥ ता जयाणं सरिए सव्व वाहिरं मंडलं उपसंकमित्ता चारं चरति, तयाणं उद्धमुह कलंबुया पुष्फ सेठिया ताव खत्तं संठिति अंतोतकूडायाहि विच्छडा जाव सबभतरियाचेववाहा सन्च वाहिरिया चेव बाहा।तितेतवभतरिया बाहा मंदर पन्वयतेणं छजोयण
सहस्साति तिण्णिय चउविसे जोयणसते छच्च दसभागे जोयणस्स एवं जं पमाण, होवे. अब अंधकार की लम्बाइ बताते हैं. प्रभ-यह अंधकार कितनी लम्बाइ चौडाइ में होता है ? उत्तर-७८३३३२ योजन का होता है. उस समय अठारह मुर्त का दिन ब बारह मुहूर्त की रात्रि होती है ॥ ४ ॥ जब सूर्य सब से बाहिर के मंडल पर चलता है तब ताप क्षेत्र का संस्थान कलम्बु पुष्प का होता है. वह अंदर से संकोचन व बाहिर स चौरा यावत् मय से भाभ्यन्तर की बांस सब से हिर की वांहा. उस में से सब से आभ्यन्तर की बांहा मेरु पर्वत की पाम १३२४. यों जो प्रमाण आभ्यंतर मंडलपर अंधकार का कहा वह सब यहां कहना. अर्थात् मेंरूपवंत की परिधि को दुगने करके दश भान देवे उस में जिनमे भावे उसन: बेर की पास की अंधकार की बाहा. और बाहिर की लपण
• पकायाक राजाबहादुर लाला मुखवाडायनी ज्वालपसादजी.
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प्ति सूत्र पठ उपाङ्ग 410
भम्भंतर मंडल अधकार सई तेतं इमाएवि तापखेत संठितिक्ति यन्वं. बाहिरं मंडले आयामो सम्वत्थ ॥ तयाणं किं संठिया अंधकार संठिई आहितेति बदेजा ता उहीमुह कलब्या पुप्फसंठिया अंधकार संठि आहितेति बवेजा अंतोसंकुडा बाहिं विश्छडा तचेव जाव सम्वन्भतरिया वाहा, सबबाहिरिया चेव वाहा तीसेणं सम्वन्भंतरिया वाहा मंदर पश्यतेणं व जोयण सहस्सातिं चत्तारिय छयासीते जोयणसते नवदस भागे, एवं जं १माणं अम्भंतरं मंडलं ठिइए सुरिए ताव
खत्तं संठिइ तचेव यचं जाव आयामो तयाणं उत्तम उक्कास अट्ठारस मुहुत्ता राई समुद्र में प्रेमठ हजार दोसो पैतालीम योजन और एक योजन के दश भाग में के ६ भाग ६३२४५+ है. इप्स की परिधि जम्बूद्वीप की परिधि स दुगुनी कर दश का भाग देवे जितने आवे उतनी परिधि. उस परिधि की लम्बाइ ३३३३३ है. अब अंधकार के संस्थान का प्रमाण कहते हैं. जब सूर्य सब के बाहिर के मंटल पर रहता है तब रात्रि में अंधकार का संस्थान किस प्रकार रहता है ? उत्तर-ऊर्च मुखकलम्बुक पुष्प के संस्थान से रहता है. वह अंदर से संकुडा वाहिर से चौडा यावत् सब के बाभ्यंतर के पाहा सब से यह की पाहा. उसमें सब से आभ्यंतर की वाहां मेरु पर्वत समीप पात्तर हजार चारभो चालीस ओर एक योजना के दश के नव भाग ७२४४० योजन है. उस समय अठारह मुहूर्त की।
ge चौथा पहुडा Aghante
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भवति, जहाण्णए दुवालसः मुहत्ते दिवसे भवति ॥ ता जंबूहोवे २ सरिया केवतियं खत्तं उड्ड तवंति, केवतियं खच अहे तवंति, केवतियं खेत्तं सीरियं तवंति; ता एगं जोयणसय उडू तवति, अट्ठारस जोयजसप्तायं अहे तवंति, सीतालीस जोयण सहस्त्राति दोणिय तेवढी जायणसते एकवीस सट्ठीभागे जोयणास तिरिय
तवति ॥ इति बउत्य पाझुडं सम्मत्तं ॥ ९ ॥ रात्रि व बारह मुहूर्व का दिन होता है. ॥ ५ ॥ अहो भगान ! जम्बुद्वीप में सूर्य ऊंचा कितना तपता है, नीचा कितना सपना और नापी रिमा पन है जान-मूर्य अपन विधान मे मो योजन उपर अठारह प्रोजन नाचे मोकि धीमापनी रिजः १००० योजन ऊडी है और समभूमि से मूर्य ८०० योज / ऊंचा है और ४७२६३ यांजन सी सपना है. पाचौथा पाहुडा संपूर्ण हुना. ॥ ४॥ ,
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१११.
पांचवा M
॥ पंचम प्रामृतम् ॥.. "ता किप्तणं सरियस्स लेमा पडिहंता आहितंति वदेजा ? तत्थ खलु इमातो धीसं पडि वचीतो पण्णत्ताओ तजहा तत्थी एव महंसु ता मंदर पध्वयंमि मरियम लेता पडिहंता आहितेति वदजा ॥॥ एगे पुण एवमासु तामरूपायाम मरियरस
लेस्सा जाव बवेजा ॥ २ ॥ एवं एएणं अभिलावेणं सा मणोरमंमि पश्यसि ॥ ३ ॥ 'सुदंसण पब्वयं ॥ ४ ॥ ता सयपभसिणं पब्वयं ॥ ५ ॥ ता गिरिरायसि पव्ययं ॥६॥
ता रयणाचुयं गं पवयं ॥ ७॥ सिलुच्चयं पब्वयामि ॥ ८ ॥ता लोगमझसि
अब पाचवा पाहुडा लेश्या के मनिपातका कहने ? प्रश्नम की लगा-भाताप का प्रतिपात कहां होता ETत्तर-इस में अभ्यतीथी की प्ररूपणा बीस पडिकृत्तियों की.इन में कितनेक सकते दिर पर्वत से सूर्य की लेश्या का प्रतिपातमा है, २ किनक मा कम किमहर्षन होणे १३ कितनेक एसा कहते हैं कि मनोरम पर्वन से ४ किसनेक ऐसा कहते सुदर्शन पर्वत मे ५ वयंप्रभ से T. गिरिराज से ७ रस्मच्युत पर्वत से ८ शिक्षा के उपनय से कितनेक ऐसा करने कि लोक मध्य
पर्वतो उस से सूर्य की लेडया का प्रतिघात होता है. : १. लोककी नाभि के स्थान पर्यो ।
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श्री श्री अमोलक ऋगिनी +
पवयंसि ॥९॥ ता लोगणाभिासण पव्वयसि ॥ ता अथिसिणं पध्वयं ॥१॥ ता सुरियावत्तसि पन्वयसि ॥ १२॥ मूरिया चरणमिण पवयंसि ॥ १३ ॥ ता उत्तमंसिणं पश्वयंमि ॥१४॥ता दिमीण पन्धयसि ॥१५॥ ता अवत्त संणं पव्ययंसि ॥ १६ ॥ सा धराणिकखीलंसिणं पश्यसि ॥ १७ ॥ ता धराण. 'सिगंसिणं पव्वयांस ॥ १८ ॥ ता पत्रयंदसिणं पब्वयंसि ॥ १५ ॥ ता पब्वय
रायंसिणं पध्वयंसि ॥ २० ॥ वयं पण एवं व्यामो-ता मदरवि प बञ्चति मेरुवि
पवुच्चति जाव पध्धयरायावि पवुच्चति, ता जेणं पोग्गला सूरियस्स लेसं फुसंति. तेणं ११. अनिशिता निर्मल जांबुनंद पर्वत से.१२ सूर्यावर्त पर्वत से १३ मर्यावर्ण पर्वत से १४ उत्तम पर्वत १५ दिशी की उत्पत्ति करनेवाला पर्वत से १६ मब में अस्तंसक पर्वत से १७ पृथ्वी में शीला समान
पर्वत से १८ धरणीश्रृंग पर्वत से १९ पर्वतेन्द्र पर्वत से और २० पर्वत राज पर्वत में सूर्य की लेख्या राहणावे. इस कथन को हम इस प्रकार कहते हैं कि मंदर नामक पर्वत यावत् पर्वत राजपर्वत मे सूर्य की
लिश्या हणावे. क्यों कि उक्त २० ही नाम मेरु पर्वत के ही हैं मात्र गुण"निष्पन्न मे पृथक् २ हो गये हैं. जैमे मंदर मापक देवता मालिक होने से
मंदर कहा गया. सब क्षेत्रों के मध्य में होमे से पह कहा गया, यो सब जानना. उक्त मतवाले एकाना
पावा-राजावादुर लालामुखदवसहायत । ज्वालाममारजी।
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मरण
गला सरियस्स लैस्स पडिहणति अतिट्ठाविणं पोग्गला मूरियस्स लेसं पडिहणंति, चरमलेसं तरगतविणं पोग्गला सूरियस्स लेसं पडिहणति आहितति वदेज्जा ॥
इति पंचमं पाहुडं सम्मत्तं ॥ ५ ॥ पक्ष ब्रहण करते हैं इस लिये उन का वचन मिथ्या है. इन में जो पुगल सूर्य की लेश्या स्पर्शते वही पुदल मूर्य की लेश्या की घात करते हैं. कठिन पुलों गर्य की लेश्या का प्रतिघात करते हैं। चरम लेश्या कि जो पर्वत में नहीं भेदाती है वही मूर्य की लेश्या का घात करती है. यह पांचवा पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥५॥
समरश चन्द्र प्रज्ञप्ति सून
80 पांचवा पाहुडा
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480
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११४
॥ षष्ठ प्रभृतम् ॥ ताकहते ओजमंठिई आहितेति वदेजा ? तत्य खलु इमातो पण्णवीसं पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ, संजहा-तक एगे एवं माहंमुअणुसमयमेवमरियरस ओया अण्णाओ उप्प. जइ अण्णवेत्ता हितति वदेजा, एगे एवमाहंमु ॥१॥ एगेपुण अणुमुहुत्तमेव सूरियस्स उया अण्णुप्पबइ,अण्णा वेति आहितति वजा ॥ एवं एएणं अभिलावेणं ता अणुरातिदिय एवमेव मुरिया ॥ ३ ॥अणुपक्वमेव सूरिया ॥ ४ ॥ ता अणुमासमेव सुरिया ॥ ५ ॥ ता अणुउरमेव सूरिया ॥ ६॥ सा अणुअयणमेव मुरिया ॥ ७ ॥ ता अणुसंवग्छर मेव सूरिया ॥ ८ ॥ ता अणुजुगमेव मूरिया ॥ १ ॥ अब छठे पाहुदे में प्रकार का कपन कहते हैं. भहो भगवन् ! पर्व काल में मयं एकरूर अवस्थापने अयवा। बण्यापने प्रकाशना ? अहो गौतम ! हम में अन्यतीर्थी की पहाण रूप पदीस परिवृत्तियों कही : किसनेक ऐसा करने में कि क्षण २ में सूर्य का प्रकाश अन्य उत्पन्न होता है और अन्य प्रकाशता. २ कितनेक एमा कहते हैं कि प्रत्यक मुड़ में सूर्य का प्रकार अन्योता और अन्य प्रकाशा कितनक ऐसा करते हैं कि प्रत्येक रात्रि में सर्य का प्रकाश अन्य उत्पन होता है और अन्य प्रकाशमा 1 ४ जिसमेक ऐसा कावे किसूर्य का प्रकार प्रत्येक पक्ष मम्म उत्पन होता है और -
विनीपानमसादी
कामता
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पत्र
ता अणुवास सयभेव सरिया ॥ .. ॥ ता अणुवास सहस्समेव भूरिया ॥" ॥ या अणुवास सय सहस्स मेव -रिया ॥ १२ ॥ ता अणुपुत्वमेव सूरिया ॥१३॥ ता अणुपुवसतमेव सरिया ॥ १४ ॥ ता अणुपुत्र सहस्स मेव सुरिया ॥ १५ ॥ ता अणुपुब्बसतसहस्समेव मूरिया ॥ १६॥ ता अणुपलिभोरम मेव मरिया ॥ १७ ॥ ता अणुपलिओवम सतमेव मरिया ॥ १८ ॥ अणु पलिओवम सहस्समेव सरिया ॥ १९ ॥ ता अणुपलिओवम सत सहस्समेव सरिया
॥ २० ॥ ता अणुसागरायममेव सरिया ॥ २१ ॥ ता अणुसागर सयमेव मरिया प्रकाशता ५ कितनेक रंग को सूर्य का प्रकाश प्रत्येक मास में अभ्य होता है और अन्य प्रकाशन है सही प्रत्येक ऋतुम ७ प्रत्येक अयन में ८ प्रत्येक संवत्सर में प्रत्येक यग में प्रत्येक वर्ष शता
१. प्रत्येक वर्ष मात्र १२ प्रत्येक लक्ष वर्ष१३ प्रत्येकम (सत्तर लाख उपम जार वर्षको एक कोडगुना करने से एक पूर्व होता)प्रत्येक मा पूर्व में १५ प्रत्येक हजार पूर्व में १६ प्रत्येक लाख पूर्व में प्रत्येक पश्योपम में १८ प्रत्येक सो पल्यापम में १९ प्रत्यक हमार पल्योपम में २० प्रत्येक वास प्रल्पोपन में २१ प्रत्येक सागरोपम में १२ प्रत्येक सो सागरोप में २३ प्रत्येक बजार सामरोपण
- .48486+ठा पारा
MIN पनि
4402
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सूत्र
अर्थ
२४ अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अलक
॥ २२ ॥ अणुसागर सहस्तमेव सूरिया ॥ २३ ॥ ता अणुसागरोत्रम सतसहरसमेत्र सूरिया || २४ ॥ गेपुण एवमाहंस ता अणुउसप्पिणी ओसप्पिणिमेत्र रियरस अण्णाउपाइ अण्णावेति आहितेति वदेजा ॥ २५ ॥१ ॥ वयं पुण एवं व्यामो ता तीस मुहुत्त सूरियस ओयाओं अवडीयाओ भवंति तेनंपरं सूरियस्त उया अणवट्टिताओ भवति ॥ छम्मास सूरिया आयं पिबुद्धेति, छम्मासं सूरिया उयं अभित निक्खममाणा मूरिए णिवुट्टेति पविसमाणे सूरिए उयं अति ॥ २ ॥ तत्थणं को हेतुति में २४ प्रत्येक लाख मागम में और २० कितनेक ऐसा कहते हैं कि प्रत्येक अवसर्पिणी काल में सूर्य का प्रकाश अन्य उन दोना है और अन्य प्रकाशता है, इस कथन को मैं प्रकाश कहता हूँ कि तीस मुहूर्त पर्यंत सूर्य का प्रकाश अपस्थित रहता है क्यों की प्रत्येक मंडलपर एक सूर्य तीस मुहूर्त तक रहता है. इस से जोर मंडळपर होने उस आश्री अवस्थित और दूसरे मंडल आश्री अनवस्थित है उस में कितनेक मेटलर प्रकाश होवे और कितनेक मंडलपर अंधकार होवे. प्रथम छमास में सूर्य का प्रकाश कमी होता है, और दूसरे छनास वें सूर्यका प्रकाश वृद्धि पाता है. अर्थात् नीकलता हुआ सूर्य { प्रकाश की हानि करता है, प्रवेश करता हुवा सूर्य प्रकाश की वृद्धि करता है. ॥ २ ॥ अहो भगवन् इस
उत्सर्पिणी
इस
• प्रकाशक राजा बहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी •
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1
448 चंद्रमा ३
वदेजा ? ता अयं जंबुद्दीवेदीये जात्र परिक्खेवेणं ता जयाणं सुरिए सव्वन्तरं मंडलं उत्रसंकमिचा चारं चति तयाणं उत्तम कट्टुपत्ता अट्ठारस मुहुते दिवसे भवति जहणिया दुवालस मुहुत्ता राई भवति ॥ से निक्खममाणे रिए णवं संवच्छ रं अयमाणे पढनंसि अहोरत्तंसि अन्यंतरानंतरं मंडलं जात्र चारं चरन तयाणं एगं भागं उपाए, एगेणं रातिदिएणं दिवस खंत्तरस निव्विहित्ता रातिखेत्तर अभिवट्टित्ता चारं चरति अट्ठारस तीसेहिं सतेहिं मंडलच्छेया, तयाणं अारस मुहुत्ते दिवसे
क्या हेतु है ? अहो गौतम ! यह जम्बूद्वीप नामक यावत् परिधिवाला है. इस में जब सूर्य सब से आभ्यंतर { पहिले मंडलपर रहकर चाल चलता है तब उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन व जघन्य बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. वहां से नीकलता हुआ सूर्यवतार में आया पहिली अहोरात्र में आभ्यंतर के अनंतर दूसरे मंडलपर जब चाल चलता है दिन में एक भाग प्रकाश का दिन के क्षेत्र यहाँ मंडल के १८३० भाग करना ऐसा एक : भाग एक मंडल को दो सूर्य एक अरात्रि में पूर्ण करते हैं.
में हीन कर रात्रि क्षेत्र में बढाकर चाल चलता है. जानना.. (१८३० भाग करने का कारन कहते हैं.
एक अहोरात्र में एक सूर्य के तीस मुर्ख होते हैं कैसे ही दूसरे मर्ग के तीस मुहूर्त मीठाने स ६० मुहूर्त
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छठा पाहुडा
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११८
मुनि श्री अपालक ऋषिणी अनुवादकामास
8 भवति, दोहिं एगट्ठी भाग ऊणे. दुवालस्स मुहत्ता राई भवति देहिं
अहिया ॥ से निक्खममाणे मुरिए दोच्च स अहे रत्तंमि अन्भंतरं तच्चं मडल जाव चारंभ चिरति ॥ ता जयाणं परिए अध्मंतर तम मंडलं जाव चारं चरति तयाण दो भाग उयाए दोहिं राइदिए हैं दिवाखम निवटा गइ वनस्ल अभाला चार चरति, अट्टारमातमहि मते मंडल छन , त अदु मह 7 दाल च रहे ऊगे, दवाल महत्ताराई भात चउहि दयाल
नवममाण गरिए तयाणंतराआ तयाणतर मडलं संकममा २ सांतेख तस्ल आभमाग र मन्त्र बाहिरं. उस को ६१ से मुना करने से ३६६ . होरे, इस को दो का भागहेने से को एक २ सूर्य के प्रत्येक मंडल के १८३० भाग होवे वैसे एक भाग क्षेत्र की हानि द्धि करना) इम सपय एसठिये दो भाग कम का दिन व दो माग अधिक की रात्रि हानी है. हा से नीकलना हा मर्य दूरी अहारात्रि में गावर चाल चलता है. व सूर्य तीर एयर चाल चलना है सर एक मंडल के १८३०॥ के भाग बना कर उसमें के दो भाग प्रकाश का दिन प्र पीकर रात्रि के क्षेत्र में बड़ा
चाल चलता है. इस समय एकमठिये चार भाग कम अठ.१६ मुहूर्त का दिन व जघन्य चार भाप सावधिक धारह मुहूर्न की रात्रि है. इस तरह नीकलता हु सूर्ग एक पछि एक मंडल पर रहता दुवा
लाला लदेक्समायनी ज्वालाप्रसादी ।
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} "मंडलंजाव चारं चरति तयाणं सबभंतरं मंडलं पणिहाय एगणं तेसौतेराइदिएसएणं
एग तेसीतं भागसयं उयाए दिवस खतस्स निटिना राइखेत्तरस अभिवद्वित्ता चारं चाति, अद्वारस तिहि मंडरच्छेत्ता, तयाणं उत्तम कापता उक्कोसिया अट्ठारस मुहुर्ता राई मति जहण्णए दुगलस मुहत्ते दिवसे भवति, एतणं पढमे उम्मासे एमणं जाव पजवासणे ॥३॥ से पविसमाणे सरिए दोचं छम्मासं अयमाणे पढमांस अहोरत्तस मंडलं जाय चारं परति,तयाणं एग भागं उयाए एगेणं राइंदिएणं
राइखेचरस निवुद्वित्ता दिवस खेचस्स अभिवहिताचारं घरति, अट्ठारस तीसेहि सएहिं एक मंडल के १८३० भाग में का एक माग प्राश एक रापिदिन में दिन के क्षेत्र में कमी करता
और रात्रि मे पहाताना सब से पाहिर मंडल पर रहकर चाल चलता है. मामूर्य सबसे गाभ्यंतर मंडल में नीलकर मप से बाहर के मंडलपर राबर पाक खताtar१८३ रात्रि दिन में एक पहल के १८३० भाग में के १८० भाग प्रकाश का दिन के क्षेत्र में करी कर रात्रि के बढाकर चल
पस समय उत्कृष्ट अठा मुन की रात्रि अघन्य सार मुहर्त का दिन होता है. यह पी 31 मास पहिला गम का पर्यवसान हुवा. ॥३॥ वहां से प्रवेश करता दुधा सूर्य दूसरे छमास मे पाता
AM पहिली ओरात्रि में बाहिर से अनंतर दुसरे मंडलपर सकर चाल चलता है. उस समय
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} " मंडलं छेत्ता, तयाणं अट्ठारस मुहुत्ता राई दोहिं ऊणा, दुवालस महुचे. दिवसे दोहि. __ अहिए, से पविसमाणे सरिए दोच्चसि अहोरसि बाहिरं तच्चं मंडलं जात्र चरति ।
ता जयाणं रिए बाहिरं तच्च मंडलं जाव चरति तयाणं दो भाग उयाए दोहिं राइंदिएहिं राइखेतस्स निविहिता दिखत्तस्स अभिवद्धिता चारं चरति, अट्ठारसतिसेहि सएहिं मडलं छेत्ता, तयाणं अट्ठारस मुहुत्ता राई चउ ऊणे दुवालस मुहुत्ते दिवस चडहिं अहिए ॥ एव खल एएणं उवाएणं पविसमाणे मरिए तयाणंतराओ तयाणं
तरं मंडलाओ मंडलं संकममाणे २ एगभाग उयाए एगमां मंडलं रातिदिएणं एक मंडल के १८३० भाग में का ? भाग प्रकाश का रात्रि क्षेत्र में कमी कर दिन के क्षेत्र में बढाकर पाल चलता है. उस समय उस्कृष्ट एकमठिये दो भाग कम अठारह मुह की रात्रि व जघन्य दो भाग भाषिक बारह मुहूर्त का दिन होता है. वहाँ से पोश करता हुवा सूर्य दूसरी अहोरात्रि में बाहिर के तीसरे मंडल पर यावत् चाल चलता है. जब सूर्य तारे मेडल पर चाल चलता है तब १८३० भाग में से दो भाग प्रकाश का एक रात्रि दिन में कम कर दिन का बढ़ा कर चाल चलता है. उस समय
एकमाठिये चार माग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि व चार भाग अधिक बारह मुहूर्त का दिन होता 17इसी तरह प्रवेश करता हुमा मूर्य एक पीले एक मंडल पर रहता हुवा १८३० के एक भाग प्रकाश के ..
अनुवादक-पालवासी मुनि श्री अमोलक सिमा
सायकसमादुर लाल मुखार सहायनीज्वालाप्रसादमी.
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सप्तदश चंद्रमज्ञप्ति सूत्र इष्ट-उपान
राइखेत्तरस गिबुड़े माणे दिवस खत्तरप अभिवडेमाणे सवभंतरं मंडल उवसंकमित्ता चारं चरति, सा जयाणं सरिए सन्न बाहिरातो मंडलातो सबभंतरं मंडलं जाव चरति, तयाणं सब्व बाहिरं मंडलं पणिहाय एगेणं तेसीतेणं राईदिएणं सतेणं एगं तेसीतं भागं उयाए राइखत्तस्स नियुड्डित्ता दिवस खेत्तस्स अभिवुड्डित्ता चारं चरति अट्ठारस तीसेहिं मंडलं छत्ता ॥ तयणं उत्तमकट्टपत्ते उक्कोस अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति जहणिया दुवालप्स मुहत्ता राई भवति ॥ एसणं दोच्चे छम्मासे एसणं जाव पजवासणे एसणं आइच्चे संवछरे, एसणं जाव पज्जवासणे ॥ इति
बंदपन्नत्तिस्स छटुं पाहुडं सम्मत्तं ॥ ६ ॥ रात्रि क्षेत्र में कम कर दिन के क्षेत्र में बढ़ाकर सब से अभ्यनर मंडल पर रहकर चाल चलता है. जा सूर्प संव मे ताहिर के मंडल से प्रवेश कर सब से आभ्यन्तर मंडल पर रहकर चाल चलता है तब सब मेota वाहिरका मंडल छोडकर १८३. रात्रि दिन में १८३० के १८३ भाग प्रकाश का रात्रि क्षेत्र में कम कर दिन के क्षेत्र में बंद कर चाल चलता है. उस समय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन व जघन्य बारह मुहूर्न की रात्रि होती है. यह दूसरा छ मास व दूसरे छ.मास का पर्यवमान हुचा. यह आदित्य संवत्सर व आदिस्य संवत्सर का पर्यवसान हुवा. यह छठा पाहूडा संपूर्ण हुवा ॥६॥
8+ छट्ठा पाहूडा bat
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अनवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक शपिजी.
॥सप्तम प्राभृतम् ॥ लो किंते गरिए चरति आहितेति वदेजा ? तत्थ खलु इमातो वीस पाडवत्तीओ पण्णताओ संजहा-तत्थ खलु एगे एवं मासु तामंदरणं पवते सूरियं चरति आहितेति वंदेजा, एगे एव माहंसु ॥ १ ॥ एगे पुणतामे रूणं पब्बए मारिए चरति आहितेति एवं एतणं अभिलावेणं जाव बीसइमा पडिवत्ती जाव ता पव्वयराणं पवते सूरियं चरति आहितेति,वदेजा एग एव माहंम् ॥ २॥ त्रयं पुण एवं बघामो-मंदरेवि पवुच्चति मेझवि पवुच्चति, एवं जाव पन्वयराएणं पव्वुच्चति ता जेणं पागला सरिथरस लेसं फुसंति ।
श्रा सातवा पाहुडा कहते हैं, अह भगवन् ! आपके पत में मूर्य प्रकाश केसे करता है ? अहो गौतम ! इस विषय में अन्यनीकी रूपणा रूप वीस पदित्तियों कही हैं कितनेक ऐसा र हैं कि मंदर पर्व: स सूर्य प्रकाश कर २ कितने ऐसा कहते हैं कि मेह पर्वत से सूर्य प्रकार करे पावत् पर्वतराज से सूर्य प्रकाश करे, यों जिम प्रकार पांचा पाहुड में सूर्य की लेश्या का कथन किया वैसे ही यहाँ मतांतरों कहना. मैं इस कथन को ऐसे कहता हूं कि मंदर मेरु यावत् पर्वत राज से मूर्य प्रकाश करतापयों कि सब नाम एक अर्थवाची है, यो जो पुदगल सूर्य के भाताप को स्पर्शते हैं उनहीं पुद्रल
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी .
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अर्थ
4- सदश-चन्द्रमहि सून पठ-उपाङ्ग 4820
ते पोग्गला सरियं चरति, अणिट्ठाविण पोग्गला सूरियं चरति चरमले संतरगता विणं पोग्गला सुरियं चरंति आहितेति वदेजा ॥ चंदरन्नत्तीए सत्तमं पाहुडं सम्मने ॥ ॥
में सूर्य प्रकाश करता है. नहीं देखा सके बने सूक्ष्य पुल भी सूर्य का प्रकाश करे. चरम लेश्या में रहे हुवे पुलों सूर्य का प्रकाश करे, यो चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र में सातवा पाहुडा संपूर्ण हुवा || ७ ||
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等
4834488**
५.२३
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F
अर्थ
२०३ अनुवादक - बालव्रह्मचारी मुनि श्री ओमालक ऋषिजी
॥ अष्टम प्रामृतम् ॥
ता कहते उदयसंठित आहितेति वदेजा ? तत्थ खल इमातो तिष्णि पडिवताओ पण्णत्ताओ तंजहा तस्थ एंगे एवं माह ता जया जबूद्दीवेदावे दाहिण अट्टारस मुहुते दिवसे भवति, तयाणं उत्तरड्डूवि अट्ठारम मुहुत्ते दिवसे भवति, ता जयाणं उत्तरढे अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति तयाण दाहिणड्डू अट्ठारस मुहुत्तं दिवसे भवति ता जया दाहिण सत्तरस मुहुत्ते दिवसे भवति तयाण उत्तरत्रि सप्तरस मुहुत्ते दिवसे भवति. जाणं दाहिणड्डू सत्तरसमुहुत्त दिवसे भवति तयाणं उत्तरवि सत्तरस मुहुते अब आतंत्र पाहुडे में सूर्य के उदय की मर्यादा का कथन करते है. अहो भगवन् ! आप के पस से सूर्योदय की संस्थिति कैसे कही है ? उत्तर - अहो गौतमः इसमें अन्यतीर्थ की प्ररूपणा रूप तीन पडिवृ { कही है ? किसने ऐसा कहते हैं कि जब जम्बूद्रीप नामक द्वीप के दक्षिण में अठारह मुहूर्त का दिन हो तब उत्तरार्ध में भी अठारह मुहूर्त का दिन होता है और जब उत्तरार्ध में अठारह मुहूर्त का दिन होता है तब दक्षिणार्ध में भी अठारह मुहूर्त का दिन होता है. ऐसे ही दक्षिणार्ध में जब सतरह
{ मुहूर्त का दिन होता है तब उत्तरार्ध में भी सतरह मुहूर्त का दिन होता है और जब उत्तरार्ध में सत्तरह मुहूर्त का दिन होता है तब दक्षिणार्ध में भी सतरह मुहूर्त का दिन होता है, यो इस
अभिलाप से जब
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* प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रमा
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सप्तदश चन्द्रप्रज्ञाप्त मूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 48+
... दिवसे. भवइ, जयाणं उत्तरड्डे सत्तरस मुहुत्ते दिवसे भवति तयाणं दाहिणड्डेवि 14
सत्तरस मुहुत्ते दिवसे भवति ॥ एवं एएणं अभिलावणं सोलसमुहुत्ते, १०णरस मुहुत्त चौदस मुहत्ते, तरममहुत्ते, ता जयागं दाहिगड्ढे बारसमुहत्ते दिवसे भवति तयाणं उत्तरढवि बरसमुहुत्ते दिवसे भवति,ता जयाणं उत्तरकै बारस मुहुत्ते दिवसे भवति तयाणं दाहिणारी बारसमहत्ते दिवसे भवति तयाणं जबूद्दीबंदीवे मदरस्म पव्वयस्स पुरथिम
पच्चत्थिमणं सया पण्णरस मुहत्ते दिवसे भवति, सया पणरस मुहुत्ता राई भवति दक्षिणार्ध में सोलह महून का दिन होवे तर उत्तरार्ध में भी सोलह मुहूर्त का दिन होवे, और जब उत्तरार्ध में सोलह मुहका दिन हवे तर दक्षिणार्ध में मोलह मुहूर्त का दिन होवे; जब द क्षणार्ध में पनाह मुहूर्न, का दिन हावे तब उत्तरार्ध में भी पनाह मुहूर्त का दिन होवे, और जब उत्तरार्ध में पन्नरह मुहूर्त का दिन होवे तब दक्षिणार्ध में भी पन्नाह मुहूर्त का दिन होने; जब दक्षिण में च उदह मुहू का दिन होवे तब * उत्तरार्ध में भी च उदह मुहू का दिन, और जर उत्तरार्ध में चउदह मुहू का दिन हाबे तव दक्षिणार्ध में
भी चउदह मुहू का दिन होवे; जब द क्षणार्ध में तेरह मुहूर्त का दिन होवे तब उत्तरार्ध में भी तेरह मुड़ ।। का दिन, और जब उत्तरार्ध में तेरह महतका दिन तब दक्षिणार्ध में भी तेरह मुहूर्त का दिन, जब दक्षिणा ।
48848 आटवा पाहुडा
+
4
.
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१२३
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
अवट्टियाणं तत्थरातिदिया पण्णचा समणाउसो ! एगे एक माहंसु ॥ १॥ एगे पुण एव माहंसु-ताजयाण जंबूद्दीवेदीवे दाहिणढे अट्ठारस मुहुत्ताणतरे दिवसे भवति तयाणं उत्तरद्धे अट्ठारस मुहत्ताणतरे दिवसे भवति जयाणं उत्तरड्डे अट्ठारस मुत्तागं. तरे दिवसे भवति तयाणं दाहिणवि अट्ठारस मुहुत्ताणंतरे दिबसे भवति एवं परिहरियवं सचरस मुहुत्साणंतर सोलसमुहत्ताणंतर पण्णरस मुहुत्ताणंतरे, चउद्दसमुहु
त्तागंतरे, तेरसमुहुत्ताणतरे, ता जयाणं दाहिणड्डे घारसमुहुत्ताणंतरे दिवसे भवति, में बारह महूर्त का दिन होने तब उत्तरार्ध में बारह मुहूर्त का दिन और जब उत्तर में बारह मुहूर्न का दिन तब दक्षिणार्थ में भी वारः मुहू का दिन होवे. इस समय जम्बूद्वीप की पूर्व पश्चिम में सदैव पन्नरह मुहू का दिन व पन्नाह मुहर्न की गधि हाती है. यहां रत्रिदिन अवस्थित रहते . २ कितनेक ऐसा कहते हैं कि जा जम्बूद्धप क दक्षिणा में अठारह मुहर्न अंतर ( अठार मुहूर्त में कम) दिन होता है तब उत्तरार्ध अठारह मुहर्न में कम दिन होता है और जब उत्तरार्ध में अठारह मुहूर्त में कम दिन है तब दक्षिण में भी अठारह मुहूर्न कम का दिन होता है. इसी तरह एक २ कम करना दक्षिणार्ध में सत्तरह महतिर दिन हवे तब उत्तरार्ध में सत्तरह महू तर दिन होवे और उत्तरार्ध में सत्तरह मुहूर्तातर
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालामसदाजी
રાઈ
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मसू
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तयाणं उत्तरद्धवि बारसमुहुत्ताणंतरे दिवसे भवति, जयाणं उत्तरडे वारसमहत्ताणतरे दिवसे भवति तयाणं दाहिणहंवि बारसमुहत्ताणतरे दिवसे भवति, तयाणं जंबूद्दीवेही मंदरस्म अयस्त पुरथिमे पञ्चत्थिमेणं न मया पण्णरम मुहुत्ते दिवसे भवति,नो सया पण्णरस मुहत्ता राई भवति अणवट्ठियाणं तत्थ रातिदिया पण्णत्ता समणाउसो ! एगे एवं माहेम् ॥ २ ॥ एगे पुण एव माहसु-ता जयाणं जंबूद्दीवेदीवे दाहिड्डे अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति तयागं उत्तरडे वालम महुन गई भवति; जयाणं उत्तरड्डे
48+ibE-BABA-B2B 462
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दिन होने तत्र दक्षिण में भी मनाह मुहू नितर दिन होने जा दक्षिण में सल, मुनितर दिन होवे तव उत्तरार्ध में भी पाल मुतिर दिन होव और जब उतरार्ध में मोलद मुहूर्गनंतर दिन हवे ता दक्षिण में भी मोलह भनितर दिन होवे. जब दक्षिणार्ध पनाह मुहूर्वातिर दिन हवे तव उत्तरार्ध में पनाह मुहू:तर दिन और जब उत्तरार्ध में पनरह मुहूर्ना-1, नंर दिन होवे नर दक्षिण में भी पनाह मानिंतर दिन. होवे, जब दक्षिण में चउदह मुहर्नानंतर दिन हावे। तब उत्तरार्ध में भी च उदह मुहूनिंतर दिन और जब उत्तरार्ध में चउदह मुहूर्नानंतर दिन तर दक्षिणार्ध में चउदह मुहूर्नानंतर दिन, जब दक्षिणार्ध में तरह मुहूतिर दिन होवे तर उत्तरार्ध में तेरह मुहूर्नानंतर दिन।
आठवा पाहुडा 488
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का अनुबादक शालारसकरी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी *
अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवति तयाणं दाहिणढ़े दुवालस मुहुत्ता राई भवति ता जयाणं दाहिणड्ढे अट्ठारसमुहत्ता णतेर दिवसे तयाणं उत्तरड्ढे दुवालस मुहुत्ता राई भवति, जयाणं उत्तरड्ढे अट्ठारस महत्ताणतरे दिवसे भवति, तयाणं दाहिणड्ड दुबालस मुहुत्ता राई भवाति एवं सत्तरस मुहुत्ते दिवसे,सत्तरसमुहुत्ताणंतरे,सोलसमुहुत्ते,सोलस मुहुत्ताणंतरे,पण्णरसमहुत्ते,पण्णरसमुहुत्ताणंतरे, चउद्दसमुहुत्ते, चउद्दसमुत्ताणंतरे तेरस र जब उत्तरार्ध तेरह मुहूर्नानंतर दिन तव दक्षिणार्ध में भी तेरह महतर दि; जब दक्षिणार्ध में वारह मुहूर्नानंतर दिन तव उत्तरार्ध में भी बारह महतर दिन और जव उत्तरार्ध में शरद महूर्नानंतर दिन तब दक्षिणार्ध में भी बारह मुहूर्तालर दिन हाय. इस समय जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत की पूर्व पश्चिम में पनाह मुहुर्तानंतर दिन व पन्नाह मुहूर्नानंतर रात्र होती है. यहां रात्रि दिन अवस्थित कहे हैं ३ कित-13 नेक ऐसा कहते हैं कि जब जम्बूद्वीप के दक्षिणा में अठारह महू का दिन होता है तब उत्तरार्ध में चारह मुहून की रात्रि होती है और जब उत्तरार्ध में अठारह मुहूर्त का दिन होता है नव दक्षिणार्ध में बारह मुहूर्त की रायि होती है. जब दक्षिणा में अठारह गहन में कम दिन होता है तब उत्तरार्ध में बारह मुहूर्त की रात्रि होती है और जर उत्तरार्ध में अठारह मुहूर्त में कम दिन होता है तब दक्षिणार्ध में बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. एमे दी सतरह मुहुर्न, सतरह मुहूर्त में कम का दिन, सोलह मुहुर्त, सोलह ।
.प्रकाशक-जावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वाला रमादर्ज .
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4%
+१+2
मुहुरो, तरसमुहत्ताणतरे बारसमहरे। बारसमुहुत्ताणतरे ता जयाणं दाहिण वारसमहत्ते दिवसे भवति तयाणं उत्तरढ़े बारस महत्ता राइ भवति, जयागं उत्तरद्ध वारस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवति, तयाणं जंबद्दीवेदीवे मंदरस्त पवयस्स पुरथिम पच्चत्थिमेणं णेवत्थि पण्णरस महत्ते दिवसे वत्थि पण्णरस मुहत्ता राई भवति वोछिण्णाणं तत्थ रातिदियाणं पण्णत्ता समकाउसो ! एगे एव माहंमु ॥३॥ १ ॥ वयं पुण एवं वयामो
ता जंबूद्दीवेदीव सृरिया उदीण मणि मुबगच्छति पाईणं दाहिण आगच्छति पाईण E मुहूर्त में कुछ कम दिन, पन्नाह मुहूर्त, पन्नर ह महूर्त में कुछ ६ म दिन, उदह मुहूर्त, चउदह मुहूर्त में कुछ
कम दिन, तेरह मुहुर्न तेरह मुहूर्त में कुछ कम दिन, और रात्रि सर्व स्थान वारद मुहूर्त की जानना. जब
दक्षिणार्ध में बारह महुर्त का दिन होता है तब उत्तरार्ध में बारह महून की गति होनी है और जब उत्तहैरार्ध में वारह मुहूर्त की रात्रि होती है. तब दक्षिणार्ध में वारह मुहूर्न का दिन होता है. जब दक्षिणायन
वारह मुहूर्त में कप दिन होता है ता उत्तरार्थ में बारह महून की रात्रि होती है और जब है उत्तरार्ध में बारह महतं कुछ कम दिन होता है तर दक्षिण में बारह महून की रात्रि
होती है. उस समय जम्बद्वीप के पूर्व पश्चिा में पन्नर महत का पूर्ण दिन नहीं होता है वैसे ही पनरह मुहूर्त की रात्रि नहीं होती है. क्यों कि वहां रात्रि दिन का व्यवच्छेद कहा है ॥ ॥ अहो शिष्य ! इस कथन को मैं इस प्रकार कहता हूं कि इस जम्बूद्वीप में सर्य उत्तर पूर्व-ईशान कौन में उदय पाते हैं और पूर्व दक्षिण अनि कौन में अस्त होते हैं भरतक्षेत्र
be-BE HEREL-28048
आठवा पाडा 42
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49 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषि
दाहिण मुरगच्छंति दाहिणंपडीमागच्छंति. दाहिणपडीण उवगन्छति. पडीणंउदीण
मागच्छति, पाडीणउदीण मुरगच्छंति, उदीण पाईण मागच्छंति, ॥ २ ॥ ता जयाणं । F} जंबूढ़ीवेदीवे दाहिण दिवसे भवति, तयाणं उत्तर दिवले भवति, जयाणं उत्तरद्रु
अपेक्षा पूर्व दक्षिण-अमे कौन से उदय हैं शिनाव:- ऋक में अस्त होते. पश्चिम पहा विदेह क्षत्र आश्री.ऋत्यकम में उदय पातच.तार में प्रस्तन एरवत क्षेत्र आश्री.
और वायव्यक। में उदय ने ईशाक में अन हात पर्ष मा.विदा क्षेत्र की अपेक्षा. यह सामान्य से सूर्योदय का कथन किया. आ विशषषा से कहते हैं. एक सूर्य दक्षिण दिशा में उदय पावे नव दूसरा सूर्य पश्चिमउसर दिश में उदय पाने. दक्षिण का भातादि क्षेत्र मरु के दक्षिणदिशा के प्रधान मंडल पर प्रकाश करे और दूसरा पश्चि। उत्तर का मूर्य अंक से उत्तर दिशा में एरवत क्षेत्र में प्रकाश करे. अव भरत क्षेत्र का सूर्य दक्षिण पश्चिम में प्रस्त पाकर पश्चिम माविदह क्षेत्र में उदय पावे भीर एरवत क्षेत्र का सर उत्तरपूर्व महाविदह में उदय पाव. दक्षिणपूर्व में उदय पाया हा सूर्य आग मंडल में परिभ्र ण करे, अवरांवदेश में प्रकाश न.रे और उत्तरी उदय पाया हवा पूर्वविदह में प्रकाश करे. व पूर्व विदह का मूर्य दक्षिण भरत क्षेत्र में आकर प्रकाश करे, और अवरविदेह का है पश्चिम उत्तर में आकर पवन क्षेत्र में प्रकाश करे. यह जम्बूद्वीप में मूर्योदय होने की विधि कहो ॥२॥ अब क्षेत्र विभाग से दिन का विभाग कहते हैं. इस जम्बुद्वीप में जब दक्षिणार्ध में दिन होता है
• प्रकाशक-राजाबहादूर लाला सुखदेव महायजी मालाप्रथादजी .
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N
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सप्तदश-चन्द्रप्रज्ञाप्त सूत्र पह-उपाङ्ग
विसे भवति, तयाणं जंबूद।वे मंदरस्स पन्वयस्स पुरस्थिम पञ्चस्थिमेणं राई भवति. जयाणं जंबद्दवेदीवे मदरम पवयर पुरस्थिमेणं दिवसे भवति तयाणं पञ्चत्थिमेणं दिवसे भवति, जयाण पच्चत्थिमेणं दिवमे भवति, तयाणं जबद्दविदीवे मंदरस्म पठनयस्स उत्तर दाहिणाणं राई भवति ॥३॥ ता जयाणं जंबुर्द वेदीवे दाहिणढे उक्कासए अटारम मुहत्ते दिवमे भवति तयाणं उत्तरड़े उक्कोसए अट्रारस महत्ते दिवसे भवति जयाणं उत्तरढू उक्कासए अट्ठारस महुतं दिवमे भवति तयाणं जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स पवयस्म पुरथम पञ्चत्मिणं जहांणया दुवालस मुहुत्ता राई भवति, ता जयाणं
जंदीवेदीय पंदरस्स पव्ययस्न पुर त्यमेणं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे तयाणं पञ्चत्थिमेणंवि उत्तागमें भी पद होना है और ना उत्तम दिन हाता है नव पूर्व और पश्चिम में रात्रि होती है ऐसेही जा इन जम्बूद्ध प पू में दिन का है नव पश्चिा में भा दिन होता है और जब पश्चिममें दिन होता तर उत्तर और दाक्षणमें रहती || ना जंबुद्ध प दडग में उत्कृष्ट अठारह मुहूर्नका दिन होता है तब उत्तरार्ध में भी उत्कृष्ट अठरह महू का दिन होता है, जा उत्तरार्ध में उत्कृष्ट अठारह मुहूर्न का दिन होता है वा पूपिश्चिम में जघन्य बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. जब जम्बूद्वीप में मेरू पर्वत की पूर्व में उत्कृष्ट अठारह.. मुहूर्त का दिन होता हैं तब पश्चिम में भी।
+ आठवा पाहुडा 4
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42, अनुवादक- लिब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
उक्सए जाव दिवसे भवति, जयाणं पञ्चत्थिमेणंवि उक्कोसए जाव दिवसे भवति तयाणं जंबूद्दीवेदी मंदरस्स पव्वयस्स उत्तर दाहिणेणं जहणिया दुवाल मुहन्ता राई भवति, एवं अट्ठारस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवति, सातिरेगा दुबालस मुहुत्ता राई भवति, सत्तरस मुहुत्ते दिवसे तेरस मुहुत्ता राई भवति, सत्तरस मुहुत्ताणंतरे दिवसे, सातिरेगा तेरस मुहुत्ता राई भवति, सोलसमुहुत्ते दिवसे चउदस मुहुत्ता राई भवति, सोलस मुहुत्ताणंतर दिवसे, सातिरंगा चउद्दस मुहुत्ता राई भवंति पण्णरस मुहुते दिवसे भवति, पण्णरस मुहत्ता राई भवति, पण्णरस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवति, सातिरेगा पण्णरस मुहुत्ता राई भवति, चउद्दस मुहुत्ते दिवसे भवति सोलस भी उत्कृष्ट अठारह मुहुर्त का दिन देता है और भी जब पुर्व पश्चिम में अठारह मुहूर्त का दिन होता है तब उत्तर दक्षिण में जघन्य बारह मुहूर्त की रात्रि होती ऐसे ही अठारह मुहूर्त में कम दिन होवे तब बारह मुहूर्त मे कुच्छ अधिक की रात्रि हावे सत्तरह मुहूर्त का दिन तेरह मुहूर्त की रात्रि होवे सतरह मुहूर्त में कम दिन तेरह मुहूर्त से कुच्छ अधिक की रात्रि सोलह मुहूर्त का दिन चौदह मुहूर्त की (रात्रि, सोलह मुहूर्त में कम का दिन चौदह मुहूर्त से अधिक रात्रि पनरह मुहूर्त का दिन पचरह मुहूर्त की रात्रि, पद्मरह मुहूर्त में कम का दिन पन्नाह मुहूर्त मे अधिक रात्रि - चउदह मुहूर्त का
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* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी ●
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मुत्ता राई भवति,चउद्दस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवति सातिरेमा सोलसमहुत्ता राई,तेरस मुहुरो दिवसे, सत्तरस महत्ता राई तेरसमुहसाणंतरे दिवसे सातिरेगा सत्तरस महत्ता राई, ता जयाणं अंबृद्दीवदीचे दाहिणजे जहण्णए दुवालस मुहत्ते दिवसे भवति तयाणं उत्तर जहण्णए बालम महत्ते दिवसे भवति, ता जयाणं उत्तर अहण्णए दुवालस मुहत्ते दिवमे, तयाण जंबुद्दीवेदीव मदरस्स पब्वयस्स पुरथिमेणं पञ्चतिदमेणं उक्कोसिया अट्ठारम महत्ता राई भवति,वा अयाणं जंघदीवदीवे मदरस्स पन्नयस पुररियमेणं जाण्मए दुगल । महुत्ते दिवसे भवति तयणं पचरिथमेणत्रि जहण्णए दुवालस महुरो दिवसे भवति दिन सोलह मुहुर्द की रात्रि, चोदा मन में कम का दिन सोसह मुहर्त से अधिक राषि; तेरह मुई का दिन सत्ताह मुहुर्त की रात्रि, तेरा मुहूर्त में कमका दिन सतरा मुहत से अधिक का रात्रि. एसेही जम्बू द्वीप के दक्षिणा में जब वारसमका दिन होता है तो उसरा में भी बारह मुहूर्त का दिन होता. है और मा उसराव से पारह पुर्न का दिन होता है तब मेरु पर्वतके पूर्व पश्चिम मे उस्कृष्ट अठास मुहुन की राषि होती है, जब जम्बूद्वप में प्रेक पर्व की पूर्व में जवन्य पारह मुहुर्त का दिन होता है। न पश्चिम भी भरह मास दिन होता है और जब पश्रिाम बारह मुह का दिन होता है वा
488-448+ आठरा पाटा 44.44
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म अनुवादक-कलामचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी "
43 'अयानं यच्चस्थिमेणं जहण्णए दुवालस अहच दिवसे,तयाणं जम्बूद्दीवे द्दीवे मंदरास उत्तरेणं
दाहिणेणं उक्कानिया अट्ठारम्म मुहुत्ता राइ भवति ॥४॥ता जयाणं जम्बृद्दीवे दाहिणे पासाणं पढमे ममए पडिवज्जति तयाण उत्तरदावि बासागं पदमे समए पडिवजात तयाणं जम्बूद्दीवे होवे मंदररस पध्ययाप पुरस्थिमेण पञ्चस्थिमेण अणंतर पुराकडे काल समयंसि वासाणे
पहमे समर पडिजति तयाणं जम्बूद्दीवे मंदररस पश्चयस्स उत्तरदाहिणणं अणंतर उच्चर दक्षिण में उत्कृष्ट अवारह मुहर्त की गति होती है ॥ ॥ जब जम्बुद्वीप के दक्षिणाध में वर्षा मत का प्रथम समय ना है इतना में भी वर्षा ऋत का प्रथम सम होता है, जब उपारदक्षिणार्ध में वर्षा
माप न नामक पर्वत में पूर्वपश्चिम के अनर पुराकृत काल में वर्षा ऋतु का प्रथम मयय होला है. अर्थन उत्तरदक्षण के दर सपर में पूर्वपश्चिम का प्रथम समय होता है. अब जम्मूद्वीप में पेश पात मे पूर्व पश्चिम में पकतु का प्रथम मपय होता है तब अनंतर पश्चातकृत समय में वर्षा का पहिला ममय प्रतिपूर्ण होता है. जसे यह वाकाल का कहा वैमे ही समय का कहना, अर्थात् तरं दक्षिण प्रथम ममय तत्पश्चात दुसरे ममय में पूर्व पश्चिमका पहिला समय, ऐसे ही आपलिका उत्तर दक्षिण प्रथम पावलिका का समय हर समय में पूर्व पश्चिम में प्रथम बाबलिका का समय, उत्तर दक्षिण में आणपाणु प्रथम समय (श्वाशोश्वाम) नेत्पश्चात् दूसरे समय में पूर्व पश्चिम में आशु पाणु का प्रथम समय. उत्तर दक्षिण
• प्रकाशक राजावाजदुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी .
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सच
अर्थ
+ सप्तदश- चंद्रमसि सूत्रपट ज्यान
पच्छाकडे समयास वासाणं पढमे समए पडिपुण्णे भवति। नहा समए एवं आवलिया आणपाणु, थांबे, लवे, मुहुत्ते, अहोरते, पक्खे, मासे, ऊऊ एए दस आलावगा बालाणं माणि ॥ ५ ॥ ता जयागं जम्बूही वे दाहिण हेमपाणं पढमे समए पडियजति तयाणं उत्तरत्रि हमताणं पढमे समए पडिवज्जति, तयाणं जम्बूदीचे मंदरस्त पव्यरस परस्थिमेणं पचस्थिमेणं अनंतरं पुराकडे काल समयंसि हेमंताणं पढमे समए परिवजति, एतस्स दस आलावगा जाब ऊऊ भाणियध्वा ॥ ६ ॥
सा
{ में योव का प्रथम समय होवे तत्पश्चात् तूमरे समय पूर्व पश्चिम में योग का प्रथम ममय, उत्तर दक्षिण में
लव का प्रथम समय पश्चात दूरे समय पूर्व पश्चिम में लव का प्रथम ममय प्रथम समय तत्पश्चात दूरे समय पूर्व पश्चिम में मुहूर्त का प्रथम समय उत्तर { प्रथम समय तत्पश्च तू दूसरे समय पूर्व पश्चिम में अहोरात्र का प्रथम समय प्रथम समय होत्रे तत्पश्चात् दूसरे समय पूर्व पश्चिम में पक्ष का प्रथम समय, ( प्रथम समय होत्रे तत्पश्चात् दूसरे समय पूर्व पश्चिम में मान का प्रथम समय प्रथम समय तत्पश्च त् दूसरे समय पूर्व पश्चिम में ऋतु का प्रथम समय यो दश आलाक कहना ॥ ५ ॥ ऐसे ही जम्बूद्वीप के दक्षिणार्ध में हेमंत के दस आलापक कहना ॥ ६ ॥ लव
उत्तर दक्षिण में मुहूर्त का दक्षिण में अहोरात्र का उत्तर दक्षिण में पक्ष का उत्तर दक्षिण में मास का उत्तर दक्षिण में ऋतु का
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44*49+ आठवा पाहुडा
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पमुक-चालनमचारी मुनि श्री अबोलक
जणि जम्बूद्दीवे २ दाहिबई गिम्हाणे पढमे समए पाडेवमति तयाणं उत्तर ई वि. गिम्हाणं पढ़मे समए पड़िवजति ता जयाण उत्तर दाहिणद्ध गिम्हाणं पढमे समए पहिवाजति तयाणं जम्बुद्दीचे २ पुरास्थिम पचास्थमण अण्णता पुराकडे काल समयसि गिम्हाण पढमे समए पडिवजति एतस्स दस लावगा जाव ऊऊ भाणिवाला जयाणं जद्दीवेदीव दाहिगडू पढम समए अयमाण पडिवजात तयाणं उत्तरहेवि पढम ममए अयमाणे पडिवजाति,अयाणं उत्तरष्टुं पढमस्मए अयमाण पडिवजति तयाणं अंदीवे
दीवे मंदररस पवयस्स पुरथिमेणं पञ्चस्थिमणं अणसरपुराकई कालसमयसि पढम अयमाणे के दक्षिणा में प्रेम ऋतु का प्रथम ममय होता है तब उत्तरार्ध में भी प्रथम समय होता है. जब जम्बूद्वीप के उत्तर दक्षिण में क्रयत का प्रथम समय होता है तब जम्बुद्वीप केक पूर्व पश्चिम मे अनंतर पुन काल में श्रीपत का प्रथम ममय बना है या इभ के भी तु पन दश भालापक कहना ॥ ७ ॥ जब जम्बूद्वीप के दक्षिण में प्रथम अयन हानी है तब उसा में भी अयत होती है और ना उत्तर दक्षिण में प्रथम अयन होती है तब जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत से पूर्व पश्चिम में अनंतर गहन काल में अर्थात् दूसरे समय में अयन का प्रथम समय होता है. जब मदीप के मेरु से पूर्व में ।
• कायाक राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालापमाद भी
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4
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be-2A BATRE in Baat
पाडवजात,ता जयाणं जीवे मदरस्स पुरथिमेणं पढमै समए अपमाणे पाडवजति,तयाणं पञ्चस्थिमे गवि पढमे समए अपमाणे पडिजति त! जयाणं पञ्चस्थिमिगं पढमेममए अयमाणे, पडिबजाते, तयाणं जयू मंदार उत्त दहिणण अगर कल समयमि पढमे समए अयमाणे टिपुन्न नमानावं . ज , ...हस्से,वामसतसहरसे, पुगपूध,डियंग तडिए, अडडंग,अडडअश्वग,अवे हरगाहहए, उप्पलंगे, उप्पल पउमग १उम, लिगंगेलिगे अस्थिपियरगे अयणियर अउयग, अउए, नउयंगे
उए, बूलियंगे चुलिए, सिमपहेलीयग सीलपहे.लया, पलिउम, सागरोधमे, ॥ अयन का प्रथम ममय होना है ता पश्चिम में भी अगन का प्रथम समय होता है. जब जम्बूद्वीप के मेरु पर्वन में पूर्व पश्चिम में अपने का प्रथम ममय होना है तब जम्बुद्वीप के सर दक्षिण में अनंतर पश्च त् कृन । एक ममय पहिले ही ] अया का प्रथम ममप प्रतिपुर्ण हाता है. ऐ है। संवत्सर, युग, वर्ष नर्षशन, सहस्त्र, वर्षशतसहस्त्र (लाख वर्ष) पूग, पू, त्रुटिनांग, शुटित, अडडांग, अडई, अपांग, १ अपपहुगहुहुध, उत्पलांग, उत्तल, पांग, पम, नालनांग, नलिन, अस्तिनीपुरोग, अस्तिनीपुर,
मांग, अजय, नययांग, नयय, अलिनांग, चलया, शीपहेलिनांग, शीर्षपलित, पल्योमम सामोपम का
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+23. IER
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4. अनुवादक-बालब्रह्मचारीमान श्री अमोलक ऋषिजी ..
पता "जयाण जबदौ दोव दाहिणई पढमे समए उसपिणि जाव पाडवजात.
तयाणं उत्तरदाय पंढमे - समए उसप्पिणी पडिवजति, सयाणं जंबूद्दीव दीवे ' मंदरस्स पयस्त पुरथिमेणं पञ्चत्यिमणं ओसप्पिणी वत्थि, तत्थ काल पण्णते
समणाउसी ! ॥ ८ ॥ एवं लवणसमुद्दे धायतिसंडे कालोए ता अब्भतर . कहना, जर इस जम्बूद के दक्षिणा में प्रथा उत्पणा होती है ता उत्तर में प्रथम उत्सावणी होती है, जब उत्तर दक्षिणा में भम उरविगी होनी है तब जम्न्दी के पूर्वपश्चिम में अवमर्पिणीपई उत्सरणीशी हातवां व समान का अदा अ युदन् ।८॥पर ही रणनमा का जानना. जैमेजबुद्धी में हो सके उदय अस्त का. दिशा विदिशा का न हा तसा लवण ममुद्र का भी कहना. परंतु इतना विशावण अयुद्ध में बार बार सूप है. जिनमें मदा मूर्य जम्बदीपक दक्षिणा के सूर्य की श्रणी और दा सूर्य जंबद की उत्तार्थ कार्य की श्रेणी में हैं. जब जद्रोप में एक मूर्य । दक्षिण के मध्य उदय पावे उम की पमश्रण पनिवद्ध दो सूर्य लवण समुद्र में दक्षिण पूर्व में उदय पप यो उदयगर गर्य उस समम प्रतिभा सर्ग और भा जाणममुद्र के पश्चिम उत्तर में उदय पाने । उदयनजदंप क मर्ग जसा मानता. मलाण ममुद्र क दणाध है में दिन होलानालाण दत्त म भा दाहालाई और जब ध न होता तब दाक्षणार्ध में भी दिन होवे एड नव नाणमुद्र इत्तरदगमदिनता नालसमद्र के पूर्वपश्चिम विभाग में रात्रि हाता है. और जब लवण समुद्र के पूर्व पश्चिम विभाग में दिन होता है तब उत्तर दक्षिण विभाग में रावि होती है, जितना दिन का प्रमाण जम्बूद्वीप में कहा उतना ही लवण समुद्र में जानना. यावतू
प्रकाशक-राजावहादूर लालामुखदेवमहायजी ज्वालामसादजी.
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सत्र
મથ
48* समय चंद्रमा प
पुक्खरद्धेत्रि सूरिया उत्तरपाईण मुत्रगच्छति, पाईण दाहिणं आगच्छति ॥ एवं जंबूदीवं वत्तत्रया भाणियन्त्रा जाव उसप्पिणिवि ॥ इति वदन्न्नतीए अटुमं पाहुडं सम्मतं ॥ ८ ॥ *#e
*
ड सर्पिणी काल लक्षण
की खंड की वक्तव्यना जानता
नहीं है यत्र कहना. जैसे लवण समुद्र की वक्तव्यता कही कैसे ही घात परंतु यहां क्षेत्र की विशालता होने से बारह चंद्र व बारह सूर्य हैं. जिनमें छ सूर्य दक्षिण में व छ उत्तर में प्रकाश करते हैं. उक्त वारा ही सूर्य जम्बूद्वीप व लवण समुद्र गत सूर्यो का श्रेणीमा हुने हैं. इनकी उ अन की विनिरूर जंबूद्वीप जैमी जानना जब घातकी खंड क दक्षिणार्ध में दिन होता है तब उत्तरार्ध में भी दिन होता है. जब धान की खंड के उभर दक्षिण विभाग में दिन होता है तब मेरु से पूर्व पश्चिम विभाग में रात्रि होती ऐसे ही उत्पणी अवसर्पिणी का आलापक कहना. कालोदधि समुद्र की वक्तव्याला समुद्र जैसी कहना, परंतु यहां क्षेत्र की विशालता से ४२ चंद्रा ४२ सूर्य कह हैं. जिन में २१ दक्षिण में और २१ उत्तर विभाग में हैं. दिन रात्रि का क्षेत्र सवैसे ही जानना. अब आभ्यंतर पुष्करार्व द्वीप के सूर्य चंद्र की वक्तव्यता जम्बूद्वीप {जैसी है। कहना परंतु यहांपर ७२ चंद्रमा व ७२ मूर्य, दिन, रात्रि, अपणी उत्सर्पिनी आदि सब वक्त व्यता जम्बूदीप जैसी कहना. यों अढाईद्वीप में १३२ चंद्र १३२ सूर्य निरंतर परिभ्रमण करते हैं. इति चंद्र इसका आठवा पाहुडा संपूर्ण हुता ॥ ८ ॥
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***+आठवा पाहुदा 498+
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कार्थ
बदकाचारी मुनि श्री अमोलक अपनी
|| नवम प्राभृतम् ॥
तयाण
ताकति कट्ठे ते सरिए पोरिसी च्छायं णिवतेति आहितेति वदेजा? तस्थ खलु इमातों तिरंग पडिवतीआ पण्णत्ताओ संजहा-तत्थ एगे एक महंसु ता जेणं पांगला मूरियसले फूति ते पोगला तपति ते पग्गला सतप्यमाणा, तराइ बाहिराति पांगला सदावनिति, एमण से समिते नावखत एग एवं माई ? || || एगे पूरा एत्र माहं तर जे पगला मूरियस कुतते योगाला नो सतप्पत्ति, ते पांगला अनंनष्यमाणे तताणतराई वाहिराति पोग्गलति नी संतावति, एसणं से समितं तावखते एमएच माहंसु ॥ २ ॥ एगंपू एवं माहस जेण
अब नववे पाहुडे में पुरुष छायाँ ( पौरुष ) का प्रमाण कहते हैं. अहो भगवन् ! आप के मन में कितन प्रमाण में पुरुष छाँया होती है ? अहो शिष्य ? इस मे अन्तर्थी की प्ररूपणारूप तीन पांडवृत्तियों कहा है. जिन में एक ऐसा कहन हैं जितने पुल सूर्य की लेया के कार्शन है वे पुट्रल सूर्य की लक्ष्या से सकते हैं. सूर्य की लक्ष्या से तपते हुने पो बाहिर के पुल तपास हैं. यह सांमत मर्यादापना में उत्पन्न हुवा तापक्षेत्र है २ किनने ऐसा कहते हैं कि जो पुगल सूर्य का लेख्या को सर्शते हैं वे पहल नहीं तपते हैं-ऊष्ण नहीं होते हैं परंतु पीठफलगगन पुद्गल का सूर्य सायमंत्र रूप से सूर्य ताप लेश्या करे नहीं स बहिर के पुल तपाये नहीं. यह समित मर्यादा पर्ने हुदा ताम क्षेत्र जानना कितनेक ऐसा
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● बकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रमादजी
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wwAAAAAAAAAmannrre
पोग्गला रियरत लेसं फसति तेणं पोग्गला अत्यंगतिया संतप्पंति, अत्यंगतिया नो
संतप्पति,अत्यंगतिया संतप्पमाणातयाणंतराति वाहिराति पोग्गलाति संतावति अत्थंगतिया . अमंतप्पमाणा तयाणतराइ बाहिराइ पोग्गलाई नो संतावितितिाएम्मणं स संमिए तावखंत्त
एगे एवं माहंमु॥३॥वयं पुण एव क्यामो-ता जातो इमाता चंदिमसरियाणं देवाण विमाणे हिंतो लेसातो बहिया अभिणिसडाआ पयाविति, एतासिणं लेसाणं अंतरेनु अणंतरातो छिन्नलतातो समुन्छति, तएणं ततो छिन्न लसातः समुच्छिन्नातो, समाणितो तेणं
सरति वाहिरातिं पागलातिं संताविति. एसणं सं समिए ताव खेने ॥ १ ॥ ता कति कहते हैं कि जो पुदमा सूर्य की हश्या को सही इनमें से किसक पुराने हैं और कितनेक नहीं! सपते हैं. कितनेक सपने हुवे पुगल दर साहिर के गुद्गल नपाते हैं और कितनक नहीं तपते हुने तंदनंतर बाहिर के पुद्गल नहीं नपाते हैं. यह मामेन मर्यादा ताप क्षेत्र दुवा. इस कथा को इस प्रकार कहता
पहुं कि यह जा चंद्रमूर्य के विमान हैं उन में से लश्या वाहिर नीकलसी है और सन्मुख दिशा में प्रकाश 190 करती है. इन विमान से नीकली हुइ लंग्या प्रांतराओ में अन्य मूल लेश्यां पर करे. अब मूल लश्या में सात
सदनंतर बाहिर के पुदल पाये. यह समित क्षेत्र पर्यादा पने बाप क्षेत्र उत्पन हुवा. यावाप क्षेत्र का
समदश चंद्र प्राप्ति सूत्र-पष्ठ उपाङ्ग 42
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सत्र
अर्थ
42 अनुवादक बालमचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
कट्ठे ते, मुरिए पारसीच्छायं निवत्तद्द आहितेति वदेजा तत्थ खलु इमातो पण्णविलं पडवसीओ पण्णत्ताओ तंजहा तत्थएंगे एवं माहंनु ता अणुसमयमेव सूरिए पोरिसीछा नित्र आहितेति वदेज | एवं एएवं अभिलावेणं जातो चत्र ओय मंठिए रणव पबितीओ, तातो चैत्र यातो जात्र तासु णुमपिणि उमापणिमेत्र भूरिए पोरसीच्छायं निव्वतेति आहितति वदजा, एगे एवं माहंसु ॥ वयं पुण एवं क्यामो
"
कथेन
हुवा ॥ १ ॥ प्रश्न - अहो भगवन् ! आप के मत में सूर्य कितने प्रमाण में पुरुषछाया बनाता है ! अहो शिष्य ! इस में अभ्यनीयों की प्ररूपणारूप पश्चीम पडिवृत्तियों कही हैं तथा १ कितनेक ऐसा कहते हैं कि प्रतिसमय मे सूर्य से नीकलती हुई लेश्या पुरुष छाया बनावे. यहां लेश्या से पारसी छाया होवे इस में कारणकार्य उपचार है. पोरसीछाया को लेश्या बतलाइ क्योंकी क्षण २ में सूर्य अन्य
लेश्या बनावे यों इस अभिलाप में यावत् जैसे छठे पाहुडे में प्रकाश के संस्थिति की पच्चीस पडिवृत्तियों कहीं वैसे ही यहां पर भी कहना यावत् प्रत्येक उत्सव अर्पिणी में सूर्य पौग्सी छाया बनाता है इस कथन को मैं इस पर कहता हूं कि जब सूर्य लेश्या छोडना हुआ ऊंचा चढता है छा होन { है अर्थात् लोक व्यवहार में जब सूर्य उदय होव तब छया बडी हावे परंतु पीछे ज्यों ज्यों सर्व चडता जाता है त्यों त्यों छाया हीन होती जाती है. यो मध्यान्ह पर्यंत होती है, और ज्योंर छाया बहती है।
● प्रकाशक- राजाबदुर का सदेवसहाय जी न्वालाप्रसादमी -०
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१.४३
-4HI AD-BhARI
ला भूरियरसागं उच्चं तं लेसंच पडुच छाया उद्देस उचंत्तं छायं. पञ्चले मुद्देसेलेसंचछायंच पडच्च उचत्त उहेलो ॥ २ ॥ तत्य खल इमाती दो पडिवत्तीओ पणत्ताओ तंजहा एगे एव माहं मु ता अस्थिणं र दिवले जंसिंच। दिवमंमि मरिए च उपं रमिच्छायं निवचेति अहवा दुपुरिसीच्छाया निवत्तीत आहितति देवा, एगेव महसु ॥ १ ॥
एगेषण एव माहमु-ता अत्थिणं से दिवसे जंसिं चगं दिवससि सरिए दुपातिंस छायं निवस्पोरलेल्या हान होती है अर्थत् मध्यान्ह पीछे सुर्य अस होता जाव स्यों छाया बढती जावे यह दूसरा उदेशा लेश्या व छाया दोनों आश्री अर्थात् मध्यान्ह समयमें सूर्य अपने मस्तकपर रहताहै इससे छायां आगे पीछे नहीं होती है यह तीसरा उद्देशा. यह लेश्या का स्वरूप कहा॥२॥ पुरुष छायां प्रमाण में अन्यतीथि कहते हैं. इसमें अन्यतीथिकी दो पडिवृत्तियो कही हैं. कितनेक एमा कहते हैं कि दिनमें जब सूर्यका उदय होता है तब उदित होता मर्य चार पुरुष की छाया बनावे. अथवा उदित होता सूर्य दो पुरुष छाया बनाये और २ कितनेक ऐसा कहते हैं दिन में उदित होता मूर्य दा पुरुष छाया बनावे अथवा किंचिन्मार छाया बनाये नही. उनमें जो अन्यतीथि एसा कहते हैं कि ऐसा दिन हैं कि जिस में उदित हो /चार पुरूष छावा बनावे अथवा ऐसा भी दिन है कि जिस में उदित होता सूर्य दो पुरुष छाम बातो.
24+8+ नववा पाहुडा +
8+
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Jan Education Interational
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तैति आहितति वदेजा एगेएवमासु ॥ तत्थ जेते एवं मासु अस्थिणं से दिवसे सिवर्ण दिवसं करिए च उपोरसी छायं निवत्तेति अहवा अत्थिणं से दिवसे जंसिचणं दिवससि भरिए. दुपारमिच्छ.यं नियत्तेत, ते एव माई।, ता जयाणं पुरिए सन्नभंतरं मंडलं. उसंकमित्ता चार वागते तपाणं उन उसे अट्ठारस मुहु ते दिवस जहण्णए दुवालस मुहत्ताराई भवाते, तसेच दिवसति सूरिए च उपारसि छायं निव्वत्तेति तंजहा उग्गमण मुहुसिच, अत्थमण मुहुसिच तलेस्स अभिकद्वेभाणे वा, निवुह्रमाणेवा॥ ता जयाणं
१४४
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जन का कथन इस तरह है कि जब सूर्य मय से आन्तर पारले पर होता है तब उत्कृत अठारह मुहूर्त का दिन व अघन्य वारह महु की गति होती है. उस दिन उदित होता मूर्य चार पुरुष छाया बना उदित मन में से ला त पुरु। छाया बनाये जमिन होता हुवा सूर्य लेश्या की
द करे और अस्स हाना सूर्य लेश्या की हानि कर. भाना सूर्य से आभ्यंतर मंडमपर र तर उत्कृष्ट अठारह मूर्त की रात्रि व जयन्य बारह महू का दिन होता है. इस दिन सूर्य दो पुरुष छापा नावे उद्गपन मुडून व असामर्न में दो पुरुष उ.या बनावे. उदित होता मूर्य लेश्या की वृद्धि करे और अस्त होता सूर्य लयाकी हानि करे. यह प्रथम अन्यतीर्थीका कथन हवा. जा अन्यतीधिक ऐसा कहते
डे उदित झना सूर्य किसी दिन में दो पारसी छाया बनाता है उन का कथन इमसे है कि जब
प्रकाशक-राजाबादुर लाला मुखदेवसमायनी ज्वाजापसावजी .
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: भारए सनशाहिर मंडलंबसंकमिचा चारं चरति तयाणं उत्तम कट्टपत्ते अट्ठारस मुहचराई भवति जहानिया दुबालस मुह ते दिवसे, तमिच गं दिसांस सूरिए दुपारसी पाय नियति त. उगा । मुह र. में प्रथमण महुलित लेसं अभिवड्डेमाणेशा निमःणेवा आहितेति वदेज, एगी. माहं ॥१॥ एग पुण एवं माहंमु ता.. बयाणं मूरिए सम्यमतर मंडलं उमंकलित चरं बरति तेसिं चणं दिवससि हरिए दुपारसी छायामिव्वतंति संजहा उम्गमम मुहत्तेलि अस्थमण मुहुचमि तंतसं अभिवमाणेवा निनाणेश, ता जयाण परिर नव्यय हिरं मडलं उपसंकमिता चार पति तसिंचन दिवससि मुरिए न किंधिवि पोरसिकायं नित्तेति तजहा उभामण
संसि अस्थमण महुनि सकेस मेने अभिड्डेमणे व निवड्माणवा अहितति 1. सबसे अभ्यर महलपर चाल चलता र क अप दिन दशवन्ध वारा..पुरा
कीम शेती है. उन दिन सूर्य दो पुरुष छाया बनाता है तथा दूपन मुहूर्त में व असम में पर्व में सूर्य की लेया में वृद्धि होती है और अस मुहूर्त में सर्थ की लेया की ही Fl माया हिरवार र पलना बर किचिव शमा भी नहीं बनाक्ष-गामा
मता
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अनुवादक-बालकाचारी मुनि श्री अमालक ऋषिजी.
वजा एंगे एकमहिंमुता कति कटुंते सरिर पौरसिछाये निव्वत्तेति, आहितेति वदेजा, तत्थ खलु इमातो छणवति पांडबत्तीओ-तत्थ एगें एवभाह ता आस्थणं से दिवसे सिचणं दिवमसि मारिए एग परिसिछायंनिव्वत्तेति आहितेति. घरेजा, एगे एवं मासु ॥ ॥ एगे-पुण ता अस्थिणं से दिवमे जैसिंचणं दिवसंसि : सरिए दुपारसि च्छायं निव्वत्तेति. आडितति वदेजा ॥ एवं एएणं अभिलावणं जाव छण्णउति पोरसिच्छायं निव्यततितित्थ जते एव माहंमु ता अत्थिणं से दिवसे सि
वणं दिवसंसि मुरिए एग परिसिच्छायं - निवत्तेति लेणं एवं मासु ता सूरिए मुहुर्त में व अस्त मुहुर्न में. उस की लश्या की भी हानि वृद्ध नहीं है क्यों की पुरुष छ या वनारे न॥३॥ गौतम स्वामी प्रश्न करते हैं. कि कितने काष्ट प्रमाण मर्य पुरुष की छाया बनाता है ? उत्तरइस में अन्यतीविकी प्राण। हाम्नु पाउं त्तयों कहा हैं तद्यथा कितनेक एसा कहते हैं कि किसी दिन सूर्य एक पुरुष छाया बनावं अर्थ जा पदार्थ जितना उभ्या डोये उतनी छायाँ बनाने, २.दुसरा अन्यतीथि
मा.काते हैं कि दिन में सुर्य दो पुरुष छाया बनाव अर्थात् मा पदार्थ होवे उसे दुगुनी छाया बनावे, इसी तरह में तीसरा अन्यत: तीन. पुरुष छाया बनाने का कथन करे, यावत् चाणवा पंचाणरे पुरुष की छाया बनाने.का.कहे और .छन्नुवा अन्यती छन्नु पुरुष छापा बनाने का कहे.
