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* अनुवादक-लब्रह्मचारीमान श्री जोकपिजी:
तयाणं इहगयस्स मणुसरस एगाहिएहिं बत्तीसाए जोयणसहस्सेहिं एगणपण्णाए सट्ठीभागेहि जोयणसट्ठिभागंच एगसट्ठीया छेत्ता तेवीसाएय चुणिया भागेहिं चक्ख. फ स हव्वमागच्छति. तयाणं अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति चउहिं ऊणादुवालस मुहुत्ते दिवसे घउहि अहिया॥८॥ एवं खलु एतेणं उवाएणं पविसमाणे सूरिए तयाणंतराओ तयाणंतरं मंडलातो मंडलं संकममाणे २ अट्ठारसट्ठी भागे जायणस्सए किंचि ऊणे एगमेगेमंडले मुहुत्तगति णिवुड्डेमाणे २ सातिरेगाति चउराती पुरिसच्छाए अभिवड्डेमाणे २ सव्व.
भतरं मंडलं उपसंकमित्ता चारं चरति ता जयाण सरिए सव्वब्भतरं मंडलं उवसंभाग होबे क्यों की बाहिर के तीसरे मंडलपर सूर्य ३१९१५ योजन, सठिये ४९ भाग और एकसठिये ३८ भाग इतना दूर से दृष्ट गोचर आता है उस में ८४ योजन साठिये १९ भाग व एकसठिये ३८ भाम दृष्टि ग चर में दान से ३२००० योजन साठिय नव भाग व ६१ ये १५ भाग हुवे. उम समय एकसठिये चार भाग कम अठारह मुहूर्न की रात्रि व उक्त चार भाग अधिक बारह मुहूर्त का दिन होता है. ॥८॥इसी ताह प्रवेश करता हुवा मूर्य आभ्यंतर मंडल २ पर रहना हुवा प्रत्येक मंडल से किंचित् कम एक योजन के साठिये अठारह भाग अर्थत् साठिये १७ भाग व १८३ भाग के १.१५ चूणिये भाग एक२ मुहूर्त में गति में मंद होता हुवा और ८४ योजन से कुछ अधिक भरत क्षेत्र के मनुष्य के चक्षुद्रष्टि का विषय बढाता
प्रकाशक-राजावादुर लाला सुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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