________________
१ अनुावदक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
कमिता चारं चरति, तयाणं सम्वन्भंतरं मंडलं पणिहाय एगेणं तासिणं राइंदिय सतेणं पंचदसूत्तरे जोयण सते विकंपावइत्ता चारं चरति, तयाणं उत्तम कटुपत्ता उक्कोसिया अट्ठारस मुहुत्ता राई भवति, जहण्णए दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति, एसणं पढमे छम्मासे, एसणं पढमरस छम्मासस्स पजवासणे ॥ से पविसमाणे सुरिए दुच्च छम्मासं अयमाणे पढमांस अहोरत्तसि बाहिराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति तयाणं दो जोयणाति अडयालीसंच एगट्ठी भाग जोयणस्स एगेणं
वतित्ता चार चरति, तयाणं अट्ठारस महत्ता राई भवति, दोहिं एगट्ठी भाग ऊणे, दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति, दोहिं एगट्ठी भाग अहिया ॥ उल्लंघकर चलता है. उस समय उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त की रात्रि व जघन्य बारह मुहूर्त का दिन होता है. यह प्रथम छमास व प्रथम छमास का पर्यवसान हवा ॥ २॥ अब वहां से आभ्यंतर मंडलों में प्रवेश करता हुवा मूर्य दूसरे छमास की अयन करता या प्रथम अहोरात्र में बाहिर के अनंतर दूसरे मंडलेपर रहकर चाल चलता है तब दो योजन व एकसाठये अडतालीस भाग २६ जितना क्षेत्र एक रात्रि दिन में उलंघकर चाल चलता है. उस समय एकसठिये दो भाग कम अठारह मुहूर्त की रात्रि व दो भाग अधिक बाहर मुहूर्तका दिन होता है. वहां से प्रवेश करता हुवा सूर्य दूसरी अहोरात्रि में बाहिर से नीमो मांदल पर।
प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखवसायजी ज्वालामसादजी
अर्थ
Jain Education International
For Personal & Private Use Only
www.jainelibrary.org