• प्रकाशक गजाबहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्या
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सप्तदश-चंद्रप्रज्ञप्ति सूध षष्ट-पान
तस्सणं सध्यहिटिमातो मूरिएपडिहाओ वहिया अभिणिसट्राहिं लेसाहिणिजमाणीहिं इमीसे रयणप्पभाए पढवीए बह नमरमणिजातो भीम भागातो जाव दितंमारिए उच्चत्तण, एवतिएगार आए अट्ठाए, एगणं छयाणमाणप्पमागेण उमाए एत्थणं से मूरिए एगे पोरमिछ.यं निव्वत्तति ॥ तत्थ जत एक माहमु अस्थिणं से दिवस जसिचणं दिवसंसि सरिए दपारमिच्छापं निम्त्तद तेण एव माहसु ता सरिए तरसणं सन्ध हेट्ठिमाओ सारए पडिहवा बहिया अभिगिसट्टाहि लसाहिं वाहिं तवणिज
माणहिं इमीस रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिजातो. भूमिभागातो जाव अर्थात् जो पदार्थ जितना लम्बा हो उस भे छम्नगनी - या हो. इन में जो अन्यताया ऐसा कहते हैं एक दिन में एक पुरुष छाया सुर्य बनाय उस का कथन इस हेतु मे है कि मप से नीचे रहा हुवा सूर्य
आकार को नष्ट कर वाहिर नीकली हुइ पनीय लेग महित इन रत्नप्रभा पृी के बहुत समरमणीय भूपिभाग में पूर्व दिशा में प्रकाश करता पूमि से उपर आरे यह अर्थ स एकसयाका अनुमान प्रमाण हो.. इस तरह सूर्य एक पुरुष छाया बनाव. जो एमा कहते हैं कि सूर्य दिन में दा पुरुष छाया बनावे उनका कथन इस हतु से है कि सब मे नीच रहा हुवा सूर्य अंधकार नष्ट कर बाहिर नीकल हुई तपती हुई लेश्या सहित इस रसप्रग पृथ्वी के बहुत समरमणाय भूमिभाग मे दिशा में प्रकाश करवा दुवा पूर्व दिशा में)
नाबचा पाहुडा
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:
मुनि श्री को पीला
marwaimammam
* मरिए उई उच्चसेणं एवति ताहि को अट्टाहै दोहि छ'शाणुमणुष्यमाणा
उमाए तस्थणं मे मरिए दुपोरिसिछायं निम्वत्तेति ॥ एष एककाए पडिसीए माणिय . 1 जाव छगउतिमा पडिवत्तिब एगे एव माह ॥ ४ ॥ यं पुण एवं व्यामो सातिरेगे
एगुणवि पोरसिखायं मिव्वत्तेति आहितमि बदजा, ता अब पारमीणं छाया दिन." से निकले, स
माव मे दो पुरुष छायागण मे बनुमान. इस तरह दो पुलाया बनाये. यो एक परिदृत्ति में एक पुरुष प्रषिक १ कहना अर्थात् नीरवनीन पुसावा, पीये पार पुरुप काय यावत् पैना में पंचाण पुरुषछाया और उन्नु पनि छन्नु पापा बनाये ॥४॥ बपन को इस कार कासाई कि मूर्य गुणसठ पुरुष से अधिक पुरुषबा बनावे. पन्न-पर्व
या बासर कितना दिन व्यतीनवा और कितना दिनास? उत्तर-प.पा स दिन का तीसरा भाग यतीचे, पति प्रथम मंडल पर पर सूर्य सेवेस. परी का दिमाग हाये. इम से ३६ को तीन का भाग देन में बारह भी का दिन माने, अन् पारस पी दिन । नवीन हो, और २४ घडी दिन शेष रहे. सूर्यास्त समय में २४ घडी दिन यती रोये और पारस
वी रिवहे. एक पुरुषाया भाषेसर किसना दिन व्यतीत होने और किसना दिन रहे कौशमान दिनापसीस गरे अर्थ. एक दिन । यही का प्रेम मित्र में से
.6-राजाबहादरलाम पुत्रदयसा
बोबाला mir
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P
1.
सरस किंग वा सेसेवा ता ति मांगे गए ती सेसेवा पोरिसिणछाया दिवसस्स किंगएका सेसेवा जाव वडभाग गएवा मेवाता दिंड पारिसी छाया दिवमस्म किंगले या सेवा,ता पंच भागेगतेव वासेवा एवं अब परिणं छाया पुच्छा दिवसहल भागं छं हुवा
९ घडी का दिन मान जाते और २७ बडी दिन आब तथ कितना दिनी पत्र माग दिन मा
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३६ दिन व्यतीत होने और २८४८ पल दिन
रहने पुरुष छाया जावे. देe पुरुष छाया और कितना दिन क्षेत्र रहे ? उच्चरदेव पुरुष छाया नय ही दिन मानाचा माग करने घडी १२ १ होइन रहे. सूर्यास्त समय में २८ घडी ४८ पल इतना और ७ घटः १२ १ दिन शेष रहा होवे सब देखें पुरुष छाया होवे. यह प्रथम हम समय का जाना इन मित्र मंडल से १८४ वे मंडल तक उपयुक्त क्षेत्रों कि उत्तराध्ययन के
समय व्यतीत
हो
पर सूर्य हो गणित करना नहीं अध्ययन में कहा है कि पशुदी १५ पूर्णिमा को उत्कृष्ट दिनमान व पुण से छाया मापने दो पात्र छाया होइन समय दिन का चौथा भाग जावे पेपर्यंत दा पनि होती है. इस से जो पदार्थ जितना लम्बा होना है उतनी उस की छाया होता है. यह नया जाना अब पुरुष दिन का चौथा भाग व्यतीत हो. यह मेडल भाजीमंड पर इस वर फरसी नहीं आती है. ऐसे ही
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सूत्र
अनुवादक-धालब्रह्मचरी मुनि श्री अमालक ऋषिजी -
गरणं जाव ता अगुट्ठि पोरिसीणंछ'या दिवपरस किं गएवा. सेसेवा ता एकूण वीससतं . . भोगवा, सेसंत्रा सातिरेग अगुणमट्टि परिसीणं च्छाया दिवसस्स · किं गतेवा
सेलेचा, ताणं किंगत किंचिविगतका ससेवा॥ ५ ॥ तत्थ खलु इमा १०वासंतिावेहा... . छ.या पणत्ता तंजहा-खंभच्छाया ॥ १ ॥ रज्जुच्छाया ॥ २ ॥ पासायच्छाया : पर्य पुरुष छाया की पच्छा .? दिनामान थोडा जावे और शप वहत रहे अर्थन २६ घडी के दिन में १२ घर का दिन आवे और २४ घडी दिन शेष रहे धगैरह सर पनरहर पाइंड में कहा वैसे कहना. जन गुगट पुप छाया होने तब कितना दिन जावे व कितना दिन शेष रहे ? उत्तर-दिन का ११९ था माग जावे अर्थात पहिले मंडल ३६ घडी का दिन होता है ३६ घडी को ११९ का भाग देने से १८ पल भोर एक पल के ११९ भाग को मे १८ भ ग अवे. इतना माग दिन जा और ३५ घबी ४० पल भार एक पल क १११ भाा में १०१ 111 को है नत्र ग हा छ या का प्रपण अच, प्रश्न-जब स क गुण ठ पुरुष छपा हापन दिन का किन भाग भनेर किनन। शप ? उत्तरसूर्य की विज्ञान व किंचित दिन जावे और शेष दिनत्र साधक गुणमठ पुरुष छाया का
प्रगण होत्र ॥५॥छा के पच्चास मंद कहे हैं. नद्यथा- संग की छाय', २ रस्सी का छाया, साकार को छाया, ४ प्रासाद की छाय, ५ शिखरबन्ध महेल की छाया ६ अनुलाम छाया, ७ प्रति
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमायनी ज्वालापुसदाजी.
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नववा
मस चंद्र प्रज्ञप्ति सत्र-पष्ट उपाहू
॥३॥ पागारछाया ॥ ४ ॥ उच छाया ॥ ५॥ अणलोमछाया ॥६॥ पडिलोमच्छ या ॥ ७ ॥ आराहिता ॥ ८ ॥ उहिया ॥ ९ ॥ समाएपडिहता ॥१०॥खील च्छाथा ॥ ११॥ पंथच्छाया ।। १२॥ परआदगा पिठओदगा ॥ १४॥ पुरम कदमागोगया ॥ १४ ॥ पछिम कंट्रभागाबगया ॥१५॥ छायाण दिगो ॥५॥ कद्राणु यादि ॥ १७ ॥ छायादिकप दहायं मगडच्छाया, ॥तत्थ खलु इमा अविहा गोलच्छाया, पण्णत्ता, तंजहा
गोलछ.या अवडगोल छ।या, गोल २ छाया, अबदुगेलरछाया, गोलावतिछाया, ओम छ'या, ८ लकडी गारे रस की कापा, ९ उढाइ हुइ की छाया, .. हाथ में पकडकर रखे उस की, छाया, ११ ले हा प्रथा लकर के खेल की छाया, १२ रने दलने हाथ मे चलाकर चले वह छाया
१३ पहिला हाथ ना करे पीछे नीचा करे उस की छाया १४ बाट के भाग में गत जैसे निशानीकर "तार में रयते छाया हाव मोपीछे नी देखकर चले सः छाया ६ छाया का अनुवाद प्रमाण
करे मा छाया कष्ट-को प्रयाण कर र वह छाया?८छ यादिक कम्प घडीस एक दीर्घपनासे खडा रहे. गडिया इस में आठ प्रकार की गोल छाया कही सपचा गोल छाया १९ अर्व गोल छाया २० गोलगोल
या पुटी सरवर्ष गोल गोलाया काचकेगोले जैसे २२ मध्य समयमें सूर्य रेखा नावे वैसे गोलवती 17
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1
मगोलावतिछाया गोलपुजछाया, अवटुगोल जच्चाया ॥ इति पदपणसीए
नवम पाहुई सम्मत् ॥१॥ . . . . . छाया २३ पूर्णमा का चंद्र मध्य रात्रि में देखावे वह अर्ध गोलावता माया, २४ खबुचे की छाया सो गोलापुजवाया और २८ अर्थ गोलपुंजाया ॥ यह चंद्र माविका नया पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ ९ ॥
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बाशक-राजावहादुर लाम सुखदेवसहायजी ज्वालापसादनी.
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+ मसदश चंद्र प्रतिसूक-पट उपस 421
॥ दशम प्राभृतम् ॥ ता जोगेति वत्थस्म आवलिय निवाए आहितति वदंबा ? ता कहते जोगवत्युस्स मावलियानिए हितति यदेजा ? तत्य खल इमातो पंच पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ, तत्य एग एमाहस जोगं जोततिता मन्त्रविणं नवखत्ता कतियादिया भरणिपजवसिया अहितति वेदजा, एग एवमासु ॥॥ एग पुण एवमाहमु-ता सम्बविण णवत्ता महादिया आसलंस पजवसिया आहितति वदेजा, एग एवमाहसु ॥ २ ॥ एगेषण एवमाइंसु ता सम्वविणं नक्खता पणिट्ठा दिया सवण पजयसिया आहितति वदेजा, एगे एवमा. इंसु ॥ ३ ॥ एगेपुण एवं माहंसु-ता सम्वेविणं णवत्ता असिणिआदिसा रेवति पज्जवसिया आहितेति वदेजा एगे एवमाहंमु ॥ ॥ एगपुण-ता सम्बविणं जासत्ता बादशवा पाइरा करते हैं. अहो भगवन् ! आपकमत में चंद्रपा मूर्य की माथ मसानों मनुक्रम से कैम जग जोडते! अहो भगवन्! नक्षत्र चंद्रपा व सूर्य की साथ कैपे चलन हैं अहाशिय!इस में अन्यनीयाकी प्ररूपणा रूप पांच परिवृत्तियों कही है. जिन में से एक ऐमा कहते कि क का में भरणी पर सब नक्ष चंद्रपा सूर्य की माय जाग करते हैं, २ दूसरे किनोक एग करत. क मादि सपश्लवा पर्यंत सबमात्र चंद्रमा सूर्य की साथ योग करते हैं, कितनक ऐसा कहत हैं कि धनिशदि श्रवण पता चनमचंद्रमा पूर्व की साचोब करते हैं, किसनेक ऐसा कहते कि परिधनी रेती व सत्र न
+या पादुका पहिला र
+
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सूत्र
अर्थ
कभी अनुवादक- बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषि
भरणिदिया असिणिपज्जवसिया आहितेति वदेखा, एगे एवमाहं ॥ ५ ॥ श्रयं पुण एवं वयामोता मनेविणं णक्वत्ता अभियादिया उत्तरामाढापज्जबसिया आहितति वदेजा, तजहा अभिच, सवणं, धणिट्ठा, समसया, पुव्यनद्दत्रया, उत्तरभद्दत्रया, रेवति, अमणि, भरगि कतिया राहिणी, मिगसिर, अंदा, पुनवसु, पुरुसो, असलस्मा, महा, पुत्राफगुणी, उत्तराफगुणी, हत्था, चित्ता, सात, विस हा, अणुराहा, अट्ठा, मुलो, पुण्यासाठा उत्तरासाढा || दसमस्त पढमं पाहुडं सम्मत् ॥ १० || 9 ||
चंद्रमा सूर्य के साथ जांग करते है ५ किसने ऐसा करते है भरणि आदि से बनी पर्यंत मत्र नक्षत्र चंद्रमा सूर्य की साथ योग करते हैं, और में इस कथनको ऐसे कहता हूं कि अभिनादि से उत्तरपदापर्यंत सब नक्षत्र चंद्रमा सूर्य की साथ भोग करते हैं. जिन के नाम-१ अभिच २ श्राण ३ ष्टशतभिषा पूर्वाभाद्रपद उत्तरा भाद्रपद ७ रेवती ८ अश्वनी ९ भरणी १० कृतिका ११ रोहिणी १२ मृगनर १३ आर्द्रा १४. १५ पुष्य १६ अश्ला १७ मधा १८ पूर्व लगुन १९ उत्तरा फाल्गुन २० । २१ चित्र २२ स्वाति २३ विशाखः २४ २६ मूत्र २७ पूपदा और २८ उत्तगदा. उक्त अठावीस नक्षत्र बैस ही युग को आदि से पुष्य नक्षत्र से पुष्यत्र पर्यंत योग करे.
२५ चंद्र सूर्य की माथ याग करत हैं.
यह दशमा पाहुडा का प्रथम अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ १० ॥ १ ॥ ..
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● प्रकाशक- राजाबहादूर लाला सुखद सहायजी ज्वालाप्रसादजी
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LAता कईते मुतगे:अहिलेति बरेजा.?.ता ९एसिगं अविसए नक्वत्तागं, भत्थि
“नकवत्ता, जेणेव पक्खत्ता बमहुत्ते सत्तावीसंच मत्सट्रिभागे मुहुत्तस्म चंदेणं सहिं जंग जायंति.अस्थि णक्वत्ता जेण पण्णरस महत्ता चंदण माहि जागं जायंति अस्थि णक्खत्ता जेणं नम्वत्ता तिसं महत्ते चंदेणं सहिं जागं जातति अस्थिणं णखत्ता जेणं नक्षत्ता पणयालिसं मुहुत्ते चंदेणं सद्धिं जोगं जयंति ॥ १॥ एएसिणं अट्ठाविसाए नक्षत्ताणं कयर खत्ते जणं नक्वत नवमहत्त सत्ताविसंच सत्तसाद चंदेणं सदि जाग जाएति, सेणं एगे अभिए । नत्थणं केते गक्खना जेणं नक्खता .
Gurmainnoimmmmmmmmmmmmm
+8+ मारामाती लगा-माज
अब दूसरा अंतर पारा करते है. महो भगवन् ! भाप के मत में चंद्र की साय नक्षत्र की मुहूर्त से कही है। बहो विष्य ! उक्त अठाइस नक्षत्रों में किसनेक नसब ऐसे नो चंद्रमा की साय नव मुहून और एक मुहूर्त के सहमर भाग में के सत्तावीम भागमे बोग करते हैं और कितनेक नक्षत्र ऐसे हैं कि
चंद्रमा की माय पसरह मुहूर्न योग करते दें. कितनेक ऐस भी नक्षत्र हैं कि जो चंद्रमा की साय तीन मुहून जाग करते हैं और कितनेक नक्षत्र से भी हैं कि जो चंद्रमा की साथ पंतालीस मुहूर्त नाग करते हैं ॥ ॥ अब इन का खुलासा करते . अहा भगवन् ! इन अठावीस नक्षत्र में से ऐसे कौन से नफा कि जो चंद्रमा की साव नर मुहर्न र सरसठिये सत्तावीस भानसे योग करते हैं? उत्तर :
दशा पाहुडेका दूसरा तर पाहुडा 420
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कायदक-Team मुनि श्री बालक ऋमिाम
मरस बहते देर्ण साई ओगंजोएति, तेणं इनक्वत्ता तंजहा-सतमिसया, भराण, दा, मसलस्सा, साति. जेट्टा, ॥ तस्थणं केते नक्खत्ता, जेणं नक्खत्ता तिसं मुहुत परेणं साहे जोग जाति तेग पर तजहा मवण, धनिट्ठा, पुषभदवया, रेवति, अग्मिणी, कतिमा ..". एरो. रहा, पुजाफरगुणि, हरया, चित्ता, अणुराहा, मुलो, पुवास.डा, ॥ तथ त पक्खता जल गक्खत्ता पणयालीस मुहुत्ते चंदेणं साई जोगं जोएति तणं छ तजहा उत्तर भवया, रोहिणी, पुणबनु,
उन्नराफग्गुणी, विसाहा.उत्तरांस ढः ॥२॥ ता एतासिणं अट्ठावीसाए गक्खताणं अस्थि . परो शिव! एक अभिव मात्र नव महून ३ एक मुहूर्व के सहसठिये सत्तावीस माग से भोग करता है. चों की पिच नक्षत्र एक बहे रात्रि मानठिये इक्कीस भाग स चंद्रमा की मात्र योग करता है इस से २१मानको... गुना (एक अहोरात्र के सीय मुहू होने से) करने से ६३. माग होषे पीछे
..ा भाग देन मे नत्र म मराठये २७ भाग होव. अहो भगवन् ! एमे कौन से मक्षत्र कामासाद अगर पर याग करत? शिष्य ! एने छनक्षत्र.जिनके माम-1 शतभिषा वरची बाई अश्लषा ५ स्वाति और ६ जष्टा. क्योंकि एक अहो रात्रि में सडसाठये ३॥ बाबा की सार बीब फरसे , इस से २५ ॥ 1.3D10.५ इस राशिं को
- राजावहादरमहा सुखरामामपालमसारका
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1 ।
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है
क्खेते जेणं णक्खत्ते चत्तारि अहोरत्ते छच्चमुहुत्ते सरिएणंसद्धि जोगं जोएति अस्थि नक्खत्ते जेणं छ अहोरते एकवीसचमुहत्ते सुरिएणं
+ दशवा पाहुदे
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सप्तदश चंद्र प्राप्ति सूब
१६. का भागदेवे तब मुहूर्त होवे. अहो भगवन्! एने कितने नक्षत्र हैं कि जो चंद्रमा की साथ तीस मुहूर्त
योग करते हैं? अहो शिष्य ! ऐसे पभरह नक्षत्र हैं जिन के नाम १-श्रवण, २ धनिष्टा, ३ पूर्व भाद्रपद, रेवती, ५ अश्विनी, ६ कृत्तिका, ७ मगशर, ८ पूष्प, ९ मघा, १० पूर्वाफाल्गुनी, ११ हस्त, १२चिवा, ३ , अनुराधा१४मूल और१५ पूर्वाषाढा.ये तीम मुहूर्न से योग करते हैं क्यों की एक अहोगत्रि के६७ये ६७ भाग से योग में करते हैं. उन को मुहूर्त के भाग करते ३० गुना करे तब २०१० होवे, इस राशि को ६७ का भागदेवे व तीम मुहून होवे. अहो भगवन् ! ऐसे कितने नक्षत्र हैं कि मो चंद्र की साथ तालीस मुहर्न में योग करते हैं ? अहो शिष्य ऐसेछ नक्षत्र हैं कि जो च की साथ तालीस मुहूर्त से योग करते हैं जिन के नाम-
14 उत्तगभाद्रपद, • राहिणी, ३ पुर्वसु, ४ उत्तराफाल्गुनी, ५ विशाखा और ६ उत्तराष ढा, क्योंकि एक अहारात्रि के ६७ सद्धमठिये १००॥ भाग से चंद्रमा की माथ उक्त छ नक्षत्रों योग करते हैं. इस से इम को ३० गुना करने मे ३० १५ हुवे फीर इसे६७ का भागदेने से ४५मुहूर्न आवे.॥२॥अब मूर्य की साथ नक्षत्रों के योग का कथन करते हैं. इन अठावीस नक्षत्रों में से ऐसे नक्षत्रों है कि जो चार अहोरात्र व छ मुहूर्त में सूर्य की म.थ योग करते हैं, कितनेक ऐसे नक्षत्र है कि जो छ अहो राये २१ मुहुर्न में सूर्य'
Rani
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अर्थ
42 अनुवादक - बालह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
सद्धि जोगं जोएति, अस्थि नक्खत्ते जेणं नक्खत्ता तेरस अहोरते दुबालस मुहु सूरिएणं सार्द्ध जोगं जोएति, अस्थि णक्खत्ते जेणं णक्खत्ता बीसं अहोरत्ते तिन्निय
की साथ योग करते हैं, कितनेक ऐसे नक्षत्र हैं. कि जो तेरह अरात्रि और बारह मुहूर्त में सूर्य की (साथ योग करते हैं, किनेक ऐसे नक्षत्र हैं कि जो बीम अहोरात्र तीन मुहुर्त में सूर्य की साथ योग करते हैं. इन अठावीस नक्षत्र में से कौन से नक्षत्र ऐसे हैं कि जो सूर्य की साथ चार दिन व छ मुहूर्त मे योग करते हैं कौन २ नक्षत्र छ अहोरात्रे इक्कीस मुहूर्त योग करते हैं, कौन २ नक्षत्र तेरह अहोरात्र बारह मुहुर्त योग करते हैं. और कौन २ नक्षत्र हैं कि जो बीस अहोरात्र तीन मुहूर्त योग करते हैं ? उत्तर-इन अठावीस नक्षत्र में से जो नक्षत्र चार अहोरात्रि छ मुहूर्त सूर्य की साथ योग करते हैं वह एक अभिच नक्षत्र है. ऐसे जैसे पहिले चंद्र के साथ नक्षत्रों का योग कहा वैसे ही यहां करना यावत् शब्द से जो छ नक्षत्र चंद्र की साथ पन्नाह मुहूर्त योग करते हैं वे यहां सूर्य की साथ छ (अहोरात्र इक्कीस मुहूर्त योग करते हैं, जो पनरह नक्षत्र चंद्र साथ तीम मुहूर्त योग करते हैं ब (यहां सूर्य की साथ तेरह रात्रि बारह मुहूर्त में योग करते हैं, वगैरह इन अठावीस नक्षत्रो मे से जो बीस अहोरात्र व तीन मुहूर्त सूर्य की साथ योग करते है वे छ नक्षत्र हैं जिनके नाम १ उत्तरा भाद्रपद २ रोहिणी ३ पुनर्वसु ४ उत्तरा फाल्गुनी ५ विशाखा और उत्तरापाठा, जो नक्षत्र चंद्र
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• प्रकाशक - राजा बहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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सत्र
अर्थ
48- सप्तदश चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग 448
मुहते सूरिएणं सद्धिं जोगं जोएति ॥ता एतेसिणं अट्ठाविसाए णक्खत्ताणं कयरे जक्खते जेणं नक्खत्ता चत्तारि अहोरचे छच्चमुहुत्ते सृरिएणं साईं जोगं जोएति ॥ करे णंक्खत्ते जेणं छ अहोरते दुबालस मुहुते सरिएणं सद्धिं जोगं जोएति ॥ करे
की साथ ९ मुहूर्त व सडसटिये २७ भाग योग करे वह नक्षत्र सूर्य की साथ चार अहोरात्रे छ मुहूर्त योग करे, चंद्र की साथ जो छ नक्षत्र १५ मुहूर्त योग करे वही छ नक्षत्र सूर्य की साथ छ अहोरात्र २१ { मुहूर्त योग करे, चंद्र की साथ जो पनरह नक्षत्र तीस मुहूर्त योग करे वे ही सूर्य की साथ १३ अहोरात्र १२ मुहूर्त योग करे, चंद्र की साथ जो छ नक्षत्र ४५ मुहूर्त योग करे। वे ही सूर्य की साथ बीस अहोरात्र तीन मुहूर्त योग करे. ऐसा योग होने की विधि बताते हैं. एक युग में चंद्रमा साथ नक्षत्र ६७ वार योग करते हैं, और सूर्य साथ पांच बार योग करते हैं. जो नक्षत्र चंद्रकी साथ ९ मुहूर्त ६० ये
५
२७ भाग योग करता है उस को ६७ से गुना करना क्योंकि एक युग में ६७ वार चंद्रकी साथ योग करता है. इस से ×६७६३० मुहूर्त होबे इस को एक अहोरात्र के ३० मुहूर्त होने से ३० का भाग देना, जिससे २१ होवे. यह २१ दिन चंद्रकी साथ योग करे. योग करे, इससे इन को पांच का भांगदेने से चार अहोरात्र और
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यही नक्षत्र पांच बार सूर्य की साथ मुहूर्त में सूर्य की साथ योग करे.
4* दशा पाहुडे का दूसरा अंतर पाहुडा 48
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श्री अमोलक ऋषिजी
णक्खत्ते जेणं नक्खना तेरस अहोरत्ते दुवालस मुहुत्ते सूरिएणं साई जोएति. कयरे णक्खत्ते जे गक्खत्ता वीसं अहारत्ते तिन्निय मुहुरो सूरिएणंसद्धिं जोगं जोएति? ताएयासिणं अट्ठावीसाए नक्ख ताणं जे से णक्खत्ते चत्तारि अहोरत्ते उच्च मुहुत्ते सूरिएणं सद्धिं जोगं जोएति सेणं एगे अभिए एवं वयासी उच्चारेया जाव तत्थणं जेते णक्खत्ता वीस अहोरत्ते तिष्णिय मुहत्ते मृरिएणसद्धि जोगं जोएति
जितने नक्षत्र चंद्र की साथ १५ महून योग करते हैं वे एक युग में १००५ मुहूर्त में योग करते
क्यों कि १५ को ६७ का भागदेने से १००५ होवे, इस को ३० का भागदेन से ३३॥ अहोरात्रि होवे. है और इस को पांच का भागदने से ६ अहोरात्रि व २१ मुडून होवे. जो ३० मुहूर्त में योग करते हैं. इनको ६७ से गुनाकार करने से २०० होचे, उम फोर ३० का भागदेने से ६७ होवे उसे पांच का भाग देने से १३ अहोरात्रि और १२ मुहर्न हुए. जो नक्षत्र चंद्र की साथ ४५ मुहूर्त योग करते हैं उम ४५ को ६७ से गुनने से ३०१५ मुहूर्त होबे, उमे ३० का भाग देने से १००॥ अहोरात्र होवे, उसे पांच का भाग देने से २० अहोरात्रि व तीन
न होवे. इछ का यहां यंत्र देते हैं.
प्रकाशंक-राजाबदुर लाल सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रमाद ने
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चंद्र प्रज्ञाप्त सूत्र-पष्ट पाङ्ग
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ST- तेणं छमक्खता तंजहा उनरभवया जावउत्तरासादः॥ दप्तमस्स बिद्वितियं पाहडं॥३॥ नक्षत्र, चंद्र साथ. मर्य माथ.
नक्षत्र. चंद्र साथ. मूर्य साथ. मुहूर्त. भग. अहारात्रि. मुहू.
महून. भाग. अहो रात्रि. मुहूर्त. १...भिच २ श्रवण ३ धनिष्टा
१२ मघा ४ शतभिषा
१.८ पूर्वा फल्गुनी ५ पूर्वाभाद्रपद
१२ २९ उत्तम फल्गुती ६उत्तंग भाद्रपद ४६ रेवती
१२२. चित्रा ८ अश्वनी
१२२२ समाति १. भरणा
२१ २३ विश.खा ११० कृत्तिका
१. २४ अनुराधा १११ रोहिणी ११२ मगर १३ आदी
__ २१ २७ पूष ढ। १४ पुनर्वसु
२० ३२८ उत्तराषाढा ४५० यह देनमा पाहुडा का दूसरा अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ १० ॥ २ ॥
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. 10000)
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84 दसवा पाहुड का दूमग अंतर पाहुडा मक
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42 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
ता कहतं एवंभागा आहितेति वदेजा, ? ता एतासिणं अट्ठावीसाए गक्खत्ताण अस्थि णक्खत्ता, पुवंभागा समक्खेत्ता तिसंतिमुहु ता पण्णता, अत्थिणं नक्खत्ता जेणं नक्खत्ते पच्छाभागा समाक्खेत्ता तीसई महत्ता पणत्ता अत्थिणक्खत्ता जगं नक्खत्ते णत्तं भागा अवड्रक्वेत्ता पण्णरस महत्ता पण्णत्ता, अत्थिण क्खत्ता उभयभागा दिवडक्खेत्ता पणयालसिं महत्ता पण्णत्ता ॥१॥ ता एएसिणं अट्ठावीसाए णखत्ताणं कयरे णक्खत्ता जेणं णवत्ता पुवभागा समक्खत्ता तिसति मुहुत्ता पण्णत्ता, कयरे पक्खत्ता जेणं णक्खत्ता पच्छाभागा समक्खेत्ते तिसति महत्ता पण्णत्ता ॥
अव दशवेका तीसरा अंतर पाहुडा कहते हैं. अहो भगवन् ! किस तरह इन नक्षत्रों के भाग कहे हैं. अहो. शिष्यः इन अठावीस नक्षत्रों में से एमे भी नक्षत्रों हैं कि जो नक्षत्र पूर्वभाग समक्षेत्र पाले तीस मुहूर्त कहे हैं. कितनेक ऐसे नक्षत्र हैं कि जो पश्चातभाग ममक्षेत्र वाले तीस मुहूर्त के कहे हैं, कितनेक नक्षत्र ऐसे है कि अर्धभाग चाले पन्नरह मुहूर्त के कहे हैं, और कितनेक नक्षत्र ऐसे है कि जो उभय भाग के देढ दिन के क्षेत्रगले ४५ मुहूर्न के कहे हैं ॥१॥ अहो भगान् ? इन अठावीस नक्षत्रों में से कौन नक्षत्रों ऐसे हैं कि जो पूर्व भाग सम क्षेत्र तीस मुहूर्न का कहा है, कोनसे नक्षत्रों पश्चात भाग समक्षेत्र
.प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायती ज्वालाप्रसादजी.
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488+ सप्तदश-चंद्रप्रज्ञप्ति मूत्र पष्ठ-उपाङ्ग 43
कयर णक्खत्ते जेणं पक्खत्ते गंत्तं भागा अबक्खेत्ता पण्णरसमहत्ता पण्णत्ता कयरे णक्खत्ते जेणं णखत्ता उभयंभागा दिवद्रक्खेत्ते पणयालिप मुहत्ता पण्णत्ता, ता एपसिणं अट्ठावीसाए णखत्ताणं, तत्थणं जेते णक्खत्तेणं
क्खत्ता पुश्वभागा समक्ख ते तिसति महत्ता पण्णत्ता तेणं छ तंजहा-पव्यभवया कत्तिया महा, पव्वाफग्गणि, मलो, पव्यासाढा ॥ तत्थणं जते नक्खत्त पच्छा भाग समखेत्ते तिसइ मुहता पण्णत्ता, तेणं दस तंजहा अभिते, सवणे, घणिट्ठा, रेवति,
अस्सिाण. मगसिर, पुस्सो, हत्था, चित्ता, अणुराहा पच्छा भाग दस हवति ॥ तीस मुहूर्त के है, कोनसे नक्षत्रो अर्धक्षेत्र पनाह मुहूर्त के हैं और कौन से नक्षत्र दोनों विभाग देढ क्षेत्र पंतालीस मुहूर्न वाले हैं? उत्तर-अहा शिष्य ! इन अठावीस नक्षत्रों में से जो नक्षत्र पूर्वभाग पमक्षेत्र में तीस मुहूर्त पर्यंत चंद्रमा साथ योग करे ( अर्थात् क्षेत्र मंडल के चार विभाग करना. पूर्व म पश्चिम तक में और उत्तर से दक्षिण उद इस में जो पूर्य दक्षिण की मध्य में योग करे वह पूर्व भाग योग जानना, एसे छ नक्षत्र कहे हैं जिन के नाम १ पूर्वाभाद्र पद, २ कृत्तिका, ३ मघा, ४ पूर्व फलानी, ५ मूल और ६ पूर्वाषाढा. यह छ नक्षत्र पूर्व भागमें चंद्र साथ योग करते हैं. जो नक्षत्र पश्चिम तरफ समक्षेत्र तास मुहूर्त कहैं वे दश नक्षत्र हैं ( नब नक्षत्र समक्षत्रीय है और एक अभिच नक्षत्र समक्षेत्र के । ६७० 'भाग वरे वैसे २..भाग क्षेत्रवाला हैं तथापि समक्षेत्र में ही इस की गिणना की है ।
दशा पाडे का तीसरा अंतर पाहुडा 4g
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मुनि श्री अलक ऋषिराज +
तत्थणं जेते णक्खत्ता णसंमागा, अबड्ड खेत्ता पण्णरस मुहुत्ता तेणं छ तंजहीसतभिसा भरणि, अद्दी, असलेला, साति, जेट्ठा, ॥ तत्थणं जेते णक्खत्ता, तेणं नक्खस्ता उभयभागा, विट्ठ खेत्ता, पणयालीसति मुहुत्ता. पण्णत्ता तेणं छ तंजहा-उत्तरभद्दवया, रोहिणि, पुणवतु, उत्तराफरणी, बिसाहा, उत्तरासाहा ॥ दसमस्स पाहुडस्स ततियं पाहुड ॥१०॥ ३ ॥ +
ता कहते जुगस्स आदि आहितेति बदजा ? ता भिया, सवणा, खलु दुव्वे णक्ख इन दश नक्षत्र के नाम, १ अभिच २ अरे । ३ धनिष्ठा ४ रेवति ५ अश्विनी । भूगसर ७ पूष्य ८ हस्त ९१ चित्रा और १० अनुराधा. 'उक्तदश नक्षत्र पश्चिम तरफ अर्थात् दक्षिण से पश्चिा सरफ जाते योम करते हैं. वहां जो नक्षत्र पश्चिम के अंत जात रात्रि में अर्थ क्षेत्र पनाह माह में याग करे वे छ नक्षत्र है। जिन के नाम-१ शतभिषा २ भरणि ३ अद्रा ४ अश्लपा ५ मांति और ६ ज्यष्टा. और जो नक्षत्र पूर्वपश्चिप दोनों भाग में देह क्षेत्र के ४५ मुहूर्त योग करे वे नक्षत्रों छ हैं जिन के नाम, १ उत्तराभाद्रपद २ रोहिणी ३ पुनर्वसु ४ उत्तराफाल्गुनी ५ विशाखा और ६ उत्तराषाढा. उक्त छ नक्षत्रों पूर्वपश्चिम भाग में योग करते हैं. यह दशवा पाहुडा का तीसरा अंतर पाहडा संपूर्ण हवा ॥ १० ॥ ३ ॥ . ___ अब चौथा अंतर पाहुडा कहते हैं. अहो भगवन् : युग की आदि कैसे कही? अर्थात् बैठते युगमें चंद्रमा
. प्रकाशक-राजाबहादरला मुखदेवसहस्यजी ज्वालाप्रसादजी.
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__ ता पच्छाभागा समक्खेत्ता सातिरेगा उणयालिमति मुहत्ता, तं पढमयाए सायं
चंदेण साई जोगं जोएति, ततोपच्छा अबरसातिरेगं दिवसं एवं खलु अभिते सवणे दुवे गक्खत्ता एगं रायं एगंचसातिरेगं दिवस चंदेणंसहि. जोगं जोएति जोग जोतित्ता जोगं अणुपरियटति, जोगं अणुपरियहित्ता सायं चंदे धणिट्ठाणं समाप्पिति ता धणिट्ठा खलु णक्वत्ते पच्छाभागे समक्खत्ते तिसति मुहुत्ते तं
Aawww
सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ती सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 4
साथ नक्षत्र का योग कैसे होवे सो कही ये ? अहो गौतम ! अभिजित व श्रवण ये दोनों नक्षत्र पश्चात् । भाग समक्षत्र साधिक ३९ मुहूर्त में पहिले दिन संध्या को चंद्रमा की साथ योग करे. अर्थात् युग की
आदि प्रभात से होती है, और वहां से प्रथम अभिजित नक्षत्र के योग का प्रारंभ होता है. अभिजित नक्षत्र का योग ९ मुहूर्त २४ भाग ६१ ये और ३९ भाग ६७ ये चंद्र की साथ होता है. यह नक्षत्र सडमठीये २१ भाग श्रवण नक्षत्र की साथ समक्षेत्री है. अभिजित नक्षत्र पीछे श्रवण नक्षत्र का योग होता है वह तीस मुहूर्त पर्यत रहता हैं. उक्त दोनों नक्षत्रों का योग दक्षिण से पश्चिम तक के क्षेत्र में 4 चंद्र साथ हावे. यद्यपि अभिजित् नक्षत्र प्रातःकाल से ही लगता है परंतु ६७ ये २१ भाग का श्रवण नक्षत्र की साथ पमक्षेत्री होने से पश्चात भाग क्षेत्री में लिया है. उक्त दोनों नक्षत्र एक रात्रि
दशवा पाहुड का चौथा अंतर पाहुडा 48
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पढमयाए सायं चंदेणसद्धि जोगंजोएतिता जोगंअणुपरियति जोगं अणुपरियहित्ता सायं चंदे सतभिस ताणं समापितिता सतभिसता खलु णक्खत्ते गंत्तं भागे अवड्डखत्ते पण्णरस मुहुत्ते तं पढमयाए मायं चंदणंसहिं जंग जोतेति नोलभइ अवरं दिवसं ॥ एवं खलु सयाभसया णक्खत्ते एगरातिं चंदणसद्धिं जोगं जोतेति जोगजोतेत्ता जोगं अणुपरियट्टित्ता, पातोचंदे पुवाणं पाढवयाणं
4. अनुवादक-पालबह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
साधिक एक दिन पर्यंत चंद्रमा साथ रहते हैं अर्थात् युगके दूसरे दिन में दूसरा श्रवण नक्षत्र की १९४७ भाग में समाप्ति होवे वहां से चंद्रमा उस नक्षत्र से पीछा नीवर्ते फीर युग के दूसरे दिन में १९ मुहूर्न २४ भाग ६१ ये ३९ भाग ६७ ये गये पीछे पश्चातभाग संध्याकाल में धनिष्टा नक्षत्र का योग होवे दूसरे दिन के उक्त साधिक ९ मुहूर्त व्यतीत होते और शेप ८ महूर्त ३२ माग ६१ ये२८१ भाग ५७ ये शेष रहे उस के प्रथप समय में संध्याकाल से धनिष्ठा नक्षत्र तीस मुहूर्न योग कर. योगी कर के युग के तीसरे दिन में ९ मुहर्न २४ भाग ६१ ये ३० भाग ३७ ये तक में योग की समाप्ति करे। और दिन का ८ मुहूर्न ३: भाग ६१ में २८ भाम ६७ शेप रहे. इस के प्रथम सपय में संध्याकाल से शतभिषा नक्षत्र प्राप्त होवे, यह नक्षत्र नक्त भागी [ रात्रि भाग ) पन्नाह मुहूर्त का होवे, इस से दूसरा दिन
प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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सूत्र
अर्थ
488+ सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति-सूत्र षष्ठ उपाङ्ग 438+
समति, तापटुवया खलु णक्खत्ते पुण्यभागे समखेते तिसति मुहुत्ते पातोचंदेणसद्धिं जोगं जाएति, ततपच्छा अवरराय ॥ एवं खलु पुव्वा पोट्ठवया पणक्लत्ते एंगच दिवस एवं च राति चंदेणं सद्धिं जोगजोत्तेति २ ता, जागं अणुपरि यहुति २ त पातो चंदे उत्तरापोटुबयाणं समप्पिति ता उत्तरापोटुवया, खलुणक्खत्ते उभयभागे दिवस खेत्तं पणपालीसति मुहुत्ते, तं पढमयाए पातो चंदणंसद्धि
प्राप्त करे नहीं परंतु रात्रि में ही चंद्र की साथ योग करे अर्थात् युग के तीसरी दिन की रात्रि में ६ मुहूर्त ३० भाग ६१ ये २१ भाग तक में शतभिषा नक्षत्र के
शेष भाग ५ मुहुर्त ३६ ६५ ये और ३९ भाग ३७ रहे, वहांने प्रथम समय में पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र पूर्व की रेखा से दक्षिण की रेखा, पर्यंत तीस मुहूर्त तक योग करे, इससे वह नक्षत्र तीसरा दिन की शेष रात्रि पूर्ण करे ( चौथा दिन पूर्ण करे और चौथा दिन की रात्रि के ६ मुहूर्त ३२ भाग
६१ ये ३९ भाग ६७ ये पूर्ण करे. और शेप ५ मुह ३३ भाग ६१ ये २८ भाग ६७ ये रहे इस क में उत्तराभाद्रपद नक्षत्र प्राप्त होवे यह उत्तराभाद्रपद नक्षत्र उभयभागी १४५ मुहूर्त का है. यह प्रभात से अर्थात् जो शेष रात्रि रहीं है वहां से चंद्र की साथ योग करते हुवे
प्रथम
समय
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488+ दशा पाहुडे का चौथा अंतर पाहुडा
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सूत्र
अर्थ
अनुावदक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अलक ऋषिजी
खलु उत्तरा
ओग जोएति, अबरं च रायं ततो पच्छा अवरं दिवसं, एवं पोयानक्खते दोय दिवसं एगंच राई चंदेणसद्धिं जोगं जोएति २ ता जोगं अणुपरियदृतिरता, सायं चंदे रेवतिणं समर्पिति ता रेवति खलु णक्खत्ते पच्छा भागे समक्खे ते तिसति मुहुत्ते तं पढमयाए सायं चंदेण साईं जोगंजाएति ततो
वह रात्रि युगका पत्रा दिन व रात्र पुर्ण करे और युग के छठे दिन में ९ मुहूर्त २४ भाग ६१ ये ३९ भाग ६७ व्यतीत होवे वहां तक रहें. इस तरह उत्तराभाद्रपद नक्षत्र दो दिन माठेरा व एक रात्रि से कुछ अधिक इतना काल तक चंद्र की साथ रहे, इतना रह कर सायंकाल में रेवति नक्षत्र की प्राप्ति होवे यह नक्षत्र पश्चात भागी बीम मुहूर्त का है. युग के छठे दिन में ९ मुहूर्त २४ भाग ६१ ये ३२. भाग ६७ ये नये पीछे प्रथम समय में सायंकाल में चंद्र की साथ योग होवे. यह रेवती नक्षत्र एक रात्रि एक दिन रह कर युग के सात के दिन के ९ मुहूर्त २४ भाग ६१ ये ३९ भाग ६७ ये योग करे. योग की प्राप्ति से निवर्त कर सायंकाल को अश्विनि नक्षत्र की प्राप्ति होवे. यह अश्विनी नक्षत्र पश्वात भागी तीस मुहूर्त का होने से इस का योग सायंकाल से होता है. युग के सातवे दिन ९ मुहूर्त २४ भाग ६१ य ३९ भाग ६० में गये पीछे प्रथम समय मे सायं काल को चंद्र की साथ योग करे. तत्पश्चात एक रात्रि एक दिन तक अश्विनी नक्षत्र योग कर के युग के आठवे दिन ९ मुहूर्त २४ भाग ६१ ये ३९ भाग ६७
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प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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सूत्र
अर्थ
4884 सप्तदश- चंद्रप्रति सूत्रपात 44+
पच्छा अवरदिवस एवं खलु रेवति णक्खत्ते, एगं राई एगंच दिवमं चंदेणसि जोगं जोएति २ चा जोगं अणुपरियद्वंति २ ता सायं चंदे अस्सणिणं समप्पति ता अस्सणि खलु णक्खत्ते पच्छाभागे समखेत्ते तिसति मुहुचे पढमयाए सायं चंदेण सद्धि जोगं जोएति २त्ता, ततो पच्छा अवरं दिवस, एवं खलु अस्सणि नक्खत्ते, एग च रायं एगंचदिवसं चंदेणसद्धि जोगं जोतेति २ सा जोगं अणुपरियहति २ त्ता सायं चंदे भरणीणं समप्पिति ता भरणि खलुणक्खत्तेणत्तं भागे अवखेत्ते पण्णरस मुहुत्ते तं पढमयाए
ये तक रहे. तत्पश्चात प्रथम समय में भरणी नक्षत्र आवे. यह भरणी नक्षत्र नक्तभागी अर्धक्षेत्री { पारह मुहूर्त का है. इस से इस का योग हुने पीछे इस नक्षत्र में दूसरा दिन नहीं आसकता है; परंतु रात्रि में ही यह नक्षत्र पूर्ण होता है. रात्रि के ६ मुहूर्त ४० भाग ६१ ये ३९ भाग ६७ ये तक यह नक्षत्र [ रहता है. इतना रात्रि समय गये पीछे प्रथम समय में कृत्तिका नक्षत्र प्राप्त होवे. यह पूर्वभाग समक्षेत्र तीस महूर्त का है. यह नक्षत्र युग के आठवे दिन की रात्रि के ६ मुहूर्त ४० भाग ६१ ये ३९ भ.ग ६७ ये गये पीछे प्रथम समय में लगता है, प्रातःकाल में चंद्रमा की साथ योग करे. एक दिन एक रात्रि तक चंद्रमा की साथ तीस मुहुर्त में योग करे, और युग के नववे दिन के रात्रि में ६ मुहर्त ४२ भाग ६१ ये ३९ भाग ६७ ये गये पीछे निवर्ते. इस से आगे प्रातःहाल में गेोहिणी नक्षत्र
यह कृत्तिका नक्षत्र
•
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दवा पाहुडे का चौथा अंतर पाहुडा
१६९
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सायं चंदेणंसईि जोगं जोतेति नो लब्भति अवरं दिवसं वं खल भरणि मक्खत्ते, एग राई चंदणसहि. जोगं जोतेति २त्ता जोग अणुपरियति २त्ता पातोचंदे कत्तियाणं समप्पिति ता कात्तया खलु णक्खत्ते पुव्वं भागे समक्खेत्ते तिसति मुहत्ते तं पढमपाए पातो चंदेण सहिं जोगं जोतेति, ततो पच्छा राई, एवं खलु कत्तिया णक्खत्ते एगंच दिवसं एगवति, चंदेणसाद जोगं जो रइ २ ता जोगं अणुपरियति २ ता
42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
का प्रारंभ होवे, यह नक्षत्र उभय भागी देढ क्षेत्री नालीम मुहुन का है. यह नक्षत्र युग के नववे दिन की शेष रही हुई रास, दवा दिन ३ दशवे दिन की राशि व अग्यारहवे दिन के ९. मुर्न २४ भाग ६१ ये :१. भाग ६१ ये तक रहे, यह नक्षत्र वहां से निवर्ने । प्रथम समय में मृगशर नक्षत्र धनिष्टा जैसे योग करे, मृगशर नक्षत्र पश्चिम भागी सन क्षेत्री तीस मुहूर्त क है. अग्यारवे दिन ९ मुहूर्न २४ भाग ६१ ये ३९ भाग ६७ ये गये पीछे योग करे. बारहवे दिन
में उतनेही मुहून तक रहता है. यहां मे निवर्ते पीछे भाद्रा नक्षत्र का योग होता है. इसका शतभिषा जैस के जानना, यह भाद्री नक्षत्र भी नक्त भागी अर्थक्षेत्री पनरह मुहूर्त का है. युग के बारहवे दिन ९ मूहुर्त २४
१६. ये ३९ भाग ६७ ये गये पीछे इसका प्रारंभ होता है, उस दिन की रात्रि के ६ मुहुर्त ४८ भाग
•प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसदाजी.
।
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98+
समदस चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र-षष्ट उपाङ्ग
पातोचंदे रोहिणीणं समंम्पिति रोहिणि जहा उत्तरभदवया, मिगसिरं जह धणिट्रा, एवं अदा जहा सतभिसया तहा ननं भागा णेयब्बा, जहा पुचभद्दवया तहा पुवाभागा छप्पिनयव्या, जहा धणिटा तहा पच्छा भ गा यव्या जहा सतभिसया तहा णतं भागा थव्या जहा उतरा भद्दवया तहा उभय भागा यव्या, जाव एवं खलु उत्तरासाढा खत्ते दाय दिवमे एगंचराति, चदेणसद्धिं जोगं जोतेति २ त्ता जागं
अणुपरियति २त्ता, सायं चंदे अभिति सवर्ण समप्पिति॥दसमरस चउत्थं पाहुडं समत्तं ॥ ६१ ये ३९. भाग ६७ ये गये पीछे योग पूर्ण करे, जैसे पुर्व भाद्रपद नक्षत्र का कहा वैसेही पूर्व भागी छ नक्षत्रों का कहना. वे प्रातःकाल में चंद्र की साथ तीस मुहू एक रात्रि एक दिन तक रहे; धनिष्टा का कहा वैसे ही पश्चान भागी नक्षत्र का कहना. वे सायंकाल में चंद्रमा साथ तीस मुहुर्त तक योग करते हैं. जैसे शतभिषा का कहा वैभेही नक्त भागी का कहना. यह सायंकाल में चंद्रकी साथ पन्नरह मुहूर्त तक रहे, यों नक्षत्रां रात्रि में ही पुर्ण होवे, दूसरे दिन तक रहे नहीं, जैसे उत्तराभाद्रपदका कहा है वैसे उभय भागो जानना. चे प्रातःकाल से चंद्र साथ ४५ मुहूर्त में दो दिन एक रात्रि तक
रहे, यों उत्तराषाढा नक्षत्र दो दिन एक रात्रि तक चंद्र की साथ योग करके सायंकाल में अभि2जित नक्षत्र का योग होवे, अहो अयुष्यमत श्रमणो ! युग की आदि में नक्षत्र मास का योग कहा.
यह दशवा पाहुडे का चौथा अंतर पाहुडा संपूर्ण हवा. ॥ १० ॥ ४॥
दशवा पाहुडे का चौथा अंतर पाहुडा 4.9
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चंद्र के साथ नक्षत्रों के योग का यंत्र. नक्षत्र मास.
दिन में नक्षत्र । दिनमें नीचे का। रात्रि नक्षत्र । रात्रि में नीचे का,
संपूर्ण करे | नक्षत्र भोगवे | संपूर्ण करे । नक्षत्र भोगवे REमहन माग भाग भाग भाग मुहू भाग भाग मुहूर्त भाग भाग
नक्षत्र
०
०
* अनुवादक-बाल ब्रह्मचारीमुनि श्री अपो के ऋषिजी में
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०
साय समय ०.०. ०० ०.०.०० ००० प्रात: समय
..AAGmk00. गुग का दिन
अभिच श्रवण | धनिष्ठा शतभिषा पूर्वाभाद्रपद उत्तराभाद्र. रेवति ८ अश्विनी
भरणी ११० कृत्तिका
"१/ रोहिणी ३११२मृगसर
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ताशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रमादजी.
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१४ पूनर्वम्
पुष्य १४ अषा
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१.१
० ० ०
4849 दशवा पाहुडे का चौथा अंतर पाहडा 42
२१, चित्रा २२, स्वाति
विशाखा १२४ अनुराधा
०
०
१२/जेष्टा
... . . . . . . .
२० मूल २७ पूर्वाषाढा २८ उत्तरापाढा
2.२८
०
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अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक अपिजी
ता कहते कुला उपकुला,कुलाबकुला आहितेति वदे जा? तत्थ खलु इमा बारस कुला बारस उबकुला चत्तारि कुलाबकुल! पणत्ता ॥ वारस कला तंजहा-धणिट्ठाकुलं उत्तराभवयाकुलं, अस्सिणी कुलं, कत्तियाकुल मगसिरकुल, पुरलोकुलं, महाकुल,
उत्तराफग्गुणी कुलं, चित्ताकुलं, विमाहा कुलं, मुलो कुलं उत्तराषाढा कुलं ॥ ___ अब पांचवे पहुड में कुल, उपकल व दपक नक्षत्र का कहते -हो भगवन् ! आपके मन में कुल नक्षत्र कितने हैं, पर क्षकित है, कुत्रा नक्ष मिन है ? अहो शिष्य ! बारह नक्षत्र कल हैं, बारह नक्षत्र उपकुल हैं और चार नक्षत्र कुपकुछ हैं. जो चारह नक्षत्र कुल हैं जिनके नाम-श्रवण मास के तीन नक्षत्र हैं, जि में पति श्रावण मास की पूर्णिमा को हाये तो कुल, २ भाद्रपद साम में नीन हैं पताको उत्तराभाद्रपद. ३ आश्विन मास में दो नक्षत्र हैं जिनमें पूर्णिमा को अश्विनि नक्षत्र कुर. कात्तिक कृत्तिका कुछ. ५ मृगसर तीन नक्षत्र जिम म पूर्णिमाको पुष्य नक्षत्र कुल, मनद क्षः जि में पूर्णिमा के! 44 क्षत्र कुल, ८ फाल्गुन मास में दो नक्षत्र जिनमें पूर्णिमाका उत्तरा फाल्गुनी कुल ह, २ चैत्र मास में दो नक्षत्र हैं, जिस में पूर्णिमा को चित्रा कुल, १० वैशाख मास में दो नक्षत्रा जिस में विशाखा कुल, ११. ज्येष्ट मास में
प्रकाशक-राजाबहार लालासुखदेव माय बालापमादजी.'
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- सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति-सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग ++
बारस उवकुला पणत्ता संजहा-सवणो उवकुलं,पुव्वभद्दवया उवकुलं, रेवति उवकुलं, ___भरणि उवकुल, रोहिणी उवकुलं, पुणवसुउबकुलं, असलेसा उपकुलं, पुवाफग्गुणी
उपकुलं, हत्थेउबकुलं साति उवकलं, रोट्ठा उबकुलं, पुवासाढ। उवकुलं ॥ चत्तारि
कुलाबकुला पण्णत्ता तंजहा- अभिति कुलाबकुलं, सत्तभिसया कुलावकुलं, अद्दाकुनान नक्षत्र जिस में पूर्णिमा को मूल कुल और १२ अषाढ मास में दो नक्षत्र जिन में पूर्णिमाको उत्तराषाढ कुल नक्षत्र जानना. अब बारह उपकुल नक्षत्र कहते हैं. जो कुल नक्षत्र हैं उनकी पूर्वके नक्षत्र यदि उस मास की पूर्णिमाको
आवे तो उपकुल होते हैं तद्यथा? श्रावणकी पूर्णिमा को श्रवण उपकुल, २ भाद्रपद की पूर्णिमा को पूर्वाभाद्रपद है है उपकुल, ३ अश्विन मास की पूर्णिमा को रेवति नक्षत्र उपकुल, ४ कार्तिक मास की पूर्णिमा को भरणी
उपकुल, ५ मृगशर मास की पूर्णिमा को रोहिणी उपकल, ६ पोष मास की पूर्णिमा को पुनर्वसु उपकुल, ई १७ माघ मास की पूर्णिमा को अश्लपा उपकुल, ८ फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पूर्शफल्गुनी उपकुल. ९ चैत्र मास की पूर्णिमा को हस्त नक्षत्र उपकुल, १० वैशाख,मास की पूर्णिश को स्वाति नक्षत्र उपकुल, ११ ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का ज्येष्ठा नक्षत्र उपकुल, और १२ अषाढ मास की पूर्णिमा को पूर्वाषाढा उपकुल होते है.
अब कुलोपकुल नक्षत्र का कथन करते हैं जो उपकुल नक्षत्र पूर्णिमा को आते हैं उन से पूर्ण के नक्षत्रों " } उस ही पूर्णिमा को कुलोपकुल कहाते हैं वे चार ही नक्षत्र हैं तद्यथा-१ श्रवण मास की पूर्णिमा को अभिजित ।
दशवा पाहुडका पाँचता अंतर पाहुडा
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नक्षत्र..
कु. उ. कुल।
नक्षत्र.
कु. उ. कुल्लो.
नक्षत्र.
कु. उ,
अभिजित
०
०
०
०
११ रोहिणी
१२ मगर १३ आर्द्रा 12.४ पूर्वसु
२१ चित्रा २२ स्वाती. २३ विशाखा २४ अनुराधा २५ जेष्टा
___०. ० .
१
०
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०
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अनचादक-बालब्रह्मचारी ने श्री अमोलक ऋषिजी
६ अश्लपा 9 मघा । 2
८ पूर्वाफाल्गुनी •५९ उत्तराफाल्गुनी १ ॥
.
०
०२७ पूर्वाषाढा
आश्वना भरण कृत्तिका
काशक-राजाबहादर लाला सुखदव सहायजी ज्वालाप्रसादजी.
०
२८ उत्तराषाढा
०
०
लाबकुलं, अणुराहा कुलावकुलं ॥ इति दसमरस पंचम पाहुडं सम्मत्तं ॥१०॥५॥ * क्षत्र कुलो क. हैं . भाद्रपद पाम + पूर्णिमा को शतभिषा नक्षत्र कुलोपकुल हैं, पौष मास की पूर्णिमा का आद्रा नक्ष कुलंग, र ४ मष्ट मास की पूर्णिमा को अनुराधा नक्षत्र। कुलोपकुल हैं. य दशा पाडे का । अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ १० ॥५॥
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ता कहते पुष्णमासी आहितेति बदेज्जा ? तन्ध खलु इमातो बारस पुण्णमासीओ बारस अमावसाओ पण्णताओ तंजहा-साविट्ठी, पोट्ठवती, आसाइ, कत्तिया, मगसिरा, पोसी, माही, फग्गुणि, चेती, विताही, जेट्ठामुला, अस ढी ॥१॥ ता सावट्ठी पोण्णिम कतिणक्खत्ता नोतेति ? ता तिणि नक्खता जोयति तंजहा-अभिये, सवणे, धनिट्ठा ता षुटुवतीणं पुणिमं कति णक्खत्ता जोतेति ? ता तिणि पक्वत्ता जोयंति ? तंजहा-सतभिसया, पुवपोढ़वया, उत्तरापाठवया ॥ आसोतीणं पुणिम कति खत्ता
अब छठा अंतर पाहुडा कहते हैं. अहो भगवन् ! आप के मत में पूर्णिमा व अमावास्या किस तरह से पूर्ण होती हैं ? उत्तर-अहो शिष्य ! एक संवत्सरकी बारह पूर्णिमा व बारह अपावास्या कही है. तद्यथा--
प्रावण मासकी श्राविष्ठा, २भाद्रपदकी पौष्टवती, ३ आश्विनकी आमोई ४ कार्तिक की कृत्तिका ५मृगः मगशिरा, ६ पोप की पोपी, ७ माघ की माघी, ८फ ल्गुन की फल्गुनी, ५चैत्र मास की चैत्री १० वैशाख मास की विशाखा, ११ ज्येष्ट मास की ज्येष्मूली और १२ अप ढ मास की अप ढी ॥१॥ अहो भगान ! श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन कितने नक्षत्र योग करते हैं ? अहो शिष्य ! तीन नक्षत्र योग करत हैं जिन के नाम-अभिजित, २ श्रवण और ३ धनिष्ठा. अहो भगवन् ! भाद्रपद माम की पूर्णिमा को कितने नक्षत्र चंद्र की साथ योग करते हैं? अहो गौतम! तीनः क्षत्र योग करते हैं. जिनके नाम-, शतभिषा, २ पूर्वा
S
.. 4g संप्तरश चंद्र प्रसप्ती सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 4
दवा पाहुड का छठा अंतर पाहुडा 18+
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मत्र
१७
मुनि श्री अम्मलक ऋषिजी क
जातेति ? ता दाप्णि वखत्ता जोयति तंजहारवति, अरिसणी ॥ ता कत्तियाणं पोणिम कतिणवखत्ता जोतेति? ता दो पखत्ता जोतेति तजहा-भरणी कतिया ॥ ता मिगसिरिणं पुणिमं कइ नवखत्ता जोतेति ? ता दोणि नक्षत्ता जोयंति, तंजहा रोहिणी. मिगसिरंाता पोसिणं पुणिमं कति णक्खत्ता जोतेति ? ता तिणि नक्खत्त। जोतेति तंजहा अहा, पुण्णवसु, पुरसता माणिं पुष्मिं कति नक्खत्ता जोतेति? तो दोणि नक्षत्ता तंजहा-अस्सलेसा, महाय ॥ ता फागुणीणं पुणिम कति णक्खत्ता जोतेति? ता
प्रकाशक-राजाबहादर लाला मुखदेवसहायजी ज्वाला मानना
भाद्रपद और उत्तराभाद्रपद.अहो भगवन् ! अश्विन मासकी पूर्णिमाको कितने नक्षत्र योग करे? अहो शिष्य! दो
क्षत्र योग करे जिन के नाम-१ रेवती २ अश्विनी. अहो भगवन् ! कार्तिक मासकी पूर्णिमाको कितने नक्षत्र योग करे ? अहो शिष्य : दो नक्षत्र, योग करे जिन के नाम-१ भरणि और २ कृत्तिका. अहो भगवन् ! मृगसर मास की पूर्णिमा को कितने नक्षत्र योग करे ? अहो ।शष्य ! दो नक्षत्र योग करे १ रोहिणी और १२ मृगशर. अहो भगवन् ! पोष पास की पूर्णिमा को कितने नक्षत्र योग करें ? अहो शिष्य ! तीन नक्षत्र का योग होवे जिन के नाम-१ आर्द्रा २ पुनर्वभू और ३ पुष्य. अहो भगवन् : माघ मासकी पूर्णिमा को कितने नक्षत्रका योग होवे ? अहो शिष्य ! दो नक्षत्रका योग होवे जिनके नाम-१ अश्लपा और २ मघा.
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48
सप्तदश चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग +8
दोणिणक्खाता जोतेति ? तंजहा पुवाफग्गुणिय, उत्तराफग्गुणिया ॥ ता चेत्तीणं पुणिम कति णक्खत्ता जोतेति ? ता दोणि नक्खत्ता जोतेति संजहा हत्थो, चित्ताय, ॥ ता विसाहि पुष्णिम कति गक्खत्ता जोतेति ? ता दोणि णक्खत्ता जोयंति ? तंजहा-साती, विमाहायता जामुलीणं, पणमासीणं कति खत्ता जोतेति ? ता तिणि नक्खत्ता जोतिति, तंजहा-अणुराहा, जेट्ठा, मूल ५॥ता आसाढीणं पोण्णमासि कति नक्खत्ता जोतेति! ता दोणि नक्वत्ता जातेति अहो भगवन् ! फाल्गुन मास की पूर्णिमा को कितने नक्षत्र का योग होवे ? अहो शिष्य दो नक्षत्रों का योग होवे जिन के नाम-१ पूर्वाफ लगती और २ उत्तराफाल्गुनी. अहो भगगन ! चैत्र मास की पूर्णिमा को अ कितने मक्षत्र का योग होवे ? असे शिष्य! दो नक्षत्र का योग होवे जिनके नाम-स्त और २ चित्रा-14 अहो भगवन् : वैशाखी पूर्णिमा को कितने नक्षत्र का योग होवे ? अहो शिष्य ! दो नक्षत्र का योग होने जिन के नाम-स्वाति और विशाखा. अहो भमवन् ज्येष्ट मास की पूर्णिमा को कितने नक्षत्र का योग होवे ? अहो शिष्य ! तीन नक्षत्रों का योग होवे जिन के नाम-१ अनुराधा २ ज्येष्छा और ३ मूल. अहो भगान् ! अषाढ मासकी पूर्णिमा को कितने नक्षत्र का योग होने ? अहो शिष्य ! दो
दशवा पाहुड का छठा अंतर
8
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तंजहा-पुवासाढा, उत्तरासाढा ॥ २ ॥ ता सावट्ठीणं पुणिमासिणं किं कुलं जोतेति उबकुलं जोतेति, कुलाबकुलं जोतेति ? ता साट्रिणं पाणिम कुलंवा जोतेति · उवकुलंबा जोतति. कूलावकुलंगा जोतेति, कुलं जोएमाणे धणिट्ठा णक्खते जोतेति.
उपकुलं जोएमाणे सवणे णक्खत्ते जोतेति. कुलावकुल जोएमाणे अभिय णखत्ते जोतेति ता - सावट्टिपुष्णिमा कुलं जोतेति,उवकुलंबा जोतेति,कुलावकुलंचा जोतेति कूलेणवा जुताउवनक्षाका योग होवे जिनके नाम- पुर्वाषाढा और २ उत्तराषाढा॥२॥अब कुल उपकुलका खुलासा करते हैं-अहो
भगवन् श्रावण मासकी पुणियाको क्या कुल नक्षत्र योग करे, उपकुल नक्षत्र योग करे,अथवा कुलोपकुल नक्षत्र अर्थIयोग करे? अहो शिष्य ! कुल नक्षत्र भी योग करे,अथवा उपकुल नक्षत्र भी यांग करे,अथवा कुलोषकुल नक्षत्र
भी योग करे. कुल नक्षत्र का योग होवे तो धनिष्ठा नक्षत्र होते. उपकुल नक्षा का योग होवे तो श्रवण नक्षत्र होवे और कुलोपकुल नक्षत्र का योग होचे तो अभिजित नक्षत्र होवे. इस से श्रावण मास पुर्णिमा को कुछ नक्षत्र योग करे, अथवा उपकुल नक्षत्र योग करे, अथवा कुलोपकुल नक्षत्र योग करे. इसी से यह पुनम कुल नक्षत्र से युक्त, उपकुल नक्षत्र से युक्त व कुलोपकुल नक्षत्र से भी युक्त है. यह श्रावण मास के पूर्णिमा के वक्तव्यता हुई. अहो भगवन् ! भाद्रपद मास की पूनम क्या फुल नक्षत्र का योग करे, उपकुल नक्षत्र का योग करे अथवा कुलोपकुल नक्ष का योग करे ? अहो शिष्य ! कुल।
40 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
पाचक-राजाबहादूर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी .
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सत्र
4980
80
488 सदश्च चंद्र प्रज्ञाप्ती सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग
कुलैणवा जुत्ता,कुलावकुलेणवा जुत्ता सावट्ठि पोणिमाजुत्ताप्ति वत्तव्वसिया ॥ता पुटुवतीपुणिमं किं कुल जोतेति उवकुलं जातति, कुलाबकुलं जोतात?कुलं जोएमाणे उत्तरापोटु बएणक्खत्ते जातेति, उक्कुलं जोएमागे पुवापोवधा णक्खत्त जोतेति, कुलावकुलं जोएमाणे सतभिसया खत्ते जातेति ॥ पाटुक्ता पुष्मिमासाणं कुलवा जोएति, उपकुलं. वाजोएति, कुलाबकुलंवा जाएति तंचव जाव पोटुवया पुणिमा जोतेते वत्तव्यंसिया ॥
सा आसाइणं पुण्णमासीणं किं कुलं जोतेति पुच्छा, ता कुलंपिजोतति उपकुलंपि नक्षत्र का योगकरे, अथवा उपकुल नक्षत्र का योग करे. व कुडे पर नक्षत्र का योग करे कु उ नक्षत्र का योगकरे तो उत्तराभाद्रपद, उपकुल नक्षत्र का योग करे तो पूर्वाभाद्रपद और कुटो कुल नक्षत्र का योग करे तो शतभिषा. इसीसे भाद्रपद मास की पूर्णिमा कुल नक्षत्र का योग करे, उपकूल नक्षत्र का योग करे, और कुलकूल नक्षत्र में का योम करे. और इसी से भाद्रपद मास कुल नक्षत्र से युक्त, उपकुल नक्षत्र से युक्त व कुठे कुल नक्षत्र मे युक्त है. आश्विन मास की पूर्णिमा की पूच्छ ? अहो शिष्य ! कुल नक्षत्र का योग करे और
उपकल नक्षत्र का भी योग करे परंतु कुलोपाल नक्षत्र का योग नहीं करे. कुछ नक्षत्र का योग होवे *तो अश्विनी और उपकुल नक्षत्र का योग होवे तो रेवती इस से आश्विन पूर्णिमा कुल अथवा उपकुल
नक्षत्र का योग करे. इसी से आश्विन पूर्णिमा कुल अथवा उपकुल नक्षत्र से युक्त होने. यह अधि '
दशवा पाहुई का छठा अतर पाहुडा -
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सन्न
48 अनुवादक-पालब्रह्मचारीमान श्री अमोलक ऋषिजी :
नो कुलाबकुलं ॥ कुलं जोएमाणे अस्सिणि णक्खत्ते जातेति उबकुलं जोएमाणे रेबति णवत्त जोतेति आमाईणं पुणिमं कुलंवा जोतेति, उवकुलंवा जोतेति. कुलणवा जुत्ता उरकलेणा जुत्ता आमाईणं पूण्णमा जुत्ताति वत्तव्यं सिया, जाय
૧૮૨ एएणं अभिलावण पासिंपाणिमाए जट्टामूलं पोणिमाए कुलाकुलं भाणियव्वा अव
सेसा कुलाबकुला त्थि जाव असाढी पुष्णिमा जुत्ताति वत्तव्वं सिया ॥ ३ ॥ पूर्णिमा की वक्तव्यता हुइ. इसी अभिलापसे कार्तिक मामकी पूर्णिमा में कुल नक्षत्र कृत्तिका और उपकुल नक्षत्र भणि है. मगशर मास की पूर्णिमा को कुल न त्र एगशर का योग होवे और उपकुल नक्षत्र रोहिणी का योग होय. ६ष मास की पूर्णिमा का कर पूष्य नक्षत्र उपकुल पुनर्वसु और कुलोप- भा कुल आद्रा नक्षत्र का योम हाय यावत् ज्येष्ट मास की पूर्णिमा के दिन कुल मूलनक्षत्र, उपकुल ज्येष्टा और कुलोपकुल अनुराधा. १ श्रावण २ भाद्रपद ३ पंप और ४ ज्येष्ट इन चार मास की पूनम में कुलापकुल नक्षत्र का योग होवे. शेष मास में कुलापकुल नक्षत्र नहीं है यावत् शब्द से माघ मास की
णमा को कुल मघा और उपकुल अश्लेपा. फाल्गुन मास की पूर्णिमा को कुल उत्तराफाल्गुनी उपकुल पूर्वाफाल्गुनी, चैत्र मास की पूर्णिमा को चित्रा कुल नक्षत्र और हस्त उपकुल नक्षत्र. वैशाख मास पूर्णिमाको विशाखा कुल और स्वाति उपकुल. अषाढ मास की पूर्णिमा को उत्तरापाहा कुल और पूर्वाषाढा उपकुल ॥३॥
• प्रकाशक-नाजाबहादुर लाला मुखदेवसायजी ज्वालाप्रसादजी.
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कुल उपकुल व कुलोपकुल नक्षत्र का यंत्र.
+
मास कुल उपकुल कुलोपकुल नं०, मास कुल उपकुल कुलोपकुल १श्रावण शु. १५ घनिता श्रवण | आभाजित ७ महा शु. १५ मघा अश्लेषा २ भाद्रपद श.१५ उत्तर भा. पूर्वाभाद्रपद शतभिषा|८फाल्गुन शु.१५/उ. फा०पूर्वा फा० ३ अश्विन श.१५ अश्विनी रक्ती | ९ चैत्र शु. १५ चित्रा हस्त ४ कार्तिक श.१५ कृत्तिका भरणी . १० वैशाख शु.१० विशाखा स्वाति ५श श.१५/ मगर रोहिणो . ११ ज्यष्ट शु. १५ मुल ज्येष्टा अनुराधा पोष श. १५/
म । अादी १० अपतु श१८ उत्तराषादा पूर्वाष ढा।
487 सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सत्र-षष्ठ उपाङ्ग
• दशवा पाहुदे का छठा अंतर पाहुडा
पर्व तिथि का नक्षत्र नीकालने की विधि. दो राशि बनाना, जिन में एक ५४९०० और दूसरी
२०१० नक्षत्र मास २० दिन ९ मुहूर्त २५ भाग ६७ या इतना है. इस को पूर्णाक में लाने के लिये १२७ को ३० महर्न का एक दिन होने से ३० से गनना, और नव मुहूर्त बढाना. २७+३०%D८१०+२% ८१९. एक मुहूर्न के ६७ भाग करने का है इससे इस ख्या को ६७ से गुनाकार कर २७ भागबहाना ८१२४६७५४८७१४२७=५४९०. इतनी राशि ६७ ये भाग की हुई. यह एक नक्षत्र
8
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१८४
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋशि
*मास की धूवराशि हुई. वैसे ही एक दिन के पुहूर्व ३० हैं इस को ६१ से गुनाकार करने से २०१०
होते हैं. यह एक दिन की धाराशि हुई. अब युग का दिन उस तिथि में कितना होता है उसे निकालने को भी दो धाराशि बचाना. एक १८३० और दूरी १८६.. जिन पर्ष की तिथि पर युग का दिन निकालना होने वह तिथि श्रावण वदी १ कितनी है अर्थात् श्रावण वदी १ से इस निधि तक कितनी तिथि होती हैं. जितनी तिथियों आरे उन पत्र को १८३. में गुणा करना और जो राशि भावे उसे १८६० का भाग देना. इस में जो पूर्ण आंक आये और शेष कुछ रहे तो पूर्णकरें एक बहाना. इतना युगका दिन जानना. यदि बडे नहीं तो एक बढाना नहीं. मोशेष संख्या रह ईईहै वह मुहूर्त के ६२ ये भाग की जानना. दृष्टांत प्रथम संवत्मा के माशर सुदी १० को या का नि कितनामा था, कितने मन में संपूर्ण होवे, कौनमा नक्षत्र था, और कौन से नक्षत्र में पूर्णिमा का प्रारंभ हुव? श्रावण बदी १ प मृगता शुदी १५ तक में १५० तिथी होवे. इन को १८३० से गुणा करने से १२७४५०० की राशि होये. इसको १८६० का भाग देने मे १४७ पूर्ण आये और शेष १.८० की
राशि होवे इस से एक बढाना इम से १४८ वा युग का दिन जानना. और १०८० भाग रहे यह प्रथम
संवत्सर के मृगशर शुदी १५ के ६२ ये भाग की राशि रही. इस को मुहूर्त करने के लिये ६२ का भाग T ,जिस से १७ मुहूर्न और शेष २६ भान.६२ ये रहे. इससे युग के १०८ वे दिन माशर शुदी १५
.प्रकाशक-राजाबदुर लालचस्वमहाला ज्यालाप्रसादज .
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अर्थ
4 सप्तदशचंद्रज्ञाम सूत्र पष्ठ उपाङ्ग
की तिथि १७ मुहूर्त और २६ भाग ६२ येतक पूर्ण होने और पूर्णिमा की तिथि२९ मुहूर्त ३२ भाग ६२ ये {है. इस मे इस में से १७ मुहूर्त - ६ भाग ६२ पे बाद करना, शेष १२ मुहूर्त ६ भाग ३२ ये रहे. और १४८ के दिन में से एक दिन के ३० मुहूर्त करना. उस में से १२ ब करना शेष १७ इस से १४७ के दिन १७ मुहूर्त संपूर्ण हुए पीछे २७ मे साग के प्रथम
रहे
में मृगशर शु १५ का
पारंभ होते. अथ मृगरी १५ को कौनसा नक्षत्र क्षेत्र इस की रीति मृतशर शु पूर्णिव १४८ दिन में संपूर्ण होती है, इस में से एक बाद करने से १४७ रहे. क्योंकि १४७ वे दिन से पूनम का (मारंभ होता है. इस को एक दिन के मुहूर्त की राशि से गुबार करने से १४७ दिन के २९९४७० की राशि होने. इस राशि को ५४२०० मास राशि से भाग देने से पांच पूरी नक्षत्र मास हुए शेष २०१७० की राशि रही. इस के मुहूर्त करने के लिये ३७ का भाग देना जिस से ११२ खुहूर्त और शेष ६३ रहे. नक्षत्र के छठे पास के मुहूर्त जानने के लिये अभिनित नक्षत्र के विना श्रमिति के अत्रण के ३०, धनिष्ठा के ३०, शतभिषा के१५, पूर्वा भाद्रपद ३० उत्तम
४२०, अश्विन ३०, भरणी १५३
कुचिका ३० और रोहिणी ४५ मुहूर्त यो सब मिलाकर. २+३०+३०+१५+३०+४५+३०+ मुहूर्त रोहिणी नक्षत्र पर्यंत होते. इतना मागे ३१२. मुहूर्त में से
१५+३०+४५=३०९
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- दसवा पाहुडे का छठा अंतर पाहुडा 4
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करते३ मुहूर्त रहे. यह मृगशर नक्षत्र का मानना. इस मृगशर नक्षत्र के ३ मुर्तगये पाछे'४
भाग के प्रथप समय में युग का १४८ वे दिन का प्रथम मपय प्रारंभ होवे. यह मृगशर नक्षत्र ३० 10 मुहूर्त का है इस में से ३ मुहूर्त बाद करते २६ । मुहूर्त हे. इतना मुहूर्त तक युग के १४८ दे दिन में
मृगशर नक्षत्र पूर्ण होवे. युग के १४८ थे दिन मृगशः शुदी १५ १७ मुहूर्त २६ भाग ६२ ये की है। है और १४७ वे दिन मृगशर नक्षत्र ३ मुहूर्त ३१ भग ६७ थे है. इम से इन दोनों को मिलने से क१२५ युहर्त, • भाग ६२ पे और ६ भाग ६७ ये होवे. नक्षत्र का इतना भाग गये पीछे युग के १४८ थे दिन मृगशर शुदी १५ की तिथि मंपूर्ण होवे. इम तिथे का प्रारंभ कौन से नक्षत्र में हुग सो कहते हैं.
१५ की तिथ २९ मुहूर्न ३२ भाग ६२ ये की है उम्र में से २१-०.६ बाद करने से शेष २१८.२१.९.१ रहे. मृगशर क्षत्र पहिले रोहिणी नक्षत्र ४५ मुहू का है उस में से ८-३१-६१ बाद
करने से ३६-३०-३ र इजा पोहणी नक्षत्र गये पंछे सातवे भाग के प्रथम समय में मृगशर शुदी १५ की तिथि के प्रथन समय का प्रारंभ हुवा. और रोहिणी नक्षत्र ८ मुहा ३१ भाग ६२ ये ६१ भाग ६७ ये पृगशर शुदी १५ की तिथि में चंद्रमा की साथ योग करे. और मृगशर नक्षत्र में १२१ मुहूर्व • भाग ६२ ये ६ भाग ३७ ये मृगशर शुदी १५ को योग करके तिथि संपूर्ण करें :
अधारी मुनि श्री अमोलक काजी
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी •
अनुयाः
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-
प्रथम नक्षत्र से अंतिम नक्षत्र पर्यंत मुहूर्त जानने का.
नक्षत्र,
भाग६७
-
नक्षत्र
महर्त
भा
-
२भनमा
मदस सेट प्रक्षा सूत्र-पए
.।। १९| उत्तराफाल्गुनी २६४२७ २. हस्त ३०९२७ २१ चित्रा ३३१२७ २० स्वाति
२३ विशाखा
२४ अनुराधा ४२९२१
२६ ज्येष्टा ४४४२७ २६ मूल ४७४२७ २७ पूर्वाषाढा ५०४२७ २८ उत्तराषाढा
१० कृत्तिका
११ रोहिणी ६१२७ १२ मृगशर
आर्द्रा ११४२७ पुनर्वसु
१५ पुष्य १६ अश्लेषा
१७ मघा ०३४७१ १८ पूर्वाफाल्गुनी
48 दशवा पाहुडे का छठा अंतर पाहुडा
64.30.64
५ पूर्वाद्रपद ६ उत्तराभद्रपद ७वति
८ अश्विनी १ ९ मणि
१०२
८१५
28+
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अनुषा -समाधान मनि श्री क्षमा namamrriramwamarrrrrrrrrm
पिनेर
-
प्रथम संवत्सर.
पा मासतींची १ श्रावण भुदी
ना
ना २०१४ग
द६६२
गशर शुदी १५१४७१२६ रोहिणी 1८३१६
पोर मी १५१७७२६३८
मु१२३५आये
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फाल्गुन शुनी १५ २३६२५४ फाली
१० वैशाख शुदी १५२१६४२ ४२ विशावा
३६२५ १११२ ११ ज्येष्ट नदी १५ ३२४९५३ अनुराधा
१२. अशाट दी २३५४ पूषि ढा ।
३१०' उत्तराषाढाए८३०३८१३ •eaukkethaye.klekhase L12 14
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द्वितीय संवत्सर
पर्व। मांस वीथी युगके
!
नक्षत्र
भाग६७
न. मास
१३ श्रावणशुदी १०३८३८ १४ श्रवण । २०१२१२७१०
३९०३८४७११८ घनिष्टा | ०१०४.१५ १४ भाद्रपद शुदी १५४५३२०४६ शतभिषा ८११५११६
४२०४१४६ ४८ पूर्वा भाद्रपद २२.१६१६ १५ माशो शु४४४२७१६ उत्तरा माद्रपद २०६५०१७
४५. ४४३२०१६वति १२२८१७१७ १६ कार्तिक शुदी१०४७२२१४८ अश्विनी ११६२४१८
४८० ४७३७ ४६ भरणी १०.०१८
१७ मगर शुदी १५५०१६ १८ रोहिणी 20३,१९१९
गय
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१८ पोप शुदी १५५२१२५० रोहिणी ३.३८१९१९
५४० .३२८४४ आद्री१३५९,२२२० १९ माघ शुदी १५५६००० पूर्दम्
५७०२६१२४१३ पुष्य २२४८४६२१ २. फल्गुन शुदी १५५१० ११५२ अश्लपा | ६४२२१२१ २१ चैत्र शुदी १५६३९४ २२ पूर्वा फाल्गुनी २७५०२२२२
। ६३०६२०२५१० उत्तरा फल्गुनी १०३८४४२३ २२ वैशाख शुदी १५६४९ १८५४ हस्त १८५०.२३२३ ६६. ६५०१०४. चित्रा४३३:४३२४
स्वाति १५२४ २३ ज्येष्ठ शुदी १५६७८३२४ विशाखा १६०२४२४
अनुराधा २८२८४२२६५
| ज्यष्टा २४ आषाढ शुदी १५७०८१७५० मुल ७२३४१२६ | ७२० ७.९११३८ पूर्वाषाडा २२ ८२६/२६
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तुतीय संवत्सर.
मास तीथी.
नक्षत्र
भागर न.मास |
२५ श्रावण शुदी १५, ७३७ २२६/ उत्तराषाढा १५/८४०२७
७३८२७/६ अभिजित | ९.४/६६२८
श्रवण ४५०२८२८ २६ भाद्रपद शुदी १५ ७६७१६५८ धनिष्टा
७८० । ७६८१२३३ शतभिषा ९५८/२९/२१ २७ आश्विन शुदी१५। ७९६ १२८ उत्तराभाद्रपद १२८३०३०
८१० ७१७२८१ उत्तरा भाद्रपद ३०६०मय ३०
Bol
rror
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२८ कार्तिक शुदी १५८२३१५६० रंगत
८४. । ८२७१३,३४ अश्विनी २२ ३३१३, २९ मगशर शुदी १५ ८५०/३० कृत्तिका १६२३३५३२
८७० ८५६२१, २ रोहिणी १३८३२/३३ ३० प्र०पौष शुदी १५ ८८५१५ ० मृगशर
। ९०० ८८६१४३२ आर्द्रा ३१ द्वि०पोष शुदी २६ २१५२०३२ पुनर्वसु १२/१३३३३४
। ९३० ००० पूष्य १०/१८३४३४ ३२ महा शुदी १५ | ९४४/१४/ २ मघा २८८३२३८
९४५१०/३० पूर्वाफाल्गुनी | १२३३०३८ ३३ फाल्गुण शु१५ ९७४२८३४ उत्तराफाल्गुनी ७-८३६३३
९१० | ९७६ ०६० उत्तराफाल्गुनी ३७२८गये ३०
३४ चैत्र शुदी १५ १.००३१३ ४ हस्त । ०६०३०३७
१०२. १००४१६२८| चित्रा २८३३/३७३७ ३५ वैशाख शुदी १५१०३३२७३६/ विशाखा ९४५६३९३४ १०५० १०३४/ १५८ अनुराधा
| ४३८३८३८ ३० ज्येष्ठ शुदी १५ १०६२/१२६ज्येष्टा ३५०२८३९
१०८०१.०६३१७२६/ मूल २५४३/३१३९ ३७ आषाड शुदी १५१०९२२६३८ उत्तराषाढा | २१६४०४०
१०९३२ २६/उत्तराषाढा ३१४८ गय ४०
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चतुर्थ संवत्सर.
-
ता
मास तीयी
DA
KNE
63111
नक्षत्रमासा
Aih
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३८श्रावण शुदी १८/१२१११) 6. श्रवण १६ ३२५४२
११४० ११२२ १८२४ धनिष्टा રરરકાર ३९ भाद्रपद शुदी १५/११५१२५/४० पूर्ण भाद्रपद २९/६०२४४३
११७० ११५२ ३५४ उत्तरा भाद्रपद ४३३४३४३ ४० आश्विन शुदी १५११८०१०१० उत्तरा भाद्रपद! ३५५२३४४
१२०० १९८१ १९२२ रेवती २५३८४४४४ ४२ कार्तिक शुदी १५/१२१०२४४० भरणी १२५१६२१४५
१२३० १२११ ४६२/ कृत्तिका १६४३४५४४५ ४२ मृगशर शुदी १५ १२३९ ९१२
| १२६० १२४०२०२० मृगशर દદ ४३, पोष शुदी १५ २२६९/२३४४ आ ०४०२०४७
१२९० १२७० ६५० पुनर्वसु २८५३४७:४७ ४४ माघ सुदी १५ १२९८८१४ पूष्य | ९३६१९४८ १३२० १२९९२११८ अश्लेषा. १५ ००४८
__यघा | ४५८४८४८ ४५ फाल्गुन शुदी १५:३२८२२४६ पूर्वा फाल्गुनी १८३०१८४९
१३५० १३२२ ६४८ उत्तरा फल्गुली २१ १४२४९ ४६/ चैत्र शुदी १५ १३५७ ७१६ इस्त २७२६/१७५०
__ १३८० १३५८६२२१६/ चित्रा २६५०५० ४७वैशाख शुदी १५ १३८७२१४८ स्वाति
। १४१० १३८८ ७४६ विशाखा २३/११५१५१ ४८ ज्येष्ठ शुदी १५ १४१६/६/१८ अनुराधा १५१५/१५५२
१४४० १४१७२३/१४ ज्येष्ठा १४१६५२८२ ४१ अशाढ शुदी १५१४४६२०/५० पूर्वापाढा | १४७० १४४७८४४ उत्तरषाढा ।५२११५५३
| ६२०१६५१
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मास तिथे
५० श्रावण शुद्धी १५ | १४७५९/२० उत्तर पढा | ३) ५/१३/०४ १५०० १४०६२४/१२/अभिजित
९२४६६५५
५१ भाद्रपद शदी १५ १००५ १९५२
५० मा खुदी १५
१६८०
पंचम संवत्सर
२७ फाल्गुन शुद्धी १६
१७५० ५८ चैत्र शुदी १५
१७४०
युग क
ਵਿਚ
५९|शाख शुदी १५
9990
६० ज्येष्ठ शुदी १५
१८००
६१ पाट शुदी १७
१८३०
१५
१५३० १५०६ ९४२ शताभवा पूत्राभाद्रपद
८ ६ ५६५६
१५६०
५२ अश्विन शुदी १५ १५३४ ४ २२ उत्तराभाद्रपद १४ ४१५७५७ ११५३०, २८ १० उत्तराभद्रपद ४४११८७८७ ३ कार्तिक शुदी १५/१५६४१८५४ २४१७ ९५८.
1600
२४ मृगशरशी १५
१६२०
१०६५/१०/४० मरणी १००३ ३१४ कृत्तिका १५९४/२६ राहिणी १६२३१७५६र १६२४ १ १ ३८ अ द्रो
५० पाष शु १५ १६८०
पुनर्वस
नक्षत्र
|
श्रवण • १७ १५५५५. ६२५ ११५६
१७१२२८४ वस्त १७४११५०० चित्रा १७४२ १.३ ३४ साति १७५० ०/३० विशाखा १७०१ २० २अनुराधा १८०० १५ ० मूल (१८०१/१४/३२ पूर्वाषाढा ६० द्रि अपाठ जुदी १६ १८३०/२०/३२६त्तराषाढा
१८६०
महूत
५१६५८६८ ३०० ८५९ २३ २१५९५९ १३ ५ ७६०.
७०.
१००२२ २६ १६.७/२७ पुष्य १६८२१६६८ मा १६८३ १२३६ पूर्वा फागुन १४३६ ६२६२ १७११ १२८ उत्तर फाल्गुनी २३५२ ४६३
२३३१६ १६१ १४५७ ५६२
२२६६०६०
६०६६१
५४१६३६३ १७४७ ३६४ ११४६/६४/६४ १९४२ २६५ १७५१.६५ ६५
२०३७ १९६६
८५६६६६६ १५०३० मा ६७
००/६७
उत्तराषाढा ४
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सूत्र
अर्थ
40 सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र पष्ठ उपा
दुशलस अमावासाओ पण्णत्ताओं तंजहा-सावट्ठी पोवती जात्र असाढी ॥ ता सावट्ठीणं अमावासा कति णक्खत्ता जोतेति ? ता दोण्णि नक्खत्ता जोतेति तं जहा - असलेसा घ मघायं || एवं एतेणं अभिलाषेणं यच्वं ॥ ता पोट्ठत्रयाणं दोणिण णक्खत्ता जोति संजहा-पुत्राफग्गुणी. उत्तरायफ ग्गुणी आसोइ दो णक्खत्ता तंजहा - हत्थो, चित्ता ॥ कत्तिया दोणक्खत्ता साति, विसाहा ॥ मागसिरि तिष्णि तं जहा अणुराहा, जेट्ठा, मूलाय ॥ पोसि दो णक्खत्ता तंजहा पुग्वासाढा उत्तरासाढा. माहितिष्णि क्खत्ता तंज हा अभिए, सवण घणिट्ठा ॥ फग्गुणी तिष्णि तंजहा सतभिसता, पुव्वाभद्दवयाय उत्तराभद्दवया ॥ चेतीणं दोपिंग तंजहा- रेवति, असणीय ॥ विसाहाहिंदोणि अब बारह अमावास्या का कथन कहते हैं. जन बारह अमावास्या के नाम--१ श्रावण की अमावास्या, १२ भाद्रपद की अनावास्य ३ आश्विन ४ कार्तिक ५ मृगसर ६ पौष महा ८ फल्गुन, ९ चैत्र १० वैशाख, ११ ज्येष्ठ और १२ अप अमावास्या ६ अहो भगवन् ! श्रावण मास की अमावास्या में कितने नक्षत्र योग करे ? अह शिष्य ! नक्षत्र योग करे जिन के नाम-अश्लषा और मघा ऐसे ही २ भाद्रपद की अमावास्या के दो पूर्व लगुती उस फालगुरी, ३ अश्विन मास की अमावास्या के दो नक्षत्र हस्त और चित्र ४ कास्या को दा नक्षत्र स्वाति और विशाखा ५ मृगशर पास की अमावास्या को तं नक्षत्र-अनुराधा, ज्येष्ट, मूल, ६ पौष अमावास्या को दो नक्ष पूर्वाषाडा उत्तराषाढा. राघ तीन नक्षत्र अभिजित, श्रवण व धनिष्ठा, फल्गुनी में तीन नक्षत्र शतभिषा पूर्व
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48 दशा पाहुडे का छठा अंतर पहुड
H+
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म
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मानि श्री अमोलक ऋषिजी
भरणि, कत्तियाय ॥ जेट्ठामूलं दोणि णक्खत्ता तंजहा- रोहिणी, मिगसि।।ता असाढीणं अमावासं कति एणक्खत्ता जोयेति, ता तिणि णक्लत्ता जोतेति तंजहा-अद्दा, पुण्णवसु, पुसा ॥ ४ ॥ ता सावट्ठीणं अमात्रामं किं कुलं जातेति उवकुलं जोतेति, कुलाबकुलं जोतेति? ता कुलं वा जोताते उबकुलं वा जातीत ना लमति कुला व कुलं,कुलं व जाएमाणे महाणकवत्तजतिति उबकुलंजोएमाणे असेसा नक्खत्ते जोतेति ॥ ता सावट्ठीणं अमावासं कुल वा जोतेति उवकुलं वा जोतेति कुले वा जुत्ता उरकुलणवाजुत्ता सावट्ठी
अमावामा जुत्ताति यतवं लिया एवं पेयव्यं गवरं मगसिरिए महाए फग्गुणीए भद्रपद व उत्तराभादपद.१ चैत्र में दो नक्षत्र रेवति व अश्विनी. १० वैशाखी अमावास्या के दो नक्षत्र-भरणी । कृत्तिका. ११. जोष्टमार की अमावास्या दो नक्षत्र रादिगा व मगश और १२ पाहमास की अमावास्या को तीन नक्षत्र अ.,' पास पर पप्प. ॥४॥ अहः भगत! श्रावण माप की अमावास्या का क्या कुल नक्षत्र का योग होने अथ: उपकल नात्र कामोरे. अथवा कलोपाल नक्षत्र का योग हार.. अहो शिष्य ! कुठनात्र का योग हाय, असा उपकलनक्षत्रकायेगहो पातु कुलो पकुल नक्षत्र का योग हाव नही. कला यागदावनक्षत्र, और उप में बननक्षम का योग हाव. इस से कुल का योग होवे अथवा उपल का योग . भइनी से कल यूक्त व उपकुल युक्त कहलाती ह यह श्ररण माम की अमावस्या की वक्ताता रही. एनहीशेष माग की अमावास्या का जानना. परंतु मृगशर, माघ फालान अं.र आपादमाम इनचारमाप्त की अमावास्था में कुलोपकुल कहना. और शप आठपास
• पकाशक राजाबहादुर लाला मुखदव पहायजी ज्वाअपसादजी.
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सप्तदश चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र षष्ट-उजाग 4
असाहाय अमावासाए केला कलं. माणियचं॥ सेमागं बलोवकलंण त्थि जाव असाढी अमावासं कुलेज वा जुला उर लेग वा जुत्ता कलाबकलेज वा जुत्ता, असाढी अ
मावासं जुत्तातिं बताया गया ॥ इति दसमम्म छ पहुई स तं ॥१०॥६॥ + में कुलोपकुल नक्षत्र की हैं. यावल दाहाः भाद्रपद की गापामा रोट पास की अमावास्या पर्यंत कहना. आपा माघी अमावास्या कुड युक्त उपकुल यक्ष व कुलकुल यक्त है. इस तरह बारह मास की अमावास्या रुज, उपलबकुवोकल नक्षत्र का यंत्र जानना यह दशवा पाहुडे का छठा अंतर पहुडा पूर्ण हुआ. ॥ १० ॥ ६ ॥
कल उपकल व कले एकल नक्ष का यंत्र. नं० मा कुल उपकल को पकल त० भाम कुल उपकुल कुलोपकुल १श्रावण वदमा अलपा
महा वद ३० धनिष्ठा श्रवण अभिाजित २ भाद्रपदवद३०० फापर्वा फा
“फ.मुलवद३० उत्तरा मा. पूर्वाभाद्रपद शतभिषा , ३ अश्विन वद३० चित्रा। इस
| ९ चैत्र ३० वश्विनी रेवती ४ कार्तिकवद३० विशखा! स्वाति
१०श ख व ३० कृत्तिका भरणी मृगशर बद३० मूल ज्येष्टा | अनुराधा ११ ज्येष्ट वद ३० मृगर रोहिणी पौष वद ३० उत्तरापाढा पूर्वाषाढा . १२ अपाढ वद ३० पुष्य पुनवम | अद्र १
दशवा पाहुडे का छठा अंतर पाहुढा *
4980
48
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र अनवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
प्रथम संवत्मर.
L.भा. भान
१ श्रावण वदी ३०/१४६४८१ पूष्य
६.०१६६,
.....
२ भाद्रपद वदी ३० ४४२११८पूर्ण फाल्गुनी ६६६६ | ४५ ४५८,१४ उत्तराफाल्गुनी ४२६, २ ३ अश्विन बी ३०/७३ ५५० उत्तराफाल्गुन
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४ कार्तिक वदी ३० १९३२०२० स्वाति
१८५ १०४,९१२ विशाखा ६मगशर कमी०५३२४५२ अनुराधा । १३५१३३२४४२ जष्टा । ६ पोरकी ३० १६२११२२ मूल०४७ | १६५ १६३१०१० पूर्गप ढा ७ महादी ३० १११.४उत्तरापढा४२०
१९५११२२२४० अभिजित
3300, vv ccc
फाल्गुनदी ३.२२११०२४ घनिष्ट
200 "२२५ २०१८ अनमिया १६०
पूर्वाभाद्रपद ९ चैत्र बी ३० २५ २५६ उत्तर द्रपद |
२.५ २५१२६३८ उत्तराभाद्रपद ३७३६ १० वैशाख वदी ३० २८०/१७२६) रेवती
२८५२८१४१२/६/ अश्विनी २८ ११ ज्येष्ठ वदी ३० ३.१२१८ कृत्तिका २४४५६
। ३१५३१०२७३६, रोहिणी ११/४/ १२ अशाढ वदी ३० ॥३३१/१६२८ मृगशर १८४२१५४
। ३४५ ॥३४०१३। ४। अदा ०५१ angelnkleusehren Benie
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द्वितीय संवत्सर
पर्व। मांस तोयी
युग
नक्षत्र
१३. श्रावणवदी ३०३६८० ६० पूर्नबमु १२३७५३ १४
३७५२४१२८३४ पुष्य १६५६१४१४ १४ भाद्रपद वदी ३०३९८१५३० मघा १३२५२१५
४.
५ ३१११४ २पूर्वा फाल्गुनी | ६१५१५ १५ आशा वही ३० उत्तराफाल्गुनी २४३४१६१६
४३५४२८२२३२ उत्तगफाल्गुनी ४४ ४१६१६ १६ कातिक वदी ३:४५७१४३२ चित्रा २०२२५२१७
४६५ ४२८१५० साति |दा ९१७११ १७ मारव ३०४८७२२२ विशाखा ८.७४११८
1. ४१५ ४८८ . अनुराधा १११४१८१८ १८१५ वी ३०५९६१३३४ मळ२०१२४८१९
। ५२५ ५१५१५६० पूर्वापाढा २१९.१९११ ११ माघ । ३०५४६२८ ४ उत्तरापाढा ८५४२०२०
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२० ५५ ५४७ १२८ उत्तरापाढा ३८२४२०२०
। फल्गु नदी ३०५७५१२३६ धीटा २९७ ५२२ २१. १८५ ५.६१६५८. शताषा -1. ४६२२२
चित्र दी ३०६०५२७६ पूर्ण भाद्रपद १८२२४४२३ २२ ६.
५ ६६,२२६ उत्तरः भ पद ११ ९२३२३ वैश ख पदी ३०६:४७१३८ रवति २७१७४३२४
६.५ ६३५१७५६ अश्विी २१४२४२४ २२ ज्यत दी ३०६२४२६८ भरणी ६१२४२२५
. ६५ ६.० ३२४ कृत्तिका २३१२२५,२५ ४ अपार दी ३०६०३३१०४० रोहिणी १५५४१२६
७५ ६९४१८५४ मृगशर १४२४२६२६
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.तृतीय संवत्सर.
मास तीथी
| दिन
नक्षत्र
महत
ग६५ न.मास
२५ श्रावण बदी ३० ७२३२८/१० पुनम
५५/०७२७
७५ ७२४१२ पर्वमु
३५२२२७२७ २६ भाद्रपद वदी: ७.२ ९४२ अश्लेषा १७.२३१२८
११३४२८२८ २७ आश्विन वदी० ७८२२४१३ पूर्वाफल्गुनी ५१५४३८,२९
७९५ ७८३ ५२० उत्तराफ लागी१७३९२९/२९ २८ कार्तिक वदी ३०८५१८५४ हस्त २०१०९३७३०
८१२२०५० चित्रा ८४४३०३० २२ मगर वी ८४१२३१४ विशाखा ०५७१३१३१
८४२६१८, विशाखा
३०प्र०पौष वदी ३०८७०/७४६ अनाया
८७१२१४८१ ज्या
१५००३२.
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३१ द्वि०पोषकदी ३०/९००२२/१६ पूर्वापाढा २७३४/३४३३
९.५ २०१७१६ उत्तरागढा ११९९३३३३ ३२ महा वर्ना २०१२२६८ अपिल ६५४३२/३५
३३ फागुण की ३०९.१२०१८ शतानमा १४/४९३१३६
१.७५ १६०८/१४ पूर्वाभाद्रपद १४४४३६३६ ३४चत्र नदी ३०/९८० ५५० उत्तराभाद्रपद २३४४/३:३७ , १.५ ९८८१२३४४/रेवात
३७३७ ३० पेशाव वदी ३.१०१२०२० अश्विनी १७३९/२१३८
३६ ज्येष्ठ वदी २०१८४७४२ रोहिणी
१०६५१४४८२४,४२ रोहिणी ३७ आपाड बदी ३०१०७७११९२२। मगर
१०७८१०१० आर्द्रा
| | पुनर्वसु
३२७३९ग३१ ३२५२३९३९
५२२२७४० १०००४०
९/२१४०४०
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चतुर्थ संवत्सर.
मास तीथी
नक्षत्र
३J11
माग६७ नक्षत्र मास
३८ श्रावण वदी ३०/५१०६ ३५४ पूष्य २०२४२६४१
११२५ १०७८५४० अश्लेषा | ७४१४१ ३९ भाद्रपद वदी ३०११३६१८२४ मघा ८१९२८४२१
११७५११३७१११८पूर्व फाल्गुन २१ १२४२४२] ४० अश्विन वदी ३०/५१६५ उत्तरा फ ७१.४२४४४३
५१८५११६२००८ल १२१७४३४३ ४१ कतिक वी ७०५१:०१७ चित्रा
१५५४४
४२ मगशर नदी ३०१२२४१
पिशाखा
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.४३ पोर कदी ३०१.२५४१६२८
मत्र' १३६११४
४४ माघ वदी ३०१२८३ जनगपाडा २२५६२०४७
१३.
५ २८४२८ अपिजत ६३७४७४८ ४५ फाल्गुन वदी २०५३१३१५६ शनिधी २६१.४१.८४१)
। १३३५३ १४ १.४ २ शतभिशा ३५७१९४९ ४६ चैत्र बदी
भाद्रपद ५११७ | १३६५३४३२९३मरा भाद्रपर २४२.५०५० ४७वैशाख वदी ३०/३७०४३२ रेती a as
१३१५१३७:१६ अश्विनी १५.७८१५१ ४८ ज्येष्ठ वदो ३०/१४०२२१२१ कविका
.'४९ अशाढ वदी ३०१४३११३३४
। १४५८ १४३२१५६० मृगशर
०६१४५३ २७३७१८३५३
१.९९
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________________
न
न. मासा
पंचम संवत्सर - मास तिथे या नक्षत्र ५० श्रावण वदी ३०२४६१२८ ४ पुनर्वसु
| १४८५ .४६२ १२८ पुष्य ५१ भाद्रपद वी ३०.४१०१२३६ अश्लेषा ४४६१२५५
। १५१५१४१११६५८ मघा २४४७५२.५ ५२ अश्विन वदी ३०१५२०२७ ६ उत्तर फाल्गुनी २०५६५६
गया १५४५१५२१ २२६ उत्तराफाल्गुनी ३०५२५६.०६ ५३ कार्तिक वदी ३० १५४९११३८ हस्त
१५७५ १५५०१७५६ चत्रा १५७८७५७ ५४मृगशर वदी ३० १५११२६ विशाखा १३३०५८/५८
१२६१०७
०५६ चत्रा
|THAT
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२२४१ ५/६२ १३६ ४६३
१६०५ १५८० ३२४ विशाखा ४३ ०५८५८ ५८पाष मदा ३० ६०८१०४० ज्यष्ठा १०२६ ८५१
१६३५ १६०११८५४ मूल १९८५१/५९ ५६माघ बंदी ३०, १६३८२५.० पूर्वाष ढा | ४२१७६०
१९६५ १६३९ ४२२ उत्तराषाढा २५१०६०/६० ५७ फाल्गुन वदी ३०१६६० १४२ श्रवण
| १६१५ १६६८ ११५२ धाटा ५८ चैत्र वदी ३० ।१६९७२४१२ शतभिषा ।
। १७२५ १६१८ ५।२० पूभि द्रपद ७५७६३६२ ५२वैशाख वदी ३० १७०६, ८४४ उत्तरभाद्रपद १.३० ३,६४
। १७५५ १७२७२०५०चिति ११०४४६४ ६० ज्येष्ठ वदी ३० ७५६२३१४ अश्विनी ४२६ २६५ | १७८५१.७५७ ६१८ भरणी
| कृत्तका
२०२१ १६६
६१५० अपाढ वदी३.१७८५, ७४६ रोहिणी
१८१५७८६२११४८ मृगशर ६२/द्वि.अषाढ वदी ३०१८१५२२१६ आ
१८४५ १८१६, ७१०/पुनर्वस
७१६ ०६७ २२१६ ८६७
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अर्थ
14मस चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र-षष्ठ उपाङ्ग 42
ता कहते सन्निवाते आहितेति वदेजा ता जयाणं साक्ट्री पोणिमा भवति, तयाणं माहि अमावामा भवति, जाणं माहि पग्गिना भवति. तयाण सावली अमावासा भवति.जयाणं पोटुवतीणगेणिमा भवति,तयाणं फगुणी अमाव तः भवति जयाणं फरगुणी पुण्णिमा भवति तयाण पोटुवति अमावासा भवति॥जयाणं असोइ पण्णिमा भवति तयाणं
चेति अमावासा भवति, जयाणं वेत। पुगिमा भवति, तयाण असोइ अमावासा भवति, है अब दशवे पाहढे का मानवा अंतर पाहडा कहत हैं. अहो भगवन् ! आपके पत में सत्रिपात कैसे कहा ? अर्थत् पूर्णमा अमावास्या नक्षत्र योग आश्री कैसे कही? अहो शिष्य ! व्यवहार नय मे जो तीन नक्षत्र श्रावण मास की पूर्णिमा को होते हैं, वे हीदीन नक्षत्रों पाव पाम की अमावास्या को होते हैं, जो दो नक्षत्रों माघ मास की पूर्णिमा को होते हैं वे ही नक्षत्रों श्रावण मास पूर्णिमा को होते हैं, जो तीन में से कोई भी नक्षत्र भाद्रपद मास की पूर्णिमा को होने हैं वे ही तीन नक्षत्रों में से कोई भी फल्गन मास की अमावास्या को होते हैं. और फालान पास की पूर्णिमा को जो दो नक्षत्रों में से कोई भी होते हैं। वे ही भाद्रपद मास की अमावास्या को होत हैं अश्विन मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होते हैं वे चैत्र मास की अमावास्या को आते हैं और जो चैत्र मास की पूर्णिमा को होते हैं वे ही अश्विन मास की अमावास्या को होते हैं. कार्तिक पूर्णिमा को जो नक्षत्र होते हैं वे ही पैशाख मास की अमावास्या को
4242 दशवा पाहुड का सातवा अंतर पाहूडा 420
|
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२०२
4 अनुावदक-सलब्रह्मचारी माने श्री अमोलक ऋषिजी -
एवं कत्तियविसा हियायेय मगसिरिए जेट्ठामूलीयेय ता जयाणं पोसि पुष्णिमा भवति तयाणं असाढी अमावासा भवति, जयाणं असाढी पुण्णिमा भवति,
तयाणं पोसि अमावासा भवति॥इति दसम पहुडस्स सत्तमं पाहुडं सम्मत्तं ॥१०॥७॥ आत है और जो वैशाख मास की पर्णिमा को होने हैं. वे कार्तिक मास की अमावास्या को आते है. मृगशर मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र हाते हैं. वे ज्येष्ठ मास की अमावस्या को आते हैं और जो ज्येष्ट मास की अमावास्या का होते हैं वे प्रशार की पूर्णिमा को आत हैं. जो पाप मास की पूर्णिमा को नक्षत्र आते हैं वे आपाढ अमावास्या को आत हैं और उनो अपर अपरावास्या को आते हैं ये पौष पूर्णिमा को आते हैं. यह दरावा पाहुडे का सातवा अंतर पाहुडा संपूर्ण मा ।। १० ।। ७ ॥
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवस हायजी ज्वालाप्रसादजी
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4280
मास
कुलोपकुल
उपकुल
कुल नक्षत्र
मास
--
अभिच शतभीषा
488+ सप्तदश-चंद्रप्रति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 42200
श्रावण शुदी १५ भद्रपद शुदी १५ अश्विन शुनी १५ कार्तिक शुदी १५ मृगशर शुदी १५ पौष शुदी १५ माह शुही १५ फाल्गुन शुद्धी १५ चैत्र शुदी १४ वैशाख शुदी १५ जेठ शुदी १५ आशाड शुदी १५
श्रवण धनिष्ठा पूर्वाभाद्रपद उत्तरा भाद्रपद रेवति
अश्विनी भरण कृनका गहिणी मृगशर पुनर्वसु अलपा मघा पूर्णफाल्गुनी उत्तरा फाल्गुनी हस्त
चित्रा स्वानि विशाखा ज्येष्टा पूर्वाषाढा उत्तराषाढा
माघ वदी ३० फल्गुन बदी ३० चत्र वदी ३० वैशाख वदी ३० ज्येष्ठ वदी ३० आशाड वदी ३० श्रावण वदी ३० भाद्रपद वदी ३० आश्वन वदी ३० कार्तिक वदी ३० मृगशर वदी ३० पोप वदी-३०
दशवा पाहुडे का आठवा अंतर पाहुडा-40882
अनुराधा
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श्री अमोलक ऋषिजी +
ता कहते णक्खत्ते संट्ठिति आहिनेति वदेजा ? ता एएसिणं अट्ठाविसाएं णवत्ताणं अभिए णक्खत्ते गोसियावाल संठिए पण्णत्ते ॥ १ ॥ सवणे णखते काहार संठिए पण्णत्ते ॥ २ ॥ धणिट्टा गक्खते सउगी पलिग संठिए प • ॥ ३ ॥ सनभिसया णक्खत्ते पुफोरयार संहिए पण्णत्ते ॥ ४ ॥ एव पुन्वभवया णक्खत्ते उत्तरभद्दवया णक्खत्ते अडवः वि सठिए पण्णत्ते ॥ ५ ॥ ६ ॥ रेवति नक्खचे नावा सठो ॥ ७ ॥ असिणि आसक्खंधग संठिए ॥ ८ ॥ भरणि णक्खत्ते भगसंठिए पत्ते ॥ ९ ॥ कत्तिया पक्खत्ते बुरघरग संठिए ॥ १० ॥ रोहिणि णक्खत्ते
अव दशा प डडे का अठा अंतर पहूडा कहते हैं. अहो भगवन् ! आपके मन में नक्षत्र के संस्थान किस प्रकार के हे हैं । को? अहो शिष्य ! इन अठ्ठावीस नक्षत्रों में से १ अभिजित नक्षत्र गोशंग के आकार स है. आपण नक्षत्र कावड के आकार से है, धनिष्ठा नक्षत्र पक्षी के पीजर के आकार से
४ शतभिषा नक्षत्र पुष्प पेच र अर्थात् पुष्प की राशि के आकार से है, २.६ पूर्वाभाद्रपद व उत्तरा भद्रपद दोनों नक्षत्रों अर्थ वावडी के आकारवाले हैं, ६६७ रेषति नक्षत्र नात्रों के साकार से है, 8883 ८ आश्विनी नक्षम अश्वस्कंध के आकार से है, . भरणी नक्षत्र स्त्री की योनि के आकार से है, . १. कृतिका नक्षत्र
•प्रकावक-राजाबहादुर लामा मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रमादर्ज .
अर्थ
42 अनुवादक-नागवार
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1. सगड संठिते पण्णत्ते ॥ ११ ॥ मगसिर ण खत्ते मिगसीसावलि संठिते पण्णत्ते
॥ १२ ॥ अदाणं रुहिर विंदु सठिए ॥ १३ ॥ पुण्णवसूणं तुलासंठिते ॥ १४ ॥ पसेणं बद्धमाणग संठिते षण्णत्ते ॥ १५॥ असेसाणं पडाग सठिए पत्ते ॥॥१६॥ महाणं पागार संठिए पणते ॥ १७ ॥ पवाफग्गणीणं अद्धपलियंक सठिते पण्णत्ते ॥ १८॥ उत्तरावि एवं ।। १५ ।। हत्थे हत्थ संठिते पण्णत्ते ॥ २० ॥ चित्ताणं महफलंग संढिते पण्णत्ते ॥ २१ ॥ सातिणं खीलग संढिए पते ॥ २२ ॥
विसाहाणं दामाण संठिए पण्णत्ते ॥ २३ ॥ अणुराहा णखत्ते एगावलि संठिते + गृह के आकार से... रोहिणी नक्षत्र शकट अथवा रथ की धूरी के आकार से है.६५६१२ मृगशर
1 मस्तक के संस्थान से ७७,१३ आद्र नक्षत्र रुधिर बिन्दु के सस्थान सं.है..पुनर्वसु नक्षत्र चूला संस्थान से है पूष्य नक्षत्र वर्धमान के आकारसे है,७१६ अश्लेषा नक्षत्र धजा पताकाके आकारस 368१७ मघा नक्षत्रपाकारके आकार से
है १८पूर्वाफाल्गुनी अर्ध पल्यंकके संस्थानसहै ७१९ उत्तरा फाल्गनी अर्थ फ्ल्यंक के आकारसे है • ७२० हस्त नक्षत्र हथेलीक संस्थान स २१ चित्रा नक्षत्र हुडे * कूल संस्था से है. २२ स्वाति नक्षत्र खीले के संस्थान से है, . २३ विशाखा नक्षत्र सुादामणी ।
श चंद्र प्रज्ञप्ती सूत्र षष्ट-उपार
मना पाहुइ का आठवा अंतर ५.हुडा
*
...
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-
त्र
२०६
47 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
पण्णत्ते ॥ २४ ॥ जेट्टा तक्रवत्ते गयदंत संठिए पत्ते ॥ २५ ॥ मुले मक्खत्ते विच्छुपलगोल मंठिने ॥ २६ ॥ पुवा गाढा णवत्तेय पविकम सांठते पगते ॥ २६ ॥ उत्तराभाढा पक्खत्ते सीहाणीसाति संठिते पण्णत्ते ॥ इति दसमस्स अट्रम पाहड मम्मत्तं ॥ १० ॥८॥ x
+ ता कहते णक्खत्ते तारगा आहितेति वदेजा ? ता एएसिणं अट्ठाविसाए णखत्ताणं अभिए णखत्ते तितारे पण्णत्ते ॥ १ ॥ सवणे पक्खत्ते तितारे पण्णत्ते ॥ २ ॥ धभिट्टापंचतारे ॥ ३ ॥ सयभिसया दपतारे ॥ ४ ॥ पुषभदवया दुतारे ॥॥
उत्तरभद्दवया दुलारे ॥ ६॥ खेति बत्तीस तारे पण्णत्ते ॥ ७ ॥ भस्मिणि तितारे संस्थान से २४ अनुराधा नक्षत्र एकावलि के संस्थान है : २ ज्येष्ठा नक्षत्र गजदंतके आकारसे है.२६मूल नक्षत्रविच्छ के आकार से है. ६७२७ पूष हा नक्षत्र स्वीकी च ल के का
२८ उत्तराषाढा नक्षत्र बैठे सिंह, आकासे काय डडे . अठ.. श्राप प्रमा र अब नववा अंतर पाहुडा कहते हैं. अहो भान् ! आप के प्रत में नक्षत्र के तारें कितो २ कह हैं ?
अहो शिष्य ! उक्त अठावीस नक्षत्रो में से . अभिजित के तीन तारे, २ श्रवण नक्षत्र के तीन तारे, १३ धनिष्टा के पांच तारे, ४ शतभिषा नक्षत्र के १०० तारे, ५ पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के दो तार, ६ उत्तरा
rammaromanmmmmmmmmmmmna
मानक-राजावहादुर लाला मुखदवसहायजी
Anirurammar
सादजी.
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+ सप्तदश चंद्र प्रतिसत्र-पष्ठ उपाङ्ग 4
पणत्ते ॥ ८ ॥ भरणि तितारे ॥ ९ ॥ कत्तिया छ तारे ॥ १० ॥ रोहिण पंचतारे ॥ २१ ॥ मिगसिरे तितारे ॥ १२ ॥ अदा एगतारे ॥ १३ ॥ पुणवसु पंचतारे ॥ १४ ॥ पुस्से तितारे ॥ १५ ॥ असलेसा छत्तारे ॥ १६ ॥ महासत्ततारे ॥ १७ ॥ पुवा फग्गुणी दुतारे ।। १९ ॥ एवं उत्तराधि ॥ १९ ॥ हत्थे पंचतारे ॥ २०॥ चित्ताणं एगतारे ॥ २१ ॥ सातिणं एगतारे ॥ २२ ॥ विसाहाणं पंचतारे ॥ २३ ॥ अणुराहा चउतारे ॥ २५ ॥ जेट्ठा तितारे ॥ २५ ।। मूले गक्खत्ते
एगारसतारे ॥ २६ ॥ पुव्वासाढा चउतारे ॥ २७ ॥ उत्तरासाढा णक्खत्ते चउतारे माद्रपद के दो तारे, रेवती के बर्तस तारे, ८ अश्विनो के तीन तारे, १ भरणी के तीन तारे, १० तका के छ तारे, " राहिणी के पांच तारे, १२ मगशर के तेन तार, १३ आर्दी का एक तारा
पुनर्वसु के पांच तारे, ५५ पुष्य के तीन तारे, १६ अलपक छ तरे, १७ मघा के सान तारे. १८ पूर्वाफाल्गुनी के दो तारे, १९ उत्तरा फाल्गुनी के दातार, २० हमके पांच तारे, २१ चित्रा का एक तारा, २२ साल का एक तारा, २३ दिशाखा के पांच तरे, २४ अनुराधा के चार तारे. २५ ज्येष्टा के तीन तार, २६ मूल के अग्यारह तारे, २७ पूर्वाषाढा के चार तारे और २८ उत्तराषाढा नक्षत्र के चार
दशवा पाहुहे का नवधा अंतर पाहुडा
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सारमा
षण्णत्ते ॥ २९इति दसमस्स पाहडस्से नवम पाहडं सम्मत्तं ॥.. ॥ ९ ॥ ता कहं ते णेया आहितेति वदेज्जा,? ता वासाणं पढम मासं चत्तारि णक्खत्ता अति
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी
तारे. यह दशवा पाहुडा का नवधा अंतर हडा संपूर्ण हुवा. ॥ १० ॥ ९ ॥ है अच दशया अत्तर पाहुडा कहत है. अहो भगात ! शाप के मत में कौन २ से नक्षत्र अहोरात्रि संपूर्ण करे ? अहो शिष्य वर्षाकाल के प्रथम म.स अर्थात श्रावण मास में चार नक्षत्र अहरात्रि संपूर्ण में करे जिनके नाम-१ उत्तराषाढ २ अभिजित श्रवण और ४ धाना. उत्तर पाढा च उदह अहो रात्र संपूर्ण करे अर्थात् श्रावण वदी १ मे श्रावण वदी १४ पर्यंत, अभिजित नक्षत्र ७ अहोरात्र संपूर्ण कर अर्थत् श्रावण वदी ३० स प्रावण झुदी ६, श्रवण नक्षत्र अठ अहो रात्रि संपूर्ण करे अर्थत श्रावण शुदी मे १४ तक और धनिष्ट एक अहो रात्रि संपूर्ण कर, अर्थात् श्रावण शुदी ९५ की रात्रि संपूर्ण कर. उक्त चार नक्षत्रं श्रावण मास संपूर्ण कर. चार अंगुठ पुरुषछाया में सूर्य परिभ्रमण कर. श्रावण मास की प्रथम अहोरात्र वदी प्रतिपदा से प्रतिदिन एक २ मंडल पर चलता हुवा मर्य उस मास के चरम दिन अर्थात् श्रावण शदी ५ को दो पांव और चार अंगुल की पौरपो हावे. ॥ १ ॥ अहो , भगवन् ! वर्षाकाल के दूसरे मास में कितने नक्षत्र अहोरात्रि संपूर्ण करे ? अहो शिष्य ! दूसग भाद्रपद मास में चार नक्षत्र अहोराचि संपूर्ण करे. जिन के नाम १ धनिष्ठा २ शतभिषा ३ पूर्वाभाद्रपद
mmmmmmmmmmmmmmmmmmmanamam
भनुपदक-बालब्रह्मचारामुनि श्री अमाकाषजी
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मश चंद्र प्रज्ञा सूत्र पष्ठ उपाङ्ग
तंजहा-उत्तरास ढा. अभिए, सणे धणिट्रा ॥ उत्तरासादा खते चउदस अहोरते.
णत, अभिये पक्खत्ते से अहोरात ॥ २ ॥ सवणे नक्खत्ते अट्र अहीरत्ते। और ४ उत्तम दाद, इमी अभिलाप में जैम दीप प्रज्ञप्ति में कहास ही कहन. यावत् शब्द में पुरुप छ या पाप शदी ५५ पर्यंत चार अंगुरु प्रतिमास वृद्धि पाप मा बदी १ सस नक्षत्र ३ दिन.
अउ शुभी १५ तर पुरुष श्रावण । समाप४ अ.भव
टाछप प्रति स चार अंगुल भाद्रपद धीमा १४ शत भाजपा मा०८ उचगभा१
॥ आश्चन । उत्तरापटप १४ ता १० वी १ कार्तिक | अचिनी
सर्य का मंडल शी १५ मुगशर
कृतिका हेंणा १५ मार . . चरन समय में ममचतम -
मृगशर १४ अ ८ पुनर्वसु ७ पुष्य १ स्थान वाला होता है.. १५. महा ९-४ अश्लपः मघा
पछि न्यग्रोध पर मंटल मधा १४पूर्वाफा.१५ उत्तगफा०१ उत्तराफाल्गुनी१४ हम १० चित्रा ?
संस्थान वाला होता। पैशाख । चित्रा १४ स्वाति १० शिखा ,
काया सात मनोहर मान विशाखा १४ अनुग्ध ८ ज्येष्टा ७ मृत ' प्रमाण सहित पुरुष १ | माड मुल १४ पूर्वाषाढ १५ उत्तराषाढा
६ पौष
पुण्य
पाहुडा 43
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सत्र
अर्थ
अनुवादक बाल जरी मुनि श्री अमालक ऋषिजी
मेति ॥ ३ ॥ धणिट्ठा मक्खन्ते एगं अहोरते णेति ॥ तो चणं मासंसि चउरंगुल पोरसिए छायाए सूरिए अणुपरियह त तस्सणं मासस्स चरमदिवसे दे पायाणि चारि
छाया
अशा
की ह
की प्रतिदिन मांडले २ पर हानिवृद्धि करना हुआ म. शुदी १५ को दो पांव से पैौरमी होवे. यह व्यवहार नय से कहा परंतु नित्रय व्यत तीस अहोरात्र में चार अंगुल की हानि वृद्धि होने और चंद्रनाथ एवर वृद्धि होने. इस कथन को पूर्वाचार्योंने गाथा से बनालाय है सो कहते हैं. गया-पत्र पर गणे तिहि । हिए पास अयये ॥ छभित्तं । जलतं त्राण हि ॥ १ ॥ जं होइ विस लहाँ । दक्ख मरण इनिज णायचं ॥ अ हवस लद्धं । णायनं उत्तर अयणं ॥ २ ॥ अथणे गय तिथि रासी ।
चउगुण पञ्चपायें भगमे ॥ जलद्धतं गुलाणीया । खयं बुद्धाय पोरीएओ || ३ || दाहिण वृड्डी दु पयाओ | अंगुलाणं तुडोइ नायव्यो । उत्तर अयणे हाणी कायच्या चढाई पायादि ॥ ४ ॥ सवण बहुल पडिया | दुपाया पोरमी धूया ॥ चतरि अंगुताइ । मासेण बहुए ततां ॥ ५ ॥ इक्कती ड भागा तिहिए । पुण अंगुलस्स चत्तारि ॥ दाहिण अपणे बुड्डी । जाब चत्तारि पयाई ।। ६ ।। उत्तर अपणे हाणी । चडा है। पाया जात्र दो पया ॥ एवं पोरसी होइए । वुड्डी खयादोति णायव्त्रा || ७ || बुड्डी वा हाणी णायव्त्रा ।। जावइया पोरसीए दिह्रो भो । ततो दिवनगएणं । जं लद्धं तत्त अवणगयं ॥ ८ ॥ इत का अर्थ-युग में {
• बरु राज उदुर बाथ सुखदेवसहायजी ज्यालाममादजी •
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अ
++
समास-सूत्र षष्ठ उ
अंगुलाति पोरिसि भवति ॥ १८ ॥ वासाणं बितियं मासं कति णक्खसा पेति ता चत्तारि णक्खत्ता णेति तजहा धणिट्टा, सतभिसया, पुव्त्रभद्दवया, उत्तरभद्दवया एवं एणं अभिलावेणं जहेब जबूद्दीत्र पण्णत्तीए, तब एत्यपि भाणियव्वं जाव
॥
पत्र में जो तिथि को पौरसी छाया जानने की इच्छा हो यह उनका अंक रखना, जो आंक आवे उसे पनरह से जितनी तिथि गइ होवे उतनी मिलाना. अब अयन के १८३
मंडल हैं, उन में चंद्र की तिथि ४८६
हो, इस से आये हुये आंक को १८६ से भाग देना, और जो भाग का अंक हो उसे सम्यक् प्रकार से जानना || १ || यदि विषम आंक अर्थात् १-३-५-७-१ आये और शेष रह जाये तो दक्षिण अयन पूर्ण कर उत्तरायण वर्तती है, और सम आंक २-४-६-८-१० आने और शेष रहे तो उत्तरायण पूर्ण होकर दक्षिणाय जानना विषयक आव और शेष रहे नहीं तो दक्षिणायन जानना. और उत्तरायण जानना भोग देने लब्धांक कुच्छ भी आवे नहीं रहे तो दक्षिणायन जानना || २ || जो शेष राशि रहे वह अयन की गत तिथि जानना. उसे चार गुना करना और पर्व के चतुर्थ भाग से भाग देना. उस में जो लब्धांक आवे सां अंगुल और शेष रहे सो [ भाग. इस तरह पौरसी की क्षय व वृद्धि जानना || ३ || दक्षिणायन में पुरुष छाया का दो पांच ऊपरसे
सम अंक आवे और शेष राशि
तब पूर्व युग की आदि से जितने प गुणाकार करता. और
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* दशवा पाहुडे का दशवा अंतर पाहुडा
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२१३
13 तास चणं मासंसि बड्डीए ॥ ४ ॥ समचउरंस संठियाए गोह परिमंडलाए सकाय. सत्र
मणुरंगिणीए छायाए सरिय अणुपरियति तस्सणं मासस्प्त · चरमदिवसे लेहट्ठावि वृद्धि होती है. और उत्तरायण में चार पांच में हानि हेली है. ॥ ४ ॥ श्रावण मास की प्रथम प्रतिपदा अर्थात् युग आदि व श्रावण माम के आग दिन यम के अंत अपड शुदी १५ को दो पांव की पौरुषः हाने, तत्पश्चात् प्रतिम स क अंत में चार २ अंसल की वृद्धि हवे. अर्थात श्रवण शुदी १५ कोई दो पांच और चार अंगुल की पौरपी हाव ॥ ७ ॥ एक निधि में ए नाये चार भाग की दक्षिणायन में वृद्धि करना, इस तरह वृद्धि करत चार पांव तक बहाना ॥६॥ उतरायन में चार पांव से दो पांच नक प्रत्येक निाथ को एकतापीए चार भाग को हानि करना. इस विधि स पारपी की हानि वृद्धि जानना ॥ ७॥ इस तरह पौरपो की हानि बद्ध कही. अब अयन में शेप गये पीछे अर्थात् जा लव्यांक आवे बह युग में अयन गय हर जानना ॥ ८ ॥ एक अयन में चंद्र तिथि ८६ हावे और १८६ तिथि में हानि वृद्धि ३४ अंगल की हो. इस तरह होने स एनिधि कि हानि वृद्धि हव? इम में राशि की स्थापना करना.५८६.२४.१. इम में अंश राशिका मर सशिम गणाकार करके
प्रथम राशि में भाग देना. अर्थात् २४४:२४१८६ इन का भाग नहीं चले. इस से छद भेद 12करना. अर्थात् २४को छ से भाम दना तो ४ घाव और १८६ को इा भाग देने मे ३१ आये. इससे एक
११ अनुवादक-बालबाह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदरमहायजी ज्वालाप्रमाद जी
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है. दोपयाति पोरिति भवति ॥ इति दसम पाहुडस्स दसम पाहुडं ॥ १०॥ .. ॥ *
it
चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र-पष्ठ उपा,
नीलिए चार भाग की एक २ तीथि में हानिवृद्धि होवे. दृष्टांत-पंचासी वे पर की पाची तीथी में कितन पांवकी पौरूषा होव? ८४ का १० ग्रमा करन २०. होय, इसमें पांच ताथी के पाच पिलाना जिस मे १२१८ होवे, उसे १८६ का भाग देने से का भाग हुवा, इसमें अयन व्यतात हुई. और 3 सातवी अयन के १.४१ दिन शेष रहे. सातकी अयन दक्षिणायन जानना. इस से १४९. तीथी को चार से गुणा करते ५९६ हुवे और उ.३१ का भाग देने ११ आया शेप७ रहा-इसे ११ अंगुल व एक तीमए ७ भाग की वृद्धि करना. इस में दो व मीलाने से तीन पाँच सात अंगुल व एकतीसए मात भाग की पौरूपी होये. यह दक्षिणायन जानना. यह दशवा पाहुडा कादशा अंतर पाहडा संपूर्ण हुआ ॥१०॥१०॥ अब दशवा पाहुडा का अग्यारह अंतर पाहुड कहते है. अहो भगान् ! आपके मत किस तरह चंद्र मार्ग कहा? अर्थात् सूर्य नक्षत्र रहित दक्षिण उत्तर प्रमर्ष कारी योग चंद्रमंडल गत परिभ्रमण रूप मंडल मार्ग कहा ? उत्तर-अहो शिष्य ! ऐस नक्षत्रो हैं कि जो सदैव चंद्रमा की माथ दक्षिण दिशा में: हए योग करते हैं. एने नक्षत्र हैं कि जो सदैव चंद्रमा की साथ उत्तर दिशा में योग करते है, अथ कितनेक ऐसे नक्षत्र हैं कि जा चंद्रमा साथ क्याचित् दक्षिण में रहकर काचिन् उत्तर में रहकर अथवा प्रमहर्षकार। अर्थत् चंद्रमा नक्षत्र भेद कर योग करे, कितनेक नक्षत्र ऐसे हैं कि जो सदैव दक्षिण
दशा पाहड का इग्यारवा अंतर पाहूडा 48
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ता कहते चंदमग्ग आहितति वदेजा ? ता ए सिणं अट्ठाविसाए गक्खत्ताणं अत्थि
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दिशा में रहकर योग करते हैं अथा प्रमहर्ष कारी-अर्थात् चंद्रमा उस नक्षत्र को भेद कर योग करे और कितनेक नक्षत्र ऐसे हैं कि जो चंद्र की साथ सदैव पपहर्ष करी योग करे अर्थात् चंद्रमा उस नक्षत्र को भेद कर योग करे. अहो भगवन् ! इन अट्ठावीस नक्षत्रों में से कौनसे नक्षत्र मदैव दक्षिण दिशा में रहकर योग
करे यावत् कौन से नक्षत्र दक्षिण दिशा में अथवा प्रपहर्ष कारी योग करे कौन से नक्षत्र सदैव प्रमहर्ष 5कारी योग करे ? इन अठ्ठावीस नक्षत्र में से जो नक्षत्रों सदैव दक्षिण दिशा में रहकर योग करते हैं वे छ
नक्षत्र हैं, जिनके नाम-१ मृगशर ३ आई ३ पूष्य ४ अश्लेषा ५ हस्त और ६ मूल. ये ६ नक्षत्रों चंद्रमा के पास मंडल व अपने ठिये मंडल पर चलते हुए चंद्रपा की साथ योग करे. अब जो नक्षत्र सदैव चंद्रमा की उत्तर दिशा में रहकर योग करते हैं ये बारह नक्षत्र हैं जिनके नाम १ अभिजित २ श्रवण ३॥ धनिष्टा ४ शतभिषा ५ पूर्वाभाद्रपट ६ उत्तगभद्राद ७ रेवति ८ अश्विन १ भरणि १० फागुन ११ उत्तरा फाल्गुनी और १२ स्वाते. ये पारह नक्षत्रो चंद्र के प्रथम मांडले व सत के जयप पांडर पर चलते हुए चंद्रमा की साथ उत्तर दिशा में रहकर योग कम्त हैं, इन अट्ठास नक्षत्रों में स एसे नक्षत्र हैं
कि जो दक्षिण दिशा में रहकर अथवा उत्तर दिशा में रहकर अथवा प्रमहर्ष करी अर्थात् नक्षत्र भेद करे 12योग करते हैं, वे सात नक्षत्र हैं जिनके नाम-१ कृत्तिका, २ रोहिगी ३ पुर्यमु. ४ मा ५ चित्रा ६)
जवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
.प्रकाशक-राजाबदुर सिल सुखदनमहाय। आलाप्रसादजे .
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क्खत्वा जेणं जक्खत्ता सया चंदस्स दाहिणेणं जोगं जोएति ॥१॥ अस्थि-ई
षष्ठ-उपाङ्ग +
विशाखा और ७ अनुराधा. उक्त मान नक्षत्र अपने २ मांडले पर चलते हुए चंद्र की साथ उत्तर दिशाई में रहकर अथवा दक्षिण दिशा में रहकर अथवा नक्षत्र भेद कर योग करते हैं. इन अट्ठारीस नक्षत्र में
से ऐसे नक्षत्र हैं कि जो दक्षिण दिशा में रहकर अथवा प्रमहर्षकारी नक्षत्र भेद कर योग करते है वे #दो हैं जिनके नाम-पूर्वाषाढा ब उत्तराषाढा. सव से बाहिर के मांडले पर योग युक्त होकर जो योग करते हैं
उन को चार २ तारे कहे हैं, जिन में से पूर्वाषाढा के क्षे तारे सब से बाहिर के परचे मांडले पर, और दो तारे सब से आभ्यंतर मांडले पर. अत्तराषाढा नक्षत्र के दो तार आभ्यंतर मांडले पर और दो तारे। बाहिर के मांडले पर. उक्त दोनों नक्षत्र सदैव दक्षिण दिशा में रहे हुवे अथवा नक्षत्र भेद कर योग करते हैं. इन अट्ठावीम नक्षत्राम से एने नक्षत्र हैं कि मो चंद्रमाकी साथ सदैव प्रमहर्ष कारी योग करो हैं, वह एक है. जिस का नाम ज्येष्टा कोई ज्येष्ठा नक्षत्र को दक्षिण उत्तर प्रप.पकारी रोग मानते ॥ १॥ अहो । भगवन् ! चंद्र के कितने मांडल कहे ? उत्तर-चंद्रमा के पनाह मांडले कहे हैं. जि .पांव मांडले जम्बूद्वीप और दश अंडले लवण समुद्र में चंद्रमा के प्रथम मांडले को अंदर का चरित एक सोई अस्सी योजन जम्बूद्वीप में अवगाहे और चंद्रमा के पनरहवा मांडले का बाहिर का चरिमांत लवण समुद्र वीन सोवीन योजन एकसटिए अहतालीस भाग अचमाई. इन पसरह मांडले में से ऐसे मांडलो है।
488 देवा पाहुडे का इग्यारवा अंतर पाहुडा
488+ सदश-चंद्रप्रज्ञाशा
...
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अथ
अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
कि जो नक्षत्रों से अधिराहते हैं अथाई उन पर सदैव नक्षत्र रहते हैं. ऐने भी मॉडले हैं कि जो सदै नक्षत्रों से विरह वाले हैं अर्थात् नक्षत्र नहीं आते हैं, ऐसे भी चंद्र मंडल हैं कि जहां पर सूर्य व चंद्र के मात्र सामान्य हैं. और ऐसे भी चंद्र के मंडल हैं कि जो सदैव सूर्य मंडल से विरह वाले हैं. अहो भगवन् ! इन पनरद्द चंद्र मंडल में से कौन से पंडल ऐसे हैं कि जो सदैव नक्षत्रों वाले है यावत् कौन चंद्र मंडल ऐसे हैं कि जो सदैव सूर्य मांडले से विरहित है ? इन पनाह चंद्र मंडल में में ऐसे आठ मंडल है कि जो सदैव नक्षत्रोंवाल है जिनके नाम-१ पहिले चंद्र मंडल पर बाहर नक्षत्रों हैं, २ छटे चंद्र मंडल पर एक नक्षत्र है, ४ सात चंद्र मंडल पर दो नक्षत्रों नक्षत्र है, दश चंद्र मांड पर एक नक्षत्र है, ७ अन्यार के चंद्र पन्नरये चंद्र मांडले पर आठ नक्षत्र हैं. इन पन्नरह चंद्रमा के मांडले विवाने हैं के सात हैं जिनके नमः १ दूसरा, २. चौथा, ३ तेरहवा, और ७ चौदहवा. इन पन्नरह चंद्र मांडल में से जो नक्षत्रों सूर्य होने से चार हैं. जिन के नाम १ प्रथम, २ दूसरा, ३ अभ्यारहवा, और पन्नरहवा. इन चार मांडले पर नृ शशी नक्षत्र के शिर है अर्थात् छत्र पर छत्र है. जो चंद्र मंडल सदैव सूर्य के मंडल से विहित हैं वे पांव हैं. जिनके नाम-१ हे चंद्र मंडल की सूर्य मंडल नहीं है, २ सात चंद्र मंडल नीचे सूर्य मंडल नहीं है, ३ आउने चंद्र मंडल नीचे सूर्य मंडल नहीं है, ४ नववे चंद्र मंडल गीचे सूर्य मंडल
रहा,
तीसरे चंद्र मंडल पर दो नक्षत्र है, ४, ५ आठ चंद्र मंडल पर एक मांडले पर एक नक्षत्र है, और में से जो नक्षत्र से सदैव पांचवा, ४ वा ५ चंद्र के नक्षत्रों समान्य
८
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प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी क्वालाप्रसादाजी ०
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प
नक्षत्र मंडल
| सूर्य मंडल
नक्षत्र मंडल
सूर्य मंडळ नक्षत्र मंडल
नक्षत्र
नक्षत्र
२२ चित्रा...
.
.
सप्तदश चंद्र प्राप्ति सूत्र षष्ठ-उपार्ने
१३
| उत्तराफाल्गुनी १ अभिजित
कृतिका -२ श्रवण .. . ३ धनिष्ठा
मृगशर
२० स्वाति . ४ शतभिषा
आर्दी
२३ विशावा पूर्वाभाद्रपद
पुनर्वसु
२४ अनुराधा ६ उत्तराभाद्रपद १ १५ पुष्य
२५ ज्येष्टा
अश्लेषा ८ अश्विनी . . १७/मघा
२७ पूर्वावाढा, १५ ५/ भरणि , १८ फाल्गुनी । । २८ उत्तराषाढा
नक्खत्ता जेणं अक्खत्ता सया चंदस्म उत्तरेणं जाग जोएति ॥ २ ॥ अस्थि । नहीं है ५ दश चंद्र भडल नीचे सूर्य मंडल नहीं है, और पहले के पांच व पीछे के पांच यो दश मांडले की सूर्य के मांडले रहे है. ॥ २॥ अब चंद्रमा के कौन से मंडल में और कितने भाम सूर्य
दशंवा पाहुड का इम्पारहदा अंतर हुडा
.
.
सूत्र
16
अर्थ
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-नक्खता जेणं णक्खता सया चंदस्स दाहिणेणवि उत्तरेणविपमपि जोयं ओएति॥३॥" अत्थि गक्खत्ता जेणं चंदस्स दाहिणेणवि पमपि जोगं जोएति ॥ ४ ॥ अत्थिण
क्वत्ता जेणं णक्वन्सा चंदस्स सया पमह जोग जोएति ॥ ५॥ ता एएसिणं अट्ठाविसाए णक्खत्ताणं कयरे णक्खत्ता जण सया चंदस्स दाहिणेण जोगं जोएति तहेव
जाव कयरे मक्खत्ता जेणं सया चदस्स पमहं जोगं जोएति ? एतेसिणं अट्राविसाए मंडल उपर होवे उस की विधि धनाते हैं. इस में प्रथम विकंप क्षेत्र की प्ररूपणा करते हैं. सूर्य का विकप
क्षत्र ५१० योजन का हैं. अब सूर्य एक २ अहोरात्रि में दो योजन व एकसठिये ४८ भाग विकंप Eक्षेष माप्त करे. इस तरह १८३वी अहोरात्र में कितने योजन प्राप्त कर ? इस मे तीन राशि की स्थापना
करना. एक अहोरात्र के विकंप के ६.ये माग करने के लिये दो योजन को ६१ ये से गुणाकार काना. जिम में १२२ होवे. इसमें ४८ मिलानेसे १७० होवे. ६१।१७०११८३ यों तीन धुवराशि हुई. यहां दूसरी राशि को नीसरी राशि में गुणाकार करके प्रथम राशे से भाग देना, और जो आ इतने योजन जानना. १७०x१८३३१११०+६१२१. योजन होवे. यह सूर्य का विकंप क्षेत्र हुवा. अब चंद्र का विकंप
क्षेत्र कहते हैं चंद्रमा को तीर्छ क्षेत्र ५१० योजन ६. ये ४८ भाग का है. इस में चंद्रमा के १५ मेडल |'चउदह अंतर हैं. १५ मंडल को ५६ से गुनना ८४० होवे, इस के योजन के लिये ६१ का भाग देना
अनुवादक-बालब्रह्मचारीमान श्री अमालक ऋापाज
कासक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी .
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+9
सदश चंद्र प्राप्ति सूत्र-पष्ट उपाङ्ग NRN
णक्खत्ताणं जेणं णक्खत्ता सया चंदस्त दाहिणेणं जोगं जोएति तेणं छ णक्खत्ता तंजहा. मगमिर, अद्दा, परलो, असेमा, हत्थो, मलो ।। तत्थणं जेते णक्खत्ता जेणं सया चंदस्त उत्तरेणं जोग जोएति, तेग बरस तंजहा• अभिए, सवणे. धणिट्रा
२१९ सयभिसया, पुनमहाया, उत्तरपट्टि ग्या, रेवति अस्मिणी, भरणी पुयाफग्गुणि, उत्तराफग्गुणी, साति ॥ तथा जत खत्ता जगं चंदस्त दाहिणणंवि उत्तरेणंवि
पमहवि जोग जाएति तणं सत्त तंजहा- कन्तिया, रोहिणी, पुणवसु. महा, चित्ता, इस से १३ योजल ६१ य ४७ भाग रहे, यह ५१८.४८ में से घना करना जिससे ४९७ योजन व १६१ या एक भाग रहा. इस को एक २ आंरे में पृथक् गिनने के लिये १४ का भाग देना इस से ३५ योजन ३० भाग ६१ ये और चार भाग साताये हुरे. अर्थात् एकेक मंडल पर ३५.३०-४ थोजन काई
आंतरा है. इसमें चंद्रमा के विमान ३१ये ५६ भाग मालाने से ३६.२५-४ योमन का एक २ मंडल है पर विकंप है. चंद्र का सर्व विकंप जानने की विधि. इस में तीन राशि की स्थापना करना. ३६ को ६१ गुरेका करके १५ मीलाना. फोर उस राशि को सात गुग कर के चार मीलाना. १६४०१२+२१९६+२५२२ १२१+७%D१५५४७+४-१५५५.. अब योजन करने को ६१ को सात गुणना. ६४x७८४२७० इम तरह ४२७.१५५५१+४, अब इस में दूसरी राशि को तीसरी राधि से गुणा करने के पहिली राशि
दशा पाहुडे का इग्यारवा
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विसाहा, अणुराहा ।तत्थणं जेते पक्खंत्ता जेणं चंदरस दाहिषणवि पमेद च जाग जोएति. तेणं दुवे तंजहा-पुष्यासाढा,उत्तरासाढसव्व वाहिर मंडलं जोयं जोतिसुवा, जोएतिवा|तत्थणं जसे णकखसे जेणं सया पमहूँ जोग जोएति साणं एगा जेट्रा॥१॥ ता कतियाणं चंदमंडला आहितति वदेजा, ता पन्नरस चंदमंडला आहितेति वदेजा. ता एतेसिणं पन्नरसण्हं चदमंडालाणं अत्थि चंदमंडला जेणं सया णक्खत्ताणं अविरहिया अस्थि चंदमंडला, जेणं सयाणक्खतेण विरहिया. अस्थि - ।
48.अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमेलक ऋषिकी+
से भाग देना. इस से २१७७१४ होवे, इस को योजन करके के लिये ४२७ का भाम देना इस से ५०९ योजन व ५३ भाग ६१ ये हुवे. यह चंद्रमा का विकंप क्षेत्र कहा. अब मूर्य के मंडल पर चंद्र का मंडल कितना रहकर माश्र हो सो नोकालने की विधि-इस की धून राशि नीकालने की रीति एक मंडल से दूसरे मंडल तक सूर्य का विकंप क्षेत्र दो योजन ४८ भाग ६. या का है, इसके ६१ भाग रने के लिये दो योजन को ६१ से गुण कर ४८ .माल ना. २४६१-१२२-४८ १७* इस के चूरणीये मातये भाग करने को सात से गुणा कम्ना. १७०४७११९२ प्रथम धृव संख्यात जानना. अब दूसरा य आंक कहते द्रमा एक मंडलस दूसरे मंडल जाते विपक्षत्र ३६ ये जन २० भाग ६१ ये४ भाग सातिये का,इस के चूराणये मत भाग करने को. ३६४६१=२१९६+२५%D१२२१४७%3D१५५४७३
कायक रानाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालापसाद जी .
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२२१
चंदमंडला जेणं रवि ससि गक्खत्तो सामणा भवति, अत्थिणं चंदमंडला, जेणं सया आइचेहिं विरहिया, ता एतसिणं पण्णरसह चंदमंडलाणं कयरे चदमंडला जेणं सया णक्वत्तहिं अविरहिया जाव कयरे चंदमंडला जेणं : सया आइचहिं विरहिया, ता एतेसिणं पन्नरसहं चंदमंडलाणं, तत्थ जेते चंदमंडला सया णक्खतेहिं अविरहिया तेणं अट्ठ तंजहा-पढने चदमंडले, ततिए चंदनंडले, छट्टे चंदमंडले,
=१५५५१ भाग सातिये न. यह दर ध्रव आंक हवा. चंद्र मर्य का प्रथम मंडल जम्बद्रीप में १२८० योजन है उतर नरफ सूर्य मंडल से चंद्र मंडल समोण में ८० योजन ऊंचा है, परंतु दक्षिण तरफ
चन्द्रमंडल आठ, भाग ६१ या सूर्य पीक ता हुवा है, क्यों की मुर्थ मंडल ४८ भाग ६ १ या का है और १ चद्रमंडल ५६ भाम ६१ या का है, इस से ८ भाग ६१ या मूर्य मंडल से चंद्र मंडल बडा होने से बाहिर नोकलता हुना है. अब चंद्र मंडल जितने क्षेत्र में एक मार्ग चले उतने क्षेत्र में सूर्य मंडल कितना मार्ग चले
पो बताते हैं. १५५५१ के एक गुना करने से १५५५१ शोचे उए १९. का भाग देना वे १३ मार्ग ११ +भाग ६१ ये और ४ भाग सात्तिये होवे. इस से जब चंद्रमा एक मंडल चलता उतने समय में सूर्य
रह मंडल और एक योजन के ११ भाग ६१ ये और ४ भाग सातिये मूर्य चलता है. जब चंद्रमा दूसरे ल जाना है तब र्य चउदहवे अंडल पर उत्तर के चरमति से दक्षिण में चंद्रमा का दूसरा मंडल की
.दशवा पाहुड़े का इग्यारहवा अंतर पहुडा
V
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mammmmmmmmmmmmmmmnion
मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
२२२
सत्तमे चंदमंडले, अट्ठमे चंदमंडले, दसमे चंदमंडले, एगारसमे चंदमंडले. पणरस. मे चंदमंडले. ॥ तत्थ जेते चदमंडले जेणं सया णखत्तेहिं विरहिया, तेणं सत्त तंजहा बीए चंदमंडले, चउथे चंडमंडल पच, नबमे, बारसमे, तेरसमे, चउदसमे चंदमंडले ॥ तत्थणं जेते चंदमंडला जेणं रावि ससी नणखत्ताणं सामणा भवति तेणं चत्तारि तंजहा-पढ़मे चदमडले, बीए चंद मंडले. एक्कारसमे चंदमंडले पण्णरसमे चंद मंडले । उत्तर चरपति • योजन ११ भाग ६१ये और ४ भाग मा तियों नीकलता है और चंद्रमा के दूसरे मंडल के उत्तर चरमांत से सूर्य के चदहवे मंडल का उत्तर चरमात उतना ही अंदर उत्तर नरफ है. .
और • योजन ३६ भाग ६१ या ३ भाग सतिया मूर्य के चपदहवे मंडल पर चंद्रमा काम दूसरा मंडल मीत्रित हैं और दक्षिण तरफ चंद्रमा की दरा मंडल योगत ११ मा ६१ ये ४ भाग सातये का नीकलता है क्योंकि चंद्रमा भूर्य मंडल ४८ भाग ६१ क स ११ भाग ६१ ये
और ४ भाग मानिय वाद करते ३६ भाग ६१२३ भाग माति य का मिश्रित होवे, और चंद्र मंडली ५६ भाग ६१ या का है इा स २३ भाग ६१ ये ३ भाग सातिये बाद करते १२ भाग ६१ ये व चार भाग सातिये का चंद्रना का दूपरा मंडल दक्षिण तरफ पाहिर निकलता हुवा है। और सूर्य का पन्नाइवे मंडल के उत्तर चरमांत में १ योजन ४१ भाग ६१ ये व ३ भाग का अंतर है।
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदव सहायजी ज्वालाप्रसादजे.
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तत्थणं जेते चंद मंडला जेणं समा आदिच्च विरहिया. तेणं पंच तंजहा-छट्टे चंद मंडले, सत्तमे चंद मंडले, अट्ठमे चंदमंडले. गवमे चंद मंडले दसम चंद मंडले इति दसमस्स पहुडस्स एकापसमं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १०॥ ११॥ * * ता कहते देवयाणं णामधेजा आहिति वदेजा ? एतेनिणं अट्ठाविसाते णक्ख
त्ताण अभिए णक्खत्ते बम्हदेवयाते, पण्णत्ते सवणे णक्खत्ते विष्णुदेवयाते पण्णत्ते, क्योंकि सूर्य के मंडल २ पर दो २ योजन का अंतर है. और चंद्र का दूसरा मंडल ११ भाग ६१ या और ४ भाग सातिया निकलता है, इस से दो योजन में से यह याद करते १ योजन ४१ भाग ६१ या और तीन भाग सातिया रहे. इसी तरह चंद्र का जितना मार्ग निकालना होवे उस मार्ग को १५५५१ से गणतार करके ११९० से भ ग देना. जो आवे सो सूर्य भाग जानना. और शेष रहे सो चुरणीय भाग जानना. यो दशवा पाहडे का इग्यारहवा अंतर पाहुडा मंपूर्ण हुवा ॥ १० ॥११॥ अहा भगवन् ! नक्षत्र के अधिष्टायक देवों के नाम कैसे कहे ? अहो शिष्य ! इन अहावीस नक्षत्रों में से अभिजित नक्षत्रका ब्रह्म देवता अविष्टायक है, २श्रवण नक्षत्रका विष्णु देवता, वो जैसे जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति में है कहा वैसे ही कहना अर्थात् ३ घन्ष्टिाको वसुदेव ४शतभिषा का वरुणदेव ५ पूर्वाभाद्रपद का अर्जदेवउत्तरा भाद्रपद का अभिवर्धनदेव रेवति का पुष्यदेवट अश्विनी का अश्वदेवरभरणी का जमदेव १० कृत्तिका काम
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4842दशना पाहड का करहा अंनर पाडा 41
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र
48 अनुावदक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
एवं जहा अंबूद्दीवपण्णत्तीए जीव उत्तरासादा णक्खत्ते विसदेवषाए यण्णत्ते 'दसमस्त दुवालसमें' पाहुडे सम्मतं ॥ १० ॥ १२ ॥
मधिजा आहितेति वदेजा ? ता एगमेगस्सणं अहोरत्तस्स तसिं मुहुत्ता पण्णत्ता तंजहा-रोद्दे, सिते, मिते, बाऊ, सुट्ठिए, तब अभिचंदे, माहिंदे, बल, पम्हें, बहुसव, चंव ईसाणे ॥ १ ॥ तटुंबं, भावियप्पा, वेसमणे, वावरेय, अग्निदेव, ११ रोहिणी का प्रजापति देव, ६२ मृगशर का सोम देव, १२ आर्द्रा का रुद्र देव, १३ पुनर्वसु का | आदित्यदेव १५ पूण्य का वृहस्पतिदेव १६ अश्लेषाका सूर्यदेव १७ मघा नक्षत्रका पित्रदेव १८ पूर्वाफाल्गुनी का भग १९ उत्तराफाल्गुनी का अर्जमदेव २० हस्त नक्षत्र का सवितादेव २१ चित्रा नक्षत्र का त्वष्टादेव२२ स्वाति नक्षत्रका वायुदेव २३ विशाखाइ अज्ञीदेव २४ अनुराधा का मित्रदेव २५ ज्येष्ठा का इन्द्रदेव २६ मूलका नैऋतु २७ पूर्वाषाढा का जलदेव और२८ उत्तरापाढा का विम्ब नामक देष है. उक्त अट्ठावीस नक्षत्र के अट्ठावीस [ अधिष्ठायक देव कडे. यह दशवा पाइडे का बारहवा अंतर पाहुडा संपूर्ण-हुवा ॥ १० ॥ १२ ॥
अब तेरहवा अंतर पाहुडा कहते हैं. अहो भगवन् ! मुहूर्त के नाम किस प्रकार कहे हैं ? अहो शिष्य ! एक २ अहोरात्र के तीस मुहूर्त कहे हैं. जिन के नाम-१ रुद्र, २ श्रयान् ३ मित्र, ४ वाय, ५ मुस्थित, ६ अभिचंद्र, ७ माहेन्द्र, ८ वलकन, ९ पूष्य अथवा पद्म, १० बहुसत्य, ११ ईशान, १२
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• प्रकाशक - राजवहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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पष्ठ-उपाङ्ग 48
- आनंदे, विएय, विजयसेणं, पयासव्वे, उवसमेय, गंधवा, अग्गिवेसे, सर्भिसते, । - आयवं च, आमवंच, अणवंच, भोमं, रिसभे, सबढे, रक्खसे चेव ॥२॥ 3 ॥ इति दसमस्स तेरसमं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १०॥ १३ ॥ * - ता कहते दिवसाणं णामधिज्जा आहितेति वदेज्जा ? ता एगमेगस्सणं पक्खस्स "पण्णरस दिवसा पण्णत्ता तजहा-पाडवा दिवसे, वितिया दिवसे, जाव पण्णरसी दिवसे ॥ ता एतेसिण पण्णरसण्हं दिवसाणं पण्णरस णामधिज्जा पण्णता तंजहा
पुव्वंगे, सिद्धमणोरमेय, ततो मणोहरो चेव, जसभद्देय, जसोधरे, सव्वकाम
नष्टेय, १३ भावितात्मा, १४ वैश्रमा. १५ वारय, १६ आनंद, १७ विजय, १८ विजयमेन, १९. प्रज्ञाप्ति, अर्थ
१२० उवसम, २१ गंधर्व, २२ अग्निवेश्य, २३ शतवृषभ, २४ आय, २५ अय, २६ मारुणवाच, २७ भूयः १२८ वृषभ २९ सर्वार्थ और ३० राक्षम. यह तीस मुहूर्त के नाम कहे. यद्द दशचा पाहुडे का तेरहवाई
अंतर पाहडा संपूर्ण दुव ॥ १ ॥ १३ ॥ ... 12 अंक चउद हवा अंतर पाहुड़ा कहते हैं-अहो भगरन् ! दिन के नाम कैसे कहे ? अहो शिष्य एक २३
ईपक्ष के पचरह दिन कहे हैं जिनके नाम. १ प्रतिदप २ द्वितीया ३ तनीया ४ चतुर्थी ५ पंचमी ६ षष्ठी ७ सप्तपी४.अष्टपी ९ नवमी १० दशमी-११ एकादशी १२ द्वादशी १३ त्रयोदशी १४ चतुर्दशी और १५ ॥
सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति
दशवा पाहुडे का चदा अंतर पाहुडा
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सूत्र
अर्थ
अनवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
समद्धेतिय ॥ १ ॥ इंदमुद्धाभिसितेय, सोमणस धर्णजएय बोधव्त्रा; आत्थसिद्धे अभिजाते, अच्चासणेय, सतंजए, अग्गित्रेसे, उवसोमेय, दिवसेणं णामत्रिजाति ॥ १ ॥ ता कहते रातिओ आहितेति वदेज्जा ? ता एगमेगस्सणं पक्खरस पण्णरस्स राई पण्णत्ता तजहा पडिवएराई, जाव पण्णरसी राई ॥ ता एतेसिणं पण्णरसहं राई परस नामधिजा पण्णत्ता तंजहा- उत्तमाय, सुनक्वत्ताय, एलाबच्ची, जसोधरा, सोमणसा चैव तहा; सिरिसंभूताय बोधव्या ॥ १ ॥ विजयाय विजयंति, जयंति अपराजियाय, इत्थि समाहारा चैत्र, तेया तहा अतितेया, देवाणंदा, णिरति, ( पंचदशी (पूर्णिमा ) इन पन्नरह दिन के पन्नाह नाम कहे हैं तथा १ पूर्वग २ सिद्ध मनोरम, ३ मनोहर ४ यशोभद्र, ५ यशोधर, ६ सर्वकाम ७ इंद्रमूर्धाभिषेक ८ सोमनस ९ धनजय १० अर्थसिद्ध ११ अभिजित १२ अत्यन १३ सतंजयं १४ अग्निवेश और १५ उपशम नाम. ये पनरह दिन' के नाम कहे. ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! रात्रि के क्या नाम कहे ? अहो शिष्य ! एक २ पक्ष की पनरह रात्रि कही है। तद्यथा पडवा यावत् पनथी. इन पनरह रात्रि के पन्नरह नाम कहे हैं तद्यथा १ उत्तमा २ सुनक्षत्रा ३ एलावची ४ यशोधरा ५ सोमनी ६ श्रीभूता ७ विजया ८ विजयंती ९ जयति १० अपराजिता ११ इत्थ {१२ समाधीरा १३ तेजा १४ अति तेजा और १५ देवानंदा ये पनरह अनुक्रम से रात्रिं के नाम कहे
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बकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ●
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रयणणिं णामधिजाति ॥२॥ इति दसमस्स यउद्दसमं पाहुडं सम्मतं ॥१०॥३४॥ ता कहते तिही आहितेति वदेजा ? तत्थ खलुइमा दुविहा तिही पण्णत्ता तंजहा दिवसानिहिव, राहीतीहया ॥१॥ ता कहते दिवस तिही आहितेति वदे जाता एगभेगस्सणं
पक्खस्स पण्णरस दिवस तिही पण्णत्ता तंजहा पंदे, भद्दे, जए, तुच्छे, पुणे, यह दशवा पाहुडा का चउदहवा अंतर पाहुडा संपूर्ण ॥ १० ॥ १४॥ . . है . अब पनरडवा अंतर पाहुडा कहते हैं. अहो भगवन् ! आप के मत में तीथि कैसे कही ? भगवान उत्तर देते हैं कि मर्य अहो राधि बनाता है और चंद्र तीथी बनाता है. यह चंद्र मंडल के तेज की हानि
द्धि कही. यह चंद्रमा कैसा है। उक्तंच तिरियकुमय सरिसापभस्स चंद्रस्म राति ॥ सुभगस्स लोए तिरिति मनियम भणियंबुढि हाणिए ॥१॥ अर्थात् कुमुद समान जिस की प्रभा है ऐसे सौभाग्यवान चंद्र की
लोक में हानि वृद्धि जानना. राहुका विमान के आवरण से चंद्र के विमान का तेज की हानि वृद्धि होने यह राहु दो प्रकार का कहा है ? धूवराहु और २ पर्वसह. इस में पर्वराहु का कथन क्षेत्र समास में कहा है सो वहां से जानना. और वराहुका विमान कृष्ण है. पह चंद्रमा के विमान नीचे चार अंगुल के अंतर से चलता है. और तेज की हानि वृद्धि करता हैं. शुद १६ की तीथी में संपूर्ण राहु के। से आवरण रहित होथे और पदी १ से वदी तक चंद्रमा के विमान की कलापर राहुका विमान आपरण
श-चंद्रमामि सूत्रपा-मान
शवा पाहुड का पत्ररहवा अवर पाहुडा 42+
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imanawmamimar
८
12. पक्वस पंचमी, पुणरवि गंदे, भद्दे, ज़ए,. .तुच्छे, .. पुणे, . पुणरवि, गंदे, भद्दे,
- जए तुच्छे, पुण्ण, पक्खस्स पण्णरसी ॥ एवं तेतीगुणा तिहितो सम्वेसि दिवसाणं : ॥ २ ॥ ता कहते राति तिही आहितति वदजा ? एग मेगस्सणं पक्खस्स पाणरस
राति तिहि पण्णत्ता तजहा-उगावती, भोगावती, जसवती, सबसिहा, सुहाणामा ।। करे. चंद्र के विमान भाग करना. इसको १५ नीयी से भाग देते ४ भग ६२ ये और शेष भाग. रहे. इस तरह एक तीथीम चार भाग ६२ये से आवरण करता हुआ वदी ३० को६० भाग६२ये काम श्रावरण करे और२ भाग १२ का आवरण विना रहे. शुबी १ को चार भाग ६२ य आवरण कमी होता जावे अथात् चंद्रमा के विमान की टेज कांति लोक बढती जावे. परंतु लोक व्यवहार चंद्र विमान के १६ भाग करना इसमें एकतीथी में एक २ भाग का आवरण करके तेज की हानि करे, और एक भाग विना आवो तेज की नद्धि करे. यह रीति लोक व्यवहार में प्रसिद्ध है. और एक अहोरावि के ६२ भाग करे जिन में से६१ भाग की एक तीर्थ है. एक अहोरात्रि के ३० मुहूर्त है और एक तीथी २१ मुहू ३२ भाग ६२ ये की है. मैने तर महू की तीथी क ६१ भाग से मुगा करके अहोरात्र से भाग देना ३०४६१-१८३.० इन को ६२ स भाग देने स २९ मुहून व ३२ भाग आते हैं...मी तीथीं दो प्रकार की कही है १ दिन की तीथी और १ रात्रि तिथी. ॥ १ ॥ अहो भरबन् ! दिन तीथी कैसे कही।
49 अनुवादक बाल.ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋर्ष जी--
र लाला सुखदेवसहायजी ज्याला प्रसाद जी.
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सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र-षष्ठ उपाङ्ग
पुणरवि-उग्गावती, भोगवती, जसवती सव्वट्ठसिद्धा, सुहा णामा॥ पुणरवि,-उगमावती' भोगवती, जसवती, सव्वदसिद्धा, सुहा णामा॥ पुणरवि-उग्गावती, भागवती,जसवंती, सवट्ठसिद्धा, मुहा णामा ॥ एते तिगुणा तिहिंतो सबसि राईणं ॥ दसमस्स पण्णरसमं पाहडं सम्मत्तं ॥ १० ॥ १५ ॥ *
ता कहंत गोत्ता आहितति वदेजा ? ता एतेसिणं अट्ठावीसाए नक्खत्ताणं अभिते अहो शिष्य ! एक २ दिन की पन्नरह तथि कही. जिन के नाम-१ नन्दा २ भद्रा ३ जया ४ तूर्या ( लोकिक में रिक्तातीथी कहाती है. )५ पूर्णा. यह पक्ष की पहिली पांच तीथी, पुनरपि ६ नंदा ७ भद्रा ८ जया १ तूर्या और १० पूर्णा. फोर भी पांच ११ नंदा १२ भद्रा १३ जया १४ तुर्या और १५ पूर्णा. यड पन्नाह तीथी हुइ. इस तरह पांच नाम की तिथी को तीन गुना करने से पनरह तीथी होती है. ॥ १ ॥ अब रात्रि तीथी किमको कहते हैं? एक २ पक्ष को पारह रात्रि तीथी कही है. जिन के नाम-उगावती २ भोगावती ३यशवती ४सर्थ सिद्धा और ५ भा. फोर भी ६गाववी ७भोगावती यशवती ९सर्वार्थसिद्धा और १. शुभा. फोर भी ११ उगापती १२ भोगावती १३यशवती १४सर्वार्थमिद्धा और १५ शुभा. या सर्व सत्रिकी १५ तीथी कही. यह दशवाका नरवा अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥१०॥१५॥ अब दश का सोलहवा पाहुडा कहते हैं-अहो भगवन् नक्षत्र के गोच किस प्रकार कहे हैं ? भगवान
० दशवा पाहुडे का सोलहवा अंतर पाहुडा 4.83
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सूत्र |
नि श्री अमोलक ऋषिजी -
नक्खत्ते मोगलास गोत्तं पण्णत्ते ॥ १ ॥ सवणे नक्खत्ते संखायण गोत्ते पण्णत्ते ॥ २ ॥ बनिट्रा अग्गिसायणगोत्ते पण्णत्ते ॥ ३ ॥ सयभिसया क्खत्ते कंडिल्लायणगोत पण्णत्ते ॥ ४॥ पव्वभवयाणं जाउ कतियसगात्त ॥ ४ ॥ उत्तर भवयाणं धणंजयस गाते पण्णत्त ॥ ६॥ रेवति पुसायणस्स गोत्ते ॥ ७ ॥ असिणी असायणस गात्त ॥ ८॥ भराण भगवस गोत्त॥ ९ ॥ कत्तिया अग्गिवेसायणगोत्ते ॥ २०॥ राहिणि गोयम गोत्ते ॥ ११ ॥ मगसिरं भारद्दगोत्ते ॥ १२ ॥
अद्दा लोहियच्चायणस्सगोत्ते॥ १३॥ पुणवसु बासिट्ठगोत्ते ॥१४॥ पुस्से उमजायणस्स उत्तर देते है कि नक्षत्र का स्वरूप से गोत्र का असंभव है; और गोत्र का स्वरूप लोक में प्रसिद्ध है जैसे गर्गा का अपत्य गर्गा गांवीय, इस तरह नक्षत्र का मोत्र नहीं होता है. यहां पर जिस नक्षत्र में ग्रह योग शभ अथवा अशुभ होवे उसे गोत्र कहते हैं. इन अटाइस नक्षत्रों में अभिजित नक्षत्र का मोगलायन गोत्र २ श्राण नक्षत्र का मंकावायन गोत्र ३ धनिटा नक्षत्र का अग्निवेसायन गोत्र ४ शतभिषा नक्षत्र का कंडीलावन मोत्र ५ पूर्वाभाद्रपद का जात कनीयम गोत्र ६ उत्तराभाद्रपद का नंजयश गोत्र ७ रेवती का पुष्यायन गोत्र ८ अश्विनी नक्षत्र अस्वायन गोत्र भरणी नक्षत्र का भगवेश ग.त्र १० कृत्तिका नक्षत्र का अग्निवैशायन गौच ११ रोहिणी नक्षत्र का गौतम गोत्र १२
.प्रकाशक-राजाबद्दादूर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालासनी
का अनुवादक-बालब्रह्म
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सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ती सूत्रष-उसङ्ग 4.
गोत्ते ॥ १५ ॥ असिलेसा मंडवायणस्स गोत्ते ॥ १६ ॥ महा पिंगलायणसगोत्ते, ॥ १७ ॥ पुवाफग्गुणी गोवलायणसगोत्ते ॥ १८ ॥ उत्तराफग्गुणी कासवगोत्ते ॥ १९ ॥ हत्था कोसियगोत्ते ॥ २० ॥ चित्तो दभियणगत्तो ॥२१॥ साति चामरत्थत्तेणस्स गोत्ते ॥ २२ ॥ विसाहा अंगायणस्स गोत्ते ॥ २३ ॥ अणुराहा णक्खत्ते गोलवायणस्स गोत्ते॥२४॥जेट्ठा तिगिच्छायणस्सगोत्ते ॥२५॥ मूले पवायणस्सगोत्ते॥२६॥पव्वासाढाणक्खत्ते विसियायणस्सगोत्ते पण्णत्ते॥२७॥उत्तरासा
ढा वग्यावचस्सगोत्तेपण्णत्ते।८ २।इति दसम पाहुडस्स सोलसम पाहुड सम्मत्तं।१०।१६॥ मृगशर नक्षत्र का भारद गोत्र १३ आर्दा नक्षत्रका लोहियाणत गोत्र १४ पुनर्वसु नक्षत्र का वासिष्ठ गोत्र १५ पुष्य नक्षत्र का उपचायणस गोत्र २६ अश्लेषा नक्षत्र का मंडवायस गोत्र १७ मघा का पिंगला यण गोत्र, १८ पूर्वा फाल्गुनीका गोवलायणस गोत्र, १९ उत्तरा फाल्गुनी का काश्यप गोत्र, २० हस्तका कोलिय गोत्र, २१चित्रका दभियायण गोत्र, २२ स्वाति नक्षत्रका चामर छत्र गोत्र, २३ विशाखाका अंगायणस गोत्र, २४ अनुराधा का गोवालयणस गोत्र २५ ज्येष्टा का तिगच्छायणस गोत्र २६ मूल का कात्यायणस गोत्र, २७ पूर्वाषाढाका विषायणस गोत्र और २८ उत्तराषाढाका वाघवचायणास गोत्र, यह दशवा पाहुडेका सोलवा अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥10॥ १६ ॥
48Hदशा पाहुड का सोलहवा अंतर पाहुडा 48.
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ता कहते भोयण आहितति वदेजा ? ता एतेसि अट्टावालाए मक्खत्ता कत्तियाहि दहिणा भोच्चा कजं साहेति ॥ १ ॥ रोहिणीहि वसभमंसंभोच्चा कजं साहेति ॥२॥ मिगसिरेणं मिगर्मसं भोच्चा कजं साहति ॥ ३ ॥ अदाहिं णवणीएहिं भोचा कजं
साहति ॥ ४ ॥ पुण्णवसुणा घएणं भोच्चा ॥ ५ ॥ पुसेखीरेणं भोच्चा ॥ ६ ॥ है असिलेसाहिं दीवग मंसेण भोच्चा ॥ ७ ॥ महाहिं कसारि भोच्चा ॥ ८ ॥ पव्वा
अब सतर हवा अंतर पाहुडा कहते हैं-अहो भगवन्! आपके मत में नक्षत्रो में किस प्रकार भोजन विचार कहा है ? अर्थात क्या भोजन कर जावे तो कार्य सिद्धि होने ? अहो शिष्य ! इन अट्ठावीस नक्षत्रों में से १ कृत्तिका नक्षत्र के दिन दधि मिश्रित भोजन कर जावे तो कार्य सिद्धि होवे, २ रहिणी नक्षत्र हो। तब चूत का भोजन कर जावे तो कार्य सि होवे. ३ प्रगशर नक्षत्र मिस दिन होवे, उस दिन कस्तूरी का भोजन करे तो कार्य सिद्धि होवे ४ आद्र नक्षत्र जिस दिन होवे उस दिन नवनीत [ मकावण ] का भोजन कर जाये तो कार्य सिद्ध होवे, १५ पुनर्वसु नक्षत्र जिम दिन होवे उस दिन बन का भोजन करक जाव तो कार्य सिद्धि हो १६ पुष्य नक्षत्र जिस दिन होघे उस दिन खीर का भोजन वर जावे तो कार्य सिद्ध होवे ७ अश्लेषा नक्षत्र जिस दिन होवे उस दिन कवच सिंग अथवा कमल का भोजन कर जावे
47 अनुमदन-पालब्रह्मचारीमान श्री अमो के ऋषिजी
प्रकाशक-राजाबदुर लाल सुखदवमहायजी ज्वालाप्रसाद ने .
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सन
फग्गुणिहिं मेटमण भोच्चा ॥ ९ ॥ उत्तराफग्गुणीहिं णक्खिमंसेणं भोच्चा ॥ १० ॥ हलोण वत्थाणिएग भोच्चा ॥ ११ ॥ चित्ताहिं मुगसएणं भोच्चा ॥३२॥ सातिमा फलाहिं मोचः॥ १३॥ बिसाहाहिं आ तिरिया भोच्चा(अहवा एगट्ठीया)।।१४॥ अणुराहाहि मानाकरण भीचः ॥ १५ ॥ जेहाहि कोलट्ठिएणं भोच्चा ॥ १६ ॥ मूलेज भूलग सा एणं भाचा ॥ १७ ॥ पुवालाढाहिं आमलग सारिणं भोच्चा
सशरंद्र प्रज्ञप्ति मात्र पह-वाङ्ग 428
तो कार्य सिद्धि हरि ८ मा नक्षत्र जि दिन हाये जा दिन कमर अथवा कसार का भोजन करे तो कार्य सिद्धि हो। ९ पूर्व कालनी नक्षत्र जिस दिन हो उस दिन एलायची अथवा आलु का जल कर जाये तो कार्य सिद्धि होन १० उत्तरः फाल्गुनी नक्षत्र जिस दिन हो उस दिन लसूद अथवा आलू का भजन कर जातो कार्य सिद्धि होने ११ हस्त नक्षत्र में सींगाडे काई
भोजन कर जाये तो कार्य निद्धि हा चित्रा नक्षत्रा गाकी दालका भोजनकर जाये तो कार्य सिद्धि होवे *१३ स्वाति फलका भोजन कर जाये तो कार्य लिद्धि होने ३४ विश खा नक्षत्र पाउला अथा। शाक का
भोजन कर जाये तो कार्य सिद्धि होवे १८ अनुगधा नक्षत्र में मिश्र कुरोधान्य का भोजन करने कार्य | सिद्धि होवे १६ ज्येष्टा नक्षत्र में कोला-सक्का कद का अवका मिश्र कुरोधान्य का भोजन करने से कार्य 1
48. दशवा पाहुडे का सतरहवा अंतर पाहुडा 18+
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केज साहेति ॥ १८ ॥ उत्तरा साढाहिं विल्लेहिं भौच्चा कजं साहेति ॥ १९ ॥ अभियेणं पुप्पेति भोच्चा कजं साहिति ॥ २० ॥ सवणेणं खीरेणं भोच्चा कजं साहेति ॥ २१ ॥ धाणट्ठाहिं जसेणं भोच्चा कजं साहेति ॥ २२ ॥ सयभिसया तुंबरातो भोच्चा कजं साहेति ॥ २३ ॥ पुवाभदवयाहि कारियएहिं भोच्चा कज्ज
साहेति ॥ २४ ॥ उत्तरा भद्दवयाहिं बराहमंसं भोच्चा कजं साहेति ॥ २५ ॥ सद्धि होवे १७ मूल नक्षत्र में मूली अथवा मोगरे के शाक का भोजन करने से कार्य सिद्धि हो १८ पूर्वाषाढा नक्षत्र में आवला का भोजन करने से कार्य सिद्धि होवे १९ उत्तराषाढा नक्षत्र बिली फल अथवा पक्के नींबू का भोजन करने से कार्य सिद्धि होवे. २० अभिजित नक्षत्र में पूष्प का भोजन करने में कार्य सिद्धि होवे २१ श्रवण नक्षत्र में खीर का भोजन कर जावे तो कार्य सिद्धि होवे १२२ धनिष्टा में करेला अथवा सकरकोला का भोजन कर जावे तो कार्य सिद्धि हो 1.5 १२३ शतभिपा में तूम्बडे का भोजन करे तो कार्य सिद्धि होवे २४ पूर्वाभाद्रपद में करेले का भोजन
करन से कार्य सिद्धि होवे २५ उत्तराभाद्रपद में कर्पूर का भोजन करने से कार्यसिद्धि होवे
१२६ रवति में जलचर फूलन अथवा पानी का भोजन करके जावे तो कार्यसिद्धि होवे 11१२७ अश्विनी नक्षत्र में सीताफल का भोजन करने से कार्यसिद्धि होवे, २८ भरणी
गुनि श्री अमोलक ऋषिजी
.भकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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रेवतिहि जलयर मंसं भौचा कज साहेति ॥ २६ ॥ अस्सिणिहिं तित्तरमसं भोच्चा कजं साहेति अहवा वट्टक मंसंभोच्चा ॥ २७ ॥ भरणीहिं तिलतंदुलयं भोच्चा कजसाहति ॥ इति दसमस्स सत्तरमं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १० ॥ १७ ॥:, :, ता कहते चारा आहितेति वदेजा ? तत्थ खलु इमे दुविहा चारा पण्णत्ता तंजहा आइच्चा चाराय, चंद चाराय ॥ ता कहते चंद चारा आहितेति वदेजा ? ता पंच
संबछरिएणं जुगे अभिए णवत्ते सतसट्ठीचार चंदेण साई जोगं जोतेति, सवणे नक्षत्र में तीली का तेल अथवा चांवल का भोजन करने से कार्य सिद्धि होवे. इस तरह अठाइस
नक्षत्रों के भोजन का विषय जैसा अन्य स्थान देखने में आया वैसा ही लीखा है. टीकाकार श्री मलयाई एमिती आचार्य ने इस को टीक नहीं की है. तत्केवलिगम्य. परंतु जो मांसादिक का आहार करेगा वह अनंत
संसार बढाने वाला होगा. इस से इन अठाइसह नक्षत्रों कोई जानने योग्य है, कोई आदरने योग्य है और कोई त्याग करने योग्य भी हैं. विशेष फेवलि गम्य. यह दशवा पाहुडे का सतरवा अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवा१०॥१७॥ है अब दशवे प हुडे के अठारवे पाहुडे में चंद्र सूर्य के चार गतिका कथन कहते है. अहो भगवन् ! आप के मत में चंद्र सूर्य की साथ नक्षत्र का चार किस प्रकार कहा है ? अहो शिष्य ! दो प्रकार का चार कहा है. १ आदित्य का साथ नक्षत्र चार चले और चंद्र की साथ नक्षत्र चार चले. इस में अहो
488 दसवा पाहुडे का अठारहवा अंतर पाहुडा
अर्थ
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पर अनुवादक-बालन नचारी पनि श्री अमोलक ऋषिजी
णक्खत्ते सतसठीचारा चंदेणं साई जोगं जोतेति ॥ एवं जाव उत्तरा साढा णक्वत सतसदिचारे चंदणसाई जोगं जांतति ॥ ता कहते आइच्च चारा आहितेति वदेजा? ता पंच संवच्छरागं जुगे अभिए णक्खत्ते पंच चारे सूरणं सद्धिं जोग जोएति ॥ एवं जात्र उत्तरा साढा नक्खत्त पंचचार सरणं सडिं जोगं जोएति ॥ इति दसमस्स अट्रारम पाहडं रम्मत्तं ॥ १० ॥ ॥ १८ ॥ * * * * ता व्हते मासा आहितेहि वदेजा ? ताएगमगेरुमणं संवच्छरस्स बारसमासा
एण्णता, तसिणं दुविहा जाम धिजा पण्णता तंजहा लोइयाय, लोउतरियाय ॥ भगवन् ! मंद साथ नपत्र कसे चार चलते हैं? अहो शिष्य! अभिनित नक्षत्र चंद्रमा की माथ एक युग में, १६७ वरसे चल च, श्रवण नक्षत्र १७ चार चाल चले यावत् उत्तर पाढा नक्षत्र एक यग में ७ बार चंद्र कीवाय यान चले अब आदित्य चार किन कहते हैं ? अहो शिष्य ! पांच मंवत्सर का एक युग :दावे. ऐसे एक या में मजित नक्षत्र पांच बार सूर्य की माथ योग करे, ऐसे ही यावत् उत्तराषाढा नक्षत्र एक था में पांच बार पूर्वी साथ य ग करे. रहदशवा का अठारवा अंतर पाहुडा संपूर्ण हुवः।।१०॥१८॥ अब गोसना पाहड! कदल. अहो भगवन् ! किस प्रकार पाम (महिने) कहे है? अहो शिष्य एक संवत्सर के बारह मास क है. इन बारहमान के दो प्रकार के नाम करे . तयथा-लाकिक नाम व लोकोत्तर
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसदाजी .
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सप्तदश-चंद्र प्रज्ञाप्त सूत्र पा-मात
तत्थ लोइयाण मासा सावणे भद्दवे अस्सोए जाव आसाढे ॥ लोगुत्तरियाणं मासा अभिनंदे, सुपइटेय, विजये, पीतिवद्धणे, सेजंसेय, सिवेय, सिसिरेय, हेमवंत, वसंतमासे,कुंसुमसंभवे निदाहे,वणविरोहिय॥इति दसमस्स एकोनविसति पाहुड॥१९॥
ता कहते णं संवच्छर आहितेति वदेज्जा? ता पंचसंवच्छ आहितेति वदज्जातंजहा णक्खस नाम. लोकिक बारह मास के नाम श्रावण १ भाद्रपद ३ आश्विन ४ कार्तिक ५, मगशिर ६ पोष ७ महा ८ फाल्गुण ९ चैत्र २० वैशाख ११ जेठ और १२ अशा द. यह बारह मास लोक प्रसिद्ध हैं. लोकोत्तर वारह पास के नाप-१ अभिनंदन, २ समतिष्ठित, ३ विनय ४ प्रीतिवर्धन, ५ सेजा श्रेय, ६ सीव ७मितिरेय १८ हिमवंत ९ वसंत १० कुमुमसंभव. ११ निदाध और १२ वनविरोध. यह दशवा पाहुडा
का मुन्नोमवा पाहुडा संपूर्ण ॥ १० ॥ ११ ॥ है अब दशवे पाहड़े के इक्कीसवे पाहुढे में पांच संवत्सर की वक्तव्यता कहते हैं. अहो भगवन्! आपके मतमें संवत्सर किस प्रकार कहा ?अहो शिष्य! पांच संवत्सर कह हैं.१ नक्षत्र संवत्सर सो जितने काल में अठाइन नक्षत्रों चंद्रमा की माथ २७ दिन और २१ भाग ६७ ये परिपूर्ण हाये उसे बारह गुणे करने से ३२५ दिन ५१ भाग ६७ का एक नक्षत्र संवत्सर होवे. २ युग संवत्सर १८३० दिन में पांच संवत्सर पूर्ण
480% दशवा पाहुडे का उन्नासका अंतर पाहुडा 4280
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२३१
49 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी 20
अर्थ
संक्च्छरे, जगसंवच्छरे, पमाणसंबच्छरे, लक्खणसंवच्छरे, सनिच्छरसंबच्छरे । १ ॥ णक्खत्तसंवच्छरे कतिविहे पण्णसे ? दुवालसबिहे पण्णत्ते तंजहा-सावणे, भद्दवए जाव आसाढे॥जाव वहसति तमहग्गहे, वालसहिं संवच्छरोहि सव्वणक्खत्तमडलं समाणेति ॥ २ ॥ ता जुगसंवच्छरे पंचविहे पण्णत्ते तजहा-चंद,चंद, अभिवाड्दए, चंदे, अभिवड़िए ॥ ता पढमस्सणं चंद संवच्छरस्स चउविसं पव्वा पण्णत्ता ॥
दुच्चरसण चंद संवच्छरस्स चउवीतं फव्वा पण्णत्त। तच्चस्सणं अभिवड्डिय संवच्छरस्स होवे मो. ३ युग का प्रमाण सो प्रमाण संवत्सर ४ लक्षण सहित सो लक्षण संवत्मर और ५ शनिश्चर से बना सो शनिश्चर संवत्सर।। १ ॥ इस में मे नक्षत्र संवत्सर के कितने भेद कहे?अहो शिष्य नक्षत्र, संवत्सर के बारह भेद कहे हैं. तद्यथा-१ श्रावण भाद्रपद यावत् अपाढ. एक नक्षत्र पर्याय को बारह गुणा करने से नक्षत्र संवत्सर पूर्ण होवे यावत् वृहस्पति नामक हानाह बारह संवत्सर में सब नत्रक्ष मंडल का समास कर. यह नक्षत्र संवत्मर ३२७ दिन ५१ भाग ६५ या का है उसे बारह गुना करने से ३९३३ दिन १९ भाग ६७ ये इतने काल में वृहस्पति नामक महागृह योग अंगीक र कर अठाइस नक्षत्रों संपूर्ण करे॥२॥ युग संवत्सर के पाच भेद कहे हैं १ प्रथम चंद्र संवत्सर २ दूसरा चंद्र संम्मर ३ तीसरा अभिवर्धन संवत्सर४ चौश चंद्र संवत्सर और पांचवा अभिवर्धन संवत्सर इन में से प्रथम चंद्र पंवत्सर के चौवीस पर्व
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ०
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सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्त सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 4800
छन्वीसं पव्वा पण्णत्ता ॥ चउत्थस्सणं चंद संवच्छरस्स चउवीसं पव्वा पण्णत्ता ॥ पंचमस्सणं अभिवाड्रेय सवच्छरस्स छव्वीसं पव्वा पण्णत्ता॥एवामेव सव्वावरणं पंच
सवच्छरिए जगे एग चउविस पव्वयसते भवति तिमक्खायं ॥ ३ ॥ ता पमाण सो बारह अमावस्या और चारह पूर्णिमा. यह चंद्र मंवत्सर बारह माम का है. चंद्रमास २० अहो रात्रि १३२ भाग ६२ या का है. इस का बारह गुना करन से ३५४ दिन १२ भाग ६२ ये का एक चंद्र संवत्मर होवे. दूसरे चंद्र संवत्सर के चौबीम पर्व कह हैं. बारह अमावास्या और बारइ पूर्णिमा. यह चंद्र मास २० दिन ३२ भाग १० ये का है, इम को बारह गुना करने से ३५४ दिन १२ भाग १६२ य का एक संव-मर होये. सामर। अश्विन संवत्सर है इसमें २६ पूर्व हैं तेरह अमावास्या तेरह
पूर्णमा. अभिवर्धन संवत्सर में चंद्र मास तरह हैं, चंद्र मास २० दिन ३२ भाग ६२ ये का है. Parइम को तेरह गुना करने से ३८३ दिन ४४ भाग ६२ य का एक अभिवर्धन संवत्सर होवे. यहां एक
अधिक मास क्यों वहा? उत्तर-तीस मूर्य मास में एकतीस चंद्र मास होवे, मर्य मास ३०॥ दिन का है। और चंद्र मास २९ दिन ३२ भाग ६२ ये का है. इस से ३०॥ में से २७ बाद करने मे ६१ भाग १६२ ये शेष रहे. उस को तास से गुना करने मे १८३० हावे. फोर इस को ६२ का भाग देने से २९११
दिन हाव. इस स एक अधिक मास हुवा. सूर्य के २९ मास और तीसवे मास के एक दिन के ६१ भाग १६२ ये गये पीछे चंद्र मास तीस संपूर्ण हो और वहां से अधिक मास का प्रारंभ होवे. सर्य मास तीस संपूर्ण होवे तब अधिक मास भा संपूर्ण होवे, चौथा चंद्र संवत्सर के चौबीस पर्वो कहे हैं. बारह अमावास्या और बारह पूर्णिमा. यह चंद्र संवत्सर बारह मास का है. और चंद्रमास २९ दिन का है।
48+ दशवा पाहुढे का बीसवा अंतर पाहुडा 498
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66
अर्थ
१० अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री ओमालक ऋषिजी +
संवछरे पंचविहे पण ते जहा गक्खन्ते, चंदे. उऊ, आइन्च्चै, अभिवड्डिए ॥ ४ ॥ ता लक्खण सवच्छरे पंचहि पण्णत्ते तंजहा - नक्खन्ते चंदे, उऊ, आइन्च्चे, अभिवड्डिए ता लक्खणं सवच्छरे पंचविहे लक्खणे पण्णत्ते तंजहा-समगं नक्खता जोगं जोएति समगं उऊ, परिणमंति, णवन्हं नातिसीय बहुउदओ होति णक्खते ॥ ५ ॥
सासे
दिन
इस को बारह गुने करने से ३५४ ये होने पांचवा अ निवत्सर के छब्बीस पर्व कहे हैं, इस में चंद्रमास तेरह हैं अधिक मास बढा. चंद्रमास के दिन २९ हैं. इस कों तेरह से गुणाकार करने से ३८२ का अभिवर्षन सवत्सर हावे. यहां अधिक मास क्यों बढा? उत्तर - प्रथम अधिक मास के अंत से तीन सूर्यमास में एकतीस चंद्रमास होवे. यों युग के पांच संवत्सर कहे हैं. और एक युग के १२४ पर्व होते. ॥ ३ ॥ प्रमाण संवत्सर पांच प्रकार का कहा हैं जिन के नाम- १ नक्षत्र संवत्सर २ चंद्र संवत्सर ३ ऋतु संवत्सर ४ सूर्य संवत्सर और ५
अभिवर्धन संवत्सर, अब पांचों नक्षत्र के दिन का स्वरूप कहते हैं. नक्षत्र संवत्सर के ३२७ दिन हैं, चंद्र संवत्सर के ३५४ दिन हैं, ऋतु संवत्सर व आदित्य संवत्सर का कथन कहते हैं. दो घडि का एक
युग संवत्सर कायंत्र.
मास पर्व
दिन
भाग ६२
१२ २४
३५४ | १२
१२
२४
३५४ १२
१३ २६
३८३ | ४४
१२
२४
३५४ १२ ३८३ ४४ ६२ १२४१८३०|
१३
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मंत्र सर
के नाम
चद्र
चंद्र
अभिवर्धन
चंद्र
५ अभिवर्धन
जोड
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• प्रक. शक राजा वहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्यालाममादजी •
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। समग पुणिमासिं जोएति, विसमचारिंणखत्ता ॥ कडओ बहुउदओया, तमाहु सं2 बच्छरं चंदं ॥२॥ विसमं पवालिको परिणमंति अणुउसदति पुप्फफलं।। वासं न सम्म
18+
उनी सूत्रष-उपाङ्ग
पुहूर्न और तीम मुहूर्त की एक अहोरात्रि, पन्नगह अहे रात्रि का एक पक्ष, दो पक्ष का एक मास,दो मास की एक ऋतु, और छ ऋतुका एक संवत्सर अर्थात, बारह मास का एक संवत्सर होता. यहां संवत्सर में ३६० अहोरात्र पूर्ण होवे. ऋतु संवत्सर में वसंनादिक ऋतु लोक में प्रसिद्ध हैं. ऋतु संवत्सर के अन्य भी । नाम कह हैं-१ कर्म संवत्सर और २ सेवन संवत्मर. लौकिक व्यवहार के प्रधानपणा से कर्म संव-ई सर और कर्म में प्रेरणा करने के प्रध नपना से सेवन संवत्सर. थाहित्य संवत्सर सो जितने काल में छ ऋतु परिपूर्ण करे उतने काल को आदित्य संवत्सर कहते हैं. यह आदित्य मंवत्सर ३६३कादिन का होता है. है लोक में ६० अहोराधि प्रमान प्रवृडादि ऋतु प्रसिद्ध हैं. परंतु निश्चय में ६१ अहारात्रि प्रमाण ऋतु जानना. कर्म संवत्सर ३६० दिन का है, आदित्य संवत्सर ३६६ का दिन का है और अभिवर्धन संवत्सर ३८३ दिन का है. इस के मास का गाथा द्वारा वर्णन करते हैं. आइच्चो खलु मासो तीस अद्धं च साइ दिवसा ॥ चंदो एगूणतीस । बासट्ठीया भाग बत्तीसं ॥१॥ नक्तत्तौ खलु मामो। सावीन भो अहारत्तं ॥ अंसाय एकवीसा ॥ सत्तछवीकएणं छेएणं ॥२॥ अभिवादे उय मासों। एकतीसं-१61 भने अहोरक्षा ॥ भागा सबभेगवीसं । चञ्चीस सयएणं ॥ ३ ॥ अर्थ-आदित्य माम ३०॥ दिन का है,
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१ अनवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
41 सति, तंमाहु संवच्छरं कम्मं ॥३ ॥ पुढविदगाणंच रसं, पुप्फफलाणं च देति,आइच्चो .
चंद्र मास २१ । दिन का है, नक्षत्र मास २७ " दिन का है, ऋतु मास ३० दिन का है और अभिवर्धन मान ३११ दिन का है. यों पांच संवत्सर के मास कहे. अब एक युग के कितने नक्षत्र मास, यावत् कितने अभिवर्धन मास हैं मो कहते हैं-गाथा-तत्थ जुग मधमाण । पंचहि मज्झेहिं पुष गुणिएहिं॥ मासेहि विभजंता । जइ मासा होइ ते वोच्छं ॥ १ ॥ आइच्चेण सहवि भासा । उऊणाओ हुँति एगसट्ठी ।। चंदेणर वासट्ठी । सत्तह होईओ णक्खत्ते ॥२॥ अभिवढे सत्तावन मासा । सत्तयराइंदियावि ॥ एक्कारसया मुहूसा । बासही भागाय तेवीसं ॥३॥ अर्थात् यहां युग के नक्षत्र मास कितने हैं ? एक नक्षत्र मास २७ दिन २१ भाग ६७ ये का होता है, इन सब के ६७ ये भाग करने को२१४६७=१८०१+२१%D१८३०१ भाग ६७ ये हुवे. और एक युग के ६.७ ये भाग करने को एक युग के १८३० दिन को ६७ से गुणा करना. १८३०४६७=१२२६१० भाग ३७ ये हुवे. इस को १८३० से भाग देने से ६७ होवे. यह युग के नक्षत्र मास जानना. ऐसे ही दिन में जो अपूर्णांक होवे उन सब को पूर्णांक में लाकर युग का भी उतना ही पूर्णाक बनाना. फीर युग के दिन को मास के दिन से भाग देना. ऐसे भाग देने से युग के गस होते हैं. इस तरह युग के चंद्र मास ६२ है, ऋतु मास ६१ हैं, सूर्य मास ६० हैं और प्रारमिवर्धन पास ५५दिन ७ मुहूर्त ११ और २३ भागं ६२ या है. यह प्रमाण (सवत्सर हुआ ॥४॥
० पकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादमी.
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सप्तदश चंद्र प्रज्ञाप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग
अप्पणवि वासेण, सम्म निप्पजए सस्तं ॥ ४॥ आइच्च तेयं तविया खणलवदिवस है ऊऊ, परिणमंति पुरेइय थलाति, त माह अभिवड्डियं जाण ॥ ५ ॥ ता साणप्रमाण संवत्सर का यंत्र
अब लक्षण संवत्सर का वथन करते
हैं. लक्षण संवत्सर के पांच भेद कहे संवत्सर । संवत्सरका मान | मास का मान.| युग का मान
हैं जिनके नाम-१ नक्षत्र २ चंद्र के नाम |दिन भाग छेद दिन भाग छद ग.दि. मुभा.६२
० ऋतु ४आदित्य और ५अभिवर्धन. . नक्षत्र ३२७ १६७२७ २१ ६७ ६७ ० ० ० इन में नक्षत्र संवत्सर के पांच प्रकार चंद्र ३५४ ६२१२२० ३२ ६२ ६२ ० ० . के लक्षण कडे.. सम्यक् प्रकार से ऋत ३६०८.३० ० ०६१००० क्षत्रयोग करे और सम्पक प्रकार से आदित्य ३६० .३० ३१ ६२६० ० ० . ऋत परिणमें अर्थात् इस संवत्सर में अभिवर्धना३८४४४६२ १३ १२११२४५७ ७११ २३ नक्षत्र के सरिखे नाम से ऋतु के पर्यव. वर्तते मास संपूर्ण करे. स १ उत्तराषाढा नक्षत्र अषाढी पूर्ण मासी समाप्ति करे २ अपाढी पूर्णिमा की साश ऋतु भी संपूर्ण होई बहुत ताप नहोबे ४ अति शीत भी न होवे और ५ वर्षा बहुन हावे. इन पांच लक्षणा से नक्षत्र संवत्सर जानना. अब चंद्र संवत्र का लक्षण करते हैं. है
चंद्रमा की साथ सम्यग् प्रकार से पूर्णिमा में नक्षत्र योग करे, विषमचारी नक्षत्र होवे, जिस 'नामका मास हाये उस से दूसरे नाम वाले नक्षत्र एक साथ पूर्णिमा का योग संपूर्ण करे. पानी बहुत बरसे ।
दशवा पाहुडे का बीसवा अंतर पडा Hot
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11 च्छरैसंवच्छर अट्ठाविसतिबिहे पण्णते तंजहा-अभिये सवणे जाव उत्तरासाढा ॥ जाव
सणिच्छरे । महाग्गाह तीसेहेसंवच्छरेहिं सवणक्खत्तमंडलं समाणेति ॥
इति दसमस्स वीसमं पाहुड सम्मत्तं ॥ १० ॥ २० ॥ पानु कटुक ह.३. शीत तापादिक बहुत होने और रोगादिक परिणमे. ऐसा जिम संवत्सर में हाये वह चंद्र संबलर हो. व तीसरा ऋतु अथवा कर्म मंवत्मर के लक्षण कहते हैनस संवत्लर में वनस्पति विषय काल में अंकूर वाली होवे, ऋतु विना पुष्प फयदि हारे. सम्यक प्रकार में वर्षा नहावे उसे कर्म संवत्सर कहते हैं. अदित्य संवत्सर का लक्षण कहते हैं-पृथ्वी, पानी, पुष्प फल दिको रम देवे, अल्प वर्षा से -बहुत धान्यादिक सम्यक प्रकार से उत्पन्न हाये, इम को आदित्य संवत्सर कहते हैं. अब अभिवर्धन संवस्तर कहते हैं. जिम में सूर्य के तेज से तप्त क्षण, लव, दिन व ऋतु परिणमत होवे, मब उचा नीचा स्थान जल से परिपूर्ण होवे वह अभिवर्धन नंवत्सर है. अब शनिश्चर संवत्सर का कथन करते हैं. शनिश्चर संवत्मर अठाइस प्रकार का कहा है तद्यथा अभिजित श्रवण यावत उत्तराषाढा. अठाइम नक्षत्र शनिश्चर महाग्रह तोम मंवस्तर में मब अढाइम नक्षत्र मंपूर्ण करे. यह नक्षत्र संघस्सर ३२ दिन का है. इमे तीसगुणा करने मे १८३२ दिन में शानेश्वर महाग्रह य ग अंगाकार कर अठाइस नक्षत्र संपूर्ण कर. यह चंद्र प्रज्ञप्ति भूत्र का दशवा पाहुडा का बीसमा अंतर पाहुडा संपूर्ण हुग ॥१॥२०॥. .
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिर्ज
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदव महायजी ज्वालाप्रमादजा
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3
ti-ka-
B
ता कहते जे.तिमिदारा आहितेति वदेजा ? तत्थ खलु इमातो पंचमडिवत्तीओ पत्ताओ नंजहा-तत्य एगे एवं माहंस ता कत्तियादियाणं सत्तणक्खत्ता पुव्बदारिया । पणत्ता एगे एवं माहसु॥॥एगे पुण एव माहेसु ता महादियाणं सत्तणखत्ता पुवदारिया पण्णत्ता एगे एव माईस ।। २ ॥ एगे पण एव माहंस ता धणिट्रादिया सत्तणदखत्ता पुवदारया पण्णत्ता, एम एव माईसु ॥ ३ ॥ एग पुण एवं माहमु अस्सिणियादिया सत्तनक्षत्ता पव्वदोरया पणत्ता, एगे एवं माहंस॥४॥एगे पूण एक माहंसु भरणिया दियाण सत्तगखत्ता पुव्वदास्थिा पण्णत्ता एगे एव माहंसु ॥ ५ ॥ १ ॥ तत्थ जे एवं माहं ! ता कत्तिय दिया गं सत्च गक्खत्ता पुबदारया पण्णत्ता तेणं एव माहं नु
अब इक्कीस पर पहुडा माहते हैं-अहो भगवन् ! ज्योतिष द्वार कैसे कहे ? अहो शिष्य ! इस में पांच पडिवृत्तिों कही है. कोई ऐसा कहते हैं कि कृत्तहादि सात नक्षत्र पूर्व द्वार वाले हैं, २ के ऐसा कह हैं कि मयादि सात नक्षत्र पूर्वद्वार वाले हैं ३ कोई ऐसा कहते है कि धनिष्टादि ति नक्षत्र से
पूर्वद्वार वाले हैं ४ कोई ना कहते हैं कि अश्विनी आदि सात नक्षत्र पूर्वद्वार वाले ॐ आर ई ऐसा कहते है के णसभ आद रात नक्षत्र पूर्व द्वार वाले हैं ॥ ॥ कृत्तिकादि सात विधान पू. दार वाले ऐसा जो कहते हैं उनका कथन इस तरह हैं कि. १. कृत्तिका रोहिणी ३.मृगशर
4848दशवा पाहुड का इक्क सवा अनर पाहूडा 480
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सूत्र
42 अनुावदक- बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋष
तंजा कत्तिया, रोहिणी, जाब असिलेसा, ॥ ता महादियाणं सत्तणवत्ता दाहिण दारिया पण्णत्ता तंजहा महा जात्र बिसाहा ॥ ता अणुराहादियाणं सन्तणक्खत्ता अवरदारिया पण्णत्ता तंजहा अणुराहा जात्र सवणे ॥ ३ ॥ ता धणिट्ठा दियाणं सत्तणक्खत्ता उत्तर दारिया पण्णत्ता धणिट्ठा जाव भरणि एगे एवं माहंसु ॥ ४ ॥ २ ॥ तत्थ जेते एक माहंसु महादियाणं सत्त णक्खत्ता पुव्वदारिया तेणं एव माहंनु तंजहा महा जाव विसाहा पुत्रदारिया ॥ ता अणुराहादियाणं सत्तनक्खत्ता दाहिण दारिया प० तंजहा अणुराहा जाव सवणे ॥ ता धणिट्ठादियाणं सत्तनक्ता अवदारिया पण्णत्ता तंजहा
आर्द्रा ५ पुनर्वसु ६ पुण्य और ७ अश्लेषा. ये सात नक्षत्र पुर्वद्वार वाले हैं. मघादि सात नक्षत्र दक्षिण दूर वाले हैं जिन के नाम-१२ पूर्वाफाल्गुनी ३ उत्तराफाल्गुनी ४ हस्त ५ चित्रा ६ स्वाति और ७ विशाखा. अनुराधादि मात नक्षत्र पश्चिम द्वार वाले हैं जिन के नान - १ अनुराधा २ ज्येष्टा ३ मूत्र ४ पूर्वाषाढा ५ उत्तपापाढा ६ अभिनित और ७ श्रवण बांन्टादि सात नक्षत्र उत्तर द्वार वाले हैं जिन के नाम- १ धनिष्टा २ शतभिषा ३ पूर्वाभद्राद ४ उत्तराभाद्रपद १ रेवती ६ अवि और ७ भरणी. ॥ २ ॥ जो ऐसा कहते हैं कि मघादि सात नक्षत्र पूर्वद्वार वाले हैं उन का कथन इस तरह हैं १ मघा २ पूर्वाफाल्गुनी ३ उत्तराफाल्गुनी ४ हस्त ५ चित्रा ६ स्वाति और ७ विशाखा. अनुराधादि सात नक्षत्र
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• प्रकाशक - राज बहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ●
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र
सप्तदश चंद्र प्राप्ति सूत्र-पष्ठ उपाङ्ग
धणिट्रा जाव भराण॥ता कत्तियादियाणं सत्तणक्खत्ता उत्तरदारिया पण्णत्ता तंजहा.. कत्तिया आव असिलेस'॥३॥ तत्थ जेते एव मासु ता धणिट्ठादियाणं सत्तणक्खत्ता पधदारिया पणत्ता तेणं एवं माहस, ता धणिट्रा जाव भराण ॥ ता कत्तिथा दियाणं सनणखत्ता दाहिणदारिया पण्णत्ता तंजहा कत्तिया जाव असिलेसा ।। महादियाणं सत्तणवत्ता अवरदारिया पण्णता तंजहा-महा जाव विसाहा ॥ ता अणुराहादियाण सत्तणक्खत्ता उत्तरदारिया पत्ता तंजहा-अणुराहा जाव सत्रणे
॥ ४ ॥ तत्थ जते एव माइंसु ता असिणियादियाणं सत्तणक्खत्ता पुव्वदारिया दक्षिण द्वार वाठे होते हैं जिन के नाम-अनुराधा यावत् श्रवण. धनिष्टादि सात नक्षत्र पश्चिमद्वार वाले कहे हैं जिन के नाम-धनिष्टा यावत् भरणी और कृत्तिकादि सात नक्षत्र उत्तरद्वार वाले कहे हैं जिन के नाम कृत्तिका यावत् अश्लेबा ॥ ३ ॥ जो धनिष्टादि सात नक्षत्र पूर्वद्वार वाले कहते हैं जिन के नाम-धनिटा यावत् भरणी. यह सात पूर्वद्वार वाले हैं कृत्तिकादि सात नक्षत्र दक्षिण द्वार वाले हैं जिन के नाम-कृत्तिका यावत् अश्लेषा. मघादि सात नक्षत्र पश्चिम द्वार वाले हैं जिन के नाम. मघा यावत् विशःखा, और अनुर धादि मात नक्षत्र उत्तर द्वार वाल कहे हैं जिन के नाम. अनुराधा यावत् श्रवण. ॥ ४ ॥ अव जो ऐसा कहते हैं कि अश्विनी आदि।
42 दशवा पाहुडे का इक्कोसना अंतर पाहुडा
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Net अनुवाइक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिज -
पण्णत्ता तेणं एव माहस तंजहा- अरिसणि जाव पुण्णवसु ॥ता पुसादिया है सत्तणक्खत्ता दाहिणदारिया पण्णत्ता तजहा-पुस्तो जाव चित्ता ॥ ता सातिदियाणं सत्तणक्खत्ताणं अवरदारिया पण्णत्ता तंजहा- सात जाव उत्तरासादा ॥ अभितिदियाणं सत्तणखत्ता उत्तरदारिया पण्णत्ता तंजहा अभिजिते जाव रेवति ॥ ५ ॥ तत्थ जेते एव माहेस ता भराणआदियागं सत्तणखता पुत्वदारिया पण्णत्ता तेण एव माहंस तंजहा-भराण जाव पस्तो !! ता आसलेसादियाणं सत्तणक्णत्ता दाहिणदारिया पणत्ता तंजहा-असिलेसा जाव साति ॥ ता विसाहादियाणं सत्त णक्खत्ता अबदारिया पणत्ता तजहा-विलाहा जाव अभिए । ता सबगादियाणं सनणवत्ता
उत्तरदारिया पण्णत्ता तंजहा सवणे जाव असिणी एग एव माहंस ॥ ६ ॥ वयंपुण सात नक्षत्र पूर्णद्वार वाल कहे हैं उन का कथन इम तरह हैं कि अश्विनी मे पुर्नमु पर्यंत सात नक्षत्र पर्व द्वार वाले हैं. पुष्य सचित्र पर्यंत सात नक्षत्र दक्षिण द्वार वाले हैं, स्वाति में उत्तरापाढा पर्यंत स नक्षत्र पाश्च दर वाले हैं, और अभिजित रेकी पयंत मान नक्षत्र उत्तर दर वाले हैं. ॥ ५ ॥ जो ऐमा कहते कि भाणो आदिनान नक्षत्र पूदि वाले हैं जिनके नाम-भरणी यापत् पूष्य, अश्लेशदिमात नक्षत्र
दक्षि गदारवाल जिनके नाम. अश्लेषा यावत् स्वाति. विशाखादिमात नक्षत्र पश्चिमद्वारवाल हैं. जिनके नाम * विशाखा यावत् अभिजित और श्रवणदिसातनक्षत्र उतद्वारवाले हैं जिनके मान श्रेषण यावत् अश्विनः॥६॥हम
• प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवमायनी ज्वालापसाद जी .
Onmernmomrani
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एवं श्यामो-अभिणिआदिय सत्तणक्खत्ता पुव्वदारिया पण्णत्ता तंजहा-अभिए जाव रवति॥ता असिणीआदिया सत्त णक्खत्ता दाहिणदारिया पण्णत्ता तंजहा-असिणि जाव पुण्णवमु ॥ ता पुस्मादियाणं सत्तणखत्ता अवरारिया पण्णत्ता तजहा- पुस्सी जाव चित्ता । ता साति याणं सत्तणक्खत्ता उत्तरदारिया प्राणत्ता तंजहा-साति जाव उत्तरासाढा ।। इति दसम पाहुडस्त एकवीसमं पाहड सम्मत्तं ॥ १० ॥ २१ ॥ ता कहते णक्खत्त विजये आहितति वदेजा ? ता अयणं जंबदीवेदीचे जाव
परिक्वेकेणं ता जंबूद्दीवेण दीव दोचंदा पभामंसुवा पभासतिवा पभास्सिस्सतिवा ।। इस कथनको एसा कहते हैं कि अभिजिनसे रेवती पर्यंत सात नक्षत्र पूर्वद्वार वाले हैं, अश्विनीसे पुनर्वसु पयत है सात नक्षत्र दक्षिण द्वार वाले हैं, पुष्य से चित्रा पर्यंत सात नक्षत्र पश्चिमवार वाले हैं, और स्वाति से उत्तराषाढा पर्यंत सात नक्षत्र उत्तर द्वार वाले हैं. यह चंद्र प्रज्ञप्ति मूत्र का दशवा पाहुड का इक्कीसवा अंतर पाहडा संपूर्ण हुवा ॥ १० ॥ २१ ॥ है अब चावीसवे अंतर पाहुडे में नक्षत्रादिकके निर्णय की वक्तव्पता कहने हैं. अहो भगवन् ! आपके है मत में नक्षत्र का विजय सो निर्णय स्वरूप.किस प्रकार कहा है ? अहो शिष्य ! यह जम्बूद्वीप नामक
40 दशवा पाहुडे का बीसा अंतर पाहुडा 4282
अर्थ
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दोसूरिया तसिवा तवंतिया सबिस्पतिवा ॥ छप्पणं णक्खता जोगं जोएसवा जोएतिवा जोइस्सतिवा वंजहा दोअभिया दोसवणा, दोधणिट्ठा दोसतभिया,दो पुवापुट्ठ वया. दो उत्तरापोट्टवया दो अस्सिणी, दो भराण, दो कत्तिया, दो रोहिणी दो मगसिरा, दो अहा, दो पुणवसु दो पुस्ता, दो असिले.सा दो महा, दो पुत्वाफग्गुणी, दो उत्तराफग्गुणी, दो हत्था, दोचित्ता, दोसाति, दोविसाहा दो
अणुराहा, दो जिट्टा, दोमूला, दो पुयासाढा, दो उत्तरासाढा ॥ ता एतेसिणं द्वीप एक लक्ष योजन का लम्ब चौडा है. इस की परिधि तीन लाख सोलह हजार दो सो सत्तावीस योजन, एक सो अट्ठावीस धनुष्य, साढे तेरह अंगुल से कुछ अधिक है. इम जम्बूद्वीप में दो चंद्रमाने गत काल में प्रकाश कीया, दांचंद्रमा वर्तमान काल में प्रकाश करते हैं, और दो चंद्रमा अनागत काल में प्रकाश करेंगे." दोमूर्य तपे,दो सूर्य तपते हैं और दो पूर्य तपगे. छप्पन नक्षत्रों ने योग किया,छप्पन नक्षत्र योग करते हैं और छप्पन नक्षत्र योग करेंगे. इसका विशेष विवरण दशवेपाहुडे दूसरे अंतर पाहुडसे जानना. यहांछन नक्षत्रों के नाम कहते हैं. दो आभाजत, दो श्राण, दो धनिष्टा, दो शतभिषा, दा पूर्वाभाद्रपद, दो उत्तराभाद्रपद, रेवति, दो अश्विनी, दो भरणी, दो कृत्तिका, दो रोहिणी, दो मृगशर, दो आर्द्रा, दो पुनर्वसु. दो
अर्थ
4. अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋर्ष जी
काशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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सूत्र
सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ति मूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 480
छप्पणं णक्खत्ताणं अत्यि गक्खत्ता जणे णवमुत्ते सत्तावीसं सत्तसट्ठिभागे मुहुत्तस्स चंदेणं सहिं जोगं जोएति ॥ १ ॥ अस्थि णक्खत्ता जेणं पण्णरस मुहत्ते चंदेणं साई जोगं जोएति ॥ २ ॥ अत्थि नक्खत्ता जा जोएति ॥ ३ ॥ अत्थिणं खत्ता जेणं पणयालीसं - चंदेणसद्धिं जोगं जोएति ॥ ४ ॥ ता एतेसिणं छप्पणाए णखत्ताणं कयरे णक्खत्ता जेणं णवमुहत्ते सत्तावीसंचं सतमद्विभागे मुहुत्तस्स चंदेण सहिं जोग जोतेति जाव कयरे णक्खत्ता जेणं णक्खत्ता पणयालीसं मुहुत्ता चंदेणसहिं जोगं जोएति ? ता एतसिणं छप्पण्ण णक्खत्ताणं तत्थ जेते णक्खत्ता नव मुहत्ता सत्तावीसंच सत्तसट्ठिभागा मुहुत्तरस
चंदेणं साई जोगं जोएति तेणं दो णक्खत्ता अभिया पण्णत्ता ॥ तत्थ जेते दो अश्लेषा, दो मघा, दो पूर्वाफाल्गुनी, दो उत्तराफाल्गुनी, दो हस्त, दो चित्रा, दो स्वाति, दो विशाखा, दो अनुराधा, दो ज्येष्ठा. दो मूल, दो पूर्वाषाढा, और दो उत्तराषाढा ॥ ॥ इन छप्पन नक्षत्रों में से ऐसे भी नक्षत्रों हैं कि जो नव मुहू व सडसठिये सत्तावीस भाग का चंद्र की साथ योग करते हैं, कितनेक ऐसे भी नक्षत्रों हैं कि जो पन्नाह मुहूर्त चंद्र की साथ योग करते हैं, कितनेक एमे भी नक्षत्रों हैं किजो चंद्रमा साथ तीस मुहूर्त योग करते हैं, और कितनेक ऐसे भी नक्षत्रों हैं।
33 दशवा पाहुडे का बारीमवा अंतर पाहुडा
4
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मुाने श्री अमोलक ऋषिजी +
'खक्खसा पण्णरस मुहत्ता जाव जोगं जोतति तेणं बारस तंजहा-दो सतभिसया,
दो भरणि, जाव दो जेट्टा ॥ २ ॥ तत्थ जेते गक्खत्ता जेणं तीसं मुहत्ता जाव' . जोगं जोएति तेणं तिसं तंजहा-दो सबणा जाव दो पुवासाढा ॥ तत्थ जेते णवत्ता जणं पणयालीस मुहुत्ता.. जाव जोगं जोएति तेणं दुवाल स तंजहां दो
उत्तराभवया जाव दा उत्तरासाढा ॥ ३ ॥ता एतेसिणं छपभाए णक्खत्ताणं कि जो चंद्रमा की साथ ४५ मुहू योग करते हैं । ॥ इन छप्पन नक्षत्रों में की से २ नक्षत्र चंद्रमा की साथ ९. महत योग करते हैं यावत् कोन से नक्षत्र तालीम मुहू। चंद्र की साथ योग करते हैं. ? इन छप्पन नक्षत्रों में से दो नक्षत्र चंद्रमा की साय ९ मुहूर्त योग करते हैं जिस के नाम-दो अभिजित. बारह नक्षत्र पनरह मुहूर्त के चंद्रपाकी साथ योग करते हैं। जिन के नाम दो शतभिषा, दो भरणि, दो आर्द्रा, दो अश्लेषा, दो स्वावि, और दो बेष्टा. तीस नक्षत्रों तीस १ मुहूर्त पर्यत चंद्रमा की साथ योग करते हैं जिन के नाम-दो श्रा, दो पछा, दो पूर्वाभाद्रपद, दो रेवति, दो अश्वमो, दो कृत्तिका, दो मृगशर दो पूष्य, दो मघा, दो पूर्वाफाल्गुनी, दो हस्त, दो चित्रा, दो अनुराधा, दो मूरु, और दो पूर्णपाढा. और बारह नक्षत्र४२ मुहूर्न पर्यन चंद्रमा की साथ योग करते हैं मिन के नाम-दो उतराभ द्रपद दो रोहिण, दो पुर्वसु, दो उत्तरा फल्गुनो, दो विशाल और दो।
प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वाला प्रसादजी ।
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सूत्र
अर्थ
दश चंद्र प्रज्ञप्तो सूत्रपट- उपाङ्ग 4
अत्थ णक्खत्ता जेगं चत्तारि अहोरत्ते छच्चमुहुत्ते सूरेणं सद्धिं जोगं जोएति ॥ अस्थि लक्खत्ता जेणं छ अहोरतं एगबीसंच मुहुत्ते सूरेण सद्धि जोगं जोएति ॥ अस्थि णक्खत्ता जेणं तेरस अहोरते दुबालसमुहुत्ते सूरेण सद्धि जोगं जोएति अस्थि णक्खत्ता जेगं णक्खत्ता वीसं अहोरते तिन्नियमुहुरते जा जोगं जोएति ता एतेसिण छप्पन्न.ए णक्खत्ताणं जेते णक्खत्ता जेणं चत्तारि अहोरसे छच्च मुहुत्ते
उत्तरापाडा
॥ ३ ॥ इन छप्पन नक्षत्रों में से ऐ
नक्षत्रों हैं जो सूर्य की साथ चार अहोरात्र व छ मह तक योग करते हैं, ऐसे भी नक्षत्रों हैं कि जो सूर्य की साथ छ अरात्रि २१ मुहूर्त तक योग करते हैं, ऐने भी नक्षत्र हैं कि जो तरह अहोरात्र व बारह महू तक सूर्य की साथ योग करते हैं, और एसे भी नक्षत्र हैं कि जो बीस अहोरात्र व तीन सुतक सूर्य की साथ योग करते हैं. इन उपनक्षत्रों में दो नक्षत्र चार दिन सूर्य की साथ योग करते हैं. जिन के नाम-दो अभिजित बारह नक्षत्र छ अहोरात्र व एकवीस मुहूर्त पर्यंत सूर्य की साथ योग करते हैं. जिन के नाम, दो शभित्र दो भरणि, दो आर्द्रा, दो अश्लेषा, दो स्वाति व दो ज्येष्ठा. तीस नक्षत्र तेरह अहोरात्र व बारह प। सूर्य की साथ योग करते हैं. जिन के नाम-दो भद्रपद, दो
श्रवण दो घनिष्ट दो
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488+ दशा पाहुडे का बासा अंतर पाहूडा 408
२५३
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मत्र
अनवादक-गालब्रह्मचारी मनि श्री अमोलक पिजी
जाव जाग जाए त तण दुव आभया तहव जाव तत्थ जते णखत्ता जेणं वीम अहोरत्ते तिन्निय मुहुत्ते मरेण साई जोगं जाएति तेण दुवालस संजहा दो उत्तरा - पोट्रवया जाव दो उचारालाढा ॥ ४ ॥ता कहते सीमा आतति वदेज। ॥ ता एतसिणं छपगाए पत्ताणं अस्थिणं नक्वत्ता जेणं णवत्ता छमया तिसस भ ग़। तिसइ भागाणं सीमा विक्खंभो ॥ १ ॥ अस्थि नक्वत्ता जेणं णक्खत्ता
एगेय सहस्तं पच्चुत्तरं सत्त-ट्ठि भागा तिसति भागाणं सीमा विक्खंभो ॥२॥ अस्थि दो अश्विनी, दो कृत्तिका, दो मृाशर, दो पूष्य, दो पूर्वाफ ल्गुनी, दा हस्त, दो चित्रा, से अनुराधा,
, और दो पूर्वाष ढ . और बाद नक्षत्रों वीम अहोरात्र व तीन मुध पर्वत पर्योस.थ योग एक जिन के नाम. १ दो उत्तरामादाद दो रोहिणी, दो पुनःसुदो उत्ता फारशुती, दो विशः वाम
3 और दो उत्तरापाढा. ॥ ४ ॥ अहा भगान् ! मंडल की सीमा के विभपना किस प्रकार नक्षत्र की इसंख्या कही ? उत्तर-इन छप्पन नक्षत्र में ए नक्षत्रों हैं कि नीर के मंडल की बीग का विष्कंभर । उसो तीस भाग मडठीये तीनीय भाग का.किननेक ऐ२ नक्षत्र हैंजिल के मंडल की सापकाविष्का पन १००६ सडसठिये तस ये भाग की हैं, ऐने नक्षत्र हैं कि जिम की सीमा का विष्कंभपना दो।जार । दशसडसठीये तीसये भाग का हैं, और कितनेक नक्षत्र ऐसे भी हैं कि जिसका सीमाविष्वभपाताना
Annanonmammmmmmmmmmmmmm
प्रकाशक-राजाबहादुरूहाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसदा
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सत्र
२५०
+म+Menkita 22224184
खत्ता जेणं णक्खत्ता दो सहरमा दसुत्तरा सत्त सट्ठीभागा तिसति भागाणं सीमाविक्खंभो ॥३॥ अत्थि णक्खत्ता जेणं णक्खत्ता तिन्निसहस्सा पण्णरसुत्तरा सत्तसट्ठीभाना तिसति भागाणं सीमाविक्खंभो॥४॥ता एतेसिणं छप्पण्णाए णक्खत्ताणं कयरे नक्खत्ता जेणं णवत्ता छप्तयातीमा सत्तसट्ठीभागा तिसतिभागाण सीमाविक्खंभो जाव कयरे णक्खत्ता जेणं णक्खत्ता तिणि सहस्सा पण्णरमुत्तरा सतसट्ठीभागा
तिसतिजा सीमाविखभो ता एतेसिणं छप्पणाए पक्खत्ताणं, तत्थ जेते गक्खत्ता पमा उमठीये तीये भाग का है. इन छप्पन्न नक्षत्रों में से कौन २ नक्षत्र छसातीस सह ठीये तीलीये भाग के मा वाले है यावत् कौन २ नक्षत्र तीनहजार पजर सडकतिरे तीसी भ ग की सीमा वाले हैं ? इन छप्पन नक्षत्रों में दो नक्षत्रों का प्तीमा विखन ६३० भाग सहसठिये तीये का. कों कि अभिजित नक्षत्र सरसठिये २१ भाग का है, हा से २१ को ३० से गुणा करने से ६३० भाग हावे. एक अभिजित नक्षत्र एक मंडल में इतना क्षेत्र सीम में योग करता हुवा माते. एक मंडल के १.१८०० भाग करना. उन में के ६३० भाग जानना. दों अभिजित नक्षत्र के १२६. भाग जानना. बारा नक्षत्र का मीमा विष्कंध एक हजार पांच (१००५)
48 दशा पाहुडे का बावीसका अंतर पाहुडा
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अनुसदक-चालब्रह्मचारी मुनि श्री अगालक ऋषिजी
जेसिणं णवखतःणं छसया तिसति सत्तसीभागातिम् ति भागाणं सीमाविक्खंभी तणं दो आ भया तत्थणं जेते णवत्ता एगेय सहस्सं पंचुत्तरसत्तसट्ठीभागा जाव सीमाविक्खंभो तेणं दुवालस तंजहा-दो सतभिसयाओ जाव दो जेट्ठाओ ॥ तस्थणं जते णक्खत्ता जेणं णक्खत्ता दोन्नि सहस्सा दसुत्तरा सतसट्ठीभागा जाव सीमाविक्खंभो तेणं तांस तंजहा-दो सवणा जाव दोपुष्वासाढातो ॥ तत्क्षणं जेते णक्खत्ता जसिणं णक्खत्ता तिन्निसहस्सा पण्णरसुत्तरा सत्तसट्ठीभागा जाव
दुवालसं तंजहा दो उत्तराभवयाओ जावदो उत्तरासाढाओ ॥५॥ता एतेसिणं छप्पणाए मडठिये तीमिये भ ग का है जिन के नाम. दो शतभिषा यावत् दो ज्येष्ठा, उक्त बारह नक्षत्र मडस टये मादृतेतीसीए भाग के हैं. इम कोहीस से गुणा करने से १.०५ भागोरे. और उसे बारह गुणा करने से १२०६० भाग जाना. नीस नक्षत्र का भीमा विष्कम २०१० सडसठीय तानिये भ ग का है जिनके नाम. दो श्रवण यावन दो पूर्वाष डा. उक्तीस नक्षत्र ६७ ये भ ग के उस बोतीम में गुगने में २०१० होने हैं. पुन: इमे ३० गुणने १०३०० भाग होवे फर बारह नक्षत्र कापीमा विभ तीन हजार पभरह सहमठिये तीसीये भाग का है जिन के नाम-दो उत्तर भ द्रपद यावत् दो उत्तराषदा, यह बारह नक्षत्र ६७ ये १०० ॥ भ ग के हैं इस वा ३० मो गुणा करने से ३०१५ होवे. इो बारह गुन करने से ३६१८० भाग होवे. ॥ ५ ॥ अहो भगवन! इन उप्पन नक्षत्रों में से कितने नक्षत्र सदैव प्रात:काल
प्रकशक-राजाबहादुर ला सुखदेवसहायजी ज्याला
'.
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सूत्र
428
bE-B.En-
नक्वत्ताणं कि सया पातो चंदेणं सद्धिं जोगं जोतेति... सया सायं चंदेणं सद्धिं जोगं जातति! किंसया दुहतो पविटित्ता चंदे महिं जोगं तेति? ता एए छप्पण्ण नक्खत्ता नो सया पातो चंदेणं सद्धिं जोगं जोएति को सया २. यं चंदेण सहिं मोगं जोएति नो सया दुहतो परिट्रित्ता देणं माहि जोगं जोतेति ! त्थि रातिदियाणं
बुड्ढावड़ए मुहुत्ताणंच चयोचवण त्या देह आभया, ता एतेणं दो अभिया मेंद्र की साय योग क... रितो
या. कार में चंद्र की साथ योग करते हैं, आर किन नक्षत्र सदैव प्रारकालाकार इन योतकार चंद्रमा की माथ योग करते हैं ?
अहो शिषः ! उक्त उत्पन्न नामदेव पल काल में योग ही करते हैं, वैस ही सदैव संध्या काल में येन नहीं करते है सीव प्रात व संध्या काल इन दोनों कल प्रवेश कर चंद्रकी साथ योग. नहीं करते। रात्रि दिन की हानि नहीं होती, कों की जब दिन में तीन मुहूर्न की वृद्धि होवे ला इतना ही मुहूर्त की रात्रि में हानि होरे. और रात्रि में तीन मुहू की वृद्धि हो तब दिन में हानि हो. इस से सदैव प्रातः काल में और सदैव संध्या काल में निक्षत्र योग नहीं करते हैं. इन में अभिजित नक्षत्र का प्रतिषेध है अर्थत् दो अभिजित नक्षत्र युग में
म्माल गपी अमावास्या संपूर्ण करे. अभिनित नक्षत्र के ६ मुहूर्त, ३७ भाग ६२ ये और ४७ भाग ।
% दमचा पाहुड का बवासवा अंतर पाहुडा
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48
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तायंचियं चीयालीसं अमावासं जातेति नो .चवणं पुण्णमासिणं॥ ६ ॥ तत्थ खलु FF इमाओ पुण्णमासिणीओ बबट्ठी, अमावासाओ बावट्ठी पण्णत्ताओ ॥ता एएमिणं अहं
संवच्छराणं पढमं पुण्णकासिणं चंदे कंसि दस जोगं जोएति,तासिणं जंसिकंदपदे चरम वावट्ठी पुण्णमासिणी जोगं जोतेति ताओणमामिणिओ ठाणाओमंडलंएगचउर सतणं छेत्ता बत्तीसं भागे उववाणिवेता एत्थरो चदे पढम पुणमासिणि जागं जोतेन्।ि
ता एतसिणं पंचण्हं संबछराणं दोचं पुनासिणं चंद कोस देससिजोगं जोतेतिता अधिक
६५ ये गये पीछे चुम्मालीसवी अमावास्या संपूर्ण करे. परंतु सूमिमा संपूर्ण नहीं करे ॥६॥ एक यु 1Eबासठ पूर्णिमा व य स अमावास्याओं की हैं. वहां गौतम सामी प्रश्न करते हैं कि इन पांच संवत्सर ।
प्रथम पूर्णिमा को चंद्र मंडल के कितने देश भांग में योग करके संपूर्ण करे ? उत्तर-अहो शिष्य ! जिस डल के देश भाग में चंद्रमा युग की वासंठवी पूर्णिमा योग कर संपूर्ण करे उम पूणमा के स्थानक से एक मंडल को १२४ भाग से छेद कर बत्तीस भाग में चलता हुवा चंद्रपा युग की प्रथर पूर्णिमा संपूर्ण करे. इन पांच संवत्सर में दूसरी पूर्णिमा को चंद्रमा मंडल को कितने विभाग में योग कर के संपूर्ण करे ? उत्तर-जिस विभाग में चंद्रमा पहिली पूणमा योग करके संपूर्ण के उस पूर्णिमा के स्थान से एक मंडल के १२४ भाग करके उनमें से बत्तीस भाग अनुक्रप
कम अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी +
प्रकाशक-राजावादर लाकाखममहायजी बारापमादजा
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1.
२५९
सप्तदश-चंद्र प्रज्ञाप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग
देसंसि चंदे पढमं पुराणमासिणं जातेति ता एतेमिणं पुण्णमासिणि ठाणाओ मंडलं एग चउविसेणं सएगछता बत्तसिं भागं उववानिवता तत्थगं से चंदे दृच पुमासिणिणं जोगं जोतेति ॥ता एतेसिणं पंवण्हं संवच्छराणं तच्चं पुण्णमामि चंदे कोस देससि जोगं जोतेति ? ताजसिणं देससि चदे दोच्चं पुणमामिणं जोगं जोनति ता तालि पुण्णमासणीओ ठाणाए मंडलं एगचउविसेणं संतेगच्छेत्ता बत्तीसं भागे उवाणिवेत्ता तत्थगं से चंदे तचं पुण्णमलिणी जागं जोतोते ॥ ता एए सण पचण्ह सवच्छराण दुवालस म पु ण मासिणं चंदे कसि देसान जोगं जे ए ते ता जंसिणं
देसि चदे तच्चं पुण्ण मसिणं जोगं जोएति ता एएसिणं पुण्णमासिणी ठाणभो। से लेा. वहा ही दूसरी पृणमा मंडल के ६४ वे भाग में योग करके संपूर्ण करे. तीसरी पर्णिमा की पृच्छा ? उत्तर-जिस विभाग में दूसरी पूर्णिमा को चंद्रमा योग करके संपूर्ण करे उस स्थान सई एक मंडल के १२४ भाग करके बत्तीस भाग अनुक्रम से लेना. वहां ही चंद्रमा योग करके तीसरी पूर्णिमा पूर्ण करे प्रश्न-अहो भगवन् ! इन पांच संवत्मरों की बारहवी पूर्णिमा किस विभाग में योग करके चंद्रमा पूर्ण करे ? उत्तर-जिम देश में तीसरा माम की पूणमा योग करके संपूर्ण करे उस पूर्णिमा के स्थान से एक मंडल के १२४ भगकरे वैसे २८८ भाग अनुक्रमः से लेना. वहां बारहवा । पणमा संपूर्ण होवे. तीसरी पूणमा से बारहवो पूर्णपा नानी होती है. इस से ३२४९%२८८ भाग
48 दशवा पाहुढे का बाब.सवा अंतर पाहुंडा 48
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सूत्र
naana
अनुवादक-पालकाली मनि श्री अमोलक ऋषिजी -
मंडलं एगचउवीस सएणं छत्ता दागिअट्टासिते. भगरते उबावणिवत्ता एत्येणं से चदे वालसमं पुणमासिणी जोगंजोतेति।।एवं खलु एतेणउतेणं ता पुण्णमासिणीओठाणातो मंडलं एगचउविसण सतेणं छत्ता. बत्तसि भागे उपवाणवेत्ता, तसि देसंलि ततं पण्णमासिगं चदे जोगं जोतेति॥ता एतसिणं पचण्हं संवच्छराणं चरवामवाट्रि पण्णमासिणं च कमि देसंक्ति जोगंजतेति ? ता जंबद्दीवरम पाइणपाडणाय तं उदीण. दाहिण मायाले बले मंडल एगं चउविसणं सतेणछत्ता दाहिणंसि च उभाग मंडलंसि सविसं भाग उमार, अद्वाविसतिम भागं बिनहा छत्ता,अट्टारसभागे उवावि
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहाय
2. 3
गी ३२४ हो. उ १२४ भाग से भागने मे डल : २
. बहारकरी पूर्णिमा योग करके संपूर्ण करे. इसी र: मे एक पू.
एक क पास के ३२ भाग से उस २देश में उमर्णिमा को बदस
कापामाच सात्सर में में बामही पूर्णिमा को
वाला
लाइव परदक्षणी की जिह्य से ए: १२४ भाग कर के दक्षिण के चे थे। भाग क मंडल में तवम भाग मंपूर्ण कर अहवामाश २० भाग मे छद देकर इन के अठारहा भाग लेकर गुन्न रुव भाग के तीन भाग कोभ.ग पश्चिम दिशा के १२४ घेतीन भाग गये पीछे और २० या
.
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IN शश-चंद्र प्राइसि सूत्र पह-उमा
णिवेत्ततिहिं भागेहि दोहिय कलाहिं पचत्थिमिल्लंसि चउभागमंडलमसंपत्ते एत्थणंसे चंदे, चरमवावटी पुण्णमासिणंजोगंजोतेति॥७॥ता एतसिणं पंचण्हं संवच्छराणं,पढमापण्णमा. सिणं सूरे कसि देससि जोगं जोतेति? ता जंसिगं देससि सूरे चरमवावट्ठी पुण्णमामीणं जागंजोतेति॥तेति पुण्णमासिणीओठाणाओमंडलं चउविसेणं संतण छेत्ता चउणउतिभा। उवावणिवेत्ता, एत्थगं से सूरे पढम पुण्णमामिण जोगं जोतेति ॥ ता एतनिण पंचण्हं संबच्छराणं देचं पण्णमासिण पच्छा? ता जसिणंदमसिमरिए पढम पण्णमामिणं जोगं
जोतेति,ताते पुण्णमासिणीओ टाणा मंडलं एगचउविसे गंसतणं च्छेत्ता चउणवतिभागे एक भाग व एक भाग के तीन भाग की एक कला शेष रहे इन की बीच के स्थान में चंद्रमा वामठवी पूर्णिमा य ग करके संपूर्ण करे. एक युग में चंद्रग अर्ध मंडल १७६८ करता है, और दो चंद्रमा मिलकर
संपूर्ण चंद्र मंडल ८८४ करते हैं॥७॥ प्रश्न-अहो भगवन् ! इन पांच संवत्सर में प्रथम पूर्णिमा को -सूर्य कौन से विभाग में योग करके संपूर्ण करे ? उत्तर- अहो शिष्य ! जिस विभाग में सूर्य युग की
चरम बासठवी पूर्णिमा योग करके संपूर्ण करे उस स्थान में एक मंडल के १२५ भाग में के १४ भाग अनुक्रम से लेकर सूर्य प्रथम पूर्णिमा याग करके पूर्ण करे. इन पांच संवत्सर में से दूसरी पर्णिमा की पृच्छा. उतर-जिम देश में मूर्य प्रथम पूर्णिमा योग करके संपूर्ण करे उस स्थान से एक मंडल के २०४ भाग करके उस में अनुक्रम से १४ भाग लेना. यहाँ पर सूर्य दूसरा पूर्णिमा योग करके संपूर्ण
दशा पाडका बावीपवा अंतर पाइडा १
अर्थ
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सूत्र
अर्थ
42 अनुवाद लब्रह्मचारीमुनि श्री अप क ऋषिजी
विणिवेत्ता एत्य से मूरे दाचं पुण्णमासिगं जोगं जोतेति, एवं तचंपि वरं दोच्च'तो पंच वच्छराणं, दुवालसमं पुण्णमासिणं पुच्छाता जंसिणं दे सितचं पुण्णमा जोगं जातेति ताते पुण्णमासिणीओ ठाणाए मडलं एगंच उविसणं सतेणच्छेत्ता अट्ठछत्ताले भागे उवावणिवित्ता एत्थ से सूरे दुवालसमं पुण्णमासिणजोगं जातेति ॥ एवं खलु एएणं उत्राएणं ताते मासिणीणं ठणाओ मंडलं एग चउवीमेणं सतेणं छेत्ता चउणरति भागे उबावात तंसि २ दसंसि तंतं पुण्णमाणि मूरे जोगं जातति ॥ ਗ एतसिणं पंचहं संवछराणं चरमत्राचट्ठी पुच्छा ?
ता जबूद्दवस्न २ पार्डींग पडिणयाए उदिणा हिण मायांत जीवाते करे. ऐसे ही तीसरी पूर्णिमा का यहां दूरी पूर्णिमा से १४ भाग लेना. अहो भगवन् ! इन पांच संवत्सर की बारहवी पूर्णता दिस देश से सूर्य यग करके संपूर्ण करे ? अहो शिष्य ! जिस देश में तीसरी पूर्णिमा सूर्य योग करके संपूर्ण करे उस देश से एक मंडल के १२४ भाग करके आठ सोई छयालीस (८४६) अनुक्रम से लेना, यहां सूर्य बारहवी पूर्णिमा योग करके संपूर्ण कर, ९४ को ९ से गुणा करने मे ८४६ होते हैं, इसी तरह से उस पूर्णिमा के स्थान से एक २ मंडल के १२४ भाग के ९४ भाग लेकर उस देश में पूर्णिया याग करके. संपूर्ण करें. अब इन पांच संवत्सर में चरम बाट पूर्णिमा की पृच्छा, इस जम्बूदीप में पूर्व पश्चिम की लम्बाई व उत्तर दक्षिण की जिला से एक मंडल के १२४)
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● प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ०
२६२
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44
Ammom rnwwwwwwwwwwwwwwwwww..
दश-चंद्र प्रज्ञप्त मूत्र षष्ठ-उपाङ्ग कम
मंडलं एगं चउवीसेणं एणंछत्ता पुरस्थिामल्लसि चउभाग मंडलंसि सत्तवासभागे उवावाणिवेत्ता अठ्ठावीसतिमं भागं विसह छेत्ता अारस भागे उवाणिवेत्ता तिहिं भामुहिं दाहिय कलाहिं दाहिण च उभाग मंडलं मसंपत्त, एत्थणं । २रे चरम पानी पण मासिणं जोग जोतेति॥८॥एवं जव अभिलावणं च स पुषणमातिया मानियाओ तेणं चेव अभिलावणं अमावसतावि भागियवाओ तंजहा-पढमा वितिया दुवालसा,
एवं खलु एतेणउवाएक ताते २ अमावासंठ.णाओ मंडलं एग चउवाले सतेणं छेत्ता भाग करना, पूर्णदिक वृशि में मंडल के चौथे भाग एकतीस भाग गरे, म २७ भ ग और 14 अट्ठावीसत्रे भाग के २० भाग में के १८ भाग व दो पला लेकर शेष ३ भ ग १२४ वे और १ भाग शबीसया और एक कला,इतना शेष रहे उम स्थान प्रर्य चरम बासठवी पूर्णिमा योग करके पूर्ण करे.
मर्य अर्ध मंडल १८३० करता है, दोनों सूर्य मिलकर संपूर्ण मंडल ९१५ करंस हैं।॥ ८ ॥ ऐहो जिस अभिलाप से चंद्र पूर्णिमा संपूर्ण करे सो कहा, वैम ही अपावास्या का भी कहना. जैसे-प्रथम अमावास्या युग की चरम ब.सठयो अमावास्या से जानना, दूसरी अमावास्या युग की पहिली अमावास्या से कहना. बारहवी अमावास्या इग्यारवी अमावास्या से कहना, इसी तरह उन २ अमावास्या के स्थानक से में
480 दशरा पाहडे का वायासबा अंतर पाहुडा 488
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सत्र
अर्थ
42 अनुवादक : बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
बत्तीसं २ भागे उवावणिवेता, तंसि २ देसंसि तंतं अमावासं वंदे जोगं जोतेति, ता ऐसिणं पंचं संच्छरणं चरम वात्रट्ठि अमावासं पुच्छा ता जंसिणं देसंसि चंदे चरम वाट्ट पुण्मासिणं जो ताते पुण्मः सिनिठाणात मंडलं एतच उविसे गं सतेनं छेत्ता सोलसम भागे, उसक्कावइत्ता, एत्थणं से चरम वात्रट्ठि अमावासं जोति ॥ ९ ॥ ता एएसिणं पंचहं संच्छराणं पढमं अमात्रासंसूरे कांदेसंसि ज. मेजोतेति ताजंसिणं सूरे चरमवावद्विअमावासं जोगंजोते ति ॥ ता - एते सिणं अमावास जो गंजोतेति ता ते अमात्रासं
के १२४ भाग छेड़ कर अनुक्रम से बतीम भाग लेना, उम २ देश के स्थानक से उस २ मास की अमावास्या को चंद्र योग करके संपूर्ण करे. इन पांच संवत्सर में बासठवी अमावास्या की पुच्छा, जिम देश में चंद्रमा चरम बासटवी पूमा योग करके संपूर्ण करे उस पूर्णिमा को स्थान में एक मंडल के १२४ भाग करे वैसे सोलह भाग पीछे लेना. यहां युग की चरम वामी अमावास्या योग करके संपूर्ण करे ॥ १ ॥ इन पांच संवत्सर में प्रथम अमावास्या को सूर्य कौनसे विभाग में संपूर्ण करे ? जिस विभाग में सूर्य चरम बासी अमावास्या येोग करे उस स्थान से एक मंडल के १२४ भाग करके ९४ भाग अनुक्रम से ग्रहण करना. यहां सूर्य प्रथम अमावास्या को योग करके संपूर्ण करे, ऐने ही जैसे सूर्य की पूर्णिमाओं
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प्रकाशक- राजाराल सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसाद •
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सूत्र
अर्थ
48- सप्तदश चंद्र मज्ञः सूत्र पट्ट उपाङ्ग 4388
ठाणांत मंडल एवं बउवणि संतणं छेत्ता चउणउति भागे उवावणिवेत्ता ॥ एथ से सूरे पढमं अमावास जोगं जोतेति॥ एवं जेणेव अभिलावणं सुरस्त पुण्णमासिणिओ भणिताओ तेणेव अमावासाओवि तंजहा वितिया ततिया जाब दुबालसमा एवं खलु एते वात तातेर अमावास द्वाणाले मंडलं एग चउवीमेणं सतेणं छेत्ता चउणउति भाग उवावणिवेत्ता तंसि २ देसंसि अमावासं सूरे जोगं जोतेलि, ता एतेसिणं पंचण्हं मंत्रच्छराण सरम बाबही अमावास पुच्छा, ता जंसिणं देसांत सुरे चरम बाब । पुष्णमासिणं जोगं जोति॥ ताते पुण्णमासिणिडाणएते, मंडल एवं चउवीसेणं सतेणं छत्ता सुयालिस भागे उसकावर्तिता, एत्थणं से सूर चरम बावट्ठी अमावास जोगं जोतेति कधी वैसे ही अमावास्याओं कहना जैसे प्रथम अमावास्या के स्थान से ९४ भाग में दूसरी अमावा स्या, दूसरी अमावास्या के स्थान से १४ भाग में अनुक्रम से तीसरी अमावास्या यावर अभ्यारची अमावास्या के स्थान से ९४ भाग में बारहवी अमावास्या. इसी तरह उस २ अमावास्या के स्थान से एक मंडल के १२४ भाग के ९४ भाग अनुक्रम से लेकर उस देश में अमावास्या सूर्य की साथ योग करे. अब इन पांच संवत्सर में चरम वासटवी अमावास्या की पृच्छ, निदेश में सूर्य चरम वामी पूर्णिमा उस देश से एक मंडल के १२४ भाग के ४७ भाग छे लेकर सूर्य चरम अस
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48 दशा पाहुडे का बावीसवा अंतर पाहुडा
२६५.
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॥१०॥ ता एएसिण पंचण्हं संवच्छराणं पढमा पुण्णमासिणं चंदे, केणं नक्खत्तेणं जोगं
मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
अमावास्या योग करके संपूर्ण करे ॥ १० ॥प्रश्न-अहो भगवन् ! इन पांच संवत्सर में प्रथम पूर्णिमा को चंद्र कौनसा नक्षत्र की साथ योग करके संपूर्ण करे ? उत्तर-धनिष्टा नक्षत्र की साथ योग करके चंद्र प्रथम पूर्णिया संपूर्ण करे. यह धनिष्ठा नक्षत्र तीन मुहूर्न बासठाये उन्नीस भ ग व एक बासठीये भाग के ६७ भाग में के ६५ भाग. इतना काल पर्यंत चंद्र धनिष्टा नक्षत्र की साथ योग करके प्रथम पूर्णिमा संपूर्ण करे. इस समय सूर्य कौनसे नक्षत्र की साथ योग करता हैं ? उस समय पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र की साथ सूर्य योग करता है. इस नक्षत्र के २८ मुहूर्न ३८ भाग बासठीये और ३२ भाग ६७ ये शेष रहे तब प्रथम पूर्णिमा संपूर्ण होवे. इस का गणित करने की विधि चंद्रमा की साथ नक्षत्र योग करके पूर्णिमा संपूर्ण करे उस नक्षत्र को नीकालने के लिये धृवराशि बनाना. पांच संवत्र के चंद्रपास ६२ हैं, और पांच संवत्सर में नक्षत्र ६७ वार चंद्र की साथ योग करते हैं. पांच संवत्सर की १८३० अहोरात्रि होती
है. उसे ६७ का भाग देने से २७ दिन ९ मुहूर्न २४ भाग ६२ ये और ६६ चरणिये भाग ६० ये होत है.. बक चरणीये भाग करने को २७ दिन को तीस से गुणा करके ९ बढाना. २७४३०+१०८१९. उसके
सठीये भाग करने को ६२ से गुना करके २४ भाग मीलाना. ८१९४६२+ २४=५०८०२० इस के चूरणिये ६७ ये भाग करने को ६७ से गुना करके ६६ चूरणिये भाग मीलाना . ५०८०२४६७+६६=
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी
- अनुवादक बाह
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प्रज्ञप्ति सूत्र-पष्ट उपाङ्ग 48 सप्तदश चंद्र
___ जोतेति? ता धणिट्ठा हं धाणि? तिणि मुहुत्त एकूणवीसं च बावट्ठी भागा मुहत्तस्स,वावट्ठी मी ३४०३८००. यह एक नक्षत्र मास की पाश हुई. अब चंद्रमास की धवराशि वताते हैं. पांच संवत्सर के १८३० दिन, इस को ६ भाग देने से २० दिन १५ मुहुर्त और एक मुहूर्त के वामठी ३० भाग हो. इस के चरणिये भाग करने के लिये दिन को ३० से गुना करना और स में १५ मीलाना १२९४३०+१५%3D८८५. उस को १२ से गुना करके ३० मीलाना ८८५४६+३०-५४१००. उसे " ६७ से गुना करने से ३६७८३०० चाणये भाग चंद्रमास के हुने. यह दूसरी धूवराशि हुई. चंद्रमा कौनसे नक्षत्र की साथ योग करके प्रथम मास संपूर्ण करे, यह जानने क लिये दूसरी धृवराशि को एक से गुना करके प्रथम धृवराशि से भाग देना. ३६७८३००x१-३६७८३००-३४०३८.८ इसी से एक पूर्ण आवे और २७४५०० शेष रहे. इस को ६२ ये भाग करने के लिये ६७ से भाग देना, जिस से ४०१७ पूर्ण भाग हुये, और शष एक रहा. इस के मुहू करने को ६२ से भाग देना जिसमें से ६६ मुहूर्त और ५ भाग शेष रहे. अर्थात् एक माम पूर्ण होने में एक नक्षत्र मास, ६६ मुहूर्न, ५ भाग १६२ ये, और एक भाग ६७ होवे. युग के प्रारंभ मे है. चंद्रमा का साथ अभिजित नक्षत्र का योग होता है, वह नक्षत्र ९ मुहूर्त २४ भाग ६२ ये व ६६ भाग ६७ ये तक रहता है. इस से आगे श्रवण नक्षत्र तीस मुहूर्त तक रहता है, इस से १६ मुहू ५ भाग ६२ये भाग ६७ये में से३९महर्न २४ भागहरयः ।
43+दशा पाहुड का बावीसवा अंतर पडा
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सूत्र
भर्थ
* भागंच सत्तसट्टियं छेत्ता पंचसटिचुणिया भागा सेसा तं समयं च णं सूरे केण णक्ख
भाग ६७ये बाद करना इससे २६ मुहूर्न ४२भ ग६२ ये दो भाग६७येष्टा नक्षत्र का साथ योग करता है. यह धनिष्टा नक्षत्र तीस मुहून का है, इस से धनिष्टा के मुहूर्त में से पूर्वोक्त महर्न बाद करने से तीन मुहूर्त १९५ ६२ य ६५ भाग ६७ ये इतना काल धनिष्टा नक्षत्र पूर्णिमा संपूर्ण होने पर शेष रहत है. अब सूर्य की साथ नक्षत्र के योग पूर्णिमा मंपूर्ण हाव यह नीकालने का यंत्र-गंच संवत्सर में चंद्र पास बासठ है और सूर्य की साथ एक २ नक्षत्र पांच वार परिभ्रण करते हैं मंच संवत्सर की १८३० अहोराधि हैं। इस से १८३० को पांच का भाग दने से ३६६ पूर्ण अव. इन ३६६ दिन में सूर्य के अट्ठाइस नक्षत्रों की साथ योग करता है. इस के मुहूर्त के बामठ ये भाम करने को ३६६ दिन को ३० मे गुना करना, इस से १०९८० मुहूर्न होवे, इम को ६२ से गुना करना जिम में ६८०७६० भाग ६२ य हाव. यह एक नक्षम बर्ष हावे, यह प्रथम नगशि हुइ. चंद्र मासकी धृवगशि पांच मंबार के १८३ ई दिन हाव, इम को वामठ मे भ ग देने मे २५ दिन .५ मुदत व ३० भाग १२ ये होवे, इम के मुहूर्न
करने को २१ को ३० गुणा कर के १८वीलाना-२९४३०+१=3D८८५ गत होरे इम के बासठ य हभाग करने के लिये १२ से गुणा कर के ३० मैलाना ८८.४६२+३०००४०००. यह चंद्र मान के -
भाग हवे. यह दूसरी धरराशि हुइ. सूर्य कोन से नक्षत्र की साथ योग करता हुवा प्रथम चंद्र मास ममाप्त करे यह नाकालने का दूसरी वरााश को एक से गुणाकर के प्रथम प्रगशि से भाम देना. इस तरह
4 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी ।
मका राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी घाल? *
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तेणं जोग जोतंति ? पुव्वाहि फग्गुणिहिं । पुवाफग्गणी अट्ठावीसं च मुहुत्ता अटुतीसं
+
भाग देने कोई भी पर्णक नहीं आता है, इसलिये इम के मुहर्न करने को ६२ में भाग देना जिससे V१८८५ महून व ३० भाग ६२ ये होने. अव प्रथम युग पठने के प्रथम समय में सूर्य की साथ पुष्य नक्षत्र
१३८ मूह में पूर्ण होकर १३१ मह २६४ मुहूर्त पर्यंत योग कर के नक्षत्र की समाप्ति होग, इससे पष्य नक्षत्र से गिनती करना. प्रथम पूर्णमास संपूर्ण होने सूर्य ८८५ मुहूर्त३ : भ ग १२ये तक नक्षत्री साथ योग करे, और मघा
* सप्तरश चंद्र प्रज्ञप्त सूत्र पठ-पाङ्ग
484 दशवा पाहुड का इक्की सवा अंतर पाहूडा 428
पूष्य
८४३० ८६३१
अश्लेषा
६५ विशावा । मघा
८६७
| अनुराधा पू.फिल्गु १२०१ ज्येष्ट उत्त फाल्नी १८७२ |मूल
२२७४ पूर्वाषाढा
उत्तरपाढा
२८७७ | अभिजित
अश्विन ३४८० श्रवण ६.१८ भरणी ૨૮૮૨ धन्टिा
कृत्तिका |शनभिषा ६६२१ रोहिणी ४४.५ पूर्वाभाद्रपद । ७००३ मृगशर ४८८७ उत्तरभाद्रपट .७६२६ आर्दा ५४१०. राति ८०२८ पुनर्वसु
| पूष्य
Vvod० ०.
चित्रा.
१०२३९ १०८४२
*
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बावट्ठी भागा मुहुत्तस्स वावट्ठी भार्ग च सत्त सढिया छत्ता दुवातीस चुणिया भागा सेसा ॥ ११ ॥ ता एतेसिणं पंचण्हं संवच्छराणं दोच्चं पुण्णमासिणं चंदे केगं
वालब्रह्म चारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी ।।
नक्षत्र ८६७ मुहू में संपूर्ण होवे. इससे ८८५ मुहू ३० भाग १२ये में से ८६७ मुहूर्त याद करने से ११८ महून ३० भाग बासठोये पू िफाल्गुनी नक्षत्र की साथ योग करे. यह पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र ४२२ मुहूर्त
का है, जिनमें से १८३० गहून बाद करने से ३८३ । पूर्वाफ ल्गुनी नक्षत्र के शेष रहे हैं, तब मूर्य.
प्रथम पूर्णमाम संपूर्ण करे. सर्य नक्षत्र ३८३ मुहूर्त शेष रहे तब चंद्र नक्षत्र कितना शेष रहे ३० कक ६२ से गुणा करके ३२ भाग पीलाना ३८३४६२+३२=२३७७८ भाग हुवे. पूर्वाफाल्गुनी
नक्षत्र ३० मुहू तक चंद्र की माथ योग करता है, इस मे इने ३० से गुना. २३७७८४३०-७१३३४.. पूर्वाफाल्गुनः नक्षत्र ४.२ सुर्यना मर्य की साथ योग करता है. इन से पूक्ति संख्या को ४०२ से भाग देना, जिस से १७७४ भग पूर्ण और १२२ शेप रहे. इस के ६७ य भाग करने को ६७ म
गुणा करन जिस से १२८६४ हावे, इस को ४०२ में भाग देने मे ३२ भाग ६७ पूर्ण आवे. १७७४ लव सटोय भाग के मुत्र करन से २८ महू व ३८ शेष रहे. इस से चंद्र नक्षत्र मूर्य की साथ २८ मुहूर्व में
२८ भाग ६२ या ३२ भ.ग ६७ या शेप रहे तब प्रथन पूर्णिमा संपूर्ण हावे..॥ ११ ॥ प्रश्न-इन पांच
काशक सजावहादुर लाला सुखदेवसहाय जी ज्वाला प्रसादजी.
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सूत्र
अर्थ
BEBY 453
नक्खत्तणं जोगंजातेति ? ता उत्तराहिं पीवताहि उत्तराणं पोटुबयाणं सत्तावीसं मुहुत्ता, चद्दस्य वाट्टि भागा मुहुत्तस्स वात्रट्टि भागंच सत्त सहिया छेत्ता, चडचण
सोमा म च सूरेकेण सत्ते जोगं जातेति ? ताराहं फगुणिहिं गुणणं समुचा तेचीच बाब भागात बाबा भागच सत्त बिया एकतीसं चुण्या भागा सेसा ॥१२॥ ता एतेसिणं पंचण्डं संवच्छरणं तच्च पुणमविंदण केणं णक्खत्तेगं जोग जोततिता अस्तिणिहिं अस्तिणीणं एक्कवसिंच रिपूर्ण होते चंद्र कौनसा नाय की साथ योग करना है ? उत्तराभाद्रपद नक्षत्र की सागर दूसरी पूर्णिमा संपूर्ण करे. यह नक्षत्र २७ मुहूर्त १४ भाग ३२ ये और ६४ दूषित ७ये देष रहे तब दूसरा मान संपूर्ण होता है. इस समय सूर्य कौन से नक्षत्र की साथ योग है सूर्य उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र की संथ योग करता है. यह नक्षत्र सात मुहूर्त ३३ भाग १२ मे और ३१ भाग ६० ये शेष रहे तर दूसरा मात्र संपूर्ण हावे. ।। १२ ।। इन पांच वस्त्र में तीसरी पूजिश को उस नक्षत्र की साथ चंद्र योग करता है?इन पांच संवत्सर में तीसरी पूर्णिमा को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र की साथ योग करता है. यह अभिनी नक्षत्र
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दशपका बासवा अंतर पाहुडा
२७१
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महुत्ता, णवय वावट्ठी भागा महत्तत वावट्ठीभार्ग च सत्तासट्टियो छेत्ता, तेवढी चुणिया नागा सेसा,त समयं चणं सूरे कणं नक्खत्तणं जोगं जातेति ?ता चित्ताहिं चित्ताण एक महुत्त अट्ठावीसंच वावट्ठी भागा मुहत्तस्स वावट्ठी भागं च सत्त सट्ठीया छेत्ता तीसंचाण्णया भागा संसा ॥ १३ ॥ ता एतसिण पचण्ह सबच्छराण दुवालसमं
पुण्णमासिणं पुच्छा ? ता उत्तराहिं असाढाहिं उत्तरास ढाहिं छब्बीसं महत्ता E२१ मुहूभाग बामठी ये तसठ चुराणिपा भ ग६७य शष रहे तब तीसरा माम पूर्ण होता है. उस समय सूर्य
कौन नक्षत्र की साथ योग करता है? उस समय सूर्य चित्रा नक्षत्र की माथ योग करता है. यह चित्रा नक्षत्र एक मुहूर्त ०८ भाग ६२ या ३: भूणिया भग ६७ या शेप रह और सूर्य नक्षत्र १९ मुहूर्न ३४ भाग ६२ या शेष रहे तब तीमरा मास संपूर्ण होने ॥ १३ ॥ इन पांच पंवत्सर में बारहरी पूर्णपा को चंद्रमा कैन से नक्षत्र की साथ योग करता है ? वार हवी पृर्णमा को चंद्रमा उत्तराप ढा नक्षत्र की साथ योग करता है यह उत्तराप ढा नक्षत्र २६ मुहूर्त २६ भाग ६२ ये ५४ भ ग १७ ये शप रहे तब व रही पूर्णमा संपूर्ण हावे. उम समय मूर्य कोनम नक्षत्र की साथ योग करता है ? उस समय सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र की साथ यंग करता है. यह नक्षत्र १६ मुहूर्न ८ भाग ६२ य, २० भाग ६७ या शेष रहे तब और सूर्य नक्षत्र .
अनुवादक-बाल ब्रह्मचारी मुाने श्रा अमालक जापान
काशक राजबहादुर लाला मुबहवसमालाप्रसादजायजी.
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+ सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ति मूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 428
छब्बीसंच वावट्ठीभागा मुहुत्तस्स बावट्ठी मागंच सत्तसट्रिया छेत्ता चउप्पण्णं चुणिया भागासेसा तं समयं चणं सूर केण णक्खत्तेणं जोगं जोएति वा पुण्णवसुहिं पुणवसुण सेोलस मुहत्ता अट्ठयावावट्ठी महत्तस्स भागा वावट्ठी भागं च सत्ससट्ठीया छत्ता
वीस.चुणिया:भागा सेसा ॥ १४ ॥ ता ऐतीसणं पंचण्डं संबच्छराणं चरम वावट्ठी पुनर्वसू २१६ मुहूर्न १२ भाग ६२ या शप रहे तब बारहवी पूर्णमा मंपूर्ण होवे. यां धृवगशि को बारह गुना करना ॥ १४ ॥ इन पांच संवत्मर में चरम यामठवी पूर्णिमा को चंद्र कौन सा नक्षत्र की साथ योग है करना है ? बासठवी पूर्णिमा को चंद्र उत्तगप ढा नक्षत्र की साथ योग करता है. उत्तराप ढा नक्षत्र के चरिम समय में योग कर के बामट्ठव मास पूर्ण के . उस समय सूर्य कौन से नक्षत्र की साथ योग करे? है उस समय सर्य पुष्य नक्षत्र का साथ योग करे. यह पुष्य नक्षत्र १९ मुर्न ४३ भाग ६२ य तेवीम भाग १६७ य शेष रहे और सूर्य नक्षत्र २६४ मुहून शेष रहे तब चासठया पूर्गप्र स संपुर्ण होवे. इम में प्रथम धृव १२
राशिको ६२ से गना करना ॥ १५ ॥ अहा भगवन् ; इन पांद संलर में प्रथम अमावास्या चंद्र कौंन से नक्षत्र की माथ योग कर के पूर्ण करे ? इन पांच संवत्सर में प्रथम अमावास्या अश्लषा नक्षत्र की साय योग कर के पूर्ण करे यह अश्लपा नक्षत्र एक मुहूर्त ४० भाग ६२ ये ६६ भाग ६७ या येष रहे . तब प्रथम अमावास्या संपूर्ण होय, इस की विधि बताते है, प्रथन अमावास्या में अर्ध पास दो इस से दूसरी है
Hदशवा पाहुडे का बावीपा और पाहुडा
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पुण्णमासिणं चंदे केणं णक्खत्तेणं जोगं जोतेति? ता उत्तराहि अंसाढाहिं उत्तराणं असाढाणं चरम समय तं समयं चणं सूरे केणं णक्खत्तेणं जोगं जोतेति? ता पुरसेणं पुस्सस्सणं एकोण विसंमुहुत्त! तेत्तालसिं च वावट्ठी भागा महत्तरस वावट्ठी भागं च सत्तसट्ठीया छेत्ता, तेत्तीसं चुणिया भागा सेसा, ॥३५॥ ता एतेसिणं पंचण्हं संवच्छराणं पढमं
धृवगाशे ३६७८३०० का अर्ध करने से १८३११५. होवे, इस के ६२ ये म.ग करने को७से भाग देना इससे २७४५० आचे, और शेष कच्छ नहा रह. मुहूत करने को २७४५० क १२ मे भाग देने से ४४२ मुहूर्त और शेप ४६ भाग रहे. पुष्य नक्षत्र पर्यंत ४२९ मुहूर्न २४ भाग ६२ ये ६६ भाग ६७ ये होते है इन में से ४४२, मुहूर्न बाद करना शंप १३ मुहू २१ भाग ६२ या व एक भाग ६७ या रहा. अश्लप। नक्षत्र मय बालकर १५ मुहुर्त का है, उस में स पूक्त मुहूर्न बाद करने से शेष एक महत ४०१, भाग ६२ ये ६६ भाग ६ ये रहे, उस समय प्रथम अमावस्या संपूर्ण द्वार. अहो भगवन्! उस समय सूर्य
कौनसा नक्षत्र की माथ योग को मंपूर्ण करे ? उस समय सूर्य अश्लेषा नक्षत्र की साथ योग करक | संपूर्ण करे. यह नक्षत्र एक महः ४० भाग ६२ ये और ६६ भाग ६१ य शेष चंद्र नक्षत्र रहने पर सूर्य 1+नक्षत्र२२ महूदि भाग ६२ये शेप रहने पर प्रथम अमावास्या पूर्ण हो. इस की विधि बताते है. प्रथम
अनावद क-बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक - ५॥
•पकाशक गजानहादूर लाला मचवमहायजी वालाएमादजी.
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अमावासं चंदे केणं नक्खत्तणं जोगं जोतेति? ता असले साहिं असलेसाणं एक्को मुहुत्तो सूत्र
चत्तालीसं चं वावट्ठीभागा मुहुत्तस्स वावट्ठी भागंच सत्तसट्ठिया छेत्ता छावट्ठी चुणिया
भागा सेसा,तंसमयं चणं सूरे के ग णक्खत्तेणं जोगं जोतेति,ता असलेसाहि चेब,असलेसा १ अमावास्या में आधा मास हारे इन से दूसरी धृवरः। ५४९० ० का आधा करने से २७४५० होवे इस . के मुहूर्त करने को ६२ स भाग देने से ४५२ मुहूर्त ४६ भाग ६२ ये रहे. इस में से पुष्य नक्षत्र के २६४१ मुहू जाते अश्लषा नक्षत्र १७८ मुहूर्न ४६ भाग ६२ ये का रहा. अश्लेषा नक्षत्र २०१ मुहूर्त का है | जिस में से १७८ मुहू ४६ भाग ६२ ये जाने से २२ मुहुः १६ भाग ६२ ये का सूर्य नक्षत्र रहे तब है। प्रथर अमावस्या पूर्ण हावे. जब सूर्य नक्षत्रइतना रहा तब चंद्र नक्षत्र कितना रहे? वाइस मुहूर्त के ६२ये भाग करनहो६२ से गणा करना, और १६ मौलाना २२४६२+१६%१३८० भाग ६२य होवे,और अश्लेषा नक्षत्र चंद्र की माथ १५ मुहुर्त पर्या योग करता है, इस से १३८० को १५ से गना करना, जिम मे २०७०
हावे और यह नक्षत्र मई की माय २०१ मुहूर्व पर्या योग करता है इस से २०७०० को २.१. *भाग देना, इन से १०२ भाग ६२ ये आये और शेष १९८ रहे इस के ६७ ये भाग करने । । को ६२ गुणा करना, जिस से १३२६६ होवे उसे २०१ से भाग देने से ६६ आय. १०२ बामठीये ।
427 मतदश-चद्र प्रज्ञप्ती सूत्रषष्ठ-उपाङ्ग 48
दशवा पाइडे का ब वीसवा अंतर पाहुडा
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२७६
__णं एक्को मुहतो चत्तालसिं च वावट्ठी भागा मुहत्तस्त वावट्ठि भागं च सत्त सट्ठिया
छत्ता छावट्टि चुणिया भागा संसा ॥ १६ ॥ ता एतेसिणं पंचण्हं सच्छराणं दोच्चं अमावास चंदे पुच्छा? ता उत्तरा फग्गुणिहिं उत्तराफग्गुणीणं चत्तालीसं मुहुत्ता पणत्ती संच वावट्ठी भागा महत्तस्स वावट्ठो भागंच सत्तसट्ठिया छत्ता पगट्ठी चणिया भाग! सेला।। तं सन्यं चणं सूरे केणं णवत्तेणं पुच्छा ? ता उत्तराहिं फग्गुणहिं उत्तराण फग्गुणीण चत्तालीसं मुहुत्ता तंचेव जाव पण्णट्टी चुणिया भागासेसा ॥ १७ ॥
अर्थ
अनवादक-बाल ब्रह्मचारी पनि श्री अमोलक षिजी
भाग के महुर्त करने को १२से भाग देना इस से १ मुहूर्त ४० भाग ६२ ये हवे इस से चंद्र नक्षत्र अश्लपा महूर्त ४० भाग ६२ ये ६६ भाग ६१ ये सूर्य की माथ शेप रहन पर प्रथम अमावास्या पुर्ण करे. ॥ १६ ॥ इन पांच संवत्सर में दूसरी अमावास्या को चंद्रमा कौन नक्षत्र की साथ योग करके
पूर्ण करे? दूसरी अमावास्या को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र योग करे. इस नक्षत्र का ४० मुहूर्त ३५ भाग ६२ य और १५ चगणये भाग ६७ ये शेष रहे नव दुमरी अमावास्या संपूर्ण हाव. इस का गणित प्रथम अमावास्या जैस जानना. इस से दूसरी धृतराशिका देदा करना क्यों कि यह अमावास्था देढ मास में पूर्ण होती हैं. इस समय सूर्य कौनमा नक्षत्र की साथ योग करता है? इस ममय सूर्य उत्तराफ ल्गुनी नक्षत्र की वाथ योग करें यह उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र ४ - मुई। ३५ भाग ६२ ये और ६५ चूरणिये भाग ६७ ये शेष रहे। तत्र और मर्य नक्षत्र ५४३ मुहूर्न ४८ भाग ६२ये शेष रहे तब दूसरी अमावास्या संपुर्ण होवे ॥ १७ ।।
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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२७७
सप्तदश चंद्रम-मत्र पठ-पाङ्ग 48
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तः एतेसिणं पंचण्ह संवच्छराणं तच्चं अमावास धंदे पुच्छा, ता हत्थेणं इत्थण चत्तारिमुहुत्ता तीसं च वावट्ठीभागा मुहुनस्स, वावट्ठी भागंच सत्तसट्रिया छेत्ता चउसट्ठी चुणिया भागा सेमा । तं समयं चणं सूरे केणं पुच्छ। ? ता हत्थेणं घेवं हत्यगं जंचेव चंदस्त ॥ १८ ता एतेसिणं पंचाहं संवच्छरार्ग दुवालसमं अमावास
पुच्छा ? ता अहाहि अदाणं चत्तारि मुहत्ता दसयवाक्ट्ठी भागा मुहत्तस्स वात्रट्ठी इन पांच संवत्सर में विक्षरी अभावारूपा को चंद्र कौनस नस की साथ योग करता है ? तीसरी अमावास्या को हैरत नक्षत्र योग करता है. इस नक्षत्र का चा मुहूर्त ३० भाग ६२ ये ६४ भाग ये शेष रहे तब तीसरी अमावास्या संपूर्ण होवे. इस समय सूर्य कौनसे नक्षत्र की साथ योग करता है ? इस समय सूर्य हस्त नक्षत्र की साय योग करके अमावास्या संपूर्ण करे. यह हस्त नक्षत्र चार मुहूर्त. ३०१ भ.ग ६२ या और ६४ भाग ६७ ये शेष रहे और सूर्य नक्षत्र ६० मुहूर्व १८ भाग ६२ या शेष रहे तब तीपरी अमावास्या संपूर्ण हे वे. इस की गिनती प्रथम अमावास्या जैसे ही लेना परंतु इस में २५ से मुणा करना क्यों की यह २॥ मास में पूर्ण होते. ॥ १८॥ इन पांच संवत्सर में बारहवी अमावास्या कौन से नक्षत्र में संपूर्ण होने ? बारहवी अमावस्या को चंद्रमा आर्द्रा नक्षत्र की साथ योग करता है. यह आ नक्षत्र चार मत १० भाग ६२ ये ५४ भाग ६७ ये शेष रहे तर बारहवी अमास्या संपूर्ण होती हैं।
दशवा पाहुडे का बावीसवा अंतर पाहुडा
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१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
भागं च सत्त सट्टिया छत्ता च उपण्णं चुणिया भागा संस॥ तं समयं चणं सूरे के पुछा? ता अदाहिं चैव अाणं चत्तारि जंचेच चंदरस तंचेव ॥ १९ ॥ ता एतसिणं पंचहं संवच्छराणं बरम वाठि अमावासं चंदे केणं पुच्छ। ? ता पुण्यवसुणा पुण्ण बसुणं बावीसंमुहुत्ता छयालीसंच व वट्ठी भागा मुहुत्तस्स तं समयं चणं सूरे केणं पुन्छ।? ता पुण्गवसुहि. पुण्णवसुणं शराबीसं जंचव चदस्स तंचव ॥ २० ॥ ता जेणं २
नक्खत्तणं चंद जोमं जोतेति सिदेससि सेणं इमातिं अट्ठएकूणवीसाइं मुहुत्तसयाई । इस समय सूर्य कौन से नक्षत्र की साथ योग करता हैं ? इस समय सूर्य आर्द्रा नक्षत्र की साल योग करता है. यह आर्द्रा नक्षत्र चार मुहूर्त १० भाग ६२ ये ५५ भाग ३७ ये शेष रहे और सूर्य नक्षत्र ५५ मुहूर्न ५८ भाग ६२ थे शेष रहे तब बारहवी अमावास्या संपर्ण होती है. यहां धराश को ११॥ से
पांच मंवत्सर में चरम अामठवी अमावास्या को चंद्र कौन से नक्षत्र साथ पोग करता है ? बासठवी अमावास्था को चंद्र पुनर्वसु नक्षत्र की साय योग करता है, यह पुविसु नक्षत्र १.२ महूर्त ४६ भाग ६० ये शेष रहे तब बानी अमावास्या मंपूर्ण होती है. इस समय सूर्य कौनसा नक्षत्र की साथ योग करता है ? उस समय मूर्य पुनर्वसु नक्षत्र की साथ योग करता है. यह पु नक्षत्र २२ मुहूर्त ४६ भाग या शेष रहे और सूर्य नक्षत्र ३०४ मुहूर्न ४६ भाग ३२ या शेष र तब चरम बासठवी अमावास्या संपूर्ण हचि २०॥ जिस नक्षत्र की साथ चंद्र का जिस देश में योग होता है।
मायाक रामाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी श्वालाममादजी
HARIJALA
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Aranyanwr
सप्तदश चंद्र प्राप्ति सूत्र-पछु उपाङ्ग
चउवासं बावट्ठी भागा मुहुत्तस्स बाबही भागंच सत्तं सट्ठिया छत्ता छावट्ठी चुणिया भागा उवावाणवित्ता पुणरवि से चदे अगणेण तारिसएणं चेत्र णक्ख स्तेण जोगं जाएति अन्नंसि देससि ॥ ता जेणं णक्वत्तेण चंदे जोगं जोएनि जंसिदेसंसि २७९ सेण इमाई सोलस अट्ठतीस मुहुतसयाति, एगउणपञ्चासं बावट्ठी भागे मुहुत्तरस वाषट्ठी
भागं च सन्तसट्ठिया छेत्स। जट्ठी चुग्गिय भागा उचावणिवित्त ॥ पुषरवि से चद वही चंद्रया ८१९ मुहुर्त २४ भाग २ ये ३ ६६ भ ग ६७ ये इतना काळ गये पीछे अन्य वैसे ही नक्षत्र
की साथ योग क्या करता है ? उत्तर--चंद्र, मूर्य व नक्षत्र इन सीन के चक्रवाल क्षेत्र के १०९८०० Fभाग करे, उप में नक्षत्र की गति शीघ्र है, इस से मंद गति सूर्य की है और इस में मंदगति चंद्र की है.
अब युग के प्रथम समय में अभिमित नक्षत्र चंद्रमा की साथ योग करता हुवा ९ मुहूर्त २४ भाग ६२ या ६६ भाग ६७ या रहकर आगे चला जाये. पीछे श्रवण नक्षत्र का योग होवे. यह तीस मुहूर्व साथी रहकर आगे चलानावे पीछे धर्मिष्टा नक्षत्र का योग होवे इसी तरह जो २ नक्षत्र जितना २ मुहूर्त का है l उतने मुहूर्त चंद्र की साय रहकर आगे जावे. इसी तरह यानत् उत्तरापाता नक्षत्र आगे जाये. और दूपरे। माप के प्रथम समय में पुन: अभिजित नक्षत्र का चंद्र की साथ योग होवे. इनने में ८१९ मुहू। २४ भाग 3 १६२ ये ६६ भाग ६७ वे इतना काल होते. जिम नक्षत्र की साथ जिस देश में चंद्रमा का योग
428 दसवा पाहुडे का बबीमत्रा अंतर पाहुडा 40
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- अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी"
अण्णणं तारिसएणं णक्खत्तेगंजोगं जोएति अन्नसि देसंसि । ता जेणं २ णवत्तेगं चंदै जोगं जोतेति जसि देससि सेणं इमाति च उप्पन्न मुहुससहस्प्लाति णवयमुहुत्त सयाई उपत्राणिवत्ता पुणरवि से चंदे अण्णेणं तारिसएणं चेव णक्खत्तणं जोगं जातंति, तसि देसेसि ता जणं णखत्रोण चंदे जोगं जातेति जसि देससि सेणे इमाई
एगमुहुत्तं स सहस्स अट्टण तिंच मुहृत्तसयाति उबावणिपित्ता॥ पुणरवि से चंदे तणं वही चंद्रमा काल से १६३८ मुर्त ४२ भाग ६२ ये ६७ चरणि भाग ६७ ये इतना काल गये पीछे पुन: अन्य वैसे नक्षत्र की साथ योग करता है. अर्थात प्रथा नक्षत्र मास के प्रथम समय में जो नक्षप्रम हावे वह नक्षत्र तीसरे नक्षत्र मास के प्रथम समय योग को ना १६३८ मुहू ४१ भाग ६२ ये ६५ भाग ६७ ये इतना काल व्यतीत हो जाने जिन मात्र कीनाथ जिस दिशा में चंद्रमा की सथ करें उम काल से ५४१८० मुहूने गये पीछे पुनः चंद्र अन्य उसी ही नक्षत्र की साथ उम ही दिशा में , योग करे अर्थात् युग की आदि में प्रथम नक्षत्र में जो नक्षत्र का योग होचे वही नक्षत्र अनुक्रम में योग स्य जता हुवा ६७ नक्षत्र माम पूर्ण होकर ६८ वे नक्षत्र मास में चंद्र की साथ योग करे तब ५.४१००१ मुहर्न होव. जिस नक्षत्र की साथ जिस देश में चंद्र गोग करे वहां एक लाख अट्ठण हजार मुहूर्त गये पाछे ।
न्य वैसा ही नक्षत्र की साथ योग करता है, अर्थात संपूर्ण चक्र में ६, नक्षत्रों हैं. यह नक्षत्र के
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवमहायजी ज्वाला
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बर्थ
समदश-चंद्र पद्धति सूत्र पह-मात
चैव खत्तेणं जोगं जोतेति तसि २ देससि ॥ २१ ॥ ता जेणं २ खत्तणं सर जोगं जोतेति जंसि देस।। सेणं इमाइं तिण्णिछायट्रीरातिदिय सयाति । उवाणिवेत्ता पुणर व से सरिए गणंतारिसतणं चेव नक्खत्तणं जागं जातेति. तसि देसमि ॥ ता जण अज्ज नक्खवत्तणं सूरे जाग जाते. तंसि दसरा सणं इमाति सत्त दवतीमं रातिदिय सयाति उवाणिवत्ता
पुणरवि से भरे तेणं चैव नक्खत्तणं जोगं जीतेति. तंसि देसास ता जेणं प्रथम माम से चंद्र की माथ योग करता हा चक्र में नक्षत्रों की साथ परिभ्रमण करे. इस तरह दो युग पूर्ण करके १३४ नक्षत्र मास पूर्ण कर ॥ २१ ॥ जो नक्षत्र सूर्य की साथ जिस देश में योम करे, वहां से ३६६ अहारात्रि में गये पीछे पुनः सूर्य उनी नक्षत्र की माथ उस देश में योग करता है. सूर्य व नक्षत्र की गाने मूर्य की गति नक्षत्र की गति से मंद है, युग की आदि में सूर्य की साथ पुष्य नक्षत्र १८ दिन २४ महू तक योग कर आगे चला जाब, पीछे अश्लेषा नक्षत्र का प्रारंभ होवे, यह ६ दिन २१ मुहूर्त पर्यन रहे और फीर आगे चला जावे, पोछे मघा नक्षत्र का योग होवे यों जितने दिन का जो. नक्षत्र
वे उने दिन तक सूर्य की माथ योग करके आगे चले जावे यावत् अंत में पूष्य नक्षत्र ४ दिन १८ मुहूर्त तक सूर्य की साथ योग करे तब तीन सा छा सठ रात्रि दिन हो,
दशा पाहुडे का बावीसवा अंतर पाहुडा 49
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अनुवादक-बालब्रह्मचारीमान श्री अमोकविजी210
अर्थ
मक्खने मेरे जो जोतेति जोस देसमिसेमाई अटास्मतीमा शातिदिय सयाति उवाणिचित्ता पुणरवि से सूरे अण्णणं तासिएक चे नसणं जोगं जातति तंति देसांस, ता जणं अजणखत्तेणं मरे जे सोशलि मि मि तणं इभाति छत्तीस सट्टाइति रातिदियालयाई उवाणिरिता पुरविले सूरे तेणं घेव णवत्तेन डोगं जोतेति ती २देससि॥ २२ ॥तया च इमे चं गति
समायण भवति तताणं इतरेचि चंदे गति समारणे साति, जया इतरवि चंदेगति जो नक्षत्र जिस देश में सूर्य को साथ योग करे उस देश से ७३२ अहोरावि अनुक्रम स गये पछ पमूर्य उन ही नक्षत्र की साथ अन्य तादशपने योग करता है. अर्थ अट्ठाइस नक्षत्र का दो चक्र हावे. जिम नक्षत्र की साथ जिम देश में सूर्य याग करता है उम ही नक्षत्र कीमथ पुनः सूर्य १८३० रात्रि दिन गये पीछे यंग करता है. जिस नक्षत्र की साथ जिस देश में सूर्य योग करता है उस देश से ३६६. रात्रि दिन गये पिछे उमड़ी नक्षत्र को साथ सूर्य योग करनाई
है. ॥ २२ ।। जम्बूद्वीप में दो चंद्र व दो मूर्य हैं. प्रत्येक को भिन्न २ ग्रहादिक का परिवार है इम से इस " का विवरण के लिये कहते हैं. नब भरत क्षेत्र में चंद्र प्रकाश करता हुवा गति समापन होवे तब अन्य
इवत क्षेत्र में भी चंद्रमा प्रकाश करता हुवा गति समापन हावे. जब इरवनक्षेत्र मे चंद्रमा प्रकाश करता।
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी वालाप्रसादजी .
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सूत्र
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48 सहाश-चद्र प्रज्ञप्ती मूत्रपठ-उपार +
समावण्णे भवति, तयाणं इमेति चंदेगति समावण्णे भवति, ता जयाणं इमे सूरिए गति समावण्णे भवति, तयाणं इयरेवि सरिए गति समावण्णे भवइ, जयाणं इयरे सरिए गति समावण्णे भवति,नयाणं इमेवि सरिए गति समावष्णे भवति ता जयाणं इमे चंदे जुत्ते जोगेणं भवति तयाणं इयरेवि चंदे जुत्त जोगेणं भवति,जयाणं इमे चंदे जुत्त जागेणं भवति तयाणं इयरेवि चंदे जुत्ते जोगेण भवति, एवं सरिए गहे णखत्ते ॥ सदाविणं चंदे जुत्ता जगेहं मदाविणं सूर जुत्ता जोगहि सदाविणं गहा जुत्ता जोगहि सयाविणं णक्खता जुत्ता जोगहि दुहताविणं चंदा जुत्ता जोगेणं या गति समापम होवे सब भरतक्षेत्र में भी चंद्रमा गति समापन होये. जब भरत क्षेत्र में सूर्य तपता हुवा गति समापन होवे तब इरक्तक्षत्र में भी तपता हुवा सूर्य गति समापन हाये, जब इरवतक्षेत्र में तपता हुवा सूर्य गति समापन हो तब भरतक्षत्र तपता हुवा सूर्य गति समापन होवे. इस से जब भरतक्षेत्र में चंद्रा याग युक्त होने तब इसतक्षेत्र में भी चंद्रमा योग युक्त होवे और जव इरवत क्षेत्र में चंद्र योग युक्त होवे नप यहाँ भरतक्षेत्र में भी चंद्र योग युक्त हावे. ऐसे ही मूर्य का आलापक कहना. गृह का व नक्षत्र का आलापक भी वैसे ही जानना. सदैव चंद्रमा योग युक्त होवे सदैव सूर्य योग युक्त होवे, सदैव गृह योग युक्त होवे, और सदै। नक्षत्र योग युक्त होवे, गृह व नक्षत्र दोनों चंद्र की साथ योग युक्त होवे,
दशा पाहुडे का गरी वा अंतर पाहुना
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दुहतोविणे सूरा जुत्ता जोगेहिं दुहतोवियणं चंदेसूर जुत्ता जोगेहिं मंडलं एगेयसहस्सेणं अट्ठाणउति सएहिं छत्ता इच्चे से णक्खत्ते खेत्ते परिभागे णखत्ते विजयवखत्ते पाहृडंति आहितेति तिमि ॥ इति दसम पाहुस्स बवि।सं पाहुडं सम्म
॥ १० ॥ २२ ॥ इति 'दममं पाहुई सम्मत्तं ॥ १० ॥ * + दोनों गृह नक्ष सूर्य की साथ योग युक्त होपे. गृह नक्षत्र दोनों चंद्र सूर्य की साथ योग युक्त होवे, एक मंडल के एक लाख अट्ठ गु से भाग ५६ नक्षत्रा के जानना, क्षत्र के विजय क्षेत्र का पाहुडा भगवान्ने कहा है. यह सत्य है. यह चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र में दशवा पाहुड! का बावीसका अंतर प.हुड! संपूर्ण हुग. ॥ १० ॥ २२ ॥ यह दशा पाहुडा समाप्त हुवा ॥ १० ॥
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अनुबपक-पालव्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋषिजी
• अक शक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्यालाप्रमादजी •
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सत्र
48 सप्तदश-चंद्र प्राप्ति सब प-उपाङ्ग480+
॥ एकादश प्रामृतम् ॥ ता कहं ते संबच्छराणं आदि आहितेति वदेजा ? तत्थ खलु इमे पंच संवच्छरा पूण् गत्ता चंदे, चंद, अभिवड्दिए, चंदे, अभिवहिए ॥१॥ ता एतसिणं पचण्ह संवच्छराणं पढमरस चंद संवच्छरस्स के आदि अहितति वदजा ? ता जेणं पंचमस्स
अभिवाट्ठिय संवच्छरस्स पज्जवासणे सणं पढमस्स चंद संवच्छरस्स आदि अणंतर र अब अग्यारवे पाहुडे में संवर की आदि अंत की वक्तव्यता कहते हैं. अहो : भगवन् ! संवत्सरकी
आदि किस प्रकार कही? अह। गौतम ! संवत्सर पांच कहे हैं जिन के नाम-१ चंद्र २ नंद्र ३ अभिFवर्धन ४ चंद्र और ५ अभिवर्धः॥१॥ इन पांच संवत्तर में से प्रथम वंद्र मंवत्सर की कहां आदि कही है ?
अहो गौतम ! जो पांचा अभिवर्धन संकलर का पर्यवमान है उस में अंतर रहित पूर्व कृत समय जो है वही प्रथम चंद्र संवलर की आदि है. अहो भगवन् ! प्रथम चंद्र संवत्सर का पर्यवसान कैसे कहा?
हो गौतम ! दूसग चंद्र मंवत्सर की आदि है वही प्रथम चंद्र संत्सा का पर्ययवसान है, दूसरे चंद्र संवत्सर में अंतर रहित जा पीछला समय है वहां प्रथम चंद्र संवत्सर का पर्यवसान है, उस समय प्रयन चंद्र संवत्सर के अंत में चंद्र कौनसा नक्षत्र की माथ योग करता है ? उस समय चंद्र उत्तराषाढा न त्र की साथ योग करता है. यह नक्षत्र २६ मुहूर्न २६ भाग ६२ ये और ५४ चूरणिये भाग ६७ वे इतना
488420 इग्यारहवा पाहुडा 48
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सूत्र
अर्थ
42 अनुवादक- बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
पुरेकडे समए तीसेणं किं पज्जवासिते आहितेति वदेजा? जेणं दोवरस चंद संच्छरस आदि सेणं पढमरस बंद संवच्छरस्स पज्जवासणे अनंतर पच्छाकडे समए तं समयं चणं चंदे णं णक्खत्तेणं जोगं जोतेति ? ता उत्तराहिं असाढाहिं, उत्तराणं असादाणं शेष रहने पर चंद्र उन की साथ योग करता है, प्रथम चंद्र संवत्सर के बारह मास में इस से दूसरी धृत्रराशि ३६०८३०० को १२ से गुना करने ४४१३९६०० होये. इस को प्रथम धृवराशि ३४०३८०० से भाग देने से १२ नक्षत्र मास पूर्ण आये और ३२१४००० भाग ६७ ये रहे. इस के ६३ ये भाग करनेको ६७ भाग देना जिससे ४२१६४ भाग ६२ये और १२ भाग ६७ये हुये. इस के मुहूर्त करने को ६२ से भाग | देना जिम से ७९२ मुहूर्त और ६० भाग ६२ ये आया. इस में पुर्वाषाढ़ा नक्षत्र तक के ७७४ मुहूर्त १२४ भाग ६२ ये ६६ भाग ६७ ये बाद करते १८ मुहूर्त ३५ भाग ३२ से १३ भाग ६० ये रहे. और उत्तराब ढा नक्षत्र ४६ मुहूर्त का है इस में से उक्त मुहूर्त बाद करते २६ मुहूर्त २३ भाग ६२ ये और ५४ भाग ६७ ये रहे. इतना उत्तराषाढा नक्षत्र प्रथम चंद्र संवत्मर पूर्ण हुने पछे चंद्र की साथ योग करते { शेष रहा. उस समय सूर्य कौनसा नक्षत्र की साथ योग करता है? उस समय सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र की साथ योग करता है. { यह चंद्र नक्षत्र सोलह मुहूर्त ८ भाग ६२ ये और २० चरणिये भाग ६७ ये सूर्य साथ शेष रहना है और सूर्य नक्षत्र के २१६ मुहूर्त १२ मा ६२ ये शेष रहते है. इस साय प्रथम चंद्र संवत्सर पूर्ण हं वे प्रथम चंद्र संवत्सर के १२ मास हैं इस दूसरी ध्रुव गरि २४२०० क १२ से गुना करने से ६५८८००
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• मकर जा रहादूर लाला सचदेवमहायजी ज्वालाप्रसादर्ज ०
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+ marwanamam
-उपाङ्ग समय-चंद्र पात्रा
छब्बीसैच मुहुत्ता छन्त्रीसंच वावटी भागा मुहुत्तस्स वावट्ठी भार्ग सत्तप्तट्टिया भई उत्ता चउपन्न चुणिया भागा सेसा ॥ तं समयं चणं सूरे केणं णक्खत्तेणं जोगं जोतेति ? ता पुण्णधसुहि, पुण्णवणं सोलस मुहत्ता अट्ठय वावट्ठी भागा मुहत्तस्स
२८७ वासठिये होवे इसे प्रथम धृवराशि ६८०७६० का भाग देना. इस से माम नहीं होता है इस से इस के मुहूर्त करने की १२ से भाग देना, जिस से १०६२५ मुहूर्त और शेष ५० भाग रहे. इस में आईी नक्षत्र तक १०२३१ मुहूर्न होते हैं इस से इतना मुहूर्न उक्त संख्या में से से याद करते पुनर्वसु नक्षत्र ३८५ मुहूर्त ५. भाग ६२ ये कार्य की. साथ योग करे. यह पुर्नमु नक्षत्र
१ मुहूर्त का है जिसमें से ३८६ मुहर्त ५. भाग ६२ ये बाद करते २१६ मुहर्न १२ भाग ६२ का सूर्य नक्षत्र शेष रहा. अब सूर्य नक्षत्र का चंद्र नक्षत्र करने को २१६ के ६२ ये भाम करना और - १२ इम में बदर. २१६४६२+१२-१३४०४ हावे. और पुनर्वसु नक्षत्र चंद्रपा की साथ ४५
ग करे इसे स ४५ से गुना करना जिम से १३४०५४४५६०३१८० की राशि हुई. पुनर्वसु नक्षत्र सूर्य की साय ६०३ मुहूर्न योग करता हैं इस से उक्त राशि को ६०३ में भाग देने से १००० भाग ६२ सये आये शेष १८० बढे, इस के ६.ये भाग करने को ६० से गुणा करना और ६०३ से भाग देना. १९८०+६७+५:३%3D२. शाम ६७ ये होवे अब १००० भाम ६२ ये का मुहूर्न १६ और शेष आठ.भ.गी ।
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422 इग्यारहवा पाहुदा 1948
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4. अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
बावट्ठी भागंच सत्तसट्टिया छेत्ता वीसं चुगिया' भागा सेसा ॥ २ ॥ ता एतसिणे पंचण्ह संवच्छराणं दोच्चरस चंद संबच्छरस्स के आदि आहितति वदेजा, ता जेणं पढमस्त चंद संवच्छरस्स पज्जवासणे सेणं दुच्चस्स चंदसंबच्छरस्स आदि अणंतर पुराकडे समए तीसणं किं पजवासिया आहितेति वदेजा ? ता जेणं. तच्चस्स अभि... वडियस्स आदि सेणं दुञ्चस्त चंद संबच्छरस्म पजवासणे, अगंतर पच्छाकडे समए । तं समय चगं चंदे के पुच्छा ? ता पुवाहिं असाढाहिं पुव्वाणं आसाढाणं आगे. इस से प्रथम चंद्र संवत्सर पूर्ण होते समय पुनर्वसु नक्षत्र के १६ मुहू ८ भाग ६२ ये और २० भाग ६७ ये शेष रहे. ॥२॥ अहो अगवन् ! दूसरा चंद्र मंवत्सर की आदि कहां कही है ? अहो गौतम जो प्रथम चंद्र संवत्सर का पर्यवसान है वह दूसरा चंद्र संवत्सर की आदि है. यहां अंतर रहित पूर्वकृत सपय लेना. अहो भगवन् ! इस का पर्यवसान कैसे कहा ? अहो गौतम ! जो तीसरा अभिवर्धन मंवत्सर की आदि उस से अनंतर पश्चातकन समय में दूसरा चंद्र संवत्सर का पर्ववसान है. अहा भगवन् ! दूसरे चंद्र संवत्सर के चरिम समय में चंद्र कौन से नक्षत्र की साथ योग करता है? अहो। गौतम ! उस समय चंद्र पूषाढा नक्षय की साथ योग करता है. यह सात मुहूर्त ५३ भाग ६२ ये
..प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसदाजी.
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E
अर्थ
488* सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग ++
सत्तमुत्ता तेवणं वाट्टी भागा मुहुत्तर वात्रट्टी भागंच सत्तस या छेत्ता एगयाली ती सं या भागा सेसा ॥ तं समयं चणं मूरे के कुच्छा ? ता पुण्णवसुणा पुण्णवसुनं छीतालसिं मुहुत्ता पष्णतीसंच बावट्टी भागा मुहत्तस्स वावट्ठि भागं च सत्तसट्टिया छेत्ता
चुणिया भागा सेसा ॥ ३ ॥ ता एतेसिणं पंचन्हं संवच्छरणं तश्चस्स अविडियस के आदि आहितेति वदेजा? ता जेणं दो बस्स चंद संच्छरस्स पज्जवासणे सेनं तच्चस्स अभिनास्म आदि अनंतरंपुरेकडे समए । तीसेणं किं पज्जवासि
४१ भाग ६७ ये इतना शेष रहे तब दूसरा चंद्र संवत्सर पूर्ण होवे. अहो भगवन् ! उस समय सूर्य कौनसे सत्र की साथ योग करता है ? अहो गौतम ! उस समय पुनर्वसु नक्षत्र की साथ सूर्य योग करता है. यह नक्षत्र ४२ मुहूर्व ३५ भाग ६२ ये और ७ चूराणये भाग ६७ ये शेष रहे तब सूर्य की { साथ चंद्र नक्षत्र योग करता है और सूर्य नक्षत्र ५७० मुहूर्त २४ माग ६२ या शेष रहे तब दूसरा चंद्र संक्रस संपूर्ण होवे इसकी विधि पूर्वोक्त जैसे जानना. यहां २४ से गुना करना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! तीसरा अभिवर्धन संवत्सर की कहां आदि कही है ? अहो गौतम ! जो दूसरा चंद्र संवत्सर का पर्यवसान है इस से अनंतर पूर्व कृत समय में तीसरा अभिवर्धन संवत्सर की आदि है. अहो भगवन् ! तीसरा अभिधन संत्सर का पर्यवसान वहां कहा है ? अहो गौतम ! जो चौंथा
चंद्र संवत्सर
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44 इग्यारका पहुडा 18+ 4254
२८१
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1 अनावदक-बाल ब्रह्मचारी मानि श्री अमोलक ऋषिनी."
आहितेति वदेजा जेणं चउत्थस्स चंद संवच्छरस आदि सेणं तच्चरस अभिवडियरस पजवामणे अणंतरपच्छाकडे समए॥ तं समयं च चंदकेणं णवत्तेणं जोगं जोतेति ? ता उत्तराहि आसाढाहिं उत्तरा साढाणं तेरसमुहुन्ता सेरस वावट्ठी भागा मुहुत्तस्स वावट्ठी भाग च सत्तसट्ठिया छेत्ता सत्तावीस चुणिया भागा सेसा तं समयं चणं सूरे केणं णक्खत्तेणं जोगं जोएति? ता पुणवसुणा पुणवमा दोणि मुहत्ता छप्पणं वावट्ठी भागा वावट्ठी भागं च सत्तसट्ठिया छेत्ता -ट्रिया चुणिया भागा सेसा ॥ ४ ॥ आदि है उस से अनंतर पश्चात् कृत समय में हीरा अभिवर्धन संवत्सर का पर्यवसान है. अहो भगवन् ! तीसरे अभिवर्धन संवत्सर के चार साय में कौनसा नक्षा की साथ योग करता है
अहो गौतम ! उस समय चंद्र उत्तरापाढा नक्षय की पाय योग करता है. यह नक्षत्र १३ मुहूर्त १३ भाग १६२ ये २७ चूरणिये भाग ६७ ये शेष रहे तब अभिवः, मत्सर संपूर्ण होवे. उस समय सूर्य कौनसा , नक्षत्र की साथ योग करता है ? अहो गौतम उस समय सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र की साथ योग करना है. यह नक्षत्र दो मुहूर्न ५६ भाग ६२ ये ६० चूणिय भाग ६७ ये शेष रहे तब चंद्र नक्षता मूर्य की साथ और सूर्य नक्षत्र ३९ महून ६ भाग ६२ ये शेष रहे त तीसरा अभिपर्धन संवत्सर संपूर्ण हो. इस की विधि पहिले जसे जानना. परंतु यहां सैंतीस से धृवराशि को गुणना क्यों कि तीसरा अभिवर्धन संवत्सर
•प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदवसहायजी
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सूत्र
अथ
4 सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र पष्ठ उपाङ्ग +
ता एतेति ण्टं च्रा वउत्थस्स चंद संवच्छरस्स के आदि ? ता जेणं तच्चस्स अभियविष्ठर से चउत्थस्स चंदसंवच्छरम्स आदि. अनंतर पुरेकडे समये ॥ तीस किं पनवासित आहितेति वदेजा ? ता जेणं पंचमस्त अभिवडिय संवास आदि लेणं च वच्छरस्स पज्जवासणे अनंतर पच्छाकडे समये ॥ तं समयं च चंदे के? ता उत्तराहिं असाढाहिं उत्तराणं असादाणं उणयालीगं मुहत्ता चत्तालीमच बाबट्टी भागा मुहुत्तस्स, वावडी भागं सत्तसट्टिया छेत्ता
३
पूर्व
में पूर्ण होता है || ४ || अहो भगवन् ! इन पांच संवत्सर में चौथा चंद्र संवत्सर की कह आदि कही ? अ गौतम ! अभिवर्धन संवत्सर का पर्यवसान जहां कहा है उस से अनंतर से बया मंद्र सरस्सर की आदि कही है.. अहो भगवन् ! चौथा चंद्र संवत्सर का पत्रसान को कहा है ? गौतम ! जो पांचवा अभिवर्धन संवत्सर की आदि है उस से अनंतर पाक समय में दोष कहा है. अहो भगवन् ! चौथा मंद्र संत्रस्सर के अंत में चंद्र कोसका साथ योग करता है ? अहो गौतम ! उत्तराषाढा नक्षत्र की साथ योग करता है. यह उन ३१४० भाग ६२ ये १४ चूरणिये भाग ६७ ये शेष रहे तब चौथा चंद्र मंत्र संपूर्ण होते. असे भगवन् ! उस समय सूर्य कौनसे नक्षत्र की साथ योग करता
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** इग्यारवा पाहुडा 42 40
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सत्र
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
चाहस चणिया भागा सेसा ॥त समयचं मरे केणं प.वखतेणं जोगं जीतति? ता पुणवसुणा, पुणवमुषण उपणतीस मुहुत्ता एकवीसं वावट्ठी भागा मुहुत्तस्स बावट्ठी भाग सत्तसट्ठिया उत्ता, सुडयालोसं चुणिया भागा सेसा ॥ ५ ॥ ता एतेसिणं पंचण्हं संवच्छराणं पंचमस्म अभिवाड्डिय संवच्छरस्स के आदि आहितति वदेजा ? ताणं चउत्थस्ल चंदसंबच्छरस्म पजवासणे सण पंचमस्स अभि
संवच्छरस्स आदि अणतरपुरेकडे समर ॥ तोसेण किं पञ्जवासते आहतति वदज्जा ? है ? अहो गौतम ! उस समय में स्यं पुनर्वसु नक्षत्र का साथ ये ग करता है. यह नक्षत्र २१ मुन (२१ भाग बासाठिये एक मुहूर्त के ४७ चूर्माणये भाग ६७ ये गर्य साथ शेष रहे और मूर्य नक्षत्र ३२३ मुहूर्न १८ भाग ६२ या मूर्य माथ शेष रहे तव चौथा चंद्र संबर र संपूर्ण होवे, इस की विधि पूर्वोक्त जैम जानना. परंतु यहां दूसरी ध्यराशि को ४९ से गुणना क्यों कि चौथा चंद्र मंवत्सर ४९ मास में पूर्ण होता है ॥ ५ ॥ अहो भगवन ! इन पांच संवत्सर में पांचवा अभिवर्धन संवत्सर की आदि कहां ईकही है ? अहो गौतम ! जो चोया चंद्र संवत्सर का पर्यवसान है उस से अनंतर पूर्वक्त समय में
पांचवा अभिवर्धन संवार की आदि कही है. अहो भगवन् ! इस का पर्यवसान कहां कहा है ? अहो । गौतम.! पहिला चंद्र मात्सर की आदि है उस से अनंता पश्चात्कृत समयमें पांचवा अभिवर्धन संवत्सर
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वाल' प्रमाद नी .
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अर्थ
श्री ममश चंद्र
ता जेणं पदमस्त चंद संत्रच्छरस्स
आदि सेणं पंचमन अभिवडियस्स संवच्छरस्स पज्जवासणे अनंतर पच्छाकडे समये तं समयं वगं चंदेकेणं णक्खत्तेणं जोगं जोति ॥ ता उत्तरहिं असाढहिं उत्तराणं असाढाणं चरम समये तं समयं चणं सूरे के लक्खत्तेण जागं जोतेति ता पुसेणं एगुणवीसं मुहुत्ता तेत्त लीसंच बाबट्टी भागा सत्तसडिया मुहुस्प बावट्ठी भाग च छत्ता, तेत्तीसं चुणिया
आगा
सेसा ॥ इति एकारसमं पाहुडं सम्मतं ॥ १ १ ॥
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कापसान है. अहो भगवन् ! पांचवा अभिवर्धन संत्र के चम समय में चंद्रमा कौनसे नक्षत्र की साथ योग करता है ? अहो गौतम ! उत्तराषाढा नक्षत्र की साथ योग करता है. यह चरम समय में योग पूर्ण करके पांचवा संवत्तर पूर्ण करे. शेष नक्षत्र रहे नहीं. उस समय सूर्य कौनसे नक्षत्र की साथ योग कर ! अहां गौतम ! उस समय सूर्य पूष्य नक्षत्र की साथ योग करे. यह चंद्र नक्षत्र १९ मुहूर्त ४३ भाग ६२ ये ३३ भाग ६७ ये सूर्य की साथ शेष रहे तब और सूर्य नक्षत्र २६४ मुहूर्त शेष रहे तब पाँचमा अभिवर्धन संवत्सर संपूर्ण हो. इस की विधि पूर्वोक्त जैसे जानना. परंतु दूसरी धनराशि का ६२ से गुना करना क्यों कि पांचवा अभिवर्धन संवत्सर ६२ मास में पूर्ण होता है. यों चंद्रप्रज्ञप्ति मंत्र का इम्यारहवा पाहुडा संपूर्ण हुवा || ११ ||
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44 इप्यारया पाहुडा
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मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
॥द्वादश प्रामृतम् ।। ता कतिणं संवच्छराणं आहितेति वदेज्जा ? तत्थ खलु इमे पंच संबच्छरा पण्णता तंजहा-णक्खत्ते चंद ऊऊ आदिच्चं अभिवडिए ॥ १ ॥ता एतेसिणं पंचण्डं संवच्छरागं पढमस्स क्खत्तसंबच्छरस्स णक्खत्तमासे तीसति मुहत्तेणं अहोरत्तेणं गणिजमाणा केवतिए रातिदिएणं आहितति वदेजा ॥ ता सत्तावीसं रातिदिया एवासिं सत्तस्ट्री भागा राति दयस्त रातिदियग्गणं आहितेति वदेजा ।ता सेणं केवतिए मुहत्तग्गेणं आहितेति वदेजा ? ता अट्रसए एकणवीसे सत्तावीसंच
अहो भगवन् ! कितने संवत्सर कहे हैं ? अहो गौतम ! पांच संक्सर कहे हैं. जिन के नामक. नक्षत्र संमत्सर २ चंद्र संवत्सर ३ ऋत संवत्सर ४ आदित्य संवत्सर और ५ अभिवर्धन संवत्सर ॥१॥
अहो भगवन् ! इन पांव संवत्सर में प्रथम नक्षत्र संवत्सर का नक्षत्र मस नीस मुहूर्न की अहोरात्रि के प्रमान में कितनी अहोरात्रि में पूर्ण होवे ? अहो गौतम ! तीम मुहूर्न की अहोरात्रि के प्रपान से एक है नक्षत्र मास की २७ अहो रात्रि १ भाग ६७ का होवे, एक युग की १८३८ अहोरात्रि है और एक युग के नक्षत्र मास ६७ हैं इस से १८३० को ६७ का भाग देने से २७ अहो र त्रि और शेष २१ रहा. अहो । भगवन ! उस नक्षत्र मास के कितने मुहूर्त हावे ? अहो गौतम ! एक नक्षत्र मास के ८१९ मुहूर्त २५
प्रकाशक राजाब: दुर लाला सुखदेवसहायजी ज्याला प्रसादजी
अनुवादक-बालब्रह्म
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सूत्र
अर्थ
सप्तदश चंद्र मज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपा
सत्तट्ठी भागे मुहुत्तरस मुहुत्त गोणं आहितेति वदेजा । ता एतेसिणं अद्धादुवालस क्खुत्तकडाणं णक्खत्त संवच्छरे, तीसेणं केवतिए रातिदियगोणं आहितति वदेजा, तातिणि सत्तावीसे रातिदिय मते एक्कावणं सत्तसट्टी भागा रातिंदियरस राईदियगोणं आहि तेति वदेज्जा । तीसेणं केवतिए मुहुत्तगोणं आहितेति वदेज्जा ? तानत्रमुत्ता सहस्साति अटुयबत्तीस मुहत्तसते छप्पणं च सत्तसट्टिभागे मुहुत्तरस मुहुत्तगोणं आहितेति वदेज्जा ॥ २ ॥ ता एतेसिणं पंचहे संबच्छराण दुच्चरस चंद संच्छरस्स वंदे मातीतिमुहुत्तेणं गणिजमाण केवतिए रातिदिएणं आहितेति वदेज्जा ? ता एकूण
६२ ये हवे. २७ दिन को ३० मुहूर्त से गुनने से इतने होते हैं. एक नक्षत्र माप को बारह गुना करने से एक नक्षत्र संवत्सर होवे. अहो भगवन् ! नक्षत्र संवत्सर के कितने रात्रि दिन होवे ? अहो गौतम ! एकक्षत्र संवत्सर के ३२७ अहोग त्रे और ५१ भाग ६७ ये [ ३२७] होवे. एक नक्षत्र मास की अहोरात्र २७ है उसे बरह गुना करने से इतनी होती हैं. भगवन् ! एक नक्षत्र संग्सर के कितने मुहूर्त कहे हैं ? अहो गौतम ! ९८३२ मुहूर्त एक नक्षत्र
अहो
संवत्लर के हांवे ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! इन पांच संवत्सर में से दूसरा चंद्र संवत्सर का चंद्र मास तीस ( मुहू की अहो रात्रि के प्रमान से गिनते कितनी अहो रात्रि का हो ? अहो गौतम ! दूसरा चंद्र
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+4 बारहवा पाहूडा 4+++
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सूत्र
अर्थ
अनुवादक बाह्न चारों मुनि श्री अमालक ऋषि +
तीसं रातिंदियाति बत्तसिंच बावट्टी भागा रातिंदियस्स, रातिंदियागेणं आहितेति वदेजा । तीसेणं केवइए मुहुत्तोगेणं आहितेति वदेज्जा ? ता अट्ठपंचासि मुहुत्तस्स तेत्तीसं च ब बट्टी भागा मुहुत्तस्स, मुहुत्तगोल अहितेति वदेजा । ता एतेलिणं अदुवास क्खुत्तकडा चंदे संच्छरे तीसेणं केवतिए रातिंदिये आहितेति वदेजा ? तातिणि चपणे रातिदिय सते दुबालस च बानी भागे रातिदियस्य रातिदियगोणं अद्दितेति वदेजा ॥ तीसणं केवतिय मुहुत्तगोगं आहितति वंदना ? ता दसमुहुत्ता
संवत्सर का चंद्रमास तीस मुहूर्त के प्रमान में गिनते २० अहोरात्र का होता है. युग के दिन १८३० है और मास ६२ है इस से १८३० को ६२ मे भाग देते प्रत्येक मास के २० दिन होते हैं. अहो भगवन् ! चंद्रवास के कितने मुहूर्त कहे हैं ? गौतम ! एक चंद्रमा के ८८५ मुहूर्त ओर ३० भाग ३२ ये (८८५३) होते हैं. २०३ की ३० से गुना करने मे इतने हते हैं. इस चंद्र मास को बारह गुना करने से एक चंद्र संवत्सर हवे. अहो भगवन् ! एक चंद्र संक्र की कितनी अहोरात्र कही ? अहो गौतम ! ३५४ अहोरात्र एक चंद्र संवत्सर की होती है. उस को १२ से गुना करने से इतने होते हैं.
क्यों का एक चंद्र मास के २४
अहोरात्र होती है
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• प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसज्वालाप्रसादजानीयजी
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२९७
सहस्साति छच्चपण्णवीसे मुहुत्तसए अहसय बावट्ठीभागा मुहुत्तस्स मुहुत्तग्गेणं
आहितति वदेजा ॥ ३ ॥ एते सणं पंचण्डं संबच्छराणं तच्चस्स उउसवच्छरस्स उउमासे तीसति मुहत्तेणं अहोरत्तेणं गणिजमाणेणं केवतिय रातिदियग्गेणं आहितेति वदेज्जा ? तातीस रातिदिए रातिदियग्गेणं आहितेति वदेजा ॥तीसेणं केवतिए मुहुत्ते सए पुच्छा ? ता नव मुहत्तसताई मुहत्तगण आहितेति वदेज्जा ॥ ता एसणं अहा दवालस खत्त कड। उउसवच्छरे, तीसेणं केवतिएरातिदियगोणं आहिति वदेजा.
ना जगा
सप्तदश चंद्र प्रज्ञाप्त सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग
अहो भगवन! एक चंद्र संबर के कितने महत कहे? अहो गौतम : एक चर संसर के १०६२९ मुहूर्न होते हैं. एक चंद्र पास के ८८५ मुहर्न हैं उसे बारह गुना करने से इतने हाते हैं. ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! इन पांच संबस्तर में तीसरा ऋतु मंदतार का ऋतु मास तीस मुहूर्त की अहोरात्रि के प्रमान स गिनते कितने रात्रिदिन में पूर्ण होवे ? अहो गीतम! ऋतु मंवत्सर के ऋतु मास की. तीस अहोरात्रि है. एक युग के १८३० रात्रि दिन है, ओर ऋतु मास ६१ है, इस से ३० अहोरात्र होते. अहोई भगवन् ! एक ऋतु मास के कितने मुहूर्त होते हैं ? अहो गौतम ! एक ऋतु मास के ९०० मुहूर्त होते हैं." ३.४३० =९०० एक ऋतु मास को बारह गुना करने से एक ऋतु संवतार होवे. अहो भगवन् एक ऋतु
4800 बारहवा पाहुडा 1824234
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मुनि श्री अमालक षिको
10 ता तिण्णि स्टे रातिदियसते, रातिदियग्गेणं आहितति देजा। तीसेणं केवतिए मुहत्तग्गेणं
आहितेति वदेज्जा ता दसमुहुत्ता सहस्साइं अट्ठसयातिं मुहुत्तग्गेणं आहितेतिवदेज्जा,॥४॥ ता एतेसिणं पंचण्हं संवच्छराणं चउत्थस्स आदिच्चसंवच्छरस्स आदिच्चेमासतिसती मुहुत्ते पच्छा? तीसं राइंदिया अवड़ भागं रातिदियरस रातिदियग्गेणं आहितेति वदेजातीसेणं केवतिया मुहुत्ते पुच्छ! ? ता णवपण्णरस मुहुत्तसए मुहुत्तग्गेगं आहितेति वदेज्जा ?
ताएतसिणं अहादुवालस खुत्तकडा आदिच्च संवच्छरे तीसेणं केवतिए राइंदियसए अर्थ
संवत्सर की स्तिनी अहो रात्रि होवे ? अहो. गौतम ! ३६० अहोरात्रि एक ऋतु संवत्सर की - होवे. अहो भगवन् ! एक ऋतु मंत्र के कितने मुहूर्त होते हैं ? अहो गौतम ! एक ऋतु संवत्सर के १०८०० मुहू हवे. एक ऋतु मास के ९०० मुहूर्त है उसे १२ गुना करने से इतने होते हैं.॥ ४ ॥ अहौ भगवन् ! इन पांच संवत्सर में चौथा आदित्य संसत्सर का आदित्य मास की तीस मुहूर्त की अहोरात्र के प्रमान से कितनी अहोरात्र होवे ? अहो गौतम ! एक आदित्य मास के ३०॥ अहो रात्रि हवे क्यों कि युग के १८३० दिन हैं और आदित्य.मास ६० हैं. अहो भगवन् !. एक आदित्य मास के कितने मुहूर्त होते हैं ? अहो गौतम ! एक आदित्य मास के ९१५ मुहूर्त शेते हैं, ३०॥४३०=११५..
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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सूत्र
अर्थ
46+ सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ- उपाङ्ग
इंदियग्गेणं पुच्छा ? ता तिणि छात्रट्ठी रातिदियमते रातिदियग्गेणं आहितेति बदेजा तीसेणं केवतिय मुहुत्ते आहितेति वदेजा ? दसमुहुत्तसहस्सातिं णवय असते मुहुत्तस्ते मुहुत्तग्गेणं आहितेति वदेजा ॥ ५ ॥ एतेसिणं पंचण्हं संबंच्छराणं पंचमस्स अभिवड्डिए संच्छरस्त अभिवडिय मातीसति मुहुतेणं अहोरचं गणिजमाणे केव
इस आदित्य मास को बारह गुना करने से, एक आदित्य संवत्सर होवे, अहो भगवन् ! एक आदित्य मंत्र की कितनी अहोरात्र कही ? अहो गौतम ! एक आदित्य संवत्सर की ३६६ अहोरात्र होती है, क्यों कि आदित्य मास की ३०|| अहोरात्र है, ३०x१२-३६६ होते. अहो भगवन् ! एक आदित्य संवत्सर { के कितने महूर्त होते हैं ! अहो गौतम ! एक आदित्य संवत्सर के १०९८० मुहूर्त होते है ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! इन पांच संवत्सर में से अभिवर्धन संत्र का अभिवर्धा के तीस मुहूर्त की अहोरात्र के प्रमाण से किननी अहोरात्र में होवे ? अहो गौतम ! एक अभिवन मास की ३१ अहोरात्र २९ मुहूर्त और १७ भाग ६२ या होवे. युग के दिन १८३० हैं. एक युग के चंद्रनास ६२ हैं, इस से १८३० को ६२ का भाग देने से २२ रे अहोरात्र का एक चंद्र मास होवे तेरह चंद्रमास का एक अभिवर्धन (संवत्सर हेवे और अभिवर्धन संवत्सर के अभिवर्धन मास १२ हैं. इस से २२३ दिन को १३ से
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बारहवा पाहुडा
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मा रातिदियराइंदिघग्गेणं आहितति वदेज्जा? ता एकतीसं रातिदियाति एमूणतसिंच मुहुत्ते,
सत्तरस वावट्ठी भागे महत्तस्स रातिदियगोणं आहितेति वदेजा ? तीसेणं . केवतिए मुहूत्तग्गेणं आहितेति वदेजा ? ता नवएगूणसटे मुहत्तसते सत्तरस बावट्ठी भागे मुहत्तस्त मुहाग्गेणं आहितेति बदेजा ॥ ता एतेलिणं अहादुवालस
क्खुत्तकडा अभिवडिए संवच्छो ॥ तीसेणं केवतिए रातिदियग्गेणं आहितेति गुना करने ३८३४ दिन का अभिवर्धन संवत्सर होता है. इस को १२ का भाग देने से ३१ अहोरात्रि २१ मुहू व १५ भाग ६२ ये होते है. अहो भगवन ! एक अभिवर्धन मास के कितने मुहूर्त कहे हैं? अहो गौतम ! एक भिवर्धन मास ९५ शुद्ध होते हैं क्यों की अभिार्धन मास ३१ दिन २१ मुहूर्त १७ भाग ६२ ये का है इस को२० मे गुनने से उक्त मुहूर्न आते हैं. इस अभिवर्धन माम को बारह गुने करने से अभिवर्धन संवत्सर होता है. अहो भगवन् ! एक अभिवर्धन संवत्सर को कितनी अहोरात्र होते है ? अहो गीतम! एक अभिरर्धन मंवत्सर की ३८३ अहोरात्रि २१ मुहूर्न और १८ भाग ६२ ये होते हैं. अहो भगवन् ! एक अभिवर्धन संवत्सर के कितने मुहूर्त कहे हैं ? अहो गौतम! एक अभिवर्धन संपत्थर के ११.११ गुहूर्न होते हैं. क्यों की अभिवर्धन मास के ९८९ मुहूर्त हैं। इस को बारह गुना करने में इतने होते हैं. एक युग में कितने अभिवर्धन मास होते हैं यह जानने के
१.१ अनुवादक बालब्रह्मचारी मनि श्री अमोलक ऋषीजा.
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसाद जी ।
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सूत्र
4 - चंद्रमा सूत्रपा
देखा ? ता तिणि तयासी रातिदियमते इक्कवीमं मुहुत्ते अट्ठारसय पावट्टीभागे मुहत्तस्स रातिरियग्गेणं अहितेति देना ॥ तीसेणं केवतिते मुहतो आहितेति देखा ? ता एकदम मुहुत्तसहस्साइं पंश्चंय एक्कारस मुहुत्तस्ते अट्ठरस्य वाट्ठी भांगे मूहुत्तस्म महत्तगोणं अ.हितेति वदेजा ॥ ६ ॥ ता केवलिएणं जुगे रातिंदिय गेणं आहितति वदेजा ? ता सत्तरस एकाणउति सर्तिदियसते एगुणवसिंच मुहुचे सत्तावणंच बडी भगं मुहुरुस्त बावट्ठी भागंच सत्तलट्ठिया छेता पणपण्ण
लिये कहते हैं. एक अभिवर्धन मास ९५९मुहूर्त का है, इम को अपूर्णांक में लाने के लिये ०५१ को ३२ से गुना करके १० बढ न. १२९४३२+१५९४७५ भाग ३२ य रहे. मैने ही युग के १८३० दिन को भी ६२ य भ ग करने का १८३० को ३० से सुनकर ३२ गुर/ १८३०३५४२००२२=२४०८०० इन को ६९४७५ मे भग देने मे ५७ पास आये और शेष १३७२५. उक दस्य त को ४५७५ से छड़ करने से ६९४७६ के ३ आये और १३७२५ के १३ आये इस तरह एक युग के अभिनमा ५७ होते हैं. ॥ ॥ ! उक्त पांचों संवत्सर मीलकर एक युग होवे. वो इस तरह इन पांचों की
अहो
दिन
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बारहवा पाहुडा
३०९
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सूत्र
अर्थ
अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 3-4
संवत्सर के नाम
पाँच संवत्सरे के मास और मासव संवत्सर के यंत्र दिन व मुहूर्त का
एक संवत्सर के
नक्षत्र चंद्र
एक युग के
मास,
६७
६२
६१
ऋतु
आदित्य
६०
अभिवर्धन ५७
दिन
२७
२९
.३०
-एक मास के
मुहूर्त | भाग | मुहूर्त मांग
८१९
८८५
९०० ९१५.
३०॥
३१. 23 २ । ९५९
०
०
३२७
३५४
| ३६० ३३६ ३८३
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मुहूर्त
c
२०.
12/20
० प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्याला माजी
माम मुहूर्त भाग
जिया भागा रातिदियग्गेणं आहितेति वदेज्बाती सेणं कंवतिय मुहुत्तग्गेणं आहितेति वदेज्जा ? ता तेपन्नं मुहुत्तसहस्साई सतियएगुणवष्णा मुहुत्तस्ते सचावण्ण बावट्ठी भागे मुहुत्त बावट्ठी भार्गव सत्तसट्टिया छेत्ता पणपण्णं चुष्णिया भागा मुहुत्तग्गेणं कितने होवे ? अहो गौतम ! १७२१ रात्रि देन १९ मुहूर्त ५७ - भाग ६२ ये और ५५ चुरणिये भग ३७ ये इतना होवे, असे भगवन् ! इन के कितने मुहूर्त होवे ? अहो गौतम । उक्त पांच संवत्सर स
९८३२
१०६२५ १०८००
१०९८० । १५११५८
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| संवत्सर दिन पहले
Eyा .
48+
०
ar
सप्तदश-चंद्र प्रज्ञाप्त मत्र षष्ठ-उपाङ्ग 480+
५१
आहितेति यजा ॥ ना केवतिय कुमाएत तिदिग्गेण आहितति भाग भाग
यदे जा ? ता अद्भुतीस के नाम
गतिदियाण दमयमुहृत्त वत्तरिय पावट्री भाग
महत्तस्म बावट्ठी भागंच आदित्य ३६३
मत्तमट्टिया छत्ता बालम 4 अभिवर्धन
चणिया भागा राति । जाड " |
दियगण आहितति विदेजा।नी कतित महत्तगोणं आहितति बद जा ? ला एकारस से मुहत्तसप
चत्तरिय बावट्ठीभागे मुहत्तम्स वावट्ठी भागंच सत्तसट्टिया छत्ता दुबालसं चुणियाभागा बने हवे एक याने ४२ मई २७ भाग १२ये और १५ चुणिये भाग ६७ ये होवे ॥७॥ अहा भगवन् ! पांच पर से बने हुवे एक यग में साथ देन के प्रमाण से वितने रात्रि दिन कमी हुए ? अहो गीतम: ३८ रात्रि दिन १० महू ४ भाग ६२ ये और १२ चरणये भाग ६७ ये इतने कमी हुए, अहो भगवन ! एक गुग के मुह के प्रपाण से एक युग में कितने महून कमी हुए ? अहोर
.
:५४० .
बारहवा पाहुडा +
अर्थ
488
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:
अनुवादक-चालनमचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिनी :
- मुहुत्तंगोणं हितेति वदंजा ॥८॥ता केवतिया जो राइदियोणं आहिततिः ६ देजा, ·ता भारती र ईदय सत राईदयरा अहितेरि बदज, तीसणं कंगतिय मुहतग्गेण आ ही बदज्जा ? ता च उप्पन्नं महत्त महराई जय महु नसते मुहतगणं आहितति वदेज । तीमण केवतिन पाचट्ठीभागे महत्तग्गेण आहितेति वदजा ? ता चात्तीसं मतसहस्त अतोमंच बावट्ठीभागे महत्तसते
वाबद्रीभागा मुहत्तणं आहितनि दजा ॥ ९॥ ता. कयाण ते आदिञ्चचंद - .. संवच्छ। समादिता सपज्जवनिया आहतेति बपजा ? ता सट्ठीएए आदिच मैनप ! एक या १५५० मुहू ५ भाग ६२ थे और ५२ भाग ६० ये इतना महूर्त कम हुना ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! एक युग के नेत्र देने कितन कहे हैं? अहो गोनम ! एक युा के १८३० रात्रि
न कहे. अहो भन : एक यगे के कितने म कहे हैं? अहो गौनम ! ५४१० मा युग के कहे हैं. अो भगवन् ! एक मुहूर्भ के ६२ भाग करे वैसे एक युग के किाने वामठीय भाग E ? अहो गीतम! एक युग के ३४ ३८०० वागठाये भाग हो॥ २ ॥ अहो भगवन् ! आदित्य व बद्र संवत्सर एक साथ सपान आदि व अंतवाले कब हो ? अर्थात् कितने भंवत्सर आदित्य व चंद्र ससा समान हो ? भहो गौतम ! ..मास का एक युग होता है, वै: ही ६२ चंद्र पास का भी एक युग
शक राजाबहादरलाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रमादजी.
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ॐ
12 मामा बाबा? एए चंदमासा एमणं अहालखुत्तकडा दुवालग भत्तिया,तिमा ९ए अादिश्च * संबच्छरा एकती एए चंद स च्छग.त्यागं एए आदच वद मच्छरा समादिता रूपज
वसिया आहिति बदजः॥१०॥ ता कपाणी एए आदिश्च उउचंद नखत्ता संवच्छरा
सम दिता समाज लिया अहाते वदन,ता मट्टीएए अदिचART एरिए उउम सा होता है. इ. को काल में ६ गुनकर बारह भाग देना. इसमें ३० आदित्य सरसर व ३१. चंद्र संवत्सर में देनों मंत्मा का पर्यवसान समान होते. एा या आदित्य मान ६० हैं उसे ६ गुना रने से ३६० पास होग, इन वाम का एक संवत्सर हनेम बारह में भाग देना. इस स ३० आदित्य संवत्सर हुआ. एक आत्य स त्सर २३६०दिन हैं इ.१३. से गुणने से१.९८.दिन होणे. अव एक यग में चंद्रमास ६२ हैं. उ। छ गना करने से ३७२ म स हुए. इस के मंवत्पर करने को १२ सभाग देना, इमरी ३१मवतार होय. एकद्र संवत्ला ३५४ दिन १२ भाग ६२ या है, इम कोई
|२१ स गुणने से १०१८० दिन हो. इस सदन संवत्सर के अंत में समानता हुई ॥१०॥ अहो १४ मावन् ! आदित्य, ऋतु, चंद्र ३. नक्षत्र संब.सर बमम अदि व सम पर्या -वाले होते हैं? अहो
गातम ! एक यु। क ६. आदित्य मास हैं, ६१ ऋतुमा हैं, १२ चंद्र म स हैं और ६७ क्षत्र मास है. इन च.रों प्रकार के मास को बारह गुर कर के वारह से भाग देना इस मे साठ आदित्सवत्सर, ६१/
28- बारहा पाहुडा
'
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श्री अमोलक अपिजी
karinamerammmmm
वाव?'एए चंदमासा सत्तट्ठी एए नक्खत्तमासा,एसणं अहा दुधालसवात्तक पालस HE भत्तिता सट्टिएए आदिच 'संवच्छरा एगट्टिएए उउ संवच्छरा बावट्ठीएए चद संवच्छरा
सत्तसट्ठीएए नक्खत्त संबच्छरा तयाणं एए आदिच्च ऊऊ चंद णक्खत्ते संवच्छ।
समादिता समपजवासया आहितेति वदेजा ॥ ११ ॥ ता कयाणं एए अभिवड्डिय ऋतु संवत्सर,६२ चंद्र संबस्तर और६७ नक्षत्र संवत्सर में आदित्य, ऋतु, चंद्र व नक्षत्र संवत्सर का समान पर्यवमान होरे, आदित्य संवत्सर के मास६. उन को बारह गुना करने से ७२० हो और बारह देने से ६० हजे. आदित्य संवत्सर के ३६६ दिन हैं इसे ६० से गुना करते २१९६० दिन होवे.
नु माम ६१ हैं उनको बारह गुना करने से ७३२ मास होवे, उसे बारह का भाग देने से ६१ संवत्सर होते. एक ऋतु संवत्सर के ३६० दिन हैं उपते ६. गुग करने से २११६० दिन होवे. चंद्र मास १६२ है उसे बारह गुना करने से ७४४ हावे और बारह का भाग देन से ६२ होये, एक चंद्र संवत्सर के ११.४ दिन १२ भाग ६२ या है, उस १२ गुना करने से २१२६० दिन होवे. नक्षत्र मास ६५ हैं उसे ११२ गुम करने से ८.४ मास हावे, इन को संवत्सर करने को १२ का भाग देने से ६७ होवे, एक नक्षत्र संवत्सर के ३२७ दिन ५१ भाग ६७ ये का है, इसे ६७ से गुना करने ११९६० दिन होते. इस से रक चारों संवत्सर का समानपना बतलाया ॥११॥ अहो .भगवन् ! अभिवर्धन संवत्स
4 अनुदानबालब्रह्मचारी
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी मालाप्रसादजी •
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4
.
8
आदिच्च उऊ चंद नक्खत्तेणं संवच्छरा समादिया समपसिया ? ता सत्तावण्ण मासा . सत्तय अहोरत्ता एक्कारमय मुहुत्ता तेवीसंच वावट्ठी भागा मुहुत्तस्स एएणं अभिवड्डिय
मासा सट्ठ। एए आदिच्च मासा एगट्ठ। एए उउमासा, वावट्ठीए चंद मासा, सत्तसट्ठी पर एए नक्खत्त मासा एसणं अह छप्पन्नसय खुत्त कडा, दुबालस भत्तिया सत्तसया चोयाला ३ एप्तणं अभिवड्डिया संवच्छरा सत्तसयाएसिया एएणं आदिच्च संबच्छरा, सत्तसयति
आदित्य संवत्सर, ऋतु संवत्सर, चंद्र संवत्सर व नक्षत्र संबस्सर इन पांचों संवत्सर का पर्यवसान कर समान हो ? अहो गौतम ! एक युग के अभिवर्धन मास, ५७ सात अहोरात्रि, इग्यारह मुहू २३
भाग ६२ ये , एक युग में साठ आदित्य मास हैं, ६१ ऋतु माम है, ६२ चंद्र मास है और ६७ L. नक्षत्र मास है. इन पांचों संवत्सर के मास को काल से १५६ गुना करना और बारह से भाग देना, जिस
Rसे ७४४ अभिवर्धन संपत्सर, ७८. आदित्य संवत्सर, ७९३ ऋतु संवत्सर, ८०६ चंद्र संवत्सर और F१८७१ नक्षत्र संवत्सर, इतने काल में अभिवर्धन, आदित्य, ऋतु, चंद्र व नक्षत्र संवत्सर का समान पर्यवसान
होवे, एक युग में अभिवर्धन के माम ५७ हैं इसे पूर्णांक में लाने से ७४४ भाग १३ के हुवे. इस को १५६ से गुण कर १२ का भाग देना. ७४४४१५६%D११६०६४१२=९६७२ भाग १३ के हो. इसे पूर्णाकमें लाने को १३का भागदेना ७४४ संवत्सर होवे. एक अभिवर्धन संवत्सरके ३८३दिन २१
दश चंद्र प्राप्त सूत्र-पष्ट उपाङ्ग
+.वारहवा पाहुडा 48+Nign
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उत्ता एएणं उउसंवकरा, अटुसया च्य एएणं चंद संवच्छरा, मट्ठसय एगुसरा एएणं पक्खत्त संवच्छरा, तयाणं एए अनिवडए मादिच उउ चंदे मक्खत्ते संबछरा समदिता समपजवसिया आहोति वदेजा,॥ १२ ॥ ताणय उत्ताणं एएचंद
सबन्छ। तिण्णि चउप्पणे राइदियसते दुगलसय वाट्टी भागे राइदियरस आहिति मत है. इ7 से ७४४ मार को मथ गु. मे २८५४८० दिन होवे. एक गुा में आदित्य माम १६. उमे १५६ मे गुने से १३.६..मास हा उस १२ का भाग देने से ७८० र हवे. एक
अदिस्यसंवत्रके ३६६ दिन हाइ स७८-संवत्सरके २:५४८.नि होवे. एक युग में ऋतु मास६११ Fइसे १५६ से गुगने स. १०१६ मास होने इस को बारह मे मग दो से ७१३ सरस्पर होवे. एक संव
सर के ३६. न हैं इसे ७१३ १ गुणने से २८५४८. दिन हावे. एक युग के चंद्र पाम ६९ हैं उन ११०६ म गण मे ९६७२ माम होवे. जो बारह का भगदमे ८.६ तर हावे. एक चंद्र के ३५४ निइसमे ८.६ बस्तर के २८५४८० दिन होवे, एक युग में नक्षत्र पास ६. हैं उन १५६ से गुणने म १०४.२ होो, इसको १२ का भाग देर से ७१वत्सर होवे, एक संवत्सर। ३२७ दिन का है. इस से ८७१ संवत र. २८५४८. दिनोवे. यहां पर नय से कितनेक अन्य तथा को समनाने के लिय कहते हैं, उक्त चंद्र संवत्सर को ३५४ अहोरात्रि व १२ भाग ६२ ये
अनुगदक ब्रह्मनागमाने श्री अपने कषिजी
•प्रकाशक-गजामहादरलाला सवदवमहायजी ज्वालाप्रमदाजा .
•
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..
सप्ताश चंद्रमबी सूत्र पछु- Wik __ पांच मंत्र के संयोगी २६ भांगे. नक्षत्र| चंद्र | ऋतु मूर्या अभवर्धन । संवत्स वत्स संवत्सर मत्सर म.सर ।
....
२१९६०
२१९६० ७४४ २८५४००
.
१०१८० ७४४ २८५४८०
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७४४ २८५४८० ७४४ २८५४८०
२११६.
२२ ६७
६
.
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१३८७१.८०६:
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७४४ २८५४८०
२१९६० ७४४२८५४८० ७४४ २८५०८०
२१९६० ७४४ २८५४८० ७४४२८५४८०
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. बारहवा पाहुडा M
* .
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लाचारी मुनि श्री अग्पालक ऋषिजी "
६. वेदेजा,॥अहा ते दुच्चेणं चंदसंवच्छरे तिाण चउप्पण्णे राइंदियसते पंचमुहुत्ते पण्णासंच १ वावट्ठीभागे मुहत्तस्स आहितेति वदेजा। १३॥तत्थ खलु इमे छउऊ पण्णत्ता तंजहा पाउसे,
वरिसा, सरदे; हेमंते, वसंते, गिम्हे, ता सविणं एए चंदे दुवे २ मासा अथवा अन्य प्रकारसे ३५.४ अहोरात्र, पांच मुहूर्त, और५० भाग ६२ये मुकिा चंद्र संवत्सर कहा है. इस में बामठीये बारह भाग के पांच महून व शेष ५० होते हैं, यह चंद्र संवत्सर की वक्तव्यता हुई ॥३३॥
अब यहां मूर्य आयतन के लिये ऋतु की बक्तव्यता कहते हैं. सूर्य की दो आयतन में छ ऋतु कही है. - जिन के नाम-१ प्रावृट ऋतु २ वर्षा ऋतु ३ शरद ऋतु ४ हेमंत ऋतु ५ वसंत ऋतु ६ ग्रीष्म ऋतु, जैन . मते में इन छ ऋतु को १ उपपौत २ वासेतो ३ सरतो ४ हेमंती ६ वरमानवसंतो और ६ ग्रीम. युग की
आदि से चंद्रमा के दो २ मास गिनते साधिक २१ अहोरात्रि में एक ऋन होवे. एक युग में तीस सूर्य ऋतु हैं और पांच अदित्य संवत्सर हैं. इस से एक संवत्सर में छ ऋतु दुई. सूर्य मास ३०. अहो:
रात्रि का है. और चंद्र मास २२३३ दिन का. है. एक. ऋतु ६१ दिन पर्यंत सूर्य की साथ बरहती है. इस से वह ऋतु चंद्रमास के कौनसे. पर्व में कौनमी तीथी में पूर्ण होवे, उस में प्रथर अर्ध
ऋतु गत युग भोगधे और अर्ध ऋतु युग के प्रारंभ में भोगवे. जैसे प्रथम प्रावृट् ऋतु युग के प्रथम संवत्सर के तीसरे पर्व में पूर्ग होये. यह भ द्रपद वदी १ के चरम समय में अनु का चरम समय भोगव कर संपूर्ण ।।
काशक-राजाबहादुर छालामुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ..
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सूत्र
सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति-सूत्र षष्ठ-उपाय 44
आदि
गणिमागे सातिरेगं एगुणंसट्ठि रातिंदियाई रातिदियग्गेणं आहितेति
हो. दूसरी वर्षा ऋत युग के प्रथम संवत्सर के सातवे पर्व में पूर्ण होवे. यह कार्तिक वदी ३ के चरम { समय में ऋतु का चरम समय भोगव कर पूर्ण होवे. तीसरी शरद ऋतु प्रथम संवत्सर के अग्यारव पर्व में पूर्ण होते. यह पोष वदी ५ के चरम समय ऋतु को चरम समय भोगव कर संपूर्ण होवे. चतुर्थ हेमंत ऋतु 'युग के प्रथम संवत्सर के पन्नरवे पर्व में पूर्ण होवे. यह फाल्गुन वदी ७ के चरम समय में ऋतु का चरम { समय भोगवकर पूर्ण होवे. पांचवी वसंत ऋतु प्रथम संवत्सर के १० वे पर्व में पूर्ण होवे. वह वैशाख बदी ९ के चरम समय ऋतु का चरम समय भोग कर पूर्ण होवे. छटी ग्रीष्म ऋतु युम के प्रथम संवत्सर के तेवीस पर्व में पूर्ण होवे. अशा वदी ११ के चरम समय में ऋतु का चस्मः समय भोगवकर संपूर्ण ( होवे. अब चरम पाँचवा संवत्सर में छ ऋतु प्ररूती है. प्रथम प्रवृटू ऋतु युम के पांचो संवत्सर में चैथे पर्व में पूर्ण होवे. यह भाद्रपद ख़ुदी ४ के चरम समय में ऋतु का भोगवकर संपूर्ण होवे. दूसरी वर्षा ऋतु आठवे पर्व में पूर्ण होवे. यह कार्तिक शदीद के चरम समय में ऋतु का चरण समय भोगवकर संपूर्ण होवे. तीसरी शरद ऋतु युग के पांचवे संवत्सर के बारहवे पर्व में पूर्ण हांवे यह पैष शुड़ी ८ के चरम समय में ऋतु का चरम समय मेगन कर संपूर्ण होवे, चौथी हेमंत ऋतु युग के पांचत्रे संवत्सर के सोलहवे पूर्व में पूर्ण होत्रे, यह
समय
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* 484 बारहवा पाहुडा 4448
३१९
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11 वदेजा ॥ तस्य खलु इमे छ ओमरता पणत्ता, तेजहा-ततियपत्रे, सत्चमेपध्वे,
कलन सुदी १० के चग्य समय में ऋतु का चरम ममय भीमा कर पूर्ग है.वे. पावस बसंत ऋतु युा के पांवो सासर के सो पर्व पूर्ण हावे यह वैशाख शुद्ध १२ करम समय में ऋत का चरम समय भोगव वर संपूर्ण होने. छठ ग्रंमत युग के पांचोकार चैवीप में पूर्ण होवे. यह प्रथा अशड शुदी १४ के चप ममय ऋतु का चरम समग भांगर कर पूर्ण हावे. यह छ ऋतु यम के चम पांवर संत्रस्पर की हुई. युग आदित्य की तोम ऋनु होवे और एक २ चंद्र संवत्सर का भी छ ऋतु हाने. एक २ ऋ द्र की ६२ तीथा भोमन कर पूर्ण होवे. इस तरह एक युग में tच प्रापट्ऋतुच वर्ष का, पांच श.द. पांच हमंत, पांच वसंत व पांच ग्रीष्म ऋतु यहा पूर्वाचायोने सूर्य का कथन किया है. भाइचः दो मासाय । एगह भो अह रत्ता ॥ १ए आइचउत्तं । उ परिणाम जिणारिति ॥ अर्थात् आदित्य के दो मास या एकसठ अहोर
विभादित्य ऋत परिणमा और मीर उर अयणं । पग पगरसगुग्ण ॥णियमा निहि लिक्विजिदिने बाटो भाग परि E ॥ अथ-सर्य संबंधो ऋतु ने कालने का अयन में जो पर्व संख्या होवे उसे पत्रह से गुना करना
इसमें जो तीथी आवे उसमें से बासाठये भाग कम करना अर्थात् एकताथी में एक याग यो । 17तीची वासट माग कम करना. वासद भाग का एक दिन होने से ६१ दिन गिना जावे. इस तरह यह
बालब्रह्मचारी मा- श्री अमोलक ऋषिकी।
..शा-राजाहदुर लाथ सुखदेवर
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एकारसमेपये पगरसमेपरे, गणवीसमेपये. तेवीसमेपव्वे ॥ तत्थ खलु इमे छ अतिरत्ता
4864he-
B
३१३
विचार कहा. ऋत अगाड मानने और पा श्रावण मास के कृष्ण पक्ष मत. अमुक पर्व में कितनी ऋतु पूर्ण हुई.कोनसी बसवत रह है. और इस शिलो दिन हो इस जानने की विध. इसमें धूध आंक स्थाप। ३२. पला अांक ११५. दू।। १८९१, नीमरा ३७८२ और चौथा ६२% यों चर धूप आंक की सार1. एक पकनाथी १५. यानधो ६१ मा ६२ ये की है। इस से १५४६१-११५ मश १५ हु, यह प्रथम धा राशि हुई. दूसरा आंक ऋतु का एक युग की १८३० रन है, आर ई ३० ऋतु मोता है. इस से १८३० को. ३० का भाग देने ६१ अहो रा की एक न हुइ. इसके ६२३ भाग करने को ६२ से गुना करना ६५४३२०२७८२ भाग ६२ य हुव'. इसमें अर्थ ऋतु र यु। में भोगता है इन के अर्ध १८९१
भग ६२ या . यह मा . हुई. तसी ३७८२ की पूरी ऋत की और चौथी ६२ ये भाग भक ६२ मशहुई. अनुप कौननी ऋ गई यह जानको पर्वका प्रथम धृध से गुता करना, .उस में दूर थापाक मीलन , इस सख्या को तीर धृ। आंक में भाग देना. जो भाग आरे उतनी
ऋतु व्यान हुई जानना. और शप रहे उचे था धून आंकसे भाग देना. जो भाग आवे वे दिन ॐऔर शेष रहा सो ६२ ये भाग जानना. दृष्टांत-प्रथम संवत्सर के फल्गुन शुदी .१५ को कौनसी ऋतु
420 बारहवा पाहूडा
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-I11B
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अनवादक-चाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिजी 8+
3. पण्णत्ते तंजह - चउत्थेपव्वे, अट्ठमेपव्वे, दुवालसमेपव्वे, सोलसमेपवे, विसतिमपव्ये,
प्रवते ? फाल्गुन शुदी १५ सोलश पर्व है. इसे ९१५ से गुना करके १८९१ पिलाना. १६४९१५-३ ११४६४०+१८९१-१६५३१ होवे. इस को तीसरी धवगशि ३९८२ से भाग देवा, इस से चार ऋतु व्यतीत हुई. शेष १४०३ रहे, इम को ६२ का भाग दन से २२ दिन आये और शेष ३१ भाग ६२ ये
रहे. ये दिन पांचवी ऋतु का जनना. प्रथम पर्व में कौनसी ऋतु प्रवर्ते ? एक को ९१५ से गुनने से १९१५ होवे उस में १८११ मीलाने में ८:६ होवे इम के ३७८२ का भाग देने से भाग नहीं आता है, इस से कोई ऋतु पूर्ण नहीं हुई है. अब शेष २८०६ को ६२ का भाग देने से ४५ दिन आये और शेष १६ रहे. इतने प्रथम ऋतु के दिन जानना. अब जित तीथी में ऋतु पूर्ण होवे यह जानने की विधि कहते हैं. ऋतु के अंक को दो गुने करक एक बद करना. शेप रहे उसे दुगुनी करना
और जो आंक आव उने पर्व जालना. उस पर्व को दोमे भागते जो आये उतनी हीथी. उस तेथी। -को पहिले के पर्व में आग गिरना, जो पर्व हुवे उनने पई यग से संपूर्ण हुने जानना. और जो तीथी रही उस तीथी के चरम समय में ऋतु का चरम समय होवे. द्रष्टांत-प्रथम ऋतु कौनसे पर्व में कौन सी ऋतु में पूर्ण होवे ? यहाँ एक ऋतु को दो से गुना करने से दो हावे, इस में से एक बाद करते शेष एक रहा, इस एक को पुन: दो से गुनने से दो रहे, य दो पर्व सिक्रम
.:प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी माला प्रमादजी।
Damanawimwanmam
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सूत्र
अर्थ
सूत्र - 4484
:-2448
चउकीसति
॥ छ चेव अतिरत्ता आइचाउ भवंति जानाहि ॥ छ चेव
चरम
दो को दो का भाग देने से एक तीची आई इस तरह समय में प्रथम ऋतु पूर्ण हुई एवं ही तीवरी से गुन्ने ६ हुवे इस में एक बाद करने से परहे इस को दो से गत इस दश पर्व को दो भाग देत पांच रइस र ग्वार
स े पर्व की प्रथम तीथी ऋतुजाने को तीन को दो १० हु की पांचवी साथी के
पर्वत हु चरम समय
तीसरी ऋतु संपूर्ण हो. ऐसे ही आगे जो जिस तीथी पर पूर्ण क्षेत्र सो जानना. यह सूर्य ऋतु का कथन किया. अब चंद्र ऋत का कथन करते हैं. एक युग में द्र ऋतु ४०२ होती है. एक नक्षत्र पर्याय में चंद्रमा की छऋतु हे पर्याय युग में ६७ है, और ऋतु ४०२ है, इस से ४०२ को ६७ का भाग देने से वे एक ऋतू कितनी अहारात्रि की होती है ? उत्तरएक नक्षत्र पर्याय चंद्र साथ २७ अहोरात्र ११ भाग ६२ या और २९ माग ६० या की है. इस को
क्योंकि
छका भाग देने से चार अहोरात्र ३४ भाग ६२ या १६ भाग ६७ या एक ऋतु भोगवे अर्थात् इतने दिन में एक चंद्र ऋ पूर्ण हवे. इस में प्रथम अर्ध ऋतु गत युग में प्रवर्ते और दूसरी अर्ध ऋतु युग के प्रारंभ में प्रत्रने अमुक पर्व में कितनी ऋतु अतीक्रमी, कौनसी ऋतु हैं, जानने को घृत्र
और उन के कितने दिन हुए की स्थापना करनी- प्रथम वृत्रक ६१३०५ दूसरा ९४५५ और तीसरा १८९१०
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48** बारहवा पाहुडा +4+
३१५
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11 उमरत्ता चंदाहि भवति मागेहं ॥ तस्थ रूलु इमातो पंचवासिकिओ पंचमतायो ।
का. एक प १५ ने थो का है और एक नयी १२ : ३१ भाग को है. इस ६१ को १५
१९१५ भाग ६२ यो, इस ६.३२ ये ग करन के ६७ म ग कानानिय ६१३०० भाग ६७ ये Jहोचे इससे यह प्रथा धागाशे हुई. एल्यु की अहास । ३४ भाग ६२ र १६ भ ग ६७ या की
हैं. चार अहोरात्र क ६२ भ ग २४८ है, उ7 में३४लन से ८२ करे. इसके . य भाग १२.८८१४ हाये उनमें १६ मीठाने १८११.०६. प्रथ- अर्थ सा गा गुम भागत. मे इन के
आधे भाग कर मे १४२५ भाग ६७यहुए. इन स दूसरीधा १४२ का हुई. अब तीसरी धुन राशि-एक ऋत् १८११० भाग ६१ की हैं. इसमें यह न स घरशिहुई अमक पर्व में कौनसी ऋनु पर्ने यह जानने के ये पर्व को प्रस्य प्रजाशि कम गुग करता जो आंक वे उस दूपर भागोश का आंकमीला धीर नीमन धाराव से भाग दना. जो आवे उतने पर्व यत हुो जानना और जोष है उ-६७ य भाजन .77 का ६२ ग भाग करन को ६७ मे है भाग देना जा असे उदय भान और शेप स ६५य भ.ग उ६२ये भग के दिन करने
को ६२ भाग देन जो भा आवे वे दिन जाना. दृष्टांत प्रस पर्व में कितनी 17'व्यतीत हुई ? और कौनसी ऋतु प्रतिी है ? एक को ६१३०५ से गुनने
A अनुवादक-चालब्रह्मचारी ने श्री अमालक ऋषिजन
प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदवसायजा वालप्मादमी.
।
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६१३.५ होवे. इम में टू-रीपुराशि १४५५ मिलाने से ७०००० होवे. इस को तीसरी धृत १८११० से भाग दे से तीन ऋत व्यतीत शेप १४.३० रहे. रस १७ का भाग देने से २.. भाग ६२ य ६२५२७ रहे: ८९ को ६२ का भाग देने सीन दिन आये, शेष २३ भाग ६२ ये रह. इस तरह प्रथप प के चरम समय में चर्थ ऋरक तं न दिन २३ भ ग ६२ ये २७ भग १७ य का चरम सय मर्ने.सही बातो पर्व का ४६१३.५% १२६१००+१४.५%3D१२३५५५५ १८११०:५ऋन व्यतीत हुई. २५६४० भाग ६७ ये रह, इसके ६७ का भाग देने से ९५ भाग १६२ ये अ.ये. शेष ४० भाग ६५ ये रहे, इस ९५ को ६२ का भाग ने एक दिन व देष ३३ भाग ६२ या रहा. इस से बसा पर्व के चरम सय ६३ वी मर का एक दिन ३३ भाग ६२ या ४. भग ६७ ये का चरम समय व. ए है। सर जानना. इस तरह शान का आंक पूर्ण करणे ६से भाग
देन शेष जी रहे वही मनु मानना. जिनके नाम-१३ ऋभु २वत ऋतु प्रम ऋतु ४ प्रवृट् Eऋ५ वर्ष ऋतु और ६ शरद ऋ. ये छ ऋचंद्र सय प्र, मन-मूर्ग स थ प्रथम दृट् ऋ: ग्रहण
की और द्र साय प्रथम हेमंत ऋा ग्रहण की उस में क्या काम है ? उत्तर-एक नक्षत्र पर्याय चंद्र ऋतु भेगता है. हेमंत ऋत के दो भाग करना, जिस । दूसर भाग के प्रथम सपयसे अभिजित नक्षत्र का प्रारंभ होता है, यों अनुक्रा से मंगा हुवा इमंद ऋतु के चम समय में उत्तराषाढा नक्षत्र का चरम समय होकर नक्षत्र पर्याय पूर्ण हाये, नक्षत्र पर्याय का दो भाग करना, इस में दूसरे भाग के प्रथम समरा
बरहना पड्डा 243
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अर्थ
4 अनुावदक- बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनो
युग की आदि के प्रथम समय में सूर्य योग करता है. छ ऋतु में प्रावृत् ऋतु के दो भाग करना, इस में दूसरे भाग का प्रथम समय युग की आई में होवे, और प्रवृऋ के चरम समय का सूर्य युग के अंत में होवे. इस से सूर्य की साथ युग की आदि में प्रवृ ऋतु कहो. सूर्य एक युग में पांच नक्षत्र पर्याय भोगता है। इस से पांच को छ गुना करने से तीस ऋतु एक युग में होके चंद्र युग की आदि में अभिजित नक्षत्र से योग करता है इस से चंद्रमा की ऋतु कही एक युग में चंद्र ६१ नक्षत्र पर्याय भोगता है, इस से
साथ युग की आदि में हेमंत एक युग में ४०२ ऋतु हुई. अब यहां प्रथम राशि के
चंद्र ऋतु संपूर्ण होवे तब कितने पर्व व कितने दिन हो, यह नीकालने की विधि.
आंक लेना. ६१३०५, ९४५५, १८२१०, ये तीन अंक जानना. जिसकी समाप्ति नीकालने की होवे उस ऋतु के आंक को तीसरी ध्रुव राशि के आंक से गुनना- दूसरी राशि के अंक बाद करना, शेष जो आंक रहे उसे प्रथम राशि के अंक से भाग देना. जा भाग आवे उन्ने पर्व शेष रहे, उतने ६७ ये भ ग जानना. फर उसे ६० का भाग देते तो रहा सो ६९ या भाग. जो शेष रहा हो ६७ या भाग, फर उस को ६९ से भाग देने जो भाग आवे सो तिथि और शेष रहे सो ६१ या भाग. द्रष्टांत प्रथम ऋतु कौनसे पर्व में कौनसी तीथी में संपूर्ण होते ? १ + १८९१०= १८९१० - ९४५५=१४५२÷६३१३०५ भाग नहीं चलता है, शेष १४२६÷६७ = १४१४. करने को ६१ से भाग देन १४१÷ इस तरह प्रथन ऋतु का चरम लमय प्रथम पक्ष की तीसरी तीथी को १९ भाग ६१ ये ८
१४१ को तीं
६१=
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प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी •
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4
अर्थ
भाग ६१ ये के चरम समय में भोगव कर पूरी होये. इसी तरह सब का जानना. छ अातु कार से नक्षत्र में *संपूर्ण हाये और कौक से मात्र शेष रहेइनकाय ते..इस तर नमो भाग शेष रहे तव ऋतु परिपूर्ण हवे.
नक्षत्र
दिन माग
३१९
0
सूत्र-षष्ठ उपाङ्ग
पूर्वाफाल्गुनी २. वसंत अश्विनी
३२॥ ५ वर्षा स्वाति ३ ग्रीन यो सब नक्षत्रों की मान्यता जानना. प्रत्येक ऋतु ३०५ भाग ६७ ये रात्रि की हैं. प्रथम प्रवृट् ऋतु के १५२॥ भाग ६७ये अहोरात्र के गया पीछे एक नक्षत्र मास की पर्याय पूर्ण हो.दूसरा नक्षत्र माप क १५२॥ भाग ६७ अहोरात्र के गये पीछे प्रवत् ऋतु की पर्याय पूर्ण हो. इस नक्षत्र के योग में चंद्र नात एक या में ५.२ कही. अब सूर्य ऋतु के परिमाग कालमेंद्र ऋतु का परिमाण क.ल होंगे. लेक कर्ड से जितना एक चंद्रमा का परिमाण होवे यह कहते हैं. प्रत्येक चंद्र ऋतु दो मास की जानना. यह कितने प्रमाण में है सो कहते है. चंद्र संवत्सर ३५४३ अहोरात्री का है, इस को छ का भाग देने से ५१३ अहोरात्र हो. ऐनी चंद्र ऋतु
थे, और एक युग में ऋतु तीस व ऋतु मास [ कर्म मास] ६१ होवे, इस अपेक्षा से एक चंद्र ऋतु
बारहवा पाहुडा 98454
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अर्थ
4 अनुवादक बालब्रह्म च मुनि श्री अपलक ऋजी
ऋतु आश्री लैकिक व्यवहार से एक २ अनमरात्रि होते. संपूर्ण कर्म संवत्सर में छ अवम रात्रि होवे. ह व्याहार नय से चंद्र सत्र की अपेक्षा से कर्म संवत्सर में होने, लौधिक ग्रीष्म ऋतु का तीसरा पर्व सो अशाढ का कृष्ण पक्ष, सात पर्वको भाद का कृष्णपक्ष में एक २ मःम छोड़कर भाग का माम का कृष्ण पक्ष लेना. अब अवका कथन करते हैं मात संपूर्ण तीन अत्रि का है और चंद्र प स २९ अहोर त्रि का है. कर्म मास की असे चंद्र की याद करने ईस ३० भाग ६२ ये रहा इनकी एक मास में अवम रात्रि जाग्ना जी अहोरात्र में ३० भाग ६२ ये अवम रात्रि है तब एक रात्रि में एक भाग र य अमरुत्रि होइन मे ६२ व तीवी में एक एकट में दिन्में पूर्ण हुई, और
अवम रात्रि हवे. इन ती
तीथी की
प्रवृत्तिई. यहीबाट ६१ भाग अहोरात्र की है. इस तरह एक युग में तीन अम रात्र हो. चंद्र ऋतु संबंध अम कहते हैं. बाल में अवरात्रि हो वहां ही वर्षा काल के
चतु
प्राण हो. इस स में दूसरी अम रात्रि
काल के तीसरे पर्व में
शीतकाल के तीसरे (मूलक्ष ११ प ) में
शनि का केस
में चौथी
* सूर्यादि क्रिया उपलक्षित, अनादि
पति व अधिनियत
काल की हानि वृद्धि नहीं होती है. परंतु
जो अवमरात्रि अति रात्रि कही है वह परस्पर मास की अपेक्षा से है. कर्म मास की अपेक्षा से चंद्र मास में अवमरात्रि होवे और कर्म मास की अपेक्षा से सूर्य मास में अतिरात्रि होते.
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राजाबहादुर लाला सुखदेवमयी ज्वालाम
३२०
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मर्थ
478+ 4
३२१
HILE-BAR
आम रात्रिका के पहले पांचो और रोपा काल के गातो पी (पलक्षा २३) पर्व में छडो अ त्रि . भूमापको से कर्म ल में अस ने काते हैं. एक युग में *म रात्र राना रूप ली। होपर्य। प्राण मा सवार पूर्ण हुने पीछे पीपमा प्रय1 मार
पायमई. अब आम मात्र कौन में पक्ष में और कसा में गाय सहनीकला को धे. जो अपम रात्र मीकालना हो उस माह से न जा आर ला पो. उस को दी मे भाग दना जो आगे म .पेनिभिर एन से अधिक पनाह स भगन जो भावे सा, यह पूरी पूोल आओ हुनना , और शेष रहेको तिघ नाना. हनप्रथम अधमरात्रि में मौनीदी का तिथि संपूर्ण र १५.५-7 = 7. इ. नथ छे शंचा पर्व की दूसरी तिथे जानना. इस से शायदा को द्वाप साह रे दी १२ आगत्र को पृच्छा. १३+४-५२-२-२६-१९ = १-११५.११. सं. र गोपने पत्र में एकादशी तिथि
सोई अनपराटासाट गई. पाम की अपेक्षा से दुर्गमय में एक रनिका होइ.२ ३. महक अार्ग माई १३०॥ अहोरात्रि का है. दो सूर्यमान की एक ऋतु, इल से एक पूर्व कहा की समाप्ति दो की मास की अपेक्षा मे एक अधिक मात्र हुई. ऋा अवाढ ने चार पर्व गये पीछे ए. अधिक रथि हाये, बाह
बगहवा पाहुटा +
+
.
+18.
.
.
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अर्थ
42 अनुवादक - बाळब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
पर्व गे पीछे दो अधिक रात्रि यों सब जानग. अब जो अधिक रात्रि नकालना हो तो उन अधिक रात्रि को चार गुना करना जो संख्या आवे उतने पर्न गये हुये जानना एक अधिक रात्रि में चार पर्व गये हुबे जानना और १६ वी अधिक रात्रि में ३४ पर्व गये पीछे १० वी अधिक रात्रि होवे इस से १६ में से एक पर्व निकलता है यो ६५ पर्व पूर्ण हुए. इस तरह सब अधिक र त्रि जानना कर्म संवतर की अपेक्षा चंद्र संवत्सर की अमरा और सूर्य संवत्सर की ती अधिक रात्रि होवे इस से एक युग में तीमऋतु दक्षिण उत्तर में बारह उसे भाव कहना. अब सूर्य का आवर्त कहत हैं. एक युग में सूर्य के कितने आवर्त हो ? सूर्य १८३ दिन
चंद्र
में एक आर्त पूर्ण
करे और युद्ध के दिन १८३० हैं इस से १० भाव में १८३० दिन पूर्ण होते. उन तरह सूर्य एक युग में दश आवर्त अयन करे. चंद्र एक युग में १७६८ अर्थ मंडल करता है. इन के { एक अयन होती हैं इस से १७६८ को १४ का भाग देने से १२६ चंद्र की अयन होवे इस से चौथे अर्थ मंडल में
१४ अर्ध मंडल में और शेष ४ रहे
पूर्ण हवे. अर सूर्य की अयन कौन पर्व में कौनसी तिथे पर आत्रे सो कहते हैं एक युग में तिथि १८६० हैं और अपन १ हैं. जो अयन का निकालने का हो उस में से एक बाद करक युग की तिथियों की साथ गुना और १० से भाग देना. जो आवे उन में एक मिलाना और १५ से भाग देना, जो आत्रे उतने पर्व अतिकमे और शेष रहे सोती थी. दृष्टांत प्रथम अयन कौनसी तिथि पर होवे ? एक में से एक बाद करने से
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प्रकाशक- राजा बहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी ●
३२२
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42:488
कुच्छ नहीं रहता है, इस सेगन युग के १. अयन लेगा. इस को १८६० मे गुना करना, जिस से १८६०.हो. इरेदश का भगदना जिम १८६० हो, इसमें एक महान ११६. हो.४१ को १५ का भग १२४प ये, हमनगा युग में गगे जानना. और एक बढः मो या की प्रथम तिथि प्रथा अयन होने. यही नीनी अयन की तिथि जाने को एक बाद करने से दो रहे. १.x100-39२०१०=३७२+१=३७१२-२४ प पूर्ण आये, र १३ रह. इस से पच्चीमवे! पर्व की १३ वा तिथि को तोमरी अपन ठे. अब चंद्र अयन कॉनमी तिथि में पूर्ण होवे सो कहते हैं, ई अयन पर्व तिथि | अयन पर्व तिथि | अपन पर्व तिथि एक यग में चंद्र अयन १२६ हैं और , अयन पचे ताथ | अयन पत्र तिाया अपना परताय ४ भाग १४ का. इस के १४ भाग
करने को १२६ को १४ से गुनः कर ४ मीलाना. १२६४१४=१७६४+४= १७३८. इस का ८ से भाग देने से, २२१ होवे, यह प्रथम धन राशि. एक
७४
418 सव-चद्र पानी सूत्रपानपाड
AamhindiwwwwwwwwwmoranAmAnandan.
धारहना पडा 19842
युग में तिथि १८६० है. इस के १४ भाग करके १८६० को १४ से गुनना. इस से २६०४०१ भाग हुवे. इस को ८ का भाग देना इस से १२५५ हुये यह दूसरी धृ राशि का आंक}A जानना. द्रष्टांत प्रथप अय: कौनमी तिथि में पूर्ण होक? दूसरी वराशि ३२५५ को एक से गुना करने से ३२५५ हो इस के प्रथम धाराशि २२१ . भाग देत
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1
आउट्टीओ पण्णत्ताओ ॥ १४ ॥ ता एएसिणं पंचण्हं संवच्छराणे पढमवासिकियं उचंद कण खत्तणं जोगं ज.तेति? ना अभिया अभिस्सणं पढमसमएसमयं
।
३२४
42 अनुवादक बालबचरी मुनि श्री अमा. ना. -
१.४ तिथे अशेप १६१ भ ग . इस ६२ ये भाग करने का १६१ का ६२: गुना करना निम से ९१८२ ४थे, इस २१ का भ.गदे स ४५ भाग ६२२, शेए ३७ भाग हे इ...२.४ य भाग मानना, इस तरह प्रथा अय युग की आदि मे २४ तिथ व्यतीत हुए पछ पनवी तिथि के ४५ भाग ६२२ ३७ भाग २२१ के. चम्म मपय पूर्ण होय, इस तरह कर अयन का जानना ॥१४॥ अब गैतम मी प्रश्न करत ओभान् ! इन पांच संवतार में प्रथम वपी काल संबंधी आउटे
. और पंद्र किम क्षत्र साथ योग कर ? अहो गौतम ! अभिव नक्षत्र के तीन तारे हे इन से हारन अभना नक्षत्र श्राण वदी १ प्रथा समय में वर्षा काल की प्रथम पाउस. दउ. एम. गुग मायक्षम ६७ प रा और मई १० उरी करते हैं. एक
क्षत्र पर्य4 के महू के ६२ भाग. ६७ ये भ ग ३४:३८०० की प्रगशि दुई, एक थाउटी के मर्न ६२२ यग ६७२ भ ग २०८:५४६. की दूसरी धाराशि हुई, इन में से प्रथम अ.उटी का प्रथम 5म कालना हवे तो प्रथम : म एक बंद करना, जिम से शेष कुच्छ रहे नहीं इस से गत युग की दश आटी हेन, इत को दूसरी धृवराशि से गुरते २२८०५४६००, इस को
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
।
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सप्तदश चंद्र प्राप्ति सूत्र-पष्ठ उपा43
" वर्ग सुरे केणं णक्खत्तेणं जोगं जोतेति ? ता पुरसेणं, पुसस्सणं गूणवीस मुह ता तेत्ताली। प्रथम धृवराशि से भाग देने से ६७ नक्षत्र पर्याय हुई, शेष कुच्छ भी नहीं रहा. इस से उत्तराषाढा नक्षत्र संपूर्ण हुवा, और अभिनित नक्षत्र ९ महूर्त २४ भाग ६२ या ६३ भाग ६७ या का है, इस नक्षत्र के प्रथम समय में आउटीका प्रथम स.य हुवा. और श्रावण वदीर के प्रथप समय में चंद्र अभिनित नक्षत्र साथ योग करता है. अहो भगान् ! इस सग्य सूर्य कौन से नक्षत्र की साथ योग करता है ? अहो गौतम !
पूष्य नक्षत्र तीन तारे हैं. इस बहन में पुष्य नक्षत्र स थ योग करता है. इस नक्षत्र का १९ मुहूर्त :४३ भाग ६२ये और ३३ चरण.ये भाग ६७ ये शेष रहे तब प्रथम समय में वर्षाकाल की प्रथम भाउटी -
बैठे. एक युग में मूर्य साथ नक्षत्र पांच पर्याय भोगता है, मूर्य की आउटी १० है और क्षत्र पर्याय के मुहूर्त १.०२८ को प्रथम धृगशि है. एक आउटी के मुहू ४४१० की दूसरी धाराशि है. प्रथम
उर्ट का था मय निकालना होवे तो रद करना. त शेष कुच्छ भी रहे हैं. इस से गत युग की १२ अरटी स.य दूसधाराशि स ग ५४१०० होवे. उस प्रथम धृवराशि से भाग देने से पांच
नक्ष' पर्याय पूर्ण हगई तपांच :क्षत्र पर गा या की हुई. और शेष कच्छ नहीं रहा. उस से | ॐ पुष्य नक्षा २ १३८ मुहू पूर्ण होगर, २१ २६४ मुहूर्न सूर्य नक्षत्र रहा इसके प्रथम समय में प्रथम भाउटी | इस समय सूर्य साथ इंद्र क्षत्र कितना रहा ? पूष्य नक्षत्र चंद्र साथ तीस मुहून का है. इसको २६४
+ बारहवा पाहुडा ++tate
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अर्थ अर्थ
48 अनुवादक बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक
{ संच यात्रट्टी भागा बावट्ठी भागंच सत्तसट्टि छेत्ता तेत्तीस चुणिया भागा सेसा ॥ १५ ॥ ता संच्छराणं दोघं वासि किं आउटिं चंदे केणं णक्खत्तण जोगं जोतेति ? ता एक्कारस मुहुत्ता एगूण चालीस बावट्ठी भागा बावट्ठी भाग व सप्तसट्ठिया
• एएस पंच भगरेमगरे
{ से गुनते ७९२० होवे और सूर्य साथ४०२ मुहूर्त का यह नक्षत्र है, इसने७९२० को ४०२ से भाग देने से ११ मुहूर्त आये, शेष २८२ रहे, इस के ६२ ये भाग करने के ६२ मे गुना करना, इस से १७४८४ हुवे. इस को ४०२ से भाग देने से ४३ भाग ६२ ये आये शेष १९८५ रहे. इस को ६७ से गुना करके ४०.२ से भाग देना इन से ३३ भाग ६७ ये आये इस से सूर्य साथ पूण्य चंद्र नक्षत्र १९ मुहूर्त ४३ भाग ६२ या ३३ चूरणिये भाग ६७ ये शेष रहे उस के प्रथम समय में प्रथम आउटी बैठे. इस से सूर्य पूष्य का योग करे || १५ || अहो भगवन् ! इन पांच संवत्सर में दूसरी वर्षा काल संबंधी आउटी क बैठे ? अर्थात् युग की आदि से तीसरी आउटी कब बैठे ? और चंद्र किस नक्षत्र साथ योग करे ? अहो गौतम ! श्रावण वदी १३ को तीसरी आउटी बैठे. मृगशर क्षत्र के तीन तारे हैं इस से बहु बचन में मृगशर नक्षत्र अग्यारह मुहूर्त ४१ भाग ६२ ये और ५३ चूरणिये भाग ६७ ये शेष रहे उस के प्रथम समय में युग की आदि से तीरी अ. उटी का प्रथम समय बैठे. इस का गणित पहले जैसे 'थ'त तीन में से एक बाद करके शेष दो रहे. इस से दूसरी धृवराशि को गुना कर प्रथम ध्रुवराशि से
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• प्रकाशक - राजा बहादुर लाला सुखदेव महायजी ज्वालामसदाजी
१.६
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मूत्र
अर्थ
संतदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ- उपाङ्ग
छेता तेयण्णं चुष्णिया भागा सेसा ॥ तं समयं चणं सूरे ता पुसेणं पुरसणं तंचेव पढमाए ॥ १६ ॥ ता एएसिणं पंचण्हं तच्चं बासं कि आउट्टि चंदे केणं णक्खत्तेणं पुच्छा ? ता विहा विहाहिं विसाहाणं तेरस
भाग देना. शेष रहे उम्र में से अभिजित नक्षत्र से नक्षत्र निकालना, अहो भगवन् ! उस समय सूर्य कौन नक्षत्र साथ योग करता है ? अहो गौतम ! पूष्प नक्षत्र साथ सूर्य योग करता है. इस नक्षत्र के तीन तारे हैं. जैसे प्रथम आउदी में कहा वैसे ही पूष्य चंद्र नक्षत्र सूर्य माथ ११ मुहूर्त ४३ भाग ६२ या ३३ भाग ६७ था शेष रहे और सूर्य नक्षत्र २६४ शेष रहे उस के प्रथम समय में सूर्य
योग करता है।
और तीसरी आउटी का प्रथम समय भोगता है. इस का गणित प्रथम जैसे जानना ॥ १३ ॥ अहो भगवन् ! इन पांच संवत्सर में तीसरी वर्ष ऋतु संबंधी युग से पांचवी आउटी कब बैठे और चंद्र किस नक्षत्र साथ योग करे ? अहो गौतम ! श्रावण शुदी १० को बैठे विशाखा नक्षत्र के पांच तारे हैं इस से बहुवचन में विशाखा नक्षत्र १३ मुहूर्त ५४ भाग ३२ ये ४० चूरणिये उस के प्रथम समय में युग की आदि से पांचवी आंटी का प्रथम समय में चंद्र गणित प्रथम आउटी जैसे जानना यहां पांव में से एक बाद करते धनराशिको चार से गुना करके माप वराशि से भाग देना.
भाग ३७ ये शेष रहे योग करता है. इस का शेष ४ रहे, इस से दूसरी अहो भगवन् ! उस समय
पुच्छा ? संवच्छराणं
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+++* बारहवा पाहुटा 43+p
३२७
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सूत्र
अर्थ
अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
हुमागा चालीस चुण्णिया भागा सेसा पढम समए तं समयं चणं सूरे के क्ख ? ताणं पुल में तंव ॥ १७॥ता एएनिगं पंचहं संच्छराणं चविसिि आउट्टि चंदे के नक्ख तेणं? ता रेवती रेवतीणं पण्णर्व सं मुहुत्ता दुवतसंच बावट्टी भागा मुहुत्तर वाट्ठी भागंच सत्ततया छत्ता छत्रीसं चूण्णिया भागासेसा ॥ तं समयंचगं सूर्य किस नक्षत्र साथ योगता है ? अ गौतम ! उस समय सूर्य पुष्य नक्षत्र से योग करता पूष्य नक्षत्र के तीन नारे कहे हैं. इस के २६४ मुहूर्त शेष रहे और पूज्य चंद्र नक्षत्र सूर्य साथ १२ मुहूर्त १४३ भाग ६२ ये ३३ भाग ३७ ये शेष रहने पर प्रथम समय में युग की आदि से पांच आउटा के प्रथम समय में सूर्य योग करें. इस का गणित पूर्वोक्त जो जानना ॥ १७ ॥ अहां भगवन् ! इन पांच सर में चतुर्थ वर्षाकाल संबंधी युग से मातवी आउटी कर बैठे ? और चंद्र किस नक्षत्र साथ योग करे ? अहो ! श्री ७ के प्रथम समय में रेवति नक्षत्र के बत्तीम तारे
कहे हैं इन से रेवति नक्षत्र के २५ मुहूर्त ३२ भाग ३२ ये २३ चूजिये भाग ६७ ये शेष रहे तब उप के मयम समय में चंद्र योग करता है. अहो भगवन् ! उस समय सूर्य किस नक्षत्र साथ योग करता है ? अहो मौन ! पुष्य नक्षत्र के तीन तारे हैं इस मे बहुवचन में पूष्य नक्षत्र पूर्वोक्त जैसे पीछे २६४ मुहुर्त शेष रहने पर वगैरह शेष सब कथन प्रथम आउदी जैसे जानना
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१३८ मुहूर्त गये यावत् पूष्य चंद्र नक्षत्र
० प्रकाशक- राजा बहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्याला प्रमादजी •
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सूरे केणं गक्खत्तेणं पूसेणं पुसस्सणं तंचेव ॥१८॥ता एएसिणं पंचण्हं संबच्छराणं पंचम वासि किं आउट्टि चंदे कणं पक्खनेणं, ता पुयाहि फग्गुणिहिं पुवाणं फग्गुणीणं वारस मुहुत्ता सत्तचालीस बावट्ठी भागा मुहत्तरस तरसय चगिया भागा सेर! तम्म चगं सूर कण? त! पसं, पुस्तणं एकूण वीसा महतरस तेत्तालच बाब भागा बारही भागंच सत्त-ट्रिया छत्ता तत्त। नेव चजिया ॥ १९॥ तमिण पहं संवच्छराणं पढभ हसते आउहि चंदे कगं णखणे ? ता हत्थेग, हत्थासणं मुह ४३ भाग ६२ से ३३ भाग ६७ येते.
र
स मय में या श्री आदि स माती ही काम समय कैडे. ॥१॥हो भग ! इन पांब संवत्सर में पांचवा ल संबंधी को भी किस तिीि पर बैठती है और चंद्रस नक्षत्र साय यंग करता है? अहो और ! फिल्गन नाच के दो सार केहे हैं. इनसे अनेकवचनले पूफ जानी नक्षत्र १२ मुद्दा ४७ भाग १.
२ ३ चरणिये भाग ६५ ये शेष रहे तब युग से नववी अस्टी का प्रथम समय में बैठे. आ 'गान् ! उस पय गर्थ किस नक्षत्र साथ याग करता है ? अगौतम ! म मय पूर नक्षत्र माय सूर्य याग करना है. इसके ताननारे कहे हैं. यह १२ रा ४३ भाग १२ये ३३चनिये भाग. येशप रह और मूर्य नक्षत्र २६४ मुर्न रहर के प्रथा समयकी अउ का प्रधाब .॥ १९ ॥ अदभगान् ! इन पांच सासर में प्रथम हयंत काल संबंध आउटा कर बैठती है और इंद्र
*2238 बरखमा पाहुडा 4-
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उस पय राय कि
कहे हैं. यह १९
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720
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* अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
पंच महुँत्ता पण्णासंच बावट्ठी भागा,बावट्ठी भागंच सत्तप्तट्टिया छेत्ता छट्टि चुणिया भागा सेसा समयं चणं सरे केणं? ता उत्तराहि असाढाहिं. उत्ताराणं असाढाणं चरम समये ॥२०॥ताएएसिण पंचण्हं संवच्छराणं दोच हेमंताकयं आउटिं चंदे केण? ता सतभिसयाहिं
सतभिसयाणं दोमुहुत्ता अट्ठावीस, बावट्ठी भागा मुहुत्तस्स सेतालिसं चुणिया भागा सेसा किस नक्षत्र साथ योग करता है ? अहो गौतम ! माघ बदी के प्रथम समय में हस्त नक्षत्र के पांच तारे कहे हैं इससे हस्त नक्षका का योग होता है. यह नक्षत्र हुवचन से पांच मुहुर्त ५० भाग ६२ ये ६० भाग ६७ ये शेष रहे तब उसके प्रथम समय में युग की आदि से दूसरी आउटी का प्रथम समय होवे. उस समय सूर्य किस नक्षत्र साथ योग करे ? अहौ गौतम् ! उस समय उत्तराषाढा नक्षत्र की माथ मूर्य योंग करे. उत्तष ढा नक्षत्र के चार तारे कहे हैं. यह नक्षत्र चरम समय भोगव कर अभिजित नक्षत्र के प्रथम समय में युग की आदि में दूसरी आउटी का प्रथम ममय प्रवते. इम का गणित प्रथम आउटी जैसे जानना ॥ २० ॥ अहो भगवन् ! इन पांच मंवत्सर में दूसरी हेमंत काल संबधी चौथी प्राउटी कर बैठती है. ? और कौनसा नक्षत्र चंद्र पाथ योग करता है ? अहो गौतम ! शतभिषा नक्षत्र के १०० तारे कहे हैं, इस मे अनेकवच में शतभिषा नक्षत्र २ मुहुर्न २८ भाग.६२ ये ४६ चूरणिये भाग ६७.थे शेष रहे तब इस के प्रथम समय में युग की आदि से चौथी आउटी का प्रथम समय हावे.
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला खदवसहायजी ज्वालाप्रसादनी ।
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तं समयं चणं सूरे फेणं गक्रुत्ते ? ता उत्तराहिं असाढहिं उत्तराणं असाढाणं चरम समए॥२१॥ ता एएसिगं पंचण्हं संवच्छराणं तच्चं हेमते किय आउ, चदे के ? ता पुणं पुनरमण एकवीस मुहता तवालीसंच चाट्टी भागा बाट्टी भागं सत्तसट्ठिया छेत्ता. तेत सं चुणिया भाग सेसा तं समयं चणं सूरे केणं ? ता उत्तराहिं आसाढाहिं
उत्तराणं असाढाणं चरम समए ॥२२॥ ता एएमिणं पंचण्ह संवच्छराणं चउत्थे हेमंते 26 अहो भगवन् ! उस समय मूर्य किस नक्षत्र साथ योग करता है ? अहो गौतम !
उस समय उत्तराषाढा नक्षत्र साथ सूर्य ये ग करता है, यह चरम समय में योग करके अभिजित नक्षत्र के प्रथम समय में युग थादिसे चौथी आउटी का प्रथम मध्य प्रवर्ते इश्क' गणित प्रथम भाउटी जैसे जानना ॥ २१ ॥ अहो भगान् ! इन पांच संवत्सर में तीसरा हेअंत काळ संबंधी युग से छठी आउटी कर बैठती है ? और चंद्र किस नक्षत्र साथ योग करता है ? अहो गोलम ! पुष्य नक्षत्र के तीन तारे कहे. हैं, महादी १ को पुष्य नक्षत्र का योग होता हैं यह नक्षत्र ११ मुहूर्त ४३ भाग ६२ ये ३३ भाग ६७ ये शेष रहे तब इस के प्रथम समय में छठी आउटी का योग होता हैं. अहो भगवन् ! उत्त समय सूर्य किस 4
नक्षत्र साथ योग करता है ? अहो गौतम ! उत्तराषाढा नक्षत्र साथ योग करता हैं. यह चरम समय | भोगव कर अभिजित नक्षत्र के प्रथम समय में छठो आउटी का प्रथम समय प्रवर्तता है ॥ २२ ॥११
शत-रंद्र प्रतिमूत्र षष्ठ-उपान 48.
418488- बारहवा पाहुडा
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१
अनुवादक-बालवाचारी मुनिश्री अजक अपिजा.
कये आउ चंदे केणं गक्खत्तेणं ? ता मूलेणं मूलरससणं छ मुहुत्ता
अट्ठावीस वावट्ठी भागा वावट्ठी भागं च सत्त सट्ठिया छेत्ता वीस चुणिया . भागा सेसा ॥ तं समयं चणं सूरे केणं ता उत्तराहिं असाढाहिं उत्तराणं असा ढाणं । चरिम समए ॥२३॥ ता एएमिण पचण्ड प्वच्छर णं पंचमं हेमंत किय आउहि चंदे
केग ? ता कत्तियाहिं, कत्तियाणं अट्रारस मुहता छत्तीसं च बावट्टी भागा मुहत्तरस हो मगवन् ? इन पांच संवत्सर में चौथा हेमंत काल संबंधी आउटी कब चैठती है और चंद्र किस नक्षत्र साथ योग करता है ? अहो गौतम ! माघदी १३ को मूल नक्षत्र के ११ तारे कहे हैं, इस से इस के अनेक वचन में मूल नक्षत्र के ६ मुर्त ५२ भाग १२ ये २. भग ६७ ये शेष रहे, तर उस के प्रथम समयमें आठशी आउटी का प्रथम समय बैठे. अहा भगरन ! मममय मर्य किम नक्षत्र स थ योग करता है? अहो गौतम! उत्तगपढा नक्षत्र माथ योग करता है, यह चरम समय में योग करके भमिजिन नक्षत्र के प्रथम समय में युगी आदिमे आयी आउट का प्रथम हा इन का गणित गप प्रास्टा अनुस र जनना. ॥ २३ ॥ अहो भगवन् ! इन पांच संपत्ता में पांचवां हेमंत काल संधी दशवी आउटी कर बैठती है और चंद्र किम नक्षत्र माय योग करता है ? भडा गीत ! उस रूपय कात्तका नक्षत्र मह वदी १० को बैठत है, इस क १८ मुहर्न ३६ भाग १२ये ६ चरणिय भग ६७ य शेष रहे हव इसके प्रथम समय में दशवी आउटी बैठती है. अहो भगवन् ! उस समय सूर्य किस नक्षत्र साथ
.प्रकाशक राजाबहादुर लाला. मुखदवमहायजी वानरममादजी.
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4
योग करता? अहो गतम उत्तराप हाक्षत्र साथ योग करता है, उसके चार तारे को. इम के चरमसनयमान कर के अभिनित नक्षत्र के प्रथम पपय में दशवी आउटी बैठे. इम का गणित पहिले मैंस जानका यह दशारा किम तिर्थ बैठती है. चंद्रका कोनसा नक्षत्र शेष रहे. सूर्य साय कोनमा सूर्य नक्षत्र में चंद्र नक्षत्र विना शेष रहे अथवा इस क प्रथम समय में आउटी बैठे उसका यंत्र
प्रजासत्र पढ-उपात्र 408
आउटी
द्रंथ.] मूर्य माथ म.पा.भा. शप रहे
|
तीथी
नक्षत्र
म०मा.मा.
नक्षष
मह
१९
81 बारहवा पाहुडा 4189480
असणी
१३१५३ पूर्वा महा शुटी ४ शभिषा २२८४६ अभिलन १२४ श्रावण शु. १० विशाखा १.५०४.. पूष्य १९४३ महा वदी १ पूष्प १२४३३३ अभिनित ९२४ श्रावण वदी। रेवती २५३२२६ पूष्य ११४. पहा वदी १३
६५८२० अभिजित श्रावण शुदी ४ पूर्वाफ ल्गुनी १२४७१३ पूष्य २१४ महा शुदा १० कृतिका १८३६ है अमिानेत ९२
२६४ १२६
48 सप्तदश
1090 .
३३||
६६
२६४
१२६
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रीमुनि श्री अमो के अविना
भर्थ
4. मनुवादक-पालब्रह्मचारीमान श्री अपो के ऋषिजी
भागं च सत्तसीट्रियोछचा छ चुग्गिया · भागा सेसा ॥ तं समयं चणं सूरे केणं णक्खत्तेणं ता उत्तराहिं असाढाहिं उत्तराणं असाढाणं चरिम समए ॥ २४ ॥ तत्थ खलु इमे सविहे जोए पण्णत्ते तंजहावसहाणुजोए, वेणुयाजोए मंचजोए भवतिमंच जोए छत्तजोए. छत्ताति छत्तजार ज़गुचजे.ए धणजाए विणोतजोए मंडुकप्पुजाए : नामदसमे
॥ २५ ॥ ता एएसिणं पंचण्ह संवच्छराणं छत्तातिछत्त जागे चदे कसि देसस इस तरह यह यंत्र संपूर्ण हुवा. इसमें पांव भाउटी मूर्य दक्षिणार्ध के पुष्य नक्षत्र साथ योग करे और पांच आउटी उत्तरार्ध के अभिजित नक्षत्र साथ योग करे ॥ २४ ॥ वहां दश प्रकार के योग कहे है वृषभानु योग वृषभ के आकार में चंद्र सूर्य नक्षत्र जिस योग में प्रत सो वृषभानु योग है, २ बेराणु योग बोवास की वाणा के आकार से ३ मांधानु योग सो मांधा के भाकार से४ मंचन मंच योग से मांचा पर मोचा का आकार वाला ५ छवान योग सो छत्राकार वाला ६ छत्रत्रावये ग सो उत्र है उस पर उनका आकार ७ यूका सो वभ के स्कंध में जूका हाये उस अकार से ८धन समृद्ध चंद्र मर्य नक्षत्र के बीच मे जावे सा ९प्रणीत योग सा गृह नक्षत्र के करण जान, सूर्य उपाय सो १० बंडक पून योग गति के संभव से होवे ॥ २५ ॥ इन दश में से छानुछ। पोग
वर्जकर क्षेष ना थोग प्राय: अनेकधा अनेक स्थान मीलते हैं इन से छत्रानुका का यहां प्रश्न सकते हैं. अहो भगवन । इन पांच संवत्सर में छत्र पर छत्र योग चंद्र किस देश में करे ? अहो,
कामक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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488*- सप्तदश चंद्र मशशि-सूत्र पष्ट पा
जोतेति ? ता जंबूदीवस २ पाई पडणाययाए उर्दिण दाहिण जीवाए मंडलं चउब्विंसणं सतेनं छेत्ता दाहिणं पुरथिमिल्लांसि चउभाग मंडलसि, सत्तावीसं भागे उतना अभागे विमतिहा छेत्ता, अट्ठारस भागे उणादिना तिहिं नागहिं दाहिया कलाहिं दाहिण पञ्चस्थिमे चउभाग मंडल असंपत्ते से चंद छत्तातिछत्तं जोगं जोतेति, उप्पं चंद मज्झेणक्खत्ते हेट्ठा आइचे तं समयं चणं वदे केण णक्ख ते ? ताहिं चित्ताहिं चिताणं चरमे समए इति बारसमं पाहुडं सम्मतं ॥ १२ ॥
तत्थ
गौतम ! इम जम्बूद्वीप में पूर्व पश्चिम की लम्बाई से व उत्तर दक्षिण की जिव्हा से एक मंडल) के १२४ के भाग चर करना. इस मे ३१ भाग उत्तर पूर्व के ईशान कून में ३१ पूर्व दक्षिण अनिकून में ३१ भाग दक्षिण पश्चिमकून में और चौथा ३१ भाग पश्चिम उत्तर वायब्दकूनम इन चार भाममें से दक्षिण पूर्व को चौथा ३१ भाग में २७ भाग लेकर अहान भाग के बीस भाग करना. जिस मे से १८ भाग लकर १९ भाग इसके दो भाग लेकर दक्षिण पश्चिम के नौथे भागको नहीं पहुंचना हुवा चंद्र इन समय उपर चंद्र मध्य में नक्षत्र और नीचे सूर्य रहे. अहो भगवन् ! इम समय चंद्र, किस नक्षत्र साथ योग करता है ? अहो गौतम ! उस समय चंद्र चित्रा नक्षत्र के चरम समय में दोवे. यह चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र का बारहवा पाहुडा संपूर्ण हुवा
छत्र पर छत्र का योग कर
॥ १२ ॥
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4+वावा पाहुडा
३३५
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अर्थ
48 अनुवादक - बालह्मचारी मुनि श्री अमोलक भाषा
॥ त्रयोदश प्राभृतम् ॥
ता कहते चंदेमास वड्डोबड्डी मुहुत्ताणं आहितति वदेज्जा ? ता अट्ठ पंचासिते महत्तसते तीमंच बावट्ठी भागे मुहुत्तस्स आहितेति वदेजा । ता दोसिणा पक्खउण अंधकार पक्खस्स आयमाणा चंदे चत्तारि बेथाली' स मुहु तसए छेतालीसंच बावट्ठी भागे मुहुतरस जावति चंदे रज्जति तं पढमाए पढम भाग वितियाए वितियं भागं जार पन्नरसमे अत्र तेरहवे पहुड़े में चंद्र की वृद्धि अपवृद्धि का कथन करते हैं. अहो मरन् ! चंद्र मासको वृद्धि अवृद्धि कैसे कहीं गौतब ! चंद्र मास की ८८५ हू की वृद्धे अपवृद्ध कढी. चंद्र तिथी २९३ मुहूर्त की है इस को ३० साथी ने गुनग८८५ मुहूर्त की है. इस के दो पक्ष कह हैं - अंधकार पक्ष जिस में अंधकार की वृद्धि और शुक्ल पक्ष जिस में अंधकार की अपवृद्ध (हान), अंधकार पक्ष आसे ४४२ मुहूर्त पर्यत चंद्र राह से रक्त होवे क्योंकि पथ का पक्ष होता है, एक तिथी२९२३ इस का मुहूर्त की है इस मे १५ से गुनना जिम से ४४२मुहूर्त होवे इस को ३० मे भाग देने से १४ दिन होवे इस ने दिन में चंद्र का विमान राहु के विमान से रक्त होवे, प्रथम तीथी में चंद्र के विमान का प्रथम भाग ररुहु के विमान से रक्त होना है, दूसरी तीथी में दो भाग, ते सरी में तीन यावत् पारहवी तीथी में पनरद्द माग चंद्र का विमान राहु के विमान से रक्त होते, और एक भाग विरक्त होवे.
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पाचक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वाला स
38
(
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मंत्र
सम-चंद्र मज्ञ से सूत्र पष्ठ उपाङ्ग 48
पण्णरस भागे चरिम समए चंदे रतं भवति, असे ते विरले नवति य अमावासं त्यणं पहले पकखे अनावासात अंकारेक्रस || || ता दाखिला पकखं अयमाणे चदा चार क्याली महत्तम छ्यालीसंच बाबी मांगे महत्तस्म जावति चंदे विरजति जहा-पटनाए पदम मार्ग जान परसमे पञ्णरसमं भागं चरम समए बंद विरत सर्वात अबसेस समय विरतय भवति ॥ अयनं पुण्णमासिणी तत्वणं देणं ॥२॥ तत्थखलु इमाओबादी पुणमाती चंद्र का विमान कर ये भ ग है, इसमें प्रत्येक थी में चार २ मा का आवरण होवे इस तरह पन्नी तिथि में भाग का आवरण हवे और दो भाग अनावृत रहे. चंद्र विमान सूर्य विमानसाथ चलता है हल से अमावास्या को चंद्र का मान मनुष्य कीटावर में नहीं आता है. इस के चरम समय मे चंद्र विरक्त होने पर कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से अमावास्या पर्यंत होता है. इस तरह अमावास्या { पर्यंत अंधकार पक्ष जानना || १ || अब दूसरा शुक्ल पक्ष आने से चंद्र ४४२ विरक्त होने, प्रथम तिथि को प्रथम भाग, दूसरी तिथि का दो भाग यावत नवी तिथि को पन हवा भाग राहु के विमान सेवक होते, चरम समय में चंद्र संपूर्ण विरक्त होने, फीर चंद्र विरक्त से रक्तवो यह शु सेदी १५ तक होते. इस तरह युग में दो पर्व, एक कृष्ण पक्ष की अमावास्या व एक शुक्ल पक्ष की
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44 पहा +4+
३३७
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अनवादक-चालब्रह्मचारी मुनि श्री अमालक पिजी +
घावटी अमावासातो पण्णत्ताओ, बावट्ठी एए कसिणारागा बावट्ठी एए कमिणा विरागा, एए चउम्बीसेपयंसते कसिण रागविराग जाव तिताणं पंचण्हं संबच्छराणं समया एएणं च उव्वीसेणं सएणं ऊगगात कत्तियाणं परित्ता असंखेज्जा सया भवइ देस रागविराग तिमक्खायं. ता अमावासातो पुणमासिणि चत्तालीम बयालीस मुहुत्तसए छयालिस च बावट्ठी भाग मुहु त्तस्स्स आहितेति वदेज्जा ॥ ता अमावासातोण अमावासा अट्ठ पंचासिते मुहुत्तसए तीसचं बावट्ठी भागं मुहुत्तस्म आहितति वदेजा ॥ ता पुण.
•प्रकशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वाला प्रसादजी.
पूर्णमा का होचे ॥२॥ इस तरह ए युग में ६२ अमावास्या ६२ पूर्णिमा कही हैं. ६२ अमावास्थाओं में एक के अंतर से राहु के विमान से चंद्र विरक्त होवे. और बासठ पूर्णिया में एक के अंतर से राहु के विमान से चंद्र विरक्त होणे. यो १२४ वर्ष एक युग में होवे. इन १२४ पर्व में किसी स्थान रक्त व किसी स्थान विरक्त होने पवन इन पांच संत्सर के जितने ममप हैं उन में एक पक्ष के एक २ममय के हिमाब१२४ रमय होवे,आंख मचकर खोलने में जो ममय लगता है वह लीया है. और जिस समय का दो। विभाग होरेएम अमंख्यान समय हो. इन में से अर्ध चंद्र का विमान राहु विपान की साथ रक्त होवे और अर्थ राह विमान से रिक्त होये. एना अांत ज्ञानीन कहा है. सा अंगीकार करना. इस में संशय करना
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- 4ks+
+
Line-he TBER 20-
मासिणितोणं अमावासं चत्तारि व पालीस मुह त सते तंचेर, ता पुष्णमासितोणं पु" मासिणि अट्ठ पंचासिते मुहुत्तस ते तीसंच वावट्ठी भागे मुहुत्ता आहितेति एमणं पति : चंदमासे, एमण पवते साले जुगे ॥ ३ ॥ ता चंदणं अद्धमासेणं चंदे कति मंडलाइं चरति ? ता चउदस चउभागा मंडल तिं चरति एग चउवासं सत भागं
मंडलस्स ॥ ता आइवेणं अहमासेणं चंदे कति मंडल इ चरइ ? ता सोलस मंडलाई - नहीं. एक अमावास्या से पूर्णिमा तक ४४२, मुहूर्त होते हैं, और अपावास्या से अपावास्या पर्यंत १८८५ मुहू होते हैं. पूर्णिमा मे अपावास्या पर्यंत ४४२ को और पूर्णिमा से पूर्णिमा तक,
म कहे हैं, यही पर्व में चंद्र मास कहा, और यही एक युग में १२४ पर्व कई हैं ॥३॥ अहो भगवन् ! अर्थ चंद्र मास में चंद्र कितने मंडल चलता है ? अहो गौतम ! अर्ध चंद्र पास में १४ मंडल और पन्नर हवा मंडल का चतुर्थ भाग पर एक मंडल के १२४ भाग करे वैमा एक भाग 4 इतना चलता है, क्यों कि एक युग में चंद्र १७६८ मंडल चलता है. एक युग के अर्ध चंद्र मास
हैं. इस से १७६८ को १२४ का भाग देने से १५ पंडल आये शेष ३२ भाग १२४ के रहे. इस ३१ भाग के पाच मंडल और शेष । रहा. अर्थत् १४३३ मंडल चलता है. अहो भगान् !
मूर्य मास में चंद्र किनने मंडल चलता है ? अहो गौतम ! अर्ध सू पास में चंद्र १६ मंडल
+ बारहबा हुडा
१
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14. चरति ता. पक्खत्ता अदमासणं. चंदे । कतिः मंडलाई चरति ता तेरस है मंडलाई चरंति. तेरस सत्तमट्टी भाग मंडलस्स ॥ ४ ॥ तदा अवराति खलु
दुव अट्ट भागाति जाति चंदे केणइ आसाम गाति सयमेव पइट्ठिया चार चरति ॥ कयरा खलु ताई दुवे अट्ठभागाइं जाति चंदे केणनि जाव पविलित्ता
चारं चरति ता इमतिं दुबे अट्ठभागाउ जाति चदे केणइ अमामण्णगाई चार चरति चलता है. - अहो भगान् ! नक्षत्र के अर्थ मास में चंद्र किनने मंडल चलता है ? अहो गौतम : १३ मंडल चंद्र चलता है क्योंकि एक यु। में चंद्र १७६ अंडर चलता है और नक्षत्र के अर्ध पास १३४ हैं। इम मे १७६८ को १३४ का भाग देने से इतने होते हैं ॥ ४ ॥ उस मम: अभ्य दो ८ भाग ३१ ये हैं कि जिस को अमामान्यपग मे सायपरमोश कर चंद्र चाल चलता है. अहो गवन् ! वेदो ८ भाग ३१. ये कौनसे हैं जिम को प्रवेश कर चंद्र च चलना हैं ? अहं गतम! यहां दो आठ भाग अर्थात्
- यहां सोलह मंडल का पाठ प्रायः 'दृष्टीगोचर होता है, परंतु यह अशुद्ध मालुम होता है. क्यों कि एक युग में चंद्र १७६८ मंडल चलता है और एक युग में सूर्य अर्ध स.२० है. इस से १७६८ को १२० का भाग देने से १४ मडल होते हैं. और यह पाठ सूर्य मंडल पर भी सकता है क्यों कि एक युग में सूर्य मंडल १८३० हैं और सूर्य अर्थ मास १२० है इस से १५ मंडल पूण करंक सोलहये मड़ल पर चाल चलता है. तत्व केवली गम्य,
4. अनुवादक बालबचारी मुनि श्री अमा.पाजा
. काशक गजामहादरलाला मुम्वदेवमहायजा ज्वालामा
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तं निक्खममाणे चेव अमावासाणं तेणं पविसमाणे चेत्र पुण्णमासएणं,एतातिं खलु जाव - चार चरति ॥ ५ ॥ ता खत्ते अदमासेणं केवइ मंडलस्स चारं चरतिता पढमाय
जागते चदे दाहिणाते सतद्धमंडलाति जातिचंदे दाहिणाए भागाते पविसमाणे चार चरति।। कतरानि खलु ताई सतद्ध मंडलाई ‘जाइ चद द हिणाए भागात पविसमाणे चारं वरति तंजहा बितिए अद्ध मंडले चउते. छट्टअट्टमं दस वारसमे चादममे अह मंडल॥ एतामिखल ताण सत्तद्धमंडलाणि जाति चंदेदाहिणाए भागाए पावसमाणे चारंचरात॥६॥
8
+ समश चंद्र प्रज्ञापत्र षष्ठ उपाऊ4101
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तेरहवा पाहुडा H
सोलद भाग ३१ ये हैं जो अमाया से चंद्र पूर्ण मान मंडल के सोलह भाग में जाकर चाल, चला है. जिन के नामा आनर मंडल पर से निकलना हुवा ( अमावास्या से) और वाह्य मंडल में प्रवेश करता हुया पूर्ण स में. इस तरह दो आठ भाग यावत् चाल चला है ॥५॥ अहो भगवन् । नक्षत्र अर्ध मास में चंद्र कितने मंडल चाल चलता है ? अहो गौतम ! चंद्र की प्रथम अयन - जाते हैं दक्षिण से सात अर्ध मंडल जाकर दक्षिण मार्ग में प्रश करता हुआ चाल चलता है अर्थात् नैऋत्य कून में है से नीकलकर ईशान कृत में जाकर सात अर्ध मंडल स्पर्शता हुवा चाल चलता. अहो भगवन् ! वे सात अर्ध पंडल कौनमे २ हैं कि जो ईशान कून में जाकर स्पर्शना हुवा चाल चलना है ? अहो गौतम ! द्रा अर्थ मंडल, चौथा, छ8', अठवा, दशवा, बारहवा और रौदहवा ये सात अर्थ मंडल ईशान कून में।
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३४२
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
तं पढमायण गते चंदे उतरद्धे भागाए तेपविसमाणे छ अहमंडलातिं तेरससत्तसट्ठि भागाई अह मंडल जातिं चंदे उत्तराते भागाते पविसमाणे चारं चरति, कतिराति खलु ताइ छ अद्ध मंडलातिं तेरस सत्तसट्ठी जाव पाविसमाणे चारं चरति? इमाणि खलु ताई छ अद्धमंडलाइ जाव चारं चरति तंजहा ततिए अद्ध मंडले पंचमे अद्ध मंडले, सत्तमे अहमंडले, एक्कारसमे अद्धमंडले, तेरसम, अद्धमंडले पारसमस अद्धमंडलरस तेर ससत्तसट्ठी भागाति एताणि खलु ताई छ अद्ध मंडलातिं तेरस सत्तसट्ठी भागाति
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
जाते समर्श कर चाल चलते हैं ॥३॥ प्रथम अथन में जाते उत्तरार्ध भाग में प्रवेश करता हुवा अर्थ ईशान कूम से नैऋत्य कून में जाता दुगा चंद्र । अर्थ मंडल १३ भ ग ६७ ये इतना मंडल पलता है. अहो भगवन् ! चे छ अर्थ मंडल व १३ भाग ६७ ये कौनसे २ हैं ? अहो गौतम ! तीमग, पांचवा,.. सातवा, नवमा, इग्य रहवा, तेरहवा ये छ और साहवे मंडल का ६७ या १३ भाग स्पर्श. इस तरह उक्त छ अर्ध मंडल व १७ ये भाग में प्रथम अयन बनता हुवा ईशान कू। मे त्य कून में प्रवेश करना हुवा चाल चलना है. यों यावत् प्रथम १३ नक्षत्र अर्थ माम में चंद्र अयन संपूर्ण हावे. जम्बूद्वीप में दो चंद्र के मंडल हैं जिन में से एक के दक्षिण में नैऋत्य कून में १५ मंडल है और दूसरे के ईशान कून में
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498-
8
सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग + ससदश-चंद्र प्रज्ञप्ति
अद्धमंडलस्स ज तिचंदे उत्तराए भागाए पविसमाणे धारं चरति ॥ एयावत पढमेचंदा यणे समत्तो भवति.॥७॥ ता खत्ते अद्धमासे णो चंदे अहमासे ता चंदेअहमासे जो णक्खत्त अडमासे|ताओ णक्खत्ताओ अद्धमासाओ चेदगं अहमासणं किंमहिंयं चरति? एग अ प्रमंडलं चरति चत्तारि सत्तसट्ठी भागाइं अहमदलस्स सत्तसट्टी भागंच एगतीसाए
छत्ताणंव भागाति॥८॥ता दोच्चायणगत चंदे पुरास्थमाए भागाए निक्खममाणे चउप्पणे १५ मंडल है. इप में नैऋत्य कुन के एकी के मंडल से चंद्र निकले सो ईशान कून के एकी के मंडल स्पर्श, और ईशान कूर के बेकी के मंडल से निकले सो नैऋत्य कून के बेकी के मंडल स्पर्शे ॥ ७॥ नक्षत्र अर्ध मास में चंद्र अर्थ मास होवे नहीं और चंद्र अर्ध मान में नक्षत्र अर्ध मास होये नहीं क्यों कि अर्ध चंद्र मास में नक्षत्र अर्थ मास का समावेश होता है. इस मे नक्षत्र अर्ध मास से चंद्र अर्ध मास बडाईहै. नक्षत्र अर्ध मास में चंद्र अर्ध मास कितना अधिक है ? नक्षत्र अर्ध मास से चंद्र अर्ध मास एक अध मंडल और दूसरे अर्ध मंडल के नार भाग ६७ ये, और ९ भाग चूाणिये ३१ ये अधिक चले ॥ ८ ॥ प्रथम अयन में चंद्र १३ भाग ६७ या चला, इन से ५४ भाग ६७ या शेष रहा. यह प्रथम नक्षत्र अर्धA मास में पन्ना हरे मंडल से जानना. इस तरह दूसरी अयन में गया हुवा चंद्र पूर्व के भाग से निकलकर ५४ भाग ६७ या जावे तब चंद्र अन्य चंद्र मंडल के क्षेत्र में चले. अर्थत् ईशान कून से चंद्र निकलक
तेरहवा पाहुडा 420 48
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३४४
44 अनावदक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषि
सत्तसट्टी भागाति जाति चंदे परत्सचिण्डप डेचरति, तेरस सत्तसट्ठी भागाई जातिंचदे भप्पणो चेत्रविण पडिचरति ता दोच्चायणगते चंदे पचत्थिमाते
भागात निक्खममाणे चउप्पणे जातिचंदे, परस्सचिण्हंपडि घरांति,तेरस भागाति जातिचंदे १३ भाग ६७ या प्रथम अया में जाता हुवा और दूसरी अयन में ५४ भाग ६७ या चलता हुवा ऋत्य कून के पनरहने मंडल पर जाने सो पनरहरा मंडल अध चंद्र का जानना. १३ भाग ६७ या जाते चंद्र अपरा मंडल क्षेत्र में चले अर्थ त् ऋत्य कून के पारवे मंडला से नीकलता हुवा ईशान कून के च उदर व मंडल पर ज ते १३ भाग ६७ यसरः के मंडल के क्षेत्र पर चले इन से ईशान कून के चंद्र के ईशान कून से एकी मंडल और नैऋत्य कून में एक मंडल जानना. दूसरी अगन में गया हुवा
ट्र ५४ भाग ६५ या शेष रहने पर प्रथम अयन संपूर्ण हुए पीछे मरी अयन में रहा हुग पश्चिम के भाग से (ऋत्य कू से चंद्र गफलता हुग ५४ भाग ६७ या अन्य चंद्र मंडल के क्षेत्र में चलता है। अर्थात् नैऋत्य कून में में चंद्र नीकल कर १३ भाग ६७ या प्रथम अयन में चला. और ५४ भाग ६७ या दूर्ग अयन में चलना ईशान कू। में पन्नरह वे मंडल पर पहू 1. यह पन्न हवा मंडल अन्य चंद्र का जाना. यहां १३ भग ६७ या चंद्र अपना क्षत्र में चले, अर्थात् ईशान कुन से नीकलता हवा ऋत्य
के च उदह वे मंडर पर मात १.३ भाग ६७ या स्वतः के क्षेत्र में चले, इस से नैऋत्य कृन के चद्र
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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सूत्र
अर्थ
431+ सरचंद्र मसूत्र - 488+
अपशोचेत्रविणं चिण्हपाडे चरति ॥ ९ ॥ अवराणि खलुताई दुवे तेरस भागाति जाति चंदे केणति असामण्णाति सयमेव पविहिता चारं चरति कतरराणि खलु ताइदुबे तेरस भागति जात्र चरं चरति ? इमाणि खलु दुबे तेरस भागातिं जात्र परिट्टिता चारं चरति तंजा समंतरे चैव मंडले सव्य बाहिरे चत्र मंडळे एतागि खलु नाणि दुबे तेरस भागातिं जातिं चंदे केइ अलामण्णाति सयंमंत्र पविताचारं चरति, एतावता दोचे के नैऋत्य कून में बक मंडल और ईशान कून में एक मंडल जानना ॥ ९ ॥ दूसरे नक्षत्र अर्ध मास में दो तेरह अर्थात् २६ भाग ६७ ये चंद्र असामान्यपा से प्रवेश कर चलना है. अ भगवन् ! यह किस प्रकार दो तेरह भाग स्वयमेत्र प्रवेश कर चंद्र असामान्याता से चलता है ? अहो गौतम ! सत्र से आभ्यंतर मंडल व सब से बाह्य मंडल इस तरह दो तेरह भाग ३७ या स्वयमेव चंद्र प्रवेश कर असामान्य पना से चरता हैं. क्योंकि एक युग में ६७ नक्षत्र मास है, और चंद्र मंडल १७६८ है इस के ६७ का भाग देने से २० मंडल होने शेर २५ भाग ३७ ये रहे इस से एक चंद्र की अपेक्षाने चदहवे मंडल पर चंद्र अयन हे वे शेष १२ मंडळ अनंतर मंडल के २६ भाग ६७ ये जाकर नक्षत्र मास पूर्ण होवे नक्षत्र मास की आदिने चंद्र बाहिर के मंडल से प्रवेश करता हुआ तेरहवे मंडल से नीकल कर चन्द मंडल के २६ भाग ६७ ये में नक्षत्र मास संपूर्ण होवे इस प्रकर दूसरी चंद्र अयन नक्षत्र मालकी अपेक्षासे
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* g* तेरहवा पाहूडा
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चंदायणे समत्ते भवति ॥ १० ॥ ता णक्खत्तमासे णो चंदमासे, चं'मासे, णो । णक्खत्तमासे ता पक्खत्तमासे चंदेणं मासेणं किं महियं चरति ? ता दो अद्धमंडलाइं चरति अट्ठय सत्तसट्ठिभागच अद्ध मंडलस्स सत्तसहि भागं च एकतीसहाछत्ता अट्ठारस भागाई॥११॥ता तच्चायणगते चंद पच्चत्थिमाते भागाते पवि
समाणे बाहिराणंतरस्स पच्चस्थिमिलस्स अद्ध मंडलम एकत्त लीसंच सत्तमट्ठीभागार्ति मंपूर्ण हो ॥१०॥ यहां नक्षत्र माम में चंद्र मास हवे नहीं और चंद्र म.स में नक्षत्र माम नहीं होगे, क्यों कि चंद्र पास मे नक्षत्र म स छोट है. यहां गौतम स्व.मो प्रश्र करते हैं कि अहो भावन् ! नक्षत्र माम स चंद्र पाम कितना अधिक चलता है? अहो गौतम! नक्षत्र मास से चंद्र मास दो अर्ध मंड-२८भ ग६७ या १८ चूराणये भाग २१बे अधिक चलन है॥११॥ नक्षत्र की तसरी अय रम गयाहा पश्चिभाग अर्थ न् नैऋत्यकास नीकल कर ईशानकूट में प्रवेश करता हुवरि के अनंतर पश्चिम के अर्ध मंडल का ४१ भाग ६२ या अपन व अन्य के क्षेत्र पर चलता है. १३ भाग ६७ या यह क्षेत्र चलना है. तेरह भाग ६. ये जात अपना व अन्य का क्षेत्र चलता है. इस ताह वाहिर के पश्चिम भाग से प्रवेश करता हुना अर्थ पंड पर
४. भाग ३७ ये में अर्ध मंडल संपूर्ण होवे. यहां जा क्षेत्र कह उI का यह कान: कि एको डर से 1दा की मंटल तक ४१ भाग ६५ या चलता है. वही मंडल का अपने नवं आंक में कहा हुवा है. इस सेना
, अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिर्ज
• पकाशक राजाबहादुर लाला मुखदवसायजी ज्वालाप्रसादजी ।
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षष्ठ उपाङ्ग
सप्तदश चंद्र प्राप्ति
जतिचंदे अप्पणीय परस्म चिणं पडिचरति तेरस सतसट्टी भागाति परस्स चिण्णं पडिचरइ ।। तेरस सतसट्टि भागाति जतिं चंदे अप्पोय परस्सचिण्णं पडिचरइ, एतावताबाहिरणंतरे पच्चथिमिल्ले अद्धमंडल एकतालीस सत्तट्ठी समते भवति, ॥ १२ ॥ ता
तच्चायणगते चंदे पुरथिमाते भागाते पविसमाणे वाहिरतस्स पुरथिमिल्लस्स अद्ध अपने मंडरपर चलता है. परंतु यहां अपना व अन्य का दोनों का कहा इम का कारण यह है कि एक मंडल १३४ भाग का है. इस में ६७ भाग में दो सूर्य व ६७ भाग में दो चंद्र इस तरह संपूर्ण मंडल के E क्षेत्र का विभाग करना. इस से एक २ विभाग ३३॥ का भाता है. परंतु ४१ भाग ६७ या चलकर ईशान कून में पाये इ-में से २४ भाग वायव्यकूनमें सूर्यका क्षेत्र स्पर्श यह पर क्षेत्र और १५॥ क्षेत्र ईशान " कून में चंद्र का साथै यह अपना क्षेत्र जानना. क्यों कि बेकी मंडल स्वनः का है. इस से १३ भाग परक्षेत्र और १५॥ भाग अपना क्षेत्र है. परंतु पाठ तेरह कहा है यह क्यों कहा होगा. सो, कारी गम र जा: ३ भाग अपना व पर का क्षेत्र कहा है उस में ॥ भाग अपना क्षेत्र और ९॥ भ अशकून मूर्यका परक्षेत्र हवे एमा संभव है तत्व केवी गम्य ॥१२॥ उम नक्षत्रकी तीसरी अयण है
हवा के अर्थ न ईशन कून में से नीकलकर नैऋत्य कुन में प्रवेश करता हुवा वाहिर के अंतर माश करता हुवा अर्थ मंडल के ४१ भाग ६७ ये जाते अपन। व अन्य का क्षेत्र पर चलता है. १३३ .
रहवा पाहुडा +8+
+8
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मंडलरस एकतालिस सत्तसट्ठीभागाति जाति चंदे अप्पोय परस्सय विगं पडिचरति,तेरस
भागाति,जातिचंदे पररसचिण्णं पडिचरति तेरस्स सत्तसट्रीभागाति जातिं चंदे अ- १ प्पणीय परस्सचिण्णं पडिचरति । एतावता बाहिरेतच्च पुरथिमिल्ले अद्धमंडले एकतालीसं
सत्तमट्रीभागेति समत्ते भवति ॥१३॥ तातचायणगते चंदे पचत्थिमाते भागाए पवि. भाग ६७ य जाते पर क्षत्रपर चलता है. और मे १३ भाग ६७ ये अपना वपर का क्षेत्र पर चलता है
इस तरह वाहिर के अंतर से पूर्व भाग में प्रवेश करता हुवा अर्ध मंडल भाग ६७ ये में संपूर्ण होवे. यह g ठ पर से अर्थ होता हैं. परंतु यहाँ क्षेत्र कहा उस का कारन यह हैं कि एकी मंडल से नीकलकर बकी
मंडलपर ४१ भाग ६७ या चले तब बेकी मंडल का अपने नवये आंक में कहा है. उस स अपने मंडलपर चरता है परंतु यहां अपना व पर का दोनों का कहा इम का कारन यह है कि
संपूर्ण महल ११ भाग का है. इस के ६५ भाग दो सूर्य के और ६७ भाग दो चंद्र के यों प्रत्येक भाग F३३॥ का हुवा. परंतु ४१ भाग ६७ ण चलकर नैऋत्यकून के मंडल पर भावे जिम में ४१ भाग
अग्र कून के क्षेत्र का समर्श सा पर क्षेत्र जना और १॥ भाग 'ऋपकून में चंद्र का क्षेत्र स्पर्श से अपना क्षेत्र जानना. परंतु पाठ में अन्य का ( पर)कहा सो क्यों कहा होगा यह
केवल. गम्य है. और तेरह भाग अपना. व पर का कहा जिसमें भाग अपना क्षेत्र सर्श और 1 । भाग वायव्य कुन में मूर्य का क्षेत्र पर्श यह होना चाहिये. तत्व केवली गम्यः ॥ १३ ॥ अब चने की
4. अनुवादक-चालन नवरी माने श्री अमालक ऋषिम
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदर महायजी आलाप्रसाद जी.
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Fo
अर्थ
44+41+
समा बाहिर चउदस्त पच्चत्थिमिलस्स अडमंडलस्स च उतीसं तत्तसी भागाति सत्तसट्ठी भागव एकतीसहछता अट्ठारस भागाति जाति चंदे अप्पणो परस्सचिण्णं पडि
तीसरी अयन में गया हुवा, पश्चिम भाग में प्रवेश करता हुवा, बाहिर के पनरडवे मंडल से चउदहवे मंडल पश्चिम के अर्धमंडल के १४ भाग ३७ ये और १७ चुरणिये भाग ३१ ये चंद्र अपने मंडल पर देव परके मंडल पर चलता है. अर्थात् १६ ॥ भाग ६७ ये ईशान कौन के अपना क्षेत्र चलकर १७| (भाग ६७ या और १८ बूर भाग ३५ ये अ. मे कून के सूर्य का पर क्षेत्र चलता है. इस तरह बाहिर से चडदवा नैऋत्य कून के अर्ध मंडलपर एक चंद्रमस संपूर्ण हुवा, क्योंकि चंद्र मास ६२ है और चंद्र के अर्ध मंडल १७३८ है. १७६८ को ६२ का भाग देने से २८ अर्ध मंडल आये और ३२ भाग ६२ या रहा. इस के ६७ ये भाग करने को ३२ को ६७ से गुणा करना जिस से २१४४ हुत्रे. इस को ३२ का भाग देने से ३४ भाग ६७ या और शेष ३३ रहे इस के ३१ के भाग करने को ३१ से गुनना जिस से १९१६ हांवे, इस को ६२ से भाग देने से १८भाग ३५ ये हुवे. इस तरह एक चंद्र पास १२८ अर्ध मंडल ३४ भाग ६७ ये और १८ चूरणीये भाग ३१ ये चलता है. इस से १४ वे मंडल पर एक अग्रन संपूर्ण होवे और २८ मंडलपर दो चंद्र अपन संपूर्ण होवे. और तीसरी अपन में पन मंडल
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49* 43+ तेरहवा पाहुडा 48*42+
३४९.
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सूत्र
अर्थ
4 अनुादक बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
भाग
चरंति, एतावता वाहिर चउदसे पच्चत्थिमिले अडमंडले समत्ते भवति ॥ १४ ॥ एवं खलु चंदेणं मासेणं चंदे परस्सं चउप्पण्णाई दुवे सत्तसट्टी भागाई चंदे अप्पणोचणं पडिचरति, तेरस सससट्टी भागाई जाति चंदे, अप्पणो देव परस्सचिणं पडिचरइ बेतालीसं से प्रवेश करते चउदये मंडलपर ३४ भाग ६७ या १८ चुरणिये भाग ३९ या चले उतने में चंद्र मास संपूर्ण होवे ॥ १४ ॥ यों एक चंद्र मास में चंद्रा एक नक्षत्र व दो अर्ध मंडल और तीसरे अर्ध मंडल के ८ ६७ ये १८ भाग ६४ ये इतना चलता हैं. यह कौन से २ क्षेत्र में संपूर्ण करे ? यह नक्षत्र मास संपूर्ण होते व चंद्र नीकलते चउदहवे अर्ध मंडल के २६ भाग ६७ या ( आकर नक्षत्र संपूर्ण कर. क्यों कि एक युग में नक्षत्र मास ६७ हैं और १७६८ अर्धमंडल चंद्र के हैं. १७६८ को ६५ से भाग देने २६ अर्व मंडल आत्रे शेष २६ भाग ६७ ये रहे. एक नक्षत्र २६ मंडल है, और २७ वे अर्ध मंडल में २३ भाग ६७ या चंद्र चलकर नक्षत्र मास संपूर्ण करे. इस से एक अयन के १४ अर्थ डल निकालने दूसरी अयन के १२ अर्ध मंडल २३ भाग ३७ या चले. परंतु पहिले ९४ वे अर्थ मंडल पर २३ भाग ३७ या कहा है उस का क्या कारन ? दूसरी अय का दूसर अर्ध मंडल से प्रारंभ होता है. इस मे तेरवे अर्ध मंडल में एक मिलाने से १४ वा अर्थ मंडल के २६ भाग ६७ ये मे एक नक्षत्र मास संपूर्ण हवा, तत्पश्चात् १४२ भाग ६७ ये १८ भाग ६१ या चलकर चंद्र मास पूर्ण हावे. १०८ भाग ६७ या परक्षेत्र से व अपना क्षेत्र में चंद्र चाल चलता है क्यार्क ईशान कून मे से नीकलता हुवा चंद्र १४ वे अर्ध मंडल पर २४| भाग ६७ या अग्निकून में
मास
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• प्रकाशक- राजा बहादुर लाला सुखदेव महायजी ज्वालाप्रसादाजी
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- सनदश-चंद्र प्रज्ञप्ती सूत्रपट-उपाङ्ग 4
भागाति,अहासत्तसट्ठीभागाइ सत्तसट्टभि गंच एकतीसह छत्ता अट्ठारस भागति जाति चंद अप्पणोय परस्सचिपडिचरति,अवराति खलु दुवेतेरस भागाति जाइ चंदे,के गति
असामाणाति सयमेव पविदिता चार चरतिइन्चेला चंद लास्यायामनिव? अणुब ट्ठिय । सूर्य का क्षेत्र चले और १६॥ मा ६१ या अपना क्षेत्र चलकर चावा अर्थ मंडल संपूर्ण करे नत्पश्चात् पन्नाचे अर्थमंड पर चमे १३॥ भाग अपना क्षेत्र चोर भाग ६७ या वायव्य कून में मर्य के क्षेत्र में चले. १६॥ भाग३१ या ईशान कून में नंद क क्षेत्र प्रति चले और पन्नरहवा अर्ध मंडल ईशान कून मे संपूर्ण करे. पही नैऋत्य कून मे नीकलना हया चंद्र चउदहवे अर्ध मंडल पर २४ भाग १६७ या वायव्य जून में सूर्य क्षेत्र चलकर व १६॥ भाग ६७ या ईशान कून में अपना क्षेत्र चलकर ईशान कनमें चउदहवा अर्थ महल संपूर्ण करे, तत्पश्चात् पनाह वे अर्थ मंडल पर चलते १६॥ भाग ६७ या ईशान कून में अपना क्षेत्र चले और ३३॥ भाग ६७ या अमिकून में पर क्षेत्र चले और १६॥ भाग पर क्षेत्र चलकर पन्नर हा अर्ध मंडल संपूर्ण करे. १३ भाग ६७ या चंद्र अपना १४ वा अर्ध मंडल में प्रवेश कर पर क्षेत्र में चले. यों नैऋत्य कून से निकल कर चंद्र नैऋत्य कून में १३ भाग ६७ या पर क्षेत्र चले और ईशान कून में निकलकर ईशान कून में १३ भाग ६७ या पर क्षेत्र चले. बियालीस भाग का अर्थ एकवीस भाग ६७ या और १८ भाग ३१ या चलते चंद्र अपने १४ वे अर्ध मंडल पर जाते पर क्षेत्र पर चलकर चंद्र मास पूर्ण करे. ईशान कून से निकलता चंद्र ३॥ भाग २७ था ईशान कून के
तरहवा पाहुडा 48488
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संठाणं सांठति विउबणमिट्टिपत्तेसुवि. चंदेदेवे २ आहितेति बदेजा ॥ इति तेरसमं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १३॥ . . * * * *
अनुवादक-चालनमचारी मुनि श्री अमोलक पनी
इचंद्र का पर क्षेत्र चलकर १७ भाग ६७ या १८ भाग ३१ ये अग्नि कून में मर्य का पर क्षेत्र चलकर वंद्र मास पूर्ण करे. और नैऋत्य कून से निकलता चंद्र ३॥ भाग ६७ या नैऋत्य कून में चंद्र का पर क्षत्र व १७ भाग ६७ या १८ भाग ६१ या वायव्य कुन के सूर्य का पर क्षेत्र चलकर चंद्र मास पूर्ण करे. दूसरी वक्त २६ भाग ६७ ये नाता हुवा चंद्र १४ वे मंडल इस प्रकार स्वयमेव प्रवेश कर चाल चलकर नक्षत्र मास संपूर्ण करे. इस प्रकार चंद्र मास में गमन की वृद्धि अनवस्थितपना से जानना. के विमान व मंडल के संस्थान कैसे प चंद्र के देवता की स्थिति कैसी है ? चंद्र का देव विकुर्वणा ग्रहण करता हुवा प्रसता है. यों तेरहवा पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ १३॥
०.प्रकाशक-राजाहादुर लाला मुखदेवसहायजी वाला
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to
414 सदश चंद्र प्रज्ञपि-पत्र षष्ठ-उपाङ्ग 438
॥ चर्तुदश प्राभृतम् ॥ ता कहते दोसिशा पक्खाओ बाहु आहितेति वदेजा?ता दाक्षिणा पक्खेणं दोसिणा बहु आहितति वदेजा ? ता कहते दोसिणा पक्खे दोसिणा वह आहितेति वदेजा ता अधकार पक्खाओ दोसिणा पक्ख दोसिणा बहु आहितति वदेना ॥ १ ॥ ता कहते ता अंधकार पक्खाओ दोसिणा पक्खे दोसिण। बहु आहितेति वंदजा ॥ ता अंधकार पक्रवाओण दोलिणा पक्खे अयमाणे चंदे चत्तारिययाल महत्तसएछेताल संच वावटी भागे मुहुत्तरस जाय चंदे विरजति तपढमाए पढमं भाग जाव पारस गुपण्णरसमं भाग।।
चउदहया पाहा कहते हैं. अहो भगवन् ! दूसरा शुक्ल पक्ष कैसे कहा है ? अहो गौतम ! शुक्ल पक्ष त बहुन कहा है. अहो भगान् ! दुसरे शुक्ल पक्ष में उद्यात हुन किस प्रकारकहा? अहो गौतम , कृष्ण पक्ष पीछे शुक्ल पक्ष आनेसे अर्थात कृष्ण पक्ष की अपेक्षा में उद्यात विशेष कहा ॥१॥ अहो भगवन् ! अंधकार पक्ष से उद्योत पक्ष के मुहूर्त कैसे कहे ? अर्थात प्रतिदिन उद्योत की वृद्धि कैसे कही? अहो गौतर ! अंधकार पक्ष मे जब उद्योस पक्ष आता है तब चंद्र ४४२% मुहूर्त पर्यंत राहु के विमान से विरक्त होते. इम में पहिले दिन एक भाग यावत् एअरहवे दिन पनरह भाग राहु के विमान से विरक्त होकर वद्धि होने. इस तरह कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष के कहे और इसी से प्रति
18+ +30+ चौदहवा पाहुडा 4234
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लू
अर्थ
अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषि
• एवं खलु अंधकार पक्खाओ दोसिणा पक्खे मुहुत्तेगं दोसिणा बहु आहितेति बदेज ॥ २ ॥ ता केवतियाणं दांसिणा पक्खरसपारत्ता दोसिणा आहितेति वदेजा? ता परित्ता असंखज्ज भागा ॥ ३ ॥ ता कहते अंधकाराबहु आहितेति वदेज्जा ? ता अंधकार पक्खे अंधकार वहु आहितति वजा ? ता कह अंधकार पक्खे अंधकार बहु आहितेति वदेजा ? ता दोसिणा पक्खातोणं अंधकार पत्रखं अंधकार वहु आहितेति वदेज्जा ॥ ४ ॥ ता कहते दोसिणा पक्खाओणं मुहुत्तेणं अंधकार अंधकार बहु आहितेति वदेज्जा ? ता दोसिणा पक्खातो अंधकार पक्खं अयमाणे चंदे चत्तारि वयालीस मुहुत्त सए छयालीसंच बावट्ठी (दिन उद्योत की वृद्धि कही || २ || अहो भगवन् ! शुक्ल पक्ष के कितने समय कहे हैं ? अहो गौतम ! शुक्ल पक्ष के असंख्यात समय कहे हैं, तथापि शुक्ल पक्ष के असंख्यान भाग कहे हैं ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! { अंधकार बहुत कैसे कहा ? अहां गौतम ! अंधकार पक्ष में अंधकार बहुत कहा. अहो भगवन् ! अंधकार पक्ष में अंधकार बहुत कैसे कहा ? अहो गौतम ! उद्योत पक्ष के अंतर से अंधकार इप से अंधकार पक्ष में अंधकार बहुत कहा है ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! उद्योत पक्ष से | अंधकार कितने मुहूर्त का कहा ? अहो गौतम ! उद्योत पक्ष से अंधकार पक्ष
पक्ष आता है.
अंधकार पक्ष का मुहूर्त का अंध
४४२
● प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादी •
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•
aakir समदश चंद्र प्रवप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग +8+
भागा मुहुत्तरस जाति चंदे रज्जति तं पढमाते पढम भागंजाव पण्णरसेसु पण्णरसम भागं॥ एवं खलु दोसिणा पक्खातो अंधकार पक्खे अंधकार बहु आहितेति वदेजा ॥ ५ ॥ ता केवतियाणं अंधकार पक्खे परित्ता अंधकारे आहितति वदेज्जा ? ता परित्ता असं
खज्जा ॥ इति चोइसमं पाहुडं सम्मत्तं ॥ १४ ॥ * * * कार कहा है. अर्थात् इतने मुहूर्त पर्यंत चंद्र राहु के विमान से आवरण घाला होवे. प्रथम तिार्थ में प्रथम भाग यावत् पनरहबी तिथि में पनरहवा भाग ।। ५ ॥ अहो भगवन् ! अंधकार पक्ष के कितने समय में कहे हैं ? अहो गौतम ! अंधकार पक्ष के असंख्यात समय कहे हैं अर्थात् अंधकार पक्ष के असंख्यात भाग होते हैं. यह चउदवा पाहुडा संपूर्ण हुवा ॥ १४ ॥
+4887 चउदडवा पाहुडा 488488
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सूत्र
अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
॥ पञ्चदश प्राभृतम् ॥ ता कहते सिग्ध वत्थु आहितेति वदेजा ? ता एएमिणं चंदिमसूरियगहगणणक्खत्त तारारुवाणं चंदहिंतो सूरा सिग्धगति सूरेहिंतो गहासिग्घगति, गाहिंतो नक्खता सिग्धगति, णक्खतेहिंतो तारासिग्धगती ॥ सव्व अप्पगतीणं चंदो, सव्त्र सिग्घगतीण तारा ॥ १ ॥ ता एगमेगेणं मुहुत्तेगं चंदे केवइयाई भाग सयाइ गच्छति ? ता जं
चत्रे पाहुडे में अंधकार व उद्योत का कथन किया. अब पनहत्रे पाहुडे में चंद्र आदि नक्षत्र की (शीघ्रता व मंदता कहते हैं. अहो भगवन् ! जो पांच प्रकार के ज्योतिषी हैं, उन में से शीघ्रगति किम की है ? अहो गौतम ! चंद्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र व तारे इन पांच प्रकार के ज्योतिषियों में चंद्र से सूर्य की शनि है, सूर्य से ग्रह की शीघ्रग ते है, ग्रह से नक्षत्र की शघ्रगति है, और नक्षत्र मे ताराओं की शीघ्रगति है. सब से मंद गति चंद्र की सत्र मे घ्रिगति ताराओं की है ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! एक २ मुहूर्त में चंद्र कितना भाग चलता है ? अहो गौतम ! चंद्र जिम २ मंडल पर चलता है उस २ मंडल का १०२८०० भाग करना जिस में के १७६८ भाग एक मुहूर्त में चलता है. एक युग में चंद्र करना मंडल करे ? युग की १८३० अहोरात्र हैं इस के मुहूर्त करने को ३० से गुना करने से
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५ . शक राजा बहादुर बाला सुखदेवसहायजी ज्याला प्रमादजी ०
३५६
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मंडलं उवसंकमित्ता चार चरनि, हा तस्स मंडलस्स परिक्खेवस्स सरस्म अट्रसट्री ___भागसयाति गच्छत मंडलं सतसहस्मणं अट्राण उतिएय सएह छेत्ता ॥२॥ता एग- १
मेगेणं महत्तेणं मरे केवतियाति भागंसयाई गच्छति? ताजंज मंडलं उवसंकमित्ता चारं १५४९०० होवे. यह ५४९०० को १७६८ स गुनते ९७०६३२०० भाग हावे. इम भाग को १०९८०० से हभाग दने से ८८४ मंडल होबे. इस से दो चंद्र मिलकर एक युग में ८८४ मंडल चले. इम के अर्ध मंडल
१७६८ होते हैं. १८३० दिन में १७२८ अर्ध मंडल होवे तो दो अर्ध मंडल में कितने दिन होवे ? १८३० को दुगुना करने से ३६६० होवे इस को १७६८ का भाग देने दो आये शेष १२४ रहे इसके
मुहूर्न करन को ३० से गुणना जिस से ३७२० होवे. इस को १७६८ का भाग देने से दो मुहूर्न आये#शेष १८४ रहे इस के २२१ के भाग करने को २२१ से गुगना जिम से ४.९६४ हो इस के १७३८ कामी
भाग देन से २३ भाग २२१ ये हो. इम से दो अर्ध मंडल चलन में चंद्र को दो दिन दो मुहूर्त व २३१ भाग २२१ ये लगे. ॥२॥ अहो भगवन् ! एक २ भाग में सूर्य कितने मो भाग चलता है ? अहो गौतम! जिस २ मंडलप सर्य चलता है उस २ मंडल की परिधि को १०९८०. भाग करे उस में से १८३० भाग एक मुहूर्त में चलता हैं. इस तरह मूर्य एक युग में किसने मंडल करता है ? एक युग में १८३० अहो रात्रि है इस के मुहूर्त करने को को १८३० को ३० गुना करने से ५४५०० होवे इम के १८३० भाग से गुनने से १००४६७००० भाग होवे. इस को मंडल के १०९८०० से भान
श चंद्र प्रज्ञाप्त सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 448
2. पनरहवा पाहुडा 4189425
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अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजीक
चरति ता तस्स मंडलस्त परिक्खेवस्स अट्ठारसतीसे भागे सते गच्छति मंडले सयसहस्सेणं अट्ठाणउति - एयसएहिं छेत्ता ॥ ३ ॥ ता एगमेगेणं
गंणक्खत्तेणं केवतियाति भागा सयातिं गच्छति ता जंजमंडल उवसंकमित्ता चार देने से ९१५ मंडल दो सूर्य एक युग में करते है. इस तरह अर्ध पंडल १८३० होवे, एक युग में ११८३० अर्ध मंडल होवे, तो दो अर्ध मंडल कितने दिन में होवे ? १८३० को दुगन करने से ३६६० हो। इस को १८३० का भाग देने से दो दिन होवे शेष कुच्छ रहे नहीं, इससे दो दिन में दो अर्ध मंडल सूर्य चलता है.॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! एक २ मुहुर्न में नक्षत्र कितः सो माग चलता है ? अहो गौतम ! नक्षत्र जिन २ मंडल पर चलते है उन २ मंडल के १००८०० भाग में से १८३५ भाग एक महून में चलते
इस तरह चलने से एक युग में कितने मंडल चले ? एक युग में १८३० अहोर त्रि है. इस के मुहूर्त करने को १३० से. गुनना जिस से ५४९०० होवे. इस मुहर्त को १८३५ के भाग से गुनते १०.७४१५०० भाग होते. इम के मंडल करने के लिये १०९८०० से भाग देना जिस से ९१७॥ मंडल होवे शेष कुच्छ रहे नहीं इतना दो नक्षत्र चले. इस के अर्ध मंडल करने को उक्त संख्या को दुगुना करना जिस मे १८३५ अध मंडल होवे. उक्त १८३५ अर्ध मंडल १८३० दिन में होघे अब दो अर्ध मंडल कितने दिन में चले साब कहते हैं. १८३० को दुगुने करने से ३६६० हुवे, इस को १८३५ का भाग देने से एक दिन व शेष
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सूखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनं ०
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4
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। ८८४
Arch
चरति तस्स मंड| एक महून एक युग में !
एक युग में एक मंपूर्ण मंडल लस्स परिक्खेवरस कितने भाग कितने मंडल
अर्ध मंडल अथवा दो अर्ध मडलं. संपूर्ण कर
अट्ठारस पण्णता में कितना समय होवे. दिन।मु०। मु.के भाग
भागसते गच्छति १७६८
मंडलं सतसह
स्सेणं अट्ठा जाव - छत्ता ॥४॥ता
जयाणं चंदे मति समावण्णगं; सूरे गति समावण्णगं भवइ सेणं गइ विसेसेति मायाए केवइया विसे - सेति ? ता बावट्ठी भागे विससेइ । ता जयाणं चंदे गइ समावण्णा पक्वत्ते गइ ११८२५ रहा. इस के मुहू करने को ३० से गुनेन से ५४७५ ० होवे इस को १८३५ का भाग देने से १२१ महू व शेष १५३५ रहे, इस के ३६७ ये भाग करने को ३६७ से गुनने से ५६३३४५ होवे, इस को
११८३५ का भाग देने मे ३०७ भाग हुवे, शेष कुच्छ नहीं रहा. इस तरह दो अर्ध मंडल नक्षत्र एक दिन 15२१ मुहूर्त व ३०७ भाग६७या में पूर्ण करे. इसका उक्त यंत्र है.॥४॥अहो भगवन्! अब चंद्र मुहूर्न के चरिमांतमें
be- BERBER 4
पभर हवा पाहुड Bitti
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42 अनुवादकालाचारीमुनि श्री अपेक ऋि
समावणे भइ सेणं गइमायाए केवइयं विंसेसेइ ता सससट्टी भागे विसेसे ता जयाणं सूरे गइ समावण्णे भवइ णक्खत्ते गइ समावणे मंत्रइ सेणं गति समायाए केवइय विसेसेइ ? ता पंच भागा विसेसेइ ॥ ५ ॥ ता जयाणं चंदे गति समावण्णग अभिइ नक्खत्तें गइ समबान्नग पुरत्थिमताए भागाए समासेति ता जत्र मुहुते गति संपूर्ण करे तब सूर्य भी मुहूर्त के चरमान में गति संपूर्ण करे. इन दोनों में सूर्य की गति में मर्यादा से क्या विशेषपना है. अर्थात् चंद्र से सूर्य एक मुहूर्त में कितना अधिक चलता है ? अहो गौतम ! मुहूर्त के चरम समय में चंद्र मे सूर्य एक मंडल के १०९८०० भाग में से ६२ भाग आगे चले इतना सूर्य का विषय अधिक कहा. अहो भगवन् ! चंद्र एक मुहूर्त में गति संपूर्ण करें, वैसे ही दशत्र एक मुहूर्त में गति संपूर्ण करे तो इस में चंद्र से नक्षत्र कितना भाग आगे चले ? अहो गौतम ! क मुहूर्त के चरम समय में चंद्र से नक्षत्र एक मंडल के १०९८०० भाग में के ६७ भाग अधिक अग चल. इतना विषय नक्षत्र का जानना. अहो भगवन् ! जैसे सूर्य एक मुहूर्त में गति संपूर्ण करता से ही नक्षत्र एक मुहूर्त में गति संपूर्ण करता है. इस तरह गति संपूर्ण करने में क्या विशेषता है ? अर्थात् कितना अधिक नक्षत्र चलता है. अहो गौतम ! के १०९८०० भाग में के पांच भाग सूर्य मे नक्षत्र अधिक चके ॥ ५ ॥ चंद्र गाते अभिजित नक्षत्र भी गति समापन्न होते तो पूर्व दिशा के भाग से योग ग्रहण कर,
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एक मंडल समपन्न होवे और नत्र मुहूर्त २७ भाग.
● प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ०
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सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ-उपाङ्ग 45
सत्तावीस च सत्तस्ट्री भागे महत्तस्स चंदण साह, जोग जोएति जणं अणपरि दृति २ त्ता विप्पजह त २ चा विगतजोगियाधि भवइ जयाणं चंदे गति समावणे भवइ सवणे खत्ते गह समायण सवइ पत्थिमात लहे। जहा अभिइस
वरं तीस महत्ते च देण साई जोगं जोएलि जाव गिजोगियावि भवति एवं एतेणं अभिलारण यवं पारस महत्ताई दीसति महत्ताइ दयालीसति
महत्ताई भाणियशनि मन उत्तरासादा विगत जोगियावि भवति । । ता ६७ ये पर्यंत चंद्र माथ रह... काल पर्यत उसकी साथ विचरे, पश्चात योग छोडकर विगत योगी होवे. जर चंद्र गति समापन हे वे और श्राण नक्षत्र गति ममापन्न होने तब अभिजित नक्षत्र जैसे पूर्व दिशा में चंद्र साथ तीम महू पयत योग करता है. इतना काल पर्यत उस की साथ विचरे. तत्पश्च त् विगत योगी होने, इस आमेलाप मे मन जानना. इन में कितनेक पसरह महून पर्यंत योग करते हैं, जिन के नाम-शभिषा, भरणि, अद्र, अश्ले, सात और ज्येष्ठा. ती मन पर्यंत योग करनेवाले नक्षत्र के नाम-श्रवण, धनेष्टा, पूर्वाभाद्रपद, रेवात, अश्विनी, कृत्तिका, गशर, पूष्य, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, हस्त, चिला, अनुराधा, मूल और पूर्वाष ढा. पंतालीस मुहू पर्वत योग करनेवाले नक्षत्र के माम-- उत्तराभ-हद २ रोहिणी ३ पुनर्वसु ४ उत्तराफ ल्गुनी ५ विशाखा और ६ उत्तराषाढा. यो मम अमिना से उत्तष ढा पर्यन कहना यात गित योगी हैं ॥६॥ जब मर्य गते समापन्न है. और जब
48*48:0- पन्नावा पाहुडा
र
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अनवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक षिजी ६१
* जयाणं पूरे गइ समावण्णे अभिइणक्वत्ते गतिसमावण्णे पुरत्थिमाए भागाए समामेति
पुरे ता चत्तारि अहोरत्ते छच्च मुहुत्ते सूरेण साई जोगं जोतेति जाब विगत
जोगियावि भवति ॥ ७ ता णक्खत्तेणं मासेणं चंदे कतिमंडलाति चरति, ता तेरस अभिजित नक्षत्र पते समापन होवे तब पूर्व दिशा के भाग से मूर्य साथ योग करे इस तरह ४ अहोरात्रि और ६ मुहूर्न पर्या सूरा साथ योग करे. इसी तरह छ नक्षत्र छ अहोरात्र २१ मुहूर्त सूर्य साथ योग करते हैं, जिन के नाम-शतभिषा, भरणी, आ, अश्लेषा, स्वाति और ज्येष्ठा. पन्नरह नक्षत्र तेरह से अहोरात्रि बारह मुहून मूर्थ साथ योग करत हैं, जिन के नाम-श्रवण, धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, रेवति, अश्विनी, कृत्तिका, माशर, पूष्प, घा, पूर्वाफलानो. हस्त, चित्रा, अनुगधा, मूल और पूर्वषाढा. और छ नक्षत्र २० अहोरात्र तीन मुहूर्त तक योग हैं, जिन के नम-उत्तराभाद्रपट, रोहिणी, पुनमु. उत्सराफाल्गुनी, पिशाबा और उत्तरापाढा. २१ पत्र अपने २ समय योग्य सूर्य साथ विचर कर बिगत योगी होते हैं ॥ ७ ॥ अहो भगान
माम में चंद्र कितने मंडल चलता है ? अहो गौतम ! तेरह मंडल व एक मंडल के ६७ भाम से १३ भाग एक नक्षत्र मास में चंद्र चलता है. ए
युग में नक्षत्र मास ६७ हैं और चद्र मंडल ८८४ हैं. जितने मास निकालना हो उतने माम मे ८८४ *को गुना करना और ६७ से भाग देना. जो आवे सो उतने मंडल जानना. यहाँ प्रथम मास का महल
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदव महायजा ज्वालाप्रसादजी .
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4+8+
4
सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति-सत्र षष्ठ-उपाङ्ग 438
मंडलाइ तेरस सत्तसट्टी भागाति मंडलरस चरति॥ ॥ताणक्खत्तेणं मासणं सूरे कइ मंड लाइं चरति?ता तेरसमडलाई च उचत्तारि सत्तसट्रि भागे . डलस्त चरति ॥९॥ताणक्ख
तेणं मासेणं णक्खत्ते कति मंडलाइं चरति? तातेरस मंडलाति अहसडतालीसंच सत्तस ट्री निकालने का है इस ये ८८४ को एक से गुन ८८४ होवे इसे ६७ से भागने से. १३ मंडल व ११३ भाग आये. इस से एक नक्षत्र मास में चंद्र १३ मंडल व १३ भाग ६७ थे चलता है ॥८॥ अहो भगवन ! एक नक्षत्र मास में सूर्य किती मंडल चला है? अहो गौतम : एक नक्षत्र मास में है मूर्य १३ मंडल व ४४ भाग ६७ ये चलता है, क्यों कि एक युग में नक्षत्र मा ६७ है और सूर्य ११५ मंडल चलता है, इस स जितने माम का मंडल निकालना होगे उतने मास मे ९१५ को गुता के के १६७ से भाग देना. जो आवे उतने मंडल मर्य चलता है मो जानना. यहां प्रथम मास के मंडल निकालने के हैं इस स ९.१५ को एक से गुरते ९१० हो उसे ६७ से भाग दने से १३ मंडल और शेष ४४ रहे इस से एक नक्षत्र मास में मूर्य १३ मंडल व ४४ भाग ६७ या चलता है ॥ ॥ अहो भगवन् ? एक नक्षत्र मास में नक्षत्र कितने मंडल चलते हैं? ओ में तय ! एक नक्षत्र मास में नक्षत्र १३ मंडल व ४६॥ भाग ६७ या चल. क्यों कि एक युग में नक्षत्र मास ६७ हैं और नक्षत्र ११७॥ मंडल चलते हैं. इस से जितने मास का निकालना होव उतने मास से ९.७ को गुमाउरके ६७से भाग देना जो आवे उतने मंडल जानना. यहां प्रथम मास का निकाला है इस से ९.४ा को एक से गुना करने से १५७॥ होने
पन्नरहवा पाहुडा 2
2
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अमापाजी
अनुवादक बालबचारी मुनि
भागे महलस चरति॥१०॥ त चंद म.रं. चंदे व तमंडलातिचरंति ? ता. चउद्दस चउभागाति मंडलाति, एक चउवसिते भागे मंडलस्स चरंति ॥ ता चंदणं
मासेणं सूरे कति पुच्छा ? ता पण्णरस चउभागृणति मंडलातिं एगं चउवीसं सते उस ६७ मे भ.ग देने में १३ मंडल व ४६॥ भाग शेष रहा. इम मे एक नक्षत्र माम में गक्षत्र १३ मंडल व ४६॥ भाग चले हैं ॥ १० ॥ अहो भयवन् ! एक केंद्र माम में चंद्र कितने मंड चलता है ? अहो गौतम ! १४ मंडल, पन्नरह । मंडल का चौथा भाग और एक मंडल के १२४ भाग करे। वैसे एक भाग. अर्थत् एक मंडल के ६२ भाग करे उ। का चौथा भ ग १०॥ होवे और एक भाग १२४ का है उस को ६२ या भ ग करे तो आधा भाग ६२ या हार यह पूक्त १५॥ भ ग में मिलाने में १६ भाग ६२ ये होवे अर्थ त एक चंद्र पास में चंद्र १४ मंडरव १६ भाग ६२ या चलता है, क्यों की एक युग में चंद्र मास ६२ हैं और चंद्र मंडल ८८४ है इस मे ८८४ को ६२ से भाग देने से इन अत हैं. अहो भगवन् ! चंद्र मास में मूर्य कितने मंडल चरते है ? अहो गौतम! पनवे मंडल में चौथा भाग कमवएकनग १२४ का अर्थ तमंडल मंपर्ग और४६॥भाग ६२ मा पन्नरखेडलका और एक भाग१२४ का निस का अधिः भाग ६२या हु. यह पूक्ति भाग पिलाने से ४७ भाग ६२या हुवा. इस
एक चंद्र माम में सूर्य १४ मंडल व ४७ भाग ६२ य चलता है. क्यों कि एक युग में चंद्र मास ६२४ 4 और सूर्य ११५ मंडल ६लता है इस से ९१५ को ६२ से भाग देने से पूर्वोक्त संख्या आती है. अहो ।
.प्रकाशक-राजाबहादूर लाला मुखदवसहायजी वाला प्रकार जी*
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सत्य-चंद्र उपा
नक्षत्र गास में चलने नक्षत्र चंद्र मंडल सूर्य मंडल नक्षत्र मंडल | मास मंडल | मा६७ मंडल | मा६७ मंडल मा ६७ मम
aaam.
१.३
३९ |
७१
१२
१.३ १.
१.४५ १५८
१३
२६
११.
२४
४०
५४
६८
८१
४४
२१
६६
४२
१९
६३
१:१
१७
१२२
६१
१३६/ ३८
१५०
१६
२२ १६३५९ १.७७
३६
1
१३ ४६ ॥ १४
२७ २६ |१५ ५ ॥१६
४१
५४ ५२ | १७
६८ ३१ ॥ १८
८२ ११ १९
९५ ५७॥२० १०९ ३७ २१ १२३ १६ ॥ २२ १३६ ६३ २३
१५० ४२ ॥ २४
१६४ २२ २५ १७८
१ ॥ २६
की मंख्या
चंद्र ड मंडल मा.६१
१.८४ | ४८
१९७
६१
२१५
२२४ २३७
२५० २६३
२७७
२१०
३०३
३१६
३२९ ३४३
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सूर्य मंडल मंडळ मा.६
१११ |
२०४
७ २१८
२० २३२ ३३ २४५॥
४६ २५९
५९ २०३
२८.
tay
१८ ३
३१. ३
४४ ३२७
५७ ३४१
३ ३५५
१३
१९१ ४८
५७ २०५ २७ ॥ ३४ २१२
११ २३२ ५३॥ ५५। २४६ ३३
३२ २६० १२॥ १ २७३ ५१ २८७ ३८ ॥ ३०१ ५८
३९४ ६४ ॥
३२८| ४४
३४२ २३॥
३५६ |
३
46
नक्षत्र मंडळ पंडळ | ६७
२८
५
H+4+ पटवा हुडा
३६५
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१६ ३६८
४२ ३६९ ४१॥ ४५ |
६२
६२१
0
raram.
.
&00000
२४ ४२४ ३४॥४९
0
६८४
६८६
१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोसख ऋषिनी +
७.
३
७२५
। ७३७
* पकाशक राजाबहादुर लाला मुखदवसायी नालाप्रसादजी।
७३१
७३८ ०८ ७६४ ७५२ ४, ७७८
.
७८.
6
७७८
३६ ६०० ६६०२, ३६ ६२ ८१८
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१० ८६० ८४४ २८ ८७४२
८७६ २८ ६७ ८८४०
०१५
. ०१७
समदश-चंद्र प्रज्ञप्ती सूत्रपष्ठ-पाङ्ग 4
भागे मडलस्स चरति ता चंदेणं मासेणं गक्ख ते कइमंडलाइ चरंति ? ता पण्णरस चउभागणाइ मंडलाइ छ चउवीसं सते भागे मडलस्स चरंति ॥ ११॥ ता उउ. णा मासणं चंद कति मंडलाति चरति ? ता चउदस मंडलार्ति तीसंच एग
भगवन् ! चंद्र मास में नक्षत्र कितने मंडल चलते हैं ? अहो गौतम ! पनरहवे मंडल में चतुर्थ भाग 4 कम अर्थात् १४ मंडल व ४६॥ भाग ६२ या और ६ भाग १२४ ये जिस के तीन भाग ६२ ये हो इस से एक चंद्र मास में नक्षत्र १४ मंडल ४९॥ भाग ६२ ये चलते है. एक युग में चंद्र मास ६२ हैं
और नक्षत्र ९१७॥ मंडल चलते है. इस से इस को ६२ का भाग देने से पूर्वोक्त संख्या आती है ॥११॥ *अब ऋतु माप्त का कयन करते हैं. अहो भगवन् ! ऋतु मास में चंद्र कितने मंडल चलता है ? अहाई।
गौतम ! १४ मंडल व ३० भाग ६१ या चला हैं. क्योंकि एक युग में ऋतु मास ६१ हैं और इंद्र मंडल ८८४ हैं इस से ८८४ को ६१ से भाग देने से १४ मंडल व ३० भाग ६१ ये होवे. अहो
-46- पनरहवा पाहुडा 4642
42
।
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वादलवारी मुनि श्री अमोलक ऋषि
चंद्र चंद्र मंडल मास
१०
मंडळ भा.६२ मंडल भा.६३ | मंडल / मा.६२
१४ | १.६ २८ ३२
चंद्र मास में चलने की मंडल संख्या. सूर्यमंडल नक्षत्र मंडल | चंद्र चंद्र मंडल सूर्य मंडल नक्षत्र मंडल मंड : भाग६२ मंडल मा.६२ मंडल | ३८ | २०६ ५४ २२१
मान
भा. ६२
9.9
३८ | २०७ २३ २२१ ६०॥
८ २३६ २४ २५०
१.२८
१४२
८८
१९
१०३
११४ ४ ११८
१५६
१२ १ १
१८५
१.४ ४७ १४ ४२ । १४ १९९ २९ ३२ २१ ३७ १६ २१३ १६ २२८ १७ २४२
४४ २४ ॥
५९
१२
७३ ६१ ।। ८८ ४९ १२ ३६ ॥
१०३
२०
११८ २४ |
१३३
१४ ।।
६१
४८ ||
२० १३२
३६
१४७
५० १६२ १७७ २२ १९१
४०
३४ |
१९
४
५१
२२
२।
२४
६ १७७
३६
२५
५३ | ११२ २३॥ २६
१८ २५०
२७० २८५
२११/
३१३ |
३२५
३४२
३५६
३७० |
३६
१४७
२१ १६२
For Personal & Private Use Only
४० २६५
५६ २८: ।
१० २९५
२६| ३९९| ४२ ३२४
५८ ३३९
२८
१२ ३५४ ३६८ | ४४ ३८३|
८ २३६
४८ ५५ २५१ ३५॥
४०
२६६
२५
१०
२३
२८१
११॥
२९५ / ६०
३१० ४७॥ ૪૨/ ३२५ ३५ २७ ३४० २२॥ १२ ३५५ १.० ५१ ३६९ ५१॥ ४४) ३८४ ४५
• प्रकाशक गजाबहादर लाला मुदवायी ज्वालापानी
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4
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पन्नर वा पाहुडा +
H
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०
७२०
८२८
८४० ८५८
८७३
१८ २०२४३॥
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०
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.
.
.
३८.५
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-he Bb-EL B
2023 Hot
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३७०
42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋविजोग
ट्ठीभागे मंडलस्स. चरति उउणा मासेणं सूरे कति पुच्छा तापण्णरस. मंडलातिंचरंति ॥ ता उउणा मासेणं णक्खत्ते पुच्छा ? ता पण्णरस मंडलाति चरति पंचम बाबीसे सत भागे मंडलस्स ॥ १२ ॥ ता आइच्चेणं मासेणं चंदे कति मंडलाति चरंति, ता
च उद्दस मंडलतिं चरंति एक्कारसयं पण्णरस भागे मंडलस्स आइच्चेणं मासेणं मरेकति भगवन् ! ऋतु माप्त में सूर्य कितन मंडल चलता है ! अहो गौतम ! एक ऋतु मास में सूर्य १५ मंडल चलता है एक युग में ऋतु माम ६१ है और सूर्य ९१५ पंडल चलना है. इस से ९१५ को ६१ सेब भाग देने से १५ मंडल आते हैं. अहो भगवन ! एक ऋतु म स में नक्षत्र कितने मंडल चलते हैं ? अहो गौतम! एक ऋतु मास में नक्षत्र १५ मंडल व पांच भाग १२२ या चलते हैं. क्यों कि एक युग में ऋतु मास ६१ हैं और नक्षत्र ९१७) मंडल चलते हैं. इस ९१७॥ के ६१ से भाग दने से पूर्वोक्त संख्या होव ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! आदित्य मास में चंद्र कितने मंडल चलता हैं ? अहो गौतम ! एक आदित्य मास में चंद्र १४ मंडल व ११ भाग १५ के चलता है. क्यो कि एक युग में आदित्य मास ६० है और चंद्र मंडल ८८४ हैं. इम से ८८४ को ६० का भाग देने में १४ होये शेष ४४ रहे. इम का छेद करने को, चार से भाग दने से ११ रहा और ६० का छद १५ हुवा, इस से एक आदित्य पास में चंद्र १४२८ मंडल चलता है. अहो भगान् ! एक आदित्य मास में सूर्य कितने मंडल चलता है ? अहो गैतप! एक आदित्य मास में सूर्य पन्नर ह मंडल व एक मंडल का चौथा भाग अर्थात् १॥ मंडल चलता हैं. एक युग
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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4 सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग 46
ऋतु मास
चंद्र मंडल
मंडळ मा.६१
१०
१.४ ३०
७२
८६
१९१
११५
९ १३०
१४४
११ १६९
१२ १७३
१३ १८८
२९
५९
२८
ऋतु मास में चलने के मंडल. सूर्य मंडल नक्षत्र मंडल | ऋतु मैडल
भाग
बास
१५
३०
४५
६०
७५
५८
९०
२७ १०५
८७ १२०
२६ १३५
२५ १६५
५५ १८० २४ १९५
१२२
३०
४५
६०
७५
९०
१०५
१२
१३५
१५०
१६५
१८०
१.१५/
चंद्र मंडल मंडल भा.३१
५ १४ २०२ ५४ २१० २३ २२५
२४०
२५५
२७०
२८५
१३००
३१५
३३०
१९| ३४५
४९ ३६० १८३७५
४८ ३९०
१० ነ
१५ १६
१२३
०
१७ २४६
२५ १८ २६०
३८
१९/ २७६
३५
२० २८९
५०
२१ ३०४
४५ २२
२३ |
२४
६०
६६ २६
३१८
३३३ |
३४७
२५ ३६२
३७६
सूर्य मंड मंडल
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नक्षत्र मंडल
मंडल
भाग
२८५
२००
१२२
२४०
२५५ ८५
२७० ९०
९८ १००
३१५ १०५
३३० ११०
११५
१२०
३४५
३६०/
३५
३९१
७०
७५
* पनरहवा पाहूडा
4
3.97
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* अनुवादक-बालब्रह्म चारी मुनि श्री अमोलक
जी
।
६६०
28
१७ ४०६
६३०
५४०
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48 सप्तदश-चंद्र प्रज्ञप्ति सत्र षष्ट-उपा448
पुच्छा ? ता पण्णरस चउभागाति मंडलानि चरति ॥ ता आइच्चे मासेणं णक्खत्तेणं पच्छा ? ता पण्णरस च उभागाति मंडलातिं पंचायवास सभागे मंडलस्स चरति
॥ १३ ॥ ता अभिवहिएणं मामण चंदे की मंडलानिति ? ला पण्णरस मंडलात में आदित्य मास ६० हैं और सूर्य मंडल २१५ हैं. हर १५५ का नाम देनेमे १५॥ रहे. अो भगवन् ! एक आदित्य पास में नक्षत्र किलो डलन ? हो गोला एक आदित्य मास में नक्षत्र १५ मंडल पांव भन... या चले अयंत् १५१ मंडल १ भाग २४ या चले. क्योकि एक युग में आदित्य माम६.: और नक्षत्र ११७॥ मंडल चलता है. इस को ६० से भाग देने १५ मंडल संपूर्ण आये ऊपर १७॥ रहा उस के २४ या भाग करने को २४ से गुनने से ४२० हुवे. उमे ६० का भाग दने मे ७ आये. इस स एक आदित्य माम में नक्षत्र १५ डल और ७ भाग २४ या चलता हैं ॥ १३ ॥ अहो भगवन् ! अभिवर्धन माम में कितने डर पला? अहो गोरम! पनाह मंडाव एकजल के १८३ भाग करे पैसे ८३ भाद्र अभिवर्धन मास में चलता है. एक युग में अभिवर्धन मास ५७३ घर चंद्र एक या ८८४ मंडल चला है. यहां मात के री। भाग करने को ५७ का १३ समुह करके तीन मिलाना ५७४१३%D७४१+३-७४४ होते. यह एक अभिवर्धन युग के जाना. इसको जिसने मास के मंडल निकालना हो उतने को १३ सेगुनना और जो . ....-- ... ---. . आने मामंटल जानना. यहां प्रथप
'
पनदरहमा पाहुडा 38302
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अनुवादक बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
आ० चंद्र मंडल मास मंडल | मा२५ मंडळ
१.४
२९
९४४
७३
८८
१०३
११७
आदित्य मास में चलने सूर्य मंडल नक्षत्र मंडल आ० भा ४ मंडल | भा. २४| मास
१४७
१६२
१७६
१९१
१५ १ ३०
२
. ३१
. १५२ १. १६७
१.२ १८३
१३८)
3
०
१.
१५ १४ ३० १४ १५ ४५ २१ १६ ६१ ४ १७ ७६ ११ १८ ९१ १८ १९ १०७ १. २० '१२२ ८ २९ १३७
२२ १५२ २२ २३ १६८| ५ २४ १८३ १२ २५ १९८ १९ २६
की मंडल संस्था.
चंद्र मंडल मंडल | भा. १५
२०६ |
२२१
-२३५
२५०
२६५
२७९ २९४
३०९
३२४
३३८
३५३
३६८ ३८३ |
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सूर्य मंडल मंडल | भा. ४
२१३
२२८
२४४
२५९
३ २७४ १४ २८९ १० ३०५
६ ३२०
३३५ |
१.३ ३५०
९
३६६
५ ३८५
३९६/
२ २१४
३ २२९
२४४ १६ २५९ २३ २७५
६
३ २९० १३
३०५ २० ३२१
३३६ १०
A
नक्षत्र मंडल मंडल | भा. २४
७०
m
३५१
३६७
३८२
३९७ १
० प्रकाशक - राजाबहादुर टाला सुखदेवसहाय जी ज्वालाप्रसाद •
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Mit:
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: 0900
+ सनदश-चंद्र प्राप्त पत्र पठ-पात्र
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पत्ररहवा पाहुडा A
०६२
६१.
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+
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अनुवादक-बाल समचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी
चरति तासियंच छामयं सतेमागे मंडलस्स चरंति,ना अभिवड्एिणं मासणं सरे पुच्छा?
ता सोलस मंडलानि नहिं भागेहिं ऊगाति, दो अडयालीमएहिं भागे मंडलं छत्ता है चरति॥ ता अभिवड़िएणं मासणं गक्खत्ते कति मंडलाति चरति? ता सोलसमंडलाई
है इस से इम को १३ मे गुना करने से १३ होते. फर ८८४ से गुमन से ११४९२ हे थे. इस को १८४४ से भगले, से १५ डर रहे, शेष ३३२ रह. इस को १८६ का भाग करने को १८६ म गुनना, जिसे ६१७५ हो, इसको ८४४ मे भाग देने से ८३ भाग आये. अहा भगवन् ! एक अभिवर्धन मास किन मंटन चरता? अहो गतम! एक अभिधन मास में सूर्य २४८ ये तीन भाग का मोल १३ ल रसता है. एक युग में अभिवर्धन माम के ७४४ भाग १३ के
होते हैं और सूर्य १.५ डल करता है. जो पास के मंडल निकालना होो उसे तेरह गुना करक F९१५ से गुना कर ७४४ भागदना. यहां पाप पाम का निकालना है. इस को नेर गुना करने
१३ होने. इस फीर १.५ मे गुना करने मे ११८५५ हांव. इम के ७४४ से भागने मे १५ मंडल व शेष ७३५ रहे. इ.को २४८ ये भाग करने को २४८ से गुना करना. जिम में १८२२८० होवे. उस को ७४४ का भाग देने २४५ भाग होवे. अहो भगवन् ! एक अभिवर्धन माम में नक्षत्र कितने पहल चलने? अहनीन! एक अभिवर्धन मामय नक्षत्र १६ मंडल व एक मंडल १४८८ भाग करे वैस ४७ भाग अर्थन माडल चलते हैं, एक युग में अभिवर्धन मास के ७४४ भाग १३ ये
प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी वाला मारा।
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३७७
सीतालीमय भागे हैं अहिय ति चउद्दसहिं अट्ठसिते हैं रातेहिं मंडलं छेत्ता ॥१४॥ ता एगमेगणं अहोरत्तणं चंदे कति मंडलाति चरति ? ताएगे मंडलं चरनि, एकतिसाते भागेहि ऊणं नवहिय पण्णरसहिं सतेहिं अह मंडलं छत्ता भी ला सगणं अहोरत्तेणं सूरे कति मंडलातिं चरति ? ता एग अह मडलं
7 .१ । ल य त हैं. इस को १३ स गुला करने से ११९२७॥ हो, इ को ७४४ पे २
२ ३ भाग रह. इसको १४८८ से गुना करने से ३४१३८ हने. इसे
म ४७ जाये. इस से एक आमवर्धन मास में नक्षत्र १६ मंडल चलने हैं. एक २३ मा ग्रहण किया है. इसमें से जितने भाग का निकालना हो उतने भाग से चंद्र. क्षा के मंडल से शना करके ७४४ स भगदेना और जो आने सो मंडल जानन'. इस नरह
मामम के प्रथप भाग चंद्र १३ मंडल. सूर्य और नक्षत्र १- मंडल मलने ॥१४॥ म भगर ! एक अहोरात्र में चंद्र किन मंडल चलता है? अोमानम !! म अब के ११५ भागमे ४४२.भ.ग एक अहं रात्रि में चंद्र चलता है. क्योंकि एक सय
पत्र १८३० हैं और चंद्र ८८४ मंडल चलता है. इस मे ८८४ का १८३० स भाग दन म इतन . . अहो भगवन् ! एड अहोरात्र में सर्य किनने मंड: चलता है ? अहो गौतम! एक अहोई .....२ रे में सूर्य एक अर्थ मंडल चरत है. क्यों कि एक युग में अहोर त्रि १८३० हैं और सूर्य मंडल
RA+HD पनदरहवा पाहुडा
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अर्थ
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक कृषिजी
चरंति, ता एगमेगेणं अहोरत्तेणं णक्खत्त कति मंडलाई चरइ ॥ ता एगं. अद्ध मंडलं दोहिं भागेहिं अहिंय संतहिं दुतिसहिं सएहिं अद्ध मंडलं छेत्ता चरंति॥ १५ ॥. ता एगमेगेण मंडले चंदे कतिहिं अहोरत्तहिं चरति?ता देोहिं अहोरत्तेहिं एकतीसाए भागेहिं
आहितेहि वउहिं बेतालेहि सतेहिं रातिंदियंच्छेत्ता, चरति ताएगमगेण मंडले सूरे कतिहिं १९१५ हैं. इस से ९१५ को १८.३० से भाग देने से एक आधा मंडल पूग आता है. अहो भगवन !
एक अहोरात्रि में नक्षत्र फितने मंडल चलता है ? अहो गौतय ! एक अहोरात्रि में नक्षत्र एक मंडल के १७३२ भ ग करे वैसे ३६७ भाग चलता है. क्योंकि एक युगमें १.८३० अहोरात्र हैं और ९१७॥ नक्षत्र मंडल हैं. ११७ को १८३० से भाग देने से इतने होते हैं ॥५॥ अहो भगवत् ! एक २ मंडल चंद्र कितनी अहोरात्रि में चलता है? अहो गौतम ! एक २ मंडल पर चंद्र दो अहोरात्र व एक अहो. रात्रि के ४४२ भाग करे वैसे ३१ भाग. (२ ) अहोरात्रि में चलता है. एक युग में १८३० अहो-* रात्रि हैं और चंद्र ८८४ मंडल चलता है इस मे १८३० को ८८४ मे भाग देने में अहोराधि होवे ? अहो भगवन् ! एक २ मंडल पर मूर्य कितनी अहौरात्रि में चलता है ? अहो गौतम ! सूर्य एक २ मंडल पर दो अहो रात्रि में चलता है. क्यों की एक युग की १८३० अहोरात्र हैं और मंडर ११५ हैं, १८३० को ९१५ से गुना करने से दो अहोरात्रि हे ती है. अहो भगवन् ! एक २ मंडल पर नक्षी
शक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्यालाप्रमादजी
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अर्थ
48-ममदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्रषष्ठ उपाङ्ग
चंदे
अहोर तेहिं चरति ?ता दोहिं अहोरत्तहिं चरति ॥ ता एगमेगेणं मंडले पुच्छा ? दोहिं अहोर तेहिं दोहिं भागेहिं ऊणा तिहिं सत्तट्ठे सतेहिं रानिंदियं छेत्ता ॥ १६ ॥ ता जुगेणं कति मंडल ति चरति ? ता अडचुलसी संतमंडलं चरति । ता जुगेणं सूरे कति मंडलाति कितनी अहोरात्र में चलता है ? अहो त ! एक मंडल पर एक मंडल के ३६७ भाग करे वैसे दो (भाग दो अहम त्र में कम (१अहोरात्र ) में चलता है. एक युग में १४३० अहोरात्र हैं और नक्षत्र १४७॥ मंडल चलता हैं. ९१७|| के अभि करते दो गुणा करना, जिससे १८३५ अर्ध मंडल हुने १८३० को दुगुने करने से ३६०० हुने. इस से ३६६० अहोरात्रे को १८३५ से भाग देने स इतने होते है. ।। १६ ।। अहे भगवन ! एक युग में चंद्र कितने मंडल चलता है ? अहो गौतम ! ग्रग में चंद्र ८८४ मंडल चलता है वीं की एक युग में १८३० अहोरात्र इस के मुहूर्त ५४००० हेते हैं. एक मुहूर्त में चंद्र एक मंडल के १०९८०० भाग करे वैसे १७३८ भाग चरता है. इन से युग के मुहूर्त ५४२०० क साथ १७६८ से गुणा करने से २०६३२०० इता भाग एक युग में चले इसका मंडल करने से १०९८०० से भाग देने से ८८४ मंडल होत. अहो भगवन् ! एक युग में सूर्य कितने मंडल चलता है ? अहो गौतम ! एक युग में सूर्य ९१५ मंडल चलता है क्यों की एक युग के मुहूर्त ५४२०० है और सूर्य एक मंडल के १०९८०० भाग करे वैसे १८३० भाग चलता है, इस से ५४१०० को १८३० से गुना करने से १०८४६७०००
एक
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00 पन्नरहना पाहुड
३७९
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चरति ता णवपण्णरस मंडलं सते चरति, ता जुगेणं गक्खत्ते कति मंडलातिं चरति ता अट्ठारस पणतीसं दुभाग मंडलं सते चरति ॥ १७ ॥ इच्चेसा मुहुत्तंगति भागेणमास रातिदय मंडलं जुगपविभत्ति सिग्धगति आहितात वदेजा ॥ इति
परम पहुई सम्मत्तं ॥ १५ ॥ () () () () ज ग में सूर्य चलता है. इस के मंडल करने को १०१८.० से भ ग देना जिस 103. आर. इस से एक या में मूर्य ११५ मंडल चलता है. अहे मगवन् ! एक युग निना मंडल चलना है ? अहो गौतम : एक युग में नक्षत्र १८३५ अर्ध मंडल चलता है. इस के
ड होते है. एक युग में मुहर्न ५४१०० है. और नक्षत्र एक महू में १८३५ म १८०० के चलता है इस से ५४९०० मुहूर्त साथ १८३० मे गुना करने से १२०७४१००० भाग
ल है. इस मंडल करने के १०९८०० से भाग देने से ९१७। मंडल होते है. इस म एक बुग में TRA ९१७॥ मंडल चलन है. ॥ १७ ॥ इस तरह चंद्र पूर्य नक्षत्र की मुहू में कितना भाग चल
दुग के नाव ओरात्रि में कितना चले, युगमें उक्त तीनों कितने मंडल चले वगैरह से तीनों की शीघ्र निति कही. यों चंद्र प्रज्ञान सत्र का पनरहवा पाहुडा संपूर्ण हु॥ १५ ॥
पकायाक-रामावादरहाला सुखद धमहायजी वालाप्रसादाजी.
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सूत्र
अर्थ
सप्तदश चंद्र प्रज्ञः सूत्र पष्ठ उपा
全等
|| पोडश प्राभृतम् ॥ ता कहते दक्षिणा लक्खा अहिनेति वदेजा ? ता देमिणा तिया चंदलेस्सा ता दोसिया तिया चलेगा कि अडे किं लक्ख ?ना एग भट्टे एगलक्खणं आहितति बजा ॥ १ ॥ ता कहते सुरेल आहितेति वदेजाता सुरलेसातिया आयावेति २ ताकि अटुं किं लक्खप ? ता एगडे एक लक्खणा॥ २ ॥ ता कहंत छाया लक्खणे आहितति देना? ता अंधकारेनियाछायातियता अंधकारतिय छयातिया कि अट्ठे किं लक्ख ? ता एगई एग लक्खण ॥ इति सोलसमं पहुई सम्मन्तं ।। १६ ।।
अव मालवा पहुडा कहते हैं अहा! उद्योत का भक्षण कैसे कहा ? अहो गौतम ! उद्योत चंद्र देश से है, घोपे या किसलिये कही अथवा उन का क्या लक्षण है !!उसका अर्थ कहा और एक लक्षण कहा ॥१॥ अधे भगवन् ! सूर्य का वय अक्षक!सूर्य या वहां आप होता है. अम
सूर्य लेश्या वहां अव किस प्रकार कहा ? एक अर्थका एक अर्थ रूप म कहा || २ || अहा भगवन्! छाया किसे कहते हैं अर्थात छाया का क्या लक्षण है ? अहो फैन ! जहां अंधकार है वहां छा है यह भगवन् ! जहां अंधकार है वहां छाया है उन का का लक्षण कहा ? अहा गौतम ! एक अर्थ अंधकार का और एक लक्षण अंधकार करने का है. यह चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र का सोलहवा पाहुडा संपूर्ण हुवा || १६ ॥
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*सोलहवा हुडा
३८५
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सूत्र
अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
॥ सप्तदश प्राभृतम् ॥
ता कहते चणोवत्राते आहितेति वदजा ? तत्थ खलु इमातो पण्णवीसं पडिवत्तीओं पण्णत्ताओ, तंजहा तत्थेगे एव माहंसु ता अणुसमय मेवचंदिम सूरिया अण्णे चयंति अण्णे उववज्जंति आहितति वदेज ? एगे पुण एवं मासु अणमुहुत्तमेव चंदिम सूरिया अण्णे चयंति अण्ण उववज्जति वदेजा, एवं जाव जच्चे वह ताए पष्णवी पांडेवतीओ, ततो एत्यपि भाणिव्यात जात्र अणुउसप्पाणिमेव चंदिम सूरिया अण्णे चयंति अण्णे उवजंति आहितेति वदेजा एंगे एवं माहंस ॥ भावयंपुण एक वयामाता चदिम सूरियाण जोइसिया देवा महिड्डिया महाजसा महावला महाणुभावा महासुक्खा ववत्थधरा वस्मल्लधरा अत्तरवाडा कहते हैं. अहो भगवन् ! चंद्र सूर्य का चवण व उत्पन्न होने का कैसे कहा ? | अहो गोतम ! इस विषय मे अन्य तीर्थीकी प्ररूपना रूप पश्चीम पडिवृत्ति में कही हैं कितनेक ऐसा कहने है कि अनुनय में चंद्र अन्य उत्पन्न होते है और अन्य चवते हैं. कितनेक ऐसा कहते हैं प्रत्येक मुहूर्त मे चंद्र सूर्य अन्य उत्पन्न होते हैं व अन्य चलते हैं. यो जिस प्रकार स्थाने अ श्री पच्चीस परिवृत्ति कहीं वैसे ही यहां कहना. यावत् प्रत्येक उत्सर्पिणी में चंद्र सूर्य अन्य उत्पन्न होते हैं
अन्य चवत हैं।
| १ | इस कथन को हम इस प्रकार कहते हैं कि चंद्र सूर्य दोनों ज्योतिषी के दत्र महर्दिक, महाझुति
ॐ प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी ०
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*
वरगंधध। अवोच्छिन्ने नयट्ठयाए अण्णे चयति अण्णे उववज्जति आहितेति वदेज्जा इति . सत्तरसम पाहुड सम्मत्त ॥ १७ ॥ * * * * *
WE
वंत, महा वरवंत महानुभावाले, महासुखपाले, श्रेष्ट वस्त्र धारन करनेवाले, श्रेष्ट माला धारन करनेवाले, श्रेष्ट गंध धारन करने वाले,अविच्छिन्नपने अ युष्म पूर्ण होने पर चलते हैं. और अन्य उत्पन्न होते हैं. यों चंद्र प्रज्ञाप्त मत्र में सतरहवा पाहुडा संपूर्ण हुबा ॥१७॥
सदश-चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ-उपनि
AAAAnnairam
सत्तरहवा पाहुडा 48
.
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जी
अनुनादक-पालनमचारी मुनि श्री अमोलक
॥ अष्टादश प्रामृतम् ॥ ता कहते उच्चत्ते आहिनेति वदेज्जा ? तत्य खलु इमातो पंचवीसं पडिवतीओ १० तजहा तोंगे एवं माहंमु ता एग जोयण सहस्से सूरे उड् उच्चत्तेणं दिवढे चंदे एगे एवं माहंमु ता दो जायण सहस्साति सूरे उर्दू उच्चत्तणं अट्टाति जाई चदे ।। एवं एएणं अभिलावणं तिणि जोया सहस्साति सरे उड़े उच्चनगं अछुट्टाइ चंदे, ता चत्तारि जोयण सहस्साति सूरे उड्ड उचत्तेग अदृपचमाइं चंद ता पचजोयणं अब अठ र हवा पाहुडा कहते हैं. अहो भगवन् ! चंद्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र व तारा कितनी ऊंचाइ से हे हैं ? अहो गौतम! इस में अन्य तीथि की प्ररूपणारूप पच्चस पाडेतत्तयों की हैं. १ कितनेक ऐ। कहते एक हजार योजन सूर्य पृथ्वी से ऊंचा है और देढ हजार यांजन चंद्र पृथ्वी से ऊंचा है, किननेक ऐसा कहते हैं कि २ दो हजार या नन मूर्य उंचा है, और अढाइ हजार योजन चंद्र पृथ्वी में, ऊंचा है. इसी प्रकार से ३ किनक तीन हजार योजन सूर्य ऊंचा व माद तीन हजार योजन चंद्र ऊंचा.
४ चार हजार गांजन सूर्य ऊंचा व माढ चार हजार योजन चंद्र ऊंचा, ५ पांच हजार योजन सूर्य ऊंचाई Fव साढ पांच हजार योजन चंद्र ऊंचा, ६ छ हजार योजन सूर्य ऊंचा, साढे छ हजार पांजन चंद्र ऊंचा. 2 ७सात हजार योनन सूर्य ऊंचा, माद सात हजार योजन चंद्र. ऊंचा, ८ पाठ का - - -
०प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाम
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48.94
सहस्साति सूरे उ8 अद्ध छट्टाति चंदे, एवं छसूरे अड सत्तमाति चंदे, सत्त मरे 141 अट्ठमाति चंदे. अट्ठसूरे. अडणवमाइ चंदे, गवसूरे अद्ध दसमाति चंदे, दममरे -- अडेएकारसमाइ चंदे, एकारस सूरे, अद्धबारसमाति चदे, वारस मरे, अद्धतेग्स .. मातिंचंदे. तेरसमरे अद्ध च उद्दसमातिं चंदे, चउद्दससूरे अद्धपण्णरसमाति. चदे, . पण्णरससूरे अद्ध सोल समाई चंदे, सोलससूरे अद्ध सत्तरसमाति चंदे,सत्तरससूरे अद्ध । अट्ठारसमाइ चंदे, अट्ठारापरे अचू एगणवीसमाई चैदे, एगूणवीसइसरे अद्ध विसांत .
माति चंदे, विसइसृरे अ. एकातितिमातिं चंद,एवं एकवीससूर अद्ध वावीसतिमाति चंदे, मारे आठ हजार योजन चंद्र ऊंचा, नव इजार योजन मूर्य ऊंचा, साढ नव हमार योनन चंद्र ऊंचा.. १० दश हजार योजन सूर्य ऊंना साढे दश हजार योजन चंद्र ऊंचा, १ अग्यारह हजार योजन सूर्य ऊंचा, साढे अग्यारह हजार योजन चंद्र ऊंचा, १२ बारह हजार याजन सूर्य अंग, माद बारह हजार 14 योजन चंद्र ऊंचा, १३ तेरह हजार योजन चंद्र ऊंचा, साढे तेरह हजार योजन सूर्य ऊंचा १४ चौदही हजार योजन सूर्य ऊंचा साढ व उदह हजार योभन चंद्र ऊंचा,१५ पन्नरह हजार योजन मूर्य ऊंचा, स पसरह है।
हजार योजन चंद्र ऊंचा. १६ सोलह हजार योजन सूर्य ऊंचा, साढ सोलह हजार योजन चंद्र ऊंचा, १७14 Tसत्ताह-रनार योजन सूर्य ऊंचा साढे सत्तरह हजार योजन चंद्र ऊंचा, १८ अठारह हजार योजन सूर्य
चामा अाजार योजन चंद्र ऊंचा, १९ गुन्बीग हजार योजन सूर्य ऊंचा माटे गुमीम इमार ।
4+ सदस-पंद्र-मामि सूत्र पठ-माज 4
अठारहवाडा +
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案
42 अनुवादक बालब्रवारी मुनि श्री अमोल कोजी
वावीसंसूरे अद्धतेवीसमाति चंदे, तेवीससूरे अरू चडवीसतिमार्ति घंबे, चवीसं सूरे, अद्धपण्णत्रीसतिमातिं चंदे एगे एवं माहंसु ॥ एगे पुण पणवीसंच जोषण सहस्लाति सूरे उड्डुं उच्चत्तेनं अद्धछत्रीसतिमातिंचंदे एगे एवं माहंसु ॥ १ ॥ वयं पुण एवं वयामोता इमीसे रयणष्पभाए पुढवीए बहुसमरमाणिजातो भूमिभागाओ सच उते जोयणसते अवाहाए हिट्ठिल्लेतारारू चरं चरति अट्ठजोयणसए अबहाए सुर. बिमाणे चारं चरति, अट्ठसी जोधणसए अवाहाए चंदविमाणे चारं चरति, णव जोयणसए
योजन चंद्र ऊंचा, २० बीस हजार योचन सूर्य ऊंचा साढ़े बीस हजार योजन चंद्र ऊंचा, २१ इक्कीस { हजार योजन सूर्य ऊंचा सांदे इक्कीस हजार योजन चंद्र ऊंचा २२ बाइस हजार योजन सूर्य ऊंचा साढे { बाइस हजार योजन चंद्र ऊंचा २३ तेइन हजार योजन सूर्य ऊंचा साढ़े तेइस हजार योजन चंद्र ऊंचा २४ तीस हजार योजन सूर्य ऊंचा साढे चौबीस हजार योजन चंद्र ऊंचा २५ हजार योजल सूर्य ऊंचा सपचीस हजार योजन चंद्र ऊंचा ॥ १ ॥ इस तरह अम्यतीर्थी की प्ररूपणा कहकर भविस अपना मत कहते हैं. इस रत्नप्रभा पृथ्वी के बहुत समरमणीय भूमिभाग से स मे नीचे का तारा मंडल है, भाइको योजन ऊंचे सूर्यका विमान है, और
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७२० योजन ऊंचे : अबाबा म
उसी महती योजन ऊंचे चंद्र
● राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायत्री ज्वालाप्रसादजी
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-चंद्र प्रजाती सूत्रपाठ-ग्याङ्ग 48
अवाहाए उवरिल्लेतारारुवे चारं चरति ॥ २ ॥ ता हेटिल्लाताणं तारस्वाती पस जोयण अबहार सरे विमाणे जारं चरति, तयाणं असीत जोयण अवाहाए चंदेवि. माणे चार वरति, तयाण बीसं जायण अवाहाए तरारूवे चारं चरति एवं जहेय जीवाभिगमे तहेव यवं सम्भंतरं जं चारं संठाणं पमाण वहति, सीहगति इ8 तारतर अग्गमाहितीतो ठिति अप्पाबहुयं जाव तारातो संखेजगुण! ॥ इति
अट्ठारसमं पाहुउं सम्म ॥ १८ ॥ का विमान है, और २०० योजन चे उपर का तारा पंडल है. ॥ २ ॥ नीचे का तारा मंडल से दश योजन ऊचे सूर्य का विमान है. उस से ८० योजन उपर चंद्र का विमान है, वहां से बीत योजन ऊंचे १ उपर का तारा मंउल है. य जैसे जीवभिगम सूत्र में कहा वैसे ही कहना. ११० योजन में ज्योतिष चक्र है. यावत् सब आभ्यंतर कौनमा नक्षत्र है ? वगैरह सब वक्तव्यता कहना. चंद्रादिक के विमान के के मंस्थान की वक्तव्यता कहना, चंद्रादिमान की लम्बाइ, चौडाइका अंगण, विमान को पहन करने वाले, शीघ्रगान, ऋद्धि. अंतर, अग्रमोहषियों, स्थिति, अल्पाबहुत्व वगैरह सब यहां कहना. यावन् ताराओं मरूपातगुने हैं. यह नद्र प्रज्ञप्ति सूत्र का अठारहवा पाहुडा संपूर्ण हवा. ॥ १८ ॥
-28- अमरहवा पहुडा 49844
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१
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अर्थ
॥ एकोनविंशतितम प्राभृतम् ॥
सा कतिणं चंदिम सारया सव्यलायसि उभासंति उजाविति तर्विति पभासंति आहिसेति वदेजा ? तत्थ खल इमातो दुबालस पडिवीओ पण्णताओ तत्येंगे एव माहंसु ता एगेचंदे एगेमूरे सव्वलोगनि भाति जाव पभासंति आहितेसि वदेजाएंगे एवं माहस। एगे पुण एवं माहंसु ता तिष्णिवंदा तिष्णियंत्र सूरे सव्यलोगंसि भासति जाब प्रभासंति आहितेति वदेजा एगे एवं माहं ॥ गे एवं महंता अट्ठ चंदा अट्ठ सूरा सलगम आभासति जाव पभासति अहो भगवन् ! मंत्र लोक में कितन चंद्र सूर्य ज्योत करते हैं, अहो गौतम ! इस विषय में अन्य तीर्थ की प्ररूपणा रूप बाह परिवृत्तियों की हैं ? किननेक ऐसा कहते हैं कि एक केंद्र व एक सूर्य सब लोक में उद्योग करते हैं। यावत् प्रकाश करते हैं. किसने ऐसा कहते हैं कि तीन चंद्र तीन ये उद्योत करते हैं यावत् प्रकाश करते हैं, ३ कितनेक ऐना कहते हैं कि आठ केंद्र सूर्य उद्यात करते हैं यावत् प्रकाश करते हैं। ई यो जिस प्रकार तीसरे पाडे में बारह प्रवृत्तियों कही है। सब कहन जैसे सात चंद्र- सान सूर्य,
भव भीमा पाहड़ा कहते हैं. सपने हैं यावत् प्रकाश करते हैं ?
चालवा मुनि श्री अलक ऋषि
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O THE EYE 71
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एवं एएणं अभिलावेणं जाव थेव ततिए पाहुडे दुवालम पडिवत्तीओ ताओ चत्र इहवि जेयव्या. व सत्त दस जाव चवतरि चंद सहस्स बावत्तरि मरिय सहस्म सबलोगंसि उभासंति आहितेत बदेजा एगे एक माहम ॥ १॥ वयं पूण एवं व्यामो सा अयण्णं जबद्दीदीवे जाव परिषखेजता जबदीवेणं दिवेणं दिवे दो चंदा पभासिनु पभासंति जहा जीवाभिमे जाव ताराओ ॥ २ ॥ त! जंबदीवेणं दीव लवणेनाम समुह बटु बलयागारे संठिते सध्यओ समंता
Hig
Aibe Bhaiti
उन्नीसवा पाहडा
१५ चंद्र दशसर्गरह चंद्र बारह सूर्य ७ च्यालीम चंद्र थालीन मूर्य ८ बहत्तर चंद्रबहसर सी गलीस मा चंद्र बयालीस सा सूर्ण १० बहत्तर मी चंद्र, हत्तर सो मूर्य, ११ यालाम हजार
मरीम रजार पूर्य १२ वहत्ता हजार चंद्र बार इनार सूर्य सव लोक में उद्योत करते हैं यावत् है - प्रकाश करने ॥ १ ॥ इस कथन का ह। एने कहते कि यर जम्बुद्धीप नामक एक लक्ष योजन
कारमा चौदा यावत् कमिवाला है. इस में दो चंद्र दो सूर्य उद्यान करते हैं, सपत. यावत् प्रकाश T.रने *. इस का कथन से जीना भिगम में कहा कैनै जानना. अर्थत् दो मूर्य तप. तपते हैं व तपेंगे.
१७६ मा ३५६ क्षत्रोंग योग किया. करत हैं व करेंगे. एक लाख तेत्तीस हजार ना सो पञ्च स केटाहो नाराओंने शोभा की, शेभा करत हैं व शोभा करेंगे ॥२॥ इस जम्बूद्वार नामक दीप को
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48 अनुवादक चालब्रह्मचारी मुनि श्री अमालक
संपरिक्खिवित्ताणं चिट्ठति, ता लवणं समद्दे किं समयकाल संठिते बिसम चकवाल सठित?ता सम चक्काल संठिते नोबिसम चक्कबाल सठिते, ता लबणेणं समुद्दे केवलियं चकवाल विक्खमेणं केवतियं परिक्त्रेणं आहितति वदेजा ? ता दोय जोयण सय सहस्सातिं चक्कवालविक्खंभेण पण्णरस जोयण सबसहस्नाति एक्कासी च सहस्त गत उगालसिं जाय गए किंचि विसेसूणा पक्खेत्रेण ॥ ता लत्रणणं समुद्दे चतरि चंदावा जाव ताराता ॥ ३ ॥ ता लवण समुद्दे घायति संड णावं दीये लवण समुद्र गोल वर्तुलाकार चुड़ी के संस्थान से संस्थित है. सत्र चारों तरफ परिधि मे अहो भगवन् ! यह लक्षण समुद्र क्या सम बाल संस्थानकाला है या न चल संस्थावला है ? अहां गौतम ! यह लवण समुद्र सम चकालस्थत है परंतु भगवन् ! यह लवण समुद्र कितना चक्राकार चौडाइ में है और
हु
लाख योजन चक्रवाल में चौडइ है और इस की परिधि १५८११३२ योजन में कुछ न्यून हैइस लवण समुद्र में चार चंद्रने प्रकाश किया, प्रकाश करते हैं व प्रकाश करेंगे यावत् तारा पर्यंत कहना. अर्थात् ४ चंद्र, ४ सूर्य, ३५२ ग्रह, ११२ नक्षत्र और २६७४०० क्रोडाकड ताराओं का जानना ॥ ३ ॥ चारों तरफ वर्तुलाकार 'संस्थानवाला
लण
समुद्र की
घातकी
खंड
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चक्रवाल संस्थित नहीं है. अह है ? अहो !
यावत् ।
:काशक- राजाबहादर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी ●
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सत्र
स
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बट्टे वलयाकार मंठते जाव चिति ॥ ता धायात खंडे दिवे किं समचक्कबाल संठिते, एवं विश्वंभी परिक्खयो जातिसं जहा जीवानिगम जान तारातो ॥ ४ ॥ ता धायति संडणं दिवे कालोरणं समुद्दे पट्टे वलयागारे जाव चिति ॥ ता कालोएगं समद कि समचमवाल संठिते विसम अब ल. एवं विक्खंभो परिवखेवो
आतिसंच भाणि यवं जाव ताराता ॥ ५ ॥ ता क.लोयणं समुंद पुक्खरवरेणं हीवे रहता है. अहो गौतम ! धातकी खंड क्या कम चक्रवाल संस्थानवाला है या वि चक्रवाल संस्थानवाला है ? अहो मौतन !ी जीवाणगय सूत्र में कहा वैसे ही यत्रो जानना. यावत् = मारा पर्यत करना. धातको खंड चार सय योजन का चकमाल में पडइ में हैं. उम की परिधि ४११०९६. योजनमें कुछ अधिक है. इनमें १२ चद्र. १२ सूर्य, १०५६ ब्रह,३३७ नक्षत्र और ८०३७०० क्रोडाकड साराओं है. ॥४॥ इस धातकी खंड की चारों तरफ कालदचि समुद्र वर्तुळाकार रक्षा हुआ है. अहो भगवन् ! यह कालोदधि समुद्र काममचारी यादिपप जमवाल है ? अहो गोरूम ! इम की डाइ, परिधि, यात तारा यह सब जीवभिगम सूत्र में जानना, यह क लोदधि ममुद्र आठ लख योजन का चक्रवाल से चौडाइमें है, इन की परिधि ५१७०६०५ योजन से कुछ अधिक की है. इस में ४२ चंद्रा, ४२ सूर्य. ३६९६ ग्रह ११७६ नक्षत्र २८१२९५० कोडाकोड ताराओं६ ॥५॥ उम
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उनीसग पाहुडा 41842
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अनुबादव-ब लब्रह्मचारी मुनि श्री अमौसख ऋषिनी १
वढे वलयाकार जाव चिट्ठति, तं. पुखरवरेणं दिवे किं समचक्कवाल विक्खंभो परिक्खेवो जोतिमं जाव तारातो ॥ ६ ॥ ता पुक्खरवरदीवरतणं दीवस्स चकवाल विक्खंभस्स बहुमज्झदेसभागे एत्थणं माण सुत्तरेणाम पवते ब? वलयाक र संठाण संठित पत्ते जेणं पुक्खरवर हवं दुहावि भयमाण २ चिटुंति तंजहा
अभंतर पक्खरडंच वाहिं पुक्खरखंच ॥ ७ ॥ ता अभितर पुक्खरहेणं कालोदधि समुद्र का चारों तरफ पुष्कर वर नामक द्वंप वर्तुलाकार रहा हुवा हैं. यह पुष्करनर नामक तैप क्या मम क्रमाल है या विषम चाल है ? अहो गौतम! इम का विभ, परिधि यावत् तारा पर्यत बनीवाभिगम सजानना. अर्थात् यह पुष्क बग्दै प लह लाख योजन का चक्रवाल से चैरइ वाला है. इस की परिधि १२२८१८१३ मे कछ अधिक की है. इस में १४४ चंद्र, १४ १२६७२ ग्रह, ४.३२ नक्षत्र, १६४४४०० काडाड तागा हैं. जिस में से ७२ चद्र, ७२ १६३३६ ग्रह, २०१६ नक्षत्र, ४८२२२०० कोडकेड तारा इतने स्थिर है. और इतने ही चलते हैं । इम पुष्करबर नामक द्वैप की १६ लाब योजन की चक्रवाल चौडाइ के बहुन मध्य भाग में मानुष त्तर नापक पर्वत है. यह मानुत्तर नामक पर्वत यतलाकर चुडी के आकार वाला है. यह पृष्करवपद्वीप आम्यं र पुकारवाहीप व बाल पुष्करवर द्वीप ऐसे दो भाग करके रहा हुवा है. ॥ ७ ॥ यह
पकाशक राजावहादुर लाला मुखदवसायजी ज्वालामसाटा.
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३१३
अर्थ
कि समचकवाल संठिते, एवं विक्खंभो परिक्खेवो जोतिसं जाव तारातो ॥ ८ ॥ ता मणुस्सक्खेत्तणं केवतियं आयाम विक्खंभेणं वदेजा ? एवं विक्खंभो परि
खवो जाति जाव ताराओ एगससिपरिवारो तारागण के डाकोडीगं ॥ ९॥ ता पुक्खरवरण दीव पुक्खरोदेनाम समुदे वटै वलयागारे जाव चिटुंति एवं विक्खंभो आभ्यंतर पुष्कर इन्द्वीप क्श सप चक्ररालस्य न घाला है या विषम चक्रवाल संस्थान वाला है ? यह आभ्यंतर अर्ध पष्करप ट ल ख योजन का चक्रवाल, चौडा है. इसकी परिधि १४२३०२४९ योजन मे कुछ अधिक की है इस में ७२ चंद्र बौरह सब पूक्त कहा वैसे कहना यावत् ४८२२२ केटाकेड तारों ८ ॥ अहो भगवन् ! मनुष्य क्षेत्र कितना लम्बा चौडा है ? अहो गौतम ! मनुष्य क्षेत्र ४५ लाख य जन का लम्बा चौडा है. इस की परिधि १४२३०२४२ योजन में कछ अधिक की है। इस में १३२ चंद्र. १३२ सूर्य, ११३१६ ग्रह, ३६९२ नक्षत्र व ८८४०७०० क्राडाकेड तारों हैं :
चंद्र की दो पंक्ति हैं तद्यथा-६६ चंद्र की पंक्ति ऋत्य कून में हैं और ६६ चंद्र की पंक्ति ईशान कून 14 वैसे ही १३२ सूर्य की पंक्ति हैं, जिम में ६६ मूर्य की एक पंक्ती भनेकून में हैं और ६६. सूर्य की दूरी
पंक्ति वायव्य कून में. ये मेक पर्वत की चारों और चलने हैं. एक न्द्र का परिवार ८८ ग्रह, २८ नक्षत्र व ६६९७५ के डाकेड तारा भोंदा है ॥ ९॥ इस पुष्करवर द्वीप को पुष्करोदाचे नामक
पानिएमा पछुपा 4
उनीमवा पाहुडा 4344
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परिक्खेवो जोतिसंच भाणियवं जहा जीवाभगमे जाव संयंमूरमणे । ॥ इति ।
एगूणवीसमं पाहुड सम्मत्तं ॥ १९ ॥ * * * * * . . . समुद्र वर्तलाकार है. यह ३२ लास योजनका चक्रवाल से चौडाइ में है, इस की परिधि ३९५२८४७. योनसे कुच्छ अधिक कही. इस में ४१२ चंद्र ४९२ सूर्य ४३२१६ ग्रह १३७७६ नक्षत्र. ३२१५१७ डाकेड ताराओं हैं. इस का सब कथन जीवशाभिगम सूत्र से स्वयंभूरपण समुद्र के अधिकार पर्यंत या 1. यह गुन्नी वा पाहुडा संपूर्ण हुवा.॥ ११ ॥
अनुवादक-बालब्रह्म चारी मुनि श्री अमोलक ऋषेनी
• प्रकाशक राजीवहादुर लाली सुखदेवसहायजी माला प्रमादबी
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Aammanmmmmmmmmmmmwom
॥ विंशतितम प्राभृतम्। ता कहते अणुमावे आहितेति वजा ? नत्थ खलु इमाओ दोपडिवचीओ पण्णत्ताओ तंजहा. तत्थणं एगे एव माहंसु-चंदिम सरियाणं नो जीवा अजीवा नो घणझ. सिरा, कायरबोंदिधरा कलेबराणस्थिणं तसि उहाणेतिवा कमेतिवा क्लेतिवा वीरिएतिबा परिसक्कार परकम्मेतिवा, ते नो विजांत लवंति नो असणि लवंति ३३। नो थगि लति अहेणं बादर काइयाए समच्छंति,अहेणं बादर वाउयाए समुच्छितिचा ..... विजय लवंतिवा असणि लवंति थगियंपि लवति ॥ ॥ एगे पुण एवमाहंसु ता . चंदिम सूरियाग जीवा नो अजीवा घणा. णो झानिरा बादर बौदिधरा कलेवरा अब यसमा पाहुडा कहते हैं. अहो भगवन् ! अनुभाव कैमे कहा ? अहो गौतम ! इस विषय में अन्य तीथि की प्ररूपणा रूप दो परिवृत्तिों कही है. कितने ऐमा कहते है कि चंद्र सूर्य जीव नहीं परंतु अजीव हैं, घनिविड नहीं हैं परंतु भूमिर पाले हैं बादर शरीर धारण करेवाल कलेवर मात्र हैं.
६. उत्था . कर्म, बल, कार्य व पुरुषात्कार पराक्रम नहीं है. विद्यत्ममान चेन परतने हैं, असंही जैसे ही बोली, बर्षा जले गरिव नहीं करते हैं, परंत बादर काय अथ 1 वादर वायु काया में से संपूच्छिमपने उत्पन्न होकर विद्यत्वमान प्रवर्तते हैं यावत् मेघ गर्जना करते हैं. दूसरे ऐसा कहते हैं कि चंद्र सर्य जोर हैं परंतु अजीव नहीं है. धन निषिद्ध है परंतु पोलारवाले नहीं हैं. बादर शरीर के धारन
बीमवा पाहुग"
mamamamaecovernmanna
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अर्थ
मानवादक-पालनमचारी मुनि श्री अमालक पिजी
' अत्यि तेर्सि उठाणेतिवा जाव परिसकार परकमेतिवा तेणं विपि लवंति..
असणिपिलवंति एग ए। माहंम ॥१॥वयं पण एवं वयामो,ता चंदिम परियाणं. देवा है महिड्डिया जाव महामुक्खा वरवत्थधरा वरगंधधरा वरमल्लधरा वराभरणधरा अवोछिन्नणयट्रयाए अण्णचयति अण्णे उबरजति आहिते ते वदेजा।।२॥ ता कहं ते. राहु कम्मे आहितेति वदेजा तत्थ खल इमातो दो पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ तंजहा तत्थेगे एव माहंपु ता रिण से राहु देवे जण चंदिम सूरंच मिण्हति . एगे एवं
माहसु ता गस्थिणं ते राहु देवे जणं चंदं मरंच गिव्हंति ॥३॥तत्यणं जेते एव माहंसु करनेवाली परंतु उन को उत्थान कर्म वल वीर्य व पुरुषात्कार पराक्रम है. वे विद्युत्ममान प्रवर्तते हैं. वन समान करते हैं, मेघ ममान गरिव करते हैं ॥१॥ इस कथन को हम इस प्रकार कहते हैं कि चंद्रमा व सूर्य दोनों देव है. वे महद्धिक यावत् महा मुखवाले हैं. श्रेष्ट वस्त्र धारन करनेवाले हैं, श्रेष्ट गंध धाग्न करवाले हैं, श्रष्ठ माला धाग्न करनेवाले हैं, श्रेष्ठ आभरण धारन करनेवाले हैं, वे अनिच्छिम्रपना से आयष्य का क्षय होने से चरते हैं और अन्य उत्पन्न हाद ॥२॥ अहो भगवन् ! र.हु की क्रिया कैसे कही? अहां गौतम : इस विषय में अन्यतीर्थ की प्ररूपणा रूप दो पडित्तियों कही. कितनेक ऐमा कहते हैं कि राहु देव है कि जो चंद्र सूर्य ग्रह कर ग्रहण करता है २ और कितनेक ऐमा कहते है कि जो चंद मर्य को ब्राण करता वह राहु नहीं ॥३॥ जो अन्य तीथि ऐसा कहते हैं कि चंद्र सूर्य कोई
राजामहादुर छाला सुबदा सहायनी मालाप्रसादजी.
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सूत्र
अर्थ
सङ्घदश चंद्र प्रति सूत्र षष्ठ- ऊपाङ्ग 49+
ता अस्थि से राहुदेवे जेणं चंदसूरंच गिव्हंसि तेणं एवं माहंस ताराहु देव चंदसरंच गिण्हमाणे बुद्धत्तेणं गिण्हंति बुद्धं तेगं गिव्हंत्ता बुद्धले मुयति, बुद्ध तेणं मुबतित्ता मुद्धतेगिण्हत मुद्धतेनं गिण्हतित्ता मुद्धणं मुयति, वामं भुयत्तणं गिन्हति २त्ता वामं भुयं तेणं मुयति, वामभुयंचेगं गिण्हइत्ता. दाहिंग यंतणं मुपति, दाहिण भुयं तेणं गिरहंतित्ता वामभयंतेणं मृयति, दाहिण भूषाव्हइत्तः दाहि भुषणं मुयति गए मासु एव ॥ ४॥ तत्थ ज त एवं माहंनु ता पत्थिण से राहुदेव जेणं चंदसरंच गिव्हइ,
जो ग्रहण करता है वह राहु है. उनका कथन
है कि
देव चंद्र सूर्य को ग्रहण करता हुवा अधोभाग से ग्रहण करत है और भो भाग छोड़कर चलता है. अधोभाग से ग्रहण करलेता है। और ऊर्ध्व भाग से छोलत है, ऊर्ध भाग से ग्रहण कर उठता है और अधोभाग से छोड़ता है. ऊर्ध भाग से ग्रहण है और ऊर्ध भाग से छेडता है जाम भूजा से ग्रहण कर वाम भूजा छोडती है. राम भूतकर दक्षिण की पूजा मे छंडता है, दक्षिण भूजा से ग्रहण कर राम भूजास छोड़ता है, दाक्षण भूज ग्रहग कर दक्षिण भूना से छोड़ता है. यों किततेक कहते हैं || ४ || अब जो अन्य तीर्थ एमा कहते हैं कि चंद्र सूर्य को जो ग्रहण करता है व राहु देव नहीं है. इन का कथन ऐसा है कि पंचरह
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पत्रा पाहुडा
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३१८
- अनुदकालव्रह्मा मुनि श्री अपोषिजी
तेणं एव मासु तत्थ खलु इमे पणरस कसिणापुग्गला पण्णत्ता तंजहा-सिंघिडए, जडिलए, खतए, खरए, अजणे, खंजणे, सीतले, हेमसीतले, कैलासे, अरुणप्पहे पभंजणे नभपू ए, कविर ए, पिंगलए, राहु॥ता जयाणं एए पण्णरस कसिणा पोग्गला सत्ता चंदस्त्या सुरवा लेताणुबंध चारिणो भवति, तताणं मणुसलोगे मणुस्सा वयंति एवंखलु राह च वा सूरवा गिव्हति। ता जयागं एए पण्णरस कसिणा पोग्गला नो चंदस्सबा सूरस्स लेसाणुबंध चारिणो भवति, तयाणं मणुस्सलोगे मणुसावयंति एए खलु
राहु चंदं भूरबा गिण्हइ एगे एवं मासु ॥ ५ ॥ वयंपुण एवं वयामो प्रकार के कृष्ण पुदल करे जिनके नाम-१ सियाटक २ जटिल ३ क्षुल्लक ४ खर ५ अंजन ६ खंजन ७ शोडल ८ मिसीतल ९ कैलान १० उरुगमय ११ प्रभंजन १२ नभएर १३ कपिल १४ पिंगल और ११५ राहु. जब उक्त पनाह प्रकार के कृष्ण पुदल संपूर्ण चंद्र अथ। सूर्य को लेश्या को आवरणरूप
तब मनुष्य को एकिन है किरहु चंद्र दर्य का ग्रहण कर है. और जब उक्त पन्नाह से प्रकार के कृष्ण पहली चंद्र मूईको आवरणरूप नहीं होने तब मनुष्य लोक में एना कहते हैं कि गहु चंद्र सूर्य को ग्रहण नहीं करता है ॥ ५ ॥ भगवान कहते हैं कि इस कथन को मैं इस प्रकार कहता हूं कि
प्रकाशक-रामवहादुर लाला सुखदेवमहायमी ज्वालामसदानी .
अर्थ
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सूत्र
અર્થ
488+ सप्तदश चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र षष्ठ उपाङ्ग
राहु देवे महिडिए जाव महालक्खे वरवत्थधरे जाव वराभरणधारी राहुस्सणं देवस्स णवणामधिज्जा पतंजहा- सिंघाडए, जडिलए, खत्तते, खरन्ते, देदुरे, मगरे, मच्छे, कच्छभे, किण्हस ॥ ६ ॥ राहुस्सणंदेवस्सविमाणा पंचत्रण्णा पण्णत्ता तंजहा किण्हा नीला लोहिया हालिद्दा सुकिला ॥ ७ ॥ अस्थिकालए राहुत्रिमाणं खंजण पण्णत्ते, अस्थि पीए र है बिनाणे लाउवण्णा पण्णत्ते, अस्थि लोहिए मजिट्ठाण्णाभ पण्णत्ते, अस्थि पीएहालवण्णाभे पण्णत्ते, अस्थि सुकिल्लए मासिवण्णाभे पण्णत्ते ॥ ८ ॥ ता जयाणं राहु आगच्छमाणेषा गच्छमाणेया विउन्त्रमाणेवा परियारेमाणेवा
राहु देव महर्द्धिक यावत् महा मुखवाला है. श्रेष्ठ वस्त्र धारत करनेवाला, श्रेष्ठ आभूषण धारन करनेवाला है. { इस राहु देव के नव नाम कहे हैं तथथा -- १ सिंघाटक २ जटिल ३ क्षुल्लक ४ स्वर ५ ददुर ६ मगर ७ मच्छ १८ कच्छ और ९ कृष्ण सर्प || ६ || इस राहु का विमान पांच वर्णवाला कहा है तद्यथा-१ कृष्ण २ नील ३ रक्त ४ पीत और ५ शुक्ल ॥ ७ ॥ राहु का कृष्ण वर्ण का विमान खंजन के वर्ण समान है, २ नीलवर्ण वाला राहुका विमान तुम्बे के वर्ण जैसा है ३ रक्त राहुका विमान मंजीठ के रंग समान ४ पीला राहुका विमान हल्दी के वर्ण समान है. और ५ शुक्ल वर्ण वाला राहुका विधान भ समान है. ॥ ८ ॥ जब राहुदेवता जात-- हु, आता हुवा, विकुरण करता हुवा, व परिचारणा करता
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* बीमचा पाहुडा
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चंदस्सा सरस्सवा ले परस्थिमैणं आवरित्तागं पचात्यमणं वितिवयति, तयाणं पुरथिमेण चं सुरे उबन्द प्रति पञ्चस्थिमेणं गहु, जयाणं गहु आगग्छमाणेवा जाव परियारमाणेवा चंदस्वास्साबले पञ्चायणं आवरिता पुररियमणं विसिवयति तयाणं पञ्चत्यिमेश चंदे मरे । उबदलीत. पु. त्यनेजरहु, एक एएण अभिलावेगं दाहिणणं आवरि. त्ताण उत्तरणं वितियइ उत्तरगं आवरिनाणं उन्तरपञ्चत्थिमेश विनिविड, दाहिग
पञ्चत्यिमेणं आशरत्ताण उत्तरपुरगत्थमणं चितिवयइ, उत्तरपलायनणं आवरिताणं हवा चंद्र अथवा सूर्य को लेश्या (कारण) को पूर्व में से आवरण कर पश्चिम दिशा में जाता है तब पूर्वदिशा में चंद्र सर्य दखावे और पश्चिम दिशा में राहु देखावे, जब राहु जाता हुना, आता हुना. यावत परिचारणा करत हु । चंद्र या सूर्म की लेइपा का पश्चिर से ढक कर पूर्व में जाता है तब पश्चिम चंद्र मूर्ग देखा है और पूर्व में राह रहता है. ऐसे ही दक्षिण दिशा में सूर्य की ढककर उत्तर दिशा में राहु जाता है तर दक्षिण दिशा में चंद्र सूर्य दीखता है और उत्तर दिशा में राहु रहना है. मे ही उत्त दिशा में चंद्र सूर्य के ढक कर दक्षिण दिशा में जब गहु जाता है नब उत्तर दिशा में चंद्रमा मू
दीखता है और दक्षिण दिशा में राहु रहता है. जब चंद्रपा मूर्य की लेश्या को दक्षिण पूर्व 12( अग्निकून ) में से ढक कर उत्तर पश्चिम (वायव्यकून ) में राहु जाता है तब आमकू। में चंद्रमा ।
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अग्लक ऋषिजी
• पकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वाला माजी +
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सूत्र
समदश चंद्र प्राप्ति सत्र-पष्ट उपाङ्ग
दाहिण पुरथिमेणं वितिक्य; उत्तरपुरत्यिमणं आवरिक्ता दाहिणपञ्चत्थिमेणं वितिवयति ता जयाणं उत्तरपुरस्थिमेणं चदे उबदसति दाहिण पत्थिमेणं राहु ॥ ९ ॥ ता जयाणं गहु आगच्छमाणेवा गच्छमाणेबा विउव्वेमाणवा परियारेमाणेवा चंदस्मलेसे आवरेमाणे चिटुति तयाणं मणस्मलोगे मणुस्सा वयति एवं खलु राहुणा चदे।। सरेवा गहिए, एवं ता जपाणं राह आगच्छमागेवा गच्छमाणवा जाव परियारेमाणेवा चंदस्सवा सू
रस्स लस्सा आवरेत्ता पासणं वितवयति तयाणं मणुस्सलोगे मणुस्सावयंति एवं खलुचंदेवा सूर्य दीख ता है और वायएयून में रहु दीवाता है. जब दक्षिण पश्चिम नैऋत्य कूल में से चंद्र सूर्य की या को ढक कर उत्तर पूर्व (ईश नकून ) में जब राहु जाता है. तब नैऋत्यकून में चंद्र सूर्य दीखाते ज्य
पार ईशान में राहु रहता है. जन्म वायव्यसूत्र में चंद्र सूर्य की लेइया ढककर अग्निकून में रहु जाता है वापव्यकून में चंद्र सूर्य दीखाते हैं और अशिकून में गा रहता हैं. जब ईशानकून में चंद्र मूर्य की लेश्या ढककर नैऋत्यकून में राहु जाता है. तब ईशा-कून में चंद्र मूर्ष दीखाते हैं और नैऋत्यकून में गहु रहता हैं. ॥ ॥ जब राहु जाता आता हुवा रिक्षणा करता हुवा या परिचारणा करता हुवा चंद्र अथवा मूर्ष की लया को आवरण करता हुवा रहता है त मनुष्यों कहते हैं कि राहुने चंद्र व सूर्य को ग्रहण किया. जब राह नावे आत, विकुर्वणा करने अथवा परिचारणा करते चंद्र सूर्य की लेश्या का
++8% बीपका पाहुड
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सूत्र
अर्थ
अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक
सूरेणं राहुस्सकुच्छी भिन्नाए, एवं ता जयाणं राहु आगच्छमाणेवा गच्छमात्रा जा परियारेमात्रा चंदरसवा सूरस्सवा लेस्सं आवरित्ताणं पञ्चोसकाइ तयाणं मणुरसलोगे मणुस्सावयंति एवं खलु चंद वा सूरे वा राहुण ते । एव ता जयाणं आगच्छमाणेवा गच्छमाणेवा चंदस्सा सूरस्सलेस्सा आवरताणं मज्झेणं वितित्रयति तयाणं मणुरसलोगे मणुस्सा वयति एवं राहुणं चंदेवा सूरेवा विश्वति चरिए, एवं ता जाणं राहु आगच्छमाणेवा गच्छमानवा चंदरसवा सूरस्सलेस्सं अहे पक् सपडिदिसिं आवरेमाणे चिट्ठति तयाणं मणुस्तलोगे मस्तावदंति एवं खलु राहु । चंदेवा सूरेवा घत्थे एवं कति
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आवरण कर पास से होकर जाते तव मनुष्य लोक में मनुष्यों कहते हैं कि चंद्र सूर्य की कुक्षि राहुने { भेदी. अर्थात् राहु के अंदर में चंद्र सूर्य गया. ऐसे ही राहु जाते. आते, दुर्वणा करते अथवा परिचारणा चंद्र अथवा सूर्य की देखा हो आवरण कर पीछा नीकलत मनुष्यलोक में मनुष्यों कहते हैं कि राहुने चंद्र सूर्य का मन किया. ऐसे ही जब राहु देवता जाते आते विकुर्वणा करते या परिचारणा करते {चंद्र अथवा सूर्य की लेश्या को चारों दिशा में ढककर रहता है तब मनुष्य लोक में मनुष्य कहते हैं राहुने अथवा सूर्य का ग्रहण किया अर्थात् खग्रास हुवा. ॥ १० ॥ अहो भगवन् ! राहु के कितने भेद कहे
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• प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्यालाप्रमादजी ०
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प्ति-मूत्र पष्ठ-उपाङ्ग
पण्णत्ता?गोयमा दुविहे राहु पण्णत्ता तंजहा-धूवराहुय पव्वराहुय ॥११॥ तत्थणं जैसे धुवराह सेणं बहुलपक्खस्स पडिवए पण्णसति भागेण पण्णरस भाग चंदस्स लेस्सं आवरेमाणे चिट्ठति तंजहा-पढमाए पढमं भागं वितियाए वितियभागं जाव पण्णरसेसू पण्णरसमभागं, चरमसमए चंदेरत्ते अवति अवसेस समए चंदेरत्ते विरत्तेवा भवति।।ता
मेव नुक्कपक्खन उबदंससाणे २चिट्ठति तंजहा पढमाए पढमभाग जाव पण्णरसं भागं चरम . समए चंदे बिरत्ते भवति अब समए चंदे रत्तेविरत्ते भवति।। १२॥ तत्थणं जैसे पवराह हैं ? अहो गौतम ! राहु के दो भेद कहे हैं जिन के नाम-१ धृवराह और राहु ॥ ११ ॥ इन
में पे जो धृवराह है वह कृष्ण पक्ष का प्रतिपदा के दिन पनवे भाग से कार पारवे दिन पिचर भाग को चंद्र लेप का आवरण कर रहा है. तयथा. प्रतिपदा को पवन भाग, द्वितिया को दोहर भाग यावत् चतुर्दशी के दिन चवदह भाग १५ सयास्वादन जाह भाग. चरम समय में चंद्र रक्त होकर आवरण करने वाला डा. अनि अमावासपा के चरम सम्पमें चंद्र को सर्वथा प्रकार
से आवरण करता है. अमावास्या का चरा समय वर्मवर शेपममय में चंद्र रक्तबमिरोवे. वैसे ही 7. शुक्ल पक्ष मे चंद्र को बताता हुमा राहु रहता प्रतिपदो को एक भाग यावत् पचरहवी तीथी।
का पन्नरह भाग पूर्णिमा के चरम समय में चंद्र विरक्त होये व शेष समय में चंद्र रक्त व विरक्त होता है ॥ १२ ॥ जो पर्व राहु है वह जघन्य छ मास उत्कृष्ट ४२ मास में चंद्र का ग्रहण करे ।
→ बसमा पाहुडा 2
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से जहण्णेनं छण्ड मासाणं उक्कोसेणं बयालीसाते मासाणं चंदरस अडतालीसति संवच्छराणं सरस्त ॥ १३ ॥ से केणट्रेणं एवं बच्चइ चदे ससी ? गोयमा! चंदरसणं जोतिसिंदस्स जोतिस्सरन्नो मियके विमाणं कंता देवा कंतातो देवीओ कंताति आसणसयणखंभ भंडमत्तोवरणाई अप्पणावियणं चंदे जोतिसिंदे जोतिसराया सोने कंते मुभगे पियदमणे सुरूवे ता सेतेणटेणं एवं वुच्चइ चदेससी ॥१४॥ सेकेणटेणं एवं वुच्चति सूरे आइच्चे ? गोयमा! ता सूरादियाण समयातिवा आवलियातिता जाव
उसीप्पणितिवा अवसप्पिणितिवासेतेण?ण एवं वुच्चति सूरे आइच्चे ॥ १५ ॥ता चंदस्सणं और जघन्य छ मास उत्कृष्ट ४८ वर्ष में सर्य का ग्रहण करे ॥१३॥ अहो भगवन् ! चंद्र को शशी क्यों कहा ? अहो गौतम ! ज्योतिपि के इन्द्र ज्योतिषि के राजा चंद्र को मृा के चिन्ह वाला मृगांक नामक विमान है, मनोहर देव व दरियों , पनाहर आसन शयन भंड व उपकरण हैं, ज्योतिपि का इन्द्र ज्योतिषी का गना चंद्र सायमन शीतलकारी, सौभाग्यकारी प्रेमका सरूप है. इसलिये चंद्र का शशी कहा है. ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! सूर्य को श्रादित्य क्यों कहा? अहो गौतम ! सूर्य आदि करने
वाला, समय. आयलिका, भासा उश्वास, स्तोक, लव, मुहूर्न, अहराधि, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, 17युग यावत् अवसर्पिणी उत्सर्पिणी का करने वाला है. इस से अहो गौवम ! सूर्य को आदित्य कहा है.
4 अनुवादक-गालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादर्ज .
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सदश-चंद्र प्राप्ति मूत्र षष्ठ उपाङ्ग Katha
जातिदस्स, जोतिसरेनो कतिअग्गमाहासिणी पण्णता?गोयमा तारि अग्गमाहिसीओ पपणत्ताओ तजहा-चप्पहा सदसणा अच्चिमालिणी, भंकरा॥ तत्थमं एगमेगाए देवीए चत्वारि २ सहस्तणं रूवं विउवित्ता एवं तंचव पव्व भणियं अटारसमे पाहडे तहामेयवं: जाब नो मेहनवत्तियं एवं सरस्सवि।।१६।। ता सरिय चंदमाणं जोतिर्सिद जोतिमरायाणो करिसए कामभोग पच्चणभवमाणा विहरति ? गोयमा ! से जहा णामए कतिपुरिसे
पढम जोवणट्ठा बलत्थए । पढन जावट्ठाण वलत्याए ठाणत्थ चव भारियत्ताए ॥ १५॥ अहो भगवन् ज्योतिषी राना मोतिषी का इन्द्र चंद्र को कितनी अग्रपतिषियों क. १३ अहोगौतम ! चार अनडिपियों की. जिन के नाम-१ चंद्रप्रभा २ सुदर्शना, ३ चिमाली व ४ प्रभं-१० करा. एक २ इन्द्राणी चार २ हजार रूपका वैक्रर करे वगैरह अठरवे पहुडे में जैसे जीवाभिगम सूब की मादोदी यहां जानना. यवत् पैथन करे नहीं. जैसे चंद्र की चारों इन्द्राणी का कहा करे? ही मर्य का जानना. थुन नहीं करते हैं करना भगवती के दशो शतक के पांचवे उद्दशे में कहा है। ॥६॥ अहो भगान् ! गेतिषी के इन्द्र व ज्योतिषी के राजा चंद्र सुर्य कैसे काम भोग भोगते हुव विचर रहे हैं? अहो गौतम ! प्रथम यौवनावस्था में प्राप्त हुवा कोइ पुरुष प्रथम यौवनावस्था वाली भार्या की साथ विवाह करके तुस्त ही पन की पाति के लिये परदेश गया. वहां सोलर वर्ष पर्यंत सब
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पास पाहडा 4228.
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भी अमोलक सपिजी ।
सद्धिं अचिरत्त विवाह कजे अत्थगवेसणताए सोलसवास विष्पवासिते सेणं ततो लढे कातकजे अणह समए पुण विसयं गिप्हं हन मागते हाए जाब सरीरे विभूसिए मणण्णं थालि पाकसिद्धं अट्ठारस बंजणाउलं भोगणं समाणे तांति तारिस गमि बालघरंसि असितओ सचिन्द कस्मे वाहिरड दुमित घटुमदु विचित्तउलोय बिलगतिलेमानिरयण पणालयंधपारे, बहुसमरमणि शनिभागे पंचवण्णरस सुरभिमक पुप्फ पंजोबयारे कलिते कालागरूपवर कुंरुदक्क तुतकधूप मघमघातं
गंधूताभिराने सुंगधवरगंधिए गंधिवाहिए, तासि तारिसमांसि सपजिसि सालिंगणा अर्थ सारन में विजय या किसी का विधा नहीं आया. इस तरह करके अपने घर आया आकर स्नान किया, मॉलीकार्य किया, सब अलंदारविभूतिमा. पोश स्याल में पश्वास व व अठारह प्रकार के शाफ तहत भोज या. पोर पुल्यत का योग्य अंदर विच प्रकार के चित्रों वाला,बाहिर स्वच्छ करके अनेक प्रकार चित्रों साला,उपरपडे की छत वाला, रलो जडित भूलवाला, उज्जल उद्योतवाला, बहुत रमणीय भूमिभागमें पंचवर्ण रस सहित सुगंधित पक्ष्यों का ढग वाला, कृष्णवर्ण सुगधि द्रव्य व कुंघरुकादिक धूप से मघमघायमान सुगंधित पदार्थों सहित रहने के घर में पुण्यवंत प्राणि
प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
अर्थ
अनुवादक-चालनमचारी
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ऋषिजी.
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कामभोगेहिंतो वाणमंतराण देवाणं एतो अणंतगुणविसिट्टतरगाचेव कामभोगा वाणमंतराणं देवाणं कामभोगेहितो अमुरिंद वजियाणं भवणवासिणं देवाणं एतो अगंतगुण विति द्रुत्तरगा चव काममोगा असुरंदवजियाणं भवण जाव भोगस्तिो असरकुमाराणं एतो अणंतगुणा असुरकुमारदाणं कामभोगेहितो गहगणगखत्ततासरूवाणं जोइसियाणदेवाणं एतो अगंतंगणा लिमिटुतरमाचेच कामभोगा गहगणगक्खत्त जाय कामभोगेहिंतो चंदम सूरियाण जोतिसियाणं जोतिसरा याणं एतो अगतगुणा विमिट्टतरगाचेव कामभोगा, ता चदिम सूरियाणं जीतसिंदा जोतिमाणा एरिने काम भोगे पच्चणुभवमाणे विहरंति॥ १७॥तत्ध खलु इमा अट्टासीति
महागहा पण्णता तंजहा-इंगालए, वियालए, लोहिताए, सांगच्छर, आहुणिए, पाहुः । अथ
वाणगंतर के कान भोगों में अमुन्द्र छोड़कर शेष भवनकासी के कामभाग अति गुने विशिष्ठतर हैं. अन्य भवननामी के कपभोगों से अमुर कुमार के कामभोग अनंतगुने विशिष्टर, असुर कुमार के कामभोगों से ग्रह, नक्षत्र व ताराओं के कामभाग अन्तगुन विशिष्टनर है. ग्रहगण, नक्षत्र व ताराओं के कामभेगों से जो.तिथी का जा, ज्योतिषी का इन्द्र चंद्र सूर्य के कामभोगों अनंतगुन विशिष्ठतर भोगवते,
हु विचरते हैं ॥ १७॥ ज्योतिषी में 8 सी मह ग्रह के हैं जिन के नाम-१ अंगारक, २ विकालक, 121३ लोहिताक्ष, ४ शनिश्चर, ५ आधुनिक, मधुनिक, ७ कनक, ८ कनकनक, २ कणग, १० चियाणक,
ramnAnamnary
अनुवादक-धालब्रह्मचारी मुनि श्री अयोलक
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी वालाप्रसाद नी.
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राइ 1.
कए कणकणए, कणग वियाणए. कणगमंताणए, सोम.साहिए, आमासणे, रुत कजोवो करणं,अयकयरर भए सख.शखरपणे, संखवण्णाभे,कसे, कंसवणे,कंसवण्णाभे निले, निलाभासे, वे, वाभास, भासे, भासरासी, तिहे, तिलपप्फे, वणे, दक्खे, दस्वतण्णे, काए, कायकंधे धुमाग धूमकेतु, हरा, पिंगलए, बुहे. बहमति, राहु अगत्या, माणवते, कासे, फासे, धूर, पमुहे, वियड. विसावी. पयल, जयल, अरुण,
अगिलाए, काले, मह काले, सोथिए, सोवत्थिए, वहमाणे, पलंव, णिचालोए,
णिजाए, सयंपहे, सेयंकरे, खाकरे, आभंकरे, पभंकरे, अरए, असोगे, अथE
११ कणमदानक, १२ सोम, १३ सहित, १४ अ.सामण, १० इ. १६ कार्यवर्त, १७ कचंडक १८ अपकरक, १९ दुहभि, २० शंख, २१ शंखवण. २२ शंखवध, २३ कंस, २४ कमवर्ण, २५ कमवणभिA १२६ नील, २७ नीलाभ स, २८ रूपी. २१ रूपीभास, ३. भाल, ३१ भासामी, ३२ तिलपुष्प, ३४
वर्ण, ३५ दक्ष, ३१ दक्षर्ण ३७ काय. ८ वापध ३९ धूमि. ४. धमत, ५१ हरि. ४२ गि १४३ बुध, ४४ शुक्र. ४० वृहसदि. ४६ राहु ४१ अस्ति १८ मानवत ४१ क स. ५: स्पर्श, ५१ धा. १५२ प्रमुख, ५३ वियन, ५४ वरान, ५५ वलय. ५६ जपल, ५७ अरुण, ५८ रंगील, ५१ काल.. महा काल ६ साथिक, ६२ सासिक६३ वर्धमान, ६४ प्रलंबना, ६२त्य लोक, ६० नित्य ज्योति ६७ स्वयंप, ६८यकर, ६९ सपकार, ७० थामंक ७१ भभकर. ७२ अरुण नागाग्रह, ७३ भरलको
समनश-चंद्र भजता मूत्रपष्ठ
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Saamammianima
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अमावदक-पालब्रह्मचारी मानि श्री वालक रिजो
बिगयो,वितले, विजये, विनाले, साले, सुव्यए, अणियष्ट, अाशि एमडी; दंडि, करकारिए, गले, पाकेतु, भावकेतु ॥ इति एक पाउछ.. (काल) , हिपण लहानपणा ॥ उकातिया भगवती, तेस्त राशि ॥ १ ॥ शहिला दिवि गारचित्रमाणि पडिगाए ॥ अबहुराए न देथा ॥ सपोरिन । भवेत्रा॥ २ ॥ सा दिइ उठाणुछ कम्बल वीस हि ॥ जोलिदिख
उबतो, अभायो पक्खि जाहि ॥ ३ ॥ सोपवयग कुलाण संघचाहिरोना १७४ विगत शोक, ७५ विचल, ७६ विवय, ७७ विशाल, ७.शाट, ७९ गया, ८. नि. १. अ १नात, ८२ एका ८३ दिनमा, ८४ कर, ८५कर की, ८६ रागठ, ८७ पुष और ८८ पहा कतं. या अव्यादी ग्रह भत्या ग्रहाचार २ हजार सामानि देव.चार २ अनघा तीन २ पारपदा देवमा २ अनिक व अधिक के शापति हैं. और सोलह आ रक्षक देव व अन्य भी सनिधनी देव व दवियों. सा का अधिपतिपना करते हुरे चिरते हैं. पूर्पोक्त श्री शशिका अर्थ प्रगट हैं. पतु अभव्य जीवों को इस का अर्थ दुर्लभ होता है ॥१८॥ यह चंद्र शनि सूरर्थाला है. इस रा इस का ज्ञान दान किम को देना किश को न देना सो दलाते हैं. यह उमा भारती श्री ज्योतिराज प्रज्ञाप्त का ज्ञान दान समयमंत्र. ग्राण करनेवाले को। ऋद्धयादि गर्व आजाने से नरकादिगति प्राप्त हो इन स उन को देना नहीं पातुं नरकादि गति मिटान
..प्रकाशक-राजाबहादुर लाचा मुखदेवपहायजी ज्वालाप्रसादनी.
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waminarmawaimadirman
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"अर्थ
-48 ससदक्ष चंद्र प्रजाति सूत्र पठ-उपाङ्ग
विणये पारहाणा ॥ अरिहंत थे गणहर मई किरहोति वालणो ॥ ४ ॥ तन्हो धिति उद्यागुच्छाह कम्बलविरिय लिक्विपना॥ धायक णियमा, णय अविगीर सुदायका ॥ ५ ॥ वीर वरस्ल भगवओ। जर मर किलेत दोस राहियस्स ॥ बंदामि विणये
पण्यो , सोलख पाइ संपाए ॥६॥ इति चंद पण्णत्तीए वीसमं पाहुढं सम्मत्तं॥२०॥ कोशति का ज्ञान दान देना. और भी जात्यादिपद युक्त, प्रत्यतीक. सिद्धांत के खंडन करनेवाले
को और जा पहश्रुत नहीं हो उसको का शारदान नहीं देना परंतु जिन प्रवन में सम्यक प्रकार से भधादिपता से शार्थ पर्याय की आलोच न करनेवाले सन्यक्वी को इस का ज्ञान दान देना. अब *शख के दान में निर्णयपना करते. ॥२॥ ज काई श्रद्धा, धृति, (धैर्य) उत्थान, उत्साह, कर्म,
बल, वीर्य, पक्षात्कार व पराक्रम मे चंद्र मज्ञाति का ज्ञान प्रात करके अयोग्य अभय को देंगे तो देनेवाले को भी इस की हानि होगी॥३॥ इस तरह अभय को ज्ञान देनेवाला साधु प्रवचः कुल गण व संघ से 5
बाहिर जानना. अरिहंत व गणवरों की मर्यादा उल्लंघनेवाला जानना ॥४॥ इस से धृति, उत्थान, A उत्साह, कर्म, बल, वीर्य से ज्ञान ग्रहण कर धारन करना. और अविनीत को देना नहीं॥६॥ जो जन्म ० जिरामरण के क्लष व अठारह दोष रहित होगये है, जिनो निराबाध मुख प्राप्त कियाहै और जो अन्य का प्रत
करानेवाले हैं. वैसे श्री चौबीसवे वर भगवान को विनय पूर्वक नमस्कार करता हूं. यह चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र का बीसवा पाहुडा संपूर्ण दुसः ॥२०॥ यह चंद्र प्रज्ञप्ति सत्र समाप्त हुवा. .
मना पाहडा
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astram * इति सप्तदश * aadeshabdkiokes - चंद्र प्रज्ञप्ति सूत्र समाप्तम्. ०
+ अनुवादक-बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलख ऋषिजी
*काशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसायजी ज्वालाप्रसादजी
ASARAMERATORS
वीर संवत २४४५ माघ वदी २ वार शनि
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________________ शास्त्रोद्धार प्रारंभ वीराब्द 2442 ज्ञान पंचमी 2- म -- DacesceDEE- NAY SAV-17 NOT इति * चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र * समाप्तम् राला मुज्वाह 9925 शास्त्रोद्धार समाप्ति वीराब्द 2446 विजयादशमी Pointo Use Only